MP News : यह तूने क्या किया सोनू

MP News : जिस सोनू को भावना बेटे की तरह मानती थी और उसे घर के अंदर तक आने देती थी, उसी सोनू ने ऐसा कुछ क्या किया कि भावना को अंत में कहना पड़ा, ‘यह तू ने क्या किया सोनू…’

वक्त और तरहतरह के अनुभव भावना को दिनोंदिन मजबूत बनाते गए. अब से कोई 10 साल पहले जब उन के पति दरियाव वर्मा की एक हादसे में मौत हो गई थी तो भावना पर जैसे दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. वह मध्य प्रदेश के खरगौन जिले के कस्बा कसरावद स्थित एक सरकारी अस्पताल में नौकरी जरूर करती थी, लेकिन उस के सामने सब से बड़ी समस्या यह थी कि वह अपने चारों बच्चों की परवरिश कैसे करे? पति अपने पीछे 3 बेटियां और एक बेटा छोड़ गए थे. भावना के साथ उस के नातेरिश्तेदार जो हमदर्दी दिखा रहे थे, उस में हमदर्दी कम, दिखावा ज्यादा लग रहा था.

लिहाजा वह समझ गई कि उसे जो भी करना है, अपने दम पर करना है. नौकरी के बाद उस ने अपना सारा ध्यान बच्चों की परवरिश और पढ़ाई पर लगा दिया. 5 सदस्यों वाले इस परिवार का गुजारा भावना की मामूली तनख्वाह से जैसेतैसे हो रहा था. उस के सामने जब कोई बड़ा खर्चा आ जाता तो वह इधरउधर से मदद ले लेती थी. इस के बाद उसे जैसे ही तनख्वाह मिलती, वह कर्ज निपटा देती. चूंकि वह सरकारी कर्मचारी थी और नीयत की साफ थी, इसलिए जरूरत पर हर कोई उसे पैसे उधार दे देता था. भावना की सब से बड़ी चिंता उस की 3 बेटियां थीं, जो देखतेदेखते बड़ी हो रही थीं.

उसे उन की शादियों की चिंता सता रही थी. वह सोचती थी कि बेटियों की शादी के बाद वह एकलौते बेटे अभिषेक (बदला नाम) के साथ रहेगी. वह उसे अपने बुढ़ापे की लाठी समझती थी. भावना ने अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दिए थे. उस की तीनों बेटियां बेहद शरीफ और समझदार थीं. यही वजह थी कि कसरावद में लोग उस की बेटियों की मिसालें देते थे. इस से भावना का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता था. अपनी तपस्या उसे सफल होती नजर आ रही थी. लेकिन एक दिन अचानक कुछ ऐसा हुआ कि उस का आत्मविश्वास डोल गया. उस के बेटे अभिषेक का एक दोस्त था आशिक उर्फ सोनू. बचपन का दोस्त होने की वजह से सोनू का उस के घर आनाजाना आम बात थी.

भावना उसे बेटे का दोस्त नहीं, बल्कि बेटे जैसा ही मानती थी. एक तरह से वह परिवार के सदस्य की तरह था. उस पर उस की बेटियां भी पूरा भरोसा करती थीं. वह एक धनाढ्य परिवार का लड़का था, जिस से उस की जेबों में हमेशा अच्छेखासे पैसे रहते थे. कई मौके ऐसे भी आए, जब जरूरत पड़ने पर सोनू ने उस की मदद की थी. भावना की सब से छोटी बेटी थी दर्शना, जिस की उम्र 17 साल हो गई थी. दर्शना पढ़ने में होशियार थी और जीवन के प्रति गंभीर भी थी. वह जानती थी कि मां किन स्थितियों से जूझते हुए चारों बच्चों की परवरिश कर रही है. कमउम्र में ही दर्शना ने फैसला कर लिया था कि वह खूब मन लगा कर पढ़ाई करेगी और अच्छी सी नौकरी हासिल करेगी, जिस से वह मां की हर तरह से मदद कर सके. वह कसरावद के कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में 10वीं कक्षा में पढ़ती थी.

पिता की मौत के समय दर्शना 7 साल की थी. सोनू उस समय भी उस के घर आताजाता था. वह दर्शना के साथ खूब खेलता था. दर्शना भी भाई का दोस्त होने के नाते उसे भाई जैसा मानती थी. समय के साथ दर्शना बड़ी होती गई. देखते ही देखते उस के शरीर में परिवर्तन तो हुए ही, साथ ही बुद्धि भी व्यावहारिक हो गई. 14 की होतेहोते दर्शना के सौंदर्य में काफी निखार आ गया. सोनू दर्शना में आ रहे तमाम बदलावों का गवाह था, लेकिन पिछले 2-3 सालों से वह जब भी दर्शना को देखता था, उस के दिल में कुछकुछ होने लगता था. खुद में आ रहे बदलावों से बेखबर दर्शना पहले की ही तरह उस के सामने पड़ती. उस के सामने पड़ते ही सोनू का हलक सूखने लगता था और जुबान जैसे लड़खड़ाने सी लगती थी.

वह खुद को स्वाभाविक और सामान्य दिखाने की कोशिश करता था, ताकि कोई उस के ऊपर शक न कर सके. दरअसल सोनू मन ही मन उसे चाहने लगा था. चौबीसों घंटे उस के दिलोदिमाग में दर्शना ही घूमती रहती थी. सोनू का झुकाव इस परिवार के प्रति दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा था. अब वह पहले से ज्यादा भावना की आर्थिक मदद करने लगा था. भावना को उस से आर्थिक मदद लेने में संकोच तो होता था, लेकिन सोनू हर बार उसे असमंजस में देख कर यही कहता था, ‘‘आंटी, क्या मैं आप का बेटा नहीं?’’

सोनू की यह बात उसे निरुत्तर कर देती थी. चूंकि वह स्वाभिमानी थी, इसलिए सोनू की पाईपाई वापस कर देती थी. पिछले कुछ दिनों से सोनू की भावनाएं, नीयत और ईमान बदल रहा है, इस बात को वह भांप नहीं सकी. उसी का नतीजा था कि सोनू उस के लिए भोलाभाला मासूम नहीं, बल्कि राक्षस बन गया था. जिस के पंजे में वह फंसी हुई महसूस कर रही थी. पिछले साल होली के आसपास की बात थी. सोनू अभिषेक के घर गया तो दर्शना अकेली थी. उसे लगा कि आज दिल की बात अपनी माशूका पर जाहिर कर देनी चाहिए. फिर ऐसा सुनहरा मौका जाने कब मिले. लिहाजा उस ने हिम्मत जुटाते हुए दर्शना की कलाई पकड़ कर कहा, ‘‘आई लव यू दर्शना.’’

इस अप्रत्याशित पेशकश से दर्शना घबरा गई. कुछ पल तो उस की समझ में ही नहीं आया कि सोनू क्या कर रहा है और वह उस की बात का जवाब दे या नहीं. दर्शना के चुप रहने से सोनू की अंगुलियां उस के शरीर पर रेंगने लगीं. एक नादान नौसिखिया आशिक इस से ज्यादा जानतासमझता भी नहीं था. वह इस बात को नहीं जानता था कि प्यार एक हसीन जज्बा है. जिस्म की जरूरत जैसी बातों से उस का कोई वास्ता नहीं होता. उस की अंगुलियां दर्शना के नाजुक अंगों पर आतीं, उस के पहले ही दर्शना ने झटके से सोनू का हाथ पकड़ लिया और उस से दूर जा खड़ी हुई.

गहरी सांसें लेते हुए दर्शना ने खुद पर काबू पाया तो उस का आत्मविश्वास भी लौट आया. उस ने जम कर सोनू को लताड़ लगाई. सोनू को इस की उम्मीद नहीं थी. वह तो सोच रहा था कि जो आग उस के जिस्म और दिल में लगी है, वही दूसरी तरफ भी लगी होगी. दर्शना के तेवर देख कर सोनू अपना सा मुंह लिए वापस चला गया. दर्शना की हालत और ज्यादा अजीब थी. सोनू अभी जो कह और कर गया था, उस के मायने वह समझती थी. वह जानती थी कि अगर उस ने सोनू की हरकत छिपाई तो उस के हौंसले और बढ़ेंगे. मुमकिन है कि बाद में लोग उसे ही गलत समझने लगें. काफी सोचविचार कर उस ने तय किया कि वह मां को सब कुछ बता देगी.

भावना अस्पताल की ड्यूटी कर के वापस आई तो दर्शना ने सारी बात उसे बता दी. भावना को लगा मानो किसी ने उसे आसमान से जमीन पर पटक दिया है. सोनू से उसे ऐसी उम्मीद सपने में भी नहीं थी. 19-20 साल के एक नौजवान की मदद और एहसान के मायने उसे अब समझ में आ रहा था, साथ ही अपने लाचार होने का भी अहसास हो रहा था. सामान्य होने के बाद उस ने तय किया कि चुप रहने से काम नहीं चलेगा. उस ने उसी समय सोनू को फोन कर के बुला लिया. भावना का फोन आते ही सोनू समझ गया कि भावना ने उसे क्यों बुलाया है. गलती करने के बावजूद वह दर्शना के घर जा पहुंचा. लेकिन इस बार उस का सिर अहसानों के गुरूर से उठा हुआ नहीं, बल्कि शर्म से झुका हुआ था.

भावना ने उसे नजरें गड़ा कर देखा तो वह और सकपका उठा. सोनू को सामने देख कर भावना उस की उतनी सख्त और तल्ख आवाज में खिंचाई नहीं कर पाईं, जितनी उस के आने से पहले मन ही मन सोच रही थी.

‘‘सोनू, मैं हमेशा तुम्हें बेटे की तरह मानती रही. इस के बावजूद तुम ने जो किया, वह सही नहीं था. तुम्हें अपने किए पर शरम आनी चाहिए.’’ खीझ और आवेग में भावना कांपती आवाज में बोली. सोनू को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि उस के साथ इतनी नरमी से बात की जाएगी. वह सिर झुकाए उसी तरह खड़ा रहा. बात को यहीं खत्म करने के अंदाज मेंभावना ने कहा, ‘‘जो हुआ सो हुआ, अब यह मसला यहीं खत्म हो जाना चाहिए.’’

भावना की बात खत्म होते ही सोनू शांत और गंभीर आवाज में बोला, ‘‘आंटी, मैं दर्शना को बहुत प्यार करता हूं और उस से निकाह करना चाहता हूं.’’

सोनू की बात सुन कर भावना की रूह तक कांप उठी. उस के मन में आया कि वह उसे खरीखोटी सुना कर उसी समय घर से भगा दे. लेकिन बदनामी के डर से वह कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करना चाहती थी. उस की बात से वह इतना तो समझ गई थी कि यह लड़का सीधे नहीं मानेगा. इस के बावजूद वह अपने गुस्से को काबू में रख कर संयत स्वर में बोली, ‘‘यह नामुमकिन है, तुम जानते हो कि हमारे तुम्हारे बीच कितने और कैसेकैसे फासले हैं.’’

पर सोनू अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ. भावना ने उसे समझाया, ‘‘तुम मुसलमान हो और दर्शना अभी नाबालिग है. इस के अलावा मेरे सिर पर और 2 लड़कियों की शादी की जिम्मेदारी है. जिस समाज में हम रहते हैं, वह इसे कतई मंजूर नहीं करेगा.’’

सोनू ने उस की बात नहीं मानी और साफसाफ कह दिया कि वह दर्शना को नहीं भूल सकता. नरमी से बात न बनते देख भावना को गुस्सा आ गया. उस ने सोनू को धमकाते हुए कहा, ‘‘निकल जाओ यहां से और अब कभी इस घर में पांव भी मत रखना, वरना मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

बहरहाल, उस दिन सोनू वहां से चला तो गया, लेकिन जातेजाते कह गया कि वह दर्शना को हरगिज नहीं छोड़ेगा. इस तरह जातेजाते वह दर्शना और भावना की नींद और चैन लेता गया. दर्शना जब भी उसे दिखती, उस का दिल बल्लियों उछलने लगता. पर मायूसी उस वक्त होती, जब वह नफरत से मुंह फेर लेती. यह बात उसे बड़ी बुरी लगती थी. दर्शना के प्रति चाहत ने सोनू की नींद और चैन उड़ा दिया था. दिनरात, सुबहशाम उसे हर जगह दर्शना ही दर्शना नजर आती थी. सोनू को उम्मीद थी कि जीत उस के प्यार की ही होगी. एक दिन भावना आंटी उसे बुला कर कहेंगी,‘ तेरा प्यार सच्चा था और तू जीत गया. अब मैं दर्शना का हाथ तेरे हाथ में देती हूं.’ लेकिन उस की यह उम्मीद उम्मीद ही बन कर रह गई.

भावना की सख्ती की वजह से दर्शना ने घर से निकलना कम कर दिया था. सोनू उस की याद में परेशान रहने लगा. इसी तरह 2 महीने बीत गए. अपना गम भुलाने के लिए सोनू शराब पीने लगा और नशे की झोंक में अपने यारदोस्तों से भी अपनी माशूका दर्शना का जिक्र सरेआम करने लगा. इस का नतीजा यह हुआ कि मोहल्ले में यह बात फैल गई. इस से दर्शना की बदनामी होने लगी. वैसे भी मजहबी तौर पर कसरावद एक संवेदनशील इलाका है, जहां जबतब हिंदूमुसलिम झड़पें होती रहती हैं. लिहाजा सोनू की बातों को एक वर्ग विशेष के लोगों ने गंभीरता से लेते हुए आपत्ति जतानी शुरू कर दी. ये बातें कोई दूसरा रूप न ले लें, इसलिए नियाज अली ने अपने इश्कजादे बेटे सोनू को खरगौन भेज दिया.

न चाहते हुए भी सोनू पिता के कहने पर कसरावद से खरगौन चला तो गया, लेकिन वहां उस का मन नहीं लगा. वहां वह इस तरह छटपटा रहा था, जैसे उस की आत्मा कसरावद में ही रह गई है. पारिवारिक अंकुश न रह जाने की वजह से वह अब पहले से ज्यादा शराब पीने लगा था. नशे में वह दर्शना को हासिल करने के तरीकों पर सोचा करता था. कसरावद में तो स्कूल या कोचिंग आतेजाते दर्शना उसे दिख जाती थी, लेकिन खरगौन आ कर तो यह सुख भी छिन गया था. किसी भी आदमी की जब यह स्थिति हो जाती है तो वह सोचनेसमझने की ताकत खो बैठता है. यही हाल सोनू का भी था. ऐसी स्थिति में एक खतरनाक खयाल उस के जेहन में आया.

दर्शना रोज की तरह 12 अक्टूबर, 2014 को शाम 6 बजे कसरावद के मोहल्ला शाहबाद स्थित कोचिंग सैंटर से पढ़ कर बाहर निकली. वह सिर झुकाए सीधे अपने घर की ओर चली जा रही थी. 5-6 मिनट में वह मंडी रोड वाली मसजिद के सामने पहुंची थी कि तभी तेज गति से पीछे की तरफ से आती एक मोटरसाइकिल उस के पास रुक गई. उस ने बाइक पर पीछे बैठे शख्स को देखा तो सहम गई. चेहरे पर रूमाल बांधे उस शख्स को वह पहचान गई. वह कोई और नहीं, आशिक उर्फ सोनू था. उस की नजरों से लग रहा था कि उस के इरादे नेक नहीं हैं.

डर के मारे उस के हाथों से कापीकिताबें छूट कर जमीन पर गिर गईं. वह वहां से भागी और खुद को महफूज करने के लिए एक मकान का दरवाजा खटखटाने लगी. वह मकान मुबारक खान का था.

खटखटाने की आवाज सुन कर अंदर से एक जनाना आवाज आई, ‘‘कौन है, आती हूं.’’

लेकिन दरवाजा खुल पाता, उस के पहले ही सोनू दौड़ कर उस के पास आया और अंटी से कट्टा निकाल कर गोली सीधे दर्शना के सिर पर दाग दी. मुबारक खान की पत्नी ने दरवाजा खोला तो चौखट पर दर्शना पड़ी थी. वह उसे पहचान गईं. दर्शना शायद बेहोशी की हालत में थी. कुछ ही देर में वहां तमाम लोग जमा हो गए. उन्होंने दर्शना के घर वालों को खबर करने के साथ इलाज के लिए उसे उसी सरकारी अस्पताल ले गए, जहां उस की मां भावना काम करती थी. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि माजरा क्या है और दर्शना को हुआ क्या है? उस की गंभीर हालत को देखते हुए उसे कसरावद के अस्पताल से जिला अस्पताल खरगौन के लिए रैफर कर दिया गया.

लेकिन अस्पताल पहुंचते ही दर्शना की मौत हो गई. इसी बीच खबर पा कर पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई थी. अब तक सभी लोग इसे सड़क दुर्घटना मान कर चल रहे थे, लेकिन खरगौन अस्पताल में उस के सिर के घाव की जांच की गई तो उस की मौत की असल वजह सामने आ गई. क्योंकि सिर पर गोली का निशान था.

खरगौन के एसपी अमित सिंह भी अस्पताल पहुंच गए थे. उन्होंने सदमे में डूबी भावना को बताया कि उन की बेटी की मौत एक्सीडेंट से नहीं, बल्कि गोली लगने से हुई है. इतना सुनते ही भावना के मुंह से निकला, ‘‘यह तू ने क्या किया सोनू.’’

बाद में भावना ने पूरी बात पुलिस को बता दी. लोगों को जब पता चला कि मुसलिम युवक सोनू ने दर्शना की हत्या की है तो दूसरे वर्ग के लोगों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. इस से पुलिस प्रशासन घबरा गया. एसपी अमित सिंह ने कसरावद के टीआई गिरीश जेजुकर और एसडीओपी सुनील लाली को सोनू उर्फ आशिक को जल्द गिरफ्तार करने के निर्देश दिए. पुलिस सोनू को गिरफ्तार करने उस के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. तब एसपी के आदेश पर जिले के समस्त थाना क्षेत्रों में नाकेबंदी कर दी और सारे टोल नाकों के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए. तब कहीं रात 2 बजे हत्यारे आशिक को सनावद से पकड़ा जा सका.

सोनू के साथ उस के साथी गुरू उर्फ भूरे को भी गिरफ्तार कर लिया गया था. सोनू से पूछताछ करने के बाद लकी उर्फ शुभम गुप्ता को भी धर दबोचा गया. लकी सोनू का दोस्त था और उसी ने हत्या में इस्तेमाल की गई बाइक सोनू को दी थी. पूछताछ कर के पुलिस ने तीनों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. MP News

UP Crime News : सौतेली बेटी की साजिश

UP Crime News : सीमा की हरकतों से तंग आ कर पति ने ही नहीं, पालनेपोसने वाले दादादादी ने भी साथ रखने से मना कर दिया था. इस के बाद उसे सहारा दिया सौतेले पिता गुलाब खान ने. लेकिन वह उन की भी न हो सकी और उस ने जो किया, आज सलाखों के पीछे है. मामला एक रिटायर्ड अग्निशमन कर्मचारी गुलाब खान की बेरहमी से हत्या का था, इसलिए सूचना मिलते ही संबंधित थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी अजयपाल सिंह के अलावा अन्य कई थानों की पुलिस के साथ एसएसपी शलभ माथुर, एसपी (सिटी) समीर सौरभ, एएसपी शैलेश कुमार पांडेय भी घटनास्थल पर आ गए थे.

शव के निरीक्षण से पता चला कि पहले सिर पर किसी भारी चीज से मार कर बेहोश किया गया था, उस के बाद गले में रस्सी लपेट कर गला घोंट दिया गया था. गुलाब खान की मौत गला घोंटने से हुई थी या सिर पर गंभीर चोट लगने से, यह पोस्टमार्टम के बाद ही पता चल सकता था. जिस मकान में हत्या की गई थी, वह उन का अपना मकान था, लेकिन उसे देख कर ही लग रहा था कि उस मकान में कोई रहता नहीं था. फर्श पर जमी धूल से साफ लग रहा था कि वहां महीनों से कोई नहीं आया था. इस बात ने पुलिस वालों को यह सोचने को मजबूर कर दिया था कि उस दिन गुलाब खान इस मकान में क्या करने आए थे?

मकान में 2 दरवाजे थे, एक दरवाजा बगल में बनी मसजिद के बराबर में खुलता था, जबकि दूसरा दरवाजा एक ऐसी सुनसान गली में खुलता था, जिस का उपयोग महिलाएं सिर्फ दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए करती थीं. निरीक्षण में एसएसपी शलभ माथुर ने देखा कि उस दिन मकान का सुनसान गली की ओर खुलने वाला दरवाजा खोला गया था. क्योंकि फर्श पर जमी धूल में उस ओर 3-4 तरह के जूतों के आनेजाने के निशान साफ दिखाई दे रहे थे. निशान भी ताजे थे, जिन में जूतों की तल्ले की डिजाइन तक साफ नजर आ रही थी. पूछताछ में पता चला कि मृतक गुलाब खान बेर का नगला में काफी सालों से रह रहे थे. उन के 2 छोटे भाई भी वहीं पास में ही रहते थे. मोहल्ले में उन के 2 मकान थे.

एक मकान में वह अपनी पत्नी और बेटी सीमा के साथ रहते थे, जबकि यह दूसरा मकान पुराना और जर्जर होने की वजह से खाली पड़ा था. इसे वह तुड़वा कर दोबारा बनवाने के बारे में सोच रहे थे. गुलाब खान के परिवार में पत्नी और 2 बेटे थे. दोनों ही बेटे अपनेअपने परिवारों के साथ अलगअलग मकानों में रह रहे थे. एसएसपी शलभ माथुर जब उन के दोनों बेटों, सलीम और इमरान से पूछताछ की तो उन्हें पता चला कि मृतक गुलाब खान ने 2 शादियां की थीं. पहली पत्नी से गुलाब खान को 2 बेटे, सलीम और इमरान थे, जबकि दूसरी पत्नी शाहीन से उन की अपनी कोई संतान नहीं थी. सीमा जो इस समय उन के साथ रह रही थी, वह शाहीन के पहले पति की बेटी थी.

कई महीने पहले सीमा अपने पति से लड़झगड़ कर यहां आ गई थी और तब से यहां सौतेले पिता और मां के साथ रह रही थी. पुलिस ने जब उस से बात करनी चाही तो पता चला कि वह गायब है. उस का मोबाइल भी बंद था. गुलाब खान भले ही सीमा के सौतेले पिता थे, लेकिन वह उन्हीं के साथ रह रही थी, इसलिए हत्या के बाद उस के इस तरह अचानक गायब हो जाने और मोबाइल फोन बंद होने से पुलिस हत्या के तार उस से जोड़ने लगी. एसएसपी शलभ माथुर ने थाना जगदीशपुरा के थानाप्रभारी अजयपाल सिंह से सीमा का पता लगाने को कहा.

पुलिस ने डौग स्क्वायड भी बुलवा लिया था. वह भी उसी सुनसान गली वाले दरवाजे से बाहर निकला था, इसलिए अनुमान लगाया गया कि हत्यारे उसी गली से आए थे और हत्या कर के उधर से ही निकल गए थे. गुलाब खान के घर वालों ने बताया था कि 11 बजे के करीब वह केबल ठीक कराने की बात कह कर घर से निकले थे. उस के बाद लौट कर नहीं आए. रात 9 बजे शाहीन बेगम ने इमरान को बुला कर उन के घर न लौटने की बात बताई तो पिता को ढूंढ़ते हुए वह बेर का नगला स्थित पुराने घर पर पहुंचा तो उसे पिता की हत्या के बारे में पता चला. इस के बाद उस ने पुलिस को सूचना दी.

थानाप्रभारी अजयपाल सिंह ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए एसएम मैडिकल कालेज भिजवा दिया. सौतेली बहन सीमा के इस तरह अचानक गायब हो जाने से इमरान को लग रहा था कि हत्या उसी ने की है, इसलिए उस ने पिता की हत्या का मुकदमा सीमा और उस के अज्ञात साथियों के खिलाफ दर्ज करा दिया. एसएसपी शलभ माथुर ने इस मामले की जांच थानाप्रभारी अजयपाल सिंह को सौंप दी. हत्या की यह घटना ताजनगरी आगरा के थाना जगदीशपुरा के मोहल्ला बेर का नगला में 9 सितंबर, 2014 को घटी थी.

मामला पुलिस के ही सहयोगी अग्निशमन विभाग के रिटायर्ड कर्मचारी की हत्या का था, इसलिए पुलिस इस मामले के खुलासे के लिए तत्परता से जुट गई थी. सीमा की तलाश में थानाप्रभारी अजयपाल सिंह जगहजगह छापे मार रहे थे. सर्विलांस टीम की भी मदद ली जा रही थी, लेकिन सीमा का फोन लगातार बंद आ रहा था. दूसरी ओर मृतक की पत्नी शाहीन बेगम बेटी सीमा की तलाश के लिए पुलिस पर दबाव बनाए हुए थी. उस ने बेटी को तलाश के लिए आगरा जोन के आईजी, डीआईजी और एसएसपी शलभ माथुर को भी प्रार्थना पत्र दिए थे.

सीमा आगरा पुलिस के लिए पहेली बनती जा रही थी. वह पिता की हत्या कर के लापता है या किसी हादसे का शिकार हो गई है, यह उस के मिलने पर ही पता चल सकता था. एकएक कर के दिन गुजरते जा रहे थे, लेकिन न गुलाब खान के हत्यारे का पता चल रहा था, न सीमा के बारे में कोई जानकारी मिल रही थी. एएसपी शैलेश कुमार पांडेय ने देखा कि थाना पुलिस इतनी मेहनत करने के बाद भी खाली हाथ है तो उन्होंने खुद मामले से जुड़े सारे पहलुओं पर गहनता से विचार किया और इस के बाद मृतक गुलाब खान की पत्नी शाहीन बेगम का मोबाइल सर्विलांस पर लगवाने के साथ अपने कुछ मुखबिर भी सीमा के बारे में पता लगाने के लिए लगा दिए थे.

उन के इस उपाय का उन्हें फायदा भी मिला. सर्विलांस से जहां सीमा के ठिकाने का पता चल गया, वहीं मुखबिरों से सीमा के ऐसे 4 दोस्तों के बारे में पता चला, जो उस के बहुत खास थे. सीमा के इस तरह छिपने से साफ हो गया था कि गुलाब खान की हत्या में किसी न किसी रूप में उस का हाथ जरूर है. इस के बाद जहां थानाप्रभारी अजयपाल सिंह ने सहयोगियों की मदद से सीमा को गिरफ्तार कर लिया, वहीं दूसरी ओर एएसपी शैलेश कुमार पांडेय ने मुखबिर की सूचना पर आवास विकास कालोनी के सेक्टर-8 में रहने वाले 2 सगे भाई नितिन सक्सेना, दीपक सक्सेना, इन के दोस्त मोनू जादौन और श्रीनगर कालोनी के रहने वाले इन के एक अन्य दोस्त अक्षय गौड़ को थाने बुलवा लिया.

पुलिस इन सभी को पूछताछ के लिए एक ऐसे कमरे में ले गई, जहां इन्हें जूते उतार कर जाना पड़ा. शैलेश कुमार पांडेय ने कमरे के बाहर एक प्रिंट एक्सपर्ट बैठा रखा था. लड़कों के अंदर जाते ही उस ने जूतों के तल्ले की डिजाइन घटनास्थल पर मिले जूतों के तल्ले की डिजाइन से मिलाया तो दोनों की डिजाइन मिल गई. प्रिंट एक्सपर्ट ने जैसे ही यह बात एएसपी शैलेश कुमार पांडेय को बताई, उन्होंने चारों लड़कों पर शिकंजा कस दिया. अभी तक उन लड़कों का कहना था कि उन का इस हत्या से कोई लेनादेना नहीं है. जो भी किया है सीमा ने किया है.

लेकिन जूतों के तल्लों के निशानों के मिल जाने के अलावा उन के मोबाइल फोन की लोकेशन भी वहां की मिली थी, इसलिए जब लड़कों को पता चला कि पुलिस ने उन के खिलाफ सारे सुबूत जुटा लिए हैं तो वे फूटफूट कर रोने लगे. इस के बाद सीमा तथा चारों लड़कों को आमनेसामने बिठा कर जब गुलाब खान की हत्या के बारे पूछताछ शुरू हुई तो सीमा और उस के उन चारों दोस्तों ने हत्याकांड की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

नौकरी के दौरान जिन दिनों गुलाब खान शाहजहांपुर में तैनात थे, उन्हीं दिनों अचानक बीमारी से उन की पत्नी नफीसा बेगम की मौत हो गई थी. वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे. नफीसा बेगम से उन्हें 2 बेटे सलीम और इमरान थे, उस समय जिन की उम्र 10-11 साल थी. नौकरी के साथसाथ 2 नाबालिग बेटों को संभालना गुलाब खान के लिए काफी मुश्किल हो रहा था, इसलिए जब उन के दोस्त वकीलुद्दीन उन के लिए दूसरी शादी का प्रस्ताव लाए तो वह मना नहीं कर सके.

वकीलुद्दीन की दूर के रिश्ते की एक बहन थी शाहीन बेगम. दोस्त होने के नाते वकीलुद्दीन को पता था कि गुलाब खान के पास पैसे की कमी नहीं है. इसलिए वह अपनी बेटी की शादी उन के बेटे सलीम से करना चाहते थे. वह इस के लिए मना न कर सके, यही सोच कर वकीलुद्दीन उन की शादी करा कर उन पर एहसान करना चाहता था. इस में वह कामयाब भी हो गया. नफीसा बेगम की मौत के मात्र 3 महीने बाद ही वकीलुद्दीन ने शाहीन बेगम का निकाह गुलाब खान से करा दिया था.

गुलाब खान ने जिस शाहीन बेगम से निकाह किया था, उस का पहले भी निकाह हो चुका था. 2 बेटियों के पैदा होने के बाद उस के पति की मौत हो गई थी. गुलाब खान से शादी की बात चली तो शाहीन बेगम की पहले पति की दोनों बेटियां इस में रोड़ा बनने लगीं. लेकिन बड़ेबूढ़ों ने इस मसले को बैठ कर हल कर दिया. तय हुआ कि शाहीन की बड़ी बेटी सीमा अपने दादादादी के पास रहेगी और छोटी बेटी रीना मां के साथ, जिस की सारी जिम्मेदारी गुलाब खान को उठानी पड़ेगी.

गुलाब खान की भी जरूरत थी, इसलिए उन्होंने इस शर्त को स्वीकार कर लिया. लगभग साल भर बाद उन का तबादला मैनपुरी हो गया तो वह शाहीन बेगम, उस की बेटी रीना और अपने दोनों बेटों को ले कर वहां चले गए. गुलाब खान के दोनों बेटे अपनी सौतेली बहन रीना को सगी बहन की तरह मानते थे, इसलिए रीना भी उन्हें उसी तरह मानती थी. इस की वजह यह थी कि शाहीन बेगम सलीम और इमरान को सगी मां जैसा प्यार कर रही थी.

समय का पंछी अपने हिसाब से उड़ता रहा. गुलाब खान का तबादला आगरा हुआ तो उन्होंने आगरा में स्थाई रूप से बसने का फैसला कर लिया और वहां के थाना जगदीशपुरा के मोहल्ला बेर का नगला में अपना मकान बनवा लिया. अब तक उन्होंने बेटों सलीम खान और इमरान खान की शादियां कर दी थीं. दूसरी ओर शाहीन बेगम की बड़ी बेटी सीमा की भी शादी उस के दादादादी ने उस के चचेरे भाई नफीस के साथ कर दी थी.

सीमा मांबाप के साथ नहीं रहती थी. दादादादी का उस पर उतना दबाव नहीं था, जितना एक बच्चे को अपनी जिंदगी संवारने के लिए होना चाहिए, इसलिए वह उच्छृंखल स्वभाव की हो गई थी. जवानी में कदम रखते ही वह बेलगाम घोड़ी की तरह दौड़ने लगी तो शादी के बाद उस का पति नफीस भी उस पर लगाम नहीं लगा सका. एक बच्चे की मां बन जाने के बाद भी जब सीमा की आदत में कोई सुधार नहीं आया तो नफीस उस से छुटकारा पाने के बारे में सोचने लगा.

चूंकि सीमा नफीस की चचेरी बहन थी, इसलिए नफीस उसे छोड़ना नहीं चाहता था. लेकिन सीमा के घर के बाहर इतने यारदोस्त बन गए थे कि उस के पास पति और बच्चे के लिए समय ही नहीं रहता था. नफीस ने उसे बहुत समझाया, पर वह अपनी आदत सुधारने को राजी नहीं थी. तब आजिज आ कर नफीस ने उसे सदासदा के लिए छोड़ दिया. सीमा की बदचलनी से दादादादी भी तंग आ चुके थे, इसलिए उन्होंने भी उसे साथ रखने से मना कर दिया. नफीस ने सीमा से पैदा हुए 6 साल के बेटे शान मोहम्मद को अपने पास रख लिया था. यह लगभग साल भर पहले की बात है

दोनों बेटों की शादी करने के बाद गुलाब खान ने शाहीन बेगम की बेटी रीना की भी अच्छे घर में शादी कर दी थी. रिटायर होने के बाद गुलाब खान को जो पैसे मिले थे, उसे उन्होंने दोनों बेटों सलीम और इमरान में बांट दिए थे. तब शाहीन बेगम ने उन के इस फैसले का विरोध किया था, लेकिन पति के आगे उस की एक नहीं चली थी. गुलाब खान ने यह कह कर उस का मुंह बंद कर दिया था कि जब तक वे जिंदा हैं, उन के खर्च भर के लिए पेंशन तो मिलती ही रहेगी, जिस से आराम से उन की जिंदगी गुजर जाएगी. इमरान और सलीम के अपनेअपने परिवार थे. उन्होंने मकान खरीद लिए थे और अपनेअपने परिवार के साथ अपनेअपने मकान में रहते थे.

इमरान का मकान आवास विकास कालोनी के सेक्टर-11 में था, जो बेर का नगला से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए वह मांबाप का हालचाल लेता रहता था. गुलाब खान अपने सगे बेटों की जो मदद कर  रहे थे, वह शाहीन बेगम को अच्छा नहीं लगता था. दूसरी ओर शाहीन बेगम की बड़ी बेटी सीमा अपनी हरकतों से बसीबसाई गृहस्थी तो बरबाद कर ही चुकी थी, दादादादी ने भी साथ रखने से मना कर दिया था, इसलिए अब उस के पास अपना कोई ठिकाना नहीं रह गया था. चूंकि उस के तमाम दोस्त उस का खर्च उठा रहे थे, इसलिए वह एक होटल में कमरा ले कर रहने लगी थी.

होटल में रहते हुए वह पढ़ेलिखे बेरोजगारों को सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर ठगने लगी. सरकारी नौकरी के नाम पर किसी से 10-5 लाख रुपए ऐंठ लेना कोई मुश्किल काम नहीं है. थोड़ीबहुत जो मुश्किल होती है, उसे आसान करने के लिए सीमा ने अपने पास रेलवे के अधिकारियों के लैटर पैड, उन की मुहरें, रेलवे भरती के पेपर्स आदि साथ लिए रहती थी. धीरेधीरे उस ने अपना जाल लखनऊ और इलाहाबाद तक फैला दिया था. लखनऊ के चार बाग रेलवे स्टेशन के एक कर्मचारी के साथ मिल कर उस ने कई लोगों के लाखों रुपए हड़प लिए थे. सीमा ने रेलवे के उस कर्मचारी के साथ मिल कर लोगों को ठगने का जो उपाय खोज निकाला था, वह ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. एक समय ऐसा भी आ गया, जब उसे शाहजहांपुर छोड़ कर भागना पड़ा.

क्योंकि नौकरी लगवाने के लिए जिन लोगों से उस ने रुपए लिए थे, काम न होने पर वे अपने रुपए वापस मांगने लगे थे. इस से उसे लगा कि अब अगर वह वहां रही तो वे उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर देंगे. इसी डर से उस ने अपना सारा सामान बटोरा और मां शाहीन बेगम के पास आगरा आ गई. मां और सौतेले पिता के साथ रहने के लिए भी सीमा ने बहुत बढि़या चाल चली थी. आगरा आने से पहले उस ने पिता और भाइयों को फोन किया था कि आगरा में शिक्षा विभाग में उसे नौकरी मिल गई है, जिस की वजह से वह वहां आ रही है. इस के बाद वह आगरा आ गई और मांबाप के साथ रहने लगी थी. वे उसे बोझ न समझें, इस के लिए एक दिन उस ने शाहीन बेगम से कहा था, ‘‘मां मैं अपने लिए किराए का मकान देख रही हूं. मकान मिलते ही यहां से चली जाऊंगी.’’

शाहीन ने लगभग डांटते हुए कहा था, ‘‘सीमा, तू कैसी बातें कर रही है. इतना बड़ा घर है, जिस में हम 2 ही लोग तो रहते हैं. पूरा घर खाली ही पड़ा रहता है, तू साथ रहेगी तो हमें सहारा ही मिलेगा.’’

गुलाब खान ने भी पत्नी की हां में हां मिलाई. इस तरह छलकपट से सीमा ने गुलाब खान के घर में अड्डा जमा लिया. नौकरी पर जाने की बात कह कर वह रोज सुबह घर से निकलती थी तो शाम को 6 बजे के बाद ही लौटती थी. इसी तरह लगभग 6 महीने बीत गए. लेकिन एक दिन सीमा की पोल खुल गई. हुआ यह कि किसी चीज का सर्वेक्षण करने उसी औफिस के कुछ कर्मचारी बेर का नगला आए, जहां सीमा ने नौकरी करने की बात गुलाब खान को बता रखी थी. लेकिन उन कर्मचारियों ने सीमा को पहचानने से इनकार करते हुए कहा कि इस नाम की कोई औरत उन के यहां नौकरी नहीं करती.

सीमा की इस हरकत का गुलाब खान को बहुत आफसोस हुआ. एक जवान औरत का इस तरह घर से पूरे दिन गायब रहना कोई अच्छे लक्षण नहीं थे. इसलिए उन्होंने कहा कि वह अपनी हरकतों पर लगाम लगाए, वरना उन का घर छोड़ कर शाहजहांपुर चली जाए. शाहजहांपुर तो वह वैसे भी नहीं जा सकती थी, इसलिए अपनी इस गलती के लिए उस ने क्षमा मांगते हुए वादा किया कि अब आगे से वह ऐसा कुछ भी नहीं करेगी. शाहीन बेगम ने भी पति को समझाया कि आगे से वह ऐसा नहीं करेगी. अपना ठिकाना छिनने के डर से सीमा ने बेशरमी वाली अपनी हरकतों पर कुछ दिनों के लिए रोक लगा ली. लेकिन कुछ दिनों बाद कंप्यूटर सीखने के बहाने वह फिर घर से बाहर जाने लगी और अपने यारदोस्तों से मिलने लगी.

आगरा आने के बाद सीमा को अपनी मां से यह तो पता चल गया था कि गुलाब खान ने अपनी सारी जमापूंजी अपने दोनों बेटों के नाम कर दी है. मां के हिस्से में अब केवल पेंशन आती है. जिस मकान में वे रहते हैं, वह और मसजिद के किनारे वाला मकान अभी गुलाब खान के नाम थे. गुलाब खान के साथ सीमा को रहते करीब 10 महीने हो चुके थे. अब तक उस के बारे में गुलाब खान सब कुछ जान चुके थे. इसी के साथ उन्होंने यह भी गौर किया था कि सीमा के आने के बाद शाहीन बेगम के व्यवहार में जबरदस्त बदलाव आ गया था, जिस से उन्हें लगने लगा कि मांबेटी उन की संपत्ति हड़पने की साजिश रच रही हैं.

यह संदेह होने पर उन्होंने करीब डेढ़ महीने पहले अपने दोनों मकानों की रजिस्ट्री अपने दोनों बेटों, सलीम और इमरान के नाम करा दी थी. गुलाब खान ने यह काम शाहीन और उस की शातिर बेटी सीमा से छिपा कर किया था, लेकिन न जाने कैसे दोनों को इस बात की जानकारी हो गई. सीमा ने मां को भड़काने की कोशिश की. शाहीन भड़की तो नहीं, लेकिन उसे बुरा जरूर लगा. उस ने भले ही पति से कुछ नहीं कहा, लेकिन सीमा ने मां को उस का हक दिलाने की ठान ली. उस ने इस बारे में अपने दोस्तों से बात की तो उन्होंने जो सलाह दी, वह काफी भयानक थी. सीमा ने दोस्तों की मदद से गुलाब खान की हत्या की योजना बना डाली. क्योंकि उसे लगता था कि पिता के पास जो बचा है, उन के मरने के बाद वह मां के नाम हो जाएगा. अब उसे उचित समय का इंतजार था.

9 सितंबर, 2014 को 11 बजे के आसपास गुलाब खान टीवी का केबल ठीक कराने के लिए केबल वाले के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले. सीमा मौका ढूंढ़ ही रही थी. इसलिए उन के घर से निकलते ही वह भी उन के पीछे लग गई. वह मसजिद के बगल वाला मकान दिखाने की जिद कर के उन्हें वहां ले गई. चाबी वह साथ ले कर आई थी. गुलाब खान को भला इस में क्या ऐतराज हो सकता था. वह जैसे ही राजी हुए सीमा ने अपने दोस्तों अक्षय गौड़, मोनू जादौन, नितिन सक्सेना और दीपक सक्सेना को फोन कर के मकान के पीछे वाले दरवाजे पर बुला लिया.

गुलाब खान सीमा को ले कर वहां पहुंचे तो सीमा ने मुख्य दरवाजा बंद कर के जा कर पीछे वाला दरवाजा खोल दिया. अंदर आ कर चारों ने गुलाब खान को दबोच लिया और उन के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया. इस के बाद सीमा ने वहीं पड़ी एक ईंट उठाई और पूरी ताकत से सिर पर दे मारी. चोट इतनी तेज थी कि उसी एक वार में गुलाब खान होश गंवा बैठे. इस के बाद सभी गुलाब खान को घसीट कर किचन में ले गए और रस्सी से गला घोंट कर मार डाला. गुलाब खान को खत्म कर के सीमा के चारों साथी जिस तरह पीछे के दरवाजे से आए थे, उसी तरह पीछे के ही दरवाजे से चले गए. जाते समय वे वह ईंट भी साथ लेते गए, जिस से पिता के सिर पर चोट पहुंचा कर सीमा ने बेहोश किया था.

उस ईंट को जाते समय उन्होंने रास्ते में फेंक दिया था. अक्षय, मोनू, दीपक और नितिन के जाने के बाद सीमा पीछे वाले दरवाजे पर ताला लगा कर बाहर आई और बाहर से ताला बंद कर के घर आ गई. सीमा अपने इन्हीं चारों दोस्तों की मदद से अपने पिता की लाश को एक वैन से रात में ले जा कर शहर की सीमा से बाहर फेंकना चाहती थी. इस के लिए उस ने पूरी तैयारी भी कर रखी थी. वह लाश को ठिकाने लगा पाती, उस के पहले ही शाहीन बेगम ने सीमा को बताए बगैर इमरान को फोन कर दिया कि सुबह 11 बजे के निकले उस के अब्बू अभी तक घर नहीं आए हैं.

सौतेली मां के इस फोन ने इमरान को परेशान कर दिया. वह तुरंत मां के पास पहुंचा और उस से बातचीत कर के पिता को ढूंढ़ने निकल पड़ा. जब वह वहां पहुंचा था, सीमा घर में ही थी. जब इमरान ने मां से पुराने घर की चाबी मांगी तो उसे लगा कि अब उस की पोल खुल सकती है, इसलिए इमरान के पीछे वह भी घर से निकल गई थी. रात में ही सीमा अपने एक दोस्त के यहां मैनपुरी चली गई थी. उस के इस तरह बिना किसी को बताए गायब हो जाने से लोगों को उस पर शक हो गया था. उस ने पुलिस को परेशान तो किया, लेकिन अंतत: पकड़ी गई. पूछताछ के बाद थाना जगदीशपुर पुलिस ने सीमा और उस के चारों दोस्तों अक्षय, मोनू, नितिन और दीपक को अदालत में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

सीमा के पकड़े जाने के बाद उस के चचेरे भाइयों ने उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई है कि नौकरी दिलाने के नाम पर उस ने उन से 40 हजार रुपए लिए थे. लेकिन उन्हें न नौकरी मिली है, न रुपए. UP Crime News

 

 

Crime Kahani : पैसों के लालच में दोस्त का गला दबा कर मार डाला

Crime Kahani : सुरेश चौहान और लेखराज चौहान की 35 साल पुरानी इतनी गहरी दोस्ती थी कि दोनों बिजनैस भी साझे में करते थे. पिता की तरह इन दोनों के बेटे सचिन और हर्ष में भी दांतकाटी दोस्ती थी. लेकिन मोटी रकम के लालच में लेखराज के बेटे हर्ष ने यह दोस्ती पीपीई किट में दफन कर दी

21 जून, 2021 की दोपहर करीब साढ़े 3 बजे सचिन अपने घर पर सो रहा था, तभी उस के मोबाइल पर वाट्सऐप काल आई. सचिन उठा और जाने के लिए तैयार हुआ. लेकिन वह गया नहीं, कुछ देर बाद कपड़े उतार कर वह लेट गया. बिस्तर पर लेटे हुए वह कुछ सोचने लगा, तभी उसे भूख लगी तो उस ने मां अनीता से खाने के लिए कुछ देने को कहा. मां ने उसे सैंडविच बना कर दिया. इसी बीच दोबारा फोन आया तो सचिन टीशर्ट और लोअर में ही सैंडविच खाते हुए चप्पलें पहने ही घर से जाने लगा. मां ने कहा, ‘‘बेटा, तुम ने अभी नाश्ता भी नहीं किया है, कहां जा रहे हो, पहले नाश्ता तो कर लो?’’

उस ने कहा, ‘‘मां, बस अभी लौट कर आता हूं.’’  सचिन ने कहा और वह घर से चला गया. काफी देर तक जब सचिन नहीं आया तो मां को चिंता हुई. वह उसे लगातार उसे फोन कर रही थी, लेकिन सचिन काल रिसीव करने के बजाय बारबार फोन काट देता था. अनीता समझ नहीं पा रही थीं कि सचिन ऐसा क्यों कर रहा है. उस के आने के इंतजार में रात हो गई. रात 11.37 बजे सचिन के पिता सुरेश चौहान के फोन की घंटी बजी. लेकिन नींद में होने के कारण वह फोन उठा नहीं सके. तब अनीता ने देखा तो वह मिस्ड काल उन के बेटे सचिन की ही थी. तब उन्होंने 11.55 बजे कालबैक की.

मगर सचिन की जगह कोई और फोन पर बात कर रहा था. अनीता ने पूछा कौन बोल रहे हो? इस पर उस ने कहा, ‘‘मैं सचिन का दोस्त हूं.’’

‘‘सचिन कहां हैं?’’ अनीता ने पूछा.

‘‘उस ने शराब ज्यादा पी ली है, इसलिए वह सो रहा है. वैसे सचिन इस समय नोएडा में है.’’ उस ने बताया.

‘‘नोएडा…वह वहां कैसे पहुंचा?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘यह बात तो आप को सचिन ही बताएगा.’’

‘‘तुम मेरी सचिन से बात कराओ.’’

‘‘सचिन अभी बात करने की कंडीशन में नहीं है, आप सुबह बात कर लेना,’’ कहते हुए उस ने सचिन का फोन स्विच्ड औफ कर दिया.

उत्तर प्रदेश की ताजनगरी आगरा के थाना न्यू आगरा के दयालबाग क्षेत्र की जयराम बाग कालोनी निवासी कोल्ड स्टोरेज कारोबारी सुरेश चौहान के 25 वर्षीय इकलौते बेटे सचिन चौहान का घरवाले सारी रात बैचेनी से इंतजार करते रहे. लेकिन उस का फोन औन नहीं हुआ.  बेटे के बारे में कोई सुराग न मिलने पर दूसरे दिन मंगलवार को घर वालों ने आसपड़ोस के साथ ही रिश्तेदारी में तलाश किया. लेकिन सचिन का कोई सुराग नहीं मिला. पूरे दिन तलाश करने के बाद 22 जून की शाम तक जब सचिन नहीं लौटा और न उस का मोबाइल औन हुआ, तब पिता सुरेश चौहान अपने पार्टनर लेखराज चौहान के साथ थाना न्यू आगरा पहुंचे.

गंभीरता से नहीं लिया केस उन्होंने थानाप्रभारी को बेटे के लापता होने के बारे में बताया. पुलिस ने उन की तहरीर पर सचिन की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने उन से फिरौती के लिए फोन आने के बारे में पूछा. सुरेश चौहान ने इस पर इनकार कर दिया. फिरौती के लिए फोन न आने की बात पर पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया. कह दिया कि यारदोस्तों के साथ कहीं चला गया होगा और 1-2 दिन में आ जाएगा. पुलिस के रवैए से असंतुष्ट सुरेश चौहान तब खुद ही अपने बेटे की तलाश में जुट गए. उन्होंने कालोनी में रहने वाले एक सेवानिवृत्त अधिकारी से भी मदद ली. उन्हें सीसीटीवी की एक फुटेज मिली, जिस में बाइक सवार 2 युवक नजर आ रहे थे. इन में से पीछे बैठा युवक भी हेलमेट लगाए था.

यह सचिन ही था. यह जानकारी उन्होंने पुलिस को दी. फुटेज देखने के बाद पुलिस ने कहा कि इस में अपहरण जैसी कोई बात नहीं है. इस में तो आप का बेटा सचिन खुद अपनी मरजी से बाइक पर बैठा नजर आ रहा है. 3 दिन तक जब सचिन का कोई सुराग नहीं मिला तो घर वाले परेशान हो गए. पुलिस भी उन से परिचितों व रिश्तेदारी में तलाश करने की बात कहती रही. सुरेश चौहान के बिजनैस पार्टनर लेखराज चौहान के एक रिश्तेदार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कार्यालय में तैनात हैं. लेखराज ने उन्हें फोन किया. फिर मुख्यमंत्री कार्यालय के हस्तक्षेप के बाद मामला एसटीएफ के सुपुर्द किया गया. एसटीएफ ने 23 जून को इस मामले में छानबीन शुरू कर दी.

सब से पहले एसटीएफ ने सीसीटीवी वाली फुटेज देखी. जिस में सचिन बाइक पर पीछे हेलमेट लगाए बैठा था. एसटीएफ ने टेक्निकल रूप से जांच शुरू की. जांच शुरू की तो कड़ी से कड़ी जुड़ती चली गई और पुलिस केस के खुलासे के नजदीक पहुंच गई. पुलिस को पता चला कि सचिन का अपहरण कर लिया गया है. 27 जून की रात को पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि इस घटना में शामिल एक आरोपी वाटर वर्क्स चौराहे पर मौजूद है. समय पर पुलिस वहां पहुंच गई और एसटीएफ ने उसे धर दबोचा. पकड़ा गया आरोपी हैप्पी खन्ना था. पता चला कि वह फरजी दस्तावेज से सिम लेने की फिराक में था. लेकिन सिम लेने से पहले ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया था. उस ने बताया कि फरजी सिम से सचिन के पिता से 2 करोड़ की फिरौती मांगी जाती.

हैप्पी ने बताया कि सचिन अब इस दुनिया में नहीं है, उस की हत्या तो किडनैप करने वाले दिन ही कर दी थी. यह सुनते ही सनसनी फैल गई. पुलिस ने गुमशुदगी की सूचना को भादंवि की धारा 364ए, 302, 201, 420 में तरमीम कर दिया. दोस्त ही निकला कातिल हैप्पी से पूछताछ के आधार पर अन्य आरोपियों को पकड़ने के लिए ताबड़तोड़ दबिशें दे कर पुलिस ने 4 अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया. इन में मृतक के पिता के बिजनैस पार्टनर लेखराज चौहान का बेटा हर्ष चौहान के अलावा सुमित असवानी निवासी दयाल बाग,  मनोज बंसल उर्फ लंगड़ा व रिंकू  निवासी कमलानगर शामिल थे.

चौंकाने वाली बात यह निकली  कि अपने दोस्त सचिन की तलाश में पुलिस और एसटीएफ की मदद करने का दिखावा करने वाला हर्ष चौहान स्वयं भी इस साजिश में शामिल था. 27 जून, 2021 को परिजनों को जैसे ही पता चला कि सचिन की हत्या उस के कुछ दोस्तों ने कर दी है तो घर में कोहराम मच गया. परिजनों का रोरो कर बुरा हाल  हो गया. सचिन अपने घर का इकलौता चिराग था, जिसे दोस्तों ने बुझा दिया था. पुलिस की कड़ी पूछताछ में सभी आरोपी टूट गए. सभी ने स्वीकार किया कि उन्होंने सचिन का अपहरण कर उस की हत्या कर लाश का अंतिम संस्कार पीपीई किट पहना कर करने के बाद उस की अस्थियां यमुना में विसर्जित करने का जुर्म कबूल कर लिया.

28 जून, 2021 को प्रैस कौन्फ्रैंस में एसएसपी मुनिराज जी. ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. सचिन की मौत की पटकथा एक महीने पहले ही लिख ली गई थी. आरोपियों ने पहले ही तय कर रखा था कि सचिन का अपहरण कर हत्या कर देंगे. उस के बाद 2 करोड़ रुपए की फिरौती उस के पिता से वसूलेंगे. पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों द्वारा सचिन के अपहरण और हत्या के बाद उस के शव का दाह संस्कार की जो कहानी सामने आई, वह बड़ी ही खौफनाक थी—

मूलरूप से बरहन कस्बे के गांव रूपधनु निवासी सुरेश चौहान आगरा के दयाल बाग क्षेत्र की जयराम बाग कालोनी में रहते हैं. उन का गांव में ही एसएस आइस एंड कोल्ड स्टोरेज है. इस के अलावा वह आगरा और हाथरस में जिला पंचायत की ठेकेदारी भी करते हैं. लेखराज चौहान भी उन के गांव का ही है. दोनों ने एक साथ काम शुरू किया. ठेकेदारी भी साथ करते हैं. उन दोनों के बीच पिछले 35 सालों से बिजनैस की साझेदारी चल रही थी. सुरेश चौहान का बेटा सचिन व लेखराज का बेटा हर्ष भी दोनों अच्छे दोस्त थे और एक साथ ही व्यापार व ठेकेदारी करते थे. दयाल बाग क्षेत्र की कालोनी तुलसी विहार का रहने वाला सुमित असवानी बड़ा कारोबारी है. 2 साल पहले तक वह अपनी पत्नी व 2 बेटों के साथ चीन में रहता था.

वहां उस का गारमेंट के आयात और निर्यात का व्यापार था. लेकिन 2019 में चीन में जब कोरोना का कहर शुरू हुआ तो वह परिवार सहित भारत आ गया. दयालबाग में ही सौ फुटा रोड पर उस ने सीबीजेड नाम से स्नूकर और स्पोर्ट्स क्लब खोला. सुमित महंगी गाड़ी में चलता था. वहीं वह रोजाना दोस्तों के साथ पार्टी भी करता था. उस के क्लब में हर्ष और सचिन भी स्नूकर खेलने आया करते थे. इस दौरान सुमित की भी उन दोनों से गहरी दोस्ती हो गई. बताया जाता है कि हर्ष चौहान के कहने पर सुमित असवानी ने धीरेधीरे कर के सचिन चौहान को 40 लाख रूपए उधार दे दिए. जब उधारी चुकाने की बारी आई तो सचिन टालमटोल कर देता. जबकि उस के खर्चों में कोई कमी नहीं आ रही थी.

कई बार तकादा करने पर भी सचिन ने रुपए नहीं लौटाए. यह बात सुमित असवानी को नागवार गुजरी. तब उस ने मध्यस्थ हर्ष चौहान पर भी पैसे दिलाने का दबाव बनाया, क्योंकि उस ने उसी के कहने पर सचिन को पैसे दिए थे. सुमित था मास्टरमाइंड  हर्ष के कहने पर भी सचिन ने उधारी की रकम नहीं लौटाई. यह बात हर्ष को भी बुरी लगी. इस पर एक दिन सुमित असवानी ने हर्ष से कहा, ‘‘अब जैसा मैं कहूं तुम वैसा करना. इस के बदले में उसे भी एक करोड़ रुपए मिल जाएंगे.’’

रुपयों के लालच में हर्ष चौहान सुमित असवानी की बातों में आ गया. दोनों ने मिल कर घटना से एक महीने पहले सचिन चौहान के अपहरण की योजना बनाई. फिर योजना के अनुसार, सुमित असवानी ने इस बीच सचिन चौहान से अपने मधुर संबंध बनाए रखे ताकि उसे किसी प्रकार का शक न हो. इस योजना में सुमित असवानी ने रुपयों का लालच दे कर अपने मामा के बेटे हैप्पी खन्ना को तथा हैप्पी ने अपने दोस्त मनोज बंसल और उस के पड़ोसी रिंकू को भी शामिल कर लिया. उन्होंने यह भी तय कर लिया था कि अपहरण के बाद सचिन की हत्या कर के उस के पिता से जो 2 करोड़ रुपए की फिरौती वसूली जाएगी. उस में से एक करोड़ हर्ष चौहान को, 40 लाख सुमित असवानी को और बाकी पैसे अन्य भागीदारों में बांट दिए जाएंगे.

षडयंत्र के तहत उन्होंने अपनी योजना को अमली जामा 21 जून को पहनाया. सुमित असवानी ने अपने मोबाइल से उस दिन सचिन चौहान को वाट्सऐप काल की. उस ने सचिन से कहा, ‘‘आज मस्त पार्टी का इंतजाम किया है. रशियन लड़कियां भी बुलाई हैं. बिना किसी को बताए, चुपचाप आ जा.’’

सचिन उस के जाल में फंस गया. घर पर बिना बताए वह पैदल ही निकल आया. वे लोग क्रेटा गाड़ी से आए थे. रिंकू गाड़ी चला रहा था. मनोज बंसल उस के बगल में बैठा था. वहीं सुमित और हैप्पी पीछे की सीट पर बैठे थे. सचिन बीच में बैठ गया. सुमित असवानी व साथी शाम 4 बजे पहले एक शराब की दुकान पर पहुंचे. वहां से उन्होंने शराब खरीदी. इस के बाद सभी दोस्त कार से शाम साढ़े 4 बजे सौ फुटा रोड होते हुए पोइया घाट पहुंचे. हैप्पी के दोस्त की बहन का यहां पर पानी का प्लांट है. इन दिनों वह प्लांट बंद पड़ा था. हैप्पी ने पार्टी के नाम पर प्लांट की चाबी पहले ही ले ली थी.

पीपीई किट से लगाई लाश ठिकाने वहां पहुंच कर सभी पहली मंजिल पर बने कमरे में पहुंचे. शाम 5 बजे शराब पार्टी शुरू हुई. जब सचिन पर नशा चढ़ने लगा, तभी सभी ने सचिन को पकड़ लिया. जब तक वह कुछ समझ पाता, उन्होंने उस के चेहरे  पर पौलीथिन और टेप बांध दिया, जिस से सचिन की सांस घुटने लगी. उसी समय सुमित असवानी उस के ऊपर बैठ गया और उस का गला दबा कर हत्या कर दी. इस बीच अन्य उस के हाथपैर पकड़े रहे. सचिन की हत्या के बाद उस के शव का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया गया. इस के लिए शातिर दिमाग सुमित असवानी ने पीपीई किट में लाश को श्मशान घाट पर ले जाने का आइडिया दिया ताकि पहचान न हो सके और कोई उन के पास न आए.

इस के लिए कमला नगर के एक मैडिकल स्टोर से एक पीपीई किट यह कह कर खरीदी कि एक कोरोना मरीज के अंतिम संस्कार के लिए चाहिए. रिंकू शव को बल्केश्वर घाट पर ले जाने के लिए एक मारुति वैन ले आया. सचिन के शव को पीपीई किट में डालने के बाद वह बल्केश्वर घाट पर रात साढ़े 8 बजे पहुंचे. वहां उन्होंने बल्केश्वर मोक्षधाम समिति की रसीद कटवाई व अंतिम संस्कार का सामान खरीदा. उन्होंने मृतक का नाम रवि वर्मा और पता 12ए, सरयू विहार, कमला नगर लिखाया था. इस दौरान कर्मचारी ने मोबाइल नंबर पूछा. तब एक हत्यारोपी ने हड़बड़ी में अपने जीजा का मोबाइल नंबर बता दिया. उसे लगा कि यह गलती हो गई. तब उस ने वह नंबर कटवा दिया, बाद में परची पर फरजी मोबाइल नंबर लिखवा दिया.

यह भी बताया कि मृतक कोरोना पौजिटिव था, इस के चलते उस की मौत हो गई. शव को जलाने के बाद रात साढ़े 10 बजे सभी अपनेअपने घर चले गए.  हर्ष ने मनोज बंसल को सचिन का मोबाइल दे कर उसी शाम साढ़े 7 बजे ही खंदारी से इटावा की बस में बैठा दिया. उस से कहा गया कि इटावा पहुंच कर वह मोबाइल औन कर ले, जिस से लोकेशन इटावा की मिले. फिर इटावा से वह सचिन के घर फोन कर 2 करोड़ की फिरौती मांगे. फिरौती की काल करने के बाद वह मोबाइल औफ कर ले. इस के बाद वह वहां से कानपुर चला जाए. वहां मोबाइल चालू करे. ताकि पुलिस भ्रमित रहे और हम लोग पकड़ में न आएं.

पुलिस को भटकाने की साजिश रात 12 बजे इटावा पहुंच कर मनोज ने जैसे ही मोबाइल औन किया तो देखा मोबाइल पर सचिन की मां अनीता के लगातार फोन आ रहे थे. मनोज ने डर से फोन नहीं उठाया और न फिरौती मांगी. उस ने उसी समय फोन स्विच्ड औफ कर दिया. सुबह 4 बजे मनोज दूसरी बस पकड़ कर कानपुर पहुंचा. वहां पहुंच कर फिर से मोबाइल औन किया और बाद में उसे कानपुर के झकरकटी स्टैंड पर फेंक दिया. ऐसा इसलिए किया ताकि पुलिस सचिन की तलाश करे तो उस के मोबाइल की लोकेशन इटावा व कानपुर की मिले. पुलिस समझे कि अपहर्त्ता उसे कानपुर की तरफ से ले गए हैं. वह पुलिस को भ्रमित करना चाहते थे. पूरे घटनाक्रम के दौरान किसी ने एकदूसरे से फोन पर बात तक नहीं की, ताकि पुलिस पकड़ न सके.

दूसरे दिन 22 जून की सुबह 8 बजे जा कर हैप्पी और रिंकू ने सचिन की अस्थियां यमुना में विसर्जित कर दीं. वे लोग दोपहर 12 बजे पानी के प्लांट से सचिन की चप्पलें उठा कर जंगल में फेंक आए. बताते चलें आरोपी मनोज एक पैर से विकलांग है. उस के 2 बच्चे हैं. पिता की दुकान थी, लेकिन बंद हो गई. लौकडाउन में ढाई लाख का कर्ज हो गया था. हैप्पी सुमित का ममेरा भाई था. उस की शादी नहीं हुई है. सुमित के साथ ही काम करता है. पिता की मौत हो चुकी है. उसे रुपयों की जरूरत थी. रिंकू एक स्कूल की वैन चलाता था. लौकडाउन के कारण स्कूल बंद होने से वह भी बेरोजगार था. इसलिए वे सभी पैसों के लालच में आ गए थे.

सचिन ने बीबीए तक की पढ़ाई की थी.  वह पिता के साथ उन के कारोबार में हाथ बंटाता था. जबकि उन के पार्टनर लेखराज चौहान का बेटा हर्ष सचिन से 2 साल छोटा था और बीबीए की पढ़ाई कर रहा था. वह भी पिता के साथ कारोबार में हाथ बंटाता था. 2 करोड़ की फिरौती के लालच में दोस्तों ने भरोसे को तारतार कर दिया. शातिरों ने अपहरण और हत्या की पूरी साजिश इस तरह रची कि पुलिस उलझ कर रह जाए. सामान्य काल की जगह वाट्सऐप काल की. फोन भी दूसरे शहर में ले जा कर फेंक दिया. सबूत मिटाने के लिए अंतिम संस्कार भी पीपीई किट में कर दिया ताकि कोई सवाल न उठाए. यहां तक कि अस्थियों को यमुना में विसर्जित कर दीं ताकि डीएनए टेस्ट भी न कराया जा सके.

पुलिस ने जुटाए सबूत लेकिन फिर भी आरोपी पुलिस की गिरफ्त से बच न सके. अपहरण व हत्या के बाद फिरौती वसूलने का सारा तानाबाना सुमित व हर्ष ने ही बुना था. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए हत्यारोपियों से 7 मोबाइल, 1200 रुपए नकदी के साथ ही 2 कारें भी बरामद कीं. इस के चलते पुलिस को न तो लाश मिली न ही अस्थियां मिलीं. ऐसे में केस में मजबूत साक्ष्य ही आरोपियों को सजा दिला पाएंगे. इस के लिए पुलिस ने फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम की मदद से 28 जून के बाद 29 जून को भी अन्य साक्ष्य जुटाए. जिस पानी के प्लांट में हत्याकांड को अंजाम दिया गया, वहां से फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम को सचिन का एटीएम कार्ड मिला. यह सचिन की हत्या के दौरान संघर्ष में गिर गया होगा.

इस के अलावा टीम को वहां फिंगर और फुटप्रिंट भी मिले हैं, ये आरोपियों के अलावा सचिन के हो सकते हैं. वहीं कुछ बाल भी मिले हैं. यह आरोपियों के हो सकते हैं. इन्हें फोरैंसिक साइंस लैब भेजा गया है. यहां से पुलिस ने जली हुई सिगरेट, खाली गिलास और पानी की बोतल बरामद की है.  इन पर फिंगरप्रिंट थे. इन्हें लिया गया है. वहीं पुलिस ने श्मशान घाट पर रवि वर्मा के नाम से रसीद कटवाई गई थी. पता सरयू विहार, कमला नगर का लिखाया गया था, मगर यहां कोई रहता नहीं है. पुलिस ने घाट के कर्मचारी के बयान दर्ज किए हैं. कमला नगर में जिस मैडिकल स्टोर से पीपीई किट खरीदी थी, उस के मालिक के बयान के साथ ही दुकान में लगे कैमरों के फुटेज भी लिए गए हैं.

इस के साथ ही पुलिस को कमला नगर व बल्केश्वर क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी मिल गई है, जिस में आरोपी साफ नजर आ रहे हैं. उन की लोकेशन भी है, जो केस में आरोपियों को सजा दिलाने के लिए साक्ष्य बनेंगे. आरोपियों की कार और वैन पुलिस ने बरामद कर ली है. कार में वे सचिन को ले गए थे, जबकि वैन में शव को ले कर गए थे. इस साल सचिन की शादी की तैयारी थी. उस के लिए कई रिश्ते आए थे. बात भी चल रही थी. सोचा था कि नवंबर में उस की शादी कर देंगे. बेटे की शादी कर बहू घर लाने की ख्वाहिश अब चौहान दंपति का सपना ही बन कर रह गई.

29 जून को पुलिस ने गिरफ्तार किए गए पांचों हत्यारोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से सभी को जेल भेज दिया गया. Crime Kahani

 

Crime Kahani : जायदाद के लिए बड़े बेटे ने किया परिवार के चार लोगों का कत्ल

Crime Kahani : कभीकभी घर के छोटेछोटे विवादों को जब गंभीरता से नहीं लिया जाता है तो वह भयानक रूप भी ले लेते हैं. काश! बालाराम अपने बड़े बेटे गंगाराम की समस्या पर ध्यान देते तो शायद उन के घर से 4 अर्थियां न उठतीं…

गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा…अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी. दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में…’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए. गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा. दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है. इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे. टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की.

गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था. इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया. पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तन रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया. निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी.

अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी. जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया. मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी.

बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा. नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया. आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था.

18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया. आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.Crime Kahani

 

Hindi Crime Story : लापता युवक का 10 साल बाद मिला कंकाल, नोकिया फोन से खुला मौत का राज

Hindi Crime Story : हाल ही में मौत का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने सभी को झकझोर कर रख दिया है. एक कमरे से आ रही तेज दुर्गंध ने इलाके में सनसनी फैला दी. जिसे देख आस पास के लोग हैरान हो गए और तुरंत पुलिस को सूचित किया. मौके पर पहुंची पुलिस ने एक कमरे में कंकाल बरामद किया. यह कंकाल किस का था? इस का हत्यारा कौन था? इन सभी सवालों ने पुलिस को भी उलझा कर रख दिया है. चलिए जानते हैं कि इस चौंकाने वाली घटना को विस्तार से

यह सनसनीखेज घटना हैदराबाद के नामपल्ली इलाके की है. जहां 14 जुलाई, 2025 को उस समय हड़कंप मच गया, जब लोगों को पता चला कि 10 साल से लापता अमीर खान का कंकाल एक बंद कमरे में पड़ा था. घटना तब सामने आई, जब स्थानीय युवक क्रिक्रेट खेल रहे थे तो उन की बौल उस घर में जा गिरी, जिस में कंकाल था. बौल लेने गया युवक कंकाल को घर में देखकर दंग रहा गया. उस के पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई.

वह दौड़ता हुआ वहां से भागा और इस के बाद उस ने तुरंत आसपास के लोगों को यह बताया. पुलिस को सूचित किया गया. पुलिस टीम ने मौके पर पंहुच कर जांच शुरु कर दी. इस के बाद पुलिस घर के पास पहुंची और ताला तोड़ा तो अदंर एक कंकाल पड़ा हुआ था और उसके साथ एक पुराना नोकिया फोन भी मिला. इस फोन की मदद से पुलिस को मृतक की पहचान करने मे सफलता मिली.

पुलिस को बाद में जांच द्वारा पता चल सका कि यह कंकाल 55 साल के अमीर खान का है, जो 10 साल से लापता था. पुलिस की जांच के अनुसार घर करीब 7 साल से बंद था.

पुलिस को शुरुआत में लगा की किसी ने अमीर की हत्या की होगी. लेकिन फोन की जांच ने पूरा मामला बदल दिया. पुलिस ने जब फोन को चार्ज किया तो उस में करीब 84 मिस्ड कौल थीं, जो उस के दोस्तों और रिश्तेदोरों की थीं. पुलिस ने बताया की ये मिस्ड कौल 2015 के आसपास की गई थीं, जब अमीर खान लापता हुआ था.

पुलिस के अनुसार, अमीर खान घर नामपल्ली इलाके में अकेला रहा करता था. अमीर के अब्बू का नाम मुनीर खान था और उन के 10 बच्चे थे. इन में अमीर खान 10 तीसरे नंबर का था.
परिवार के सभी लोग अलग अलग जगह रहा करते हैं.

पुलिस को शक है कि अकेलेपन और किसी स्वास्थ्य प्रोब्लम के कारण उस की मौत हुई होगी. पुलिस ने कंकाल को फोरैंसिक जांच के लिए भेज दिया है. मामले की जांच गहराई से एसीपी (आसिफनगर) किशन कुमार की देखरेख में चल रही है. Hindi Crime Story

Delhi News : दोस्ती पर दाग – जिगरी दोस्तों ने चाकू से ली एकदूसरे की जान

Delhi News : दिल्ली मे एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जहां दो जिगरी दोस्तों के बीच झगड़ा इतना बढ़ा कि उन्होंने एक दूसरे पर चाकू से हमला कर जान ले ली. कभी गहरे दोस्त रहे ये लड़के आखिर कातिल कैसे बन गए. जानते हैं पूरी स्टोरी विस्तार से दोस्तों ने ली एक दूसरे की जान,

यह घटना दिल्ली के तिलक नगर की है, जहां 13 जुलाई 2025 दिन रविवार रात के दिन यह वारदात हुई. जहां दो जिगरी यार एक पार्क में बैठे थे, तभी दोनों के बीच किसी बात को लेकर बहस शुरू गई. दोनों के बीच यह बहस इतनी बढ़ गई कि दोनों में हाथापाई होने लगी और फिर दोनों ने गुस्से में एक दूसरे पर चाकू से हमला शुरू कर दिया. यह हमला इतना गंभीर था कि दोनों गंभीर रुप से घायल हो गए.

फिर आसपास के लोगों ने दोनों घायलों को तुरंत स्थानीय अस्पताल ले गए और पुलिस को भी सूचित कर दिया गया. सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर अस्पताल पहुंच जाती है. पुलिस ने देखा कि दोनों बुरी तरह से घायल थे. डौक्टरों ने इलाज शुरू कर दिया था, लेकिन गंभीर चोटों के कारण दोनों ने रात में दम तोड़ दिया.
पुलिस ने जांच में पाया कि मृतकों में एक का नाम आरिफ और दूसरे का नाम संदीप था. जो दोनों ही ख्याला बी ब्लौक के रहने वाले थे और एक ही गली में दोनों अपने परिवार के साथ रहते थे.

दिल्ली पुलिस के अनुसार, डीसीपी वेस्ट विचित्र ने कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है. पुलिस के द्वारा जांच गहराई से की जा रही है. पुलिस स्थानीय क्षेत्र में जाकर पता करने की कोशिश कर रही है कि दोनों जिगरी दोस्तों के बीच ऐसा क्या हुआ जिससे बहस खूनी संघर्ष में बदल गई. साथ ही पुलिस दोनों के परिवार वालों से पूछताछ कर रही है ताकि यह यह पता किया जा सके कि दोनों के बीच दोस्ती आखिर में दुश्मनी में कैसे बदल गई.

पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिर्पोट और अन्य साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी. इस दर्दनाक घटना ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है. पुलिस ने जांच में यह भी जाना कि आरिफ और संदीप दोनों शादीशुदा भी थे. संदीप का प्रौपर्टी का बिजनेस कर रहा था जबकि इससे पहले वह एक जिम ट्रेनर भी रह चुका था. वही आरिफ का भी अलग पेशा था. पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर रही है. Delhi News

MP News : शक के चलते पत्नी ने डॉक्टर पति को करंट लगाकर मार डाला

MP News : नीरज पाठक एक जानेमाने डाक्टर थे. उन की पत्नी डा. ममता पाठक कैमेस्ट्री की प्रोफेसर थी. उच्चशिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार होने के बावजूद ममता पाठक पति पर शक करती थी. शक का यह कीड़ा इतना बलवती हो गया कि एक दिन इस ने…

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके के छतरपुर जिले की एक पौश कालोनी है, लोकनाथपुरम. इसी कालोनी में 65 साल के डा. नीरज पाठक का एक क्लीनिक है. डा. पाठक इस जिले के जाने माने मैडिसिन स्पैशलिस्ट हैं. डा. पाठक छतरपुर के जिला अस्पताल में डाक्टर थे, परंतु रिटायरमेंट के 2 साल पहले ही सरकारी नौकरी से वीआरएस ले लिया था. तभी से वह अपने निजी क्लीनिक पर मरीजों का उपचार करते थे. डा. पाठक की 62 साल की पत्नी ममता पाठक छतरपुर के शासकीय महाराजा कालेज में कैमेस्ट्री की प्रोफेसर थीं. मगर अपने पति से उन की कैमेस्ट्री कभी ठीक नहीं रही. डा. दंपति के 2 बेटे हैं, जिन में से बड़ा बेटा नीतेश पाठक मानसिक रूप से अस्वस्थ रहता है.

वह रूस से एमबीबीएस की पढ़ाई छोड़ कर घर आ गया था, जबकि छोटा बेटा मानस आईटी से इंजीनियरिंग की डिगरी लेने के बाद अमेरिका में नौकरी करता है. डा. नीरज और ममता की शादी जब 11 मई 1994 को हुई थी, तो परिवार के लोग दोनों की योग्यता और पद पर नाज करते थे. शादी के कुछ समय बाद तक तो सब कुछ ठीकठाक चलता रहा, पर 2 बेटों के जन्म के बाद उन के दांपत्य जीवन में दरार आ गई. डा. पाठक जिले के नामीगिरामी चिकित्सक थे, तो ममता पाठक भी शहर के सब से प्रतिष्ठित सरकारी कालेज में प्रोफेसर थीं. अपनी योग्यता के इसी अहं के कारण दोनों के बीच दीवार खड़ी हो गई.

कहते हैं कि केवल उच्च शिक्षा और पैसा हासिल कर लेने से ही सब कुछ नहीं मिल जाता, जीवन में खुशियां लाने के लिए खुला मन और अच्छी सोच का होना जरूरी है. डा. नीरज पाठक और ममता पाठक की जिंदगी में शक की लाइलाज बीमारी ने जहर घोलने का काम किया. घुलता गया शक का जहर पढ़ीलिखी प्रोफेसर ममता पाठक को हमेशा यही शक बना रहता था कि उन के पति के किसी महिला से अवैध संबंध हैं. इस की वजह से वह अपने पति की हर गतिविधि पर नजर रखती और छोटीछोटी बातों को ले कर शंका करती. डा. पाठक पत्नी के इस व्यवहार से दुखी रहते थे. दोनों के बीच चरित्र संदेह को ले कर अकसर लड़ाईझगडे़ और मारपीट होती रहती थी.

छोटीछोटी बातों से शुरु हुई कलह घर की चारदीवारी से बाहर निकलने लगी. दोनों एकदूसरे के बुरे व्यवहार की शिकायत कई बार पुलिस के आला अधिकारियों से कर चुके थे. पुलिस भी पतिपत्नी के आपसी विवाद में ज्यादा कुछ न कर उन्हें हर बार समझाइश दे कर मामले को रफादफा करती रही. आखिरकार, ममता का शक्की मिजाज उन के दांपत्य जीवन में बिखराव का कारण बन गया. यानी करीब 11 साल पहले ममता अपने बेटों को ले कर अपने पति से अलग रहने लगी. बाद में छोटा बेटा मानस नौकरी के लिए अमेरिका चला गया. अलग रहते हुए भी ममता अपने पति से घर चलाने का खर्च वसूल करती रही. इधर डा. पाठक एक घरेलू नौकर के भरोसे अपनी जिंदगी की गाड़ी खींच रहे थे.

पतिपत्नी के रिश्ते की दरार जब बढ़ जाती है तो रिश्ते बोझिल हो जाते हैं. यही वजह थी कि दोनों एक दूसरे के खिलाफ थाने में कई बार रिपोर्ट दर्ज करा चुके थे. हाईप्रोफाइल इस दंपति की आपसी कलह ने उन की सामाजिक प्रतिष्ठा को भी प्रभावित कर दिया था. छतरपुर जिले में डा. पाठक का अपना रसूख था, मगर पत्नी की हरकतों की वजह से डा. पाठक मानसिक रूप से प्रताडि़त हो रहे थे. ऐसे में पुलिस और रिश्तेदारों की पहल पर पतिपत्नी में समझौता हुआ और सितंबर 2020 में ममता अपने बेटे नीतेश को ले कर पति के घर वापस आ गई. कमरे में पड़ी थी डा. पाठक की लाश पहली मई 2021 को सुबह का समय था. ममता पाठक ने 100 डायल पर सूचना दी कि उन के पति कमरे में मृत पड़े हुए हैं.

ममता की सूचना पर छतरपुर के सिविल लाइंस थाने के टीआई जगतपाल सिंह पुलिस टीम के साथ डा. पाठक के बंगले पर पहुंच गए. प्रोफेसर ममता पाठक बदहवास हालत में मिली. टीआई प्रोफेसर ममता पाठक से परिचित थे तो उन्होंने बैडरूम में पड़े हुए डा. पाठक की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘मैडम डा. साहब को क्या हो गया?’’

प्रोफेसर ममता पाठक ने टीआई को बताया, ‘‘डा. पाठक पिछले कुछ दिनों से बीमार चल रहे थे और आज उन की डेथ हो गई’’ टीआई जगतपाल सिंह को याद आया कि अभी 2 दिन पहले 29 अप्रैल को ही डा. पाठक ने व्हाट्एप के माध्यम से उन्हें एक शिकायत भेजी थी कि उन की पत्नी और बेटा उन्हें प्रताडि़त कर रहे हैं. खैर, उन की मौत कैसे हुई, यह बात तो उन्हें जांच के बाद ही पता चलनी थी. चूंकि मामला शहर के हाई प्रोफाइल डा. पाठक से जुड़ा था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. उन्होंने फोरैंसिक एक्सपर्ट की टीम भी डा. पाठक के बंगले पर बुला ली.

चूंकि कोरोना महामारी का खौफ पूरे शहर में था, इस वजह से पीपीई किट में पहुंची पुलिस ने जिस बैड रूम में डा. नीरज पाठक का शव पड़ा उस रूम के अलावा पूरे बंगले की जांच की. पोस्टमार्टम में हुआ नया खुलासा पुलिस ने कागजी काररवाई पूरी कर मामला संदिग्ध होने की वजह से शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया. एसपी सचिन शर्मा के निर्देश पर 3 डाक्टरों की टीम ने डा. पाठक के शव का पोस्टमार्टम किया. अगले दिन पुलिस के पास जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस अधिकारी आश्चर्यचकित रह गए. रिपोर्ट में बताया गया कि डा. पाठक की मौत बिजली का करंट लगने से हुई थी. मौत 24 घंटे से पहले होने का अंदेशा भी जताया गया.

डा. पाठक के अंतिम संस्कार के कुछ दिन तक पुलिस ममता और उस के बेटे नीतेश के बयान नहीं ले सकी, लेकिन पुलिस की शंका की सुई पत्नी ममता पाठक की ओर ही घूम रही थी. इधर ममता पाठक पुलिस को यही बता रही थी कि डा. पाठक पिछले 3 दिनों से बीमार थे, इस कारण उन की मौत हो गई. मौके पर पहुंचे डा. पाठक के रिश्तेदारों ने पुलिस को बताया कि ममता पाठक द्वारा डा. नीरज पाठक को कमरे में बंद कर प्रताडि़त कर उन्हें खाना भी नहीं दिया गया था. डा. पाठक की हत्या के बाद से ही पुलिस इस मामले की तफ्तीश में जुट गई थी. छतरपुर जिले के एसपी सचिन शर्मा ने पुलिस की एक टीम गठित की जिस में टीआई जगतपाल सिंह, एसआई माधवी अग्निहोत्री, गुरुदत्त सेषा, प्रधान आरक्षक हरचरन राजपूत, आरक्षक दिनेश मिश्रा और धर्मेंद्र चतुर्वेदी को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने जांचपड़ताल शुरू की तो पूरे घटनाक्रम की कडि़यां जुड़ती रहीं और इस बात का पुख्ता सबूत मिल गया कि डा. पाठक को उन की पत्नी ने ही मौत के घाट उतारा है. 7 मई 2021 को पुलिस ने ममता पाठक को हिरासत में ले कर पूछताछ की तब ममता पहले तो पुलिस को अलगअलग बयान दे कर गुमराह करती रही, लेकिन एसआई माधवी अग्निहोत्री ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो मामले का सच सामने आ गया. पूछताछ में पत्नी ममता ने पति की हत्या की जो कहानी बताई, वह रिश्तों को शर्मसार करने वाली निकली. शक की वजह से शुरू हुआ रिश्तों के बिखराव का अंतहीन सिलसिला आखिर पति की मौत का कारण बन गया.

11 साल के वनवास के बाद ममता अपने पति के पास वापस जरूर आ गई थी, लेकिन पतिपत्नी के संबंधों में कड़वाहट खत्म नहीं हुई थी. सनकी मिजाज की ममता के दिमाग में बैठा शक का कीड़ा हमेशा कुलबुलाता रहता था. इसी वजह से ममता की रातों की नींद गायब हो गई थी. जब ममता डा. पाठक को नींद न आने की बात कहती तो डा. पाठक ममता को रात में एक इंजेक्शन लगा देते थे. जिस से ममता को नींद आ जाती थी. खाने में मिला दीं नींद की गोलियां इंजेक्शन के बाद ममता को होश नहीं रहता. जब सुबह उस की नींद खुलती तो उसे यही शक बना रहता कि डा. पाठक उसे बेहोशी का इंजेक्शन दे कर किसी महिला के साथ रंगरलियां मनाते हैं. इस बात को ले कर दोनों में अकसर विवाद होता.

अप्रैल की 29 तारीख को भी इसी बात को ले कर जब विवाद बढ़ गया तो ममता ने डा. पाठक को कमरे में बंद कर दिया. डा. पाठक ने एक वीडियो वायरल कर इस बात की जानकारी अपने एक वकील और रिश्तेदारों को देते हुए शिकायत टीआई जगतपाल को भी व्हाट्सएप द्वारा कर दी. रिश्तेदारों और पुलिस की समझाइश से मामला शांत तो हो गया, लेकिन ममता के मन में अपने पति के प्रति नफरत इस हद तक बढ़ गई कि ममता ने अपने पति को हमेशा के लिए मौत की नींद सुलाने का निश्चय कर लिया. 29 अप्रैल, 2021 को ममता ने डा. पाठक के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं और उन के कमरे में भोजन की थाली ले कर पहुंच गई.

डा. पाठक के साथ तमीज से पेश आते हुए उस ने उन से खाना खाने का आग्रह किया. विवाद की वजह से सुबह से भूखेप्यासे रहे डा. पाठक ने खाना खाया. खाना खाने के बाद ही वह गहरी नींद में चले गए. ममता ने सोचा कि नींद की ज्यादा गोलियां खाने से डा. पाठक की मृत्यु हो गई है. इस के बाद डर के मारे उस का बुरा हाल था. ममता यही सोचसोच कर डर रही थी कि कहीं खाने में नींद की गोलियां मिलाने की बात सामने आई तो उस का जेल जाना तय है. इस के बाद उस के मस्तिष्क में एक विचार आया. तब वह नीचे से बिजली का एक्सटेंशन बोर्ड और वायर ले कर उस कमरे में पहुंची जहां पति अचेत अवस्था में पड़े थे, उस बोर्ड से ममता ने पति को काफी देर तक बिजली का करंट लगाया, जिस से डा. नीरज की मौत हो गई.

पति की मौत होने के बाद दूसरे दिन 30 अप्रैल को वह एक प्राइवेट कार में अपने बेटे को ले कर झांसी चली गई. इसी दौरान उस ने एक वीडियो देखा था, जिस में बताया था कि खाने में जहर या नशीली दवा देने के बाद यदि 2 दिन तक शव को रखा रहने दिया जाए तो पोस्टमार्टम में नशीली दवा जहर ट्रैस नहीं होता है. ममता अपने बेटे के साथ शाम को छतरपुर वापस आ कर चुपचाप सो गई. डा. पाठक की डेडबौडी को घर में पड़े जब 2 दिन हो गए तो ममता को पूरी तरह यकीन हो गया कि अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट में नशीली दवा की पुष्टि नहीं होगी. इस के बाद पहली मई को उस ने पुलिस को सूचना दी. इसी वजह से पोस्टमार्टम में नशीली दवा देने की बात नहीं आई.

ममता पाठक के बयान के आधार पर पुलिस ने उस के खिलाफ पति की हत्या का मामला दर्ज किया और उस की निशानदेही पर प्रयुक्त बची हुई नींद की गोलियां ममता पाठक के किचन से बरामद कर लीं. बिजली का करंट लगाने में उपयोग किया गया एक्सटेंशन बोर्ड और वायर भी ममता के बेडरूम के दराज से बरामद हुआ. बेटे नीतेश के मानसिक रूप से फिट न होने के कारण उस की संलिप्तता इस घटनाक्रम में साबित नहीं हो सकी. 8 मई, 2021 को ममता को हिरासत में ले कर न्यायालय में पेश किया जहां से उसे छतरपुर जेल भेज दिया गया. शक्की मिजाज बीवी की सनक मिजाजी की वजह से एक उच्च शिक्षित परिवार किस तरह जीवन भर मुश्किलों का सामना करता रहा और अपने पति की कातिल बनी बीवी ममता को उम्र के आखिरी पड़ाव पर जेल की सलाखों के बीच रहने को मजबूर होना पड़ा. MP News

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Parivarik Kahani in Hindi : पिता जायदाद बेचना चाहता था तो बेटे और बेटी ने कर दी हत्या

Parivarik Kahani in Hindi : अनुज और उस की बहन अल्पना को लगा कि उन के पिता सुनील कुमार जो कुछ कर रहे हैं, वह उन के भविष्य के लिए ठीक नहीं है. इस से बचने के लिए अल्पना ने अपने प्रेमी संजेश और भाई अनुज के साथ मिल कर जो योजना बनाई, वह…

रात लगभग 2 बजे  पिता सुनील कुमार की चीख सुन कर पहली मंजिल पर सो रहे बेटे अनुज और उस की मां आशा देवी की आंखें खुल गईं. दोनों बदहवास से नीचे उतर कर बरामदे में पहुंचे. देखा बरामदे में सो रहे पिता सुनील कुमार के सिर पर गांव का ही अनवर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा है. जब बेटे व पत्नी ने अनवर को रोकने की कोशिश की तो वह जान से मारने की धमकी दे कर वहां भाग गया. अनुज ने देखा पिता की मौत हो चुकी थी. रात के समय पिता की नृशंस हत्या से घर में कोहराम मच गया. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए.

अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया, रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था.

अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचे. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया. पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज के अलावा 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया. पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया.

पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था. हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस पकड़ कर थाने लाई. यहां उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी कोई सुनील पर कोई असर नहीं हुआ. इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी.

संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली. अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी. अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वे उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं.

यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा. सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए.

उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया. इस पर आसपास के लोग आ गए. अनुज ने ही पुलिस को फोन पर घटना की जानकारी दी. पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दूध का दूध और पानी का पानी कर एक बेगुनाह अनवर को हत्या के मामले में जेल जाने से बचा लिया. पुलिस ने सुनील के चारों हत्यारोपियों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया. Parivarik Kahani in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

UP Crime News : जायदाद के लालच में बहू ने सास को जहर का इंजेक्शन देकर मार डाला

UP Crime News : एक ऐसा दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जिसने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जहां एक बहू ने जायदाद के लालच में सास की हत्या कर दी. आइए खोलते हैं इस स्टोरी की हर परत को

यह घटना उत्तर प्रदेश जिले के झांसी की है. जहां 24 जून को सुशीला देवी घर में मृत पाई गई. शुरुआत में मामला पुलिस को डकैती जैसा लगा, लेकिन जैसे जैसे पुलिस ने आगे की जांच की तो सुशीला की हत्या की परतें दर परतें खुलती गई. पुलिस ने जांच में पाया कि सुशील की हत्या उसकी बहू पूजा जाटव ने की है. सास का अंतिम संस्कार होते ही बहू पूजा जाटव अचानक लापता हो गई, जिससे शक और गहराता गया.

इसके बाद पुलिस ने मोबाइल लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड, सीसीटीवी से खुलासा हुआ कि सास की हत्याकांड की असली मास्टरमाइंड पूजा जाटव ही निकलती है. पूजा ग्वालियर की रहने वाली है. वह अपनी 18 बीघा जमीन को बेचकर ग्वालियर में बसना चाहती थी. ये सारी जमीन उसके पति कल्याण के नाम पर थी. इसी जमीन में उसका देवर और ससुर उसको हिस्सा देने के लिए भी तैयार थे. लेकिन सास सुशीला देवी जमीन देने को तैयार नहीं थीं और हस्ताक्षर से इनकार कर दिया. इसी नाराजगी में पूजा ने सास की हत्या की साजिश रच डाली.

पुलिस के अनुसार, पूजा ने इस हत्या लिए अपनी बहन कामिनी और उसके प्रेमी अनिल वर्मा को शामिल किया. इसी साजिश तहत 24 जून की शाम तीनों ने सुशीला देवी को जहर का इंजेक्शन दिया, फिर गला घोंटकर मार डाला. फिर हत्या कर तीनों ने करीब 8 लाख के जेवर भी चुराए, ताकि वारदात को डकैती का रूप दिया जा सके. पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है.

पूछताछ में पूजा ने सास की हत्या की साजिश कबूल की, लेकिन उसका अतीत और चौंकाने वाला निकला. पहले पति से शादी में उसे घरेलू हिंसा झेलनी पड़ी थी. एक झगड़े में पति ने उस पर गोली चला दी थी, जिससे उसकी ज़िंदगी में नया मोड़ आ गया.

यह मामला कोर्ट तक पहुंचा और इसी केस के दौरान पूजा की मुलाकात कल्याण से हुई, जिससे नजदीकियां बढ़ीं और दोनों ने शादी कर ली. छह साल बाद कल्याण की सड़क हादसे में मौत हो गई. इसके बाद पूजा ने कल्याण के बड़ें भाई से अवैध संबंध बना लिए और उसके साथ लिव-इन में रहने लगी. संतोष पहले से ही शादीशुदा था. इसके बाद संतोष की पत्नी ने लगातार इस रिश्ते का विरोध किया और कहा की वह कल्याण की विधवा है, इसी लिए संपत्ति मे आधा हिस्सा मिलना चाहिए.

यह बात सास को मंजूर नहीं थी. उसका मानना था की पूजा का व्यवहार अच्छा नही है. इसी के चलते वह सपंत्ति पर हक जमा रही है.

पुलिस ने जांच के बाद पूजा, कामिनी और अनिल को गिरफ्तार कर लिया गया है. उन पर हत्या, साजिश और डकैती की धाराएं लगाई गई हैं. पुलिस अब अन्य एंगल से भी मामले की जांच कर रही है.UP Crime News