Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

hindi-manohar-family-crime-story

44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: जब एक बैनर ने पकड़वाया कातिल

Crime Story: पटना गया रेलवे लाइन के पास कई टुकड़ों में मिली लाश की गुत्थी को एक बैनर ने सुलझा दिया. 45 साला गीता की लाश के कुछ टुकड़े सरस्वती पूजा के लिए बने बैनर में लिपटे मिले थे. उस बैनर पर फ्रैंड्स क्लब, कुसुमपुर कालोनी, नत्थू रोड, परसा बाजार लिखा हुआ था. इस गुत्थी को सुलझाने के लिए सदर अनुमंडल पुलिस अधीक्षक प्रमोद कुमार मंडल की अगुआई में जक्कनपुर थाना इंचार्ज अमरेंद्र कुमार झा और परसा बाजार थाना इंचार्ज नंदजी प्रसाद व दारोगा रामशंकर की टीम बनाई गई. पूछताछ के बाद पता चला कि उस बैनर को रंजन और मेकैनिक राजेश अपने साथ ले कर गए थे. पुलिस ने तुरंत राजेश को दबोच लिया. राजेश से पूछताछ करने के बाद कत्ल की गुत्थी चुटकियों में हल हो गई.

गीता का कत्ल उस के अपनों ने ही कर डाला था. कत्ल से ज्यादा दिल दहलाने वाला मामला लाश को ठिकाने लगाने के लिए की गई हैवानियत थी. गीता के पति उमेश चौधरी, बेटी पूनम देवी और दामाद रंजन ने मिल कर गीता का कत्ल किया था. रंजन और उस के दोस्त राजेश ने मिल कर लाश को 15 छोटेछोटे टुकड़ों में काटा. उमेश, पूनम और राजेश को पुलिस ने दबोच लिया है, जबकि रंजन फरार है. हत्या में इस्तेमाल किए गए 3 धारदार हथियार भी पुलिस ने बरामद कर लिए हैं.

रंजन और राजेश ने गीता की लाश को चौकी पर रखा और हैक्सा ब्लेड से सब से पहले सिर को धड़ से अलग किया. सिर को काटने के बाद खून का फव्वारा बहने लगा, तो खून को एक प्लास्टिक के टब में जमा कर लिया और टौयलेट के बेसिन में डाल कर फ्लश चला दिया. उस के बाद लाश के दोनों हाथपैरों को काटा गया.

गीता की बोटीबोटी काट कर उसे कई पौलीथिनों में बांध कर दूरदूर अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. धड़ को कुसुमपुर में ही पानी से भरे एक गड्ढे में फेंक दिया गया. सिर को जक्कनपुर थाने के पास गया फेंका गया. वहीं पर हत्या में इस्तेमाल किए गए गड़ांसे और हैक्सा ब्लेड वगैरह को फेंक दिया गया.

हाथपैरों के टुकड़ों को पटनागया पैसेंजर ट्रेन में रख कर रंजन और राजेश पुनपुन रेलवे स्टेशन पर उतर गए. पटना गया पैसेंजर ट्रेन जब गया स्टेशन पहुंची, तो रेलवे पुलिस ने एक डब्बे में लावारिस बैग बरामद किया. उस बैग में हाथपैर के टुकड़े मिलने से गया पुलिस ने 18 अप्रैल को पटना पुलिस को सूचित किया. पटना पुलिस को धड़ और सिर पहले ही मिल चुके थे. शरीर के सभी हिस्सों को जोड़ने के बाद पता चला कि वह एक ही औरत की लाश है.

हत्यारों द्वारा गीता के जिस्म के टुकड़ों को अलगअलग जगहों पर फेंकने की वजह से हत्या के मामले को 3 थानों में दर्ज कराना पड़ा. गया के जीआरपी थाने में हाथपैर मिलने का, परसा बाजार में सिर मिलने का और पटना के जक्कनपुर थाने में धड़ मिलने का मामला दर्ज किया गया.

पटना के एसएसपी मनु महाराज कहते हैं कि अपराधी चाहे कितनी भी चालाकी कर ले, कोई न कोई सुबूत पुलिस के लिए छोड़ ही जाता है. गीता की हत्या करने वालों ने भी कानून की पकड़ से बचने के लिए पूरा उपाय किया था, पर उस के दामाद ने ऐसा सुबूत छोड़ दिया कि पुलिस आसानी से उन तक पहुंच गई.

कत्ल के 40 घंटे के भीतर पटना सदर पुलिस की टीम ने पूरे मामले का खुलासा कर दिया. 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया. गीता का कत्ल कर उमेश अपनी बेटी पूनम के साथ मसौढ़ी चला गया था. उस के बाद रंजन ने अपने साथ काम करने वाले दोस्त राजेश को घर पर बुलाया और उस की मदद से लाश को टुकड़ों में काट डाला. इस के बदले में रंजन ने उसे 20 हजार रुपए देने का लालच दिया था.

17 अप्रैल की रात को पूनम ने अपनी मां गीता को चिकन खाने के लिए घर पर बुलाया था. वहां उमेश और रंजन पहले से मौजूद थे. पूनम ने चिकन में नींद की गोलियां मिला दी थीं. खाना खाने के बाद गीता बेहोश हो गई. तकरीबन 5 घंटे के बाद गीता को होश आया, तो उसे काफी कमजोरी महसूस हो रही थी.

गीता ने कमरे में इधरउधर देखा, तो कोई नजर नहीं आया. किसी तरह से उस ने अपने मोबाइल फोन से तुरंत अपने प्रेमी अरमान को फोन किया और बताया कि उस की तबीयत काफी खराब लग रही है. इसी बीच गीता का दामाद रंजन कमरे में पहुंच गया और उस ने गीता को मोबाइल फोन पर किसी से बात करते हुए सुन लिया. रंजन ने गुस्से में आ कर गीता का गला दबा कर उसे मार डाला.

पुलिस की छानबीन में पता चला है कि गीता का अरमान नाम के शख्स से नाजायज रिश्ता था. इस वजह से पति और बेटी ने मिल कर उस की हत्या कर डाली. गीता हर महीने अपने पति उमेश से रुपए लेने पहुंच जाती थी और उस से उस की तनख्वाह का बड़ा हिस्सा ले कर अपने प्रेमी अरमान को दे देती थी. पिछले 20 सालों से गीता और अरमान के बीच नाजायज रिश्ता था. गीता का पति उमेश सचिवालय के भवन निर्माण विभाग में ड्राफ्टमैन था.

55 साल के उमेश की शादी 30 साल पहले मसौढ़ी के तरेगाना डीह की रहने वाली गीता से हुई थी. शादी के बाद गीता ससुराल में रहने लगी और उन के 3 बच्चे भी हुए. कुछ सालों के बाद उमेश लकवे का शिकार हो गया. पति की बीमारी का फायदा उठाते हुए गीता ने अपने पड़ोसी अरमान से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी और उस के बाद जिस्मानी रिश्ते भी बने. वह ज्यादा से ज्यादा समय अरमान के साथ ही गुजारती थी.

गीता की इस हरकत से उमेश और उस की बेटियां गुस्से में रहती थीं. उन्होंने कई दफा गीता को समझाने और परिवार को संभालने की बात की, पर गीता पर उन की बातों का कोई असर नहीं होता था. यही वजह थी कि गीता का इतनी बेरहमी से कत्ल किया गया.

गांव वालों के ताने सुन कर उमेश परेशान रहने लगा था और उस ने अपना पुश्तैनी घर भी छोड़ दिया था. उस के बाद उमेश ने कुसुमपुर वाला घर भी छोड़ दिया. कभीकभी वह मसौढ़ी में अपनी ससुराल वाले घर में रहता था, तो कभी पटना में रहता था.

एसएसपी मनु महाराज ने बताया कि हत्यारों ने हत्या में इस्तेमाल किए गए गंड़ासे और हैक्सा ब्लेड को फ्लैक्स में लपेट कर फेंका था. बैनर पर कुसुमपुर फ्रैंड्स क्लब का पता लिखा हुआ था. उसी पते के सहारे पुलिस कुसुमपुर पहुंची और फ्रैंड्स क्लब का पता कर के हत्यारों तक आसानी से पहुंच गई. Crime Story

UP Crime News: कातिल सहेलियां

UP Crime News: प्रियंका और अंजू दोनों ही बाचाल किस्म की लड़कियां थीं. उन्होंने जो किया था, उस के लिए उन्हें उम्रकैद की सजा मिली. अगर घर वालों की बात मान कर वक्त रहते दोनों सुधर गई होतीं तो उन का यह अंजाम  न होता. 2 सहेलियां  की कू्ररता का दिल दहला देने वाला कारनामा…

उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ के कचहरी परिसर स्थित जिला न्यायाधीश रामकिशन गौतम की अदालत के बाहर सुबह से ही भारी भीड़ लगनी शुरू हो गई थी. भीड़ में अधिवक्ताओं और आम लोगों के अलावा प्रिंट व इलैक्ट्रौनिक मीडियाकर्मी भी शामिल थे. भीड़ को काबू करने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था. दरअसल, न्यायाधीश गौतम की अदालत में उस दिन दोस्ती और दौलत की खातिर रिश्तों के कत्ल के लिए एक बहुचर्चित हत्याकांड की गुनाहगार 2 सहेलियों को सजा सुनाई जानी थी. ये 2 सहेलियां थीं कुमारी प्रियंका और उस की सहेली कुमारी अंजू. इंजीनियर पिता की बेटी प्रियंका ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था.

वह मेरठ की मिस ब्यूटी क्वीन भी रह चुकी थी, जबकि अंजू एनसीसी ग्रुप की कमांडो रही थी और उस ने  भी इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर रखा था. साधन संपन्न, रसूखदार और शिक्षित परिवार की खूबसूरत प्रियंका ऐसी बेरहम लड़की थी, जिस ने उच्च शिक्षित होते हुए भी सहेली से ताजिंदगी अपने रिश्तों को बनाए रखने की चाहत में अपने मातापिता के प्यार को भुला दिया था. प्रियंका न केवल साजिश की सरताज बनी, बल्कि उस ने अपने मातापिता को ही मौत की नींद सुला दिया था. इस बहुचर्चित हत्याकांड ने कानून-व्यवस्था की स्थिति व समाज को हिला कर रख दिया था.

हत्या के बाद किसी सफल अदाकारा की तरह नाटक कर के उस ने लोगों की सहानुभूति भी बटोरी. पुलिस जांचपड़ताल के दौरान साजिश की चादर में छेद नजर आने लगे तो दोनों सहेलियां बेनकाब हो गईं. अदालत में 6 साल 3 महीने में 16 गवाहों की गवाही और सबूतों के बाद आखिर 28 मई, 2015 को इस केस के फैसले का दिन आ ही गया. इस केस की बुनियाद 285 पेजों की इबारत पर टिकी थी. गहमागहमी के बीच प्रियंका और अंजू अपने अधिवक्ता के साथ अदालत में दाखिल हुईं. मीडिया से बचने के लिए दोनों ने अपने चेहरों पर रूमाल बांध रखे थे. सरकारी अधिवक्ता अनिल तोमर पहले की कई तारीखों पर जोरदार बहस कर के दोनों को सख्त सजा दिए जाने की मांग कर चुके थे.

प्रियंका व अंजू को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था. मुकदमें की सुनवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी. लिहाजा अदालत ने फैसले के लिए 28 तारीख मुकर्रर की थी. न्यायाधीश रामकिशन गौतम अपनी सीट पर आ कर बैठे तो अदालत में खामोशी छा गई. काररवाही शुरू हुई तो बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने एक बार फिर अदालत से आखिरी बार गुहार लगाई, ‘‘जज साहब, इन लड़कियों के सामने पूरी जिंदगी पड़ी हैं, आप इन्हें कम से कम सजा दें. इन्हें मौका मिलेगा तो ये अपनी गलती को सुधार लेंगी.’’

इस पर अभियोजन पक्ष के अधिवक्ता अनिल तोमर ने दो टूक कहा, ‘‘सर, कानून सभी के लिए बराबर है, इन लड़कियों ने जघन्य अपराध किया है. लिहाजा इन्हें सख्त से सख्त सजा दी जाए.’’

दोनों पक्षों की बातें सुनने के बाद न्यायाधीश ने प्रियंका और अंजू की ओर देख कर पूछा, ‘‘तुम्हें कुछ कहना है?’’ उन्होंने मासूमियत से जवाब दिया, ‘‘हमें फंसाया जा रहा है जज साहब, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

इस के बाद अदालत में खामोशी छा गई. न्यायाधीश रामकिशन गौतम ने एक नजर दोनों लड़कियों की ओर देखा और फिर लिखित फैसले को पढ़ने लगे, ‘‘प्रियंका और अंजू, दोनों का गुनाह निहायत ही संगीन रहा है. परिस्थितिजन्य साक्ष्यों और गवाहों की गवाही के अलावा दोनों के खिलाफ तमाम सबूत हैं. इन सबूतों और गवाहियों की रोशनी में यह अदालत दोनों मुजरिमों को उम्रकैद की सजा सुनाती है.’’

अदालत के सजा सुनाते ही पुलिसकर्मियों ने दोनों लड़कियों को घेर लिया. तब तक दोनों के चेहरे गमजदा हो चुके थे. दोनों को अदालत से बाहर लाया गया तो मीडियाकर्मियों के सामने दोनों ने खामोशी की चादर ओढ़ ली. पुलिस उन्हें जिला कारागार ले गई. उन्हें मिली उम्रकैद की सजा पर किसी को अफसोस नहीं था. दरअसल, 11 नवंबर, 2008 की सुबह मैडिकल थानाक्षेत्र की पौश कालोनी प्रेम प्रयाग में रहने वाली मंजू सुबह टहलने के लिए निकली तो कोठी नंबर-48 पर ताला लटका देख कर चौंक गईं. कोठी में उन की सगी बहन संतोष अपने पति सेवानिवृत्त इंजीनियर प्रेमवीर सिंह के साथ रहती थीं. मंजू भी पड़ोस में ही रहती थीं. मन में ढेरों सवाल लिए वह अपने घर पहुंचीं और यह बात पति पदम सिंह को बताई.

उन्होंने प्रेमवीर का मोबाइल फोन नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ मिला. चिंता की बात यह थी कि प्रेमवीर और संतोष पिछली शाम तक कोठी में ही थे. प्रेमवीर मूलरूप से अलीगढ़ जनपद की तहसील इग्लास के गांव रजाबल के रहने वाले  थे. करीब 10 साल पहले उन्होंने मेरठ में अपनी कोठी बनाई थी. प्रेमवीर पावर कारपोरेशन में जूनियर इंजीनियर रह चुके थे. सेवानिवृत्त होने के बाद वह घर में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी संतोष सिंह के अलावा बड़ी बेटी सोनिया, उस से छोटा बेटा गौरव और सब से छोटी और खूबसूरत बेटी थी प्रियंका उर्फ गुडि़या.

प्रेमवीर सुलझे हुए मिलनसार और व्यवहारकुशल व्यक्ति थे. बड़ी बेटी का वह एक सैन्य अधिकारी के साथ विवाह कर चुके थे. उस का पति भूटान बौर्डर पर तैनात था. बला की खूबसूरत प्रियंका सन 2005 में मिस मेरठ रह चुकी थी. शोख व चंचल प्रियंका ने ग्रेजुएट किया था और अब दिल्ली के वीमन पालीटैक्निकल कालेज, लाजपतनगर से इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी. वह वहीं हौस्टल में रहती थी. जबकि प्रेमवीर का बेटा गौरव हैदराबाद की एक निजी कंपनी में इंजीनियर था. अनहोनी की आशंका ने सताया तो पदम सिंह कुछ लोगों के साथ प्रेमवीर की कोठी पर जा पहुंचे. उस वक्त अंदर से एफएम पर गाने चलने की आवाज आ रही थी. यह बात सब को थोड़ी अजीब लगी.

घर में विदेशी नस्ल का एक कुत्ता था, वह भी दिखाई नहीं दे रहा था. संतोष या उन के पति को कहीं जाना होता था तो आदतन मंजू के घर बता कर और चाबी दे कर जाते थे. संदेह हुआ तो उन लोगों ने इस की सूचना मैडिकल थाना पुलिस को दे दी. सूचना मिलते ही मैडिकल थानाप्रभारी आर.वी. कौल अपनी टीम के साथ मौके पर आ गए. पुलिस ताला तोड़ कर कोठी के अंदर गई. अंदर कमरों में भी ताले लगे हुए थे. खिड़की का परदा हटा कर अंदर झांका गया तो सभी सन्न रह गए. बैडरूम में प्रेमवीर और संतोष की लाशें पड़ी थीं. पुलिस ने किचन का ताला तोड़ कर घर में प्रवेश किया. प्रेमवीर की लाश नीचे पड़ी थी और संतोष की लाश डबलबैड पर थी.

प्रेमवीर सिंह के सिर पर किसी भारी चीज  से प्रहार किया गया था, जबकि संतोष के चेहरे व गले पर अंगुलियों के निशान थे. दोनों के मुंह में कपड़ा ठूंसा हुआ था. डबलबैड पर खून के निशान थे. घटनास्थल को देख कर लगता था कि प्रेमवीर ने मृत्युपूर्व हत्यारों से संघर्ष किया था. उन के हाथ व अन्य स्थानों पर चोट के निशान थे. ताज्जुब की बात यह थी कि विदेशी नस्ल का बुलडौग भी कोठी में चेन से बंधा हुआ था. घर का सारा सामान अस्तव्यस्त था.

पुलिस ने घटनास्थल की बारीकी से जांचपड़ताल की तो बैडरूम में लगे लैंडलाइन फोन का वायर निकला हुआ मिला. रिसीवर पर भी खून के धब्बे लगे थे. कालर आईडी फोन डिस्प्ले स्क्रीन पर 100 नंबर की डायलिंग दिख रही थी. इस का मतलब प्रेमवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना देने का प्रयास किया था. मृतकों के रिश्तेदारों ने घर का मुआयना कर के बताया कि हत्यारे घर में रखे करीब 50 हजार रुपए नकद, लाखों के आभूषण, लगभग 5 लाख के फिक्स डिपाजिट, मोबाइल फोन व कोठी की वसीयत के कागजात ले गए थे. संतोष के कान और गले की ज्वैलरी भी लापता थी.

पुलिस ने लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतक के साढू पदम सिंह की तहरीर के आधार पर अज्ञात बदमाशों के खिलाफ हत्या व लूट का मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी रघुवीरलाल ने थाना मैडिकल पुलिस की टीम के अलावा एसओजी टीम को भी इस मामले के खुलासे में लगा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पता लगा कि प्रेमवीर और संतोष की मौत दम घुटने से हुई थी. प्रेमवीर के शरीर पर चोटों के 11, जबकि संतोष के शरीर पर 3 निशान पाए गए.

अगले दिन पुलिस ने परिवार के सभी सदस्यों से एकएक कर के पूछताछ का मन बनाया तो यह देख कर आश्चर्य हुआ कि मृत दंपति के सभी नातेरिश्तेदार तो आ गए थे, लेकिन उन की छोटी बेटी प्रियंका नहीं आई थी. पुलिस ने इस की जड़ में जाने का प्रयास किया तो चौंकाने वाली जानकारी हाथ लगी. पुलिस को पता चला कि प्रियंका का अपने परिवार से मनमुटाव चल रहा था. यह भी जानकारी मिली कि उस की एक सहेली अंजू उस की हमराज है. पुलिस जब इस मनमुटाव की जड़ में पहुंची तो पता चला कि अंजू के कहने पर प्रियंका ने अंजू के भाई से प्रेम विवाह कर लिया था.

इस मामले में प्रियंका के घर वालों ने अपहरण का मुकदमा भी दर्ज कराया था, लेकिन प्रियंका ने चूंकि अपनी तथाकथित ससुराल के पक्ष में बयान दिए थे, इसलिए मामला कमजोर पड़ गया था. यह अप्रैल, 2008 की बात थी. इस के बाद प्रियंका का परिवार उस से नफरत करने लगा था. पुलिस ने प्रियंका के मोबाइल पर संपर्क करने का प्रयास किया, लेकिन वह औफ जाता रहा. इस से पुलिस को लगने लगा कि इस हत्याकांड के तार प्रियंका से जुड़े हो सकते हैं. फलस्वरूप शक की सुई उसी पर जा कर ठहर गई. देखतेदेखते 4 दिन बीत गए. मांबाप की हत्या के बाद प्रियंका ने अपने किसी रिश्तेदार तक से संपर्क नहीं किया था. यह पता चलने पर पुलिस को पूरा विश्वास होने लगा कि प्रियंका हत्यारों के साथ थी.

हत्यारों के साथ प्रियंका के होने की बात उस घरेलू कुत्ते की वजह से भी लग रही थी, जिस पर कोई घर वाला ही काबू कर सकता था. दरअसल रात के वक्त कुत्ता खुला रहता था. घटना के दिन भी वह खुला था और उस के होते हुए किसी बाहरी व्यक्ति का घर में घुस पाना आसान नहीं था. खतरनाक बुलडौग भला किसी ऐसे शख्स को कैसे बख्श सकता था, जो उस के मालिक की हत्या कर रहा हो? एसएसपी रघुवीरलाल ने एसओजी के सबइंसपेक्टर राकेश के नेतृत्व में एक पुलिसटीम को दिल्ली भेजा, लेकिन वह दिल्ली में नहीं मिली.

इस पर पुलिस ने प्रियंका के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स और लोकेशन देख कर पुलिस अधिकारी चौंके. पता चला कि वह अपनी मां के संपर्क में थी. प्रियंका द्वारा खुद किए गए प्रेम विवाह के बाद घर वालों ने एक तरह से उस का बायकाट कर दिया था. लेकिन काल डिटेल्स के आधार पर पता चला कि वह बराबर अपनी मां के संपर्क में रहती थी. घटना वाली रात भी हत्या के समय उस की संतोष से बात हुई थी. प्रियंका की लोकेशन भी उस रात उसी क्षेत्र में पाई गई थी, जबकि घटना की रात और उस से पहले प्रियंका की लोकेशन मेरठ के ही टीपीनगर क्षेत्र के दशमेशनगर में मिली थी. घटना के बाद उस का मोबाइल लगातार औफ था. इस से यह स्पष्ट हो गया कि हो न हो प्रियंका मेरठ में ही शरण लिए हुए हो.

पुलिस ने उस की तलाश शुरू की. आखिर पुलिस को 17 नवंबर को कामयाबी मिल गई. प्रियंका अपनी सहेली अंजू के साथ एक छोटे से कमरे में किराए पर रह रही थी. कमरे की तलाशी के दौरान पुलिस को उन के पास से लूट के 50 हजार रुपए, लाखों की एफडी, लौकर की चाबियां और लाखों के आभूषण भी मिल गए. इस से यह प्रमाणित हो गया कि हत्याओं में उन्हीं दोनों सहेलियों का हाथ था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाने ले आई. अधिकारियों ने दोनों से पूछताछ की तो ऐसी चौंकाने वाली कहानी पता चली, जिसे सुन कर पुलिस अधिकारी भी दंग रह गए.

प्रेमवीर सिंह के परिवार को देख कर हर कोई कहता था कि यह एक सुखी परिवार है. हर पिता की तरह प्र्रेमवीर सिंह का भी सपना था कि उन के बच्चे बुलंदियों को छुएं. हंसमुख स्वभाव की प्रियंका शुरू से ही महत्वकांक्षी लड़की थी. वह बीए कर रही थी. कुछ साल पहले प्रेमवीर सिंह सेवानिवृत्त हो गए थे. इस बीच गौरव की नौकरी हैदराबाद में लग गई तो वह वहां चला गया. वह बीचबीच में घर आता रहता था. प्रियंका फैशन की दुनिया में नाम कमाना चाहती थी. वह छोटीमोटी प्रतियोगिताओं में भाग लेती रहती थी. इस के लिए प्रेमवीर या उन की पत्नी ने उसे कभी नहीं रोका.

सन 2002 में प्रियंका ने फैशन डिजाइनिंग से डिप्लोमा किया. सन 2005 में प्रियंका को एक प्रतियोगिता में मिस मेरठ चुना गया. इस समारोह में बतौर मुख्य अतिथि मेरठ की तत्कालीन एसएसपी अंजू गुप्ता ने उसे मिस मेरठ का ताज पहनाया. प्रियंका का जीवन खुशियों से भरा हुआ था. मिस मेरठ बनने के बाद उस का जिंदगी जीने का अंदाज ही बदल गया. उस के कई दोस्त भी बन गए थे. बदलते वक्त के साथ इंसान की सोच और अचारविचार भी बदलते हैं. प्रियंका के साथ भी ऐसा ही हुआ. वह अपनी सहेलियों और दोस्तों के साथ समय बिताने लगी. इस से प्रियंका की उड़ान बेकाबू होती गई. वह स्टाइलिश जिंदगी जीने लगी और उस का ज्यादातर समय दोस्तों के साथ घूमने में बीतने लगा.

प्रियंका का यह रंगढंग पिता प्रेमवीर और भाई गौरव को पसंद नहीं आया. इस के लिए गौरव ने उसे डांटाफटकारा भी. इसी बीच घर वालों ने यह सोच कर उस का दाखिला दिल्ली के पौलिटैक्निक कालेज में इंटीरियर डिजाइनिंग कोर्स के लिए करा दिया कि दोस्तों से उस का पीछा छूट जाएगा. 24 वर्षीया प्रियंका हौस्टल में रह कर पढ़ाई करने लगी. यहीं उस की मुलाकात उस की हमउम्र अंजू से हुई. अंजू उर्फ ज्योति मूलरूप से जिला अमरोहा के गांव शहबाजपुर निवासी संतराम की बेटी थी. जब अंजू छोटी थी, तभी संतराम की मौत हो गई थी. उस के चाचा धर्मपाल ने उस की मां से विवाह कर लिया था. बाद में धर्मपाल का एक बेटा हुआ अजेंद्र.

अंजू बचपन से ही तेजतर्रार थी. पढ़ाई के दौरान ही उस ने एनसीसी में कमांडों की ट्रेनिंग ली थी. बेस्ट कमांडों होने की वजह से उस का सिलेक्शन गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में होने वाली परेड में भी हुआ था. बाद में उस के घर वालों ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने के लिए उस का दाखिला दिल्ली के पौलिटैक्निक कालेज में करा दिया था. यहीं  वह प्रियंका से मिली थी. वक्त के साथ प्रियंका और अंजू में ऐसा भावनात्मक लगाव पैदा हुआ कि दोनां एकदूसरे की पूरक बन गईं. इसी के चलते दोनों एक ही कमरे में रहने लगीं. अपनी दोस्ती की बात दोनों ने अपनेअपने घर वालों को भी बता दी थी.

अंजू का भाई अजेंद्र उस के पास दिल्ली आता रहता था. इसी दौरान उस की मुलाकात प्रियंका से हुई. प्रियंका बोल्ड किस्म की लड़की थी. अजेंद्र गांव का सीधासादा देहाती युवक था और प्रियंका हाईप्रोफाइल जमाने के साथ कदम मिला कर चलने वाली लड़की. एक बार अंजू अपने गांव गई तो साथ में प्रियंका को भी ले गई. प्रियंका को अंजू कुछ मिनटों के लिए भी खुद से दूर नहीं होने देती थी. दोनों साथ खातीपीती थीं और साथ सोती थीं. कुछ दिन गांव में रुक कर दोनों दिल्ली चली आईं. प्रियंका अंजू के लगाव में ऐसी डूबी कि उस ने घर वालों से भी दूरी बना ली.

पहले प्रियंका शनिवार को मेरठ आ जाती थी और रविवार को रुक कर चली जाती थी, लेकिन बाद में उस ने बहाने बनाने शुरू कर दिए. शुरू में तो किसी की कुछ समझ नहीं आया. लेकिन एक बार गौरव घर पर आया तो उस ने प्रियंका को जबरन घर बुला कर उसे समझाया. लेकिन इस से प्रियंका में कोई बदलाव नहीं आया. इस की जगह उस की आदतें लगातार बिगड़ती चली गईं. प्रियंका जब भी मेरठ आती थी, वह अपने दोस्तों के साथ घूमने चली जाती थी. उस के इन दोस्तों में उस की सहेलियों के कई भाई भी शामिल थे और अन्य कई लोग भी. जब वह रातों को भी घर से गायब रहने लगी तो घर में तनाव के हालात बन गए.

हालात तब और भी अधिक बिगड़ गए, जब प्रियंका दिल्ली से भी गायब रहने लगी. घर पर उस की अटेंडेंस कम होने का 2 बार नोटिस आया तो घर वालों को पता चला. इस के बाद प्रेमवीर और संतोष उसे खरीखोटी सुनाने लगे. गौरव को भी यह सब अच्छा नहीं लगा तो उस ने प्रियंका को ताने देदे कर उस के साथ मारपीट शुरू कर दी. वह उस से नफरत करने लगा. प्रियंका को अपनी जिंदगी में घर वालों का दखल गवारा नहीं लगता था. इसी बीच एक बार गौरव को जब पता चला कि प्रियंका अंजू के साथ उस के गांव जाती है तो उस ने उसे जम कर लताड़ा. प्रियंका के साथ अंजू मेरठ भी आई.

अंजू चूंकि तेजतर्रार लड़की थी, इसलिए उसे किसी ने पसंद नहीं किया. घर वालों ने प्रियंका को उस का साथ छोड़ने की सलाह दी, लेकिन उस ने साफ कह दिया कि वह सब कुछ छोड़ सकती है, लेकिन अंजू को नहीं. मार्च, 2008 में गौरव मेरठ में ही था. तभी प्रियंका अंजू को ले कर मेरठ आई. घर में दोनों साथ ही रहीं. अंजू के सामने ही गौरव ने प्रियंका पर हाथ छोड़ दिया. अंजू साथ थी, इसलिए प्रियंका भाई से भिड़ गई. यह बात किसी को अच्छी नहीं लगी. घर में मनमुटाव होने के बाद प्रियंका अंजू के साथ चली गई और परिजनों से संपर्क बंद कर दिया.

प्रियंका के घर वाले उसे बिगाड़ने में अंजू का हाथ मानते थे, क्योंकि वह वही करती थी, जो अंजू कहती थी. एक बार प्रेमवीर की तबीयत खराब हुई तो गौरव ने प्रियंका से मेरठ पहुंचने को कहा. पहले तो उस ने बहाना बनाया, लेकिन जब गौरव ने उस पर दबाव बनाया तो वह अंजू को साथ ले कर मेरठ आ गई. गौरव भी मेरठ आ गया था. कुछ मुद्दों पर बात हुई तो प्रियंका की मुंहजोरी देख कर गौरव ने प्रियंका के साथ मारपीट की. गौरव ने उस से अंजू का साथ छोड़ने को भी कहा, लेकिन प्रियंका ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया.

नतीजतन यह हुआ कि गौरव ने गुस्से में दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया. दरअसल प्रियंका और अंजू का रिश्ता कुछ ऐसा खास बन गया था कि वह एकदूसरे के बिना जीने की सोच भी नहीं सकती थीं. अलबत्ता दोनों को लगने लगा था कि घर वाले अब उन्हें साथ नहीं रहने देंगे. प्रियंका को अपने साथ बनाए रखने के लिए शातिर दिमाग अंजू ने एक योजना बनाई. वह अपने इस रिश्ते को शादी की बैशाखी पर चलाए रखना चाहती थी. अप्रैल, 2008 के प्रथम सप्ताह में वह प्रियंका को ले कर अपने गांव पहुंची. उस ने अपने भाई अजेंद्र से कहा कि प्रियंका उस से प्यार करती है और शादी करना चाहती है. यह सुन कर अजेंद्र की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.

प्रियंका ने भी अपनी अदाओं से उसे ऐसा रिझाया कि वह पलक झपकते ही तैयार हो गया. उम्र के हिसाब से अजेंद्र प्रियंका से 3 साल छोटा था. आखिर 7 अप्रैल, 2008 को अंजू ने अमरोहा की आर्य समाज धर्मशाला में दोनों का विवाह करा दिया. यह विवाह पुरोहित  तेजपाल सिंह ने संपन्न कराया. प्रियंका और अंजू को यहां शपथपत्र दाखिल करने पड़े. शपथपत्र में प्रियंका ने अपना मेरठ का फरजी पता लिखवाया. प्रियंका और अजेंद्॑र ने एकदूसरे के साथ फेरे लिए और जयमाला पहनाईं. मंदिर की तरफ से उन्हें विवाह का प्रमाण पत्र भी दे दिया गया. अजेंद्र यह नहीं जानता था कि वह सिर्फ एक मोहरा है.

असली खिलाड़ी तो उस की बहन और उस की सहेली हैं. प्रियंका अजेंद्र की पत्नी तो बन गई, लेकिन पत्नी का धर्म न उसे निभाना था न ही उस ने निभाया. अजेंद्र जब भी उस का साथ पाने की कोशिश करता, वह बीमारी या दर्द का बहाना कर देती. रात में उस के साथ अंजू सोती थी. प्रियंका के घर वाले उसे ले कर पहले ही परेशान थे. जब उन्हें पता चला कि वह अंजू के साथ अमरोहा में रह रही है तो वे लोग वहां पहुंचे और खूब हंगामा किया. उन्होंने प्रियंका को अगवा करने का मुकदमा भी दर्ज करा दिया. लेकिन यहां भी प्रियंका ने जब अंजू का ही साथ दिया तो उन्होंने प्रियंका से रिश्ता तोड़ लिया.

कुछ माह के लिए प्रियंका और अंजू दिल्ली चली गईं और फिर से गांव लौट आईं. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहती थीं. अजेंद्र ने प्रियंका पर हक जताया और घर में उन के रिश्तों का विरोध हुआ तो प्रियंका और अंजू फिर दिल्ली चली गईं. इस के बाद दोनों को घर से खर्चा मिलना बंद हो गया. आगे कोई उम्मीद नहीं थी. ऐसे में नौकरी करना जरूरी था. दोनों ने चूंकि ताउम्र साथ रहने की कसमें खाई थीं, इसलिए उन्होंने सहारनपुर का रुख किया. सहारनपुर में प्रियंका की एक सहेली का भाई रहता था. वह मारबल कारोबारी का बेटा था. वहां के एक युवक से अंजू की भी दोस्ती थी. दोनों ने कारोबारी के बेटे से आर्थिक हालात का रोना रो कर नौकरी दिलाने की बात कही.

उन्होंने प्रयास भी किए, लेकिन प्रियंका के पास शैक्षणिक प्रमाण पत्र नहीं थे, इसलिए उसे नौकरी नहीं मिल सकी. अलबत्ता दोनों युवकों ने उन्हें अपने एटीएम कार्ड जरूर दे दिए, ताकि वे अपना खर्चा चला सकें. इस के बाद दोनों सहेलियां मेरठ चली आईं और टीपीनगर थानाक्षेत्र की कालोनी दशमेश नगर में 6 सौ रुपए महीने पर किराए का एक कमरा ले कर रहने लगीं. दोनों की जिंदगी के जो थोड़े बहुत गम थे उन्हें वह सिगरेट के धुएं और शराब में उड़ा देती थीं. उधर विद्रोही बेटी से आजिज आ कर प्रेमवीर सिंह ने स्थिति को भांपते हुए अपनी वसीयत तैयार करा ली थी, जिस में उन्होंने प्रियंका को कोई जगह नहीं दी थी. वसीयत में केवल सोनिया व गौरव को शामिल किया गया था.

हालांकि घर के हालात तनावपूर्ण चल रहे थे, इस सब के बावजूद प्रियंका अपनी मां के काफी करीब थी. मां ही थी, जिस की ममता बारबार जोर मार रही थी. मां संतोष गुपचुप ढंग से फोन कर के प्रियंका को समझाती रहती थीं. प्रियंका और अंजू किराए पर रह रही थीं. प्रियंका नौकरी करना चाहती थी, लेकिन उस के प्रमाण पत्र पिता के घर पर थे. उसे पिता की वसीयत का पता चला तो उस के मन में अपने परिवार के प्रति नफरत का सैलाब उमड़ पड़ा. उस की जिंदगी दोराहे पर आ कर खड़ी हो गई थी. आखिरकार 10 नवंबर को उस ने घर जा कर अपने प्रमाण पत्र लाने का फैसला कर लिया. उस दिन रात तकरीबन 9 बजे रिक्शा ले कर प्रियंका और अंजू प्रेमवीर सिंह के घर जा पहुंची. दरवाजा संतोष ने ही खोला. प्रियंका को देख कर वह गुस्से में बोलीं, ‘‘अब तेरे लिए इस घर में कोई जगह नहीं है.’’

‘‘मैं अंदर बैठ कर बातें करूंगी.’’ वह निर्णायक अंदाज में नरम हो कर बोली. इसी बीच ड्राइंगरूम में बैठे प्रेमवीर भी बाहर आ गए. उन की नजर प्रियंका पर पड़ी तो उन्होंने भी उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी और बड़बड़ाते हुए बाहर टहलने के लिए निकल गए. संतोष से बात करते हुए अंजू बैडरूम में पहुंच गई.

‘‘मुझे अपनी डिग्रियां चाहिए.’’ प्रियंका ने कहा तो संतोष गुस्से में बोलीं, ‘‘बेशरम, तूने जो डिग्री ली है, वह क्या कम है? तुझे मैं बहुत समझा चुकी, अब तू मेरे लिए भी मर चुकी है.’’

‘‘मेरी जिंदगी पर सिर्फ मेरा हक है. मैं चाहे जो करूं मेरी मरजी.’’

‘‘यह सब तेरी वजह से हुआ है.’’ संतोष ने अंजू की तरफ घूम कर उसे धक्का देना चाहा. इस पर प्रियंका व अंजू दोनों को ताव आ गया. प्रियंका ने पलक झपकते ही मां के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. इस पर संतोष बिफर गईं और शोर मचाने का प्रयास करने लगीं. दोनों लड़कियों के रूप में उन्हें अपनी मौत नजर आने लगी थी.

प्रियंका और अंजू समझ गईं कि अब खेल बिगड़ चुका है. संतोष उन्हें बख्शने वाली नहीं है और न ही प्रमाण पत्र मिल पाएंगे. वसीयत में अपना नाम न होने और परिवार की उपेक्षा से वह पहले ही प्रतिशोध की आग में जल रही थी. फलस्वरूप दोनों ने पलक झपकते ही लूट की योजना बना ली. दोनों ने आंखोंआंखों में इशारे कर के संतोष का खेल खत्म करने की ठान ली. अंजू एनसीसी कमांडो रह चुकी थी. उस ने एक ही झटके में संतोष को बैड पर गिरा दिया. संतोष कुछ समझ पातीं, उस से पहले ही अंजू ने उन का गला दबा दिया. संतोष छटपटाईं तो प्रियंका ने उन के पैरों को कस कर पकड़ लिया.

कुछ ही देर में उन की नाक व मुंह से खून आने लगा और वह ठंडी पड़ गईं. उन्हें सांस न आ जाए, इसलिए अंजू ने उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. अचानक पैदा हुई इस स्थिति से प्रियंका व अंजू बौखला गईं. प्रियंका को डर था कि उस के पिता कभी भी आ सकते हैं. सोचविचार कर उस ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. कुछ देर बाद प्रेमवीर ने दरवाजे पर दस्तक दी तो अंजू ने प्रियंका को दरवाजा खोलने का इशारा किया और खुद हमले के लिए तैयार हो गई. दरवाजा खुलते ही प्रेमवीर जैसे ही अंदर घुसे अंजू ने पीछे से ऐसी लात मारी कि वह लड़खड़ा कर नीचे गिर गए. इस के बावजूद बैड पर पत्नी की लाश पड़ी देख उन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

‘‘तुम ने संतोष को मार डाला, मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं, अभी पुलिस को बुलाता हूं.’’ कहते हुए वह फोन की तरफ लपके और 100 नंबर डायल कर दिया. इसी बीच प्रियंका ने फोन का तार खींच दिया. तभी अंजू ने किचन से चाकू ला कर उन के सिर पर वार करने शुरू कर दिए. प्रेमवीर शरीर से मजबूत थे. वह दोनों से गुत्थमगुत्था हो गए. अंजू उन पर वार करती रही और उन के सीने पर सवार हो गई. इसी बीच प्रियंका ने कपड़ा ला कर उन के मुंह में ठूंस दिया. कुछ ही देर में उन्होंने भी दम तोड़ दिया. इस के बाद प्रियंका ने अपने प्रमाण पत्र तो लिए ही, साथ ही सेफ से लाखों की एफडी, जो उस के साथ ज्वाइंट थी, वसीयत, जेवरात व नगदी ले कर एक बैग में डाल लिए, ताकि यह घटना लूटपाट की लगे और उस पर किसी को शक न हो.

इसी के मद्देनजर दोनों ने घर के सामान को उथलपुथल कर के बिखेर दिया. संतोष के मोबाइल को उस ने औफ कर के अपने पास रख लिया और एफएम चला दिया. सारा काम खत्म कर के प्रियंका कोठी के आंगन में घूम रहे बुलडौग को प्यार करते हुए बैडरूम में लाई और उसे चेन से बांध दिया. रात में दोनों दूसरे कमरे में सो गईं. भोर में करीब 5 बजे कोठी में ताला लगा कर दोनों रिक्शा ले कर अपने टीपीनगर स्थित कमरे पर पहुंच गईं. प्रियंका ने संतोष के मोबाइल फोन को ईंट से तोड़ दिया, ताकि उस के जरिए पुलिस उन तक न पहुंच सके और अपना मोबाइल बंद कर दिया. दोनों की योजना बैंक का लौकर खंगालने और एफडी तुड़वाने की थी, ताकि बाकी जिंदगी आराम से कहीं बाहर जा कर बिताई जा सके.

इस बीच इस दोहरे हत्याकांड ने शहर को हिला कर रख दिया था. अखबारों में कई दिन तक यही खबर छाई रही. इस से दोनों कमरे में ही छिपे रहने पर मजबूर हो गईं और माहौल के ठंडा होने का इंतजार करने लगीं. लेकिन आखिर दोनों पुलिस के शिकंजे में आ ही गईं. मिस मेरठ का कारनामा अखबारों और न्यूज चैनलों पर सुर्खियों में आया तो लोग हैरत में रह गए. पूछताछ के बाद अगले दिन पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

विवेचनाधिकारी ने 80 दिनों की विवेचना के बाद कोर्ट में इस मामले का आरोप पत्र दाखिल कर दिया. अदालत में मुकदमें पर जिरह शुरू हो गई. 285 पन्नों में सबूतों का दस्तावेज कोर्ट में पेश किया गया. 6 साल में 16 गवाहों की गवाहियां हुईं. इन गवाहों में वादी व प्रियंका के मौसा पदम सिंह, उस का भाई गौरव, विवेचनाधिकारी आर.वी. कौल, डा. नरेंद्र, हेडकांस्टेबल सुरेंद्रपाल, एसआई कृष्णवीर, अमन सिंह, राकेश कुमार, कांस्टेबल किरण, कांस्टेबल पवन सिंह, तेजपाल प्रियंका की मौसी मंजू, राजीव सक्सेना, रमेशचंद, पवन सिंह और रामआसरे शामिल थे. दोनों पक्षों की जिरह सुनने और सबूतों को देखने के बाद अदालत ने प्रियंका और अंजू को 28 मई को उम्रकैद की सजा सुना दी.

कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थीं. दोनों के घर वालों के अलावा सभी रिश्तेदारों ने भी उन का हर तरह से साथ छोड़ दिया था. प्रियंका व अंजू ने अपने बहकते कदमों को वक्त रहते संभाला होता और घर वालों की मानी होती तो उन का भविष्य बरबाद नहीं होता. जिला जेल में उन से महिला कैदियों को पढ़ाने का काम लिया जा रहा है. UP Crime News

कथा न्यायालय के निर्णय पर आधारित

 

Real Crime Story: हुस्न बना दुश्मन

Real Crime Story: शातिर तूबा को लगा कि उस के सारे दोस्त खूबसूरत अबीरा के होते जा रहे हैं तो वह उसे रास्ते से हटाने के बारे में सोचने लगी. उस ने इस के लिए तरीका तो बहुत बढि़या अख्तियार किया, लेकिन पुलिस की नजरों से बच नहीं सकी.

जनवरी की 13 तारीख थी, मौसम में काफी ठंडक थी. पूरा पंजाब लोहड़ी की तैयारी में लगा हुआ था. अगर आप यह सोचते हैं कि लोहड़ी सिर्फ भारत में ही मनाई जाती है तो आप गलत सोच रहे हैं, पाकिस्तान के पंजाब में भी लोहड़ी का त्यौहार अत्यंत उत्साह के साथ मनाया जाता है. लाहौर के लोगों में भी लोहड़ी का उत्साह था. सुबह का समय था, लाहौर के एक संभ्रांत इलाके जौहर टाउन के शेरकोट बसअड्डे पर अच्छीखासी भीड़ थी. बसअड्डे के लाउंज में एक लावारिस सूटकेस रखा था.

बहुत देर तक जब कोई उस सूटकेस को लेने नहीं आया तो बसअड्डे पर मौजूद लोगों में से किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. इसके बाद थोड़ी देर में ही पुलिस आ गई. पुलिस ने सूटकेस को खोला तो उस में से एक लड़की की लाश निकली. लड़की की लाश बिलकुल ठंडी थी. पुलिस को लगा कि यह मौसमी ठंडक की वजह से ठंडी नहीं हुई है, बल्कि इसे बर्फ में रख कर ठंडा किया गया था. लड़की के जिस्म पर चोट के निशान थे, जिस से पता चलता था कि उसे मारापीटा गया था. पहली नजर में ही देखने से लग रहा था कि लड़की की मौत दम घुटने की वजह से हुई थी. क्योंकि उस के गले पर नीले रंग का निशान था.

पुलिस ने लाश की पहचान करवाने की कोशिश की, लेकिन वहां मौजूद लोगों में से कोई भी लाश को नहीं पहचान सका. जब कई दिनों तक लाश की पहचान नहीं हो सकी तो पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम और औटोप्सी कराई. पुलिस ने बसअड्डे के पास लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग निकलवाई तो उस से पता चला कि वह सूटकेस सुबहसुबह एक लड़की औटोरिक्शा में रख कर लाई थी और उसे बसस्टैंड पर रख कर फौरन वापस चली गई थी. लेकिन पुलिस उस लड़की की पहचान नहीं कर पाई थी.

औटोप्सी से पता चला कि मृतका को खाने में आर्सेनिक और नाइट्रेट जहर भी दिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस के साथ बलात्कार होने की भी पुष्टि हुई थी. वैसे उस की मौत गला घोंटने के कारण हुई थी. लाश को पहचान के लिए अस्पताल में सुरक्षित रख दिया गया था. 10-12 दिनों तक न तो लाश की पहचान हो पाई और न ही उस लड़की की. अंतत: पुलिस ने लावारिस मान कर लाश को दफन करा दिया. 13 फरवरी 2015 को लाहौर की वहादत कालोनी के पुलिस स्टेशन में एक आदमी आया. उस का नाम जुहेब भट्टी था

उस ने अपना पूरा परिचय देते हुए बताया कि वह सियालकोट के छावनी इलाके के रहने वाले मोहम्मद भट्टी का बेटा है और सियालकोट में अपने बड़े भाई जावेद भट्टी के साथ प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. उस की 2 बहनें थीं, उज्मा और अबीरा. मां का कुछ साल पहले देहांत हो चुका है. उस ने आगे बताया कि उस की बहन अबीरा, जिस की उम्र 22 साल थी, कुछ साल पहले वह पढ़ने के लिए लाहौर आई थी. पहले  कुछ समय तक वह लाहौर में अपने मामू के यहां रही. चूंकि उस की हार्दिक इच्छा थी कि वह मौडल बने, इसलिए वह शोबिज (व्यावसायिक पार्टियां) की पार्टियों में शिरकत करने लगी.

ऐसी पार्टियों में शामिल होने के लिए वह नएनए दोस्त बनाती रहती थी. उस की इस आदत की वजह से मामू परेशान रहते थे और उसे डांटते भी थे. इसलिए उस ने मामू का घर छोड़ दिया था और वहादत कालोनी स्थित एक हौस्टल में रहने लगी थी. अब वह कई दिनों से हौस्टल से लापता है. उसे शक है कि हौस्टल की मालकिन सिदरा ने उस की बहन को गायब कर दिया है. पुलिस ने जुहेब भट्टी की शिकायत पर  वहादत रोड स्थित हौस्टल में छापा मार कर हौस्टल की मालकिन सिदरा अवान सहित 4 लोगों, नौमान कुरैशी, फरहान खान, सकीना और आयशा बट को हिरासत में ले लिया.

पुलिस सभी को थाने ले आई. पुलिस ने जब सिदरा से जुहेब भट्टी की बहन अबीरा के बारे में पूछताछ की तो उस ने अबीरा के बारे में अनभिज्ञता जाहिर की, लेकिन इतना जरूर बता दिया कि अबीरा आजकल तूबा से बहुत मिलती थी, जो एक मेकअप आर्टिस्ट है. वह खासकर मौडल्स का मेकअप करती है. इकबाल टाऊन के एसपी मोहम्मद इकबाल ने जब जुहेब से उस की बहन का हुलिया पूछा तो उस ने जो हुलिया बताया, उस से पुलिस को लगा कि संभवत: बसअड्डे पर मिली लाश उस की बहन की थी. लाश के फोटो देखने के बाद जुहेब ने उस की शिनाख्त अपनी बहन अबीरा के रूप में कर दी. चूंकि अब लाश की पहचान हो गई, इसलिए पुलिस जांच में तेजी आ गई.

पुलिस ने शेरकोट बसअड्डे की सीसीटीवी की फुटेज पहले ही अपने कब्जे में ले रखी थी. उस में साफ दिख रहा था कि एक लड़की औटोरिक्शा में सूटकेस ले कर आई थी और सूटकेस वहां रख कर वापस चली गई थी. पुलिस ने वह सीसीटीवी फुटेज सिदरा को दिखाई तो उस ने फुटेज में दिख रही लड़की की पहचान तूबा के रूप में कर के बताया कि अबीरा आजकल इसी के साथ कुछ ज्यादा दिखाई दी जा रही थी. साथ ही उस ने तूबा का पता भी बता दिया था. पुलिस ने तुरंत तूबा के घर छापा मारा तो वह घर पर ही मिल गई. पुलिस उसे पकड़ कर थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में तूबा ने बताया कि अबीरा को उस ने नहीं, औटोरिक्शा वाले ने मारा है. पुलिस ने तूबा की निशानदेही पर औटोचालक असलम को भी गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस पूछताछ में असलम ने अबीरा की हत्या से साफ इनकार कर दिया. उस ने पुलिस को बताया कि वह तो अबीरा को जानता तक नहीं. वह तो तूबा के कहने पर उस सूटकेस को बसअड्डे तक ले आया था. इस के बाद पुलिस के सामने यह सवाल खड़ा हो गया कि वह तूबा से सच कैसे उगलवाए. इस के लिए पुलिस ने तूबा का पौलिग्राफिक टेस्ट कराया. इस पौलिग्राफिक टेस्ट में जो हकीकत सामने आई, उस से सारे पुलिस अफसर हैरान रह गए. इस के बाद पूछताछ में तूबा ने बताया कि उस का असली नाम उज्मा राव है और वह मेकअप आर्टिस्ट है. 7 साल पहले उस की शादी बाबर बट के साथ हुई थी.

पति से उसे एक बेटी पैदा हुई. एक दिन उस की तबीयत खराब हुई तो बाबर ने अपने दोस्त यूसुफ खोखर के कहने पर उसे डाक्टर को इसलिए नहीं दिखाने दिया, क्योंकि वह लड़की थी. यूसुफ खोखर कैमरामैन था. दरअसल बाबर और युसुफ, दोनों ही मौडलिंग की दुनिया से जुड़े थे. डाक्टर को न दिखाने की वजह से तूबा की बेटी मर गई. तूबा ने इस का सारा इल्जाम बाबर और यूसुफ पर डाला. इस के बाद उस की बाबर से अनबन रहने लगी. आखिरकार 2 साल बाद बाबर ने उसे तलाक दे दिया. इस के बाद तूबा उर्फ उज्मा ने बाबर और यूसुफ को मारने का फैसला कर लिया.

बाबर से तलाक लेने के बाद तूबा जौहर टाऊन के एक अपार्टमेंट में अलग रहने लगी थी. यहीं रहते हुए उस की कई पुरुषों से दोस्ती हो गई, जिन में से एक का नाम जीशान था. एक दिन उस ने जीशान से कोई जहर ला कर देने को कहा तो उस ने उसे आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. तूबा ने बाबर से तलाक लेने के बाद भी उस के दोस्त यूसुफ खोखर से दोस्ती कायम कर रखी थी. उस ने इसी दोस्ती का फायदा उठा कर एक दिन खाने में यूसुफ को जीशान द्वारा लाया आर्सेनिक जहर दे दिया. आर्सेनिक जहर की विशेषता यह है कि यह कुछ समय बाद असर करता है. यूसुफ ने खाना तो खाया तूबा के साथ, लेकिन मरा अपने घर जा कर. इस से पुलिस को पता नहीं लग सका कि उसे जहर किस ने दिया था.

इस के बाद तूबा इस फिक्र में रहने लगी कि बाबर को किस तरह मौत के घाट उतारा जाए. इसी बीच उस की जिंदगी में एक और आदमी आया, जिस का नाम फारुख रहमान था. वह एक प्राइवेट बैंक में अधिकारी था. तूबा उस के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगी. फारुख रंगीनमिजाज आदमी था. वह जब भी कोई सुंदर लड़की देखता, उस की लार टपकने लगती थी. तूबा का प्रोफेशन चूंकि मौडल्स का मेकअप करना था, इसलिए वह भी शोबिज की पार्टियों में शामिल हुआ करती थी. 24 दिसंबर, 2014 को एक ऐसी ही पार्टी में उस के परिचित तरनजीत सिंह ने उस की मुलाकात एक नई उभरती मौडल से कराई. इस मौडल का नाम था अबीरा. वह बेपनाह हुस्न व कशिश की मलिका थी. ऊंचा कद, गोरा रंग, एकदम हूर लगती थी.

अबीरा एक उभरती हुई मौडल थी. उसे किसी अच्छे कौंट्रेक्ट की चाहत थी. तरनजीत ने जब उसे बताया कि तूबा की मौडलिंग इंडस्ट्री में काफी जानपहचान है तो अबीरा उस से मिली. इस पहली मुलाकात में ही वह उस से काफी प्रभावित हुई. वह जल्द ही उस से घुलमिल गई. इस के 3-4 दिनों बाद तूबा ने अबीरा को अपने घर बुलाया. उस वक्त वहां फारुख भी मौजूद था. फारुख ने अबीरा को देखा तो देखते ही उस के हुस्न का दीवाना हो गया. उस ने तूबा के सामने अपनी ख्वाहिश रखते हुए कहा कि वह हर हाल में उसे पाना चाहता है. पता नहीं क्या सोच कर तूबा ने उस की मदद करने की हामी भर दी. उस समय तूबा अपने दिमाग में शायद किसी साजिश का तानाबाना तैयार कर रही थी.

उस ने सोचा कि अबीरा की मदद से वह अपने पूर्व पति बाबर बट की हत्या करवा सकती है. वह जानती थी कि बाबर भी अय्याश किस्म का आदमी है और आसानी से अबीरा के हुस्न के जाल में फंस जाएगा. फिर जिस तरह उस ने यूसुफ खोखर को जिंदगी से छुटकारा दिलाया था, उसी तरह अबीरा भी बाबर को उस की जिंदगी से छुटकारा दिला देगी. तूबा को पता था कि अबीरा के पास अभी कोई बड़ा प्रोजैक्ट नहीं है, इसलिए वह आर्थिक तंगी से गुजर रही है. घर वालों से रिश्ते ठीक न होने की वजह से वह उन से भी मदद नहीं मांग सकती.

सोचविचार कर तूबा ने अबीरा से एक समझौता कर लिया. फिर उसी समझौते के तहत अबीरा को बाबर की हत्या में तूबा की मदद करनी थी. इस के बदले में तूबा को उसे कुछ नकद और मौडलिंग के कुछ अच्छे अनुबंध दिलाने थे. अबीरा जानती थी कि तूबा के शोबिज के सर्किल में काफी अच्छे ताल्लुकात हैं. निस्संदेह उस की मदद से वह कामयाबी की सीढि़या चढ़ सकती है. इसलिए उस ने तूबा का साथ देने की हामी भर ली. दूसरी ओर तूबा ने सोचा था कि एक बार अगर अबीरा उस के साथ जुर्म में शामिल हो गई तो फिर वह बड़े आराम से अपने दोस्त फारुख की इच्छा पूरी करवा देगी, क्योंकि इस के बाद अबीरा इस स्थिति में नहीं रह जाएगी कि उस की किसी बात से इनकार कर सके.

फारुख ने जिस दिन तूबा से यह कहा था कि वह अबीरा को पाना चाहता है, वह जलभुन उठी थी. लेकिन वह चाह कर भी फारुख का कुछ नहीं कर सकती थी. उस ने फारुख के जाने के बाद अबीरा के फोटो निकाले और गुस्से में उस के फोटो पर ही खुरचखुरच कर उस का चेहरा बिगाड़ दिया था. उस वक्त वह इतने गुस्से में थी कि अगर अबीरा वहां होती तो शायद उस का चेहरा सचमुच बिगाड़ देती. खैर, अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए जनवरी के पहले सप्ताह में उस ने अबीरा को अपने घर बुलाया और बाबर को मारने की अपनी योजना में साथ देने को कहा. लेकिन इस बार अबीरा ने मना कर दिया. तूबा ने उसी वक्त सोच लिया कि अब वह अबीरा को इस दुनिया में जीवित नहीं रहने देगी.

तूबा ने उस वक्त तो अबीरा से कुछ नहीं कहा. अलबत्ता उस ने अपने दोस्त जीशान से जरूर कहा कि उसे डर है कि अबीरा कहीं उस से उस के दोस्तों को न छीन ले. अगर ऐसा हुआ तो उस का धंधा चौपट हो जाएगा. जीशान ने उसे फिर से आर्सेनिक जहर ला कर दे दिया. 12 जनवरी, 2015 को तूबा ने मौडलिंग का एक अच्छा और बड़ा अनुबंध दिलाने के बहाने अबीरा को खाने पर बुलाया. अबीरा वहां आई तो फारुख को यह पता नहीं था कि तूबा उसे मारने की योजना बना चुकी है. तूबा ने अबीरा के लिए स्पैशल खीर बनाई. उस ने अबीरा की खीर में जीशान का लाया जहर मिला दिया. जब अबीरा खाना खा चुकी तो फारुख उसे बहाने से अपने कमरे में ले गया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. इस के बाद उस ने अबीरा को अपनी हवस का शिकार बनाने की कोशिश की.

अबीरा पर चूंकि जहर का असर होने लगा था, इसलिए वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी और फारुख ने आसानी से अपनी अच्छा पूरी कर ली. तब तक अबीरा बेहोश हो चुकी थी. थोड़ी देर बाद उस ने तूबा को बुलाया और अबीरा को वहां से ले जाने को कहा. तूबा जानती थी कि जो जहर अबीरा को दिया गया है, उसे पूरे तौर पर असर करने में अभी कई घंटे का समय लगेगा. उसे डर था कि अगर उसे बेहोशी की हालत में कहीं छोड़ा गया और वह बच गई तो उस का पुलिस से बच पाना नामुमकिन हो जाएगा. यही सोच कर तूबा ने पास पड़े अपने दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. जिस से अबीरा उसी वक्त मर गई.

अबीरा तो मर गई. अब समस्या यह थी कि अबीरा की लाश का क्या किया जाए? इस के लिए तूबा ने फारुख से कहा कि लाश को एक बड़े सूटकेस में डाल कर बंद कर दो. फारुख ने ऐसा ही किया. लाश को सूटकेस में रख कर दोनों ने उसे फ्रीजर में रख दिया. रात भर सूटकेस तूबा के अपार्टमेंट में ही फ्रीजर में रखा रहा. तूबा ने वह रात फारुख के साथ दूसरे कमरे में गुजारी. सुबह सूरज निकलने से पहले तूबा ने अपने जानने वाले एक औटोरिक्शा वाले असलम को फोन कर के बुलाया. फिर उस के औटोरिक्शा में सूटकेस रखकर शेरकोट बसअड्डे पहुंची.

चूंकि सुबह का समय था, इसलिए बसअड्डे पर ज्यादा भीड़भाड़ नहीं थी. तूबा सूटकेस उतार कर बसअड्डे के लाउंज में ले गई और वहीं रख कर वापस आ गई. लेकिन सीसीटीवी कैमरे से उस की सारी हरकतें रिकौर्ड हो गईं. जब पुलिस ने तूबा के अपार्टमेंट पर छापा मारा था तो पुलिस को उस के घर से वह जहर भी मिल गया था, जो पोस्टमार्टम में अबीरा के शरीर में पाया गया था. इस के अलावा अबीरा की फोन काल डिटेल्स में अबीरा की आखिरी लोकेशन तूबा के घर की पाई गई थी. तूबा के बयान के आधार पर पुलिस ने फारुख और जीशान को भी गिरफ्तार कर लिया.

आगे की जांच में पता चला कि तूबा का असली नाम उज्मा राव था. उस ने अपना पहचान पत्र तूबा के फरजी नाम से बनवा रखा था. पुलिस को यूसुफ की हत्या के सबूत भी तूबा के घर से मिल गए हैं. पुलिस के अनुसार बाबर बट ने तूबा के साथ बलात्कार किया था, जिस की उस ने पुलिस में रिपोर्ट भी दर्ज कराई थी. लेकिन बाद में जब बाबर ने केस के डर से तूबा से शादी कर ली थी तो तूबा ने अपनी शिकायत वापस ले ली थी. तूबा अपने दूसरे दुश्मन बाबर बट का कत्ल करती, इस से पहले ही उस की एक और अबीरा दुश्मन पैदा हो गई. अपनी इसी दुश्मन अबीरा को रास्ते से हटाने के चक्कर में वह पुलिस की गिरफ्त में आ गई.

पुलिस ने तूबा, फारुख, जीशान और असलम को लाहौर की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. तीनों जेल की सलाखों के पीछे हैं और अपने किए की सजा भुगत रहे हैं. असलम को जमानत मिल गई है. Real Crime Story

लेखक – एम.जेड. बेग      

Chandigarh Crime: हमशक्ल की अक्ल का कारनामा

Chandigarh Crime: एक हत्याकांड में फरार गुरविंदर सिंह गैरी की प्रौपर्टी पर जिस गुरप्रीत सिंह की नजर थी, इत्तफाक से वह गैरी का हमशक्ल था. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने नकली दस्तावेज तैयार करा कर गैरी की प्रौपर्टी को बेचने के नाम पर तमाम लोगों से लाखों रुपए ठग लिए थे.

मोहाली के फेज-7 के रहने वाले गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी को चंडीगढ़ के सेक्टर-9 स्थित जापान लाइफ कंपनी ने जादू का एक शो करने को कहा था.  उसे यह शो दिल्ली में करना था. शो की तैयारी के लिए उसे कुछ सामान की जरूरत थी. इस के लिए उस ने अपने एक परिचित जादूगर प्रदीप से बात की. 28 वर्षीय प्रदीप ने 4-5 साल पहले ही जादूगरी के क्षेत्र में कदम रखा था. उन दिनों वह चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित फाइवस्टार होटल शिवालिक व्यू में शो करता था. प्रदीप और गैरी की जानपहचान करीब 2 साल पहले तब हुई थी, जब प्रदीप सेक्टर-35 के होटल खायबर में जादू के शो किया करता था. गैरी वहां बीयर पीने जाता था. किसी दिन दोनों की जानपहचान हुई तो हमपेशा होने की वजह से उन में दोस्ती हो गई थी.

गैरी सुबह साढ़े 9 बजे प्रदीप के पास पहुंच गया था. जापान लाइफ कंपनी के निमंत्रण की बात बताने के बाद उस ने कहा, ‘‘आज सेक्टर-39 में ‘गो बनानाज किड्स क्लब’ में मेरा कार्यक्रम है. इस के लिए भी मुझे जादू का कुछ सामान चाहिए, चाहो तो तुम भी अपना कोई आइटम वहां पेश कर सकते हो. 11 बजे शो शुरू होगा, मन हो तो चलो.’’

प्रदीप तैयार हो गया. दोनों 11 बजे से पहले ही सेक्टर-39 पहुंच गए. संयोग से गैरी का एक परिचित कुलविंदर सिंह वहां मिल गया. वह गैरी का शो देखने आया था. वह पैट्रोलपंप पर काम करता था और पैट्रोलपंप पर पहनी जाने वाली ड्रैस में ही चला आया था. शो खत्म होने के बाद कुलविंदर ने कहा कि उस के पास जादू के खेलों की 1 कैसेट है. गैरी ने उस से कैसेट को मांगा तो कुलविंदर दोनों को अपने घर ले गया. उस ने पहले अपने कपड़े बदले, उस के बाद दोनों के साथ खाना खाया.

खाना खाते समय गैरी ने प्रदीप से जादू के सामान की बात की तो उस ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें दिल्ली के चांदनी चौक की 1 दुकान का पता देता हूं, वहां तुम्हें एकदम बढि़या सामान मिल जाएगा.’’

प्रदीप की बात खत्म होते ही कुलविंदर ने कहा, ‘‘इतने चक्कर में पड़ने के बजाय तुम जादूगर अशोक से क्यों नहीं मिल लेते. जितना अच्छा सामान उस के पास मिल जाएगा,  उतना अच्छा शायद कहीं और न मिल पाए.’’

‘‘ठीक है, हमें तो सामान चाहिए, अशोक से ही ले लेता हूं.’’ गैरी ने कहा.

इस के बाद तीनों इधरउधर की बातें करते हुए गैरी के घर पहुंचे. पहले तो तीनों ने जादू की वीडियो कैसेट देखी, जिस में 1 विदेशी जादूगर के जादू के खेलों का बहुत अच्छा प्रदर्शन था. कैसेट देखने के बाद गैरी ने कुलविंदर से जादूगर अशोक को फोन करने को कहा. कुलविंदर ने पंचकूला स्थित अशोक की दुकान पर फोन किया तो वह दुकान पर ही मिल गया. कुलविंदर ने गैरी के शो के बारे में बता कर जादू के कुछ सामान के लिए कहा तो वह बोला, ‘‘रात 9 बजे सेक्टर 30 के अहाते में आ जाना, 2-2 पैग भी लगाएंगे और वहीं इस बारे में बात भी कर लेंगे.’’

चंडीगढ़ के सेक्टर-46सी में रहने वाले मोहनलाल अरोड़ा के परिवार में पत्नी आशा रानी के अलावा 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. 6 संतानों में सब से बड़ा बेटा अशोक था. उसे बचपन से ही जादूगर बनने का शौक था. शायद इसी वजह से उस ने जादू के तमाम खेल सीख लिए थे. इस में अविश्वसनीय बात यह थी कि उस ने जादू किसी से सीखा नहीं था. उस का दिमाग इतना तेज था कि वह एक बार जो देख लेता था, जरा सी देर में उसे हूबहू दोहरा देता था. दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद वह पिता के साथ सेक्टर-18 स्थित उन की स्वर्णकारी की दुकान पर बैठने लगा था. सन 1985 में उस की नमिता से शादी हो गई तो जल्दी ही वह एक बेटे वरुण का बाप बन गया. 1996 में उस ने पंचकूला के सेक्टर-15 में महारानी ज्वैलर्स नाम से अपनी अलग दुकान खोल ली.

आशोक की दुकान बढि़या चल रही थी, लेकिन उस का जादू का शौक गया नहीं था. अब तक जादू के खेल में उस ने न केवल महारत हासिल कर ली थी, बल्कि उसे काफी लोकप्रियता भी मिल गई थी. चंडीगढ़ के बड़ेबड़े स्कूलों में उस ने जादू के तमाम शो किए थे. सेक्टर-17 के परेड ग्राऊंड में भी उस ने हजारों लोगों की उपस्थिति में जादू के कई कार्यक्रम किए थे. विदेशों में भी उस ने कुछ शो किए थे, जिस से उसे काफी प्रसिद्धि मिल गई थी. जादू के खेलों में इस्तेमाल किए जाने वाले बेशकीमती सामानों की उस के पास भरमार थी.

इस के बावजूद स्वर्णकारी की अपनी दुकान की वजह से अशोक को जादू के खेल के आयोजनों के लिए समय निकालना मुश्किल हो गया. फिर भी उस के जादूगर दोस्त कभीकभी उस से मिलने आते रहते थे. वे अशोक से जादूगरी का करतब तो सीखते ही थे, जरूरत पड़ने पर सामान भी किराए पर ले जाते थे. अशोक खुले दिल का इंसान था, इसलिए उस ने कभी अपने किसी जादूगर दोस्त को निराश नहीं किया. ऐसे में ही 21 मई, 2000 को कुलविंदर का फोन आया तो अशोक ने रात 9 बजे सेक्टर-30 के अहाते में मिलने के लिए कह दिया था.

उसी रात खाना खाने के बाद अशोक अपने छोटे भाई मुकेश अरोड़ा के साथ घर के पीछे के कंपाउंड में बैठा बातें कर रहा था. तभी एक मारुति कार वहां आ कर रुकी. उस समय साढ़े 11 बज रहे थे. उस वक्त उस के पिता और उस के पड़ोसी निर्मल सिंह भी वहीं बैठे थे. कार से 4 युवक निकल कर अशोक के पास आए और चारों ने एक साथ कहा, ‘‘अशोक, तुम हमारे साथ चलो.’’

चारों ने अशोक से जिस तरह साथ चलने को कहा था, वहां बैठे सभी लोगों को बड़ा अजीब लगा था. लिहाजा मुकेश ने भाई से उन के बारे पूछा. अशोक ने कहा कि ये उस के दोस्त हैं और इन के नाम गुरविंदर सिंह गैरी, लखबीर सिंह, रणबीर सिंह और कुलविंदर सिंह हैं. साथ ही यह भी बताया कि मोहाली के रहने वाले ये लड़के उस से जादू सीखा करते हैं. इस के बाद चारों अशोक को एक किनारे ले जा कर बातें करने लगे. कुछ देर बाद अशोक ने मुकेश के पास आ कर कहा, ‘‘अभी मैं जादू का एक आइटम सिखाने इन के साथ जा रहा हूं. तुम लोग आराम से सो जाना. मुझे आने में शायद थोड़ी देर हो जाए.’’

‘‘लेकिन तुम जा कहां रहे हो?’’ मुकेश ने पूछा.

‘‘मैं मोहाली के फेज-7ए जा रहा हूं. घबराने की कोई बात नहीं है, ये सभी मेरे खास दोस्त हैं.’’

इतना कह कर अशोक उन लोगों के साथ उन की कार में बैठ कर चला गया.

कुछ देर बाद मुकेश भी पिता के साथ कंपाउंड से उठा और अंदर चला गया. निर्मल सिंह भी अपने घर चले गए. अब तक अशोक के घर के सभी लोग सो चुके थे. अपनेअपने बिस्तर पर पहुंच कर थोड़ी देर में मुकेश और उस के पिता भी सो गए. सुबह मुकेश की आंख खुली तो पता चला कि आशोक अभी तक लौट कर नहीं आया. जाते समय अशोक ने जिस तरह बात की थी, उस से उन लोगों को चिंता हो रही थी. फिर भी उन लोगों ने सोचा कि कुछ देर और इंतजार कर लेते हैं, उस के बाद देखते हैं. लेकिन जब 10 बजे तक भी अशोक नहीं लौटा तो मुकेश से रहा नहीं गया और वह अपने एक पड़ोसी को साथ ले कर अशोक की तलाश में मोहाली के फेज-7 की ओर चल पड़ा.

मुकेश पड़ोसी के साथ सेक्टर 45-46 के चौक पर पहुंचा तो उसे कुलविंदर सिंह मिल गया. उस के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं. ऐसा लग रहा था, वह डर के मारे कांप रहा है. मुकेश ने उसे रोक कर उस की इस हालत के बारे में पूछा तो उस ने डरते हुए कहा, ‘‘रात 12 बजे गैरी की कोठी पर अशोक का गैरी, लखबीर और रणबीर से झगड़ा हो गया. उस समय सभी शराब पी रहे थे. शराब पीते हुए तीनों अशोक से जादू के आइटम सीखने की जिद करने लगे. अशोक ने कहा कि इतने कम समय में और इस हालात में वे आइटम नहीं सिखाए जा सकते.

जब वे नहीं माने तो एक आइटम दिखाते हुए अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. तीनों ने गैरी की उस अंगूठी के बारे में पूछा तो अशोक ने कहा कि अब वह नहीं मिल सकती. शराब के नशे में होने की वजह से वे अशोक की पिटाई करने लगे. उन लोगों ने अशोक को इतना मारा कि …’’

कुलविंदर कुछ और कहता, परेशानी की उस हालात में मुकेश ने उस की बात बीच में ही काट कर पूछा, ‘‘फिलहाल अशोक कहां है, उसे बहुत ज्यादा चोटें आई हैं क्या? हमें जल्दी से उस के पास ले चलो.’’

कुलविंदर ने रोते हुए कहा,‘‘अब मैं आप को किस अशोक के पास ले चलूं? डंडों से पिटाई के बाद वे रसोई से चाकू ले आए और उसी चाकू से उसे मार डाला. अशोक को मार कर उन्होंने कस्सी और कुल्हाड़ी से उस की दोनों बांहें, टांगें और गर्दन काट कर धड़ सहित कार में डाल लिया. मैं उन लोगों के साथ जाना तो नहीं चाहता था, पर उन्होंने मुझे भी जबरदस्ती कार में बैठाया और गांव मौली के बगल से बहने वाले गंदे नाले पर ले गए. वहां उन्होंने अशोक के शरीर के टुकड़ो को अलगअलग जगहों पर फेंक दिया. जबकि सिर कार में ही पड़ा रहने दिया. इतना सब करते करते सुबह के 4 बज गए. फेज-11 के पास उन्होंने कार रोक कर मुझे उतार दिया और खुद अशोक के सिर को ठिकाने लगाने के लिए कहीं चले गए.’’

‘‘हे भगवान.’’ दोनों हाथों से अपना सिर थाम कर मुकेश ने कहा और जमीन पर बैठ कर रोने लगा. इस के बाद कुलविंदर ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘गैरी, लखबीर और रणबीर ने अशोक की हत्या करने के बाद उस की अंगूठियां, ब्रेसलेट और सोने की चेन उतार ली थी. लड़ाईझगड़े में अशोक का रिवाल्वर गिर गया था, जिसे गैरी ने ले लिया था.’’

मुकेश ने किसी तरह खुद को संभाल कर पूछा, ‘‘तुम ने इस घटना के बारे में पुलिस को इन्फौर्म किया?’’

‘‘अभी नहीं, दरअसल मैं इतना डर गया था कि पुलिस के पास जाने की मेरी हिम्मत ही नहीं हुई. इस के अलावा मुझे यह भी डर लग रहा था कि कहीं वे मुझे भी न मार दें. क्योंकि वे मुझे धमकी दे रहे थे कि अगर इस हत्या के बारे में मैं ने किसी को कुछ बताया तो वे मेरा भी वही हाल करेगें, जो अशोक का किया है. यही वजह थी कि जहां उन लोगों ने मुझे कार से उतारा था, कई घंटे तक मैं वहीं छिपा बैठा रहा. अभी कुछ देर पहले ही वहां से निकल कर मैं सीधे आप लोगों के पास ही जा रहा था कि आप मिल गए.’’

‘‘चलो, पहले थाने चलते हैं.’’ मुकेश ने कहा.

इस के बाद मुकेश कुलविंदर को भी अपने साथ ले कर मोहाली की ओर चल पड़ा. वे अंबवाले चौक के पास पहुंचे थे कि मोहाली के थाना सेंट्रल के थानाप्रभारी इंसपेक्टर प्रीतम सिंह सहयोगियों के साथ मिल गए. मुकेश ने उन्हें सारी बात बताई तो उन्होंने मामला फ्लैश करवा कर मुकेश की शिकायत दर्ज करने के लिए उस की तहरीर थाने भिजवा दी और खुद टीम को साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. गैरी के मकान पर ताला लटक रहा था. खिड़की का कांच तोड़ कर एक पुलिस वाले को अंदर भेजा गया, जिस ने अंदर से दरवाजा खोला. इस के बाद मकान की तलाशी ली गई तो खून सनी चादर, कस्सी, शराब की बोतल और जगहजगह खून के धब्बे देख कर पुलिस को विश्वास हो गया कि कुलविंदर ने जादूगर अशोक के भाई मुकेश को जो बताया है, वह एकदम सही हैं. इसी के साथ पुलिस को यह भी शक हुआ कि अशोक के कत्ल में कुलविंदर भी शामिल था.

अब यह खुद को बचाने के लिए नाटक कर रहा है. फिलहाल इंस्पेक्टर प्रीतम सिंह कुलविंदर और मुकेश को साथ ले कर अशोक की लाश के टुकड़े बरामद करने चल पड़े. मोहाली के नजदीक मौली गांव के गंदे नाले से अशोक का धड़ बरामद हो गया. थाना सेंट्रल में जादूगर अशोक की हत्या का मुकदमा गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने कुलविंदर को हिरासत में ले कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए उसे 3 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. थाने में की गई पूछताछ में कुलविंदर बताया कि वह मोहाली के फेज-11 के मकान नंबर-1353 में रहता था. उस के पिता का नाम जोगेंद्र सिंह था.

दसवीं पास करने के बाद वह इन दिनों सेक्टर-10 के एक पैट्रोलपंप पर नौकरी कर रहा  था. उसे जादू सीखने का शौक था, जिस की वजह से मरने तथा मारने वालों से उस की दोस्ती हो गई थी. इस पूछताछ में कुलविंदर सिंह ने वही सब बताया, जो वह मुकेश को पहले बता चुका था. लेकिन पुलिस वालों को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हो रहा था. इसलिए पुलिस ने उस की रिमांड अवधि बढ़वा ली. पुलिस ने उस पर काफी दबाव डाला, पर वह लगातार यही कहता रहा कि जादूगर अशोक की हत्या में वह शामिल नहीं था.

इसी पूछताछ में जादूगर प्रदीप का नाम सामने आया. पुलिस ने प्रदीप से भी पूछताछ की. उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में प्रदीप ने बताया था कि गुजरात का प्रसिद्ध जादूगर स्वामी राव पिछले दिनों चंडीगढ़ आया था. वह और अशोक उस से मिलने सेक्टर-17 गए थे. इस के बाद उन्होंने गैरी को भी उस से मिलवाया था. स्वामी राव के जादू के करतबों से गैरी इतना प्रभावित हुआ कि वह उस से कुछ नए आइटम्स सिखाने की जिद करने लगा. आखिर तय हुआ कि 22 मई को वे सभी एक साथ स्वामी राव के पास जा कर जादू के नए आइटम्स सीखेंगे.

21 मई को कुलविंदर ने अशोक को पंचकूला स्थित उस की दुकान पर फोन किया तो अशोक ने अहाते में मिलने को कहा था. इस के बाद गैरी और कुलविंदर ने उसे उस के घर छोड़ दिया. इस के बाद वे कहां गए, उसे मालूम नहीं. प्रदीप के बताए अनुसार, उस शाम सुखना लेक पर उस का शो था. वह उस की तैयारी में जुट गया. शाम 6 बजे से 8 बजे तक वह अपने शो में व्यस्त रहा. वहां से वह सीधे शिवालिक व्यू होटल चला गया, जहां वह रात के साढ़े 10 बजे तक व्यस्त रहा. इस के बाद वह घर जा कर सो गया.

अगले दिन वह तय समय पर जादूगर स्वामी राव के पास पहुंच गया, लेकिन अशोक गैरी, लखबीर, रणबीर और कुलविंदर नहीं आए. घंटों इंतजार के बाद भी जब वे नहीं आए तो वह लौट कर अपने कामों में लग गया. रात 11 बजे घर आ कर वह इत्मीनान से सो गया. अगले दिन अखबारों से उसे पता चला कि अशोक के साथियों ने ही उस का कत्ल कर दिया है. डर की वजह से वह अशोक के यहां भी नहीं जा सका. मोहाली उन दिनों जिला न हो कर रोपड़ का एक सब डिवीजन था. जिला रोपड़ के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर थे. उन्होंने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एक विशेष टास्क फोर्स गठित कर दिया था, जिस से मामले की गहराई में पहुंच कर अभियुक्तों को जल्दी से जल्दी गिरफ्तार किया जा सके.

टास्क फोर्स मामले को हल करने के लिएजीजान से जुट गई. 23 मई को इस टीम ने गांव पापड़ी के पास एक वीरानी जगह से अशोक की टांगें बरामद कर लीं. इस के अगले दिन फेज-9 के इंडस्ट्रियल एरिया के पास बहने वाले नाले से अशोक के हाथ भी बरामद हो गए. लेकिन न शरीर के बाकी हिस्से मिले और न ही हत्यारों का पता चल सका. 2 जून को अशोक के शरीर के बरामद अंग पुलिस ने अंतिम संस्कार के लिए उस के घर वालों को सौंप दिए. 3 जून को घर वालों ने उस का दाहसंस्कार कर दिया. इसी के साथ शरीर के वे अंग अशोक के ही हैं, इस का पता लगाने के लिए पुलिस ने नमूना ले कर डीएनए टेस्ट के लिए हैदराबाद की फोरैंसिक लैबोरेटरी भिजवा दिया था.

बाद में रिपोर्ट आने पर साबित हो गया कि शरीर के वे टुकड़े जादूगर अशोक के शरीर के ही थे. पुलिस जांच में जो निष्कर्ष निकल कर सामने आया, उस के हिसाब से अशोक की हत्या की कहानी कुछ प्रकार थी. गैरी, रणबीर, लखबीर और कुलविंदर 21 मई, 2000 की रात 9 बजे जादूगर अशोक से मिलने चंडीगढ़ के सेक्टर-30 के अहाते में पहुंचे, जहां इन लोगों ने शराब पी. इस के बाद जादू का कोई आइटम दिखाने की बात चली तो अशोक ने गैरी की सोने की अंगूठी गायब कर दी. उस समय बात आईगई हो गई. लेकिन घर पहुंच कर खाना खाते समय गैरी का ध्यान अपने हाथ की अंगुली पर गया तो उसे अपनी अंगूठी की याद आई. इस के बाद वह अपने तीनों दोस्तों को साथ ले कर अशोक को उस के घर से बुला लाया.

वह उसे अपने घर न ले जा कर मोहाली के फेज-7 स्थित अपने पिता के घर ले गया, जहां गैरी ने अशोक को शराब पिला कर अपनी अंगूठी के बारे में पूछा. तब अशोक ने हंसते हुए कहा कि अंगूठी तो अब कल ही मिल सकती है. उस के इस जवाब पर गैरी को गुस्सा आ गया तो वह उसे  गालियां देने लगा. यही नहीं, वह उसे मारने के लिए भी दौड़ा. तब अशोक ने अपने बचाव के लिए लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल ली. फिर क्या था, गैरी और उस के साथी उस पर पिल पड़े. इस के बाद उन्होंने अशोक की हत्या कर दी और उस के शव के टुकड़े यहांवहां फेंक कर गैरी, लखबीर और रणबीर फरार हो गए.

पुलिस को अपने सूत्रों से पता चला कि अशोक के हत्यारे दिल्ली में कहीं छिपे हैं. मोहाली पुलिस की एक विशेष टीम दिल्ली गई. पुलिस टीम को पता चला था कि गैरी का दिल्ली में मकान है, जहां हत्या के बाद कई दिनों तक 3 लोग ठहरे थे. उन के पास काले रंग की मारुति 1000 कार भी थी, लेकिन वे उस कार का उपयोग बिलकुल नहीं कर रहे थे. 4 जून को ओल्ड राजेंद्रनगर स्थित उस मकान पर मोहाली पुलिस ने छापा मारा. लेकिन वहां कोई नहीं मिला. कार जरूर वहां खड़ी थी. कार के निरीक्षण में पुलिस ने पाया कि उस पर काफी धूल जमी थी. कार के अंदर जगहजगह खून के धब्बे भी थे.

पुलिस को संदेह था कि तीनों हत्यारे विदेश भाग गए हैं, लेकिन इस सफलता के बाद पुलिस को लगा कि हत्यारे भारत में ही कहीं छिपे हैं. अब तक की भागदौड़ से पुलिस ने वांछित हत्यारों के बारे में कुछ व्यक्तिगत जानकारियां जुटा ली थीं. लखबीर और रणबीर सगे भाई थे. लखबीर बीए पास था और फेज-7 की मोटर मार्केट में औफिस खोल कर विदेशी गाडि़यों की खरीदफरोख्त का काम करता था. बीए करने के बाद रणबीर भी भाई के काम में हाथ बंटाने के साथ जादूगरी आदि करने लगा था. उन दिनों वह एक जापानी कंपनी से जुड़ा था. इस के बावजूद दोनों भाई जादू के और आइटम सीखने के चक्कर में लगे रहते थे.

लेकिन गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी का आचरण एकदम अलग था. जिस कोठी में जादूगर अशोक का कत्ल हुआ था, वह उस के पिता हरभजन सिंह की थी. कोठी के आसपास रहने वालों के अनुसार, वह अलग किस्म के आदमी थे. 70 बरस की उम्र में भी वह अखबारों में अपनी शादी के विज्ञापन दिया करते थे, जबकि उन की पत्नी करतार कौर विदेश में रह रही थीं. गैरी की पत्नी भी इंग्लैंड में रहती थी. मोहाली के फेज-3बी में गैरी की अपनी कोठी थी, लेकिन अशोक की हत्या उस ने अपने पिता की कोठी में की थी पुलिस को मिली जानकारी के अनुसार, गैरी खूंखार प्रवृत्ति का आदमी था. अपने घर में उस ने सांप, बंदर, मछलियां, कुत्ते, कबूतर और तीतर आदि तो पाल ही रखे थे, एयरगन से इन का शिकार करने में उसे विशेष आनंद आता था. जानवरों को आपस में लड़वाना भी उस का खास शौक था.

गैरी को दूसरों को यातनाएं देने में भी बड़ा मजा आता था. उस की स्थिति मानसिक तौर पर बीमार बिगड़े नवाबों जैसी थी. पहले वह भी इंग्लैंड में रहता था. गैरी के पूर्व नौकर रमेश के अनुसार, वह गैरी की क्रूरता का शिकार हो चुका था. रमेश के बताए अनुसार, गैरी की फितरत समझ पाना बहुत मुश्किल था. सीधेसरल अंदाज में बैठा यह आदमी कब क्या कर बैठे, इस की कल्पना नहीं की जा सकती थी. रमेश के बताए अनुसार, वह 1995 तक मोहाली के फेज-7 स्थित रैडीमेड कपड़ों की एक दुकान पर अच्छीभली नौकरी कर रहा था. बदकिस्मती से एक दिन उस की मुलाकात गैरी से हुई तो उस ने उस से कपड़े का कारोबार करने की बात कह कर उसे मोटी तनख्वाह देने का लालच दिया.

रमेश लालच में आ गया और अपनी अच्छीभली नौकरी छोड़ कर गैरी के पास आ पहुंचा. कुछ दिन तो ठीकठाक गुजरे. उस के बाद एक दिन अपना कैमरा चोरी होने का आरोप लगा कर वह उस की पिटाई करने लगा. यही नहीं, चंडीगढ़ पुलिस के अपने एक परिचित सबइंसपेक्टर को बुला कर उस ने उसे बुरी तरह टार्चर करवाया. टांगों के नीचे डंडे रख कर उस के कंधों पर बैठ कर उसे ऐसी पीड़ा दी गई कि उस के बारे में बताते हुए उस की आंखों में आंसू छलक आए. रमेश ने आगे बताया कि जब उस की इतनी पिटाई के बाद भी कुछ हासिल नही हुआ तो गैरी ने उसी तरह अपने नेपाली नौकर बहादुर को प्रताडि़त किया. यातना की वजह से मौत को सिर पर मंडराते देख बहादुर ने कैमरा चोरी का आरोप स्वीकार कर लिया.

इस के बाद गैरी ने उस से कैमरे के बारे में पूछा तो उस ने झूठमूठ सेक्टर-45 का एक पता बता दिया. गैरी और सबइंसपेक्टर उस पते पर पहुंचे तो वहां एक बैंक अधिकारी रहता था. उस ने हंगामा मचाया तो दोनों वहां से भाग खड़े हुए. उस अधिकारी की शिकायत पर मामला दर्ज हुआ, जिस की जांच के बाद सबइंस्पेक्टर निलंबित हो गया. पुलिस ने रमेश से भी मुकदमा दर्ज कराने को कहा, लेकिन उस ने यह कह कर मना कर दिया कि उस की  जान बच गई यही क्या कम है. वह शिकायत कर के बड़े लोगों से दुश्मनी नहीं निभा सकता.

इंसपेक्टर प्रीतम सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम ने फेज-3बी स्थित गैरी की कोठी का ताला तोड़वा कर तलाशी ली तो वहां हैरान कर देने वाले अविश्वसनीय तथ्य सामने आए. मोहाली के ज्यूडिशियल मैजिस्ट्रेट संजय अग्निहोत्री की अनुमति पर मारे गए इस छापे में पुलिस ने गैरी की कोठी से न केवल आधा किलो चरस, महंगी विदेशी शराब की बोतलें और हथियार बरामद किए, बल्कि छिपा कर रखी एक हथकड़ी भी बरामद की. एक एनआरआई के घर से इस तरह हथकड़ी का मिलना पुलिस के लिए पहेली जैसा बन गया था. इस का खुलासा गैरी की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में ही हो सकता था.

खैर, गैरी की कोठी में हुई तलाशी में इस सब के अलावा पौन किलोग्राम सोना और सोने का एक बिस्कुट भी पुलिस के हाथ लगा. घर के एक हिस्से में बना एक आलीशान स्विमिंग पूल गैरी की शानोशौकत की जीतीजागती मिसाल था. वहां एक ऐसा शाही बिस्तर बिछा था, जिस की कीमत लाखों में आंकी गई. यह बिस्तर एक्युप्रेशर पद्धति पर आधारित था. ड्राइंगरूम में बाघ की असली खाल के अलावा हिरण और बारहसिंगे के सिर और पैर तरतीब से सजाए हुए थे. यहीं एक बार भी बना था, जिस में विदेशी शराब की बोतलें भरी पड़ी थीं. इलैक्ट्रौनिक्स सामान तो इस कद्र भरा पड़ा था कि पुलिस के लिए उस की सूची बना पाना कठिन हो रहा था.

तलाशी में मिले सामान को कब्जे में ले कर पुलिस ने गैरी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20/61/88, आबकारी अधिनियम की धारा 6/1/14 एवं आर्म्स एक्ट की धाराओं 25/54/59 के अंतर्गत मामले दर्ज कर लिए. अलबत्ता एनिमल्स एक्ट एवं वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन के तहत सबूतों के अभाव में कोई मामला दर्ज नहीं किया गया. मोहाली का यह एक ऐसा सनसनीखेज मामला था, जो उन दिनों लगातार अखबारों की सुर्खियां बना रहा. इस में सब से निराशाजनक पहलू यह रहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद मोहाली पुलिस गैरी, लखबीर और रणबीर को गिरफ्तार नही कर सकी. कुलविंदर को चश्मदीद गवाह बना लिया गया था. आखिर 12 सितंबर, 2000 को गैरी, लखबीर और रणबीर को फरार अपराधी घोषित कर दिया गया.

देखतेदेखते इस मामले को घटित हुए 15 साल लंबा अरसा गुजर गया. अपराधी जाने किस गुफा में घुस कर बैठ गए थे. इतना समय बीत जाने के बाद भी उन के बारे मे कहीं कुछ पता नहीं चला था. गुरप्रीत सिंह भुल्लर अन्य कई जगहों से तबादला होते हुए एक बार फिर यहां के एसएसपी बने. एसएसपी मोहाली के रूप में उन्होंने यहां के कई अनसुलझे मामलों को खंगाला. जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल सामने आते ही उन्हें इस मामले की एकएक बात याद आ गई. पुलिस के लिए यह शरम की बात थी कि 15 साल पहले इस जघन्य अपराध की जांच जहां थी, आज भी वहीं थी. एसएसपी भुल्लर ने एक बार फिर इस मामले की जांच की जिम्मेदारी जिले के सीआईए इंस्पेक्टर गुरचरण सिंह को सौंप दी.

गुरचरण सिंह ने एसआई हरभजन सिंह के नेतृत्व में एक विशेष टीम का गठन कर जादूगर अशोक हत्याकांड की फाइल फिर से खोल दी. अन्य प्रयासों के साथ हरभजन सिंह ने अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. इसी 23 अप्रैल, 2015 की शाम करीब साढ़े 4 बजे एसआई हरभरज सिंह, एएसआई पवन कुमार, हवलदार सतीश कुमार, दर्शन सिंह और रसजीत के साथ रूटीन गश्त में गांव दाऊं के मोड़ पर मौजूद थे कि उन के एक विश्वस्त मुखबिर ने आ कर उन्हें एक ऐसी सूचना दी, जो हैरान करने वाली थी.

सूचना के अनुसार, जादूगर अशोक हत्याकांड का वांछित अभियुक्त गुरविंदर सिंह उर्फ गैरी अपनी जायदाद बेचने के लिए अपने कुछ साथियों के साथ मोहाली आया हुआ था. 15 साल के अंतराल में उस की सूरत थोड़ी बदल गई थी. खुली दाढ़ी, सामान्य कपड़ों में उस ने अपना हुलिया काफी बदल रखा था. मुखबिर ने उन्हें बताया था कि उस ने उस आदमी के बारे में काफी गहराई से पता किया है.  चौंकाने वाली बात यह है कि वह आदमी असली गैरी नहीं है. वह सारे दस्तावेज तैयार करा कर खुद को गुरविंदर सिंह गैरी साबित कर के उस की जमीन जायदाद बेचने की कोशिश कर रहा है. इस के लिए उस ने कई लोगों से लाखों रुपए एडवांस भी ले लिए हैं.

मुखबिर का कहना था कि ठगी का यह काम करने वाले उस आदमी का अपना एक गिरोह है. एसआई हरभजन सिंह ने तुरंत यह जानकारी इंसपेक्टर गुरचरण सिंह को दी. उन्होंने एसएसपी हरप्रीत सिंह भुल्लर से संपर्क किया तो उन्हें दिशानिर्देश के साथ काररवाई करने का आदेश मिल गया. अधिकारियों का निर्देश और आदेश मिलते ही हरभजन सिंह ने मुखबिर से मिली जानकारियों के आधार पर एक तहरीर तैयार कर थाना बलौंगी भिजवा दी, जहां अपराध भादंवि की धाराओं 410, 420, 465, 467 478, 471 एवं 120 बी के तहत कुल 9 लोगों गुरविंदर सिंह, बूटा सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह, हरभजन सिंह, लाला पटवारी, सुक्खी पत्नी अमरजीत सिंह, बंटी और हरबंस डीलर के खिलाफ मुकदमा दर्ज हो गया.

हरभजन सिंह ने अपने साथियों के साथ मुखबिर द्वारा बताई जगह पर छापा मार कर 4 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. बाकी लोग उन के वहां पहुंचने से पहले ही चले गए थे. जो 4 लोग पकड़े गए, उन के नाम थे गुरविंदर सिंह, जगतार सिंह, उत्तम सिंह और हरभजन सिंह, इन्हें अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए 4 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया गया. हरभजन सिंह और इंसपेक्टर गुरचरण सिंह के अलावा एसएसपी भुल्लर ने भी इन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की. इस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह थोड़ा हैरान करने वाली थी.

गुरप्रीत सिंह मूलरूप से डूगरी, लुधियाना का रहने वाला था. गुजारे लायक पढ़ाई करने के बाद वह छिटपुट काम करते हुए दुबई चला गया. वहां से कुछ समय पहले वह लौटा तो उस की मुलाकात पंचकूला निवासी अमरजीत सिंह से हुई, जिस ने खुद को पंजाब पुलिस का कर्मचारी बताया. उस ने यह भी बताया कि उस की नियुक्ति खेल कोटे से हुई थी. गुरप्रीत सिंह को उस ने एक फायदे की बात यह बताई कि आपराधिक मामलो में फंस कर कई बार लोग पुलिस की मार से बचने के लिए अपनी जमीनजायदाद छोड़ कर भूमिगत हो जाते हैं. ऐसे में नकली दस्तावेज तैयार करा कर इस तरह की संपत्ति को बेच कर मोटा पैसा कमाया जा सकता है.

बात जंच गई तो गुरप्रीत और अमरजीत ने अपना एक गिरोह बना लिया. उन का यह धंधा चल निकला. मगर अचानक अमरजीत की मौत हो गई तो उस की पत्नी सुक्खी को इस गिरोह में शामिल कर लिया गया, जिसे जादूगर अशोक हत्याकांड वाले मामले की काफी जानकारी थी. उस का कहना था कि इस मामले का मुख्य आरोपी गैरी बहुत अमीर आदमी था. चंड़ीगढ़ और मोहाली में उस की काफी प्रौपर्टी थी, जिसे छोड़ कर वह विदेश भाग गया था और अब वह कभी वापस आने वाला नहीं था. जैसेतैसे इन लोगों ने गैरी की फोटो जुटा ली तो यह बात सामने आई कि उस की शक्ल गिरोह के सदस्य गुरप्रीत से एकदम मेल खा रही है. दोनों को हमशक्ल कहा जा सकता था.

इस के बाद योजना बना कर गुरप्रीत की फोटो के साथ गुरविंदर सिंह गैरी के नाम से वोटर कार्ड के अलावा अन्य जाली दस्तावेज तैयार करा लिए गए. इस तरह गुरप्रीत को गैरी बना कर उस की प्रौपर्टी बेचने की कोशिश में एडवांस के रूप में इन्होंने 60 लाख रुपए इकट्ठा कर लिए. दरअसल ये लोग प्रौपर्टी की कीमत मार्केट रेट से इतनी कम बताते थे कि लोग इन के झांसे में आसानी से आ जाते थे. गिरफ्त में आए 4 लोगों से हुई पूछताछ के बाद इन की निशानदेही पर पुलिस ने वह पैसा बरामद कर लिया था. अभियुक्त उत्तम सिंह निवासी गांव आलमपुर जिला पटियाला, हरभजन सिंह निवासी गांव तलबड़ी, जिला मोहाली और जगतार सिंह निवासी हरपालपुर, जिला पटियाला साधारण परिवारों से थे. सभी शादीशुदा और बालबच्चेदार हैं.

पढ़ाई भी इन्होंने गुजारे लायक कर रखी है. छिटपुट काम करते हुए अपने गुजारे लायक कमाई भी कर रहे थे. बिना मेहनत के रातोरात अमीर बनने के लालच ने इन की मति मारी गई थी. पुलिस ने पकड़े गए चारों अभियुक्तों से पूछताछ कर के इन्हें पुन: अदालत में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. पुलिस को अब अन्य अभियुक्तों बूटा सिंह, लाला पटवारी, बंटी, हरबंस डीलर और सुक्खी की तलाश है. ठगी करने वाले भले ही पकड़े गए, मगर अफसोस की बात यह है कि जादूगर अशोक हत्याकांड का एक भी अभियुक्त अभी तक पकड़ा नहीं जा सका. Chandigarh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Hindi Crime Story: बदल जाए जब प्यार

Hindi Crime Story: बिरमा को अनुज यादव से प्यार हुआ तो वह पुराने प्रेमी राजकुमार से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए बिरमा ने जो रास्ता अपनाया, क्या वह उचित था?

फिरोजाबाद से मैनपुरी की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित थानाकस्बा घिरोर के नजदीकी गांव नंगला केहरी के शिव मंदिर के पास जब गांव वालों ने 2-2 लाशें पड़ी देखीं तो परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना थाना घिरोर पुलिस को दी. गांव नंगला केहरी थाना घिरोर के अंतर्गत ही आता था. वह थाने के नजदीक ही था, इसलिए थानाप्रभारी देवेश कुमार जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतकों की उम्र 35-40 साल रही होगी. शक्लसूरत और पहनावे से दोनों ही ठीकठाक घरों के लग रहे थे. लाशों के आसपास खून नहीं था, इस से पुलिस समझ गई कि इन्हें कहीं दूसरी जगह मार कर लाशें यहां फेंकी गई हैं.

गांव वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाए थे. इस का मतलब वे इस इलाके के रहने वाले नहीं थे. पुलिस को लाशों की तलाशी में भी कुछ नहीं मिला था, जिस से उन की पहचान हो पाती. पुलिस को लगा कि इन की शिनाख्त में परेशानी होगी. लेकिन जब उन्हें एक लाश की कमीज पर सिलने वाले दरजी का स्टिकर दिखाई दिया तो मन को थोड़ा संतोष हुआ कि शायद इस से कुछ मदद मिल जाए. पुलिस ने कोशिश की तो उस स्टिकर से मदद ही नहीं मिली, बल्कि मृतकों के घर तक पहुंच गई. कमीज पर जो स्टिकर लगा था, वह आगरा के फतेहाबाद के एक दरजी का था. थाना घिरोर पुलिस दरजी के यहां पहुंची तो उस ने तुरंत मृतक की शिनाख्त कर दी. उस ने बताया कि यह कमीज गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजकुमार की है.

थाना घिरोर पुलिस ने राजकुमार के घर पहुंच कर उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने कहा कि वे खुद ही राजकुमार और लक्ष्मीकांत को ढूंढ रहे हैं. दोनों एक दिन पहले फिरोजाबाद में रहने वाली अपनी बहन के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले थे, लेकिन वे बहन के यहां पहुंचे ही नहीं. चिंता की बात यह है कि उन का फोन भी बंद है. जब पुलिस ने घर वालों को बताया कि राजकुमार और लक्ष्मीकांत की हत्या हो गई है तो घर वाले हैरान होने के साथसाथ रोनेबिलखने लगे. घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की हत्या क्यों की गई?

क्योंकि उन की ऐसी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि दोनों का किसी महिला से कोई चक्कर वगैरह तो नहीं था तो घर वालों ने बताया कि राजकुमार का फिरोजाबाद में रह रही बिरमा से संबंध था. उस का यह संबंध तब से था, जब वह इसी गांव में रहती थी. 2 भाइयों की हत्या को ले कर पुलिस गंभीर थी. बिरमा की ससुराल आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव खिसवा में थी. राजकुमार का तभी से उस के यहां आनाजाना था. लेकिन इधर उस का पति प्रहलाद सिंह उसे और बच्चों को ले कर फिरोजाबाद में रहने लगा था. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए राजकुमार के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार राजकुमार की घटना वाले दिन एक नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पुलिस ने पता किया तो वह नंबर फिरोजाबाद में झील की पुलिया की रहने वाली ऊषा का निकला.  पुलिस ऊषा के घर पहुंची तो वह घर से गायब थी. उस के घर से गायब होने पर पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि ऊषा देहधंधा करने के अलावा लड़कियां भी सप्लाई करती थी. ऊषा के मिलने पर ही स्थिति साफ हो सकती थी. पुलिस ऊषा के पीछे लग गई. वह जहांजहां मिल सकती थी, पुलिस ने छापा मारा. उस के पति बलबीर पर भी शिकंजा कसा गया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. इस के बाद मुखबिरों की मदद ली गई. तब जा कर मैनपुरी बसअड्डे से उसे गिरफ्तार किया गया.

उस के साथ एक औरत और थी. दोनों दिल्ली जाने की फिराक में थीं. पूछताछ में पता चला कि ऊषा के साथ जो औरत थी, वह बिरमा थी. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती थी. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन के बताए अनुसार, राजकुमार और उस के चचेरे भाई लक्ष्मीकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. हत्या की यह कहानी कुछ इस प्रकार थी: आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजेंद्र सिंह का बेटा था राजकुमार. उस के 2 भाई और थे, भोले और पूरन. राजेंद्र सिंह गांव का खातापीता किसान था.

राजकुमार की शादी मुरैना के जनकपुर की रहने वाली गुड्डी के साथ हुई थी, जिस से उसे एक बेटी और 2 बेटे थे. राजकुमार के पड़ोस के गांव में रहता था प्रहलाद सिंह, जो ब्याज पर पैसे देने का काम करता था. राजकुमार अकसर प्रहलाद सिंह के घर जाया करता था. वह उस की पत्नी बिरमा को भाभी कहता था. न जाने क्यों बिरमा उस की खूब आवभगत करती थी. राजकुमार को भी वह अच्छी लगती थी. एक तो बिरमा का अच्छा लगना, दूसरे उस के द्वारा आवभगत करना, राजकुमार उस की ओर आकर्षित हो गया. फिर वह उसे अपनी बनाने के चक्कर में रहने लगा. दूसरी ओर बिरमा ब्याही भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन कभी उस ने उसे पसंद नहीं किया, इस की वजह यह थी कि प्रहलाद सिंह कमजोर दिमाग का था.

बिरमा उस के साथ बिलकुल खुश नहीं थी. इसीलिए राजकुमार के आने पर वह उस की खूब आवभगत करती थी. क्योंकि वह उसे पसंद करती थी. दोनों ओर से आकर्षण की डोर बढ़ी तो उसे जुड़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन यह सब चोरीछिपे हो रहा था. बिरमा भी 1 बेटी और 2 बेटों की मां थी. वह रहती भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन वह पति राजकुमार को ही मानती थी. कोई बात आखिर कितने दिनों तक छिपी रह सकती है. धीरेधीरे गांव वालों को बिरमा और राजकुमार के संबंधों का पता चल गया.

कुछ लोगों ने प्रहलाद सिंह को आगाह भी किया, लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिरमा को रोक सकता. दूसरी ओर राजकुमार भी दबंग किस्म का युवक था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी उसे कोई रोक नहीं सका. इस तरह राजकुमार और बिरमा बिना किसी रुकावट के एकदूसरे से मिलते रहे. लेकिन जब पति के इन संबंधों की जानकारी गुड्डी को हुई तो वह तनाव में रहने लगी. बिरमा की वजह से पतिपत्नी के बीच दूरियां पैदा होने लगीं. उस ने कई बार सास से शिकायत भी की, लेकिन मां भी बेटे को नहीं रोक पाई. लिहाजा इसी गम और चिंता में एक दिन गुड्डी चल बसी.

गुड्डी जब मरी थी, बच्चे छोटेछोटे थे. लेकिन राजकुमार ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि उस का काम तो बिरमा से चल ही रहा था. अब वह पूरी तरह से आजाद था. प्रहलाद सिंह की गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने अपना गांव छोड़ दिया और फिरोजाबाद के थाना लाइन पार के रामनगर गांव में अपना मकान बनवा कर परिवार के साथ रहने लगा. जिस बदनामी की वजह से प्रहलाद सिंह ने गांव छोड़ा था, उस ने यहां आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. बिरमा और राजकुमार के संबंध उसी तरह बने रहे. वह यहां भी लगातार आता रहा. फिरोजाबाद में बिरमा की दोस्ती ऊषा से हो गई तो वह उस के घर भी आनेजाने लगी.

यहीं ऊषा की मुलाकात राजकुमार से हुई. राजकुमार को पता चला कि ऊषा देहधंधा तो करती ही है, लड़कियां भी सप्लाई करती है तो उसे खुशी हुई. इस के बाद वह ऊषा के घर जा कर अपने लिए लड़कियां मंगवाने लगा. इस तरह शारीरिक सुख की चाह में वह ऊषा के घर भी जाने लगा. बिरमा को इस की जानकारी थी, लेकिन उसे इस से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि राजकुमार अब भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. लेकिन जब बिरमा की मुलाकात चिलवा गेट के रहने वाले अनुज यादव से हुई तो राजकुमार उसे खटकने लगा. अनुज भी सूदखोरी का काम करता था. वह भी बिरमा पर दिल खोल कर रुपए खर्च करने लगा था. था तो वह भी शादीशुदा और बालबच्चेदार, लेकिन जैसा कहा जाता है कि आदमी को घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है, वैसा ही कुछ अनुज के साथ भी था.

इस नए प्रेमी के जिंदगी में आने के बाद बिरमा राजकुमार से दूरियां बनाने लगी. उस ने राजकुमार का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. बिरमा के इस व्यवहार से राजकुमार को परेशानी होने लगी, क्योंकि उसी से मिल कर उस के दिल को तसल्ली मिलती थी. जब उसे बिरमा से कुछ ज्यादा ही उपेक्षा मिलने लगी तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘बिरमा, इधर तुम बदल नहीं गई हो, लगता है मैं तुम्हें भारू लगने लगा हूं?’’

‘‘नहीं तो, यह तुम्हारा वहम है. मैं तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहती हूं. लेकिन अब परेशानी की बात यह है कि बच्चे बड़े हो गए हैं. उन के सामने यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

बिरमा राजकुमार से ये बातें कह ही रही थी कि तभी उस की बेटी आ गई. उसे देख कर राजकुमार मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो, बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’’

राजकुमार ने बिरमा की बेटी को जिस तरह  देखा था, उस की नजरों में खोट था, जिसे बिरमा ने ताड़ लिया था. उस ने तुरंत बेटी को अंदर जाने का इशारा करते हुए राजकुमार से धीरे से कहा, ‘‘अब हम घर के बाहर मिले तो ज्यादा ठीक रहेगा.’’

बिरमा की बेवफाई राजकुमार की समझ में नहीं आ रही थी. उस की उपेक्षा से वह चिंतित था. उसे लगा, इस के पीछे जरूर कोई बात है. उस ने कोशिश की तो सच्चाई सामने आ गई. बिरमा और अनुज यादव के संबंधों की उसे जानकारी हो गई. बिरमा ने उसे शारीरिक सुख दिया था तो उस ने भी उस के बदले उस के लिए कम नहीं किया था. अब उसे चिंता थी कि अगर बिरमा हाथ से निकल गई तो उसे शारीरिक सुख कैसे मिलेगा? वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए उस ने बिरमा से पूछा, ‘‘अनुज यादव तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘अनुज यादव से मेरा क्या संबंध? बस मोहल्ले में रहता है?’’ बिरमा ने कहा.

‘‘बिरमा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. इसलिए कान खोल कर सुन लो, अगर हमारे बीच कोई आया तो मैं न तुम्हें जिंदा छोड़ूंगा और न उसे.’’ राजकुमार ने धमकी दी.

राजकुमार की इस धमकी से बिरमा परेशान जरूर हो गई, लेकिन अब वह अनुज को कतई नहीं छोड़ सकती थी. वह उसी की बदौलत राजकुमार से पीछा छुड़ाना चाहती थी. जबकि यह इतना आसान नहीं था. इसी वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा. जब राजकुमार को लगा कि बिरमा उस के बजाय अनुज को ज्यादा महत्त्व दे रही है तो उस ने अपनी लायसेंसी पिस्तौल से बिरमा के घर फायरिंग करते हुए धमकी दी कि अगर उस ने अनुज से संबंध खत्म नहीं किए तो अच्छा नहीं होगा. राजकुमार के तेवर देख कर बिरमा डर गई. बिरमा को लगने लगा कि राजकुमार कभी भी उस की बेटी पर हाथ डाल सकता है. यह बात उस ने अनुज से बता कर कहा, ‘‘अगर तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो राजकुमार नाम के इस कांटे को तुम्हें निकालना होगा.’’

अनुज को पता चल गया था कि राजकुमार दबंग किस्म का आदमी है. बिरमा के लिए वह उस की भी जान ले सकता है. इसलिए उस ने सोचा कि राजकुमार उस के साथ कुछ गड़बड़ करे, उस के पहले ही वह उसे ठिकाने लगा दे. इस के बाद उस ने ऊषा और बिरमा के साथ बैठ कर राजकुमार को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजना बनने के बाद ऊषा ने राजकुमार को फोन किया, ‘‘एक अच्छी लड़की आ गई है. अगर चाहो तो आ जाओ. लेकिन पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा.’’

राजकुमार ने कहा, ‘‘पैसे की कोई चिंता नहीं है. बस लड़की अच्छी होनी चाहिए.’’

‘‘लड़की अच्छी है, तभी तो फोन किया है.’’

‘‘फिर रात में मैं पहुंच रहा हूं.’’ कह कर राजकुमार ने फोन काट दिया.

शाम को राजकुमार ने घर वालों से कहा कि वह बहन के यहां जा रहा है. वह घर से निकला तो चचेरा भाई लक्ष्मीकांत दिखाई दे गया. लड़की के बारे में बता कर उस ने उसे भी साथ ले लिया. लक्ष्मीकांत भी विधुर था. शारीरिक सुख की लालसा से वह भी राजकुमार के साथ चल पड़ा. दोनों ऊषा के घर पहुंचे तो वहां बिरमा भी मौजूद थी. बिरमा और लड़की को देख कर राजकुमार ने कहा कि वह बिरमा के साथ मौजमस्ती करेगा और लक्ष्मीकांत लड़की के साथ. ऊषा ने लड़की के साथ लक्ष्मीकांत को संतनगर भेज दिया तो राजकुमार को बिरमा के साथ तिलकनगर के अन्य मकान में. राजकुमार अपनी पिस्तौल लिए था.

लेकिन जब वह बिरमा के साथ उस घर में पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे अनुज यादव, लाला पंडित और विजय सिंह उस पर टूट पड़े. अनुज यादव ने राजकुमार की हत्या के लिए उन दोनों को 2 लाख रुपए दिए थे. राजकुमार को पिस्तौल निकालने का मौका ही नहीं मिला. उन लोगों ने ईंटपत्थर से राजकुमार की हत्या कर दी. लक्ष्मीकांत लड़की के साथ संतनगर स्थित जिस मकान में आया था, थोड़ी देर बाद टाटा मैजिक से राजकुमार की लाश ले कर तीनों वहां पहुंचे. उन्हें देख कर वह हक्काबक्का रह गया. वह कुछ समझ पाता, गोली मार कर उस की भी हत्या कर दी गई.

इस के बाद उस की लाश को भी उसी टाटा मैजिक में डाल कर वे मैनपुरी को जाने वाली सड़क पर चल पड़े. रोड पर ही स्थित थानाकस्बा घिरोर के पास गांव नंगला केहरी के शिवमंदिर के पास दोनों लाशें फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. थाना घिरोर पुलिस ने ऊषा और बिरमा को गिरफ्तार कर हत्या का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी मुख्य अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगे थे. देवेश कुमार मुख्य अभियुक्तों तक पहुंचते, उस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उस के बाद आए नए थानाप्रभारी दिवाकर सिंह यादव. उन्होंने काफी कोशिश कर के अनुज यादव को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में अनुज यादव ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन वह राजकुमार की मोटरसाइकिल, पिस्तौल और मोबाइल नहीं बरामद कर सके. उस का कहना था कि इन चीजों के बारे में लाला पंडित और गुन्नू यादव उर्फ विजय सिंह ही कुछ बता सकते हैं. अनुज यादव की गिरफ्तारी के बाद लाला पंडित और विजय सिंह को लगा कि वे कभी भी पकड़े जा सकते हैं. पकड़े जाने के डर से दोनों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस पूछताछ तथा सामान की बरामदगी के लिए उन्हें रिमांड पर लेने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक उन्हें रिमांड पर नहीं लिया जा सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP News: प्यार में खत्म हुई ‘सीमा’

UP News: नाबालिग सीमा अपने प्रेमी प्रभु के साथ भाग गई थी. पुलिस ने सीमा को बरामद कर के प्रभु को गिरफ्तार भी कर लिया. इस के बावजूद जब सीमा की हत्या हो गई तो पुलिस को संदेह उस के घर वालों पर ही हुआ. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बरेली जनपद के थाना विशारतगंज के मोहल्ला वार्ड नंबर 11 में भूरे खां अपने परिवार के साथ रहता था. भूरे के परिवार में पत्नी नसीम, 6 बेटियां और 2 बेटे थे. इन में केवल सब से बड़ी सकीना का विवाह हुआ था, बाकी सभी अविवाहित थे.

इश्तियाक दिल्ली में किसी फैक्ट्री में नौकरी करता था. मुश्ताक भी कुछ दिनों तक दिल्ली में रहा था, लेकिन इधर वह घर पर ही रह रहा था. पूरा परिवार जरी का काम करता था, जिस से होने वाली कमाई से उन के घर का खर्च आसानी से चल रहा था. भूरे की 15 साल की बेटी सीमा किशोरावस्था की सीमा पार कर के जवानी की दहलीज पर कदम रख रही थी. जवानी की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, इस के बावजूद उसे फिल्मों का जबरदस्त शौक था. उस की सहेलियां भी उसी जैसी सोच की थीं. इसलिए उन में जब भी बातें होतीं, फिल्मों और उन में दिखाए जाने वाले प्रेमसंबंधों को ले कर होतीं.

यह उम्र का ही तकाजा था कि सीमा को उन बातों में खूब मजा आता था. उस के दिल में भी उमंगें थीं, उस के ख्यालों में भी अपने चाहने वाले की तस्वीर थी. लेकिन यह तस्वीर कुछ धुंधली सी थी. उस की आंखें ख्यालों की तस्वीर के चाहने वाले की तलाश किया करती थीं. लेकिन काफी कोशिशों के बाद भी वह धुंधली तस्वीर साफ हो रही थी और न वह कहीं नजर आ रहा था. उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले लड़के कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा नहीं था, जो उस के ख्यालों की तस्वीर में फिट बैठता.

2 साल पहले सीमा पिता भूरे के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के ही एक गांव रेवती गई. यह गांव उस के गांव से ज्यादा दूर नहीं था. लौटते समय वह रेवती रेलवे स्टेशन पर खड़ी ट्रेन का इंतजार कर रही थी, तभी एक वेंडर युवक पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा. उस लड़के में सीमा ने न जाने क्या देखा कि उस का दिल एकदम से धड़क उठा. उस की निगाहें उस पर टिक कर रह गई. उस के दिल से आवाज आई, ‘सीमा यही है तेरा चाहने वाला.’

उस युवक का चेहरा आंखों के रास्ते दिल में पहुंचा तो उस के ख्यालों में बनी धुंधली तस्वीर, बिलकुल साफ हो गई. वह युवक जब तक उस की नजरों के सामने रहा, सीमा उसे एकटक निहारती रही. उसे अपनी ओर इस तरह निहारते देख वह युवक भी बारबार उसी को देखने लगा. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैर उठती. ट्रेन आई तो सीमा पिता के साथ ट्रेन में बैठ गई. पूरे रास्ते उस की आंखें के सामने उसी युवक का चेहरा घूमता रहा.

वह विशारतगंज रेलवे स्टेशन पर ट्रेन से उतर कर स्टेशन से बाहर आई तो उस नवयुवक को एक अंडे की दुकान पर देखा. वह ग्राहकों को अंडे बेच रहा था. इस का मतलब वह दुकान उसी की थी. इस का मतलब युवक विशारतगंज का रहने वाला था. यह जान कर सीमा को काफी खुशी हुई. उस ने सोचा कि वह जब भी चाहेगी, उस युवक के बारे में पता कर के उस से मिल सकेगी. यह बात दिमाग में आते ही उसे काफी सुकून मिला. वह पिता के साथ घर आ गई.

सीमा ने जल्दी ही उस युवक के बारे में पता कर लिया. उस का नाम था प्रभु गोस्वामी. वह वार्ड नंबर 6 में रहता था. उस के पिता महेश की मौत हो चुकी थी. परिवार में मां और 2 छोटे भाई थे. घर प्रभु की ही कमाई से चल रहा था. रेलवे स्टेशन के पास वह अंडे की दुकान लगाता था, साथ ही स्टेशन और ट्रेन में पानी की बोतलें बेच लेता था. एक दिन सुबह प्रभु छत पर बैठा मौसम का आनंद ले रहा था, तभी अचानक उस के मोबाइल की घंटी बज उठी. इतनी सुबह फोन करने वाला उस का कोई दोस्त ही होगा, यह सोच कर वह मोबाइल स्क्रीन पर नंबर देखे बगैर ही बोला, ‘‘हां बोल?’’

‘‘जी, आप कोन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी लड़की की मधुर आवाज आई तो प्रभु चौंका. उसे अपनी गलती का अहसास हुआ तो उस ने तुरंत ‘सौरी’ कहते हुए कहा, ‘‘माफ करना, दरअसल मैं ने सोचा कि इतनी सुबहसुबह कोई दोस्त ही फोन कर सकता है, इसीलिए… वैसे आप को किस से बात करनी है, आप कौन बोल रही हैं?’’

‘‘मैं सीमा बोल रही हूं. मुझे भी अपनी दोस्त से बात करनी थी. लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया है.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा करेंगी तो गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘नहीं तो, क्यों?’’

‘‘बात तो पुलिस वालों की ही तरह कर रहे हो. सवाल के साथ सलाह भी.’’ कह कर सीमा जोर से हंसी.

‘‘अरे नहीं, मैं ने तो वैसे ही कह दिया. दोस्त आप की, फोन भी आप का. आप चाहें नंबर सेव करें या न करें.’’

‘‘आप बुजुर्ग हैं?’’ सीमा ने फिर छेड़ा.

‘‘जी नहीं, अभी मैं नौजवान हूं.’’

‘‘तब तो किसी न किसी के खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी प्रभु की थी. वह जोर से हंसा फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताएं, मैं क्या करूं?’’ प्रभु ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल, सीमा ने किसी तरह प्रभु का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया था. सीमा के पास खुद का मोबाइल नहीं था. इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए. उन के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों ही एकदूसरे के लिए अपनापन महसूस करने लगे. इस के बाद उन के बीच अक्सर बातें होने लगीं. सीमा ने प्रभु को बता दिया था कि उस दिन उस ने अनजाने में नहीं, जानबूझ कर फोन किया था और वह भी उस का नंबर हासिल कर के. इतना ही नहीं, उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब प्रभु ने मुलाकात के बारे में पूछा तो सीमा ने रेवती रेलवे स्टेशन पर हुई मुलाकात के बारे में बता दिया. प्रभु यह जान कर खुश हआ, क्योंकि उस दिन सीमा का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर चुका था. इस के बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं. दिनोंदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता गया. सीमा दीवानगी की हद तक प्रभु को चाहने लगी थी. प्रभु इस बात को बखूबी जानता था, लेकिन उस के दिमाग में जातिधर्म की बात बैठी हुई थी, इसलिए उसे हमेशा सीमा को खो देने का डर सताता रहता था. प्रेम दीवानों के प्रेम की खुशबू जब जमाने तक पहुंचती है तो लोग उन दीवानों पर तमाम बंदिशें लगाने लगते हैं. यही सीमा के घर वालों ने भी किया.

सीमा का गैरधर्म के लड़के के साथ इश्क लड़ाना घर वालों को रास नहीं आया. उन्होंने सीमा पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी सीमा प्रभु से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी. इसी बीच एक मुलाकात में प्रभु को उदास देखा. सीमा ने कारण पूछा, ‘‘तुम्हारे दिल में ऐसी क्या बात है, जिस की वजह से तुम्हारे चेहरे पर उदासी छाई है?’’

‘‘कुछ नहीं, तुम्हें ऐसे ही लग रहा है.’’ प्रभु ने टालने की कोशिश की.

‘‘मुझे ऐसे ही नहीं लग रहा, कोई बात है जिस की वजह से तुम उदास हो. तुम्हें मेरी कसम, बताओ क्या बात है?’’

‘‘सीमा मुझे डर है कि मैं तुम्हें खो न दूं.’’

‘‘क्यों, तुम्हें ऐसा क्यों लगता है?’’

‘‘हम दोनों की जाति तो छोड़ो, धर्म भी अलगअलग है. ऐसे में घर समाज ही नहीं, घर वाले ही हमारी शादी के लिए नहीं राजी होंगे.’’

‘‘सच्चा प्यार ऊंचनीच और जातिधर्म का मोहताज नहीं होता. लोग कहते हैं न कि जोडि़यां ऊपर वाला बनाता है. इसलिए हम दोनों में प्यार हुआ है तो इस का मतलब है कि ऊपर वाले को हमारा प्यार मंजूर है. फिर इस में संदेह की कोई बात कहां है.’’

‘‘लेकिन तुम्हरे घर वाले तो हमें दूर करने के लिए जमीनआसमान एक किए हुए हैं.’’

‘‘चिंता मत करो, मैं अपने घर वालों को किसी न किसी तरह समझा लूंगी. अगर नहीं समझा पाई तो हमारे सामने और भी रास्ते हैं. देखो प्रभु, हमें दुनिया से जितना लड़ना पड़े, हम लड़ेंगे और जीतेंगे भी. कोई ताकत हमें जुदा नहीं कर सकती.’’

इतना कह कर सीमा प्रभु के सीने से लग गई. ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी सीमा ने हार नहीं मानी. उस की हिम्मत उस का प्यार था, जिसे वह हर हाल में अपने से जुदा नहीं कर सकती थी. फिर कुछ देर और बात कर के दोनों अपनेअपने घरों को लौट गए. सीमा ने अपने घर वालों से बात की, लेकिन वे राजी नहीं हुए, उल्टे उस की पिटाई कर दी. बंदिशों के बाद भी उन के चोरीछिपे मिलने की भनक सीमा के घरवालों को लग ही जाती थी. उसी बीच रामलीला मेले में प्रभु पर चाकू से जानलेवा हमला किया गया. लेकिन संयोग था कि प्रभु बच गया. पुलिस में शिकायत भी की गई, लेकिन पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की.

इस घटना ने सीमा को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर वे यहां रहें तो दोनें की जान को खतरा बना रहेगा. उन दोनों को अलग करने के लिए उस के घर वाले किसी भी हद तक जा सकते हैं, इसलिए उस ने एक फैसला लिया. 18 फरवरी को सीमा रेलवे स्टेशन पहुंची और प्रभु से भाग चलने की जिद करने लगी. प्रभु तैयार नहीं हुआ तो वह वहां खड़ी सद्भावना एक्सप्रेस के आगे लेट गई और जान देने की धमकी देने लगी. हार कर प्रभु को उस की बात माननी पड़ी. वह सीमा को वहां से अपने घर ले गया और छिपा दिया. रात में दोनों रेलवे स्टेशन पहुंचे और ट्रेन से हिमाचल प्रदेश चले गए. प्रभु घर से 10 हजार रुपए ले कर गया था. वहां दोनों ने विवाह कर लिया और पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

इधर सीमा के घर वालों को प्रभु के साथ उस के भाग जाने की खबर लगी तो उन्होंने उस की खोजबीन शुरू कर दी. काफी खोजबीन के बाद भी जब उस का कुछ पता नहीं चला तो एक मार्च को सीमा के पिता भूरे ने विशारतगंज थाने में प्रभु और उस के चाचा रमेश पर तमंचे की नोक पर सीमा का अपहरण करने का आरोप लगाते हुए तहरीर दी. थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने प्रभु और रमेश के विरूद्ध भादंवि की धारा 363, 366, 452, 504 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने प्रभु के घरवालों और रिश्तेदारों पर दबाव बनाना शुरू किया तो प्रभु ने होली के एक दिन पहले 5 मार्च को एक भाजपा नेता के माध्यम से सीमा को पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने उसे महिला थाना भेजने के बजाय बिना मैडिकल कराए ही परिजनों के हवाले कर दिया. 9 मार्च को उस के कोर्ट में बयान होने थे. इसी बीच 8 मार्च को देर रात पुलिस ने प्रभु को भी गिरफ्तार कर लिया.  9 मार्च की सुबह साढ़े 7 बजे भूरे विशारतगंज थाने पहुंचा कि किसी नकाबपोश ने सुबह 4 बजे सीमा की हत्या कर दी है. उस समय घर का मेनगेट खुला हुआ था. सीमा की मां नसीम टौयलेट गई थी, बाकी लोग सो रहे थे. अचानक गोली चलने की आवाज सुनाई दी तो सभी उठ कर दौड़े. पास जा कर देखा तो सीमा के सिर से खून बह रहा था और उस का शरीर शिथिल पड़ चुका था. उस की मौत हो चुकी थी. उन्होंने एक नकाबपोश को वहां से भागते देखा था, वह कोई और नहीं प्रभु था.

उस का आरोप सुन कर थानाप्रभारी शुजाउर रहीम ने कहा कि प्रभु तो उन की हिरासत में है, वह कैसे खून कर सकता है? बहरहाल, शुजाउर रहीम पुलिस फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मामले की गंभीरता को देखते हुए उन्होंने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी और खुद सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. कुछ ही देर में एसपी (ग्रामीण) ब्रजेश श्रीवास्तव और सीओ (आंवला) धर्म सिंह मार्छाल भी घटनास्थल पर पहुंच गए. सीमा के सिर में काफी गहरा घाव था, जिस से अनुमान लगाया कि हत्यारे ने बहुत नजदीक से गोली चलाई थी. पुलिस अधिकारियों ने घर वालों से पूछताछ की तो सभी के बयान अलगअलग थे. शुरुआती जांच में और अब तक की पूछताछ में यह मामला औनर किलिंग का लग रहा था.

घटना के बाद से ही सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक घर से गायब था. पुलिस ने आसपड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि देर रात तक सीमा के घरवाले जागते रहे थे. सीमा से लड़ाईझगड़ा होने की बात भी सामने आई. देर रात तक उन के घर में अफरातफरी का माहौल बना रहा था. उस के बाद कुछ समय के लिए सब शांत हो गया. सुबह 4 बजे गोली चलने की आवाज आई और फिर उस के बाद रोनेपीटने की आवाजें आने लगीं. इस के बाद सीमा की हत्या किए जाने की बात सामने आई. सीमा की हत्या में सारे हालात किसी अपने की ओर इशारा कर रहे थे. वह अपना कोई और नहीं, उस का बड़ा भाई इश्तियाक हो सकता था. वही घर से गायब था और उस का मोबाइल भी बंद था.

पूछताछ के बाद सीमा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. इस के बाद पुलिस ने घर की तलाशी ली, लेकिन कुछ खास हाथ नहीं लगा. आगे की जांच में पता चला कि घटना की रात सीमा का मामा गुड्डू भी आया था. गुड्डू बरेली के थाना सिरौल के गांव हरदासपुर में रहता था. पुलिस ने उस के घर छापा मारा तो वह घर में ही था. लेकिन पुलिस को देखते ही वह छत के रास्ते भागने में सफल हो गया.

14 मार्च को थानाप्रभारी शुजाउर रहीम, एसआई चमन सिंह, प्रताप सिंह और अतुल दुबे की टीम ने गुड्डू को बदायूं के कुंवरगांव से गिरफ्तार कर लिया. उस के पास से हत्या में प्रयुक्त 315 बोर का तमंचा भी बरामद हो गया. दरअसल, सीमा का मामा गुड्डू पंजाब में फेरी लगा कर कबाड़ी का काम करता था. उसे फोन से सीमा के गैर धर्म के लड़के के साथ भाग जाने की जानकारी मिली तो वह क्रोध से जल उठा. जब पुलिस ने सीमा को बरामद कर घर वालों के हवाले किया तो गुड्डू ने भूरे से सीमा को समझाने को कहा. लेकिन सीमा प्रभु के पास जाने की जिद पर अड़ी थी. गुड्डू ने भी उसे समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. इस के बाद गुड्डू के सामने एक ही रास्ता बचा कि वह सीमा को खत्म कर दे.

8 मार्च की सुबह वह हावड़ा-अमृतसर एक्सपे्रस टे्रन से बरेली के आंवला स्टेशन पर उतरा. वहां से वह अपने गांव हरदासपुर गया और शाम को विशारतगंज आ गया. देर रात वह भूरे के घर पहुंचा. उस ने सीमा को अपनी जिद छोड़ने के लिए काफी समझाया, जिसे ले कर काफी देर तक बहस चलती रही. सीमा का बड़ा भाई इश्तियाक भी मामा गुड्डू के सुर में सुर मिला रहा था. जब किसी तरह बात नहीं बनी तो सीमा के सो जाने पर गुड्डू ने इश्तियाक के साथ मिल कर सीमा के सिर से तमंचा सटा कर गोली मार दी. एक ही झटके में सीमा मौत की नींद सो गई. इस के बाद दोनों वहां से फरार हो गए. कुछ लोगों ने गुड्डू का पीछा भी किया, लेकिन वह किसी के हाथ नहीं आया.

शुजाउर रहीम ने गुड्डू और इश्तियाक के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा कर गुड्डू को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इश्तियाक फरार था. पुलिस उस की तलाश कर रही थी. गुड्डू को जरा भी कानून का ज्ञान होता तो सीमा की जान बच सकती थी. सीमा नाबालिग थी. ऐसी स्थिति में अदालत उसे उस के घर वालों को ही सौंपती न कि प्रेमी प्रभु को. UP News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Hindi Crime Story: तांत्रिक की तीसरी शादी

Hindi Crime Story: समझदार होते ही सोनू की समझ में आ गया था कि यह दुनिया मूर्खों से अटी पड़ी है, बस मूर्ख बनाने का तरीका मालूम होना चाहिए. इस के बाद उस ने तंत्रमंत्र सीखा और अंधविश्वास में डूबे लोगों को मूर्ख बनाने लगा. उस की पोल तो तब खुली, जब वह तीसरी शादी के चक्कर में पड़ा.

निशा उन दिनों कुछ ज्यादा ही परेशान थी. उस की परेशानी का आलम यह था कि उसे खानेपीने तक की सुध नहीं रहती थी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? पिछले 2-3 महीने से कुछ ऐसा उलटा चक्कर चल रहा था कि उस का अच्छाखासा चल रहा घर डूबते जहाज की तरह हिचकोले लेने लगा था. पहले मां बीमार हुई, उस के बाद छोटे भाई का हाथ टूट गया. उन दोनों को संभालने के चक्कर में उस की अपनी नौकरी चली गई. मां कुछ ठीक हुई तो उस ने दौड़भाग कर छोटामोटा काम ढूंढा, लेकिन मां एक बार फिर बीमार पड़ गई.

रोज कुआं खोद कर पानी पीने वालों के घर पैसा होता ही कहां है? निशा ने जो थोड़ाबहुत जमा कर रखा था, वह सब मां और भाई के इलाज पर खर्च हो गया. अब मां का इलाज कराने की कौन कहे, खाने के भी लाले पड़ गए. वह मां का इलाज कराए या खाने का इंतजाम करे. मकान मालिक का किराया भी वह 3 महीने से नहीं दे पाई थी. निशा परेशान थी कि ऐसे में कैसे क्या होगा? वह मां के इलाज और खानेपीने का जुगाड़ करने में जूझ ही रही थी कि एक अन्य खबर ने उसे झकझोर कर रख दिया. मकान मालिक ने उसे बुला कर कहा कि वह उस का पिछला सारा किराया अदा कर के मकान खाली कर दे.

निशा ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अंकलजी, आप का किराया मैं धीरेधीरे अदा कर दूंगी. रही बात मकान खाली करने की तो इस हालत में हम कहां जाएंगे? अचानक मकान खाली करना हमारे लिए आसान नहीं है अंकलजी. पहले आप अपना पिछला किराया तो अदा हो जाने दीजिए. उस के बाद हम कोई इंतजाम कर के आप का मकान खाली करेंगे. आप हमें थोड़ी मोहल्लत दीजिए.’’

‘‘भई, मोहल्लत देने का सवाल ही नहीं उठता. तुम लोगों का हर महीने का यही तमाशा है. वैसे भी अगले महीने मेरे घर बेटी की शादी है. नातेरिश्तेदार आएंगे तो उन के उठनेबैठने के लिए जगह तो चाहिए. जब अपने पास जगह है तो बाहर इंतजाम करने की क्या जरूरत है. इसलिए तुम मेरा मकान खाली कर दो.’’ मकान मालिक ने साफसाफ कह दिया. निशा के लिए मकान खाली करना इतना आसान नहीं था. क्योंकि मकान का बकाया किराया, राशन और दूध वाले को मिला कर लगभग 15 हजार रुपए होते थे. अगर वह मकान खाली करती तो नए मकान का एडवांस किराया, सामान वगैरह की ढुलाई आदि को ले कर इतने ही रुपए और चाहिए थे.

इतनी बड़ी रकम का इंतजाम वह कहां से कर सकती थी? जबकि उस के पास उस समय 20 रुपए भी नहीं थे. अपनी यह परेशानी निशा ने अपनी सहेली सुधा से बताई तो सहेली की परेशानी सुन कर वह भी सोच में पड़ गई. अगर उस के पास पैसे होते तो इस हालत में वह अवश्य ही सहेली की मदद कर देती. अचानक उसे जैसे कुछ याद आया हो तो वह बोली, ‘‘निशा, मुझे लगता है तुझे सोनू तांत्रिक से मिलना चाहिए. वह तेरी समस्या का कोई न कोई समाधान जरूर कर देगा.’’

‘‘यह सोनू तांत्रिक कौन है और वह हमारी समस्या का समाधान कैसे कर सकता है?’’

‘‘यह तो वहां चलने पर ही पता चलेगा. लेकिन जहां तक मुझे उस के बारे में जानकारी मिली है, वह हर छोटीबड़ी समस्या का समाधान चुटकी बजा कर कर देता है. बस तू तैयार हो जा, कौन हमें दूर जाना है. यहीं न्यू कंपनी बाग की गली नंबर 3 में उस की कोठी है.’’

‘‘लेकिन सुधा, मैं तंत्रमंत्र के चक्कर में नहीं पड़ना चाहती. मुझे अपने कर्म पर भरोसा है. आज नहीं तो कल हालात बदल ही जाएंगे.’’ निशा ने कहा.

निशा तांत्रिक सोनू के पास जाना नहीं चाहती थी, लेकिन सुधा की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. निशा सुधा के साथ जिस समय तांत्रिक सोनू की कोठी पर पहुंची, वह कमरे में पूजा कर रहा था, इसलिए उन्हें बाहर बैठ कर पूजा खत्म होने का इंतजार करना पड़ा. पूजा खत्म होते ही सोनू ने दोनों को अपने कमरे में बुलाया. तांत्रिक को देख कर निशा हैरान रह गई, क्योंकि वह तांत्रिक जैसा लग ही नहीं रहा था. सोनू तांत्रिक 32-35 साल का राजकुमार जैसा युवक था. आसमानी रंग के सफारी सूट में वह किसी प्रतिष्ठित परिवार का लड़का लग रहा था. निशा के मन में तांत्रिक की जो छवि थी, वह उस के एकदम विपरीत था. उस ने तो सोचा था कि काले से कू्रर चेहरे पर बड़ीबड़ी दाढ़ीमूंछें और गले में ढेरों रुद्राक्ष की मालाएं पहने कोई आदमी बैठा होगा. लेकिन यहां तो मामला एकदम उलटा था.

बहरहाल, तांत्रिक सोनू को प्रणाम कर के दोनों बैठ गईं. सुधा ने निशा का परिचय करा कर उस की समस्या बतानी चाही तो तांत्रिक सोनू ने अपना दायां हाथ उठा कर उसे रोकते हुए कहा, ‘‘देवी, अगर आप ही सब कुछ बता देंगी तो मेरी साधना किस काम आएगी? मुझे पता नहीं है क्या कि आजकल देवी किन हालात से गुजर रही हैं? मां की दवा के लिए भी अभी तक इंतजाम नहीं कर पाई हैं. रात के खाने की भी व्यवस्था करनी है. लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है. आप मेरे यहां आ गई हैं, अब आप की सारी समस्याएं दूर हो जाएंगीं.’’

सोनू द्वारा अपने घर की स्थिति बताने से जहां निशा शरम से पानीपानी हो गई थी, वहीं वह उस की इस बात से काफी प्रभावित भी हुई. क्योंकि बिना कुछ बताए ही उस ने उस के बारे में सब कुछ जान लिया था. इस तरह पहली ही मुलाकात में वह उस की अंधभक्त बन गई. सोनू ने अंगुलियों पर कुछ गणना कर के कहा, ‘‘मैं नाम तो नहीं बताऊंगा, लेकिन तुम्हारे किसी अपने बहुत खास ने ही तुम्हारे परिवार पर ऐसा इल्म चलवाया है कि तुम दानेदाने को मोहताज हो जाओ. आज रात को मैं उस इल्म को कील दूंगा और फिर किसी दिन श्मशान पूजा कर के उस डाकिनी को भस्म कर दूंगा.’’

निशा मंत्रमुग्ध भाव से सोनू को देखती रही. उस ने होंठों ही होंठों में कुछ मंत्र पढ़े और निशा पर फूंक मारे. इस के बाद सुधा को बाहर भेज कर अपनी गद्दी के नीचे से 5 सौ रुपए का एक नोट निकाल कर निशा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘लो मांजी के लिए दवाओं और आज के खानेपीने की व्यवस्था कर लेना. कल की कल देखी जाएगी.’’

‘‘नहीं, मैं आप के रुपए कैसे ले सकती हूं.’’

‘‘यह मेरा नहीं, मां का आदेश है. मां काली ने मुझे अभीअभी आदेश दिया है कि मैं तुरंत तुम्हारी मदद करूं. मैं मां का सेवक हूं, इसलिए मुझे उन की आज्ञा का पालन करना ही होगा. तुम नि:संकोच ये रुपए रख लो.’’ इस तरह मां के नाम पर सोनू ने निशा को 5 सौ रुपए का नोट लेने पर मजबूर कर दिया.

निशा रुपए ले कर घर आ गई. वह यह सोचसोच परेशान थी कि उस के घर की एकएक बात की जानकारी तांत्रिक सोनू को कैसे हो गई? मकान मालिक ने मकान खाली करने के लिए कहा था, यह बात भी उसे मालूम थी. अगले दिन स्वयं सोनू तांत्रिक निशा के घर आ पहुंचा. वह मां की दवाएं और कुछ सामान भी साथ लाया था. स्वयं को संस्कारी दिखाने के लिए आते ही उस ने निशा की मां के पांव छुए. न चाहते हुए भी निशा को सोनू तांत्रिक की मदद लेनी पड़ी. क्योंकि इस के अलावा उस के पास कोई उपाय भी नहीं था. इस के बाद सोनू निशा और उस के घर वालों की हर तरह से मदद करने लगा.

तंत्रमंत्र और पूजापाठ के नाम पर वह निशा को अपनी कोठी पर बुलाता. थोड़ी देर पूजापाठ कर के निशा से इधरउधर की बातें करने लगता. इस बातचीत में वह उस के घरपरिवार के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए हमदर्दी दिखाने की कोशिश करता. निशा के मकान खाली करने की बात आई तो सोनू तांत्रिक ने मकान मालिक का बकाया अदा कर के निशा को रहने के लिए गली नंबर शून्य वाला अपना मकान दे दिया. सोनू से मिलने के बाद निशा और उस के घर वालों की मुसीबतें लगभग खत्म हो गईं. इस तरह उन की सभी समस्याओं का समाधान हो गया.

धीरेधीरे सोनू तांत्रिक ने निशा और उस के घर के हर सदस्य पर अपना वर्चस्व कायम कर लिया. घर में था ही कौन, मांबेटी और एक लड़का. निशा के उस घर में अब वही होता था, जो सोनू चाहता था. निशा के घर वालों को भी सोनू का उन के घर में दखल देना अच्छा लगता था. इस में वे अपनी शान भी समझते थे, क्योंकि सोनू तांत्रिक से उन के संबंध थे. सोनू तांत्रिक धनी तो था ही, इलाके में उस का काफी दबदबा भी था. तांत्रिक होने की वजह से लोग उस की इज्जत तो करते ही थे, डरते भी थे. लोग उस के आशीर्वाद के लिए उस के घर के चक्कर लगाते थे.

यही वजह थी कि निशा और उस के घर वाले सोनू तांत्रिक की कृपा पा कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे थे. बड़ी होशियारी से सोनू तांत्रिक ने निशा के दिल में अपनी जगह बना ली थी. इस के बाद एक रात उस ने डाकिनी पूजा के नाम पर निशा को अपने घर बुलाया. निशा सोनू की कोठी पर जा पहुंची. थोड़ी देर बाद उस ने पूजा शुरू की. पूजा खत्म होने के बाद उस ने कहा कि उस ने उस डाकिनी को भस्म कर दिया है, जो उस के घर वालों को तकलीफ पहुंचाती थी. अब चिंता की कोई बात नहीं है. तथाकथित डाकिनी के खत्म हो जाने की बात पर निशा बहुत खुश हुई. पूजा खत्म होने के बाद सोनू ने निशा का हाथ अपने हाथों में ले कर कहा,

‘‘निशा, आज मैं तुम से अपने मन की एक ऐसी बात कहने जा रहा हूं, जिस का जवाब तुम्हें काफी सोचसमझ कर देना होगा.’’

हैरानी से निशा ने पूछा, ‘‘ऐसी कौन सी बात है महाराज? खैर, कोई भी बात हो, आप मुझे बताएं क्या, आदेश करें.’’

‘‘निशा, ऐसे मामलों में जोरजबरदस्ती या आदेश नहीं दिया जाता. यह सब प्रेम की भावना के अंतर्गत होता है. प्रेम में वह ताकत होती है, जो 1-2 क्या, हजारों डाकिनीशाकिनी के मुंह मोड़ सकती है. बहरहाल तुम इतना जान लो कि मैं तुम से प्रेम करता हूं और तुम से विवाह करना चाहता हूं.’’ सोनू ने निशा को फंसाने के लिए जाल फेंका.

सोनू की बात सुन कर निशा सन्न रह गई. उस के मुंह से सिर्फ इतना ही निकला, ‘‘महाराज, आप यह क्या कह रहे हैं. कहां आप और कहां मैं? आप में और मुझ में जमीन आसमान का अंतर है.’’

तंत्रमंत्र की दुकान चलाने वाले सोनू ने निशा को अपनी बाहों में ले कर कहा, ‘‘जब मेरा और तुम्हारा मिलन हो जाएगा तो सारे अंतर स्वयं ही खत्म हो जाएंगे. यह मिलन सभी भेदभाव खत्म कर देगा.’’

सम्मोहित सी निशा सोनू तांत्रिक की बातें सुनती रही. इतने बड़े तांत्रिक ने उसे इस योग्य समझा, यह जान कर वह खुद को बड़ी भाग्यशाली समझ रही थी. निशा की कमर में हाथ डाल कर सोनू उसे बैडरूम में ले गया, जहां उस ने वह सब पा लिया, जिस के लिए उस ने इतने बड़े चक्रव्यूह की रचना की थी. दरअसल, सोनू तांत्रिक न हो कर एक ऐसा धूर्त था, जो लोगों की अंधी आस्था की बदौलत उन का आर्थिक एवं शारीरिक शोषण करता था. लोगों को बेवकूफ बना कर वह दोनों हाथों से धन बटोर रहा था. इस के पीछे उस का कोई दोष नहीं था, लोग खुद ही उस के पास अपना शोषण कराने आते थे. अपनी खूनपसीने की कमाई उसे अय्याशी के लिए सौंप रहे थे. समस्या समाधान के नाम पर अपनी बहनबेटियों की इज्जत से खिलवाड़ करा रहे थे.

दुनिया कितनी भी आधुनिक क्यों न हो जाए, मंगल ग्रह पर पहुंच जाए या किसी नए ब्रह्मांड की खोज कर ले, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोगों के मन में जो अंधविश्वास बैठा है, उसे निकालना आसान नहीं है. जब तक दुनिया में अंधविश्वास है, तब तक सोनू जैसे तथाकथित ढोंगी आम लोगों की बहूबेटियों की इज्जत से खेलते रहेंगे और तंत्रमंत्र का भय दिखा कर लूटते रहेंगे.’

सोनू तांत्रिक यानी सोनू शर्मा मूलरूप से हरियाणा के जिला जींद के रहने वाले चंद्रभान शर्मा का मंझला बेटा था. चंद्रभान धार्मिक प्रवृत्ति के शरीफ इंसान थे. वह कर्म को पूजा मानते थे. लेकिन उन के बेटे सोनू शर्मा की नीति उन के एकदम विपरीत थी. सोनू शुरू से ही अतिमहत्त्वाकांक्षी और आपराधिक प्रवृत्ति का युवक था. जल्दी ही उस की समझ में आ गया था कि दुनिया मूर्ख है. बस उसे मूर्ख बनाने वाला होना चाहिए. जो मजा लोगों को बेवकूफ बना कर कमाने में है, वह हाड़तोड़ मेहनत करने में नहीं है. उसे पता चल ही गया था कि अंधी आस्था को ले कर लोग अपना सर्वस्व तक लुटाने को तैयार रहते हैं.

और मजे की बात यह कि लुटने के बाद किसी को बताते भी नहीं. यह एक ऐसा कारोबार था, जिस में कुछ खास लगाना भी नहीं था, जबकि कमाई इतनी मोटी थी कि इस का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. इस के अलावा लोग उसे पूजते भी भगवान की तरह हैं. यही सब देखसुन कर सोनू को इस कारोबार से अच्छा और कोई दूसरा कारोबार नहीं लगा. इस के बाद कुछ तंत्रमंत्र और टोटके सीख कर वह तांत्रिक बन गया. हरियाणा के कई शहरों में तंत्रमंत्र की छोटीमोटी ठगी करते हुए वह हिमाचल के जिला कांगड़ा जा पहुंचा. वहां उस का यह ठगी का धंधा तो चल ही निकला, वहीं उस की मुलाकात सोनिया से हुई.

सोनिया राजेश शर्मा की बेटी थी. उन का अच्छाखासा कारोबार था, लेकिन किन्हीं वजहों से उन के कारोबार में घाटा होने लगा तो उन की आर्थिक स्थिति कुछ खराब हो गई. सोनिया अपनी ऐसी ही किसी समस्या के समाधान के लिए सोनू तांत्रिक के पास गई तो पहली ही मुलाकात में वह सोनू की नजरों में ऐसी चढ़ी कि वह उसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को तैयार हो गया. लेकिन राजेश शर्मा का परिवार एक संस्कारी परिवार था. वही संस्कार सोनिया में भी थे. इसलिए सोनू ने सोनिया को जो सब्जबाग दिखाए, उन का सोनिया पर कोई असर नहीं हुआ. तब उसे पाने के लिए सोनू ने उस से शादी का फैसला कर लिया और इस के बाद सोनिया के मातापिता की सहमति से दिसंबर, 2003 में उस ने सोनिया के साथ विवाह कर लिया.

समय के साथ दोनों 2 बच्चों के मातापिता बने, जिन में 8 साल का आदित्य और 6 साल की एलियन है. इस बीच सोनू हिमाचल के अलावा पंजाब के भी कई शहरों में अपने पांव जमाने की कोशिश करता रहा. कई शहरों के चक्कर लगाने के बाद उसे लुधियाना कुछ इस तरह पसंद आया कि वहां टिब्बा रोड पर उस ने तंत्रमंत्र की अपनी स्थाई दुकान खोल ली. यह सन् 2010 की बात है. लुधियाना का टिब्बा रोड इलाका हिंदूमुस्लिम और अमीरगरीब सभी तरह के लोगों से भरा है. जल्दी यहां सोनू का प्रभाव इस तरह बढ़ा कि लोग उस की पूजा करने लगे. यहां से कमाई दौलत से उस ने 2 मकान और एक आलीशान कोठी अपने लिए बनवा डाली.

यहां आने के बाद वह धीरेधीरे कांगड़ा में रह रही अपनी पत्नी सोनिया और बच्चों को लगभग भूल सा गया. अब वह कईकई महीनों बाद उन से मिलने कांगड़ा जाता था. लुधियाना में रहते हुए सोनू ने अपने लिए नई लड़की की तलाश शुरू कर दी, क्योंकि सोनिया अब उसे पुरानी लगने लगी थी. उसी बीच किसी शादी समारोह में उस की नजर स्टेज पर थिरकती निशा पर पड़ी तो वह उस पर मर मिटा. निशा एक आर्केस्ट्रा ग्रुप में डांस करती थी. निशा की एक ही झलक में सोनू उस का दीवाना बन गया था और हर कीमत पर उसे पा लेना चाहता था. सोनू तांत्रिक की एक आदत यह भी थी कि जो चीज उसे पसंद आ जाती थी, उसे वह हर हाल में पा लेना चाहता था.

पसंद आने के बाद उस ने निशा को हासिल करने के प्रयास शुरू किए तो सब से पहले उस ने उस के और उस के घर वालों के बारे में पता किया. सोनू को पता चला कि निशा के पिता प्रेमशाही ठाकुर की कई सालों पहले उस समय मृत्यु हो गई थी, जब बच्चे छोटेछोटे थे. निशा की मां ने मेहनतमजदूरी कर के किसी तरह बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया था. युवा होने पर निशा ने छोटीमोटी नौकरी कर के परिवार का खर्च चलाने की कोशिश की. वह खूबसूरत थी, उस की अदाएं इतनी कातिल थीं कि कोई भी उसे देख कर पागल हो सकता था. इसीलिए जब आर्केस्ट्रा ग्रुप ने उसे अपने डांस ग्रुप में शामिल होने को कहा तो वह उस में मिलने वाली मोटी रकम के लालच में उस में शामिल होने के लिए खुशीखुशी तैयार हो गई थी.

अपनी खूबसूरती, मेहनत और अच्छे डांस की वजह से वह जल्दी ही प्रसिद्ध हो गई. आर्केस्ट्रा में डांस कर के निशा की इतनी कमाई हो जाती थी कि पूरा परिवार मजे से रह रहा था. सोनू को जब पता चला कि निशा ही अपने परिवार का एकमात्र सहारा है तो सब से पहले उस ने अपने प्रभाव से निशा को उस आर्केस्ट्रा से निकलवा दिया, जिस में वह डांस करती थी. काम छूटा तो निशा के घर की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई. अचानक राह चलते निशा के भाई को किसी मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी, जिस से उस का एक हाथ टूट गया. मां पहले से ही बीमार रहती थी.

इस तरह निशा चारों ओर से टूट गई तो सोनू के इशारे पर ही मकान मालिक ने उस से मकान खाली करने के लिए कह दिया. इस के बाद अचानक सोनू तांत्रिक ने हीरो की भांति उस के जीवन में एंट्री मारी और अपने तंत्रमंत्र का नाटक कर के निशा और उस के घर की समस्याओं का समाधान कर दिया. इस से वह उन की नजरों में भगवान बन बैठा. बहरहाल, सोनू ने जैसा चाहा था, ठीक वैसा ही हुआ था. लगभग हर रात निशा सोनू के पहलू में होती थी. क्योंकि उसे पूरा विश्वास था कि सोनू उस से शादी करेगा. लेकिन यह उस की गलतफहमी थी. उस का यह भ्रम 13 मार्च, 2015 को बैसाखी वाले दिन तब टूटा, जब उसे पता चला कि सोनू किसी खूबसूरत लड़की के साथ चंडीगढ़ रोड स्थित मोहिनी रिसौर्ट में शादी कर रहा है.

यह जानकारी मिलने के बाद निशा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. इस का सीधा मतलब यह था कि शादी का झांसा दे कर सोनू तांत्रिक ने 2 सालों तक उस की इज्जत से खेला था और अब मन भर जाने के बाद दूसरी लड़की से शादी कर रहा था. यह बात भला निशा कैसे बरदाश्त कर सकती थी. वह सीधे मोहिनी रिसौर्ट पहुंची, ताकि सोनू तांत्रिक की शादी रुकवा सके. लेकिन सोनू के गुर्गों ने उसे अंदर जाने नहीं दिया और बाहर से ही भगा दिया. सोनू और गीता चड्ढा का विवाह आराम से हो गया. जबकि अपने भाग्य पर आंसू बहाते हुए निशा घर लौट आई. वह घर तो लौट आई, लेकिन उसे चैन नहीं मिल रहा था. चैन मिलता भी कैसे, सोनू ने उस के साथ जो बेवफाई की थी, उसे वह भुला नहीं पा रही थी.

अगले दिन शाम को निशा को पता चला कि सोनू तांत्रिक अपनी नईनवेली दुलहन गीता के साथ गली नंबर 3 वाली कोठी में मौजूद है तो एक बार फिर हिम्मत कर के निशा उस से बात करने के लिए उस की कोठी पर जा पहुंची. इस बार सोनू से उस का सामना हो गया. उस ने हंगामा खड़ा करते हुए सोनू से पूछा, ‘‘तुम शादी का वादा कर के 2 सालों तक मेरे शरीर से खेलते रहे. जबकि अब शादी किसी और से कर ली. तुम ने यह ठीक नहीं किया. मैं ऐसा कतई नहीं होने दूंगी.’’

‘‘अब तो जो होना था, वह हो गया. मुझे जिस से शादी करनी थी, कर ली. अब तुम कर ही क्या सकती हो? मैं ने तुम से शादी का जो वादा किया था, वह वादा ही रहा. अगर मैं वादा करने वाली हर लड़की से शादी करने लगूं तो पता चला कि मैं हर साल शादी कर रहा हूं.’’ इस के बाद निशा को घूरते हुए बोला, ‘‘अच्छा यही होगा कि तुम चुपचाप यहां से चली जाओ. फिर कभी दिखाई भी मत देना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

सोनू से अपमानित हो कर निशा घर तो आ गई, लेकिन उस के साथ जो छल हुआ था वह उसे पचा नहीं पा रही थी. काफी देर तक वह रोती रही. और जब मन का गुबार निकल गया तो उस ने तय किया कि वह सोनू जैसे ढोंगी और धोखेबाज को अवश्य सबक सिखाएगी. अगर उस ने उसे सबक न सिखाया तो वह उस जैसी न जाने कितनी लड़कियों की इसी तरह जिंदगी बरबाद करता रहेगा. दृढ़ निश्चय कर के निशा थाना बस्ती जोधेवाल पहुंची और थानाप्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह से मिल कर उन्हें अपनी आपबीती सुनाई.

हरपाल सिंह ने निशा की पूरी बात सुनने के बाद टिब्बा रोड पुलिस चौकी के इंचार्ज एएसआई हरभजन सिंह को आदेश दिया कि वह निशा के बयान के आधार पर सोनू तांत्रिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के तुरंत काररवाई करें. इस के बाद एएसआई हरभजन सिंह ने निशा के बयान के आधार पर 16 मार्च, 2015 को सोनू तांत्रिक के खिलाफ शादी का झांसा दे कर यौन शोषण करने और धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर के पूछताछ के लिए उसे पुलिस चौकी बुलवाया. लेकिन सफाई देने के लिए चौकी आने के बजाय सोनू गायब हो गया.

तब हरभजन सिंह ने हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह जीता, कांस्टेबल लखविंदर सिंह, दविंदर सिंह और जसबीर सिंह की एक टीम बना कर सोनू की तलाश के लिए उस के पीछे लगा दिया. सोनू की तलाश चल ही रही थी कि अखबारों में छपी खबर पढ़ कर कांगड़ा में रह रही उस की पहली पत्नी सोनिया शर्मा भी लुधियाना आ पहुंची. उस ने पुलिस चौकी जा कर बयान ही नहीं दर्ज कराया, बल्कि सोनू से अपनी शादी और 2 बच्चे होने के प्रमाण भी दिए. सोनिया के बयान के आधार पर उस की ओर से भी सोनू के खिलाफ धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज किया गया. फिर उसी दिन शाम को हेडकांस्टेबल जगजीत सिंह की टीम ने जालंधर बाईपास से सोनू तांत्रिक को उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह बस से शहर छोड़ कर भागने के चक्कर में वहां पहुंचा था.

चौकी ला कर सोनू से पूछताछ की गई तो उस ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को स्वीकार कर लिया. उसे अदालत में पेश कर के साक्ष्य जुटाने के लिए एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर 18 मार्च, 2015 को उसे पुन: मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. 20 मार्च, 2015 को निशा का मैडिकल कराया गया. मैडिकल रिपोर्ट के अनुसार वह सहवास की आदी पाई गई. मैडम प्रीतमा अरोड़ा की अदालत में धारा 164 के तहत उस के बयान भी दर्ज किए गए.

निशा ने यहां भी वही बयान दिए, जो उस ने आपबीती में बताया था. उस का कहना था कि ऐसे ढोंगी अपराधियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. ऐसे लोग लोगों की धार्मिक व कोमल भावनाओं को भड़का कर उन का शारीरिक और आर्थिक शोषण करते हैं. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है, कथा में कुछ पात्रों के नाम बदले गए हैं.

Haridwar Crime Story: विद्रोही बीवी का दंश

Haridwar Crime Story: नफीस और गुफराना आपसी मतभेदों के चलते अलगअलग रहने लगे थे. जब गुफराना को पता चला कि नफीस दूसरी शादी के चक्कर में है तो उस की करोड़ों की जायदाद के चक्कर में उस ने गुनाह की ऐसी भूमिका बनाई कि पुलिस भी चकरा गई. 26 अप्रैल, 2015 को सुबह के 11 बज रहे थे. जिला हरिद्वार के रुड़की शहर की सिविल लाइंस कोतवाली के एसएसआई आर.के. सकलानी कोतवाली में ही थे. पिछले कुछ दिनों से एटीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ और ठगी की शिकायतें मिल रही थीं. इसलिए आर.के. सकलानी क्षेत्र की एटीएम मशीनों की सुरक्षा व्यस्था की चैकिंग करने की सोच रहे थे. तभी उन के मोबाइल की घंटी बजने लगी. सकलानी ने काल रिसीव की तो पता चला कि दूसरी ओर शहर के विधायक प्रदीप बत्रा हैं.

बातचीत हुई तो प्रदीप बत्रा ने सकलानी को बताया कि कोतवाली क्षेत्र स्थित मोहल्ला ग्रीनपार्क का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस 9 अप्रैल से गायब है. उन्होंने यह भी बताया कि नफीस के घर वाले गांव बिझौली में रहते हैं और उसे सभी परिचितों और रिश्तेदारों के यहां ढूंढ़ चुके हैं. आर.के. सकलानी ने बत्रा साहब से कहा कि वह नफीस के घर वालों को उस के फोटो के साथ कोतवाली भेज दें. वह नफीस को ढूंढ़ने में उन की पूरी मदद करेंगे. थोड़ी देर बाद नफीस का भाई नसीर अपने 2 रिश्तेदारों के साथ कोतवाली सिविल लाइंस पहुंच गया. उसे चूंकि विधायकजी ने भेजा था, इसलिए सकलानी ने नफीस के लापता होने के मामले में पूरी दिलचस्पी लेते हुए नसीर से जरूरी बातें पूछीं.

उस ने बताया कि 9 अप्रैल को नफीस मोटरसाइकिल से अपने भतीजे साकिब के पास गया था. साकिब मदरसा जामिया तुलउलूम का छात्र था. शाम को उस ने साकिब को बाइक की चाबी दे कर कहा था कि वह थोड़ी देर में आ रहा है. लेकिन वह आज तक वापस नहीं लौटा. नसीर ने यह भी बताया कि उस के पास मोबाइल था, जो उसी दिन से बंद है.

‘‘नफीस की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी?’’ सकलानी के पूछने पर नसीर ने बताया कि नफीस सीधासादा इंसान था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. एसएसआई सकलानी ने नसीर से नफीस का फोटो ले कर उस की गुमशुदगी का मामला दर्ज करा दिया. उस का पता लगाने की जिम्मेदारी एसआई अजय कुमार को सौंपी गई. अजय कुमार ने भी नसीर से उस के भाई नफीस के बारे में विस्तृत पूछताछ की. चूंकि नफीस को गायब हुए 10 दिन हो चुके थे, इसलिए यह मामला थोड़ा गंभीर लग रहा था. अजय कुमार ने नफीस के कई रिश्तेदारों से पूछताछ भी की और उस के फोन की काल डिटेल्स भी निकलवाई. लेकिन कई दिनों की भागदौड़ के बाद भी कोई नतीजा नहीं निकला.

एक दिन सकलानी की एक वीआईपी ड्यूटी के बारे में पड़ोस की कोतवाली भगवानपुर के कोतवाल योगेंद्र सिंह भदौरिया से बात हुई तो बातोंबातों में भदौरिया ने बताया कि 20 दिनों पहले उन के इलाके में एक अज्ञात व्यक्ति की लाश मिली थी, जिस की शिनाख्त अभी तक नहीं हुई है. भदौरिया ने यह भी बताया कि मृतक क्रीम कलर की चैकदार शर्ट और मटमैले रंग की पैंट पहने था और उस का शरीर और चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. यह सुन कर सकलानी ने सोचा कि कहीं वह लाश नफीस की ही न रही हो. यह बात दिमाग में आते ही उन्होंने एसआई अजय कुमार और मृतक के भाई नसीर को कोतवाली भगवानपुर भेजा.

चूंकि लाश काफी दिनों पहले मिली थी, इसलिए पुलिस ने 3 दिनों तक लाश की शिनाख्त का इंतजार करने के बाद उसे दफन करा दिया था. अलबत्ता लाश के कपड़े कोतवाली के मालखाने में ही रखे थे. पुलिस ने जब उन कपड़ों को नसीर को दिखाया तो वह उन्हें देखते ही रोने लगा. वे कपड़े नफीस के ही थे. भगवानपुर पुलिस ने बताया कि नफीस की लाश 9 से 10 अप्रैल, 2015 की रात को देहरादून रोड स्थित पुहाना गांव के तिराहे के पास मिली थी. लाश का चेहरा काफी हद तक कुचला हुआ था. इसीलिए उस की शिनाख्त नहीं हो सकी थी.

भगवानपुर कोतवाली के इंसपेक्टर योगेंद्र सिंह भदौरिया ने बताया कि वे इस मामले को दुर्घटना समझ रहे थे. फिर भी उन्होंने मृतक की शिनाख्त कराने का पूरा प्रयास किया था. मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी उस की मृत्यु का कारण सिर की चोटों की वजह से अत्यधिक रक्तस्राव होना बताया गया था. शिनाख्त की काररवाई के बाद अजय कुमार रुड़की लौट आए. शाम को उन्होंने इस मामले में वरिष्ठ उपनिरीक्षक आर.के. सकलानी, कोतवाल बी.डी. उनियाल व एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा से विचारविमर्श किया. लंबी बातचीत से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि यह मामला एक्सीडेंट का नहीं, बल्कि कत्ल का था.

एएसपी प्रहलाद नारायण मीणा ने जांच अधिकारी अजय कुमार को निर्देश दिया कि वह मृतक नफीस की काल डिटेल्स देख कर उन लोगों से पूछताछ करें, जिन्होंने घटना वाले दिन उसे फोन किया था. साथ ही उस की पारिवारिक स्थिति की गोपनीय जानकारी भी जुटाएं. एसआई अजय कुमार ने नफीस की पारिवारिक जानकारी जुटाई तो पता चला कि थाना मंगलौर के अंतर्गत आने वाले गांव बिझौली का रहने वाला 40 वर्षीय नफीस खेतीबाड़ी करता था. 18 वर्ष पूर्व नफीस का निकाह पुरकाजी, मुजफ्फरनगर की गुफराना उर्फ सुक्खी से हुआ था. दोनों के 2 बच्चे थे अजमल और एहतराम. नफीस के पास बिझौली में खेती की जमीन भी थी और मकान भी.

इस के अलावा रुड़की शहर में भी उस का एक मकान था. उस की कुल संपत्ति करीब ढाई करोड़ की थी. यह भी पता चला कि नफीस अय्याश किस्म का इंसान था. इसी वजह से 3 साल पहले उस की गुफराना से अनबन हो गई थी. वह दोनों बच्चों के साथ अपने मायके पुरकाजी में ही रह रही थी. यह सारी बातें एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को पता चलीं तो उन्होंने इस मामले की जांच में एसओजी टीम को भी शामिल कर दिया. एसओजी टीम ने जब नफीस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स खंगालीं तो पता चला कि नफीस के लापता होने से पूर्व उस की एक नंबर पर बात हुई थी. उस नंबर पर एसओजी को कुछ संदेह हुआ. क्योंकि उस नंबर पर बात होने के बाद नफीस का मोबाइल स्विच औफ हो गया था.

एसओजी टीम के प्रभारी मोहम्मद यासीन ने जब उस नंबर की जांच की तो पता चला कि वह नंबर मोहल्ला झोझियान, पुरकाजी निवासी इकराम के नाम से था. पुलिस ने जब इकराम के बारे में सुरागरसी की तो मालूम हुआ कि वह कहने को तो ट्रक ड्राइवरी करता था, लेकिन आपराधिक प्रवृत्ति का था. 2 साल पहले वह एक मोटर- साइकिल लूट के मामले में थाना छपार, मुजफ्फरनगर में गिरफ्तार हो कर जेल भी गया था. फिलहाल वह घर से फरार है. इस के बाद सकलानी, अजय कुमार और एसओजी टीम ने इकराम की गिरफ्तारी के लिए मेरठ, गाजियाबाद व हापुड़ में उस के ठिकानों पर दबिश देनी शुरू कर दी.

आखिरकार 2 मई, 2015 को पुलिस ने इकराम को उस वक्त पुरकाजी से ही गिरफ्तार कर लिया, जब वह चोरीछिपे अपने घर वालों से मिलने आ रहा था. गिरफ्तारी के बाद पुलिस उसे रुड़की ले आई. कोतवाली में पुलिस ने जब उस से नफीस की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने स्वीकार कर लिया कि नफीस की हत्या की गई थी और वह हत्या की वारदात में शामिल था. उस ने यह भी बताया कि इस हत्या में उस की खुद की बीवी भूरी, महबूब और शमीम भी शामिल थे. जबकि हत्या की सुपारी नफीस की पत्नी गुफराना उर्फ सुक्खी ने दी थी. इकराम से पूछताछ के बाद इस मामले की हकीकत कुछ इस तरह सामने आई.

18 वर्ष पूर्व जब गुफराना और नफीस का निकाह हुआ था, इकराम काफी छोटा था. पुरकाजी में वह इन लोगों का पड़ोसी था. पड़ोसी होने के नाते इकराम गुफराना को फूफो कहता था. उस का एक भाई और 4 बहनें थीं. पैसे की कमी की वजह से उस की बहनों की शादियां नहीं हुई थीं. इकराम बाइक लूट के अपने मुकदमे की पैरवी के लिए मुजफ्फरनगर कोर्ट जाता रहता था. भूरी नाम की एक तलाकशुदा महिला भी अपने पति से चल रहे तलाक के मुकदमें की वजह से वहां आतीजाती थी. वहीं पर दोनों की मुलाकात हुई. धीरेधीरे मुलाकातें बढ़ने लगीं तो इकराम भूरी की मदद करने लगा.

बाद में इकराम ने भूरी से निकाह कर लिया और मुजफ्फरनगर के मोहल्ला लद्दावाला में किराए का मकान ले कर रहने लगा. एक बार इकराम पुरकाजी आया तो एक दिन फूफी गुफराना उसे मिल गई. दोनों की पुरानी जानपहचान थी, इसलिए खूब बातें हुईं. बातोंबातों में गुफराना ने उसे बताया कि उस का शौहर नफीस किसी औरत से दूसरा निकाह करने वाला है, इसलिए उस ने बच्चों सहित उसे घर से निकाल दिया है. गुफराना ने इकराम से यह भी कहा कि अगर किसी तरह वह नफीस को ठिकाने लगा दे तो वह उसे 8 लाख रुपए देगी. कुछ दिनों तक इकराम ने गुफराना की इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब एक दिन उस ने बड़ी गंभीरता से कहा कि 8 लाख की रकम कम नहीं होती तो वह नफीस की हत्या करने के लिए तैयार हो गया. इस के बाद दोनों ने मिल कर नफीस की हत्या की योजना बना ली.

इस के बाद गुफराना ने इकराम को एडवांस के तौर पर 80 हजार रुपए भी दे दिए. गुफराना ने नफीस का मोबाइल नंबर भी इकराम को दे दिया. योजना के अनुसार, इकराम ने 19 मार्च, 2015 को रुड़की की रामपुर चुंगी के निकट भूरी के रहने के लिए किराए के एक कमरे का इंतजाम कर दिया. आगे की योजना के तहत एक दिन भूरी ने नफीस के मोबाइल पर मिसकाल की. इस के जवाब में नफीस ने लौट कर फोन किया और भूरी से लंबी बात की. इस के बाद भूरी और नफीस एकदूसरे को अकसर फोन करने लगे. कुछ ही दिनों में भूरी ने नफीस को अपने प्रेमजाल में फांस लिया. इस के बाद नफीस अकसर उस से मिलने उस के कमरे पर जाने लगा.

नफीस को सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस खूबसूरत औरत के प्रेमजाल में फंस कर वह पैसा उड़ा रहा है, वह उस की मौत का तानाबाना बुन चुकी है. बहरहाल षडयंत्र से अनभिज्ञ नफीस भूरी के भ्रमजाल में फंसा रहा. योजना के तहत 9 अप्रैल, 2015 को इकराम ने देहरादून जाने के लिए 2500 रुपए में पुरकाजी निवासी सुनील की टैक्सी बुक की और शाम को अपने दोस्तों शमीम और जावेद के साथ रामपुर चुंगी स्थित भूरी के कमरे पर आ गया. टैक्सी ड्राइवर अर्जुन उन के साथ था. योजना के अनुसार, गुफराना का भाई महबूब भी उस वक्त भूरी के कमरे पर मौजूद था. शाम 7 बज कर 30 मिनट पर भूरी ने फोन कर के नफीस को अपने कमरे पर बुलवा लिया.

जब नफीस कमरे पर आया तो महबूब और जावेद बाहर खड़ी कार में बैठ गए. भूरी ने नफीस से कमरे पर मौजूद शमीम का परिचय अपने रिश्तेदार के रूप में कराया. इस के बाद वह दूध गरम करने लगी. उधर थोड़ी देर बैठे रहने के बाद इकराम ने टैक्सी चालक अर्जुन से कहा कि अभी बच्चों को तैयार होने में देर लगेगी, तब तक तुम जावेद के साथ जा कर अपनी शाम रंगीन कर लो. टैक्सी की चाबी मुझे दे दो, मैं इस में तेल डलवा देता हूं. इस के बाद टैक्सी चालक अर्जुन जावेद के साथ शराब के ठेके पर पहुंच गया, जहां उस ने खूब शराब पी. जावेद उसे पीने के लिए उकसा रहा था. दूसरी ओर भूरी ने नफीस की नजर बचा कर गर्म दूध में नशे की 4 गोलियां डाल दी थी. नफीस भूरी पर अंधविश्वास करता था. उस ने दूध पी लिया.

नशीला दूध पीने के बाद नफीस को नींद आने लगी तो वह वहीं सो गया. तभी शमीम और इकराम कमरे में आए. आते ही उन्होंने नफीस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद वे उस की लाश को टैक्सी की पिछली सीट पर डाल कर गांव सालियर होते हुए पुहाना जहाजगढ़ मार्ग पर ले आए. एक सुनसान जगह देख कर इन लोगों ने नफीस की लाश को सड़क के किनारे फेंक दिया. नफीस की लाश की शिनाख्त न हो सके, इस के लिए इकराम ने कई बार टैक्सी आगेपीछे कर के उस का मृत शरीर और चेहरा कुचल दिया, ताकि यह दुर्घटना का मामला लगे. इस के बाद तीनों वापस भूरी के कमरे पर आ गए.

ड्राइवर अर्जुन और जावेद नशे में धुत हो कर रात 12 बजे वापस लौटे. रात को सब वहीं सो गए. सुबह इकराम ने अर्जुन को उलाहना दिया कि तुम्हारे ज्यादा पीने की वजह से हम देहरादून नहीं जा सके. इकराम को यकीन था कि अर्जुन कुछ भी नहीं समझ पाया होगा. अगले दिन सुबह 7 बजे शमीम व जावेद बाइक से मुजफ्फरनगर चले गए तथा इकराम व भूरी टैक्सी से पुरकाजी लौट आए. नफीस की जेब से निकाला पैसों से भरा पर्स इकराम ने भूरी को सौंप दिया था.

नफीस की हत्या का खुलासा होने के बाद एसआई अजय कुमार ने नफीस की गुमशुदगी का मुकदमा भादंवि की धारा 302, 201, 328, 34 व 120 बी में परिवर्तित कर दिया. इस के बाद एसओजी प्रभारी मोहम्मद यासीन तथा उन की टीम के सदस्यों, अशोक, जाकिर, आशुतोष तिवारी, कपिल, शेखर, राहुल, अमित, पूरण, हेमंत, अंशु चौधरी और रश्मि गुज्यांल ने पुरकाजी व मुजफ्फरनगर में दबिशें दे कर गुफराना व भूरी को भी गिरफ्तार कर लिया और रुड़की ले आए. भूरी व गुफराना ने अपने बयानों में इकराम के बयानों का ही समर्थन किया. गुफराना ने बताया कि वह इकराम को अपने शौहर नफीस की हत्या की सुपारी के 80 हजार रुपए दे चुकी है तथा शेष रकम अपना आम का बाग बेच कर देती.

इस के बाद पुलिस ने भूरी की निशानदेही पर मृतक नफीस का पर्स उस के मुजफ्फरनगर स्थित मकान से बरामद कर लिया. उस की निशानदेही पर आर.के. सकलानी ने हत्या में इस्तेमाल इंडिका टैक्सी पुरकाजी से बरामद कर ली. 3 मई, 2015 को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने इकराम, भूरी और गुफराना उर्फ सुक्खी को मीडिया के सामने पेश कर के नफीस हत्याकांड का खुलासा किया. तीनों आरोपियों की गिरफ्तारी की भनक पा कर अभियुक्त जावेद, शमीम व महबूब फरार हो गए थे. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए प्रयासरत थी. Haridwar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana News: दोस्त के घर गई युवती की मिट्टी के ढेर में मिली लाश

Haryana News: एक ऐसी चौंकाने वाली वारदात सामने आई है, जिस ने पूरे गुरुग्राम को झकझोर कर रख दिया है. यह युवती अपनी फ्रेंड को फोन कर कहती है कि ‘2 घंटे में लौटती हूं.’ फिर इस युवती के साथ ऐसा क्या हुआ कि वह मिट्टी के ढेर में दफन पाई गई. आखिर क्या था इस हत्या का पूरा राज. चलिए जानते हैं इस क्राइम की स्टोरी को विस्तार से जो आप को इस घटना से अवगत कराएगी और होने वाले अपराध से भी सचेत करेगी.

यह दर्दनाक घटना हरियाणा के गुरुग्राम से सामने आई है. यहां एक हिंदू प्रेमी संजय ने असम की रहने वाली मुसलिम प्रेमिका जाबेदा खान का कत्ल कर दिया. जाबेदा खान ने फोन कर दोस्त को सूचित किया था कि वह 2 घंटे में वापस आ रही है. वह अपने प्रेमी संजय से मिलने गई हुई थी. फिर दोनों के बीच विवाद हुआ तो संजय ने जाबेदा की गला दबा कर हत्या कर दी. इस के बाद उस ने उस की लाश को मिट्टी में दबा दिया.

11 दिन बाद मिली सूचना ने पुलिस को भी हैरान कर दिया. इस के बाद आरोपी संजय को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. उस ने पुलिस को बताया कि वह पहले जाबेदा को सुशांत लोक में अपने कमरे में ले कर गया था. वहां जा कर दोनों ने शारीरिक संबंध बनाए फिर दोनों के बीच किसी बात को ले कर विवाद हो गया. जब जाबेदा घर जाने लगी तो संजय उसे सुनसान जगह ले गया और वहां उस का गला दबा कर मार डाला तथा शव को मिट्टी में दबाकर फरार हो गया.

इस के बाद उस का फोन बंद था और 11 दिनों तक उस का कोई सुराग नहीं मिला. 10 दिसंबर, 2025 को पुलिस को जाबेदा की लाश मिली. इस के बाद पुलिस ने 24 घंटे के अंदर आरोपी संजय को अरेस्ट कर लिया. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पुलिस के अनुसार, जाबेदा के फ्रेंड ने पहली दिसंबर को गुरुग्राम के सेक्टर 17/18 थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. उस ने बताया था कि 27 नवंबर को उस की फ्रेंड जाबेदा खान ने कहा था कि वह 2 घंटे में वापस आएगी. लेकिन बाद में उस का फोन बंद हो गया. इस शिकायत के बाद ही पुलिस से काररवाई शुरू की थी.

अब पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. वह एसी रिपेयर का काम करता है. संजय अपने ताऊ के साथ सुशांत लोक, गुरुग्राम में रहता था. पुलिस उस से घटना के बारे में विस्तार से पूछताछ कर रही है. Haryana News