पति को दी जल समाधि

दूसरी लड़कियों की तरह बिंदिया की भी इच्छा थी कि उस की सुहागरात फिल्मों जैसी हो. शादी का धूमधड़ाका थम चुका था, अधिकांश मेहमान भी विदा हो गए थे. अपने कमरे में बैठी बिंदिया सुहागरात के खयालों में डूबी पति छोटेलाल का इंतजार कर रही थी. बिंदिया ने काफी दिन पहले से सुहागरात के बारे में न केवल काफी कुछ सोच रखा था, बल्कि मन ही मन उसे अमल में लाने की भी तैयारियां कर चुकी थी.

हालांकि बिंदिया बहुत ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी और न ही किसी मालदार घराने की थी. फिर भी सुहागरात और शादीशुदा जिंदगी को ले कर उस के सपने वैसे ही थे, जैसे उस ने फिल्मों और टीवी सीरियलों में देखे थे.

मसलन पति कमरे में दाखिल होगा, फिर आहिस्ता से दरवाजे की कुंडी बंद कर पलंग तक आएगा, प्यार भरी रोमांटिक बातें करेगा, धीरेधीरे उस के अंगअंग को सहलाएगा चूमेगा. फिर दोनों जिंदगी के सब से हसीन सुख के समंदर में गोते लगाते हुए कब सो जाएंगे, उन्हें पता नहीं चलेगा.

इन्हीं खयालों में डूबी बिंदिया ने जैसे ही किसी के आने की आहट सुनी, उस के शरीर का रोआंरोआं खड़ा हो गया. उस का हलक सूखने लगा और मारे शरम व डर के वह दोहरी हो गई. जिस रात का ख्वाब वह सालों से देख रही थी, वह आ पहुंची थी. छोटेलाल कमरे में दाखिल हो चुका था.

पर यह क्या, छोटेलाल ने उसे कुछ सोचनेसमझने का मौका ही नहीं दिया. कमरे में आते ही वह उस पर जानवरों की तरह टूट पड़ा. उस के शरीर से इत्र या परफ्यूम नहीं महक रहा था, बल्कि मुंह से शराब की गंध आ रही थी. छोटेलाल ने उस से कोई बातचीत नहीं की और उस के कपड़े जिस्म से उतारे नहीं बल्कि खींच कर अलग कर दिए. उसे लाइट बुझाने का भी होश नहीं था.

सुहागरात बनी बलातरात

जैसे ही बिंदिया का सांवला बदन छोटेलाल की आंखों में नुमाया हुआ, वह बजाय रोमांटिक होने के पूरी तरह वहशी हो गया. उस की हालत वैसी ही थी जैसे लाश के पास बैठे गिद्ध की होती है.

देखते ही देखते वह बिंदिया पर छा गया और कुछ देर बाद यानी अपनी प्यास बुझाने के बाद करवट बदल कर खर्राटे भरने लगा. बिंदिया के सपने चूरचूर हो चुके थे, उसे लग रहा था कि उस ने सुहागरात नहीं बल्कि बलातरात मनाई है, जिस में उस का रोल हवस मिटाने वाली गुडि़या जैसा था.

कुछ देर बाद वह सामान्य हुई तो गहरी नींद में सोऐ छोटेलाल को देख कर उस का मन गुस्से से भर उठा. शराब से तो उसे बचपन से ही नफरत थी. उसे क्या पता था कि उसे एक शराबी के पल्लू से बांध दिया जाएगा.

न घूंघट उठा, न छेड़छाड़ हुई और न ही प्यारभरी बातें हुईं. जो हुआ उसे याद कर बिंदिया का रोमरोम सुलग रहा था. उसे लग रहा था कि इस गंवार और जाहिल आदमी की पीठ पर लात मार कर उसे उठा कर बताए कि एक पत्नी सुहागरात की रात क्या चाहती है और कैसे चाहती है.

पर बेबसी ने उस के होंठ बांध दिए, क्योंकि उसे पहले ही बता दिया गया था कि अब पति ही तुम्हारा सब कुछ है. उस की मरजी को हुक्म मानना और जैसे भी हो, उसे खुश रखना क्योंकि अब वही तुम्हारा सब कुछ है.

अकसर सुहागरात को ही तय हो जाता है कि आने वाली जिंदगी कैसी होगी. यह बात बिंदिया को अब समझ आ गई थी कि अब जैसे भी हो बाकी की जिंदगी उसे इसी छोटेलाल के साथ काटनी है. जिस में रत्ती भर भी शऊर नहीं है और न ही वह पत्नी और शादीशुदा जिंदगी के मायने समझता है. इतना सब कुछ समझ आ जाने के बाद दुखी और सुबकती बिंदिया ने कपड़े पहने और सोने की कोशिश करने लगी.

राजस्थान का धौलपुर जिला मध्य प्रदेश के मुरैना और उत्तर प्रदेश के जिले आगरा को मिलाता हुआ है. आगरा के आमदोह गांव की बिंदिया की शादी धौलपुर के गांव छातीपुरा के छोटेलाल निषाद से हुई थी.

दोनों ही गरीब घर के थे, लिहाजा शादी से पहले ही बिंदिया ने मन ही मन तय कर लिया था कि पति जो भी रूखासूखा खिलाएगा, खा लेगी. जो भी पहनाएगा, पहन लेगी और जैसे भी रखेगा, रह लेगी. लेकिन जिएगी प्यार से, यही जज्बा जिंदगी को खुशहाल बनाता है, जिस के लिए पैसों की रत्ती भर भी जरूरत नहीं पड़ती.

पहली ही रात बिंदिया को समझ आ गया था कि उस के सपने अब कभी पूरे नहीं होने वाले, क्योंकि छोटेलाल दिन भर मेहनत मजदूरी करता था और रात को अकसर शराब पी कर उस के बदन को नोचने खसोटने लगता था. बेमन से बिंदिया उस का साथ देती थी, जिस के चलते पूरी तरह न तो उस के तन की प्यास बुझती थी और न छोटेलाल को उस के मन से कोई वास्ता ही था.

घरजमाई बन कर रहने लगा छोटेलाल

छीतापुरा में छोटेलाल को रोजाना काम नहीं मिलता था, इसलिए शादी के कुछ दिनों बाद वह आमदोह आ कर बस गया. यानी घरजमाई बन गया. मायके आ कर बिंदिया को भी थोड़ा सकून मिला. यहां कम से कम सब लोग जानेपहचाने तो थे, जिन से वह अपना दुखदर्द बांट सकती थी, हंसबोल सकती थी.

ससुराल आ कर भी छोटेलाल की आदतों में कोई बदलाव नहीं हुआ. उलटे उस की शराब की लत और बढ़ गई. जल्द ही उस की दोस्ती एक आटो ड्राइवर राजकुमार से हो गई, जो यारबाज आदमी था. वह छोटेलाल को कभीकभी दारूमुर्गे की पार्टी देता रहता था. देखते देखते दोनों में गहरी छनने लगी. राजकुमार कभीकभी छोटेलाल के घर यानी ससुराल में ही बैठ कर दावत देने लगा.

शराब से नफरत करने वाली बिंदिया को राजकुमार का आनाजाना खटका नहीं, क्योंकि उसे वह बचपन से ही जानती थी और यह भी जानती थी कि यह वही राजकुमार है, जिस ने जवानी के शुरुआती दिनों में उस के पीछे खूब चक्कर लगाए थे. उसे पटाने की कोशिश की थी, लेकिन बिंदिया ने ही उसे घास नहीं डाली थी.

बिंदिया जब पति के साथ आमदोह वापस आई तो उस की खिली और गदराई जवानी देख कर राजकुमार के मन में पुरानी हसरतें जोर मारने लगी थीं. बिंदिया के हावभाव और बातचीत से वह जल्द ही भांप गया था कि वह पति से खुश नहीं है.

एक सधे खिलाड़ी की तरह उस ने बिंदिया की तरफ प्यार या वासना कुछ भी कह लें, का दाना डाला तो यह जान कर उस का दिल बल्लियों उछलने लगा कि दाना चुगने में बिंदिया ने तनिक भी आनाकानी नहीं की थी. यानी आग दोनों तरफ बराबरी से लगी थी, इंतजार था मौके का. इस आग को धधकने में देर नहीं लगी और एक दिन जरा सी कोशिश करने पर बिंदिया पके आम की तरह राजकुमार की झोली में आ गिरी.

यह पका आम चोरी का था, जिसे राजकुमार मनमुआफिक अपनी मरजी से खा या चूस नहीं सकता था. दोनों को अपने तन और मन की आग बुझाने कस्बे से बाहर जंगलों में जाना पड़ता था. राजकुमार ठीक वैसी ही बातें करता था, जैसी कि बिंदिया चाहती थी. प्यार मोहब्बत और रोमांस की ये वे बातें थीं, जिन्हें वह पति छोटेलाल के मुंह से सुनने को तरसती रही थी.

छोटेलाल ने कभी उस की खूबसूरती की तारीफ नहीं की थी, पर राजकुमार तारीफों के पुल बांध देता था. बिंदिया इस पर और निहाल हो जाती थी. अब हालत यह थी कि छोटेलाल का हक उस के शरीर पर तो था, लेकिन मन पर नहीं. उस के मन पर तो राजकुमार ने कब्जा जमा लिया था.

गांव वालों ने आंखों में ही बना ली वीडियो

गांव में भले ही सीसीटीवी नहीं थे, लेकिन गांव वालों की नजर किसी कैमरे की मोहताज नहीं थी. जल्द ही लोगों को बिंदिया और राजकुमार के नाजायज संबंधों की भनक लग गई. किसी ने दोनों को जंगल में गुत्थमगुत्था होते देख लिया तो बिना स्मार्टफोन का इस्तेमाल किए दिमाग में बना उन के संबंधों का वीडियो औडियो गांव भर में वायरल हो गया.

हालांकि बिंदिया के पास मोबाइल फोन आ गया था, जिस के जरिए वह राजकुमार के संपर्क में रहती थी. दोनों घंटों प्यार और अभिसार की बातों में डूबे रहते थे. खासतौर से उस वक्त जब उस का पति घर पर नहीं होता था और जब होता था तब राजकुमार शराब की बोतल ले कर पहुंच जाता था. लेकिन इस बात की वह पूरी अहतियात बरतता था कि छोटेलाल के सामने कोई ऐसी बात या हरकत न हो, जिस से उस के मन में शक पैदा हो. क्योंकि इस से बनीबनाई बात बिगड़ने का पूरा अंदेशा था.

तमाम सावधानियों के बाद भी बात बिगड़ ही गई. गांव की चर्चा जब छोटेलाल के कानों में पहुंची तो पहले तो उसे यकीन नहीं हुआ, लेकिन इस धुएं की आग कहां है, यह देखने से वह खुद को रोक नहीं पाया. गलत नहीं कहा जाता कि शक का बीज एक बार दिमाग में घर कर ले तो बिना पेड़ बने सूखता या मरता नहीं.

यही छोटेलाल के साथ हुआ. लिहाजा उस ने मन का शक मिटाने या सच जान लेने की गरज से राजकुमार और बिंदिया की निगरानी शुरू कर दी. नतीजा भी जल्द सामने आ गया, जब उस ने एक दिन दोनों को आदिम हालत में रंगेहाथों पकड़ लिया.

रंगेहाथों पकड़ी गई बिंदिया

पत्नी को गैरमर्द की बाहों में बेशरमी से मचलता और लिपटता देख छोटेलाल का खून खौल उठा. उस ने राजकुमार को पकड़ने की कोशिश की तो वह अपने कपडे़ हाथ में ले कर नंगधडं़ग हालत में भाग निकला. लेकिन बेचारी बिंदिया इस हालत में कहां जाती. उस दिन छोटेलाल ने उस की तबीयत से धुनाई कर डाली. मार से बेहाल बिंदिया तरहतरह की कसमें खाते पति से माफी मांगती रही कि अब दोबारा ऐसा नहीं होगा.

छोटेलाल नाम का ही छोटा था, लेकिन दिल का बड़ा निकला. उस ने पत्नी को माफ कर दिया. इस पर बिंदिया ने चैन की सांस ली लेकिन अब राजकुमार का घर आनाजाना बंद हो गया था. दोनों में बातचीत भी नहीं होती थी. यह हालत ज्यादा दिनों तक नहीं रह पाई. छोटेलाल को पैसों की तंगी और शराब की तलब परेशान करने लगी थी.

पति को नर्म पड़ते देख बिंदिया ने राजकुमार को इशारा किया तो वह एक दिन छोटेलाल से माफी मांगने उस के घर जा पहुंचा. शराब की तलब की मजबूरी कह लें या फिर वाकई फिर बड़े दिल वाला कह लें, छोटेलाल ने उसे भी इस शर्त पर माफ कर दिया कि आइंदा वह कभी भी बिंदिया की तरफ आंख उठा कर नहीं देखेगा.

बात अंधा क्या चाहे दो आंखों वाली जैसी थी. दुश्मनी रफादफा हो गई तो फिर महफिल जमने लगी और दोनों दारूमुर्गे की दावत उड़ाने लगे. बिंदिया भी पति और यार की नजदीकियों से खुश थी. उसे राजकुमार से फिर आंख और इश्क लड़ाने का मौका मिल रहा था.

लेकिन अब छोटेलाल चौकन्ना था और पहले के मुकाबले सख्त भी हो चला था, इसलिए दोनों को परेशानी होने लगी. इतने नजदीक होने पर जिस्मों की दूरियां राजकुमार और बिंदिया की प्यास और भड़का रही थीं.

गांव में पहले ही इतनी बदनामी हो चुकी थी कि दोनों के दिलोदिमाग से शरमोहया नाम की चीज खत्म हो चुकी थी. तंग आ कर इन हैरान परेशान प्रेमियों ने वासना की आग में जलते एक सख्त फैसला ले लिया, जिस की 2 महीने तक किसी को हवा नहीं लगी.

पुलिस पहुंची बिंदिया के पास

वह बीते 5 जून की तारीख थी, जब कुछ पुलिस वाले आमदोह गांव पहुंचे और बिंदिया का पता पूछने लगे. बिंदिया जब पुलिस के सामने आई तो उस के चेहरे की रंगत उड़ी हुई थी. पुलिस वालों ने छोटेलाल के बारे में पूछताछ की तो उस ने टरकाने की गरज से जवाब दिया कि वह तो कुछ दिनों से कहीं गए हुए हैं.

बिंदिया को अहसास नहीं था कि पुलिस वाले अपना पूरा होमवर्क कर के आए हैं. उन्होंने शुरुआती पूछताछ में ढील दी और फिर बिंदिया की निगरानी और पूछताछ शुरू की तो पता चला कि छोटेलाल के जाने के बाद राजकुमार का बिंदिया के घर आनाजाना बढ़ गया था. कुछ लोगों ने दोनों के नाजायज ताल्लुकात होने की बात भी दबी जुबान से कही.

असल में हुआ यूं था कि 5 मार्च को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गांव गुलेंदा निवासी मुन्ना सिंह ने नूराबाद थाने में खबर दी थी कि सुनरेखा नदी के किनारे एक लाश तैर रही है. खबर मिलते ही थानाप्रभारी विनय यादव हरकत में आ गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने गांव वालों की मदद से लाश को बाहर निकाला.

लाश का मुआयना करने पर चोट के निशान नहीं पाए गए तो पुलिस वाले इसे हादसे से हुई मौत मानते रहे. लाश के पास से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से उस की शिनाख्त हो पाती. लेकिन जब पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आई तो उस में मौत की वजह जहर बताया गया.

पुलिस की दिक्कत यह थी कि लाख कोशिशों के बाद भी मृतक की पहचान का कोई सुराग नहीं मिल रहा था. इस के बाद भी पुलिस वालों ने हिम्मत नहीं हारी.

एसपी मुरैना असित यादव ने इस ब्लाइंड मर्डर की गुत्थी सुलझाने के लिए एसडीपीओ ओ.पी. रघुवंशी के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी, जिस में विनय यादव के अलावा एएसआई जयपाल सिंह, अजय बेशांदर, रामदास सिंह, हैडकांस्टेबल केशवचंद, धर्मवीर, मुन्ना सिंह, सुनील, सुरेंद्र सिंह, अजय और दीनदयाल को शामिल किया गया.

एक महीने तक पुलिस टीम मृतक की शिनाख्त की कोशिश में जुटी रही, तब कहीं जा कर पता चला कि मृतक छोटेलाल निषाद पुत्र पूरन निषाद निवासी छीतापुरा है. यहीं से पुलिस टीम को पता चला कि छोटेलाल कुछ महीनों पहले अपनी ससुराल आमदोह जा कर रहने लगा था.

जब पुलिस वालों को बिंदिया और राजकुमार के संबंधों के बारे में पता चला तो उन्होंने गुपचुप तरीके से बिंदिया के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई, जिस से पता चला कि न केवल उस की और राजकुमार की लंबीलंबी बातें होती थीं, बल्कि हादसे के दिन दोनों के ही फोन की लोकेशन भी घटनास्थल की आ रही थी. अब कहने सुनने को कुछ खास नहीं बचा था.

पुलिस वालों ने जब बिंदिया से राजकुमार के बारे में पूछा तो वह यह कह कर साफ मुकर गई कि वह तो किसी राजकुमार को नहीं जानती. लेकिन पुलिस टीम जानती थी कि बिंदिया राजकुमार को कितने गहरे तक जानती है.

दोनों ने कबूला अपना गुनाह

राजकुमार और बिंदिया से अलगअलग पूछताछ की गई तो दोनों के बयानों में काफी विरोधाभास पाया गया. फिर जल्द ही दोनों ने अपना जुर्म कबूल लिया कि उन्होंने ही योजना बना कर छोटेलाल नाम का कांटा अपने रास्ते से हटाया था.

योजना के मुताबिक बिंदिया ने छोटेलाल के खाने में जहर मिला दिया था, जो राजकुमार ने उसे ला कर दिया था. जब जहर का असर हुआ तो छोटेलाल लुढ़क गया. उस के बेहोश होते ही दोनों एकदूसरे से लिपट गए और सब से पहले अपनी कई दिनों की हवस की प्यास बुझाई.

इस के बाद लाश ठिकाने लगाने के लिए राजकुमार ने फोन कर के अपने दोस्तों सुलतान कुशवाह व जंगबहादुर उर्फ गुड्डू जाटव को बुला लिया. चारों ने बेहोश छोटेलाल को आटोरिक्शा में बीच में इस तरह बैठाया कि कोई देखे तो लगे कि सवारियां बैठी हैं.

यह आटोरिक्शा आमदोह नगला थाना चौकी आगरा से होता हुआ गुलेंदा के पास पहुंचा, जहां सुनसान जगह देख इन्होंने छोटेलाल को नदी में फेंक दिया. जब 2 महीने तक कुछ नहीं हुआ तो दोनों बेफिक्र हो गए कि उन के गुनाह पर परदा पड़ा रहेगा.

पुलिस ने चारों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. नाजायज संबंधों के चलते प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या की एक और कहानी खत्म हुई, जो अपने पीछे कई सवाल भी छोड़ गई. मसलन मौजमस्ती के लिए लोग क्या कुछ नहीं कर गुजरते.

बिंदिया बजाए राजकुमार को यार बनाने के छोटेलाल को ही रास्ते पर लाने की कोशिश करती तो इस से बात बन सकती थी, लेकिन उसे अपने सपनों का राजकुमार, राजकुमार कुशवाह में दिखा और सपनों की जिंदगी जीने के लिए पति को ही निपटा दिया, जिस की सजा वह भोग रही है.

छोटेलाल जैसे पति भी अगर पत्नियों की भावनाओं को समझें, उन की कद्र करें तो न केवल हादसों से बच सकते हैं, बल्कि एक खुशहाल जिंदगी भी जी सकते हैं.

सगे भतीजे की नृशंस हत्या करने वाला चाचा

मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले में चरगवां पुलिस थाने के अंतर्गत एक छोटा सा गांव है सगड़ा. इस गांव की आबादी बमुश्किल 700-800 होगी. गांव के अधिकांश लोग खेतीबाड़ी का काम करते हैं. सगड़ा गांव में उत्तम गिरि का 6 भाइयों का परिवार रहता है. उत्तम गिरि और सब से बड़े भाई सतमन गिरि एक साथ रहते हैं. जबकि 4 अन्य भाई घर से कुछ दूरी पर बने मकान में रहते हैं. मूलत: किसानी करने वाले इस परिवार के पास लगभग 40 एकड़ खेती की जमीन है.

8 अप्रैल, 2019 की बात है. उत्तम गिरि की पत्नी ममता परिवार के लिए खाना बना रही थी. ममता का 10 साल का बेटा बादल खेलने की बात कह कर घर से बाहर चला गया था, जबकि 5 साल की बेटी मानवी घर पर ही खेल रही थी.

ममता खाना बना कर रसोई के सारे काम निपटा चुकी थी. तब तक दोपहर के 12 बज गए थे. लेकिन उस का बेटा बादल खेल कर नहीं लौटा था. वह बुदबुदाई, ‘‘खेल में इतना डूब जाता है कि खानेपीने का भी खयाल नहीं रहता.’’

उसी समय ममता का पति उत्तम गिरि भी खेत से घर आ गया. जब उसे पता चला कि बादल बाहर खेलने गया है तो उस ने उसे बुलाने के लिए बेटी मानसी को भेजा ताकि वह भी सब के साथ खाना खा ले.

कुछ देर बाद मानसी अकेली ही लौट आई. उस ने बताया कि बादल बाहर नहीं है. यह सुन कर उत्तम गिरि खुद बेटे को खोजने के लिए निकल गया. आसपड़ोस में रहने वाले लोगों ने उत्तम को बताया कि बादल खेलने आया तो था. सुबह साढ़े 10 बजे के आसपास वह मोहल्ले में ही साहबलाल के घर के सामने खेल रहा था.

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              बादल

चूंकि साहबलाल का बेटा भी बादल के साथ स्कूल में पढ़ता था, इसलिए दोनों प्राय: रोज ही साथ खेलते रहते थे. उन्होंने साहबलाल के घर जा कर बेटे के बारे में पूछा तो उस के बेटे ने बताया कि आज वह खेलने के लिए घर से निकला ही नहीं है. इस के बाद बादल की मम्मी, पापा के अलावा उस के बड़े पापा (ताऊ) सतमन गिरि की चिंता बढ़ गई.

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जैसे ही गांव बालों को उत्तम के 10 वर्षीय बेटे बादल के गुम होने की जानकारी मिली तो उत्तम के घर लोगों की भीड़ जुटने लगी. जब शाम तक बादल का पता नहीं चला तो उत्तम गिरि के बड़े भाई सतमन गिरि ने शाम को चरगवां थाने पहुंच कर बादल के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

चूंकि फरवरी माह में मध्य प्रदेश के चित्रकूट में 2 बच्चों के अपहरण के बाद हत्या करने की घटना हो चुकी थी, इसलिए थानाप्रभारी ने इस मामले को गंभीरता लिया. उन्होंने इस की सूचना पुलिस कप्तान निमिष अग्रवाल को भी दे दी. उन्होंने थानाप्रभारी को इस मामले में त्वरित काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसएसपी के निर्देश पर एसपी (ग्रामीण) रायसिंह नरवरिया थाना चरगवां प्रभारी नितिन कमल के साथ सगड़ा गांव पहुंच गए.

पुलिस ने बादल के मातापिता को भरोसा दिया कि पुलिस बहुत जल्द बादल का पता लगा लेगी. लेकिन अगले दिन सोशल मीडिया और स्थानीय अखबारों में घटना की खबर प्रकाशित होते ही पुलिस की नींद उड़ गई.

एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम ने 2 दिन और 2 रात गांव सगड़ा में कैंप कर गांव में घर घर जा कर करीब 100 से अधिक महिलाओं, पुरुषों व बादल के हमउम्र बच्चों से सघन पूछताछ की, लेकिन बादल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला.

घटना को ले कर गांव में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. कोई कहता कि बादल का अपहरण हो गया है तो कोई नवरात्रि में किसी तांत्रिक क्रिया के लिए देवी मां को बलि चढ़ाने की बात कहता. पुलिस किसी से जाती दुश्मनी और अन्य पहलुओं पर भी छानबीन कर रही थी. उसे यह भी शक था कि कहीं किसी ने बादल के साथ कुकर्म कर हत्या न कर दी हो.

10 अप्रैल की रात गांव में पुलिस बल की मौजूदगी में बादल के परिजनों और गांव के प्रमुख लोगों ने रात 2 बजे तक बादल की खोजबीन की, लेकिन उस का कोई अता पता नहीं लग सका. बादल के गायब होने की गुत्थी पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी. इस बीच एसपी साहब ने बादल की सूचना देने वाले को 25 हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा कर दी.

उधर बादल की मां ममता का रोरो कर बुरा हाल था. किसी अज्ञात आशंका के डर से उस का कलेजा रहरह कर कांप उठता.

गुरुवार 11 अप्रैल, 2019 की सुबह साढ़े 8 बजे के लगभग गांव के कुछ लोगों को पास में बने एक खाली मकान से अजीब सी बदबू आती महसूस हुई. जब उत्तम और गांव के लोग उस मकान के अंदर पहुंचे तो उन्हें एक जर्जर कमरे में प्लास्टिक की बोरी नजर आई. तत्काल बोरी खोल कर देखी गई तो उस के अंदर बादल की लाश मिली. उस के दोनों हाथ और पैर तार से बंधे हुए थे. बौडी गल चुकी थी.

जिस मकान में बादल की लाश मिली, वह मकान रामजी नाम के व्यक्ति का था, जो कुछ साल से पास के गांव कमतिया में रह रहा था. उस का यह घर खाली पड़ा रहता था. रामजी के 3 भाइयों का परिवार गांव में रहता था.

कमरे के अंदर गोबर से लिपाई की गई जगह पर एक कोने में पत्थर पर उकेरी गई देवी की मूर्ति रखी थी. मूर्ति के पास ही त्रिशूल, मोर पंख, बुझे हुए दीपक के साथ 2 नारियल भी थे. घर के आंगन और पिछले दरवाजे तक खून के धब्बे मिले. पिछले दरवाजे में बाहर की ओर से ताला लगा हुआ था, लेकिन रामजी और गांव वालों ने बताया कि पिछले दरवाजे में सिर्फ सांकल लगी रहती थी.

गांव वालों ने आशंका प्रकट की कि शायद लाश को छिपाने वाले बाहर से ताला लगा कर गए होंगे. बादल के गायब होने के बाद से उत्तम गिरि के परिवार के लोग रामजी के इस घर में कई बार बच्चे को ढूंढने पहुंचे थे, लेकिन उस समय वहां कुछ नहीं मिला था.

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बादल की लाश मिलते ही उस के परिजनों के साथ गांव के लोग आक्रोशित हो गए. इसलिए रामजी के भाइयों के परिवार को गांव वालों ने घेर लिया. सुबह साढ़े 8 बजे रामजी के भतीजे मुकेश ने फोन पर अपने चाचा रामजी को बताया कि उन के घर में बादल की लाश मिली है, जिस के कारण गोस्वामी परिवार के लोग उन सभी को परेशान कर रहे हैं.

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यह जानकारी मिलते ही रामजी भी सगड़ा पहुंच गया. उधर गोस्वामी परिवार के साथ गांव के कई युवकों ने गांव की घेराबंदी कर रखी थी. इस बीच किसी ने पुलिस को खबर की तो चरगवां थाने की पुलिस वहां पहुंच गई.

गांव में उस समय तनाव जैसा माहौल था. तनाव की स्थिति को देख एसपी निमिष अग्रवाल, एएसपी (ग्रामीण) रायसिंह नरवरिया के साथ पुलिस के सभी अधिकारी भारी फोर्स ले कर गांव पहुंच गए और एफएसएल टीम ने लाश मिलने वाली जगह का निरीक्षण कर सबूत इकट्ठा किए.

एसपी ने मौके पर मौजूद थानाप्रभारी (चरगवां) नितिन कमल, थानाप्रभारी (ओमती) नीरज वर्मा और थानाप्रभारी (शहपुरा) घनश्याम सिंह मर्सकोले एवं एफएसएल, साइबर सेल, क्राइम ब्रांच के साथ जवानों की टीमें बनाईं और गांव के एकएक घर की तलाशी लेने के निर्देश दिए. इस तलाशी अभियान के बाद भी हत्यारों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

चरगवां थानाप्रभारी नितिन कमल द्वारा की गई जांच एवं पूछताछ में एक बात तो तय मानी जा रही थी कि बादल के अपहरण एवं हत्या में किसी करीबी का हाथ है. विवेचना के दौरान गांव की महिलाओं एवं पुरुषों और बच्चों से लगातार सघन पूछताछ की गई. पूछताछ के आधार पर संदेह की सुई मुकेश श्रीपाल के इर्दगिर्द घूमने लगी.

बादल का शव जिस मकान में मिला, उस के मालिक रामजी के भतीजे मुकेश श्रीपाल के बारबार बयान बदलने से पुलिस को संदेह हुआ. पुलिस ने जब मुकेश के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि मुकेश अपने पुराने साथी गुड्डू उर्फ मनोहरलाल तिवारी और अनिल उर्फ अन्नू गोस्वामी के साथ रहता है.

अनिल उर्फ अन्नू गोस्वामी मृतक बादल का ताऊ यानी उस के पिता का बड़ा भाई था. तीनों जुआ खेलने के आदी थे और उन पर लाखों रुपयों का कर्ज था. मुकेश के साथ रहने वाला गुड्डू तिवारी भेड़ाघाट में हुई एक हत्या का आरोपी भी है.

पुलिस टीम ने जब मुकेश से पूछताछ की तो वह इस मामले में खुद पाकसाफ बताता रहा लेकिन पुलिस की सख्ती पर वह टूट गया. मुकेश ने पुलिस को जो कहानी बताई, वह दिल दहला देने वाली थी. पता चला कि मासूम बादल के अपहरण और हत्या की साजिश में बादल का सगा ताऊ अनिल गोस्वामी उर्फ अन्नू और उस का दोस्त मनोहर तिवारी शामिल थे.

जुए, सट्टे की गलत आदत के चलते लाखों रुपए के कर्ज में डूबे इन दरिंदों ने पैसे के लिए मासूम बादल का कत्ल किया था. मुकेश की निशानदेही पर पुलिस ने अनिल और गुड्डू तिवारी को भी हिरासत में ले कर उन से सघन पूछताछ की.

पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, उस के अनुसार गांव सगड़ा निवासी मुकेश श्रीपाल, गुड्डू उर्फ मनोहरलाल तिवारी और अनिल गिरि को जुआ खेलने और शराब पीने की लत थी. कुछ दिन पहले ही तीनों नरसिंहपुर जिले की सीमा से सटे नगर गोटेगांव में जुआ खेलने गए थे.

वहां बड़ी रकम हारने के कारण तीनों पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया था. जब कर्जदारों ने उन्हें धमकाना शुरू किया तो तीनों परेशान रहने लगे. कर्ज से मुक्ति पाने के लिए तीनों लूट, डकैती और अपहरण की योजना बनाने लगे.

तीनों को जब कोई रास्ता नजर नहीं आया तो इस के लिए अनिल उर्फ अन्नू ने सुझाव दिया कि उस के छोटे भाई उत्तम के बेटे बादल का अपहरण कर लिया जाए तो 10-12 लाख की फिरौती मिल सकती है. उत्तम कुछ भी कर के रुपए दे देगा. यह सुन कर मुकेश, गुड्डू और अन्नू ने योजना बनानी शुरू कर दी. इस के बाद वे तीनों बादल के अकेले घर से निकलने का इंतजार करने लगे.

8 अप्रैल, 2019 की सुबह लगभग पौने 11 बजे गुड्डू, मुकेश और अन्नू गांव में खाली पड़ी दलान पर जुआ खेल रहे थे. तभी उन की नजर अकेले घर जाते हुए बादल पर पड़ी तो उन्होंने जुआ खेलना बंद कर दिया और अनिल गिरि उर्फ अन्नू बादल के पास पहुंच गया. उस ने बड़े प्यार से बादल से घूमने चलने को कहा तो वह ताऊ की बात नहीं टाल सका.

जैसे ही बादल को ले कर अनिल वहां से जाने लगा तो लोगों से नजर चुरा कर मुकेश और गुड्डू तिवारी भी उस के पीछेपीछे चलने लगे. गांव से बाहर निकलते ही तीनों बादल से मीठीमीठी बातें करने लगे. बादल इन तीनों को पहले से जानता था, इसलिए वह बातें करता रहा.

तीनों बड़ी सफाई और चालाकी से उसे गांव के बाहर खेत में बने सूने मकान में ले गए. यह मकान लखन गौड़ का था, जिस में कोई नहीं रहता था. काफी देर तक वहां रहने के बाद जब बादल ने घर जाने की जिद की तो तीनों ने पास में पड़े बिजली के तार से उस के हाथपैर बांध कर मुंह पर कपड़ा बांध दिया ताकि उस की आवाज न निकल सके.

बादल को वहीं छोड़ कर तीनों गांव आ कर यह योजना बनाने लगे कि उत्तम गिरि से कैसे फिरौती मांगी जाए. गांव में जब पुलिस बादल की तलाश करने पहुंची तो बादल के परिजनों और गांव वालों के साथ तीनों लोग भी बादल की खोज के बहाने पुलिस और परिवार की गतिविधियों पर नजर रखने लगे.

पुलिस के साथ बादल के पिता उत्तम और परिजन बादल की तलाश करने लगे. यह देख कर तीनों अपहर्त्ता डर गए. माहौल देख कर उन्हें लगने लगा कि उत्तम से फिरौती की रकम वसूलना अब मुश्किल है.

तीनों अपहर्त्ता एक बार फिर से खेत में बने मकान में आ गए. उन्हें भय लगा कि अगर बादल को छोड़ दिया तो वे पकड़े जाएंगे. क्योंकि बादल तीनों को पहचानता था. हाथपैर और मुंह बंधा बादल हाथपैर पटक कर छूटने का प्रयास कर रहा था कि उसी समय गुड्डू तिवारी ने बादल की गला दबा कर हत्या कर दी.

गुड्डू शातिर अपराधी था. पहले भी वह एक युवक की हत्या कर के शव को नदी में फेंकने के आरोप में जेल की हवा खा चुका था. गुड्डू ने कहा कि अगर बादल की लाश नहीं मिली तो वे सभी बच जाएंगे. इस के बाद तीनों आरोपियों ने बादल के शव को बोरी में भर कर नर्मदा नदी में फेंकने की योजना बनाई.

8 और 9 अप्रैल को पुलिस और गांव वालों ने बादल को सभी जगह तलाशा, जिस से कारण तीनों को लाश ठिकाने लगाने का मौका नहीं मिला. 10 अप्रैल की रात वे तीनों लखन गौड़ के सूने मकान में पहुंचे और बादल के शव को बोरी में भर कर बाइक से नदी में फेंकने के लिए ले जाने लगे.

तीनों गांव के बाहरी रास्ते से जा रहे थे, तभी खेत की ओर से किसी ने बाइक पर तीनों को जाते देख कर टौर्च जलाई, जिसे देख कर तीनों डर गए और शव को ले कर गांव के अंदर सुनसान जगह में घुस गए. इस के बाद शव वाली बोरी को एक मकान में रख कर बैठ गए. इस दौरान कुछ खून बोरी से इधरउधर टपक गया.

तीनों ने कुछ लोगों को आते देखा तो जल्दबाजी में शव की बोरी को मुकेश श्रीपाल के घर के पास उस के चाचा रामजी के खंडहरनुमा मकान में छिपा दिया. इस के बाद  तीनों वहां से भाग कर अपनेअपने घर आ गए.

गांव के चप्पेचप्पे पर पुलिस बल की मौजूदगी और सर्चिंग के कारण मुकेश लाश की बोरी को ठिकाने नहीं लगा पाया और 11 अप्रैल की सुबह साढ़े 8 बजे रामजी के मकान से बदबू आने के कारण गोस्वामी परिवार को प्लास्टिक की बोरी में बादल का शव मिल गया.

जब पुलिस ने गांव में उत्तम गोस्वामी, सतमन गोस्वामी और उस के अन्य भाइयों को अनिल उर्फ अन्नू गोस्वामी के बारे में बताया तो उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि उन का भाई बादल का अपहरण और कत्ल कर सकता है. इस के बाद पुलिस ने सभी भाइयों से एक कमरे में अनिल से बातचीत करने के लिए कहा तो बातचीत में अनिल ने हत्या करना स्वीकार कर लिया, जिसे सुन कर उत्तम और अन्य भाई सहम गए.

उत्तम और उस के अन्य भाइयों को यह तो मालूम था कि अनिल कर्ज में डूबा है, जिसे चुकाने के लिए वे सभी उसे रुपए भी दे चुके थे. साथ ही दूसरी फसल पर रुपए देने का वादा किया था, लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि कर्ज चुकाने के लिए वह उन के कलेजे के टुकड़े का ही कत्ल कर देगा.

अनिल के जुर्म कबूलने के बाद गोस्वामी परिवार के लोग मायूस हो कर कमरे से बाहर निकल आए और पुलिस से उसे गिरफ्तार कर सख्त काररवाई करने को कहा.

जबलपुर जिले के एसपी निमिष अग्रवाल ने 18 अप्रैल, 2019 को प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया कि चरगवां थाना अंतर्गत 10 वर्षीय बादल की हुई नृशंस हत्या के हत्यारे मोहनलाल उर्फ गुड्डू तिवारी, मुकेश श्रीपाल, अनिल उर्फ अन्नू गोस्वामी को गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर उन के पहने हुए कपड़े मोटरसाइकिल और घटनास्थल से मिले तार के टुकड़ों को जब्त कर लिया.

पुलिस ने तीनों आरोपियों को भादंवि की धारा 363, 364, 302, 201 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सीतापुर सामूहिक हत्याकांड : खुशियों में खूनी खलल

लोगों के बीच कानाफूसी होने लगी थी. बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चे वहां का दृश्य देख कर स्तब्ध थे. सिर से पांव तक ढंकी लाशें एकएक कर निकाली गई थीं. एंबुलेंस में लाद दी गई थीं, उन की संख्या 6 थी. जिन में 2 लाशें बच्चों की भी थीं. एक बच्चा बुरी तरह से जख्मी था. सब से पहले सब को अस्पताल ले जाया गया.

कुछ समय में ही उपस्थित लोगों को लाशों के बारे में भी पता चल गया. ये लाशें सिंह परिवार के सदस्यों की थी. लोगों के बीच इस बात की कानाफूसी होने लगी कि परिवार के ही एक शख्स ने नशे में मां, पत्नी और अपने 3 बच्चों की हत्या कर दी है. फिर उस ने खुद भी गोली मार कर आत्महत्या कर ली है.

उस ने पहले मां को गोली मारी, इस के बाद पत्नी को हथौड़े से कूच कर मार डाला. फिर तीनों बच्चों को छत से फेंक दिया.

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में रामपुर मथुरा स्थित पल्हापुर गांव में बड़े आकार के आधा दरजन से अधिक कमरों वाले दोमंजिला मकान और उस के आसपास की चहलपहल दूर से ही अपनी भव्यता, खुशहाली और खुशियों की कहानी कह रही है. उस के अहाते में खेतीकिसानी के आधुनिक सामान, ट्रैक्टर आदि के अलावा आनेजाने के लिए निजी गाडिय़ां अकसर देखी जाती थीं.

उस में रहने वाला परिवार 2 हिस्से में बंटा हुआ था. एक हिस्सा बुजुर्ग विधवा महिला सावित्री सिंह परिवार के सदस्यों के साथ इस मकान में रहतीं थीं, जबकि परिवार की बहू प्रियंका सिंह अपने 3 बच्चों के साथ लखनऊ के मकान में रहती थी. 2 भाई गांव में रह कर ही खेती का काम संभालते थे. उन के पास अच्छीखासी 100 बीघे जमीन थी. एक तालाब भी था, जिस में मछली पालन का कारोबार था.

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           आरोपी अजीत सिंह

परिवार की अच्छी तरक्की, सुख के साधन और शिक्षित होने आदि की चर्चा पूरे गांव में होती थी. परिवार के मुखिया स्व. वीरेंद्र सिंह इलाके में बड़े किसान की हैसियत रखते थे और उन का परिवार आधुनिक ढंग से खेती करवाने के लिए जाना जाता था. परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था. गांव वालों की निगाह में उन की जिंदगी आनंद के साथ गुजर रही थी.

अचानक 11 मई की सुबह 7 बजे के करीब उसी घर के आगे कोहराम मच गया था. वहां कई एंबुलेंस और पुलिस की गाडिय़ां पहुंच चुकी थीं. अस्पतालकर्मी और पुलिसकर्मी मकान के भीतर जा चुके थे और अहाते से ले कर आसपास के रास्ते पर ग्रामीणों की अच्छीखासी भीड़ जुट चुकी थी.

दरअसल, सिंह परिवार के पट्टीदार प्रभाकर ने सुबहसुबह रामपुर मथुरा थाने की पुलिस को नृशंस हत्या के वारदात की सूचना दी थी. उसे परिवार के एक सदस्य ने 4 बजे के करीब फोन कर बुलाया था.

इस वारदात की जानकारी मिलते ही मौके पर सीओ, इंसपेक्टर समेत काफी पुलिस फोर्स मौके पर पहुंच गई थी. फोरैंसिक टीम भी मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल करने लगी थी. पहली जांच के अनुसार वारदात को 42 साल के अनुराग सिंह ने अंजाम दिया था.

वह परिवार समेत रहता था. मरने वालों में  सावित्री सिंह (62 वर्ष), अनुराग सिंह (40 वर्ष) प्रियंका सिंह (40 वर्ष), अश्विनी (12 वर्ष) थे, जबकि छोटा लड़का आदिक (8 वर्ष) और अश्वी (10 वर्ष)  उस वक्त तक जीवित था. पहली जांच के बाद सीओ (महमूदाबाद) दिनेश शुक्ला के अनुसार आत्महत्या करने वाला शख्स अनुराग सिंह नशे का आदी था. परिवार वाले उसे नशामुक्ति केंद्र ले जाना चाहते थे. इसे ले कर रात में विवाद हुआ था, जो काफी बढ़ गया था.

अनुराग के नशे की आदत के बारे में पड़ोसियों ने भी जानकारी दी. उन्होंने बताया कि अनुराग नशा करता था और अकसर वह शराब पी कर ही घर आता था. उस के घर से हमेशा झगडऩे की आवाजें आती थीं. उन की अस्पष्ट आवाजों में किसान क्रेडिट कार्ड, बंटवारे, बाबूजी, कर्ज, खर्च आदि की बातें सुनाई देती थीं. घर के मुखिया के निधन के बाद से ऐसा लगता था कि मानो घर की सुखशांति भंग हो गई हो. अनुराग की मानसिक हालत भी ठीक नहीं चल रही थी.

किस ने की 6 लोगों की हत्या

एक ही परिवार के 6 लोगों की हत्या से गांव के लोग भी गमगीन हो गए थे. गांव के कई लोगों ने गोलियों की आवाज सुनी थी और मौके की ओर दौड़ पड़े थे. परिवार का एकमात्र सदस्य अजीत सिंह ही बचा था. वह अनुराग का छोटा भाई है.

एक परिवार के 6 लोगों की मौत की खबर मिलने के बाद मौके पर ग्रामीणों की भीड़ लग गई थी. मौत का तांडव कितना लोमहर्षक रहा होगा, इस की कल्पना कर लोग सिहर गए थे. एक ही परिवार के पुरुष, महिला और बच्चों की मौत किसी को भी झकझोर देने वाली घटना थी. इस हत्याकांड ने पूरे जिले को हिला कर रख दिया था. जिस ने भी इस घटना के बारे में देखा और सुना, उसे यकीन नहीं हो रहा था.

मृतका प्रियंका के भाई आदित्य ने चीखचीख कर पुलिस को बताया कि उस के जीजा अनुराग हत्या जैसा काम कर ही नहीं सकते. इन सब का कातिल कोई और है. उस ने मामले की जांच की मांग की. लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी और अजीत सिंह के बताए गए सीन पर ही एफआईआर दर्ज कर ली. उस की द्वारा बताई गई घटना को ही सच मान लिया. जबकि आदित्य ने सीतापुर पुलिस को एक शिकायती पत्र भी भेजा. उस ने आरोप लगाया कि अनुराग का भाई अजीत सिंह और नौकर इस अपराध में शामिल हो सकते हैं.

बाद में पता चला कि यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह आदित्य और मृतका प्रियंका सिंह के नाना थे और गोरखपुर के कैमियरगंज विधानसभा से विधायक फतेहबहादुर सिंह दोनों के मामा हैं.

Tarun gaba

         आईजी रेंज तरुण गाबा

पीडि़त परिवार के हाई प्रोफाइल होने की सूचना पर उत्तर प्रदेश पुलिस के डीजीपी प्रशांत कुमार को इस में दिलचस्पी लेनी पड़ी. उन्होंने आईजी रेंज तरुण गाबा को भेज कर मामले की जांच कराई. उन की टीम के साथ एसटीएफ टीम और सीतापुर क्राइम ब्रांच को भी लगाया गया. उधर मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. रिपोर्ट देख कर पुलिस आश्चर्यचकित रह गई. आदित्य का दावा सही साबित लग रहा था.

सीतापुर का पल्हापुर कांड की परतें अब धीरेधीरे खुल कर सामने आने लगी थीं. पुलिस ने इस हत्याकांड की 5 दिनों तक गहन तफ्तीश की. इस बीच सभी मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई थी. रिपोर्ट चौंकाने वाली थी, जिस से पता चल गया कि अनुराग ने आत्महत्या नहीं की थी. उस के बाद ही उस के छोटे भाई अजीत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अनुराग के सिर में 2 गोलियां लगने और हथौड़े से वार किए जाने की बात का खुलासा हुआ, जिस से यह साफ हो गया कि ये सभी की सभी 6 मौतों का जिम्मेदार अनुराग नहीं कोई और है. इस बाबत पुलिस ने अजीत, उस की पत्नी विभा और दूसरे नातेरिश्तेदारों और गांव वालों से लंबी पूछताछ की. काल डिटेल्स, फोन की लोकेशन चैक करने से ले कर मौकाएवारदात पर मिले तमाम सबूतों का बारीकी से मुआयना किया और तब आखिर में संदेह अजीत की ओर गया.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर जिला सीतापुर है. अनुराग सिंह और अजीत सिंह दोनों भाइयों के पास दिवंगत पिता वीरेंद्र सिंह का पुश्तैनी मकान और करीब 100 बीघा खेती की जमीन थी. इस जमीन पर खेतीबाड़ी का जिम्मा अनुराग सिंह संभालते थे. उन के पास एग्रीकल्चर से बी.एससी. की डिग्री थी. वैसे अनुराग आईएएस बनना चाहते थे. इस के लिए उन्होंने प्रयागराज और दिल्ली में रह कर कोचिंग भी की थी.

सफलता नहीं मिलने पर वह खेतीबाड़ी के काम में लग गए थे. खेती में वह आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते थे. इस बार भी उस ने पूरे खेत में तरबूज की फसल उगाई थी. बताया जा रहा है कि खेती से हर साल लाखों का टर्नओवर होता था. वहीं परिवार के पास गांव में घर के पीछे 4 बीघे में बना एक निजी तालाब भी है.

अनुराग सिंह और अजीत सिंह का परिवार गांव में ही बने दोमंजिला मकान में रहता था. आलीशान मकान में सभी सुविधाएं मौजूद थीं, जिस की कीमत लाखों में बताई जाती है. रुपएपैसे की कोई कमी नहीं थी. गांव में बने घर के हर कमरे में एसी लगा हुआ है. इस के अलावा अजीत, अनुराग व प्रियंका के पास अपनी अलगअलग गाडिय़ां हैं. परिवार के पास कुछ दुकानें भी हैं, जिन से अच्छाखासा किराया आता है.

अनुराग सिंह की लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र में सरगम परिसर में एक कोठी भी है, जिस की कीमत करीब एक करोड़ रुपए आंकी गई है. उस की पत्नी और तीनों बच्चे यहीं रहते थे. तीनों बच्चे लखनऊ के पब्लिक स्कूल सीएमएस की अलीगंज ब्रांच में पढ़ते थे.

अनुराग सिंह का भाई अजीत सिंह सीतापुर के ही ग्राम महमूदाबाद प्राथमिक विद्यालय में सहायक अध्यापक है. इस घटना का एकमात्र चश्मदीद अजीत सिंह ही है. उस ने अपनी पत्नी और बच्चे को एक दिन पहले ही अपनी ससुराल महमूदाबाद में पहुंचा दिया था.

पूछताछ में अजीत सिंह ने जो कहानी गढ़ी, वह पुलिस के गले नहीं उतरी. उस ने बताया कि उस का भाई उसे भी मार देना चाहता था. उस ने बड़ी मुश्किल से कमरे में बंद हो कर अपनी जान बचाई थी.

उस ने बताया कि घटना की वजह अनुराग की शराब पीने की लत थी. इस वजह से उस का प्रियंका से झगड़ा होता रहता था. वारदात वाली रात भी अनुराग शराब पीने लगा था. कुछ समय में अनुराग और प्रियंका के बीच झगड़ा होने लगा. उस वक्त वह अपने रूम में बंद हो गया. बाहर से अनुराग ने भी दरवाजे की कुंडी लगा दी.

पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर अजीत के इस बयान पर सवाल उठाए, जिस का वह जवाब नहीं दे पाया. पुलिस ने पूछा कि अगर अनुराग ने उस के कमरे की कुंडी बाहर से बंद कर दी थी, तब वह बाहर कैसे निकला? पुलिस ने तीखा सवाल किया कि जब उस ने रात में ही अनुराग को परिवार के लोगों को गोली मारते देखा तो पुलिस को फोन क्यों नहीं किया?

इन हत्याओं में हथौड़े का सहारा लिया गया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किसी भारी चीज से मां और प्रियंका के चेहरे को कुचला गया था. यही नहीं, उन्हें गोली भी मारी गई थी. मां के सिर के बीचोबीच गोली मारी गई थी. उस के बाद चेहरे पर वार किया गया. प्रियंका के सिर और चेहरे पर हथौड़ा मारा गया था.

सीने में बाईं ओर सटा कर गोली मारी गई थी. हथौड़ा भी प्रियंका की लाश के पास से मिला था. बड़ी बेटी के पैर तोड़े गए थे. फिर गरदन पर सटा कर गोली मारी गई थी, जो सिर को चीर कर बाहर निकल गई थी. छोटी बेटी और बेटे के सिर पर पहले वार किए गए और फिर तीनों को दूसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया गया था. बच्चे बहुत देर तक तड़पते रहे थे.

ऐसे हुआ वारदात का खुलासा

अजीत सिंह से हत्याकांड के बारे में गहन पूछताछ होने लगी, तब वह गुस्से में आ गया. अंत में बिफरते हुए उस ने घटना को अंजाम देने की बात स्वीकार कर ली. उस ने पूछताछ में पूरी कहानी बयां कर दी.

उस ने बताया कि पिता वीरेंद्र सिंह का करीब साल भर पहले निधन हो जाने के बाद उस के बड़े भाई अनुराग सिंह के बीच पैसे और जमीन को ले कर कहासुनी होने लगी थी. इस बात को ले कर कई बार तीखी बहस और लड़ाईझगड़े की नौबत आ जाती थी.

गुस्से में वह अपने बड़े भाई के खिलाफ अपशब्द भी बोल देता था. ऐसी हालत में मां उन का बीचबचाव करती थीं और तब किसी तरह से मामला शांत हो पाता था.

अनुराग सिंह जो एक पढ़ालिखा कृषि विज्ञान का ग्रेजुएट होने के बावजूद लगातार शराब का आदी था. अजीत का कहना था कि वह इस कारण खुद को समाज में अपमानित महसूस करता था. उस के पिता ने किसान क्रेडिट कार्ड से लोन ले रखा था, जिस का कुल 24 लाख रुपए का भुगतान किया जाना बाकी थी. इसे ले कर बारबार तकादे का नोटिस आता रहता था. इसी बीच पिता की मृत्यु हो गई थी.

अजीत सिंह हमेशा अपने परिवार के सामने सवाल करता था कि लोन कौन चुकाएगा? इसे ले कर अजीत सिंह और अनुराग सिंह के बीच तथा अनुराग सिंह की पत्नी प्रियंका सिंह के बीच कई बार वादविवाद हुआ.

अनुराग सिंह ने इसी साल तरबूज की फसल की बिक्री के बाद अपने हिस्से का लोन चुकाने का वादा किया. इसी सिलसिले में 10 मई की शाम को पूरा परिवार इकट्ठा हुआ था. ऐन वक्त पर उस की मां सावित्री सिंह और भाभी प्रियंका सिंह ने उसे बताया कि अनुराग सिंह फिलहाल लोन चुकाने में असमर्थ है.

इस बात पर अजीत सिंह गुस्से से भर गया. उस ने शाम के समय घर में बनी खिचड़ी में नींद की 4-5 गोलियां मिला दीं और सभी के सोने का इंतजार करने लगा. अजीत का कहना था कि उस का मकसद अपने भाई व भाभी को खत्म करने का था, क्योंकि उस की नाराजगी भाईभाभी से थी.

मां और बच्चों को केवल नींद की गोली दे कर सुलाना चाहता था. उस की योजना पर पानी तब फिर गया, जब उसे मालूम हुआ कि परिवार के सभी लोग बाहर से खाना खा कर आए हैं. किसी ने घर में पकी खिचड़ी नहीं खाई.

अजीत सिंह पशोपेश में पड़ गया कि वह अब क्या करे? फस्र्ट फ्लोर पर बने अपने कमरे में जा कर वह लेट गया, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. रात के 2 चुके थे. वह अचानक उठा और फस्र्ट फ्लोर पर बने प्रियंका सिंह और बच्चों के कमरे की बिजली का मेन स्विच औफ कर दिया.

कुछ समय में ही गरमी के कारण प्रियंका कमरे से बाहर आ गई. बाहर खड़े अजीत ने उस पर गोली दाग कर हत्या कर दी.

अचानक गोली की आवाज सुन कर मां सावित्री सिंह की नींद खुल गई. वह हड़बड़ी में अपने कमरे से बाहर निकल आईं. अजीत ने उन पर हथौड़े से हमला कर दिया. उस के बाद अनुराग सिंह को उस के कमरे में जा कर गोली मार दी.

अजीत यहीं नहीं रुका. मां, भाभी और भाई की हत्या के बाद अनुराग की बड़ी बेटी को यह समझाने की कोशिश की कि उस के पिता ने मां और पत्नी की हत्या कर खुदकुशी कर ली है.

किंतु बड़ी लड़की यह मानने को तैयार नहीं हुई और चीखनेचिल्लाने लगी. उस के चीखने पर अन्य दोनों बच्चे भी चिल्लाने लगे. अजीत गुस्से में आ गया और उस ने तीनों को बारीबारी छत पर ले जा कर मार डाला और छत से नीचे फेंक दिया.

फिर बना दी एक फिल्मी कहानी

फिर नीचे आ कर इस हत्याकांड की जानकारी अपनी पत्नी समेत अन्य रिश्तेदारों व गांव के कुछ लोगों को फोन कर के दे दी. सभी को उस ने अपनी बनाई हुई कहानी सुनाई कि उस के बड़े भाई ने नशे की हालत में पूरे परिवार की हत्या कर खुदकुशी कर ली है. सभी को फोन काल सुबह 4 बजे के आसपास किया गया.

करीब 5 बजे अजीत सिंह के पड़ोस में रहने वालों के चिल्लाने पर गांव के लोग धीरेधीरे जमा हो गए. अजीत सिंह के रिश्तेदार मौके पर पहुंच गए. उन्होंने देखा कि 2 बच्चों की मृत्यु तब तक नहीं हुई थी. उन के शरीर में कुछ हरकत बाकी थी. ग्रामीण दोनों बच्चों को अनुराग सिंह की कार द्वारा महमूदाबाद ले गए. वहां पहुंचते ही एक बच्चे की मृत्यु हो गई, जबकि वहां से एक बच्चे को ट्रामा सेंटर लखनऊ भेजा गया. उस की भी रास्ते में ही मौत हो गई.

जांच में पाया गया कि इस वारदात को अंजाम देने वाला अकेला अजीत सिंह ही था. घटना के समय अजीत सिंह की पत्नी, साला ससुर, बहनबहनोई, ताई के दोनों लड़के और अन्य प्रमुख रिश्तेदार अपनेअपने घरों में थे. इस कारण  घटना में उन की संलिप्तता का सच नहीं मिला. मौके पर भी ऐसा कोई अन्य मोबाइल नंबर एक्टिव नहीं पाया गया.

मौके पर पुलिस टीम द्वारा क्राइम सीन रीक्रिएशन भी किया गया, जिस से अजीत सिंह के बयानों की सत्यता परखी गई, जिसे पहली नजर में सही पाया गया.

हत्याकांड को अंजाम देने वाले अजीत सिंह ने काफी क्रूरता दिखाई. उस ने बताया कि सब से पहले अपनी भाभी के सीने में गोली मारी थी. गोली की आवाज सुन कर जब उस की मां पहुंची थीं, तब उन पर हथौड़े से वार कर घायल कर गोली मारी थी.

उस के बाद अनुराग व उस के बाद ऊपर के कमरे में सो रहे तीनों बच्चों को मौत के घाट उतारा. कुछ देर वह घायल मां के पास बैठा रहा. फिर अचानक उन का सिर हथौड़े से कूंच दिया था.

पुलिस को दिए गए बयान के अनुसार अजीत को सब से ज्यादा नाराजगी प्रियंका सिंह से थी. इसलिए वह 10-11 मई की रात असलहा और हथौड़ा ले कर उन को ही मारने के लिए छत पर गया था. अजीत ने पुलिस को बताया कि मां को मारने का इरादा नहीं था. लेकिन, वह अचानक से सामने आ गईं, इसलिए उस ने उन पर वार कर दिया.

जब अन्य सभी की हत्या कर वह मां के पास पहुंचा तो उन की सांसें चल रही थीं. अजीत ने यह भी दावा किया कि मां ने कहा था कि वह वहां से चला जाए. अजीत का कहना था कि उस पर सनक चढ़ी थी, कुछ समझ नहीं आ रहा था. ऐसा लगा कि अगर मां जिंदा रहेंगी तो वह कैसे उन का सामना करेगा. यह सोचते ही अजीत ने मां सावित्री पर कई वार कर दिए.

जब तक पड़ोसियों को पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. घर के सामने रहने वाले अनुराग के करीबी प्रभाकर प्रताप सिंह ने बताया कि घटना की जानकारी पर वह मौके पर पहुंचे. बच्चों की सांसें चलने का हवाला दे कर उन्होंने अनुराग के भाई अजीत से कार की चाबी मांगी, लेकिन आधे घंटे तक चाबी नहीं मिली.

बाद में अनुराग की गाड़ी की चाबी मिल गई. वह गांव के अमरेंद्र सिंह, निर्मल व राजू के साथ तीनों बच्चों को ले कर महमूदाबाद सीएचसी गए. यहां से वे लोग उन्हें ले कर लखनऊ भागे, तब गाड़ी में पहले बेटी खत्म हुई और अस्पताल पहुंचने पर बेटे ने भी दम तोड़ दिया.

बताते हैं कि बेटा कुछ बोलने की कोशिश कर रहा था. वैसे उसे मरा जानकर ऊपर से फेंका गया था, फिर भी यदि समय से उपचार मिल जाता तो वह घटना की हकीकत बता सकता था.

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित

महाभारत सीरियल के कृष्ण का आईएएस पत्नी संग पंगा

पशु चिकित्सक से अभिनेता बने नीतीश भारद्वाज की आईएएस पत्नी स्मिता भारद्वाज के साथ फिर सुबह सुबह बहस हो गई थी. नाराज पत्नी चीखती हुई हिदायत के साथ बोल पड़ी थी, ”मैं ने तुम्हें कितनी बार कहा है कि बच्चों को महाभारत के किस्से कहानियों से दूर रखा करो. अभी उन की पढ़ाई का समय है.’’

”धर्म और अध्यात्म की बातों से ज्ञान मिलता है,’’ नीतीश ने चाय का प्याला उठाते हुए कहा.

”मिलता होगा, लेकिन उस की एक उम्र होती है. और वैसे भी महाभारत की कौन सी बातें सीख कर ज्ञान हासिल करेंगे?’’ पत्नी बोली.

”महाभारत में सीखने की बहुत सारी बातें हैं. उस में गलत क्या है?’’ नीतीश ने कहा.

”क्या सीखेगी उस से हमारी 7 साल की बेटी? चीर हरण, औरतों का अपमान और जुआ…’’ पत्नी चीखती हुई बोली.

”तुम तो बेकार में बात खींच रही हो. बच्चों को आध्यात्मिक किताबों का ज्ञान तो होना ही चाहिए.’’ नीतीश ने समझाने की कोशिश की.

”कोर्स की किताबों का क्या होगा?’’ कह कर गुस्से में पत्नी अपने कमरे में चली गई और काफी देर तक बड़बड़ाती रही. नई पुरानी बातों से उन के बीच बहस और तेज हो गई.

उन के बीच यह आए दिनों की बात थी. अकसर वे धर्म, अध्यात्म और आजकल के माहौल में बच्चों की परवरिश को ले कर दोनों झगड़ पड़ते थे. जब उन के बीच तनाव काफी बढ़ जाता था, तब पत्नी स्मिता नीतीश को पहली पत्नी और बच्चों को छोड़ कर चले जाने का ताना मारने लगती थी. कई बार चेतावनी दे चुकी थी, ”यही रवैया रहा तो मैं भी बच्चों संग अपनी अलग दुनिया बसा लूंगी.’’

स्मिता के व्यवहार से परेशान हो कर नीतीश भारद्वाज ने उस के खिलाफ 14 फरवरी, 2024 को पुलिस में लिखित शिकायत दे दी. उस ने पत्नी पर मानसिक उत्पीडऩ का आरोप लगाया. स्मिता मध्य प्रदेश कैडर की आईएएस है. अपनी शिकायत में नीतीश भारद्वाज ने बताया कि उस की पत्नी स्मिता भारद्वाज उसे काफी लंबे समय से मानसिक रूप से प्रताडि़त कर कर रही है.

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नीतीश भारद्वाज ने यह शिकायत भोपाल के पुलिस आयुक्त हरिनारायण चारी मिश्र से खुद मिल कर की. इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए पुलिस कमिश्नर ने स्मिता को फोन लगाया और अपना पक्ष रखने के लिए अपने कार्यालय में बुलाया, लेकिन स्मिता ने कहा कि नीतीश ही घर आ जाएं.

अपने शिकायती आवेदन में नीतीश भारद्वाज ने यह भी लिखा कि उस की पत्नी सीनियर आईएएस अधिकारी है और इस बात का अनुचित फायदा उठा कर एक पिता को उस की दोनों बेटियों से अलग कर दिया है. वे अपनी बेटियों से मिलना चाहता है, देखना चाहता है, लेकिन उस की पत्नी उसे बेटियों से मिलने तक नहीं दे रही है.

नीतीश भारद्वाज ने कहा कि उस का अपनी पत्नी से तलाक का केस चल रहा है और अब ऐसा कभी संभव नहीं हो सकेगा कि उस का अपनी पत्नी से समझौता हो जाए और वापस शादी बहाल हो सके.

इसी के साथ नीतीश ने मध्य प्रदेश के खेल एवं युवा कल्याण विभाग में अपर मुख्य सचिव के पद पर पदस्थ स्मिता भारद्वाज पर कई गंभीर आरोप लगाए. इस का खुलासा नीतीश ने खुद 15 फरवरी को मीडिया के सामने कर दिया. उस ने पत्नी पर बेटियों के अपहरण करने तक के आरोप लगा दिए.

खुद के घर में कैसे शुरू हुई महाभारत

नीतीश ने पीडि़त मन से कहा, ”मैं ने महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण का किरदार निभाया. श्रीमदभगवत गीता के उपदेश दिए, लेकिन आज मैं अपने निजी जीवन में बेहद दुखी हो गया हूं. मेरी आईएएस पत्नी स्मिता घाटे उर्फ स्मिता भारद्वाज महाभारत के दुर्योधन की तरह मनमानी कर रही है. मुझे मानसिक रूप से प्रताडि़त किया जा रहा है. मुझे मेरी बेटियों की चिंता है, क्योंकि पिछले 4 सालों से मुझे उन से दूर रखा गया है और आप सभी बताएं कि इसे मैं अपहरण क्यों न कहूं?’’

नीतीश ने पत्नी पर आरोप लगाया कि उन की जानकारी के बगैर जुड़वां बेटियों का नामांकन भोपाल के स्कूल में करवाया. जब मुझे उन के बारे में जानकारी हुई, तब उस ने बिना बताए इस स्कूल निकाल कर ऊटी के स्कूल में डलवा दिया.

अब मुझे मालूम हुआ है कि मेरी बेटियों को ऊटी के स्कूल से भी निकाल लिया है. एक पिता होने के नाते मुझे पता होना चाहिए कि मेरी बेटियां कहां हैं, लेकिन मुझे आज की तारीख में उन के बारे में कोई भी जानकारी नहीं है.

नीतीश ने बताया कि 26 जनवरी, 2024 को मैं ने स्कूल से जानकारी ली तो पता चला कि ऊटी के स्कूल से भी बेटियों को निकाल लिया गया है. इस के बाद 8 और 9 फरवरी को मैं ने स्मिता को मेल कर बेटियों के बारे में जानना चाहा, किंतु इस का उस ने कोई जबाब ही नहीं दिया. बेटियों की जानकारी के मामले में वह मुझे अंधेरे में रखे हुए है. मुझे बेटियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

पुलिस में शिकायत दर्ज किए जाने के वक्त उस की जुड़वां बेटियों की उम्र 11 वर्ष 9 महीने थी. नीतीश ने मीडिया को पत्नी के साथ विवाद होने के कारण भी बताए. उस ने बताया कि बेटियां जब 7 साल की थीं, तब उसे वह महाभारत धारावाहिक दिखाया करता था. इस पर स्मिता ने बेटियों को महाभारत नहीं दिखाने को कहा.

उस ने अपने बारे में बताया कि वह वर्ष 1999 से 2007 तक मध्य प्रदेश में रहते हुए मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी भी संभाली थी. उस ने बताया कि वह कई आईएएस अधिकारियों के साथ काम करने का मौका मिला है.

नीतीश भारद्वाज का यह भी कहना था कि स्मिता जैसी अडिय़ल आईएएस अधिकारी उस ने नहीं देखी. उस ने आशंका जताई कि स्मिता अपना मानसिक संतुलन खो बैठी है. मुंबई कुटुंब न्यायालय से मैं ने उस की मानसिक स्थिति की जांच कराने का लिखित में आग्रह भी किया है. अब उस ने मेरा नंबर ब्लौक कर दिया है और ईमेल का जवाब तक नहीं देती है.

दरअसल, 23 जनवरी, 2020 को स्मिता भारद्वाज ने तलाक की अरजी दी थी. उस के बाद से ही उस ने नीतीश का नंबर ब्लौक कर दिया था. उस वक्त उस की दोनों बेटियां इंदौर के एक स्कूल में पढ़ रही थीं. वर्ष 2019 में स्कूल के वार्षिकोत्सव में नीतीश अपनी बेटियों से मिला था. इस के बाद मुंबई न्यायालय में बेटियों से मिलने की गुहार लगाने के बाद 2 जनवरी, 2024 को न्यायालय में उन से मिलना संभव हो पाया था.

नीतीश का आरोप है कि पत्नी स्मिता ने बेटियों को उस के खिलाफ भड़का दिया है. न्यायालय में मुलाकात के वक्त एक बेटी ने मुझ पर ही आरोप लगा दिया कि मैं उसे बहन से अलग करना चाहता हूं.

कौन है नीतीश भारद्वाज

नीतीश भारद्वाज का जन्म 2 जून, 1963 को मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था.  पिता जनार्दन उपाध्याय मुंबई हाईकोर्ट में सीनियर वकील थे. माता साधना उपाध्याय विलसन कालेज, मुंबई में मराठी साहित्य की लेक्चरर थीं. पिता वकील होने के साथसाथ 60 और 70 के दशक में श्रमिक आंदोलन में जार्ज फर्नांडीस के करीबी सहयोगी थे.

नीतीश भारद्वाज की स्कूली शिक्षा मुंबई के गोखले एजुकेशन सोसाइटी के डीजीटी हाईस्कूल और रौबर्ट मनी स्कूल प्राक्टर रोड से हुई थी. इस के बाद उस ने अपनी बी.एससी. मुंबई में विलसन कालेज से (1977-1979) पूरी की.

बाद में उस ने बौंबे वेटरनरी कालेज (1979-1983) से पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन में स्नातक की डिग्री हासिल कर ली. हालांकि परिवार के लोग उसे एमबीबीएस डाक्टर के रूप में देखना चाहते थे.

कालेज के दिनों में वह अभिनय को ले कर भी गंभीर था. उस ने कई नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया था. साथ ही उस ने मुंबई के बच्चों के थिएटर संगठन में प्रशिक्षण दिया, जिसे लिटिल थिएटर कहा जाता है.

नीतीश भारद्वाज वैसे तो एक पेशेवर पशु चिकित्सा सर्जन बन गया, लेकिन फिल्मों और टेलीविजन में एक अभिनेता रूप में शुरुआत बौंबे दूरदर्शन के लिए एक उद्घोषक और न्यूज रीडर के रूप में हुई. वैसे मुंबई में रेसकोर्स में नीतीश को एक सहायक पशुचिकित्सक की नौकरी मिल गई थी. इस काम में उस का मन नहीं लगा और जल्दी ही उस ने नौकरी छोड़ दी.

बौंबे दूरदर्शन पर न्यूज रीडर की नौकरी करने के साथ ही उस ने मराठी थिएटर में अपने अभिनय करिअर की शुरुआत की. मराठी डेब्यू फिल्म ‘खटियाल सासु नथमल सन’ (1987) थी. उस की पहली हिंदी फिल्म 1988 में ‘त्रिशाग्नि’ आई थी. वह एक मलयालम फिल्म ‘नजन गंधर्वन’ में भी दिखाई दिया.

उन्हीं दिनों 1988 में नीतीश ने बी.आर. चोपड़ा की ‘महाभारत’ से टेलीविजन में शुरुआत की. उस के बाद वह बी.आर. चोपड़ा के ‘विष्णु पुराण’ (2003) और ‘रामायण’ (2003) में भी दिखाई दिया. इस के बाद नीतीश ने कुछ फिल्में भी कीं, लेकिन उन में कोई भी हिट नहीं हुई.

इन विफलताओं के बाद नीतीश ने लंदन का रुख किया. उस का विचार मातापिता से भिन्न था. अपने 4 साल के लंदन प्रवास के दौरान नीतीश ने कई फ्रेंच थिएटर अंगरेजी में किए. वहां पर उस ने रेडियो 4 के लिए भगवत गीता और रामायण पर कई कार्यक्रम किए.

शुरू हुआ महाभारत से संसद तक का सफर

सन 2013 में उस ने मराठी फिल्म ‘पित्रु रौन’ के साथ एक लेखक और निर्देशक के रूप में अपनी शुरुआत की. इस के अतिरिक्त उस ने कुछ लोकप्रिय बौलीवुड फिल्मों में दोबारा पारी शुरू की. जिन में ‘मोहेनजो दारो’ (2016) और ‘केदारनाथ’ (2018) प्रमुख हैं.

नीतीश भारद्वाज को वर्ष 2014 में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए स्क्रीन अवार्ड मिला. 2014 में मराठी फीचर फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक के लिए सह्याद्री फिल्म पुरस्कार मिला. 2014 में ही 2 बार सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार मिला. 2014 में ही 2 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों के लिए महाराष्ट्र राज्य फिल्म पुरस्कार मिला.

1995 में लंदन से भारत लौटने के बाद नीतीश ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया और राजनीति में सक्रिय हो गया. अरविंद त्रिवेदी (रामायण में रावण के पात्र), दीपिका चिखलिया (रामायण में सीता) की तरह ही नीतीश भाजपा के लिए एक पौराणिक ट्रंप कार्ड बन गया था. बी.आर. चोपड़ा की महाभारत में कृष्ण के रूप में सवारी करते हुए नीतीश भारद्वाज ने बिहार के जमशेदपुर से (अब झारखंड में) लोकसभा सीट हासिल की.

हालांकि उस ने बाद में राजगढ़ सीट से भी चुनाव लड़ा, लेकिन हार गया. 1999 के लोकसभा चुनाव में वह मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह से चुनाव हार गया. उस ने मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम (2004-05) के बोर्ड के अध्यक्ष का पद भी संभाला. वर्ष 2002 में उस ने ‘इन क्वेस्ट औफ गौड- कैलाश मानसरोवर की यात्रा’ शीर्षक से एक पुस्तक का सहलेखन भी किया.

नीतीश भारद्वाज का वैवाहिक जीवन अधिक सफल नहीं रहा. उस ने 2 शादियां कीं. पहली शादी 27 दिसंबर, 1991 को मोनिषा पाटिल से हुई थी. वह उस दौर की एक पौपुलर मैगजीन के डायरेक्टर की बेटी है. सन 2005 में उस का किसी वजह से मोनिषा से तलाक हो गया. मोनिषा-नीतीश का एक बेटा और एक बेटी है. दोनों बच्चे लंदन में अपनी मां मोनिषा के साथ रहते हैं.

मध्य प्रदेश कैडर से 1992 बैच की आईएएस अधिकारी स्मिता घाटे से नीतीश भारद्वाज की पहली मुलाकात पुणे में हुई थी. इस के बाद दोनों मध्य प्रदेश में मिले. दोनों के कौमन दोस्त ने नीतीश को स्मिता से शादी की सलाह दी. नीतीश ने स्मिता से 14 मार्च, 2009 को दूसरी शादी कर ली. स्मिता घाटे भारद्वाज से 2 जुड़वां बेटियां पैदा हुईं.

स्मिता घाटे और नीतीश कैसे आए संपर्क में

स्मिता घाटे का जन्म 16 मार्च, 1966 को पुणे में हुआ था. उस ने 1978 से 1980 तक सेंट्रल स्कूल लोहेगांव पुणे में पढ़ाई की, उस के बाद उस ने पुणे के सिंबायोसिस कालेज औफ आट्र्स ऐंड कौमर्स से 12वीं कक्षा की पढ़ाई पूरी की.

बीएससी की पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने 1987 में पुणे के गरवारे कालेज औफ साइंस एवं आट्र्स से समाजशास्त्र में एमए की डिग्री हासिल की.

स्मिता को 1992 में एमपी कैडर के आईएएस अधिकारी के रूप में चुना गया था. उसे 2009 में सिंथेटिक और रेयान टेक्सटाइल्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल के कार्यकारी निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया.

मई 2010 में स्मिता को दोबारा उस के कैडर में नियुक्त किया गया. इस तरह वह 2015 में इंदौर में एमपी फाइनैंशियल कारपोरेशन में प्रबंध निदेशक के रूप में नियुक्त की गई.

वर्तमान में स्मिता घाटे मध्य प्रदेश की सीनियर आईएएस अधिकारी है. हाल ही में वह इंदौर से ट्रांसफर हो कर भोपाल आई है. यहां पर वह पहले मानवाधिकार आयोग में पदस्थ रह चुकी है. इस बार उसे खेल एवं युवा कल्याण विभाग में अपर मुख्य सचिव पद पर रखा गया है. स्मिता घाटे अपनी सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता के लिए जानी जाती है.

स्मिता ने भी अपने जीवन में 2 शादियां की हैं. पहले पति से शादी के कुछ साल बाद ही तलाक हो गया था. उस के बाद उस ने नीतीश भारद्वाज से शादी की थी. तब ऐसा लगा था कि इस जोड़े की शादी खुशहाल और सौहार्दपूर्ण गुजरेगी. लेकिन 2022 में चीजें और हालात तब खराब हो गए, जब उस ने अलग होने और तलाक की घोषणा कर दी थी.

कलयुगी बेटे ने पीट पीट कर की पिता की हत्या

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से 25 किलोमीटर दूर है तहसील मोहनलालगंज, इसी तहसील के कोराना गांव में 70 साल के बाबूलाल रावत अपने इकलौते बेटे रामकिशुन उर्फ कालिया, उस की पत्नी रेखा और बच्चों के साथ रहते थे. बाबूलाल खेतीकिसानी  कर के परिवार का गुजारा करते थे. इस गांव के तमाम लोग नशा करने के आदी हो गए थे.

गांव के लोगों की संगत का असर रामकिशुन पर भी हुआ. वह भी शराब के अलावा दूसरी तरह के नशीले पदार्थों का सेवन करने लगा. लंबे समय तक नशे में रहने का प्रभाव रामकिशुन के शरीर और सोच पर भी पड़ रहा था. वह पहले से अधिक गुस्से में रहने लगा था.

चिड़चिड़े स्वभाव की वजह से वह बातबात पर मारपीट करने लगता. केवल बाहर के लोगों के साथ ही नहीं बल्कि घर में भी वह पत्नी और बच्चों से झगड़ कर मारपीट करता था. उस की नशे की लत से घर के ही नहीं, मोहल्ले के लोग भी परेशान रहते थे.

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रात में जब वह ठेके से शराब पी कर चलता तो गांव में घुसते ही गाली देनी शुरू कर देता था. चीखचीख कर गाली देने से गांव वालों को उस के घर लौटने का पता चल जाता था. घर पहुंचते ही वह घर में मारपीट करने लगता था, कभी पिता से कभी पत्नी से तो कभी बेटे के साथ.

जून, 2019 के पहले सप्ताह की बात है. रामकिशुन नशे में धुत हो कर घर आया. पत्नी रेखा ने उसे समझाना शुरू किया, ‘‘इतनी रात गए शराब पी कर घर आते हो, ऊपर से लड़ाई झगड़ा करते हो, यह कोई अच्छी बात है क्या. जानते हो, तुम्हारी वजह से गांव वाले कितना परेशान होते हैं.’’

रामकिशुन भी लड़खड़ाई आवाज में बोला, ‘‘मैं शराब अपने पैसे से पीता हूं. इस से गांव वालों का क्या लेना देना. किसी के कहने का मेरे ऊपर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. तुम भी कान खोल कर सुन लो, मुझे ज्यादा समझाने की कोशिश मत करो. बस अपना काम करो.’’

रेखा भी मानने वाली नहीं थी. उसे पता था कि वह अभी नशे में है. ऐसी हालत में समझाने का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि सुबह नशा उतरने पर वह सब भूल जाएगा. इस से बेहतर तो यह है कि इस से कल दिन में बात की जाए.

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अगले दिन रेखा ने घर वालों के सामने पति रामकिशुन को समझाना शुरू किया. शुरुआत में तो वह इधर उधर की बातें कर के खुद को बचने की कोशिश करता रहा, इस के बाद भी जब रेखा ने रात के नशे की बात को ले कर बवाल जारी रखा तो रामकिशुन झगड़ा करने लगा. रेखा भी चुप रहने वालों में नहीं थी. उस ने झगड़े के बीच ही अपना फैसला सुना दिया, ‘‘अगर तुम नहीं सुधर सकते तो अपना घर संभालो, मैं अपने मायके चली जाऊंगी.’’

रेखा की धमकी ने 1-2 दिन तो असर दिखाया, इस के बाद रामकिशुन फिर से नशा कर के आने लगा. अब पानी सिर से ऊपर जा रह था, रेखा ने सोचा कि समझौता करने से कोई लाभ नहीं. उसे घर छोड़ कर चले जाना चाहिए. इस के बाद रेखा पति और बेटे को छोड़ कर अपने मायके चली गई.

रामकिशुन नशे का आदी था. पत्नी के घर छोड़ कर जाने का उस के ऊपर कोई असर नहीं पड़ा बल्कि पत्नी के जाने के बाद तो वह और भी अधिक आजाद हो गया. वह देर रात तो वापस आता ही, अब वह दिन में भी नशा करने लगा था.

नशे में वह घर में सभी से मार पिटाई करता था. उस की पत्नी रेखा 15 दिन बीत जाने के बाद भी घर वापस नहीं आई थी. ऐसे में घर की जिम्मेदारी भी रामकिशुन के ऊपर आ गई थी. जिस से वह और भी अधिक चिड़चिड़ा हो गया था. 18 जून, 2019 की शाम 5 बजे रामकिशुन नशे में धुत हो कर घर आया. सुबह वह अपने बेटे रामकरन को घर के कुछ काम करने के लिए कह कर गया था, वह काम पूरे नहीं हुए तो गुस्से में आ कर रामकिशुन ने बेटे रामकरन की पिटाई शुरू कर दी.

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                         रामकिशुन

अपने पोते की पिटाई होते देख रामकिशुन के पिता बाबूलाल गुस्से में आ गए. उन्हें नशा करने की वजह से बेटे पर गुस्सा तो पहले से था. अब यह गुस्सा और भी अधिक बढ़ गया था.

वह बोले, ‘‘पत्नी घर छोड़ कर चली गई, इस के बाद भी तुम्हें समझ नहीं आया कि शराब छोड़ दो. ध्यान रखो, यदि नशा करना बंद नहीं किया तो एकएक कर के सारा परिवार तुम्हें छोड़ देगा. बेटे को पीटते हुए तुम्हें शर्म नहीं आ रही.’’

रामकिशुन ने पिता की बात को दरकिनार कर के बेटे की पिटाई जारी रखी. वह बोला, ‘‘जब मैं इसे समझा कर गया था तो इस ने काम क्यों नहीं किया? इस की मां घर छोड़ कर चली गई है तो बदले में इसे ही काम करना होगा.’’

बाबूलाल अपने पोते को बचाने के लिए आए तो वह बोला, ‘‘देखो, यह मामला हमारे बापबेटे के बीच का है. तुम बीच में मत बोलो.’’ यह कह कर उस ने पिता को झगड़े से दूर रहने को कहा.

बाबूलाल के हाथ में कुल्हाड़ी थी. वह जंगल से लकड़ी काट कर वापस आ रहे थे. पोते की पिटाई का विरोध करते और उसे बचाने के प्रयास में कुल्हाड़ी रामकिशुन को लग गई. इस से उस की आंखों के पास से खून निकलने लगा. रामकिशुन को इस बात की गलतफहमी हो गई कि पिता ने उस पर कुल्हाड़ी से हमला किया है. आंख के पास से खून बहता देख कर वह पिता पर आगबबूला हो गया.

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                              मृतक बाबूलाल

रामकिशुन बेटे को पीटना छोड़ कर पिता बाबूलाल की तरफ बढ़ गया. उस ने पिता के हाथ से कुल्हाड़ी ले कर फेंक दी और डंडे से पिता की पिटाई शुरू कर दी. पिटाई में बाबूलाल का सिर फूट गया पर इस बात का खयाल रामकिशुन को नहीं आया. बेतहाशा पिटाई से बाबूलाल की हालत खराब हो गई. रामकिशुन उन्हें मरणासन्न अवस्था में छोड़ कर भाग निकला.

बाबूलाल की खराब हालत देख कर पोता रामकरन बाबा को इलाज के लिए सिसेंडी कस्बे के एक निजी अस्पताल ले गया, जहां डाक्टरों ने बाबूलाल की खराब हालत और पुलिस केस देख कर जवाब दे दिया. वहां से निराश हो कर रामकरन बाबा को ले कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, मोहनलालगंज ले गया.

वहां डाक्टरों ने बाबूलाल की गंभीर हालत देखते हुए उन्हें लखनऊ के ट्रामा सेंटर रेफर कर दिया. ट्रामा सेंटर के डाक्टरों ने बाबूलाल को एडमिट कर इलाज शुरू कर दिया. बाबा के इलाज में पैसा खर्च होने लगा. रामकरन के पास जो पैसे थे वह जल्दी ही खत्म हो गए.

रामकरन ने पैसों के इंतजाम के लिए प्रयास किए, पर कोई मदद करने वाला नहीं था. लोगों ने समझाया कि पैसे नहीं हैं तो अब बाबूलाल को यहां रखना ठीक नहीं है. अच्छा होगा कि घर पर ही रखा जाए. वहीं इन की सेवा की जाए.

इलाज का कोई रास्ता न देख कर रामकरन ने डाक्टरों से कहा कि उस के पास पैसे खत्म हो चुके हैं ऐसे में हम बाबा को अपने गांव वापस ले जाना चाहते हैं. डाक्टरों से मिन्नतें कर के रामकरन अपने बाबा को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर घर ले आया. उसी दिन देर रात बाबूलाल ने अपने घर पर दम तोड़ दिया.

बाबूलाल की मौत के बाद सुबह को रामकरन ने पूरे मामले की सूचना मोहनलालगंज पुलिस को दे दी तो इंसपेक्टर जी.डी. शुक्ला बाबूलाल के घर पहुंच गए.

जरूरी काररवाई कर के पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. पुलिस ने रामकरन की सूचना पर उस के पिता रामकिशुन के खिलाफ गैरइरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उस की पड़ताल शुरू कर दी. इंसपेक्टर जी.डी. शुक्ला ने एक पुलिस टीम का गठन कर के रामकिशुन की तलाश शुरू कर दी.

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इसी बीच पुलिस को पता चला कि रामकिशुन गांव के बाहर छिपा हुआ है, पुलिस ने पिता बाबूलाल की हत्या के आरोप में रामकिशुन को गांव के बाहर से गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे जेल भेज दिया. अगर रामकिशुन नशे का आदी नहीं होता तो वह पिता की हत्या नहीं करता और न ही उसे जेल जाना पड़ता. नशे की आदत ने पूरे परिवार को तबाह कर दिया.

पति एक खिलौना : नई दुल्हन का दुखदायी खेल

थाणे जिले का एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है कल्याण. उत्तर और दक्षिण को जाने वाली सभी रेलगाडि़यां यहां हो कर आतीजाती  हैं. कल्याण का एक उपनगर है विट्ठलवाड़ी, जिस के परिसर में दुर्गा का मंदिर है. मंदिर के ठीक सामने यशवंत अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 9 में जगदीश सालुंखे अपने बड़े भाई कांचन सांलुखे के परिवार के साथ रहता था.

जगदीश अंबरनाथ की एक फार्मास्युटिकल कंपनी में नौकरी करता था. उस की शादी एक चंचल शोख हसीना और महत्त्वाकांक्षी युवती वृशाली ठाकरे से हुई थी. शादी के बाद जगदीश सालुंखे ने अपने भाई का घर छोड़ दिया और उसी सोसायटी में किराए का एक फ्लैट ले कर पत्नी के साथ रहने लगा.

जगदीश सालुंखे और वृशाली की शादी को अभी 3 महीने भी नहीं हुए थे कि जगदीश की मौत हो गई. 6 मार्च, 2019 को रात के लगभग 11 बजे वृशाली ने वहीं पास में रहने वाले जगदीश सालुंखे के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन किया. वह घबराई हुई लग रही थी.

फोन नई बहू वृशाली ने किया था, फोन सुन कर नंदलाल के होश उड़ गए. वृशाली उन से मदद मांगते हुए कह रही थी कि मामाजी यहां घर में बहुत बड़ी चोरी हुई है. चोरों ने जगदीश को मार दिया है. प्लीज मामाजी, आप जल्दी घर पर आ जाएं.

यह सारी बातें वृशाली ने रोते हुए एक ही सांस में नंदलाल को बता दी थीं. नंदलाल ने वृशाली को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तुरंत उस के घर पहुंच रहे हैं. जगदीश के घर के पास ही उस का बड़ा भांजा यानी जगदीश का बड़ा भाई कांचन सालुंखे रहता था. नंदलाल ने यह जानकारी कांचन को भी दे दी. वह भी अपने मामा के साथ तत्काल घटनास्थल पहुंच गया.

थोड़ी सी देर में यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई. आसपड़ोस के लोगों के साथसाथ जगदीश सालुंखे के जान पहचान वालों और नाते रिश्तेदारों की भीड़ एकत्र हो गई.

उन की नजर घर के अंदर गई तो उन्होंने देखा कि जगदीश सालुंखे बैड पर पड़ा था. घर का सारा सामान इधर उधर बिखरा हुआ था. जगदीश सालुंखे की पत्नी वृशाली पति के शरीर से लिपट कर रो रही थी.

जगदीश सालुंखे के घर पहुंच कर उस के भाई कांचन सालुंखे और मामा नंदलाल सौदाणे ने पड़ोसियों की मदद से वृशाली को जगदीश से अलग किया और एक आटो की मदद से पास ही गुलाबराव पाटिल के दवाखाने ले कर गए, जहां से उन्हें किसी दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा गया.

इस पर वे जगदीश सालुंखे को डा. भुजबल के अस्पताल ले कर गए. लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी. वहां डाक्टरों ने जगदीश सालुंखे की स्थिति देख कर उसे रुक्मिणी बाई अस्पताल रैफर कर दिया. वहां के डाक्टरों ने जगदीश को देखते ही मृत घोषित कर दिया. इस के साथ ही साथ अस्पताल की ओर से इस मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस थाने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी गई.

जिला अस्पताल से सूचना मिलते ही थाना कोलसेवाड़ी में रात्रि ड्यूटी पर मौजूद एसआई एस.एस. तड़वी 2 कांस्टेबलों के साथ जिला अस्पताल पहुंच गए. इस की जानकारी उन्होंने सीनियर पीआई शाहूराजे सालवे को दे दी थी.

अस्पताल पहुंच कर वह अभी मृतक के परिवार से पूछताछ कर ही रहे थे कि उसी समय थाणे के डीसीपी संजय शिंदे, एसीपी पवार, सीनियर पीआई शाहूराजे सालवे, पीआई मधुकर भोंगे, एपीआई सुनीता राजपूत, एसआई नलावड़े, हेडकांस्टेबल हनुमंत शिर्के, अभिनाश काले, प्रकाश मुंडे के साथ अस्पताल पहुंच गए.

मामला चोरी का नहीं था

डाक्टरों से बात करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने सरसरी निगाह से मृतक जगदीश सालुंखे के शव का निरीक्षण किया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के चले जाने के बाद सीनियर पीआई शाहूराजे सावले ने अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर जगदीश सालुंखे का शव पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. इस के बाद वह सीधे घटनास्थल पर गए. घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद वह थाने लौट गए.

थाने लौट कर जब उन्होंने अपने सहायकों  के साथ इस मामले पर गंभीरता से विचार किया तो उन्हें चोरी और जगदीश सालुंखे की हत्या की कडि़यों में कई पेंच नजर आए. मामला वैसा नहीं था जैसा कि बताया जा रहा था. मामले की तह में जाने के लिए जगदीश सालुंखे की पत्नी वृशाली का बयान जरूरी था.

लेकिन उस समय वृशाली बयान देने की स्थिति में नहीं थी. इसलिए सीनियर पीआई शाहूराजे ने पूछताछ करने के लिए वृशाली को दूसरे दिन थाने बुलाया और मामले की तफ्तीश पीआई मधुकर भोंगे और एपीआई सुनीता राजपूत को सौंप दी.

वृशाली ने अपने बयान में बताया कि घर में सागसब्जी नहीं थी. उस ने पति जगदीश सालुंखे को फोन पर इस बात की जानकारी दी. लेकिन वह काम से लौटते समय खाली हाथ आ गए. इस पर वह सीधे बाजार चली गई. बाजार से लौट कर जब वह घर आई तो घर की स्थित देख कर उस के होश उड़ गए. भाग कर जब वह पति जगदीश के पास पहुंची तो वह बेहोश पड़े थे.

यह देख कर वह बुरी तरह डर गई. उस की शादी के सारे जेवर चोर ले गए थे. उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने पति के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन पर सारी जानकारी दे दी.

हालांकि पुलिस ने वृशाली सालुंखे के बयान पर भादंवि की धारा 174 के तहत अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी. लेकिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस का शक वृशाली पर गया. वह सीधेसीधे पुलिस के राडार पर आ गई. जगदीश सालुंखे के परिवार वालों ने उस की मौत को गहरी साजिश बताया था.

परिवार वालों के बयान के अनुसार वृशाली जगदीश के साथ हुई अपनी शादी से खुश नहीं थी. शादी के पहले वह 2 बार जगदीश सालुंखे से शादी करने के लिए मना कर चुकी थी. यह शादी उसे उस के घर वालों के भारी दबाव के कारण करनी पड़ी थी.

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पुलिस टीम ने जब इन सब बातों की सच्चाई जानने के लिए वृशाली से पूछताछ की तो पहले तो उस ने पुलिस को घुमाने की कोशिश की. लेकिन पुलिस के सवालों के चक्रव्यूह में वह कुछ इस तरह फंसी कि उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

23 वर्षीय जगदीश सालुंखे सुंदर स्वस्थ युवक था. वह मूलरूप से जनपद जलगांव के तालुका रावेर का रहने वाला था. उस के पिता गोकुल सालुंखे सीधेसादे व्यक्ति थे. गांव में उन की थोड़ी बहुत काश्तकारी थी. इस के अलावा रावेर में उन की हेयरकटिंग की दुकान भी थी. परिवार में उन की पत्नी के अलावा सिर्फ 2 बेटे थे. बडे बेटे कांचन सालुंखे की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी के साथ कल्याण के उपनगर कोलसेवाड़ी में रहता था.

जबकि छोटा बेटा जगदीश सालुंखे पढ़ाई कर रहा था. गोकुल सालुंखे अपनी काश्तकारी और दुकान से परिवार की गाड़ी पूरी जिम्मेदारी से चला रहे थे. जगदीश को ले कर माता पिता का सपना था कि उन का छोटा बेटा उन के साथ रह कर घर की पूरी जिम्मेदारियां संभाले. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

पढ़ाई पूरी करने के बाद जगदीश का मन गांव में नहीं लगा तो उस ने शहर की राह पकड़ ली. शहर आ कर वह अपने बड़े भाई कांचन सालुंखे और भाभी के साथ रहने लगा. जल्दी ही उसे अंबरनाथ स्थित एक फार्मास्युटिकल कंपनी में नौकरी मिल गई. जगदीश सालुंखे जब नौकरी करने लगा तो परिवार वाले उस की शादी की सोचने लगे.

गोकुल सालुंखे ने जब बेटे की शादी की बात अपने नाते रिश्तेदारों और जानपहचान वालों के बीच चलाई तो जगदीश के लिए मलाड के रहने वाले ठाकरे परिवार की वृशाली ठाकरे का रिश्ता आया.

22 वर्षीय वृशाली ठाकरे अपने परिवार की इकलौती बेटी थी. उस के पिता की मृत्यु हो चुकी थी. घर में एक भाई सतीश ठाकरे और मां थी. घर की पूरी जिम्मेदारी सतीश ठाकरे के कंधों पर थी. इसलिए उस ने अभी तक शादी नहीं की थी. वृशाली जितनी सुंदर थी उतनी ही वह चंचल और हंसमुख भी थी. जगदीश सालुंखे को वह पहली नजर में भा गई.

वृशाली ने घर वालों को यह रिश्ता बहुत पसंद आया. ऊपर से उन का पुराना पारिवारिक रिश्ता भी निकल आया. इसलिए ठाकरे परिवार वृशाली की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहता था. जगदीश सालुंखे और वृशाली के देखा देखी के बाद दोनों परिवार और उन के नाते रिश्तेदारों ने मिल कर वृशाली और जगदीश सालुंखे की सगाई कर दी और साथ ही शादी की तारीख भी तय हो गई.

आज के जमाने में लोग सगाई को आधी शादी मानते हैं. और अपने बच्चों को खुली छूट दे देते हैं. लड़का और लड़की दोनों बातचीत के साथसाथ मिलने जुलने और घूमने फिरने लगते हैं. ऐसा ही कुछ वृशाली और जगदीश सालुंखे के साथ भी हुआ था.

वृशाली और जगदीश सालुंखे भी एकदूसरे से मिलनेजुलने और बातचीत करने लगे थे. उन का यह सिलसिला लगभग 6 महीने तक चलता रहा. जगदीश सालुंखे वृशाली से शादी तय होने से खुश था. दूसरी तरफ आधुनिक विचारों वाली वृशाली 6 महीने में ही जगदीश सालुंखे से बोर हो गई थी.

सीधे सादे नहीं, हीरो या मौडल जैसे पति की दरकार

वृशाली को एक सीधासादा नहीं हीरो, मौडल जैसा स्मार्ट पति चाहिए था, जो उस के इशारों पर चले और उस की सारी इच्छाएं पूरी करे. शादी के 20 दिन पहले वृशाली ने जगदीश सालुंखे को फोन कर मुंबई के दादर रेलवे स्टेशन पर बुलाया और बुझे मन से कहा कि वह उस के साथ शादी जैसे पवित्र बंधन में नहीं बंधना चाहती. क्योंकि दोनों के आचार विचार एकदूसरे से नहीं मिलते. अगर दोनों की शादी हो गई तो वह खुश नहीं रह पाएगी. इस से अच्छा है कि वह शादी से इनकार कर दे.

वृशाली ठाकरे की इस बात से जगदीश सालुंखे के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. वजह यह कि उस के घर वालों ने शादी की पूरी तैयारी कर ली थी. सारे नाते रिश्तेदारों को शादी के कार्ड भी भेज दिए गए थे. जगदीश ने जब यह बात वृशाली को समझाने की कोशिश की. लेकिन उस ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अगर उस की शादी जबरन की गई तो वह जहर खा कर आत्महत्या कर लेगी. तब उस का क्या अंजाम होगा, वह सोच ले. वृशाली की इस धमकी से जगदीश सालुंखे बुरी तरह डर गया. उस ने वृशाली की सारी बातें अपने परिवार वालों को बता दीं.

इस बात की खबर जब वृशाली के घर वालों को लगी तो वे भी सकते में आ गए. उन्होंने वृशाली को आड़े हाथों लिया. अपने परिवार के दबाव में वृशाली ने अपनी गलती मानी और जगदीश से शादी करने के लिए तैयार हो गई. लेकिन जगदीश सालुंखे के परिवार वालों को वृशाली की बातों पर यकीन नहीं था.

वह वृशाली के परिवार वालों की विनती पर शादी के लिए तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि अगर भविष्य में वृशाली ने कोई गलत कदम उठाया तो जिम्मेदारी उन की नहीं होगी, इस के लिए उन्होंने अलग से गारंटी और माफी पत्र लिखवा कर अपने पास रख लिया. इस के बाद वह शादी की तैयारी में जुट गए.

घर परिवार वालों के दबाव में आ कर आखिर वृशाली जगदीश सालुंखे से शादी के लिए तैयार हो गई. लेकिन उस के मन में जगदीश सालुंखे को ले कर असमंजस की स्थिति थी. जगदीश सालुंखे को वह पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रही थी. यही कारण था कि वह अपनी शादी के लिए टालमटोल कर रही थी.

शादी के सप्ताह भर पहले वृशाली ने जगदीश सालुंखे को एक होटल में बुलाया और वही पुरानी बातें दोहराते हुए कहा कि वह इतनी जल्दी शादी नहीं करना चाहती. उसे ब्यूटीशियन का कोर्स करना है. कोर्स कर के पहले अपना कैरियर बनाएगी. फिर शादी विवाह के बारे में सोचेगी. तब तक के लिए वह शादी की तारीखों को आगे बढ़वा दे. जब कैरियर बन जाएगा तो शादी विवाह तो कभी भी कर सकते हैं.

इस बार जगदीश सालुंखे ने वृशाली को समझाने की कोशिश नहीं की. बल्कि उस ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘यह बात तुम अपने परिवार वालों से क्यों नहीं कहती हो. मुझ से यह सब नहीं होगा.’’ इतना कह कर जगदीश सालुंखे गुस्से में वहां से उठ कर चला गया.

जगदीश सालुंखे के इस रवैये से वृशाली जलभुन गई थी. इस समस्या से निपटने के लिए अब उसे ही कुछ करना था. वह सोचने लगी कि ऐसा क्या करे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

घर जाने के बाद वह सारी रात अपनी समस्या को ले कर सोचती रही, करवटें बदलती रही. और सुबह तक उस ने समस्या का जो हल निकला, वह काफी खतरनाक था. दूसरी ओर दोनों परिवार वृशाली और जगदीश सालुंखे की शादी को ले कर उत्साहित थे.

वृशाली का पहला अटैक

वृशाली की शादी हो रही थी. इस बात को ले कर उस की सहेलियों और दोस्तों में खुशी की लहर थी. वह सब वृशाली से शादी की बैचलर पार्टी की मांग कर रहे थे. जिसे वृशाली आजकल कह कर टाल रही थी. वृशाली ने शादी के 2-4 दिन पहले अपने घर में छोटी सी पार्टी रखी और इस से खासतौर पर जगदीश को भी बुलाया था.

वृशाली के बुलाने पर जगदीश पार्टी में आया तो जरूर था पर उस ने पार्टी में एंजौय नहीं किया. घर लौटते समय वृशाली ने बड़े प्यार से जगदीश के लिए खाने का टिफिन तैयार किया और उसे घर पहुंच कर खाने के लिए कह दिया.

लेकिन जगदीश ने टीफिन का खाना नहीं खाया. घर जाने के बाद उस ने टिफिन खोला तो उस में से एक अजीब सी गंध आई, जिस की वजह से जगदीश ने खाना फेंक दिया. उस खाने में वृशाली ने बड़ी चालाकी से जहर डाला था.

अंतत: 29 दिसंबर, 2018 को बड़ी धूमधाम से वृशाली ठाकरे और जगदीश सालुंखे की शादी हो गई. शादी के बाद वे दोनों घूमने के लिए हिल स्टेशन चले गए. इस शादी से जगदीश सालुंखे तो बहुत खुश था और वृशाली के सारे गिले शिकवे भूल गया था. लेकिन वृशाली शादी से खुश नहीं थी.

शादी के नाम पर उस ने सिर्फ एक समझौता किया था. जैसेजैसे समय बीत रहा था वैसे वैसे वृशाली के व्यवहार में परिवर्तन आता जा रहा था. वह बातबात पर जगदीश और उस के परिवार वालों से लड़ाई करने लगी थी. इस से तंग आ कर जगदीश सालुंखे के परिवार वालों ने उसे कहीं अलग रहने की सलाह दी. अंतत: जगदीश उसी परिसर में किराए का एक फ्लैट ले कर वृशाली के साथ रहने लगा.

वृशाली को घरगृहस्थी नहीं चाहिए थी

वृशाली यही चाहती भी थी कि कोई उसे रोकने टोकने वाला न हो. नए घर में आने के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो गई. वह सारा सारा दिन मोबाइल फोन से चिपकी रहती थी. जगदीश जब इस पर ऐतराज करता, तो वह उस से उलझ जाती थी. बात आगे न बढ़े इस के लिए जगदीश सालुंखे खुद ही चुप हो जाता था.

लोग शादी के बाद अपने दांपत्य जीवन की गाड़ी हंसीखुशी के साथ चलाते हैं. लेकिन जिस दांपत्य जीवन की नींव रेत पर खड़ी हो वह भला कितने दिनों तक चल सकता है. और यही जगदीश सालुंखे के साथ भी हुआ. उस की शादी को अभी 3 महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि अपनी आजादी के लिए वृशाली सालुंखे ने जो रास्ता चुना, वह सीधा जेल में जा कर खुलता था.

घटना के दिन वृशाली काफी खुश थी. उस ने काम से लौट कर आए जगदीश सालुंखे से प्यार भरी बातें कीं और अपनी योजना के अनुसार उस के खाने में चूहे मारने की दवा मिला दी.

खाना खाने के बाद जगदीश जब सोने के लिए अपने बैड पर गया तो उस का मन व्याकुल होने लगा. इस के पहले कि वह उठ कर बाथरूम में जाता, वृशाली ने उस के गले में नायलोन की रस्सी डाल कर पूरी ताकत से उस का गला घोंट दिया. वृशाली को जब इस बात का पूरा यकीन हो गया कि पति मर गया है. तब उस ने ड्रामा करते हुए जगदीश के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन कर दिया.

वृशाली ने परिवार वालों और पुलिस को गुमराह करने की काफी कोशिश की. लेकिन वह सफल नहीं हो पाई. शादी से आजादी पाने के चक्कर में वह एक ऐसी खाई में जा गिरी, जहां से उस का निकलना संभव नहीं था.

पीआई मधुकर भोंगे और उन की टीम ने वृशाली सालुंखे से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उसे भादंवि की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया गया.

कथा लिखे जाने तक वृशाली सालुंखे जेल में थी. पीआई मधुकर भोंगे और उन की टीम इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मामला सिर्फ पति के न पसंद होने का था या फिर हकीकत कुछ और थी.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

खुद का पाला सांप : मौसी के प्यार में भाई की हत्या

थाना गोला का मंदिर के थानाप्रभारी प्रवीण शर्मा क्षेत्र में गश्त कर के अभीअभी लौटे थे. तभी उन के थाना क्षेत्र की गोवर्धन कालोनी में रहने वाली 29-30 वर्षीय रश्मि नाम की महिला कन्हैया, तेजकरण व कुछ अन्य लोगों के साथ थाने पहुंची.

प्रवीण शर्मा ने रश्मि से आने का कारण पूछा. इस पर उस ने बताया कि वह अपने 14-15 साल के 2 बेटों के साथ गोवर्धन कालोनी में रहती है. सुबह उस का बेटा सत्यम रोज की तरह आदर्श नगर में कोचिंग के लिए गया था, पर वह वापस नहीं लौटा. रश्मि के साथ 25-26 साल का एक युवक विवेक उर्फ राहुल राजावत भी था. रश्मि ने उसे अपनी बहन का बेटा बताया.

थानाप्रभारी प्रवीण शर्मा पूछताछ कर ही रहे थे कि राहुल ने उन्हें बताया कि करीब 2-ढाई महीने पहले सत्यम का इलाके के कुछ लड़कों से झगड़ा हुआ था. उन लड़कों ने सत्यम को बंधक बना कर मारपीट भी की थी. उसे शक है कि सत्यम के गायब होने के पीछे उन्हीं लड़कों का हाथ है.

मामला गंभीर था, इसलिए प्रवीण शर्मा ने सत्यम की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर के इस घटना की जानकारी पुलिस अधीक्षक ग्वालियर नवनीत भसीन व सीएसपी मुनीष राजौरिया को दे दी. इस के साथ ही उन्होंने अपनी टीम को सत्यम की खोज में लगा दिया.

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पूरी रात गुजर गई, लेकिन न तो पुलिस को सत्यम के बारे में कुछ खबर मिली और न ही सत्यम घर लौटा. अगले दिन सुबहसुबह राहुल रश्मि को ले कर थाने पहुंच गया. उस ने थानाप्रभारी प्रवीण शर्मा से उन 3 लड़कों के खिलाफ काररवाई करने को कहा, जिन के साथ सत्यम का झगड़ा हुआ था.

बच्चों के झगड़े होते रहते हैं, जो खुद ही सुलझ भी जाते हैं. टीआई शर्मा को बच्चों के झगड़े को इतना तूल देने की बात गले नहीं उतर रही थी. सत्यम को लापता हुए 24 घंटे हो चुके थे लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल पा रहा था.

इस घटना की जानकारी ग्वालियर रेंज के डीआईजी मनोहर वर्मा को मिली तो उन्होंने अपराधियों के खिलाफ तत्काल सख्त काररवाई का निर्देश दिया. थानाप्रभारी प्रवीण शर्मा ने विवेक उर्फ राहुल के शक के आधार पर उन तीनों लड़कों को थाने बुला लिया, जिन के साथ सत्यम का झगड़ा हुआ था.

प्रवीण शर्मा ने तीनों लड़कों से पूछताछ की. उन से पूछताछ कर के टीआई शर्मा समझ गए कि सत्यम के गायब होने में उन तीनों की कोई भूमिका नहीं है. इसलिए पूछताछ के बाद उन तीनों को छोड़ दिया गया.

इस बात पर राहुल उखड़ गया और पुलिस पर मिलीभगत का आरोप लगाने लगा. इतना ही नहीं, उस ने शहर के एकदो राजनीति से जुड़े रसूखदार लोगों से भी टीआई प्रवीण शर्मा को फोन करवा कर दबाव बनाने की कोशिश की. उस का कहना था कि पुलिस उन 3 लड़कों के खिलाफ सत्यम के अपहरण का केस दर्ज नहीं कर रही है.

लापता हो जाने के बाद से ही राहुल राजावत अपनी रिश्ते की मौसी के साथ सत्यम की खोज में लगा था. लेकिन इस दौरान थानाप्रभारी ने यह बात नोट कर ली थी कि राहुल की रुचि सत्यम से अधिक उन 3 लड़कों को आरोपी बनवाने में है, जिन के साथ सत्यम का झगड़ा हुआ था.

यह बात खुद राहुल को संदेह के दायरे में ला रही थी. इसी के मद्देनजर टीआई प्रवीण शर्मा ने अपने कुछ लोगों को राहुल की हरकतों पर नजर रखने के लिए तैनात कर दिया.

इतना ही नहीं, वह इस बात की जानकारी जुटा चुके थे कि जिस रोज सत्यम गायब हुआ था, उस रोज राहुल खुद ही उसे अपनी कार से कोचिंग सेंटर छोड़ने आदित्यपुरम गया था. इस बारे में उस का कहना था कि उस ने सत्यम को कोचिंग सैंटर के पास पैट्रोल पंप पर छोड़ दिया था.

इस पर पुलिस ने राहुल को बिना कुछ बताए कोचिंग सेंटर के आसपास लगे सीसीटीवी के फुटेज खंगाले, जिन में न तो राहुल वहां दिखाई दिया और न ही उस की कार दिखी.

सब से बड़ी बात यह थी कि उस रोज सत्यम कोचिंग सेंटर पहुंचा ही नहीं था. इस से राहुल पुलिस के राडार पर आ गया. टीआई शर्मा ने इस बात पर भी गौर किया कि राहुल सत्यम के बारे में पूछताछ करने उस की मां के साथ तो थाने आता था, लेकिन सत्यम के पिता के साथ वह कभी नहीं आया.

इसलिए पुलिस ने राहुल की घटना वाले दिन की गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाई, जिस से यह बात सामने आई कि उस रोज राहुल के साथ जौरा में रहने वाली उस की बुआ का बेटा सुमित सिंह भी देखा गया था. लेकिन राहुल को घेरने के लिए पुलिस को अभी और मजबूत आधार की जरूरत थी.

यह आधार पुलिस को घटना से 4 दिन बाद 10 जनवरी को मिला. हुआ यह कि उस दिन सुबह सुबह जौरा थाने के बुरावली गांव के पास से हो कर गुजरने वाली नहर में एक किशोर का शव तैरता मिला. चूंकि सत्यम की गुमशुदगी की सूचना आसपास के सभी थानों को दे दी गई थी, इसलिए पुलिस ने शव के मिलने की खबर गोला का मंदिर थानाप्रभारी प्रवीण शर्मा को दे दी.

नहर में मिलने वाले किशोर के शव का हुलिया सत्यम से मिलताजुलता था, इसलिए पुलिस सत्यम के परिजनों को ले कर मौके पर जा पहुंची. घर वालों ने शव की पहचान सत्यम के रूप में कर दी.

शव जौरा के पास के गांव बुरावली के निकट नहर में तैरता मिला था. जिस दिन सत्यम गायब हुआ था, उस दिन इस मामले का संदिग्ध राहुल जौरा में रहने वाली अपनी बुआ के बेटे के साथ देखा गया था. राहुल द्वारा सत्यम को कोचिंग सेंटर के पास छोड़े जाने की बात पहले ही गलत साबित हो चुकी थी, इसलिए पुलिस ने बिना देर किए राहुल उर्फ विवेक राजावत और उस की बुआ के बेटे सुमित को हिरासत में ले लिया.

नतीजतन अब तक पुलिस के सामने शेर बन रहा राहुल हिरासत में लिए जाते ही भीगी बिल्ली बन गया. इस के बावजूद उस ने अपना अपराध छिपाने की काफी कोशिश की, लेकिन पुलिस की थोड़ी सी सख्ती से वह टूट गया.

उस ने सुमित के साथ मिल कर राहुल को नहर में डुबा कर मारने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने राहुल की वह कार भी जब्त कर ली, जिस में सत्यम को बैठा कर वह सबलगढ़ ले गया था. इस के बाद रिश्तों में आग लगा देने वाली यह कहानी इस प्रकार सामने आई—

सत्यम के पिता मूलरूप से विजयपुर मेवारा के रहने वाले हैं. वह इंदौर के एक होटल में नौकरी करते हैं, जबकि बच्चों की पढ़ाई के लिए मां रश्मि दोनों बेटों के साथ ग्वालियर में रहती थी. रश्मि का परिवार पहले आदित्यपुरम में रहता था.

लेकिन कुछ महीने पहले रश्मि ने आदित्यपुरम का मकान छोड़ कर गोला का मंदिर थाना इलाके की गोवर्धन कालोनी में किराए का दूसरा मकान ले लिया था. ग्वालियर के पास ही रश्मि के एक दूर के रिश्ते की बहन भी रहती थी.

विवेक उर्फ राहुल राजावत उसी का बेटा था. चूंकि रश्मि रिश्ते में राहुल की मौसी लगती थी, इसलिए उस का रश्मि के घर काफी आनाजाना हो गया था. वह जब भी ग्वालियर आता, रश्मि से मिलने उस के घर जरूर जाता था.

35 साल की रश्मि 2 बच्चों की मां होने के बाद भी जवान युवती की तरह दिखती थी. अनजान आदमी उसे देख कर उस की उम्र 25-27 साल समझने का धोखा खा जाता था. धीरेधीरे राहुल की रश्मि से काफी पटने लगी थी. पहले दोनों के बीच रिश्ते का लिहाज था, लेकिन वक्त के साथ उन के बीच दुनिया जहान की बातें होने लगीं. इस से दोनों के रिश्ते में दोस्ती की झलक दिखाई देने लगी.

इसी बीच राहुल पढ़ाई करने गांव से ग्वालियर आया तो रश्मि ने अपने पति से कह कर राहुल को अपने ही घर में रख लिया. चूंकि रश्मि के पति इंदौर में नौकरी करते थे सो उन्हें भी लगा कि राहुल के साथ रहने से रश्मि और बच्चों को सुविधा हो जाएगी. इसलिए उन्होंने भी राहुल को साथ रखने की अनुमति दे दी, जिस से राहुल ग्वालियर में रश्मि के साथ रहने लगा.

इस से दोनों के बीच पहले ही कायम हो चुके दोस्ताना रिश्ते में और भी खुलापन आने लगा. दूसरी तरफ काम की मजबूरी के चलते रश्मि के पति 4-6 महीने में हफ्ते 10 दिन के लिए ही घर आ पाते थे. इस में भी पिता के आने पर बच्चे उन से चिपके रहते, इसलिए वह चाह कर भी रश्मि को अकेले में अधिक समय नहीं दे पाते थे.

फलस्वरूप पति के आने पर भी रश्मि की शारीरिक जरूरतें अधूरी रह जाती थीं. ऐसे में एक बार रश्मि के पति ग्वालियर आए तो लेकिन मामला कुछ ऐसा उलझा कि वह एक बार भी उसे एकांत में समय नहीं दे सके. इस से रश्मि का गुस्सा सातवें आसमान को छूने लगा.

राहुल यह बात समझ रहा था, इसलिए उस ने रश्मि को गुस्से में देखा तो मजाक में कह दिया, ‘‘क्या बात है मौसी, मौसाजी चले गए इसलिए गुस्से में हो?’’

‘‘राहुल, तुम कभी अपनी पत्नी से दूर मत जाना.’’

राहुल की बात का जवाब देने के बजाए रश्मि ने अलग ही बात कही. सुन कर राहुल चौंक गया. उस ने सहज भाव से पूछ लिया, ‘‘क्यों, ऐसा क्या हो गया जो आज आप इतने गुस्से में हो?’’

राहुल की बात सुन कर रश्मि को अपनी गलती का अहसास हुआ तो उस ने बात बदल दी. लेकिन राहुल समझ गया था कि असली बात क्या है. बस यहीं से उस के मन में यह बात आ गई कि अगर कोशिश की जाए तो मौसी की नजदीकी हासिल हो सकती है.

इसलिए उस ने धीरेधीरे रश्मि की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया. कभी वह रश्मि की तारीफ करता तो कभी उस की सुंदरता की. धीरेधीरे रश्मि को भी राहुल की बातों में रस आने लगा और वह उस की तरफ झुकने लगी. इस का फायदा उठा कर एक दिन राहुल ने डरते डरते रश्मि को गलत इरादे से छू लिया.

रश्मि शादीशुदा थी, राहुल के स्पर्श के तरीके से सब समझ गई. उस ने तुरंत तुरुप का पत्ता खेलते हुए कहा, ‘‘यूं डर कर छूने से आग और भड़कती है राहुल. इसलिए या तो पूरी हिम्मत दिखाओ या मुझ से दूर रहो.’’

राहुल के लिए इतना इशारा काफी था. उस ने आगे बढ़ कर रश्मि को अपनी बांहों में जकड़ लिया, जिस के बाद रश्मि उसे मोहब्बत की आखिरी सीमा तक ले गई. बस इस के बाद दोनों में रोज पाप का खेल खेला जाने लगा. दोनों के बीच रिश्ता ऐसा था कि कोई शक भी नहीं कर सकता था.

वैसे भी राहुल घर में ही रहता था, इसलिए दोनों बेटों के स्कूल जाते ही राहुल और रश्मि दरवाजा बंद कर पाप की दुनिया में डूब जाते थे. रश्मि अनुभवी थी, जबकि राहुल अभी कुंवारा था. रश्मि को जहां अपना अनाड़ी प्रेमी मन भा गया था, वहीं राहुल अनुभवी मौसी पर जान छिड़कने लगा था.

समय के साथ दोनों के बीच नजदीकी कुछ ऐसी बढ़ी कि रात में दोनों बच्चों के सो जाने के बाद रश्मि अपने बिस्तर से उठ कर राहुल के बिस्तर में जा कर सोने लगी. अब जब कभी रश्मि का पति इंदौर से ग्वालियर आता तो रश्मि और राहुल दोनों ही उस के वापस जाने का इंतजार करने लगते.

राहुल लंबे समय से रश्मि के घर में रह रहा था. मोहल्ले में कभी उस के खिलाफ बातें नहीं हुई थीं. लेकिन जब बच्चों के स्कूल जाने के बाद रश्मि और राहुल दरवाजा बंद कर घंटों अंदर रहने लगे तो पासपड़ोस के लोगों ने पहले तो उन के रिश्ते का लिहाज किया, लेकिन बाद में उन के बीच पक रही खिचड़ी चर्चा में आ गई.

बाद में यह बात इंदौर में बैठे सत्यम के पिता तक भी पहुंच गई. इसलिए कुछ महीने पहले उन्होंने ग्वालियर आ कर न केवल आदित्यपुरम इलाके का मकान खाली कर दिया, बल्कि राहुल को भी अलग मकान ले कर रहने को बोल दिया.

इतना ही नहीं, उन्होंने राहुल को आगे से घर में कदम रखने से भी मना कर दिया. इंदौर वापस जाने से पहले उन्होंने अपने बड़े बेटे सत्यम को हिदायत दी कि अगर राहुल घर आए तो वह इस की जानकारी उन्हें दे दे.

अब राहुल और रश्मि का मिल पाना मुश्किल हो गया. क्योंकि एक तो रश्मि आदित्यपुरम छोड़ कर गोवर्धन कालोनी में रहने आ गई थी. दूसरे चौकीदार के रूप में सत्यम का डर था कि वह राहुल के घर आने की खबर पिता को दे देगा. लेकिन दोनों एकदूसरे से दूर भी नहीं रह सकते थे, इसलिए एक दिन मौका देख कर राहुल रश्मि से मिलने उस के घर जा पहुंचा.

राहुल को देखते ही रश्मि पागलों की तरह उस के गले लग गई. उसे ले कर वह सीधे बिस्तर पर लुढ़क गई. राहुल भी सब कुछ भूल कर रश्मि के साथ वासना में डूब गया. लेकिन इस से पहले कि दोनों अपनी मंजिल पर पहुंचते, अचानक घर लौटे सत्यम ने मां और मौसेरे भाई का पाप अपनी आंखों से देख लिया. सत्यम को आया देख कर राहुल और रश्मि दोनों घबरा गए.

फंसने से बचने के लिए राहुल सत्यम को चाट खिलाने ले गया, जहां बातोंबातों में उस ने सत्यम से कहा, ‘‘यार मेरे घर आने की बात पापा को मत बताना.’’

‘‘ठीक है, नहीं बताऊंगा. लेकिन इस से मुझे क्या फायदा होगा?’’ सत्यम ने शातिर अंदाज से कहा तो राहुल बोला, ‘‘जो तू कहेगा, कर दूंगा. बस तू पापा को मत बोलना.’’

राहुल को लगा कि सत्यम राजी हो जाएगा. लेकिन सत्यम तेज था, वह बोला, ‘‘ठीक है, मुझे 2 हजार रुपए दो, दोस्तों को पार्टी देनी है.’’

राहुल के पास पैसों की कमी नहीं थी. उस ने सत्यम को 2 हजार रुपए दे कर उसे बाजार घूमने के लिए भेज दिया और खुद वापस रश्मि के पास लौट आया.

सत्यम बिक गया, यह जान कर रश्मि भी खुश हुई. इस से दोनों के बीच पाप की कहानी फिर शुरू हो गई. आदित्यपुरम में रश्मि और राहुल के रिश्ते की भले ही चर्चा हुई हो, लेकिन नए मोहल्ले में पहले जैसी परेशानी नहीं थी और सत्यम भी चुप रहने के लिए राजी हो गया था.

इस बात का फायदा उठा कर जहां राहुल और रश्मि अपने पाप की दुनिया में जी रहे थे, वहीं सत्यम भी इस का पूरा फायदा उठा रहा था. वह राहुल से चुप रहने के लिए पैसे लेने लगा. लेकिन धीरेधीरे सत्यम की मांगें बढ़ने लगीं.

कुछ दिन पहले उस ने राहुल को ब्लैकमेल करते हुए उस से 20 हजार रुपए का मोबाइल खरीदवा लिया. राहुल रश्मि के नजदीक रहने के लिए सत्यम की हर मांग पूरी करता रहा. कुछ दिन पहले अचानक सत्यम ने उस से नई मोटरसाइकिल खरीद कर देने को कहा.

राहुल के पास इतना पैसा नहीं था. और था भी तो वह एक लाख रुपए रिश्वत में खर्च नहीं करना चाहता था. लेकिन सत्यम अड़ गया. उस ने कहा कि अगर वह मोटरसाइकिल नहीं दिलाएगा तो वह पापा से उस के घर आने की बात कह देगा.

इस से राहुल परेशान हो गया. इसी दौरान करीब 2-3 महीने पहले सत्यम का 3 लड़कों से झगड़ा हो गया, जिस में उन्होंने सत्यम के साथ काफी मारपीट की. यह झगड़ा भी राहुल ने ही शांत करवाया था. लेकिन इस सब से उस के दिमाग में आइडिया आ गया कि इस झगड़े की ओट में सत्यम को हमेशा के लिए अपने और रश्मि के बीच से हटाया जा सकता है.

इस के लिए उस ने अपनी बुआ के बेटे सुमित से बात की तो वह इस शर्त पर साथ देने को राजी हो गया कि काम हो जाने के बाद वह उसे रश्मि के संग एकांत में मिलने का मौका ही नहीं देगा, बल्कि रश्मि को इस के लिए राजी भी करेगा.

राहुल ने उस की शर्त मान ली तो सुमित ने उसे किसी दिन सत्यम को जौरा लाने को कहा. घटना वाले दिन राहुल रश्मि से मिलने उस के घर पहुंचा तो सत्यम वहां मौजूद था.

राहुल को इस से कोई दिक्कत नहीं थी. क्योंकि राहुल जब भी रश्मि से मिलने आता था, तब सत्यम किसी न किसी बहाने से कुछ देर के लिए वहां से हट जाता था. लेकिन उस रोज वह वहीं पर अड़ कर बैठ गया.

राहुल ने उस से बाहर जाने को कहा तो सत्यम बोला, ‘‘पहले मोटरसाइकिल दिलाओ.’’

इस पर राहुल ने उसे समझाया कि तुम बाहर चलो, मैं आधे घंटे में आता हूं. फिर तुम्हारी बाइक का इंतजाम कर दूंगा. इस पर सत्यम राहुल को अपनी मां से अकेले में मिलने का मौका देने की खातिर घर से बाहर चला गया. रश्मि के साथ कुछ समय बिताने के बाद राहुल बाहर जा कर सत्यम से मिला. उस ने सत्यम से जौरा चलने को कहा.

राहुल ने उसे बताया कि जौरा में उसे एक आदमी से उधारी का काफी पैसा लेना है. वहां से पैसा मिल जाएगा तो वह उसे बाइक दिलवा देगा.

बाइक के लालच में सत्यम राहुल के साथ जौरा चला गया, जहां बुआ के घर जा कर राहुल ने सुमित को साथ लिया और तीनों वहां से आ कर सबलगढ़ के बदेहरा गांव की पुलिया पर खड़े हो गए. राहुल ने सत्यम को बताया कि जिस से पैसा लेना है, वह यहीं आने वाला है. इस दौरान सत्यम ने मुरैना ब्रांच कैनाल में झांक कर देखा तो राहुल और सुमित ने उसे पानी में धक्का दे दिया.

सत्यम को तैरना नहीं आता था, फलस्वरूप वह गहरे पानी में डूब गया. इस के बाद सुमित और राहुल ग्वालियर आ गए. इधर सत्यम के कोचिंग से वापस न आने पर रश्मि परेशान हो गई. उस ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा दी तो राहुल सत्यम के अपहरण में उन युवकों को फंसाने की कोशिश करने लगा, जिन के साथ सत्यम का झगड़ा हुआ था.

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उस का मानना था कि तीनों के खिलाफ अपहरण का मामला दर्ज हो जाएगा तो लाश मिलने पर उन्हें हत्यारा बनाना पुलिस की मजबूरी बन जाएगी, जिस से वह साफ बच जाएगा. लेकिन ग्वालियर पुलिस ने लाश बरामद होते ही राहुल की कहानी खत्म कर दी.

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

पत्नी के शौक ने ली पति की जान

रामप्रवेश अपने बेटे महेश्वर की ससुराल पहुंचा, उस समय महेश्वर के शरीर में कोई हरकत नहीं थी. ससुराल वाले उस के शव को ठिकाने लगाने की नीयत से ले जाने की तैयारी में जुटे हुए थे, लेकिन इसी दौरान मृतक के पिता रामप्रवेश और अन्य के पहुंच जाने से वे लोग सकपका गए.

बेटे की ससुराल वालों ने रामप्रवेश को गुमराह करने की भरसक कोशिश की, लेकिन बेटे की मौत पर गमजदा महेश्वर के पिता ने हठ पकड़ ली कि जब तक पुलिस नहीं आ जाती, तब तक लाश किसी भी सूरत में नहीं उठने दूंगा.

बिहार के बेगूसराय जिले का एक थाना है खोदाबंदपुर. इसी थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले फफौत गांव में पति द्वारा अपनी पत्नी को इंस्टाग्राम पर उत्तेजक गानों पर वीडियो बनाने से क्या टोका, वह तो इस कदर तिलमिला गई कि उस ने अपने आशिक और बहनों के साथ मिल कर पति को ही मौत के घाट उतार दिया. यह घटना 7 जनवरी, 2024 की है.

दरअसल, बिहार के जिला समस्तीपुर स्थित नरहन गांव के रहने वाले महेश्वर राय की एक दिन समस्तीपुर के एक कैफे में रानी से मुलाकात हुई थी. वह बेगूसराय के गांव फफौत की रहने वाली थी.

रानी बेहद खूबसूरत तो थी ही, साथ में बातूनी भी कुछ ज्यादा ही थी. इसलिए पहली ही मुलाकात में वह बिना किसी हिचकिचाहट के हंसहंस कर बातें कर रही थी. इस से महेश्वर काफी प्रभावित हुआ.

कैफे में नाश्ता करने के दौरान उस ने रानी का मोबाइल नंबर ले लिया. रानी से पहली मुलाकात में ही महेश्वर उस का दीवाना हो गया. उस का मोबाइल नंबर तो उस के पास था ही, इसलिए जब उस का मन करता, उस से फोन पर बातें कर लेता था.

रानी को भी महेश्वर से बातचीत करना अच्छा लगता था, धीरेधीरे उन दोनों में दोस्ती हो गई. यही दोस्ती कुछ समय बाद प्यार में बदल गई, दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे, इसलिए उन्होंने लव- मैरिज कर ली. यह सन 2018 की बात है.

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         आरोपी पत्नी रानी

रानी से लवमैरिज करने के बाद महेश्वर अपने घर वालों के साथ नरहन गांव में रहने लगा और गांव में ही छोटा मोटा काम करके जैसेतैसे अपनी गृहस्थी चलाने लगा. इसी दौरान वह एक बच्चे का बाप बन गया. बच्चे के पैदा होने के बाद खर्चा बढ़ गया तो अच्छी आमदनी के लिए पत्नी को अपने मातापिता के पास छोड़ कोलकाता चला गया.

पति के कोलकाता जाने के बाद रानी का अपनी ससुराल में कतई मन नहीं लगता था, इसलिए उस ने शर्म और हिचकिचाहट का परदा हटा कर इंस्टाग्राम पर मादक अदाओं वाले वीडियो बना कर पोस्ट करने शुरू कर दिए. देखते ही देखते थोड़े समय में ही उस के फालोअर्स की तादाद बढऩे लगी.

इंस्टाग्राम का वीडियो ले गया जुर्म तक

इतना ही नहीं, फालोअर्स की संख्या बढऩे की होड़ में मादक अदाओं वाले गरमागरम वीडियो बनाने के लिए रानी ने घर से बाहर अंजान युवकों के साथ ज्यादा समय बिताना शुरू कर दिया. लेकिन इंस्टाग्राम पर वीडियो बनाने का चस्का एक दिन उसे रियल लाइफ में जुर्म के दलदल में धकेल देगा, ये किसी ने भी नहीं सोचा था.

इंस्टाग्राम पर वीडियो डालने का चस्का इस कदर हावी हुआ कि जब रानी के पति महेश्वर ने रानी को इंस्टाग्राम पर वीडियो बना कर डालने से मना किया तो रानी अपने बेटे को साथ ले कर बेगूसराय जिले के गांव फफौत में स्थित अपने मायके में आ कर रहने लगी, लेकिन पति के मना करने के बावजूद रानी ने अपनी मादक अदाओं वाले वीडियो इंस्टाग्राम पर बनाने और डालने का सिलसिला जारी रखा. यह जान कर महेश्वर को गुस्सा आ गया.

7 जनवरी, 2024 को कोलकाता से महेश्वर अपने गांव नरहन आया और कुछ समय अपने मातापिता के पास गुजारने के बाद उन से अनुमति ले कर वह अपनी पत्नी और बेटे से मिलने के बहाने अपनी ससुराल फफौत के लिए निकल पड़ा. शाम के वक्त वह फफौत पहुंच गया.

महेश्वर पत्नी द्वारा अपना कहा न मानने से गुस्से में तो था ही, उस ने अपनी ससुराल पहुंच कर रानी को जम कर खरीखोटी सुनाई और कहा कि अभी भी वक्त है, संभल जा और ये बेशर्मी के वीडियो इंस्टाग्राम पर डालना और अंजान युवकों के साथ घूमनाफिरना बंद कर दे. तेरा ये कृत्य अब मुझे कतई पसंद नहीं है.

महेश्वर के मुंह से यह सुनते ही रानी बिफर पड़ी. रानी को बिफरता देख महेश्वर को और अधिक गुस्सा आ गया. उस ने उसी समय रानी के गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

अपनी बहनों के सामने पति द्वारा थप्पड़ जड़े जाने से तिलमिलाई रानी भी अपना आपा खो बैठी और पति से भिड़ गई. इसी दौरान अचानक रानी का आशिक शहजाद भी वहां आ गया. रानी ने बिना देरी किए अपनी बहन रोजी के गले में पड़ी चुन्नी ले कर पति के गले में डाल दी. इस के बाद प्रेमी शहजाद और दोनों बहनों रोजी व सुनीता के सहयोग से पति का गला चुन्नी से कस दिया.

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सिर चढ़ कर कैसे बोला जुर्म

थोड़ी ही देर में उस की मौत हो गई. तभी इत्तफाक से महेश्वर के भाई रुदल का फोन महेश्वर के मोबाइल पर बारबार आना शुरू हो गया. जब यह सिलसिला नहीं थमा तो महेश्वर की नाबालिग साली रोजी ने मोबाइल काल रिसीव कर ली.

महेश्वर के बड़े भाई ने कहा, ”मैं इतनी देर से तुझे फोन कर रहा हूं, रिसीव क्यों नहीं कर रहा तू? अब मेरी बात का जवाब क्यों नहीं देता?’’

रोजी कुछ नहीं बोली. इसी दौरान महेश्वर के मोबाइल पर शोरगुल सुन कर उस के भाई को संदेह हुआ. उस ने तुरंत अपने पिता रामप्रवेश राय को सारा घटनाक्रम बताते हुए कहा, ”मुझे लगता है, महेश्वर के साथ ससुराल में कोई अनहोनी घट गई है. आप बिना देरी किए गांव के कुछ दबंग लोगों को ले कर महेश्वर की ससुराल फफौत पहुंच कर पता करो आखिर माजरा क्या है.’’

बेटे के कहने पर गांव के 5-7 लोगों को ले कर रामप्रवेश बेटे की ससुराल पहुंच गया. वहां बेटे की लाश देखते ही रामप्रवेश को शक हो गया कि उस के बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है.

इसी बीच रामप्रवेश के साथ आए लोगों में से किसी ने खोदाबंदपुर थाने को फोन कर इस घटनाक्रम की जानकारी दे दी. कुछ ही देर में एसएचओ मिथलेश कुमार मौके पर पहुंच गए.

घटनास्थल की स्थिति और मृतक के पिता रामप्रवेश राय के बयान के आधार पर महेश्वर की पत्नी रानी, उस की दोनों बहनों समेत रानी के आशिक शहजाद को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.

घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर एसएचओ ने महेश्वर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उधर जब रानी को थाने ला कर पूछताछ की तो उस ने बताया कि मेरे पति को किसी ने नहीं मारा बल्कि उन्होंने मेरी बहन की चुन्नी से फांसी लगा कर खुदकुशी की है.

यह कह कर उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया, लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि महेश्वर की हत्या उसी ने अपने आशिक शहजाद और बहनों के साथ मिल कर की है.

रानी ने पुलिस को हत्या की ऐसी वजह बताई, जिसे सुन कर पुलिस वाले भी हैरान रह गए. उस ने बताया, ”मुझे इंस्टाग्राम पर वीडियो डालने का शौक है, लेकिन मेरे पति को यह कतई पसंद नहीं था. इस से आए दिन हम दोनों में झगड़ा होने लगा तो मैं बेटे को ले कर मायके में आ गई. मेरा मायके में रहना ससुराल वालों को रास नहीं आया. उसी बीच मैं शहजाद नाम के युवक के संपर्क में आ गई और मैं ने महेश्वर से किनारा कर लिया.

”इस के बावजूद भी शहजाद से मेरी निकटता उसे खटकती थी, अत: महेश्वर से पीछा छुड़ाने के लिए मैं ने शहजाद की मदद से चुन्नी से गला कस कर पति को मार डाला.’’

रानी और शहजाद को उम्मीद थी कि महेश्वर की हत्या पहेली बन कर रह जाएगी और वे दोनों हत्या के जुर्म में कभी नहीं पकड़े जाएंगे.

विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने रानी और उस की बहनों रोजी और सुनीता तथा आशिक शहजाद को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

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