Delhi Crime: इश्क में राहुल ने उजाड़ दिया पूरा परिवार

Delhi Crime: 8 जनवरी, 2017 को दोपहर बाद की बात है. 34 साल का राहुल माटा पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अजंता अपार्टमेंट के गेट पर पहुंचा. इसी अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर-32 में उस के मातापिता रहते थे. लेकिन राहुल की गलत आदतों की वजह से उस के पिता रविंद्र माटा ने उसे घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद उस के सोसाइटी में घुसने तक पर रोक लगा दी गई थी. जाहिर है, राहुल की कोई न कोई बात उस सोसाइटी के पदाधिकारियों को बुरी लगी होगी, तभी तो गेट पर तैनात गार्डों से भी कह दिया गया था कि उसे किसी भी सूरत में सोसाइटी के अंदर न आने दिया जाए.

उस दिन राहुल अपने फ्लैट पर जाने के लिए सोसाइटी के गेट पर पहुंचा तो वहां मौजूद सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक दिया. गार्ड ने कहा कि सोसाइटी के पदाधिकारियों के आदेश पर ही वह यह कर रहा है. एक सुरक्षागार्ड की राहुल के सामने भला क्या औकात थी. गार्ड द्वारा रोकने की बात राहुल को बुरी लगी. वह गार्ड को डांटते हुए आगे बढ़ा तो गार्ड ने इस का विरोध किया. क्योंकि उसे तो अपनी ड्यूटी करनी थी. राहुल को गार्ड की यह जुर्रत नागवार लगी और वह गार्ड से झगड़ने लगा तथा उस की पिटाई कर दी.

शोरशराबा सुन कर सोसाइटी के कई लोग अपनेअपने फ्लैट से निकल आए. उन लोगों ने भी सुरक्षागार्ड का पक्ष लिया, पर राहुल सभी की बात अनसुनी कर के जबरदस्ती आगे बढ़ गया. तब तक राहुल के 63 वर्षीय पिता रविंद्र माटा भी फ्लैट से बाहर निकल आए थे. बेटे का गार्ड से झगड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस से बात करने के लिए वह उस की तरफ बढ़े. चूंकि वह उसे संपत्ति से पहले ही बेदखल कर चुके थे, इसलिए राहुल ने उन से झगड़ना शुरू कर दिया.

उसी दौरान राहुल ने अपने साथ लाए नारियल काटने वाले चापड़ से पिता पर हमला कर दिया. वहां जितने भी लोग मौजूद थे, उन में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह रविंद्र माटा को बचा सकते. बल्कि वह अपनी जान बचाने के लिए अपने फ्लैटों में चले गए और दरवाजे बंद कर लिए. राहुल पिता पर करीब ढाई मिनट तक चापड़ से वार करता रहा और वह जमीन पर गिर कर तड़पते रहे. इस दौरान किसी ने पुलिस के 100 नंबर पर फोन कर के वारदात की जानकारी देने का साहस जरूर कर दिया था.

राहुल को जब लगा कि उस के पिता मर चुके हैं तो वह खून से सना चापड़ हाथ में थामे अपने फ्लैट पर पहुंचा. पर उस की मां विभा माटा ने पहले ही दरवाजा बंद कर लिया था. राहुल ने मां को आवाज देते हुए कई बार दरवाजा खटखटाया, पर विभा ने दरवाजा नहीं खोला. राहुल को अब इस बात का डर लगा कि कहीं सोसाइटी के लोग उसे पकड़ न लें. इसलिए खुद को बचाने के लिए वह किसी दूसरे फ्लैट में जा रहा था, तभी रास्ते में रेनू बंसल नाम की महिला मिलीं, जो पास के फ्लैट में ही रहती थीं. राहुल ने चापड़ से उन्हें भी घायल कर दिया. रेनू को घायल करने के बाद वह तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 35 में घुस गया.

यह फ्लैट फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा का था. उस समय वह अपने बेटे कशिश के साथ मौजूद थे. राहुल के हाथ में खून से सना चापड़ देख कर वह भी डर गए. राहुल ने दोनों बापबेटों को धक्का दे कर कहा, ‘‘मेरे पास मत आना, वरना मार डालूंगा.’’

वी.के. शर्मा ने अपनी फिल्मी लाइफ में फिल्मी गुंडों को देखा था पर अब तो राहुल उन के सामने सचमुच का गुंडा था. उस से कोई पंगा लेने के बजाए उन्होंने खुद को बचाना जरूरी समझा और बेटे के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. राहुल उन के किचन में चला गया और अंदर से किचन का दरवाजा बंद कर लिया. तब तक मधु विहार थाने की पुलिस अजंता अपार्टमेंट पहुंच चुकी थी. गेट से कुछ कदम दूर रविंद्र माटा की लहूलुहान लाश पड़ी थी. सोसाइटी के लोगों ने बताया कि इन की हत्या इन के बेटे राहुल ने की है जो फ्लैट नंबर 35 में छिपा है.

पुलिस टीम फ्लैट नंबर 35 में पहुंची. उस फ्लैट का किचन और एक कमरा अंदर से बंद था. पुलिस ने दोनों जगह दस्तक दी तो पुलिस का नाम सुनते ही अभिनेता वी.के. शर्मा ने दरवाजा खोल दिया. सामने पुलिस देख कर उन्होंने राहत की सांस ली. उन्होंने बताया कि राहुल उन के किचन में है.

पुलिस ने किचन का दरवाजा खटाखटा कर राहुल से दरवाजा खोलने को कहा. पर राहुल ने दरवाजा नहीं खोला. उसे डर था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी. इसलिए वह अपने बचाव का रास्ता खोजने लगा. पर उसे ऐसा कोई रास्ता नहीं मिला. जब काफी देर तक राहुल ने दरवाजा नहीं खोला तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

तब राहुल ने रसोई गैस (पीएनजी) खोल कर पुलिस को धमकी दी. इतना ही नहीं उस ने आग भी लगा दी. रसोई गैस की आग ने पूरे किचन को चपेट में ले लिया. पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर किचन की आग की लपटों में घुस कर राहुल माटा को बाहर निकाल लिया. उस समय तक राहुल काफी जल गया था. राहुल को सुरक्षित निकालने में 10 पुलिसकर्मी भी झुलस गए. झुलसे हुए पुलिसकर्मियों में इंसपेक्टर मनीष जोशी, एसआई संजय, निशाकर, अंशुल, मनीष, एएसआई सुनील कुमार, चंद्रघोष, हैडकांस्टेबल रामकुमार, कांस्टेबल सुधीर, गजराज शामिल थे. खुद के घायल होने के बावजूद भी पुलिस राहुल को मैक्स अस्पताल ले गई.

तब तक आग पूरे फ्लैट में फैल चुकी थी. फायर ब्रिगेड की 10 गाडि़यां मौके पर पहुंच गईं. घंटे भर की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका. पर आग में अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट का सारा सामान स्वाहा हो चुका था. उन्हें उत्कृष्ट अदाकारी के लिए संगीत नाटक अकादमी से मिला पुरस्कार भी स्वाहा हो गया था.

बचाव के दौरान पुलिसकर्मियों के झुलसने की बात सुन कर डीसीपी ओमवीर सिंह बिश्नोई भी अस्पताल पहुंच गए. आरोपी राहुल माटा और 4 पुलिसकर्मियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया गया. राहुल 40 प्रतिशत जल चुका था. घायल पुलिसकर्मियों को देखने के लिए पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा भी अस्पताल पहुंचे.

राहुल ने रेनू बंसल नाम की जिस महिला को घायल किया था, उसे भी 26 टांके लगे थे. राहुल की हालत सामान्य होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की तो चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

राहुल माटा एक धनाढ्य परिवार से था. उस के पिता रविंद्र माटा का कनाडा में अपना बिजनैस था. करीब 20 साल पहले वह कनाडा चले गए थे. परिवार में पत्नी विभा माटा के अलावा 2 बेटे ही थे. एक राहुल माटा और दूसरा मुकुल माटा. दोनों बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई दिल्ली में हुई थी. विभा दिल्ली में सरकारी नौकरी करती थीं. स्कूली शिक्षा पूरी  करने के बाद राहुल ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया. आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने उसे अमेरिका भेज दिया. सन 1995 से 1999 तक उस ने अमेरिका में पढ़ाई की.

इस के बाद सन 2000 में उस ने अमेरिका की ही एक बैंक में नौकरी कर ली. 8 सालों तक वहां काम करने के बाद वह पिता के पास कनाडा चला गया. पिता को कनाडा की नागरिकता मिली हुई थी. कनाडा में उस ने मर्चेंट नेवी में नौकरी की पर अनुशासनहीनता के आरोप में उसे सन 2011 में नौकरी से निकाल दिया गया.  कनाडा की एक लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में राहुल को जेल जाना पड़ा, जिस में उसे 2 साल की सजा भी हुई. इस आरोप की वजह से राहुल को कनाडा से डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया.

बाद में सन 2014 में उस का मर्चेंट नेवी का लाइसैंस भी निरस्त हो गया. तब मर्चेंट नेवी में नौकरी करने का उस का रास्ता भी बंद हो गया.

रविंद्र माटा ने अपने छोटे बेटे मुकुल माटा को भी कनाडा बुला लिया था. उस की वहां एक मोबाइल फोन कंपनी में नौकरी लग गई थी. दोनों बापबेटे कनाडा में रहते थे, जबकि राहुल अपनी मां विभा के साथ दिल्ली के अजंता अपार्टमेंट के फ्लैट में रहता था. अब से करीब 2 साल पहले विभा भी रिटायर हो गई थीं. अजंता अपार्टमेंट का यह फ्लैट रविंद्र ने सन 1994 में खरीदा था.

दिल्ली में कोई कामधाम करने के बजाय राहुल दिन भर दोस्तों के साथ घूमता रहता था. खर्च के लिए पैसे मां से ले जाता था. विभा जब उसे कोई काम करने को कहतीं तो वह काम न मिलने का बहाना बना देता. इस के बावजूद भी मां उसे समझाती रहतीं. पर वह उन की सलाह को अनसुना कर देता था.

जिस अपराध की वजह से राहुल को कनाडा छोड़ना पड़ा था, उसी तरह का आरोप उस पर सोसाइटी की एक महिला ने भी लगाया था. राहुल पर बारबार इस तरह के आरोप लगने के बाद भी मांबाप ने उस की शादी नहीं की. इस का नतीजा यह हुआ कि राहुल 2 बच्चों की मां निशा के चक्कर में पड़ गया. निशा के 15 और 16 साल के 2 बच्चे थे. वह एक स्कूल में टीचर थी. राहुल निशा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा. एक दिन राहुल ने यह बात मां को बताई तो उन्हें यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना.

इतना ही नहीं, वह निशा को मां के पास फ्लैट पर भी लाने लगा. विभा ऐतराज जताती रहीं और उसे फ्लैट पर लाने के लिए मना करती रहीं. मां की आपत्ति पर राहुल ने कहा कि उस ने उस के साथ मंदिर में शादी कर ली है. यह सुन कर विभा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने यह जानकारी कनाडा में रह रहे पति को दे दी, साथ ही यह भी कह दिया कि मना करने के बावजूद राहुल जबरदस्ती निशा को फ्लैट पर लाता है.

तब वीडियो कौन्फ्रैंसिंग कर रविंद्र ने भी बेटे राहुल को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर तो प्यार का फितूर चढ़ा था. वह भी अपनी जिद पर अड़ा था. राहुल की जिद से रविंद्र माटा और उन की पत्नी को इस बात की आशंका होने लगी कि कहीं बिना शादी की हुई यह महिला और उस के बच्चे उन के फ्लैट पर कब्जा न कर लें.

राहुल की हठधर्मिता से विभा का उस के प्रति व्यवहार भी बदल गया. हर महीने वह उसे खर्च के जो पैसे देती थीं, उन्होंने देने बंद कर दिए. तब राहुल उन से झगड़ता और उन की पिटाई तक कर देता. कभीकभी तो मांबेटे के बीच झगड़ा इतना बढ़ जाता कि पड़ोसियों को बीचबचाव के लिए आना पड़ता.

उस के हिंसक मिजाज से सोसाइटी के लोग भी परेशान थे. एकदो बार पड़ोसियों ने हस्तक्षेप किया तो राहुल ने उन के साथ भी बदतमीजी की. विभा के परिवार में कलह लगातार बढ़ती जा रही थी. फोन कर के वह कनाडा में बैठे पति को सब बताती रहती थीं. बेटे के आचरण से रविंद्र माटा भी परेशान हो गए.

12 अक्तूबर, 2016 को वह कनाडा से दिल्ली आ गए. उन्होंने एक बार फिर बेटे राहुल को समझाया. उन्हें लगा कि राहुल सुधरने वाला नहीं है तो उन्होंने उसे अपनी चलअचल संपत्ति से पूरी तरह से बेदखल करने की चेतावनी दे दी और कह दिया कि वह आइंदा उन के फ्लैट पर न आए.

सोसाइटी वाले तो राहुल के व्यवहार और उस के शोरशराबा करने से पहले परेशान थे. ऊपर से रविंद्र माटा ने सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता से कह दिया कि राहुल को उन के फ्लैट में आने की अनुमति न दी जाए. इस के बाद अजंता रेजीडैंशियल सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता ने गेट पर तैनात सुरक्षागार्डों को राहुल की एंट्री पर बैन लगाने की हिदायत दे दी.

बेटे से खतरे को देखते हुए रविंद्र माटा ने अपने फ्लैट की एंट्री और बालकनी में लोहे के ग्रिल और दरवाजे भी लगवा दिए. बेटे के तेवर देखते हुए उन्होंने इस की शिकायत थाने में भी कर दी थी. सीनियर सिटिजन सेफ्टी के लिहाज से पुलिस ने उन्हें कुछ सेफ्टी टिप्स दिए, साथ ही पुलिस ने पड़ोसियों से भी उन का ध्यान रखने को कह दिया. बहरहाल रविंद्र माटा और विभा अब सतर्क रहने लगे. हालात सामान्य होने पर रविंद्र माटा का कनाडा लौटने का कार्यक्रम निश्चित था.

घर से बेदखल होने के बाद राहुल निशा के साथ पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर में रहने लगा था. अब उसे अपने मांबाप दुश्मन लगने लगे. इतना ही नहीं, उस ने दोनों की हत्या करने की ठान ली. इस के लिए उस ने बाजार से एक चापड़ खरीद लिया. चापड़ अपने साथ ले कर वह 8 जनवरी को दोपहर के समय अजंता अपार्टमेंट पहुंच गया. वह जैसे ही गेट पर पहुंचा, वहां तैनात सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक लिया और बता दिया कि उस के अपार्टमेंट में घुसने पर बैन लगा है.

सुरक्षागार्ड के इतना कहते ही राहुल उस से उलझ गया और अपना रौब दिखाने लगा. गार्ड तो अपनी ड्यूटी कर रहा था, पर राहुल नहीं माना. सुरक्षागार्ड की पिटाई करने के बाद राहुल अपने फ्लैट की तरफ जाने लगा. इस के बाद शोर सुन कर बाहर आए पिता को उस ने चापड़ से वार कर मौत के घाट उतार दिया.

पिता की हत्या करने के बाद वह मां की हत्या करने के लिए फ्लैट पर गया. फ्लैट का दरवाजा बंद होने पर उस ने दूसरी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया.

रेनू बंसल को घायल करने के बाद वह फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट में घुस गया और खुद को बचाने के चक्कर में उन के घर को आग के हवाले कर दिया. वी.के. शर्मा पिछले 15 सालों से इस फ्लैट में रह रहे थे.

राहुल माटा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 9 जनवरी, 2017 को कड़कड़डूमा अदालत में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. राहुल ने जज को बताया कि उस ने अपने पिता की हत्या नहीं की और वी.के. शर्मा के फ्लैट में आग उस ने नहीं, बल्कि पुलिस ने लगाई थी. बहरहाल पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उसे जेल भेज दिया. मामले की जांच इंसपेक्टर अजीत सिंह कर रहे हैं. Delhi Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है.

Domestic Dispute: पत्नी की सहेली पर वासना का वार

Domestic Dispute: दिन ढलने वाला था. करीब 3 बजे का वक्त रहा हागा. उत्तरी दिल्ली के बुराड़ी में रहने वाले 26 वर्षीय अमन बिष्ट कमरे में बैड पर करवटें बदल रहा था. मन में अजीब तरह की बेचैनी थी. काल सेंटर की ड्यूटी से सुबह 5 बजे घर आया था. सीधा बैड पर कंबल में जा घुसा था. पत्नी अनुप्रिया कब ड्यूटी पर घर से निकली, उसे पता ही नहीं चला. दिन में 11 बजे के करीब नींद खुली, तब फ्रैश होने के लिए सीधा बाथरूम में गया.

आधे घंटे बाद किचन में रखा फ्रिज खोलने लगा. उस पर एक चिट चिपकी थी. चिट पर लिखा था, ‘दूध खत्म हो गया है, ले आना. रात की बची सब्जी खा लेना. आटा रखा है. परांठा बना लेना.’ चिट पत्नी अनुप्रिया लगा कर गई थी.

सुबह साढ़े 8 बजे निकलते हुए उस ने सोए अमित को जगा कर कहने के बजाय चिट पर लिख दिया था. चिट की सारी बातें आदेश थीं. पढ़ कर अमन भीतर ही भीतर तिलमिला गया. पत्नी दरवाजा बाहर से लौक कर गई थी. डुप्लीकेट चाबी फ्रिज पर रखी थी.

वह कौशिक एनक्लेव के अपार्टमेंट के नीचे की दुकान से दूध, ब्रेड और मक्खन खरीद लाया. चाय बनाई. उस के साथ 4 ब्रेड सेंक लिए. खाने के बाद कमरे में ही इधरउधर चहलकदमी करता हुआ मोबाइल पर सोशल साइटों को स्क्राल करने लगा.

अचानक जाने उसे क्या सूझी, उस ने बार्डरोब से पत्नी के कपड़े निकाल कर बैड पर फैला दिए. उस में से कुछ अंडरगारमेंट छांटे. बाकी कपड़े सहेज कर दोबारा बार्डरोब में रख दिए.

कुछ समय बाद उस ने मोबाइल से एक नंबर पर काल मिलाया, ‘‘हैलो प्रियंका, क्या हो रहा है?’’

‘‘कुछ खास नहीं, यूं ही शादी के लिए लहंगे का प्राइस पता कर रही हूं. मम्मी ने कहा है कि मेरी शादी के कुछ हफ्ते ही बचे हैं.’’ प्रियंका बोली.

वह उस की पत्नी अनुप्रिया के स्कूल की खास सहेली थी. पास में ही अपने मातापिता और भाईबहन के साथ रहती थी. अमन ने पत्नी की उसी सहेली प्रियंका को काल किया था. वह उस से काफी घुलीमिली थी. उस के घर भी आनाजाना लगा रहता था.

जब कभी अमन का मन विचलित होता या उदासी से घिर जाता, तब प्रियंका से बातें कर लिया करता था. इस बात को प्रियंका भी समझती थी.

उस रोज 18 फरवरी, 2022 को भी अमन का मन बेचैन था. मन में कुछ वैसी बातें गांठ बन रही थीं, जो प्रियंका ही खोल सकती थी. इसलिए वह अपने मन की बात प्रियंका को बताना चाहता था. खुशमिजाज प्रियंका को उस ने कहा, ‘‘तुम से आज मिलना चाहता हूं, कुछ जरूरी काम है.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ? फिर अनुप्रिया से झगड़ा हो गया?’’ प्रियंका बोली.

‘‘वैसा ही कुछ समझ लो, वैलेंटाइन डे के एक दिन पहले से ही रूठी है.’’

‘‘आखिर हुआ क्या?’’ प्रियंका बोली.

‘‘मैं जो गिफ्ट देना चाहता था, उस का नाम सुनते ही भड़क उठी. फिर भी मैं अगले रोज खरीद लाया,’’ अमन बोला.

‘‘क्या गिफ्ट था, जरा मैं भी तो सुनूं.’’ प्रियंका बोली.

‘‘मिलोगी, तब उस बारे में बताऊंगा.’’ अमन बोला.

‘‘अच्छा छोड़ो पुरानी बात, अब क्या है? वैलेंटाइन गए तो कई दिन गुजर गए,’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘मैं चाहता हूं कि उस के पसंद की साड़ी खरीदूं, लेकिन मुझे उस की अच्छी समझ नहीं है. इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ बाजार चलो ताकि मैं अच्छी साड़ी खरीद लूं. वैसे भी तुम उस का टेस्ट मुझ से अच्छी तरह जानती हो,’’ अमन आग्रह के लहजे में बोला.

‘‘चलो ठीक है चलती हूं, लेकिन मम्मी से पूछ कर काल करती हूं. तुम अपनी स्कूटी ले कर आ जाना,’’ कहती हुई प्रियंका ने फोन कट कर दिया.

कुछ देर में ही प्रियंका ने अमन को फोन कर आने की सूचना दे दी. अमन 10 मिनट में प्रियंका के घर चला गया. उसे स्कूटी पर अपने फ्लैट पर ले आया. जबकि प्रियंका ने उस से सीधे बाजार चलने को कहा, तब उस ने बताया कि पहले उसे वह गिफ्ट को दिखाना चाहता है, जो पत्नी के लिए खरीदा था.’’

बातें करतेकरते दोनों फ्लैट में आ गए थे. अमन ने प्रियंका को सीधा बैडरूम में जाने के लिए इशारा किया और खुद किचन में चला गया. प्रियंका बैडरूम में बैड पर फैले कपड़ों को देख कर चौंक पड़ी.

तुरंत वह भी किचन में आते ही बोली, ‘‘यह सब क्या है अमन? बैडरूम की तुम ने क्या हालत बना रखी है. और…और उस पर तुम ने बीवी के कैसेकैसे कपड़े फैला रखे हैं. मुझे लगता है कि अनुप्रिया ने तो ऐसा नहीं किया होगा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ पसंद नहीं आया वह सब,’’ अमन मुसकराता हुआ बोला.

‘‘पसंद? कैसी बेशर्मी की बातें कर रहे हो, वह भी एक लड़की के सामने. अब समझी कि अनुप्रिया तुम से क्यों नाराज हुई होगी.’’ प्रियंका सख्ती से बोली.

‘‘इस में नाराज होने की बात क्या है? मैं वही तो उस के लिए वैलेंटाइन गिफ्ट ले कर आया था. उसे पसंद नहीं आया. तुम्हें पसंद है तो तुम ले लो मेरी तरफ से यह गिफ्ट.’’

‘‘तुम तो बड़े बदतमीज हो. मैं तुम से अंडरगारमेंट्स गिफ्ट लूंगी? शर्म नहीं आती है तुम्हें… मैं तो तुम्हें बहुत अच्छा और सभ्य समझती थी, लेकिन तुम तो बेहद ही गंदे इंसान निकले. मैं जा रही हूं.’’ कहती हुई प्रियंका मेन गेट की ओर बढ़ी.

अमन ने उस का हाथ पकड़ लिया. एक झटके में हाथ छुड़ा कर प्रियंका तेजी से दरवाजा खोलने के लिए हैंडल घुमाने लगी. दरवाजा लौक था. पीछे से अमन उस के पास आ कर बोला, ‘‘लौक लगा है. दरवाजा तब तक नहीं खुलेगा, जब तक मैं नहीं चाहूंगा.’’

प्रियंका का हाथ पकड़ कर खींचते हुए बैडरूम में ले गया. उसे बैड पर वहीं गिरा दिया, जहां अनुप्रिया के लिए खरीदे गए अंडरगारमेंट्स फैले थे. कुटिलता के साथ बोला, ‘‘मैं आज इस बिकिनी और ब्रा को तुम्हें अपने हाथों से पहनाऊंगा और गिफ्ट भी करूंगा…’’

प्रियंका बैड से उठ बैठी. उस ने हाथ जोड़ लिए. वहां से जाने देने की भीख मांगने लगी, लेकिन अमन के दिमाग में उस समय कुछ और ही चल रहा था. प्रियंका उस की आंखों में सैक्स का उतावलापन देख कर सहम गई थी.

कमरे से निकलने की कोशिश करने लगी, लेकिन अमन उसे दबोचने का प्रयास करने लगा, ‘‘मैं जो कहता हूं, सीधी तरह मान जाओ, वरना मैं कुछ गलत कर बैठूंगा, तब मुझे बाद में मत कहना.’’

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‘प्लीज मुझे छोड़ दो! छोड़ दो!!’ प्रियंका कहती रही. जबकि अमन उसे अपनी जिद के आगे झुकाने में लगा रहा.

‘‘मैं तुम्हें अपने हाथों से बिकिनी पहनाऊंगा, साथ में एक सेल्फी लूंगा. फिर तुम उसी पर अपने कपड़े पहन लेना और चली जाना. मैं सिर्फ इतना ही चाहता हूं.’’ अमन बोला.

‘‘नहीं…नहीं, प्लीज… अगले महीने मेरी शादी होने वाली है,’’ प्रियंका गिड़गिड़ाने लगी.

‘‘तो तुम ऐसे नहीं मानोगी.’’ यह कहते हुए अमन तेजी से किचन जा कर नायलोन की रस्सी ले आया.

पीछेपीछे दरवाजे तक आ चुकी प्रियंका को धकेलते हुए उस ने उसे बैड पर दोबारा पटक दिया. उस के हाथपैर बांध दिए. उस के साथ जबरदस्ती करने लगा. उस ने उस की जींस की बेल्ट खोलने की कोशिश की.

बचाव में प्रियंका पलट गई. अमन गुस्से में बोला, ‘‘साली… हरामजादी, हमारी बिल्ली, हम से म्याऊं. यह ले और छटपटा ले.’’ गुस्से में बड़बड़ाते हुए अमन ने उस के गले में रस्सी फंसा कर जोर से खींच दिया. प्रियंका की हलकी सी चीख निकल पड़ी और छटपटाती हुई कुछ पल में ही शांत हो गई.

औंधे मुंह पड़ी प्रियंका को देख कर अमन बोला, ‘‘सीधी तरह मान जाती तो बेहोश नहीं होती. पड़ी रह ऐसे. तेरे साथ मैं तो अब मनमाफिक सैक्स भी करूंगा…’’

अमन प्यार से प्रियंका के बदन को सहलाने लगा. उस की जींस खोल दी. उसे बिकिनी पहनाई. मोबाइल में उस की तसवीरें भी लीं और अपने मन की हर मुराद पूरी कर ली.

पत्नी की बेरुखी के चलते यौन जीवन से वंचित गुबार निकालने के बाद उस ने पाया कि प्रियंका बेहोश नहीं थी, बल्कि उस की सांसें हमेशा के लिए थम चुकी थीं. इस दौरान उस ने प्रियंका की लाश के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध भी बनाए.

प्रियंका की मौत हो जाने का एहसास होने पर वह घबरा गया. उस ने बचाव के लिए फटाफट अपने कपड़े और जरूरी सामान बैग में भरे और फरार हो गया. प्रियंका की लाश उस ने वहीं छोड़ दी. कमरे को इंटरलौक करने के अलावा बाहर से एक दूसरा ताला जड़ दिया.

शाम के करीब 8 बजे अनुप्रिया ड्यूटी से अपने फ्लैट पर आई. बाहर दूसरा ताला जड़ा देख चौंक गई. किसी अनहोनी से भी आशंकित हो गई. कारण इंटरलौक के साथसाथ दूसरा ताला तभी लगाया जाता था, जब दोनों अधिक समय या कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर जाते थे.

अमन की स्कूटी नीचे पार्किंग में लगी थी. उस के पास बाहर लगे ताले की एक्स्ट्रा चाबी नहीं थी. वह सोच में पड़ गई. क्या करे… नहीं चाहते हुए भी उस ने अमन के मोबाइल पर काल किया, जो स्विच्ड औफ था.

अब उस की चिंता और बढ़ गई. कुछ देर इंतजार किया. करीब आधे घंटे तक वह नहीं आया, तब उस ने पड़ोसियों की मदद से ताला तुड़वाया.

कमरे में घुसते ही उसे कुछ अच्छा महसूस नहीं हुआ. जहांतहां सामान बिखरा पड़ा था. बैडरूम में जाते ही उस की चीख निकल गई. बैड पर एक युवती की अर्धनग्न लाश पड़ी थी. उस का चेहरा आधा दिख रहा था. उस ने तुरंत उसे पहचान लिया, मुंह से निकल पड़ा, ‘‘अरे यह तो प्रियंका है. यहां कैसे आई?’’

उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को काल कर लाश की सूचना दे दी. पुलिस टीम के साथ 5 मिनट में ही आ गई. पुलिस बैड पर पड़ी लाश की स्थिति, पास पड़ी नीले रंग की नायलोन की रस्सी, गले में रस्सी के गहरे निशान, अस्तव्यस्त बैड की चादर, बिखरे कपड़े आदि से समझ गई कि उस की गला घोट कर हत्या की गई है. युवती का अर्धनग्न शरीर रेप की भी गवाही दे रहा था.

पुलिस ने घटनास्थल की जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में अनुप्रिया ने बताया कि मरने वाली प्रियंका उस की सहेली थी. उस का पति अमन बिष्ट वारदात के बाद से ही फरार है.

शुरुआती जांच में हत्या का संदेह अनुप्रिया के पति पर गया. पुलिस ने मृतका के घर वालों को इस की सूचना दे कर घटनास्थल पर बुला लिया.

मृतका की मां भागीभागी आई. उन्होंने पुलिस को बताया कि उस की बेटी प्रियंका अनुप्रिया के पति अमन के साथ बाजार से साड़ी खरीदवाने के लिए गई थी. अमन ही उसे बुलाने आया था.

इस मामले में थाना बुराड़ी में अमन बिष्ट के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. अनुप्रिया ने बताया कि उस ने अमन से 2 साल पहले प्रेम विवाह किया था. ग्रैजुएट अनुप्रिया एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी. जबकि अमन एक काल सेंटर में काम करता था.

उस ने हरियाणा से पौलिटैक्निक किया था. अमन के मातापिता उन के प्रेम विवाह से नाराज चल रहे थे. वे अमन से कोई संबंध नहीं रखते थे. इस कारण अमन परिवार वालों से अलग किराए के मकान में रहता था.

फरार अमन की तलाशी के लिए डीसीपी (नौर्थ) सागर सिंह कलसी ने एसीपी स्वागत पाटिल के नेतृत्व में एक टीम बनाई.

टीम में बुराड़ी थानाप्रभारी राजेंद्र प्रसाद, एसआई सतेंद्र कुमार, दीपक कुमार, एएसआई राजीव कुमार, हैडकांस्टेबल सतवीर, परवीन कुमार, कांस्टेबल शीशराम, कुलदीप के साथसाथ महिला कांस्टेबल मेघा को शामिल किया गया.

अमन को ढूंढने की शुरुआत 18 फरवरी से हो गई. उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया गया. अगले रोज 19 फरवरी की शाम को दिल्ली पुलिस ने अमन का फोन लखनऊ में औन पाया. तुरंत वहां की पुलिस को सूचना दे कर मदद मांगी गई. लेकिन पुलिस उसे लखनऊ में नहीं दबोच पाई.

मोबाइल फोन सर्विलांस के माध्यम से 20 फरवरी, 2022 को अमन के जयपुर में होने की जानकारी मिली. दिल्ली पुलिस ने तुरंत वहां की पुलिस से संपर्क किया. अमन जयपुर से निकल भागने में सफल नहीं हो पाया. जयपुर की पुलिस ने अमन को बस अड्डे से गिरफ्तार कर लिया.

21 फरवरी की सुबहसुबह अमन बुराड़ी थाने में था. उस से जांच टीम ने प्रियंका की हत्या के मामले में गहन पूछताछ की. जल्द ही उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

अमन के बयान के आधार पर उस पर 24 वर्षीय युवती प्रियंका की हत्या और उस के साथ अप्राकृतिक यौनाचार संबंधी आईपीसी की धाराएं लगाई गईं. हत्या की धारा 302 तो पहले से ही एफआईआर में दर्ज थी. उस में बलात्कार की धारा और अप्राकृतिक यौन संबंध की धारा 377 को  भी जोड़ दिया गया.

अमन ने बताया कि उस ने प्रियंका के साथ बलात्कार करने की कोशिश की थी. वह उस की हत्या नहीं करना चाहता था, लेकिन उस के द्वारा  विरोध करने पर गुस्से में उस के गले में रस्सी डाल दी थी. उसे अंदाजा नहीं था कि उस की मौत हो जाएगी.

इस छानबीन के बाद पुलिस ने दावा किया कि आरोपी एक सैक्स उन्मादी युवक था. वह नियमित रूप से पोर्न देखता था. अपनी पत्नी के साथ यौन जीवन से असंतुष्ट था.

इस कारण ही उस ने 24 वर्षीया प्रियंका को निशाना बना लिया था. यहां तक कि वह ड्रग्स और सैक्स क्षमता बढ़ाने वाली गोलियां लेता था. वह अपने करीबी दोस्तों के तानों से भी परेशान था. वे उसे कमजोर मर्द का ताना देते थे.

पूछताछ के दौरान अमन ने पत्नी के वास्ते साड़ी दिलाने के बहाने प्रियंका को अपने कमरे में बुलाने की बात स्वीकार ली. उस की बात मानने से इनकार करने पर जबरदस्ती की. गुस्से में आ कर उस की गरदन पर इतना जोर लगाया कि उस का दम घुट गया.

पुलिस ने नीले रंग की नायलोन की रस्सी बरामद कर ली. मैडिकल रिपोर्ट के आधार पर अप्राकृतिक यौन संबंध का खुलासा हो गया था.

दिल्ली पुलिस ने पूछताछ कर 23 फरवरी, 2022 को उसे कोर्ट में पेश कर दिया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

(यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों पर माननीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार पीडि़ता की निजता की रक्षा के लिए उस की पहचान का खुलासा नहीं किया गया है. कथा में अनुप्रिया और प्रियंका परिवर्तित नाम हैं) Domestic Dispute

Romantic Story: मोहब्बत पर भारी पड़े अरमान

Romantic Story: शाम सुरमई हो चली थी. थकाथका सा निढाल सूरज धीरेधीरे पश्चिम दिशा में डूब रहा था. उस की सिंदूरी किरणें वातावरण में फैली हुई थीं. तहसील बिलाईगढ़ के एक गांव के बाहर अमराई में 2 युवा जोड़े प्रेमालाप में मशगूल थे. आम के दरख्तों की टहनियों में बौर निकल आए थे. टहनियों के बीच कंचे के बराबर अमियां हवा के झोंके से झूम उठा करती थीं. कोयलों की कूक और अमियों की सुगंध से नंदिनी खगेश्वर के प्यार में बढ़ोत्तरी ही हुई थी.

नंदिनी खगेश्वर की बांहों से खुद को आजाद करती हुई हांफ उठी थी. खुद को संभालते हुए और अपनी अनियंत्रित सांसों को काबू करती हुई फुसफुसा कर खगेश्वर प्रसाद से बोली, ‘‘तोषू (खगेश्वर को वह प्यार से तोषू कहती थी), बहुत देर हो गई है, अब मुझे जाने दो. घर वालों को कहीं शक न हो जाए. तुम्हें पता नहीं कि मैं दिशामैदान के बहाने बड़ी मुश्किल से निकल पाई हूं.

‘‘जब भी दिशामैदान की बात आती है, घर वाले कहा करते हैं कि घर में शौचालय स्नानागार की पूरी सुविधा है, इस के बावजूद भी तुम नहाने तालाब पर और दिशामैदान के लिए बाहर जाती हो. ऐसा क्यों करती हो. बस, यही कहती हूं कि घर में रहेरहे हाथपैरों की वर्जिश नहीं हो पाती, इसलिए इसी बहाने बाहर हो आया करती हूं. अब तुम बताओ कि हमेशा तो मैं ऐसा कर नहीं पाऊंगी.’’

खगेश्वर उर्फ तोषू ने फिर से नंदिनी को अपनी बांहों में लेना चाहा, लेकिन नंदिनी खुद को बचाती हुई बोली, ‘‘किसी रोज हम पकड़े जाएंगे, मुझे हमेशा अनजाना सा डर लगा रहता है. आखिर हम कब तक ऐसे ही लुकछिप कर मिला करेंगे?’’

‘‘कुछ महीनों की बात है, मैं ने कुछ रुपए इकट्ठे कर रखे हैं. कुछ रुपए और हो जाएं तो यह लुकछिप कर मिलने वाली बात ही नहीं रहेगी. हम यहां से निकल कर कहीं भी जाएंगे तो सब से पहले सिर ढकने को छत चाहिए. 2-4 महीने के खर्च के लिए रुपए भी चाहिए. इस के लिए मैं कोशिश कर रहा हूं. रायपुर के जयहिंद चौक शीतला मंदिर के पीछे लोधी पारा में मैं ने सभी सुविधाओं वाला एक घर देख रखा है.’’ तोषू गंभीर होता हुआ बोला.

नंदिनी जरा नागवारी के अंदाज में बोली, ‘‘महीनों से सुन रही हूं घर रुपए, घर रुपए. तुम मुझे यहां से ले चलो, दोनों इकट्ठे मिल कर कमाएंगे, 12वीं तक मैं भी तो पढ़ी हूं. 12-15 हजार रुपए मैं खुद कमा सकती हूं. 10-12 हजार तुम कमा लोगे. 20-25 हजार में दालरोटी तो चल ही जाएगी.’’

तोषू बोला, ‘‘मेरा वादा है, अगले महीने की 25 तारीख को हम दोनों यहां से निकल चलेंगे. लेकिन मेरी शर्त है, मैं अपने वादे पर तभी अमल करूंगा जब तुम मुझे…’’ कहते हुए तोषू ने निश्चिंत खड़ी नंदिनी के मुखड़े को हथेलियों के बीच लेते हुए भरेभरे होंठों का चुंबन लिया, गहरा और चटख चुंबन.

‘‘अब मैं तुम से 25 तारीख को ही मिलूंगी,’’ नंदिनी मीठी झिड़की लगाती हुई बोली.

‘‘25 तारीख आने में अभी एक महीना बाकी है मेरी जान, तब तक मैं कैसे गुजारूंगा?’’ तोषू तुरंत मनुहार करते हुए बोला.

‘‘ये तुम जानो, मैं चली. याद रखना, 25 यानी 25.’’

फिर नंदिनी वहां रुकी नहीं. तोषू पीछे से पुकारता रह गया, ‘‘सुनो तो…सुनो नंदिनी.’’

नंदिनी को रुकना नहीं था, वह वहां रुकी नहीं. इस के बाद नंदिनी ने किसी भी बहाने अब घर से निकलना बंद कर दिया.

नंदिनी कोसरिया और खगेश्वर कोसरिया उर्फ तोषू छत्तीसगढ़ के जिला बलौदाबाजार के कस्बा बिलाईगढ़ के रहने वाले थे. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहते थे. लेकिन मुलाकात न हो पाने की वजह से तोषू अधजले परवाने की तरह छटपटाने लगा. नंदिनी भी अंदर ही अंदर छटपटाती रही लेकिन तोषू से मिलना उचित नहीं समझा. ऐसा उस ने इसलिए किया कि यदि वह तोषू से मिल लेती तो तोषू फिर अपने वादे पर कायम नहीं रह पाता. प्यार में तड़प जरूरी थी. भले ही वह तोषू से मिलने के लिए मन ही मन व्याकुल हुए जा रही थी.

नंदिनी से मुलाकात करने के लिए उस ने बहुतेरे प्रयास किए लेकिन असफल ही रहा. तोषू अपने घर के बरामदे में उदास बैठा हुआ था कि एक 10-12 साल की एक लड़की दौड़ती हुई आई और तोषू के हाथ में एक कागज थमा गई. उसी पैर लौटने हुए वह बोली, ‘‘नंदिनी दीदी ने तुम्हें देने को कहा है.’’

फिर वह अबोध लड़की वहां ठहरी नहीं, कुलांचे भरती हुई वहां से निकल गई. तोषू वापस लौट कर बरामदे में बैठा और तह किए हुए उस कागज की परतें खोलीं. उस खत में कुछ ही लाइनें लिखी थीं. वह इस राइटिंग को बखूबी पहचानता था. वह उस की प्रेमिका नंदिनी की थी. लिखा था, ‘तोषू जान, जुदाई के ये पल आत्मा को लहूलुहान कर रहे हैं. मुझे अहसास है कि इस पीड़ा से तुम भी घायल जरूर हो गए होगे. 23 तारीख को वहीं मुलाकात होगी. उम्मीद है भविष्य में साथ रह सकें, तैयारी तुम्हारी ओर से पूरी हो गई होगी. मैं ने अभी से पैकिंग करनी शुरू कर दी है. बस, मुझे तुम्हारे पैरों के निशां पर कदम बढ़ाना है. तुम्हारी नंदिनी.’

तोषू की आंखों में आंसू झिलमिला उठे. खत में उसे नंदिनी का चेहरा उभरता दिख रहा था. उस ने कई बार खत को उस रात पढ़ा. नंदिनी के शब्दों पर उस ने दीवानों की तरह चुंबन लगाए. 2 दिन बचे थे. नंदिनी के दिए गए समय को आने में 2 दिन उस ने जैसे अंगारों पर लोट कर समय गुजारा. इस बीच उसे अपनी शेव करने का खयाल भी नहीं आया. पहले से मुकर्रर मिलने की जगह पर तोषू पहुंच कर प्रेमिका का इंतजार करने लगा. उस ओर टकटकी लगाए हुए निहार रहा था, जिस रास्ते से नंदिनी को वहां पहुंचना था.

शाम को धुंधलका काबिज हो चुका था. कोहरे ने बिलाईगढ़ कस्बे को अपने में समेटने का भरसक प्रयास किया था. शाम होने के पहले ही शाम का आभास वातावरण में व्याप्त था. उस ने देखा, कोहरे की धुंध को चीरती हुई कोई चली आ रही है. कदकाठी और चलने के अंदाज ने उसे इस बात का अहसास करा दिया कि आने वाली उस की जाने जिगर, जाने तमन्ना नंदिनी है. तोषू ने कोहरे में ही हाथ हिला कर अपनी मौजूदगी का भान नंदिनी को करवाने का प्रयास किया. नंदिनी दूर से ही तोषू को पहचान चुकी थी. पहचानती भी क्यों नहीं, 7 महीने से दोनों प्रेम के झूले में जो झूल रहे थे.

नंदिनी तोषू के करीब पहुंची. दौड़ कर नंदिनी अपने तोषू के कंधे से जा लगी. सिसक जो पड़ी नंदिनी. अनायास तोषू के हाथ गर्दिश करने लगे. सुबकती हुई नंदिनी बोली, ‘‘कैसे मैं ने इतने दिन गुजारे तोषू, अब मैं तुम से एक पल को अलग नहीं रहूंगी. तुम्हारी कसम तोषू, जुदाई के पल कितने गहन और भयावह हुआ करते हैं, सोचने से ही कलेजा मुंह को आ जाता है.’’

अपने से दूर करता हुआ भर्राई आवाज में तोषू बोला, ‘‘मेरी भी स्थिति तुम से अलग नहीं रही है. जुदाई के गम को किसी तरह बरदाश्त करता रहा हूं.’’

दोनों वहीं एक पत्थर की आड़ ले कर बैठ गए. उन दोनों में भविष्य को ले कर बातचीत होने लगी. बातचीत में यह बात उन लोगों के बीच मुख्य रही कि कब, कहां और कितने बजे मिलना है. उस दिन लुकाछिपी का उन का यह मिलन आखिरी था. रात के चौथे पहर में नंदिनी घर छोड़ कर निकल गई. अलसुबह आवागमन का साधन तो था नहीं, पहले से ही खगेश्वर ने अपने दोस्त से एक बाइक की व्यवस्था कर ली थी.

बाइक पर सवार हो कर वह बिलाईगढ़ से बलौदा बाजार पहुंचा. बाइक को वह कहां खड़ी करेगा, कहां रखेगा, बाइक की चाबी किस को सौंपेगा, यह सब उस ने अपने दोस्त को पहले से ही बता दिया था. बलौदा बाजार से सुबहसुबह बस पकड़ कर वे दोनों रायपुर पहुंचे. यहां पर खगेश्वर उर्फ तोषू ने पहले से ही लोधीपारा शीतला मंदिर के पास किराए का कमरा ले रखा था. लिहाजा खगेश्वर को नंदिनी को यहांवहां ले कर भटकना नहीं पड़ा.

मकान मालिक अरुण जहोल को उस ने नंदिनी का परिचय अपनी पत्नी के रूप में कराया. पहचान के लिए उस ने मकान मालिक को आधार कार्ड दिखाया. संतुष्ट होने के बाद अरुण जहोल ने किराए पर उन दोनों को कमरे की चाबी दे दी. हफ्ते 15 दिन तक दोनों भयभीत रहे. दोनों के घर वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि दोनों गांव छोड़ कर चल गए हैं. थोड़ा होहल्ला हुआ गांव में.

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चूंकि दोनों एक ही जाति के थे, इसलिए यह मामला विशेष तूल नहीं पकड़ा. दोनों के घर वालों को यह समझने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई कि नंदिनी खगेश्वर के साथ भाग गई है. नंदिनी के पिता ने बेटी के गायब होने की थाने में रिपोर्ट तक नहीं लिखाई. जो होना था, वह हो चुका था. सांप निकल चुका था. लकीर पीटने से हालात सुधर नहीं सकते थे. लिहाजा दोनों पक्षों ने खामोशी से समझौता कर लिया था.

इधर दूसरी ओर खगेश्वर कब तक घर में बैठा रहता. उस ने एक कपड़े की दुकान में नौकरी कर ली. खगेश्वर जब काम पर चला जाता, तब नंदिनी घर में अकेली बैठी बोर होती. खगेश्वर से उस ने एक बार कहा, ‘‘तुम्हारे काम पर चले जाने के बाद घर में मैं अकेली बोर हो जाया करती हूं. अगर तुम कहो तो मैं भी कहीं कुछ काम कर लूं. इस से आमदनी तो बढ़ेगी, साथ ही मेरी बोरियत भी दूर हो जाएगी.’’

पहले तो खगेश्वर ने उसे नौकरी के लिए मना किया लेकिन नंदिनी के काफी मनुहार और बोरियत का हवाला देने पर किसी तरह से वह राजी हो गया. इस दिशा में नंदिनी को बहुत ज्यादा भटकना नहीं पड़ा. उसे सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिल गई. आय का जरिया भी बढ़ गया और नंदिनी की बोरियत भी दूर हो गई. सब कुछ अच्छाअच्छा गुजरने लगा. दोनों को साथ रहते हुए एक साल गुजरने को था. दोनों के घर वाले भी कभीकभी उन से मिलने लोधीपारा आनेजाने लगे थे. उन के घर वालों को यह देख कर संतोष मिलता था कि चलो दोनों कमाखा रहे हैं, सुखी हैं.

दोनों के घरवालों को किसी तरह का किसी से कोई गिलाशिकवा नहीं रह गया था. जब सब कुछ अच्छा गुजरने लगा तो एक नया ही फितूर नंदिनी पर काबिज होता चला गया. जब भी वह टीवी पर शादी से संबंधित रस्मोरिवाज होते हुए देखती तो उसे खुद से मलाल होने लगता था. अकसर वह खगेश्वर उर्फ तोषू से इस बात का जिक्र कर बैठती कि काश! हमारी भी ऐसी ही धूमधड़ाके से शादी हुई होती. तुम बारात ले कर आते, मंडप सजा होता, सहेलियों के बीच मैं छिपी होती. एक रस्म तुम्हें मालूम है तोषू, जिस पत्तल पर वधू खाना खाती है, उसी पत्तल को लपेट कर छिप कर उस से वर को मारती भी है.

‘‘जब होना था, तब तो हुआ नहीं और अब लाख चाहने के बावजूद यह संभव नहीं है. ऐसी बातें सोच कर क्यों अपना दिल दुखाती हो और मेरा मूड भी खराब करती हो.’’ खगेश्वर ने समझाया.

दोनों के बीच और कई तरह के मुद्दों को ले कर अकसर तकरार होने लगती थी. मोहल्ले के लोग समझाबुझा कर दोनों को शांत करा दिया करते थे. अकसर उन दोनों में इन्हीं बातों को ले कर जबतब कलह हो जाती थी. एक रोज खगेश्वर अपने दोस्त की शादी में गया हुआ था. अपने मोबाइल पर उस ने शादी के रस्मोरिवाजों को शूट किया. शूट किए हुए मोबाइल की वीडियो उस ने नंदिनी को दिखाईं तो उस के सोए अरमान फिर जाग उठे. उसी मुद्दे को ले कर वह तकरार करने लगी.

उस ने उलाहना देते हुए खगेश्वर से कहा, ‘‘लोग अपनी माशूका के लिए चांदसितारे तोड़ लाने का माद्दा रखते हैं और तुम हो कि मेरी एक इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते.

‘‘सुनो, मैं आसमां को बांहों में समेटने को नहीं कह रही हूं. सिर्फ इतना चाहती हूं कि हम दोनों एक बार रस्मोरिवाजों के मुताबिक शादी कर लेते. अच्छी सी पार्टी देते. ढेर सारे मेहमान आते. कितना अच्छा लगता.’’

तोषू दिन भर का थकामांदा आया था. इस वक्त दोनों खाना खा कर बैड पर लेटे हुए बातें कर रहे थे, ‘‘यार, तुम समझती नहीं हो. अब न तुम माशूका रह गई और न मैं आशिक. हम दोनों का रिश्ता पतिपत्नी का हो चुका है.’’

‘‘वक्त गुजर गया, इन सब बातों के लिए. कैसी बातें कर रहे हो. कौन सा हम लोग बुड्ढे हो गए हैं या हमारे 4-6 बच्चे हो गए हैं. सच्ची कह रही हूं तोषू, मेरी यह इच्छा पूरी कर दो.’’ वह मनुहार से बोली, ‘‘2 ही साल तो हुए हैं हमें पतिपत्नी बने हुए.’’

‘‘यार, मेरा मूड खराब मत किया करो.’’

‘‘मैं कहां खराब कर रही हूं. पैसों को ले कर तुम चिंता मत करो, मेरे पास पैसे हैं. बस तुम हां कह दो.’’

माहौल तल्ख होता चला गया. तूतूमैंमैं पर दोनों उतर आए. दोनों के बीच तकरार इतनी बढ़ गई कि हालात बेकाबू होते चले गए. बात 2 मार्च, 2022 की है. जिले के थाना पंडरी के थानाप्रभारी उमाशंकर राठौर के पास एक युवक बदहवास सा तेजी के साथ थाने में आया. ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने उस युवक को रोकना चाहा लेकिन वह रुका नहीं. युवक सीधे थानाप्रभारी उमाशंकर राठौर के सामने जा कर बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम खगेश्वर कोसरिया है. मैं ने अपनी पत्नी नंदिनी को मार डाला. मैं बीवी का हत्यारा हूं. उस की लाश कमरे में पड़ी है.’’

उस की बात सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए. उन्होंने उस से पूरी बात विस्तार से बताने को कहा. इस के बाद खगेश्वर उर्फ तोषू सब कुछ सिलसिलेवार बताता चला गया.

पूरी बात सुनने के बाद राठौर ने यह बात एसपी प्रशांत अग्रवाल एएसपी तारकेश्वर पटेल को भी बता दी. उन के निर्देश पर खगेश्वर को गिरफ्तार कर लिया.

इस के बाद पुलिस खगेश्वर को साथ ले कर उस के कमरे पर पहुंची तो वहां नंदिनी की लाश पड़ी थी. खगेश्वर ने बताया कि उस ने नंदिनी का गला घोटा था. सामाजिक रीतिरिवाज से शादी करने को ले कर उस ने उस का जीना हराम कर दिया था, इसलिए गुस्से में उसे मार डाला.

पुलिस ने मौके की काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी और खगेश्वर उर्फ तोषू से पूछताछ के बाद उसे हत्या के  आरोप में 2 मार्च, 2022 को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Romantic Story

Allahabad Crime: बेबी को पति नहीं प्रेमी पसंद है

Allahabad Crime: 14 नवंबर, 2016 की शाम उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के थाना नैनी के मोहल्ला करबला का रहने वाला मोहम्मद हुसैन रोज की अपेक्षा आज कुछ जल्दी ही घर आ गया था. हाथमुंह धोने के बाद वह चाय पी कर टीवी देखते हुए 2 साल की बेटी शैजल के साथ खेलने लगा तो पत्नी बेबी ने पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, अब आप को कहीं नहीं जाना?’’

‘‘क्यों, कोई काम है क्या?’’

‘‘हां, अगर आप को कहीं नहीं जाना तो चल कर मेरे मोबाइल का चार्जर खरीदवा लाओ. कितने दिनों से खराब पड़ा है. दूसरे का चार्जर मांग कर कब तक काम चलेगा.’’

हुसैन बेबी की बात को टाल नहीं सका और फौरन तैयार हो गया. बेबी को भी साथ जाना था, इसलिए वह भी फटाफट तैयार हो गई. बेटी को उस ने सास के हवाले किया और पति के साथ बाजार के लिए चल पड़ी.

मोबाइल शौप उन के घर से महज 2 सौ मीटर की दूरी पर थी. जैसे ही दोनों दुकान के सामने पहुंचे, एक मोटरसाइकिल उन के सामने आ कर रुकी. मोटरसाइकिल सवार हेलमेट लगाए था, इसलिए कोई उसे पहचान नहीं सका. पतिपत्नी कुछ समझ पाते, उस के पहले ही उस ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और हुसैन के सीने पर रख कर गोली दाग दी.

गोली लगते ही हुसैन जमीन पर गिर पड़ा. शाम का समय था इसलिए बाजार में काफी भीड़भाड़ थी. पहले तो लोगों की समझ में नहीं आया कि क्या हुआ. लेकिन जैसे ही लोगों को सच्चाई का पता चला, बाजार में अफरातफरी मच गई. धड़ाधड़ दुकानों के शटर गिरने लगे. इस अफरातफरी का फायदा उठा कर बदमाश भाग गया. कोई भी उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका.

हुसैन का घर घटनास्थल के नजदीक ही था, इसलिए उसे गोली मारे जाने की सूचना जल्दी ही उस के घर तक पहुंच गई. खून से लथपथ जमीन पर पड़ा हुसैन तड़प रहा था. बेबी उस का सिर गोद में लिए रो रही थी.

सूचना मिलते ही आननफानन में हुसैन के घर वाले और पड़ोसी आ गए थे. घटना की सूचना पा कर थाना नैनी की पुलिस भी आ गई थी. चूंकि हुसैन की सांसें चल रही थीं, इसलिए पुलिस और घर वाले उसे उठा कर पास के एक नर्सिंगहोम में ले गए. उस की हालत काफी नाजुक थी, इसलिए नर्सिंगहोम के डाक्टरों ने उसे स्वरूपरानी नेहरू जिला चिकित्सालय ले जाने की सलाह दी. लेकिन हुसैन की हालत प्रति पल बिगड़ती ही जा रही थी.

पुलिस हुसैन को ले कर जिला अस्पताल ले गई लेकिन वहां पहुंचतेपहुंचते उस की मौत हो चुकी थी. वहां के डाक्टरों ने उसे देखते ही मृत घोषित कर दिया. हुसैन की मौत की जानकारी होते ही उस के घर में कोहराम मच गया. मां और पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. इस हत्या की सूचना पा कर एसपी (गंगापार) ए.के. राय, सीओ करछना बृजनंदन एवं नैनी समेत कई थानों की पुलिस आ गई थी.

हुसैन के बड़े भाई नफीस की तहरीर पर थाना नैनी पुलिस ने हुसैन की बीवी बेबी और उस के प्रेमी सल्लन मौलाना के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर बेबी को तुरंत हिरासत में ले लिया था.

अगले दिन पोस्टमार्टम के बाद हुसैन का शव उस के घर वालों को सौंप दिया गया था. उस के अंतिम संस्कार के बाद बेबी से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह खुद को निर्दोष बताती रही, लेकिन जब पुलिस ने मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए सवालों की झड़ी लगाई तो वह असलियत छिपा नहीं सकी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने पति की हत्या उस के दोस्त सल्लन मौलाना से कराई थी. इस के बाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर 16 नवंबर को छिवकी जंक्शन से सल्लन को भी गिरफ्तार कर लिया था.

थाना नैनी के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अवधेश प्रताप सिंह और अन्य पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में मृतक हुसैन की पत्नी बेबी बेगम और दोस्ती में दगा देने वाले सल्लन ने हुसैन की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

इलाहाबाद में यमुनापार स्थित थाना नैनी के मुरादपुर करबला निवासी मोहम्मद हुसैन का निकाह सन 2013 में कोरांव गांव की रहने वाली बेबी के साथ हुआ था. हुसैन औटो चलाता था. वह इतना कमा लेता था कि परिवार हंसीखुशी से रह रहा था. शादी के करीब साल भर बाद ही वह बेटी शैजल का बाप बन गया तो उस का परिवार भरापूरा हो गया.

हुसैन की दोस्ती मोहल्ला लोकपुर के रहने वाले सल्लन से थी, जो थाना नैनी का हिस्ट्रीशीटर था. मुरादपुर अरैल में उस की तूती बोलती थी. वह मौलाना के नाम से मशहूर था. सल्लन मोहम्मद हुसैन के घर भी आताजाता था. इसी आनेजाने में कब सल्लन और हुसैन की पत्नी बेबी की आंखें चार हो गईं, हुसैन को पता नहीं चला. क्योंकि वह तो अपने दोस्त सल्लन पर आंखें मूंद कर विश्वास करता था.

आंखें चार होने के बाद सल्लन अपने दोस्त हुसैन की अनुपस्थिति में भी उस के घर आनेजाने लगा. जैसे ही हुसैन औटो ले कर घर से निकलता, बेबी सल्लन को फोन कर के घर बुला लेती. इस के बाद दोनों ऐश करते. ऐसी बातें छिपी तो रहती नहीं, सल्लन और बेबी के संबंधों की जानकारी पहले मोहल्ले वालों को, उस के बाद हुसैन तथा उस के घर वालों को हो गई.

लेकिन सल्लन के डर से कोई सीधे उस से कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. लेकिन जब मोहल्ले वाले हुसैन और उस के घर वालों पर तंज कसने लगे तो घर वालों ने हुसैन पर सल्लन से दोस्ती खत्म कर के उस के घर आनेजाने पर पाबंदी लगाने को कहा. उन का कहना था कि अगर इसी तरह चलता रहा तो बेबी नाक कटवा सकती है.

उस समय तो हुसैन कुछ नहीं बोला, लेकिन पत्नी की बेवफाई पर वह तड़प कर रह गया. दोस्त सल्लन की करतूत सुन कर उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. इतना सब जानने के बाद भी उस ने सल्लन से कुछ नहीं कहा. इसलिए उस की और सल्लन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा. अलबत्ता हुसैन ने बेबी पर जरूर शिकंजा कसा. उस ने उसे समझाया कि वह जो कर रही है, वह ठीक नहीं है.

बेबी ने हुसैन को सफाई दी कि लोग उसे बिनावजह बदनाम कर रहे हैं. कभीकभार सल्लन उसे पूछने घर आ जाता है तो क्या वह उसे घर से भगा दे. बेबी ने सफाई भले दे दी, लेकिन वह समझ गई कि पति को उस के और सल्लन के संबंधों का पता चल गया है. यही नहीं, उसे यह भी पता चल गया था कि इस की शिकायत हुसैन के भाई हसीन ने की थी. इसलिए उस ने सल्लन से उसे सबक सिखाने के लिए कह दिया ताकि दोनों आराम से मौजमस्ती कर सकें.

हसीन ने जो किया था, वह सल्लन को बुरा तो बहुत लगा लेकिन न जाने क्यों वह शांत रहा. शायद ऐसा उस ने हुसैन की वजह से किया था. उस के बाद उस ने हुसैन के घर भी आनाजाना कम कर दिया था. लेकिन मौका मिलते ही बेबी से मिलने जरूर आ जाता था. इसी का नतीजा यह निकला कि एक दिन हुसैन दोपहर में घर आ गया और उस ने बेबी व सल्लन को रंगेहाथों पकड़ लिया.

सल्लन तो सिर झुका कर चला गया, लेकिन बेबी कहां जाती. पत्नी की कारगुजारी आंखों से देख कर हुसैन का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. क्योंकि उस पर भरोसा कर के उस ने घर वालों तक की बात नहीं मानी थी. उस गुस्से में हुसैन ने बेबी की जम कर पिटाई कर दी. इस के बाद बेबी ने कान पकड़ कर माफी मांगी कि अब वह इस तरह की गलती दोबारा नहीं करेगी.

हुसैन ने पत्नी को माफ तो कर दिया, लेकिन अब उसे न तो पत्नी पर भरोसा रहा और न दोस्त सल्लन पर. इसलिए वह दोनों पर नजर रखने लगा. बेबी ने पति से माफी जरूर मांग ली थी, लेकिन अपनी हरकतों से बाज नहीं आई.

चोरीछिपे वह सल्लन से फोन पर बातें करती रहती. इस का नतीजा यह निकला कि सन 2016 के जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में वह सल्लन के साथ भाग गई. इस से मोहल्ले और रिश्तेदारी में काफी बदनामी हुई. इस के बाद दोनों के घर वालों के बड़ेबुजुर्गों के हस्तक्षेप के बाद हुसैन और उस के घर वाले बेबी को अपने घर ले आए.

दरअसल, बेबी के मायके वालों को उस की यह हरकत काफी बुरी लगी थी. वे नहीं चाहते थे कि बेबी अपना अच्छाखासा बसाबसाया घर बरबाद कर के एक गुंडे के साथ रहे. क्योंकि इस से उन की भी बदनामी हई थी. सब के दबाव में हुसैन बेबी को घर तो ले आया था लेकिन घर आने के बाद उस ने उस की जम कर धुनाई की थी.

महीने, 2 महीने तक तो सब ठीक रहा, लेकिन इस के बाद बेबी फिर पहले की तरह फोन पर अपने यार सल्लन से बातें करने लगी. शायद उसी के कहने पर सल्लन ने हुसैन के छोटे भाई पर गोली चलाई थी, जिस में वह बालबाल बच गया था. हसीन ने इस वारदात की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो इस बार भी बड़ेबुजुर्गों ने बीच में पड़ कर दोनों पक्षों का थाने में समझौता करा दिया.

बेबी से सल्लन की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. यही हाल सल्लन का भी था. दोनों ही एकदूसरे के बिना रहने को तैयार नहीं थे. लेकिन बेबी ऐसा नाटक कर रही थी, जैसे हुसैन ही अब उस का सब कुछ है.

पत्नी में आए बदलाव से हुसैन पिछली बातें भूल कर उसे माफ कर चुका था. हुसैन की यह अच्छी सोच थी, जबकि बेबी कुछ और ही सोच रही थी. अब वह पति को राह का कांटा समझने लगी थी, जिसे वह जल्द से जल्द निकालने पर विचार कर रही थी. क्योंकि अब वह पूरी तरह सल्लन की होना चाहती थी.

मन में यह विचार आते ही एक दिन उस ने प्रेमी से बातें करतेकरते रोते हुए कहा, ‘‘सल्लन, अब मुझ से तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं होती. हुसैन मुझे छूता है तो लगता है कि मेरे शरीर पर कीड़े रेंग रहे हैं. अब तुम मुझे हुसैन से मुक्त कराओ या मुझे मार दो. ये दोहरी जिंदगी जीतेजीते मैं खुद तंग आ गई हूं.’’

बेबी की बातें सुन कर सल्लन तड़प उठा. उस ने कहा, ‘‘तुम्हें मरने की क्या जरूरत है. मरेंगे तुम्हारे दुश्मन. बेबी, जो हाल तुम्हारा है, वही मेरा भी है. तुम कह रही हो तो मैं जल्दी ही प्यार की राह में रोड़ा बन रहे हुसैन को ठिकाने लगाए देता हूं.’’

इस के बाद बेबी और सल्लन ने मोबाइल फोन पर ही हुसैन को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उसी योजना के अनुसार, 14 नवंबर, 2016 की शाम बेबी हुसैन को चार्जर खरीदवाने के बहाने लोकपुर मोहल्ला स्थित मोबाइल शौप पर ले आई, जहां पहले से घात लगाए बैठे सल्लन मौलाना ने गोली मार कर हुसैन की हत्या कर दी.

सल्लन की निशानदेही पर थाना नैनी पुलिस ने 315 बोर का देसी पिस्तौल और एक जिंदा कारतूस बरामद कर लिया. पूछताछ के बाद पुलिस ने सल्लन और बेबी को इलाहाबाद अदालत में पेश किया था, जहां से दोनों को जिला कारागार, नैनी भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हुई थी. Allahabad Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: साक्षी की साजिश में समर

 True Crime Story: प्रेमी समर खान के कहने पर साक्षी ने राहुल अग्रवाल से शादी तो कर ली, लेकिन ससुराल में उस का मन नहीं लगा. इसी बीच ऐसा क्या हुआ कि वह लुटेरी दुलहन बन कर प्रेमी समर के साथ जेल पहुंच गई.

उत्तर प्रदेश का एक जिला है संभल, जो अपने आप में अनेक गाथाओं को समेटे हुए है. इस के अलावा इस शहर में सींग के सामान बनाने का बहुत बड़ा उद्योग भी फैला हुआ है. जिस की वजह से इस की विश्व भर में पहचान है. इसी ऐतिहासिक शहर के गवां मोहल्ले के गिरीश चौक पर दीपक अग्रवाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन की गिनती पुराने रईसों में होती है. उन की रासायनिक खाद की दुकान है और गवां में एक पैट्रोल पंप भी है.

दुकान पर उन का बेटा राहुल बैठता था, जबकि वह खुद पैट्रोल पंप को देखते थे. दोनों ही सुबह घर से निकलने के बाद देर रात को ही घर लौटते थे. रोजाना की तरह 23 मई, 2015 को भी वे अपनेअपने काम पर निकल गए. उस के बाद घर पर राहुल की भतीजी प्रियंका और बीवी साक्षी थीं. दोपहर करीब 12 बजे किसी ने उन के घर का दरवाजा खटखटाया. साक्षी ने दरवाजा खोला तो सामने 4 युवक खड़े थे. इस से पहले कि साक्षी उन से कुछ पूछती, वे चारों अंदर घुस आए और अंटी से तमंचे निकाल कर साक्षी को चुप रहने की हिदायत दी. हथियार देख कर साक्षी डर गई. भतीजी प्रियंका उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. बदमाशों ने प्रियंका को भी चुप रहने की धमकी दी और उस के हाथपैर बांध दिए.

इस के बाद बदमाशों ने साक्षी से अलमारियों की चाबी मांगी. साक्षी ने बताया कि चाबियां ऊपर के कमरे में हैं तो 2 बदमाश साक्षी को खींच कर ऊपर ले गए और 2 प्रियंका के पास ही खड़े रहे. डर की वजह से साक्षी ने चाबियां बदमाशों के हवाले कर दीं. चाबियां पाने के बाद उन्होंने साक्षी के भी हाथपैर बांध कर डबलबैड पर डाल दिया, साथ ही धमकी दी कि शोर मचाया तो गोली से उड़ा दिया जाएगा. चाबियां मिलते ही बदमाशों ने अलमारियों से नकदी, फोन, लैपटौप, ज्वैलरी आदि लूट ली. कुछ ही देर में लाखों रुपए का सामान समेट कर बदमाश वहां से चले गए. जाते समय वे प्रियंका का कमरा बाहर से बंद करते गए.

करीब एक घंटा बाद साक्षी ने किसी तरह खुद को खोला और डरते हुए नीचे आईं. नीचे के कमरे में बाहर से कुंडी लगी थी. कुंडी खोल कर साक्षी ने भतीजी प्रियंका को भी खोला. साक्षी ने लूट की सूचना सब से पहले अपने पति राहुल और ससुर दीपक अग्रवाल को फोन द्वारा दी. उस समय दीपक अग्रवाल अपने पैट्रोल पंप पर थे और राहुल अग्रवाल अपनी खाद की दुकान पर. घर पर लूट होने की सूचना मिलते ही दीपक अग्रवाल और राहुल के होश उड़ गए. दोनों तुरंत अपने घर की ओर चल दिए. पति और ससुर को खबर करने के बाद साक्षी प्रियंका को ले कर घर के बाहर आ गई और अपने यहां लूट होने का शोर मचा दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए.

तब तक दीपक अग्रवाल बेटे राहुल के साथ घर पहुंच गए. दोनों ने सब से पहले यह देखा कि बदमाश घर व अलमारियों से क्याक्या सामान ले गए हैं? जांच करने पर पता चला कि घर से सोनाचांदी की ज्वैलरी, नकदी, चांदी के सिक्के, फोन, लैपटौप आदि गायब थे. उन के यहां से बदमाश करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए थे. दिनदहाड़े लाखों रुपए की लूट होने की बात सुन कर हर कोई हैरान था. उसी दौरान किसी ने इस लूट की खबर फोन द्वारा थाना रजपुरा को दे दी. थाना वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव मय फोर्स के दीपक अग्रवाल के घर पहुंच गए. उन्होंने कमरों का निरीक्षण किया तो अलमारियां खुली हुई थीं और उन का सामान आदि फैला हुआ था.

थानाप्रभारी ने इस की सूचना अपने उच्च अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलते ही एसपी अतुल सक्सेना, एएसपी कमलेश दीक्षित भी वहां पहुंच गए. उधर शहर के व्यवसाइयों को जब पता चला कि दीपक अग्रवाल के यहां दिनदहाड़े लूट हो गई है तो तमाम व्यवसाई भी उन के घर पहुंचने लगे. व्यापारियों का जमावड़ा होने से एसपी अतुल सक्सेना को चिंता होने लगी कि कोई हंगामा न खड़ा हो जाए, इसलिए उन्होंने बहजोई, धनारी, हयातनगर थानों की फोर्स के अलावा क्राइम ब्रांच को भी बुला लिया. दीपक अग्रवाल ने पुलिस को बताया कि बदमाश नकदी सहित करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए हैं. देखा जाए तो यह बहुत बड़ी लूट थी.

पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ डराधमका कर लूट करने की रिपोर्ट दर्ज कर ली और बदमाशों की तलाश के लिए पुलिस अधीक्षक के आदेश पर शहर के मुख्य मार्गों पर बैरिकेड्स लगा कर चैकिंग शुरू कर दी. लेकिन पुलिस को सफलता नहीं मिली. लूट के इस मामले को सुलझाने के लिए एसपी अतुल सक्सेना ने थाना रजपुरा के थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव, धनारी के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह यादव के अलावा क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की टीम को भी लगा दिया. टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों ने गहनता के साथ केस की छानबीन शुरू कर दी.

दीपक अग्रवाल का घर गली के अंतिम छोर पर था. ऐसी सुरक्षित जगह पर कोई अनजान आदमी आसानी से नहीं पहुंच सकता था. विचारविमर्श के बाद पुलिस टीम इस नतीजे पर पहुंची कि इस वारदात को किसी जानकार ने ही अंजाम दिया होगा. दीपक अग्रवाल के पैट्रोल पंप और खाद की दुकान पर काम करने वाले सभी लोगों और नौकरों से पुलिस ने पूछताछ की. उन के घर पर काम करने वाली आया से भी पूछताछ की गई, परंतु पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला.

उधर संभल शहर के अलावा सीमावर्ती कस्बे बहजोई के व्यापारियों के मन में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था. व्यापारियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने एसपी से मुलाकात कर चेतावनी दी कि जल्द केस न खुला तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे. एसपी अतुल सक्सेना ने उन्हें भरोसा दिलाया कि जिले के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी केस को सुलझाने में लगे हैं और जल्द ही केस खुलने की संभावना है. व्यापारियों को आश्वासन दे कर उन्होंने उन्हें संतुष्ट तो कर दिया, लेकिन उन के ऊपर भी केस जल्द खुलने का दबाव बढ़ गया. उन्होंने टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों की मीटिंग बुलाई और कुछ दिशानिर्देश देते हुए केस को जल्द से जल्द खोलने को कहा.

इस के बाद सभी पुलिस अधिकारी अलगअलग दृष्टिकोण से मामले की जांच करने लगे. क्राइमब्रांच के इंसपेक्टर रूप सिंह बघेल, साइबर सेल के प्रभारी संतोष कुमार त्यागी ने परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाईं. उन्होंने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी के फोन से एक नंबर पर ज्यादा बातचीत करने की बात सामने आई. जिस नंबर पर साक्षी अकसर बात करती थी, वह नंबर बरेली के कस्बा आंवला के रहने वाले समर खान का निकला.

पुलिस ने दीपक अग्रवाल से पूछा कि आंवला में क्या उन के कोई रिश्तेदार वगैरह रहते हैं?

‘‘हां, आंवला में हमारे बेटे राहुल की ससुराल है. लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं? इस घटना से उन का क्या मतलब?’’ दीपक अग्रवाल बोले.

थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव ने एक फोन नंबर उन्हें देते हुए कहा, ‘‘आप की बहू साक्षी की इस फोन नंबर पर वक्तबेवक्त बहुत बातें होती थीं. हम यह जानना चाहते हैं कि यह नंबर किस का है.’’

दीपक अग्रवाल और उन के बेटे के पास साक्षी के मायके के सभी लोगों के नंबर उन के फोन में सेव थे. थानाप्रभारी ने जो नंबर उन्हें दिया था, उस के बारे में वह अनजान थे. इसलिए राहुल ने साक्षी को बुला कर उस फोन नंबर के बारे में पूछा तो वह बोली, ‘‘यह नंबर आंवला के ही हमारे पापा के जानकार समर खान का है. यह हमारे घर के सदस्य की तरह हैं. मैं ने लूट की खबर देने के लिए इन्हें फोन किया था.’’

यह बात मान भी ली जाए कि घटना वाले दिन साक्षी ने उसे घटना की जानकारी देने के लिए फोन किया होगा, लेकिन इस से पहले वक्तबेवक्त यह उस से क्या बातें करती थी. यह बात थानाप्रभारी की समझ में नहीं आ रही थी. उस समय उन्होंने दीपक अग्रवाल और उन की बहू साक्षी से और ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि उन्होंने उसी शख्स की जांच करना जरूरी समझा, जिस से साक्षी ज्यादा बातें करती थी.

आंवला के किला मोहल्ला के जिस समर खान से साक्षी बात करती थी, सादा वेश में पुलिस टीम वहां पहुंच गई. 2 पुलिस वाले किला मोहल्ले के लोगों से समर खान के बारे में जानकारी जुटाने लग गए तो टीम के बाकी सदस्य समर खान के घर चले गए. साक्षी ने जिस तरह समर को अपने पिता का जानकार बताया था, उस से पुलिस यही समझ रही थी कि समर खान अधेड़ उम्र का होगा. लेकिन वह तो 25-26 साल का युवक निकला. स्थानीय लोगों से उन दोनों पुलिसकर्मियों को चौंकाने वाली बात पता चली. लोगों ने बताया कि समर खान एक शातिर इंसान है, उस का आंवला की ही साक्षी नाम की एक लड़की से कई सालों से चक्कर चल रहा है. दोनों शादी करने वाले थे.

साक्षी के घर वालों को इस प्रेमप्रसंग का जब पता चला तो उन्होंने संभल के राहुल अग्रवाल के साथ आननफानन में उस की शादी कर दी. उधर पुलिस टीम को समर खान घर पर नहीं मिला. लेकिन उस के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली थी, वह बहुत महत्त्वपूर्ण थी. समर खान के न मिलने पर पुलिस टीम वापस संभल लौट आई. उस का फोन नंबर पुलिस के पास था ही. उस फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाने पर उस की लोकेशन अनूप शहर रोड की आ रही थी. पुलिस टीम फटाफट अनूप शहर रोड पर पहुंच कर नाकेबंदी लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी. उसी समय एक होंडा सिटी कार आती दिखी. पुलिस को देखते ही ड्राइवर ने कार की गति बढ़ा दी. कुछ दूर पीछा करने के बाद पुलिस ने उस कार को रोक लिया.

उस कार में ड्राइवर के अलावा एक आदमी और बैठा था. पूछताछ करने में उन दोनों ने अपने नाम क्रमश: समर खान और विकास नारंग उर्फ विक्की बताए. समर खान नाम सुनते ही पुलिस समझ गई कि यह वही है, जिस की उन्हें तलाश थी, लिहाजा उन दोनों को पूछताछ के लिए पुलिस बहजोई थाने ले आई. समर खान ने अपना जो मोबाइल नंबर बताया था, वह वही निकला, जिस पर साक्षी की बातें होती थीं. पुलिस टीम ने समर खान को हिरासत में लेने वाली बात एसपी अतुल सक्सेना और एएसपी कमलेश दीक्षित को बताई तो दोनों पुलिस अधिकारी थाना बहजोई पहुंच गए. उन की मौजूदगी में समर खान से पूछताछ की गई तो उस ने व्यवसाई दीपक अग्रवाल के घर लूट करने की बात स्वीकार ली.

इस के अलावा उस ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि यह वारदात उस ने अपनी प्रेमिका साक्षी के कहने पर की थी. लूट की साजिश में व्यवसाई दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी का नाम सामने आने पर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए, क्योंकि संभ्रांत परिवार में इस तरह की यह पहली वारदात थी. पुलिस ने दीपक अग्रवाल, उन के बेटे राहुल और बहू साक्षी को भी थाने बुला लिया. थाने में समर खान को देख कर साक्षी घबरा गई. सब के सामने पुलिस ने समर खान से पूछताछ की तो समर खान ने वारदात को अंजाम देने के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

साक्षी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के कस्बा आंवला में पक्का कटरा मोहल्ले के रहने वाले प्रदीप कुमार की बेटी थी. पेशे से वह भी बिजनेसमैन थे. बात करीब 6 साल पुरानी है. उस समय 13 साल की साक्षी आंवला के ही एक स्कूल में पढ़ रही थी. उसी स्कूल में पढ़ने वाली रुकैया नाम की एक लड़की से उस की गहरी दोस्ती थी. रुकैया भी पक्का कटरा मोहल्ले में रहती थी.

रुकैया का एक दोस्त था समर खान, जो आंवला के ही किला मोहल्ले में रहता था. एक दिन रुकैया ने साक्षी की मुलाकात समर से कराई तो साक्षी भी उस की दोस्त बन गई. समर खान कक्षा 8 में पढ़ता था. साक्षी को देख कर वह बहुत प्रभावित हुआ. उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए शातिर दिमाग समर ने खुद को एक बड़े घर का बताया. वह बताता था कि उस के पिता का हार्डवेयर का बहुत बड़ा बिजनैस है. उस ने साक्षी को अपनी बातों के जाल में फांस कर अपना दोस्त बना लिया था.

जैसेजैसे समर खान और साक्षी की उम्र बढ़ती गई, उन की सोच में बदलाव आता गया. धीरेधीरे उन की दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे. इतना ही नहीं, दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया. इसी बीच साक्षी के घर वालों को बेटी के संबंधों की जानकारी हो गई. उन्हें बदनामी का डर सताने लगा. बीएससी करने के बाद साक्षी उस समय एयरहोस्टेस का कोर्स कर रही थी. उन्हें उस की शादी की इतनी जल्दी होने लगी कि उन्होंने उस का एयरहोस्टेस का कोर्स पूरा होना जरूरी नहीं समझा. वह उस के लिए लड़का तलाशने लगे. किसी ने उन्हें संभल के गवां मोहल्ले में रहने वाले बिजनेसमैन दीपक अग्रवाल के बेटे राहुल अग्रवाल के बारे में बताया.

दीपक अग्रवाल का गवां में एक पैट्रोल पंप था. जबकि राहुल रासायनिक खाद की दुकान संभालता था. प्रदीप अग्रवाल ने राहुल के बारे में छानबीन की तो वह उन्हें पसंद आ गया. इस बारे में उन्होंने दीपक अग्रवाल से बात की. दोनों तरफ से बातचीत होने के बाद 17 अप्रैल, 2015 को साक्षी और राहुल की शादी होने का दिन भी मुकर्रर कर दिया गया. आननफानन में तय हुई शादी के बात साक्षी को पता लगी तो वह परेशान हो गई. वह तो समर से शादी करना चाहती थी. उस ने समर खान को यह जानकारी दे कर जल्द से जल्द कोर्टमैरिज करने के लिए कहा.

लेकिन समर खान ने पैसों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘साक्षी इस समय मैं मजबूर हूं. व्यापार में काफी घाटा हो गया है, इसलिए पैसे न होने की वजह से मैं कोर्टमैरिज नहीं कर सकता. ऐसा करो फिलहाल जिस लड़के से तुम्हारी शादी हो रही है, कर लो. जैसे ही पैसों का इंतजाम हो जाएगा, तुम्हें मुंबई ले कर चला जाऊंगा.’’

न चाहते हुए भी साक्षी ने समर खान की बात मान ली. निर्धारित 17 अप्रैल, 2015 को धूमधाम के साथ साक्षी की राहुल के साथ शादी हो गई. इस तरह बेमन से वह पिया के घर चली गई. लेकिन पति राहुल अग्रवाल ने प्यार के बूते साक्षी का दिल जीत लिया था. कुछ दिनों तक तो वह राहुल के साथ खुश रही, लेकिन बाद उसे ससुराल में बोरियत महसूस होने लगी. राहुल सुबह 11 बजे खाना खा कर अपनी दुकान पर चला जाता था और रात 8-9 बजे घर लौटता था. साक्षी का अकेले मन नहीं लगता था. वह खुले विचारों वाली युवती थी. घूमनाफिरना, बड़ेबड़े होटलों में खाना खाना, उस की आदत थी.

शादी से पहले उस के मातापिता आंवला के बजाय शौपिंग कराने के लिए उसे बरेली ले जाते थे. तब उसे अच्छे होटल में खाना भी खिलाते थे. जबकि राहुल उसे बाहर घुमाने तक नहीं ले जाता था. वह घर में खाली पड़ी बोर होती रहती थी. उधर साक्षी की शादी के बाद समर खान पैसे कमाने के लिए मुंबई चला गया था. वह साक्षी को भूला नहीं था. इस बीच उस की अपनी प्रेमिका से फोन पर बात होती रहती थी. वह साक्षी को सुनहरे सपने दिखाता था. एक महीने बाद ही वह मुंबई से आंवला आ गया. साक्षी अपने पति राहुल से नाराज थी. वह उस से कहीं घूमनेफिरने को कहती तो वह दुकान पर बिजी होने की बात कह कर उस की बात को टाल देता था.

ऐसे में साक्षी को प्रेमी समर खान की याद आती. वह समर से कहती थी कि तुम मुझे इस नरक से निकालो. मेरे पिता ने मुझे गांव में डाल दिया है. मैं गाय के खूंटे की तरह बंध कर नहीं रहना चाहती. समर बारबार पैसे न होने की बात कहता. तब एक दिन साक्षी ने उस की समस्या का समाधान करते हुए कहा, ‘‘समर, मेरी ससुराल में बहुत माल है. मेरी ससुराल के लोग अपनेअपने कारोबार में व्यस्त हैं. सुबह निकल जाते हैं और देर शाम को ही वापस आते हैं. अलमारियों की सारी चाबियां मेरे पास ही रहती हैं. तुम किसी दिन पूर्वांह्न 11 बजे के बाद यहां आ कर सारा माल ले जाओ. मैं कह दूंगी लुटेरे ले गए हैं.’’

साक्षी की यह योजना समर को पसंद आ गई.  समर जानता था कि साक्षी की शादी एक खातेपीते परिवार में हुई है. उस के यहां माल भी काफी होगा. उस के यहां लूट की वारदात को अंजाम देना उस के अकेले के बस का नहीं था. उस ने इस बारे में अपने अपराधी किस्म के दोस्तों विकास उर्फ विक्की, सोनू और नीरज से बात की. पैसे के लालच में वे सब उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. फिर योजना के मुताबिक 15 मई, 2015 को समर खान और उस के दोस्तों ने राहुल के घर की रेकी की.

योजना को अंजाम देने के लिए एक हफ्ते बाद 23 मई, 2015 को दिन के 12 बजे के करीब वे चारों राहुल के घर पहुंच गए. दरवाजे पर दस्तक देने पर साक्षी ने दरवाजा खोला. उन्होंने दिखावे के लिए उसे तमंचे से डरा दिया. राहुल की भतीजी प्रियंका उस समय टीवी देख रही थी. साक्षी ने इशारे से बता दिया था कि वह अंदर है. तब उन चारों लोगों ने प्रियंका को पकड़ कर उस के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया. 2 लोग उस के पास ही खड़े रहे.

मारनेपीटने का नाटक कर 2 बजे साक्षी को ऊपर के कमरे में ले गए. तभी साक्षी ने अलमारियों की चाबियां समर को दे दीं. अलमारियों से उन्होंने ज्वैलरी, चांदी के सिक्कों के अलावा नकदी भी निकाल ली. एक अलमारी का ताला उन से नहीं खुल रहा था तो साक्षी ने अपने हाथों से वह ताला खोल कर सोनेचांदी के जेवर निकाल कर उन्हें दे दिए थे. दिखावे के लिए समर ने साक्षी के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया था. कुछ ही देर में वे ज्वैलरी, नकदी, लैपटौप, मोबाइल आदि सहित करीब 30 लाख रुपए का माल ले गए.

कुछ देर बाद साक्षी ने अपने पति राहुल, ससुर आदि को घटना की जानकारी दी व मोहल्ले में शोर मचा दिया कि बदमाश लूटपाट कर के सारा सामान ले गए. दीपक अग्रवाल और राहुल को इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि साक्षी अपने ही घर में ऐसा कर सकती है. लेकिन अभियुक्त समर खान के स्वीकारने के बाद वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. पुलिस ने समर की निशानदेही पर उस की होंडा सिटी कार से दीपक के यहां से लूटा गया लैपटौप, 38 चांदी के सिक्के, 80 हजार रुपए नकद, मोबाइल फोन, 2 तमंचे और कारतूस बरामद किए. पुलिस ने वह होंडा सिटी कार भी बरामद कर ली. साक्षी को भी उन्होंने उसी समय गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दिनांक 3 जून, 2015 को तीनों अभियुक्तों समर खान, साक्षी व विकास नारंग उर्फ विक्की को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अन्य आरोपी सोनू और नीरज कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार नहीं हो सके थे. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, रुकैया परिवर्तित नाम है

 

Dehradun Crime: नादान उम्र की भूल

Dehradun Crime: नादान शालू की रवि राजपूत से दोस्ती हो गई, जिसे रवि प्यार समझ बैठा. परेशानी तब हुई, जब इस प्यार ने रवि को जुनूनी बना दिया. वह शालू को भगा कर अपनी दुनिया बसाना चाहता था. एक रात वह शालू को भगा ले जाने के इरादे से आया तो शालू ने इंकार कर दिया. दोनों की इस जिद में शालू की जान गई तो रवि अपराधी बन गया.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पौश कालोनी पाम सिटी में लोगों की एक से बढ़ कर एक कोठियां और फ्लैट्स हैं. इन्हीं कोठियों में से कोठी नंबर 91 के.के. अरोड़ा की है. खुशमिजाज शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले के. के. अरोड़ा पेशे से प्रौपर्टी डीलर थे. वह होटल कारोबार से भी जुड़े रहे हैं. हर शख्स चाहता है कि उस का परिवार खुश रहे, आर्थिक रूप से संपन्न अरोड़ा भी इस चाहत को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे.

उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 2 बेटियां थीं, शालू व शालिनी और एक छोटा बेटा विशाल. शालू शहर के ही एक कालेज में इंटर की छात्रा थी. उस के दोनों भाईबहन भी पढ़ाई कर रहे थे. अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह परिवार बेहद खुशहाल था. किस की जिंदगी में खुशियों का सूरज कब रेशमी किरणें फैलाने लगे और कब शाम का रंग लाल हो कर दिल दहला जाए, कोई नहीं जानता. 21 जून, 2015 को विश्व योग दिवस मनाया जाना था. इसे ले कर शहर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे. के. के. अरोड़ा को भी एक ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना था, जहां सामूहिक रूप से योगा किया जाना था. उस दिन वह भोर में करीब साढ़े 5 बजे जाग गए थे.

उन की कोठी चूंकि 2 मंजिला थी, लिहाजा सभी के सोने के लिए अलगअलग कमरे बने हुए थे. सुबहसुबह अरोड़ाजी कोठी की छत पर जा कर टहलने लगे. तब तक उन की पत्नी लक्ष्मी भी उठ कर बैडरूम से बाहर आ गई थीं. वह बड़ी बेटी शालू के कमरे की तरफ गईं. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं थी. आमतौर पर हर रोज उस वक्त शालू सोती हुई मिला करती थी. बेटी को बिस्तर पर न पा कर लक्ष्मी थोड़ा चौंकीं. उन्हें नहीं पता था कि वह कहां चली गई थी. उन्होंने पति के पास पहुंच कर बताया कि शालू अपने कमरे में नहीं है.

अरोड़ा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘‘हो सकता है घूमने चली गई हो.’’

कालेज की छुट्टियां चल रही थीं. कभीकभी ऐसा भी होता था कि शालू मौर्निंग वाक पर निकल जाती थी. लक्ष्मी दूसरी बेटी शालिनी के पास गईं. तब तक वह जाग चुकी थी. उन्होंने उस से भी पूछा, ‘‘शालू कहीं नहीं दिख रही, तूने देखा है क्या उसे?’’ लेकिन शालिनी ने भी शालू को देखने की बात से इनकार किया.

वैसे तो यह मामूली सी बात थी. लेकिन बच्चे मातापिता की नजरों के सामने न हों या उन्हें बिना बताए कहीं चले जाएं तो चिंता हो ही जाती है. बेटियों के मामले में तो चिंता और बढ़ जाती है. लक्ष्मी को चिंता हुई तो वह ‘शालू शालू’ पुकारते हुए कोठी में दूसरी तरफ गईं. उसी वक्त अनायास उन की निगाह लौबी की ओर चली गई. वहां शालू खून के सैलाब में डूबी फर्श पर पड़ी थी. यह नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘बेटीबेटी’ पुकारते हुए शालू को हिलायाडुलाया, उसे झिंझोड़कर देखा. लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

बदहवास सी लक्ष्मी चिल्लाते हुए पति की तरफ दौड़ीं. वह भी दौड़ कर आए. बेटी को इस दशा में देख कर वह भी जड़वत रह गए. शालू का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था. इस खौफनाक मंजर ने लक्ष्मी की रुलाई को हृदयविदारक चीखों में तब्दील कर दिया. आसपड़ोस के लोगों ने चीखने और रोने की आवाज सुनी तो वे घरों से बाहर निकल आए. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पहले से ही मौर्निंग वाक के लिए सड़क पर टहल रहे थे. वे भी अंदर आ गए. रक्तरंजित नजारा देख कर उन के कलेजे कांप गए. निस्संदेह किसी ने शालू की हत्या कर दी थी.

आननफानन में 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया. करीब 20 मिनट में एक गश्ती पीसीआर मौके पर पहुंच गई. यह इलाका थाना पटेलनगर में आता था. थानाप्रभारी पंकज गैरोला, वरिष्ठ उप निरीक्षक नत्थीलाल उनियाल तथा अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना सनसनीखेज थी, सूचना मिलते ही एसएसपी पुष्पक ज्योति और एसपी सिटी अजय कुमार वगैरह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. 17 वर्षीया शालू 3 फुट की लौबी में पड़ी थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था और आसपास खून फैल कर जम गया था.

मौके पर काले व सफेद रंग का एक मर्दाना गमछा पड़ा था. संभवत वह कातिल का था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसएसपी के निर्देश पर क्राइम ब्रांच की फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुलाया गया. जांच में मदद के उद्देश्य से ट्रेनर पुलिसकर्मी ने प्रशिक्षित कुत्ते को घटनास्थल और लाश को सुंघा कर छोड़ दिया. वह छत व सीढि़यां उतर कर नीचे गया और टहल कर वापस आ गया. जाहिर है इस से कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने भी अपने हिसाब से घटनास्थल की जांच की. पुलिस ने परिजनों से भी औपचारिक पूछताछ की. मृतका के बहन और भाई गमगीन होने की वजह से बात करने की स्थिति में नहीं थे. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि शालू की हत्या का सैटरडे नाइट में परिवार के किसी सदस्य को पता तक नहीं लग सका था. किसी ने उस के चीखने की आवाज भी नहीं सुनी थी. यह बात थोड़ी अजीब लगने वाली थी. वैसे भी घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था.

शुरुआती जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला सीधेसीधे हत्या का था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. क्योंकि घर से कोई चीज गायब नहीं थी. तीसरा यह कि वारदात में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जो घर की भौगोलिक स्थिति से भी परिचित था. यह भी संभव: हो सकता था कि बदमाश लूटपाट के इरादे से कोठी में घुसे हों और इसी बीच शालू लौबी में गई हो और उन्होंने उस की हत्या कर दी हो. इस के बाद वे बिना लूटपाट किए ही भाग गए हों. यह केवल अनुमान भर था.

प्राथमिक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने के. के. अरोड़ा की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ पटेलनगर थाने में भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. साथ ही शालू के शव को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्पताल भिजवा दिया. इस केस की विवेचना एसएसआई नत्थीलाल उनियाल के सुपुर्द की गई. घटना का पता चलने पर डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देश पर एसएसपी पुष्पक ज्योति ने केस की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में थाना पुलिस के अलावा सहसपुर थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट, प्रेमनगर थानाप्रभारी रवि कुमार सैनी, एसआई मनोज नैनवाल, नरोत्तम सिंह, विक्रम सिंह, कांस्टेबल अनिल, संदीप, सहदेव त्यागी, हितेश कुमार व आशीष राठी के अलावा क्राइम ब्रांच को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालू का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने रिपोर्ट में बताया कि शालू की मृत्यु सिर पर हुए प्रहार के कारण अत्यधिक रक्तप्रवाह की वजह से हुई थी. उस के सिर की हड्डी भी टूटी पाई गई थी. पुलिस ने पड़ताल शुरू की. सुरक्षा के लिहाज से कालोनी के एंट्री गेट पर रात में एक सिक्योरिटी गार्ड रहता था. उस के मुताबिक घटना वाली रात 12 बजे के बाद कालोनी में किसी का आवागमन नहीं हुआ था. हालांकि कालोनी के कुछ घरों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, परंतु उन के फोकस का दायरा सीमित था. कातिल बाहर से नहीं आया था तो शालू की हत्या किस ने की, यह अहम सवाल था.

पुलिस ने शालू के घर वालों से पुन: पूछताछ की तो उन्होंने रवि राजपूत नामक युवक पर अपना संदेह जताया. मृतका की बहन ने पुलिस को बताया कि नजदीक के एक फ्लैट में रहने वाला लड़का रवि राजपूत शालू को परेशान किया करता था. उस ने यह भी बताया कि मौकाएवारदात पर जो मर्दाना गमछा पाया गया है, उसे उस ने रवि के गले में कई बार देखा था. पुलिस ने रवि को शक के दायरे में रख कर जांच आगे बढ़ाई. पुलिस वहां पहुंची, जिस फ्लैट में रवि रहता था. पता चला कि रवि मूलरूप से हरियाणा के जिला करनाल के रहने वाले रूप सिंह का बेटा था. वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुका था.

उस फ्लैट में वह अपने ममेरे भाई ऋषिपाल के पास कभीकभी आ कर ठहरता था. ऋषिपाल मूलरूप से सहारनपुर के बड़गांव का रहने वाला था और प्रौपर्टी का काम करता था. उस वक्त वह भी लापता था. पुलिस ने शालू का मोबाइल हासिल किया तो उस में लौक लगा था. एक्सपर्ट से उस का लौक खुलवाया गया. उस में लेट नाइट की एक आखिरी काल थी. जांच में वह नंबर रवि का निकला. पुलिस ने शालू व रवि के नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. उन से साबित हुआ कि घटना वाली रात उस की न सिर्फ शालू से बातें हुई थीं, बल्कि आधी रात के बाद रवि की लोकेशन भी पाम सिटी में ही थी.

रवि पूरी तरह शक के दायरे में आ गया था. पुलिस टीम ने उस की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह देहरादून से भागने की कोशिश कर रहा था. उस के साथ सुनील राणा व उस का दोस्त प्रताप सिंह भी थे. पुलिस तीनों को थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया तो एक चौंकाने वाली कहानी पता चली. रवि बचपन से ही जिद्दी और दबंग स्वभाव का युवक था. बुरे लड़कों की संगत में रह कर वह कालेज के लड़ाईझगड़ों में पड़ने लगा था. परिजनों ने उसे डांटाफटकारा, समझाया, लेकिन वह नहीं समझा. उस ने जैसेतैसे इंटरमीडिएट तो पास कर लिया, लेकिन इस से आगे वह न पढ़ा.

बेटा सुधर जाए इस उम्मीद में पिता ने 2015 में उसे देहरादून की पाम सिटी में रह रहे ऋषिपाल के पास भेज दिया था. उन्हें लगता था कि वह उस के साथ रह कर कोई काम करेगा तो सुधर जाएगा. रवि देहरादून आया तो उसे और भी आजादी मिल गई. वह शराब भी पीने लगा. उस के हावभाव से ले कर बातों में दबंगई होती थी. अपनी दबंगई के लिए वह अपने पास एक तमंचा भी रखता था. देहरादून में भी उस ने अपने कई दोस्त बना लिए थे. यहीं पर एक दिन राह से गुजरते हुए रवि की नजरें शालू से चार हो गईं. पहली ही नजर में शालू उस के दिल में उतर गई.

रवि उन युवाओं में से था, जो उम्र से पहले ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. वह चालाक किस्म का युवक था. एक दिन उस ने बहाने से शालू से बातचीत की और उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. बड़े शहरों में लड़केलड़कियों के बीच यह कोई बड़ी बात नहीं होती. शालू ने भी बिना सोचेसमझे उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. शालू ने अपनी छोटी बहन शालिनी को भी यह बात बता दी थी. कई बार की बातों और सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए दोनों एकदूसरे के संपर्क में बने रहे. शालू उस के मैसेज का जवाब दे देती थी. इस से उस के हौसले बढ़ गए. शालू खूबसूरत लड़की थी. रवि उसे अपना बनाने का सपना देखने लगा. उस ने एक दिन अपने प्यार का इजहार भी कर दिया, लेकिन शालू ने इनकार कर दिया.

रवि को लगा कि उस का इनकार सिर्फ दिखावा है, अंदर से शालू भी उस से प्यार करती है. दोनों की मेलमुलाकातें हुईं तो शालू के रिश्ते के एक भाई आशीष ने उन्हें देख लिया. उस ने शालू को डांटा, क्योंकि वह रवि की आवारगी जानता था. इस के बाद उन का मिलनाजुलना कम हो गया. दूसरी तरफ रवि शालू को पाने के सपने देखने लगा था. शालू जब उस से बात नहीं करती तो वह रास्ते में उसे रोकने की कोशिश कर के उसे परेशान करता. शालिनी इन बातों को जानती थी. फोन पर वह न केवल शालू के संपर्क में रहने लगा, बल्कि उसे मैसेज भी भेजा करता था. रवि के सिर पर प्यार का भूत सवार था. शालू ने उस के एकतरफा प्यार को जब ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उस ने अपनी एक फोटो इंटरनेट के जरिए उसे भेज दी.

उस फोटो में वह फांसी का फंदा हाथ में लिए नजर आ रहा था. उस ने लिखा था, ‘यदि तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’ यह देख कर शालू उलझन में पड़ गई. वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से कोई मर जाए, तभी रवि का फोन आ गया. वह बोला, ‘‘अब बोलो, तुम मुझ से प्यार करती हो ना?’’

‘‘देखो, मैं कुछ नहीं कहना चाहती. तुम्हें जो समझना है समझो और हां प्लीज ऐसी कोई हरकत आगे से मत करना.’’

रवि ने उस की इन बातों को इकरार समझ लिया. उसे लगा कि शालू को उस की फिक्र है, इसलिए वह उसे मरने नहीं देना चाहती. इस के बाद वह उस के खयालों में ही खोया रहने लगा. अंजाम से बेखबर शालू उस के जुनून को समझ नहीं पाई. उस ने यह बातें अपने मातापिता को भी नहीं बताईं. यह उस की नादान उम्र का तकाजा था. अलबत्ता शालू ने रवि के फोटो भेजने वाली बात अपनी बहन शालिनी को जरूर बता दी थी. रवि को ले कर कोई बदनामी न हो, इसलिए शालू ने उस से थोड़ी दूरी बनाने की सोची. वह उस से कम बातें करने लगी. इस से रवि को लगा कि शायद वह अपने परिवार की वजह से ऐसा करती है.

उस के दिमाग में सुबहशाम, दिनरात शालू की ही छवि घूमती रहती थी. उसे देखे बिना उसे सुकून नहीं आता था. शालू से दोस्ती के किस्से उस ने अपने दोस्तों को भी सुना रखे थे. इसी बीच वह करनाल चला गया. वहां जाने के बाद उसे दूरियां बरदाश्त नहीं हुईं. शालू भले ही उसे तवज्जो नहीं देती थी, लेकिन अपनी तरफ से वह उसे बहुत प्यार करता था. शालू ने सोचा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और रवि उसे अपने दिमाग से निकाल कर अपने काम पर ध्यान देगा. उधर रवि के सिर पर शालू को पाने की जिद सवार हो गई थी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह शालू को अपनी बना कर ही दम लेगा. इस के लिए रवि ने उसे भगाने की योजना बनाई.

उस ने सोचा कि शालू परिवार की मजबूरियों में कैद है, इसलिए वह उस से ज्यादा बात नहीं कर पाती. वह उस के सामने प्रस्ताव रखेगा तो वह उस के साथ खुशीखुशी चल देगी. उस ने यह बात अपने दोस्त सुनील व प्रताप को बताई कि वह एक लड़की से प्यार करता है और उसे भगा कर शादी करना चाहता है. रवि ने उन्हें बताया कि वह उसे हर सूरत में हासिल करना चाहता है. रवि की चाहत देख कर वे दोनों उस की मदद करने को तैयार हो गए. 19 जून की शाम रवि सुनील व प्रताप के साथ शालू को भगा ले जाने के इरादे से देहरादून आया. तीनों जीएसएम रोड स्थित एक होटल में रुके.

रवि अपने साथ एक तमंचा भी लाया था. उस ने सोचा था कि अगर शालू के घर वाले किसी वजह से रोकने की कोशिश करेंगे तो वह उन्हें डराधमका कर रोक देगा. अगली रात उस ने शालू को फोन कर के कहा, ‘‘शालू मुझे तुम से मिलना है.’’

‘‘अब रात में?’’ शालू चौंकी.

‘‘हां, मेरे पास वक्त कम है और तुम से नहीं मिला तो सच में मैं मर जाऊंगा. मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात है? मोबाइल पर ही बता दो.’’

‘‘नहीं, मिल कर ही बताऊंगा और तुम्हें मेरी बात माननी होगी.’’

‘‘मानने वाली होगी तो ही मानूंगी ना, फिर ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘पहले मुझे आने दो.’’

‘‘तुम जानते हो यह गलत है और कोई गड़बड़ भी हो सकती है.’’

‘‘कुछ नहीं होगा मैं लेट नाइट आ जाऊंगा.’’ रवि ने कहा तो शालू सोच में डूब गई. वैसे भी उसे रवि की दोस्ती परेशान करने लगी थी और वह उस से पीछा छुड़ाने के बारे में सोच रही थी. वह रवि पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने इजाजत भी दे दी, ‘‘ठीक है, तुम आ जाना, मैं पिछला दरवाजा खोल दूंगी.’’

कोठी के पीछे की तरफ से भी एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा था. इस भौगोलिक स्थिति को रवि जानता था. यह बात उसे शालू ही बता चुकी थी. रवि करीब एक बजे सुनील व प्रताप के साथ होटल से निकला. ये लोग पैदल चल कर कारगी चौक की ओर गए. उधर से ही पाम सिटी का रास्ता था. कालोनी में जाने के लिए उस ने मुख्य गेट नहीं चुना. वह जानता था कि शालू के भागने के बाद हंगामा मचेगा तो वह पकड़ा जा सकता है.

पाम सिटी कालोनी की चारदीवारी थी. उस के बाहर खेत व जंगल था. खेतों के रास्ते वे लोग दीवार फांद कर कालोनी में दाखिल हो गए. करीब डेढ़ बजे कोठी के पीछे पहुंच कर रवि ने शालू को फोन किया. उस ने चुपके से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सुनील व प्रताप लौबी में ही खड़े रहे, जबकि शालू के साथ रवि ड्राइंगरूम में पहुंच गया. शालू ने उस से पूछा, ‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘शालू मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हूं.’’

‘‘मतलब?’’ उस की बात सुन कर शालू चौंकी.

‘‘तुम्हें यहां से आजाद करा कर मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

सुन कर शालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे नहीं पता था कि रवि इतने बड़े ख्वाब देख चुका है.

‘‘पागल हो गए हो तुम?’’ शालू ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहे जो समझो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा. तुम डरती किस से हो, मैं सब को देख लूंगा.’’ कहते हुए उस ने तैश में आ कर तमंचा निकाल कर शालू को दिखाया. लेकिन शालू ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया.

इस के बावजूद वह करीब एक घंटा उसे समझाता रहा. शालू नानुकूर करती रही. रवि जबरन प्यार हासिल करना चाहता था. उस ने मन ही मन सोच लिया कि या तो वह शालू को साथ ले जाएगा या हमेशा के लिए उस का किस्सा खत्म कर देगा. शालू समझ गई कि यह बिगड़ैल किस्म का युवक है, इसलिए उस से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है. बात करतेकरते दोनों लौबी में आ गए. शालू ने उसे चले जाने को कहा.

रवि को अपनी योजना फेल होती नजर आई तो उस ने निर्णायक अंदाज में पूछा, ‘‘शालू आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम मेरे साथ चलोगी या नहीं?’’

शालू ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘बिलकुल नहीं, तुम पागल हो गए हो.’’

‘‘मैं तुम्हें उठा कर ले जाऊंगा, फिर देखता हूं तुम्हारी मरजी कैसे चलेगी.’’ उस ने कहा तो शालू ने उसे चेतावनी भरे लहजे में जवाब दिया. ‘‘ऐसी गलती मत करना रवि, मैं शोर मचा कर तुम सब को अभी पकड़वा दूंगी समझे. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

अपनी जिद पूरी न होते देख रवि गुस्से में आ गया. उस ने शालू को हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो शालू ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया. इस से वह आगबबूला हो गया. तब तक उस के साथी भी आ गए थे. रवि ने तमंचा निकाल कर उस की बट से शालू के सिर पर वार कर दिया. वार तेज था. खून बहा तो मामूली चीख के साथ वह सिर थाम कर नीचे बैठ गई. उस ने चिल्लाने की कोशिश की तो रवि ने उस का मुंह दबा दिया और नीचे गिरा दिया. फिर उस का सिर पकड़ कर फर्श में दे मारा. उस के साथियों ने शालू के हाथपैर पकड़ लिए. रवि तब तक उस का सिर पटकता रहा, जब तक कि उस की मौत नहीं हो गई. इस से उस का सिर बुरी तरह फट गया और आसपास खून फैल गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने रवि की निशानदेही पर तमंचा बरामद कर लिया. उस के साथियों का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि रवि इस तरह हत्या कर देगा. वह तो शालू को भगाने में उस का सहयोग करने के लिए उस के साथ चले आए थे. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

शालू नादान उम्र में रवि जैसे सिरफिरे की दोस्ती में न पड़ी होती और उस की हरकतों के बारे में अपने पिता को बता दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. रवि ने भी अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से प्यार के जुनून में खून से हाथ रंग कर अपना भविष्य खराब कर लिया. कथा लिखे जाने तक रवि व उस के साथियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर रही थी. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Crime Story: ख्वाहिश की खूनी उड़ान

Crime Story: राजेश मास्टर गोवर्धनदास को इस बात की सजा देना चाहता था कि उस बूढ़े मास्टर ने उस की पत्नी को खराब किया था. उस ने पत्नी की मदद से मास्टर को सजा तो दे दी, लेकिन नतीजा क्या निकला…

मैं उन दिनों पंजाब के जिला पटियाला का एसएसपी था, जब यह लोमहर्षक हत्याकांड घटित हुआ था. 1994 में आईपीएस अधिकारी के रूप में मैं ने पंजाब पुलिस जौइन की थी. अपनी 21 साल की नौकरी में कत्ल की ऐसी दास्तान मेरे सामने इस के पहले नहीं आई थी. 2 दिनों के कस्टडी रिमांड में थाना पुलिस के साथ मैं ने भी इस हत्याकांड के अभियुक्तों सुदीप कौर और राजेश से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की थी. इस पूछताछ में उन लोगों ने हमें जो कुछ बताया था और पुलिस जांच में जो तथ्य सामने आए थे, उस से अपराध की एक ऐसी कहानी सामने आई थी, जो काल्पनिक अपराध कथाओं से भी कहीं ज्यादा रोचक एवं अविश्वसनीय थी.

जाट सुरजीत सिंह पटियाला के एक अस्पताल में नौकरी करता था, जबकि उस की पत्नी दलजीत कौर घर की जिम्मेदारी संभालती थी. उन के यहां बच्चों में एक बेटा और 3 बेटियां थीं. दलजीत चाहती थी कि उस की सभी संतानें खूब पढ़लिख कर अच्छी नौकरियां हासिल कर के अपना भविष्य बनाएं. यह परिवार मूलरूप से जिला पटियाला के एक गांव का रहने वाला था. बच्चों की पढ़ाई की खातिर पटियाला शहर आ गया था और राजपुरा कालोनी में किराए का मकान ले कर रहने लगा था.

एक समस्या ने यहां भी इस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह समस्या थी सुरजीत सिंह का नियमित शराब पीना. इसी वजह से घर में काफी लड़ाईझगड़ा होता रहता था. ऐसे माहौल में बच्चों के लिए पढ़ाई कर पाना मुश्किल हो जाता था. बच्चों में सब से बड़ी बेटी सुदीप कौर पढ़ाई में काफी होशियार थी. पटियाला आने के बाद सुदीप को मास्टर गोवर्धनदास के बारे में पता चला तो वह उन से मिलने उन के घर गई. पहले वह अर्थशास्त्र के अध्यापक थे और अपने विद्यार्थियों में वह काफी प्रसिद्ध थे. पढ़ाने में उन का कोई जवाब नहीं था. कुछ सालों पहले नौकरी से रिटायर होने के बाद वह घर पर ट्यूशन पढ़ाने लगे थे. गरीब विद्यार्थियों को वह मुफ्त ट्यूशन पढ़ाते थे.

पटियाला के पुराने एरिया में मास्टर गोवर्धनदास का बहुत बड़ा मकान था. पूछतेपूछते सुदीप भी उन के यहां जा पहुंची थी. मास्टरजी को लगा कि लड़की पढ़ाईलिखाई में होशियार है, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति पढ़ाई में बाधा बन रही है तो उन्होंने उसे मुफ्त में ट्यूशन पढ़ाने के लिए हामी भर दी. मास्टर गोवर्धनदास की छत्रछाया में सुदीप ने इकोनौमिक्स से एमए किया. वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती थी. लेकिन वह वकील बन पाती, घर वालों ने पहले ही उस की शादी कर दी. सुदीप पढ़लिख तो गई ही थी, उस की उम्र भी शादी लायक हो गई थी, इसलिए घर वालों ने अच्छा रिश्ता देख कर उस की शादी कर दी थी.

अब तक मास्टर गोवर्धनदास को भी अपनी इस लायक शिष्या से काफी लगाव हो गया था. उस की पारिवारिक स्थिति भी उन से छिपी नहीं थी, इसलिए उन्होंने उस की शादी में दिल खोल कर खर्च किया था. सुदीप के पति का नाम था राजेश. उस के साथ सुदीप जब कभी गोवर्धनदास के यहां जाती, वह उन की आवभगत बेटी और दामाद की तरह ही करते थे.

एक दिन गोवर्धनदास के परिवार के सभी लोग कहीं गए हुए थे. घर में वह और उन का बेटा अशोक था. दोपहर को मास्टरजी के लिए किसी का फोन आया. फोन पर बात करने के बाद उन्होंने बेटे से कहा, ‘‘अशोक, सुदीप के पति के काम से मुझे अभी दिल्ली जाना होगा. तुम मेरी अटैची तैयार कर दो, मैं 2-4 दिनों बाद लौटूंगा.’’

पिता के स्वभाव को अशोक बखूबी जानता था. जब भी किसी को उन की जरूरत पड़ती थी, वह न वक्त की परवाह करते थे और न खर्चे की. क्योंकि उन के पास पैसों की कमी तो थी नहीं. पैंशन मिल ही रही थी, अच्छे और संपन्न घरों के बच्चे उन के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे, जिन से वह मोटी फीस वसूल करते थे. चूंकि इस उम्र में भी वह बढि़या कमा रहे थे, इसलिए घर में किसी की ओर से उन पर कोई बंदिश नहीं थी. वह जहां चाहे जा सकते थे, मर्जी के हिसाब से खर्च कर सकते थे.

पिता के कहने पर अशोक ने तुरंत उन की अटैची तैयार कर दी और अपनी स्कूटर से उन के कहे अनुसार गुरुद्वारा दुख निवारण के पास छोड़ दिया. गोवर्धनदास के जाने के बाद उन के बेटे अशोक को भी किसी काम से पटियाला से बाहर जाना पड़ गया. 3 दिनों बाद लौट कर जब उस ने पिता के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अभी दिल्ली से लौट कर नहीं आए हैं. उन का कोई फोन भी नहीं आया है. अशोक ने पिता को फोन किया तो उन का मोबाइल स्विच्ड औफ बता रहा था. अशोक ने सोचा कि बैटरी वगैरह डिस्चार्ज हो गई होगी. इसलिए ऐसा हो रहा है.

लेकिन जब अगले दिन भी उन का फोन बंद बताता रहा तो अशोक को पिता की चिंता हुई. वह सुदीप के पति का काम कराने की बात कह कर दिल्ली गए थे, इसलिए उन के बारे में सुदीप से ही कुछ पता चल सकता था. अशोक तुरंत उस के घर जा पहुंचा. सुदीप और उस का पति घर पर ही थे. अशोक ने जब उन से पिता के बारे में पूछा तो उन्होंने एक साथ कहा, ‘‘मास्टरजी हमारे किसी काम से दिल्ली नहीं गए. हम ने उन्हें किसी काम के लिए कहा ही नहीं था. हमें तो यह भी पता नहीं कि मास्टरजी दिल्ली गए हुए हैं.’’

उन के इनकार करने से अशोक निराश हो कर घर लौट आया. इस के बाद परिवार के सभी लोग गोवर्धनदास की तलाश में जुट गए. काफी कोशिश के बाद भी जब कोई सफलता हाथ नहीं लगी तो अशोक अगले दिन सुबह अर्बन एस्टेट पुलिस चौकी जा कर चौकीप्रभारी एसआई बलविंदर सिंह से मिला. उन से पूरी बात बताई तो उन्होंने मास्टर गोवर्धनदास की गुमशुदगी दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. गोवर्धनदास के दामाद दलीप कुमार वर्मा ने देखा कि मास्टरजी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो उन्होंने थाना सदर में तहरीर दी कि ‘मैं गोवर्धनदास की बेटी सीमा का पति हूं. मेरे ससुरजी सरकारी स्कूल से रिटायर होने के बाद घर पर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते थे. उन्हीं में एक सुदीप कौर भी थी, जिसे मेरे ससुरजी बेटी की तरह मानते थे. 2-3 महीने पहले उस की शादी राजेश से हो गई थी.

‘जब वह कुंवारी थी तो गुरमेज सिंह निवासी गांव मिदड़ो व जगबीर सिंह निवासी गांव लहरां अकसर उसे मेरे ससुरजी के यहां छोड़ने आते थे. इस पर मेरे ससुरजी ने ऐतराज किया. इस बात को ले कर एक बार मेरी भी उन से तकरार हुई. बाद में मैं ने सुदीप और उन दोनों लड़कों के संबंधों के बारे में पता लगाया.

‘पता चला कि उन दोनों लड़कों से सुदीप के नाजायज संबंध थे. वह उन लड़कों के साथ होटलों में भी जाया करती थी. जब इस बात की जानकारी मेरे ससुरजी को हुई तो उन्होंने उसे समझाते हुए चेतावनी दी कि वह उन लड़कों से अपने संबंध हमेशा के लिए खत्म कर ले.

‘इस बात से नाराज हो कर गुरमेज और जगबीर ने मेरे ससुरजी को धमकी भी दी थी. इस के बाद सुदीप की शादी हो गई तो बात आईगई हो गई. शादी के बाद सुदीप कभी अकेली तो कभी अपने पति राजेश के साथ मेरे ससुरजी के यहां आती रहती थी.

‘अब तक गुरमेज और जगबीर की बात सब के दिमाग से निकल गई. इस के बाद सुदीप के पति का काम करवाने के लिए दिल्ली जाने की बात कह कर मेरे ससुरजी घर से निकले थे. लेकिन वह गए तो लौट कर नहीं आए.

‘घर से जाते समय मेरे ससुरजी स्टेट बैंक औफ पटियाला का अपना एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन साथ ले गए थे. जब कई दिनों तक उन का मोबाइल फोन बंद बताता रहा तो चौकी पुलिस की मदद से मैं ने अपने ससुरजी का खाता चैक करवाया, तब बैंक से पता चला कि उस में से 75 हजार रुपए निकाले गए हैं. खाते में ढाई लाख रुपए और बचे थे. इसलिए मैं ने खाते को सील करवा दिया.

‘मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे ससुरजी को साजिश के तहत गुरमेज और जगबीर ने ही अगवा किया है. इस की वजह यह हो सकती है कि उन दोनों के सुदीप से नाजायज संबंध थे और मेरे ससुरजी इन की राह का रोड़ा बने हुए थे. उन्हीं लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के लिए अपहरण किया है.

‘यह भी हो सकता है कि उन लोगों ने मेरे ससुरजी को मौत के घाट उतारने के बाद उन की लाश को ठिकाने लगा दिया हो. आप से विनती है कि तीनों के खिलाफ मामला दर्ज कर सख्त काररवाई करें.’

थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए दलीप वर्मा की इस तहरीर पर भादंवि की धारा 364 के तहत मामला दर्ज करा दिया और वांछित मुजरिमों की तलाश में उन के ठिकानों पर छापामारी शुरू कर दी. छापेमारी में जगबीर और गुरमेज ही नहीं, सुदीप और राजेश भी अपनेअपने घरों से नदारद मिले. 2 दिनों तक इन चारों के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. पटियाला के फोकल पौइंट इलाके में एक फर्म है, जिस के मालिक व्यापारी होने के साथसाथ समाजसेवी भी हैं. एक दिन उन्होंने सुदीप और राजेश को थानाप्रभारी मनजीत सिंह बराड़ के सामने पेश कर के कहा कि मास्टर गोवर्धनदास का कत्ल इन्हीं लोगों ने किया है. यह अपना अपराध स्वीकार कर रहे हैं.

जब कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति इस तरह के दोषी को पुलिस के सामने पेश करता है तो इस प्रक्रिया को एक्स्ट्रा जूडीशियल कन्फैशन कहा जाता है. इस के अधीन पुलिस मुजरिम को पेश करने वाले व्यक्ति का सीआरपीसी की धारा 161 के तहत बयान दर्ज कर के अपराधियों को विधिवत गिरफ्तार कर के आगे की काररवाई करती है. इस मामले में भी मनजीत सिंह ने ऐसा ही किया. इधर पुलिस की काररवाई शुरू हुई, उधर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से आए वारंट औफिसर ने थाने में छापा मार दिया. उन का कहना था कि थाना पुलिस राजेश और सुदीप को गलत तरीके से हिरासत में रख कर उन पर झूठा केस बनाने की कोशिश कर रही है. इस संबंध में एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल की गई थी.

मनजीत सिंह बराड़ को समझते देर नहीं लगी कि जिन 2 मुजरिमों को उन की अपराध स्वीकृति की पेशकश के साथ ला कर उन के समक्ष पेश किया गया था, दोनों बहुत ही शातिर और अव्वल दर्जे के चालाक थे. लेकिन मनजीत सिंह भी कम चालाक नहीं थे. उन्होंने सारी कानूनी काररवाई बड़ी तेजी से की थी. अगर उन्होंने ऐसा न किया होता तो वारंट अधिकारी सुदीप और राजेश को अपने साथ ले जाता तो फिर शायद वे दोनों जल्दी उन की पकड़ में न आ पाते.

मनजीत सिंह ने सारी जानकारी डीएसपी गुरमीत चौहान को उन के मोबाइल पर दी तो वह भी तत्काल थाने आ गए. सुदीप और राजेश के अपराध और उन की गिरफ्तारी के सारे कागजात देख कर वारंट औफिसर संतुष्ट हो कर चले गए. यह मामला पहले ही मेरी नोटिस में आ चुका था. लेकिन जब डीएसपी गुरमीत चौहान ने यह सब मुझे विस्तार से बताया तो इस केस में मेरी रुचि और बढ़ गई. शुरू में ही अच्छाखासा झटका लग गया था, इसलिए आगे हर कदम फूंकफूंक कर रखने की जरूरत थी. उस दिन सुदीप और राजेश से कोई खास पूछताछ नहीं हो सकी. दोनों को हवालात में अलगअलग बंद कर दिया गया था. रात में भी खाना खा कर उन्हें सोने दिया गया.

अगले दिन थाना पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश कर के 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले लिया. रिमांड के दौरान इंसपेक्टर मनजीत सिंह, डीएसपी गुरमीत चौहान और सीआईए पुलिस के अलावा मैं ने भी दोनों से मनोवैज्ञानिक तरीके से व्यापक पूछताछ की. इस पूछताछ में राजेश और सुदीप ने हमें जो कुछ बताया, उस से अपराध की एक अलग तरह की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी. कहानी का कुछ हिस्सा ऊपर आ ही चुका है. आगे की कहानी कुछ इस तरह थी. सुदीप जब मास्टर गोवर्धनदास के यहां ट्यूशन पढ़ने आने लगी तो वह अकेली ही आतीजाती थी. ऐसे में रास्ते में कुछ लड़के उस से छेड़खानी करते थे.

उन में कुछ लड़के ऐसे भी थे, जो उसे अपनी कार में लिफ्ट देने की कोशिश करते थे. उन्हीं लड़कों में गुरमेज और जगबीर भी थे. ये अन्य लड़कों की अपेक्षा कुछ होशियार थे. जल्दी ही सुदीप इन के जाल में फंस गई. दोनों सुदीप को अपनी कार से घुमाने लगे और उस पर दिल खोल कर पैसे लुटाने लगे. बदले में सुदीप उन की बांहों में सिमट कर उन्हें खुश करने लगी थी. एक बार वह किसी होटल के कमरे में गुरमेज के साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ी गई तो यह बात उस के घर तक जा पहुंची. इस के बाद उस के पिता ने उस की बहुत पिटाई की. पिता उस की पढ़ाई बंद करा देना चाहते थे, लेकिन मास्टर गोवर्धनदास के बीच में आ जाने से उस की पढ़ाई जारी रही.

अब सुदीप एक तरह से मास्टर गोवर्धनदास की पनाह में आ गई थी. मास्टरजी उस का भला चाहते थे, इसलिए उसे उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते थे. सुदीप की मां की तरह वह भी चाहते थे कि सुदीप पढ़लिख कर कुछ बन जाए. इसीलिए उन्होंने गुरमेज और जगबीर से संबंध तोड़ कर ठीक से पढ़ने को कहा. अब सुदीप का ज्यादा समय मास्टरजी के यहां ही बीतने लगा था. कभीकभी वह रात में भी उन के यहां रुक जाती थी. एक रात मास्टरजी घर पर अकेले थे. उस रात भी देर होने की वजह से सुदीप उन के घर रुक गई तो उस के सामने मास्टरजी के ‘सज्जन’ होने का भेद खुल गया.

भेड़ की खाल में वह पूरे भेडि़या निकले. उन्होंने सुदीप को इमोशनली ब्लैकमेल कर के उस से शारीरिक संबंध बना लिए. शुरुआत होने के बाद यह रोज का सिलसिला बन गया. सुदीप को वह अकेली ही पढ़ाते थे. उसी बीच वह कमरे का दरवाजा बंद कर के अपनी ‘फीस’ वसूल लेते थे. एक तो गोवर्धनदास अध्यापक थे, दूसरे बुजुर्ग, इसलिए उन के और सुदीप के बीच बने इस अनैतिक संबंधों पर किसी को संदेह नहीं हुआ. यही वजह थी कि वह अपनी इस शिष्या से संबंध बनाए रहे. एमए करने के बाद सुदीप ने गोवर्धनदास से इच्छा जताई कि वह एलएलबी कर के वकील बनना चाहती है तो मास्टरजी ने उसे पूरा सहयोग करने का आश्वासन दिया. लेकिन उसी बीच सुदीप की शादी की बात चलने लगी तो आगे की पढ़ाई खटाई में पड़ गई.

सुदीप ने अपनी शादी की बात मास्टरजी से बताई तो उन्होंने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे घर वाले जहां चाहते हैं, तुम वहां शादी कर लो. जिस लड़के से तुम्हारी शादी होगी, वह तो तुम्हारा नाम का पति होगा. क्योंकि तुम्हें तो मेरे साथ संबंध बनाए रखना है. अगर शादी के बाद भी तुम मुझ से संबंध बनाए रहोगी तो तुम्हारा ही नहीं, तुम्हारे पति का भी हर तरह से खयाल रखूंगा.’’

सुदीप की शादी के लिए उस के मांबाप के पास उतने पैसे नहीं थे, जितने की जरूरत थी. इस के बावजूद वह उस की शादी जल्दी से जल्दी कर देना चाहते थे. इस की वजह यह थी कि शायद उन्हें मालूम हो चुका था कि उन की बेटी के कदम बहक चुके हैं. ऐसे में समय रहते उस पर नकेल न कसी गई तो वह जिस लड़के के साथ होटल में पकड़ी गई है, उस के साथ कोई नया गुल खिला सकती है. यही सब सोच कर उस के मांबाप पूरी तरह से इस कोशिश में लग गए कि जितनी जल्दी हो सके, कोई शरीफ लड़का ढूंढ़ कर उस की शादी कर दें. आखिर उन्हें राजेश मिल गया, जिस के साथ उन्होंने सुदीप की शादी कर दी.

राजेश के पिता का नाम अचित्तर सिंह और मां का सुरजीत कौर था. खेतीकिसानी करने वाला यह परिवार संगरूर के गांव माजरा का रहने वाला था. राजेश ने 10वीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी थी. उसे गाने का बहुत शौक था. उसे लगता था कि अगर वह अपने इस शौक को थोड़ा निखार ले तो प्रोफेशनल सिंगर बन कर नाम और पैसा, दोनों कमा सकता है. यही वजह थी कि 10वीं पास कर के वह गांव छोड़ कर संगरूर के मशहूर गायकों की शरण में आ गया था और गायकी के हुनर सीखने लगा था. सीखने के साथसाथ वह उन गायकों के साथ स्टेज शो भी करने लगा था.

उसी दौरान उस ने कुछ वीडियो अलबम्स में छोटेमोटे रोल भी किए थे. इसी बीच उसे एक लड़की से प्रेम हो गया तो उस ने उस के साथ विवाह कर लिया था. लेकिन जल्दी ही उस की पत्नी की मौत हो गई. इस के बाद उस की शादी सुदीप से हो गई थी. शादी के बाद राजेश ने अपने गायक बनने के सपने के बारे में सुदीप को बताया तो वह उसे मास्टरजी के पास ले गई. मास्टर गोवर्धनदास ने न केवल राजेश को उत्साहित किया, बल्कि सुदीप के हाथ पर 10 हजार रुपए रखते हुए कहा, ‘‘जरूरत पड़ी तो आगे भी मैं तुम्हारी इसी तरह मदद करता रहूंगा. मैं तुम्हारे पति का यह सपना जरूर पूरा करूंगा.’’

मास्टरजी ने जिस तरह 10 हजार रुपए सुदीप के हाथ पर रख दिए थे, राजेश हैरान रह गया. सुदीप मास्टरजी से केवल ट्यूशन पढ़ती थी. शादी में मास्टरजी का आना अलग बात थी. लेकिन बिना किसी वजह के इतनी बड़ी रकम देना उसे हैरान करने वाली बात लगी. बस यहीं से उस की सोच बदल गई. राजेश को पूरा विश्वास हो गया कि सुदीप और मास्टर गोवर्धनदास के बीच जरूर कुछ ऐसा है, जिस का खुलासा होने पर दिल बेचैन हो सकता है. उस समय तो उस ने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर आ कर उस ने सुदीप पर भावुकता का ऐसा मनोवैज्ञानिक शिकंजा कसा कि उसने रोते हुए मास्टरजी से शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार ली.

इस के बाद उस ने राजेश के पैर छू कर वादा भी किया कि अब आगे वह मास्टरजी से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं रखेगी. सुदीप ने संबंध खत्म करने का भले ही वादा कर लिया, लेकिन राजेश को इतने में संतोष नहीं हुआ. उस ने कहा, ‘‘नहीं, बात इतने में ही खत्म नहीं होती. उस आदमी ने तुम्हें खराब किया है, इसलिए उसे इस की सजा मिलनी चाहिए. मैं उस जलील आदमी को जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

सुदीप ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘देखो, नादान मत बनो. मास्टरजी के पास लाखों रुपए हैं और मैं उस के ये रुपए आसानी से हथिया सकती हूं. उन रुपयों से हम तुम्हारे गानों का अलबम तैयार कर के मार्केट में उतारेंगे. तुम्हारा नाम चमकाने में मैं कोई कसर नहीं छोड़ूंगी. तुम्हारे भविष्य के लिए मैं अपना कुछ भी दांव पर लगाने को तैयार रहूंगी.’’

दरअसल, इस तरह की बातें कर के सुदीप मास्टरजी की ओर से राजेश का ध्यान हटाना चाहती थी. सुदीप इस में कामयाब भी हो गई, क्योंकि उस की बातों में उसे वजन लगा था. इस रास्ते से उस के पास इतना पैसा आ सकता था कि उस के गीतों की अलबम भले ही न सही, कैसेट तो निकाली ही जा सकती थी. इस के बावजूद राजेश के दिमाग से यह बात नहीं निकल रही थी कि बुड्ढे मास्टर ने उस की पत्नी से नाजायज संबंध बनाए थे. इस की सजा उसे हर हालत में मिलनी चाहिए. सजा भी ऐसीवैसी नहीं, सीधे मौत. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह मास्टर को इस दुनिया से विदा तो करेगा ही, उस का सारा पैसा भी हथिया लेगा.

इस के बाद राजेश और सुदीप किसी न किसी बहाने गोवर्धनदास से पैसा ऐंठने लगे. मास्टरजी न केवल उन के हाथों ब्लैकमेल होते रहे, बल्कि सुदीप से उस के पति के गीतों की कैसेट निकलवाने का वादा भी करते रहे. मास्टरजी को काबू में रखने के लिए सुदीप अभी भी उन के साथ अवैध संबंध बनाए रही. कुछ ही दिनों में सुदीप ने मास्टरजी से इतने पैसे ऐंठ लिए कि राजेश ने अपने लिए मारुति कार खरीद ली. लेकिन इतने में भी उसे तसल्ली नहीं हुई. उस ने और सुदीप ने योजना बनाई कि रिकौर्डिंग कंपनी वालों से मिलने का बहाना कर के मास्टरजी को दिल्ली चलने के लिए तैयार किया जाए और रास्ते में उन का सारा पैसा ले कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया जाए. योजना बनाने के बाद सुदीप ने यह बात मास्टरजी से कही तो वह उन लोगों के साथ दिल्ली जाने को तैयार हो गए.

राजेश और सुदीप ने मास्टर गोवर्धनदास को अपने साथ दिल्ली चलने के लिए तैयार कर के उन्हें गुरुद्वारा दुख निवारण के नजदीक बुला लिया. यहां से दोनों उन्हें अपनी मारुति कार से माता काली देवी मंदिर के नजदीक के स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम पर ले गए, जहां उन से 1 हजार रुपए निकालने को कहा. राजेश भी मास्टरजी के साथ एटीएम केबिन में घुस गया और उन के पिन दबाते समय उन का पिन नंबर याद कर लिया था. वहां से सभी जीटी रोड आ गए. आगे के लिए राजेश ने बेहोशी की दवा पहले से ही खरीद कर रख ली थी. मास्टरजी को साथ ले कर वे लुधियाना पहुंचे. वहां रेलवे स्टेशन की एक फ्रूट जूस की दुकान से उन्होंने संतरे का जूस खरीदा और उस में बेहोशी की दवा मिला कर उसे मास्टरजी को पिला दिया.

इस के बाद वे ब्राऊन रोड पर स्थित एक होटल में रुके तो वहां से वे शाम को निकले. अब तक मास्टरजी पर दवा का असर होने लगा था. मास्टरजी को ले कर वे चंडीगढ़ रोड पर पहुंचे. अब तक वह दिल्ली जाने के बारे में कई बार पूछ चुके थे. राजेश ने उन से कहा था कि कैसेट कंपनी वाले आज पंजाब आए हैं. संभव है कि उन से यहीं मुलाकात हो जाए, फिर दिल्ली नहीं जाना पड़ेगा. चंडीगढ़ रोड पर एक ढाबे पर वे खाना खाने के लिए रुके. वहां भी मास्टरजी की नजरें बचा कर उन की दाल में दवा डाल दी. खाना खाने के बाद वे कार में बैठे तो बैठते ही मास्टरजी पर बेहोशी छाने लगी.

मास्टर गोवर्धनदास कार की पिछली सीट पर बैठे थे. थोड़ी देर में वह एक ओर लुढ़क गए. सुदीप और राजेश को इसी का इंतजार था. कार को नहर के किनारे चलाते हुए वे कटानी गुरुद्वारा की ओर चल पड़े. दोराहे के पास एक जगह कार रोक कर राजेश ने गोवर्धनदास की जेबों से उन का एटीएम कार्ड, मोबाइल और पर्स निकाल कर उन के गले में रस्सी बांध कर नहर तक घसीट कर लाया और फिर उन्हें उठा कर नहर में फेंक दिया. अपना काम कर के दोनों लुधियाना चले गए, जहां भारतनगर चौक पर स्थित स्टेट बैंक औफ पटियाला के एटीएम से मास्टरजी के कार्ड से उन के खाते से 15 हजार रुपए निकाले. वह रात उन्होंने लुधियाना के एक होटल में गुजारी. अगले दिन दोनों लुधियाना में मौजमस्ती करते रहे. इस बीच उन्होंने गोवर्धनदास के एटीएम कार्ड के जरिए कई बार पैसे निकलवाए.

वे 75 हजार रुपए ही निकाल पाए थे कि खाता सील हो गया. पैसे मिलने का रास्ता बंद हो गया तो वे घर लौट आए. राजेश और सुदीप को मालूम था कि मास्टरजी घर नहीं लौटेंगे तो उन के यहां से कोई न कोई पूछने जरूर आएगा. हुआ भी वही. मास्टर का बेटा अशोक जब उन के घर पूछने आया तो उन्होंने अपनी बातों से उसे यकीन दिला दिया कि वे मास्टरजी के बारे में कुछ नहीं जानते. बाद में जब उन्हें मुकदमा दर्ज होने की सूचना मिली तो वे भूमिगत हो गए. घर से फरार होने के बाद उन्हें अपने आप को पुलिस से बचाए रखने में काफी मुश्किल हो रही थी.

लिहाजा सोचसमझ कर उन्होंने एक चाल चली.  एक वकील के जरिए उन्होंने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि पुलिस उन्हें नाजायज हिरासत में रख कर टौर्चर करते हुए किसी झूठे गंभीर केस में फंसाने की कोशिश कर रही है. इसलिए उन्हें पुलिस की गलत हिरासत से छुड़ाया जाए. अपील दाखिल होने के बाद जब उन्हें हाईकोर्ट से वारंट औफिसर के पटियाला पहुंचने की जानकारी मिली तो दोनों ने किसी के माध्यम से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. हमारी पूछताछ में पैसों के बारे में सुदीप और राजेश ने बताया कि उन में से 27 हजार रुपए उन्होने अपने ऊपर खर्च कर दिए थे. बाकी के पैसे राजेश के गांव वाले घर से बरामद हो गए थे. रिमांड समाप्त होने पर दोनों अभियुक्तों को फिर से अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

विवेचक मनजीत सिंह बराड़ ने उन के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर के समय से इलाका मजिस्ट्रेट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से मामला सेशन कमिट हो कर पटियाला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश की कोर्ट में चला गया. वहां से दोनों को उम्रकैद की सजा हुई, आजकल दोनों पटियाला की सेंट्रल जेल में अपनी सजा काट रहे हैं. मेरे कैरियर का यह एक ऐसा केस था, जिसे मैं शायद ही कभी भूल पाऊं. Crime Story

 

Motivational Story: जिन्होंने तूफान में उतार दी कश्ती

Motivational Story: पूरी तरह दृष्टिहीन होने के बावजूद बेनो जहां भारत की सब से कठिन और सर्वोच्च परीक्षा पास कर के आईएफएस बनीं, वहीं स्कोलिओसिस जैसी बीमारी से पीडि़त होने के बावजूद इरा ने इस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान ला कर सब को चौंका दिया. अक्षमता इन दोनों की राह में बाधा नहीं बनी.

तमिलनाडु के एक साधारण परिवार में बेटी का जन्म हुआ तो पड़ोसी, दोस्त और रिश्तेदार बधाई देने आए. बेटी पैदा होने की खुशी मनाई जाती, उस के पहले ही मां ने बेटी के चेहरे को गौर से देखा. उन्हें बच्ची में कुछ गड़बड़ लगा. उन्हें जो गड़बड़ लगा था, उस ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया था. बच्ची जिस तरह देख रही थी, उस से मां को लगा कि बच्ची की आंखों में रौशनी नहीं है. डाक्टरों को दिखाया गया तो उन्होंने कहा कि बच्ची पूरी तरह दृष्टिहीन है. इस का कोई इलाज भी नहीं है.

मातापिता अवाक रह गए. अब उन के वश में कुछ नहीं था. लेकिन यह कोई पहली घटना नहीं थी, जो वे इस का मातम मनाते. दुनिया में तमाम दृष्टिहीन लोग हैं और बढि़या जीवन जी रहे हैं. यही सोच कर मां ने बेटी को गले से लगाते हुए तय किया कि वह उस के जीवन को प्यार से इस तरह रौशन कर देंगी कि उसे कभी अहसास नहीं होगा कि वह देख नहीं सकती. आखिर उन्होंने किया भी वही. उस दृष्टिहीन बच्ची के पिता ल्यूक एंटोनी चार्ल्स रेलवे में नौकरी करते थे. मां पद्मजा पढ़ीलिखी थीं, लेकिन घर में रह कर घरगृहस्थी संभालती थीं. दोनों ने बड़े प्यार से बेटी का नाम बेनो जेफाइन रखा.

बेनो का मतलब है ईश्वर और जेफाइन का मतलब है खजाना यानी ईश्वर का खजाना. मांबाप ने जैसा नाम रखा, वैसा ही उसे माना भी. सचमुच बेनो मम्मीपापा के लिए कुदरत का खजाना थी. मांबाप ने जो प्यार दिया, उस से उस का बचपन तमाम खुशियों से रौशन रहा. परिवार ने कभी उसे इस बात का अहसास नहीं होने दिया कि वह दृष्टिहीन है. वह 4 साल की हुई तो मम्मीपापा ने उस का दाखिला लिटिल फ्लावर कौनवेंट स्कूल में करा दिया. यह दृष्टिहीन बच्चों का स्कूल था. बेनो स्कूल जाने लगी.

बेनो शुरू से ही पढ़ाई में तेज थी. स्वभाव से बातूनी होने की वजह से बेनो के ढेर सारे दोस्त बन गए थे. अपने इस गुण की वजह से बच्चों से ही नहीं, तमाम अध्यापकों से भी उस की अच्छी दोस्ती हो गई थी. सभी उस के बेबाक अंदाज के कायल थे. क्लास में जब भी कुछ पूछा जाता, वह बेहिचक बोलना शुरू कर देती. उन दिनों वह अपर केजी में थी, जब उस के अध्यापक ने कहा कि स्टेज पर जाओ और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बारे में कुछ कहो.

बेनो तेजी से स्टेज की ओर बढ़ी. माइक पकड़ा और धाराप्रवाह बोलने लगी. गजब का आत्मविश्वास था उस में. उस के इस भाषण ने उसे प्रथम पुरस्कार दिलाया. इनाम में उसे स्टील की प्लेट मिली. यह उस का पहला इनाम था. इस पहले इनाम को वह आज भी नहीं भूल पाई है. इस के बाद जीत का सिलसिला सा चल पड़ा. प्रतियोगिता स्कूल की हो या स्कूल के बाहर की, अगर बेनो ने उस में हिस्सा लिया है तो उन का अव्वल आना तय था. समय के साथसाथ उन की भाषण शैली और बोलने की क्षमता निखरती गई. वह पहले लिख कर भाषण देती थीं, बाद में बिना लिखे बोलने लगीं. बचपन में उन के विषय हुआ करते थे नेहरू, गांधी जैसे महान नेता. बड़ी और समझदार हुईं तो पर्यावरण, कैंसर, जल संरक्षण जैसे गंभीर विषयों पर भाषण देने लगीं.

बेनो के कोर्स की किताबें तो ब्रेल लिपि में होती थीं, उन्हें वह पढ़ लेती थीं, लेकिन भाषण के लिए पापा किताबें ला कर देते थे. मम्मी पढ़ कर सुनाती थीं. उन के भाषण जानकारीपूर्ण और प्रेरक होते थे, इसलिए हर कोई उन्हें सुनना चाहता था. वह 10वीं में पढ़ रही थीं, तब उन का सोचना था कि वह शिक्षक या वकील बनेंगी, लेकिन 10वीं के बाद अचानक इरादा बदल गया. दरअसल, वह जल संरक्षण पर काफी कुछ अपनी मां से सुन चुकी थीं. कई बार इस विषय पर भाषण भी दिया था, इसलिए जब एक दिन बेनो पड़ोसियों से जल संरक्षण पर चर्चा करने लगीं तो किसी पड़ोसन चिढ़ कर बोली, ‘‘लो आ गई कलेक्टर साहिबा, हम को समझाने.’’

इस के बाद बेनो के मन में आया कि अब वह कलेक्टर यानी आईएएस बनेंगी. स्कूल से कालेज तक पढ़ाई बेनो के लिए कभी बोझ नहीं रही. उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था. उन की हर विषय में रुचि थी. पढ़ाई उन का सब से बड़ा शौक था. इसलिए किताबें उन के लिए बेहतरीन उपहार थीं. कालेज में दाखिला लिया तो माहौल एकदम अलग था. पहले बेनो जिस स्कूल में पढ़ती थीं, वहां सिर्फ दृष्टिहीन बच्चे ही पढ़ते थे. लेकिन कालेज में तो सब सामान्य बच्चे थे. बेनो में आत्मविश्वास भी था और हिम्मत भी, इसलिए उन्हें यहां भी कुछ मुश्किल नहीं लगा.

मद्रास यूनिवर्सिटी के स्टेला मेरिस कालेज से बीए करने के बाद लायला कालेज से बेनो ने अंगरेजी साहित्य से एमए किया. इस के बाद उन्होंने पीओ की परीक्षा दी. इस में उन्हें सफलता मिली और 2013 में स्टेट बैंक औफ इंडिया में बतौर प्रोबेशनरी अफसर नौकरी मिल गई. बेनो कहती हैं, ‘‘नौकरी मिलने के बाद मुझे लगा कि अब मैं बच्ची नहीं रही, बड़ी हो गई हूं. पहली बार मुझे जिम्मेदारी का अहसास हुआ. पहले वेतन से मैं ने पापा के लिए सोने की चेन और मां के लिए कान के झुमके खरीदे.’’

बैंक में उन्हें डूबे हुए कर्ज की वसूली का काम सौंपा गया. काम चुनौतीपूर्ण था, लेकिन इस जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया. जल्द ही वह वसूली रानी के नाम से मशहूर हो गईं. वह जिस तरह अपना काम जिम्मेदारी और निष्ठा से करती थीं, लोगों को यही लगता था कि वह बहुत सख्त हैं, पर ऐसा नहीं था. बात सिर्फ इतनी थी कि वह अपने मूल्यों से समझौता नहीं करती थीं और पूरी ईमानदारी से अपना काम करती थीं. इस के बाद बेनो ने यूपीएससी परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. उन्हें बचपन से रेडियो पर खबरें सुनने की आदत थी. इस से उन्हें सामान्य ज्ञान बढ़ाने में मदद मिली. अन्य विषयों की पढ़ाई के लिए किताबों को स्कैन करवा कर कंप्यूटर पर रखा और फिर उसे एक सौफ्टवेयर की मदद से पढ़ने की कोशिश की.

जो किताबें स्कैन नहीं हो पाईं, उन्हें मां ने अपनी जिंदगी का सब से महत्त्वपूर्ण और जरूरी समय खराब कर के बेनो के भविष्य को बनाने के लिए कोर्स की किताबें पढ़ कर सुनाने में लगा दिया. दिन भर काम करने के बाद पिता और मां उन के लिए जोरजोर से उन की किताबें पढ़ते. इस तरह मम्मीपापा उन की आंखें बन गए. उन की आंखों से बेनो ने अपनी पढ़ाई की. उन के पिता के पास 2 ही काम थे, औफिस का काम करना और उन के लिए किताबें ढूंढना तथा यह पता लगाना कि किस तकनीक की मदद से बेनो अधिक से अधिक आसानी से अपनी पढ़ाई कर सकती है. पहली कोशिश में कामयाबी नहीं मिली, पर मजबूत इरादों वाली बेनो निराश नहीं हुईं.

उन्होंने दोबारा परीक्षा दी और इस बार उन की 343वीं रैंक आई. पैनल इंटरव्यू के दौरान उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वह विदेश विभाग में सेवा करना चाहती हैं. विदेश विभाग ने इस से पहले किसी ऐसे अफसर को नियुक्त नहीं किया था, जो सौ फीसदी दृष्टिहीन रहा हो. इसलिए बेनो को नियुक्ति के लिए एक साल का इंतजार करना पड़ा. इस बीच नियमों में बदलाव किए गए और फिर उन्हें पद ग्रहण के लिए विदेश मंत्रालय की ओर से पत्र भेजा गया कि 60 दिनों में वह अपना पद ग्रहण करें. बेनो देश की पहली दृष्टिहीन आईएफएस अफसर हैं. वह कहती हैं कि यह कामयाबी उन के मातापिता की मेहनत और आशीर्वाद का फल है.

राह में अनेक दिक्कतें थीं, पर असंभव जैसा कुछ नहीं था. मन में कुछ करने का जज्बा और मजबूत इरादे का ही नतीजा था कि अब बेनो जेफाइन भारतीय विदेश सेवा अफसर बन गई हैं. बेनो सभी चुनौतियों का सामना करने को तैयार हैं. अपनी इस नौकरी को ले कर वह काफी उत्साहित हैं. आईएफएस के लिए वह पूरी तरह से पात्र थीं, लेकिन ब्लाइंडनेस के चलते पहले पद नहीं दिया गया था. एक साल के इंतजार के बाद विदेश मंत्रालय ने पिछले हफ्ते उन्हें आदेश भेजा है. 25 साल की जेफाइन देश की पहली पूरी तरह से दृष्टिहीन आईएफएस अफसर हैं. पूरी तरह से दृष्टिबाधित आईएफएस अधिकारी एन.एल. बेनो जेफाइन अपने कैरियर में आने वाली चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. अब वह भारत का विश्व भर में प्रतिनिधित्व करने को उत्सुक हैं.

इस साल संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) परीक्षा में आल इंडिया टौप करने वाली इरा सिंघल के आईएएस बनने के सफर पर नजर डालें तो वह ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हें तूफान में कश्ती उतारने की आदत है. मेरठ में जन्मी इरा जन्म के समय सामान्य बच्चों जैसी थीं, लेकिन कुछ समय बाद उन की रीढ़ की हड्डी का आकार बिगड़ने लगा. कई डाक्टरों को दिखाया गया. शुरू में कुछ समझ में नहीं आया, बाद में पता चला कि उन्हें स्कोलिओसिस है. इस की वजह से उन की रीढ़ की हड्डी सीधी होने के बजाय ‘एस’ आकार की हो गई है. डाक्टरों ने औपरेशन की सलाह देने के साथ यह चेतावनी भी दी कि इस में बच्ची की जान को खतरा है. खतरे की आशंका के चलते मातापिता औपरेशन कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाए.

इरा बड़ी होने लगीं. सिंघल परिवार का आंगन उन की मासूम बातों और दिल छू लेने वाली शरारतों से रौशन रहने लगा. 4 साल की हुईं तो पिता राजेंद्र सिंघल को उन की पढ़ाई को ले कर चिंता हुई. शहर के एक मशहूर स्कूल में बेटी को ले कर एडमिशन कराने पहुंचे तो स्कूल ने बच्ची को देखते ही दाखिला देने से इनकार कर दिया. पेशे से बिजनैसमैन राजेंद्र सिंघल को प्राइमरी स्कूल से ले कर सेकैंडरी स्कूल तक इरा को एडमिशन दिलाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा. शारीरिक दिक्कत की वजह से स्कूल प्रबंधन उन्हें दाखिला देने को तैयार नहीं होता था.

दाखिला भले ही मुश्किल से मिला हो, मगर स्कूल जाने के बाद इरा छा गईं. कुछ ही दिनों में वह क्लासटीचर की सब से चहेती छात्रा बन गईं. चाहे पढ़ाई हो या फिर सांस्कृतिक कार्यक्रम, इरा सब में आगे रहती थीं. मेरठ के सोफिया गर्ल्स स्कूल से पढ़ाई शुरू करने के बाद उन्होंने दिल्ली के लोरेटो कौनवेंट स्कूल और आर्मी स्कूल से स्कूली पढ़ाई की. क्योंकि इस बीच उन का परिवार दिल्ली आ गया था. स्कूल के दिनों से ही उन के अंदर लोगों की मदद करने का जज्बा रहा. जिन दिनों वह कक्षा 3 में थीं, तब वह करीब 8 साल की रही होंगी. घर में लोग उत्तरकाशी के भूकंप पीडि़तों की चर्चा कर रहे थे. तब नन्ही इरा ने पापा से कहा था कि उन के गुल्लक के पैसे उन लोगों को दे दो.

गुल्लक में कुल 91 रुपए थे. उन्होंने वे रुपए भूकंप पीडि़तों को भिजवा दिए. हाईस्कूल पास करने के बाद इरा ने डाक्टर बनने की इच्छा जाहिर की, लेकिन राजेंद्र सिंघल राजी नहीं हुए. इसीलिए उन्होंने इरा को जीवविज्ञान विषय नहीं लेने दिया. उन्हें लगा कि शारीरिक दिक्कत बेटी के डाक्टर बनने की राह में रोड़ा बन सकती है. उन्हें लगता था कि इरा मैडिकल की पढ़ाई तो कर लेगी, लेकिन उसे खड़े हो कर सर्जरी करने में परेशानी होगी. मजबूरी में इरा को इंजीनियरिंग में दाखिला लेना पड़ा. पापा ने उन्हें डाक्टरी नहीं पढ़ने दी थी, जिस की वजह से उन के मन में बड़ा गुस्सा था.

यही वजह थी कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई उन्होंने बेमन से की. कई बार तो उन्होंने परीक्षा के मात्र 10 घंटे पहले पढ़ाई शुरू की. इस के बाद भी हर बार उन के अच्छे अंक आए. शारीरिक दिक्कत ने कभी इरा के हौसले को नहीं तोड़ा. यह उन की हिम्मत ही थी कि उन्होंने अपनी बीमारी को कभी कमी नहीं माना. दिल्ली के द्वारका स्थित नेताजी सुभाषचंद्र बोस टैक्निकल यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर इंजीनियरिंग से बीई करने के बाद उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रतिष्ठित फैकल्टी औफ मैनेजमेंट स्टडीज से फाइनैंस व मार्केटिंग में एमबीए किया.

इस के बाद चौकलेट बनाने वाली कैडबरी कंपनी में उन्हें नौकरी मिल गई. कालेज के दिनों में वह थिएटर ग्रुप में शामिल हो गई थीं. अभिनय के अलावा उन्हें साहित्य पढ़ने और कविताएं लिखने का भी शौक है. इरा को लगता है कि साहित्यिक किताबें इंसान को जीना सिखाती हैं. कालेज कैंपस में उन्होंने तमाम नाटकों में हिस्सा लिया. इस दौरान कई विदेशी भाषाएं भी सीखीं. स्पैनिश, फ्रेंच, इटालियन और अंगरेजी की उन्हें अच्छी समझ है. मातापिता के प्रोफेशनल होने की वजह से अकसर घर में वह अकेली होती थीं. इस स्थिति में उपन्यास उन के अच्छे दोस्त रहे. खाना बनाना भी उन्हें खूब भाता था. जहां तक मनमौजी रवैए की बात है, वह जब मन में आता है बिना बताए घूमने निकल जाती हैं.

इरा के ज्यादातर दोस्त इंजीनियर हैं और कारपोरेट सैक्टर में नौकरी करते हैं. परिवार या रिश्तेदारी में कोई भी सिविल सर्विस में नहीं है. पर नौकरी के दौरान इरा के मन में सिविल सेवा में जाने का ख्याल आया. उन्होंने भूगोल को मुख्य विषय बनाया और जम कर पढ़ाई की. सन 2010 में पहली कोशिश में ही वह सफल रहीं. इस में उन्हें 815 रैंक मिली. उन्हें भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी बनने का अवसर मिला. लेकिन मैडिकल स्तर पर उन्हें पोस्टिंग नहीं दी गई. सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद बीमारी की वजह से उन्हें अयोग्य करार दे दिया गया. इरा की लंबाई ज्यादा नहीं है. इस के बाद उन्होंने अपने साथ हुए इस अन्याय के खिलाफ सेंट्रल एडमिनिस्टै्रटिव ट्रिब्यूनल (कैट) का रुख किया.

वहां से उन्हें जीत हासिल हुई तो इस समय वह हैदराबाद में राजस्व अधिकारी की ट्रेनिंग कर रही थीं. 2012 में शुरू हुई इस लड़ाई का नतीजा 2014 में आया. इस दौरान उन्होंने सन 2012 और 2013 में भी यूपीएससी की परीक्षा में सफलता हासिल की. लेकिन हर बार रैंक बहुत ज्यादा आती रही. इस बीच उन के एक दोस्त ने सलाह दी कि आईएएस बनने के लिए उन्हें चौथी बार कोशिश करनी चाहिए. नौकरी की ट्रेनिंग के साथसाथ वह तैयारी में जुट गईं. इस बार जब नतीजा आया तो उन्होंने सब को चौंका दिया, क्योंकि इस बार उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा में टौप किया था.

आज पूरे देश में उन की चर्चा हो रही है. इरा की मां अनीता सिंघल का कहना है कि वह कभी किताबों से चिपकी नहीं रहीं. एक बार पढ़ लेने से उन्हें सब याद हो जाता था. इरा की मानें तो उन्होंने कभी 4-5 घंटे से ज्यादा पढ़ाई नहीं की. उन का कहना है कि जो भी करो, मन से करो. किसी को दिखाने के लिए मत पढ़ो. पढ़ने से ज्यादा जरूरी है समझना. ऐसा नहीं है कि इरा ने कभी हताशा नहीं झेली. परीक्षा पास करने के बाद भी पोस्टिंग न मिलना यकीनन कठिन रहा. कानूनी लड़ाई भी आसान नहीं थी. पर वह निराश नहीं हुईं. उन का कहना है कि सफलता को जीवन या मरण का विषय नहीं बनाना चाहिए.

पास नहीं हुए तो इस का यह मतलब कतई नहीं हुआ कि जीवन खत्म हो गया. एक काम में सफल नहीं हुए तो दूसरा करना चाहिए. लेकिन जो भी करना चाहिए, मन से करना चाहिए. यूपीएससी के नतीजे बताते हैं कि महिलाएं पुरुषों से कंधे से कंधा मिला कर नहीं चल रहीं, बल्कि अब उन्हें पीछे कर रही हैं. यह अच्छी बात है. कोई भी दबाकुचला आजाद होता है तो वह इसी तरह उछाल मारता है. यह उन्हें इतनी आसानी से नहीं मिला. इस के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है.

महिलाओं को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) समेत किसी भी तरह की नागरिक सेवा का पात्र 67 साल पहले माना गया था. उस के बाद 1951 में भारत की अन्ना राजम मल्होत्रा पहली आईएएस तो 1972 में किरण बेदी पहली आईपीएस अधिकारी बनीं. Motivational Story

 

Uttar Pradesh Crime: रहस्य में दफन हो गई सारा की मौत

Uttar Pradesh Crime: अमनमणि त्रिपाठी ने घर वालों की मरजी के बिना संभ्रांत परिवार की लड़की सारा सिंह से कोर्टमैरिज तो कर ली लेकिन बाद में ऐसे क्या हालात हुए कि वह उस से किनारा करने की सोचने लगा? फिर एक दिन…

पौ फटते ही सूरज की किरणें धरती को चूमने लगी थीं. चिडि़यों के मधुर कलरव से फिजाएं गूंज उठी थीं. कलियां भी मुसकान बिखरने लगी थीं तो वहीं चंचल मकरंद कलियों पर मंडराने लगे थे. चिडि़यों के मीठे स्वर जब सारा के कानों से टकराए तो वह अंगड़ाइयां लेती हुई बिस्तर से उतरी और तरोताजा होने के लिए गुसलखाने की ओर बढ़ी. कुछ देर बाद वहां से लौटी तो दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर दौड़ाई. उस वक्त सुबह के साढ़े 6 बज रहे थे. फिर एक नजर घर में दौड़ाई, घर के बाकी लोग सो रहे थे.

फटाफट तैयार हो कर उस ने नाश्ता किया. उस समय वह बहुत खुश थी. बारबार दीवार घड़ी पर नजर डाल कर वह दरवाजे से ही सड़क की तरफ इस तरह से देखती जैसे उसे किसी के आने का इंतजार हो. दरवाजे से आ कर वह बेचैनी से लौन में चहलकदमी कर ने लगती. उस की जूतियों की खटपट से सारा की मां सीमा सिंह की नींद टूट गई.

बेटी को अलसुबह तैयार हुआ देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बेटी, इतनी जल्दी तैयार हो कर कहां जा रही हो? रात तुम ने मुझे बताया नहीं कि सुबह तुम्हें कहीं जाना है?’’

‘‘जी मां, मैं बताना भूल गई थी. दरअसल बात यह है कि शादी की दूसरी सालगिरह पर अमन ने दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया है. आज हम पहले दिल्ली जाएंगे. फिर वहां से आगे की तैयारी करेंगे.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जाओ, पर इतना लंबा सफर तुम कैसे तय करोगे?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मां, हम ने इस बार कार से जाने का मन बनाया है.’’ सारा मां को बता रही थी कि उसी समय उसे दरवाजे के बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज आई. वह कमरे से दरवाजे की तरफ गई. वहीं से वह चहक कर बोली, ‘‘मां गाड़ी आ गई.’’

सीमा सिंह ने बाहर की तरफ देखा तो एक कार के पास सफेद कमीज पहने दामाद अमनमणि त्रिपाठी खड़ा था. सारा अपना सूटकेस उठा कर मां को ‘बाय’ कहती हुई घर से निकल कर सफेद रंग की मारुति स्विफ्ट कार नंबर यूपी-53-बीआर-0060 में जा कर बैठ गई. सास को बायबाय कर के अमनमणि वहां से चला गया. इस के बाद अमनमणि ने कार दिल्ली की ओर दौड़ा दी. यह बात 9 जुलाई, 2015 की है. सीमा सिंह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के घोसडि़या चौराहे के पास स्थित आलीशान कोठी में अपने परिवार के साथ रहती थीं.

उन के परिवार में 4 बच्चे थे, जिन में बेटी सारा तीसरे नंबर की थी. सीमा सिंह के पति अशोक कुमार सिंह की कई साल पहले स्वाभाविक मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी सीमा सिंह के कंधों पर आ गई थी. सीमा सिंह कोई मामूली हैसियत वाली महिला नहीं थीं. वह अधिवक्ता के अलावा अखिल भारतीय कांगे्रस पार्टी की सदस्य भी थीं. वह एक रईस खानदान की बहू थीं. धनदौलत की उन के घर में कोई कमी नहीं थी. बेटी सारा चंचल और बला की खूबसूरत थी. अपने आजादखयाल के चलते ही सारा सिंह ने कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी से अलीगंज स्थित आर्य समाज मंदिर में 27 जुलाई, 2013 को शादी की थी.

शादी की दूसरी सालगिरह को यादगार बनाने के लिए वह पति के साथ घूमने निकली थी. वैसे सारा लंबी दूरी की यात्रा हवाई जहाज से ही करती थी. लेकिन आज लंबे सफर के लिए कार से निकलने पर सीमा सिंह को हैरानी हुई. उसी दिन सीमा सिंह अपने बच्चों के साथ दोपहर का खाना खा रही थीं कि उसी बीच उन के छोटे बेटे सिद्धार्थ सिंह के मोबाइल पर किसी अंजान नंबर से काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही उस काल को रिसीव किया, काल डिसकनैक्ट हो गई. कुछ क्षण बाद उसी नंबर से फिर काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारे बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है.’’ इतना कहने के बाद दूसरी ओर से फोन डिसकनैक्ट हो गया.

सिद्धार्थ कुछ समझ नहीं पाया. उस ने मोबाइल मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा कि किसी ने फोन कर के बताया है कि बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है. बेटे के मुंह से एक्सीडैंट की बात सुन कर सीमा अचंभित हुई. क्योंकि अमनमणि के साथ उन की बेटी सारा भी थी.

बेटी की चिंता करते हुए वह उसी नंबर को रिडायल करने लगीं, जिस नंबर से बेटे के मोबाइल पर फोन आया था. वह नंबर मिला ही रही थीं कि उसी दौरान उन के मोबाइल पर सारा के मोबाइल से काल आई. सीमा सिंह ने झट काल रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो, बेटा सारा, क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी सारा नहीं, मैं अमन बोल रहा हूं,’’ रोते हुए अमन बोला, ‘‘मम्मी हमारे साथ बड़ी दुर्घटना घट गई है.’’

‘‘रोओ मत बेटा, बताओ क्या हुआ?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मम्मीजी, सारा अब इस दुनिया में नहीं रही. मैं इस के बिना कैसे जीऊंगा.’’ इतना कह कर अमनमणि बिलख-बिलख कर रोने लगा.

बेटी की मौत की खबर सुन कर सीमा सिंह एकदम सन्न रह गईं. वह बोलीं, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

रोतेरोते अमनमणि त्रिपाठी ने उन्हें बताया कि फिरोजाबाद के पास सिरसागंज इलाके में उस की कार का एक्सीडैंट हो गया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, यह झूठ है.’’ कहते हुए वह भी रोने लगीं. बहन की मौत की खबर पर सिद्धार्थ की आंखों से भी आंसू टपकने लगे.

सिद्धार्थ ने यह खबर बड़े भाई हर्ष को भी फोन कर के दे दी. वह शहर में किसी काम से निकला था. बड़े बेटे के घर आने के बाद सीमा सिंह बेटे व अपने शुभचिंतकों के साथ फिरोजाबाद के लिए रवाना हो गईं. शाम करीब 6-7 बजे वह फिरोजाबाद के सिरसागंज थाने पहुंच गईं. थानाप्रभारी अतर सिंह से उन्होंने बेटी और दामाद के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि एक्सीडैंट बहुत खतरनाक था. सारा की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी. उस की डेडबौडी पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी गई है और अमनमणि को ऋषि कुमार पांडेय के अपहरण वाले मामले में हिरासत में ले लिया गया है. सीमा सिंह दामाद से मिलना चाहती थीं, लेकिन थानाप्रभारी ने मिलने से मना कर दिया.

सीमा सिंह की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि पुलिस उन्हें दामाद से मिलने क्यों नहीं दे रही है? वह अमनमणि से मिल कर जानना चाहती थीं कि आखिर यह दुर्घटना कैसे हुई? उन के काफी अनुरोध करने के बाद पुलिस ने उन्हें अमनमणि से मिलने की इजाजत दी. अमन को एक कमरे में कैद कर के रखा गया था. अमन ने सीमा सिंह को बताया कि गाड़ी तेज गति से जा रही थी कि अचानक सामने से साइकिल सवार एक लड़की आ गई. उस लड़की को बचाने के चक्कर में गाड़ी पलटी खा कर गिर गई और सारा सदा के लिए चिरनिद्रा में चली गई.

दामाद की बात सीमा सिंह के गले नहीं उतर रही थी. क्योंकि दुर्घटना में अमनमणि को भी थोड़ीबहुत चोट आनी चाहिए थी, लेकिन उस के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. उस के कपड़ों पर धूलमिट्टी ही लगी हुई थी, जबकि वह खुद भी उसी कार में था. सीमा सिंह को तब और आश्चर्य हुआ, जब उन्हें थाने में ही अमनमणि त्रिपाठी के बाबा पूर्व विधायक श्यामनारायणमणि त्रिपाठी सहित गोरखपुर के उस के तमाम शुभचिंतक मिले. यह आश्चर्य की बात इसलिए थी कि गोरखपुर से फिरोजाबाद वे लोग इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए? इस से सीमा सिंह को लगने लगा कि यह दुर्घटना नहीं हो सकती, बल्कि उन की बेटी सारा को सुनियोजित तरीके से मारा गया है.

अमनमणि त्रिपाठी समाजवादी पार्टी का नेता था, इसलिए सूचना मिलते ही मीडिया से जुड़े लोग वहां पहुंच गए. मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला, जिस से यह मामला हाई प्रोफाइल बन गया. घटना की सूचना मिलते ही सारा के मामा एस.के. रघुवंशी, जो अखिलेश सरकार में गृहसचिव के पद पर तैनात हैं, वह भी मौके पर पहुंच गए. उन्हें भी कार दुर्घटना पर संदेह हो रहा था. सारा सिंह के मायके वाले उस की मौत को साजिश के तहत की गई हत्या मान रहे थे. 2 दिनों बाद सारा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली, जिस में सारा की मौत की वजह सिर और छाती में आई बड़ी चोट बताई गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के 9 दिनों बाद सीमा सिंह ने फिरोजाबाद के एसएसपी पीयूष श्रीवास्तव से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें एक तहरीर देते हुए कहा कि उन की बेटी को इन लोगों ने एक साजिश के तहत मारा है. उस तहरीर के आधार पर एसएसपी ने सिरसागंज थाने में भादंवि की धारा 498ए, 302, 120बी के तहत अमनमणि त्रिपाठी, उस के पिता अमरमणि त्रिपाठी, मां मधुमणि त्रिपाठी आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया. सपा के युवा नेता अमनमणि त्रिपाठी और रसूख खानदान की बेटी सारा सिंह की दोस्ती कैसे हुई? दोस्ती के रास्ते वे पतिपत्नी के रिश्ते में कैसे बंधे? इन सवालों के जवाब पाने के लिए हमें इन के अतीत के पन्नों में झांकना होगा.

30 वर्षीय अमनमणि त्रिपाठी पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन सजा काट रहे सपा के कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी का बेटा है. अमनमणि के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. अमनमणि दूसरे नंबर का था. अमरमणि त्रिपाठी की दोनों बेटियों को राजनीति से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन बेटा अमनमणि त्रिपाठी पिता की राजनीतिक विरासत को आगे संभाल कर रखना चाहता था. पिता से ही उस ने राजनीति के सारे गुर सीख लिए थे. इस में उस के बाबा पूर्व मंत्री श्याम-नारायणमणि त्रिपाठी भीष्मपितामह के रूप में उस के साथ रहे.

धीरेधीरे अमनमणि का राजनीतिक कद बढ़ता गया. वह भी पिता के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मीपुर में लोगों का चहेता बनता गया. इस से अमनमणि लोकसभा चुनाव लड़ने की जुगत में लग गया. उस की मेहनत रंग लाई और पिछले लोकसभा चुनाव में उसे टिकट भी मिल गया. लेकिन उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा. उस के पिता के राजनीतिक बैरी कांगे्रस के कद्दावर नेता अखिलेश सिंह ने बाजी मार ली. चुनावी जंग में अमनमणि के साथ उस के खास दोस्त अमित कुमार उर्फ मानू पांडेय, संदीप त्रिपाठी, रवि शुक्ला, गौरव त्रिपाठी, संतोषमणि त्रिपाठी, आशीष शाही, राज त्रिवेदी, त्रिपुरारी मिश्रा, अनूप शंकर पांडेय, पंकज तिवारी, राजीव ऋषि तिवारी, के. सी. पांडेय, अरुण शुक्ला और अमरदीप शुक्ला ने जीजान से मेहनत की. ये हर वक्त साए की तरह उस के पीछेपीछे चलते रहे.

अमनमणि त्रिपाठी फेसबुक का शौकीन था. बात वर्ष 2012-13 की है. फुरसत के समय वह अपना काफी समय सोशल साइट फेसबुक पर बिताता था. सारा सिंह भी फेसबुक पर दोस्तों से बातें करती रहती थी. अमनमणि त्रिपाठी ने फेसबुक पर सारा सिंह का फोटो देखा तो उस की खूबसूरती पर वह ऐसा लट्टू हुआ कि उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. अमनमणि त्रिपाठी के सब से करीबी कहे जाने वाले व्यवसाई मित्र दयालमुनि पांडेय थे. उस ने दयालमुनि पांडेय को सारा सिंह का फोटो दिखाते हुए अपने मन की बात बताई. दयालमुनि पांडेय सारा सिंह को अच्छी तरह से जानते थे. लिहाजा एक दिन उन्होंने सारा सिंह और अमनमणि का आमनेसामने परिचय करा दिया. उस के बाद अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती हो गई.

बताया जाता है कि सारा सिंह की एक व्यवसाई से शादी पक्की हो चुकी थी. उसी बीच अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती की जड़ें गहराई तक पहुंच रही थीं. लखनऊ में अमरमणि त्रिपाठी की लारेंस टैरेस, हजरतगंज में आलीशान कोठी थी.  गोरखपुर छोड़ कर अमनमणि त्रिपाठी लखनऊ रहने लगा. उन दोनों की दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. अमनमणि सारा को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. सारा भी उस पर जान छिड़कती थी. पैसों की उस के पास कोई कमी नहीं थी. वह उस पर दोनों हाथों से पानी की तरह दौलत बहाने लगा था. उस पर इतना पैसा खर्च कर दिया कि उस का हाथ खाली हो गया. वह उसे बहुत ज्यादा चाहता था.

उस से सारा की दूरियां सही नहीं जाती थीं. वह जल्द से जल्द उस से शादी करना चाहता था. सारा का भी हाल कुछ ऐसा ही था. सारा ने अपनी प्रेम कहानी मां से बताई तो सीमा सिंह चौंक गईं. उन्होंने बेटी से कहा, ‘‘क्या तुम अमरमणि त्रिपाठी के बारे में जानती हो? वह मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. ऐसे आदमी से मैं रिश्ता कतई नहीं जोड़ सकती.’’

मां का टका सा जवाब सुन कर सारा असमंजस में पड़ गई कि वह क्या करे? उस ने यह बात अमनमणि को बताई तो उस ने साफ तौर पर कह दिया कि लोग उस के परिवार के बारे में बिना सिरपैर की बातें करते हैं. उसने सारा से कह दिया कि वह उसे बेपनाह मोहब्बत करता है और शादी उसी से करेगा. उस के बाद वह सारा पर शादी का दबाव बनाने लगा. सारा भी अमनमणि को चाहती थी, लेकिन मां वाली बात से वह फैसला नहीं ले पा रही थी. अंत में उस ने अमनमणि के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर ही लिया. इस के बाद 27 जुलाई, 2013 को अलीगंज के आर्य समाज मंदिर में अमनमणि ने सारा सिंह से विवाह कर लिया. उस विवाह में अमनमणि के गांव के 2 दोस्त गवाह के रूप में मौजूद थे. दोनों ने ही इस शादी की भनक अपने घर वालों तक को नहीं लगने दी.

शादी के 10 दिनों बाद अमनमणि त्रिपाठी सारा से मिलने उस की आलीशान कोठी पर पहुंचा. उस वक्त सीमा सिंह घर पर मौजूद थीं और सारा अपने कमरे में थी. अपने यहां अमनमणि को देख कर सीमा चौंक गईं. वह सीमा सिंह से बोला, ‘‘आंटी सारा कहां है? मैं उसे लेने आया हूं.’’

‘‘लेने.’’ सीमा सिंह चौंकते हुए बोलीं, ‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुम्हारा उस पर कोई अधिकार हो.’’

‘‘हां अधिकार है, तभी तो कह रहा हूं. वह मेरी पत्नी है, यकीन न हो तो यह देख लो.’’ कह कर उस ने अपनी पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस ने मंदिर में सारा के साथ की गई शादी की फोटो दिखाए, जिस में वह सारा की मांग में सिंदूर भरता हुआ नजर आ रहा था.

फोटो देख कर सीमा सिंह को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सारा को आवाज दी. मां की आवाज सुन कर सारा आई. उन्होंने अमनमणि द्वारा दिखाए फोटो के बारे में पूछा तो सारा ने सारी बात बता दी. बेटी का जवाब सुन कर उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. बेटी को जो करना था, सो वह कर चुकी थी. बात को तूल देने के बजाय सीमा चुप रहीं और अंत में उन्होंने उस रिश्ते को मजबूरी में स्वीकार कर लिया. लेकिन बेटी के इस फैसले से वह खुश नहीं थीं. समाज में सीमा सिंह की भी अपनी इज्जत थी. इस इज्जत को बनाए रखने के लिए वह सामाजिक रीतिरिवाज से यह शादी करना चाहती थीं.

इस संबंध में बात करने के लिए वह गोरखपुर पहुंच कर मैडिकल कालेज में अमनमणि के मातापिता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि से मिलीं. सीमा सिंह ने उन से अमनमणि और सारा द्वारा कोर्ट में शादी करने की बात बताई तो वे भड़क गए. उन्होंने साफ कह दिया कि यह शादी हरगिज मंजूर नहीं है. सीमा के साथ अमनमणि भी था. बेटे की इस करतूत पर अमरमणि ने वहीं पर बेटे के 2-4 थप्पड़ भी जड़ दिए. बात न बनने पर सीमा सिंह वहां से वापस लखनऊ लौट गईं. अमनमणि भी उन्हीं के साथ लखनऊ आ गया. मांबाप से नाखुश अमनमणि 4 महीने तक गोरखपुर नहीं लौटा.

बेटे के इस कदम को अमरमणि त्रिपाठी अपनी बेइज्जती समझ रहे थे. उन्होंने और उन के रिश्तेदारों ने अमनमणि को समझाते हुए सारा से रिश्ता तोड़ने के लिए दबाव डाला, पर अमनमणि सारा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. संकट की इस घड़ी में अमनमणि के नजदीकी दोस्त मानू पांडेय ने उस की सब से ज्यादा मदद की. बाद में अमरमणि त्रिपाठी और मधुमणि को जब पता चला कि मानू ही अमनमणि की आर्थिक मदद कर रहा है तो अमरमणि ने मानू को आगाह करते हुए बेटे से दूर रहने की हिदायत दी. ऐसा न करने पर उसे मधुमिता शुक्ला जैसा हश्र करने की चेतावनी भी दे डाली.

मानू पांडेय अमरमणि त्रिपाठी के रुतबे से अच्छी तरह परिचित था. डर की वजह से उस ने अपने जिगरी दोस्त अमनमणि का साथ छोड़ दिया. वह उस से दूर हो गया. मानू के दूर होते ही अमनमणि की आर्थिक तंगी बढ़ गई. अमनमणि को पता नहीं था कि मानू उस से दूरी क्यों बना रहा है? वह मानू को जब भी बुलाता, वह कोई न कोई काम का बहाना बना देता था. मानू का यह व्यवहार उसे कतई पसंद नहीं था. इसी बात पर अमनमणि मानू से खफा हो गया.

दरअसल मानू पांडेय गोरखपुर जिले के थरुवापार गांव के रहने वाले ऋषि कुमार पांडेय का बेटा था. वैसे उस का नाम अमित कुमार पांडेय था, लेकिन प्यार से सब उसे मानू कहते थे. ऋषिकुमार पांडेय नगर निगम के रजिस्टर्ड ठेकेदार थे. मानू छात्र जीवन से ही नेता था. उसी दौरान वह बसपा के कद्दावर नेता रामभुआल निषाद के संपर्क में आया. इस के बाद उस का अनेक राजनीतिज्ञों के संपर्क होता गया. मानू पांडेय और अमनमणि के बीच दोस्ती होने की भी एक अलग कहानी है. बात 7 मई, 2012 की है. दोपहर के समय बाहुबली पप्पू निषाद नाम का प्रौपर्टी डीलर अपने मुकदमे की तारीख निपटा कर स्कौर्पियो से कचहरी से लौट रहा था. उस की गाड़ी में 5-6 लोग और सवार थे.

वह कचहरी से करीब 500 मीटर पूरब दिशा में पहुंचा था कि तभी 3 मोटरसाइकिलों पर सवार 6 जनों ने उस की कार को चारों तरफ से घेर लिया. उन के हाथों में हथियार थे. इस से पहले कि पप्पू निषाद कुछ समझ पाता, उन लोगों ने उस की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अपनी जान बचाने के लिए पप्पू निषाद गाड़ी से कूद कर छात्रसंघ चौराहे के पास स्थित मेगामार्ट में फिल्मी स्टाइल में शीशा तोड़ कर घुस गया. तब कहीं जा कर उस की जान बची. पप्पू निषाद ने इस मामले में पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद, उस के भाई मनोज निषाद के अलावा सूरज निषाद, मनीष कन्नौजिया, रामजीत यादव, गुड्डू कटाई और दिनेशचंद यादव को नामजद किया था.

लेकिन पुलिस तफ्तीश में अमित कुमार पांडेय उर्फ मानू पांडेय का नाम भी सामने आ रहा था. पुलिस ने नामजद आरोपियों को तो गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था, लेकिन मानू पांडेय का कहीं पता नहीं लग पा रहा था. उस की तलाश में पुलिस जीजान से जुटी थी. पुलिस से बचने के लिए मानू इधरउधर छिप रहा था. उसी दौरान उस के दोस्तों ने सलाह दी कि समाजवादी पार्टी के किसी कद्दावर नेता की मदद ली जाए तो बात बन सकती है. क्योंकि प्रदेश में सपा की सरकार थी. मानू सोचने लगा कि वह किस नेता से संपर्क करे. मानू के नाना हड़बड़ शुक्ला अमरमणि त्रिपाठी का कारोबार पिछले 25 सालों से देख रहे थे. उन दिनों अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी की राजनीति भी चमक रही थी. मानू अमनमणि से परिचित तो था, लेकिन संबंध ज्यादा गहरे नहीं थे.

नाना की मार्फत मानू की जब अमनमणि से मुलाकात हुई तो मानू ने उसे अपनी परेशानी बताते हुए मदद मांगी. बताया जाता है कि अमनमणि के संपर्क में आने के बाद पुलिस मानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई. इस के बाद उन दोनों की दोस्ती काफी मजबूत हो गई थी. लेकिन इस गलतफहमी की वजह से उन के बीच दूरियां बढ़ गई थीं. उसी दौरान एक नई घटना घट गईं अमनमणि और सारा की शादी के समय मांग में सिंदूर भरते हुए फोटो फेसबुक पर किसी ने डाल दी. फिर वहीं से वह फोटो स्थानीय अखबार हिंदुस्तान ने अपने सभी संस्करणों में छाप दी. फोटो छपते ही अमनमणि बौखला गया.

उसे पता था कि शादी की यह फोटो मानू के अलावा और कि॒सी के पास नहीं है. इसलिए उसे विश्वास हो गया कि यह सब मानू पांडेय ने ही किया होगा. उस ने तय कर लिया कि वह उसे इस का सबक जरूर सिखाएगा. मानू पांडेय और अमनमणि त्रिपाठी की दोस्ती में दरार पड़ चुकी थी. यह दरार उन्हें दुश्मनी के मुकाम तक ले गई. अमनमणि त्रिपाठी एक रसूखदार बाप की औलाद था. बताया जाता है कि मानू की हत्या के लिए उस ने शूटर लगा दिए. अपनी जान की सलामती के लिए मानू और उस के घर वाले भूमिगत हो गए. उन के इधरउधर रहने के बाद उन का अंधियारीबाग वाला मकान खाली पड़ा था.

मौके का फायदा उठाते हुए अमनमणि ने उस मकान पर कब्जा जमा लिया. मानू को जब पता चला तो वह उस से अपना मकान खाली कराने में लग गया. एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मकान वापस मिला. उसी दौरान मानू की मां शीला पांडेय की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. उन्हें एक गंभीर बीमारी हुई थी. मानू पांडे और उस का बड़ा भाई अनुराग पांडेय दिल्ली में अपनी बहन के पास थे. दोनों भाइयों ने अपने पिता से कह दिया कि वह मां को दिल्ली ले कर आ जाएं. तब ऋषि पांडेय अपनी स्कौर्पियो से पत्नी को दिल्ली के लिए ले कर चल दिए.

5 अगस्त, 2014 की रात को मानू की मां शीला की तबीयत बेहद नाजुक हो गई. उस समय ऋषि पांडेय और उन की बड़ी बहू प्रियंका ही घर पर थे, वे उन्हें ले कर दिल्ली के लिए निकल गए. उन्होंने आक्सीजन मास्क लगवा दिया था, ताकि रास्ते में शीला को कोई परेशानी न हो. कहीं से यह सूचना अमनमणि त्रिपाठी को मिल गई तो वह अपने साथियों संदीप त्रिपाठी व रवि शुक्ला के साथ लालबत्ती लगी फौरच्यूनर गाड़ी से निकल गया. रात डेढ़ बजे के करीब लखनऊ के आवास विकास मुख्यालय के सामने उस ने अपनी गाड़ी ऋषि पांडे की गाड़ी के सामने रोक दी और पिस्टल की नोक पर ऋषि पांडेय का अपहरण कर के अपनी गाड़ी में बैठा लिया.

पत्नी की सीरियस हालत का हवाला देते हुए ऋषि पांडेय ने छोड़ने की काफी मनुहार की, लेकिन अमनमणि का दिल नहीं पसीजा. वह उन्हें हजरतगंज में स्थित अपनी कोठी में ले गया. वहां ले जा कर उस ने ऋषि पांडेय को एक कमरे में बंद कर दिया. उन तीनों ने उन की जम कर धुनाई की. फिर अमनमणि ने उन से 1 लाख रुपए की मांग की. वह जानता था कि पत्नी के इलाज के लिए दिल्ली जा रहे हैं तो उन के पास पैसे जरूर होंगे. अमनमणि त्रिपाठी उन पर पैसों के लिए दबाव बना रहा था कि तभी पता नहीं उस के दिमाग में क्या बात आई कि उस ने उन्हें अपने घर में रखना उचित नहीं समझा. उसी वक्त उन्हें गाड़ी में बैठा कर दूसरे ठिकाने पर ले जाने लगा. वह बीच रास्तें में था कि उस के किसी दोस्त का फोन आया.

उस ने बताया कि पुलिस को तुम्हारे बारे में पता चल चुका है. फोन आते ही अमनमणि ने अपनी योजना बदल दी. उस ने अपनी गाड़ी का रुख वीवीआईपी इलाके की तरफ कर दिया और वहीं पर चलती गाड़ी से धक्का मार कर उन्हें गिरा दिया और साथियों सहित फरार हो गया. उधर अनुराग पांडेय की पत्नी प्रियंका ने अपने ससुर के अपहरण की खबर पुलिस के अलावा दिल्ली में मौजूद अपने पति और देवर को दे दी थी. पिता के अपहरण की सूचना मिलते ही अनुराग और मानू रात में ही कार से लखनऊ के लिए रवाना हो गए. पुलिस भी ऋषि पांडेय को खोजने में जुट गई.

आखिर रात 3 बजे के करीब ऋषि पांडेय वीवीआईपी इलाके में सड़क के किनारे पड़े मिल गए. उन्होंने पुलिस को बता दिया कि अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने ही अपने साथियों के साथ मिल कर उन का अपहरण किया था. जिस इलाके में ऋषि पांडेय मिले थे, वह इलाका थाना कैंट क्षेत्र में आता था. इसलिए वहीं पर अमनमणि त्रिपाठी, रवि शुक्ला और एक अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 304, 386, 323, 504, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने थोड़े प्रयास के बाद रवि शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. 30 अगस्त, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया. पुलिस की पकड़ से अमनमणि त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी अभी भी दूर थे. पुलिस संदीप त्रिपाठी के ऊपर 5 हजार रुपए इनाम भी घोषित कर चुकी थी. 20 दिसंबर, 2014 को उत्तर प्रदेश एसटीएफ की गोरखपुर इकाई के प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह ने संदीप त्रिपाठी को गोरखपुर के खोराबार इलाके के खिरवनिया गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस के अन्य साथी भागने में सफल रहे.

टीम ने उस के कब्जे से एक पिस्टल, 5 कारतूस, 3 मोबाइल फोन और 6 सिम बरामद किए. 22 दिसंबर, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ भी न्यायलय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. तीसरे आरोपी अमनमणि की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही थी. मार्च, 2015 में विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पांडेय का एक कार्यक्रम सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित हुआ. वहां प्रदेश के बड़ेबड़े नेता पहुंचे थे. मंत्री शिवपाल यादव के ठीक बगल वाली सीट पर अमनमणि त्रिपाठी भी नजर आया तो प्रैस फोटोग्राफरों ने उस का फोटो खींच लिया.

दूसरे दिन समाचार पत्रों में इस तसवीर को प्रमुखता से छापा गया. पुलिस फिर उसे गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हुई तो वह फिर से भूमिगत हो गया. अदालत ने अमनमणि त्रिपाठी को भगोड़ा घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82/83 (कुर्की) आदेश करा कर उस के गोरखपुर के कोतवाली इलाके के दुर्गाबाड़ी रोड आवास पर नोटिस चस्पा कर दिया. इस बीच सारा, पति की हकीकत जान चुकी थी. उसे जब पता चला कि उस का पति आपराधिक छवि का है तो उस के दिल को काफी ठेस पहुंची.

उस ने पति को समझाने की काफी कोशिश की कि वह गुनाह के रास्ते से तौबा कर के अच्छे रास्ते पर चले, पर वह पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता. जब वह यही बात बारबार कहती तो वह उस की पिटाई कर देता. सारा यह सारी बातें मां से कह देती थी, तब सीमा सिंह नाराज होते हुए अमनमणि को फटकार सुनाती थी. ऐसा कई बार हुआ था. जब वह सारा की आए दिन पिटाई करने लगा तो सीमा सिंह ने गोमतीनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया और कहा कि जब तक तुम्हारे मांबाप इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक तुम सारा को ले कर वहां रह सकते हो. लेकिन अमनमणि ने ऐसा नहीं किया.

वह इधरउधर रह कर सिर छिपाता रहा तो सारा मायके में रही. धीरेधीरे सारा और अमन के बीच दूरियां बढ़ती गईं. दूरियां बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि अमन उस पर शक करने लगा था कि उस की पत्नी का झुकाव कहीं उसी व्यवसाई की ओर तो नहीं हो रहा है, जिस से उस की शादी होने वाली थी. शक के दौरान वह मौका मिलने पर पत्नी के दोनों मोबाइल के चारों नंबरों की काल डिटेल्स चेक करता रहता था. कोई भी नंबर उसे अंजान लगता तो वह उसे ले कर सारा के साथ झगड़ा और मारपीट करता. इन सब के पीछे खास वजह यह थी कि वह जान चुका था कि उस की सच्चाई पत्नी के सामने खुल चुकी है. वह उस की आपराधिक छवि को जान चुकी है.

पति से आजिज हो कर सारा मां से कहने लगी कि वह किसी तरह से अमनमणि से तलाक दिला दें. वह उस के साथ जीवन नहीं बिता सकेगी. रातरात भर वह अवारा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटी की बात सुन कर सीमा सिंह को काफी आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी को तलाक दिलाने का फैसला ले लिया. बेटी ने जो गलती की थी, उस की सजा उसे मिल चुकी थी. इसलिए एक दिन उन्होंने अमनमणि को समझाते हुए कहा कि वह सारा को तलाक दे दे. अमनमणि ने उस समय तो उन की बात का जवाब नहीं दिया, पर बाद में उस ने सारा से कह दिया कि वह चाहे जो कर ले, पर उसे किसी कीमत पर तलाक नहीं देगा. यह बात जून, 2015 की थी.

उस के बाद पता नहीं क्या हुआ कि अचानक अमनमणि के व्यवहार में परिवर्तन आ गया. उस ने सीमा सिंह से वादा किया कि वह सारा को अब कोई परेशानी नहीं होने देगा, उसे बड़े प्यार से रखेगा. उस पर कभी हाथ भी नहीं छोड़ेगा. यही नहीं, उस ने हमेशाहमेशा के लिए अपने मांबाप का घर छोड़ने का भी वादा कर लिया. पति के अंदर आए इस बदलाव से सारा काफी खुश हुई. कोमल दिल की सारा ने पति को माफ कर दिया और नए तरीके से जिंदगी शुरू करने के ख्वाब देखने लगी.

अमन ने उस से कहा कि वह पिछली सालगिरह पर कोई खुशी नहीं मना पाया. उन की खुशियों में कोई भी शामिल नहीं हुआ. इस बार वह सालगिराह बड़ी धूमधाम से मनाएगा. उस ने इस मौके पर दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला घूमने का प्रस्ताव सारा के सामने रखा तो सारा ने हां कर दी. वह बड़ी खुश थी. लेकिन उसे क्या पता था कि जो खुशी पाने के लिए वह फूली नहीं समा रही, वह खुशी उसे कभी नहीं मिलेगी. पूरी योजना बनाने के बाद 9 जुलाई, 2015 की सुबह सफेद कलर की मारुति स्विफ्ट कार ले कर अमनमणि सारा की कोठी के सामने पहुंच गया. सारा चहकते हुए उस में बैठ गई.

अमनमणि उसे ले कर लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए कह कर निकला. और दिन के एक बजे के करीब फिरोजाबाद के सिरसागंज इलाके में एक लड़की को बचाने के चक्कर में एक्सीडैंट हो गया. सारा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, लेकिन अमन को एक खरोंच तक नहीं आई. बहरहाल, घटना के बाद पुलिस ने अमनमणि त्रिपाठी को ऋषिकुमार पांडेय के अपहरण के केस में गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस को उस की पिछले 11 महीने से तलाश थी. मृतका सारा सिंह की मां सीमा सिंह से टेलीफोन पर बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सारा की दुर्घटना में हुई मौत एक बड़ा षडयंत्र है.

यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि सीधेसीधे हत्या है. यह हत्या पूर्व मंत्री और आपराधिक छवि के सपा नेता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी ने मिल कर की है. जिस क्षेत्र में घटना घटी है, उस के आसपास का क्षेत्र अमरमणि के प्रभाव वाला है. उस क्षेत्र में बड़ी संख्या में अमरमणि के रिश्तेदार भी रहते हैं. उन्होंने इस की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कथा लिखे जाने तक मामले की जांच थाना पुलिस कर रही थी. कथा संकलन तक प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं की थी. Uttar Pradesh Crime

—कथा में दयालमुनि पांडेय परिवर्तित नाम है, कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Dehradun Crime: मंगेतर की खातिर

Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.

हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.

स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’

उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.

इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.

देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.

तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.

इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.

उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.

एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.

पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.

लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’

‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.

‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.

राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती  से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.

हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.

नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.

करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.

फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.

इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.

‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.

इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.

करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.

घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’

राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’

राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.

नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं.  यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.

राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’

दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.

नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी  3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.

राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.

यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’

‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.

लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’

नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’

‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’

‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.

खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.

कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.

5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.

जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.

राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.

वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है