UP News : जिंदा बेटी के कत्‍ल के इल्‍जाम में पिता महीनों रहा जेल में बंद

UP News : बेटी कमलेश के गायब होने के बाद सुरेश ने नामजद रिपोर्ट लिखाई. लेकिन पुलिस ने डंडे के बल पर सुरेश, उस के बेटे व रिश्तेदार को औनर किलिंग के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. फिर 17 महीने बाद कमलेश अपने प्रेमी के साथ जीवित मिली तो…

चंद्रवती के पति और बेटे को जेल गए लगभग 7 महीने बीत चुके थे. लेकिन उसे अभी भी न्याय मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी. उन दोनों की जमानत होने की सब से बड़ी अड़चन थी देश में लौकडाउन का लगना. इस लौकडाउन के चलते उस के घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई थी. कोर्ट में कुछ इमरजेंसी केसों की औनलाइन सुनवाई चालू हुई तो चंद्रवती ने अपने वकील से मिल कर पति सुरेश सिंह और बेटे रूपकिशोर की जमानत की अरजी लगवा दी. पति और बेटे को जेल से छुड़ाने के लिए चंद्रवती ने जुतासे की अपनी ढाई बीघा जमीन भी बेच दी. लेकिन उस के बाद भी उस के हाथ खाली के खाली रहे.

चंद्रवती ने जैसेतैसे 6 अगस्त, 2020 को 5 हजार रुपयों का बंदोबस्त किया और वह पैसे अपने बेटे राहुल को देते हुए वकील साहब के खाते में डालने को कहा, जिस से पति और बेटे की जमानत की प्रक्रिया आगे बढ़ सके. राहुल बाइक ले कर हसनपुर स्थित बैंक चला गया. उस समय न तो उस के पास बाइक के कागज थे और न ही ज्यादा पैट्रोल. अपना काम पूरा करने के बाद उस ने घर का रुख किया तो रास्ते में एक जगह पुलिस वाहनों की चैकिंग करती मिली. चैकिंग के डर से राहुल ने अपना रास्ता बदला. वह गांव रहरा से पौरारा गांव की ओर चल पड़ा. लेकिन परेशानी ने उस का वहां भी पीछा नहीं छोड़ा.

पौरारा गांव पहुंचते ही उस की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया. बाइक साइड में लगा कर राहुल सोचने लगा कि अब क्या करे. उसी दौरान उस की नजर सामने के घर से निकलती एक युवती पर पड़ी तो उस का माथा झनझना उठा. पलभर के लिए उसे लगा कि कहीं सपना तो नहीं देख रहा. एकबारगी आंखों पर यकीन नहीं हुआ तो उस ने आंखें मल कर फिर देखा. लेकिन उस ने जो देखा था, उस पर वह उस का मन विश्वास करने को तैयार नहीं था. उस के दिमाग से बाइक का पैट्रोल खत्म होने की बात पूरी तरह निकल गई थी. उस ने घर पर फोन मिला कर मां को वह बात बताई तो चंद्रवती ने राहुल को समझाया,

‘‘बेटा, पागल हो गया है क्या. जिस की हत्या के आरोप में तेरा बाप और भाई जेल काट रहे हैं, तू उस के जिंदा होने की बात कह रहा है.’’

राहुल किसी भी कीमत पर अपनी आंखों देखी बात झुठलाने को तैयार नहीं था. फिर भी उस ने जैसेतैसे पौरारा गांव में किसी से पैट्रोल लिया और घर लौट आया. जब वह घर पहुंचा, तो उस के घर वाले उसी बात की चर्चा कर रहे थे. राहुल ने घर वालों को अपनी बहन कमलेश, जो मर चुकी थी, के जिंदा होने की बात बताई तो घर वालों को सहजता से यकीन नहीं हुआ. उसी शाम राहुल ने यह बात घर के सभी सदस्यों और गांव वालों के सामने रखी. राहुल की बात की सच्चाई जानने के लिए गांव वालों ने अगली सुबह पौरारा गांव जाने की योजना बना ली. 7 अगस्त, 2020 को राहुल गांव वालों के साथ गांव पौरारा जा पहुंचा. जिस घर में राहुल ने युवती को देखा था, उस घर में पहुंच कर सब ने जो देखा, उसे देख सब की आंखें फटी रह गईं.

घर के आंगन में कमलेश अपने नवजात शिशु को खिला रही थी. उस के पास ही एक चारपाई और पड़ी थी, जिस पर एक युवक बैठा उन दोनों को देख रहा था. घर में अचानक आए दरजनों लोगों को देख कर दोनों सहम गए. पलभर को उन की समझ में कुछ नहीं आया. लेकिन जैसे ही कमलेश की नजर मां और भाई पर पड़ी तो उसे सब कुछ समझ आ गया. बेटी की हकीकत जानने के बाद मांबेटा दोनों आदमपुर थाने पहुंच गए. चंद्रवती ने पुलिस को बताया कि जिस बेटी की हत्या के आरोप में उस का पति और बेटा जेल की सजा काट रहे हैं, वह जिंदा है. लेकिन पुलिस ने उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया. इस के बाद चंद्रवती ने सीओ सत्येंद्र सिंह को इस बात से अवगत कराया, जिन के आदेश के तुरंत बाद थाना पुलिस हरकत में आई. आननफानन में पुलिस गांव पौरारा पहुंच गई.

जिस वक्त पुलिस राहुल के बताए घर पर पहुंची, उस वक्त कमलेश और उस का प्रेमी घर पर मौजूद थे. कमलेश के जिंदा होने की खबर क्षेत्र में फैल गई थी. लेकिन कमलेश को देख कर पुलिस को जैसे सांप सूंघ गया था. कमलेश के जिंदा होने की खबर पा कर मलकपुर के सैकड़ों ग्रामीण पहले ही पौरारा पहुंच गए थे. कमलेश को ले कर काफी हंगामा हुआ. कमलेश की हकीकत आई सामने अपने घर पर हंगामा होते देख कमलेश का प्रेमी राकेश अपने मोबाइल से लोगों की रिकौर्डिंग करने लगा तो उत्तेजित भीड़ ने उस का मोबाइल छीन लिया. उस के बाद कमलेश की मां ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू की तो कमलेश अपने पति राकेश के बचाव में सामने आ खड़ी हुई.

उस का साफ कहना था कि राकेश उस का पति है. उस ने उस के साथ प्रेम विवाह किया है. अगर किसी ने भी उस के ऊपर हाथ उठाने की कोशिश की तो उस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. राकेश के घर पर भीड़ को बेकाबू होते देख पुलिस दोनों को अपने साथ थाने ले आई. जहां पर पुलिस ने दोनों से विस्तार से पूछताछ की. पुलिस पूछताछ में कमलेश के गायब होने की जो गाथा खुल कर सामने आई, उस से खुद पुलिस ही अपराधी के कटघरे में आ खड़ी हुई. उत्तर प्रदेश के जिला अमरोहा का एक थाना है आदमपुर. इस थाना क्षेत्र का का एक गांव है मलकपुर. सुरेश सिंह का 11 सदस्यों का परिवार इसी गांव में रहता था. सुरेश के पास गांव में जुतासे की जमीन थी, जिस के सहारे उस के परिवार की जीविका चलती थी. बेटे बड़े हुए तो सुरेश का सहारा बन गए. वे खेती के अलावा दूसरा कामधंधा कर के पैसा कमाने लगे.

कमलेश सुरेश के बच्चों में चौथे नंबर की बेटी थी. वह अभी नाबालिग थी. सुरेश सिंह को उस की शादी की अभी कोई चिंता भी नहीं थी. सुरेश सिंह के परिवार में सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि 6 फरवरी, 2019 को खेतों से चारा लेने गई कमलेश वापस नहीं लौटी. उस के गायब होने से पूरा गांव सन्न सा रह गया. उस के घर वालों ने गांव वालों के सहयोग से उसे हरसंभव जगह पर खोजा, लेकिन उस का कोई पता नहीं चल सका. जब सुरेश के घर वाले कमलेश की तलाश करतेकरते थक गए तो उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई. रिपोर्ट में सुरेश ने अपने एक रिश्तेदार की संलिप्तता का शक जाहिर किया था. कमलेश के गायब होने से 15 दिन पूर्व कमलेश की चचेरी बहन भी अचानक गायब हो गई थी, जिस के गायब होने में 2 लोगों के नाम सामने आए थे.

ये दोनों लोग सुरेश के दूर के रिश्तेदार थे. लेकिन पुलिस ने उन दोनों पर कोई काररवाई नहीं की थी. इसी आधार पर सुरेश को कमलेश के लापता होने में उन्हीं का हाथ होने की शंका थी. फरवरी, 2019 को सुरेश सिंह के बेटे रूपकिशोर की ओर से थाना बछरायूं, सुल्तानपुर निवासी होमराम, हरफूल, खेमवती, जयपाल और सुरेंद्र के खिलाफ कमलेश के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी. एक युवती के अपहरण की नामजद रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस ने त्वरित काररवाई कर के इस मामले में होमराम व हरफूल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

इस मामले की विवेचना स्वयं आदमपुर थानाप्रभारी अशोक कुमार शर्मा कर रहे थे. उसी विवेचना के दौरान पुलिस को पता चला कि सुरेश का अपने भाइयों के साथ जुतासे की जमीन को ले कर विवाद चल रहा था. जिस का फैसला होने में भाई का दामाद होमराम और हरफूल व उन के रिश्तेदार फैसला नहीं होने दे रहे थे. इसी रंजिश के चलते सुरेश ने दोनों को अपनी लड़की के अपहरण के आरोप में जेल भिजवा दिया था. यह जानकारी मिलते ही पुलिस ने इस मामले की फिर से तफ्तीश शुरू की. जांच अधिकारी अशोक कुमार ने इस केस को नया मोड़ देते हुए 28 दिसंबर, 2019 को दूसरे पक्ष के लोगों के दबाव में आ कर सुरेश व उस के बेटे रूपकिशोर और उस के एक रिश्तेदार देवेंद्र को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. तीनों से गहनता के साथ पूछताछ की गई.

सुरेश पहले ही अपनी बेटी के गायब होने से परेशान था, पुलिस की उलटी काररवाई देख उस का मनोबल पूरी तरह से टूट गया. पुलिस ने सुरेश और उस के बेटे के साथ उस के एक रिश्तेदार को इतना टौर्चर किया कि सुरेश का मानसिक संतुलन ऐसा गड़बड़ाया कि उस ने स्वयं को बेटी का हत्यारा मान लिया. पुलिस की काररवाई ने सुरेश व उस के घर वालों को ऐसा दर्द दिया कि उन की रातों की नींद ही उड़ गई थी. पहले से ही अपनी बेटी के खो जाने का गम मन में पाले सुरेश सिंह की बीवी ने अपने पति और बेटे पर बेटी की मौत का कलंक लगने से क्षुब्ध थी और खानापीना त्याग दिया था.

आखिर पुलिस ने बना दिया रस्सी का सांप पुलिस की बेरहमी के सामने दुखी और कुंठित सुरेश ने आत्मसमर्पण तो कर दिया, लेकिन पुलिस ने उस के कबूलनामे में जो बात पत्रकारों को बताई, वह निराधार थी. पुलिस विवेचना के अनुसार सुरेश ने अपनी बेटी की हत्या का जुर्म कबूलते हुए बताया था कि उस की लड़की गलत संगत में पड़ गई थी, उस के चालचलन से बदनामी हो रही थी. काफी समझाने की कोशिश की गई, लेकिन उस ने उस की एक नहीं मानी. उसी से तंग आ कर उस ने अपने बेटे रूपकिशोर और रिश्तेदार देवेंद्र के साथ मिल कर कमलेश की गोली मार कर हत्या कर दी. इस के बाद तीनों ने उस की लाश बोरे में भर कर गंगा नदी में फेंक दी थी.

कमलेश को मौत के घाट उतारने के बाद तीनों अपने घर चले आए. उस के बाद उन्होंने इस केस में अपने भाई रोहताश के दामाद होमराम और उस के परिजनों को फंसाने के लिए षडयंत्र रचा. फिर होमराम और उस के घर वालों सहित 5 लोगों के खिलाफ अपनी बेटी के अपहरण का झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया था, ताकि उन के जेल चले जाने के बाद विवाद वाली भूमि उन्हें मिल जाए. पुलिस ने आरोपी पिता सुरेश की निशानदेही पर उसी के घर के संदूक से कमलेश की हत्या में इस्तेमाल तमंचा, कारतूस और जंगल में छिपाए गए कमलेश के कपड़े बरामद कर लिए. इस केस का खुलासा स्वयं अमरोहा एसपी डा. विपिन ताड़ा व एएसपी ने किया था. 29 दिसंबर, 2019 को पुलिस ने सुरेश सिंह व उस के बेटे रूपकिशोर व टेलर देवेंद्र को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया था.

पुलिस ने इस मामले की तहकीकात में लगी पुलिस टीम में शामिल एसएसआई विनोद कुमार त्यागी, एसआई राकेश कुमार, आरिफ मोहम्मद, कांस्टेबल कृष्णवीर सिंह, दीपक कुमार, अनिरुद्ध, महिला कांस्टेबल अपेक्षा तोमर और निधि सिंह की भी इस केस को खोलने में सराहना की थी. सुरेश सिंह के जेल जाने से पूरे परिवार पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा. गांव वालों की नजरों में सुरेश और उस का परिवार बेटी का कातिल बन गया था. गांव के लोग उस के परिवार वालों से मिलते हुए भी कतराने लगे थे. लेकिन उस के घर वालों को उम्मीद थी कि जिस तरह का इलजाम सुरेश सिंह पर लगाया गया है वह निराधार  है.

घर वाले जेल में सुरेश से मिलने जाते. उस से हकीकत पूछते तो उस का साफ कहना होता था कि वह इतना पागल नहीं कि अपनी ही बेटी को मौत की नींद सुला सके. सुरेश हर बार यही सफाई देता कि पुलिस ने होमराम और उस के परिवार वालों से मिल कर उसे साजिशन फंसाया है. यह बात जब गांव वालों के सामने आई तो गांव वाले भी उस की जमानत कराने की कोशिश करने लगे. इसी दौरान घर वालों ने जेल में बंद पिता और बेटे की जमानत के लिए 2 बार आवेदन किया. लेकिन पुलिस के पक्के दावे के कारण दोनों बार आवेदन खारिज हो गया. इस पर घर वालों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की शरण लेते हुए बेटी का शव बरामद नहीं होने को आधार बना कर जमानत पत्र दाखिल किया. लेकिन लौकडाउन के चलते सब कुछ खटाई में पड़ गया.

सुरेश के वकील ने हर तारीख पर तीनों को झूठे मुकदमे में फंसाने की वकालत की, लेकिन पुलिस की ओर से इस मामले को औनर किलिंग का मामला दिखा कर केस को काफी मजबूती से पेश किया गया था, जिस के चलते उन की जमानत में अड़चनें आ रही थीं. समय गुजरता गया. सुरेश जेल की सलाखों में पड़ा अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाता रहा. एक बार उस की जमानत की उम्मीद जागी तो देश में लौकडाउन लग गया. देश की सभी अदालतों के दरवाजे बंद हुए तो सुरेश सिंह की दिक्कतें और भी बढ़ गईं. इस मामले को हुए पूरे 17 महीने गुजर गए.

अपनी बेटी को खो चुके सुरेश के परिवार वाले उस की जमानत के लिए तारीखों पर पैसे खर्च कर रहे थे. 2 महीने पहले सुरेश के एक मिलने वाले ने उस की बीवी चंद्रवती को बताया कि उस ने बिलकुल उस की बेटी की तरह एक लड़की को देखा है. लेकिन किसी ने भी उस की बात पर गहराई से नहीं सोचा. जबकि चंद्रवती अपनी बेटी जैसी युवती दिखने वाली बात सुन कर परेशान हो उठी. चंद्रवती को पूरा विश्वास था कि उस की बेटी जिंदा है और एक न एक दिन घर वापस जरूर आएगी. यही सोच कर चंद्रवती ने अपनी बेटी के जिंदा होने की बात कहते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर उसे बरामद कराने की मांग की थी. लेकिन लौकडाउन के चलते उस के प्रार्थना पर कोई सुनवाई न हो सकी.

कमलेश को जीवित देख कर पुलिस रह गई भौचक मामला खुलने पर जब पुलिस को पता चला कि जिस कमलेश की हत्या के आरोप में वह उस के पिता और भाई को 7 महीने पहले जेल भेज चुकी है, वह जिंदा मिल गई है तो पुलिस के होश फाख्ता हो गए. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एसपी डा. विपिन ताड़ा, सीओ धनौरा और इंसपेक्टर पंकज वर्मा ने किशोरी व राकेश से विस्तृत जानकारी हासिल की. इस मामले में पुलिस का फरजीवाड़ा उजागर होते ही लोगों का गुस्सा भड़क उठा. देखते ही देखते थाने पर ग्रामीणों की भीड़ जमा हो गई. उस के बाद भीड़ ने खूब हंगामा किया. थाने पर लोगों की भीड़ जुटने की सूचना पाते ही शासनप्रशासन हिल गया.

सूचना पाते ही एसपी डा. विपिन ताड़ा थाने पहुंचे और वहां पर इकट्ठा भीड़ को भरोसा दिया कि इस मामले में फिर से निष्पक्ष जांच कर के दोषी पाए जाने वाले पुलिसकर्मियों को उचित दंड दिया जाएगा. इस के तुरंत बाद उन्होंने थानाप्रभारी अशोक कुमार शर्मा को निलंबित कर दिया. पुलिस ने कमलेश और राकेश से कड़ी पूछताछ की. पुलिस पूछताछ में राकेश और उस की प्रेमिका कमलेश के द्वारा जो जानकारी मिली वह इस प्रकार थी. मलकपुर गांव से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित था राकेश का गांव पौरारा. राकेश सैनी शादियों में खाना बनाने का काम करता था. उसी काम के सिलसिले में उसे आसपास के गांवों में जाना पड़ता था.

सुरेश ने अपनी बेटी राधा और बेटे राहुल की शादी में खाना बनवाने के लिए राकेश को ही बुलाया था. उसी दौरान राकेश को खाना बनाने के लिए किसी सामान की जरूरत होती तो घर के सदस्यों के व्यस्त होने की वजह से कमलेश ही सामान ला कर देती थी. इसी के चलते कमलेश उस के दिल को भा गई थी. उस की नजर हर वक्त उसी की राह ताकती रहती थी. हालांकि कमलेश नाबालिग थी. लेकिन उसे दूसरों की नजरें पढ़ने का भी ज्ञान था. वह समझ गई कि राकेश उस से क्या चाहता है. धीरेधीरे दोनों के दिलों में एकदूसरे के प्रति प्यार अंकुरित हुआ. राकेश ने कमलेश को अपने दिल की रानी बनाने का निर्णय ले लिया.

कमलेश ने राकेश का मोबाइल नंबर ले लिया और उस के जाने के बाद जब कभी उस की याद सताती तो वह परिवार वालों से नजर बचा कर उस से बात करने लगी थी. राकेश भी उस के गांव आ कर कमलेख से खेतों पर मिलने लगा. राकेश के साथ हो गई फरार इस प्रेम कहानी के चलते दोनों को फिर से रूबरू होने का मौका मिल जाता. राकेश और कमलेश के बीच काफी समय से प्रेम प्रसंग चला आ रहा था, लेकिन उस के परिवार वालों को इस की भनक तक नहीं थी. इसी प्रेम प्रसंग के चलते ही दोनों ने एक साथ जीनेमरने की कसम ली और जिंदगी के सफर पर आगे बढ़ने के लिए घर से भागने का फैसला भी कर लिया.

6 फरवरी, 2019 को वादे के मुताबिक दोनों अपनेअपने घरों से निकले. राकेश को कहीं भी जाने से रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. कमलेश ने उस दिन घर वालों से खेतों पर जाने की बात कही और निकल पड़ी गंगा किनारे की ओर. राकेश पहले से ही गंगा पुल पर खड़ा मिल गया. राकेश पक्का खिलाड़ी था. उस ने घाटघाट का पानी पी रखा था. कमलेश को साथ ले कर वह सीधा दिल्ली पहुंचा. वहां उस ने दोस्त की मदद से दिल्ली में एक किराए का कमरा लिया और वहीं रह कर काम करने लगा. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद दोनों गाजियाबाद में आ कर रहने लगे थे. वहीं पर दोनों ने लव मैरिज कर ली. लव मैरिज कर के दोनों घर वालों की चिंता से मुक्त हो गए. राकेश के साथ शादी करने के बाद कमलेश ऐसी मस्त हुई कि उस ने एक बार भी अपने परिवार वालों की खैरखबर तक जानने की कोशिश नहीं की.

गाजियाबाद में शादी कर के राकेश कमलेश को साथ ले कर मुरादाबाद आ कर रहने लगा था. मुरादाबाद में उस का काम ठीकठाक चलने लगा था. इसी दौरान कमलेश एक बेटे की मां बनी. मुरादाबाद आ कर राकेश की आर्थिक स्थिति ठीकठाक हो गई थी. लेकिन इसी दौरान मार्च में लौकडाउन लग गया, जिस के बाद शहर में काम के लाले पड़ने लगे थे. ऐसे में राकेश को कमलेश के साथ अपने गांव पौरारा लौट पड़ा. तब से दोनों गांव में रह रहे थे. इसी दौरान राहुल को घर के बाहर कमलेश दिखाई दी. जिस के बाद उस की पोल खुल गई थी. षडयंत्रकारी आदमपुर पुलिस की झूठी स्क्रिप्ट ने सुरेश और उस के परिवार वालों को जो दर्द दिया, उस की भरपाई कभी नहीं हो सकती.

लेकिन सुरेश के परिवार को इस बात की खुशी थी कि उस पर लगने वाला बेटी के कत्ल का कलंक गया था. उन्हें गम भी नहीं था कि उन की बेटी ने घर से भाग कर उन के चेहरे पर कालिख पोती थी. उन्हें सब से ज्यादा दुख पुलिस की षडयंत्रकारी दरिंदगी का था. पुलिस ने सुरेश सिंह, उस के बेटे रूपकिशोर व रिश्तेदार को असहनीय यातनाएं दे कर मुलजिम बना कर जेल में डाल दिया था. इस केस के खुलते ही इस केस की तफ्तीश कर रहे पंकज वर्मा ने कमलेश के सीआरपीसी की धारा 164 के तहत न्यायालय में बयान दर्ज कराए. कोर्ट ने कमलेश को मुरादाबाद स्थित बाल कल्याण समिति के पास भेज दिया. समिति के सदस्य मसरूर सिद्दीकी और जहीरुल इसलाम ने कमलेश की काउंसलिंग की.

समिति ने कमलेश के सामने नारी निकेतन या फिर अपने मातापिता के पास जाने के विकल्प रखे. कमलेश ने अपने पति राकेश के साथ जाने की इच्छा जताई. उस की मां चंद्रवती ने उस से अनुरोध किया कि वह उस के साथ घर चले. कोई भी उसे कुछ नहीं कहेगा लेकिन कमलेश अपनी जिद पर अड़ी रही. इसलिए समिति ने उसे 6 महीने के लिए नारी निकेतन भेज दिया ताकि वह सोच कर अपने लिए सही फैसला कर सके.  दूसरी ओर आदमपुर पुलिस ने बेगुनाही में जेल में बंद उस के पिता सुरेश सिंह, भाई रूपकिशोर और रिश्तेदार देवेंद्र की रिहाई के लिए कोर्ट में प्रार्थनापत्र दे दिया. कानूनी प्रक्रियाओं के बाद तीनों को रिहा कर दिया गया.

 

Bihar Crime : 3 लाख की सुपारी देकर कराई पति की हत्या

Bihar Crime : शोभा सरकारी कर्मचारी पंकज कुमार गुप्ता की पत्नी थी, खुशहाल जिंदगी जी रही थी. इस के बावजूद 2 बच्चों की मां शोभा अपनी उम्र से 7 साल छोटे सन्नी से प्यार कर बैठी. इस के बाद जो हुआ, उस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.

बात 8 जुलाई, 2020 की है. सुबह के साढे़ 7 बज गए थे. पंकज गुप्ता स्टील की 2 लीटर वाली डोलची हाथ में लटकाए दूध लेने शहरी बाजार समिति की ओर जा रहा था. वह रोजाना दूध लेने इसी समय पर जाया करता था. ऐसा नहीं था कि मोहल्ले में कोई दूधिया दूध देने नहीं आता था, लेकिन पंकज को आशंका थी कि दूधिए दूध में मिलावट करते हैं, इसलिए वह उन से दूध नहीं लेता था. दूसरे इसी बहाने उस की मार्निंग वाक भी हो जाती थी. इसलिए वह सुबहसुबह दूध लेने पैदल ही निकल जाता था. पंकज बिजली विभाग में नौकरी करता था. पंकज जैसे ही शहरी समिति के गेट के सामने पहुंचा, पीछे से तेजी से एक अपाचे मोटरसाइकिल उस के बगल से हो कर गुजरी.

बाइक पर 2 युवक सवार थे. बगल से बाइक गुजरने पर विकास हड़बड़ा गया और गिरतेगिरते बचा. ससंभल कर बुदबुदाते हुए वह आगे बढ़ा. वह थोड़ी दूर ही बढ़ा होगा कि वही बाइक मुड़ कर फिर उसी की ओर आई. बाइक को आता देख पंकज यह सोच कर रुक गया कि शायद बाइक सवार युवकों की नीयत ठीक नहीं है. उन के निकल जाने के बाद ही आगे बढ़ेगा. पंकज सोच रहा था कि बाइक निकले तो आगे बढ़े, लेकिन बाइक उस के पास आ कर रुक गई. इस से पहले कि पंकज कुछ समझ पाता, बाइक पर पीछे बैठे युवक ने निशाना साध कर 2 गोलियां उस के सिर में उतार दीं और मौके से फरार हो गए.

गोली लगते ही पंकज धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा. चूंकि सुबह का वक्त था, लोग अभी अपनेअपने घरों में ही थे. गोली की आवाज सुन कर पासपड़ोस के लोग जमा हो गए. उन्होंने जमीन पर खून से लथपथ पड़े पंकज को पहचान लिया. पंकज पटना शहर के मोहल्ले अगवानपुर में रहता था. घटनास्थल से उस का घर थोड़ी दूर पर था. भीड़ में से किसी ने वारदात की सूचना बाढ़ थाने को दे दी और पंकज के घर पर भी खबर भिजवा दी. घटना की सूचना मिलते ही उस के घर में कोहराम मच गया. पत्नी शोभा और दोनों मासूम बेटियां चीखचीख कर रोने लगी. शोभा जिस हाल में थी, मासूमों को साथ लिए उसी हाल में घटनास्थल की ओर दौड़ी.

मौके पर पहुंची तो देखा पति पंकज हाथ में बाल्टी लिए चित अवस्था में लहूलुहान पड़ा है. पुलिस के खिलाफ पति की लाश से लिपट कर रोने लगी. मां को रोते देख कर बच्चे भी बिलखबिलख कर रो रहे थे. बच्चों को रोते देख वहां खड़े लोगों का दिल पसीजने लगा. उसी समय बाढ़ थाने के थानाप्रभारी संजीत कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. पुलिस को देख कर स्थानीय लोग जाने के बजाए वहीं डटे रहे. उन में पुलिस के खिलाफ भारी आक्रोश था. दरअसल, उसी इलाके में कुछ दिनों पहले भी 2 हत्याएं हो चुकी थीं. दोनों घटनाओं के हत्यारे अभी भी फरार थे. अब तीसरी हत्या बिजलीकर्मी पंकज की हो गई थी.

इस हत्या से स्थानीय नागरिकों में पुलिस की भूमिका को ले कर गहरा आक्रोश था. आक्रोश बढ़ने पर लोग पंकज की हत्या के विरोध में राष्ट्रीय राजमार्ग 31 को जाम कर प्रदर्शन करने लगे. नागरिकों के धरने पर बैठते ही पुलिस के हाथपांव फूल गए. आननफानन में थानाप्रभारी संजीत कुमार ने एएसपी अंबरीश राहुल और एसएसपी उपेंद्र शर्मा को घटना की जानकारी दे दी. स्थिति तनावपूर्ण और विस्फोटक होती जा रही थी. स्थिति पर काबू पाने के लिए पुलिस ने सब से पहले मृतक की लाश अपने कब्जे में ली और कागजी काररवाई कर के पोस्टमार्टम के लिए पटना मैडिकल कालेज भिजवा दी.

घटनास्थल का निरीक्षण करने पर पुलिस को वहां से कारतूस के 2 खोखे मिले, जिन्हें पुलिस ने साक्ष्य के तौर पर कब्जे में ले लिया. उधर राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम की सूचना मिलते ही एएसपी अंबरीश राहुल मौके पर पहुंच कर प्रदर्शनकारियों को मनाने में जुट गए. प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि हत्यारों की जल्द से जल्द गिरफ्तारी हो. एएसपी ने उन्हें भरोसा दिया कि अपराधी जो भी होंगे, उन की गिरफ्तारी जल्द से जल्द होगी.  एएसपी के आश्वासन पर प्रदर्शनकारियों ने जाम खोला. मृतक की पत्नी शोभा की तहरीर पर थानाप्रभारी संजीत कुमार ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया.

पुलिस के लिए पंकज हत्याकांड चुनौती की तरह था, क्योंकि इस के पहले 2 हत्याओं का अब तक खुलासा नहीं हो सका था. हत्यारों को गिरफ्तार करने के लिए नागरिकों ने पुलिस पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था. अगले दिन कुछ सम्मानित लोग बिजली कर्मचारी पंकज कुमार गुप्ता हत्याकांड के खुलासे के लिए एसएसपी उपेंद्र कुमार शर्मा से मिले और हत्यारों को जल्द गिरफ्तार करने की मांग की. मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी ने अपने दफ्तर में आपात बैठक बुलाई.  बैठक में एएसपी अंबरीश राहुल और 4 थानों के थानाप्रभारियों एसओ (बख्तियारपुर) कमलेश प्रसाद शर्मा, एनटीपीसी एसओ अमरदीप कुमार, मोकामा एसओ राजनंदन, एसओ (बाढ़) संजीत कुमार, एएसआई राकेश कुमार रंजन, अनिरुद्ध कुमार, सिपाही अमित कुमार और शिव चंद्र शाह शामिल हुए.

एसएसपी ने शहर में हुई हत्याओं के खुलासे न होने पर नाराजगी जताई और पंकज गुप्ता के केस को खोलने के लिए उसी समय टीम बना दी. टीम का नेतृत्व उन्होंने एएसपी राहुल को सौंपा. पुलिस टीम जांच में जुट गई. उस के लिए सब से बड़ा सवाल यह था कि पंकज की हत्या क्यों की गई? इस सवाल का जवाब मृतक की पत्नी ही दे सकती थी. पुलिस ने अपनी तफ्तीश मृतक के घर से शुरू की. पुलिस ने शोभा से पंकज की किसी से दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने पति की किसी से भी दुश्मनी होने की जानकारी से इनकार कर दिया. ऐसे में यह घटना पुलिस के लिए चुनौती बन गई. घटना की तह तक पहुंचने के लिए पुलिस ने मृतक के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई और मदद के लिए मुखबिरों की भी मदद ली.

मृतक की काल डिटेल्स में पुलिस को ऐसा कुछ भी नहीं मिला, जिस से घटना का खुलासा हो पाता. लेकिन 2 दिनों बाद यानी 10 जुलाई को मुखबिर ने पुलिस को जो चौंकाने वाली जानकारी दी, उसे सुन कर पुलिस अधिकारी हैरान रह गए. मुखबिर ने एसओ संजीत कुमार को बताया कि 9 जुलाई को शोभा ने अपने भारतीय स्टेट बैंक के एकाउंट से करीब पौने 3 लाख रुपए निकाले थे.

यह बात पुलिस को खटकी कि आखिर इतनी बड़ी रकम उस ने क्यों निकाली? पुलिस को हैरान करने वाली यह रकम ही सुराग की कड़ी बनी. एएसपी अंबरीश राहुल को शोभा पर शक हुआ कि कहीं पति की हत्या में पत्नी का ही हाथ तो नहीं है? पुलिस ने शोभा का फोन नंबर हासिल किया. उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई और साथ ही उस के नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. संजीत कुमार ने काल डिटेल्स का बारीकी से अध्ययन किया तो चौंके. उन का शक सही निकला. घटना वाली रात से सुबह घटना के बाद तक शोभा लगातार किसी से फोन पर बात करती रही थी. काल डिटेल्स से घटना की तसवीर साफ होती दिख रही थी. जिस नंबर पर शोभा ने बात की थी, पुलिस ने उस नंबर की डिटेल्स निकलवा ली. वह नंबर सन्नी उर्फ गोलू निवासी अगवानपुर का था. मुखबिर के जरिए पुलिस को हत्यारे की सही जानकारी मिल गई थी.

पंकज की हत्या में उस की पत्नी शोभा भी शामिल थी. शोभा ने प्रेमी सन्नी को सवा 3 लाख की सुपारी दे कर पति की हत्या करवाई थी. इस के बाद पुलिस ने हत्या की अलगअलग कडि़यों को जोड़ना शुरू किया. 12 जुलाई को हत्या की कड़ी पूरी तरह जुड़ गई तो पुलिस ने शोभा और उस के प्रेमी सन्नी दोनों को अगवानपुर से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ शुरू की. जल्द ही दोनों ने पुलिस के सामने घुटने टेक दिए और अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. गोलू ने पंकज की हत्या में शामिल अन्य साथियों के नाम भी बता दिए. गोलू की निशानदेही पर पुलिस ने 5 और आरोपियों मुकेश (मृतक का सगा साला), मनीष कुमार, मोहित कुमार उर्फ आदित्य, राजा सिंह और आयुष को गिरफ्तार कर लिया. मुकेश को छोड़ बाकी सभी आरोपी अगवानपुर के ही निवासी थे.

अगले दिन 13 जुलाई, 2020 को एएसपी अंबरीश राहुल ने पुलिस लाइन में पत्रकारवार्ता बुलाई, जिस में पंकज हत्याकांड के सातों आरोपितों को  पत्रकारों के सामने पेश किया. सभी आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उन्होंने हत्या की पूरी कहानी पत्रकारों के सामने परोस दी. वार्ता संपन्न होने के बाद पुलिस ने सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. आरोपियों से पूछताछ के बाद कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

35 वर्षीय पंकज कुमार गुप्ता मूलरूप से पटना जिले के बाढ़ थाने के अगवानपुर का रहने वाला था. उस के परिवार में कुल 4 सदस्य थे. पतिपत्नी और 2 बच्चे. उस का परिवार हर तरह सुखी था. घर में किसी चीज की कमी नहीं थी. वह बिजली विभाग में नौकरी करता था, जहां से उसे अच्छीभली तनख्वाह मिलती थी. कुछ ऊपर से भी कमाई कर लेता था. पंकज की पत्नी शोभा भले ही खूबसूरत नहीं थी लेकिन वह पढ़ीलिखी और सलीकेदार औरत थी. वह परिवार के अच्छेबुरे का खयाल रखती थी. पंकज और शोभा दोनों एकदूसरे की खुशियों पर पूरा ध्यान देते थे. लेकिन कालांतर में पता नहीं उन की खुशियों को किस की बुरी नजर लग गई, जिस ने हंसतेखेलते परिवार को महाभारत का मैदान बना दिया. कल तक जो पतिपत्नी एकदूसरे पर अपनी जान छिड़कते थे, वही अब एकदूसरे के खून के प्यासे हो गए थे.

कहानी में जिस दिन से गोलू उर्फ सन्नी नाम के किरदार का प्रवेश हुआ था उसी दिन से पंकज के हंसतेखेलते घर में कलह शुरू हो गई थी. हुआ कुछ यूं था कि पंकज दिन भर ड्यूटी पर घर से बाहर रहता था. उस के 2 छोटे बच्चे थे. उन की देखभाल शोभा ही करती थी. पंकज पैसे कमा कर पत्नी की हथेली पर रख देता था. उस के बाद घर में क्या हो रहा है, इस से उसे कोई मतलब नहीं रहता था. पति के इस रवैए से शोभा खिन्न रहती थी और दुखी भी. बात 2 साल पहले की है. शोभा की बड़ी बेटी तान्या की तबियत ज्यादा खराब हो गई थी. उसे अस्पताल ले जा कर डाक्टर को दिखाना था. शोभा पति से कई बार कह चुकी थी कि बेटी को ले जा कर डाक्टर को दिखा दे. लेकिन पंकज नौकरी की दुहाई दे कर उस से कहता कि वही उसे ले जा कर किसी अच्छे डाक्टर को दिखा लाए.

अगवानपुर से कुछ दूरी पर एक नर्सिंगहोम था. शोभा बच्चों के इलाज के लिए यहीं आया करती थी. उस दिन भी वह बेटी को दिखाने इसी नर्सिंगहोम में आई थी. वहीं पर गोलू उर्फ सन्नी नाम का एक युवक भी अपने किसी परिचित को दिखाने आया था. बातोंबातों में दोनों के बीच परिचय हुआ. पता चला कि दोनों एक ही मोहल्ले अगवानपुर के रहने वाले हैं. गोलू साधारण शक्लसूरत का गबरू जवान था. लेकिन चपल और बातूनी. अपनी बातों से हर घड़ी सभी को गुदगुदाता रहता था. शोभा उस की बातें सुन कर अपनी हंसी काबू नहीं कर पा रही थी. वह खिलखिला कर हंस पड़ती थी. शोभा की हंसी गोलू के दिल में मकाम कर गई. हर घड़ी उस की आंखों के सामने शोभा का हंसता चेहरा थिरकता रहता था. कुंवारा गोलू समझ नहीं पा रहा था उसे ये क्या गया है.

शोभा 28 साल की शादीशुदा औरत थी जबकि गोलू उस से 7 साल छोटा यानी 21 साल का नौजवान था. गोलू के दिमाग पर शोभा के अक्स की रंगीन चादर बिछी थी, जो हटने का नाम ही नहीं ले रही थी. एक ही मुलाकात में गोलू को शोभा के गदराए जिस्म से प्यार हो गया था. वह उस के दीदार के लिए बेचैन रहने लगा. शोभा गोलू की इस चाहत से अंजान थी. उसे नहीं पता था एक ही मुलाकात में गोलू उस का दीवाना बन जाएगा. उस दिन के बाद शोभा बेटी को ले कर कई बार नर्सिंगहोम गई. इत्तफाक की बात यह रही कि शोभा जबजब बेटी को दिखाने नर्सिंगहोम पहुंचती, उसे उसे गोलू वहीं मिल जाता था. शोभा गोलू को देखती, उसे देखते ही उस के होंठों पर मीठी सी मुसकान थिरक उठती थी. गोलू भी उसे देख कर मुसकरा देता था.

धीरेधीरे दोनों के बीच दोस्ती हो गई. बाद में ये दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों एकदूसरे से प्यार करने लगे. एक शादीशुदा औरत के इश्क में गोलू ऐसा डूबा कि उसी का हो कर रह गया. उसे देखे बिना गोलू को चैन नहीं मिलता था. इधर पति के ड्यूटी पर चले जाने के बाद शोभा फोन कर के गोलू को अपने घर बुला लेती और उस के साथ घंटों रंगरेलियां मनाती. बंद दरवाजे के अंदर शोभा और गोलू का प्यार जवां हो रहा था. जमाने की नजरों से बेखबर दोनों मोहब्बत के सागर में गोते लगा रहा थे. वे समझते थे कि उन की मोहब्बत के बारे में कोई नहीं जानता. हर प्यार करने वाले को यही भ्रम होता है. जबकि मोहल्ले में दोनों के प्रेम के चर्चे होने लगे थे. फिजाओं में फैली उन के प्यार की खुशबू आखिरकार पति पंकज तक पहुंच ही गई.

पंकज को यकीन नहीं हुआ. वह तो पत्नी को बेहद प्यार जो करता था. वह सोच रहा था कि पत्नी उसे धोखा कैसे दे सकती है. किसी की बातों पर उसे यकीन नहीं हो रहा था. लेकिन वह उन बातों को झुठला भी नहीं पा रहा था. सच सामने लाने के लिए वह पत्नी की जासूसी में जुट गया. जब भी पंकज पत्नी को फोन करता, उस का फोन व्यस्त मिलता था. अब पंकज को यकीन होने लगा कि जरूर शोभा का किसी के साथ चक्कर है. समझदारी का परिचय देते हुए एक दिन पंकज ने पत्नी को उस के अफेयर को ले कर अप्रत्यक्ष तौर से समझाया ताकि पत्नी को यह न पता चले कि उसे उस के संबंधों के बारे में पता चल चुका है. पति का बारबार उसी की ओर इशारा कर के बात करने से शोभा समझ गई कि पति को उस पर शक हो गया है.

फिर क्या था, उस दिन के बाद से शोभा संभल गई और प्रेमी गोलू को भी सावधान कर दिया कि पति को उन के संबंधों पर शक हो गया है. जब तक वह उस के शक को मिटा नहीं देती, तब तक हमारा मिलना कम होगा. हम फोन पर ही बातें करेंगे. शोभा ने पति को विश्वास दिलाने के लिए कई कलाएं पेश कीं, लेकिन पंकज सब समझ रहा था. उसे उस की बातों पर तनिक भी यकीन नहीं हुआ. एक दिन तो पंकज ने शोभा को फोन पर प्रेमी से बात करते रंगेहाथ पकड़ लिया. यही नहीं उस ने जब पत्नी के हाथ पर गोलू के नाम का लिखा टैटू देखा तो उस का खून खौल उठा.

कोई भी पति यह बरदाश्त नहीं कर सकता कि उस की पत्नी अपने जिस्म पर किसी पराए मर्द का नाम लिखाए. उस दिन पंकज का गुस्सा पत्नी के अंगअंग पर टूटा. कई दिनों का गुस्सा पंकज ने उस पर उतार दिया. साथ ही सख्त हिदायत भी दी कि आज के बाद फिर प्रेमी से बात करने या मिलने की कोशिश की तो वह उसे जान से मार देगा. पति से पिटी शोभा ने भी उस से कह दिया, ‘‘गोलू मेरी जान है. मैं उस से दूर रह कर जिंदा नहीं रह सकती. तुम चाहो तो मेरी जान ही क्यों न ले लो. मुझे मर जाना मंजूर है लेकिन गोलू के बिना जीना मंजूर नहीं.’’

इस के बाद इसी बात को ले कर अकसर रोजाना ही शोभा की पिटाई होने लगी. पति की रोजरोज मारपीट से शोभा ऊब गई थी. उस ने पति नाम की बीमारी से छुटकारा पाने की योजना बनाई और प्रेमी गोलू से पति को रास्ते से हमेशा के लिए हटाने की बात कही. शोभा के प्यार में अंधे गोलू ने प्रेमिका की बात मान ली और पंकज को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. इस काम के लिए गोलू ने अपने दोस्त मनीष से मदद मांगी और साजिश में शामिल कर लिया. मनीष गोलू का साथ देने के लिए तैयार हो गया. गोलू जानता था कि मनीष का एक दोस्त है, जो भाड़े पर हत्या करता है. गोलू के कहने पर मनीष ने क्रिमिनल मोहित से संपर्क साधा और काम करने को कहा लेकिन मोहित ने यह कहते हुए हत्या की सुपारी लेने से इनकार कर दिया कि वह ये काम नहीं करता.

लेकिन उस का एक दोस्त राजा सिंह है जो ये काम करता है, उन्हें उस से मिला देगा, काम हो जाएगा. मोहित ने मनीष को राजा सिंह से मिलवा दिया. राजा ने काम के बदले एडवांस के रूप में 50 हजार रुपए मांगे. मनीष ने यह बात गोलू को बताई और गोलू ने प्रेमिका शोभा से एडवांस के 50 हजार रुपए मांगे. शोभा के पास इतनी रकम नहीं थी. उस ने अपने भाई मुकेश से पैसे मांगे तो उस ने भी हाथ खड़े कर दिए, लेकिन उस की साजिश में शामिल हो कर उस का साथ देने लगा. शोभा ने पति की हत्या के लिए उस के बनवाए अपने सोने के झुमके 45 हजार रुपए में बेच दिए. यह रकम राजा सिंह को दे दी गई.

उस के बाद आगे की योजना तय हो गई. फिर राजा सिंह ने घटना को अंजाम देने के लिए शूटर आयुष को सुपारी दी. आयुष ने काम के बदले शोभा से 3 लाख रुपए की डिमांड की. लेकिन ये सौदा सवा 3 लाख में तय हुआ. शोभा ने आयुष को बताया कि वह एडवांस के रूप में राजा सिंह को 50 हजार रुपए दे चुकी है. बाकी के पैसे काम होने के बाद दे देगी. शूटर आयुष को विश्वास दिलाने के लिए शोभा ने दस्तखत कर के एक ब्लैंक चैक उसे दे दिया. चैक पाने के बाद शूटर ने 8 जुलाई को घटना को अमली जामा पहना दिया. 7/8 जुलाई, 2020 की रात शोभा ने पति की हत्या के संबंध में गोलू को फोन में बातें की थीं. रोज की तरह पंकज सुबह दूध लेने स्टील की डोलची ले कर घर से निकला तो शोभा ने गोलू को फोन कर के बता दिया कि पंकज घर से निकल चुका है.

उस ने यह भी कहा कि आयुष पंकज को गोली मारे तो गोली की आवाज उसे जरूर सुनाए. गोलू ने उस से कहा ऐसा ही होगा. पंकज के घर से निकलने की बात गोलू ने शूटर आयुष को बता दी. उस समय आयुष पंकज के घर के आसपास ही मंडरा रहा था. जैसे ही गोलू का फोन आया वह सतर्क हो गया और अपाचे मोटरसाइकिल ले कर पंकज के पीछेपीछे लग गया. आयुष बाइक पर पीछे बैठा था, जबकि राजा सिंह बाइक चला रहा था. घर से निकल कर पंकज जैसे ही शहर समिति गेट के पास पहुंचा, बाइक पर पीछे बैठे शूटर आयुष ने पंकज को लक्ष्य साध कर उस के सिर में 2 गोलियां उतार दीं. गोली मारते समय आयुष ने अपना मोबाइल फोन औन किया हुआ था, उधर शोभा अपने फोन को कान से लगाए हुए थी.

गोली की आवाज सुन कर शोभा की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा. इधर गोली मारने के बाद दोनों बदमाश बाइक ले कर फरार हो गए.  घटना के दूसरे दिन शोभा भाई मुकेश को ले कर भारतीय स्टेट बैंक पहुंची और बैंक से 2 लाख 80 हजार रुपए निकाल कर शूटर आयुष को दे दिए. मुखबिर के जरिए यह बात पुलिस को पता चल गई. एएसपी अंबरीश राहुल की सूझबूझ से पंकज कुमार गुप्ता हत्याकांड से परदा उठ गया और घटना में शामिल सभी अपराधी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गए. पुलिस ने आरोपियों से हत्या में प्रयुक्त बाइक, पिस्टल और 2 जिंदा कारतूस बरामद किए. जिस प्रेमी गोलू से शोभा शादी रचाने का ख्वाब देख रही थी, उस ने भी इस घटना के बाद उस से शादी करने से इनकार कर दिया था. शोभा न इधर की रही, न उधर की.

पुलिस ने सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories : लोहे की रौड से पति का किया कत्ल

Crime Stories : उमेश और रिशु ने सोचा था कि अशोक को रास्ते से हटा देने पर उन्हें रोकनेटोकने वाला कोई नहीं रहेगा. दोनों ने मिल कर योजना बनाई और अशोक को ठिकाने लगा दिया. लेकिन यह सब करते वक्त दोनों यह भूल गए कि पुलिस जड़ें खोदने में तेज होती है. जब पुलिस ने जांच शुरू की तो…

महमदपुर गांव के कुछ लोग सुबहसुबह घूमने निकले तो उन्होंने इमामपुर मार्ग पर खेत में एक बोलेरो खड़ी देखी. उन्हें आश्चर्य हुआ कि बोलेरो सड़क किनारे खड़ी करने के बजाय खेत के बीच में क्यों खड़ी की गई. मन में शंका हुई तो वे उत्सुकतावश उस कार के पास गए. वहां उन्होंने जो देखा, उस से उन की घिग्घी बंध गई. बोलेरो के अंदर एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश देख कर वे गांव की ओर भागे. रास्ते में उन्हें जो भी मिला, उसे बताया फिर गांव पहुंच कर यह बात सब को बता दी. गांव में कोहराम सा मच गया, जरा सी देर में खेत पर भीड़ उमड़ पड़ी. इसी बीच किसी ने मोबाइल से यह खबर थाना खुटहन पुलिस को दे दी. यह बात 25 जुलाई, 2020 की सुबह 8 बजे की है.

सुबहसवेरे हत्या की सूचना पा कर खुटहन थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा का मन कसैला हो गया. उन्होंने मर्डर की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय वहां गांव वालों की भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटा कर पुलिस वहां पहुंची, जहां बोलेरो खड़ी थी. कार का दरवाजा खुला था. पिछली सीट पर एक युवक की लाश पड़ी थी. लाश को उन्होंने कार से बाहर निकलवाया और शिनाख्त कराने की कोशिश की. गनीमत यह रही कि लोगों ने लाश को देखते ही पहचान लिया. उन्होंने थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा को बताया कि लाश अशोक कुमार उर्फ दीपक बरनवाल की है, जो पड़ोस के गांव तिधरा में रहता है और किराना व्यवसाई है.

अशोक की हत्या किसी भारी चीज से सिर पर प्रहार कर के की गई थी, जिस से उस का सिर फट गया था. उस की उम्र 40 के आसपास थी. शरीर से वह हृष्टपुष्ट था. कार के पास ही शराब की खाली बोतल, प्लास्टिक के 2 गिलास और नमकीन के 2 खाली पैकेट पड़े थे. पुलिस ने इस सामान को जाब्ते की काररवाई में शामिल कर के सुरक्षित कर लिया. मृतक के घर उस की हत्या की सूचना भिजवा दी. मृतक की पत्नी रिशु को पति की हत्या की सूचना मिली तो वह घटनास्थल पर आ गई और पति के शव से लिपट कर रोने लगी. थानाप्रभारी कुशवाहा ने उसे धैर्य बंधा कर शव से दूर किया. रिशु को साथ आई महिलाओं ने संभाला.

थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अशोक कुमार, एएसपी त्रिभुवन सिंह तथा सीओ जितेंद्र कुमार दुबे भी वहां आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम तथा डौग स्क्वायड को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. फोरैंसिक टीम ने कार और घटनास्थल की जांच कर साक्ष्य जुटाए. खोजी कुत्ता शव को सूंघ कर भौंकते हुए कुछ दूर गया और गन्ने के खेत के पास जा कर भौंकने लगा. इस पर टीम ने गन्ने के खेत की सघन तलाशी ली. खेत के अंदर खून सनी लोहे की रौड व खून सना गमछा मिला. टीम ने अनुमान लगाया कि संभवत: उसी रौड से मृतक की हत्या की गई होगी और गमछे से चेहरे का खून पोंछा गया होगा. सबूत के तौर पर टीम ने रौड तथा गमछे को सुरक्षित कर लिया.

कुछ नहीं बताया रिशु ने मौकाएवारदात पर पुलिस अधिकारियों ने मृतक के कपड़ों की जामातलाशी कराई तो उस की पैंट की जेब से एक पर्स बरामद हुआ, जिस में ड्राइविंग लाइसैंस और कुछ रुपए थे. दूसरी जेब से उस का मोबाइल फोन मिला. पुलिस ने पर्स व मोबाइल फोन सुरक्षित कर लिया. बोलेरो कार को थाने भिजवा दिया गया. घटनास्थल पर मृतक अशोक की पत्नी रिशु मौजूद थी. पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ की तो उस ने बताया कि अशोक कल रात 8 बजे घर से बोलेरो कार ले कर निकले थे. पूछने पर उन्होंने बताया था कि वह कस्बा जाफराबाद में एक बारात में जा रहे हैं. रात 11 बजे के पहले लौट आएंगे. लेकिन वह वापस घर नहीं आए. किसी ने उन की हत्या कर दी. आज सुबह 10 बजे जब पुलिस से सूचना मिली तब वह यहां आई.

‘‘तुम्हारे पति की किसी से रंजिश या लेनदेन का कोई झगड़ा तो नहीं था?’’ पुलिस अधिकारियों ने पूछा.

‘‘सर, उन की न तो किसी से रंजिश थी और न ही किसी से लेनदेन था. वह अपनी किराने की दुकान चलाते थे. सरल स्वभाव की वजह से उन की पासपड़ोस के गांवों तक जानपहचान थी. पता नहीं किस ने उन की हत्या कर दी.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ एएसपी त्रिभुवन सिंह ने रिशु से पूछा.

‘‘सर, हमें किसी पर शक नहीं है. हम नाम ले कर किसी को झूठमूठ नहीं फंसाना चाहते.’’

घटनास्थल का निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने मृतक का शव पोस्टमार्टम के लिए जौनपुर के जिला अस्पताल भिजवा दिया. साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज करा दिया गया. एसपी अशोक कुमार ने इस ब्लाइंड मर्डर का रहस्य खोलने के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया. इस टीम में थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा, सीओ (शाहगंज) जितेंद्र कुमार दुबे, एसआई मनोज सिंह, भूपत राम, कांस्टेबल करतार सिंह, जयदेव मिश्रा, महिला सिपाही राखी यादव, पूनम तथा सर्विलांस टीम को सम्मिलित किया गया. टीम की कमान एएसपी त्रिभुवन सिंह को सौंपी गई. गठित पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का निरीक्षण कर के पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया.

फिर मृतक की पत्नी रिशु तथा उस के पड़ोसियों से पूछताछ की. रिशु ने तो अपना रटारटाया बयान ही दिया. लेकिन पड़ोेसियोंं ने पुलिस को जानकारी दी कि रिशु मनचली औरत है. उस के घर उमेश का आनाजाना था, जो अशोक को अच्छा नहीं लगता था. वह इस का विरोध करता था. उमेश को ले कर अशोक व रिशु में झगड़ा भी होता था. अशोक की हत्या का रहस्य रिशु के पेट में ही छिपा हो सकता है. रिशु रडार पर आई तो पुलिस टीम ने उस से दोबारा कड़ाई से पूछताछ की. साथ ही उस का मोबाइल भी ले लिया.

पुलिस टीम ने उस का फोन खंगाला तो पता चला कि घटना वाली रात वह 2 मोबाइल नंबरों पर सक्रिय थी. जिन में एक नंबर उस के पति अशोक का था, जबकि दूसरा नंबर ड्राइवर उमेश का था जो तिधरा का ही रहने वाला था. पुलिस टीम ने उमेश के घर दबिश दी तो उस के घर पर ताला लटका मिला. इस से उस पर पुलिस का शक और भी बढ़ गया. पुलिस टीम ने उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाया और 26 जुलाई की दोपहर उसे तिधरा मोड़ से गिरफ्तार कर लिया. उसे थाना खुटहन लाया गया. इसी बीच रिशु को भी हिरासत में ले लिया गया था. खुल गई कलई थाने पर जब उमेश से अशोक उर्फ दीपक की हत्या के संबंध में पूछा गया तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि अशोक उस का दोस्त था, दोनों के बीच गहरी दोस्ती थी. उस ने अशोक की हत्या नहीं की.

उमेश ने बरगलाने का प्रयास किया तो पुलिस ने उस के साथ सख्ती की. इस से वह टूट गया. उस ने हत्या का अपराध कबूल कर लिया. उमेश के टूटते ही रिशु भी लाइन पर आ गई. उस ने पति की हत्या की बात मान ली. उमेश ने बताया कि रिशु से उस के नाजायज संबंध थे. अशोक इन संबंधों का विरोध करता था और बाधक बनने लगा था. उस ने रिशु को भी प्रताडि़त करना शुरू कर दिया था. इस पर हम दोनों ने अशोक को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और उसे मौत के घाट उतार दिया. चूंकि उमेश व रिशु ने हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था, अत: थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा ने अज्ञात में दर्ज हत्या के केस में उमेश व रिशु को नामजद कर के उन पर भादंवि की धारा 302/120बी लगा दीं. दोनों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस जांच में अवैध रिश्तों की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

जौनपुर जिले के खुटहन थाना क्षेत्र में बड़ी जनसंख्या वाला गांव है- तिधरा. यहां सप्ताह में 2 दिन बाजार लगता है. अशोक कुमार उर्फ दीपक बरनवाल इसी तिधरा में रहता था. वैसे वह खेता सराय कस्बे का मूल निवासी था, लेकिन शादी के बाद ससुराल में रहने लगा था. उस ने तिधरा बाजार में एक मकान खरीद लिया था और उसी में परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी रिशु के अलावा 2 बच्चे थे, बेटा राहुल तथा बेटी आरती. अशोक कुमार किराना व्यवसाई था. मकान के भूतल पर उस की किराने की दुकान थी. अशोक के कुशल व्यवहार से दुकान पर ग्राहकों की भीड़ जुटी रहती थी. बाजार वाले दिन भीड़ कुछ ज्यादा होती थी, सो उस की पत्नी रिशु को भी दुकान पर बैठना पड़ता था. वह रुपयों का लेनदेन करती थी.

दुकान की कमाई से अशोक ने एक बोलेरो कार खरीद ली थी. इसे वह बुकिंग पर स्वयं चलाता था. इस से उसे अतिरिक्त आमदनी हो जाती थी. कुल मिला कर उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. अशोक की पत्नी रिशु पढ़ीलिखी, सुंदर और चंचल स्वभाव की महिला थी. उस ने ब्यूटीशियन का कोर्स कर घर में ही ब्यूटीपार्लर खोल लिया था. शुरू में तो उस का यह काम फीका रहा, लेकिन बाद में ठीकठाक चलने लगा था, इस के मद्देनजर उस ने एक युवती को भी नौकरी पर रख लिया. वह बुकिंग पर भी जाने लगी थी. पतिपत्नी की कमाई से घर की आर्थिक स्थिति तो मजबूत हुई थी, लेकिन दोनों के बीच दूरियां आ गई थीं. एक छत के नीचे रहते हुए भी दोनों पतिपत्नी का रिश्ता नहीं निभा पा रहे थे. अशोक दिन भर किराने की दुकान चलाता था. शाम तक वह इतना थक जाता था कि खाना खाते ही पलंग पर पसर जाता और खर्राटे भरने लगता. पति के खर्राटे रिशु को शूल की तरह चुभते थे.

रिशु 2 बच्चों की मां जरूर थी, पर उस की कामेच्छाएं प्रबल थीं. वह हर रात पति का साथ चाहती थी, जो उसे नहीं मिल पा रहा था. एक रोज अशोक की बोलेरो कार की बुकिंग किसी बारात में थी, पर उस की तबियत खराब थी. वह परेशान था कि बारात की बुकिंग कैसे निपटाए. तभी उसे उमेश की याद आई. उमेश तिधरा में ही रहता था और कुशल ड्राइवर था. दोनों में दोस्ती थी. कभी किसी बारात या कहीं और मिलते तो शराब पार्टी कर लेते थे. उमेश भी शादी समारोहों वगैरह में गाड़ी ले कर जाता था. खुद घर बुलाई मौत अशोक ने मोबाइल पर उमेश से बात की तो वह खाली था. अशोक ने उमेश को बुला कर बात की और बोलेरो उसे सौंप कर बुकिंग पर भेज दिया.

दूसरे रोज सुबह 10 बजे उमेश अशोक के घर पहुंचा और कार खड़ी कर चाबी तथा रुपयों का हिसाब अशोक को सौंप दिया. अशोक ने मेहनताने के रूप में 300 रुपए उमेश को दे दिए. हिसाब हो गया तो अशोक ने पत्नी को आवाज दी, ‘‘सुनती हो, तुम्हारा देवर आया है, पानी तो ले आओ.’’

रिशु पानी ले कर बैठक में पहुंची, तो उस के होठों पर मुसकान थी. उमेश ने एकदो बार दूर से रिशु को देखा था, आमनासामना पहली बार हो रहा था. रिशु ने पानी उस की तरफ बढ़ाया, उमेश ने पानी पीने के लिए हाथ बढ़ाया, तो अनायास ही उस का हाथ रिशु के हाथ को छू गया. वह सकपकाया, तभी दोनो की नजरें मिलीं. रिशु के होंठों पर मुसकराहट थी, जबकि आंखों में कामुक शरारत नाच रही थी. उमेश भी हड़बड़ाहट में मुसकरा दिया और उस के मुंह से निकला, ‘‘शुक्रिया भाभी.’’

पहली ही नजर में उमेश और रिशु एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. उमेश जहां गबरू जवान था, वहीं रिशु भी खूबसूरती में कम नहीं थी. दोनों ने एकदूसरे को दिल में बसा लिया. 3-4 दिन तक उमेश कशमकश में पड़ा रहा कि वह रिशु से मिलने जाए या न जाए. क्योंकि अशोक उस का दोस्त था और रिशु उस की पत्नी. लेकिन रिशु का आमंत्रण उस के जेहन को मथ रहा था. आखिर एक दिन दोपहर में वह अशोक के घर पहुंच ही गया. संयोग से उस रोज अशोक किसी काम से जौनपुर गया हुआ था. चारों तरफ सन्नाटा पसरा था. ऐसे में उमेश को देखने वाला भी कोई नहीं था. उस ने घर के दरवाजे पर दस्तक दी, तो दरवाजा रिशु ने ही खोला. फिर चहक कर बोली, ‘‘देवरजी आप! बड़ी देर कर दी मेहरबां आतेआते. जानते हो, मैं हर रोज तुम्हारी राह देखती थी.’’

‘‘ऐसी कौन सी बात थी, जो आप को मेरा इंतजार था?’’ उमेश ने उस के मन की थाह ली.

‘‘पहले अंदर तो आओ.’’ रिशु ने बेहिचक उस का हाथ थामा और अंदर खींच लिया. फिर उसे पलंग पर बिठा कर पूछा, ‘‘पानी लाऊं?’’

‘‘नहीं, प्यास नहीं है.’’ उमेश बोला.

रिशु ने नैन मटकाए, ‘‘देवरजी, झूठ मत बोलो. प्यास नहीं होती, तो सुनसान दोपहर में भाभी के पास क्यों आते?’’ कहने के साथ उस ने नैनों की कटार चला दी. उमेश कुछ कह पाता, रिशु पलटी. दरवाजा बंद किया और अंदर से कुंडी भी चढ़ा दी. उमेश समझ गया कि रिशु क्या चाहती है. उस ने भी मन बना लिया. जो होगा, देखा जाएगा. रिशु आ कर उस के बगल में बैठ गई. उस ने साफ शब्दों में दिल की बात कह दी, ‘‘जब से तुम्हें देखा, मन के साथ तन भी विचलित है. मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

‘‘भाभी, यह क्या कह रही हो. तुम किसी की पत्नी हो और मैं किसी का दोस्त.’’ उमेश ने तर्क दिया.

‘‘उस से पहले मैं एक औरत हूं, जो स्वयं अधूरी है और तुम एक मर्द, जो पराई औरत का आमंत्रण पा कर आए हो.’’

अपनी बात कहने के साथ रिशु ने उस के सीने पर हाथ रख दिया, ‘‘जरा देखूं तो, तुम घबरा तो नहीं रहे हो.’’

रिशु का स्पर्श पा कर उमेश के बदन में करंट सा दौड़ने लगा. उस ने उसे बांहों में भर लिया. बाहर दोपहर का सन्नाटा था. ऐसे में वासना में डूबी 2 देह एकदूसरे में गुंथ गईं. कमरे में सांसों की सरगम गूंजने लगी. यह सब तभी थमा जब दोनों तृप्त हो गए. अवैध संबंधों का खेल एक बार शुरू हुआ तो वक्त के साथ बढ़ता ही गया. रिशु थी ही इतनी मादक कि उमेश उसे पाने का लोभ छोड़ नहीं पाता था. जिस दिन अशोक की बोलेरो कार की बुकिंग होती, रिशु फोन कर उमेश को घर बुला लेती और रंगरेलियां मनाती. अशोक कुमार इस सब से बेखबर था कि बीवी घर में क्या गुल खिला रही है. दरअसल, रिशु को पति से संतुष्टि नहीं मिल पाती थी. वह उन औरतों में से थी जिन्हें हर रात पति का साथ चाहिए होता है. वह पति से निराश हुई तो उस ने उमेश को कामनाओं का साथी बना लिया. उस का मानना था कि वह बदचलन हो कर कोई गुनाह नहीं कर रही है.

लेकिन अवैध रिश्ते को कब तक छिपाए रखा जा सकता है. उमेश का चोरीछिपे अशोक के घर आना, लोगों से छिपा न रह सका. इसे ले कर किसी ने अशोक के कान भर दिए. उस ने बीवी से जवाबतलब किया तो रिशु ने त्रियाचरित्र दिखाते हुए उलटे उस पर ही आक्षेप लगाना शुरू कर दिया कि वह उस पर लांछन लगा रहा है. अशोक जानता था कि बिना आग धुंआ नहीं उठता है. अत: वह उमेश के घर पहुंच गया. उस ने गहरी नजर से उमेश को देखा, ‘‘आजकल बहुत पर निकल आए हैं तुम्हारे.’’

‘‘मैं ने क्या किया है भाई, जो आप की त्यौरी चढ़ी हुई है.’’ उमेश ने पूछा.

अशोक सख्त लहजे में बोला, ‘‘मेरी गैरहाजिरी में मेरे घर क्यों जाते हो?’’

‘‘नहीं तो, एकदो बार भाभी ने कुछ सामान मंगाया था, सामान देने जरूर गया था.’’

‘‘कान खोल कर सुन लो, आइंदा तुम्हें हमारे घर जाने की कोई जरूरत नहीं है.’’ कह कर अशोक तमतमाया हुआ बाहर निकल गया. अशोक यही सोच रहा था कि उस ने उमेश को समझा दिया है और अब सब कुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन यह सोचना उस की भूल थी. उमेश ने रिशु को मोबाइल पर फोन कर के बता दिया कि अशोक ने उसे चेतावनी दी है. अब वह उस से मिलने नहीं आएगा. कुछ दिन दोनों नहीं मिले. फिर दोनों ने नया रास्ता खोज लिया. दोनों घर के बाहर मिलने लगे. लेकिन एक शाम अशोक ने दोनों को गांव के बाहर प्रमोद की ट्यूबवैल वाली कोठरी में रंगेहाथ पकड़ लिया.

उमेश तो भाग निकला. लेकिन रिशु की उस ने जम कर पिटाई की. रिशु ने गलती के लिए माफी मांग ली. रिशु ने रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद माफी जरूर मांग ली थी, लेकिन उस ने पति को मिटाने का निश्चय भी कर लिया था. उस ने अपने इरादों से उमेश को भी अवगत करा दिया था. एक दिन मौका मिलने पर दोनों ने सिर से सिर जोड़ कर अशोक को ठिकाने लगाने की योजना बनाई और उचित समय का इंतजार करने लगे. बन गई भूमिका हत्या की 24 जुलाई, 2020 की शाम अशोक कुमार ने पत्नी रिशु को बताया कि उसे जाफराबाद कस्बा में एक मुसलिम भाई की शादी में शामिल होेने जाना है. रात 11 बजे से पहले लौट आएगा.

रिशु ने इस की जानकारी उमेश को दे दी और कहा अच्छा मौका है, काम तमाम कर दो. इस पर उमेश ने अपनी योजना तैयार कर ली. रात 8 बजे अशोक अपनी बोलेरो कार से जफराबाद जाने के लिए निकला. तभी योजना के तहत उमेश ने तिधरा मोड़ पर हाथ दे कर उसे रोक लिया और बोला, ‘‘भाई जाफराबाद तक छोड़ दो, मुझे एक जरूरी काम है.’’

अशोक की इच्छा उसे गाड़ी पर बिठाने की नहीं थी, पर पुराना दोस्त था सो इनकार भी नहीं कर सका और बिठा लिया. उमेश ने अपनी लच्छेदार बातों से अशोक को मूड बनाने के लिए राजी कर लिया. उमेश ने जफराबाद के ठेके पर कार रुकवा कर शराब, पानी, गिलास व नमकीन लिया. फिर दोनों ने गाड़ी में बैठ कर शराब पी. चालाकी से उमेश ने अशोक के गिलास में नशीला पदार्थ मिला दिया, जिस से कुछ देर बाद वह बेहोश हो कर गाड़ी की पिछली सीट पर लुढ़क गया. उमेश ड्राइवर था ही, सो वह बोलेरो को महमदपुर गांव के पास लाया और सड़क किनारे खेत में खड़ी कर दी. इस के बाद उस ने कार से लोहे की रौड निकाली और अशोक के सिर पर कई प्रहार किए. अशोक का सिर फट गया. अधिक खून बहने से उस की मौत हो गई.

अशोक की हत्या के बाद उस ने गमछे से हाथ व माथे का खून पोंछा. शराब की खाली बोतल, गिलास व नमकीन के खाली पैकेट कार के बाहर फेंके. फिर रौड व गमछे को गन्ने के खेत में छिपा कर फरार हो गया. 25 जुलाई की सुबह कुछ ग्रामीणों ने खेत में खड़ी बोलेरो में लाश देखी, तब पुलिस को सूचना दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी जगदीश कुशवाहा मौके पर पहुंचे और शव को कब्जे में ले कर जांच शुरू की. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या का परदाफाश हुआ. 27 जुलाई, 2020 को थाना खुटहन पुलिस ने अभियुक्त उमेश तथा रिशु को जौनपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime : भागकर शादी करने पर पिता ने बेटी और दामाद को मारी गोली

Love Crime : प्यार करने वालों का सदियों से जमाना दुश्मन रहा है. लेकिन नाजिया के तो उस के घर वाले ही दुश्मन बन बैठे. पिता मुजम्मिल और भाई मोहसिन ने उस की लौकडाउन की लवस्टोरी का इस तरह अंत किया कि…

कोरोना काल के चलते जहां एक तरफ पूरी दुनिया अस्तव्यस्त हुई, वहीं आम इंसान के जीवन पर  भी काफी असर पड़ा है. यही कारण है कि आज आम जनता अपनेअपने घरों में कैद रहने के लिए विवश है. 7 सितंबर, 2020 को रात के साढ़े 8 बजे काशीपुर शहर में सड़क पर सन्नाटा पसरा था. उस वक्त नाजिया अपने शौहर राशिद के साथ दवा लेने डाक्टर के पास गई हुई थी. तभी उस के मोबाइल पर उस के अब्बू की काल आई. अपने अब्बू की काल देखते ही उस के दिल की धड़कनें दोगुनी हो चली थीं. क्योंकि उस के अब्बू ने बहुत समय बाद उसे फोन किया था. अब्बू ने न जाने किस लिए फोन किया, उस की समझ में नहीं आ रहा था. यह उस के लिए जिज्ञासा के साथसाथ चिंता का विषय भी था.

नाजिया अपनी दवाई ले चुकी थी. राशिद ने अपनी बाइक स्टार्ट की और घर की ओर निकल पड़ा. उस के पीछे बैठी नाजिया अपने अब्बू से मोबाइल पर बात करने लगी. नाजिया को पता था कि उसे घर पहुंचने में केवल 3-4 मिनट ही लगेंगे. उस के बाद वह घर पर आराम से उन से बात कर लेगी. जैसे ही राशिद की बाइक उस के घर के मोड़ पर पहुंची. सामने से आ रहे कुछ लोगों ने उन पर ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. इस से पहले कि राशिद और नाजिया कुछ समझ पाते, दोनों ही बाइक से नीचे सड़क पर गिर कर तड़पने लगे. उन के कई गोलियां लगी थीं. देखते ही देखते सड़क उन के खून से तरबतर हो गई.

अधिक खून रिसाव के कारण दोनों की मौके पर ही मौत हो गई. इस घटना के घटते ही नाजिया के हाथ से मोबाइल छूट कर वहीं गिर गया था. खामोशी में डूबे मोहल्ले में अचानक 4-5 गोलियों के चलने की आवाज ने लोगों में दहशत पैदा कर दी थी. दोनों पर की ताबड़तोड़ फायरिंग घटनास्थल के आसपास बने मकानों की खिड़कियां खुलीं और लोगों ने सड़क का मंजर देखा तो देखते ही रह गए. सड़क पर एक साथ 2 लाशें पड़ी हुई थीं. एक युवक और एक युवती की. उन के पास में ही एक बाइक पड़ी हुई थी. मतलब साफ था कि कोई युवकयुवती का मर्डर कर फरार हो चुका था. यह मंजर देख कर आसपड़ोस वालों ने हिम्मत जुटाई और सड़क पर बाहर निकल आए थे. एक के बाद एक लोगों के घर से निकलने का सिलसिला शुरू हुआ, तो घटनास्थल पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा.

दोनों मृतक उसी मोहल्ले के रहने वाले थे, इसी कारण दोनों की शिनाख्त होने में भी कोई परेशानी नहीं आई. वहां पर मौजूद लोगों में से किसी ने मृतक युवक राशिद के भाई के मोबाइल पर फोन कर इस घटना की जानकारी दी. घटना की जानकारी मिलते ही उस के घर वालों के साथ उस के पड़ोसी भी तुरंत ही घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल पर पहुंचते ही राशिद के परिवार वालों ने उस के शरीर को छू कर देखा, जो पूरी तरह से ठंडा पड़ चुका था. उस की मौत हो चुकी थी. उस के पास पड़ी नाजिया भी मौत की नींद सो चुकी थी. घटनास्थल पर पड़े खून को देख कर सभी लोगों का मानना था कि उन्हें डाक्टर के पास ले जाने का भी कोई लाभ नहीं होगा.

जैसेजैसे लोगों को इस मामले की जानकारी मिलती गई, वैसेवैसे वहां पर लोगों का जमघट लगता गया. तुरंत ही इस सनसनीखेज मामले की सूचना किसी ने पुलिस नियंत्रण कक्ष को दे दी. चूंकि यह क्षेत्र काशीपुर कोतवाली के अंतर्गत आता है, इसलिए कोतवाली प्रभारी सतीशचंद्र कापड़ी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की तरफ रवाना हो गए. सूचना मिलने पर एएसपी राजेश भट्ट, सीओ मनोज ठाकुर भी मौके पर पहुंचे.  घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस ने जांचपड़ताल की. युवकयुवती दोनों की लाशें पासपास पड़ी हुई थीं. युवक राशिद का चेहरा बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका था. मृतक के चेहरे को देख कर लगता था कि हत्यारों ने उस के सिर से सटा कर गोली चलाई थी. जिस के कारण उस के चेहरे की पहचान ही खत्म हो गई थी.

इस मामले को ले कर पुलिस ने युवक युवती के परिवार वालों के बारे में जानकारी जुटाई. राशिद के परिवार वालों ने बताया कि दोनों का काफी लंबे समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था, जिस के चलते दोनों घर से भाग गए थे. उसी दौरान जून, 2020 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. फिर कुछ समय बाद दोनों काशीपुर वापस आ गए थे. तब से पास में ही दोनों किराए का कमरा ले कर रह रहे थे. नाजिया की तबीयत खराब होने के कारण उस शाम दोनों बाइक से दवाई लेने डाक्टर के पास गए थे. वहां से वापसी के दौरान किसी ने उन की गोली मार कर हत्या कर दी. औनर किलिंग का शक घटनास्थल की जांचपड़ताल के दौरान पुलिस ने मृतक राशिद और उस की बीवी नाजिया के मोबाइल अपने कब्जे में ले लिए थे.

पुलिस ने दोनों के मोबाइल चैक किए तो पता चला कि घटना के वक्त नाजिया अपने पिता के मोबाइल पर बात कर रही थी. यह बात सामने आते ही पुलिस समझ गई कि उन दोनों की हत्या में जरूर युवती के पिता मुजम्मिल का हाथ हो सकता है. पुलिस ने तुरंत ही युवती के घर पर जा कर उस के बारे में जानकारी ली तो पता चला कि मुजम्मिल घर से फरार है. उस के घर पर ताला लटका हुआ था. उस के अन्य परिवार वाले भी घर से गायब थे. घर के सभी लोगों के अचानक फरार होने से इस हत्याकांड में उस की संलिप्तता साफ जाहिर हो गई थी. पुलिस ने युवती के घर वालों को सब जगह खोजा,लेकिन उन का कहीं भी अतापता न लग सका.

यह सब जानकारी जुटाने के बाद पुलिस ने दोनों शव पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिए. इस केस में मृतक राशिद के भाई नईम की तहरीर के आधार पर पुलिस ने 4 आरोपियों मुजम्मिल, उस के बेटे मोहसिन के अलावा अफसर अली, जौहर अली पुत्र निसार अली निवासी अलीखां के खिलाफ भांदंवि की धारा 302/342/504/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. इस केस में नामजद मुकदमा दर्ज होते ही इस घटना की जांच एएसपी (काशीपुर) राजेश भट्ट व सीओ मनोज ठाकुर के नेतृत्व में अलगअलग 3 पुलिस टीमों का गठन किया गया. इन टीमों में काशीपुर कोतवाली प्रभारी सतीशचंद्र कापड़ी, एसआई अमित शर्मा, रविंद्र सिंह बिष्ट, दीपक जोशी, कैलाशचंद्र, कांस्टेबल वीरेंद्र यादव, राज पुरी, अनुज त्यागी, सुरेंद्र सिंह, राजेंद्र प्रसाद, सुनील तोमर, दलीप बोनाल, संजीत प्रसाद, प्रियंका, रिचा आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीमों ने आरोपियों के शरीफ नगर, ठाकुरद्वारा, रामपुर और मुरादाबाद में कई संभावित स्थानों पर दबिश डाली. काफी प्रयास करने के बाद भी आरोपी पुलिस पकड़ में नहीं आए. पुलिस काररवाई के दौरान 9 सितंबर, 2020 को पुलिस को एक मुखबिर से सूचना मिली कि मुजम्मिल और उस का बेटा मोहसिन दोनों ही दडि़याल रोड लोहिया पुल के पास कहीं जाने की फिराक में खड़े हैं. आरोपी चढ़े पुलिस के हत्थे सूचना पाते ही काशीपुर कोतवाली प्रभारी सतीश कुमार कापड़ी तुरंत पुलिस टीम ले कर लोहिया पुल पर पहुंचे. पुलिस ने चारों ओर से घेराबंदी करते हुए दोनों को गिरफ्तार कर लिया. दोनों को हिरासत में ले कर पुलिस कोतवाली आ गई.

पुलिस ने दोनों से इस दोहरे हत्याकांड के बारे में कड़ी पूछताछ की. कुछ समय तक तो मुजम्मिल ने पुलिस को घुमाने की पूरी कोशिश की. फिर बाद में मुजम्मिल ने बताया कि जिस समय वह बेटे के साथ अपनी बेटी नाजिया से मिलने के लिए घर के नुक्कड़ पर पहुंचा, उस वक्त तक उन दोनों की हत्या हो चुकी थी. उस ने अपने बेटे के साथ दोनों को मृत पाया तो वह बुरी तरह से घबरा गया. उन के जाने से पहले ही उन दोनों को कोई मौत के घाट उतार चुका था. उन को उस हालत में देख कर बापबेटे दोनों बुरी तरह से घबरा गए थे. उन्हें डर था कि उन की हत्या का इलजाम उन पर न लग जाए. इसी कारण वे तुरंत ही मौके से फरार हो गए थे.

उस की बातें सुन कर कोतवालीप्रभारी सतीशचंद्र कापड़ी को उस पर शक हो रहा था कि यह झूठ बोल रहा है. उन्होंने मुजम्मिल और उस के बेटे मोहसिन पर थोड़ी सी सख्ती बरती तो दोनों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस के तुरंत बाद ही पुलिस ने उन की निशानदेही पर 315 बोर के 2 तमंचे बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों के खिलाफ 3/25 शस्त्र अधिनियम के 2 अलग मुकदमे भी दर्ज कर लिए. सरेआम ताबड़तोड़ फायरिंग कर दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने वाले आरोपियों से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के सामने पूछताछ करने पर जो जानकारी सामने आई, वह इस प्रकार थी. उत्तराखंड के शहर काशीपुर के मोहल्ला अली खां में रहता था कमरूद्दीन का परिवार. कमरुद्दीन का बड़ा परिवार था. लेकिन बच्चों के बड़े होते ही वह भी पैसे कमाने लगे, जिस से उस के परिवार की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई थी.

उस का एक बेटा काम करने दुबई चला गया और दूसरा सऊदी अरब. उन के और लड़के भी काशीपुर में ही अपना कामधंधा करते थे. कमरुद्दीन के घर के पास ही मुजम्मिल का मकान भी था. मुजम्मिल की आर्थिक स्थिति पहले से ही मजबूत थी. मुजम्मिल मूलत: शरीफनगर (ठाकुरद्वारा) का निवासी था. गांव में उस की काफी जमीनजायदाद थी. अब से लगभग 10 साल पहले मुजम्मिल ने अपनी गांव की कुछ जुतासे की जमीन बेची और काशीपुर के मोहल्ला अलीखां में आ कर बस गया. उस की ससुराल भी यहीं पर थी. काशीपुर आने के तुरंत बाद ही उस ने यहां पर कुछ जुतासे की जमीन खरीदी और उस पर खेती का काम करना शुरू किया. मुजम्मिल के परिवार में उस की बीवी सहित कुल 8 सदस्य थे.

जमीन के बाकी बचे पैसों से मुजम्मिल ने एक कैंटर खरीद लिया था. मुजम्मिल के 4 बेटे जवान थे, जो काफी समय पहले से ही अपना कामधंधा करने लगे थे. कैंटर मुजम्मिल स्वयं ही चलाता था, जिस से काफी आमदनी हो जाती थी. 2 बेटियों में वह एक की पहले ही शादी कर चुका था, उस के बाद सब से छोटी नाजिया बची थी. नाजिया और राशिद की लवस्टोरी कमरुद्दीन और मुजम्मिल दोनों ही पड़ोसी थे, इसी नाते दोनों परिवार एकदूसरे के घर आतेजाते थे. भले ही दोनों अलगअलग जाति से ताल्लुक रखते थे, लेकिन दोनों परिवारों में घर जैसे ही ताल्लुकात थे. मुजम्मिल के बेटे राशिद की मोहसिन से अच्छी दोस्ती भी थी. राशिद और मोहसिन का जब कभी भी कहीं काम होता तो दोनों साथसाथ ही घर से निकलते थे.

मोहसिन की एक बहन थी नाजिया. नाजिया देखनेभालने में जितनी सुंदर थी, उस से कहीं ज्यादा तेजतर्रार भी थी. भले ही नाजिया राशिद के दोस्त की बहन थी, लेकिन उस के दिल को वह भा गई थी. घर आनेजाने की कोई पाबंदी थी नहीं. इसी आनेजाने के दौरान नाजिया ने राशिद की आंखों में अपने प्रति प्यार देखा तो वह भी उस की अदाओं पर मर मिटी. प्यार का सुरूर आंखों के रास्ते उतरा तो दिल में जा कर समा गया. दोनों के बीच मोहब्बत का सफर चालू हुआ तो अमरबेल की तरह बढ़ने लगा. देखतेदेखते उन के प्यार के चर्चे घर की दीवारों को लांघ कर मोहल्ले में छाने लगे थे. यह बात नाजिया के घर वालों को पता चली तो आगबबूला हो उठे. मुजम्मिल ने अपनी बेटी को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह राशिद को छोड़ने को तैयार न थी.

उस के बाद मुजम्मिल ने राशिद के परिवार वालों को उन के बेटे की काली करतूतों का हवाला देते हुए उसे समझाने को कहा. लेकिन राशिद भी प्रेम डगर से पीछे हटने को तैयार न था. एक पड़ोसी होने के नाते जितना दोनों परिवारों में प्यार था, पल भर में वह नफरत में बदल गया. हालांकि दोनों ही परिवार वालों ने अपनेअपने बच्चों को समझाने का अथक प्रयास किया. लेकिन दोनों ही अपनी जिद पर अड़े थे. इस मामले को ले कर दोनों परिवारों के बीच विवाद बढ़ा तो मामला पंचायत तक जा पहुंचा. भरी पंचायत में फैसला हुआ कि राशिद काशीपुर छोड़ कर कहीं बाहर जा कर काम देखे. परिवार वालों के दबाव में राशिद रोजगार की तलाश में सऊदी चला गया. राशिद के काशीपुर छोड़ कर चले जाने के बाद नाजिया उस की याद में तड़पने लगी.

कुछ ही दिनों में उस ने राशिद से सऊदी में भी मोबाइल द्वारा संपर्क बना लिए. फिर दोनों ही मोबाइल पर प्रेम भरी बातें करते हुए साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. पूरी दुनिया में कोरोना का कहर बरपा तो राशिद अपने घर लौट आया. इस वक्त घर आना उस की मजबूरी बन गई थी. अपने घर काशीपुर आते ही उस ने शहर में एक टायर शोरूम में नौकरी कर ली. उसी दौरान मोहसिन अपनी पुरानी रंजिश को भूल कर राशिद से मिला. मोहसिन जानता था कि लौकडाउन खुलते ही राशिद दोबारा सऊदी चला जाएगा. दरअसल राशिद के सऊदी चले जाने के बाद से ही मोहसिन के दिल में भी सऊदी जाने की तमन्ना पैदा हो गई थी. मोहसिन जानता था कि वह राशिद के संपर्क में रह कर ही सऊदी तक पहुंच सकता है. मोहसिन के संपर्क में आने के बाद राशिद को मनचाही मंजिल और भी आसान लग रही थी.

उसी दोस्ती के कारण राशिद का नाजिया के घर आनाजाना बढ़ गया था. यही आनाजाना दोनों को उस मुकाम तक ले गया, जहां से दोनों का लौटना नामुमकिन हो गया था. यानी उन के प्रेम संबंध और ज्यादा मजबूत हो गए. फिर अब से लगभग 3 महीने पहले राशिद और नाजिया अचानक घर से फरार हो गए. नाजिया के घर से फरार होते ही उस के घर वालों को गहरा सदमा लगा. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि उन की बेटी एक दिन उन की इज्जत को तारतार कर देगी. मुजम्मिल को पता था कि वह जरूर राशिद के साथ गई होगी. राशिद के बारे में जानकारी लेने पर पता चला वह भी घर से गायब था. मुजम्मिल को दुख इस बात का था कि उस की बेटी ने गैरबिरादरी के लड़के के साथ भाग कर समाज में उस की नाक कटवा दी थी.

मुजम्मिल के मानसम्मान को ठेस पहुंची तो उस ने दोनों से मोबाइल पर बात कर उन्हें जान से मारने की धमकी दे डाली थी. उस के बावजूद भी दोनों ने बाहर रहते ही चोरीछिपे एक मौलवी के सामने निकाह भी कर लिया. यह बात जब नाजिया के घर वालों को पता चली तो घर में मातम सा छा गया. बदनामी की वजह से साधी चुप्पी समाज में अपनी इज्जत को देख नाजिया के अब्बू मुजम्मिल ने इस राज को राज ही बने रहने दिया. मुजम्मिल ने इस मामले में पूरी तरह से चुप्पी साध ली और फिर नाजिया और राशिद के वापस आने का इंतजार करने लगा. राशिद ने नाजिया के साथ निकाह करते ही अपना मोबाइल नंबर भी बदल लिया था, जिस के बाद मुजम्मिल की उन से बात नहीं हो पाई थी. मुजम्मिल पेशे से ड्राइवर होने के नाते काफी तेजतर्रार था. वह किसी तरह से राशिद का नया मोबाइल नंबर हासिल करना चाहता था.

वह जानता था कि राशिद के घर वालों से ही उस का नंबर मिल सकता है. उस ने किसी तरह उस की अम्मी को विश्वास में लेते हुए उस का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. जब मुजम्मिल के सब्र का बांध टूट चुका तो उस ने दूसरी चाल चली. मुजम्मिल ने एक दिन अपनी बेटी को फोन कर कहा, ‘‘नाजिया बेटी, तुम ने जो भी किया ठीक ही किया. बेटा बहुत दिन हो गए. तुम्हारे बिना हम से रहा नहीं जाता. हमें अब तुम से कोई गिलाशिकवा नहीं है. तुम दोनों घर वापस आ जाओ. हम चाहते हैं कि तुम दोनों का धूमधाम से निकाह करा दें.’’

मुजम्मिल की बात सुन कर नाजिया को विश्वास नहीं हुआ. उस ने यह बात पति राशिद को बताई. साथ ही यह भी समझाया कि आप मेरे अब्बू की बातों में मत आना. मैं उन की नसनस से वाकिफ हूं. वह झूठा प्यार दिखा कर हमें काशीपुर बुलाने के बाद हमारे साथ क्या कर डालें, कुछ पता नहीं. इस के बावजूद राशिद मुजम्मिल की बातों में आ कर नाजिया को साथ ले कर काशीपुर चला आया. काशीपुर आने के बाद राशिद ने मोती मसजिद के पास अलीखां मोहल्ले में ही एक किराए का कमरा ले लिया और वहीं पर नाजिया के साथ रहने लगा. यह बात मुजम्मिल को भी पता लग गई थी. उस के बाद मुजम्मिल अपने दिल में राशिद और नाजिया के प्रति फैली नफरत को खत्म करने के लिए उचित समय का इंतजार करने लगा.

बापभाई ही बने प्यार के दुश्मन अपनी बेटी और राशिद के प्रति उस के दिल में इस कदर नफरत पैदा हो गई थी कि वह किसी भी सूरत में दोनों को मौत के घाट उतारने की योजना बना चुका था. उसी योजना के तहत मुजम्मिल ने उत्तर प्रदेश के एक गांव से 315 बोर के 2 तमंचे और 8 कारतूस खरीदे. उस के बाद मुजम्मिल अपने बेटे मोहसिन को साथ ले कर दोनों का साए की भांति पीछा करने लगा. राशिद और नाजिया कब, कहां और क्यों जाते हैं, यह जानना उस की दिनचर्या में शामिल हो गया. इस घटना से 15 दिन पहले मुजम्मिल को जानकारी मिली कि नाजिया राशिद के साथ जसपुर स्थित कालू सिद्ध की मजार पर गई हुई है.

कालू सिद्ध की मजार पतरामपुर के जंगलों में स्थित है. जहां पर दूरदूर तक झाड़झंखाड़ और वन फैला है. यह जानकारी मिलते ही मुजम्मिल अपने बेटे मोहसिन को साथ ले कर कालू सिद्ध के रास्ते में भी छिप कर बैठा. लेकिन उस दिन उन्हें नाजिया अकेले ही दिखाई दी थी. जबकि मुजम्मिल नाजिया के साथ राशिद को भी खत्म करने की फिराक में था. लेकिन उस दिन दोनों बापबेटे गम का घूंट निगल कर अपने घर वापस आ गए.  फिर दोनों के साथ मिलने की ताक में रहने लगे. 7 सितंबर 2020 की शाम को पता चला कि राशिद नाजिया को साथ ले कर बाइक से कहीं पर गया हुआ है. यह जानकारी मिलते ही उस ने अपनी योजना को अंजाम देने के लिए पूरी तैयारी कर ली. लेकिन उस वक्त उसे यह जानना भी जरूरी था कि वे दोनों शहर में गए हैं या फिर कहीं बाहर.

यह जानकारी लेने के लिए वह अपने घर के मोड़ पर एक चबूतरे पर जा बैठा. वहां पर पहले से ही कई लोग बैठे हुए थे. वहां पर भी उस का मन नहीं लगा. उस के मन में राशिद और नाजिया को ले कर जो खिचड़ी पक रही थी, वह उसे ले कर परेशान था. मुजम्मिल वहां से उठ कर अपने घर चला आया. जब राशिद और नाजिया को गए हुए काफी समय बीत गया तो उस के सब्र का बांध टूट गया. उस ने उसी समय नाजिया को फोन मिला दिया. अपने अब्बू का फोन आते ही वह भावुक हो उठी और उस ने बता दिया कि वह दवाई लेने आई हुई थी. अब वह कुछ ही देर में घर की ओर ही निकल रही है. यह जानकारी मिलते ही मुजम्मिल अपने बेटे मोहसिन को साथ ले कर अपने घर की ओर आने वाले मोड़ पर जा पहुंचा. उस वक्त तक वहां पर बैठे लोग भी अपनेअपने घर जा चुके थे.

जैसे ही राशिद नाजिया को साथ ले कर घर की ओर जाने वाले मोड़ पर पहुंचा, मुजम्मिल और उस के बेटे मोहसिन ने इस घटना को अंजाम दे डाला. पुलिस ने मुजम्मिल और उस के बेटे मोहसिन से विस्तार से पूछताछ के बाद उन्हें 10 सितंबर, 2020 को कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया था. इस केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम की सराहना करते हुए एएसपी राजेश भट्ट ने ढाई हजार रुपए देने की घोषणा की.

 

विकास दुबे : 8 पुलिसवालों का कातिल, गैंगस्टर और अपराध का बादशाह

Gangster Story : 8 पुलिस वालों की हत्या और पुलिस टीम का खून बहाने वाले गैंगस्टर विकास की उलटी गिनती 3 जुलाई की रात से ही शुरू हो गई थी. फिर भी उस ने एनकाउंटर से बचने के लिए बहुत कोशिश की. महाकाल की शरण तक में गया. लेकिन उसे कांटों की वही फसल तो काटनी ही थी, जो उस ने खुद बोई थी. आखिर…

पुरानी कहावत है कि पुलिस वालों से न दोस्ती अच्छी न दुश्मनी, लेकिन विकास दुबे ने दोनों ही कर ली थीं. कई थानों के पुलिस वाले उस के दरबार में जीहुजूरी करते थे, तो कुछ ऐसे भी थे जिन की वरदी उस की दबंगई पर भारी पड़ती थी. ऐसे ही थे बिल्हौर के सीओ देवेंद्र मिश्रा. विकास ने अपने ही गांव के राहुल तिवारी की जमीन कब्जा ली थी. इतना ही नहीं, उस पर जानलेवा हमला भी किया था. राहुल अपनी शिकायत ले कर थाना चौबेपुर गया, लेकिन चौबेपुर थाने के इंचार्ज विनय तिवारी विकास के खास लोगों में से थे. उन्होंने राहुल की शिकायत सुनने के बजाय उसे भगा दिया.

इस पर राहुल बिल्हौर के सीओ देवेंद्र मिश्रा से मिला. उन्होंने विनय तिवारी को फोन कर के रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया तो उस की रिपोर्ट दर्ज हो गई. लेकिन इस पर कोई एक्शन नहीं लिया गया. बाद में राहुल तिवारी ने सीओ देवेंद्र मिश्रा को खबर दी कि विकास दुबे गांव में ही है. देवेंद्र मिश्रा ने यह सूचना एसएसपी दिनेश कुमार पी. को दी. विकास दुबे कोई छोटामोटा अपराधी नहीं था. अलगअलग थानों में उस के खिलाफ हत्या सहित 60 आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. ऊपर से उसे राजनीतिक संरक्षण भी मिला हुआ था. एसएसपी दिनेश कुमार पी. ने देवेंद्र मिश्रा को निर्देश दिया कि आसपास के थानों से फोर्स मंगवा लें और छापा मार कर विकास दुबे को गिरफ्तार करें. इस पर देवेंद्र मिश्रा ने बिठूर, शिवली और चौबेपुर थानों से पुलिस फोर्स मंगा ली.

गलती यह हुई कि उन्होंने चौबेपुर थाने को दबिश की जानकारी भी दी और वहां से फोर्स भी मंगा ली. विकास दुबे को रात में दबिश की सूचना थाना चौबेपुर से ही दी गई, जिस की वजह से उस ने भागने के बजाय पुलिस को ही ठिकाने लगाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने फोन कर के अपने गिरोह के लोगों को अपने गांव बिकरू बुला लिया. सब से पहले उस ने जेसीबी मशीन खड़ी करवा कर उस रास्ते को बंद किया जो उस के किलेनुमा घर की ओर आता था. फिर अंधेरा घिरते ही अपने लोगों को मय हथियारों के छतों पर तैनात कर दिया. विकास खुद भी उन के साथ था.

योजनानुसार आधी रात के बाद सरकारी गाडि़यों में भर कर पुलिस टीम के 2 दरजन से अधिक जवान तथा अधिकारी बिकरू गांव में प्रविष्ट हुए. लेकिन जैसे ही पुलिस की गाडि़यां विकास के किले जैसे मकान के पास पहुंचीं तो घर की तरफ जाने वाले रास्ते में जेसीबी मशीन खड़ी मिली, जिस से पुलिस की गाडि़यां आगे नहीं जा सकती थीं. निस्संदेह मशीन को रास्ता रोकने के लिए खड़ा किया गया था. सीओ देवेंद्र मिश्रा, दोनों थानाप्रभारियों कौशलेंद्र प्रताप सिंह व महेश यादव और कुछ स्टाफ को ले कर विकास दुबे के घर की तरफ चल दिए. बाकी स्टाफ से कहा गया कि जेसीबी मशीन को हटा कर गाडि़यां आगे ले आएं.

सीओ साहब जिस स्टाफ को ले कर आगे बढ़े थे, उस के चंद कदम आगे बढ़ाते ही अचानक पुलिस पर तीन तरफ से फायरिंग होने लगी. गोलियां विकास के मकान की छत से बरसाई जा रही थीं. अचानक हुई इस फायरिंग से बचने के लिए पुलिस टीम के लोग इधरउधर छिपने की जगह ढूंढने लगे. पूरा गांव काफी देर तक गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजता रहा. काफी देर बाद जब गोलियों की तड़तड़ाहट बंद हुई तो पूरे गांव में सन्नाटा छा गया. सीओ देवेंद्र मिश्रा सहित 8 पुलिस वाले शहीद दबिश देने पहुंची पुलिस टीम पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसाई गई थीं,

उस में से बिल्हौर के सीओ देवेंद्र कुमार मिश्रा, एसओ (शिवराजपुर) महेश यादव, चौकी इंचार्ज (मंधना) अनूप कुमार, सबइंस्पेक्टर (शिवराजपुर) नेबूलाल, थाना चौबेपुर का कांस्टेबल सुलतान सिंह, बिठूर थाने के कांस्टेबल राहुल, जितेंद्र और बबलू की गोली लगने से मौत हो गई थी. अचानक हुई ताबड़तोड़ गोलीबारी में बिठूर थाने के एसओ कौशलेंद्र प्रताप सिंह को जांघ और हाथ में 3 गोली लगी थीं. दरोगा सुधाकर पांडेय, सिपाही अजय सेंगर, अजय कश्यप, चौबेपुर थाने का सिपाही शिवमूरत और होमगार्ड जयराम पटेल भी गोली लगने से घायल हुए थे. खास बात यह कि चौबेपुर थाने के इंचार्ज विनय तिवारी और उन की टीम में एक सिपाही शिवमूरत के अलावा कोई घायल नहीं हुआ था. शिवमूरत को भी उस की गलती से गोली लगी. दरअसल, पहले से जानकारी होने की वजह से चौबेपुर की टीम जेसीबी से आगे नहीं बढ़ी थी.

बदमाशों की इस दुस्साहसिक वारदात की जानकारी रात में ही एसएसपी दिनेश कुमार को दी गई. वे एसपी (पश्चिम) डा. अनिल कुमार समेत 3 एसपी और कई सीओ की फोर्स के साथ बिकरू पहुंच गए.  एसओ (बिठूर) समेत गंभीर रूप से घायल 6 पुलिसकर्मियों को रात में ही रीजेंसी अस्पताल में भरती कराने के लिए कानपुर भेज दिया गया. इस वारदात की सूचना मिलते ही आईजी जोन मोहित अग्रवाल और एडीजी जय नारायण सिंह तत्काल लखनऊ से कानपुर के लिए रवाना हो गए. गांव में सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 4 कंपनी पीएसी भी बुलवा ली गई थी.

दूसरी तरफ घटना के बाद कानपुर, कानपुर देहात, कन्नौज, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया की सभी सीमाएं सील कर के पुलिस ने कौंबिंग औपरेशन शुरू कर दिया. कौंबिंग के दौरान बिठूर के एक खेत में छिपे 2 बदमाश पुलिस को दिखाई दे गए. दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं. एनकाउंटर में दोनों बदमाश ढेर हो गए. इन में एक हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का मामा प्रेम प्रकाश पांडेय था और दूसरा उस का चचेरा भाई अतुल दुबे. सीओ देवेंद्र मिश्रा का क्षतविक्षत शव प्रेम प्रकाश के घर में ही मिला था. लूटी गई 9 एमएम की पिस्टल भी प्रेम प्रकाश की लाश के पास मिली. प्रदेश ही नहीं, पूरा देश हिल गया था  सुबह का उजाला बढ़ते ही प्रदेश के एडीजी (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार तथा स्पैशल टास्क फोर्स के आईजी अमिताभ यश भी अपनी सब से बेहतरीन टीमों को ले कर बिकरू गांव पहुंच गए.

विकास दुबे के बारे में मिली सभी जानकारी ले कर एसटीएफ की कई टीमें उसी वक्त कानपुर, लखनऊ तथा अन्य शहरों के लिए रवाना कर दी गईं. प्रदेश के डीजीपी एच.सी. अवस्थी के लिए यह घटना बड़ी चुनौती थी. उन्होंने विकास दुबे को जिंदा या मुर्दा लाने वाले को 50 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. फिर वह लखनऊ से सीधे कानपुर के लिए रवाना हो गए. प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पुलिस अधिकारियों को सख्त आदेश दिए कि किसी भी हालत में इस घटना के लिए जिम्मेदार अपराधियों को उन के अंजाम तक पहुंचाया जाए. मुख्यमंत्री ने सभी शहीद 8 पुलिस वालों के परिवारों को एकएक करोड़ रुपए की आर्थिक मदद देने की भी घोषणा की.

दूसरी तरफ इस घटना के बाद गुस्से में भरी पुलिस की टीमों ने विकास दुबे की तलाश में ताबड़तोड़ काररवाई शुरू कर दी थी. पुलिस की एक टीम ने सुबह 7 बजे विकास के लखनऊ के कृष्णानगर स्थित घर पर दबिश दी. आसपास के लोगों से पता चला कि विकास यहां अपनी पत्नी रिचा दुबे, जो जिला पंचायत सदस्य थी, 2 बेटों आकाश और शांतनु के साथ रहता था. पुलिस को 24 घंटे की पड़ताल के बाद बहुत सारी ऐसी जानकारियां हाथ लगीं, जिस से एक बात साफ हो गई कि विकास दुबे ने उस रात बिकरू गांव में उसे गिरफ्तार करने पहुंची पुलिस पार्टी पर हमला अचानक ही नहीं किया था, बल्कि चौबेपुर थाने के अफसरों की शह पर उस ने पुलिस टीम को मार डालने की पूरी तैयारी की थी.

घायल पुलिसकर्मियों ने जो बताया, उस से एक यह बात भी पता चली कि अचानक हुई ताबड़तोड़ फायरिंग से बचने के लिए पुलिसकर्मियों ने जहां भी छिप कर जान बचाने की कोशिश की उन्हें ढूंढढूंढ कर मारा गया. इसलिए पुलिस को बिकरू के हर घर की तलाशी लेनी पड़ी. पुलिस पार्टी पर हमला करने वाले बदमाशों ने हमले के बाद वारदात में मारे गए पुलिसकर्मियों की एके-47 राइफल, इंसास राइफल, दो 9 एमएम की पिस्टल तथा एक ग्लोक पिस्टल लूट ली थीं. छानबीन में यह बात सामने आ रही थी कि चौबेपुर के थानाप्रभारी विनय कुमार तिवारी ने विकास दुबे को दबिश की सूचना दी थी.

तह तक जाने के लिए अधिकारियों ने चौबेपुर एसओ विनय तिवारी की कुंडली खंगालनी शुरू कर दी. पता चला विनय तिवारी के विकास दुबे से बेहद आत्मीय रिश्ते थे. 2 दिन पहले भी वे विकास दुबे से मिलने उस के गांव आए थे. वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम ने भी विनय तिवारी से विकास दुबे के रिश्तों को ले कर पूछताछ की. इसी थाने के एक अन्य एसआई के.के. शर्मा समेत थाने के सभी कर्मचारियों की विकास दुबे से सांठगांठ का पता चला तो पुलिस ने विकास दुबे के मोबाइल की सीडीआर निकलवा कर उस की जांचपड़ताल शुरू की.

पता चला घटना वाली रात चौबेपुर एसओ विनय तिवारी की विकास दुबे से कई बार बात हुई थी. लिहाजा उच्चाधिकारियों के आदेश पर विनय तिवारी को पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया, जबकि एसएसपी ने इस थाने के सभी 200 पुलिस वालों को लाइन हाजिर कर दूसरा स्टाफ नियुक्त कर दिया. विकास दुबे हालांकि इतना बड़ा डौन नहीं था कि पूरे प्रदेश या देश में लोग उस के नाम को जानते हों. लेकिन उस की राजनीतिक पैठ और दुस्साहस ने उसे आसपास के इलाके में इतना दबंग बना दिया था, जिस से उसे पुलिस को घेर कर उन पर हमला करने का हौसला मिला.

किशोरावस्था में ही बन गया था गुंडा विकास ने गुंडागर्दी तभी शुरू कर दी थी जब वह रसूलाबाद में चाचा प्रेम किशोर के यहां रह कर पढ़ता था. जब उस की शिकायत घर तक पहुंची तो प्रेम किशोर ने उसे वापस बिकरू जाने को कह दिया. उसे चाचा ने घर से निकाला तो वह मामा के यहां जा कर रहने लगा. यहीं रहते उस ने ननिहाल के गांव गंगवापुर में पहली हत्या की. तब वह मात्र 18 साल का था. लेकिन इस हत्याकांड में वह सजा से बच गया. यहीं से विकास के आपराधिक जीवन की शुरुआत हुई और वह दिनबदिन बेकाबू होता गया. 1990 में गांव नवादा के चौधरियों ने विकास के पिता की बेइज्जती कर दी थी. उसे पता चला तो उस ने उन्हें उन के घर से निकालनिकाल कर पीटा. ऐसा कर के उस ने चौबेपुर क्षेत्र में अपनी दबंगई का झंडा बुलंद कर दिया.

करीब 20 साल पहले विकास ने मध्य प्रदेश के शहडोल जिले के बुढ़ार कस्बे की रिचा निगम उर्फ सोनू से कानपुर में लव मैरिज की थी. रिचा के पिता और घर वाले इस शादी के खिलाफ थे. उन के विरोध करने पर विकास ने गन पौइंट पर शादी की. फिलहाल उस की पत्नी रिचा जिला पंचायत सदस्य थी. बुलंद हौसलों के बीच 1991 में उस ने अपने ही गांव के झुन्ना बाबा की हत्या कर दी. इस हत्या का मकसद था बाबा की जमीन पर कब्जा करना. इस के बाद विकास ने कौन्ट्रैक्ट किलिंग वगैरह शुरू की. उस ने 1993 में रामबाबू हत्याकांड को अंजाम दिया.

झगड़ा, मारपीट, लोगों से रंगदारी वसूलना और कमजोर लोगों की जमीनों पर कब्जे करना उस का धंधा बन चुका था. उस के रास्ते में जो भी आता, वह उसे इतना डरा देता कि वह उस के रास्ते से हट जाता. अगर कहीं कुछ परेशानी होती तो हरिकृष्ण श्रीवास्तव का एक फोन उस का कवच बन जाता. नेताओं की छत्रछाया में पला गैंगस्टर विकास 1996 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले हरिकृष्ण श्रीवास्तव ने बीजेपी छोड़ कर बीएसपी का दामन थाम लिया और उन्हें पार्टी ने चौबेपुर विधानसभा सीट से टिकट दे दिया. जबकि भाजपा ने संतोष शुक्ला को टिकट दिया. हरिकृष्ण श्रीवास्तव और भाजपा के संतोष शुक्ला के बीच तगड़ा मुकाबला हुआ.

इस चुनाव में विकास दुबे ने इलाके के एकएक प्रधान, ग्राम पंचायत और ब्लौक के सदस्यों को डराधमका कर अपने गौडफादर हरिकृष्ण श्रीवास्तव के पक्ष में मतदान करने को मजबूर कर दिया. इसी चुनाव के दौरान संतोष शुक्ला और विकास दुबे के बीच कहासुनी भी हो गई थी, कड़े मुकाबले के बावजूद हरिकृष्ण श्रीवास्तव इलेक्शन जीत गए. विकास और उस के गुर्गे जीत का जश्न मना रहे थे, तभी संतोष शुक्ला वहां से गुजरे. विकास ने उन की कार रोक कर गालीगलौज शुरू कर दी. दोनों तरफ से जम कर हाथापाई हुई. इस के बाद विकास ने संतोष शुक्ला को खत्म करने की ठान ली.

5 साल तक संतोष शुक्ला और विकास के बीच जंग जारी रही. इस दौरान दोनों तरफ के कई लोगों की जान गई. 1997 में कुछ समय के लिए बीजेपी के सर्मथन से बसपा की सरकार बनी और मायावती मुख्यमंत्री बन गईं. हरिकृष्ण श्रीवास्तव को स्पीकर बनाया गया. बस फिर क्या था विकास दुबे की ख्वाहिशों को पंख लग गए. उस ने हरिकृष्ण श्रीवास्तव को राजनीतिक सीढ़ी बना कर बसपा और भाजपा के कई कद्दावर नेताओं से इतनी नजदीकियां बना लीं कि उस के एक फोन पर ये कद्दावर नेता उस की ढाल बन कर सामने खड़े हो जाते थे, क्योंकि उन सब ने देख लिया था कि विकास राजनीति करने वाले लोगों के लिए वोट दिलाने वाली मशीन है.

विकास ने साल 2000 में ताराचंद इंटर कालेज पर कब्जा करने के लिए शिवली थाना क्षेत्र में कालेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की गोली मार कर हत्या कर दी थी. इस मामले में गिरफ्तार हो कर जब वह कुछ दिन के लिए जेल गया तो उस ने जेल में बैठेबैठे कानपुर के शिवली थानाक्षेत्र में रामबाबू यादव की हत्या करा दी. लेकिन जेल में बंद होने के कारण पुलिस इस मामले में उसे दोषी साबित नहीं कर सकी. सिद्धेश्वर केस में विकास को उम्रकैद की सजा हुई लेकिन उस ने हाईकोर्ट से जमानत हासिल कर ली, जिस के बाद उस की अपील अभी तक अदालत में विचाराधीन है. दुश्मनी ठानने के बाद विकास गोली से बात करता था

शिवली विकास के गांव बिकरू से 3 किलोमीटर दूर है. यहां के लल्लन वाजपेई 1995 से 2017 तक पंचायत अध्यक्ष रहे. जब उन का कार्यकाल समाप्त हुआ तो उन्होंने अगला चुनाव लड़ने का फैसला किया. विकास इस चुनाव में अपने किसी आदमी को अध्यक्ष पद का चुनाव लड़वाना चाहता था. उस ने लल्लन के लोगों को डरानाधमकाना शुरू किया. लल्लन ने उसे रोका तो वह विकास की आंखों में चढ़ गए और उस ने उन्हें सबक सिखाने की ठान ली. ब्राह्मण बहुल इस क्षेत्र में पिछड़ों की हनक को कम करने के लिए विकास कई नेताओं की नजर में आ गया था और वे उसे संरक्षण देने लगे थे. इसी क्षेत्र में कांग्रेस के पूर्व विधायक थे नेकचंद पांडेय. विकास की दबंगई देख कर उन्होंने उसे राजनीतिक संरक्षण देना शुरू कर दिया.

तब वह खुल कर अपनी ताकत दिखाने लगा. उस की दबंगई का कायल हो कर भाजपा के चौबेपुर से विधायक हरिकृष्ण श्रीवास्तव ने भी उस के सिर पर हाथ रख दिया. हरिकृष्ण श्रीवास्तव उसी इलाके में जनता दल, जनता पार्टी से भी विधायक रह चुके थे. इलाके में उन का दबदबा था. उन्होंने चौबेपुर में अपनी राजनीतिक धमक मजबूत करने के लिए विकास दुबे को अपनी शरण में ले लिया. हरिकृष्ण श्रीवास्तव के खिलाफ चुनाव लड़ने के दौरान बीजेपी के नेता संतोष शुक्ला विकास के दुश्मन बन गए. लल्लन और संतोष शुक्ला के करीबी संबंध थे. उन्हीं दिनों भाजपा और बसपा की मिलीजुली सरकार बनी तो मुख्यमंत्री बने कल्याण सिंह. कल्याण सिंह ने संतोष शुक्ला को श्रम संविदा बोर्ड का चेयरमैन बना कर राज्यमंत्री का दर्जा दे दिया था, जिस से संतोष शुक्ला और लल्लन वाजपेई दोनों की ही इलाके में हनक बढ़ गई थी.

हालांकि लखनऊ के कुछ प्रभावशाली भाजपा नेताओं ने संतोष शुक्ला और विकास के बीच सुलह कराने की कोशिश की, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए. दरअसल, संतोष शुक्ला ने सत्ता की हनक के बल पर विकास का एनकाउंटर कराने की योजना बना ली थी. एक तो लल्लन वाजपेई की मदद करने के कारण दूसरे अपने एनकाउंटर की साजिश रचने की भनक पा कर विकास को खुन्नस आ गई. उस ने संतोष शुक्ला को खत्म करने का फैसला कर लिया. नवंबर 2001 में जब संतोष शुक्ला शिवली में एक सभा को संबोधित कर रहे थे, तभी विकास अपने गुर्गों के साथ वहां आ धमका और संतोष शुक्ला पर फायरिंग शुरू कर दी. जान बचाने के लिए वह शिवली थाने पहुंचे, लेकिन विकास वहां भी आ धमका और इंसपेक्टर के रूम में छिपे बैठे संतोष को बाहर ला कर मौत के घाट उतार दिया.

जिस तरह पुलिस की मौजूदगी में संतोष शुक्ला की हत्या की गई थी, उस ने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी, इस के बाद पूरे इलाके में विकास की दहशत फैल गई. संतोष शुक्ला के मर्डर के बाद पुलिस विकास दुबे के पीछे पड़ गई. कई माह तक वह फरार रहा. सरकार ने उस के सिर पर 50 हजार का इनाम घोषित कर दिया था. पुलिस एनकाउंटर में मारे जाने के डर से उस ने एक बार फिर अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल किया. वह अपने खास भाजपा नेताओं की शरण में चला गया. उन्होंने उसे अपनी कार में बैठा कर लखनऊ कोर्ट में सरेंडर करवा दिया. कुछ माह जेल में रहने के बाद विकास की जमानत हो गई. बाहर आते ही उस ने फिर अपना आतंक फैलाना शुरू कर दिया.

विकास के गैंग के लोगों तथा राजनीतिक संरक्षण देने वालों ने संतोष शुक्ला हत्याकांड में चश्मदीद गवाह बने सभी पुलिसकर्मियों को इतना आतंकित कर दिया कि सभी हलफनामा दे कर गवाही से मुकर गए. अगला निशाना लल्लन वाजपेई पर फलस्वरूप विकास दुबे संतोष शुक्ला हत्याकांड से साफ बरी हो गया. लेकिन इस के बावजूद विकास दुबे के मन में लल्लन वाजपेई को सबक ना सिखा पाने की कसक रह गई थी. क्योंकि उस के साथ शुरू हुई राजनीतिक रंजिश में ही उस ने संतोष शुक्ला की हत्या की थी, इसीलिए वह मौके का इंतजार करने लगा.

जल्द ही उसे यह मौका भी मिल गया. 2002 में पंचायत चुनाव से पहले एक दिन लल्लन के घर पर चौपाल लगी थी. 5 लोग बैठे थे. शाम 7 बजे का समय था. अचानक घर के बगल वाले रास्ते से और सामने से कुछ लोग मोटरसाइकिल से आए और बम फेंकना शुरू कर दिया. साथ ही फायरिंग भी की. दरवाजे की चौखट पर बैठे लल्लन जान बचाने के लिए अंदर भागे. उन की जान तो बच गई लेकिन इस हमले में 3 लोगों की मौत हो गई. गोली लगने से लल्लन का एक पैर खराब हो गया था. इस हमले में कृष्णबिहारी मिश्र, कौशल किशोर और गुलाटी नाम के 3 लोग मारे गए. पुलिस में हत्या का मामला दर्ज हुआ, जिस में विकास दुबे का भी नाम था. लेकिन आरोप पत्र दाखिल करते समय पुलिस ने उस का नाम हटा दिया था.

विकास दुबे ने इस हत्याकांड को जिस दुस्साहस से अंजाम दिया था, सब जानते थे. फिर भी वह अपने रसूख से साफ बच गया था. जबकि अन्य लोगों को सजा हुई. इस के बाद तो उस के कहर और डर के सामने सब ने हथियार डाल दिए. बिकरू और शिवली के आसपास के क्षेत्रों में विकास की दहशत इस कदर बढ़ गई थी कि उस के एक इशारे पर चुनाव में वोट डलने शुरू हो जाते थे. सरकार बसपा, भाजपा या समाजवादी पार्टी चाहे किसी की भी रही  विकास को राजनीतिक संरक्षण देने वाले नेता खुद उस के पास पहुंच जाते थे. 2002 में जब प्रदेश में बसपा की सरकार थी, तो उस का सिक्का बिल्हौर, शिवराजपुर, रिनयां, चौबेपुर के साथसाथ कानपुर नगर में भी चलने लगा था.

विकास ने राजनेताओं के संरक्षण से राजनीति में एंट्री की और जेल में रहने के दौरान शिवराजपुर से नगर पंचायत का चुनाव जीत लिया. इस से उस के हौसले और ज्यादा बुलंद हो गए. राजनीतिक संरक्षण और दबंगई के बल पर आसपास के 3 गांवों में उस के परिवार की ही प्रधानी कायम रही. विकास ने राजनीतिक जड़ें मजबूत करने के लिए लखनऊ में भी घर बना लिया, जहां उस की पत्नी रिचा दुबे के अलावा छोटा बेटा रहता था, जो लखनऊ के एक इंटर कालेज में पढ़ रहा था जबकि उस का बड़ा बेटा ब्रिटेन से एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है.

यूपी के कई जिलों में विकास दुबे के खिलाफ 60 मामले चल रहे थे. पुलिस ने उस की गिरफ्तारी पर 25 हजार का इनाम रखा हुआ था. लेकिन सामने होने पर भी उसे कोई नहीं पकड़ता था. कानपुर नगर से ले कर देहात तक में विकास दुबे की सल्तनत कायम हो चुकी थी. पंचायत, निकाय, विधानसभा से ले कर लोकसभा चुनाव के वक्त नेताओं को बुलेट के दम पर बैलेट दिलवाना उस का पेशा बन गया था. विकास दुबे के पास जमीनों पर कब्जे, रंगदारी, ठेकेदारी और दूसरे कामधंधों से इतना पैसा एकत्र हो गया था कि उस ने एक ला कालेज के साथ कई शिक्षण संस्थाएं खोल ली थीं.

बिकरू, शिवली, चौबेपुर, शिवराजपुर और बिल्हौर ब्राह्मण बहुल क्षेत्र हैं. यहां के युवा ब्राह्मण लड़के विकास दुबे को अपना आदर्श मानते थे. गर्म दिमाग के कुछ लड़के अवैध हथियार ले कर उस की सेना बन कर साथ रहने लगे थे. आपराधिक गतिविधियों से ले कर लोगों को डरानेधमकाने में विकास इसी सेना का इस्तेमाल करता था. अपने गांव में विकास दुबे ने एनकाउंटर के डर से पुलिस पर हमला कर के 8 जवानों को शहीद तो कर दिया लेकिन वह ये भूल गया कि पुलिस की वर्दी और खादी की छत्रछाया ने भले ही उसे संरक्षण दिया था, लेकिन जब कोई अपराधी खुद को सिस्टम से बड़ा मानने की भूल करता है तो उस का अंजाम मौत ही होती है.

बिकरू गांव में पुलिस पर हमले के बाद थाना चौबेपुर में 3 जुलाई को ही धारा 147/148/149/302/307/394/120बी भादंवि व 7 सीएलए एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया था. साथ ही विकास दुबे के साथ उस के गैंग का खात्मा करने के लिए लंबीचौड़ी टीम बनाई गई थी. इस टीम को जल्द से जल्द औपरेशन विकास दुबे को अंजाम तक पहुंचाने के आदेश दिए गए. पुलिस की कई टीमों ने इलैक्ट्रौनिक सर्विलांस के सहारे काम शुरू कर दिया. दूसरी तरफ पुलिस ने अगले 2 दिनों के भीतर विकास दुबे की गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपए का इनाम घोषित करने के बाद 3 दिन के भीतर उसे बढ़ा कर 5 लाख का इनामी बना दिया.

विकास दुबे के गांव बिकरू में बने किलेनुमा घर को बुलडोजर चला कर तहसनहस कर दिया गया था. गांव में विकास गैंग के दूसरे सदस्यों के घरों पर भी बुलडोजर चले. साथ ही विकास के गांव तथा लखनऊ स्थित घर में खड़ी कारों को बुलडोजर से कुचल दिया गया. पुलिस की छापेमारी में सब से पहले विकास के साथियों की गिरफ्तारियां और मुठभेड़ में मारे जाने का सिलसिला शुरू हुआ. विकास के मामा प्रेम प्रकाश और भतीजे अतुल दुबे को उसी दिन मार गिराने के बाद एसटीएफ ने सब से पहले कानपुर से विकास के एक खास गुर्गे दयाशंकर अग्निहोत्री को गिरफ्तार किया.

पुलिस अभियान उसी से मिली सूचना के बाद एसटीएफ ने 5 जुलाई को कल्लू को गिरफ्तार किया, जिस ने एक तहखाने और सुरंग में छिपा कर रखे हथियार बरामद करवाए. 6 जुलाई को पुलिस ने नौकर कल्लू की पत्नी रेखा तथा पुलिस पर हुए हमले में मददगार विकास के साढू समेत 3 लोगों को गिरफ्तार किया. 7 जुलाई को पुलिस ने विकास के गैंग में शामिल उस के 15 करीबी साथियों के पोस्टर जारी किए. इसी दौरान पुलिस को विकास की लोकेशन हरियाणा के फरीदाबाद में मिली. लेकिन एसटीएफ के वहां पहुंचने से पहले ही विकास गायब हो गया. लेकिन उस के 3 करीबी प्रभात मिश्रा, शराब की दुकान पर काम करने वाला श्रवण व उस का बेटा अंकुर पुलिस की गिरफ्त में आ गए.

8 जुलाई को एसटीएफ ने हमीरपुर में विकास के बौडीगार्ड व साए की तरह साथ रहने वाले उस के साथी अमर दुबे को मुठभेड़ में मार गिराया. उस पर 25 हजार का इनाम था. अमर दुबे की शादी 10 दिन पहले ही हुई थी. उस की पत्नी को भी पुलिस ने साजिश में शामिल होने के शक में गिरफ्तार कर लिया. पुलिस को सूचना मिली थी कि उस रात पुलिस पर हुए हमले में अमर भी शामिल था. उसी दिन चौबेपुर पुलिस ने विकास के एक साथी श्याम वाजपेई को मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किया. 9 जुलाई को एसटीएफ जब फरीदाबाद में गिरफ्तार अंकुर, श्रवण तथा कार्तिकेय उर्फ प्रभात मिश्रा को ट्रांजिट रिमांड पर कानपुर ला रही थी, तो रास्ते में पुलिस की गाड़ी पंक्चर हो गई.

मौका देख कर प्रभात मिश्रा ने एक पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन कर भागने की कोशिश की. प्रभात को पकड़ने के प्रयास में मुठभेड़ के दौरान एनकाउंटर में उस की मौत हो गई. उसी दिन इटावा पुलिस ने बिकरू गांव शूटआउट में शामिल विकास के एक और साथी 50 हजार के इनामी प्रवीण उर्फ बउआ दुबे को भी एनकाउंटर में मार गिराया. विकास के साथियों की ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां व एनकाउंटर हो रहे थे, लेकिन एसटीएफ को जिस विकास दुबे की तलाश थी, वह अभी तक पकड़ से बाहर था. फरीदाबाद के एक होटल से फरार होने के बाद पुलिस सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उसे पूरे एनसीआर में तलाश रही थी, जबकि विकास दुबे पुलिस को चकमा दे कर मध्य प्रदेश के उज्जैन पहुंच गया था.

वहां 9 जुलाई की सुबह उस ने नाटकीय तरीके से महाकाल मंदिर में अपनी पहचान उजागर कर दी और खुद को पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवा दिया. इस नाटकीय गिरफ्तारी की सूचना चंद मिनटों में मीडिया के जरिए न्यूज चैनलों के माध्यम से देश भर में फैल गई. उत्तर प्रदेश एसटीएफ की टीम उसी रात उज्जैन पहुंच गई. उज्जैन पुलिस ने बिना कानूनी औपचारिकता पूरी किए विकास दुबे को यूपी पुलिस की एसटीएफ के सुपुर्द कर दिया. विकास का अंतिम अध्याय  मगर इस बीच एमपी और यूपी पुलिस ने विकास दुबे से जो औपचारिक पूछताछ की थी, उस में उस ने खुलासा किया कि उसे डर था कि गांव बिकरू आई पुलिस टीम उस का एनकाउंटर कर देगी.

चौबेपुर थाने के उस के शुभचिंतक पुलिस वालों ने उसे यह इत्तिला पहले ही दे दी थी. तब उस ने अपने साथियों को बुला कर पुलिस को सबक सिखाने का फैसला किया. विकास दुबे ने यह भी बताया कि वह चाहता था कि मारे गए सभी पुलिस वालों के शव कुएं में डाल कर जला दिए जाएं, ताकि सबूत ही खत्म हो जाएं. इसीलिए उस ने पहले ही कई कैन पैट्रोल भरवा कर रख लिया था. विकास दुबे के साथियों ने शूटआउट में मारे गए 5 पुलिस वालों के शव कुएं के पास एकत्र भी करवा दिए थे, लेकिन जब तक वह उन्हें जला पाते तब तक कानपुर मुख्यालय से अतिरिक्त पुलिस बल आ गया और उन्हें भागना पड़ा.

यह बात सच थी, क्योंकि पुलिस को 5 पुलिस वालों के शव विकास के घर के बाहर कुएं के पास से मिले थे. विकास ने पूछताछ में बताया कि वह सीओ देवेंद्र मिश्रा को पसंद नहीं करता था. चौबेपुर समेत आसपास के सभी थानों के पुलिस वाले उस के साथ मिले हुए थे. लेकिन न जाने क्यों देवेंद्र मिश्रा हमेशा उस का विरोध करते थे. ताकत और घमंड के नशे में चूर कुछ लोग यह भूल जाते हैं कि कुदरत हर किसी को उस के गुनाहों की सजा इसी संसार में देती है. यूपी एसटीएफ की टीम विकास दुबे को ले कर 4 अलगअलग वाहनों से सड़क के रास्ते उज्जैन से कानपुर के लिए रवाना हुई. मीडिया चैनलों की गाडि़यां लगातार एसटीएफ की गाडि़यों का पीछा करती रहीं. हांलाकि एसटीएफ ने लोकल पुलिस की मदद से कई जगह इन गाडि़यों को चकमा देने का प्रयास किया.

10 जुलाई की सुबह 6 बजे के आसपास कानपुर देहात के बारा टोल प्लाजा पर एसटीएफ का काफिला आगे निकल गया, काफिले के पीछे चल रहे मीडियाकर्मियों की गाडि़यों को सचेंडी थाने की पुलिस ने बैरीकेड लगा कर रोक दिया. मीडियाकर्मियों ने पुलिस से बहस की तो कहा गया कि रास्ता अभी के लिए बंद कर दिया गया है. इस के साथ ही हाइवे पर बाकी वाहन भी रोक दिए गए थे. इस काफिले को रोके जाने के 15 मिनट बाद सूचना आई कि विकास दुबे को ले जा रही एसटीएफ की गाड़ी बारिश व कुछ जानवरों के सामने आने से कानुपर से 15 किलोमीटर पहले भौती में पलट गई. पता चला कि गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने एक पुलिसकर्मी की पिस्टल छीन कर भागने का प्रयास किया था. तब तक पीछे से दूसरी गाडियां भी पहुंच गईं और विकास दुबे का पीछा कर आत्मसर्मपण के लिए कहा गया, लेकिन वह नहीं रुका और पुलिस पर फायरिंग कर दी.

लिहाजा पुलिस की जवाबी काररवाई में वह घायल हो गया, उसे हैलट अस्पताल भेजा गया. लेकिन वहां पहुंचते ही डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. विकास दुबे आदतन खतरनाक अपराधी था, जिस के सिर पर कई लोगों की हत्या का आरोप था, ऐसे अपराधी की मौत से किसी को भी हमदर्दी नहीं हो सकती. लेकिन अहम सवाल यह है कि खाकी और खादी के संरक्षण में गैंगस्टर बने विकास दुबे का अंत होने के बाद क्या उन लोगों के खिलाफ कोई काररवाई होगी, जिन्होंने उस के हौसलों को खूनी हवा दी थी?

—कथा पुलिस के अभिलेखों में दर्ज मामलों और पीडि़तों व जनश्रुति के आधार पर एकत्र जानकारी पर आधारित

 

Bijnor News : जिस प्रेमी ने प्रेमिका के लिए प्लौट का नौमिनी बनाया, उसी ने ही ले ली प्रेमी की जान

Bijnor News : मुसकान और शारिक एकदूसरे से दिली मोहब्बत करते थे, ऐसी मोहब्बत कि शारिक ने मुसकान को अपने प्लौट का नौमिनी तक बना दिया था. एक मामले में शारिक के जेल जाने के बाद मुसकान ने उस के जिगरी दोस्त अनस से नजदीकियां बढ़ा लीं. इन दोनों की दोस्ती में फांस बनी मुसकान ने आखिर एक दिन…

दोपहर करीब एक बजे का समय था. मुसकान खाना खाने के बाद घर पर आराम कर रही थी. उस की नजर घड़ी पर गई तो बिस्तर से उठ कर फटाफट तैयार होने लगी. उस ने धानी रंग का टौप और काले रंग की स्किन टाइट जींस पहनी तो उस का खूबसूरत बदन और भी खूबसूरत लगने लगा. कपड़े पहनने के बाद जब उस ने आइने में अपने आप को निहारा तो खुशी से फूली नहीं समाई. यह उस की आदत में भी शुमार था कि रोज आइने के सामने अपने संगमरमरी बदन को देख कर एक बार दिल से मुसकराती थी. वह तैयार हो कर घर से उस स्थान की तरफ निकल गई, जहां वह रोज अपने प्रेमी शारिक उर्फ शेट्टी से मिलती थी. जब वह उस स्थान पर पहुंची तो शारिक वहां पहले से बैठा था. वह बेसब्री से उसी का इंतजार कर रहा था.

मुसकान चुपचाप शारिक के पीछे पहुंची और उस की आंखों को अपने हाथों से बंद कर लिया. यह देख कर पहले तो शारिक हड़बड़ाया लेकिन मुसकान के हाथों को छू कर वह जान गया कि वह कोई और नहीं बल्कि उस की मुसकान है. उस ने मुसकान के हाथों को अपनी आंखों से हटाया तो वह उस के सामने आ कर खड़ी हो गई. उस की खूबसूरती देख शारिक की आंखों में अलग तरह की चमक आ गई.

‘‘क्या बात है मुसकान, आज तो तुम बिजली गिरा रही हो.’’

‘‘धत्त! लगता है, आज तुम ने मुझे बेवकूफ बनाने का इरादा कर रखा है.’’

‘‘नहीं मुसकान, मैं तुम्हें बेवकूफ नहीं बना रहा. तुम तो हीरा हो और हीरे की चमक को सिर्फ जौहरी ही जान सकता है.’’

‘‘अच्छा जौहरी साहब, आप ने इस हीरे की पहचान कर ली हो तो अब जरा यह भी बता दीजिए कि यह हीरे की चमक है या कुछ और…’’ मुसकान उस से नजरें मिलाते हुए बोली.

‘‘यह खूबसूरती और चमक खालिस हीरे की ही हो सकती है. लेकिन इस जौहरी ने अगर अपना जौहर हीरे पर दिखा दिया तो इस हीरे की खूबसूरती और चमक दोगुनी हो जाएगी.’’ शारिक ने मुसकान की आंखों में आंखें डाल कर प्यार से कहा तो मुसकान को भी उस की बात की गहराई समझते देर नहीं लगी. मुसकान अपनी पलकें झुकाते हुए बोली, ‘‘इस हीरे की चाहत सिर्फ तुम हो.’’ इतना कह कर उस ने आस भरी नजरों से शारिक की तरफ देखा तो वह मुसकरा रहा था. शारिक ने मुसकान का हाथ अपने हाथों में लिया और बड़े विश्वास के साथ बोला, ‘‘मुसकान, हम दोनों की चाहत जरूर पूरी होगी.’’

शारिक के प्यार के जुनून को देख कर मुसकान खुश हो गई. मुसकान उत्तर प्रदेश के जनपद बिजनौर के थाना नगीना देहात के गांव हरजानपुर में रहने वाले नाजिम की बेटी थी. उस के 2 भाई थे, जो दूसरे शहर में काम करते थे. मुसकान परिवार में इकलौती बेटी थी, इसी नाते उसे घर में ज्यादा लाड़प्यार मिला. इसी प्यार दुलार ने मुसकान को बेलगाम बना दिया था. घर में मिली खुली छूट से वह बेपरवाह हो गई थी. मुसकान खूबसूरत थी. इस का इल्म उसे तब होता, जब वह आइने के सामने खड़ी होती. अपने आप को आइने में देख कर वह किसी हीरोइन से कम नहीं समझती थी. शुरू में तो मुसकान का मन पढ़ाई में खूब लगा, लेकिन जैसे ही उस के बदन पर सोलहवें साल का यौवन उतरा, पढ़ाई से उस का मन उचट गया और वह सतरंगी सपनों की दुनिया में खोई रहने लगी.

मुसकान में भी दूसरी लड़कियों की तरह अच्छे रहनसहन की ललक थी. वह एक सामान्य परिवार से जरूर थी लेकिन पूरी जिंदगी सुख और खुशी से गुजारना चाहती थी. बिजनौर के मोहल्ला भाटान कुम्हारों वाली गली में शमीम रहते थे. उन के 5 बेटे और एक बेटी थी. बेटी का विवाह हो चुका था. शमीम के सभी बेटे कमाखा रहे थे सिवाय शारिक के. शारिक चौथे नंबर का बेटा था. उसे सीधे तरीके से पैसे कमाना अच्छा नहीं लगता था. उसे अपराध की दुनिया लुभाती थी, जिस में एक झटके में मालामाल हो जाने के रास्ते थे. जैसी चाहत हो, इंसान वैसी ही संगत ढूंढता है. शारिक ने भी अपराध की दुनिया में कदम रखा तो उस के दोस्त भी वैसे ही बन गए. वह आपराधिक वारदातों में शरीक हुआ तो शमीम ने शारिक से किनारा कर लिया.

शारिक ने भी घर जाना बंद कर दिया. वह यारदोस्तों के साथ रहता. जब कभी जेल जाता तो उस के यारदोस्त ही उस की जमानत करा देते. वर्तमान में शारिक पर शहर कोतवाली में ही 7 मुकदमे दर्ज थे. शारिक का हरजानपुर गांव जाना होता था, वहीं उस का एक परिचित रहता था. वहां आनेजाने के दौरान शारिक की मुलाकात मुसकान से हुई थी. इस के बाद दोनों में दोस्ती हो गई. दोनों जबतब मिलने लगे. दिन में मुसकान घर पर अकेली होती थी. इसलिए वह उस के घर पर मिलने आने लगा. इन मुलाकातों में उसे पता चल गया कि मांबाप के काम पर जाने के बाद वह घर में अकेली रहती है. यह जान कर तो उसे जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई.

अब वह उसी समय उस के घर जाता, जब वह घर में अकेली होती. उस से खूब बातें करता, घुमाने ले जाता और उस की पसंद की चीजें खिलातापिलाता. जिस से मुसकान को भी उस का साथ अच्छा लगने लगा था. एक दिन शारिक जब मुसकान के घर पहुंचा तो मुसकान घर में अकेली थी. वह उसी समय नहा कर निकली थी. उस ने बदन पर सिर्फ एक हलकी मैक्सी डाल रखी थी. बाल गीले थे, इसलिए उसने अपना सिर तौलिए से ढक रखा था. उसी ने दरवाजा खोला. शारिक को उस ने अंदर आने को कहा लेकिन उस ने जैसे सुना ही नहीं, वह तो मुसकान के भीगे रूपसौंदर्य में खो सा गया था. उस का दिल कर रहा था कि वह आगे बढ़े और मुसकान को अपनी बांहों में भर ले.

शारिक की निगाहों का निशाना समझ कर मुसकान मुसकरा कर रह गई. फिर वह उसे झिंझोड़ते हुए बोली, ‘‘क्या बात है, कहां खो गए? अंदर भी आओगे या बाहर से ही लौटना है?’’

शारिक हड़बड़ाया, उस की तंद्रा भंग हुई तो एहसास हुआ कि वह अभी बाहर ही खड़ा हुआ है. वह बोला, ‘‘सौरी, क्या करूं, तुम इस समय कुछ ज्यादा ही खूबसूरत लग रही हो, इसलिए तुम्हारे बदन से नजरें हटने का नाम ही नहीं ले रही थीं.’’

‘‘मजाक मत करो, मैं जानती हूं कि मैं इतनी खूबसूरत नहीं लग रही.’’ मुसकान शारिक के मुंह से अपनी तारीफ सुन कर झेंप सी गई.

‘‘मैं सच कह रहा हूं मुसकान, तुम खूबसूरत तो हो ही, आज तो कयामत ढा रही हो.’’

घर के अंदर ले गई मुसकान मुसकान उसे ले कर घर के अंदर आ गई. शारिक उस से बोला, ‘‘देखो मुसकान, मेरी बात तुम्हें कुछ अजीब लग सकती है. मगर यह सच है कि पिछले काफी समय से तुम्हारे प्रति मेरी चाहत बढ़ती जा रही है. मुझे तुम से प्यार हो गया है. बताओ क्या तुम्हें मेरा प्यार स्वीकार है?’’

मुसकान ने मुसकराते हुए शारिक के हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, ‘‘हां शारिक, मुझे भी तुम से प्यार है. मुझे भी तुम बहुत अच्छे लगते हो.’’ कह कर मुसकान ने नजरें झुका लीं. मगर उस के शब्दों ने शारिक पर जादू सा असर दिखाया था. शारिक ने आगे बढ़ कर मुसकान को अपनी बांहों में भर लिया और दोनों मस्ती में एकदूसरे को बेतहाशा चूमने लगे. जब शारिक हद से आगे बढ़ने लगा तो मुसकान ने अपने तन को बेकाबू होने से रोका, साथ ही शारिक को भी हटा कर अलग कर दिया. वह अपनी धड़कनों और सांसों पर काबू करने का प्रयास करने लगी.

शारिक को यह अच्छा नहीं लगा, लेकिन उस ने बुरा नहीं माना. उस ने सोचा जब आज इतनी हद पार हो गई है तो किसी और दिन बाकी भी हो जाएगा. दूसरी तरफ मुसकान की धड़कनें और सांसें सामान्य स्थिति में आईं तो वह बोली, ‘‘प्लीज शारिक, इतना तक तो ठीक है लेकिन इस के आगे बढ़ने की कभी उम्मीद न करना और न ही कोशिश करना.’’

‘‘ठीक है, लेकिन जब हम प्यार करते हैं, हमारे दिल मिल चुके हैं तो शारीरिक मिलन में क्या दिक्कत है?’’

‘‘नहीं, जब तक मैं इस के लिए पूरी तरह तैयार नहीं होऊंगी, तब तक ऐसावैसा कुछ नहीं करूंगी.’’

मुसकान ने शारिक को कुछ इस तरह समझाया कि वह बुरा भी न माने और वह उसे अपनी जरूरतों को पूरा करने का जरिया बनाए रखे. शारिक मुसकान की जरूरतों का पूरापूरा खयाल रखने लगा. मुसकान ने जब पूरी तरह से शारिक को अपने ऊपर मेहरबान देखा तो एक दिन उस की चाहत को भी पूरा कर दिया. इस के बाद तो वह उस का पूरी तरह से दीवाना हो गया. मुसकान को बनाया नौमिनी शारिक ने शहर में एक प्लौट खरीद रखा था, दीवानगी में उस ने मुसकान को प्लौट का नौमिनी बना दिया. उस ने नोटरी से प्रमाणित एक शपथपत्र में मुसकान को लिख कर दे दिया कि अगर उसे कुछ हो जाता है तो उस प्लौट की मालकिन मुसकान होगी, वह उसे बेच भी सकती है.

इस शपथपत्र से मुसकान बहुत खुश हुई. खुशी की बात भी थी, क्योंकि वक्तबेवक्त वह प्लौट उस के बहुत काम आ सकता था’ इसी बीच शारिक लंबे समय के लिए जेल चला गया. मुसकान अकेली पड़ गई. शारिक के न होने से उस की शारीरिक और आर्थिक जरूरतें दोनों ही पूरी नहीं हो पा रही थीं. ऐसे में मुसकान की नजर इधरउधर पड़ने लगी. उसे अपनी नजर को दूर तक नहीं ले जाना पड़ा. शारिक का एक जिगरी दोस्त था अनस. अनस शहर कोतवाली के काजीपाड़ा मोहल्ले में रहता था. अनस भी आपराधिक प्रवृत्ति का था. उस पर नगीना देहात थाने में एनडीपीएस ऐक्ट और बाइक चोरी के 2 मुकदमे दर्ज थे.

दोस्ती के कारण हर गलत काम में दोनों एकदूसरे का साथ देते थे. दोनों ही नशे के भी आदी थे. अनस शारिक और मुसकान के प्रेम संबंध से पूरी तरह वाकिफ था. मुसकान भी अनस को बखूबी जानती थी. शारिक के न होने पर वह अनस की ही मदद लेने लगी. जब शारिक ने अनस को पहली बार मुसकान से मिलाया था तो अनस मुसकान को एकटक देखता रह गया था. मुसकान अनस से बड़े प्यार से पेश आने लगी. अपनी आंखों से अनस को उस की चाहत का दीदार कराने की कोशिश करने लगी. बातोंबातों और हंसीमजाक में उस के बदन से चिपकने लगी तो अनस को भी भांपते देर नहीं लगी कि मुसकान का मन बदल रहा है. जो वह चाहता था, उसे हकीकत में होता देख खुशी फूला नहीं समाया.

अब मुसकान की वजह से 2 दोस्तों की गहरी दोस्ती खतरे में आने वाली थी. वैसे भी अपराध की दुनिया में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता, मतलब और समय के हिसाब से सब कुछ बदलता रहता है. अनस मुसकान को पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार था. एक दिन जब मुसकान उस के कंधे पर सिर रख कर चाहत दर्शाने लगी तो अनस से रहा न गया, वह बोला, ‘‘तुम्हारा तनमन बहुत खूबसूरत है. तुम इतनी प्यारी हो कि तुम्हारी तसवीर मेरे छोटे से दिल में बस गई है. उस तसवीर को मैं हमेशा अपने दिल में बसाए रखना चाहता हूं. ऐसे में मेरा यह जानना जरूरी है कि तुम मेरे दिल और नजरों की चाहत को पूरा करने की तमन्ना रखती हो कि नहीं?’’

मुसकान अनस के खूबसूरत जज्बातों को बड़े ही प्यार से सुनसमझ रही थी. उस की बात सुन कर मुसकान बोली, ‘‘अनस, मैं भी तुम से यहीं कहना चाह रही थी लेकिन बारबार मेरे जज्बात सीने में कैद हो कर रह जाते थे. यह सोच कर कि कहीं तुम मेरे दिल की बात को न समझ पाए तो मैं अंदर से टूट जाऊंगी.

‘‘लेकिन आज तुम्हारी बातें सुन कर मेरे दिल को बहुत सुकून पहुंचा है. हम दोनों के विचार आपस में मिलते हैं, यह जान कर मुझे बेहद खुशी हुई है. मैं भी तुम्हारे साथ जिंदगी बिताने का सपना देख रही थी, जो आज सच हो गया.’’ भावविभोर हो कर मुसकान अनस के सीने से लग गई. मुसकान ने बदल दिया प्रेमी अनस ने भी उसे अपनी बांहों के घेरे में ले लिया. इस से दोनों ने राहत की सांस ली और एकदूसरे के प्यार की गरमी को नजदीक से महसूस किया. इस के बाद दोनों के बीच एक बार जो संबंध बने, वह बेरोकटोक बनने लगे. 21 जुलाई की सुबह 6 बजे का समय था. खेतों पर काम करने वाले मजदूर काम पर जाने लगे थे. थाना कीरतपुर क्षेत्र के मोहल्ला अफगानान के पश्चिम में वासित खां के आम के बाग में मजदूरों ने एक चारपाई पर किसी अज्ञात युवक की लाश पड़ी देखी.

मजदूरों ने यह सूचना मोहल्ले वालों को दी. मोहल्ले वालों ने जा कर देखा तो वाकई वहां किसी युवक की लाश पड़ी थी. लाश मिलने की सूचना कीरतपुर थाना पुलिस को दे दी गई. थाना इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र करीब 27-28 साल रही होगी. उस के माथे पर 3 गहरे घाव थे, जो किसी धारदार हथियार से किए गए मालूम हो रहे थे. कपड़ों की तलाशी लेने पर मृतक की जेब से जो आधार कार्ड मिला, उस से पता चला कि वह लाश शमीम के बेटे शारिक की है. इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार ने मृतक शारिक के घरवालों को घटना की सूचना भिजवा दी. फिर जरूरी काररवाई कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया और थाने वापस आ गए.

शारिक के पिता शमीम थाने आए तो उन की तरफ से अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. केस की जांच शुरू करते हुए इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार ने शमीम से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि डेढ़दो साल से शारिक घर नहीं आया था. वह अपने दोस्तों के साथ ही रहता था, जेल जाता था तो पता नहीं कौन लोग उस की जमानत कराते थे. इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार ने शारिक के जमानतदारों व दोस्तों का पता लगाया तो उन में से कुछ नाम शक के घेरे में आए. उन सब की डिटेल्स खंगाली गई तो उन में से अनस नाम के युवक पर उन का शक पुख्ता हो गया. अनस ही वह व्यक्ति था जो शारिक के सब से करीब था. दोनों हर काम साथ करते थे.

घटना वाले दिन की अनस के फोन की लोकेशन शारिक के साथ घटनास्थल की आ रही थी. शारिक और अनस की काल डिटेल्स में एक नंबर कौमन था, जिस पर दोनों की बातें होती थीं, उस नंबर से घटना की रात 12 बजे शारिक के नंबर पर काल भी की गई थी, शारिक ने बात भी की थी. जांच में वह नंबर मुसकान का निकला. शारिक की हत्या में दोनों का हाथ होने के पुख्ता सुबूत मिले तो इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार ने दोनों की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए. लेकिन दोनों ही घर से गायब थे. 25 जुलाई, 2020 की सुबह करीब सवा 5 बजे इंसपेक्टर सतेंद्र कुमार ने दोनों को मोतीचूर गेट के पास से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब सख्ती से पूछताछ की तो दोनों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया और हत्या की वजह भी बयां कर दी.

अनस और मुसकान के बीच के संबंध इतने मजबूत हो गए थे कि दोनों निकाह कर के एक साथ रहने की सोचने लगे थे. इन सब में सब से बड़ी अड़चन था शारिक. शारिक घटना से कुछ समय पहले ही एनडीपीएस के एक मामले में जमानत पर जेल से छूटा था. जब से वह आया था, दोनों खुल कर नहीं मिल पा रहे थे. मुसकान को आ गया लालच मुसकान अगर अनस के साथ रहती तो शारिक से मिलने वाला प्लौट उस के हाथ से चला जाता और शारिक भी उस की और अनस की जान का दुश्मन बन जाता. ऐसे में अनस के साथ मिल कर शारिक को ही अपने रास्ते से हटाने की योजना मुसकान ने बना ली.

शारिक के हटने से प्लौट और अनस दोनों ही उसे मिल जाने वाले थे. अनस को भी एक तरफ मुसकान मिलती तो दूसरी तरफ मुसकान की वजह से प्लौट भी उस का हो जाता, इसलिए वह अनस की हत्या करने को तैयार हो गया. दूसरी ओर शारिक को इस बात की भनक तक नहीं थी कि उस की प्रेमिका उस से बेवफाई और दोस्त दगाबाजी करने पर उतर आए हैं. 20-21 जुलाई की रात अनस ने शारिक के साथ शराब पी. उस ने खुद तो कम पी, शारिक को अधिक पिलाई. अनस उसे बातों में लगा कर कीरतपुर के मोहल्ला अफगानान में वासित खां के आम के बाग में ले गया.

रात 12 बजे मुसकान ने फोन किया तो शारिक ने मुसकान से बात की. उस के लगभग एक घंटे बाद नशे में बेसुध हो कर शारिक वहीं पड़ी चारपाई पर लुढ़क गया. अनस ने साथ लाए सब्बल से बेसुध पड़े शारिक के माथे पर 3 प्रहार किए, जिस से उस की मौत हो गई. इस के बाद अनस ने शारिक का मोबाइल जेब से निकाल लिया. फिर सब्बल और शारिक का मोबाइल छिपा कर घर लौट गया. पकड़े जाने के डर से वह मुसकान के साथ घर से फरार हो गया.

लेकिन उन का जुर्म छिप न सका और दोनों कानून की गिरफ्त में आ गए. अनस की निशानदेही पर शारिक का मोबाइल और हत्या में इस्तेमाल सब्बल बरामद कर लिया गया. इस के अलावा पुलिस ने मुसकान और अनस का मोबाइल, मुसकान का आधार कार्ड, शारिक का आधार कार्ड और शपथपत्र की छाया प्रति भी बरामद कर ली. कागजी खानापूर्ति पूरी करने के बाद दोनों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News : फिरौती नहीं दी तो गला दबाकर कर दी हत्या

Crime News : उत्तर प्रदेश में बढ़ रही आपराधिक घटनाएं बता रही हैं कि अपराधी अब बेलगाम हो चुके हैं. कानपुर, गोंडा और गोरखपुर में अपहरण के बाद हुई हत्याओं ने साबित कर दिया कि अब अपराधियों के दिल में पुलिस नाम का कोई डर नहीं है.  लगातार बढ़ रही घटनाओं से पुलिस भी शक के घेरे में आ रही है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद में 14 वर्षीय बलराम गुप्ता की अपहरण के बाद हुई हत्या से प्रदेश के लोगों में डर बैठ गया है. लोगों का सोचना है कि जब मुख्यमंत्री के जिले के लोग ही सुरक्षित नहीं हैं तो और लोग कैसे सुरक्षित रह सकते हैं.

गोरखपुर जिले के थाना पिपराइच के गांव जंगल छत्रधारी टोला मिश्रौलिया के रहने वाले बच्चे बलराम गुप्ता का जिस तरह अपहरण करने के बाद उस की हत्या कर दी गई, उस से पूरे क्षेत्र में सनसनी फैल गई. 5वीं कक्षा में पढ़ने वाला बलराम गुप्ता 26 जुलाई, 2020 को दोपहर 12 बजे खाना खा कर रोजाना की तरह घर से बाहर खेलने निकला. अपने दोस्तों के साथ खेलने के बाद वह अकसर डेढ़दो घंटे में घर लौट आता था, लेकिन उस दिन वह घर नहीं लौटा. उस की मां और बहन ने उसे आसपास ढूंढा, लेकिन बलराम के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. बलराम के पिता महाजन गुप्ता घर के पास में ही पान की दुकान चलाते थे. इस के अलावा वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम भी करते थे.

जब उन्हें पता लगा कि बलराम दोपहर के बाद से गायब है तो वह भी परेशान हो गए. करीब 3 बजे महाजन गुप्ता के मोबाइल फोन पर एक ऐसी काल आई जिस से घर के सभी लोग असमंजस में पड़ गए. फोन करने वाले ने कहा कि तुम्हारा बेटा बलराम हमारे कब्जे में है. अगर उसे जिंदा चाहते हो तो एक करोड़ रुपए का इंतजाम कर लो, अन्यथा बहुत पछताना पड़ेगा. यह खबर सुनते ही महाजन गुप्ता घबरा गए. उन्होंने अपहर्त्ता से कहा कि वह उन के बेटे का कुछ न करें. जैसा वे कहेंगे वैसा ही करने को तैयार हैं. बलराम अपनी 5 बहनों के बीच इकलौता भाई था, इसलिए वह घर में सभी का लाडला था. बलराम के अपहरण की जानकारी उस की मां और बहनों को हुई तो सभी परेशान हो गईं.

महाजन गुप्ता की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि वह एक करोड़ रुपए की व्यवस्था कर सकें, इसलिए वह यह सोचसोच कर परेशान हो रहे थे कि इतने पैसों का इंतजाम कहां से करें. उसी दौरान अपहर्त्ताओं ने उन्हें दोबारा फोन किया, ‘‘एक बात याद रखना पुलिस को सूचना देने की भूल मत करना…’’

‘‘नहींनहीं, मैं ऐसा हरगिज नहीं करूंगा. लेकिन आप जितने पैसे मांग रहे हैं, मेरे पास नहीं हैं. अगर कुछ कम कर लेंगे तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’ महाजन गुप्ता ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘इस बारे में हम 5 बजे के करीब फिर बात करेंगे. तब तक तुम पैसों का इंतजाम करो.’’ अपहर्त्ता ने कहा.

महाजन को लगा कि वह अपहर्त्ताओं द्वारा मांगी गई फिरौती का इंतजाम नहीं कर सकते, इसलिए उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को दे दी. बच्चे के अपहरण की सूचना मिलते ही थाना पपराइच पुलिस उसी समय महाजन के घर पहुंच गई. घर वालों से बातचीत करने के बाद पुलिस ने उन बच्चों से भी पूछताछ की, जिन के साथ बलराम अकसर खेला करता था. थाना पुलिस अभी यह जांच कर ही रही थी कि पुलिस को सूचना मिली कि गांव से 3-4 किलोमीटर दूर नहर में एक बच्चे की लाश पड़ी है. सूचना मिलने पर पुलिस महाजन गुप्ता को ले कर नहर पर पहुंच गई. नहर में मिली लाश बलराम की ही निकली, जिस की शिनाख्त महाजन ने कर ली.

बेटे की लाश देखते ही महाजन गुप्ता गश खा कर वहीं गिर गए. गांव में यह खबर फैली तो सभी सन्न रह गए. महाजन के घर में तो हाहाकार मच गया. गांव वाले समझ नहीं पा रहे थे कि प्रदेश में यह क्या हो रहा है. अपराधी बेलगाम हो कर वारदात पर वारदात कर रहे हैं और पुलिस कान में तेल डाले सो रही है. लिहाजा बलराम की हत्या के बाद ग्रामीणों में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ने लगा, जिस के बाद खबर मिलने पर जिला स्तर के पुलिस अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए. चूंकि मामला प्रदेश के मुख्यमंत्री के गृह जनपद का था, इसलिए मुख्यमंत्री को भी इस घटना की जानकारी मिल गई. उन्होंने मामले को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र ही केस का खुलासा करने के आदेश दिए.

मुख्यमंत्री के आदेश पर थाना पुलिस के अलावा क्राइम ब्रांच और एसटीएफ भी केस को खोलने में जुट गई. पुलिस टीमों ने सब से पहले महाजन गुप्ता से पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. महाजन ने जब दुश्मनी होने से इनकार कर दिया तो जांच टीमों ने उस फोन नंबर की जांच शुरू कर दी,जिस से महाजन के पास फिरौती की काल आई थी. उस फोन नंबर की जांच के सहारे पुलिस रिंकू नाम के उस शख्स के पास पहुंच गई, जिस ने वह सिम कार्ड फरजी आईडी पर दिया था. रिंकू ने बताया कि वह सिम उस ने दयानंद राजभर नाम के व्यक्ति को दिया था. रिंकू को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने  उस की निशानदेही पर दयानंद राजभर को भी गिरफ्तार कर लिया. उस ने स्वीकार कर लिया कि बलराम की हत्या में अजय चौहान और नितिन चौहान भी शामिल थे. उन्होंने फिरौती के चक्कर में उस की हत्या की थी.

बलराम की हत्या का केस लगभग खुल चुका था. अब केवल अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी बाकी थी. पुलिस टीमों ने अन्य अभियुक्तों की तलाश में संभावित स्थानों पर दबिश डालनी शुरू की. अगले दिन 27 जुलाई को पुलिस को सूचना मिली कि आरोपी अजय चौहान और नितिन उर्फ मुन्ना चौहान को हैदरगंज के गुलरिहा गांव में रहने वाले उन के एक रिश्तेदार ने कमरे में बंद कर लिया है. सूचना मिलने पर भारी तादाद में पुलिस गुलरिहा पहुंच गई और दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर थाने ले आई. अब तक पुलिस के हत्थे 5 आरोपी चढ़ चुके थे, जिन में 3 लोग बलराम के अपहरण और हत्या में शामिल थे और 2 पर फरजी कागजात के जरिए सिम कार्ड बेचने की बात सामने आई.

पूछताछ में अभियुक्तों ने बताया कि उन्हें खबर मिली थी कि महाजन गुप्ता प्रौपर्टी डीलिंग में अच्छी कमाई करते हैं. हाल ही में उन्होंने अपनी कोई जमीन अच्छे पैसों में बेची थी. मोटी फिरौती के लालच में उन्होंने उन के इकलौते बेटे बलराम का अपहरण किया था. बलराम का अपहरण करने के बाद वे उसे एक दुकान में ले गए थे और भेद खुलने के डर से उस की गला घोंट कर हत्या कर दी थी. फिर उस की लाश नहर में डाल आए थे. लाश ठिकाने लगाने के बाद आरोपी नितिन उर्फ मुन्ना चौहान और अजय चौहान गुलरिहा स्थित अपनी मौसी के घर छिपने के लिए पहुंचे. उन्होंने मौसी को सच्चाई बता दी. मौसी को इस बात का डर था कि कहीं उन के चक्कर में पुलिस एनकाउंटर कर के उस के बच्चों की जान न ले ले, इसलिए उन्होंने आत्मसमर्पण करने की सलाह दी.

दोनों आरोपियों को डर था कि आत्मसमर्पण के बाद भी पुलिस उन का एनकाउंटर कर सकती है. तब रिश्तेदारों ने पूरे गांव वालों के सामने उन का आत्मसमर्पण करने की योजना बनाई. अजय और नितिन को एक कमरे में बंद कर उन्होंने पुलिस को फोन कर दिया और जब पुलिस उन दोनों को गिरफ्तार कर ले जा रही थी तो उस समय पूरा गांव जमा हो गया था. 14 वर्षीय बलराम के अपहरण और हत्या के आरोप में पुलिस ने 5 अभियुक्तों को गिरफ्तारकर लिया. एसएसपी डा. सुनील गुप्ता ने लापरवाही बरतने के आरोप में एक दरोगा और 2 सिपाहियों को सस्पेंड कर दिया. उधर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बलराम गुप्ता की हत्या पर संवेदना व्यक्त की और उस के परिजनों को 5 लाख रुपए की सहायता राशि जिलाधिकारी के माध्यम से भिजवाई.

बलराम एक साल पहले एक रिश्तेदार के घर से रहस्यमय तरीके से लापता हो गया था, जिसे 4-5 दिन बाद पुलिस ने कुसमही के जंगल से बरामद किया था. लेकिन इस बार गायब होने पर उस की लाश मिली.

Extramarital Affair : कोल्‍ड ड्रिंक में नशीली गोलियां मिला कर पहले पति को पिलाया, फिर किया कत्‍ल

Extramarital Affair : महत्त्वाकांक्षी होना कोई गलत बात नहीं है. लेकिन उस के चक्कर में देहरी लांघ जाना ठीक नहीं. 2 बच्चों की मां गजाला इस बात को समझ जाती तो उस का पति शाहिद तो जीवित होता ही, साथ ही गजाला को भी जेल न जाना पड़ता…

10 जुलाई, 2020 की सुबह आगरा के महात्मा दूधाधारी इंटर कालेज के पास नगला कमाल के रास्ते पर एक युवक की लाश पड़ी थी. सूचना मिलते ही मौके पर गांव वाले पहुंच गए, भाजपा नेता उदय प्रताप भी वहां पहुंचे. उन्होंने इस की सूचना थाना खेरागढ़ पुलिस को दे दी. लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थानाप्रभारी अवधेश अवस्थी पुलिस टीम के मौके पर पहुंच गए. वहां पहुंच कर उन्होंने फौरेंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया. इस के बाद थानाप्रभारी ने लाश का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 28 से 30 वर्ष के बीच रही होगी. उस के गले पर किसी तेज धारदार हथियार के निशान थे.

कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस की पैंट की जेब में आधार कार्ड मिला. आधार कार्ड मृतक का ही था. उस में उस का नाम शाहिद खान लिखा था. पता कटघर ईदगाह, आगरा लिखा था. इस के अलावा कोई साक्ष्य नहीं था. आधार कार्ड को जाब्ते में लेने के बाद थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी. फिर थाने वापस लौट आए. पुलिस ने इस की सूचना मृतक के घरवालों को दे दी. शाहिद की हत्या की खबर मिलते ही घर में हाहाकार मच गया. घर वाले थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी अवस्थी ने उन से पूछताछ की तो पता चला मृतक शाहिद खान खुद का टैंपो चलाता था.

4 साल से वह पत्नी गजाला और 2 बच्चों के साथ रैना नगर, धनौली में किराए पर रह रहा था. उन से पूछताछ के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी अवधेश अवस्थी मृतक के घर गए तो घर पर शाहिद की पत्नी गजाला मिली. पूछने पर उस ने बताया कि एक दिन पहले यानी 9 जुलाई की शाम शाहिद टैंपो ले कर निकला था, तब से वापस नहीं आया. थाने लौटने के बाद थानाप्रभारी अवस्थी ने मामले पर विचार किया कि कहीं शाहिद की हत्या की वजह लूटपाट तो नहीं है, क्योंकि उस का टैंपो भी नहीं मिला था. लेकिन अगले ही पल दिमाग में आया कि हत्या लूट के लिए की गई होती तो लुटेरे लाश को इतना दूर क्यों फेंकते.

इंसपेक्टर अवस्थी ने दिमाग पर जोर दिया तो उन्हें शाहिद की पत्नी गजाला की हरकतें कुछ अटपटी लगीं. जब वह शाहिद के घर गए थे तो गजाला घबराई हुई थी. वह रो तो रही थी लेकिन उस की आंखें बराबर इधरउधर चल रही थीं. वह बराबर पुलिस की गतिविधि पर नजर रख रही थी. थानाप्रभारी को गजाला पर शक हुआ तो उन्होंने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर था, जिस पर वह रोजाना बातें करती थी. वह नंबर रैना नगर के ही रहने वाले राहुल हुसैन का था. इस के बाद सर्विलांस टीम की मदद ली गई. सर्विलांस टीम ने जांच की तो पता चला घटना वाले दिन 9 जुलाई की शाम को राहुल हुसैन शाहिद खान के साथ था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने 12 जुलाई को राहुल हुसैन को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के दोस्त इमरान को भी उठा लिया. दोनों से पूछताछ के बाद गजाला को उस के घर से गिरफ्तार किया गया. तीनों से जब पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. 30 वर्षीय शाहिद खान आगरा के खेरागढ़ के कटघर ईदगाह (रकाबगंज) मोहल्ले में रहने वाले हबीब खान का बेटा था. 2 भाइयों में सब से बड़ा शाहिद अपना खुद का टैंपो चलाता था. 8 साल पहले शाहिद का निकाह रैना नगर, धनौली (मलपुरा) में रहने वाली गजाला के साथ हुआ था. शाहिद गजाला जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर बहुत खुश था. जबकि सांवले रंग के साधारण शौहर शाहिद से गजाला खुश नहीं थी.

दरअसल गजाला ने अपने मन में जिस तरह शौहर की कल्पना की थी, शाहिद वैसा नहीं था. गजाला ने सपना संजो रखा था कि उस का शौहर हैंडसम और सुंदर होगा. जबकि शाहिद उस की अपेक्षाओं के बिलकुल विपरीत था. गजाला अपने हिसाब से उसे मौडर्न बनाने की कोशिश भी करती, शाहिद फैशनेबल कपड़े पहनता भी तो उस पर वे जंचते नहीं थे, वह रंगरूप से मात खा जाता था. गजाला मन मसोस कर रह जाती. इसी चक्कर में वह कुंठित और चिड़चिड़ी हो गई. वह बातबात में शाहिद से झगड़ने लगती थी. उस की यह आदत सी बन गई थी. पतिपत्नी के रोजरोज के झगड़ों से शाहिद के घरवाले परेशान रहने लगे. इस सब के चलते गजाला एक बेटा और एक बेटी की मां बन गई. 4 साल पहले शाहिद रैना नगर, धनौली में ससुराल के पास किराए पर कमरा ले कर रहने लगा.

शाहिद सुबह टैंपो ले कर निकल जाता तो देर रात घर लौटता था. उस के चले जाने के बाद चंचल हसीन और खूबसूरत गजाला को रोकनेटोकने वाला कोई नहीं था. उस का मन नहीं लगता तो वह बनसंवर कर घर से निकल कर ताकझांक करने लगती. चूंकि पास में ही उस का मायका था, इसलिए वह कुछ देर के लिए मायके चली जाती थी. गजाला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की महत्त्वाकांक्षा उसे चंचल बना रही थी, मर्यादा हनन करने को उकसा रही थी. रैना नगर में ही राहुल हुसैन रहता था. वह अपने मांबाप की एकलौती संतान था. देखने में स्मार्ट और अविवाहित. गजाला जब उस के मोहल्ले में पति के साथ रहने आई, तभी उस की नजर गजाला पर पड़ चुकी थी. उसे गजाला का रूपसौंदर्य पहली नजर में ही भा गया था.

गजाला राहुल से परिचित थी. शाहिद के घर न होने पर राहुल उसके पास पहुंचने लगा. गजाला को उस से बात करना अच्छा लगता था. चंद मुलाकातों में दोनों के बीच काफी नजदीकियां हो गईं. राहुल और गजाला में हंसीमजाक भी होने लगी. गजाला राहुल के मजाक का बिलकुल बुरा नहीं मानती थी.  राहुल बातूनी था, इसलिए वह भी उस से खूब बतियाती थी. दरअसल गजाला के दिल में राहुल के प्रति चाहत पैदा हो गई थी.  राहुल जब भी उस के रूपसौंदर्य की तारीफ करता तो गजाला के शरीर में तरंगें उठने लगती थीं. 2 बच्चों की मां बनने के बाद गजाला का गदराया यौवन और रसीला हो गया था. आंखों में मादकता छलकती थी.

एक दिन राहुल ने उस के हुस्न और जिस्म की तारीफ  की तो वह गदगद हो गई. फिर वह बुझे मन से बोली, ‘‘ऐसी खूबसूरती किस काम की, जिस पर शौहर ध्यान ही न दे.’’

राहुल को गजाला की ऐसी ही किसी कमजोर नस की ही तलाश थी. जैसे ही उस ने पति की बेरुखी का बखान किया, राहुल ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘तुम क्यों चिंता करती हो, हीरे की परख जौहरी ही करता है. आज से तुम्हारे सारे दुख मेरे हैं और मेरी सारी खुशियां तुम्हारी.’’

राहुल की लच्छेदार बातों ने गजाला का मन मोह लिया. वह उस की बातों और व्यक्तित्व की पूरी तरह कायल हो गई. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. मन बेकाबू होने लगा तो गजाला ने थरथराते होठों से कहा, ‘‘अब तुम जाओ. उन के आने का समय हो गया है. कल दोपहर में आना, मैं इंतजार करूंगी.’’

राहुल ने वह रात करवटें बदलते काटी. सारी रात वह गजाला के खयालों में डूबा रहा. सुबह वह देर से जागा. दोपहर तक सजसंवर कर वह गजाला के घर पहुंचा. गजाला उसी का इंतजार कर रही थी. उस ने उस दिन खुद को विशेष ढंग से सजायासंवारा था. राहुल ने पहुंचते ही गजाला को अपनी बांहों में समेट लिया, ‘‘आज तो तुम हूर लग रही हो.’’

‘‘थोड़ा सब्र से काम लो. इतनी बेसब्री ठीक नहीं होती.’’ गजाला ने मुसकरा कर कहा, ‘‘कम से कम दरवाजा तो बंद कर लो, वरना किसी आनेजाने वाले की नजर पड़ गई तो हंगामा हो जाएगा.’’

राहुल ने फौरन कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. जैसे ही उस ने अपनी बांहें फैलाईं तो गजाला उन में समा गई. राहुल के तपते होंठ गजाला के नर्म और सुर्ख अधरों पर जम गए. इस के बाद एक शादीशुदा औरत की पवित्रता, पति से वफा का वादा सब कुछ जल कर स्वाहा हो गया. अवैध संबंधों का यह सिलसिला एक बार शुरू हुआ तो फिर रुकने का नाम नहीं लिया. ऐसी बातें समाज की नजरों से कब तक छिपी रह सकती हैं. शाहिद की गैरमौजूदगी में राहुल का उस के कमरे पर बने रहना पड़ोसियों के मन में शक पैदा कर गया. किसी पड़ोसी ने यह बात शाहिद के कान में डाल दी. यह सुन कर उस पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा.

बीवी के बारे में ऐसी बात सुन कर शाहिद परेशान हो गया. उस का काम से मन उचट गया. बड़ी मुश्किल से शाम हुई तो वह घर लौट आया. गजाला को पता नहीं था कि उस के शौहर को उस की आशनाई के बारे में पता चल गया है. वह खनकती आवाज में बोली, ‘‘क्या बात है, आज बड़ी जल्दी घर लौट आए.’’

‘‘सच जानना चाहती हो तो सुनो. तुम जो राहुल के साथ गुलछर्रे उड़ा रही हो, मुझे सब पता चल गया है.’’ शाहिद ने बड़ी गंभीरता से कहा, ‘‘अब तुम्हारी भलाई इसी में है कि मुझ से बिना कुछ छिपाए सब कुछ सचसच उगल दो. उस के बाद मैं तुम्हें बताऊंगा कि तुम्हारा क्या करना है.’’

गजाला शौहर की बात सुन कर अवाक रह गई. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक न एक दिन शाहिद को सब पता चल जाएगा. भय के मारे उस का चेहरा उतर गया. वह घबराए स्वर में कहने लगी, ‘‘जिस ने भी तुम से मेरे बारे में यह सब कहा है, वह झूठा है. लोग हम से जलते हैं, इसलिए किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं.’’

गजाला ने जान लिया था कि अब त्रियाचरित्र दिखाने में ही उस की भलाई है. वह भावुक स्वर में बोली, ‘‘मैं कल भी तुम्हारी थी और आज  भी तुम्हारी हूं. कोई दूसरा मेरा बदन छूना तो दूर मेरी ओर देखने की हिम्मत भी नहीं कर सकता.

‘‘तुम मुझ पर यकीन करो. तुम ने जो कुछ सुना है, वह सिर्फ अफवाह है. कुछ लोग मेरे पीछे पड़े हैं, वह मुझे हासिल नहीं कर सके तो हमारे बीच आग लगा कर हमारा जीना हराम करना चाहते हैं.’’

आखिरकार गजाला की बातों से शाहिद को लगा कि वह सच कह रही है. उस ने गजाला पर यकीन कर लिया. घर में कुछ दिन और शांति बनी रही. फिर एकदो लोगों ने टोका, ‘‘शाहिद, तुम दिन भर बाहर रहते हो, देर रात को लौटते हो. इस बीच गजाला किस के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है, तुम्हें क्या मालूम, अब भी समय है, चेत जाओ वरना ऐसा न हो कि किसी दिन तुम्हें पछताना पड़े.’’

शाहिद को उन की बात समझ में आ गई. वह जान गया कि धुंआ तभी उठता है, जब कहीं आग लगती है. उस ने गजाला को चेतावनी दी कि अब कभी उस ने कोई गलत काम किया तो अंजाम अच्छा नहीं होगा. अच्छा हुआ भी नहीं. कोई न कोई गजाला की खबर उस तक पहुंचा देता था, इस से आजिज आ कर शाहिद गजाला के साथ झगड़ा और मारपीट करने लगा. घटना से 6 दिन पहले गजाला की बहन तनु की शादी थी. शाहिद ने शादी के बाद भी गजाला को पीटा. गजाला पति से परेशान हो चुकी थी. उस ने फोन पर रोतेरोते यह बात राहुल को बताई. वैसे भी गजाला राहुल से निकाह कर के उस के साथ रहने का मन बना चुकी थी.

राहुल भी यही चाहता था. ऐसे में राहुल ने शाहिद को रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया. गजाला को उस ने बताया तो उस ने भी अपनी सहमति दे दी. शाहिद की हत्या करने के लिए राहुल ने अपने दोस्त इमरान को भी शामिल कर लिया. वह उसी मोहल्ले में रहता था.  9 जुलाई, 2020 की देर शाम को राहुल ने शाहिद का टैंपो भाड़े पर बुक किया और उसे सब्जी मंडी बुलाया. वहां राहुल इमरान के साथ पहले से मौजूद था. शाहिद के वहां पहुंचने पर राहुल ने उसे कोल्ड ड्रिंक पिलाई, जिस में उस ने नशीली गोलियों का पाउडर मिला दिया था. कोल्ड ड्रिंक पी कर शाहिद बेहोश हो गया. दोनों ने उसे टैंपो की पिछली सीट पर लिटा दिया. इमरान टैंपो चलाने लगा.

दोनों बेहोश हुए शाहिद को दूधाधारी इंटर कालेज के पास ले गए. वहां दोनों ने तेज धारदार चाकू से शाहिद का गला रेत कर उस की हत्या कर दी और उस की लाश वहीं फेंक कर फरार हो गए. लेकिन आखिरकार कानून की गिरफ्त में आ ही गए. राहुल और इमरान की निशानदेही पर पुलिस ने आलाकत्ल चाकू और शाहिद का टैंपो भी बरामद कर लिया. इस के बाद कानूनी लिखापढ़ी कर के गजाला, राहुल और इमरान को न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों को जेल भेज दिया गया़

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Murder Story : प्रेमी के साथ मिलकर किया शौहर का कत्ल

Murder Story : लतीफ से निकाह हो जाने के बाद अजमेरिन को मायके के प्रेमी तेजपाल से संबंध खत्म कर देने चाहिए थे. लेकिन उस ने ऐसा नहीं किया. बल्कि वह प्रेमी तेजपाल को अपनी ससुराल में भी बुलाने लगी. इस का नतीजा इतना खतरनाक निकला कि…

9 अप्रैल की सुबह 5 बजे अजमेरिन की चीख और रोनेपीटने की आवाज सुन कर घर वाले तथा पड़ोसी आ गए. उस ने अपने ससुर साबिर अली को बताया कि उस के शौहर लतीफ को किसी ने रात में मार डाला है. बेटे की हत्या की बात सुन कर साबिर अली अवाक रह गए. इस के बाद तो बेहटा गांव में कोहराम मच गया. अजमेरिन को ले कर गांव में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. कुछ लोग दबी जुबान से तो कुछ खुल कर अजमेरिन को ही दोषी ठहरा रहे थे. घर वालों को भी अजमेरिन पर ही शक था. कुछ देर बाद साबिर अली थाना ठठिया पहुंचे. उस समय थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह थाने पर मौजूद थे. उन्होंने अधेड़ उम्र के व्यक्ति को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘बताइए, कैसे आना हुआ और इतने घबराए हुए क्यों हो?’’

‘‘साहब, मेरा नाम साबिर अली है. मैं गांव बेहटा का रहने वाला हूं. बीती रात किसी ने मेरे बेटे लतीफ की हत्या कर दी. वह 20 दिन पहले ही हैदराबाद से गांव लौटा था.’’

हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह चौंके. उन्होंने साबिर अली से पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे लतीफ की हत्या किस ने और क्यों की होगी? क्या उस की गांव में किसी से कोई दुश्मनी या लेनदेन का लफड़ा था?’’

‘‘साहब, लतीफ बहुत सीधासादा था. गांव में उस की न तो किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से लेनदेन का लफड़ा था. पर मुझे एक आदमी पर गहरा शक है.’’

‘‘किस पर?’’ शैलेंद्र सिंह ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘लतीफ की बीवी अजमेरिन पर.’’ साबिर अली ने बताया.

‘‘वह कैसे?’’ थाना प्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, लतीफ की बीवी अजमेरिन का चरित्र ठीक नहीं है. वह मायके के यार तेजपाल को घर बुलाती थी. तेजपाल को ले कर मियांबीवी में झगड़ा होता था. मुझे शक है कि अजमेरिन ने ही अपने प्रेमी तेजपाल के साथ मिल कर मेरे बेटे को मार दिया है. अब वह पाकीजा बनने का नाटक कर रही है.’’

अवैध संबंधों में हुई हत्या का पता चलते ही थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह ने इस वारदात से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया और फिर पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पहुंच गए. उस समय लौकडाउन की वजह से इक्कादुक्का लोग ही मौजूद थे. पुलिस को देख कर शौहर के शव के पास बैठी अजमेरिन छाती पीटपीट कर रोने लगी. अजमेरिन रो जरूर रही थी, पर उस की आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे. शैलेंद्र सिंह को समझते देर नहीं लगी कि अजमेरिन रोने का ड्रामा कर रही है. फिर भी सहानुभूति जताते हुए उन्होंने उसे शव से दूर किया और निरीक्षण कार्य में जुट गए. मृतक लतीफ का शव घर के बाहर बरामदे में तख्त पर पड़ा था. उस के शरीर पर चोटों के निशान थे. देखने से ऐसा लग रहा था कि हत्या गला दबा कर की गई थी. उस की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी और वह शरीर से हृष्टपुष्ट था.

थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह अभी जांच कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद, एएसपी विनोद कुमार तथा सीओ सुबोध कुमार जायसवाल घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया फिर मृतक की बीवी अजमेरिन से पूछताछ की. अजमेरिन ने बताया कि बीती रात 9 बजे उस ने शौहर के साथ बैठ कर खाना खाया था. कुछ देर दोनों बतियाते रहे, उस के बाद वह घर के बाहर बरामदे में जा कर तख्त पर सो गए. इस के बाद रात में किसी ने उन की हत्या कर दी. कैसे और कब, इस बारे में उसे नहीं मालूम. सुबह जब वह सो कर उठी और साफसफाई करते हुए बरामदे में पहुंची तो उन्हें मृत पाया. पति को इस हालत में देख कर वह चीखीचिल्लाई तो ससुर व पड़ोसी आ गए. ससुर ने पुलिस को सूचना दी तो पुलिस आ गई.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के वालिद साबिर अली से बात की तो उस ने लतीफ की बीवी अजमेरिन पर शक जताया कि वह चरित्र की खोटी है. पुलिस अधिकारी पक्के सबूत के बिना अजमेरिन को गिरफ्तार नहीं करना चाहते थे. इसलिए घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल कन्नौज भिजवा दिया गया. साथ ही थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद काररवाई करें. 10 अप्रैल की शाम 5 बजे थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को लतीफ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट के मुताबिक लतीफ की हत्या गला घोंट कर की गई थी. हत्या के पहले उस के साथ मारपीट भी हुई थी. उस के हाथों व पैरों पर गंभीर चोटों के निशान थे.

भोजन पचा पाया गया, जिस से अनुमान लगाया कि हत्या रात 12 बजे के बाद हुई थी. जहर की आशंका को देखते हुए विसरा को सुरक्षित कर लिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद शैलेंद्र सिंह दूसरे रोज सुबह 10 बजे मृतक की बीवी अजमेरिन से पूछताछ करने उस के गांव बेहटा पहुंचे लेकिन वहां दरवाजे पर ताला लटक रहा था. उन्होंने मृतक के पिता साबिर अली से पूछा, तो उन्होंने बताया कि अजमेरिन घर में ताला डाल कर फरार हो गई है. संभव है, वह अपने मायके चली गई है. उस का मायका कानपुर देहात जनपद के रसूलाबाद थाना अंतर्गत गांव सहवाजपुर में है. उसी गांव में उस का आशिक तेजपाल भी रहता है.

अजमेरिन के फरार होने से थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को पक्का यकीन हो गया कि लतीफ की हत्या में उस का ही हाथ है. उसी ने अपने आशिक के साथ मिल कर शौहर की हत्या की है. अत: अजमेरिन और उस के आशिक को पकड़ने के लिए शैलेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ थाना रसूलाबाद पहुंच गए. वहां की पुलिस की मदद से उन्होंने गांव सहवाजपुर में अजमेरिन व तेजपाल के घर छापा मारा. लेकिन वह दोनों अपनेअपने घर में नहीं थे. तेजपाल के पिता ओमप्रकाश ने बताया कि तेजपाल 8 अप्रैल की सुबह मोटरसाइकिल ले कर घर से निकला था, तब से वह वापस नहीं आया. जबकि अजमेरिन के घर वालों ने बताया कि वह मायके आई ही नहीं है.

तेजपाल व अजमेरिन को पकड़ने के लिए थानाप्रभारी ने तमाम संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों पकड़ में नहीं आए. इस बीच उन्होंने उन के घर वालों से भी सख्ती से पूछताछ की, लेकिन उन का पता नहीं चला. इस पर थानाप्रभारी ने अपने खास मुखबिरों का जाल फैला दिया. 14 अप्रैल की सुबह 8 बजे एक मुखबिर ने थाने आ कर थानाप्रभारी को बताया कि अजमेरिन अपने आशिक तेजपाल के साथ नेरा पुल के पास मौजूद है. दोनों शायद किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में है. मुखबिर की इस सूचना पर शैलेंद्र सिंह सक्रिय हुए और पुलिस बल के साथ नेरा पुल के पास पहुंच गए. पुल पर उन्हें कोई नजर ही नहीं आया.

निरीक्षण करते हुए पुलिस जब पुल के नीचे पहुंची तो वहां एक युवक और एक युवती मिले. पुलिस को देख कर दोनों ने भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने घेराबंदी कर दोनों को पकड़ लिया. थाना ठठिया ला कर जब उन से पूछताछ  की गई तो युवक ने अपना नाम तेजपाल बताया. जबकि युवती ने अपना नाम अजमेरिन बताया. उन से जब लतीफ की हत्या के संबंध में पूछा गया तो दोनों साफ मुकर गए. लेकिन जब पुलिस ने अपना असली रंग दिखाया तो दोनों टूट गए और हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. यही नहीं उन्होंने हत्या में इस्तेमाल अंगौछा और डंडा भी बरामद करा दिया जिसे उन्होंने घर में छिपा दिया था. अजमेरिन ने बताया कि तेजपाल से उस के संबंध निकाह से पूर्व से थे. जो निकाह के बाद भी बने रहे.

उस का शौहर इन नाजायज ताल्लुकात का विरोध करता था और मारपीट और झगड़ा करता था. शौहर की शराबखोरी और मारपीट से आजिज आ कर उस ने तेजपाल के साथ मिल कर शौहर की हत्या की योजना बनाई. फिर 8 अप्रैल की रात उस के साथ मारपीट की और गला घोंट कर मार डाला. अजमेरिन की बात का तेजपाल ने भी समर्थन किया. थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह ने लतीफ हत्याकांड का परदाफाश करने और उस के कातिलों को पकड़ने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो वह थाना ठठिया आ गए. उन्होंने हत्यारोपियों से खुद पूछताछ की. फिर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने आननफानन प्रैसवार्ता बुलाई और हत्यारोपियों को मीडिया के सामने पेश कर घटना का खुलासा किया.

चूंकि हत्यारोपियों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था. इसलिए शैलेंद्र सिंह ने मृतक के पिता साबिर अली को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत तेजपाल व अजमेरिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई और दोनों को विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक ऐसी औरत की कहानी सामने आई जिस ने देह सुख के लिए शौहर का कत्ल करा दिया. उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर (देहात) के रसूलाबाद थाना अंतर्गत ककवन रोड पर एक गांव है सहवाजपुर. हिंदूमुसलिम की मिलीजुली आबादी वाला यह गांव पूरी तरह से विकसित है. सड़क मार्ग से जुड़ा होने के कारण गांव में दिन भर चहल पहल रहती है.

यहां के ज्यादातर लोग या तो खेती करते हैं या फिर व्यवसाय. हफ्ते में हर बुधवार को यहां साप्ताहिक बाजार भी लगता है, जिस में आसपास के गांव के लोग आते हैं. नूर आलम अपने परिवार के साथ इसी सहवाजपुर गांव में रहता था. उस के परिवार में बीवी खालिदा बेगम, 2 बेटियां अनीसा, अजमेरिन और बेटा ताहिर था. नूर आलम जूताचप्पल बेचने का काम करता था. इस काम में उस का बेटा ताहिर भी मदद करता था. इसी धंधे से उस के परिवार का भरणपोषण आसानी से हो जाता था. बड़ी बेटी अनीसा का निकाह इरशाद के साथ कर दिया. इरशाद रसूलाबाद कस्बे में रहता था और फल बेचता था. अनीसा शौहर के साथ खुशहाल थी.

नूर आलम की बेटी अजमेरिन भाईबहनों में सब से छोटी थी. वह 5 जमात के आगे न पढ़ सकी. वह मां के साथ चौकाचूल्हा में हाथ बंटाने लगी थी. गोरा चेहरा, नशीली आंखें और सुर्ख होठों पर कंपन लिए अजमेरिन जब मस्तानी चाल से घर से बाहर निकलती तो जवान युवकों की धड़कनें बढ़ जाती थीं. वह उसे देख कर फब्तियां कसते थे. उन की चुभती नजरें अजमेरिन को रोमांच से भर देती थीं. अजमेरिन के वैसे तो कई दीवाने थे, लेकिन 4 घर दूर रहने वाला तेजपाल उसे कुछ ज्यादा ही चाहता था. तेजपाल के पिता ओमप्रकाश किसान थे. उन के 3 बच्चों में तेजपाल सब से छोटा था.

घर के बाहरी छोर पर उन की जनरल स्टोर की दुकान थी, जिस पर तेजपाल बैठता था. उन का बड़ा बेटा कानपुर शहर में नौकरी करता था, जबकि बेटी की शादी हो चुकी थी. पड़ोस में रहने के कारण अजमेरिन और तेजपाल का आमनासामना अकसर हो जाता था. तेजपाल जहां अजमेरिन के रूप का दीवाना था, तो अजमेरिन भी तेजपाल के कुशल व्यवहार से प्रभावित थी. दोनों हंसबोल लेते थे. अजमेरिन 20 साल की हो चुकी थी. उस के युवा तन में तरंगें उठने लगी थीं. तेजपाल भी 22 वर्ष की उम्र का बांका जवान था. उस की रातें भी बेचैनी से बीतती थीं. अजमेरिन जब भी उस की दुकान पर आती, तो तेजपाल उस के यौवन को निहारता रह जाता था.

उसे इस तरह देखते देख अजमेरिन उसे मुसकरा कर देखती और हया से सिर झुका लेती. मोहब्बत का बीज शायद दोनों के मन में पड़ चुका था. धीरेधीरे यह सिलसिला सा बन गया. जब भी अजमेरिन तेजपाल के सामने पड़ती, लाज से उस के गाल सुर्ख हो जाते. तेजपाल मंदमंद मुसकराते हुए उसे देखता तो वह और भी शरमा जाती. एक रोज एकांत पा कर अजमेरिन ने पूछ ही लिया, ‘‘मुझे देख कर यूं शरारत से क्यों मुसकराते हो?’’

‘‘इसलिए कि सीधीसादी अजमेरिन के हुस्न का खजाना मेरी आंखों में बस गया है.’’ तेजपाल ने कह दिया.

‘‘धत्त,’’ अजमेरिन ने तिरछी चितवन से उसे देखा और शरमा कर चली गई.

अब दोनों की निगाहें एकदूजे से कुछ कहने लगीं. एक रोज अजमेरिन तेजपाल की दुकान पर गई तो दुकान बंद थी. वह घर के अंदर गई तो तेजपाल खाना बना रहा था. दरअसल तेजपाल की मां बीमार थी, पिता उसे डाक्टर को दिखाने गए थे. अजमेरिन को शरारत सूझी तो वह बोली, ‘‘अपने हाथों से चपातियां ठोकते हो, शादी क्यों नहीं कर लेते?’’

‘‘चलो, तुम्हें मेरी परेशानी देख कर रहम तो आया,’’ तेजपाल ने ठंडी सांस छोड़ी, ‘‘जब तुम जैसी कोई हसीना मिलेगी, ब्याह रचा लूंगा.’’

अजमेरिन के गालों पर गुलाब खिल गए. उस ने उसे तिरछी चितवन से निहारा और बिना जवाब दिए मुड़ कर जाने लगी. तेजपाल ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘मेरा चैन ओ करार छीन कर मुसकराती हो’’?

‘‘तुम ने भी तो मेरी रातों की नींद छीन रखी है.’’ अजमेरिन ने कहा.

दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ी तो दोनों मिलन का अवसर ढूंढने लगे. उन्हें यह मौका जल्द ही मिल गया. उस रोज अजमेरिन के घर वाले रिश्तेदार के घर गए थे और वह घर में अकेली थी. अजमेरिन ने ही तेजपाल को घर सूना होने की बात बता कर मिलन की राह सुझाई थी. दोपहर के समय दुकान बंद कर तेजपाल, अजमेरिन के घर पहुंचा. उस समय वह उसी का इंतजार कर रही थी. तेजपाल ने धीरे से दरवाजा अंदर से बंद किया फिर अजमेरिन के पास आ कर उसे बांहों में भर लिया और शारीरिक छेड़छाड़़ करने लगा. तेजपाल के इरादे को भांप कर अजमेरिन ने दिखावे के तौर पर विरोध किया, और बोली, ‘‘हंसना, बोलना और हंसीमजाक अपनी जगह ठीक है, लेकिन जो तुम चाहते हो वह पाप है.’’

‘‘पापपुण्य मैं नहीं जानता, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि जो चेहरा मेरे सपनों में बस गया है, वह मुझे मिल जाए.’’ तेजपाल ने बाजू छोड़ कर उस का चेहरा हथेलियों में समेट लिया. धीरेधीरे तेजपाल का चेहरा नजदीक आता गया. इतना करीब कि सांसें एकदूसरे के चेहरे से टकराने लगीं. तेजपाल की गुनगुनी सांसें अजमेरिन को कमजोर करने लगीं. इतना ज्यादा कि मर्यादा हार गई और हसरत जीत गई. दोनों ही विशुद्ध कुंवारे थे. प्रथम मिलन का असीम आनंद दोनों को मिला तो वह इस आनंद को पाने के लिए लालायित रहने लगे. अजमेरिन मौका पा कर सामान लेने के बहाने तेजपाल की दुकान पर जाती और मौका पाते ही दोनों मिलन कर लेते.

तेजपाल तो इतना दीवाना हो गया था कि वह अजमेरिन से शादी रचाने को भी राजी था. लेकिन अजमेरिन जानती थी कि वह मुसलमान है, अत: हिंदू लड़के, वह भी पड़ोसी, से कभी उस के परिवार वाले शादी को राजी नहीं होंगे. तेजपाल का समयअसमय अजमेरिन के घर आना पड़ोसियों को नागवार लगा. उन्होंने अजमेरिन के भाई ताहिर से शिकायत की तो उस का माथा ठनका. उस ने बहन पर नजर रखनी शुरू कर दी. एक रोज तेजपाल बहाने से घर आया और अजमेरिन से मिला तो ताहिर ने छिप कर दोनों पर नजर रखी. इस का नतीजा यह निकला कि उस ने दोनों को एकदूसरे को चूमते देख लिया. उस समय तो उस ने बहन से कुछ नहीं कहा. लेकिन दूसरे रोज उसे अकेले में समझाया कि तेजपाल हिंदू है और तू मुसलमान. उस से तेरा रिश्ता कभी नहीं हो सकता. इसलिए तू उस का ख्वाब छोड़ दे.

अजमेरिन ने भाई से वादा किया कि वह तेजपाल से कभी नहीं मिलेगी. तेजपाल को भी ताहिर ने समझा दिया. लेकिन यौवन की आरजू के आगे अजमेरिन भी हार गई और तेजपाल भी. कुछ माह बीतने के बाद दोनों फिर छिपछिप कर मिलने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों के नाजायज रिश्तों के चर्चे गांव की हर गली के मोड़़ पर होने लगे. बदनामी ने पैर पसारे और बिरादरी में भी थूथू होने लगीं तो नूर आलम परेशान हो उठा. उस ने बेलगाम लड़की पर लगाम कसने के लिए, उस का जल्द ही जातिबिरादरी के लड़के के साथ निकाह करने की ठान ली. इस बाबत उस ने खोज शुरू की तो अजमेरिन के लिए उसे लतीफ पसंद आ गया.

लतीफ के पिता साबिर अली कन्नौज जनपद के ठठिया थाना अंतर्गत गांव बेहटा में रहते थे. उन की 4 औलादों में लतीफ सब से छोटा था. 2 बेटियां व एक बेटे की वह शादी कर चुके थे, जबकि लतीफ अभी कुंवारा था. लतीफ साधारण रंगरूप का था. पिता के साथ वह किसानी करता था. नूर आलम ने जब लतीफ को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी अजमेरिन के लिए पसंद कर लिया. साल 2010 के जुलाई माह में अजमेरिन का शादी लतीफ के साथ हो गई. अजमेरिन खूबसूरत थी. वह लतीफ की दुलहन बन कर ससुराल पहुंची तो ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया और उस के हुस्न की तारीफ की.

खूबसूरत बीवी पा कर लतीफ जहां खुश था, वहीं अजमेरिन साधारण रंगरूप वाले शौहर को देख कर उदास थी. उस ने तो अपने प्रेमी तेजपाल जैसे युवक की तमन्ना की थी, लेकिन उस की तमन्ना अधूरी रह गई. 2 हफ्ते ससुराल में रहने के बाद अजमेरिन मायके आई तो उस का चेहरा मुसकराने के बजाय कुम्हलाया हुआ था. अजमेरिन का सामना तेजपाल से हुआ तो वह रो पड़ी, ‘‘तेजपाल, मेरी तो किस्मत ही फूट गई. न शौहर ढंग का मिला न घरद्वार. पता नहीं उस घर में मेरा जीवन कैसे कटेगा. मुझे तो ससुराल में भी तुम्हारी याद सताती रही.’’

तेजपाल अजमेरिन के गोरे गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे ससुराल चले जाने के बाद मुझे भी चैन कहां था. रातरात भर मैं तुम्हारे खयालों में ही खोया रहता था. आज मैं ने जब तुम्हें सामने देखा तो दिल को तसल्ली हुई. तुम किसी तरह की चिंता न करो. मैं तुम्हारा हमेशा साथ दूंगा.’’

अजमेरिन मायके आई तो स्वच्छंद हो गई. निकाह के बाद घर वालों ने भी उसे रोकनाटोकना बंद कर दिया था. अत: वह पहले की तरह तेजपाल से मिलनेजुलने लगी. शारीरिक मिलन भी होने लगा. तेजपाल, अजमेरिन की हर ख्वाहिश पूरी करने लगा. 3 महीने बाद अजमेरिन दोबारा ससुराल चली गई लेकिन इस बार वह तेजपाल का दिया मोबाइल भी लाई थी. इस मोबाइल से वह ससुराल वालों से नजर बचा कर बात कर लेती थी. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अजमेरिन जब मायके आती तो प्रेमी तेजपाल के साथ गुलछर्रे उड़ाती और जब ससुराल में होती तो मोबाइल फोन पर बातें कर अपनी दिल की लगी बुझाती. देर रात मोबाइल फोन पर बतियाना न तो उस के सासससुर को अच्छा लगता था और न ही शौहर को. लतीफ ने कई बार उसे टोका भी. पर वह तुनक कर कहती, ‘‘क्या मैं अपने घर वालों से भी बात न करूं?’’

अजमेरिन को संयुक्त परिवार में रहना अच्छा नहीं लगता था. क्योंकि संयुक्त परिवार में बंदिशें थीं, सासससुर की हुकूमत थी, इसलिए जब मोबाइल फोन पर बात करने को ले कर टोकाटाकी होने लगी तो वह घर में झगड़ा करने लगी. सासससुर को तीखा जवाब देने लगी. घर में कलह बढ़ी तो साबिर अली ने अजमेरिन का चूल्हाचौका अलग कर दिया. घरजमीन का भी बंटवारा हो गया. लतीफ अपने परिवार से अलग नहीं रहना चाहता था, लेकिन बीवी के आगे उसे झुकना पड़ा. अब वह अजमेरिन के साथ 2 कमरों वाले मकान में रहने लगा. अजमेरिन अलग रहने लगी तो वह पूरी तरह से स्वच्छंद हो गई. उस ने शर्मोहया त्याग दी और बेरोकटोक घर से निकलने लगी. वह सासससुर से तो दूरियां बनाए रखती थी, पर पड़ोसियों से हिलमिल कर रहती थी.

अलग होने के बाद अजमेरिन ने तेजपाल से आर्थिक मदद मांगी तो वह राजी हो गया. आर्थिक मदद के बहाने तेजपाल का अजमेरिन की ससुराल में आनाजाना शुरू हो गया. बातूनी तेजपाल ने अपनी बातों के जाल में अजमेरिन के शौहर लतीफ को भी फंसा लिया. उस ने उसे शराब का चस्का भी लगा दिया. अब जब भी तेजपाल आता तो शराब और गोस्त जरूर लाता. शाम को अजमेरिन मीट पकाती और तेजपाल और लतीफ की शराब की पार्टी शुरू हो जाती. तेजपाल जानबूझकर लतीफ को ज्यादा पिला देता, उस के बाद लतीफ तो जैसेतैसे खाना खा कर चारपाई पर पसर जाता और तेजपाल रात भर अजमेरिन के साथ रंगरलियां मनाता.

सवेरा होने के पहले ही वह मोटरसाइकिल पर सवार हो कर अपने गांव की ओर रवाना हो जाता. चूंकि तेजपाल कभीकभी ही आता था, सो लतीफ को उस पर शक नहीं हुआ. दूसरे जब वह आता था तो लतीफ की मुफ्त में दारू पार्टी होती थी. इसलिए वह स्वयं भी उस के आने का इंतजार करता था. तीसरे, जब कभी उसे बीज खाद के लिए पैसों की जरूरत होती थी तो वह बेहिचक उस से मांग लेता था. लतीफ तेजपाल को अपना हमदर्द और दोस्त मानता था, जबकि तेजपाल यह सब अपने स्वार्थ के लिए करता था. कहते हैं कि चोर कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन उस की चोरी पकड़ी ही जाती है.

अजमेरिन और तेजपाल के साथ भी यही हुआ. हुआ यह कि उस शाम लतीफ ने तेजपाल के साथ शराब तो जम कर पी थी, लेकिन कुछ देर बाद उसे उल्टी हो गई थी. आधी रात के बाद उस की आंखें खुलीं तो अजमेरिन कमरे में नहीं थी. वह कमरे से बाहर निकला तो उसे दूसरे कमरे में कुछ खुसरफुसर सुनाई दी. लतीफ का माथा ठनका. वह दबे पांव कमरे में पहुंचा तो उस ने शर्मनाक नजारा देखा. अजमेरिन अपने मायके के यार के साथ मौजमस्ती कर रही थी. उन दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख कर लतीफ मानो बुत बन गया. उसे बीवी व दोस्त से ऐसी उम्मीद न थी. अजमेरिन और तेजपाल ने लतीफ को अपने सिर पर खड़े देखा तो हड़बड़ाकर अलग हो गए.

उस ने गालीगलौज शुरू की तो तेजपाल भाग गया, पर अजमेरिन कहां जाती. लतीफ ने उस की जम कर पिटाई की. मौके की नजाकत भांप कर अजमेरिन ने गिरगिट की तरह रंग बदला और शौहर से माफी मांग ली. लतीफ अपनी बसीबसाई गृहस्थी नहीं उजाड़ना चाहता था. इसलिए अजमेरिन को चेतावनी देते हुए माफ कर दिया. अपने लटकोंझटकों से उस ने शौहर को भी मना लिया. हवस औरत को बहुत नीचे गिरा देती है. पति द्वारा माफ करने पर अजमेरिन को संभल जाना चाहिए था. पर मायके के यार को वह भुला नहीं पाई और पति धर्म भूल गई. कुछ समय बाद वह तेजपाल से फिर मिलने लगी.

तेजपाल को ले कर घर में शुरू हुई कलह ने पैर पसार लिए थे. लतीफ और अजमेरिन में झगड़ा बढ़ा तो बात घर से निकल कर बाहर आ गई. पड़ोसी जान गए कि झगड़ा क्यों होता है. साबिर अली भी बहू की बदचलनी से वाकिफ हो गया. लतीफ अब शराब पी कर घर आता और अजमेरिन को पीटता. पिटाई से अजमेरिन बुरी तरह चीखतीचिल्लाती. शराब पीने के कारण लतीफ की आर्थिक हालत खराब हो गई थी. उस ने अपना खेत भी गिरवी रख दिया था. आर्थिक स्थिति खराब हुई तो लतीफ कमाई करने के लिए हैदराबाद चला गया. वहां उस का एक दोस्त मजदूर सप्लाई करने वाले किसी ठेकेदार के पास काम करता था. उस ने लतीफ को भी मजदूरी के काम पर लगवा दिया था.

शौहर परदेश कमाने चला गया, तो अजमेरिन मायके आ गई. मायके आ कर उस ने तेजपाल को रोरो कर अपने उत्पीड़न की व्यथा बताई. उस ने साफ कह दिया कि अब वह शौहर के जुल्म बरदाश्त नहीं करेगी. वह उस से छुटकारा चाहती है. फिर मायके में रहने के दौरान ही अजमेरिन ने प्रेमी तेजपाल के साथ मिल कर शौहर के कत्ल की योजना बनाई और उस के वापस घर आने का इंतजार करने लगी. 10 मार्च को लतीफ हैदराबाद से वापस घर लौटा. आते ही उस ने अजमेरिन को मायके से बुलवा लिया. अजमेरिन पहले ही शौहर को हलाल करने की योजना बना चुकी थी. इसलिए वह बिना किसी हीलाहवाली के ससुराल वापस आ गई.

औरत एक बार फिसल जाए तो वह विश्वास के काबिल नहीं रहती. अजमेरिन भी विश्वास खो चुकी थी, सो लतीफ उसे शक की नजर से देखता था और अजमेरिन को पीट भी देता था. अजमेरिन तो कुछ और ही सोच कर आई थी, सो पिट कर भी जुबान बंद रखती थी. 8 अप्रैल की सुबह अजमेरिन ने मोबाइल फोन पर तेजपाल से बात की और देर शाम उसे घर बुलाया. तेजपाल समझ गया कि उसे क्यों बुलाया गया है. मोटरसाइकिल से वह रात 8 बजे बेहटा गांव पहुंच गया. उस ने अपनी मोटरसाइकिल मदरसे के सामने खड़ी की और पैदल ही अजमेरिन के घर पहुंच गया.

उस समय लतीफ घर में नहीं था. अजमेरिन ने उसे कमरे में बिठा दिया. देर रात लतीफ देशी शराब पी कर आया. अजमेरिन ने उसे खाना खिलाया फिर वह चारपाई पर जा कर लुढ़क गया. इस के बाद अजमेरिन तेजपाल के कमरे में पहुंची, जहां दोनों ने पहले हसरतें पूरी कीं. आधी रात के बाद दोनों लतीफ की चारपाई के पास पहुंचे और उसे दबोच लिया. दोनों ने मिल कर पहले लतीफ  की डंडों से पिटाई की फिर उसी के अंगौछे से गला कस कर उसे मार डाला. हत्या करने के बाद शव को घर के बाहर बरामदे में तख्त पर डाल दिया. सुबह 4 बजे तेजपाल मोटरसाइकिल से फरार हो गया.

सुबह अजमेरिन रोनेपीटने लगी, तब घर और पड़ोसियों को लतीफ की हत्या की जानकारी हुई. कुछ देर बाद मृतक के पिता साबिर अली थाना ठठिया पहुंचे और बेटे की हत्या की सूचना दी. तेजपाल और अजमेरिन से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें 15 अप्रैल को कन्नौज के जिला सत्र न्यायाधीश के आवास पर उन के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.द्य

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories : पति की धमकी से तंग आकर पत्नी ने कराया पति का कत्ल

Crime Stories : पति पत्नी के बीच के झगड़े और मतभेद आम सी बात है. वक्त के साथ सब ठीक हो जाता है. लेकिन अगर हमदर्द बन कर कोई तीसरा दोनों के बीच कूद जाए तो परिणाम भयावह…

वह 26 जून, 2020 की मध्यरात्रि थी. समय सुबह के 3 बजकर 20 मिनट. उत्तराखंड के जिला हरिद्वार की लक्सर कोतवाली के कोतवाल हेमेंद्र सिंह नेगी देहात क्षेत्र के गांवों में गस्त कर रहे थे, तभी उन के मोबाइल की घंटी बजी. नेगी ने मोबाइल स्क्रीन देखी, कोई अज्ञात नंबर था. इतनी रात में कोई यूं ही फोन नहीं करता. नेगी ने मोबाइल काल रिसिव की. दूसरी ओर कोई अपरीचित था, जिस की आवाज डरीसहमी सी लग रही थी. हेमेंद्र सिंह के परिचय देने पर उस ने कहा, ‘‘सर, मेरा नाम अभिषेक है और मैं आप के थाना क्षेत्र के गांव झीबरहेडी से बोल रहा हूं.

मुझे आप को यह सूचना देनी थी कि आधा घंटे पहले बदमाशों ने मेरे चचेरे भाई प्रदीप की हत्या कर दी है.’’

‘‘हत्या, कैसे? पूरी बात बताओ’’

‘‘सर मुझे हत्यारों की तो कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि उस वक्त मैं गहरी नींद में था. करीब आधा घंटे पहले मेरे मकान की दीवार से किसी के कूदने की आवाज आई थी. मुझे लगा कि गांव में बदमाश आ गए हैं. मैं तुरंत नीचे आ कर दरवाजा बंद कर के लेट गया.

‘‘थोड़ी देर बाद चचेरे भाई प्रदीप के कराहने की आवाज आई तो मैं बाहर आया. मैं ने देखा कि प्रदीप लहूलुहान पड़ा था, उस के पेट, छाती व सिर पर धारदार हथियारों से प्रहार किए गए थे.’’ अभिषेक बोला.

‘‘फिर?’’

‘‘सर, फिर मैं ने अपने घरवालों को जगाया और प्रदीप को  तत्काल अस्पताल ले जाने को कहा. लेकिन हम प्रदीप को अस्पताल ले जाते, उस ने दम तोड़ दिया.’’ अभिषेक बोला.

‘प्रदीप किसान था?’ नेगी ने पूछा

‘नहीं सर प्रदीप स्थानीय श्री सीमेंट कंपनी में ट्रक चलाता था और गत रात ही वह देहरादून से लौटा था. रात को वह अकेला ही अपने घर की छत पर सो रहा था.’ अभिषेक बोला.

‘‘प्रदीप की गांव में किसी से कोई रंजिश तो नहीं थी?’ नेगी ने पूछा.

‘‘नहीं सर वह तो हंसमुख स्वभाव का था और गांव के सभी बिरादरी के लोग उस की इज्जत करते थे. प्रदीप ज्यादातर अपने काम से काम रखने वाला आदमी था.’’ अभिषेक बोला.

‘‘ठीक है अभिषेक, पुलिस 15 मिनट में घटनास्थल पर पहुंच जाएगी.’’

कोतवाल हेमेंद्र नेगी ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया. नेगी ने सब से पहले लक्सर कोतवाली की चेतक पुलिस को गांव झीबरहेड़ी में प्रदीप के घर पहुंचने का आदेश दिया. फिर इस हत्या के बारे में सीओ राजन सिंह, एसपी देहात स्वप्न किशोर सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सेंथिल अबुदई कृष्णाराज एस. को सूचना दी. नेगी गांव झीबरहेड़ी की ओर चल दिए. 20 मिनट बाद नेगी प्रदीप के घर पर पहुंच गए. उस समय सुबह के 4 बज गए थे और अंधेरा छंटने लगा था. प्रदीप के घर में उस का शव आंगन में चादर से ढका रखा था, आसपास गांव वालों की भीड़ जमा थी. नेगी व चेतक पुलिस के सिपाहियों ने सब से पहले ग्रामीणों को वहां से हटाया. इस के बाद शव का निरीक्षण किया. हत्यारों ने प्रदीप की हत्या बड़ी बेरहमी से की थी.

बदमाशों ने प्रदीप का पूरा शरीर धारदार हथियारों से गोद डाला था. जब नेगी ने प्रदीप के बीबी बच्चों की बाबत, पूछा तो घर वालों ने बताया कि कई सालों से प्रदीप की बीबी ममता बच्चों के साथ अपने मायके बादशाहपुर में रहती है. घरवालों से नंबर ले कर नेगी ने ममता को प्रदीप की हत्या की जानकारी दी. इस के बाद नेगी ने गांव वालों से प्रदीप की दिनचर्या के बारे में जानकारी ली और पूछा कि उस की गांव में किसी से दुश्मनी तो नहीं थी. नेगी का अनुमान था कि प्रदीप की हत्या का कारण रंजिश भी हो सकता है, क्योंकि यह मामला लूट का नहीं लग रहा था.

नेगी ग्रामीणों से प्रदीप के बारे में जानकारी जुटा ही रहे थे, कि सीओ राजन सिंह, एसपी देहात एसके सिंह और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सेंथिल अबुदई कृष्णाराज एस भी पहुंच गए. तीनों अधिकारियों ने वहां मौजूद ग्रामीणों से प्रदीप की हत्या के बारे में पूछताछ की. इस के बाद अधिकारियों ने कोतवाल नेगी को प्रदीप के शव को पोस्टमार्टम के लिए जेएन सिन्हा स्मारक राजकीय अस्पताल रुड़की भेजने के निर्देश दिए और चले गए. शव को अस्पताल भेज कर नेगी थाने लौट आए. उन्होंने प्रदीप के भाई सोमपाल की ओर से धारा 302 के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया और मामले की जांच शुरू कर दी. प्रदीप की हत्या का मामला थोड़ा पेचीदा था, क्योंकि न तो प्रदीप का कोई दुश्मन था और न लूट हुई थी.

अगले दिन 27 जून को एसपी देहात एसके सिंह ने इस केस का खुलासा करने के लिए लक्सर कोतवाली में मीटिंग की, जिस में सीओ राजन सिंह, कोतवाल हेमेंद्र नेगी, थानेदार मनोज नोटियाल, लोकपाल परमार, आशीष शर्मा, यशवीर नेगी सहित सीआईयू प्रभारी एनके बचकोटी, एएसआई देवेंद्र भारती व जाकिर आदि शामिल हुए. एसके सिंह ने सीओ राजन सिंह के निर्देशन में इन सभी को जल्द से जल्द प्रदीप हत्याकांड का खुलासा करने के निर्देश दिए. निर्देशानुसार सीआईयू प्रभारी एनके बचकोटी ने झीबरहेड़ी में घटी घटना का साइट सैल डाटा उठाया. साथ ही रात में हत्या के समय आसपास चले मोबाइलों की काल डिटेल्स खंगाली. इस के बाद पुलिस द्वारा उन मोबाइल नंबरों की पड़ताल की गई.

साथ ही बचकोटी ने सीआईयू के एएसआई देवेंद्र भारती व जाकिर को प्रदीप हत्याकांड की सुरागरसी करने के लिए सादे कपड़ों में झीबरहेड़ी भेजा. सिपाहियों कपिलदेव व महीपाल को उन्होंने प्रदीप की पत्नी ममता के बारे में जानकारी जुटाने के लिए उस के मायके बादशाहपुर भेजा था. इस का परिणाम यह निकला कि 28 जून, 2020 की शाम को पुलिस और सीआईयू के हाथ प्रदीप हत्याकांड के पुख्ता सबूत लग गए. पुलिस को जो जानकारी मिली, वह यह थी कि मृतक प्रदीप के साथ अमन भी ट्रक चलाता था. वह गांव हरीपुर, जिला सहारनपुर का रहने वाला था. इसी के चलते वह प्रदीप के घर आताजाता था. प्रदीप की पत्नी ममता का चालचलन ठीक नहीं था, इस वजह से पति पत्नी में अकसर मनमुटाव रहता था.

घर में आनेजाने से अमन की आंखे ममता से लड़ गई थीं और वे दोनों प्रदीप की गैरमौजूदगी में रंगरलियां मनाने लगे थे. गत वर्ष जब प्रदीप को ममता व अमन के अवैध संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने दोनों को धमकाया भी, मगर 42 वर्षीया ममता अपने 23 वर्षीय प्रेमी अमन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. इस विवाद के चलते वह अपने बच्चों के साथ मायके बादशाहपुर जा कर रहने लगी थी. उस के जाने के बाद प्रदीप अपने झीबरहेडी स्थित मकान पर अकेला रहने लगा. 29 जून, 2020 को पुलिस को प्रदीप की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई, जिस में उस की मौत का कारण शरीर पर धारदार हथियारों के प्रहारों से ज्यादा खून बहना बताया गया था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस को अमन पर शक हो गया. दूसरी ओर सीआईयू प्रभारी एनके बचकोटी को जिस मोबाइल नंबर पर शक था, वह अमन का ही नंबर था. सीआईयू ने अमन की गिरफ्तारी के लिए जाल बिछा दिया था. अमन को शाम को ही पुलिस ने लक्सर क्षेत्र से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह ममता से मिलने जा रहा था. अमन को पकड़ने के बाद पुलिस उसे कोतवाली ले आई. इस के बाद एसपी देहात एसके सिंह व सीओ राजन सिंह ने उस से प्रदीप की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की. अमन ने पुलिस को जो जानकारी दी, वह इस प्रकार है—

अमन ने अपना जुर्म कबूल करते हुए बताया कि वह प्रदीप के साथ गत 3 वर्षो से ट्रक चलाता था. उस का प्रदीप के घर आना जाना होता रहता था. प्रदीप की बीवी ममता पति के रूखे व्यवहार से परेशान रहती थी. जब उस ने ममता से प्यार भरी बातें करनी शुरू कर दीं, तो वह भी उसी टोन में बतियाने लगी. तनीजा यह हुआ कि उस के ममता से अवैध संबंध बन गए. यह जानकारी मिलने पर प्रदीप ने मुझे धमकी दी, जिस से मैं बुरी तरह डर गया. इस के बाद उस ने प्रदीप द्वारा दी गई धमकी की जानकारी ममता को दी. तब उस ने ममता की सहमति से प्रदीप की हत्या की योजना बनाई. 26 जून को उस ने प्रदीप के बेटे शकुन को फोन किया और उस से प्रदीप के बारे में पूछा.

शकुन के मुताबिक प्रदीप उस शाम घर पर ही था. रात 12 बजे मैं छुरी ले कर झीबरहेडी की ओर निकल गया. प्रदीप के मकान के पीछे खेत थे रात करीब 2 बजे वह खेतों की ओर से मकान पर चढ़ गया. उस समय प्रदीप मकान की छत पर अकेला बेसुध सोया पड़ा था. उसे देख कर उस का खून खौल गया. इस के बाद उस ने पूरी ताकत लगा कर प्रदीप के गले पर वार करने शुरू कर दिए. उस ने प्रदीप के गले, सिर व पेट पर कई वार किए. इस के बाद वह मकान की छत से कूद कर, वापस लक्सर आ गया. लक्सर से बादशाहपुर ज्यादा दूर नहीं था. इसलिए लक्सर पुलिस ममता को भी कोतवाली ले आई. जब ममता ने अमन को पुलिस हिरासत में देखा, तो वह सारा माजरा समझ गई और पुलिस के सामने अपने पति की हत्या का षडयंत्र रचने में अपनी संलिप्तता मान कर ली.

इस के बाद एसपी देहात एसके सिंह ने प्रदीप हत्याकांड का खुलासा होने और 2 आरोपियों के गिरफ्तार होने की जानकारी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिद्वार सेंथिल अबुदई कृष्णाराज को दी. 30 जून, 2020 को एसपी देहात एसके सिंह ने लक्सर कोतवाली में प्रैसवार्ता के दौरान मीडियाकर्मियों को प्रदीप हत्याकांड के खुलासे की जानकारी दी. इस के बाद पुलिस ने अमन व ममता को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. 3 बच्चों की मां होने के बाद भी ममता अमन के प्रेम में इस कदर डूबी कि उस ने पति की हत्या अपने प्रेमी से कराने में कोई संकोच नहीं किया, बल्कि इस हत्याकांड को छिपाए रखा.

प्रदीप से ममता की शादी वर्ष 2001 में हुई थी. प्रदीप का 18 वर्षीय बेटा सन्नी हैदराबाद में कोचिंग कर रहा है और 17 साल की बेटी आंचल और 12 साल का बेटा शकुन मां ममता के साथ बादशाहपुर में रहते थे.

(पुलिस सूत्रों पर आधारित)