UP News: प्यार में खत्म हुई ‘सीमा’

UP News: नाबालिग सीमा अपने प्रेमी प्रभु के साथ भाग गई थी. पुलिस ने सीमा को बरामद कर के प्रभु को गिरफ्तार भी कर लिया. इस के बावजूद जब सीमा की हत्या हो गई तो पुलिस को संदेह उस के घर वालों पर ही हुआ. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के थाना विशारतगंज के मोहल्ला वार्ड नंबर 11 में भूरे खां अपने परिवार के साथ रहता था. भूरे के परिवार में पत्नी नसीम, 6 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में केवल सब से बड़ी सकीना का विवाह हुआ था, बाकी सभी अविवाहित थे.

इश्तियाक दिल्ली में किसी फैक्ट्री में नौकरी करता था. मुश्ताक भी कुछ दिनों तक दिल्ली में रहा था, लेकिन इधर वह घर पर ही रह रहा था. पूरा परिवार जरी का काम करता था, जिस से होने वाली कमाई से उन के घर का खर्च आसानी से चल रहा था. भूरे की 15 साल की बेटी सीमा किशोरावस्था की सीमा पार कर के जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी. जवानी की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, इस के बावजूद उसे फिल्मों का जबरदस्त शौक था. उस की सहेलियां भी उसी जैसी सोच की थीं. इसलिए उन में जब भी बातें होतीं, फिल्मों और उन में दिखाए जाने वाले प्रेमसंबंधों को ले कर होतीं.

यह उम्र का ही तकाजा था कि सीमा को उन बातों में खूब मजा आता था. उस के दिल में भी उमंगें थीं, उस के ख्यालों में भी अपने चाहने वाले की तस्वीर थी. लेकिन यह तस्वीर कुछ धुंधली सी थी. उस की आंखें ख्यालों की तस्वीर के चाहने वाले की तलाश किया करती थीं. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी वह धुंधली तस्वीर साफ हो रही थी और न वह कहीं नजर आ रहा था. उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले लड़के कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा नहीं था, जो उस के ख्यालों की तस्वीर में फिट बैठता.

2 साल पहले सीमा पिता भूरे के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के ही एक गांव रेवती गई. यह गांव उस के गांव से ज्यादा दूर नहीं था. लौटते समय वह रेवती रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी एक वेंडर युवक पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा. उस लड़के में सीमा ने न जाने क्या देखा कि उस का दिल एकदम से धड़क उठा. उस की निगाहें उस पर टिक कर रह गई. उस के दिल से आवाज आई, ‘सीमा यही है तेरा चाहने वाला.’

उस युवक का चेहरा आंखों के रास्ते दिल में पहुंचा तो उस के ख्यालों में बनी धुंधली तस्वीर, बिलकुल साफ हो गई. वह युवक जब तक उस की नजरों के सामने रहा, सीमा उसे एकटक निहारती रही. उसे अपनी ओर इस तरह निहारते देख वह युवक भी बारबार उसी को देखने लगा. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैर उठती. ट्रेन आई तो सीमा पिता के साथ ट्रेन में बैठ गई. पूरे रास्ते उस की आंखें के सामने उसी युवक का चेहरा घूमता रहा.

वह विशारतगंज रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर आई तो उस नवयुवक को एक अंडे की दुकान पर देखा. वह ग्राहकों को अंडे बेच रहा था. इस का मतलब वह दुकान उसी की थी. इस का मतलब युवक विशारतगंज का रहने वाला था. यह जान कर सीमा को काफी खुशी हुई. उस ने सोचा कि वह जब भी चाहेगी, उस युवक के बारे में पता कर के उस से मिल सकेगी. यह बात दिमाग में आते ही उसे काफी सुकून मिला. वह पिता के साथ घर आ गई.

सीमा ने जल्दी ही उस युवक के बारे में पता कर लिया. उस का नाम था प्रभु गोस्वामी. वह वार्ड नंबर 6 में रहता था. उस के पिता महेश की मौत हो चुकी थी. परिवार में मां और 2 छोटे भाई थे. घर प्रभु की ही कमाई से चल रहा था. रेलवे स्टेशन के पास वह अंडे की दुकान लगाता था, साथ ही स्टेशन और ट्रेन में पानी की बोतलें बेच लेता था. एक दिन सुबह प्रभु छत पर बैठा मौसम का आनंद ले रहा था, तभी अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. इतनी सुबह फोन करने वाला उस का कोई दोस्त ही होगा, यह सोच कर वह मोबाइल स्क्रीन पर नंबर देखे बगैर ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कोन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी लड़की की मधुर आवाज आई तो प्रभु चौंका. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं ने सोचा कि इतनी सुबहसुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसीलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं सीमा बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी. लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया है.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करेंगी तो गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘बात तो पुलिस वालों की ही तरह कर रहे हो. सवाल के साथ सलाह भी.’’ कह कर सीमा जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही कह दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘आप बुजुर्ग हैं?’’ सीमा ने फिर छेड़ा.

‘‘जी नहीं, अभी मैं नौजवान हूं.’’

‘‘तब तो किसी न किसी के खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी प्रभु की थी. वह जोर से हंसा फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ प्रभु ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल, सीमा ने किसी तरह प्रभु का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. सीमा के पास खुद का मोबाइल नहीं था. इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों ही एकदूसरे के लिए अपनापन महसूस करने लगे. इस के बाद उन के बीच अक्सर बातें होने लगीं. सीमा ने प्रभु को बता दिया था कि उस दिन उस ने अनजाने में नहीं, जानबूझ कर फोन किया था और वह भी उस का नंबर हासिल कर के. इतना ही नहीं, उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब प्रभु ने मुलाकात के बारे में पूछा तो सीमा ने रेवती रेलवे स्टेशन पर हुई मुलाकात के बारे में बता दिया. प्रभु यह जान कर खुश हआ, क्योंकि उस दिन सीमा का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर चुका था. इस के बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं. दिनोंदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता गया. सीमा दीवानगी की हद तक प्रभु को चाहने लगी थी. प्रभु इस बात को बखूबी जानता था, लेकिन उस के दिमाग में जातिधर्म की बात बैठी हुई थी, इसलिए उसे हमेशा सीमा को खो देने का डर सताता रहता था. प्रेम दीवानों के प्रेम की खुशबू जब जमाने तक पहुंचती है तो लोग उन दीवानों पर तमाम बंदिशें लगाने लगते हैं. यही सीमा के घर वालों ने भी किया.

सीमा का गैरधर्म के लड़के के साथ इश्क लड़ाना घर वालों को रास नहीं आया. उन्होंने सीमा पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी सीमा प्रभु से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी. इसी बीच एक मुलाकात में प्रभु को उदास देखा. सीमा ने कारण पूछा, ‘‘तुम्हारे दिल में ऐसी क्या बात है, जिस की वजह से तुम्हारे चेहरे पर उदासी छाई है?’’

‘‘कुछ नहीं, तुम्हें ऐसे ही लग रहा है.’’ प्रभु ने टालने की कोशिश की.

‘‘मुझे ऐसे ही नहीं लग रहा, कोई बात है जिस की वजह से तुम उदास हो. तुम्हें मेरी कसम, बताओ क्या बात है?’’

‘‘सीमा मुझे डर है कि मैं तुम्हें खो न दूं.’’

‘‘क्यों, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?’’

‘‘हम दोनों की जाति तो छोड़ो, धर्म भी अलगअलग है. ऐसे में घर समाज ही नहीं, घर वाले ही हमारी शादी के लिए नहीं राजी होंगे.’’

‘‘सच्चा प्यार ऊंचनीच और जातिधर्म का मोहताज नहीं होता. लोग कहते हैं न कि जोडि़यां ऊपर वाला बनाता है. इसलिए हम दोनों में प्यार हुआ है तो इस का मतलब है कि ऊपर वाले को हमारा प्यार मंजूर है. फिर इस में संदेह की कोई बात कहां है.’’

‘‘लेकिन तुम्हरे घर वाले तो हमें दूर करने के लिए जमीनआसमान एक किए हुए हैं.’’

‘‘चिंता मत करो, मैं अपने घर वालों को किसी न किसी तरह समझा लूंगी. अगर नहीं समझा पाई तो हमारे सामने और भी रास्ते हैं. देखो प्रभु, हमें दुनिया से जितना लड़ना पड़े, हम लड़ेंगे और जीतेंगे भी. कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

इतना कह कर सीमा प्रभु के सीने से लग गई. ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी सीमा ने हार नहीं मानी. उस की हिम्मत उस का प्यार था, जिसे वह हर हाल में अपने से जुदा नहीं कर सकती थी. फिर कुछ देर और बात कर के दोनों अपनेअपने घरों को लौट गए. सीमा ने अपने घर वालों से बात की, लेकिन वे राजी नहीं हुए, उल्टे उस की पिटाई कर दी. बंदिशों के बाद भी उन के चोरीछिपे मिलने की भनक सीमा के घरवालों को लग ही जाती थी. उसी बीच रामलीला मेले में प्रभु पर चाकू से जानलेवा हमला किया गया. लेकिन संयोग था कि प्रभु बच गया. पुलिस में शिकायत भी की गई, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.

इस घटना ने सीमा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर वे यहां रहें तो दोनें की जान को खतरा बना रहेगा. उन दोनों को अलग करने के लिए उस के घर वाले किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए उस ने एक फैसला लिया. 18 फरवरी को सीमा रेलवे स्टेशन पहुंची और प्रभु से भाग चलने की जिद करने लगी. प्रभु तैयार नहीं हुआ तो वह वहां खड़ी सद्भावना एक्सप्रेस के आगे लेट गई और जान देने की धमकी देने लगी. हार कर प्रभु को उस की बात माननी पड़ी. वह सीमा को वहां से अपने घर ले गया और छिपा दिया. रात में दोनों रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन से हिमाचल प्रदेश चले गए. प्रभु घर से 10 हजार रुपए ले कर गया था. वहां दोनों ने विवाह कर लिया और पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

इधर सीमा के घर वालों को प्रभु के साथ उस के भाग जाने की खबर लगी तो उन्होंने उस की खोजबीन शुरू कर दी. काफी खोजबीन के बाद भी जब उस का कुछ पता नहीं चला तो एक मार्च को सीमा के पिता भूरे ने विशारतगंज थाने में प्रभु और उस के चाचा रमेश पर तमंचे की नोक पर सीमा का अपहरण करने का आरोप लगाते हुए तहरीर दी. थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने प्रभु और रमेश के विरूद्ध भादंवि की धारा 363, 366, 452, 504 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने प्रभु के घरवालों और रिश्तेदारों पर दबाव बनाना शुरू किया तो प्रभु ने होली के एक दिन पहले 5 मार्च को एक भाजपा नेता के माध्यम से सीमा को पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उसे महिला थाना भेजने के बजाय बिना मैडिकल कराए ही परिजनों के हवाले कर दिया. 9 मार्च को उस के कोर्ट में बयान होने थे. इसी बीच 8 मार्च को देर रात पुलिस ने प्रभु को भी गिरफ्तार कर लिया.  9 मार्च की सुबह साढ़े 7 बजे भूरे विशारतगंज थाने पहुंचा कि किसी नकाबपोश ने सुबह 4 बजे सीमा की हत्या कर दी है. उस समय घर का मेनगेट खुला हुआ था. सीमा की मां नसीम टौयलेट गई थी, बाकी लोग सो रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी तो सभी उठ कर दौड़े. पास जा कर देखा तो सीमा के सिर से खून बह रहा था और उस का शरीर शिथिल पड़ चुका था. उस की मौत हो चुकी थी. उन्होंने एक नकाबपोश को वहां से भागते देखा था, वह कोई और नहीं प्रभु था.

उस का आरोप सुन कर थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने कहा कि प्रभु तो उन की हिरासत में है, वह कैसे खून कर सकता है? बहरहाल, शुजाउर रहीम पुलिस फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी और खुद सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. कुछ ही देर में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश श्रीवास्तव और सीओ (आंवला) धर्म सिंह मार्छाल भी घटनास्थल पर पहुंच गए. सीमा के सिर में काफी गहरा घाव था, जिस से अनुमान लगाया कि हत्यारे ने बहुत नजदीक से गोली चलाई थी. पुलिस अधिकारियों ने घर वालों से पूछताछ की तो सभी के बयान अलगअलग थे. शुरुआती जांच में और अब तक की पूछताछ में यह मामला औनर किलिंग का लग रहा था.

घटना के बाद से ही सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक घर से गायब था. पुलिस ने आसपड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि देर रात तक सीमा के घरवाले जागते रहे थे. सीमा से लड़ाईझगड़ा होने की बात भी सामने आई. देर रात तक उन के घर में अफरातफरी का माहौल बना रहा था. उस के बाद कुछ समय के लिए सब शांत हो गया. सुबह 4 बजे गोली चलने की आवाज आई और फिर उस के बाद रोनेपीटने की आवाजें आने लगीं. इस के बाद सीमा की हत्या किए जाने की बात सामने आई. सीमा की हत्या में सारे हालात किसी अपने की ओर इशारा कर रहे थे. वह अपना कोई और नहीं, उस का बड़ा भाई इश्तियाक हो सकता था. वही घर से गायब था और उस का मोबाइल भी बंद था.

पूछताछ के बाद सीमा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. इस के बाद पुलिस ने घर की तलाशी ली, लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा. आगे की जांच में पता चला कि घटना की रात सीमा का मामा गुड्डू भी आया था. गुड्डू बरेली के थाना सिरौल के गांव हरदासपुर में रहता था. पुलिस ने उस के घर छापा मारा तो वह घर में ही था. लेकिन पुलिस को देखते ही वह छत के रास्ते भागने में सफल हो गया.

14 मार्च को थानाप्रभारी शुजाउर रहीम, एसआई चमन सिंह, प्रताप सिंह और अतुल दुबे की टीम ने गुड्डू को बदायूं के कुंवरगांव से गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा भी बरामद हो गया. दरअसल, सीमा का मामा गुड्डू पंजाब में फेरी लगा कर कबाड़ी का काम करता था. उसे फोन से सीमा के गैर धर्म के लड़के के साथ भाग जाने की जानकारी मिली तो वह क्रोध से जल उठा. जब पुलिस ने सीमा को बरामद कर घर वालों के हवाले किया तो गुड्डू ने भूरे से सीमा को समझाने को कहा. लेकिन सीमा प्रभु के पास जाने की जिद पर अड़ी थी. गुड्डू ने भी उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद गुड्डू के सामने एक ही रास्ता बचा कि वह सीमा को खत्म कर दे.

8 मार्च की सुबह वह हावड़ा-अमृतसर एक्सपे्रस टे्रन से बरेली के आंवला स्टेशन पर उतरा. वहां से वह अपने गांव हरदासपुर गया और शाम को विशारतगंज आ गया. देर रात वह भूरे के घर पहुंचा. उस ने सीमा को अपनी जिद छोड़ने के लिए काफी समझाया, जिसे ले कर काफी देर तक बहस चलती रही. सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक भी मामा गुड्डू के सुर में सुर मिला रहा था. जब किसी तरह बात नहीं बनी तो सीमा के सो जाने पर गुड्डू ने इश्तियाक के साथ मिल कर सीमा के सिर से तमंचा सटा कर गोली मार दी. एक ही झटके में सीमा मौत की नींद सो गई. इस के बाद दोनों वहां से फरार हो गए. कुछ लोगों ने गुड्डू का पीछा भी किया, लेकिन वह किसी के हाथ नहीं आया.

शुजाउर रहीम ने गुड्डू और इश्तियाक के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर गुड्डू को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इश्तियाक फरार था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी. गुड्डू को जरा भी कानून का ज्ञान होता तो सीमा की जान बच सकती थी. सीमा नाबालिग थी. ऐसी स्थिति में अदालत उसे उस के घर वालों को ही सौंपती न कि प्रेमी प्रभु को. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: तांत्रिक की तीसरी शादी

Hindi Crime Story: समझदार होते ही सोनू की समझ में आ गया था कि यह दुनिया मूर्खों से अटी पड़ी है, बस मूर्ख बनाने का तरीका मालूम होना चाहिए. इस के बाद उस ने तंत्रमंत्र सीखा और अंधविश्वास में डूबे लोगों को मूर्ख बनाने लगा. उस की पोल तो तब खुली, जब वह तीसरी शादी के चक्कर में पड़ा.

निशा उन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान थी. उस की परेशानी का आलम यह था कि उसे खानेपीने तक की सुध नहीं रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पिछले 2-3 महीने से कुछ ऐसा उलटा चक्कर चल रहा था कि उस का अच्छाखासा चल रहा घर डूबते जहाज की तरह हिचकोले लेने लगा था. पहले मां बीमार हुई, उस के बाद छोटे भाई का हाथ टूट गया. उन दोनों को संभालने के चक्कर में उस की अपनी नौकरी चली गई. मां कुछ ठीक हुई तो उस ने दौड़भाग कर छोटामोटा काम ढूंढा, लेकिन मां एक बार फिर बीमार पड़ गई.

रोज कुआं खोद कर पानी पीने वालों के घर पैसा होता ही कहां है? निशा ने जो थोड़ाबहुत जमा कर रखा था, वह सब मां और भाई के इलाज पर खर्च हो गया. अब मां का इलाज कराने की कौन कहे, खाने के भी लाले पड़ गए. वह मां का इलाज कराए या खाने का इंतजाम करे. मकान मालिक का किराया भी वह 3 महीने से नहीं दे पाई थी. निशा परेशान थी कि ऐसे में कैसे क्या होगा? वह मां के इलाज और खानेपीने का जुगाड़ करने में जूझ ही रही थी कि एक अन्य खबर ने उसे झकझोर कर रख दिया. मकान मालिक ने उसे बुला कर कहा कि वह उस का पिछला सारा किराया अदा कर के मकान खाली कर दे.

निशा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकलजी, आप का किराया मैं धीरेधीरे अदा कर दूंगी. रही बात मकान खाली करने की तो इस हालत में हम कहां जाएंगे? अचानक मकान खाली करना हमारे लिए आसान नहीं है अंकलजी. पहले आप अपना पिछला किराया तो अदा हो जाने दीजिए. उस के बाद हम कोई इंतजाम कर के आप का मकान खाली करेंगे. आप हमें थोड़ी मोहल्लत दीजिए.’’

‘‘भई, मोहल्लत देने का सवाल ही नहीं उठता. तुम लोगों का हर महीने का यही तमाशा है. वैसे भी अगले महीने मेरे घर बेटी की शादी है. नातेरिश्तेदार आएंगे तो उन के उठनेबैठने के लिए जगह तो चाहिए. जब अपने पास जगह है तो बाहर इंतजाम करने की क्या जरूरत है. इसलिए तुम मेरा मकान खाली कर दो.’’ मकान मालिक ने साफसाफ कह दिया. निशा के लिए मकान खाली करना इतना आसान नहीं था. क्योंकि मकान का बकाया किराया, राशन और दूध वाले को मिला कर लगभग 15 हजार रुपए होते थे. अगर वह मकान खाली करती तो नए मकान का एडवांस किराया, सामान वगैरह की ढुलाई आदि को ले कर इतने ही रुपए और चाहिए थे.

इतनी बड़ी रकम का इंतजाम वह कहां से कर सकती थी? जबकि उस के पास उस समय 20 रुपए भी नहीं थे. अपनी यह परेशानी निशा ने अपनी सहेली सुधा से बताई तो सहेली की परेशानी सुन कर वह भी सोच में पड़ गई. अगर उस के पास पैसे होते तो इस हालत में वह अवश्य ही सहेली की मदद कर देती. अचानक उसे जैसे कुछ याद आया हो तो वह बोली, ‘‘निशा, मुझे लगता है तुझे सोनू तांत्रिक से मिलना चाहिए. वह तेरी समस्या का कोई न कोई समाधान जरूर कर देगा.’’

‘‘यह सोनू तांत्रिक कौन है और वह हमारी समस्या का समाधान कैसे कर सकता है?’’

‘‘यह तो वहां चलने पर ही पता चलेगा. लेकिन जहां तक मुझे उस के बारे में जानकारी मिली है, वह हर छोटीबड़ी समस्या का समाधान चुटकी बजा कर कर देता है. बस तू तैयार हो जा, कौन हमें दूर जाना है. यहीं न्यू कंपनी बाग की गली नंबर 3 में उस की कोठी है.’’

‘‘लेकिन सुधा, मैं तंत्रमंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. मुझे अपने कर्म पर भरोसा है. आज नहीं तो कल हालात बदल ही जाएंगे.’’ निशा ने कहा.

निशा तांत्रिक सोनू के पास जाना नहीं चाहती थी, लेकिन सुधा की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. निशा सुधा के साथ जिस समय तांत्रिक सोनू की कोठी पर पहुंची, वह कमरे में पूजा कर रहा था, इसलिए उन्हें बाहर बैठ कर पूजा खत्म होने का इंतजार करना पड़ा. पूजा खत्म होते ही सोनू ने दोनों को अपने कमरे में बुलाया. तांत्रिक को देख कर निशा हैरान रह गई, क्योंकि वह तांत्रिक जैसा लग ही नहीं रहा था. सोनू तांत्रिक 32-35 साल का राजकुमार जैसा युवक था. आसमानी रंग के सफारी सूट में वह किसी प्रतिष्ठित परिवार का लड़का लग रहा था. निशा के मन में तांत्रिक की जो छवि थी, वह उस के एकदम विपरीत था. उस ने तो सोचा था कि काले से कू्रर चेहरे पर बड़ीबड़ी दाढ़ीमूंछें और गले में ढेरों रुद्राक्ष की मालाएं पहने कोई आदमी बैठा होगा. लेकिन यहां तो मामला एकदम उलटा था.

बहरहाल, तांत्रिक सोनू को प्रणाम कर के दोनों बैठ गईं. सुधा ने निशा का परिचय करा कर उस की समस्या बतानी चाही तो तांत्रिक सोनू ने अपना दायां हाथ उठा कर उसे रोकते हुए कहा, ‘‘देवी, अगर आप ही सब कुछ बता देंगी तो मेरी साधना किस काम आएगी? मुझे पता नहीं है क्या कि आजकल देवी किन हालात से गुजर रही हैं? मां की दवा के लिए भी अभी तक इंतजाम नहीं कर पाई हैं. रात के खाने की भी व्यवस्था करनी है. लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है. आप मेरे यहां आ गई हैं, अब आप की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगीं.’’

सोनू द्वारा अपने घर की स्थिति बताने से जहां निशा शरम से पानीपानी हो गई थी, वहीं वह उस की इस बात से काफी प्रभावित भी हुई. क्योंकि बिना कुछ बताए ही उस ने उस के बारे में सब कुछ जान लिया था. इस तरह पहली ही मुलाकात में वह उस की अंधभक्त बन गई. सोनू ने अंगुलियों पर कुछ गणना कर के कहा, ‘‘मैं नाम तो नहीं बताऊंगा, लेकिन तुम्हारे किसी अपने बहुत खास ने ही तुम्हारे परिवार पर ऐसा इल्म चलवाया है कि तुम दानेदाने को मोहताज हो जाओ. आज रात को मैं उस इल्म को कील दूंगा और फिर किसी दिन श्मशान पूजा कर के उस डाकिनी को भस्म कर दूंगा.’’

निशा मंत्रमुग्ध भाव से सोनू को देखती रही. उस ने होंठों ही होंठों में कुछ मंत्र पढ़े और निशा पर फूंक मारे. इस के बाद सुधा को बाहर भेज कर अपनी गद्दी के नीचे से 5 सौ रुपए का एक नोट निकाल कर निशा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो मांजी के लिए दवाओं और आज के खानेपीने की व्यवस्था कर लेना. कल की कल देखी जाएगी.’’

‘‘नहीं, मैं आप के रुपए कैसे ले सकती हूं.’’

‘‘यह मेरा नहीं, मां का आदेश है. मां काली ने मुझे अभीअभी आदेश दिया है कि मैं तुरंत तुम्हारी मदद करूं. मैं मां का सेवक हूं, इसलिए मुझे उन की आज्ञा का पालन करना ही होगा. तुम नि:संकोच ये रुपए रख लो.’’ इस तरह मां के नाम पर सोनू ने निशा को 5 सौ रुपए का नोट लेने पर मजबूर कर दिया.

निशा रुपए ले कर घर आ गई. वह यह सोचसोच परेशान थी कि उस के घर की एकएक बात की जानकारी तांत्रिक सोनू को कैसे हो गई? मकान मालिक ने मकान खाली करने के लिए कहा था, यह बात भी उसे मालूम थी. अगले दिन स्वयं सोनू तांत्रिक निशा के घर आ पहुंचा. वह मां की दवाएं और कुछ सामान भी साथ लाया था. स्वयं को संस्कारी दिखाने के लिए आते ही उस ने निशा की मां के पांव छुए. न चाहते हुए भी निशा को सोनू तांत्रिक की मदद लेनी पड़ी. क्योंकि इस के अलावा उस के पास कोई उपाय भी नहीं था. इस के बाद सोनू निशा और उस के घर वालों की हर तरह से मदद करने लगा.

तंत्रमंत्र और पूजापाठ के नाम पर वह निशा को अपनी कोठी पर बुलाता. थोड़ी देर पूजापाठ कर के निशा से इधरउधर की बातें करने लगता. इस बातचीत में वह उस के घरपरिवार के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हमदर्दी दिखाने की कोशिश करता. निशा के मकान खाली करने की बात आई तो सोनू तांत्रिक ने मकान मालिक का बकाया अदा कर के निशा को रहने के लिए गली नंबर शून्य वाला अपना मकान दे दिया. सोनू से मिलने के बाद निशा और उस के घर वालों की मुसीबतें लगभग खत्म हो गईं. इस तरह उन की सभी समस्याओं का समाधान हो गया.

धीरेधीरे सोनू तांत्रिक ने निशा और उस के घर के हर सदस्य पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. घर में था ही कौन, मांबेटी और एक लड़का. निशा के उस घर में अब वही होता था, जो सोनू चाहता था. निशा के घर वालों को भी सोनू का उन के घर में दखल देना अच्छा लगता था. इस में वे अपनी शान भी समझते थे, क्योंकि सोनू तांत्रिक से उन के संबंध थे. सोनू तांत्रिक धनी तो था ही, इलाके में उस का काफी दबदबा भी था. तांत्रिक होने की वजह से लोग उस की इज्जत तो करते ही थे, डरते भी थे. लोग उस के आशीर्वाद के लिए उस के घर के चक्कर लगाते थे.

यही वजह थी कि निशा और उस के घर वाले सोनू तांत्रिक की कृपा पा कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. बड़ी होशियारी से सोनू तांत्रिक ने निशा के दिल में अपनी जगह बना ली थी. इस के बाद एक रात उस ने डाकिनी पूजा के नाम पर निशा को अपने घर बुलाया. निशा सोनू की कोठी पर जा पहुंची. थोड़ी देर बाद उस ने पूजा शुरू की. पूजा खत्म होने के बाद उस ने कहा कि उस ने उस डाकिनी को भस्म कर दिया है, जो उस के घर वालों को तकलीफ पहुंचाती थी. अब चिंता की कोई बात नहीं है. तथाकथित डाकिनी के खत्म हो जाने की बात पर निशा बहुत खुश हुई. पूजा खत्म होने के बाद सोनू ने निशा का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा,

‘‘निशा, आज मैं तुम से अपने मन की एक ऐसी बात कहने जा रहा हूं, जिस का जवाब तुम्हें काफी सोचसमझ कर देना होगा.’’

हैरानी से निशा ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन सी बात है महाराज? खैर, कोई भी बात हो, आप मुझे बताएं क्या, आदेश करें.’’

‘‘निशा, ऐसे मामलों में जोरजबरदस्ती या आदेश नहीं दिया जाता. यह सब प्रेम की भावना के अंतर्गत होता है. प्रेम में वह ताकत होती है, जो 1-2 क्या, हजारों डाकिनीशाकिनी के मुंह मोड़ सकती है. बहरहाल तुम इतना जान लो कि मैं तुम से प्रेम करता हूं और तुम से विवाह करना चाहता हूं.’’ सोनू ने निशा को फंसाने के लिए जाल फेंका.

सोनू की बात सुन कर निशा सन्न रह गई. उस के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, ‘‘महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं. कहां आप और कहां मैं? आप में और मुझ में जमीन आसमान का अंतर है.’’

तंत्रमंत्र की दुकान चलाने वाले सोनू ने निशा को अपनी बाहों में ले कर कहा, ‘‘जब मेरा और तुम्हारा मिलन हो जाएगा तो सारे अंतर स्वयं ही खत्म हो जाएंगे. यह मिलन सभी भेदभाव खत्म कर देगा.’’

सम्मोहित सी निशा सोनू तांत्रिक की बातें सुनती रही. इतने बड़े तांत्रिक ने उसे इस योग्य समझा, यह जान कर वह खुद को बड़ी भाग्यशाली समझ रही थी. निशा की कमर में हाथ डाल कर सोनू उसे बैडरूम में ले गया, जहां उस ने वह सब पा लिया, जिस के लिए उस ने इतने बड़े चक्रव्यूह की रचना की थी. दरअसल, सोनू तांत्रिक न हो कर एक ऐसा धूर्त था, जो लोगों की अंधी आस्था की बदौलत उन का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण करता था. लोगों को बेवकूफ बना कर वह दोनों हाथों से धन बटोर रहा था. इस के पीछे उस का कोई दोष नहीं था, लोग खुद ही उस के पास अपना शोषण कराने आते थे. अपनी खूनपसीने की कमाई उसे अय्याशी के लिए सौंप रहे थे. समस्या समाधान के नाम पर अपनी बहनबेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करा रहे थे.

दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, मंगल ग्रह पर पहुंच जाए या किसी नए ब्रह्मांड की खोज कर ले, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों के मन में जो अंधविश्वास बैठा है, उसे निकालना आसान नहीं है. जब तक दुनिया में अंधविश्वास है, तब तक सोनू जैसे तथाकथित ढोंगी आम लोगों की बहूबेटियों की इज्जत से खेलते रहेंगे और तंत्रमंत्र का भय दिखा कर लूटते रहेंगे.’

सोनू तांत्रिक यानी सोनू शर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला जींद के रहने वाले चंद्रभान शर्मा का मंझला बेटा था. चंद्रभान धार्मिक प्रवृत्ति के शरीफ इंसान थे. वह कर्म को पूजा मानते थे. लेकिन उन के बेटे सोनू शर्मा की नीति उन के एकदम विपरीत थी. सोनू शुरू से ही अतिमहत्त्वाकांक्षी और आपराधिक प्रवृत्ति का युवक था. जल्दी ही उस की समझ में आ गया था कि दुनिया मूर्ख है. बस उसे मूर्ख बनाने वाला होना चाहिए. जो मजा लोगों को बेवकूफ बना कर कमाने में है, वह हाड़तोड़ मेहनत करने में नहीं है. उसे पता चल ही गया था कि अंधी आस्था को ले कर लोग अपना सर्वस्व तक लुटाने को तैयार रहते हैं.

और मजे की बात यह कि लुटने के बाद किसी को बताते भी नहीं. यह एक ऐसा कारोबार था, जिस में कुछ खास लगाना भी नहीं था, जबकि कमाई इतनी मोटी थी कि इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इस के अलावा लोग उसे पूजते भी भगवान की तरह हैं. यही सब देखसुन कर सोनू को इस कारोबार से अच्छा और कोई दूसरा कारोबार नहीं लगा. इस के बाद कुछ तंत्रमंत्र और टोटके सीख कर वह तांत्रिक बन गया. हरियाणा के कई शहरों में तंत्रमंत्र की छोटीमोटी ठगी करते हुए वह हिमाचल के जिला कांगड़ा जा पहुंचा. वहां उस का यह ठगी का धंधा तो चल ही निकला, वहीं उस की मुलाकात सोनिया से हुई.

सोनिया राजेश शर्मा की बेटी थी. उन का अच्छाखासा कारोबार था, लेकिन किन्हीं वजहों से उन के कारोबार में घाटा होने लगा तो उन की आर्थिक स्थिति कुछ खराब हो गई. सोनिया अपनी ऐसी ही किसी समस्या के समाधान के लिए सोनू तांत्रिक के पास गई तो पहली ही मुलाकात में वह सोनू की नजरों में ऐसी चढ़ी कि वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को तैयार हो गया. लेकिन राजेश शर्मा का परिवार एक संस्कारी परिवार था. वही संस्कार सोनिया में भी थे. इसलिए सोनू ने सोनिया को जो सब्जबाग दिखाए, उन का सोनिया पर कोई असर नहीं हुआ. तब उसे पाने के लिए सोनू ने उस से शादी का फैसला कर लिया और इस के बाद सोनिया के मातापिता की सहमति से दिसंबर, 2003 में उस ने सोनिया के साथ विवाह कर लिया.

समय के साथ दोनों 2 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 8 साल का आदित्य और 6 साल की एलियन है. इस बीच सोनू हिमाचल के अलावा पंजाब के भी कई शहरों में अपने पांव जमाने की कोशिश करता रहा. कई शहरों के चक्कर लगाने के बाद उसे लुधियाना कुछ इस तरह पसंद आया कि वहां टिब्बा रोड पर उस ने तंत्रमंत्र की अपनी स्थाई दुकान खोल ली. यह सन् 2010 की बात है. लुधियाना का टिब्बा रोड इलाका हिंदूमुस्लिम और अमीरगरीब सभी तरह के लोगों से भरा है. जल्दी यहां सोनू का प्रभाव इस तरह बढ़ा कि लोग उस की पूजा करने लगे. यहां से कमाई दौलत से उस ने 2 मकान और एक आलीशान कोठी अपने लिए बनवा डाली.

यहां आने के बाद वह धीरेधीरे कांगड़ा में रह रही अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को लगभग भूल सा गया. अब वह कईकई महीनों बाद उन से मिलने कांगड़ा जाता था. लुधियाना में रहते हुए सोनू ने अपने लिए नई लड़की की तलाश शुरू कर दी, क्योंकि सोनिया अब उसे पुरानी लगने लगी थी. उसी बीच किसी शादी समारोह में उस की नजर स्टेज पर थिरकती निशा पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. निशा एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में डांस करती थी. निशा की एक ही झलक में सोनू उस का दीवाना बन गया था और हर कीमत पर उसे पा लेना चाहता था. सोनू तांत्रिक की एक आदत यह भी थी कि जो चीज उसे पसंद आ जाती थी, उसे वह हर हाल में पा लेना चाहता था.

पसंद आने के बाद उस ने निशा को हासिल करने के प्रयास शुरू किए तो सब से पहले उस ने उस के और उस के घर वालों के बारे में पता किया. सोनू को पता चला कि निशा के पिता प्रेमशाही ठाकुर की कई सालों पहले उस समय मृत्यु हो गई थी, जब बच्चे छोटेछोटे थे. निशा की मां ने मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया था. युवा होने पर निशा ने छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार का खर्च चलाने की कोशिश की. वह खूबसूरत थी, उस की अदाएं इतनी कातिल थीं कि कोई भी उसे देख कर पागल हो सकता था. इसीलिए जब आर्केस्ट्रा ग्रुप ने उसे अपने डांस ग्रुप में शामिल होने को कहा तो वह उस में मिलने वाली मोटी रकम के लालच में उस में शामिल होने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई थी.

अपनी खूबसूरती, मेहनत और अच्छे डांस की वजह से वह जल्दी ही प्रसिद्ध हो गई. आर्केस्ट्रा में डांस कर के निशा की इतनी कमाई हो जाती थी कि पूरा परिवार मजे से रह रहा था. सोनू को जब पता चला कि निशा ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा है तो सब से पहले उस ने अपने प्रभाव से निशा को उस आर्केस्ट्रा से निकलवा दिया, जिस में वह डांस करती थी. काम छूटा तो निशा के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. अचानक राह चलते निशा के भाई को किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी, जिस से उस का एक हाथ टूट गया. मां पहले से ही बीमार रहती थी.

इस तरह निशा चारों ओर से टूट गई तो सोनू के इशारे पर ही मकान मालिक ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. इस के बाद अचानक सोनू तांत्रिक ने हीरो की भांति उस के जीवन में एंट्री मारी और अपने तंत्रमंत्र का नाटक कर के निशा और उस के घर की समस्याओं का समाधान कर दिया. इस से वह उन की नजरों में भगवान बन बैठा. बहरहाल, सोनू ने जैसा चाहा था, ठीक वैसा ही हुआ था. लगभग हर रात निशा सोनू के पहलू में होती थी. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि सोनू उस से शादी करेगा. लेकिन यह उस की गलतफहमी थी. उस का यह भ्रम 13 मार्च, 2015 को बैसाखी वाले दिन तब टूटा, जब उसे पता चला कि सोनू किसी खूबसूरत लड़की के साथ चंडीगढ़ रोड स्थित मोहिनी रिसौर्ट में शादी कर रहा है.

यह जानकारी मिलने के बाद निशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. इस का सीधा मतलब यह था कि शादी का झांसा दे कर सोनू तांत्रिक ने 2 सालों तक उस की इज्जत से खेला था और अब मन भर जाने के बाद दूसरी लड़की से शादी कर रहा था. यह बात भला निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी. वह सीधे मोहिनी रिसौर्ट पहुंची, ताकि सोनू तांत्रिक की शादी रुकवा सके. लेकिन सोनू के गुर्गों ने उसे अंदर जाने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया. सोनू और गीता चड्ढा का विवाह आराम से हो गया. जबकि अपने भाग्य पर आंसू बहाते हुए निशा घर लौट आई. वह घर तो लौट आई, लेकिन उसे चैन नहीं मिल रहा था. चैन मिलता भी कैसे, सोनू ने उस के साथ जो बेवफाई की थी, उसे वह भुला नहीं पा रही थी.

अगले दिन शाम को निशा को पता चला कि सोनू तांत्रिक अपनी नईनवेली दुलहन गीता के साथ गली नंबर 3 वाली कोठी में मौजूद है तो एक बार फिर हिम्मत कर के निशा उस से बात करने के लिए उस की कोठी पर जा पहुंची. इस बार सोनू से उस का सामना हो गया. उस ने हंगामा खड़ा करते हुए सोनू से पूछा, ‘‘तुम शादी का वादा कर के 2 सालों तक मेरे शरीर से खेलते रहे. जबकि अब शादी किसी और से कर ली. तुम ने यह ठीक नहीं किया. मैं ऐसा कतई नहीं होने दूंगी.’’

‘‘अब तो जो होना था, वह हो गया. मुझे जिस से शादी करनी थी, कर ली. अब तुम कर ही क्या सकती हो? मैं ने तुम से शादी का जो वादा किया था, वह वादा ही रहा. अगर मैं वादा करने वाली हर लड़की से शादी करने लगूं तो पता चला कि मैं हर साल शादी कर रहा हूं.’’ इस के बाद निशा को घूरते हुए बोला, ‘‘अच्छा यही होगा कि तुम चुपचाप यहां से चली जाओ. फिर कभी दिखाई भी मत देना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

सोनू से अपमानित हो कर निशा घर तो आ गई, लेकिन उस के साथ जो छल हुआ था वह उसे पचा नहीं पा रही थी. काफी देर तक वह रोती रही. और जब मन का गुबार निकल गया तो उस ने तय किया कि वह सोनू जैसे ढोंगी और धोखेबाज को अवश्य सबक सिखाएगी. अगर उस ने उसे सबक न सिखाया तो वह उस जैसी न जाने कितनी लड़कियों की इसी तरह जिंदगी बरबाद करता रहेगा. दृढ़ निश्चय कर के निशा थाना बस्ती जोधेवाल पहुंची और थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह से मिल कर उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

हरपाल सिंह ने निशा की पूरी बात सुनने के बाद टिब्बा रोड पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई हरभजन सिंह को आदेश दिया कि वह निशा के बयान के आधार पर सोनू तांत्रिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के तुरंत काररवाई करें. इस के बाद एएसआई हरभजन सिंह ने निशा के बयान के आधार पर 16 मार्च, 2015 को सोनू तांत्रिक के खिलाफ शादी का झांसा दे कर यौन शोषण करने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर के पूछताछ के लिए उसे पुलिस चौकी बुलवाया. लेकिन सफाई देने के लिए चौकी आने के बजाय सोनू गायब हो गया.

तब हरभजन सिंह ने हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह जीता, कांस्टेबल लखविंदर सिंह, दविंदर सिंह और जसबीर सिंह की एक टीम बना कर सोनू की तलाश के लिए उस के पीछे लगा दिया. सोनू की तलाश चल ही रही थी कि अखबारों में छपी खबर पढ़ कर कांगड़ा में रह रही उस की पहली पत्नी सोनिया शर्मा भी लुधियाना आ पहुंची. उस ने पुलिस चौकी जा कर बयान ही नहीं दर्ज कराया, बल्कि सोनू से अपनी शादी और 2 बच्चे होने के प्रमाण भी दिए. सोनिया के बयान के आधार पर उस की ओर से भी सोनू के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया. फिर उसी दिन शाम को हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह की टीम ने जालंधर बाईपास से सोनू तांत्रिक को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह बस से शहर छोड़ कर भागने के चक्कर में वहां पहुंचा था.

चौकी ला कर सोनू से पूछताछ की गई तो उस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया. उसे अदालत में पेश कर के साक्ष्य जुटाने के लिए एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 18 मार्च, 2015 को उसे पुन: मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 20 मार्च, 2015 को निशा का मैडिकल कराया गया. मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह सहवास की आदी पाई गई. मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में धारा 164 के तहत उस के बयान भी दर्ज किए गए.

निशा ने यहां भी वही बयान दिए, जो उस ने आपबीती में बताया था. उस का कहना था कि ऐसे ढोंगी अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. ऐसे लोग लोगों की धार्मिक व कोमल भावनाओं को भड़का कर उन का शारीरिक और आर्थिक शोषण करते हैं. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है, कथा में कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं.

Haridwar Crime Story: विद्रोही बीवी का दंश

Haridwar Crime Story: नफीस और गुफराना आपसी मतभेदों के चलते अलगअलग रहने लगे थे. जब गुफराना को पता चला कि नफीस दूसरी शादी के चक्कर में है तो उस की करोड़ों की जायदाद के चक्कर में उस ने गुनाह की ऐसी भूमिका बनाई कि पुलिस भी चकरा गई. 26 अप्रैल, 2015 को सुबह के 11 बज रहे थे. जिला हरिद्वार के रुड़की शहर की सिविल लाइंस कोतवाली के एसएसआई आर.के. सकलानी कोतवाली में ही थे. पिछले कुछ दिनों से एटीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ और ठगी की शिकायतें मिल रही थीं. इसलिए आर.के. सकलानी क्षेत्र की एटीएम मशीनों की सुरक्षा व्यस्था की चैकिंग करने की सोच रहे थे. तभी उन के मोबाइल की घंटी बजने लगी. सकलानी ने काल रिसीव की तो पता चला कि दूसरी ओर शहर के विधायक प्रदीप बत्रा हैं.

बातचीत हुई तो प्रदीप बत्रा ने सकलानी को बताया कि कोतवाली क्षेत्र स्थित मोहल्ला ग्रीनपार्क का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस 9 अप्रैल से गायब है. उन्होंने यह भी बताया कि नफीस के घर वाले गांव बिझौली में रहते हैं और उसे सभी परिचितों और रिश्तेदारों के यहां ढूंढ़ चुके हैं. आर.के. सकलानी ने बत्रा साहब से कहा कि वह नफीस के घर वालों को उस के फोटो के साथ कोतवाली भेज दें. वह नफीस को ढूंढ़ने में उन की पूरी मदद करेंगे. थोड़ी देर बाद नफीस का भाई नसीर अपने 2 रिश्तेदारों के साथ कोतवाली सिविल लाइंस पहुंच गया. उसे चूंकि विधायकजी ने भेजा था, इसलिए सकलानी ने नफीस के लापता होने के मामले में पूरी दिलचस्पी लेते हुए नसीर से जरूरी बातें पूछीं.

उस ने बताया कि 9 अप्रैल को नफीस मोटरसाइकिल से अपने भतीजे साकिब के पास गया था. साकिब मदरसा जामिया तुलउलूम का छात्र था. शाम को उस ने साकिब को बाइक की चाबी दे कर कहा था कि वह थोड़ी देर में आ रहा है. लेकिन वह आज तक वापस नहीं लौटा. नसीर ने यह भी बताया कि उस के पास मोबाइल था, जो उसी दिन से बंद है.

‘‘नफीस की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ सकलानी के पूछने पर नसीर ने बताया कि नफीस सीधासादा इंसान था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. एसएसआई सकलानी ने नसीर से नफीस का फोटो ले कर उस की गुमशुदगी का मामला दर्ज करा दिया. उस का पता लगाने की जिम्मेदारी एसआई अजय कुमार को सौंपी गई. अजय कुमार ने भी नसीर से उस के भाई नफीस के बारे में विस्तृत पूछताछ की. चूंकि नफीस को गायब हुए 10 दिन हो चुके थे, इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर लग रहा था. अजय कुमार ने नफीस के कई रिश्तेदारों से पूछताछ भी की और उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कई दिनों की भागदौड़ के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला.

एक दिन सकलानी की एक वीआईपी ड्यूटी के बारे में पड़ोस की कोतवाली भगवानपुर के कोतवाल योगेंद्र सिंह भदौरिया से बात हुई तो बातोंबातों में भदौरिया ने बताया कि 20 दिनों पहले उन के इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति की लाश मिली थी, जिस की शिनाख्त अभी तक नहीं हुई है. भदौरिया ने यह भी बताया कि मृतक क्रीम कलर की चैकदार शर्ट और मटमैले रंग की पैंट पहने था और उस का शरीर और चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. यह सुन कर सकलानी ने सोचा कि कहीं वह लाश नफीस की ही न रही हो. यह बात दिमाग में आते ही उन्होंने एसआई अजय कुमार और मृतक के भाई नसीर को कोतवाली भगवानपुर भेजा.

चूंकि लाश काफी दिनों पहले मिली थी, इसलिए पुलिस ने 3 दिनों तक लाश की शिनाख्त का इंतजार करने के बाद उसे दफन करा दिया था. अलबत्ता लाश के कपड़े कोतवाली के मालखाने में ही रखे थे. पुलिस ने जब उन कपड़ों को नसीर को दिखाया तो वह उन्हें देखते ही रोने लगा. वे कपड़े नफीस के ही थे. भगवानपुर पुलिस ने बताया कि नफीस की लाश 9 से 10 अप्रैल, 2015 की रात को देहरादून रोड स्थित पुहाना गांव के तिराहे के पास मिली थी. लाश का चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. इसीलिए उस की शिनाख्त नहीं हो सकी थी.

भगवानपुर कोतवाली के इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि वे इस मामले को दुर्घटना समझ रहे थे. फिर भी उन्होंने मृतक की शिनाख्त कराने का पूरा प्रयास किया था. मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उस की मृत्यु का कारण सिर की चोटों की वजह से अत्यधिक रक्तस्राव होना बताया गया था. शिनाख्त की काररवाई के बाद अजय कुमार रुड़की लौट आए. शाम को उन्होंने इस मामले में वरिष्ठ उपनिरीक्षक आर.के. सकलानी, कोतवाल बी.डी. उनियाल व एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा से विचारविमर्श किया. लंबी बातचीत से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि यह मामला एक्सीडेंट का नहीं, बल्कि कत्ल का था.

एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा ने जांच अधिकारी अजय कुमार को निर्देश दिया कि वह मृतक नफीस की काल डिटेल्स देख कर उन लोगों से पूछताछ करें, जिन्होंने घटना वाले दिन उसे फोन किया था. साथ ही उस की पारिवारिक स्थिति की गोपनीय जानकारी भी जुटाएं. एसआई अजय कुमार ने नफीस की पारिवारिक जानकारी जुटाई तो पता चला कि थाना मंगलौर के अंतर्गत आने वाले गांव बिझौली का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस खेतीबाड़ी करता था. 18 वर्ष पूर्व नफीस का निकाह पुरकाजी, मुजफ्फरनगर की गुफराना उर्फ सुक्खी से हुआ था. दोनों के 2 बच्चे थे अजमल और एहतराम. नफीस के पास बिझौली में खेती की जमीन भी थी और मकान भी.

इस के अलावा रुड़की शहर में भी उस का एक मकान था. उस की कुल संपत्ति करीब ढाई करोड़ की थी. यह भी पता चला कि नफीस अय्याश किस्म का इंसान था. इसी वजह से 3 साल पहले उस की गुफराना से अनबन हो गई थी. वह दोनों बच्चों के साथ अपने मायके पुरकाजी में ही रह रही थी. यह सारी बातें एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को पता चलीं तो उन्होंने इस मामले की जांच में एसओजी टीम को भी शामिल कर दिया. एसओजी टीम ने जब नफीस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स खंगालीं तो पता चला कि नफीस के लापता होने से पूर्व उस की एक नंबर पर बात हुई थी. उस नंबर पर एसओजी को कुछ संदेह हुआ. क्योंकि उस नंबर पर बात होने के बाद नफीस का मोबाइल स्विच औफ हो गया था.

एसओजी टीम के प्रभारी मोहम्मद यासीन ने जब उस नंबर की जांच की तो पता चला कि वह नंबर मोहल्ला झोझियान, पुरकाजी निवासी इकराम के नाम से था. पुलिस ने जब इकराम के बारे में सुरागरसी की तो मालूम हुआ कि वह कहने को तो ट्रक ड्राइवरी करता था, लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति का था. 2 साल पहले वह एक मोटर- साइकिल लूट के मामले में थाना छपार, मुजफ्फरनगर में गिरफ्तार हो कर जेल भी गया था. फिलहाल वह घर से फरार है. इस के बाद सकलानी, अजय कुमार और एसओजी टीम ने इकराम की गिरफ्तारी के लिए मेरठ, गाजियाबाद व हापुड़ में उस के ठिकानों पर दबिश देनी शुरू कर दी.

आखिरकार 2 मई, 2015 को पुलिस ने इकराम को उस वक्त पुरकाजी से ही गिरफ्तार कर लिया, जब वह चोरीछिपे अपने घर वालों से मिलने आ रहा था. गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसे रुड़की ले आई. कोतवाली में पुलिस ने जब उस से नफीस की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि नफीस की हत्या की गई थी और वह हत्या की वारदात में शामिल था. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या में उस की खुद की बीवी भूरी, महबूब और शमीम भी शामिल थे. जबकि हत्या की सुपारी नफीस की पत्नी गुफराना उर्फ सुक्खी ने दी थी. इकराम से पूछताछ के बाद इस मामले की हकीकत कुछ इस तरह सामने आई.

18 वर्ष पूर्व जब गुफराना और नफीस का निकाह हुआ था, इकराम काफी छोटा था. पुरकाजी में वह इन लोगों का पड़ोसी था. पड़ोसी होने के नाते इकराम गुफराना को फूफो कहता था. उस का एक भाई और 4 बहनें थीं. पैसे की कमी की वजह से उस की बहनों की शादियां नहीं हुई थीं. इकराम बाइक लूट के अपने मुकदमे की पैरवी के लिए मुजफ्फरनगर कोर्ट जाता रहता था. भूरी नाम की एक तलाकशुदा महिला भी अपने पति से चल रहे तलाक के मुकदमें की वजह से वहां आतीजाती थी. वहीं पर दोनों की मुलाकात हुई. धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ने लगीं तो इकराम भूरी की मदद करने लगा.

बाद में इकराम ने भूरी से निकाह कर लिया और मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. एक बार इकराम पुरकाजी आया तो एक दिन फूफी गुफराना उसे मिल गई. दोनों की पुरानी जानपहचान थी, इसलिए खूब बातें हुईं. बातोंबातों में गुफराना ने उसे बताया कि उस का शौहर नफीस किसी औरत से दूसरा निकाह करने वाला है, इसलिए उस ने बच्चों सहित उसे घर से निकाल दिया है. गुफराना ने इकराम से यह भी कहा कि अगर किसी तरह वह नफीस को ठिकाने लगा दे तो वह उसे 8 लाख रुपए देगी. कुछ दिनों तक इकराम ने गुफराना की इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब एक दिन उस ने बड़ी गंभीरता से कहा कि 8 लाख की रकम कम नहीं होती तो वह नफीस की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर नफीस की हत्या की योजना बना ली.

इस के बाद गुफराना ने इकराम को एडवांस के तौर पर 80 हजार रुपए भी दे दिए. गुफराना ने नफीस का मोबाइल नंबर भी इकराम को दे दिया. योजना के अनुसार, इकराम ने 19 मार्च, 2015 को रुड़की की रामपुर चुंगी के निकट भूरी के रहने के लिए किराए के एक कमरे का इंतजाम कर दिया. आगे की योजना के तहत एक दिन भूरी ने नफीस के मोबाइल पर मिसकाल की. इस के जवाब में नफीस ने लौट कर फोन किया और भूरी से लंबी बात की. इस के बाद भूरी और नफीस एकदूसरे को अकसर फोन करने लगे. कुछ ही दिनों में भूरी ने नफीस को अपने प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद नफीस अकसर उस से मिलने उस के कमरे पर जाने लगा.

नफीस को सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस खूबसूरत औरत के प्रेमजाल में फंस कर वह पैसा उड़ा रहा है, वह उस की मौत का तानाबाना बुन चुकी है. बहरहाल षडयंत्र से अनभिज्ञ नफीस भूरी के भ्रमजाल में फंसा रहा. योजना के तहत 9 अप्रैल, 2015 को इकराम ने देहरादून जाने के लिए 2500 रुपए में पुरकाजी निवासी सुनील की टैक्सी बुक की और शाम को अपने दोस्तों शमीम और जावेद के साथ रामपुर चुंगी स्थित भूरी के कमरे पर आ गया. टैक्सी ड्राइवर अर्जुन उन के साथ था. योजना के अनुसार, गुफराना का भाई महबूब भी उस वक्त भूरी के कमरे पर मौजूद था. शाम 7 बज कर 30 मिनट पर भूरी ने फोन कर के नफीस को अपने कमरे पर बुलवा लिया.

जब नफीस कमरे पर आया तो महबूब और जावेद बाहर खड़ी कार में बैठ गए. भूरी ने नफीस से कमरे पर मौजूद शमीम का परिचय अपने रिश्तेदार के रूप में कराया. इस के बाद वह दूध गरम करने लगी. उधर थोड़ी देर बैठे रहने के बाद इकराम ने टैक्सी चालक अर्जुन से कहा कि अभी बच्चों को तैयार होने में देर लगेगी, तब तक तुम जावेद के साथ जा कर अपनी शाम रंगीन कर लो. टैक्सी की चाबी मुझे दे दो, मैं इस में तेल डलवा देता हूं. इस के बाद टैक्सी चालक अर्जुन जावेद के साथ शराब के ठेके पर पहुंच गया, जहां उस ने खूब शराब पी. जावेद उसे पीने के लिए उकसा रहा था. दूसरी ओर भूरी ने नफीस की नजर बचा कर गर्म दूध में नशे की 4 गोलियां डाल दी थी. नफीस भूरी पर अंधविश्वास करता था. उस ने दूध पी लिया.

नशीला दूध पीने के बाद नफीस को नींद आने लगी तो वह वहीं सो गया. तभी शमीम और इकराम कमरे में आए. आते ही उन्होंने नफीस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद वे उस की लाश को टैक्सी की पिछली सीट पर डाल कर गांव सालियर होते हुए पुहाना जहाजगढ़ मार्ग पर ले आए. एक सुनसान जगह देख कर इन लोगों ने नफीस की लाश को सड़क के किनारे फेंक दिया. नफीस की लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए इकराम ने कई बार टैक्सी आगेपीछे कर के उस का मृत शरीर और चेहरा कुचल दिया, ताकि यह दुर्घटना का मामला लगे. इस के बाद तीनों वापस भूरी के कमरे पर आ गए.

ड्राइवर अर्जुन और जावेद नशे में धुत हो कर रात 12 बजे वापस लौटे. रात को सब वहीं सो गए. सुबह इकराम ने अर्जुन को उलाहना दिया कि तुम्हारे ज्यादा पीने की वजह से हम देहरादून नहीं जा सके. इकराम को यकीन था कि अर्जुन कुछ भी नहीं समझ पाया होगा. अगले दिन सुबह 7 बजे शमीम व जावेद बाइक से मुजफ्फरनगर चले गए तथा इकराम व भूरी टैक्सी से पुरकाजी लौट आए. नफीस की जेब से निकाला पैसों से भरा पर्स इकराम ने भूरी को सौंप दिया था.

नफीस की हत्या का खुलासा होने के बाद एसआई अजय कुमार ने नफीस की गुमशुदगी का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 328, 34 व 120 बी में परिवर्तित कर दिया. इस के बाद एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन तथा उन की टीम के सदस्यों, अशोक, जाकिर, आशुतोष तिवारी, कपिल, शेखर, राहुल, अमित, पूरण, हेमंत, अंशु चौधरी और रश्मि गुज्यांल ने पुरकाजी व मुजफ्फरनगर में दबिशें दे कर गुफराना व भूरी को भी गिरफ्तार कर लिया और रुड़की ले आए. भूरी व गुफराना ने अपने बयानों में इकराम के बयानों का ही समर्थन किया. गुफराना ने बताया कि वह इकराम को अपने शौहर नफीस की हत्या की सुपारी के 80 हजार रुपए दे चुकी है तथा शेष रकम अपना आम का बाग बेच कर देती.

इस के बाद पुलिस ने भूरी की निशानदेही पर मृतक नफीस का पर्स उस के मुजफ्फरनगर स्थित मकान से बरामद कर लिया. उस की निशानदेही पर आर.के. सकलानी ने हत्या में इस्तेमाल इंडिका टैक्सी पुरकाजी से बरामद कर ली. 3 मई, 2015 को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इकराम, भूरी और गुफराना उर्फ सुक्खी को मीडिया के सामने पेश कर के नफीस हत्याकांड का खुलासा किया. तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी की भनक पा कर अभियुक्त जावेद, शमीम व महबूब फरार हो गए थे. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत थी. Haridwar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana News: दोस्त के घर गई युवती की मिट्टी के ढेर में मिली लाश

Haryana News: एक ऐसी चौंकाने वाली वारदात सामने आई है, जिस ने पूरे गुरुग्राम को झकझोर कर रख दिया है. यह युवती अपनी फ्रेंड को फोन कर कहती है कि ‘2 घंटे में लौटती हूं.’ फिर इस युवती के साथ ऐसा क्या हुआ कि वह मिट्टी के ढेर में दफन पाई गई. आखिर क्या था इस हत्या का पूरा राज. चलिए जानते हैं इस क्राइम की स्टोरी को विस्तार से जो आप को इस घटना से अवगत कराएगी और होने वाले अपराध से भी सचेत करेगी.

यह दर्दनाक घटना हरियाणा के गुरुग्राम से सामने आई है. यहां एक हिंदू प्रेमी संजय ने असम की रहने वाली मुसलिम प्रेमिका जाबेदा खान का कत्ल कर दिया. जाबेदा खान ने फोन कर दोस्त को सूचित किया था कि वह 2 घंटे में वापस आ रही है. वह अपने प्रेमी संजय से मिलने गई हुई थी. फिर दोनों के बीच विवाद हुआ तो संजय ने जाबेदा की गला दबा कर हत्या कर दी. इस के बाद उस ने उस की लाश को मिट्टी में दबा दिया.

11 दिन बाद मिली सूचना ने पुलिस को भी हैरान कर दिया. इस के बाद आरोपी संजय को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. उस ने पुलिस को बताया कि वह पहले जाबेदा को सुशांत लोक में अपने कमरे में ले कर गया था. वहां जा कर दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए फिर दोनों के बीच किसी बात को ले कर विवाद हो गया. जब जाबेदा घर जाने लगी तो संजय उसे सुनसान जगह ले गया और वहां उस का गला दबा कर मार डाला तथा शव को मिट्टी में दबाकर फरार हो गया.

इस के बाद उस का फोन बंद था और 11 दिनों तक उस का कोई सुराग नहीं मिला. 10 दिसंबर, 2025 को पुलिस को जाबेदा की लाश मिली. इस के बाद पुलिस ने 24 घंटे के अंदर आरोपी संजय को अरेस्ट कर लिया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पुलिस के अनुसार, जाबेदा के फ्रेंड ने पहली दिसंबर को गुरुग्राम के सेक्टर 17/18 थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. उस ने बताया था कि 27 नवंबर को उस की फ्रेंड जाबेदा खान ने कहा था कि वह 2 घंटे में वापस आएगी. लेकिन बाद में उस का फोन बंद हो गया. इस शिकायत के बाद ही पुलिस से काररवाई शुरू की थी.

अब पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. वह एसी रिपेयर का काम करता है. संजय अपने ताऊ के साथ सुशांत लोक, गुरुग्राम में रहता था. पुलिस उस से घटना के बारे में विस्तार से पूछताछ कर रही है. Haryana News

Agra Crime: बहन को बीवी बनाने की जिद

Agra Crime: प्रदीप और शिवानी भले ही एकदूसरे को प्यार करते थे, लेकिन उन के रिश्ते ऐसे थे कि शादी नहीं हो सकती थी. शिवानी ने तो घर वालों के दबाव में पैर पीछे खींच लिए, लेकिन प्रदीप जिद पर अड़ गया. नतीजा क्या निकला…

आगरा की ऐतिहासिक इमारतों में ताज के बाद सिकंदरा स्थित अकबर के मकबरे का नाम आता है. इस शानदार और गौरवमयी इमारत का निर्माण बादशाह अकबर ने करवाया था. हर साल देशविदेश के हजारों पर्यटक इस इमारत को देखने आते हैं. इसी ऐतिहासिक इमारत में 6 अप्रैल, 2015 को एक अनहोनी हो गई. किसी पर्यटक ने वहां एक लड़की की खून सनी लाश देखी तो उस ने शोर मचा दिया, जिस से उधर घूम रहे पर्यटक वहां इकट्ठा हो गए. लड़की की लाश देख कर लोग हैरान थे कि पता नहीं किस ने इस की हत्या कर दी. सूचना पा कर वहां मौजूद सिक्योरिटी गार्ड भी पहुंच गए. उन्होंने इस की सूचना थाना सिकंदरा पुलिस को फोन कर के दे दी.

सिकंदरा के गेट से थाना करीब 2 सौ मीटर की दूरी पर था. इसलिए खबर मिलते ही थानाप्रभारी ज्ञानेंद्र सिरोही थोड़ी ही देर में पुलिस टीम के साथ उस जगह पहुंच गए, जहां लड़की की लाश पड़ी थी. उन्होंने लाश का निरीक्षण शुरू किया. मरने वाली लड़की की उम्र 19-20 साल थी. हत्यारे ने किसी धारदार हथियार से उस की गरदन के अलावा पेट पर भी वार किए थे. लाश खून में तरबतर थी. लाश के पास ही एक मोबाइल फोन और एक चाकू पड़ा था. इन पर भी खून लगा था. थानाप्रभारी ने अनुमान लगाया कि हत्यारे ने इसी चाकू से इसे मौत के घाट उतारा है.

थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी. कोई पर्यटक घटना को अपने कैमरे में कैद न कर ले, इसलिए पुलिस ने बिना फोरेंसिक सुबूत जुटाए ही फटाफट लाश को सील कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. थोड़ी देर बाद ही एसएसपी राजेश डी. मोदक के साथ खोजी कुत्ते और फोरेंसिक टीम भी मौके पर आ गई. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट को भी बुलाया गया. सभी टीमों द्वारा काम निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया. मृतका के पास से कोई ऐसी चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो सकती. इसलिए पुलिस के लिए पहला काम मृतका की शिनाख्त कराना था. लाश के पास जो मोबाइल फोन मिला था, पुलिस ने उस की मैमोरी में सेव फोन नंबरों पर बात करनी शुरू कर दी.

उसी क्रम में एक नंबर मृतका के किसी रिश्तेदार का मिल गया. उस रिश्तेदार से बात करने पर पता चला कि वह फोन नंबर शिवानी नाम की लड़की का है. उस रिश्तेदार से पुलिस को जानकारी मिली कि शिवानी जगदीशपुरा थानाक्षेत्र की आवास विकास कालोनी के सैक्टर-7 में रहने वाले अन्नू नागर की बेटी है.

शाम साढ़े 5 बजे के करीब पुलिस अन्नू नागर के घर पहुंची. घर में अन्नू की पत्नी रेखा मिली. पुलिस को देख कर वह परेशान हो गई. पुलिस ने उस से पूछा, ‘‘आप शिवानी को जानती हैं?’’

‘‘जी, शिवानी मेरी बेटी है. मगर आप उस के बारे में क्यों पूछ रहे हैं?’’ रेखा परेशान हो कर बोली.

‘‘वह सब भी बता देंगे, लेकिन पहले यह बताओ कि शिवानी कहां है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘सर, वह तो अपना फोन रिचार्ज कराने घर से निकली थी, लेकिन अभी तक लौटी नहीं. मैं उसी का इंतजार कर रही हूं. उस का फोन भी नहीं लग रहा है.’’

‘‘आप का कोई और रिश्तेदार रहता है?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मेरे जेठजी रहते हैं, वह डीएम औफिस में नौकरी करते हैं.’’ रेखा ने कहा.

पुलिस रेखा को ले कर मुन्नालाल के घर गई. रेखा घबरा रही थी कि पता नहीं क्या बात है, जो पुलिस उसे कुछ बता नहीं रही है. मुन्नालाल उसी समय ड्यूटी से लौटा था. अपनी भाई की पत्नी के साथ पुलिस को देख कर वह भी चौंका. पुलिस ने मुन्नालाल से बात कर के सिकंदरा में मिली लाश का फोटो दिखाया. मुन्नालाल ने उस फोटो को देख कर कहा, ‘‘अरे, यह तो मेरी भतीजी शिवानी है. इसे किस ने मार दिया?’’

‘‘अभी कुछ नहीं पता, सिकंदरा में इस की लाश मिली है. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है.’’ पुलिस ने बताया.

बेटी की हत्या की बात सुन कर रेखा दहाड़े मार कर रोने लगी. रेखा का पति अन्नू नागर एक प्रकाशन कंपनी में सुरक्षागार्ड की नौकरी करता था. मुन्नालाल ने उसे फोन कर के घर बुला लिया. इस के बाद पुलिस दोनों भाइयों को साथ ले कर थाने आ गई. थाने में लाश के पास से बरामद फोन जब दोनों भाइयों को दिखाया गया तो उन्होंने बताया कि वह मोबाइल शिवानी का ही है. इन बातों से साफ हो गया कि सिकंदरा में पुलिस ने जो लाश बरामद की थी, वह अन्नू नागर की बेटी शिवानी की थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने हत्यारों तक पहुंचने के लिए जांच की शुरुआत शिवानी के घर से ही शुरू की. थानाप्रभारी ने अन्नू नागर से पूछा, ‘‘शिवानी का हत्यारा कौन हो सकता है, मेरा मतलब क्या तुम्हें किसी पर कोई शक है?’’

‘‘सर, मुझे तो एक ही आदमी पर शक है, और वह है मेरे साढ़ू का लड़का प्रदीप. यह काम उसी का हो सकता है.’’ अन्नू नागर ने अपनी शंका प्रकट की.

‘‘वह क्यों?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘सर, वह शादी के लिए मेरी बेटी के पीछे हाथ धो कर पड़ा था.’’ अन्नू ने कहा.

इतना सुनते ही थानाप्रभारी को यह मामला प्रेमप्रसंग का लगा. अन्नू से प्रदीप का पता मालूम करने के बाद वह अगले दिन जिला एटा के गांव निघौली कला स्थित प्रदीप के घर जा पहुंचे. प्रदीप के घर के बाहरी दरवाजे पर कुंडी लगी थी. पड़ोसियों की मौजूदगी में कुंडी खोल कर पुलिस घर में घुसी तो अंदर कोई नहीं मिला. घर की लाइट जल रही थी और सारा सामान पैक था. ऐसा लग रहा था, जैसे घर के लोग सामान सहित कहीं भागने की तैयारी में थे. लेकिन उन्हें पुलिस के आने की भनक लग गई, जिस से वे घर छोड़ कर भाग गए. लोगों ने बताया कि प्रदीप 6 अप्रैल, 2015 की सुबह 7 बजे अपने 2 दोस्तों के साथ बाइक से घर से निकला था. उस के बाद किसी ने उसे नहीं देखा.

प्रदीप का पूरा परिवार भी गायब था, जिस से पुलिस का शक पुख्ता हो गया कि वारदात प्रदीप ने ही की है. काफी देर तक जब कोई वहां नहीं आया तो एक कांस्टेबल को वहां छोड़ कर थानाप्रभारी लौट आए. अब तक शिवानी के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स पुलिस को मिल चुकी थी. उस पर जो आखिरी काल आई थी, जांच में पता चला, वह काल प्रदीप के फोन से की गई थी. सर्विलांस टीम ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. अगले दिन उक्त नंबर की लोकेशन दिल्ली में मिली. थानाप्रभारी ने एक पुलिस टीम दिल्ली रवाना कर दी. दिल्ली पहुंचने पर पता चला कि उस की लोकेशन जलेसर में है. पुलिस टीम जलेसर पहुंची. इस के बाद उस फोन की लोकेशन आगरा की हो गई.

जैसेजैसे उस फोन की लोकेशन बदल रही थी, सर्विलांस टीम उस की जानकारी पुलिस टीम को दे रही थी. जब पुलिस टीम को पता चला कि उस फोन की लोकेशन आगरा में है तो पुलिस टीम उस का पीछा करते हुए आगरा पहुंच गई. आखिर 9 अप्रैल, 2015 को कारगिल पैट्रोल पंप के पास से पुलिस ने प्रदीप को हिरासत में ले लिया. पुलिस के शिकंजे में आते ही प्रदीप हक्काबक्का रह गया. थाने ला कर प्रदीप से पूछताछ शुरू हुई. शुरू में उस ने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की सख्ती के सामने उस की एक नहीं चली. उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया और कहा कि उसी ने शिवानी की हत्या की थी.

शिवानी प्रदीप की मौसेरी बहन थी. अपनी मौसेरी बहन की हत्या की उस ने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला एटा का एक गांव है निघौली कला. रामनिवास इसी गांव के रहने वाले थे. वह पेशे से हलवाई थे. उन के परिवार में पत्नी सरोज के अलावा 6 बच्चे थे. उन में से 2 बेटियों और एक बेटे की वह शादी कर चुके हैं. अपनी बेटी सुमन और बेटे कुलदीप की शादी उन्होंने इसी साल फरवरी में 6 दिन के अंतराल पर की थी. दोनों ही शादियों में अन्नू नागर भी पत्नी रेखा और बेटी शिवानी के साथ आए थे. प्रदीप इन्हीं रामनिवास का बेटा है. शादी में आई अपनी सगी मौसेरी बहन शिवानी प्रदीप को भा गई. शिवानी की नजरों का जादू प्रदीप पर कुछ इस तरह चला कि वह उस के आगेपीछे घूमने लगा. प्रदीप अपनी कोशिशों से शिवानी को आकर्षित कर रहा था.

उसे मौके की तलाश थी. आखिर उसे वह मौका मिल गया. शिवानी किसी काम से छत पर गई तो प्रदीप भी उस के पीछेपीछे वहां पहुंच गया. वहां शिवानी को अकेली देख कर वह खुद को रोक नहीं सका. उस ने कहा, ‘‘शिवानी आज तुम कितनी सुंदर लग रही हो. तुम्हारे सामने सब फीके हैं.’’

शिवानी ने शरमा कर कहा, ‘‘भैया, तुम मजाक बहुत अच्छा कर लेते हो.’’

प्रदीप पास आ कर बोला, ‘‘देखो शिवानी, मेरी तुम्हारी उम्र में ज्यादा फर्क नहीं है, इसलिए तुम मुझे भैया कहने के बजाय नाम से बुलाया करो.’’

‘‘अगर तुम कह रहे हो तो मैं नाम से ही बुलाऊंगी. तुम भी कभी आगरा आना. वहां बहुत सी देखने लायक जगहें हैं.’’

‘‘तुम कह रही हो, इसलिए जरूर आऊंगा. हां, एक बात कहना चाहता हूं कि यह ड्रेस तुम पर बहुत अच्छी लग रही है.’’

प्रदीप की बात सुन कर शिवानी हंसने लगी.

6 दिनों में शिवानी और प्रदीप की कई बार लंबीलंबी बातें हुईं. प्रदीप के मन में अजीब से भाव उमड़ रहे थे, जबकि शिवानी के लिए वह सिर्फ मौसेरा भाई था. शादी के बाद सारे मेहमान जाने लगे थे. प्रदीप के मन में अजीब सी हलचल थी, क्योंकि वह अभी तक अपने दिल की बात शिवानी से कह नहीं पाया था. शिवानी के जाने से पहले वह उस से मन की बात कह देना चाहता था. मौके के इंतजार में वह शिवानी के इर्दगिर्द मंडराने लगा. जैसे ही उसे मौका मिला, वह शिवानी का हाथ पकड़ कर एकांत में ले गया. इस से पहले कि शिवानी कुछ समझ पाती, उस ने कहा, ‘‘शिवानी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं और अब मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम तो यहां से चली जाओगी, लेकिन तुम्हारे बिना मेरा दिल नहीं लगेगा.’’

प्रदीप की बात शिवानी को कुछ अजीब सी लगी, क्योंकि प्रदीप उस का मौसेरा भाई था. वह उसे कोई जवाब दिए बगैर वहां से चली गई. अगले दिन शिवानी अपने मांबाप के साथ आगरा आ गई. आगरा आने के बाद शिवानी की मनोस्थिति कुछ अजीब सी थी. शिवानी के जाने के बाद वास्तव में प्रदीप बेचैन हो गया. वह जबतब शिवानी को फोन कर के मीठीमीठी बातों से उसे लुभाने की कोशिश करने लगा. शिवानी भी उम्र की उस दहलीज पर खड़ी थी, जहां भावनाओं और उमंगों का सैलाब दूर तक बहा कर ले जाने की कोशिश करता रहता है अर्थात शिवानी का झुकाव भी प्रदीप की तरफ होने लगा. उसे प्रदीप अच्छा लगने लगा.

एक दिन प्रदीप ने शिवानी को फोन किया कि वह आगरा आ रहा है. उस के आने की बात पर शिवानी खुश हो गई. उस का मन भी प्रदीप से मिलने के लिए उमड़ने लगा. प्रदीप आगरा पहुंचा तो शिवानी घर में बिना बताए तय जगह पर प्रदीप से मिलने पहुंच गई. वहां से प्रदीप शिवानी को ताजमहल ले गया. वहीं पर शिवानी ने प्रदीप की मोहब्बत कबूल कर ली. शिवानी और प्रदीप भले ही रिश्ते में भाईबहन थे, लेकिन उन की सोच नए जमाने की थी. इसलिए प्यार के नशे में वे अपने बहनभाई के रिश्ते को भूल गए. प्रदीप ने तय किया कि वह शिवानी से ही शादी करेगा. लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि वह अपने घर वालों से मन की बात कहे कैसे कि वह मौसेरी बहन शिवानी के साथ शादी कर के अपनी दुनिया बसाना चाहता है.

हालांकि वह जानता था कि दिल की बात जुबां तक आते ही परिवार और समाज में तूफान आ जाएगा. पर वह अपने उस दिल का क्या करता, जो केवल शिवानी के लिए ही धड़क रहा था. अपनी दुनिया बसाने की गरज से वह दिल्ली जा कर शादीब्याह में हलवाईगिरी का काम करने लगा. बीचबीच में वह शिवानी से मिलने आगरा आता रहता था. एक दिन जब वह आगरा आया तो उस ने शिवानी से कहा, ‘‘शिवानी, मैं चाहता हूं कि हमारा यह प्यार एक नए रिश्ते में बदल जाए. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं, इसलिए तुम अपनी मम्मीपापा से बात कर लो. तुम उन की अकेली संतान हो, इसलिए वे तुम्हारी बात मान भी लेंगे.’’

‘‘तुम यह क्या कह रहे हो प्रदीप. बेशक तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो, पर मेरे मांबाप इस रिश्ते के लिए हरगिज तैयार नहीं होंगे.’’

‘वह सब बाद में देखेंगे. अभी तो हमें यह देखना है कि उन की क्या राय है? मैं फिलहाल दिल्ली जा रहा हूं. तुम फोन कर के बताना कि वे क्या कह रहे हैं?’

‘‘ठीक है, मैं कोशिश कर के देखती हूं.’’ शिवानी ने जवाब दिया.

प्रदीप तो चला गया, लेकिन शिवानी को कशमकश में डाल गया. उस के मन में यही बात घूम रही थी कि शादी की बात मां से कैसे कहे. फिर हिम्मत कर के उस ने एक दिन अपनी मां से कहा, ‘‘मम्मी, प्रदीप मुझ से शादी करना चाहता है.’’

बेटी की बात सुन कर रेखा की आंखें फटी की फटी रह गईं. वह हैरान हो कर बोली, ‘‘यह क्या कह रही है? वह तेरा भाई है और भाईबहन के बीच शादी कभी नहीं हो सकती.’’

मां के सख्त तेवर देख कर शिवानी सहम गई. दूसरी ओर रेखा चिंता में पड़ गई. उस ने कहा, ‘‘आज के बाद तू प्रदीप से कभी भी नहीं मिलेगी.’’

मां का गुस्सा देख कर शिवानी कोई जवाब नहीं दे सकी. फोन कर के उस ने प्रदीप से कह दिया कि मम्मीपापा इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे.

‘‘देखो शिवानी, कोई माने या न माने, शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगा और जल्दी ही यह बात मैं अपने घर में बता दूंगा. उस के बाद मेरी मम्मी तुम्हारी मम्मी को मना लेंगी.’’ प्रदीप ने कहा. जब रेखा ने बेटी की बात पति अन्नू को बताई तो अन्नू ने शिवानी को डांटने के बजाय प्यार से समझाया कि बेटा समाज ऐसे रिश्तों को कभी कबूल नहीं करता, इसलिए बेहतर यही होगा कि तुम उस का फोन रिसीव ही मत करो. पिता की बात को शिवानी समझ रही थी. वह कशमकश में फंस गई कि अब क्या करे. एक ओर उस के मांबाप थे तो दूसरी ओर उस का प्यार प्रदीप. आखिर उस ने तय किया कि मांबाप की इज्जत को ध्यान में रख कर वह प्रदीप से न तो मिलेगी और न ही उस का फोन रिसीव करेगी.

दूसरी ओर एक दिन हिम्मत कर के प्रदीप ने अपने मांबाप से कह दिया कि वह शिवानी से शादी करना चाहता है. उस की बात सुन कर पिता रामनिवास हक्केबक्के रह गए. उन्होंने उसे डांटते हुए कहा, ‘‘तेरा दिमाग तो खराब नहीं हो गया है? तू जानता है कि वह तेरी बहन लगती है. उस से तेरी शादी हरगिज नहीं हो सकती.’’

लेकिन प्रदीप के सिर पर तो मोहब्बत का जादू चढ़ कर बोल रहा था. उस पर पिता के समझाने का कोई असर नहीं हुआ. अपने प्यार की खातिर उस ने अपने घर वालों से बगावत कर ली. उस ने कह दिया कि वह हर हालत में शिवानी से शादी करेगा. अपने मांबाप से बगावत करने की बात शिवानी से बता कर प्रदीप ने शिवानी को फोन किया. लेकिन शिवानी ने उस का फोन रिसीव नहीं किया. कई बार फोन करने के बाद भी जब शिवानी ने फोन रिसीव नहीं किया तो वह परेशान हो गया. उस के बारबार फोन करने की बात शिवानी ने अपनी मां रेखा को बता दी.

रेखा ने एक दिन परिवार वालों को बुला कर पंचायत की. सब ने प्रदीप को फटकारा और कहा कि उस की जिद गलत है. बहन के साथ कभी शादी नहीं हो सकती. प्रदीप को लगा कि वह अकेला पड़ता जा रहा है. उस का बागी मन यह सोच कर परेशान था कि उस की खुशी में समाज का क्या लेनादेना. सभी ने बहुत समझाया, पर उस ने अपना फैसला नहीं बदला. प्यार जब हद से गुजर जाता है तो जुनून बन जाता है. उस ने रात में ही शिवानी को फोन किया. इस बार शिवानी ने उस की काल रिसीव कर के साफ कह दिया कि वह घर वालों की मरजी के बिना कुछ नहीं कर सकती. इसलिए वह उस से शादी करने की बात भूल जाए.

‘‘शिवानी, मना तो मेरे घर वाले भी कर रहे हैं, लेकिन मैं ने उन की बात ठुकरा दी. मैं तुम्हारे लिए उन्हें भी छोड़ने को तैयार हूं. अब तुम अपने कदम पीछे मत खींचो.’’

‘‘प्रदीप, मैं एक लड़की हूं, इसलिए मैं घर वालों के खिलाफ नहीं जा सकती.’’ यह कह कर उस ने फोन काट दिया.

उसी बीच अन्नू को पता चल गया कि शिवानी और प्रदीप के बीच फोन पर बातें हुई हैं तो उस ने शिवानी के मोबाइल का सिम तोड़ दिया. अब प्रदीप का शिवानी से संपर्क पूरी तरह से टूट गया. वह बहुत आहत था. उस की हालत जख्मी शेर सी हो गई. एक दिन उस ने शिवानी के पिता अन्नू को फोन पर धमकाया कि अगर उस ने शिवानी की शादी मेरे अलावा किसी और से कर दी तो वह शिवानी को मार डालेगा. अन्नू प्रदीप की हरकतों से परेशान था. उस ने तय किया कि वह जल्दी ही बेटी की शादी कर के प्रदीप से अपना पीछा छुड़ा लेगा. पिता को परेशान देख कर शिवानी ने उन से वादा किया, ‘‘पापा, आप परेशान न हों. अब मैं प्रदीप से कभी बात नहीं करूंगी.’’

बेटी पर विश्वास करते हुए अन्नू ने उसे नया सिम कार्ड ला कर दे दिया. प्रदीप को पता नहीं कहां से शिवानी का नया नंबर मिल गया तो वह फिर उसे फोन करने लगा. शिवानी ने उस से साफ कह दिया कि उस के पापा उस के लिए रिश्ता देख रहे हैं. वह उस से न शादी कर सकती और न ही कोई संबंध रखना चाहती है. शिवानी के रिश्ते की बात सुन कर प्रदीप एक तरह से पागल हो उठा. उस का किसी काम में मन नहीं लग रहा था. वह गुस्से में उबलने लगा. इस के बाद उस ने कई बार कोशिश की कि वह शिवानी से मिल कर अपने दिल का हाल बताए, लेकिन शिवानी उस से मिलना नहीं चाहती थी. प्रदीप समझ गया कि शिवानी उसे दगा दे गई. उस ने तय किया कि वह शिवानी को किसी और की नहीं होने देगा. अगर वह नहीं मानी तो वह उसे छोड़ेगा नहीं.

प्रदीप के दिमाग पर शैतान बैठ गया. खून उस के सिर पर सवार हो गया. उस ने 5 अप्रैल को एक तेज धार वाला चाकू खरीद कर रख लिया. इस के बाद उस ने शिवानी को फोन कर के कहा, ‘‘शिवानी चलो मैं ही तुम्हारी बात मान कर अपना रास्ता बदल लेता हूं, पर एक बार तुम मुझ से जरूर मिल लो. बस आखिरी बार हमारे प्यार की खातिर.’’

शिवानी मौत की दस्तक से अनभिज्ञ थी. इसलिए उस ने कहा, ‘‘ठीक है, जब तुम इतनी जिद कर रहे हो तो मिल लूंगी.’’

प्रदीप ने उसे मिलने के लिए सिकंदरा बुलाया. शिवानी मां से मोबाइल रिचार्ज कराने की बात कह कर अपने घर से निकली. वह सीधे सिकंदरा पहुंची, जहां प्रदीप उस का इंतजार कर रहा था. शिवानी प्रदीप को देख कर मुसकराई, मगर प्रदीप ने नजर फेर ली. शिवानी ने पूछा, ‘‘कहो, क्या कहना है?’’

‘‘क्या सारी बातें यहीं कर लोगी, अंदर चलते हैं.’’

‘‘प्रदीप मुझे जल्दी घर जाना होगा.’’ शिवानी बोली.

‘‘ठीक है, चली जाना.’’ प्रदीप ने लापरवाही से कहा, ‘‘कुछ देर बैठ कर बातें कर लेते हैं.’’

इस के बाद सिकंदरा के अंदर जाने के लिए उस ने 10-10 रुपए के टिकट खरीदे. टिकट लेने के बाद उस ने इधरउधर देखा. गेट के पास पार्क बिलकुल सुनसान था. वह शिवानी को ले कर उधर आ गया और एक पेड़ की आड़ में बैठ गया. वहां से मेन गेट करीब सौ मीटर दूर था. शिवानी सामान्य थी, पर प्रदीप के शैतानी दिमाग में कुछ और ही चल रहा था.

प्रदीप ने कहा, ‘‘शिवानी अब बताओ कि शादी के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है?’’

‘‘प्रदीप, मैं पहले ही कह चुकी हूं कि मम्मीपापा नहीं मान रहे हैं. फिर जरा सोचो, रिश्तेदार और मोहल्ले वाले क्या कहेंगे.’’

शिवानी के इतना कहते ही प्रदीप ने इधरउधर देखा. कोई दिखाई नहीं दिया तो उस ने जेब से चाकू निकाला और शिवानी का मुंह दबा कर चाकू का एक वार उस की गरदन पर कर दिया. मुंह बंद होने से शिवानी चीख भी नहीं पाई. उस की आंखें फटी की फटी रह गईं. प्रदीप ने 5-6 वार उस के पेट में किए. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. उस ने चाकू वहीं फेंका और तेजी से मेन गेट से बाहर निकल गया. इस के बाद एक पर्यटक की नजर शिवानी की लाश पर पड़ी तो उस ने वहां घूमने वाले अन्य लोगों को वह लाश दिखाई. इस के बाद वहां तैनात सुरक्षा गार्डों को लड़की की लाश पार्क में पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे घटनास्थल पर पहुंचे और पुलिस को सूचना दी.

प्रदीप से पूछताछ कर के पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. रिश्तों की मर्यादा को न समझने वाले युवक ने अपने जुनून में अपनी ही रिश्ते की बहन की जिंदगी छीन ली, पर उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. Agra Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Crime Story Hindi: जहरीली दोस्ती का दांव

Crime Story Hindi: शफीक ने प्रेमिका को पाने के लिए जो दांव खेला, वह सचमुच चौंकाने वाला था. लेकिन इस के लिए उस ने जिस दोस्त फहद को दांव पर लगाया था, उसी की हत्या की वजह से उस की कलई खुल गई. उन दिनों मेरी पोस्टिंग थाना मरीद में थी जो लाहौर और गुजरांवाला के बीच में था. उस दिन सुबह जब मैं थाने पहुंचा तो पता चला कि एक जोड़ा हवालात में बंद है. मैं एसआई हारुन से उस के बारे में पूछा. उसे उस ने बताया कि यह जोड़ा रात 2 बजे घर के बाहर चबूतरे पर बैठा गलत हरकतें कर रहा था.

मैं ने पूछा, ‘‘ये लोग हैं कौन?’’

‘‘सर, ये दोनों कस्बा रत्तावली के रहने वाले हैं, 2 दिन पहले यहां आए हैं और नेमत बीबी नाम की एक बेवा के घर किराए पर रह रहे हैं.’’ एसआई हारुन ने बताया. कस्बा रत्तावाली मरीद से करीब 10 किलोमीटर के फासले पर था. मैं ने दोनों को अपने औफिस में बुलवा कर पूछताछ की तो 25-26 साल के उस युवक ने अपना नाम फहद और लड़की ने नरगिस बताया. उन्हें देखते ही मेरे दिल में खयाल आया कि यह लड़का जरूर लड़की को भगा कर लाया है. दोनों सिर झुकाए मेरे सामने खड़े थे. मैं ने सख्त लहजे में पूछा, ‘‘कहां रहते हो और तुम्हारा आपस में क्या रिश्ता है?’’

‘‘सर, हम रत्तावाली के रहने वाले हैं और आपस में पतिपत्नी हैं. हमारी शादी करीब एक साल पहले हुई थी. मैं गांव की खेतीबाड़ी नहीं करना चाहता था, इसलिए नौकरी के लिए यहां चला आया. यहां नईम नाम के एक आदमी की बदौलत मुझे मुंशी की नौकरी मिल गई.’’ फहद ने रुकरुक कर बताया.

मैं ने उन से अगला सवाल किया, ‘‘एक साल पहले तुम्हारा निकाह किस ने पढ़ाया था?’’

यह सुन कर फहद कुछ उलझन में पड़ गया. लेकिन नरगिस झट से बोली, ‘‘मौलवी शराफत अली ने पढ़ाया था निकाह.’’

‘‘तुम्हें मौलवी का पता नहीं था?’’ मैं ने फहद को घूरते हुए कहा.

‘‘पता था साहब, लेकिन ध्यान नहीं आ रहा था. रत्तावली में एक ही तो मौलवी हैं, जो मसजिद में नमाज भी पढ़ाते हैं.’’

इस पूछताछ के बाद मैं ने दोनों को जाने की इजाजत दे दी, साथ ही यह भी कहा कि जांच पूरी होने तक वे कस्बा छोड़ कर कहीं नहीं जाएं. उन दोनों के जाने के बाद मैं भी अने कामों में व्यस्त हो गया. रात को अच्छी बारिश हुई. मौसम भी ठीक हो गया था. सुबह जब मैं थाने पहुंचा तो एक सनसनी खेज खबर मिली कि रात को किसी ने फहद परदेसी का कत्ल कर दिया. यह सुन कर मैं हैरान रह गया. एसआई हारुन और एक कांस्टेबल के साथ मैं नेमत बीबी के घर पहुंच गया. वहां अच्छेखासे लोग जमा थे. मैं ने मकतूल फहद की लाश को गौर से देखा. वह चारपाई पर चित हालत में थी और दस्ते तक एक खंजर उस के सीने में घुसा हुआ था. चारपाई के नीचे खून फैला हुआ था.

2 बातें मुझे चौंका रही थीं. एक तो लाश की पोजीशन और दूसरे नरगिस का वहां से गायब होना. क्योंकि आदमी के सीने में अगर खंजर घोंपा जाता है तो वह तुरंत नहीं मरता, बल्कि बुरी तरह तड़पता है, पर चारपाई पर पड़ी लाश से ऐसा नहीं लग रहा था. मौके पर खोजी कुत्ता भी मंगवाया गया, लेकिन उस कुत्ते से भी कोई मदद नहीं मिल सकी. घटनास्थल की जरूरी काररवाई निपटा कर मैं ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. प्राथमिक काररवाई के बाद मैं ने पूछताछ शुरू की. नेमत बीबी करीब 60 साल की समझदार औरत थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप इस हादसे के बारे में क्या जानती हैं?’’

‘‘थानेदार जी, दोनों रात को बैठक में ठीकठाक सोए थे. उन्होंने थाने में पड़ी डांट के बारे में मुझे बता दिया था. वे परेशान से नजर आ रहे थे. पता नहीं कैसे सवेरे यह हादसा हो गया, जिस का मुझे आज सुबह ही पता चला.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला, तुम बैठक के अंदर गई थीं?’’

‘‘हां, मैं अंदर गई थी. मैं सुबह जल्दी उठती हूं. नरगिस भी जल्दी उठ जाती थी. उठते ही वह सीधे बाहर आती थी उस के आदमी को भी मंडी जाना होता था. वह बरतन और किचन मेरा ही इस्तेमाल करती थी, क्योंकि उन के पास सामान नहीं था. फहद के नाश्ते का वक्त हो गया था. नरगिस बाहर नहीं आई तो मुझे अचंभा हुआ. मैं ने सोचा जा कर देखूं. बैठक का एक दरवाजा बाहर गली में खुलता है. पर मैं ने अंदर वाले दरवाजे पर दस्तक दी. कोई जवाब नहीं आया. जरा सा दबाव पड़ते ही दरवाजा खुल गया. मुझे अच्छे से याद है, रोजाना की तरह रात को अंदर से उन्होंने दरवाजे की कुंडी लगा ली थी.

‘‘फहद चारपाई पर मुर्दा पड़ा था और नरगिस गायब थी. उसे इस हालत में देख कर मैं घबरा गई, फिर बाहर जा कर लोगों को बताया. कुछ लोग यहां आ गए, उन्हीं में से कोई थाने जा कर खबर दे आया.’’

‘‘नरगिस के बारे में तुम्हें क्या पता है?’’

‘‘मैं उस के बारे में कुछ नहीं जानती.’’

नरगिस के गायब होने से मेरा ध्यान 2 बातों की तरफ जा रहा था. पहला यह कि कहीं वह फहद को कत्ल कर के तो नहीं भाग गई? दूसरा फहद को कत्ल करने वाला उसे अपने साथ ले गया था या वह अपनी मरजी से उस के साथ गई थी.

मैं ने नेमत बीबी से पूछा, ‘‘नरगिस कैसी थी? क्या वह कातिल से मिली हुई लगती थी?’’

‘‘साहब, उस की शादी को एक साल हुआ था. मेरे यहां वो 2-3 दिन पहले ही आई थी. इतने दिनों में इस से ज्यादा मैं क्या जान सकती हूं?’’

‘‘क्या इन 3-4 दिनों में कोई उन से मिलने आया था?’’

‘‘नहीं, उन से मिलने कोई भी नहीं आया था. इसी वजह से दोनों देर रात तक घर के बाहर चबूतरे पर बैठ कर बतियाते रहते थे.’’

मैं ने बाहर निकलते हुए नेमत बीबी को समझा दिया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक बैठक की किसी चीज को हाथ न लगाए, न ही सफाई वगैरह करे. जब मैं थाने पहुंचा तो आढ़ती नईम मेरे इंतजार में बैठा था. उस ने इस बात की तसदीक की कि फहद उस की दुकान पर लिखतपढ़त का काम करता था. वह उस की मौत पर बहुत अफसोस जता रहा था. उस से मैं ने कई सवाल पूछे पर उस ने भी वही बताया जो मुझे पहले से मालूम था. मैं ने उसे यह कह कर जाने दिया कि फहद या नरगिस के बारे में कुछ भी पता चले तो मुझे खबर करे. इन सब से पूछताछ के बाद मुझे इस बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि वे दोनों मियांबीवी थे. मुझे लग रहा था कि ये दोनों भाग कर यहां आए थे.

मुझे पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही पता चल सकता था कि फहद की मौत कैसे हुई? एसआई हनीफ को मैं ने फहद और नरगिस के घर रत्तावाली भेजा था, अब उन के वहां से लौटने का इंतजार था. उन से ही दोनों के बारे में और ज्यादा जानकारी मिलने की संभावना थी. दोपहर के वक्त हनीफ भी रत्तावली से वापस आ गए. उस वक्त भी बारिश हो रही थी. उन्होंने रतावली से लौट कर बताया, ‘‘साहब, फहद और नरगिस ने हम से झूठ बोला था. बस इतना सही था कि दोनों रतावली के रहने वाले थे और उन के मांबाप के नाम सही थे. लेकिन वे दोनों मियांबीवी नहीं थे. उन की शादी हुई ही नहीं थी. वहां के मौलवी शराफत अली ने भी बताया कि उन्होंने उन दोनों का निकाह नहीं पढ़ा.’’

‘‘गांव वालों से पता चला कि फहद पहली अगस्त को रत्तावाली से रवाना हुआ था. उस ने अपने घर वालों को कहा था कि वह 10-12 दिनों के लिए काम के सिलसिले में अपने दोस्त शफीक के पास जा रहा है.’’

‘‘और नरगिस का क्या किस्सा है?’’ मैं ने पूछा

‘‘नरगिस की रत्तावाली के एक लड़के जावेद से मंगनी हो चुकी थी. जल्दी ही उस की शादी होने वाली थी कि 4 अगस्त को वह भी अचानक गांव से गायब हो गई और अब तक गांव वापस नहीं पहुंची. रत्तावाली एक छोटा सा गांव है, इसलिए नरगिस के गायब होने की खबर मिनटों में ही फैल गई. उस समय फहद ही गांव से बाहर था, इसलिए गांव वाले यही शक करने लगे थे कि वह उसी के साथ भागी है. जबकि फहद का बाप करीम अली इस बात का विरोध कर रहा था. उस का कहना था कि फहद 2 दिन पहले अपने दोस्त से मिलने लाहौर चला गया था.’’

‘‘रत्तावाली तो हमारे थाने में ही आता है. मुंशी से यह पूछो कि नरगिस के बाप ने उस की गुमशुदगी की कोई रिपोर्ट तो दर्ज नहीं कराई थी?’’

‘‘अभी तक तो नहीं कराई. वैसे सुना यह है कि फहद का बाप करम अली लाहौर जा कर अपने बेटे का पता लगाएगा कि वह शफीक के पास है या कहीं और चला गया है.’’

‘‘नरगिस की जावेद नाम के जिस लड़के के साथ शादी हो रही थी, उस का क्या रिएक्शन है?’’

‘‘जनाब वह तो एकदम शांत बैठा है. असल में जावेद ने अपने बाप के जोर देने पर शादी की हामी भरी थी. वह इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. दरअसल जावेद के बाप और नरगिस के बाप में बहुत गहरी दोस्ती है, दोनों दोस्ती को रिश्ते में बदलना चाहते थे, पर जावेद की मां को नरगिस पसंद नहीं थी. वह उस की जगह अपनी भांजी को बहू बना कर लाना चाहती थी.’’

‘‘करम अली लाहौर जाने को कह रहा था. बेहतर यही है कि फहद की मौत की खबर तुम उन तक पहुंचा दो, एक बार फिर तुम्हें रत्तावाली जाना पड़ेगा.’’ कह कर मैं ने हनीफ को तांगे से रवाना कर दिया.

अगली सुबह मौसम साफ था. मैं थाने पहुंचा ही था कि हनीफ भी आ गए. उन के साथ फहद का बाप करम अली और नरगिस की मां आइशा भी आई थी. करम अली करीब 60 साल का दुबलापतला आदमी था, दाढ़ी सफेद हो चुकी थी. वह बहुत दुखी और टूटा हुआ दिखाई दे रहा था. आइशा करीब 50 साल की थी और तेजतर्रार दिखती थी. जैसे ही फहद का जिक्र निकला. करम अली फट पड़ा, ‘‘साहब यह क्या जुल्म हुआ?’’

मैं ने उसे तसल्ली दी और समझाते हुए कहा, ‘‘अगर तुम हमारी मदद करोगे तो हम जल्द ही कातिल को ढूंढ़ निकालेंगे.’’

‘‘हम क्या मदद कर सकते हैं, साहब?’’

‘‘जो भी पूछा जाए, उस का सचसच जवाब दो. कुछ भी नहीं छिपाना.’’

‘‘ठीक है, साहब.’’

‘‘ये बताओ कि पहली अगस्त को तुम्हारा बेटा अपने दोस्त से मिलने लाहौर गया था?’’

‘‘जी साहब, वह यही कह कर घर से गया था.’’

‘‘जिस के पास वह गया था, उस का क्या नाम है और काम कहां करता है?’’

‘‘उस का नाम शफीक है साहब. उन दोनों की बहुत पुरानी दोस्ती है. शफीक भी रत्तावाली का रहने वाला है. वह रोजगार के सिलसिले में लाहौर चला गया था. 2 साल हो गए, उसे गए हुए. महीने में दोएक बार गांव आता है. वह लाहौर में फिरोजपुर रोड पर स्थित डबलरोटी बनाने वाली किसी फैक्ट्री में काम करता है.’’

‘‘यह आखिरी सवाल है, इस का जवाब बहुत सोचसमझ कर देना. क्या तुम्हारे बेटे फहद और आइशा की बेटी नरगिस में इश्कमोहब्बत का कोई चक्कर चल रहा था?’’

‘‘सवाल ही नहीं उठता, थानेदार साहब.’’ उस से पहले नरगिस की मां आइशा बोल पड़ी.

‘‘मैं ने तुम से नहीं पूछा.’’ मैं ने उसे घूर कर देखते हुए कहा.

‘‘जनाब चंद महीने बाद मेरी बेटी की शादी होने वाली है. उस पर ऐसे इलजाम न लगाएं.’’ वह फिर उखड़ते हुए बोली.

‘‘देखो आइशा, मुझे मेरा काम करने दो, बीच में मत बोलो. हां, करम अली तुम ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया?’’

वह झिझकते हुए बोला, ‘‘जी… मेरा खयाल है फहद नरगिस को पसंद करता था.’’

‘‘क्या उस ने खुद तुम्हें अपनी पसंद के बारे में बताया था?’’

‘‘मुझे तो नहीं बताया था, पर इस सिलसिले में अपनी मां से जरूर जिक्र किया था, मेरी बीवी ने मुझे बताया था.’’

‘‘क्या नरगिस भी उसे पसंद करती थी?’’

‘‘मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता.’’ उस ने कहा.

उस से पूछताछ करने के बाद मैं ने करम अली को बाहर भेजा, फिर आइशा से कहा, ‘‘देखो आइशा, इस हकीकत को कोई नहीं झुठला सकता कि तुम्हारी बेटी नरगिस पिछले 3-4 दिनों से फहद के साथ बीवी की हैसियत से रह रही थी. बाहर बैठ कर अश्लील हरकत के इलजाम में जब उन्हें थाने लाया गया था तो उस ने मुझ से खुद को फहद की बीवी बताया था. उस का कहना था कि उन दोनों का एक साल पहले निकाह हुआ था. हादसे की रात दोनों कमरा बंद कर के सोए थे, अगली सुबह फहद की लाश मिली और नरगिस गायब थी. तुमहारी अकल इस बारे में क्या कहती है?’’

‘‘मेरी अकल तो बिलकुल काम नहीं कर रही है. एक बार नरगिस मिल जाए तो उस से ही पूछूं कि यह क्या चक्कर है?’’ वह रुआंसी आवाज में बोली.

‘‘नरगिस का बाप क्यों नहीं आया?’’  ‘‘साहब, वह गहरे सदमें में है. वह जावेद के बाप से भी बहुत शर्मिंदा

है कि उस से अब क्या कहे?’’

‘‘आइशा, तुम जावेद के रिश्ते के विरोध में क्यों थी?’’

‘‘साहब, जावेद सुस्त व बोंगा लड़का है, इसलिए वह मुझे पसंद नहीं था.’’

पूछताछ के बाद मैं ने उन दोनों को भी घर भेज दिया. अगले रोज 12 बजे फहद की लाश अस्पताल से वापस आ गई. बाद में उस की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई. रिपोर्ट के अनुसार, फहद की मौत 7 अगस्त की रात 1 से 2 बजे के बीच हुई थी. रिपोर्ट में बताया गया था कि मौत के वक्त वह गहरी बेहोशी में था. उस के पेट से मिले नमूने में बेहोशी की दवा के आसार मिले. इस का मतलब यह हुआ कि रात के खाने में उसे बेहोशी की दवा दी गई होगी. नींद में चले जाने के बाद उस की हत्या की गई होगी. बेहोश होने की वजह से वह न तो अपना बचाव कर सका था और न ही शोरशराबा कर पाया था.

अब सवाल यह उठ रहा था कि नरगिस उसे पसंद करती थी, उस के साथ भाग कर आई थी, फिर उसे मार कर क्यों गायब हो गई? जरूर इस खतरनाक खेल में कोई तीसरा शामिल था, जिस ने नरगिस की मदद की या नरगिस ने उस की मदद की. वह तीसरा कौन था? इसी पर हमारी जांच केंद्रित हो गई. मैं ने यह सोच कर लाहौर जाने का फैसला कर लिया कि शायद वहां इस बंद गली का कोई रास्ता निकल आए. क्योंकि पहली अगस्त को फहद लाहौर में अपने दोस्त शफीक के पास जाने को कह कर निकला था. संभव था कि बीच के 2 दिन वह शफीक के पास गया हो? यही सब जानने के लिए शफीक से मुलाकात बहुत जरूरी हो गई थी.

शफीक डबलरोटी, बन, शीरमाल बनाने वाली बेकरी में काम करता था. मैं करीब 11 बजे वहां पहुंच गया. मैं सादे कपड़ों में था. मैं बेकरी के मैनेजर सुलेमान बुखारी से मिला और उसे अपने आने की वजह बता दी. मैनेजर सुलेमान बुखारी ने बताया, ‘‘साहब, आज वह जल्दी छुट्टी ले कर घर चला गया. उस का एक साथी कदीर बता रहा था कि गांव से उस का कोई दोस्त मिलने आया है, इसलिए वह छुट्टी ले कर चला गया.’’

‘‘गांव से कोई दोस्त.’’ मैं ने चौंक कर कहा, ‘‘बुखारी साहब, मैं अभी शफीक के घर जाना चाहता हूं. आप किसी ऐसे बंदे को मेरे साथ भेज दें, जिस ने शफीक का घर देखा हो.’’

कुछ देर बाद हम तीनों बुखारी की कार से शफीक के घर जा रहे थे. साथ में शफीक को पहचानने वाला कदी भी था. एक कालोनी के पीछे कच्ची आबादी थी. जब सुलेमान बुखारी ने मेन फिरोजपुर रोड से गाड़ी कच्ची आबादी की तरफ मोड़ी तो कदीर ने चौंक कर कहा, ‘‘साहब, एक मिनट…’’

‘‘क्या बात है, क्या हुआ?’’ बुखारी ने उलझन भरे लहजे में पूछा.

‘‘आप गाड़ी रोक दें. मुझे लगता है शफीक वह जा रहा है.’’ उस ने एक तरफ इशारा करते हुए कहा.

मैं ने गरदन घुमा कर देखा, सड़क के किनारे एक जोड़ा जा रहा था. उन की पीठ हमारी तरफ थी. मैं ने कदीर से पूछा, ‘‘क्या तुम इस जोड़े की बात कर रहे हो?’’

‘‘जी, जब साहब ने कार मोड़ी थी तो मैं ने शफीक की एक झलक देख ली थी. पर उस के साथ यह औरत कौन है?’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

मैं सुलेमान बुखारी को सारा किस्सा सुना चुका था. इसलिए उस ने मुझ से पूछा, ‘‘अब क्या करना है साहब?’’

‘‘बुखारी साहब, आप कार को उस तरफ ले कर चलें, जिस तरफ वे दोनों जा रहे हैं. मैं इस लड़की का चेहरा देखना चाहता हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘यह रांग साइड ड्राइविंग होगी, पर हुक्म करें तो चलता हूं.’’

‘‘आप कानून न तोड़ें, मुझे यहीं उतार दें और अगले कट से गाड़ी घुमा कर ले आएं. तब तक मैं पैदल उन का पीछा करता हूं.’’

बुखारी ने बिना कोई सवाल किए मुझे वहीं ड्रौप कर दिया और गाड़ी को फिरोजपुर रोड की दूसरी तरफ ले गया. मैं तेज कदमों से उस जोड़े के पीछे चल पड़ा. मैं ने शफीक को नहीं देखा था, लेकिन नरगिस से मेरी मुलाकात हो चुकी थी. मैं उस का चेहरा देखते ही पहचान सकता था. चलतेचलते मैं सोचने लगा कि अगर यह महिला नरगिस निकल आई तो केस जल्दी खुल सकता है. मैं बड़ी होशियारी से कदम दबा कर उन का पीछा कर रहा था. जब हमारे बीच करीब 10 फुट का फासला रह गया तो मैं ने देखा, वे दोनों दाईं तरफ एक सिनेमा हाल की ओर मुड़ गए. यानी दोनों सिनेमा देखने के लिए घर से निकले थे. उसी समय मैं उस महिला की झलक देखने में कामयाब हो गया. उसे देख कर मेरी नसें तन गईं, क्योंकि वह कोई और नहीं, नरगिस ही थी.

वही नरगिस, जिस की तलाश ने मुझे बुरी तरह बेचैन और परेशान कर रखा था. मैं उन की तरफ लपका और जोर से पुकारा, ‘‘नरगिस.’’

आवाज सुनते ही दोनों ठिठक कर रुक गए, फिर उन्होंने पलट कर मेरी तरफ देखा. शफीक के चेहरे पर हैरानी और उलझन थी. नरगिस का चेहरा डर और खौफ से पीला पड़ गया था. नरगिस ने एक तरफ भागने की कोशिश की तो मैं ने दौड़ कर उसे काबू कर लिया. अचानक हुई इस पकड़धकड़ को देख कर शफीक ने दूसरी तरफ दौड़ लगा दी. मैं ने फौरन अपना सर्विस रिवाल्वर निकाला. इस से पहले कि मैं उसे धमकाने के लिए हवाई फायर करता, सुलेमान बुखारी मौके पर पहुंच गया. उस ने बड़ी तेजी से कार हमारी तरफ बढ़ा दी. इत्तेफाक से शफीक उसी तरफ भागने की कोशिश कर रहा था. वह बुखारी की कार के बोनट से टकराया और वहीं सिनेमा के गेट के करीब जमीन पर गिर कर कराहने लगा. उस के घुटने पर चोट लगी थी. सुलेमान बुखारी और कदीर कार से उतर आए. उन दोनों ने उसे पकड़ लिया.

जब कोई मुजरिम किसी ठोस सबूत के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ जाता है तो फिर उस की जुबान खुलवाना मुश्किल नहीं होता. उसी शाम मैं सुलेमान बुखारी की कार में बिठा कर नरगिस और शफीक को थाना मरीद ले आया. बुखारी और कदीर के जाने के बाद मैं ने नरगिस और शफीक से कहा, ‘‘तुम दोनों सीधी तरह सच बोलोगे या फिर…’’

पहले तो वे अपने बचाव के लिए इधरउधर की बातें करने लगे, लेकिन उन से थोड़ी सख्ती की गई तो फहद की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह बड़ी सनसनीखेज और हैरतअंगेज थी. दरअसल नरगिस और शफीक में बड़ी खुफिया सेटिंग चल रही थी. उन्होंने अपनी इश्कमोहब्बत को बेहद छिपा कर रखा था. गांव में किसी को भी उन के इश्क की खबर तक नहीं लगी. उन का चक्कर चल ही रहा था कि फहद भी नरगिस में दिलचस्पी लेने लगा. फहद और शफीक अच्छे दोस्त थे, पर इतने गहरे नहीं थे कि शफीक अपनी और नरगिस की मोहब्बत के बारे में उसे बताता.

जब नरगिस की जुबानी शफीक को पता चला कि फहद बड़ी तेजी से उस के साथ नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रहा है तो उसे परेशानी होने लगी. वह खुल्लमखुल्ला फहद को नरगिस से प्यार करने को मना नहीं कर सकता था, क्योंकि उस स्थिति में फहद उस से वजह पूछता. जबकि शफीक नरगिस से रिश्ता तय हो जाने से पहले अपने प्यार को उजागर नहीं करना चाहता था. इस बारे में उसे पहले अपनी मां से बात करनी थी. अभी ये उलझन चल ही रही थी कि नरगिस के बाप याकूब ने अपने दोस्त के बेटे जावेद से उस का रिश्ता तय कर दिया और उस की मंगनी भी कर दी. नरगिस इस शादी के लिए बिलकुल राजी नहीं थी. नरगिस की मंगनी किसी और के साथ तय हो जाने पर शफीक भी बहुत परेशान था.

नरगिस उस के हाथ से न निकले, इस के लिए शफीक कोई तरकीब सोचने लगा. अचानक उस के शैतानी दिमाग में एक खतरनाक प्लान आ गया. उस ने नरगिस को विश्वास में ले कर अपने मंसूबे के बारे में बताया. नरगिस उस से बहुत प्यार करती थी. वह भी शफीक से ही शादी करना चाहती थी. इसलिए उस ने शफीक के बताए मंसूबे पर बिना सोचेसमझे यकीन कर लिया. शफीक ने उसे समझाया कि कुछ दिन वह फहद के साथ उस की बीवी की हैसियत से रहे. 8-10 दिनों बाद वह उसे अपने साथ ले जाएगा.

शफीक ने नरगिस को कुछ इस तरह समझाया था कि वह उस की बात मान कर फहद के साथ रहने को तैयार हो गई. उसे यकीन था कि शफीक जल्दी ही उस से शादी कर के उसे लाहौर ले जाएगा. शफीक ने उस से कहा कि इन सब बातों की भनक फहद के कानों में नहीं पड़नी चाहिए. यह एक खुफिया प्लान है. नरगिस ने वही किया, जो फहद ने किया. दूसरी तरफ उस ने फहद को दूसरी पट्टी पढ़ाते हुए कहा कि अगर वह उस की बात मानेगा तो नरगिस उस की हो सकती है. शफीक के ही कहने पर फहद घर से 2  दिन पहले निकला, ताकि नरगिस के गायब होने पर कोई उस पर शक न करे. शफीक ने फहद से यह भी कहा था कि वह उन दोनों की शादी करा देगा और वे दोनों आराम से मरीद में रह सकते हैं.

फहद और नरगिस ने ऐसा ही किया. दोनों मरीद में किराए का एक कमरा ले कर रहने लगे. सब कुछ शफीक की प्लानिंग के अनुसार हो रहा था. फहद को इस प्लान का कुछ पता नहीं था. वह नरगिस को पा कर बेहद खुश था. वह शफीक का बहुत अहसानमंद था, क्योंकि उस की वजह से उस की जिंदगी में ये खूबसूरत दिन आए थे. उसे खबर ही नहीं थी कि उस का दोस्त उस के साथ क्या चाल चल रहा है. फहद नरगिस के बहुत करीब रह रहा था. वह उसे जिस्मानी तौर पर पाना चाहता था, पर नरगिस उसे यह कह कर टाल रही थी कि निकाह से पहले यह सब नहीं होगा. निकाह अभी हुआ नहीं था, पर दोनों के बीच हल्कीफुल्की छेड़छाड़ हो जाती थी.

कई बार फहद नरगिस के अंगों को स्पर्श कर लेता था. एक रात वह घर के बाहर वाले चबूतरे पर बैठा नरगिस को गले लगा कर प्यार कर रहा था. तभी रात की गश्त पर निकले एक एएसआई ने उन दोनों को अश्लील हरकतें करते देखा तो वह उन्हें थाने ले आया था. योजना के मुताबिक दूसरे दिन नरगिस ने फहद के रात के खाने में बेहोश होने की दवा डाल दी. उसे नींद की गोलियां भी शफीक ने ही ला कर दी थीं. तय प्रोग्राम के मुताबिक शरीफ आधी रात को नेमत बीबी के घर पहुंच गया. उस ने बाहर के दरवाजे पर एक खास तरह से दस्तक दी तो नरगिस ने दरवाजा खोल दिया और खुद बाहर गली में निकल आई.

शफीक ने उसे गली में रुकने को कहा और खुद बैठक में चला गया. अंदर आ कर उस ने दरवाजे की कुंडी चढ़ाई और बेसुध पड़े फहद के सीने में दस्ते तक खंजर घोंप दिया. इस के बाद वह दरवाजा खोल कर अंदर सेहन में पहुंचा. फिर घर का दाखिली दरवाजा खोल कर बाहर गली में निकल आया, जहां नरगिस उस की राह देख रही थी. इस के बाद दोनों तय कार्यक्रम के मुताबिक लाहौर के लिए रवाना हो गए. इस मौके पर नरगिस ने शफीक से कोई सवाल नहीं किया था. उसे यह बात पता नहीं थी कि शफीक ने फहद की हत्या कर दी थी. शफीक बाहर निकलते वक्त बैठक का दरवाजा भिड़ा आया था. फहद की हत्या के बाद दोनों लाहौर पहुंचे और कच्ची आबादी वाले घर में मजे से रहने लगे.

शफीक ने अपनी प्लानिंग को कामयाब बनाने के लिए कुछ दिनों पहले ही लाहौर में अपने मोहल्ले में यह खबर उड़ा दी थी कि उस की शादी हो गई है और जल्दी ही वह अपनी बीवी को यहां ले आएगा. इसलिए जब नरगिस कच्ची आबादी के घर में पहुंची तो किसी को उस पर शक नहीं हुआ. लेकिन इस से पहले कि वे साथ रह कर अपनी आगे की जिंदगी आराम से काटते, कानून के शिकंजे में फंस गए. शफीक ने बताया कि उस दिन वह फैक्ट्री से जल्दी छुट्टी कर के नरगिस को फिल्म दिखाने सिनेमाहाल ले जा रहा था.

शफीक के इकबालिया बयान के बाद यह केस पूरी तरह से हल हो गया था. फिर भी एक सवाल कांटे की तरह दिमाग में चुभ रहा था. आखिर मैं ने उस से पूछ लिया, ‘‘जब तुम्हारा सोचा हुआ मंसूबा पूरी तरह कामयाब हो गया था तो तुम ने फहद की जान क्यों ली?’’

‘‘इस कत्ल की 2 वजहें थीं?’’

‘‘कौन सी 2 वजहें?’’ मैं ने डपट कर पूछा.

‘‘पहली तो यह थी कि मुझे इस बात का डर था कि जब सुबह फहद उठेगा तो नरगिस को गायब पाएगा उस के बाद सीधे मेरे पास लाहौर आ जाएगा. जबकि मैं ऐसा नहीं चाहता था. इसलिए मैं ने उस का किस्सा ही खत्म कर दिया. दूसरी वजह यह थी कि मैं ऐसा कर के पुलिस की तफ्तीश का रुख बदलना चाहता था.’’

‘‘दूसरी तरफ तुम ने नेमत बीबी के घर का बाहरी दरवाजा खुला छोड़ कर यह जताने की कोशिश की कि जैसे नरगिस फहद को कत्ल कर के फरार हो गई हो?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, मैं यह चाहता था कि किसी का भी ध्यान मेरी तरफ न जाए. मैं इस मामले को इतना उलझा देना चाहता था कि कोई सुराग न मिल सके और कहीं भी मेरा नाम न आए.’’

शफीक की बातें सुन कर नरगिस उसे नफरत व गुस्से से देखते हुए गुर्रा कर बोली, ‘‘अगर मुझे पता होता कि तुम अंदर से इतने बोदे और कमीने हो तो मैं तुम्हारी बातों में कभी न आती. तुम ने अपनी मासूमियत का खूब फायदा उठाया. अब मैं तुम्हारे साथ एक पल भी नहीं रहूंगी. थूकती हूं तुम पर मैं.’’

‘‘साथ रहने की नौबत आएगी, तब न तुम इस के साथ रहोगी. थोड़ी देर में तुम्हारा यह आशिक यहां से सीधे जेल जाएगा. तुम ने एक कमजोर और बीमार घोड़े पर दांव लगा कर अपनी जिंदगी की सब से बड़ी भूल की है.’’ मैं ने कड़वा सच कहा तो नरगिस फटीफटी आंखों से मुझे देखती रह गई.

मोहब्बत में मात खाई नरगिस की स्थिति यह हो गई थी कि अब उस ने सारी उम्र मोहब्बत से नफरत करने का फैसला कर लिया था, क्योंकि इसी इश्क ने उसे बदनाम कर दिया था. Crime Story Hindi

Suspense Crime Story: 4 करोड़ की चोरी का रहस्य

Suspense Crime Story: हरियाणा और पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ के सेक्टर 34 में एक्सिस बैंक का करेंसी चेस्ट है. इस में हर समय करोड़ों रुपए रहते हैं. इस चेस्ट से बैंक की ट्राइसिटी के अलावा हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, पंजाब व जम्मूकश्मीर की शाखाओं को पैसा भेजा जाता है और वहां से आता भी है. हर समय करोड़ों रुपए रखे होने के कारण यहां सुरक्षा के भी काफी बंदोबस्त हैं. बैंक ने अपने सिक्योरिटी गार्ड तो लगा ही रखे हैं. साथ ही पंजाब पुलिस के जवान भी वहां हर समय तैनात रहते हैं.

इसी 11 अप्रैल की बात है. सुबह हो गई थी. कोई साढ़े 5-6 बजे के बीच का समय रहा होगा. सूरज निकल आया था, लेकिन अभी चहलपहल शुरू नहीं हुई थी. चेस्ट पर तैनात पंजाब पुलिस के जवानों को वहां रात में उन के साथ तैनात रहने वाला बैंक का सिक्योरिटी गार्ड सुनील नजर नहीं आ रहा था.

पुलिसकर्मियों ने एकदूसरे से पूछा, लेकिन किसी को भी सुनील के बारे में पता नहीं था. उन्हें बस इतना ध्यान था कि वह रात को ड्यूटी पर था. रात के 3-4 बजे के बाद से वह दिखाई नहीं दिया था. पुलिस के उन जवानों को चिंता हुई कि कहीं सुनील की तबीयत तो खराब नहीं हो गई? तबीयत खराब होने पर वह बैंक की चेस्ट में ही कहीं इधरउधर सो नहीं गया हो? यह बात सोच कर उन्होंने चेस्ट में चारों तरफ घूमफिर कर सुनील को तलाश किया, लेकिन न तो वह कहीं पर सोता मिला और न ही उस का कुछ पता चला.

सुनील की ड्यूटी रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक थी, लेकिन वह 2-3 घंटे से गायब था. वह किसी को कुछ बता कर भी नहीं गया था. एक पुलिस वाले ने उस के मोबाइल नंबर पर फोन किया, लेकिन उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. पुलिस वालों को पता था कि सुनील रोजाना अपनी पलसर बाइक से आता था. वह बैंक की चेस्ट के पीछे अपनी बाइक खड़ी करता था. उन्होंने उस जगह जा कर बाइक देखी, लेकिन वहां उस की बाइक भी नहीं थी.

अब पुलिस वालों की चिंता बढ़ गई. चिंता का कारण वहां रखी करोड़ों रुपए की रकम थी. उन्होंने बैंक के अफसरों को फोन कर सारी बात बताई. कुछ देर में बैंक के अफसर आ गए. उन्होंने चेस्ट में रखे रुपयों से भरे लोहे के बक्सों की जांचपड़ताल की. पहली नजर में नोटों के इन बक्सों में कोई हेराफेरी नजर नहीं आई. नोटों से भरे सभी बक्सों पर ताले लगे हुए थे. सरसरी तौर पर कोई गड़बड़ी नजर नहीं आ रही थी. दूसरी तरफ सुनील का पता नहीं चल रहा था. उस का मोबाइल बंद होना और बाइक बैंक के बाहर नहीं होने से संदेह पैदा हो रहा था कि कोई न कोई बात जरूर है. वरना सुनील ऐसे बिना बताए कैसे चला गया?

काफी सोचविचार के बाद अफसरों के कहने पर नोटों से भरे बक्सों को हटा कर जांच की गई. एक बक्से को हटा कर चारों तरफ से देखा तो उस का ताला लगा हुआ था, लेकिन वह बक्सा पीछे से कटा हुआ था. बक्से को काट कर नोट निकाले गए थे. सवाल यह था कि कितने नोट निकाले गए हैं? क्या ये नोट सुनील ने ही निकाले हैं? इस की जांचपड़ताल जरूरी थी. इसलिए बैंक अफसरों ने सेक्टर-34 थाना पुलिस को इस की सूचना दी.

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पुलिस ने आ कर जांचपड़ताल शुरू की. यह तो साफ हो गया कि बैंक की चेस्ट से बक्से को पीछे से काट कर नोट निकाले गए हैं. कितनी रकम निकाली गई है, इस सवाल पर बैंक वालों ने पुलिस के अफसरों से कहा कि सारे नोटों की गिनती करने के बाद ही इस का पता लग सकेगा.

पुलिस ने बैंक वालों से सुनील के बारे में पूछताछ की. बैंक के रिकौर्ड में सुनील के 2 पते लिखे थे. एक पता पंचकूला में मोरनी के गांव बाबड़वाली भोज कुदाना का था और दूसरा पता मोहाली के पास सोहाना गांव का. वह 3 साल से बैंक में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहा था. पुलिस अफसरों ने 2 टीमें सुनील के दोनों पतों पर भेज दीं.

सुरक्षा के लिहाज से बैंक की चेस्ट में भीतरबाहर कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने कैमरों की फुटेज देखी. इन फुटेज में सामने आया कि सुनील रात को बारबार बैंक के अंदर और बाहर आजा रहा था.

उस की चालढाल और हाथों के ऐक्शन से अंदाजा लग गया कि वह बैंक के अंदर से अपने कपड़ों के नीचे कोई चीज छिपा कर बारबार बाहर आ रहा था. कपड़ों के नीचे छिपे शायद नोटों के बंडल होंगे. बाहर वह इन नोटों के बंडलों को कहां रख रहा था, इस का पता नहीं चला. यह भी पता नहीं चला कि बैंक के बाहर उस का कोई साथी खड़ा था या नहीं. एक फुटेज में वह हाथ में एक बैग ले कर बाहर निकलता नजर आया.

सीसीटीवी फुटेज देखने के बाद यह बात साफ हो गई थी कि सुनील ने योजनाबद्ध तरीके से बैंक की चेस्ट से रुपए चोरी किए थे. फुटेज में 10-11 अप्रैल की दरम्यानी रात 3 बजे के बाद वह नजर नहीं आया. इस का मतलब था कि रात करीब 3 बजे वह बैंक से रकम चोरी कर फरार हो गया था. बैंक वालों ने 5-6 घंटे तक सारी रकम की गिनती करने के बाद पुलिस अफसरों को बताया कि 4 करोड़ 4 लाख रुपए गायब हैं. यह सारी रकम 2-2 हजार रुपए के नोटों के रूप में थी. 4 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में बैंक से 4 करोड़ रुपए से ज्यादा चोरी होने का पता चलने पर पुलिस भी हैरान रह गई.

शुरुआती जांच में यह अनुमान लगाया गया कि सुनील ने अपने किसी साथी के सहयोग से यह वारदात की है. अनुमान यह भी लगाया गया कि इतनी बड़ी रकम ले कर वह किसी चारपहिया वाहन से भागा होगा. फिर सवाल आया कि सुनील अगर चारपहिया वाहन से भागा था तो उस की बाइक बैंक के पीछे मिलनी चाहिए थी, लेकिन उस की बाइक वहां नहीं मिली थी. इस से यह बात स्पष्ट हो गई कि बाइक या तो वह खुद या उस का कोई साथी चला कर ले गया.

पुलिस ने बैंक की चेस्ट में उस रात ड्यूटी पर मौजूद पंजाब पुलिस के चारों जवानों के बयान लिए. बैंक वालों के भी बयान लिए. बैंक वालों से सुनील के यारदोस्तों और उस के आनेजाने के ठिकानों के बारे में पूछताछ की गई. तमाम कवायद के बाद भी पुलिस को ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से उस के बारे में कोई सुराग मिलता.

सुनील की बाइक का पता लगाने के लिए पुलिस ने खोजी कुत्ते की मदद ली. पुलिस का स्निफर डौग उस के बाइक खड़ी करने की जगह पर चक्कर लगाने के बाद कुछ दूर गया. इस के बाद लौट आया. इस से पुलिस को कुछ भी पता नहीं लग सका. पुलिस ने सुनील की बाइक का पता लगाने के लिए बसस्टैंड के आसपास और दूसरी जगहों की पार्किंग पर तलाश कराई, लेकिन पता नहीं चला. उस के मोबाइल की आखिरी लोकेशन भी बैंक की आई.

सुनील के गांव भेजी गई पुलिस की टीमें शाम को चंडीगढ़ लौट आईं. मोरनी के पास स्थित गांव बाबड़वाली भोज कुदाना में पता चला कि सुनील को गंदी आदतों के कारण उस के मांबाप ने कई साल पहले ही घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद सुनील ने भी गांव आनाजाना कम कर दिया था.

पिता राममूर्ति ने पुलिस को बताया कि सुनील 2011-12 में पढ़ने के लिए कालेज जाता था. उसी दौरान वह एक लड़की को भगा ले गया था और बाद में उस से शादी कर ली थी. सुनील की इस हरकत के बाद ही मांबाप ने उसे घर से निकाल दिया था. बाद में पता चला कि सुनील ने पत्नी को तलाक दे दिया था. बैंक में चोरी की वारदात से करीब 3 महीने पहले वह किसी काम से गांव जरूर आया था.

पुलिस जांचपड़ताल में जुट गई. सुनील के दोस्तों और जानपहचान वालों की सूची बनाई गई. उन से पूछताछ की गई. पता चला कि वह मोहाली में एक दोस्त के साथ पेइंगगेस्ट के तौर पर पीजी में रहता था. पीजी पर जांच में सामने आया कि वह रात को बैंक में ड्यूटी करने के बाद कई बार सुबह पीजी पर नहीं आता था. वारदात के बाद भी वह कमरे पर नहीं आया था. सुनील का सुराग हासिल करने के लिए पुलिस ने वारदात वाली रात बैंक के आसपास चालू रहे मोबाइल नंबरों का डेटा जुटाया. इन नंबरों की जांच की गई, लेकिन इन में से किसी भी नंबर से सुनील के मोबाइल पर बात नहीं हुई थी.

इस से पहले पुलिस यह मान रही थी कि वारदात में अगर सुनील के साथ दूसरे लोग भी शामिल हैं तो उन की मोबाइल पर आपस में कोई न कोई बात जरूर हुई होगी. इसी का पता लगाने के लिए बैंक के आसपास के मोबाइल टावरों से उस रात जुड़े रहे मोबाइल नंबरों की जांच की गई थी, लेकिन पुलिस का यह तीर भी खाली निकल गया. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज से ही क्लू हासिल करने के मकसद से कई बार फुटेज देखी, लेकिन इस से भी ऐसी कोई बात सामने नहीं आई, जिस से सुनील का पता लगता या जांच का नया सिरा मिलता. पुलिस सभी पहलुओं को ध्यान में रख कर जांच में जुटी रही.

अधिकारी यह मान रहे थे कि सुनील ने इतनी बड़ी वारदात करने के लिए पूरी योजना जरूर बनाई होगी. ऐसा नहीं हो सकता कि अचानक ही उस रात उस ने चोरी की हो. इस नजरिए से पुलिस को यह संदेह भी हुआ कि अगर उस ने योजनाबद्ध तरीके से इतनी बड़ी वारदात की है, तो वह भारत से बाहर भी जा सकता है. इस शक की बुनियाद पर पुलिस ने सुनील का लुकआउट नोटिस जारी करवा कर एयरपोर्ट और बंदरगाहों को सतर्क कर दिया.

इस के साथ ही पुलिस इस बात की जांचपड़ताल में भी जुट गई कि क्या सुनील ने कोई पासपोर्ट बनवाया है या उस के पास पहले से पासपोर्ट तो नहीं है. 2 दिन तक जांच में प्रारंभिक तौर पर यही पता चला कि सुनील के नाम का कोई पासपोर्ट नहीं है. जांचपड़ताल में जुटी पुलिस को 14 अप्रैल को पता चला कि सुनील को 2-3 दिन के दौरान पंचकूला के पास रायपुररानी में देखा गया है. पुलिस ने रायपुररानी पहुंच कर सूचनाएं जुटाईं. इस के बाद उसी दिन चंडीगढ़ पुलिस की क्राइम ब्रांच ने चंडीगढ़ आते समय मनीमाजरा शास्त्रीनगर ब्रिज के पास सुनील को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल कर ली.

बाद में पुलिस ने उस की निशानदेही पर 4 करोड़ 3 लाख 14 हजार रुपए बरामद कर लिए. पुलिस के लिए यह बड़ी सफलता थी. चोरी हुए 4 करोड़ 4 लाख रुपए में केवल 86 हजार रुपए ही कम थे. पुलिस ने सुनील से पूछताछ की. पूछताछ में बैंक से इतनी बड़ी चोरी करने और उस के पकड़े जाने की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है—

मोरनी इलाके के गांव बाबड़वाली भोज कुदाना का रहने वाला 32 साल का सुनील एक्सिस बैंक में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता था. इस नौकरी से उस के शौक पूरे नहीं होते थे. घर वालों से उस के ज्यादा अच्छे संबंध नहीं थे. पत्नी से भी तलाक हो चुका था. वह शराब पीता था और महिलाओं से दोस्ती रखने के साथ दूसरे शौक भी करता था. उस के पास दूसरा कोई कामधंधा था नहीं, इसलिए पैसों के लिए हमेशा उस का हाथ तंग ही रहता था.

उसे पता था कि एक्सिस बैंक की जिस चेस्ट में वह नौकरी करता है, वहां हर समय करोड़ों रुपए बक्सों में भरे रहते हैं. वह सोचता था कि इन बक्सों से 20-30 लाख रुपए निकाल ले, तो उस की लाइफ बदल जाएगी. लेकिन बक्सों से नोट निकालना कोई आसान काम नहीं था. बैंक की चेस्ट में कड़ी सुरक्षा में नोटों के बक्से रहते थे. बक्सों पर ताले लगे होते थे. हर समय पुलिस का पहरा रहता था. चारों तरफ कैमरे लगे थे. वह यही सोचता रहता कि बक्सों से रुपए कैसे निकाले जाएं?

सुरक्षा के इतने तामझाम देख कर वह अपना मन मसोस कर रह जाता था. उसे लगता था कि सारे सपने अधूरे ही रह जाएंगे. तरहतरह की बातें सोच कर भले ही वह डर जाता था, लेकिन उस ने उम्मीदें नहीं छोड़ी थीं. वह मौके की तलाश में लगा रहता था. वह रात को कई बार शराब पी कर ड्यूटी देता था. 10 अप्रैल की रात भी वह शराब पी कर बैंक में ड्यूटी करने पहुंचा. रोजाना की तरह पंजाब पुलिस के जवान भी ड्यूटी पर आ गए. इन जवानों की ड्यूटी चेस्ट के बाहर रहती थी जबकि सुनील की ड्यूटी चेस्ट के अंदर तक रहती थी.

सुनील ने उस रात बैंक की चेस्ट में आनेजाने के दौरान देखा कि एक बक्सा पीछे से कुछ टूटा हुआ था. उस में से नोटों के पैकेट दिख रहे थे. यह देख कर सुनील को अपना सपना साकार होता नजर आया. उस ने तैनात पुलिसकर्मियों की नजर बचा कर उस बक्से का टूटा हुआ हिस्सा इतना तोड़ दिया कि उस में से नोटों के पैकेट आसानी से निकल सकें.

इस के बाद वह 2-3 बार बाहर तक आया और पुलिस वालों पर नजर डाली. उसे यह भरोसा हो गया कि ये पुलिस वाले उस पर किसी तरह का शक नहीं करेंगे. पूरी तरह यकीन हो जाने के बाद सुनील ने बक्से से नोटों के पैकेट निकाले और उन्हें अपने कपड़ों में छिपा कर बाहर आ गया. बाहर आ कर उस ने अपनी बाइक के पास वह नोटों के बंडल रख दिए.

करीब 20-30 मिनट के अंतराल में वह 5-6 चक्कर लगा कर 10-12 नोटों के बंडल बाहर ले आया. इस के बाद वह अपने पास रखे बैग में नोटों के बंडल रख कर बाहर ले आया. एक बंडल में 2-2 हजार के नोटों की 10 गड्डियां थीं. मतलब एक बंडल में 20 लाख रुपए थे. बैग में रख कर और कपड़ों में छिपा कर वह नोटों के 20 बंडल और 2 गड्डियां बाहर ला चुका था. ये सारे रुपए उस ने चेस्ट के बाहर छिपा दिए थे. तब तक रात के 3 बज चुके थे. अब वह जल्द से जल्द वहां से भाग जाना चाहता था.

उस ने मौका देखा. चेस्ट के बाहर पंजाब पुलिस के जवान सुस्ताते हुए बैठे थे. वह उन्हें बिना कुछ बताए चेस्ट के पीछे गया और छिपाए नोटों के बंडल बैग में रख कर अपनी बाइक ले कर चल दिया. कुछ दूर चलने के बाद उसने अपना मोबाइल तोड़ कर फेंक दिया ताकि पुलिस उस तक नहीं पहुंच सके. बाइक से वह हल्लोमाजरा गया. वहां जंगल में एक गड्ढा खोद कर उस ने एक प्लास्टिक की थैली में रख कर 4 करोड़ रुपए दबा दिए. बाकी के 4 लाख रुपए ले कर वह बाइक से पंचकूला के पास रायपुररानी पहुंचा. वहां एक होटल में जा कर रुक गया.

होटल के कमरे में नरम बिस्तरों पर भी उसे नींद नहीं आई. वह बेचैनी से करवटें बदलता रहा. उसे 2 चिंताएं सता रही थीं. पहली अपने पकड़े जाने की और दूसरी जंगल में छिपाए 4 करोड़ रुपए की. बेचैनी में वह होटल से निकल कर रायपुररानी के बसस्टैंड पर आ गया. उस ने पहले अपनी मनपसंद का नाश्ता किया. फिर 24 हजार रुपए का नया मोबाइल फोन खरीदा. उसे सब से ज्यादा चिंता 4 करोड़ रुपए की थी. इसलिए वह बाइक से वापस हल्लोमाजरा गया. वहां जंगल में जा कर उस ने वह जगह देखी, जहां रुपए छिपाए थे. रुपए सुरक्षित थे. वह बाइक से वापस रायपुररानी आ गया. बाजार में घूमफिर कर उस ने नए कपड़े खरीदे और नशा किया.

सुनील अपनी पत्नी से तलाक ले चुका था. वह महिलाओं से दोस्ती रखता था और शादी की एक औनलाइन साइट पर ऐक्टिव रहता था. वह लगातार तलाकशुदा महिलाओं से बातचीत करता रहता था. जांचपड़ताल के दौरान पुलिस को जब इन बातों का पता चला तो पुलिस ने उस के सोशल मीडिया अकाउंट को खंगाला. सोशल मीडिया अकाउंट से ही पुलिस को उस की लोकेशन का सुराग मिला और पता चला कि वह रायपुररानी में है. पुलिस ने उसे 14 अप्रैल, 2021 को गिरफ्तार कर उस के पास से 3 लाख 14 हजार रुपए बरामद किए. इस के बाद उस की निशानदेही पर हल्लोमाजरा के जंगल में गड्ढा खोद कर छिपाए गए 4 करोड़ रुपए बरामद कर लिए. पुलिस ने उसे अदालत से एक दिन के रिमांड पर लेने के बाद 16 अप्रैल को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पूछताछ में सामने आया कि सुनील ने अकेले ही चोरी की वारदात की. पहले इस तरह के बड़े अपराध नहीं करने के कारण वारदात के बाद वह काफी डर गया. डर की वजह से वह न तो सो सका और न ही कहीं भाग सका. वह 4 करोड़ रुपयों की सुरक्षा की चिंता में चंडीगढ़, मोहाली और पंचकूला के आसपास ही घूमता रहा. प्रोफेशनल अपराधी नहीं होने के कारण वह न तो चोरी के रुपयों को ठिकाने लगा पाया और न ही अपने बचाव के बारे में सोच सका. दरअसल, चोरी की वारदात में उसे अपनी उम्मीद से बहुत ज्यादा एक साथ 4 करोड़ रुपए मिलने पर वह इतना बेचैन हो गया कि अपने शौक भी पूरे नहीं कर सका. Suspense Crime Story

Mumbai News: मुन्ना भाई के चेले

Mumbai News: मुंबई में बैग छीनने और जेब काटने की ट्रेनिंग देने वाले मुन्नाभाई ने अपने चेलों के साथ जयपुर के जौहरी बाजार से 2 बार में लाखों का माल लूट तो लिया लेकिन उस ने ऐसी कौन सी गलती की कि पकड़ा गया. नवंबर का आधा महीना बीत चुका था. गुलाबी सर्दी ने दस्तक दे दी थी. देवउठनी एकादशी के बाद सावे शुरू हो चुके थे, इसलिए राजस्थान के गुलाबी नगर जयपुर की बाजारों में काफी भीड़भाड़ थी. यहां का जौहरी बाजार दुनिया भर में मशहूर है. इस बाजार को हीरेजवाहरातों और रत्नों की मंडी भी कहा जाता है. यहां रोजाना करोड़ों रुपए का कारोबार होता है.

राजाओंमहाराजाओं के जमाने में बसे जौहरी बाजार में छोटीछोटी तमाम गलियां हैं, अलगअलग नामों से रास्ते हैं, जिन में सैकड़ों दुकानें हैं. जवाहरात व्यवसाय से हजारों लोग जुड़े हैं. खरड़ बेचने वालों से ले कर उन्हें तराशने और बेचने वाले हजारों लोगों की रोजीरोटी जवाहरातों की इस मंडी से जुड़ी है. यहां से पूरी दुनिया में हीरेजवाहरात निर्यात होते हैं, इसलिए तमाम लोग यहां दलाली भी करते हैं. राकेश पारिख भी जवाहरातों की दलाली करते थे. जयपुर की तख्तेशाही रोड पर स्थित कानोता बाग में देवी पथ पर रहने वाले राकेश पारिख छोटे से बैग में लाखों रुपए के हीरेजवाहरात ले कर घूमा करते थे. 15 नवंबर की शाम 7 बजे वह बदहवास हालत में थाना माणक चौक पहुंचे.

वह काफी घबराए हुए थे. गेट पर राइफल ले कर खड़े संतरी से उन्होंने थानाप्रभारी के बारे में पूछा तो संतरी ने एक कमरे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘साहब अंदर बैठे हैं, चले जाइए.’’

राकेश तेज कदमों से चलते हुए सीधे थानाप्रभारी के कमरे में पहुंचे. थानाप्रभारी राम सिंह अपने 2-3 मातहतों के साथ किसी मसले पर चर्चा कर रहे थे. अनजान आदमी को कमरे में देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘कहिए, क्या काम है?’’

घबराए राकेश ने कहा, ‘‘साहब, मैं लुट गया. मुझे इंचार्ज साहब से बात करनी है.’’

थानाप्रभारी राम सिंह ने राकेश पारिख को कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘मैं ही थानाप्रभारी हूं, आप आराम से बैठ कर पूरी बात बताइए. आप के साथ क्या हुआ?’’

थानाप्रभारी के कहने पर राकेश पारिख कुर्सी पर बैठ गए. लेकिन उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. उन की जुबान सूख गई थी. उन की हालत देख कर थानाप्रभारी ने उन्हें पानी पिलवाया तो उन्होंने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम राकेश पारिख है. मैं जवाहरातों की दलाली करता हूं. आज बाजार में लुटेरों ने मुझे लूट लिया.’’

राकेश को सांत्वना देते हुए थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आप के साथ क्या और कैसे हुआ, विस्तार से बताइए? मैं यकीन दिलाता हूं कि पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी.’’

थानाप्रभारी के सांत्वना देने पर राकेश के अंदर थोड़ा साहस आया. उन्होंने कहा, ‘‘शाम साढ़े पांच बजे के करीब मैं मोती सिंह भौमियो के रास्ते बैग ले कर एक व्यापारी के पास जा रहा था. बैग में कीमती हीरेजवाहरात और नकद रुपए थे. चंद्रमहल कौंप्लैक्स के बाहर 7-8 लोगों ने मुझे घेर लिया. मैं कुछ समझ पाता, तभी किसी ने पीछे से मेरे हाथ से बैग छीन लिया. उन लोगों ने मुझे इस तरह गुमराह कर दिया कि मैं कुछ नहीं कर सका. जब वे लोग निकल गए तो मैं चिल्लाया ‘पकड़ो-पकड़ो’, लेकिन तब तक वे सभी अपना काम कर के निकल चुके थे.’’

इतना कहतेकहते राकेश रुआंसे हो गए. उन्होंने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘उन लोगों ने मुझे बरबाद कर दिया साहब.’’

ध्यानपूर्वक राकेश पारिख की बातें सुन रहे थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘आप बरबाद कैसे हो गए?’’

‘‘साहब, मेरे उस बैग में 50 लाख रुपए के हीरेजवाहरात और 20 लाख रुपए नकद थे.’’ राकेश ने सिर पकड़ कर कहा.

राकेश पारिख की बात सुन कर थानाप्रभारी राम सिंह सन्न रह गए. जौहरी बाजार में दिनदहाड़े 70 लाख रुपए की इस तरह की लूट होना हैरानी की बात थी. दिन भर जगहजगह पुलिस की गश्त होने की वजह से जौहरी बाजार में आमतौर पर इस तरह की वारदातें नहीं होतीं. इसलिए थानाप्रभारी सहित वहां मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों को राकेश पारिख की बात पर एकबारगी विश्वास नहीं हुआ. लेकिन एकदम से अविश्वास भी नहीं किया जा सकता था. थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों एडीशनल डीसीपी (उत्तर) ज्ञानचंद यादव एवं माणक चौक सर्किल के एसीपी आलोक शर्मा को घटना की सूचना देने के साथ इस घटना की असलियत का पता लगाने के लिए सबइंसपेक्टर राजेश कुमार और तेजतर्रार हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह को राकेश पारिख के साथ घटनास्थल पर भेज दिया.

सबइंसपेक्टर राजेश कुमार ने राकेश पारिख के साथ घटनास्थल पर पहुंच कर चंद्रमहल कौंप्लैक्स के आसपास के व्यापारियों से पूछताछ की तो वहां इस तरह की कोई लूट होने की किसी ने पुष्टि नहीं की. हां राकेश पारिख की ‘पकड़ो-पकड़ो’ की आवाज सुनने की बातें 2-4 व्यापारियों ने जरूर स्वीकार की. इस के बाद सबइंसपेक्टर राजेश कुमार और हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह ने थाने वापस आ कर थानाप्रभारी राम सिंह को सारी बातें बताईं. सबइंसपेक्टर की बातें सुन कर थानाप्रभारी के सामने पसोपेश की स्थिति पैदा हो गई. राकेश पारिख 70 लाख रुपए की लूट की बात कह रहे थे. जबकि घटनास्थल पर घटना की पुष्टि नहीं हो रही थी. उन्होंने मामले की तह तक पहुंचने के लिए राकेश पारिख से विस्तार से सारी बातें बताने को कहा.

राकेश पारिख ने उस दिन की अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘साहब, घर से भोजन करने के बाद मैं स्कूटर से पहले गणेशजी के मंदिर गया. इस के बाद मोतीडूंगरी के जैन मंदिर दर्शन कर के अन्य काम करता हुआ दोपहर करीब 3 बजे पीतलिया का चौक पहुंचा. वहां हीरावतजी से 6 लाख रुपए लिए. इस के बाद शाम करीब साढ़े 4 बजे पैदल ही नेशनल हैंडलूम के सामने से होते हुए मोती सिंह भौमियों का रास्ता पहुंचा.

‘‘वहां से रत्ना सागर होते हुए राजीव सौगानी के औफिस गया. निखिलजी को एक दिन पहले दिए हीरे के 10 सेट उन से वापस लिए. उन के यहां चाय पी और करीब आधा घंटे तक गपशप करने के बाद दूसरे व्यापारी के पास जा रहा था कि तभी चंद्रमहल के पास यह घटना घट गई.’’

राकेश ने थोड़ा रुक कर आगे कहा, ‘‘लुटेरे मेरा जो बैग छीन कर ले गए हैं, वह हरे रंग का था. उस बैग में हीरे के 10 सेट, कुंदन के 3 पेंडेंट सेट, 20 लाख रुपए नकद के अलावा चैकबुक, पिता गंगाराम पारिख के नाम का यूटीआई का एक चैक और मेरे परिचय पत्र की फोटोकौपी आदि रखी थी.’’

राकेश पारिख से मिली जानकारी के आधार पर थानाप्रभारी राम सिंह ने हीरावतजी और निखिलजी को फोन कर के इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने राकेश को 6 लाख रुपए नकद एवं हीरे के 10 सेट दिए थे या नहीं? दोनों से राकेश पारिख के बयान की पुष्टि होने पर थानाप्रभारी को विश्वास हो गया कि राकेश सच बोल रहे हैं. थानाप्रभारी राम सिंह गंभीर हो गए और तुरंत एक्शन लेते हुए जयपुर से बाहर जाने वाले रास्तों पर नाकेबंदी का आदेश दे दिया. इसी के साथ अलगअलग पुलिस टीमें गठित कर रेलवे स्टेशन. बसस्टैंडों के अलावा होटलों में पता लगाने के लिए भेज दिया. राकेश पारिख की रिपेर्ट थाना माणक चौक में अपराध संख्या 404/2014 पर भादंवि की धारा 392 के तहत दर्ज कर ली गई थी.

शुरुआती जांच से तय हो गया था कि राकेश पारिख के साथ हुई लूट की घटना झूठी नहीं थी. थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों के निर्देशन में अलगअलग पुलिस टीमें गठित कर उन्हें अलगअलग जिम्मेदारियां सौंप दी थीं. जांच दल में सबइंसपेक्टर राजेश कुमार, एएसआई कृष्ण कुमार, हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह, कांस्टेबल विनीत कुमार, महावीर सिंह, संजय डांगी व रामनिवास को शामिल किया गया था. पुलिस टीमों ने घटनास्थल के आसपास की सीसीटीवी फुटेज व मोबाइल फोनों की लोकेशन के अलावा बड़े शहरों में इस तरह की लूट को अंजाम देने वाले गिरोहों के बारे में जानकारियां जुटाईं. पुलिस इस मामले की जांच में जुटी ही थी कि उसी बीच 15 जनवरी, 2015 को वैसी ही एक और घटना घट गई.

जयपुर के थाना कानोता के मीणा पालड़ी के रहने वाले अशोक पटवा ने थाना माणक चौक में रिपोर्ट दर्ज कराई कि पटवागिरी का काम करने वाले ह ज्वैलरी के शोरूम से माल ले कर उन की धागा पुआई कर के लौटा देते थे. 15 जनवरी को उन्होंने एमआई रोड स्थित चमेली मार्केट से राहुल जैन से 50 चांदी के पेंडेंट पुआई हेतु लिए. शाम करीब सवा 5 बजे वह राहुल की दुकान से माल ले कर पैदल ही चले जा रहे थे. सवा छह बजे के करीब वह जौहरी बाजार स्थित बौंबे बूट हाउस के पास बरामदे में पहुंचे तो पीछे से 7-8 लोगों ने उन्हें घेर लिया और उन के हाथ से बैग छीन कर भाग गए. उन्होंने शोर मचाया, लेकिन तब तक लुटेरे भाग चुके थे.

जौहरी बाजार में 2 महीने में एक जैसी लूट की 2 घटनाएं घट जाने से पुलिस अधिकारी चिंतित हो उठे. हीराजवाहरात व्यवसायियों में भी असुरक्षा की बात उठने लगी. क्योंकि लुटेरों ने भीड़ाभाड़ वाले स्थानों पर शाम के समय जिस तरह से लूट की थी, वह जिगरा वालों का ही काम हो सकता था. दोनों वारदातों में ज्वैलरी व जवाहरात के व्यवसाय से जुड़े लोगों को निशाना बनाया गया था और दोनों ही बार लुटेरों की संख्या 7-8 होने की बात सामने आई थी, जिन्होंने व्यापारी को घेर कर बैग छीन लिया था. इस घटना के बाद पुलिस ने नए सिरे से रणनीति बनाई. दोनों मामलों की नए सिरे से जांच शुरू हुई. राकेश पारिख से लूट के मामले में सीसीटीवी फुटेज एक बार फिर से खंगाली गई. जांच टीम में शामिल हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह को एक फुटेज में राकेश पारिख के आसपास 4-5 युवकों का घेरा नजर आया. इन में एक युवक मोबाइल फोन पर बातें करता दिखाई दिया.

इस से हरिओम सिंह को एक क्लू मिल गया. उन्होंने अपने संपर्क सूत्रों से सूचनाएं जुटा कर जांच आगे बढ़ाई. हरिओम सिंह ने उच्चाधिकारियों को सूचनाएं दे कर उन के निर्देशन में अपराध और अपराधियों की कडि़यां जोड़ीं. इन कडि़यों के आधार पर थाना माणक चौक पुलिस ने मुंबई में डेरा डाल दिया. जयपुर पुलिस की मेहनत रंग लाई और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की अंधी गलियों में चलने वाले लूट के एक ट्रेनिंग स्कूल का खुलासा हो गया. इसी के साथ मुंबई के ऐसे लुटेरे गिरोह का पता चला, जिस की कई राज्यों की पुलिस को तलाश थी. मुंबई में बदमाशों को लूट की ट्रेनिंग देने वाले कुख्यात सरगना मुन्नाभाई को भी गिरफ्तार करने में जयपुर पुलिस को सफलता मिली. मुन्नाभाई के अलावा 6 अन्य कुख्यात अपराधी भी पकड़े गए. ये अपराधी लूट की रकम को नशा और अय्याशी में उड़ाते थे.

रोजाना डांस बार में जाना और रुपए लुटाना इन के शौक थे. इन अपराधियों की बार डांसरों के अलावा कई अन्य लड़कियों से दोस्ती थी. उन्हीं लड़कियों पर ये लूट का पैसा खर्च करते थे. एकएक बदमाश का रोजाना का खर्च 10 से 15 हजार रुपए तक था. मुन्नाभाई के ये शागिर्द आपस में एकदूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे. उन्हें एकदूसरे का न तो असली नाम पता था और न ही पता ठिकाना. इस के बावजूद ये लोग गिरोह के रूप में वारदात करते थे. लूट की वारदात ये कोडवर्ड में करते थे. इन का कोडवर्ड होता था, जादू की मशीन. बैग छीनने को ये लोग कोडवर्ड में जादू करना कहते थे. शिकार को बाबू एवं धुर कहते थे. ये सिर्फ महानगरों में ही वारदातें करते थे. ये जिस शहर में वारदात करते थे, उस के बजाय आसपास के शहर में ठहरते थे. वहीं से वारदात करने वाले शहर में बस, ट्रेन या टैक्सी से जाते थे.

पहले ये ज्वैलरी, कीमती सामान और नकदी ले जाने वाले लोगों की रैकी करते थे. शिकार मिल जाने पर ये गिरोह बना कर उसे घेर लेते थे. इसी बीच एक बदमाश बैग छीन कर भाग जाता था तो उस के बाद बाकी के साथी पीडि़त को अपनी बातों में लगा लेते थे. जब उन का साथी निकल जाता था तो उसे तलाशने के बहाने वे भी रफूचक्कर हो जाते थे. काम हो जाने के बाद वे उस शहर को छोड़ कर सीधे मुंबई के लिए रवाना हो जाते थे. इस गिरोह की मुंबई के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों की पुलिस को तलाश थी. इस गिरोह में मुंबई के छोटेबड़े सैकड़ों अपराधी हैं.

जयपुर पुलिस ने हीरेजवाहरातों की लूट के मामले में मुंबई के कापड़ बाजार माहिम के रहने वाले मुन्नाभाई उर्फ यूसुफ खान उर्फ मुन्ना सरकार के अलावा मुंबई में नाला सोपारा, ठाणे के रहने वाले नुमान अजीम शेख उर्फ इब्बू उर्फ बाबू उर्फ गब्बू, मुंबई में सुंदरनगर कालोनी शाही दर्शन बिल्डिंग अंधेरी ईस्ट के रहने वाले साजिद रियासत खान उर्फ इमरान उर्फ चिकना. मुंबई की बिस्मिल्ला चाल कमेटी साइन धारावी डिपो के रहने वाले राजू बाबू तांबे उर्फ रज्जाक, मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और आजकल मुंबई के माहिम दरगाह रेती बंदर के रहने वाले मोहम्मद नासिर, मूलरूप से कोलकाता और आजकल मुंबई ईस्ट में अंधेरी बस स्टौप मां महाकाली गुफा के पास रहने वाले सरफराज आलम उर्फ मोहन, मुंबई में जोगेश्वरी ईस्ट अंधेरी के रहने वाले अलताफ खान उर्फ सुजात को गिरफ्तार किया था.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पता चला कि मुन्नाभाई मुंबई में लूट गिरोह से जुड़े बदमाशों को लूट के लिए हत्थी मार कर बैग छीनने और बचने के तरीके बताने की ट्रेनिंग देता था. वह अपने स्कूल में टे्रनिंग देने के साथ संगठित गिरोह भी चलाता था. इस के अलावा वह अन्य गिरोह के बदमाशों के साथ भी वारदात करता था. वह वारदात के समय अन्य बदमाशों के साथ ठहरता तो था, लेकिन वारदात में खुद शामिल नहीं होता.

59 वर्षीय मुन्नाभाई ने देश के विभिन्न शहरों में सैकड़ों वारदातें की थीं. वह 14 नवंबर को गिरोह के संचालक इब्बू उर्फ गब्बू और साजिद रियासत उर्फ चिकना समेत करीब 10 बदमाशों के साथ जयपुर आया था. ये सभी जयपुर में सिंधी कैंप, विधायकपुरी व हसनपुरा इलाके के 4 अलगअलग होटलों में ठहरे थे. होटलों में ठहरने के लिए मुन्नाभाई ने खुद का पहचान पत्र दिया था. इस से पहले 13 नवंबर को ये अजमेर गए थे, जहां एक रात रुक कर दरगाह में जियारत की थी. उस के बाद अगले दिन जयपुर आए थे.

नुमान अजीम शेख उर्फ इब्बू उर्फ बाबू उर्फ गब्बू का पिता अजीम शेख फिल्म यूनिट में स्पौट ब्वौय का काम करता था. इब्बू दसवीं फेल है. उस ने मुंबई के नेशनल उर्दू हाईस्कूल जोगेश्वरी से 2008 में पढ़ाई छोड़ दी थी. इस के बाद उस ने एयर कंडीशनर रिपेयरिंग का डिप्लोमा किया था, लेकिन मेहनत का काम उस से हो नहीं सका और वह अपराध की दुनिया में उतर गया. इब्बू के खिलाफ मुंबई के विभिन्न थानों में कई मामले दर्ज हैं. वह कई बार जेल जा चुका है. वह चरस, गांजा, स्मैक, कोकीन से ले कर तमाम नशे करता था. सन् 2010 में नशे के अपने साथियों से इब्बू को पता चला कि मुन्नाभाई मुंबई का सब से बड़ा बैग लिफ्टर है और अपना गिरोह चलाता है. इस के बाद वह माहिम की दरगाह पर मुन्नाभाई से मिला. इस के बाद मुन्नाभाई के साथ वारदात करने लगा.

सन 2010 में इब्बू ने अपने गिरोह के साथ दिल्ली के चांदनी चौक से करोड़ों रुपए का माल लूटा था. मुन्नाभाई को इब्बू चाचू कहता है, जबकि मुन्नाभाई की बीवी जरीना उसे भाई कहती थी. पत्नी नीलोफर इब्बू पर जान छिड़कती थी, लेकिन इब्बू के मोबाइल में कई लड़कियों के नंबर मिले हैं. साजिद रियासत खान उर्फ इमरान उर्फ चिकना दसवीं तक पढ़ा है. पिता रियासत खान कारपेंटरी का काम करते थे. साजिद ने शुरू में आइस क्यूब फैक्ट्री में काम किया, उस के बाद कैटरिंग, बैंक की रिकवरी, मोबाइल की दुकान से ले कर ज्वैलरी की दुकान तक पर काम किया. सन 2008 में वह अपराध के दलदल में आ धंसा.

उस के खिलाफ मुंबई के कई थानों में लूट के मुकदमे दर्ज हैं. 4 बार पकड़ा जा चुका है. कई बार जेल जा चुका है. उस की मुन्नाभाई से जब से जानपहचान हुई है, तब से गिरफ्तार होने पर वही उस की और उस के साथियों की जमानत कराता था. राजू बाबू तांबे उर्फ रज्जाक 18 साल से जेब काटने व बैग छीनने का काम कर रहा था. अपराध करतेकरते वह इतना शाहिर हो चुका था कि उसे अपनी छठी इंद्रिय से पता चल जाता था कि किस के बैग में कितना माल हो सकता है. बैग में रकम है या कोई कीमती चीज, वह बैग देख कर ही जान लेता था.

इन्हीं बदमाशों ने 15 नवंबर को जयपुर के जौहरी बाजार में राकेश पारिख का हीरे जवाहरातों व नकदी से भरा बैग लूटा था. इस के बाद ये तुरंत अजमेर चले गए थे और वहां से मुंबई. वहीं उन्होंने माल का बंटवारा किया. जनवरी में ये फिर जयपुर आए और इस बार अशोक पटवा को अपना शिकार बनाया. इब्बू और चिकना इतने शातिर हैं कि इन्होंने अपने गुरु मुन्नाभाई को भी चूना लगा दिया था. राकेश पारिख का बैग लूटने के बाद दोनों ने औटो से होटल जाने तक अपने साथियों की नजर बचा कर बैग से डायमंड के 6 नैकलेस एवं एक बगड़ी निकाल ली थी. इन में एक नैकलेस इब्बू ने अपने पास रख लिया था और एक नैकलेस चिकना को दे दिया था. बाकी के 4 नैकलेस और एक बगड़ी मुंबई पहुंच कर मकसूद उर्फ इमाम की मार्फत एक मारवाड़ी को बेच दिए थे.

नैकलेस और बगड़ी बेच कर मिले साढ़े 6 लाख रुपए दोनों ने आपस में बांट लिए थे. दूसरी ओर मुंबई पहुंच कर मुन्नाभाई ने राकेश पारिख के बैग से मिले माल का बंटवारा किया. उस में से 12 लोगों को उन के काम के हिसाब से रुपयों का बंटवारा किया गया. जयपुर पुलिस ने भले ही इस गिरोह के सरगना समेत 7 सदस्यों को पकड़ लिया है, लेकिन जब तक मुन्नाभाई जैसे लोग अपराधों की ट्रेनिंग देते रहेंगे, तब तक अपराध की विषबेल फलतीफूलती रहेगी. Mumbai News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories : आस्था की चोरी

Crime Stories : उदय कोलते को आस्था से इसलिए नफरत हो गई थी क्योंकि उस की पत्नी उसे छोड़ कर चली गई थी और जेल जाने की वजह से घर वाले उस से नफरत करने लगे थे. इसलिए उस ने बदला लेने के लिए मंदिरों में चोरियां शुरू कर दीं. एक बड़ी चोरी में उस के हाथ मोटा माल लगा भी, लेकिन…

बोरीवली थाने के एपीआई जी.एस. घार्गे डिटेक्शन रूम में अपने सहकर्मियों के साथ एक शातिर बदमाश से पूछताछ कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. असमय आई इस काल को वह रिसीव नहीं करना चाहते थे. काल डिस्कनेक्ट करने के लिए उन्होंने जेब से फोन निकाला तो उन की नजर फोन की स्क्रीन पर आ रहे नंबर पर पड़ी. उस नंबर को देख कर घार्गे की आंखों में चमक बढ़ गई क्योंकि वह नंबर उन के एक खास मुखबिर का था.

एपीआई घार्गे तुरंत डिटेक्शन रूम से बाहर लौबी में आ गए और काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘यस थर्टी फोर, बहुत दिनों से गायब हो. कोई काम की खबर भी नहीं दे रहे?’’

तभी मुखबिर बोला, ‘‘सर, कोई आप के काम की खबर होती तो जरूर फोन करता. अब जो खबर देने जा रहा हूं उसे सुन कर आप उछल पड़ेंगे.’’

‘‘बताओ क्या खबर है?’’ घार्गे ने उतावलेपन से पूछा.

‘‘सर, रत्नागिरी का कुख्यात सेंधमार और सजायाफ्ता चोर उदय मुंबई में देखा गया है. पता चला है कि वह आज करीब 3 बजे बोरीवली के गोखले कालेज के पास स्थित वामन हरी पेठे ज्वैलर्स के पास वाली गली में किसी को चोरी का मोटा माल देने या बेचने आने वाला है.’’

एपीआई घार्गे ने यह सुना तो उन की आंखों में चमक बढ़ गई. उन्होंने कलाई घड़ी में देखा. उस समय दोपहर के 12 बज रहे थे. उन्होंने मुखबिर से कहा, ‘‘तुम 2 बजे गोखले कालेज के पास पहुंच जाना, मैं स्टाफ के साथ वहीं मिलूंगा. मैं देखता हूं, आज उदय पुलिस के हाथों से कैसे बच कर जाएगा?’’

मुखबिर से बात कर के घार्गे फिर से डिटेक्शन रूम में पहुंच गए. वे मन ही मन संकल्प कर चुके थे कि आज हर हालत में उदय को दबोचना है. उदय नाम के उस सेंधमार ने महाराष्ट्र पुलिस की नींद उड़ा रखी थी. करीब डेढ़ बजे एपीआई घार्गे अपने सहयोगी औफिसर एपीआई जी.डी. पिसाल, हवलदार नेहरू पाटिल, बबन बबाटे, अशोक खोत, शकील शेख, रंजीत शिंदे, निलेश सांबरेकर, सचिन केलजी और सचिन खताते के साथ सादा वेश में प्राइवेट कारों से बोरीवली पश्चिम स्थित शिंपोली रोड पर गोखले कालेज के पास पहुंच गए. मुखबिर वहां पहले से मौजूद था.

वहां पहुंचते ही सभी पुलिसकर्मियों ने 2-2, 3-3 के ग्रुपों में विभाजित हो कर शिंपोली रोड पर अपना जाल फैला लिया. पुलिस को वहां इंतजार करतेकरते साढ़े 4 बज गए लेकिन उदय कहीं नजर नहीं आया. घार्गे को लगने लगा था कि खबर शायद गलत मिली है. वह दूर खड़े मुखबिर से इस सिलसिले में फोन पर बातें कर ही रहे थे कि तभी मुखबिर ने कहा, ‘‘शिकार जाल में फंसने आ चुका है साहब. हाथों में ट्रौली वाली बैग थामे हरे रंग की शर्ट वाला जो शख्स आप की ओर आ रहा है, वही उदय है. आप उसे संभालिए, मैं यहां से जा रहा हूं.’’

घार्गे ने चौंकते हुए सड़क के दूसरे किनारे की तरफ देखा तो सचमुच एक शख्स हाथ में एक ट्रौली बैग उठाए चला आ रहा था. घार्गे ने अपने स्टाफ को इशारा किया और वह खुद भी तेजी से उदय की ओर बढ़ गए. 2 मिनट के अंदर पुलिस दल ने सेंधमार उदय को दबोच कर उस का बैग अपने कब्जे में ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना नाम उदय बताया. पुलिस ने जब बैग की तलाशी ली तो उस में देवीदेवताओं की अनेक मूर्तियां व सोनेचांदी के आभूषण निकले. इतना बहुमूल्य सामान देख कर एपीआई घार्गे दंग रह गए थे. पुलिस ने जब पूछा कि ये सोनेचांदी के आभूषण किस के हैं और सारी मूर्तियां वह कहां से लाया है तो वह इस का कोई जवाब नहीं दे पाया.

इस बीच वहां तमाम लोग इकट्ठे हो गए थे. वहां मौजूद लोगों के सामने बैग के सामान की गिनती की गई तो उस में बहुमूल्य धातु की 8 मूर्तियां, चांदी के 8 मुखौटे, सोने की 61 अनुकृतियां, 2 सोने व 2 चांदी की चेन, एक सोने का गंडा (बे्रसलेटनुमा), एक चांदी का पालना, चांदी के 6 पत्ते, चांदी के 15 सिक्के आदि चीजें मिलीं. इस सामान की कीमत अनुमानत: 15-20 लाख रुपए थी. पुलिस को अनुमान नहीं था कि उस के पास से चोरी का इतना सामान मिल जाएगा.

पुलिस उदय को गिरफ्तार कर के बोरीवली थाने ले आई. शातिर चोर के गिरफ्तार होने की बात पता चलते ही डीसीपी बालसिंह राजपूत एवं सीनियर पीआई नारायण खैरे भी बोरीवली थाने पहुंच गए. इस उपलब्धि पर पुलिस अधिकारियों ने एपीआई घार्गे की सराहना की. उदय ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि उस ने सारा सामान मंदिरों से चुराया है. चूंकि उस से विस्तार से पूछताछ करनी थी, इसलिए पुलिस ने उदय को बोरीवली मैट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर के 29 नवंबर, 2014 तक के लिए उस का पुलिस रिमांड ले लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने जब उदय से पूछताछ की तो पता चला कि उस का चोरी का तरीका बिलकुल फिल्मी था. चोरियां करतेकरते यह आस्तिक चोर देवीदेवताओं से अचानक नफरत क्यों करने लगा, इस की एक दिलचस्प कहानी सामने आई. महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले की तहसील लांजा में एक छोटा सा गांव है शिपुशी. इसी गांव के रहने वाले सुधाकर कोलते का बेटा था उदय. उदय बचपन से ही कामचोर और उद्दंड प्रवृत्ति का था. मांबाप के लाड़प्यार में वह बिगड़ गया था.

वह दिन भर गांव के आवारा युवकों के साथ घूमता. उन के साथ रह कर उस ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. बातबात पर गांव वालों से झगड़ा व मारपीट करने की वजह से गांव में वह दबंग के रूप में जाना जाने लगा था. उस की करतूतों से उस के घरवाले परेशान रहने लगे थे. उन्होंने उसे बहुत समझाया लेकिन उदय ने मांबाप की एक नहीं सुनी. जब उदय के परिजनों को लगा कि उदय उन के समझाने से सुधरने वाला नहीं है तब उन्होंने तय किया कि उस की शादी करा दी जाए. हो सकता है, पत्नी के समझाने पर वह अपनी जिम्मेदारियों को समझे और अपनी बुरी आदतें छोड़ दे. उन्होंने अपने रिश्तेदारों आदि से उदय के लिए कोई लड़की देखने को कहा. पर आवारा, बेरोजगार व शराबी उदय को भला कौन शरीफ बाप अपनी बेटी का हाथ देता.

काफी कोशिशों के बाद भी उदय की शादी नहीं हो सकी तो वह बाजारू औरतों के पास जाने लगा. रोजरोज उन के पास जाने के लिए उसे पैसों की जरूरत पड़ने लगी. शराब व अय्याशी के लिए पैसे जुटाने के लिए उस के कदम जरायम की तरफ बढ़ गए. ज्यादा पैसे कमाने के लिए उस ने दोस्तों के साथ सेंधमारी शुरू कर दी. शुरुआत उस ने पड़ोस के गांव के एक मकान से की थी. मकान मालिक पूरे परिवार के साथ अपने एक रिश्तेदार की शादी में गया हुआ था, तभी उस ने रात करीब 2 बजे खाली पड़े मकान का ताला तोड़ा और घर में रखी नकदी, ज्वैलरी आदि सामान चुरा लिया. मकान मालिक जब घर लौटा तो उस ने घर का कीमती सामान गायब पाया.

इस की रिपोर्ट उस ने थाना लांजा में दर्ज कराई. पुलिस ने इस मामले को लाख खोलने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली. पहली वारदात की कामयाबी से उदय की हिम्मत और बढ़ गई. इस के बाद वह धड़ाधड़ वारदातें करता चला गया. एक साल के अंदरअंदर सेंधमारी के करीब 8 मामले लांजा व आसपास के पुलिस स्टेशनों में दर्ज तो हुए परंतु पुलिस उदय तक नहीं पहुंच पाई. दूसरी ओर वारदात की रकम से उदय व उस के साथी ऐश करते रहे. उदय अब बनठन कर रहने लगा. कोई पूछता तो वह कह देता कि वह शहर में बिजनैस करता है.

जब उस के बिजनैस करने की बात फैली तो रंजना नाम की एक लड़की से उस की शादी हो गई. रंजना अत्यंत सुंदर व संस्कारी थी. वह तो यही समझती थी कि उस का पति कोई बिजनैस करता है. इसलिए वह भी ठाठबाट से रहती. लेकिन उसे क्या पता था कि पति का असली बिजनैस चोरी है. कई साल बीत गए लेकिन शातिर उदय ने पत्नी को सच्चाई पता नहीं चलने दी. इस बीच वह 2 बच्चों की मां भी बन चुकी थी. शातिरदिमाग उदय अपने खास दोस्त के साथ ही वारदात करता था. इसलिए उस के कारनामों का किसी को पता नहीं चला. लोग यह तो जानते थे कि उदय दबंग है और लड़नेमरने को तैयार रहता है. लेकिन वह शातिर चोर है, इस हकीकत से कोई वाकिफ नहीं था. इसी के चलते वह एक के बाद एक वारदात करता चला गया.

इस दौरान रत्नागिरी के विभिन्न पुलिस थानों में 24 वारदातें दर्ज की गईं. लेकिन पुलिस यह तक पता नहीं लगा पाई कि इन वारदातों को अंजाम किस ने दिया. उधर अखबारों में पुलिस की नाकामी की खबरें छपने से पुलिस की किरकिरी हो रही थी. इस से संबंधित थानाप्रभारियों पर जिले के पुलिस अधिकारियों का दबाव बढ़ रहा था. इस के बाद पुलिस ने रातदिन एक कर के जैसेतैसे चोर का पता लगा ही लिया. जब उन्हें पता चला कि वह शातिर चोर उदय है तो एक दिन लांजा पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ करने के बाद पुलिस ने चोरी के कई मामलों का खुलासा किया और उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

रंजना को जब पति की सच्चाई पता चली तो उसे बड़ा दुख हुआ. गुस्से में वह बच्चों को साथ ले कर वहां से चली गई. उस के खिलाफ न्यायालय में कई साल केस चला और उसे 4 साल की सजा सुनाई गई. जेल में रहते हुए उदय को जब पत्नी के चले जाने की जानकारी मिली तो उसे गहरा सदमा पहुंचा. वह इस कुदरत का खेल समझने लगा, इसलिए उसे भगवान के नाम से ही नफरत हो गई. उस ने तय कर लिया कि उस ने अब तक इंसानों के घरों की तिजोरियां साफ की हैं, लेकिन जेल से रिहा होने के बाद अब मंदिरों की दानपेटियों आदि सामान पर हाथ साफ करेगा. उदय ने जेल में रहने के दौरान ही साथी कैदियों से सुना था कि पंचधातु व अष्टधातु की मूर्तियां करोड़ों में बिकती हैं.

रत्नागिरी से उदय का मन पूरी तरह से उचट गया था, इसलिए उस ने तय कर लिया कि वहां से किसी दूसरे शहर चला जाएगा. 4 साल की सजा पूरी करने के बाद उदय जेल से छूट कर घर पहुंचा तो उस ने महसूस किया कि गांव के लोग ही नहीं बल्कि उस के घर वाले भी उसे नफरत की निगाह से देखते हैं. मांबाप की निगाहों में नफरत थी और पत्नी उसे छोड़ कर चली ही गई थी. पुराने यारदोस्त भी उस से कन्नी काटने लगे थे. इन सब के लिए भी वह भगवान को ही दोषी मान रहा था. अब वह ऐसे मंदिरों की तलाश में था जहां से उसे मोटा माल मिल सके. चोरी कर के वह भगवान से प्रतिशोध ले सके. तभी उसे लांजा तहसील से 18 किलोमीटर दूर रुण गांव में स्थित अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के बारे में जानकारी मिली.

उसे पता चला कि वहां रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं. मुराद पूरी होने पर तमाम लोग वहां नकदी के अलावा कीमती ज्वैलरी आदि भी दान देते हैं. किस तरह काम को अंजाम दिया जाए इस की रेकी करने के लिए वह श्रद्धालु बन कर कई बार उस मंदिर में गया. उसे पता चला कि मंदिर में सुरक्षा के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है. वहां सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे थे. उसे यह भी जानकारी मिली कि सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ही मंदिर के मुख्य गेट का ताला खोलता है. फिर रात 8 बजे की आरती के बाद मुख्य गेट पर ताला लगा कर वह अपने घर चला जाता है. उस का घर पास के ही गांव में था. यानी रात 8 बजे से सुबह 7 बजे तक मंदिर में कोई नहीं होता था. वह समझ गया कि एक ताले के भीतर लाखों की संपत्ति बंद रहती है.

उदय ने तय कर लिया कि इसी मंदिर की संपत्ति व मूर्तियों पर हाथ साफ कर के वह मुंबई भाग जाएगा और वहां अलग नाम व अलग पहचान के साथ शान की जिंदगी जीएगा. इस के बाद वह फिर कभी चोरी नहीं करेगा. रेकी करने के बाद उदय को लगा कि मंदिर से इतने सामान की वह अकेले चोरी नहीं कर पाएगा. इसलिए वह एक ऐसे साथी की तलाश में लग गया जो विश्वसनीय हो. उस ने दिमाग दौड़ाया तो उसे अपना एक पुराना बेराजगार मित्र सचिनधनाजी बुवड याद आया. उदय को भरोसा था कि पैसों के लालच में सचिन उस का साथ देने के लिए तैयार हो जाएगा.

उदय ने सचिन से संपर्क किया और उसे रत्नागिरी के एक बीयर बार में ले गया. बातचीत के दौरान ही उदय जान गया था कि सचिन अब भी बेरोजगार है और वह भुखमरी के दौर से गुजर रहा है. मौके का फायदा उठाते हुए उदय ने उसे अपनी योजना बताई. लालच में आ कर सचिन उस का साथ देने को तैयार हो गया. इस के बाद योजना को किस तरह अंजाम देना है, दोनों ने इस की रूपरेखा तैयार कर ली. 23 सितंबर, 2014 की रात 9 बजे उदय व सचिन ने लांजा में शराब पी और ताला आदि तोड़ने के कुछ औजार ले कर रात करीब 11 बजे बस द्वारा रुण गांव जा पहुंचे. रात 2 बजे तक वे एक खेत में छिपे रहे. सुनसान होने के बाद वे अथलेश्वर काल भैरव मंदिर के मुख्य गेट पर पहुंचे. उदय ने अपने साथ लाए औजार से मुख्य गेट का ताला काट दिया.

ताला काट कर वे दोनों मंदिर के भीतर पहुंच गए. सब से पहले इन लोगों ने दानपेटी का ताला तोड़ कर उस की सारी रकम प्लास्टिक की एक बोरी में भर ली. इस के बाद इन्होंने दूसरी बोरी में मंदिर की सभी 8 मूर्तियां, 6 अनुकृतियां, सोने व चांदी के आभूषण आदि भर लिए. अपना काम करने के बाद वे वहां से निकल लिए. सुबह 7 बजे मंदिर का पुजारी मंदिर पहुंचा तो मंदिर के मुख्य द्वार का ताला कटा देख उस के होश उड़ गए. वह भागाभागा मंदिर के भीतर गया तो वहां न मूर्तियां थीं और न मूर्तियों के आभूषण. दानपेटी भी पूरी तरह खाली थी. मंदिर खुलते ही श्रद्धालु भी आने लगे थे. मंदिर में चोरी की बात सुन कर सभी आश्चर्यचकित रह गए. पुजारी गणपत लिंगायत गुरव ने लांजा थाने में फोन कर के चोरी की सूचना दे दी.

मंदिर में चोरी होने की बात सुन कर थानाप्रभारी भी हैरान रह गए. वह पुलिस टीम के साथ तुरंत मंदिर की तरफ रवाना हो गए. तब तक वहां आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग जमा हो चुके थे. थानाप्रभारी की सूचना पर एसपी, डीएसपी, डीएम भी वहां पहुंच गए. मंदिर में इतनी बड़ी चोरी होने पर वहां मौजूद लोगों में आक्रोश था. वे पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मंदिर के गेट पर ही धरनाप्रदर्शन करने लगे. मीडियाकर्मी भी वहां पहुंच चुके थे. पुलिस प्रदर्शनकारियों को समझाने की कोशिश में लगी थी.

पुलिस अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया कि पुलिस चोरों को जल्द ही गिरफ्तार कर के चोरी गया सामान बरामद करने की कोशिश करेगी. इस आश्वासन के बाद लोग शांत हुए और उन्होंने प्रदर्शन बंद किया. इस के बाद लांजा पुलिस ने अज्ञात चोरों के खिलाफ मामला दर्ज कर के अभियुक्तों की तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने इलाके के तमाम मुखबिरों और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों से पूछताछ की परंतु लाख कोशिशों के बावजूद वह चोरों तक नहीं पहुंच सकी. इस से लांजा पुलिस की किरकिरी हो रही थी. मीडिया वाले पुलिस की जम कर खिंचाई कर रहे थे. स्थानीय राजनीतिज्ञ भी पुलिस पर दबाव बना रहे थे.

उधर उदय ने सचिन को कुछ आभूषण व नकदी दे कर जिले से बाहर भगा दिया. जबकि वह खुद नहीं भागा. शातिरदिमाग उदय को पता था कि अगर वह घर से गायब हुआ तो पुलिस को उस पर शक हो जाएगा. सारा माल घर के कबाड़ में छिपा कर उदय मामला शांत होने का इंतजार करता रहा. सितंबर से नवंबर तक जब पुलिस उस तक नहीं पहुंच सकी, तब उसे भरोसा हो गया कि अब उस पर कोई भी शक नहीं करेगा. इस के बाद एक ट्राली बैग खरीद कर उस ने सारा माल उस में भरा व चुपचाप मुंबई चला गया.

उस ने सोचा था कि वह चोरी का माल धीरेधीरे बेचेगा. मूर्तियां बेचने के लिए वह किसी ऐसे एजेंट की तलाश करेगा जो सारी मूर्तियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में बिकवा कर ज्यादा पैसे दिलवा सके. अपने मकसद में वह कामयाब होता इस से पहले ही एक मुखबिर की सूचना पर एपीआई घार्गे, एपीआई पिसाल की टीम ने उदय को सारे माल के साथ धर दबोच लिया.

बोरीवली पुलिस की सूचना पर रत्नागिरी के लांजा थाने की पुलिस भी मुंबई पहुंच गई और कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के वह उदय को अपनी हिरासत में लांजा ले गई. लांजा थाना पुलिस के उदय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. चोरी में शामिल दूसरे अभियुक्त सचिन की तलाश में कई जगहों पर दबिशें डाली गईं, लेकिन कथा संकलन तक वह गिरफ्तार नहीं हो सका. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित. कथा में कु