Crime News: 7 साल बाद पकड़ में आए हत्यारें

Crime News: इफ्खिर अहमद सुनहरे सपनों की चाह में इंग्लैंड गया था. वहां उसे सब कुछ मिला भी. लेकिन 2 शादियों और मजहबी चक्रव्यूह के कारण वह अपनी ही बेटी का हत्यारा बन बैठा. इस चक्कर में वह तो जेल गया ही, उस की पत्नी फरजाना भी नहीं बच सकी. इफ्तिखार अहमद मूलत: पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव उत्ताम का निवासी था. वर्षों पहले जब वह युवा था, एक हसीन जिंदगी जीने का सपना संजो कर पाकिस्तान से इंग्लैंड आ गया था.

इफ्तिखार अहमद कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, पर ड्राइविंग अच्छी जानता था, जो विदेश में आ कर उस के रोजगार का साधन बन गई. उस का बचपन भले ही बेहद गरीबी में गुजरा था, पर वह शुरू से महत्वकांक्षी था. बंदिशें उसे पसंद नहीं थीं. अलबत्ता अपने धर्म के प्रति वह पूरी तरह आस्थावान था. वह 6-7 वर्ष का था, तभी उस का रिश्ता उस के दूर के मामा की बेटी फरजाना से तय हो गया था. बड़ेबड़े सपने देखने वाला इफ्तिखार अकसर अपने दोस्तों से कहा करता था, ‘‘देखना एक दिन मैं बहुत बड़ा आदमी बनूंगा, दुनिया का हर ऐशोआराम मेरे कदमों में होगा.’’

दोस्त उसे टोक देते, ‘‘जमीन पर ही रह, हवा में मत उड़. घर में दो वक्त की रोटी नहीं, बनेगा बड़ा आदमी.’’

इफ्तिखार गुस्सैल स्वभाव का था. ऐसे तानें भला कैसे सुनता? उस ने दोस्तों से 2-4 हाथ कर लिए और चीख कर कहा, ‘‘तुम लोग यहीं सड़ते रहोगे. देखना, बड़ा हो कर मैं विदेश जाऊंगा. वहां जा कर हर कीमत पर अपने हालात बदल दूंगा.’’

खैर, किसी तरह बचपन अभावों में गुजरा. इफ्तिखार ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और बचपन के सपनों में रंग भरने की कोशिश शुरू कर दी. यह अलग बात थी कि कुछ घर की माली हालात के चलते तो कुछ पढ़ाई में मन न लगने की वजह से वह जैसेतैसे नौवीं कक्षा ही पास कर पाया. पढ़ न पाने के कारण उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल सकती थी, ऊपर से घर वालोें का दबाव कि हमारा ना सही, अपना ही पेट भर ले. कोई और रास्ता न देख इफ्तिखार ने अपने एक जानकार ट्रक ड्राइवर के साथ कंडक्टरी शुरू कर दी. इसी दौरान उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. धीरेधीरे हाथ साफ हो गया तो उस ने कंडक्टरी छोड़ दी और लाहौर आ कर किराए की टैक्सी चलाने लगा. उस ने 2 साल वहीं बिताए. फिर वह अपने घर वापस आ गया. इस बीच उस ने कुछ पैसे जोड़ लिए थे. अपना ख्वाब पूरा करने के लिए उस ने अपना पासपोर्ट बनवाया और फिर एक दिन फ्लाइट पकड़ कर इंग्लैंड आ गया.

इंग्लैंड में उसे हमवतन एजाज मिल गया, जिस ने उस की मदद की और उसे किराए पर चलाने के लिए टैक्सी दिलवा दी. इफ्तिखार मन लगा कर काम करने लगा. उसे यह बात अखरती थी कि उस की कमाई का ज्यादा हिस्सा तो टैक्सी मालिक के पास चला जाता है, सो उस ने बचत शुरू कर दी. 3-4 साल में उस ने काफी पैसे जोड़ लिए. कुछ पैसे कम पड़े तो एजाज ने मदद कर दी. पैसे एकत्र हो गए तो इफ्तिखार ने खुद की टैक्सी खरीद ली. अपनी टैक्सी आने के बाद सारा पैसा इफ्तिखार की जेब में आने लगा. पैसा आया तो उसे कई ऐब लग गए. इफ्तिखार को औरत के जिस्म का चस्का लग गया. वह अकसर देह बेचने वालियों के पास रातें बिताने लगा.

इसी दरम्यान उस की मुलाकात लोन एंडरसन नाम की एक लड़की से हुई, जो मूलत: डेनमार्क की रहने वाली थी और इंग्लैंड में एक बुकशौप में काम करती थी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं. वे अकसर मिलते रहते थे. इफ्तिखार उसे अपनी टैक्सी में भी घुमाता था. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. इफ्तिखर ने एक दिन अपने प्यार का इजहार किया तो लोन एंडरसन ने भी अपने दिल की बात कह दी. लोन एंडरसन बेशक पश्चिमी देश की थी, पर सभ्य और शालीन थी. एक दिन जब दोनों एकांत में मिले तो इफ्तिखार ने उस के सामने शारीरिक दूरी खत्म करने की चाहत बयान करते हुए कहा, ‘‘इस के बिना हमारा प्यार अधूरा है. मैं इसे मुकम्मल कर देना चाहता हूं.’’

लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के चेहरे को गौर से देखा. फिर गंभीर आवाज में कहा, ‘‘शादी से पहले नहीं. मैं खुले विचारों की जरूर हूं, पर शादी के बाद ही अपना तन किसी पुरुष को सौपूंगी. इसीलिए मैं ने आज तक अपने नारीत्व की गरिमा को कायम रखा है.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे, लेकिन आज दिल न तोड़ो.’’ इफ्तिखार ने गुजारिश की.

‘‘नहीं, कतई नहीं. मैं शादी से पहले इस की मंजूरी किसी हाल में नहीं दूंगी.’’ लोन एंडरसन ने साफ लहजे में सख्ती से मना कर दिया.

सुन कर इफ्तिखार का चेहरा उतर गया. वह मायूस हो गया. जबरदस्ती वह कर नहीं सकता था, सो मन मार कर रह गया. इस घटना के कुछ महीनों बाद आखिरकार इफ्तिखार और लोन एंडरसन ने कोपेनहेगन स्थित चर्च में शादी कर ली. यह सन 1981 के जून महीने की बात है. उसी रात दोनों ने एक होटल में हनीमून मनाया. 2 दिनों बाद इफ्तिखार होटल से उसे अपने घर ले आया. इस के बाद लोन एंडरसन के कहने पर इफ्तिखार उस के साथ डेनमार्क चला गया. वहां भी उस ने अपना टैक्सी ड्राइवर वाला काम कर लिया. दोनों खूब खुश थे और हंसीखुशी जिंदगी बिता रहे थे. शादी के एक साल बाद लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम टोनी एंडरसन रखा गया. इफ्तिखार चाहता था कि उसे अपनी मरजी का कोई मुसलिम नाम दे, पर लोन एंडरसन की इच्छा और डेनमार्क के नियम के चलते वह ऐसा नहीं कर पाया.

सन 1985 के जनवरी माह में इफ्तिखार के नाम पाकिस्तान से एक खत आया. खत उस के घर वालों ने भेजा था. इफ्तिखार और उस के परिवार के बीच पत्र व्यवहार चलता रहता था, इसलिए यह कोई खास बात नहीं थी. लेकिन इस पत्र को पढ़ कर वह सोच में पड़ गया. उसे गंभीर देख कर लोन एंडरसन ने कारण पूछा तो इफ्तिखार ने कहा, ‘‘मेरी मां बहुत बीमार है. मुझे पाकिस्तान जाना होगा.’’

‘‘बिलकुल जाओ, वैसे भी तुम्हें जाना चाहिए. आखिर वह तुम्हारी मां है.’’ लोन एंडरसन ने बिना कोई आपत्ति जताए कहा. उस वक्त वह यह बिलकुल नहीं समझ पाई कि इफ्तिखार उस से फरेब कर रहा है. हकीकत में उस की मां बीमार नहीं थी, बल्कि खत में लिखा था कि बचपन में फरजाना नाम की जिस लड़की से उस का निकाह तय हुआ था, वह अब जवान हो चुकी है. उस के घर वाले निकाह के लिए दबाव बना रहे हैं. इसलिए वह फौरन स्वदेश लौट आए और घर वालों द्वारा फरजाना के परिवार से किए वादे को पूरा करे.

खैर, इफ्तिखार अहमद जनवरी, 1985 के आखिर में अपनी पत्नी लोन एंडरसन और 3 साल के बेटे टोनी एंडरसन को डेनमार्क में छोड़ कर पाकिस्तान आ गया. पाकिस्तान आ कर उस ने फरजाना के साथ निकाह कर लिया. उस ने अपने घर वालों और फरजाना पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पहले से शादीशुदा है और साथ ही एक बेटे का बाप भी. कुछ महीने इफ्तिखार पाकिस्तान में ही रहा. वजह यह कि उस पर दबाव था कि वह फरजाना को भी अपने साथ ले जाए. फरजाना का पासपोर्ट बनने और वीजा लगने में समय लग रहा था. अंतत: इफ्तिखार अपनी दूसरी पत्नी फरजाना को ले कर ब्रैडफोर्ड, इंग्लैंड आ गया. उस ने डेनमार्क में इंतजार कर रही लोन एंडरसन से कोई संपर्क नहीं किया.

कई महीने गुजर गए, इफ्तिखार नहीं लौटा तो लोन एंडरसन को चिंता हुई. पाकिस्तान का पता उस के पास था नहीं, जो वहां से कोई पूछताछ करती. अत: वह ब्रैडफोर्ड आई और इफ्तिखार के पुराने घर पर गई. वहां उसे पता चला कि इफ्तिखार ने पड़ोस में ही दूसरा घर ले लिया है. लोन एंडरसन वहां पहुंची तो फरजाना को देख कर उसे लगा कि इफ्तिखार की कोई रिश्तेदार होगी. उसी समय इफ्तिखार आ गया. उस ने यह बात छिपा ली कि फरजाना उस की बीवी है. इत्तफाक से तभी फरजाना की तबीयत खराब हो गई. इफ्तिखार और लोन एंडरसन उसे ले कर डाक्टर के पास गए. वहां पता चला कि फरजाना गर्भ से है. इस जानकारी के बाद इफ्तिखार लोन एंडरसन से सच नहीं छिपा पाया. उस ने बता दिया कि फरजाना उस की पत्नी है. वह पाकिस्तान निकाह करने गया था.

इस से लोन एंडरसन का दिल टूट गया. वह कुछ नहीं बोली और वापस डेनमार्क लौट गई. कुछ दिनों बाद वह अपने बेटे टोनी एंडरसन के साथ वापस आई और इफ्तिखार से कहा कि उस ने उस के साथ जो किया सो किया, पर वह उस के बेटे को पिता की सरपस्ती से दूर न करे. वह उसे अपने पास रखे. लेकिन इफ्तिखार इस के लिए राजी नहीं हुआ. उस ने कहा कि अगर बेटी होती तो वह उसे अपने पास रख लेता, पर बेटे को नहीं रखेगा. लोन एंडरसन ने उस पर कोई दबाव नहीं बनाया. वह बेटे को ले कर वापस लौट गई. अलबत्ता इस के बाद भी वह इफ्तिखार से संपर्क जरूर बनाए रही. दूसरी ओर इफ्तिखार बेखौफ फरजाना के साथ अपना गृहस्थ जीवन जी रहा था. 14 जुलाई, 1986 को फरजाना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया शेफीलिया अहमद.

इस के ठीक एक साल बाद फरजाना ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस का नाम रखा गया अलेशा अहमद. फिर फरजाना ने एक बेटे को जन्म दिया. तीनों बच्चे कुछ बड़े हुए तो इफ्तिखार ब्रैडफोर्ड छोड़ कर परिवार सहित वारिंगटन आ बसा. शेफीलिया पढ़ाई में काफी होशियार थी. वह वकील बनना चाहती थी. वहीं उस से छोटी अलेशा की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी. वह पिता के दबाव में जबरदस्ती पढ़ रही थी. बात 2003 की है. शेफीलिया का हाईस्कूल का आखिरी साल था. 11 सितंबर, 2003 को शेफीलिया की टीचर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी कि वह एक सप्ताह से ना तो स्कूल आ रही है और ना ही घर पर है. घर वाले भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे रहे हैं.

पुलिस ने इफ्तिखार अहमद से पूछताछ की तो उस ने बताया कि शेफीलिया की उसे भी कोई खबर नहीं है. उन लोगों ने उस की सहेलियों से भी संपर्क किया, पर उस का कोई पता नहीं चला. शेफीलिया लापता है, इस की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? यह पूछने पर इफ्तिखार अहमद ने कहा कि बेटी का मामला है. वह नहीं चाहता था कि शेफीलिया के गुम होने पर उस के परिवार वालों को किसी प्रकार की जगहंसाई का सामना करना पड़े. वैसे भी यह शेफीलिया के भविष्य का भी सवाल था. अगर एक बार चरित्र पर दाग लग जाता तो उन के समाज में शेफीलिया का निकाह होना मुश्किल है.

खैर, पुलिस ने प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में शेफालिया के गायब होने की सूचना प्रसारित करवा दी. पुलिस खुद भी अपने स्तर पर उस की खोज करने लगी. न्यूज चैनलों पर उस की खोज के लिए बड़े पैमाने पर कैंपेन चलाए गए. इस के तहत अंगे्रजी फिल्मों की अभिनेत्री शोभना गुलाटी ने टीवी पर शेफीलिया द्वारा लिखित कविताओं का पाठ किया. पर शेफीलिया का कोई सुराग नहीं मिल पाया. इसी तरह कई महीने बीत गए. 24 फरवरी, 2004 को पुलिस कंट्रोल में किसी ने सूचना दी कि वारिंगटन से करीब 110 किलामीटर दूर कंब्रिया के सेडविक शहर स्थित केंट नदी के किनारे किसी लड़की का सड़ागला शव पड़ा हुआ है. नदी में भारी बाढ़ आने की वजह से शव नदी के किनारे आ लगा था. पुलिस तुरंत नदी किनारे पहुंची.

सूचना सही थी, लेकिन लड़की की लाश इतनी सड़ गई थी कि उस की पहचान करना मुश्किल था. हां, लाश के बाएं हाथ में जिगजेग गोल्ड बे्रसलेट और हाथ की एक अंगुली में ब्ल्यू टोपाज रिंग अब भी मौजूद थी. इफ्तिखार अहमद ने बेटी की गुमशुदगी के समय इन चीजों का जिक्र किया था. पुलिस ने इस की सूचना इफ्तिखार अहमद को दी और तुरंत नदी पर आने को कहा. इफ्तिखार अहमद पत्नी फरजाना सहित वहां पहुंचा. उस ने गोल्ड ब्रेसलेट और रिंग को पहचानते हुए लाश की शिनाख्त अपनी 17 वर्षीया बेटी शेफीलिया अहमद के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो गई तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम में मौत का कारण पता नहीं लग पाया. वजह थी, लाश का अत्यधिक सड़ जाना. पुलिस ने लाश का दूसरी बार पोस्टमार्टम करवाया, पर इस बार भी कोई परिणाम नहीं निकला. अब की बार पुलिस ने मृतका शेफीलिया के बाएं थाई बोन का डीएनए टेस्ट करवाया. इस से साफ हो गया कि लाश शेफीलिया की ही थी. वहीं निचले जबड़े को भी शेफीलिया के दंत चिकित्सक को दिखाया गया. उस ने भी पुष्टि कर दी कि लाश शेफीलिया की ही थी. पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच शुरू की तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं. इस जांच के लिए पुलिस ने इफ्तिखार अहमद, उस की पत्नी फरजाना, इफ्तिखार के साथी टैक्सी ड्राइवर व 5 अन्य परिचितों को हिरासत में ले लिया.

सभी से अलगअलग तरहतरह से पूछताछ की गई. पर उस की हत्या का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला. इस पर बिना चार्ज लगाए सभी को छोड़ दिया गया. बावजूद इस के पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच जारी रखी. जांच के दौरान इफ्तिखार के घर से शेफीलिया के सामान से उस की डायरी बरामद हुई, जिस में काफी कविताएं लिखी हुई थीं. उस की कविताओं में एक कविता ‘आई फील टे्रप्ड’ शीर्षक से थी. यह कविता शेफीलिया की मनोदशा व्यक्त करती थी. इस से उस के निराशाजनक जीवन का साफ पता चल रहा था.

जांच के दौरान ही इफ्तिखार की पड़ोसन शैला कोस्टेलो ने बताया था कि शेफीलिया को उस का परिवार उपेक्षित रखता था. परिवार द्वारा पीडि़त करने की वजह से वह कई बार घर से भाग गई थी. 2 बार पुलिस में उस के लापता होने की रिपोर्ट भी लिखाई गई थी. दोनों बार वह अपने बौयफ्रेंड के घर पर पाई गई थी. पड़ोसन ने यह भी बताया कि उस ने सुना था कि शेफीलिया के घर वाले उस की इसी उम्र में अरेंज मैरिज करने के लिए दबाव बना रहे थे. इफ्तिखार के घर से एक वीडियो भी बरामद हुआ. यह वीडियो उस समय का था, जब सन 2003 के शुरू में इफ्तिखार अहमद परिवार सहित पाकिस्तान गया था. इस वीडियो में शेफीलिया पाकिस्तान में मस्ती करती हुई दिखाई दे रही थी.

बहरहाल, शेफीलिया की हत्या की जांच चलती रही. जनवरी, 2008 में मृत्यु समीक्षक जोजफ द्वारा की गई जांच में कहा गया कि शेफीलिया की हत्या का केस बहुत ही जघन्य हत्याकांड की श्रेणी में आता है. उस ने शंका भी व्यक्त की कि हो सकता है, इस में उस के घर वालों का हाथ रहा हो. इस के बाद पुलिस ने फिर से इफ्तिखार से पूछताछ की. उस ने बताया कि यह सही है कि शेफीलिया गुस्सैल स्वभाव की जिद्दी लड़की थी. उसे पश्चिमी पहनावा पसंद था. जबकि उस का परिवार इस के खिलाफ था. उस पर रोक लगाई जाती थी तो वह विद्रोह पर उतर आती थी. पूछताछ के दौरान कोई ऐसी बात नहीं निकल कर आई कि इफ्तिखार पर शक किया जाता.

देखतेदेखते शेफीलिया की मौत को 7 साल बीत गए. पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई. पर कहते हैं कि पाप एक न एक दिन जरूर बेपरदा हो जाता है. आखिर शेफीलिया अहमद हत्याकांड के ताले की चाबी बन कर उस की छोटी बहन अलेशा सामने आई. शुरू से पढ़ाई चोर और बिगड़ैल मिजाज की अलेशा गलत सोहबत में पड़ गई थी. उस के खर्चे बेपनाह थे, जबकि घर से उसे नाममात्र का ही जेबखर्च मिलता था. अपने खर्चे पूरे करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी. यहां तक कि उस ने अपने खुद के ही घर में डकैती डलवा दी थी. यह घटना 25 अगस्त, 2010 की है. घटना के समय वह अपने मातापिता व भाईबहन के साथ घर में ही मौजूद रही, ताकि उस पर घर वालों या पुलिस को कोई शक न हो. इस के लिए उस ने अपने बौयफ्रेंडों के साथ मिल कर सुरक्षित योजना बनाई थी. इस डकैती में घर से काफी गहने व नकदी लूटी गई.

डकैती की सूचना पुलिस को दी गई तो उस ने जांच शुरू की. अलेशा से पूछताछ के दौरान उस के बदले हुए भाव को देखते ही पुलिस को उस पर शक हो गया था. पर वह सहज रूप से सच नहीं उगल पा रही थी. आखिर उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वह टूटने लगी. आखिर उस ने सारा सच उगल दिया. साथ ही उस ने अपने घर वालों के भय से 7 साल से दिल में छिपा कर रखा अपनी बड़ी बहन शेफीलिया की हत्या का राज भी उगल दिया. बतौर अलेशा, शेफीलिया शुरू से आजाद ख्याल की थी. उसे पश्चिमी रहनसहन, खुलापन और पहनावा पसंद था. जबकि घर वाले इस सब के खिलाफ थे. वह चाहते थे कि शेफीलिया उन के मजहब की परंपरा के अनुसार आचरण अपनाए, घर की चारदीवारी तक सीमित रहे. बुर्का पहने और लड़कों से दोस्ती न करे. पर वह ऐसा नहीं करती थी.

वह पश्चिमी पहनावा पहनती और लड़कों से खुल कर दोस्ती करती. इसी वजह से इफ्तिखार अकसर उस की पिटाई तक कर देता था. उसे भूखा रखा जाता और अन्य तरीकों से भी प्रताडि़त किया जाता. इस से उस का स्वभाव विद्रोही हो गया. 15 वर्ष की होतेहोते उस का यह स्वभाव अपने चरम पर पहुंच गया था. अब जब भी उसे प्रताडि़त किया जाता, वह घर से भाग जाती. फिर 2-4 दिन में वापस लौट आती. उस का एक बौयफ्रेंड था मुश्ताक बगास. वह ब्लेकबर्न में रहता था और 28 साल का था. यानी वह उस से करीब 11 साल बड़ा था. 2002 में जब शेफीलिया का परिवार ब्लेकबर्न में रहता था, तब दोनों की दोस्ती हुई थी, जो प्यार के बाद शारीरिक संबंधों में बदल गई थी. इस की पहल शेफीलिया ने ही की थी.

बगास ने तो उसे रोका था कि अभी वह नाबालिग है और शादी से पहले यह उचित नहीं है, पर शेफीलिया ने जिद पकड़ ली थी. वह बोली, ‘‘मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करती हूं. फिर प्यार में किसी प्रकार की दीवार क्यों? जब मैं ने तुम्हें अपना मन सौंप दिया है तो तन सौंपने में क्या हर्ज है. आखिर शादी के बाद भी तो यही सब करना है. फिर शादी तक हम क्यों समय बर्बाद करें. जिंदगी मौजमस्ती का नाम है. कल किस ने देखा है. जो करना है, आज ही क्यों ना कर लें.’’

‘‘लेकिन यह गलत होगा.’’ बगास समझदार था और इस तरह का कोई फायदा नहीं उठाना चाहता था.

‘‘प्यार में गलत सही कुछ नहीं होता. फिर तुम कौन सा मुझ से जबरदस्ती कर रहे हो. मैं अपनी इच्छा से तुम्हें अपना सब कुछ सौंपना चाहती हूं.’’ शेफीलिया ने कहा. आखिर उस की दलीलों के आगे बगास की एक न चली और उस ने वैसा ही किया जैसा शेफीलिया चाहती थी.

अब जब भी शेफीलिया घर से भागती. बगास के घर ही पहुंच जाती. दोनों खुल कर मौजमस्ती करते. बातचीत के लिए बगास ने उसे एक मोबाइल फोन भी दे दिया था, जो वह छिपा कर रखती थी. मौका मिलने पर वह अपने दुखसुख की बात उस से कर लेती थी. शेफीलिया यूं तो कई बार घर से भागी थी, पर पुलिस में उस की रिपोर्ट 2-3 बार ही दर्ज कराई गई थी. दिसंबर, 2002 में उस ने बगास को स्कूल के लंच समय में मिलने के लिए बुलाया. उस दिन तो वह नहीं आया, पर अगले दिन दोनों मिले. शेफीलिया ने उसे अपने पिता द्वारा की गई पिटाई के निशान दिखाते हुए कहा, ‘‘अब सहन नहीं होता बगास. कुछ करो, वरना मैं यूं ही किसी दिन दम तोड़ दूंगी. अब हद हो गई है. मेरे घर वाले मेरा निकाह पाकिस्तान में मेरे कजिन से करना चाहते हैं, जो मुझ से 30 साल बड़ा है. मुझे अब सारा भरोसा तुम्हारे प्यार पर है, वरना…’’

बगास उस के हर दर्द से वाकिफ था. वह भी चाहता था कि शेफीलिया सदा खुश रहे. इसलिए वह उस की मदद करने को तैयार हो गया. दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया. 2 जनवरी, 2003 को सुबहसवेरे ही बगास कार ले कर उस के घर से कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. उस ने मिसकाल दे कर शेफीलिया को अपने आने की सूचना दे दी. शेफीलिया मौका देख कर एक बैग में अपने कुछ कपड़े रख कर सावधानीपूर्वक घर की खिड़की से कूद कर बाहर आ गई और बगास की कार में जा बैठी. बगास ने फौरन कार आगे बढ़ा दी. इस बार वह शेफीलिया को अपने घर नहीं ले गया. क्योंकि पहले 2 बार शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद उसे वहां से बरामद कर चुके थे.

बगास शेफीलिया को ब्लेकबर्न में ही अपने भाई के घर ले गया. वहां रात में दोनों ने एकदूसरे को खूब प्यार किया. दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध भी बने. इस दौरान शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन इफ्तिखार अहमद ने किसी तरह शेफीलिया का पता लगा ही लिया. वह सीधे बगास के भाई के घर पहुंचा और शेफीलिया को जबरदस्ती साथ ले आया. उस ने चलते समय बगास को चेतावनी भी दी, ‘‘अगर अब की बार मैं ने तुम्हें इस के साथ देख लिया तो इस के साथ तुझे भी काट डालूंगा.’’

घर आ कर इफ्तिखार ने शेफीलिया की खूब पिटाई की और फरमान सुना दिया कि 2-4 दिन में सब लोग पाकिस्तान चले जाएंगे. वहां उस का निकाह कर दिया जाएगा. शेफीलिया बेबस हो गई. वह घर में कैद थी. जनवरी, 2003 के आखिर में पूरा परिवार पाकिस्तान गया. वहां शेफीलिया के निकाह की तैयारी भी कर ली गई. शेफीलिया को इस से बचने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उस ने अपनी इहलीला समाप्त करने की ठान ली. उस ने मौका देख ब्लीच पी लिया. इस से उस की हालत बिगड़ने लगी. लेकिन समय रहते घर वालों ने उसे बचा लिया. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों को बताया गया कि अंधेरा होने के कारण शेफीलिया ने दवा की जगह कोई जहरीली चीज पी ली थी.

अभी तक इफ्तिखार के रिश्तेदारों को इस की भनक नहीं लगी थी. सो मई में वह शेफीलिया और परिवार सहित वापस इंग्लैंड लौट आया. यहां उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया. क्योंकि वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी. न तो उस के गले से कुछ नीचे उतरता था, न ही वह कमजोरी के कारण ठीक से चल पाती थी. यहां कई सप्ताह तक उस का इलाज चला. उस के बगल वाले बेड की मरीज ने जब शेफीलिया से पूछा कि उस ने ब्लीच क्यों पी तो उस ने बताया कि जबरन उस की शादी उस से की जा रही थी, जिसे वह पसंद ही नहीं करती.

उस का पासपोर्ट भी उस के पिता ने छीन लिया था. इफ्तिखार ने यहां अस्पताल की एक एशियन मूल की नर्स को कहा कि वह गोरी नर्सों को न बताए कि शेफीलिया ने ब्लीच पी थी. उस नर्स ने शेफीलिया से कहा कि वह कैसे अपने घर वालों के साथ रहती है. उस की फैमिली तो लवलेस फैमिली है. स्वस्थ होने के बाद शेफीलिया पर फिर से शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा. पर उस ने साफ मना कर दिया. उस के पिता को उस पर शक भी होने लगा था कि वह गर्भ से है. उन्हें जब विश्वास हो गया कि अब वह किसी भी तरह नहीं मानेगी तो 11 दिसंबर, 2003 को इफ्तिखार और उस की पत्नी फरजाना ने शेफीलिया की खूब पिटाई की. अलेशा थोड़ी सी खुली खिड़की से सब देख रही थी. फरजाना ने अपने पति से कहा, ‘‘यह लड़की हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. बेहतर है, इसे खत्म कर दो.’’

इफ्तिखार इस के लिए तैयार हो गया तो फरजाना कंबल, चादर, टेप के 2 रोल, एक काला विग और बैग ले आई. इस के बाद इफ्तिखार ने एक प्लास्टिक बैग से शेफीलिया का मुंह तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस ने दम नहीं तोड़ दिया. तत्पश्चात दोनों ने उस की लाश को चादर व कंबल में लपेट कर बैग में भर दिया. फिर दोनों ने मिल कर बैग को चारों तरफ से टेप से पैक कर दिया. इस के बाद दोनों ने लाश को बाहर खड़ी कार में रख दिया. इफ्तिखार अकेले ही कार ले कर चला गया. उस ने लाश केंट नदी में फेंक दी और घर लौट आया. इस के कई महीने बाद पुलिस ने लाश बरामद की. शक इफ्तिखार पर गया. पर उस के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला. यह केस यहीं दफन हो जाता अगर 7 साल बाद अलेशा सच उजागर न करती.

डकैती के आरोप में अलेशा को 6 महीने की सजा सुनाई गई. उस की सजा ज्यादा होती, पर उस ने मानवीयता दिखाते हुए अपनी बहन शेफीलिया की हत्या का राज खोला था, इस का उसे लाभ दिया गया. जज इरविन ने कहा, ‘‘जब सच्चाई व्यक्त करने की इच्छा होती है, तो कोई भी व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता. अलेशा ने कानून की मदद की है, इस के लिए उस का यह कदम सराहनीय है. इस से उस के मन को शांति मिलेगी, जो उस की आगे की जिंदगी को सामान्य बनाने में मदद करेगी.’’

खैर, अब फिर से इफ्तिखार अहमद तथा फरजाना को गिरफ्तार कर लिया गया. एक पेशी के दौरान जज जान स्मिथ ने कहा, ‘‘शेफीलिया हत्याकांड एक जघन्य कृत्य है. वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती थी. वह होनहार थी और ला की पढ़ाई करना चाहती थी. उसे अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार था. पर उस के मातापिता उसे इस अधिकार से वंचित रखना चाहते थे. शेफीलिया 2 संस्कृतियों के बीच फंसी हुई थी. उसे अपने तरीके से जीने देना चाहिए था, पर उस के मातापिता ने जीवन की जगह उसे मौत दे दी. ये किसी भी तरह रहम के काबिल नहीं हैं.’’

कोर्ट में कई सुनवाई हुईं. इस दौरान शेफीलिया के जानकारों के भी बयान दर्ज किए गए. नार्थवेस्ट के नए चीफ प्रौसिक्यूटर नाजिर अफजल ने कोर्ट को बताया कि एशियन समाज में अभिभावक औनर क्राइम करने से नहीं डरते. शेफीलिया की हत्या के कई सुबूत मिले हैं. वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी. घर वालों ने उस से अपनी मर्जी की जिंदगी जीने का अधिकार छीन लिया था. शेफीलिया के दोस्त साराह बैनट ने कोर्ट में बयान दिया कि शेफीलिया ने अपने बालों को रंग लिया था और नाखून बढ़ा लिए थे. इस पर उस की मां फरजाना ने कैमिकल की सहायता से उस के बालों का रंग धो दिया और उस के नाखून काट दिए थे. साथ ही उस की बेरहमी से पिटाई भी की थी. उसे गंदी गालियां भी दी जाती थीं. उस की मां उसे पकड़ती तो पिता उस की पिटाई करता था.

शेफीलिया के दूसरे दोस्त बुड्स ने बताया कि उसे शेफीलिया ने एक नोट दिया था. उस ने वही नोट कोर्ट में पढ़ कर सुनाया. उस में लिखा था, ‘‘पिछले कुछ सालों से घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है. वे मुझे कालेज जाने से रोकना चाहते थे. वे मुझ से जबरदस्ती नौकरी करवाना चाहते थे. मैं ने जेब खर्च से 2 हजार यूरो बचा कर अपने खाते में डलवाए तो मेरे पिता ने वे भी निकलवा लिए. मुझे डर रहता है, क्योंकि मेरे मातापिता मुझे पाकिस्तान ले जा कर मेरी शादी करवाना चाहते हैं. वे लोग मुझे वहीं छोड़ देना चाहते हैं. जबकि मुझे वह कल्चर कतई पसंद नहीं है. मुझे घर में घुटन होती है. मैं ने पिता द्वारा लाए गए कई रिश्ते ठुकरा दिए थे. इस कारण मुझे मार खानी पड़ती थी.’’

शेफीलिया की टीचर जोएनी कोड ने कोर्ट में बयान दिया, ‘‘शेफीलिया की मौत से करीब 11 महीने पहले उस के स्कूल से अनुपस्थित रहने पर जब मैं ने उसे फोन किया और पूछा कि क्या कोई चिंता की बात है? तब शेफीलिया ने हां कहा था. जब वह दूसरे दिन स्कूल लौटी तो मैं ने उस की गर्दन पर खरोचों के निशान देखे थे. उस के होंठों पर भी कट का निशान था. पूछने पर शेफीलिया ने बताया कि उस की मां ने उसे नीचे कर के पकड़े रखा और पिता ने पीटा. इसी से वे निशान आए थे. उसे अकसर कमरे में बंद कर के भूखा रखा जाता था. उस के उत्पीड़न की बात एक सोशल वर्कर को पता लगी तो वह स्कूल में उस से पूछताछ करने आया. पर शेफीलिया ने उसे कुछ नहीं बताया था.’’

7 सितंबर, 2011 को तमाम गवाहों के बयानों के बाद पुलिस ने इफ्तिखार अहमद और फरजाना के विरुद्ध कोर्ट में चार्जशीट पेश की. जिस में उन पर बेटी शेफीलिया की हत्या का चार्ज लगाया गया था. दोनों के खिलाफ ट्रायल मई, 2012 से 3 अगस्त, 2012 तक हुआ. इस दौरान इफ्तिखार अहमद और फरजाना ने अपना अपराध कुबूल लिया था. उन्होंने बताया कि शेफीलिया की हरकतों से वे तंग आ गए थे. वह हर तरह से उन की बदनामी करवाना चाहती थी. इसी कारण उन्हें उस की हत्या करनी पड़ी.

तमाम पेशियों के बाद 14 दिसंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. इफ्तिखार अहमद और फरजाना को शेफीलिया की हत्या का दोषी करार देते हुए दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. सजा सुनते ही दोनों रो पड़े. Crime News

Kanpur Crime News : अपना अपराध दूसरे के सिर

Kanpur Crime News : परशुराम का पत्नी और बेटी के साथ गांव वापस आना उस के भाई जयराम को जरा भी अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उस ने अपने हिस्से की जमीन और घर बंटा लिया था. जमीन और घर पर कब्जा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है…

घर के अंदर का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. खून से लथपथ 3 लाशें पड़ी थीं. मृतकों में परशुराम यादव, उस की कथित पत्नी विमला देवी और मासूम बेटी हिमांशी थी. तीनों की हत्या गोली मार कर की गई थी. परशुराम और विमला की लाशें कमरे के अंदर खून में डूबी पड़ी थीं, जबकि मासूम हिमांशी की लाश बरामदे में पड़े तखत पर पड़ी थी.लकमरे से ले कर बरामदे तक खून ही खून फैला था. कमरे के अंदर का सामान अस्तव्यस्त था और फर्श पर चूडि़यों के टुकड़े बिखरे थे. वहां की हालत देख कर साफ लग रहा था कि मरने से पहले परशुराम और विमला का हत्यारों से जम कर संघर्ष हुआ था. दिल दहलाने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा में 13 दिसंबर, 2014 की रात घटी थी.

चूंकि हत्याएं गोली मार कर की गई थीं, इसलिए गांव वालों को तुरंत हत्याओं की जानकारी हो गई थी. मृतक के भाई जयराम सिंह ने हत्यारों को भागते देखा भी था, इसलिए गांव वालों की सलाह पर उस ने तुरंत घटना की सूचना थाना उसराहार पुलिस को दे दी थी. मामला 3-3 हत्याओं का था, इसलिए घटना की जानकारी होते ही रात को ही एसएसपी राकेश सिंह, सीओ अनिल यादव के साथ थाना ऊसराहार के थानाप्रभारी संजय यादव भी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम भी एसएसपी राकेश सिंह साथ लाए थे. पहले पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के बाद मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह से पूछताछ की गई.

जयराम सिंह ने बताया कि 2 मंजिला बने मकान में भूतल पर वह अपने परिवार के साथ रहता था, जबकि पहली मंजिल पर उस का बड़ा भाई परशुराम अपनी पत्नी विमला और 3 वर्षीया बेटी हिमांशी के साथ रहता था. रात में गोलियां चलने की आवाज सुन कर जब वह घर से बाहर निकला तो देखा रामकिशन और धर्मेंद्र तमंचा लिए 2 अन्य लोगों के साथ भागे जा रहे थे. मैं ने उन्हें अच्छी तरह पहचान लिया था. शोर भी मचाया था, लेकिन अन्य लोगों के आतेआते वे अंधेरे का फायदा उठा कर निकल गए.

‘‘ये रामकिशन और धर्मेंद्र कौन हैं, मृतक की उन से क्या दुश्मनी थी?’’ एसएसपी राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बड़े भाई परशुराम के रामकिशन की पत्नी विमला से नाजायज संबंध बन गए थे. रामकिशन ने विरोध किया तो परशुराम विमला को दिल्ली भगा ले गया और पत्नी बना कर रहने लगा. पिछली होली पर परशुराम गांव लौट आया तो रामकिशन आ धमका. उस ने गांव में पंचायत बुलाई और विमला को अपने साथ भेजने के लिए पंचायत से गुहार लगाई. लेकिन विमला ने रामकिशन के साथ जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद पंचायत क्या करती, बेइज्जत हो कर रामकिशन चला तो गया, लेकिन जातेजाते अंजाम भुगतने की धमकी देता गया. उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने ये तीनों हत्याएं की हैं.’’

फिंगर एक्सपर्ट टीम ने घटनास्थल से फिंगर प्रिंट उठा लिए तो खोजी कुत्ता टीम ने कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटनास्थल और लाशों को सूंघ कर भौंकता हुआ नीचे आया. जयराम सिंह के घर के सामने आ कर कुछ देर वह भौंकता रहा, उस के बाद जयराम सिंह को पकड़ लिया. इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि कहीं भाई और उस के परिवार की हत्या भाई ने ही तो नहीं की. क्योंकि अक्सर जर, जोरू जमीन के लिए इस तरह हत्याएं होती रही हैं. इन हत्याओं में जोरू भी थी और जरजमीन भी. हत्याओं की सही वजह क्या हो सकती थी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था.

इस पूछताछ के बाद एसएसपी राकेश सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी संजय यादव ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और जरूरी सुबूत जुटा कर थाने वापस आ गए, जहां उन्होंने मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह की तहरीर पर रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर खुद ही जांच शुरू कर दी. चूंकि जयराम सिंह ने तीनों हत्याओं का आरोप मृतका विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाया था, इसलिए थानाप्रभारी संजय यादव ने रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए गांव चौबिया स्थित उस के घर छापा मारा.

रामकिशन और उस का बेटा धर्मेंद्र घर पर ही मिल गया था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाना ऊसराहार ले आई. थाने पर जब रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र से परशुराम, उस की पत्नी और बेटी की हत्या के बारे में पूछा गया तो रामकिशन ने कहा कि यह सच है कि परशुराम से उस की दुश्मनी थी, क्योंकि वह उस की पत्नी विमला को भगा ले गया था और उस के साथ शादी कर ली थी. लेकिन जहां तक हत्याओं की बात है तो उस ने ये हत्याएं नहीं कीं. कोई अपने फायदे के लिए उस की दुश्मनी का फायदा उठा कर उसे फंसाना चाहता है.

‘‘ऐसा कौन हो सकता है, जो अपने फायदे के लिए तुम्हें फंसाएगा?’’ थानाप्रभारी संजय यादव ने पूछा.

‘‘साहब, पूरे यकीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मुझे परशुराम के भाई जयराम सिंह पर शक है. उसी ने मकान और जमीन हथियाने के लिए यह खूनी खेल खेला है.’’ रामकिशन ने कहा.

थानाप्रभारी संजय यादव असमंजस में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच्चा है और कौन झूठा? दोनों हत्याओं की वजह ऐसी बता रहे थे कि अविश्वास करने का सवाल ही नहीं उठता था. सचझूठ का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी संजय यादव ने अपने खास मुखबिर को रामकिशन और जयराम सिंह के पीछे लगा दिया. यही नहीं, वह खुद भी सुरागरसी करते रहे. थानाप्रभारी संजय यादव के उस खास मुखबिर ने जयराम सिंह और रामकिशन से दोस्त गांठ ली और वह उन के साथ खानेपीने लगे. एक दिन जयराम सिंह के साथ महफिल जमी तो मुखबिर ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘यार जयराम! तू ने खेल तो बहुत अच्छा खेला भाई. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.’’

‘‘कौन सा खेल?’’ जयराम शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए बोला.

‘‘अरे वही, जमीनजायदाद भी मिल गई और पुलिस से भी बच गए. बड़ी सफाई से हत्याओं का इल्जाम दूसरे के सिर मढ़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’ जयराम ने शराब का गिलास नीचे रख कर हैरानी से पूछा.

‘‘दोस्त हूं तुम्हारा, दिल की बात जान लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’ मुखबिर ने टकराने के लिए अपना गिलास ऊपर उठा कर कहा.

‘‘तुम जान गए हो तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम तो अपने हो. लेकिन किसी दूसरे के सामने जुबान मत खोलना.’’ जयराम ने गिलास से गिलास टकराते हुए कहा.

महफिल खत्म कर के मुखबिर सीधे थाना ऊसराहार पहुंचा. थानाप्रभारी संजय यादव थाने में ही मौजूद थे. मुखबिर के चेहरे की चमक देख कर ही संजय यादव समझ गए कि यह जरूरी संदेश लाया है. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बिठा कर पूछा, ‘‘कोई खुशखबरी?’’

‘‘जी सर, खुशखबरी ही है.’’

‘‘तो जल्दी बताओ, ताकि तुरंत काररवाई की जा सके.’’

‘‘साहब, परशुराम, उस की पत्नी विमला और बेटी हिमांशी का कत्ल उस के भाई जयराम सिंह ने ही किया है. मकान और जमीन हथियाने के लिए उसी ने तीनों को गोली मार कर मारा है और इल्जाम विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगा दिया है.’’

‘‘तुम यह बात इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो?’’ संजय यादव ने पूछा.

‘‘सर, अभी थोड़ी देर पहले हम दोनों की महफिल जमी थी. उसी में मुझे जुबान न खोलने की नसीहत देते हुए जयराम ने तीनों की हत्या की बात स्वीकार की है.’’

थानाप्रभारी संजय यादव को भी जयराम सिंह पर ही शक था. क्योंकि खोजी कुत्ते ने उसी को पकड़ा था. लेकिन जयराम सिंह ने हत्या की जो वजह बताई थी, उस से वह गुमराह हो गए थे. मुखबिर ने सच्चाई पता लगा ली तो उन्होंने देर करना उचित नहीं समझ. पुलिस बल के साथ वह गांव इकघरा पहुंचे और जयराम सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में उस से पूछताछ शुरू हुई तो पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन जब उन्होंने अपना अंदाज दिखाया तो उस ने तीनों हत्याओं का अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जयराम सिंह ने खून से सने कपडे़ और वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने भूसे वाली कोठरी में छिपा रखा था. जयराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने मुकदमे से रामकिशन और धर्मेंद्र का नाम हटा कर उस का नाम दर्ज कर दिया. इस के बाद पूछताछ एवं पुलिस जांच में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना चौबिया के गांव गंगापुरा में कुल्फ सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे बालकिशन और रामकिशन थे. कुल्फ सिंह के पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए उस की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी.

गुजरबसर के लिए वह अपने खेतों पर काम करने के बाद दूसरे के यहां मेहनतमजदूरी कर लेता था. दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी मेहनतमजदूरी कर के पिता की मदद करने लगे. बड़ा बेटा बालकिशन जवान हुआ तो कुल्फ सिंह ने उस का विवाह इटावा के ही थाना ऊसराहार के गांव इकघरा के रहने वाले हुकुम सिंह यादव की बेटी अमृता के साथ कर दिया. अमृता फैशन परस्त व खुले विचारों की लड़की थी. वह सासससुर के आगे परदा नहीं करती थी, जिस से नाराज हो कर सासससुर ने घरजमीन का बंटवारा कर के उसे अलग कर दिया.

बालकिशन से छोटे रामकिशन की शादी विमला के साथ हुई. गोरीचिट्टी आकर्षक कदकाठी की विमला थाना इकदिल के गांव तीरवा के रहने वाले राम सिंह की 3 संतानों में सब से छोटी थी. राम सिंह के पास अपनी इतनी जमीन थी कि उस में खेती कर के वह अपना गुजारा आसानी से कर रहा था. रामकिशन विमला को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, विमला वैसी ही थी. उस की मोहक मुसकान, कजरारी आंखे एवं गठीले बदन ने उसे दीवाना बना दिया था. लेकिन विमला अपनी इस शादी से खुश नहीं थी, क्योंकि उस का पति रामकिशन उम्र में उस से 10 साल बड़ा था. उस ने भी अपनी उम्र के युवक की कल्पना की थी, लेकिन रामकिशन वैसा नहीं था.

समय के साथ विमला एक बेटे की मां बनीं, नाम रखा धर्मेंद्र सिंह. बेटे के पैदा होने के बाद रामकिशन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने गांव से बाहर जा कर पैसा कमाने का विचार किया. मातापिता से बात की तो वे भी राजी हो गए. उस ने कुछ जरूरी सामान लिया और आगरा चला गया. वहां उसे एक बिल्डिंग बनवाने वाले ठेकेदार के यहां नियमित काम मिल गया. रामकिशन सुबह 9 बजे ड्यूटी पर जाता तो शाम को ही लौटता. वह अपनी तरह के अन्य मजदूरों के साथ कच्ची बस्ती में रहता था. सब मिलजुल कर खाना बनाते और एक साथ बैठ कर खाते. कभीकभी उन के बीच पीनेपिलाने का भी दौर चलता. धीरेधीरे रामकिशन को आगरा शहर पसंद आ गया. अब उस का एक ही लक्ष्य था, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना.

2-3 महीने में वह घर आता और जो कमा कर लाता, पिता के हाथों पर रख देता. विमला को खर्च के लिए अलग से पैसे देता. हफ्तादस दिन घर में रह कर वह नौकरी पर वापस चला जाता. गांव में विमला पति की यादों को दिल में संजोए बच्चे का मुंह देख कर दिन काट रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार वह जेठानी अमृता के घर चली जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात अमृता के भाई परशुराम से हुई. परशुराम जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हुकुम सिंह यादव था. हुकुम सिंह के 2 बेटे, परशुराम, जयराम और एक बेटी अमृता थी. हुकुम सिंह ने दोनों बेटों की शादी कर के घरजमीन का बंटवारा कर दिया था.

छोटा भाई जयराम तो परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहा था, जबकि परशुराम की जिंदगी में भूचाल आ गया था. बीमारी से उस की पत्नी सूर्यमुखी की मौत हो गई थी. वह तनहा जिंदगी काट रहा था. अकेला होने की वजह से अक्सर वह अपनी बहन अमृता के यहां चला जाता था. वहीं उस की मुलाकात बहन की देवरानी विमला से हुई. अमृता के घर विमला और परशुराम का आमनासामना हुआ तो इसी पहली मुलाकात में दोनों ही एकदूसरे को देख कर कुछ इस तरह मोहित हुए कि पलकें झपकाना भूल गए. विमला की आकर्षक देहयष्टि परशुराम की आंखों में बस गई. वहीं परशुराम का गठीला बदन देख कर विमला मंत्रमुग्ध सी हो गई.

बातचीत के दौरान परशुराम की नजरें विमला पर ही जमी रहीं. वह बारबार कनखियों से उसे ही ताकता रहा. विमला की नजरें जब भी उस की नजरों से टकरातीं, वह कुछ इस तरह मुसकराता कि विमला का दिल मचल उठता. उस की इस मुसकराहट से विमला के दिलोदिमाग में हलचल मचने लगी. उस दिन विमला अपने घर आई तो उसे लगा जैसे वह अपना कुछ खो आई है. परशुराम का अक्स उस के दिमाग में बस गया था. दूसरी ओर परशुराम का भी वही हाल था. उसे साफ महसूस हो रहा था कि विमला की आंखों में उस के लिए चाहत थी.

पति के दूर रहने से विमला को जब भी परशुराम की मुसकान याद आती, उस का मन विचलित होने लगता. रामकिशन ने उस की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था. महीनों हो गए थे, वह गांव नहीं आया था. पति की उपेक्षा से विमला व्याकुल रहने लगी थी. यही वजह थी कि उस ने परशुराम को खयालों में बसा लिया था. परशुराम से मिलने और उस से बातें करने का विमला का जब भी मन होता, वह जेठानी के यहां आ जाती. बहाना जेठानी से मिलने का होता था, जबकि नजरें परशुराम को खोजा करती थीं. जल्दी ही परशुराम और विमला के बीच अंतरंगता बढ़ गई और आंखों ही आंखों में इशारे भी होने लगे. एक दिन विमला ने कहा, ‘‘मैं रोज यहां आती हूं, जबकि तुम कभी हमारे घर नहीं आते. अब मैं तभी यहां आऊंगी, जब तुम मेरे घर आओगे…’’

‘‘अगर तुम्हारे सासससुर ने ऐतराज किया तो..?’’ परशुराम ने कहा.

‘‘मेरे सासससुर एक सप्ताह के लिए रिश्तेदारी में भागवत कथा सुनने गए हैं. मैं घर में बिलकुल अकेली हूं. इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है. तुम मेरे घर आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’ शरारत से आंखें नचाते हुए विमला ने कहा.

परशुराम समझ गया कि विमला क्या अच्छा लगने की बात कर रही है. आग दोनों ओर लगी थी. इसलिए अगले दिन परशुराम विमला के घर जा पहुंचा. विमला घर में सचमुच अकेली थी. इस का परिणाम यह निकला कि मर्यादा टूट गई. एक बार मर्यादा क्या टूटी, परशुराम अब महीने में पंद्रह दिन बहन के घर ही पड़ा रहने लगा. परशुराम बहन के घर क्यों पड़ा रहता है, इस बात की गांव में चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ाते बात रामकिशन के कानों तक पहुंची. रामकिशन ने परशुराम और विमला को अलग करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रेम दीवानी विमला ने परशुराम का साथ नहीं छोड़ा. तंग आ कर रामकिशन गांव में ही रहने लगा, जिस से दोनों को मिलने में परेशानी होने लगी.

तब किसी तरह एक दिन विमला ने परशुराम से मिल कर कहा, ‘‘परशुराम, अब मैं तुम्हारे लिए और मार नहीं खा सकती. तुम मजा ले कर दीदी के घर जा कर चैन से सो जाते हो, जबकि मेरा पति मुझे जानवरों की तरह पीटता है. अगर तुम मुझे सचमुच चाहते हो तो मुझे इस मारपीट से मुक्ति दिला दो. मुझे यहां से कहीं और ले चलो.’’

‘‘सच विमला.’’ परशुराम ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए पति और बेटे, दोनों को छोड़ने को तैयार हूं.’’

और फिर सचमुच एक दिन विमला ने अपना सामान समेटा और परशुराम के साथ भाग गई. परशुराम विमला को ले कर दिल्ली चला गया. वहां उस ने लक्ष्मीनगर में मदर डेयरी के पास झोपड़पट्टी में एक कमरा किराए पर लिया और विमला के साथ आराम से रहने लगा. रोजीरोटी के लिए वह सब्जी बेचने लगा. दूसरी ओर विमला के भाग जाने से रामकिशन की बड़ी बदनामी हुई. उस ने विमला को खोजने की खुद तो कोशिश की ही, थाने में भी परशुराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन विमला और परशुराम का कुछ पता नहीं चला. हार कर वह शांत हो कर बैठ गया.

लगभग 8 सालों बाद परशुराम मार्च, 2014 में अचानक अपने गांव इकघरा लौटा. साथ में उस की कथित पत्नी विमला और 3 साल की बेटी हिमांशी भी थी. गांव आ कर वह पत्नी और बेटी के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगा. जमीन का अपना आधा हिस्सा भी उस ने बंटा लिया. परशुराम का घर लौटना उस के छोटे भाई जयराम सिंह को अच्छा नहीं लगा. इस की वजह यह थी कि अभी तक घर और जमीन पर उसी का कब्जा था. उसे लगता था कि डर की वजह से परशुराम कभी लौट कर नहीं आएगा. विमला के आने की जानकारी रामकिशन को हुई तो वह इकघरा आया और गांव में पंचायत बैठा कर विमला को अपने साथ भिजवाने की गुहार लगाई. लेकिन विमला ने भरी पंचायत में उस के साथ जाने से मना कर दिया. बेटे धर्मेंद्र को देख कर भी उस का दिल नहीं पसीजा.

जब वह उसे छोड़ कर गई थी, तब वह 8 साल का था. अब वह 16 साल का हो गया था.  धर्मेंद्र ने भी मां से वापस चलने को कहा. समाज में हो रही बदनामी का भी वास्ता दिया, उस के बाद भी विमला राजी नहीं हुई. उस के बाद रामकिशन विमला और परशुराम को अंजाम भुगतने की धमकी दे कर वापस चला गया. भाई के आने से जयराम सिंह परेशान रहता था. उस का दिन का चैन और रातों की नींद छिन गई थीं. उस का सोचना था कि अगर परशुराम लौट कर न आता तो मकान और जमीन उसी की होती. लेकिन अब यह नामुमकिन था. इसी सोचविचार में जयराम सिंह ने एक रात एक तीर से 2 निशाने साधने की तरकीब निकाली.

उस ने बड़े भाई परशुराम, उस की कथित पत्नी विमला और बेटी हिमांशी की हत्या कर के इल्जाम विमला के पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाने की योजना बना डाली. योजना बना कर जयराम सिंह ने एक बदमाश से 4 हजार रुपए में एक तमंचा और 5 कारतूस खरीदे. 13 दिसंबर, 2014 की रात जब गांव में सन्नाटा पसर गया तो जयराम तमंचा लोड कर के पहली मंजिल पर पहुंचा और बरामदे में सो रही मासूम हिमांशी के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर परशुराम और विमला ने समझा कि बदमाश आ गए हैं. वे कमरे में दुबक गए.

इस के बाद जयराम सिंह कमरे में आया तो परशुराम ने भाई को पहचान लिया. वह उस से भिड़ गया. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. लेकिन मौका मिलते ही जयराम ने परशुराम के सीने में गोली मार दी. वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. विमला ने भी जयराम को पहचान लिया था. वह भी उसे से भिड़ गई. लपटाझपटी में विमला की चूडि़यां टूट कर बिखर गईं. वह चीख पाती, उस के पहले ही जयराम ने विमला के सीने में गोली मार दी. विमला भी खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी.

तीनों को मौत के घाट उतार कर जयराम ने तमंचा तथा खून से सने कपड़े भूसे की कोठरी में छिपा दिए और घर के बाहर आ कर जोरजोर से शोर मचाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी को जयराम ने बताया कि विमला के पति रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अन्य लोगों ने ये हत्याएं की हैं. भागते समय उस ने रामकिशन तथा धर्मेंद्र को पहचान लिया था. कुछ देर बाद ग्रामप्रधान अंगद सिंह यादव ने इन तीनों हत्याओं की सूचना थाना ऊसराहार पुलिस को दी.

पूछताछ के बाद 21 दिसंबर, 2014 को थाना ऊसराहार पुलिस ने अभियुक्त जयराम सिंह को इटावा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. Kanpur Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

UP Crime News : दोस्ती की शिकार मासूम देवालिका

UP Crime News : आज के जमाने में लड़केलड़की की दोस्ती कोई गुनाह नहीं है, लेकिन घर वालों की अत्यधिक छूट और लाड़प्यार जब किसी लड़के या लड़की को बिगाड़ने लगे तो घर वालों को सतर्क हो जाना चाहिए. अगर सावन जैन के घर वाले अपने लाडले को संभाल लेते तो उसे और उस के पिता व दादा को जेल न जाना पड़ता. देवालिका उर्फ काकू सुंदर भी थी और पढ़ाई में होनहार भी. जब बच्चे ऐसे हों तो मातापिता, नातेरिश्तेदार ऐसे बच्चों पर गर्व करते हैं. देवालिका पर भी सभी गर्व करते थे. वह मेरठ के एक प्रतिष्ठित स्कूल में 12वीं की पढ़ाई कर रही थी. छुट्टी के दिन को छोड़ कर, सुबह स्कूल जाना, दोपहर में वापस आना और शाम को स्कूटी से ट्यूशन जाना, यही उस की दिनचर्या थी.

देवालिका नौचंदी थाना क्षेत्र में नई सड़क स्थित एक ट्यूशन सेंटर में 4 से 6 बजे तक ट्यूशन पढ़ती थी. घर आने के बाद वह बाहरी दुनिया से प्रत्यक्ष ताल्लुक कम ही रखती थी. घर वाले भी यही चाहते थे कि उन की बेटी केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, ताकि किसी काबिल बन सके. देवालिका उत्तर प्रदेश के मेरठ की मोती प्रयाग कालोनी में रहने वाले प्रदीप कुमार यादव की बेटी थी. प्रदीप व उन की पत्नी रूबिया यादव मेरठ डिग्री कालेज में प्रोफेसर थे. प्रदीप यादव की 2 बेटियां थीं, जिन में देवालिका दूसरे नंबर की थी. बड़ी बेटी सुभि बीटेक की पढ़ाई कर रही थी. यादव दंपति उच्च शिक्षित थे, समाज में उन्हें सम्मान की नजरों से देखा जाता था. समयाभाव के चलते वे लोगों से ज्यादा मिलजुल नहीं पाते थे.

वे चाहते थे कि बेटियां भी उन्हीं की तरह उच्च शिक्षित हो कर अच्छा मुकाम हासिल करें. 6 अक्टूबर, 2014 की शाम को प्रदीप बहुत परेशान थे. उन की परेशानी की वजह थी देवालिका. दरअसल वह अपनी स्कूटी ले कर ट्यूशन पढ़ने गई थी, लेकिन वापस नही आई थी. चिंता की बात यह थी कि उस का मोबाइल भी बंद बता रहा था. बेटी के वापस न आने से पतिपत्नी दोनों ही परेशान थे. ऐसा पहली बार हुआ था कि उसे आने में इतनी देर हुई हो. अपने स्तर पर उन्होंने बेटी की खोजबीन शुरू की. प्रदीप के नातेरिश्तेदारों और परिचितों को यह बात पता चली तो उन्होंने भी खोजबीन में उन की मदद की.

जब रात गहराने लगी और बेटी का कोई पता नहीं चला तो उन्होंने थाना नौचंदी में देवालिका की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी विनोद कुमार सिंह ने उन्हें जल्द काररवाई करने का आश्वासन दिया. प्रदीप तरहतरह की आशंकाओं में डूबे हुए थे. इसी के मद्देनजर उन्होंने यह सोच कर आसपास के अस्पतालों में भी बेटी की तलाश की कि हो न हो वह किसी दुर्घटना का शिकार हो गई हो. लेकिन खोजबीन के बाद भी रात भर उस का कोई पता नहीं चल सका. अगले दिन प्रदीप के कालेज के शिक्षकों और अन्य लोगों ने एकत्र हो कर पुलिस से इस मामले में जल्द काररवाई करने को कहा. थानाप्रभारी ने इस घटना की जानकारी आला अधिकारियों को दे दी.

मामले की गंभीरता को भांप कर एसएसपी ओंकार सिंह ने अपने अधीनस्थ अफसरों को जल्द काररवाई करने को कहा. साथ ही पुलिस अधीक्षक ओमप्रकाश व सीओ (सिविल लाइन) शिवराज सिंह ने पीडि़त परिवार से मिल कर देवालिका के बारे में जानकारी एकत्र की. देवालिका की बरामदगी की मांग को ले कर शिक्षकों का एक प्रतिनिधि मंडल एसएसपी से मिला और देवालिका की जल्द से जल्द बरामदगी न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी. इस पर एसएसपी ने खुद पूरे मामले की मानीटरिंग शुरू कर दी.

पुलिस ने सब से पहले देवालिका का मोबाइल नंबर हासिल कर के उस की काल डिटेल्स हासिल की. उस की काल डिटेल्स से पता चला कि गत दिवस शाम को लापता होने से पहले एक नंबर पर उस की आखिरी बार बात हुई थी. पुलिस ने सर्विस प्रोवाइडर कंपनी से उस मोबाइल नंबर का पता निकलवाया तो वह नंबर मेरठ के ही थाना सदर बाजार के अंतर्गत आने वाले बौंबे बाजार निवासी सावन जैन के नाम पर रजिस्टर्ड निकला. बढ़ते दबाव में काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस बिना समय गंवाए उस पते पर पहुंच गई. पता बिलकुल सही था, सावन जैन का ताल्लुक एक संपन्न घराने से था.

पूछताछ में पता चला कि वह शहर के ही एक स्कूल में 12वीं का छात्र था. उस के पिता राजीव जैन दवा कारोबारी थे. जबकि उस के दादा अपर जिलाधिकारी के पद से रिटायर हुए थे. घर पर पुलिस आई तो सावन के दादा ने भी बात की और उस के पिता भी वहां आ गए. उन लोगों ने बताया कि सावन अपनी बुआ के घर सरधना गया हुआ है. सावन के घर वालों को विश्वास में ले कर पुलिस ने सब से पहले सावन के मोबाइल नंबर की पुष्टि की. जिस नंबर पर देवालिका की बात हुई थी, वह नंबर उसी का था. सरधना मेरठ से ज्यादा दूर नहीं था. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम सरधना जा पहुंची.

पुलिस ने पूछताछ की तो सावन ने यह बात तो मान ली कि वह देवालिका को अच्छी तरह जानता था और गत दिवस शाम को देवालिका से उस की बात हुई थी, लेकिन वह कहां है, इस बारे में उस ने कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया. जब पुलिस ने उस से कहा कि देवालिका कल शाम से गायब है तो वह चौंकते हुए बोला, ‘‘कहां गई वह?’’

‘‘यह तो तुम ही बता सकते हो, उस से आखिरी बार तुम्हारी ही बात हुई थी.’’ पुलिस के इस सवाल पर सावन निर्भीक हो कर बोला, ‘‘बात जरूर हुई थी, लेकिन मैं यह बात कैसे बता सकता हूं कि वह कहां गई.’’

‘‘तो फिर यह बता दो कि उस से तुम्हारी क्या बात हुई थी?’’ पुलिस ने सवाल किया तो सावन बोला, ‘‘कुछ खास नहीं. पहले हम दोनों एक ही क्लास और एक ही स्कूल में पढ़ते थे. इस साल मैं ने स्कूल चेंज कर लिया था, लेकिन हमारी बातें होती रहती थीं. कल भी उस से मेरी सामान्य बात हुई थी. उस ने मुझे बताया था कि वह ट्यूशन के लिए घर से निकली है और अपने कुछ दोस्तों के साथ घूमने जाएगी.’’

‘‘कहां घूमने जाने की बात कर रही थी, कुछ बताया था उस ने?’’

‘‘नहीं. इस बारे में तो उस ने मुझे कुछ नहीं बताया था.’’ सावन का आत्मविश्वास गजब का था. उस की बातें पुलिस को सच लग रही थीं. अभी बात चल ही रही थी कि इसी बीच सावन के पिता बोले, ‘‘सर, हमारे नसीब अच्छे थे, जो हमारा बेटा बच गया.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘सर, कल शाम इसे बदमाशों ने उठा लिया था, गनीमत यही रही कि वे इसे दिल्लीदेहरादून हाईवे पर छोड़ कर चले गए. दरअसल वे लोग किसी और का अपहरण करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने गलती से हमारे बेटे को उठा लिया था.’’ सावन के पिता की बात सुन कर पुलिस चौंकी. राजीव जैन ने जो बताया था उस के अनुसार 6 अक्टूबर की शाम सावन अपने दोस्त से मिलने के लिए सड़क किनारे खड़ा उस का इंतजार कर रहा था. तभी कुछ लोग उसे जबरन एक कार में डाल कर ले गए. रास्ते में उन्होंने उस से नामपता पूछा तो उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और वह उसे दौराला थाना क्षेत्र में उतार कर चले गए. इस के बाद वह पैदल चल कर थाने पहुंचा.

पुलिस ने सूचना दी तो घर वाले वहां जा कर उसे अपने साथ ले आए थे. सावन से पूछताछ कर के पुलिस सरधना से वापस लौट आई. देवालिका के गायब होने से उस के घर वाले तो परेशान थे ही, साथ ही प्रदीप यादव के साथी शिक्षक भी गुस्से में थे. शिक्षकों का एक प्रतिनिधि मंडल एसएसपी ओंकार सिंह से मिला और उन्हें देवालिका का पता न लगने पर आंदोलन की चेतावनी दी. चूंकि देवालिका की अंतिम बात सावन से ही हुई थी, इसलिए वही मुख्य संदिग्ध था. पुलिस ने उस के बारे में लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उस की संगत अच्छी नहीं थी. पुलिस ने उस के मोबाइल की लोकेशन हासिल करने के साथ ही देवालिका के मोबाइल की लोेकेशन भी निकलवाई.

पुलिस ने दोनों की लोेकेशन का मिलान किया तो चौंकी, क्योंकि देवालिका की अंतिम लोकेशन भी दौराला थाना क्षेत्र में ही पाई थी. इस का मतलब सावन व देवालिका साथसाथ थे. सावन का परिवार प्रभावशाली था, इसलिए पुलिस बिना सुबूतों के उस पर हाथ डालने से कतरा रही थी. यह आश्चर्य की ही बात थी कि बदमाशों ने सावन को उसी थाना क्षेत्र में छोड़ा था, जहां देवालिका की लोकेशन मिली थी, यह घटना हकीकत में घटी थी या कोई ड्रामा भर था, इस का अंदाजा लगाना इसलिए मुश्किल हो रहा था, क्योंकि सावन दौराला थाने गया था और अपने अपहरण की कहानी पुलिस को बताई थी.

अलबत्ता लापता होने वाली शाम को देवालिका के साथ बातचीत और उस के साथ मिली लोकेशन ने उसे संदिग्ध जरूर बना दिया था. मेरठ से दौराला जाने वाले हाईवे पर राष्ट्रीय राजमार्ग का टोल प्लाजा पड़ता था. वहां सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने वहां जा कर सीसीटीवी फुटेज की जांच की तो यह बात साफ हो गई कि देवालिका व सावन एक ही स्कूटी से दौराला की तरफ गए थे. उस वक्त शाम के करीब 6 बजे थे. पुलिस ने इस फुटेज को अपने कब्जे में ले लिया. इसी बीच पुलिस को सूचना मिली कि जिस स्कूटी से देवालिका ट्यूशन गई थी, वह दौराला क्षेत्र में लावारिस हालत में सड़क किनारे खड़ी है. पुलिस ने उस स्कूटी को बरामद कर लिया.

देवालिका कहां थी, इस का सुराग अब सिर्फ सावन ही दे सकता था. पुलिस टीम उस के घर पहुंची और उसे हिरासत में ले कर थाने लौट आई. सावन नई पीढ़ी का ऐसा चालाक युवक था, जिस ने पूरे आत्मविश्वास से झूठ बोल कर पुलिस को चकमा दे दिया था. इस बार भी उस ने ऐसी ही कोशिश की तो पुलिस ने उस से नरमी बरतनी बंद कर दी. इस बार वह टूट गया. पूछताछ में उस ने जो हकीकत बताई, उस ने पुलिस के रोंगटे खड़े कर दिए. वह झांसा दे कर देवालिका को न सिर्फ अपने साथ ले गया था, बल्कि उस की हत्या कर के उस के शव को जंगल में फेंक आया था. निस्संदेह सावन के मासूम चेहरे के पीछे खतरनाक इरादों वाला एक हैवान छिपा था.

देवालिका की लाश बरामद होनी जरूरी थी. सावन ने अपने बयान में बताया था कि उस ने देवालिका की लाश सरधना दौराला मार्ग पर जंगल में फेंकी थी. पुलिस उसे ले कर उस जगह पहुंची, जहां उस ने हत्या कर के लाश फेंकने की बात बताई थी, लेकिन वहां लाश नहीं मिली. पुलिस ने उसे ले कर घंटों जंगल में छानबीन की, लेकिन लाश का कोई नामोनिशान नहीं मिला. इस से पुलिस को लगा कि लाश या तो कोई जंगली जानवर उठा ले गया होगा या फिर सावन शातिराना ढंग से पुलिस को भटका रहा होगा. पुलिस ने उसे थाने ला कर उस से फिर से गहराई से पूछताछ की. लेकिन कभी वह देवालिका की लाश को जंगल में फेंकने की बात कहता तो कभी नहर में. कभी वह कहता कि वह देवालिका के साथ मारपीट कर के उसे वहीं छोड़ आया था.

देवालिका की हत्या और शव न मिलने से शिक्षकों व शहर के लोगों में आक्रोश भर गया था. इस के विरोध में शिक्षक, छात्रछात्राएं तथा सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए. उन्होंने विरोध प्रकट करने के लिए मानव शृंखला बना कर जाम लगा दिया. शिक्षकों ने एसएसपी ओंकार सिंह का घेराव कर के उन्हें देवालिका की लाश बरामदगी के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया. लोगों का गुस्सा और भी भड़क सकता था, इसलिए अगले दिन यानी 8 अक्टूबर को पुलिस सावन को ले कर फिर जंगल में पहुंचीं. एसएसपी ओंकार सिंह, एसपी (सिटी) ओमप्रकाश और एसपी (देहात) एमएम बेग भी पुलिस टीम के साथ थे. एसएसपी के आदेश पर अन्य थानों का पुलिस बल भी खोजबीन में लगा दिया गया.

पुलिस ने सघन तलाशी अभियान चलाया. गंगनहर पुल के आसपास सारा जंगल खंगाला गया, लेकिन न तो देवालिका की लाश मिली और न ही उस का मोबाइल. मामला चर्चित हो चुका था. घटना की गंभीरता के मद्देनजर मेरठ जोन के आईजी आलोक शर्मा के आदेश पर इस जांच में सीओ (क्राइम) मनीष मिश्रा को भी लगा दिया गया. बड़ा सवाल यह था कि अगर सावन ने देवालिका के शव को जंगल में फेंका था तो वह आखिर गया कहां. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि कहीं सावन के घर वालों ने ही उसे बचाने के लिए शव को गायब तो नहीं करा दिया. सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने सावन और उस के घर वालों को आमनेसामने बैठा कर भी पूछताछ की.

तब तक पुलिस सावन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 363 व 201 के अंतर्गत मुकदमा दर्ज कर चुकी थी. खाफी खोजबीन के बाद आखिर 9 अक्टूबर की सुबह पुलिस ने सरधना मार्ग पर मढियाई गांव के नजदीक से देवालिका की लाश बरामद कर ली. लाश सड़ने लगी थी. देवालिका का शव मिलने की सूचना पर आईजी आलोक शर्मा, एसएसपी ओंकार सिंह, एसपी सिटी ओमप्रकाश और एसपी देहात एमएम बेग भी मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. पोस्टमार्टम में उस की मौत का कारण गला दबाने से दम घुटना बताया गया. देवालिका की मौत से हर कोई गमजदा था. उसी शाम उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस की अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए.

शमशान घाट पर जिलाधिकारी पंकज यादव, एसएसपी ओंकार सिंह भी पहुंचे. सैंकड़ों लोगों ने मोमबत्तियां जला कर देवालिका को श्रद्धांजलि दी. सावन से हुई विस्तृत पूछताछ में देवालिका हत्याकांड की चौंकाने वाली कहानी कुछ इस तरह निकली. बड़े कारोबारी राजीव जैन के 2 बेटे थे, बादल और सावन. छोटा होने की वजह से सावन सब का लाडला था. उस के दादा वेदप्रकाश एसडीएम रह चुके थे, रसूखदार आदमी. परिवार की रईसी सावन के सिर चढ़ कर बोलती थी. वह अपने अंदाज में जिंदगी जीता था. उस ने स्कूल में अपने ही जैसे दोस्तों की मंडली बना रखी थी. वह इस मंडली का ग्रुप लीडर था. वर्ष 2013 में देवालिका उस की सहपाठी थी.

एक ही क्लास में होने की वजह से उस की देवालिका से दोस्ती हो गई थी. यह कोई हैरानी की बात नहीं थी. देवालिका होनहार लड़की थी. उम्र के नाजुक दौर से गुजर रही देवालिका दोस्ती के मामले में सावन को पहचानने में धोखा खा गई. दरअसल, धीरेधीरे सावन उसे दोस्ती से भी बढ़ कर कुछ और मानने लगा था. देवालिका उस की इस सोच से पूरी तरह अंजान थी. सावन को उस का दूसरे लड़कों से बात करना तक पसंद नहीं था. सावन की आदतें बिगड़ी हुई थीं. फेसबुक, हुक्काबार, दोस्ती और मौजमस्ती जैसी बातें उस की जिंदगी का हिस्सा थीं. घर में पैसे की किसी प्रकार की कमी नहीं थी. वह जब चाहता था, उसे पैसा मिल जाता था. इस से उस की आदतें और भी बिगड़ गई थीं.

दोस्तों के बीच उस की गिनती बिगड़े रईसजादों में होती थी. घर वालों से पैसे वसूलने के लिए उस ने कभी अपने अपहरण का नाटक किया तो कभी अन्य हथकंडे अपनाए. एकदो बार बात पुलिस तक भी पहुंची, पर पुलिस ने हर बार उसे छात्र समझ कर छोड़ दिया. लेकिन इन सब बातों का उस पर कोई असर नहीं पड़ा. नतीजा यह हुआ कि सावन ने इस आजादी का मतलब कुछ गलत ही निकाल लिया.वह निरंकुश होता गया. पढ़ाई के अलावा उस का ज्यादातर वक्त दोस्तों, मोबाइल या इंटरनेट पर बीतता था. कहते हैं जब संतान पटरी से उतरती दिखाई दे तो उसे समझाने के साथसाथ अन्य तरीकों से पटरी पर लाने की कोशिश करनी चाहिए.

सावन के घर वालों ने भी ऐसा किया, पर उस ढंग से नहीं, जैसा करना चाहिए था. उन का लाड़प्यार हमेशा इस के आड़े आ जाता था. खराब आदतों के चलते सावन को 11वीं के बाद स्कूल से निकाल दिया गया. उस ने 12वीं में दूसरे स्कूल में दाखिला ले लिया. इस से उस का स्कूल जरूर बदल गया, लेकिन उस ने अपने दोस्तों से कोई दूरी नहीं बनाई. दूर रह कर भी वह दोस्तों के जरिए देवालिका पर नजर रखे रहा. मोबाइल पर दोनों की बातें भी होती रहती थीं और दोनों कभीकभी मिल भी लिया करते थे.

इसी बीच जब सावन को पता चला कि देवालिका की दोस्ती कुछ अन्य लड़कों से हो गई है तो यह बात उसे नागवार गुजरी. उस ने देवालिका से नाराजगी प्रकट की तो उस ने उसे समझाया, ‘‘किसी से बात कर लेने का मतलब दोस्ती नहीं होता. मैं तुम्हें दोस्त मानती हूं. तुम्हें अपने दिमाग में इस तरह की बातें नहीं लानी चाहिए.’’

देवालिका ने समझाया जरूर, लेकिन सावन को उस की बातें समझ में नहीं आईं. दरअसल वह मन ही मन उस से एकतरफा प्यार करता था. इसी वजह से वह उस पर शक करने लगा. ऐसी स्थिति में देवालिका को उस से किनारा कर लेना चाहिए था, लेकिन वह सावन को समझने की भूल कर रही थी. ज्यादा टोकाटाकी पर सावन की देवालिका से कई बार झड़पें भी हुईं. इस के बाद देवालिका ने सावन से दूरी बनानी शुरू कर दी. इस से सावन को लगने लगा कि वह उस से दूर जा रही है और इस की वजह दूसरे लड़कों से उस की दोस्ती है. इन बातों ने उसे विचलित कर दिया. अपनी रईसी को ले कर उसे इस बात का गुरूर था कि देवालिका के लिए उस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कोई दूसरा नहीं होना चाहिए.

उसे ले कर वह पूरी तरह जुनूनी हो चुका था. उस की गलत सोच और दोस्ती के मुद्दे पर दोनों में कई बार टकराव हुआ. जब सावन को हालात अपने अनुकूल नहीं लगे तो उस ने मन ही मन देवालिका को सबक सिखाने की ठान ली. उस ने सोच लिया कि अगर वह उस के कहे अनुसार नहीं चली तो उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा देगा. यह घृणित निर्णय करने के बाद उस ने मनमुटाव त्याग कर देवालिका को विश्वास में लेने के लिए उस से बातचीत शुरू कर दी. अपनी योजना के अनुरूप सावन ने मानमनौव्वल कर के देवालिका से मिलने का आग्रह किया. हालांकि यह ठीक नहीं था, पर वह उस के जाल में फंस गई. दोनों ने तय किया कि वह दोनों 6 अक्तूबर की शाम को मिल कर बातें करेंगे.

सावन ने उस से कहा कि शाम के वक्त वह उसे कैंट इलाके में सोफिया स्कूल के बाहर खड़ा मिलेगा. 6 तारीख को देवालिका प्रतिदिन की तरह ट्यूशन के लिए घर से निकली. उस ने 4 से 5 बजे वाला ट्यूशन तो पढ़ा, लेकिन 5 से 6 बजे वाला ट्यूशन पढ़ने के बजाय वह सावन के बताए स्थान पर पहुंच गई. वहां सावन पहले ही उस का इंतजार कर रहा था. स्कूटी पर बैठ कर वे हाईवे पर चल दिए. दौराला पार कर के दोनों सड़क किनारे स्थित एक रेस्टोरेंट में पहुंचे. वहां सावन ने उसे समझाने की कोशिश की कि वह अन्य लड़कों से दोस्ती न रखे. 7 बजे के बाद दोनों वहां से वापस आए और दौराला से सरधना की तरफ गंगनहर वाले पटरी मार्ग पर चल दिए. रास्ते में दोनों बातचीत करने के लिए गंगनहर के एक पुल पर रुक गए. वह जगह एकदम सुनसान थी. सावन ने एक बार फिर देवालिका से कहा, ‘‘तुम मेरी बात समझ गई न?’’

‘‘ठीक है मैं समझ गई, लेकिन वैसा कुछ भी नहीं है जैसा तुम सोच रहे हो. कोई क्लास का लड़का है तो बात तो करनी ही पड़ती हैं.’’

‘‘चलो ठीक है, लेकिन याद रखना मुझे अगर कुछ ऐसावैसा पता चला तो मैं कुछ भी कर सकता हूं.’’

‘‘सावन, यह ठीक है कि मैं तुम्हें दोस्त मानती हूं. लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि मुझ पर इस तरह हक जताओ.’’ देवालिका ने नाराजगी जाहिर की. इसी बीच देवालिका के मोबाइल पर किसी के मैसेज की बीप बजी तो सावन ने उस के हाथ से मोबाइल ले लिया. उस मैसेज को पढ़ कर सावन की त्यौरियां चढ़ गईं. वह गुस्से में भड़क कर बोला, ‘‘मैं जिस लड़के से बात करने को मना कर रहा हूं, वही मैसेजबाजी कर रहा है. जबकि तुम कह रही हो कि कोई ज्यादा मतलब नहीं है.’’

‘‘अगर उस ने मैसेज भेजा है तो मैं क्या कर सकती हूं?’’

‘‘मैं तुम्हें किसी और की नहीं होने दूंगा. बंद करो अपनी बकवास.’’ सावन ने कहा तो देवालिका को उस की बातों से गुस्सा आ गया. उस ने कह दिया, ‘‘मैं तुम्हारी गुलाम नहीं हूं समझे.’’

‘‘लगता है, तुम ऐसे नहीं मानोगी. मुझे तो तुम्हारे चरित्र पर ही शक हो रहा है.’’ सावन ने कहा तो देवालिका को उस की बात पर ताव आ गया. उस ने सावन के गाल पर एक चांटा जड़ दिया. थप्पड़ लगते ही वह बिलबिला उठा. वह पहले से ही खार खाए बैठा था. सावन यह सोच कर आया था कि अगर देवालिका ने उस की बात नहीं मानी, तो उसे सबक सिखा देगा. थप्पड़ ने उस के गुस्से को आसमान पर पहुंचा दिया. उस ने भी बदले में देवालिका के मुंह पर मुक्का जड़ दिया. मुक्का लगते ही उस की नाक से खून बह निकला.

‘‘मैं ने कहा था न कि मैं कुछ भी कर सकता हूं, अब मैं तुझे सबक सिखाता हूं.’’ कहते हुए उस ने देवालिका को पीटना शुरू कर दिया. इस पर वह विरोध करते हुए चिल्लाई तो सावन ने उस का गला पकड़ लिया.

देवालिका इतनी ताकतवर नहीं थी कि उस का मुकाबला कर सकती. वह बचाव के लिए बहुत छटपटाई, पर सावन हैवान बन चुका था. उस ने देवालिका के गले पर अपने पंजे कस दिए. फलस्वरूप जरा सी देर में देवालिका ने छटपटा कर दम तोड़ दिया. सावन ने उस की लाश खींच कर पटरी किनारे झाडि़यों में फेंक दी. हत्या के बाद सावन ने खुद को बचाने के लिए अपना दिमाग चलाया तो उस के दिमाग में खुद के अपहरण के नाटक का आइडिया आया. ऐसा वह पहले भी कर चुका था. नई योजना के तहत उस ने देवालिका की स्कूटी को सरधना मार्ग से आ कर दौराला हाईवे पर सड़क किनारे खड़ा कर दिया और थाने जा कर अपने अपहरण की मनगढ़ंत कहानी पुलिस को सुना दी.

पुलिस ने इस मामले की सूचना उस के घर वालों को दे दी. उस के घर वाले थाना दौराला आ गए और सावन को अपने साथ मेरठ ले आए. सावन घर तो आ गया, लेकिन वह पूरी रात सो नहीं पाया. अगले दिन उस ने अपने पिता व दादा को एक और नई कहानी बताई. उस के अनुसार वह अपनी दोस्त देवालिका के साथ दौराला की तरफ गया था. रास्ते में कुछ लोगों ने उस के साथ मारपीट की और देवालिका को साथ ले गए. इस बीच उस के पिता व दादा दोनों को इस बात का अहसास हो गया था कि सावन उन से कोई बात छिपा रहा है.

वह उसे ले कर उस की बताई जगह पर भी गए. जब शक के आधार पर पुलिस सावन से पूछताछ करने उस के घर पहुंची थी तो उसे बचाने के लिए उन्होंने यह बात पुलिस से छिपा ली थी. सावन को उम्मीद थी कि अगर पुलिस को उस पर शक हुआ भी तो भी इस कहानी से वह साफ बच जाएगा. इस में उस के घर वालों का प्रभाव और पैसा भी काम आएगा, लेकिन उस की सोच गलत साबित हुई. पुलिस ने सावन के दादा वी.पी. जैन और पिता राजीव जैन को भी साक्ष्य मिटाने व साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने सावन का मैडिकल परीक्षण भी कराया, जिस में उस की उम्र 18 साल 2 महीने पाई गई.

अगले दिन तीनों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 15 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. सावन की बिगड़ी प्रवृत्तियों के चलते जहां देवालिका बेमौत मारी गई, वहीं सावन की करतूत से जैन परिवार की 3 पीढि़यां एक साथ जेल पहुंच गईं. उस का अपना भविष्य तो चौपट हो ही गया. देवालिका ने अगर सावन जैसे बिगड़ैल लड़के पर भरोसा कर के दोस्ती न की होती तो शायद ऐसी नौबत नहीं आती. वहीं सावन को भी उस के परिवार ने समय रहते संभाल लिया होता तो 3-3 लोग सलाखों के पीछे नहीं होते. आधुनिकता, जवानी के वेग, संस्कारों व नैतिक शिक्षा के अभाव में हुई यह दुखद घटना आज की पीढ़ी के लिए एक बड़ा सबक जरूर है. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Jharkhand Crime News : पाताललोक वेबसीरीज देख कर किया दोस्त की पत्नी और बच्चों का कत्ल

Jharkhand Crime News : दूसरों की वजह से यदि उग्र स्वभाव का इंसान आंतरिक क्रोध के जाल में फंस जाए तो उसे बुरे करेक्टर याद आते हैं. दीपक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. ऐसे में उसे वेबसीरीज ‘पाताल लोक’ का करेक्टर हथौड़ा त्यागी याद आया और उस ने हथौड़ा उठा लिया. फिर तो उस ने…

पारसी व्यवसाई जमशेदजी नौशरवानजी टाटा द्वारा बसाया गया झारखंड का जमशेदपुर भारत के सब से प्रगतिशील औद्योगिक नगरों में एक है. इस शहर की बुनियाद सन 1907 में टाटा आयरन ऐंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना से पड़ी. जमशेदपुर को टाटानगर भी कहते हैं. इस शहर में टिस्को के अलावा टेल्को, टायो, उषा मार्टिन, जेम्को, टेल्कान, बीओसी सहित आधुनिक स्टील ऐंड पावर के कई उद्योग और देश की नामी इकाइयां हैं. दीपक कुमार अपने परिवार के साथ इसी जमशेदपुर शहर में कदमा थाना इलाके में तीस्ता रोड पर क्वार्टर नंबर एन-97 में रहता था. परिवार में कुल 4 लोग थे.

दीपक, उस की पत्नी वीणा और 2 बेटियां. बड़ी बेटी श्रावणी 15 साल की थी और छोटी बेटी दिव्या 10 साल की. दीपक खुद करीब 40 साल का था और उस की पत्नी वीणा 36 साल की. मूलरूप से बिहार के खगडि़या जिले का रहने वाला दीपक टाटा स्टील कंपनी में फायर ब्रिगेड कर्मचारी था. पिछले कुछ सालों से नौकरी के सिलसिले में वह जमशेदपुर में रहता था, वेतन ठीकठाक था. साइड बिजनैस के रूप में वह ट्रांसपोर्ट का काम भी करता था. इसलिए घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. लेकिन दोस्तों के धोखा देने और लौकडाउन में ट्रांसपोर्ट से आमदनी घटने से वह आर्थिक संकट में आ गया था.

इसी 12 अप्रैल की बात है. दीपक ने अपने दोस्त रोशन और उस की पत्नी आराध्या को लंच पर घर बुलाया. सुबह करीब साढ़े 9 बजे जब दीपक का फोन आया था, तब रोशन ने तबीयत ठीक न होने की बात कह कर मना कर दिया था, लेकिन दीपक के काफी इसरार करने पर रोशन ने कह दिया कि तबीयत ठीक रही, तो वह दोपहर बारह-एक बजे तक आने या नहीं आने के बारे में बता देगा. रोशन और उस की बीवी आराध्या से दीपक के पारिवारिक संबंध थे. दरअसल, रोशन आराध्या से प्यार करता था, लेकिन दोनों के घर वाले इस रिश्ते के लिए राजी नहीं थे. तब दीपक ने दोनों परिवारों को रजामंद कर के रोशन और आराध्या की शादी कराई थी.

दीपक का छत्तीसगढ़ में ट्रांसपोर्ट का काम था. वहां रोशन का भी ट्रक चलता था. आराध्या दीपक को मामा कहती थी. रोशन और आराध्या कुछ महीने पहले ही जमशेदपुर में शिफ्ट हुए थे. आराध्या या रोशन का फोन नहीं आया, तो दीपक ने दोपहर करीब एक बजे पत्नी वीणा के मोबाइल से आराध्या को फोन कर लंच पर जरूर आने का आग्रह किया. आराध्या मना नहीं कर सकी. उस ने कहा, ‘‘ठीक है. हम जरूर आएंगे.’’

दोपहर करीब ढाई बजे रोशन अपनी पत्नी आराध्या और एक साल की बेटी के साथ कार से कदमा में दीपक के घर पहुंचे. उन के साथ रोशन का साला अंकित भी था. अंकित दिल्ली रहता था. वह बहनबहनोई से मिलने जमशेदपुर आया था. रोशन और आराध्या दीपक के घर लंच पर जा रहे थे, अंकित घर में अकेला बोर होगा. सोच कर वे उसे भी अपने साथ लेते गए. घर पहुंचने पर दीपक ने गेट खोला. उस ने रोशन और उस की बीवी का गर्मजोशी से स्वागत किया. उन के साथ तीसरे युवक को देख कर दीपक ने रोशन की तरफ सवालिया नजरों से देखा. उस की नजरों को भांप कर रोशन ने हंसते हुए कहा, ‘‘यार, ये मेरा साला और मेरी बेगम साहिबा का भाई है. नाम है अंकित. दिल्ली से आया है.’’

रोशन, उस की बीवी और अंकित को ड्राइमरूम में सोफे  पर बैठने का इशारा करते हुए दीपक ने कहा, ‘‘आप लोग बैठो, मैं फ्रिज से ठंडा पानी ले कर आता हूं.’’

दीपक पानी लाने के लिए जाने लगा, तो आराध्या चौंक कर बोली, ‘‘मामा, आप पानी क्यों ला रहे हो? वीणा मामी को कह दो, वह ले आएंगी.’’

‘‘अरे यार, मैं तुम्हें बताना भूल गया. वीणा कुछ देर पहले मेरे भाई के घर रांची चली गई. साथ में दोनों बच्चों को भी ले गई,’’ दीपक ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘घर में अकेला मैं ही हूं. मुझे ही आप लोगों की आवभगत करनी पड़ेगी.’’

‘‘मामा, हमें शर्मिंदा मत कीजिए. आप ने हमें बेकार ही लंच पर बुलाया,’’ आराध्या ने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘‘मामीजी घर पर नहीं हैं, तो हम लंच के लिए फिर कभी आ जाएंगे.’’

दीपक ने आराध्या को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘आप को लंच पर बुलाया है, तो बाजार से खाना ले आएंगे.’’

दीपक की इस बात पर आराध्या ने पति रोशन की ओर देखा. रोशन क्या कहता, उस ने फ्रिज से पानी लेने जा रहे दीपक को सोफे पर ही बैठा लिया और बातें करने लगे. घरपरिवार और बच्चों की बातें करते हुए वे ठहाके भी लगाते जा रहे थे. उन्हें बातें करते हुए 5-7 मिनट ही हुए थे कि आराध्या की बेटी ने पौटी कर दी. आराध्या बेटी को गोद में ले कर बाथरूम में चली गई. बाथरूम में उस ने बच्ची को साफ किया. पीछेपीछे रोशन भी बीवी की मदद के लिए बाथरूम में आ गया और उस ने बेटी का नैपकिन धोया. बाथरूम से ड्राइंगरूम में आते समय उन्हें चिल्लाने की आवाज सुनाई दी. वे तेज कदमों से ड्राइंगरूम में पहुंचे, तो दीपक हथौड़े से अंकित पर हमला कर रहा था.

रोशन कुछ समझ नहीं पाया कि अचानक ऐसी क्या बात हो गई, जो दीपक अंकित को मार रहा है. वह दीपक से पूछते हुएअंकित को बचाने लगा, तो दीपक ने उस की बच्ची को अपनी ओर खींचते हुए मारने की कोशिश की. रोशन बचाने लगा, तो दीपक ने उस पर भी हथौड़े से हमला कर दिया. इस से रोशन को भी चोटें लगीं. किसी तरह रोशन ने अपनी बेटी, पत्नी और साले को बचा कर वहां से बाहर निकाला. अंकित के सिर से खून बह रहा था. उस के सिर पर रुमाल बांध कर खून रोकने की कोशिश की गई. फिर वे कार से सीधे टाटा मैमोरियल हौस्पिटल पहुंचे. अंकित का तुरंत इलाज जरूरी था. उसे हौस्पिटल में भरती कराया गया. रोशन को भी डाक्टरों ने भरती कर लिया.

बाद में रोशन ने दीपक के साले विनोद को फोन कर पूरी बात बताई. विनोद को दाल में कुछ काला नजर आया. उस ने यह बात अपने छोटे भाई आनंद साहू को बताईं. दीपक की ससुराल जमशेदपुर के ही शास्त्रीनगर में थी. शाम करीब 4 बजे विनोद और उस के घर वाले दीपक के क्वार्टर पर पहुंचे. वहां गेट पर ताला लगा हुआ था, लेकिन अंदर एसी चल रहा था. विनोद और उस के घर वाले सोचविचार कर ही रहे थे कि इसी दौरान रिंकी को ढूंढते हुए उस की मां नीलिमा और मंझली बहन बिपाशा भी वहां पहुंच गईं. उन्होंने बताया कि रिंकी दीपक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आती थी. वह सुबह 11 बजे घर से निकली थी और अभी तक घर नहीं पहुंची.

रोजाना वह दोपहर एक बजे घर वापस आ जाती थी. बहनों की औनलाइन क्लास होने के कारण रिंकी उस दिन मोबाइल नहीं ले गई थी. जब रोजाना के समय पर रिंकी वापस घर नहीं पहुंची, तो घर वालों ने दीपक को फोन किया. दीपक ने कहा कि वह ट्यूशन पढ़ा कर जा चुकी है. इस के बाद भी दोपहर 3 बजे तक जब रिंकी घर नहीं पहुंची, तो नीलिमा और बिपाशा दीपक के क्वार्टर पर पहुंची थीं. चिंता में मांबेटी वहां से कदमा थाने पहुंचीं और पुलिस को पूरी बात बताई. पुलिस ने कोई घटना दुर्घटना होने की आशंका जताते हुए एक बार हौस्पिटल में देख आने की सलाह दी. वे टीएमएच गईं, लेकिन वहां कुछ पता नहीं चला, तो थकहार कर दोनों दोबारा दीपक के क्वार्टर पर आईं. यहां उन्हें विनोद और उस के घर वाले मिले.

विनोद ने रिंकी की मांबहन के साथ सोचविचार कर दीपक के क्वार्टर के दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया. विनोद अंदर कमरे में गया और चिल्लाते हुए बाहर निकल आया. उस ने बताया कि वीणा और दोनों बेटियां मरी पड़ी हैं. यह सुन कर विनोद के साथ दूसरे लोग कमरे में गए. उन्होंने वीणा और दोनों बच्चियों को हिलायाडुलाया, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई. उन की नब्ज भी ठंडी पड़ चुकी थी. वीणा और उस की दोनों बेटियों की लाश देख कर विनोद और उस के घर वाले रोने लगे. दीपक की पत्नी और बेटियों की लाश देख कर रिंकी की मां और बहन को शक हुआ. खोजबीन में रिंकी की एक चप्पल बाहर पड़ी मिल गई.

इस से संदेह और बढ़ गया. वे घर में रिंकी को तलाशने लगीं. उस की स्कूटी तो बालकनी में खड़ी मिली, लेकिन रिंकी नहीं मिली. मंझली बेटी बिपाशा मां को दिलासा देते हुए अलगअलग कमरों में बड़ी चीजें हटा कर देखने लगी. उस ने एक कमरे में पलंग का बौक्स खोला, तो उस में रिंकी की लाश पड़ी थी. उस के हाथ बंधे हुए और कपड़े अस्तव्यस्त थे. रिंकी की लाश देख कर नीलिमा और बिपाशा रोने लगीं. चारों हुईं हथौड़े का शिकार एक क्वार्टर में 4 लोगों की हत्या होने की बात पूरे शहर में फैल गई. सूचना मिलने पर कदमा थानाप्रभारी से ले कर डीएसपी, एसपी (सिटी) सुभाषचंद्र जाट और एसएसपी डा. एम. तमिलवाणन के अलावा फोरैंसिक टीम मौके पर पहुंच गई.

पुलिस अफसरों ने मौकामुआयना किया. एक कमरे की दीवार पर खून के छींटे मिले. तलाशी के दौरान कमरे में खून लगी हथौड़ी और खून से सना तकिया भी मिला. शराब की एक बोतल भी मिली. फोरैंसिक टीम ने फिंगरप्रिंट लिए और जरूरी सबूत जुटाए. मौके के हालात से लग रहा था कि वीणा और उस की दोनों बेटियों की हत्या कई घंटे पहले की गई थी. अनुमान लगाया गया कि सुबह करीब 11 बजे के बाद ट्यूशन टीचर रिंकी जब दीपक की बेटियों को पढ़ाने आई होगी, तो उस ने वीणा और दोनों बच्चियों की लाश देख ली होगी. इस पर दीपक ने भेद खुलने के डर से रिंकी को दूसरे कमरे में ले जा कर मार डाला होगा.

रिंकी की हत्या 11 से दोपहर 1 बजे के बीच की गई होगी, क्योंकि करीब एक बजे दीपक ने रोशन की पत्नी आराध्या को लंच पर बुलाने के लिए फोन किया था. 21 साल की रिंकी के अस्तव्यस्त कपड़े देख कर उस से दुष्कर्म किए जाने का अनुमान भी लगाया गया. पुलिस ने जरूरी जांचपड़ताल और लिखापढ़ी के बाद चारों शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिए. पुलिस की कार्रवाई में रात हो गई थी, इसलिए रात में पोस्टमार्टम नहीं हो सके. चारों हत्याओं में सीधा शक दीपक पर था और उस का कुछ अतापता नहीं था. अधिकारियों ने दीपक के ससुराल वालों से उस के बारे में पूछताछ की. पता चला कि वह उस दिन सुबह ही ससुराल गया था.

ससुर पारसनाथ साहू ने दामाद दीपक से जब बेटी और नातिनों के बारे में पूछा, तो उस ने कहा था कि वे रांची में उस के भाई के घर गई हैं. पारसनाथ ने पुलिस अफसरों को बताया कि कदमा तीस्ता रोड पर कुछ दिनों से चोरी की वारदातें हो रही थीं. इसलिए बेटी वीणा ने कुछ दिन पहले करीब 5 लाख रुपए के अपने कीमती जेवर सुरक्षा के लिहाज से उन के घर पर रख दिए थे. दीपक एक दिन पहले 11 अप्रैल की शाम को भी अपनी ससुराल गया था, तब वह बच्चों के साथ खेलता रहा फिर कुछ देर रुक कर चला गया था. इस के बाद दूसरे दिन सुबह वह दोबारा आया, तो उस ने अपने जेवर वापस मांगे. हम ने उसे जेवर दे दिए. जेवर ले कर वह चला गया.

पुलिस ने ससुराल वालों से दीपक का मोबाइल नंबर ले कर उस की लोकेशन पता कराई. करीब 3 बजे की उस की आखिरी लोकेशन जमशेदपुर में ही रमाडा होटल के पास बिष्टुपुर में मिली. फिर उस का मोबाइल बंद हो गया था. दीपक की बुलेट मोटरसाइकिल भी नहीं मिली. इसलिए अनुमान लगाया गया कि ससुराल से गहने ले कर वह बुलेट से फरार हो गया. जांचपड़ताल में पुलिस को रात के 10 बज गए. इसलिए क्वार्टर सील कर बाकी जांच अगले दिन करने का फैसला किया गया. 13 अप्रैल को सुबह से ही पुलिस इस मामले की जांचपड़ताल में जुट गई. दीपक के क्वार्टर की तलाशी में एक कमरे से सीमन लगा एक गमछा और रिंकी के कुछ कपड़े मिले. इसी कमरे में पलंग के बौक्स में रिंकी की लाश मिली थी.

जांचपड़ताल में यह भी पता चला कि 12 अप्रैल की सुबह दीपक ससुराल से जो जेवर ले कर आया था, वे जेवर उस ने सुबह करीब साढ़े 10 बजे कदमा उलियान स्थित आरके ज्वैलर्स पर बेच दिए थे. दीपक ज्वैलर का परिचित था. परिवार के जेवर वह इसी दुकान से बनवाता था. दुकानदार रमेश सोनी से उस ने जमीन खरीदने के लिए जेवर बेचने की बात कही थी. सारे जेवरों का वजन 109 ग्राम था. इन का सौदा 4 लाख 40 हजार रुपए में हुआ. रुपया देने के लिए दुकानदार ने 2-3 घंटे का समय मांगा. पुलिस ने अनुमान लगाया कि इस के बाद दीपक अपने क्वार्टर पर आ गया होगा. कुछ देर बाद ट्यूशन टीचर रिंकी घोष वहां पहुंची होगी. रिंकी ने कमरे में लाशें देख लीं, तो दीपक ने उस को पकड़ लिया होगा और दुष्कर्म करने के बाद उस की हत्या कर लाश पलंग के बौक्स में छिपा दी होगी.

रिंकी की लाश ठिकाने लगाने के बाद दोपहर करीब डेढ़ बजे दीपक वापस ज्वैलर के पास पहुंचा. ज्वैलर ने उसे 3 लाख रुपए नकद दिए. बाकी पैसे एकदो दिन में देने की बात कही, तो दीपक ने बाकी 1.40 लाख रुपए अपने भाई के बैंक खाते में ट्रांसफर करने को कहा. इस के लिए दुकानदार ने हामी भर ली. इस के बाद दीपक वापस अपने क्वार्टर पर आया होगा. कुछ देर बाद रोशन अपनी पत्नी, बेटी और साले के साथ लंच के लिए वहां पहुंच गया. वहां दीपक ने अंकित और रोशन पर जानलेवा हमला किया. इस से बच कर वे भाग गए, तो दीपक दोपहर 3 बजे अपने क्वार्टर पर ताला लगा कर बुलेट से फरार हो गया होगा.

शादी कराने वाला ही बना दुश्मन पुलिस को दीपक के ससुराल वालों से पूछताछ में पता चला कि दीपक का किसी ना किसी बात पर वीणा से झगड़ा होता रहता था. वह अपने पारिवारिक विवाद के लिए रोशन और उस की पत्नी आराध्या को दोषी मानता था. शायद इसीलिए दीपक ने पत्नी और दोनों बेटियों की हत्या करने के बाद रोशन और आराध्या को जान से मारने की नीयत से ही लंच पर बुलाया था, लेकिन रोशन के साथ उस का साला भी पहुंच गया. 2 पुरुषों के बीच दीपक का हमला कमजोर पड़ गया और रोशन के परिवार की जान बच गई. ससुराल वालों से ही पता चला कि दीपक अपने बड़े साले विनोद साहू को भी जान से मारने की फिराक में था.

उस ने फोन कर जमीन संबंधी कोई बात करने के लिए दोपहर में विनोद को अपने घर बुलाया था, लेकिन विनोद काम में व्यस्त होने के कारण नहीं जा सका था. विनोद ने कुछ साल पहले किसी लड़की से अफेयर के मामले में दीपक की पिटाई कर दी थी, तब से दीपक उस से रंजिश रखता था. दीपक के छोटे साले आनंद साहू के बयान पर कदमा थाने में दीपक के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. रोशन ने पहले ही दीपक के खिलाफ जानलेवा हमला करने की शिकायत थाने में दे दी थी. कोल्हान के डीआईजी राजीव रंजन सिंह ने जमशेदपुर पहुंच कर मौकामुआयना किया और रोशन सहित दीपक के ससुराल वालों से पूछताछ की. दूसरी ओर, पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिए.

सूचना देने और इतनी बड़ी घटना के बाद भी दीपक के परिवार से कोई भी जमशेदपुर नहीं आया. वीणा और उस की बेटियों के शवों का दाह संस्कार मायके वालों ने किया. रिंकी के शव की अंत्येष्टि उस के घर वालों ने की. पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि दीपक ने 12 अप्रैल की सुबह हथौड़े से वार कर पत्नी और बेटियों की हत्या की थी. उस ने वीणा के सिर में 2 जगह और चेहरे पर वार किए थे. फिर तकिए से उस का मुंह दबाया था. बड़ी बेटी श्रावणी के सिर में पीछे से चोट की गई थी. उस का भी गला दबाया गया था. दीपक सब से ज्यादा प्यार छोटी बेटी दिव्या को करता था. उस के सिर के पीछे तेज चोट मारी गई थी. इस से उस की कई हड्डियां टूट गई थीं.

दीपक को तलाशना जरूरी था. दोस्तों और ससुराल वालों से उस के छिपने के ठिकानों का पता लगा कर पुलिस ने अलगअलग टीमें बनाईं और जमशेदपुर व रांची के अलावा बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल तक उस की तलाश शुरू कर दी. कई जगह छापे मारे गए. इस के साथ ही उस की मोटरसाइकिल की तलाश भी शुरू की गई. पुलिस ने दीपक के भाई और बहनों से बात की और उन के मोबाइल नंबरों की जांच की. ट्यूशन टीचर रिंकी घोष की हत्या के आरोपी को गिरफ्तार करने की मांग को ले कर टाइगर्स क्लब के संस्थापक सदस्य आलोक मुन्ना के नेतृत्व में 15 अप्रैल को कदमा रंकिणी मंदिर से गोल चक्कर तक कैंडल मार्च निकाला गया.

इन लोगों की मांग थी कि हत्यारे को पकड़ कर अदालत में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए और उसे फांसी दी जाए. 4-5 दिन की भागदौड़ के बाद 16 अप्रैल को दीपक धनबाद में पकड़ा गया. वह 12 अप्रैल की दोपहर जमशेदपुर से बुलेट ले कर निकला और राउरकेला पहुंचा. बुलेट उस ने राउरकेला में छोड़ दी. वहां से टैक्सी ले कर वह पुरी व रांची हो कर 15 अप्रैल को धनबाद पहुंचा, जहां एक होटल में रुका. दीपक अपने पास रखे पैसों में से डेढ़ लाख रुपए भाई मृत्युंजय के खाते में जमा कराना चाहता था. इस के लिए वह 16 अप्रैल को धनबाद में एक प्राइवेट बैंक में पैसे जमा कराने गया. बैंक में पैसे जमा होते ही दीपक के भाई के मोबाइल पर मैसेज आया.

पुलिस ने दीपक और उस के भाई का मोबाइल पहले ही सर्विलांस पर लगा रखा था. मैसेज आते ही पुलिस को दीपक का सुराग मिल गया. जमशेदपुर पुलिस ने धनबाद पुलिस को सूचना दे दी. धनबाद पुलिस बैंक में पहुंची. इसी दौरान दीपक दोबारा बैंक पहुंचा, तो पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस 16-17 अप्रैल की दरम्यानी रात उसे धनबाद से जमशेदपुर ले आई. जमशेदपुर में पुलिस ने दीपक से पूछताछ की तो उस के हथौड़ीमार नर पिशाच बनने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है. पहले दीपक परसुडीह थाना इलाके के गांव सोपोडेरा में मातापिता के साथ रहता था. वहां उन का आलीशान पैतृक मकान था. प्रभु उस का जिगरी दोस्त था साल 2004 में दीपक की शादी वीणा से हो गई.

बाद में 2012 में दीपक की टाटा स्टील में फायरमैन के पद पर नौकरी लग गई. इस के बाद वह जमशेदपुर के कदमा इलाके में रहने लगा. परिवार बढ़ने के साथ जिम्मेदारियां और खर्च भी बढ़ गए थे. एक दिन दीपक ने दोस्त प्रभु से कोई साइड बिजनेस कराने की बात कही. इस पर प्रभु ने उसे ट्रांसपोर्ट का काम करने की सलाह दी. प्रभु ने उसे काम तो बता दिया लेकिन इतना पैसा दीपक के पास नहीं था. इस पर प्रभु ने उस से कहा कि वह सोपोडेरा का अपना पुश्तैनी मकान बेच दे और उस का पैसा ट्रांसपोर्ट में लगा दे, तो अच्छी आमदनी होगी. दीपक को यह बात जंच गई.

दोस्तों ने ही दिया धोखा उस ने अपना मकान 40 लाख रुपए में बेच दिया. इस में से 20 लाख रुपए उस ने अपने भाई मृत्युंजय को दे दिए. बाकी के 20 लाख रुपए दीपक के पास रहे. करीब दो साल पहले प्रभु ने उसे 17 लाख रुपए में एक हाइवा (मालवाहक ट्रक) और एक बुलेट दिलवा दी. यह हाइवा उस ने प्रभु के मार्फत जोजोबेड़ा में चलवा दिया. इस से उसे अच्छी आमदनी होने लगी. पिछले साल कोरोना के कारण लौकडाउन हो जाने से उस की आमदनी कम हो गई. इस बीच, दीपक को पता चला कि प्रभु ने जो ट्रक दिलवाया था, उस पर 5 लाख रुपए रोड टैक्स बकाया है.

परिवहन विभाग का नोटिस आने पर उस ने कर्ज ले कर टैक्स जमा कराया. इस के लिए उस ने टिस्का कोआपरेटिव सोसायटी से साढ़े चार लाख रुपए और अपने पीएफ अकाउंट से डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया. दीपक की तनख्वाह 34 हजार रुपए महीना थी. सोसायटी से कर्ज लेने के बाद उसे केवल 8 हजार रुपए ही मिलने लगे. ट्रक से भी आमदनी कम हो गई थी. करीब छह महीने पहले प्रभु ने बताया कि उस का भांजा रोशन खुद का और उस का ट्रक पश्चिम बंगाल में खड़गपुर की एक स्टील कंपनी में चलवा रहा है. रोशन पहले से ही उस का दोस्त था.

उस की शादी भी उस ने ही कराई थी. कमाई की उम्मीद में दीपक ने भरोसा कर बिना किसी लिखापढ़ी के अपना ट्रक रोशन को सौंप दिया. रोशन ने दीपक का ट्रक तो कंपनी में लगवा दिया, लेकिन उसे कमाई का हिस्सा नहीं दिया. इस बीच, दीपक लगातार कर्जदार होता गया. दीपक अपनी इस बर्बादी के लिए प्रभु और रोशन को जिम्मेदार मानता था. उस ने उन से बदला लेने की योजना बनाई. दीपक अपने मोबाइल पर वेबसीरीज देखा करता था. पाताल लोक और असुर वेबसीरीज देख कर उस ने उन की हत्या करने का मन बनाया. वह एक वेबसीरीज पाताललोक के कैरेक्टर हथौड़ा त्यागी से काफी प्रभावित था.

इसीलिए उस ने हथौड़े से हत्या करने का फैसला किया. उस ने दोनों दोस्तों को मारने की तो योजना बना ली लेकिन इस बात से परेशान था कि वह पकड़ा गया और जेल चला गया, तो बीवीबच्चों का क्या होगा? काफी सोचविचार के बाद उस ने अपने परिवार को भी खत्म करने का निर्णय लिया. 12 अप्रैल को दीपक सुबह जल्दी उठ गया. देखा कि पत्नी वीणा पानी भर रही थी. वह बिस्तर पर ही बेचैनी से इधरउधर करवटें बदलता रहा. पानी भरने और छोटेमोटे घरेलू काम निपटाने के बाद सुबह करीब 8 बजे वीणा फिर बैड पर लेट गई. दीपक ने उसी दिन अपने परिवार और दोनों दोस्तों का काम तमाम करने का आखिरी फैसला कर लिया.

दीपक ने पहले से ही बैड के पास छिपा कर रखा हथौड़ा निकाला और वीणा के सिर में पीछे से वार कर दिया. वीणा चीखती, इस से पहले ही उस ने तकिए से उस का गला दबा दिया. वीणा की मौत हो गई. इस के बाद दीपक दूसरे कमरे में गया. वहां बैड पर दोनों बेटियां सो रही थीं. दीपक ने एक नजर उन्हें देखा. फिर बेरहमी से पहले बड़ी बेटी के सिर में हथौड़ी से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा. फिर इसी तरह छोटी बेटी को भी मौत की नींद सुला दिया. पत्नी और दोनों बेटियों की हत्या के बाद उस ने रोशन को लंच पर आने के लिए फोन किया. इस के बाद दूसरे दोस्त प्रभु को फोन कर शाम 4 बजे जोजोबेड़ा में मिलने की बात कही.

दोनों दोस्तों से बात करने के बाद वह नहाधो कर ससुराल गया और अपने जेवर ले कर ज्वैलर्स के पास पहुंचा. जेवर बेच कर वह वापस घर आया. कुछ देर बाद ही रिंकी घोष उस के बच्चों को पढ़ाने आ गई. रिंकी ने वीणा और बच्चों की लाशें देख लीं, तो दीपक को भेद खुलने का डर हुआ. उस ने उस के भी सिर पर हथौड़ी से हमला कर उसे मार डाला. इस के बाद उस ने उस की लाश से दुष्कर्म किया और शव पलंग के बौक्स में छिपा दिया. रोशन की हत्या की योजना फेल हो जाने पर वह डर गया था. इसलिए अपने क्वार्टर पर ताला लगा कर बुलेट से भाग निकला. उस की प्रभु को मारने की योजना भी अधूरी रह गई.

जल्लाद बने दीपक की सनक में ट्यूशन टीचर रिंकी बेमौत मारी गई. वह जमशेदपुर में कदमा रामजनम नगर की रहने वाली नीलिमा घोष की 3 बेटियों में सब से बड़ी थी और जमशेदपुर वीमंस कालेज में बीए अंतिम वर्ष की छात्रा थी. मंझली बेटी बिपाशा केरला पब्लिक स्कूल में 10वीं और छोटी बेटी विशाखा 5वीं कक्षा में पढ़ती थी. दीपक की बड़ी बेटी श्रावणी बिपाशा की क्लासमेट थी. श्रावणी के कहने पर ही रिंकी 2 साल से दीपक के घर ट्यूशन पढ़ाने जाती थी. दीपक का भाई मृत्युंजय रांची में एसबीआई में ब्रांच मैनेजर था. बाद में वह एक निजी फाइनैंस कंपनी में क्रेडिट इंचार्ज के पद पर काम करने लगा था.

मृत्युंजय अब जमशेदपुर आना चाहता था. इस के लिए उस ने दीपक से कहा भी था. दीपक ने अपने ससुराल वालों को भी यह बात बताई थी. इस घटना से कुछ दिन पहले ही दीपक अपने परिवार के साथ पुरी घूम कर आया था. 11 अप्रैल की रात भी वह परिवार के साथ एक पार्टी में गया था और 10 बजे के बाद लौटा था. दीपक ने अपना परिवार उजाड़ दिया और रिंकी के परिवार की खुशियां छीन लीं. कानून उसे उस के किए की सजा देगा, लेकिन उस के ससुराल वाले और रिंकी के परिवार वाले जीवन भर इस दुख को नहीं भुला पाएंगे. दीपक ने पकड़े जाने पर पुलिस को बताया था कि उस का आत्महत्या करने का प्लान था. इसलिए जेल में अब उस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है. Jharkhand Crime News

 

hindi crime story : रोहतक के अखाड़े में खूनी खेल

hindi crime story : मेहर सिंह अखाड़े में तैनात सुखविंदर न केवल अच्छा पहलवान था बल्कि बेहतरीन कोच भी था. उस की नजर अखाड़े की 17 वर्षीया पहलवान पूजा पर थी. पूजा ने जब उस की हरकतों की शिकायत मुख्य कोच मनोज मलिक से की तो कोच कमेटी ने उसे अखाड़े से हटा दिया. इस पर…

एक पुरानी कहावत है कि हर जुर्म की पृष्ठभूमि में जर, जोरू और जमीन मूल कारण होता है. हरियाणा के रोहतक स्थित जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में उस रात जो कुछ हुआ, उस की जड़ में कोई एक नहीं, बल्कि ये तीनों ही कारण छिपे थे. 12 फरवरी, 2021 की रात के करीब 9 बजे जाट कालेज का पूरा प्रांगण सैकड़ों लोगों की भीड़ से खचाखच भरा था. चारों तरफ चीखपुकार मची थी. महिलाओं की मर्मांतक चीखों से पूरा माहौल गमगीन था. कालेज के बाहर पुलिस और प्रशासन की गाडि़यों का हुजूम जमा था. सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यों और एंबुलैंस से पूरा इलाका किसी बड़े हादसे की ओर इशारा कर रहा था.

करीब 2 घंटे पहले मेहर सिंह अखाड़े में जो खूनी खेला गया था, उस के बाद वहां सिर्फ तबाही और मौत के निशान बचे थे. जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में जो हादसा हुआ था, उस की शुरुआत शाम करीब साढ़े 6 बजे हुई थी. मनोज कुमार मलिक, जो जाट कालेज रोहतक में डीपीई थे, अपनी पत्नी साक्षी मलिक व अपने 3 साल के बेटे सरताज के साथ अखाड़े में मौजूद थे. साक्षी मलिक एथलीट कोटे से रेलवे में कार्यरत थी. मनोज जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में हर शाम कुश्ती के खिलाडि़यों को प्रशिक्षण देने आते थे. उस शाम मनोज करीब 6 बजे खिलाडि़यों को अभ्यास कराने के लिए अपनी पत्नी साक्षी व बेटे सरताज को साथ ले कर जाट कालेज के अखाड़े आए थे.

साक्षी मैदान में जा कर अपने गेम की प्रैक्टिस कर रही थीं, बेटा सरताज भी उन के साथ था. अखाड़े वाले मैदान में ऊंची आवाज में स्टीरियो पर वार्मअप म्यूजिक बज रहा था. मनोज मलिक जिस वक्त अखाडे़ में पहुंचे वहां कोच प्रदीप मलिक, सतीश दलाल पहले से ही खिलाडि़यों को प्रशिक्षण दे रहे थे, महिला खिलाड़ी पूजा अखाडे़ में दावपेंच आजमा रही थी. साक्षी मैदान में अपनी एथलीट की प्रैक्टिस करने लगीं. बेटा सरताज उन के पास ही था. कोच सतीश दलाल खिलाड़ी पूजा से कुश्ती के दावपेंच को ले कर बात कर रहे थे. मनोज व प्रदीप मलिक आपस में बात करने लगे. इस के बाद प्रदीप जिम्नेजियम के ऊपर बने रेस्टहाउस में चले गए, जहां एक कमरे में पहले से ही कोच सुखविंदर मौजूद था.

प्रदीप मलिक ने सुखविंदर के कमरे में जा कर उस से बातचीत शुरू कर दी. जिम्नेजियम में भी ऊंची आवाज में म्यूजिक बज रहा था, जहां कई युवा पहलवान वार्मअप कर रहे थे. सुखविंदर से बातचीत के दौरान अचानक प्रदीप मलिक का फोन आ गया. फोन ले कर वह जैसे ही उठे, तभी अचानक सुखविंदर ने उन के सिर में गोली मार दी. गोली लगते ही प्रदीप लहरा कर जमीन पर गिर पड़े. सुखविंदर ने प्रदीप के शव को दरवाजे के सामने से हटा कर एक तरफ डाल दिया. गोली जरूर चली थी, लेकिन मैदान में चल रहे स्टीरियो साउंड के कारण किसी को पता नहीं चला कि गोली कहां चली और किस ने चलाई.

सुखविंदर ने जिम्नेजियम की छत से आवाज दे कर मुख्य कोच मनोज मलिक को, जो नीचे मैदान में थे, को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में उस ने प्रदीप को गोली मारी थी. जैसे ही मनोज मलिक कमरे में घुसे, सुखविंदर ने बिना कोई बात किए सीधे उन के सिर में गोली मार दी. उन की भी मौके पर ही मौत हो गई. सुखविंदर ने उन के शव को भी कमरे में एक तरफ डाल दिया. 2 लोगों को गोली मारने के बाद सुखविंदर ने जिम्नेजियम की बालकनी में जा कर कोच सतीश दलाल को बात करने के लिए आवाज दे कर उसी कमरे में बुला लिया. सतीश दलाल के कमरे में एंट्री करते ही उस ने उन्हें भी गोली मार दी. कुछ ही मिनटों में तीनों की हत्या के बाद भी सुखविंदर का जुनून कम नहीं हुआ.

उस कमरे में शवों को छिपाने के लिए और जगह नहीं बची थी, इसलिए उस ने उस कमरे में ताला लगा दिया. अगला निशाना थी पूजा सुखविंदर का अगला निशाना थी अखाड़े में पहलवानी कर रही महिला पहलवान पूजा. सुखविंदर ने पूजा को फोन किया कि मनोज मलिक और दूसरे कोच कुछ बात करने के लिए उसे जिम्नेजियम में बने कमरे में आने के लिए कह रहे हैं. जिस कमरे में उस ने पूजा को बुलाया, वह दूसरा कमरा था. पूजा जैसे ही उस कमरे में पहुंची सुखविंदर ने उसे भी गोली मार दी. गोली लगते ही उस की भी मौके पर ही मौत हो गई.

मनोज मलिक व पूजा की हत्या के बाद सुखविंदर के टारगेट पर थीं साक्षी मलिक, जो उस वक्त नीचे मैदान में प्रैक्टिस कर रही थी. सुखविंदर ने बालकनी से उन्हें भी आवाज दे कर बुलाया कि मनोज बुला रहे हैं. ऊपर आ जाओ आप से कुछ सलाह लेनी है. उस ने साक्षी को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में पूजा की हत्या कर उस की लाश रखी थी. साक्षी के कमरे में एंट्री करते ही बिना कोई सवालजवाब किए सुखविंदर ने सीधे सिर में गोली मार कर उन की भी हत्या कर दी. सुखविंदर के सिर पर मनोज मलिक के लिए नफरत का जुनून इस कदर हावी था कि वह मनोज के पूरे वंश को मिटाना चाहता था. दरअसल, सुखविंदर ने एक बार अखबार में खबर पढ़ी थी कि बेटे ने अपने पिता की हत्या के 20 साल बाद जवान हो कर हत्यारे को मौत के घाट उतार कर बदला लिया था.

इसलिए सुखविंदर मनोज के बेटे को जिंदा छोड़ना नहीं चाहता था, जिस से बाद में वह अपने पिता की मौत का बदला ले सके. साक्षी की हत्या के बाद वह नीचे गया और मैदान में खेल रहे सरताज को यह कहते हुए उठा लिया कि उस की मम्मी ऊपर बुला रही है. ऊपर लाने के बाद सुखविंदर ने सरताज को भी गोली मार दी. सरताज को मृत समझ कर सुखविंदर ने उस कमरे में भी ताला लगा दिया. दोनों कमरों का ताला लगाने के बाद वह मेनगेट पर तीसरा ताला लगा कर अखाड़े के मैदान में आ गया. अखाड़े में मौजूद सभी लोगों की हत्या के बाद सुखविंदर नीचे आ कर अपनी गाड़ी में बैठ गया. उस समय नीचे कोई नहीं था. वहां से वह सीधे जाट कालेज के सामने पहुंचा, जहां पर मेहर सिंह अखाड़े का एक दूसरा कोच अमरजीत भी पहुंच चुका था.

अमरजीत को उस ने अखाड़े के संबंध में बात करने के लिए बुलाया था. अमरजीत के कार से बाहर निकलते ही सुखविंदर ने सीधे उस के सिर में गोली मारनी चाही, लेकिन गोली चेहरे पर जा लगी. गोली लगते ही अमरजीत लहूलुहान हालत में मैडिकल मोड़ की तरफ भागा. सुखविंदर को लगा कि अब अगर वह वहां रुका तो पकड़ा जाएगा, इसलिए अमरजीत का पीछा करने के बजाय उस ने अपनी गाड़ी का रुख दिल्ली की ओर कर दिया. नफरत व जुनून के बाद अब उस के चेहरे पर सुकून साफ नजर आ रहा था. पहलवानों को हुआ शक जिस समय ये वारदात हुई थी, अखाड़े तथा जिम्नेजियम हाल में कई पहलवान

प्रैक्टिस कर रहे थे. अखाड़े के मुख्य कोच मनोज के चाचा का लड़का टोनी, मामा का लड़का विशाल, उस की 5 साल की बेटी फ्रांसी भी उस वक्त वहां प्रैक्टिस कर रहे थे. उन के साथ अन्य पहलवानों ने देखा कि प्रदीप मलिक के अलावा मनोज, सतीश, साक्षी, पूजा और सरताज ऊपर सुखविंदर के कमरे में गए थे, लेकिन काफी देर बाद भी नीचे नहीं आए. यही सोच कर कुछ लोग जब ऊपर गए तो उन्हें एक कमरे से कोच मनोज के बेटे सरताज के रोने की आवाज सुनाई दी. कुछ पहलवानों को बुला कर जब सब ने कमरे का ताला तोड़ा तो अखाड़े में हुए इस भीषण नरसंहार कर पता चला.

रेस्टरूम के दोनों तालाबंद कमरों के दरवाजे तोड़ने के बाद वहां एक के बाद एक कई लोग लहुलूहान मिले. सुखविंदर का कहीं नामोनिशान नहीं था. माजरा समझ में आते ही कुछ लोगों ने पुलिस को खबर कर दी. चंद मिनटों में पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस के आने से पहले ही साक्षी, पूजा, प्रदीप की मौत हो चुकी थी. मनोज, अमरजीत, सरताज और सतीश दलाल की सांसें चल रही थीं. उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां कुछ देर बाद मनोज और सतीश को भी डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. हरियाणा के रोहतक स्थित इस प्रसिद्ध अखाड़े में हुई गोलीबारी की वारदात की खबर तब तक जंगल की आग की तरह फैल गई थी.

इस गोलीबारी में 7 लोगों को गोली लगी थी, जिस में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि अमरजीत व मासूम सरताज गंभीर रूप से घायल थे. पुलिस काररवाई घटना की जानकारी मिलते ही पीजीआईएमएस थाने के एसएचओ राजू सिंधू  पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे. वारदात इतनी संगीन थी कि एसपी (रोहतक) राहुल शर्मा भी खबर मिलते ही फोरैंसिक टीम व दूसरे अधिकारियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. मनोज मलिक के बडे़ भाई प्रमोज कुमार व दूसरे परिजन भी अपने परिचितों के साथ खूनी अखाड़े के बाहर जमा हो गए थे. रात के 9 बजतेबजते सभी मरने वालों के परिजन घटनास्थल पर भारी हुजूम के साथ मौजूद थे.

उसी रात पीजीआईएमएस थाने में मनोज मलिक के भाई प्रमोज की शिकायत पर सुखविंदर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. अमरजीत ने पुलिस को अपना बयान दिया कि उस पर सुखविंदर ने गोली चलाई है. पुलिस की टीमों ने पूरे शहर की घेराबंदी कर दी. लेकिन सुखविंदर पुलिस के हाथ नहीं लगा.  एसपी राहुल शर्मा ने उसी रात जाट कालेज स्थित जिम्नेजियम हाल में चल रहे अखाड़े में हुए गोलीकांड में आरोपी सुखविंदर को पकड़ने के लिए डीएसपी नरेंद्र कादयान व डीएसपी विनोद कुमार के नेतृत्व में विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया, जिस में पीजीआईएमएस थाना, सीआईए यूनिट, एवीटी स्टाफ और साइबर सेल को शामिल किया गया.

हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव और एडीशनल डीजीपी व रोहतक रेंज के आईजी संदीप खिरवार ने केस की मौनिटरिंग का काम अपने हाथ में ले लिया. इतना ही नहीं सुखविंदर की गिरफ्तारी पर डीजीपी ने उसी रात एक लाख रुपए के ईनाम की घोषणा भी कर दी. साइबर सेल को सुखविंदर के मोबाइल फोन की सर्विलांस से पता चला कि वह भाग कर दिल्ली पहुंच गया है. उस की तलाश में टीमों को दिल्ली रवाना कर दिया गया. अगली सुबह सभी पांचों मृतकों का पोस्टमार्टम हो गया. मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि सभी को करीब 20-25 फीट की दूरी से गोली मारी गई थी. गोली सभी के सिरों में लगी जरूर थीं, लेकिन पार नहीं हुई थीं.

पोस्टमार्टम में साक्षी के सिर से 2 और बाकी चारों के सिर से एकएक गोली मिली. घायल अमरजीत और सरताज को एकएक गोली लगी थी, जो आरपार हो गई थी. फोरैंसिकटीम ने बताया कि सुखविंदर ने वारदात को .32 बोर की रिवौल्वर से अंजाम दिया था. मृतकों के शरीर में 9 एमएम की गोलियां मिली थीं. चूंकि मासूम सरताज की हालत बेहद  गंभीर थी, इसलिए उसे रोहतक पीजीआई से पंडित भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर स्वास्थ्य संस्थान में रेफर कर वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया. उस की आंखों के बीच में गोली लगी थी जो सिर के पार निकल गई थी. उस का इलाज करने में डाक्टरों की एक विशेष टीम जुट गई थी.

शुरुआती जांच में एक बात साफ हो गई कि अखाडे़ में कई लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी को भी सुखविंदर के कमरे में चलने वाली गोलियों की आवाज इसलिए सुनाई नहीं दी, क्योंकि प्रैक्टिस के समय तेज आवाज में म्यूजिक चल रहा था. हालांकि हल्के धमाके का अंदाजा तो सब को हुआ था, लेकिन उन्हें यही लगा कि किसी शादी में पटाखे बज रहे होंगे. किसी को इस का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि सुखविंदर ने ऊपर कमरे में 5 लोगों की हत्या कर दी है. अखाड़े में मौजूद चश्मदीदों से पूछताछ व शुरुआती जांच में यह भी पता कि सुखविंदर का अखाड़े के दूसरे कोचों के साथ कोई विवाद था, जिस के कारण उस ने पूरी वारदात को अंजाम दिया.

जिद्दी और गुस्सैल था सुखविंदर सुखविंदर के बारे में पुलिस ने ज्यादा जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि वह मूलरूप से सोनीपत के बरौदा गांव का रहने वाला है. पुलिस की एक टीम तत्काल उस के घर पहुंची. वहां उस के परिजनों से पूछताछ हुई तो पता चला कि उस के पिता मेहर सिंह सेना से रिटायर्ड हैं. सुखविंदर शादीशुदा है. 6 साल पहले उस की शादी उत्तर प्रदेश की तनु के साथ हुई थी और उस का 4 साल का एक बेटा है. सुखविंदर जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव का था, इसलिए बेटा होने के बाद पत्नी से उस का झगड़ा होने लगा और 4 साल पहले वह पत्नी को उस के मायके छोड़ आया. तभी से वह मायके में है. जबकि उस का बेटा अपने दादादादी के पास है.

सुखविंदर की मां सरोजनी देवी ने बताया कि पिता मेहर सिंह ने उस की हरकतों के कारण उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. जिस के बाद से वह कभीकभार ही बेटे से मिलने के लिए घर आता था. पुलिस ने सुखविंदर को गिरफ्तार करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. लेकिन संयोग से वारदात के अगले ही दिन 13 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने समयपुर बादली इलाके में संदिग्ध अवस्था में कार में घूमते हुए एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था. उस के कब्जे से एक अवैध पिस्तौल तथा 5 कारतूस भी बरामद हुए थे.

उस से पूछताछ करने पर समयपुर बादली पुलिस को पता चला कि सुखविंदर नाम के उस शख्स ने एक दिन पहले रोहतक के मेहर सिंह अखाडे़ में 5 पहलवानों की नृशंस हत्या को अंजाम दिया है तो पुलिस ने उस के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर तत्काल इस की सूचना रोहतक पुलिस को दी. सूचना मिलते ही रोहतक पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पीजीआईएमएस थाना पुलिस ने दिल्ली  की अदालत में अरजी दे कर सुखविंदर का ट्रांजिट रिमांड हासिल किया और उसे रोहतक ला कर अदालत में पेश किया. पुलिस ने अदालत से उस का 4 दिन का रिमांड ले लिया.

इस दौरान एसआईटी ने उसे साथ ले जा कर पूरे घटनाक्रम का सीन रिक्रिएट किया. पुलिस ने सुखविंदर के खिलाफ सभी साक्ष्य एकत्र किए और यह पता लगाया कि आखिर उस ने इस जघन्य हत्याकांड को क्यों अंजाम दिया था. उस से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने जर, जोरू और जमीन के लिए एक नहीं, बल्कि 6 हत्याओं को अंजाम दिया था. क्योंकि तब तक मनोज व साक्षी के 3 वर्षीय बेटे सरताज की भी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी. सुखविंदर की पिछले कुछ दिनों से मनोज मलिक से एक खास वजह से रंजिश चल रही थी. मनोज मलिक व उन की पत्नी साक्षी नामचीन खिलाड़ी थे. मनोज अपने जमाने के जानेमाने राष्ट्रीय स्तर के पहलवान रहे थे.

उन्होंने कई प्रतियोगिताएं जीती थीं. बाद में रोहतक के जाट कालेज में उन्हें सहायक शिक्षक यानी डीपीई की नौकरी मिल गई. जाट कालेज के पास ही उन्हें रोहतक के सब से प्रतिष्ठित मेहर सिंह अखाडे़ में कोच की नौकरी भी मिल गई. इस अखाडे़ में मनोज मलिक के अलावा कई अन्य कोच थे. उन्हीं में सुखविंदर भी एक था. वे सभी अखाडे़ में कुश्ती के लिए नए पहलवान तैयार करते थे. मनोज मलिक (39) मूलरूप से गांव सरगथल जिला सोनीपत के रहने वाले थे. मनोज मलिक और साक्षी 14 फरवरी, 2013 को शादी के बंधन में बंधे थे. शादी की 8वीं सालगिरह से 2 दिन पहले ही दोनों ने एक साथ इस दुनिया को छोड़ दिया था.

राष्ट्रीय स्तर की एथलीट थी साक्षी साक्षी एथलीट की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थी. बाद में उन्हें भी रेलवे में स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिल गई थी. मनोज मलिक पिछले कई सालों से अपनी पत्नी साक्षी मलिक व 3 साल के बेटे सरताज के साथ रोहतक में जाट कालेज व अखाड़े के पास देव कालोनी में रहते थे. मनोज मलिक और उन की पत्नी साक्षी चूंकि दोनों ही अच्छे खिलाड़ी थे. इसलिए वे अपने मासूम बेटे सरताज को भी कुश्ती का खिलाड़ी बनाना चाहते थे. ट्रैक और कुश्ती मैट पर अठखेलियां करता सरताज मांबाप के साथ अखाडे़ में जाता था. वह नए पहलवानों की आंखों का तारा बन गया था. कुल मिला कर उन दोनों का वैवाहिक जीवन सुखमय था.

मनोज को कभी सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस सुखविंदर को उन्होंने ही 2 साल पहले 15 हजार रुपए महीने पर अखाड़े में कोच की नौकरी पर रखा था, वह अपनी नीच हरकतों के कारण एक दिन न सिर्फ उन की हत्या कर देगा, बल्कि उन के परिवार के खात्मे का सबब बन जाएगा. बाद में खिलाडि़यों की शिकायत पर मनोज ने उसे हटा दिया था. बस इसी बात से गुस्साए सुखविंदर ने इस घटना को अंजाम दिया था. सामूहिक गोली कांड में मारे गए अखाड़े के एक अन्य कोच सतीश दलाल (28) मूलरूप से गांव माडोठी, जिला झज्जर हाल निवासी सांपला के रहने वाले थे. जानेमाने कुश्ती  खिलाड़ी सतीश दलाल इन दिनों मनोज मलिक के अखाड़े में कुश्ती के कोच का काम संभाल रहे थे.

इस हादसे में मारे गए महम चौबीसी के गांव मोखरा निवासी प्रदीप मलिक (28) भी थे. रामकुमार मलिक के 3 बेटों में प्रदीप सब से छोटे थे. प्रदीप का बड़ा भाई विक्रम सीआरपीएफ में तथा बीच वाला भाई संदीप बीएसएफ में नौकरी करता है. प्रदीप खेल कोटे से रेलवे में सीटीआई थे. उन की ड्यूटी रतलाम, मध्य प्रदेश में थी. विवाहित प्रदीप का एक बेटा है अग्निपथ, जो केवल 15 महीने का है. प्रदीप की पत्नी अंजलि गांव मोखरा में ही रहती है. परिवार का मुख्य काम खेतीबाड़ी है. प्रदीप मलिक गजब के पहलवान थे. वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय तथा महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के चैंपियन रहे थे. 77 किलोग्राम भार वर्ग में प्रदीप ने आल इंडिया रेलवे चैंपियनशिप भी जीती थी.

प्रदीप ने जाट कालेज रोहतक से बीए पास किया था. उन्हें जालंधर में प्रस्तावित राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियनशिप में भाग लेना था, इसी चैंपियनशिप के लिए वह दिल्ली में ट्रेनिंग कैंप में आए हुए थे. वहीं से छुट्टी ले कर रोहतक आए थे ताकि यहां कुश्ती के दावपेंच और अधिक गहरे से सीख सकें. प्रदीप का सुखविंदर के साथ कोई सीधा झगड़ा नहीं था. बस अखाड़े में उस की हरकतों को ले कर एक बार अखाड़े में जा कर उसे समझाया था तथा 2-4 बार वाट्सऐप पर बात हुई थी और उन्होंने सुखविंदर को अपना व्यवहार ठीक करने की सलाह दी थी. इसी से सुखविंदर प्रदीप से भी रंजिश रखने लगा था.

पूजा तोमर पर डालता था डोरे सामूहिक हत्याकांड में मारी गई प्रतिभाशाली युवा महिला पहलवान पूजा तोमर (17) यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. पूजा का परिवार मूलरूप से मथुरा के गांव सिहोरा का रहने वाला है, लेकिन फिलहाल वे मथुरा के लक्ष्मीनगर में रहते हैं. पूजा के पिता रामगोपाल और भाई विष्णु कपड़े की दुकान चलाते हैं. पूजा दमदार खिलाड़ी थी और परिवार वालों ने उन्हें करीब डेढ़ साल पहले रोहतक में जाट कालेज के पीछे बने अखाड़े में कोचिंग लेने के लिए भेजा था. पूजा 2014 से 2020 तक 57 किलो भार वर्ग की प्रतियोगिताओं में यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. 2019 और 2020 में पूजा नैशनल चैंपियन भी रहीं.

दरअसल, इस हादसे की असल वजह थी सुखविंदर का महिला पहलवानों से अश्लील व्यवहार तथा उन से संबंध बनाने का दबाव. मेहर सिंह अखाडे़ में कुश्ती सीखने वाली पूजा तोमर ने कुछ दिन पहले अपने परिवार व अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक से सुखविंदर की शिकायत की थी. पूजा ने अखाडे़ के कोच व अपने परिवार से सुखविंदर की जो शिकायत की थी, उस में बताया था कि सुखविंदर उसे परेशान कर रहा है और उस पर शादी का दबाव बना रहा है. दरअसल, अपनी पत्नी से दूर हो कर तनहा जीवन जी रहे सुखविंदर में अपोजिट सैक्स के प्रति एक कुंठा भर गई थी. वह किसी भी तरह अखाडे़ पर अपने आधिपत्य के साथ किसी महिला से संबंध बनाना चाहता था.

अखाड़े की महिला पहलवान से संबंध बनाने या शादी करने के उसे 2 फायदे नजर आ रहे थे. एक तो अखाड़े की पहलवान कुश्ती से नाम और पैसा कमा कर कमाई में उस का हाथ बंटाती. दूसरे उस की जिस्मानी जरूरत पूरी करने के लिए एक हृष्टपुष्ट औरत मिल जाती. पूजा चूंकि कम उम्र की आकर्षक युवती थी, इसलिए सुखविंदर को उस पर डोरे डालना आसान लगा. इस के लिए वह काफी दिनों से पूजा पर दबाव बना रहा था. जब पानी सिर से ऊपर पहुंच गया तो पूजा ने अपने परिवार से इस बात की शिकायत कर दी. परिवार वालों ने अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक को इस की सूचना दे कर अपनी बेटी को अखाडे़ से हटाने की बात कही तो मनोज मलिक को लगा कि ऐसा हुआ तो अखाड़े की शान और उन के नाम को बड़ा नुकसान और बदनामी होगी.

मनोज ने यह बात साथी कोचों से बताई तो सब ने एक राय से सुखविंदर को अखाडे़ से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उन सभी ने सुखविंदर को बुला कर पहले सामूहिक रूप से जम कर खरीखोटी सुनाई और फिर उस से साफ कह दिया कि वह 14 फरवरी तक अखाड़ा छोड़ दे. साथ ही उसी दिन से सुखविंदर को अखाड़े में आने से मना कर दिया. अपने हाथ से लड़की और अखाड़े की नौकरी निकलती देख सुखविंदर अपमान की आग में जलने लगा. और तभी उस ने फैसला कर लिया कि जो लोग उस की बरबादी का कारण बने हैं, उन सब की जिंदगी छीन लेगा.

वारदात को अंजाम देने के लिए 4 दिन पहले ही उस ने साजिश रच ली थी. उस ने सोचा कि उस का खुद का घर तो उजड़ चुका है, अब वह उन का भी घर उजाड़ देगा, जिन के प्रति उस के मन में रंजिश थी. सुखविंदर से पूछताछ में खुलासा हुआ कि पूजा ही नहीं, उस ने एक अन्य महिला पहलवान से भी ऐसी ही हरकत की थी. इन्हीं कारणों से मुख्य कोच मनोज मलिक, सतीश दलाल, प्रदीप मलिक ने सुखविंदर पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस बात को ले कर सुखविंदर की अमरजीत से भी कहासुनी हुई थी. उसे बता दिया गया था कि अब अखाड़े से उस का कोई मतलब नहीं है और न ही उसे यहां से कोई पैसा मिलेगा.

बस यही बात सुखविंदर को नागवार गुजरी. उस का मानना था कि उस ने अखाड़े के लिए काफी मेहनत की थी, लेकिन अब उसे ही बाहर निकाला जा रहा है. इसी वजह से उस ने करीब 4 दिन पहले हत्याकांड की साजिश रच ली थी. हत्याकांड से साफ था कि आरोपित किसी भी सूरत में मनोज के परिवार को जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था. पहले से रची गई उस की साजिश का पता इस बात से भी चलता है कि सुखविंदर पिछले कई दिनों से प्रैक्टिस के दौरान बारबार कहता था कि कुछ बड़ा करूंगा. कुछ ऐसा करूंगा कि सब मुझे याद करेंगे. पीजीआईएमएस पुलिस ने आवश्यक पूछताछ के बाद आरोपी सुखविंदर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

लेकिन एक मामूली सी बात पर 6 लोगों की जिंदगी छीन लेने वाले सुखविंदर के कारण उस अखाड़े के दामन पर लगे खून के छींटों को शायद ही मिटाया जा सके, जहां से देश को नामचीन पहलवान मिले थे. hindi crime story

—कथा पुलिस की जांच, पीडि़तों के बयान व अभियुक्त के बयान पर आधारित

 

Parivarik Kahani in Hindi : ननदोइयों ने भाभी की हत्या कर शव को बैड बॉक्स में छिपाया

Parivarik Kahani in Hindi  : एक भाई डाक्टर, दूसरा इंजीनियर. साधनसंपन्न परिवार के. लेकिन लालच सिर चढ़ कर बोल रहा था, जिस के लिए 2 हत्याएं कर डालीं. दोनों ने सोचा भी नहीं था कि संपत्ति की जगह जेल तक..

करीब 10 साल पहले नेहा की शादी छत्तीसगढ़ के पूर्व वन मंत्री डी.पी. घृतलहरे के बेटे तरुण के साथ हुई थी. 30 जनवरी, 2021 को रात करीब साढ़े 9 बजे आकाश ने बहन नेहा को फोन लगाया. नेहा के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन वह काल रिसीव नहीं कर रही थी. आकाश ने कई बार ट्राई किया, लेकिन उस के फोन की घंटी तो बजती रही, लेकिन नेहा ने फोन रिसीव नहीं किया. आकाश परेशान हो गया कि पता नहीं नेहा इस समय कहां है जो फोन नहीं उठा रही. तब आकाश ने अपने बहनोई तरुण को फोन मिलाया. तरुण ने आकाश को बताया कि वह तो अपने गांव आया है और उस का छोटा भाई इंद्रजीत कहीं बाहर गया हुआ है.

घर पर इस समय नेहा और अनन्या ही हैं. 9 वर्षीय अनन्या उर्फ पिहू नेहा की बेटी थी. आकाश ने सोचा कि जब नेहा घर पर है तो वह फोन क्यों नहीं उठा रही. आकाश ने कोई एकदो बार नहीं बल्कि कई बार फोन किया था पर उस के फोन की घंटी तो बज रही थी लेकिन वह फोन उठा नहीं रही थी. यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो घर के सभी लोग परेशान हो गए. आकाश का घर रायपुर जिले के खरोड़ा गांव में था, जबकि उस की बहन की ससुराल रायपुर के ही खम्हारडी कस्बे में थी. खम्हारडी उस के घर से कोई 40 किलोमीटर दूर था. आकाश ने तय किया कि वह अभी नेहा की ससुराल जाएगा. वह अपनी छोटी बहन को कार में बिठा कर खम्हारडी के लिए रवाना हो गया. करीब एक घंटे में वह नेहा की ससुराल पहुंच गया.

नेहा ऊंचा राजनीतिक रसूख वाले परिवार में ब्याही थी, उन का वहां आलीशान बंगला था. आकाश जब बंगले पर पहुंचा तो मेनगेट का ताला बंद था. उस ने मन ही मन सोचा कि बंगले के गेट का ताला क्यों बंद है, उस ने बंगले के बाहर से नेहा के फोन पर फिर से काल की. अब भी उस के फोन की घंटी बज रही थी लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की. आकाश को उस के बहनोई तरुण ने बता दिया था कि बंगले पर केवल नेहा और अनन्या ही हैं. लेकिन गेट पर लगे ताले से लग रहा था कि बंगले में कोई नहीं है. आकाश ने आसपास रहने वाले लोगों से मालूम किया कि नेहा कहीं गई हुई है क्या? लेकिन पड़ोसियों ने अनभिज्ञता जाहिर की.

आकाश ने उन्हें बताया कि वह साढ़े 9 बजे से नेहा को फोन लगा रहा है, फोन की घंटी तो जा रही है पर वह फोन रिसीव नहीं कर रही. पता नहीं इस समय वह कहां है. पड़ोसियों ने भी बताया कि नेहा इस तरह बंगले से अकेली कभी नहीं जाती. जब वह फोन नहीं उठा रही तो जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है. कुछ ही देर में बंगले के बाहर तमाम लोग जमा हो गए. आकाश को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि क्यों न गेट का ताला तोड़ कर बंगले के अंदर देखा जाए. तब आकाश ने लोगों के सहयोग से बंगले के मेनगेट का ताला तोड़ दिया. लोगों के साथ जब वह बंगले में पहुंचा तो उसे नेहा के बैडरूम का भी ताला बंद मिला.

यह देख कर वह आश्चर्यचकित रह गया कि बंगले के बाकी सब कमरे खुले हुए हैं तो नेहा के कमरे का ही ताला क्यों बंद है. आकाश ने नेहा के कमरे का ताला भी तोड़ दिया. ताला तोड़ कर जैसे ही आकाश और अन्य लोग कमरे में घुसे तो वहां पर 2 लोग बैठे हुए मिले. उन में से एक नेहा का ननदोई डा. आनंद राय था. उस के साथ एक और व्यक्ति था. आकाश और अन्य लोग उस व्यक्ति को नहीं जानते थे. यह बात किसी की समझ में नहीं आई कि 2 तालों में बंद हो कर लोग नेहा के बैडरूम में क्यों बैठे हैं. आकाश और अन्य लोगों को देख कर आनंद राय और उस के साथी के चेहरे का रंग उड़ गया. आकाश ने जब उन से कमरे में बंद रहने की वजह पूछी तो वे कुछ जवाब नहीं दे पाए, बल्कि वहां से भागने की कोशिश करने लगे.

शक होने पर लोगों ने दोनों को पकड़ लिया. उन्हें शक होने लगा कि जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है. उन्होंने कमरे की तलाशी लेनी शुरू कर दी. जब उन्होंने बैड का बौक्स खोला तो बौक्स में नेहा और उस की बेटी अनन्या की लाशें औंधे मुंह पड़ी मिलीं. दोनों की लाशें देखने के बाद लोग समझ गए कि जरूर दोनों के मर्डर के पीछे इन  का ही हाथ है. लिहाजा लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. इसी दौरान किसी ने खम्हारडी थाने में फोन कर के बता दिया कि किसी ने बंगले में पूर्व मंत्री डी.पी. घृतलहरे की बहू और नातिन की हत्या कर दी है.

मामला एक हाईप्रोफाइल परिवार से जुड़ा हुआ था, इसलिए सूचना पाते ही थानाप्रभारी ममता शर्मा हैडकांस्टेबल वेदव्यास दीवान, बच्चन सिंह ठाकुर, टीकम सिंह आदि को साथ ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गईं. थाने से घटनास्थल करीब एक किलोमीटर दूर था इसलिए वह कुछ देर में ही वहां पहुंच गईं.

इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी उन्होंने  एसपी अजय यादव को भी दे दी. थानाप्रभारी जब मौके पर पहुंचीं तो देखा कि कुछ लोग 2 लोगों को पकड़े हुए थे और नेहा व उस की बेटी की लाश बैड के बौक्स में पड़ी थीं.  लोगों ने पुलिस को बताया कि जब उन्होंने इस कमरे का ताला तोड़ा था तो ये दोनों इन लाशों के पास ही बैठे मिले थे. ये ही इन के कातिल हैं. पति भी संदेह के दायरे में पुलिस को पूछताछ में पता चला कि उन दोनों में से एक मृतका का सगा ननदोई डा. आनंद राय है. इस के बाद पुलिस के सामने ही लोग उन दोनों की पिटाई करने लगे. लोगों में आक्रोश भरा हुआ था. गुस्से में लोग कहीं दोनों को मार न डालें, इसलिए थानाप्रभारी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें भीड़ के चंगुल से छुड़ा कर अपने कब्जे में लिया और उन्हें तुरंत थाने भिजवा दिया.

कुछ ही देर में फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट, पुलिस फोटोग्राफर और एसपी अजय यादव भी वहां पहुंच गए. आक्रोशित लोगों को एसपी साहब ने समझाया. मौकामुआयना करने से यह स्पष्ट पता चल रहा था कि मृत्यु से पहले नेहा ने अपने बचाव में जीजान लगा कर संघर्ष किया था. क्योंकि उस के चेहरे व शरीर पर खरोंचों के निशान थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने मौके से सुबूत जुटाए. पुलिस अधिकारियों ने भी मौके का बारीकी से मुआयना किया.

पुलिस अधिकारियों ने वहां मौजूद आकाश से बात की तो उस ने बताया कि जब वह यहां आया तो बंगले के बाहर वाले गेट पर ताला लगा हुआ था. जब वह ताला तोड़ कर अंदर आया तो नेहा के बैडरूम का ताला भी बाहर से बंद था. कमरे का ताला तोड़ा तो कमरे में  नेहा का ननदोई डा. आनंद राय और उस के साथ एक अन्य व्यक्ति बैठा हुआ मिला. उसे शक है कि बहन और भांजी की हत्या में इन दोनों का हाथ है.

उस समय मृतका नेहा का पति तरुण घर पर नहीं था, इसलिए पुलिस को इस बात का शक था कि कहीं पत्नी की हत्या में उस का हाथ तो नहीं है. आकाश इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी अपने बहनोई तरुण को फोन द्वारा दे चुका था. वह थोड़ी देर में घर आ गया. जब तरुण को पता चला कि नेहा की लाश के पास आनंद राय और एक अन्य व्यक्ति बैठा मिला था, तो उसे भी विश्वास हो गया कि उस की पत्नी और बेटी की हत्या जरूर आनंद राय ने ही की होगी. यह शक उस ने पुलिस के सामने जाहिर भी कर दिया.

तरुण भले ही पत्नी की हत्या का आरोप अपने बहनोई आनंद राय पर लगा रहा था, लेकिन पुलिस की नजरों में तरुण भी संदिग्ध था. इसलिए एसपी अजय यादव ने थानाप्रभारी को आदेश दिया कि वह है तरुण पर नजर रखें, वह फरार न होने पाए. पूर्व वन मंत्री की बहू और नातिन की हत्या की खबर थोड़ी ही देर में रायपुर शहर में फैल गई. लोग तरुण के बंगले के बाहर पहुंच गए. ऐहतियात के तौर पर पुलिस ने वहां भारी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम कर दिया. दोनों लाशों के गले पर पड़े निशानों को देख कर लग रहा था कि दोनों की हत्या गला घोंट कर की गई है. हत्या किस ने और क्यों की, यह बात तो जांच के बाद ही पता चल सकती थी.

मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दीं. इस के बाद पुलिस पूछताछ के लिए उन दोनों व्यक्तियों सहित मृतका के पति तरुण को भी अपने साथ थाने ले गई. पुलिस ने लोगों के चंगुल से छुड़ा कर जिन 2 लोगों को कस्टडी में लिया था, उन में से एक मृतका का ननदोई डा. आनंद राय था जबकि दूसरा युवक आनंद राय का भतीजा दीपक सायतोडे था. तलाश अजय राय की इन दोनों से पुलिस ने नेहा और उस की बेटी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो दोनों खुद को बेकसूर बताते रहे, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उन दोनों की हत्या उन्होंने नहीं बल्कि अजय राय ने की है.

अजय राय तरुण का दूसरा बहनोई था, आनंद राय का सगा भाई. पेशे से वह इंजीनियर था. पुलिस ने जब उसे तलाशा तो अजय घर पर नहीं मिला. एसपी अजय यादव के निर्देशन में पुलिस टीमें अपनेअपने स्तर से उसे तलाशने में जुट गईं. डा. आनंद राय और दीपक सायतोडे  पूछताछ में पुलिस को बारबार यही बयान देते रहे कि वह तो अजय राय के कहने पर साथ आए थे. इन दोनों की हत्या तो इंजीनियर अजय राय ने की है. पुलिस को लग रहा था कि वे दोनों अभी भी झूठ बोल रहे हैं. उन से विस्तार से पूछताछ के लिए पुलिस ने दोनों को पहली फरवरी, 2021 को कोर्ट में पेश कर के 5 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया.

उधर पुलिस की कई टीमें फरार इंजीनियर अजय राय की तलाश में जुटी हुई थीं.  सर्विलांस टीम भी अपने स्तर से जांच कर रही थी. इसी बीच जांच टीम को पता चला कि अजय ने उत्तर प्रदेश के शहर प्रयागराज से पहले बाईपास के नजदीक अपना मोबाइल फोन औन किया था. इसी क्लू के आधार पर क्राइम ब्रांच की एक टीम रायपुर से प्रयागराज पहुंच गई. जिस जगह पर अजय के फोन की लोकेशन मिली थी, वहां हाइवे पर एक पंक्चर वाले की दुकान थी. पुलिस ने उसे अजय का फोटो दिखा कर उस से पूछताछ की.

फोटो देखते ही पंक्चर वाला पहचान गया. क्योंकि 1-2 दिन पहले उसी शक्ल के एक व्यक्ति ने उस के फोन से किसी को फोन किया था. इस से रायपुर पुलिस को जांच में सफलता के कुछ आसार दिखाई देने लगे. पंक्चर वाले ने अपने मोबाइल में देख कर पुलिस को वह नंबर बता दिया, जिस पर उस ने बात की थी. पुलिस ने जांच की तो वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या स्थित सुलतानगंज के रहने वाले शिवप्रकाश का निकला. पुलिस टीम वहां से अयोध्या की तरफ रवाना हो गई. स्थानीय पुलिस के सहयोग से रायपुर पुलिस अयोध्या के सुलतानगंज में रहने वाले शिवप्रकाश के घर पहुंच गई. वहां से पुलिस ने अजय राय को गिरफ्तार कर लिया.

पता चला कि शिवप्रकाश अजय राय का गहरा दोस्त था. शिवप्रकाश आपराधिक प्रवृत्ति का था. कुछ दिनों पहले ही वह गांजे की तसकरी में जेल की सजा काट कर घर आया था. शिवप्रकाश घर पर नहीं मिला. यह बात 4 फरवरी, 2021 की है. इंजीनियर अजय राय को गिरफ्तार कर पुलिस रायपुर लौट आई. वहां उस ने अपने भाई डा. आनंद राय और भतीजे दीपक को पुलिस हिरासत में देखा तो समझ गया कि दोनों ने पुलिस को सब कुछ बता दिया होगा. पुलिस ने जब अजय राय से नेहा और उस की बेटी अनन्या की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने हत्या का आरोप अपने भाई आनंद व भतीजे दीपक पर लगाया.

कुछ देर तक वे एकदूसरे पर हत्या का आरोप मढ़ते रहे. लेकिन जब उन के साथ थोड़ी सख्ती बरती गई तो सभी सच बोलने लगे. पता चला कि इन तीनों ने ही सुनियोजित योजना के तहत नेहा और उस की बेटी की हत्याएं की थीं. उन तीनों से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी—

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले का कस्बा खम्हारडी. इसी कस्बे के सतनाम चौक के पास एक बड़े राजनीतिज्ञ डी.पी. घृतलहरे का बंगला है. डी.पी. घृतलहरे छत्तीसगढ़ सरकार में वन मंत्री थे. वह जानीमानी शख्सियत थे. उन की 2 बीवियां थीं. पहली पत्नी वसंता से एक बेटी थी शशिप्रभा और दूसरी पत्नी प्रभादेवी से 4 बच्चे थे. जिन में 2 बेटियां थीं और 2 बेटे तरुण व इंद्रजीत.

दोनों बेटियों की वह शादी कर चुके थे. एक बेटी की शादी उन्होंने शहर के ही जानेमाने डाक्टर आनंद राय से की थी और दूसरी बेटी की शादी उन्होंने आनंद राय के भाई अजय राय के साथ की थी. अजय राय इंजीनियर था. दोनों बेटियां संपन्न परिवार में ब्याही थीं, इसलिए दोनों ही खुश थीं. बेटा तरुण शादी के योग्य हुआ तो उन्होंने उस की शादी जिले के ही खरोरागांव की रहने वाली नेहा से कर दी. नेहा भी एक संपन्न परिवार से थी. उस के पिता जमींदार थे. नेहा उच्चशिक्षित और समझदार थी. ससुराल आते ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल ली थीं.

डी.पी. घृतलहरे के दोनों दामाद उच्चशिक्षित और संपन्न जरूर थे, लेकिन वे लालची प्रवृत्ति के थे. किसी न किसी बहाने वे ससुराल से पैसे या अन्य महंगा सामान ऐंठते रहते थे. मंत्रीजी के पास अकूत संपत्ति थी इसलिए दोनों दामादों की नजर उन की संपत्ति पर लगी रहती थी. इसी दौरान 19 अप्रैल, 2020 को डी.पी. घृतलहरे का देहांत हो गया. उन की मौत के बाद घर के सभी लोग तो दुखी थे ही, लेकिन सब से ज्यादा परेशान तरुण की बुआ कुन्नीबाई थीं. इस की वजह यह थी कि तरुण के दोनों बहनोइयों की गिद्धदृष्टि उन की संपत्ति पर थी.

कुन्नीबाई को यह आशंका लगी रहती थी कि दोनों दामाद भाई की जुटाई संपत्ति को नोचखसोट न लें. कुन्नीबाई के पास खेती की करीब 17 एकड़ जमीन थी. उन्होंने इस संपत्ति का मुख्तियार तरुण को बना दिया था. तरुण की पत्नी नेहा अपनी दोनों ननदों और ननदोइयों की बहुत सेवा करती थी. जितना उस से बन पड़ता, वह  उन्हें गिफ्ट आदि दिया  करती थी. लेकिन वे लोग उस के द्वारा दिए गए सामान से कभी खुश नहीं होते थे. लालची जीजाओं का जाल डा. आनंद राय और इंजीनियर अजय राय इस की चर्चा अकसर अपनी पत्नियों से करते थे. दोनों उलाहना देते हुए कहा करते थे कि तुम्हारे पिता के घर में इतना सब कुछ होने के बावजूद तुम्हारे भाई और भाभी हम लोगों के बारे में तनिक भी नहीं सोचते.

यह तो सभी जानते हैं कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी अधिकार होता है. फिर तुम्हारे साथ यह दोहरा बरताव क्यों होता है. दोनों बहनें भी समझती थीं कि उन के पति जो कह रहे हैं वह बिलकुल सही है. एक तरह से वे अपनेअपने पतियों को मूक समर्थन देती थीं. संपत्ति को ले कर आनंद राय और अजय राय के मन में लालच ने अपना घर बना लिया था. नेहा अपने दोनों ननदोई की लालची नीयत से वाकिफ थी. अजय और आनंद ने कई बार नेहा को अपनी बातों के जाल में फंसाने की कोशिश की, लेकिन नेहा उन की बातों में नहीं आई. वह अपनी बुआ कुन्नीबाई को सारी बात बता देती थी. नेहा ने तय कर लिया था कि वह अपने ननदोइयों को संपत्ति हड़पने की चाल में नहीं फंसेगी.

नेहा के साथ दाल न गलने पर आनंद और अजय परेशान हो गए. तब उन के मन में खयाल आया कि जब नेहा नहीं फंस रही तो क्यों न तरुण को अपने जाल में फंसा कर इस संपत्ति को बेचने के लिए मजबूर किया जाए. तरुण अपने दोनों बहनोइयों की चाल में फंस गया. उन के बहकावे में आ कर वह अपनी प्रौपर्टी का सौदा करने को तैयार हो गया. इस के बाद अजय राय, आनंद राय और तरुण तीनों की आपस में खूब पटने लगी तो नेहा समझ गई कि उन्होंने तरुण को अपने जाल में फंसा लिया है. लिहाजा वह उन पर नजर रखने लगी.

एक दिन कमरे में बैठे तीनों जब संपत्ति  को बेचने के बारे में बातें कर रहे थे, तब नेहा परदे की ओट में उन की बातें सुन रही थी. नेहा को लगा कि यदि अब वह खामोश रही तो सारी संपत्ति हाथ से निकल जाएगी. वह उसी समय दरवाजे की ओट से निकल कर ड्राइंगरूम में पहुंच गई. उन तीनों के सामने अचानक नेहा के पहुंचते ही ड्राइंगरूम में सन्नाटा छा गया. नेहा को देखते ही अजय राय ने तुरंत टौपिक बदल दिया, लेकिन उन तीनों के चेहरों पर जो हवाइयां उड़ रही थीं, उस से नेहा समझ गई. फिर भी अनजान बनते हुए वह बोली, ‘‘आप तीनों के चेहरों पर हवाइयां कैसे उड़ रही हैं. आजकल तरुण से आप लोगों की बहुत ज्यादा पट रही है, आखिर इस की वजह क्या है?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, काफी दिनों बाद साले साहब से रूबरू हुए तो घुलमिल कर बातें कर रहे थे.’’ आनंद

राय बोला.

‘‘लेकिन मुझे तो बात कुछ और ही नजर आ रही है. मेरे आने से पहले आप लोग प्रौपर्टी बेचने के बारे में कुछ बातें कर रहे थे,’’ नेहा कहा, ‘‘यदि मेरी बात गलत हो तो आप लोग बता दीजिए.’’

नेहा की बात सुन कर तीनों समझ गए कि उसे पूरी बात पता चल गई है. इसलिए वह हक्केबक्के हो कर एकदूसरे की तरफ देखने लगे. तभी अजय बोला, ‘‘दरअसल नेहा, जब तुम पूछ रही हो तो बताए देता हूं कि हमें बड़ी मुश्किल से इस बंगले का खरीदार मिला है, जो बंगले की अच्छी कीमत देने को तैयार है.

‘‘बारबार हमें ऐसा मौका नहीं मिलेगा. समझदारी इसी में है कि हम इसे बेच दें. हम लोग सोच रहे हैं कि इस बंगले को बेच कर जो रकम मिलेगी, उस से हम जमीन खरीद कर उस पर आलीशान फ्लैट्स बना कर

उन्हें बेच देंगे. इस से हमें करोड़ों रुपए का फायदा होगा.’’

‘‘जीजाजी, नेक सलाह के लिए हम आप के शुक्रगुजार हैं. लेकिन एक सलाह मेरी भी है कि आप दोनों जो स्कीम बता रहे हैं, उस की जगह अपनीअपनी संपत्ति बेच कर खुद कर लें. आप को लाखोंकरोड़ों का फायदा मिल जाएगा.’’ नेहा ने दोनों ननदोइयों से कहा.

‘‘देखो दामाद होने के नाते मैं आप दोनों का बड़ा सम्मान करती हूं लेकिन भविष्य में इस तरह की स्कीम और संपत्ति खरीदनेबेचने की बातें यहां कहने मत आना. आप मेरे पति को भी अपनी बातों में ले कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं.’’ नेहा ने कहा और अपने पति से वहां से उठने का इशारा किया. नेहा की बात सुन कर आनंद राय और अजय के चेहरे सुर्ख हो गए. इस से उन्हें अपमान महसूस हुआ. उस समय रात हो गई थी. उन्होंने दीवार घड़ी की ओर देखा फिर दोनों भाई बंगले से बाहर निकल गए. तरुण या नेहा ने उन दोनों को रोकने की कोशिश नहीं की.

घर पहुंच कर दोनों भाइयों ने इस की शिकायत अपनीअपनी पत्नियों से की कि उन की भाभी नेहा ने किस तरह से उन का अनादर किया है. दोनों बहनों ने इस की शिकायत नेहा भाभी से की. जवाब में नेहा ने ननदों को पूरी बात बता दी. पर इतनी बेइज्जती होने के बाद भी अजय राय और आनंद राय ने तरुण के बंगले पर जाना बंद नहीं किया. सपत्ति का विवाद दिन प्रतिदिन बढ़ता गया. लालच में अंधे हो कर वे अपमान की गठरी सिर पर लिए घूमते रहे. जब बात नहीं बनी तो दोनों भाइयों ने एक दिन यहां तक कह दिया कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी हक होता है

इस पर नेहा बोली, ‘‘मैं कब मना कर रही हूं कि संपत्ति में बेटियों का हक नहीं होता, लेकिन जो संपत्ति ससुर की है वह उसी में से हिस्सा ले सकती हैं. पर तुम तो सास और बुआ की संपत्ति पर अपनी नजरें गड़ाए बैठे हो. यह बात सरासर गलत है. ऐसा मैं हरगिज नहीं होने दूंगी. बताओ, कानून की कौन सी किताब में यह बात लिखी है कि बुआ की संपत्ति पर दामादों का हिस्सा बनता है.

‘‘जब कुन्नीबाई बुआ ने अपनी मरजी से 17 एकड़ भूमि का मुख्तियार तरुण को बनाया है तो आप लोगों को क्यों जलन हो रही है. आप को हिस्सा लेना ही था तो ससुर के सामने मांग लेते. उस समय तो आप लोग नहीं बोले. अब वह नहीं हैं तो उन की संपत्ति पर नजरें गड़ाए हुए हो.’’

नेहा अपने दोनों ननदोइयों को इसी तरह बेइज्जत कर दिया करती थी. जिस से दोनों भाई नेहा से नफरत करने लगे थे. लालच में अंधा हुआ इंसान विवेकशून्य हो जाता है. दोनों भाइयों डा. आनंद राय और इंजीनियर अजय राय का भी यही हाल था. कोई रास्ता नहीं मिला तो अपनी मंशा पूरी करने के लिए उन्होंने एक आपराधिक योजना तैयार कर ली. उन्होंने सोचा कि क्यों न तरुण को ही रास्ते से हटा दिया जाए. लेकिन इस योजना पर उन्होंने विराम लगा दिया. इस की वजह यह थी कि तरुण की पत्नी नेहा साधनसंपन्न और दबंग परिवार से थी. उन्होंने सोचा कि तरुण के साथ कुछ भी किया तो वह उन्हें जीने नहीं देगी. वह कोई दूसरी योजना बनाने लगे.

नेहा ने अपने पति तरुण को भी समझा दिया था कि दोनों बहनोई लालची प्रवृत्ति के हैं. वे लालच में कुछ अहित भी कर सकते हैं. तरुण पत्नी की बात अच्छी तरह समझ गया था. लिहाजा उस ने अपनी बहनोइयों की बातों पर तवज्जो देनी बंद कर दी. जब कभी नेहा के ननदोई प्रौपर्टी को ले कर तरुण से बात करते तो नेहा खुद ही बीच में आ जाती और पति के बोलने से पहले ननदोइयों की बात काट देती थी. वह उन लोगों की निगाह में पति को अच्छा इंसान बनाना चाहती थी.

आनंद और अजय का लालच विकराल होता गया. नेहा उन के रास्ते का पत्थर बन गई थी. इस पत्थर को हटाए बिना उन्हें अपनी चाहत पूरी होती दिखाई नहीं दे रही थी. नेहा को रास्ते से हटाने के लिए ये लोग उचित अवसर की तलाश में रहने लगे. सोचविचार कर दोनों भाइयों ने एक खौफनाक साजिश रच डाली. इस साजिश में उन्होंने अपने भतीजे दीपक सायतोडे को भी शामिल कर लिया. योजना को दिया अंजाम आखिरकार 30 जनवरी, 2021 को उन्हें सही मौका मिल गया. इस के लिए उन्होंने कुछ दिनों तक रेकी भी की. जब उन लोगों को पता चला कि तरुण अपने गांव गया है और उस का छोटा भाई इंद्रजीत भी घर पर नहीं है, तो  मौका पा कर आनंद और अजय दीपक को ले कर खम्हारडी स्थित उन के बंगले पर पहुंच गए.

उस समय रात के करीब साढ़े 9 बजे थे. तीनों बेरोकटोक बंगले के मुख्य दरवाजे पर पहुंच गए. उस वक्त नेहा अपनी 9 साल की बेटी अनन्या उर्फ पीहू के साथ खेल रही थी. घंटी बजी तो अनन्या बोली, ‘‘देखो मम्मी, लगता है पापा आ गए हैं.’’

नेहा दरवाजा खोलने के लिए चली, तभी दोबारा घंटी बजी तो नेहा बोली, ‘‘रुको, आ रही हूं.’’

नेहा ने जैसे ही दरवाजा खोला. दोनों ननदोई और एक अपरिचित व्यक्ति सामने खड़े थे. उन्हें देखते ही वह बोली, ‘‘इस वक्त, खैरियत तो हैं?’’

‘‘हां, सब ठीक हैं. क्या हमें अंदर आने को नहीं कहोगी,’’ आनंद बोला.

नेहा एक तरफ होती हुई बोली, ‘‘आइए.’’

तीनों को वह ड्राइंगरूम में ले गई. तीनों सोफे पर बैठ गए. कुछ देर वह उन से औपचारिक बातें करती रही. फिर उन लोगों ने बातचीत का रुख संपत्ति और रुपयों की ओर मोड़ दिया. नेहा ने उस वक्त संयम से काम लिया, लेकिन वे तीनों योजना के तहत उस से झगड़ा करने लगे.

नेहा गुस्से में ड्राइंगरूप से उठ कर अपने बैडरूम में चली गई. उस के पीछेपीछे अजय राय, आनंद राय और दीपक भी पहुंच गए. उन तीनों को अपने पीछे आया देख कर नेहा बोली, ‘‘मैं इस समय आप लोगों से कोई बात नहीं करना चाहती. इस बारे में जो कुछ कहना हो तरुण से कहना.’’

तभी अजय दांत पीसते हुए बोला, ‘‘वह हमारी सुनता कहां है.’’

‘‘तो मैं क्या करूं. मेहरबानी कर के आप लोग यहां से चले जाइए.’’

यह सुन कर उन तीनों ने आंखों ही आंखों में इशारा किया. तभी दीपक ने पास बैठी अनन्या को उठा लिया और जूते का फीता निकाल कर उस के गले में कसने लगा. बेटी की जान बचाने के लिए नेहा उन से भिड़ गई. यह देख अजय और आनंद ने नेहा को काबू में करने का प्रयास किया. उन के बीच 15 मिनट तक हाथापाई होती रही. मौका पा कर आनंद ने नेहा के पैर जकड़ लिए और अजय ने अपने दोनों हाथों से नेहा का गला घोंट दिया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. उधर दीपक ने अनन्या के गले को जूतों के फीते से कस दिया. बच्ची की भी मौत हो गई. दीपक ने अपनी संतुष्टि के लिए उसी फीते से एक बार फिर नेहा के गले को जोर से कसा.

वे लोग पूरी तसल्ली चाहते थे कि उन दोनों में से कोई जिंदा न रहे. इस की पुष्टि के लिए उन्होंने दोनों लाशों को उठा कर बाथरूम के टब में डाल कर यह देखा कि नाक या मुंह से पानी में बुलबुले तो नहीं निकल रहे. 5 मिनट तक पानी में कोई बुलबुला नहीं उठा तो उन्हें संतुष्टि हो गई कि दोनों की मौत हो चुकी है. इस के बाद तीनों ने चैन की सांस ली. फिर वे लाशों को उठा कर नेहा के बैडरूम में ले गए और दोनों लाशें औंधे मुंह दीवान के बौक्स में डाल दीं. इस के बाद तीनों ने सलाह  की कि इन्हें ठिकाने कैसे लगाया जाए. कुछ देर विचार करने के बाद उन्होंने तय किया कि दोनों लाशों को मंदिर हसौद नया रायपुर के सुनसान इलाके में ले जा कर ठिकाने लगा दिया जाए.

अजय राय यह कहता हुआ वहां से अपनी कार से चला गया कि वह उपयुक्त जगह ढूंढ कर आता है. तब तक रात भी गहरा जाएगी. वह नेहा के बैडरूम और बंगले का ताला बंद कर के चला गया. आनंद राय और दीपक दोनों ताले में बंद लाशों के पास ही बैठे रहे. उधर नेहा के भाई आकाश ने नेहा को फोन किया तो नेहा के फोन की घंटी तो बजती रही, लेकिन वह फोन नहीं उठा रही थी. कई बार काल करने के बाद भी जब नेहा ने फोन नहीं उठाया तो वह अपनी छोटी बहन को साथ ले कर कार से रात करीब साढ़े 11 बजे नेहा के बंगले पर  पहुंच गया.

दोनों लाशों को ठिकाने लगाने के लिए अजय राय भी एक सुनसान जगह देख कर लौट आया था. जब वह बंगले के पास पहुंचा तो उसे वहां भीड़ दिखाई दी. उस का माथा ठनका. उसे समझते देर नहीं लगी कि बंगले के बाहर लोगों का हुजूम क्यों लगा है. भाग गया अजय राय उस समय उस की कार बंगले से करीब आधा फर्लांग दूर थी. माजरा समझते ही उस ने यू टर्न लिया और वहां से  निकल गया. वह समझ गया कि हत्या का मामला खुल चुका है और पुलिस उस तक पहुंच जाएगी. ऐसे में उस ने शहर से बाहर भागने में ही अपनी भलाई समझी. वह कार से भंडारपुरी, कसडोल, बिलाईगढ़ होता हुआ बिलासपुर बसस्टैंड पहुंचा.

उस ने अपनी कार लौक कर के एक जगह छोड़ दी और फिर बस से प्रयागराज के लिए निकल गया. प्रयागराज में वह अपने एक परिचित के यहां रुका. कुछ दिन प्रयागराज में रुकने के बाद वह अयोध्या चला गया. अयोध्या में उस का एक दोस्त शिवप्रकाश रहता था. वह आपराधिक प्रवृत्ति का था. अयोध्या जाने से पहले उस ने प्रयागराज हाइवे पर पहुंच कर शिवप्रकाश से फोन पर बात करनी चाही. इस के लिए उस ने अपना मोबाइल औन किया. तभी उसे ध्यान आया कि अगर उस ने अपने मोबाइल से बात की तो वह पुलिस की पकड़ में आ जाएगा. इसलिए उस ने वहां मौजूद एक पंक्चर बनाने वाले से बात की. अजय ने उस से कहा कि उस का मोबाइल खराब हो गया है और उसे किसी से अर्जेंट बात करनी है.

यदि वह अपने फोन से उस की बात करा दे तो मेहरबानी होगी. बदले में वह 100 रुपए दे देगा. पंक्चर वाला तैयार हो गया और उस ने अपना मोबाइल अजय को दे दिया. अजय ने उस के मोबाइल से अपने दोस्त शिवप्रकाश से बात की. वह शिवप्रकाश का नंबर डिलीट करना भूल गया था. इस के बाद अजय अयोध्या में अपने दोस्त शिवप्रकाश के पास चला गया और वहीं पर रहने लगा. लेकिन वह वहां भी सुरक्षित नहीं रह सका और रायपुर पुलिस के चंगुल में फंस गया. पुलिस उसे अयोध्या से गिरफ्तार कर के ले आई. पुलिस ने बिलासपुर बसस्टैंड से उस की कार भी बरामद कर ली.

तीनों अभियुक्त पुलिस की गिरफ्त में आ चुके थे. पुलिस ने तीनों को 5 फरवरी, 2021 को कोर्ट में पेश कर 10 दिन की पुलिस रिमांड मांगी. पुलिस के अनुरोध पर कोर्ट ने तीनों आरोपियों को 15 फरवरी, 2021 तक के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया. रिमांड अवधि में विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को अदालत पर पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Parivarik Kahani in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Gujarat News : एक ही घर में तीन कत्ल करने वाले कातिल की स्टोरी

Gujarat News : हत्या के जुर्म में सुनाई गई सजा काटते वक्त पैरोल जंप कर गुजरात से आ कर रतलाम में बसा हत्यारा गैंगस्टर दिलीप देवले इसलिए हत्या कर देता था ताकि पुलिस को उस के खिलाफ कोई सबूत न मिल सके. देव दिवाली की रात भी उस ने 3 लोगों को इसीलिए मौत की नींद सुला दिया था  कि…

25 नंवबर, 2020 को देव दिवाली का त्यौहार होने के कारण एक ओर जहां रतलाम के लोग अपने आंगन में गन्ने से बने मंडप तले शालिग्राम और माता तुलसीजी का विवाह उत्सव मना रहे थे, वहीं दूसरी ओर शहर भर के बच्चे दीवाली की बची आतिशबाजी को खत्म करने के जतन में लगे हुए थे. चारों तरफ भक्ति के साथ धूमधड़ाके का माहौल था. लेकिन इस से अलग औद्योगिक थाना इलाके में कब्रिस्तान के पास बसे राजीव नगर में 4 युवक बेवजह ही सड़क पर यहां से वहां चक्कर लगाते हुए कालोनी के एक तिमंजिला मकान पर नजर लगाए हुए थे. यह मकान गोविंद सेन का था. लगभग 50 वर्षीय गोविंद सेन का स्टेशन रोड पर अपना सैलून था.

उन का रिश्ता ऐसे परिवार से रहा जिस के पास पुश्तैनी संपत्ति रही है इसलिए पारिवारिक बंटवारे में मिली बड़ी संपत्ति के कारण उन्होंने राजीव नगर में यह आलीशान मकान बनवा लिया था. इस की पहली मंजिल पर वह स्वयं 45 वर्षीय पत्नी शारदा और 21 साल की बेहद खूबसूरत बेटी दिव्या के साथ रहते थे. जबकि बाकी 5 मंजिल पर किराएदार रहते थे. उन की एक बड़ी बेटी भी थी, जिस की शादी हो चुकी थी. इस परिवार के बारे में आसपास के लोग जितना जानते थे, उस के हिसाब से गोविंद सिंह की पत्नी घर पर अवैध शराब बेचने का काम करती थी. जबकि उन की बेटी को काफी खुले विचारों के तौर पर जाना जाता था. लोगों का मानना था कि दिव्या एक ऐसी लड़की है जो जवानी में ही दुनिया जीत लेना चाहती थी.

उस की कई युवकों से दोस्ती की बात भी लोगों ने अपनी आंखों से देखी और सुनी थी. फिर हाथ कंगन को आरसी क्या, पिता के सैलून चले जाने के बाद दिन भर ही तो घर में अकेली रह जाती. मां शारदा और बेटी दिव्या से मिलने के लिए आने वालों की कतार लगी रहती थी. मोहल्ले वाले यह सब देख कर कानाफूसी करने के बाद ‘हमें क्या करना’ कह कर अनदेखी करते रहते थे. इसलिए 25 नवंबर की रात जब चारों ओर देव दिवाली की धूम मची हुई थी. राजीव नगर की इस गली मे घूम रहे युवक कोई साढे़ 7 बजे के आसपास गोविंद के घर के सामने से गुजरते हुए सीढ़ी चढ़ कर ऊपर चले गए तो सामने के मकान से देख रहे युवक ने इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया.

जबकि उन का चौथा साथी गोविंद के घर जाने के बजाय कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. रात कोई सवा 9 बजे गोविंद दूध की थैली लिए हुए थकाहारा सा घर की ओर लौटा. गोविंद सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंचे, जिस के कुछ देर बाद वे तीनों युवक उन के घर से निकल कर नीचे आ गए. जिस पड़ोसी ने इन को ऊपर जाते देखा था, संयोग से इन तीनों को वापस उतरते भी देखा तो यह सोच कर उस के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई कि घर लौटने पर इन युवकों को अपने घर में पहले से मौजूद देख कर गोविंद सेन की मन:स्थिति क्या रही होगी. तीनों युवकों ने नीचे खड़ी दिव्या की एक्टिवा स्कूटी में चाबी लगाने की कोशिश की, लेकिन संभवत: वे गलत चाबी लाए थे.

इसलिए उन में से एक वापस ऊपर जा कर दूसरी चाबी ले आया, जिस के बाद वे दिव्या की एक्टिवा पर बैठ कर चले गए. 26 नवंबर की सुबह के 8 बजे रतलाम में रोज की तरह सड़कों पर आवाजाही थी. लेकिन गोविंद सेन के घर में अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ था. कुछ देर में उन के मकान में किराए पर रहने वाली युवती ज्वालिका अपने कमरे से बाहर निकल कर दिव्या के घर की तरफ बढ़ गई. गोविंद के मकान में किराए पर रहने वाली दिव्या की हमउम्र ज्वालिका एक प्राइवेट अस्पताल में नौकरी करती है. गोविंद की बेटी भी एक निजी कालेज से बीएससी की पढ़ाई के साथ नर्सिंग का कोर्स कर रही थी. महामारी के कारण आजकल क्लासेस बंद पड़ी थीं, इसलिए वह अपनी बड़ी बहन की कंपनी में नौकरी करने लगी.

ज्वालिका और दिव्या एक ही एक्टिवा का उपयोग करती थीं. जब जिस को जरूरत होती, वही एक्टिवा ले जाती थी. लेकिन इस की चाबी हमेशा गोविंद के घर में रहती थी. सो काम पर जाने के लिए एक्टिवा की चाबी लेने के लिए ज्वालिका जैसे ही गोविंद के घर में दाखिल हुई, चीखते हुए वापस बाहर आ गई. उस की चीख सुन कर दूसरे किराएदार बाहर आ गए और उन्हें पता चला कि गोविंद के घर के अंदर गोविंद, उस की पत्नी और बेटी की लाश पड़ी है. घबराए लोगों ने यह खबर नगर थाना टीआई रेवल सिंह बरडे को दे दी. जिस से कुछ ही देर में वह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और मामले की गंभीरता को देखते हुए इस तिहरे हत्याकांड की खबर तुरंत एसपी गौरव तिवारी को दे दी.

चंद मिनट बाद ही एसपी गौरव तिवारी एएसपी सुनील पाटीदार, एफएसएल अधिकारी अतुल मित्तल एवं एसपी के निर्देश पर माणकचौक के थानाप्रभारी अयूब खान भी मौके पर पहुंच गए. तिहरे हत्याकांड की खबर पूरे रतलाम में फैल गई, जिस से मौके पर जमा भारी भीड़ के बीच मौकाएवारदात की जांच में एसपी गौरव तिवारी ने पाया कि शारदा का शव बिस्तर पर पड़ा था, जिस के सिर में गोली लगी थी. उन की बेटी दिव्या की लाश किचन के बाहर दरवाजे पर पड़ी थी. दिव्या के हाथ में आटा लगा हुआ था और आधे मांडे हुए आटे की परात किचन में पड़ी हुई थी. इस से साफ हुआ कि पहले बिस्तर पर लेटी हुई शारदा की हत्या हुई होगी. गोली की आवाज सुन कर दिव्या बाहर आई होगी तो हत्यारों ने उसे भी गोली मार दी होगी.

जांच में स्पष्ट हुआ कि दरवाजे के पास पड़ी गोविंद की लाश की हत्या सब से बाद में हुई थी. उन के पैर में जूते थे और हाथ में दूध की थैली. जिस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे 2 हत्या करने के बाद भागना चाहते होंगे, लेकिन भागते समय ही गोविंद घर लौट आए, जिस से उन की भी हत्या कर दी होगी. पड़ोसियों ने गोविंद को 9 बजे घर आते देखा था. उस के बाद 3 लोगों को घर से बाहर जाते देखा. इस से यह साफ हो गया कि हत्या 9 बजे के पहले की गई होगी. पुलिस ने जांच शुरू की तो गोविंद सेन के परिवार के बारे में जो जानकरी निकल कर सामने आई, उस से पुलिस को शक था कि हत्याएं प्रेम प्रसंग या अवैध संबंध को ले कर की गई होंगी.

लेकिन गोविंद के एक रिश्तेदार ने इस बात को पूरी तरह गलत करार देते हुए बताया कि गोविंद ने कुछ ही समय पहले गांव की अपनी जमीन 30 लाख रुपए में बेची थी. दूसरा घटना के दिन ही शारदा और दिव्या ने डेढ़ लाख रुपए की ज्वैलरी की खरीदारी की थी, जो घर में नहीं मिली. इस कारण पुलिस लूट के एंगल से भी जांच करने में जुट गई. चूंकि मौके पर संघर्ष के निशान नहीं थे और हत्यारे गोविंद की बेटी की एक्टिवा भी साथ ले गए थे. इस से यह साफ हो गया कि वे जो भी रहे होंगे, परिवार के परिचित रहे होंगे एवं उन्हें गाड़ी की चाबी आदि रखने की जगह भी मालूम थी. हत्यारों ने वारदात का दिन देव दिवाली का सोचसमझ कर चुना. इसलिए आतिशबाजी के शोर में किसी ने भी पड़ोस में चलने वाली गोलियों की आवाज पर ध्यान नहीं दिया था.

मामला गंभीर था इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने भी मौके का निरीक्षण करने के बाद हत्यारों की गिरफ्तारी पर 30 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा कर दी. वहीं एसीपी गौरव तिवारी ने 10 थानों के टीआई और लगभग 60 पुलिसकर्मियों की एक टीम गठित कर दी, जिस की कमान  थानाप्रभारी अयूब खान को सौंपी गई. इस टीम ने इलाके के पूरे सीसीटीवी कैमरे खंगाल दिए, इस के अलावा घटना के समय राजीव नगर में स्थित मोबाइल टावर के क्षेत्र में सक्रिय 70 हजार से अधिक फोन नंबरों की जांच शुरू की. दिव्या को एक बोल्ड लड़की के रूप में जाना जाता था. उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. कुछ दिन पहले उस ने एक अलबम ‘मैनूं छोड़ के…’ में काम किया था.

इस अलबम में भी उस की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. पुलिस ने उस के साथ काम करने वाले युवक अभिजीत बैरागी से पूछताछ की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. घटना से ले कर चंद रोज पहले तक दिव्या ने जिन युवकों से फोन पर बात की थी, उन सभी से पुलिस ने पूछताछ की गई. गोविंद सेन की एक्टिवा देवनारायण नगर में लावारिस खड़ी मिली. तब पुलिस ने वहां भी चारों ओर लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज जमा कर हत्यारों का पता लगाने की कोशिश शुरू कर दी. जिस में दोनों जगहों के फुटेज से 2 संदिग्ध युवकों की पहचान कर ली गई. जिन्हें घटना से पहले इलाके में पैदल घूमते देखा गया था. और बाद में वही युवक गोविंद की एक्टिवा पर जाते हुए सीसीटीवी कैमरे में कैद हुए.

जाहिर है कि हर बड़ी घटना के आरोपी भले ही कितनी भी दूर क्यों न भाग जाएं, वे घटना वाले शहर में पुलिस क्या कर रही है. इस बात की जानकारी जरूर रखते हैं, यह बात एसपी गौरव तिवारी जानते थे. इसलिए उन्होंने जानबूझ कर जांच के दौरान मिले महत्त्वपूर्ण सुराग को मीडिया के सामने नहीं रखा था. दरअसल, जब पुलिस सीसीटीवी के माध्यम से हत्यारों के भागने के रूट का पीछा कर रही थी कि देवनारायण नगर में आ कर दोनों संदिग्धों ने गोविंद की एक्टिवा छोड़ दी थी. वहां पहले से एक युवक स्कूटर ले कर खड़ा था, जिसे ले कर वे वहां से चले गए. जबकि स्कूटर वाला युवक पैदल ही वहां से गया था.

इस से एसपी का शक था कि तीसरा युवक स्थानीय हो सकता है, जो आसपास ही रहता होगा. बात सही थी, वह अनुराग परमार उर्फ बौबी था, जो विनोबा नगर में रहता था. इंदौर से बीटेक करने के बाद भी उस के पास कोई काम नहीं था. वह इस घटना में शामिल था और पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था. इसलिए जब उसे पता चला कि पुलिस को उस का कोई फुटेज नहीं मिला तो वह लापरवाही से घर से बाहर घूमने लगा. जिस के चलते नजर गड़ा कर बैठी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की. उस से मिली जानकारी के 4 दिन बाद ही पुलिस ने दाहोद (गुजरात) से लाला देवल निवासी खरेड़ी गोहदा और यहीं से रेलवे कालोनी रतलाम निवासी गोलू उर्फ गौरव को गिरफ्तार कर लिया.

उन से पता चला कि पूरी घटना का मास्टरमांइड दिलीप देवले है, जो खरेड़ी गोहद का रहने वाला है. यही नहीं पूछताछ में यह भी साफ हो गया कि जून 20 में दिलीप देवल ने ही अपने ताऊ के बेटे सुनीत उर्फ सुमीत चौहान निवासी गांधीनगर, रतलाम और हिम्मत सिंह देवल निवासी देवरादेनारायण के साथ मिल कर डा. प्रेमकुंवर की हत्या की थी. जिस से पुलिस ने सुनीत और हिम्मत को भी गिरफ्तार कर लिया. इन से पता चला कि तीनों हत्याएं लूट के इरादे से की गई थीं. दिलीप के बारे में पता चला कि वह रतलाम में ही छिप कर बैठा है. पुलिस को यह भी पता चला कि वह मिडटाउन कालोनी में किराए के एक मकान में रह रहा है और पुलिस तथा सीसीटीवी कैमरे से बचने के लिए पीछे की तरफ टूटी बाउंड्री से आताजाता है.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पीछे की तरफ खाचरौद रोड पर उसे घेरने की योजना बनाई, जिस के चलते 2 दिसंबर, 2020 को वह पुलिस को दिख गया. पुलिस टीम ने उसे ललकारा तो दिलीप ने पुलिस पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जवाबी काररवाई में पुलिस ने भी गोलियां चलाईं. कुछ ही देर में मास्टरमाइंड दिलीप मारा गया. इस प्रकार से असंभव से लगने वाले तिहरे हत्याकांड के सभी आरोपियों को पुलिस ने महज 5 दिन में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. इस में टीम प्रभारी अयूब खान और 2 एसआई सहित 5 पुलिसकर्मी भी घायल हुए.

 

सिस्टर अभया हत्याकांड : 28 साल पुराने मामले के लिए दोषियों को कैसी सजा मिली

Kerala Crime News : 28 साल का समय बहुत होता है. इस बीच इस केस को खत्म कराने, बंद कराने, अदालत को गुमराह करने के हरसंभव प्रयास हुए. पुलिस, क्राइम ब्रांच यहां तक कि सीबीआई ने भी कातिलों का साथ दिया. लेकिन आखिरकार सिस्टर अभया को…

केरल के तिरुवनंतपुरम की सीबीआई कोर्ट में चल रहे सिस्टर अभया की हत्या के मुकदमे में पूरे 28 साल बाद सीबीआई के स्पैशल न्यायाधीश के. सनिल कुमार ने बुधवार 23 दिसंबर, 2020 को अपना फैसला सुनाया. इतनी देर से फैसला आने की वजह यह थी कि इस मामले की जांच बहुत लंबी चली. मामले की जांच पहले स्थानीय थाना पुलिस ने की. उस के बाद क्राइम ब्रांच ने की और जब मामला नहीं सुलझा तो जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. सीबीआई की भी 4 अलगअलग टीमों ने जांच की. इस तरह कुल मिला कर 6 जांच एजेंसियों ने इस केस की जांच की. इस बीच कई सीबीआई अफसर भी बदले गए.

सीबीआई ने 3 बार क्लोजर रिपोर्ट लगाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने उसे स्वीकर नहीं किया. सीबीआई की चौथी टीम ने इस मामले में एक चोर की गवाही पर जो चार्जशीट दाखिल की, उसी चोर की गवाही पर कोर्ट इस मामले में अंतिम नतीजे पर पहुंचा और हत्यारों को सजा सुनाई. इतनी लंबी जांच होने की वजह से ही हत्या के इस मामले को केरल की हत्या की सब से लंबी जांच का मामला कहा जा सकता है. सिस्टर अभया हत्याकांड में क्या फैसला आया, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि सिस्टर अभया कौन थी, उन की हत्या क्यों हुई और हत्या के इस मामले में इतनी लंबी जांच क्यों करनी पड़ी. 19 साल की सिस्टर अभया कोट्टायम के पायस टेन कौन्वेंट में प्री कोर्स की पढ़ाई कर रही थीं.

पिता थौमस और मां लीला ने उन का नाम बीना थौमस रखा था. पढ़ाई के लिए जब वह नन बनीं तो उन का नाम बदल कर अभया रख दिया गया. वह सेंट जोसेफ कौन्ग्रीगेशन औफ रिलीजियस सिस्टर्स की सदस्य थीं. 27 मार्च, 1992 की सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पढ़ने के लिए उठीं. क्योंकि उस दिन उन की परीक्षा थी, जिस की तैयारी करनी थी. उन्होंने 4 बजे का अलार्म लगा रखा था. उन्हें प्यास लगी थी. वह पानी लेने के लिए किचन में गईं. लेकिन वापस अपने कमरे में नहीं आईं. किचन में गईं सिस्टर अभया कमरे में नहीं लौटीं. उन के साथ रहने वाली अन्य ननें भी पढ़ने के लिए उठीं तो सिस्टर अभया कमरे में नहीं थीं. जबकि उस समय उन्हें कमरे में ही होना चाहिए था.

उन लोगों को अभया की चिंता हुई. उन्होंने उन की तलाश शुरू की. सिस्टर अभया को ढूंढते हुए वे किचन में पहुंची तो देखा फ्रिज का दरवाजा खुला हुआ था. उसी के पास पानी की एक बोतल खुली पड़ी थी और बोतल का पानी फर्श पर फैला था. उसी के पास अभया की एक चप्पल पड़ी थी. सिस्टर अभया की काफी तलाश की गई, पर उन का कुछ पता नहीं चला. जल्दी ही यह बात पूरे कंपाउंड में फैल गई कि सिस्टर अभया गायब हैं. सवेरा हो चुका था. उजाला होने पर किसी की नजर कौन्वेंट के ही कंपाउंड में बने कुएं के पास पड़ी अभया की दूसरी चप्पल पर पड़ी. कुएं के पास चप्पल पड़ी होने से अंदाजा लगाया गया कि कहीं सिस्टर अभया कुएं में तो नहीं गिर गईं.

इस के बाद स्कूल प्रशासन ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी. पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कुएं को खंगाला तो सिस्टर अभया की लाश मिली. अब तक सुबह के लगभग 10 बज चुके थे. पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. जांच में सिस्टर अभया की एक चप्पल फ्रिज के पास पड़ी मिली. फ्रिज का दरवाजा खुला था. पानी की खुली बोतल फर्श पर पड़ी थी और उस के पास पानी फैला था, जो यह बताता था कि फ्रिज से पानी की बोतल निकाली गई थी. सिस्टर अभया की दूसरी चप्पल कुएं के पास पड़ी मिली थी. सोचने की बात यह थी कि सिस्टर अभया कुएं के पास कैसे पहुंचीं? पुलिस ने कुछ लोगोें से पूछताछ भी की, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

अंत में सब ने यही सोचा कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की होगी. क्योंकि वहां हत्या करने वाला कोई नहीं आ सकता था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में स्पष्ट लिखा था कि सिस्टर अभया की मौत पानी में डूबने से हुई है. उन के शरीर पर जो चोट लगी थी, उस के बारे में कहा गया कि वह चोट उन के कुएं में गिरने पर लगी है. स्थानीय पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सबूत मान कर अपनी फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की है. पुलिस और स्कूल प्रशासन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सच मान कर बात खत्म कर दी. पर स्कूल के हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को न तो पुलिस जांच पर भरोसा था और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर.

इस की एक वजह यह थी कि एक नन ने उसी सुबह किचन के पास हौस्टल की प्रभारी सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य फादर जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. वह ननों का हौस्टल था, इसलिए वहां फादर का जाना वर्जित था. इस के अलावा सिस्टर अभया की एक चप्पल किचन में मिली थी तो दूसरी कुएं के पास. फ्रिज खोल कर उन्होंने पीने के लिए पानी की बोतल निकाल कर खोली तो थी, पर शायद पानी पी नहीं पाई थीं. क्योंकि अगर वह पानी पीतीं तो बोतल का ढक्कन लगा कर उसे साथ ले जातीं या फिर फ्रिज में रख देतीं. फ्रिज का दरवाजा भी खुला पड़ा था. अगर उन्हें कुएं में कूद कर आत्महत्या ही करनी थी तो वह फ्रिज का दरवाजा बंद कर के जा सकती थीं.

एक चप्पल किचन में और दूसरी कुएं के पास क्यों छोड़तीं. चप्पल पहन कर भी तो कुएं में कूद सकती थीं. इस के अलावा किचन का कुछ सामान भी अस्तव्यस्त था. उसे देख कर लग रहा था कि जैसे वहां हाथापाई हुई थी. इन्हीं वजहों से हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भरोसा नहीं हुआ. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्हें लगता था कि उस रात वहां कुछ तो गड़बड़ हुई थी, जिस ने सिस्टर अभया के साथ कुछ उल्टासीधा किया था. परिणामस्वरूप हौस्टल की 67 ननोें ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन को एक पत्र लिख कर अपील की कि उन्हें पुलिस जांच पर भरोसा नहीं है, इसलिए सिस्टर अभया की मौत के मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए.

ननों की इस अपील के बावजूद केरल सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को देने के बजाय केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने पूछताछ शुरू की तो उस नन ने बताया कि उस रात उस रात उस ने हौस्टल के किचन में सिस्टर सेफी के अलावा 2 फादर, थौमस कोट्टूर और जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. इस के अलावा क्राइम ब्रांच को एक गवाह भी मिल गया था. वह गवाह था एक चोर, जिस का नाम था अदक्का राजा. उस रात वह कौन्वेंट में चोरी करने आया था. दरअसल वह चोर आकाशीय बिजली को रोकने के लिए छत पर लगे तांबे के तार को चुराने आया था. चोर अदक्का राजा छत पर चढ़ कर जब तार चोरी करने जा रहा था, उसी समय उस ने सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और फादर जोस पुथुरुक्कयिल को टार्च लिए किचन के दरवाजे पर देखा था.

जब उस ने सिस्टर अभया की पूरी कहानी अखबारों में पढ़ी तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उस रात सिस्टर अभया ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि इन्हीं तीनों ने उस की हत्या की थी. उस ने खुद क्राइम ब्रांच के औफिस जा कर यह बात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों से बताई. लेकिन पुलिस ने उस की गवाही मानने के बजाय उसे चोरी के आरोप में जेल भेज दिया और क्राइम ब्रांच पुलिस ने भी वही रिपोर्ट दी, जो स्थानीय थाना पुलिस ने दी थी. क्राइम ब्रांच का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत कुएं में डूबने से हुई थी यानी उन्होंने आत्महत्या की थी. पर कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था. यही वजह थी कि जेमोन पुथेनपुरक्कल जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस जांच के खिलाफ न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस मामले को ले कर विधानसभा में भी काफी हंगामा हुआ.

अंतत: जब यह मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी. यह सन 1993 की बात है. जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई की टीम सिस्टर अभया की मौत के रहस्य का पता लगाने में लग गई. सीबीआई ने भी अपनी जांच के बाद वही कहा, जो पुलिस और क्राइम ब्रांच ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. उस का कहना था कि उसे इस तरह का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला कि वह इसे हत्या का मामला माने. सीबीआई की इस टीम का ध्यान न तो उस नन की बात पर गया था, न चोर अदक्का राजा की बात पर. सीबीआई ने यह रिपोर्ट सन 1996 में दी थी. लेकिन हाईकोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की दूसरी टीम इस मामले की जांच में लगाई गई.

दूसरी टीम ने भी जांच कर के सन 1999 में रिपोर्ट दी कि उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि सिस्टर अभया की हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की है. पर इस टीम ने इस मामले को संदिग्ध जरूर माना था. इस टीम का कहना था कि मामला है तो संदिग्ध, पर सबूत के अभाव में वह निश्चित रूप से कुछ कह नहीं सकती. हाईकोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगा कर फिर से ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की तीसरी टीम जांच में लगाई गई. इस तीसरी टीम ने जांच करने के बाद कोर्ट को बताया कि जांच में यह तो पता चल गया है कि मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का है. लेकिन उन के पास ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि वह किसी को दोषी मान कर जांच आगे बढ़ाए. उस का कहना था कि इस मामले में अब तक सारे सबूत मिटाए जा चुके हैं.

कोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया और एक बार फिर से डांट कर ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस बार सीबीआई ने किसी भी तरह का सबूत या सुराग देने वाले को 3 लाख रुपए ईनाम देने की घोषणा भी की थी. फिर भी सीबीआई के हाथ ऐसा कोई सबूत या सुराग नहीं लगा कि वह कोर्ट में यह साबित कर सके कि यह हत्या का मामला है. इसी बीच सीबीआई के एक अफसर वर्गीज पी. थौमस, जो इस मामले की जांच कर रहे थे और काफी तेजतर्रार अफसर माने जाते थे, ने एक दिन अचानक उन्होंने प्रैस कौन्फ्रैंस बुलाई. 19 जनवरी, 1994 को जब यह रिपोर्ट आई थी, तब उन्होंने कहा था कि वह समय से पहले अपनी नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस मामले में ईमानदारी से जांच करने की इजाजत नहीं दी जा रही है.

केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के सुपरिटेंडेंट वी. त्यागराजन उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सिस्टर अभया के मामले में अपनी जांच रिपोर्ट को सुसाइड में तब्दील कर के कोर्ट में सुसाइड ही दिखाएं. यह खुलासा होने के बाद तो हंगामा मच गया. सीबीआई पर काफी दबाव पड़ा तो वी. त्यागराजन को कोच्चि से हटा दिया गया. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर सीबीआई की चौथी टीम को जांच पर लगाया गया. यह टीम केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के अफसरों की थी. सीबीआई की टीम ने इस केस में फादर कोट्टूर, फादर जोस पुथुरुक्कयिल और नन सिस्टर सेफी को संदिग्ध माना. साथ ही उन लोगों का नारको टेस्ट कराने का फैसला किया.

जब इस बात की जानकारी कौन्वेंट को हुई तो उस ने हौस्टल की रसोइया की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करा कर नारको टेस्ट रोकवाने का भी प्रयास किया. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोक लगाने से मना कर दिया. इस के बाद बेंगलुरु में इन तीनों का नारको टेस्ट कराया गया. तीनों का नारको टेस्ट डा. मालिनी ने किया. नारको टेस्ट के दौरान इन तीनों का जो इकबालिया बयान था, वह एक सीडी के तौर पर सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसे सीबीआई ने कोर्ट में पेश किया. लेकिन बाद में पता चला कि सीबीआई ने तीनों के नारको टेस्ट की जो सीडी अदालत में पेश की थी, उस के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इस का मतलब यह था कि फादर और नन सेफी ने नारको टेस्ट के दौरान जो कुछ भी कहा था, छेड़छाड़ कर के उसे बदल दिया गया था.

इस के बाद कोर्ट ने सीधे डा. मालिनी से संपर्क कर उन से कहा कि इस मामले की जो ओरिजनल रिकौर्डिंग है, वह उन्हें भेजें. पर डा. मालिनी ने अपने बर्थ सार्टिफिकेट को ले कर कुछ गलत काम किया था, इसलिए उसी समय उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. इस के बाद यह मामला यहीं लटक गया. अब वह सीडी सही है या गलत, कोई जानकारी देने वाला नहीं था. लेकिन एक दिन अचानक वही सीडी केरल के एक लोकल चैनल पर चल गई. वह सीडी चैनल को कहां से और कैसे मिली, यह तो पता नहीं चल सका. जबकि कोर्ट ने कहा कि यह सीडी सीलबंद लिफाफे में हमें दो. उस सीडी में दोनों फादर और नन अपनी पूरी कहानी सुना रहे थे, जो नारको टेस्ट के दौरान उन्होंने बताई थी. इस के बाद सीबीआई की इस चौथी टीम का ध्यान चोर अदक्का राजा पर गया.

पहली बार सन 2008 में सीबीआई ने उसी अदक्का राजा की गवाही के आधार पर चार्जशीट दाखिल की. जिस के बाद पहली बार सन 2008 में सिस्टर अभया की हत्या के आरोप में दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथुरुक्कयिल और नन सेफी को गिरफ्तार किया गया. हालांकि गिरफ्तारी के बाद ये तीनों साल भर भी जेल में नहीं रहे और 2009 में हाईकोर्ट ने इन्हें जमानत पर छोड़ दिया था. इस के बाद यह मामला फिर रुक गया. सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की थी और सीडी में तीनों ने जो कहानी सुनाई थी, वह कुल मिला कर कुछ इस तरह थी. उस रात सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पानी पीने के लिए किचन में गईं और पानी पीने के लिए फ्रिज से बोतल निकाल कर जैसे ही बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पीना चाहा, तभी उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी.

उन्होंने पलट कर देखा तो दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथरुक्कयिल, जिन्हें कोर्ट ने 2 साल पहले सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था और सिस्टर सेफी आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए. उन लोगों को उस स्थिति में देख कर सिस्टर अभया सन्न रह गईं. इसी के साथ दोनों फादर और सिस्टर सेफी ने भी सिस्टर अभया को देख लिया था. अभया को देख कर तीनों घबरा गए. क्योंकि उन की चोरी पकड़ी गई थी. चोरी भी ऐसी कि अगर बात खुल जाती तो तीनों की बदनामी तो होती ही, उन्हें वहां से निकाल भी दिया जाता. इस के बाद वे कहीं के न रहते. इसलिए उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि क्यों न सिस्टर अभया की हत्या कर उन का मुंह हमेशाहमेशा के लिए बंद कर दिया जाए.

यह निर्णय लेते ही फादर थौमस कोट्टूर ने आगे बढ़ कर हैरानपरेशान खड़ी सिस्टर अभया का एक हाथ से गला और दूसरे हाथ से उन का मुंह दबोच लिया तो सिस्टर सेफी ने किचन में रखी कुल्हाड़ी उठा कर पूरी ताकत से सिस्टर अभया के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में सिस्टर अभया बेहोश हो कर गिर पड़ीं तो उन्हें लगा कि वह मर चुकी हैं. और यही सोच कर फादर थौमस और सिस्टर सेफी ने बेहोश पड़ी अभया को घसीट कर कौन्वेंट के कंपाउंड में बने कुएं में ले जा कर डाल दिया. उस समय यह किसी को पता नहीं था कि सिस्टर अभया जिंदा थीं या मर चुकी थीं. इस के बाद किचन में आ कर वहां फैले खून को साफ कर दिया. लेकिन सिस्टर अभया की चप्पल, फ्रिज के दरवाजे, फर्श पर पड़ी बोतल और वहां अस्तव्यस्त हुए सामान की ओर उन का ध्यान नहीं गया.

बाद में इन्हीं चीजों से लोगों कोे अभया के साथ कोई हादसा होने का शक हुआ. उसी समय चोर अदक्का राजा चोरी करने के इरादे से छत पर चढ़ा था. तभी उस ने इन तीनों को वहां देख लिया था. उस समय उस ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को पहचान भी लिया था. बाद में उस ने दोनों की शिनाख्त भी कर दी थी. फादर जोस अंधेरे में थे, इसलिए वह उन्हें पहचान नहीं पाया था. यह पूरी बातें नारको टेस्ट में सामने आई थीं. कोर्ट नारको टेस्ट को सबूत नहीं मानता, क्योंकि इस में आदमी जो भी बताता है, वह नशे की हालत में यानी अर्द्धबेहोशी की हालत में बताता है, इसलिए कोर्ट इसे पुख्ता सबूत नहीं मानता. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ.

कोर्ट ने नारको टेस्ट में दिए गए बयान को सही नहीं माना और तीनों को सन 2009 में जमानत पर रिहा कर दिया था. इस मामले की जिस पुलिस अधिकारी ने जांच की थी, उस पर भी संदेह था. बाद में पता चला कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी छेड़छाड़ की गई थी. उस रात सिस्टर अभया ने जो कपड़े पहने थे, वे भी गायब कर दिए गए थे. उन के  शरीर पर जो चोट के निशान थे, वे भी छिपाए गए थे. इस तरह इस मामले में हर कदम पर साक्ष्य और सबूत छिपाए और नष्ट किए गए. शायद इसीलिए सीबीआई ने इस मामले में एक पुलिस अधिकारी को भी साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोपी बनाया था, लेकिन बाद में वह हाईकोर्ट से बरी हो गए थे.

सन 2018 में फादर जोस पुथुरुक्कयिल इस केस में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए. इस के बाद सन 2019 में हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.जी. अरुण की बेंच ने इस मामले में हो रही देरी की ओर ध्यान दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि इस केस को जल्द से जल्द निपटाया जाए. इस के बाद सीबीआई कोर्ट में इस केस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई, जिस की वजह से घटना के 28 साल बाद कोर्ट किसी नतीजे पर पहुंच सका और न्यायाधीश के. सनिल कुमार के फैसले के साथ इस मामले का पटाक्षेप हुआ. श्री सनिल कुमार ने अपने फैसले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर को उद्धृत करते हुए अपना जो फैसला सुनाया वह इस प्रकार था.

उन का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत का मामला निश्चय ही ऐसा था, जिस पर मलयाली भाषी केरल की पूरी एक पीढ़ी ने अपने जीवनकाल के दौरान घरघर खूब चर्चा सुनी. झूठ, फरेब, अपराध को छिपाना, राजनीतिक प्रभाव, अदालती काररवाई और बीचबीच में मामला बंद करने की रिपोर्ट सहित सब कुछ देखासुना था. न्यायाधीश जाते रहे, पर मुकदमा जस का तस रहा. रिकौर्ड में उपलब्ध साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इतने अधिक हैं कि परिस्थितियों की तारतम्यता की कड़ी कुल मिला कर आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करती है और इस नतीजे पर पहुंचाती है कि आरोपियोें ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया है.

गवाहोें और प्राप्त सबूतों से साबित होता है कि सिस्टर अभया की मौत सिर में लगी चोट और पानी में डूबने से हुई. अभया के शव परीक्षण से पता चला कि उस की गरदन के दोनों ओर नाखूनों की खरोंच के निशान थे, उन की गरदन पर जख्म भी था और सिर के पिछले हिस्से में भी जख्म था, मैडिकल विशेषज्ञों के अनुसार ये जख्म मौत से पहले के थे. गवाहों के बयानों और प्राप्त सबूतों के आधार पता चला कि अभया ने फादर थौमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और संभवत: एक दूसरे आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. अपने बचाव के लिए उन्होंने उस के सिर पर कुल्हाड़ी से हमला किया और उस की हत्या कर अपनी करतूतों पर परदा डालने के इरादे से उसे कुएं में फेंक दिया.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अपना जीवन खत्म करने पर तुला व्यक्ति जो अपना जीवन तत्काल खत्म कर रहा हो, वह अपने साथी छात्रों के साथ मिल कर पढ़ाई करने की बात तो दूर वह अपने भविष्य को ले कर क्यों चिंता करेगा? अपनी परीक्षा को अच्छी तरह देने के बारे में सोच कर अच्छी नींद भी नहीं लेगा और न मन लगा कर पढ़ाई करेगा. ये सारी बातें आत्महत्या करने की बात को झुठलाती हैं. अदालत का कहना था कि अभया एक बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ, ईमानदार, सादगी पसंद, दृढ़निश्चयी और अति शिष्टाचारी लड़की थी, जो हर तरह से कुशल थी और परोपकारी जीवन व्यतीत कर रही थी. उस के लिए खुद ही अपने जीवन का अंत कर लेना पूरी तरह से असंभव था, जैसी दलीलें बचाव पक्ष पेश कर रहा है.

इस मामले में गवाही देने वाला अदक्का राजू या अंडासू राजू जिसे ज्यादातर लोग इसी नाम से बुलाते थे, एक मामूली चोर था, वह आकाशीय बिजली रोकने के लिए कौन्वेंट की छत में लगी तांबे की छड़ की चोरी किया करता था. न्यायाधीश ने इस तथ्य का भी जिक्र किया है कि वह अपने बयान पर अडिग रहा कि उस ने फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य व्यक्ति को टौर्च के साथ किचन के पास खड़े देखा था. जबकि बचाव पक्ष ने राजू की पृष्ठभूमि के आधार पर उस की गवाही पर ही सवाल खड़े किए. लेकिन 2 वकीलों द्वारा जिरह करने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहा. फैसले में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि किस तरह से गवाह राजू को अपने बयान से मुकरने और सिस्टर अभया की हत्या कबूल करने के लिए धमकियां मिलीं, यातना दी गई और मोटी रकम देने का प्रलोभन दिया गया, पर वह अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ.

अदालत ने इस तथ्य को रिकौर्ड किया कि सिस्टर अभया की मौत वाली रात सिस्टर सेफी अकेली थीं. क्योंकि उन की साथिन रिट्रीट सेंटर गई थीं. उस रात और सवेरे रसोई घर में सामान्य स्थिति नहीं थी, जिस के बारे में अदालत को कौन्वेंट में रहने वाले अन्य लोगों ने, जो बाद में मुकर गए थे, की गवाही से पता चला था. एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी कि सिस्टर सेफी ने अपने यौनाचार में लिप्त रहने के तथ्य को छिपाने के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से अपनी हाईमेनोप्लास्टी कराई थी. अदालत ने पाया कि सेफी ने यह प्रक्रिया सीबीआई द्वारा गिरफ्तार करने के बाद कराई थी. अदालत ने इस मामले के गवाहों में से एक गवाह कलारकोडे वेणुगोपाल को दिए गए फादर थौमस कोट्टूर के बयान का संज्ञान लिया. इस मामले में वेणुगोपाल ने कोट्टूर का नारको टेस्ट कराए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिलने पर थौमस कोट्टूर से संपर्क किया था.

तब उन्होंने भावावेश में वेणुगोपाल से कहा था कि वह लोहे या पत्थर से नहीं बने, वह भी मनुष्य हैं, जो एक समय पर सिस्टर सेफी के साथ पतिपत्नी की तरह रहे थे, अब उन्हें क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है. बचाव पक्ष ने अदालत से वेणुगोपाल के बयान को भरोसेमंद न मानने का आग्रह किया था. पर अदालत ने कहा कि आरोपी का बर्ताव, उस की गवाही के दौरान उस की भावभंगिमाएं औैर अपनी गवाही के बुनियादी तथ्यों से टस से मस नहीं होने का तथ्य गवाह की विश्वसनीयता बता रहा था. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अचानक बगैर किसी वजह से पूरा कौन्वेंट सामूहिक रूप से मुकर गया, सबूत भी गायब हो गए और कौन्वेंट की रसोइया अचम्मा ने नारको टेस्ट को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी.

अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उस ने स्वीकार किया कि उच्चतम न्यायालय में देश के महानतम वकीलों में शामिल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उस की ओर से पेश हुए थे. अदालत ने फैसले में कहा कि उस ने यह भी स्वीकार किया कि उस के मुकदमे का खर्च कौन्वेंट ने उठाया था. जबकि उसे मुकदमे के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी. अदालत ने कहा कि इस से यह साबित होता है कि इस मुकदमे को किस अंतिम नतीजे पर पहुंचने से रोकने तथा अभियोजन के मामले की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए प्रभावशाली लोगों ने व्यवस्थित और संगठित तरीके से प्रयास किए.

न्यायाधीश श्री के. सनिल कुमार ने इस मामले के जांच अधिकारियों, डीएसपी के. सैमुअल और तत्कालीन एसपी केटी माइकल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन की इस मामले में दिलचस्पी की वजह से साक्ष्य नष्ट हुए, मनगढ़ंत सबूत तैयार किए गए. यहां तक कि मुख्य गवाह अदक्का राजू को सिखायापढ़ाया गया और अन्य गवाहों पर दबाव डाले गए. अदालत ने भविष्य में इस तरह से हस्तक्षेप के खिलाफ सख्त चेतावनी देते हुए इस फैसले की प्रति राज्य पुलिस के मुखिया को भी देने का आदेश दिया. अंत में न्यायाधीश सनिल कुमार ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को सिस्टर अभया की हत्या, अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास यानी जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई. साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया.

थौमस कोट्टूर पर घर में बिना अनुमति घुस जाने का भी आरोप लगा. सिस्टर सेफी अब नन वाले कपड़े नहीं पहन सकेंगी. सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों में अकेले जीवित बचे मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया. यह इस बात का उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उस के पास पैसा और बाहुबल है तो वह न्याय से खिलवाड़ कर लेगा. जिस चोर अदक्का राजा की गवाही पर दोनों को सजा हुई, फैसला आने के बाद उस ने कहा कि उसे मुकरने के लिए बहुत प्रताडि़त किया गया. उस पर दबाव डाला गया, 3 करोड़ रुपए का लालच दिया गया. पर वह अपनी बात पर अडिग रहा. आखिर उस की भी तो बेटियां हैं. इस मामले में कुल 167 गवाह थे, जिन में से लगभग सब मुकर गए थे.

 

Chhattisgarh Crime : शराब पिला कर दोस्तों को क्यों मारी गोली

Chhattisgarh Crime : लौकडाउन सब से बड़ी मुसीबत बना पीनेपिलाने वालों के लिए. लेकिन पैसे वाले अपने लिए कोई न कोई राह निकाल ही लेते हैं. आकाश गुप्ता ने शराब का जुगाड़ कर के अपने दोस्तों सौरभ और सुनील को पिलाने के लिए बुलाया. दोनों आ भी गए लेकिन…

छत्तीसगढ़ के सरगुजा का शहर अंबिकापुर.रात के लगभग 8 बजे थे, कोरोना महामारी के चलते देशभर में लौकडाउन चल रहा था. जिधर देखो, उधर ही सन्नाटा. छत्तीसगढ़़ सरगुजा संभाग के ब्रह्म रोड, अंबिकापुर स्थित अपने आवास के बाहर खड़े सौरभ अग्रवाल ने मोबाइल से अपने चचेरे भाई सुनील अग्रवाल को काल लगाई. काल रिसीव हुई तो उस ने पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई? वैसे कर ही क्या सकते हो, चारों ओर तो सन्नाटा पसरा है.’’

हैलो के साथ सुनील ने दूसरी ओर से कहा, ‘‘घर पर बैठा हूं, टीवी पर कोरोना की खबरों के अलावा कुछ है ही नहीं. देखदेख कर बोर हो रहा हूं. कभी मौतों के आंकड़े आते हैं तो कभी मरीजों के. देख कर लगता है, जैसे अगला नंबर मेरा ही है.’’

हलकी हंसी के साथ सौरभ बोला, ‘‘आओ, आकाश के यहां चलते हैं. कह रहा था, टाइम पास नहीं हो रहा, सारी व्यवस्था कर रखी है उस ने.’’

सौरभ ने इशारे में सुनील को बता दिया. लेकिन वह तल्ख स्वर में बोला, ‘‘तू आकाश के चक्कर में मत रहा कर. उस क ी जुबान की कोई कीमत नहीं है. पिछले डेढ़ साल से चक्कर पर चक्कर कटवा रहा है, एक नंबर का बदमाश है.’’

‘‘भाई, समयसमय की बात है, कभी करोड़ों का आसामी था, उस के पिता की तूती बोलती थी सरगुजा में… समय का मारा है बेचारा. रही बात मकान की तो चिंता क्यों करते हो, पक्की लिखापढ़ी है, मकान तो उस के पुरखे भी खाली करेंगे.’’ सौरभ ने आकाश का पक्ष रखने की कोशिश की.

‘‘ठीक है, मैं आता हूं.’’ सुनील अग्रवाल ने बात बंद कर दी. सुनील उस का चचेरा भाई था, उम्र लगभग 40 वर्ष. दोनों में खूब छनती थी. दोनों मिलजुल कर अंबिकापुर में बिल्डिंग वर्क और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते थे. सौरभ अपनी इनोवा सीजी 15डी एच8949 पर आ कर बैठ गया. थोड़ी देर में सुनील अग्रवाल आ गया .

दोनों कार से शहर का चक्कर लगा कर आकाश गुप्ता के घर पहुंच गए. हमेशा की तरह आकाश ने मुसकरा कर दोनों का स्वागत किया. तीनों के आपस में मित्रवत संबंध थे, एक ही शहर एक ही मोहल्ले में रहने के कारण एकदूसरे के काफी करीब थे. आपस में लेनदेन भी चलता था. वह आकाश का पुश्तैनी घर था, जो अकसर खाली रहता था. जब पीनेपिलाने का प्रोग्राम बनता था तो सब दोस्त अक्सर यहीं एकत्र होते थे. फिर कैरम खेलने और पीनेपिलाने का दौर चलता था, इसी के चलते आकाश ने यह मकान 2. 30 करोड़ में सौरभ को बेच दिया था और पैसे भी ले लिए थे, मगर वह मकान को सुपुर्द करने में आनाकानी कर रहा था.

बहरहाल, इन सब बातों को दरकिनार कर सुनील और सौरभ आकाश गुप्ता के घर पहुंचे और महफिल सज गई. आकाश ने बेशकीमती शराब, मुर्गमुसल्लम वगैरह मंगा रखा था. लौकडाउन के समय में ऐसी बेहतरीन व्यवस्था देख कर सौरभ अग्रवाल चहका, ‘‘अरे भाई क्या इंतजाम किया है, लग ही नहीं रहा लौकडाउन चल रहा है.’’ इस पर आकाश गुप्ता और सुनील अग्रवाल दोनों हंसने लगे. बातचीत और पीनेपिलाने का दौर शुरू हुआ. इसी बीच अपने उग्र स्वभाव के मुताबिक सुनील अग्रवाल ने आकाश की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘यार, ये सब तो ठीक है मगर तू यह बता… सौरभ को मकान कब दे रहा है, 6 महीने हो गए.’’

यह सुन कर आकाश गुप्ता मुसकराते हुए बोला, ‘‘यार, तुम मौजमजा करने आए हो. मजे करो. कोरोना पर बात करो. ये मकान कहां जाएगा.’’

इस पर सौरभ बोला, ‘‘बात बिलकुल ठीक है. आज कोरोना की वजह से हुए लौकडाउन को 17वां दिन है. त्राहित्राहि मची है.’’

सौरभ की बात पर सुनील गंभीर हो गया और चुपचाप शराब का गिलास हाथों में उठा लिया. आकाश ने अपने एक साथी सिद्धार्थ यादव को भी बुला रखा था जो उन की सेवा में तैनात था, साथ ही हमप्याला भी बना हुआ था. हंसतेमुसकराते तीनों शराब पी रहे थे. तभी एकाएक सुनील अग्रवाल ने कहा, ‘‘यार, तूने यह आदमी कहां से ढूंढ निकाला, पहले तो तेरे यहां कभी नहीं देखा.’’

कुछ सकुचाते हुए आकाश गुप्ता ने कहा,

‘‘हां, नयानया रखा है  तुम्हारी सेवाटहल के लिए.’’

‘‘इसे कहीं देखा है…’’ सुनील ने शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए कहा

‘‘हां देखा होगा. मैं यहीं का हूं भैया, पास में ही मेरा घर है.’’

‘‘नाम  क्या  है  तेरा?’’

‘‘सिद्धार्थ… सिद्धार्थ यादव.’’

‘‘हूं, तू जेल गया था न, कब छूटा?’’ सुनील ने उस पर तीखी नजर डालते हुए कहा

‘‘मैं…अभी एक महीना हुआ है.’’ सिद्धार्थ ने हकलाते हुए दोनों की ओर देख कर कहा.

‘‘अरे, तुम भी यार… सिद्धार्थ बहुत काम का लड़का है. अब सुधर गया है.’’ कहते हुए आकाश गुप्ता ने दोनों के खाली गिलास फिर से भर दिए. दोनों पीते रहे. जब नशा तारी हुआ तो अचानक आकाश गुप्ता जेब से पिस्तौल निकालते हुए बोला, ‘‘आज तुम दोनों खल्लास, मेरा… मेरा मकान चाहिए. ब्याज  पर ब्याज …ब्याज पर ब्याज… आज तुम दोनों को मार कर यहीं दफन कर दूंगा.’

आकाश का रौद्र रूप देख सौरभ और सुनील दोनों के होश उड़ गए. वे कुछ कहते समझते, इस से पहले ही आकाश ने गोली चला दी जो सीधे सुनील अग्रवाल के सिर में लगी. वह चीखता हुआ वहीं ढेर हो गया. सुनील को गोली लगते देख सौरभ कांप  उठा और वहां से भागने लगा. यह देख पास खड़े सिद्धार्थ यादव ने गुप्ती निकाली और सौरभ अग्रवाल के पेट में घुसेड़ दी. उस के पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह वहीं गिर गया. आकाश ने उस पर भी एक गोली दाग दी. सुनील और सौरभ फर्श पर गिर कर थोड़ी देर तड़पते रहे और फिर मौत के आगोश में चले गए.

आकाश गुप्ता ने पिस्तौल जेब में रख ली. फिर उस ने सिद्धार्थ के साथ मिल कर सौरभ और सुनील की लाशों को घर में पहले से ही खोद कर रखे गए गड्ढे में डाल कर ऊपर से मिट्टी डाल दी. इस से पहले सिद्धार्थ यादव ने सौरभ और सुनील की जेब से पर्स, हाथ से अंगूठी, चेन, इनोवा गाड़ी की चाबी अपने कब्जे में ले ली थी. आकाश के निर्देशानुसार वह घर से निकला और इनोवा को चला कर आकाशवाणी मार्ग पर पहुंचा. उस ने इनोवा वहीं खड़ी कर उस में पर्स, मोबाइल रख दिया. लेकिन वह यह नहीं देख सका कि उस का चेहरा कैमरे की जद में आ गया है.

10 अप्रैल, 2020 शुक्रवार को देर रात तक जब सौरभ अग्रवाल और सुनील अग्रवाल घर नहीं पहुंचे तो घर वालों को चिंता हुई. देश के साथसाथ अंबिकापुर में भी लौकडाउन का असर था. सड़कें सूनी थीं. सौरभ के भाई सुमित अग्रवाल ने सौरभ व सुनील के कुछ मित्रों को उन के मोबाइल पर काल कर के दोनों के बारे में पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. दोनों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ थे. इस से घर वाले चिंतातुर थे. अगले दिन सुबह सुमित अग्रवाल ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से आकाश गुप्ता का मोबाइल नंबर ले कर उसे काल की और सौरभ व सुनील के बारे में पूछा. आकाश गुप्ता ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

यह बताने पर कि सौरभ व सुनील भैया दोनों रात भर घर नहीं आए तो आकाश ने नाटकीयता पूर्वक कहा, ‘‘अरे, यह तो चिंता की बात है… रुको, मैं पता लगाता हूं.’’

सभी को यह जानकारी थी कि आकाश गुप्ता से सौरभ के घनिष्ठ संबंध थे. ऐसे में आकाश ने उस के परिजनों का विश्वास जीतने का प्रयास किया. थोड़ी देर बाद वह स्वयं सौरभ अग्रवाल के घर आ पहुंचा और बातचीत में शामिल हो गया. जब सुबह भी सौरभ व सुनील का पता नहीं चल पाया तो तय हुआ कि इस बात की जानकारी पुलिस को दे दी जाए. सुनील और सौरभ के भाई सुमित थाने पहुंचे. उन्हें कोतवाल विलियम टोप्पो से मिल कर उन्हें पूरी बात बता दी.

कोतवाल टोप्पो ने पूछा, ‘‘पहले कभी ऐसा हुआ था?’’

‘‘नहीं…सर, ऐसा कभी नहीं हुआ, दोनों रात 11 बजे तक घर आ जाया करते थे. दोनों के मोबाइल भी औफ हैं. हम ने सारे परिचितों से भी पूछताछ कर ली है.’’ सुमित अग्रवाल यह सब बताते हुए रुआंसा हो गया.

‘‘देखो, चिंता मत करो, तुम्हारी तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर हम खोजबीन शुरू करते हैं.’’ कोतवाल  विलियम टोप्पो ने आश्वासन दिया. कोतवाल दोनों के घर पहुंचे और जरूरी बातें पूछने के बाद उच्चाधिकारियों एसपी आशुतोष सिंह, एडीशनल एसपी ओम चंदेल और एसपी (सिटी) एस.एस. पैकरा को इस घटना की जानकारी दे दी. मामला अंबिकापुर के धनाढ्य परिवार से जुड़ा था. सौरभ और सुनील के गायब होने की खबर बहुत तेजी से फैली. पुलिस पर सम्मानित लोगों का प्रेशर बढ़ने लगा. दोपहर होते होते एसपी आशुतोष सिंह और सभी अधिकारी व डीएसपी फोरैंसिक टीम के साथ सौरभ अग्रवाल व सुनील के घर पहुंच गए. इस के साथ ही जांच तेजी से शुरू हो गई.

इसी बीच खबर मिली कि सौरभ व सुनील जिस इनोवा कार में घर से निकले थे, वह अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक के पास खड़ी है. यह सूचना मिलते ही कोतवाल विलियम टोप्पो आकाशवाणी चौक पहुंचे और गाड़ी की सूक्ष्मता से जांच की. गाड़ी में सुनील और सौरभ के पर्स व मोबाइल मिल गए. इस से मामला और भी संदिग्ध हो गया. पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच की तो एक शख्स गाड़ी पार्क करते और उस में से निकलते दिखाई दे गया. पुलिस ने तफ्तीश की तो पता चला वह शातिर अपराधी  सिद्धार्थ यादव उर्फ श्रवण है, जो फरवरी 2020 में ही एक अपराध में जेल से बाहर आया है. पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी.

पहले तो सिद्धार्थ एकदम भोला बन कर कहने लगा, ‘‘मैं तो घर पर था, कहीं गया ही नहीं.’’

मगर जब उसे सीसीटीवी में कैद उस की फुटेज दिखाई गई तो उस का चेहरा स्याह पड़ गया. उस के कसबल ढीले पड़ गए. आखिर उस ने पुलिस को चौंकाने वाली बात बताई. उस ने कहा कि सौरभ व सुनील अग्रवाल की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. सिद्धार्थ यादव के बयान के आधार पर पुलिस ने आकाश गुप्ता के यहां दबिश दी. वह शराब में डूबा घर पर बैठा था. पुलिस ने उसे गिरफ्त मे ले कर पूछताछ शुरू की. साथ ही सिद्धार्थ यादव की निशानदेही पर आकाश गुप्ता के घर में खोदे गए गड्ढे से सौरभ व सुनील की लाशें भी बरामद कर ली.

हत्या में इस्तेमाल की गई पिस्तौल भी जब्त कर ली गई. तब तक यह खबर अंबिकापुर के कोनेकोने तक पहुंच गई थी. लौकडाउन के बावजूद आकाश गुप्ता के घर के बाहर लोगों का हुजूम जुट गया. पुलिस हिरासत में आ कर आकाश गुप्ता का नशा हिरन हो गया था. थरथर कांपते हुए उस ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और पुलिस को सब कुछ बता दिया. आकाश के पिता काशी प्रसाद गुप्ता कभी शहर के बहुत बड़े आसामी थे, पांच बहनों में अकेले भाई आकाश को पिता की अर्जित धनसंपत्ति शौक में उड़ाने  के अलावा कोई काम नहीं था.

धीरेधीरे वह करोड़ों की जमीनजायदाद बेचता रहा. उस ने अपना पुश्तैनी मकान भी सौरभ को 2 करोड़ 30 लाख रुपए में बेच दिया था. वह उस से रुपए भी ले चुका था, लेकिन उस की नीयत खराब हो गई थी. वह चाहता था किसी तरह मकान उस के कब्जे में रह जाए. दूसरी तरफ 2016 में आकाश गुप्ता ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से 20  लाख रुपए का कर्ज  लिया था और इन 4 वर्षों में 50 लाख रुपए अदा करने के बावजूद उस से ब्याज के 50 लाख रुपए मांगे जा रहे थे. परेशान आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को विश्वास में लिया. उसे सिद्धार्थ की आपराधिक पृष्ठभूमि पता थी. आकाश ने धीरेधीरे सिद्धार्थ से घनिष्ठ संबंध बनाए और उसे बताया कि वह किस तरह करोड़पति से बरबादी की ओर जा रहा है.

इस पर सिद्धार्थ यादव ने आकाश गुप्ता के साथ हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘ऐसा है तो क्यों ना सौरभ को रास्ते से हटा दिया जाए. आकाश को सिद्धार्थ की कही बात जम गई. दोनों ने साथ मिल कर पहले सौरभ के अपहरण की योजना बनाई. लेकिन उस में बड़े पेंच देख कर तय किया कि हत्या ज्यादा आसान है. दोनों ने इसी योजना पर काम किया. सौरभ की हत्या की योजना बनने लगी तो सिद्धार्थ ने आकाश को पास के उपनगर  गंगापुर के रमेश अग्रवाल से मिलवाया. रमेश ने बरगीडीह निवासी शिव पटेल से 90 हजार रुपए में एक पिस्तौल व गोलियां दिला दीं.

हत्या की योजना बना कर पहले ही यह तय कर लिया गया था कि सौरभ व सुनील को मार कर उन की लाशें घर में ही दफन कर दी जाएंगी. सिद्धार्थ और आकाश ने 4 अप्रैल से धीरेधीरे गड्ढा खोदने का काम शुरू कर दिया था. आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को मोटी रकम देने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. सिद्धार्थ भी आकाश गुप्ता की रईसी से प्रभावित था और धारणा बना चुका था कि इस काम में उस की मदद कर के उस का जिंदगी भर का राजदार बन जाएगा और आगे की जिंदगी मौजमजे से गुजारेगा.

11 अप्रैल 2020 की देर शाम तक आकाश गुप्ता और सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सौरभ अग्रवाल, सुनील अग्रवाल की हत्या के आरोप में आकाश और सिद्धार्थ के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 302, 201, 120बी 34,25, 27 आर्म्स एक्ट  के तहत मामला दर्ज कर के आरोपियों को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें अंबिकापुर कारागार भेज दिया गया.

Crime News : दोस्त का अपहरण करके मांगी 30 लाख की फिरौती

Crime News : पुलिस ने अगर संजीत के पिता चमन सिंह की बात पर जरा सा भी यकीन किया होता तो न तो संजीत की जान जाती और न 30 लाख रुपए. इस के बजाय पुलिस यही कहती और मानती रही कि संजीत अपनी किसी गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. इस का नतीजा…

कानपुर दक्षिण में काफी बड़े क्षेत्र में फैला एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है बर्रा. बड़े क्षेत्र को देखते हुए इसे कई भागों में बांटा गया है. चमन सिंह यादव अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के बर्रा 5 की एलआईजी कालोनी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कुसुमा देवी के अलावा एक बेटा था संजीत और एक बेटी रुचि यादव. चमन सिंह एक फैक्ट्री में काम करते थे. वह धनवान तो नहीं थे, पर घर में किसी चीज की कमी भी नहीं थी. चमन सिंह मृदुभाषी थे सो अड़ोसीपड़ोसी सभी से मिलजुल कर रहते थे. चमन सिंह खुद तो ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई थी. बेटी रुचि डीबीएस कालेज गोविंद नगर से बीएससी कर के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी थी, जबकि बेटे संजीत ने बीएससी नर्सिंग कर रखा था.

वह नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथोलौजी विभाग में बतौर लैब टेक्नीशियन कार्यरत था. उस का काम था मरीजों के खून का नमूना जांच हेतु एकत्र करना. फिर उसे जांच के लिए पैथोलौजी लैब ले जाना और जांच रिपोर्ट लाना. चमन सिंह की बेटी रुचि जौब की तलाश में थी, चमन सिंह बेटी का ब्याह कर देना चाहते थे. इस में उन की पत्नी कुसुमा की भी सहमति थी. इसी कवायद में चमन सिंह को रुचि के लिए राहुल यादव पसंद आ गया. राहुल बर्रा विश्व बैंक कालोनी में रहता था. उस के पिता राजेंद्र यादव पीएसी में तैनात थे. राहुल पसंद आया तो उन्होंने बेटी का रिश्ता तय कर दिया. रिश्ता तय हुआ तो चमन सिंह बेटी की शादी की तैयारी में जुट गए. उन्होंने बेटी के लिए जेवरात बनवा लिए तथा कैश का भी इंतजाम कर लिया.

संजीत का सपना था कि वह अपनी बहन को कार से ससुराल भेजेगा. कार खरीदने के लिए उस ने बैंक से 2 लाख का कर्ज भी ले लिया था. रुचि की शादी की तैयारियां चल ही रही थीं कि इसी बीच चमन सिंह को पता चला कि राहुल रुचि के लिए ठीक लड़का नहीं है. चमन सिंह ने अपने स्तर से पता लगाया तो बात सच निकली. इस के बाद उन्होंने पत्नी व बच्चों के साथ इस गंभीर समस्या पर विचारविमर्श किया और रुचि के भविष्य को देखते हुए रिश्ता तोड़ दिया. रिश्ता टूटने से राहुल और उस के घर वाले बौखला गए. राहुल, रुचि के पिता व भाई को मनाने में जुट गया, परंतु बात नहीं बनी. हर रोज की तरह 22 जून, 2020 को भी संजीत अस्पताल गया, लेकिन जब वह रात 10 बजे तक वापस घर नहीं आया, तब चमन सिंह व उस की पत्नी कुसुमा को चिंता हुई.

दरअसल संजीत रात 9 बजे तक हर हाल में घर आ जाता था. कभी उसे अस्पताल में रुकना होता था या कहीं और जाना होता तो वह अपनी मां या बहन को फोन कर के बता देता था. 10 बज गए थे. न वह आया था, न ही फोन पर बताया था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी बंद था. ज्योंज्यों समय बीतता रहा था, चमन सिंह, उन की पत्नी कुसुमा और बेटी रुचि की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. रुचि ने संजीत के अस्पताल फोन किया तो पता चला वह 7 बजे ही अस्पताल से चला गया था. पैथोलाजी लैब वह गया ही नहीं था. रुचि ने भाई के दोस्तों जिन्हें वह जानती थी, सब को फोन किया, कोई जानकारी नहीं मिली. मांबेटी और पिता रात भर फोन पर फोन करते रहे, लेकिन कहीं से भी संजीत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

सुबह का उजाला फैला तो पूरी कालोनी में संजीत के लापता होने की खबर फैल गई. पड़ोसी सांत्वना देने घर पहुंचने लगे. चमन सिंह ने कुछ खास पड़ोसियों से विचारविमर्श किया फिर बेटी रुचि को साथ ले कर जनता नगर पुलिस चौकी पहुंच गए. उस समय चौकी इंचार्ज राजेश कुमार चौकी पर मौजूद थे. चमन सिंह ने उन्हें एकलौते बेटे संजीत के लापता होने की जानकारी दी. साथ ही अपहरण की आशंका भी जताई. राजेश कुमार ने चमन सिंह से तहरीर ले ली, फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी किसी से दुश्मनी या जमीन वगैरह की रंजिश तो नहीं है. संजीत का लेनदेन में किसी से झगड़ाफसाद तो नहीं हुआ था.’’

‘‘सर, हम सीधेसादे लोग हैं. हमारी या बेटे संजीत की न तो किसी से रंजिश है, न ही लेनदेन का झगड़ा है.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ चौकीप्रभारी राजेश कुमार ने पूछा.

‘‘हां सर, मुझे राहुल यादव पर शक है.’’ चमन सिंह ने बताया.

‘‘वजह बताओ?’’ राजेश कुमार ने अचकचा कर पूछा.

‘‘सर, राहुल यादव, विश्व बैंक कालोनी बर्रा में रहता है. उस के पिता पीएसी में तथा चाचा मैनपुरी में दरोगा है. राहुल के साथ मैं ने अपनी बेटी रुचि का विवाह तय किया था. लेकिन कुछ कारणों से हम ने रिश्ता तोड़ दिया था. रिश्ता टूटने से राहुल बौखला गया. मुझे शक है कि इसी बौखलाहट में उस ने संजीत का अपहरण किया है.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ. मैं इस मामले को देखता हूं.’’ कह कर राजेश कुमार ने चमन सिंह को टरका दिया. उन्होंने न तो गुमशुदगी दर्ज की और न ही किसी से कोई पूछताछ की.

24 जून की सुबह 10 बजे चमन सिंह आशंका जताते हुए राहुल के खिलाफ नामजद तहरीर ले कर चौकी पहुंचे. तहरीर पढ़ते ही चौकीप्रभारी राजेश कुमार भड़क उठे, ‘‘तुम्हारा बेटा गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. किसी पर गलत आरोप लगाओगे तो भुगतना पड़ेगा. गलत होने पर मैं तुम्हारे खिलाफ मानहानि का मुकदमा लिख दूंगा, समझे.’’

चमन सिंह समझ गए कि यहां कोई काररवाई संभव नहीं है. अत: वह थाना बर्रा जा कर थानाप्रभारी रणजीत राय से मिले. उन्होंने उन्हें जनता नगर चौकी में दी गई तहरीर के आधार पर गुमशुदगी दर्ज न करने की बात बताई. इस पर वह नाराज होते हुए बोले, ‘‘हथेली पर सरसों मत उगाओ. तुम्हारा बेटा मिल जाएगा.’’

थाने से निराशा हाथ लगी तो चमन सिंह डीएसपी (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता और एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता से मिले और अपनी परेशानी बताई. लेकिन जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों ने भी उस के आंसुओं को नजरअंदाज कर दिया. दरअसल, पुलिस यह मान रही थी कि संजीत मौजमस्ती करने कहीं चला गया है. अगर उस का अपहरण हुआ होता तो अब तक फिरौती के लिए फोन आ गया होता. पुलिस की खुमारी तब टूटी जब 29 जून को फिरौती के लिए अपहर्त्ताओं का फोन आया. उन्होंने संजीत को सहीसलामत लौटाने के लिए 30 लाख रुपए मांगे थे. चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बताई. पुलिस ने उन्हें रुपयों का इंतजाम करने को कहा.

एक साधारण परिवार के लिए 30 लाख रुपए का इंतजाम करना आसान नहीं था. लेकिन सवाल एकलौते बेटे का था. चमन सिंह ने बेटी रुचि की शादी के लिए जो रकम सहेज कर रखी थी, वह और बेटी की शादी के लिए बनवाए गए जेवर बेच कर पैसा एकत्र किया. पर 30 लाख की रकम पूरी नहीं हो पाई. इस पर उन्होंने गांव की जमीन और मकान बेच दिया. पैसा एकत्र हो गया तो चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बता दी. इस बीच अपहर्त्ताओं  के फोन पर फोन आ रहे थे. उन का कहना था कि चाहे जैसे भी हो, 30 लाख रुपए जमा कर लो, बेटा अमित मिल जाएगा. रुचि हर रोज सारी बात पुलिस को बता रही थी. इस बीच संजीत के अपहरण को 3 हफ्ते बीत गए थे. इसे पुलिस की कमजोरी ही कहा जाएगा कि वह अपहर्त्ताओं का नंबर तक ट्रेस नहीं कर पाई थी.

रकम का इंतजाम हो जाने पर यह बात पुलिस को बता दी गई. इस पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने अपहर्त्ताओं को रंगेहाथों पकड़ने के लिए योजना तैयार की. इस के लिए क्राइम ब्रांच की टीम और सर्विलांस टीम को भी साथ लिया गया. चमन सिंह के परिवार को तो अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार था ही, पुलिस भी इंतजार कर रही थी. लेकिन अपहर्त्ताओं का फोन आया 12 जुलाई को. चमन सिंह ने उन्हें बता दिया कि रकम तैयार कर ली गई है. इस पर उन्होंने कहा कि 30 लाख की रकम बैग में भर कर तैयार रखो. जल्दी ही बता दिया जाएगा कि रकम कहां और कैसे देनी है. रुचि ने यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी.

उन्होंने पूरी टीम को सादे कपड़ों में तैयार रहने के लिए अलर्ट कर दिया.  लेकिन उस दिन अपहर्त्ताओं का फोन नहीं आया. उन का फोन आया 13 जुलाई की दोपहर में. अपहर्त्ताओं ने चमन सिंह से कहा कि शाम 5 बजे रकम का बैग ले कर वह गुजैनी हाइवे के फ्लाईओवर पर पहुंच जाएं. फ्लाईओवर से बैग नीचे फेंकना है. वे लोग पुल के नीचे रहेंगे. रकम मिलते ही संजीत को छोड़ दिया जाएगा. यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी गई. उन्होंने पुलिस टीम को तैयार रहने का आदेश दे दिया. ठीक 6 बजे पुलिस की 2 गाडि़यां फ्लाईओवर पर पहुंच गईं. एक गाड़ी में पुलिस जवानों के साथ अपर्णा गुप्ता थीं और दूसरी में सहयोगियों के साथ थानाप्रभारी रणजीत राय थे.

तभी रकम का बैग ले कर चमन सिंह मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. मोटरसाइकिल खड़ी कर के उस ने नीचे झांका. तभी अपहर्त्ताओं का फोन आ गया कि चंद कदम आगे जा कर बैग नीचे फेंक दो. चमन सिंह ने बैग नीचे फेंक दिया तो अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया. उन्होंने कहा कि थोड़ा आगे जा कर हनुमान मंदिर है, वहीं पहुंचो. संजीत मिल जाएगा. इस बीच पुलिस की निगाहें चमन सिंह पर ही जमी थीं. जैसे ही उस ने बैग फेंका, पुलिस अपहर्त्ताओं को पकड़ने के लिए दौड़ी, लेकिन नीचे जाने का रास्ता लंबा था. पुलिस के वहां पहुंचने तक अपहर्त्ता बैग ले कर भाग गए थे. उधर चमन सिंह आंखों में आस समेटे मंदिर पर पहुंचा. लेकिन संजीत वहां नहीं मिला. पुलिस औपरेशन पूरी तरह फेल रहा.

चमन सिंह का परिवार अवाक रह गया. जैसेतैसे जुटाई 30 लाख की रकम तो गई ही, बेटा भी नहीं मिला. इस पर रुचि पिता के साथ जा कर आईजी मोहित अग्रवाल से मिली. रुचि ने पूरी बात आईजी को बताई. साथ ही संदेह भी व्यक्त किया कि पुलिस अपहर्त्ताओं से मिली हुई थी. संभव है पैसों का बैग भी पुलिस के ही पास हो. चमन सिंह और रुचि की शिकायत पर आईजी मोहित अग्रवाल उसी समय थाना बर्रा पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी रणजीत राय से पूछताछ की. उन की बातों से संतुष्ट न होने पर उन्होंने रणजीत राय को सस्पेंड कर के हरमीत सिंह को थानाप्रभारी नियुक्त कर दिया.

इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने क्राइम ब्रांच व सर्विलांस टीम की मदद से जांच प्रारंभ की. उन्होंने पहले अपहृत संजीत के परिवार वालों से पूछताछ की, फिर संजीत के मोबाइल नंबर को खंगाला, जिस से पता चला अपहरण वाले दिन यानी 22 जून को संजीत के मोबाइल फोन पर एक नंबर से 5 काल आई थीं. 2 बार काल करने वाले ने बात की थी और 3 बार संजीत ने उसी नंबर पर बात की थी. रात पौने 8  बजे संजीत की उस नंबर पर आखिरी बार बात हुई थी. पौने 9 बजे संजीत का मोबाइल और संदिग्ध नंबर के मोबाइल का स्विच्ड औफ हो गया था. फिरौती के लिए अलग नंबर प्रयोग किया गया था. उस नंबर से 22 बार काल की गई थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस टीम ने सिम बेचने वाले दुकानदार का पता लगाया तो पता चला उस की सिम कार्ड की दुकान चकरपुर में हैं. पुलिस ने उसे उठा कर कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने 6 सिम कार्ड बेचने की बात कही. सर्विलांस टीम ने सभी मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवानी शुरू की. साथ ही उन नंबरों को लिसनिंग पर भी लगा दिया. इस के बाद पुलिस ने धनवंतरि अस्पताल की पैथालौजी के 2 कर्मचारियों को हिरासत में लिया. उन में से एक की संदिग्ध नंबर पर बात हुई थी. उस कर्मचारी से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला, वह संदिग्ध नंबर कुलदीप गोस्वामी का था, जो कुछ माह पहले धनवंतरि अस्पताल में काम करता था. लौकडाउन में विवाद होने पर उस ने नौकरी छोड़ दी थी. कुलदीप गोस्वामी पुलिस की रडार पर आया तो उस की तलाश शुरू की गई.

23 जुलाई, 2020 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी हरमीत सिंह को सूचना मिली कि कुलदीप गोस्वामी अपने साथियों के साथ अंबेडकर नगर के पटेल चौक पर मौजूद है. इस सूचना पर हरमीत सिंह क्राइम ब्रांच की टीम के साथ पटेल चौक पहुंच गए. पुलिस को देख कर एक युवती और 4 युवक भागने लगे. लेकिन क्राइम ब्रांच की टीम ने घेराबंदी कर युवती सहित 4 युवकों को गिरफ्तार कर लिया और सुरक्षा की दृष्टि से थाना बर्रा न ले जा कर सीओ औफिस गोविंद नगर ले आए. उन से पूछताछ की गई तो युवकों ने अपना नाम कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह और रामजी शुक्ला बताया. युवती ने अपना नाम प्रीति शर्मा बताया. पकड़े गए सभी युवक थे. उन की उम्र 25 से 30 वर्ष के बीच थी.

पकड़े गए युवकों से जब संजीत यादव के अपहरण के संबंध में पूछा गया तो सब ने मौन धारण कर लिया और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. इस पर उन्हें तराशा गया, आखिर उन्होंने जुबान खोली और बताया कि संजीत अब इस दुनिया में नही है. इन लोगों ने आगे बताया कि अपहरण के 4 दिन बाद उस की हत्या कर दी थी. फिर उस के शव को बोरी में भर कर पांडव नदी में फेंक दिया था. यह सुनते ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह के होश उड़ गए. उन्होंने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही आईजी मोहित अग्रवाल, एसएसपी दिनेश कुमार पी, तथा एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने अपहर्ताओं से पूछताछ की, फिर शव बरामदगी के लिए फ्लड कंपनी बटालियन की 6 बोट तथा 35 गोताखोरों को बुला कर उन्हें पांडव नदी में उतारा गया.

गोताखोरों ने 30 किलोमीटर तक शव को तलाशा, लेकिन शव बरामद नहीं हो सका. इधर अपहर्ताओं की निशानदेही पर पुलिस ने सड़क किनारे झाड़ी में छिपाई गई संजीत की मोटरसाइकिल, अपहरण व हत्या में प्रयुक्त कार, कार में रखा बैग तथा 4 मोबाइल फोन बरामद किए. पुलिस अब तक फिरौती के 30 लाख रुपए बरामद नहीं कर पाई थी. इस बाबत अपहर्ताओं से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि पुलिस के डर से वे नोटों से भरा बैग नहीं ले जा पाए थे. अब सवाल था, जब नोटों से भरा बैग अपहर्ताओं ने नहीं उठाया, तो बैग क्या पुलिस ने गायब कर दिया.

पुलिस अधिकारियों को डर था कि हत्या की खबर फैलते ही बर्रा क्षेत्र में सनसनी फैल जाएगी. लोग सड़क पर उपद्रव मचाएंगे. नेता आग में घी डालने का काम करेंगे, अत: पुलिस अधिकारियों ने पहले क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की, फिर रात 11 बजे चमन सिंह के घर जा कर अपहर्ताओं के पकड़े जाने तथा संजीत की हत्या कर शव को पांडव नदी में बहाने की जानकारी दी. संजीत की हत्या की खबर सुन कर घर में कोहराम मच गया. चमन सिंह, कुसुमा और रुचि चीखनेचिल्लाने लगी. उन की चीखपुकार सुन कर रात के सन्नाटे में मोहल्ले के लोग घरों से निकल आए.

देखते ही देखते सैकड़ों की भीड़ चमन सिंह के घर आ पहुंची. हत्या की जानकारी मिलने पर लोगों का गुस्सा भड़क उठा. मांबेटी की चीखों से महिलाएं द्रवित हो उठीं. रुचि पुलिस अधिकारियों के पैर पकड़ कर बोली, ‘‘आप लोग, जिंदा तो मेरे भाई को ला नहीं पाए, कम से कम मुर्दा ही ला दो. ताकि आखिरी बार उसे राखी बांध सकूं.’’ उस की इस बात पर पुलिस अधिकारी द्रवित हो गए. उन्होंने रुचि को धैर्य बंधाया. 24 जुलाई, 2020 की सुबह 11 बजे आईजी मोहित अग्रवाल तथा एसएसपी दिनेश कुमार पी ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैस वार्ता बुलाई और अपहर्ताओं को प्रिंट तथा इलेक्ट्रौनिक मीडिया के सामने पेश कर संजीत के अपहरण और हत्या का खुलासा कर दिया.

मीडिया के तीखे सवालों के आगे पुलिस अधिकारी बेबस नजर आए. चूंकि अपहर्ताओं ने अपहरण और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थाना बर्रा पुलिस ने पहले से दर्ज अपहरण के मामले में राहुल यादव का नाम हटा दिया और उसी क्राइम नंबर पर भादंवि की धारा 364/302/201/120बी के तहत कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हेें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस जांच तथा अभियुक्तों के बयानों से पैसे के लिए दोस्ती का कत्ल करने की घटना प्रकाश में आई.

कानपुर शहर के बर्रा भाग 5 में रहने वाला संजीत यादव नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथालौजी विभाग में काम करता था. उसी के साथ कुलदीप गोस्वामी तथा ज्ञानेंद्र सिंह काम करते थे. कुलदीप का दोस्त नीलू सिंह था, जबकि ज्ञानेंद्र का दोस्त रामजी शुक्ला था. सभी में खूब पटती थी और सप्ताह में एक बार बीयर पार्टी होती थी. दोस्तों के बीच संजीत धनवान होने का बखान करता था. उस ने दोस्तों को बताया था कि उस के 2 ट्रक चलते हैं, 2 कार हैं, गांव में जमीनमकान है. नौकरी तो वह समय काटने के लिए करता है. जल्द ही अपनी पैथालौजी खोल लेगा.

संजीत का दोस्त ज्ञानेंद्र सिंह दबौली में रहता था. उस के पिता श्रीकृष्ण यादव धनाढ्य थे. उस ने पिता से अस्पताल खोलने के लिए पूंजी लगाने का अनुरोध किया था. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया था. बीएससी नर्सिंग पास ज्ञानेंद्र सिंह महत्त्वाकांक्षी था. वह अमीर बनना चाहता था. पर 10-12 हजार की नौकरी से अमीर नहीं बना जा सकता था. यद्यपि वह ठाटबाट से रहता था. कार से आताजाता था. जनवरी 2020 में कुलदीप और ज्ञानेंद्र सिंह ने धनवंतरि अस्पताल से नौकरी छोड़ दी. ज्ञानेंद्र सिंह संविदा पर हैलट अस्पताल में काम करने लगा जबकि कुलदीप स्वरूपनगर में डा. एस.के. कटियार के यहां नौकरी करने लगा. कुलदीप सरायमीता पनकी में रहता था. उस के पिता प्रेम गोस्वामी किराए की गाड़ी चलाते थे. उस की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी.

कुलदीप की दोस्ती सचेंडी के गज्जापुरवा निवासी नीलू सिंह से थी. वह फरजी काम करता था. उस की मां की मौत हो चुकी थी और पिता चंद्रप्रकाश सरिया मिल में काम करते थे. 3 भाइयों में वह दूसरे नंबर का था. नीलू की एक महिला मित्र थी प्रीति शर्मा. वह हनुमान पार्क कौशलपुरी की रहने वाली थी. उस ने अपने पति को छोड़ दिया था और पनकी में अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी थी. नीलू सिंह का उस के घर आनाजाना था. वह अपनी अवैध कमाई उसी पर खर्च करता था. उस ने कुलदीप से भी उस की दोस्ती करा दी थी. ज्ञानेंद्र सिंह का दोस्त रामजी शुक्ला अंबेडकर नगर (गुजैनी) में रहता था. वह तेजतर्रार और अपराधी प्रवृत्ति का था. उस के पिता योगेश शुक्ला फैक्ट्रीकर्मी थे. छोटा भाई श्यामजी है.

दोनों भाइयों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था, जिस से क्षेत्र में उन का दबदबा था. ज्ञानेंद्र सिंह ने उस से दबंगई की वजह से ही दोस्ती की थी. ज्ञानेन्द्र सिंह को 2 टीवी सीरियल सावधान इंडिया और क्राइम पैट्रोल बेहद पसंद थे. इन सीरियलों को देख कर उस ने अपहरण कर फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने कुलदीप, रामजी शुक्ला, नीलू सिंह व उस की प्रेमिका प्रीति शर्मा को शामिल किया. प्रीति को 3 लाख रुपए देने का लालच दिया गया. एक रोज सब ने सिर से सिर जोड़ कर माथापच्ची की तो संजीत यादव के अपहरण और फिरौती की बात तय हुई. क्योंकि उस के बताए अनुसार संजीत धनवान था.

योजना के तहत नीलू सिंह ने महिला मित्र प्रीति शर्मा के साथ जा कर 15 जून को रतनलाल नगर में ब्रोकर रवींद्र तिवारी की मार्फत 15 हजार रुपया मासिक किराए पर सुनील श्रीवास्तव का मकान ले लिया. मकान किराए पर लेते समय प्रीति को उस ने अपनी पत्नी बताया था. इस मकान में प्रीति अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी. नीलू ने ही फरजी आईडी पर 6 सिम और 4 चाइनीज मोबाइल खरीदे और ज्ञानेंद्र को दे दिए. ज्ञानेंद्र ने चारों मोबाइल आपस में बांट लिए. ये मोबाइल अपहरण में इस्तेमाल करने के लिए थे. इधर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को बेहोश करने के लिए नशे के इंजेक्शन, मुंह पर लगाने के लिए टेप तथा नींद की गोलियां हैलट अस्पताल के सामने मैडिकल स्टोर से खरीदीं.

मैडिकल स्टोर के कर्मचारी ज्ञानेंद्र को जानते थे इसलिए उन्होंने डाक्टर का पर्चा नहीं मांगा. ज्ञानेंद्र ने इस सामान को बैग में सुरक्षित कर कार में रख लिया. 22 जून की शाम 7बज कर 47 मिनट पर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को फोन कर के बताया कि आज उस का जन्मदिन है, पार्टी करने चलते हैं. पार्टी के नाम पर संजीत तैयार हो गया. इस के बाद दोनों का फोन पर संपर्क बना रहा. ज्ञानेंद्र अपनी फोर्ड फीगो कार ले कर शिवाजी पुलिया नौबस्ता के पास खड़ा हो गया. उस समय कार में ज्ञानेंद्र के अलावा कुलदीप, नीलू तथा रामजी शुक्ला मौजूद थे. कुछ देर बाद संजीत आया तो इन लोगों ने उसे कार में बिठा लिया.

कार में ही उन लोगों ने संजीत को शराब पिलाई. उसी में नशीली गोलियां मिला दी गई थीं. बेहोश होेने पर ये लोग उसे रतनलाल नगर स्थित किराए वाले मकान पर ले आए. यहां प्रीति पहले से मौजूद थी. उसी ने दरवाजा खोला. कमरे में ला कर इन लोगों ने संजीत के हाथपैर बांधे, मुंह पर टेप लगाया और नशीला इंजेक्शन लगा दिया. इस के बाद बारीबारी से सब उस की निगरानी करने लगे. 26 जून की रात 10 बजे खाना खाते वक्त संजीत ने भागने का प्रयास किया और गेट तक पहुंच गया. लेकिन नीलू सिंह ने उसे दबोच लिया. इस के बाद ज्ञानेंद्र, कुलदीप व रामजी शुक्ला आ गए. सभी ने मिल कर संजीत का गला घोंट दिया. फिर शव को बोरी में भर कर, कार की डिक्की में रखा और सवेरा होने के पहले ही पांडव नदी में फेंक आए. फिर नीलू को छोड़ कर सब अपनेअपने घर चले गए.

संजीत की हत्या के बाद अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन किया और 30 लाख रुपए की मांग की. 13 जुलाई को उन्होंने फिरौती की रकम ले भी ली. अपहर्त्ताओं ने पुलिस से बचने का भरसक प्रयास किया, लेकिन बच नहीं पाए और पकड़े गए. इधर संजीत की हत्या की खबर प्रिंट मीडिया में छपी और टीवी चैनलों में दिखाई जाने लगी तो राजनीतिक भूचाल आ गया. सपा, बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता प्रदेश की कानूनव्यवस्था पर सवाल खड़े करने लगे तो सीएम योगी तिलमिला उठे. मुख्यमंत्री ने आईजी मोहित अग्रवाल से संजीत प्रकरण की जानकारी जुटाई, साथ ही पुलिस की भूमिका की भी जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने लापरवाह पुलिस अधिकारियों व पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने का फरमान जारी कर दिया.

एसएसपी दिनेश कुमार पी का भी तबादला झांसी कर दिया गया. शासन के आदेश पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, डीएसपी मनोज कुमार गुप्ता, पूर्व बर्रा थानाप्रभारी रणजीत राय, चौकी प्रभारी राजेश कुमार, दरोगा योगेंद्र सिंह, सिपाही अवधेश, भारती, दिशू, विनोद कुमार, सौरभ, मनीष और शिव प्रताप को सस्पेंड कर दिया गया. लेकिन मृतक संजीत की बहन रुचि ने मीडिया से रूबरू हो कर कहा कि सस्पेंड पुलिसकर्मियों की लापरवाही से उस के भाई की हत्या हो गई. इसलिए ये पुलिसकर्मी उतने ही दोषी हैं, जितने अपहर्त्ता. उस की शासन से मांग कि केवल निलंबन से काम नहीं चलेगा. उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जाए.

25 जुलाई, 2020 को थाना बर्रा पुलिस ने अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह, कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक पुलिस न तो शव बरामद कर सकी थी और न ही नोटों भरा बैग. बैग बरामदगी तथा जांच हेतु पुलिस हेडक्वार्टर से एडीजी वी.पी. जोगदंड को भेजा गया. उन्होंने जांच शुरू कर दी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित