उस रात की सच्चाई : प्यार करने की मिली सजा – भाग 2

सच्चाई का पता चलने पर पूरा गांव हैरान रह गया था. आइए अब जानते हैं कि उस रात ऐसा क्या हुआ था कि पुलिस वाले ही नहीं, अशोक सिंह सिकरवार के समर्थन में आए लोग भी हैरान थे. बंधक बनाए गए बदमाश यानी शेर सिंह ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार यह घटना कुछ इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश की ताजनगरी आगरा से यही कोई 30 किलोमीटर दूरी पर बसा है गांव चौगान. ठाकुर बाहुल्य इस गांव के किसान, जिन के पास अपने खुद के खेत थे, यमुना एक्सपे्रसवे का निर्माण होने से उन में से कुछ करोड़पति बन गए हैं. इस की वजह यह है कि 165 किलोमीटर लंबा यमुना एक्सप्रेसवे, जो आगरा से ग्रेटर नोएडा तक बना है, में जिन गांवों की जमीनों का अधिग्रहण किया गया था, उन्हीं गावों में एक चौगान भी था.

यमुना एक्सप्रेस वे के लिए किसानों की जमीन का अधिग्रहण किया जाने लगा था तो किसानों ने मिलने वाले मुआवजे के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था. परिणामस्वरूप उन्हें मुंहमांगा मुआवजा मिला था, जिस से जिन किसानों की ज्यादा जमीनें गईं वे रातोंरात करोड़पति बन गए. ऐसे ही लोगों में चौगान गांव के भी 2 परिवार थे. उन में से एक था ठाकुर रामदयाल सिंह सिकरवार का परिवार तो दूसरा था अमर सिंह का. अमर सिंह की लगभग 20 साल पहले मौत हो चुकी थी. वर्तमान में उस के 4 बेटे थे, जो करोड़पति बन गए थे.

वैसे तो अशोक सिंह और अमर सिंह के घरों के बीच मात्र 100 कदम की दूरी रही होगी, लेकिन उन के बीच कोई आपसी सामंजस्य नहीं था. इस की वजह यह थी कि रामदयाल सिंह सिकरवार जहां ठाकुर थे, वहीं अमर सिंह दलित. शायद इसीलिए दोनों परिवार रहते भले ही आसपास थे, लेकिन उन में दुआसलाम तक नहीं थी.

अमर सिंह अपने पीछे 4 बेटों और 2 बेटियों का भरापूरा परिवार छोड़ गया था. उस के बेटों में शेर सिंह सब से छोटा था. पढ़ाई में तो वह ठीकठाक था ही, खेलकूद में भी अव्वल था. वह क्रिकेट बहुत अच्छा खेलता था, इसीलिए कालेज की क्रिकेट टीम का वह कप्तान था.

जिस विमला देवी इंटर कालेज में वह पढता था, उसी कालेज में उस के पड़ोस में रहने वाले अशोक सिंह सिकरवार की बेटी रुचि उर्फ रश्मि भी पढ़ती थी. उसे भी खेलकूद में रुचि थी, इसलिए वह भी स्कूल के खेलों में भाग लेती रहती थी. भले ही रुचि और शेर सिंह के परिवारों में कोई सामंजस्य नहीं था, लेकिन एक ही कालेज में पढ़ने की वजह से शेर सिंह और रुचि में पटने लगी थी.

साथ आनेजाने और खेल के मैदान में मिलते रहने की वजह से रुचि और शेर सिंह के बीच कब प्यार पनप उठा, उन्हें पता ही नहीं चला. हंसीमजाक और छेड़छाड़ में उन का यह प्यार बढ़ता ही गया. जब उन्हें लगा कि मिलने के दौरान वे पूरी बातें नहीं कर पाते तो उन्होंने बातें करने के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करना शुरू कर दिया. फिर तो उन के बीच रात को लंबीलंबी बातें होने लगीं. शेर सिंह के पास अपनी मोटरसाइकिल थी, इसलिए रुचि कभीकभार उस की मोटरसाइकिल पर बैठ कर उस के साथ आगरा घूमने जाने लगी.

ऐसे में ही रुचि और शेर सिंह का प्यार शारीरिक संबंध में बदल गया. दोनों घर के बाहर तो मिलते ही थे, मौका देख कर रुचि शेर सिंह को अपने घर भी बुला लेती थी. इस में मोबाइल फोन उन की पूरी मदद करता था. रुचि जब भी घर में अकेली होती, फोन कर के शेर सिंह को बुला लेती.

रुचि की दोनों बहनें एक ही कमरे में एक साथ सोती थीं. जबकि रुचि पढ़ाई के बहाने अलग कमरे में अकेली ही सोती थी. क्योंकि अकेली होने की वजह से रात में उसे शेर सिंह से बातें करने में कोई परेशानी नहीं होती थी. एक समय ऐसा आ गया रुचि रात को घर वालों की उपस्थिति में ही रात को शेर सिंह को अपने घर बुलाने लगी.

उसी बीच गांव के किसी आदमी ने रुचि के पिता अशोक सिंह सिकरवार को बताया कि उस ने उन की बड़ी बेटी रुचि को गांव के ही शेर सिंह की मोटरसाइकिल पर बैठ कर शहर में घूमते देखा है. अशोक सिंह के लिए यह बहुत बड़ा झटका था. जिस घरपरिवार से कोई राहरीति न हो, उस घर के लड़के के साथ बेटी के घूमने का मतलब वह तुरंत समझ गए उन की बेटी गांव के ही दलित लड़के के साथ घूम रही है. यह सुन कर उन का खून खौल उठा.

अशोक सिंह ने तुरंत अपने भाइयों को बुलाया और दरवाजे पर कुर्सियां डाल कर बैठ गए. थोड़ी देर बाद रुचि लौटी तो सिर झुकाए सीधी घर की ओर चली जा रही थी. उस के हावभाव से ही लग रहा था कि वह कोई गलत काम कर के आई है और घर वालों से नजरें छिपा रही है. रुचि घर में घुसती, उस के पहले ही अशोक सिंह ने कहा, ‘‘रुचि, जरा इधर तो आना.’’

रुचि उन के सामने आ कर खड़ी हो गई. जब उस की नजरें पिता से मिलीं तो उस की तो जैसे हलक ही सूख गई.नजरों से ही उस ने भांप लिया कि पिता गुस्से में हैं. वह रुचि से कुछ कहते, उन के भाई ने कहा, ‘‘इसे जाने दो. इस से घर के अंदर चल कर बात करेंगे.’’

रुचि चुपचाप घर चली गई. लेकिन वह समझ गई कि आज का दिन उस के लिए ठीक नहीं है. उस की यह आशंका तब और बढ़ गई, जब उस के घर के अंदर आने के 10 मिनट बाद ही बाहर से शेर सिंह के रोनेचीखने की आवाजें आती उसे सुनाई दीं.

दरअसल शेर सिंह रुचि को गांव के बाहर अपनी मोटरसाइकिल से उतार कर रुक गया था, जिस से गांव वालों को यही लगे कि दोनों आगे पीछे आए हैं. रुचि घर पहुंच गई होगी, यह सोच कर वह अपने घर जाने लगा तो अशोक सिंह ने आवाज दे कर उसे बुला लिया. वह जैसे ही उन के पास पहुंचा, तीनों भाई लाठीडंडा ले कर उस पर पिल पड़े. वह बचाव के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन किसी की क्या कहें, उस के भाइयों तक की हिम्मत नहीं पड़ी कि वे उसे बचाने आते.

अशोक सिंह और उन के भाई मारपीट कर थक गए तो उस के भाइयों से कहा कि इसे उठा ले जाओ. भाइयों ने शेर सिंह को घर ला कर इस मारपीट की वजह पूछी तो उस ने सच न बता कर कहा कि वह उधर से गुजर रहा था, तभी अशोक ने उसे रोक लिया और भाइयों के साथ पिटाई करने लगा. शेर सिंह के भाई भी पैसे वाले थे, उन्होंने सच्चाई का पता लगाने के बजाय शेर सिंह को साथ ले जा कर पुलिस चौकी पहुंचे और अशोक सिंह तथा उस के भाइयों के खिलाफ मारपीट की तहरीर दिलवा दी.

पुलिस ने अशोक सिंह को चौकी पर बुलवा कर मारपीट की वजह पूछी तो अशोक सिंह ने जो बताया, उस से शेर सिंह के भाइयों को भी सच्चाई का पता चल गया. सच्चाई पता चलने पर पुलिस ने इस मामले में कोई काररवाई इसलिए नहीं कि गांव की बात है, आपस में मामला सुलझ जाएगा. पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो शेर सिंह को गुस्सा आ गया. इतनी मारपीट के बाद उसे रुचि से दूर हो जाना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. शेर सिंह इस मारपीट का बदला रुचि से शारीरिक संबंध बना कर लेने लगा.

रुचि बीएससी सेकेंड ईयर में पढ़ रही थी. जबकि शेर सिंह ने पढ़ाई छोड़ कर छलेसर चौराहे पर जनरल स्टोर की दुकान खोल ली थी. अशोक सिंह ने अपने मकान की छत पर आनेजाने के लिए घर के बाहर से सीढि़यां बनवा रखी थीं. इसलिए उन की छत पर जाना तो आसान था, लेकिन घर के अंदर उतरने की कोई व्यवस्था नहीं थी.

इसलिए शेर सिंह ठंड की रातों में रुचि से मिलने उस के घर जाता था तो बाहर से बनी सीढि़यों से छत पर चढ़ जाता था. नीचे उतरने के लिए रुचि नीचे से साड़ी या रस्सी फेंक देती थी, जिसे आंगन की ओर बनी रेलिंग में बांध कर शेर सिंह नीचे आंगन में उतर आता था. उस के बाद रुचि उसे अपने कमरे में ले कर चली जाती थी.

काम होने के बाद शेर सिंह जिस तरह आता था, उसी तरह वापस चला जाता था. लेकिन यह सब ठंडी की रातों में ही हो पाता था. गर्मी के दिनों में सब बाहर सोते थे, इसलिए इस तरह दोनों का मिलना नहीं हो पाता था.

जवानी बनी जान की दुश्मन – भाग 2

शीला के अपहरण और हत्या के मामले में 4 लोगों को जेल तो भेज दिया गया, लेकिन उस के बारे में कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी बरामद नहीं हुई. शीला के गायब होने से अब वे लोग भी परेशान थे, जिन्हें जेल भेजा गया था. अब उन के घर वाले भी शीला की तलाश में लग गए, क्योंकि वे तभी जेल से बाहर आ सकते थे, जब शीला का कुछ पता चलता.

वे शीला की तलाश तो कर ही रहे थे, इस के अलावा उन्होंने गांव वालों तथा रिश्तेदारों की एक पंचायत भी बुलाई. इस पंचायत में श्रीनिवास तथा उस के गांव के भी 10-12 लोगों को बुलाया गया था. पंचायत में जेल भेजे गए लोगों के घर वालों ने शीला के चरित्र पर सवाल उठाते हुए किसी के साथ भाग जाने का आरोप लगाया तो श्रीनिवास भड़क उठा. उस ने शीला के जेठ और देवरों और देवरानी को शीला के अपहरण और हत्या को दोषी मानते हुए अपनी काररवाई को उचित ठहराया.

श्रीनिवास अपनी जिद पर अड़ा रहा तो 3-4 घंटों तक बातचीत चलने के बाद पंचायत बिना किसी फैसले के खत्म हो गई. जिस काम के लिए यह पंचायत बुलाई गई थी, वह वैसा का वैसा ही रह गया. जेल भेजे गए लोगों की रिहाई भी नहीं हो सकी. शीला के गायब होने से उस के घर तथा मायके वाले तो परेशान थे ही, उन के घर वाले भी परेशान थे, जो जेल भेजे गए थे.

सभी इस कोशिश में लगे थे कि कहीं से भी शीला का कोई सुराग मिल जाता. उन लोगों की कोशिश कोई रंग लाती, उस से पहले ही शीला के बारे में अपने आप पता चल गया. किसी ने फिरोजाबाद में रहने वाली शीला की बुआ महादेवी को फोन कर के बताया कि उन की भतीजी शीला का शव निबोहरा रोड से थोड़ा आगे सड़क से अंदर जा कर एक कंजी के पेड़ के नीचे पड़ा है.

इस खबर से महादेवी चौंकी. उस ने फोन अपने बेटे शीलू को पकड़ा दिया. शीलू ने उस से जानना चाहा कि वह कौन है और कहां से बोल रहा है तो उस ने फोन काट दिया. शीलू ने तुरंत यह बात श्रीनिवास को बताई और वह फोन नंबर भी लिखा दिया, जिस नंबर से फोन कर के यह बताया गया था.

श्रीनिवास वह नंबर देख कर चौंका, क्योंकि वह नंबर उस की बहन शीला का ही था. देर किए बगैर श्रीनिवास कुछ दोस्तों को साथ ले कर बहन की लाश की तलाश में बताए गए स्थान की ओर चल पड़ा. निबोहरा रोड 10 किलोमीटर के आसपास थी. इतनी बड़ी सड़क पर सड़क से थोड़ा अंदर जा कर कंजी का पेड़ तलाशना आसान नहीं था. श्रीनिवास दोस्तों के साथ शीला के शव की तलाश में घंटों लगा रहा.

काफी कोशिश के बाद भी उन्हें लाश नहीं मिली. अंत में निराश हो कर सब लौट पड़े. वे शमसाबाद चौराहे पर पहुंचे थे कि श्रीनिवास के मोबाइल पर फोन आया. उस ने नंबर देखा तो वह शीला का था. उस ने फोन रिसीव करने के साथ ही रिकौर्डिंग चालू कर दी, जिस से वह फोन करने वाले की बात रिकौर्ड कर सके.

फोन रिसीव होते ही दूसरी ओर से कहा गया, ‘‘भाई साहब, आप लोग शीला की लाश जहां ढूंढ़ रहे थे, वह जगह तो काफी आगे है. शीला की लाश शमसाबाद चौराहे से निबोहरा रोड पर 2 किलोमीटर के अंदर ही पड़ी है.’’

‘‘भाई, तुम बोल कौन रहे हो? यह शीला का मोबाइल तुम्हें कहां से मिला? तुम्हें कैसे पता कि शीला की हत्या हो चुकी है और उस की लाश निबोहरा रोड पर थोड़ा अंदर जा कर कंजी के पेड़ के नीचे पड़ी है?’’ श्रीनिवास ने एक साथ कई सवाल पूछ लिए.

श्रीनिवास के सवालों का जवाब देने के बजाय दूसरी ओर से फोन काट दिया गया. निराश और थकेमांदे श्रीनिवास के अंदर इस दूसरे फोन ने जान डाल दी. एक बार फिर वह फोन पर बताई गई जगह पर जा कर लाश की तलाश करने लगा. आखिर उस की मेहनत रंग लाई और वह बदनसीब घड़ी आ गई, जिस का कोई भी भाई इंतजार नहीं करना चाहता.

लाश इस तरह सड़ चुकी थी कि पहचान में नहीं आ रही थी. श्रीनिवास ने अपनी मां और थाना शमसाबाद पुलिस को शीला की लाश मिलने की सूचना दे दी. तब थाना शमसाबाद पुलिस ने थाना फतेहाबाद पुलिस को सूचना देने को कहा, क्योंकि जहां शीला की लाश पड़ी थी, वह जगह थाना फतेहाबाद के अंतर्गत आती थी. तब श्रीनिवास ने 100 नंबर पर फोन कर के सारी बात बताई. इस के बाद जिला नियंत्रण कक्ष ने थाना फतेहाबाद के थानाप्रभारी मुनीष कुमार को सूचना दे कर तत्काल काररवाई का निर्देश दिया.

बेटी की लाश मिलने की सूचना पा कर रामदेवी भी घटनास्थल पर जा पहुंची. शक्लसूरत से वह भी लाश को नहीं पहचान सकी. तब उस ने बेटी की लाश कान के कुंडल, गले के मंगलसूत्र और साड़ी से पहचानी. अब तक थाना फतेहाबाद के प्रभारी मुनीष कुमार भी सहयोगियों के साथ वहां पहुंच गए थे.

लाश देख कर ही वह जान गए कि 3-4 दिनों पहले हत्या कर के इसे यहां ला कर फेंका गया है. क्योंकि वहां संघर्ष का कोई निशान नहीं था. जिस से साफ लगता था कि हत्या यहां नहीं की गई है. इस के अलावा लाश के पास तक मोटरसाइकिल के टायरों के आने और जाने के निशान भी थे.

लाश से इतनी तेज दुर्गंध आ रही थी कि वहां खड़ा होना मुश्किल हो रहा था. इसलिए पुलिस ने आननफानन में जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज भिजवा दिया. इस के बाद थाना शमसाबाद पुलिस ने अपने यहां दर्ज शीला के अपहरण और हत्या का मुकदमा थाना फतेहाबाद पुलिस को स्थानांतरित कर दिया, जहां यह अपराध संख्या 183/2013 पर भादंवि की धाराओं 302, 201 के अंतर्गत दर्ज हुआ. मुकदमा दर्ज होते ही थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने जांच शुरू कर दी. यह 3 अगस्त, 2013 की बात है.

मुनीष कुमार ने सब से पहले श्रीनिवास से पूछताछ की. उस ने शुरू से ले कर लाश बरामद होने तक की पूरी कहानी उन्हें सुना दी. उस की इस कहानी में मृतका शीला के मोबाइल फोन से उस की हत्या और लाश पड़ी होने की बताने वाली बात चौंकाने वाली थी, क्योंकि अकसर हत्या करने वाले मृतक का मोबाइल सिम निकाल कर फेंक देते हैं. जिस से वे पकड़े न जाएं. लेकिन यहां मामला अलग था. साफ था कि मृतका का मोबाइल जिस किसी के भी पास था, वह उस के हत्यारे को जानता होगा या खुद ही हत्यारा होगा.

यही सोच कर मुनीष कुमार ने उस नंबर को सर्विलांस टीम को सौंप दिया, क्योंकि इस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन हत्यारे तक पहुंचा सकती थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार शीला की हत्या 31 जुलाई, 2013 की शाम को गला दबा कर की गई थी. लेकिन गला दबाने से पहले उसे कोई जहरीली चीज भी खिलाई गई थी. इस का मतलब शीला की हत्या उसी दिन हो गई थी, जिस दिन वह गायब हुई थी.

भाजपा नेता ने हड़पी करोड़ों की जमीन – भाग 2

आरोपियों की तलाश में जुटीं 5 पुलिस टीमें

इधर पुलिस कमिश्नर आर.के. स्वर्णकार तथा जौइंट पुलिस कमिश्नर आनंद प्रकाश तिवारी ने किसान बाबू सिंह यादव की आत्महत्या के मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए कानपुर शहर के तेजतर्रार इंसपेक्टरों को चुन कर 5 टीमें बनाईं.

R. K. Swarnkar (CP)

राहुल जैन की गिरफ्तारी के लिए एक टीम को नोएडा भेजा गया. दूसरी टीम शुभम चौहान की गिरफ्तारी के लिए मैनपुरी भेजी गई. तीसरी टीम को मधुर पांडेय, बबलू यादव व जितेंद्र यादव की गिरफ्तारी के लिए कानपुर तैनात किया गया.

चौथी टीम को रसूखदार नेता प्रियरंजन आशू दिवाकर की गिरफ्तारी के लिए लगाया गया. पांचवीं टीम को रिजर्व रखा गया, ताकि सूचना मिलने पर उसे कहीं भी भेजा जा सके. इन टीमों ने आरोपियों के घरों तथा संभावित ठिकानों पर छापे मारे, लेकिन कोई भी आरोपी गिरफ्त में नहीं आया.

Amar nath

इन टीमों ने लखनऊ, कानपुर, मैनपुरी, प्रयागराज, फतेहपुर, उन्नाव व जबलपुर के विभिन्न होटलों, आरोपियों के रिश्तेदारों व यारदोस्तों के आवासों पर छापेमारी की, लेकिन एक भी आरोपी हाथ नहीं आया.

आरोपी रसूखदार नेता डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर को पकडऩे के लिए पुलिस टीम ने उन के श्याम नगर स्थित घर पर छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. पुलिस टीम ने उस की पत्नी अनामिका, मां उर्मिला, भाभी रेनू तथा बेटे से सख्ती से पूछताछ की, लेकिन वे आशू दिवाकर के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सके. टीम उस की तलाश में जबलपुर तक गई, पर उस का पता न चला.

जांच के नाम पर होती रही खानापूर्ति

एक भी गिरफ्तारी न होने से नाराज बिटान देवी का गुस्सा योगी सरकार पर फूट पड़ा. वह बोली, ‘‘मेरा सुहाग लुट गया… बेटियां अनाथ हो गईं… जमीन छिन गई… रुपया भी नहीं मिला. योगीजी, इन हत्यारों, लुटेरों पर आप का बुलडोजर कब चलेगा? इतना बड़ा अपराध करने वाले आराम से कहीं छिपे बैठे है. योगीजी, आप की पुलिस जांच कर रही है कि लीपापोती के खिलवाड़ में लगी है. अपराधी गिरफ्तार न हुए और हड़पी गई जमीन वापस न मिली तो बेटियों के साथ मैं भी ट्रेन से कट कर जान दे दूंगी.’’

Bitan Devi (Mratak Ki Patni)

बिटान देवी व उस की बेटियों के आंसू पोंछने सत्ता पक्ष का कोई सांसद या विधायक नहीं आया. लेकिन समाजवादी पार्टी के आर्यनगर (कानपुर) क्षेत्र के विधायक अमिताभ बाजपेई तथा कैंट क्षेत्र के विधायक मोहम्मद हसन रूमी बिटान देवी के घर पहुंचे. उन्होंने पीडि़त परिवार को धैर्य बंधाया और न्याय दिलाने का भरोसा दिया. इन्होंने बिटान देवी व उस की बेटियों रूबी व काजल को आश्वासन दिया कि वह कंधे से कंधा मिला कर उन का साथ देंगे.

गिरफ्तारी न होने से बिटान देवी व उस की बेटियों ने आरोपियों की फोटो जला कर आक्रोश जताया. पुलिस कमिश्नर आर.के. स्वर्णकार और जौइंट सीपी आनंद प्रकाश तिवारी से मुलाकात कर आरोपियों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी की मांग की.

इस के बाद उन्होंने जा कर डीएम विशाखजी को ज्ञापन सौंपा और मांग की कि उन की जमीन का दाखिल खारिज रद्ïद कर के जमीन उन्हें वापस कराई जाए और आरोपी भाजपा नेता के घर बुलडोजर चलाया जाए. बेटियों ने मुख्यमंत्री को संबोधित एक ज्ञापन भी उन्हें सौंपा. डीएम विशाखजी ने जल्द ही उचित काररवाई का उन्हें आश्वासन दिया.

धोखाधड़ी और आत्महत्या मामले की जांच थाना चकेरी के एसएचओ अशोक कुमार दुबे को सौंपी थी. उन्होंने जब मृतक बाबू सिंह के बैंक खाते को चैक किया तो पता चला कि उस के बैंक खाते में 2 चैक 5 लाख तथा 1 लाख 85 हजार के जमा हुए थे. ये दोनों चैक पास हुए और खाते में पैसा आया. ये दोनों चेक मधुर पांडेय ने दिए थे. इस के बाद उस के खाते में कोई पैसा नहीं आया.

स्पष्ट था कि उस के साथ 6 करोड़ 29 लाख की फाइनेंशियल धोखाधड़ी की गई और जमीन हड़प ली गई. शातिरों ने जो चैक दिए थे, वे रजिस्ट्री होने के बाद छीन लिए थे और फोटोकापी उसे थमा दी थी. इस के बाद जांच अधिकारी ने सभी आरोपियों के 13 बैंक खातों को सीज करा दिया ताकि लेनदेन की पूरी जानकारी मिल सके.

ननिहाल से मिली थी 10 बीघा जमीन

बाबू सिंह यादव मूलरूप से नर्वल (कानपुर) का रहने वाला था. उस के 2 अन्य भाई रामसिंह व अमर सिंह थे. तीनों भाइयों के बीच 12 बीघा जमीन थी. सभी के हिस्से में 4-4 बीघा जमीन आई. राम सिंह के 2 बेटे मुन्ना सिंह व विनय सिंह थे जबकि अमर सिंह के भी 2 बेटे धर्मेंद्र सिंह व जितेंद्र थे. तीनों भाइयों के बीच कोई विवाद नहीं था.

तीनों भाइयों में सब से छोटा बाबू सिंह था. बाबू सिंह का ननिहाल कानपुर नगर के चकेरी थाने के अहिरवां गांव में था. इस गांव में बाबू सिंह के नाना सुखदेव यादव अपनी पत्नी पूसा देवी के साथ रहते थे. उन के पास 10 बीघा जमीन थी. खेतीकिसानी से उन का जीवनयापन होता था.

सुखदेव यादव संपन्न तो थे, लेकिन उन के कोई बेटा नहीं था. अत: अपने बुढ़ापे का सहारा बनाने के लिए उन्होंने किसी बच्चे को गोद लेने तथा उसे अपना घरजमीन वसीयत करने का निश्चय किया. उन्हीं दिनों पूसा देवी की निगाह अपने नाती बाबू सिंह पर पड़ी. उस समय बाबू सिंह की उम्र 5 साल थी. पूसा देवी ने बाबू सिंह को ही गोद लेने तथा अपनी वसीयत सौंपने का निश्चय किया. इस के लिए उन्होंने अपने पति सुखदेव को भी राजी कर लिया.

22 जुलाई, 1978 को पूसा देवी ने विधि सम्मत गोदनामा कर बाबू सिंह को गोद ले लिया. गोदनामा का पंजीकरण उप निबंधक कानपुर के कार्यालय में बही संख्या 4, जिल्द संख्या 782 के पेज संख्या 150-151 की क्रमांक संख्या 532 पर दर्ज किया गया. इस के बाद बाबू सिंह नानानानी के साथ अहिरवां गांव में रहने लगा. नानानानी ने घर और जमीन की वसीयत भी उसे कर दी.

कालांतर में पति सुखदेव की मौत के बाद पूसा देवी अपने मायके चली गईं. उन का मायका कानपुर की नर्वल तहसील के गांव घरूवा खेड़ा में था. बाबू सिंह भी उन के साथ चला गया. पूसा देवी ने बाकी का जीवन मायके में ही गुजारा. 14 नवंबर, 1997 को पूसा देवी का निधन हो गया.

नानी के निधन के बाद बाबू सिंह अपनी पत्नी बिटान देवी व दोनों बेटियों रूबी व काजल के साथ अहिरवां गांव में रहने लगा और वसीयत में मिली 10 बीघा जमीन पर खेती कर अपने परिवार का भरणपोषण करने लगा. समय बीतता रहा और समय के साथ उस की बेटियों की उम्र भी बढ़ती गई.

अहिरवां गांव पहले शहर की चकाचौंध से दूर था. लेकिन जैसेजैसे कानपुर शहर का विकास होता गया, वैसेवैसे गांव की अहमियत बढ़ती गई. अहिरवां गांव की जमीन भी अब कीमती हो गई. जो जमीन लाखों की थी, वह करोड़ों में तब्दील हो चुकी थी.

बाबू सिंह का एक रिश्तेदार था नरेंद्र सिंह यादव. वह अहिरवां गांव में ही रहता था. वह दिखावे के तौर पर तो बाबू सिंह का सगा था, लेकिन पीठ पीछे उस से जलता था. यह जलन उसे बाबू सिंह को वसीयत में मिली जमीन को ले कर थी. धीरेधीरे उस ने वसीयत वाली जमीन पर आंखें जमानी शुरू कर दीं. उस ने बाबू सिंह को शराब पीने का भी आदी बना दिया. वर्ष 2018 में नरेंद्र ने फरजी वसीयत बनवा कर अपनी दबंगई के बल पर बाबू सिंह की जमीन पर कब्जा जमा लिया.

प्रियरंजन ने सहयोग कर के भरोसा जीता बाबू सिंह का

रिश्तेदार के घात से बाबू सिंह तिलमिला उठा. उसे जब कोई रास्ता नहीं सूझा तो जमीन वापसी के लिए उस ने कोर्ट में मुकदमा कर दिया. यही नहीं उस ने भतीजे जितेंद्र यादव से भी मदद मांगी. जितेंद्र भी अहिरवां में ही रहता था और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. उस ने चाचा को मदद का आश्वासन दिया.

जितेंद्र का साढ़ू था बबलू यादव. वह चकेरी थाने के टटियन झनाका में रहता था और भाजपा के रसूखदार नेता प्रियरंजन आशू दिवाकर की कार चलाता था. जितेंद्र ने बबलू को अपने चाचा बाबू सिंह की समस्या बताई और प्रियरंजन आशू दिवाकर के मार्फत चाचा की मदद करने को कहा. बबलू ने तब बाबू सिंह की मुलाकात आशू दिवाकर से कराई. आशू दिवाकर ने उसे मदद करने का भरोसा दिया.

जेठानी की आशिकी ने बनाया कातिल

उस रात की सच्चाई : प्यार करने की मिली सजा – भाग 1

रात के यही कोई 11 बजे आगरा के थाना एतमादपुर के गांव चौगान से जिला नियंत्रण कक्ष को फोन द्वारा सूचना दी गई कि गांव के  अशोक सिंह के घर हथियारों से लैस कुछ बदमाश लूटपाट के इरादे से घुस आए थे. घर वालों ने बदमाशों से मोर्चा लिया तो बदमाश भाग निकले. लेकिन लूटपाट का विरोध करने की वजह से जातेजाते बदमाशों ने अशोक सिंह की बड़ी बेटी को गोली मार दी है, जिस की तुरंत मौत हो गई है. बाकी बदमाश तो भाग गए लेकिन एक बदमाश को उन लोगों ने बंधक बना लिया है.

खबर सनसनीखेज थी, लिहाजा पुलिस कंट्रोलरूम ने तुरंत इस खबर को पूरे जिले में प्रसारित कर दी.चौगान गांव थाना एतमादपुर के अंतर्गत आता था, इसलिए गश्त पर निकले एतमादपुर के थानाप्रभारी अमित कुमार ने जीप में लगे वायरलेस सेट से जैसे ही लूटपाट के इरादे से की गई हत्या की खबर सुनी, तत्काल चौगान गांव के लिए रवाना हो गए. उस समय उन के साथ 6 सिपाही थे. जीप से ही उन्होंने फोन द्वारा इस घटना की सूचना पुलिस चौकी छलेसर के प्रभारी टोडी सिंह को दे कर चौगान पहुंचने के लिए कह दिया था.

पुलिस को अशोक सिंह का घर ढूंढ़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. गोलियों की आवाज और चीखचिल्लाहट से पूरा गांव जाग चुका था. इसलिए गांव में घुसते ही गांव वालों ने पुलिस को अशोक सिंह के घर पहुंचा दिया था. गांव वालों के साथ घर के बाहर खड़े अशोक सिंह अपनी लाइसेंसी रिवाल्वर के साथ पुलिस का इंतजार कर रहे थे. घर के अंदर से रोने की आवाजें आ रही थीं. अशोक सिंह के अन्य भाईभतीजे भी वहां मौजूद थे.

अशोक सिंह के जिस मकान में डकैती पड़ी थी, वह 6-7 कमरों का एकमंजिला मकान था. उन का यह मकान चारों ओर से बंद था, लेकिन छत से हो कर मकान के अंदर आसानी से जाया जा सकता था. क्योंकि छत पर जाने की सीढि़यां बाहर से बनी थीं.

पुलिस मकान के अंदर पहुंची तो देखा कि छत पर आंगन की ओर लगी रेलिंग से बंधी एक साड़ी लटक रही थी. पुलिस को अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि किसी बदमाश के इसी साड़ी के सहारे नीचे आ कर बाकी बदमाशों के आने के लिए दरवाजे की कुंडी खोली होगी.

पूछताछ में अशोक सिंह ने बताया, ‘‘साहब, मैं अपनी पत्नी कमला देवी के साथ अपने कमरे में सो रहा था तो मेरे दोनों बेटे सचिन और विपिन अपनेअपने कमरों में सो रहे थे. एक कमरे में मेरी 2 बेटियां सो रहीं थीं. चूंकि बड़ी बेटी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही थी, इसलिए वह देर रात तक जाग कर पढ़ाई करती थी. इसी वजह से वह अकेली अलग कमरे मे सोती थी.’’

‘‘रात पौने 11 बजे के आसपास मैं ने बड़ी बेटी रुचि के चीखने की आवाज सुनी तो तुरंत कमरे से बाहर आ गया. वही आवाज सुन कर मेरे बेटे भी अपनेअपने कमरे से बाहर आ गए थे. रुचि के चीखते ही तड़ातड़ गोलियां चली थीं. उस के साथ एक बार फिर रुचि चीखी थी.

गोलियां चलाने वाले मुख्य दरवाजे की ओर भाग रहे थे, क्योंकि वे जान गए थे कि अब उन का मकसद पूरा नहीं होगा. तभी मेरी नजर रुचि पर पड़ी, जो गोलियों से घायल हो कर आंगन में गिरी पड़ी थी. बाकी बदमाश तो भाग गए, लेकिन एक बदमाश नहीं भाग सका. उसे हम ने हथियारों के बल पर कमरे में बंद कर दिया है.’’

मामला काफी गंभीर था. आंगन में एक जवान लड़की की लाश पड़ी थी. उस के शरीर से अभी भी खून बह रहा था. आंगन की ओर दीवारों पर गोलियों के कुछ निशान नजर आ रहे थे. माना गया कि बदमाशों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं होंगी, जिस से कुछ गोलियां दीवारों पर जा लगी थीं.

घटना की सूचना थानाप्रभारी अमित कुमार ने पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. इसी सूचना के आधार पर डीआईजी विजय सिंह मीणा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर, पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण-पश्चिम) बबीता साहू, क्षेत्राधिकारी अवनीश कुमार गांव चौगान पहुंच गए थे. इन अधिकारियों ने भी घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के साथ अशोक सिंह तथा घर के अन्य लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की.

बंधक बना बदमाश अभी तक कमरे में बंद था. उस ने अंदर से कुंडी लगा रखी थी. बदमाश के पास कोई भी हथियार हो सकता था. इस स्थिति में पुलिस ने उसे रात में निकालना उचित नहीं समझा, क्योंकि पुलिस का मानना था कि वह अपनी जान बचाने के लिए पुलिस पर भी हमला कर सकता है.

पुलिस ने सुबह तक का इंतजार करना उचित समझा. सवेरा होने पर खिड़की और झरोखों से देख कर यह निश्चित कर लिया गया कि बंधक बनाए गए बदमाश के पास कोई हथियार नहीं है तो पुलिस ने उस से दरवाजा खोलने को कहा. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में जान की भीख मांगते हुए बदमाश ने दरवाजा खोल दिया.

कमरे से निकला बदमाश 24-25 साल का हट्टाकट्टा नौजवान था. बदमाश के बाहर आते ही पुलिस उस के साथियों के नाम पते पूछने लगी तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मुझे थाने ले चलो, क्योंकि यहां मेरी जान को खतरा है. थाने में मैं सब कुछ बता दूंगा.

क्षेत्राधिकारी अवनीश कुमार ने बदमाश का मुंह ढंक कर जीप में बैठाया और थानाप्रभारी अमित कुमार की देखरेख में उसे थाना एतमादपुर ले जाने के लिए कहा. इस के बाद अधिकारियों की देखरेख में चौकीप्रभारी टोडी सिंह ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर बदमाशों की गोली का शिकार अशोक सिंह की बेटी रुचि की लाश को पोस्टमार्टम के लिए आगरा के एस.एन. मेडिकल कालेज भिजवा दिया. पुलिस ने घटनास्थल से कारतूसों के खोखे भी कब्जे में ले लिए थे.

इस के बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर सहयोगियों के साथ चलने लगे तो उन्होंने अशोक सिंह से थाने चल कर रिपोर्ट लिखवाने को कहा. तब उस ने बड़ी ही लापरवाही से कहा, ‘‘सर, आप चलिए. मैं घर वालों को समझाबुझा कर थोड़ी देर में आता हूं.’’

अशोक सिंह का यह जवाब वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर की समझ में नहीं आया. जिस की बेटी को बदमाशों ने मार दिया था और एक बदमाश पकड़ा भी गया था. इस के बावजूद भी वह आदमी मुकदमा दर्ज कराने में हीलाहवाली कर रहा था. वह उसे साथ ले जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने कहा, ‘‘देखो, रिपोर्ट जितनी जल्दी लिख जाएगी, पुलिस उतनी ही जल्दी काररवाई शुरू कर देगी. तुम्हारी बेटी के हत्यारों को पकड़ना भी है. बिना रिपोर्ट लिखे पुलिस कोई भी काररवाई करने से रही. इसलिए जितनी जल्दी हो सके तुम्हें थाने चल कर रिपोर्ट लिखा देनी चाहिए.’’

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की इस बात का अशोक सिंह पर कुछ असर पड़ा. उस ने अपने भाइयों, पत्नी और बेटों से कुछ सलाहमशविरा किया और फिर पुलिस के साथ थाने आ गया. उसी के साथ गांव के तमाम अन्य लोग भी उस बदमाश को देखने थाने आ गए थे.

पुलिस ने पहले तो गांव वालों को थाना परिसर से बाहर निकाला. क्योंकि वे बदमाश को सामने लाने की बात कर रहे थे. साथ ही वे यह भी कह रहे थे कि जल्दी रिपोर्ट लिख कर अशोक सिंह को जाने दो. गांव वालों को बाहर निकाल कर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक शलभ माथुर की उपस्थिति में पकड़े गए बदमाश से उस के साथियों के बारे में पूछा गया तो उस ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस दंग रह गई.

पता चला, पकड़ा गया युवक बदमाश नहीं, उसी गांव का रहने वाला शेर सिंह था. उस ने पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार सारा मामला ही पलट गया था. उस के बताए अनुसार रुचि की हत्या का मुकदमा बदमाशों के बजाय उस के पिता अशोक सिंह सिकरवार तथा उन के बेटों के खिलाफ दर्ज कर के अशोक सिंह को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया था.

जब इस बात की जानकारी थाने आए गांव वालों को हुई तो वे भी हैरान रह गए क्योंकि अभी तक उन्हें ही पता नहीं था कि पकड़ा गया बदमाश कौन था और अशोक सिंह के घर में उस रात क्या हुआ था. दरअसल पुलिस ने कमरे में बंद शेर सिंह को जब बाहर निकाला था, तो उस के मुंह को ढक दिया था, इसलिए गांव वाले उस समय उसे देख नहीं पाए थे.

जवानी बनी जान की दुश्मन – भाग 1

दोपहर 2 बजे की गई शीला रात होने तक घर नहीं लौटी तो उस के बच्चे परेशान होने लगे. वह  डा. बंगाली से खुजली की दवा लेने शमसाबाद गई थी. उसे घंटे, 2 घंटे में लौट आना चाहिए था. लेकिन घंटे, 2 घंटे की कौन कहे, उसे गए कई घंटे हो गए थे और वह लौट कर नहीं आई थी. अब तक तो डा. बंगाली का क्लिनिक भी बंद हो गया होगा.

शीला का बड़ा बेटा 10 साल का सतीश रात होने की वजह से डर रहा था. वह ताऊ चाचाओं से भी मदद नहीं ले सकता था, क्योंकि अभी कुछ दिनों पहले ही उस की मां की ताऊ और चाचाओं से खूब लड़ाई हुई थी. उस लड़ाई में ताऊ और चाचाओं ने उस की मां की खूब बेइज्जती की थी.

सतीश के मन में मां को ले कर तरहतरह के सवाल उठ रहे थे. मां के न आने से वह परेशान था ही, उस से भी ज्यादा परेशानी उसे छोटे भाइयों के रोने से हो रही थी. 8 साल के मनोज और 3 साल के हरीश का रोरो कर बुरा हाल था. अब तक उन्हें भूख भी लग गई थी. उस ने उन्हें दुकान से बिस्किट ला कर खिलाया था, लेकिन बच्चे कहीं बिस्किट से मानते हैं. अब तक खाना खाने का समय हो गया था.

सतीश अब तक मां को सैकड़ों बार फोन कर चुका था, लेकिन मां का फोन बंद होने की वजह से उस की बात नहीं हो पाई थी. जब वह हद से ज्यादा परेशान हो गया और उसे कोई राह नहीं सूझी तो उस ने अपने मामा श्रीनिवास को फोन कर के मां के बंगाली डाक्टर के यहां जाने और वापस न लौटने की बात बता दी.

दोपहर की गई शीला उतनी देर तक नहीं लौटी, यह जान कर श्रीनिवास परेशान हो गया. वह समझ गया कि मामला कुछ गड़बड़ है. बहन के इस तरह अचानक रहस्यमय ढंग से गायब होने की जानकारी पा कर वह बेचैन हो उठा. उस के भांजे मां को ले कर किस तरह परेशान होंगे, उसे इस बात का पूरा अंदाजा था. उस ने भी शीला को फोन किया, लेकिन जब फोन बंद था तो शीला की भी उस से कैसे बात होती.

बहन से बात नहीं हो सकी तो दोस्त की मोटरसाइकिल ले कर वह तुरंत घर से निकल पड़ा. 8 किलोमीटर का रास्ता तय कर के वह 15-20 मिनट में भांजों के पास आ पहुंचा.

बहन को ले कर उस के मन में तरहतरह के विचार आ रहे थे. जवान बहन के साथ बदनीयती से किसी ने बुरा तो नहीं कर दिया, यह सोचने के पीछे वजह यह थी कि एक तो शीला घर नहीं लौटी थी, दूसरे उस का फोन बंद था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा अचानक क्या हो गया कि बहन का फोन बंद हो गया?

श्रीनिवास ने सब से पहले तो अपने तीनों भांजों के लिए खाने की व्यवस्था की. इस बीच बातचीत में सतीश ने मामा को बताया कि उन्हें स्कूल से ला कर खाना खिलाया. वे अपना होमवर्क करने लगे तो मां तैयार हो कर दवा लेने चली गई. उस ने घंटे, डेढ़ घंटे में लौटने को कहा था. लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि वह लौट कर ही नहीं आई.

सतीश ने बताया था कि शीला शमसाबाद वाले डा. बंगाली से दवा लेने गई थी. सतीश की इस बात से श्रीनिवास को हैरानी हुई, क्योंकि अभी तक तो शीला गांव से थोड़ी दूरी पर अपना क्लिनिक चलाने वाले डा. बंगाली से दवा लेती थी. इस बार वह शमसाबाद क्यों चली गई? शीला का पति यानी श्रीनिवास का बहनोई जयपाल दिल्ली में रहता था. श्रीनिवास ने जयपाल को फोन कर के सारी बात बताई तो उस ने मजबूरी जताते हुए उस समय गांव पहुंचने में असमर्थता व्यक्त करते हुए शीला की खोजबीन करने का अनुरोध किया.

श्रीनिवास ने बहन के इस तरह अचानक गायब होने पर उस के जेठ सहीराम और देवरों गिरिराज, राकेश तथा दिनेश से बात की तो इन लोगों में से किसी ने भी उसे ठीक से जवाब नहीं दिया. उन्होंने शीला और उस के बच्चों से किसी तरह की हमदर्दी या सहानुभूति दिखाने के बजाय साफसाफ कह दिया कि वह खुद ही ढूंढ ले. उस से उन्हें कोई लेनादेना नहीं है.

अपनी बहन के जेठ और देवरों की बातों से श्रीनिवास समझ गया कि पिछले दिनों संपत्ति को ले कर इन लोगों का उस की बहनबहनोई से झगड़ा हुआ था, उसी वजह से ये लोग नाराज हैं. इसलिए इन लोगों से किसी भी तरह की मदद की उम्मीद करना बेकार है. वह तीनों भांजों को ले कर अपने गांव चला गया. बच्चों को अपनी मां के पास छोड़ कर वह बहन की तलाश करने लगा. बेटी के इस तरह अचानक गायब होने से उस की मां भी चिंतित थी.

शीला के जेठ और देवरों ने श्रीनिवास के साथ जैसा व्यवहार किया था, उस से उसे लगा कि उस के गायब होने के पीछे इन लोगों का हाथ तो नहीं है? उस की मां को भी कुछ ऐसा ही लग रहा था. इसलिए मांबेटे ने इस बात पर गहराई से विचार किया. रात काफी हो गई थी, इस के बावजूद श्रीनिवास शमसाबाद चौराहे पर डा. बंगाली की क्लिनिक तक शीला को ढूंढ़ आया था.

उस का सोचना था कि साधन न मिल पाने की वजह से बहन घर न जा पाई हो. लेकिन पूरे रास्ते में उसे एक भी आदमी आताजाता नहीं मिला. रास्ते में ही नहीं, बाजार में भी सन्नाटा पसरा था. विकलांग श्रीनिवास. पूरी रात बहन की तलाश में भटकता रहा.

अगले दिन डा. बंगाली की क्लिनिक खुलने के पहले ही वह शमसाबाद पहुंच गया. डा. सपनदास विश्वास 9 बजे के आसपास क्लिनिक पर पहुंचे तो श्रीनिवास ने उन से बहन के बारे में पूछा. डा. विश्वास ने मरीजों का रजिस्टर देख कर बताया कि कल तो शीला नाम की कोई मरीज उन के यहां नहीं आई थी.

इस से श्रीनिवास को किसी अनहोनी की आशंका हुई. वह सीधे थाना शमसाबाद जा पहुंचा. उस ने शीला के अपहरण और हत्या की रिपोर्ट दर्ज करानी चाही तो थानाप्रभारी ने अगले दिन शीला की फोटो ले कर आने को कहा. थानाप्रभारी ने अगले दिन आने को कहा तो श्रीनिवास को लगा पुलिस टाल रही है. इसलिए वह वहां से सीधे जिलाधिकारी के यहां चला गया.

एक विकलांग को अपनी जवान विवाहिता बहन की तलाश में भटकते देख जिलाधिकारी गुहेर बिन सगीर ने उस की व्यथा  ध्यान से सुनी और थाना शमसाबाद पुलिस को आदेश दिया कि तत्काल पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज कर के काररवाई की जाए. जिलाधिकारी के आदेश के बाद श्रीनिवास थाना शमसाबाद पहुंचा और शीला का अपहरण कर हत्या करने की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए उस ने शीला के जेठ सहीराम, देवर, गिरिराज, दिनेश, राकेश और देवरानी रामलाली को नामजद करते हुए तहरीर दे दी.

रिपोर्ट दर्ज कर के पुलिस शीला की देवरानी को छोड़ कर चारों नामजद लोगों को हिरासत में ले कर थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ और जांच में पुलिस ने सभी को निर्दोष पाया, लेकिन अपना पीछा छुड़ाने के लिए पुलिस ने कागजी काररवाई कर के उन्हें जेल भेज दिया.

खुद के बिछाए जाल में

भाजपा नेता ने हड़पी करोड़ों की जमीन – भाग 1

नानी के निधन के बाद बाबू सिंह अपनी पत्नी बिटान देवी व दोनों बेटियों रूबी व काजल के साथ अहिरवां गांव में रहने लगा और नानी की वसीयत में मिली 10 बीघा जमीन पर खेती कर अपने परिवार का भरणपोषण करने लगा. समय बीतता रहा और समय के साथ उस की बेटियों की उम्र भी बढ़ती गई.

अहिरवां गांव पहले शहर की चकाचौंध से दूर था. लेकिन जैसेजैसे कानपुर शहर का विकास होता गया, वैसेवैसे गांव की अहमियत बढ़ती गई. अहिरवां गांव की जमीन भी अब कीमती हो गई. जो जमीन लाखों की थी, वह करोड़ों में तब्दील हो चुकी थी.

बाबू सिंह का एक रिश्तेदार था नरेंद्र सिंह यादव. वह अहिरवां गांव में ही रहता था. वह दिखावे के तौर पर तो बाबू सिंह का सगा था, लेकिन पीठ पीछे उस से जलता था. यह जलन उसे बाबू सिंह को नानी से वसीयत में मिली जमीन को ले कर थी. धीरेधीरे उस ने वसीयत वाली जमीन पर आंखें जमानी शुरू कर दीं. उस ने बाबू सिंह को शराब पीने का भी आदी बना दिया. वर्ष 2018 में नरेंद्र ने फरजी वसीयत बनवा कर अपनी दबंगई के बल पर बाबू सिंह की जमीन पर कब्जा जमा लिया.

बाबू सिंह यादव शाम को घर वापस आया तो उस के माथे पर चिंता की लकीरें थीं. वह कमरे में पड़े तख्त पर जा कर बैठ गया और दोनों हाथ माथे पर रख कर कुछ सोचने लगा. उस वक्त उस की पत्नी बिटान देवी रसोई में खाना बना रही थी. जबकि दोनों बेटियां रूबी और काजल कमरे में पढ़ाई कर रही थीं. पति को आया देख कर बिटान ने चाय बनाई, फिर आवाज लगाई, ‘‘बेटा काजल, पापा को चाय दे दो.’’

काजल चाय ले कर कमरे में पहुंची तो बाबू सिंह चिंतित बैठा था. उस के आंसू भी टपक रहे थे. पिता को दुखी देख कर काजल ने पूछा, ‘‘क्या बात है पापा, आप बहुत परेशान नजर आ रहे हैं?’’

‘‘हां छोटू (काजल) मैं बहुत दुखी हूं. समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूं, कहां जाऊं?’’ काजल को घर में सब प्यार से छोटू कहते थे.

‘‘पर बात क्या है पापा?’’ काजल ने पूछा.

‘‘छोटू, आज मैं खेत पर गया था. वहां बिल्डर व उस के आदमी प्लाटिंग कर रहे थे. उन्होंने चारों तरफ बाउंड्री भी बना ली. जब मैं ने प्लाटिंग का विरोध किया तो उन लोगों ने मुझे बेइज्जत कर भगा दिया. उन शातिरों ने मेरी जमीन भी छीन ली और पैसा भी नहीं दिया. मैं अब न घर का रहा, न घाट का. बेटा, हम हार गए. अब मैं जिंदा नहीं रहूंगा.’’

बापबेटी की बातें सुन कर बिटान देवी घबरा गई. वह रसोई से कमरे में आ गई और पति से बोली, ‘‘छोटू के पापा, तुम परेशान मत होओ. हम नमक रोटी खा कर रह लेंगे. जमीन चली गई तो चली जाने दो.’’

तब बाबू सिंह ने कहा, ‘‘छोटू की मां, महंगी जमीन के मालिक के रूप में हम इलाके में जाने जाते हैं. अब हम गांव में सीना तान कर नहीं चल पाएंगे. किसी से नजर तक नहीं मिला पाएंगे. लोग ताने भी मारेंगे. ऐसे जीने से तो मर जाना ही बेहतर होगा.’’

पति द्वारा जान देने की बात सुन कर बिटान देवी व उस की बेटियां घबरा गईं. उन्होंने अपने पापा को समझाया कि वे सब मिल कर संघर्ष करेंगी और फाइनेंशियल धोखाधड़ी कर हड़पी गई करोड़ों की जमीन वापस लेंगी. उन्हें कानून पर पूरा भरोसा है.

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पत्नी व बेटियों के समझाने के बाद बाबू सिंह ने आधाअधूरा खाना खाया, फिर बाहर वाले कमरे में जा कर चारपाई पर लेट गया. बिटान व उस की दोनों बेटियां घर के अंदर वाले कमरे में जा कर सो गईं.

9 सितंबर, 2023 की सुबह कानपुर जिले के अहिरवां गांव में होहल्ला मचा कि किसी आदमी ने रेल से कट कर जान दे दी है. यह खबर सुनते ही बिटान देवी का माथा ठनका. वह पति के कमरे में गई तो चारपाई खाली थी. अब उस का दिल तेजी से धडक़ने लगा और मन में अच्छे बुरे विचार आने लगे.

मन में चल रही तमाम आशंकाओं के बीच बिटान देवी ने दोनों बेटियों को साथ लिया और रेलवे लाइन की तरफ तेजी से चल दी. गांव के बाहर से ही रेलवे ट्रैक गुजर रहा था. अत: वहां तक पहुंचने में मांबेटियों को चंद मिनट ही लगे.

रेलवे ट्रैक के बीच में एक आदमी का क्षतविक्षत शव पड़ा था. इस शव को बिटान देवी ने देखा तो वह चीख पड़ी. क्योंकि शव उस के पति बाबू सिंह यादव का था. पिता का शव देख कर रूबी व काजल भी बिलख पड़ीं. इस के बाद तो जंगल की आग की तरह यह खबर अहिरवां गांव में फैली और देखते ही देखते घटनास्थल पर भीड़ जुट गई.

बाबू सिंह ने सदमे में कर लिया सुसाइड

इसी बीच किसी ने हादसे की जानकारी थाना चकेरी (कानपुर) पुलिस को दे दी. खबर पाते ही चकेरी थाने के एसएचओ अशोक कुमार दुबे अपनी टीम के साथ आ गए. उन की सूचना पर जौइंट पुलिस कमिश्नर आनंद प्रकाश तिवारी तथा एसीपी अमरनाथ यादव भी आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक बाबू सिंह यादव की उम्र 50 साल के आसपास थी. साक्ष्यों के आधार पर उस ने ट्रेन से कट कर आत्महत्या की थी. जामातलाशी में उस के पास से एक पत्र बरामद हुआ.

इस पत्र को पुलिस अधिकारियों ने गौर से पढ़ा. पत्र में लिखा था, ‘केंद्रीय और योगी जी सरकार, आप से मेरी शिकायत है कि आप के राज्य में आप की ही पार्टी के सदस्य आप का ही कानून तोड़ रहे हैं. आप की केंद्र सरकार ने कानून लागू किया था कि कोई भी लेनदेन 20 हजार से ऊपर का रजिस्ट्री से होगा. मुझे 6 करोड़ 29 लाख का चैक दे कर मेरी 6 बीघा जमीन ले ली गई. चैक फरजी था. और क्या लिखूं, लिखने को तो बहुत कुछ है. जीने का कुछ मतलब नहीं बचा. सारे फोटो फोन में हैं. आत्महत्या के जिम्मेदार डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर, बबलू यादव हैं. हो सके तो बच्चों को न्याय मिले. छोटू बाय. बाबू सिंह.’

इस पत्र से स्पष्ट था कि बाबू सिंह की 6 बीघा जमीन की प्रियरंजन दिवाकर, बबलू आदि ने रजिस्ट्री करा ली और फरजी चैक दे दिया. उस ने आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का दोषी प्रियरंजन दिवाकर व बबलू आदि को ठहराया. पत्र में उस ने केंद्र व योगी सरकार की कानून व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए तथा बच्चों को न्याय दिलाने की मांग की.

घटनास्थल पर मृतक की पत्नी बिटान देवी व उस की दोनों बेटियां मौजूद थीं. वे तीनों विलाप कर रही थीं. उन के रुदन से लोगों का कलेजा कांप उठा था. पुलिस अधिकारियों ने उन तीनों को धैर्य बंधाया और घटना के संबंध में पूछताछ की.

Maa Beti Ko Dhairya Bandhate Parijan

बिटान देवी ने बताया कि डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर भाजपा का रसूखदार नेता है. वह बाल संरक्षण आयोग का सदस्य भी है. उस ने अपने ड्राइवर बबलू यादव व अन्य गुर्गों के साथ षडयंत्र रच कर उस की बेशकीमती जमीन की रजिस्ट्री करा ली और 6 करोड़ 29 लाख का चैक दे कर पति से यह कह कर छीन लिया कि चैक में कुछ गड़बड़ी है, कैश नहीं होगा.

इस के बाद दोबारा चैक नहीं दिया. जोर देने पर चैकों की फोटोकापी पकड़ा दी. इसी से आहत हो कर पति ने जान दे दी. बिटान ने कहा कि यदि उसे न्याय नहीं मिला तो वह भी दोनों बेटियों के साथ जान दे देगी. इस पर पुलिस अधिकारियों ने भरोसा दिया कि उन्हें न्याय जरूर मिलेगा और दोषी जेल जाएंगे.

भाजपा नेता और अन्य के खिलाफ हुई रिपोर्ट दर्ज

पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने जरूरी काररवाई पूरी कर बाबू सिंह यादव के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपत राय अस्पताल भिजवा दिया. पोस्टमार्टम के बाद उन के शव घर लाया गया तो एक बार फिर गांव में मातम छा गया. मृतक की बेटी रूबी व काजल ने शव को कंधा दिया. उस के बाद शव को गंगा तट सिद्धनाथ घाट लाया गया, जहां मृतक के भतीजे मुन्ना सिंह ने मुखाग्नि दी.

10 सितंबर, 2023 की शाम बिटान देवी थाना चकेरी पहुंची. उस ने एसएचओ अशोक कुमार दुबे को एक लिखित तहरीर दी. तहरीर के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 420/306/34/504/506 के तहत भाजपा के रसूखदार नेता डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर निवासी श्याम नगर, बबलू यादव निवासी टटियन झनाका, जितेंद्र सिंह यादव निवासी अहिरवां गांव, कानपुर नगर, मधुर पांडेय निवासी 102ए, 100 फुटा रोड, कानपुर नगर, राहुल जैन निवासी बी 92, सेक्टर 31, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर तथा शिवम सिंह चौहान निवासी मकरनपुर (मैनपुरी) के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

फाइनेंशियल धोखाधड़ी कर जमीन हड़पने तथा आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का मुकदमा दर्ज होते ही आरोपी राहुल जैन, मधुर पांडेय, बबलू यादव, जितेंद्र यादव व शिवम भूमिगत हो गए. उन्होंने अपने मोबाइल फोन भी बंद कर लिए. भूमिगत हो कर सभी अपनेअपने बचाव का रास्ता खोजने लगे.

रिश्तों का कत्ल : पैसों के लिए की दोस्त की हत्या – भाग 3

भोलू का जूतों के डिब्बे बनाने का काम बढि़या चल निकला. उसी की कमाई से जल्दी ही उस ने मारुति स्विफ्ट कार खरीद ली. भोलू अपनी बहन सीमा के यहां आताजाता ही रहता था. इसी आनेजाने में उस ने महसूस किया कि स्लाटर हाउस में जो लोग जानवर सप्लाई करते हैं, उन की अच्छीखासी कमाई होती है. उस के पास पैसे तो थे ही, उस ने अपने बहनोई इरफान से इस संबंध में बात की तो उस ने भुट्टो से बात कर के भोलू को जानवर खरीद कर लाने के लिए कह दिया.

इस के बाद भोलू आगरा के जानवरों के बाजारों, किरावली, शमसाबाद, बटेश्वर आदि से सस्ते दामों में जानवर खरीद कर बहनोई की मार्फत स्लाटर हाउस में बेचने लगा. इस काम में उसे अच्छीखासी कमाई होने लगी. जूतों के डिब्बों का उस का काम चल ही रहा था. इस तरह महीने में वह एक लाख रुपए से अधिक की कमाई करने लगा.

किरावली बाजार में जानवरों की खरीदारी के दौरान भोलू की मुलाकात सलमान से हुई तो उसे यह आदमी भा गया. सलमान भी जानवरों की खरीदफरोख्त करता था. इस की वजह यह थी कि एक तो भोलू को कई काम देखने पड़ते थे, दूसरे सलमान इस काम में काफी तेज था. इसीलिए पहली मुलाकात में ही भोलू ने सलमान को बिजनैस पार्टनर बना लिया था. इस के बाद दोनों मिल कर जानवर खरीदने और बेचने लगे.

भोलू ने सलमान को बिजनैस पार्टनर तो बना लिया, लेकिन उस के बारे में उसे ज्यादा कुछ पता नहीं था. उस के बारे में उसे सिर्फ इतना पता था कि वह किरावली का रहने वाला है और उस का मोबाइल नंबर यह है. भोलू के साथ रहने में सलमान को फायदा दिखाई दिया, इसलिए वह उस के साथ रहने लगा.

बड़े भाई का साला होने की वजह से इमरान की भोलू से खूब पटती थी. जिस दिन भोलू पशु मेले या बाजार नहीं गया होता था, सारा दिन इमरान उसे अपने साथ रखता था. उसी के सामने वह बैंक से पैसे भी निकालता था और जमा भी कराता था. 50 लाख से ले कर करोड़ रुपए निकालना उस के लिए आम बात थी.

भोलू ने कभी कोई ऐसी वैसी हरकत नहीं की थी, इसलिए इमरान उस पर पूरा विश्वास करने लगा था. भोलू का काम दोनों ओर से ठीकठाक चल रहा था. उस की कमाई महीने में लाख रुपए से ऊपर थी. लेकिन कमाई बढ़ी तो उस की पैसों की भूख भी बढ़ गई थी. अब वह करोड़पति बनने के सपने देखने लगा.

एक दिन शाम को वह सलमान के साथ बैठा था तो उस के मुंह से निकला, ‘‘यार सलमान, मेरे पास एक ऐसी योजना है, जिस के तहत हमें एक करोड़ रुपए आसानी से मिल सकते हैं.’’

‘‘कैसे?’’ सलमान ने पूछा.

इस के बाद भोलू ने उसे जो योजना बताई, सुन कर सलमान की रूह कांप उठी. लेकिन जब भोलू ने उसे पूरी योजना समझा कर मिलने वाली रकम का लालच दिया तो वह उस की योजना में शामिल हो गया.  3 दिसंबर को उन्होंने अपनी इस योजना को अंजाम देने की तैयारी भी कर ली.

2 दिसंबर यानी सोमवार को भोलू इमरान के साथ ही रहा. उस दिन बैंक का कोई काम नहीं था, इसलिए बैंक जाना नहीं हुआ. लेकिन उस दिन भोलू को पता चल गया कि अगले दिन इमरान को बैंक जाना है और लगभग एक करोड़े रुपए निकाल कर लाना है. शाम को घर जाते समय इमरान ने भोलू को वाटर वर्क्स चौराहे पर छोड़ दिया तो वहां से वह वजीरपुरा स्थित अपने घर चला गया.

इमरान की गाड़ी से उतरते ही भोलू ने सलमान को फोन कर के अगले दिन चाकू और पिस्तौल ले कर तैयार रहने के लिए कह दिया था. अगले दिन यानी 3 दिसंबर, 2013 दिन मंगलवार को योजनानुसार 10 बजे के आसपास भोलू ने अपने बहनोई इरफान को फोन कर के बताया कि आज वह सलमान के साथ जानवरों की खरीदारी करने शमसाबाद जा रहा है. इसलिए वह देर शाम तक ही स्लाटर हाउस आ पाएगा.

तब इरफान ने उस से कहा था, ‘‘आज इमरान को बैंक से बड़ी रकम निकाल कर लाना है, हो सके तो तुम यह काम करा कर जाओ.’’

इस पर भोलू ने कहा, ‘‘दरअसल वहां कुछ व्यापारी सस्ते जानवर ले कर आने वाले हैं, अगर उन से सौदा पट गया तो काफी मोटा मुनाफा हो सकता है. इसलिए वहां जाना जरूरी है.’’

इस के बाद भोलू ने इमरान को भी फोन कर के कहा था, ‘‘इमरानभाई, मैं सलमान के साथ शमसाबाद जानवर खरीदने जा रहा हूं. इसलिए तुम अकेले ही बैंक चले जाना. क्योंकि मैं देर शाम तक ही वापस आ पाऊंगा.’’

योजनानुसार न तो भोलू शमसाबाद गया न सलमान. दोनों साए की तरह इमरान के पीछे इस तह लगे रहे कि वह उन्हें देख न पाए. इस बीच इमरान को फोन कर के वह पूछता रहा कि वह क्या कर रहा है? लेकिन उस ने यह नहीं पूछा था कि आज वह कितने रुपए निकाल रहा है?

इमरान जैसे ही रुपए ले कर बैंक से निकला, भोलू और सलमान टूसीटर से उस से पहले वाटर वर्क्स चौराहे पर पहुंच गए और वहीं खड़े हो कर इमरान पर नजर रखने लगे. जब उन्हें लगा कि इमरान वाटर वर्क्स चौराहे पर पहुंच गया होगा तो भोलू ने उसे फोन किया, ‘‘इमरानभाई, मैं शमसाबाद से लौट आया हूं और वाटर वर्क्स चौराहे पर खड़ा हूं. इस समय तुम कहां हो?’’

‘‘मैं यहीं वाटर वर्क्स चौराहे पर जाम में फंसा हूं. जहां से जवाहर पुल शुरू होता है, तुम वहीं पहुंचो. मैं वहीं से तुम्हें ले लूंगा.’’

भोलू सलमान के साथ जवाहर पुल के पास जा कर खड़ा हो गया. 5-7 मिनट बाद इमरान वहां पहुंचा तो भोलू इमरान की बगल वाली सीट पर बैठ गया तो सलमान पीछे वाली सीट पर. गाड़ी आगे बढ़ गई. इमरान को बातों में उलझा कर भोलू ने डैशबोर्ड पर रखे उस के दोनों मोबाइल फोन के स्विच औफ कर दिए. कार जैसे ही कुबेरपुर के पास पहुंची, भोलू ने कहा, ‘‘इमरानभाई, मेरे 2 दोस्त चौगान गांव के पास एक्सप्रेसवे के नीचे मेरा इंतजार कर रहे हैं. अगर तुम मुझे वहां तक छोड़ देते तो अच्छा रहता.’’

इमरान ने नानुकुर की, लेकिन चौगान गांव वहां से कोई बहुत ज्यादा दूर नहीं था. फिर भोलू पर उसे पूरा विश्वास था, इसलिए साथ में इतने रुपए होने के बावजूद इमरान ने कार चौगान गांव की ओर मोड़ दी. चौगान से कोई आधा किलोमीटर पहले ही सुनसान जंगली रास्ते पर लघुशंका के बहाने भोलू ने इमरान से कार रुकवा ली.

भोलू नीचे उतरा और इधरउधर देख कर अंदर बैठे सलमान को इशारा किया. जैसे ही सलमान नीचे उतरा, भोलू ने तमंचा निकाल कर ड्राइविंग सीट पर बैठे इमरान के सीने पर गोली मार दी. उस ने दूसरी गोली मारनी चाही, लेकिन तमंचा धोखा दे गया. गोली लगते ही इमरान के मुंह से हलकी सी चीख निकली और वह छटपटाने लगा. भोलू ने सलमान से छुरा ले कर इमरान पर कई वार करने के साथ गला भी काट दिया कि कहीं यह बच न जाए. चाकू चलाने के दौरान भोलू के दोनों हाथ जख्मी हो गए, जिस में उस ने रूमाल बांध ली.

इस के बाद इमरान की लाश घसीट कर दोनों ने हाईवे से सटे एक गड्ढे में फेंक दी. वहीं पास ही उन्होंने चाकू और तमंचा भी फेंक दिया. इस के बाद कार ले कर भाग निकले. रास्ते में एक हैंडपंप पर कार रोक कर थोड़ीबहुत धुलाई की. वहां से थोड़ा आगे आ कर एक्सप्रेसवे पर उन्होंने रकम गिनी तो पता चला कि ये तो सिर्फ 20 लाख रुपए ही हैं. जबकि उन्हें एक करोड़ रुपए होने की उम्मीद थी.

दोनों ने ही अपना अपना सिर पीट लिया. बहरहाल अब तो जो होना था, वह हो गया था. दोनों ने आधीआधी रकम ले ली. भोलू ने  सलमान को कार ठिकाने लगाने के लिए दे कर एक जगह रकम छिपाई और खुद स्लाटर हाउस पहुंच गया.

स्लाटर हाउस में इमरान के न आने की वजह से इरफान परेशान था. बहनोई से हालचाल पूछ कर वह इमरान की तलाश करने के बहाने बाहर आ गया. इरफान ने उस के हाथों पर रूमाल बंधी देखी तो उस के बारे में पूछा था. तब उस ने बहाना बना दिया था. स्लाटर हाउस से निकल कर भोलू ने छिपा कर रखे रुपए अपने एक परिचित के पास रखे और वापस जा कर इरफान के साथ इमरान की तलाश करने लगा.

दूसरी ओर इमरान की कार ले कर गया सलमान वहां से 5 किलोमीटर दूर एक ढाबे पर पहुंचा और एक दुर्घटनाग्रस्त ट्रेलर के पीछे कार खड़ी कर के ढाबे के एक कर्मचारी को 5 सौ रुपए का नोट दे कर कहा कि वह दिल्ली जा रहा है, इसलिए एक दिन के लिए अपनी इस कार को यहीं खड़ी कर रहा है. ढाबे के उस कर्मचारी को क्या ऐतराज होता, उस ने कह दिया कि खड़ी कर दो. सलमान ने वहीं अपने फोन का स्विच औफ किया और रुपए ले कर फरार हो गया.

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पुलिस ने मोबाइल फोन की लोकेशन के आधार पर इमरान की हत्या में भोलू को गिरफ्तार किया था. इस की वजह यह थी कि उस ने सब से कहा था कि वह शमसाबाद जा रहा है, जबकि उस के मोबाइल फोन की लोकेशन आईसीआईसीआई बैंक से ले कर जहां से इमरान की लाश बरामद हुई थी, वहां तक मिली थी.

मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस ने इमरान की कार तो उस ढाबे से बरामद कर ली थी, लेकिन सलमान का मोबाइल बंद होने की वजह से उसे नहीं पकड़ पाई. पूछताछ के बाद पुलिस ने भोलू को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया था.

सलमान की तलाश में आगरा के कई थानों की पुलिस तो लगी ही है, मृतक इमरान के घर वाले भी उस की खोज में लगे हैं. उन्हें 10 लाख रुपयों से ज्यादा इमरान के हत्यारे को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाने की चिंता है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित