मामा का खूनी सिंदूर : परिवार ही बना निशाना – भाग 2

पारिवारिक और सामाजिक वर्जनाओं की वजह से आमतौर पर देखा गया है कि लड़कियां अपने रिश्ते के करीबी युवक से ज्यादा घुल जाती हैं. वह उन का मामा, जीजा, चचेरा या मौसेरा या ममेरा भाई कोई भी हो सकता है. वे उसे ही अपना दोस्त बना लेती हैं. संगीता के सब से नजदीक मामा प्रवींद्र ही था, अत: उन दोनों में भी ऐसा ही रिश्ता था.

प्रवींद्र की नजर थी खूबसूरत भांजी पर

शुरुआती दिनों में जब प्रवींद्र ने बहन ऊषा के घर आना शुरू किया था, तब उस के मन में संगीता के लिए कोई गलत भावना नहीं थी. रिश्ते में वह उस की भांजी थी. किंतु भावनाओं में तूफान आते और रिश्ता बदलते कितनी देर लगती है. संगीता से मेलमिलाप की वजह से प्रवींद्र की भावनाओं में भी तूफान आ गया और मामाभांजी के पवित्र रिश्ते पर कालिख लगनी शुरू हो गई. हुआ यह कि एक दिन प्रवींद्र ऊषा के घर पहुंचा तो वह परिवार सहित गांव में एक परिचित के घर समारोह में जाने को तैयार थी. संगीता भी खूब बनीसंवरी थी. उस ने गुलाबी सलवारसूट पहना था और खुले बाल कमर तक लहरा रहे थे. उस समय संगीता बेहद खूबसूरत दिख रही थी.

संगीता का वह रूप प्रवींद्र की आंखों के रास्ते से दिल में उतर गया. प्रवींद्र के मन में कामना की ऐसी आंधी चली कि उस की धूल ने सारे रिश्तेनाते को ढक लिया. वह भूल गया कि संगीता उस की भांजी है.प्रवींद्र का मन चाह रहा था कि संगीता उस के सामने रहे और वह उसे अपलक देखता रहे, लेकिन ऐसा कहां संभव था. वे लोग तो समारोह में जाने को तैयार थे.

प्रवींद्र को घर की तालाकुंजी दे कर वे सब चले गए. प्रवींद्र की नजरें तब तक संगीता का पीछा करती रहीं जब तक वह आंखों से ओझल नहीं हो गई.उन के जाने के बाद प्रवींद्र खाना खा कर बिस्तर पर लेट गया. लेकिन नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. उस की आंखों में संगीता का अक्स बसा था और जेहन में उसी के खयाल उथलपुथल मचा रहे थे. कई बार प्रवींद्र की अंतरात्मा ने उसे झिंझोड़ा, ‘संगीता तुम्हारी भांजी है, उस के बारे में गंदे विचार तक मन में लाना पाप है. संगीता के बारे में गलत सोचना बंद कर दो.’

प्रवींद्र ने हर बार यह सोच कर अंतरात्मा की आवाज को दबा दिया कि हर लड़की किसी न किसी की भांजी होती है. अगर लोग मामाभांजी का ही रिश्ता निभाते रहे तो चल गई दुनिया. कहते हैं कि बुरे विचार अच्छे विचारों को जल्दी ही दबा देते हैं. प्रवींद्र की अच्छाई पर बुराई हावी हो गई.इधर ऊषा और रमेश रात को काफी देर से लौटे. सुबह वे जल्दी उठ कर अपनेअपने काम से लग गए. रमेशचंद्र और ऊषा खेत पर चले गए थे, जबकि संगीता घरेलू कामों में व्यस्त थी.

प्रवींद्र की आंखें खुलीं तो उस की नजर आंगन में काम कर रही संगीता पर पड़ी. वह मुंह से तो कुछ नहीं बोला लेकिन टकटकी लगाए संगीता को देखने लगा.
प्रवींद्र को इस तरह अपनी ओर ताकते देख संगीता ने टोका, ‘‘क्या बात है मामा, तुम कुछ बोल क्यों नहीं रहे. बस टकटकी लगा कर मुझे ही देखे जा रहे हो.’’

‘‘इसलिए देख रहा हूं कि तुम बहुत खूबसूरत हो. जी चाहता है कि तुम सामने खड़ी रहो और मैं तुम्हें देखता रहूं. यह कमबख्त नजरें तुम्हारे चेहरे से हटने का नाम ही नहीं ले रही हैं.’’ वह बोला.

संगीता मामा के मन का मैल न समझ कर उन्मुक्त हंसी हंसने लगी. हंसी पर विराम लगा तो बोली, ‘‘यह कौन सी नई बात है. गांव में भी सब कहते हैं कि संगीता तुम खूबसूरत हो.’’फिर वह शरारत से उस की आंखों में देखने लगी, ‘‘कैसे मामा हो जिसे आज पता चला कि मैं खूबसूरत हूं.’’‘‘आज नहीं, मैं ने कल जाना कि तुम खूबसूरत हो.’’ प्रवींद्र के मन की बात उस की जुबान पर आ गई, ‘‘गुलाबी रंग का सलवारसूट तुम्हारे गोरे बदन पर बेहद फब रहा था.

ऊपर से तुम्हारा मेकअप तो मेरे दिल पर बिजली गिरा गया. किसी दुलहन से कम नहीं लग रही थी तुम…’’संगीता अपने सौंदर्य की तारीफ सुन कर गदगद हो गई, उस ने शरम से नजरें झुका लीं. साथ ही उस के मन में कांटा सा चुभा. वह सोचने लगी कि क्या मामा के दिल में खोट आ गया है, जो ऐसी बातें उस से कर रहे हैं. वह अभी ऐसा सोच ही रही थी कि तभी प्रवींद्र 2 कदम आगे बढ़ कर संगीता की कलाई पकड़ कर बोला, ‘‘संगीता, तुम वाकई बहुत खूबसूरत हो. मैं तुम से प्यार करता हूं.’’

संगीता काफी दिनों से महसूस कर रही थी कि उस के मामा प्रवींद्र के मन में उस के लिए बेपनाह प्यार है. सच तो यह था कि संगीता भी मन ही मन मामा प्रवींद्र को चाहती थी. यही कारण था कि जब प्रवींद्र ने अपनी मोहब्बत का इजहार किया तो संगीता ने फौरन इकरार करते हुए कह दिया, ‘‘हां, मैं भी तुम्हें दिल की गहराइयों से चाहती हूं.’’

मोहब्बत को मिली जुबान

खामोश मोहब्बत को जुबान मिली तो संगीता और प्रवींद्र की आशिकी के रंग निखरने लगे. प्रवींद्र का पहले से ही घर में आनाजाना था. रमेशचंद्र दोहरे भी उसे बेटे की तरह मानते थे, इसलिए संगीता से उस के मिलनेजुलने या एकांत में बातचीत करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं थी. प्रवींद्र जब अपने गांव कतरतन्ना में होता तब वे दोनों मोबाइल फोन पर देर तक बातें करते थे.

संगीता उसे अपना हालेदिल सुनाया करती.बहन के घर जाने में भाई को बहाने की जरूरत नहीं होती. संगीता के बुलाने पर वह उस के यहां आ जाता. सब उसे देख कर खुश होते कि देखो भाईबहन में कितना प्यार है.लेकिन यह तो केवल संगीता जानती थी कि प्रवींद्र किसलिए आता है. ज्योंज्यों दिन गुजरते गए, संगीता और प्रवींद्र की मोहब्बत के तकाजे भी बढ़ते गए. उन की चाहत तनहाई और खुफिया मुलाकात की मांग करने लगी. यह तकाजा पूरा करने के लिए उन दोनों ने किसी तरह की कोताही नहीं की.

रात को जब सब लोग सो जाते, तब संगीता और प्रवींद्र चुपके से उठ कर छत पर चले जाते और वहां एकदूजे की बांहों में खो जाते. तनहाई और रात के सन्नाटे में 2 जिस्म मिले तो जज्बात भड़कते ही हैं. संगीता और प्रवींद्र भी अपनी भावनाओं पर काबू नहीं पा सके. पे्रमोन्माद में वे एकदूसरे को समर्पित हो गए.समय बीतता रहा. किसी को अब तक नहीं खबर नहीं थी कि संगीता और प्रवींद्र एकदूसरे से प्यार करते हैं. मन से ही नहीं, दोनों तन से भी एक हो चुके हैं. प्रवींद्र और संगीता के इश्क का खेल 2 सालों तक निर्बाध रूप से चलता रहा. लेकिन एक रोज उन का भांडा फूट ही गया.

उस दिन शाम को प्रवींद्र आया तो पता चला रमेश जीजा रिश्तेदारी में उन्नाव गए हैं. वह 3 दिन बाद घर लौटेंगे. ऊषा आंगन में अकेली बैठी थी और संगीता रसोई में खाना बना रही थी. ज्यों ही प्रवींद्र ऊषा के पास आ कर बैठा, उस ने वहीं से रसोई की ओर मुंह कर आवाज दी, ‘‘बेटी संगीता, मामा आए हैं, इन के लिए भी खाना बना लेना.प्रवींद्र चारपाई पर पसर गया और हंस कर बोला, ‘‘हां दीदी, मैं खाना भी खाऊंगा और रुकूंगा भी. जीजा बाहर गए हैं न इसलिए घर और तुम दोनों की देखभाल करना मेरा फर्ज है. वैसे भी दीदी तुम मुझे फोन पर बता देती तो मैं दौड़ा चला आता.’’

‘‘यह भी कोई कहने की बात है,’’ ऊषा भी हंसने लगी, ‘‘मैं खुद तुझ से यहीं रुकने को कहने वाली थी. लेकिन तूने मेरे मुंह की बात छीन ली.’’ संगीता को पता चला कि मामा आए हैं तो उस का शरीर रोमांच से भर गया. वह जान गई कि आज की रात रंगीन होने वाली है. उस ने खाना बना कर तैयार किया फिर मां और मामा को खिलाया. उस के बाद खुद खाना खा कर घर की साफसफाई की.प्रवींद्र छत पर सोने चला गया और संगीता मां के साथ नीचे कमरे में पड़ी चारपाई पर लेट गई. कुछ देर बाद ऊषा तो सो गई लेकिन संगीता की आंखों में नींद नहीं थी. ऊषा जब गहरी नींद सो गई तो संगीता दबेपांव उठी और प्रवींद्र के पास छत पर जा पहुंची. प्रवींद्र भी उस के आने का ही इंतजार कर रहा था. संगीता के पहुंचते ही उस ने उसे बांहों में भर लिया.

इधर आधी रात को ऊषा की आंखें खुलीं तो उस ने संगीता को चारपाई से नदारद पाया. वह उसे खोजते हुए आंगन में आई तो उसे छत पर खुसरफुसर की आवाज सुनाई दी. वह जीने की ओर बढ़ी, तभी संगीता जीने से नीचे उतरी. शायद उसे मां के जागने का आभास हो गया था. कमरे में पहुंचते ही ऊषा ने पूछा, ‘‘संगीता, तू आधी रात को छत पर क्यों गई थी?’’‘‘मामा उल्टियां कर रहे थे. उन्हें पानी देने गई थी.’’ संगीता ने बहाना बना दिया.ऊषा ने संगीता की बात पर विश्वास तो कर लिया किंतु उस के मन में शक का बीज अंकुरित होने लगा. अब वह दोनों पर कड़ी नजर रखने लगीं. संगीता और प्रवींद्र कड़ी निगरानी के कारण सतर्कता बरतने लगे थे, लेकिन सतर्कता के बावजूद एक रात ऊषा ने संगीता और प्रवींद्र को रंगेहाथ पकड़ लिया. उस रात ऊषा ने संगीता की जम कर फटकार लगाई और उस की पिटाई भी कर दी. उस ने छोटे भाई प्रवींद्र को भी भलाबुरा कहा और रिश्ते को कलंकित करने का दोषी ठहराया.

मौत का आशीर्वाद : ससुर बना दामाद का हत्यारा

प्रेम सिंह खेतीकिसानी के अलावा एक बैंक के एटीएम पर गार्ड की नौकरी भी करते थे. परिवार में पत्नी रमा एक बेटी रिंकी और 2 बेटे अंकित व अमित थे.

भाइयों की एकलौती बहन थी रिंकी. चंचल स्वभाव की रिंकी पढ़ाई में तेज थी. वह पढ़लिख कर पुलिस में जाना चाहती थी. पढ़ाई के बाद जब भी समय मिलता तो वह टीवी से चिपक जाती. रिंकी को फिल्म देखने का शौक था. वह टीवी पर आने वाली सभी फिल्में देखती थी. फिल्मों और फिल्मों के गानों का रिंकी पर इतना प्रभाव पड़ा कि वह अपने आप को किसी फिल्मी हीरोइन से कम नहीं समझती थी.

चूंकि फिल्मों में प्यारमोहब्बत को हमेशा महिमामंडित किया जाता है, इसलिए रिंकी को भी किसी ऐसे युवक की तलाश थी जो फिल्मी हीरो की तरह उस के सामने प्यारमोहब्बत का प्रस्ताव रखे. उसे चाहे, उसे सराहे. उस के हुस्न की तारीफ करे और उस की याद में तड़पे.

रिंकी के घर से 200 मीटर की दूरी पर मनीष का घर था. मनीष के पिता विश्वनाथ सिंह लोधी खेतीकिसानी करते थे. मनीष का एक छोटा भाई था मंदीप जो बीए की पढ़ाई कर रहा था.

मनीष भी पढ़ाई में तेज था. वह भी पुलिस विभाग में जाना चाहता था. इसी उद्देश्य से वह अपनी पढ़ाई में जी जान से जुटा रहता था. रिंकी की तरह मनीष को भी फिल्मों का जबरदस्त शौक था. पढ़ाई के दौरान वह मनोरंजन के लिए कुछ समय निकाल लेता था.

मनीष पहनावे से संभ्रांत युवक नजर आता था. शरीर पर भी वह विशेष ध्यान देता था. हमेशा फैशनेबल कपड़े पहनता था. मनीष को भी पागलपन की हद तक फिल्में देखने का शौक था. उस के मोबाइल का मेमोरी कार्ड फिल्मों से भरा रहता था. बड़ी स्क्रीन के मोबाइल पर वह जब चाहे अपनी मनपसंद फिल्म देख लेता था. उस पर फिल्मों का असर  इस हद तक था कि उस का बात करने और चलने का स्टाइल भी फिल्मी हो गया था.

मनीष उम्र के उस मोड़ पर था, जहां स्वभाव में आशिकी अपने आप शामिल हो जाती है. मनीष भी इस का अपवाद नहीं था. लव स्टोरी वाली फिल्में देखदेख कर उस का मिजाज भी आशिकाना हो गया था.

मनीष का रिंकी के घर आनाजाना था. दोनों परिवार सजातीय थे. दोनों के घरवाले एकदूसरे के घर आतेजाते थे. रिंकी और मनीष अलगअलग कालेज में पढ़ते थे, फिर भी पढ़ाई को ले कर उन के बीच खूब बातचीत होती रहती थी.

दोनों की आदतें, शौक और विचार मेल खाते थे. पढ़ाई के साथसाथ दोनों के बीच फिल्मों को ले कर भी बातचीत होती थी. दोनों एक ही शौक के शिकार थे. दोनों घंटों बैठ कर बातें करते रहते, जिन में आधी बातें फिल्मों की होती थीं. एक जैसी रूचि के चलते दोनों काफी समय साथसाथ बिताते थे.

इंटरमीडिएट कर के दोनों प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लग गए. पुलिस विभाग में भरती होती तो दोनों ही फार्म भरते और साथसाथ पेपर देने जाते. साथ समय बिताने और बाहर जा कर घूमते. इसी सब के चलते दोनों एकदूसरे के करीब आने लगे. वैसे भी हर मामले में दोनों के बीच समानताएं थीं. ऐसे में दोनों के दिल कब तक करीब आने से बच पाते.

समय के साथ दोनों को एकदूसरे का संग खूब भाने लगा था. दोनों साथसाथ रोमांटिक मूवी भी देखते. फिर फिल्म के कलाकारों की नकल करते, उन के डायलौग बोलते और उसी अंदाज में एकदूसरे को बांहों में भर कर आंखों में आंखें डाल कर उसी तरह बोलते जैसे फिल्म में कलाकार करते हैं. इस से दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए थे.

दोनों एकदूसरे के दिल की धड़कनों की आवाज और सांसों की सरगम को बखूबी महसूस करते थे. दोनों को नजदीकियां अच्छी लगने लगी थीं. जब वे नजदीक होते तो अलग होने की बात को दिमाग में आने ही नहीं देते थे. लेकिन मजबूर हो कर उन्हें एकदूसरे से अलग होना ही पड़ता. फिल्मी कलाकारों के लव सीन की ऐक्टिंग करतेकरते दोनों एकदूसरे से प्यार कर बैठे. अब प्यार का इजहार बाकी था.

एक दिन लव सीन की ऐक्टिंग करतेकरते मनीष ने रिंकी को अपनी बांहों में लिया तो फिल्म के डायलौग न बोल कर उस ने अपने दिल की बात कहनी शुरू कर दी, ‘‘रिंकी, देखता तो मैं तुम्हें बचपन से आया हूं. लेकिन जब से हम ऐक्टिंग के जरिए एकदूसरे के नजदीक आए हैं, तब से मैं ने तुम्हें बेहद करीब से देखा. अब ये नजरें तुम्हारे सिवा कुछ और देखना ही नहीं चाहतीं.

‘‘तुम्हारी झील सी आंखों की गहराइयों में डूब कर तुम्हारे दिल का हाल जाना तो लगा कि तुम्हारा दिल भी मेरे पास आना चाहता है. इस बात की गवाही तुम्हारे दिल की धड़कनें देती हैं.

‘‘मैं तो तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं. मुझे अपने प्यार पर भी पूरा भरोसा है कि वह मुझे बेइंतहा चाहता है, बस देर है तो उसे तुम्हारी जुबां से कुबूल करने की.’’

रिंकी तो जैसे उस के प्रेम से सराबोर हो गई और उस की आंखों में देखती हुई फिल्मी स्टाइल में बेसाख्ता बोली, ‘‘कुबूल है…कुबूल है…कुबूल है मेरे महबूब.’’

यह सुन कर मनीष की खुशी का ठिकाना न रहा. उस ने रिंकी को अपने सीने से लगा लिया और बोला, ‘‘आई लव यू…आई लव यू रिंकी.’’

उस के प्यार भरे शब्द रिंकी के कानों में रस घोल रहे थे. उसे मीठा सुखद एहसास हुआ तो उस ने अपनी आंखें बंद कर लीं और मनीष के कंधे पर सिर रख दिया. काफी देर तक दोनों उसी स्थिति में बैठे रहे. बाद जब दोनों अलग हुए तो उन के चेहरे खिले हुए थे.

इस के बाद तो रिंकी और मनीष की तूफानी मोहब्बत तेजी के साथ बुलंदियों की तरफ बढ़ने लगी.

सन 2018 में रिंकी का चयन पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर हो गया. इटावा में टे्रनिंग के बाद उस की पोस्टिंग उरई (जालौन) के थाना रमपुरा में हुई. उरई में वह शहर कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला शिवपुरी में किराए का कमरा ले कर रहने लगी.

दूसरी ओर मनीष बीसीए करने के बाद एलएलबी कर रहा था. उस ने पुलिस विभाग में भरती का फार्म भरा था, जिस का पेपर देने वह कानपुर गया. पेपर देने के बाद वह वहां से घर जाने के बजाय रिंकी के पास उरई चला गया. दोनों में फोन पर बात कर के तय कर लिया था कि मनीष पेपर दे कर कानपुर से सीधे उरई आ जाएगा. मनीष रिंकी के साथ उसी के कमरे पर रहने लगा.

रिंकी को पता था कि उस के पिता प्रेम सिंह गुस्सैल स्वभाव के है. वह उस की मरजी के बजाय उस की शादी अपनी मरजी से कराएंगे. इसलिए उन्हें बिना बताए रिंकी ने मनीष से शादी करने का फैसला कर लिया. 8 फरवरी, 2019 को 2 रिश्तेदारों की मौजूदगी में दोनों ने उरई के राधाकृष्ण मंदिर में विवाह कर लिया.

रिंकी के विवाह कर लेने की बात पिता प्रेम सिंह को लगी तो वह आगबबूला हो उठा.

उस ने मनीष के घर जा कर उस के पिता विश्वनाथ सिंह को खूब खरीखोटी सुनाई और मरनेमारने पर उतारू हो गया. उस ने मनीष के पिता विश्वनाथ से कहा कि जिस तरह उस के बेटे ने उस की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया है. उसी तरह भविष्य में एक दिन वह भी उस के परिवार की लड़की की ऐसे ही बिना मरजी के शादी करवा कर मानेगा. गांव वालों ने जैसेतैसे दोनों का बीचबचाव किया.

प्रेम सिंह को लगता था कि रिंकी ने अपनी मरजी से शादी कर के गांव में उस की नाक कटवा दी है.

इस में वह मनीष को दोषी मान रहा था कि उस ने ही रिंकी को बरगलाया होगा. जब बेटी कमाने लायक हुई तो अपनी मरजी से शादी कर के घर से दूर हो गई.

हालांकि रिंकी घर नहीं जाती थी लेकिन अपने वेतन में से कुछ रकम घर भेज दिया करती थी. जब रिंकी 7 माह की गर्भवती हुई तो उस ने मातृत्व अवकाश ले लिया, जिस से बच्चे की डिलीवरी और उस की देखभाल अच्छी तरह से हो सके.

घर में नए मेहमान के आने की खुशी में दोनों खुश थे. रिंकी ने जो चाहा था, वह उसे सब मिल रहा था. पहले पुलिस में नौकरी, जिसे चाहा उस का जीवन भर का साथ और अब उस के प्यार की निशानी जिंदगी में आने वाली थी. रिंकी मनीष को अपनी जान से भी ज्यादा चाहती थी. उस के आने से ही उस की जिंदगी में खुशी के रंग बिखरे थे.

इसी साल अपै्रल में रिंकी ने बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम दोनों ने शिवाय रखा. समय कुछ आगे बढ़ा तो दोनों शिवाय के मुंडन संस्कार की तैयारी करने लगे. इस वजह से रिंकी ने घर पैसा भेजना बंद कर दिया.

दूसरी ओर प्रेम सिंह पहले से ही जलाभुना बैठा था. वह समय की ताक में था. माथे पर लगा बदनामी का दाग प्रेम सिंह को दिनरात चैन नहीं लेने देता था. प्रेम सिंह ने अपने साले देशराज सिंह को घर बुला कर इस मुद्दे पर बात की, उस समय प्रेम सिंह का बेटा अंकित भी मौजूद था.

देशराज फतेहपुर के थाना हुसैनगंज क्षेत्र के गांव सुखपुर का निवासी था. करीब 6 साल पहले उस ने गौसपुर में ही मकान बनवा लिया था. वह अपनी मां के साथ रहता था. उस की पत्नी और बच्चे उस के साथ नहीं रहते थे. देशराज अपराधी किस्म का था, वह कई बार जेल भी जा चुका था.

प्रेम सिंह ने अपने बेटे अंकित और साले देशराज के साथ मिल कर मनीष और रिंकी की हत्या की योजना बनाई. प्रेम सिंह के मन में दोनों के लिए इतनी नफरत थी कि वह दोनों को जिंदा नहीं देखना चाहता था.

योजनानुसार 22 अगस्त को अंकित अपनी बहन रिंकी के घर गया. भाई अंकित को घर आया देख रिंकी बहुत खुश हुई कि वह  उस से मिलने और अपने भांजे को देखने आया है.

जबकि अंकित वहां रेकी करने आया था. सारी स्थिति का मुआयना करने के बाद चलते समय उस ने रिंकी से मोबाइल खरीदने के लिए 10 हजार रुपए मांगे. रिंकी ने उसे 4 हजार रुपए दिए और कहा कि इस समय उस के पास इस से ज्यादा पैसे नहीं है.

अंकित उन रुपयों को ले कर वहां से चला आया. आ कर उस ने अपने पिता और मामा देशराज को सारी स्थिति से अवगत करा दिया.

27 अगस्त की शाम साढ़े 7 बजे प्रेम सिंह, देशराज और अंकित रिंकी के शिवपुरी वाले किराए के कमरे पर पहुंचे. पिता, मामा और भाई को एक साथ घर आया देख रिंकी खुशी से फूली नहीं समाई.

वह उन के लिए खाना बनाने के लिए किचन में चली गई. उस समय मनीष बेटे शिवाय को बैड पर लिटा कर दूध पिला रहा था. रिंकी के किचन में जाते ही प्रेम सिंह ने देशराज को इशारा किया तो देशराज ने किचन में जा कर रिंकी को दबोच लिया.

इधर प्रेम सिंह ने अंकित के साथ मिल कर मनीष को दबोच लिया. साथ में लाए 2 चाकुओं से दोनों ने मनीष के पेट पर ताबड़तोड़ प्रहार करने शुरू कर दिए. बेदर्दी से वार करते हुए प्रेम सिंह का चाकू तक टूट गया. मनीष की चीखों से कमरा और आसपास के लोग दहल उठे.

रिंकी यह सब देख कर बदहवास हालत में चीखनेचिल्लाने लगी. शोर सुन कर आसपास के लोग इकट्ठा हो गए. तब तक मनीष की हत्या की जा चुकी थी. अपने आप को लोगों से  घिरा देख कर तीनों ने भागने की कोशिश नहीं की. तीनों कमरे में ही बैठ गए. उन्हें रिंकी को मारने का मौका नहीं मिला.

इसी बीच किसी पड़ोसी ने घटना की सूचना शहर कोतवाली को दे दी. सूचना पा कर इंसपेक्टर जे.पी. पाल पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. तीनों हत्यारों को हिरासत में लेने के बाद उन्होंने लाश का निरीक्षण किया.

मनीष के पेट पर लगभग 15-16 घाव थे. पास में ही 2 रक्तरंजित चाकू पड़े थे, जिन्हें इंसपेक्टर पाल ने अपने कब्जे में ले लिया. प्रेम सिंह और अंकित के चेहरे व हाथ पर खून के निशान मौजूद थे, जो उन की करनी की गवाही दे रहे थे.

आवश्यक पूछताछ के बाद इंसपेक्टर जे.पी. पाल ने बदहवास रिंकी को उस के बच्चे के साथ उरई में ही एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया. इस के बाद उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दिया और कमरे को सील कर के तीनों हत्याभियुक्तों को साथ ले कर कोतवाली आ गए.

कोतवाली आ कर उन्होंने रिंकी को वादी बना कर प्रेम सिंह लोधी, देशराज सिंह लोधी और अंकित सिंह लोधी के खिलाफ भादंवि की धारा 302/34 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अगले दिन 28 अगस्त को तीनों हत्याभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक केस से संबंधित सभी साक्ष्य पुलिस द्वारा संकलित किए जा चुके थे. जल्द ही आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल कर देने की बात पुलिस द्वारा कही जा रही थी.

एक ससुर द्वारा दामाद को दिया जाने वाला ‘मौत का आशीर्वाद’ की चर्चा चारों ओर फैल चुकी थी. लोग उस के कुकृत्य पर उसे कोस रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, सितंबर 2020

एक सिपाही की प्रेम लीला

विकास पालीवाल 

सिपाही यतेंद्र कुमार यादव ने 26 अप्रैल, 2020 को रात 9 बजे अपने चचेरे साले सुरजीत

के मोबाइल पर फोन किया. फोन सुरजीत के छोटे भाई योगेंद्र ने उठाया. यतेंद्र ने कहा, ‘‘सुनो, जैसे ही गेट में घुसोगे, घुसते ही नेमप्लेट लगी है. उस के ऊपर ग्रिल है, चाबी वहीं रखी है और अंदर पिंकी (पत्नी) आंगन में है. आप उन लोगों (ससुरालीजनों) को बता देना. मतलब हम ने पिंकी को गोली मार दी है. साफसीधी बात है.’’

योगेंद्र ने पूछा, ‘‘कब?’’

यतेंद्र ने बताया, ‘‘आज रात में.’’

‘‘बच्चियां कहां हैं?’’

इस पर यतेंद्र ने कहा, ‘‘बच्चियां भी गायब हैं. आप उन को (ससुरालीजनों को) बता देना, बहुत सोचसमझ कर ही कोई कदम उठाएं. हमें जो करना था कर दिया. आप समझदार हो, जो भी गलती हुई माफ करना. अभी चाहो अभी काल कर लो. रात की बात है. जो भी काररवाई करवानी है करवाओ.’’

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जनपद के शिकोहाबाद थानांतर्गत हाइवे स्थित आवास विकास कालोनी 3/39 के सेक्टर-3 में 32 वर्षीय सरोज देवी उर्फ पिंकी अपनी 3 बेटियों 10 साल की आकांक्षा, 8 साल की आरती व सब से छोटी 4 साल की अन्या के साथ अपने निजी मकान में रहती थीं. सरोज का पति यतेंद्र कुमार यादव आगरा के थाना सैंया में डायल 112 पर सिपाही पद पर तैनात था.

बीचबीच में यतेंद्र घर पर अपनी पत्नी व बेटियों के पास आताजाता रहता था. कहते हैं कभीकभी खून सिर चढ़ कर बोलता है. यही बात यतेंद्र के साथ भी हुई.

उस ने अपनी पत्नी की हत्या करने के बाद अपने चचेरे साले को फोन कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और अपने ससुरालीजनों को सूचना देने व आगे की काररवाई करने को कहा. इस के साथ ही उस ने उन्हें धमकी भी दी कि वे जो भी काररवाई करें, खूब सोचसमझ कर करें.

योगेंद्र ने पूरी बात रिकौर्ड कर ली थी. उसे जैसे ही बहनोई यतेंद्र से अपनी चचेरी बहन पिंकी की हत्या की जानकारी मिली उस के हाथपैर फूल गए. उस समय लौकडाउन चल रहा था. उसे इस बात की जानकारी थी कि पिंकी और यतेंद्र के बीच विवाद चल रहा है. लेकिन हालात हत्या तक पहुंच जाएगा, इस की उस ने कल्पना भी नहीं की थी.

योगेंद्र ने रात में ही पिंकी के मायके में फोन कर अपने चचेरे भाई हरिओम को घटना की जानकारी दी. हरिओम ने जैसे ही बहन पिंकी की हत्या की खबर बताई, घर में कोहराम मच गया. रोनापीटना शुरू हो गया.

इस से पहले 26 अप्रैल की सुबह 9 बजे हरिओम के पास आवास विकास कालोनी में रहने वाले एक परिचित का फोन आया था. उस ने बताया कि वह उस की बहन सरोज उर्फ पिंकी के घर गया था. मकान का गेट अंदर से बंद था. कई आवाजें देने पर भी गेट नहीं खुला.

इस पर हरिओम ने अपने बहनोई यतेंद्र व बहन सरोज उर्फ पिंकी के मोबाइलों पर फोन किया, लेकिन किसी ने भी फोन नहीं उठाया. हरिओम ने अनुमान लगाया कि वे लोग कहीं गए होंगे, मोबाइल घर पर भूल गए होंगे.

रात को हरिओम के पास योगेंद्र का फोन आने पर बहनोई यतेंद्र द्वारा बहन सरोज उर्फ पिंकी की हत्या किए जाने की जानकारी हुई. हरिओम ने थाना शिकोहाबाद पुलिस को घटना की जानकारी दे दी.

इस पर थाना पुलिस रात में ही आवास विकास कालोनी स्थित उस मकान पर पहुंची, लेकिन मकान का दरवाजा बंद देख कर लौट गई. पुलिस ने हरिओम से थाने आने को कहा.

इन सब बातों के चलते काफी रात हो गई. इस के साथ ही लौकडाउन के चलते और गांव में एक गमी होने के कारण हरिओम व उस के घरवाले शिकोहाबाद नहीं आ पाए थे.

दूसरे दिन 27 अप्रैल को सुबह होते ही हरिओम यादव अपने पिता रामप्रकाश व अन्य रिश्तेदारों के साथ शिकोहाबाद की आवास विकास कालोनी पहुंच गए और पुलिस को सूचना दी. घर वालों के आने की सूचना पर थानाप्रभारी अनिल कुमार पुलिस टीम के साथ आवास विकास कालोनी पहुंच गए.

हरिओम ने पुलिस को बताया कि बहनोई यतेंद्र ने फोन पर ताऊ के लड़के योगेंद्र को मकान की चाबी ग्रिल के ऊपर रखी होने की जानकारी दी थी. इस पर चाबी को तलाशा गया. बताई गई जगह पर चाबी मिल गई. मकान का ताला खोल कर पुलिस अंदर गई.

आंगन में सरोज की खून से लथपथ लाश पड़ी हुई थी. तीनों बच्चियां भी गायब थीं. थानाप्रभारी अनिल कुमार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए यह सूचना अपने उच्चाधिकारियों को दे दी.

सूचना पर सीओ इंदुप्रभा सिंह व एसपी (ग्रामीण) राजेश कुमार फोरैंसिक टीम को ले कर मौकाएवारदात पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी होते ही कालोनी के लोग भी एकत्र हो गए. सिपाही द्वारा पत्नी की हत्या किए जाने की खबर से सनसनी फैल गई.

पुलिस अधिकारियों ने लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतका के शरीर पर चोटों के साथ ही गोलियों के 4 निशान भी मिले. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर पूरे घर से साक्ष्य जुटाए. लाश के पास की दीवारों पर खून के छींटे मिलने के साथ ही टूटी हुई चूडियां भी मिलीं. इस से अनुमान लगाया कि मृतका ने अंतिम सांस तक पति के साथ संघर्ष किया था.

हरिओम ने हत्यारोपी सिपाही यतेंद्र द्वारा किए गए फोन की रिकौर्डिंग भी पुलिस अधिकारियों को सुनवाई.

मकान से पुलिस को 2 मोबाइल फोन मिले. यह मृतका के बताए जा रहे थे. पुलिस ने फोनों के लौक खुलवा कर जांच कराने की बात कही. तीनों बेटियों के स्कूल आईडी कार्ड घर के बाहर पड़े मिले.

4 साल पहले यतेंद्र ने अपने परिचित के जरिए शिकोहाबाद की आवास विकास कालोनी में प्लौट खरीदा और रजिस्ट्री पत्नी सरोज के नाम कराई थी. इस के बाद मकान बनवाया था.

आवास विकास कालोनी का इलाका आबादी से दूर होने से सिपाही यतेंद्र ने सुरक्षा की दृष्टि से 5 सीसीटीवी कैमरे लगवा रखे थे. शातिर सिपाही ने पत्नी की हत्या के बाद सारे सुबूत मिटाने की कोशिश की थी. वह घर के अंदर और बाहर लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग डिलीट करने के बाद तीनों बेटियों को ले कर इस तरह घर निकला कि किसी को कानोंकान भनक तक नहीं लगी.

पूछताछ में मृतका के भाई हरिओम यादव व पिता रामप्रकाश ने बताया कि यतेंद्र के मथुरा की एक युवती से अवैध संबंध थे. इस के चलते पतिपत्नी में विवाद होता रहता था. यतेंद्र मकान बेचने का दबाव बनाने के साथ ही दहेज की मांग को ले कर बहन पिंकी का उत्पीड़न करता था. सरोज की शिकायत पर घर वालों ने यतेंद्र को कई बार समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं पड़ा. यतेंद्र आए दिन पिंकी के साथ मारपीट करता था और इसी के चलते यतेंद्र ने उस की हत्या कर दी.

घटना के बाद से तीनों बच्चियां भी गायब थीं. घर वालों को आशंका थी कि आरोपी ने बच्चियों के साथ कोई अनहोनी न कर दी हो. पड़ोसियों ने बताया कि रात में उन्हें गोली चलने की आवाज सुनाई नहीं दी.

मृतका के भाई हरिओम यादव की तहरीर पर पुलिस ने सिपाही यतेंद्र कुमार यादव, उस के पिता रामदत्त व यतेंद्र के बहनोई हरेंद्र के खिलाफ सरोज की गोली मार कर हत्या करने का केस दर्ज कर लिया.

पुलिस का अनुमान था कि कालोनी हाइवे के किनारे स्थित है, मकान दूरी पर बने हैं. रात का समय होने पर संभव है कि पड़ोसियों को गोली की आवाज सुनाई न दी हो. एक पड़ोसी ने इतना जरूर बताया कि शनिवार की शाम सरोज को घर के दरवाजे पर बैठा देखा था.

एसपी (ग्रामीण) ने बताया कि या तो कैमरे बंद किए गए थे या फिर रिकौर्डिंग डिलीट कर दी गई थी. आगरा से जानकारी करने पर पता चला कि यतेंद्र 26 अप्रैल को दोपहर 2 बजे से अनुपस्थित चल रहा था, उस के खिलाफ आगरा में रपट लिखी गई है.

पुलिस का मानना था कि हो सकता है कि तीनों बेटियों को आरोपी यतेंद्र अपने साथ ले गया हो. बेटियों को ले कर वह कहां गया, इस का कोई पता नहीं चल रहा था.

पुलिस व फोरैंसिक टीम ने मौके की काररवाई निपटाने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला चिकित्सालय फिरोजाबाद भिजवा दिया.

हत्यारोपी सिपाही की गिरफ्तारी के लिए लौकडाउन में पुलिस ने 3 टीमें गठित कीं. इन टीमों ने मैनपुरी और इटावा स्थित सिपाही के घर व रिश्तेदारियों के अलावा आगरा व मथुरा में भी दबिशें दीं.

मथुरा के थाना हाइवे क्षेत्र निवासी उस की प्रेमिका से भी पूछताछ की गई लेकिन हत्यारोपी सिपाही का कोई सुराग नहीं मिला. प्रेमिका ने पुलिस को बताया कि यतेंद्र से एक साल से बात नहीं हुई है.

आरोपी का एक मामा भी कांस्टेबल था. मामा के मोबाइल की भी काल डिटेल्स खंगाली गई. जांच में पता चला कि मामा के मोबाइल पर एक भी फोन आरोपी का नहीं आया था. आरोपी की तलाश में पुलिस द्वारा लगातार दबिशें दिए जाने पर भी पुलिस के हाथ खाली थे. सरोज उर्फ पिंकी इटावा जनपद के थाना भरथना अंतर्गत गांव नगला नया कुर्रा निवासी रामप्रकाश यादव की बड़ी बेटी थी. स्वभाव से मिलनसार. पिंकी की शादी 2008 में मैनपुरी जनपद के कुर्रा थानांतर्गत गांव अंबरपुर सौंख निवासी रामदत्त यादव के बेटे यतेंद्र कुमार यादव के साथ हुई थी. यतेंद्र 2005 बैच का सिपाही है.

ससुरालीजनों ने बताया कि डेढ़ साल पहले यतेंद्र की तैनाती मथुरा जनपद के थाना हाइवे में हुई थी. ड्यूटी के दौरान यतेंद्र की मुलाकात उसी क्षेत्र की रहने वाली एक युवती से हुई. दोनों के बीच प्यार परवान चढ़ा तो वह यह भी भूल गया कि पहले से शादीशुदा है.

सिपाही यतेंद्र अपनी प्रेमिका को ले कर फरार हो गया. जब ये बात प्रेमिका के घरवालों को पता चली तो उन्होंने थाना हाइवे में मुकदमा दर्ज करा दिया. इस संबंध में यतेंद्र कुमार सस्पेंड भी रहा था. 2 माह बाद युवती वापस आ गई और उस ने सिपाही यतेंद्र के पक्ष में बयान दिया था. बाद में यह मामला रफादफा हो गया था.

पति की इस करतूत से पिंकी को गहरी ठेस लगी. दोनों के बीच इस बात को ले कर तल्खी बढ़ गई. छोटीमोटी बातों को ले कर दोनों के बीच विवाद होने लगे. इस के चलते जीवन भर साथ निभाने वाली पत्ली पिंकी पति की नजरों में खटकने लगी थी.

घटना के 3 दिन बाद मृतका पिंकी की तीनों बेटियां नाना के गांव नगला नया कुर्रा से 3-4 किलोमीटर दूर रौरा गांव की रोड पर मिलीं. उन्हें दिन के समय यतेंद्र छोड़ गया था. बच्चियों को देख कर गांववालों ने उन से पूछताछ की. इस पर सब से बड़ी लड़की आकांक्षा ने अपने नाना रामप्रकाश यादव के साथ ही गांव का नाम भी बता दिया.

पास का गांव होने के कारण गांव वाले उन के परिवार को जानते थे. गांव वालों ने तीनों बच्चियों को उन के गांव पहुंचा दिया. बच्चियों ने बताया कि पापा उन्हें कार से छोड़ कर चले गए थे.

बच्चियों के मिलने की सूचना पुलिस को भी दे दी गई. आकांक्षा ने बताया कि उस ने पापा को मम्मी को गोली मारते देखा था. हम लोग डर गए थे.

घटना के बाद आरोपी सिपाही की गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने काफी प्रयास किए, लेकिन सफलता न मिलने पर एसएसपी सचिंद्र पटेल ने इसे गंभीरता से लिया और आरोपी पर 15 हजार का इनाम घोषित कर दिया. उन्होंने थानाप्रभारी अनिल कुमार को उस की गिरफतारी के भी निर्देश दिए.

आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई. लौकडाउन में फरार चल रहे हत्यारोपी सिपाही यतेंद्र को पुलिस ने शिकोहाबाद के सुभाष तिराहे से लगभग एक माह बाद 24 मई की सुबह पौने 6 बजे तब गिरफ्तार कर लिया, जब वह कहीं जाने के लिए वाहन का इंतजार कर रहा था. सिपाही के कब्जे से 32 बोर की देशी पिस्टल भी बरामद हुई. इसी पिस्टल से उस ने अपनी पत्नी पिंकी की हत्या की थी.

पुलिस ने सिपाही यतेंद्र के खिलाफ हत्या के साथ ही 25 आर्म्स एक्ट के अंतर्गत भी मुकदमा दर्ज किया. थाने में एसपी ग्रामीण राजेश कुमार ने प्रैसवार्ता में हत्यारोपी यतेंद्र कुमार यादव उर्फ सिंटू की गिरफ्तारी की जानकारी दी.

घटना के बाद वह बच्चियों को नाना के गांव के पास छोड़ गया था. पुलिस ने उस के घर से गिरफ्तारी से 15 दिन पूर्व कार बरामद कर ली थी. विवेचना में यह बात सामने आई कि सिपाही के एक युवती से प्रेम संबंधों को ले कर पिछले डेढ़ साल से पतिपत्नी के बीच कलह शुरू हो गई थी.

यतेंद्र पत्नी पर मकान को बेचने का दबाव डालता था. 26 अप्रैल को यतेंद्र आगरा से शिकोहाबाद स्थित अपने घर आया हुआ था. पुरानी बातों को ले कर पतिपत्नी के बीच विवाद हो गया. मामला इतना बढ़ा कि यतेंद्र ने पत्नी सरोज उर्फ पिंकी के साथ मारपीट की. इस से भी जब उस का मन नहीं भरा तो उस ने साथ लाई देशी 32 बोर की पिस्टल से 4 गोलियां उस के सीने में उतार दीं.

घटना को अंजाम देने से पहले उस ने अपनी तीनों बेटियों को मकान के बाहर खड़ी कार में बैठा दिया था. बड़ी बेटी आकांक्षा अपने पिता की करतूत को पूरी तरह समझ गई थी, लेकिन पिता द्वारा धमकी देने से वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकी थी.

घटना को अंजाम देने के बाद सिपाही यतेंद्र तीनों बेटियों को ले कर फरार हो गया. गिरफ्तारी के बाद आरोपी सिपाही ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

सुंदर, सुशील पत्नी के होते हुए भी युवती से प्रेम संबंधों के चलते सिपाही यतेंद्र ने अपनी खुशहाल जिंदगी को ग्रहण लगा लिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, जुलाई, 2020

गजाला के मन में डूबा शाहिद

गांव वाले पहुंच गए, भाजपा नेता उदय प्रताप भी वहां पहुंचे. उन्होंने इस की सूचना थाना खेरागढ़ पुलिस को दे दी.

लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थानाप्रभारी अवधेश अवस्थी पुलिस टीम के मौके पर पहुंच गए. वहां पहुंच कर उन्होंने फौरेंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 28 से 30 वर्ष के बीच रही होगी. उस के गले पर किसी तेज धारदार हथियार के निशान थे. कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस की पैंट की जेब में आधार कार्ड मिला.

आधार कार्ड मृतक का ही था. उस में उस का नाम शाहिद खान लिखा था. पता कटघर ईदगाह, आगरा लिखा था. इस के अलावा कोई साक्ष्य नहीं था.

आधार कार्ड को जाब्ते में लेने के बाद थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी. फिर थाने वापस लौट आए.

पुलिस ने इस की सूचना मृतक के घरवालों को दे दी. शाहिद की हत्या की खबर मिलते ही घर में हाहाकार मच गया. घर वाले थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी अवस्थी ने उन से पूछताछ की तो पता चला मृतक शाहिद खान खुद का टैंपो चलाता था. 4 साल से वह पत्नी गजाला और 2 बच्चों के साथ रैना नगर, धनौली में किराए पर रह रहा था. उन से पूछताछ के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

थानाप्रभारी अवधेश अवस्थी मृतक के घर गए तो घर पर शाहिद की पत्नी गजाला मिली. पूछने पर उस ने बताया कि एक दिन पहले यानी 9 जुलाई की शाम शाहिद टैंपो ले कर निकला था, तब से वापस नहीं आया.

थाने लौटने के बाद थानाप्रभारी अवस्थी ने मामले पर विचार किया कि कहीं शाहिद की हत्या की वजह लूटपाट तो नहीं है, क्योंकि उस का टैंपो भी नहीं मिला था. लेकिन अगले ही पल दिमाग में आया कि हत्या लूट के लिए की गई होती तो लुटेरे लाश को इतना दूर क्यों फेंकते.

इंसपेक्टर अवस्थी ने दिमाग पर जोर दिया तो उन्हें शाहिद की पत्नी गजाला की हरकतें कुछ अटपटी लगीं. जब वह शाहिद के घर गए थे तो गजाला घबराई हुई थी. वह रो तो रही थी लेकिन उस की आंखें बराबर इधरउधर चल रही थीं. वह बराबर पुलिस की गतिविधि पर नजर रख रही थी.

थानाप्रभारी को गजाला पर शक हुआ तो उन्होंने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर था, जिस पर वह रोजाना बातें करती थी. वह नंबर रैना नगर के ही रहने वाले राहुल हुसैन का था.

इस के बाद सर्विलांस टीम की मदद ली गई. सर्विलांस टीम ने जांच की तो पता चला घटना वाले दिन 9 जुलाई की शाम को राहुल हुसैन शाहिद खान के साथ था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने 12 जुलाई को राहुल हुसैन को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के दोस्त इमरान को भी उठा लिया. दोनों से पूछताछ के बाद गजाला को उस के घर से गिरफ्तार किया गया. तीनों से जब पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया.

30 वर्षीय शाहिद खान आगरा के खेरागढ़ के कटघर ईदगाह (रकाबगंज) मोहल्ले में रहने वाले हबीब खान का बेटा था. 2 भाइयों में सब से बड़ा शाहिद अपना खुद का टैंपो चलाता था.

8 साल पहले शाहिद का निकाह रैना नगर, धनौली (मलपुरा) में रहने वाली गजाला के साथ हुआ था. शाहिद गजाला जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर बहुत खुश था. जबकि सांवले रंग के साधारण शौहर शाहिद से गजाला खुश नहीं थी.

दरअसल गजाला ने अपने मन में जिस तरह शौहर की कल्पना की थी, शाहिद वैसा नहीं था. गजाला ने सपना संजो रखा था कि उस का शौहर हैंडसम और सुंदर होगा. जबकि शाहिद उस की अपेक्षाओं के बिलकुल विपरीत था.

गजाला अपने हिसाब से उसे मौडर्न बनाने की कोशिश भी करती, शाहिद फैशनेबल कपड़े पहनता भी तो उस पर वे जंचते नहीं थे, वह रंगरूप से मात खा जाता था. गजाला मन मसोस कर रह जाती.

इसी चक्कर में वह कुंठित और चिड़चिड़ी हो गई. वह बातबात में शाहिद से झगड़ने लगती थी. उस की यह आदत सी बन गई थी.

पतिपत्नी के रोजरोज के झगड़ों से शाहिद के घरवाले परेशान रहने लगे. इस सब के चलते गजाला एक बेटा और एक बेटी की मां बन गई. 4 साल पहले शाहिद रैना नगर, धनौली में ससुराल के पास किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

शाहिद सुबह टैंपो ले कर निकल जाता तो देर रात घर लौटता था. उस के चले जाने के बाद चंचल हसीन और खूबसूरत गजाला को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उस का मन नहीं लगता तो वह बनसंवर कर घर से निकल कर ताकझांक करने लगती. चूंकि पास में ही उस का मायका था, इसलिए वह कुछ देर के लिए मायके चली जाती थी.

गजाला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की महत्त्वाकांक्षा उसे चंचल बना रही थी, मर्यादा हनन करने को उकसा रही थी.

रैना नगर में ही राहुल हुसैन रहता था. वह अपने मांबाप की एकलौती संतान था. देखने में स्मार्ट और अविवाहित. गजाला जब उस के मोहल्ले में पति के साथ रहने आई, तभी उस की नजर गजाला पर पड़ चुकी थी. उसे गजाला का रूपसौंदर्य पहली नजर में ही भा गया था.

गजाला राहुल से परिचित थी. शाहिद के घर न होने पर राहुल उसके पास पहुंचने लगा. गजाला को उस से बात करना अच्छा लगता था. चंद मुलाकातों में दोनों के बीच काफी नजदीकियां हो गईं. राहुल और गजाला में हंसीमजाक भी होने लगी. गजाला राहुल के मजाक का बिलकुल बुरा नहीं मानती थी.  राहुल बातूनी था, इसलिए वह भी उस से खूब बतियाती थी. दरअसल गजाला के दिल में राहुल के प्रति चाहत पैदा हो गई थी.

राहुल जब भी उस के रूपसौंदर्य की तारीफ करता तो गजाला के शरीर में तरंगें उठने लगती थीं. 2 बच्चों की मां बनने के बाद गजाला का गदराया यौवन और रसीला हो गया था. आंखों में मादकता छलकती थी.

एक दिन राहुल ने उस के हुस्न और जिस्म की तारीफ  की तो वह गदगद हो गई. फिर वह बुझे मन से बोली, ‘‘ऐसी खूबसूरती किस काम की, जिस पर शौहर ध्यान ही न दे.’’

राहुल को गजाला की ऐसी ही किसी कमजोर नस की ही तलाश थी. जैसे ही उस ने पति की बेरुखी का बखान किया, राहुल ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘तुम क्यों चिंता करती हो, हीरे की परख जौहरी ही करता है. आज से तुम्हारे सारे दुख मेरे हैं और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी.’’

राहुल की लच्छेदार बातों ने गजाला का मन मोह लिया. वह उस की बातों और व्यक्तित्व की पूरी तरह कायल हो गई. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मन बेकाबू होने लगा तो गजाला ने थरथराते होठों से कहा, ‘‘अब तुम जाओ. उन के आने का समय हो गया है. कल दोपहर में आना, मैं इंतजार करूंगी.’’

राहुल ने वह रात करवटें बदलते काटी. सारी रात वह गजाला के खयालों में डूबा रहा. सुबह वह देर से जागा. दोपहर तक सजसंवर कर वह गजाला के घर पहुंचा. गजाला उसी का इंतजार कर रही थी. उस ने उस दिन खुद को विशेष ढंग से सजायासंवारा था. राहुल ने पहुंचते ही गजाला को अपनी बांहों में समेट लिया, ‘‘आज तो तुम हूर लग रही हो.’’

‘‘थोड़ा सब्र से काम लो. इतनी बेसब्री ठीक नहीं होती.’’ गजाला ने मुसकरा कर कहा, ‘‘कम से कम दरवाजा तो बंद कर लो, वरना किसी आनेजाने वाले की नजर पड़ गई तो हंगामा हो जाएगा.’’

राहुल ने फौरन कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. जैसे ही उस ने अपनी बांहें फैलाईं तो गजाला उन में समा गई. राहुल के तपते होंठ गजाला के नर्म और सुर्ख अधरों पर जम गए. इस के बाद एक शादीशुदा औरत की पवित्रता, पति से वफा का वादा सब कुछ जल कर स्वाहा हो गया.

अवैध संबंधों का यह सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया. ऐसी बातें समाज की नजरों से कब तक छिपी रह सकती हैं. शाहिद की गैरमौजूदगी में राहुल का उस के कमरे पर बने रहना पड़ोसियों के मन में शक पैदा कर गया. किसी पड़ोसी ने यह बात शाहिद के कान में डाल दी. यह सुन कर उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा.

बीवी के बारे में ऐसी बात सुन कर शाहिद परेशान हो गया. उस का काम से मन उचट गया. बड़ी मुश्किल से शाम हुई तो वह घर लौट आया. गजाला को पता नहीं था कि उस के शौहर को उस की आशनाई के बारे में पता चल गया है. वह खनकती आवाज में बोली, ‘‘क्या बात है, आज बड़ी जल्दी घर लौट आए.’’

‘‘सच जानना चाहती हो तो सुनो. तुम जो राहुल के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो, मुझे सब पता चल गया है.’’ शाहिद ने बड़ी गंभीरता से कहा, ‘‘अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि मुझ से बिना कुछ छिपाए सब कुछ सचसच उगल दो. उस के बाद मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम्हारा क्या करना है.’’

गजाला शौहर की बात सुन कर अवाक रह गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक न एक दिन शाहिद को सब पता चल जाएगा. भय के मारे उस का चेहरा उतर गया. वह घबराए स्वर में कहने लगी, ‘‘जिस ने भी तुम से मेरे बारे में यह सब कहा है, वह झूठा है. लोग हम से जलते हैं, इसलिए किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं.’’

गजाला ने जान लिया था कि अब त्रियाचरित्र दिखाने में ही उस की भलाई है. वह भावुक स्वर में बोली, ‘‘मैं कल भी तुम्हारी थी और आज  भी तुम्हारी हूं. कोई दूसरा मेरा बदन छूना तो दूर मेरी ओर देखने की हिम्मत भी नहीं कर सकता.

‘‘तुम मुझ पर यकीन करो. तुम ने जो कुछ सुना है, वह सिर्फ अफवाह है. कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, वह मुझे हासिल नहीं कर सके तो हमारे बीच आग लगा कर हमारा जीना हराम करना चाहते हैं.’’

आखिरकार गजाला की बातों से शाहिद को लगा कि वह सच कह रही है. उस ने गजाला पर यकीन कर लिया. घर में कुछ दिन और शांति बनी रही. फिर एकदो लोगों ने टोका, ‘‘शाहिद, तुम दिन भर बाहर रहते हो, देर रात को लौटते हो. इस बीच गजाला किस के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है, तुम्हें क्या मालूम, अब भी समय है, चेत जाओ वरना ऐसा न हो कि किसी दिन तुम्हें पछताना पड़े.’’

शाहिद को उन की बात समझ में आ गई. वह जान गया कि धुंआ तभी उठता है, जब कहीं आग लगती है. उस ने गजाला को चेतावनी दी कि अब कभी उस ने कोई गलत काम किया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. अच्छा हुआ भी नहीं. कोई न कोई गजाला की खबर उस तक पहुंचा देता था, इस से आजिज आ कर शाहिद गजाला के साथ झगड़ा और मारपीट करने लगा.

घटना से 6 दिन पहले गजाला की बहन तनु की शादी थी. शाहिद ने शादी के बाद भी गजाला को पीटा. गजाला पति से परेशान हो चुकी थी. उस ने फोन पर रोतेरोते यह बात राहुल को बताई. वैसे भी गजाला राहुल से निकाह कर के उस के साथ रहने का मन बना चुकी थी.

राहुल भी यही चाहता था. ऐसे में राहुल ने शाहिद को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. गजाला को उस ने बताया तो उस ने भी अपनी सहमति दे दी. शाहिद की हत्या करने के लिए राहुल ने अपने दोस्त इमरान को भी शामिल कर लिया. वह उसी मोहल्ले में रहता था.

9 जुलाई, 2020 की देर शाम को राहुल ने शाहिद का टैंपो भाड़े पर बुक किया और उसे सब्जी मंडी बुलाया. वहां राहुल इमरान के साथ पहले से मौजूद था. शाहिद के वहां पहुंचने पर राहुल ने उसे कोल्ड ड्रिंक पिलाई, जिस में उस ने नशीली गोलियों का पाउडर मिला दिया था. कोल्ड ड्रिंक पी कर शाहिद

बेहोश हो गया. दोनों ने उसे टैंपो की पिछली सीट पर लिटा दिया. इमरान टैंपो चलाने लगा.

दोनों बेहोश हुए शाहिद को दूधाधारी इंटर कालेज के पास ले गए. वहां दोनों ने तेज धारदार चाकू से शाहिद का गला रेत कर उस की हत्या कर दी और उस की लाश वहीं फेंक कर फरार हो गए.

लेकिन आखिरकार कानून की गिरफ्त में आ ही गए. राहुल और इमरान की निशानदेही पर पुलिस ने आलाकत्ल चाकू और शाहिद का टैंपो भी बरामद कर लिया. इस के बाद कानूनी लिखापढ़ी कर के गजाला, राहुल और इमरान को न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया़

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, अगस्त, 2020

एक किशोर की जहरीली जवानी

कपड़े तलाशने में थोड़ा टाइम लग गया. जब वह बच्चे के कपड़े ले कर बाहर आई तो अर्नव वहां से गायब था. उस ने यह सोच कर कि कोई अर्नव को खिलाने के लिए साथ न ले गया हो, पड़ोसियों से पूछा, लेकिन बच्चे का कहीं पता नहीं लग सका.

योगेश के बेटे अर्नव के अचानक गायब हो जाने की खबर से गांव में तहलका मच गया कि इतना छोटा बच्चा कहां चला गया. इस तरह बच्चे का गायब हो जाना चिंता की बात थी. किसी अनहोनी की आशंका के चलते तय हुआ कि पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जाए.

घर वाले थाने जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि किसी ने बताया कि पास के नाले में प्लास्टिक का एक कट्टा पड़ा हुआ है. चिंतित परिवार वाले नाले के पास पहुंचे और कट्टे को बाहर निकाला. उसे देखते ही सभी सदमे में आ गए. क्योंकि कट्टे में मासूम अर्नव ही था. अर्नव को कट्टे से बाहर निकाल कर घर वाले उसे एक प्राइवेट अस्पताल ले गए. पता चला काफी समय पहले उस की मौत हो चुकी थी.

बच्चे की गरदन पर नाखून के गहरे निशान थे, जिस से अंदाजा लगाया गया कि उस की हत्या गला दबा कर की गई होगी. यह इलाका काशीपुर (उत्तराखंड) के थाना आईटीआई के अंतर्गत आता था. योगेश अपने परिवार के साथ थाने के पास रेलवे लाइन के किनारे बसी दोहरी परसा कालोनी में रहता था.

देर रात इस मामले की सूचना पुलिस को दी गई. बच्चे का अपहरण कर के उस की हत्या की सूचना पाते ही थानाप्रभारी कुलदीप सिंह, एसआई मनोज देव के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

योगेश के घर जा कर पुलिस ने इस मामले में विस्तृत जानकारी हासिल की. पुलिस ने बच्चे की लाश वाले बोरे को गौर से देखा तो उस पर विकास (परिवर्तित नाम) लिखा हुआ था. पुलिस ने विकास के बारे में पूछताछ की तो पता चला कि विकास योगेश का मौसेरा भाई है.

कालोनी के एक आदमी ने पुलिस को बताया कि करीब 5 बजे उस ने विकास को प्लास्टिक का एक कट्टा कंधे पर लाद कर ले जाते देखा था.

विकास नाबालिग था. उसे देख कर यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि अवयस्क लड़का इतना जघन्य अपराध करेगा. इस के बावजूद पुलिस ने विकास को बुला कर उस से पूछताछ की. उस ने साफ शब्दों में कह दिया कि अर्नव की हत्या के बारे में उसे कुछ नहीं मालूम. उस कट्टे को विकास के घर वाले भी पहचानते थे. उन का कहना था कि वे उस कट्टे में आटा पिसवाते थे. कट्टा शायद हवा के झोंके में मकान की छत से उड़ गया होगा.

इस मामले में योगेश के मौसेरे भाई का नाम सामने आते ही पुलिस ने उस के बारे में जानकारी जुटाई. इस मामले में कोई बेगुनाह न फंसे, सोच कर पुलिस ने इस अपराध की तह तक जाने के लिए डौग स्क्वायड और फोरैंसिक एक्सपर्ट को भी मौके पर बुला लिया.

डौग स्क्वायड देर रात तक बच्चे की मौत की जांच में जुटी रही. लेकिन कोई सफलता नहीं मिली. पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले. लेकिन उन से भी कोई अहम जानकारी नहीं मिल सकी.

अंतत: पुलिस ने अपना पूरा ध्यान किशोर विकास की ओर लगा दिया. पुलिस ने विकास को हिरासत में लेने के लिए उस के घर दबिश दी तो वह घर से फरार मिला. इस से पुलिस को उस पर पूरा शक हो गया. विकास इतना चालाक था कि डौग स्क्वायड के आने से पहले ही गायब हो गया था. थानाप्रभारी ने उस के घर पर निगरानी के लिए एक सिपाही को लगा दिया.

इसी दौरान पुलिस को एक अहम जानकारी मिली कि बच्चे को ढूंढते समय विकास भी साथ था. योगेश के घर वालों की उस नाले में पड़े कट्टे पर पहले भी नजर गई थी. लेकिन उसे चैक करने के लिए विकास ही नाले में उतरा था.

उस ने कट्टा देखते ही खाली होने की बात कह कर उधर से सब का ध्यान हटा दिया था. जिस के बाद योगेश और गांव वाले वहां से हट कर दूसरी ओर चले गए थे.

बाद में गांव के ही एक आदमी ने जब बताया कि नाले में जो कट्टा पड़ा है, उस में जरूर कुछ न कुछ है. तब शक दूर करने के लिए योगेश के घर वाले दोबारा वहां पर गए. फिर नाले से कट्टा निकाल कर देखा तो उस में बच्चे का शव था.

इसी दौरान थानाप्रभारी को जानकारी मिली कि विकास घर आया हुआ है. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विकास के घर पहुंच गए और विकास को हिरासत में ले लिया. पुलिस हिरासत में आते ही विकास के चेहरे की रंगत उड़ गई.

उस से वहीं पर कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने स्वीकार कर लिया कि अर्नव की हत्या उसी ने की थी. 17 वर्षीय विकास ने स्वीकार किया कि आरती भाभी से उस के संबंध हैं. जिस की वजह से उसे अर्नव की हत्या करनी पड़ी.

विकास की बात सुन कर पुलिस भी हैरत में पड़ गई. 17 वर्षीय लड़के के प्रेम संबंध भाभी से होने वाली बात लोगों के गले नहीं उतर रही थी. सच्चाई जानने के लिए पुलिस ने आरती से पूछताछ की तो वह मूक बनी रही.

बाद में घर वालों ने उस से हकीकत जाननी चाही तो उस ने बताया कि विकास उस के पीछे पड़ा हुआ था. उस ने उसे कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आता था. विकास ने अर्नव को क्यों मारा, उसे कोई जानकारी नहीं थी.

विकास से पूछताछ के दौरान यह तो साबित हो गया था कि योगेश की बीवी का भले ही विकास के साथ प्रेम प्रसंग चल रहा था, लेकिन उसे मारने में आरती का कोई हाथ नहीं था.

देवरभाभी के प्यार के इस खेल में देवर ने एक मासूम को मौत की नींद सुला दिया था. आखिर उस डेढ़ वर्षीय बच्चे से उस की क्या दुश्मनी थी, जिसे रास्ते से हटाने के लिए उसे इतना बड़ा अपराध करना पड़ा. देवरभाभी की प्रेम दास्तान भी कुछ विचित्र थी.

ठाकुरद्वारा के खबरिया गांव निवासी निहाल सिंह का परिवार सन 1995 में रोजगार की तलाश में काशीपुर आया था. काशीपुर में निहाल सिंह को रामनगर रोड स्थित एक फैक्ट्री में नौकरी मिल गई थी. रामनगर रोड स्थित हिम्मतपुर में निहाल सिंह ने किराए का मकान ले लिया और वहीं रहने लगा.

उसी दौरान निहाल सिंह को आईजीएल फैक्ट्री में काम मिल गया तो वह वहां से नौकरी छोड़ कर अपने परिवार के साथ आईजीएल फैक्ट्री के पास किराए के मकान में रहने लगा. बाद में निहाल सिंह ने वहीं पर दोहरी परसा कालोनी में अपना मकान बना लिया था.

निहाल सिंह के 2 बेटे थे, बड़ा लोकेश और उस से छोटा योगेश. उस के दोनों बेटों ने उसी के साथ फैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया था. दोनों बेटे कमाने लगे तो उस ने दोनों की शादी कर दी थी.

सन 2017 में निहाल सिंह के छोटे बेटे योगेश की शादी टंडोला मंझरा की आरती के साथ हुई थी. आरती सुंदर थी, जबकि उस के मुकाबले योगेश का रंग कुछ दबा हुआ था.योगेश नौकरी करता था. उस ने आरती के खर्चों में किसी भी तरह की परेशानी नहीं आने दी थी.

डेढ़ साल पहले आरती अर्नव की मां बनी. घर में बच्चे के आते ही उस के परिवार की खुशियां दोगुनी हो गई थीं.

योगेश के घर के पास ही उस के मौसा का घर था. उस के मौसा अनूप सिंह भी काफी समय पहले ठाकुरद्वारा के निकटवर्ती गांव जैतपुर से आ कर यहां बस गए थे. गांव की कुछ जमीन बेच कर कर अनूप सिंह ने भी उसी कालोनी में अपना मकान बना लिया था.

अनूप सिंह भी उसी फैक्ट्री में काम करता था, जिस में योगेश काम करता था. उस के परिवार में पत्नी तारावती, 2 बच्चे बेटी नीलम और बेटा विकास, कुल मिला कर 4 सदस्य थे. विकास उस का एकलौता बेटा था.

विकास का पढ़ाई में मन नहीं लगता था, जिस से वह हाईस्कूल में फेल हो गया. बाद में उस ने ओपन से हाईस्कूल की तैयारी करनी शुरू कर दी थी. उस का रेगुलर स्कूल जाना बंद हुआ तो वह इधरउधर आवारागर्दी करने लगा.

घर पर रहते घर वाले उसे पढ़ाई करने को कहते तो विकास निगाह बचा कर योगेश के घर चला जाता था. योगेश की ड्यूटी का टाइम फिक्स नहीं था. कभी उस की ड्यूटी दिन में लग जाती तो कभी रात में. विकास को इस से कुछ ज्यादा फर्क नहीं पड़ता था. चूंकि योगेश उस की मौसी का लड़का था, इसलिए वह योगेश के सामने भी उस के घर पर पड़ा रहता था.

दिन में योगेश के ड्यूटी जाने के बाद घर पर केवल उस की पत्नी आरती ही रह जाती थी, जो विकास का टाइम पास करने के लिए बढि़या जरिया बन गई थी. आरती विकास से कुछ ज्यादा ही घुलमिल गई थी. विकास उस से जो भी पूछता, वह हंस कर जबाव देती थी. कुछ ही दिनों में उस की हंसती छवि विकास के दिल पर गहरा घाव कर गई.

विकास भले ही अभी बच्चा था, लेकिन इंटरनेट से उस ने वह सब पहले ही जान लिया था, जो उसे जवानी में जानना चाहिए था. उसी एकांत का लाभ उठा कर वह अपनी भाभी को भी इंटरनेट पर परोसी जा रही अश्लीलता के दर्शन करा देता था. जिस से दोनों एकदूसरे से इतने खुल गए थे कि विकास आरती के साथ कोई भी शरारत करता तो वह उसे हंस कर टाल देती. लेकिन शरारत के बाद वह उसे अजीब सी नजरों से देखती.

आरती की इन्हीं अदाओं पर वह मर मिटा था. वह भाभी के इस तरह से देखने का मतलब भी समझने लगा था.

इंसान की जुबान भी अजीब ही चीज है. कड़वे शब्द भी उसी से निकलते हैं और मीठे भी. अंतर दोनों में केवल इतना होता है कि कड़वे शब्द किसी के दिल में तीर की तरह चुभते हैं, तो मीठे शब्द किसी के दिल को खुश कर देते हैं. यही आरती के साथ भी हुआ. योगेश अपने काम में  व्यस्त रहता था कि उस की बीवी कभी भी उस से खुश नहीं रहती थी. जबकि आवारा की तरह घर पर पड़ा विकास उस के दिल को भाने लगा था.

आरती की आंखों में अपने प्रति चाहत देख कर विकास अकेलेपन का लाभ उठाने की सोचने लगा. इस मामले में आरती भी पीछे नहीं थी. दोनों एकदूसरे से खूब प्यारीप्यारी बातें करते. लेकिन एक दिन ऐसा भी आया कि दोनों ने रिश्ते की मर्यादाओं को लांघ कर अवैध संबंध बना लिए.

अब योगेश की अनुपस्थिति में दोनों आए दिन अपनी शारीरिक भूख मिटाने लगे थे. विकास का हर वक्त योगेश के घर पर पड़े रहना योगेश को बुरा जरूर लगने लगा था. लेकिन बच्चा समझ कर उसने उस पर शक नहीं किया था.

योगेश का भ्रम तब टूटा जब एक दिन सच्चाई उस के सामने आई. दोनों के संबंधों का कच्चा चिट्ठा दोनों के घर वालों के सामने आ गया.

योगेश अपनी बीवी को प्यार करने के साथ उस की हर ख्वाहिश पूरी करता था. लेकिन उस की बीवी और उस के भाई ने उस के साथ जितना बड़ा विश्वासघात किया था, उस ने योगेश को बुरी तरह तोड़ दिया. उस ने आरती को खूब खरीखोटी सुनाई और उस की पिटाई भी की. उस के बाद दोनों के परिवार वालों के बीच मनमुटाव हो गया.

विकास ने उस दिन के बाद आरती के पास आनाजाना भी बंद कर दिया. उस के परिवार वालों ने भी उसे काफी मारापीटा और फिर कभी भी ऐसी हरकत न करने की नसीहत दी.

कुछ ही दिनों में योगेश का परिवार आरती और विकास की हरकतों को भुला बैठा था. आरती और विकास के दिलों में जो प्यार का अधपका ज्वालामुखी फट चुका था, उसे रोकना संभव नहीं था. आरती फिर से मौका पाते ही विकास से मोबाइल पर बात करने लगी.

वह एकांत का लाभ उठाने के लिए विकास को बुला लेती और उस के साथ अपनी हसरतों का खेल खेल कर उसे घर से निकाल देती. कई बार अर्नव उन के संबंधों में अड़चनें पैदा करने लगा था.

बच्चा तो आखिर बच्चा ही होता है. न उस के खानेपीने का कोई निश्चित समय होता है और न सोनेजागने का. विकास को अर्नव का डिस्टर्ब करना जरा भी पसंद नहीं था.

विकास ने कई बार आरती से घर से भाग चलने को कहा. लेकिन आरती जानती थी कि न तो उस के पास नौकरी है और न ही पैसा. ऐसे में उस के साथ भाग कर क्या खाएगी और क्या बेटे को खिलाएगी. यह बात उस ने विकास को समझाई भी.

लेकिन विकास नादान था. उसे केवल आरती के शरीर से खेलने की सनक थी, जिस के लिए उस के मन में आरती और अपने बीच से अर्नव को हटाने की जुनून सवार हो गया.

जब विकास का धैर्य टूट गया तो उस ने उस के बच्चे को ही रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. बच्चे को मौत की नींद सुलाने की योजना बना कर उस ने 2 दिन पहले घर से एक प्लास्टिक का कट्टा ले कर रेलवे लाइन के किनारे स्थित दोमंजिले खंडहर में छिपा दिया था, ताकि वह अर्नव की हत्या कर उस कट्टे में डाल कर उसे कहीं दूर फेंक सके. वह मौके की तलाश में रहने लगा.

15 जुलाई, 2020 को उसे मौका मिल गया. अर्नव विकास को अच्छी तरह पहचानता था. उस दिन अर्नव की मां आरती जब उसे छोड़ कर घर के अंदर गई तो विकास बड़ी फुरती से वहां पहुंचा और अर्नव को चौकलेट खाने को दी. उस के बाद वह उसे उसे गोद में उठा कर रेलवे लाइन के किनारे स्थित खंडहर में ले गया. जहां पर जाते ही उस ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी.

अर्नव को मौत की नींद सुलाने के बाद उस ने उस की लाश कट्टे में डाल कर पास के नाले में फेंक दी. बाद में जब गांव में अर्नव के गायब होने की बात चली तो वह भी उसे ढूंढने में सब के साथ लगा रहा, ताकि कोई उस पर शक न कर सके.

विकास से पूछताछ के बाद पुलिस ने मासूम अर्नव के हत्यारोपी विकास को भादंवि की धारा 301/201/264 के अंतर्गत मामला दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

केस का खुलासा होने के बाद योगेश और उस के घर वालों को आरती के प्रति इस कदर नफरत पैदा हो गई कि उन्होंने उसे उसी समय उस के मायके वालों के साथ भेज दिया. उन का कहना था कि जो औरत अपनी औलाद की न हुई, वह दूसरों की क्या होगी. बच्चे की हत्या में संलिप्तता न पाई जाने पर पुलिस ने उसे पूछताछ के बाद छोड़ दिया था.

—कथा परिजनों व पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, अगस्त, 2020

पुत्रवती होने का नुस्खा : छोटा भाई बना हत्यारा

35 वर्षीय शिवकुमार सिंह उत्तर प्रदेश के जिला सुलतानपुर के गांव लखनेपुर का निवासी था. उस के पिता उदयभान सिंह खेतीबाड़ी का काम करते थे. शिवकुमार के 3 भाई थे. एक बड़ा राजकुमार और 2 छोटे नरेश और देवकुमार. राजकुमार का विवाह हो चुका था, वह पिता के साथ खेती के काम में हाथ बंटाता था. शिवकुमार का विवाह करीब 12 साल पहले उमा से हुआ था. बाद में वह 2 बेटियों की मां बनी.

उमा जब पहली बार गर्भवती हुई, तब उस की चाह बेटे की थी. यह चाहत दूसरी बार भी बनी रही. दोनों बार उमा को निराश होना पड़ा.

शिवकुमार को पता था कि बेटा न होने से उमा दुखी है. वह उसे समझाता भी था, लेकिन वह बेटा न होने के गम में घुलती रहती है. यह अलग बात है कि कई मायनों में बेटियां बेटों से लाख गुना बेहतर होती हैं.

उमा के जी में तो आग लगी रहती कि सब के बेटे हुए, पर उसे नहीं हुआ. उस में ऐसी कौन सी कमी है, जो बेटी पर बेटी हो गई.

बच्चों के बड़े होने पर खर्च तो बढ़ा, लेकिन आमदनी उस हिसाब से नहीं बढ़ी. शिवकुमार बाहर जा कर काम करने की सोचने लगा. उस के गांव के कुछ लोग फरीदाबाद में काम करते थे. शिवकुमार ने उन से बात की तो दोस्तों ने काम पर लगवाने का वादा कर उसे फरीदाबाद बुला लिया. शिवकुमार पत्नी और बच्चों को छोड़ कर फरीदाबाद चला गया.

फरीदाबाद में एक फैक्ट्री में उस की नौकरी लग गई. वहां काम पर लगने के कुछ दिन बाद ही उस ने किराए पर कमरा ले लिया. रहने का सही ठिकाना हुआ तो वह गांव आ कर पत्नी उमा और दोनों बेटियों को अपने साथ फरीदाबाद ले गया. इस तरह उस की गृहस्थी की गाड़ी ठीकठाक चलने लगी.

शिवकुमार का छोटा भाई देवकुमार गांव में बेरोजगार घूमता था. उस ने कुछ दिनों बाद देवकुमार को भी फरीदाबाद बुला लिया. उस ने उसे भी काम पर लगवा दिया. दोनों भाई अच्छा कमाने लगे.

उमा के लिए फरीदाबाद अजनबी शहर था. वह दिन भर कमरे में ही रहती थी और कमरे में 2 ही इंसान थे, जिन से वह बात कर सकती थी, एक पति और दूसरा देवर.

पति से तो उमा सीमित बात करती लेकिन देवर देवकुमार से खूब गपशप करती थी. देवकुमार उमा से आयु में छोटा था और अविवाहित भी. वैसे भी देवरभाभी का रिश्ता होने के कारण उन में खूब पटती थी.

पहले तो उमा के प्रति देवकुमार की नीयत में खोट नहीं थी. लेकिन जब से उमा ने उस के सामने बेटा न होने का राग अलापना शुरू किया, तब से देवकुमार की नीयत डोलने लगी. भाभी की इसी कमजोरी का लाभ उठा कर देवर देवकुमार अपना उल्लू सीधा करने की सोचने लगा.

एक दिन काम से वापस आ कर देवकुमार जब उमा के पास बैठा तो उमा ने फिर अपने दुखड़े का पुलिंदा खोल दिया, ‘‘पता नहीं, मैं ने ऐसा कौन सा अपराध किया था, जिस का दंड बेटियों के तौर पर मुझे मिल रहा है.’’

देवकुमार को अपना उल्लू सीधा करने की दिशा मिल गई, ‘‘भाभी, बेटा और बेटी तो समान होते हैं, फिर तुम्हें बेटियों से चिढ़ क्यों है.’’

‘‘मुझे बेटियों से चिढ़ नहीं, अपने नसीब से शिकायत है.’’ उमा बोली, ‘‘2 बेटियों में से एक भी बेटा हो गया होता तो आज मेरे कलेजे में आग न लगी होती. कम से कम बुढ़ापे का सहारा और चिता में आग देने वाला भी तो कोई होना चाहिए. बेटा न होने से हमारे बाद तुम्हारे भैया का वंश ही खत्म हो जाएगा.’’

‘‘भाभी, विश्वास रखो,’’ देवकुमार ने आकाश की ओर उंगली उठाई, ‘‘नीली छतरी वाले के घर देर है, अंधेर नहीं. भाभी, लगातार 2 बेटियां होने से तुम खुद को दोषी क्यों मानती हो,’’ देवकुमार ने स्वार्थ की बिसात पर शातिर चाल चली, ‘‘तुम्हारी यह इच्छा जरूरी पूरी होगी.’’

उमा ने उस की आंखों में देखा, ‘‘यह तुम किस आधार पर कह रहे हो?’’

‘‘इसलिए कि शायद तुम्हें पता नहीं कि बेटा हो या बेटी, उस के लिए जिम्मेदार मां नहीं पिता होता है.’’

उमा ने चौंक कर उस की ओर देखा,‘‘मैं समझी नहीं, खुल कर बोलो.’’

‘‘भाभी जमीन को जोत कर उस में जिस पौधे का बीज डाला जाए, वही पौधा उगता है.’’ देवकुमार ने कायदे से समझाया, ‘‘अगर बीज खराब हो तो वह अंकुरित नहीं होता, मिट्टी में ही पड़ा रह कर सड़ जाता है.’’

‘‘हां, सड़ जाता है.’’

‘‘और बीज कमजोर होता है, तो उस से निकला पौधा भी कमजोर होता है न.’’

‘‘हां, होता है.’’

‘‘बस बेटियां होने की भी यही वजह है.’’ देवकुमार ने उमा को अपने शब्दों में समझा कर उस की दुखती रग पर उंगली रखी, ‘‘शिवकुमार भैया अंदर से कमजोर हैं. दरजन भर बच्चे पैदा कर लो, लड़की ही होगी. और तुम लड़के के लिए तरसती रहोगी.’’

उमा गहरी सोच में डूब गई. देवकुमार ने उस की भावनाओं पर एक और चोट की, ‘‘मेरी बात का विश्वास न हो तो किसी पढ़े लिखे समझदार व्यक्ति से पूछ लो.’’

उमा की सोच और गहरी हो गई. उमा को इसी भंवर में फंसा छोड़ कर देवकुमार सोने चला गया. मन ही मन खुश होते हुए वह सोच रहा था कि तीर सही निशाने पर लगा है, असर जरूर देखने को मिलेगा. देवकुमार का सोचना सही था. उस की बात ने उमा के दिल पर गहरा असर किया था.

उमा कुछ देर बाद सोच के भंवर से निकली और उस ने तय किया कि वह पता करेगी कि क्या वास्तव में संतान के लिंग धारण का जिम्मेदार पिता होता है.

अगले ही दिन बीमारी का बहाना बना कर उमा एक लेडी डाक्टर के यहां गई. उस ने डाक्टर से पूछा तो उस ने कहा कि संतान के लिंग निर्धारण का उत्तरदायी पिता होता है. डाक्टर ने उमा को एक्सवाई की थ्योरी भी समझा दी.

लेडी डाक्टर के जवाब से उमा के मन पर छाया अपराधबोध छंट गया. अब पति से उसे चिढ़ हो गई. वह सोचने लगी कि जरूर उसे पता होगा कि वह बेटा पैदा करने लायक नहीं. इसीलिए लड़कियों की हिमायत करता है.

उस दिन जब देवकुमार वापस आया तो उमा बोली, ‘‘तुम ने बता कर बहुत अच्छा किया, हकीकत बता कर मेरी आंखें खोल दीं.’’

‘‘भाभी, यह तो अच्छी बात है.’’

‘‘और अच्छी बात तब होगी, जब तुम यह बताओ कि तुम्हारे भैया का इलाज कहां कराऊं, जिस से हमारे आंगन में भी बेटा खेलेकूदे.’’

देवकुमार समझ रहा था कि भाभी बेटा पैदा करने के लिए उतावली है और उस के लिए किसी भी सीमा तक जा सकती है. अत: उस ने जाल फैलाया, ‘‘भाभी, भैया का इलाज तो संभव नहीं है, लेकिन तुम जरूर पुत्रवती हो सकती हो.’’

‘‘वो कैसे?’’ उमा की आंखों में उम्मीद की किरण दिखने लगी.

‘‘तुम्हें किसी दूसरे से नियोग करना होगा.’’ वह बोला.

‘‘नियोग में क्या करना होगा?’’ उमा ने पूछा.

‘‘तुम्हें पराए मर्द के साथ मिलन करना होगा.’’ देवकुमार ने बताया.

‘‘क्या बकवास कर रहे हो’’ उमा आंखें दिखाने लगी, ‘‘ऐसी बात कहते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए. तुम्हारे भैया ने सुना तो न जाने क्या कर डालेंगे.’’

‘‘तो फिर बेटियों से ही संतोष करो.’’

उमा कई दिन तक सोचती रही. उस ने अपनी इच्छा दबाने का भी प्रयास किया, परंतु नाकाम रही. किसी भी दशा में वह बेटे को जन्म देना चाहती थी. बहुत सोचने के बाद वह पतित होने को तैयार हो गई.

दूसरे दिन उस ने देवकुमार को अपना निर्णय सुना दिया, ‘‘ मैं तुम्हारी सलाह पर अमल करने को तैयार हूं. सवाल यह है कि यह काम होगा कैसे?’’

‘‘भाभी, काम भी हो जाएगा और किसी को भनक तक नहीं लगेगी.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘मैं हूं न, मेरी नसों में भी वही खून है, जो भैया के शरीर में है. खून वही रहेगा, पर शरीर बदल जाएगा. इस तरह भैया की नस्ल भी खराब नहीं होगी.’’

‘‘सोच कर बताऊंगी.’’

उमा ने काफी सोचा. फिर फैसला किया कि उसे हर हाल में बेटा चाहिए, इस के लिए वह देवकुमार से नियोग करेगी. अगले दिन उमा ने देवकुमार को नियोग करने की सहमति दे दी.

देवकुमार बेताब था तो उमा शर्म से गड़ी जा रही थी. देवकुमार ने उसे बांहों में ले कर प्यार करना शुरू किया तो उस की शर्म जाती रही. फिर वे वासना के सागर में गोते लगाने लगे. देवकुमार के नए जोश और उमा के अनुभव ने ऐसा कमाल दिखाया कि इस पहले मिलन से वे एकदूसरे के दीवाने हो गए.

कई महीने बीतने के बाद उमा को देवकुमार से गर्भ नहीं ठहरा, पर अवैध संबंध का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा. उमा तन से देवकुमार की हुई तो उसे मन से भी उस की होते देर नहीं लगी.

कोरोना महामारी के चलते देश में लौकडाउन हुआ तो 24 मई, 2020 को शिवकुमार पत्नी, बच्चों और देवकुमार के साथ फरीदाबाद से गांव वापस आ गया. फरीदाबाद में तो शिवकुमार के न रहने पर दोनों खूब मस्ती करते थे. लेकिन गांव आने पर शिवकुमार के साथसाथ घर के और लोग भी थे. उन सब की नजरों  से बच कर मिलना आसान नहीं था लेकिन दोनों किसी तरह मिल कर मिलन का आनंद ले लेते थे.

14 जुलाई, 2020 की सुबह शिवकुमार की लाश घर से 200 मीटर दूर भीटे में पड़ी मिली. सुबह गांव की महिलाएं उधर गईं तो देखा, तब उन्होंने इस की जानकारी घरवालों को दी. घरवाले वहां पहुंच कर रोनेबिलखने लगे. गांव के ही शुभम सिंह नाम के व्यक्ति ने पुलिस को घटना की सूचना दी.

सूचना पा कर एसओ मनबोध तिवारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक शिवकुमार की लाश का उन्होंने निरीक्षण किया. उस के सिर पर किसी तेज धारदार हथियार के गहरे निशान थे. आसपास का निरीक्षण करने पर घटना से संबंधित कोई सुराग हाथ नहीं लगा.

पूछताछ के दौरान परिजन कुछ भी बताने से हिचक रहे थे. घटना की सूचना देना तो दूर वह लाश का अंतिम संस्कार करने की तैयारी कर रहे थे. इस पर एसओ को शक हो गया कि मृतक के घर वाले जानते हैं कि किस ने उन के बेटे की हत्या की है.

लेकिन हत्यारा भी कोई अपना करीबी होने के कारण मुंह नहीं खोल रहे हैं. फिलहाल एसओ मनबोध तिवारी ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

पुलिस ने शिवकुमार के पिता उदयभान सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

एसओ मनबोध तिवारी ने घटना के संबंध में गांव वालों से पूछताछ की तो पता चला कि घटना वाले दिन शाम को शिवकुमार का अपने भाई देवकुमार से झगड़ा हुआ था. इस से पहले भी दोनों भाइयों का एकदो बार झगड़ा हो चुका था. देवकुमार घर से फरार भी था. इसलिए एसओ तिवारी का शक देवकुमार पर पुख्ता हो गया.

17 जुलाई, 2020 को उन्होंने मुखबिर की सूचना पर धनपतगंज से देवकुमार को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म  स्वीकार कर लिया.

घटना से 3 दिन पहले शिवकुमार ने उमा और देवकुमार को आपत्तिजनक हालत में देख लिया था. जिस के बाद शिवकुमार ने दोनों को मारापीटा. इस के बाद शिवकुमार का देवकुमार से कई बार झगड़ा हुआ.

13 जुलाई को घटना वाली रात भी दोनों में उमा को ले कर झगड़ा हुआ. उसी रात शिवकुमार का अचानक पेट खराब हो गया. उसे दस्त हो गए. वह भीटे (गांव के बाहर स्थित टीले) की तरफ गया. पहले से जाग रहे देवकुमार ने उसे जाते देखा तो उसे भाई को सबक सिखाने का अच्छा मौका मिल गया. उस ने घर में रखी कुल्हाड़ी उठा ली और उस के पीछेपीछे हो लिया.

भीटे में पहुंचते ही देवकुमार ने पीछे से शिवकुमार के सिर पर कुल्हाड़ी से कई वार किए. शिवकुमार जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. चंद पलों में ही उस की मौत हो गई. भाई को मारने के बाद देवकुमार घर से फरार हो गया.

लेकिन उस का गुनाह छिप न सका और वह पकड़ा गया. देवकुमार की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी भी बरामद हो गई. आवश्यक कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद देवकुमार को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

सौजन्य: सत्यकथा, अगस्त, 2020

वो नहीं मानी : गलतियों ने दी शीला को सजा

छत्तीसगढ़ का औद्योगिक नगर कोरबा एशिया के नक्शे में अपनी कोयला खदानों, सार्वजनिक क्षेत्र के एल्युमिनियम कारखाने, एनटीपीसी के विद्युत प्लांट के कारण अहम स्थान रखता है. 30 वर्षीय खूबसूरत शीला अपने दूसरे पति दिनेश कंवर और बच्चे के साथ कोरबा के उपनगर कटघोरा में किराए के मकान में रहती थी.

15 नवंबर, 2019 की शाम शीला के मोबाइल पर पति दिनेश कंवर की काल आई. दिनेश ने घबराए स्वर में कहा, ‘‘शीला, तुम कहां हो? बहुत बुरी खबर है.’’

पति की बात सुन कर शीला घबरा गई. वह बोली, ‘‘मैं कटघोरा बसस्टैंड पर हूं. क्या हो गया, जो इतना घबराए हुए हो?’’

‘‘शीला, तुम कहीं मत जाना, मैं आ रहा हूं. नरेश चाचा के लड़के का एक्सीडेंट हो गया है. हमें उन के यहां जाना है.’’ दिनेश ने कहा.

पति की बातें सुन कर शीला कंवर चिंतित हो उठी. वह घर से कोरबा जाने के लिए निकली थी, मगर पति की बातें सुन उस ने अपना इरादा बदल दिया. उस समय शीला के साथ उस की फ्रैंड धनश्री और मीना भी थीं. उस ने दोनों को बताया कि अचानक घर में जरूरी काम आ गया है, इसलिए वह कोरबा नहीं जा पाएगी. वे दोनों चली जाएं.

इस पर धनश्री ने तुनक कर कहा, ‘‘ये क्या बात हुई, छोटी सी बात पर तुम कोरबा जाने का प्रोग्राम कैंसिल कर रही हो. इस से तो पूरा खेल बिगड़ जाएगा.’’

‘‘अरे यार, तुम जानती नहीं हो. दिनेश आजकल छोटीछोटी बातों पर उखड़ जाता है. बातबात में मुझ पर शक करता है. अगर मैं घर नहीं गई तो वह फिर झगड़ा करेगा.’’ शीला ने दोनों फ्रैंड्स को समझाते हुए कहा. इस पर धनश्री बोली, ‘‘अरे यार,  ज्यादा भाव खा रहा है तो छोड़ दे इसे भी.’’

‘‘नहीं यार, वह जैसा भी है मुझे बहुत चाहता है. कमाता कम है मगर दिल से प्यार करता है. ऐसा पति मिलना मुश्किल है. पहले वाला तो मेरी सुनता भी नहीं था, मगर यह सुनता तो है.’’ शीला ने कहा.

‘‘क्या सुनता है?’’

‘‘मेरी हर बात सुनता है. मैं ही उस की नहीं सुनती. तुझे पता है, अपने हाथ और सीने पर उस ने मेरे नाम का टैटू भी बनवाया है. अब तू ही सोच, क्या ऐसा प्यार करने वाला पति फिर मिलेगा? हां, थोड़ा कड़क है, वो चाहता है कि मैं उस के हिसाब से चलूं, घर पर रहूं, कहीं आऊंजाऊं नहीं, मगर…’’

‘‘तू तो पूरी पागल हो गई है.’’ धनश्री ने हंस कर ठिठोली की.

‘‘औरत को हर कदम पर पति की जरूरत होती है. बाप न हो तो बच्चों पर भी गलत असर पड़ता है. हर बात माननी जरूरी नहीं, मगर कुछ तो मानना ही पड़ता है. इसलिए आज तुम लोग जाओ, हम कल मिलते हैं.’’ कह कर शीला ने मीना और धनश्री को कटघोरा बसस्टैंड पर छोड़ कर घर की ओर रुख किया.

शीला कटघोरा के स्टेट बैंक के पास किराए के मकान में रहती थी. उस का दूसरे पति दिनेश कंवर से 3 साल का बेटा अमन था. जब शीला घर पहुंची तो शाम के 5 बज रहे थे. थोड़ी देर बाद घबराया हुआ दिनेश वहां पहुंचा.

दिनेश और शीला ने 4 साल पहले विवाह किया था. शीला अपने पूर्व पति महेश महंत को छोड़ चुकी थी. महेश से उस का 10 साल पहले विवाह हुआ था. वह कटघोरा में कपड़े की दुकान में काम करता था.

लगभग 7 साल तक दोनों की गृहस्थी जैसेतैसे चली और अंतत: शीला ने सामाजिक रूप से महेश महंत से तलाक ले लिया और उस से अलग रहने लगी.

इसी बीच उस की मुलाकात 30 साल के दिनेश कंवर से हुई. दिनेश कटघोरा से बिलासपुर, रायपुर ट्रक चलाता था. वह कोयला खदान में ड्राइवर था. जो भी कमाता, वह सब शीला पर लुटा देता था. दिनेश के दिलफेंक अंदाज के कारण शीला ने उस के साथ मंदिर में शादी कर ली और उस के साथ रहने लगी.

दिनेश घर पहुंचा तो उस ने बाहर से ही आवाज दी, ‘‘शीला कहां हो?’’

पति का तेज स्वर सुन कर शीला घर से बाहर आई तो देखा सामने पति दिनेश और उस का हमउम्र चाचा नरेश खड़े थे.

दिनेश ने कहा, ‘‘चलो, चलते हैं. देखो, चाचा भी आए हैं. बांगो के आगे राजू का एक्सीडेंट हो गया है. जाने के लिए मैं ने बोलेरो मंगाई है.’’

शीला पति की बात सुन गंभीर हो गई. बच्चे को पड़ोसी की देखरेख में छोड़ वह दिनेश के भाई सोनू और चाचा नरेश के साथ बोलेरो में बैठ गई.

बोलेरो संतोष यादव चला रहा था. गाड़ी आगे बढ़ी तो बांगो का घना जंगल शुरू हो गया. करीब 30 किलोमीटर आगे बालागांव के निकट एक जगह दिनेश ने संतोष से कह कर बोलेरो रुकवाई. तभी दिनेश ने बहाने से शीला को भी बोलेरो से उतार लिया.

शीला बाहर आई तो दिनेश कंवर का बोलने का लहजा बदल गया. वह शीला पर चीखा, ‘‘तुम ने मेरे साथ धोखा किया है. मेरी गैरमौजूदगी में तुम अय्याशी करती हो. मुझे तुम्हारी पलपल की खबर मिल जाती है.’’ वह शीला को गालियां देने लगा.

अचानक माहौल बदला देख शीला घबराई. दिनेश कह रहा था, ‘‘कल दोपहर तुम प्रकाश के साथ थी. बोलो, सच है कि नहीं. मैं…मैं तुम से कितना प्यार करता हूं और तुम बेवफा निकली…’’

यह सुन शीला के चेहरे का रंग फीका पड़ गया, क्योंकि उस की चोरी पकड़ी गई थी.

‘‘मैं आज तुझे बेवफाई की सजा दूंगा.’’ कहते हुए वह बोलेरो में रखी लोहे की रौड उठा लाया और उस के सिर पर 2-3 वार कर दिए. शीला वहीं गिर गई. थोड़ी देर तड़प कर उस की मृत्यु हो गई. पास खड़े चाचा नरेश कोरची और सोनू ने मृत पड़ी शीला को उठाया और बोलेरो में डाला और खुद भी बैठ गए. बोलेरो चालक संतोष यादव यह सब देख रहा था. दिनेश ने उसे पैसों का लालच दे कर साथ मिला लिया था.

गाड़ी में शीला की लाश रख कर ये लोग आगे बढ़े. शीला की लाश को ठिकाने लगाना जरूरी थी. चाचा नरेश ने दिनेश से कहा, ‘‘इस को कहीं दफन कर देते हैं. ऐसे लाश फेंक देंगे तो जरूर पकड़े जाएंगे. मैं ने कहीं सुना है कि लाश दफन करने से चंद दिनों में मिट्टी में मिल जाती है. हम ने इसे दफन कर दिया तो किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’

दिनेश को चाचा की राय अच्छी लगी. उस ने कहा, ‘‘चाचा, एक काम और करते हैं. इस के कपड़े वगैरह भी उतार देते हैं क्योंकि कपड़ों से लाश की शिनाख्त हो सकती है.’’

‘‘ठीक है.’’ चाचा नरेश ने स्वीकृति दी.

कुछ दूर गाड़ी चलने के बाद सलिहाभाटा गांव का बुड़बुड़ नाला आया. वहां पहुंच कर संतोष ने गाड़ी रोक दी तो दिनेश, चाचा नरेश और नाबालिग सोनू ने लाश ठिकाने लगाने की जुगत लगानी शुरू की. उन्होंने नाले में उतर कर एक गड्ढा खोदा ताकि लाश को उस में दफन किया जा सके.

थोड़ी मशक्कत के बाद गड्ढा खुद गया तो शीला की लाश उस गड्ढे में डाल, ऊपर से मिट्टी भर दी. फिर चारों कटघोरा के लिए निकल गए.

19 नवंबर, 2019 को सलिहाभाटा का एक किसान बैजू बुड़बुड़ नाले के पास अपने मवेशी चरा रहा था.

उस की नजर नाले की तरफ गई तो उसे एक इंसान का हाथ दिखाई दिया. बैजू चौंका, उस ने पास जा कर देखा तो उस के होश उड़ गए. वह सचमुच किसी इंसान का ही हाथ था. आसपास दुर्गंध फैली हुई थी.

बैजू भागता हुआ गांव के कोटवार (चौकीदार) लालू के पास पहुंचा और यह जानकारी उसे दी. लालू गांव के कुछ लोगों के साथ घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां बुरी तरह बदबू फैली हुई थी, लाश आधी बाहर थी, आधी मिट्टी में दबी हुई थी. कोटवार घटना की जानकारी देने के लिए बांगो थाने के लिए रवाना हो गया.

बांगो थाना कटघोरा से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर है. थाना कोरबा-अंबिकापुर फोरलेन पर सड़क के एक किनारे है. यहां छत्तीसगढ़ का बहुउद्देशीय हसदेव बांगो बांध है, जो पर्यटन के लिहाज से जाना जाता है.

बांगो थाने के टीआई एस.एस. पटेल थाने में ही थे. चौकीदार लालू ने उन्हें नाले के किनारे लाश दबी होने की सूचना दी.

चौकीदार लालू की बात सुन टीआई एस.एस. पटेल पुलिस टीम ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. जब वह सलिहाभाटा स्थित बुड़बुड़ नाले के पास पहुंचे तो वहां लोगों का हुजूम लगा हुआ था. टीआई पटेल ने मामले की गंभीरता को समझते हुए एसडीपीओ संदीप मित्तल को पूरी जानकारी दी. वह भी वहां पहुंच गए.

जब मिट्टी हटवाई गई तो गड्ढे में एक महिला की नग्न लाश निकली. वहां से कुछ दूरी पर झाडि़यों में महिला के कपड़े और चप्पल पड़ी थीं. अंदाजा लगाया गया कि कपड़े और चप्पल मृतका के होंगे. सबूत एकत्र करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

मौके पर ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से महिला की लाश की शिनाख्त हो पाती. केवल उस के एक हाथ पर ‘ॐ’ गुदा हुआ था. एसडीपीओ संदीप मित्तल ने इस ब्लाइंड मर्डर को खोलने की जिम्मेदारी टीआई एस.एस. पटेल को दी.

पटेल के सामने कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी थीं. पुलिस ने आसपास के गांवों के लोगों को बुला कर शिनाख्त कराने की कोशिश की. पुलिस ने शव के चेहरे का फोटो ले कर पोस्टर और पैंफ्लेट छपवाए और आसपास के ग्रामीण बाजारों में बंटवाए. पुलिस जांच में यह तथ्य भी सामने आया कि जिस तरह से हत्या कर के शव दफन किया गया था, उस से जाहिर था मृतका की हत्या कहीं और की गई थी और शव वहां दफनाया गया था.

21 नवंबर को दोपहर में एक महिला बांगो थाने पहुंची. टीआई एस.एस. पटेल से मिल कर उस ने उन्हें पैंफ्लेट देते हुए कहा कि इस में जिस महिला की हत्या की बात कही गई है, वह उस की फ्रैंड शीला कंवर हो सकती है. एस.एस. पटेल ने महिला का नाम पूछा तो उस ने अपना नाम धनश्री बताते हुए कहा कि वह शीला की फ्रैंड है. कुछ दिनों से शीला दिखाई नहीं दे रही है.

पुलिस ने धनश्री को शीला के अन्य फोटोग्राफ्स और कपड़े दिखाए तो उस की आंखों में आंसू छलक आए. क्योंकि वह शीला के ही थे. एक जगह हाथ में ॐ भी लिखा था, जिसे उस ने पहचाना और कपड़ों की भी शिनाख्त कर दी. उस ने बताया, ‘‘सर, 15 नवंबर को हम साथ थे. तब शीला यही कपड़े पहने थी.’’

धनश्री ने टीआई को अपने मोबाइल में वही कपड़े पहने शीला का फोटो दिखाया.

टीआई को लगा कि अब उन के हाथ जो सिरा आ गया है, उस के सहारे वह आसानी से शीला कंवर के हत्यारों तक पहुंच जाएंगे. धनश्री से बातचीत कर के टीआई ने शीला के घर वालों की जानकारी ले ली और पता ले कर जांच प्रारंभ कर दी. पटेल ने धनश्री से शीला के पति का मोबाइल नंबर भी ले लिया था.

उन्होंने शीला के पति दिनेश कंवर का नंबर मिलाया तो वह स्विच्ड औफ था. पुलिस को सब से पहले उसी से पूछताछ करनी थी. दिनेश का फोन नहीं मिला तो शीला के मातापिता को फोन कर के कोरबा जिले के दीपका टाउन बुलाया. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस जब शीला की लाश उन के सुपुर्द करने लगे तो उस के पिता मोहन महंत ने हाथ खड़े कर के कहा, ‘‘साहब, शीला तो हमारे लिए बहुत पहले ही मर चुकी थी.’’

उस ने बताया कि 5 साल पहले शीला ने दिनेश कंवर से प्रेम विवाह कर लिया था. उस के बाद से उन का उस से संबंध विच्छेद हो गया था और सामाजिक परंपरा के कारण वह शीला का अंतिम संस्कार नहीं कर सकते.

पुलिस ने शीला का अंतिम संस्कार अपने खर्चे पर कराया. अंतिम संस्कार के बाद पुलिस दिनेश कंवर की तलाश में जुट गई. पुलिस की क्राइम टीम ने जांच में पाया कि उसका मोबाइल बीचबीच में औन हो रहा था और लगातार उस की लोकेशन बदल रही थी.

ऐसी स्थिति में पुलिस की यह शंका बलवती होती गई कि शीला की हत्या में उस के पति का हाथ हो सकता है. जांच में यह तथ्य भी सामने आ चुका था कि दिनेश कंवर और शीला में अकसर विवाद होता था. शीला तीखे नाकनक्श की सुंदर महिला थी, जिसे कोई भी एक नजर देख फिदा हो जाता.

इसी के चलते उस के कदम बहक गए थे. वह महंगे शौक पाले हुए थी. पुलिस की जांच में यह तथ्य भी सामने आ गया कि उस की दोस्ती कई पुरुषों से थी.

दरअसल, कोरबा का इंडस्ट्रियल एरिया होने की वजह से वहां तमाम ऐसे लोग रहते थे, जिन्हें महिलाओं की जरूरत होती थी. शीला और उस की फ्रैंड्स उन्हीं लोगों के पास जाती थीं.

क्राइम टीम ने आखिरकार 23 नवंबर, 2019 को कोरबा जिले के चोटिया के पास से दिनेश को हिरासत में ले लिया. उसे थाने ला कर टीआई एस.एस. पटेल व एसडीपीओ संदीप मित्तल ने शीला की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने पुलिस को पूरा घटनाक्रम बता दिया.

उस के इकबालिया बयान के अनुसार शीला और दिनेश की मुलाकात लगभग 5 साल पहले हुई थी और वह उसे देखते ही पसंद करने लगा था. धीरेधीरे दोनों के संबंध बने और उन्होंने विवाह कर लिया.

कुछ समय सुखमय बीता, मगर धीरेधीरे शीला का सच उस के सामने आने लगा. उसे उस के कई परिचित बताने लगे कि शीला को तो आज एक पुरुष के साथ देखा था. यह बारबार जानसुन कर वह गुस्से से भर उठता और प्रयास करता कि शीला सिर्फ उस की हो कर रहे. मगर उस की सारी कोशिश बेकार साबित हुईं.

एक साल बाद शीला ने एक बेटे अमन को जन्म दिया. मगर इस के बाद भी शीला नहीं सुधरी. उस का अन्य पुरुषों से मेलजोल बना रहा. घटना के एक दिन पहले दिनेश के एक मित्र ने उसे बताया कि शीला को एक पुरुष के साथ कोरबा में देखा था. उस ने व्यंगपूर्ण शब्दों में कहा, ‘‘यार, तू अपनी बीवी को संभाल नहीं पाता, कैसा मर्द है तू?’’

यह बात दिनेश को चुभ गई. उस ने उसी समय से शीला की हत्या करने की योजना बनानी शुरू कर दी. दिनेश ने अपने हमउम्र चाचा नरेश से मदद मांगी तो वह तैयार हो गया. जब दोनों शीला की हत्या की योजना बना रहे थे, उन की बातें सुन दिनेश का छोटा भाई सोनू भी उस में शामिल हो गया. वह भी अपनी भाभी शीला के चरित्रहीन होने से खुद को अपमानित महसूस किया करता था.

अंतत: योजना बनी कि 15 नवंबर को शीला को जंगल में ले जा कर उस का काम तमाम कर दिया जाए. उसी योजना के अनुसार दिनेश ने बोलेरो किराए पर ले ली. चालक संतोष यादव, जो दिनेश का दोस्त भी था, का सहयोग ले कर उन्होंने शीला की हत्या कर के सलिहाभाटा के बुड़बुड़ नाले में दफन कर दिया.

पुलिस ने दिनेश कंवर के बयान के आधार पर उस के चाचा नरेश, भाई आकाश उर्फ सोनू और बोलेरो चालक संतोष यादव को गिरफ्तार कर लिया. उन के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज हुआ.

पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें कटघोरा जेल भेज दिया गया. जबकि आकाश उर्फ सोनू को बाल सुधार गृह भेजा गया.

—कथा में आकाश नाम परिवर्तित है

सौजन्यसत्यकथा, जून 2020