Delhi Crime News: 2 लाख के विवाद में खूनी खेल – टेंट कारोबारी के हाथ काट डाले

Delhi Crime News: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. मामूली पैसों के विवाद इतनी खतरनाक हो गया कि एक मेहनतकश कारोबारी की जिंदगी खतरे में पड़ गई. सवाल यही है कि क्या यह हमला सिर्फ बकाया रकम का नतीजा था या इस के पीछे कोई और गहरी रंजिश छिपी हुई है? यह कहानी न सिर्फ डराती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि छोटे विवाद कब खतरनाक मोड़ ले सकते हैं.

यह घटना दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के द्वारका क्षेत्र के डाबड़ी स्थित विजय एन्क्लेव की है, जहां 32 वर्षीय टेंट और हलवाई का काम करने वाले लोकेश गुप्ता पर जानलेवा हमला किया गया. आरोप है कि पैसे मांगने पहुंचे लोकेश पर इतनी बेरहमी दिखाई गई कि उन के हाथ तक काट दिए गए. गंभीर हालत में उन्हें पहले पास के अस्पताल ले जाया गया और बाद में बेहतर इलाज के लिए एम्स में भरती कराया गया, जहां उन की हालत नाजुक बनी हुई है.

पुलिस के मुताबिक, 24 अप्रैल, 2026 की रात करीब साढ़े 8 बजे पीसीआर कौल के जरिए घटना की जानकारी मिली. मौके पर पहुंची टीम ने लोकेश को लहूलुहान हालत में पाया. शुरुआती जांच में सामने आया कि अजय पाल नाम के व्यक्ति ने अपनी बेटी की शादी के लिए लोकेश से टेंट का काम कराया था, जिस की कुल रकम करीब ढाई लाख रुपए तय हुई थी. आरोप है कि इस में से करीब 2 लाख रुपए अब भी बाकी थे, जिन्हें लेने के लिए लोकेश आरोपी के घर पहुंचे था.

बताया जा रहा है कि पैसों को ले कर दोनों पक्षों में बहस शुरू हुई, जो देखते ही देखते हिंसक झगड़े में बदल गई. इसी दौरान अजय पाल और उस के साथियों ने मिलकर लोकेश पर हमला कर दिया और धारदार मशीन (ग्राइंडर) से उस के हाथ काट दिए.

पुलिस ने मौके से सबूत जुटाकर मामला दर्ज कर लिया है और आरोपियों की तलाश जारी है. इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है और आगे की जांच जारी है. Delhi Crime News

Lover Crime Story: प्रेमिका के लिए गुनाह

Lover Crime Story: आवारा प्रवृत्ति के हिमांशु के प्रेमिल संबंध  ममता से हुए तो उस की ख्वाहिश पूरी करने के लिए उस ने तीन महीने के असद का अपहरण तो कर लिया, लेकिन इस के बाद उस ने जो किया खुद तो जेल गया ही प्रेमिका और उस का पति भी सलाखों के पीछे जा पहुंचा.

उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के पुलिस कंट्रोल रूम को 2 मार्च, 2016 की शाम जो सूचना मिली थी, उस से विभाग अफरातफरी मच गई थी. इस की वजह यह थी कि महज 3 महीने के बच्चे का सरेआम अपहरण कर लिया गया था. वारदात में न मारपीट हुई थी, न खूनखराबा और न ही किसी हथियार का इस्तेमाल किया गया था. जिस तरह बच्चे का अपहरण हुआ था, वह हैरान करने वाला था.

सूचना पा कर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो वहां लोगों की भीड़ लगी थी. घटना को ले कर लोग काफी नाराज थे. जिस परिवार के बच्चे का अपहरण हुआ था, उस में कोहराम मचा हुआ था. अपहृत बच्चे का नाम असद था. वह थाना जनकपुरी के मोहल्ला खानआलपुरा के रहने वाले असलम का बेटा था. उस के परिवार में पत्नी शाहीन के अलावा अन्य सदस्य भी थे. शाहीन का रोरो कर बुरा हाल था. वह बारबार बेटे को ढूंढ़ कर लाने की गुहार लगा रही थी. थोड़ीथोड़ी देर में वह बेहोश भी हो जा रही थी. आसपड़ोस की महिलाएं किसी तरह उसे संभाल रही थीं. सूचना पा कर पहुंचे सीओ (द्वितीय) अमित नागर और थानाप्रभारी यशपाल सिंह ने घटना के बारे में पूछताछ की.

असद के घर वालों और आसपास रहने वाले लोगों ने बताया कि असलम का 10 साल का भतीजा जुनैद असद को गोद में लिए घर के बाहर गली में घूम रहा था. करीब पौने 6 बजे एक्टिवा सवार एक युवक आया और जुनैद की गोद से बच्चे को छीन कर भाग गया था. सब कुछ इतनी जल्दी में हुआ कि जुनैद को संभलने तक का मौका नहीं मिला. वह चिल्लाया कि कोई असद को ले कर भाग रहा है, उसे बचाओ. लोगों का ध्यान उस तरफ गया तो उन्होंने फुर्ती दिखाते हुए स्कूटी सवार का पीछा किया, लेकिन वह तेजी से घंटाघर की ओर भाग गया. उस के बाद पुलिस को सूचना दी गई.

जमा लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. सभी असद को जल्द से जल्द बरामद करने की मांग कर रहे थे. यही नहीं, उन्होंने मोहल्ले से बाहर आ कर देहरादून मार्ग पर जाम भी लगा दिया था. पुलिस ने युवक का हुलिया पूछ कर जिले में चैकिंग अभियान चलाया, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं मिला. घटना काफी गंभीर थी. एसएसपी आर.पी. सिंह यादव को इस की सूचना मिली तो उन्होंने अधीनस्थों को हालात पर निमंत्रण पा कर जल्द से जल्द बच्चे की सकुशल बरामदगी के निर्देश दिए. जाम और लोगों की नाराजगी को देखते हुए अन्य थानों की पुलिस भी बुलवा ली गई. कोतवाली प्रभारी संजय पांडेय और थाना सदर के थानाप्रभारी एस.के. दुबे भी वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने किसी तरह लोगों को समझाबुझा कर जाम खुलवाया. अबोध बच्चे के अपहरण के पीछे किसी का क्या मकसद हो सकता है, यह सवाल पुलिस के सामने था. असलम की माली हालत भी ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए उस के बेटे का अपहरण किया जाता. मामला रंजिश का हो सकता था. पुलिस ने इस बारे में पूछताछ की तो उस ने किसी से भी रंजिश होने की बात से साफ इंकार कर दिया. लोगों ने आशंका जाहिर की कि असद को तंत्रमंत्र के लिए भी उठाया जा सकता है. पुलिस भी इस आशंका से इंकार नहीं कर रही थी, क्योंकि नरबलि आदि के मामलों में अंधविश्वासी लोग ऐसा ही करते हैं. पुलिस ने असलम की तहरीर पर मुकदमा दर्ज किया और तहकीकात में जुट गई.

अपहर्ता युवक तक पहुंचने को पुलिस के पास कोई सुराग नहीं था. हुलिए के आधार पर पुलिस उस की तलाश में लग गई. बेटे की जुदाई और बुरे खयालों ने पूरी रात असलम के घर वालों को सोने नहीं दिया. पुलिस किसी नतीजे पर पहुंचती, अगली सुबह बुरी खबर सुनाई दी. मानकमऊ क्षेत्र स्थित नहर में शमशाद नामक युवक ने एक अबोध का शव देख कर पुलिस को सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने बच्चे की लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. असलम को इस की सूचना दी गई. पोस्टमार्टम हाउस पहुंच कर उस ने लाश देखी तो वह बिलख पड़ा. वह उसी के बेटे की लाश थी. उस की हत्या की खबर पूरे परिवार पर बिजली बन कर गिरी.

मोहल्ले में आक्रोश फैल गया और लोग जाम लगाने की कोशिश करने लगे, लेकिन वहां पहुंचे एसपी (सिटी) महेंद्र यादव, सिटी मजिस्ट्रेट आर.के. गुप्ता और सीओ अमित नागर ने लोगों को समझाया और हत्यारे को गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. कोई बुरी घटना न घटे, इस के लिए पीएसी की टुकड़ी तैनात कर दी गई. पुलिस के लिए अबोध बच्चे की हत्या चुनौती बन गई. हत्यारा जो भी था, बेहद क्रूर था. उसे मासूम पर जरा भी दया नहीं आई थी. शाम तक असद की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ गई, जिस में मौत की वजह दम घुटना बताया गया था. हत्यारे ने मुंह दबा कर उस की सांसों की डोर काट दी थी.

पुलिस को हत्या की 2 वजहें नजर आ रही थीं, पहली रंजिश और दूसरी तांत्रिक क्रिया. लेकिन दोनों के ही कोई सबूत नहीं मिले थे. पुलिस ने असद के घर वालों से एक बार फिर पूछताछ की. पुलिस ने असलम और उस की पत्नी का मोबाइल नंबर ले लिया. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस टीम ने मुख्य मार्ग पर जहांजहां सीसीटीवी कैमरे लगे थे, उन की रिकौर्डिंग चैक की तो उस में असद को उठाने वाला युवक नजर आ गया. उस ने दाएं हाथ से बच्चे को पकड़ा हुआ था. लेकिन रिकौर्डिंग में उस का चेहरा स्पष्ट नजर नहीं आ रहा था. उस की स्कूटी के रंग का जरूर पता चल गया था. वह ग्रे रंग की एक्टिवा थी.

एसएसपी आर.पी. सिंह ने अबोध की हत्या की गुत्थी को सुलझाने के लिए कई पुलिस टीमों को लगा दिया था. पुलिस ने आरटीओ औफिस से ग्रे कलर की सैंकड़ों एक्टिवा की डिटेल हासिल कर के उन की जांच शुरू की. पुलिस रंजिश को भी ध्यान में रख कर चल रही थी. पुलिस का मानना था कि किसी ने खुंदक में बच्चे की जान ले ली है. पुलिस ने घंटाघर और आसपास के इलाके में मुखबिरों का जाल बिछा दिया. पुलिस सीसीटीवी फुटेज के जरिए हत्यारे तक पहुंचने की कोशिश कर रही थी. आखिर पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि वीडियो फुटेज से मिलतेजुलते हुलिए का एक युवक मोहल्ला पिलखनतला में रहता है. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो पता चला कि उस का नाम हिमांशु है.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की लोकेशन और काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की. उस की लोकेशन घटनास्थल पर पाई गई. इस से स्पष्ट हो गया कि घटना में उसी का हाथ है. 8 मार्च को पुलिस ने हिमांशु को हिरासत में ले लिया और थाने ले आई. उस से पूछताछ की गई तो उस ने वारदात में अपना हाथ होने से साफ मना कर दिया, लेकिन पुलिस के पास सबूत थे, इसलिए जब सबूतों के आधार पर पूछताछ की गई तो उस ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस हैरान रह गई. उस ने प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी करने के लिए इतना बड़ा गुनाह कर डाला था. विस्तृत पूछताछ में जो कहानी निकल कर सामने आई, वह हैरान कर देने वाली थी.

शादियों में स्टौल लगाने का काम करने वाला हिमांशु आवारा प्रवृत्ति का युवक था. आवारगी के चक्कर में ही उस की दोस्ती मोहल्ला गौशाला निवासी संजय सैनी से हो गई थी. संजय भी उस का हमपेशा था. संजय के परिवार में पत्नी ममता और एक बेटी थी. दोस्ती हुई तो हिमांशु उस के घर भी आनेजाने लगा. इसी आनेजाने में हिमांशु संजय की पत्नी को दिल दे बैठा. चंद दिनों में ममता को भी अहसास हो गया कि हिमांशु के दिल में उस के लिए कुछ है. वह उस से खूब हंसीमजाक करता था. ममता उस के मजाक का बुरा मानने के बजाय खुल कर साथ देती थी. दोनों के बीच रिश्ता देवरभाभी का था. संजय भी उन के हंसीमजाक को गंभीरता से नहीं लेता था.

बाद में हिमांशु अक्सर ऐसे मौके पर आने लगा, जब संजय घर पर नहीं होता था. ममता कोई नादान नहीं थी. उस की लच्छेदार बातों और मजाक का मतलब वह अच्छी तरह समझ रही थी. वक्त के साथ रिश्ते गहराए तो हिमांशु ने अपने दिल की बात उस से कह दी. ममता ने भी खुशीखुशी उस के इजहार पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी. दोनों के रिश्ते मर्यादा तोड़ चुके थे. वक्त अपनी गति से चल रहा था. ममता को बेटी थी. उसे बेटे की चाहत थी, लेकिन किसी शारीरिक समस्या के चलते वह आगे बच्चा पैदा नहीं कर सकती थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपना यह दर्द हिमांशु से कहा तो प्रेमिका के इस दुख ने उसे परेशान कर दिया. कई दिनों तक वह इस समस्या से निजात के बारे में सोचता रहा.

संजय भी इस बात से परेशान रहता था. करीब 6 महीने पहले की बात है. एक दिन संजय और ममता बैठे थे, तभी हिमांशु आ गया. वह काफी खुश नजर आ रहा था. उसे देख कर संजय ने पूछा, ‘‘क्या बात है, आज तुम बहुत खुश नजर आ रहे हो?’’

‘‘खुशी की ही बात है, मैं ने तुम्हारे घर बेटा लाने का रास्ता खोज लिया है.’’ हिमांशु ने कहा.

उस की बात सुन कर ममता के चेहरे पर जैसे खोई रौनक लौट आई, ‘‘सच?’’

‘‘हां भाभी, अब तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं है.’’

‘‘ऐसा क्या करोगे तुम?’’

‘‘मैं तुम्हारे लिए नवजात बेटे का इंतजाम कर दूंगा.’’

‘‘कैसे, क्या वह दुकान पर मिलेगा?’’

‘‘नहीं, अस्पताल में.’’

‘‘मतलब?’’ ममता ने जिज्ञासा से पूछा.

‘‘मैं बच्चा चोरी कर के ला दूंगा. आप उसे पाल लेना.’’

हिमांशु की बात हैरान करने वाली थी, लेकिन ममता और संजय भी कुछ देर की बहस के बाद इस के लिए तैयार हो गए. बच्चा पैदा होने की बात सही लगे, इस के लिए ममता ने अपने पेट पर कपड़ा बांध कर आसपड़ोस में कहना शुरू कर दिया कि वह गर्भवती है. सभी ने उस की बात पर सहज विश्वास भी कर लिया. जैसेजैसे समय बढ़ता गया, वैसेवैसे ममता खुद को गर्भवती दिखाने के लिए पेट पर कपड़ों की परतें बढ़ाती गई.

अपनी कोख में बच्चा होने का वह तमाशा भर कर रही थी. उस ने और संजय ने तय कर रखा था कि हिमांशु जब उन्हें तुरंत का पैदा बच्चा ला कर देगा तो वे उसे ले कर कुछ दिनों के लिए बाहर चले जाएंगे और आ कर बताएंगे कि उन्हें बेटा पैदा हुआ है. इस पर उन पर किसी को शक भी नहीं होगा. ममता और संजय की सारी उम्मीदें हिमांशु पर ही टिकी थीं. वे उसे अक्सर टोकते भी रहते थे. वह भी प्रेमिका की ख्वाहिश हर सूरत में पूरी करना चाहता था. उस ने सोच लिया था कि वह किसी भी तरह अस्पताल से बच्चा चोरी कर के लाएगा. वह इस की प्लानिंग भी करता रहता था.

2 मार्च को उस ने अपनी योजना को पूरा करने का फैसला कर लिया. वह बच्चा चोरी करने के इरादे से महिला जिला अस्पताल पहुंचा. वहां एकदो बच्चे थे, लेकिन उन के पास चूंकि घर वाले तो थे ही, अस्पताल का स्टाफ भी था, इसलिए पकड़े जाने के डर से वह बच्चा चुराने की हिम्मत नहीं कर सका. कुछ देर इधरउधर घूम कर वह लौट आया. वह हताश हो कर घूम रहा था कि उस की नजर असद पर पड़ गई. उसे लगा कि इस बच्चे को हासिल कर के वह प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी कर सकता है. असद चूंकि छोटे बच्चे की गोद में था, इसलिए उसे हासिल करना उसे आसान लगा. उस ने मौका देख कर स्कूटी एकदम नजदीक जा कर रोकी और असद को बच्चे की गोद से छीन कर भाग गया.

उसे ले कर वह सीधे संजय के घर पहुंचा. उस ने सोचा था कि बच्चे को देख कर ममता खुशी से चहक उठेगी, लेकिन उस की उम्मीदों को तब झटका लगा, जब बच्चे को देख कर ममता के तेवर बदल गए. उस ने कहा, ‘‘यह किसे ले आए तुम?’’

‘‘लड़का है, जो तुम्हें चाहिए था.’’

‘‘लेकिन मुझे तुरंत का जन्मा बच्चा चाहिए, इतना बड़ा नहीं. इसे देख कर कोई भरोसा नहीं करेगा कि मैं ने जन्म दिया है.’’

‘‘तुम्हारी गोद भर रही है. तुम्हें और क्या चाहिए?’’ हिमांशु ने उसे समझाते हुए कहा.

‘‘नहीं, मुझे यह लड़का नहीं चाहिए. इसे ढूंढ़ा गया तो कोई भी इसे आसानी से पहचान लेगा.’’

संजय ने भी उसे लेने से मना कर दिया. हिमांशु आसमान से जमीन पर आ गिरा. उसी बीच असद ने रोना शुरू कर दिया तो तीनों घबरा गए. हिमांशु को लगा कि बच्चा ज्यादा रोया तो वह पकड़ा जाएगा. प्रेमिका के मना करने और बच्चे के रोने से वह हैवान बन गया. उस ने मासूम का मुंह दबा कर उस की हत्या कर दी.

तब तक रात हो चुकी थी. वह असद को मानकमऊ ले गया और नहर किनारे फेंक कर अपने घर चला गया. हिमांशु ने सोचा था कि उस के गुनाह का किसी को पता नहीं चलेगा, लेकिन उस की यह गलतफहमी पुलिस द्वारा पकड़े जाते ही दूर हो गई. उस के अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने ममता और उस के पति संजय को भी गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से भी पूछताछ की गई. पुलिस ने वह स्कूटी भी बरामद कर ली, जिस से हिमांशु ने असद का अपहरण किया था.

एसएसपी आर.पी. सिंह ने प्रेसवार्ता कर के असद के अपहरा के मामले का खुलासा किया. उस समय असद के घर वाले भी वहां मौजूद थे, जो आरोपियों को फांसी देने की मांग कर रहे थे. सभी कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक उन की जमानतें नहीं हुई थीं.

प्रेमिका की ख्वाहिश पूरी करने के फेर में हिमांशु एक बड़ा गुनाह कर के खुद तो हत्यारा बना ही, प्रेमिका और उस के पति का भी भविष्य चौपट कर दिया. असद के मातापिता बेटे के खोने का यह दुख अब इस जन्म में तो नहीं ही भुला पाएंगे. Lover Crime Story

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story Hindi: पुलिस की गिरफ्त में पुलिस

Crime Story Hindi: खूबसूरत महिलाओं के साथ रंगरेलियां मनाने के चक्कर में कई लोग हनीट्रैप में कुछ इस तरह फंस जाते हैं कि पुलिस के पास जाने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते. आशीष के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ लेकिन समय रहते ही उन की बुद्धि काम कर गई और वह एक बड़ी मुसीबत से बच गए.

आशीष अपनी दुकान पर बैठे थे, उसी समय उन के मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से केवल हाय लिखा हुआ वाट्सऐप मैसेज आया. वह उसे कोई तवज्जो न दे कर अपने काम में लग गए. कुछ देर बाद उसी नंबर से वाट्सऐप पर 2-3 खूबसूरत लड़कियों के फोटो आए. सुंदर लड़कियों के फोटो देख कर उन की जिज्ञासा बढ़ी तो उन्होंने उस नंबर पर फोन किया, जिस नंबर से मैसेज और फोटो आए थे.

दूसरी ओर किसी लड़की ने फोन उठाया तो आशीष ने पूछा, ‘‘आप के नंबर से मेरे पास 2-3 लड़कियों के फोटो भेजे गए हैं. क्या मैं जान सकता हूं कि ये फोटो मुझे क्यों भेजे गए हैं?’’

‘‘सौरी सर, दरअसल ये फोटो मुझे किसी और को भेजने थे, गलती से आप के नंबर पर चले गए. वैसे सर, अगर आप अन्यथा न लें तो क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन और कहां से बोल रहे हैं?’’ लड़की ने कहा.

‘‘मेरा नाम आशीष है और रानीबाग इलाके में मेरी कार एसेसरीज की दुकान है.’’ आशीष ने उसे अपने बारे में बताया.

कुछ लोग आदतन लड़कियों के फोन को ज्यादा तवज्जो देते हैं. ऐसे लोगों के फोन पर अगर किसी लड़की का फोन आ जाए तो वे उस से ज्यादा से ज्यादा देर तक बात करने की कोशिश करते हैं. आशीष भी ऐसे ही लोगों में थे.

‘‘ओके सर.’’ आशीष की हकीकत जान कर लड़की ने कहा.

‘‘वैसे मैडम, क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं और कहां से बोल रही हैं?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘जी मेरा नाम प्रीति है और मैं भी दिल्ली में ही रहती हूं. दरअसल, आप के मोबाइल पर जिन लड़कियों के फोटो आए हैं, वे मुझे किसी और को भेजने थे. वैसे अगर आप भी शौकीन हों तो उन में से कोई लड़की पसंद कर सकते हैं.’’ प्रीति ने मीठे स्वर में कहा.

37 साल के आशीष इतने नासमझ नहीं थे कि प्रीति की बातों का मतलब न समझ पाते. वह चूंकि बीवीबच्चों वाले थे, इसलिए मन ललचाने के बावजूद उन्होंने जल्दबाजी में कोई कदम उठाना उचित नहीं समझा. उन्होंने प्रीति को टालने के लिए कहा, ‘‘मैडम, अभी मैं काम में बिजी हूं, जब भी जरूरत होगी, आप को बता दूंगा.’’

‘‘ठीक है सर, आप जब भी चाहें बेझिझक बता दें. एक बार हमारी सेवा लेने के बाद आप की तबीयत खुश हो जाएगी.’’ कह कर प्रीति ने फोन काट दिया.

इस के बाद प्रीति और आशीष के बीच दोस्ती हो गई. दोनों वाट्सऐप पर अकसर बातें करने लगे. 5-6 महीने तक उन के बीच इसी तरह बातें चलती रहीं. एक बार प्रीति ने एक पता दे कर उन्हें मिलने के लिए बुलाया, पर व्यस्तता की वजह से वह जा नहीं सके. 14 मार्च, 2016 को भी आशीष की वाट्सऐप पर प्रीति से बात हुई. प्रीति ने शिकायती लहजे में कहा, ‘‘आप आए नहीं?’’

‘‘आ कर क्या करें, कोई बढि़या चीज तो आप के पास है नहीं. अगर कोई बढि़या माल हो तो बताइए?’’ आशीष ने कहा.

‘‘हमारे पास बढि़या माल भी है, अभी फोटो भेजती हूं.’’ प्रीति ने कहा.

कुछ देर बाद आशीष के वाट्सऐप पर एक लड़की की फोटो आई. वह लाल रंग का स्लीवलैस टौप पहने थी और वाकई खूबसूरत लग रही थी. फोटो देखते ही आशीष उस पर फिदा हो गए. उन्होंने उसी वक्त प्रीति को फोन कर के कहा, ‘‘मैडम, यह लड़की मुझे पसंद है.’’

‘‘आशीष साहब, इस की एक बार की कीमत 3 हजार रुपए है.’’ प्रीति ने कहा.

कीमत सुन कर आशीष चौंक गए क्योंकि इतने कम पैसों में इतनी सुंदर कालगर्ल नहीं मिल सकती. आशीष ने तुरंत कहा, ‘‘कोई बात नहीं मैडम, जब चीज पसंद आ जाए तो हम कीमत नहीं देखते. आप इसे हमारे पास रानीबाग भेज दीजिए.’’

‘‘सौरी सर, लड़की वहां नहीं जा सकती. दरअसल वह कालेज स्टूडेंट है. अपने घर वालों से कोई बहाना कर थोड़ीबहुत देर के लिए घर से निकल सकती है. ऐसा कीजिए, आप 3 बजे तक रोहिणी सेक्टर-15 में बंसल भवन के पास पहुंच जाइए. तब तक लड़की को मैं अपने फ्लैट में बुला लूंगी. आप को हम पिक कर लेंगे.’’

आशीष ने बात करते हुए दुकान में लगी दीवार घड़ी की तरफ देख कर कहा, ‘‘मैडम, 3 तो बजने वाले हैं. मैं इतनी जल्दी रोहिणी कैसे पहुंच पाऊंगा?’’

‘‘कोई बात नहीं सर, सवा 3-साढ़े 3 तक पहुंच जाइए. हम आप को वहीं मिलेंगे.’’ प्रीति बोली.

आशीष की दुकान पर मौजूद लड़के एक कार में एसेसरीज लगाने में जुटे थे. आशीष को सैक्टर-15 पहुंचने की जल्दी थी. उन्होंने लड़कों से कहा कि वह किसी से मिलने जा रहे हैं, थोड़ी देर में लौट आएंगे. इस के बाद वह अपनी कार से रोहिणी सेक्टर-15 के लिए रवाना हो गए. करीब आधे घंटे बाद वह बंसल भवन के नजदीक पहुंचे तो वहां 2 लड़कियां खड़ी मिलीं. उन में से एक तो वही थी, जिस की फोटो प्रीति ने उन्हें भेजी थी. प्रीति को उन्होंने देखा नहीं था. उस से केवल फोन पर ही बातें हुई थीं. इसलिए वह समझ गए कि दूसरी लड़की प्रीति ही होगी.

फिर भी संतुष्टि के लिए उन्होंने कार से उतर कर प्रीति का नंबर मिलाया और उन दोनों लड़कियों की ओर देखने लगे. नंबर मिलाते ही उन दोनों में से एक ने काल रिसीव करते हुए फोन कान से लगाया तो आशीष ने अपना एक हाथ उठा कर इशारा किया तो दोनों लड़कियां उन की कार के नजदीक आ गईं. उन में से एक लड़की ने अपना परिचय प्रीति और दूसरी का परिचय शिखा के रूप में दिया.

कार को वहीं पार्किंग में लगवा कर प्रीति आशीष को रोहिणी सेक्टर-15 के ही एक फ्लैट में ले जा कर बोली, ‘‘यहां कोई समस्या खड़ी हो सकती है, इसलिए यहां से कहीं और चलना होगा.’’

‘‘कहां?’’ आशीष ने पूछा.

‘‘यहीं रोहिणी के सेक्टर-2 में हमारा फ्लैट है, वहीं चलते हैं.’’ प्रीति बोली.

आशीष ने कार से चलने का प्रस्ताव रखा तो प्रीति बोली, ‘‘साथ चलना ठीक नहीं है, आप अपनी कार से सेक्टर-2 स्थित अवंतिका हौस्पिटल के पास पहुंचिए, हम वहीं मिलेंगे.’’

आशीष कार से सेक्टर-2 की तरफ चल दिए. सेक्टर-2 के अवंतिका हौस्पिटल से कहां जाना है, यह उन्हें पता नहीं था. इसलिए निश्चित जगह पर पहुंच कर उन्होंने प्रीति को फोन लगाया. इस पर प्रीति ने उन्हें सेक्टर-2 के ब्लौक-ए स्थित एक फ्लैट पर आने को कहा. कार खड़ी कर के आशीष ए-ब्लौक में प्रीति द्वारा बताई गई जगह पहुंच गए. वहां प्रीति उन्हें मिल गई. वह उन्हें साथ ले कर एक फ्लैट में पहुंची. उस फ्लैट में 2 कमरे थे. प्रीति ने आशीष से 3 हजार रुपए ले कर उन्हें शिखा के साथ दूसरे कमरे में भेज दिया. आशीष के लिए खुद पर काबू रखना मुश्किल हो रहा था. उन्होंने फटाफट दरवाजा बंद किया और शिखा को अपनी बांहों में समेट लिया.

‘‘इतनी भी क्या जल्दी है जनाब, थोड़ा सब्र रखिए.’’ कहते हुए शिखा ने आशीष की शर्ट के बटन खोलने शुरू कर दिए.

‘‘नहीं शिखा, मैं अब और बरदाश्त नहीं कर सकता,’’ कह कर आशीष ने खुद ही अपने कपड़े उतार दिए. शिखा भी प्राकृतिक अवस्था में आ गई. आखिर आशीष ने अपनी हसरत पूरी कर ली.

इस के बाद शिखा फटाफट कपड़े पहन कर कमरे से बाहर निकल गई. उस के बाहर जाते ही 5 लोग उस कमरे में घुस आए. उन में से एक दिल्ली पुलिस की वर्दी पहने था, जिस की नेमप्लेट पर सुभाषचंद लिखा था. उन में से 2 लोग अपनेअपने मोबाइलों से आशीष की अर्द्धनग्नावस्था की वीडियो बनाने लगे. अचानक आए उन लोगों को देख आशीष के होश उड़ गए. आशीष समझ गए कि ये पुलिस के लोग हैं और वह बुरी तरह फंस गए हैं. पुलिस की वर्दी वाला एएसआई सुभाषचंद था. उस ने कहा, ‘‘रेड में तुम रंगेहाथों पकड़े गए हो.’’

‘‘सर, मुझ से क्या गलती हो गई?’’ आशीष ने डरते हुए पूछा.

‘‘जब तुम रेप के आरोप में जेल जाओगे तो गलती का खुद ही पता चल जाएगा.’’ पुलिस वाले ने धमकाते हुए कहा.

‘‘सर, मैं ने किसी के साथ रेप नहीं किया. वह लड़की तो खुद मुझे यहां ले कर आई थी.’’ आशीष ने सफाई दी.

‘‘चुप रह. उस लड़की का बयान और हमारी बनाई वीडियो फिल्म तुझे सजा दिलाने के लिए काफी है. अब तू खुद सोच ले कि तेरी इस करतूत की वजह से तेरी कितनी बदनामी होगी.’’ पुलिस वाले ने आशीष को हड़काया.

आशीष बुरी तरह डरे हुए थे. वह उन लोगों के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगे. यह देख कर एएसआई सुभाषचंद ने कहा, ‘‘देख भई, तेरे खिलाफ बड़ा पक्का मामला बन रहा है. इस से बचने का एक ही तरीका है. लेकिन उस के लिए तुझे 15 लाख खर्च करने पड़ेंगे. क्योंकि जिस लड़की के साथ तूने रेप किया है, उसे काफी पैसे देने होंगे, वरना वह नहीं मानेगी.’’

‘‘सर, यह रकम तो बहुत ज्यादा हैं. इतने पैसे मैं कहां से लाऊंगा?’’ आशीष ने कहा.

‘‘यह बात तो तुझे उस के साथ कमरे में जाने से पहले सोचनी चाहिए थी.’’ एएसआई ने कहा.

‘‘सर, यह ऐसे नहीं मानेगा, इसे थाने ले चलो. वहां पर इस के घर वालों और रिश्तेदारों को बुला कर इस की करतूत बताई जाएगी तो यह समझेगा.’’ साथ में खड़े उस के साथी ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा मत करिए. मैं बरबाद हो जाऊंगा. आप यहीं मामला निपटा लीजिए.’’ आशीष ने हाथ जोड़ कर कहा.

‘‘तो चल, 10 लाख दे दे. मामला रफादफा कर देंगे.’’ सुभाषचंद ने कहा.

आशीष पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने 10 लाख रुपए देने की हामी भर ली. उन लोगों ने आशीष से कहा कि 3 लाख रुपए अभी दे दे, बाकी कल ले लेंगे. लेकिन उस समय आशीष के पास इतने पैसे नहीं थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह 3 लाख रुपए का इंतजाम कहां से करें. मुसीबत के उस समय में उन्हें अपना दोस्त वैभव याद आया. उस की दिल्ली के मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में फैक्ट्री थी. वह अपनी फैक्ट्री में है या नहीं, यह जानने के लिए उन्होंने उसे फोन किया. वैभव उस समय फैक्ट्री में ही था.

वे पांचों लोग आशीष के साथ मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया में पहुंच गए. आशीष ने अपनी कार दोस्त की फैक्ट्री के बाहर खड़ी कर दी. एएसआई सुभाषचंद और उस के साथी उस की कार में बैठे रहे. जबकि वह अपने दोस्त के पास चले गए. उन्होंने अपने दोस्त वैभव को खुद के फंसने की पूरी कहानी बता दी. वैभव समझ गया कि आशीष मुसीबत में फंस गया है लेकिन उस समय उस के पास भी 3 लाख रुपए नहीं थे. उस ने किसी तरह एक लाख रुपए का इंतजाम कर के उसे दे दिए. आशीष ने एक लाख रुपए कार में बैठे एएसआई सुभाषचंद को देते हुए कहा कि बड़ी मुश्किल से एक लाख का इंतजाम हो पाया है. इस के लिए भी मुझे अपनी कार गिरवी रखनी पड़ी है.

‘‘इतने से काम नहीं चलेगा. बात 3 लाख की हुई है. पूरी रकम का इंतजाम आज ही करना होगा.’’ उन में से एक शख्स ने कहा.

‘‘मैं ने काफी कोशिश की, लेकिन 3 लाख का इंतजाम नहीं हो पाया. आप मुझे कल तक का टाइम दो. मैं कल तक 2 लाख रुपए का जुगाड़ कर दूंगा.’’ आशीष ने अनुरोध किया.

‘‘2 लाख नहीं, बाकी के सारे पैसे भी कल ही देने होंगे. पैसे कहां पहुंचाने हैं, यह बात हम तुझे फोन कर के बता देंगे. और हां, ज्यादा स्याणा बनने की कोशिश मत करना, वरना तेरी वीडियो फिल्म हमारे मोबाइल में है.’’ उन के एक साथी ने कहा.

इस के बाद वे पांचों वहां से चले गए. आशीष ने राहत की सांस ली. तब तक शाम हो चुकी थी, इसलिए उन्होंने फोन कर के अपनी दुकान पर काम करने वाले लड़के से कह दिया कि दुकान बंद कर के चाबी अपने साथ ले जाए और सुबह जल्दी आ कर दुकान खोल ले. इस के बाद वह भी वेस्ट पटेलनगर के पास शादी खामपुर गांव स्थित अपने घर चले गए. अन्य दिनों की अपेक्षा उस दिन उन का चेहरा मुरझाया हुआ था. पत्नी ने इस की वजह जाननी चाही तो उन्होंने झूठ बोल दिया कि काम की वजह से थकान हो गई है.

खाना खाने के बाद आशीष जब बिस्तर पर लेटे तो उन की आंखों से नींद गायब थी. उन्हें बस यही चिंता सता रही थी कि कल उन लोगों को पैसे कहां से ला कर देंगे. अगर पैसों का इंतजाम नहीं हुआ तो उन्हें रेप के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा. रात भर उन के दिमाग में इसी तरह के विचार घूमते रहे. सुबह को वह रानीबाग स्थित अपनी दुकान पर चले गए. आशीष दुकान पर पहुंचे ही थे कि एक अनजान नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. उन्होंने काल रिसीव की तो दूसरी ओर से एएसआई सुभाषचंद की आवाज आई, ‘‘पैसों का इंतजाम हुआ या नहीं?’’

यह सुन कर आशीष घबरा कर बोले, ‘‘सर, अभी नहीं हुआ है. मैं उसी के इंतजाम में लगा हूं.’’

‘‘जल्दी इंतजाम कर ले. पैसे ले कर तुझे आज ही शाम 7 बजे मंगोलपुरी इंडस्ट्रियल एरिया के अनुकंपा बैंक्वेट हौल के पास आना है.’’ कह कर एएसआई सुभाषचंद ने फोन काट दिया.

आशीष को शाम 7 बजे से पहलेपहले पैसों का जुगाड़ करना था. उन्होंने मार्केट में अपने जानने वालों से बात की, पर पैसों का इंतजाम नहीं हो पाया. ज्योंज्यों समय बीतता जा रहा था, आशीष की चिंता बढ़ती जा रही थी. तमाम कोशिशों के बाद भी पैसों का इंतजाम नहीं हो सका. फिर भी वह शाम 7 बजे से पहले ही निर्धारित जगह पर पहुंच गए. तभी पहले वाले नंबर से उन के मोबाइल पर फोन आया. आशीष ने कह दिया कि वह अनुकंपा बैंक्वेट हौल के सामने खड़े हैं. कुछ देर बाद 20-22 साल का एक युवक उन के पास आया. वह उसे देखते ही पहचान गए. वह युवक कल सुभाषचंद के साथ था. उस युवक ने अपना नाम अमित बताते हुए आशीष से पैसे मांगे.

आशीष ने उस के सामने गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं ने बहुत कोशिश की, तमाम लोगों के पास गया और कई से फोन पर भी बात की, लेकिन कहीं भी बात नहीं बनी. आप मुझे थोड़ा वक्त और दे दो.’’

‘‘नहीं, अब तुझे कोई टाइम नहीं मिलेगा. क्या करेगा, कहां से पैसे लाएगा, हमें नहीं पता. जैसे भी हो, पैसे ले कर आज रात साढ़े 9 बजे बाहरी रिंग रोड स्थित काली माता मंदिर पर पहुंच जाना. यह तुझे आखिरी मौका मिल रहा है.’’

यह सुन कर आशीष मानसिक तनाव में आ गए. उन के पास ढाई घंटे का समय बचा था. इन ढाई घंटों में वह इतनी मोटी रकम कहां से लाएं, यह बात उन की समझ में नहीं आ रही थी. अपना दुखड़ा रोने के लिए वह फिर से अपने दोस्त वैभव की फैक्ट्री में चले गए. वैभव को आशीष की हालत पर तरस आ रहा था, पर उस के पास इतनी मोटी रकम नहीं थी. आखिर उस ने आशीष को पुलिस के पास जाने की सलाह दी. आशीष के पास पुलिस में शिकायत ले कर जाने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. काफी सोचनेसमझने के बाद वह दोस्त को साथ ले कर बाहरी जिले के थाना रोहिणी (दक्षिणी) चले गए.

थाने में मौजूद थानाप्रभारी संजय शर्मा को आशीष ने पूरी बात बता दी. थानाप्रभारी को जब यह पता चला कि उस गैंग में दिल्ली पुलिस का एक एएसआई भी शामिल है तो उन्हें आश्चर्य हुआ. वह एएसआई असली है या फरजी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था. उन्होंने पूरे मामले से बाहरी जिले के डीसीपी विक्रमजीत सिंह को अवगत करा दिया.

चूंकि उन लोगों ने आशीष को पैसे ले कर उसी रात साढ़े 9 बजे काली माता मंदिर पर बुलाया था, इसलिए उन्हें रंगेहाथों पकड़ने का अच्छा मौका था. डीसीपी विक्रमजीत सिंह ने एसीपी उमेश सिंह के नेतृत्व में एक टीम बनाई. इस टीम में थानाप्रभारी संजय शर्मा, सबइंसपेक्टर रजनीश, हैडकांस्टेबल राजकुमार और कांस्टेबल कुलवीर को शामिल किया गया.

एएसआई सुभाषचंद द्वारा जिस नंबर से आशीष को फोन किया गया था, पुलिस के कहने पर आशीष ने उसी नंबर पर फोन किया, ‘‘हैलो सर, मैं आशीष बोल रहा हूं.’’

तभी दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘हां भई, बोल. पैसों का इंतजाम हो गया क्या?’’

‘‘जी, 9 लाख तो नहीं हो पाए, पर मैं बड़ी मुश्किल से 4 लाख का इंतजाम कर पाया हूं.’’ आशीष ने पुलिस के निर्देशानुसार कहा.

‘‘ठीक है, तू पैसे ले कर वहीं काली माता मंदिर पर पहुंच, हम वहीं मिलेंगे.’’ दूसरी तरफ से आवाज आई.

बात हो जाने के बाद पुलिस टीम सादा कपड़ों में काली मंदिर पर पहुंच गई. इस के कुछ देर बाद ही आशीष भी अपनी कार से वहां पहुंच गए. अपने हाथ में बैग थामे जैसे ही वह कार से उतरे, एएसआई सुभाषचंद और अमित उन के पास पहुंच गए. उस समय सुभाषचंद पुलिस वर्दी में नहीं था. आशीष ने जैसे ही सुभाष के हाथ में बैग दिया, थाना रोहिणी (दक्षिणी) की पुलिस टीम ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

पुलिस दोनों को थाने ले आई. अन्य अभियुक्त फरार न हो जाएं, इसलिए एसीपी उमेश सिंह ने इस पुलिस टीम में मंगोलपुरी थाने के सबइंसपेक्टर रोबिन त्यागी, हैडकांस्टेबल दिनेश, सुभाष और कांस्टेबल वीरेंद्र को शामिल कर उसी दिन नांगलोई, कंझावला में दबिशें दे कर कंझावला से टिंकू उर्फ साहिल, नांगलोई से ललित सिंह और आजम खान को गिरफ्तार कर लिया. रैकेट में शामिल युवतियों शिखा और प्रीति के घरों पर भी दबिश डाली गई, लेकिन वे फरार हो चुकी थीं. पुलिस ने पांचों अभियुक्तों से पूछताछ की तो पता चला कि इन का सरगना सुभाषचंद ही था. वह फरजी पुलिस वाला नहीं, बल्कि दिल्ली पुलिस के कम्युनिकेशन विभाग का एएसआई था. उस की पोस्टिंग बाहरी जिला के थाना मंगोलपुरी में थी.

मूलरूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला सुभाषचंद करीब 26 साल पहले दिल्ली पुलिस में भरती हुआ था. बाद में उस ने सुल्तानपुरी में अपना मकान बना लिया था और परिवार के साथ दिल्ली में ही रहने लगा था. उस की मुलाकात जेजे कालोनी सावदा, नांगलोई के रहने वाले टिंकू से हुई. टिंकू साप्ताहिक बाजारों में दुकान लगाता था. टिंकू की दोस्ती कृष्णा पार्क देवली, खानपुर के रहने वाले अमित से थी. टिंकू के 2 दोस्त और थे आजम खान और अमित. आजम एक निजी अस्पताल में डायलिसिस मशीन का टेक्नीशियन था और अमित बाल बियरिंग मैकेनिक था.

ये सभी जल्द से जल्द पैसे कमाने की सोचते रहते थे. 6 महीने पहले ही अमित की प्रीति उर्फ मनीषा से शादी हुई. इसलिए उस का भी खर्च बढ़ गया था. वह आए दिन अखबारों में हनीटै्रप द्वारा लोगों को ठगने की खबरें पढ़ता रहता था. मोटी रकम कमाने के लिए उसे यह काम सही लगा. क्योंकि इस तरह एक ही झटके में मोटी रकम ऐंठी जा सकती थी. यह बात उस ने अपने दोस्तों को बताई. फिर उन लोगों ने इस बारे में मंगोलपुरी थाने में तैनात एएसआई सुभाषचंद से बात की. पैसों के लालच में वह भी उन का साथ देने को तैयार हो गया. असली पुलिस वाले के शामिल होने पर सभी की हिम्मत बढ़ गई.

योजना तो बन गई, लेकिन समस्या यह थी कि किसे फांसा जाए. इस के लिए इन लोगों ने कुछ कालगर्ल्स से संपर्क कर के किसी तरह उन लोगों के फोन नंबर हासिल कर लिए, जो उन के पास मौजमस्ती के लिए आते थे. ग्राहकों को फंसाने की जिम्मेदारी अमित की पत्नी प्रीति उर्फ मनीषा ने संभाली. शिकार फंसाने के लिए वह पहले लोगों से वाट्सऐप पर दोस्ती करती थी. दोस्ती के जरिए वह फंसने वाले से अनौपचारिक बातें भी करने लगती थी. फिर उस के पास कुछ लड़कियों के फोटो भेज कर उन्हें पसंद करने के लिए कहती थी. फंसा हुआ ग्राहक जब किसी लड़की के साथ जाने को तैयार हो जाता था तो उसी दौरान वे लोग उस के आपत्तिजनक फोटो खींच लेते थे. उसी को मुद्दा बना कर ये लोग उस से मोटी रकम ऐंठते थे.

इसी तरह उन्होंने वेस्ट पटेलनगर के शादी खामपुर गांव के रहने वाले आशीष को फांसा था. उस से उन्होंने 15 लाख रुपए मांगे. मामला 10 लाख रुपए में तय हो गया. इस से पहले कि उन की मंशा पूरी हो पाती, 5 अभियुक्त पुलिस के शिकंजे में फंस गए. गिरफ्तार हुए अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने 30 हजार रुपए नकद, 4 मोबाइल फोन, एक डिजिटल कैमरा बरामद किया. पुलिस ने 16 मार्च, 2016 को अभियुक्त सुभाषचंद, ललित सिंह, टिंकू, अमित और आजम को गिरफ्तार कर महानगर दंडाधिकारी रविंद्र सिंह के समक्ष पेश किया. पुलिस ने अमित, ललित और सुभाषचंद को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. जबकि आजम व टिंकू को जेल भेज दिया गया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने तीनों अभियुक्तों से विस्तार से पूछताछ कर के उन्हें 18 मार्च, 2016 को पुन: कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. कथा लिखने तक प्रीति और शिखा पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ सकी थीं. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. आशीष और वैभव परिवर्तित नाम हैं.

 

True Crime Story: सहेली ने कराई प्रेमी से घिनौनी हरकत

True Crime Story: रोहित ने अपनी नाबालिग प्रेमिका रूबी के सामने जो शर्त रखी थी, अमूमन उस के लिए जल्दी कोई लड़की तैयार नहीं होती. लेकिन प्रेमी की बात मान कर उस ने सहेली के साथ गलत काम तो कराया ही, अपने बचाव में उस की जान भी ले ली.

मध्य प्रदेश के जिला भिंड के एक गांव के अशोक कुमार बरसों पहले हरियाणा के शहर कालका में आ कर बस गए थे. उन के परिवार में पत्नी सीतारानी के अलावा एक बेटा नरेश और बेटी दीक्षा थी. अशोक और उस की पत्नी सीता कालका की बगल में बसे हिमाचल प्रदेश के औद्योगिक नगर परवाणू की अलगअलग फर्मों में नौकरी करते थे. अशोक की ड्यूटी सुबह साढ़े 5 बजे से शाम साढ़े 4 बजे तक रहती थी तो वहीं सीतारानी की ड्यूटी सुबह साढ़े 7 बजे से साढ़े 4 बजे तक की होती थी. दोनों ही अपनी ड्यूटी खत्म कर के पैदल ही घर चले आते थे. एक लंबे अरसे से इन की यही दिनचर्या थी.

कालका और परवाणू के बीच केवल 3 किलोमीटर का फासला है. यहां चलने वाली लोकल बसें अकसर ट्रैफिक में फंस जाती हैं, जिस की वजह से यह दूरी तय करने में उन्हें काफी समय लग जाता है. इसलिए यहां के लोग अकसर इस दूरी को पैदल ही तय कर लेते हैं. परवाणू में किराए के मकान मिलते ही नहीं और अगर मिल भी जाते हैं तो उन का किराया इतना ज्यादा होता है कि फैक्ट्रियों में काम करने वाले लोग उसे वहन नहीं कर पाते, इसलिए परवाणू में काम करने वाले अधिकांश लोगों ने अपनी रिहाइश कालका में ही बना रखी है. अशोक भी पिछले 4 सालों से कालका की एक घनी बस्ती में रह रहा था.

उस के बेटे नरेश ने दसवीं पास कर ली थी. आगे की पढ़ाई करने के बजाय वह नौकरी की तलाश में था. बेटी दीक्षा अभी 3 महीने पहले 13 बरस की हुई थी. वह स्थानीय सरकारी स्कूल की नौवीं कक्षा में पढ़ रही थी. इन दिनों उस की सालाना परीक्षाएं चल रही थीं. 11 मार्च, 2016 को दोपहर बाद 2 बजे उसे अपनी परीक्षा देने जाना था. उस दिन उस का भाई अपनी रिश्तेदारी में कालका से बाहर गया था. वह घर में अकेली ही थी. वैसे भी यहां डर जैसी कोई बात नहीं थी. पासपड़ोस में सब इन्हें जानतेपहचानते थे. शाम के वक्त वह अकसर रोजाना गली के बच्चों के साथ खेलती भी थी.

11 मार्च, 2016 की शाम 6 बजे तक वह घर से बाहर नहीं निकली तो कुछ बच्चे उसे खेलने को बुलाने के लिए उस के घर गए. उस का घर खुला हुआ था. बच्चों ने दीक्षा को आवाज लगाई. जवाब न आने पर उन्होंने भीतर जा कर देखा. वहां का दृश्य देख कर उन के होश उड़ गए. अर्धनग्न अवस्था में दीक्षा बिस्तर पर बेसुध पड़ी थी. बच्चे बाहर आ कर शोर मचाने लगे तो मोहल्ले की औरतें और आदमी वहां आ गए. उन्होंने जा कर देखा तो दीक्षा मृत पड़ी थी. एक जानकार ने अशोक कुमार को फोन कर के कहा उस के यहां कुछ गड़बड़ है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, वह घर आ जाए.

अशोक ने पत्नी को फोन कर दिया. उस के बाद दोनों साथसाथ पैदल घर की तरफ चल दिए. दोनों को एक ही बात बेचैन कर रही थी कि पता नहीं घर पर क्या हो गया है. खैर, वे तेज कदमों से चलते हुए घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उन के घर के पास काफी भीड़ जमा है. जब उन्होंने देखा कि किसी ने उन की बेटी की हत्या कर दी है तो वे फूटफूट कर रोने लगे. उन के पहुंचने से पहले ही किसी ने पुलिस को फोन कर दिया था.

थाना कालका के थानाप्रभारी उमेद सिंह एसआई रेशम सिंह, हवलदार प्रदीप कुमार, नरेश कुमार, महिला कांस्टेबल जसमीत कौर के अलावा कांस्टेबल रमेश कुमार के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. मामला पहले ही फ्लैश किया जा चुका था. सूचना पा कर कालका क्षेत्र के एसीपी राजेश कुमार व जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन भी वहां आ गए थे. पुलिस जांच में पहली ही नजर में मामला दुष्कर्म के बाद हत्या का लग रहा था. इसलिए पुलिस ने मृतका के पिता अशोक कुमार की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या का केस दर्ज कर लिया था.

लड़की के नीचे के कपड़े शरीर पर नहीं थे. बिस्तर पर जिस स्थिति में उस की लाश पड़ी थी, उस से साफ लग रहा था कि मरने से पहले उस के साथ दुराचार किया गया था. लेकिन बिना मैडिकल जांच के रेप का आरोप नहीं लगाया जा सकता था. देर शाम क्राइम इनवैस्टीगेशन व फोरैंसिक टीमें घटनास्थल पर पहुंच कर सबूत जुटाने में जुट गईं. मौके की प्रारंभिक काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए कालका के सिविल अस्पताल भेज दिया. अब तक काफी रात घिर आई थी. इस केस को हल करने में पुलिस को कोई सुराग नहीं मिल पाया था.

अगली सुबह एसएमओ डा. एस.एस. नरवाल की निगरानी में डाक्टरों के एक पैनल ने दीक्षा के शव का पोस्टमार्टम कर के रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट में मौत की वजह दम घुटना बताते हुए दुष्कर्म की पुष्टि की गई थी. इस के अलावा मृतका की गरदन व जिस्म के कुछ अन्य हिस्सों पर ऐसे जख्मों के निशान पाए गए थे, जिस से यह बात साबित होती थी कि मरने से पहले मृतका ने हत्यारे से काफी संघर्ष किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई थी कि दुष्कर्म मरने से पहले किया गया था. मृतका का विसरा निकाल कर रासायनिक परीक्षण के लिए भिजवाने के लिए सुरक्षित रख लिया गया था. दुष्कर्म की पुष्टि हो जाने पर केस में भादंवि की धारा 376 भी जोड़ दी गई. तफ्तीश के नाम पर थाना पुलिस के हाथ अभी खाली थे.

डीसीपी अनिल धवन ने पहले से ही इस केस को गंभीरता से ले रखा था. इस केस का खुलासा करने के लिए उन्होंने पुलिस की 3 टीमें गठित कर दीं. जिन में से एक टीम ने अपनी जांच की शुरुआत मृतका के पड़ोसियों से पूछताछ कर के की. उन से जानकारी मिली कि पिछले कुछ दिनों से दीक्षा के घर के बाहर 2 लड़कों को चक्कर काटते देखा गया था. यह भी पता चला कि सांवले रंग की एक लड़की भी दीक्षा के पास आया करती थी.

पड़ोसियों से हुलिए हासिल कर के पुलिस ने उन के स्कैच तैयार करवाए, साथ ही मृतका का मोबाइल फोन भी चैक किया. पड़ोसियों ने सांवले रंग की जिस लड़की का जिक्र किया था, उसी के हुलिए से मिलतीजुलती एक लड़की का फोटो दीक्षा के वाट्सऐप पर मिल गया. पुलिस ने वह फोटो पड़ोसियों को दिखाया तो उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी कि यही लड़की दीक्षा से मिलने आया करती थी. पर दीक्षा के मातापिता ने उस लड़की को पहचानने से इंकार कर दिया. पुलिस ने वाट्सएप वाली उस लड़की का फोटो दीक्षा के स्कूल की कुछ लड़कियों को दिखाया तो उन्होंने छूटते ही कहा कि यह रूबी है.

वह लड़की भी उसी स्कूल में पढ़ती थी. पिछले साल आठवीं पास कर लेने के बाद इस ने पढ़ाई छोड़ दी थी. स्कूल से रूबी के घर का पता हासिल कर के पुलिस उस के घर पहुंच गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले आई. महिला पुलिस द्वारा उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो नाबालिग रूबी पुलिस की शुरुआती पूछताछ में ही टूट गई. इस के बाद उस ने अपनी खास सहेली दीक्षा की हत्या की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. 15 साल की रूबी के पिता परवाणू में ही एक चाय की दुकान चलाते थे. स्कूल से लौटने के बाद रूबी अकसर पिता के काम में हाथ बंटाने के लिए दुकान पर बैठ जाया करती थी. उस से बड़ी 2 बहनें और थीं, जिन की शादियां हो चुकी थीं. सब से छोटा एक भाई था, जो परवाणू के एक स्कूल में पढ़ता था.

रूबी की दुकान पर रोहित नाम का एक युवक रोजाना चाय लेने आता था. वह वहीं की एक फैक्ट्री में नौकरी करता था. 22 साल का रोहित मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के गांव मुस्तफाबाद का रहने वाला था. वह करीब 4 साल पहले गांव के एक दोस्त के साथ काम के सिलसिले में परवाणू आया था. यहां उसे सैक्टर-2 स्थित गैसचूल्हा बनाने वाली एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी. वहां उस का काम चूल्हों की सफाई करना और फैक्ट्री के लोगों के लिए चाय वगैरह लाना था. रूबी की चाय की दुकान उस की फैक्ट्री के नजदीक थी, इसलिए वह वहीं से फैक्ट्री के कामगारों के लिए चाय लाता था. कई बार उसे दुकान पर रूबी बैठी मिलती थी.

रोहित का चाय का और्डर अन्य ग्राहकों के मुकाबले काफी बड़ा होता था. इस की पेमेंट भी उसी के जरिए होती थी, इसलिए रूबी उस का खास ध्यान रखती थी. रूबी थी तो काफी सांवली, पर उस के नयननक्श अच्छे थे, जिस की वजह से रोहित उसे चाहने लगा था. रूबी को खुश करने के लिए कई बार वह चाय के बिल में 10-12 कप ज्यादा लिखवा कर उसे अपनी फैक्ट्री से अतिरिक्त पैसे दिलवा दिया करता था. अपने पास से भी कई बार उस ने 100-50 का नोट उस के हाथों पर रख कर मुट्ठी बंद कर दी थी. इस से रूबी का झुकाव रोहित की तरफ हो गया. रोहित चौबीसों घंटे फैक्ट्री में रहता था.

फैक्ट्री के वर्करों की छुट्टी हो जाने के बाद एक दिन रोहित ने रूबी को फैक्ट्री में ही बुला लिया. उस दिन दोनों का शारीरिक मिलन हो गया. एक बार जिस्मानी संबंध बनने के बाद उन के बीच इस का सिलसिला चल निकला. पहले रोहित अपनी कमाई से हर महीने कुछ पैसे घर भेज दिया करता था. पर रूबी से संबंध बनने के बाद उस ने घर पैसे भेजने बंद कर दिए. उस ने सारे पैसे रूबी पर लुटाने शुरू कर दिए. रूबी के लिए वह एक तरह से सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन गया था.

इसी तरह 2 बरस निकल गए. इस के बाद एक दिन अचानक कुछ ऐसा हो गया कि उन के संबंधों में दरार पड़ गई. दरअसल, एक दिन कालका के मुख्य बाजार में रोहित की रूबी से मुलाकात हुई तो उस के साथ एक गोरीचिट्टी लड़की भी थी. रूबी ने उस लड़की का परिचय अपनी सहेली दीक्षा के रूप में करा कर बताया कि दोनों दूसरी क्लास से आठवीं तक साथसाथ पढ़ी थीं. इसी पहली मुलाकात में रोहित का दिल दीक्षा पर आ गया. इस के बाद रूबी से जब भी उस की मुलाकात होती, वह उस से दीक्षा के बारे में ही बातें करता. इस तरह उस ने दीक्षा के बारे में उस से तमाम जानकारियां हासिल कर लीं.

इस के बाद दीक्षा की झलक पाने के लिए वह उस की गली के चक्कर लगाने लगा. लेकिन दीक्षा न तो किसी से फालतू बातें करती थी और न ही फिजूल में इधरउधर घूमती थी. वह अपनी पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों को समझने वाली गंभीर प्रवृत्ति की लड़की थी. रोहित को जब लगा कि दीक्षा आसानी से उस के जाल में फंसने वाली नहीं है तो उस ने एक योजना बनाई. उस योजना के तहत उस ने एक दिन रूबी से सीधे कहा, ‘‘देख रूबी, मेरा मन तेरी सहेली दीक्षा पर आ गया है.

अगर तू चाहती है कि हमारा और तेरा रिश्ता हमेशा बना रहे तो कैसे भी तू उस से मेरी एक बार अकेले में मुलाकात करवा दे, सिर्फ एक बार. इस के बाद उस की तरफ देखना तो दूर, मैं कभी उस के बारे में सोचूंगा भी नहीं. अगर तुम ने मेरा यह काम नहीं किया तो समझ लो मेरा और तुम्हारा संबंध हमेशा के लिए खत्म.’’

इस तरह की स्थिति में अमूमन लड़कियां अपने प्रेमी से झगड़ा करने लगती हैं. वह अपने प्यार को हरगिज नहीं बंटने देती. पर रूबी न जाने कैसी घटिया सोच वाली लड़की निकली कि वह रोहित की बात मान गई. इतना ही नहीं, प्रेमी की ख्वाहिश पूरी करवाने के लिए वह दीक्षा के यहां जा पहुंची.  वह दीक्षा से रोहित के मन की बात तो कह नहीं सकती थी, पर साहस जुटा कर उस ने दीक्षा से यह जरूर कह दिया कि उस का दोस्त रोहित परीक्षा वाले दिन मिठाई और चौकलेट से उस का मुंह मीठा करा कर उसे अपनी शुभकामनाएं देना चाहता है.

दीक्षा ने इस पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. इस के बावजूद रूबी ने मिठाई खरीद कर उस में बेहोशी की दवा मिला दी. उस के बाद मिठाई और चौकलेट रोहित को देते हुए बोली, ‘‘वह मान तो गई है, लेकिन सिर्फ एक बार के लिए. तुम मेरे ही साथ उस के घर चलना. मैं दरवाजे पर खड़ी हो कर बाहर का ध्यान रखूंगी और तुम उस के कमरे में चले जाना.’’

रोहित खुश हो गया कि अब उस की इच्छा जल्द पूरी हो जाएगी. रूबी को पता था कि दीक्षा की वार्षिक परीक्षा शुरू हो चुकी है और मांबाप के ड्यूटी पर जाने के बाद वह अकेली ही कमरे पर रहती है. 11 मार्च, 2016 को दोपहर के 2 बजे से दीक्षा का पेपर था. उस दिन 11 बजे रूबी रोहित को ले कर दीक्षा के घर पहुंच गई. उस समय दीक्षा अकेली ही बैड पर बैठ कर पढ़ रही थी. अचानक अपनी सहेली रूबी को आया देख कर दीक्षा खुश हुई. 1-2 मिनट बात करने के बाद रूबी कमरे से बाहर चली गई. कमरे में रोहित और दीक्षा रह गए.

इधरउधर की बातें करते हुए रोहित बैड पर उस के नजदीक पहुंच गया. वह उस के साथ छेड़छाड़ करने लगा तो दीक्षा घबरा गई. उस ने उसे डांटा तो रोहित ने जबरदस्ती उस के मुंह में बेहोशी की दवा मिली मिठाई का टुकड़ा डाल दिया. थोड़ी देर में वह निढाल हो गई. इस के बाद रोहित ने उस के साथ मनमानी की. दवा का असर शायद कम था, जिस से दीक्षा थोड़ी देर में होश में आ गई. वह शोर मचाने को हुई तो रोहित ने उस का मुंह दबा लिया. उस की घुटीघुटी आवाज बाहर आ रही थी, जिसे सुन कर रूबी कमरे में आ गई.

उसे देख कर दीक्षा ने अपने मुंह से रोहित का हाथ हटा कर धमकाया कि वह इस बारे में अपने मम्मीपापा को बता कर उसे ऐसा सबक सिखाएगी कि वह याद रखेगी. इस से रूबी डर गई. उसे लगा कि अगर इस ने अपने मांबाप को यह बात बता दी तो उस की मोहल्ले में बदनामी तो होगी, साथ ही वह जेल भी जाएगी. इस से बचने के लिए रूबी ने पास पड़ा तकिया उठा कर उस के चेहरे पर रख दिया. रोहित ने दीक्षा के हाथ पकड़ लिए, जिस से वह ज्यादा विरोध नहीं कर सकी. कुछ ही देर में सांस घुटने से दीक्षा की मौत हो गई. उस वक्त वह अर्धनग्न अवस्था में थी. उसी अवस्था में वे उसे छोड़ कर चले गए.

रूबी से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसी दिन यानी 13 मार्च, 2016 को रोहित को भी हिरासत में ले लिया. रूबी चूंकि नाबालिग थी, इसलिए  उसे अगले दिन जुवेनाइल कोर्ट में पेश कर के करनाल स्थित नारी निकेतन भेज दिया गया, जबकि रोहित को कालका के प्रथम श्रेणी के न्यायिक दंडाधिकारी श्री दानेश गुप्ता की अदालत में पेश कर 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड अवधि में पुलिस ने रोहित से विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद उसे फिर से अदालत में पेश कर अंबाला जेल भेज दिया गया. True Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. रूबी, दीक्षा और दीक्षा के परिजनों के नाम परिवर्तित हैं)

 

Motivational Story: आईएसएस टौपर – हौसले से मिली जीत

Motivational Story: सपने तो हर कोई देखता है, लेकिन उन्हें साकार करना हर किसी के वश की बात नहीं होती, क्योंकि इस के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ती है. यह कहानी ऐसे कुछ लोगों की है, जिन्होंने अपनी अथक मेहनत की बदौलत अपने सपनों को साकार किया है.

10 मई, 2016 को संघ लोक सेवा आयोग ने दोपहर एक बजे के करीब जब सिविल सर्विस एग्जाम का रिजल्ट घोषित किया तो टीना डाबी और उन के घर वालों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. उन के घर में इतनी बड़ी खुशी पहली बार आई थी और वह खुशी यह थी कि टीना डाबी ने सिविल सर्विस की परीक्षा में टौप किया था.

टीना के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. इसलिए रिजल्ट आने के कुछ देर बाद ही गोल मार्केट की बीएसएनएल कालोनी स्थित उन के फ्लैट में बधाई देने वालों का तांता लग गया. टीना की मां हिमाली डाबी और पिता जसवंत डाबी आने वाले हर आदमी का मुंह मीठा करा रहे थे. मीडिया वाले भी उन के यहां जुटने लगे. उस समय टीना किसी वीवीआईपी से कम नहीं थीं, क्योंकि हर कोई उन से बात करने को बेताब था.

देश की सब से प्रतिष्ठित सिविल सर्विस परीक्षा पास करना ज्यादातर शिक्षित युवाओं का सपना होता है. अथक परिश्रम के बावजूद अधिकांश युवाओं की यह मंशा पूरी नहीं होती. लेकिन 22 साल की टीना डाबी ऐसी खुशकिस्मत थीं, जिन्होंने अपने पहले ही प्रयास में न केवल यह परीक्षा पास कर ली थी, बल्कि पहला स्थान प्राप्त किया था. टीना इस का श्रेय अपनी मां हिमाली डाबी और पिता जसवंत डाबी को देती हैं. क्योंकि उन की गाइडैंस और प्रेरणा से उन्हें यह मुकाम हासिल हुआ है. टीना ने बताया कि उन्हें इस परीक्षा में पास होने का विश्वास तो था, पर यह उम्मीद नहीं थी कि इतनी बड़ी पोजीशन मिलेगी. वह इसे खुद के लिए सरप्राइज मान रही हैं.

टीना डाबी के मातापिता दोनों ही आईईएस हैं. भारतीय इंजीनियरिंग सेवा की परीक्षा पास करने के बाद दोनों की बीएसएनएल में नौकरी लग गई थी. मां हिमाली डाबी इस विभाग में इलैक्ट्रिकल इंजीनियर हैं, जबकि पिता जसवंत डाबी टेलीकौम इंजीनियर है. इन की 2 बेटियां हैं, टीना और रिया. टीना का जन्म भोपाल में हुआ था. उस वक्त उन की पोस्टिंग भोपाल में थी. वहीं पर टीना की प्रारंभिक शिक्षा हुई. कहते हैं, पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं. टीना भी पढ़ाई में शुरू से होशियार थी. हर कक्षा उस ने अच्छे नंबरों से पास की.

इस के बाद टीना के मातापिता का ट्रांसफर दिल्ली हुआ तो मजबूरी में उन्हें अपने परिवार को दिल्ली लाना पड़ा. दिल्ली के कौन्वैंट और जीसस ऐंड मेरी नाम के स्कूल में दोनों बेटियों का दाखिला करा दिया गया. उस समय टीना सातवीं कक्षा में थी. टीना के हाईस्कूल पास करने के बाद ही जसवंत डाबी ने उस के कैरियर की प्लानिंग शुरू कर दी. वैसे उन की इच्छा थी कि वह मैडिकल या इंजीनियरिंग क्षेत्र में जाए, लेकिन अपनी सोच वह बेटी पर लादना नहीं चाहते थे. उन्होंने इस बारे में टीना से बात की तो उस ने कहा कि अभी उस ने तय नहीं किया कि वह किस क्षेत्र में जाएगी.

टीना के दादा पुरुषोत्तम माधव राव भी अपने जमाने में स्कूल के टौपर रहे थे और वह स्टेशन मास्टर थे. दोनों ही टीना का उत्साह बढ़ाते रहते थे. उन्हीं के उत्साह पर टीना ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का फैसला लिया. इस बारे में टीना ने अपने मातापिता से बात की तो वे बहुत खुश हुए. उन्होंने कहा कि वे उस की इस इच्छा को पूरी करने का हरसंभव प्रयास करेंगे. इस तरह टीना ने 11वीं कक्षा से ही भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी.

12वीं कक्षा में 97 प्रतिशत अंक ला कर उन्होंने परिवार के साथसाथ स्कूल का भी मान बढ़ाया. टीना ने राजनीतिशास्त्र में 100 प्रतिशत अंक हासिल किए थे. सन 2012 में उन्होंने दिल्ली के श्रीराम कालेज औफ कौमर्स में बीए में दाखिला लिया. पढ़ाई के साथसाथ वह कालेज में होने वाली वादविवाद प्रतियोगिताओं व अन्य कार्यक्रमों में भी बढ़चढ़ कर भाग लेती थीं. वह एक अच्छी डिबेटर हो गईं. यूथ पार्लियामेंट 2012 में वह डिप्टी स्पीकर रहीं. इतना ही नहीं, कालेज की तरफ से उन्हें यूथ औफ द ईयर भी चुना गया. सन 2014 में टीना ने बीए की परीक्षा टौप बन कर पास की. विश्वविद्यालय की तरफ से उन्हें गोल्ड मैडल प्रदान किया गया.

ग्रैजुएशन पूरा कर लेने के बाद टीना पूरी तरह से भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी में जुट गईं. अपनी मेहनत और लगन से सफलता की सीढि़यां चढ़ने वाली टीना डाबी का अब एक ही लक्ष्य था आईएएस बनना. परीक्षा की तैयारी में समय प्रबंधन का खास योगदान होता है. इस मामले में टीना के मातापिता ने उन की मदद की. वह अपने टाइम टेबल के अनुसार पढ़ाई करने लगीं.

ज्वलंत विषयों पर पकड़ मजबूत करने और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक विषयों पर ज्ञान हासिल करने के लिए वह दैनिक अखबार पढ़तीं. इस के अलावा वह रोजाना 8 से 14 घंटे पढ़ाई पर देने लगीं. मां हिमाली डाबी टीना को गाइड करती रहती थीं. बेटी की परीक्षा की तैयारी के लिए हिमाली डाबी ने अपनी सरकारी नौकरी भी दांव पर लगा दी. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले कर वह घर बैठ गईं, ताकि बेटी को किसी तरह की कोई असुविधा न हो. वह न केवल उस के खानपान का ध्यान रखतीं, बल्कि उस का मार्गदर्शन भी करती थीं.

कालेज के टीचर व अन्य मित्रों से भी टीना पढ़ाई के संबंध में मदद लेती थीं. वह अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़संकल्प थीं. उसी लक्ष्य को साध कर वह पूरी कर्मठता और एकाग्रता से पढ़ाई में जुटी थीं. पढ़तेपढ़ते कभी थक जातीं तो विचार आता कि उन्होंने कौन सा फील्ड चुन लिया. डिप्रेशन हो जाता तो मां उन्हें हिम्मत बंधातीं. वह उन का सटीक मार्गदर्शन करतीं तो टीना फिर से उत्साह से भर कर तैयारी में जुट जातीं.

24 अगस्त, 2014 को संघ लोक सेवा आयोग ने देश के 59 परीक्षा केंद्रों पर परीक्षा आयोजित कराई, जिस में 4 लाख 51 हजार परीक्षार्थी सम्मिलित हुए. टीना डाबी भी उन में से एक थीं. इस परीक्षा में टीना डाबी सहित 16 हजार 9 सौ 33 परीक्षार्थी सफल हुए. प्रारंभिक परीक्षा पास करने के बाद टीना का आत्मविश्वास बढ़ गया और वह मुख्य परीक्षा की तैयारी में जुट गईं. संघ लोक सेवा आयोग ने दिसंबर में जब मुख्य परीक्षा आयोजित की तो उस में 16 हजार 2 सौ 86 परीक्षार्थी शामिल हुए. इस परीक्षा का परिणाम 13 मार्च, 2016 को घोषित कर दिया गया. 3 हजार 3 सौ 8 परीक्षार्थियों ने यह परीक्षा पास की. मुख्य परीक्षा पास करने वालों में टीना डाबी का नाम भी शामिल था.

मुख्य परीक्षा पास करने वालों को साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरना था. आयोग ने 27 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच सभी परीक्षार्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया. टीना पूरे आत्मविश्वास के साथ साक्षात्कार देने के लिए पहुंचीं. इंटरव्यू बोर्ड में सम्मिलित अलगअलग विषयों के विशेषज्ञों ने टीना से सवाल पूछे, जिन का टीना ने पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया.

प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के बाद आयोग ने 10 मई, 2016 को दोपहर एक बजे एक हजार 364 सफल अभ्यर्थियों की लिस्ट जारी की. इस लिस्ट में टीना डाबी का नाम सब से ऊपर था. यानी दिल्ली विश्वविद्यालय से गोल्ड मैडल के साथ स्नातक करने वाली टीना डाबी पहली कोशिश में ही सिविल सर्विस एग्जाम में टौप रहीं. उन के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी.

टीना इस सफलता का श्रेय अपनी मां को देती हैं. आईएएस टौपर टीना को पढ़ाई के साथसाथ पेंटिंग का भी शौक है. वह मधुबनी स्टाइल की बेहद आकर्षक पेंटिंग बनाती हैं. इस के अलावा शौपिंग और सामाजिक कामों भी रुचि रखती हैं. फुरसत मिलने पर वह घर वालों के साथ गप्पें मारने के अलावा टीवी भी खूब देखती हैं. उन्हें टीवी पर इंगलिश सिरीज देखना पसंद है. वह कौन सा कैडर चाहती हैं, यह पूछने पर टीना डाबी ने बताया कि हरियाणा कैडर मिल जाए तो अच्छा रहेगा. हरियाणा उन का पसंदीदा राज्य है. उन का कहना है कि हरियाणा में गर्ल चाइल्ड रेशियो कम है. इसलिए वह वहां रह कर लैंगिक असमानता और महिला सशक्तिकरण पर काम करना चाहती हैं.

टीना ने बताया कि आज लड़कियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, इसलिए उन्हें मन लगा कर पढ़ना चाहिए. उन का कहना है कि लक्ष्य बना कर दृढ़ संकल्प के साथ काम किया जाए तो सफलता अवश्य मिलती है. इस में जरूरत इस बात की है कि हौसला हमेशा बना रहे. Motivational Story

 

One Sided Love: एकतरफा प्यार का दुखत अंत

One Sided Love: प्यार ऐसी चीज नहीं है, जिसे जबरदस्ती हासिल किया जा सके यह तो दिल से पैदा होता है. लेकिन पीयूष अपनी साथी टीचर नीलम का प्यार जबरदस्ती पाना चाहता था. इसी जिद में वह एक खौफनाक गुनाह कर बैठा.

एक युवक सड़क पर भागा जा रहा था, जिस की उम्र 24-25 साल थी. उस के हाथ में चाकू था, जो खून से सना था. उस के हाथ भी खून से सने थे.

भागते हुए वह चीख रहा था, ‘‘मैं ने उसे मार दिया.’’

उस युवक को उस तरह भागते देख कर लोग हैरान जरूर थे, पर माजरा किसी की समझ में नहीं आ रहा था. लोग एकदूसरे से पूछने लगे, लेकिन जवाब किसी के पास नहीं था. बदहवासी की हालत में भागते उस युवक ने एक प्राइवेट स्कूल में घुसने की कोशिश की, लेकिन स्कूल के स्टाफ और अन्य लोगों ने उसे अंदर नहीं घुसने दिया. चीखताचिल्लाता वह युवक कुछ देर बाजार में भागता रहा. इस के बाद अपने घर के पास जा कर उस ने हाथ में पकड़ा चाकू एक तरफ सड़क पर फेंक दिया और घर में घुस गया.

यह घटना 28 अप्रैल, 2016 की है. सुबह के यही कोई सवा 8 बजे का वक्त था. राजस्थान में झीलों की नगरी के नाम से प्रसिद्ध उदयपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है ऋषभदेव. यह कस्बा धार्मिक नगरी के नाम से भी जाना जाता है. इस कस्बे में ऋषभदेव का दर्शनीय मंदिर है. जहां रोजाना सैकड़ों की संख्या में देशविदेश के पर्यटक दर्शन के लिए आते हैं. इस के अलावा ग्रीन मार्बल की खानों के लिए भी ऋषभदेव प्रसिद्ध है. घटना इसी ऋषभदेव कस्बे की है.

इसी कस्बे के लोहरवाड़ा मोहल्ले में रहने वाले रमनलाल पांचाल की बेटी नीलम रोज की तरह उस दिन भी सुबह करीब साढ़े 5-6 बजे उठ गई थी. उस के जागने के साथ उस का बेटा रिद्धिश भी जाग गया. 3 साल का रिद्धिश उठते ही मां से लिपट कर बोला, ‘‘मम्मा, आज मुझे घुमाने ले चलोगी ना?’’

नीलम ने उस का माथा चूम कर दुलारते हुए कहा, ‘‘आज शाम को हम अपने राजा बेटा को जरूर घुमाने ले चलेंगे, नानी भी साथ चलेंगी, वहां आइसक्रीम भी खाएंगे.’’

रिद्धिश बोला, ‘‘मम्मी, मैं बैलून भी लूंगा.’’

‘‘हां, राजा बेटा को बैलून भी दिलाऊंगी.’’ नीलम ने उसे प्यार करते हुए कहा.

उसी बीच नीलम की मां ने आ कर कहा, ‘‘रिचु बेटे, सुबहसुबह मम्मी को परेशान मत करो. मम्मी को फ्रेश होना है, फिर नहानाधोना भी है. इस के बाद स्कूल जाना है. तुम इस तरह करते रहोगे तो मम्मी स्कूल के लिए लेट हो जाएगी. मम्मी लेट हो गईं तो उस के सर उसे डाटेंगे.’’

यह कहते हुए नीलम की मां ने नवासे रिचु को गोद में उठा लिया और उसे घर के बाहर ले आईं. सुबहसुबह ठंडी सुहानी हवा चल रही थी. रिचु नानी की गोद में खेलने लगा. रिद्धिश को घर में प्यार से सब रिचु कहते थे. रिचु खेलने लगा तो नीलम फ्रेश होने चली गई. इस के बाद उस ने ब्रश किया और तौलिया और अन्य कपड़े ले कर नहाने के लिए बाथरूम में जाने लगी तो रिचु वहां आ गया. वह मचलते हुए बोला, ‘‘मम्मी, मैं भी आप के साथ नहाऊंगा’’

नीलम उसे कैसे मना करती. रोजाना तो नहीं, लेकिन जब भी मौका मिलता था वह मम्मा के साथ ही नहाता था. जब मम्मा के साथ नहीं नहा पाता था तो नानी उसे नहलाती थी.

रिचु को जिद करते देख नीलम ने उस के कपड़े निकाले और उसे भी अपने साथ बाथरूम में ले गई. नीलम ने पहले बेटे को नहलाया, उस के बाद जल्दीजल्दी खुद भी नहाया. बाथरूम से निकल कर रिचु को अपनी मां को सौंपते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप इसे तैयार कर देना. मैं तैयार करने लगी तो स्कूल पहुंचने में लेट हो जाऊंगी.’’

नीलम की मां स्थिति को जानतीसमझती थीं, इसलिए बोलीं, ‘‘बेटी, तू चिंता मत कर, मैं इसे संभाल लूंगी. तू फटाफट तैयार हो जा.’’

नीलम ने जल्दीजल्दी खुद को तैयार किया और शीशे में निहारा तो उसे लगा कि आज वह रोज से ज्यादा खूबसूरत लग रही है. खूबसूरत तो वह थी ही, सुबह की उमंग और हलके मेकअप ने उस की खूबसूरती और बढ़ा दी थी. अपनी खूबसूरती पर वह हलके से मुसकरा दी. तभी मां ने आवाज दी, ‘‘बेटी, नाश्ता तैयार है, फटाफट नाश्ता कर लो. रिचु भी दूध पीने को मचल रहा है.’’

चेहरे पर आई बालों की लटों को संवारते हुए एक बार फिर शीशे में खुद को निहारने के बाद नीलम ने दीवार घड़ी की ओर देखा. घड़ी में पौने 8 बज रहे थे. वह कमरे से बाहर आते हुए बोली, ‘‘मम्मी, आज तो वाकई देर हो रही है. मुझे जल्दी से एक परांठा दे दो. रिचु का दूध गर्म हो गया हो तो वह भी दे दो, मैं उसे दूध भी पिला देती हूं.’’

नीलम की मां परांठे की प्लेट और दूध का गिलास उसे देते हुए बोलीं, ‘‘बेटी, जल्दी करो.’’

नीलम ने पहले रिचु को दूध को पिलाया, उस के बाद खुद नाश्ता किया. इस के बाद बेटे को गोद में ले कर कहा, ‘‘राजा बेटा, अब आप की मम्मा स्कूल जा रही हैं. आओ एक पप्पी दो. और हां, नानी को परेशान मत करना. अगर नानी को परेशान किया तो घुमाने नहीं ले जाऊंगी.’’

‘‘आप नानी से पूछ लो, मैं कोई शैतानी नहीं करता. शाम को घुमाने का प्रौमिस है ना?’’ रिचु ने भोलेपन से कहा.

‘‘हां बेटा, शाम को घुमाने का प्रौमिस,’’ नीलम ने कहा, ‘‘चलो राजा बेटा, अब मम्मा को एक पप्पी दो.’’

रिचु ने मम्मा को पप्पी दी तो नीलम ने उसे गोद से उतार दिया. दीवार घड़ी पर नजर डाली तो 8 बजने में कुछ मिनट शेष थे. नीलम ने पर्स कंधे पर डाला और मां तथा बेटे को बायबाय कहते हुए तेजी से घर से बाहर निकल गई. नीलम बेटे के बारे में सोचते हुए तेजी से पैदल ही क्लासिक पब्लिक स्कूल की तरफ चली जा रही थी. छुट्टी के दिन को छोड़ कर उस का रोज का लगभग यही नियम था. स्कूल ज्यादा दूर नहीं था. सुबह 8 बजने से कुछ पहले वह घर से निकलती थी और पैदल ही 10-15 मिनट में स्कूल पहुंच जाती थी.

नीलम अपने विचारों में खोई चली जा रही थी कि आज 28 तारीख है. अगले सप्ताह स्कूल से तनख्वाह मिल जाएगी तो कुछ पैसे मम्मी को दे कर बाकी बचे पैसों से वह अपने लिए एक नई डिजाइन की साड़ी और रिचु के लिए कुछ कपड़े खरीदेगी. आधे से ज्यादा रास्ता तय कर के नीलम होली चौक से आगे प्रैस गली स्थित मशानिया महादेव मंदिर के पास पहुंची थी कि घात लगा कर बैठा पीयूष भंडारी एकाएक उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. उस के हाथ में एक बड़ा सा चाकू चमक रहा था. नीलम कुछ समझ पाती, उस ने उस के गले, सीने व पीठ पर उसी चाकू से तबातोड़ कई वार कर दिए. इस के बाद उस ने उसी चाकू से अपने हाथ की नस काट ली.

नीलम पहले चिल्लाई, उस के बाद बेसुध हो कर गिर पड़ी. उस की चीख सुन कर आसपास के लोग उस की ओर बढ़े तो पीयूष भाग निकला. भागता हुआ वह शिल्पी मोहल्ले स्थित अपने घर पहुंचा और घर में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया. नीलम सड़क पर बेहोश पड़ी थी. जहांजहां चाकू घोंपा गया था, वहां से खून बह रहा था. वहां रहने वाले सभी लोग नीलम को जानते थे, इसलिए किसी ने इस घटना की जानकारी नीलम के घर वालों को दे दी. कस्बे में रिक्शा या औटो जल्दी नहीं मिलते. कोई साधन नहीं मिला तो कुछ लोग नीलम को चार पहिए वाली ठेली पर लाद कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए. कस्बे के उस अस्पताल में इलाज की खास व्यवस्था नहीं थी, इसलिए प्राथमिक उपचार के बाद डाक्टर ने नीलम को उदयपुर रैफर कर दिया.

घर के तथा कस्बे के कुछ लोग नीलम को उदयपुर के एमबी अस्पताल ले गए, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका. काफी मात्रा में खून बह जाने की वजह से नीलम की मौत हो गई. इस के बाद पुलिस ने अपनी औपचारिक काररवाई कर के नीलम की लाश का पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. उस के शरीर पर चाकू के 6 घाव मिले थे. नीलम की मौत के बाद ऋषभदेव कस्बे में आक्रोश फैल गया था. बाजार बंद हो गया. कुछ लोग पाटुना चौक पर पहुंच गए तो कुछ लोग पुलिस थाने पर पहुंच कर नारे लगाने लगे. वहीं कुछ लोग सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंच कर अव्यवस्थाओं को ले कर आक्रोश जताते हुए अस्पताल को बंद करवाने लगे.

सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंच गए. कस्बे में तनाव की स्थिति को देखते हुए आसपास के पुलिस थानों खैरवाड़ा, बावलवाड़ा, पहाड़ा व सराड़ा से अतिरिक्त पुलिस बुला ली गई. अधिकारियों ने लोगों को समझाबुझा कर शांत किया और आरोपी को गिरफ्तार कर के कड़ी से कड़ी सजा दिलाने का आश्वासन दिया. उधर पोस्टमार्टम के बाद घर वाले नीलम का शव एंबुलैंस से ऋषभदेव ले आए और सीधे शिल्पी मोहल्ले में रहने वाले नीलम के हत्यारे पीयूष भंडारी के घर पहुंच गए. पीयूष के घर ताला लटक रहा था. नाराज घर वालों ने पीयूष के घर का दरवाजा तोड़ दिया और नीलम की लाश घर के अंदर रख दी.

वे पीयूष के घर को आग लगाने जा रहा रहे थे कि तभी सूचना पा कर पुलिस अधिकारी वहां पहुंच गए. आक्रोश में भरे लोग अधिकारियों से नीलम की मौत पर मुआवजा दिलाने की मांग करने लगे. पुलिस ने आरोपी को पकड़े जाने की जानकारी देते हुए उस के खिलाफ कड़ी से कड़ी काररवाई करने का आश्वासन दिया. इस के बावजूद लोगों का गुस्सा शांत नहीं हुआ. इस के बाद अधिकारियों ने कानून का हवाला दे कर लोगों को समझाना शुरू किया. वहां काफी देर तक चले हंगामे के बाद लोग शांत हो कर नीलम का शव ले जाने पर सहमत हुए. इस के बाद घर वाले नीलम का शव अपने घर ले गए और उसी दिन शाम को उस की अंत्येष्टि कर दी.

वारदात की जानकारी मिलते ही पुलिस ने आरोपी पीयूष भंडारी को उस के घर से पकड़ लिया था. वारदात कर के वह अपने घर में जा कर छिप गया था. हाथ की नसें काट लेने से उस के शरीर से भी काफी खून बह गया था. पुलिस ने पहले ऋषभदेव के अस्पताल ले जा कर उस का प्राथमिक उपचार कराया, उस के बाद उसे उदयपुर रैफर कर दिया गया.

इलाज के बाद 30 अप्रैल को पुलिस ने पीयूष भंडारी को न्यायालय में पेश किया, जहां से पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. पुलिस ने पीयूष की निशानदेही पर वह चाकू बरामद कर लिया, जिस से उस ने नीलम का खून किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर पुलिस ने उसे दोबारा अदालत में पेश किया, जहां अदालत के आदेश पर उसे डूंगरपुर जेल भेज दिया गया. सीआई ज्ञानेंद्र सिंह इस मामले की जांच कर रहे हैं.

एक मई की रात को नीलम की याद में कस्बे के लोगों ने ऋषभदेव मंदिर से पाटुना चौक तक कैंडल मार्च निकाला. इस में सैकड़ों  लोगों ने भाग लिया. उसी दिन नीलम के घर वाले और पांचाल समाज के लोग विधायक नानालाल अहारी के नेतृत्व में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया से मिले. उन्होंने गृहमंत्री से न्याय दिलाने की मांग की. कहानी तो हालांकि यहीं पर खत्म हो जाती है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि आखिर पीयूष ने नीलम को क्यों मार डाला?

लोहरवाड़ा मोहल्ले के रहने वाले रमनलाल पांचाल ने पहले कुछ सालों तक कुवैत में काम किया था. वहां से लौट कर उन्होंने ऋषभदेव में मनिहारी की दुकान खोल ली थी. दुकान अच्छी चलती थी. उन के 3 बच्चे थे, 2 बेटियां और एक बेटा. इन में सब से बड़ी नीलम थी. वह काफी खूबसूरत थी. उस ने उदयपुर की मोहनलाल सुखाडि़या यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रैजुएशन किया था. उस की शादी करीब 4 साल पहले राजस्थान के जिला डूंगरपुर के रठौड़ा निवासी हरीश पांचाल से हुई थी.

शादी के बाद नीलम ससुराल चली गई. ससुराल में वह खुश थी. उस का पति हरीश अहमदाबाद में बिजनैस करता था. घर में उसे किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. नीलम गर्भवती हुई तो अचानक पतिपत्नी या ससुराल में ऐसा न जाने क्या हुआ कि उन में मनमुटाव हो गया. शादी के करीब साल भर बाद ही नीलम मायके आ गई तो लौट कर नहीं गई. पिता के घर ही उस ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रखा रिद्धिश उर्फ रिचु. घर में खुशियां छा गईं. बेटे ने उस का खालीपन दूर कर दिया. धीरेधीरे रिचु बड़ा होने लगा. रिचु के पैदा होने से नानानानी को भी एक खिलौना मिल गया था. मामा और मौसी भी रिचु को अपनी आंखों से दूर नहीं जाने देते थे.

नीलम पढ़ीलिखी थी. पिता के घर में हालांकि किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन घर में पड़ेपड़े वह बोर होने लगी थी. उस ने नौकरी करने का मन बनाया. ऋषभदेव कस्बा ही तो है, वहां महिलाओं के लिए नौकरी के अवसर बहुत कम हैं. नीलम अपने पति से अलग मायके में रह रही थी. उसे नौकरी देने पर कई तरह की बातें हो सकती थीं. सारी स्थितियों पर विचार करने के बाद नीलम ने किसी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का मन बनाया.

उसे बच्चों को पढ़ाने में रुचि भी थी. उस ने कुछ स्कूलों में बात की तो क्लासिक पब्लिक स्कूल में बात बन गई. कस्बे के प्राइवेट स्कूलों में तनख्वाह ज्यादा नहीं मिलती, लेकिन नीलम ने यह सोच कर यह नौकरी स्वीकार कर ली कि इस से उस का समय तो पास हो जाएगा. अपने खर्च के लिए एक बंधीबंधाई रकम हर महीने हाथ में आ जाएगी. समस्या बेटे रिचु की थी, जिसे नीलम की मां ने संभालने की जिम्मेदारी ले ली. स्कूलों में आमतौर पर 6 घंटे की नौकरी होती है, इसलिए उस ने सोचा कि दोपहर में तो वह घर आ ही जाया करेगी. इस बीच रिचु नानी के पास रह लेगा.

करीब एक साल पहले नीलम ने स्कूल की नौकरी जौइन कर ली थी. इसी स्कूल में कस्बे के ही शिल्पी मोहल्ले के रहने वाले प्रभाष भंडारी का बेटा पीयूष भंडारी कई सालों से पढ़ा रहा था. वह भी ग्रैजुएट था. वह करीब 25 साल का था, अभी उस की शादी नहीं हुई थी. स्कूल में आई नई टीचर नीलम को देख कर वह उस पर फिदा हो गया. वह मन ही मन उसे प्यार करने लगा. एकदो बार बातचीत में उस ने नीलम से अपने प्यार का इजहार भी किया, लेकिन नीलम ने उसे फटकार दिया. इस से वह निराश नहीं हुआ. वह किसी न किसी तरीके से नीलम का प्यार हासिल करने की कोशिश में लगा रहा.

लेकिन नीलम ने कभी उसे तवज्जो नहीं दी. जब भी उस ने कोशिश की, नीलम ने उसे झिड़क दिया. पीयूष की हरकतों से तंग आ कर नीलम उस से दूर रहने लगी. उस की हरकतों को अनदेखी करते हुए कभी उस ने अपने घर वालों से उस के बारे में नहीं बताया, लेकिन स्कूल में उस की हरकतों की चर्चा जरूर होने लगी. तब स्कूल की बदनामी के डर से स्कूल प्रबंधक ने उसे नौकरी से निकाल दिया. यह कुछ महीने पहले की बात है.

स्कूल से नौकरी छूटने के बाद पीयूष नीलम को रोजरोज देख नहीं पाता था. एकाध बार पीयूष ने स्कूल से लौटते समय नीलम से बात करने की कोशिश की, लेकिन नीलम ने उसे कोई भाव नहीं दिया. पीयूष से यह बरदाश्त नहीं हुआ. वह तड़प उठा. वह उसे सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. आखिर उस ने तय कर लिया कि अगर नीलम उस की नहीं हुई तो वह किसी और के लिए उसे जीने नहीं देगा. इस के बाद उस ने एक चाकू का इंतजाम किया और मौके का इंतजार करने लगा.

27 अप्रैल की रात पीयूष को नींद नहीं आ रही थी. वह नीलम के बारे में ही सोचता रहा. बारबार वह उस के जेहन में आ रही थी. हर बार वह उसे इग्नोर करते हुए फटकार रही थी. नीलम की दीवानगी ने उसे पागल कर दिया था. वह उस से एकतरफा प्यार करता था. आखिर उस ने रात में ही तय कर लिया कि सुबह वह नीलम को उस की फटकार का जवाब दे देगा.

28 अप्रैल की सुबह तैयार हो कर पीयूष घर से निकल गया. उस ने चाकू अपने कपड़ों में छिपा रखा था. वह प्रैस गली स्थित मशानिया महादेव मंदिर के पास जा कर बैठ गया. उसे पता था कि नीलम रोज 8 बजे के करीब इसी रास्ते से स्कूल जाती है. नीलम को आते देख वह अपना आपा खो बैठा और पास आते ही उस पर चाकू से ताबड़तोड़ हमला कर के उस की जान ले ली. पीयूष की इस सनक ने उस की विधवा मां का भी आसरा छीन लिया है. पीयूष के पिता प्रभाष भंडारी नल फिटिंग का काम करते थे. कुछ साल पहले उन की मौत हो गई थी. उस के बाद परिवार में पीयूष, उस का बड़ा भाई और मां ही रह गई थी. पीयूष अब जेल चला गया है.

एकतरफा प्यार की इस कहानी का ऐसा दुखद अंत होगा, किसी ने सोचा भी नहीं था. पीयूष को तो कानून सजा देगा. लेकिन नीलम के घर वाले पूछते हैं कि आखिर इस में नीलम की क्या गलती थी? पीयूष की सनक ने रिचु से उस की मां का प्यार छीन लिया. पिता का प्यार उसे मिला ही नहीं. जबकि रिचु अपनी मां की मौत से अनजान है. उसे मम्मी के स्कूल से लौटने का इंतजार है. वह अकसर अपनी नानी से पूछता है, ‘नानी, मम्मा स्कूल से कब आएगी?’ One Sided Love

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

UP Crime: नए जूते पहनने की जिद बनी खून की वजह, भाई ने भाई को उतारा मौत के घाट

UP Crime: अकसर परिवार में भाईबहनों के बीच झगड़े होते रहते हैं, लेकिन क्या आप ने कभी सुना है कि नए जूते पहनने की बात पर एक भाई ने अपने ही भाई की जान ले ली हो. अगर नहीं तो यह मामला आप को चौंका देगा, जहां मामूली सी बात ने एक परिवार को शोक में डुबो दिया.

यह घटना उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के घुघली थाना क्षेत्र के चौमुखा नौका टोला गांव की है. यहां नए जूते पहले पहनने को ले कर 16 साल के किशोर और उस के छोटे भाई लक्ष्मण शर्मा के बीच विवाद हो गया. देखते ही देखते यह बहस इतनी बढ़ गई कि किशोर गुस्से में आ गया. उस ने पास में रखी कैंची उठाई और अपने छोटे भाई लक्ष्मण पर ताबड़तोड़ वार कर दिए.

इस हमले में लक्ष्मण गंभीर रूप से घायल हो कर जमीन पर गिर पड़ा और खून से लथपथ हो गया.
फेमिली वाले उसे तुरंत अस्पताल ले गए, लेकिन इलाज के दौरान उस की मौत हो गई.
पुलिस ने मौके पर पहुंचकर शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है. इस घटना के बाद पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है और लोग इस दर्दनाक वारदात से सदमे में हैं. UP Crime

Delhi Robbery: दिल्ली में 25 लाख की डकैती, घरेलू सहायक ही निकला मास्टरमाइंड

Delhi Robbery: एक ऐसा मामला सामने आया है. जहां एक कारोबारी के घर लुटेरों ने 25-30 लाख की लूट कर ली. आखिर कौन थे यह लुटेरे और किस तरह से दिया पूरी वारदात को अंजाम? पुलिस इन अपराधियों को पकड़ने में कामयाब हो पाई या नहीं? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी का सच, जो आप को बताएगा इस घटना की पूरी सच्चाई.

यह वारदात देश की राजधानी दिल्ली से आई है. जहां थाना तुगलक रोड एरिया के गोल्फ लिंक में इस घटना को अंजाम दिया गया. 5-6 लुटेरे  शराब और एनर्जी ड्रिंक कारोबारी अशोक चावला के घर में  घुसे, फिर हथियारों की नोक पर पूरे परिवार को बंधक बना लिया. इसके बाद 25-30 लाख रुपए और गहने लूटकर फरार हो गए. इस घटना की सूचना मिलते ही आसपास इलाके में हड़कंप मच गया. मौके पर पहुंची पुलिस ने जांच शुरू कर दी है और पीड़ित परिवार के सदस्यों के बयान दर्ज कर लिए हैं.

डीसीपी सचिन शर्मा ने बताया कि घटना रात करीब 8 बजे हुई थी. घर में कारोबारी अशोक चावला, उन की पत्नी, बहू और एक बच्चा था. रात को लुटेरे घर में दाखिल हुए और फेमिली वालों को बंधक बना लिया. इस के बाद उन्होंने एकएक करके सभी से कीमती सामान के बारे में पूछताछ की.

पुलिस की जांच में सामने आया है कि पीड़ित परिवार ने अपने एक घरेलू सहायक के जरिए आरोपी को 5 दिन पहले ही काम पर रखा था. उसी ने अपने साथियों को कौल करके बुलाया और इस घटना को अंजाम दिया. पुलिस अब आरोपियों की तलाश कर रही है और आरोपी किस रास्ते से घर में   घुसे थे, यह भी जांच कर रही है.

साथ ही पुलिस आरोपियों के पिछले रिकौर्ड व सीसीटीवी कैमरों को खंगाल रही है. पुलिस का कहना है कि जल्द ही आरोपियों को पकड़ लिया जाएगा. Delhi Robbery

Blackmail Case: हैदराबाद में लव ट्रैप का जाल, 20 लड़कियों को फंसाकर ब्लैकमेल करता था आरोपी

Blackmail Case: आजकल प्यार से जुड़े मामले आप को मिल जाएंगे. जहां प्रेमी प्रेमिका का कत्ल कर देता है तो कहीं प्रेमिका प्रेमी का कत्ल कर देती है, लेकिन यह मामला थोड़ा अलग है. इस में एक शख्स लड़कियों को प्यार के जाल में फंसाता था. अगर आप ने ऐसा नहीं सुना है तो बता दें कि एक आरोपी ने 20 लड़कियों को अपने झांसे में ले कर उन्हें ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया. आइए जानते हैं इस अपराधी की पूरी कहानी, जिस ने प्यार को ही हथियार बना लिया.

यह सनसनीखेज मामला हैदराबाद से सामने आया है. यहां चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ अर्जुन नाम के युवक ने प्यार का झांसा दे कर 20 से ज्यादा नाबालिग लड़कियों को फंसा लिया और उन से पैसे भी ठग लिए.
वह गुंटूर जिले के वट्टिचेरुकुरु मंडल के चामल्लामुडी गांव का रहने वाला है और फिलहाल हैदराबाद के मियांपुर इलाके में रह रहा था. चंद्रशेखर अमीर परिवारों के घरों में काम करने वाले चौकीदारों और मालियों से दोस्ती करता था. उन्हीं के जरिए घरों की जानकारी ले कर वह वहां रहने वाली लड़कियों को निशाना बनाता और फिर अपनी ठगी की साजिश को अंजाम देता था.

आरोपी सोशल मीडिया के जरिए नाबालिग लड़कियों को अपने जाल में फंसाता था. वह खासतौर पर अमीर परिवारों की लड़कियों को चुनता और उन से चैटिंग शुरू करता. खुद को अमीर दिखाने के लिए वह महंगी कारों और आलीशान जगहों की तसवीरें भेजता था. धीरेधीरे लड़कियां उस के करीब आ जातीं और उस के झूठे प्यार पर भरोसा कर बैठतीं.

इस के बाद वह उन की निजी तसवीरें और वीडियो हासिल कर लेता और उन्हीं के सहारे उन्हें ब्लैकमेल करके पैसे ऐंठता था. डर के कारण कई लड़कियों ने घर से नकदी और गहने तक उसे दे दिए.

जब कोई लड़की उस के जाल में फंस जाती तो वह चोरीछिपे उस की निजी तसवीरें और वीडियो बना लेता था. फिर इन्हीं के जरिए दबाव बनाकर पैसे वसूलता था.
पुलिस के मुताबिक, आरोपी ने करीब 2 साल में तेलंगाना राज्य की 20 से ज्यादा लड़कियों को अपना शिकार बनाया. आखिरकार एक पीड़िता की शिकायत के बाद जुबली हिल्स पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.

जांच के दौरान एक चौंकाने वाला खुलासा भी हुआ. परिवार वालों ने बताया कि आरोपी की धमकियों से परेशान हो कर एक लड़की ने घर में रखे 29 लाख रुपए चुरा लिए. उस ने उस में से 13 लाख रुपए आरोपी को और 10 लाख रुपए सरस्वती नाम की महिला को दे दिए.

आगे की जांच में पता चला कि आरोपी ने नरसिंगी इलाके की एक और युवती को भी इसी तरह फंसाया था. वह उसे होटल में ले गया और संबंध बनाए. बाद में उन्हीं पलों की तसवीरों और वीडियो के जरिए उसे ब्लैकमेल करता रहा और उस से सोने की चेन तक ले ली. Blackmail Case

Crime Story Hindi: 5 घंटे तालाब में डूबा रहा अपराधी

Crime Story Hindi: एक ऐसा शातिर अपराधी सामने आया, जिस की करतूत ने सभी को चौंका दिया. पुलिस से बचने के लिए वह करीब 5 घंटे तक पानी में डूबा रहा और भीतर छिप कर गिरफ्तारी से बचने की कोशिश करता रहा. उस की यह चालाकी और दुस्साहस सुनकर हर कोई दंग रह गया. आखिर कौन था यह शातिर अपराधी, जिसे पकड़ने के लिए पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी? आइए जानते हैं इस सनसनीखेज मामले की पूरी कहानी, जो आप को अलर्ट रहने का संदेश देगी.

यह शातिर अपराधी हरविंदर सिंह उत्तर प्रदेश के बिजनौर का रहने वाला है, जिस ने अब तक देशभर में 400 से अधिक चोरी की वारदातों को अंजाम दिया है. चौंकाने वाली बात यह है कि वह वर्ष 2017 में बिजनौर के हल्दौर नगर निकाय से निर्दलीय पार्षद भी रह चुका है. हरविंदर सिंह के खिलाफ मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मुंबई सहित कई स्थानों पर मामले दर्ज हैं. गिरफ्तारी से बचने के लिए वह हर वारदात के बाद सिम बदल लेता था और अपने साथ कोई पहचान पत्र नहीं रखता था. फिलहाल जबलपुर पुलिस और रेलवे सुरक्षा बल द्वारा उस से अन्य मामलों में पूछताछ की जा रही है.

यह सनसनीखेज घटना मध्य प्रदेश के जबलपुर में सामने आई, जहां मंगलवार शाम पुलिस और एक अंतरराज्यीय चोर के बीच फिल्मी अंदाज में पीछा हुआ. पुलिस को चकमा देने के लिए आरोपी खितौला रेलवे स्टेशन के पास काई से भरे एक तालाब में कूद गया और करीब 5 घंटे तक पानी के भीतर छिपा रहा. उस की इस चालाकी ने पुलिस को भी हैरान कर दिया. हैरानी की बात यह रही कि आरोपी सांस लेने के लिए कमल की डंठल, जिसे कमलनाल कहा जाता है, का सहारा लेता रहा.

दरअसल, यह घटना रीवाइतवारी एक्सप्रैस ट्रेन की है, जहां एसी कोच में एक महिला का पर्स चोरी करने की कोशिश के दौरान वह आरपीएफ की नजर में आ गया. ट्रेन के सिहोरा रोड रेलवे स्टेशन के पास धीमी होते ही वह कूदकर भागा, लेकिन जवानों ने उस का पीछा जारी रखा और अंततः उसे घेर लिया. रात के अंधेरे और तालाब में फैली शैवाल के कारण आरोपी काफी देर तक पुलिस की नजरों से ओझल रहा, लेकिन गोताखोरों की मदद से उसे पकड़ लिया गया. गिरफ्तारी के बाद उस ने अपना नाम बबलू और पता चंडीगढ़ बताया, परंतु आरपीएफ इंसपेक्टर राजीव खरब को उस पर संदेह हुआ.

पुराने रिकौर्ड से मिलान करने पर उस की पहचान हरविंदर सिंह उर्फ सनी के रूप में हुई. इस खुलासे ने पुलिस को भी चौंका दिया और उस के आपराधिक नेटवर्क की परतें खुलने लगीं. Crime Story Hindi