True Crime Story: जाल में फंसी कुसुमलता – परिवार बना मोहरा

True Crime Story: पहली अप्रैल, 2021 को सुबह के करीब पौने 8 बज रहे थे. राजस्थान के अलवर जिले के बहरोड़ थाने  के थानाप्रभारी विनोद सांखला को फोन पर सूचना मिली कि जखराना बसस्टैंड के पास एक बाइक और स्कौर्पियो गाड़ी की भिड़ंत हो गई है. सूचना मिलते ही विनोद सांखला पुलिस टीम ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर काफी भीड़ जमा थी. पुलिस को देखते ही भीड़ थोड़ा हट गई. पुलिस ने देखा कि वहां एक व्यक्ति की दबीकुचली लाश सड़क पर पड़ी थी. थोड़ी दूरी पर मृतक की मोटरसाइकिल गिरी पड़ी थी.

घटनास्थल पर प्रत्यक्षदर्शियों ने पुलिस को बताया कि नीमराना की तरफ से स्कौर्पियो गाड़ी आई थी. स्कौर्पियो में सवार लोगों ने जानबूझ कर मोटरसाइकिल को टक्कर मारी थी. बाइक सवार स्कौर्पियो की टक्कर से उछल कर दूर जा गिरा. तब स्कौर्पियो यूटर्न ले कर आई और बाइक से गिरे युवक को कुचल कर चली गई. गाड़ी के टायर युवक के सिर से गुजरे तो सिर का कचूमर निकल गया. जब स्कौर्पियो सवार निश्चिंत हो गए कि बाइक सवार की मौत हो गई है, तब वे वापस उसी रोड से भाग गए.

वहां मौजूद लोगों ने थानाप्रभारी विनोद सांखला को बताया कि यह दुर्घटना नहीं बल्कि हत्या है. स्कौर्पियो में सवार अज्ञात लोगों ने बाइक सवार को जानबूझ कर टक्कर मार कर हत्या की है. थानाप्रभारी ने घटना की खबर उच्च अधिकारियों को दे दी. खबर पा कर बहरोड़ के सीओ और एसडीएम घटनास्थल पर आ गए. बाइक सवार युवक की पहचान कृष्णकुमार यादव निवासी भुंगारका, महेंद्रगढ़, हरियाणा के रूप में हुई.

कृष्णकुमार यादव वर्तमान में राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय जखराना में अपर डिविजन क्लर्क के पद पर कार्यरत था. कृष्णकुमार के एक्सीडेंट होने की खबर पा कर विद्यालय के प्रधानाचार्य ने बताया कि कृष्णकुमार यादव अपने पिताजी की औन ड्यूटी मृत्यु होने पर उन की जगह मृतक आश्रित कोटे से नौकरी पर लगा था. कृष्णकुमार अपने मांबाप का इकलौता बेटा था. वह अपने गांव भुंगारका से रोजाना बाइक द्वारा ड्यूटी आताजाता था. सीओ देशराज गुर्जर ने भी घटनास्थल का मुआयना किया और उपस्थित लोगों से जानकारी ली. जानकारी में यही सामने आया कि कृष्णकुमार की हत्या की गई है.

पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज निकाले. फुटेज से पता चला कि प्रत्यक्षदर्शियों ने जो बातें बताई थीं, वह सच थीं. हत्यारे कृष्णकुमार की हत्या को दुर्घटना दिखाना चाह रहे थे. मगर लोगों ने यह सब अपनी आंखों से देखा था.

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मृतक के परिजनों को भी हत्या की खबर दे दी गई. खबर मिलते ही मृतक के घर वाले एवं रिश्तेदार घटनास्थल पर आ गए. उन से भी पुलिस ने पूछताछ की और शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद वह परिजनों को सौंप दिया. मृतक के परिजनों की तरफ से कृष्णकुमार की हत्या का मामला बहरोड़ थाने में दर्ज करा दिया गया. थानाप्रभारी विनोद सांखला, एसआई सुरेंद्र सिंह और अन्य पुलिसकर्मियों की टीम ने सीसीटीवी फुटेज और स्कौर्पियो गाड़ी के नंबरों के आधार पर जांच शुरू की. पुलिस ने स्कौर्पियो गाड़ी का नंबर दे कर सभी थानों से इस नंबर की गाड़ी की जानकारी देने को कहा.

तभी जयपुर पुलिस ने सूचना दी कि इस नंबर की स्कौर्पियो गाड़ी पावटा जयपुर में खड़ी है. पुलिस टीम ने पावटा पहुंच कर वहां से स्कौर्पियो गाड़ी सहित 2 युवकों अशोक और पवन मेघवाल को भी हिरासत में ले लिया. गाड़ी के मालिक अजीत निवासी भुंगारका सहित कुछ और संदिग्ध युवकों को भी पुलिस ने पूछताछ के लिए उठा लिया.

थाने में इन सभी से पूछताछ की. अशोक व पवन मेघवाल एक ही रट लगाए थे कि उन की कृष्णकुमार से कोई दुश्मनी नहीं थी. अचानक वह गाड़ी से टकरा गया था. बाइक के एक्सीडेंट के बाद हड़बड़ाहट में गाड़ी घुमाई तो कृष्णकुमार पर गाड़ी चढ़ गई. उन्होंने बताया कि उन्हें इस बात का डर लग रहा था कि लोग उन्हें पकड़ कर मार न डालें, इस डर के कारण वे गाड़ी भगा ले गए. मगर आरोपियों की यह बात पुलिस के गले नहीं उतर रही थी. भुंगारका निवासी अजीत ने पुलिस को बताया कि उस ने अपनी स्कौर्पियो गाड़ी एक लाख 80 हजार रुपए में सन्नी यादव को बेच दी. सन्नी ने अशोक के नाम पर यह गाड़ी खरीदी थी.

अजीत ने पुलिस को सन्नी का नाम बताया. तब तक पुलिस को लग रहा था कि अजीत का इस मामले से कोई संबंध नहीं है. अशोक और पवन मेघवाल 4 दिन तक पुलिस को एक ही कहानी बताते रहे कि अचानक बाइक से गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था. पुलिस को भी लगने लगा था कि मामला कहीं दुर्घटना का ही तो नहीं है. मगर सीसीटीवी फुटेज में जो एक्सीडेंट का दृश्य था, वह बता रहा था कि कृष्णकुमार की साजिश के तहत हत्या की गई थी. हत्या को उन्होंने साजिश के तहत दुर्घटना का रूप देने की कोशिश की थी.

तब पुलिस अधिकारियों ने अपना पुलिसिया रूप दिखाया. बस फिर क्या था. पुलिस का असली रूप देख कर वे टूट गए और स्वीकार कर लिया कि उन्होंने जानबूझ कर कृष्णकुमार यादव की हत्या की थी, फिर उन्होंने हत्या की कहानी बता दी. हरियाणा के नांगल चौधरी इलाके के भुंगारका गांव में कृष्णकुमार यादव अपनी पत्नी कुसुमलता (35 वर्ष) के साथ रहता था. कृष्णकुमार की 4 बहनें हैं, जिन की शादी हो चुकी थी. वे सब अपनी ससुराल में हैं. पिता की औनड्यूटी मृत्यु होने के बाद आश्रित कोटे के तहत कृष्णकुमार की क्लर्क पद पर सरकारी स्कूल में नौकरी लग गई थी. वह अपने मातापिता का इकलौता बेटा था.

कृष्णकुमार के पड़ोस में उस के चाचा मुकेश यादव रहते थे. उन का बड़ा बेटा सन्नी 10वीं कक्षा में फेल हो गया तो उस ने स्कूल छोड़ दिया. वह कोई कामधंधा नहीं करता था. कृष्णकुमार के परिवार के ठाठबाट देखता तो उसे जलन होती थी. क्योंकि कृष्णकुमार के पास करोड़ों रुपए की संपत्ति थी. कृष्णकुमार के नाम करीब 50 बीघा जमीन थी. जोधपुर, राजस्थान के फलोदी में 17 बीघा जमीन, बहरोड़ में 2 कामर्शियल प्लौट, भुंगारका गांव में 32 बीघा जमीन व आलीशान मकान था. यह सब कृष्णकुमार के नाम था.

सन्नी ने योजना बनाई कि अगर कुसुमलता को वह प्यार के जाल में फंसा क र कृष्णकुमार को रास्ते से हटा दे तो वह कुसुमलता से विवाह कर के उस की करोड़ों की प्रौपर्टी का मालिक बन सकता है. आज से करीब 3 साल पहले सन्नी ने कुसुमलता पर डोरे डालने शुरू किए. कुसुमलता रिश्ते में उस की भाभी लगती थी.

सन्नी से कुसुमलता उम्र में 10 साल बड़ी थी. मगर वह जायदाद हड़प कर करोड़पति बनने के चक्कर में अपने से 10 साल बड़ी भाभी के आसपास दुम हिलाने लगा. कृष्णकुमार ड्यूटी पर चला जाता तो कुसुमलता घर में अकेली रह जाती थी. कृष्णकुमार की गैरमौजूदगी में सन्नी उस की बीवी के पास चला आता था. सन्नी कुसुमलता के चाचा ससुर का बेटा था. वह भाभी से हंसीमजाक करतेकरते उसे बांहों में भर कर बिस्तर तक ले आया. कुसुमलता भी जवान देवर की बांहों में खेलने लगी. वह सन्नी की दीवानी हो गई. सन्नी की मजबूत बांहों में कुसुमलता को जो शारीरिक सुख का चस्का लगा, वह दोनों को पतन के रास्ते पर ले जा रहा था.

सन्नी ने कुसुमलता को अपने रंग में ऐसा रंगा कि वह उस के लिए पति के प्राण तक लेने पर आमादा हो गई. आज से करीब डेढ़ साल पहले सन्नी ने कुसुमलता से कहा, ‘‘कुसुम, तुम रात में कृष्णकुमार को बिजली के करंट का झटका दे कर मार डालो. इस के बाद हम दोनों के बीच कोई तीसरा नहीं होगा. पति की जगह तुम्हारी नौकरी भी लग जाएगी. फिर मैं तुम से विवाह कर लूंगा और फिर हम मौज की जिंदगी जिएंगे.’’

‘‘ठीक है सन्नी, मैं पति को रास्ते से हटाने का इंतजाम करती हूं.’’ कुसुमलता ने हंसते हुए कहा.

वह देवर के प्यार में पति की हत्या करने करने का मौका तलाशने लगी. एक दिन कृष्णकुमार रात में गहरी नींद में था. तब कुसुमलता ने उसे बिजली का करंट दिया. करंट का कृष्णकुमार को झटका लगा तो वह जाग गया. तब बीवी ने कूलर में करंट आने का बहाना बना दिया. कृष्णकुमार को करंट का झटका लगा जरूर था, मगर वह मरा नहीं.

यह सुन कर सन्नी बोला, ‘‘कुसुम, जल्द से जल्द कृष्ण का खात्मा करना होगा.’’

‘‘तुम ही यह काम किसी से करा दो. मैं तुम्हारे साथ हूं मेरी जान.’’ कुसुमलता बोली.

कुसुमलता और सन्नी जल्द से जल्द कृष्णकुमार को रास्ते से हटाना चाहते थे. कृष्ण के ड्यूटी जाने के बाद वाट्सऐप कालिंग पर दोनों बातचीत करते थे. सन्नी ने अपने छोटे भाई की शादी कर दी थी. खुद शादी नहीं की थी. उस का मकसद तो करोड़ों की मालकिन कुसुमलता से शादी करना था. सन्नी भाभी से शादी कर के वह जल्द से जल्द करोड़पति बनना चाहता था.

एक दिन सन्नी और कुसुमलता के संबंधों की जानकारी किसी ने कृष्णकुमार को दे दी. बीवी और चचेरे भाई के संबंधों की बात सुन कर कृष्णकुमार को बहुत गुस्सा आया. उस ने अपनी बीवी से इस बारे में बात की तो वह त्रियाचरित्र दिखाने लगी. आंसू बहाने लगी. मगर कृष्णकुमार के मन में संदेह पैदा हुआ तो वह उन दोनों पर निगाह रखने लगा. इस के बाद कुसुमलता ने सन्नी को सचेत कर दिया. दोनों छिप कर मिलने लगे. मगर उन्हें हर समय इसी बात का डर लगा रहता कि कृष्णकुमार को कोई बता न दे.

कृष्णकुमार ने सन्नी से भी कह दिया था कि वह उस के घर न आए. यह बात कृष्ण, कुसुम और सन्नी के अलावा कोई नहीं जानता था. किसी को पता नहीं था कि कृष्ण अपनी बीवी और सन्नी पर शक करता है. ऐसे में कुसुमलता और सन्नी ने उसे एक्सीडेंट में मारने की योजना बनाई ताकि उन पर कोई शक भी न करे और राह का कांटा भी निकल जाए. सन्नी ने इस काम में कुछ खर्चा होने की बात कही तो कुसुमलता ने खुद के नाम की 4 लाख रुपए की एफडी मार्च 2021 के दूसरे हफ्ते में तुड़वा दी. 4 लाख रुपए कुसुम ने सन्नी को दे दिए.

सन्नी ने योजनानुसार 18 मार्च, 2021 को भुंगारका के अजीत से एक लाख 80 हजार रुपए में एक स्कौर्पियो गाड़ी एग्रीमेंट के तहत अशोक कुमार के नाम से खरीदी. अशोक को उस ने 2 छोटे मोबाइल व सिम दिए. इन्हीं सिम व मोबाइल के जरिए अशोक की बात सन्नी से होती थी. कृष्णकुमार को मारने के लिए सन्नी ने अशोक को डेढ़ लाख रुपए भी दे दिए.

उसी स्कौर्पियो गाड़ी से अशोक ने सन्नी के कहने पर कृष्णकुमार का एक्सीडेंट करने की कई बार कोशिश की मगर वह सफल नहीं हुआ. तब 26 मार्च, 2021 को राहुल अपने दोस्त पवन मेघवाल को भुंगारका के हरीश होटल पर ले आया. यहां अशोक से पवन की जानपहचान कराई. रात में तीनों शराब पी कर खाना खा कर होटल पर रुके और सुबह चले गए. 30 मार्च, 2021 को अशोक ने पवन से कहा कि मुझे स्कौर्पियो से एक आदमी का एक्सीडेंट करना है. तुम मेरे

साथ गाड़ी में रहोगे तो मैं तुम्हें 40 हजार रुपए दूंगा.

पवन की अशोक से नई दोस्ती हुई थी और वैसे भी पवन को सिर्फ गाड़ी में बैठे रहने के 40 हजार रुपए मिल रहे थे, इसलिए 40 हजार रुपए के लालच में पवन ने हां कर दी. 31 मार्च, 2021 को अशोक और पवन मेघवाल स्कौर्पियो गाड़ी ले कर जखराना आए लेकिन उस दिन कृष्णकुमार ड्यूटी पर नहीं गया. अशोक रोजाना की बात सन्नी को बता देता था. सन्नी अपनी प्रेमिका भाभी कुसुमलता को सारी बात बता देता था. पहली अप्रैल 2021 को सुबह साढ़े 7 बजे कृष्णकुमार अपने गांव भुंगारका से ड्यूटी पर जखराना निकला. यह जानकारी कुसुमलता ने अपने देवर प्रेमी सन्नी को दी. सन्नी ने अशोक को यह सूचना दे दी.

अशोक कुमार गाड़ी में पवन को ले कर जखराना बसस्टैंड पहुंच गया. जैसे ही कृष्णकुमार मोटरसाइकिल से जखराना बसस्टैंड से स्कूल की ओर जाने लगा, तभी अशोक ने स्कौर्पियो से कृष्णकुमार को सीधी टक्कर मार दी. टक्कर लगते ही कृष्णकुमार उछल कर दूर जा गिरा. इस के बाद अशोक ने गाड़ी को यूटर्न लिया और कृष्णकुमार के ऊपर एक बार चढ़ा दी, जिस के बाद उस की मौके पर ही मौत हो गई. इस के बाद सूचना पा कर बहरोड़ पुलिस आई. प्रत्यक्षदर्शियों ने इसे हत्या बताया. तब पुलिस ने जांच कर हत्या के इस राज से परदा हटाया.

अशोक कुमार और पवन मेघवाल से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने इस हत्याकांड में शामिल रहे सन्नी और उस की प्रेमिका कुसुमलता को भी गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों ने भी कृष्णकुमार की हत्या में शामिल होने का अपराध स्वीकार कर लिया. पूछताछ के बाद कुसुमलता, सन्नी यादव, अशोक यादव और पवन मेघवाल को बहरोड़ कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News: मासूम बच्चों का सीरियल किलर – पुलिस की गिरफ्त में

Crime News: सीरियल किलर रविंद्र एकएक कर के करीब 40 मासूमों के साथ कुकर्म कर उन की हत्याएं कर चुका था. निशा की हत्या करने के बाद यदि वह अपनी मां के प्रेमी सन्नी को फंसाने की कोशिश न करता तो शायद अब भी गिरफ्तार नहीं हो पाता.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव के नजदीक जैननगर में काफी बड़ी झुग्गी बस्ती है. यह इलाका बेगमपुर थाने के अंतर्गत आता है. इसी बस्ती के रहने वाले संतोष कुमार की 6 वर्षीया बेटी निशा रोजाना की तरह 14 जुलाई को भी नित्य क्रिया के लिए सूखी नहर की तरफ गई थी. सुबह 6 बजे घर से निकली निशा जब आधापौने घंटे बाद भी घर नहीं लौटी तो मां पुष्पा देवी चिंतित हुई. चिंता की बात इसलिए थी क्योंकि निशा को तैयार हो कर 7 बजे स्कूल के लिए निकलना था. वह नजदीक के ही सरकारी स्कूल में पढ़ती थी. कुछ देर और इंतजार करने के बाद भी वह नहीं आई तो पुष्पा बेटी को देखने के लिए सूखी नहर की तरफ चली गई.

पुष्पा ने सूखी नहर की तरफ जा कर बेटी को ढूंढा, लेकिन वह नहीं मिली. उधर आनेजाने वाली महिलाओं और बच्चों से भी उस ने बेटी के बारे में पता किया, पर कोई भी उस की बच्ची के बारे में नहीं बता सका. तब परेशान हो कर वह घर लौट आई. उस ने यह बात पति संतोष को बताई तो वह भी परेशान हो गया. अब तक बेटी के स्कूल जाने का समय हो गया था. मियांबीवी एक बार फिर बेटी को ढूंढने निकल गए. उन के साथ पड़ोसी भी उन की मदद के लिए गए थे. एक, डेढ़ घंटे तक वह बेटी को इधरउधर ढूंढते रहे, लेकिन उस का पता नहीं चल सका.

बस्ती के लोग इस बात से हैरान थे कि आखिर घर और सूखी नहर के बीच से बच्ची कहां गायब हो गई? संतोष की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह बच्ची को कहां ढूंढे? आखिर वह पड़ोसियों को ले कर थाना बेगमपुर पहुंचा. थानाप्रभारी रमेश सिंह उस दिन छुट्टी पर थे. थाने का चार्ज अतिरिक्त थानाप्रभारी जगमंदर दहिया संभाले हुए थे. संतोष कुमार ने उन्हें बेटी के गुम होने की बात बताई.

बच्ची की उम्र 6 साल थी, इसलिए पुलिस यह भी नहीं कह सकती थी कि वह अपने किसी प्रेमी के साथ चली गई होगी. दूसरे बच्ची के पिता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि किसी ने फिरौती के लिए उस का अपहरण कर लिया है. संतोष ने बताया था कि उस की किसी से कोई दुश्मनी वगैरह नहीं थी. इन सब बातों को देखते हुए पुलिस को यही लग रहा था कि या तो बच्ची खेलतेखेलते कहीं चली गई है या फिर उसे बच्चा चुराने वाला कोई गैंग उठा ले गया है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में तमाम बच्चे रहस्यमय तरीके से गायब हो रहे थे. इसी बात को ध्यान में रख कर उन्होंने उसी समय निशा के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी और इस की जांच हेडकांस्टेबल शमशेर सिंह को सौंप दी. बच्ची के अपहरण का मुकदमा दर्ज हो जाने के बाद दिल्ली के समस्त थानों में उस का हुलिया बता कर वायरलैस से सूचना दे दी गई. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया कुछ पुलिसकर्मियों के साथ उस जगह पर पहुंच गए, जहां से बच्ची लापता हुई थी. उन्होंने संतोष के घर से ले कर सूखी नहर तक का निरीक्षण किया. उसी दौरान उन्होंने कुछ लोगों से बात भी की, लेकिन उन्हें ऐसा कोई क्लू नहीं मिला, जिस के सहारे लापता बच्ची का पता लगाया जा सकता.

वह उधर की झाडि़यों में भी यह सोच कर खोजबीन करने लगे कि कहीं किसी बहशी दरिंदे ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो. क्योंकि आए दिन बच्चों के साथ कुकर्म करने जैसे मामले सामने आते रहते थे. झाडि़यों में भी उन्हें कुछ नहीं मिला. संतोष के घर से करीब 50 मीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत दिखाई दे रही थी. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया ने अपने आसपास खड़े बस्ती वालों से उस इमारत के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि यह बिल्डिंग किसी जैन की है, लेकिन पिछले काफी दिनों से इस के निर्माण का काम रुका हुआ है.

जिज्ञासावश वह उस बिल्डिंग की तरफ चल दिए. जैननगर की गली नंबर 6 में निर्माणाधीन उस 3 मंजिला बिल्डिंग में जब वह घुसे तो एक कमरे में उन्हें एक बच्ची निर्वस्त्र हालत में पड़ी मिली. वह मृत अवस्था में थी. उन के साथ मौजूद संतोष उस बच्ची को देख कर चीख पड़ा. वह उसी की बेटी निशा थी. बच्ची का निचला हिस्सा खून से सना हुआ था. उस के कपड़े पास पड़े हुए थे. निशा की हालत देख कर इंसपेक्टर दहिया समझ गए कि यह किसी दरिंदे की शिकार बनी है. निशा की हत्या की खबर सुन कर बस्ती के सैकड़ों लोग थोड़ी देर में वहां जमा हो गए. इंसपेक्टर दहिया ने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम व फोरैंसिक टीम को भी दे दी.

कुछ देर बाद बाहरी दिल्ली के डीसीपी विक्रमजीत, डीसीपी-2 श्वेता चौहान, एसीपी ऋषिदेव कराला भी जैननगर पहुंच गए. डीसीपी ने मौके पर क्राइम ब्रांच को भी बुलवा लिया. क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम भी मौके से सबूत जुटाने लगी. इन टीमों का काम निपटने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. उसी बिल्डिंग में दूसरी मंजिल पर एक ड्राइविंग लाइसेंस और ट्रांसपोर्ट से संबंधित कुछ कागज मिले. पुलिस ने वह सब अपने कब्जे में ले लिया.

लाश का मुआयना करने पर यही लग रहा था कि किसी ने उस बच्ची के साथ गलत काम कर के उस का गला घोंट दिया है. निशा की हत्या पर बस्ती के लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इस से पहले कि वे कोई आक्रामक कदम उठाते, पुलिस ने उन्हें समझाबुझा कर शांत कर दिया. मौके की जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सुल्तानपुरी के संजय गांधी मैमोरियल अस्पताल भेज दिया.

इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी विक्रमजीत ने एसीपी ऋषिदेव के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर जगमंदर दहिया, एएसआई सुरेंद्रपाल, हेडकांस्टेबल नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल टी.आर. मीणा आदि को शामिल किया गया. जिस बिल्डिंग में निशा की लाश मिली थी, उसी बिल्डिंग में पुलिस को जो ड्राइविंग लाइसेंस और कागजात मिले थे, उन की जांच शुरू की गई. ड्राइविंग लाइसेंस पर सन्नी पुत्र सुरेंद्र कुमार नाम लिखा था. उस पर जो पता लिखा था, वह कराला के जैननगर का ही था. यानी यह पता वही था, जहां मरने वाली बच्ची रहती थी.

खैर, पुलिस सन्नी के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. पता चला कि वह डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती है. जब पुलिस अस्पताल पहुंची तो जानकारी मिली कि सन्नी को कुछ देर पहले ही डिस्चार्ज कर दिया गया था. लिहाजा उलटे पांव पुलिस जैननगर लौट आई. सन्नी घर पर ही मिल गया. उस के हाथपैर और शरीर के अन्य भागों पर चोट लगी हुई थी. पुलिस ने 14 जुलाई को ही सन्नी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कल रात पड़ोस के ही रविंद्र, उस के भाई सुनील और उस के दोस्त हिमांशु ने उस की खूब पिटाई की थी. पिटाई करने के बाद रविंद्र उस की जेब से मोबाइल, ड्राइविंग लाइसेंस, पैसे आदि निकाल कर ले गया था. मुझे उम्मीद है कि उसी ने यह सब किया होगा.

रविंद्र का घर सन्नी के घर के पास ही था. पुलिस उस के घर गई तो वह और उस के भाई में से कोई नहीं मिला. घर पर मौजूद उस के पिता ने पुलिस को बताया कि दोनों भाई अपने किसी दोस्त के यहां गए हुए हैं. पुलिस उस के पिता को हिदायत दे कर चली आई. पुलिस ने रविंद्र के बारे में छानबीन की तो जानकारी मिली कि पिछले साल उस ने बेगमपुर थानाक्षेत्र में ही एक बच्चे के साथ कुकर्म कर के उस की गला काट कर हत्या कर दी थी. इस की रिपोर्ट थाना बेगमपुर में ही भादंवि की धारा 363/307/377 के तहत लिखी गई थी. इस मामले में वह गिरफ्तार हुआ था. गिरफ्तारी के 6 महीने बाद सन्नी के पिता सुरेंद्र सिंह ने उस की जमानत कराई थी. तब वह जेल से बाहर आया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को रविंद्र पर शक हुआ. उस का जो मोबाइल नंबर पुलिस को मिला था, वह स्विच्ड औफ था. पुलिस टीम रविंद्र को सरगर्मी से तलाशने लगी. 2 दिन बाद एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने 16 जुलाई, 2015 को उसे थाना क्षेत्र के ही सुखवीरनगर बस स्टौप से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब रविंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने निशा की हत्या का जुर्म तो स्वीकार कर ही लिया, इस के अलावा उस ने ऐसा खुलासा किया कि पुलिस हैरान रह गई.

उस ने बताया कि वह निशा की तरह तकरीबन 40 बच्चों की हत्या कर चुका है. पुलिस तो केवल मर्डर के एक केस को खोलने के लिए रविंद्र को तलाश रही थी, लेकिन वह इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, पता नहीं था. इंसपेक्टर जगमंदर दहिया के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उन्होंने उसी समय डीसीपी विक्रमजीत को यह जानकारी दी तो आधे घंटे के अंदर वह भी बेगमपुर थाने पहुंच गए.

एक लाश और ड्राइविंग लाइसेंस ने ऐसे गुनाह से परदा उठा दिया था, जिसे सुन कर इंसानियत भी शर्मशार हो जाए. उस ने डीसीपी के सामने रोंगटे खड़ी कर देने वाली बच्चों की हत्या की जो कहानी बताई, वह नोएडा के निठारी कांड से कम नहीं थी. रविंद्र ने बताया कि वह बच्चों की हत्या करने के बाद ही उन से कुकर्म करता था. उस के खुलासे पर डीसीपी भी चौंके. 24 साल के रविंद्र ने एक के बाद एक कर के करीब 40 बच्चों की हत्या करने और सैक्स एडिक्ट बनने की जो कहानी बताई, वह दिल को झकझोरने वाली थी.

रविंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला कासगंज के कस्बा गंज डुंडवारा के रहने वाले ब्रह्मानंद का बेटा था. रविंद्र के अलावा उस के 3 और बेटे थे. ब्रह्मानंद प्लंबर का काम करता था, इसलिए उस की हैसियत ऐसी नहीं थी कि वह बच्चों को पढ़ा सकता. लिहाजा जब उस के 2 बेटे बड़े हुए तो वह उन से भी मजदूरी कराने लगा. बेटे कमाने लगे तो उस के घर की माली हालत सुधरने लगी. उसी दौरान सन 1990 में गंज डुंडवारा में दंगा भड़क गया तो ब्रह्मानंद अपनी पत्नी मंजू और बच्चों को ले कर दिल्ली आ गया.

बाहरी दिल्ली के कराला गांव में उस की जानपहचान के तमाम लोग रहते थे. लिहाजा वह भी उन के साथ कराला में रहने लगा. उस समय मंजू गर्भवती थी. कुछ दिनों बाद उस ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम रविंद्र रखा. घर में सब से छोटा होने की वजह से वह सब का प्यारा था. ब्रह्मानंद्र अपने बाकी बच्चों को तो पढ़ा नहीं सका था, लेकिन वह रविंद्र को पढ़ाना चाहता था. जब वह स्कूल जाने लायक हुआ तो उस ने उस का दाखिला सरकारी स्कूल में करा दिया. लेकिन मोहल्ले के बच्चों की संगत में पड़ कर वह पांचवीं कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. वह नशा करने वाले बच्चों की संगत में पड़ गया, जिस से वह भी चरस, गांजा आदि पीने लगा. घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने उसे डांटा भी, लेकिन वह नहीं माना.

रविंद्र नहीं पढ़ा तो ब्रह्मानंद उसे अपने साथ काम पर ले जाने लगा. लेकिन उस की आदत तो दोस्तों के साथ घूमने की थी. पिता के साथ मेहनत का काम भला वह क्यों करता. इसलिए वह पिता के साथ भी ज्यादा दिन नहीं टिक सका. उसे जब खर्च के लिए पैसों की जरूरत होती, वह अपनी जानपहचान वाले ड्राइवर सन्नी के साथ हेल्परी करने चला जाता. सन्नी उसी के पड़ोस में रहता था और वह ट्रेलर चलाता था. उस का ट्रेलर मुंडका मैट्रो स्टेशन के निर्माण के कार्य में लगा हुआ था. रविंद्र वहां से जो भी कमाता, अपने नशा के शौक पर उड़ा देता था.

सन 2008 की बात है. उस समय रविंद्र करीब 17 साल का था. एक बार वह आधी रात को दोस्तों से फारिग हो कर अपने घर लौट रहा था. उस ने कराला में एक झुग्गी के बाहर मांबाप के साथ सो रही बच्ची को देखा. उस बच्ची की उम्र कोई 6 साल थी. उस बच्ची को देख कर रविंद्र की कामवासना जाग उठी. वह चुपके से गहरी नींद में सो रही उस बच्ची को उठा ले गया. बच्ची के मांबाप को पता ही नहीं चला कि उन की बेटी उन के पास से गायब हो चुकी है. रविंद्र उस बच्ची को सूखी नहर की तरफ ले गया. जैसे ही उस ने उस बच्ची को जमीन पर लिटाया वह जाग गई.

खुद को सुनसान और अंधेरे में देख कर वह डर गई. वहां उस के मांबाप की जगह एक अनजान आदमी था. वह रोने लगी तो रविंद्र ने डराधमका कर उसे चुप करा दिया. उस के बाद उस ने उस के साथ कुकर्म किया. बच्ची दर्द से चिल्लाने लगी तो उस ने उस का मुंह दबा दिया. कुछ ही देर में वह बेहोश हो गई. भेद खुलने के डर से उस ने बच्ची की  गला दबा कर हत्या कर दी और अपने घर चला गया. अगली सुबह झुग्गी के बाहर सो रहे दंपति को जब अपनी बेटी गायब मिली तो वह उसे खोजने लगे. उसी दौरान उन्हें सूखी नहर में बेटी की लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे वहां पहुंचे. इस मामले की थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई, लेकिन पुलिस केस को नहीं खोल सकी.

केस न खुलने से रविंद्र की हिम्मत बढ़ गई. इस के बाद सन 2009 में बाहरी दिल्ली के ही विजय विहार, रोहिणी इलाके से 6-7 साल के एक लड़के को बहलाफुसला कर वह सुनसान जगह पर ले गया और कुकर्म करने के बाद उस की हत्या कर दी. इस मामले को भी पुलिस नहीं खोल सकी. रविंद्र को अपनी कामवासना शांत करने का यह तरीका अच्छा लगा. क्योंकि वह 2 हत्याएं कर चुका था और दोनों ही मामलों में वह सुरक्षित रहा, इस से उस के मन का डर निकल गया. इस के बाद वह कंझावला इलाके में एक बच्ची को बहलाफुसला कर सुनसान जगह पर ले गया और उस के साथ कुकर्म कर के उस की हत्या कर दी.

वह कोई एक काम जम कर नहीं करता था. कभी गाड़ी पर हेल्परी का काम करता तो कभी बेलदारी करने लगता. नोएडा के सेक्टर-72 में वह एक बिल्डिंग में काम कर रहा था. वहां भी उस ने अपने साथ काम करने वाली महिला बेलदारों की 2 बच्चियों को अलगअलग समय पर अपनी हवस का शिकार बनाया. वह उन बच्चियों को चौकलेट दिलाने के लालच में गेहूं के खेत में गया. वहीं पर उस ने उन की गला दबा कर हत्या कर दी थी.

उस के पिता ब्रह्मानंद का दिल्ली आने के बाद अपने गांव जाना नहीं हो पाता था, लेकिन रविंद्र कभीकभी अपने गांव जाता रहता था. खानदान के और लोग भी दिल्ली और नोएडा चले आए थे. रविंद्र जब भी गांव जाता, गंज डुंडवारा के पास गांव नूरपुर में अपनी मौसी मुन्नी देवी के यहां ठहरता था. वहीं पास के ही बिरारपुर गांव में उस की बुआ कृपा देवी का घर था. कभीकभी वह उन के यहां भी चला जाता था. उस की हैवानियत वहां भी जाग उठी तो उस ने वहां भी अलगअलग समय पर 2 बच्चियों को अपनी हवस का शिकार बनाया.

अब तक रविंद्र सैक्स एडिक्ट हो चुका था. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह अपने शिकार को तलाशता रहता. बच्चे उस का शिकार आसानी से बन जाते थे, इसलिए वे उस का सौफ्ट टारगेट बन जाते थे. ज्यादातर वह झुग्गीझोपडि़यों या गरीब परिवारों के बच्चों को ही निशाना बनाता था, ताकि वे लोग ज्यादा कानूनी काररवाई न कर सकें. इस तरह उस ने दिल्ली के निहाल विहार, मुंडका, कंझावला, बादली, शालीमार बाग, नरेला, विजय विहार, अलीपुर हरियाणा के बहादुरगढ़, फरीदाबाद, उत्तर प्रदेश के सिकंदराऊ, अलीगढ़ आदि जगहों पर 6 से 9 साल के करीब 40 लड़केलड़कियों को अपना निशाना बनाया. उस की मानसिकता ऐसी हो गई थी कि वह कुकर्म के बाद हर बच्चे की हत्या कर देता था. ज्यादातर के साथ उस ने मारने के बाद कुकर्म किया था.

उस ने कई बच्चों की लाशें ऐसी जगहों पर डाली थी कि पुलिस भी उन्हें बरामद नहीं कर सकी. 4 जून, 2014 को उस ने अपने दोस्त राहुल के साथ अपनी ही बस्ती जैननगर के कृष्ण कुमार के 6 साल के बेटे शिबू को सोते हुए उठा लिया. दोनों उसे आधा किलोमीटर दूर सुनसान जगह पर ले गए और उस के साथ कुकर्म किया. राहुल नाई था. वह अपने साथ उस्तरा भी ले गया था. बाद में उस ने उसी उस्तरे से उस का गला काट कर लाश सूखी गटर में डाल दिया था. बच्चे को गटर में डालते हुए उन्हें किसी ने देख लिया था. उन दोनों ने तो यही समझा था कि शिबू मर चुका है, लेकिन वह जीवित था. अगले दिन जब खोजबीन हुई तो वह सूखी गटर में पड़ा मिला.

जिस शख्स ने रविंद्र और राहुल को देखा था, उसी ने अगले दिन पुलिस को सब बता दिया. नतीजा यह हुआ कि पुलिस ने रविंद्र और राहुल को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. रविंद्र जिस सन्नी के साथ ट्रेलर पर हैल्परी करता था, उसी सन्नी के रविंद्र की मां मंजू से अवैधसंबंध थे. बेटे के जेल जाने के बाद मंजू परेशान हो गई. वह बेटे की जमानत की कोशिश में लग गई. कहसुन कर उस ने सन्नी के पिता सुरेंद्र से बेटे की जमानत करवा ली. लिहाजा 20 मई, 2015 को रविंद्र जेल से बाहर आ गया.

बात 13 जुलाई, 2015 की है. मंजू अपने घर में अकेली थी. उस ने फोन कर के अपने प्रेमी सन्नी को घर पर बुला लिया. दोनों अपनी हसरतें पूरी करते, अचानक रविंद्र घर आ गया था. सन्नी उस समय मंजू से बातें कर रहा. इसलिए रविंद्र को उस पर कोई शक वगैरह नहीं हुआ. रविंद्र के आने के बाद मंजू और सन्नी की योजना खटाई में पड़ती नजर आ रही थी. बेटे को बाहर भेजने के लिए मंजू ने घर में पड़ा टेप रिकौर्डर रविंद्र को देते हुए कहा कि वह उसे ठीक करा लाए. मां के कहने पर रविंद्र टेप रिकौर्डर ठीक कराने चला गया.

बेटे के जाते ही मंजू और सन्नी अपनी हसरतें पूरी करने लगे, लेकिन मैकेनिक की दुकान बंद होने की वजह से रविंद्र जल्द ही वापस लौट आया. घर का दरवाजा बंद था. उस ने दरवाजा खटखटाया तो दरवाजा नहीं खुला, फिर वह गली में जा कर खड़ा हो गया. उधर दरवाजा खटखटाने पर मंजू और सन्नी की कामलीला में व्यवधान पड़ गया. फटाफट दोनों ने कपड़े पहने और सन्नी दरवाजा खोल कर चला गया. सन्नी रविंद्र को नहीं देख सका. अपने घर से सन्नी को निकलता देख रविंद्र का माथा घूम गया. वह समझ गया कि उस की मां के साथ सन्नी का जरूर कोई चक्कर चल रहा है.

उस ने उसी समय तय कर लिया कि वह सन्नी को सबक सिखा कर रहेगा. उस ने यह बात अपने भाई सुनील को बताई तो सुनील का भी सन्नी के प्रति खून खौल उठा. दोनों भाइयों ने सन्नी के खिलाफ योजना बना ली. इस योजना में रविंद्र ने अपने दोस्त हिमांशु को भी शामिल कर लिया. उसी दिन शाम को रविंद्र ने सन्नी से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि वह इस समय मुंडका में है. योजना को अंजाम देने के लिए रविंद्र, हिमांशु और सुनील को ले कर मुंडका पहुंच गया. सन्नी उन्हें वहीं मिल गया. सन्नी के साथ उन्होंने एक जगह बैठ कर शराब पी. सन्नी पर जब थोड़ा नशा चढ़ गया तो उसी दौरान तीनों ने सन्नी की जम कर पिटाई की और रविंद्र ने उस की जेब से उस का मोबाइल फोन और ड्राइविंग लाइसेंस व अन्य कागजात निकाल लिए.

रविंद्र ने सन्नी को जिंदा जलाने के लिए उसी की मोटरसाइकिल से पेट्रौल निकाल कर उसी के ऊपर छिड़क दिया. लेकिन सुनील ने उसे आग लगाने से रोक दिया. सुनील यह कहते हुए भाई को समझा दिया कि अभी इस के लिए इतनी ही सजा काफी है. अगर यह अब भी नहीं मानेगा तो इसे दुनिया से ही मिटा देंगे. उसी वक्त मौका मिलते ही सन्नी वहां से खेतों की तरफ भाग गया. सन्नी की बाइक ले कर रविंद्र, सुनील और हिमांशु अपने घर चले गए.

सन्नी रात भर खेतों में ही रहा. डर की वजह से वह घर तक नहीं गया. सुबह होने पर वह अपने घर गया और पुलिस कंट्रोल रूम को फोन कर के अपने साथ घटी घटना की जानकारी दी. तब पुलिस ने सन्नी को रोहिणी के डा. अंबेडकर अस्पताल में भरती कराया और रविंद्र, सुनील व हिमांशु के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. 14 जु़लाई को सुबह 6 बजे के करीब रविंद्र नित्य क्रिया के लिए घर से निकला, तभी उस ने रास्ते में संतोष की 6 साल की बेटी निशा को अकेली जाते हुए देखा. वह भी नित्य क्रिया के लिए जा रही थी. उसे अकेली देख कर उस का शैतानी दिमाग जाग उठा. उस ने उस बच्ची को 10 रुपए दिए और किसी बहाने से उसे वहां से 50 मीटर की दूरी पर स्थित निर्माणाधीन इमारत में ले गया.

वह इमारत खाली पड़ी थी. नादान बच्ची उस के इरादों को नहीं समझ पाई. उस ने अन्य बच्चों की तरह निशा के साथ भी कुकर्म कर के उस की गला घोंट कर हत्या कर दी. शातिर दिमाग रविंद्र ने इस बच्ची के मामले में सन्नी को फंसाने के लिए सन्नी का ड्राइविंग लाइसेंस और अन्य कागजात उसी इमारत की दूसरी मंजिल पर डाल दिए, ताकि पुलिस सन्नी को गिरफ्तार कर के जेल भेज दे. रविंद्र ने सन्नी को फंसाने का जाल तो अच्छी तरह बिछाया था, पर अपने जाल में वह खुद फंस जाएगा, ऐसा उस ने नहीं सोचा था. आखिर वह पुलिस की गिरफ्त में आ ही गया.

रविंद्र से पूछताछ के बाद डीसीपी भी हैरान रह गए कि यह एक के बाद एक 40 वारदातें करता गया और पुलिस को पता तक नहीं चला. अगर यह क्रूर हत्यारा अब भी नहीं पकड़ा जाता तो न मालूम कितने और बच्चों को अपना निशाना बनाता. बहरहाल, पुलिस ने 17 जुलाई को रविंद्र को रोहिणी जिला न्यायालय के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव के समक्ष पेश किया. रविंद्र ने पुलिस को बताया था कि वह लगभग 40 बच्चों को अपना शिकार बना कर उन की हत्या कर चुका है. ये सारी वारदातें उस ने दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी की थीं.

घटनास्थल का सत्यापन और केस से संबंधित सबूत जुटाने के लिए उस से और ज्यादा पूछताछ करनी जरूरी थी. इसलिए पुलिस ने कोर्ट से उस का 7 दिनों का रिमांड मांगा, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया. रिमांड मिलने के बाद पुलिस रविंद्र को उन जगहों पर ले गई, जहांजहां उस ने वारदातों को अंजाम दिया था. रविंद्र ने पुलिस को अलगअलग जगहों पर ले जा कर 27 केसों की पुष्टि करा दी. बाकी केसों के बारे में उसे खुद को ध्यान नहीं रहा कि उस ने कहां वारदात की थी. जिन जगहों पर वारदात कराने की उस ने पुष्टि कराई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के थाने में संपर्क किया तो पता चला कि उन में से केवल 15 केसों की ही अलगअलग थानों में रिपोर्ट दर्ज हुई थी.

पुलिस किसी और बच्चे की लाश बरामद नहीं कर पाई. इस की वजह यह थी कि उसे वारदात को अंजाम दिए काफी दिन बीत चुके थे, जिस से अनुमान यही लगाया गया कि बच्चों की लाशें जंगली जानवरों द्वारा या अन्य वजह से नष्ट हो गईं. जैसेजैसे सीरियल किलर रविंद्र की क्रूरता के खुलासे लोगों को पता लगते गए, उन का गुस्सा भी बढ़ता जा रहा था. दिल्ली और आसपास के क्षेत्र के जिन गायब हुए बच्चों का कोई सुराग नहीं लग रहा था, उन के मांबाप भी यही सोचने लगे कि कहीं उन का बच्चा भी रविंद्र का शिकार तो नहीं हो गया. वे भी थाना बेगमपुर पहुंचने लगे.

रिमांड अवधि खत्म होने से पहले पुलिस ने 23 जुलाई, 2015 को जब रविंद्र को फिर से न्यायालय में पेश किया गया तो उसे देखने के लिए कोर्ट में और कोर्ट से बाहर तमाम लोग जमा हो गए. वे सभी गुस्से से भरे थे. वे उसे जनता के सुपुर्द करने की मांग करने लगे, ताकि उस क्रूर हत्यारे को अपने हाथों से सजा दे सकें. भारी पुलिस सुरक्षा के बीच उसे कोर्ट में पेश किया गया.  अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने रविंद्र को जेल भेजने के आदेश दिए. पुलिस जब उसे कोर्ट से बाहर ले जा रही थी, तभी वकीलों ने रविंद्र पर हमला कर उस की पिटाई शुरू कर दी. बड़ी मशक्कत से पुलिस ने उसे बचाया. इस के बाद बार एसोसिएशन के सचिन ने ऐलान कर दिया कि कोई भी वकील वहशी दरिंदे का मुकदमा नहीं लड़ेगा.

कथा संकलन तक रविंद्र जेल में बंद था. रविंद्र के घर वालों ने भी कह दिया कि वह उस की जमानत की पैरवी नहीं करेंगे. बहरहाल रविंद्र को जानने वाले सभी लोग उस के कारनामे से आश्चर्यचकित हैं. सीधासादा दिखने वाला रविंद्र इतना बड़ा सीरियल किलर निकलेगा, ऐसी उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी. जांच अधिकारी इंसपेक्टर जगमंदर दहिया उस के केसों से संबंधित ज्यादा से ज्यादा सबूत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि इस सीरियल किलर को उस के गुनाहों की उसे सजा मिल सके. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दौलत के लालच में अपनों का कत्ल

True Crime Story: वर्षा से शादी के बाद से ही खफा चल रहे उस के देवर कृष्णकांत को जब यह पता चला की वर्षा  किसी और के साथ लिवइन में रह रही है तो यह उस से सहा नहीं गया. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद उस का सारा पैसा भी उस की भाभी वर्षा ही ले गई थी. भाई के बदले वह सेना में नौकरी चाह रहा था. यह मामला भी कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका था.

भाभी के लिवइन में रहने की खबर के बाद कृष्णकांत को लगा कि भाभी उस के भाई की ही संपत्ति और पैसे पर ऐश कर रही है. तब कृष्णकांत ने अपनी भाभी को सदा के लिए मौत की नींद सुला देने का भयानक निर्णय ले लिया. मध्य प्रदेश के जिला बैतूल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर बसा है आमला कस्बा. आदिवासी बाहुल्य यह कस्बा ज्यादा बड़ा तो नहीं है पर आसपास के गांव वाले यहां खरीदारी करने आया करते हैं.

लिहाजा शाम तक यहां के बाजार भीड़ से भरे होते हैं. ऐसे में पुलिस को भी कानूनव्यवस्था के लिए चुस्त रहना पड़ता है. 6 फरवरी, 2021 को रात करीब 9 बजे का वक्त रहा होगा. आमला के टीआई सुनील लाटा शहर में भ्रमण पर थे. इसी बीच उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि कनौजिया गांव में गोली चली है, इस में एक महिला गंभीर रूप से घायल है.

सूचना मिलते ही टीआई कनौजिया गांव पहुंचे, इस इलाके में गोली चलने की वारदात अमूमन कम ही होती है. बरहाल, टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी सिमाला प्रसाद को दी. साथ ही एसडीपीओ मुलताई नम्रता सोंधिया समेत फोरैंसिक टीम के सदस्यों को दी और वह तत्काल कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

आमला से कनौजिया की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, लिहाजा पुलिस को यहां पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची, तब तक भीड़ काफी जमा हो चुकी थी. कनौजिया गांव के जिस मकान में गोली चलने की घटना हुई थी, वहां करीब 4-5 कमरे थे. पहले कमरे में बैड पर खून से लथपथ एक 27-28 वर्षीय युवती का शव पड़ा था. पास में ही उस का मोबाइल पड़ा था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि घटना के समय युवती मोबाइल पर बात कर रही होगी.

टीआई सुनील लाटा अभी मौकामुआयना कर ही रहे थे कि इतने में एसडीपीओ (मुलताई) नम्रता सोंधिया भी मौके पर आ गईं. इस के बाद एसपी सिमाला प्रसाद भी वहां पहुंच गईं. पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम वर्षा नागपुरे है और वह बोखड़ी कस्बे की रहने वाली थी. सुबह ही वह अपनी मां के पास कनोजिया आई थी.

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पुलिस ने यहां लोगों से प्रारंभिक पूछताछ भी की, पर वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे. उन का कहना था कि कौन आया, किस ने वर्षा को गोली मारी, पता ही नहीं चला. वे तो गोली चलने की आवाज के बाद अपने घरों से बाहर आए थे. वर्षा की हत्या की वजह पुलिस को भी समझ नहीं आ रही थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि मायके में आने के बाद उस की हत्या किस ने की? एफएसएल टीम द्वारा जांच करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

पुलिस ने इस के बाद वर्षा के मायके वालों से पूछताछ की तो वर्षा के भाई कृष्णा पवार ने बहन वर्षा की हत्या का संदेह उस के देवर कृष्णकांत नागपुरे और महेश नागपुरे निवासी बोडखी पर व्यक्त किया था. इधर पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि वर्षा किसी के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

बहरहाल, सारी जानकारी जुटाने के बाद टीआई सुनील लाटा आमला लौट आए. उन के सामने जिन लोगों के नाम संदेह के तौर पर सामने आए थे, उन पर नजर रखने के लिए उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों को लगा दिया. पुलिस को अपनी जांच में यह भी पता चला कि अपनी ससुराल वालों से वर्षा के रिश्ते ठीक नहीं थे, लिहाजा उन्होंने जांच का रुख ससुराल वालों की तरफ मोड़ लिया.

इस बीच टीआई सुनील लाटा को खबर मिली कि वर्षा का देवर कृष्णकांत घटना से कुछ दिनों से गांव बोडखी में ही देखा गया था. पर घटना के बाद से वह गायब है. पुलिस ने अब अपना ध्यान कृष्णकांत की ओर लगा दिया.

पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो यह भी पता चला कि कृष्णकांत का अपनी भाभी वर्षा से काफी समय से विवाद चल रहा था. जब से उस ने कृष्णकांत के बड़े भाई चंद्रशेखर नागपुरे से लवमैरिज की थी, तभी से ससुराल वाले उस से नाराज चल रहे थे. जिस से वह शादी के बाद से ही ससुराल वालों से अलग पति के साथ रह रही थी. वह भी उस से खुश नहीं थे.

पुलिस ने वर्षा की सास और जेठ से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वर्षा उन से अलग रहती थी. लिहाजा उन्होंने भी उस से रिश्ता लगभग खत्म कर रखा था. इस मामले में पता चला कि कीर्ति नाम की युवती से मृतका के देवर की मित्रता थी. पुलिस ने कीर्ति के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का कृष्णकांत से मिलनाजुलना था. पुलिस ने कीर्ति से पूछताछ की और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना के दिन कई बार उस की कृष्णकांत से बात भी हुई थी.

कीर्ति से जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कृष्णकांत अकसर उस से वर्षा के बारे में पूछता रहता था. तब वह उसे वर्षा की लोकेशन बता देती थी. कीर्ति ने पुलिस को बताया कि अब कृष्णकांत कहां है, इस बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है. कृष्णकांत का मोबाइल फोन भी बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों को लगातार इस मामले में नजर रखने को कहा था. इस का परिणाम यह हुआ की पुलिस को जानकरी मिली कि कृष्णकांत भोपाल में है.

पुलिस को यह भी पता चला कि वह कोर्ट के काम से आमला आने वाला है. लिहाजा पुलिस मुस्तैद हो कर उस के आने का इंतजार करने लगी. अगले दिन जैसे ही वह आमला आया, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने थाने ले जा कर जब कृष्णकांत से पूछताछ की तो वह खुद को बेगुनाह बताने लगा. उस ने बताया कि घटना वाली तारीख को वह भोपाल में था.

पुलिस ने जब उसे बताया कि घटना की रात उस का मोबाइल देर रात तक आमला के आसपास ही लोकेशन दिखा रहा था. उसे उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स दिखाई तो वह टूट गया. उस ने कबूल कर लिया कि उस ने अपनी दोस्त कीर्ति की मदद से अपनी भाभी वर्षा की हत्या की है. वर्षा ने हालात ही ऐसे बना दिए थे, जिस से उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

कृष्णकांत ने पुलिस को जो बताया उस के अनुसार कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई—

बैतूल जिले के आमला गांव के समीप बोडखी में रहने वाले आर.के. नागपुरे के 3 बेटों में सब से बड़ा चंद्रशेखर नागपुरे था. इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद चंद्रशेखर सेना में भरती हो गया.

नौकरी से छुट्टी मिलने पर जब वह घर आता तो कनोजिया में रहने वाले अपने मामा के यहां भी जाता था. उस के मामा की बेटी वर्षा उस समय जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रही थी और महज 16 साल की थी. इधर चंद्रशेखर 27 की उम्र छू रहा था. पर सेना में होने के कारण उस का बदन गठीला था और सेना में होने का रौब तो उस पर था ही. उसी दौरान वर्षा से उसे प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

रिश्ते मे वर्षा चंद्रशेखर की ममेरी बहन थी, पर इस के बाद भी दोनों रिश्तों की मर्यादा भूल गए और प्यार की पींगे बढ़ाने लगे. जब इस बात की भनक चंद्रशेखर के घर वालों को लगी तो वे उस पर नाराज हुए. उन को कतई गवारा नहीं था कि उन का बेटा ऐसी युवती से प्रेम करे, जो उस के सगे रिश्ते में आती हो. वे चंद्रशेखर का रिश्ता कहीं दूसरी जगह करने की योजना बना रहे थे. उन्होंने चंद्रशेखर को काफी समझाया पर वह नहीं माना.

चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध की परवाह नहीं की ओर वर्षा से मिलना जारी रखा. वर्षा भी उस के प्यार में दीवानी थी. लिहाजा उस ने नजदीकी रिश्ते से ज्यादा अपने प्यार को अहमियत दी. नतीजा यह हुआ कि घर वालों के विरोध के बावजूद चंद्रशेखर और वर्षा ने शादी का फैसला कर लिया और घर वालों के विरोध के बावजूद उन्होंने शादी कर ली.

शादी चूंकि चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध के बावजूद की थी, लिहाजा शादी के बाद वह घर से अलग हो गया और बोखड़ी में ही अलग मकान ले कर रहने लगा. समय अपनी गति से बीतता रहा. कुछ समय बाद वर्षा एक बेटे की मां भी बन गई. बात 2013 के आसपास की है. चंद्रशेखर की जहर खाने से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. उस ने जहर कैसे खाया, इस बात का खुलासा तो नहीं हो पाया, पर कहा यह जाता है कि चंद्रशेखर अपने घर वालों के व्यवहार से दुखी था और घर वालों द्वारा उसे स्वीकार नहीं किया तो उस ने यह कदम उठा लिया.

हालांकि उस ने जहर खाया था या उसे दिया गया था, यह भी एक रहस्य था. चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद उस की सारी संपत्ति की वारिस उस की पत्नी वर्षा बन गई. चंद्रशेखर के घर वाले वर्षा को पहले ही नापसंद करते थे. उन्होंने इस शादी को भी मान्यता नहीं दी थी, लिहाजा वे इस के खिलाफ हो गए कि वर्षा को उस की संपत्ति में से कुछ मिले. पर उन के चाहने से कुछ नहीं हुआ.

सेना ने वर्षा को उस की पत्नी मानते हुए उस की मौत के बाद उस के सारे देय दे दिए. बताया जाता है कि वर्षा को चंद्रशेखर की मौत के बाद करीब 30 लाख रुपए मिले थे. चंद्रशेखर का भाई कृष्णकांत इसे अपनी संपत्ति मान रहा था और उस का मानना था कि इस से उस के घर वालों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. उस ने सेना मुख्यालय में भी पत्र लिख कर इस धनराशि में अपना अधिकार बताया. कृष्णकांत ने कहा कि चंद्रशेखर का वर्षा के साथ कभी विवाह हुआ ही नहीं था. दोनों भाईबहन थे, लिहाजा उस की संपत्ति पर घर वालों का अधिकार है.

उस ने चंद्रशेखर की मौत के बाद खुद को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने की मांग भी सेना से की थी. जब यह बात नहीं बनी तो वह कोर्ट चला गया. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी जारी थी. अब बात करते हैं हत्या के कारणों की. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद कृष्णकांत भोपाल आ गया और यहां एक कंपनी में मोटरसाइकिल राइडर बन गया. वह कंपनी के निर्देश पर लोगों को लाने ओर छोड़ने का काम करने लगा.

इस दौरान वह जब भी गांव जाता तो वर्षा के शानोशौकत भरे खर्चे देख कर उसे बेहद पीड़ा होती थी. उसे लगता था कि उस का परिवार आर्थिक दिक्कत झेल रहा है और वर्षा उस के भाई की मौत के बाद मिले पैसों से ऐश कर रही है. कुछ दिनों बाद कृष्णकांत को पता चला की वर्षा किसी और व्यक्ति के साथ लिवइन में रहने लगी है तो उसे और बुरा लगा. उसे लगा कि अब तो वर्षा की संपत्ति उसे कभी नहीं मिलेगी. लाखों के लालच में उस ने वर्षा को मारने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने कीर्ति को अपने विश्वास में लिया और उस से दोस्ती कर ली. कीर्ति को उस ने यह जिम्मेदारी दी कि वर्षा की हर गतिविधि पर नजर रखे और उस की हर गतिविधि की उसे फोन द्वारा जानकारी देती रहे.

6 फरवरी, 2021 को वर्षा अपनी मां के यहां आई थी. कीर्ति ने इस की जानकारी फोन पर कृष्णकांत को दी. कृष्णकांत को लगा कि अच्छा मौका है. शाम के समय वैसे भी गांव में अंधेरा छा जाता है और अधिकांश लोग अपने घरों में कैद हो जाते हैं. ऐसे मे वर्षा की हत्या करना कृष्णकांत को आसान लगा. उस ने अपने एक मित्र से एक तमंचे का जुगाड़ किया और शाम को मोटरसाइकिल से सीधा कनौजिया गांव पहुंचा और वर्षा के घर के सामने जा कर खड़ा हो गया. वहां उस समय कुछ लोग उसे दिखे और घर का दरवाजा भी बाहर से बंद था.

लिहाजा वह घर के पीछे गया. वहां वर्षा की दादी बरतन साफ कर रही थीं. बूढ़ी होने के कारण उन्हें कम दिखाई और कम सुनाई देता था. उन्हें चकमा दे कर वह पीछे के दरवाजे से अंदर घुस गया. वर्षा कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. कृष्णकांत ने बिना समय गंवाए उस पर गोली चला दी. गोली लगते ही वर्षा ढेर हो गई. उधर अपना काम करने के बाद कृष्णकांत पीछे के दरवाजे से फरार हो गया. उसी रात वह मोटरसाइकिल से भोपाल आ गया. कोर्ट के काम से उसे फिर आमला जाना पड़ा. हालांकि वह 2 दिन में निश्चिंत हो चुका था कि उसे किसी ने नहीं देखा होगा. इस कारण वह पकड़ा नहीं जाएगा.

लेकिन कहते हैं न कि जुर्म कहीं न कहीं अपने निशान छोड़ ही जाता है. कृष्णकांत के साथ भी यही हुआ. पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़ी तो उस का जुर्म सामने आ गया. पुलिस ने कृष्णकांत और कीर्ति से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

Crime Story: प्रेमी के सिंदूर की चाहत – पति बना पत्नी का शिकार

Crime Story: 17 मई की शाम करीब साढ़े 5 बजे थे जब दिल्ली में द्वारका सेक्टर 29 से सटे छावला के थाने के टेलीफोन की घंटी बजी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत फाइल समेटते हुए अपना हाथ टेलीफोन का रिसीवर उठाने के लिए आगे बढ़ाया. जैसे ही ड्यूटी औफिसर ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से किसी ने घबराते हुए बोला, ‘‘छावला पुलिस स्टेशन?’’

ड्यूटी औफिसर, ‘‘मैं छावला थाने से बोल रहा हूं. बताइए आप क्या कहना चाहते हैं?’’ ड्यूटी औफिसर ने कहा.

‘‘साहब, निर्मलधाम के पास सड़क किनारे एक आदमी की लाश पड़ी है. मैं यहां से गुजर रहा था तो मैं ने देखा. आप यहां आ कर देख लीजिए.’’

ड्यूटी औफिसर ने फोन के रिसीवर को अपने दांए कंधे और कान के सहारे दबाया, अपने दोनों हाथों को आजाद किया और टेबल पर कहीं पड़े नोट्स वाली डायरी ढूंढने लगे. वह लगातार फोन पर उस राहगीर से वारदात की घटना के बारे में पूछ रहे थे और डायरी ढूंढ रहे थे. टेबल पर बिखरे सारे सामान को उलटने पुलटने के बाद जब डायरी नहीं मिली तो एक फाइल के पीछे ही उन्होंने वारदात की जगह समेत बाकी जरूरी जानकारियां लिख डालीं. ड्यूटी औफिसर ने उस राहगीर को वारदात की जगह से कहीं भी हिलने से मना कर दिया और फोन काट दिया.

ये सारी जानकारी ड्यूटी औफिसर ने उस समय थाने में मौजूद थानाप्रभारी राजवीर राणा को दी. राजवीर राणा बिना किसी देरी के थाने में मौजूद स्टाफ को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां पहुंचते ही पुलिस की टीम ने उस सुनसान सी सड़क के एक किनारे पर एक बाइक खड़ी देखी. बाइक के बिलकुल बगल में खून से लथपथ एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. लाश को देखते ही वहां मौजूद पुलिस टीम चौकन्नी हो गई और सबूत जमा करने के मकसद से घटनास्थल के इर्दगिर्द फैल गई.

थानाप्रभारी राजवीर राणा जब लाश का मुआयना करने के लिए बौडी के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस के बदन पर किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. जो साफ दिखाई दे रहे थे. उन्होंने लाश के अगलबगल नजर घुमाई तो एक मोबाइल फोन वहीं पास में पड़ा था, जो कि संभवत: मरने वाले शख्स का रहा होगा.

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रात होने को थी. मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने बिना किसी देरी के बाइक और मोबाइल जब्त कर लिया और लाश की काररवाई आगे बढ़ाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम के आने का इंतजार करने लगे.

उस सड़क से पैदल आने जाने वाले लोगों ने पुलिस और वहां मौजूद लाश को देख कर घटनास्थल पर जमावड़ा लगा दिया. सब टकटकी लगाए पुलिस को अपना काम करते देख आपस में फुसफुसाहट करने लगे.

जब वहां मौजूद पुलिस ने आसपास के मूकदर्शक बने लोगों से लाश की पहचान करने के लिए पूछताछ की तो कुछ लोगों ने लाश की शिनाख्त करते हुए कहा कि इस का नाम अशोक कुमार है और यह पेशे से टैक्सी ड्राईवर है.

तब तक मौके पर क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम भी आ पहुंची. टीम ने अपना काम शुरू किया. उन्होंने सब से पहले लाश की फोटोग्राफी की. उन्होंने सबूत के तौर पर घटनास्थल से खून लगी मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर लिए. यह सब काम कर लेने के बाद थानाप्रभारी राजवीर राणा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मौर्चरी भेज दिया.

सारे काम निपटा लेने के बाद पुलिस की टीम थाने लौट आई तथा इस केस के संबंध में काम आगे बढ़ाने लगी. पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी राजवीर राणा ने स्वयं संभाली.

केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए थानाप्रभारी राणा ने सब से पहले घटनास्थल से बरामद किए गए मोबाइल फोन को निकलवाया. यह फोन टूटा नहीं था. सिर्फ बैटरी चार्जिंग खत्म होने की वजह से बंद हो गया था.

उस की काल डिटेल्स निकलवाई और देखा कि आखिरी बार एक नंबर से अशोक कुमार को कई बार काल की गई थी. इस के कुछ देर बाद ही अशोक कुमार की हत्या हो गई थी.

शक की सूई अब इसी आखिरी नंबर पर आ कर रुक गई थी. राजवीर राणा ने अपने फोन से इस नंबर को डायल किया तो दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज आई. थानाप्रभारी ने पहले अपना परिचय दिया और उस के बाद उस महिला से अशोक कुमार के रिश्ते के बारे में पूछा.

महिला ने अपना नाम शीतल और खुद को अशोक कुमार की बेटी बताया. राजवीर ने फोन पर बड़े दु:ख के साथ शीतल को बताया कि उस के पिता सड़क दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो चुके हैं, यह जानने के बाद शीतल उसी समय ही बिलखने लगी. उन्होंने उस से उस की मां के बारे में पूछा तो शीतल ने अपनी मां राजबाला से उन की बात करा दी.

थानाप्रभारी ने राजबाला को अशोक की मौत की खबर देते हुए उन से शीघ्र ही थाने पहुंचने को कहा 2-3 घंटे बाद जब राजबाला थाने पहुंची तो वह राजवीर राणा को देखते ही फफकफफक कर रोने लगी.

अपने पति की हत्या की खबर सुन कर वह आहत थी. राजवीर राणा ने राजबाला को हौसला रखने को कहा और उस से उस के पति से किसी से साथ दुश्मनी होने के बारे में पूछा. राजबाला ने रोते हुए कहा कि अशोक की किसी के साथ भी कोई दुश्मनी नहीं थी.

राजबाला से बात करते समय थानाप्रभारी राजवीर राणा को उस की बातों से ऐसा नहीं लग रहा था कि उसे पति की मौत का दुख है. बेशक राजबाला राजवीर राणा के सामने रो रही थी और दुखी दिखाई दे रही थी. लेकिन राजवीर को राजबाला पर शक हो चुका था.

राजबाला के आंसू घडि़याली लग रहे थे. दाल में कहीं तो कुछ काला जरुर था, जिस का पता लगाना जल्द से जल्द जरुरी था. आखिर एक व्यक्ति का कत्ल जो हुआ था.

राजबाला से पूछताछ खत्म होने पर वह अपने घर के लिए रवाना हो गई और पीछे कई तरह के शक और सवाल छोड़ गई.

इन सभी शकों को दूर करने के लिए और इस मामले से जुडे़ सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए थानाप्रभारी ने शीतल और राजबाला की काल डिटेल्स मंगवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स को बेहद बारीकी से परखी और उस की जांच की तो वह बेहद हैरान रह गए.

काल डिटेल्स से उन्हें यह पता लगा कि शीतल जिस समय अशोक को लगातार काल कर रही थी उस के ठीक बाद उस ने एक अन्य नंबर पर काफी देर तक बातचीत की थी. यह सब देख कर पुलिस ने यह अनुमान लगाया कि यदि इस मामले में शीतल को थोडा ढंग से कुरेदा जाए तो शायद इस केस में एक और लीड मिल सकती है. राजवीर ने बिना देरी किए फिर से एक बार राजबाला और शीतल को थाने बुला लिया.

उन्होंने इस बार दोनों से अलगअलग पूछताछ की. उन्होंने पहले शीतल से इस घटना के बारे में विस्तार से पूछा. शीतल का बयान लेने के बाद उन्होंने राजबाला से इस मामले में फिर से पूछताछ की. क्रास पूछताछ में दोनों की चोरी पकड़ी गई.

दोनों के बयान एक दूसरे से अलग थे. जब राजवीर राणा ने दोनों को कानून का थोड़ा डर दिखा कर उन पर दबाव बनाया तो शीतल ज्यादा देर टिक नहीं सकी. शीतल ने रोतेबिलखते, अपने हाथ से अपना सिर पीटते हुए अपनी मां राजबाला और उस के प्रेमी वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू के साथ साजिश रच कर अपने पिता की हत्या कराने की बात कबूल कर ली.

यह सब सुनते ही बेटी के सामने राजबाला का चेहरा पीला पड़ गया. उसे जैसे न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रहा था. थाने में शीतल के सामने राजबाला अपनी बेटी को घूरे जा रही थी. वह उसे ऐसे घूर रही थी जैसे मानो अगर उसे मौका मिलता तो वह वहीं पर शीतल का भी कत्ल कर बैठती.

शीतल द्वारा जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. फिर राजबाला की निशानदेही पर उस के प्रेमी वीरेंद्र को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने अशोक की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. वीरेंद्र के बताए हुए पते पर जा कर पुलिस टीम ने अशोक कुमार की हत्या में इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू और उस की कार बरामद कर ली. तीनों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में अशोक कुमार की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो सनसनीखेज दास्तान सामने आई, कुछ इस तरह थी—

अशोक कुमार दिल्ली के नजफगढ़ के नजदीक भरथल गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस का 3 सदस्यों का छोटा परिवार था जिस में अशोक, उस की पत्नी राजबाला और बेटी शीतल ही थी. अशोक की कमाई का जरिया उस की टैक्सी थी. वह बेटी शीतल की शादी जाफरपुर कला के पास इशापुर गांव के रहने वाले हिमांशु से कर चुका था. शीतल अपने पति के साथ बेहद खुश थी. बेटी की शादी के बाद अशोक के सिर पर अब कोई और जिम्मेदारी नहीं थी.

लेकिन पिछले साल कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में लौकडाउन लगा तो ज्यादातर लोगों की तरह अशोक भी अपने घर में कैद हो कर रह गया. उस का काम न के बराबर रह गया. घर पर रहने पर अशोक बहुत ज्यादा परेशान नहीं था.

अशोक को महसूस हुआ कि वैसे भी अपने काम के दौरान वह अकसर अपने घर से बाहर ही रहता है, ऐसे में न जाने कितने अरसे बाद उसे इतने लंबे समय के लिए घर में रहना नसीब हुआ है. अपने काम से हमेशा बाहर रहने वाले व्यक्ति को जब घर में कैद होना पड़ जाए तो जाहिर सी बात है कि वह घर की हर एक चीज को बारीकी से परखता है, गौर करता है.

ऐसे ही लौकडाउन के एक दिन अशोक घर का सामान लेने के लिए गांव में निकला तो दुकानदार से बातचीत के दौरान उस ने जो सुना उस से उस के होश ही उड़ गए.

दुकानदार ने कहा, ‘‘क्या भई अशोक. मजा आ रहा है घर में कैद हो कर?’’

‘‘कैद होना किस को अच्छा लगता है भला. अब समस्या सिर पर बैठी है तो हम बस उसे झेलने को मजबूर हैं. घर में रहने के अलावा और कुछ कर भी तो नहीं सकते.’’ अशोक बोला.

‘‘अब तो तुम्हारी महरिया भी तुम्हारे साथ कैद हो गई होगी. अब तो लोग आ जा भी नहीं सकते तुम्हारे घर. दुकानदार ने जोर देते हुए कहा.’’

‘‘वो घर में कैद हो गई…? क्या मतलब. और घर में लोगों के आने की क्या बात कह रहे हो.’’ अशोक भौंहें चढ़ाते हुए बोला.

दुकानदार ने धीमी, दबी आवाज में कहा, ‘‘अरे वो तो लौकडाउन लग गया तब जा कर तुम्हारी महरिया घर पर रुकने को मजबूर है. नहीं तो तुम्हारे घर से निकलते ही तुम्हारी महरिया आशिकी करने निकल जाती थी.’’

‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो. कौन है उस का आशिक?’’ अशोक ने गुस्से से पूछा.

दुकानदार दबी आवाज में बोला, ‘‘अरे ढिल्लू का नाम सुना है न तुम ने? वीरेंद्र का? वही तो है जो शीतल की मां के साथ आशिकी करता फिरता है. यह बात तो पूरे गांव वालों को पता है. चाहे तो पूछ लो.’’

ये सब सुनते ही अशोक के दाएं हाथ में थामी पौलिथिन थैली छूट गई. थैली फटने से चीनी, आटा, दाल और घर का कुछ और सामान नीचे पथरीली सड़क पर गिर कर फैल गया. अशोक को इस बात पर जितना सदमा लगा था उस से कहीं ज्यादा उसे इस बात को सुन कर गुस्सा आ रहा था. लोग उस की पत्नी राजबाला और गांव के बदमाश वीरेंद्र के बारे में उलटी सीधी बातें कर रहे थे.

दुकानदार से यह सब सुन कर उस ने 2-4 और लोगों से इस बारे में पूछताछ की. हर किसी ने दबी आवाज में अशोक को वही बताया जो कि उस दुकानदार ने बताया था.

दरअसल 43 वर्षीय वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू भरथल का ही निवासी था. वीरेंद्र उस इलाके का नामचीन बदमाश था. दिल्ली के कई थानों में उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. एक तरह से जेल उस का दूसरा घर था.

लोगों के अनुसार जब अशोक घर पर नहीं रहता था तब उस के पीठ पीछे वीरेंद्र राजबाला के साथ गुलछर्रे उड़ाता था. अशोक ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजबाला से इस बारे में पूछा.

लेकिन राजबाला ने पति की बात से कन्नी काट ली. उस ने उस की बात से साफ इनकार कर दिया. लेकिन उस दिन के बाद राजबाला अशोक की नजरों का ज्यादा देर तक सामना नहीं कर पाई.

राजबाला के मोबाइल पर जब कभी भी वीरेंद्र का फोन आता तो वह पति से दूर जा कर बात करती, जब अशोक उस से पूछता कि किस का फोन आया था तो वह रिश्तेदार होने का बहाना बनाने लगती. यह सब कुछ देख कर अशोक को यह यकीन जरूर हो गया कि दाल में जरूर कुछ काला है.

अकसर पति के घर पर रहने से पत्नी को खुशी होती है लेकिन अशोक के घर पर होने से राजबाला की खुशियों पर मानो बादल छा गए थे.

राजबाला वीरेंद्र से मिलने के लिए तड़पने लगी. उसे अपने पति से ज्यादा वीरेंद्र पसंद था. वीरेंद्र के साथ मां की आशिकी के किस्से बेटी शीतल से भी नहीं छिपे थे. वह भी उन के रिश्ते के बारे में बखूबी जानती थी और वह भी तो वीरेंद्र से पिता का महत्त्व देती थी.

शीतल वीरेंद्र को पिता अशोक से ज्यादा पसंद करती थी. क्योंकि अशोक जब घर पर नहीं रहता था, उस समय वीरेंद्र राजबाला से मिलने आता तो शीतल के लिए महंगे तोहफे साथ लाता था. दरअसल लौकडाउन की वजह से अशोक अपनी पत्नी राजबाला, बेटी शीतल और वीरेंद्र के लिए गले की हड्डी बन गया था.

लौकडाउन के चलते जेल में बंद वीरेंद्र को भी पैरोल पर छोड़ दिया गया था. एक दिन अशोक की नजरों से बचते बचाते वीरेंद्र राजबाला से मिला. उस दिन राजबाला ने वीरेंद्र पर इस कदर प्यार लुटाया जैसे वीरेंद्र के पर लग गए हों.

शारीरिक सुख भोग लेने के बाद जब राजबाला और वीरेंद्र एकदूसरे से अलग हुए तो उस ने वीरेंद्र्र से कहा कि अगर उस ने उस के पति अशोक को जल्द ठिकाने नहीं लगाया तो वह आत्महत्या कर लेगी. तब वीरेंद्र ने प्रेमिका से कहा, ‘‘तुम्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं है. मैं उसे ही निपटा दूंगा.’’

इस के बाद राजबाला और वीरेंद्र ने योजना बनाई. इस योजना में उन्होंने शीतल को शामिल कर लिया. शीतल इस काम के लिए खुशी से तैयार हो गई.

17 मई, 2021 को शीतल ने अपने पिता अशोक को मिलने के लिए निर्मलधाम बुलाया. अशोक अपनी बाइक से निर्मलधाम के रास्ते में ही था. शीतल पलपल पिता को काल कर उस से खबर लेती रही. जब अशोक निर्मलधाम के नजदीक पहुंचा तो शीतल ने वीरेंद्र को काल कर यह बात बता दी.

वीरेंद्र अपनी हुंडई कार से वहां पहुंच गया और अशोक को सड़क किनारे रोक कर चाकू से गोद दिया. अशोक की लाश को वहीं छोड़ कर वीरेंद्र्र वहां से फरार हो गया. काम हो जाने पर वीरेंद्र्र ने राजबाला और शीतल को इस बात की जानकारी फोन कर के दी.

राजबाला, शीतल और वीरेंद्र्र तीनों अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे थे लेकिन पुलिस ने अपनी सूझबूझ के साथ 12 घंटे के अंदर ही अशोक कुमार हत्याकांड का परदाफाश कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी राजवीर राणा कर रहे थे. Crime Story

Domestic Dispute: गलती गुरतेज की – क्यों बना बीवी का हत्यारा

Domestic Dispute: गुरतेज सिंह के 2 और भाई थे. ये सभी बठिंडा के थाना संगत के गांव मुहाला के आसपास रहते थे. गुरतेज भाइयों से अलग रहता था. उस के पास पैसा भी था और रुतबा भी. शादी के 2 सालों बाद ही वह एक बेटे का बाप बन गया था.

वह सुबह खेती के काम के लिए निकल जाता तो शाम को ही लौटता था. पतिपत्नी एकदूसरे से बहुत खुश थे. लेकिन एक दिन गुरतेज के एक दोस्त ने उसे जो बताया, उस से इस घर की खुशियों में ग्रहण लगना शुरू हो गया. गुरतेज के उस खास दोस्त ने बताया था कि उस ने जसप्रीत भाभी को एक लड़के के साथ शहर के बाजार में घूमते देखा था. लेकिन गुरतेज को उस की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ.

लेकिन यही बात कुछ दिनों बाद किसी दूसरे दोस्त ने बताई तो गुरतेज सोचने को मजबूर हो गया कि दोनों दोस्तों को एक जैसा धोखा नहीं हो सकता.

इसलिए शाम को घर लौट कर उस ने जसप्रीत से इस बारे में पूछा तो उस ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘लगता है, आप के दोस्त भांग पी कर घूमते हैं, इसीलिए आप से बहकीबहकी बातें करते हैं. आप खुद ही सोचिए, मैं आप के बगैर शहर क्या करने जाऊंगी?’’

जसप्रीत के इस जवाब से गुरतेज लाजवाब हो गया. लेकिन यह धोखा नहीं था. इस के 10 दिनों बाद की बात है. यही बात एक रिश्तेदार ने गुरतेज से कही तो घर में झगड़ा होना स्वाभाविक था, जबकि जसप्रीत का अब भी वही कहना था, जो उस ने पहले कहा था.

जसप्रीत की बातों से गुरतेज को लगता कि वही गलत है. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच है और कौन झूठा? लेकिन एक बात तय थी कि कोई न कोई तो झूठ बोल रहा था. काफी सोचनेविचारने के बाद भी गुरतेज को इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आया. इसी तरह ऊहापोह में कुछ दिन और बीत गए, इस बार उस के छोटे भाई जगतार ने एक दिन उस से कहा, ‘‘भाई, आप होश में आ जाइए, कहीं ऐसा न हो कि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाए और आप को इस की खबर तक न लगे.’’

इस बार भाई जगतार ने जसप्रीत के बारे में खबर दी तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि सभी सच थे, झूठ जसप्रीत ही बोल रही थी. इसलिए उस दिन गुरतेज ने सख्ती से काम लिया. उस ने जसप्रीत को खूब डांटाफटकारा.

इस के बाद पतिपत्नी दोनों ही सतर्क हो गए. जसप्रीत जहां घर से बाहर निकलने में सावधानी बरतने लगी, वहीं गुरतेज गुपचुप तरीके से उस पर नजर रखने के साथ पड़ोसियों से उस के बारे में पूछता रहता था. इस से गुरतेज को पता चल गया कि उस के खेतों पर जाने के बाद कोई लड़का उस के घर आता है. उस के आने के बाद जसप्रीत बेटे को किसी पड़ोसी के घर छोड़ कर उस लड़के के साथ चली जाती है.

वह लड़का कौन था, यह कोई नहीं जानता था. इस से साफ हो गया कि जसप्रीत के किसी लड़के से संबंध हैं. इस बारे में गुरतेज ने जसप्रीत से कुछ नहीं पूछा. दरअसल, वह उसे रंगेहाथों पकड़ना चाहता था, इसलिए एक दिन घर से वह खेतों पर जाने की बात कह कर गांव में ही छिप गया.

करीब एक घंटे बाद एक टाटा 407 टैंपो आ कर रुका. उस में से एक लड़का उतर कर गांव की ओर चला गया. गुरतेज ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि इस तरह लोगों के रिश्तेदार अपनी गाडि़यों से आते रहते थे. लेकिन जब कुछ देर बाद टैंपो स्टार्ट होने लगा तो उस ने झांक कर देखा. लड़के के साथ टैंपो में जसप्रीत बैठी थी.

गुरतेज मोटरसाइकिल से टैंपो के पीछेपीछे चल पड़ा, लेकिन वह टैंपो का पीछा नहीं कर सका. कुछ दूर जा कर टैंपो उस की आंखों से ओझल हो गया. कुछ देर वह सड़क पर खड़ा सोचता रहा, उस के बाद घर लौट आया. घर के अंदर कदम रखते ही उस का दिमाग चकरा गया, क्योंकि जसप्रीत घर में बैठी बेटे को खाना खिला रही थी. उसे देख कर गुरतेज की बोलती बंद हो गई.

उस ने सोचा था कि जसप्रीत यार से मिल कर लौटेगी तो वह पूछेगा कि कहां से आ रही है? पर उस ने अपनी आंखों से जो देखा, वह भी झूठा हो गया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे, उस ने उसे खुद टैंपो में बैठ कर जाते देखा था. यह धोखा कैसे हो गया? गुरतेज के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा था, इसलिए वह खामोश रह गया.

लेकिन उस ने जसप्रीत का पीछा करना नहीं छोड़ा. आखिर एक दिन उस ने जसप्रीत को बाजार में एक लड़के के साथ घूमते देख लिया. दोनों उस से कुछ दूरी पर थे. वहां भीड़ थी. गुरतेज के वहां पहुंचने तक लड़का तो गायब हो गया, पर जसप्रीत खड़ी रह गई. अब जसप्रीत के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था.

गुरतेज ने घर आ कर जसप्रीत की जम कर पिटाई की, लेकिन उस ने प्रेमी का नाम बताना तो दूर, यह भी नहीं माना कि उस के साथ बाजार में कोई था. लेकिन अब गुरतेज को सच्चाई का पता चल गया था. इसलिए पतिपत्नी में क्लेश रहने लगा. घर में रोजाना लड़ाईझगड़ा और मारपीट आम बात हो गई.

आखिर एक दिन गुरतेज को कुछ बताए बगैर जसप्रीत बेटे को छोड़ कर घर से भाग गई. लेकिन वह अपने किसी प्रेमी के साथ नहीं भागी थी, अपने पिता के घर गई थी. हालांकि जसप्रीत के पिता ने उसे काफी समझाया, पर उस ने उन की एक नहीं सुनी. पिता के घर कुछ दिन रहने के बाद वह अपनी बड़ी बहन के पास बाड़ी गांव चली गई.

दरअसल, जसप्रीत बहन के यहां कुछ दिन रह कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाना चाहती थी. लेकिन उस की बहन को न जाने कैसे इस बात का पता चल गया. उस ने यह बात अपने पति को भी बता दी. उन लोगों ने सोचा कि अगर जसप्रीत उन के घर से भागती है तो उन की बदनामी तो होगी ही, साथ ही लोग यही कहेंगे कि जसप्रीत को उन्हीं लोगों ने भगाया है.

यही सोच कर उन्होंने गुरतेज को अपने गांव बुलाया और पतिपत्नी में समझौता करा दिया. गुरतेज जसप्रीत को ले कर गांव आ गया. जसप्रीत ने भी पति से माफी मांगी और वादा किया कि अब वह कभी वैसी गलती नहीं करेगी. पतिपत्नी फिर पहले की ही तरह रहने लगे. जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर दौड़ने लगी.

27 जुलाई, 2017 की रात आम दिनों की तरह गुरतेज और जसप्रीत ने साथसाथ रात का खाना खाया. बेटा पहले ही खाना खा कर सो गया था. खाना खाते ही गुरतेज को बहुत जोर से नींद आ गई तो वह जा कर बैड पर लेट गया. वह पिछले एक सप्ताह से देख रहा था कि खाना खाते ही उसे नींद आ जाती है. लेकिन उस ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

बहरहाल, खाना खा कर वह सो गया. सुबह 4 बजे के करीब उस की आंख खुली तो उसे लगा कि उस का सिर भारीभारी है. वह बिस्तर पर चुपचाप पड़ा रहा. तभी उसे किसी के हंसने और बातें करने की आवाजें सुनाई दीं. उस ने ध्यान लगा कर सुना तो उन की आवाजों के साथ चूडि़यों के खनकने की भी आवाजें आ रही थीं.

अब उस से रहा नहीं गया. वह बैड से उठा. कमरे से बाहर आ कर उस ने जो देखा, उस से उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. गुस्सा और उत्तेजना से उस का पूरा शरीर कांपने लगा. सामने आंगन में बिछी चारपाई पर जसप्रीत एक लड़के के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस दृश्य ने उसे आकाश की ऊंचाइयों से उठा कर पाताल में झोंक दिया था. वही क्या, उस की जगह कोई भी होता, उस का यही हाल होता.

गुरतेज कमरे में गया और दीवार पर टंगी लाइसेंसी बंदूक उतारी और आंगन में पड़ी चारपाई के पास पहुंच कर उस ने बिना कुछ कहे एक गोली जसप्रीत की छाती में तो दूसरी गोली उस के यार को मार कर दोनों को मौत के घाट उतार दिया.

पत्नी और उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार कर गुरतेज ने यह बात दोनों भाइयों, गुरप्रीत सिंह और जगतार सिंह को बता दी. इस के बाद इधरउधर भागने के बजाय उस ने थाना पुलिस को फोन कर के कहा कि उस ने अपनी पत्नी और उस के प्रेमी को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया है. पुलिस आ कर उन की लाशें बरामद कर के उसे गिरफ्तार कर ले. वह घर में बैठा पुलिस का इंतजार कर रहा है.

इस के बाद गुरतेज ने अपने छोटे भाई जगतार से नाश्ता बनवाने तथा बेटे को संभालने को कहा. इस के बाद नहाधो कर घर के आंगन में कुरसी डाल कर बैठ कर पुलिस का इंतजार करने लगा.

सचना मिलते ही थाना संगत के थानाप्रभारी इंसपेक्टर परमजीत सिंह एसआई सुरजीत सिंह, हवलदार जसविंदर सिंह, सिपाही राकेश कुमार, तारा सिंह, तेज सिंह, महिला सिपाही चरनजीत कौर और कर्मजीत कौर को साथ ले कर गांव मलीहा पहुंच गए.

गुरतेज आंगन में कुरसी डाले बैठा था. बाहर गांव वालों की भीड़ लगी थी. वहीं चारपाई पर जसप्रीत और उस के प्रेमी की रक्तरंजित निर्वस्त्र लाशें पड़ी थीं. परमजीत सिंह ने लाशों पर चादर डलवा कर सारी काररवाई कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

गुरतेज सिंह उर्फ तेजा को हिरासत में ले कर थाने आ गए. उस के बयान के आधार पर अपराध संख्या 174/2017 पर आईपीसी की धारा 302 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. उसी दिन उसे जिला मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद परमजीत सिंह ने जसप्रीत के साथ मारे गए उस के प्रेमी के बारे में पता किया तो पता चला कि उस का नाम गुरप्रीत सिंह था. वह गांव मिडू खेड़ा के रहने वाले दिलवीर सिंह का बेटा था. वह टैंपो चलाता था. करीब 2 सालों से जसप्रीत कौर से उस के अवैध संबंध थे.

दोनों शादी करना चाहते थे, वे शादी करते, उस के पहले ही गुरतेज ने उन्हें खत्म कर दिया. लेकिन यहां गलती गुरतेज ने भी की. बेशर्म पत्नी और उस के प्रेमी को मार कर उन्हें क्या मिला, वह तो हत्या के आरोप में जेल चले गए. शायद उन्हें सजा भी हो जाए. ऐसे में उन का घर तो बरबाद हुआ ही, बेटा भी अनाथ हो गया. Domestic Dispute

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: जब माया की सास बनीं फांस

True Crime Story: 8 जनवरी, 2020 की बात है. पन्ना, अजयगढ़ में सर्दी का भारी प्रकोप था. पवई थाना क्षेत्र के बधाई गांव का रहने वाला संजय चौधरी खेतों की रखवाली के लिए रात को खेतों पर ही सोता था, उस के पिता मलुवा चौधरी भी खेत पर ही सोते थे. घर खेत के करीब ही थे.8 जनवरी की रात को दोनों बापबेटे खेत पर सोने गए थे, जबकि घर पर संजय की पत्नी मायाबाई और मां कसुम थी. सुबह को संजय की पत्नी मायाबाई ने उसे फोन पर बताया कि थोड़ी देर पहले वह सो कर उठी तो उस के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद मिला. मायाबाई ने उसे आगे बताया कि फोन लगाने से पहले उस ने सासू मां को कई आवाजें दी थीं. लेकिन जब उन की तरफ से कोई उत्तर नहीं मिला, तब उस ने उन्हें फोन लगाया.

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि अम्मा दिशामैदान चली गई हों, तुम इंतजार करो. हो सकता है, थोड़ी देर में आ जाएं.’’ संजय बोला.‘‘मैं काफी देर से उन का इंतजार कर रही हूं, आज तक वह बाहर से दरवाजा बंद कर के कभी नहीं गईं. आप जल्द दरवाजा खोल दो.’’ मायाबाई ने पति से कहा.पत्नी की बात सुन कर संजय घर पहुंच गया. उस ने कमरे का दरवाजा खोला तो माया बहुत घबराई हुई थी. संजय ने उस से पूछा तो उस ने कहा कि पता नहीं किस ने कमरे का दरवाजा बंद कर दिया था.इस के बाद मियांबीवी दोनों मां के कमरे में गए तो वह कमरे में नहीं थी. कुछ देर तक दोनों ने उस के लौटने का इंतजार किया. काफी देर बाद भी जब वह नहीं लौटी तो संजय ने खेत पर जा कर पिता को यह जानकारी दे दी. मायाबाई भी खेत पर पहुंच गई थी.

पत्नी के गायब होने की बात सुन कर मलुवा चौधरी भी परेशान हो गए. उन के एक खेत में अरहर की फसल खड़ी थी. मायाबाई पति के साथ जब उसी खेत के किनारे से जा रही थी, तभी संजय की नजर अरहर के खेत में पड़ी एक लाश पर गई. वह लाश के नजदीक पहुंचा तो उस की चीख निकल गई. लाश उस की मां कुसुम की थी.उस की गरदन के आसपास कई जगह कुल्हाड़ी के गहरे घाव थे. खून से सनी कुल्हाड़ी भी वहीं पड़ी थी. इस से लग रहा था कि किसी ने उसी कुल्हाड़ी से उस की हत्या की है.

संजय की चीखपुकार पर पास के खेतों में सो रहे किसान कन्हैयालाल और मांगीलाल भी आ गए. कुछ देर बाद संजय ने यह खबर डायल 100 को दे दी. कुछ देर बाद पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. डायल-100 के एक पुलिसकर्मी ने मामले की जानकारी पवई थाने के टीआई एस.पी. शुक्ला को दे दी.महिला की हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सिपाही संजय को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. टीआई ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका कुसुम के शव से बहा खून अभी भी सूखा नहीं था. इस से टीआई समझ गए कि घटना सुबह हुई है. उन्होंने सोचा कि जब कुसुम दिशामैदान के लिए खेत में आई होगी, तभी किसी ने उस की हत्या कर दी. लेकिन शव के पास लोटा वगैरह नहीं था. सवाल यह उठा कि अगर कुसुम शौच के लिए नहीं आई तो खेत पर सुबहसुबह क्यों आई.

हत्या की खबर पा कर एसपी मयंक अवस्थी, डीएसपी (पवई) डी.एस. परिहार भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी मौकामुआयना किया. टीआई द्वारा पूछताछ करने पर कुसुम के पति मलुवा और बेटे संजय ने किसी से दुश्मनी होने की बात से इनकार कर दिया. संजय की पत्नी मायाबाई ने भी सारी जानकारी पुलिस को दे दी.इस के बाद पुलिस ने उन के घर का मुआयना किया. पूछताछ करने पर टीआई को कुसुम के किसी परिचित पर ही हत्या का शक था, क्योंकि जिस कमरे में कुसुम सो रही थी, वहां किसी संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले थे. इस से लग रहा था कि कुसुम अपनी मरजी से उठ कर ही बाहर आई थी.

मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद किए जाने को ले कर टीआई का मानना था कि संभव है, कुसुम के गांव के किसी आदमी से अवैध संबंध हों. उस का आशिक रात में कुसुम से मिलने घर आया होगा. कहीं बहू अपने कमरे से निकल कर सास के कमरे में न आ जाए, इसलिए उस ने ही मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया होगा. इस के बाद किसी बात को ले कर कुसुम का उस के प्रेमी से विवाद हुआ होगा. इसी के चलते उस व्यक्ति ने कुसुम की हत्या कर दी होगी. लेकिन 56 साल की कुसुम का प्रेम पुलिस के गले नहीं उतर रहा था. फिर भी टीआई ने पुष्टि के लिए गांव में कुसुम के चालचलन की जानकारी जुटानी शुरू की.

इस जांच में कुसुम के बारे में तो नहीं लेकिन उस की बहू मायाबाई के बारे में यह जानकारी निकल कर आई कि गांव में सब से ज्यादा सुंदर मानी जाने वाली मायाबाई का चालचलन संदिग्ध था. आसपास के लोगों ने यह भी बताया कि मायाबाई का चक्कर पड़ोस में रहने वाले एक 19 वर्षीय युवक हलके चौधरी के साथ था.
पुलिस पहले भी संजय की पत्नी मायाबाई से पूछताछ कर चुकी थी, लेकिन उस के बयानों में पुलिस को कुछ भी संदिग्ध नहीं लगा था. सिवाय इस के कि बयान देते समय मायाबाई एक हाथ लंबा घूंघट निकाले रहती थी. इस से टीआई को लगा कि हो सकता है मायाबाई अपने चेहरे के भाव छिपाने के लिए घूंघट का सहारा लेती हो, इसलिए उस के बारे में नई जानकारी मिलने के बाद टीआई शुक्ला ने एक महिला पुलिसकर्मी को मायाबाई से पूछताछ करने को कहा.

महिला पुलिसकर्मी ने उस का घूंघट खुलवा कर उस से घटना वाली रात के बारे में कई सवाल पूछते हुए अचानक से पूछा, ‘‘अच्छा, यह बता कि हलके तेरे पास कितने बजे आया था?’’हलके का नाम सुनते ही मायाबाई का चेहरा बुझ गया. पहले तो वह सकपकाई फिर बोली, ‘‘कौन हलके? वो मेरे पास क्यों आएगा?’’‘‘ज्यादा सयानी मत बन. पुलिस को सारी बात पता चल गई है. उस रात हलके तुझ से मिलने आया था, इसलिए सीधेसीधे बता दे कि हलके ने तेरी सास को क्यों मारा? देख, तू सच बता देगी तो पुलिस तुझे छोड़ देगी वरना तुझे जेल जाने से कोई नहीं रोक सकेगा.’’मायाबाई पुलिस की बातों में आ गई, उस ने स्वीकार कर लिया कि उस रात सास ने उसे उस के प्रेमी हलके के साथ देख लिया था. इस के बाद हालात ऐसे बने कि उस ने प्रेमी के साथ मिल कर सास की हत्या कर दी.पुलिस पूछताछ में बहू के इश्क में सास के कत्ल की कहानी इस प्रकार सामने आई—

कोई 5 साल पहले मायाबाई जब संजय के साथ ब्याह कर गांव में आई, तब उस की उम्र 21 साल थी. पति के साथ कुछ समय तो उस के दिन अच्छे बीते लेकिन बाद में संजय पत्नी के बजाए खेती पर ज्यादा ध्यान देने लगा. पत्नी की भावनाओं को नजरंदाज करते हुए वह घर के बजाए रात को खेतों पर ही सोने लगा.
ऐसे में मायाबाई की नजरें पड़ोस में रहने वाले युवक हलके चौधरी से लड़ गईं. वह मायाबाई से 2 साल छोटा था और उसे भौजी कहता था. गांव में मायाबाई के आते ही उस की सुंदरता के चर्चे होने लगे थे. लेकिन उस वक्त हलके इन सब बातों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं लेता था. धीरेधीरे उस की उम्र बढ़ी तो उस के मन में भी मायाबाई की खूबसूरती गुदगुदी करने लगी.

मायाबाई के कच्चे मकान में कच्चा बाथरूम बाहर आंगन में था, जो हलके के घर से साफ दिखाई देता था. इसलिए 20 साल की उम्र तक आतेआते जब हलके के मन में जवानी की तरंगें उछाल मारने लगीं तो वह मायाबाई को नहाते हुए छिप कर देखने लगा. इसी बीच करीब साल भर पहले एक दिन नहा रही मायाबाई की नजर हलके पर पड़ गई. उस ने उस से कुछ नहीं कहा. वह समझ गई थी कि हलके चौधरी की जवानी अंगड़ाई ले रही है.फिर मायाबाई के मन में भी चुहल करने की बात घर कर गई. अगले दिन से वह चोरीछिपे ताकाझांकी करने वाले हलके को अपने रूप के और भी खुले दर्शन करवाने लगी. मायाबाई ने यह खेल हलके के मन में आग लगाने के लिए खेला था. लेकिन धीरेधीरे उसे न केवल इस खेल में मजा आने लगा, बल्कि हलके के प्रति उस के मन में भी चाहत पैदा हो गई.

हलके का मायाबाई के घर आनाजाना था, इसलिए जब भी हलके मायाबाई के घर आता तो वह उस से हंसीमजाक करती, जिस से कुछ दिनों में हलके की समझ में भी आ गया कि मायाबाई उस के मन की बात समझ चुकी है. इसलिए एक दिन दोपहर में वह उस समय मायाबाई के घर पहुंचा, जब वह घर पर अकेली थी. मायाबाई को भी ऐसे ही मौके का इंतजार था. उस रोज मायाबाई ने बातोंबातों में हलके से पूछ लिया, ‘‘हलके, तुम मुझे यह बताओ कि तुम्हारी कोई प्रेमिका है?’’‘‘नहीं.’’ हलके चौधरी ने जवाब दिया.
‘‘क्यों, अभी तक क्यों नहीं बनाई? तुम्हारा मन तो होता होगा?’’ मायाबाई ने पूछा.
‘‘नहीं.’’ हलके ने झूठ बोला.

‘‘मन नहीं होता तो फिर छिप कर मुझे नहाते क्यों देखते हो? मैं तो समझी थी कि मेरा देवर कई लड़कियों से दोस्ती कर चुका होगा, इसलिए अब मेरे साथ दोस्ती करना चाहता है.’’ मायाबाई मुसकराते हुए बोली.
‘‘वो तो इसलिए कि आप अच्छी लगती हो.’’‘‘कभी मेरी सुंदरता को पास से देखने का मन नहीं करता तुम्हारा?’’ मायाबाई ने पूछा.‘‘करता है, लेकिन डर लगता है कि कहीं आप गुस्सा न हो जाओ.’’ हलके ने बताया.‘‘मैं ने कब कहा कि मैं गुस्सा हो जाऊंगी. अच्छा, एक काम करो अभी तो अम्मा खेत से आने वाली हैं. कल सुबह जल्दी आ जाना फिर देख लेना, अपनी भाभी को एकदम पास से और मन करे तो छू कर भी देखना.’’ इतना कह कर मायाबाई ने नौसिखिया हलके के गाल पर एक पप्पी दे कर उसे उस के घर भेज दिया.

दूसरे दिन हलके चौधरी मायाबाई के घर पहुंच गया. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई नहीं था. मायाबाई ने इस का फायदा उठाया. उस ने हलके को कामकला का ऐसा पाठ पढ़ाया कि वह उस का मुरीद बन गया. इस के बाद तो दोनों के बीच आए दिन वासना का खेल खेला जाने लगा.

मायाबाई को कम उम्र का प्रेमी मिला तो वह उसे बढ़चढ़ कर वासना के खेल सिखाने लगी. जिस के चलते हलके उस का ऐसा दीवाना हुआ कि हर दिन मायाबाई से अकेले में मिल कर प्यार करने की जिद करने लगा. लेकिन यह रोजरोज कैसे संभव हो पाता. इसलिए मायाबाई ने एक रास्ता निकाला.
रात को जब उस का पति और ससुर खेत की रखवाली करने चले जाते तो सास के सो जाने के बाद आधी रात में वह अपने प्रेमी हलके को कमरे में बुला लेती और फिर पूरी रात उसके संग अय्याशी करने के बाद सुबह होने से पहले वापस भेज देती.

8 जनवरी, 2020 की रात को भी यही हुआ. रात में संजय और उस के पिता मलुवा खेत पर चले गए. फिर सास भी खाना खापी कर गहरी नींद सो गई तो मायाबाई ने हलके को बुला लिया. हलके अब प्यार के खेल में काफी होशियार हो चुका था. वह अपने मोबाइल पर अश्लील फिल्में लगा कर मायाबाई को गुदा मैथुन के लिए मना रहा था लेकिन मायाबाई तैयार नहीं हो रही थी. उस रोज हलके ने जिद की तो मायाबाई गुदा मैथुन के लिए राजी हो गई.

उसी दौरान मायाबाई के मुंह से चीख निकली तो बाहर कमरे में सो रही सास की नींद टूट गई. अनुभवी सास ऐसी चीख का मतलब अच्छी तरह जानती थी, सो उस ने उठ कर चुपचाप बहू के कमरे में झांक कर देखा तो पड़ोसी हलके के साथ बहू को अय्याशी करते देख उस की आंखें फटी रह गईं. सास ने गुस्से में किवाड़ पर लात मार कर दरवाजा खोला और मायाबाई और हलके को खूब खरीखोटी सुनाई. सास बहू की करतूत अपने बेटे को बताने के लिए रात में ही खेत पर जाने लगी.यह देख कर मायाबाई के हाथपैर फूल गए. उस ने पास पड़ी कुल्हाड़ी उठा कर हलके के हाथ में पकड़ाते हुए कहा कि वह सास की कहानी खत्म कर दे वरना उन के प्यार की कहानी खत्म हो जाएगी.

हलके के हाथपैर कांपने लगे. उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह बाहर जा कर कुसुम की हत्या कर सके. लेकिन जब मायाबाई भी साथ हो गई तो दोनों ने पीछे से जा कर खेतों पर पहुंच चुकी कुसुम की गरदन पर कुल्हाड़ी से वार किया, जिस से वह वहीं गिर गई. इस के बाद उस के शरीर पर कुल्हाड़ी से कई वार और किए, जिस से कुसुम की मृत्यु हो गई.कुछ देर बाद मायाबाई के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर हलके चौधरी अपने घर चला गया. दोनों को भरोसा था कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी, लेकिन पवई पुलिस ने 4 दिन में ही दोनों को कानून की ताकत का अहसास करवा दिया.

Delhi Crime: इश्क में राहुल ने उजाड़ दिया पूरा परिवार

Delhi Crime: 8 जनवरी, 2017 को दोपहर बाद की बात है. 34 साल का राहुल माटा पूर्वी दिल्ली के मधु विहार स्थित अजंता अपार्टमेंट के गेट पर पहुंचा. इसी अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर-32 में उस के मातापिता रहते थे. लेकिन राहुल की गलत आदतों की वजह से उस के पिता रविंद्र माटा ने उसे घर से बेदखल कर दिया था. इस के बाद उस के सोसाइटी में घुसने तक पर रोक लगा दी गई थी. जाहिर है, राहुल की कोई न कोई बात उस सोसाइटी के पदाधिकारियों को बुरी लगी होगी, तभी तो गेट पर तैनात गार्डों से भी कह दिया गया था कि उसे किसी भी सूरत में सोसाइटी के अंदर न आने दिया जाए.

उस दिन राहुल अपने फ्लैट पर जाने के लिए सोसाइटी के गेट पर पहुंचा तो वहां मौजूद सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक दिया. गार्ड ने कहा कि सोसाइटी के पदाधिकारियों के आदेश पर ही वह यह कर रहा है. एक सुरक्षागार्ड की राहुल के सामने भला क्या औकात थी. गार्ड द्वारा रोकने की बात राहुल को बुरी लगी. वह गार्ड को डांटते हुए आगे बढ़ा तो गार्ड ने इस का विरोध किया. क्योंकि उसे तो अपनी ड्यूटी करनी थी. राहुल को गार्ड की यह जुर्रत नागवार लगी और वह गार्ड से झगड़ने लगा तथा उस की पिटाई कर दी.

शोरशराबा सुन कर सोसाइटी के कई लोग अपनेअपने फ्लैट से निकल आए. उन लोगों ने भी सुरक्षागार्ड का पक्ष लिया, पर राहुल सभी की बात अनसुनी कर के जबरदस्ती आगे बढ़ गया. तब तक राहुल के 63 वर्षीय पिता रविंद्र माटा भी फ्लैट से बाहर निकल आए थे. बेटे का गार्ड से झगड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. उस से बात करने के लिए वह उस की तरफ बढ़े. चूंकि वह उसे संपत्ति से पहले ही बेदखल कर चुके थे, इसलिए राहुल ने उन से झगड़ना शुरू कर दिया.

उसी दौरान राहुल ने अपने साथ लाए नारियल काटने वाले चापड़ से पिता पर हमला कर दिया. वहां जितने भी लोग मौजूद थे, उन में से किसी की भी इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वह रविंद्र माटा को बचा सकते. बल्कि वह अपनी जान बचाने के लिए अपने फ्लैटों में चले गए और दरवाजे बंद कर लिए. राहुल पिता पर करीब ढाई मिनट तक चापड़ से वार करता रहा और वह जमीन पर गिर कर तड़पते रहे. इस दौरान किसी ने पुलिस के 100 नंबर पर फोन कर के वारदात की जानकारी देने का साहस जरूर कर दिया था.

राहुल को जब लगा कि उस के पिता मर चुके हैं तो वह खून से सना चापड़ हाथ में थामे अपने फ्लैट पर पहुंचा. पर उस की मां विभा माटा ने पहले ही दरवाजा बंद कर लिया था. राहुल ने मां को आवाज देते हुए कई बार दरवाजा खटखटाया, पर विभा ने दरवाजा नहीं खोला. राहुल को अब इस बात का डर लगा कि कहीं सोसाइटी के लोग उसे पकड़ न लें. इसलिए खुद को बचाने के लिए वह किसी दूसरे फ्लैट में जा रहा था, तभी रास्ते में रेनू बंसल नाम की महिला मिलीं, जो पास के फ्लैट में ही रहती थीं. राहुल ने चापड़ से उन्हें भी घायल कर दिया. रेनू को घायल करने के बाद वह तीसरी मंजिल स्थित फ्लैट नंबर 35 में घुस गया.

यह फ्लैट फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा का था. उस समय वह अपने बेटे कशिश के साथ मौजूद थे. राहुल के हाथ में खून से सना चापड़ देख कर वह भी डर गए. राहुल ने दोनों बापबेटों को धक्का दे कर कहा, ‘‘मेरे पास मत आना, वरना मार डालूंगा.’’

वी.के. शर्मा ने अपनी फिल्मी लाइफ में फिल्मी गुंडों को देखा था पर अब तो राहुल उन के सामने सचमुच का गुंडा था. उस से कोई पंगा लेने के बजाए उन्होंने खुद को बचाना जरूरी समझा और बेटे के साथ खुद को एक कमरे में बंद कर लिया. राहुल उन के किचन में चला गया और अंदर से किचन का दरवाजा बंद कर लिया. तब तक मधु विहार थाने की पुलिस अजंता अपार्टमेंट पहुंच चुकी थी. गेट से कुछ कदम दूर रविंद्र माटा की लहूलुहान लाश पड़ी थी. सोसाइटी के लोगों ने बताया कि इन की हत्या इन के बेटे राहुल ने की है जो फ्लैट नंबर 35 में छिपा है.

पुलिस टीम फ्लैट नंबर 35 में पहुंची. उस फ्लैट का किचन और एक कमरा अंदर से बंद था. पुलिस ने दोनों जगह दस्तक दी तो पुलिस का नाम सुनते ही अभिनेता वी.के. शर्मा ने दरवाजा खोल दिया. सामने पुलिस देख कर उन्होंने राहत की सांस ली. उन्होंने बताया कि राहुल उन के किचन में है.

पुलिस ने किचन का दरवाजा खटाखटा कर राहुल से दरवाजा खोलने को कहा. पर राहुल ने दरवाजा नहीं खोला. उसे डर था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर लेगी. इसलिए वह अपने बचाव का रास्ता खोजने लगा. पर उसे ऐसा कोई रास्ता नहीं मिला. जब काफी देर तक राहुल ने दरवाजा नहीं खोला तो पुलिस ने दरवाजा तोड़ना शुरू कर दिया.

तब राहुल ने रसोई गैस (पीएनजी) खोल कर पुलिस को धमकी दी. इतना ही नहीं उस ने आग भी लगा दी. रसोई गैस की आग ने पूरे किचन को चपेट में ले लिया. पुलिस ने दरवाजा तोड़ कर किचन की आग की लपटों में घुस कर राहुल माटा को बाहर निकाल लिया. उस समय तक राहुल काफी जल गया था. राहुल को सुरक्षित निकालने में 10 पुलिसकर्मी भी झुलस गए. झुलसे हुए पुलिसकर्मियों में इंसपेक्टर मनीष जोशी, एसआई संजय, निशाकर, अंशुल, मनीष, एएसआई सुनील कुमार, चंद्रघोष, हैडकांस्टेबल रामकुमार, कांस्टेबल सुधीर, गजराज शामिल थे. खुद के घायल होने के बावजूद भी पुलिस राहुल को मैक्स अस्पताल ले गई.

तब तक आग पूरे फ्लैट में फैल चुकी थी. फायर ब्रिगेड की 10 गाडि़यां मौके पर पहुंच गईं. घंटे भर की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया जा सका. पर आग में अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट का सारा सामान स्वाहा हो चुका था. उन्हें उत्कृष्ट अदाकारी के लिए संगीत नाटक अकादमी से मिला पुरस्कार भी स्वाहा हो गया था.

बचाव के दौरान पुलिसकर्मियों के झुलसने की बात सुन कर डीसीपी ओमवीर सिंह बिश्नोई भी अस्पताल पहुंच गए. आरोपी राहुल माटा और 4 पुलिसकर्मियों की हालत गंभीर होने पर उन्हें सफदरजंग अस्पताल रेफर कर दिया गया. राहुल 40 प्रतिशत जल चुका था. घायल पुलिसकर्मियों को देखने के लिए पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा भी अस्पताल पहुंचे.

राहुल ने रेनू बंसल नाम की जिस महिला को घायल किया था, उसे भी 26 टांके लगे थे. राहुल की हालत सामान्य होने के बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की तो चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

राहुल माटा एक धनाढ्य परिवार से था. उस के पिता रविंद्र माटा का कनाडा में अपना बिजनैस था. करीब 20 साल पहले वह कनाडा चले गए थे. परिवार में पत्नी विभा माटा के अलावा 2 बेटे ही थे. एक राहुल माटा और दूसरा मुकुल माटा. दोनों बच्चों की प्रारंभिक पढ़ाई दिल्ली में हुई थी. विभा दिल्ली में सरकारी नौकरी करती थीं. स्कूली शिक्षा पूरी  करने के बाद राहुल ने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया. आगे की पढ़ाई के लिए पिता ने उसे अमेरिका भेज दिया. सन 1995 से 1999 तक उस ने अमेरिका में पढ़ाई की.

इस के बाद सन 2000 में उस ने अमेरिका की ही एक बैंक में नौकरी कर ली. 8 सालों तक वहां काम करने के बाद वह पिता के पास कनाडा चला गया. पिता को कनाडा की नागरिकता मिली हुई थी. कनाडा में उस ने मर्चेंट नेवी में नौकरी की पर अनुशासनहीनता के आरोप में उसे सन 2011 में नौकरी से निकाल दिया गया.  कनाडा की एक लड़की से छेड़छाड़ के आरोप में राहुल को जेल जाना पड़ा, जिस में उसे 2 साल की सजा भी हुई. इस आरोप की वजह से राहुल को कनाडा से डिपोर्ट कर भारत भेज दिया गया.

बाद में सन 2014 में उस का मर्चेंट नेवी का लाइसैंस भी निरस्त हो गया. तब मर्चेंट नेवी में नौकरी करने का उस का रास्ता भी बंद हो गया.

रविंद्र माटा ने अपने छोटे बेटे मुकुल माटा को भी कनाडा बुला लिया था. उस की वहां एक मोबाइल फोन कंपनी में नौकरी लग गई थी. दोनों बापबेटे कनाडा में रहते थे, जबकि राहुल अपनी मां विभा के साथ दिल्ली के अजंता अपार्टमेंट के फ्लैट में रहता था. अब से करीब 2 साल पहले विभा भी रिटायर हो गई थीं. अजंता अपार्टमेंट का यह फ्लैट रविंद्र ने सन 1994 में खरीदा था.

दिल्ली में कोई कामधाम करने के बजाय राहुल दिन भर दोस्तों के साथ घूमता रहता था. खर्च के लिए पैसे मां से ले जाता था. विभा जब उसे कोई काम करने को कहतीं तो वह काम न मिलने का बहाना बना देता. इस के बावजूद भी मां उसे समझाती रहतीं. पर वह उन की सलाह को अनसुना कर देता था.

जिस अपराध की वजह से राहुल को कनाडा छोड़ना पड़ा था, उसी तरह का आरोप उस पर सोसाइटी की एक महिला ने भी लगाया था. राहुल पर बारबार इस तरह के आरोप लगने के बाद भी मांबाप ने उस की शादी नहीं की. इस का नतीजा यह हुआ कि राहुल 2 बच्चों की मां निशा के चक्कर में पड़ गया. निशा के 15 और 16 साल के 2 बच्चे थे. वह एक स्कूल में टीचर थी. राहुल निशा के साथ लिवइन रिलेशन में रहने लगा. एक दिन राहुल ने यह बात मां को बताई तो उन्हें यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उन्होंने उसे समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना.

इतना ही नहीं, वह निशा को मां के पास फ्लैट पर भी लाने लगा. विभा ऐतराज जताती रहीं और उसे फ्लैट पर लाने के लिए मना करती रहीं. मां की आपत्ति पर राहुल ने कहा कि उस ने उस के साथ मंदिर में शादी कर ली है. यह सुन कर विभा के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उन्होंने यह जानकारी कनाडा में रह रहे पति को दे दी, साथ ही यह भी कह दिया कि मना करने के बावजूद राहुल जबरदस्ती निशा को फ्लैट पर लाता है.

तब वीडियो कौन्फ्रैंसिंग कर रविंद्र ने भी बेटे राहुल को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर तो प्यार का फितूर चढ़ा था. वह भी अपनी जिद पर अड़ा था. राहुल की जिद से रविंद्र माटा और उन की पत्नी को इस बात की आशंका होने लगी कि कहीं बिना शादी की हुई यह महिला और उस के बच्चे उन के फ्लैट पर कब्जा न कर लें.

राहुल की हठधर्मिता से विभा का उस के प्रति व्यवहार भी बदल गया. हर महीने वह उसे खर्च के जो पैसे देती थीं, उन्होंने देने बंद कर दिए. तब राहुल उन से झगड़ता और उन की पिटाई तक कर देता. कभीकभी तो मांबेटे के बीच झगड़ा इतना बढ़ जाता कि पड़ोसियों को बीचबचाव के लिए आना पड़ता.

उस के हिंसक मिजाज से सोसाइटी के लोग भी परेशान थे. एकदो बार पड़ोसियों ने हस्तक्षेप किया तो राहुल ने उन के साथ भी बदतमीजी की. विभा के परिवार में कलह लगातार बढ़ती जा रही थी. फोन कर के वह कनाडा में बैठे पति को सब बताती रहती थीं. बेटे के आचरण से रविंद्र माटा भी परेशान हो गए.

12 अक्तूबर, 2016 को वह कनाडा से दिल्ली आ गए. उन्होंने एक बार फिर बेटे राहुल को समझाया. उन्हें लगा कि राहुल सुधरने वाला नहीं है तो उन्होंने उसे अपनी चलअचल संपत्ति से पूरी तरह से बेदखल करने की चेतावनी दे दी और कह दिया कि वह आइंदा उन के फ्लैट पर न आए.

सोसाइटी वाले तो राहुल के व्यवहार और उस के शोरशराबा करने से पहले परेशान थे. ऊपर से रविंद्र माटा ने सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता से कह दिया कि राहुल को उन के फ्लैट में आने की अनुमति न दी जाए. इस के बाद अजंता रेजीडैंशियल सोसाइटी के सचिव जे.एल. गुप्ता ने गेट पर तैनात सुरक्षागार्डों को राहुल की एंट्री पर बैन लगाने की हिदायत दे दी.

बेटे से खतरे को देखते हुए रविंद्र माटा ने अपने फ्लैट की एंट्री और बालकनी में लोहे के ग्रिल और दरवाजे भी लगवा दिए. बेटे के तेवर देखते हुए उन्होंने इस की शिकायत थाने में भी कर दी थी. सीनियर सिटिजन सेफ्टी के लिहाज से पुलिस ने उन्हें कुछ सेफ्टी टिप्स दिए, साथ ही पुलिस ने पड़ोसियों से भी उन का ध्यान रखने को कह दिया. बहरहाल रविंद्र माटा और विभा अब सतर्क रहने लगे. हालात सामान्य होने पर रविंद्र माटा का कनाडा लौटने का कार्यक्रम निश्चित था.

घर से बेदखल होने के बाद राहुल निशा के साथ पूर्वी दिल्ली के पांडव नगर में रहने लगा था. अब उसे अपने मांबाप दुश्मन लगने लगे. इतना ही नहीं, उस ने दोनों की हत्या करने की ठान ली. इस के लिए उस ने बाजार से एक चापड़ खरीद लिया. चापड़ अपने साथ ले कर वह 8 जनवरी को दोपहर के समय अजंता अपार्टमेंट पहुंच गया. वह जैसे ही गेट पर पहुंचा, वहां तैनात सुरक्षागार्ड नंदन सहाय ने उसे रोक लिया और बता दिया कि उस के अपार्टमेंट में घुसने पर बैन लगा है.

सुरक्षागार्ड के इतना कहते ही राहुल उस से उलझ गया और अपना रौब दिखाने लगा. गार्ड तो अपनी ड्यूटी कर रहा था, पर राहुल नहीं माना. सुरक्षागार्ड की पिटाई करने के बाद राहुल अपने फ्लैट की तरफ जाने लगा. इस के बाद शोर सुन कर बाहर आए पिता को उस ने चापड़ से वार कर मौत के घाट उतार दिया.

पिता की हत्या करने के बाद वह मां की हत्या करने के लिए फ्लैट पर गया. फ्लैट का दरवाजा बंद होने पर उस ने दूसरी बड़ी वारदात को अंजाम दे दिया.

रेनू बंसल को घायल करने के बाद वह फिल्म अभिनेता वी.के. शर्मा के फ्लैट में घुस गया और खुद को बचाने के चक्कर में उन के घर को आग के हवाले कर दिया. वी.के. शर्मा पिछले 15 सालों से इस फ्लैट में रह रहे थे.

राहुल माटा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे 9 जनवरी, 2017 को कड़कड़डूमा अदालत में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. राहुल ने जज को बताया कि उस ने अपने पिता की हत्या नहीं की और वी.के. शर्मा के फ्लैट में आग उस ने नहीं, बल्कि पुलिस ने लगाई थी. बहरहाल पुलिस ने कोर्ट के आदेश के बाद उसे जेल भेज दिया. मामले की जांच इंसपेक्टर अजीत सिंह कर रहे हैं. Delhi Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है.

True Crime Story: साक्षी की साजिश में समर

 True Crime Story: प्रेमी समर खान के कहने पर साक्षी ने राहुल अग्रवाल से शादी तो कर ली, लेकिन ससुराल में उस का मन नहीं लगा. इसी बीच ऐसा क्या हुआ कि वह लुटेरी दुलहन बन कर प्रेमी समर के साथ जेल पहुंच गई.

उत्तर प्रदेश का एक जिला है संभल, जो अपने आप में अनेक गाथाओं को समेटे हुए है. इस के अलावा इस शहर में सींग के सामान बनाने का बहुत बड़ा उद्योग भी फैला हुआ है. जिस की वजह से इस की विश्व भर में पहचान है. इसी ऐतिहासिक शहर के गवां मोहल्ले के गिरीश चौक पर दीपक अग्रवाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन की गिनती पुराने रईसों में होती है. उन की रासायनिक खाद की दुकान है और गवां में एक पैट्रोल पंप भी है.

दुकान पर उन का बेटा राहुल बैठता था, जबकि वह खुद पैट्रोल पंप को देखते थे. दोनों ही सुबह घर से निकलने के बाद देर रात को ही घर लौटते थे. रोजाना की तरह 23 मई, 2015 को भी वे अपनेअपने काम पर निकल गए. उस के बाद घर पर राहुल की भतीजी प्रियंका और बीवी साक्षी थीं. दोपहर करीब 12 बजे किसी ने उन के घर का दरवाजा खटखटाया. साक्षी ने दरवाजा खोला तो सामने 4 युवक खड़े थे. इस से पहले कि साक्षी उन से कुछ पूछती, वे चारों अंदर घुस आए और अंटी से तमंचे निकाल कर साक्षी को चुप रहने की हिदायत दी. हथियार देख कर साक्षी डर गई. भतीजी प्रियंका उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. बदमाशों ने प्रियंका को भी चुप रहने की धमकी दी और उस के हाथपैर बांध दिए.

इस के बाद बदमाशों ने साक्षी से अलमारियों की चाबी मांगी. साक्षी ने बताया कि चाबियां ऊपर के कमरे में हैं तो 2 बदमाश साक्षी को खींच कर ऊपर ले गए और 2 प्रियंका के पास ही खड़े रहे. डर की वजह से साक्षी ने चाबियां बदमाशों के हवाले कर दीं. चाबियां पाने के बाद उन्होंने साक्षी के भी हाथपैर बांध कर डबलबैड पर डाल दिया, साथ ही धमकी दी कि शोर मचाया तो गोली से उड़ा दिया जाएगा. चाबियां मिलते ही बदमाशों ने अलमारियों से नकदी, फोन, लैपटौप, ज्वैलरी आदि लूट ली. कुछ ही देर में लाखों रुपए का सामान समेट कर बदमाश वहां से चले गए. जाते समय वे प्रियंका का कमरा बाहर से बंद करते गए.

करीब एक घंटा बाद साक्षी ने किसी तरह खुद को खोला और डरते हुए नीचे आईं. नीचे के कमरे में बाहर से कुंडी लगी थी. कुंडी खोल कर साक्षी ने भतीजी प्रियंका को भी खोला. साक्षी ने लूट की सूचना सब से पहले अपने पति राहुल और ससुर दीपक अग्रवाल को फोन द्वारा दी. उस समय दीपक अग्रवाल अपने पैट्रोल पंप पर थे और राहुल अग्रवाल अपनी खाद की दुकान पर. घर पर लूट होने की सूचना मिलते ही दीपक अग्रवाल और राहुल के होश उड़ गए. दोनों तुरंत अपने घर की ओर चल दिए. पति और ससुर को खबर करने के बाद साक्षी प्रियंका को ले कर घर के बाहर आ गई और अपने यहां लूट होने का शोर मचा दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए.

तब तक दीपक अग्रवाल बेटे राहुल के साथ घर पहुंच गए. दोनों ने सब से पहले यह देखा कि बदमाश घर व अलमारियों से क्याक्या सामान ले गए हैं? जांच करने पर पता चला कि घर से सोनाचांदी की ज्वैलरी, नकदी, चांदी के सिक्के, फोन, लैपटौप आदि गायब थे. उन के यहां से बदमाश करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए थे. दिनदहाड़े लाखों रुपए की लूट होने की बात सुन कर हर कोई हैरान था. उसी दौरान किसी ने इस लूट की खबर फोन द्वारा थाना रजपुरा को दे दी. थाना वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव मय फोर्स के दीपक अग्रवाल के घर पहुंच गए. उन्होंने कमरों का निरीक्षण किया तो अलमारियां खुली हुई थीं और उन का सामान आदि फैला हुआ था.

थानाप्रभारी ने इस की सूचना अपने उच्च अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलते ही एसपी अतुल सक्सेना, एएसपी कमलेश दीक्षित भी वहां पहुंच गए. उधर शहर के व्यवसाइयों को जब पता चला कि दीपक अग्रवाल के यहां दिनदहाड़े लूट हो गई है तो तमाम व्यवसाई भी उन के घर पहुंचने लगे. व्यापारियों का जमावड़ा होने से एसपी अतुल सक्सेना को चिंता होने लगी कि कोई हंगामा न खड़ा हो जाए, इसलिए उन्होंने बहजोई, धनारी, हयातनगर थानों की फोर्स के अलावा क्राइम ब्रांच को भी बुला लिया. दीपक अग्रवाल ने पुलिस को बताया कि बदमाश नकदी सहित करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए हैं. देखा जाए तो यह बहुत बड़ी लूट थी.

पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ डराधमका कर लूट करने की रिपोर्ट दर्ज कर ली और बदमाशों की तलाश के लिए पुलिस अधीक्षक के आदेश पर शहर के मुख्य मार्गों पर बैरिकेड्स लगा कर चैकिंग शुरू कर दी. लेकिन पुलिस को सफलता नहीं मिली. लूट के इस मामले को सुलझाने के लिए एसपी अतुल सक्सेना ने थाना रजपुरा के थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव, धनारी के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह यादव के अलावा क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की टीम को भी लगा दिया. टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों ने गहनता के साथ केस की छानबीन शुरू कर दी.

दीपक अग्रवाल का घर गली के अंतिम छोर पर था. ऐसी सुरक्षित जगह पर कोई अनजान आदमी आसानी से नहीं पहुंच सकता था. विचारविमर्श के बाद पुलिस टीम इस नतीजे पर पहुंची कि इस वारदात को किसी जानकार ने ही अंजाम दिया होगा. दीपक अग्रवाल के पैट्रोल पंप और खाद की दुकान पर काम करने वाले सभी लोगों और नौकरों से पुलिस ने पूछताछ की. उन के घर पर काम करने वाली आया से भी पूछताछ की गई, परंतु पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला.

उधर संभल शहर के अलावा सीमावर्ती कस्बे बहजोई के व्यापारियों के मन में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था. व्यापारियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने एसपी से मुलाकात कर चेतावनी दी कि जल्द केस न खुला तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे. एसपी अतुल सक्सेना ने उन्हें भरोसा दिलाया कि जिले के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी केस को सुलझाने में लगे हैं और जल्द ही केस खुलने की संभावना है. व्यापारियों को आश्वासन दे कर उन्होंने उन्हें संतुष्ट तो कर दिया, लेकिन उन के ऊपर भी केस जल्द खुलने का दबाव बढ़ गया. उन्होंने टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों की मीटिंग बुलाई और कुछ दिशानिर्देश देते हुए केस को जल्द से जल्द खोलने को कहा.

इस के बाद सभी पुलिस अधिकारी अलगअलग दृष्टिकोण से मामले की जांच करने लगे. क्राइमब्रांच के इंसपेक्टर रूप सिंह बघेल, साइबर सेल के प्रभारी संतोष कुमार त्यागी ने परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाईं. उन्होंने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी के फोन से एक नंबर पर ज्यादा बातचीत करने की बात सामने आई. जिस नंबर पर साक्षी अकसर बात करती थी, वह नंबर बरेली के कस्बा आंवला के रहने वाले समर खान का निकला.

पुलिस ने दीपक अग्रवाल से पूछा कि आंवला में क्या उन के कोई रिश्तेदार वगैरह रहते हैं?

‘‘हां, आंवला में हमारे बेटे राहुल की ससुराल है. लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं? इस घटना से उन का क्या मतलब?’’ दीपक अग्रवाल बोले.

थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव ने एक फोन नंबर उन्हें देते हुए कहा, ‘‘आप की बहू साक्षी की इस फोन नंबर पर वक्तबेवक्त बहुत बातें होती थीं. हम यह जानना चाहते हैं कि यह नंबर किस का है.’’

दीपक अग्रवाल और उन के बेटे के पास साक्षी के मायके के सभी लोगों के नंबर उन के फोन में सेव थे. थानाप्रभारी ने जो नंबर उन्हें दिया था, उस के बारे में वह अनजान थे. इसलिए राहुल ने साक्षी को बुला कर उस फोन नंबर के बारे में पूछा तो वह बोली, ‘‘यह नंबर आंवला के ही हमारे पापा के जानकार समर खान का है. यह हमारे घर के सदस्य की तरह हैं. मैं ने लूट की खबर देने के लिए इन्हें फोन किया था.’’

यह बात मान भी ली जाए कि घटना वाले दिन साक्षी ने उसे घटना की जानकारी देने के लिए फोन किया होगा, लेकिन इस से पहले वक्तबेवक्त यह उस से क्या बातें करती थी. यह बात थानाप्रभारी की समझ में नहीं आ रही थी. उस समय उन्होंने दीपक अग्रवाल और उन की बहू साक्षी से और ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि उन्होंने उसी शख्स की जांच करना जरूरी समझा, जिस से साक्षी ज्यादा बातें करती थी.

आंवला के किला मोहल्ला के जिस समर खान से साक्षी बात करती थी, सादा वेश में पुलिस टीम वहां पहुंच गई. 2 पुलिस वाले किला मोहल्ले के लोगों से समर खान के बारे में जानकारी जुटाने लग गए तो टीम के बाकी सदस्य समर खान के घर चले गए. साक्षी ने जिस तरह समर को अपने पिता का जानकार बताया था, उस से पुलिस यही समझ रही थी कि समर खान अधेड़ उम्र का होगा. लेकिन वह तो 25-26 साल का युवक निकला. स्थानीय लोगों से उन दोनों पुलिसकर्मियों को चौंकाने वाली बात पता चली. लोगों ने बताया कि समर खान एक शातिर इंसान है, उस का आंवला की ही साक्षी नाम की एक लड़की से कई सालों से चक्कर चल रहा है. दोनों शादी करने वाले थे.

साक्षी के घर वालों को इस प्रेमप्रसंग का जब पता चला तो उन्होंने संभल के राहुल अग्रवाल के साथ आननफानन में उस की शादी कर दी. उधर पुलिस टीम को समर खान घर पर नहीं मिला. लेकिन उस के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली थी, वह बहुत महत्त्वपूर्ण थी. समर खान के न मिलने पर पुलिस टीम वापस संभल लौट आई. उस का फोन नंबर पुलिस के पास था ही. उस फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाने पर उस की लोकेशन अनूप शहर रोड की आ रही थी. पुलिस टीम फटाफट अनूप शहर रोड पर पहुंच कर नाकेबंदी लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी. उसी समय एक होंडा सिटी कार आती दिखी. पुलिस को देखते ही ड्राइवर ने कार की गति बढ़ा दी. कुछ दूर पीछा करने के बाद पुलिस ने उस कार को रोक लिया.

उस कार में ड्राइवर के अलावा एक आदमी और बैठा था. पूछताछ करने में उन दोनों ने अपने नाम क्रमश: समर खान और विकास नारंग उर्फ विक्की बताए. समर खान नाम सुनते ही पुलिस समझ गई कि यह वही है, जिस की उन्हें तलाश थी, लिहाजा उन दोनों को पूछताछ के लिए पुलिस बहजोई थाने ले आई. समर खान ने अपना जो मोबाइल नंबर बताया था, वह वही निकला, जिस पर साक्षी की बातें होती थीं. पुलिस टीम ने समर खान को हिरासत में लेने वाली बात एसपी अतुल सक्सेना और एएसपी कमलेश दीक्षित को बताई तो दोनों पुलिस अधिकारी थाना बहजोई पहुंच गए. उन की मौजूदगी में समर खान से पूछताछ की गई तो उस ने व्यवसाई दीपक अग्रवाल के घर लूट करने की बात स्वीकार ली.

इस के अलावा उस ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि यह वारदात उस ने अपनी प्रेमिका साक्षी के कहने पर की थी. लूट की साजिश में व्यवसाई दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी का नाम सामने आने पर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए, क्योंकि संभ्रांत परिवार में इस तरह की यह पहली वारदात थी. पुलिस ने दीपक अग्रवाल, उन के बेटे राहुल और बहू साक्षी को भी थाने बुला लिया. थाने में समर खान को देख कर साक्षी घबरा गई. सब के सामने पुलिस ने समर खान से पूछताछ की तो समर खान ने वारदात को अंजाम देने के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

साक्षी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के कस्बा आंवला में पक्का कटरा मोहल्ले के रहने वाले प्रदीप कुमार की बेटी थी. पेशे से वह भी बिजनेसमैन थे. बात करीब 6 साल पुरानी है. उस समय 13 साल की साक्षी आंवला के ही एक स्कूल में पढ़ रही थी. उसी स्कूल में पढ़ने वाली रुकैया नाम की एक लड़की से उस की गहरी दोस्ती थी. रुकैया भी पक्का कटरा मोहल्ले में रहती थी.

रुकैया का एक दोस्त था समर खान, जो आंवला के ही किला मोहल्ले में रहता था. एक दिन रुकैया ने साक्षी की मुलाकात समर से कराई तो साक्षी भी उस की दोस्त बन गई. समर खान कक्षा 8 में पढ़ता था. साक्षी को देख कर वह बहुत प्रभावित हुआ. उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए शातिर दिमाग समर ने खुद को एक बड़े घर का बताया. वह बताता था कि उस के पिता का हार्डवेयर का बहुत बड़ा बिजनैस है. उस ने साक्षी को अपनी बातों के जाल में फांस कर अपना दोस्त बना लिया था.

जैसेजैसे समर खान और साक्षी की उम्र बढ़ती गई, उन की सोच में बदलाव आता गया. धीरेधीरे उन की दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे. इतना ही नहीं, दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया. इसी बीच साक्षी के घर वालों को बेटी के संबंधों की जानकारी हो गई. उन्हें बदनामी का डर सताने लगा. बीएससी करने के बाद साक्षी उस समय एयरहोस्टेस का कोर्स कर रही थी. उन्हें उस की शादी की इतनी जल्दी होने लगी कि उन्होंने उस का एयरहोस्टेस का कोर्स पूरा होना जरूरी नहीं समझा. वह उस के लिए लड़का तलाशने लगे. किसी ने उन्हें संभल के गवां मोहल्ले में रहने वाले बिजनेसमैन दीपक अग्रवाल के बेटे राहुल अग्रवाल के बारे में बताया.

दीपक अग्रवाल का गवां में एक पैट्रोल पंप था. जबकि राहुल रासायनिक खाद की दुकान संभालता था. प्रदीप अग्रवाल ने राहुल के बारे में छानबीन की तो वह उन्हें पसंद आ गया. इस बारे में उन्होंने दीपक अग्रवाल से बात की. दोनों तरफ से बातचीत होने के बाद 17 अप्रैल, 2015 को साक्षी और राहुल की शादी होने का दिन भी मुकर्रर कर दिया गया. आननफानन में तय हुई शादी के बात साक्षी को पता लगी तो वह परेशान हो गई. वह तो समर से शादी करना चाहती थी. उस ने समर खान को यह जानकारी दे कर जल्द से जल्द कोर्टमैरिज करने के लिए कहा.

लेकिन समर खान ने पैसों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘साक्षी इस समय मैं मजबूर हूं. व्यापार में काफी घाटा हो गया है, इसलिए पैसे न होने की वजह से मैं कोर्टमैरिज नहीं कर सकता. ऐसा करो फिलहाल जिस लड़के से तुम्हारी शादी हो रही है, कर लो. जैसे ही पैसों का इंतजाम हो जाएगा, तुम्हें मुंबई ले कर चला जाऊंगा.’’

न चाहते हुए भी साक्षी ने समर खान की बात मान ली. निर्धारित 17 अप्रैल, 2015 को धूमधाम के साथ साक्षी की राहुल के साथ शादी हो गई. इस तरह बेमन से वह पिया के घर चली गई. लेकिन पति राहुल अग्रवाल ने प्यार के बूते साक्षी का दिल जीत लिया था. कुछ दिनों तक तो वह राहुल के साथ खुश रही, लेकिन बाद उसे ससुराल में बोरियत महसूस होने लगी. राहुल सुबह 11 बजे खाना खा कर अपनी दुकान पर चला जाता था और रात 8-9 बजे घर लौटता था. साक्षी का अकेले मन नहीं लगता था. वह खुले विचारों वाली युवती थी. घूमनाफिरना, बड़ेबड़े होटलों में खाना खाना, उस की आदत थी.

शादी से पहले उस के मातापिता आंवला के बजाय शौपिंग कराने के लिए उसे बरेली ले जाते थे. तब उसे अच्छे होटल में खाना भी खिलाते थे. जबकि राहुल उसे बाहर घुमाने तक नहीं ले जाता था. वह घर में खाली पड़ी बोर होती रहती थी. उधर साक्षी की शादी के बाद समर खान पैसे कमाने के लिए मुंबई चला गया था. वह साक्षी को भूला नहीं था. इस बीच उस की अपनी प्रेमिका से फोन पर बात होती रहती थी. वह साक्षी को सुनहरे सपने दिखाता था. एक महीने बाद ही वह मुंबई से आंवला आ गया. साक्षी अपने पति राहुल से नाराज थी. वह उस से कहीं घूमनेफिरने को कहती तो वह दुकान पर बिजी होने की बात कह कर उस की बात को टाल देता था.

ऐसे में साक्षी को प्रेमी समर खान की याद आती. वह समर से कहती थी कि तुम मुझे इस नरक से निकालो. मेरे पिता ने मुझे गांव में डाल दिया है. मैं गाय के खूंटे की तरह बंध कर नहीं रहना चाहती. समर बारबार पैसे न होने की बात कहता. तब एक दिन साक्षी ने उस की समस्या का समाधान करते हुए कहा, ‘‘समर, मेरी ससुराल में बहुत माल है. मेरी ससुराल के लोग अपनेअपने कारोबार में व्यस्त हैं. सुबह निकल जाते हैं और देर शाम को ही वापस आते हैं. अलमारियों की सारी चाबियां मेरे पास ही रहती हैं. तुम किसी दिन पूर्वांह्न 11 बजे के बाद यहां आ कर सारा माल ले जाओ. मैं कह दूंगी लुटेरे ले गए हैं.’’

साक्षी की यह योजना समर को पसंद आ गई.  समर जानता था कि साक्षी की शादी एक खातेपीते परिवार में हुई है. उस के यहां माल भी काफी होगा. उस के यहां लूट की वारदात को अंजाम देना उस के अकेले के बस का नहीं था. उस ने इस बारे में अपने अपराधी किस्म के दोस्तों विकास उर्फ विक्की, सोनू और नीरज से बात की. पैसे के लालच में वे सब उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. फिर योजना के मुताबिक 15 मई, 2015 को समर खान और उस के दोस्तों ने राहुल के घर की रेकी की.

योजना को अंजाम देने के लिए एक हफ्ते बाद 23 मई, 2015 को दिन के 12 बजे के करीब वे चारों राहुल के घर पहुंच गए. दरवाजे पर दस्तक देने पर साक्षी ने दरवाजा खोला. उन्होंने दिखावे के लिए उसे तमंचे से डरा दिया. राहुल की भतीजी प्रियंका उस समय टीवी देख रही थी. साक्षी ने इशारे से बता दिया था कि वह अंदर है. तब उन चारों लोगों ने प्रियंका को पकड़ कर उस के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया. 2 लोग उस के पास ही खड़े रहे.

मारनेपीटने का नाटक कर 2 बजे साक्षी को ऊपर के कमरे में ले गए. तभी साक्षी ने अलमारियों की चाबियां समर को दे दीं. अलमारियों से उन्होंने ज्वैलरी, चांदी के सिक्कों के अलावा नकदी भी निकाल ली. एक अलमारी का ताला उन से नहीं खुल रहा था तो साक्षी ने अपने हाथों से वह ताला खोल कर सोनेचांदी के जेवर निकाल कर उन्हें दे दिए थे. दिखावे के लिए समर ने साक्षी के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया था. कुछ ही देर में वे ज्वैलरी, नकदी, लैपटौप, मोबाइल आदि सहित करीब 30 लाख रुपए का माल ले गए.

कुछ देर बाद साक्षी ने अपने पति राहुल, ससुर आदि को घटना की जानकारी दी व मोहल्ले में शोर मचा दिया कि बदमाश लूटपाट कर के सारा सामान ले गए. दीपक अग्रवाल और राहुल को इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि साक्षी अपने ही घर में ऐसा कर सकती है. लेकिन अभियुक्त समर खान के स्वीकारने के बाद वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. पुलिस ने समर की निशानदेही पर उस की होंडा सिटी कार से दीपक के यहां से लूटा गया लैपटौप, 38 चांदी के सिक्के, 80 हजार रुपए नकद, मोबाइल फोन, 2 तमंचे और कारतूस बरामद किए. पुलिस ने वह होंडा सिटी कार भी बरामद कर ली. साक्षी को भी उन्होंने उसी समय गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दिनांक 3 जून, 2015 को तीनों अभियुक्तों समर खान, साक्षी व विकास नारंग उर्फ विक्की को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अन्य आरोपी सोनू और नीरज कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार नहीं हो सके थे. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, रुकैया परिवर्तित नाम है

 

Dehradun Crime: नादान उम्र की भूल

Dehradun Crime: नादान शालू की रवि राजपूत से दोस्ती हो गई, जिसे रवि प्यार समझ बैठा. परेशानी तब हुई, जब इस प्यार ने रवि को जुनूनी बना दिया. वह शालू को भगा कर अपनी दुनिया बसाना चाहता था. एक रात वह शालू को भगा ले जाने के इरादे से आया तो शालू ने इंकार कर दिया. दोनों की इस जिद में शालू की जान गई तो रवि अपराधी बन गया.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की पौश कालोनी पाम सिटी में लोगों की एक से बढ़ कर एक कोठियां और फ्लैट्स हैं. इन्हीं कोठियों में से कोठी नंबर 91 के.के. अरोड़ा की है. खुशमिजाज शख्स के तौर पर पहचाने जाने वाले के. के. अरोड़ा पेशे से प्रौपर्टी डीलर थे. वह होटल कारोबार से भी जुड़े रहे हैं. हर शख्स चाहता है कि उस का परिवार खुश रहे, आर्थिक रूप से संपन्न अरोड़ा भी इस चाहत को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करते थे.

उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी के अलावा 2 बेटियां थीं, शालू व शालिनी और एक छोटा बेटा विशाल. शालू शहर के ही एक कालेज में इंटर की छात्रा थी. उस के दोनों भाईबहन भी पढ़ाई कर रहे थे. अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह परिवार बेहद खुशहाल था. किस की जिंदगी में खुशियों का सूरज कब रेशमी किरणें फैलाने लगे और कब शाम का रंग लाल हो कर दिल दहला जाए, कोई नहीं जानता. 21 जून, 2015 को विश्व योग दिवस मनाया जाना था. इसे ले कर शहर में कई कार्यक्रम आयोजित किए जाने थे. के. के. अरोड़ा को भी एक ऐसे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जाना था, जहां सामूहिक रूप से योगा किया जाना था. उस दिन वह भोर में करीब साढ़े 5 बजे जाग गए थे.

उन की कोठी चूंकि 2 मंजिला थी, लिहाजा सभी के सोने के लिए अलगअलग कमरे बने हुए थे. सुबहसुबह अरोड़ाजी कोठी की छत पर जा कर टहलने लगे. तब तक उन की पत्नी लक्ष्मी भी उठ कर बैडरूम से बाहर आ गई थीं. वह बड़ी बेटी शालू के कमरे की तरफ गईं. लेकिन वह अपने कमरे में नहीं थी. आमतौर पर हर रोज उस वक्त शालू सोती हुई मिला करती थी. बेटी को बिस्तर पर न पा कर लक्ष्मी थोड़ा चौंकीं. उन्हें नहीं पता था कि वह कहां चली गई थी. उन्होंने पति के पास पहुंच कर बताया कि शालू अपने कमरे में नहीं है.

अरोड़ा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘‘हो सकता है घूमने चली गई हो.’’

कालेज की छुट्टियां चल रही थीं. कभीकभी ऐसा भी होता था कि शालू मौर्निंग वाक पर निकल जाती थी. लक्ष्मी दूसरी बेटी शालिनी के पास गईं. तब तक वह जाग चुकी थी. उन्होंने उस से भी पूछा, ‘‘शालू कहीं नहीं दिख रही, तूने देखा है क्या उसे?’’ लेकिन शालिनी ने भी शालू को देखने की बात से इनकार किया.

वैसे तो यह मामूली सी बात थी. लेकिन बच्चे मातापिता की नजरों के सामने न हों या उन्हें बिना बताए कहीं चले जाएं तो चिंता हो ही जाती है. बेटियों के मामले में तो चिंता और बढ़ जाती है. लक्ष्मी को चिंता हुई तो वह ‘शालू शालू’ पुकारते हुए कोठी में दूसरी तरफ गईं. उसी वक्त अनायास उन की निगाह लौबी की ओर चली गई. वहां शालू खून के सैलाब में डूबी फर्श पर पड़ी थी. यह नजारा देख कर उन के होश उड़ गए. उन्होंने आगे बढ़ कर ‘बेटीबेटी’ पुकारते हुए शालू को हिलायाडुलाया, उसे झिंझोड़कर देखा. लेकिन उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई.

बदहवास सी लक्ष्मी चिल्लाते हुए पति की तरफ दौड़ीं. वह भी दौड़ कर आए. बेटी को इस दशा में देख कर वह भी जड़वत रह गए. शालू का शव खून से लथपथ पड़ा हुआ था. इस खौफनाक मंजर ने लक्ष्मी की रुलाई को हृदयविदारक चीखों में तब्दील कर दिया. आसपड़ोस के लोगों ने चीखने और रोने की आवाज सुनी तो वे घरों से बाहर निकल आए. कुछ लोग ऐसे भी थे, जो पहले से ही मौर्निंग वाक के लिए सड़क पर टहल रहे थे. वे भी अंदर आ गए. रक्तरंजित नजारा देख कर उन के कलेजे कांप गए. निस्संदेह किसी ने शालू की हत्या कर दी थी.

आननफानन में 100 नंबर पर पुलिस कंट्रोल रूम को फोन किया गया. करीब 20 मिनट में एक गश्ती पीसीआर मौके पर पहुंच गई. यह इलाका थाना पटेलनगर में आता था. थानाप्रभारी पंकज गैरोला, वरिष्ठ उप निरीक्षक नत्थीलाल उनियाल तथा अन्य पुलिसकर्मी भी घटनास्थल पर पहुंच गए. घटना सनसनीखेज थी, सूचना मिलते ही एसएसपी पुष्पक ज्योति और एसपी सिटी अजय कुमार वगैरह भी वहां आ पहुंचे. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. 17 वर्षीया शालू 3 फुट की लौबी में पड़ी थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. उस का सिर फटा हुआ था और आसपास खून फैल कर जम गया था.

मौके पर काले व सफेद रंग का एक मर्दाना गमछा पड़ा था. संभवत वह कातिल का था. पुलिस ने उसे अपने कब्जे में ले लिया. एसएसपी के निर्देश पर क्राइम ब्रांच की फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड को भी बुलाया गया. जांच में मदद के उद्देश्य से ट्रेनर पुलिसकर्मी ने प्रशिक्षित कुत्ते को घटनास्थल और लाश को सुंघा कर छोड़ दिया. वह छत व सीढि़यां उतर कर नीचे गया और टहल कर वापस आ गया. जाहिर है इस से कोई स्पष्ट अनुमान नहीं लगाया जा सकता था.

क्राइम ब्रांच की टीम ने भी अपने हिसाब से घटनास्थल की जांच की. पुलिस ने परिजनों से भी औपचारिक पूछताछ की. मृतका के बहन और भाई गमगीन होने की वजह से बात करने की स्थिति में नहीं थे. सब से चौंकाने वाली बात यह थी कि शालू की हत्या का सैटरडे नाइट में परिवार के किसी सदस्य को पता तक नहीं लग सका था. किसी ने उस के चीखने की आवाज भी नहीं सुनी थी. यह बात थोड़ी अजीब लगने वाली थी. वैसे भी घर का मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था.

शुरुआती जांच में 3 बातें स्पष्ट हुईं. एक तो यह कि सिर पर किसी चीज से प्रहार किया गया था. दूसरा यह कि मामला सीधेसीधे हत्या का था, न कि लूटपाट में हुई हत्या का. क्योंकि घर से कोई चीज गायब नहीं थी. तीसरा यह कि वारदात में किसी ऐसे व्यक्ति का हाथ था, जो घर की भौगोलिक स्थिति से भी परिचित था. यह भी संभव: हो सकता था कि बदमाश लूटपाट के इरादे से कोठी में घुसे हों और इसी बीच शालू लौबी में गई हो और उन्होंने उस की हत्या कर दी हो. इस के बाद वे बिना लूटपाट किए ही भाग गए हों. यह केवल अनुमान भर था.

प्राथमिक काररवाई पूरी कर के पुलिस ने के. के. अरोड़ा की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ पटेलनगर थाने में भादंवि की धारा 302 के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया. साथ ही शालू के शव को पोस्टमार्टम के लिए दून अस्पताल भिजवा दिया. इस केस की विवेचना एसएसआई नत्थीलाल उनियाल के सुपुर्द की गई. घटना का पता चलने पर डीआईजी संजय गुंज्याल के निर्देश पर एसएसपी पुष्पक ज्योति ने केस की जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में थाना पुलिस के अलावा सहसपुर थानाप्रभारी यशपाल सिंह बिष्ट, प्रेमनगर थानाप्रभारी रवि कुमार सैनी, एसआई मनोज नैनवाल, नरोत्तम सिंह, विक्रम सिंह, कांस्टेबल अनिल, संदीप, सहदेव त्यागी, हितेश कुमार व आशीष राठी के अलावा क्राइम ब्रांच को शामिल किया गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालू का शव उस के परिवार वालों को सौंप दिया गया. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने रिपोर्ट में बताया कि शालू की मृत्यु सिर पर हुए प्रहार के कारण अत्यधिक रक्तप्रवाह की वजह से हुई थी. उस के सिर की हड्डी भी टूटी पाई गई थी. पुलिस ने पड़ताल शुरू की. सुरक्षा के लिहाज से कालोनी के एंट्री गेट पर रात में एक सिक्योरिटी गार्ड रहता था. उस के मुताबिक घटना वाली रात 12 बजे के बाद कालोनी में किसी का आवागमन नहीं हुआ था. हालांकि कालोनी के कुछ घरों में सीसीटीवी कैमरे भी लगे थे, परंतु उन के फोकस का दायरा सीमित था. कातिल बाहर से नहीं आया था तो शालू की हत्या किस ने की, यह अहम सवाल था.

पुलिस ने शालू के घर वालों से पुन: पूछताछ की तो उन्होंने रवि राजपूत नामक युवक पर अपना संदेह जताया. मृतका की बहन ने पुलिस को बताया कि नजदीक के एक फ्लैट में रहने वाला लड़का रवि राजपूत शालू को परेशान किया करता था. उस ने यह भी बताया कि मौकाएवारदात पर जो मर्दाना गमछा पाया गया है, उसे उस ने रवि के गले में कई बार देखा था. पुलिस ने रवि को शक के दायरे में रख कर जांच आगे बढ़ाई. पुलिस वहां पहुंची, जिस फ्लैट में रवि रहता था. पता चला कि रवि मूलरूप से हरियाणा के जिला करनाल के रहने वाले रूप सिंह का बेटा था. वह इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुका था.

उस फ्लैट में वह अपने ममेरे भाई ऋषिपाल के पास कभीकभी आ कर ठहरता था. ऋषिपाल मूलरूप से सहारनपुर के बड़गांव का रहने वाला था और प्रौपर्टी का काम करता था. उस वक्त वह भी लापता था. पुलिस ने शालू का मोबाइल हासिल किया तो उस में लौक लगा था. एक्सपर्ट से उस का लौक खुलवाया गया. उस में लेट नाइट की एक आखिरी काल थी. जांच में वह नंबर रवि का निकला. पुलिस ने शालू व रवि के नंबरों की काल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. उन से साबित हुआ कि घटना वाली रात उस की न सिर्फ शालू से बातें हुई थीं, बल्कि आधी रात के बाद रवि की लोकेशन भी पाम सिटी में ही थी.

रवि पूरी तरह शक के दायरे में आ गया था. पुलिस टीम ने उस की सरगर्मी से तलाश शुरू कर दी. पुलिस ने लोकेशन के आधार पर उसे उस वक्त गिरफ्तार कर लिया, जब वह देहरादून से भागने की कोशिश कर रहा था. उस के साथ सुनील राणा व उस का दोस्त प्रताप सिंह भी थे. पुलिस तीनों को थाने ले आई. पुलिस पूछताछ में उन्होंने अपना अपराध स्वीकार किया तो एक चौंकाने वाली कहानी पता चली. रवि बचपन से ही जिद्दी और दबंग स्वभाव का युवक था. बुरे लड़कों की संगत में रह कर वह कालेज के लड़ाईझगड़ों में पड़ने लगा था. परिजनों ने उसे डांटाफटकारा, समझाया, लेकिन वह नहीं समझा. उस ने जैसेतैसे इंटरमीडिएट तो पास कर लिया, लेकिन इस से आगे वह न पढ़ा.

बेटा सुधर जाए इस उम्मीद में पिता ने 2015 में उसे देहरादून की पाम सिटी में रह रहे ऋषिपाल के पास भेज दिया था. उन्हें लगता था कि वह उस के साथ रह कर कोई काम करेगा तो सुधर जाएगा. रवि देहरादून आया तो उसे और भी आजादी मिल गई. वह शराब भी पीने लगा. उस के हावभाव से ले कर बातों में दबंगई होती थी. अपनी दबंगई के लिए वह अपने पास एक तमंचा भी रखता था. देहरादून में भी उस ने अपने कई दोस्त बना लिए थे. यहीं पर एक दिन राह से गुजरते हुए रवि की नजरें शालू से चार हो गईं. पहली ही नजर में शालू उस के दिल में उतर गई.

रवि उन युवाओं में से था, जो उम्र से पहले ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. वह चालाक किस्म का युवक था. एक दिन उस ने बहाने से शालू से बातचीत की और उस की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया. बड़े शहरों में लड़केलड़कियों के बीच यह कोई बड़ी बात नहीं होती. शालू ने भी बिना सोचेसमझे उस की दोस्ती स्वीकार कर ली. शालू ने अपनी छोटी बहन शालिनी को भी यह बात बता दी थी. कई बार की बातों और सोशल नेटवर्किंग साइट के जरिए दोनों एकदूसरे के संपर्क में बने रहे. शालू उस के मैसेज का जवाब दे देती थी. इस से उस के हौसले बढ़ गए. शालू खूबसूरत लड़की थी. रवि उसे अपना बनाने का सपना देखने लगा. उस ने एक दिन अपने प्यार का इजहार भी कर दिया, लेकिन शालू ने इनकार कर दिया.

रवि को लगा कि उस का इनकार सिर्फ दिखावा है, अंदर से शालू भी उस से प्यार करती है. दोनों की मेलमुलाकातें हुईं तो शालू के रिश्ते के एक भाई आशीष ने उन्हें देख लिया. उस ने शालू को डांटा, क्योंकि वह रवि की आवारगी जानता था. इस के बाद उन का मिलनाजुलना कम हो गया. दूसरी तरफ रवि शालू को पाने के सपने देखने लगा था. शालू जब उस से बात नहीं करती तो वह रास्ते में उसे रोकने की कोशिश कर के उसे परेशान करता. शालिनी इन बातों को जानती थी. फोन पर वह न केवल शालू के संपर्क में रहने लगा, बल्कि उसे मैसेज भी भेजा करता था. रवि के सिर पर प्यार का भूत सवार था. शालू ने उस के एकतरफा प्यार को जब ज्यादा तवज्जो नहीं दी तो उस ने अपनी एक फोटो इंटरनेट के जरिए उसे भेज दी.

उस फोटो में वह फांसी का फंदा हाथ में लिए नजर आ रहा था. उस ने लिखा था, ‘यदि तुम मुझ से प्यार नहीं करोगी तो मैं अपनी जान दे दूंगा.’ यह देख कर शालू उलझन में पड़ गई. वह नहीं चाहती थी कि उस की वजह से कोई मर जाए, तभी रवि का फोन आ गया. वह बोला, ‘‘अब बोलो, तुम मुझ से प्यार करती हो ना?’’

‘‘देखो, मैं कुछ नहीं कहना चाहती. तुम्हें जो समझना है समझो और हां प्लीज ऐसी कोई हरकत आगे से मत करना.’’

रवि ने उस की इन बातों को इकरार समझ लिया. उसे लगा कि शालू को उस की फिक्र है, इसलिए वह उसे मरने नहीं देना चाहती. इस के बाद वह उस के खयालों में ही खोया रहने लगा. अंजाम से बेखबर शालू उस के जुनून को समझ नहीं पाई. उस ने यह बातें अपने मातापिता को भी नहीं बताईं. यह उस की नादान उम्र का तकाजा था. अलबत्ता शालू ने रवि के फोटो भेजने वाली बात अपनी बहन शालिनी को जरूर बता दी थी. रवि को ले कर कोई बदनामी न हो, इसलिए शालू ने उस से थोड़ी दूरी बनाने की सोची. वह उस से कम बातें करने लगी. इस से रवि को लगा कि शायद वह अपने परिवार की वजह से ऐसा करती है.

उस के दिमाग में सुबहशाम, दिनरात शालू की ही छवि घूमती रहती थी. उसे देखे बिना उसे सुकून नहीं आता था. शालू से दोस्ती के किस्से उस ने अपने दोस्तों को भी सुना रखे थे. इसी बीच वह करनाल चला गया. वहां जाने के बाद उसे दूरियां बरदाश्त नहीं हुईं. शालू भले ही उसे तवज्जो नहीं देती थी, लेकिन अपनी तरफ से वह उसे बहुत प्यार करता था. शालू ने सोचा कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा और रवि उसे अपने दिमाग से निकाल कर अपने काम पर ध्यान देगा. उधर रवि के सिर पर शालू को पाने की जिद सवार हो गई थी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया था कि अब वह शालू को अपनी बना कर ही दम लेगा. इस के लिए रवि ने उसे भगाने की योजना बनाई.

उस ने सोचा कि शालू परिवार की मजबूरियों में कैद है, इसलिए वह उस से ज्यादा बात नहीं कर पाती. वह उस के सामने प्रस्ताव रखेगा तो वह उस के साथ खुशीखुशी चल देगी. उस ने यह बात अपने दोस्त सुनील व प्रताप को बताई कि वह एक लड़की से प्यार करता है और उसे भगा कर शादी करना चाहता है. रवि ने उन्हें बताया कि वह उसे हर सूरत में हासिल करना चाहता है. रवि की चाहत देख कर वे दोनों उस की मदद करने को तैयार हो गए. 19 जून की शाम रवि सुनील व प्रताप के साथ शालू को भगा ले जाने के इरादे से देहरादून आया. तीनों जीएसएम रोड स्थित एक होटल में रुके.

रवि अपने साथ एक तमंचा भी लाया था. उस ने सोचा था कि अगर शालू के घर वाले किसी वजह से रोकने की कोशिश करेंगे तो वह उन्हें डराधमका कर रोक देगा. अगली रात उस ने शालू को फोन कर के कहा, ‘‘शालू मुझे तुम से मिलना है.’’

‘‘अब रात में?’’ शालू चौंकी.

‘‘हां, मेरे पास वक्त कम है और तुम से नहीं मिला तो सच में मैं मर जाऊंगा. मुझे तुम से जरूरी बात करनी है.’’

‘‘क्या बात है? मोबाइल पर ही बता दो.’’

‘‘नहीं, मिल कर ही बताऊंगा और तुम्हें मेरी बात माननी होगी.’’

‘‘मानने वाली होगी तो ही मानूंगी ना, फिर ऐसी कौन सी बात है?’’

‘‘पहले मुझे आने दो.’’

‘‘तुम जानते हो यह गलत है और कोई गड़बड़ भी हो सकती है.’’

‘‘कुछ नहीं होगा मैं लेट नाइट आ जाऊंगा.’’ रवि ने कहा तो शालू सोच में डूब गई. वैसे भी उसे रवि की दोस्ती परेशान करने लगी थी और वह उस से पीछा छुड़ाने के बारे में सोच रही थी. वह रवि पर विश्वास करती थी, इसलिए उस ने इजाजत भी दे दी, ‘‘ठीक है, तुम आ जाना, मैं पिछला दरवाजा खोल दूंगी.’’

कोठी के पीछे की तरफ से भी एक छोटा खिड़कीनुमा दरवाजा था. इस भौगोलिक स्थिति को रवि जानता था. यह बात उसे शालू ही बता चुकी थी. रवि करीब एक बजे सुनील व प्रताप के साथ होटल से निकला. ये लोग पैदल चल कर कारगी चौक की ओर गए. उधर से ही पाम सिटी का रास्ता था. कालोनी में जाने के लिए उस ने मुख्य गेट नहीं चुना. वह जानता था कि शालू के भागने के बाद हंगामा मचेगा तो वह पकड़ा जा सकता है.

पाम सिटी कालोनी की चारदीवारी थी. उस के बाहर खेत व जंगल था. खेतों के रास्ते वे लोग दीवार फांद कर कालोनी में दाखिल हो गए. करीब डेढ़ बजे कोठी के पीछे पहुंच कर रवि ने शालू को फोन किया. उस ने चुपके से दरवाजा खोल दिया. तीनों अंदर आ गए. सुनील व प्रताप लौबी में ही खड़े रहे, जबकि शालू के साथ रवि ड्राइंगरूम में पहुंच गया. शालू ने उस से पूछा, ‘‘बोलो क्या बात है?’’

‘‘शालू मैं तुम्हें ले जाने के लिए आया हूं.’’

‘‘मतलब?’’ उस की बात सुन कर शालू चौंकी.

‘‘तुम्हें यहां से आजाद करा कर मैं तुम से शादी कर लूंगा.’’

सुन कर शालू के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे नहीं पता था कि रवि इतने बड़े ख्वाब देख चुका है.

‘‘पागल हो गए हो तुम?’’ शालू ने गुस्से में कहा.

‘‘तुम चाहे जो समझो, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता. तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा. तुम डरती किस से हो, मैं सब को देख लूंगा.’’ कहते हुए उस ने तैश में आ कर तमंचा निकाल कर शालू को दिखाया. लेकिन शालू ने उस के साथ जाने से इनकार कर दिया.

इस के बावजूद वह करीब एक घंटा उसे समझाता रहा. शालू नानुकूर करती रही. रवि जबरन प्यार हासिल करना चाहता था. उस ने मन ही मन सोच लिया कि या तो वह शालू को साथ ले जाएगा या हमेशा के लिए उस का किस्सा खत्म कर देगा. शालू समझ गई कि यह बिगड़ैल किस्म का युवक है, इसलिए उस से पीछा छुड़ाना ही बेहतर है. बात करतेकरते दोनों लौबी में आ गए. शालू ने उसे चले जाने को कहा.

रवि को अपनी योजना फेल होती नजर आई तो उस ने निर्णायक अंदाज में पूछा, ‘‘शालू आखिरी बार पूछ रहा हूं, तुम मेरे साथ चलोगी या नहीं?’’

शालू ने साफ इनकार कर दिया, ‘‘बिलकुल नहीं, तुम पागल हो गए हो.’’

‘‘मैं तुम्हें उठा कर ले जाऊंगा, फिर देखता हूं तुम्हारी मरजी कैसे चलेगी.’’ उस ने कहा तो शालू ने उसे चेतावनी भरे लहजे में जवाब दिया. ‘‘ऐसी गलती मत करना रवि, मैं शोर मचा कर तुम सब को अभी पकड़वा दूंगी समझे. अब तुम चुपचाप यहां से चले जाओ.’’

अपनी जिद पूरी न होते देख रवि गुस्से में आ गया. उस ने शालू को हाथ पकड़ कर खींचना चाहा तो शालू ने उस के गाल पर तमाचा जड़ दिया. इस से वह आगबबूला हो गया. तब तक उस के साथी भी आ गए थे. रवि ने तमंचा निकाल कर उस की बट से शालू के सिर पर वार कर दिया. वार तेज था. खून बहा तो मामूली चीख के साथ वह सिर थाम कर नीचे बैठ गई. उस ने चिल्लाने की कोशिश की तो रवि ने उस का मुंह दबा दिया और नीचे गिरा दिया. फिर उस का सिर पकड़ कर फर्श में दे मारा. उस के साथियों ने शालू के हाथपैर पकड़ लिए. रवि तब तक उस का सिर पटकता रहा, जब तक कि उस की मौत नहीं हो गई. इस से उस का सिर बुरी तरह फट गया और आसपास खून फैल गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने रवि की निशानदेही पर तमंचा बरामद कर लिया. उस के साथियों का कहना था कि उन्हें नहीं पता था कि रवि इस तरह हत्या कर देगा. वह तो शालू को भगाने में उस का सहयोग करने के लिए उस के साथ चले आए थे. अगले दिन पुलिस ने तीनों को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया.

शालू नादान उम्र में रवि जैसे सिरफिरे की दोस्ती में न पड़ी होती और उस की हरकतों के बारे में अपने पिता को बता दिया होता तो शायद ऐसी नौबत कभी नहीं आती. रवि ने भी अपने जिद्दी स्वभाव की वजह से प्यार के जुनून में खून से हाथ रंग कर अपना भविष्य खराब कर लिया. कथा लिखे जाने तक रवि व उस के साथियों की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र तैयार कर रही थी. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Dehradun Crime: मंगेतर की खातिर

Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.

हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.

स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’

उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.

इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.

देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.

तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.

इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.

उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.

एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.

पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.

लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’

‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.

‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.

राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती  से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.

हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.

नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.

करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.

फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.

इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.

‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.

इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.

करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.

घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’

राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’

राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.

नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं.  यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.

राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’

दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.

नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी  3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.

राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.

यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’

‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.

लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’

नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’

‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’

‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.

खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.

कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.

5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.

जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.

राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.

वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है