काल डिटेल्स की जांच में पता चला कि नीलम की मां के मोबाइल से एक नंबर पर अधिकतर बातें होती थीं. मां इस बारे में अनजान थी. तब इस नंबर को खंगाला गया. यह नंबर थाना किरावली के गांव डावली निवासी गणेश का निकला.
पुलिस ने बिना देर किए शाम को गणेश को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. नीलम के परिजनों को इस बात की जानकारी नहीं थी कि नीलम किसी युवक से मोबाइल पर बातचीत करती है.
सिकंदरा पुलिस की गिरफ्त में आने के बाद गणेश झूठ बोलता रहा. गणेश का कहना था कि नीलम उस से मिलने आई थी. वह उसे छोड़ने गांव आ रहा था. उस का कहना था कि वह रुनकता गांव गया ही नहीं था. नीलम ने उस से कहा कि गांव के बाहर ही छोड़ दो, कोई देख लेगा तो घर वालों को मालूम पड़ जाएगा. वह यहां से पैदल घर चली जाएगी. तब उस ने उसे गांव के बाहर ही छोड़ दिया था.
उस के बाद नीलम के साथ क्या हुआ, उसे नहीं मालूम. उधर, नीलम के घर वाले भी सही सोच रहे थे कि वह घर में मौजूद है तो घटना नहीं कर सकता. पीड़िता के घर वाले भी उस पर शक नहीं कर रहे थे. मगर, पुलिस ने घटना वाले दिन गणेश के मोबाइल की काल डिटेल्स और लोकेशन निकाल कर पूरी घटना का परदाफाश कर दिया.
गणेश के मोबाइल की लोकेशन नीलम के गांव और रुनकता क्षेत्र की आई. गणेश ने इस दौरान मोबाइल खरीदने और रेस्टोरेंट में नाश्ते के लिए औनलाइन भुगतान भी किए थे. इस बात ने उसे सच बोलने पर मजबूर कर दिया.
पुलिस ने उस से कहा कि अब झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं होगा. पुलिस के सख्ती दिखाने पर वह टूट गया. इस के बाद उस ने पुलिस के सामने सारा सच उगल दिया. गणेश ने घटना का जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने घटना में शामिल अपने गांव के दोस्त संतोष का नाम भी बताया.
पुलिस ने उस के दोस्त संतोष को 11 मार्च, 2023 को गिरफ्तार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद घटना की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—
गणेश नीलम के गांव मांगरौल गूजर में अपनी रिश्तेदारी में आयाजाया करता था. नीलम से 6 महीने पहले उस की दोस्ती हुई थी. एक दिन नीलम अपनी मौसी के घर जा रही थी. गणेश की नजर उस पर पड़ी. वह नीलम की खूबसूरती पर लट्टू हो गया. उस ने पहली बार में ही उसे दिल में बसा लिया.
नीलम को भी इस बात का अहसास हो गया कि युवक उसे चाहत भरी नजरों से देख रहा है. 24 वर्षीय गणेश कसी हुई कदकाठी का जवान युवक था. उसे देख कर 14 वर्षीय नीलम का दिल भी तेजी से धड़कने लगा था. दोनों ने एक दूसरे को पीछे मुड़ कर भी कई बार देखा.
गणेश जब भी नीलम के गांव जाता उस की मुलाकात नीलम से हो जाती. दोनों ही एकदूसरे को देख कर मुसकरा देते थे. जब दो युवा मिलते हैं तो जिंदगी में नया रंग घुलने लगता है. दोनों एकदूसरे से प्यार का इजहार करना चाहते थे. आखिर एक दिन गणेश को मौका मिल ही गया. गणेश बाइक से नीलम के घर के सामने से निकल रहा था. उस समय वह अपने घर के दरवाजे पर खड़ी थी.
नीलम को देखते ही गणेश ने चुपचाप एक परची गिरा दी. नीलम ने वह परची उठा कर अपने पास रख ली. उस ने घर जा कर एकांत में परची खोली तो उस में एक मोबाइल नंबर लिखा था. नीलम समझ गई कि यह नंबर उसी युवक का है. उस ने बिना देर किए उस नंबर को मिलाया.
दूसरी ओर से ‘हैलो की आवाज आई तो नीलम ने कहा, ”मैं नीलम बोल रही हूं, आप कौन?’‘
नीलम का नाम सुनते ही गणेश खुश हो गया. वह बोला, ”मैं गणेश बोल रहा हूं. आप के गांव में मेरी रिश्तेदारी है, इसलिए वहां आताजाता रहता हूं. आप को जब से देखा है, तब से बात कर ने का मन कर रहा था. इसलिए परची पर अपना मोबाइल नंबर लिख दिया था.’‘ इस तरह गांव की रिश्तेदारी से गणेश ने नीलम को अपने जाल में फंसाया.
फिर एक दिन दोनों की मुलाकात हुई. नीलम ने कहा, ”मैं जिस कालेज में पढ़ती हूं उस कालेज में मैं ने आप को पहले भी देखा है.’‘
इस पर गणेश ने कहा, ”मैं कालेज कम ही जाता हूं.’‘
फिर दोनों को पता चल गया कि वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते हैं. गणेश ने इंटरमीडिएट जबकि नीलम ने हाईस्कूल की परीक्षा दी थी. दोनों की उम्र में 10 साल का अंतर था, लेकिन जब प्यार होता है तो वह उम्र या जाति नहीं देखता.
गणेश गांव में अपनी रिश्तेदारी में आताजाता था. दोनों चोरीछिपे मिल कर एकदूसरे से दिल खोल कर बातें करते थे. अब दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर भी थे. दोनों मौका मिलते ही मोबाइल पर खूब प्यारमोहब्बत की बातें करते. नीलम अपनी मां के मोबाइल से उन की जानकारी के बिना गणेश से बातें करती थी.
गणेश 3 भाईबहनों में सब से बड़ा है. वह जयपुर स्थित एक सैलून में बाल काटता है. उस की रिश्तेदारी नीलम के गांव में है. वह जब भी अपने गांव आता तो मांगरौल गूजर गांव में अपनी रिश्तेदारी में भी आयाजाया करता था. 12 फरवरी को इंटरमीडिएट की परीक्षा देने आया था. 3 मार्च तक वह वहीं रुका था. इस के बाद वह अपने काम पर जयपुर चला गया. होली पर वह 7 मार्च, 2023 को अपने गांव फिर आया था.
क्यों की गई नीलम की हत्या
9 मार्च को गणेश की नीलम से बाइक पर घूमने चलने की बात हुई. तब नीलम अपनी मां से मौसी के यहां होली खेलने की बात कह कर घर से निकल गई थी. गणेश अपने गांव के ही 23 वर्षीय दोस्त संतोष के साथ नीलम को बाइक से रुनकता घुमाने ले गया. जाते समय मांगरौल के जंगल में गणेश और उस के दोस्त संतोष ने शराब पार्टी की. इस के लिए वे घर से ही शराब की बोतल ले कर आए थे.
इस के बाद गणेश व संतोष उसे बाइक से रुनकता ले गए. वहां एक रेस्टोरेंट में नाश्ता किया. नीलम अपनी मां के मोबाइल से चोरीछिपे गणेश से बात करती रहती थी. बात करने में आसानी रहे, इसलिए गणेश ने नीलम को एक मोबाइल और सिम भी दे दिया.
शाम को गांव लौटते समय दोनों दोस्तों गणेश व संतोष की नीयत में खोट आ गई. वे नीलम को जंगल में खींच कर ले गए. गणेश और उस के दोस्त ने नीलम के साथ रेप किया. मनमानी करने के बाद उन्हें लग रहा था कि नीलम गांव में जा कर सब कुछ बता देगी. इस के बाद दोनों ने उस की हत्या कर शव ठिकाने लगाने का निर्णय लिया.
इस के लिए उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया. पेड़ से सिर को कई बार टकराया. इतना ही नहीं किशोरी के सिर पर ईंट से प्रहार किया. उस की नाक, मुुंह और आंखों पर घूंसों से ताबड़तोड़ प्रहार किए जिस से आंख, नाक और मुंह से खून निकलने लगा.
नीलम बेहोश हो गई. दोनों को विश्वास हो गया कि वह मर गई है. उसे मरा समझ कर गले में दुपट्टा बांध खींचते हुए जंगल में और अंदर ले गए और कांटों की झाड़ियों के बीच डाल कर फरार हो गए. इस के बाद दोनों अपने घर जा कर सो गए.
इत्तफाक से नीलम बच गई. आरोपियों को दूसरे दिन समाचारपत्रों से पता चला कि नीलम जिंदा है तो दोनों के होश उड़ गए. दोनों भागने की तैयारी में थे. मगर पुलिस ने 10 मार्च, 2023 की शाम को ही डावली निवासी गणेश को पकड़ लिया. इस के बाद उस के साथी संतोष को भी दबोच लिया.
जांच में पता चला कि आरोपी गणेश और संतोष बचपन के दोस्त हैं. संतोष अपने पिता के साथ गांव में ही सैलून की दुकान चलाता है. जबकि गणेश यही काम जयपुर में करता है.
2 दिन इलाज के बाद नीलम की हालत में कुछ सुधार हुआ. उसे जिला अस्पताल से एस.एन. मैडिकल कालेज में रेफर कर दिया गया था. डाक्टरों ने नीलम को 72 घंटे तक अपनी निगरानी में रखने को कहा. नीलम के सिर में गहरा घाव था, शरीर में जख्म और गले पर सूजन थी. परिजनों का कहना था कि बेटी बस जिंदा बच गई उसे नया जीवन मिला गया.
शोभाराम ने नफरत से दोनों लाशों को देखा. फिर वहीं बैठ कर बीड़ी सुलगा कर पीने लगा. एक लाश उस की पत्नी रागिनी की थी और दूसरी रिंकू की थी. छत पर उस ने दोनों को रंगेहाथ रंगरलियां मनाते पकड़ा था. उस के बाद उस ने दोनो की ईंट से सिर कूंच कर हत्या कर दी थी.
बीड़ी के कश के साथ शोभाराम के मन में तरहतरह के विचार आजा रहे थे. इन्हीं विचारों के बीच शोभाराम ने जेब में पड़ा मोबाइल निकाला और पुलिस कंट्रोल रूम के 112 नंबर पर काल की. उस समय रात के 12 बज रहे थे और आसमान में बादल गरज रहे थे.
शोभाराम की काल डायल 112 के एसआई पंकज मिश्रा ने रिसीव की. उन्होंने पूछा, ”बताइए, आप को क्या परेशानी है? आप कौन और कहां से बोल रहे हैं?’‘
”साहब, मेरा नाम शोभाराम दोहरे है. मैं गांव नंदपुर से बोल रहा हूं. मैं ने डबल मर्डर किया है. आप जल्दी से आ कर मुझे गिरफ्तार कर लो.’‘
शोभाराम के मुंह से डबल मर्डर की बात सुन कर पंकज मिश्रा दंग रह गए. फिर वह सोचने लगे, ‘कहीं शोभाराम शराबी तो नहीं और नशे में गुमराह कर रहा है.Ó अत: वह कड़कदार आवाज में बोले, ”इतनी रात बीतने के बावजूद अभी तक तेरा नशा उतरा नहीं, जो डबल मर्डर की सूचना दे रहा है.’‘
”साहब, मैं शराबी नही हूं. मैं पूरे होशोहवास में हूं. मैं सच बोल रहा हूं. मैं ने रागिनी और उस के प्रेमी रिंकू यादव को मार डाला है. दोनों लाशें मेरे मकान की छत पर पड़ी हैं. यकीन हो तो आ जाइएगा.’‘
शोभाराम ने जिस आत्मविश्वास के साथ बात की, उस से एसआई पंकज मिश्रा को यकीन हो गया कि वह जो बता रहा है, वह सच है. अत: उन्होंने सूचना से पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया फिर सहयोगियों के साथ नंदपुर गांव पहुंच गए.

शोभाराम का घर गांव के पूर्वी छोर पर था. पुलिस जीप वहीं जा कर रुकी. शोभाराम पुलिसकर्मियों को छत पर ले गया, जहां 2 लाशें पड़ी थीं. लाशें देख कर एसआई पंकज मिश्रा सिहर उठे. उन्होंने तत्काल शोभाराम को हिरासत में ले लिया. डबल मर्डर की यह घटना उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के नंदपुर गांव में 14 जून, 2023 की रात घटी थी.
डबल मर्डर से मचा हड़कंप
डबल मर्डर की सूचना से जिले के पुलिस अधिकारियों में भी हड़कंप मच गया था. कुछ देर बाद ही एसएचओ आर.डी. सिंह, सीओ (सिटी) प्रदीप कुमार, एसपी चारू निगम तथा एएसपी दिगंबर कुशवाहा घटनास्थल पर आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. हत्यारे शोभाराम ने बड़ी बेरहमी से दोनों की ईंट से कूंच कर हत्या की थी. मृतकों में रागिनी व रिंकू यादव था. रागिनी की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. रिंकू की उम्र 22 वर्ष के आसपास थी. दोनों के शव अर्धनग्नावस्था में थे. छत पर शवों के करीब ही खून से सनी ईंट पड़ी थी, जिसे पुलिस ने सुरक्षित कर लिया.
पौ फटते ही नंदपुर गांव में सनसनी फैल गई. जिस ने भी 2 हत्याओं की बात सुनी, उसी ने दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में शोभाराम के घर के बाहर भारी भीड़ जुट गई. मीना यादव को जब पता चला कि शोभाराम ने उस के बेटे रिंकू को मार डाला है तो वह बदहवास हालत में घटनास्थल पहुंची और बेटे का शव देख कर फूटफूट कर रोने लगी.
महिलाओं ने उन्हें किसी तरह संभाला. रिंकू के पिता लायक सिंह होमगार्ड थे. वह सहार थाने में ड्यूटी पर थे. उन्हें बेटे की हत्या की खबर लगी तो वह भी गांव आ गए. बेटे का शव देख कर वह भी बिलखने लगे.
रिंकू यादव की हत्या से नंदपुर गांव की यादव जाति में गुस्से की आग भड़क उठी थी. उन में आक्रोश इस बात से था कि शोभाराम जैसे छोटी जाति के व्यक्ति ने उन की बिरादरी के युवक की हत्या कर दी थी. इस हत्या से उन की प्रतिष्ठा पर आंच आई है. नवयुवकों में गुस्सा कुछ ज्यादा था.
एसपी चारू निगम व एएसपी दिगंबर कुशवाहा को जब यादव बिरादरी में जन आक्रोश की जानकारी हुई तो उन्होंने कई थानों की पुलिस फोर्स को घटनास्थल पर बुलवा लिया और नंदपुर गांव की हर गली के मोड़ पर पुलिस पहरा लगा दिया. यही नहीं, उन्होंने हर स्थिति से निपटने के लिए पीएसी का कैंप भी लगा दिया.
कड़ी सुरक्षा के बीच पुलिस अधिकारियों ने मृतक रिंकू व मृतका रागिनी के शवों को सीलमोहर करा पोस्टमार्टम के लिए औरैया के जिला अस्पताल भिजवा दिया.

शोभाराम दोहरे को पुलिस सुरक्षा में थाना सहायल लाया गया. यहां पर पुलिस अधिकारियों ने उस से घटना के संबंध में पूछताछ की. शोभाराम ने अधिकारियों के सामने दोनों हत्याओं का जुर्म कुबूल कर पूरी घटना की जानकारी दी. उस ने इस घटना में किसी अन्य के शामिल होने से साफ इंकार किया.
चूंकि शोभाराम ने जुर्म कुबूल कर लिया था और पुलिस ने आलाकत्ल खून सनी ईंट भी बरामद कर ली थी, इसलिए एसएचओ आर.डी. सिंह ने मृतक रिंकू यादव की मां मुन्नी देवी की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत शोभाराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा शोभाराम को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.
पुलिस पूछताछ में उस ने इस हत्याकांड की जो वजह बताई, वह एक बेवफा पत्नी की कहानी निकली.
उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात जनपद के थाना रसूलाबाद के अंतर्गत एक गांव है-झकर गढ़ा. रागिनी इसी गांव की रहने वाली थी. उस के पिता राजाराम दोहरे गांव के दबंग किसान थे. 3 बहनों में रागिनी सब से छोटी, सब से दुलारी और बेहद खूबसूरत थी. राजाराम अपनी 2 बड़ी बेटियों का विवाह कर चुके थे. अब वह रागिनी का घर बसाना चाहते थे. इस बारे में घर में बात भी होने लगी थी.
शादी की चर्चा चलते ही रागिनी का मन गुदगुदाने लगा. खुली आंखों से वह जीवनसाथी के सुहाने सपने देखने लगी थी. वह सोचती कि मेरे दोनों जीजा हैंडसम हैं तो पिता मेरे लिए भी सैकड़ों में से किसी एक को चुनेंगे क्योंकि अपनी बहनों से मैं ज्यादा हसीन जो हूं.
रागिनी की तमन्ना थी कि उस का पति फिल्मी हीरो जैसा और खूब प्यार करने वाला हो. राजाराम की तलाश जारी थी. इसी तलाश के दौरान राजाराम को शोभाराम के बारे में पता चला.
जगदीश दोहरे औरैया जिले के नंदपुर गांव के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी सरला के अलावा 2 बेटियां व एक बेटा शोभाराम था. बेटियों की वह शादी कर चुके थे. शोभाराम अभी कुंवारा था. बापबेटे दोनों मिल कर अपनी जमीन पर मौसमी सब्जियों की खेती करते थे और शहर कस्बे में बेचते थे. शोभाराम राजमिस्त्री भी था.
राजाराम ने नंदपुर गांव जा कर जगदीश दोहरे से मुलाकात की और उन के बेटे शोभाराम के साथ अपनी बेटी रागिनी की शादी करने की बात की.
जगदीश की पत्नी सरला की मौत हो चुकी थी. इसलिए जगदीश भी बेटे का विवाह करने के इच्छुक थे. इसलिए पहले लड़की देखने की इच्छा जताई. इस के बाद उन्होंने झकर गढ़ा गांव जा कर रागिनी को देखा तो वह उन्हें पसंद आ गई. फिर सन 2012 की पहली लगन में रागिनी और शोभाराम का विवाह हो गया.
विवाह मंडप में रागिनी ने पहली बार पति को देखा था. शोभाराम सूट पहने था, सिर पर सेहरा बंधा था, उस के चारों ओर घर वालों का हुजूम था, इसलिए रागिनी उसे नजर भर कर देख नहीं पाई.
4 जुलाई, 2023 का दिन था. अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश (पोक्सो एक्ट) प्रमेंद्र कुमार की कोर्ट में काफी गहमागहमी थी. घटना होने के मात्र 116 दिनों बाद उस दिन एक ऐसे मामले में फैसला सुनाया जाना था, जिस में दोस्ती परवान चढऩे से पहले ही तारतार हो गई थी. आइए, कोर्ट का फैसला जानने से पहले इस मामले के बारे में जान लेते हैं.
आगरा के सिकंदरा क्षेत्र के रुनकता के पास मांगरौल गूजर का जंगल करीब 6 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है. यमुना का किनारा है और अकसर जंगली जानवर यहां घूमते रहते हैं. जंगल की सन्नाटे भरी सर्द रात में जंगली जानवरों के खतरे के बीच कांटेदार झाड़ियों के बीच पड़ी घायल 14 वर्षीय नीलम को जब हलका सा होश आया, तब चारों ओर घना अंधेरा छा चुका था.
नीलम दर्द से कराह रही थी. उस के अंगअंग में दर्द हो रहा था. वह रातभर तड़पती रही. वह अस्मत जाने के बाद भी टूटती सांसों को संजोए हुए थी. प्यास से उस का गला सूख रहा था, वहीं घावों से खून बह रहा था.
इस हालत में भी नीलम ने हिम्मत नहीं हारी. बेसुध शरीर ने हिम्मत कर हिलने की कोशिश की तो कांटे चुभ उठे. वह असहनीय दर्द को पी गई और कांटों के बिस्तर पर पड़ीपड़ी भोर होने का इंतजार कर ने लगी.
जीवन और मृत्यु से संघर्ष के बीच सुबह जब सूरज की रोशनी दिखाई दी तो इतनी हिम्मत आ गई कि वह करीब 100 मीटर घिसट कर रोड तक पहुंच गई. आखिर नीलम जंगल में कैसे पहुंची? उस की यह हालत कैसे और किस ने की?
गांव देहात में होली का पर्व कई दिनों तक मनाया जाता है. 9 मार्च, 2023 को आगरा जिले के थाना सिकंदरा के मांगरौल गूजर निवासी 14 वर्षीय नीलम गांव में रहने वाली अपनी मौसी के यहां होली खेलने को कह कर घर से अपराह्नï लगभग ढाई बजे निकली थी.
शाम 7 बजे तक जब नीलम घर वापस नहीं आई तो घर वालों को चिंता हुई. इस बारे में मौसी से संपर्क किया तो पता चला कि वह उन के यहां भी नहीं पहुंची थी. घबराए हुए घर वालों ने उस की सहेलियों व परिचितों के यहां तलाश किया, लेकिन नीलम का गांव में कोई सुराग नहीं मिला.
पूरी रात घर वाले गांव वालों के साथ उस की तलाश करतेे रहे, लेकिन नीलम का कोई सुराग नहीं लगा. सारी रात घर वालों को नींद भी नहीं आई.
10 मार्च की सुबह 8 बजे पास के ही गांव का रहने वाला सिक्योरिटी गार्ड जयप्रकाश ड्यूटी समाप्त कर अपने गांव जा रहा था. उस के गांव का रास्ता मांगरौल हो कर ही जाता है. उसे सिकंदरा के जंगल के रास्ते में सड़क किनारे मांगरौल गांव से करीब 3 किलोमीटर दूर एक किशोरी लहूलुहान अर्द्धबेहोशी की हालत में पड़ी मिली. गार्ड जयप्रकाश को देखते ही किशोरी ने हाथ हिलाया. गार्ड ने अपनी साइकिल खड़ी कर दी और किशोरी के पास पहुंचा.
किशोरी के खून से सने और फटे हुए कपड़े देख कर जयप्रकाश ने अपने गमछे से उस का बदन ढक दिया. जयप्रकाश के कई बार पूछने पर कि कौन हो तुम बेटी? किशोरी सही ढंग से बोल नहीं पा रही थी. उस ने किसी तरह अपना नाम बताया. पूछने पर अपने पिता व गांव का नाम भी बता दिया.
गार्ड से किशोरी ने कहा कि मेरे भाई को फोन कर दो. किशोरी ने नंबर बताया तब गार्ड जयप्रकाश ने उस के भाई को फोन कर घटना की जानकारी दी. इसी बीच वहां से आ जा रहे राहगीर एकत्र हो गए.
इस पर जयप्रकाश ने उस के घर फोन कर दिया. जानकारी मिलते ही घर वाले घटनास्थल पर पहुंच गए. घर वालों नेे पुलिस को भी नीलम के मिलने की जानकारी दे दी. कुछ ही देर में थाना सिकंदरा के एसएचओ आनंद कुमार शाही, पुलिस उपायुक्त (नगर) विकास कुमार भी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गए.
सड़क से करीब 100 मीटर अंदर झाड़ी पर नीलम की चुन्नी पड़ी थी. पास में ही चप्पलें और कुछ कपड़े थे. उस की आंखों, नाक और सिर से खून बह रहा था. उसे कई बार उल्टियां भी हुईं. गंभीर हालत को देखते हुए एंबुलेंस बुलाकर नीलम को पहले जिला अस्पताल और बाद में आगरा के एस.एन. मैडिकल कालेज ऐंड हौस्पिटल की इमरजेंसी भरती कराया गया.
घटनास्थल पर भी खून पड़ा था. फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. नीलम के चेहरे और गले पर खरोंचें थीं, उस का गला सूजा हुआ था, जिस से वह बोल नहीं पा रही थी. बेटी को इस हालत में देख कर मां के आंसू नहीं रुक रहे थे.
पुलिस का अनुमान था कि कल नीलम होली खेलने घर से निकली थी. रास्ते में ही उस का अपहरण कर जंगल में उस के साथ दरिंदगी की गई थी. इतना ही नहीं उसे बुरी तरह पीटा गया और गला घोंट कर जान से मारने की कोशिश भी की गई. किसी तरह नीलम की जान तो बच गई थी, लेकिन उस की हालत चिंताजनक थी.
आरोपी उसे मरा समझ कर झाडिय़ों में डाल कर फरार हो गए थे. रात भर नीलम जंगल में पड़ी रही. इस संबंध में गांव मझली पार्टी, थाना सिकदंरा, जिला आगरा निवासी नीलम के पिता ने थाने में अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 376(3), 307 व 3/4 पोक्सो एक्ट के अंतर्गत रिपोर्ट दर्ज कराई, जिस में बेटी से सामूहिक दुष्कर्म, जान से मारने के लिए गंभीर चोटें पहुंचाने का आरोप लगाया गया था.
नीलम को दोपहर में होश आ गया. उस का गला सूजा हुआ था इसलिए वह बोल नहीं पा रही थी. फिर भी किसी तरह उस ने बताया कि वह कल दोपहर को मौसी के यहां जाने के लिए अपने घर से निकली थी, तभी एक बाइक सवार उसे मिला. उस ने पूछा, ”कहां जा रही हो?’‘
”गांव में मौसी के यहां.’‘
”चलो, बाइक पर बैठ जाओ. मैं उधर ही जा रहा हूं, तुम्हें छोड़ दूंगा.’‘ बाइक सवार बोला.
तब वह उस की बाइक पर बैठ गई. वह उसे जंगल में ले गया. पीने को बोतल से पानी दिया. पानी पीने के बाद वह बेहोश हो गई. उस के बाद उसे कुछ याद नहीं.
पुलिस को नीलम की बातों पर विश्वास नहीं हो रहा था. क्योंकि अनजान व्यक्ति की बाइक पर वह क्यों बैठ गई? फिर जब वह गांव से बाहर ले जाने लगा तो उस ने शोर क्यों नहीं मचाया?
जंगल में कैसे पहुंची नीलम?
नाबालिग की मां का दर्द उस की आंखों से छलक रहा था. मां ने रोते हुए कहा कि उस की बेटी के साथ जिस ने भी यह कृत्य किया है उसे फांसी की सजा मिले. उस की बेटी गांव में होली खेलने निकली थी. वहीं से उस का अपहरण कर लिया गया. यह बात बेटी को पूरी तरह होश आने के बाद ही पता चलेगी कि कितने लोग थे? सुबह वह केवल इतना बता पाई थी कि उसे कोई नशीला पदार्थ पिलाया गया था. इस के बाद वह बेहोश हो गई थी.
महिला पुलिस द्वारा तब नीलम को विश्वास में ले कर उस से बातचीत की गई. तब नीलम ने हकीकत बताई. उस ने बताया कि घटना वाले दिन उस के दोस्त गणेश का फोन आया था. उस ने कहा कि गांव के बाहर आ जा होली खेलेंगे.
इस के बाद वह अपने घर मौसी के घर जाने की बात कह कर गांव से बाहर गणेश से मिलने पहुंच गई. गणेश के साथ उस का दोस्त संतोष भी था. गणेश ने उस से कहा, ”यहां बहुत भीड़ है, रुनकता चलते हैं, वहां होली खेलेंगे.’‘
इस के बाद वह गणेश और संतोष के साथ बाइक पर बैठ गई. रुनकता ले जा कर उन्होंने उसे बर्फी (मिठाई) खिलाई. फिर उस ने बाइक जंगल की ओर मोड़ दी. जंगल में ले जा कर दोनों ने उस के साथ जोर जबरदस्ती की और यह हाल गणेश व उस के दोस्त ने किया है.
नीलम से दुष्कर्म और हत्या के प्रयास की घटना बड़ी थी. पुलिस आयुक्त डा. प्रीतिंदर सिंह ने सिकंदरा पुलिस की कई टीमों को घटना के खुलासे के लिए लगाया. इस जानकारी के बाद कि गणेश से नीलम की बातचीत होती थी, पुलिस ने नीलम के घर वालों के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई.
भूपेंद्र की पत्नी मायके गई हुई थी. इसलिए अकेला लेटा वह योजनाएं बनाता रहता था. ऐसे में ही उस ने सोचा कि क्यों न वह शीला नाम की इस बला को ही खत्म कर दे. इस में पकड़े जाने की संभावना कम रहेगी. इस योजना को अंजाम देने के लिए उस ने शीला से एक बार फिर मेलजोल बढ़ा लिया. अब वह उस से सिर्फ बातें करता था. रात में उस के पास आने के लिए कभी नहीं कहता था.
शीला भी अब फिर उस में दिलचस्पी लेने लगी. एक दिन बातचीत में शीला ने भूपेंद्र से कहा कि वह जल्दी ही विजय सिंह के साथ भाग जाएगी. बच्चों को भी वह साथ ले जाएगी. तब भूपेंद्र ने मन ही मन सोचा जब वह उसे भागने के लिए जिंदा छोडे़गा, तब न वह भागेगी. वह कमजोर था क्या, जो इस ने विजय सिंह का दामन थाम लिया.
शीला अपने बच्चों को ले कर भागे, उस के पहले ही वह उसे खत्म कर देना चाहता था. 30 जुलाई को उसे पता चला कि शीला दवा लेने डा. बंगाली के यहां जाएगी. तब भूपेंद्र ने उस से कहा, ‘‘तुम डा. बंगाली की दवा कब से खा रही हो. इस से तुम्हें कोई फायदा नहीं हो रहा है. ऐसा करो, तुम किसी बहाने से गांव के बाहर आ जाओ. मैं तुम्हें शहर ले जा कर अच्छे डाक्टर से दवा दिला देता हूं.’’
पिछले कई महीनों से शीला खुजली से परेशान थी. गांव के डा. बंगाली की दवा से उसे कोई फायदा नहीं हो रहा था. इसलिए वह भूपेंद्र के साथ किसी अच्छे डाक्टर के पास जाने को तैयार हो गई. फिर उसे पता भी तो नहीं था कि भूपेंद्र के मन में क्या है.
भूपेंद्र पर शीला को पूरा विश्वास था, इसलिए 31 जुलाई को बच्चों को स्कूल से ला कर वह भूपेंद्र के साथ डाक्टर के पास जाने के लिए तैयार हो गई. चलते समय उस ने बड़े बेटे सतीश को 20 रुपए दे कर कहा, ‘‘सतीश, तुम भाइयों को संभालना. मैं शमसाबाद के डा. बंगाली से दवा लेने जा रही हूं. वहां से लौटने में 2 घंटे तो लग ही जाएंगे. अगर तुम लोगों को भूख लगे तो बाजार से कुछ ला कर खा लेना.’’
इस के बाद शीला ने भूपेंद्र को फोन किया तो उस ने कहा, ‘‘तुम शमसाबाद चौराहे पर आ जाओ. मैं वहीं खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’
भूपेंद्र ने शीला को खत्म करने की तैयारी पहले से ही कर रखी थी. वह शीला को कोई तेज जहर दे कर मारना चाहता था. जब उसे कोई जहर नहीं मिला तो उस ने छिपकली मार कर सुखा कर उस का जहर तैयार कर लिया था. शमसाबाद चौराहे पर शीला उसे मिली तो उस ने वहां से रबड़ी खरीदी और उस में छिपकली का चूर्ण मिला कर पौलीथीन में पैक कर लिया.
भूपेंद्र शीला को मोटरसाइकिल पर बैठा कर निबोहरा रोड पर चल पड़ा. दोपहर की वजह से सड़क पर आवागमन काफी कम था.
अपनी योजना को अंजाम देने लायक जगह देख कर भूपेंद्र ने मोटरसाइकिल खराब होने के बहाने रोक दी. इस के बाद दोनों वहीं बने एक चबूतरे पर बैठ गए. भूपेंद्र ने कहा, ‘‘शीला मैं बाप बनने वाला हूं. इस खुशी में मैं तुम्हारा मुंह मीठा कराने के लिए रबड़ी खरीद कर लाया हूं.’’
‘‘मुबारक हो, इतनी बड़ी खुशखबरी है. तब तो मुंह मीठा करूंगी ही.’’ शीला ने कहा.
इस के बाद भूपेंद्र ने मोटरसाइकिल की डिक्की से रबड़ी और बोतल का पानी निकाल शीला को थमा दिया. शीला ने उस से भी रबड़ी खाने को कहा, लेकिन उस ने मना करते हुए कहा, ‘‘यह पूरी रबड़ी मैं तुम्हारे लिए लाया हूं. मैं ने तो दुकान पर ही खा ली थी.’’
शीला ने आराम से पूरी रबड़ी खाई और बोतल का पानी पी कर प्रेमिल नजरों से भूपेंद्र की ओर देखा. तब भूपेंद्र ने कहा, ‘‘शीला, मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’
‘‘कहो क्या कहना है?’’ शीला ने पूछा.
‘‘मैं चाहता हूं कि अब हमारा मिलना ठीक नहीं है. मेरी शादी हो गई है, इसलिए मैं अपना परिवार देखूं. तुम्हारा अपना परिवार है, इसलिए तुम अपना परिवार देखो.’’
‘‘यही तो मैं भी कह रही थी. भई तुम्हारी नईनई पत्नी है. उस के साथ मौज करो. कहां मेरे पीछे पड़े हो.’’ शीला ने भूपेंद्र को समझाया.
इसी तरह की बातें करते करते आधा घंटा बीत गया. अब तक जहर शीला पर अपना असर दिखाने लगा था. जहर का असर होते देख भूपेंद्र ने अपने दोस्त फतेह सिंह को फोन कर के वहां आने को कहा. करीब आधे घंटे में फतेह सिंह वहां पहुंचा तो भूपेंद्र उसे फतेह सिंह की मोटरसाइकिल पर बिठा कर उस के पीछे खुद बैठ गया.
इस तरह बेहोश शीला को बीच में बैठा कर सड़क से कुछ अंदर जा कर शीला को जमीन पर पटक दिया. वहीं पर उस की गला दबा कर हत्या कर दी गई. इस के बाद लाश को कंजी के पेड़ के नीचे इस तरह रख दिया कि वह आसानी से दिखाई न दे.
इस के बाद भूपेंद्र ने फतेह सिंह को इस मदद के लिए एक हजार रुपए नकद और शीला का मोबाइल फोन दे कर विदा कर दिया. फतेह सिंह अपने घर चला गया तो भूपेंद्र भी अपनी मोटरसाइकिल से अपने घर चला गया.
शीला के घर वाले क्या कर रहे हैं, भूपेंद्र को सब पता चलता ही रहता था. लेकिन शीला की लाश का क्या हुआ, यह देखने के लिए वह अगले दिन घटनास्थल पर गया. तेज गरमी की वजह से अगले दिन ही शीला की लाश सड़ने लगी थी. प्रेमिका की लाश को सड़ते देख भूपेंद्र बेचैन हो उठा. जिस शरीर से उसे इतना सुख मिला था, उसे वह सड़ता गलता नहीं देखना चाहता था.
फिर भी उस दिन वह चुप रहा. लेकिन जब उस के परिवार के 4 निर्दोष लोग जेल चले गए तो उस से रहा नहीं गया और उस ने फतेह सिंह से फोन कर के लाश की जानकारी पहले शीला की बुआ और उस के बाद उस के भाई श्रीनिवास को दे दी. शायद उसे पता नहीं था कि इस तरह फोन करने से वह पकड़ा जाएगा. अगर उसे पता होता तो वह यह गलती कतई न करता.
पूछताछ के बाद पुलिस ने भूपेंद्र एवं फतेह सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. पुलिस ने फतेह सिंह के पास से शीला का वह मोबाइल भी बरामद कर लिया था, जिस से निबोहरा रोड पर लाश पड़ी होने की सूचना दी गई थी. कथा लिखे जाने तक दोनों अभियुक्त जेल में थे.
— कथा पुलिस सूत्रों पर आधार
इधर राहुल जैन ने डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर के रसूख के चलते रजिस्ट्री कराई गई, जमीन का दाखिल खारिज करा लिया. बाबू सिंह की आपत्ति के बावजूद दाखिल खारिज कर दिया गया. इतना ही नहीं, राहुल जैन ने जमीन के 2 मामूली टुकड़े 70-70 लाख में बेच भी दिए. एक टुकड़ा उस ने नई सब्जीमंडी निवासी राजेंद्र पांडेय को तथा दूसरा टुकड़ा आजाद नगर, रसूलाबाद (कानपुर देहात) निवासी नैंसी चंदेल व विजय लक्ष्मी को बेच दिया.
8 सितंबर, 2023 को बाबू सिंह जब खेत पर पहुंचा तो इसी जमीन पर बिल्डर चारदीवारी खींच कर प्लाटिंग कर रहे थे. बाबू सिंह ने प्लाटिंग का विरोध जताया तो उसे बेइज्जत कर वहां से भगा दिया गया. इस सदमे को वह बरदाश्त नहीं कर पाया और उस ने 9 सितंबर की सुबह 4 बजे ट्रेन से कट कर आत्महत्या कर ली.
इधर राहुल जैन को गिरफ्तार करने गई पुलिस टीम एक सप्ताह से नोएडा व दिल्ली में डेरा डाले थी. उस ने नोएडा स्थित फ्लैट छोड़ दिया था और होटलों में फरारी काट रहा था. 16 सितंबर, 23 को पुलिस टीम को मोबाइल सर्विलांस के जरिए एक रिश्तेदार का नंबर मिला, जिस के जरिए पुलिस टीम मयूर विहार स्थित होटल आईएलडी पहुंची और सुबह 4 बजे राहुल जैन को गिरफ्तार कर थाना चकेरी लाया गया.

पूछताछ में राहुल जैन पहले तो चुप्पी साधे रहा, फिर बोला कि आशू ने उसे कौडिय़ों के भाव बेशकीमती जमीन दिलाने का लालच दे कर फंसा दिया. वह चैक देने व छीनने का जवाब नहीं दे सका, न ही शिवम द्वारा चैक देने का जवाब दे सका. पूछताछ के बाद उसे कानपुर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.
26 सितंबर, 2023 को पुलिस की कानपुर टीम ने मधुर पांडेय को अलीगढ़ से गिरफ्तार कर लिया. उसे चकेरी थाने लाया गया. पूछताछ में उस ने बताया कि उसे बबलू यादव व आशू दिवाकर ने सस्ती जमीन दिलाने के नाम पर फंसा दिया. बबलू ने उस से कहा था कि करोड़ों की जमीन लाखों में मिल जाएगी. पूछताछ के बाद मधुर को भी जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने सक्रियता दिखाते हुए डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर, शिवम सिंह, बबलू व जितेंद्र के खिलाफ कोर्ट से गैरजमानती वारंट प्राप्त कर उन पर 50 हजार का इनाम घोषित कर दिया. अर्थात जो भी उन्हें पकड़वाएगा, उसे यह इनाम दिया जाएगा.
इसी बीच पुलिस ने सीआरपीसी की धारा 82 के तहत काररवाई भी शुरू कर दी, लेकिन इसी दरम्यान आशू दिवाकर ने बिटान देवी द्वारा दायर एफआईआर को निरस्त करने की अरजी हाईकोर्ट में डाल दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उस की अरजी खारिज कर दी.
पुलिस की ताबड़तोड़ दबिशों के बावजूद जब आशू दिवाकर, बबलू, जितेंद्र व शिवम सिंह चौहान गिरफ्त में नहीं आए तो पुलिस कमिश्नर आर.के. स्वर्णकार के आदेश पर चारों आरोपियों की इनाम राशि 50 हजार से बढ़ा कर एक लाख कर दी. यही नहीं, कोर्ट के आदेश से चारों को भगोड़ा भी घोषित कर दिया गया. पुलिस ने बबलू, जितेंद्र व शिवम के घर पहुंच कर डुग्गी पिटवा कर मुनादी कराई और नोटिस चस्पा किया.
18 अक्तूबर, 2023 को सपा अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव किसान बाबू सिंह के अहिरवां स्थित घर पहुंचे. उन्हें देखते ही दोनों बेटियां रूबी व काजल रो पड़ीं. बाबू सिंह की पत्नी बिटान देवी हाथ जोड़ कर बोली कि हमें उम्मीद नहीं थी कि आप आएंगे. अखिलेश ने बाबू सिंह की तसवीर पर फूल चढ़ा कर उन्हें श्रद्वांजलि दी और परिवार के साथ आधा घंटे का समय बिताया.

अखिलेश यादव ने कहा कि आशू दिवाकर प्रदेश के डिप्टी सीएम का खास है. भाजपा उसे बचा रही है. वह उन के संपर्क में है. वह बोले, ‘‘अब बुलडोजर क्यों नहीं चल रहा है? उस की चाबी खो गई या पेट्रोल डीजल नहीं है. बुलडोजर का ड्राइवर भाग गया है या फिर लखनऊ से अनुमति नहीं मिल रही है. जानबूझ कर ऐसे लोगों पर बुलडोजर नहीं चलाना चाहते हैं.’’
उन्होंने बेटियों को आश्वासन दिया कि उन की पढ़ाईलिखाई और शादी के खर्च को ले कर कोई समस्या नहीं आएगी. रूबी बीएससी (फाइनल) की छात्रा है जबकि काजल इंटरमीडिएट की.
22 अक्तूबर, 2023 को जब पुलिस टीम भगोड़ा घोषित एक लाख के इनामी आरोपी डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर के घर मुनादी कराने व नोटिस चस्पा करने पहुंची तो पता चला कि उस की मां उर्मिला देवी की मौत हो गई है. अत: पुलिस बिना मुनादी के ही वापस आ गई. लेकिन 2 दिन बाद मुनादी करा कर नोटिस चस्पा कर दिया.
पुलिस को अनुमान था कि आशू दिवाकर अपनी मां उर्मिला को कंधा देने अवश्य आएगा, अत: पुलिस अधिकारियों ने उसे गिरफ्तार करने के लिए सादे कपड़ों में पुलिस का जाल बिछाया. लेकिन गिरफ्तारी के डर से आशू मां को कंधा देने भी नहीं आया.
बहरहाल, कथा संकलन तक 2 आरोपी राहुल जैन व मधुर पांडेय कानपुर जेल में बंद थे. उन की जमानत नहीं हुई थी. 4 आरोपी शिवम चौहान, बबलू यादव, जितेंद्र यादव तथा प्रियरंजन आशू दिवाकर भगोड़ा घोषित हैं. उन पर एकएक लाख रुपए का इनाम घोषित है. पुलिस उन की सरगरमी से तलाश कर रही थी.
आरोप लगने पर भाजपा ने डा. प्रियरंजन आशू को पार्टी से निकाल दिया था. लेकिन वह बाल आयोग का सदस्य अभी भी है. पीडि़ता बिटान देवी न्याय की तलाश में दरदर भटक रही थी. अभी तक उन्हें जमीन वापस नहीं मिली थी. पुलिस व प्रशासनिक अधिकारी रजिस्ट्री कैंसिल कराने तथा दाखिल खारिज निरस्त कराने का प्रयास कर रहे थे.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
इस बार भी ठंड आते ही जब सभी लोग अपनेअपने कमरों में सोने लगे तो रुचि शेर सिंह को रात में अपने घर बुलाने लगी. 11 नवंबर, 2013 की रात को भी जब रुचि को लगा कि घर के सभी लोग सो गए हैं तो उस ने फोन कर के शेर सिंह को आने के लिए कह दिया. गांवों में ज्यादातर लोग शाम को जल्दी खा कर सो जाते हैं. इसलिए गांवों में रात 10 बजे तक सन्नाटा पसर जाता है.
गांव में सन्नाटा पसरते ही शेर सिंह अशोक सिंह के घर पहुंच गया. रुचि उस का इंतजार कर ही रही थी इसलिए उस के छत पर आते ही उस ने साड़ी फेंक दी. शेर सिंह रेलिंग में साड़ी बांध कर आंगन में उतरा और रुचि के साथ उस के कमरे में चला गया.
रुचि और शेर सिंह कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध के तैयार ही हुए थे कि उन्हें आंगन में किसी की पदपाप सुनाई दी. उन्हें लगा कि कोई लघुशंका के लिए उठा होगा. वे सांस रोक कर उस के वापस कमरे में जाने का इंतजार करने लगे. लेकिन तब दोनों सहम उठे, जब अशोक सिंह की आवाज उन के कानों में पड़ी. वह अपने दोनों बेटों, सचिन और विपिन को आवाज दे कर बाहर आने के लिए कह रहे थे.
सचिन और विपिन के बाहर आते ही अशोक सिंह ने रुचि को आवाज दे कर कमरे का दरवाजा खोलने को कहा. अब रुचि और शेर सिंह को समझते देर नहीं लगी कि उन्हें शेर सिंह के कमरे में होने की शंका हो गई है. रुचि और शेर सिंह जिस स्थिति में थे, उस स्थिति में दरवाजा नहीं खोल सकते थे. दोनों ने जल्दीजल्दी कपड़े पहनने लगे. दरवाजा नहीं खुला तो अशोक सिंह ने दरवाजे पर जोर से लात मार कर एक बार फिर रुचि को दरवाजा खोलने को कहा.
अब रुचि के पास दरवाजा खोलने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. डर से कांप रही रुचि ने दरवाजा खोला और तेजी से बाहर की ओर भागी. उस के बाहर निकलते ही शेर सिंह ने फुरती से एक बार फिर अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. बाहर जाते ही रुचि ने कहा, ‘‘पापा, उसे कुछ मत कहना. उस की कोई गलती नहीं है.’’
रुचि का इतना कहना था कि तड़ातड़ गोलियां चलने लगीं. उसी के साथ रुचि के चीखने की आवाज शेर सिंह को सुनाई दी. चीखें ऐसी थीं, जिन्हें सुन कर शेर सिंह को समझते देर नहीं लगी कि वे गोलियां रुचि के ऊपर दागी गई थीं.
यह जान कर शेर सिंह का पेशाब निकल गया. रुचि को गोली मारने के बाद अशोक सिंह ने एक बार फिर कमरे का दरवाजा खुलवाने की कोशिश की. लेकिन शेर सिंह जानता था कि उस के बाहर निकलते ही उसे भी गोली मार दी जाएगी. इसलिए उस ने दरवाजा नहीं खोला. उस के बाद ठोकर मार कर दरवाजा तोड़ने की कोशिश की गई. लेकिन दरवाजा मजबूत था, इसलिए टूटा नहीं.
कमरे के अंदर बैठा शेर सिंह मौत का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. उस के पास मोबाइल तो था, लेकिन बैटरी खत्म हो जाने की वजह से वह बंद हो गया था. इसलिए वह भाइयो को फोन कर के इस बारे में कुछ बता भी नहीं सकता था. वह मौत का इंतजार कर ही रहा था कि तभी पकड़ो पकड़ो की आवाजें आने लगीं.
यह शोर सुन कर गांव के कुछ लोग अशोक सिंह के घर के अंदर आ गए तो उन्होंने रोते हुए कहा, ‘‘कुछ हथियारबंद बदमाश घर के अंदर आ कर लूटपाट करने की कोशिश कर रहे थे. बाकी लोग तो सो रहे थे, लेकिन रुचि जाग रही थी. उस ने विरोध किया तो उसे गोली मार कर बदमाश भाग गए. लेकिन मैं ने विपिन और सचिन की मदद से एक बदमाश को कमरे में बंद कर दिया है.’’
गांव वालों की सलाह पर अशोक सिंह ने सौ नंबर पर फोन कर के घटना की सूचना दे दी थी. गांव वालों के आ जाने और पुलिस को सूचना देने की बात सुन कर कमरे में बंद शेर सिंह की जान में जान आई. उसे लगा कि अब जो करेगी, पुलिस करेगी. ये लोग उस का कुछ नहीं करेंगे.
सूचना पा कर पुलिस अशोक सिंह के घर पहुंची और काररवाई कर के शेर सिंह को थाने ले आई. थाने में की गई पूछताछ में जब उस ने पुलिस को सच्चाई बताई तो सारा मामला ही उलट गया. इस के बाद थानाप्रभारी अमित कुमार ने अशोक सिंह को एकांत में बुला कर जब कहा कि उन्हें सारी सच्चाई का पता चल गया है, इसलिए उन के लिए अच्छा यही होगा कि वह स्वयं ही सारी सच्चाई बता दें.
मजबूरन अशाक सिंह को सच बताना पड़ा. अशोक सिंह ने जो बताया उस के अनुसार, रात में जब वह लघुशंका के लिए उठे तो उन्हें रेलिंग से बंधी साड़ी दिखाई दी. पहले तो उन्हें संदेह हुआ कि कहीं प्रेमी के विछोह में रुचि फांसी लगा कर आत्महत्या तो नहीं करना चाहती. लेकिन जब वह रुचि के कमरे के पास पहुंचे तो उन्हें कमरा अंदर से बंद मिला. इस बात पर उन्हें ताज्जुब हुआ, क्योंकि रुचि का कमरा अंदर से कभी बंद नहीं रहता था. कमरे के अंदर से बंद होने और साड़ी के लटकने से उन्हें संदेह हुआ तो उन्होंने बेटों को आवाज दी.
दोनों बेटों के साथ अशोक सिंह की पत्नी कमला देवी भी आंगन में आ गई थीं. साड़ी को उस तरह लटकती देख सभी हैरान थे. इस के बाद अशोक सिंह ने रुचि के कमरे की ओर इशारा कर के कहा कि यह दरवाजा अंदर से बंद है. उन्हें शक है कि अंदर रुचि के अलावा भी कोई है. इस के बाद अपना लाइसेंसी रिवाल्वर निकाल कर अशोक ने दरवाजा खोलने के लिए रुचि को आवाज दी. बेटे भी तमंचे लिए हुए थे. जब रुचि ने दरवाजा नहीं खोला तो उन्होंने दरवाजे पर लात मारी.
पिता को गुस्से में देख कर रुचि कमरे का दरवाजा खोल कर बाहर की ओर भागी. शायद उस के सलवार का नाड़ा ठीक से बंधा नहीं था, इसलिए भागते समय वह नीचे गिर गया. रुचि को उस हालत में देख कर अशोक सिंह समझ गए कि अंदर क्या हो रहा था. फिर क्या था, बापबेटों का दिमाग घूम गया और उन्होंने हाथ में लिए हथियारों से रुचि पर गोलियां चला दीं. कुछ गोलियां रुचि को लगीं तो कुछ दीवारों पर जा लगीं.
रुचि को खत्म कर के अशोक सिंह और उन के बेटों का ध्यान रुचि के कमरे की ओर गया, क्योंकि कमरा एक बार फिर अंदर से बंद हो गया था. वे समझ गए कि कमरे के अंदर शेर सिंह है जो उस ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया है. एक बार फिर कमरा खोलवाने की कोशिश की गई, लेकिन दरवाजा नहीं खुला. कमरे का दरवाजा मजबूत था, इसलिए जल्दी टूट भी नहीं सकता था. गोलियों की आवाजें सुन कर गांववाले जाग गए थे. वे शोर मचाते हुए अशोक सिंह के घर की ओर दौड़ पडे़ थे.
उस स्थिति में अशोक सिंह ने घर वालों के साथ मिल कर तुरंत एक योजना बनाई. फिर उसी योजना के तहत वे जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगे कि लूटने के उद्देश्य घर में घुस आए बदमाशों ने विरोध करने पर उन की बड़ी बेटी रुचि को गोली मार दी है.
गांव वालों से पूछने पर जब उन्होंने बताया कि हथियारों के बल पर एक बदमाश को बंधक बना लिया है तो गांव वालों ने उन से 100 नंबर पर फोन करा कर घटना की सूचना दिला दी. अशोक सिंह ने होशियारी तो बहुत दिखाई, लेकिन शेर सिंह ने जब सारी सच्चाई पुलिस को बता दी तो वह खुद ही अपने बिछाए जाल में फंस गए.
अशोक सिंह से पूछताछ के बाद पुलिस ने अज्ञात हत्यारों की जगह अशोक सिंह और उन के बेटों, सचिन और विपिन का नाम दर्ज कर के मामले में शस्त्र अधिनियम की धाराएं और बढ़ा दीं. पुलिस ने अशोक सिंह को तो गिरफ्तार कर ही लिया था, विपिन और सचिन को गिरफ्तार करने गांव चौगान पहुंच गई.
लेकिन विपिन और सचिन को इस बात की भनक लग गई थी, इसलिए पुलिस के पहुंचने के पहले ही दोनों भाई फरार हो गए थे. अशोक सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने वे हथियार बरामद कर लिए, जिन से रुचि की हत्या हुई थी. इस के बाद पुलिस ने अशोक सिंह को अदालत मे पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस सचिन और विपिन की तलाश कर रही थी. कथा लिखे जाने तक उन का कुछ पता नहीं चला था.
—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
सर्विलांस से मिली जानकारी के अनुसार, शीला का फोन 31 जुलाई की शाम को बंद हो गया था. 2 दिनों बाद फोन चालू हुआ तो उस की लोकेशन गांव अमर सिंह का पुरा की थी. फोन की लोकेशन तो बदलती रही थी, लेकिन ज्यादातर उस की लोकेशन अमर सिंह का पुरा की ही बता रही थी. इस का मतलब फोन उसी गांव के किसी आदमी के पास था. थानाप्रभारी ने अमर सिंह का पुरा में अपने मुखबिरों को तैनात कर दिया.
इस के बाद उन्होंने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो पता चला कि शीला के फोन पर 30 जुलाई से 31 जुलाई की दोपहर तक एक नंबर से लगातार बात हुई थी. मुनीष कुमार ने उस नंबर के बारे में पता किया तो वह नंबर शीला के ही परिवार के एक लड़के भूपेंद्र कुमार का था. रिश्ते में वह उस का भतीजा लगता था. भूपेंद्र शीला के जेठ लगने वाले रामलाल का बेटा था. थानाप्रभारी मुनीष कुमार सोचने लगे कि आखिर भूपेंद्र ने शीला को फोन क्यों किए थे? उन्होंने जब इस सवाल पर गहराई से सोचा तो भूपेंद्र पर उन्हें शक हो गया.
भूपेंद्र पर शक होते ही थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ शाहपुर के लिए निकल पड़े. थाना फतेहाबाद पुलिस टीम शाहपुर गांव पहुंची तो गांव वाले परेशान हो उठे, क्योंकि शीला की हत्या के मामले में पहले से ही 4 लोग जेल जा चुके थे. पुलिस किसे पकड़ने आई है, गांव में इसी बात की चर्चा होने लगी.
पुलिस गांव वालों से पूछ कर रामलाल के घर पहुंची. भूपेंद्र घर पर ही था. पुलिस ने उसे जीप में बैठा लिया. गांव वालों ने इस बात का काफी विरोध किया, लेकिन पुलिस के आगे किसी की भी एक नहीं चली और थानाप्रभारी उसे थाने ले आए. थाने ला कर उन्होंने उस से सीधे पूछा, ‘‘शीला की हत्या तुम ने क्यों की?’’
मुनीष कुमार ने भूपेंद्र से यह बात इस तरह पूछी जैसे उन्हें पता हो कि शीला की हत्या इसी ने की है. उन के इस सवाल से भूपेंद्र परेशान हो उठा कि इन्हें कैसे पता चला कि शीला की हत्या उसी ने की है. उस ने सुना था कि अपराध उगलवाने के लिए पुलिस आरोपियों को बहुत बुरी मार मारती है. पुलिस की मार से बचने के लिए उस ने तुरंत स्वीकार कर लिया कि अपने दोस्त फतेह सिंह के साथ मिल कर उसी ने शीला की हत्या की है.
अमर सिंह का पुरा के रहने वाले फतेह सिंह के पास ही शीला का मोबाइल फोन है. उसी ने फोन कर के पहले शीला की बुआ और उस के बाद श्रीनिवास को लाश के बारे में बताया था.
थानाप्रभारी मुनीष कुमार ने अमर सिंह का पुरा जा कर भूपेंद्र की निशानदेही पर उस के दोस्त फतेह सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद भूपेंद्र और फतेह सिंह से की गई पूछताछ में शीला की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.
थाना डौकी गांव कटोरा के रहने वाले रामसनेही के परिवार में पत्नी रामदेवी के अलावा 7 संतानों का भरापूरा परिवार था. संतानों में बेटी मुन्नी देवी सब से बड़ी थी तो कल्लो सब से छोटी. शीला रामसनेही की दूसरे नंबर की बेटी थी. बेटियों में वह सब से खूबसूरत थी. विवाहयोग्य होते ही रामसनेही ने उस के घरवर की तलाश शुरू कर दी थी.
खूबसूरत होने की वजह से रामसनेही को उस के लिए ज्यादा भागदौड़ नहीं करनी पड़ी. शाहपुर के रहने वाले छोटेलाल का बेटा जयपाल उन्हें शीला के लिए पसंद आ गया. जयपाल को शीला पहली ही नजर में भा गई थी. इस के बाद दोनों का विवाह हो गया. यह 10-11 साल पहले की बात है.
शीला ससुराल आ गई. ससुराल में एक जेठ और 3 देवरों का भरापूरा परिवार था. जयपाल दिल्ली में नौकरी करता था. महीने, 2 महीने में ही उस का गांव आना होता था. समय के साथ शीला 3 बच्चों सतीश, मनोज और हरीश की मां बनी.
हरीश के पैदा होने के बाद जयपाल की तबीयत खराब रहने लगी. लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उसी पर थी, इसलिए दिल्ली में रह कर नौकरी करना उस की मजबूरी थी. उस की इस बीमारी का असर सब से ज्यादा शीला पर पड़ा. क्योंकि बीमारी की वजह से उस का शरीर इस लायक नहीं रहा कि घर जाने पर वह शीला को खुश कर पाता.
शीला को जब लगा कि पति अब उसे खुश नहीं कर सकता तो वह अपनी खुशी किसी और में तलाशने लगी. उस की यह तलाश जल्दी ही खत्म हो गई, क्योंकि इस के लिए उसे कहीं बाहर नहीं जाना पड़ा. परिवार के ही जेठ रामलाल का 20-22 साल का बेटा भूपेंद्र उसे भा गया. वह सेल्समैन था. उस का शहर भी आनाजाना लगा रहता था. गांव में वह सब से ज्यादा स्मार्ट था. शहर आनेजाने की वजह से वह रहता भी बनठन कर था.
शीला को भूपेंद्र भा गया तो वह उस पर डोरे डालने लगी. खूबसूरत शीला का गदराया बदन था. चाची का खुला आमंत्रण पा कर जवानी की दहलीज पर खड़ा कुंवारा भूपेंद्र उस के मोहपाश में बंधता चला गया. फिर तो वह दिन आते देर नहीं लगी, जब चाचीभतीजे ने सारी मर्यादाएं तोड़ कर 2 जिस्म एकजान कर दिए.
शीला गांव में बच्चों के साथ अकेली ही रहती थी, इसलिए भूपेंद्र से उसे मिलने में कोई परेशानी नहीं होती थी. भूपेंद्र उस के घर से मात्र 20 मीटर की दूरी पर रहता था. बच्चों के सो जाने पर वह फोन कर के भूपेंद्र को अपने घर बुला लेती. दोनों का मिलन रात में ही होता था. यही वजह थी कि उन के इन संबंधों की जानकारी गांव या परिवार के किसी भी आदमी को नहीं हो पाई.
इसी तरह एकएक कर के 3 साल बीत गए. भूपेंद्र से संबंध बनने के बाद शीला को जयपाल की कोई फिकर नहीं रह गई थी. लेकिन जब घरवालों ने भूपेंद्र के लिए लड़कियां देखनी शुरू कीं तो एक बार शीला फिर परेशान हो उठी. फिर वह भी अपने लिए नया यार खोजने लगी, क्योंकि उसे पता था कि भूपेंद्र की शादी हो जाएगी तो वह उसे घास डालना बंद कर देगा. जबकि अब उसे दूसरों का ही सहारा था. जयपाल तो अब कईकई महीने बाद घर आता था.
इस बार शीला की नजर गांव के ही विजय सिंह पर जम गई. विजय सिंह भी कुंवारा था, इसलिए जल्दी ही वह शीला के प्रेमजाल में फंस गया. इस तरह शीला के अब 2 यार हो गए. विजय सिंह को अपने प्रेमजाल में फांस कर शीला निश्चिंत हो गई. भूपेंद्र उस के पास आना छोड़ देगा तो विजय सिंह तो रहेगा ही. वह विजय को भी भूपेंद्र की ही तरह सब के सो जाने पर रात को बुलाती थी.
गर्मियों में जयपाल घर आया तो जायदाद को ले कर भाइयों से विवाद हो गया. जयपाल अकेला था, जबकि भाई 4 थे. उन्होंने जयपाल की पिटाई कर दी. शीला पति को बचाने गई तो उन लोगों ने उसे भी जमीन पर गिरा कर मारापीटा. इस के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा तो जेठ और देवरों ने सब के सामने अपनी गलती के लिए लिखित रूप से माफी मांग ली. इस के बाद पूरा परिवार शीला से नफरत करने लगा. ठीक होने के बाद जयपाल दिल्ली चला गया तो शीला अपने पुराने ढर्रे पर चल पड़ी.
भूपेंद्र ने मांबाप से विवाह का काफी विरोध किया, लेकिन उम्र का वास्ता दे कर मांबाप ने उस की एक नहीं सुनी और 13 जुलाई, 2013 को उस का विवाह कर दिया. पत्नी के आने के बाद वह शीला की ओर से लापरवाह तो हुआ, लेकिन उस के पास जाना नहीं छोड़ा. ऐसे में ही किसी दिन उसे शीला और विजय सिंह के संबंधों का पता चला तो वह बौखला उठा.
उस ने यह बात शीला से कही तो शीला ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी ब्याहता तो हूं नहीं कि सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूं. मैं ने जिस के साथ 7 फेरे लिए, जब उस की नहीं हुई तो तुम्हारी क्यों होऊंगी. मेरे मन में जो आएगा, वह करूंगी. रौबदाब दिखाना है तो अपनी पत्नी को दिखाओ. उसे पल्लू में बांध कर रखो. तुम उस के पास सोते हो तो मैं ने तो नहीं मना किया. फिर तुम मुझे क्यों रोक रहे हो.’’
शीला की ये बातें भूपेंद्र को अच्छी नहीं लगीं. फिर भी वह कुछ नहीं बोला. लेकिन मन ही मन उस ने तय कर लिया कि शीला जिस शरीर और सुंदरता के बल पर कूद रही है, उसे वह ऐसा कर देगा कि छूने की कौन कहे, कोई उस की ओर देखेगा तक नहीं. इस के लिए उस ने तेजाब डालने की योजना बनाई. लेकिन इस में उसे लगा कि वह फंस जाएगा. क्योंकि तेजाब डालते समय शीला उसे पहचान लेगी. फंसने के डर से उस ने इस योजना पर पानी डाल दिया और कोई नई योजना बनाने लगा.
प्रियरंजन आशू दिवाकर मूलरूप से मैनपुरी का रहने वाला है. वहां उस का पुश्तैनी मकान है. उस के पिता रामप्रकाश दिवाकर शिक्षा विभाग में अधिकारी थे. 3 भाइयों में प्रियरंजन सब से छोटा है. कानपुर के श्याम नगर में भी उस का आलीशान मकान है.
वह स्वयं भी डाक्टर है और उस की पत्नी अनामिका भी डाक्टर है. आशू दिवाकर 1999 बैच का डाक्टर है. उस ने कानपुर मैडिकल कालेज से ही एमबीबीएस फिर एमएस की पढ़ाई की थी. उस की पत्नी डा. अनामिका यहीं पर फिजियोलौजी डिपार्टमेंट में कार्यरत है. उसे मैडिकल कालेज में आवास भी मिला हुआ है. लेकिन डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर ने डाक्टरी पेशा नहीं चुना. उसे तो राजनीतिक भूख थी, इसलिए उस ने भारतीय जनता पार्टी को अपने राजनीतिक करिअर के रूप में चुना.
भाजपा में उस ने अपनी मेहनत और लगन से कद बढ़ाया, जिस का परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने 2007 में उसे मैनपुरी के किशनी विधानसभा क्षेत्र से टिकट दे दिया, लेकिन वह हार गया. इस के बाद वह सपा में चला गया. सपा ने उसे जिला पंचायत अध्यक्ष बना दिया. कुछ समय बाद वह फिर से पाला बदल कर भाजपा में आ गया.
2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उसे पुन: किशनी से टिकट दिया, लेकिन वह फिर हार गया. इस के बाद भाजपा ने उसे बाल संरक्षण आयोग का सदस्य बना दिया. बाल आयोग में विभिन्न क्षेत्रों से सदस्यों को चुना जाता है. चूंकि प्रियरंजन आशू दिवाकर डाक्टर था, इसलिए उस का चयन मैडिकल क्षेत्र से किया गया था.

डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर ने अपने ड्राइवर बबलू यादव की सिफारिश पर किसान बाबू सिंह की कोर्टकचहरी में जम कर पैरवी की और उस की जमीन नरेंद्र के चंगुल से मुक्त करा दी. लेकिन नरेंद्र व उस के बेटे फिर भी उसे परेशान करते रहे. इस गम में बाबू सिंह अधिक शराब पीने लगा. वह बीमार पड़ गया. आशू दिवाकर को जानकारी हुई तो उस ने बाबू सिंह को हैलट अस्पताल में भरती कराया और उस का इलाज कराया.
नरेंद्र से बाबू सिंह तो परेशान था ही, उस की बेटियां भी भयभीत रहती थीं. बेटियां जानती थीं कि इस समस्या से निजात रसूखदार नेता आशू दिवाकर ही दिला सकता है. अत: एक रोज बाबू सिंह की छोटी बेटी काजल ने एक भावुक पत्र लिख कर बबलू के मार्फत आशू दिवाकर को भिजवाया और मदद की गुहार लगाई.
पत्र में काजल ने लिखा, ‘नमस्ते आशू अंकल, मैं काजल यादव पुत्री बाबू यादव अहिरवां (चकेरी) में रहती हूं. आप के साथ जो बबलू यादव रहते हैं, उन के रिश्तेदार की बेटी हूं. एक बार मेरी आप से आप के श्याम नगर (कानपुर) वाले घर में मुलाकात हुई थी, जब पापा शराब पीने के कारण बहुत बीमार हो गए थे.
‘आप ने हैलट में उन का इलाज कराया था. आप की पैरवी पर पापा मुकदमा तो जीत गए, लेकिन जमीन पापा को अभी भी नहीं मिल पाई. नरेंद्र यादव व उस के लडक़े बहुत परेशान करते हैं. आप थोड़ी और मदद कर दीजिए, वरना पापा आत्महत्या कर लेंगे. अंकल, हमें पता है कि आप मंत्री बन गए हैं. प्लीज हेल्प मी अंकल.’
काजल के इस पत्र को पढऩे के बाद डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर भावुक हो गया. इस के बाद उस ने अपने रसूख के चलते नरेंद्र यादव व उस के बेटों पर शिकंजा कसा. उस की थाने में ही नहीं, कोर्टकचहरी तक हनक थी. अत: नरेंद्र यादव डर गया और उस ने बाबू सिंह की जमीन छोड़ दी. जमीन का कब्जा पा कर बाबू सिंह व उस का परिवार खुशी से झूम उठा. पूरा परिवार नेता का अहसानमंद हो गया.
डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर ने बाबू सिंह को जमीन तो दिलवा दी लेकिन अब उस की निगाह बाबू सिंह की बेशकीमती जमीन पर जम गई. उस ने अपने ड्राइवर बबलू व उस के रिश्तेदार जितेंद्र यादव के मार्फत बाबू सिंह पर जमीन बेचने का दबाव बनाया.
जितेंद्र ने चाचा बाबू सिंह को समझाया कि वह झगड़ालू जमीन को बेच कर कानपुर देहात में ठिकाना बना लें. इस जमीन से उन्हें करोड़ों रुपए मिलेंगे. इस से वह बेटियों को पढ़ालिखा कर उन की शादी भी कर लेंगे और मकान भी बना लेंगे. फिर भी इतना पैसा बच जाएगा कि उन का जीवन आराम से गुजरेगा. हर तरह के झंझट और टेंशन से भी निजात मिल जाएगी.
बाबू सिंह पहले तो राजी नहीं हुआ, लेकिन जब डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर ने भी दबाव डाला तो बाबू सिंह राजी हो गया. उस ने पत्नी व बेटियों को भी राजी कर लिया. बाबू सिंह जब जमीन का सौदा करने को राजी हो गया तो शातिर दिमाग आशू दिवाकर ने उस की जमीन हड़पने का षडयंत्र रचा. इस षडयंत्र में उस ने अपने खास गुर्गे राहुल जैन, शिवम चौहान, मधुर पांडेय, बबलू व जितेंद्र यादव को भी शामिल कर लिया.
राहुल जैन डा. प्रियरंजन दिवाकर का बेहद करीबी था. वह बी 92, सेक्टर 31, नोएडा में रहता था. वह खुद को आशू का प्रतिनिधि बता कर रौब गांठता था. उस ने सी 15 सेक्टर 4 नोएडा में प्रतिनिधि कार्यालय खोल रखा था. इसी तरह शिवम चौहान मैनपुरी का था. आशू दिवाकर के हर कार्यक्रम में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेता था, इसलिए वह आशू का खास था.
मधुर पांडेय भाजपा का युवा कार्यकर्ता था. वह यशोदा नगर कानपुर का रहने वाला था. वह अकसर श्याम नगर वाले घर में आशू से मिलने जाता था, इसलिए अच्छी जानपहचान थी. आशू दिवाकर ने इन सब को सस्ती जमीन दिलाने का लालच दिया था. बबलू ड्राइवर था और आशू के हर राज का जानकार था.
बाबू सिंह को जो 10 बीघा जमीन वसीयत में मिली थी, वह 7 रकबों में बंटी थी, जिस में आराजी संख्या 1609 में 0.287 हेक्टेयर, आराजी संख्या 1479 में 0.143 हेक्टेयर, आराजी संख्या 1480 में 0.287 हेक्टेयर, आराजी संख्या 1735 में 0.082 हेक्टेयर, आराजी संख्या 1742 में 0.210 हेक्टेयर, आराजी संख्या 1749 में 0.164 हेक्टेयर और आराजी संख्या 1747 में 0.051 हेक्टेयर जमीन दर्ज थी.
योजना के तहत 18 मार्च, 2023 को बाबू सिंह को कानपुर रजिस्ट्री कार्यालय लाया गया. पहली रजिस्ट्री मधुर पांडेय ने कराई, जिस में 0.103 हेक्टेयर जमीन के 6 लाख 85 हजार रुपए उस ने बाबू सिंह को 2 बैंक चैकों के जरिए दिए. जिस में एक चैक 5 लाख और दूसरा 1.85 लाख का था. दोनों चैक एक्सिस बैंक यशोदा नगर के थे. 15 हजार रुपया नगद भी दिया गया.
इस के बाद राहुल जैन ने 1.121 हेक्टेयर की एक के बाद एक 4 रजिस्ट्री कराईं, जिस का सौदा 6.29 करोड़ में हुआ. इस में राहुल जैन ने एक चैक 20 लाख और दूसरा 5 लाख का अपने हस्ताक्षर का बाबू सिंह को दिया. ये दोनों चैक एक्सिस बैंक नोएडा ब्रांच के थे. इस के बाद शिवम सिंह चौहान ने 3 चैक एक 3.15 करोड़ का तथा 2 चैक 1.57 करोड़ के अपने हस्ताक्षर कर बाबू सिंह को दिए. ये तीनों चैक भारतीय स्टेट बैंक, मैनपुरी शाखा के थे.
बाबू सिंह इन चैकों को अपने खाते में जमा करता, उस के पहले ही डा. प्रियरंजन आशू दिवाकर ने बाबू सिंह को अपने श्याम नगर (कानपुर) वाले मकान पर बुलवा लिया और कहा कि चैक गलत बैंक के हैं, कैश नहीं होंगे. फिर देखने के बहाने पांचों चैक बाबू सिंह से छीन लिए. बाबू ने दोबारा चैक मांगे तो फोटो कापी थमा दी.
इस के बाद बाबू सिंह दोबारा असली चैक प्राप्त करने के लिए बबलू, आशू दिवाकर व राहुल जैन से गिड़गिड़ाता रहा, लेकिन उन्होंने चैक नहीं दिए. थकहार कर बाबू सिंह ने 30 मार्च, 2023 को शातिरों के खिलाफ सिविल जज (अपर वर्ग) कानपुर कोर्ट में मुकदमा दाखिल कर दिया और पैरवी करने लगा.