Ambala Triple Murder: पोते ने ली दादी, चाचा और बड़े भाई की जान

Ambala Triple Murder: परिवार में अकसर पैसों को ले कर भाईबहनों के बीच झगड़े हो जाया करते हैं, लेकिन कभीकभी यही पैसा लोगों को मौत के मुंह तक पहुंचा देता है. ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां एक पोते ने परिवार के 3 लोगों की जान ले ली. चलिए जानते हैं इस घटना का पूरा सच, जो आप को ऐसी घटनाओं से सचेत और सावधान करेगा.

आपको बता दें कि यह घटना हरियाणा के अंबाला से सामने आई है, जहां पोते अभिषेक ने अपनी सगी दादी, चाचा और बड़े भाई की रिवौल्वर से गोली मारकर हत्या कर दी. यह पूरी घटना घर के पास लगे एक सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. जिस ने भी यह सीसीटीवी फुटेज देखी, उस के रोंगटे खड़े हो गए.

सीसीटीवी कैमरे में साफ देखा गया कि अभिषेक नीली शर्ट और सफेद टोपी पहनकर रिवौल्वर ले कर अपने घर की तरफ आता हुआ दिखाई दिया. घर के अंदर गया तो वहां उसे कोई बाहर नहीं दिखा. इस के बाद जब वह बाहर आया तो उसे रास्ते में दादी नजर आईं. उस ने उन के पास जा कर बिना कुछ कहे गोली मार दी, जिस से दादी नीचे गिर गईं और मौके पर ही उन की मौत हो गई.

इस के बाद गोली की आवाज सुनकर परिवार के अन्य लोग बाहर आए. चाचा ने अभिषेक के हाथ में रिवौल्वर देखी तो वे भागने की कोशिश करने लगे, लेकिन अभिषेक ने उन के सीने में गोली मार दी. इस के बाद सनकी अभिषेक अपने बड़े भाई और चाची की तरफ गया और उन पर भी गोली चला दी. वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी मौके से फरार हो गया.

इस घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और दादी के शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. वहीं आरोपी की तलाश के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही है.

इस फायरिंग के बाद पूरे गांव में अफरातफरी मच गई. गंभीर रूप से घायल चाचा संदीप, चाची और बड़े भाई को अस्पताल ले जाया गया. उन की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें चंडीगढ़ के अस्पताल रेफर कर दिया, लेकिन रास्ते में ही चाचा और बड़े भाई ने दम तोड़ दिया. वहीं, चाची की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है.

पुलिस ने बताया कि बीचपड़ी गांव में 2 किला जमीन से मिट्टी निकालने का परिवार का ठेका चल रहा था. इसी ठेके को ले कर परिवार में काफी समय से विवाद चला आ रहा था. शनिवार को इसी ठेके को ले कर विवाद ज्यादा बढ़ गया, जिस के बाद अभिषेक ने रिवौल्वर निकालकर फायरिंग शुरू कर दी. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है.

अब अगर इस घटना से सीख लेने की बात करें तो यह समझना जरूरी है कि अपराध करके कोई बच नहीं सकता. इसलिए हर व्यक्ति को अपराध करने से पहले यह जरूर सोचना चाहिए कि उस का अंजाम क्या होगा? मनोहर कहानियां हमेशा आप को यह बताने की कोशिश करती है कि ऐसी घटनाओं से कैसे बचा जाए और कैसे सतर्क रहा जाए. इसलिए आप भी पढ़ते रहिए मनोहर कहानियां. Ambala Triple Murder

Surat Crime News: दुर्लभ एंबरग्रीस – ‘व्हेल की उल्टी’ की तसकरी

Surat Crime News: यह जान कर ज्यादातर लोगों को हैरानी होगी कि समुद्र की सब से बड़ी मछली व्हेल की उल्टी होती है कीमती है. कारण इस का इस्तेमाल महंगे इत्र बनाने के काम आता है. मोम की तरह दिखने वाला खुशबूदार यह पदार्थ एंबरग्रीस कहलाता है.

पिछले दिनों इसी एंबरग्रीस यानी व्हेल की उल्टी के साथ सूरत के डिंडोली इलाके में 3 लोग गिरफ्तार किए गए. इस का वजन कुल 1.071 किलोग्राम था, जिस की कीमत 1.07 करोड़ रुपए आंकी गई. इस मामले में गिरफ्तार किए गए 3 लोगों की पहचान अंबरीश मिश्रा, सोनू उर्फ बबलू उपाध्याय और संदीप उपाध्याय के रूप में हुई.

अंबरीश उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले का रहने वाला है और डिलीवरी एग्जीक्यूटिव का काम करता है, जबकि बाकी दोनों जौनपुर के ही रहने वाले रिक्शाचालक हैं. कुछ समय से तीनों ही सूरत में रह रहे थे.  व्हेल की ‘उल्टी’ यानी एंबरग्रीस को कुदरत का खजाना कहा जाता है, जो व्हेल के शरीर में बनने वाला एक दुर्लभ पदार्थ है. यह समुद्र में समय के साथ कीमती और खुशबूदार बन जाता है. यह महंगे परफ्यूम बनने के काम आता है, लेकिन कई देशों में इस का व्यापार प्रतिबंधित है.

यह पदार्थ दुनिया के सब से कीमती प्राकृतिक संसाधनों में से एक है. यह खासतौर पर स्पर्म व्हेल के शरीर में बनता है. व्हेल के पाचन तंत्र में यह तब बनता है, जब वह समुद्री जीव स्क्पिड को खा लेती है. स्क्विड के नलीनुमा शरीर में 10 भुजाओं, जिस के नलीनुमा शरीर में 8 हाथ और 2 टेंटकल्स होते हैं. यह तेज तैरने वाला जीव है.

स्क्विड की कठोर चोंच को पचाना व्हेल के लिए मुश्किल होता है, इसलिए व्हेल के शरीर में एक खास तरह का मोम जैसा पदार्थ बनता है, जो इन हिस्सों को ढक लेता है. समय के साथ यह पदार्थ सख्त हो कर समुद्र में बाहर निकल जाता है और फिर सालों तक समुद्र में तैरता रहता है. एंबरग्रीस समुद्र में लंबे समय तक रहने के बाद हल्का, खुशबूदार और बेहद कीमती बन जाता है. शुरुआत में इस की गंध तेज और असहनीय होती है, लेकिन समय के साथ इस से एक मीठी, मिट्टी जैसी खुशबू निकलने लगती है.

इस कारण इसे ‘तैरता हुआ सोना’ भी कहा जाता है. इस की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में करोड़ों रुपए तक आंकी जाती है. यह इत्र को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करता है. व्हेल एक संरक्षित जीव है, इसलिए कई देशों में एंबरग्रीस का व्यापार पूरी तरह से प्रतिबंधित है. भारत में भी इसे रखना, खरीदना या बेचना गैरकानूनी है, क्योंकि यह वन्यजीव संरक्षण कानून के तहत आता है.  इस के पीछे मुख्य कारण यह है कि व्हेल की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए और किसी भी तरह से उन के शोषण को रोका जा सके.

बरामद एंबरग्रीस एक सफेद और लाल रंग के डिजाइन वाले प्लास्टिक बैग में मिला था. डीसीपी एसओजी (स्पेशल औपरेशंस ग्रुप) राजदीप सिंह नकुम के अनुसार गिरफ्तार लोगों को यह पदार्थ करीब 3 महीने पहले भरुच समुद्र तट के पास धीरू वाघेला और उमेश पलिया ने दिया था. तीनों इसे बेचने के लिए ग्राहक तलाश रहे थे. इसी दौरान किसी को इस की जानकारी मिली और उस ने एसओजी को सूचना दे दी, जिस के बाद इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. Surat Crime News

Rajasthan Crime News: नर्स की मौत – फंदा पंखे पर, लाश सीढिय़ों पर

Rajasthan Crime News: राजस्थान में उदयपुर जिले के कानोड़ स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डौक्टर के आवास पर महिला एएनएम यानी नर्स की संदिग्ध हालत में लाश मिलने से सनसनी फैल गई.  लाश 15 अप्रैल, 2026 की देर रात संदिग्ध परिस्थितियों में मिली थी. मृतका नर्स स्वास्थ्य केंद्र पर नौकरी करती थी. रात 11 बजे के करीब, जहां उस की लाश मिली, वह डा. सुरेंद्र बिजारणिया का सरकारी आवास है. इस संबंध में पुलिस ने छानबीन की, तब अन्य कई संदिग्ध बातों का खुलासा हुआ, जिस में फांसी का फंदा पंखे से झूलता पाया गया.

इस मामले की जांच में जुटी पुलिस ने बताया कि एएनएम डा. सुरेंद्र बिजारणिया पर शादी करने का दबाव बना रही थी. दिसंबर में डौक्टर की शादी होने के बाद से वह उस से नाराज चल रही थी. बताते हैं कि घटना की रात 11 बजे के करीब डौक्टर और नर्स के बीच बहस हो गई थी. उन के बीच चल रही बहस के दौरान ही डौक्टर के मोबाइल पर उन की पत्नी का फोन आ गया था, जिस से नर्स और नाराज हो कर बहस करने लगी थी. इस तरह दोनों के बीच काफी समय तक झगड़ा होने लगा था.

बताते हैं डौक्टर फोन पर पत्नी से बात करते हुए नीचे आवास से बाहर चला आया था, जबकि नर्स कमरे में रह गई थी. तभी नर्स अपनी चुन्नी का फंदा बना कर पंख से झूल गई थी. पत्नी से बात पूरी होने पर जब डौक्टर आवास पर गया, तब कमरे का मेनगेट बंद मिला. डौक्टर ने खिड़की से कमरे में झांक कर देखा. कमरे में नर्स फंदे से लटकी दिखाई दी.

इस वारदात की सूचना कनोड़ के थाना अधिकारी हुकम सिंह को रात करीब सवा 12 बजे पुलिस कंट्रोल रूम के जरिए मिली. मौके पर पहुंचने पर पुलिस को महिला का शव सीढिय़ों पर पढ़ा मिला, जबकि पंखे पर फंदा लटका था. मृतका की पहचान 30 वर्षीय अनीता मीणा के रूप में हुई. घटना के बाद आरोपित डौक्टर शव को सीढिय़ों पर लावारिस छोड़ कर मौके से फरार हो गया था.

हालांकि डौक्टर को चित्तौढग़ढ़ के मंगलवाड़ चौराहे पर नाकेबंदी में पकड़ लिया गया था. हिरासत में लेने के बाद उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई. इस बारे में जब डौक्टर से सख्ती के साथ पूछताछ की गई, तब पता चला कि नर्स 4 दिनों से डौक्टर के आवास पर ही थी. डा. सुरेंद्र बिजारणिया ने भी स्वीकार कर लिया कि उस के मृतका के साथ अवैध संबंध थे.

डौक्टर सुरेंद्र बिजारणिया सीकर में श्रीमाधोपुर का निवासी हैं और कानोड़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में नियुक्त है. उस से नर्स की मुलाकात मीटिंग और दूसरे कारणों से होती रही है. इन का अकसर मिलना होता रहा. इसी दौरान उन के बीच दोस्ती शुरू हो गई थी. उन की दोस्ती जल्द ही प्रेम संबंध में बदल गई. इस घटना ने विभागीय जिम्मेदारियों पर भी लोगों ने अंगुली उठाई.

डा. बिजारणिया पर शराब पी कर अस्पताल में उत्पात मचाने और वरिष्ठ डौक्टर के साथ मारपीट करने का आरोप लग चुका है. इस के बावजूद  विभाग ने कोई काररवाई नहीं की. स्थानीय लोगों और महिला डौक्टर ने भी आरोप लगाया कि अस्पताल में ब्लैकमेलिंग और फील्ड पोस्टिंग के लिए दबाव बनाया जाता है. उन्होंने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. Rajasthan Crime News

Hapur Crime News: दारोगा बनते ही पति पर किया केस

Hapur Crime News: कहने को तो पतिपत्नी के बीच बने अटूट प्रेम संबंध से बने रिश्ते एकदूसरे को आदर और सम्मान देते हैं. ताउम्र समर्पित बने रहते हैं और सुखदुख में हमदर्द और सहयोगी बन कर परिवार समेत समाज को जोडऩे का काम करते हैं. जबकि उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले की एक दंपति ने उल्टी कहानी लिख डाली है. पत्नी ने पति द्वारा उस के लिए की गई पूरी मेहनत को अपने रुतबे और रौब से रौंद डाला. उस पर दहेज उत्पीडऩ का मुकदमा ठोंक दिया. वह पति के तमाम संघर्ष, समर्पण और सहयोग को भूल गई.

पिछले दिनों बरेली में तैनात दारोगा पायल रानी द्वारा हापुड़ निवासी अपने पति और ससुराल वालों पर दहेज उत्पीडऩ का मुकदमा दर्ज करवाने का मामला काफी चर्चा में आ गया. इस बारे में पति गुलशन का कहना था कि उस ने मेहनत कर के अपनी पत्नी को पढ़ायालिखाया और दारोगा बनाया, लेकिन नौकरी मिलने के बाद अब उस ने उसे ही झूठे केस में फंसा दिया. हापुड़ थाने में महिला दारोगा और उस के पति के बीच बने विवाद में पति समेत ससुराल वालों के खिलाफ दहेज ऐक्ट का मुकदमा दर्ज करवाया गया है.

एसआई पायल रानी ने 13 नवंबर, 2025 को हापुड़ में अपने पति गुलशन, सासससुर, जेठजेठानी, ननदों और ननदोई के खिलाफ दहेज उत्पीडऩ का मुकदमा दर्ज कराया है. पायल का आरोप है कि उस की शादी 2 दिसंबर 2022 को हिंदू रीतिरिवाज से हुई थी, शादी के कुछ समय बाद ही वह ट्रेनिंग के लिए मुरादाबाद चली गई थी, तभी से ससुराल वालों ने उस पर 10 लाख रुपए और कार देने का दबाव बनाना शुरू कर दिया.

इस पर पति गुलशन का कहना है कि उस ने मेहनत कर जिसे दारोगा बनवाया, अब वही उसे और उस के परिवार को फंसाने में लगी है. पायल की शिकायत है कि वह बरेली पोस्टिंग होने पर अपनी सैलरी अपने पति के अकाउंट में ट्रांसफर करती रही है. फिर भी उस के ससुराल वालों की भूख नहीं मिटी है. पति के दबाव में आ कर वह 10 लाख रुपए का लोन अपने नाम पर ले कर उन्हें दे चुकी है. फिर भी पति और ससुराल वाले लगातार 10 लाख रुपए नकद और एक लग्जरी कार की मांग कर रहे हैं.

इस के साथ ही पायल ने ससुराल वालों द्वारा उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त करने का भी आरोप लगाया है. उस का कहना है कि उस के साथ मारपीट की गई है और यहां तक कि उस पर तेजाब फेंकने की धमकी भी दी गई है. हालांकि पति गुलशन भी पुलिस के सामने अपनी बात रख चुका है. उस का कहना है कि उस ने 2016 से ही पायल के साथ प्रेम संबंध में रहते हुए 2021 में कोर्टमैरिज कर ली थी. एक साल बाद 2022 में उन की सामाजिक रीतिरिवाज से शादी हुई थी.

गुलशन का कहना है कि जब पायल पढ़ाई कर रही थी, तब उस ने अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई से उसे पढ़ाने के लिए कोचिंग पर काफी खर्च किया. असल में वह अब उस के साथ नहीं रहना चाहती है. अपने बचाव के लिए गुलशन ने हापुड़ के एसपी कुंवर ज्ञानंजय सिंह से मुलाकात कर न्याय की गुहार लगाई है. इस मामले में उस की भी शिकायत दर्ज कर ली गई है. Hapur Crime News

Death Penalty Police Case: बापबेटे की हिरासत में मौत 9 पुलिस वालों को फांसी

Death Penalty Police Case: बात करीब 6 साल पहले की है. पूरे देश में कोविड का दौर चरम पर था. लौकडाउन की जबरदस्त परिस्थितियां बनी हुई थीं. अधिकतर लोग कोरोना के भय से अपनेअपने घरों में कैद थे. उन्हीं दिनों तमिलनाडु के शहर सथानकुलम में 58 साल के कारोबारी पी. जयराज और उन के 31 साल के बेटे जे. बेनिक्स कोविड लौकडाउन नियमों के कथित उल्लंघन के आरोप में एक थाने की लौकअप में थे. आरोप था कि उन्होंने लौकडाउन के दौरान दुकान खोल रखी थी.

बेटे को तब हिरासत में लिया गया था, जब वह अपने पिता से मिलने थाने गए थे. दोनों को सथानकुलम पुलिस स्टेशन में रखा गया था. कई सालों तक कोर्ट में चले इस मामले की आखिरी सुनवाई मदुरै की फस्र्ट एडिशनल डिस्ट्रिक्ट ऐंड सेशंस कोर्ट में 7 अप्रैल 2026 को हुई थी. न्यायाधीश ने एक चौंकाने वाला फैसला सुनाते हुए सभी 10 दोषी पुलिसकर्मियों को मौत की सजा दे दी.

सजा पाने वालों में एक आरोपी की कोविड के दौरान ही कोरोना से मौत हो गई थी. इस कारण फांसी की सजा पाने वाले 9 पुलिसकर्मियों के नाम हैं—

तत्कालीन इंसपेक्टर एस. श्रीधर, एसआई के. बालकृष्णन, पी. रघु गणेश, हैडकांस्टेबल एस. मुरुगन, ए. समदुरई, कांस्टेबल एम. मुतुराजा, एस. चेल्लादुरई, एक्स. थौमस फ्रांसिस और एस. वैलमुतु. इस केस के 10वें आरोपी पल्दुरई (तत्कालीन स्पैशल सबइंसपेक्टर) थे. बचे पुलिसकर्मी 23 मार्च, 2026 को ही इस डबल मर्डर के दोषी ठहराए थे. मगर तब सजा नहीं सुनाई गई थी. इस केस को इस अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई कदम उठाने पड़े थे.

इस की शुरुआत तब हुई, जब दोनों बापबेटे की मौत के बाद तमिलनाडु में बड़े स्तर पर विरोध शुरू हुआ. लोगों ने विरोध में अपनी दुकानें बंद कीं और उस बर्बरता के खिलाफ आवाज उठाई, जिस में जयराज और बेनिक्स को पीटा गया था. उन की कहानी आज भी सुनने पर लोगों में गुस्सा और दहशत दोनों महसूस होता है. चार्जशीट के अनुसार इस के बाद पूरी रात दोनों की पुलिस ने बुरी तरह पिटाई की. मकसद था उन्हें यह ‘सबक’ सिखाना कि पुलिस से कैसे पेश आना चाहिए.

सीबीआई के मुताबिक, पिटाई के बाद दोनों पितापुत्र को अपने ही जख्मों से बह रहे खून को साफ करने पर मजबूर किया गया. मगर इस का असली मकसद सफाई नहीं, बल्कि उत्पीडऩ था, क्योंकि सबूत मिटाने के लिए अगली सुबह अलग से सफाई कर्मचारी बुलाया गया था. जिस ने पुलिस स्टेशन के फर्श से सारा खून साफ किया, ताकि निशान मिटाए जा सके. इन घटनाओं की बारीकियां सिर्फ उन की क्रूरता से नहीं, बल्कि इस बात से सिहरन पैदा करने जैसी हैरानी होती है कि इन्हें किस हद तक साधारण दिखाने की कोशिश की गई. जब यह सब हो रहा था, तब उस पूरी रात जयराज का परिवार थाने के बाहर इंतजार करता रहा.

इस केस का सब से डरावना पहलू यह था कि दोनों को मजिस्ट्रैट के सामने ठीक से पेश ही नहीं किया गया, न ही रिमांड से पहले उन की चोटों की जांच हुई. इस बारे में जयराम के साले जोसेफ का कहना है कि मजिस्ट्रैट ऊपर की मंजिल से ही दिखाई दिए और सिर्फ एक इशारे से उन्हें रिमांड पर भेज दिया. जांच अधिकारियों के अनुसार, बेहद गंभीर चोटों के बावजूद दोनों के लिए ‘फिट फौर रिमांड सर्टिफिकेट’ ले लिया गया. यानी कागज पर यह दर्ज करा दिया गया कि वे रिमांड के लिए बिलकुल स्वस्थ हैं.

दोनों के खून से सने कपड़े अस्पताल के डस्टबिन में फेंक दिए गए. इस के बाद जयराज और बेनिक्स को कोविलपट्टी सब जेल में रखा गया. जब उन की हालत और बिगड़ गई, तब उन्हें सरकारी अस्पताल में भरती करवाया गया. वहीं 22 जून, 2020 को भारी मात्रा में खून बहने और हेमरेज से बेनिक्स की मौत हो गई. अगले दिन उन के पिता जयराज की भी मौत हो गई. मामले की गंभीरता को देखते हुए 24 जून, 2020 को मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने स्वत:संज्ञान लेते हुए न्यायिक जांच के आदेश दिए. लोकल पुलिस पर भरोसा नहीं करते हुए सीबीआई को जांच करने के लिए कहा.

इस जांच के आधार पर ही तमिलनाडु की मदुरै सेशन कोर्ट ने सथानकुलम कस्टोडियल डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई. कोर्ट ने इसे ‘रेयरेस्ट औफ रेयर’ बताया. Death Penalty Police Case

Ghazipur Suicide Case: दहेज का दंश – पहले सेल्फी, फिर फांसी का फंदा

Ghazipur Suicide Case: उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में आत्महत्या का एक अनोखा मामला सामने आया, जिस में एक युवती रात 3 बजे मां को सेल्फी भेजने के बाद फांसी के फंदे से झूल गई थी. यह घटना कासिमाबाद कोतवाली अंतर्गत एक गांव की है. हालांकि पुलिस के मौके पर पहुंचने से पहले ही घर में मौजूद लोगों ने मृतका के शव को फंदे से उतार कर नीचे लिटा दिया था. इस बारे में बताते हैं कि महिला ने रात को 3 बजे अपने बेटे के साथ सेल्फी ले कर अपनी मां के मोबाइल पर भेज दी थी. उस के बाद फांसी लगाई थी.

घटना की जानकारी होने के बाद मृतक महिला के परिजन मौके पर पहुंच कर उस के ससुराल वालों कई गंभीर आरोप लगाए. मृतका की पहचान 26 वर्षीया नजमा खातून के रूप में हुई, जिस की मोहम्मदपुर कुसुम अतरौली पुरवा मौजा में ससुराल है. बेटी के मरने की सूचना के बाद नजमा की मां मुन्नी खातून मौके पर पहुंची और उस के ससुराल के लोगों पर दहेज के लिए प्रताडि़त किए जाने का आरोप लगाया.

मुन्नी मऊ जिले के हलधरपुर थाना क्षेत्र के इटोरा गांव की रहने वाली है. उस ने अपनी बेटी की शादी 7 साल पहले कासिमाबाद के मोहम्मदपुर कुसुम गांव निवासी आमिर खान से धूमधाम से की थी. मुन्नी बताया कि शादी के बाद से ही नजमा को उस के ससुराल पक्ष के लोग दहेज के लिए प्रताडि़त करते थे. घटना के कुछ दिनों पहले ससुराल वालों ने उस पर गहने चोरी करने का आरोप लगा कर मारपीट भी की थी. इस के बाद से उसे काफी प्रताडि़त भी किया जा रहा था.

मृतका का पति आमिर खान जमशेदपुर में रह कर नौकरी करता है, जो घटना के वक्त अपने घर पर नहीं था. मृतक की मां ने पुलिस को बताया कि बुधवार की देर रात उन की बेटी से उस के देवर ने मारपीट की थी. इस बारे में उस ने उन्हें फोन पर बताया था. उन की बेटी ने देर रात 3 बजे के आसपास अपने बेटे के साथ एक सेल्फी भी उन के मोबाइल पर भेजी थी. सुबह होते ही उन्हें सूचना मिली की नजमा ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है.

मृतका के 2 बच्चों में एक 5 साल का बेटा और दूसरी एक साल की बेटी है. इस मामले में मृतका की मां ने ससुर, सास, देवर और ननद के खिलाफ दहेज उत्पीडऩ और मारपीट किए जाने की तहरीर थाने में दी है. Ghazipur Suicide Case

Haryana Crime: पुलिस के शिकंजे में शातिर जालसाज

Haryana Crime: एक बार किसी के हस्ताक्षर देख कर हूबहू वैसे ही हस्ताक्षर कर लेना धनीराम मित्तल के बाएं हाथ का खेल था. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षरों को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट भी नहीं पकड़ सकते थे. फरजी हस्ताक्षरों के सहारे वह अफसर ही नहीं बना, झज्जर की कोर्ट में सवा महीने तक जज बन कर उस ने तमाम मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया था.

अब तक एक हजार से अधिक आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुके धनीराम मित्तल का जन्म 29 जून, 1939 को हरियाणा के भिवानी शहर के रहने वाले अमीलाल मित्तल के घर हुआ था. अमीलाल एक साधनसंपन्न व्यक्ति थे. उन के परिवार में पत्नी किन्नी देवी के अलावा 4 बेटियां और 5 बेटे थे. उन की एक आटा मिल थी, जिस से आमदनी अच्छी हो रही थी, सो उन्हें 9 बच्चों का पालनपोषण करने में कोई दिक्कत नहीं आई. अमीलाल ने उस जमाने में अपने सभी बच्चों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी. धनीराम ने रोहतक के हिंदू कालेज से बीएससी की थी.

धनीराम तेजतर्रार होने के साथ पढ़ाई में भी होशियार था. बीएससी करने के बाद उस ने राजस्थान के श्रीगंगानगर के खालसा कालेज से एलएलबी की. इस के बाद उस ने करनाल स्थित ‘मौडर्न सेल’ नाम के इंस्टीट्यूट से हस्तलिपि विशेषज्ञ का एक साल का डिप्लोमा किया. इसी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने के लिए उस ने कोलकाता में रह कर हैंडराइटिंग एक्सपर्ट का 3 साल का डिप्लोमा किया. पढ़ाई के साथसाथ वह सरकारी नौकरी पाने की भी तैयारी कर रहा था. उस की मेहनत रंग लाई. रेलवे में क्लर्क की परीक्षा पास करने के बाद सन 1942 में वह दिल्ली जंक्शन पर बुकिंग क्लर्क बन गया. सरकारी नौकरी मिलने से घर वाले भले ही खुश थे, लेकिन धनीराम इस नौकरी से खुश नहीं था.

बुकिंग क्लर्क की नौकरी से वह ऊब गया तो दूसरी नौकरी की कोशिश करने लगा. आज की तरह उन दिनों नौकरी के लिए इतनी मारामारी नहीं थी. फिर धनीराम एक काबिल इंसान था, इसलिए थोड़ी कोशिश के बाद उसे हरियाणा राज्य परिवहन निगम में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी मिल गई. उस की पोस्टिंग अंबाला में हुई. उसी दौरान उस की लक्ष्मी से शादी हो गई, जिस से बाद में उसे 3 बच्चे हुए. यह नौकरी भी उस की इच्छा के अनुरूप नहीं थी. नौकरी से उसे जो पगार मिलती थी, उस से वह संतुष्ट नहीं था. वह तो कोई ऐसा काम करना चाहता था, जिस से वह कम समय में ज्यादा पैसे कमा सके और उस की काबिलियत का भी इस्तेमाल हो.

काम में मन नहीं लगा तो उस ने यह नौकरी भी छोड़ दी. धनीराम ने हस्तलिपि विशेषज्ञ का जो कोर्स किया था, उस से वह दूसरों के हस्ताक्षरों को हूबहू करना जान गया था. अपनी योग्यता को जांचने के लिए वह ब्लौक, तहसील स्तर के अधिकारियों के हस्ताक्षर कर के लोगों के छोटेमोटे काम कराने लगा. उस के द्वारा किए गए फरजी हस्ताक्षर विभाग में किसी की पकड़ में नहीं आ सके तो धनीराम की हिम्मत बढ़ती गई. यह प्रयोग सफल हो गया तो उस के दिमाग में तरहतरह की योजनाएं घूमने लगीं. इस के बाद उस ने रोहतक के आरटीओ विभाग से अपना जालसाजी का धंधा शुरू किया.

वह जानता था कि इस विभाग में भ्रष्टाचार खुलेआम होता है. वह विभाग के कुछ अधिकारियों के हस्ताक्षर करना जान गया था. फिर क्या था, उन के जाली हस्ताक्षर से वह लोगों को ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य दस्तावेज तैयार कर के देने लगा. इस के बदले वह लोगों से मोटी रकम वसूलता था. अधिकारियों के फरजी हस्ताक्षर से दस्तावेज बनाने का उस का यह धंधा चल निकला. लेकिन उस का यह धंधा ज्यादा दिनों तक चल नहीं सका. लिहाजा वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. सन 1964 में उस के खिलाफ रोहतक के सिटी थाने में पहली रिपोर्ट दर्ज हुई. भादंवि की धारा 380/379/420/468/471 के तहत उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

करीब 52 साल पहले धनीराम मित्तल जब जेल गया था, उस समय उस की उम्र करीब 25 साल थी. अगर वह चाहता तो अपनी गलती पर पश्चाताप कर के अपराध का रास्ता छोड़ सकता था, लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया, बल्कि वह नएनए तरीके से जालसाजी करने के बारे में सोचने लगा. जमानत पर जेल से बाहर आने के बाद वह फिर से जालसाजी के काम करने लगा. धनीराम के पास एलएलबी की डिग्री थी. वह न्यायालय से संबंधित सभी कामों को जानना चाहता था. इसलिए वह दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट के एडवोकेट श्यामसुंदर शर्मा के यहां मुंशी का काम करने लगा. बाद में वह दिल्ली और हरियाणा की अदालतों में वकालत करने लगा. वह अपने मुकदमे भी खुद ही लड़ रहा था.

एक बार तो उस ने ऐसा काम किया, जिस से रेलवे के बड़े अधिकारी भी सकते में आ गए. बीकानेर रेलवे स्टेशन अधीक्षक ओमप्रकाश शर्मा को एक दिन टेलीग्राम मिला. टेलीग्राम में लिखा था ‘तत्काल प्रभाव से आप का तबादला किया जाता है. 2 दिनों बाद दिल्ली मुख्यालय आ कर रिपोर्ट करें.’

टेलीग्राम को पढ़ कर ओमप्रकाश शर्मा हैरान रह गए, क्योंकि उन का ट्रांसफर ड्यू नहीं था. वह समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक उन का ट्रांसफर क्यों कर दिया गया. उन्होंने सोचा कि ड्यूटी खत्म होने के बाद अपने जानने वाले अधिकारियों से इस बारे में बात करेंगे. उन की ड्यूटी खत्म भी नहीं हुई थी कि टेलीग्राम मिलने के 2 घंटे बाद सूटेडबूटेड धनीराम मित्तल हाथ में ब्रीफकेस लिए उन के पास पहुंच गया.

उस ने ओमप्रकाश शर्मा को बताया कि उसे दिल्ली से ट्रांसफर कर के यहां का चार्ज लेने के लिए कहा गया है. उस ने अपनी नियुक्ति की प्रति भी शर्मा को सौंप दी. शर्मा ने उस का नियुक्ति पत्र पढ़ा और उस की तरफ देखने लगे. तभी धनीराम बोला, ‘‘शर्माजी, बधाई हो, आप का प्रमोशन हुआ है और मुख्यालय में आप के कार्यों और ईमानदारी की बड़ी चर्चा हो रही है. आप को मुख्यालय में पोस्टिंग दी गई है.’’

अपनी प्रशंसा से ओमप्रकाश शर्मा काफी खुश हुए. उन्होंने उस दिन धनीराम को अपने साथ रख कर उस की खूब खातिरदारी की. वह जल्द से जल्द दिल्ली पहुंच जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने फटाफट टिकिट बिक्री और पार्सल का सारा कैश धनीराम को सौंप दिया और दिल्ली रवाना हो गए. ओमप्रकाश शर्मा अपने प्रमोशन की बात सोचसोच कर रास्ते भर खुश होते रहे. उन्होंने सोच रखा था कि दिल्ली में चार्ज संभालने के बाद वह अपने प्रमोशन की खुशखबरी टेलीग्राम द्वारा गांव में रह रहे अपनी बीवीबच्चों को देंगे. उन्होंने प्लान भी कर लिया था कि अब वह बीवीबच्चों को गांव से बुला कर दिल्ली में रखेंगे.

खुशीखुशी वह मुख्यालय पहुंचे. संबंधित अधिकारी के पास वह अपना ट्रांसफर लेटर ले कर पहुंचे तो वह अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गया, क्योंकि वह लेटर मुख्यालय से भेजा ही नहीं गया था और ना ही उन का कोई प्रमोशन हुआ था. यह सुन कर शर्माजी के होश उड़ गए. प्रमोशन की खुशी से उन्होंने जो प्लान बनाए थे, वे काफूर हो गए. वह समझ नहीं पा रहे थे कि जिस आदमी को उन्होंने चार्ज सौंपा है, आखिर वह है कौन और उन के पास टेलीग्राम से जो ट्रांसफर लेटर आया था उस पर बाकायदा संबंधित अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर भी थी. यह खेल किस ने और क्यों खेला है?

वह बीकानेर पहुंचे तो पता चला कि धनीराम कलेक्शन की सारी रकम ले कर फरार हो चुका था. नौकरी बचाने के लिए ओमप्रकाश शर्मा ने सारी रकम अपनी जेब से भरी. धनीराम ने इस के 8 महीने बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर स्टेशन को अपना निशाना बनाया. कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर गंगा स्नान के लिए यहां हजारों लोग आते हैं, जिस से यहां टिकिटों की बिक्री खूब होती है. धनीराम इस बात को जानता था. लंबा हाथ मारने के लिए धनीराम ने कार्तिक पूर्णिमा का ही दिन चुना.

गढ़मुक्तेश्वर के स्टेशन मास्टर को भी उस ने फरजी ट्रांसफर लेटर दे कर खुद वहां का चार्ज ले लिया और वहां से सारा कैश ले कर रफूचक्कर हो गया. फरजी जौइनिंग लेटर के जरिए उस ने दिल्ली जंक्शन, हरिद्वार, श्रीगंगानगर रेलवे स्टेशनों पर भी स्टेशन मास्टर बन कर कैश पर हाथ साफ किया. अब तक रेल विभाग में धनीराम मित्तल चर्चित हो गया था. हालत यह हो गई कि अब विभाग में किसी का ट्रांसफर होता तो वह कर्मचारी संबंधित अधिकारी से पहले अपने ट्रांसफर की पुष्टि करता, उस के बाद ही दूसरे कर्मचारी को चार्ज सौंपता. इस दौरान धनीराम जालसाजी के मामलों में अलगअलग जगहों पर गिरफ्तार भी होता रहा, पर जमानत पर छूटने के बाद वह फिर से यही काम करने लगता.

सन 1970 में देश में चीनी और मिट्टी के तेल की किल्लत हुई. सरकार राशन कार्ड पर ही इन चीजों को सस्ते दाम पर उपलब्ध करा रही थी. उसी दौरान धनीराम ने रोहतक जिले में 5 हजार फरजी राशन कार्ड बना कर वहां के हलवाइयों और अन्य लोगों को दे दिए थे. ऐसा नहीं था कि उस ने वे राशन कार्ड फ्री में दिए थे, उस ने उन लोगों से पैसे लिए थे. 2 महीने तक उन राशन कार्डों से लोगों ने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान से चीनी और मिट्टी का तेल लिया था. बाद में भेद खुलने पर खाद्य एवं आपूर्ति विभाग ने वे राशन कार्ड निरस्त कर दिए थे और धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

सन 1970 में ही शातिरदिमाग धनीराम ने ऐसा काम किया कि लोग हैरान रह गए. दरअसल हुआ यह कि हरियाणा के झज्जर जिले के जज साहब लंबी छुट्टी पर गए हुए थे. इसी का फायदा उठाते हुए उस ने पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट के फरजी कागजात बनाए और उन्हीं के बूते पर उस ने उस जज की कुरसी संभाल ली. वह अदालती काम से वाकिफ था ही, साथ ही उसे कानून की भी जानकारी थी.

इस के अलावा उस में एक खास बात यह थी कि वह निडर हो कर काम करता था. इसी वजह से किसी को भी उस पर शक नहीं होता था. अदालती काररवाई की उसे अच्छी जानकारी थी, इसलिए वह 28 दिनों तक जज की कुरसी पर बैठ कर केसों की सुनवाई करता रहा. इस बीच उस ने कई केसों के फैसले भी सुनाए. इतना ही नहीं, मोटे पैसे ले कर उस ने हत्या और संगीन मामलों के 30 मुलजिमों को जेल से रिहा भी करा दिया. ताज्जुब की बात यह रही कि 28 दिनों में उस ने वहां रह कर अच्छी कमाई की, पर वहां काम कर रहे किसी भी कर्मचारी को उस पर शक नहीं हुआ. लेकिन जब यह मामला खुला तो उसे एक बार फिर जेल जाना पड़ा. धनीराम फरजी जमानती वारंट बनाने में भी एक्सपर्ट था.

कोर्ट में वकालत करने के दौरान वह मोटी रकम ले कर फरजी जमानती वारंट तैयार कर देता था और उन्हीं की बदौलत उस ने तमाम मुजरिमों को जेल से बाहर निकलवाया. इतना ही नहीं, फरजी जज वाले मामले में भी उस ने जेल में रहते हुए किसी तरह अपना भी फरजी जमानती वारंट तैयार कर लिया और जेल से बाहर आ गया. एक बार सन 1976 में पुलिस किसी मामले में उसे पेश करने के लिए रोहतक जेल से बीकानेर की अदालत में ले गई. वहां मजिस्ट्रेट ने उसे जमानत पर छोड़ने से इनकार कर दिया. धनीराम ने वापस आ कर रोहतक जेल के अधीक्षक को जज के फरजी हस्ताक्षर वाला जमानती वारंट दिखाया तो जेल अधीक्षक ने उसे रिहा कर दिया. बाद में पता चला कि वह वारंट फरजी था.

धनीराम जालसाजी के ये काम केवल पैसे कमाने के लिए ही नहीं करता था, बल्कि निजी खुन्नस निकालने के लिए भी उस ने रोहतक के तत्कालीन चीफ ज्यूडीशियल मजिस्ट्रेट एन.एल. पारुथी को ऐसा सबक सिखाया था कि शायद वह उसे कभी भूल पाएं. इस की वजह यह थी कि उन की अदालत में धनीराम का एक केस चल रहा था. धनीराम खुद ही अपना केस लड़ रहा था. वह कोर्ट में ऐसा व्यवहार कर रहा था, जो अदालत के हिसाब से ठीक नहीं था. चीफ ज्यूडीशियल मजिस्टे्रट एन.एल. पारुथी ने धनीराम को लताड़ते हुए अदालत में अपना आचरण ठीक करने को कहा.

भरी अदालत में लताड़े जाने से धनीराम की बेइज्जती हुई थी. यह बात उसे बहुत खली. उस ने उसी समय जज पारुथी को इस बेइज्जती का खामियाजा भुगतने की धमकी दे दी. जज पारुथी को क्या सबक सिखाना है, इस की रूपरेखा धनीराम ने तुरंत तैयार कर ली. एक दिन जज पारुथी को रजिस्टर्ड डाक से पंजाब व हरियाणा हाइकोर्ट के न्यायाधीश का पत्र मिला. पत्र में लिखा था, ‘तत्काल प्रभाव से आप का इस्तीफा मंजूर कर लिया गया है. अत: आप तुरंत अपना पद और कार्यभार छोड़ दें.’

पत्र पढ़ते ही पारुथी का हलक सूख गया. वह परेशान हो उठे कि उन्होंने जब इस्तीफा दिया ही नहीं है तो वह मंजूर कैसे हो गया. यही बात सोचसोच कर रात भर उन्हें नींद नहीं आई. अगले दिन वह उस पत्र को ले कर चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गए. वहां मुख्य न्यायाधीश से मिल कर उन्होंने कहा, ‘‘सर, कल मुझे यह लैटर मिला है. जबकि मैं ने अपने इस्तीफे के बारे में कोई पत्र दिया ही नहीं है.’’

मुख्य न्यायाधीश ने उन्हें वह फाइल दिखाई, जिस में उन के इस्तीफे की दरख्वास्त लगी थी. पारुथी ने उस दरख्वास्त को पढ़ा तो उस पर जो दस्तखत थे, वे उन के ही थे. उन का माथा चकराया कि जब उन्होंने दरख्वास्त लिखी ही नहीं है तो यह दस्तखत कैसे हो गए? उन्होंने कहा, ‘‘सर, यह दरख्वास्त मैं ने नहीं लिखी. जरूर यह किसी की साजिश है.’’

‘‘भले ही साजिश हो, पर यहां तो तुम्हारी सेवानिवृत्ति की विभागीय औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी हैं.’’ मुख्य न्यायाधीश ने कहा.

‘‘प्लीज सर, रुकवा दीजिए, वरना मेरी सालों की मेहनत बेकार जाएगी. मैं तबाह हो जाऊंगा,’’ पारुथी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मुझे लगता है, यह सब धनीराम का किया है. इस तरह के काम वही करता है.’’

मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप पर पारुथी के इस्तीफे की प्रक्रिया रोकी गई. इस के बाद पारुथी ने रोहतक पहुंच कर सिटी थाने में धनीराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. देशी चार्ल्स शोभराज के रूप में मशहूर धनीराम जालसाजी से कागज तैयार करने में ही माहिर नहीं था, बल्कि एक बार वह दिनदहाड़े पुलिस हिरासत से बहुत आराम से फरार भी हो गया था. किसी मामले में रोहतक पुलिस ने बड़ी मशक्कत के बाद धनीराम को गिरफ्तार किया था. 4 नवंबर, 1995 को रोहतक जेल से उसे फरीदाबाद की कोर्ट में पेश करने के लिए ले जाया गया. लेकिन फरीदाबाद कोर्ट परिसर में भीड़ का फायदा उठा कर वह वहां से नौ दो ग्यारह हो गया. लाख ढूंढने के बाद भी पुलिस उसे ढूंढ नहीं सकी.

हरियाणा की भिवानी जेल में कुख्यात अपराधी जिले सिंह बंद था. विभिन्न धाराओं में उसे 25 साल की सजा हुई थी. उसे किसी तरह पता चला कि धनीराम फरजी जमानती वारंट से सैकड़ों लोगों को जेल से रिहा करा चुका है. अपनी रिहाई के लिए उस ने अपने एक संबंधी को धनीराम के पास भेजा. मोटी रकम ले कर धनीराम उस का यह काम कराने को तैयार हो गया. चूंकि जिले सिंह सजायाफ्ता कैदी था, इसलिए उस की रिहाई के लिए उसे काफी मशक्कत करनी पड़ी थी.

जेल के अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह काम करना आसान नहीं था. उस समय आर.के. गुप्ता जेल अधीक्षक थे. धनीराम ने आर.के. गुप्ता के बेटे पंकज गुप्ता के माध्यम से बात आगे बढ़ाई. पैसों के लालच में आर.के. गुप्ता अपनी जिम्मेदारियों को भूल गए. धनीराम ने फरजी तरीके से जिले सिंह की रिहाई के जाली पेपर तैयार कर दिए और उस की 25 साल की सजा पूरी होने से पहले ही उसे जेल से रिहा करा दिया. बाद में जब यह मामला प्रकाश में आया तो पुलिस ने धनीराम, पंकज गुप्ता, जेल के 2 कनिष्ठ कर्मचारियों नरेश व अंजू सहित 5 लोगों को गिरफ्तार किया.

धनीराम फरजी वकील बन कर कोर्ट में अपने केसों की ही पैरवी नहीं करता, बल्कि अन्य केसों की भी पैरवी करता था था. फरवरी, 2005 में वह अपने एक मुवक्किल विजय के चैक बाउंस के केस के सिलसिले में पटियाला हाउस कोर्ट में आया, तभी वकीलों ने उसे घेर लिया. पूछने पर वह अपना रजिस्ट्रेशन नंबर तक नहीं बता पाया. सूचना मिलने पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में पता चला कि उस के पास केवल एलएलबी की डिग्री है. कोर्ट में प्रैक्टिस करने का कोई भी वैध दस्तावेज वह नहीं दिखा सका, पुलिस ने उस के पास से विभिन्न केसों की 7 फाइलें भी बरामद की थीं. इस मामले में पुलिस ने उसे जेल भेज दिया था.

जेल से जमानत पर बाहर आने के बाद वह फिर से वकालत करने लगा. 6 दिसंबर, 2005 को उसे दिल्ली के तीसहजारी न्यायालय में महानगर दंडाधिकारी राजेश कुमार की अदालत में फिर से फरजी वकील के रूप में गिरफ्तार किया गया. उस दिन वह अपने मुवक्किल के आर्म्स एक्ट के मामले की पैरवी करने आया था. धनीराम ठगी और जालसाजी के अलावा छोटीमोटी चोरियां भी कर लेता था. कार से स्टीरियो, स्टेपनी, ब्रीफकेस या अटैची उड़ाना वह हाथ की सफाई समझता था. 3 दिसंबर, 1996 को उसे दिल्ली स्थित डब्लूएचओ औफिस में कार्यरत दीप्ति नाग की मारुति कार से स्टीरियो चुराते रंगेहाथों पकड़ा गया था.

तिहाड़ जेल में ही धनीराम की मुलाकात अशोक कुमार से हुई. अशोक कुमार एक कार चोर था. जबकि धनीराम चोरी के अलावा जाली कागज बनाने में माहिर था. दोनों ने मिल कर कार चुराने और फरजी कागज बना कर उन्हें ठिकाने लगाने की योजना बनाई. अलगअलग समय पर दोनों जेल से जमानत पर बाहर आए. दोनों ही हरियाणा, पंजाब, दिल्ली आदि जगहों से कार चुरा कर फरजी कागजात तैयार कर के बेचने लगे. इस दौरान धनीराम अपने रहने के ठिकाने बदलता रहा.

26 अप्रैल, 2004 को दोनों कार चुराने के लिए चंडीगढ़ पहुंचे. हाइकोर्ट परिसर में उन्होंने सफेद रंग की चमचमाती मारुति कार नंबर एचआर01 पी 4177 देखी. वह कार जानेमाने एडवोकेट अशोक कुमार खुंगर की थी. मौका मिलते ही उन्होंने मास्टर चाबी से वह कार चुरा ली. एडवोकेट खुंगर अपनी गाड़ी लेने पहुंचे तो कार न देख कर वह परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी. पुलिस ने बैरिकेड्स लगा कर जांच की तो जीरकपुर रोड पर पुलिस ने चुराई गई कार के साथ धनीराम को गिरफ्तार कर लिया. जबकि उस का साथी अशोक बस द्वारा दिल्ली के लिए पहले ही रवाना हो गया था. धनीराम को गिरफ्तार कर बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

चंडीगढ़ के वकील की कार चुराने का मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है. लंबे समय तक जब वह चंडीगढ़ कोर्ट की तारीखों पर नहीं पहुंचा तो चंडीगढ़ न्यायालय के जज श्री बलविंदर कुमार ने 6 मार्च, 2008 को उसे भगोड़ा घोषित कर दिया. दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के विभिन्न राज्यों में धनीराम एक हजार से ज्यादा आपराधिक वारदातों को अंजाम दे चुका है. विभिन्न राज्यों के थानों में उस के खिलाफ 127 केस दर्ज हो चुके हैं. उस की खास बात यह है कि उस ने कभी भी अपना नाम और हुलिया नहीं बदला और न ही जालसाजी जैसे आपराधिक कामों से उस ने संन्यास लिया. 77 साल की उम्र में भी वह इस काम में जुटा है.

दिल्ली के रानीबाग इलाके में 5 नवंबर, 2015 को एक शख्स की सैंट्रो कार चोरी हो गई. पुलिस ने जब वहां के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज देखी तो पता चला कि कार चुराने वाला और कोई नहीं, धनीराम मित्तल है. दिल्ली पुलिस के पास धनीराम के फोटो तो थे, पर उस का ठिकाना नहीं था. पश्चिम जिले के वाहन चोर निरोधक दस्ते के इंसपेक्टर राजपाल डबास के पास धनीराम का पूरा इतिहास मौजूद था. वह अपने स्तर से उसे तलाशने लगे.

उन की मेहनत रंग लाई. उन्हें धनीराम मित्तल के बारे में सुराग मिला कि वह उत्तरी दिल्ली के नत्थूपुरा इलाके में रहता है. डीसीपी पुष्पेंद्र कुमार को उन्होंने इस सूचना से अवगत करा दिया. डीसीपी ने एसीपी दिनेश शर्मा की अध्यक्षता में एक टीम बनाई, जिस में एसआई सुमेर सिंह, एएसआई सतीश कौशिक, हैडकांस्टेबल नवीन कुमार, कांस्टेबल हरिप्रकाश को शामिल किया गया. टीम का नेतृत्व एडीशनल डीसीपी मोनिका भारद्वाज कर रही थीं. टीम ने मुखबिरों को भी लगा दिया.

31 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर राजपाल डबास को सूचना मिली कि धनीराम रोहिणी कोर्ट से पश्चिम विहार की तरफ आने वाला है. यह सूचना मिलते ही पुलिस टीम ने पश्चिम विहार डिस्ट्रिक्ट पार्क के नजदीक बाहरी रिंग रोड पर बैरिकेड्स लगा कर वाहनों की जांच शुरू कर दी. तभी डीएल4सीएपी1880 नंबर की एक सैंट्रो कार रोहिणी की तरफ से आई. वह कार बैरिकेड्स के पास पहुंच कर धीमी हुई तो ड्राइविंग सीट पर बैठे धनीराम को पुलिस ने पहचान लिया. हिरासत में ले कर उसे इंसपेक्टर राजपाल डबास अपने औफिस ले आए.

उन्होंने धनीराम से पूछताछ की तो उस ने आसानी से बता दिया कि इस सैंट्रो कार का असली नंबर डीएल4सीएपी0882 था, जिसे उस ने बदल कर फरजी नंबर लगा लिया था. उस ने बताया कि यह कार उस ने दिल्ली के रानीबाग इलाके से चुराई थी. इसे वह किसी को बेचने जा रहा था. धनीराम ने बताया कि जालसाजी और कार चोरी करना उस का एक शौक है और शौक आसानी से नहीं छूटता.

उस ने बताया कि फरजी जमानती वारंट के जरिए वह अब तक ढाई हजार से ज्यादा मुलजिमों को विभिन्न जेलों से निकलवा चुका है. इंसपेक्टर राजपाल डबास को केवल कार चोरी के मामले में उस की तलाश थी. उन्हें यह भी पता चला कि वह चंडीगढ़ कोर्ट द्वारा भगोड़ा घोषित किया जा चुका है, इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ पुलिस को भी उस की गिरफ्तारी की सूचना दे दी. दिल्ली पुलिस की सूचना पर अगले दिन चंडीगढ़ पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पुलिस ने जब धनीराम को रोहिणी कोर्ट में पेश किया तो वहीं से चंडीगढ़ पुलिस उसे ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ ले गई.

धनीराम मित्तल बहुत ही होशियार शख्स है. लेकिन उस ने अपनी शिक्षा और काबिलियत को गैरकानूनी कामों में प्रयोग किया. अपनी काबिलियत के बूते पर वह किसी सरकारी विभाग में बड़ा अधिकारी बन सकता था, पर उस ने शुरुआत में ही ऐसे रास्ते पर कदम बढ़ा दिए, जिन का अंजाम हमेशा गलत ही होता है. पता चला है कि उस के रास्ते पर उस का बेटा संजय कुमार मित्तल भी चल निकला है. बहरहाल अब देखना यह है कि जेल से छूटने के बाद वह क्या करता है. Haryana Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आध

Love Crime Story: प्यार में अंधी सोनम की करतूत

Love Crime Story: सोनम जिस नवीन से प्रेम करती थी, वह उसी के गोत्र का था. इसलिए मांबाप उस की शादी नवीन से करने को तैयार नहीं थे. जबकि सोनम अपनी जिद पर अड़ी थी. जब उस के पिता ने कहा कि उन के जीतेजी यह विवाह नहीं हो सकता तो सोनम ने तय कर लिया कि…

हरियाणा के जिला रोहतक के गांव कबूलपुर निवासी फौजी भूपेंद्र सिंह की आंखों के सामने बारबार वह हृदयविदारक घटना घूम जाती थी, जब उन की मां भूरी देवी, बड़े भाई सुरेंद्र सिंह, भाभी प्रमिला, बड़े भाई के बेटे अरविंद, उन की खुद की बेटियों सोनिका, मोनिका और बेटे विशाल की गला घोंट कर बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. दिल दहला देने वाले इस हत्याकांड को किसी और ने नहीं, उन के बड़े भाई सुरेंद्र सिंह की लाडली बेटी सोनम ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अंजाम दिया था. वह हवस में इस कदर अंधी हो गई थी कि जिन मांबाप ने उसे पैदा किया था, जिस दादी की गोद में पलीबढ़ी थी और जिन भाईबहनों के साथ खेलकूद कर जवान हुई थी, प्रेमी के साथ मिल कर उन्हीं लोगों को मार दिया था.

इस अपराध को अंजाम देने में सोनम, उस का प्रेमी नवीन और नवीन का दोस्त जसबीर शामिल था. इस मामले में 6 मार्च को अदालत में उन के किए की सजा सुनाई गई. उस दिन फौजी भूपेंद्र सिंह ने सुबह नहाधो कर मन ही मन यही प्रार्थना की थी कि जिन लोगों ने उन के घर वालों की बेरहमी से हत्या की है, उन्हें कठोर से कठोर सजा मिले, जिस से उन्हें भी पता चले कि जिंदगी की कीमत क्या होती है.

इस के बाद वह अपने बच्चों की फोटो निकाल कर उन के मासूम चेहरों को काफी देर तक एकटक ताकते रहे. फोटो देखतेदेखते उन की आंखों से आंसू की धारा बह निकली. तभी उन के पिता तकदीर सिंह ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘देख लेना बेटा, कानून उन्हें उन के किए की ऐसी सजा देगा कि फिर जल्दी कोई ऐसा करने की सोचेगा भी नहीं.’’

पिता की बात पर भूपेंद्र सिंह ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘अगर ऐसा हुआ तो बाबूजी मां, भाइयाभाभी और बच्चों की आत्मा को जरूर शांति मिल जाएगी.’’

इस के बाद बापबेटे बोझिल मन से कमरे से बाहर निकले और नाश्ता कर के रोहतक के लिए रवाना हो गए. आम दिनों की अपेक्षा 6 मार्च को रोहतक के सेशन जज श्री सुशील कुमार गुप्ता की अदालत के बाहर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ दिखाई दे रही थी. जिन लोगों के मुकदमों की तारीखें थीं, वे तो आए ही थे, इस के अलावा वहां तमाम पत्रकार भी जमा थे. उस दिन न्यायालय की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या को देख कर ही इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था कि उस दिन श्री सुशील कुमार गुप्ता की अदालत में किसी खास मुकदमे का फैसला आने वाला है.

भूपेंद्र सिंह भी अपने पिता के साथ अदालत पहुंच गए और बाहर पड़ी बैंच पर बैठ कर पुकार का इंतजार करने लगे. थोड़ी देर बाद जज श्री सुशील कुमार गुप्ता अदालत में आ कर अपनी कुर्सी पर बैठे तो वहां सन्नाटा पसर गया. उन के इशारे पर पेशकार ने पुकार कराई तो भूपेंद्र सिंह के मुकदमे की अभियुक्ता सोनम, उस के प्रेमी नवीन और उस के साथी जसबीर को ला कर कटघरे में खड़ा कर दिय गया. लंबी सुनवाई के बाद उस दिन उन के मुकदमे का फैसला आने वाला था. बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष के वकीलों के बीच सजा को ले कर अंतिम बहस शुरू हुई. इस मामले में क्या फैसला आया, जानने से पहले आइए हम यह जान लेते हैं कि यह सोनम कौन है, उस ने अपने प्रेमी नवीन के साथ मिल कर अपने ही घर के 7 लोगों की बेरहमी से हत्या क्यों की थी?

हरियाणा के जिला रोहतक के गांव कबूलपुर में तकदीर सिंह डागर अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी भूरी देवी के अलावा 2 बेटे थे, बड़ा सुरेंद्र सिंह और उस से छोटा भूपेंद्र सिंह. तकदीर सिंह ने बेटों की परवरिश और शिक्षादीक्षा पर विशेष ध्यान दिया था. इसी का नतीजा था कि पढ़ाई पूरी होते ही सुरेंद्र सिंह को वन विभाग में नौकरी मिल गई थी तो भूपेंद्र सिंह को सेना में. दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हो गए तो उन के रिश्ते आने लगे.

तकदीर सिंह ने बड़े बेटे सुरेंद्र सिंह की शादी साल्हावास से विधायक रह चुके जिले सिंह की बेटी प्रमिला से की थी. प्रमिला सुंदर, सुशील और संस्कारी युवती थी. इसलिए उसे पत्नी के रूप में पा कर सुरेंद्र सिंह खुद को धन्य समझ रहे थे. प्रमिला भी कमाऊ और जान से बढ़ कर प्यार करने वाला पति पा कर खुद को भाग्यशाली मान रही थी.

परिवार में किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी. समय हंसीखुशी से गुजर रहा था. इसी गुजरते समय में प्रमिला और सुरेंद्र सिंह बेटे अरविंद और बेटी सोनम के मांबाप बन गए. पतिपत्नी बच्चों का लालनपालन लगन से करने लगे. भूपेंद्र सिंह की भी सेना में नौकरी लग गई थी तो तकदीर सिंह ने उस की भी शादी कर दी थी. भूपेंद्र सिंह के 3 बच्चे हुए, 2 बेटियां सोनिका, मोनिका और एक बेटा विशाल. लेकिन शायद कुदरत को भूपेंद्र की यह खुशी अच्छी नहीं लगी, इसलिए घटना के डेढ़ साल पहले उन की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी.

बच्चे छोटे थे और भूपेंद्र सिंह नौकरी की वजह से बाहर रहते थे, इसलिए सुरेंद्र सिंह ने भूपेंद्र सिंह के बच्चों को अपने साथ रख लिया था. सुरेंद्र सिंह की बेटी सोनम सयानी हुई तो जीवन के रंगीन सपने देखने लगी. उन्हीं में भावी राजकुमार का सपना भी था. उसी बीच एक दिन वह अपने घर के बाहर खड़ी थी, तभी उस की नजर सामने साइकिल से उतर रहे एक युवक पर पड़ी.

वह युवक एकटक उसे ही ताक रहा था. युवक की हरकत उसे अच्छी तो नहीं लगी, पर उस की नजरों में ऐसा आकर्षण था कि वह चाह कर भी उसे कुछ नहीं कह सकी. वह युवक उसे उसी तरह ताकता रह गया तो सोनम को उस की हिम्मत पर हैरानी हुई. कुछ देर तक वह उसे उसी तरह एकटक ताकता रहा, उस के बाद मुसकराते हुए सोनम के घर से कुछ दूरी पर स्थित एक घर में घुस गया. युवक तो चला गया, लेकिन उस ने नजरों का जादू चला कर सोनम के दिल में हलचल मचा दी थी. उस का चेहरा अब उस की नजरों के सामने नाचने लगा था. उसे जब भी उस की मुसकराहट याद आती, वह बेचैन हो उठती.

युवक कौन था, कहां का रहने वाला था, यह जानने के लिए सोनम की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. धीरेधीरे उस की स्थिति अजीब होती जा रही थी. वह उस युवक के बारे में जितना सोचती थी, उस के आकर्षण का जादू उतनी ही तेजी से उस के रोमरोम में समाता जा रहा था. आखिर जब उस की बेचैनी हद पार करने लगी तो उस ने युवक के बारे में अपनी एक सहेली से पता किया. सहेली के बताए अनुसार, युवक का नाम नवीन था और वह कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा कर रहा था. वह उस की खूबसूरती और गदराए जिस्म का दीवाना हो चुका था. उस की एक झलक पाने के लिए वह हमेशा लालायित रहता था.

आग दोनों तरफ बराबर लग चुकी थी, इसलिए नवीन को शीशे में उतारने के लिए सोनम ने पहल की तो जल्दी ही उसे कामयाबी मिल गई. इसे टीवी का प्रभाव कहें या किशोर उम्र की फिसलन, सोनम को पढ़ाई के दौरान ही यह प्रेमरोग लग गया था. जल्दी ही दोनों मिलनेजुलने ही नहीं लगे, बल्कि घंटोंघंटों फोन पर प्यार में डूबी बातें भी करने लगे थे. सोनम का जब भी नवीन से मिलने का मन होता या समय मिलता, वह फोन कर के समय और जगह बता देती. नवीन वहां समय से पहले पहुंच जाता. इस तरह दोनों एकांत में भी मिलने लगे थे. समय के साथ दोनों का प्रेम परवान चढ़ा तो मन के साथ तन मिलने में भी देर नहीं लगी.

बुराई कोई भी हो, ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहती. यहां भी यही हुआ. सोनम और नवीन के प्यार की खुशबू फैली तो घर वालों की नाक तक पहुंच गई. जब सुरेंद्र सिंह और प्रमिला तक सोनम के प्यार की महक पहुंची तो पतिपत्नी सन्न रह गए. इस की एक वजह यह थी कि एक तो सोनम ने अपने मन से प्यार कर के उन्हें आघात पहुंचाया था, दूसरे इस से भी बड़ा आघात यह था कि नवीन उन्हीं के गोत्र का था.

हरियाणा में तो प्यार करना ही गुनाह है, ऊपर से अगर प्यार सगोत्री है तो प्यार करने वालों को मौत तक का फरमान सुना दिया जाता है. भला ऐसे में सुरेंद्र सिंह और उन का परिवार कैसे बरदाश्त करता कि उन की बेटी एक सगोत्री लड़के से प्यार करे. लिहाजा सोनम के घर वाले बंदिशें लगा कर उस पर नजर रखने लगे. घर वालों ने उस का मोबाइल भी छीन लिया. मिलना तो मुश्किल हो ही गया था, बातचीत में भी बाधा पड़ी तो नवीन ने एक मोबाइल फोन और सिम ला कर सोनम को दे दिया. इस के बाद दोनों एकदूसरे से अपनी पीड़ा बयां करने लगे. सोनम ने बारहवीं पास कर के बीए में दाखिला लिया तो एक बार फिर नवीन से मिलने का उस का रास्ता खुल गया.

जब सोनम के घर वालों को पता चला कि वह नवीन से घर के बाहर मिलती है तो घर वालों ने घरपरिवार की इज्जत की दुहाई दे कर उसे नवीन से संबंध खत्म कर लेने के लिए खूब समझाया. लेकिन नवीन के प्यार में पागल सोनम को घर वालों की बातें अच्छी लगने के बजाय बुरी लगीं. इस के बाद भी वह नवीन से चोरीछिपे मिलती रही. सुरेंद्र सिंह बेटी की हरकतों से तंग आ गए तो उन्होंने उसे हौस्टल में डाल दिया. सोनम के घर वालों का सोचना था कि नवीन से दूर रह कर शायद सोनम उसे भूल जाएगी, लेकिन उन की यह सोच उलटी पड़ गई.

सोनम के हौस्टल में भेजे जाने की जानकारी नवीन को हुई तो वह भी शहर में किराए पर कमरा ले कर रहने लगा. वहां कोई रोकनेटोकने वाला तो था नहीं, इसलिए दोनों खुल कर मिलनेजुलने लगे. परिणामस्वरूप उन का प्यार इतना गहरा हो गया कि वे जुदाई की बात से ही सहम उठते थे. शायद यही वजह थी कि दोनों ने घर वालों की चोरी महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के पार्क में शादी कर ली थी.

जब इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो उन्होंने सोनम की पढ़ाई छुड़वा कर घर में कैद कर दिया. लेकिन सोनम की मोबाइल फोन से नवीन से बातें होती रहती थीं. घर वालों की सख्ती से सोनम परेशान थी और उन की बातों से वह जान गई थी कि घर वाले किसी भी कीमत पर उस का ब्याह नवीन से नहीं करेंगे. जबकि उसे लगता था कि नवीन के बिना वह रह नहीं पाएगी. नवीन भी बारबार उस से यही कहता था कि वह भी उस के बिरा नहीं रह सकता. किसी दिन बातचीत में जब सुरेंद्र सिंह ने कहा कि उन के जीतेजी यह शादी नहीं हो सकती तो सोनम के मन में आया कि उन के मरने के बाद तो हो सकती है. बस उस ने तय कर लिया कि वह ब्याह करेगी तो नवीन से ही, भले ही घर वालों को मारना ही क्यों न पड़े.

इस के बाद सोनम ने इस विषय पर नवीन से बात की तो वह भी राजी हो गया. दोनों ने इस विषय पर गहराई से सोचाविचारा. इस तरह नवीन के प्यार में अंधी सोनम ने अपने घर वालों को खत्म करने की योजना बना डाली. इसी योजना के अनुसार, नवीन ने अपने दोस्त जसबीर से नशे की गोलियां मंगवाई. जसबीर का दोस्त ओमवीर कैमिस्ट था. जसवीर उस से नशे की 100 गोलियां ले आया और नवीन को दे दीं. नवीन ने वे सारी गोलियां सोनम को दे दीं. उस दिन रात का खाना सोनम ने ही बनाया. उस ने नवीन द्वारा दी गई नशे की गोलियां आटे और सब्जी में मिला दीं. नशे की गोलियां पड़ी होने की वजह से रात का खाना खाने के बाद घर के सभी लोग गहरी नींद सो गए. इस के बाद सोनम ने फोन कर के नवीन को बुला लिया.

जिस समय नवीन सोनम के घर आया, उस समय रात के 10 बज रहे थे. सोनम ने सब से पहले अपने मातापिता सुरेंद्र सिंह और प्रमिला के गले में रस्सी डाल कर गला घोंटा. इस के बाद सामने वाले मकान में सो रही दादी भूरी देवी, भाई अरविंद और फिर चाचा की बेटियों सोनिका, मोनिका तथा बेटे विशाल की कपड़े से गला घोंट कर हत्या कर दी. अपने ही घरपरिवार के 7 लोगों की हत्या करने के बाद सोनम को खुद को बचाने की चिंता हुई. इस के लिए उस ने सोचाविचारा तो उसे लगा कि कुछ ऐसा किया जाए कि लोगों को लगे कि ये हत्याएं लूट के लिए की गई हैं. इस के लिए उस ने नवीन के साथ मिल कर घर का सामान इधरउधर फैला दिया. इतना सब कर के दोनों ने लाशों के बीच अपने जिस्म की प्यास भी बुझाई.

इस के बाद नवीन अपने घर चला गया तो सोनम ने बेहोशी का नाटक करते हुए खुद को बाथरूम में बंद कर लिया. इस के अगले दिन नवीन छारा गांव के रहने वाले अपने मामा के घर चला गया. तकदीर सिंह रात को सोने के लिए गांव के बाहर वाले मकान पर चले जाते थे. सुबह की चाय उन के लिए वहीं पहुंचाई जाती थी. उस दिन वह फ्रैश हो कर रोज की तरह चाय का इंतजार करने लगे. काफी देर तक जब उन के लिए कोई चाय ले कर नहीं आया तो उन्हें चिंता हुई कि आखिर कोई चाय ले कर क्यों नहीं आया.

जब काफी देर हो गई तो तकदीर सिंह घर की ओर चल पड़े. घर पहुंच कर उन्होंने दरवाजा खटखटाने के लिए हाथ बढ़ाया तो वह खुल गया. घर का दरवाजा खुला देख कर उन्हें हैरानी हुई. उन्होंने आवाज लगाई. आवाज लगाने पर जब कोई जवाब नहीं आया तो उन का दिल धड़क उठा. धड़कते दिल से वह अंदर दाखिल हुए तो उन का दिल जिस आशंका से धड़का था, वह गलत नहीं थी. अंदर कमरे में बेटा सुरेंद्र और उस की पत्नी प्रमिला बैड पर बेसुध पड़ी थी.  नजदीक पहुंच कर जब उन्होंने उन के गले पर पड़े निशान देखे तो उन के मुंह से चीख निकल गई.

चीख इतनी तेज थी कि आसपड़ोस वाले जैसे थे, उसी हालत में उन के पास पहुंच गए. देखते ही देखते काफी संख्या में लोग जमा हो गए. तकदीर सिंह सामने वाले घर में पहुंचे तो वहां पत्नी और पोतेपोतियों की लाशें देख कर सिर थाम कर जमीन पर बैठ गए. सुरेंद्र की बड़ी बेटी सोनम कहीं दिखाई नहीं दे रही थी. उस की तलाश शुरू हुई तो वह बाथरूम में बेहोश मिली. उसे तत्काल इलाज के लिए पीजीआई भेज दिया गया.

मकान के चौबारे में 2 इलैक्ट्रीशियन सोए थे. दोनों सुरेंद्र के मकान में बिजली फिटिंग करने आए थे. रात को वे वहीं रुक गए थे. दोनों को सुबह गांव वालों ने जगाया तो उन्हें घटना का पता चला. पूछताछ में उन्होंने बताया कि रात का खाना खाने के बाद पता नहीं क्या हुआ कि वे इतनी गहरी नींद सो गए कि उन की आंख उन लोगों के जगाने पर खुली है. एक ही परिवार के एक साथ 7 लोगों की हत्या से पूरे गांव में मातम फैल गया था. किसी ने इस घटना की जानकारी पुलिस को दे दी थी. घटना अति गंभीर थी, इसलिए सूचना मिलते ही थाना पुलिस ही नहीं, जिले के सभी पुलिस अधिकारी भी गांव कबूलपुर पहुंच गए थे.

पुलिस जांच शुरू होते ही पुलिस को पता चल गया कि पुलिस का ध्यान बंटाने के लिए घर का सामान फैलाया गया है, जबकि असल में ऐसा कुछ भी नहीं था. पुलिस ने फोरैंसिक एक्सपर्ट, डौग स्क्वौयड आदि को भी बुला लिया था. लेकिन इस सब से पुलिस को तत्काल कोई सफलता नहीं मिली थी. तकदीर सिंह का कहना था कि उन की किसी से ऐसी दुश्मनी नहीं थी कि इस तरह उन के परिवार को मार देता. पुलिस ने घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर के सभी लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. इस के बाद सुरेंद्र सिंह के मामा की शिकायत पर कर्मवीर, उस की पत्नी और एक अन्य रिश्तेदार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के जांच शुरू कर दी गई.

चूंकि मामला एक पूर्व विधायक की बेटीदामाद और सैनिक के बच्चों की हत्या का मामला था, इसलिए पुलिस इस मामले के खुलासे के लिए जीजान से जुट गई थी. लेकिन कहीं से कोई सुराग नहीं मिल रहा था. लेकिन जब डीएसपी हैडक्वार्टर दलवीर यादव ने सोनम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की एक नंबर पर लगातार और लंबीलंबी बातें होती थीं. जब उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नवीन का नंबर निकला.

इस बीच पुलिस को पता चल गया था कि सोनम और नवीन के बीच प्रेमसंबंध चल रहा था, जिस को ले कर सोनम के घर में कलह चल रही थी. 2 दिनों बाद पीजीआई से डिस्चार्ज होने के बाद पुलिस ने पूछताछ के लिए सोनम को थाने बुला लिया. पूछताछ शुरू हुई तो सोनम ने इधरउधर की बातें कर के पुलिस को बरगलाने की काफी कोशिश की. लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो हवस में अंधी एक ऐसी लड़की की कहानी उस ने सुनाई, जिस ने जिस मांबाप ने पैदा किया था, जिस दादी की गोद में वह पलीबढ़ी थी और जिन भाईबहनों के साथ खेलकूद कर जवान हुई थी, उन सभी को प्रेमी के साथ मिल कर मार दिया था.

सोनम के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने नवीन को उस के मामा के गांव छारा से गिरफ्तार कर लिया था. इस के बाद पुलिस ने उस के दोस्त जसबीर और उस के कैमिस्ट दोस्त ओमवीर को भी गिरफ्तार कर लिया. सभी को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस के बाद पुलिस ने समय से अदालत में चार्जशीलट पेश कर दी, जिस के बाद अदालती काररवाहियों का सिलसिला शुरू हुआ. सुनवाई के दौरान इस बहुचर्चित हत्याकांड में सोनम और नवीन के लिए फोरैंसिक टीम की रिपोर्ट और नवीन द्वारा सोनम को दिया गया फर्जी पते पर सिम गले की फांस बन गया. फोरैंसिक टीम ने जांच में घर के अंदर खड़ी मोटरसाइकिल के शीशे पर नवीन के फिंगरप्रिंट पाए थे. इस के अलावा मृतकों के विसरा में मिला नशीला पदार्थ और सब्जी तथा आटे में मिला पदार्थ एक ही पाया गया था.

पूछताछ में इलैक्ट्रीशियन ने बताया था कि उस रात सोनम ने ही खाना बना कर सभी को खिलाया था. उन्हें भी वही खाना दिया गया था, जो परिवार के अन्य सदस्यों को दिया गया था. उन की भी गवाही मुकदमे में अहम साबित हुई थी. नवीन की निशानदेही पर पुलिस ने दवा के रैपर एक खंडहर से बरामद किए थे. यह मुकदमा करीब साढ़े 4 साल तक चला. अंत में सेशन जज श्री सुनील कुमार गुप्ता की अदालत ने सोनम, उस के प्रेमी नवीन और जसवीर को दोषी करार दिया, जबकि इस हत्याकांड में ड्रग्स एक्ट के तहत नामजद ओमवीर को कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया.

सजा के लिए हुई बहस में पीडि़त पक्ष के वकीन ने फांसी की मांग की. इस के लिए रेलूराम पुनिया हत्याकांड और उत्तराखंड के सुंदर मामले का उदाहरण दिया गया. इन दोनों मामलों में परिवार के लोगों की सामूहिक हत्या की गई थी और इन में फांसी की सजा सुनाई गई थी. जबकि बचाव पक्ष ने जीने का अधिकार की बात करते हुए फांसी न दिए जाने की मांग की.

दोनों पक्षों की बहस के बाद जज श्री सुशील कुमार गुप्ता लंच के बाद 2 बज कर 5 मिनट पर कुर्सी पर बिना बैठे ही एक मिनट में फैसला सुना कर अपने केबिन में चले गए थे. अपने प्रेमी के साथ मिल कर परिवार के 7 लोगों को गला घोंट कर मौत के घाट उतारने वाली सोनम और उस के प्रेमी नवीन को उन्होंने फांसी की सजा सुनाई थी, जबकि साजिश में शामिल नवीन के साथ गांव छारा निवासी जसबीर को आजीवन कारावास की सजा दी थी. शाम करीब साढ़े 4 बजे तीनों दोषियों को फैसले की कापी दे कर सुनारिया जेल भेज दिया गया था. Love Crime Story

 

Journalist Death Mystery: पत्रकार पूजा – हत्या या आत्महत्या

Journalist Death Mystery: पूजा की मौत के मामले में पुलिस के शक की सुई भले ही पुलिस इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ की ओर उठ रही हो, लेकिन हकीकत की तह तक वह अभी भी नहीं पहुंच पाई है. क्या हत्या और आत्महत्या के बीच झूलता पूजा की मौत का रहस्य सामने आ सकेगा?

महिला पत्रकार पूजा तिवारी फरीदाबाद के सैक्टर 46 स्थित सद्भावना अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 42 में रहती थी. वह दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक अंग्रेजी अखबार में रिपोर्टर थी. इस अखबार में वह पिछले 3 सालों से काम कर रही थी. फरीदाबाद वाले फ्लैट में पूजा अकेली नहीं बल्कि अपनी रूममेट आफरीन के साथ रहती थी. पूजा अपार्टमेंट की 5वीं मंजिल स्थित जिस फ्लैट में रहती थी, वह उस ने हरियाणा पुलिस के इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ के सहयोग से किराए पर लिया था.

2 मई, 2016 की रात लगभग 11 बजे पूजा के साथ इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ और उस के साथ न्यूजपेपर में काम करने वाली आफरीन फ्लैट में मौजूद थी. रात लगभग साढ़े 11 बजे अपार्टमेंट के एक सिक्योरिटी गार्ड ने धमाके के साथ किसी महिला की चीख सुनी तो वह उस दिशा में दौड़ा, जिधर से आवाज आई थी. कुछ ही दूर आगे सिक्योरिटी गार्ड ने अपार्टमेंट के नीचे फर्श पर एक युवती को खून से लथपथ पड़े देखा. यह हृदय विदारक दृश्य देख कर उस ने शोर मचा दिया. शोर सुन कर अपार्टमेंट में रहने वाले तमाम लोग वहां आ गए. इन में से कुछ लोग मृत युवती को पहचानते थे. वह पत्रकार पूजा तिवारी थी. एक व्यक्ति ने 100 नंबर पर फोन कर के घटना के बारे में पुलिस कंट्रोल रूम को बता दिया.

वह इलाका थाना सूरजकुंड के अंतर्गत आता था. पुलिस नियंत्रण कक्ष ने यह सूचना थाना सूरजकुंड को दे दी. थाना सूरजकुंड के थानाप्रभारी राजेंद्र सिंह सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. राजेंद्र सिंह ने डीसीपी एनआईटी पूरनचंद पवार, पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी तथा सहायक पुलिस आयुक्त गजेंद्र सिंह को भी इस बारे में बता दिया था. पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो वहां काफी भीड़ एकत्र थी. लोग पूजा तिवारी की क्षतविक्षत लाश को घेरे खड़े थे. पुसिल ने उन्हें वहां से हटाया, ताकि काररवाई की जा सके. मृतका के शरीर पर नाइटसूट था. उस की मौत 5वीं मंजिल से गिरने की वजह से हुई थी.

राजेंद्र सिंह लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि डीसीपी पूरनचंद पवार, पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी, सहायक पुलिस आयुक्त गजेंद्र सिंह, फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट तथा क्राइम टीम के साथ मौके पर आ गए. सभी अपनीअपनी काररवाई में लग गए. पूजा 5वीं मंजिल स्थित फ्लैट की बालकनी से चित अवस्था में नीचे गिरी थी. उस का सिर बुरी तरह फट गया था. आसपास काफी मात्रा में खून फैला था. देखने से ही लग रहा था कि उस की मौत हो चुकी है.

क्राइम टीम ने लाश का मुआयना करने के बाद उस के फ्लैट की तलाशी ली तो वहां से शराब और बीयर की कई खाली बोतलें, मेज पर रखी ऐशट्रे में सिगरेट के टोटे और शीशे के 2 गिलास मिले, साथ ही बैड के नीचे 2 कंडोम भी मिले, जिस में एक इस्तेमाल किया हुआ था. सभी चीजों को क्राइम टीम ने सील कर के अपने कब्जे में ले लिया.

पूजा के साथ वाले फ्लैट में रहने वाली महिला आशा भाटिया लाश के पास खड़ी सिसक रही थीं. डीसीपी पूरनचंद पवार ने आशा से पूछा, ‘‘आप मृतका की रिश्तेदार हैं?’’

‘‘जी नहीं,’’ आशा दुपट्टे से आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘पूजा हमारे साथ वाले फ्लैट में रहती थी. मुझ से उस का काफी अपनत्व था. वह मुझे भाभी कहती थी. मैं भी उसे अपनी ननद की तरह मानती थी.’’

‘‘आप के खयाल से यह हादसा है या खुदकुशी?’’ पूरनचंद पवार ने पूछा तो आशा ने बताया, ‘‘पूजा इतनी लापरवाह नहीं थी कि बालकनी से गिर जाती. रही खुदकुशी करने की बात तो मैं यकीन के साथ कह सकती हूं कि वह खुदकुशी कभी नहीं कर सकती थी.’’

‘‘न हादसा न खुदकुशी,’’ पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी ने कहा, ‘‘तो फिर आप यह मान रही हैं कि ये हत्या का मामला हो सकता है?’’

‘‘ऐसा मुझे संदेह है, लेकिन यकीनी तौर पर मैं इस बारे में अभी कुछ नहीं कह सकती.’’

‘‘आप पूजा के काफी नजदीक थीं. क्या आप बता सकती हैं कि पूजा के फ्लैट पर कौनकौन आया करता था?’’ डीसीपी पूरनचंद ने पूछा.

‘‘उस के साथ अखबार में काम करने वाली आफरीन, हरियाणा पुलिस का इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ और कभीकभी पूजा की रूममेट रह चुकी मिडी रीबा आया करती थी. अमित वशिष्ठ इस समय यहीं मौजूद है.’’ कह कर आशा ने पास खड़े इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ की ओर इशारा किया. डीसीपी पूरनचंद पवार ने अमित की ओर देखा. उस के चेहरे पर बदहवासी के भाव थे और आंखें आंसुओं से डबडबा रही थीं.

डीसीपी पूरनचंद पवार को सैल्यूट करते हुए अमित बोला, ‘‘सर, मेरा नाम अमित वशिष्ठ है और मैं फरीदाबाद पुलिस लाइन में हूं.’’

‘‘पूजा के रिश्तेदार हो या जानपहचान वाले?’’ पुलिस आयुक्त हनीफ कुरैशी ने अमित वशिष्ठ के चेहरे की ओर देखते हुए पूछा तो वह एकाएक हड़बड़ा गया. फिर उस ने बताया, ‘‘पूजा एक न्यूजपेपर के साथसाथ एक न्यूज चैनल की रिपोर्टर थी. कवरेज के सिलसिले में उस की मुझ से अकसर मुलाकात होती रहती थी. मैं ने उसे छोटी बहन मान रखा था. वह बहुत मासूम और ईमानदार थी.’’

कहतेकहते अमित हथेलियों से चेहरा छिपा कर फफक पड़ा. डीसीपी पूरनचंद पवार ने उसे चुप कराया, फिर सवाल किया, ‘‘आप इतनी रात गए यहां क्यों आए थे?’’

‘‘मैं पूजा के बुलाने पर रात 9 बजे उस के फ्लैट पर आया था. उस वक्त पूजा के साथ आफरीन भी मौजूद थी. पूजा काफी परेशान थी. उस ने 2 साल पहले अवैध रूप से गर्भपात और गर्भ में लिंग परीक्षण करने वाले डाक्टरों का स्टिंग औपरेशन किया था. डाक्टरों ने उस पर ठगी और ब्लैकमेलिंग का मुकदमा दर्ज करा दिया था. उसी वजह से पूजा को नौकरी से निकाल दिया गया था. पता नहीं रात 11 बजे के बाद उसे क्या हुआ कि वह रोरो कर कहने लगी, ‘लोग मुझे जीने नहीं देंगे.’ फिर वह तेजी से बालकनी की तरफ गई और वहां से छलांग लगा दी.’’

‘‘आफरीन कहां है, उस से भी पूछताछ करनी है?’’ हनीफ कुरैशी ने पूछा तो अमित ने कहा, ‘‘मैं 9 बजे पूजा के फ्लैट पर आया था, उस वक्त आफरीन कौफी पी रही थी. कौफी खत्म कर के वह सोने चली गई थी. आफरीन 3 महीने से पूजा के साथ फ्लैट में रह रही थी.’’

अमित वशिष्ठ से पूजा के पिता का फोन नंबर और पता मिल गया. नंबर और पता नोट करने के बाद हनीफ कुरैशी ने पूजा के पिता रवि तिवारी को फोन पर पूजा की मौत की सूचना दे दी. पूजा के मातापिता और भाई सौरभ इंदौर से 9 मई की दोपहर दिल्ली आ गए. तब तक पूजा का शव पोस्टमार्टम हेतु मोर्चरी में भेजा जा चुका था.

पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने पूजा का शव उस के घर वालों को सौंप दिया. बेटी की मौत के गम में डूबे घर वालों ने दिल्ली में ही उस का दाहसंस्कार कर दिया. पूजा के पिता रवि तिवारी ने थाना सूरजकुंड में फरीदाबाद निवासी डा. अनिल गोयल, उन की पत्नी अर्चना गोयल और झोलाछाप डा. धवल सिंह के खिलाफ पूजा को मानसिक रूप से प्रताडि़त करने तथा खुदकुशी के लिए उकसाने के लिए मुकदमा दर्ज करा दिया.

गौरतलब है कि पूजा तिवारी ने इन्हीं डाक्टरों के खिलाफ स्टिंग औपरेशन किया था. लेकिन इन डाक्टरों ने उस पर ठगी तथा ब्लैकमेलिंग का आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज करा दिया था. इसी वजह से पूजा को नौकरी से निकाल दिया गया था. फिलहाल वह बेरोजगार थी, जिस से तनावग्रस्त थी. इसी कारण पूजा ने आत्महत्या करने का फैसला किया और 5वीं मंजिल से छलांग लगा कर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली.

इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ पूजा के घर वालों का भी काफी करीबी था. वह पूजा के साथ 2-3 बार उस के घर वालों से मिलने इंदौर भी गया था. पूजा के घर वाले उसे अपना फैमिली मैंबर मानते थे. डाक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने से पहले अमित से पूजा के पिता रवि तिवारी की तमाम पहलुओं पर बातचीत हुई थी. उसी के उकसाने पर रवि तिवारी ने डाक्टरों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था. उधर मीडिया द्वारा मामले को प्रमुखता से उछालने के कारण पुलिस की छीछालेदर शुरू हुई तो पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेना शुरू किया.

क्राइमटीम ने पूजा के साथ रहने वाली आफरीन खान से पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘करीब 8 बजे अमित फ्लैट पर आया था. अमित लगभग रोजाना ही आता था. जब भी वह आता था, मैं उन दोनों को अकेला छोड़ कर सोने चली जाती थी. उस रात भी मैं सोने चली गई थी. मेरे पीछे वहां क्या हुआ, मुझे नहीं पता. हां, मैं ने अमित व पूजा की आवाजें जरूर सुनी थीं. उन की आवाजों से लग रहा था, जैसे दोनों में झगड़ा हो रहा हो?’’

‘‘तुम पूजा के बेहद नजदीक थीं. अमित से रिश्तों को ले कर पूजा ने तुम से कुछ खास बातें तो जरूर शेयर की होंगी?’’ हनीफ कुरैशी ने पूछा तो आफरीन ने पल भर सोचने के बाद कहा, ‘‘पूजा ने बस यही बताया था कि अमित उस का फैमिली मैंबर भी है और सब से खास दोस्त भी.’’

‘‘तुम्हारे खयाल से पूजा खुदकुशी कर सकती थी?’’

‘‘बिलकुल नहीं, उस जैसी हिम्मतवाली लड़की, जिस का जीवन संघर्ष और दुश्वारियों से भरा हुआ था, खुदकुशी का विचार भी मन में नहीं ला सकती थी.’’

‘‘तो फिर यह हादसा…’’

‘‘इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकती.’’

क्राइम टीम ने अपार्टमेंट की जांच के दौरान तीसरी मंजिल स्थित एक फ्लैट की बालकनी की रेलिंग को थोड़ा मुड़ा हुआ पाया. इस से यह अनुमान लगाया गया कि जब पूजा 5वीं मंजिल से नीचे गिरी होगी तो उस के नीचे गिरने से पहले उस का शरीर तीसरी मंजिल की रेलिंग से टकराया होगा. क्राइम टीम ने फोरैंकिस एक्सपर्ट की मदद से क्राइम सीन रीक्रिएट कराने के लिए पूजा की कदकाठी की 3 डमी बनवाईं, फिर 3 बार क्राइमसीन रिक्रिएट किया गया. 2 बार डमी नीचे फर्श पर पेट के बल गिरी, जबकि पूजा की डैडबौडी पीठ के बल पड़ी मिली थी.

फोरैंसिक एक्सपर्ट ने इस बाबत बताया, ‘चूंकि पूजा की डैडबौडी पीठ के बल मिली, इस से यह आशंका बलवती होती है कि अगर कोई उसे गोद में उठा कर नीचे फेंकता तो लाश इसी हालत में मिली होती. लेकिन छलांग लगाने के बाद उस का शरीर तीसरी मंजिल की रेलिंग से टकरा कर नीचे गिरा, ऐसी स्थिति में बौडी पेट के बल गिरी होगी.’ पूजा की मौत के तीसरे दिन यानी 11 मई को अमित वशिष्ठ पूजा के पिता रवि तिवारी से मिला. रवि तिवारी को 4 पन्ने दिखाते हुए अमित ने कहा, ‘‘यह पूजा का सुसाइड नोट है, जो मुझे मेज की दराज में रखा मिला है. इस में पूजा ने डाक्टरों के बारे में विस्तार से चर्चा करते हुए लिखा है, ‘उन्हीं लोगों ने मेरी जिंदगी बर्बाद की है. मेरी मौत के जिम्मेदार यही डाक्टर हैं.’

अमित ने आंसू पोंछते हुए आगे कहा, ‘‘पूजा तो हमें छोड़ कर चली गई. उस की आत्मा को तब तक शांति नहीं मिलेगी, जब तक उसे आत्महत्या करने को मजबूर करने वाले डाक्टर सुकून से रहेंगे. आप साथ दें तो पूजा के इस सुसाइड नोट के जरिए हम 1-2 करोड़ रुपए उन डाक्टरों से वसूल सकते हैं.’’

लेकिन रवि तिवारी इस के लिए राजी नहीं हुए. रवि तिवारी ने पूजा का वह सुसाइड नोट पुलिस के हवाले कर दिया. सुसाइड नोट 4 पन्नों का था. वह पहले काले रंग के पेन से, फिर नीले रंग के पेन से लिखा हुआ था. इस से पुलिस का माथा ठनका. पुलिस ने पूजा की रूम पार्टनर आफरीन खान से इस बाबत पूछताछ की तो उस ने बताया, ‘‘पूजा मैजिक पैन से लिखती थी, जिस का रंग ग्रीन था. यह सुसाइड नोट पूजा का लिखा हरगिज नहीं हो सकता.’’

यही बात पूजा के भाई सौरभ ने भी बताई. उस ने रहस्य की एक बात यह भी बताई कि उस ने अमित के पास एक पेन देखा था, जिस में 3 रिफिल थीं. लाल, नीली और काली. यह सुसाइड नोट अमित का लिखा हो सकता है. इस मामले में ट्विस्ट तब आया, जब अरुणाचल प्रदेश की रहने वाली एक युवती मिडी रीबा अखबार में पूजा की मौत की खबर पढ़ कर दिल्ली आई. मिडी रीबा सन 2011 में नोएडा स्थित एक मीडिया हाउस में काम करती थी. वहीं पूजा तिवारी भी काम करती थी, दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी.

सन 2012 में पूजा की नौकरी दिल्ली में लगी तो उस ने साउथ एक्स में किराए पर फ्लैट ले लिया. मिडी रीबा उस की रूममेट बन कर 2 साल तक उस के साथ रही थी. फिर पूजा की नौकरी एक अंगरेजी अखबार में लग गई तो पूजा फरीदाबाद में रहने लगी थी. मिडी रीबा ने क्राइमटीम को बताया, ‘‘सितंबर, 2015 की एक रात मैं फरीदाबाद स्थित पूजा के सद्भावना अपार्टमेंट के फ्लैट में गई थी. उस दिन पूजा मिडी की मुलाकात अमित से कराने वाली थी. पूजा अमित को अपना खास दोस्त बताती थी. रात को अमित आया. वह बहुत ही रूखा इंसान था.

‘‘हम सभी ने बीयर पी, फिर न जाने किस बात को ले कर पूजा व अमित में झगड़ा होने लगा. अमित ने पूजा की बेरहमी से पिटाई कर दी. उस का सिर फट गया और दोनों हाथों में फ्रेक्चर भी हुआ. अमित वहां से चला गया तो मैं उसे एक स्थानीय डाक्टर के पास ले कर गई थी.’’

मिडी रीबा ने आगे कहा, ‘‘पूजा बहुत ही सीधी, सरल स्वभाव की जिंदादिल लड़की थी. वह मीडिया में पौपुलर होना चाहती थी. वह आत्महत्या नहीं कर सकती थी.’’

क्राइम टीम ने पूजा का लैपटौप तथा उस का मोबाइल फोन अमित के पास से बरामद किया है, जो उस ने पंचकूला स्थित घर में रखा हुआ था. पुलिस ने लैपटौप व फोन को खंगाला. पुलिस को उस में से कई ऐसे साक्ष्य मिले, जो यह साबित कर सकते हैं कि पूजा का अमित के साथ कितना गहरा रिश्ता था. बहरहाल पुलिस ने अभी तक इस का खुलासा नहीं किया है.  पूजा तिवारी युवावस्था से ही एक पौपुलर पत्रकार बनने की इच्छुक थी. वह अपनी मां और भाई के काफी करीब थी. सन 2011 में पूजा इंदौर से दिल्ली आई. सब से पहले उसे नोएडा स्थित एक मीडिया हाउस में काम मिला. इस के डेढ़ साल बाद वह दिल्ली में एक न्यूज चैनल से जुड़ी तो अपने सहयोगी अशोक मिश्रा के साथ अवैध रूप से गर्भपात करने वाले डाक्टरों का स्टिंग औपरेशन करने लगी.

अपने जुनून, साहस, लगन और हिम्मत के बूते पर उस ने इस क्षेत्र में काफी नाम व इज्जत कमाई. लेकिन कुछ भ्रष्ट पत्रकारों व डाक्टरों की मिलीभगत से वह ठगी व ब्लैकमेलिंग के झूठे केस में फंस गई. नौकरी छूटने से वह काफी तनाव में रहने लगी थी. पूजा तिवारी की मौत के आठवें दिन पुलिस को फोरैंसिक टीम से घटनास्थल की जांच कराने की याद आई. मधुबन स्थित फोरैंसिक साइंस लैब के एक्सपर्ट्स ने घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस पर कई सवाल उठाए. एक्सपर्ट ने कहा कि 8 दिनों में साक्ष्य नष्ट भी किए जा सकते हैं और गायब भी.

बहरहाल, एक्सपर्ट ने पूजा के कथित सुसाइड नोट की जांच कर के यह पता लगाने की कोशिश की है कि उस में पूजा की राइटिंग है या किसी और की. जबकि पूजा के घर वाले, मिडी रीबा और आफरीन का कहना है कि वह राइटिंग पूजा की नहीं है. पूजा ने आत्महत्या की या उस की हत्या की गई, इस का सारा दारोमदार उस सुसाइड नोट पर है, जिस की फोरैंसिक साइंस लैब के एक्सपर्ट जांच कर रहे हैं. अगर एक्सपर्ट की रिपोर्ट में यह बात सामने आई कि सुसाइड नोट में पूजा की राइटिंग नहीं है तो इंसपेक्टर अमित वशिष्ठ पर पुलिस का शिकंजा कसना लाजिमी है. तभी यह बात सामने आएगी कि पूजा व अमित के रिश्ते किस हद तक थे. बहरहाल अमित को सस्पैंड किया जा चुका है.

पुलिस इस बात पर क्यों गौर नहीं कर रही कि पूजा के बैड के नीचे इस्तेमाल किया एक कंडोम कहां से आया? यदि ऐसा है तो इस मामले में गहरी साजिश होने का प्रबल अंदेशा है. अमित के अलावा शक की सुई आफरीन की तरफ भी उठ सकती है. यकीनन सच सामने आने के बाद कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकता है. पूजा के रूम से मिला इस्तेमाल किया हुआ कंडोम चीखचीख कर कह रहा है कि इस मामले में सैक्स भी एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है. Journalist Death Mystery

 

Queen of Tigers: बाघो की रानी – मछली

Queen of Tigers: 19 साल की हो चुकी बाघिन मछली उम्र के अंतिम पड़ाव पर भले ही जीवन के लिए संघर्ष कर रही हो, लेकिन जवानी के दिनों में उस की दहाड़ से न केवल रणथंभौर अभयारण्य थर्राता था, बल्कि बड़ेबड़े विशालकाय जीव भी भाग खड़े होते थे.

उस का नाम मछली जरूर है, लेकिन वह किसी नदी या समुद्र में तैरने वाली मछली नहीं, बल्कि बाघिन है. उस के बाएं गाल पर मछली जैसा निशान होने की वजह से वन अधिकारियों ने उसे मछली नाम दिया था. करीब 19 साल की मछली राजस्थान के रणथंभौर बाघ अभयारण्य में रहती है. माना जाता है कि बाघबाघिनों के वंश में वह भारत ही नहीं, दुनिया भर की सब से ज्यादा उम्र वाली बाघिन है. मछली को लाइफटाइम अवार्ड सहित दुनिया के कई नामी पुरस्कारों से नवाजा जा चुका है.

मछली रणथंभौर की रौयल बाघिन है. उसे बाघों की रानी भी कहा जाता है. वह लेडी औफ द लेक्स और मगरमच्छों की शिकारी के रूप में भी मशहूर रही है. मछली अब जीवन के आखिरी पड़ाव पर है. जवानी के दिनों में रणथंभौर अभयारण्य में मछली के अपने जलवे थे. रणथंभौर में सब से ज्यादा पर्यटक मछली को ही देखने के लिए आते थे. रणथंभौर की आर्थिक समृद्धि और राजस्थान में वन्यजीव पयर्टन बढ़ाने में मछली का सब से बड़ा योगदान रहा है. यह भी माना जाता है कि राजस्थान ही नहीं, बल्कि गुजरात और मध्य प्रदेश के अभयारण्य भी मछली के वंशजों से आबाद हैं.

मौजूदा समय में मछली की 4 पीढि़यां आसपास के अभयारण्यों में राज कर रही हैं. मछली अब दादी, पड़दादी, सगड़दादी, नानी, पड़नानी और सगड़नानी तक बन चुकी है. रणथंभौर की रानी मछली की कहानी बरसों पुरानी है. उस का जन्म सन 1997 की जुलाई में मानसून के दौरान हुआ था. रणथंभौर के वन कर्मचारियों को उसी वर्ष अक्तूबर के महीने में वह अपनी मां और 2 अन्य शावकों के साथ पहली बार जंगल में विचरण करती दिखाई दी थी. जब वह किशोर अवस्था से जवानी की दहलीज की ओर बढ़ने लगी तो पदचिन्हों के आधार पर पता चला कि वह बाघ वंश की मादा है. उस की मां के साथ जो 2 अन्य शावक थे, वे भी मादा थीं. यानी ये तीनों बहनें थीं.

वनकर्मियों ने उस के बाएं गाल पर मछली जैसा निशान देख कर उस का नाम मछली रख दिया था. उस की मां के माथे पर भी मछली जैसा ही निशान था. उस समय तक अभयारण्यों में बाघबाघिनों के नाम उन की आदत, ताकत, किसी खास निशान या अन्य विशेषताओं के आधार पर रखे जाते थे. बाद में सुरक्षा की दृष्टि से बाघबाघिनों का नामकरण बंद हो गया और उन्हें अंकों के आधार पर टी-1, टी-2, टी-3 आदि कोड नाम दे दिए गए, ताकि उन की पहचान छिपी रहे. अंकों के आधार पर मछली का कोड टी-16 रखा गया. जन्म के करीब डेढ़दो साल बाद मछली अपनी मां की बिना किसी मदद के शिकार करने लगी. सन 1999 में वह अपनी मां से अलग हो गई. मां ने मछली को जंगल का एक हिस्सा सौंप दिया, जिसे मछली ने अपनी टेरिटरी बना लिया.

मछली ने जो टेरिटरी बनाई, वह रणथंभौर अभयारण्य के सब से प्रमुख स्थानों में है. दसवीं शताब्दी में बने ऐतिहासिक रणथंभौर दुर्ग के चारों ओर फैली वनों की हरियाली में विचरण करने वाले वन्यजीवों के लिए कई तालाब और झीलें हैं. मछली अपने यौवन काल में सब से खूबसूरत और ताकतवर बाघिन मानी जाती थी. अपनी ताकत के बल पर उस ने रणथंभौर अभयारण्य में पदम तालाब, मलिक तालाब, तांबाखान, राजबाग हंटिंग पैलेस सहित किले के आसपास के इलाके को अपनी टेरिटरी बना लिया था. झालरा इलाके में भी उस की हुकूमत थी. अपनी टेरिटरी में मछली का ऐसा रुतबा था कि कोई बाघ या बाघिन उधर पैर रखने की हिम्मत नहीं कर सकता था.

मछली अपने जीवन में कम से कम 4 बार गर्भवती हुई. इस दौरान उस ने करीब 9 शावकों को जन्म दिया. कुछ दस्तावेजों में मछली के 5 बार गर्भवती होने और 11 शावकों को जन्म देने का भी जिक्र है, लेकिन सब से ज्यादा पुष्टि 4 बार में 9 शावकों की पैदाइश की है. मछली के संबंध मुख्य रूप से 2-3 नर बाघों से रहे. इन में रणथंभौर का एक शक्तिशाली विशालकाय नर बाघ बंबूराम था. माना जाता है कि बंबूराम से संपर्क से मछली 2 बार गर्भवती हुई. बंबूराम की मौत के बाद मछली के संबंध दूसरे नर बाघ से बने, लेकिन उस के दूसरे पार्टनर बाघों का ज्यादा खुलासा नहीं हो सका. सब से पहले बंबूराम के साथ संबंध से गर्भवती हुई मछली ने सन 2000 में 2 शावकों को जन्म दिया.

ये दोनों नर थे. इन में एक का नाम रखा गया तिरछा कान (स्लंट ईयर). चूंकि उस का एक कान तिरछा था, इसीलिए उसे यह नाम दिया गया था. दूसरे शावक की पूंछ टूटी हुई नजर आने से उस का नाम टूटी पूंछ (ब्रोकन टेल) रखा गया. दिसंबर, 2001 के अंत तक मछली के दोनों शावक जब जवान होने लगे तो उस ने उन्हें अलग कर दिया. दोनों अपनी अलग टेरिटरी बनाने में लग गए, लेकिन अज्ञात कारणों से तिरछे कान वाला बाघ फिर कभी दिखाई नहीं दिया. माना गया कि वह जीवित नहीं रहा. वहीं टूटी पूंछ वाले बाघ की अगस्त, 2003 में रणथंभौर अभयारण्य से लगभग सौ किलोमीटर दूर रेलवे ट्रैक पार करते हुए एक यात्री ट्रेन से टकरा जाने से मौत हो गई.

कहा जाता है कि टूटी पूंछ वाले इस बाघ ने रणथंभौर अभयारण्य छोड़ दिया था और वह अपनी टेरिटरी बनाने के लिए कोटा जिले के दर्रा अभयारण्य की ओर निकल गया था. तभी यह हादसा हुआ था. टूटी पूंछ वाले इस बाघ की मौत के बाद उस के जीवन पर एक फिल्म भी बनाई गई. यह फिल्म बीबीसी सहित कई चैनलों पर दिखाई गई. इस फिल्म ने दुनिया का प्रतिष्ठित वाइल्ड लाइफ फिल्म फेस्टिवल अवार्ड जीता था. दूसरी बार बंबूराम के साथ बने संबंध से सन 2002 के अप्रैलमई महीने में मछली के गर्भ से 2 शावक पैदा हुए. इन में एक नर और एक मादा थी. मादा शावक का नाम रखा गया झुमरी और नर शावक का झुमरू. माना जाता है कि इस के बाद बंबूराम की मौत हो गई.

इस बीच झुमरी और झुमरू जवान होने लगे थे और अपनी मां से अलग हो कर अपनी टेरिटरी बनाने में लगे हुए थे. झुमरू ने लाहपुर में अपी टेरिटरी बनाई. लाहपुर की टेरिटरी एक नर बाघ की मौत से खाली हुई थी. वहीं मां से अलग होने के बाद झुमरी के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिल सकी. मछली अभी जवान थी. बंबूराम की मौत से उस के जीवन में खालीपन आ गया था, लेकिन जल्दी ही वह रणथंभौर के एक अन्य नर बाघ के संपर्क में आ गई. हालांकि इस नर बाघ की पहचान के बारे में कभी ज्यादा खुलासा नहीं हुआ, लेकिन कहा जाता है कि बंबूराम की मौत के बाद कटे कान वाले एक विशालकाय नर बाघ ने बंबूराम की टेरिटरी पर कब्जा कर लिया था.

कटे कान वाले इसी नर बाघ से बने संबंधों के बाद तीसरी बार गर्भवती हुई मछली ने सन 2004 के अप्रैल महीने में फिर 2 शावकों को जन्म दिया. इन में एक नर था और एक मादा. वन अधिकारियों ने प्यार से इन के नाम बंटी और बबली रखे. यह वह समय था, जब बौलीवुड फिल्म ‘बंटी और बबली’ चर्चाओं में थी. इस फिल्म के मुख्य किरदारों के नाम पर ही इन के नाम बंटीबबली रखे गए. वन विभाग के अधिकारी मानते थे कि 3 बार में 6 शावकों को जन्म देने के बाद मछली की प्रजनन क्षमता कम हो गई होगी, लेकिन ऐसा नहीं था. वन अधिकारियों की इस धारणा को गलत साबित कर के मछली चौथी बार गर्भवती हुई.

माना जाता है कि इस बार मछली के संपर्क किसी तीसरे नर बाघ से रहे, क्योंकि कटे कान वाला नर बाघ अकाल मौत का शिकार हो गया था. मछली ने चौथी बार में 3 शावकों को जन्म दिया. ये तीनों ही मादा थीं. इन के नाम रखे गए टी-17, टी-18 और टी-19, इन में टी-17 का निक नेम था सुंदरी और टी-19 का कृष्णा. इस तरह मछली ने 5 मादा और 4 नर शावकों को जन्म दिया. कहा यह भी जाता है कि मछली ने सन 2005 में भी 2 शावकों को जन्म दिया था. ये दोनों मादा थीं. कुछ दस्तावेजों में इस का उल्लेख भी मिलता है. अगर इन 2 शावकों को जोड़ा जाए तो मछली ने 5 बार में 11 शावक पैदा किए.

वन अधिकारी मानते हैं कि रणथंभौर में बाघों की वंश वृद्धि में मछली की सब से अहम भूमिका रही है. राजस्थान और आसपास के इलाकों में 60 फीसदी बाघबाघिन मछली के ही वंशज माने जाते हैं, उन की नसों में किसी न किसी रूप में मछली का ही रक्त दौड़ रहा है. मछली ने जन्म के बाद हर बार अपने शावकों की सुरक्षा मे कोई कमी नहीं छोड़ी. वह नर बाघ और दूसरे खूंखार जंगली जानवरों से अपने बच्चों को बचाने के लिए उन से भिड़ जाती थी. मछली अपनी जवानी के दिनों में बहुत दबंग थी. उस की दहाड़ सुन कर नर बाघ तक दुम दबा कर भाग जाते थे.

अपनी ताकत और शिकार कौशल के लिए भी मछली की अलग पहचान रही. रणथंभौर बाघ अभयारण्य में पानी के स्रोत के रूप में कई प्रमुख तालाब हैं. इन में राजबाग तालाब, पदम तालाब, मलिक तालाब आदि शामिल हैं. अभयारण्य में कई झीलें भी हैं. इन तालाबों और झीलों में बड़ी संख्या में मगरमच्छ हैं. मछली ने अपनी जवानी में कई मगरमच्छों का शिकार किया. सन 2007 में मछली अपने चौथे प्रसव के कुछ महीने बाद तीनों नन्हे शावकों को महफूज रखने के लिए राजबाग हंटिंग पैलेस ले जा रही थी. इस हंटिंग पैलेस तक पहुंचने का रास्ता तालाब से हो कर जाता है.

इस तालाब में मगरमच्छों का राज है. तालाब पार करते वक्त एक विशालकाय मगरमच्छ ने मछली के एक शावक को दबोच लिया. मगरमच्छ की इस हरकत से मछली गुस्से में भर गई. वह उस से भिड़ गई. कई घंटे चली मुठभेड़ में मछली ने उस 14 फुट लंबे मगरमच्छ को मार गिराया. मगरमच्छ को मार कर मछली ने अपना शावक तो बचा लिया, लेकिन उस ने अपने 2 कैनाइन दांतों को खो दिया. बाघबाघिनों की ताकत उन के आगे के 4 लंबे व नुकीले कैनाइन दांत ही होते हैं. इन्हीं दांतों से ये अपने शिकार की चीरफाड़ करते हैं. मछली के 2 कैनाइन दांत उस मगरमच्छ से मुठभेड़ में टूट गए.

राजस्थान के प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हैड औफ फौरेस्ट फोर्स रहे भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी आर.एन. मेहरोत्रा बताते हैं कि आमतौर पर जंगलों में बाघबाघिन की सामान्य उम्र 12 से 14 साल होती है. यह गौरव की बात है कि रणथंभौर की बाघिन मछली लगभग 19 साल की उम्र में भी खुद को जीवित रखने के लिए संघर्षरत है. मेहरोत्रा को वन एवं वन्यजीव प्रबंधन का 39 साल का अनुभव है. वह 2005 से 2010 तक राजस्थान के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक रहे हैं. इस के बाद वह दिसंबर, 2011 तक राजस्थान में वन विभाग के सब से बड़े पद प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं हैड औफ फौरेस्ट फोर्स रहे. वह राज्य सरकार की ओर से गठित वन एवं वन्यजीव प्रबंधन की राज्य एंपावर्ड कमेटी के सचिव भी रहे.

राजस्थान से सेवानिवृत्त होने के बाद मेहरोत्रा अब दिल्ली में रहते हैं. वह केंद्र सरकार और वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया, देहरादून के विशेष सलाहकार मंडल में शामिल हैं. मेहरोत्रा आजकल भारत सहित विदेशों में मुख्यरूप से अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ सलाहकार के रूप में काम कर रहे हैं. मेहरोत्रा ने राजस्थान में 39 साल की भारतीय वन सेवा की नौकरी के दौरान छोटे से ले कर सब से बड़े पद पर रहते हुए वनों और वन्यजीवों को बहुत नजदीक से देखा है. सैकड़ों बार भ्रमण के कारण वह रणथंभौर एव सरिस्का अभयारण्यों में एकएक बाघबाघिन को पहचानते हैं. रणथंभौर अभयारण्य की मछली उन की प्रिय बाघिन रही है.

मेहरोत्रा बताते हैं कि रणथंभौर की समृद्धि में मछली का बहुत बड़ा योगदान रहा है. राजस्थान के प्राकृतिक सौंदर्य, वनों एवं वन्यजीवों के अलावा परिंदों को देखने आने वाले देसीविदेशी पर्यटक मछली को देख कर एक खास तरह का रोमांच मायूस करते हैं. रणथंभौर अभयारण्य आने वाले वन्यजीव प्रेमियों और सैलानियों की सब से पहली इच्छा मछली को देखने की होती थी. अपने अनुभवों के आधार पर मेहरोत्रा बताते हैं कि शावकों का सब से बड़ा दुश्मन उस को जन्म देने वाला पिता ही होता है. उस पिता को डर रहता है कि जवान होते ही शावक उस की टेरिटरी (क्षेत्राधिकार) में अपना आधिपत्य जमा लेगा.

कोई भी नर बाघ अपनी टेरिटरी में दूसरे बाघ का दखल बर्दाश्त नहीं करता. इसीलिए वह अपने ही शावकों को मारने की फिराक में रहता है, लेकिन अपनी कोख से जन्म देने वाली मां उन शावकों को पिता की बुरी नजरों से बचाती है. बाघिन अपने शावकों को करीब डेढ़ साल तक साथ रखती है. इस दौरान वह उन शावकों को जीवन जीने और शिकार करने के तरीकों के साथसाथ संघर्ष करने के गुर भी सिखाती है. मेहरोत्रा बताते हैं कि जंगल का अपना नियम है. जंगलों में रोजाना अपने आधिपत्य और क्षेत्राधिकार के लिए संघर्ष होता है. इस संघर्ष में वही जीतता है, जो ताकतवर होता है.

मछली के सम्मान में भारत सरकार ने पोस्टल कवर एवं डाक टिकट जारी किए थे. मछली का फेसबुक पेज भी है. उस के फालोअर्स की तादाद लाखों में है. मछली पर दुनिया के कई नामी वन्यजीव लेखकों ने पचासों किताबें लिखी हैं. उस पर हजारों लेख लिखे जा चुके हैं. दुनियाभर के मशहूर फोटोग्राफरों ने मछली के लाखों फोटो खींचे हैं. वह दुनियाभर में एकलौती ऐसी बाघिन है, जिस की सब से ज्यादा फोटोग्राफी हुई है. उस के जीवन पर टाइगर क्वीन शीर्षक से 50 मिनट की कहानी नेशनल ज्योग्राफिक एंड एनिमल प्लेनेट पर दिखाई गई थी. बीबीसी के नेचुरल वर्ल्ड कार्यक्रम में भी क्वीन औफ टाइगर शीर्षक से मछली की कहानी प्रसारित हुई थी.

इंग्लैंड की टै्रवल इंडस्ट्री के प्रमुख संगठन टै्रवल औपरेटर्स फौर टाइगर्स (टीओएफटी) ने मछली को लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड से नवाजा था. मशहूर वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर आदित्य डिकी सिंह ने एक जवान विशालकाय नर बाघ से मछली की भिड़ंत की कई फोटो खींची थीं. एक लेख में अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने लिखा है कि 1 अप्रैल, 2009 को मछली की एक नर बाघ से भिड़ंत की 20 मीटर दूर से खींची गई तस्वीरें उन के जीवन का सब से रोमांचक अनुभव रहीं.

दोनों बाघ दहाड़ते और गुर्राते हुए एकदूसरे की जान लेने पर उतारू थे. ऐसा लग रहा था, जैसे बाघों का वायलेंट डांस हो रहा है. यह भिड़ंत सांभर के शिकार को ले कर हुई थी. दरअसल शिकार मछली ने किया था. दूसरा बाघ उस पर कब्जा जमाना चाहता था. काफी देर चली इस भिड़ंत में मछली ने आखिर अपने दुश्मन को पस्त कर के खदेड़ दिया था. मेहरोत्रा बताते हैं कि मछली की कई बार दूसरे बाघबाघिनों से भिड़ंत हुई, लेकिन हर बार विजय मछली की ही हुई. हालांकि इन मुठभेड़ों में मछली को कई बार चोटें भी लगीं. लेकिन मछली ने कभी हारना नहीं सीखा, इसीलिए वह जीवित है.

मछली द्वारा किए गए मगरमच्छ के शिकार की खींची गई एम.डी. पाराशर की एक दुर्लभ फोटो भी काफी चर्चित रही है. इस फोटो में मछली विशालकाय मगरमच्छ पर सवार हो कर उस का शिकार कर रही है. यह फोटो उस समय की है, जब सन 2004 में रणथंभौर अभयारण्य में भयंकर सूखा पड़ा था. जंगल में झीलों और तालाबों में पानी सूख गया था. जलस्रोत सूखने की वजह से वन विभाग वन्यजीवों को पानी उपलब्ध करा रहा था. झीलें सूखने से उन में रहने वाले मगरमच्छ भी बाहर निकल आए थे. मगरमच्छों को भी भोजन के लाले पड़ गए थे. तेज गर्मी और सूखे के कारण कई मगरमच्छों की मौत भी हो गई थी. इसी दौरान एक दिन मछली ने एक जानवर का शिकार किया.

मछली अपने शिकार को पदम तालाब के पास झाडि़यों में छिपा कर कुछ देर के लिए वहां से चली गई. शिकार पर नजर रखने के लिए मछली अपने 2 नन्हे शावकों को वहां छोड़ गई थी. इसी बीच मृत वन्यजीव की गंध पा कर एक भूखा विशालकाय मगरमच्छ उस झाड़ी में पहुंच गया. मगरमच्छ को देख कर मछली के दोनों शावक उस से बचने के लिए आसपास की झाडि़यों में छिप गए. मगरमच्छ उस शिकार को घसीट कर दलदल की तरफ ले जाने लगा. तभी मछली वहां आ गई. मगरमच्छ को अपना शिकार घसीट कर ले जाते देख वह पूरा माजरा समझ गई. इस के बाद आगबबूला हुई मछली ने उस मगरमच्छ का कचूमर निकाल कर ही दम लिया.

मछली के जीवन का सूरज अब अस्त होने वाला है. इसलिए पिछले 2-3 सालों से उस की मौत की खूब अफवाहें उड़ती रहती हैं. मछली जब कुछ दिन दिखाई नहीं देती तो उस की मौत की चर्चा शुरू हो जाती है. अप्रैल-मई, 2014 में मछली की मौत की अफवाह तेजी से फैली थी. दरअसल, उस समय करीब 20 दिनों तक मछली किसी को दिखाई नहीं दी थी. कई दिनों तक लापता रहने से यह अफवाह फैल गई कि मछली अब शायद नहीं रही. इस से वन्यजीव प्रेमियों को बड़ा धक्का लगा. वन विभाग के अधिकारी भी अधिकृत रूप से कुछ नहीं कह पा रहे थे, क्योंकि न तो मछली दिखाई दे रही थी और न ही उस की मौत के चिह्न मिल रहे थे.

बाद में मई के पहले सप्ताह में मछली की मौत की अफवाहों पर तब विराम लगा, जब वन अधिकारियों ने उसे देखा और उस के फोटो लिए. इस के बाद वन विभाग के उच्चाधिकारियों ने अधिकृत रूप से कहा कि मछली की मौत की खबरें निराधार हैं, वह जंगल में घूम रही है. इस से पहले और इस के बाद भी कई बार मछली के कुछ दिनों तक न दिखने पर उस की मौत की अफवाहें फैलती रही हैं. राजस्थान में बाघों की शरणस्थली के रूप में मुख्य रूप से 2 अभयारण्य हैं, सरिस्का और रणथंभौर. अलवर से जयपुर जिले तक फैले सरिस्का अभयारण्य का क्षेत्रफल अब लगभग 1200 वर्ग किलोमीटर है, इसलिए सरिस्का में बाघों के दर्शन मुश्किल से ही पाते हैं.

सरिस्का के मुकाबले रणथंभौर बाघ अभयारण्य का क्षेत्रफल कम है. सवाई माधोपुर जिले में स्थित रणथंभौर अभयारण्य लगभग 400 वर्ग किलोमीटर में फैला है. क्षेत्रफल कम होने और बाघबाघिनों की संख्या ज्यादा होने से रणथंभौर में बाघों को देखना आसान है. वन विभाग के अधिकारियों की सजगता से रणथंभौर अभयारण्य में बाघों का कुनबा लगातार बढ़ा है. इस कुनबे के बाघबाघिनों की नई खेप अब अपने लिए नए ठिकाने तलाश रही है. इस के लिए वे आसपास के जंगलों में चले जाते हैं. रणथंभौर से निकल कर बाघबाघिनों की नई खेप करौली, दौसा जिले में ठिकाना बना रही है.

कुछ बाघबाघिन सवाई माधोपुर जिले की सीमाएं पार कर के बूंदी व कोटा हो कर बने जंगल कारीडोर से पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश और गुजरात तक पहुंच गए हैं. देश में करीब एकडेढ़ दशक पहले बाघ संकट में आ गए थे. कुख्यात वन्यजीव तस्कर संसारचंद के इशारे पर उस के गुर्गे शिकारियों ने बाघ अभयारण्यों को उजाड़ दिया था. इन में राजस्थान का सरिस्का बाघ अभयारण्य भी शामिल था. बाद में सरकार ने बाघों के संरक्षण पर ध्यान दिया. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक सन 2004 में हुई गणना में देशभर में 1411 बाघ थे. सरकार के प्रयासों से सन 2011 में बाघों की संख्या बढ़ कर 1706 हो गई. सन 2014 में फोटोग्राफिक डाटा बेस के आधार पर देशभर में 2226 बाघ गिने गए.

इन में सब से ज्यादा 408 बाघ कर्नाटक में पाए गए. उत्तराखंड में 340, मध्य प्रदेश में 308, तमिलनाडु में 229, महाराष्ट्र में 190, आसाम में 167, केरल में 136 व उत्तर प्रदेश में 117 बाघ गणना में आए. राजस्थान के जिला अलवर स्थित सरिस्का अभयारण्य में बाघों का पूरी तरह सफाया हो जाने की बातें सामने आई थीं. उस समय इसे ले कर काफी शोरशराबा भी हुआ था. सीबीआई ने इस मामले की जांच की. प्रारंभिक जांच में साफ हो गया था कि सरिस्का में एक भी बाघ नहीं है. कई सालों तक सरिस्का अभयारण्य बाघ विहीन रहा.

इस दौरान राज्य सरकार ने इस संकट से निपटने, बाघ अभयारण्यों की हालत सुधारने और बाघों सहित अन्य वन्यजीवों पर खास ध्यान देने के लिए आर.एन. मेहरोत्रा को प्रदेश के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक की जिम्मेदारी सौंपी. मेहरोत्रा ने शिकार पर सख्ती से रोक लगाने और अभयारण्यों में आसपास के गांव वालों की घुसपैठ तथा पशुओं की चराई रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए. इसी के साथ उन्होंने सरिस्का अभयारण्य को बाघों से फिर आबाद करने के लिए ब्लू प्रिंट भी तैयार किया. हालांकि इस में कई तरह की अड़चनें आईं, लेकिन वह अपने प्रयासों में लगे रहे.

मेहरोत्रा ने केंद्र सरकार एवं वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया के सहयोग से बाघों के पुनर्वास और अभयारण्यों में बसे गांवों को अन्यत्र बसाने का प्रस्ताव तैयार किया. इस प्रस्ताव को सरकार ने हरी झंडी दे दी. इस के बाद यह तय किया गया कि सरिस्का को आबाद करने के लिए रणथंभौर से विभिन्न चरणों में बाघ शावकों को ला कर छोड़ा जाए. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट औफ इंडिया की टीम ने इसरो की मदद से रणथंभौर से शिफ्ट किए जाने वाले शावकों की तलाश शुरू की.

मेहरोत्रा और डब्ल्यूआईआई की टीम के लगातार प्रयासों से भारत में 28 जून, 2008 को बाघ का पहला ट्रांसलोकेशन किया गया. इसे रणथंभौर अभयारण्य में ट्रंकुलाइज कर के भारतीय वायु सेना के हेलीकौप्टर से सरिस्का अभयारण्य में ला कर छोड़ा गया. इस के बाद समयसमय पर रणथंभौर से 2 नर और 2 मादा बाघों को ला कर सरिस्का में छोड़ा गया. इस तरह सरिस्का में रीइंट्रोड्यूस बाघों की वंश वृद्धि की कवायद शुरू हुई. रणथंभौर से सरिस्का लाए गए 5 बाघबाघिनों में मछली की 2 संतानें थीं. मछली की ये दोनों मादा संतानें चौथी बार में पैदा हुई थीं.

इन में सब से पहले लाए गए नर बाघ की नवंबर 2010 में पायजनिंग से मौत हो गई. अलबत्ता शेष बाघों को सरिस्का में स्वच्छंद विचरण और अपनी टेरिटरी बनाने के लिए विशाल जंगल मिला. इस के बाद सरिस्का में वह समय भी आ गया, जिस का लंबे समय से इंतजार था. शावकों के जन्म से बाघों का कुनबा बढ़ने लगा. मछली की संतानों ने सरिस्का को फिर से आबाद कर दिया. मेहरोत्रा के प्रयासों से शुरू किए गए बाघों के रीइंट्रोडक्शन के बाद भारत सहित विदेशों में वन्यजीवों के रीइंट्रोडक्शन को भी बढ़ावा मिला.

फिलहाल मछली अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर है. कई बार दूसरे बाघबाघिनों और मगरमच्छों से मुठभेड़ में अपने कैनाइन दांत खो चुकी मछली अब शिकार करने में भी लाचार है. सामान्य जीवन से डेढ़दो गुना जिंदगी जी चुकी मछली का शरीर भी काफी कमजोर हो चुका है. हालात यह हैं कि मछली को उस की ही संतानों ने उस के विशाल साम्राज्य वाली टेरिटरी से बेदखल कर दिया है. कुछ समय पहले वह उस अंबाघाटी में रहने लगी थी, जो बूढ़े बाघों की शरणस्थली मानी जाती है. आजकल वह कभीकभार लाकड़दा के जंगलों में दिखाई दे जाती है.

पहले वन विभाग के अधिकारी मछली के लिए भोजन का इंतजाम कर देते थे, लेकिन बाद में नैशनल टाइगर कंजरवेशन अथौरिटी (एनटीसीए) ने बाघिन को इस तरह भोजन देने पर रोक लगा दी. अब मछली को बुढ़ापे में भोजन मिलना भी मुश्किल हो गया है. जैसेतैसे वह अपने भोजन का इंतजाम कर के जीवन की आखिरी सांसें ले रही है. पता नहीं कब मछली की जिंदगी का सूर्यास्त होने की खबरें आ जाएं. बहरहाल मछली ने बाघबाघिनों की दुनिया में जीतेजी अपना नाम अमर कर दिया है. Queen of Tigers

—विभिन्न दस्तावेजों एवं वन्यजीव