Uttar Pradesh Crime : शराब में जहरीला पदार्थ मिलाकर प्रेमी को मार डाला

Uttar Pradesh Crime : बेटी मानसी चौरसिया के कदम बहकने के बाद पिता रोहित चौरसिया को किसी भी तरह उस के कदमों को रोकना चाहिए था. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि वह बेटी के कहने पर बेटे के साथ मिल कर ऐसा  कुछ कर बैठा कि …

25 नवंबर, 2019 की बात है. उत्तर प्रदेश के गोंडा का रहने वाला रमेश गुप्ता घर में बिस्तर पर लेटा आराम कर रहा था. तभी अचानक उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन उठा कर काल रिसीव की, बात होने के बाद उस ने कपडे़ बदले और छोटे भाई सुरेश से यह कह कर चला गया कि मनोज के घर जा रहा है. अगर जरूरत हुई तो वह उन के घर पर रुक जाएगा. दरअसल, मनोज गुप्ता के ससुर बीमार थे, सुरेश उन की देखभाल के लिए उन के घर जाता रहता था. दोनों परिवारों के घ्निष्ठ संबंध थे. रमेश को गए काफी देर हो गई. जब वह नहीं लौटा तो सुरेश ने समझा कि वह मनोज के घर रुक गए होंगे. रमेश जब 26 नवंबर की सुबह तक भी नहीं लौटा तो सुरेश ने मनोज गुप्ता को फोन किया तो उन्होंने बताया कि रमेश कल रात को उन के यहां आया ही नहीं था.

यह जान कर सुरेश को चिंता हुई. रमेश जहांजहां जा सकता था, सुरेश ने उन सभी जगहों पर उस की खोज की, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. 30 वर्षीय रमेश गुप्ता अपने परिवार के साथ जिला गोंडा के थाना कोतवाली क्षेत्र में स्थित विष्णुपुरी कालोनी में रहता था. जब सुरेश रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से पूछपूछ कर परेशान हो गया तो उस ने 29 नवंबर को थाना कोतवाली जा कर भाई रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज करा दी. कोतवाल आलोक राव ने सुरेश की तहरीर पर रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने उस की तलाश के लिए आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. गोंडा शहर के ही सिविल लाइंस क्षेत्र में अफीम कोठी मोहल्ले में एक खाली मैदान है, जिस में तमाम झाडि़यां थीं. इस खाली मैदान में 2 दिसंबर को कुछ लोग गए तो वहां बदबू के तेज भभके उठ रहे थे.

लोगों ने खोजबीन शुरू की तो वहां एक सूखे कुएं में क्षतविक्षत अवस्था में लाश पड़ी देखी. वह कुआं मिट्टी से आधा पट चुका था, इसलिए चित अवस्था में पड़ी उस लाश का चेहरा स्पष्ट दिख रहा था. उन लोगों ने वह लाश पहचान ली. वह लाश विष्णुपुरी कालोनी के रहने वाले रमेश गुप्ता की थी. रमेश के मकान से उस जगह की दूरी महज 200 मीटर थी. उन में से ही एक आदमी ने जा कर रमेश के भाई सुरेश गुप्ता को रमेश की लाश मिलने की सूचना दे दी. सुरेश तुरंत मौके पर पहुंचा तो उस ने कुएं में पड़ी भाई की लाश पहचान ली. सुरेश ने कोतवाल आलोक राव को भाई की लाश मिलने की सूचना दे दी.

सूचना पा कर इंसपेक्टर आलोक राव, एसएसआई राजेश मिश्रा आदि के साथ मौके पर पहुंच गए. मौके पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. इंसपेक्टर राव ने लाश कुएं से निकलवाई. लाश काफी सड़गल चुकी थी, इसलिए लाश का निरीक्षण करने पर मौत की वजह पता नहीं चल रही थी. इसी बीच एसपी राजकरन नैयर और एएसपी महेंद्र कुमार भी मौके पर पहुंच गए. लाश का मुआयना करने के बाद उन्होंने रमेश के भाई सुरेश से पूछताछ की. सुरेश ने भाई की हत्या में उस की प्रेमिका मानसी का हाथ होने का शक जताया. वैसे भी अफीम कोठी मोहल्ले में ही 100 मीटर की दूरी पर मानसी चौरसिया का मकान था.

सुरेश से पूछताछ के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. फिर सुरेश की तहरीर पर मानसी चौरसिया के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया. इंसपेक्टर राव ने मृतक रमेश गुप्ता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो पता चला कि 25 नवंबर की रात को उस के मोबाइल पर जो काल आई थी, वह मानसी चौरसिया के फोन नंबर से ही की गई थी. अब मानसी से पूछताछ करनी जरूरी थी. लिहाजा 3 दिसंबर को इंसपेक्टर आलोक राव ओर एसएसआई राजेश मिश्रा ने महिला कांस्टेबल की मदद से मानसी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कोतवाली ला कर जब मानसी से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि रमेश की हत्या करने में उस के दूसरे प्रेमी अंकित सिंह, पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू चौरसिया ने साथ दिया था. पूछताछ के बाद मानसी ने रमेश की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा की नगर कोतवाली अंतर्गत रामचंद्र गुप्ता अपने परिवार के साथ रहते थे. रामचंद्र के परिवार में उन की पत्नी राजकुमारी और 2 बेटियों के अलावा 3 बेटे दिनेश, रमेश और सुरेश थे. रामचंद्र प्राइवेट नौकरी करते थे. उन्होंने दिनेश का विवाह कर दिया था. दिनेश को विवाह के कुछ समय बाद ही चालचलन ठीक न होने पर रामचंद्र ने उसे घर से निकाल दिया. यह लगभग 8 साल पहले की बात है. इस समय दिनेश परिवार के साथ बस्ती जिले में रहता है. रामचंद्र ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया था. रमेश और सुरेश अभी अविवाहित थे. रमेश ने बीए तक पढ़ाई की थी. रामचंद्र के कूल्हे में रौड पड़ी थी. उस रौड की वजह से उन्हें इंफेक्शन हो गया था, जो कि किडनी और उस के आसपास फैल गया था. वह काफी समय से बीमार थे.

इस की वजह से उन की देखभाल बड़ा बेटा रमेश किया करता था. देखभाल करने के कारण रमेश कोई काम नहीं करता था. घर पर ही रहता था. जबकि सुरेश एक बैंक में मैनेजर के रहमोकरम पर काम करने लगा था. विष्णुपुरी कालोनी से सटा अफीम कोठी मोहल्ला था. इसी मोहल्ले में रोहित चौरसिया परिवार के साथ रहता था. रोहित रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. उस की पत्नी जगदेवी का देहांत हो चुका था. रोहित के 2 बेटे दीपू चौरसिया और सूरज चौरसिया और एकलौती बेटी मानसी थी. दीपक का रीमा नाम की युवती से विवाह हो चुका था. सूरज अविवाहित था और मुंबई में रहता था. मानसी ने इंटरमीडिएट तक शिक्षा ग्रहण की थी, इस के बाद उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो वह घर के रोजमर्रा के काम करने लगी.

रमेश और मानसी के मकान के बीच महज 200 मीटर की दूरी थी. दोनों एकदूसरे से परिचित थे. मानसी काफी महत्त्वाकांक्षी थी. छरहरी काया वाली मानसी को लड़कों से दोस्ती करना बहुत अच्छा लगता था. उस की वजह थी कि उस के नाजनखरे उठाने में लड़कों की लाइन लगी रहती थी. उन के साथ घूमने, मौजमस्ती के उसे खूब मौके मिलते थे. रमेश मोहल्ले में ही घूमता रहता था, इसलिए वह मानसी के चालचलन से बखूबी वाकिफ था. उस ने भी मानसी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो मानसी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दोनों की दोस्ती धीरेधीरे रंग दिखाने लगी. वैसे भी दोस्ती प्यार की पहली सीढ़ी होती है. रमेश और मानसी दोनों यह सीढ़ी चढ़ चुके थे.

दोनों साथ में काफी समय बिताने लगे. उन के बीच मोबाइल पर भी बातें होती रहती थीं. जैसेजैसे समय गुजरने लगा, दोनों को अहसास होने लगा कि दोनों दोस्ती की सीमाओं को पार कर उस से भी आगे निकल चुके हैं. उन के दिलों में प्यार की उमंगें हिलारें मार रही थीं. दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. यह भी तय कर लिया कि जीवन भर दोनों पतिपत्नी के रूप में साथसाथ रहेंगे. दोनों ने विवाह करने की बात अपने घरों में की तो रमेश के घर वालों को तो शादी से कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन मानसी के पिता रोहित और भाई दीपू ने मना कर दिया. उन्होंने मानसी से कहा कि रमेश एक तो उन की जातिबिरादरी का नहीं और दूसरे वह निठल्ला है. कुछ कामधाम नहीं करता. ऐसे में शादी के बाद वह उसे कैसे रख पाएगा.

बाप की नसीहत बेटी के दिमाग में घर कर गई. मानसी ने अभी तक इस बारे में सोचा ही नहीं था. वह तो प्यार में इतनी डूब गई थी कि और कुछ सोचसमझ ही नहीं पा रही थी. बाप की नसीहत ने जैसे उस की आंखें खोल दी थीं. अब उस ने रमेश से दूरी बनानी शुरू कर दी. लेकिन रमेश था कि उस का पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं था. इसी बीच मानसी की मुलाकात कुछ दूर जानकीनगर मोहल्ला निवासी अंकित से हो गई. अंकित अच्छा कमाता था. रमेश के मुकाबले हर लिहाज से अंकित मानसी को अच्छा लगा था. दोनों की मुलाकातें दिनोंदिन बढ़ने लगीं. दोनों के बीच की दूरियां कम होती गईं. मानसी अंकित के साथ बहुत खुश थी. रमेश ने मानसी चौरसिया को अपने से दूरी बनाते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा. वह ऐसा क्यों कर रही है, यह जानने की उस ने कोशिश की तो उस के सामने हकीकत आते देर नहीं लगी.

रमेश को लगा कि दूसरा प्रेमी मिलते ही मानसी ने उस से किनारा कर लिया है. यह बात रमेश के दिमाग में बारबार कौंध रही थी. वह इसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. वह मानसी को हर हाल में पाना चाहता था. एक दिन रमेश ने मानसी से मिल कर उसे समझाया लेकिन मानसी नहीं मानी. मानसी ने उसे बताया कि परिवार वाले उस से विवाह करने को तैयार नहीं हैं और वह अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सकती. इस पर रमेश ने सीधे कहा कि ऐसे में तुम्हें अपने घर वालों को मनाना चाहिए. लेकिन तुम ने तो दूसरा प्रेमी ही ढूंढ लिया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.

मानसी को न मानते देख रमेश ने उसे धमकाया कि अगर उस ने उसे छोड़ कर किसी दूसरे को चुना तो उस के जो अश्लील फोटो उस के पास हैं, वह उन्हें वायरल कर देगा. रमेश के इतना कहने पर मानसी डर गई लेकिन उस ने हिम्मत कर के कह दिया कि वह अब उस की नहीं हो सकती. इस के बाद मानसी के दिमाग में यही चलता रहता था कि कहीं रमेश उस के अश्लील फोटो को वायरल न कर दे. वह इसी डर में जी रही थी. ऐसे में उस ने रमेश को सबक सिखाने का फैसला कर लिया. उस ने अपने दूसरी प्रेमी अंकित से कहा कि कुछ दिनों पहले रमेश ने धोखे से उस के कुछ अश्लील फोटो खींच लिए थे, उन के बल पर वह उसे ब्लैकमेल कर फोटो वायरल करने की धमकी दे रहा है.

मानसी ने अंकित से कहा कि उसे रोकने का एक ही तरीका है कि उसे मार दिया जाए. अंकित इस काम में उस का साथ देने को तैयार हो गया. उसे कहां और कैसे मारना है, इस पर दोनों ने विचार कर लिया. इस के बाद दोनों को लगा कि वे दोनों इस काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पाएंगे. इस पर मानसी ने रमेश को ठिकाने लगाने के लिए अपने पिता और भाई को राजी करने का उपाय सोचा. योजनानुसार मानसी ने रोते हुए अपने पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू को बताया कि रमेश के पास उस के कुछ अश्लील फोटो हैं. उन को वायरल कर के वह उस की जिंदगी बरबाद करना चाहता है. यह सुन कर दोनों को मानसी और रमेश पर गुस्सा आया. पर पहले तो उन्हें रमेश को देखना था, क्योंकि उन के लिए मानसी की इज्जत यानी परिवार की इज्जत पहले थी. इज्जत बचाने की खातिर उस के पिता व भाई रमेश को सबक सिखाने को तैयार हो गए.

तब मानसी ने दोनों को बता दिया था कि इस सब में उस का एक दोस्त अंकित भी मदद करने को तैयार है. इस के बाद एक दिन मानसी ने अंकित को घर बुला लिया. फिर सब ने मिल कर रमेश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. 25 नवंबर को मानसी के भाई दीपू की पत्नी रीमा अपने मायके गई हुई थी. योजनानुसार रात साढ़े 10 बजे मानसी ने फोन कर के रमेश को अपने घर बुलाया. रमेश अपने भाई सुरेश से घर के सामने रहने वाले मनोज गुप्ता के यहां जाने की बात कह कर निकला और सीधे मानसी के घर पहुंच गया.  वहां मानसी, उस के पिता रोहित, भाई दीपू के अलावा अंकित भी मौजूद था. रमेश के पहुंचने पर सब ने पहले उसे शराब पिलाई. शराब में पहले से ही जहरीला पदार्थ मिला दिया गया था. शराब में मिले जहर ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो रमेश की हालत बिगड़ने लगी. वह उठ कर जाने की कोशिश करने लगा तो सब ने मिल कर उसे दबोच लिया और गला दबा कर उसे मार डाला.

रमेश को मौत की नींद सुलाने के बाद रात एक बजे उस की लाश अपने घर के पीछे झाडि़यों से पटे खाली मैदान में बने सूखे कुएं में डाल दी. इस के बाद अंकित अपने घर चला गया. लेकिन उन का गुनाह छिप न सका. मानसी चौरसिया ने सभी के नाम खोले तो इंसपेक्टर आलोक राव ने अंकित, रोहित चौरसिया और दीपू चौरसिया की गिरफ्तारी के लिए दबिश देनी शुरू कर दी. मानसी के हिरासत में लिए जाने के बाद ही तीनों अपने घरों से फरार हो गए थे. पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अंकित ने 6 दिसंबर, 2019 को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर राव ने दीपू चौरसिया को गिरफ्तार कर लिया. आवश्यक लिखापढ़ी के बाद अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक रोहित चौरसिया फरार चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मनोज गुप्ता परिवर्तित नाम है.

 

Love Story : कॉलेज लाइफ की लव स्‍टोरी

Love Story : वैलेंटाइंस डे पर हर्ष ने अनुशा को गुलाब का फूल दे कर अपने प्यार का इजहार किया था, लेकन उस ने न ऐतबार किया और न स्वीकार. लेकिन जब हर्ष उस की फ्रैंड रितु से शादी करने लगा तो…

एमबीबीएस की पढ़ाई का पहला साल. प्रवेश प्रक्रिया पूरी होते ही हौस्टल में रहने आए सभी छात्र अपनी नई जीवनशैली के अनुकूल ढलने की कोशिश कर रहे थे. सभी के मन में नए साथियों से मिलने का आनंद था, साथ ही घर से दूर आ कर घर की याद भी सता रही थी. सभी स्टूडेंट घर और हौस्टल में संतुलन साधने का प्रयास कर रहे थे. इसी समिश्रित लगाव को मन में छिपाए हौस्टल से कालेज जा रहे गेट के पास तेजी से चली आ रही एक लड़की हर्ष से टकरा गई. उस लड़की ने झिझकते हुए कहा, ‘‘सौरी, मैं जरा जल्दी में थी. मेरा एडमिशन आज ही हुआ है. क्या आप बता देंगे कि एमबीबीएस फर्स्ट ईयर का लेक्चर हाल कहां है?’’

‘‘इट्स ओके. सेकेंड फ्लोर लेक्चर हाल नंबर 705.’’ हर्ष ने जवाब दिया.

‘‘थैंक्स.’’ कह कर लड़की पलभर में गायब हो गई. जैसेजैसे प्रवेश प्रक्रिया का काम पूरा हो रहा था, वैसेवैसे कालेज में नए चेहरे आते जा रहे थे. उस लड़की के कोमल मुलायम कंधे का स्पर्श और मधुर स्वर में हुआ संवाद हर्ष के हृदय को गति दे रहा था. लेक्चर हाल में दाखिल होते ही हर्ष की निगाहें स्टूडेंट्स के बीच उसी चेहरे को खोज रही थीं. आखिर पहली ही लाइन में वह चेहरा दिखाई दे गया. उस पर नजर पड़ते ही उस के हृदय की गति तेज हो गई. उस दिन के बाद हर्ष रोजाना उस चेहरे को निहारता रहता और मन ही मन तेज गति से धड़कते दिल की धड़कन को काबू करने की कोशिश करता रहता. इस के पहले उस ने किसी के लिए इतना लगाव महसूस नहीं किया था.

हर्ष किसी भी तरह उस लड़की से बात करना चाहता था. उस की इस चाहत को पूरा करने में मदद की रितु ने. रितु और हर्ष एक शहर के रहने वाले तो थे ही, एक ही कालेज में साथ पढ़े थे. हर्ष ने रितु को पूरी बात बताई तो उस ने खुश हो कर कहा, ‘‘अनुशा मेरी बेस्ट फ्रैंड है. मैं उस से तुम्हारी बात तो करा दूंगी, पर…’’

‘‘पर क्या?’’ हर्ष ने पूछा.

‘‘इस के बदले में मुझे क्या मिलेगा?’’

‘‘इस के लिए तुम जो कहो, मैं करने को तैयार हूं.’’ हर्ष ने उत्तेजित हो कर कहा.

‘‘तुम्हें मेरी एनाटौमी का जर्नल लिखना होगा. इस के अलावा कैंटीन में रोज एक आइसक्रीम खिलानी पड़ेगी.’’

‘‘ओके डन.’’ हर्ष के हिसाब से सौदा बहुत सस्ते में पट गया था.

और रितु ने कैंटीन में हर्ष की मुलाकात अनुशा से करा दी, ‘‘इट इज नाइस टू मीट यू अगेन.’’ कहते हुए हर्ष की आंखों में अपार खुशी छलक रही थी.

‘‘हम दोनों अपने कालेज के पहले दिन मिले थे.’’ अनुशा ने जवाब दिया.

पता चला अनुशा भी उसी शहर की रहने वाली थी, जिस शहर के वे दोनों थे. थोड़ी बातचीत उस के बाद आइसक्रीम पार्टी कर के तीनों हौस्टल के लिए निकल गए. हर्ष अपने हौस्टल के कमरे की ओर जा तो रहा था, लेकिन उस के मन में अनुशा ही बसी थी. बस, इसी तरह मुलाकातें बढ़ती गईं. कभी कैंटीन में हर्ष और अनुशा के साथ रितु भी होती तो कभी सिर्फ हर्ष और अनुशा ही होते. हर्ष का मन अनुशा के साथ उत्कट प्रणय संबंध में बंध गया था, पर यह प्रणय एकतरफा था. सौदे के अनुसार हर्ष रितु का काम तो करता ही, अनुशा के भी उसे कई काम करने होते थे. कैंटीन में अनुशा और रितु के लिए नाश्ता और कौफी वही लाता था. पर वह चाह कर भी वह दिल की बात अनुशा से नहीं कह सका.

इसी तरह 3 साल बीत गए. चौथे साल के पहले सेमेस्टर की भी परीक्षा हो गई थी. सभी स्टूडेंट्स फाइनल एग्जाम की तैयारी में लगे थे. फाइनल एग्जाम अप्रैल-मई में होने थे. इसी बीच फरवरी का महीना आ गया. पे्रम करने वालों के लिए इस महीने की 14 तारीख महत्त्वपूर्ण होती है. जिन के वैलेंटाइन होते हैं, वे अपनेअपने वैलेंटाइन को गुलाब का फूल और उपहार देते हैं. यानी एक तरह से प्रेम का इजहार करते हैं. हर्ष ने अनुशा से अपने प्यार का इजहार करने के लिए इसी दिन को चुना, क्योंकि यह उस के लिए अंतिम चांस था. अगर इस बार वह चूक जाता तो फिर जल्दी मौका नहीं मिलता. क्योंकि एग्जाम के दौरान ऐसी बात नहीं की जा सकती थी. एग्जाम खत्म होते ही सब को अपनेअपने घर चले जाना था. हर्ष को पूरी उम्मीद थी कि अनुशा उस के प्यार को अस्वीकार नहीं करेगी.

आखिर 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे को कैंटीन में हर्ष ने अनुशा को गुलाब का फूल दे कर सहज रूप से हैप्पी वैलेंटाइंस डे कहा और अपने दिल की बात उस के सामने रखी, ‘‘अनुशा, मैं ने एक सपना देखा है कि शहर की पौश कालोनी में नदी के किनारे एक फ्लैट है. उस फ्लैट की गैलरी में तुम खड़ी हो और मैं शाम को तुम्हारे लिए कौफी बना कर लाता हूं. क्या तुम मुझे ऐसा मौका दोगी कि मैं तुम्हारे लिए रोज कौफी बनाऊं?’’

‘‘मतलब?’’ अनुशा की भौंहें तन गईं.

‘‘आई लव यू अनुशा. कालेज के पहले दिन ही तुम्हें देख कर मेरा दिल धड़कने लगा था. और अब यह हमेशाहमेशा के लिए सिर्फ तुम्हारी खातिर धड़कना चाहता है. तुम्हारे लिए इस में अनहद प्रेम है और सदा इसी तरह अनहद रहेगा.’’ कहते हुए हर्ष ने प्रेमभरी नजरों से अनुशा को देखा और उस के प्रत्युत्तर की राह तकने लगा.

‘‘हर्ष, मैं जो कहने जा रही हूं, तुम उस का बुरा मत मानना. मैं ने कभी भी तुम्हें एक फ्रैंड से ज्यादा नहीं माना. जीवनसाथी को ले कर मेरे मन में बड़ी अपेक्षाएं हैं, जिस में तुम्हारा साधारण और सामान्य रूप फिट नहीं बैठता. मुझे अपनी सुंदरता पर अभिमान तो नहीं है पर चाहती हूं कि मेरा जोड़ीदार ऐसा हो, जिस के साथ मैं खड़ी होऊं तो लोग कहें कितनी सुंदर जोड़ी है.’’ अनुशा ने अपनी बात स्पष्ट कर दी. अनुशा के इन शब्दों ने हर्ष के दिल की गति मंद कर दी थी. अनुशा संभवत: उस के प्रणय की परिभाषा नहीं समझ सकी थी. हर्ष को आघात तो लगा, पर वह दुखी होने का समय नहीं था. जिस के लिए वह अपना घरपरिवार छोड़ कर वहां आया था, वह काम जरूरी था. उसी दिन से हर्ष अपनी पढ़ाई में लग गया और उस ने पूरे मन से परीक्षा दी.

परीक्षा दे कर अनुशा अपने मामा के यहां चली गई, क्योंकि उन का अपना नर्सिंगहोम था. रितु और हर्ष अपने शहर लौट गए. क्योंकि उन के घर वालों की उन्हीं के शहर में जमीजमाई प्रैक्टिस थी. सभी अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए. एक दिन अचानक रितु ने अनुशा को फोन किया, ‘‘हैलो अनुशा, कैसी हो?’’

‘‘हाय वैनवी, बहुत मजे में तो नहीं हूं, फिर भी चल रहा है. बस, वही रूटीन क्लिनिक वर्क. तुम बताओ, आज सवेरेसवेरे कैसे याद कर लिया. कोई गुड न्यूज है क्या? क्योंकि तुम्हारी बातों में ही खुशी झलक रही है.’’

‘‘बहुत होशियार हो गई हो दिल्ली जा कर. तुम्हें तो बातों से सब पता चल जाता है. सुनो, 16 फरवरी को मेरी शादी है. तुम्हें आज ही यहां आना है. अभी मेरी सारी की सारी शौपिंग बाकी है. तुम्हारे आने के बाद ही शौपिंग शुरू करूंगी.’’

‘‘वाव दैट्स ग्रेट न्यूज. कौन है भाई वह भाग्यशाली, जो मेरी रितु को ले जा रहा है?’’ अनुशा के मन में भी खुशी भर गई थी.

‘‘तुम आ जाओ बस, सब बताऊंगी. तुम्हें लेने मैं एयरपोर्ट पर आऊंगी.’’ वर्षों बाद अनुशा से मिल कर सब कुछ बताने की उत्कंठा और खुशी रितु के चेहरे पर स्पष्ट झलक रही थी.

एयरपोर्ट पर रितु को देखते ही अनुशा उस के गले लग गई. दोनों की आंखों में हर्ष और खुशी टपक रही थी. गले लगेलगे ही अनुशा ने पूछा, ‘‘अब तो बताओ, कौन है वह खुशनसीब, यह सब कब तय हुआ?’’

‘‘धीरज रखो, तुम्हारे जीजाजी यहीं हैं. कार लाने पार्किंग में गए हैं. तुम खुद ही देख लेना मेरी पसंद.’’ रितु ने कहा. उस समय उस की आंखों में एक अजीब चमक थी.

दोनों बातें कर रही थीं, तभी उन के पास एक होंडा सिटी कार आ कर रुकी. अंदर से ब्लैक गोगल्स लगाए एक आकर्षक युवक बाहर निकला. वह आकर्षक युवक दोनों के नजदीक आ कर काला चश्मा उतारते हुए अनुशा की आंखों में आंखें डाल कर बोला, ‘‘कैसी हो मिस अनुशा, पहचाना या नहीं?’’

अनुशा चौंकी. उस ने हैरानी से उस युवक को ताकते हुए कहा, ‘‘हर्ष तुम..? तुम कितने बदल गए हो? बहुत हैंडसम लग रहे हो, यह चमत्कार कैसे हुआ?’’

‘‘थोड़ी एक्सरसाइज, जिम और थोड़ी स्किन ट्रीटमेंट, क्योंकि आजकल लोगों को किसी चीज की गुणवत्ता की अपेक्षा पैकिंग में ज्यादा रुचि होती है.’’ हर्ष ने कहा और खिलखिला कर हंसने लगा. रितु ने भी हंसने में उस का साथ दिया. न चाहते हुए अनुशा को भी उन का साथ देना पड़ा क्योंकि वह समझ गई थी कि यह बात हर्ष ने उसी को लक्ष्य बना कर कही थी. कार में रितु आगे की सीट पर हर्ष के साथ बैठ गई. हर्ष ने उस का सीट बेल्ट बांधा और उस का हाथ पकड़ कर ‘आई लव यू’ कहा तो रितु ने भी उन्हीं शब्दों में जवाब दिया. अनुशा को यह अच्छा नहीं लगा, क्योंकि वह उतनी दूर से उसी के लिए आई थी. वह सोच रही थी कि रितु उस के साथ बैठेगी तो दोनों बातें करेंगी. चूंकि अब उन दोनों की शादी होने जा रही थी, इसलिए अनुशा ने अपने मन को मना लिया.

कार एयरपोर्ट से निकल कर रितु के घर की ओर चल पड़ी. रास्ते में रितु ने अनुशा की ओर देखते हुए कहा, ‘‘शादी तक तुझे मेरे घर पर ही रहना है. मैं ने अंकलआंटी से बात कर ली है.’’

‘‘ओके डियर रितु, जैसा तुम चाहोगी वैसा ही होगा. मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी.’’ इस तरह खुशीखुशी अनुशा ने रितु की मांग मान ली. दोनों की बातचीत बंद करा कर हर्ष ने एक मैरिज हाल की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखो अनुशा, हमारी शादी यहीं होगी.’’

अनुशा ने उत्कंठा से खिड़की के बाहर देखा. उस के बाद बोली, ‘‘वाव, कितनी सुंदर जगह है. एकदम स्वर्ग जैसी.’’

मैरिज हाल देख कर अनुशा ने तारीफ तो की पर मन में एक अजीब तरह का असमंजस महसूस किया, लेकिन वह समझ नहीं सकी कि ऐसा क्यों हुआ. अनुशा के आते ही रितु शादी की तैयारी में मशगूल हो गई. अनुशा को साथ ले कर रितु शौपिंग के लिए निकल पड़ती. हर्ष भी उन के साथ होता. रितु के सभी शौपिंग बैग ले कर हर्ष उस के पीछेपीछे चलता. कुछ भी लेने से पहले रितु उस से पूछती और हर्ष सहर्ष उस की पसंद को सम्मान देता. सभी शौपिंग करतेकरते थक जाते तो हर्ष सब के लिए नाश्तापानी की व्यवस्था करता.

हर्ष और रितु एक ही प्लेट में नाश्ता करते. तब अनुशा को कालेज के दिनों की याद आ जाती. यहां फर्क बस इतना था कि तब हर्ष की आंखों में उस के लिए प्रेम छलकता था, जबकि अब वही प्रेम रितु के लिए था. शौपिंग कर के शाम को वापस आते तो अपने घर जाते समय हर्ष रितु का हाथ पकड़ कर उसे चूमते हुए ‘आई लव यू’ कहता. थोड़ा शरमाते हुए आंखें झुका कर रितु भी उन्हीं शब्दों को वापस करती. तब अनुशा कहती, ‘‘अरे ओ मेरे लैलामजनूं और रोमियो जूलियट, अब तुम्हारे विरह के कुछ ही दिन बचे हैं.’’

इस के बाद तीनों हंसने लगते. हंसते हुए हर्ष कार में बैठता और खुशीखुशी अपने घर चला जाता. एक दिन सवेरेसवेरे रितु ने कहा, ‘‘अनुशा, आज जल्दी तैयार हो जाना, शादी का जोड़ा पसंद करने चलना है. मैं तुम्हारी पसंद का जोड़ा लूंगी. लहंगाचोली भी एकदम मस्त पहनूंगी. उसे भी तुम्हें ही पसंद करना है. चलो, आज ही खरीद लेते हैं, क्योंकि फिटिंग में भी तो समय लगेगा.’’

रितु के आदेश के बाद अनुशा समय से तैयार हो गई. अनुशा ने रितु के लिए एक बहुत ही सुंदर शादी का जोड़ा पसंद किया. उस के बाद उस जोड़े को खुद ओढ़ कर दुकान में लगे दर्पण में खुद को देखा तो खयालों में खो गई. तभी रितु उस के लिए एक लहंगा चोली ले कर आई, ‘‘देखो अनुशा, मैं ने तुम्हारे लिए इसे पसंद किया है. कैसा लग रही है?’’

रितु के पुकारने से अनुशा का ध्यान भंग हुआ. उस ने लहंगाचोली की ओर निहारते हुए कहा, ‘‘बहुत सुंदर है. और यह जो मैं ने तुम्हारे लिए पसंद किया है, कैसा है?’’

‘‘बहुत सुंदर है अनुशा, तुम न होती तो शौपिंग करना, मेरे लिए कितना मुश्किल होता.’’

रितु की शौपिंग में अनुशा ने काफी मदद की थी. अनुशा रितु की मदद तो पूरे मनोयोग से कर रही थी, पर सहेली की शादी में जिस तरह खुश होना चाहिए, उस तरह खुश नहीं थी. उस के मन में एक टीस सी उठती रहती थी, जिसे वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है. शादी के कुछ ही दिन बाकी रह गए थे. हर्ष कभीकभी रात को रितु के घर आ जाता और दोनों बालकनी में देर रात तक शीतल चांदनी में बैठ कर बातें करते. अनुशा बिस्तर पर रितु का इंतजार करते हुए करवटें बदलती रहती, साथ ही किसी तरह मन को समझाती रहती. 13 फरवरी की शाम को रितु ने अचानक कहा, ‘‘अरे अनुशा, मैं ने तुम्हें अपनी शादी का कार्ड तो दिखाया ही नहीं. देखो, यह हर्ष की शादी का कार्ड, जिसे मैं ने पसंद किया है और यह देखो मेरी शादी का कार्ड, जिसे हर्ष ने पसंद किया है.’’

अनुशा दोनों कार्ड हाथ में ले कर देखने लगी. एक कार्ड पर लिखा था—डा. हर्ष वेड्स डा. रितु और दूसरे पर लिखा था डा. रितु वेड्स डा. हर्ष. अनुशा ने डा. हर्ष के नाम पर हाथ फेरा. उस दिन अनुशा को अपने मन में होने वाली टीस का पता चल गया था. रितु के प्रति हर्ष का अनहद प्यार अब उस से देखा नहीं जा रहा था, क्योंकि ऐसा प्यार उस ने अब तक के जीवन में देखा नहीं था. अब शायद उसे अपनी उस बात पर अफसोस हो रहा था, जो उस दिन हर्ष से कही थी. अगर उस ने हर्ष का प्रपोजल स्वीकार कर लिया तो आज उस कार्ड में हर्ष के साथ रितु की जगह उस का नाम होता. अगले दिन 14 फरवरी यानी वैलेंटाइंस डे था. उसे वह दिन याद आ गया, जिस वैलेंटाइन डे को हर्ष ने उसे गुलाब का फूल दे कर अपने दिल की बात कही थी. अपनी कही बात को याद कर के उस का दिल दुखी हो गया.

एकदम से अनुशा के हृदय में हर्ष के लिए प्रेम उमड़ आया. वह रितु की जगह खुद को हर्ष के साथ रख कर सोचने लगी और एकदम से व्यग्र हो उठी. कार्ड देख कर उस की आंखों में आंसू भर आए थे, जिन्हें उस ने रितु से बड़ी होशियारी से छिपा लिया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अगले दिन का सामना कैसे करेगी. उस पूरी रात अनुशा हर्ष के बारे में सोचती रही. आंखों में बस हर्ष की यादें तैर रही थीं. वह पूरी रात उस ने नम आंखों में गुजारी. उस का मन हो रहा कि वह हर्ष से माफी मांग कर उसे ‘आई लव यू टू हर्ष’ कह कर उस के सीने पर सिर रख कर खूब रोए. पर अब यह संभव नहीं था. हर्ष तो अब किसी और की अमानत था.

अनुशा ने रात में ही तय कर लिया कि शादी की तो छोड़ो, वह कल वैलेंटाइंस डे को भी यहां नहीं रहेगी. क्योंकि वह हर्ष को रितु को गुलाब का फूल देते नहीं देख पाएगी. इसलिए उस ने तय कर लिया कि सवेरा होते ही वह मामा के यहां वापस चली जाएगी. अगर वह मम्मीपापा के यहां रही तो उसे शादी में आना पड़ेगा. अब वह हर्ष को किसी और का होता नहीं देख सकती. उठते ही उस ने अपना बैग पैक करना शुरू कर दिया. अनुशा को बैग पैक करते देख रितु ने आश्चर्य से पूछा, ‘‘अनुशा इस तरह अचानक, क्या हुआ? तुम बैग क्यों पैक कर रही हो? कहीं जा रही हो क्या?’’

‘‘मैं मामा के यहां वापस जा रही हूं. कारण मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी.’’ अनुशा ने नम आंखों को पोंछते हुए कहा.

‘‘पर कारण तो मैं अभी जानना चाहूंगी. जब तक कारण नहीं बताओगी, मैं तुम्हें जाने नहीं दूंगी. अब 4-5 दिनों की ही तो बात है.’’ रितु की बातों में अनुशा को रोकने की जिद थी.

‘‘रितु, मुझे माफ करना. मैं अब यहां बिलकुल नहीं रुक सकती.’’ अनुशा भी अपने निर्णय पर अडिग लग रही थी.

‘‘जब तक तुम सहीसही कारण नहीं बता देती, मैं तुम्हें यहां से जाने नहीं दे सकती. मैं कारण जानना चाहती हूं.’’ रितु भी इस तरह अचानक अनुशा द्वारा लिए गए निर्णय के बारे में जानना चाहती थी.

रितु को जिद पर अड़ी देख कर अनुशा ने कहा, ‘‘तो सुनो, मैं भी हर्ष को उतना ही प्रेम करती हूं, जितना तुम. इसलिए मैं हर्ष की शादी तुम्हारे साथ होते देख नहीं सकती. आज वैलेंटाइंस डे है. वह तुम्हें गुलाब दे कर वैलेंटाइन डे मनाएगा, यह भी मुझ से देखा नहीं जाएगा. इसीलिए मैं जा रही हूं.’’

अनुशा की बातें सुन कर रितु जोर से हंसी. उस के बाद अपनी हंसी को रोकते हुए बोली, ‘‘अरे पगली, यही तो मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती थी.’’

‘‘मतलब?’’ अनुशा की भौंहें तन गईं.

‘‘अनुशा, मानव की सहज प्रवृत्ति ऐसी है कि जब अपना प्रेमी या प्रेमिका किसी अन्य से प्रेम न करने लगे, तब तक हम उस के प्रेम की कद्र नहीं करते.’’

रितु के होंठों पर अब खुशी उतर आई थी. उस ने अपनी बात को सरल बनाते हुए आगे कहा, ‘‘जैसे मंदगति से चल रहे हृदय को गति देने के लिए शौक देने की जरूरत पड़ती है, उसी तरह सुषुप्तावस्था में रहे तुम्हारे हर्ष के प्रति प्रेम को चेतना में लाने के लिए हमें यह हाई वोल्टेज ड्रामा करना पड़ा.’’

‘‘तो यह सब ड्रामा था?’’ अनुशा हैरानी से रितु को देखती रह गई.

रितु ने अनुशा को हकीकत बताते हुए कहा, ‘‘जब हर्ष ने तुम्हारे सामने प्यार का प्रस्ताव रखा तब शायद वह इस समय की तरह आकर्षक नहीं था. तुम ने उस के बाह्यरूप को देख कर उस के प्रेम को स्वीकार नहीं किया. तब तुम ने उस के सौम्य रूप और हृदय में अनहद प्रेम को नहीं देखा था. क्या प्रणय की परिभाषा समझाने के लिए किसी का आकर्षक होना जरूरी है. इस पूरी घटना की मैं साक्षी हूं. तुम ने उस के प्रेम को अस्वीकार तो कर दिया, पर हर्ष ने तुम्हारे हृदय में प्रणय का बीज तो रोप ही दिया था, जो तुम्हारे बातव्यवहार से पता चल रहा था. अब मुझे उस बीज को बड़ा वृक्ष बनाना था और मैं उस में कामयाब भी रही.

‘‘अरे वह पागल तो तुम्हारे मामा के यहां जाने के बाद जीवन से ही हार मान बैठा था. उस के लिए जिंदगी सिर्फ तुम थीं. मुझ से उस की दशा देखी नहीं गई इसलिए मेरे दिमाग में इस योजना ने आकार लिया. सब से पहले हर्ष को मनाया. अरे वह बेवकूफ तो इस नाटक में मेरा हाथ तक पकड़ने को तैयार नहीं था. किसी तरह उसे मनाया.

‘‘इस के बाद हम तुम्हारे मम्मीपापा से मिले. हर्ष उन्हें बहुत पसंद आया. उन्होंने इस संबंध के लिए हामी भर दी. उस के बाद हम ने उन्हें अपनी योजना बताई तो उन्होंने पूरा सहयोग करने का वचन दिया. अब तुम पूरा घटनाक्रम याद करो. तुम एयरपोर्ट पर उतरीं तो मैं ने तुम्हें तुम्हारे घर नहीं जाने दिया, क्योंकि तुम्हारे घर भी शादी की तैयारी चल रही है.

‘‘अगर तुम अपने घर जाती तो मेरी योजना पर पानी फिर जाता. शादी का जोड़ा भी तुम्हारी पसंद का खरीदा, क्योंकि उसे तुम्हें ही पहनना था. रही बात निमंत्रण कार्ड की तो मात्र एक कार्ड में मेरा और हर्ष का नाम लिखा है. बाकी के कार्ड तुम्हारे और हर्ष के नाम छपे हैं.’’

इतना कह कर रितु ने निमंत्रण कार्ड का बंडल ला कर अनुशा के सामने रख दिया. अनुशा ने जल्दी से बंडल खोल कर निमंत्रण कार्ड देखे, उन में लिखा था, ‘डा. अनुशा वेड्स डा. हर्ष’.

अनुशा की आंखें मारे खुशी के छलक उठीं.

‘‘और सुनो, तुम्हें बैग पैक करते देख मैं ने हर्ष को मैसेज कर दिया था. तुम्हारा वह फिल्मी हीरो तुम्हारे लिए गुलाब का बुके ले कर आ गया है. उसे हीरो बनाने में मेरा दिमाग है समझी.’’

अनुशा ने नम आंखों से रितु को बांहों में भर लिया. थैंक्स या इस तरह का कोई शब्द कहने की जरूरत नहीं थी. क्योंकि अनुशा की आंखों से ही सब व्यक्त हो रहा था. अनुशा दौड़ती हुई हर्ष के पास पहुंची. वह गुलाब का बुके लिए कार से टेक लगाए खड़ा उसी की राह देख रहा था. अनुशा ने उस के हाथ से बुके छीन कर उस के सीने से लगते हुए कहा, ‘‘हैप्पी वैलेंटाइंस डे हर्ष. हर्ष मैं ने एक सपना देखा है. शहर के पौश इलाके में नदी के किनारे एक फ्लैट है. उस फ्लैट की गैलरी में शाम को तुम खड़े हो और मैं तुम्हारे लिए कौफी बना रही हूं. क्या तुम रोज उस तरह अपने लिए कौफी बनाने का मौका दोगे? आई लव यू हर्ष.’’

हर्ष के दोनों हाथों ने अनुशा को जकड़ लिया था. अब मुंह से कुछ भी कहने की जरूरत नहीं रह गई थी.

 

 

Lucknow Crime : बेवफा बीवी ने प्रेमी के साथ मिल कर बनाया पति का मर्डर प्‍लान

Lucknow Crime : कमला और रामकुमार की अच्छीभली गृहस्थी थी. लेकिन जब ज्ञान सिंह दोनों के बीच आया तो उन की गृहस्थी भी बिखरने लगी और रिश्तों के धागे भी उलझ गए. अब कमला और उस के चाहने वाले ज्ञान सिंह के पास एक ही विकल्प था कि…

शाम के यही कोई 6 बजे थे. धुंधलका उतर आया था. लखनऊ से सीतापुर जाने वाले मार्ग पर एक कस्बा है बख्शी का तालाब. इसी कस्बे से शिवपुरी बराखेमपुर गांव को एक रोड जाती है. सायंकाल का वक्त होने के कारण वह रोड सुनसान थी. अचानक गुडंबा की तरफ से आ रही एक बाइक गोलइया मोड़ पर आ कर रुकी. बाइक पर 3 व्यक्ति सवार थे. वे सड़क किनारे खड़े हो कर किसी के आने का इंतजार करने लगे. कुछ देर के बाद सामने से एक बाइक आती हुई दिखाई दी, जिस पर 2 लोग बैठे थे. इस से पहले कि मामला कुछ समझ में आता कि सड़क किनारे खड़े उन तीनों व्यक्तियों में से एक ने सामने से आती हुई उस बाइक को रोका. उस बाइक पर रामकुमार और उस का भतीजा मतोले बैठे थे, जो शिवपुरी बराखेमपुर में रहते थे.

जैसे ही रामकुमार ने बाइक की गति धीमी की, तभी उन तीनों में से एक व्यक्ति ने तमंचे से फायर कर दिया. गोली बाइक रामकुमार के लगी जिस से बाइक सहित वे दोनों लड़खड़ा कर गिर पड़े. उन के गिरते ही तीनों हमलावर घटनास्थल से फरार हो गए. यह घटना 25 दिसंबर, 2019 की है. रात काफी हो गई थी. मतोले ने उसी समय फोन कर के यह सूचना रामकुमार की पत्नी कमला को देते हुए कहा, ‘‘चाची, ज्ञानू ने अपने 2 साथियों राजा व अंकित के साथ चाचा रामकुमार पर हमला कर दिया है. उन के पेट में गोली लगी है. चाचा गोलइया मोड़ के पास घायल पड़े हैं.’’

यह खबर सुनते ही कमला फफक कर रो पड़ी. उस ने अपने जेठ यानी मतोले के पिता जयकरण व देवर दिनेश व अन्य परिवारजनों को यह जानकारी दे दी. घटनास्थल गांव से 4-5 सौ मीटर की दूरी पर था. इसलिए जल्द ही परिवार व मोहल्ले वाले घटनास्थल पर पहुंच गए. परिवारजन घायल रामकुमार कोे बाइक से बख्शी के तालाब तक ले आए, फिर वहां से वाहन द्वारा लखनऊ के केजीएमयू मैडिकल अस्पताल ले गए. रामकुमार की हालत गंभीर थी. उस के पेट में गोली लगने से खून ज्यादा मात्रा में बह चुका था, डाक्टरों की लाख कोशिशों के बाद भी रामकुमार को बचाया नहीं जा सका. मैडिकल कालेज में उपचार के दौरान उस की मृत्यु हो गई.

चूंकि मामला हत्या का था, इसलिए अस्पताल प्रशासन ने इस की सूचना स्थानीय थाना बख्शी का तालाब में दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी बृजेश सिंह, एसएसआई कुलदीप कुमार सिंह और एसआई योगेंद्र कुमार, अवनीश कुमार और सिपाही नितेश मिश्रा के साथ मैडिकल कालेज जा पहुंचे. डाक्टरों से बातचीत करने के बाद उन्होंने मृतक के परिजनों से पूछताछ की तो मतोले ने थानाप्रभारी को हमलावरों के नाम भी बता दिए. जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने रामकुमार का शव अस्पताल की मोर्चरी में भेज दिया. इस के बाद थानाप्रभारी रात में ही घटनास्थल पर पहुंच गए. रोशनी की व्यवस्था कर उन्होंने घटनास्थल से खून आलूदा मिट्टी से सबूत एकत्र किए.

अगले दिन 26 दिसंबर, 2019 को पोस्टमार्टम होने के बाद रामकुमार का शव उस के परिजनों को सौंप दिया. अंतिम संस्कार के बाद थानाप्रभारी ने रामकुमार की पत्नी कमला की ओर से ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू और राजा के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 120बी व एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. चूंकि मुकदमे में एससी/एसटी एक्ट की धारा भी लगी थी, इसलिए इस की जांच की जिम्मेदारी सीओ स्वतंत्र सिंह ने संभाली. पुलिस ने जांच शुरू की तो पता चला कि मृतक की पत्नी कमला का चरित्र ठीक नहीं था, इसलिए पुलिस ने कमला का मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया और उस से ज्ञान सिंह यादव का फोन नंबर भी प्राप्त कर लिया. पुलिस ने उन के नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.

घटना का चश्मदीद मृतक का भतीजा मतोले था, पूछताछ करने पर मतोले ने पुलिस को बताया कि पड़ोस की दूध की डेयरी पर काम करने वाले ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू ने उस से कई बार कहा कि तुम शहर में कामधंधे के लिए अपने चाचा रामकुमार के साथ न जाया करो, क्योंकि तुम्हारे चाचा से मेरी रंजिश चल रही है. उस ने अपने दोस्तों के साथ घेर कर चाचा को गोली मार दी. उधर पुलिस ने कमला और ज्ञान सिंह के फोन नंबरों की काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो इस बात की पुष्टि हो गई कि कमला और ज्ञान सिंह के बीच दाल में कुछ काला अवश्य है.

एसएसआई कुलदीप सिंह ने इस बारे में मतोले से पूछा तो उस ने हां में सिर हिला दिया. ऐसे में कमला से पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए 26 दिसंबर, 2019 की शाम एसएसआई कुलदीप सिंह अपने सहयोगियों एसआई अवनीश कुमार, हंसराज, महिला सिपाही श्रद्धा शंखधार, नेहा शर्मा को साथ ले कर कमला के घर पहुंचे. रात में पुलिस को अपने घर आया देख कर कमला सकपका गई. उस के चेहरे का रंग उतर गया. उस ने पूछा, ‘‘दरोगाजी, इतनी रात को घर आने का क्या मकसद है?’’

‘‘मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू से तुम्हारे पति रामकुमार की कोई रंजिश थी? मुझे पता चला है कि तुम्हारे पति पर ज्ञान सिंह ने ही भाड़े के लोगों के साथ हमला कराया था. पुलिस उसी की तलाश में गांव आई है.’’ एसएसआई ने कहा. यह कह कर एसएसआई ने कमला के दिमाग से शक का कीड़ा निकाल दिया, ताकि उसे लगे कि वह पुलिस के शक के दायरे में नहीं है. इस केस की जांच में सहयोग करने के लिए तुम्हें कल सुबह थाने आना होगा. इस पूछताछ में पुलिस को ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू व अंकित यादव के खिलाफ कुछ और तथ्य मिल गए.

अगले दिन पुलिस टीम ज्ञान सिंह यादव उर्फ ज्ञानू, अंकित आदि की तलाश में उन के घर गई तो वे घरों पर नहीं मिले. पता चला कि कमला भी अपने घर से फरार हो गई है. इस से पुलिस को पूरा विश्वास हो गया कि ये लोग इस अपराध से जुड़े हैं. इसलिए पुलिस ने तीनों के पीछे मुखबिर लगा दिए. मुखबिरों द्वारा पुलिस को पता चला कि कमला अपने प्रेमी ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू व उस के दोस्त अंकित यादव के साथ फरार होने के लिए गांव से निकल कर भगतपुरवा तिराहा, भाखामऊ रोड पर खड़ी है. कुछ ही देर में थाना बख्शी का तालाब से एक पुलिस टीम वहां पहुंच गई. वहीं से पुलिस ने कमला, ज्ञान सिंह और अंकित को गिरफ्तार कर लिया.

एक मुखबिर की सूचना पर एक अन्य आरोपी उत्तम कुमार को भैसामऊ क्रौसिंग से एक तमंचे व 2 कारतूस सहित गिरफ्तार कर लिया गया. थाने पहुंच कर कमला निडरता के साथ बोली, ‘‘दरोगाजी, हमें थाने बुला कर काहे बारबार परेशान कर रहे हैं.’’

इतना सुनते ही थानाप्रभारी बृजेश कुमार सिंह ने महिला सिपाही नेहा शर्मा और सिपाही शंखधार को बुला कर कहा, ‘‘इस औरत को हिरासत में ले लो. एक तो इस ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर अपने पति की हत्या करने की साजिश रची और ऊपर से स्वयं पतिव्रता बनने का नाटक कर रही है.’’

थानाप्रभारी ने हंसते हुए कमला से कहा, ‘‘परेशान न हो शाम तक तुम्हें घर वापस भेज दिया जाएगा. कुछ अधिकारी यहां आ रहे हैं, तुम उन्हें सचसच बता देना.’’

सीओ स्वतंत्र सिंह भी जांच हेतु थाने पहुंच गए. सूचना पा कर एसपी (ग्रामीण) आदित्य लंगेह भी थाना बख्शी का तालाब आ पहुंचे. चारों आरोपियों को अधिकारियों के सामने पेश किया गया. चारों आरोपियों ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि कमला के गांव के ही निवासी ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू से अवैध संबंध थे. उन्होंने ही रामकुमार को ठिकाने लगाया था. उन चारों से हुई पूछताछ के आधार पर रामकुमार हत्याकांड की गुत्थी सुलझ गई. पूछताछ में कमला और ज्ञान सिंह के अवैध संबंधों की जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार है—

लखनऊ से 20 किलोमीटर दूर लखनऊ-सीतापुर राजमार्ग के किनारे तहसील बख्शी का तालाब है. इसी क्षेत्र में गांव शिवपुरी बरा खेमपुर है. रामकुमार रावत का परिवार इसी गांव में रहता था. रामकुमार रावत अपने परिवार में सब से बड़ा था. उस के अन्य 2 भाई दिनेश (35 साल) व राजेश (30 साल) थे. रामकुमार का विवाह करीब 15 साल पहले मूसानगर के निकट कुरसी गांव की रहने वाले शिवचरण रावत की बेटी कमला के साथ हुआ था. उस के 2 बच्चे थे. रामकुमार लखनऊ के आसपास कामधंधे की तलाश में जाता रहता था. उस के पड़ोस में ही ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू रहता था, जो मूलरूप से शिवपुरी मानपुर लाला, थाना बख्शी का तालाब का रहने वाला था. ज्ञान सिंह अविवाहित था.

रामकुमार की पत्नी कमला की उम्र लगभग 40 वर्ष के आसपास रही होगी. कमला की एक बहन रामप्यारी शिवपुरी मानपुर लाला में रहती थी. निकटवर्ती रिश्तेदारी होने के कारण कमला का अपनी बहन के गांव शिवपुरी मानपुर लाला अकसर आनाजाना लगा रहता था. ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू अपने गांव में दूध की डेयरी का काम करता था. वह रोजाना अपने गांव से दूध इकट्ठा कर बाइक से बख्शी का तालाब कस्बे में बेचने के लिए आताजाता था. कमला की बहन रामप्यारी के कहने पर ज्ञान सिंह ने कमला के पति रामकुमार को अपने साथ दूध के काम पर लगा दिया. इस के बाद दूध इकट्ठा करने का काम रामकुमार करने लगा. बाद में वह दूध बेचने के लिए लखनऊ व निकटवर्ती इलाकों में निकल जाता था और दूध बेच कर शाम तक अपने गांव शिवपुरी बराखेमपुर लौट आता था.

रामकुमार की दिन भर की यही दिनचर्या थी. इस तरह कई सालों तक रामकुमार ज्ञान सिंह के साथ रह कर दूध बेचने का काम करता रहा. चूंकि ज्ञान सिंह और रामकुमार के गांवों में महज 3 किलोमीटर की दूरी थी. ज्ञान सिंह का रामकुमार के घर भी आनाजाना हो गया और धीरेधीरे रामकुमार ज्ञान सिंह का विश्वासपात्र बन गया. इसी दौरान ज्ञान सिंह की नजरें रामकुमार की पत्नी कमला पर जा टिकीं. रामकुमार दिन में जब दूध ले कर शहर को निकल जाता तो ज्ञान सिंह दोपहर के वक्त कमला के घर में बैठ कर उस से घंटों बतियाता. दरअसल वह उस के मन को टटोला करता था. कमला की नजरों ने ज्ञान सिंह के मन को भांप लिया कि वह क्या चाहता है. ज्ञान सिंह कमला को भाभी कहता था.

उम्र में वह कमला से काफी छोटा था. इसलिए दोनों में नजदीकियां काफी बढ़ गईं. वक्तजरूरत पर ज्ञान सिंह ने पैसे से मदद कर कमला का मन जीत लिया था. धीरेधीरे वह भी उस की तरफ आकर्षित होने लगी और कमला का झुकाव ज्ञान सिंह की तरफ हो गया था. फिर दोनों में करीबी रिश्ता बन गया. एक दिन कमला ने मौका देख कर ज्ञान सिंह से कहा, ‘‘तुम मेरे मकान के नजदीक खाली पड़े खंडहर में दूध की डेयरी का काम क्यों नहीं शुरू कर देते. तुम्हारे भाईसाहब को भी शिवपुरी मानपुर लाला से जा कर रोजाना दूध लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उन्हें भी आसानी हो जाएगी. समय निकाल कर मैं भी दूध की डेयरी पर हाथ बंटा दिया करूंगी. बच्चों का खर्च उठाने के लिए मुझे भी धंधा मिल जाएगा.’’

कमला की बात सुन कर ज्ञान सिंह हंसते हुए बोला, ‘‘अच्छा तो यह बात है. मैं अपने रिश्तेदार अंकित यादव से इस बारे में बात करूंगा.’’

ज्ञान सिंह उर्फ ज्ञानू अंकित यादव का रिश्तेदार था. उस के अंकित के परिवार से अच्छे संबंध थे. ज्ञान सिंह ने अंकित के सामने यह प्रस्ताव रखा कि वह शिवपुरी बरा खेमपुर में दूध की डेयरी खोलना चाहता है. अंकित ने ज्ञान सिंह के प्रस्ताव को सुन कर हामी भर ली और शिवपुरी बरा खेमपुर में रामकुमार के आवास के पास ही दूध की डेयरी खोल ली और दूध के कारोबार की जिम्मेदारी कमला के पति रामकुमार को सौंप दी. कमला ज्ञान सिंह की इस पहल से काफी खुश थी. गांव में दूध की डेयरी खुल जाने के बाद कमला और ज्ञान सिंह की नजदीकियां बढ़ गईं तो दोनों ने इस का भरपूर फायदा उठाया. रामकुमार भी पहले से अधिक ज्ञान सिंह की डेयरी पर समय बिताने लगा. रामकुमार ज्ञान सिंह की काली करतूतों से अनजान था.

धीरेधीरे ज्ञान सिंह और कमला की नजदीकियों की चर्चा रामकुमार के कानों तक पहुंच गई. पहले तो रामकुमार ने इन चर्चाओं पर विश्वास नहीं किया. उस ने कहा कि जब तक वह आंखों से देख नहीं लेगा, विश्वास नहीं करेगा. लेकिन फिर एक दिन कमला और ज्ञान सिंह को रामकुमार ने अपने ही घर में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस समय रामकुमार कमला से कुछ नहीं बोला लेकिन रात का खाना खा कर रामकुमार ने फुरसत के क्षणों में कमला से पूछा, ‘‘क्यों, मैं जो कुछ सुन रहा हूं और जो कुछ मैं ने अपनी आंखों से देखा, वह सच है?’’

चतुर कमला ने दोटूक जवाब देते हुए ज्ञान सिंह से अपने संबंधों की बात नकार दी. लेकिन रामकुमार के मन में संदेह का बीज पनपते ही घर में कलह की नींव पड़ गई. धीरेधीरे उस का मन ज्ञान सिंह की डेयरी पर काम करने को ले कर उचटने लगा. मन में दरार पड़ते ही उस ने ज्ञान सिंह से साफ कह दिया कि उस की पत्नी और उस के बीच जो कुछ भी चल रहा है, वह उस के जीवन में जहर घोल रहा है. उस ने ज्ञान सिंह से उस की डेयरी पर काम करने के लिए न केवल इनकार कर दिया, बल्कि ज्ञान सिंह की डेयरी पर काम भी छोड़ दिया. दोनों की दोस्ती कमला को ले कर दुश्मनी में बदल गई. यह बात ज्ञान सिंह और कमला को अच्छी नहीं लगी. कमला ने पति से कहा कि उस ने ज्ञान सिंह का कारोबार छोड़ कर दुश्मनी मोल ले ली है,

लेकिन रामकुमार ने उस की एक नहीं सुनी. इतना ही नहीं, उस ने पत्नी कमला पर दबाव बना कर पत्नी की तरफ से ज्ञान सिंह के खिलाफ थाना बख्शी का तालाब में एससी/एसटी एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करवा दी. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद ज्ञान सिंह की बदनामी हुई तो कुछ लोगों ने गांव में ही दोनों का फैसला करा दिया. ज्ञान सिंह की दूध की डेयरी पर काम बंद करने एवं थाने में शिकायत दर्ज कराने को ले कर ज्ञान सिंह के मन में काफी खटास पैदा हो गई थी. दूसरे, दूध की डेयरी की जिम्मेदारी भी ज्ञान सिंह पर स्वयं आ पड़ी. रामकुमार ने भी अपनी मेहनतमजदूरी के वास्ते शहर जा कर काम ढूंढ लिया. पुलिस की जानकारी में आया कि एक बार ज्ञान सिंह ने शहर के एक अज्ञात व्यक्ति द्वारा रामकुमार पर हमला करवा दिया था. उस दिन से रामकुमार और ज्ञान सिंह दोनों एकदूसरे के कट्टर दुश्मन बन गए. उस दिन घर लौट कर रामकुमार ने कमला को खूब खरीखोटी सुनाई थी.

रामकुमार ने कमला को हिदायत देते हुए ज्ञान सिंह ने दूर रहने की चेतावनी दे दी. ऐसा न करने पर उस ने अंजाम भुगतने की धमकी भी दी. लेकिन दोनों में से कोई भी रामकुमार की हिदायतों को मानने के लिए तैयार नहीं था. इधर कमला की भी मजबूरी थी. वह ज्ञान सिंह द्वारा वक्तवक्त पर आर्थिक मदद के कारण उस के दबाव और अहसानों से दबती चली गई. रामकुमार इस बात से बिलकुल अंजान था. कमला ने ज्ञान सिंह से ली हुई रकम को चुकता करने के लिए डेयरी पर आनेजाने का सिलसिला जारी रखा. वह चाहती थी कि ज्ञान सिंह की दूध की डेयरी पर अधिक से अधिक दिनों तक काम कर के उस की ली हुई आर्थिक मदद में उधार की रकम की देनदारी को चुकता कर दे.

रामकुमार को कमला का उस की डेयरी पर आनाजाना बिलकुल नहीं भाता था. लेकिन कमला ने पति की चिंता नहीं की. वह पति से ज्यादा प्रेमी ज्ञान सिंह को चाहती थी. इस की एक वजह यह थी कि ज्ञान सिंह उच्च जाति का धनवान व्यक्ति था. रामकुमार से अनबन कर लेने पर उसे कोई नुकसान नहीं था, लेकिन ज्ञान सिंह से अलग हो जाने पर गृहस्थी का सारा खेल बिगड़ सकता था. इसी वजह से कमला ने ज्ञान सिंह से मिलनाजुलना जारी रखा. रामकुमार मन ही मन कुढ़ता रहता और रोजाना घर में कलह होती रहती. पति के चाहते हुए भी कमला ज्ञान सिंह को अपनी जिंदगी से दूर करने का विकल्प नहीं ढूंढ पा रही थी.

ज्ञान सिंह ने एक दिन कमला से कहा, ‘‘भाभी, पानी सिर से ऊपर हो चुका है. अब एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं. तुम ही बताओ कुछ न कुछ तो करना होगा.’’

कमला ने कहा, ‘‘तुम ही बताओ, कौन सा रास्ता निकाला जाए.’’

ज्ञान सिंह ने कमला से मिल कर अपने मन की छिपी हुई बात बताते हुए कहा कि तुम्हारे पास मेरी जो 20 हजार रुपए की रकम है, वह तुम्हें वापस करनी थी. उन में से अब 13 हजार रुपए देने होंगे और रामकुमार को किराए के लोगों से बुला कर शाम के समय लखनऊ से गांव लौटते समय रास्ते से हटा देंगे. इस प्रस्ताव को सुन कर कमला भी खुश हो गई. उस ने ज्ञान सिंह को रजामंदी दे दी, फिर ज्ञान सिंह ने कमला के साथ मिल कर षडयंत्रपूर्वक एक योजना बना ली. तब ज्ञान सिंह ने कमला के पति रामकुमार को रास्ते से हटाने के लिए अंकित यादव को इस वारदात के लिए राजी कर लिया. ज्ञान सिंह ने उस से और किराए के आदमी जुटाने को कहा.

तब अंकित यादव ने रामकुमार की हत्या के लिए 20 हजार रुपए में सौदेबाजी पक्की कर ली. इस काम के लिए उस ने राजा, निवासी बरगदी, के.डी. उर्फ कुलदीप सिंह निवासी बख्शी का तालाब, उत्तम कुमार निवासी अस्ती रोड, गांव मूसानगर को तैयार किया. राजा के कहने पर कमला और ज्ञान सिंह ने 13 हजार रुपए अंकित यादव को सौंप दिए और 7 हजार रुपए काम हो जाने के बाद देने का वादा कर लिया गया. सभी ने तय किया कि 25 दिसंबर, 2019 को लखनऊ से आते समय भखरामऊ गोलइया मोड़ पर रामकुमार की हत्या को अंजाम दिया जाएगा. योजना के अनुसार 25 दिसंबर, 2019 की शाम को के.डी. सिंह के साथ राजा और उस के साथी पहुंच गए. राजा ने रामकुमार पर बाइक से आते समय तमंचे से हमला कर दिया. उस समय बाइक रामकुमार स्वयं चला रहा था और उस का भतीजा मतोले पीछे बैठा हुआ था.

पुलिस को अभी 2 अभियुक्तों राजा व कुलदीप सिंह की तलाश थी. पुलिस द्वारा मुखबिरों का जाल फैला दिया गया था. मुखबिर की सूचना पर 3 जनवरी, 2020 को राजा व कुलदीप दोनों को मय तमंचे और बाइक के साथ गिरफ्तार कर लिया गया. राजा ने पुलिस के साथ जा कर हमले में उपयोग किया गया तमंचा बरामद करा दिया. पुलिस ने अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

 

Agra Crime : पति की लाश को संदूक में बंद कर यमुना में फेंका

Agra Crime : पतिपत्नी के रिश्ते कितने भी मधुर क्यों न हों, अगर उन के बीच ‘वो’ आ जाए तो न केवल रिश्तों का माधुर्य बिखर जाता है बल्कि किसी एक को मिटाने की भूमिका भी बन जाती है. हरिओम और बबली के साथ भी यही हुआ. इन के रिश्तों में जब कमल की एंट्री हुई तो…

मानने वाले प्रेमीप्रेमिका और पतिपत्नी का रिश्ता सब से अजीम मानते हैं. लेकिन जबजब ये रिश्ते आंतरिक संबंधों की महीन रेखा को पार करते हैं, तबतब कोई न कोई संगीन जुर्म सामने आता है. हरिओम तोमर मेहनतकश इंसान था. उस की शादी थाना सैंया के शाहपुरा निवासी निहाल सिंह की बेटी बबली से हुई थी. हरिओम के परिवार में उस की पत्नी बबली के अलावा 4 बच्चे थे. हरिओम अपनी पत्नी बबली और बच्चों से बेपनाह मोहब्बत करता था. बेटी ज्योति और बेटा नमन बाबा राजवीर के पास एत्मादपुर थानांतर्गत गांव अगवार में रहते थे, जबकि 2 बेटियां राशि और गुड्डो हरिओम के पास थीं. राजवीर के 2 बेटों में बड़ा बेटा राजू बीमारी की वजह से काम नहीं कर पाता था. बस हरिओम ही घर का सहारा था, वह चांदी का कारीगर था.

हरिओम और बबली की शादी को 15 साल हो चुके थे. हंसताखेलता परिवार था, घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया.  3 नवंबर, 2019 की रात में हरिओम अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ घर से लापता हो गया. पिछले 12 साल से वह आगरा में रह रहा था. 36 वर्षीय हरिओम आगरा स्थित चांदी के एक कारखाने में चेन का कारीगर था. पहले वह बोदला में किराए पर रहता था. लापता होने से 20 दिन पहले ही वह पत्नी बबली व दोनों बच्चियों राशि व गुड्डो के साथ आगरा के थानांतर्गत सिकंदरा के राधानगर इलाके में किराए के मकान में रहने लगा था.

आगरा में ही रहने वाली हरिओम की साली चित्रा सिंह 5 नवंबर को अपनी बहन बबली से मिलने उस के घर गई. वहां ताला लगा देख उस ने फोन से संपर्क किया, लेकिन दोनों के फोन स्विच्ड औफ थे. चित्रा ने पता करने के लिए जीजा हरिओम के पिता राजबीर को फोन कर पूछा, ‘‘दीदी और जीजाजी गांव में हैं क्या?’’

इस पर हरिओम के पिता ने कहा कि कई दिन से हरिओम का फोन नहीं मिल रहा है. उस की कोई खबर भी नहीं मिल पा रही. चित्रा ने बताया कि मकान पर ताला लगा है. आसपास के लोगों को भी नहीं पता कि वे लोग कहां गए हैं. किसी अनहोनी की आशंका की सोच कर राजबीर गांव से राधानगर आ गए. उन्होंने बेटे और बहू की तलाश की, लेकिन उन की कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर पिता राजबीर ने 6 नवंबर, 2019 को थाना सिकंदरा में हरिओम, उस की पत्नी और बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करा दी. जांच के दौरान हरिओम के पिता राजबीर ने थाना सिकंदरा के इंसपेक्टर अरविंद कुमार को बताया कि उस की बहू बबली का चालचलन ठीक नहीं था. उस के संबंध कमल नाम के एक व्यक्ति के साथ थे, जिस के चलते हरिओम और बबली के बीच आए दिन विवाद होता था.

पुलिस ने कमल की तलाश की तो पता चला कि वह भी उसी दिन से लापता है, जब से हरिओम का परिवार लापता है. पुलिस सरगरमी से तीनों की तलाश में लग गई. इस कवायद में पुलिस को पता चला कि बबली सिकंदरा थानांतर्गत दहतोरा निवासी कमल के साथ दिल्ली गई है. उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस की एक टीम दिल्ली के लिए रवाना हो गई. शनिवार 16 नवंबर, 2019 को बबली और उस के प्रेमी कमल को पुलिस ने दिल्ली में पकड़ लिया. दोनों बच्चियां भी उन के साथ थीं, पुलिस सब को ले कर आगरा आ गई. आगरा ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो मामला खुलता चला गया. पता चला कि 3 नवंबर की रात हरिओम रहस्यमय ढंग से लापता हो गया था. पत्नी और दोनों बच्चे भी गायब थे. कमल उर्फ करन के साथ बबली के अवैध संबंध थे. वह प्रेमी कमल के साथ रहना चाहती थी.

इस की जानकारी हरिओम को भी थी. वह उन दोनों के प्रेम संबंधों का विरोध करता था. इसी के चलते दोनों ने हरिओम का गला दबा कर हत्या कर दी थी. बबली की बेहयाई यहीं खत्म नहीं हुई. उस ने कमल के साथ मिल कर पति की गला दबा कर हत्या दी थी. बाद में दोनों ने शव एक संदूक में बंद कर यमुना नदी में फेंक दिया था. पूछताछ और जांच के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

फरवरी, 2019 में बबली के संबंध दहतोरा निवासी कमल उर्फ करन से हो गए थे. कमल बोदला के एक साड़ी शोरूम में सेल्समैन का काम करता था. बबली वहां साड़ी खरीदने जाया करती थी. सेल्समैन कमल बबली को बड़े प्यार से तरहतरह के डिजाइन और रंगों की साडि़यां दिखाता था. वह उस की सुंदरता की तारीफ किया करता था. उसे बताता था कि उस पर कौन सा रंग अच्छा लगेगा. कमल बबली की चंचलता पर रीझ गया. बबली भी उस से इतनी प्रभावित हुई कि उस की कोई बात नहीं टालती थी. इसी के चलते दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे. अब जब भी बबली उस दुकान पर जाती, तो कमल अन्य ग्राहकों को छोड़ कर बबली के पास आ जाता.

वह मुसकराते हुए उस का स्वागत करता फिर इधरउधर की बातें करते हुए उसे साड़ी दिखाता. कमल आशिकमिजाज था, उस ने पहली मुलाकात में ही बबली को अपने दिल में बसा लिया था. नजदीकियां बढ़ाने के लिए उस ने बबली से फोन पर बात करनी शुरू कर दी. जब दोनों तरफ से बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो नजदीकियां बढ़ती गईं. फोन पर दोनों हंसीमजाक भी करने लगे. फिर उन की चाहत एकदूसरे से गले मिलने लगी. बातोंबातों में बबली ने कमल को बताया कि वह बोदला में ही रहती है. इस के बाद कमल बबली के घर आनेजाने लगा. जब एक बार दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूटी तो फिर यह सिलसिला सा बन गया. जब भी मौका मिलता, दोनों एकांत में मिल लेते थे.

हरिओम की अनुपस्थिति में बबली और कमल के बीच यह खेल काफी दिनों तक चलता रहा. लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं, एक दिन हरिओम को भी भनक लग गई. उस ने बबली को कमल से दूर रहने और फोन पर बात न करने की चेतावनी दे दी. दूसरी ओर बबली कमल के साथ रहना चाहती थी. उस के न मानने पर वह घटना से 20 दिन पहले बोदला वाला घर छोड़ कर सपरिवार सिकंदरा के राधानगर में रहने लगा. 3 नवंबर, 2019 को हरिओम शराब पी कर घर आया. उस समय बबली मोबाइल पर कमल से बातें कर रही थी. यह देख कर हरिओम के तनबदन में आग लग गई. इसी को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ तो हरिओम ने बबली की पिटाई कर दी.

बबली ने इस की जानकारी कमल को दे दी. कमल ने यह बात 100 नंबर पर पुलिस को बता दी. पुलिस आई और रात में ही पतिपत्नी को समझाबुझा कर चली गई. पुलिस के जाने के बाद भी दोनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ, दोनों झगड़ा करते रहे. रात साढे़ 11 बजे बबली ने कमल को दोबारा फोन कर के घर आने को कहा. जब वह उस के घर पहुंचा तो हरिओम उस से भिड़ गया. इसी दौरान कमल ने गुस्से में हरिओम का सिर दीवार पर दे मारा. नशे के चलते वह कमल का विरोध नहीं कर सका. उस के गिरते ही बबली उस के पैरों पर बैठ गई और कमल ने उस का गला दबा दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद हरिओम की मौत हो गई. उस समय दोनों बच्चियां सो रही थीं. कमल और बबली ने शव को ठिकाने लगाने के लिए योजना तैयार कर ली. दोनों ने शव को एक संदूक में बंद कर उसे फेंकने का फैसला कर लिया, ताकि हत्या के सारे सबूत नष्ट हो जाएं.

योजना के तहत दोनों ने हरिओम की लाश एक संदूक में बंद कर दी. रात ढाई बजे कमल टूंडला स्टेशन जाने की बात कह कर आटो ले आया. आटो से दोनों यमुना के जवाहर पुल पर पहुंचे. लाश वाला संदूक उन के साथ था. इन लोगों ने आटो को वहीं छोड़ दिया. सड़क पर सन्नाटा था, कमल और बबली यू टर्न ले कर कानपुर से आगरा की तरफ आने वाले पुल पर पहुंचे और संदूक उठा कर यमुना में फेंक दिया. इस के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. दूसरे दिन 4 नवंबर को सुबह कमल बबली और उस की दोनों बच्चियों को साथ ले कर दिल्ली भाग गया.

बबली की बेवफाई ने हंसतेखेलते घर को उजाड़ दिया था. उस ने पति के रहते गैरमर्द के साथ रिश्ते बनाए. यह नाजायज रिश्ता उस के लिए इतना अजीज हो गया कि उस ने अपने पति की मौत की साजिश रच डाली. पुलिस 16 नवंबर को ही कमल व बबली को ले कर यमुना किनारे पहुंची. उन की निशानदेही पर पीएसी के गोताखोरों को बुला कर कई घंटे तक यमुना में लाश की तलाश कराई गई, लेकिन लाश नहीं मिली. अंधेरा होने के कारण लाश ढूंढने का कार्य रोकना पड़ा. रविवार की सुबह पुलिस ने गोताखोरों और स्टीमर की मदद से लाश को तलाशने की कोशिश की. लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला.

बहरहाल, पुलिस हरिओम का शव बरामद नहीं कर सकी. शायद बह कर आगे निकल गया होगा. पुलिस ने बबली और उस के प्रेमी कमल को न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime : शादी के लिए गर्लफ्रेंड नहीं मानी, तो मार डाला

Love Crime : ससुरालियों से खटपट हो जाने के बाद आराधना अपने दोनों बच्चों को ले कर मायके आ गई. फिर एकाउंटेंट की नौकरी करने के दौरान उसे प्रवीण कुमार से प्यार हो गया. इस से पहले कि प्रवीण उस से शादी कर पाता, आराधना का झुकाव शोएब की तरफ हो गया. आराधना की यह गुस्ताखी प्रवीण को इतनी नागवार लगी कि…

उस दिन दिसंबर 2019 की 16 तारीख थी, रात के 9 बज रहे थे. रामप्रकाश गौतम बेहद परेशान थे. वह घर के अंदर चहलकदमी कर रहे थे. कभी उन की निगाह कमरे की दीवार घड़ी पर टिक जाती तो कभी दरवाजे की ओर. दरअसल वह अपनी बेटी के लिए परेशान हो रहे थे. उन की 35 वर्षीय बेटी आराधना गौतम किदवई नगर स्थित जैन ट्रेडिंग कंपनी में एकाउंटेंट थी. वह हर हाल में 8 बजे तक घर आ जाती थी, किंतु उस दिन तो रात के 9 बज गए, उस का कुछ अतापता नहीं था. वह उस के मोबाइल फोन पर कई बार काल कर चुके थे. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन वह रिसीव नहीं कर रही थी.

ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, त्योंत्यों रामप्रकाश गौतम की चिंता बढ़ती जा रही थी. आखिर जब उन के सब्र का बांध टूट गया तो रात 10 बजे उन्होंने अपने साले रामकुमार तथा भाई रमन गौतम को घर बुला लिया. उन्होंने उन्हें आराधना के घर वापस न आने के बारे में बताया तो वह भी चिंतित हो उठे. आपस में विचारविमर्श कर के रामप्रकाश ने पुलिस कंट्रोलरूम को सूचना दी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद पुलिस तातियागंज, कानपुर स्थित उन के घर पहुंच गई. रामप्रकाश ने पुलिस को बेटी के संबंध में जानकारी दी तो पुलिसकर्मियों ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि मामला किदवई नगर थाना क्षेत्र का है. अत: किदवई नगर थाने जा कर रिपोर्ट दर्ज कराएं.

इस पर रात 11 बजे रामप्रकाश गौतम अपने भाई रमन तथा साले रामकुमार के साथ थाना किदवईनगर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश पाठक उस समय थाने पर ही मौजूद थे. उन्होंने थानाप्रभारी को अपनी बेटी के अभी तक घर न लौटने की जानकारी दी. चूंकि मामला एक महिला एकाउंटेंट के लापता होने का था, अत: थानाप्रभारी राजेश पाठक ने आराधना गौतम की गुमशुदगी दर्ज कर ली और उस की खोज में जुट गए. उन्होंने रामप्रकाश से आराधना का फोन नंबर लिया फिर उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. डिटेल्स में उस के फोन की अंतिम लोकेशन कल्याणपुर थाना क्षेत्र के शताब्दी नगर की मिली. राजेश पाठक आराधना के घर वालों के साथ रात में ही कल्याणपुर पहुंचे और आराधना के संबंध में वहां के थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय को जानकारी दी.

मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी राजेश पाठक तथा थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय फोर्स के साथ शताब्दी नगर पहुंचे और उन्होंने वहां स्थित मोबाइल टावर के 500 मीटर की परिधि में आराधना की खोजबीन शुरू की. लेकिन उस का पता नहीं चला. दरअसल, उस समय आराधना के मोबाइल फोन का इंटरनेट बंद था, जिस से पुलिस को उस के फोन की वास्तविक लोकेशन नहीं मिल पा रही थी. इंसपेक्टर राजेश पाठक ने कई बार आराधना का नंबर अपने मोबाइल फोन से मिलाया तो उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन रिसीव नहीं हो रहा था. पुलिस ने उस के परिजनों के संग सुबह 4 बजे तक आराधना की तलाश की लेकिन सफलता नहीं मिली. तब पुलिस लौट गई.

सुबह 5 बजे रामप्रकाश गौतम भाई रमन के साथ घर पहुंचे तो उन की पत्नी रमा गौतम परिवार की अन्य महिलाओं के साथ दरवाजे पर ही बैठी थीं. उन्होंने पूरी रात आराधना के इंतजार में ही गुजार दी थी. रामप्रकाश को देखते ही रमा गौतम ने पूछा, ‘‘मेरी बेटी का कुछ पता चला?’’

जवाब में नहीं सुनते ही वह फफक पड़ीं. रामप्रकाश ने उन्हें धैर्य बंधाया कि बेटी का पता जल्द ही लग जाएगा. इधर सुबह 10 बजे के लगभग कुछ लोग शताब्दी नगर स्थित जवाहरपुरम पार्क पहुंचे तो उन्होंने पार्क के अंदर झाडि़यों के बीच एक महिला का शव पड़ा देखा. उन्हीं लोगों में से किसी ने इस की सूचना उसी समय थाना कल्याणपुर को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी अश्विनी कुमार पांडेय जवाहरपुरम पार्क पहुंच गए. उन्होंने एक महिला का शव पाए जाने की खबर पहले अधिकारियों को दी फिर थाना किदवई नगर पुलिस को भी सूचित कर दिया. क्योंकि उन के थाना क्षेत्र से आराधना गौतम नाम की युवती भी लापता थी.

सूचना पाते ही एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, सीओ (कल्याणपुर) अजय कुमार तथा किदवई नगर थानाप्रभारी राजेश पाठक आराधना के पिता रामप्रकाश गौतम को साथ ले कर घटनास्थल पर आ गए. रामप्रकाश गौतम ने झाडि़यों में पड़े शव को देखा तो वह शव देखते ही फफक पडे़ और बोले, ‘‘सर, यह शव हमारी बेटी आराधना का है. पता नहीं इसे किस ने बेरहमी से मार डाला.’’ इस के बाद तो रामप्रकाश के घर में कोहराम मच गया. पुलिस अधिकारियों ने रामप्रकाश गौतम को धैर्य बंधाया फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका के गले पर खरोंच का निशान था, जिस से स्पष्ट था कि उस की हत्या रस्सी या तार से गला कस कर की गई थी.

शव से कुछ दूरी पर मृतका के कान की एक बाली पड़ी थी तथा दूसरी उस के कान में ही थी. कुछ चूडि़यां भी टूटी हुई थीं तथा उस का पर्स भी पार्क में पड़ा था. निरीक्षण में पार्क की घास से साफ दिखाई दे रहा था कि शव घसीट कर झाडि़यों तक ले जाया गया है. मौकामुआयना करने से यही लग रहा था कि आराधना ने मृत्यु से पहले हत्यारे से संघर्ष किया होगा. पुलिस अधिकारियों ने यह भी अनुमान लगाया कि हत्यारा मृतका का अति करीबी रहा होगा, जिस के साथ वह यहां तक आई. उस करीबी का इरादा सिर्फ आराधना की हत्या का ही रहा. क्योंकि उस ने उस के आभूषणों पर हाथ नहीं लगाया था. पुलिस ने मौके से सबूत अपने कब्जे में ले लिए. इस के बाद जरूरी काररवाई कर शव पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय चिकित्सालय भिजवा दिया.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने महिला एकाउंटेंट आराधना गौतम की हत्या के मामले को बेहद गंभीरता से लिया और खुलासे की जिम्मेदारी किदवई नगर थानाप्रभारी राजेश पाठक को सौंपी. उन्होंने स्वयं भी किदवई नगर थाने में डेरा डाल दिया. श्री पाठक ने आराधना की गुमशुदगी भादंवि की धारा 302 में तरमीम कर दी. फिर वह जांच में जुट गए. उन्होंने सब से पहले जैन ट्रेडर्स के कर्मचारियों को जांच के दायरे में लिया, जहां आराधना गौतम काम करती थी. श्री पाठक ने मालिक से ले कर कर्मचारियों तक से पूछताछ की, जिस से पता चला कि आराधना गौतम पिछले 3 साल से यहां काम कर रही थी. वह समय से काम पर आती थी और समय से घर जाती थी. कंपनी के किसी कर्मचारी से उस की कहासुनी तक नहीं हुई थी.

जैन टे्रडर्स के यहां जांचपड़ताल के दौरान 2 बातें चौंकाने वाली सामने आईं. एक तो यह कि 16 दिसंबर को आराधना गौतम किसी का फोन आने के बाद शाम सवा 6 बजे औफिस से निकली थी. दूसरा यह कि पिछले कुछ दिनों से आराधना का झुकाव फर्म के कर्मचारी शोएब की ओर बढ़ गया था. इस बाबत थानाप्रभारी ने शोएब से पूछताछ की तो उस ने स्वीकार किया कि दोनों के बीच दोस्ती तो थी, लेकिन हत्या से उस का कोई वास्ता नहीं है. फर्म में पूछताछ के बाद थानाप्रभारी राजेश पाठक ने मृतका के पिता रामप्रकाश गौतम को थाना किदवई नगर बुलाया और उन का बयान दर्ज किया. रामप्रकाश ने बताया कि उन्होंने आराधना का विवाह दौलतपुर (कानपुर देहात) गांव निवासी धर्मेंद्र गौतम के साथ किया था.

धर्मेंद्र केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) का जवान था. वह आराधना को दहेज के लिए मारतापीटता था, जिस से आराधना अपने 2 बच्चों के साथ मायके में आ कर रहने लगी थी. उस ने पति पर दहेज उत्पीड़न तथा भरणपोषण का मामला दर्ज करवाया था. धर्मेंद्र गौतम इस समय छत्तीसगढ़ में तैनात है. उस ने पत्नी के रहते दूसरी शादी भी रचा ली. आराधना उस के वैवाहिक जीवन में बाधा न बने तथा मुकदमे से छुटकारा मिल जाए, इसलिए धर्मेंद्र ने ही अपने मामा प्रकाश व जयशंकर के साथ मिल कर आराधना की हत्या की है. रामप्रकाश के बयान के आधार पर थानाप्रभारी राजेश पाठक ने जांच आगे बढ़ाई और आराधना के पति धर्मेंद्र गौतम से संपर्क साधने का प्रयास किया लेकिन न तो धर्मेंद्र से संपर्क हो सका और न उस के मामा प्रकाश व जयशंकर से, क्योंकि दोनों फरार थे.

एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने मृतका के पर्स की जामातलाशी कराई. उस के पर्स में 2 मोबाइल फोन, कुछ नकदी, चाबी तथा साजशृंगार का सामान मिला. उन में से एक मोबाइल चालू हालत में था. पुलिस ने उस की काल डिटेल्स निकलवाई. इस काल डिटेल्स में एक संदिग्ध नंबर मिला. उस नंबर की जांच की गई तो पता चला कि वह नंबर राजेंद्र का है. थानाप्रभारी राजेश पाठक ने राजेंद्र को उस के घर से दबोचा और उसे पूछताछ के लिए थाना किदवई नगर ले आए. थाने आतेआते राजेंद्र कांपने लगा था. उस ने सहज ही बता दिया कि उस के मोबाइल फोन से उस के दोस्त प्रवीण ने किसी महिला को फोन किया था. प्रवीण तातियागंज (चौबेपुर) थाना क्षेत्र के मालौगांव में रहता है और बस ड्राइवर है. वह उस के बारे में और कुछ ज्यादा नहीं जानता.

थानाप्रभारी राजेश पाठक ने प्रवीण को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर मालौगांव छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. पुलिस ने तब उस के कई खास रिश्तेदारों के घर दबिश दी, पर प्रवीण हाथ नहीं आया. तब पुलिस ने उस की टोह में एक खास मुखबिर लगा दिया. 18 दिसंबर, 2019 को इस खास मुखबिर ने थानाप्रभारी राजेश पाठक को जानकारी दी कि प्रवीण कुमार इस समय गौशाला (जुही) टैंपों स्टैंड पर मौजूद है. चूंकि मुखबिर की सूचना अतिमहत्त्वपूर्ण थी, इसलिए थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ गौशाला टैंपो स्टैंड पहुंच गए. पुलिस जीप रुकते ही वहां खड़ा एक युवक मोटरसाइकिल स्टार्ट कर भागने लगा. तभी पुलिस ने उसे दबोच लिया. उस ने अपना नाम प्रवीण कुमार बताया. पुलिस उसे थाने ले आई.

पुलिस ने जब प्रवीण से आराधना गौतम की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गया. लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गया और हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने मोटरसाइकिल के बैग से वह रस्सी भी बरामद करा दी, जिस से उस ने आराधना का गला घोंटा था. पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मोटरसाइकिल तथा रस्सी अपने कब्जे में ले ली. पुलिस पूछताछ में प्रवीण ने बताया कि वह आराधना से प्रेम करता था और उस से शादी करना चाहता था. आराधना भी राजी हो गई थी, लेकिन जब उस का एक्सीडेंट हो गया तो वह उस से कतराने लगी. इतना ही नहीं, उस ने फोन पर बात करनी भी बंद कर दी, तब उसे आराधना पर शक हुआ. उस ने गुप्तरूप से जानकारी जुटाई तो पता चला कि वह किसी और से प्यार करने लगी है. यही बात उसे चुभ गई.

इस के बाद उस ने निश्चय कर लिया कि यदि आराधना उस की नहीं होगी तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा. फाइनल बात करने को उस ने घटना वाली शाम दोस्त राजेंद्र के फोन से बात कर आराधना को बुलाया. फिर मोटरसाइकिल पर बिठा कर उसे जवाहरपुरम पार्क ले गया. वहां शादी को ले कर दोनों के बीच झगड़ा हुआ. वह शादी को राजी नहीं हुई तो उस ने गला घोंट कर आराधना को मार दिया. एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने भी प्रवीण कुमार से पूछताछ की, फिर आननफानन में थाना किदवई नगर में ही प्रैसवार्ता आयोजित कर प्रवीण को मीडिया के समक्ष पेश कर घटना का खुलासा किया.

चूंकि प्रवीण कुमार ने आराधना गौतम की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और हत्या में प्रयुक्त रस्सी भी बरामद करा दी थी, अत: थानाप्रभारी राजेश पाठक ने प्रवीण कुमार को आराधना की हत्या के जुर्म में भादंवि की धारा 302 के तहत विधिसम्मत बंदी बना लिया. प्रवीण के बयानों के आधार पर प्रेमिका की बेवफाई की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई. उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर जीटी रोड पर एक कस्बा मंधना पड़ता है. इसी से सटा हुआ तातियागंज है. तातियागंज पहले गांव था, लेकिन जैसेजैसे मंधना का विकास होता गया, यह गांव कस्बा के समीप आता गया. इस तातियागंज में लिपस्टिक तथा अन्य सौंदर्य प्रसाधन बनाने वाली कई फैक्ट्रियां हैं, जहां ज्यादातर महिलाएं काम करती हैं.

तातियागंज में ही रामप्रकाश गौतम अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा गौतम के अलावा 3 बच्चे थे, जिस में बेटी आराधना सब से छोटी थी. रामप्रकाश गौतम ट्रांसपोर्टर हैं. उन की आर्थिक स्थिति भी मजबूत है. रामप्रकाश गौतम की बेटी आराधना बीकौम करने के बाद नौकरी के लिए प्रयासरत थी. वहीं उस के पिता रामप्रकाश गौतम उस के योग्य वर खोज रहे थे. रामप्रकाश की तमन्ना थी कि वह अपनी लाडली तथा खूबसूरत बेटी की शादी किसी संपन्न परिवार में ही करेंगे, ताकि उसे किसी प्रकार की कमी महसूस न हो. ऐसा संपन्न घरवर खोजने में रामप्रकाश को 3 साल लग गए. तब कहीं जा कर वह बेटी के योग्य लड़के की खोज कर पाए. लड़के का नाम था धर्मेंद्र गौतम उर्फ लालजी.

धर्मेंद्र के पिता दयाराम गौतम कानपुर देहात जिले के मैथा ब्लौक के गांव दौलतपुर के रहने वाले थे. उन के 4 बच्चों में धर्मेंद्र सब से छोटा था. धर्मेंद्र उर्फ लालजी पढ़ालिखा युवक था. वह सीआरपीएफ का जवान था. दयाराम गौतम के पास 10 बीघा खेती की जमीन थी, जिस में अच्छी उपज होती थी. कुल मिला कर उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. रामप्रकाश गौतम को घरवर पसंद आया तो वह आराधना की शादी धर्मेंद्र से करने को राजी हो गए. इस के बाद 6 अप्रैल, 2003 को आराधना की शादी धर्मेंद्र गौतम उर्फ लालजी के साथ धूमधाम से कर दी.

आराधना के मुकाबले धर्मेंद्र उम्र में बड़ा था. ऊपर से वह सांवला भी था. धर्मेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उसे इतनी सुंदर बीवी मिलेगी. उस से शादी कर के वह बहुत खुश था. आराधना ने अपनी समझदारी और काम से पति ही नहीं बल्कि सासससुर का मन भी जीत लिया था. हंसीखुशी से उस की गृहस्थी को 7 साल बीत गए. इन 7 सालों में आराधना एक बेटा अभय तथा एक बेटी सुप्रिया की मां बन चुकी थी. बच्चों के जन्म से परिवार की खुशियां दूनी हो गई थीं. धर्मेंद्र गौतम की ड्यूटी एक राज्य से दूसरे राज्य में लगती रहती थी. उसे जब छुट्टी मिलती थी, तभी घर आ पाता था. लेकिन छुट्टियां खत्म होने के बाद जब वह अपनी ड्यूटी पर चला जाता तो आराधना को अपनी जिंदगी नीरस लगने लगती थी. उस का दिन तो बच्चों के कोलाहल में कट जाता था लेकिन रात बैरन बन जाती थी.

इन्हीं दिनों पति, सास व ससुर का व्यवहार भी आराधना के प्रति बदल गया, जिस से वह और भी परेशान रहने लगी. सासससुर उसे बातबेबात प्रताडि़त करते थे. मकान के निर्माण हेतु उस पर मायके से पैसा लाने का दबाव बनाते. उसे दहेज कम लाने के ताने भी दिए जाने लगे. मायके से रुपए न लाने पर आराधना को प्रताडि़त किया जाने लगा. आखिर जब आराधना आजिज आ गई तो उस ने पति का घर त्याग दिया और अपने दोनों बच्चों को साथ ले कर पिता के घर रहने लगी. आराधना को विश्वास था कि पति धर्मेंद्र बच्चों की खातिर उसे मनाने आएगा और अपने साथ ले जाएगा. लेकिन धर्मेंद्र ने ऐसा नहीं किया. वह आराधना को मनाने नहीं आया.

पति के इस रूखे व्यवहार से आराधना को गहरी ठेस पहुंची. उस ने पति व सासससुर को सबक सिखाने के लिए उन के खिलाफ कानपुर कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत दहेज उत्पीडन तथा भरणपोषण का मुकदमा कायम करा दिया. मुकदमा दर्ज कराने की जानकारी धर्मेंद्र को हुई तो आराधना के प्रति उस की नफरत और बढ़ गई. उस ने आराधना से समझौता करने के बजाए मुकदमा लड़ने का निश्चय किया. आराधना ने 3 साल तक इंतजार किया कि शायद धर्मेंद्र समझौते का प्रस्ताव लाएगा और उसे तथा बच्चों को साथ ले जाएगा. लेकिन धर्मेंद्र नहीं आया. तब आराधना ने बच्चों को पढ़ाने तथा उन के भविष्य को बनाने के लिए नौकरी करने का निश्चय किया. हालांकि आराधना तथा उस के बच्चों को पिता रामप्रकाश के घर पर हर प्रकार की सुविधा थी, फिर भी वह पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी. वह कोई नौकरी करना चाहती थी.

आराधना पढ़ीलिखी युवती थी. उस ने बीकौम कर रखी थी. एकाउंट की ट्रेनिंग भी उस ने की थी, अत: उसे नौकरी हासिल करने में ज्यादा समय नहीं गंवाना पड़ा. सन 2016 में उसे किदवई नगर स्थित जैन ट्रेडिंग नामक फर्म में एकाउंटेंट की नौकरी मिल गई. आराधना ने अपने कुशल व्यवहार व अच्छे काम से कुछ महीने में ही मालिक व कर्मचारियों का दिल जीत लिया और सब की चहेती बन गई. आराधना के हाथ पर सैलरी का पैसा आने लगा तो वह अपनी तथा बच्चों की जरूरतें उचित तरीके से पूरी करने लगी. अब उसे पिता का मुंह नहीं ताकना पड़ता था. आराधना पहले दिन भर घर में बैठे बोर हुआ करती थी, लेकिन नौकरी लग जाने के बाद उस के दिन हंसीखुशी से बीतने लगे थे. रामप्रकाश को भी सकून मिला था कि आराधना अब खुश रहने लगी है.

आराधना तातियागंज से औफिस बस व टैंपो से आतीजाती थी. वह मंधना से झकरकटी बस द्वारा फिर झकरकटी से किदवईनगर औफिस टैंपो द्वारा पहुंचती थी. वह सुबह 10 बजे औफिस पहुंचती थी और शाम सवा 6 बजे औफिस छोड़ देती थी. वह हर हाल में रात 8 बजे तक अपने घर पहुंच जाती थी. हां, यह बात दीगर थी कि जब औफिस में किसी दिन काम ज्यादा होता तो उसे घर पहुंचने में देर हो जाती थी. ऐसी हालत में वह फोन द्वारा पिता को बता देती थी. आराधना जिस बस से औफिस आतीजाती थी, उस बस का ड्राइवर प्रवीण कुमार था. वह चौबेपुर थाने के मालौगांव का रहने वाला था. प्रवीण एक ट्रैवल कंपनी की बस चलाता था. उस का रूट मंधना से जाजमऊ तक था. प्रवीण की बस से आतेजाते आराधना और प्रवीण में दोस्ती हो गई. धीरेधीरे यह दोस्ती प्यार में बदल गई.

रविवार को आराधना की छुट्टी रहती थी. प्रवीण भी रविवार को छुट्टी करता था, अत: उस दिन दोनों कभी मोतीझील तो कभी साईंमंदिर में मिलते थे. यहां दोनों घंटों बतियाते थे और खूब हंसीठिठोली करते थे. आराधना अपने दोनों बच्चों को भी साथ लाती थी. प्रवीण उन्हें खूब खिलातापिलाता था. दोनों बच्चे प्रवीण से खूब घुलमिल गए थे. आराधना के प्यार में आकंठ डूबा प्रवीण सारी कमाई आराधना व उस के बच्चों पर खर्च करने लगा था. आराधना भले ही 2 बच्चों की मां थी, लेकिन उस के सौंदर्य और जिस्मानी कसाव में जरा भी कमी नहीं आई थी. स्वभाव से आराधना मजाकिया तथा खुले विचारों की थी. प्रवीण से हंसीमजाक तथा नयनों के तीर भी चला देती थी. इस से प्रवीण उसे पाने के सपने देखने लगा था. प्रवीण आराधना से 8-10 साल छोटा था.

एक दिन प्रवीण ने प्यार का इजहार कर दिया, ‘‘आराधना, मैं तुम से बेइंतहा प्यार करता हूं. तुम्हारा साथ जीवन भर चाहता हूं. बोलो, मेरा साथ दोगी?’’

आराधना प्रवीण की बात सुन कर गहरी सोच में पड़ गई. फिर कुछ देर बाद बोली, ‘‘प्रवीण, मैं शादीशुदा और 2 बच्चों की मां हूं. पति से मेरा तलाक भी नहीं हुआ है. ऐसी हालत में मैं तुम से कैसे शादी कर सकती हूं. रही बात प्यारमोहब्बत की तो वह मैं तुम से करती हूं और करती रहूंगी.’’

आराधना के जवाब से प्रवीण कुछ मायूस जरूर हुआ, लेकिन उसे लगा कि जब आराधना उस से प्यार करती है तो आज नहीं तो कल शादी भी उसी से करेगी. इसलिए वह उस का दीवाना बना रहा. उस ने अपनी और आराधना की मोहब्बत की जानकारी अपने परिवार वालों को भी दे दी. इस पर उस के मातापिता ने उसे समझाया और एक शादीशुदा महिला से रिश्ता तोड़ने को कहा. लेकिन प्रवीण ने घर वालों की बात नहीं मानी. आराधना और प्रवीण रिश्ते में बंध पाते, उस से पहले ही प्रवीण का एक्सीडेंट हो गया. उस की नौकरी छूट गई और उस की आर्थिक स्थिति भी खराब हो गई. प्रवीण को यकीन था कि आराधना एक्सीडेंट की जानकारी पा कर उस से मिलने आएगी और उस की हरसंभव मदद करेगी.

लेकिन महीनों बीत गए, आराधना न तो उस से मिलने आई और न ही उस की कोई आर्थिक मदद की. और तो और उस ने मोबाइल पर प्रवीण से बतियाना भी बंद कर दिया. आराधना में आए इस अकस्मात बदलाव से प्रवीण बेचैन हो उठा. उस ने गुप्तरूप से आराधना के संबंध में जानकारी जुटाई तो उस के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उसे पता चला कि आराधना औफिस के ही एक कर्मचारी शोएब की मोहब्बत में बंधी है. वह उस के साथ ही सैरसपाटा करती है. उस ने इस का विरोध आराधना से किया तो उस ने दोटूक जवाब दे दिया कि वह उस की जिंदगी में दखल देने वाला होता कौन है. वह कुछ बन कर दिखाए, तब उस से बात करे.

आराधना के जवाब से प्रवीण का दिल घायल हो गया. आराधना के प्रति वह नफरत से भर उठा. फिर भी वह आराधना को दिल से निकाल नहीं सका. आराधना ने अब उस से फोन पर बात करनी भी बंद कर दी थी. वह काल पर काल करता, तब कहीं जा कर उस की काल रिसीव करती और जवाब दे कर अपना फोन बंद कर लेती. प्रवीण तब खिसिया कर रह जाता था. 10 दिसंबर, 2019 को प्रवीण आराधना के औफिस के पास पहुंचा. कुछ देर बाद आराधना औफिस से बाहर निकली और सहकर्मी शोएब की मोटरसाइकिल पर बैठ गई. प्रवीण ने उस का पीछा किया. वह उस के साथ घंटाघर गई. शौपिंग की, फिर उसी के साथ घर गई. इस बीच प्रवीण ने आराधना को फोन कर पूछा कि वह कहां है तो उस ने कहा कि वह अपने एक रिश्तेदार के यहां शादी में शामिल होने आई है.

उस के इस झूठ से प्रवीण बौखला गया. उस ने आराधना की हत्या का फैसला कर लिया. 16 दिसंबर, 2019 की शाम 6 बजे प्रवीण ने अपने दोस्त राजेंद्र के मोबाइल से आराधना से बात की और मिलने का अनुरोध किया. आराधना ने पहले तो साफ मना कर दिया लेकिन प्रवीण के विशेष अनुरोध पर वह मान गई. इस के बाद प्रवीण मोटरसाइकिल से आराधना के औफिस पहुंच गया. शाम सवा 6 बजे आराधना औफिस से बाहर निकली. प्रवीण ने उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा लिया. रास्ते में शोएब को ले कर दोनों के बीच झगड़ा हुआ.

लड़तेझगड़ते प्रवीण आराधना को शताब्दी नगर स्थित जवाहरपुरम पार्क ले आया. अब तक रात के 8 बज चुके थे. भीषण सर्दी पड़ने के कारण पार्क में सन्नाटा था. पार्क में प्रवीण ने उस से सीधे पूछा, ‘‘आराधना, तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

इतना सुनते ही प्रवीण भड़क उठा.

दोनों में झगड़ा शुरू हो गया. इसी झगड़े में आराधना की चूडि़यां टूट गईं और कान की एक बाली पार्क में गिर गया. झगड़े के दौरान ही प्रवीण ने आराधना का पर्स पार्क में फेंक दिया और उसे दबोच लिया. फिर उस के गले में रस्सी का फंदा कसते हुए बोला, ‘‘आराधना, तू मेरी नहीं हुई तो मैं किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’

उस के बाद उस ने फंदा तभी गले से निकाला, जब उस के प्राणपखेरू उड़ गए. हत्या करने के बाद प्रवीण ने आराधना के शव को घसीट कर झाडि़यों में छिपाया और फिर मोटरसाइकिल से फरार हो गया. हत्यारोपी प्रवीण कुमार से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे 19 दिसंबर, 2019 को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट महेंद्र कुमार गर्ग की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. आराधना के दोनों बच्चे नाना रामप्रकाश गौतम के संरक्षण में पल रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Chhattisgarh Crime : गमछे से घोंटा प्रेमिका का गला

Chhattisgarh Crime : जवानी की दहलीज पर चढ़ते ही मंजू ने शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ से न सिर्फ दोस्ती की बल्कि कोर्ट में शादी भी कर ली. बाद में जब मंजू ने सैफ से किनारा करना चाहा तो उस ने न सिर्फ मंजू को बल्कि उस की बहन मनीषा को अपने गुस्से का शिकार बना डाला…

नए साल के पहले दिन मंजू अपनी बहन मनीषा के साथ मूवी देखने रायगढ़ के मल्टीप्लैक्स पहुंची तो वहां शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ उस का बड़ी बेताबी से इंतजार कर रहा था. मंजू सिदार सैफ से पहली दफा मिलने वाली थी. लगभग एक साल से दोनों फेसबुक और वाट्सऐप पर ही बातें करते रहे थे. उन की दोस्ती फेसबुक के माध्यम से ही हुई थी. धीरेधीरे उन की दोस्ती परवान चढ़ती गई. उन्होंने तय किया कि पहली जनवरी को वे एक साथ पिक्चर देखने चलेंगे. जब मंजू सिदार और सैफ ने एकदूसरे को देखा तो दोनों बहुत खुश हुए. शोएब अहमद अंसारी ने मंजू को बताया कि उस ने टिकट ले ली है और मूवी शुरू होने में अभी थोड़ा समय है. क्यों न पास के रेस्टोरेंट में बैठ कर कुछ बातें कर लें.

मंजू की स्वीकृति के बाद दोनों रेस्टोरेंट में जा कर बैठ गए. एकदूसरे को निकटता से समझने के प्रयास में मंजू और सैफ बातों में डूब गए. सैफ मंजू को पहली बार देख कर उस का दीवाना ही हो गया. मंजू की बातों से सैफ मंत्रमुग्ध सा हो गया. उस दिन उस ने मौका हाथ से नहीं जाने दिया. पिक्चर देखने के बाद तीनों एक गार्डन में बैठ गए, जहां दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर दिया. सैफ ने तो यहां तक कह दिया कि मैं शादी करूंगा तो तुम से ही करूंगा. मंजू पहली ही मुलाकात में सैफ के व्यवहार से प्रभावित हो गई. वह बोली, ‘‘सैफ, मैं तुम्हें पसंद करती हूं. मगर शादी के लिए इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं. अभी हम एकदूसरे को और समझ लें. वैसे भी अभी मेरी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी नहीं हुई है. मैं रायपुर जा कर पढ़ाई पूरी कर लूं.’’

‘‘ठीक है, तुम सोच लो, मैं तो तुम्हारा हो गया. समझ लो, मैं तुम्हारी इच्छा का गुलाम हूं. जब तुम कहोगी, तब शादी कर लेंगे.’’ सैफ ने कहा.

यह सुन मंजू हंसते हुए बोली, ‘‘तुम मुसलिम हो न, मुझे जाने क्यों मुसलिम बहुत अच्छे लगते हैं. मैं शादी करूंगी, मगर थोड़ा समय दो.’’

मंजू के मुसलमान वाले फिकरे को सुन कर सैफ के कान खड़े हो गए. वह सोचने लगा कि मंजू कहीं उस के मुसलिम होने की वजह से उस से निकाह नहीं करना चाहती या और कोई बात है. सैफ ने मंजू की आंखों में झांकते हुए प्यार से कहा, ‘‘मंजू, अगर तुम्हें आपत्ति है तो मैं तुम्हारी खातिर अपना धर्म बदलने को तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, तुम्हें धर्म बदलने की कोई जरूरत नहीं है. न तुम धर्म बदलो और न मैं बदलूंगी. यह तय है.’’ मंजू बोली.

मंजू की बात सुन कर सैफ खुश हुआ. मंजू ने उस से कहा, ‘‘सैफ, मैं अभी पढ़ना चाहती हूं. मेरे जीवन का उद्देश्य पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना है. मैं नर्स बनना चाहती हूं. बस तुम मुझे थोड़ा समय दो.’’

सैफ ने उस की बातों पर अपनी स्वीकृति दे दी. इस घटनाचक्र के बाद मंजू सिदार और सैफ अकसर मिलते और साथसाथ समय बिताते. उन की दोस्ती ने रंग लाना शुरू कर दिया. उन का प्यार बढ़ता गया. शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ रायगढ़ के बोइरदादर कस्बे का रहने वाला था. रायगढ़ में उस की मोबाइल फोन और एक्सेसरीज की दुकान थी. एक दिन जब दोनों मिले तो मंजू बोली, ‘‘सैफ, मैं अगले हफ्ते रायपुर जाऊंगी, क्योंकि वहीं रह कर मुझे पढ़ाई पूरी करनी है.’’

अब मंजू को पढ़ाई के लिए 2 साल रायपुर में रहना था. त्यौहार आदि पर वह साल में 1-2 बार ही रायगढ़ आ सकती थी. मंजू की बातें सुन कर सैफ निराश हुआ. उसे निराश होते देख मंजू चहकी, ‘‘तुम इतने दुखी क्यों हो गए?’’

‘‘मैं क्या कहूं,’’ सैफ ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं तो तुम्हारा गुलाम हूं, जो कहोगी सुनूंगा, करूंगा.’’

मंजू ने हंस कर कहा, ‘‘मगर एक खुशी की खबर है.’’

‘‘क्या?’’ सैफ उत्सुक हुआ.

‘‘उस से पहले हम शादी कर सकते हैं, अगर तुम चाहो तो…’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? अंधे से पूछ रही हो कि आंखें चाहिए, मैं तैयार हूं.’’ वह खुश हो कर बोला.

इस के बाद फैसला कर दोनों ने 21 मार्च, 2019 को रायगढ़ से नोटरी पब्लिक शपथ पत्र बनवा लिया और कोर्ट में औपचारिक रूप से विवाह कर लिया. इस विवाह के साक्षी दोनों के नजदीकी मित्र बने. दोनों ने तय किया कि कुछ समय दोनों अलगअलग ही रहेंगे, मगर जल्द ही एकदूसरे के हो जाएंगे. मंजू छत्तीसगढ़ के जिला रायगढ़ के विनीतानगर वार्ड में रहने वाले गजाधर सिदार की बेटी थी. गजाधर रायगढ़ तहसील में पटवारी हैं. उन की 2 बेटियां थीं मंजू और मनीषा. दोनों बेटियों को वह उन के मनमुताबिक पढ़ा रहे थे. दोनों बहनों में आपस में बहुत प्यार था. मंजू सिदार की छोटी बहन मनीषा कहने को तो उस की बहन थी, लेकिन वह उस की दोस्त भी थी. वह भी मंजू और सैफ के विवाह की गवाह थी. एक दिन उस ने अपनी मां प्रभावती को बातों ही बातों में बता दिया कि मंजू दीदी ने शादी कर ली है.

यह बात जब मां प्रभावती और पिता गजाधर सिदार को पता चली तो दोनों मंजू से बेहद नाराज हुए. मां प्रभावती तो मानो टूट ही गईं. उस ने मंजू को प्यार से समझाया. साथ ही दुहाई दे कर कहा कि तुम गलत दिशा में जा रही हो. तुम ने जो कदम उठाया है, उस से तुम्हारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. मां की सलाह से धीरेधीरे मंजू के विचार बदल गए. उसे समझ में आने लगा कि उस ने जीवन की बहुत बड़ी भूल की है. सैफ और उस के रास्ते बिलकुल अलग हैं. जब मंजू को यह बात समझ में आई तो धीरेधीरे उस ने सैफ से कन्नी काटनी शुरू कर दी. इतना ही नहीं, उस ने सैफ से बातचीत भी बहुत कम कर दी. सैफ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर मंजू उसे इग्नोर क्यों कर रही है.

एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो सैफ ने बहुत सारे गिफ्ट, जरूरी सामान और पैसे मंजू को देने चाहे. मगर मंजू ने लेने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘सैफ, तुम्हारे और मेरे रास्ते अब जुदाजुदा हैं.’’

सैफ मानो आसमान से जमीन पर गिर पड़ा. वह अचंभित सा मंजू को देखता रह गया. मंजू ने आगे कहा, ‘‘सैफ, अच्छा तो यही रहेगा कि अब तुम मुझे भूल जाओ.’’ इस पर सैफ बोला, ‘‘मंजू, तुम ने मेरे साथ ब्याह किया है, कोर्ट मैरिज. और अब कहती हो भूल जाऊं. यह भला कैसे हो सकता है. मंजू अगर ऐसी बात थी तो तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिए था. यह तो सरासर धोखा है.’’

‘‘नहींनहीं, यह धोखा नहीं बल्कि हमारा बचपना था. मुझ से भूल हुई. बिना मांबाप, परिवार की सहमति के भला विवाह कैसे हो सकता है?’’ वह बोली.

‘‘हम ने कोर्टमैरिज की है, उस का क्या होगा?’’

‘‘उन कागजों को जला दो.’’ मंजू ने सपाट स्वर में कहा.

मंजू की कठोरता देख शोएब अंसारी उर्फ सैफ का दिल टूट गया. उस की आंखों के आगे जैसे अंधेरा घिर आया. उस ने कातर स्वर में कहा, ‘‘मंजू, तुम चाहे जो सोचो, जो कहो, मगर मैं साफसाफ कहता हूं मैं ने सच्चे दिल से तुम्हें चाहा है और सदैव चाहता रहूंगा. मैं तुम्हें अपनी पत्नी स्वीकार कर चुका हूं.’’

मंजू सैफ की आंखों में देखती रही. उसे लगा सैफ उसे सचमुच दिल से चाहता है, उस का सिर घूम गया. फिर वह अपने घर चली गई. 10 दिसंबर, 2019 को मंगलवार था. उस दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के टिकरापारा के गोदावरी नगर स्थित फ्लैट के बाहर शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ अपने 2 साथियों गुलाम मुस्तफा (18 वर्ष) और रामलाल (15 वर्ष) के साथ खड़ा था. मंजू वहीं फ्लैट में रह कर अपनी पढ़ाई कर रही थी. उस समय उस की छोटी बहन मनीषा भी उस के पास आई हुई थी. सैफ ने मुस्तफा से कहा, ‘‘देखो, मंजू ने मेरे साथ जो धोखा किया है, उसे मैं अब और बरदाश्त नहीं कर पा रहा हूं. मंजू मेरे साथ ऐसा करेगी, मैं ने कभी सोचा नहीं था. अब मैं ने फैसला कर लिया है कि ऐसी धोखेबाज को सबक जरूर सिखाना है. यानी उस का काम तमाम करना है.

अगर तुम मेरा यह काम कर दोगे, तो मैं तुम्हें 7 लाख रुपए दूंगा.’’ कहतेकहते उस का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. सैफ की बात सुन गुलाम मुस्तफा बोला, ‘‘देख यार सैफ, तू गुस्सा न हो. तू उस से बात कर. हो सकता है अभी भी वह तेरी हो जाए. मगर सुन ले हमारे पैसे तुम्हें दोनों ही हालत में देने होंगे.’’

‘‘मेरा वादा है, पैसे जरूर दूंगा. बस मेरा काम हो जाए.’’ सैफ ने कहा.

‘‘आओ, फिर हम अपना काम करें.’’ गुलाम मुस्तफा ने कहा. मंजू घर में है या नहीं, पता लगाने के लिए सैफ ने उस के मोबाइल पर फोन कर कहा, ‘‘मंजू, मैं तुम से आखिरी बार कुछ बात करना चाहता हूं. उस के बाद तुम्हें कभी परेशान नहीं करूंगा.’’

मंजू सुबह का नाश्ता बना कर नर्सिंग कालेज जाने के लिए तैयार थी. उसे वहां 12 बजे पहुंचना था. उस ने सैफ को फ्लैट पर बुला लिया. सैफ और मुस्तफा फ्लैट में चले गए और रामलाल फ्लैट के बाहर ही खड़ा रहा. फ्लैट में प्रवेश करते ही सैफ ने देखा मंजू उस समय अपनी छोटी बहन मनीषा के साथ नाश्ता कर रही थी.  सैफ पास पहुंच कर बोला, ‘‘मंजू, मैं आखिरी बार तुम्हारे पास आया हूं, क्योंकि मैं रोजरोज की बातों से आजिज आ चुका हूं. बताओ, तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो?’’

यह सुनते ही मंजू और मनीषा नाश्ता छोड़ उस की ओर देखने लगीं. तभी मंजू बोली, ‘‘सैफ, मैं तो तुम्हें पहले ही बोल चुकी हूं कि अब तुम मुझे भूल जाओ. जो हुआ, वह भी भूल जाओ.’’

मंजू की तल्ख बातें सुन कर सैफ आपे में नहीं रहा. वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम ने रमन के साथ टिकटौक पर वीडियो क्यों डाला? क्या यह वीडियो अपलोड करना तुम्हारी फितरत को बयां नहीं करता?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘सीधी सी बात है, तुम ने मुझे बरबाद किया अब रमन को बरबाद करोगी. पहले मेरे साथ कोर्टमैरिज की, अब उसे फंसा रही हो.’’

‘‘नहीं, मेरी रमन के साथ शादी होने जा रही है.’’ मंजू ने एकाएक जैसे बड़े रहस्य से परदा उठा दिया.

‘‘मुझे छोड़ कर तुम किसी और के साथ शादी नहीं कर सकती.’’ सैफ तल्ख हो गया.

मंजू भी आगबबूला हो गई. दोनों में कहासुनी बढ़ती गई.

तभी सैफ ने वहीं रखा फ्राइंग पैन उठा कर मंजू के सिर पर दे मारा. जिस से मंजू की चीख निकल गई और उस के सिर से खून बहने लगा. वह वहीं ढेर हो गई. बहन की गंभीर हालत देख कर मनीषा सैफ पर हमलावर हो उठी तो उस ने उसी फ्राइंग पैन से कई वार कर के मनीषा को भी मरणासन्न कर डाला. इस बीच गुलाम मुस्तफा उस का बराबर साथ दे रहा था. वह अपना गमछा ले कर मंजू के पास पहुंचा और गमछे से मंजू का गला घोंट दिया. फिर उसी गमछे से मनीषा का भी गला घोंट दिया, जिस से दोनों की ही मौत हो गई.

सैफ और गुलाम मुस्तफा दोनों ने उन के मोबाइल उठा कर अपने पास रख लिए. अपना काम निपटा कर जब वह घर से बाहर भागने को हुए तो घर के बाहर से किसी की आवाज सुनाई दी. आवाज सुन कर वे घबरा गए, जिस से जल्दबाजी में गुलाम मुस्तफा का एक जूता किसी चीज में फंस कर वहीं रह गया. वह दरवाजा खोल भाग खड़ा हुआ. इस दरमियान उस फ्लैट के बाहर दूसरी मंजिल पर लगे सीसीटीवी कैमरे में वे सब कैद हो गए. मंजू और मनीषा की चीखें सुन कर आसपड़ोस वाले भी वहां आ गए. उन्होंने फ्लैट की खिड़की से झांक कर देखा तो दोनों लड़कियों को लहूलुहान देख कर वह माजरा समझ गए.

उन्होंने सूचना फ्लैट मालिक इंद्रजीत सिंह को दे दी. इंद्रजीत फ्लैट पर पहुंचे तो वहां रहने वाली मंजू और उस की बहन को लहूलुहान हालत में देख कर वह घबरा गए. उन्होंने तुरंत फोन कर के थाना तिकरापारा पुलिस को सूचना दी. सूचना पा कर टीआई कय्यूम मेमन पुलिस मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सब से पहले दोनों बहनों को रायपुर के अंबेडकर हौस्पिटल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल में 2 पुलिसकर्मियों को छोड़ कर टीआई कय्यूम मेमन घटनास्थल पर पहुंचे. सूचना पा कर एसपी आरिफ एच. शेख और एएसपी (क्राइम) पंकज चंद्रा भी घटनास्थल पर पहुंचे. स्थिति का मुआयना कर उन्होंने इस दोहरे हत्याकांड को खोलने के लिए 5 पुलिस टीमें बनाईं. टीआई ने मंजू के घर भी फोन कर सूचना दे दी.

कुछ देर बाद मंजू के मातापिता और अन्य लोग अंबेडकर अस्पताल की मोर्चरी पहुंच गए. दोनों बेटियों के शव देख कर वे फूटफूट कर रोने लगे. पिता गजाधर सिदार से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने रायगढ़ के ही रहने वाले शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ पर अपना शक जताया. उन्होंने बताया कि उस ने उन की बेटी मंजू से कथित रूप से विवाह कर लिया था. मंजू जब रावतपुरा नर्सिंग कालेज, रायपुर में पढ़ाई कर रही थी, तब सैफ लगातार फोन कर के उसे परेशान किया करता था. उन्होंने यह भी बताया कि सैफ ने उन की बेटी के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए थे. तब उन्होंने उस के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. जिस पर पुलिस ने उसे पोक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा था.

गजाधर सिदार से यह जानकारी मिलने के बाद टीआई कय्यूम मेमन ने एक पुलिस टीम रायगढ़ के बोइरदादर भेजी, जहां का सैफ रहने वाला था. मगर पुलिस को जानकारी मिली कि वह पिछले 2 दिनों से गायब है. पुलिस ने उस के मोबाइल को ट्रेस करना शुरू किया और सूत्रों से उस की जानकारी लेनी आरंभ की तो खबर मिली कि सैफ बिलासपुर से पेंड्रा के शहडोल मैहर होता हुआ रीवा पहुंच चुका है. रायपुर पुलिस ने 11 दिसंबर, 2019 को रीवा (मध्य प्रदेश) पुलिस की सहायता से तोपखाना के निकट छिप कर रह रहे सैफ को अपनी गिरफ्त में ले लिया. सैफ से पूछताछ के बाद पुलिस ने गुलाम मुस्तफा को रायगढ़ से और नाबालिग रामलाल को जिला चांपा जांजगीर से अपनी गिरफ्त में ले लिया.

उन्होंने इकबालिया बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने मंजू और मनीषा की हत्या में सैफ की मदद की थी. सैफ ने बताया कि मंजू ने अपनी मरजी से उस के साथ कोर्टमैरिज की थी. मगर उस के बाद मंजू अपना रंग दिखाने लगी, जिस से वह बहुत निराश हो गया था. मगर जब एक लड़के के साथ उस ने टिकटौक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया तो उस के तनबदन में आग लग गई और उस ने उसी दिन निर्णय लिया कि अब मंजू को मार डालेगा. इस बारे में उस ने अपने दोस्तों गुलाम मुस्तफा और रामलाल के साथ प्लानिंग की. उस की मंशा सिर्फ मंजू की हत्या करने की थी, लेकिन घटना के समय मनीषा ने जिस तरह विरोध करना शुरू किया तो गुस्से में उन्होंने उस की भी हत्या कर दी.

पुलिस ने हत्यारोपी शोएब अहमद अंसारी, गुलाम मुस्तफा और रामलाल को भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, रायपुर के न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में रामलाल परिवर्तित नाम है.

 

Uttar Pradesh Crime : प्रेमिका के भाई को मारा फिर बोरी में बंद कर रेत में दफना डाला

Uttar Pradesh Crime : आजकल के ज्यादातर युवा तो प्यार को जानते हैं और जानना चाहते हैं. उन के लिए शारीरिक आकर्षण ही प्यार होता है. इसी आकर्षण को प्यार समझ कर वे ऐसीऐसी कंदराओं में खो जाते हैं, जो अपने अंदर का अंधेरा उन के जीवन में भर देती हैं. ऐसा ही विकास के साथ भी हुआ. आखिर…  

रोजाना की तरह पूनम उस दिन भी स्कूल जाने के लिए अपनी साइकिल से निकली तो रास्ते में पहले से उस का इंतजार कर रहे विकास ने उस के पीछे अपनी साइकिल लगा दी. पूनम ने विकास को पीछे आते देखा तो अपनी साइकिल की गति और तेज कर दी. विकास अपनी साइकिल की रफ्तार और तेज कर के पूनम के आगे जा कर इस तरह खड़ा हो गया कि अगर वह अपनी साइकिल के ब्रेक लगाती तो जमीन पर गिर जाती. साइकिल संभालते हुए पूनम साइकिल से उतर कर खड़ी हुई और बोली, ‘‘देख नहीं रहे हो, मैं स्कूल जा रही हूं. आज वैसे भी देर हो गई है. अगर हमें किसी ने देख लिया तो बिना मतलब बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगेगी.’’

‘‘जिसे जो बातें बनानी हैं, बनाता रहे. मुझे किसी की परवाह नहीं है.’’ विकास ने बड़े प्यार से अपनी बात कह डाली.

पूनम स्कूल जाने के लिए मन ही मन बेचैन थी. उस ने विकास की तरफ देखा और उस से अनुरोध करते हुए बोली, ‘‘देखो, मुझे देर हो रही है. अभी मुझे स्कूल जाने दो. मैं तुम से बाद में मिल लूंगी. तुम्हें जो बात करनी हो, कर लेना.’’

विकास पूनम की बात सुन कर नरम पड़ गया. वह अपनी साइकिल को साइड में कर के पूनम के चेहरे को देखते हुए बोला, ‘‘पूनम, तुम मेरी आंखों में झांक कर देखो, इस में तुम्हें बेपनाह मोहब्बत नजर आएगी. तुम्हें पता है, तुम्हारी चाहत में मैं सब कुछ भूल गया हूं. मुझे दिनरात बस तुम ही तुम नजर आती हो.’’

‘‘वह सब तो ठीक है विकास, पर तुम्हें यह तो पता है कि हम एक ही जगह के हैं और हमारे तुम्हारे घर के बीच बहुत ज्यादा फासला नहीं है. अगर हम दोनों इस तरह प्यारमोहब्बत की पेंग बढ़ाएंगे तो मोहल्ले वालों से हमारा प्रेम कब तक छिपा रहेगा

‘‘तुम मेरे पिता को तो जानते हो, बातबात में गुस्सा हो जाते हैं. अगर उन्हें हम दोनों के प्रेम की भनक लगी तो मैं बदनाम हो जाऊंगी. फिर मेरे पिता मेरी क्या गत बनाएंगे, यह तो ऊपर वाला ही जाने.’’ वह बोली.

‘‘पूनम, मैं सपने में भी तुम्हें बदनाम करने की नहीं सोच सकता. तुम तो मेरी मोहब्बत हो और मोहब्बत के लिए लोग जाने क्याक्या कर जाते हैं. तुम सिर्फ जरा सी बदनामी से डरती हो. पता है, मैं तुम से मिलने और बातें करने के लिए क्याक्या तिकड़म भिड़ाता हूं

‘‘तब कहीं जा कर तुम से तनहाई में मुलाकात होती है. देखो पूनम, मैं तुम्हें बदनाम नहीं होने ही दूंगा. और हां, मैं ने निर्णय ले लिया है कि शादी करूंगा तो सिर्फ तुम से. मेरी दुलहन तुम्हारे अलावा कोई दूसरी नहीं होगी, फिर बदनामी कैसी.’’

पूनम कुछ देर शांत मन से विकास की बातें सुनती रही. फिर लंबी सांस ले कर बोली, ‘‘अच्छा, अब बस करो, मैं स्कूल जा रही हूं. मुझे काफी देर हो चुकी है.’’

पूनम ने इतना कह कर अपनी साइकिल आगे बढ़ाई ही थी कि विकास मुसकराता हुआ बोला, ‘‘हां जाओ, लेकिन मिलने के लिए थोड़ा समय निकाल लिया करो.’’

पूनम बिना कुछ बोले अपने स्कूल की ओर बढ़ गई. पूनम के स्कूल जाने वाले रास्ते के उस मोड़ के पास विकास अकसर उस का रास्ता रोक कर कभी प्रेम से तो कभी थोड़ा गुस्से में अपने प्रेम का इजहार करने लगता था. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिला रामपुर, थाना स्वार की चौकी मसवासी के अंतर्गत एक मोहल्ला है भूबरा. वीर सिंह अपने परिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहता था. परिवार में उस की पत्नी के अलावा 3 बेटे और 2 बेटियां थीं. वीर सिंह और उस की पत्नी प्रेमवती दोनों दिव्यांग थे. वीर सिंह हाईस्कूल पास था. वह मोहल्ले के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था. बड़ा बेटा गिरीश नौकरी करता था. बापबेटे मिल कर परिवार का बोझ उठाते थे.

वीर सिंह की बेटी पूनम खूबसूरत भी थी और चंचल भी. वीर सिंह और प्रेमवती उसे बहुत चाहते थे. पूनम एक स्थानीय स्कूल में दसवीं में पढ़ती थी. 15 वर्षीय पूनम उम्र के उस पायदान पर खड़ी थी, जहां शरीर में काफी बदलाव जाते हैं और दिल में उमंग की लहरें हिचकोले लेने लगती हैं. पूनम पहले से ही सुंदर थी, लेकिन जब कुदरत ने उस के बदन को खूबसूरती के सांचे में ढाल कर आकर्षक आकार दिया तो उस की सुंदरता कयामत ढाने लगी, जिस का पूनम को भी अहसास हो गया था. अपनी सुंदरता पूनम को लुभाती तो थी, लेकिन लोगों की चुभती नजरों से बचने के लिए उसे तरहतरह के जतन करने पड़ते थे. वह लोगों की गिद्ध दृष्टि को अच्छी तरह पहचानती थी. लेकिन विकास उन सब से अलग था. उस की आंखों में पूनम को अपने लिए अलग तरह की चाहत दिखती थी. विकास स्मार्ट भी था और खूबसूरत भी.

विकास मौर्य भी भूबरा मोहल्ले में ही रहता था. पूनम के घर से उस के घर की दूरी महज ढाई सौ मीटर थी. विकास के पिता नरपाल मौर्य खेतीकिसानी का काम करते थे. घर में पिता के अलावा उस की मां जगदेवी, एक बड़ा भाई और 3 बहनें थीं. वीर सिंह और नरपाल मौर्य के परिवारों का एकदूसरे के घर आनाजाना था. इसी आनेजाने में जब विकास की नजर जवान होती पूनम पर पड़ी तो वह बरबस उस की ओर आकर्षित होगया और उसे मन ही मन चाहने लगालेकिन पूनम के घर वालों की वजह से उसे अकेले में पूनम से बात करने का मौका नहीं मिल पाता था. विकास हमेशा इस फिराक में रहता था कि मौका मिले तो पूनम से बात करे.

संयोग से एक साल पहले विकास को मौका मिल गया. पूनम के घर वाले किसी शादी समारोह में गए हुए थे. पूनम घर पर अकेली थी. यह पता चलते ही विकास बहाने से वीर सिंह के घर पहुंच गया और दरवाजे पर दस्तक दी. पूनम उस समय पढ़ रही थी. दस्तक सुन कर उस ने दरवाजा खोला तो सामने विकास खड़ा था. विकास को देख वह बोली, ‘‘सब लोग शादी में गए हैं. घर में कोई नहीं है.’’

विकास ने पूनम की बात खत्म होते ही कहा, ‘‘देखो पूनम, आज मैं सिर्फ तुम से ही मिलने आया हूं. चाचा से मिलना होता तो कभी भी मिल लेता.’’

‘‘ठीक है, अंदर जाओ और बताओ मुझ से क्यों मिलना है.’’ पूनम के कहने पर विकास अंदर गया

विकास के अंदर आते ही पूनम फिर से बोली, ‘‘हां विकास, बोलो, क्या कहना चाहते हो?’’

विकास एकटक पूनम की ओर देखते हुए बोला, ‘‘दरअसल, मैं बहुत दिनों से तुम से एकांत में मिलना चाह रहा था. मैं तुम्हें दिल से चाहने लगा हूं. मुझे तुम से प्यार हो गया है. दिल नहीं माना तो तुम से मिलने चला आया.’’

विकास आगे कुछ और बोलता, इस से पहले ही पूनम के होंठों पर हंसी गई. वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आतेजाते तुम मुझे जिस तरह से देखते थे, उस से ही मुझे आभास हो गया था कि जरूर तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई चाहत है.’’

‘‘इस का मतलब तुम भी मुझे पसंद करती हो. तुम्हारी इन बातों से विश्वास हो गया कि हम दोनों के दिल में एकदूसरे के प्रति प्यार है.’’ विकास कुछ और बोल पाता, तभी पूनम बोल पड़ी, ‘‘मम्मीपापा के आने का समय हो गया है. इसलिए तुम अभी यहां से चले जाओ. मुझे मौका मिला तो मैं फिर बात कर लूंगी.’’

पूनम के इतना कहने के बाद भी विकास वहीं खड़ा रहा और पूनम की खूबसूरती के कसीदे पढ़ता रहा. पूनम से रहा नहीं गया तो वह जबरदस्ती विकास का हाथ पकड़ कर उसे मेनगेट तक ले आई और उसे बाहर कर के मेनगेट बंद कर लिया. लेकिन जातेजाते विकास पूनम को यह याद कराना नहीं भूला कि उस ने बाहर मिलने का वादा किया है. पूनम अपने वादे को नहीं भूली और अगले दिन स्कूल जाते समय रास्ते में विकास दिखा तो उस ने इशारे से बता दिया कि स्कूल से वापस लौटते समय उस से मिलेगीविकास समय से पहले ही पूनम के वापस लौटने वाले रास्ते पर उस का इंतजार करने लगा. पूनम स्कूल से लौटी तो विकास से उस की मुलाकात हुई. उस ने विकास के प्यार को स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार को स्वीकार कर रही हूं और चाहती हूं कि हम बदनाम हों. इसलिए तुम्हें भी सावधान रहना होगा ताकि किसी को हमारे प्यार की भनक लगे.’’

विकास पूनम के हाथों को अपने हाथों में लेता हुआ बोला, ‘‘तुम भी कैसी बातें करती हो? क्या कभी कोई प्रेमी चाहेगा कि उस की प्रेमिका की समाज में रुसवाई हो? तुम मुझ पर भरोसा रखो.’’

समय बीतता रहा. दोनों लोगों की नजरों से बच कर चोरीछिपे मिलते रहे. दोनों का प्यार इतना बढ़ गया कि वे एकदूसरे के लिए कुछ भी कर सकते थे. यहां तक कि एकदूजे के लिए जान भी दे सकते थे. पर एकदूसरे से अलग होना उन्हें किसी भी हाल में मंजूर नहीं था. बीते 9 दिसंबर को पूनम का सब से छोटा 7 वर्षीय भाई अंश दोपहर 2 बजे के करीब घर के बाहर खेल रहा था, लेकिन अचानक वह लापता हो गया. बडे़ भाई गिरीश ने अपने भाईबहनों के साथ उसे काफी खोजा लेकिन उस का कोई पता नहीं चला. एक दिन पहले ही किसी अनजान युवक ने अंश को 10 रुपए दिए थे. यह बात अंश ने घर कर बताई थी. लेकिन घर के लोगों ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था, इस के अगले दिन यह घटना घट गई

जब किसी तरह से अंश का पता नहीं चला तो 10 दिसंबर, 2019 को गिरीश ने स्वार थाने जा कर इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार सिंह को पूरी बात बताई. सतेंद्र सिंह ने गिरीश की तहरीर पर अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 363 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने गिरीश और उस के पिता के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए, ताकि अपहर्त्ता फिरौती के लिए फोन करें तो ट्रेस किया जा सके. 11 दिसंबर, 2019 को अपहर्त्ता ने वीर सिंह के नंबर पर काल कर के अंश को रिहा करने के एवज में 15 लाख रुपए की फिरौती मांगी. सर्विलांस टीम और अंश के घर वालों द्वारा सूचना देने पर मसवासी चौकी इंचार्ज कुलदीप सिंह चौधरी अंश के घर गए और उस के घर वालों से पूछताछ की.

जिस नंबर से काल की गई थी, वह फरजी आईडी पर खरीदा गया था. जिस मोबाइल में वह सिम डाला गया था, उस मोबाइल में उस से पहले जो सिम डाले गए थे, उन की जांचपड़ताल करने के बाद पुलिस अपहर्त्ता तक पहुंच गई. वह कोई और नहीं, अंश की बड़ी बहन पूनम का प्रेमी विकास मौर्य था. 12 दिसंबर को इंसपेक्टर सतेंद्र सिंह और चौकी इंचार्ज कुलदीप सिंह चौधरी ने मानपुर तिराहे से विकास मौर्य को उस के साथी अनुराग शर्मा के साथ गिरफ्तार कर लिया. दोनों से कड़ाई से पूछताछ की गई तो दोनों ने अपने 3 अन्य साथियों विकास सैनी, रवि सैनी और रोहित के नाम बताए. इन सब ने साथ मिल कर अंश का अपहरण कर हत्या कर देने की बात कबूल कर ली. साथ ही हत्या के पीछे की कहानी भी बयान कर दी

विकास मौर्य और पूनम का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ रहा था, वह भी सब की नजरों से बच कर. लेकिन एक दिन पूनम के छोटे भाई अंश ने दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में एक साथ देख लिया. पूनम ने जैसेतैसे अंश को समझा दिया और उसे अपने साथ घर ले गई, लेकिन विकास इस बात से डर गया कि कहीं वह घर वालों को उन दोनों के बारे में बता दे. इसी वजह से उस ने अंश का अपहरण कर उसे मार देने का फैसला किया. इस बारे में उस ने पूनम को भनक तक नहीं लगने दी. उस ने अपने दोस्तों सीतारामपुर गांव निवासी अनुराग शर्मा, विकास सैनी, रवि सैनी और भूबरा मोहल्ला निवासी रोहित से बात की. दोस्ती की खातिर ये सब विकास का साथ देने को तैयार हो गए.

8 दिसंबर, 2019 को अंश घर के बाहर बच्चों के साथ खेल रहा था. तभी विकास के साथ अनुराग वहां गया. विकास ने अनुराग को अंश की तरफ इशारा कर के उस की पहचान कराई. अनुराग अंश के पास पहुंचा और उस से प्यार से बात की, साथ ही उसे 10 रुपए दिए. मासूम अंश ने उस से 10 रुपए ले लिए. अनुराग उस से दोस्ती कर के चला गया. अंश ने घर जा कर इस अनजान दोस्त से मिले पैसों के बारे में बताया तो किसी ने इस बात को गंभीरता से नहीं लिया. अगले दिन 9 दिसंबर को योजनानुसार दोपहर 2 बजे विकास अनुराग के साथ बाइक से अंश के घर के पास पहुंचा. रोज की तरह उस समय अंश बच्चों के साथ खेल रहा था. विकास ने उस से कहा कि उस के बड़े भैया गिरीश उसे बुला रहे हैं. वह आगे खड़े हैं. मासूम अंश उन के साथ बाइक पर बैठ गया.

आगे कुछ दूरी पर विकास सैनी, रवि और रोहित खड़े थे. अंश को उन के साथ देख कर वे भी उन के साथ हो लिए. अंश को वे बेलवाड़ा गांव के जंगल में ले गए. वहां रुमाल से बनाया फंदा अंश के गले में डाल कर कस दिया, जिस से अंश की दम घुटने से मौत हो गई. इस के बाद अंश की लाश को एक प्लास्टिक की बोरी में डाल कर रेत में दबा दिया. इस के बाद 11 दिसंबर को विकास ने केस की दिशा मोड़ने के लिए फरजी सिम से अंश के पिता को काल कर के 15 लाख रुपए की फिरौती मांगी. इस से केस की दिशा तो नहीं बदली, लेकिन उस के पकड़े जाने का रास्ता जरूर खुल गया. विकास की यह गलती उसे और उस के साथियों को भारी पड़ी.

12 दिसंबर को ही विकास मौर्य और अनुराग शर्मा की निशानदेही पर इंसपेक्टर सतेंद्र सिंह और चौकी इंचार्ज कुलदीप सिंह चौधरी ने एसडीएम राकेश कुमार गुप्ता की मौजूदगी में रेत में दबी अंश की लाश बरामद कर ली. इस के बाद मुकदमे में दर्ज धारा 363 को भादंवि की धारा 364, 302, 201, 34 तरमीम कर दिया गया. पुलिस ने 14 दिसंबर, 2019 को मुंशीगंज तिराहे से विकास सैनी और रवि सैनी को भी गिरफ्तार कर लिया

आवश्यक कानूनी लिखापढ़ी के बाद चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से सब को जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक रोहित फरार था.

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में पूनम परिवर्तित नाम है.

          

 

 

  

Love crime story : गर्लफ्रेंड को मार कर खुद भी खा लिया पॉइजन

Love crime story : प्यार में जान देने की बात करना या कसम खाना मामूली बातें हैं. जब बात वाकई जान देने की आती है तो डर लगने लगता है. यही वजह थी कि जब गौरी पीछे हटी तो हेत सिंह ने वादा निभाने के लिए उसे मार दिया, लेकिन खुद…

आगरा के थाना खेरागढ़ क्षेत्र में एक गांव है खां का गढ़. गांव का एक युवक नेहनू गांव से लगभग एक किलोमीटर दूर स्थित पुराने प्राइमरी स्कूल की खंडहर इमारत के पास से गुजर रहा था. नया स्कूल बन जाने के बाद पुराने स्कूल की इमारत लगभग खंडहर हो गई थी. नेहनू की नजर स्कूल के एक कमरे की ओर गई तो वहां का दृश्य देख कर नेहनू को सर्दी में भी पसीना आ गया. स्कूल के एक कमरे में 16-17 साल की युवती की लाश पड़ी थी. उस के चारों ओर खून फैला हुआ था, जिसे देखते ही नेहनू के मुंह से चीख निकल गई. वह गांव की ओर भागा. रास्ते में कुछ लोग अलाव ताप रहे थे. उस ने इस बात की जानकारी उन्हें दे दी. खां का गढ़ के लोगों को किसी मृत लड़की की खबर मिली तो लोग स्कूल की ओर दौड़े. कुछ ही देर में वहां भीड़ जुट गई.

यह 30 नवंबर, 2019 की सुबह की बात है. ग्रामीणों ने पास जा कर देखा तो युवती उन्हीं के गांव के हरिओम की 17 वर्षीय बेटी गौरी थी. गौरी के घर वालों को भी घटना से अवगत करा दिया गया. खबर सुनते ही परिवार में कोहराम मच गया. इसी बीच किसी ने पुलिस को सूचना दे दी थी. गौरी के घर वाले भी गांव के लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सूचना मिलने के लगभग एक घंटे बाद खेरागढ़ के थानाप्रभारी शेर सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. युवती की हत्या की खबर आसपास के गांवों में भी फैल चुकी थी, जिस से वहां देखने वालों की भीड़ एकत्र हो गई. लाश देख कर लोग आक्रोशित थे और हंगामा कर रहे थे. पुलिस ने जब मृतका की लाश कब्जे में लेनी चाही तो लोगों ने विरोध किया. वे आरोपी को पकड़ने की मांग कर रहे थे. भीड़ बढ़ती देख किसी अनहोनी की आशंका के डर से थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों को भी घटना से अवगत करा दिया.

सूचना मिलने पर एसएसपी बबलू कुमार, एसपी (ग्रामीण) रवि कुमार, सीओ (खेरागढ़) प्रदीप कुमार के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. एसएसपी के आदेश पर फोरैंसिक टीम, डौग स्क्वायड और आसपास के थानों की फोर्स भी वहां पहुंच गई. उच्चाधिकारियों ने युवती के शव का निरीक्षण किया. स्कूल के कमरे में मृतका गौरी का लहूलुहान शव पड़ा था. उस का गला किसी तेज धारदार हथियार से रेता गया था. गले पर कट के 2 निशान थे, एक हलका था और दूसरा गहरा. सिर में भी पीछे की ओर चोट थी.  फोरैंसिक टीम को तलाशी के दौरान मृतका के कपड़ों से एक सामान्य सा मोबाइल भी मिला, जो स्विच्ड औफ था. इस से जाहिर हो रहा था कि हत्यारे ने हत्या के बाद मोबाइल स्विच औफ कर मृतका के कपड़ों में रख दिया होगा. पानी से भरा लोटा भी शव के पास रखा था.

पुलिस को नहीं मिला कोई सुराग पुलिस ने मृतका के परिवार वालों से बात की. उन्होंने बताया कि गौरी आज तड़के 5 बजे अपने घर से शौच के लिए निकली थी. लेकिन जब वह 2 घटे तक वापस नहीं आई तो घर वाले उस की तलाश में जुट गए. इसी बीच उन्हें उस की हत्या की खबर मिली. अधिकारियों ने जब उन से पूछा कि उन की किसी से दुश्मनी या रंजिश तो नहीं है तो गौरी के पिता हरिओम ने बताया कि गांव में उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस बीच फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल से जरूरी सबूत जुटाए. पुलिस का खोजी कुत्ता भी घटनास्थल से लगभग 400 मीटर तक खेतों में गया. इस पर पुलिस ने खेतों में तलाशी की, लेकिन ऐसा कोई सुराग नहीं मिल सका, जिस से कातिल का सुराग मिलता.

कई घंटे तक जांच करने के बाद जब पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए शव को उठाना चाहा तो ग्रामीणों ने विरोध किया. उन्होंने कहा कि हत्या की गुत्थी सुलझने के बाद ही शव उठने दिया जाएगा. एसएसपी बबलू कुमार ने आक्रोशित ग्रामीणों को समझाया कि मृतका के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाल कर हत्यारों का पता लगाया जाएगा. उन्होंने आश्वासन दिया कि पुलिस शीघ्र ही हत्यारों को गिरफ्तार कर लेगी. उन के इस आश्वासन के बाद ग्रामीण शांत हो गए. पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. एसएसपी ने जानकारी दी कि गौरी के शव का पोस्टमार्टम पैनल से कराया जाएगा. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जांच की दिशा तय होगी. मृतका के पिता हरिओम सिंह की तहरीर पर थाना खेरागढ के थानाप्रभारी शेर सिंह ने अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

एसएसपी ने इस केस की जांच में कई टीमें लगा दीं. पुलिस ने सब से पहले मृतका गौरी के पास मिले फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. गौरी के मोबाइल में जिस का भी नंबर मिला, उसे ही पुलिस ने पूछताछ के लिए थाने बुला लिया. इन में 3 युवकों पर शक हुआ. उन तीनों से 2 दिन तक पूछताछ चली. इस के बाद 25 और संदिग्धों से पूछताछ की गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिल सका. काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा था, जिस पर बारबार बात की गई थी. पुलिस को उसी नंबर पर सब से ज्यादा शक था, लेकिन वह नंबर बंद था. पुलिस ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला वह नंबर 21 वर्षीय हेत सिंह तोमर उर्फ छोटू उर्फ कमल, निवासी गांव छिछावली, थाना मुरैना, मध्य प्रदेश का है. पुलिस ने जब इस पते पर दबिश दी तो हेत सिंह घर पर नहीं मिला. पुलिस ने उस के परिजनों से कह दिया कि वह आए तो उसे खेरागढ़ थाने भेज दें.

2 दिसंबर की शाम को पुलिस ने 2 युवक थाने बुलाए. पुलिस उन दोनों से पूछताछ कर रही थी. इसी बीच रात लगभग 8 बजे हेत सिंह थाने में पहुंचा. उस के कदम लड़खड़ा रहे थे. उस के हाथ में पानी की एक बोतल थी. वह बारबार बोतल से पानी पी रहा था. थाने में दरोगा और सिपाहियों को देखते ही हेत सिंह ने कहा, ‘‘अब मैं बचूंगा नहीं. दरोगाजी, मैं ने अपने प्यार को मार डाला. मैं ही गौरी का हत्यारा हूं. मेरे मांबाप को परेशान मत करो, जो सजा देनी है मुझे दो. मैं ने जहर खा लिया है. मैं भी उस के पास जाना चाहता हूं.’’

इतना सुनते ही थाने में हड़कंप मच गया. हेत सिंह के हाथ से बोतल छीन ली गई. एक सिपाही उस का वीडियो बनाने लगा. इस के बाद पूछताछ के लिए लाए गए सभी लोग थाने से छोड़ दिए गए. हेत सिंह को तुरंत गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया. उस की हालत खराब होने पर उसे आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज ले जाया गया. सूचना मिलने पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी अस्पताल पहुंच गए. अधिकारियों द्वारा हेत सिंह से गौरी की हत्या के संबंध में विस्तार से पूछताछ की गई. लेकिन उपचार के दौरान ही उस की मौत हो गई. इस बीच उस ने गौरी की हत्या का जुर्म कबूल करते हुए जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

थाना खेरागढ़ के अंतर्गत स्थित खां का गढ़ गांव में हेत सिंह की बहन की ससुराल है. उस का बहन के यहां आनाजाना लगा रहता था. एक बार पड़ोस में रहने वाली गौरी जब उस की बहन के यहां आई तो हेत सिंह की नजर उस पर पड़ी. गौरी सुंदर लड़की थी. वह उस का अनगढ़ सौंदर्य देख ठगा सा रह गया. उस ने उसी क्षण उस से दोस्ती करने का निर्णय ले लिया. गौरी की प्रेम कहानी हेत सिंह टकटकी लगाए उसे निहारता रहा. गौरी को भी इस बात का अहसास हो गया कि हेत सिंह उसे देख रहा है. हेत सिंह कसी हुई कदकाठी का जवान था. जवानी की दहलीज पर पहुंची गौरी का दिल भी उस पर रीझ गया. उसे देख गौरी का दिल तेजी से धड़कने लगा था. वहीं पर दोनों में परिचय हुआ.

गौरी खां का गढ़ के रहने वाले हरिओम सिंह की बेटी थी. गौरी के अलावा हरिओम सिंह का एक बेटा था. हरिओम की पत्नी को कैंसर था, जिस का कुछ दिन पहले ही औपरेशन हुआ था. मां की बीमारी की वजह से घर के काम गौरी ही करती थी, जिस से वह इंटरमीडिएट से आगे की पढ़ाई नहीं कर सकी थी. इंटरमीडिएट भी उस ने प्राइवेट किया था. गौरी और हेत सिंह की यह मुलाकात धीरेधीरे दोस्ती में बदल गई. फिर दोनों चोरीचोरी गांव के बाहर मिलने लगे. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए थे, जिस से फोन पर भी उन की बातें होने लगीं. इस के बाद उन का प्यार और गहराता गया. उन के प्रेम संबंधों की किसी को भनक तक नहीं लगी.

पुलिस को हेत सिंह ने बताया कि वह गौरी को बेइंतहा प्यार करता था. वह भी उसे बहुत चाहती थी. उस के लिए गौरी ही सब कुछ थी. दोनों ने साथ जीनेमरने की कसम खाई थी. लेकिन उन की शादी नहीं हो पा रही थी. इसलिए उन्होंने तय किया कि जब वे एक साथ रह नहीं सकते तो साथसाथ जान तो दे ही सकते हैं. अत: उन्होंने एक साथ जान देने का निर्णय ले लिया. योजना के अनुसार हेत सिंह अपने घर से 28 नवंबर, 2019 को ही गांव खां का गढ़ आ गया था. उस ने शनिवार को फोन कर गौरी को पुराने स्कूल में बुला लिया. गौरी वहां आ तो गई लेकिन वह अपने वायदे से मुकर गई.

पिछले कुछ दिनों से उस का व्यवहार भी बदल गया था. इस से हेत सिंह को शक हो गया कि गौरी की जिंदगी में शायद कोई और आ गया है. उसे डर था कि उस की मोहब्बत उस से छिन न जाए. इसलिए गौरी उस के साथ मरने को मना कर रही है. हेत सिंह नहीं चाहता था कि उस की गौरी किसी और की हो जाए. लिहाजा उस ने गौरी को उसी समय सजा देने की ठान ली. खुद डर गया मौत से उस ने गौरी को धक्का दे कर गिरा दिया. उस के गिरते ही हेत सिंह ने अपने साथ लाए चाकू से उस का गला काटना चाहा, लेकिन गौरी के विरोध के चलते उस के गले पर हलका कट लगा. किसी तरह उस ने गौरी को काबू कर चाकू से उस का गला रेत दिया. हेत सिंह ने गौरी के मोबाइल को स्विच्ड औफ कर के उस के कपड़ों में रख दिया.

इस के बाद उस ने हत्या में इस्तेमाल चाकू स्कूल के पास स्थित तालाब में फेंक दिया और वहां से फरार हो गया. गौरी की हत्या करने के बाद हेत सिंह अपने घर गया. जब उस ने घर वालों को एक युवती की हत्या की बात बताई तो पूरा परिवार सन्न रह गया. पुलिस से बचने के लिए हेत सिंह वहां से मथुरा स्थित अपनी रिश्तेदारी में चला गया. दूसरे दिन उसे पता चला कि पुलिस उस के घर दबिश देने आई थी. उस ने मथुरा से जहर खरीदा और खेरागढ़ आ कर एक जगह पर जहर का सेवन किया. इस के बाद वह थाना खेरागढ़ पहुंच गया. पोस्टमार्टम गृह पर आए हेत सिंह के भाई राहुल ने पुलिस को बताया कि हेत सिंह टैक्सी चलाता था. वह दिन भर घर नहीं आता था. परिवार वालों से उस का संपर्क कम ही हो पाता था.

घटना को अंजाम देने के बाद जब पुलिस घर आई, तब उस की करतूत का पता चला. घर वालों ने उस से कहा, ‘‘तुम मर जाओ या फिर थाने जा कर गुनाह कबूल करो. हम से कोई संबंध नहीं है.’’

घर वालों ने एक तरह से हेत सिंह से पल्ला झाड़ लिया था. परिचितों ने उस पर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने का दबाव बनाया था. गौरी के प्यार में पागल हुआ हेत सिंह कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था. गुस्से में उस ने गौरी की हत्या तो कर दी थी, लेकिन अब वह पछता रहा था. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. ऐसी स्थिति में उस ने आत्महत्या करने का निर्णय लिया. परिजनों ने हेत सिंह के शव को मुरैना ले जा कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Agra Crime : पहले पति को मारा, फिर लाश पर चढ़ा दी कार

Agra Crime : ‘नार नहीं नौरंगी है, ढक ले तो सारे कुल को ढक ले वरना नंगी की नंगी है’ इस कहावत का आशय स्त्री के चाल, चरित्र और चेहरे को दर्शाने से है, जो सही है. भावना की जिंदगी में सब कुछ था, अफसर पति, कोठी, कार और 2 बच्चे, लेकिन उस ने…

मानव मन को समझना आसान नहीं है. इंसान कब किस को प्यार करने लगे और कब प्यार नफरत में बदल जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता. ऐसा ही कुछ भावना के साथ भी हुआ. एक अच्छे और संभ्रांत परिवार की बेटी और बहू भावना कुछ ऐसा कर बैठेगी, किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था. कहते हैं, विनाश काल में इंसान की सकारात्मक सोच बंद हो जाती है. फिर समय की इस आंधी में सब कुछ तहसनहस हो जाता है. बिना सोचेसमझे भावना ने जो कदम उठाया, उस से कई जिंदगियां तबाह हो गईं और खुशियां मुट्ठी में बंद रेत की तरह फिसल गईं. ताजनगरी आगरा दुनिया भर में प्रसिद्ध है, जहां देशविदेश से पर्यटक आते हैं और शाहजहां मुमताज की यादगार मोहब्बत को नमन करते हैं. वहीं मोहब्बत की इस नगरी में खून से लथपथ आशिकी की अनगिनत कहानियां दफन हैं.

आगरा के अशोक विहार में नाथूराम अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिता रहे थे. उन के 3 बेटे थे सुशील, वीरेंद्र और नरेंद्र. नाथूराम सेना में सीनियर औडिटर थे. उन का बड़ा बेटा सुशील भी सेना में ही था. छोटा नरेंद्र पढ़ रहा था और मंझले बेटे वीरेंद्र की नौकरी पंजाब में भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में लग गई थी. कुल मिला कर नाथूराम का अच्छा खुशहाल और आर्थिक रूप से संपन्न परिवार था. लेकिन समय के चक्र के साथ जीवन में बदलाव आते रहते हैं. 14 साल पहले नाथूराम के मंझले बेटे वीरेंद्र की शादी गढ़ी भदौरिया निवासी ओमप्रकाश की बेटी भावना के साथ हुई थी. भावना की 2 बहनें शादीशुदा थीं और खुशहाल जीवन बिता रही थीं. इन का एक भाई था.

वीरेंद्र गंभीर प्रवृत्ति का व्यक्ति था. उस की जिंदगी की गाड़ी ठीक चल रही थी. भावना ने कालांतर में आयुष और शुभि को जन्म दिया. सब कुछ ठीक था, भावना अपने पति और बच्चों के साथ खुश थी. वीरेंद्र भी अपनी सरकारी नौकरी की जिम्मेदारियां निभा रहा था. लेकिन अचानक कालचक्र अपनी धुरी पर उल्टा घूमने लगा. वीरेंद्र ने आगरा की पंचशील कालोनी में अपनी कोठी बनवाई. वीरेंद्र अपनी पत्नी और बच्चों को खुशहाल जीवन देना चाहता था. करीब 3 साल पहले वीरेंद्र का तबादला आगरा हो गया वह अपने परिवार के साथ पंचशील कालोनी स्थित अपनी कोठी नंबर 12 में रहने लगा. वीरेंद्र बीएसएनएल में जूनियर इंजीनियर के पद पर था. उस की तैनाती आगरा के बिजली घर स्थित बीएसएनएल औफिस में थी. अपने पद के अलावा उस के पास एसडीओ का चार्ज भी था.

वीरेंद्र के पिता फौज की नौकरी से रिटायर हो चुके थे. अपने औफिस जाने से पहले वीरेंद्र पिता के लिए खाना देने उन के अशोक विहार स्थित घर पर जाता था. कालांतर में सुशील भी लांस नायक पद से रिटायर हो गए. जबकि नरेंद्र बीटेक के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. यानी सभी अपनेअपने काम में व्यस्त थे. जिंदगी के रंगों को अचानक छुआ भावना की साड़ी ने

एक दिन वीरेंद्र अपनी पत्नी और बच्चों के साथ किसी शादी समारोह में गया. वहां भावना अचानक उस समय एक युवक से टकरा गई, जब दोनों प्लेट में खाना ले कर निकल रहे थे. युवक ने सौरी कहा. जवाब में भावना ने हंसते हुए कहा, ‘‘कोई बात नहीं, भीड़भाड़ में ऐसा हो जाता है.’’

‘‘लेकिन आप की साड़ी में दाग लग गया है,’’ युवक ने विनम्रता से कहा.

‘‘दाग साड़ी पर ही तो लगा है, धुल जाएगा. बस जीवन पर नहीं लगना चाहिए.’’ भावना बोली.

युवक ने भावना को गौर से देखते हुए कहा, ‘‘अच्छी फिलौसफी है आप की मैडम, आप के लिए कुछ लाऊं?’’

भावना को युवक की विनम्रता पसंद आई. वह बोली, ‘‘हां, कुछ मीठा ले आइए.’’

युवक आइसक्रीम ले आया. आइसक्रीम देने के बाद वह बोला, ‘‘मैडम, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कहां रहती हैं?’’

‘‘मैं पंचशील कालोनी में रहती हूं,’’ भावना ने इधरउधर देखते हुए कहा, ‘‘अच्छा, मैं जाती हूं, बच्चों ने कुछ खाया है या नहीं?’’ कह कर भावना वहां से चली गई.

वह युवक दिल्ली नगर निगम में जूनियर इंजीनियर था. नाम था कपिल.

29 साल का कपिल एक रिटायर्ड अफसर का बेटा था. उस के पिता सूरजभान एफसीआई से रिटायर थे.  वह दिल्ली के अशोक विहार में रहते थे. उन का बड़ा बेटा देवेंद्र भी दिल्ली नगर निगम में जूनियर इंजीनियर था, अत: कपिल ने देवेंद्र के पास रह कर ही पढ़ाई की थी. कपिल शनिवार और रविवार की छुट्टियों में घर पर ही रहता था. नौकरी मिलने के बाद उस ने दिल्ली में किराए पर अलग कमरा ले लिया था. कपिल का दोस्त मनीष कपिल के साथ उस के कमरे में रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था. वह बीटेक पास कर चुका था और आगरा की पंचशील कालोनी स्थित अपने घर आनाजाना रहता था.

उस दिन शादी समारोह में कपिल और भावना की वह छोटी सी मुलाकात कुछ ऐसा गुल खिलाएगी, जिस में सब कुछ तबाह हो जाएगा, किसी ने कल्पना तक नहीं की थी. दिल्ली आने के बाद कपिल ने मनीष को बताया कि आगरा में शादी समारोह में उसे पंचशील कालोनी की एक महिला मिली थी, जिस से उस की बातचीत भी हुई थी. तुम तो पंचशील कालोनी में ही रहते हो, जरा पता लगाना कि कौन है. मनीष ने ठहाका लगाया, ‘‘तूने मुझे क्या जासूस समझ रखा है? पंचशील में क्या वही एक औरत ही रहती है? अरे भाई, न नाम, न पता, इतनी बड़ी कालोनी में कैसे ढूंढेंगे उसे. वैसे उस औरत में ऐसा क्या है जो उसे तलाश कर उसे तुझ से मिलाना चाहिए.’’

‘‘कुछ नहीं यार, बस जरा यूं ही. उस से एक बार फिर बात करने की इच्छा हो रही है.’’

‘‘ठीक है इस बार आगरा चलेंगे तो कालोनी के चक्कर लगाएंगे, शायद वह कहीं मिल जाए.’’ कह कर मनीष ने बात खत्म की.

भावना का पति वीरेंद्र व्यस्त अधिकारी था. उसे सुबह 10 बजे औफिस पहुंचना होता था और शाम 6 बजे घर लौटता था. सुबहशाम वह पिता को अशोक विहार स्थित घर जा कर खाना भी पहुंचाता था. कुल मिला कर भावना को लगता कि उस का पति आम पतियों की तरह उस की भावनाओं पर ध्यान नहीं देता. फिर अचानक उस के जेहन में शादी समारोह में मिला वह युवक घूमने लगता था. एक दिन अचानक फेसबुक पर भावना को एक फ्रैंड रिक्वेस्ट आई. फोटो देख कर वह चौंकी. अरे यह तो वही युवक है. उस के दिल की धड़कनें तेज होने लगीं. उस ने खुद को आईने में निहारा और सोचा उस के चेहरे पर अभी भी कुछ ऐसा है, जो किसी युवक को आकर्षित कर सकता है.

साड़ी का रंग सोच में उतरने लगा भावना जानती थी कि वह 39 साल की है और 2 बच्चों की मां भी. जबकि युवक काफी कमउम्र का था. समय काटने के लिए दोस्त बना लेने में कोई हर्ज नहीं है. सोच कर उस ने कपिल नाम के उस युवक की फ्रैंड रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. कपिल बहुत खुश था, उसे मनचाही मुराद मिल गई थी. फेसबुक पर बात का सिलसिला शुरू हो गया, जो निकट भविष्य में कुछ और ही रंग लाने वाला था. चैटिंग के दौरान एक दिन कपिल ने भावना की एक फोटो पर लिख कर भेजा, ‘‘आप बहुत सुंदर हैं.’’

अपनी तारीफ सुन कर भावना का दिल बल्लियों उछलने लगा. उस ने थैंक्स के साथ लिखा कि आज तक मेरी किसी ने तारीफ नहीं की. उस दिन भावना देर तक सोचती रही कि उस ने वीरेंद्र के साथ शादी कर के गलती कर दी थी. पैसा ही सब कुछ नहीं होता. वह उसे कोमल भावनाओं से भरी पत्नी नहीं बल्कि मशीन की तरह इस्तेमाल करता है. वीरेंद्र के प्रति वितृष्णा के भाव मन में आ चुके थे. उस रात काम खत्म कर के जब वह पलंग पर आई तो वीरेंद्र एक फाइल देख रहा था. भावना ने कहा, ‘‘कभी अपनी बीवी के दिल की फाइल भी पढ़ लिया करो.’’

वीरेंद्र हंसते हुए बोला, ‘‘बताओ, क्या है तुम्हारे दिल में?’’

‘‘यह तो तुम भी जानते हो कि पत्नी क्या चाहती है?’’ वह बोली.

‘‘सब कुछ तो है तुम्हारे पास. खर्चे के लिए मैं पैसा भी बराबर देता हूं, जो जरूरत हो ले लो.’’ वीरेंद्र ने कहा.

‘‘मुझे जो चाहिए, उसे पैसे से नहीं खरीदा जा सकता. क्या तुम अपनी पत्नी की तारीफ में दो मीठे बोल भी नहीं कह सकते. बताओ क्या मैं सुंदर नहीं हूं?’’

‘‘ओह तो यह बात है.’’ वीरेंद्र बोला, ‘‘कभी आईने में खुद को गौर से देखा है. 2 बच्चों की मां हो, उन का भी कुछ खयाल किया करो. तुम जैसी हो वैसी ही रहोगी, तारीफ करने से कुछ भी बदलने वाला नहीं है. अच्छा, अब बहुत रात हो गई है. चलो सो जाओ.’’

पति की बातें भावना को चुभ गईं. उस ने सोचा कि इस से अच्छा तो वह कपिल है जो उस की तारीफ करता है. धीरेधीरे कपिल उस के दिलोदिमाग पर छाने लगा. दोनों में चैटिंग तो होती ही थी दोनों ने फोन नंबर और अपना पता एकदूसरे को बता दिया. इस के बाद कभीकभी कपिल छुट्टी ले कर आगरा आने लगा. मौका देख कर वह भावना से भी मिलने लगा. कपिल को यह बात अच्छी तरह पता चल चुकी थी कि पति और बच्चों के होते हुए भी भावना बिलकुल तनहा है. वह वीरेंद्र के साथ खुश नहीं है. कभीकभी भावना कहती, ‘‘कपिल, यह जिंदगी एक जेल की तरह है और मैं खुद को आजीवन कारावास की सजा पाए हुए कैदी की तरह महसूस करती हूं.’’

‘‘तो फिर निकल जाओ न इस कैद से.’’ नादान कपिल ने सलाह दी.

‘‘मैं एमएससी पास हूं. कुछ कर के अपनी जिंदगी संवार सकती थी, पर पिता ने मुझे बोझ की तरह उतार फेंका. पढ़ाई के बाद कुछ भी मन का नहीं करने दिया और इस जंजाल में फंस गई. बच्चे पैदा कर के उन की आया बन जाओ और दिनरात घर के लोगों के लिए खाना पकाओ. बस, यही जिंदगी है मेरी.’’

भावना की खीझ और कुंठा उस के व्यक्तित्व को घेर रही थी और उस का नादान प्रेमी उन शोलों को हवा दे रहा था. दोनों इस बात से अनजान थे कि यदि ये शोले भड़क गए तो सब जल कर राख हो जाएगा. भावना और कपिल के बीच नाजायज संबंध बन चुके थे. भावना खुद को कपिल की बांहों में सुरक्षित महसूस कर रही थी. वह यह भूल गई थी कि वह उम्र में कपिल से बड़ी है और विवाह जैसे बंधन को अपवित्र कर एक बड़ा गुनाह कर रही है. लेकिन कपिल के प्रति उस की दीवानगी ने उस की सोच पर परदा डाल दिया था. धीरेधीरे वक्त गुजर रहा था और दीवानगी भरी मोहब्बत के बंधन और मजबूत हो रहे थे. भावना पति और बच्चों की परवाह किए बिना कुछ पाने की चाह में खतरनाक राह पर चली जा रही थी.

काश! वीरेंद्र ने स्थिति को संभाला होता वीरेंद्र अभी तक इस खेल से अनजान था. बच्चों को भी कोई जानकारी नहीं थी, पर कोई भी गुनाह ज्यादा दिन तक नहीं छिप पाता. यह गुनाह भी नहीं छिप पाया. एक दिन वीरेंद्र औफिस से कुछ जल्दी ही वापस आ गया. उस ने देखा कि कोई युवक अभीअभी उस के घर से बाहर निकला था. इस से पहले कि वह अपनी गाड़ी लौक कर के उसे पहचान पाता, वह चला गया. वीरेंद्र ने डोरबैल बजाई तो भावना ने दरवाजा खोलते हुए कहा, ‘‘अरे तुम फिर वापस आ गए.’’

लेकिन सामने वीरेंद्र खड़ा था. पति को देखते ही भावना का चेहरा पीला पड़ गया. वीरेंद्र ने उस से पूछा, ‘‘कौन था वह?’’

‘‘कौन..? किस की बात कर रहे हो तुम?’’ वह बोली.

‘‘वही जो अभीअभी घर से निकल कर गया है.’’ वीरेंद्र ने कहा.

‘‘यह क्या कह रहे हो तुम, यहां से तो कोई नहीं निकला. तुम ने जरूर कहीं और  किसी को देखा होगा. चलो आओ, चाय बनाती हूं.’’ भावना ने बात संभालते हुए कहा.

लेकिन वीरेंद्र के दिल में शक का बीज पड़ चुका था. पिछले कुछ समय से उसे पत्नी का व्यवहार परेशान कर रहा था. अंदर आ कर उस ने देखा कि मेज पर बादाम, काजू की प्लेटें रखी थीं. भावना ने वीरेंद्र की नजरों को भांप लिया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने सोचा कि बच्चों के लिए कुछ बनाऊंगी, अभीअभी निकाले हैं. तुम खाओ, मैं चाय लाती हूं.’’ कह कर भावना किचन में चली गई. वीरेंद्र को समस्या और उस के हल को खोजना था. पत्नी किस के साथ दोस्ती पाले हुए है, यह जानना बहुत जरूरी था. इस से पहले कि वीरेंद्र भावना का फोन चैक करता, भावना ने कपिल की दी हुई सिम फोन में से निकाल दी.

भावना और कपिल के संबंधों की जानकारी वीरेंद्र को करीब डेढ़ साल बाद मिली, तब तक नाजायज संबंधों की बेल काफी बढ़ चुकी थी. इतना ही नहीं, बल्कि दोनों का संबंध खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका था. इधर कपिल के पिता सूरजभान ने उस के लिए रिश्ते की तलाश शुरू कर दी, लेकिन कपिल तय कर चुका था कि भावना ही उस की हमसफर बनेगी. एक दिन उस ने मन की बात भावना को बताई तो वह चौंकी.

‘‘ये क्या कह रहे हो तुम? मैं तुम से उम्र में बड़ी हूं और 2 बच्चों की मां भी. ऐसे में मेरे बच्चों का क्या होगा?’’

‘‘बच्चे काफी बड़े हैं. उन्हें उन का बाप देखेगा. और रही उम्र की बात तो तुम्हारी उम्र से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. तुम तलाक ले लो वीरेंद्र से.’’ कपिल ने साफ कहा.

‘‘ठीक है, मैं सोचूंगी.’’ भावना ने कहा.

इधर वीरेंद्र काफी डर गया था. क्योंकि भावना का रवैया पिछले कुछ दिनों से अच्छा नहीं था. वीरेंद्र जानता था कि वासना से पीडि़त बुद्धिहीन औरत कुछ भी कर सकती है. सुरक्षा के लिहाज से उस ने दरवाजों पर लोहे के जालीदार दरवाजे भी लगवा दिए पर वह यह भी जानता था कि खतरा कहीं बाहर नहीं बल्कि वह तो उस के घर में ही मौजूद है. वीरेंद्र ने अपने कुछ खास परिचितों को बताया भी था कि वह इन दिनों खुद को खतरे में महसूस कर रहा है, पर खतरा कैसा है यह वह किसी को बता नहीं पाया. आखिर एक दिन वीरेंद्र को यह बात पता चल ही गई कि दिल्ली नगर निगम में काम करने वाले कपिल का उस की पत्नी के पास आनाजाना है. यह जान कर वह सन्न रह गया. समस्या को जान लेने के बाद उस का उपचार कैसे किया जाए, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी.

इधर कपिल इस बात पर जोर दे रहा था कि भावना जल्द से तलाक ले ले. लेकिन भावना जानती थी कि अगर उस ने वीरेंद्र से तलाक ले लिया तो संपत्ति से हाथ धो बैठेगी. उस ने साफ कह दिया कि तलाक तो नहीं ले सकती, कुछ और सोचो. इधर वीरेंद्र ने भी तय किया कि वह पत्नी पर नजर रखेगा. इसलिए वह जबतब अचानक घर आ जाता. पति की इस हरकत से भावना का गुस्सा बढ़ गया. आए दिन दोनों में झगड़ा होता. दोनों बच्चे सहमे हुए रहने लगे. एक दिन वीरेंद्र ने कहा कि भावना इस बार तुम अपना बर्थडे सेलिब्रेट करना, मैं तुम्हें एक अच्छा गिफ्ट दूंगा. वीरेंद्र ने ऐसा ही किया भी. उस ने पत्नी को एक महंगा मोबाइल फोन गिफ्ट किया.

इतना ही नहीं वीरेंद्र ने भावना के लिए कार भी खरीदी. उस ने सोचा कि शायद उस के व्यवहार से प्रभावित हो कर भावना सही रास्ते पर आ जाए और दोनों का वैवाहिक जीवन बिगड़ने से बच जाए. पर भावना पर आशिकी का नशा इतना चढ़ चुका था कि उतरने के लिए किसी बड़ी साजिश का इंतजार कर रहा था. संदेह था वीरेंद्र की हत्या हुई  5 जनवरी, 2020 की रात 3 बजे आगरा के एस.एन. अस्पताल में 2 लोग एक व्यक्ति को जख्मी हालत में लाए. उन्होंने बताया कि वे लोग घायल को पहले साकेत कालोनी के प्रशांत अस्पताल ले गए थे. लेकिन उन्होंने भरती करने से इनकार कर दिया. तब वे उसे दिल्ली गेट स्थित पुष्पांजलि अस्पताल ले गए. लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे एस.एन. मैडिकल कालेज रैफर कर दिया गया है.

पूछताछ में पता चला कि वह जख्मी व्यक्ति बीएसएनएल का जेटीओ है. जख्मी का डाक्टरों ने परीक्षण किया तो वह मृत पाया गया. प्रथमदृष्टया यह मामला हत्या का था, इसलिए अस्पताल प्रशासन ने तुरंत पुलिस को सूचना दे दी. थाना शाहगंज के इंसपेक्टर अरविंद कुमार सिंह पुलिस टीम के साथ तुरंत अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने यह बात उच्चाधिकारियों को भी बता दी. पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. मृतक को इमरजेंसी में लाने वाले मृतक के बड़े भाई सुशील वर्मा और उन का बेटा प्रशांत थे. पोस्टमार्टम के बाद जो रिपोर्ट आई, उस से पता चला कि वीरेंद्र की मौत चेहरे और छाती पर लगे जख्मों और पसलियों के टूटने से हुई थी. पसलियां किसी भारी चीज से तोड़ी गई मालूम होती हैं. संभवत: हत्या को एक्सीडेंट केस बनाने की कोशिश की गई थी. रिपोर्ट में गला दबाना भी बताया गया था.

पूछताछ में सुशील ने पुलिस को बताया कि रात को उस की भाभी भावना का फोन आया कि वीरेंद्र किसी का फोन सुन कर घर से 7 हजार रुपए ले कर पैदल ही चले गए. जब वह नहीं लौटे तो उस ने उन्हें फोन किया. लेकिन काल रिसीव नहीं की गई. फिर फोन स्विच्ड औफ हो गया. भावना ने आगे बताया था कि किसी परिचित ने 10 हजार रुपए मांगे थे, लेकिन घर में 7 हजार रुपए ही थे. सुशील ने बताया कि भावना की बात सुनते ही वह अपने बेटे के साथ भाई को खोजने निकल गया. रात लगभग 3 बजे वीरेंद्र जख्मी हालत में घर से करीब 400 मीटर की दूरी पर दीप इंटर कालेज के पास खाली प्लौट के सामने मिले, जिन्हें वह गाड़ी में डाल कर ले आया.

पुलिस ने सुशील की तहरीर पर आईपीसी की धारा 302 के तहत अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. सुशील ने पुलिस को बताया कि वीरेंद्र किसी को पैसे देने के लिए रात को एक बजे अकेले ही घर से निकले थे. लेकिन मौकाएवारदात पर पुलिस को कोई पैसा या मोबाइल नहीं मिला था. मृतक की हत्या जिस तरीके से की गई थी, उसे देख कर लूट का मामला तो बिलकुल भी नहीं लग रहा था. यह बात सुशील के गले भी नहीं उतर रही थी, क्योंकि वीरेंद्र शाम के बाद कभी अकेले घर से नहीं निकलते थे. पुलिस ने फूटफूट कर रो रही भावना से पूछताछ की तो उस ने कहा कि उस ने पति को अकेले रात में बाहर निकलने से मना किया था, पर वह नहीं माने और चले गए. भावना के हावभावों से पुलिस को शंका हो रही थी.

मामले की जांच का कार्य एसएसपी बबलू कुमार ने सीओ नम्रता श्रीवास्तव को सौंप दिया. शाहगंज थाने की टीम और सर्विलांस टीम को भी इस केस की जांच में लगाया गया. इसी के साथ हत्याकांड के खुलासे में एसपी (सिटी) बोत्रे रोहन, प्रमोद और उन की टीम भी लग गई. एसपी (सिटी) खुद इंजीनियर हैं, सर्विलांस टीम में भी कई इंजीनियर थे. पुलिस ने सब से पहले मृतक के एक नजदीकी रिश्तेदार से पूछताछ की. उस ने बताया कि भावना की कपिल नाम के एक युवक के साथ दोस्ती थी और कपिल का गहरा दोस्त था मनीष. 2 साल पहले कपिल की नौकरी दिल्ली नगर निगम में लग गई थी. वह अपने दोस्त मनीष के साथ किराए के कमरे में रहता है और मनीष का पूरा खर्च उठाता है.

अब पुलिस का फोकस नाजायज संबंधों पर ठहर गया. पुलिस ने कपिल और मनीष के बारे में जांच कर पता लगा लिया कि आगरा की पंचशील कालोनी में रहने वाला मनीष राम सिंह का बेटा है, जो एक फैक्ट्री में काम कर के परिवार पालता है. मनीष का एक छोटा भाई भी है. पुलिस मनीष को दिल्ली से ले आई और उस से पूछताछ शुरू कर दी. उधर पुलिस की एक टीम पंचशील कालोनी और घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच कर रही थी. लेकिन कोहरे के कारण किसी सीसीटीवी कैमरे में कोई फोटो नहीं आ पाई थी, पर कालोनी के लोगों ने बताया कि 5 जनवरी, 2020 की रात में वीरेंद्र के घर पास एक कार देखी गई थी.

वीरेंद्र के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो उस के फोन की आखिरी लोकेशन कालोनी में ही मिली. पुलिस को गुमराह करने के लिए हत्यारे ने फरजी नामपते पर एक सिम ली थी. साजिश को अंजाम देने के लिए उसी सिम से वीरेंद्र को काल की गई थी. शक होने पर पुलिस ने भावना को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने मनीष और भावना से सख्ती से पूछताछ की तो उन के टूटने में ज्यादा देर नहीं लगी. इस के बाद कपिल को भी पुलिस दिल्ली से गिरफ्तार कर ले आई. पूछताछ में उन्होंने अपना गुनाह कबूल कर लिया. पता चला कि नाजायज रिश्ते बरकरार रखने और अपनीअपनी खुशियां पाने के लिए उन्होंने हत्या की साजिश एक महीने पहले रची थी और उसे 4 जनवरी को अंजाम दिया था. अपनी खुशी और सुख पाने के लिए भावना इतनी अंधी हो गई थी कि उस ने यह तक नहीं सोचा कि उस के इस कदम के बाद बच्चों का क्या होगा.

योजना के मुताबिक, 5 जनवरी, 2020 को कपिल अपने दोस्त दीपक की कार ले कर मनीष के साथ रात में आगरा पहुंचा. उस समय रात के करीब 12 बज चुके थे. भावना ने अपने घर का बाहरी दरवाजा खुला छोड़ दिया. दोनों अंदर आ गए. उस समय वीरेंद्र सो रहा था. कपिल ने तकिए से उस का मुंह और मनीष ने गला दबाया. भावना ने पति के पैर पकड़ लिए ताकि वह विरोध न कर सके.  जब वीरेंद्र ने छटपटाना बंद कर दिया तो तीनों ने मिल कर उसे कार में डाला और दीप इंटर कालेज के पास एक खाली प्लौट के सामने चार फुटा रोड पर डाल दिया. इस के बाद कई बार उस की लाश पर कार चढ़ाई, जिस से उस की पसलियां टूट गईं.

कोशिश की, लेकिन पुलिस को नहीं लगा एक्सीडेंट बेशक कातिलों ने हत्या को एक्सीडेंट का रूप देने की कोशिश की, पर पुलिस की सूझबूझ से राज खुल ही गया. इश्क की मारी भावना का कोई ड्रामा काम नहीं आया. हत्या के बाद कपिल और मनीष दिल्ली आए थे लेकिन उन दोनों के मोबाइल फोनों की लोकेशन निकलवाई गई तो मनीष के फोन की लोकेशन घटनास्थल पर और फिर दिल्ली की पाई गई. भावना ने फोन की काल डिटेल्स निकाली गई तो हत्या से पहले उस की कपिल से बात होने की पुष्टि हुई. पुलिस ने 48 घंटे में इस हत्याकांड से परदा उठा दिया और तीनों आरोपियों भावना, कपिल और मनीष को गिरफ्तार कर 8 जनवरी, 2020 को पुलिस जब कोर्ट ले गई तो उन्हें देखने के लिए भारी भीड़ जमा हो गई. तीनों को सुरक्षा घेरे में ले कर अदालत में पेश किया गया. जैसे ही अदालत ने उन्हें जेल भेजने के आदेश दिए तो तीनों आरोपी रोने लगे.

अपने सुख के लिए पति नाम के कांटे को रास्ते से हटाने के लिए भावना ने गहरी चाल चली थी. भावना ने सोचा था कि विधवा हो जाने पर उसे सहानुभूति और प्रौपर्टी दोनों ही मिलेंगी, पर इस अपराध के लिए उसे मिली जेल. कुछ रिश्तेदारों और अपनों ने भावना से मुंह फेर लिया. अब उस के पास काली अंधी दुनिया के सिवाय कुछ नहीं है. भावना का बेटा 7वीं कक्षा में और बेटी 6ठी कक्षा में पढ़ती है. उन्हें नहीं मालूम कि मां ने उन्हें अनाथ क्यों किया. एक कातिल मां की इस कारगुजारी का बच्चों पर क्या असर होगा, यह तो भविष्य में ही पता चलेगा. पर मां ने फिलहाल तो उन से उन के हिस्से की खुशियां छीन ही लीं.

 

 

Extramarital Affair : पत्‍नी से अवैध संबंध बनाने वाले दोस्‍त को मार कर दफनाया

Extramarital Affair : पंकज और आशीष की गहरी दोस्ती थी, इसी दोस्ती के चलते आशीष और पंकज की पत्नी अनीता के बीच नाजायज संबंध बन गए. यह बात जब पंकज को पता चली तो उस ने…

मध्य प्रदेश के जिला नरसिंहपुर की एक तहसील है गोटेगांव. इस तहसील क्षेत्र में प्रसिद्ध धार्मिक स्थल झोतेश्वर होने की वजह से छोटा शहर होने के बावजूद गोटेगांव खासा प्रसिद्ध है. गोटेगांव के इलाके में ही एक गांव है कोरेगांव. 8 दिसंबर, 2019 की सुबह कोरेगांव का रहने वाला खुमान ठाकुर झोतेश्वर पुलिस चौकी की इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री के पास आया. उस ने अंजलि को बताया कि उस के भाई का बड़ा लड़का आशीष 6 दिसंबर को किसी काम से घर से निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. उन्होंने उसे गांव के आसपास के अलावा सभी रिश्तेदारों के यहां तलाश किया, लेकिन उस की कोई खबर नहीं मिली. उस ने आशीष की गुमशुदगी दर्ज कर उसे तलाशने की मांग की.

एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान से पूछा, ‘‘आप को किसी पर कोई शक हो तो बताओ.’’ खुमान के साथ आए उस के दामाद कृपाल ने बताया कि 6 दिसंबर को उस ने आशीष को उस के दोस्तों पंकज और सुरेंद्र के साथ खेतों की तरफ जाते देखा था. उस ने यह भी बताया कि आशीष के परिवार के लोगों ने जब पंकज और सुरेंद्र को बुला कर पूछताछ की तो वे इस बात से साफ मुकर गए कि आशीष उन के साथ था. इसलिए हमें उन पर शक हो रहा है. चौकी इंचार्ज अंजलि अग्निहोत्री ने खुमान की शिकायत दर्ज कर इस घटना की सूचना तत्काल एसपी गुरुचरण सिंह, एसडीपीओ (गोटेगांव) पी.एस. बालरे और टीआई प्रभात शुक्ला को दे दी.

एसडीपीओ के निर्देश पर चौकी इंचार्ज एसआई अंजलि अग्निहोत्री ने कोरेगांव में पंकज और सुरेंद्र के घर दबिश तो दोनों घर पर ही मिल गए. उन दोनों से पुलिस चौकी में पूछताछ की गई तो पंकज और सुरेंद्र ने बताया कि हम तीनों दोस्त मछली मारने के लिए गांव से बाहर खेतों के पास वाले नाले पर गए थे. मछली मारते समय नाले के पास से जाने वाली मोटरपंप की सर्विस लाइन से आशीष को करंट लग गया, जिस से उस की मौत हो गई. उन्होंने बताया कि आशीष की इस तरह हुई मौत से वे दोनों घबरा गए. डर के मारे उन्होंने आशीष के शव को नाले के समीप ही गड्ढा खोद कर दफना दिया.

पुलिस को पंकज और सुरेंद्र द्वारा गढ़ी गई इस कहानी पर विश्वास नहीं हुआ. उधर आशीष का छोटा भाई आनंद ठाकुर पुलिस से कह रहा था कि उस के भाई की हत्या की गई है. मामला संदेहपूर्ण होने के कारण पुलिस ने गोटेगांव के एसडीएम जी.सी. डहरिया को पूरे घटना क्रम की जानकारी दे कर दफन की गई लाश को निकालने की अनुमति ली. उसी दिन गोटेगांव एसडीपीओ पी.एस. बालरे, फोरैंसिक टीम सहित दोनों आरोपियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. आरोपियों की निशानदेही पर कोरेगांव के नाले के पास खेत में बने एक गड्ढे से लाश निकाली गई.

आशीष के पिता ने लाश के हाथ पर बने टैटू को देखा तो वह फूटफूट कर रोने लगा. लाश के गले पर घाव और खून का निशान था. इस से स्पष्ट हो गया कि आशीष की मौत करंट लगने से नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई थी. पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए जबलपुर मैडिकल कालेज भेज दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि आशीष की मौत बिजली के करंट से नहीं, बल्कि किसी धारदार हथियार से गले पर किए गए प्रहार से हुई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस को पूरा यकीन हो गया कि आशीष की हत्या पंकज और सुरेंद्र ने ही की है.

पुलिस ने दोनों आरोपियों से जब सख्ती से पूछताछ की तो पंकज जल्दी ही टूट गया. उस ने पुलिस के सामने आशीष की हत्या करने की बात कबूल ली. आशीष ठाकुर की हत्या के संबंध में उस ने पुलिस को जो कहानी बताई, वह अवैध संबध्ाोंं पर गढ़ी हुई निकली—

आदिवासी अंचल के छोटे से गांव कोरेगांव के साधारण किसान पुन्नूलाल का बड़ा बेटा आशीष और गांव के ही जगदीश ठाकुर के बेटे पंकज की आपस में गहरी दोस्ती थी. हमउम्र होने के कारण दोनों का दिनरात मिलनाजुलना बना रहता था. आशीष पंकज के घर आताजाता रहता था. पंकज ठाकुर की शादी हो गई थी और पंकज की पत्नी अनीता (परिवर्तित नाम) से भाभी होने के नाते आशीष हंसीमजाक किया करता था. एक लड़की के जन्म के बाद भी अनीता का बदन गठीला और आकर्षक था. अनीता आशीष की शादी की बातों को ले कर उस से मजाक किया करती थी. 24 साल का आशीष उस समय कुंवारा था. वह अनीता की चुहल भरे हंसीमजाक का मतलब अच्छी तरह समझता था. देवरभाभी के बीच होने वाली इस मजाक का कभीकभार पंकज भी मजा ले लेता था.

दोस्तों के साथ मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो देख कर आशीष के मन में अनीता को ले कर वासना का तूफान उठने लगा था. इसी के चलते वह अनीता से दैहिक प्यार करने लगा. उसे सोतेजागते अनीता की ही सूरत नजर आने लगी थी. पंकज का परिवार खेतीकिसानी का काम करता था. घर के सदस्य दिन में अकसर खेतों में काम करते थे. इसी का फायदा उठा कर आशीष पंकज की गैरमौजूदगी में अनीता से मिलने आने लगा. करीब 2 साल पहले सर्दियों की एक दोपहर में आशीष पंकज के घर पहुंचा तो अनीता की 2 साल की बेटी सोई हुई थी और अनीता नहाने के बाद घर की बैठक पर कपड़े बदल रही थी.

अनीता के खुले हुए अंगों और उस की खूबसूरती को देखते ही आशीष के अंदर का शैतान जाग उठा. वह घर की बैठक के एक कोने में पड़ी चारपाई पर बैठ गया और अनीता से इधरउधर की बातें करने लगा.

बातचीत के दौरान जैसे ही अनीता उस के पास आई, उस ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और बोला, ‘‘भाभी, मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं.’’

आशीष के बंधन में जकड़ी अनीता ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘आशीष, छोड़ो, कोई देख लेगा.’’

इस पर आशीष ने उस के गालों को चूमते हुए कहा, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करता हूं तो डरना क्या.’’

अनीता कुछ शरमाई तो आशीष ने उसे अपने सीने से दबाते हुए अपने होंठे उस के होंठों पर रख दिए. देखते ही देखते आशीष के कृत्य की इस चिंगारी से उठी वासना की आग ने अनीता को भी अपने आगोश में ले लिया. आपस की हंसीमजाक से शुरू हुआ प्यार का यह सफर वासना के खेल में बदल गया. अनीता अपना सब कुछ आशीष को सौंप चुकी थी. अब जब भी पंकज के घर के लोग काम के लिए निकल जाते, आशीष अनीता के पास पहुंच जाता और दोनों मिल कर अपनी हसरतें पूरी करते. एक बार पंकज ने आशीष को अनीता के साथ ज्यादा नजदीकी से बात करते देख लिया, तब से उस के दिमाग में शक का कीड़ा बैठ गया. उस ने अनीता को आशीष से दूर रहने की हिदायत दे कर आशीष से इस बारे में बात की तो वह दोस्ती की दुहाई देते हुए बोला, ‘‘तुम्हें गलतफहमी हुई है, मैं तो भाभी को मां की तरह मानता हूं.’’

लेकिन प्यार के उन्मुक्त आकाश में उड़ने वाले इन पंछियों पर किसी की बंदिश और समझाइश का कोई असर नहीं पड़ा. आशीष और अनीता के प्यार का खेल बेरोकटोक चल रहा था. जब भी उन्हें मौका मिलता, दोनों अपनी जिस्मानी भूख मिटा लेते थे. पंकज भी अब पत्नी अनीता पर नजर रखने लगा था. पंकज अकसर सुबह को खेतों में काम के लिए निकल जाता और शाम को ही वापस आता था. लेकिन एक दिन जब वह दोपहर में ही घर लौट आया तो अपने बिस्तर पर आशीष और अनीता को एकदूसरे के आगोश में देख लिया. अपनी पत्नी को पराए मर्द की बांहों में देख कर उस का खून खौल उठा. आशीष तो जल्दीसे अपने कपड़े ठीक कर के वहां से चुपचाप निकल गया, मगर क्रोध की आग में जल रहे पंकज ने अपनी पत्नी अनीता की जम कर धुनाई कर दी.

पंकज ने बदनामी के डर से यह बात किसी को नहीं बताई. वह गुमसुम सा रहने लगा और आशीष से मिलनाजुलना भी कम कर दिया. अब उस ने गांव के एक अन्य युवक सुरेंद्र ठाकुर से दोस्ती कर ली. इसी दौरान आशीष की शादी भी हो गई और उस ने अनीता से मिलनाजुलना बंद कर दिया. लेकिन पंकज के दिल में बदले की आग अब भी जल रही थी. उस की आंखों में आशीष और अनीता का आलिंगन वाला दृश्य घूमता रहता था. उस के मन में हर समय यही खयाल आता था कि कब उसे मौका मिले और वह आशीष का गला दबा दे. पंकज सोचता था कि जिस दोस्त के लिए वह जान की बाजी लगाने को तैयार रहता, उसी दोस्त ने उस की थाली में छेद कर दिया.

6 दिसंबर के दिन योजना के मुताबिक सुरेंद्र ठाकुर आशीष को मछली मारने के लिए गांव के बाहर नाले पर ले गया. नाले के पास ही पंकज ठाकुर अपने खेतों पर उन दोनों का इंतजार कर रहा था. उस ने आशीष और सुरेंद्र को नाले में मछती मारते हुए देखा तो वह खेत पर रखे चाकू को जेब में छिपा कर नाले के पास आ गया. आशीष नाले के पानी में कांटा डाले मछली पकड़ने में तल्लीन था. तभी पंकज ने मौका पा कर आशीष के गले पर चाकू से धड़ाधड़ कई वार किए तो आशीष छटपटा कर जमीन पर गिर गया. कुछ देर में उस ने दम तोड़ दिया. यह देख पंकज ने अपने खेतों से फावड़ा ला कर गड्ढा खोदा और सुरेंद्र की मदद से आशीष को दफना दिया. चाकू और फावड़े को इन लोगों ने खेत के पास झाडि़यों में छिपा दिया. फिर कपड़ों पर लगे खून के छींटों को नाले में धोया और दोनों अपनेअपने घर चले गए.

हत्या के बाद दोनों सोच रहे थे कि उन्हें किसी ने नहीं देखा. लेकिन आशीष के जीजा कृपाल ने सुरेंद्र और आशीष को नाले की तरफ जाते देख लिया था. इसी आधार पर घर वालों ने सुरेंद्र और पंकज पर संदेह होने की बात पुलिस को बताई थी. पंकज ने बिना सोचेसमझे बदले की आग में अपने दोस्त पंकज का कत्ल तो कर दिया, लेकिन कानून की पकड़ से नहीं बच सका. पंकज और सुरेंद्र के इकबालिया बयान के आधार पर आशीष ठाकुर की हत्या के आरोप में गोटेगांव थाने में भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहम मामला कायम कर उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

जवानी के जोश में अपने दोस्त की पत्नी से अवैध संबंध बनाने वाले आशीष को अपनी जान गंवानी पड़ी तो पंकज ठाकुर और सुरेंद्र ठाकुर को जेल की सलाखों के पीछे जाना पड़ा.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित