Hindi Stories: रूढि़वादी विचारों में फंस कर लोग आर्गन डोनेट करने में हिचकिचाते हैं. लेकिन एक आम गृहिणी संतोष ने पति के आर्गन डोनेट कर के कई लोगों को नई जिंदगी दी. आज चिकित्सा के क्षेत्र में जितना तेजी से विकास हो रहा है, मरीजों की संख्या भी उतनी ही तेजी से बढ़ती जा रही है. इस

का अनुमान प्राइवेट और सरकारी अस्पतालों में पहुंचने वाले मरीजों से लगाया जा सकता है. प्रदूषण, असंयमित दिनचर्या व अन्य वजहों से आज आर्गन फेल्योर मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है. आर्गन डोनेट कर के इस तरह के मरीजों की सहायता की जा सकती है, लेकिन समाज में फैले रूढि़वादी विचार इस रास्ते में बाधक बने हुए हैं. पर हाल ही में एक मरीज के घर वालों ने रूढि़वादी विचारों को त्याग कर एक ऐसा फैसला लिया कि कई लोगों की जिंदगी बदल गई.

दिल्ली के पश्चिम विहार निवासी रामबाबू आनंद पर्वत स्थित किसी निजी कंपनी में नौकरी करते थे. 29 जुलाई की शाम 6, साढ़े 6 बजे ड्यूटी पूरी कर के शाम को स्कूटर से वह अपने घर लौट रहे थे, तभी पंजाबीबाग के नजदीक किसी भारी वाहन ने पीछे से उन के स्कूटर में टक्कर मार दी. जिस से वह स्कूटर से उछल कर दूर जा गिरे और बेहोश हो गए. टक्कर मार कर वह भारी वाहन तेज गति से भाग गया. 57 वर्षीय रामबाबू को देखने के लिए सड़क पर चलने वाले कई लोग जमा तो हो गए, लेकिन इतनी हिम्मत कोई नहीं कर पा रहा था कि उन्हें किसी अस्पताल तक पहुंचा सके. कुछ लोगों की मानवीयता जागी भी, लेकिन वे घायल रामबाबू को अस्पताल ले जा कर पुलिस के लफड़े में नहीं पड़ना चाहते थे.

उधर से कार से गुजरने वाले लोग भीड़ को देख कर कार की गति धीमी कर के जायजा लेने की कोशिश तो करते, लेकिन जब उन्हें पता चलता कि मामला एक्सीडेंट का है तो वे वहां से खिसक जाते. दिल्ली में ज्यादातर लोग संवेदनहीन हो गए हैं. इस की वजह पुलिस का लफड़ा हो या उन की भागती जिंदगी, लेकिन इस मानसिकता की वजह से दुर्घटनाग्रस्त अनेक लोगों को समय पर चिकित्सा नहीं मिल पाती. कुछ देर बाद एक औटो वाले ने घायल रामबाबू को लोगों के सहयोग से अपने औटो में डाला और उन्हें नजदीक के एमजीएस अस्पताल ले गया.

आपातकालीन वार्ड में रामबाबू का इलाज शुरू हो गया. इस दुर्घटना में उन्हें कोई खुली चोट नहीं आई थी. लेकिन जब अस्पताल में जांच हुई तो पता चला कि उन के सिर में गंभीर चोट आई है. प्राथमिक उपचार के बाद डाक्टरों ने उन्हें आईसीयू में भरती कर दिया. रामबाबू को आईसीयू में भरती कर तो लिया, लेकिन डाक्टरों ने उन का उपयुक्त तरीके से इलाज शुरू नहीं किया. इस की वजह यह थी कि रामबाबू की तरफ से अस्पताल में एडवांस पैसे जमा नहीं हुए थे. और पैसे जमा करता भी कौन, क्योंकि उन का कोई परिजन या नजदीकी वहां था नहीं.

जो औटो वाला उन्हें भरती करने आया था, वह भी वहां से कब का जा चुका था. रामबाबू की सीरियस हालत को देखते हुए डाक्टरों को उन का इलाज शुरू कर देना चाहिए था. रही बात पैसों की तो उन के घर वालों के पहुंचने पर उन से ले लेते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए अस्पताल प्रशासन की तरफ से स्थानीय पंजाबीबाग थाने की पुलिस को जानकारी दे दी गई. लिहाजा पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई.

पुलिस को रामबाबू के पास ड्राइविंग लाइसेंस और स्कूटर के जो कागज मिले थे, उन से पता चला कि वह पश्चिमी दिल्ली के पश्चिम विहार इलाके के हैं. उन कागजों से उन्हें एक फोन नंबर मिला. उस फोन नंबर पर बात की गई तो वह रामबाबू की पत्नी संतोष का था. पुलिस ने संतोष को रामबाबू की दुर्घटना की जानकारी देते हुए पंजाबीबाग के एमजीएस अस्पताल आने को कहा.

पति का एक्सीडेंट होने की बात सुन कर संतोष घबरा गईं. उस समय वह घर पर अकेली थीं. उन का एकलौता बेटा चिराग नोएडा में अपनी नौकरी पर था. उन्होंने उस समय बेटे को फोन कर के यह जानकारी दी और खुद अपने पड़ोसियों के साथ एमजीएस अस्पताल पहुंच गईं. आईसीयू में इलाज शुरू करने से पहले डाक्टर ने उन से पैसे जमा कराने को कहा. लेकिन जल्दबाजी में वह घर से पैसे ले कर चलना ही भूल गई थीं. पति के एक्सीडेंट की खबर मिलने पर वह इतना घबरा गई थीं कि जल्दी से पड़ोसी को बता कर उस के साथ अस्पताल आ गईं. वह डाक्टरों से लाख कहती रहीं कि इलाज शुरू करें, बेटे के आने पर पैसे जमा करा देंगी, लेकिन डाक्टरों का दिल नहीं पसीजा.

एक, सवा घंटा बाद रामबाबू का बेटा चिराग जब नोएडा से अस्पताल पहुंचा तो उस ने इधरउधर से पैसे इकट्ठे कर के अस्पताल में जमा कराए. इस के बाद ही करीब साढ़े 8 बजे डाक्टरों ने रामबाबू का इलाज शुरू किया. जांच में पता चला कि उन के मस्तिष्क की कुछ नसें फट गई हैं.

डाक्टरों की टीम उन के उपचार में लगी रही, पर उन की हालत में सुधार नहीं हो पा रहा था. इस से घर वालों की चिंता बढ़ती जा रही थी. चिराग बारबार डाक्टरों के पास जा कर पिता की तबीयत के बारे में पूछ रहा था. जब चिराग को लगा कि इस अस्पताल में पिता की हालत सुधरने वाली नहीं है तो उस ने सर गंगाराम अस्पताल के अपने जानकार न्यूरोसर्जन से सलाह ली. चिराग ने व्हाट्सऐप से न्यूरोसर्जन को पूरी रिपोर्ट भेज दी थी. न्यूरोसर्जन ने उसे सलाह दी कि ब्रेन की कंडीशन ठीक नहीं है, इसलिए उन्हें आब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा.

चिराग अपने पिता को किसी अच्छे अस्पताल में ले जाना चाहता था. इस के लिए उस ने सब से पहले सर गंगाराम अस्पताल में बात की, पर वहां के आईसीयू में कोई बेड खाली नहीं मिला. इस के बाद उस ने साकेत के मैक्स अस्पताल में बात की. इत्तफाक से वहां के आईसीयू में भी बेड खाली नहीं था. वह परेशान हुआ जा रहा था. ऐसे में उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी उस के एक परिचित ने राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल के बारे में बताया कि वह भी मल्टीस्पैशिलिटी अस्पताल है. वहां बात कर के देखो.

तब चिराग ने बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को अपने पिता की हालत से अवगत कराते हुए आईसीयू में बेड उपलब्ध कराने की मांग की. उन के हां कहने के बाद चिराग 30 जुलाई को तड़के 3-4 बजे अपने पिता को एमजीएस अस्पताल से बीएल कपूर अस्पताल ले गया. वहां आईसीयू में वेंटिलेटर पर रख कर डाक्टरों की टीम उन के इलाज में जुट गई. सीनियर न्यूरोसर्जन डा. विकास गुप्ता और डा. राजेश पांडे के नेतृत्व में टीम रामबाबू के उपचार में लगी रही, लेकिन उन की हालत में कोई सुधार नहीं हो रहा था. उन की हालत सीरियस बनी हुई थी. अगले दिन तक उन की हालत सुधरने के बजाय और ज्यादा सीरियस हो गई. आखिर 31 जुलाई को सुबह साढ़े 10 बजे रामबाबू का ब्रेन डेड हो गया.

ब्रेन डेड होने की हालत में मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है, जबकि शरीर के अन्य अंग कुछ घंटों तक सक्रिय रहते हैं. डा. विकास गुप्ता ने रामबाबू का ब्रेन डेड होने वाली बात उन के एकलौते बेटे चिराग को बताई तो उस के ऊपर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. वह अस्पताल में ही फफकफफक कर रोने लगा. संतोष को जब पता लगा कि उस के पति अब इस दुनिया में नहीं रहे तो वह भी जोरजोर से रोने लगीं. कुछ रिश्तेदार मांबेटे को ढांढस बंधाने लगे. उन के परिवार के लिए यह एक गहरा सदमा था.

ब्रेन डेड होने की स्थिति में रामबाबू का ठीक होना असंभव था, क्योंकि कुछ घंटों बाद उन के बाकी आंतरिक अंगों के निष्क्रिय हो जाने पर डाक्टर उन्हें मृत घोषित कर देते. रामबाबू का इलाज कर रही टीम ने यह बात अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता को बताई तो उन्होंने सोचा कि ऐसी हालत में यदि उन के अन्य अंगों को जरूरतमंद लोगों में प्रत्यारोपित कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. इस से पहले इस अस्पताल में इसी तरह के 9 जनों के आर्गन दूसरे मरीजों में सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किए जा चुके थे. मगर यह काम रामबाबू के घर वालों की सहमति के बिना नहीं हो सकता था.

ऐसे में सब से बड़ी समस्या रामबाबू के परिजनों से बात करने की थी, क्योंकि उन का तो रोरो कर बुरा हाल था. घर वाले ही नहीं, रिश्तेदार भी शोक में डूबे थे. एक तो उन के घर का आदमी चला गया था, ऊपर से उस के अंगदान की बात उन से करना आसान नहीं था.

अब डाक्टरों के सामने यह बात एक चुनौती जैसी हो गई कि गमगीन माहौल में संतोष और उन के बेटे से किस तरह बात की जाए. दूसरे बात यह भी थी कि उन के परिवार से बातचीत की शुरुआत जल्दी की जाए क्योंकि उन्होंने बात करने में देर कर दी तो रामबाबू के आर्गन भी निष्क्रिय हो जाएंगे, जिस से उन का ट्रांसप्लांट नहीं हो सकेगा. रामबाबू के परिवार की ओर से अस्पताल में जो लोग मौजूद थे, उन में उन का बेटा चिराग ही ज्यादा भागदौड़ कर रहा था. वही ज्यादा एक्टिव था. डाक्टरों ने सब से पहले उस से ही बात करना मुनासिब समझा.

डाक्टरों की टीम ने एक कक्ष में बैठा कर उस से बातचीत शुरू की. सब से पहले उन्होंने उसे सांत्वना देते हुए समझाया. जब वह कुछ सामान्य हुआ तो कहा, ‘‘देखो चिराग, आप के परिवार की जो क्षति हुई है, उस की पूर्ति कोई नहीं कर सकता, लेकिन आप थोड़ा समझ कर फैसला लेंगे तो कई लोगों को नई जिंदगी दे सकते हैं.’’

डाक्टर की बात सुन कर चिराग चौंका और उन की तरफ गौर से देखते हुए बोला, ‘‘वह कैसे?’’

‘‘देखो, आप के पिता का ब्रेन डेड हो चुका है. अब इस के कुछ घंटे बाद शरीर के आंतरिक अंग भी निष्क्रिय हो जाएंगे. यदि उन के अंग डोनेट कर दिए जाएं तो कई लोगों को नई जिंदगी मिल सकती है. यह बहुत बड़ा परोपकार होगा.’’ डाक्टर ने समझाया.

चिराग पढ़ालिखा और समझदार था, फिर भी उसे यह बात सुन कर एक झटका सा लगा क्योंकि एक तो उस के पिता जा चुके थे, ऊपर से डाक्टर उन के अंगदान करने को कह रहे थे. वह बोला, ‘‘आप यह क्या कह रहे हैं?’’

‘‘देखो चिराग, आप पढ़ेलिखे और समझदार हो, इसलिए आप जानते होगे कि भारत में ऐसे तमाम मरीज हैं, जिन्हें आर्गन की जरूरत है, लेकिन तमाम वजहों से वे आर्गन ट्रांसप्लांट नहीं करा सकते. सोचो, ऐसे में उन को आप के पिता के आर्गन मिल गए तो वे लोग कितनी दुआएं देंगे.’’ डाक्टर ने कहा.

डाक्टर की बात चिराग की समझ में आ तो गई, लेकिन अंतिम निर्णय तो उस की मां संतोष को ही लेना था, क्योंकि उन की लिखित अनुमति के बिना यह काम नहीं हो सकता था. चिराग के हावभाव देख कर डाक्टरों को लग रहा था कि बात पौजिटिव जा रही है.

‘‘कल्पना करो चिराग, उन की दोनों आंखें उन लोगों को ट्रांसप्लांट की जाएंगी, जिन की जिंदगी में अंधेरा है. जब वे आप के पिता की आंखों से दुनिया देखेंगे तो कितनी खुशी महसूस करेंगे. वे आप को जिंदगी भर दुआएं देंगे और यह बात ध्यान रखो कि आप को यह फैसला बहुत जल्दी लेना है.’’ डाक्टर ने समझाया.

डाक्टरों से बात कर के जैसे ही चिराग कक्ष से बाहर निकला, उस के रिश्तेदारों ने उस से पूछना शुरू कर दिया कि डाक्टर क्या कह रहे थे? जब चिराग ने उन्हें पिता के अंगदान करने वाली बात बताई तो कुछ रिश्तेदार आश्चर्यचकित हो कर अपनीअपनी दलीलें देने लगे कि ऐसे दुख के माहौल में डाक्टर भी भला यह कैसी बात कर रहे हैं. कुल मिला कर दलीलें देने वाले रिश्तेदार अंगदान करने के पक्ष में नहीं थे.

डाक्टरों की बात चिराग की समझ में आ चुकी थी, इसलिए उस ने रिश्तेदारों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उस ने इस बारे में अपनी मां से बात की. बेटे की बात सुन कर एक बार को संतोष भी उस की तरफ देखने लगीं कि यह क्या कह रहा है? एक तो पति चले गए थे, ऊपर से यह उन का शरीर फड़वा कर अंगदान करने को कह रहा है. उन्होंने साफ कह दिया कि वह उन की लाश की दुर्गति नहीं होने देंगी.

चिराग के 1-2 रिश्तेदार थे, जो उस की बात से सहमत थे. तब चिराग ने उन के साथ मां को समझाया. थोड़ी कोशिश के बाद बात उन की समझ में आ गई. लेकिन उन्होंने शर्त यह रखी कि पति के जो भी अंग जिन लोगों को ट्रांसप्लांट किए जाएं, उन से बदले में कोई पैसा न लिया जाए. तब डाक्टरों ने उन्हें भरोसा दिया कि जब आप अंगदान कर रहे हैं तो पैसे लेने की बात ही नहीं उठती. इस के बाद संतोष ने पति के अंगदान करने की लिखित अनुमति दे दी.

रामबाबू के ब्रेन डेड का पहला टेस्ट सुबह साढ़े 10 बजे हुआ था. दूसरा टेस्ट 6 घंटे के अंतराल पर होना था, उस के बाद ही अंग प्रत्यारोपण की काररवाई होनी थी. अब उन्हें अनुमति मिल ही गई थी. इस के बाद डाक्टरों ने शाम साढ़े 4 बजे फिर से रामबाबू का परीक्षण किया तो उस में भी रिपोर्ट ब्रेन डेड की ही आई.

संतोष से कानूनी प्रक्रिया पूरी कराने के बाद अब आगे की काररवाई करनी थी. चूंकि यह पुलिस केस था, इसलिए कुछ कानूनी औपचारिकताएं भी पूरी करनी थीं. रामबाबू की दुर्घटना पश्चिमी दिल्ली के थाना पंजाबीबाग क्षेत्र में हुई थी, इसलिए उस थाने के एसएचओ ईश्वर सिंह को भी शाम 7 बजे अस्पताल बुलवा लिया गया. रामबाबू के कौनकौन से अंग दान करने हैं, यह जानने के लिए थानाक्षेत्र के हिसाब से संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के पोस्टमार्टम हाउस के डाक्टर का वहां होना जरूरी था.

डाक्टरों ने एसएचओ ईश्वर सिंह को आर्गन डोनेट करने वाली बात बताई तो उन्होंने इस काम में भरपूर सहयोग किया. उन्होंने संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल के डाक्टर को बुलाने के लिए एक गाड़ी भेज दी. उस गाड़ी से रात साढ़े 9-10 बजे डा. ढींगरा बीएल कपूर अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने जांच कर के बताया कि रामबाबू का हार्ट, लीवर, किडनी और दोनों कार्निया ही ट्रांसप्लांट लायक हैं. अब बात यह थी कि ये अंग किसे ट्रांसप्लांट किए जाएं. किडनी ट्रांसप्लांट के 30-35 मरीज बीएल कपूर अस्पताल में ही वेटिंग लिस्ट में थे. डा. एच.एस. भटियाल, डा. आदित्य प्रधान और डा. सुनील प्रकाश की टीम ने रामबाबू की दोनों किडनियां इसी अस्पताल के प्रतीक्षारत 2 रोगियों में ट्रांसप्लांट कर दीं.

इसी अस्पताल के एक मरीज को उन का लीवर ट्रांसप्लांट कर दिया गया. कार्निया के लिए सेंटर फौर साइट से डा. ए.के. नायक को बुला लिया गया. वे रामबाबू की दोनों कार्निया अपने साथ ले गए. अब उन का हार्ट बचा था. ऐसा मरीज बीएल कपूर अस्पताल की प्रतीक्षा सूची में नहीं था. इस के लिए डा. संजय मेहता ने पहले दिल्ली के एम्स अस्पताल से संपर्क किया. वहां कई पेशेंट हार्ट ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में थे. रामबाबू का ब्लड ग्रुप ए पौजिटिव था. उन का हार्ट उसी ब्लड ग्रुप के पेशेंट में ट्रांसप्लांट किया जा सकता था. एम्स के डाक्टरों ने इसी ग्रुप के वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात करनी चाही.

रात के 2 बज चुके थे, उस समय उन के कई मरीजों के फोन बंद मिले. कुछ मरीज दिल्ली से बाहर थे. 1-2 मिले भी, लेकिन वे दिल्ली से दूर के थे. उन का उसी समय अस्पताल पहुंचना असंभव था. लिहाजा एम्स में भी हार्ट ट्रांसप्लांट का मरीज नहीं उपलब्ध हो सका. एम्स में मरीज उपलब्ध न होने पर सर गंगाराम अस्पताल में बात की गई, वहां भी कोई ऐसा मरीज नहीं मिला, जो रात में ही हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए उन के अस्पताल आ सकता.

हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए अपोलो और मेदांता अस्पताल में भी बात की, लेकिन वहां भी कोई मरीज नहीं मिला तो मैक्स अस्पताल में बात की गई. इस अस्पताल में भी कई मरीज वेटिंग में थे. वेटिंग लिस्ट के मरीजों से बात की गई तो साकेत स्थित मैक्स अस्पताल का 42 वर्षीय मिराजुद्दीन उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया.

दिल्ली के अबुल फजल एन्क्लेव के शाहीन बाग का रहने वाला मिराजुद्दीन दैनिक मजदूर था. कई अस्पतालों में इलाज कराने के बाद पिछले 3 महीने से उस का मैक्स अस्पताल के डा. राजेश मल्होत्रा के नेतृत्व में इलाज चल रहा था. उस का हार्ट डायलेस हो चुका था. वह 15-20 प्रतिशत ही काम कर रहा था. उस से बात की गई तो वह उसी समय अस्पताल आने को तैयार हो गया. मैक्स अस्पताल साकेत की तरफ से पेशेंट कन्फर्म की सूचना बीएल कपूर अस्पताल को दे दी गई.

रामबाबू राजेंद्र प्लेस स्थित बीएल कपूर अस्पताल में थे. वहां से हार्ट साकेत के मैक्स अस्पताल लाना था. यह दूरी 20 किलोमीटर थी. हार्ट निकालने के बाद कुछ घंटे के अंदर ही दूसरे मरीज में ट्रांसप्लांट होना जरूरी था. इन दोनों अस्पतालों को जो सड़कें जोड़ती हैं, उन पर अकसर ज्यादा ट्रैफिक रहता है. वैसे रात में रोड अकसर खाली मिलता है. फिर भी इत्तफाक से हार्ट ले जाने वाली एंबुलेंस जाम में फंसने के बाद उन की कोशिश पर कहीं पानी न फिर जाए. यही चिंता दोनों अस्पतालों के डाक्टरों को थी.

तब बीएल कपूर अस्पताल के एमएस डा. संजय मेहता ने रात में ही दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के अतिरिक्त आयुक्त शरद अग्रवाल से बात कर के मदद मांगी. अपने सामाजिक उत्तरदायित्व को समझते हुए शरद अग्रवाल ने उन्हें सहयोग देने का आश्वासन दिया. उन्होंने रात में ही ट्रैफिक पुलिस के अधिकारियों से बात कर के उक्त दोनों अस्पतालों के बीच ग्रीन कारीडोर बनाने के निर्देश दिए, ताकि हार्ट को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने में कोई असुविधा न हो.

ट्रैफिक पुलिस अलर्ट हो गई. हार्ट ले कर जाने वाले मार्ग पर ट्रैफिक पुलिस के जवान तैनात हो गए. पूरी तैयारी के बाद चीफ कार्डियो सर्जन डा. रजनीश मल्होत्रा ने 4 डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल भेज दी. हार्ट सुरक्षित निकालने से पहले टीम ने हार्ट में कार्डियोप्लीजिया का इंजेक्शन दे दिया, जिस से उन का हार्ट 90 मिनट के लिए रुक गया.

इस के बाद उसे प्रिजर्व कर के आइस में रख लिया. उस जीवित हार्ट को ले कर रात 3 बजे डाक्टरों की टीम बीएल कपूर अस्पताल से मैक्स अस्पताल के लिए रवाना हो गई. एंबुलेंस से आगे पुलिस की 2 गाडि़यां ग्रीन कारीडोर में रास्ता बनाते हुए चल रही थीं. 3 बज कर 16 मिनट पर डाक्टर उस हार्ट को ले कर साकेत स्थित मैक्स अस्पताल पहुंच गए.

मैक्स अस्पताल में डा. रजनीश मल्होत्रा के नेतृत्व में टीम पेशेंट मिराजुद्दीन के साथ औपरेशन थिएटर में तैयार थी. टीम ने हार्ट ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू कर दी. सुबह 6 बजे तक औपरेशन की प्रक्रिया चली. इस के बाद उस में खून का प्रवाह शुरू कर दिया. मिराजुद्दीन के शरीर में रामबाबू का हार्ट काम करने लगा. यह देख कर डा. रजनीश मल्होत्रा की टीम बहुत खुश हुई. क्योंकि मैक्स अस्पताल में हार्ट ट्रांसप्लांट का यह पहला मामला था. जब हार्ट सही तरीके से काम करने लगा तो डा. रजनीश मल्होत्रा ने मिराजुद्दीन को 24 घंटे वेंटीलेटर पर रख कर दूसरे वार्ड में ट्रांसफर कर दिया.

सफलतापूर्वक हार्ट ट्रांसप्लांट होने की प्रक्रिया में ट्रैफिक पुलिस की भी अहम भूमिका रही. दोनों अस्पतालों के डाक्टरों ने पुलिस की ग्रीन कारीडोर व्यवस्था की सराहना की है. संतोष और उन के बेटे द्वारा लिए गए अहम फैसले ने कई मरीजों को नई जिंदगी दी है. संतोष की तरह अन्य लोगों को भी इस तरह की सामाजिक सेवा में आगे आना चाहिए.

उत्तर भारत के गिनेचुने अस्पतालों में ही हार्ट ट्रांसप्लांट की सुविधा मौजूद है. दिल्ली में सब से ज्यादा हार्ट ट्रांसप्लांट एम्स में किए गए हैं. एम्स में अब तक करीब 25 हार्ट ट्रांसप्लांट किए जा चुके हैं. Hindi Stories

 

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