UP Crime: मामूली बात पर

UP Crime: अरविंद और उन का परिवार मिलनसार स्वभाव का था. उन्होंने पड़ोस में रहने वाले एक युवक विपुल को इसलिए अपनी दुकान किराए पर देने से मना कर दिया कि किराए के लेनदेन से संबंध खराब हो सकते हैं. लेकिन विपुल ने इसे गलत तरीके से लेते हुए मन में रंजिश पाल ली. इस का नतीजा भी बहुत भयानक निकला.

6 सितंबर 2015 की शाम को अरविंद शर्मा बाहर से घर लौटे तो उन की पत्नी पूनम के चेहरे पर

परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. यह देख कर अरविंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पूनम, कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘परेशानी की ही बात है. लक्ष्य को बहुत देर हो गई. साइकिल ले कर गया था, अभी तक वापस नहीं आया.’’

‘‘इधर उधर घूम रहा होगा आ जाएगा.’’ वह हंसते हुए बोले.

‘‘पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ इस पर अरविंद पत्नी को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘घबराओ नहीं, थोड़ा इंतजार कर लो, वह आ जाएगा.’’

पूनम चिंतामग्न हो कर बैठ गई.

अरविंद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के रहने वाले थे. उन के पिता श्यामलाल शर्मा सेवानिवृत्त शिक्षक थे. कई साल पहले अरविंद का परिवार शामली से लगे मुजफ्फरनगर के थाना सिविल लाइन क्षेत्र की इंदिरा कालोनी में आ कर बस गया था. अरविंद खुद भी बेसिक शिक्षा विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे. उन के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बच्चे थे. 2 बेटियां वर्णिका, वैष्णवी और 11 साल का बेटा लक्ष्य. लक्ष्य शहर के डीएवी पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ता था. परिवार में इकलौता बेटा होने की वजह से वह सब का लाडला था. श्यामलाल शर्मा परिवार को एकसूत्र में बांधे हुए थे. संस्कारी और मिलनसार परिवार था. व्यवहारकुशल श्यामलाल व उन के बेटे अरविंद को मोहल्ले में इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

अरविंद सुबह औफिस जाते थे और शाम को घर आ जाते थे. 6 सितंबर को रविवार की वजह से घर पर ही थे, लेकिन दोपहर बाद किसी काम से बाहर चले गए थे. जब वह लौटे तो उन का एकलौता बेटा लक्ष्य घर पर नहीं था. लक्ष्य जिद कर के साइकिल ले कर बाहर चला जाता था, यह कोई नई बात नहीं थी. उस दिन भी वह साइकिल ले कर बाहर गया था. शाम का धुंधलका फैला, तो परिवार की चिंता बढ़ गई. अरविंद बेटे को ढूंढने के लिए बाहर सड़क की तरफ निकल गए, जबकि पूनम व उन की बेटियों ने आसपास के घरों में लक्ष्य को ढूंढा, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्य के लापता होने की खबर मोहल्ले में फैली तो लोग भी उसे ढूंढने में लग गए. वह कहां चला गया, इस बात को कोई नहीं जानता था. अरविंद का परिवार बेहद परेशान था. पूनम का बेटे के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखतीं, उन्हें लगता कि बेटा आ गया है. लोगों ने हर तरफ लक्ष्य के बारे में पूछताछ भी की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. वह पूरी रात परेशानी में बीती. अगले दिन लक्ष्य के लापता होने की सूचना थाना सिविल लाइन में दे दी गई. थाना प्रभारी चंद्र किरण यादव ने उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अगले दिन का इंतजार किया, परंतु उस दिन भी वह वापस नहीं आया. इस से इस आशंका को बल मिला कि लक्ष्य का अपहरण कर लिया गया है.

हालांकि शर्मा परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए कोई उन के बेटे का अपहरण करे, लेकिन इस के और भी कई कारण हो सकते थे. पुलिस इस इंतजार में थी कि यदि लक्ष्य का अपहरण किया गया होगा, तो फिरौती के लिए फोन या पत्र जरूर आएगा. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. इस तरह का कोई फोन परिवार के पास नहीं आया, तो यह मामला रंजिश का लगा. पुलिस ने अरविंद व उन के पिता से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि वह सीधेसादे लोग हैं. किसी से रंजिश तो दूर उन का कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ था.

इस से पुलिस उलझन में पड़ गई. बहरहाल पुलिस ने लक्ष्य के फोटो लगे इश्तहार बनवाए और सभी थानों में भिजवा दिए, पर इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अगले कई दिनों तक भी जब लक्ष्य नहीं मिला, तो लोगों में गुस्सा पनपने लगा. लक्ष्य के घरवालों और शुभचिंतकों ने एकत्र हो कर एसएसपी के.बी. सिंह से मुलाकात की. एसएसपी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को शीघ्र काररवाई के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) प्रबल कुमार सिंह व एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने थाना पुलिस को सुरागसी में लगा दिया.

एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने अभी तक के जांच बिंदुओं पर विचारविमर्श भी किया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हो न हो लक्ष्य को रंजिशन उठा कर मार दिया गया हो. वह साइिकल समेत लापता हुआ था, इस से जाहिर होता था कि वह विश्वास कर के किसी जानकार के साथ ही गया होगा. शर्मा परिवार रंजिश से इंकार कर रहा था, इसलिए इस थ्यौरी पर अविश्वास भी हो रहा था, फिर भी पुलिस अपने इस शक पर कायम रही.

चूंकि कुछ रंजिशें एक पक्षीय होती हैं, इसलिए पुलिस को लगा कि हो न हो मोहल्ले का ही कोई आदमी अरविंद या उन के परिवार से रंजिश रखता हो, इसलिए पुलिस ने आसपास के लोगों की फेहरिश्त तैयार की. इस फेहरिश्त में एक नाम विपुल सैनी का भी सामने आया. विपुल अरविंद के ही पड़ोसी जगलाल का बेटा था और डीजे (डिस्क जौकी) का काम करता था. पुलिस को पता चला कि उस की सोहबत अच्छी नहीं थी और वह आवारा व दबंग प्रवृत्ति का युवक था.

पुलिस अरविंद के घर पहुंची और उन से विपुल के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह भले ही बिगडै़ल प्रवृत्ति का युवक है, लेकिन उन के लिए अच्छा है. उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्य के लापता होने के बाद से विपुल लगातार उन के साथ उसे ढुंढवाने में साथ रहा है. आनेजाने वाले शुभचिंतकों को चाय पानी देने का जिम्मा भी उस ने ही संभाल रखा था. अगले दिन पुलिस को पता चला कि विपुल अपने घर से अचानक लापता हो गया है. पुलिस ने जब अरविंद से एक बार फिर से इस बारे में पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि विपुल को यह बात पता चल गई थी कि पुलिस उस के बारे में पूछताछ कर रही है. इस के तुरंत बाद अचानक लापता हो जाने से विपुल पूरी तरह शक के दायरे में आ गया.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की कालडिटेल्स के साथ पिछले कई दिनों की लोकेशन भी निकलवाई. नंबरों की जांच से पता चला कि लक्ष्य के लापता होने वाले दिन व रात 3 नंबरों पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस जांच में यह भी पता चल गया कि वह नंबर पंकज प्रजापति, कपिल और विक्की के नाम पर थे. इन में पंकज उसी कालोनी में रहता था, जबकि कपिल गांव अलमासपुर का और विक्की गांव गजावली का रहने वाला था.

लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये तीनों कपिल के जिगरी दोस्त थे और उसी की तरह आवारा थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि 6 सितंबर को विपुल व उस के दोस्तों की लोकेशन एक साथ थी. रात 12 बजे उन सभी की लोकेशन बागोवाली क्षेत्र में पाई गई. बागोवाली शहर की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र था. पुलिस समझ गई कि लक्ष्य का राज इन्हीं चारों के बीच छिपा था. 15 सितंबर को पुलिस ने एकएक कर के विपुल, कपिल व पंकज को उठा लिया. जबकि विक्की पुलिस के हाथ नहीं लग सका पुलिस उन से कई घंटे तक घुमाफिरा कर पूछताछ करती रही, लेकिन उन्होंने लक्ष्य के अपहरण में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

अलबत्ता पुलिस इतना जरूर समझ गई कि तीनों बेहद शातिर युवक थे. अंतत: जब पुलिस ने अपना परपंरागत तरीका अपनाया, तो तीनों टूट गए. उन लोगों ने न केवल मासूम लक्ष्य का अपहरण किया था, बल्कि उस की हत्या कर के शव भी गन्ने के खेत में फेंक दिया था. पुलिस तीनों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और उन की निशानदेही पर गन्ने के एक खेत से बोरे में बंद लक्ष्य का शव बरामद कर लिया, जो बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम लक्ष्य के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

लक्ष्य की हत्या से लोगों में जबर्दस्त आक्रोश था, इसलिए विपुल के घर पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. इस बीच उस के घर वाले लोगों के आक्रोश से डर का घर में ताला डाल कर फरार हो गए. पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तृत पूछताछ की. लक्ष्य की हत्या इतनी मामूली बात पर की गई थी कि पुलिस भी हतप्रभ रह गई. अरविंद के परिवार से विपुल के अच्छे रिश्ते थे. वह उन के पास अकसर आताजाता रहता था. इस नाते श्यामलाल से ले कर लक्ष्य तक सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. विपुल बिगड़ैल और आवारा था, लेकिन चूंकि अरविंद से वह अच्छा व्यवहार करता था, इसलिए वह उसे अच्छा मानते थे.

अरविंद की एक खाली दुकान थी. उसे वह किराए पर देना चाहते थे. यह बात जब विपुल को पता चली, तो उस ने दुकान किराए पर देने के लिए कहा. अरविंद सुलझे हुए व्यक्ति थे. पड़ोस का मामला था, इसलिए वह कतई नहीं चाहते थे कि दुकान की किराएदारी को ले कर उन के बीच कोई मनमुटाव हो, इसलिए उन्होंने प्यार से दुकान देने से मना कर दिया. विपुल को उन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. यह बात उसे बेहद नागवार गुजरी और वह अंदर ही अंदर अरविंद से चिढ़ने लगा. उठतेबैठते, सोतेजागते उस के दिमाग में अरविंद के इनकार के शब्द गूंजते रहते. प्रवृत्ति अच्छी न हो और सोच फितरती हो, तो जलन की अग्नि और तेज हो जाती है. विपुल के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा था.

उस की जलन की यह आग तब और भी बढ़ गई, जब उसे पता चला कि अरविंद ने अपनी दुकान एक अन्य युवक मोंटी को किराए पर दे दी है. विपुल को पता चला कि मोंटी अपनी दुकान का मुहूर्त 7 सितंबर को करेगा. विपुल ने मन ही मन में सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वह दुकान का मुहूर्त नहीं होने देगा. अरविंद को वह ऐसा दर्द देगा कि जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा. उस ने अपनी इस रंजिश को जाहिर नहीं होने दिया और उन से मेलभाव बनाए रखा. विपुल व उस के दोस्त कपिल की साझेदारी में कालोनी से थोड़ी दूरी पर डीजे की दुकान थी.

विपुल वहां अपने दोस्तों कपिल, पंकज व विक्की के साथ बैठ कर शराब पीता था. एक दिन ऐसी ही महफिल के दौरान उस ने अपने दोस्तों से सारी बात बता कर कहा, ‘‘मुझे मेरे पड़ोसी ने दुकान नहीं दी. मुझे उसे सबक सिखाना है.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई.’’ उस के एक दोस्त ने कहा.

‘‘नहीं, मैं जीते जी आग में जल रहा हूं. तुम लोग मेरा साथ दो, मैं उस के इकलौते बेटे को खत्म कर दूंगा.’’ विपुल ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा. कभीकभी शराबियों की दोस्ती बहुत गहरी होती है. उन सब का बहुत गहरा याराना था. वे सब विपुल  का साथ देने को तैयार हो गए.

अंतत: उन्होंने 6 सितंबर को लक्ष्य को मारने की योजना बना ली. अगले दिन विपुल ने अपने दोस्तों को फोन कर दिया कि वे शाम को दुकान पर पहुंचकर इंतजार करें. वह बहाने से अरविंद के बेटे को ले आएगा. उधर विपुल घर आया और लक्ष्य के घर से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. 6 सितंबर को रविवार था. लक्ष्य पूरे दिन घर पर ही रहा. शाम को वह जिद कर के साइकिल ले कर निकल गया. विपुल बाहर नजरें गड़ाए हुए था. उसे पूरी उम्मीद थी कि लक्ष्य साइकिल से बाहर जरूर आएगा.

लक्ष्य पर नजर पड़ते ही विपुल की आंखों में चमक आ गई. वह पैदल चल कर कालोनी के बाहर वाले रास्ते पर चला गया, तब तक लक्ष्य राउंड पूरा कर के वापस आ रहा था. विपुल को देखते ही लक्ष्य ने नमस्ते की, तो उस ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘कहां घूम रहा है लक्ष्य?’’

‘‘कुछ नहीं भैया जी. साइकिल चलाने आया था.’’

‘‘चल आ मैं तुझे नया वीडियो गेम खिलाता हूं. मैं ने अपनी दुकान पर लगाया है.’’ वीडियो गेम की बात पर लक्ष्य खुश हो गया. वह मासूम उस की चालाकी को समझ नहीं पाया और उस के साथ चल दिया. विपुल उसे ले कर सीधे कपिल की दुकान पर पहुंचा. वहां कपिल, पंकज व विक्की पहले से ही मौजूद थे. वहां पहुंचते ही लक्ष्य ने जिज्ञासा से कहा. ‘‘भैया अब तो मैं आप की दुकान पर खेलने आया करूंगा, मम्मी पापा भी नहीं रोकेंगे. कहां है नया वीडियो गेम?’’

‘‘अभी दिखाता हूं.’’ कहने के साथ ही उस ने अपने दोस्तों को इशारा कर दिया. उन्होंने लक्ष्य का मुंह दबा कर उसे जकड़ लिया. मामूली बात पर अंधे हुए विपुल ने दुकान में पड़ी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और लक्ष्य के गले में डाल कर कसनी शुरू कर दी. दम घ़ुटा तो लक्ष्य मौत के भय से छटपटा कर रह गया. उस ने उन के चंगुल से छूटने के लिए हाथ पैर चलाए, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई.

विपुल ने रस्सी तब तक उस के गले में कसी, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई. हत्या के तुरंत बाद इन लोगों ने लक्ष्य के शव को एक बोरे में बंद कर के कोने में सामान के पीछे छिपा दिया. इस के बाद उन्होंने रात होने का इंतजार किया. तकरीबन 12 बजे इन लोगों ने बोरे को उठाया और मोटरसाइकिल से बागोवाली क्षेत्र में गन्ने के खेत में फेंक आए. विक्की ने लक्ष्य की साइकिल भी एक स्थान पर छिपा दी. विपुल ने घर आ कर उस दिन के बाद अरविंद के साथ लक्ष्य को ढुंढवाने का सफल नाटक किया. इतना ही नहीं वह परिवार व पुलिस जांच की टोह लेने के लिए अधिकांश उन के घर पर ही रहता था. अरविंद के जो भी मिलने वाले आते थे, उन्हें चाय आदि पिलाने का जिम्मा भी उस ने ही उठा लिया था.

किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विपुल ऐसा बेहरम हो सकता है. बेटे के विछोह में पूनम व अरविंद की तड़प उसे सुकून दे रही थी. विपुल को जब एक दिन पता चला कि पुलिस उस के बारे में भी पूछताछ कर रही है, तो डर की वजह से वह लापता हो गया. यहीं से वह शक के दायरे में आया और पकड़ा गया. अगले दिन पुलिस ने चौथे हत्यारे विक्की को भी धर दबोचा. उस ने भी हत्या में शामिल होने की बात कुबूल ली. पुलिस को उस की निशानदेही पर लक्ष्य की साइकिल भी मिल गई. पुलिस ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के चारों आरोपियों को लोगों के गुस्से और हमले की आशंका के मद्देनजर भारी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामूली सी बात पर विपुल की बिगड़ैल प्रवृति और मन में उपजी रंजिश ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया. उस ने यह रंजिश न रखी होती, तो लक्ष्य भी जीवित होता और उस का व उस के दोस्तों का भविष्य भी चौपट होने से बच जाता. लक्ष्य के परिजनों का कहना था कि यदि विपुल ने अपनी नाराजगी बताई होती, तो वह उसे दुकान दे देते. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

Assam Crime News: अंधविश्वास की आग में जिंदा जले दंपति

Assam Crime News: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जिस ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जादूटोना के चलते गांव के लोगों ने एक दंपति को जला कर मार डाला. आखिर क्या था इस जादूटोना का पूरा सच, जिस के लिए दंपति को जिंदा जला दिया गया? पूरा सच जानने के लिए पढ़िए आगे.

यह हैरान कर देने वाली घटना 30 दिसंबर, 2025 को असम के करबी आंगलोंग जिले में घटी.अंधविश्वास ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया. रात होवराघाट क्षेत्र के बेलोगुरी मुंडा गांव में ग्रामीणों ने जादूटोना के शक में गार्दी बिरोवा और उन की पत्नी मीरा बिरोवा को निशाना बनाया. अफवाहों से भड़की भीड़ ने पहले तेजधार हथियारों से दंपति पर हमला किया और फिर उन के घर में आग लगा दी. आग की लपटों में घिरे दोनों जिंदा जल गए. उन की चीखें गूंजती रहीं, लेकिन अंधविश्वास के आगे इंसानियत खामोश रही.

गांव वालों का मानना था कि यह दंपति जादूटोना करता था, जिस से गांव के लोगों को नुकसान पहुंच रहा था. इसी अंधविश्वास के कारण दोनों को निशाना बनाया गया.

इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि गांव के लोग अंधविश्वास और अफवाहों पर भरोसा करते थे, जिस से उन्हें लगता था कि गांव में हो रही परेशानियों के पीछे यही दंपति जिम्मेदार है. फिलहाल पुलिस ने गांव वालों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत काररवाई की जा रही है. प्रशासन का कहना है कि अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके. Assam Crime News

Love Crime: इश्क की आग में कुछ इस तरह बरबाद हुआ एक परिवार

Love Crime: 2 लोगों के साथ जगराओं के थाना सिटी पहुंची लक्ष्मी ने थानाप्रभारी इंसपेक्टर इंद्रजीत सिंह को बताया था कि उस के पति प्रवासराम 2 दिन पहले काम पर गए तो अब तक लौट कर नहीं आए हैं. थानाप्रभारी ने पूरी बात बताने को कहा तो लक्ष्मी ने बताया कि उस के पति प्रवासराम मूलरूप से बिहार के जिला बांका के थाना रजौली के गांव उपराम के रहने वाले थे.

कई सालों पहले वह काम की तलाश में जगराओं आ गया था और पीओपी का काम सीख कर बडे़बडे़ मकानों में पीओपी करने के ठेके लेने लगा था. उस का काम ठीकठाक चलने लगा तो वह गांव से पत्नी और बच्चों को भी ले आया. जगराओं में वह डा. हरिराम अस्पताल के पास रहता था. सन 2001 में प्रवासराम की लक्ष्मी से शादी हुई थी. उस के कुल 6 बच्चे थे, जिन में 4 बेटियां और 2 बेटे थे. वह सुबह काम पर जाता था तो शाम 7 बजे तक वापस आता था. लक्ष्मी की बात सुन कर इंद्रजीत सिंह ने पूछा, ‘‘जिस जगह तुम्हारा पति काम करता था, वहां जा कर तुम ने पता किया था?’’

‘‘जी साहब, यह लड़का उन्हीं के साथ काम करता था.’’ साथ आए 20-22 साल के एक लड़के की ओर इशारा कर के लक्ष्मी ने कहा.

थानाप्रभारी ने उस लड़के की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम सोनू है, मैं उन्हीं के साथ काम करता था. वह 2 दिनों से काम पर नहीं आए हैं, जिस से हम सभी बहुत परेशान हैं. हम सभी खाली बैठे हैं.’’

इंद्रजीत सिंह ने एएसआई बलजिंदर सिंह को पूरी बात समझा कर प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज करा कर उस की पत्नी से उस का एक फोटो लेने को कहा. थानाप्रभारी के आदेश पर बलजिंदर सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कर लक्ष्मी से उस का एक फोटो ले लिया. इस के बाद उन्होंने उस की फोटो के साथ सभी थानों को उस की गुमशुदगी की सूचना दे दी. यह 4 अप्रैल, 2017 की बात है. इस का मतलब प्रवासराम 2 अप्रैल से गायब था.

6 अप्रैल, 2017 को पुलिस को जगराओं के बाहरी इलाके में सेम नानकसर रोड पर स्थित एक गंदे नाले में एक लाश मिली. उसे बिस्तर में लपेट कर फेंका गया था. मौके पर पहचान न होने की वजह से पुलिस ने लाश को मोर्चरी में रखवा कर उस के पोस्टर जारी कर दिए थे. पोस्टर देख कर अगवाड़ लोपो के रहने वाले मृतक के साढू समीर ने उस की शिनाख्त डा. हरिराम अस्पताल के पास रहने वाले प्रवासराम की लाश के रूप में कर दी थी.

इंद्रजीत सिंह ने तुरंत सिपाही भेज कर लक्ष्मी को बुलवा लिया था. लाश देखते ही लक्ष्मी रोने लगी. अब शक की कोई गुंजाइश नहीं रह गई थी. वह लाश उस के गुमशुदा पति प्रवासराम की ही थी. लाश की शिनाख्त होने के बाद इंद्रजीत सिंह ने प्रवासराम की गुमशुदगी की जगह अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लाश लक्ष्मी और उस के रिश्तेदारों को सौंप दी. उसी दिन शाम को उन्होंने उस का अंतिम संस्कार कर दिया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, प्रवासराम की हत्या 4 दिनों पहले गला घोंट कर की गई थी. उस की गरदन पर रस्सी के निशान थे. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच बलजिंदर सिंह को ही सौंप दी थी. उन्होंने मृतक की पत्नी लक्ष्मी और उस के भाइयों को बुला कर विस्तार से पूछताछ की. मृतक के भाई अनूप का कहना था कि उस के भाई की न किसी से कोई दुश्मनी थी और न किसी तरह का कोई लेनादेना था. इस के बाद बलजिंदर सिंह ने लक्ष्मी से पूछा, ‘‘तुम सोच कर बताओ कि काम पर जाने से पहले तुम्हारी पति से कोई खास बात तो नहीं हुई थी?’’

‘‘कोई बात नहीं हुई थी साहब, रोज की तरह उस दिन भी वह अपना खाने का टिफिन ले कर सुबह साढ़े 7 बजे घर से गए तो लौट कर नहीं आए.’’

बलजिंदर सिंह ने वहां जा कर भी पूछताछ की, जहां प्रवासराम काम करा रहा था. उस के साथ काम करने वाले मजदूर ही नहीं, मकान के मालिक ने भी बताया कि प्रवासराम निहायत ही शरीफ और ईमानदार आदमी था. लड़ाईझगड़ा तो दूर, वह किसी से ऊंची आवाज में बात भी नहीं करता था. समय पर काम कर के मालिक से समय पर मजदूरी ले कर अपने मजदूरों को उन की मजदूरी दे कर उन्हें खुश रखता था. बलजिंदर सिंह को अब तक की पूछताछ में कोई ऐसा सुराग नहीं मिला था, जिस से वह हत्यारों तक पहुंच पाते. यह तय था कि हत्यारे 2 या 2 से अधिक थे. लेकिन उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे शरीफ आदमी की भला किसी की क्या दुश्मनी हो सकती थी, जो उसे मार दिया.

थानाप्रभारी इंद्रजीत सिंह से सलाह कर के बलजिंदर सिंह मुखबिरों की मदद से यह पता करने लगे कि मृतक की पत्नी का किसी से अवैध संबंध तो नहीं था. इस की एक वजह यह थी कि लक्ष्मी ने कई बार बयान बदले थे. यही नहीं, पूछताछ के दौरान वह डरीडरी सी रहती थी. कभी वह कहती थी कि 2 अप्रैल को काम से लौटने के बाद वह कुछ लेने के लिए बाजार गए थे तो लौट कर नहीं आए तो कभी कहती थी कि सुबह काम पर गए थे तो लौट कर नहीं आए थे.

उस की इन्हीं बातों पर उन्हें उस पर शक हो गया था. मुखबिरों से उन्हें पता चला था कि लक्ष्मी के घर सिर्फ 20-22 सल के सोनू का ही आनाजाना था. उसी सोनू के साथ लक्ष्मी प्रवासराम की गुमशुदगी दर्ज कराने थाने आई थी. उस की उम्र लक्ष्मी से इतनी कम थी कि उस पर संदेह नहीं किया जा सकता था. लेकिन मुखबिर ने जो खबर दी थी, उस से सोनू ही संदेह के घेरे में आ गया था. पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला.

बलजिंदर सिंह महिला सिपाही की मदद से लक्ष्मी को थाने ले आए और जब उस से कहा कि उसी ने सोनू के साथ मिल कर अपने पति की हत्या की है तो वह अपने बच्चों की कसम खाने लगी. उस का कहना था कि पुलिस को शायद गलतफहमी हो गई है. वह भला अपने पति की हत्या क्यों करेगी. लेकिन पुलिस को मुखबिर पर पूरा भरोसा था. इसलिए जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने अपने पति प्रवासराम की हत्या का अपराध स्वीकार करते हुए बता दिया कि उसी ने अपने प्रेमी सोनू के साथ साजिश रच कर पति प्रवासराम की हत्या कराई थी.

इस हत्या में उस का प्रेमी सोनू और उस के 2 दोस्त मिल्टन और छोटू सोनू शामिल थे. सोनू के दोस्त का नाम भी सोनू था, इसलिए यहां उस का नाम छोटू सोनू लिख दिया गया है. लक्ष्मी ने ही प्रवासराम की हत्या करा कर उस की लाश गंदे नाले में फेंकवा दी थी. इस के बाद लक्ष्मी की निशानदेही पर उस के प्रेमी सोनू और उस के साथी अवधेश (बदला हुआ नाम) को हिरासत में ले लिया गया था. जबकि उस का साथी सोनू फरार होने में कामयाब हो गया था. शायद उसे लक्ष्मी, अवधेश और सोनू के गिरफ्तार होने की सूचना मिल गई थी.

बलजिंदर सिंह ने उसी दिन यानी 9 अप्रैल, 2017 को तीनों अभियुक्तों लक्ष्मी, अवधेश और सोनू को जिला मजिस्टै्रट की अदालत में पेश कर के लक्ष्मी और सोनू को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया, जबकि नाबालिग होने की वजह से अवधेश को बाल सुधारगृह भेज दिया गया. रिमांड अवधि के दौरान प्रवासराम की हत्या की जो कहानी प्रकाश में आई, वह  इस प्रकार थी- 6 बच्चों की मां बन जाने के बाद भी लक्ष्मी की देह की आग शांत होने के बजाय और भड़क उठी थी. इस की वजह यह थी कि प्रवासराम सीधासादा और शरीफ आदमी था. उस ने लक्ष्मी से कहा था कि अब उसे खुद पर संयम रखना चाहिए, क्योंकि उस के 6 बच्चे हो चुके हैं. अब उसे अपने इन बच्चों की फिक्र करनी चाहिए.

प्रवासराम दिनभर काम कर के थकामांदा घर लौटता और खाना खा कर अगले दिन काम पर जाने के लिए जल्दी सो जाता. लक्ष्मी को यह जरा भी नहीं सुहाता था. जब पति ने उस की ओर से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया तो उस की नजरें खुद से लगभग 22 साल छोटे सोनू पर जा टिकीं. काम से फारिग होने के बाद अकेला रहने वाला सोनू अक्सर प्रवासराम के साथ उस के घर आ जाता था. वह घंटों बैठा प्रवासराम और लक्ष्मी से बातें किया करता था. लक्ष्मी की नजरें उस पर टिकीं तो वह उस से हंसीमजाक के साथसाथ शारीरिक छेड़छाड़ भी करने लगी. युवा हो रहे सोनू को यह सब बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन दोपहर को जब सोनू काम से छुट्टी ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा तो लक्ष्मी ने उसे पकड़ कर बैड पर पटक दिया और मनमानी कर डाली. सोनू के लिए यह एकदम नया सुख था. उसे ऐसा लगा, जैसे वह जन्नत की सैर कर रहा है. उस दिन के बाद यह रोज का नियम बन गया. सोनू काम के बीच कोई न कोई बहाना कर के लक्ष्मी के पास पहुंच जाता और मौजमस्ती कर के लौट जाता. यह सब लगभग एक साल तक चलता रहा. किसी तरह इस बात की जानकारी प्रवासराम को हुई तो उस ने लक्ष्मी को खरीखोटी ही नहीं सुनाई, बल्कि प्यार से समझाया भी, पर उस के कानों पर जूं नहीं रेंगी.

जब प्रवासराम ने लक्ष्मी पर रोक लगाने की कोशिश की तो सोनू के प्यार में पागल लक्ष्मी ने सोनू के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना डाली. एक दिन उस ने सोनू से कहा, ‘‘जब तक प्रवासराम जिंदा रहेगा तो हम दोनों इस तरह मिल नहीं पाएंगे. वैसे भी अब उस के वश का कुछ नहीं रहा. वह बूढा हो गया है, अब उस का मर जाना ही ठीक है.’’

लक्ष्मी के साथ मिल कर प्रवासराम की हत्या की योजना बना कर सोनू ने साथ काम करने वाले अवधेश और छोटू सोनू को कुछ रुपयों का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. घटना वाले दिन यानी 2 अप्रैल, 2017 को सोनू पार्टी देने के बहाने शराब की बोतल और चिकन ले कर लक्ष्मी के घर पहुंचा. अवधेश और छोटू सोनू भी उस के साथ थे. उस ने प्रवासराम से कहा, ‘‘भइया चिकन और शराब लाया हूं, आज पार्टी करने का मन है.’’

योजनानुसार चारों शराब पीने बैठ गए. खुद कम पी कर सोनू और उस के साथियों ने प्रवासराम को अधिक शराब पिला दी. रात के 11 बजे तक प्रवासराम जरूरत से ज्यादा शराब पी कर लगभग बेहोश हो गया तो लक्ष्मी ने सोनू को इशारा किया. सोनू ने छोटू सोनू और अवधेश की तरफ देखा तो छोटू सोनू ने बेसुध पड़े प्रवासराम के दोनों पैर कस कर पकड़ लिए. अवधेश उस की छाती पर सवार हो गया तो लक्ष्मी और सोनू ने प्रवासराम के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. प्रवासराम तड़प कर शांत हो गया तो चारों ने मिल कर लाश को बैड से उतार कर नीचे खिसका दिया.

अवधेश और छोटू सोनू तो अपनेअपने घर चले गए, जबकि सोनू लक्ष्मी के कमरे पर ही रुक गया. दोनों पूरी रात उसी बैड पर मौजमस्ती करते रहे, जिस बैड के नीचे प्रवासराम की लाश पड़ी थी. अगले दिन यानी 3 अप्रैल की रात को अवधेश और छोटू सोनू की मदद से सोनू प्रवासराम की लाश को बिस्तर में लपेट कर रेहड़े से ले जा कर सेम नानकसर रोड पर बहने वाले गंदे नाले में फेंक आया. रिमांड अवधि के दौरान लक्ष्मी की निशानदेही पर पुलिस ने उस के घर से वह रस्सी बरामद कर ली थी, जिस से प्रवासराम का गला घोंटा गया था. हत्या करते समय लक्ष्मी ने अपने सभी बच्चों को दूसरे कमरे में सुला कर बाहर से कुंडी लगा दी थी, जिस से बच्चों को कुछ पता नहीं चल सका था.

रिमांड अवधि समाप्त होने पर 11 अप्रैल, 2017 को लक्ष्मी और उस के प्रेमी सोनू को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. अवधेश को पहले ही बाल सुधार गृह भेज दिया गया था. इस हत्याकांड का एक आरोपी छोटू सोनू अभी फरर है. पुलिस उस की तलाश कर रही है. प्रवासराम की हत्या और लक्ष्मी के जेल जाने के बाद उन के सभी बच्चों को प्रवासराम का छोटा भाई अपने घर ले गया है. लक्ष्मी ने अपनी वासना में अपना परिवार तो बरबाद किया ही, 3 लड़कों की जिंदगी पर सवालिया निशान लगा दिए. Love Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. अवधेश बदला हुआ नाम है.

Hindi Crime Story: बदल जाए जब प्यार

Hindi Crime Story: बिरमा को अनुज यादव से प्यार हुआ तो वह पुराने प्रेमी राजकुमार से पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगी. प्रेमी से पीछा छुड़ाने के लिए बिरमा ने जो रास्ता अपनाया, क्या वह उचित था?

फिरोजाबाद से मैनपुरी की ओर जाने वाली सड़क पर स्थित थानाकस्बा घिरोर के नजदीकी गांव नंगला केहरी के शिव मंदिर के पास जब गांव वालों ने 2-2 लाशें पड़ी देखीं तो परेशान हो उठे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना थाना घिरोर पुलिस को दी. गांव नंगला केहरी थाना घिरोर के अंतर्गत ही आता था. वह थाने के नजदीक ही था, इसलिए थानाप्रभारी देवेश कुमार जल्दी ही घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतकों की उम्र 35-40 साल रही होगी. शक्लसूरत और पहनावे से दोनों ही ठीकठाक घरों के लग रहे थे. लाशों के आसपास खून नहीं था, इस से पुलिस समझ गई कि इन्हें कहीं दूसरी जगह मार कर लाशें यहां फेंकी गई हैं.

गांव वाले भी उन्हें नहीं पहचान पाए थे. इस का मतलब वे इस इलाके के रहने वाले नहीं थे. पुलिस को लाशों की तलाशी में भी कुछ नहीं मिला था, जिस से उन की पहचान हो पाती. पुलिस को लगा कि इन की शिनाख्त में परेशानी होगी. लेकिन जब उन्हें एक लाश की कमीज पर सिलने वाले दरजी का स्टिकर दिखाई दिया तो मन को थोड़ा संतोष हुआ कि शायद इस से कुछ मदद मिल जाए. पुलिस ने कोशिश की तो उस स्टिकर से मदद ही नहीं मिली, बल्कि मृतकों के घर तक पहुंच गई. कमीज पर जो स्टिकर लगा था, वह आगरा के फतेहाबाद के एक दरजी का था. थाना घिरोर पुलिस दरजी के यहां पहुंची तो उस ने तुरंत मृतक की शिनाख्त कर दी. उस ने बताया कि यह कमीज गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजकुमार की है.

थाना घिरोर पुलिस ने राजकुमार के घर पहुंच कर उस के बारे में पूछा तो घर वालों ने कहा कि वे खुद ही राजकुमार और लक्ष्मीकांत को ढूंढ रहे हैं. दोनों एक दिन पहले फिरोजाबाद में रहने वाली अपनी बहन के यहां जाने की बात कह कर घर से निकले थे, लेकिन वे बहन के यहां पहुंचे ही नहीं. चिंता की बात यह है कि उन का फोन भी बंद है. जब पुलिस ने घर वालों को बताया कि राजकुमार और लक्ष्मीकांत की हत्या हो गई है तो घर वाले हैरान होने के साथसाथ रोनेबिलखने लगे. घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि उन की हत्या क्यों की गई?

क्योंकि उन की ऐसी किसी से दुश्मनी भी नहीं थी. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि दोनों का किसी महिला से कोई चक्कर वगैरह तो नहीं था तो घर वालों ने बताया कि राजकुमार का फिरोजाबाद में रह रही बिरमा से संबंध था. उस का यह संबंध तब से था, जब वह इसी गांव में रहती थी. 2 भाइयों की हत्या को ले कर पुलिस गंभीर थी. बिरमा की ससुराल आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव खिसवा में थी. राजकुमार का तभी से उस के यहां आनाजाना था. लेकिन इधर उस का पति प्रहलाद सिंह उसे और बच्चों को ले कर फिरोजाबाद में रहने लगा था. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए राजकुमार के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स के अनुसार राजकुमार की घटना वाले दिन एक नंबर पर कई बार बात हुई थी. उस नंबर के बारे में पुलिस ने पता किया तो वह नंबर फिरोजाबाद में झील की पुलिया की रहने वाली ऊषा का निकला.  पुलिस ऊषा के घर पहुंची तो वह घर से गायब थी. उस के घर से गायब होने पर पुलिस को उस पर शक हुआ. पुलिस ने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि ऊषा देहधंधा करने के अलावा लड़कियां भी सप्लाई करती थी. ऊषा के मिलने पर ही स्थिति साफ हो सकती थी. पुलिस ऊषा के पीछे लग गई. वह जहांजहां मिल सकती थी, पुलिस ने छापा मारा. उस के पति बलबीर पर भी शिकंजा कसा गया, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला. इस के बाद मुखबिरों की मदद ली गई. तब जा कर मैनपुरी बसअड्डे से उसे गिरफ्तार किया गया.

उस के साथ एक औरत और थी. दोनों दिल्ली जाने की फिराक में थीं. पूछताछ में पता चला कि ऊषा के साथ जो औरत थी, वह बिरमा थी. पुलिस उस से भी पूछताछ करना चाहती थी. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो उन के बताए अनुसार, राजकुमार और उस के चचेरे भाई लक्ष्मीकांत की हत्या की जो कहानी सामने आई, सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. हत्या की यह कहानी कुछ इस प्रकार थी: आगरा के थाना फतेहाबाद के गांव छहबिस्वा के रहने वाले राजेंद्र सिंह का बेटा था राजकुमार. उस के 2 भाई और थे, भोले और पूरन. राजेंद्र सिंह गांव का खातापीता किसान था.

राजकुमार की शादी मुरैना के जनकपुर की रहने वाली गुड्डी के साथ हुई थी, जिस से उसे एक बेटी और 2 बेटे थे. राजकुमार के पड़ोस के गांव में रहता था प्रहलाद सिंह, जो ब्याज पर पैसे देने का काम करता था. राजकुमार अकसर प्रहलाद सिंह के घर जाया करता था. वह उस की पत्नी बिरमा को भाभी कहता था. न जाने क्यों बिरमा उस की खूब आवभगत करती थी. राजकुमार को भी वह अच्छी लगती थी. एक तो बिरमा का अच्छा लगना, दूसरे उस के द्वारा आवभगत करना, राजकुमार उस की ओर आकर्षित हो गया. फिर वह उसे अपनी बनाने के चक्कर में रहने लगा. दूसरी ओर बिरमा ब्याही भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन कभी उस ने उसे पसंद नहीं किया, इस की वजह यह थी कि प्रहलाद सिंह कमजोर दिमाग का था.

बिरमा उस के साथ बिलकुल खुश नहीं थी. इसीलिए राजकुमार के आने पर वह उस की खूब आवभगत करती थी. क्योंकि वह उसे पसंद करती थी. दोनों ओर से आकर्षण की डोर बढ़ी तो उसे जुड़ने में ज्यादा देर नहीं लगी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला चल निकला. लेकिन यह सब चोरीछिपे हो रहा था. बिरमा भी 1 बेटी और 2 बेटों की मां थी. वह रहती भले प्रहलाद सिंह के साथ थी, लेकिन वह पति राजकुमार को ही मानती थी. कोई बात आखिर कितने दिनों तक छिपी रह सकती है. धीरेधीरे गांव वालों को बिरमा और राजकुमार के संबंधों का पता चल गया.

कुछ लोगों ने प्रहलाद सिंह को आगाह भी किया, लेकिन उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बिरमा को रोक सकता. दूसरी ओर राजकुमार भी दबंग किस्म का युवक था. इसलिए सब कुछ जानते हुए भी उसे कोई रोक नहीं सका. इस तरह राजकुमार और बिरमा बिना किसी रुकावट के एकदूसरे से मिलते रहे. लेकिन जब पति के इन संबंधों की जानकारी गुड्डी को हुई तो वह तनाव में रहने लगी. बिरमा की वजह से पतिपत्नी के बीच दूरियां पैदा होने लगीं. उस ने कई बार सास से शिकायत भी की, लेकिन मां भी बेटे को नहीं रोक पाई. लिहाजा इसी गम और चिंता में एक दिन गुड्डी चल बसी.

गुड्डी जब मरी थी, बच्चे छोटेछोटे थे. लेकिन राजकुमार ने दूसरी शादी नहीं की, क्योंकि उस का काम तो बिरमा से चल ही रहा था. अब वह पूरी तरह से आजाद था. प्रहलाद सिंह की गांव में ज्यादा बदनामी होने लगी तो उस ने अपना गांव छोड़ दिया और फिरोजाबाद के थाना लाइन पार के रामनगर गांव में अपना मकान बनवा कर परिवार के साथ रहने लगा. जिस बदनामी की वजह से प्रहलाद सिंह ने गांव छोड़ा था, उस ने यहां आने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ा. बिरमा और राजकुमार के संबंध उसी तरह बने रहे. वह यहां भी लगातार आता रहा. फिरोजाबाद में बिरमा की दोस्ती ऊषा से हो गई तो वह उस के घर भी आनेजाने लगी.

यहीं ऊषा की मुलाकात राजकुमार से हुई. राजकुमार को पता चला कि ऊषा देहधंधा तो करती ही है, लड़कियां भी सप्लाई करती है तो उसे खुशी हुई. इस के बाद वह ऊषा के घर जा कर अपने लिए लड़कियां मंगवाने लगा. इस तरह शारीरिक सुख की चाह में वह ऊषा के घर भी जाने लगा. बिरमा को इस की जानकारी थी, लेकिन उसे इस से कोई मतलब नहीं था, क्योंकि राजकुमार अब भी उस पर दिल खोल कर पैसे खर्च करता था. लेकिन जब बिरमा की मुलाकात चिलवा गेट के रहने वाले अनुज यादव से हुई तो राजकुमार उसे खटकने लगा. अनुज भी सूदखोरी का काम करता था. वह भी बिरमा पर दिल खोल कर रुपए खर्च करने लगा था. था तो वह भी शादीशुदा और बालबच्चेदार, लेकिन जैसा कहा जाता है कि आदमी को घर की मुर्गी दाल बराबर लगती है, वैसा ही कुछ अनुज के साथ भी था.

इस नए प्रेमी के जिंदगी में आने के बाद बिरमा राजकुमार से दूरियां बनाने लगी. उस ने राजकुमार का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. बिरमा के इस व्यवहार से राजकुमार को परेशानी होने लगी, क्योंकि उसी से मिल कर उस के दिल को तसल्ली मिलती थी. जब उसे बिरमा से कुछ ज्यादा ही उपेक्षा मिलने लगी तो एक दिन उस ने कहा, ‘‘बिरमा, इधर तुम बदल नहीं गई हो, लगता है मैं तुम्हें भारू लगने लगा हूं?’’

‘‘नहीं तो, यह तुम्हारा वहम है. मैं तुम्हें अभी भी उसी तरह चाहती हूं. लेकिन अब परेशानी की बात यह है कि बच्चे बड़े हो गए हैं. उन के सामने यह सब अच्छा नहीं लगता.’’

बिरमा राजकुमार से ये बातें कह ही रही थी कि तभी उस की बेटी आ गई. उसे देख कर राजकुमार मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम सही कह रही हो, बच्चे बड़े हो गए हैं. मैं ने तो इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया.’’

राजकुमार ने बिरमा की बेटी को जिस तरह  देखा था, उस की नजरों में खोट था, जिसे बिरमा ने ताड़ लिया था. उस ने तुरंत बेटी को अंदर जाने का इशारा करते हुए राजकुमार से धीरे से कहा, ‘‘अब हम घर के बाहर मिले तो ज्यादा ठीक रहेगा.’’

बिरमा की बेवफाई राजकुमार की समझ में नहीं आ रही थी. उस की उपेक्षा से वह चिंतित था. उसे लगा, इस के पीछे जरूर कोई बात है. उस ने कोशिश की तो सच्चाई सामने आ गई. बिरमा और अनुज यादव के संबंधों की उसे जानकारी हो गई. बिरमा ने उसे शारीरिक सुख दिया था तो उस ने भी उस के बदले उस के लिए कम नहीं किया था. अब उसे चिंता थी कि अगर बिरमा हाथ से निकल गई तो उसे शारीरिक सुख कैसे मिलेगा? वह किसी भी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहता था. इसलिए उस ने बिरमा से पूछा, ‘‘अनुज यादव तुम्हारा कौन लगता है?’’

‘‘अनुज यादव से मेरा क्या संबंध? बस मोहल्ले में रहता है?’’ बिरमा ने कहा.

‘‘बिरमा, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. इसलिए कान खोल कर सुन लो, अगर हमारे बीच कोई आया तो मैं न तुम्हें जिंदा छोड़ूंगा और न उसे.’’ राजकुमार ने धमकी दी.

राजकुमार की इस धमकी से बिरमा परेशान जरूर हो गई, लेकिन अब वह अनुज को कतई नहीं छोड़ सकती थी. वह उसी की बदौलत राजकुमार से पीछा छुड़ाना चाहती थी. जबकि यह इतना आसान नहीं था. इसी वजह से दोनों के बीच तनाव बढ़ने लगा. जब राजकुमार को लगा कि बिरमा उस के बजाय अनुज को ज्यादा महत्त्व दे रही है तो उस ने अपनी लायसेंसी पिस्तौल से बिरमा के घर फायरिंग करते हुए धमकी दी कि अगर उस ने अनुज से संबंध खत्म नहीं किए तो अच्छा नहीं होगा. राजकुमार के तेवर देख कर बिरमा डर गई. बिरमा को लगने लगा कि राजकुमार कभी भी उस की बेटी पर हाथ डाल सकता है. यह बात उस ने अनुज से बता कर कहा, ‘‘अगर तुम मुझ से संबंध बनाए रखना चाहते हो तो राजकुमार नाम के इस कांटे को तुम्हें निकालना होगा.’’

अनुज को पता चल गया था कि राजकुमार दबंग किस्म का आदमी है. बिरमा के लिए वह उस की भी जान ले सकता है. इसलिए उस ने सोचा कि राजकुमार उस के साथ कुछ गड़बड़ करे, उस के पहले ही वह उसे ठिकाने लगा दे. इस के बाद उस ने ऊषा और बिरमा के साथ बैठ कर राजकुमार को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. योजना बनने के बाद ऊषा ने राजकुमार को फोन किया, ‘‘एक अच्छी लड़की आ गई है. अगर चाहो तो आ जाओ. लेकिन पैसा थोड़ा ज्यादा लगेगा.’’

राजकुमार ने कहा, ‘‘पैसे की कोई चिंता नहीं है. बस लड़की अच्छी होनी चाहिए.’’

‘‘लड़की अच्छी है, तभी तो फोन किया है.’’

‘‘फिर रात में मैं पहुंच रहा हूं.’’ कह कर राजकुमार ने फोन काट दिया.

शाम को राजकुमार ने घर वालों से कहा कि वह बहन के यहां जा रहा है. वह घर से निकला तो चचेरा भाई लक्ष्मीकांत दिखाई दे गया. लड़की के बारे में बता कर उस ने उसे भी साथ ले लिया. लक्ष्मीकांत भी विधुर था. शारीरिक सुख की लालसा से वह भी राजकुमार के साथ चल पड़ा. दोनों ऊषा के घर पहुंचे तो वहां बिरमा भी मौजूद थी. बिरमा और लड़की को देख कर राजकुमार ने कहा कि वह बिरमा के साथ मौजमस्ती करेगा और लक्ष्मीकांत लड़की के साथ. ऊषा ने लड़की के साथ लक्ष्मीकांत को संतनगर भेज दिया तो राजकुमार को बिरमा के साथ तिलकनगर के अन्य मकान में. राजकुमार अपनी पिस्तौल लिए था.

लेकिन जब वह बिरमा के साथ उस घर में पहुंचा तो वहां पहले से घात लगाए बैठे अनुज यादव, लाला पंडित और विजय सिंह उस पर टूट पड़े. अनुज यादव ने राजकुमार की हत्या के लिए उन दोनों को 2 लाख रुपए दिए थे. राजकुमार को पिस्तौल निकालने का मौका ही नहीं मिला. उन लोगों ने ईंटपत्थर से राजकुमार की हत्या कर दी. लक्ष्मीकांत लड़की के साथ संतनगर स्थित जिस मकान में आया था, थोड़ी देर बाद टाटा मैजिक से राजकुमार की लाश ले कर तीनों वहां पहुंचे. उन्हें देख कर वह हक्काबक्का रह गया. वह कुछ समझ पाता, गोली मार कर उस की भी हत्या कर दी गई.

इस के बाद उस की लाश को भी उसी टाटा मैजिक में डाल कर वे मैनपुरी को जाने वाली सड़क पर चल पड़े. रोड पर ही स्थित थानाकस्बा घिरोर के पास गांव नंगला केहरी के शिवमंदिर के पास दोनों लाशें फेंक कर अपनेअपने घर चले गए. थाना घिरोर पुलिस ने ऊषा और बिरमा को गिरफ्तार कर हत्या का खुलासा तो कर दिया, लेकिन अभी मुख्य अभियुक्त उन के हाथ नहीं लगे थे. देवेश कुमार मुख्य अभियुक्तों तक पहुंचते, उस के पहले ही उन का तबादला हो गया. उस के बाद आए नए थानाप्रभारी दिवाकर सिंह यादव. उन्होंने काफी कोशिश कर के अनुज यादव को गिरफ्तार कर लिया.

पूछताछ में अनुज यादव ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया, लेकिन वह राजकुमार की मोटरसाइकिल, पिस्तौल और मोबाइल नहीं बरामद कर सके. उस का कहना था कि इन चीजों के बारे में लाला पंडित और गुन्नू यादव उर्फ विजय सिंह ही कुछ बता सकते हैं. अनुज यादव की गिरफ्तारी के बाद लाला पंडित और विजय सिंह को लगा कि वे कभी भी पकड़े जा सकते हैं. पकड़े जाने के डर से दोनों ने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस पूछताछ तथा सामान की बरामदगी के लिए उन्हें रिमांड पर लेने की कोशिश कर रही थी. लेकिन कथा लिखे जाने तक उन्हें रिमांड पर नहीं लिया जा सका था. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Jharkhand News: अंधविश्वास का खौफनाक अंजाम – डायन बताकर महिला से की गई मारपीट

Jharkhand News: एक ऐसी घटना सामने आई है, जिस में डायन बताकर एक महिला के साथ मारपीट की गई और उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई. आखिर क्यों एक महिला के साथ ऐसा गलत व्यवहार किया गया. इस महिला के पीछे की पूरी सच्चाई क्या है, आइए जानते हैं, इस क्राइम स्टोरी को विस्तार से, जो आप को भी हैरान कर देगी.

यह सनसनीखेज घटना झारखंड के  सरायकेला खरसावां जिले के छोटा गम्हरिया गांव की है. यहां अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियों के चलते शीला महतो नाम की महिला को डायन बताकर उस के साथ बेरहमी से मारपीट की गई. डर के साए से जी रही पीड़िता शीला महतो ने मंगलवार को परिवार परामर्श केंद्र, कोलाबिस में शिकायत कर आरोप लगाया कि 15 नवंबर, 2025 की रात उस के पड़ोस में रहने वाले माया महतो, मंजू महतो, दिनेश महतो और महादेव महतो ने उस के घर में घुसकर लोहे के औजार से हमला किया था. इसी हमले से वह गंभीर रूप से घायल हो गई.

शीला महतो का कहना है कि आरोपियों ने उन्हें डायन करार देते हुए जान से मारने की धमकी भी दी. इस के साथ ही शीला के साथ उत्पीड़न लगातार जारी है. पिछले 2 दिनों से आरोपी उस के घर आ कर दुर्व्यवहार और धमकियां दे रहे हैं, जिस से वह और उस का परिवार दहशत में है.

पीड़िता शीला महतो ने परिवार परामर्श केंद्र में पद्मश्री से सम्मानित छुटनी महतो से मुलाकात की. इस के बाद केंद्र संचालिका ने मामले को गंभीरता से लिया और शीला महतो को कानूनी सहायता और सुरक्षा का आश्वासन भी दिया है.

उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं समाज के लिए बेहद चिंताजनक हैं और डायन प्रताड़ना कानून के तहत दोषियों पर सख्त काररवाई होनी चाहिए. मामले की जानकारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को भेजी जा रही है.

इस घटना के बाद परिवार डरा हुआ है और ग्रामीणों ने भी इस घटना पर गहरी चिंता जताते हुए प्रशासन से तत्काल और कड़ी काररवाई की मांग की है. Jharkhand News

Social Crime: देह के दलदल में देश की दत्तक बेटियां

Social Crime: अंजना के होंठों पर गहरी लाल लिपस्टिक दूर से चमक रही थी. शैंपू और कंडीशनर से चमकते लहराते बाल, आंखों के सामने लटकती लटों के बीच चेहरा पाउडर और क्रीम के मेकअप से दमक रहा था. नए कपड़े के पहनावे में उस का यौवन खिल उठा था. एक दिन पहले ही वह मुंबई से अपने गांव आई थी. हाथ में पर्स लटकाए गांव की गलियों में इठलाती घूम रही थी. कलाई में खनकती नई चूडि़यों की आवाज से गांव के हर किसी की नजर बरबस उठ रही थी. उसे देखते ही सामने से आ रही गांव की सिलमिना ने टोका, ‘‘अरे अंजना, तू तो हीरोइन लग रही है. कब आई रे?’’

‘‘कल ही तो शाम को मुंबई से आई हूं, मैं तुम्हारे घर ही जा रही थी.’’ अंजना चहकती हुई बोली.

दोनों बचपन की सहेलियां थीं. प्यार से अंजना ने पूछा, ‘‘कैसी है रे तू?’’

यह सुन कर सिलमिना का चेहरा उतर गया. उदासी से आंखें नम हो गईं. धीरे से बोली, ‘‘अब तुम्हें क्या बताऊं अपनी हालत, देख ही रही हो. यहां न भरपेट खाने को मिलता है और न ही पहनने को अच्छे कपड़े. सब कुछ तो तुम जानती ही हो, बस तरसते हुए जी रही हूं.’’ सिलमिना बोली. अंजना ने उस के हाथों को पकड़ लिया, फिर गले लग गई. उस का ऐसा करना सिलमिना को अच्छा लगा. वह थोड़ी सहज हुई. बोली, ‘‘तू तो एकदम नहीं बदली!’’

‘‘वह सब छोड़, बता तू मेरे साथ मुंबई चलेगी?’’ अंजना ने अपनी सहेली सिलमिना से सीधा सवाल किया.

इस के लिए सिलमिना तैयार नहीं थी. वह उसे एकटक देखने लगी.

‘‘अरे, तू देखती क्या है यह देख मुझे, सब कुछ मुंबई में ही तो मिला है. अरे वहां स्वर्ग है, स्वर्ग.’’ अंजना बोली.

‘‘मैं तो चली चलूं, मगर मां का क्या होगा?’’ सिलमिना ने चिंता जताई.

‘‘मां की फिक्र तुम मत करो, मां के पास हर महीने पैसे भेज देना.’’ अंजना ने सुझाव दिया.

‘‘क्या, सचमुच ऐसा हो सकता है? मुझे वहां इतने पैसे मिल जाएंगे कि मैं मां को भी पैसे भेज सकती हूं.’’ सिलमिना बोली.

‘‘ और नहीं तो क्या?’’ अंजना बोली.

‘‘तो फिर जैसा तुम कहो मैं चलने को तैयार हूं.’’

अंजना से बात कर सिलमिना की आंखों में चमक आ गई थी. उसे अंजना ने एक अद्भुत आत्मविश्वास से भर दिया था. दोनों छत्तीसगढ़ के बीहड़ जंगलों में निवास करने वाली कोरवा समुदाय की थीं.

वहां के लोगों के पास कोई ठोस कामधंधा नहीं था, जिस से उन का पेट भर पाता और वे सामान्य जीवन गुजार पाते. ऐसे में सभी अभावग्रस्त दर्दभरी जिंदगी गुजार रहे थे. जब भी अंजना गांव आती थी, तब बहुत परिवारों के लिए वह आशा की किरण बन जाती. परिवार में बुजुर्ग मांबाप को लगता था कि उन की बेटी को दिल्ली या मुंबई में घरेलू नौकरानी का काम मिल जाएगा. सिलमिना अपनी सहेली अंजना के कहने पर मुंबई जाने के लिए तैयारी में जुट गई. उस के अलावा गांव की कुछ और लड़कियां भी तैयार हो गईं, जो आसपास के इलाके की थीं.

उन्हें अंजना ने विश्वास दिलाया था कि सभी को मुंबई या दिल्ली में काम मिल जाएगा. जो जहां जाना चाहे चल सकती है, उस की जानपहचान दोनों जगहों के काम दिलाने वाले खास लागों से है. उस के भरोसे पर 14 से 18 साल के उम्र की कुल 16 लड़कियां अच्छी जिंदगी की उम्मीद में गांव से महानगर के लिए निकल पड़ीं. उन्हें अंजना ने बताया कि महानगरों में घरेलू काम करने वाली लड़कियों की बहुत कमी है. घर में साफसफाई करने, कपड़ेलत्ते धोने और बरतन मांजने का काम करना होता है. उस के काम के हिसाब से महीने में पगार मिलता है.

खाने और रहने का इंतजाम मालकिन द्वारा ही किया जाता है. उस का पैसा नहीं लगाता है. बीचबीच में उपहार भी मिलता रहता है. किसी अतिथि के आने पर वे अलग से पैसे दे जाते हैं. यह सब अंजना समझा ही रही थी कि एक लड़की मधु पूछ बैठी, ‘‘दीदी और क्या करना होता है?’’

‘‘और क्या करना है, घर में बच्चे हों तो उन्हें खिलाओ, घुमाओ और आराम की जिंदगी गुजारो.’

‘‘इन सब के लिए कितने पैस मिल जाते हैं दीदी?’’ उत्सुकता से मधु ने पूछा.

‘‘पैसे बहुत मिलते हैं पगली. 5 हजार रुपए महीने तो मिलेंगे ही. उस में तुम्हें एक पैसा खर्च नहीं होगा. बाकी जो मैं ने और कुछ बताया, उस के अलावा है.’’ अंजना बोली.

‘‘क्या?’’ अंजना की बात सुन कर मधु की आंखें फटी की फटी रह गईं.

‘‘लेकिन तू अभी छोटी है इसलिए 3 हजार ही मिलेंगे.’’ यह सुन कर सभी लड़कियां हंसने लगीं.

मधु ने आंखें घुमाते हुए कहा, ‘‘दीदी मुझे भी पूरे पैसे दिलवाना, मैं 2 के बराबर अकेली ही काम कर दूंगी.’’

‘‘मधु, तुम चिंता नहीं करो वहां पहुंच कर तुम्हें लगेगा कि तुम कहां पहुंच गई हो. समझो स्वर्ग है स्वर्ग. और जिंदगी की सभी खुशियां मिलेंगी, मजे करोगी, मजे!’’ कहती हुई अंजना ने उस की गालों को थपथपा दिया.

इस तरह आकर्षक सपने दिखा कर अंजना अपने साथ 16 लड़कियों को मुंबई ले गई. वहां पहुंच कर उस ने लड़कियों को अपने खास लोगों को सौंप दिया, जहां से उन्हें काम के लिए भेजा जाना था. उस के बाद लड़कियों के साथ जो हुआ, वह सब उसे दिखाए गए सपने के काफी उलट था. मधु एक्का सांवली सी सुतवां नाकनक्श की आकर्षक किशोरी थी. उसे एक प्लाई शौप के मालिक ने अपने यहां नौकरी पर रख लिया था. महीने की पगार 4 हजार रुपए तय हुई थी. इसी तरह से 18 वर्षीया सिलमिना सिदार को आरटीओ एजेंट रमेश चंद्रा ने अपने घर में घरेलू नौकरानी के तौर पर 5 हजार के मासिक वेतन पर रख लिया था.

16 साल की प्रमिला मंझवार एक व्यापारी के घर पहुंच गई थी, जबकि 17 साल की सुनीता धनुहार एक कामकाजी महिला रजनी के यहां लग गई थी. इसी तरह से सभी लड़कियां कहीं न कहीं काम पर लगा दी गई थीं. मगर जैसेजैसे समय बीतता चला गया, लड़कियों के सपने टूटते चले गए. वे अमानवीय दौर से गुजरने लगीं. उन्हें घरपरिवार से बात करने की मनाही थी. उन में कुछ लड़कियां देह के धंधे पर उतरने को विवश हो गईं. उन्हें पूरी तरह से एहसास हो गया था कि वे पिंजरे में कैद हो कर रह गई हैं. उन की अशिक्षा किसी दुर्भाग्य से कम नहीं थी. उन्हें न तो किसी अधिकार के बारे में मालूम था और न ही सामने दीवारों और पोस्टरों पर लिखी पंक्तियों का अर्थ समझ पाती थीं.

एक दिन मधु एक्का को फोन करने का मौका मिल गया. उस ने अपने एक परिचित को फोन कर दिया. फोन पर उस ने एक सांस में सारी तकलीफें बयां कर डाली. परिचित ने यह बात अपने दोस्त को बताई. बात पूरे कोरवा में फैल गई और मामला पुलिस तक जा पहुंचा. पुलिस पर जांच का दबाव भारत सरकार के गृह मंत्रालय से पड़ा. इस का असर हुआ और सभी लड़कियों की बरामदगी हो गई. फिर उन्हें कोरवा उन के परिजनों को सौंप दिया गया. उन्होंने पुलिस और परिजनों को अपनी आपबीती सुनाई. उस के बाद जो देहव्यापार की दर्दनाक दास्तान सामने आई, उस की एक झलक इस प्रकार है.

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर, रायगढ़, जशपुर जिले में कोरवा जनजाति को राष्ट्रपति का संरक्षण प्राप्त है. उन्हें विशेष दरजा दे कर दत्तक संतान का दरजा दिया गया है. उन के जनजीवन को सुधारने के लिए सरकार की तरफ से कई योजनाएं चलाई गई हैं, फिर भी उन की आय में गिरावट बनी हुई है. उस समुदाय के बच्चे मुश्किल से 5वीं, 8वीं तक पढ़ पाते हैं. उन की जिंदगी एकदम से ठहरी हुई जंगली वातावरण सी उलझ गई है. यही कारण है कि उन पर महानगरों की प्लेसमेंट ऐजेंसियों की नजर टिकी रहती है. वे अपना निशाना कमसिन लड़कियों को बनाते हैं और उन्हें दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद आदि शहरों में नौकरी के बहाने अपने जाल में फंसा लेते हैं.

कहने को तो उन से घरेलू नौकरानी, मौल, प्राइवेट कंपनियां, औफिस में काम दिलवाने का वादा किया जाता है, लेकिन अधिकतर देह व्यापार में धकेल दी जाती हैं. ऐसी ही एक लड़की ने बताया, ‘‘मैं काफी गरीब परिवार से हूं. मुंबई यही सोच कर गई थी कि हमें नौकरी से पैसा मिलेगा और शांति से जिंदगी गुजरेगी. लेकिन वहां देह बेचना पड़ा. इस बारे में हम किसी को बता भी नहीं सकते थे. इस का विरोध करना तो बहुत ही मुश्किल काम था. कई बार तो एक दिन में आधेआधे घंटे पर अलगअलग मर्द के साथ सोना पड़ा.’’

उस ने बताया कि कैसे उसे उस के जानपहचान वाले राजकुमार ने काम दिलाने के नाम पर दुर्गाबाई नाम की महिला के हाथों बेच दिया था. वह बिहार के रोहतास जिले की रहने वाली थी. उस ने उस की खूबसूरती और उभार वाले वदन को देख कर कीमत सवा लाख रुपए लगाई थी. इस काम में राजकुमार के साथ महेश और सरला नाम की युवती भी शामिल थे. दुर्गाबाई के पास छत्तीसगढ़ की 6 लड़कियां थीं, जिन्हें बाद में 5 जनवरी, 2021 को पुलिस ने बरामद किया था. दुर्गाबाई लड़कियों को ग्राहकों के पास भेजती थी. हर ग्राहक से उसे डेढ़ हजार से ढाई हजार रुपए तक मिलते थे, जबकि वह हर लड़की को उसी में से खर्चे के नाम पर 300 से 500 तक देती थी.

मुक्त करवाई गई एक लड़की ने बताया कि किस तरह से वह राजकुमार के जाल में फंसी. उसे पहले बिलासपुर से बिक्रमगंज लाया था. वहां महेश और सरला मिले थे. दोनों ने पतिपत्नी होने का परिचय दिया. वह उसे दुर्गाबाई के पास ले गए. महेश ने बताया कि वह उन की सास है और मुंबई में रहती हैं. उन के साथ उसे 6 महीने तक रहना होगा. बाद में दोनों जब वहां आ जाएंगे तब वह वापस आना चाहे तो आ सकती है. या फिर उन के साथ रहना चाहे तो रह सकती है. लड़की को उन की बातों में सच्चाई दिखी और वह दुर्गाबाई के साथ 27 दिसंबर, 2020 को मुंबई आ गई.

वहां उस ने देखा कि उसी के जिले की 7 और लड़कियां रह रही हैं. उन में से ही एक लड़की ने उस के कान में चुपके से बताया कि वह गलत जगह आ गई है. उस की किस्मत अच्छी थी कि एक सप्ताह बाद ही दुर्गाबाई के उस मकान पर पुलिस ने छापा मारा और वह दूसरी लड़कियों के साथ मुक्त करवा ली गई. मुक्त करवाई गई जशोपुर जिले की एक पीडि़ता की मां ने बताया कि उस की बच्ची को 15 हजार रुपए महीने पर आर्केस्ट्रा में काम दिलवाने के नाम पर ले गया था. उन्होंने बताया कि उस की बच्ची को नाचने का शौक था, इसलिए सोचा अच्छा काम है. पैसा मिलेगा और धीरेधीरे शोहरत मिलेगी तब बड़ा कलाकार भी बन सकती है.

वहां से उसे अंबिकापुर लाया गया. बाद में नशीली कोल्ड ड्रिंक्स पिला कर उत्तर प्रदेश में सोनभद्र जिला ले जाया गया. वहां बिंदास आर्केस्ट्रा ग्रुप के संचालक मनोज कुमार और अन्नू उर्फ गोलू को सौंप दिया गया. उन्होंने लड़की को छोटे से कमरे में बंद कर दिया. 3 दिन बीतने के बाद जब लड़की ने पूछा कि उस का प्रोग्राम कब होगा तब उन्होंने उस के साथ जबरदस्ती की और फिर सजासंवार कर एक ग्राहक के पास भेज दिया. इस तरह से वह कथित आर्केस्ट्रा ग्रुप की एक नई सैक्सवर्कर बना दी गई. उस की मां ने बताया कि लड़की 12 मई को किसी ग्राहक के पास भेजी जाने वाली थी. बताया गया था कि वहां उसे 6 लड़कियों के साथ एक निजी पार्टी में शामिल होना है. म्यूजिक पर नाचगाना करना होगा.

संयोग से इस पार्टी की जानकारी पुलिस को भी लग गई थी. पुलिस को किसी ने सूचना दी थी कि कोई बर्थडे सेलिब्रशन के बहाने ड्रग कारोबारियों से डील करने वाला है. लेकिन जब पुलिस ने वहां छापेमारी की तब वहां से 7 लड़कियां रंगेहाथों पकड़ी गईं. उन से पूछताछ होने पर आर्केस्ट्रा ग्रुप की आड़ में देहव्यापर का भंडाफोड़ हो गया. आर्केस्ट्रा संचालक भी पकड़े गए. उस के बाद पुलिस को नई जानकारी मिली. इस तरह देहव्यापार के दलाल कोरवा जनजाति की लड़कियों को किसी न किसी तरह से अपने जाल में फांस कर जिस्मफरोशी के धंधे में शामिल कर रहे हैं.

कहानी में कुछ नाम परिवर्तित हैं.  

थानाप्रभारी भी पकड़ा गया रंगरलियां मनाते हुए  देह व्यापार के ठिकानों पर पुलिस समयसमय पर छापे मारती रहती है. आमतौर पर इन ठिकानों से देह व्यापार में लिप्त युवतियां और महिलाओं के अलावा रंगरलियां मनाने आए लोग पकड़े जाते हैं. राजस्थान के शेखावाटी इलाके में चूरू में देह व्यापार के एक ठिकाने पर पुलिस ने छापा मारा तो वहां आबकारी पुलिस थाने का इंचार्ज भी रंगरलियां मनाते पकड़ा गया. वहां थानाप्रभारी को इस हालत में देख कर छापा मारने वाली पुलिस टीम भी चौंक गई.

दरअसल, इसी 24 जुलाई को चूरू की डीएसपी ममता सारस्वत ने बोगस ग्राहक को भेज कर शहर के अग्रसेन नगर में एक मकान पर छापा मारा. उस मकान में किराए पर रहने वाली  महिला सीमा मेघवाल ने बोगस ग्राहक के रूप में आए कांस्टेबल से रुपए ले लिए. बाद में कांस्टेबल का इशारा मिलने पर पुलिस ने उस मकान पर  दबिश दी. मकान में 3 युवतियां मिलीं. एक बंद कमरे में एक युवती और एक व्यक्ति आपत्तिजनक हालत में मिले. पुलिस ने चारों को पकड़ लिया. इन में सीमा के पास से 12 हजार रुपए भी बरामद हुए.

पुलिस थाने ला कर इन से पूछताछ की गई, तो पता चला कि पकड़ा गया व्यक्ति 40 वर्षीय रणवीर सिंह नायक चूरू में आबकारी निरोधक थाने का इंचार्ज था. उस का काम अवैध शराब पकड़ना था. पुलिस ने आबकारी विभाग के थानाप्रभारी रणवीर सिंह के अलावा तीनों युवतियों 35 साल की सीमा नायक, 30 साल की पियारू निशा और 30 साल की हलीमा इमरान को गिरफ्तार कर लिया. इन में पियारू निशा पश्चिम बंगाल और हलीमा इमरान मुंबई के ठाणे की रहने वाली निकली.

पूछताछ में पता चला कि चूरू के बास घंटेल की रहने वाली सीमा मेघवाल को उस के पति नेमीचंद मेघवाल ने छोड़ रखा था. वह कई महीनों से चूरू के अग्रसेन नगर में किराए का मकान ले कर रह रही थी और मुंबई व पश्चिम बंगाल सहित दूसरे राज्यों से नईनई खूबसूरत युवतियां बुला कर ग्राहकों को पेश करती थी. वह अपने ग्राहकों से एक से डेढ़ हजार रुपए तक लेती थी. सीमा वाट्सएप के जरिए अपना धंधा चलाती थी. ग्राहकों को वह वाट्सऐप पर लड़कियों की फोटो भेजती थी. पसंद आने पर रुपए तय करती थी.

गिरफ्तार युवतियों ने पुलिस को बताया कि वे पहले भी चूरू आ चुकी थीं. उन्हें एकडेड़ महीने के लिए अच्छी रकम दे कर बुलाया जाता था. सीमा  ने बताया कि वह समयसमय पर  दूसरे राज्यों से भी लड़कियां बुलाती  थी, ताकि ग्राहकों को नएनए चेहरे  मिल सकें.  पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

Crime Stories: ढाई महीने में मिली सजा ए मौत

Crime Stories: राजस्थान के हनुमानगढ़ का रहने वाला सुरेंद्र माडि़या एक तो कामचोर था, दूसरा नशेड़ी भी. दारू के नशे में वह सब कुछ भूल जाता था. उसे न अपनेपराए का जरा भी खयाल रहता था और न ही सामाजिक संस्कार और रिश्ते के प्रति मानमर्यादा. एक रात उस के लिए अनैतिकता का दलदल बन गई थी. जिस में गिरते ही वह धंसता चला गया. बात 15 सितंबर, 2021 की है. उस दिन सुरेंद्र को मजदूरी में और दिन की तुलना में कुछ अधिक पैसे मिल गए थे, जिस से वह बेहद खुश हो गया था. इस खुशी में वह सीधे शराब के ठेके पर जा पहुंचा. 2 दिन से उसे तलब लगी हुई थी. उस ने सूखे कंठ को जी भर कर गीला करने की लालसा पूरी कर ली थी. फिर लड़खड़ाते कदमों से किसी तरह अपने मिट्टी और फूस पराली के बने कच्चे घर टपरे पर जा पहुंचा था. उस में वह अकेला ही रहता था.

उस के आगेपीछे कोई कहने सुनने वाला नहीं था. कुछ साल पहले जब से उस के बड़े भाई ने आत्महत्या कर ली थी, तब से वह और भी बेफिक्र और अपनी मरजी का मालिक बन गया था. हनुमानगढ़ जिलांतर्गत पीलीबंगा तहसील से करीब 20 किलोमीटर दूर गांव दुलमाना में मेघवाल समुदाय के सुरेंद्र को सभी मांडिया कह कर बुलाते थे. वहीं वह मवेशी पालने और उस की चरवाही करने वाली 60 वर्षीया एक विधवा भी अकेली रहती थी. मांडिया के टपरे से आधे किलोमीटर पर वह भी उस जैसी ही कच्चे टपरे में रहती थी. वह उसे अच्छी तरह जानती पहचानती थी. सुरेंद्र का आना जाना उस के घर से हो कर ही होता था. खाली समय में उस के साथ बैठ कर गप्पें मारता रहता था. सुरेंद्र उन्हें सम्मान से चाची कह कर बुलाता था.

उस रोज सुरेंद्र ने इतनी अधिक दारू पी ली थी कि उसे घर लौटते हुए पता ही नहीं चला कि रात की शुरुआत हो चुकी है. एक राहगीर से पूछा, ‘‘भाई तेरे पास घड़ी है क्या? बता दो जरा कितना समय हुआ है? लगता है रात बहुत हो गई है मुझे घर जाना है.’’

‘‘अरे तू क्या करेगा समय जान कर नशेड़ी, कौन तुझे कोई गाड़ी पकड़नी है इस वक्त, अभी ज्यादा रात नहीं हुई है, 9 बजे हैं, 9…’’ सुरेंद्र की हालत देख कर राहगीर ने कमेंट किया. वह उसे पहचानता था.

‘‘मेरा घर आ गया क्या?’’ सुरेंद्र ने फिर पूछा.

‘‘जब तुझे अपना घर पहचानने का भी होश नहीं रहता, तब इतनी दारू क्यों पी लेते हो?’’ राहगीर उसे नसीहत देता हुआ आगे बढ़ गया.

सुरेंद्र अपने लड़खड़ाते कदमों से बुदबुदाने लगा, ‘‘लगता है मेरा घर आ गया, लेकिन यहां ढोरमवेशी किस ने बांध दिए? जरूर किसी की कारस्तानी होगी?’’

दरअसल, सुरेंद्र अभी वृद्धा के घर के पास ही पहुंचा था, जिसे अपना घर समझ बैठा था. उसी के मवेशी बाहर बंधे थे. बगैर आगापीछे ध्यान दिए वह सीधे बिना दरवाजे वाले उस टपरे में घुस गया. अंदर चारपाई पर वृद्धा नींद में लेटी थी. दीए की धीमी रोशनी में उस की नजर औरत के अस्तव्यस्त कपड़ों पर गई. उस के भीतर वासना का हैवान जाग उठा. उस महिला को वह चाची कह कर बुलाता था, उस की चारपाई पर जा बैठा. कामुक नजरों से निहारने लगा. वह कच्ची नींद में थी. इसी बीच हलचल से वह जाग गई. जागते ही पूछ बैठी, ‘‘कौन है भाई?’’

‘‘अरे, धीरे बोल मैं हूं माडि़या’’ सुरेंद्र ने कहा.

‘‘बेटा, इतनी रात गए क्यों

आया है, कोई बात है का?’’ वृद्धा ने सवाल किया.

‘‘भाभी, रात को अकेली औरत के पास कोई मर्द क्यों आता है…समझ जा.’’

सुरेंद्र का इतना कहना था कि विधवा गुस्से से बोल पड़ी. उस ने चारपाई पर नजदीक बैठे सुरेंद्र को धकेल दिया, ‘‘क्या बोला, भाभी? मैं तेरी भाभी लगती हूं? जरा भी लाजशर्म है या नहीं, तूने दारू पी रखी है. नशे में कुछ भी बक देगा. कुछ भी करेगा, अभी तुझे बताती हूं.’’ इसी के साथ विधवा गुस्से में तेजी से चारपाई से उठी. तुरंत चारपाई के नीचे से डंडा निकाल कर तान दिया.

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सामने सिर पर डंडे और विधवा के तमतमाए चेहरे को देख कर सुरेंद्र का आधा नशा उतर चुका था. उस का गुस्सा कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा था. बिफरती हुई बोली, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई रात को मेरे घर में घुसने की? ठहर, अभी मैं अपने देवर को फोन कर बुलाती हूं. वही तुम्हारी अच्छी तरह से मरम्मत करेगा.’’

गुस्से में दहाड़ती विधवा का विरोध देख कर सुरेंद्र की सिट्टीपिट्टटी गुम हो गई. जैसेतैसे कर वह विधवा के चंगुल से छूटा और वहां से भागने को हुआ. इस डर से कहीं विधवा अपने देवर को फोन न कर दे, चारपाई पर सिरहाने रखा उस का मोबाइल ही ले कर भाग गया. मोबाइल ले कर भागता देख विधवा भी उस के पीछे दौड़ी, लेकिन जब तक सुरेंद्र ने अपने घर की ओर दौड़ लगा दी और अंधेरे में गुम हो गया था. भागता हुआ सुरेंद्र अपने घर आ गया था. रात को खटका सुन कर उस की मां जाग गई. पिता बंसीलाल नींद में खर्राटे भर रहे थे. मां ने देर रात आने पर डांटा, तो उस ने बताया कि वह एक दोस्त के घर गया हुआ था. और फिर वह चारपाई पर जा कर पसर गया, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी.

एक तरफ विधवा का गुस्सा बारबार ध्यान में आ रहा था, दूसरी तरफ लेटी अवस्था में उस के अस्तव्यस्त कपड़े में झांकती देह का दृश्य झिलमिलाता हुआ एकदूसरे में गड्डमड्ड हो रहे थे. उस ने जैसे ही आंखें बंद कीं तो दिमाग में फिर वासना का कीड़ा कुलबुलाने लगा.

सोचने लगा, ‘‘…अगर थोड़ी सख्ती दिखाता तो शायद वह उस के कब्जे में आ जाती, आत्मसमर्पण कर देती.’’

इसी विचार से वह बिस्तर से उठा और फिर से विधवा के घर की ओर चल पड़ा. दूसरी तरफ विधवा अपना मोबाइल लेने के लिए बदहवास हालत में नजदीक रह रहे अपने देवर बनवारी मेघवाल के घर जा पहुंची.

भाभी की हालत देख कर बनवारी चौंका, ‘‘भाभी, इतनी रात गए क्यों आई हो?’’ विधवा ने सिलसिलेवार ढंग से सारा वाकया सुनाया. इसी के साथ उस ने बताया कि माडि़या उस का फोन ले कर भाग गया है.

बनवारी बोला, ‘‘भाभी, आप यहीं अपनी देवरानी के साथ सो जाओ. सुबह माडि़या की खबर लूंगा. मोबाइल भी उस से लूंगा.’’

‘‘ नहीं भैया, मेरे घर पशु बंधे हैं, इसलिए अपने घर पर ही जा कर सोऊंगी.’’ विधवा बोली.

थोड़ी देर में विधवा अपने घर आ गई. सुरेंद्र पहले से ही उस के घर में आ कर छिपा हुआ था. वह जैसे ही बिछावन पर लेटने को हुई, सुरेंद्र ने उसे दबोच लिया. महिला ने सुरेंद्र की पकड़ से बचने की कोशिश की, लेकिन उस की हवस का शिकार होने से नहीं बच पाई. किसी तरह सुरेंद्र के कब्जे से मुक्त हुई. तब उस ने लात मार कर उसे जमीन पर गिरा दिया. सुरेंद्र ने पास पड़ी प्लास्टिक की रस्सी महिला के गले में डाल दी. विधवा अपना बचाव नहीं कर पाई, जबकि सुरेंद्र ने पूरी ताकत से रस्सी को खींच दिया. कुछ पल में ही महिला की मौत हो गई. उस की मौत हो जाने के बाद सुरेंद्र ने उस के साथ जी भर कर दोबारा मनमानी भी की. किंतु जैसे ही उस पर से वासना का भूत शांत हुआ, वह डर गया.

कभी खुद को देखने लगा, तो कभी विधवा की लाश को इतना तो समझ ही गया था कि उस के द्वारा एक नहीं, बल्कि 2-2 गुनाह हो गए थे. डरा हुआ सुरेंद्र अपने बचाव के तरीके खोजने लगा. वह सीधा अपने चाचा राजाराम के घर गया. उन्हें जगा कर उन के पांव पकड़ लिए. गिड़गिड़ाते हुए बचाने की गुहार करने लगा. उस के अपराध के बारे में सुन कर राजाराम भी सन्न रह गए. उन्होंने उसे संभालाते हुए भरोसा दिया, ‘‘बेटा, जो हुआ उसे खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन रात बहुत हो गई है, जा कर तू सो जा. कल सुबह सारा मामला सुलटा दूंगा.’’

माडि़या वहां से अपने घर चला आया. राजाराम अपने 2 साथियों श्योपत और सहदेव को ले कर बनवारी के घर गए. उसे सारी बात बताई. सुबह होने पर बनवारी लाल मेघवाल गांव के कुछ लोगों के साथ पीलीबंगा पुलिस स्टेशन गया. उस ने सुरेंद्र के खिलाफ लिखित प्राथमिकी दर्ज करवा दी. थानाप्रभारी इंद्रकुमार ने सुरेंद्र के खिलाफ भादंसं की धारा 302, 376, 450 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस मामले को एसपी प्रीति जैन ने गंभीरता से लेते हुए इंद्रकुमार को ही जांच अधिकारी नियुक्त कर दिया. इंद्रकुमार ने कुछ घंटे बाद ही आरोपी सुरेंद्र को गांव दुलमाना से गिरफ्तार कर लिया. घटनास्थल से सबूत के तौर पर कदमों के निशान, रस्सी, वीर्य लगे वृद्धा के कपड़े, बालों के गुच्छे आदि इकट्ठा कर लिए. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

विभिन्न साक्ष्यों का डीएनए टेस्ट करवा कर आरोपी के साथ मेल भी करवा लिया गया. इस लंबी प्रक्रिया को पूरी करने में पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 7 दिनों में केस की चार्जशीट तैयार कर अदालत में दाखिल कर दी. हनुमानगढ़ जिला मुख्यालय स्थित सत्र न्यायालय में 29 नवंबर, 2021 को काफी गहमागहमी थी. सब की निगाहें उस फैसले पर टिकी थीं, जिस के लिए साक्ष्यों और गवाहों से संबंधित दस्तावेज काफी कम समय में जुटा लिए गए थे. लोगों को आश्चर्य इस बात को ले कर था कि रेप और हत्या के इस मामले का फैसला काफी कम समय में आने वाला है, जिसे मात्र 74 दिन पहले ही अदालत में दाखिल किया गया था.

सब कुछ समय से हो रहा था. पुलिस गाड़ी अभियुक्त सुरेंद्र उर्फ माडि़या को जिला जेल से ले कर अदालत पहुंच गई थी. वहां उसे अस्थाई अभियुक्त बैरक में बंद कर दिया था. पुलिस बरामदे में सुस्ताने लगी थी. कुछ समय में ही जिला न्यायाधीश संजीव मागो अदालत पहुंच गए थे. वह अपने चैंबर से निकल कर न्याय की कुरसी पर जा बैठे थे. अदालत की काररवाई शुरू हो चुकी थी. पेशकार के कहने पर हरकारे ने सुरेंद्र बनाम स्टेट की आवाज लगा दी थी. सब कुछ नियम से हो रहा था. अदालत के कठघरे में मुलजिम सुरेंद्र हाजिर हो चुका था. वह हाथ बांधे सिर झुकाए खड़ा था. न्यायाधीश ने अपने सामने रखे केस से संबंधित दस्तावेज उठाते हुए कहा, ‘‘काररवाई शुरू की जाए.’’

अभियुक्त पक्ष के वकील अलंकार सिंह से पहले लोक अभियोजक उग्रसेन नैन ने मामले पर रोशनी डालते हुए कहा—

योर औनर इस केस में पीडि़ता एक विधवा और गरीब औरत थी. उस की उम्र 60 साल के करीब थी. वह आजीविका के लिए मवेशी पालती थी. वह अपने घर में अकेली रहती थी. घटना की रात को अभियुक्त सुरेंद्र जबरन उस के घर में घुस गया था. उस ने उस के साथ जोरजबरदस्ती की और उस के साथ रेप का प्रयास किया. जब उस ने विरोध किया, तब उस ने उसे रस्सी से गला घोंट कर मार डाला. उस के बाद उस ने विधवा वृद्धा के साथ मनमानी की. उग्रसेन ने आगे कहा, अभियुक्त सुरेंद्र ने हत्या के साथसाथ अमानवीय कृत्य भी किया है. ऐसा व्यक्ति समाज के लिए भी गंभीर खतरा है. ऐसा व्यक्ति समाज में रहने के लायक नहीं है.

अत: हुजूर से दरख्वास्त है कि वर्तमान दंड व्यवस्था के अनुरूप आजीवन कारावास की सजा एक सामान्य नियम है. किंतु इस जघन्य मामले में अभियुक्त ने निर्मम तरीके से अपराध को अंजाम दिया है, वह एक दुर्लभ मामला बन गया है. इसलिए इस मामले को असाधारण की श्रेणी में रखते हुए मृत्युदंड दिया जाए. इसी के साथ उन्होंने पुलिस द्वारा जुटाए गए सारे दस्तावेज न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत कर दिए.लोक अभियोजक का इतना कहना था कि अदालत में सन्नाटा पसर गया. सब की निगाहें अब अभियुक्त के वकील की दलील और उस के अनुरूप न्यायाधीश के फैसले पर टिक गईं. न्यायाधीश महोदय ने भी मामले को गंभीरता से लेते हुए बचाव पक्ष के वकील अलंकार सिंह को अपना तर्क रखने का मौका दिया, लेकिन वह अपना कोई पक्ष नहीं रख पाए.

हालांकि उन्होंने 14 अदालती उदाहरण दे कर सुरेंद्र को अपराध से मुक्त करने की अपील की. उन्होंने अपने तर्क में सिर्फ इतना कहा कि उसे सुधरने का एक मौका दिया जाए. जबकि जिला अभियोजन पक्ष ने 47 पन्ने का दस्तावेजी साक्ष्य पेश किया था. हालांकि घटना का कोई चश्मदीद नहीं था, पर बनवारी लाल और राजाराम ने सुरेंद्र को बचाने की कोशिश की. फिर भी सारे साक्ष्य सुरेंद्र के खिलाफ थे. यहां तक कि विधवा का मोबाइल फोन भी पुलिस ने सुरेंद्र के घर से बरामद कर लिया था. इन सारे तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायाधीश ने अहम फैसला सुनाने से पहले इस तरह के मामले से संबंधित सजा के बारे में कुछ बातें भी बताईं. सुरेंद्र पर लगे सभी धाराओं का अलगअलग विश्लेषण करते हुए अंत में उन्होंने धारा 302 की भी पुष्टि कर दी.

इसी के साथ उसे रेप, हत्या, अप्राकृतिक कृत्य, मारपीट आदि के दंड के साथ सजाएमौत की साज सुना दी. उल्लेखनीय है कि भारत में सजाएमौत के लिए फांसी दी जाती है. उसे तत्काल जिला जेल भेजे जाने से पहले उसे उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और राष्ट्रपति से गुहार लगाने का अधिकार भी दे दिया. इस फैसले पर प्रदेश के डीजीपी अजीत सिंह ने इस केस की तेज गति से जांच कर ठोस सबूत पेश करने वाले पुलिस जांच टीम की सराहना की. Crime Stories

True Crime: मोह में मिली मौत – विदेश जाने का चढ़ा खुमार

True Crime: 19 जनवरी, 2022 को अमेरिका से लगी कनाडा सीमा के पास मिनेसोटा राज्य के एमर्शन शहर के नजदीक कनाडा की ओर मेनिटोबा रौयल कैनेडियन माउंटेन पुलिस (आरसीएमपी) ने अमेरिका में चोरीछिपे यानी अवैध रूप से घुस रहे 7 लोगों को गिरफ्तार किया था. इन लोगों से पता चला कि इन के 4 लोग और थे, जो पीछे छूट गए हैं. पीछे छूट गए लोगों की तलाश में जब आरसीएमपी के जवानों ने सीमा की तलाशी शुरू की तो उन्हें सीमा के पास बर्फ में ढके 4 शव मिले. आरसीएमपी के जवानों ने जिन 7 लोगों को गिरफ्तार किया था, वे गुजरात के गांधीनगर के आसपास के रहने वाले थे. इस से उन जवानों ने अंदाजा लगाया कि ये मृतक भी शायद उन्हीं के साथी होंगे.

बर्फ में जमी मिली चारों लाशों में एक  पुरुष, एक महिला, एक लड़की और एक बच्चे की लाश थी. ये लाशें सीमा से 10 से 13 मीटर की दूरी पर कनाडा की ओर पाई गई थीं. मेनिटोबा रायल कैनेडियन पुलिस ने लाशों की तलाशी ली तो उन के पास मिले सामानों में बच्चे के उपयोग में लाया जाने वाला सामान मिला था. अंदाजा लगाया गया कि इन की मौत ठंड से हुई है. बर्फ गिरने की वजह से उस समय वहां का तापमान माइनस 35 डिग्री सेल्सियस था. अगले दिन जब यह समाचार वहां की मीडिया द्वारा प्रसारित किया गया तो भारत के लोग भी स्तब्ध रह गए थे.

खबर में मृतकों के गुजरात के होने की संभावना व्यक्त की गई थी, इसलिए उस समय गुजरात से कनाडा गए लोगों के भारत में रहने वाले परिजन बेचैन हो उठे. सभी लोग कनाडा गए अपने परिजनों को फोन करने लगे. उसी समय गांधीनगर की तहसील कलोल के गांव डिंगुचा के रहने वाले बलदेवभाई पटेल का बेटा जगदीशभाई पटेल भी अपनी पत्नी, बेटी और बेटे के साथ कनाडा गया था. इसलिए उन्हें चिंता होने लगी कि कहीं उन का बेटा ही तो सीमा पार करते समय हादसे का शिकार नहीं हो गए. उन का बेटे से संपर्क भी नहीं हो रहा था. सच्चाई का पता लगाने के लिए उन्होंने कनाडा स्थित दूतावास को मेल किया, पर कुछ पता नहीं चला. पता चला 9 दिन बाद.

पुलिस को चारों लाशों की पहचान कराने में 9 दिन लग गए थे. 9 दिन बाद 27 जनवरी, 2022 को आरसीएमपी की ओर से रोब हिल द्वारा अधिकृत रूप से भारतीय उच्चायोग को सूचना दी गई कि चारों मृतक भारत के गुजरात राज्य के जिला गांधीनगर के डिंगुचा गांव के रहने वाले थे. चारों मृतक एक ही परिवार के थे. उन की पहचान बलदेवभाई पटेल के बेटे जगदीशभाई पटेल (39 साल), बहू वैशाली पटेल (37 साल), पोती विहांगी पटेल (11 साल) और पोते धार्मिक पटेल (3 साल) के रूप में हुई थी. यह परिवार 12 जनवरी को कनाडा जाने की बात कह कर घर से निकला था और वहां पहुंच कर फोन करने की बात कही थी.

यह परिवार उसी दिन कनाडा के टोरंटो शहर पहुंच गया था. इस के बाद यह परिवार 18 जनवरी को मैनिटोबा प्रांत के इमर्शन शहर पहुंचा था और 19 जनवरी को पूरे परिवार की लाशें मेनिटोबा प्रांत से जुड़ी अमेरिका कनाडा सीमा पर कनाडा सीमा में 12 मीटर अंदर मिली थीं. दूसरी ओर जब पता चला कि यह परिवार अवैध रूप से अमेरिका में घुस रहा था तो गुजरात के डीजीपी आशीष भाटिया ने पटेल परिवार को गैरकानूनी रूप से विदेश भेजने से जुड़े लोगों से ले कर पूरी जांच की जिम्मेदारी सीआईडी क्राइम ब्रांच की एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग ब्रांच को सौप दी. जिस के लिए डिप्टी एसपी सतीश चौधरी के नेतृत्व में टीम गठित कर जांच शुरू भी कर दी गई थी.

विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने भी इस घटना को गंभीरता से लिया. जिस की वजह से भारत, अमेरिका और कनाडा की जांच एजेसियां इस मामले की संयुक्त रूप से जांच करने लगीं. पता चला है कि अमेरिका की पुलिस ने डिंगुचा गांव के पटेल परिवार के 4 सदस्यों सहित 11-12 अन्य लोगों को अवैध रूप से सीमा पार कराने के आरोप में फ्लोरिडा के स्टीव शैंड नामक एजेंट को गिरफ्तार किया था. चारों लाशें कनाडा में थीं. अंतिम संस्कार के लिए के लिए जब उन्हें भारत लाने की बात चली तो पता चला कि एक लाश लाने में करीब 40 लाख रुपए का खर्च आएगा. मतलब करोड़ों का खर्च था. इसलिए तय हुआ कि चारों मृतकों का अंतिम संस्कार कनाडा में ही करा दिया जाए.

और फिर किया भी यही गया. चारों मृतकों का अंतिम संस्कार वहीं करा दिया गया. चूंकि अमेरिका, कनाडा में पटेल बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं, इसलिए मृतकों का अंतिम संस्कार करने में कोई दिक्कत नहीं आई थी. क्योंकि इस परिवार की मदद के लिए पटेल समाज आगे आ गया था. इतना ही नहीं, अमेरिका और कनाडा के रहने वाले पटेलों ने जगदीशभाई पटेल के परिवार के लिए 66 हजार डालर की रकम इकट्ठा भी कर के भेज दी है. जगदीशभाई पटेल गुजरात के जिला गांधीनगर की तहसील कलोल के गांव डिंगुचा के रहने वाले थे. उन के पिता बलदेवभाई पटेल पत्नी मधुबेन और बड़े बेटे महेंद्रभाई पटेल के साथ डिंगुचा में ही रहते हैं. उन के साथ ही बड़े बेटे का परिवार भी रहता है.

बलदेवभाई गांव के संपन्न आदमी थे. उन के पास अच्छीखासी जमीन, इसलिए उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी. बड़े बेटे महेंद्रभाई की शादी पहले ही हो गई थी. जगदीश भी गांव के स्कूल में नौकरी करने लगा तो पिता ने उस की भी शादी कर दी. शादी के बाद जब जगदीशभाई को बिटिया विहांगी पैदा हुई तो वह बेटी की पढ़ाई अच्छे से हो सके, इस के लिए पत्नी वैशाली और बेटी विहांगी को ले कर कलोल आ गए थे. जगदीश ने गांव की अपनी स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी. कलोल में परिवार के खर्च के लिए उन्होंने बिजली के सामानों की दुकान खोल ली थी. कलोल आने के बाद उन्हें बेटा धार्मिक पैदा हुआ था. सब कुछ बढि़या चल रहा था. बेटी विहांगी 11 साल की हो गई थी तो बेटा 3 साल का हो गया था. इस बीच उन्हें न जाने क्यों विदेश जाने की धुन सवार हो गई.

दरअसल, गुजरात और पंजाब में विदेश जाने का कुछ अधिक ही क्रेज है. डिंगुचा गांव में करीब 7 हजार की जनसंख्या में से 32 सौ से 35 सौ के आसपास लोग विदेश में रहते हैं. इसी वजह से इस गांव के लोगों में विदेश जा कर रहने का बड़ा मोह है.

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ऐसा ही मोह जगदीश के मन में भी पैदा हो गया था. तभी तो वह एक लाख डालर (75 लाख) रुपए खर्च कर के एजेंट के माध्यम से अमेरिका जाने को तैयार हो गए थे. वह चले भी गए थे, पर उन के और उन के परिवार का दुर्भाग्य ही था कि बौर्डर पर बर्फ गिरने लगी और उन का पूरा परिवार ठंड की वजह से काल के गाल में समा गया. यह कोई पहली घटना नहीं है. इस तरह की अनेक हारर स्टोरीज इतिहास के गर्भ में छिपी हैं. मात्र कनाडा ही नहीं, मैक्सिको की सीमा से भी लोग गैरकानूनी रूप से अमेरिका में प्रवेश करते हैं. आज लाखों पाटीदार (पटेल) यूरोप और अमेरिका में रह रहे हैं.

अमेरिका विश्व की महासत्ता है. सालों से गुजरातियों ने ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों के लोगों में अमेरिका जाने का मोह है. क्योंकि अमेरिका में कमाने के तमाम अवसर हैं. गुजरात के पटेल सालों से अमेरिका जा कर रह रहे हैं. अमेरिका की 32 करोड़ की आबादी में आज 20 लाख से अधिक भारतीय हैं, जिन में 10 लाख लोग पाटीदार हैं. गैरकानूनी रूप से किसी को भी अमेरिका ही नहीं बल्कि किसी भी देश में नहीं जाना चाहिए. कलोल के पास के डिंगुचा गांव के पटेल परिवार की करुणांतिका जितना हृदय को द्रवित करने वाली है, उतनी ही आंखें खोलने वाली भी है.

एक समय अमेरिका में 10 लाख रुपए में गैरकानूनी रूप से प्रवेश हो जाता था. लेकिन अब यह एक करोड़ तक पहुंच गया है. इस धंधे को कबूतरबाजी कहा जाता है. इस तरह के कबूतरबाज रोजीरोटी की तलाश और अच्छे जीवन की चाह रखने वाले गुजराती परिवारों के साथ धोखेबाजी करते हैं और इस के लिए तमाम एजेंट गुजरात में भी हैं. अमेरिका या कनाडा से फरजी स्पांसर लेटर्स मंगवा कर विजिटर वीजा पर उन्हें अमेरिका में प्रवेश करा देते हैं और फिर वे सालों तक गैरकानूनी रूप से अमेरिका में रहने के लिए संघर्ष करते रहते हैं. उन्हें कायदे की नौकरी न मिलने की वजह से होटलों या रेस्टोरेंट में साफसफाई या वेटर की नौकरी करनी पड़ती है.

यह एक तरह से दुर्भाग्यपूर्ण ही है. सोचने वाली बात यह है कि जो लोग करोड़ों रुपए खर्च कर के चोरीछिपे अमेरिका जाते हैं, वे 50 या सौ करोड़ की आसामी नहीं होते. वे बेचारे वेटर और क्वालिटी लाइफ की तलाश में अपना मकान, जमीन या घर के गहने बेच कर जाते हैं. इस की वजह यह होती है कि देश में उन के लिए नौकरी नहीं होती. वे बच्चों को अच्छी शिक्षा या अच्छा इलाज दे सकें, उन के पास इस की व्यवस्था नहीं होती. ऐसा ही कुछ सोच कर जगदीशभाई ने भी 75 लाख रुपए खर्च किए. पर उन का दुर्भाग्य था कि अच्छे जीवन की तलाश में उन्होंने जो किया, वह उन का ही नहीं, उन के पूरे परिवार का जीवन लील गया.

रोजगार और अच्छे भविष्य के लिए गुजराती अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे देशों में जान को खतरे में डाल कर गैरकानूनी रूप से घुसते हैं. जब इस बारे में पता किया गया तो जो जानकारी मिली, उस के अनुसार एजेंट को पैसा वहां पहुंचने के बाद मिलता है. गुजरात से हर साल हजारों लोग गैरकानूनी रूप से विदेश जाते हैं. इस में उत्तर गुजरात तथा चरोतर के पाटीदार शामिल हैं. विदेश जाने की चाह रखने वाले परिवार मात्र आर्थिक ही नहीं, सामाजिक और शारीरिक यातना भी सहन करते हैं. इस समय इमिग्रेशन की दुनिया में कनाडा का बोलबाला है. जिन्हें कनाडा हो कर अमेरिका जाना होता है या कनाडा में ही रहना होता है, उन के लिए कनाडा के वीजा की डिमांड होती है. इस समय जिन एजेंटों के पास कनाडा का वीजा होता है, उस में स्टीकर के लिए वे ढाई लाख रुपए की मांग करते हैं.

गैरकानूनी रूप से विदेश जाने के लिए सब से पहले समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति से बात की जाती है. अगर कोई स्वजन विदेश में है तो उस से सहमति ली जाती है. इस के बाद तांत्रिक से दाना डलवाने यानी धागा बंधवाने का भी ट्रेंड है. तांत्रिक की मंजूरी के बाद एजेंट को डाक्यूमेंट सौंप दिए जाते हैं. यहां हर गांव का एजेंट तय है. एजेंट समाज की संस्था या मंडल से संपर्क करता है. मंडल या संस्था एक व्यक्ति या परिवार का हवाला लेता है, जहां रुपए की डील तय होती है. अगर समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति एजेंट का हवाला नहीं लेता तो जमीन, घर लिखाया जाता है. एक व्यक्ति का एक करोड़ रुपया और कपल का एक करोड़ 30 लाख रुपया एजेंट लेता है. अगर बच्चे या अन्य मेंबर हुए तो यह रकम बढ़ जाती है.

डील के बाद समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति की भूमिका शुरू होती है. समाज का प्रतिष्ठित व्यक्ति रुपए की जिम्मेदारी लेता है तो एजेंट डाक्यूमेंट का काम शुरू करता है. यह स्वीकृति किसी भी कीमत पर बदल नहीं सकती. अगर बदल गई तो समाज में परिवार की बहुत बेइज्जती होती है. एजेंट पहले कानूनी तौर पर वीजा के लिए आवेदन करता है. रिजेक्ट होने के बाद गैरकानूनी रूप से खेल शुरू होता है. जिस देश के लिए वीजा आन अराइवल होता है, उस देश के लिए प्रोसेस शुरू होता है. वहां पहुंचने पर विदेशी एजेंट मनमानी शुरू कर देता है. महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तक करता है.

कभीकभी तो रातदिन सौ किलोमीटर तक पैदल चलाता है. माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में सुनसान जंगलों और बर्फ पर संघर्ष करना पड़ता है. अगर कोई ग्रुप से छूट गया या पीछे रह गया तो उस का इंतजार नहीं किया जाता. उसे उस के हाल पर छोड़ दिया जाता है. जैसा जगदीशभाई और उन के परिवार के साथ हुआ. इस स्थिति में कभीकभी मजबूरी में बर्फ, जंगल या फायरिंग रेंज में आगे बढ़ना पड़ता है. ऐसे में अमेरिकी बौर्डर पर पहुंच कर 3 औप्शन होते हैं. पहला औप्शन है अमेरिकी सेना के समक्ष सरेंडर कर देना. दूसरा औप्शन होता है कि वह अपने देश में सुरक्षित नहीं है और तीसरा औप्शन है कि अमेरिका में अपने सोर्स से छिपे रहना.

इस के बाद कंफर्मेशन होने के बाद पेमेंट होता है. अमेरिका में कदम रखते ही दलाल एक फोन करने देता है. समाज के उस प्रतिष्ठित व्यक्ति से सिर्फ ‘पहुंच गया’ कहने दिया जाता है. इस कंफर्मेशन के बाद भारत में दलाल को रुपए मिल जाते हैं. समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति को 5 से 10 प्रतिशत मिला कर देने की डील होती है. पास में पैसा न हो और अमेरिका जाना हो तो समाज की मंडली से आर्थिक मदद मिलती है. अमेरिका पहुंच कर रकम मंडल में जमा करा दी जाती है. करीब 100 करोड़ जितनी रकम का हवाला पड़ गया है. ईमानदारी ऐसी कि यह रकम समय पर अदा कर दी जाती है. ऐसा ही कुछ जगदीशभाई पटेल के भी मामले में हुआ था. पर वह अमेरिका में कदम नहीं रख पाए.

अमेरिका-कनाडा की सीमा पर काल के गाल में समाए जगदीशभाई पटेल और उन के परिवार वालों के लिए 7 फरवरी, 2022 को उन के गांव डिंगुचा में शोक सभा का आयोजन किया गया. जगदीशभाई और उन के परिवार के लिए पूरा देश दुखी है. पर इस हादसे के बाद क्या कबूतरबाजी बंद होगी? कतई नहीं. लोग इसी तरह जान जोखिम में डाल कर विदेश जाते रहेंगे. क्योंकि विदेश का मोह है ही ऐसा. True Crime

Real Crime News : सरपंच न बनने पर बना जल्लाद

सोमवार 6 दिसंबर, 2021 का दिन था. कड़कड़ाती ठंड छत्तीसगढ़ की हवाओं को सर्द बनाए हुए थी. शाम के लगभग 7 बज रहे थे. इंजीनियर शिवांग चंद्राकर अपने फार्महाउस से धीमी गति से बाइक चलाते हुए अपने घर मरौदा की ओर जा रहा था. तभी उस ने देखा कि कोई उसे हाथ दे रहा है, सामने अशोक खड़ा था. उसे देख कर शिवांग ने बाइक रोक दी. शिवांग अशोक देशमुख को अच्छी तरह जानता था, जिसे वह अच्छी तरह जानता था. अशोक ने शिवांग चंद्राकर ने कहा, ‘‘भाई, मेरी बाइक खराब हो गई है. क्या तुम मुझे लिफ्ट दे सकते हो?’’

शिवांग चंद्राकर जानता था कि अशोक  गांव का नामचीन व्यक्ति है, उस की उस से कभी नहीं बनी. मगर इंसानियत भी कोई चीज होती है, यह सोच कर उस ने मुसकरा कर  कहा, ‘‘हांहां क्यों नहीं भाई, आओ बैठो बताओ कहां चलना है.’’

यह सुनना था कि अशोक देशमुख उछल कर शिवांग की बाइक पर बैठ गया.

अशोक ने शिवांग के कंधे पर हाथ रखा तो उसे महसूस हुआ मानो उस के हाथ में कोई कठोर चीज है. शिवांग को जाने क्यों महसूस हुआ कि कुछ गड़बड़ है, मगर अब वह क्या कर सकता था. चुपचाप बाइक चला रहा था, देखा सामने 2 लोग और खड़े मिले. वह भी उसे रुकने के लिए इशारा कर रहे थे.

उन्हें देख कर के शिवांग ने बाइक की गति तेज कर दी. मगर अशोक ने कंधे पर थपथपा कर कहा, ‘‘नहींनहीं, रुको.’’

मजबूर शिवांग ने बाइक रोकी. वही दोनों लोग उस के पास आ गए जो हाथ के इशारे से बाइक रुकवा रहे थे. शिवांग उन्हें थोड़ाथोड़ा जानता था.

तभी अशोक देशमुख ने शिवांग को कस कर पीछे से जकड़ लिया. शिवांग को महसूस हुआ मानो वह किसी बड़े खतरे में फंस चुका है. थोड़ी ही देर में उस के मस्तिष्क में अशोक देशमुख के साथ सारे विवाद घूमने लगे. उस ने अशोक के चंगुल से छूटने की कोशिश की. लेकिन उस ने पूरी ताकत से उसे जकड़ रखा था इसलिए छूट नहीं सका. इसी बीच सामने खड़े दोनों व्यक्तियों ने आगे बढ़ कर उसे पकड़ा. उन में से एक ने उस के गले में नायलोन की रस्सी डाल कर कस दी. थोड़ी ही देर में दम घुटने से शिवांग की मौत हो गई.

इस के बाद अशोक देशमुख ने अपने साथियों के साथ मिल कर शिवांग के हाथ और पैर पकड़ कर लाश झाडि़यों के पास डाल दी. फिर अशोक अपने साथियों से बोला, ‘‘तुम लोग यहां रुको, मैं अभी कार ले कर आता हूं.’’

उस के दोनों साथियों में एक बसंत साहू था और दूसरा विक्की उर्फ मोनू देशमुख.

इस पर बसंत साहू ने कहा, ‘‘भैया जल्दी आना, यहां लोग आतेजाते रहते हैं किसी को भी शक हो सकता है.’’

‘‘हां, मैं जल्द ही कार ले कर आता हूं.’’

अशोक तेजी से चला गया. थोड़ी ही देर में अपनी कार ले कर के वहां आ गया और तीनों ने मिल कर शिवांग चंद्राकर के शव को कार की डिक्की में डाल दिया.

अशोक देशमुख कार चलाते हुए झरझरा में हरीश पटेल की खाली पड़ी जमीन पर ले गया. वहां हार्वेस्टर चलने से गड््ढे बने हुए थे. एक गड्ढे में शिवांग की लाश जलाने की व्यवस्था उन्होंने पहले ही कर रखी थी.

वहीं दोनों अन्य आरोपी अपनी मोटर बाइक से आ गए. फिर तीनों ने मिल कर मिट्टी का तेल डाल कर शिवांग चंद्राकर के शव में आग लगा दी. दिसंबर का महीना था. लोग भीषण ठंड के कारण अपनेअपने घरों में दुबके हुए थे. कहीं ऐसे में लोगों को आग जलती हुई दिखती है तो दूसरे लोग यही समझते हैं कि ठंड दूर करने के लिए किसी ने अलाव जला रखा है. यही वजह थी कि जब ये लोग शिवांग के शव को जला रहे थे तो लोगों ने कोई शक नहीं किया. जब आग बुझी तो शिवांग का शव आधा जल चुका था. तब वह उसे मिट्टी से ढक कर अपनेअपने घर चले गए.

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का चंदखुरी गांव अपनी खेतीकिसानी के कारण जिले भर में प्रसिद्ध है. लगभग 3 हजार की जनसंख्या का यह हरित अनुपम गांव शहर से लगा हुआ है. यहां के धनाढ्य लोगों को दाऊजी कह कर सम्मान के साथ संबोधित किया जाता है. अधिकांश लोगों का जीवनयापन खेतीकिसानी और शहर में नौकरी से गुजरबसर करना होता है. 31 वर्षीय अशोक देशमुख गांव की राजनीति करते हुए खेतीकिसानी करता था. हाल ही में हुए ग्राम पंचायत चुनाव में वह सरपंच का चुनाव चंद मतों से हार गया था. जिस का दोषी वह शिवांग चंद्राकर और उस के परिवार को ही मानता था. यही कारण था कि अशोक शिवांग से बदला लेने का मौका ढूंढ रहा था.

उस ने गांव के ही रहने वाले अपने खास दोस्त विक्की उर्फ मोनू देशमुख (20 वर्ष) और बसंत साहू (उम्र 24 वर्ष) जोकि गांव चंद्रपुरी में ही रहते थे, से एक दिन मौका देख कर बात की.

‘‘यार मोनू, आज मैं सरपंच होता, मेरी गांव में अच्छीखासी चलती. दो पैसे कमाता, तुम लोगों को भी हमेशा खिलातापिलाता, मगर एक आदमी की वजह से पूरा प्लान धरा का धरा रह गया.’’

इस पर मोनू और बसंत साहू ने उस की ओर देखा तो मोनू ने कहा, ‘‘भैया, मैं जानता हूं लेकिन अब क्या किया जा सकता है. चुनाव में इस ने तो आप का बैंड बजा दिया.’’

यह सुन कर के अशोक ने कहा, ‘‘अगर तुम लोग मेरे सच्चे दोस्त हो तो मेरा साथ दो, मैं इस को ऐसा सबक सिखाऊंगा कि जिंदगी में कभी हमारा कोई विरोध नहीं करेगा.’’

‘‘क्याक्या करना होगा, बताओ.’’

इस पर विक्की उर्फ मोनू ने गुस्से से भर कर  कहा, ‘‘शिवांग के बड़े भाई धर्मेश ने मुझे थप्पड़ मारा था, इसलिए मैं भी इन से बदला लेना चाहता हूं. मैं तुम्हारे साथ हूं. शिवांग इंजीनियर क्या बन गया है, इस के घर के लोग अपने आप को बड़ा आदमी समझने लगे हैं.’’

यह सुन कर अशोक खुश होते हुए बोला, ‘‘बस, मेरे दोस्त, तुम ने मेरा दिल जीत लिया. मैं एक योजना बनाता हूं और इस को सबक सिखाते हैं.’’

इस पर बसंत साहू  ने कहा, ‘‘हां, क्या है आखिर तुम्हारी योजना, भाई. बताओ?’’

‘‘यह बात है तो सुनो. मेरे दिमाग में बहुत दिनों से एक कीड़ा कुलबुला रहा है. सरपंच चुनाव में तो हार गया हूं. मगर इन से हम 25-50 लाख रुपए वसूल सकते हैं. इस से तुम दोनों की भी जिंदगी बन जाएगी. फिर जिंदगी भर ऐश करोगे.’’

यह सुन कर के दोनों खुशी से उछल पड़े और एक साथ बोले, ‘‘ऐसा है तो हम तुम्हारे साथ हैं जब जैसा कहोगे वैसा करेंगे.’’

7 दिसंबर, 2021 सुबह लगभग 11 बज रहे थे कि थाना पुलगांव के टीआई नरेश पटेल के पास 2 लोग आए.

उन में से एक ने थानाप्रभारी से कहा, ‘‘साहब, मैं दीपराज चंद्राकर हूं और गांव चंदखुरी से आया हूं. मेरा भांजा शिवांग चंद्राकर कल शाम से लापता है उस का कोई पता नहीं चल रहा है.’’ यह कहते दीपराज रोआंसा हो गया. उस की आंखें भर आई थीं. थानाप्रभारी नरेश पटेल मामले की गंभीरता को समझ कर उन्हें भरोसा दिलाते हुए बोले, ‘‘तुम लोग चिंता मत करो, हम पूरी मदद करेंगे. तुम अभी गुमशुदगी दर्ज करवाओ.’’

इस के बाद दीपराज ने शिवांग चंद्राकर की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के पुलिस ने अपने स्तर से इंजीनियर शिवांग को ढूंढना शुरू कर दिया. एक हफ्ता बीत गया था. शिवांग चंद्राकर का कहीं कोई पता नहीं चल रहा था. रिश्तेदारों के यहां मातापिता ने पता किया, मगर शिवांग की कोई जानकारी नहीं मिल रही थी. धीरेधीरे लोगों में आक्रोश पैदा हो रहा था कि पुलिस शिवांग को आखिर क्यों नहीं ढूंढ पा रही है. मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंचा. जब स्थिति बिगड़ने लगी तो पुलिस के आईजी ओ.पी. पाल के निर्देश पर एसएसपी ने केस को गंभीरता से लिया. इस के अलावा उस के पैंफ्लेट छपवा कर बताने वाले को 10 हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा की.

टीम में थानाप्रभारी नरेश पटेल, गौरव तिवारी, एसआई डुलेश्वर सिंह चंद्रवंशी, एएसआई राधेलाल वर्मा, नरेंद्र सिंह राजपूत, समीत मिश्रा, अजय सिंह, हैडकांस्टेबल संतोष मिश्रा, कांस्टेबल जावेद खान, प्रदीप सिंह, जगजीत सिंह, धीरेंद्र यादव, चित्रसेन, केशव साहू, लव पांडे, अलाउद्दीन, हीरामन, तिलेश्वर राठौर को शामिल किया गया. इस सब के बावजूद पुलिस को शिवांग चंद्राकर की गुमशुदगी के बारे में कहीं कोई सुराग नहीं मिल रहा था और पुलिस हाथ पर हाथ धरे मानो बैठी हुई थी कि 5 जनवरी, 2022 को शिवांग चंद्राकर के बड़े भाई धर्मेश चंद्राकर ने थानाप्रभारी को सनसनीखेज जानकारी दी.

धर्मेश ने बताया, ‘‘सर, झरझरी कैनाल रोड के पास एक खेत में एक कंकाल और हड्डियां मिली हैं, टाइमैक्स घड़ी मिली है, जले हुए कपड़े हैं, देख कर लगता है कि यह शिवांग के ही होंगे.’’

थानाप्रभारी नरेश पटेल ने यह जानकारी उच्चाधिकारियों को दी. इस के बाद पुलिस अधिकारी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां खुदाई कर के अस्थियां और एक मानव मुंड बरामद किया. फोरैंसिक विशेषज्ञ मोहन पटेल ने सूक्ष्मता से जांच शुरू की. कंकाल और जले हुए कपड़ों व बालों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता था कि यह आखिर किस का शव है. शिवांग चंद्राकर का पूरा परिवार चिंतित था और लोगों द्वारा यह कयास लगाया जा रहा था कि यह शिवांग का कंकाल और अवशेष हो सकता है.

नरेश पटेल ने उच्चाधिकारियों को जानकारियां दे कर अवशेष की जांच डीएनए हेतु रायपुर भेजने की काररवाई शुरू कर दी.

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इस के साथ ही जिले भर में यह चर्चा होने लगी कि 6 दिसंबर को लापता हुए शिवांग चंद्राकर की जब कोई जानकारी नहीं मिल रही है तो जरूर 5 जनवरी को मिले हुए कंकाल से उस का संबंध हो सकता है. इस संदर्भ में स्थानीय समाचार पत्रों में भी इसी तरह की खबरें प्रकाशित हो रही थीं. और जब डीएनए जांच रिपोर्ट सामने आई तो यह स्पष्ट हो गया कि वह अस्थियां शिवांग की ही हैं. पुलिस के सामने अब इस केस को खोलने की चुनौती थी. इस के लिए 5 जांच टीमें बनाई गईं और आईजी ओ.पी. पाल और एसएसपी बद्रीनारायण मीणा ने पुलिस टीमों के साथ मीटिंग करने के बाद दिशानिर्देश दिए.

पुलिस ने इस केस में करीब 500 लोगों से पूछताछ की. पुलिस ने जोरशोर से विवेचना प्रारंभ कर दी. पुलिस ने इसी दरमियान छत्तीसगढ़ के चंद्रखुरी गांव के रहने वाले अशोक देशमुख से भी पूछताछ की. पुलिस को पता चला था कि सरपंच के चुनाव में अशोक की शिवांग से खटपट हुई थी. लेकिन अशोक खुद को बेकुसूर बताता रहा. पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स की जांच की तो पाया कि उस दिन वह अपने घर में ही था. ऐसे में वह पुलिस की जांच से बाहर हो गया था.

इसी दरमियान एक दिन दूसरे संदिग्ध आरोपी विक्की उर्फ मोनू देशमुख से जब पूछताछ चल रही थी तो वह टूट गया. उस ने पुलिस को बताया कि शिवांग चंद्राकर की हत्या उस ने अशोक देशमुख  और बसंत साहू के साथ मिल कर की थी. पुलिस को उस ने अपने बयान में बताया कि शिवांग चंद्राकर के भाई धर्मेश ने एक विवाद में उसे थप्पड़ जड़ दिया था. जिस का बदला लेने के लिए वह अशोक देशमुख के साथ इस हत्याकांड में शामिल हो गया था. उस ने अपने इकबालिया बयान में यह भी बता दिया कि अशोक देशमुख पिछला पंचायत पंच चुनाव हारने के कारण शिवांग चंद्राकर से बदला लेना चाहता था और उस से 30 लाख रुपए  फिरौती की योजना बनाई थी.

मगर पुलिस की सक्रियता और गांव का सख्त माहौल देखते हुए उन लोगों ने फिरौती की योजना को दरकिनार कर के मौन रहना ही उचित समझा था. यह जानकारी मिलने के बाद तत्परता दिखाते हुए टीआई नरेश पटेल की टीम ने उसी रात अशोक देशमुख और विक्की चंद्राकर को हिरासत में ले लिया और जब इन दोनों से पूछताछ की तो दोनों ही पुलिस जांच के सामने टूट गए और सब कुछ सचसच बयां कर दिया. अशोक देशमुख ने बताया कि पंचायत चुनाव में वह सरपंच का चुनाव लड़ रहा था. मगर शिवांग देशमुख के पिता राजेंद्र देशमुख के कारण वह चुनाव हार गया था.

इस के साथ ही रेगहा में स्थित 15 एकड़ के कृषि फार्महाउस का विवाद भी इस का एक कारण था, जिसे राजेंद्र चंद्राकर ने उस से हथिया लिया था. यहां एक रोचक बात यह भी सामने आई कि जांच में यह पाया गया कि अशोक देशमुख घर पर ही था तो फिर अब कैसे हत्यारा हो गया. पुलिस ने उस की पत्नी रजनी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि पति घर पर ही था. मोबाइल में 7 मिस काल दिखाई दे रही थीं. अब सवाल यह था कि आखिर जब अशोक घर पर था तो पत्नी ने काल क्यों किया था और अशोक ने काल रिसीव क्यों नहीं कीं.

अशोक ने इस संदर्भ में खुलासा करते हुए बताया कि शिवांग चंद्राकर की हत्या के लिए उस ने लंबे समय तक एक योजना बनाई थी कि किस तरह हम हत्या के इस केस से बच सकते हैं और फिरौती भी हासिल कर सकते हैं? इसी तारतम्य में यह सोचीसमझी योजना बनाई गई थी कि हत्या के दिन मोबाइल को घर में रखना है. ताकि कभी पुलिस वेरिफिकेशन हो तो एक नजर में यह माना जाए कि वह तो घर पर ही था. फिर भला हत्या कैसे कर सकता है. इस तरह आरोपियों ने इंजीनियर शिवांग की बाइक पर लिफ्ट ले कर एकांत में गला घोट कर हत्या कर दी थी.

जांच के बाद पुलिस ने हत्याकांड में प्रयुक्त कार, मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली. गला घोटने में प्रयुक्त हुई नायलौन की रस्सी भी आरोपियों की निशानदेही पर बरामद कर ली. तीनों आरोपियों अशोक देशमुख पुत्र रामनारायण देशमुख, विक्की उर्फ मोनू देशमुख और बसंत साहू को भादंवि की धारा 364, 365, 201, 120बी और 302 के तहत मामला दर्ज कर के 10 फरवरी, 2022 को गिरफ्तार कर लिया और अगले दिन 11 फरवरी को उन्हें मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, दुर्ग, छत्तीसगढ़ के समक्ष पेश किया.

जहां मामले की गंभीरता को देखते हुए मजिस्ट्रैट ने तीनों आरोपियों को जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों और चर्चा पर आधारित

Crime News : क्या मिला प्रियंका तनेजा को हनीप्रीत बनकर

Crime News : प्रियंका तनेजा को भले ही कम लोग जानते हैं, लेकिन हनीप्रीत की चर्चा आज घरघर में हो रही है. हनीप्रीत का नाम लेते ही मेकअप से लकदक जो लुभावना चेहरा आंखों के सामने आता है, वह दुष्कर्म के जुर्म में 20 साल की सजा पाए कथित संत गुरमीत राम रहीम द्वारा बनाई गई फिल्मों की नायिका ही नहीं, उन की सहनिर्देशक एवं सहनिर्मात्री भी थी. लेकिन सब के बीच बाबा गुरमीत राम रहीम उसे अपनी दत्तक पुत्री कहते थे.

बाबा के जेल जाते ही हनीप्रीत अचानक गायब हो गई. कई राज्यों की पुलिस उस की तलाश में मारीमारी फिरती रही, पर उस के बारे में पता नहीं कर सकी. उस के नेपाल में होने की आशंका पर वहां भी उस की तलाश की गई, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. उसी बीच वकील प्रदीप कुमार आर्य ने हनीप्रीत की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में 25 सितंबर, 2017 को एक याचिका दाखिल की, जिस में हनीप्रीत 3 सप्ताह की अंतरिम ट्रांजिट जमानत मांग रही थी. इस याचिका में उस ने कहा था कि उस की जान को खतरा है. इस याचिका में उसे अदालत में पेश न होने की अनुमति मिल गई थी.

26 सितंबर की सुबह साढ़े 10 बजे वकील प्रदीप कुमार आर्य ने कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल के सम्मुख पेश हो कर कहा था कि उन की मुवक्किल हनीप्रीत को जान का खतरा है, इसलिए उन्हें 3 सप्ताह के लिए अंतरिम ट्रांजिट जमानत दी जाए. अदालत द्वारा जब पूछा गया कि हनीप्रीत को किस से जान का खतरा है तो वकील प्रदीप कुमार आर्य ने बताया, ‘‘ड्रग माफिया से. वे हनीप्रीत को ढूंढ रहे हैं और मिलते ही उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं.’’

‘‘पर पूरा देश तो यह जानना चाहता है कि हनीप्रीत कहां है? सिंगल बेंच आप के मामले की सुनवाई करेगा. सब को नोटिस भेजे जा चुके हैं.’’ यह कहते हुए जस्टिस गीता मित्तल ने वकील प्रदीप कुमार आर्य को फारिग कर दिया. दोपहर बाद पौने 3 बजे जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल की अदालत में इस मामले की सुनवाई शुरू हुई. दिल्ली पुलिस की ओर से स्टैंडिंग काउंसिल राहुल मेहरा, एपीपी अनिल अहलावत, वकील जैमल अख्तर तथा हरियाणा सरकार की ओर से एएजी अनिल ग्रोवर, वकील नूपुर सिंघल के साथ पेश हुए. वकील प्रदीप कुमार आर्य के साथ उन के आधा दरजन से ज्यादा सहयोगी वकील भास्कर भारद्वाज,राजकरन शर्मा, कपिल ढाका, राणा कुनाल, अमरेश आनंद, अश्विन कालरा और के.के. छाबड़ा आए थे.

बहस शुरू होते ही वकील प्रदीप कुमार आर्य ने अदालत के सामने दलील रखी कि हनीप्रीत के खिलाफ कोई सबूत नहीं है, सिर्फ बयानों से कोई अपराधी नहीं बन जाता. वह एक शांतिप्रिय और कानून को मानने वाली नागरिक है. ड्रग माफिया से उसे पहले से ही खतरा था और अब उस पर ये आरोप लगा दिए गए हैं. इस के जवाब में राहुल मेहरा ने कहा, ‘‘किसी भी आरोपी की मदद करना ठीक नहीं है. हनीप्रीत तो कहती है कि उस के पिता भगवान हैं, फिर उसे खतरा किस बात का है?’’

अनिल ग्रोवर का कहना था कि हनीप्रीत को सिर्फ अपनी गिरफ्तारी का खतरा है, बाकी उसे किसी से कोई खतरा नहीं है. उस पर पंचकूला में हिंसा करवाने का गंभीर आरोप है, इसीलिए पुलिस उस की तलाश कर रही है. दोनों तरफ की दलीलें सुन कर जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल ने कहा कि जमानत देने के बाद भी हनीप्रीत को पंजाब अथवा हरियाणा की कोर्ट में जाना पड़ेगा. इसलिए वह सीधे वहीं क्यों नहीं जाती. जाने में 4 घंटे तो ही लगेंगे. आत्मसमर्पण ही उस के लिए सब से आसान रास्ता है. कोर्ट ने हनीप्रीत की जमानत याचिका पर कोई फैसला सुनाने के बजाय उसे रिजर्व कर लिया. हनीप्रीत का क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा उस के बारे में जान लेते हैं.

कौन है हनीप्रीत हनीप्रीत का असली नाम प्रियंका तनेजा उर्फ अनु था. सन 1975 में वह रामानंद तनेजा के घर पैदा हुई थी. हरियाणा के नगर फतेहाबाद के जगजीवनपुरा के रहने वाले रामानंद का नैशनल हाइवे पर किसान टायर्स नाम से शोरूम था. रामानंद के पिता यानी प्रियंका के दादाजी सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के प्रबल अनुयायी थे और नियमित वहां जाते थे. धीरेधीरे इस परिवार के सभी लोग डेरा से जुड़ गए. हनीप्रीत भी घर वालों के साथ डेरे पर जाती थी. जल्दी ही प्रियंका डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम इंसां की करीबी बन गई. बाबा उसे पसंद करते थे, इसलिए उसे खुश करने की कोशिश करते रहते थे. उसी बीच बाबा ने उसे अपनी दत्तक पुत्री घोषित कर के उस का नया नाम रखा हनीप्रीत इंसां.

सन 1999 में बाबा ने डेरा के ही एक अनुयायी के बेटे विश्वास गुप्ता से हनीप्रीत की शादी करा दी. बाबा जहां हनीप्रीत को अपनी दत्तक पुत्री कहते थे, वहीं विश्वास गुप्ता को बेटा कहते थे. जबकि विश्वास गुप्ता का कहना है कि उस के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था. कहने को हनीप्रीत उस की ब्याहता थी, लेकिन उस के बाबा गुरमीत राम रहीम से संबंध थे. विश्वास गुप्ता के अनुसार, बाबा ने एक दिन कहा कि डेरे के खास लोगों के साथ वह ‘बिग बौस’ खेलेंगे. उस में बाबा के परिवार के भी लोग शामिल थे. हनीप्रीत और विश्वास गुप्ता खास लोगों में थे, इसलिए उन्हें भी शामिल किया गया था. खेल की शर्तों में था कि खेल में जिस से भी कोई गलती होगी, उसे बाबा की गुफा में बैठ कर उन के नाम का जाप करना होगा.

विश्वास गुप्ता का कहना है कि हनीप्रीत जानबूझ कर गलती करती और नियम के अनुसार बाबा की गुफा में चली जाती, जहां से एक रास्ता बाबा के बैडरूम तक जाता था. इस तरह वह जानबूझ कर गलतियां कर रही थी, जिस की वजह से उसे घंटों गुफा में रहना पड़ता था. जब हनीप्रीत हो गई बाबा गुरमीत राम रहीम की विश्वास गुप्ता के बताए अनुसार, उसे हनीप्रीत की इन हरकतों से लगा कि कहीं बाबा और उस के बीच कोई खिचड़ी तो नहीं पक रही है. लेकिन उस समय वह किसी से कुछ कहने की स्थिति में नहीं था. क्योंकि उस ने अपनी आंखों से कुछ गलत देखा भी नहीं था, इसलिए कुछ कहना उचित भी नहीं था. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि जब तक वह अपनी आंखों से ऐसा कुछ देख नहीं लेता, तब तक वह किसी से कुछ नहीं कहेगा.

विश्वास गुप्ता के अनुसार, डेरे में खेले गए बिग बौस का शो समाप्त होतेहोते हनीप्रीत पूरी तरह बाबा गुरमीत राम रहीम की हो गई थी. कहने को सोती वह उस के साथ थी, लेकिन रात में गुप्त दरवाजे से निकल कर वह बाबा के पास पहुंच जाती थी. पूरी रात बाबा के पास बिता कर वह सुबह उस के पास आ जाती थी. न चाहते हुए भी विश्वास गुप्ता ने एक दिन इस बारे में हनीप्रीत से पूछ लिया तो उस ने तुनक कर जवाब दिया कि पिताजी की तबीयत ठीक नहीं रहती, इसलिए वह उन की सेवा के लिए जाती है. इस के बाद उस ने उसे धमकी दी कि अगर उस ने उस पर इस तरह बेवजह शक किया तो वह पिताजी से यह बात बता देगी. उस के बाद वह उसे जान से मरवा देंगे.

बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसां के कहने पर विश्वास गुप्ता डेरे पर ही रहने लगा था. बाबा हनीप्रीत को बेटी कहता था, इसलिए विश्वास गुप्ता को दामाद कहता था. उसे डेरे में कहीं भी घूमनेफिरने की पूरी आजादी थी. यहां तक कि वह बाबा की गुफा में भी बिना अनुमति के आजा सकता था. इस से उसे बाबा की कई करतूतों की जानकारी हो गई थी. बाबा ने अपने बैडरूम के बगल वाले कमरे को विश्वास गुप्ता का बैडरूम बनवा दिया था. इन दोनों कमरों के बीच एक गुप्त दरवाजा था, जिस से रात में हनीप्रीत बाबा के बैडरूम में चली जाती थी. विश्वास गुप्ता अपने बैडरूम में करवटें बदलते हुए रात बिताता था.

दूसरी ओर उस की ब्याहता बाबा के साथ मौजमस्ती कर रही होती. एक रात विश्वास गुप्ता हिम्मत कर के बाबा के बैडरूम में चला गया तो दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. बस, उसी दिन के बाद विश्वास गुप्ता के बुरे दिन शुरू हो गए. उस से साफ कह दिया गया कि जैसा चल रहा है, आगे भी वैसा ही चलता रहेगा. आंखें मूंद कर उसे चुपचाप यह सब सहन करना होगा. अगर उस ने इस बारे में किसी से कुछ कहा या विरोध जताने की कोशिश की तो यह उस के लिए ठीक नहीं होगा. उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं. विश्वास गुप्ता हनीप्रीत का पति था. पत्नी की हरकतें उस के लिए बरदाश्त से बाहर थीं.

न चाहते हुए भी हलकाफुलका ही सही, हनीप्रीत और बाबा के संबंधों पर वह अंगुली उठाने लगा. फिर क्या था, उसे परेशानियों ने घेरना शुरू कर दिया. उसे जान का खतरा भी महसूस होने लगा. ऐसे में उसे हनीप्रीत से भी ज्यादा परिवार की चिंता सताने लगी. उस के पिता का अच्छाखासा चलता कारोबार था, जिसे बाबा ने बिकवा कर करोड़ों की सारी रकम अपने डेरे में निवेश करवा दी थी. उस के बाद उस के घर वाले घरबार बेच कर डेरा सच्चा सौदा में ही रहने लगे थे. डेरे की बदली स्थिति देख कर विश्वास गुप्ता हनीप्रीत को वहीं छोड़ कर किसी तरह अपने मांबाप के साथ डेरे से निकलने में कामयाब हो गया. पंचकूला में किराए का मकान ले कर एक बार फिर व्यवस्थित होने की कोशिश करने लगा. भले ही वह पंचकूला आ गया था, लेकिन हनीप्रीत ने उस का पीछा नहीं छोड़ा.

हनीप्रीत ने विश्वास गुप्ता के खिलाफ ही नहीं, उस के पूरे परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा के अलावा डेरे की ओर से डीफेमेशन व चैक बाउंस के मुकदमे दर्ज करवा दिए गए. विश्वास गुप्ता द्वारा बताए अनुसार, इन मुकदमों में जब वह विचाराधीन कैदी के रूप में पटियाला की सैंट्रल जेल में बंद था तो बाबा गुरमीत राम रहीम ने 10 लाख रुपए की सुपारी दे कर उसे जेल में मरवाने की कोशिश की थी. लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में जेल में बंद बलवंत सिंह राजोआना ने उसे बचा लिया था.

विश्वास गुप्ता उस से अकसर बातें किया करता था. उसे विश्वास के बारे में सारी जानकारी थी. उसे पता था कि बाबा गुरमीत राम रहीम ने उस की पत्नी को हथिया कर उसे झूठे आरोपों में फंसा कर जेल भिजवा दिया है. जेल में अपराधी गिरोहों को 10 लाख रुपए की सुपारी दे कर उस की हत्या की कोशिश चल रही है. इसलिए यह बात उस ने जेलर को तो बता ही दी थी. यही नहीं, उस ने विश्वास गुप्ता की जान भी बचाई. बाबा के 10 लाख रुपए भी वापस भिजवा दिए गए थे.

हनीप्रीत ने बरबाद कर दिया ससुराल वालों को विश्वास गुप्ता ने जो बताया, उस के अनुसार, इस के बाद भी हनीप्रीत और बाबा गुरमीत राम रहीम ने ऐसेऐसे हथकंडे अपनाए कि वह परिवार के साथ बुरी तरह टूट गया. बाबा उन की करोड़ों की संपत्ति तो डकार ही गया था, झूठे मुकदमे दर्ज करवा कर सभी को खूब प्रताडि़त भी करवाया. विश्वास गुप्ता ने पत्नी हनीप्रीत को कभी कुछ नहीं कहा था, इस के बावजूद उस ने उस के परिवार को तरहतरह की धमकियां दे कर खूब परेशान किया.

डेरे के कोप से बचने के लिए विश्वास गुप्ता के सामने 2 शर्तें रखी गईं. पहली शर्त यह थी कि सत्संग के वक्त वह अपने परिवार को ले कर डेरे में आएगा और वह और उस के पिता डेरे के लाखों श्रद्धालुओं के सामने रोते हुए बाबा गुरमीत राम रहीम से माफी मांगेंगे. दूसरी शर्त यह थी कि वह हनीप्रीत से तलाक ले लेगा. यह सन 2009 की बात है. विश्वास गुप्ता ने बाबा की ये दोनों ही शर्तें मानते हुए परिवार के साथ डेरे में जा कर बाबा से माफी भी मांगी और हनीप्रीत को तलाक भी दे दिया. इस के बाद उसे और उस के परिवार को डेरे की ओर कभी न देखने की चेतावनी दे कर भगा दिया गया था.

इस के बाद हनीप्रीत और उस का परिवार डेरे में ही रहने लगा था. उस के पिता रामानंद ने बेटे साहिल के साथ मिल कर सीड्स प्लांट का कारोबार शुरू कर दिया. हनीप्रीत की छोटी बहन निशा की शादी फतेहाबाद निवासी संजू बजाज से हुई तो डेरे की ओर से इस शादी में उम्मीद से बढ़ कर मदद की गई. कहते हैं, धीरेधीरे हनीप्रीत इस तरह बाबा की चहेती बन गई कि डेरा में बाबा के बाद उसी का हुक्म चलता था. बाबा के परिवार में भी अगर किसी को किसी चीज की जरूरत होती थी तो वह बिना हनीप्रीत की अनुमति के नहीं मिलती थी. पैसों तक के लिए उन्हें हनीप्रीत के सामने हाथ फैलाने पड़ते थे.

बाबा गुरमीत राम रहीम जहां अपने घर वालों से भी कम मिलते थे, वहीं हनीप्रीत हमेशा उन के साथ रहती थी. बाबा जब फिल्में बनाने लगे तो हनीप्रीत को उन फिल्मों की नायिका बनाने के साथसाथ उन की सहनिर्देशक और सहनिर्मात्री भी बनाया गया. कैटरीना कैफ बनने के सपने देख रही थी हनीप्रीत कहा जाता है कि हनीप्रीत खुद को परदे पर अभिनय करते हुए देखने को बेताब थी. वह कैटरीना कैफ बनने के सपने देख रही थी. उस की इसी इच्छा पूरी करने के लिए बाबा ने फिल्में बनाई थीं. कहते हैं, हनीप्रीत ने ही बाबा के मन में यह बात बैठा दी थी कि वह इतना बढि़या अभिनय करते हैं कि बड़ेबड़े फिल्मी सितारे उन के सामने बेकार हैं. इसी के बाद करोड़ों रुपए खर्च कर के बाबा फिल्में बनाने लगे थे.

बाबा अकसर हनीप्रीत को साथ ले कर मुंबई जाते थे,जहां दोनों ने कई फिल्मी सितारों से अच्छे रिश्ते बना लिए थे. उन के हिसाब से सब बहुत बढि़या चल रहा था. धार्मिक डेरे के नाम पर उन्होंने अपना ऐसा साम्राज्य स्थापित कर लिया था, जहां राजाओंमहाराजाओं जैसी सुखसुविधाएं उपलब्ध थीं. उन्हें लगता था कि जल्दी फिल्म इंडस्ट्री में भी उन की तूती बोलने लगेगी. हनीप्रीत नायिका के रूप में सलमान खान के साथ एक ऐसी फिल्म में आना चाहती थी, जो तमाम भव्यता से बनाई जाए. उसे अपना यह सपना जल्दी पूरा होता भी नजर आ रहा था. क्योंकि इस फिल्म में बाबा गुरमीत राम रहीम को ही पैसा लगाना था, जो अकूत संपत्ति के मालिक तो थे ही, वह फिल्म पर पैसा लगाने को भी तैयार थे.

लेकिन एक बात यह भी सच है कि इंसान जैसे कर्म करता है, उसे वैसे ही फल भी भोगने पड़ते हैं. अपने बारे में ये लोग कुछ भी कहते रहे, पर सच्चाई यह थी कि इन के बुरे दिन शुरू हो गए थे. लोग कहने भी लगे थे कि बाबा गुरमीत राम रहीम ने जिंदगी में जो बुरे कर्म किए हैं, अब उन्हें उन का परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो जाना चाहिए.

ऐसा ही हुआ भी. बाबा के खिलाफ चल रहे कई आपराधिक मामलों में डेरे की 2 साध्वियों से दुष्कर्म वाला मामला अंतिम चरण में था. 25 अगस्त, 2017 को 100 से ज्यादा गाडि़यों के काफिले के साथ बाबा पंचकूला पहुंचे तो हनीप्रीत भी उन के साथ थी. बाबा को अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद पंचकूला में दंगे भड़क उठे. इस बीच बाबा को एक हेलीकौप्टर में बिठा कर रोहतक की सुनारिया जेल ले जाया गया तो हनीप्रीत भी उन के साथ हेलीकौप्टर से गई थी.

रात में वह सफेद रंग की कार नंबर एचआर 26बीएस 5426 पर कुछ लोगों के साथ सवार हो कर सिरसा के लिए चल पड़ी थी. यहां तक अधिकांश लोगों को उस के बारे में यही जानकारी थी कि वह बाबा गुरमीत राम रहीम की मुंहबोली बेटी थी और अदालत से अनुमति ले कर अपने कथित पिताजी के साथ उन्हें जेल तक छोड़ने गई थी. लेकिन इस के बाद हनीप्रीत का नाम रोज ही चर्चा में आने लगा. इस की वजह यह थी कि सिरसा स्थित डेरे पर पहुंचने के बाद वह गायब हो गई थी. दरअसल, बाबा की गिरफ्तारी के बाद पंचकूला में भड़के दंगों के आरोप में मुकदमे दर्ज कर के पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि इन दंगों के पीछे डेरे के कुछ प्रमुख लोगों के अलावा मुख्यरूप से हनीप्रीत का हाथ था.

लिहाजा पुलिस की वांछित सूची में हनीप्रीत का नाम सब से ऊपर था. इस मामले की तह में जाने के लिए पुलिस की एसआईटी का गठन किया गया. 21 सितंबर को इस टीम के कुछ सदस्यों ने सिरसा जा कर डेरे पर छापा मार कर हनीप्रीत के बारे में जानकारियां जुटाने का प्रयास किया तो पता चला कि वह वहां रुकी तो थी, लेकिन पुलिस के आने से पहले ही निकल गई थी. पकड़े गए आरोपियों से पूछताछ में पता चला था कि इस दंगे की प्लानिंग पहले ही हो चुकी थी. डेरा ने 8 दिनों पहले ही पंचकूला का सर्वे करा लिया था. इसे ले कर कुल 10 मीटिंग हुई थीं.

23 सितंबर तक पंचकूला में हुई हिंसा को ले कर साढ़े 11 सौ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी थी. लेकिन हनीप्रीत के बारे में कहीं से कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिल रही थी. उसी दिन बौलीवुड अदाकारा राखी सावंत के भाई राकेश सावंत ने सार्वजनिक रूप से खुलासा किया कि हनीप्रीत अब जिंदा नहीं है. चूंकि वह बाबा गुरमीत राम रहीम के कई राज जानती थी, इसलिए बाबा ने उसे मरवा दिया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द की हनीप्रीत की जमानत याचिका हरियाणा के डीजीपी बी.एस. संधू को पूरी उम्मीद थी कि हनीप्रीत जल्दी ही पकड़ी जाएगी. उन्होंने संकेत भी दिया था कि अगर वह पकड़ी न गई तो पुलिस उसे भगोड़ा घोषित कर देगी.

25 सितंबर को बाबा की ओर से उस के वकीलों ने सीबीआई द्वारा सुनाई 20 साल कैद की सजा को पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी. उसी दिन बाबा गुरमीत राम रहीम के बेटे जसमीत की पत्नी खुशप्रीत के ममेरे भाई भूपेंद्र सिंह गोरा ने हनीप्रीत की सूचना देने वाले को 5 लाख रुपए रकद ईनाम देने की घोषणा कर दी. उसी दिन दिल्ली के हाईकोर्ट में हनीप्रीत की ओर से 3 हफ्ते का ट्रांजिट बेल हासिल करने की याचिका दायर कर दी गई, जिस पर  26 सितंबर को सुनवाई हुई. जस्टिस संगीता ढींगरा सहगल ने दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया.

रात में पौने 8 बजे सुनाए अपने फैसले में सक्षम न्यायाधीश ने हनीप्रीत को अंतरिम ट्रांजिट बेल देने की याचिका रद्द कर दी. उस की ओर से दी जाने वाली एक भी दलील को अदालत ने नहीं माना. उन्होंने कहा कि अगर हनीप्रीत खुद को कानून की इज्जत करने वाला मानती है तो आगे आ कर जांच में मदद करे.  पर हनीप्रीत तो शायद दूसरी मिट्टी की बनी थी. वह छिपतीछिपाती दिल्ली के लाजपतनगर स्थित वकील प्रदीप कुमार आर्य के औफिस पहुंच गई और वहां 2 घंटे तक रुकी पर आत्मसमर्पण नहीं किया. वह अच्छी तरह जानती थी कि पुलिस ने कुछ लोगों के साथ उस का भी गिरफ्तारी वारंट हासिल कर लिया है. किसी बात की चिंता किए बगैर हनीप्रीत ट्रांजिट बेल की अर्जी रद्द होने के बाद एक बार फिर अंडरग्राउंड हो गई.

3 अक्तूबर की सुबह अचानक ‘आजतक’ टीवी चैनल पर उस का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू शुरू हुआ, जो दिन भर बारबार दिखाया जाता रहा. यह भी बताया गया कि पिछली रात साढ़े 11 बजे हनीप्रीत का इंटरव्यू करने के लिए आजतक के औफिस में इस निर्देश के साथ फोन आया कि इंटरव्यू की खातिर सिर्फ एक रिपोर्टर व एक फोटोग्राफर ही बताई गई जगह पर पहुंचेंगे. रिपोर्टर सतिंदर चौहान अपने कैमरामैन के साथ तय जगह पर पहुंच गए, जहां उन के चेहरों पर काले मास्क चढ़ा कर उन्हें दूसरी गाड़ी में बैठा कर ले जाया गया. जहां इन के चेहरों से मास्क हटाया गया तो वहां हनीप्रीत मौजूद थी.

बिना मेकअप के हनीप्रीत पहचान में नहीं आ रही थी. साक्षात्कार में ज्यादातर रोते हुए वह खुद को निर्दोष साबित करने की कोशिश कर रही थी. इंटरव्यू के अंत में रिपोर्टर ने उसे सलाह दी कि 38 दिनों से वह जो लुकाछिपी का खेल खेल रही है, उस के लिए बेहतर यही है कि वह आत्मसमर्पण कर दे. जब हनीप्रीत चढ़ी पुलिस के हत्थे पर हनीप्रीत ने ऐसा नहीं किया. अब तक वह नेपाल सहित 7 राज्यों की पुलिस को गच्चा दे चुकी थी. उसका सोचना था कि पुलिस उस तक पहुंच नहीं पाएगी. लिहाजा शिमला रोड पर पंचकूला को पार कर के पटियाला जाने के लिए वह जीरकपुर क्रौस कर गई. 3 अक्तूबर की दोपहर को वह जीरकपुर से थोड़ा आगे गई थी कि पंचकूला पुलिस के हत्थे चढ़ गई. उस समय उस के साथ एक अन्य महिला थी. वह बठिंडा की सुखप्रीत कौर थी, जिस का पति हनीप्रीत का ड्राइवर था.

शुरुआती पूछताछ में हनीप्रीत बस एक ही बात कहती रही कि उसे कुछ याद नहीं है और वह तथा बाबा गुरमीत राम रहीम निर्दोष हैं. अगले दिन उसे सीजेएम की अदालत पर पेश कर के 6 दिनों के कस्टडी रिमांड पर लिया गया. लेकिन पुलिस उस से कुछ भी उगलवा नहीं सकी. 3 दिनों का रिमांड और बढ़ाया गया. आखिर हनीप्रीत टूट गई और उस ने माना कि बाबा गुरमीत राम रहीम को छुड़ा कर भगाने की खातिर ही पंचकूला में दंगा करवाने की योजना बनाई गई थी, जिस में वह भी शामिल थी.

दरअसल, पहले तो उन्हें लगता ही नहीं था कि दुष्कर्म के आरोप में बाबा को सजा होगी. उस ने अपने इंटरव्यू में कहा था कि वे तो यह सोच कर चले थे कि खुशीखुशी पंचकूला जाएंगे और खुशीखुशी लौट आएंगे. लेकिन उन्हें इस बात की भी आशंका थी कि अगर अदालत ने बाबा को दोषी ठहराते हुए जेल भेज दिया तो बड़ी बदनामी होगी. इसी आशंका के तहत जो योजना बनाई गई, उस का संचालन हनीप्रीत और कुछ अन्य लोगों को करना था. इस संबंध में डेरे के अंदर कई बैठकें हुईं. 17 अगस्त, 2017 को जो अंतिम निर्णय लिया गया, उस के लिए 5 करोड़ रुपए मुहैया कराए गए.

योजना के अनुसार, 25 अगस्त को पंचकूला की सीबीआई कोर्ट के पास लाखों लोगों को इकट्ठा करना था. उन लोगों को यही कहना था कि वे अपने गुरुजी के दर्शन को आए हैं. चूंकि सभी लोग खाली हाथ रहेंगे, इसलिए धार्मिक भावना के चलते उन से ज्यादा टोकाटाकी नहीं होगी. आने वालों को प्रति व्यक्ति एक हजार रुपए अदा करना था. अगर बाबा बरी हो जाते तो वे बाबा की जयकार करते हुए उन्हें ट्राइसिटी में घुमाते. लेकिन अगर कहीं अदालत बाबा को दोषी करार देते हुए गिरफ्तार करने का आदेश देती तो वे हंगामा शुरू कर देते.

पुलिस इन्हें संभालने लगती तो उसी बीच हथियारों से लैस गुंडे आ कर बाबा को छुड़ा ले जाते. उन गुंडों को मोटी रकम दी गई थी. पूछताछ में हनीप्रीत ने माना कि दंगा करवाने के लिए उस ने उन्हें सवा करोड़ रुपए एडवांस दिए थे. असलियत सामने लाने के लिए पुलिस हनीप्रीत का ब्रेन मैपिंग करवाना चाहती है. कस्टडी रिमांड के दौरान 8 अक्तूबर को हनीप्रीत ने करवाचौथ का व्रत रखा. यह व्रत किस के लिए रखा, इस बारे में उस ने किसी को कुछ नहीं बताया. बाद में पता चला कि दोपहर में ही उस ने व्रत तोड़ कर खाना खा लिया था.

हनीप्रीत ने बनाई थी दंगे की योजना पुलिस पूछताछ में हनीप्रीत ने 10 अक्तूबर को बताया कि बाबा को दोषी करार दिए जाने से पहले ही समर्थक पंचकूला पहुंचने लगे थे. वहां से वीडियो बना कर हनीप्रीत को भेजी जाती रही. हनीप्रीत देखती रही कि कहां समर्थक ज्यादा हैं और कहां लोगों को व्यवस्थित करना है. इस के बाद वह दोबारा वीडियो बना कर उसे वायरल करती.

इस तरह दिन में 10-12 वीडियो बनवाए जाते थे. हनीप्रीत ने माना कि दुनिया से हिंदुस्तान का नक्शा मिटाने का वीडियो बना कर उसी ने वायरल किया था. उस की निशानदेही पर पुलिस ने कई दस्तावेज बरामद किए. सिरसा डेरे से उस का निजी मोबाइल और लैपटौप भी बरामद किया गया. एक बार डेरे की चेयरपरसन विपासना इंसां को भी हनीप्रीत के सामने बैठा कर साढ़े 4 घंटे तक पूछताछ की गई.

सुनारिया जेल, रोहतक से निकल कर पहले वह सिरसा स्थित डेरे पर आई और वहां तमाम दस्तावेज नष्ट कर के वह कुछ दस्तावेजों और धनदौलत के साथ राजस्थान से ले कर नेपाल तक कई स्थानों पर छिपती रही. उस ने ज्यादातर समय बठिंडा में अपने ड्राइवर की पत्नी सुखदीप कौर के यहां बिताया, जो आखिर तक उस के साथ रही और दोषी को पनाह देने के आरोप में गिरफ्तार की गई. अन्य आरोपों के अलावा हनीप्रीत पर देशद्रोह का केस भी दर्ज है.

13 अक्तूबर को कस्टडी रिमांड की समाप्ति पर हनीप्रीत और सुखदीप कौर को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में अंबाला की सैंट्रल जेल भेज दिया गया. हनीप्रीत अदालत से रोरो कर एक ही गुहार लगाती रही कि उसे कहीं और न भेज कर बाबा गुरमीत राम रहीम वाली जेल में भेजा जाए. उसी बीच खबर आई कि 16 अक्तूबर को बाबा गुरमीत राम रहीम के परिवार के लोग उस से मिलने सुनारिया जेल पहुंचे तो बाबा अपनी पत्नी हरजीत कौर से मिल कर फूटफूट कर रोया. उस के बाद परिवार के अन्य सदस्यों से मिला. उस की दाढ़ी और सिर के बाल सफेद हो चुके थे. चेहरे पर झुर्रियां भी झलकने लगी थीं.

18 अक्तूबर को डीजीपी (जेल) के.पी. सिंह से अनुमति ले कर हनीप्रीत के पिता रामानंद तनेजा, मां आशा तनेजा, भाई साहिल तनेजा, भाभी सोनाली और कजिन सिद्धार्थ सिंगला उस से मिलने अंबाला की जेल पहुंचे. यहां हनीप्रीत को जेल की .32 चक्की की 11 नंबर सैल में कड़ी सुरक्षा में रखा गया था. मिठाई और मोमबत्ती ले कर वहां पहुंचे घर वालों से उस की मुलाकात कांच के मोटे शीशे के पीछे से और बातचीत इंटरकौम पर करवाई गई.

हनीप्रीत से की गई पूछताछ के आधार पर गिरफ्तार हो रहे हैं लोग हनीप्रीत द्वारा की गई पूछताछ के आधार पर लगभग रोज ही किसी न किसी को गिरफ्तार किया जा रहा है. 19 अक्तूबर को गिरफ्तार किए गए डेरे से जुड़े 2 लोगों सी.पी. अरोड़ा और लालचंद ने पूछताछ में बताया कि बिगड़ते हालात को देख कर जब सरकार ने इंटरनेट बंद करने के आदेश दिए तो उन लोगों ने 100 वायरलैस सैट मंगवा लिए थे, जिन की फ्रीक्वेंसी कई किलोमीटर की एरिया में काम करती थी.

पंचकूला के सैक्टर-3 में एक कंट्रोल रूम बनाया गया था, ताकि संदेश आराम से फ्लैश हो सके. इन सेटों के इस्तेमाल के लिए एक खास टीम लगाई गई थी, जो उन लोगों से संपर्क करती थी, जिन्हें 17 अगस्त को डेरा में हुई विशेष मीटिंग के दौरान हनीप्रीत और डेरा के डा. आदित्य इंसां ने जिम्मेदारियां सौंपी थीं. ऐसे ही एक सेट से सी.पी. अरोड़ा ने सैक्टर 2 और 4 की डिवाइडिंग रोड पर दंगा भड़काने का संदेश प्रसारित करवाया था.

उसी के बाद ढकौली की ओर जाने वाले हाईवे पर इकट्ठा हुए लोगों को पता चला था कि बाबा को दोषी करार दे दिया गया है. इस के बाद बाबा के समर्थकों की भीड़ भड़क उठी थी, जिस में आ मिले असामाजिक तत्वों ने भयंकर गुंडागर्दी शुरू कर दी थी. पकड़े गए लोगों के अनुसार, हनीप्रीत के निर्देश पर सारा काम प्लानिंग के अनुसार किया गया था. अगर उन की यह योजना सफल हो जाती तो आज बाबा गुरमीत राम रहीम जेल में न होता. हनीप्रीत भी खुला घूम रही होती.

हनीप्रीत के घर के कुछ लोगों को आज इस बात का भारी अफसोस है कि उन की सीधीसादी और भोलीभाली प्रियंका तनेजा ने हनीप्रीत बन कर खुद को परेशानियों के दलदल में झोंक दिया है. शादी के बाद उस ने घर संभाल रखा होता तो आज वह जवान हो रहे बच्चों की मां होती. चमकदमक के चक्कर में फंसी हनीप्रीत ने हमदर्दी वाला कोई काम नहीं किया. ? Crime News

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2017