Short Hindi Story: सब्र की सीमा

Short Hindi Story: हर बात की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाएगा. प्रेम और धोखेबाजी की एक दुखांत कथा…

राजेंद्र तिवारी ने क्याक्या सपने नहीं संजोए थे, क्याक्या नहीं सोचा था, अपने लिए…उस के लिए और अपने भावी जीवन के लिए. जबकि वह जानता था कि सपने कभी सच नहीं होते, अपना सोचा कभी पूरा नहीं होता. शायद यही वजह थी कि आज उसे उस का खून अपने ही हाथों करने पर मजबूर होना पड़ा. दरअसल इस के अलावा कोई दूसरा रास्ता शायद उसे सूझा ही नहीं.  शादी के 10 महीनों का जीवन उस के लिए नारकीय था. हर पल उस की यही कोशिश रही कि यह जीवन किसी तरह सुखमय हो जाए. लेकिन कलयुग में शायद यह उस के लिए संभव नहीं था.

उस ने विश्वास किया तो दगा मिली. प्यार दिया तो घृणा हाथ लगी. जहर का घूंट पीतेपीते वह पूरी तरह थक चुका था. जब सहन की सीमा पार हो गई तो वह कर बैठा, जो कानून की नजरों में अपराध था. उस का कहना था कि यह अपराध तो बहुत पहले हो चुका होता, अगर वह गांधीवादी सोच का न होता. इतना घृणित दृश्य देखने के बाद शायद ही कोई अधिक समय तक चुप बैठता. लेकिन वह शांति का उपासक था, अहिंसा का पुजारी था, इसीलिए सोचता था कि बाकी जिंदगी अहिंसा और नेकी की राह पर चलते हुए कट जाए तो बेहतर होगा.

लेकिन ऐसा हो नहीं सका. क्योंकि वह जितना टालता, समस्या उतनी ही उलझती रही. एक बार तो उस ने उस की ओर से एकदम से निगाहें हटा लीं, परंतु उसे यह भी अच्छा नहीं लगा. मजबूर हो कर यह कठोर कदम उठाना पड़ा. वह मानता है कि इस सब का गुनहगार वही है. लेकिन उस के द्वारा किए गए इस अपराध का एक अच्छा परिणाम यह निकला कि समाज को कलंकित करने वाला सदा के लिए मिट गया. उस का मानना है कि उस ने अपराध नहीं, समाज पर एहसान किया है.

उसे वह पहली मुलाकात आज भी अच्छी तरह याद है. वह लखनऊ के हजरतगंज में एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट में प्रशिक्षक था. वह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का था. अग्रवाल शिक्षा विभाग में नौकरी करते थे. वह कभीकभार ही वहां आते थे. इंस्टीट्यूट की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी राजेंद्र तिवारी पर ही थी.

उस दिन क्लास के बाद राजेंद्र औफिस में बैठा आराम कर रहा था, तभी एक लड़की उस के औफिस में आई. बहुत खूबसूरत थी वह. गजब का आकर्षण था उस में. वह अपलक उस की ओर देखता रहा.

‘‘मैं कंप्यूटर सीखना चाहती हूं.’’ उस के स्वर में मिठास थी.

राजेंद्र हड़बड़ा कर बोला, ‘‘हां..हां, बैठिए.’’

‘‘कितने दिनों में मैं कंप्यूटर सीख जाऊंगी.’’ सामने की कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा.

‘‘यह तो सीखने वाले पर डिपेंड करता है. वैसे थोड़ी सी प्रैक्टिस से 6 महीने में अच्छाखासा सीख जाएंगी.’’

‘‘ठीक है, मुझे एडमीशन के लिए फार्म दे दीजिए.’’

‘‘आप का नाम?’’ मेज की दराज से फार्म निकाल कर उस की ओर बढ़ाते हुए राजेंद्र ने पूछा.

‘‘अमिता सक्सेना. मैं सर्विस करती हूं, इसलिए शाम को ही आ सकूंगी.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप फार्म भर दीजिए.’’

उस ने सरसरी निगाह फार्म पर डाली. फिर कुछ सोचते हुए बोली, ‘‘मैं इसे भर कर बाद में ले आऊं तो कोई हर्ज है?’’

‘‘नहीं, कोई हर्ज नहीं है. फार्म के साथ आप फीस जमा कर दीजिएगा. उसी दिन आप का एडमीशन हो जाएगा.’’

‘‘ठीक है, मैं जब भी आऊंगी, इसे भर कर ले आऊंगी.’’ इतना कह कर अमिता चली गई.

अमिता राजेंद्र को अच्छी लगी थी. ऐसा नहीं कि वह कोई आशिकमिजाज था. लड़कियों से खासतौर पर वह दूर ही रहता था. पर अमिता में न जाने क्या खासियत थी कि वह काफी देर तक उस के खयालों में खोया रहा. उस ने जैसे उस के ऊपर कोई जादू कर दिया था. वह दोबारा उस की एक झलक पाने के लिए बेचैन हो उठा था. उस के बारे में उस के मन में इस बात का भी संदेह था कि कहीं वह विवाहित तो नहीं. वह अगले दिन अमिता का इंतजार करता रहा कि शायद वह आए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी.

3 दिनों बाद अमिता आई. फार्म उस ने राजेंद्र को दे दिया. फार्म में उस के नाम के पहले ‘कुमारी’ शब्द देख कर उसे बड़ा सुकून मिला. फार्म पर सरसरी नजर डाल कर उस ने पूछा, ‘‘आप कहां नौकरी करती हैं?’’

‘‘स्टेशन रोड पर एक बिल्डर के औफिस में. यह इंस्टीट्यूट आप का है?’’

वह बीच में ही बोल उठा, ‘‘मुझे राजेंद्र तिवारी कहते हैं. मैं यहां प्रशिक्षक हूं. यह इंस्टीट्यूट अखिलेश अग्रवाल का है. लेकिन देखभाल मैं ही करता हूं. कभी कोई चीज समझ में न आए तो बिना झिझक पूछ लेना, शरमाना नहीं.’’

‘‘जी, वैसे मैं कल से जौइन करूंगी.’’ कह कर अमिता मुसकराई और कुरसी से उठ खड़ी हुई.

उस ने अगले दिन से जौइन कर लिया. कंप्यूटर सिखाते समय राजेंद्र की नजरें उसी पर टिकी रहतीं. अमिता ने उस का कहा माना था, मतलब उसे जो समझ में न आता, झट पूछ लेती. राजेंद्र भी पूरे मनोयोग से उसे कंप्यूटर सिखा रहा था.

कोई एक सप्ताह बाद एक दिन क्लास समाप्त होने पर अमिता औफिस में आई, ‘‘मुझे आप से कुछ पूछना है?’’

‘‘पूछो, क्या पूछना है?’’

उस ने कुछ सवाल पूछे. राजेंद्र ने उत्तर समझा दिए. बाद में व्यंग्य करते हुए उस ने कहा, ‘‘लगता है, मेरा बताया तुम्हारी समझ में नहीं आता.’’

‘‘नहीं, आप बतातेसिखाते तो बहुत अच्छा हैं, पर मेरी ही समझ में देर से आता है.’’ चेहरे पर मासूमियत लाते हुए वह बोली.

‘‘हां, बेवकूफों के साथ यही होता है.’’

राजेंद्र के इस मजाक पर उस ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘चलिए, आप ने पहचान तो लिया. गुरु को अपना ही गुण शिष्य में दिखाई पड़ता है.’’

कुछ देर तक दोनों यूं ही हंसीमजाक करते रहे. बातोंबातों में अमिता बोली, ‘‘किसी दिन मेरे घर चाय पर आइए. मेरा घर पता है आप को?’’

उस ने राजेंद्र को बताया कि अमीनाबाद में वह अपने चाचा के साथ रहती है. उस के मातापिता लखनऊ में ही तालकटोरा थानाक्षेत्र स्थित राजाजीपुरम कालोनी में रहते हैं. राजेंद्र भी राजाजीपुरम में ही रहता था. यह बात उस ने अमिता को बताई तो उस ने पूछा, ‘‘आप किस ब्लौक में रहते हैं?’’

‘‘ई ब्लौक में.’’

‘‘अरे, मैं भी ई ब्लौक में रहती हूं.’’

‘‘तुम अब वहां क्यों नहीं रहती?’’

वह टालते हुए बोली, ‘‘ऐसे ही, अच्छा अब मैं चलूंगी, काफी देर हो गई है.’’

इस बातचीत के बाद दोनों काफी घुलमिल गए थे. इस बीच एक बार राजेंद्र उस के घर भी हो आया. उस के चाचा हंसमुख और मिलनसार लगे. उस ने लौटते समय अमिता के चाचा को अपने घर आने के लिए आमंत्रित किया. उस का अनुमान था कि उन के साथ अमिता भी आएगी. पर न तो चाचा आए और न अमिता. अचानक एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस जा पहुचा. ज्यादा बड़ा औफिस नहीं था. फिर भी 15-20 लोग काम करते थे. उसे देख कर अमिता मुसकरा दी. वह झेंप सा गया. उस समय उस की ड्यूटी समाप्त होने वाली थी. उसे बैठने के लिए कह कर वह एक केबिन में गई. शायद वह उस के बौस की केबिन थी, 2 मिनट बाद ही बाहर आ कर बोली, ‘‘आइए, चलें.’’

दोनों एक रेस्तरां में जा पहुंचे. कौफी पीते हुए उस ने राजेंद्र को छेड़ा, ‘‘आज इधर का रास्ता कैसे भूल गए?’’

‘‘तुम से मिलने का मन था, चला आया.’’

राजेंद्र की इस बात पर वह गुमसुम हो गई. उसे लगा, जैसे उस ने कुछ गलत कह दिया हो. झट सफाई दी, ‘‘मुझे गलत मत समझो.’’

‘‘नहीं, यह बात नहीं है. आज पहली बार मुझ से किसी ने इतने अपनत्व से बात की है, वरना सब मुझे काट खाने दौड़ते हैं. मातापिता से भी मुझे प्यार नहीं मिला. घर में हर एक ने मुझे दुत्कारा. मजबूरी में मैं चाचा के यहां रहने लगी. वहां सब मुझे ऊपर से तो प्यार दिखाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर जलते हैं. एक भी महीने अगर पूरी तनख्वाह उन्हें न दूं तो मुझ पर पहाड़ टूट पड़ता है. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूं.’’ कहतेकहते अमिता की आंखें सजल हो गईं.

उस समय राजेंद्र को ऐसा लगा कि अमिता दुनिया में बिलकुल अकेली है, बेसहारा है. शायद वह अपने अंदर दुख ही दुख समेटे है. वह अपने को उस का सब से बड़ा हमदर्द समझ कर बोल पड़ा, ‘‘इस में इतना परेशान होने की क्या बात है? मैं तो हूं, सब ठीक हो जाएगा.’’

राजेंद्र की इस सहानुभूति ने अमिता को आत्मबल दिया. उस के काफी समझानेबुझाने पर वह सामान्य हो गई. इस के बाद दोनों काफी करीब आते गए. दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. मुलाकातों का सिलसिला तेजी से चल निकला. रोज ही मिलना, बातें करना, साथ घूमना जैसे जरूरी हो गया. अमिता की बातों से राजेंद्र को लगता कि जैसे वह उस के बिना रह नहीं पाएगी. वह भी उस का जीवन सुखमय बनाना चाहता था. इसीलिए उस ने उस का हाथ थामने का निर्णय ले लिया. जबकि राजेंद्र उस से 4 साल छोटा था. लेकिन उस ने इस की भी परवाह नहीं की. उसे डर था कि उस के कदम पीछे खींच लेने से एक इंसान की जिंदगी चली जाएगी और उस का जिम्मेदार वह होगा.

राजेंद्र के पिता शिवप्रसाद तिवारी रायबरेली की डलमऊ तहसील स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में हेड क्लर्क थे. रायबरेली में ही उस का पैतृक घर था. 3 भाइयों और एक बहन में वह दूसरे नंबर पर था. सब से बड़े भाई देवेंद्र कुमार तिवारी घर पर ही खेतीबाड़ी का काम देखते थे. उस से छोटा नरेंद्र और बहन थी. दोनों पढ़ रहे थे. राजेंद्र के इस निर्णय की जानकारी उस के पिता को होगी तो उन का क्या रुख होगा, यह उसे अच्छी तरह पता था. एक तो प्रेम विवाह, दूसरा अपने से बड़ी उम्र की लड़की से, तीसरा विजातीय. उस के निर्णय का पता चलते ही उन्होंने उस से संबंध तोड़ लिए. उस ने उन्हें समझाने का प्रयास किया, पर उन्होंने उस की एक न सुनी.

घर वालों से बगावत कर के राजेंद्र ने अमिता से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में दोनों के ही परिवारों के लोग शामिल नहीं हुए. शादी के बाद वह अमिता को राजाजीपुरम स्थित अपने मकान में ले आया. वैवाहिक जीवन हंसीखुशी बीतने लगा. इंस्टीट्यूट में नौकरी करने के साथसाथ राजेंद्र किसी अच्छी नौकरी की तलाश में था. शादी के बाद उस ने इस ओर खास ध्यान देना शुरू कर दिया. अमिता नियमित रूप से अपनी नौकरी पर जा रही थी.

एक दिन राजेंद्र अमिता के औफिस पहुंचा तो उस के बौस दिनेश मेहरा कहीं जाने की तैयारी में थे. अमिता ने राजेंद्र का परिचय उन से कराया तो वह तपाक से बोले, ‘‘अरे तुम राजेंद्र हो, कहो कैसी कट रही है?’’

‘‘सब बढि़या चल रहा है.’’ राजेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘कभी कोई काम हो तो बताना.’’ कहते हुए उन्होंने राजेंद्र के कंधे पर हाथ रखा और आगे बढ़ गए. मेहराजी पहली मुलाकात में राजेंद्र को काफी भले आदमी नजर आए. उस समय उसे क्या पता था कि ऊपर से सज्जन लगने वाले यह शख्स उस की जिंदगी में जहर घोल कर रख देंगे. अमिता ने एक दिन उसे बताया कि मेहराजी बड़ी दिलचस्पी से हमारे घर की बातें पूछा करते हैं. यह बात उसे बड़ी अजीब लगी कि आखिर उन का उस के घर से क्या मतलब. बहरहाल उस ने उस समय इस बात पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया.

धीरेधीरे छोटीछोटी बातों पर अमिता राजेंद्र से झगड़ने लगी. उस की सही बात को भी गलत बताती. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अमिता के व्यवहार में अचानक यह बदलाव क्यों आ गया. एक रात जब उस ने उस के व्यवहार में आए बदलाव के बारे में पूछा तो उस से मिली जानकारी से वह दंग रह गया. अमिता ने बताया कि मेहराजी अकसर उस के घर के बारे में राय दिया करते थे कि यह काम ऐसे होना चाहिए, फलां काम नहीं करना चाहिए. मेहराजी अमिता को जिस तरह की सलाह देते थे, उस के हिसाब से वह बिलकुल बेतुकी होती थीं. चूंकि अमिता पूरी तरह उन की सलाह पर चल रही थी, इसीलिए उन दोनों में मनमुटाव हो रहा था.

उस की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर यह कौन सी राजनीति है? आखिर मेहराजी उस के परिवार में कलह पैदा करने पर क्यों तुले हैं? राजेंद्र ने इस ओर गंभीरता से ध्यान शुरू किया. उसी बीच उसे पता चला कि उस की शादी के पहले से ही मेहराजी के अमिता से काफी आत्मीय संबंध थे. दरअसल शादी से पहले जब अमिता अपनी पारिवारिक स्थिति से परेशान थी तो मेहराजी उस के साथ सहानुभूति जता कर उस के हमदर्द बन गए थे. लेकिन शादी के बाद अमिता की स्थिति बदल गई थी. शायद यही कारण था कि मेहराजी ने कूटनीति अपना कर उस के वैवाहिक जीवन में फूट डालने की कोशिश शुरू कर दी थी, ताकि वे फिर अमिता के हितैषी बन सकें.

सीधे स्वभाव की अमिता को मेहराजी ने अपने व्यवहार से काफी प्रभावित कर रखा था. जबतब काम के बहाने वह उसे साथ ले जाते. घुमातेफिराते, ऊंचेऊंचे ख्वाब दिखाते, कीमती सामान खरीद कर देते. राजेंद्र ने अमिता को समझाने का भरसक प्रयास किया. पर उसे लगा कि वह मेहराजी से जलता है, इसलिए ऐसी बातें कर रहा है. यही वजह थी कि उस के समझानेबुझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. मेहराजी से वह इतना अधिक प्रभावित थी कि उन के आगे उस की हर बात महत्त्वहीन थी. अब उसे विश्वास हो गया कि अमिता के सीधे और सरल स्वभाव का मेहरा नाजायज फायदा उठा रहा है.

राजेंद्र ने अमिता को बहुत समझाया, मेहराजी के साथ घूमनेफिरने से मना किया, उन की मक्कारी के बारे में बताया. एक बार तो अमिता को उस की बातें समझ में आ गईं. उस ने वादा किया कि अब वह कभी मेहराजी से औफिस के काम के अलावा कोई बात नहीं करेगी. कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन जल्दी ही मेहराजी ने उसे फिर बहकाना शुरू कर दिया. इस बार उन्होंने अमिता को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा दिया. अब जब भी राजेंद्र उसे समझाता तो जवाब मिलता, ‘‘मैं स्वतंत्र हूं, बंधुआ नहीं.’’

अजीब थी उस की स्वतंत्रता और मेहराजी का स्वतंत्रता पाठ. राजेंद्र के सामने ही उस का घर उजड़ रहा था और वह असहाय था. लेकिन वह कठोर कदम उठा कर मेहराजी को कोई आसान मौका नहीं देना चाहता था. वह नहीं चाहता था कि उस का घर बिखरे. राजेंद्र ने अमिता को समझाया कि ये पैसे वाले लोग उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. पैसे के बल पर वे उन्हें खरीदने तथा गुलाम बनाने की कोशिश करते हैं. उन का हित इसी में है कि मेहनत से जो कुछ कमाएं, उसी में गुजारा करें. दूसरों के पैसों के पीछे न भागें.

अमिता ने महसूस किया कि राजेंद्र की बात सही है. इसीलिए उस ने फिर वादा किया कि अब वह मेहराजी की बातों पर ध्यान नहीं देगी. लेकिन अगले ही दिन जब वह औफिस से लौटी तो मेहराजी ने उस के सारे उपदेश गलत सिद्ध कर दिए. उसी शाम मेहराजी उस के घर आ धमके. उन्होंने राजेंद्र को चेतावनी दी, ‘‘अमिता तुम से जो कुछ कहे, वह तुम्हें मानना होगा. अगर ऐसा नहीं किया तो अंजाम ठीक नहीं होगा.’’

यह सुन कर राजेंद्र सन्न रह गया. शांत और विनम्र भाव से उस ने जवाब दिया, ‘‘ठीक है, जो आप चाहते हैं, वही होगा. साथ ही मैं कोशिश करूंगा कि जितनी जल्दी हो, अमिता की जिंदगी से दूर हो जाऊं.’’

राजेंद्र मेहराजी के सामने इसलिए विनम्र हो गया था कि शायद उस के दुख को समझ कर उन्हें सद्बुद्धि आ जाए. पर हुआ इस के विपरीत. मेहराजी ने अपनी जीत पर प्रसन्न हो कर राजेंद्र के सामने ही उस की पत्नी को ले कर घूमने चले गए. उन के जाने के बाद राजेंद्र आंसू बहाता रहा. सोचता रहा कि क्या दुनिया में कमजोर लोगों के साथ ऐसा ही होता है? लौटने पर अमिता को जब उस ने समझाया तो वह बोली, ‘‘मेहराजी तो मजाक कर रहे थे, आप बुरा मान गए.’’

उस के साथ मजाक? आखिर क्या रिश्ता है मेहराजी से उस का, जो वह उस से मजाक कर रहे थे? उस की समझ में नहीं आ रहा था. इसलिए चुप रह गया. इस गंभीर समसया के समाधान का वह रास्ता ढूंढने लगा. काफी माथापच्ची के बाद भी उसे कोई उपाय नहीं सूझा. हां, इस बीच मेहराजी और अमिता का मिलनाजुलना और भी आसान हो गया. हुआ यह कि गरमियों में राजेंद्र के मकान मालिक सपरिवार घूमने चले गए. इस बीच अमिता ने 15 दिनों की छुट्टी ले ली. राजेंद्र के नौकरी पर जाने के बाद घर में केवल अमिता ही रह जाती थी. मेहराजी उस की अनुपस्थिति में घर आ जाते. दोनों घंटों बैठ कर गपशप करते या फिर घूमने चले जाते.

राजेंद्र को इस बात का आभास तब हुआ, जब घर लौटने पर कमरे में मेहराजी का कोई न कोई सामान पड़ा मिलता. बरतन जूठे मिलते. आखिर एक दिन उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या बात है, आज चाय बहुत बनी है?’’

‘‘मेहराजी आए थे.’’ अमिता ने बड़े तीखे स्वर में कहा. राजेंद्र चुप रह गया.

राजेंद्र ने उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर असफल रहा. इसी बीच उस के इंस्टीट्यूट का समय भी बदल गया. जिस दिन समय बदला था, उस दिन जल्दी छुट्टी हो गई. वह घर आ गया. वहां बाउंड्री वाले मेनगेट पर अंदर से ताला बंद था. अंदर के दरवाजे भी बंद थे. ग्रिल वाला गेट फांद कर वह खिड़की के पास पहुंचा. एक कब्जा टूटा होने के कारण खिड़की ठीक से बंद नहीं होती थी. चुपके से उस ने अंदर झांका तो अमिता और मेहरा को आपत्तिजनक अवस्था में देख कर उस के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. वह तो सिर्फ यही समझता था कि दोनों के बीच मामला केवल घूमनेफिरने तक ही सीमित था.

उस समय राजेंद्र की समझ में नहीं आया कि वह क्या करे. एक बार उस के मन में आया कि पड़ोसियों को बुला कर मेहराजी को मजा चखा दे. फिर यह सोच कर चुप रह गया कि इस में बदनामी उसी की होगी. गेट फांद कर वह फिर बाहर आ गया. कुछ देर इधरउधर चहलकदमी कर सोचता रहा, लेकिन कुछ समझ में नहीं आया. फिर कुछ देर बाद उस ने जोर से गेट भड़भड़ाया. अमिता बाहर निगली. गेट पर उसे देख कर चौंकी. उस ने ग्रिल वाले मेनगेट का ताला खोला. वह अंदर पहुंचा. सामने मेहराजी बैठे थे. उन्हें यह जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने सब कुछ देख लिया था. वह बनावटी हंसी हंसता रहा. कुछ देर बाद मेहराजी चले गए.

राजेंद्र ने इस बारे में अमिता से भी कुछ नहीं कहा. लेकिन इधरउधर की बात कर उसे एक बार फिर समझाने की कोशिश की, पर कोई नतीजा नहीं निकला. वह बराबर यही कहती रही, ‘‘मेहराजी बहुत अच्छे आदमी हैं. तुम नाहक उन से जलते हो. वह हमारी हर तरह से मदद कर रहे हैं. उन का एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकती.’’

उन्हीं दिनों अमिता ने अपने मातापिता के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. उस के मातापिता पास में ही रहते थे. अब वह सुबह बहुत जल्दी औफिस जाने के लिए निकलती और रात देर से घर लौटती. राजेंद्र फोन कर के पूछ भी नहीं सकता था कि वह कहां है और कब तक आएगी. जल्दी जाने और  देर से लौटने का कारण पूछने पर राजेंद्र को धमकी मिलती, ‘‘मेरी जो इच्छा होगी करूंगी, तुम मुझे रोक नहीं सकते.’’

राजेंद्र की विनम्रता और सीधेपन का नाजायज फायदा उठाया जाता रहा. वह उसे कमजोर और डरपोक समझ रही थी. वह नहीं चाहता था कि उस की इज्जत चौराहे पर नीलाम हो, लोग उस पर हंसें. लेकिन अब उसे इस बात का पश्चाताप हो रहा था कि उस ने मातापिता की बात नहीं मानी. उन के न चाहते हुए भी प्रेमविवाह क्यों कर लिया? अब महसूस हो रहा था कि मांबाप हमेशा अपनी संतान के हित की सोचते हैं. अपने अनुभवों के आधार पर ही संतान को उचित राय देते हैं. मांबाप की याद आते ही वह दुखी हो उठता. प्रेम के नाम से उसे नफरत होने लगी थी.

दूसरी ओर मेहराजी ने अमिता को यह आश्वासन दे रखा था कि अगर पति उसे छोड़ देगा तो वह उसे अपनी पत्नी बना लेंगे. मेहराजी की संपत्ति की वह मालकिन हो जाएगी. शायद यही वजह थी कि जब भी राजेंद्र उसे समझाने की कोशिश करता, वह बेबाक कह देती, ‘‘ठीक है, मैं मेहराजी के साथ जा रही हूं, रात देर से लौटूंगी.’’

मेहरा और अमिता ने राजेंद्र के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि एक ही रास्ता शेष था कि वह उन के बीच से हट जाए. मेहरा के औफिस के तमाम कर्मचारी अमिता और बौस के रिश्ते को जान गए थे. इस से राजेंद्र को खुद पर शरम महसूस हो रही थी. वह अपने प्रेम और धोखेबाजी के बारे में सोचसोच कर परेशान हो रहा था. आखिर क्या उसे सारी जिंदगी यही देखना पड़ेगा. उस दिन तो वह जैसे आसमान से गिर पड़ा, जब अमिता को अपने सगे भाई अश्विनी के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. उस ने भाईबहन के पवित्र रिश्ते पर बदनुमा दाग लगा दिया था. अब राजेंद्र समझ गया कि असली दोषी कौन है. वह अभी तक सारा दोष मेहराजी को ही दे रहा था, जबकि अपना ही सिक्का खोटा था. इस घटना के बाद वह पूरी तरह टूट गया.

आखिर कोई कब तक अपने स्वाभिमान को तिलांजलि देता रहेगा? कितना झुकेगा? कितना दबेगा? राजेंद्र ने काफी प्रयास किया कि बात उसी तक सीमित रहे, आगे न बढ़े. पर उस का चुप रहना उस की कमजोरी माना जा रहा था. वह इस विचार का था कि वह प्यार सच्चा नहीं होता, जिस में प्रेमी को क्षमा न किया जा सके. इसी कारण वह अमिता को समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने का असफल प्रयास करता रहा. लेकिन उस के मनमस्तिष्क को तो मेहराजी ने विकृत कर दिया था. ‘वाह रे मेहराजी, तुम ने अजीब राजनीति का खेल खेला. तुम समझते होगे कि राजेंद्र घुटघुट कर मर जाएगा या फिर जहर खा लेगा. फिर तुम मनचाहा राज करोगे.’ लेकिन राजेंद्र ऐसा करने वालों में नहीं था. शायद वह कोई कठोर कदम उठाने से रुक जाता था. उसे विश्वास था कि कुदरत उन्हें उन के कर्मों का दंड अवश्य देगा.

लेकिन हर चीज की एक सीमा होती है. समुद्र और सब्र की भी सीमा होती है. दोनों अगर अपनी सीमा तोड़ दें तो अनर्थ हो जाता है. किसी चीज की अति करने का अर्थ होता है विनाश. वे दोनों अति की ओर अग्रसर हो रहे थे. राजेंद्र शांत रह कर बुरे दिन टलने का इंतजार करता रहा. वह अपनी पत्नी को अब न तो कुछ समझाता था और न ही उस की किसी हरकत का विरोध करता था. उसे बिलकुल स्वच्छंद छोड़ दिया था, इसलिए कि शायद कभी ठोकर खा कर वह अपने कर्मों पर शर्मिंदगी महसूस करे. लेकिन वे घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही थीं. एक दिन अमिता ने राजेंद्र से कहा, ‘‘आज मैं अपनी मां के साथ बाजार जाऊंगी.’’

राजेंद्र ने उस की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया तो उस ने अपने कुछ कपड़े लिए और घर से निकल गई. उसे इस तरह कपड़े ले जाते देख उसे शक हुआ. उस के जाने के थोड़ी देर बाद वह घर से निकला और अपनी ससुराल जा पहुंचा. वहां मजदूर घर की पुताई कर रहे थे. अमिता की मम्मी और पापा बाजार गए थे. घर में केवल अमिता का भाई अश्विनी था. वह सीधे उस के कमरे की ओर बढ़ा. कमरे के दरवाजे को हाथ से धकेलने की कोशिश की, लेकिन वह अंदर से बंद था. उस ने अपना शक मिटाने के लिए खिड़की से अंदर झांका. वहां का दृश्य देख कर वह कांप उठा. वह चुपचाप वापस लौट आया.

राजेंद्र ने तय कर लिया कि अब वह यह घर छोड़ कर चला जाएगा. उस का मन वैराग्य की ओर मुड़ गया. लेकिन उस के संन्यासी हो जाने से उस के दुश्मनों का मतलब हल हो जाएगा. यह सोच कर उस ने तय किया कि दुनिया से पूछ लिया जाए कि आखिर कौन गलत है, कौन सही? जब उस का जीवन बरबाद हो ही गया है तो फिर सच उजागर करने में ज्यादा से ज्यादा उस की जान ही तो जाएगी. वैसे भी कैसा डर? इस जिंदगी से तो मौत ही अच्छी है. वह जानता था कि अन्याय करने वाले से ज्यादा दोषी अन्याय सहने वाला होता है. पर वह मजबूर था. किसी को दंड नहीं दे सकता था. क्योंकि किसी को दंड देने का कोई अधिकार उस के पास नहीं था. यही सोच कर उस का संन्यास ले लेने का निर्णय पक्का होता गया.

लेकिन शायद ऐसा नहीं होना था. 21 जनवरी को रात साढ़े 8 बजे अमिता औफिस से घर लौटी. उस के इतनी देर से आने के बावजूद राजेंद्र ने कुछ नहीं कहा. उस ने कपड़े बदले. वह विचारों में खोया था. अचानक उस के दिमाग में आया कि क्यों न घर छोड़ने से पूर्व अमिता को आखिरी बार समझाने की कोशिश करे. राजेंद्र ने उस से बात छेड़ी ही थी कि वह बिफर उठी. उसे दुत्कारने लगी. इस के बावजूद वह उसे समझाने की कोशिश करता रहा. उस के समझाने का उस पर कोई असर नहीं हुआ. उस ने उसे खरीखोटी सुनानी शुरू कर दी. वह भी थोड़ा उत्तेजित हुआ. दोनों में झगड़ा होने लगा. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम मेरे जीवन से निकल जाओ. तुम्हारे लिए अब मेरी जिंदगी में कोई जगह नहीं है. न ही अब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. अब मैं मेहराजी की पत्नी बन कर रहूंगी.’’

राजेंद्र ने उसे अपने प्यार की दुहाई दी. परंतु वह जानबूझ कर उस की खिल्ली उड़ा रही थी. वह अपना होश खो बैठा. मेज पर पड़ी कैंची उस के हाथ में आ गई. उस ने कैंची का भरपूर वार उस के पेट पर कर दिया. वह चीख उठी. परंतु उस पर तो जैसे शैतान सवार हो गया था. वह कैंची से उस के शरीर को गोदता चला गया. वह जमीन पर गिर पड़ी. कुछ देर तड़पने के बाद उस ने दम तोड़ दिया. अमिता की मृत देह देख कर राजेंद्र के सिर पर सवार शैतान उतर गया. सामने लाश देख कर वह कांप उठा. अब क्या होगा? उस की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे. उस ने क्या सोचा था और क्या कर बैठा. कहां सब कुछ त्याग कर वह संन्यासी बनने चला था, कहां अब खूनी बन गया.

स्वयं को संतुलित कर उस ने आपबीती लिखनी शुरू की. उस के साथ जो कुछ हुआ था, सब लिख डाला. यह घटना स्पष्ट रूप से दिनेश मेहरा तथा अमिता के भाई के कारण ही हुई थी. राजेंद्र ने सब कुछ होशोहवास में लिखा था. 28 पृष्ठों के उस पत्र की कौपियां राष्ट्रपति, भारत सरकार, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा गृहमंत्री और लखनऊ के जिलाधिकारी को आवश्यक काररवाई हेतु भेज दिया. राजेंद्र कुमार तिवारी द्वारा लिखे गए इस पत्र को पढ़ कर थाना तालकटोरा के थानाप्रभारी रामकुमार यादव की आंखें फटी रह गईं. हत्यारे ने न केवल अपना अपराध स्वीकार किया था, बल्कि हत्या के कारण को भी स्पष्ट लिख दिया था. हत्या करने के बाद ही यह पत्र लिखा गया था, क्योंकि पत्र के अंत में राजेंद्र कुमार ने अपने हस्ताक्षर करने के साथ खून की छींटें भी डाली थीं.

थानाप्रभारी को यह पत्र अमिता की लाश के समीप एक मेज पर मिला था, जिसे वह उसी समय पूरा पढ़ गए थे. मेज पर ही खून से सनी कैंची भी रखी थी. कमरे की दीवारों पर भी खून के छींटे पड़े थे. मृत अमिता के शरीर पर सलवारकुर्ता था. राजेंद्र कुमार तिवारी की मकान मालकिन श्रीमती बाधवा भी उसी मकान के एक हिस्से में रहती थीं. पूछताछ के दौरान श्रीमती बाधवा ने पुलिस को बताया कि बीती रात उन्होंने राजेंद्र तथा उस की पत्नी के बीच हुए झगड़े की आवाजें सुनी थीं. घटना वाली सुबह जब वह बाहर निकलीं तो राजेंद्र के घर का दरवाजा बंद था. उन्हें आश्चर्य हुआ, क्योंकि उस समय तक दोनों लौन में बैठ कर अखबार पढ़ते हुए दिखाई देते थे.

उन्होंने दरवाजा खटखटाया. राजेंद्र को आवाज दी, पर अंदर से कोई जवाब नहीं मिला. वह सशंकित हो उठीं. मकान के पिछले हिस्से की तरफ जाने पर उन्होंने बाथरूम के दरवाजे पर ताला बंद पाया. श्रीमती बाधवा ने यह बात अमिता के पिता को बता देना उचित समझा. उन का फोन नंबर उन के पास था. उन्होंने फोन कर के उन्हें पूरी बात बता दी. एकदो पड़ोसियों को साथ ले कर अमिता के पापा राजेंद्र के मकान पर पहुंचे. उन लोगों ने भी दरवाजा खटखटाया. ताला तोड़ने की कोशिश की, पर सफल न हो सके. राजेंद्र को फोन किया. उस का फोन बंद था. किसी अनिष्ट की आशंका से उन्होंने थाना तालकटोरा पुलिस को फोन किया. थानाप्रभारी रामकुमार यादव पुलिस दल के साथ मौके पर पहुंचे. ताला तोड़ कर जब उन्होंने अंदर प्रवेश किया तो वहां अमिता का शव पड़ा था.

रामकुमार यादव इस घटना से काफी परेशान हो उठे थे. सुबहसुबह उन के थानाक्षेत्र में 2 अन्य घटनाएं भी हो चुकी थीं. एक अन्य युवती की हत्या का मामला था और तालकटोरा थानाक्षेत्र के डी-ब्लौक स्थित रेलवे लाइन पर एक घायल युवक मिला था. उस युवक को कुछ लोग बेहोशी की हालत में उठा कर थाने ले आए थे. उसे उपचार हेतु अस्पताल भेज दिया गया था. युवक की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. थानाप्रभारी ने संभावित स्थानों पर खोज की, परंतु राजेंद्र नहीं मिला. उस का फोन बंद ही था, इसलिए संपर्क नहीं हो सका. उस की तलाश में पुलिस टीम रायबरेली गई. वह अपने पिता के यहां भी नहीं मिला. पुलिस उस के पिता शिवप्रसाद तिवारी को अपने साथ लखनऊ ले आई. उन से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक बार फिर राजेंद्र की तलाश की, पर उस का पता नहीं चला.

अचानक थानाप्रभारी का माथा ठनका कि कहीं रेलवे लाइन पर घायल मिला युवक ही राजेंद्र न हो. इस के बाद उन्होंने शिवप्रसाद तिवारी को साथ लिया और बलरामपुर अस्पताल जा पहुंचे. वह युवक अभी तक बेहोश था. शिवप्रसाद तिवारी उसे देखते ही रो पड़े. वह राजेंद्र ही था. उस की निगरानी के लिए 2 सिपाहियों को वहां तैनात कर दिया गया. तीन दिनों बाद 25 जनवरी को राजेंद्र को होश आ गया. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस का कहना था, ‘‘मैं ने जो कुछ किया, उस का मुझे कोई दुख नहीं है. मलाल तो इस बात का है कि मेरा परिवार तबाह करने वालों को कानून ने कोई सजा नहीं दी. अब कुदरत ही उन के कर्मों का फल उन्हें देगा, ऐसा मेरा विश्वास है.’’

लेकिन सवाल उठता है कि क्या अमिता की हत्या के बाद राजेंद्र द्वारा लिखे गए पत्र में लगाए गए आरोपों की कोई सजा कथित दोषियों को मिल सकती है? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि कुछ लोगों को बदनाम करने के लिए हत्या के बाद लिखे गए पत्र में राजेंद्र ने उन का नाम लिखा हो? शायद यही वजह है कि दिनेश मेहरा (55 वर्ष) का कहना है, ‘‘मेरा और अमिता का रिलेशन केवल औफिशियल था. राजेंद्र ने अपने पत्र में मेरा जिक्र क्यों किया, यह मुझे नहीं पता. हो सकता है, उस ने मुझे बदनाम करने के लिए ऐसा किया हो. जहां तक सवाल है कि राजेंद्र ने अमिता की हत्या क्यों की तो इस का पता लगाना पुलिस का काम है, मेरा नहीं. हां, मैं यह जरूर कह सकता हूं कि अमिता बहुत ही मेहनती महिला थी. औफिस का काम भी वह पूरी ईमानदारी और लगन से करती थी. उस की मौत का मुझे दुख है.’’

दूसरी ओर अमिता के भाई अश्विनी का कहना था, ‘‘मुझे जो कुछ कहना है, पुलिस के सामने या अदालत में कहूंगा. लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि राजेंद्र न केवल सनकी, बल्कि पागल था. उस ने जो कुछ लिखा है, अपनी सनक और पागलपन की झोंक में लिखा है. हत्या के असली कारण से पुलिस का ध्यान हटाने के लिए उस ने ऊलजुलूल बातें अपने पत्र में लिखी हैं. आखिर इन बातों का कोई सुबूत तो होना चाहिए.’’

एक अहम सवाल यह भी है कि जब राजेंद्र अपना अपराध स्वीकार कर रहा है तो उसे हत्या का असली कारण छिपाने से क्या लाभ? उस ने अमिता से प्रेमविवाह किया था. दोनों साथसाथ रह रहे थे. दोनों ही सर्विस में थे. इसलिए न तो आर्थिक संकट जैसा कोई कारण था और न ही सर्विस को ले कर कोई मनमुटाव था. बहरहाल, पुलिस का कहना है कि उसे हत्या का अपराधी मिल गया है. पुलिस का काम तो हत्या के अपराधी को पकड़ने के साथ ही समाप्त हो गया है. किसी को सजा देने का काम अदालत का है. शायद इसी कारण पुलिस ने राजेंद्र द्वारा पत्र में लिखी गई बातों की वास्तविकता का पता नहीं लगाया और न ही इस संबंध में कोई छानबीन की.

थानाप्रभारी रामकुमार यादव इस बारे में कहते हैं, ‘‘राजेंद्र ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया है. उस ने अपने पत्र में किस पर क्या आरोप लगाया है, इस की जांच का काम हमारा नहीं है. हां, इतना जरूर है कि पाप का प्रायश्चित करने वाला व्यक्ति न झूठ बोल सकता है और न झूठ लिख सकता है. अदालत भले ही किसी को सजा न दे सके, लेकिन कुदरत जरूर सजा देगी.’’

कथा लिखे जाने तक राजेंद्र को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. पुलिस आरोपपत्र तैयार करने में जुटी थी. Short Hindi Story

—कथा सत्य घटना पर आधारित है. कथा में पात्रों एवं स्थानों के नाम बदले हुए हैं.

 

Family Crime: चरित्रहीन मां का गैरतमंद बेटा

Family Crime: भुलऊराम ने जो  हरकत की थी, कोई  भी गैरतमंद बेटा   बरदाश्त नहीं कर सकता था तो समयलाल कैसे बरदाश्त करता. आखिर मां की चरित्रहीनता ने उसे कातिल बना दिया. लंबी बीमारी के बाद ढेलाराम की जब मौत हुई तो पत्नी सुरजाबाई के लिए वह संपत्ति के नाम पर 6 बच्चे और एक छोटा सा मकान छोड़ गया था. गनीमत यह थी कि उस समय तक उस का बड़ा बेटा समयलाल 25 साल का हो चुका था. लड़का कमाने लायक हो गया था, इसलिए पति की मौत से सुरजाबाई को दिक्कतों का ज्यादा सामना नहीं करना पड़ा.

सुरजाबाई जवान थी, इसलिए खुद तो मजदूरी करती ही थी, समयलाल ने भी बलौदा बाजार मंडी के सामने साइकिल मरम्मत की दुकान खोल ली थी. मांबेटे की कमाई से किसी तरह खींचखांच कर गुजरबसर होने लगा था. इस की वजह यह थी कि कमाई के साथसाथ बच्चे बड़े हो रहे थे, जिस से खर्च बढ़ता जा रहा था. सुरजाबाई गांव के ही राजमिस्त्री भुलऊराम के साथ मजदूरी करने बलौदा बाजार जाती थी. उस के साथ आनेजाने में उसे कोई परेशानी नहीं होती थी. वह अपनी साइकिल से उसे साथ ले जाता और ले आता था.

सुरजाबाई अभी अधेड़ थी, इसलिए उसे मर्द की जरूरत महसूस होती थी. दिन तो कामधाम में कट जाता था, लेकिन रातें तनहाई में बेचैन करती थीं. तब जिस्मानी भूख उसे व्याकुल करती तो वह मन ही मन किसी ऐसे मर्द की कल्पना करती थी, जो उस की जिस्मानी भूख को शांत करता. उस की इस कल्पना में सब से पहले जिस का चेहरा आंखों के सामने आया, वह था भुलऊराम का, जिस के साथ वह पूरा दिन रहती थी. लोकलाज के भय से किसी तरह वह अपनी इस भूख को 2 सालों तक दबाए रही. लेकिन किसी भी चीज को आखिर कब तक दबाया जा सकता है. सुरजाबाई भी अपनी इस भूख को नहीं दबा सकी.

भुलऊराम ही सुरजाबाई के सब से करीब था. वह सुबह उस की साइकिल पर बैठ कर घर से निकलती थी तो सूर्यास्त के बाद ही घर लौटती थी. भुलऊराम था भी उस के जोड़ का. एक तो दोनों का हमउम्र होना, दूसरे पूरे दिन साथ रहने का नतीजा यह निकला कि वे एकदूसरे के प्रति आकर्षित होने लगे.

एक दिन काम करते हुए भुलऊराम ने कहा, ‘‘सुरजा, काम तो तुम मेरे साथ करती हो, जबकि मैं देखता हूं तुम्हारा मन कहीं और रहता है.’’

‘‘भुलऊ, तुम ठीक कह रहे हो. दिन तो तुम्हारे साथ गुजर जाता है, लेकिन रात गुजारे नहीं गुजरती. ऐसे में मन तो भटकेगा ही.’’ भुलऊराम को घूरते हुए सुरजाबाई ने कहा.

भुलऊराम ने जानबूझ कर यह बात कही थी. सुरजाबाई ने जवाब भी उसी तरह दिया था. वह कुछ कहता, उस के पहले ही सुरजाबाई बोली, ‘‘भुलऊ, तुम्हारी पत्नी कुछ दिनों के लिए मायके चली जाती है तो तुम्हें कैसा लगता है?’’

भुलऊराम ने सहज भाव से कहा, ‘‘मैं तो 10 दिनों में ही बेचैन हो जाता हूं. नहीं रहा जाता तो ससुराल जा कर ले आता हूं.’’

‘‘तुम 10 दिनों में ही बेचैन हो जाते हो, यहां तो मेरे पति को मरे 2 साल हो गए हैं. मेरी क्या हालत होती होगी, कभी सोचा है?’’ सुरजाबाई ने बेचैन नजरों से ताकते हुए कहा.

भुलऊराम इतना भोला नहीं था, जो सुरजाबाई के मन की बात न समझता. लेकिन वहां और भी तमाम लोग थे, इसलिए दोनों मन मसोस कर रह गए. दोनों ने उस दिन समय से पहले ही काम निपटा दिया और घर की ओर चल पड़े. सावन का महीना था, आसमान में घने काले बादल छाए थे. दोनों आधे रास्ते पहुंचे थे कि हवा के साथ बरसात शुरू हो गई. भुलऊराम ने एक पेड़ के नीचे साइकिल रोक दी. बरसात की वजह से रास्ता सूना हो गया था. दोनों भीग गए  थे, इसलिए उन के शरीर के उभार झलकने लगे थे. उस मौसम में रहा नहीं गया तो भुलऊराम ने सुरजा का हाथ थाम लिया. सुरजा ने उस की आंखों में झांका तो उस ने कहा, ‘‘सुरजा, तुम्हारा बदन तो तप रहा है. तुम्हें बुखार है क्या?’’

सुरजा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘भुलऊ, यह बुखार की तपन नहीं, यह तपन दिल में जो आग जल रही है, उस की है. आज तुम ने इस आग को और भड़का दिया है. अब तुम्हीं इस आग को बुझा सकते हो. आज रात को मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी. दरवाजा खुला रहेगा और मैं दहलीज में ही लेटूंगी.’’

भुलऊराम ने चाहतभरी नजरों से सुरजा को ताका और फिर साइकिल पर सवार हुआ तो पीछे कैरियर पर सुरजा बैठ गई. गांव आते ही सुरजा अपने घर चली गई तो भुलऊ अपने घर चला गया. कपड़े बदल कर उस ने खाना खाया और सब के सोने का इंतजार करने लगा. गांवों में तो वैसे भी लोग जल्दी सो जाते हैं. भुलऊराम के गांव वाले भी सो गए तो वह सुरजाबाई के घर की ओर चल पड़ा. बरसात होने की वजह से मौसम ठंडा था. बरसाती मेढक टर्रटर्र कर रहे थे तो झींगुरों की तीखी आवाज सन्नाटे को तोड़ रही थी. 5 मिनट बाद वह सुरजाबाई के घर के सामने खड़ा था. उस ने हलके हाथ से दरवाजा ठेला तो वह खुल गया. उस ने धीरे से आवाज दी, ‘‘सुरजा… ओ सुरजा.’’

सुरजा जाग रही थी. इसलिए उस के आवाज देते ही वह उस के सामने आ कर खड़ी हो गई. उस का हाथ थाम कर धीरे से फुसफुसाई, ‘‘बड़ी देर कर दी.’’

‘‘घर वाले जाग रहे थे. जब सब सो गए, तभी निकला. इसी चक्कर में देर हो गई.’’ भुलऊराम ने कहा.

सुरजा भुलऊराम का हाथ पकड़ कर कमरे में ले आई. उसे चारपाई पर बैठा कर खुद भी सट कर बैठ गई. तन की आंखों से भले ही वे एकदूसरे को नहीं देख रहे थे, लेकिन मन की आंखों से वे एकदूसरे का तनमन सब देख रहे थे.

सुरजाबाई ने भुलऊराम का हाथ थाम कर कहा, ‘‘तुम एकदम चुप हो. कुछ सोच रहे हो क्या?’’

भुलऊराम विचारों के भंवर से निकल कर बोला, ‘‘कल की सुरजा में और आज की सुरजा में कितना अंतर है.’’

‘‘तुम कहना क्या चाह रहे हो, मैं समझी नहीं?’’ सुरजा ने पूछा.

‘‘सुरजा थोड़ा ही सही, लेकिन तुम ने खुद को बदला है, यह अच्छी बात है. इंसान के मन को जो अच्छा लगे, वही करना चाहिए.’’

इस के बाद सुरजाबाई का मिजाज बदलने लगा. उसने भुलऊराम के कंधे पर हाथ रखा तो उस के सोए हुए अरमान जाग उठे. उस की पत्नी 15 दिनों से मायके गई हुई थी, इसलिए वह औरत की नजदीकी पाने के लिए बेचैन था. सुरजाबाई तो सालों से प्यासी थी. भुलऊराम पर टूट पड़ी. इस तरह भुलऊराम और सुरजाबाई के बीच नए संबंध बन गए. इस के बाद घरबाहर जहां भी मौका मिलता, दोनों संबंध बना लेते. वैसे भी दोनों दिन भर साथ ही रहते थे. आतेजाते भी साथ थे, इसलिए उन्हें न मिलने में दिक्कत थी, न संबंध बनाने में. इस के अलावा दोनों अपनी मर्जी के ही नहीं, घर के भी मालिक थे, इसलिए उन्हें कोई रोकटोक भी नहीं सकता था.

लेकिन जब दोनों का मिलनाजुलना खुलेआम होने लगा तो उन के संबंधों की चर्चा गांव में होने लगी. इस के बाद सुरजाबाई को बिरादरी वालों ने बाहर कर दिया. दूसरी ओर भुलऊराम की पत्नी भी इस संबंध का विरोध करने लगी. बिरादरी से बाहर किए जाने के बाद सुरजाबाई का बड़ा बेटा समयलाल भी मां के इस संबंध का विरोध करने लगा. इस की एक वजह यह भी थी कि गांव में सब समयलाल का मजाक उड़ाते थे. इसलिए पहले उस ने मां को समझाया. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने सख्ती की. लेकिन अब तक वह भुलऊराम के साथ संबंधों की आदी हो चुकी थी, इसलिए बेटे के रोकने पर उस ने कहा,

‘‘किस के लिए मैं दिनरात मेहनत करती हूं, तुम्हीं लोगों के लिए न? इतनी मेहनत कर के अगर मुझे किसी के साथ 2 पल की खुशी मिलती है तो तुम लोगों को परेशानी क्यों हो रही है?’’

‘‘तुम जिस तरह मुझे बहका रही हो, मैं सब जानता हूं. इस दुनिया में ऐसी तमाम औरतें हैं, जिन के पति मर चुके हैं, क्या वे सभी तुम्हारी तरह नाक कटाती घूम रही हैं. अपना नहीं तो कम से कम बच्चों का खयाल करो. तुम मां के नाम पर कलंक हो.’’ समयलाल गुस्से में बोला.

‘‘आज तू मुझे सिखा रहा है. कभी सोचा है मैं ने किन परिस्थितियों से गुजर कर तुम लोगों को पाला है. तुम्हारा बाप क्या छोड़ कर गया था? सिर्फ बच्चे पैदा कर के मर गया था. आज जो बकरबकर बोल रहा है, मुझे कुलटा कह रहा है, इस लायक मैं ने ही अपना खून जला कर बनाया है.’’ सुरजा गुस्से में बोली, ‘‘गनीमत है कि मैं तुम लोगों के साथ हूं. अगर छोड़ कर चली गई होती, तो…?’’

‘‘छोड़ कर चली गई होती, तभी अच्छा रहता. लोग आज हमारी हंसी तो न उड़ाते.’’

‘‘मुझे तुम से कोई सीख नहीं लेनी. मैं जैसी हूं, वैसी ही रहने दे. तुझ से नहीं देखासुना जाता तो तू घर छोड़ कर चला जा. और सुन, आज के बाद इस मामले में मुझ से कोई बात भी मत करना.’’ सुरजा ने साफ कह दिया कि कुछ भी हो, वह उन लोगों को छोड़ सकती है, पर भुलऊराम को नहीं छोड़ सकती.

इसी तरह दिन महीने बीतते रहे. न तो भुलऊराम ने अनीति का रास्ता छोड़ा और न ही सुरजाबाई ने. धीरेधीरे 3 साल बीत गए. इस बीच समयलाल ने मां को न जाने कितनी बार समझाया, लेकिन वह अपनी आदत से बाज नहीं आई. समयलाल खून का घूंट पी कर समय से तालमेल बिठाने की कोशिश करता रहा, लेकिन लाख प्रयास के बावजूद वह इस बदनामी को झेल नहीं सका, क्योंकि पानी अब सिर से ऊपर गुजरने लगा था. उस दिन यानी 3 अप्रैल को तो हद हो गई. अभी तक जो चोरीछिपे होता था, उस दिन सब के सामने ही भुलऊराम सुरजा से मिलने आ धमका. हुआ यह कि शाम को बलौदा बाजार से लौटते समय सुरजाबाई और भुलऊराम ने रास्ते में गोश्त और शराब खरीद लिया था.

घर आ कर सुरजा गोश्त बना रही थी कि कपड़े बदल कर भुलऊराम आ गया. इस के बाद दोनों शराब पीने लगे. खाना खातेखाते दोनों ने इतनी पी ली कि भुलऊराम को जहां सुरजाबाई के अलावा कुछ और नहीं दिखाई दे रहा था, सुरजा का भी कुछ वैसा ही हाल था. दोनों की हरकतों से तंग आ कर समयलाल ने भुलऊराम के पास जा कर कहा, ‘‘रात काफी हो गई है, अब तुम अपने घर जाओ. तुम्हारे घर वाले तुम्हारा इंतजार कर रहे होंगे.’’

‘‘मैं घर जाऊं या यहां सोऊं, तुम मुझ से कहने वाले कौन होते हो?’’ भुलऊराम ने कहा.

समयलाल को गुस्सा आ गया. वह अंदर से चारपाई का पाया उठा लाया और उसी से भुलऊराम पर हमला कर दिया. उस ने पूरी ताकत से पाया भुलऊराम के सिर पर मारा तो उस की खोपड़ी पहली ही बार में फट गई. फिर तो उस ने उसे तभी छोड़ा, जब वह मर गया. उसे मार कर वह घर से गायब हो गया. सुबह गांव वाले दिशामैदान के लिए गांव से बाहर निकले तो बाठी में उन्हें एक लाश दिखाई दी. पल भर में इस की चर्चा पूरे गांव में फैल गई. लाश औंधे मुंह पड़ी थी, उस के शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था, इस के बावजूद गांव वालों को उसे पहचानने में जरा भी दिक्कत नहीं हुई. लाश भुलऊराम की थी. भुलऊराम के भाई पुनीतराम ने बलौदा बाजार के थाना सिटी जा कर भाई की हत्या की सूचना दी.

हत्या का मामला था, इसलिए थानाप्रभारी डी.के. मरकाम ने घटनास्थल पर जाने से पहले घटना की सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. जिस से उन के घटनास्थल पर पहुंचतेपहुंचते आईएसपी अभिषेक सांडिल्य, एसडीएपी सी.पी. राजभानु भी घटनास्थल पहुंच गए थे. लाश की स्थिति से ही पता चल रहा था कि हत्या बड़ी बेरहमी से की गई थी. हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. लाश वहां घसीट कर लाई गई थी. पुलिस जब लाश घसीट कर लाने के निशान की ओर बढ़ी तो वह निशान सुरजाबाई के घर जा कर खत्म हो गया था.

मृतक भुलऊराम की साइकिल वहां से 2 सौ मीटर की दूरी पर खड़ी मिली. पूछताछ में पता चला कि वह उसी के यहां गया था और सुरजाबाई से उस के संबंध थे तो पुलिस के लिए आशंका की कोई बात नहीं रही. पुलिस ने सुरजाबाई और उस के बड़े बेटे समयलाल को हिरासत में ले लिया. इस तरह पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने से पहले ही अभियुक्तों को पकड़ लिया था. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मांबेटे को ले कर थाने आ गई.

थाने आ कर पहले मृतक के भाई पुनीतराम की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज किया, उस के बाद समयलाल से पूछताछ शुरू की. सख्ती के डर से उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना अपराध स्वीकार कर के भुलऊराम की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी. भुलऊराम के उस की मां से संबंध हैं, यह वह जानता ही था. सब कुछ जान कर भी वह चुप था. लेकिन उस दिन तो भुलऊराम ने हद ही कर दी. उस के यहां शराब पी कर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस के सामने ही वह उस की मां से अश्लील हरकतें करने लगा. उस ने मना किया तो उस ने अपने सारे कपड़े उतार कर कहा, ‘‘मैं यहीं तेरे सामने ही तेरी मां से संबंध बनाऊंगा, देखता हूं तू क्या करता है.’’

भुलऊराम ने जो कहा था, और जो करने जा रहा था, समयलाल की जगह कोई भी गैरतमंद बेटा होता, बरदाश्त नहीं कर सकता था. उस से भी नहीं बरदाश्त हुआ. उस ने इधरउधर देखा, चारपाई का एक पाया पड़ा दिखाई दिया. उस ने उसे उठाया और भुलऊराम पर पिल पड़ा. इस के बाद तो वहां खून ही खून नजर आने लगा. भुलऊराम खून में डूबता गया. भुलऊराम की हत्या कर के समयलाल अपने दोस्त के यहां चला गया. सुबह जब वह घर पहुंचा तो लाश वहां नहीं थी. लाश बाठी तक कैसे पहुंची, उसे मालूम नहीं.

इस के बाद पुलिस ने सुरजाबाई से पूछताछ की तो उस ने रोते हुए कहा, ‘‘मैं दरवाजे के पास खड़ी सब देख रही थी. मैं पतिता ही सही, पर इस की मां हूं. साहब मेरी वजह से आज यह हत्यारा हो गया है. इसे बचाने के लिए मैं लाश को घसीट कर बाठी में डाल आई और सुबह होने से पहले गोबर से लिपाई कर के खून साफ कर दिया.’’

इस के बाद समयलाल की निशानदेही पर पुलिस ने चारपाई का पाया, खून से सने उस के कपड़े बरामद कर लिए. सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने समयलाल और उस की मां सुरजाबाई को कोर्ट में पेश किया, जहां से उस की मां को रायपुर की महिला जेल तो समयलाल को बलौदा बाजार जेल भेज दिया गया. Family Crime

Hindi Crime Stories: ममता को दी मौत

Hindi Crime Stories: पैसों के लिए जितेंद्र मां से झोपड़ी बचेने को कह रहा था जबकि मां झोपड़ी बेचना नहीं चाहती थी. जितेंद्र ने झोपड़ी तो बेच दी लेकिन ममता का कत्ल कर के. जितेंद्र को पैसों की सख्त जरूरत थी, लेकिन कहीं से जुगाड़ नहीं बन रहा था. क्योंकि उसे जितने पैसों की जरूरत थी, उतने कोई उधार नहीं दे सकता था. उस के पास इतनी प्रौपर्टी भी नहीं थी कि किसी बैंक से कर्ज मिल जाता. उस के पास कोई ऐसी जमापूंजी भी नहीं थी कि उसी से काम चला लेता. मजदूरी कर के भी वह उतने पैसे इकट्ठा नहीं कर सकता था.

बाप मनीराम पहले ही किसी दूसरी औरत के चक्कर में उसे और उस की मां को छोड़ कर चला गया था. गांव में औरतों को न तो ठीक से काम मिलता था और अगर काम मिलता भी था तो ठीक से मजदूरी नहीं मिलती थी, इसलिए फिरतीन बाई एकलौते बेटे जितेंद्र को गांव में छोड़ कर बिलासपुर आ गई थी, जहां उसे ठीकठाक काम के साथ अच्छी मजदूरी भी मिल रही थी, जिस से उस का गुजर तो आराम से हो ही रहा था, 4 पैसे बच भी रहे थे. जो पैसे बचते थे, महीने में एक बार वह गांव जा कर बेटे की मदद कर देती थी.

बिलासपुर में रहने के लिए फिरतीन बाई ने सरकारी जमीन पर एक झोपड़ी बना रखी थी. यह बात जितेंद्र को पता थी. उसे यह भी पता था कि वह झोपड़ी आराम से 60-70 हजार में बिक सकती है. इसलिए जब जितेंद्र को पैसों की जरूरत पड़ी तो उस ने मां से झोपड़ी बेचने को कहा. लेकिन फिरतीन बाई इस के लिए राजी नहीं हुई. क्योंकि उसे पता था कि जब तक उस के हाथपैर चल रहे हैं, वह इस झोपड़ी में रह कर कमाखा रही है. जो 4 पैसे बचते हैं, उस से बेटे की मदद कर देती है.

बुढ़ापे के लिए उस का हाथ खाली था. उस की जो जमापूंजी थी, वही झोपड़ी थी. कल को हाथपैर नहीं चलेगा तो इस झोपड़ी को बेच कर किसी तरह वह गांव में गुजरबसर कर लेगी. अगर वह अभी झोपड़ी बेच देती है तो सारे पैसे बेटा ले लेगा. उस के बाद वह खाली हाथ हो जाएगी. बेटे पर उसे भरोसा नहीं था कि बुढ़ापे में वह उस की सेवा करेगा. फिरतीन अपने बारे में सोच रही थी तो जितेंद्र अपने बारे में. उसे किसी भी तरह रुपए चाहिए थे. पहले तो जब मां गांव आती थी, तभी वह उस से झोपड़ी बेचने को कहता था.

लेकिन जब मां ने साफ मना कर दिया तो वह मां को मनाने शहर भी जाने लगा, क्योंकि उस की मंशा भांप कर मां ने गांव आना बंद कर दिया था. एकदो बार तो वह अकेला ही गया, लेकिन जब मां ने हामी नहीं भरी तो दबाव डालने के लिए वह रिश्तेदारों को ले कर जाने लगा. काफी कोशिशों के बाद भी फिरतीन बाई झोपड़ी बेचने को राजी नहीं हुई तो अंत में जितेंद्र मां को समझाने के लिए अपने ससुर तिहारूराम को ले कर मां की झोपड़ी पर पहुंचा. समधी पहली बार फिरतीन बाई की झोपड़ी पर आया था, इसलिए उस ने उस की अपनी हैसियत के हिसाब से आवभगत की. नाश्तापानी के बाद झोपड़ी बेचने की बात चली तो तिहारूराम दामाद का पक्ष ले कर फिरतीन बाई को समझाने लगा.

समधी के समझाने पर भी जब फिरतीन बाई झोपड़ी बेचने को राजी नहीं हुई तो जितेंद्र को गुस्सा आ गया. वह उठा और मां के पास जा कर बोला, ‘‘मां, मुझे पैसों की सख्त जरूरत है, इसलिए झोपड़ी तो तुम्हें बेचनी ही पड़ेगी. सीधे नहीं बेचोगी तो…’’

जितेंद्र की बात पूरी होती, उस के पहले ही फिरतीन बाई बोली, ‘‘तो क्या तू जबरदस्ती मेरी झोपड़ी बिकवा देगा. झोपड़ी मेरी है, जब मैं चाहूंगी तभी बेचूंगी, नहीं चाहूंगी तो नहीं बेचूंगी. तू कौन होता है मेरी झोपड़ी बिकवाने वाला.’’

‘‘मां, मुझे पैसों की सख्त जरूरत है. अगर सीधेसीधे बेच दे तो अच्छा रहेगा, वरना…’’

‘‘वरना क्या…मैं झोपड़ी कतई नहीं बेचूंगी, तुझे जो करना हो कर ले.’’ फिरतीन बाई चीखी.

‘‘देख, मैं क्या कर सकता हूं…’’ कह कर जितेंद्र ने मां के बाल पकड़े और जमीन पर पटक दिया. फिरतीन बाई ने सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है. इसलिए बेटे की इस हरकत पर वह हक्काबक्का रह गई. वह कुछ कहती या करती, जितेंद्र ने अपना दाहिना पैर उठाया और मां के गले पर रख दिया.

फिरतीन बाई ने गला छुड़ाने के लिए दोनों हाथों से जितेंद्र का पैर पकड़ कर हटाना चाहा, लेकिन तब तक तो वह अपना पैर गले पर इस तरह जमा चुका था कि वह टस से मस नहीं कर पाई. गले पर दबाव पड़ा तो वह छटपटाई. लेकिन वह ठीक से छटपटा भी नहीं सकी, क्योंकि जितेंद्र के ससुर तिहारूराम ने उस के दोनों पैर पकड़ लिए थे. पलभर में जितेंद्र ने ससुर की मदद से मां का खेल खत्म कर दिया. अब उन के सामने फिरतीन बाई की लाश पड़ी थी. लाश छोड़ कर वे जा नहीं सकते थे. अगर वहां लाश पड़ी रहती तो झोपड़ी बिक नहीं सकती थी. बाद में लोग उसे लेने से कतराते. अगर कोई लेता भी तो औनेपौने दाम में लेता, इसलिए ससुरदामाद लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाने लगे.

जितेंद्र ने टीवी पर आने वाले सीरियल सीआईडी में देखा था कि कोई लाश 2 थानों या 2 जिलों की सीमा पर मिलती है तो मामला सीमा विवाद में उलझ कर रह जाता है. इसलिए उस ने मां की लाश को 2 जिलों की सीमा पर फेंकने का विचार किया. उस का सोचना था कि सीमा पर लाश फेंकने पर मामला सीमा विवाद में तो उलझेगा ही, लाश की शिनाख्त भी जल्दी नहीं हो पाएगी. तब पुलिस किसी भी सूरत में उस तक नहीं पहुंच पाएगी. यही सब सोच कर उस ने ससुर से बात की और लाश को बोरे में भर कर उसे ठिकाने लगाने के लिए मोटरसाइकिल से बलौदा बाजार सीमा की ओर चल पड़ा.

बिलासपुर के थाना पचपेड़ी के अंतर्गत बलौदा बाजार और बिलासपुर जिलों की सीमा पर स्थित गांव नयापारा रहटाटोर के पास शिवनाथ नदी पर बने बांध में उन्होंने लाश फेंक दी और अपनेअपने घर चले गए. इस के बाद जितेंद्र ने बिलासपुर जा कर मां की झोपड़ी यह कह कर 67 हजार रुपए में बेच दी कि उस की मां अब गांव में ही रहेगी. इस तरह जितेंद्र ने मां की हत्या कर के झोपड़ी बेच दी. उसे पूरा विश्वास था कि पुलिस उस तक कतई नहीं पहुंच पाएगी. इस की वजह यह थी कि उन्होंने लाश दूसरे जिले यानी बलौदा बाजार जिले में फेंकी थी, जबकि वह रहती बिलासपुर जिले में थी.

हुआ भी वही. 3 मार्च को बलौदा बाजार पुलिस को बांध में लाश पड़ी होने की सूचना मिली. लेकिन बलौदा बाजार पुलिस घटनास्थल पर नहीं पहुंची. तब जिला बिलासपुर के घटनास्थल के नजदीकी थाना पचपेड़ी पुलिस ने जा कर लाश कब्जे में ली और घटनास्थल की काररवाई निपटा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. घटनास्थल पर लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर पता चला कि महिला की गला दबा कर हत्या की गई थी, इसलिए थाना पचपेड़ी पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज करा दिया. थाना पचपेड़ी पुलिस को पूरा विश्वास था कि लाश जहां पड़ी थी, वह स्थान बलौदा बाजार जिले के अंतर्गत आता है, इसलिए उन्होंने मामले की फाइल बलौदा बाजार पुलिस को भेज दी.

लेकिन जब बलौदा बाजार के एसपी ने नापजोख कराई तो पता चला कि जिस स्थान पर लाश पड़ी थी, वह स्थान जिला बिलासपुर के अंतर्गत ही आता है तो उन्होंने फाइल बिलासपुर के एसपी को भिजवा दी. बिलासपुर के एसपी बद्रीनारायण मीणा ने कत्ल के इस मामले को चुनौती के रूप में लिया और थाना पचपेड़ी पुलिस को निर्देश दे कर फाइल सौंप दी. कत्ल के इस मामले की जांच चौकीप्रभारी वाई.एन. शर्मा को सौंपी गई. इस मामले में सब से मुश्किल काम था लाश की शिनाख्त कराना. श्री शर्मा ने मृतका की शिनाख्त के लिए बिलासपुर के ही नहीं, बलौदा बाजार के भी सभी थानों से पता किया कि इस तरह की महिला की कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है.

उन की यह कोशिश असफल रही. क्योंकि इस तरह की महिला की गुमशुदगी किसी थाने में दर्ज नहीं थी. इस के बाद एसपी श्री मीणा ने लाश के फोटो के पैंफ्लेट छपवा कर घटनास्थल से 30 किलोमीटर की रेंज में चस्पा कराने का आदेश दिया. लाश के फोटो वाले पैंफ्लेट गांवगांव चस्पा कराए गए. इस का परिणाम यह निकला कि जिला बलौदा बाजार की पुलिस चौकी लवन के अंतर्गत आने वाले गांव चिचिरदा के रहने वाले फागुलाल ने मृतका की पहचान अपनी बहन फिरतीन बाई के रूप में कर दी. इस के बाद वाई.एन. शर्मा ने जांच आगे बढ़ाई तो संदेह के घेरे में मृतका का बेटा जितेंद्र आ गया. इस की वजह यह थी कि उस ने थाने में मां की गुमशुदगी नहीं दर्ज कराई थी. झोपड़ी बेचते समय उस ने सभी को यही बताया था कि मां अब गांव में रहेगी. लेकिन वह गांव में भी नहीं थी.

पुलिस जितेंद्र को पकड़ कर थाना पचपेड़ी ले आई. पूछताछ में पहले तो उस ने मां की हत्या से इनकार किया. लेकिन जब पुलिस ने उस के साथ सख्ती की तो मजबूर हो कर उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने पुलिस को बताया कि मां के झोपड़ी बेचने से मना करने पर उसी ने अपने ससुर तिहारूराम के साथ मिल कर मां की हत्या की थी. इस के बाद जितेंद्र की निशानदेही पर वाई.एन. शर्मा ने उस के ससुर तिहारूराम को गिरफ्तार कर के वह मोटरसाइकिल भी बरामद कर ली, जिस से उन्होंने लाश को ठिकाने लगाया था. सारे साक्ष्य जुटा कर पुलिस ने 28 वर्षीय जितेंद्र और 60 वर्षीय तिहारूराम को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

जितेंद्र से पूछताछ में पता चला कि फिरतीन बाई और उस के भाई के खिलाफ 1991 में बलवा और हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ था, जिस में वह डेढ़ साल तक जेल में रही थी. Hindi Crime Stories

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Illicit Affair: मामी की मोहब्बत में

Illicit Affair: राहुल और संतोष को जब नर्मदा ने नशे में अपने और सुनीता के संबंधों के बारे में बताया तो दोनों का खून खौल उठा. इस के बाद तो उन्होंने न संबंधों का खयाल रखा और न दोस्ती का. न र्मदा प्रसाद ने 36 वर्षीया मुंहबोली मामी सुनीता के साथ पहली बार शारीरिक संबंध बनाए तो खुद को जांबाज मर्द समझने लगा. बेरोजगारी की वजह से नर्मदा पहले न किसी से प्यार कर पाया था और न किसी से शारीरिक संबंध बनाए थे. इस तरह का खेल उस ने अपने दोस्तों के मोबाइल पर जरूर देखा था. तब उसे लगा था कि यह खेल सचमुच में खेला जाए तो जरूर बड़ा मजा आएगा.

सुनीता के साथ उसी की पहल पर जब पहली बार जिंदगी के इस हसीन सुख से रूबरू हुआ तो सुख के इस समुद्र में डूबतातैरता हुआ वह समझ नहीं पाया कि इस में उस की खुद की कोई खूबी नहीं, बल्कि सुनीता मामी की हिदायतें और सीखें ज्यादा थीं. सुनीता को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह एकदो नहीं, बल्कि 3 बच्चों की मां है.

36 की उम्र में भी उस का अंगअंग सांचे में ढला लगता था. यह कुदरत की ही मेहरबानी थी. क्योंकि वह फिटनैस के लिए रईस औरतों की तरह न किसी फिटनैस सेंटर या जिम में जाती थी, न ही सुंदर दिखने के लिए किसी ब्यूटीपौर्लर में. हां, घर के कामकाज जरूर उसे अपने हाथों से करने पड़ते थे, क्योंकि पति की इतनी आमदनी नहीं थी कि वह कामवाली रख लेती. लेकिन पति की कमाई इतनी कम भी नहीं थी कि फांके मारना पड़ता या किसी के सामने हाथ फैलाना पड़ता. भोपाल से सटे औद्योगिक इलाके मंडीदीप में फैक्ट्रियों की भरमार है, जहां आसपास या मध्य प्रदेश के ही नहीं, देश भर के लोग काम की तलाश में आते हैं. नौकरी मिल जाने पर ज्यादातर लोग यहीं बस गए हैं. देश की जिन नामी कंपनियों ने यहां फैक्ट्रियां लगा रखी हैं, उन में एक बड़ा नाम दवा बनाने वाली कंपनी ल्यूपिन का भी है, जिस में हजारों मजदूर काम करते हैं.

उन्हीं हजारों लोगों में एक 37 वर्षीय कुंवर सिंह तोमर भी है, जो फैक्ट्री में नौकरी करते हुए जानता था कि अगर बच्चों और साथ रह रहे भाई राहुल को कुछ बनाना है तो उन्हें बेहतर पढ़ाई मुहैया कराना जरूरी है. लिहाजा वह लगन और मेहनत से नौकरी तो करता ही था, साथ ही शाम को ड्यूटी खत्म होने के बाद पानीपूरी का ठेला भी लगाता था. इस से उसे 3-4 सौ रुपए रोज की ऊपर की आमदनी हो जाती थी. सालों पहले जब कुंवर सिंह हरदा जिले के नीमगांव से मंडीदीप आया था तो अन्य लोगों की तरह खाली हाथ था. लेकिन धीरेधीरे घरगृहस्थी की जरूरत की सारी जरूरी चीजें जमा हो गई थीं. पास में कुछ पैसे भी हो जाएं, इस के लिए वह शाम को पानीपूरी का ठेला लगाने लगा था.

इस काम में उसे न शरम आती थी, न ही हिचक महसूस होती थी. मिलनसार होने की वजह उस का यह धंधा बढि़या चल निकला था. मंडीदीप में हर कोई उसे जानने भी लगा था. फैक्ट्री में अपनी ड्यूटी करने के बाद वह देर रात तक पानीपूरी बेच कर इतना थक जाता था कि घर आते ही खाना खा कर बिस्तर पर लुढ़क कर खर्राटे भरने लगता. यह बात कई बार सुनीता को बेहद नागवार गुजरती, लेकिन वह कुछ कह नहीं पाती थी. क्योंकि कुंवर सिंह बच्चों और घरगृहस्थी की बेहतरी के लिए ही अपना खूनपसीना एक कर रहा था. पति की इस मजबूरी की वजह से सुनीता बिस्तर पर करवटें बदलते हुए आहें भरती रहती. ऐसे में 12 साल पहले हुई शादी के बाद के दिनों को याद कर के सोने की कोशिश में वासना की आग बुझने के बजाय और भड़क उठती.

किसी तरह उसे नींद आती तो सुबह जल्दी उठ कर घर के कामकाज और बच्चों की तीमारदारी में लग जाना होता. मन ही मन घुट रही सुनीता की समझ में आने लगा था कि अब कुछ नहीं हो सकता. कुंवर सिंह उस के जज्बातों को समझ नहीं सकता. उसे रोज इसी तरह मछली की तरह तड़पना होगा. सुनीता के मन में बारबार यही खयाल आता कि पति को वह कैसे समझाए कि 3 बच्चों की मां बन जाने से औरत की शारीरिक सुख की लालसा कम नहीं हो जाती, बल्कि और बढ़ जाती है. लेकिन यह बात वह कहतेकहते रह जाती. ज्यादा बच्चे न हों, पति के कहने पर उस ने नसबंदी करा ली थी. इस पूरी कशमकश में अच्छी बात यह थी कि अभी तक उस के मन में पराए मर्द का खयाल नहीं आया था. शायद आता भी न, अगर नर्मदा प्रसाद का इस तरह उस के घर आनाजाना न होता.

यह नए साल यानी 2015 की शुरुआत की बात थी, जब एक दिन कुंवर सिंह ने सुनीता से कहा कि होशंगाबाद से भांजा नर्मदा प्रसाद काम की तलाश में उन के घर आने वाला है. नर्मदा को कभी सुनीता ने देखा नहीं था, लेकिन अपने पति की मुंहबोली बहन को वह अच्छी तरह जानती थी, जो कभीकभार उस के यहां राखी बांधने आती थी. और अगर नहीं आ पाती थी तो डाक से भेज देती थी. नर्मदा की मां और उस के पति ने एक ही गुरु से दीक्षा ली थी, इस नाते वह भाईबहन हो गए थे. वे इस रिश्ते का पूरी तरह सम्मान करते थे और हैसियत के मुताबिक निभाते भी थे.

नर्मदा प्रसाद जब मंडीदीप आया तो कुंवर सिंह ने उस की हर तरह से मदद की. पहले तो सिफारिश कर के उसे एक ग्लास फैक्ट्री में नौकरी दिलवाई. इस के बाद मंडीदीप मोहल्ला वार्ड नंबर 2 में अपने घर के सामने ही किराए पर कमरा दिलवा कर रहने की व्यवस्था कर दी. कुंवर सिंह उसे एकदम सगे भांजे की तरह मानता था. यह बात सचमुच मिसाल थी, क्योंकि वजहें कुछ भी हों, आजकल लोग सगे रिश्तों को भी इस तरह नहीं निभा पाते. इधर मुद्दत से काम की तलाश में भटक रहे बेटे को नौकरी मिली तो होशंगाबाद में रह रही उस की मां को भी तसल्ली हुई कि अब बेटे की जिंदगी पटरी पर आ जाएगी.

रायसेन में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी कर रहे नर्मदा प्रसाद के पिता लक्ष्मीनारायण ने भी बेटे की नौकरी लगने पर बेफिक्री की सांस ली और मन ही मन सोचने लगे कि साल, 2 साल नर्मदा नौकरी कर ले तो अच्छी सी लड़की देख कर उस की शादी कर के गृहस्थी बसाने की जिम्मेदारी पूरी कर देंगे. होशंगाबाद से हो कर बहती नर्मदा नदी की वजह से उसी का प्रसाद मान कर लक्ष्मीनारायण ने बेटे का नाम नर्मदा प्रसाद रखा था. तब उन्हें शायद इस बात का अहसास नहीं था कि मंडीदीप जा कर उस की जिंदगी की नदी एकदम उलटी बह कर अनर्थ कर डालेगी.

नर्मदा जब मंडीदीप में रहने लगा तो स्वाभाविक रूप से मामा के घर उस का जानाआना होता रहा. शुरुआत में तो सुनीता ने उसे ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि पहले से ही उस के काफी रिश्तेदार और जानपहचान वाले मंडीदीप में रहते थे. ऐसे में पति ने इस मुंहबोले भांजे को ला कर उस का सिरदर्द और बढ़ा दिया था. लेकिन उस के लगातार आनेजाने से जल्दी ही वह खुद को फिर से जवान समझने लगी थी. वजह थी नर्मदा की उस के हसीन जिस्म को भेदती नजरें. हट्टाकट्टा और खूबसूरत नर्मदा जब अपनी इस मुंहबोली मामी को देखता तो लाख कोशिश के बाद भी वह मन में उठ रहे वासना के तूफान को चेहरे पर आने से रोक नहीं पाता.

भांजे के मन की बात का अहसास होते ही सुनीता का दिल उछलने लगा था कि नर्मदा चोरीछिपे उस के जिस्म को नापतातौलता रहता है. अकसर उस की निगाहें उस के उभारों पर आ कर ठहर जातीं. यह जानने के बाद उस ने नर्मदा को बातों और हरकतों से शह देना शुरू कर दिया. अब वह सीने को पल्लू से ढंकने के बजाय अकसर गिरा देती और उसी तरह गिरा रहने देती, जिस से नर्मदा उस से नजरें बचा कर अपनी मुराद पूरी कर सके. इस के बाद दोनों में बातें तो खूब होने ही लगीं, मजाक भी होने लगा. धीरेधीरे उन के मजाक में दोअर्थी शब्द भी आने लगे. सुनीता की शारीरिक सुख की कामना अंगड़ाईयां लेने लगीं. सामने बैठा मर्द क्या सोच रहा है, यह एक औरत ही बेहतर समझ सकती है. अब यह उस की मर्जी पर निर्भर करता है कि वह उसे पहली सीढ़ी पर ही रोक दे या फिर छत तक जाने दे.

सुनीता ने तो अपनी तरफ से पूरा दरवाजा ही खोल दिया था, लेकिन यह नर्मदा के मन की हिचकिचाहट और डर था कि आंखों के सामने मिठाई रखे होने के बाद भी वह उसे उठा कर खाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था. लेकिन आंखों से देखने से पेट तो भर नहीं सकता था. यही हालत सुनीता की भी थी और नर्मदा की भी. इस का मतलब आग दोनों तरफ बराबर लगी थी, बस भड़कने का इंतजार था कि पहल कौन करे. नर्मदा अपने दिल की बात इशारों से कहता तो सुनीता खुश होने के साथसाथ झल्ला भी उठती थी कि कैसा बेवकूफ लड़का है, सारी छूट दे रखी है, इस के बावजूद यह सिर्फ आग सुलगा कर चला जाता है. आखिरकार एक दिन सुनीता के सब्र का बांध टूट गया और उस ने पूछ लिया, ‘‘यूं चोरीछिपे देखते ही रहोगे कि मुंह से कहोगे भी कि तुम चाहते क्या हो?’’

नर्मदा इतना नादान और बेवकूफ भी नहीं था कि इतने पर भी चुप रहता. सुनीता की इस पहल पर उस ने वही किया, जो कोई भी युवक करता. उस समय घर में उन दोनों के अलावा कोई और नहीं था, इसलिए उस ने सुनीता को बांहों में उठाया और बिस्तर पर ला पटका. इस के बाद वह उस पर छा गया. अब कहनेसुनने को कुछ नहीं रह गया था. वासना एक तेज तूफान आया और एक नौसिखिया तथा एक तजुर्बेकार तैराक अपनेअपने तरीके से उस में गोते लगाने लगे. सुनीता को मुद्दत बाद मर्द का सुख मिला था, इसलिए वह उस पर निहाल हो उठी. दूसरी ओर नर्मदा भी अपने कमरे में आ कर निढाल सा बिस्तर पर पड़ कर कुछ देर पहले भोगे सुख को याद कर के रोमांचित होने लगा.

उस ने शारीरिक सुख के बारे में जो सुना और पढ़ा था, उस का असली सुख तो उस से कहीं ज्यादा था. इस के बाद यह लगभग रोज की बात हो गई. नर्मदा फैक्ट्री से आता तो सीधे सुनीता के पहलू में जा समाता. मौके की कमी नहीं थी, उस समय बच्चे खेलने गए होते थे और राहुल अपने दोस्तों के साथ गप्पे लड़ाने में मशगूल रहता था. उन दोनों के इस नाजायज रिश्ते के बारे में कोई शक भी नहीं करता था. इस की वजह कुंवर सिंह का व्यवहार और इन दोनों की सतर्कता थी. उम्र में अपने से कुछ छोटे राहुल को भी नर्मदा ने इस तरह पटा लिया था कि वह भी इस बारे में सोच नहीं सकता था.

धीरेधीरे सुनीता और नर्मदा के शारीरिक संबंध प्यार में बदल गए और दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. यही नहीं, उन का यह प्यार इस हद तक परवान चढ़ा कि दोनों अपना बच्चा पैदा करने के बारे में सोचने लगे. इस के लिए सुनीता नसबंदी का औपरेशन खुलवाने को भी तैयार हो गई. चूंकि मंडीदीप में रहते दोनों शादी नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने भाग कर शादी करने का फैसला कर लिया. सुनीता भूल गई कि वह 3 बच्चों की मां और गरीब ही सही, पर एक इज्जतदार आदमी की पत्नी है, जिस का समाज और रिश्तेदारी में अपना अलग रसूख है.

नर्मदा भी मामा का एहसान भूल गया कि इस शख्स ने भागदौड़ कर किस तरह नौकरी दिलाई और मंडीदीप में जमने में मदद की. शायद उतनी सहायता तो सगा मामा भी नहीं करता और उस ने एवज में क्या किया, इस मुंहबोले मामा की पीठ में छुरा घोंप दिया. नर्मदा और सुनीता सारी दुनियादारी और जिम्मेदारियां भूल कर नई दुनिया बसाने की तैयारी में जुट गए थे. मई के पहले सप्ताह में चिलचिलाती गरमी में नर्मदा, राहुल और सुनीता की बहन के लड़के संतोष को शराब की पार्टी देने होशंगाबाद ले गया. मंडीदीप और होशंगाबाद के बीच औबेदुल्लागंज में रुक कर तीनों ने छक कर शराब पी. नर्मदा आदतन शराबी था, लेकिन उस दिन ज्यादा पी लेने की वजह से उस का दिमाग काबू से बाहर होने लगा. राहुल और संतोष को काफी दिनों बाद मनमाफिक पीने की मिली थी, वह भी मुफ्त में, इसलिए वे दोनों भी धुत होते जा रहे थे.

शराब का नशा क्यों नुकसानदेह कहा जाता है, यह जल्दी ही सामने आ गया. नशे की झोंक में डींगे हांकते हुए नर्मदा ने राहुल और संतोष को हमदर्द समझते हुए उन के सामने सुनीता के साथ के अपने संबंध उजागर कर दिए. उस ने दिल की बात जिस तरह कही, वह सुन कर राहुल का खून खौल उठा. लेकिन उस समय उस ने खामोश रहना ही बेहतर समझा, क्योंकि नशे की हालत में वह कुछ नहीं कर सकता था. दूसरे नर्मदा कितना सच और कितना झूठ बोल रहा था, इस का भी अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था. नर्मदा के मुंह से यह सुन कर कि जल्दी ही भाग कर दोनों शादी करने वाले हैं, उसे लगा कि दाल में जरूर कुछ काला ही नहीं है, बल्कि पूरी दाल ही काली है.

अपनी भाभी को मां की तरह चाहने और इज्जत देने वाले राहुल का नशा उड़ चुका था. वह बदले की आग में जल रहा था. तीनों पार्टी खत्म कर के मंडीदीप वापस आ गए और सो गए. अगले दिन राहुल ने जिस अंदाज में सुनीता और नर्मदा को बातें करते देखा, उस से उसे ताड़ते देर नहीं लगी कि बीती रात नशे में ही सही, नर्मदा ने जो कहा था, वह गलत नहीं था. अब राहुल की दिमागी स्थिति गड़बड़ाने लगी. कल तक जो नर्मदा उसे पक्का दोस्त लगता था, वह दुश्मन नंबर एक लगने लगा. उसी के साथ मां समान लगने वाली भाभी कुलटा लग रही थी, जो देवता समान पति की धोखा देने में तनिक भी नहीं हिचकिचा रही थी.

क्या किया जाए, यह सवाल राहुल को मथे डाल रहा था. भाई से कहता तो तय था कि वह उस की बात पर यकीन नहीं करते और बेवजह बात का बतंगड़ बनाते. मुमकिन है, भाभी भी उस पर ही उलटासीधा इलजाम लगा देती. हैरानपरेशान राहुल ने संतोष से बात की, जो खुद पिछली रात से तनाव में था कि उस की मौसी ऐसी है. दोनों ने मिल कर तय किया कि अब नर्मदा की हत्या के सिवाय और कोई रास्ता नहीं है. इस के लिए दोनों ने तुरंत योजना भी बना डाली. शाम के वक्त नर्मदा उन्हें मिला तो दोनों ने ऐसी ऐक्टिंग की, मानों बीती रात क्या हुआ था, उसे वे भूल चुके थे या फिर उस से उन्हें कोई सरोकार नहीं था. इतराते हुए उन्होंने नर्मदा से फिर शराब पिलाने को कहा तो नर्मदा खुशीखुशी तैयार हो गया.

तय हुआ कि आज कलियासोत बांध पर चल कर पी जाए. तीनों बांध पर पहुंचे और पीनी शुरू कर दी. फर्क इतना था कि आज राहुल और संतोष दिखावे के लिए घूंटघूंट पी रहे थे, जबकि नर्मदा को ज्यादा से ज्यादा पिलाने की कोशिश कर रहे थे. नशा चढ़ा तो नर्मदा ने फिर अपने और सुनीता के संबंधों के बारे में बताना शुरू कर दिया. ये बातें राहुल और संतोष के कानों में पिघले शीशे की तरह उतर रही थीं. सुनतेसुनते जब यकीन हो गया कि नर्मदा को इतना नशा चढ़ गया है कि वह कुछ नहीं कर सकता तो दोनों ने एकदूसरे को इशारा किया.

इस के बाद वे उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार करने लगे. नर्मदा के शरीर को चाकुओं से गोद कर उस के चेहरे पर एक भारी पत्थर पटका. जब उन्हें तसल्ली हो गई कि यह मर चुका है तो उन्होंने लाश को वहीं कचरे के ढेर में छिपा दिया और मंडीदीप वापस आ गए. दूसरे दिन 8 मई को थाना मिसरोद के थानाप्रभारी के.एस. मुकाती को किसी अज्ञात आदमी ने फोन द्वारा सूचना दी कि कलियासोत नदी के पुल के नीचे एक नौजवान की सिर कुचली लाश पड़ी है तो वह फौरन पुलिस टीम ले कर घटनास्थल पर जा पहुंचे. लाश देख कर ही पुलिस समझ गई कि मामला हत्या का है. मृतक की पहचान के लिए जब उस की तलाशी ली गई तो जेब से मिली परची पर लिखे फोन नंबर से उस की पहचान नर्मदा प्रसाद के रूप में हो गई.

शुरुआती जांच में पुलिस को कुछ हासिल नहीं हुआ. राहुल और संतोष से भी पूछताछ हुई, लेकिन उन्होंने इस तरह इत्मीनान से जवाब दिए कि पुलिस का शक उन पर नहीं गया. उन्होंने कहा था कि नर्मदा की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, इसलिए उसे कोई क्यों मारेगा. नर्मदा की मौत शायद रहस्य बन कर रह जाती, अगर उस की मां के बयान न लिए जाते. उस ने अपने बयान में सीधे तो नहीं, लेकिन इशारों में बता दिया था कि नर्मदा के अपनी मुंहबोली मामी सुनीता से नाजायज ताल्लुकात थे. इस के बाद पुलिस के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं रह गया. अपने बयान में राहुल और संतोष यह बात छिपा गए थे कि पिछली रात वे नर्मदा के साथ कलियासोत नदी पर गए थे. पुलिस ने दोनों के हलक में अंगुली डाली तो सारी कहानी बाहर आ गई.

दोनों को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. लेकिन सुनीता पर कोई आरोप नहीं लगा, जो इस कत्ल की वजह थी. हैरत की और सोचने की बात यह है कि जो औरत फसाद की जड़ थी, वह कानूनी शिकंजे से बाहर है. उस के पाप की सजा अब उस का जवान देवर और भांजा भुगतेंगे. Illicit Affair

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime News: उम्र के भंवरजाल में फंसी औरत

Crime News: 2 बच्चों की मां नीरू जब जवान हुई तो उस का पति बूढ़ा हो गया. इस स्थिति में उस के कदम बहक गए. इस का दुखद अंत यह हुआ कि बीवी के कत्ल में आज पति जेल में है.

रात के 12 बज रहे थे. अभी तक नीरू उर्फ नीलम घर नहीं लौटी थी. बीते 3 दिनों से यही क्रम चल रहा था. महावीर अग्रवाल ने पत्नी की गैरहाजिरी में खाना बना कर बेटी कोमल और बेटे हर्षित को खिला कर सुला दिया था. खुद खा कर पत्नी नीरू का खाना फ्रिज में रख दिया था. 4 लोगों के इस परिवार में बीते कई सालों से यही सिलसिला चला आ रहा था. महावीर के चेहरे पर कभी शिकन तक नहीं आई थी.

घर और कपड़ों की साफसफाई से ले कर चौकाचूल्हा तक के काम में वह पत्नी की मदद करता था. नीरू की गैरहाजिरी में वह अपने दोनों बच्चों को पिता के साथसाथ मां के स्नेह से भी सराबोर कर रहा था. दोनों बच्चों के चेहरे देख कर और उन्हें लाड़प्यार कर के वह दिन भर की दौड़धूप और घर के कामकाज की थकावट को भूल जाता था. राजस्थान के जिला श्रीगंगानगर के मोहल्ला प्रेमनगर के बने एक साधारण से घर में टीवी के सामने बैठा महावीर अग्रवाल पत्नी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था. रात एक बजे के करीब नीरू घर में दाखिल हुई.

अस्तव्यस्त कपड़े, बिखरे बाल और पस्त बदन देख कर महावीर का माथा ठनका. वह कुछ कहता, उस से पहले ही नीरू बोल पड़ी, ‘‘क्या करूं यार, आज 3 जगहों के और्डर थे और एक दुलहन तो पौर्लर पर ही आ गई थी. अब 4-4 दुलहनों को सजाने में देर तो हो ही जाएगी.’’

नीरू ने देर होने की वजह बता दी. महावीर ने उस की इस सफाई पर ध्यान दिए बगैर कहा, ‘‘सुबह बात करेंगे. खाना फ्रिज में रखा है, मन हो तो खा लेना.’’

इतना कह कर महावीर अपने बिस्तर पर जा कर लेट तो गया, लेकिन उस की नींद आंखों से कोसों दूर थी. दोनों बच्चों के भविष्य, खस्ताहाल दुकानदारी और नीरू के संदिग्ध चालचलन को ले कर उस के दिमाग में तूफान चल रहा था. नीरू कपड़े बदल कर दूसरे कमरे में जा कर अपने बिस्तर पर लेट गई. उस ने खाना नहीं खाया था. महावीर को लगा, संभवत: वह किसी के यहां से मनपसंद खाना खा कर आई होगी. सुबह महावीर की आंख लगी तो वह देर से सो कर उठा. कोमल और हर्षित स्कूल जा चुके थे. नाश्ता कोमल ने बनाया था.

धूप चढ़े नीरू उठी तो महावीर ने 2 कप चाय बनाई. बिस्तर पर बैठी नीरू को चाय का कप पकड़ा कर महावीर उस के सामने पड़ी कुरसी पर बैठते हुए बोला, ‘‘देखो नीरू, तुम्हारा रवैया दिनबदिन असहनीय होता जा रहा है. तुम मेरी उपेक्षा कर रही हो, इस की मुझे रत्ती भर चिंता नहीं है. लेकिन बच्चों के लिए तो सोचो.’’

‘‘मैं ने क्या कर दिया भई. ब्यूटीपौर्लर चलता हूं. इन दिनों लगनें चल रही हैं. मैं ने तो आप को रात में ही बता दिया था कि 4 दुलहनों को तैयार करना है, घर आने में देर हो जाएगी.’’ नीरू ने कहा.

महावीर को पता था कि उस दिन शादियां नहीं थीं, नीरू रटारटाया बहाना बना कर झूठ बोल रही है. वह नहीं चाहता था कि नीरू बात का बतंगड़ बना कर झगड़ा करने लगे, इसलिए उस ने बड़े धैर्य से उसे समझाने की कोशिश की. महावीर ने कहा, ‘‘देखो नीरू, मुझे पता है कि दुकानदारी से जो कमाई हो रही है, उस से घर के खर्चे पूरे नहीं हो रहे हैं. दोनों बच्चों को अच्छा खिलाड़ी बनाने के लिए कोचिंग करानी है. ठीक से आमदनी न होने की वजह से मैं काफी परेशान रहता हूं. मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं. तुम मेरी सहनशीलता की परीक्षा लेना बंद कर दो. किसी भी समय मेरे सब्र का बांध टूट सकता है. जिस दिन ऐसा हुआ, अनर्थ हो जाएगा.’’

महावीर ने ये बातें जिस तरह गिड़गिड़ाते हुए कही थीं, कोई भी समझदार औरत होती तो सिर ऊपर न उठाती. लेकिन नीरू उस की बात समझने के बजाय गुस्से में बोली, ‘‘यह गीदड़ भभकी किसी और  को देना. तुम्हारा और तुम्हारे बच्चों का खर्च पूरा करने के लिए ही तो मैं रातदिन खटती हूं. इस बात का एहसान मानने के बजाय तुम मुझे धमकी दे रहे हो. अपने मांबाप की तरह तुम भी मुझ पर शक करते हो. तुम जैसे निखट्टू के पल्ले बंध कर मेरा तो जीवन नरक हो गया है.’’

नीरू की इन जहरबुझी बातों से महावीर को भी गुस्सा आ गया. अपने 16 साल के वैवाहिक जीवन में महावीर पहली बार आपा खो बैठा. उस ने चाय का कप लिए नीरू के गालों पर तड़ातड़ 2 थप्पड़ रसीद कर दिए. नीरू तिलमिला उठी. भद्दी सी गाली देते हुए उस ने कहा, ‘‘तुम ने मेरे ऊपर हाथ उठाया है. अब देखो, मैं तुम्हें कैसा मजा चखाती हूं. मैं अभी मम्मी को फोन कर के बुलाती हूं. तुम्हारे शरीर में भूसा न भरवा दिया तो मेरा भी नाम नीरू नहीं.’’

नीरू इसी तरह बड़बड़ाती रही और महावीर घर से निकल गया. मोहल्ले के पार्क में पेड़ के नीचे लेटा महावीर भविष्य के तानेबाने बुनता रहा. उस के मोबाइल पर कई बार उस की सास चंपा देवी का फोन आया, लेकिन उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उस की नजर में यह पतिपत्नी के बीच घटी एक मामूली घटना थी. नीरू ने नमकमिर्च लगा कर मां से शिकायत कर दी होगी. इसलिए वह उसे खरीखोटी सुनाने के लिए फोन कर रही होगी.

महावीर की सास चंपा देवी नीरू से भी ज्यादा तीखी थी. नीरू ने उन से कहा था कि उस से ब्याह कर के उस का जीवन नरक हो गया है, जबकि यह सरासर झूठ था. सही बात तो यह थी कि नीरू मजे लूट रही थी और उस की वजह से उसी की नहीं, पूरे परिवार का जीवन नरक हो चुका था. अंधेरा घिरने तक महावीर पार्क में ही पड़ा रहा. अब तक उस की सास ने न जाने कितनी बार फोन कर दिया था, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया था. रात 10 बजे वह घर पहुंचे तो दोनों बच्चे खापी कर सो चुके थे. किचन में मिला खाना खा कर महावीर लेट गया. नीरू अभी पौर्लर से नहीं लौटी थी.

अगले दिन सुबह महावीर थोड़ी देर से उठा. दोनों बच्चे स्कूल चले गए थे. नीरू अपने कमरे में घोड़े बेच कर सो रही थी. घर के थोड़ेबहुत काम निपटा कर महावीर पार्क में जा पहुंचा. नीरू परिवार की ही नहीं, अपने दोनों मासूम बच्चों की भी अनदेखी कर रही थी. उसे उन की जरा भी चिंता नहीं थी. यही सब सोचसोच कर उसे नीरू से नफरत सी होती जा रही थी. उस की सहनशीलता अंतिम पड़ाव पर जा पहुंची थी. तभी उस की सास चंपा देवी का फोन आ गया. महावीर ने जैसे ही फोन रिसीव किया, दूसरी ओर से चंपा देवी उसे डांटने लगी. अंत में उस ने उसे जेल भिजवाने तक की धमकी दे डाली. महावीर जवाब में तो कुछ नहीं बोला, लेकिन जेल भिजवाने की धमकी उस के दिमाग में बैठ गई.

महावीर के दिमाग में आया, वह तो वैसे भी जेल से बदतर जीवन जी रहा है. वही क्यों, उस के दोनों बच्चे, बूढ़े मांबाप भी एक तरह से जेल से भी गयागुजरा जीवन जीने को मजबूर हैं. उस समय महावीर जिन स्थितियों से गुजर रहा था, उस में सकारात्मक सोच मिलने पर वह संत बन सकता था और नकारात्मक सोच में शैतान. महावीर और उस के परिवार का दुर्भाग्य था कि उस समय उस के दिमग पर नकारात्मक सोच भारी हो गई. अपने बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए उस ने एक भयानक निर्णय ले लिया. उस का सोचना था कि अब उसे जेल जाना ही है, सास भिजवाए या वह स्वयं चला जाए. अंत में उस ने खुद जेल जाने का निर्णय कर लिया.

खतरनाक निर्णय लेने के बाद महावीर ने खुद को काफी हलका महसूस किया. शायद उस का दिलोदिमाग विवेकहीन हो गया था. वह पार्क से उठा और सीधा घर पहुंचा. नहाधो कर 3 दिनों से बंद पड़ी अपनी स्पेयर पार्ट्स की दुकान पर पहुंचा. उसे अब दुकानदारी में कोई दिलचस्पी नहीं थी. शाम होने से पहले ही वह घर लौट आया. दोनों बच्चे घर पर ही थे. बच्चों की मनपसंद का खाना बना कर उन्हें प्यार से खिलाया और सुला दिया. इस के बाद खुद टीवी देखते हुए नीरू का इंतजार करने लगा.

देर रात नीरू घर लौटी तो महावीर ने उसे मुख्य द्वार पर ही रोक लिया. बरामदे में 2 कुरसी उस ने पहले से रख दी थी. उस ने नीरू का हाथ पकड़ कर एक कुरसी पर बिठा दिया और खुद सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया. इस के बाद उस के गाल पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘नीरू जो हो गया, अब उसे भूल जाओ. मैं अपनी गलती के लिए माफी मांगता हूं. अब इस परिवार को बचाना तुम्हारे हाथ में है. मैं तुम्हारा हर आदेश मानने को तैयार हूं. तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूंगा. बस तुम गलत आदतें छोड़ दो.’’

महावीर की इन बातों पर गंभीर होने के बजाय नीरू खिलखिला कर हंस पड़ी. इस के बाद व्यंग्य से बोली, ‘‘इस तरह की फालतू बातें मैं सुनने की आदी नहीं.’’

नीरू इतना ही कह पाई थी कि महावीर के सब्र का बांध टूट गया. वह उस पर एकदम से पिल पड़ा. उस ने नीरू के गले में पड़े दुपट्टे को लपेट कर कसना शुरू किया तो फिर तभी छोड़ा, जब वह मर कर कुर्सी से लुढ़क गई. पत्नी को मार कर महावीर ने उस की लाश को उठा कर बरामदे के कोने में बने स्टोर रूम में ले जा कर रख दिया और अपने बिस्तर पर जा कर सो गया. अगले दिन सुबह महावीर बच्चों से पहले उठ गया. बच्चों ने मम्मी के बारे में पूछा तो कहा कि वह ब्यूटीपौर्लर का सामान लेने बाहर गई है. उसी समय सास चंपा देवी का फोन आया तो उन से भी कह दिया कि वह बाहर गई है. बच्चे स्कूल चले गए तो महावीर बाजार गया और लोहा काटने की एक आरी खरीद लाया. मुख्य दरवाजा बंद कर के वह स्टोर रूम में घुस गया.

महावरी ने उस के दोनों पैर आरी से काट कर धड़ से अलग कर दिए. इस के बाद दोनों हाथों के पंजे काटे. दब्बू पति से जल्लाद बना महावीर अब तक थक गया था. उस के दिल में नीरू के प्रति पैदा नफरत बढ़ती जा रही थी. अब वह उस की लाश से बदला ले रहा था. इस के बाद उस ने कमरे में ताला बंद कर दिया और अगले दिन तक बच्चों के साथ सामान्य ढंग से रहता रहा. दोनों बच्चे रोज की तरह स्कूल चले गए. बच्चों के जाने के बाद महावीर कमरे में घुसा तो दोनों हाथ काट कर धड़ से अलग किए. इस के बाद उस ने सिर काट कर अलग किया. इस तरह नीरू की लाश 8 टुकड़ों में बंट गई. जबकि महावीर के चेहरे पर किसी तरह की शिकन या प्रायश्चित नहीं था.

इस बीच चंपा देवी ने महावीर को कई बार फोन कर के नीरू या बच्चों से बात करवाने के लिए कह चुकी थी. लेकिन हर बार उस ने नीरू के न लौटने और बच्चों के बाहर होने की बात कह कर सास को टरका दिया था. अब तक चंपा देवी को किसी अनहोनी की आशंका हो गई थी. इसलिए उस ने श्रीगंगानगर में ही रह रहे अपने दूसरे दामाद धर्मेंद्र अग्रवाल को फोन कर के नीरू के बारे में पता लगाने को कहा. महावीर ने उसे भी टरका दिया था. थकहार कर चंपा देवी ने फाजिल्का में रह रहे अपने भाई अमित को नीरू के बारे में पता लगाने के लिए श्रीगंगानगर भेजा, इसी के साथ वह खुद भी श्रीगंगानगर के लिए रवाना हो गई.

अमित अग्रवाल श्रीगंगानगर पहुंचे तो महावीर ने उन्हें भी गोलमोल जवाब दिया. हर्षित और कोमल घर में ताला बंद होने की वजह से पड़ोसी के यहां बैठे थे. अमित तुरंत सेतिया कालोनी स्थित पुलिस चौकी पहुंचे और अपनी भांजी नीरू के संदिग्ध परिस्थितियों में लापता होने की सूचना दी, लेकिन पुलिस ने उन की शिकायत पर ध्यान नहीं दिया. तब अमित ने अपने कुछ रिश्तेदारों और परिचितों को इस मामले के बारे में बता कर मदद मांगी. जब सभी लोग महावीर के घर पहुंचे तो वहां से आने वाली असहनीय दुर्गंध से उन्हें आशंका हुई. अमित के साथ आए लोगों ने तुरंत कोतवाली पुलिस को सूचना दी. सूचना मिलते ही कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री दलबल के साथ महावीर के घर पहुंच गए.

उन्होंने इस बात की सूचना अधिकारियों को दी तो उन की सूचना पर एएसपी (शहर) शशि डोगरा, प्रशिक्षु आईपीएस चूनाराम भी घटनास्थल पहुंच गए. महावीर के पहुंचने पर कमरा खुलवाया गया तो पुलिस अधिकारी भी नफरत की वजह से मानवीय संवेदनाओं का वहशीपन भरा हश्र देख कर भौचक्के रह गए. पुलिस अधिकारियों ने नीरू की 8 टुकड़ों में बंटी लाश को कब्जे में ले लिया. महावीर ने अपना जुर्म कबूल लिया था, इसलिए पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. इस के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. पुलिस घटनास्थल की काररवाई निपटा रही थी, तभी नीरू की मां चंपा देवी भी वहां पहुंच गई थीं.

कोतवाली पुलिस ने चंपा देवी की ओर से नीरू की हत्या का मुकदमा महावीर अग्रवाल के खिलाफ दर्ज कर लिया. यह 6 अप्रैल, 2015 की बात थी. चंपा देवी के बताए अनुसार, नीरू की हत्या 2 अप्रैल की रात 2 बजे के करीब की गई थी. उस ने तो हत्या के इस मामले में महावीर के पूरे परिवार को नामजद करा दिया था, लेकिन जांच में पता चला कि परिवार के बाकी लोगों से इन लोगों का बहुत पहले ही संबंध खत्म हो चुका था, इसलिए पुलिस ने बाकी लोगों को निर्दोष मान लिया. पुलिस पूछताछ में नीरू की हत्या की जो कहानी सामने आई थी, वह इस प्रकार थी—

पंजाब प्रदेश का एक जिला है फतेहगढ़ साहिब. इसी जिले की एक प्रमुख व्यावसायिक मंडी है गोविंदगढ़. यहीं आयरन मंडी में रहते थे शिवदयाल अग्रवाल. उन की बेटी नीलम उर्फ नीरू विवाह लायक हुई तो रिश्तेदारों के बताने पर उन्होंने अबोहर निवासी खुशीराम के बेटे महावीर से नीरू का विवाह कर दिया था. खुशीराम काफी संपन्न आदमी थे. महावीर भी खूब मेहनती और मिट्टी में सोना निकालने वाला था. लेकिन नीरू और महावीर की उम्र के बीच का फासला काफी लंबा था. नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. लेकिन धनदौलत और वैभवशाली परिवार की चकाचौंध में दोगुनी उम्र का अंतर गौण हो गया था.

महावीर और नीरू के शुरुआती दिन बड़े अच्छे गुजरे. लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उन के दांपत्य में खटास आने लगी. उसी बीच खुशीराम को व्यापार में घाटा हुआ तो वह परिवार के साथ अबोहर से श्रीगंगानगर आ गए. शादी के 2 सालों बाद नीरू ने बेटी कोमल और उस के बाद बेटे हर्षित को जन्म दिया. महत्वाकांक्षी और स्वछंद विचारों वाली नीरू को संयुक्त परिवार में घुटन सी होती थी. इसलिए अलग रहने के लिए उस ने क्लेश शुरू कर दिया. महावीर ने किराए पर अलग मकान ले लिया और कमाई के लिए स्पेयर पार्ट्स का खुदरा व्यवसाय शुरू कर दिया. संजनेसंवरने का शौक रखने वाली नीरू ने अपने इस शौक को व्यावसायिक उपयोग करने की गरज से ब्यूटीपौर्लर खोल लिया.

नीरू का ब्यूटीपौर्लर चल निकला. पतिपत्नी, दोनों के कमाने से परिवार में बरकत होने लगी. नीरू और महावीर की उम्र में अंतर तो था ही, अब उन के विचारों में भी जमीनआसमान का अंतर आ गया था. स्वच्छंद जीवन जीने वाली नीरू को रोकटोक बहुत कस्टदायक लगता था. जबकि महावीर को इस तरह की आजादी बिलकुल पसंद नहीं थी. इस तरह विचारों के टकराव की वजह से पतिपत्नी में कलह रहने लगी. कहा जाता है कि श्रीगंगानगर में आने के बाद खुशीराम और उन की पत्नी मनोरीदेवी ने नीरू की आजादी से नाराज हो कर उस से पूरी तरह रिश्ता खत्म कर लिया था.

खुदगर्जी का जीवन जीने वाली नीरू अपने पति और बच्चों से अलगअलग होती गई. मांबाप के बीच होने वाली कलह और खींचतान से बच्चे भी परेशान रहते थे. उन्होंने अपने ढंग से दोनों को समझाने की कोशिश भी की, लेकिन नीरू और महावीर के अपनेअपने जो अहम थे, उस की वजह से बात बन नहीं पाई और बात हत्या तक पहुंच गई. हत्या के इस मामले की जांच कोतवाली प्रभारी विष्णु खत्री ने स्वयं संभाली. पूछताछ में महावीर ने बताया कि नीरू की बदचलनी की वजह से वह परेशान हो चुका था. उस की सास चंपा देवी उसे जेल भिजवाने की धमकी देती रहती थी.

अगले दिन पुलिस ने महावीर को न्यायालय में पेश कर के पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि के दौरान पुलिस ने वह आरी बरामद कर ली, जिस से नीरू की लाश के टुकड़े किए गए थे. इस के बाद अन्य औपचारिकताएं पूरी कर के महावरी को पुन: न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. लोगों का कहना है कि इस हत्या की मुख्य वजह मियांबीवी के बीच की उम्र का अंतर था. शादी के समय नीरू 18 साल की थी, जबकि महावीर 35 साल का. नीरू जब पूरी तरह जवान हुई तो महावीर को बुढ़ापा आ गया, जिस की वजह से नीरूके कदम बहके तो बहकते ही चले गए. परिणामस्वरूप उसे असमय ही मरना पड़ा.

महावीर की बेटी कोमल और बेटा हर्षित पढ़ने में तो अच्छे हैं ही, बैडमिंटन और टेबल टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हैं. अब मां का कत्ल हो गया और पापा मां के कत्ल के आरोप में जेल चले गए. दोनों बच्चों के लिए दुख की बात यह है कि उन्होंने दादादादी को मां की मौत और पिता के जेल जाने के बाद पहली बार देखा था. वहीं ननिहाल पक्ष वालों ने उन्हें अपने साथ ले जाने से साफ मना कर दिया था. ऐसे में इन होनहार बच्चों का क्या होगा?

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: शादी में छिपी साजिश

Suspense Story: प्रिया अपने करोड़पति बाप की बहुत ही लाडली थी. इस के बावजूद उस ने अपनी सौतेली मां अंजलि को सगी मां की तरह ही मानसम्मान दिया, लेकिन लालची अंजलि के मनमस्तिष्क में तो एक खतरनाक योजना बन चुकी थी. प्रिया की शादी के मौके पर उस ने उस योजना को अंजाम तो दिया, लेकिन इस में वह अपनी सगी बेटी मीनू का ही मर्डर कर बैठी. आखिर क्या थी उस की योजना?

घर के सभी लोग शादी की तैयारियों में बिजी थे. तभी अंजलि ने बेटी को आवाज दी, ”प्रिया… प्रिया..! किधर हो बेटा तुम?’’

मम्मी की आवाज सुनते ही प्रिया ने फटाफट मोबाइल फोन स्विच औफ किया और दौड़ती हुई अपने रूम से बाहर आ कर थोड़ा झुंझलाहट से बोली, ”क्या हुआ मम्मी? क्यों परेशान हो रही हैं आप?’’

”अरे तू बस दिनरात मोबाइल पर ही चिपकी रह! अरे, कुछ वक्त हमारे साथ भी तो बिता ले.’’ अंजलि ने उसे प्यार से झिड़कते हुए कहा.

यह सुनते ही प्रिया बड़े प्यार से मम्मी के गले में झूल गई, ”ओ मम्मी, आप कितनी अच्छी हो.’’

अंजलि ने प्यार से उसे चूमते हुए कहा, ”मेरी प्रिंसेस! कितनी सुंदर लग रही है तू, किसी की नजर न लगे मेरी लाडो को.’’

”अरे नजर तो लग चुकी है मम्मी प्रिया दी को,’’ प्रिया की छोटी बहन मीनू ने हंसते हुए कहा.

अंजलि चौंक कर बोली, ”क्या बोल रही है तू? किस की नजर लग गई मेरी प्रिया को..?’’

”राज जीजू की नजर,’’ मीनू खिलखिला कर बोली.

तभी बाहर गाड़ी रुकने की आवाज आई और प्रिया के पापा यानी धनराज मित्तल अपने भाइयों विजय, रमेश और शंकर के साथ अंदर आए. धनराज एक बड़े बिजनैसमैन थे और उन के तीनों भाई अलगअलग शहरों में बड़े सरकारी ओहदे पर थे. धनराज मित्तल का ध्यान बचपन से ही पढ़ाई में नहीं लगा और इसीलिए उन्होंने बिजनैस पर अपना फोकस किया और सफल रहे.

”आइएआइए. और आप सब की फेमिली किधर रह गई?’’ अंजलि यानी धनराज मित्तल की वाइफ ने सब का स्वागत करते हुए पूछा.

”यहां हैं हम!’’ कहते हुए तीनों भाइयों की पत्नियां सरिता, रूपा और वीणा अपने बच्चों समेत आ खड़ी हुईं.

अंजलि ने सब का वेलकम करते हुए नौकरों को चायनाश्ता लाने को बोला और फिर मेहमानों से कहने लगीं, ”अब लगा है घर मे शादीब्याह जैसा माहौल! आप सब के आने से घर की रौनक में चारचांद लग गए जी.’’

वीणा हंसते हुए बोली, ”अजी भाभीजी, हम आते कैसे नहीं! हमारी प्रिया बिटिया की शादी है.’’

तभी धनराज बोले, ”अब आप सब चायनाश्ता कर के अपनेअपने रूम में जा कर रेस्ट कर लीजिए! अंजलि तुम ने सब व्यवस्था करवा दी है न?’’

”जी हां, सब इंतजाम करवा दिया है.’’ अंजलि मेहमानों के सामने हाथ जोड़ कर मुसकराते हुए बोली.

रूपा और सरिता बोलीं, ”क्या भैयाभाभी, हम कोई मेहमान नहीं, घरपरिवार के ही हैं.’’

अंजलि उन को गले लगाते हुए बोली, ”अरे तो तुम सब परिवार ही हो हमारा, पर बच्चे भी थक गए होंगे न और तुम सब को भी अब कल से काम में लगना है. इसलिए आज जी भर कर रेस्ट कर लो सब.’’

सब चायनाश्ता करते हुए बातचीत में लग गए. फिर रिया, सानिया और मीनू तीनों प्रिया के ही रूम में जा कर उसे तंग करते हुए उस के मंगेतर राज का नाम लेले कर छेडऩे लगे और सारी लेडीज बैठ कर शादी के प्रोग्राम को फाइनल टच देने लगीं. तभी धनराजजी का मोबाइल बज उठा और वह बातें करते हुए बहुत उत्साहित लग रहे थे.

कौल खत्म होते ही विजय ने उन से पूछा, ”क्या बात है भाई साहब, बड़े खुश नजर आ रहे हो!’’

”बात है ही इतनी बढिय़ा, आज शाम ही हम सब खंडाला के लिए रवाना हो जाएंगे, वहां इवेंट मैनेजर ने पूरी व्यवस्था कर ली है.’’ धनराजजी बोले.

वीणा बोली, ”वाह! ये तो सच ही बहुत खुशी की बात है, पर भाई साहब लड़के के घर वाले मीन्स राज के रिश्तेदार? क्या वो भी कल तक पहुंच जाएंगे?’’

अंजलि हंसते हुए कहने लगी, ”अरे, कल तक नहीं, बल्कि वो तो आज ही वहां पहुंच गए हैं. उन का पूरा इंतजाम एक बड़े होटल में कर दिया है.’’

”हां, मैं कोई भी कमी नहीं रखना चाहता अपनी बेटी की शादी में. वो लोग ऊपर के 2 फ्लोर पर रहेंगे और हम सब नीचे के फ्लोर पर.’’ धनराजजी ने बताया. कुछ देर बाद सब अपनेअपने रूम में चले गए और धनराज व अंजलि दोनों कुछ काम से बाहर चले गए. शंकर और रूपा को इतने आरामदायक बैड पर भी आराम नहीं मिल रहा था और वो बैचेनी से रूम में टहल रहे थे, तभी रूपा बोली, ”आप देख रहे हैं, अंजलि भाभी के तो पैर अब जमीन पर ही नहीं पड़ रहे.’’

शंकर चेयर पर बैठते हुए बोला, ”भाभी की छोड़ो, भाई साहब के रंगढंग ही निराले हो गए हैं. लगता है बेटी की शादी में करोड़ों रुपए स्वाहा कर देंगे.’’

रूपा चिढ़ कर बोली, ”अब करेंगे ही, कमाया भी तो उन्होंने करोड़ों रुपया है. तुम्हारी तरह सर्विस तो कर नहीं रहे कि बंधीबंधाई सैलरी मिले.’’

रमेश अपने रूम में लेटा हुआ छत को एकटक देख रहा था, तभी उस की पत्नी सरिता बोली, ”क्यों जी, किधर ध्यानमग्न हो?’’

रमेश अनमना सा उठा और कहने लगा, ”भैया की प्लानिंग तो करोड़ों रुपए खर्च करने की दिख रही है इस शादी में.’’

सरिता मुंह बना कर बोली, ”तो अब करोड़पति हैं वो, कोई हमारी तरह थोड़ी हैं. हुंह!’’

रमेश गुस्से से बोला, ”देखो, कुछ भी बकवास मत करो, मैं भी एक आईएएस औफीसर हूं, कोई क्लर्क नहीं, जो इस तरह रिएक्ट कर रही हो.’’

सरिता तेज स्वर में बोली, ”ओह हो! आईएएस औफीसर! पर आज देखा कुछ भाई साहब का रौब और ये महल जैसा बंगला और अंजलि भाभी के जेवर! ये सब तो सपने में भी अफोर्ड नहीं कर सकते हम.’’

विजय अपने रूम में आराम से लेटा हुआ मोबाइल में कुछ देख रहा था कि वीणा ने उस का मोबाइल छीनते हुए गुस्से से कहा, ”बस, तुम इस मोबाइल में ही लगे रहो जिंदगी भर.’’

विजय ने चिढ़ते हुए अपना मोबाइल मांगा, ”देखो वीणा, मुझे ये बेकार की बकबक बिलकुल पसंद नहीं! मेरा मोबाइल वापस करो.’’

वीणा तुनक कर बोली, ”इस मोबाइल को तो आग लग जाए कमबख्त! अरे, कभी तो कुछ अपने बच्चों का भी सोचो. भाई साहब को देखो कि कैसी राजसी शादी का प्लान बनाया है अपनी बेटी का.’’

विजय उस की ओर चिढ़ कर देखने लगा, फिर बोला, ”जो भी करें तुम्हें क्या प्रौब्लम हो रही है प्रिया की शादी से?’’

वीणा बोली, ”क्यों? क्या ये पूरी प्रौपर्टी सिर्फ अकेले भाई साहब की ही है? तुम्हारे पिताजी की भी तो जमापूंजी लगी होगी आखिर इस में?’’

विजय ने अब पत्नी की तरफ गुस्से से देखा और कहा, ”हां, लगी थी पिताजी की जमापूंजी! पर यही कोई 10 या 15 लाख! बाकी तो सब भाई साहब की मेहनत का फल है.’’

उधर प्रिया अपने रूम में लेटी हुई सोच रही थी, ‘काश… जल्दी वो दिन आ जाए, जब राज और वो हमेशा के लिए एक डोर में बंध जाएं.’

वह अपने बैड पर लेटी खयालों में गुम थी कि अचानक उस के मोबाइल की रिंग बज उठी.

”ओफ्फोह किस की कौल है अब!’’ कहते हुए प्रिया ने जैसे ही हैलो कहा, उधर से एक तेज आवाज सुनाई दी, ”मूर्ख लड़की, शादी के सुनहरे ख्वाब देख रही है.’’

प्रिया गुस्से से चिल्लाई, ”कौन है? स्टौप दिस नानसेंस!’’ और अचानक ही कौल कट गई.

प्रिया एकदम से उठ बैठी. नंबर देखा तो अननान नंबर आ रहा था.

प्रिया सोच ही रही थी कि तभी उस के यहां की मेड वहां आ कर बोली, ”प्रिया बेबी, आप का पार्सल आया है.’’

प्रिया ने दरवाजा खोल कर पार्सल लिया और फिर से दरवाजा बंद कर दिया. वह पार्सल देख सोचने लगी कि मैं ने तो कुछ मंगवाया नहीं था अभी, ‘ओह शायद राज ने कुछ गिफ्ट भेजा होगा!’

सोचते ही प्रिया खुशी से पार्सल खोलने लगी. पर ये क्या…उस में तो एक गुडिय़ा दुलहन के वेश में थी और जिस की गरदन कटी हुई थी. प्रिया की चीख पूरे घर में गूंज उठी. प्रिया की चीख सुन कर सब के सब दौड़ते हुए आए और प्रिया को आवाज देने लगे. तभी धनराजजी और अंजलि भी वापस आ गए और यह नजारा देख भागते हुए प्रिया के रूम के पास आए.

”प्रिया… बेटा दरवाजा खोलो प्लीज!’’ सब आवाजें दे रहे थे. तभी प्रिया ने दरवाजा खोला और बुत बनी पथराई आंखों से सब को देखने लगी. उस की हालत देख सब घबरा गए और उस की मम्मी अंजलि तो रोरो कर उस से पूछने लगी, ”क्या हुआ है?’’

पर प्रिया इस हालत में नहीं थी कि कुछ बोल सके. धनराजजी ने तुरंत फेमिली डौक्टर को कौल कर बुलाया.

तभी अचानक मीनू की नजर बैड के नीचे गिरे पार्सल पर पड़ी तो वह बोली, ”अरे, ये क्या है?’’

कहते हुए उस ने जैसे ही उस में देखा तो वह भी डर के मारे चीख पड़ी और वह पार्सल नीचे फेंक दिया.

रूपा उस गुडिय़ा को उठाते हुए कहने लगी, ”ओह, ये तो लगता है किसी बदमाश की शरारत है.’’

”शरारत! ये शरारत नहीं, कोई बड़ी बदमाशी है, जो मेरी बेटी को डराने के लिए की गई है…’’ अंजलि गुस्से से बोली.

धनराजजी ने अपनी बेटी को संभाल कर बिठाया और मीनू ने उसे पानी पिलाया, तब जा कर प्रिया थोड़ी होश में आई और फिर मम्मी से लिपट कर रोने लगी, ”मम्मी…मम्मी, वो न अभी मुझे थोड़ी देर पहले एक अननान नंबर से कौल भी आया था, किसी लेडी का! वो मुझे न अजीब सी बातें बोल रही थी.’’

धनराज जी सोचते हुए बोले, ”मेरे खयाल से अब हमें प्रिया बेटी को अकेली नहीं छोडऩा चाहिए. अंजलि तुम इस का सही से ध्यान रखो और बाकी सब बाहर आ जाइए.’’

इस के बाद सब चुपचाप बाहर हाल में आ कर बैठ गए. तभी डौक्टर भी आ गया और प्रिया को चैक कर के धनराजजी से कहने लगा, ”देखिए, घबराने की कोई बात नहीं, पर प्रिया मेंटली बहुत डिस्टर्ब हो गई है. इसलिए मेरी राय है कि आप लोग जल्दी ही खंडाला के लिए रवाना हो जाइए. वहां का वातावरण और शादी का माहौल उसे ठीक कर देगा पूरी तरह.’’

धनराजजी ने उसी समय सब को खंडाला के लिए रेडी होने के लिए कहा और बोले, ”हम 3 घंटे बाद ही निकल चलेंगे यहां से, ओके.’’

और फिर वो भी अपने रूम में जा कर तैयारियों में बिजी हो गए. अंजलि प्रिया के ही साथ थी और उस का सामान पैक कर रही थी. कुछ ही देर में सब के सब रेडी हो कर हाल में आ गए और सर्वेंट्स उन के बैग्स गाडिय़ों में ला कर रखने लगे. सानिया और मीनू प्रिया के साथ ही अंजलि और धनराजजी की गाड़ी में बैठ गए. गाड़ी स्टार्ट की ही थी कि इतने में धनराजजी का मोबाइल बज उठा.

मोबाइल पर बात करते ही धनराजजी एकदम परेशान से दिखने लगे. अंजलि पूछ बैठी, ”क्या हुआ जी! सब ठीक तो है न?’’

धनराजजी मोबाइल रखते हुए बोले, ”नहीं, परेशानी की कोई बात नहीं! बस बिजनैस की थोड़ी उलझन और कुछ नहीं. चलो, अब चलें हम खंडाला.’’ कहते हुए उन्होंने ड्राइवर को इशारा किया और गाड़ी स्पीड में चल पड़ी. पीछेपीछे सभी गाडिय़ां भी रवाना हो गईं, जिन में अन्य रिश्तेदार बैठे थे. शाम होने ही वाली थी. सूरज भी ढल रहा था. धीरेधीरे तभी अचानक धनराजजी की गाड़ी के ड्राइवर ने एकदम गाड़ी के ब्रेक लगाए और गाड़ी झटके से रुक गई.

”क्या हुआ? अचानक से ब्रेक क्यों लगाया?’’ धनराजजी ने पूछा.

”सर, वो जरा सामने देखिए न आप! रोड पर कोई अचानक ही सामने आ गया था, इसलिए ब्रेक लगाया मैं ने.’’ ड्राइवर बोला.

धनराजजी और ड्राइवर नीचे उतर कर देखने लगे. ड्राइवर ने उस शख्स को पलटा तो धनराजजी के मुंह से चीख निकल गई. वह बेहोश शख्स और कोई नहीं राज था, उन का होने वाला दामाद.

”राज…! क्या हुआ बेटा, उठो!’’ धनराजजी घबरा कर उसे होश में लाने लगे.

तब तक अंजलि और प्रिया भी गाड़ी से उतर कर बाहर आ गईं और राज को यूं सड़क पर बेहोश देख चिल्लाने और रोने लगीं.

”राज… राज! उठो न प्लीज..!’’ प्रिया रोती हुई उसे उठाने लगी.

तभी मीनू और सानिया पानी की बोतल ले कर आईं और राज के मुंह पर पानी छिड़क कर होश में लाने की कोशिश करने लगीं.

राज ने धीरेधीरे आंखें खोलीं और प्रिया को सामने देख खुश होता हुआ बोला, ”प्रिया! तुम!’’

राज को सहारा दे कर प्रिया और धनराज गाड़ी तक लाए और अंदर बिठाया. फिर सानिया और मीनू से कहा कि वे पीछे आ रही विजय की गाड़ी में बैठ जाएं. तब तक सब रिश्तेदार भी गाडिय़ों से उतर कर हालात समझने की कोशिश करने लगे. इतने में धनराजजी ने सब को कहा, ”देखिए, अब खड़े हो कर यूं टाइम वेस्ट करना ठीक नहीं, हमें जल्दी ही खंडाला पहुंचना चाहिए. वहां डौक्टर भी मौजूद है और राज के परिवार वाले भी.’’

सब के सब गाड़ी में बैठ फिर से खंडाला की ओर चल पड़े.

राज चुपचाप आंखें बंद किए सीट पर सिर टिका कर बैठा था और प्रिया उस का सिर सहला रही थी. पीछे आ रहे विजय शंकर और रमेश के मन में हलचल सी मची थी. उन सब की पत्नियों के मन भी कुलबुला रहे थे कि क्या हो रहा ये सब?

आखिर रात के 9 बजे के करीब सब खंडाला पहुंच गए. उन की गाडिय़ां रुकते ही होटल का स्टाफ और इवेंट मैनेजमेंट क्रू दौड़ा चला आया. सब उतर कर रूम की ओर चल पड़े. धनराजजी और अंजलि राज को ले कर उस के पैरेंट्स के रूम की ओर चल पड़े, जो सेकेंड फ्लोर पर था. प्रिया भी उन्हीं के साथ पीछेपीछे आ रही थी. राज अब तक बिलकुल खामोश था. न तो उस ने कोई बात की थी, न प्रिया की ही तरफ देखा था. जैसे ही राज के मम्मीपापा यानी सुधीर सहवाल और रुचा सहवाल ने अपने बेटे राज को देखा तो एकदम से ‘बेटा’ कह कर उस से लिपट गए. जब धनराजजी ने बताया कि वह अचानक उन की गाड़ी के सामने आ गया था तो सुधीरजी एकदम हैरान हो गए.

”क्या..? पर राज तो इवनिंग वाक कर के घंटे भर में आ रहा हूं कह कर निकला था. ये कब और क्यों उतनी दूर आप की गाड़ी के रास्ते मे पहुंच गया? हम यहां कब से इसे ढूंढ रहे हैं.’’ वे लोग बोले.

”ओके! अभी डौक्टर आ रहा है, वो राज का चैकअप कर के मैडिसिन दे देगा और फिर कल हम बात करेंगे आराम से.’’ धनराजजी बोले.

”नहींनहीं, मुझे कोई चैकअप नहीं कराना है.’’ राज ने एकदम ठंडे स्वर में कहा.

उस की आवाज सुन सब एकदम से चौंक से गए. फिर धनराज, अंजलि और प्रिया बाहर आ गए और अपने रूम की तरफ चल पड़े. प्रिया अपने रूम में पहुंच कर शावर लेने के इरादे से जैसे ही बाथरूम में घुसी तो देखा कि शावर में एक लंबी डोरी बांध कर एक दुलहन बनी डौल फांसी जैसे लटकी पड़ी थी. उसे देखते ही प्रिया चीखते हुए बाहर भागी और अपनी मम्मी के कमरे के बाहर दरवाजा पीटने लगी, ”मम्मी, जल्दी आओ आप. देखो कोई मुझे मारना चाह रहा है.’’

अंजलि जब तक बाहर निकली, प्रिया डर से बदहवास हो गई थी. धनराजजी ने तुरंत होटल मैनेजर को बुला कर डांट पिलाई और सिक्योरिटी पर ध्यान देने को कहा. मैनेजर ने अपने पूरे स्टाफ को सख्ती से वार्निंग देते हुए चौकन्ना रहने की हिदायत दी. प्रिया दूसरे रूम में शिफ्ट हो गई. वह अभी  बैग ओपन कर ही रही थी कि उस का मोबाइल बज उठा, वही अनजान नंबर था. प्रिया ने डरतेडरते ‘हैलो’ बोला तो उधर से आवाज गूंज उठी, ”वेलकम टू खंडाला प्रिया! अब तुम आ तो गई हो पर दुलहन के लिबास में नहीं, कफन में जाओगी यहां से. हा… हा… हा.’’ वही भयानक हंसी गूंजने लगी.

प्रिया के हाथ से मोबाइल छूट कर फर्श पर जा गिरा. प्रिया कुछ देर तक तो बुत बनी मोबाइल को घूरती रही फिर उसे उठाया और मीनू को कौल लगाने लगी. मीनू ने दीदी का कौल देखी तो वह फौरन प्रिया के रूम में ही पहुंच गई, ”क्या हुआ दी! सब ठीक तो है न? आप ने कौल क्यों किया था?’’ मीनू एक सांस में पूछने लगी.

”ओह मीनू, मैं बहुत डिस्टर्ब हो गई हूं. लग रहा है कि कोई मेरी जान लेना चाहता है.’’ प्रिया सहमी हुई बोली.

मीनू एकदम तैश में आ गई, ”आप की जान कोई नहीं ले सकता दीदी, हम सब आप की हर पल हिफाजत करेंगे यहां.’‘‘

प्रिया उस का हाथ पकड़ते हुए बोली, ”देख, मैं तुझ से ज्यादा किसी पर यकीन नहीं कर सकती, इसलिए मेरी बात ध्यान से सुन…’’ और फिर प्रिया मीनू के कान में कुछ कहने लगी. कुछ देर बाद ही प्रिया के रूम का दरवाजा खुला और स्कार्फ लपेटे हुए मीनू वापस अपने रूम में आ कर सो गई. सानिया ने उस से पूछना चाहा कि इतनी देर किधर थी, पर मीनू को सीधे बैड पर जा सोते हुए देख उस ने कुछ न पूछना ही ठीक समझा. करीब एक घंटे बाद अचानक ही अंजलि उठ बैठी और फिर रूम का दरवाजा खोल कर बाहर जाने लगी कि धनराजजी की आंखें भी खुल गईं. वह बोले, ”अरे इतनी रात में कहां जा रही हो तुम?’’

अंजलि थोड़ी चौंक गई. फिर बोली, ”पता नहीं क्यों मेरा जी थोड़ा घबरा सा रहा है! बस प्रिया बेटी को देखने जा रही थी मैं.’’

धनराजजी उसे समझाते हुए कहने लगे, ”अरे, वो थक कर सो रही होगी अभी, कहां उसे फालतू डिस्टर्ब करने जा रही हो?’’

अंजलि बोली, ”बस एक नजर तसल्ली कर लूं.’’ और वह बाहर निकल गई. पीछेपीछे धनराजजी भी आ गए. दोनों जब प्रिया के रूम के पास पहुंचे तो देखा कि दरवाजा खुला हुआ था.

अंजलि बड़बड़ाई, ”बताओ… हद है लापरवाही की. दरवाजा भी बंद नहीं किया इस ने.’’

धनराजजी भी परेशान हो उठे. फिर उन्होंने अंदर जा कर लाइट औन कर दी. लाइट औन होते ही दोनों पागलों की तरह चीख उठे. पूरा बैड खून से लाल हो रहा था और प्रिया की गरदन कटी लाश एक किनारे पर पड़ी थी. उस के लंबे बालों ने आधे चेहरे को ढंक रखा था. अंजलि तो बेहोश हो कर गिर पड़ी और धनराजजी ने किसी तरह होश काबू में करते हुए मैनेजर को फोन लगाया और तुरंत आने को कहा.

कुछ ही देर में जंगल की आग की तरह यह बात दूर तक फैल गई और लगभग सभी रिश्तेदार और होटल स्टाफ वहां इकट्ठा हो गया. राज के मम्मीपापा भी दौड़ते हुए आए तो उन्हें देखते ही धनराजजी का सब्र जवाब दे गया और वे फूटफूट कर रो पड़े. उन की यह हालत देख सब के दिल रो पड़े. तभी वीणा बोली, ”अरे, सानिया और मीनू बिटिया नहीं दिख रहीं, क्या उन्हें किसी ने खबर नहीं की?’’

तभी रूपा सानिया को लिए हुए आई और बोली, ”कमाल है! ये मीनू आधी रात को रूम से किधर गायब हो गई है.’’

अंजलि सानिया को झकझोर कर पूछने लगी, ”सानिया, बताओ बेटा, क्या तुम्हें कुछ बता कर गई है मीनू?’’

परेशान सहमी सानिया बोली, ”नहीं, मुझे तो कुछ भी नहीं पता कि वह कब रूम से बाहर गई. हां, कोई 3 घंटे पहले जरूर मैं ने मीनू को रूम से बाहर जाते देखा था. कुछ देर बाद वह वापस आई और चुपचाप चादर ओढ़ कर सो गई.’’

तभी पुलिस वहां आ गई और सब को रूम से बाहर जाने के लिए कहा. सब गलियारे में इकट्ठे हो कर चर्चा करने लगे. इतने में विजय ने कहा, ”राज दिखाई नहीं दे रहा यहां. क्या उसे अब तक इस बुरी खबर का पता नहीं चला है?’’

राज की मम्मी दुखी स्वर में बोली, ”पता नहीं किस की मनहूस नजर बच्चों को लग गई? हम यहां आए थे शादी कर के बहू ले जाने और हमारी बहू बनने से पहले ही…’’ कह कर वह रोने लगी. राज के पापा ने उन्हें संभालते हुए कहा, ”अब कमजोर मत बनो तुम, नहीं तो फिर राज को कौन संभालेगा? अभी तक तो उसे कुछ बताया तक नहीं, क्योंकि वह खुद कल शाम को बहुत ही अजीब सी मानसिक हालत में था.’’

तभी पुलिस रूम के अंदर से लाश को स्ट्रेचर पर ले कर बाहर आई और धनराजजी को बताया, ”पोस्टमार्टम के बाद आप को बौडी सौंप दी जाएगी.’’

अंजलि चीख मार कर रोने लगी और साथ में सभी रिश्तेदारों के भी आंसू बह निकले. तभी वीणा ने रोते हुए कहा, ”एक बार तो हमें प्रिया का चेहरा देखने दो.’’

पुलिसकर्मियों ने स्ट्रेचर नीचे रख दिया. वीणा और सरिता रोती हुई प्रिया के चेहरे पर से चादर हटाने लगीं, ”ये क्या?’’

उन की चीखें तो हलक में अटक गईं. स्ट्रेचर पर पड़ी लाश का चेहरा जो अब तक बालों में छिपे होने की वजह से स्पष्ट नहीं दिख रहा था, अब एकदम सामने था. वह लाश प्रिया की नहीं, बल्कि मीनू की थी. सब का मुंह एकदम बंद हो गया. सिर्फ अंजलि ही ‘मीनू’ कह कर दहाड़ें मार कर रोने लगी. पुलिस औफीसर भी हैरत में पड़ गया कि ये क्या माजरा है? किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि प्रिया के रूम में मीनू की लाश कैसे? और फिर प्रिया कहां गई आखिर?

तभी पुलिस औफीसर की नजर गलियारों में लगे सीसीटीवी कैमरों पर पड़ी तो वह तुरंत बोला, ”ओह… गुड, मैनेजर साहब आप ये पूरा सीसीटीवी फुटेज मुझे अभी दिखाने का इंतजाम करें.’’

मैनेजर उन को ले कर तुरंत अपने केबिन में आ गया और सीसीटीवी की फुटेज दिखाने लगा. फुटेज में दिख रहा था कि पहले मीनू प्रिया के रूम में आई, फिर कुछ देर बाद वो स्कार्फ बांधे वापस निकल गई. इस के करीब 20 मिनट बाद एक काले कंबल में ढंका हुआ एक साया वहां आया और नौक किया. कुछ ही देर में डोर खुला और वो साया लपक कर अंदर चला गया. फिर 5 मिनट बाद ही वह बाहर आ कर चला गया गलियारे की तरफ. पुलिस औफीसर मैनेजर के ही साथ वापस प्रिया के रूम के पास पहुंचा और बोला, ”अब समझ आ गया कि जरूर प्रिया ने मीनू को कौल कर के अपने रूम में बुलाया होगा और फिर खुद मीनू की ड्रेस पहन कर स्कार्फ बांध कर वो मीनू के रूम में चली गई और मीनू यहां प्रिया के रूम में रुक गई.’’

तभी अंजलि बोली, ”पर आखिर प्रिया ने ऐसा क्यों और किसलिए किया? मुझे क्यों नहीं बुलाया उस ने?’’ और वो फिर रोने लगीं.

पुलिस औफीसर बोला, ”इन सब का जवाब तो प्रिया ही दे सकती है, पर वो है कहां? किधर गायब हो गई वो?’’

”कौन गायब हो गया? यहां पुलिस क्यों आई है?’’ कहते हुए अचानक राज वहां आ पहुंचा.

राज को देखते ही अंजलि और धनराज दोनों ही रोते हुए बोले, ”बेटा, देखो न ये क्या हो गया? हमारी मीनू का किसी ने बेदर्दी से कत्ल कर दिया और प्रिया बिटिया लापता है.’’

राज हैरान होते हुए बोला, ”क्या? ऐसा कैसे हो सकता है?’’

”प्रिया ने तो अभी कुछ देर पहले ही मुझे कौल लगाया था. इस से ही तो मेरी नींद टूटी.’’

पुलिस औफीसर ने पूछा, ”तो कहां है प्रिया? क्या बोला उस ने?’’

”मेरे कौल पिक करने से पहले ही कट हो गई और मैं ने जब उसे कौल किया तो फोन स्विच औफ आ रहा था. इसीलिए मैं खुद उस से बात करने नीचे आ रहा था और ये सब पता चला.’’ राज उलझे स्वर में बोला.

”ओके! हम जल्दी ही सब पता लगा लेंगे, फिलहाल होटल से कोई भी बाहर नहीं जाएगा.’’ कहते हुए पुलिस औफीसर वहां से चला गया.

सब रिश्तेदार दुख और उलझन में डूबे थे. किसी की भी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वीणा, सरिता और रूपा तीनों ही अंजलि को सांत्वना देने का प्रयास कर रही थीं.

राज के पिता बोले, ”धनराजजी, मैं आप का दुख समझ सकता हूं. आखिर मैं भी एक पिता हूं.’’

धनराजजी राज को पकड़ कर रो पड़े, ”बेटा, मुझे तो कुछ नहीं समझ रहा कि क्या करूं मैं? कल तक कितना खुश था मैं और आज…’’ कह कर वह बिलख पड़े. राज उन्हें शांत करते हुए बोला, ”प्लीज अंकल, आप यूं हिम्मत न हारिए. आप को देख कर ही तो बाकी सब में संभलने का साहस आएगा.’’

दिन के उजाले में सब के उदास और दुखी चेहरे और भी जर्द दिखने लगे. धीरेधीरे सब अपनेअपने रूम की ओर चल पड़े. तभी राज का मोबाइल बज उठा, उस ने कौल रिसीव किया और तुरंत अपने रूम की ओर चल पड़ा. धनराजजी अपने रूम में बैठे हुए रोते हुए पछता रहे थे कि क्यों यहां आ कर शादी का प्लान बनाया.

अंजलि रोते हुए बोली, ”काश! मैं ने अपनी प्रिया को अकेले रूम में नहीं छोड़ा होता…’’

इतने में धनराजजी बोले, ”अब तक मैं नहीं समझ पा रहा हूं कि आखिर प्रिया ने अपनी जगह मीनू को क्यों सुलाया रूम में? वो हमारे रूम में भी तो आ सकती थी न…’’

अंजलि सिर पीटते हुए बोली, ”हमारा दुर्भाग्य और क्या.’’

अचानक बाहर कुछ शोर सा हुआ…

”अरे क्या हुआ! इतना शोर क्यों मच रहा है?’’ कहते हुए धनराजजी बाहर आए तो देखा कि रमेश अपने रूम का दरवाजा पीट रहा है जोरजोर से. और अपनी बीवी सरिता को पुकार रहा था.

धनराजजी ने पूछा, ”क्या हुआ रमेश? बात क्या है?’’

रमेश बोला, ”देखिए न भाई साहब, सरिता अंदर से कुछ जवाब नहीं दे रही और न दरवाजा खोल रही है.’’

इतने में मैनेजर डुप्लीकेट चाबी ले कर आ गया और दरवाजा खोल दिया. रमेश और धनराजजी तेजी से रूम में गए और देखा तो सरिता रूम में नहीं थी, अंदर थी प्रिया, जो बैड पर बेहोश पड़ी थी. सब के सब स्तब्ध से हो गए और फिर धनराजजी ‘प्रिया…प्रिया…’ पुकारते हुए उसे होश में लाने लगे.

तभी पुलिस भी वहां आ पहुंची अपनी इन्वैस्टिगेशन करने. खबर मिलते ही डौक्टर भी आ गया और प्रिया को होश में लाने की कोशिश करने लगा. फिर उस ने चैक कर के बताया कि प्रिया किसी दवाई की वजह से गहरी बेहोशी में है. उसे होश में आने में 3 से 4 घंटे लगेंगे, तब तक उसे डिस्टर्ब न किया जाए. और वो उसे इंजेक्शन लगा कर चला गया. प्रिया को अपने रूम में ही रख लिया था अंजलि ने, अब वो पल भर के लिए उसे अपनी आंखों से ओझल नहीं करना चाहती थी. अब पुलिस के साथ ही सब सरिता को खोजने में जुट गए. हर रूम, टेरेस, गलियारे सब की तलाशी हो गई पर सरिता का पता ही नहीं चल रहा था. पुलिस औफीसर ने मोबाइल लोकेशन देखी तो वह होटल की ही आ रही थी.

रमेश बारबार बोल रहे थे, ”कितनी मनहूस जगह है ये! जब से आए हैं, हमें चैन नहीं. काश! मेरी बीवी जल्दी सहीसलामत मिल जाए तो मैं अभी अपने घर निकल पड़ूं.’’

धनराजजी उसे घूरते हुए बोले, ”तो क्या तुम प्रिया और राज की शादी में शामिल नहीं होगे? ठीक है कि मेरी छोटी बेटी का कत्ल हो गया, पर उस दुख के बाद भी ये शादी तो पहले तय मुहूर्त पर ही करनी होगी. नहीं तो राज चला जाएगा वापस लंदन.’’

”अजी चला जाएगा तो चला जाए…’’ भड़क कर रमेश और शंकर चिल्लाए.

इतने में पुलिस औफीसर ने टोका, ”मुझे अभी राज का बयान लेना है, किधर है वो?’’

राज के पिता बोले, ”औफीसर, वो अपने रूम में ही है. पर मेंटली बहुत डिस्टर्ब है.’’

औफीसर ने मुसकरा कर कहा, ”मुझे मेरे काम के बारे अच्छे से पता है, इसलिए आप चिंता न करें.’’

औफीसर ने जैसे ही डोर नौक किया, राज ने दरवाजा खोला और बोलने लगा, ”क्या आप बाद में नहीं पूछताछ कर सकते सर! एक्चुअली मैं अभी बहुत ही डिस्टर्ब हूं.’’

औफीसर ने उस के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ”डोंट वरी! बी रिलैक्स! आओ हम कौफी पीते हैं.’’ कहते हुए औफीसर ने  इंटरकाम पर कौफी का और्डर दिया.

तब तक औफीसर सोफे पर बैठते हुए राज से बोला, ”अरे, आओ न बैठो भी, इतने टेंशन में क्यों हो आखिर?’’

राज बैठ ही रहा था कि अचानक ही अंदर के रूम से कुछ आवाज आई.

”क्या है! कौन है अंदर?’’ कहता हुआ औफीसर उठ के अंदर रूम की ओर चल पड़ा.

राज एकदम उसे रोकते हुए बोला, ”प्लीज, आप ऐसा नहीं कर सकते! आप जो पूछने आए हैं, वो पूछ कर जाइए यहां से.’’

औफीसर ने सख्त लहजे में कहा, ”देखिए, मुझे अपना काम करने दें.’’

अंदर एक कुरसी पर सरिता रस्सी से बंधी हुई बैठी थी और उस के मुंह पर पट्टी बंधी थी.

तभी राज एकदम पीछे से आया और हाथ जोड़ कर बोलने लगा, ”प्लीज, मुझे माफ कर दीजिए सर, मेरी बात तो सुन लीजिए एक बार.’’

औफीसर ने पहले सरिता को रस्सी से आजाद किया और मुंह पर बंधी पट्टी हटाई. हटते ही सरिता गुस्से से राज की ओर लपकी, पर तभी औफीसर ने सरिता को रोक दिया फिर राज से कहा, ”जल्दी से बताओ, आखिर ये सब क्या माजरा है?’’

राज कुछ पल चुप रहा फिर कहने लगा, ”सर, एक्चुअली जब मैं कालेज में था, तब बुरी संगत में पड़ कर ड्रग्स के चक्कर में पड़ गया. समय के साथ ये लत बढ़ती गई और मुझे हर समय ज्यादा से ज्यादा पैसों की जरूरत पडऩे लगी. अब मम्मीपापा को न मालूम हो, इसलिए मैं ने ड्रग्स की स्मगलिंग तक की और एक बार गल्फ कंट्री में पकड़ा भी गया. बड़ी मुश्किल से किसी तरह मैं वहां से आजाद हुआ और पेरेंट्स को यही बताया कि मैं स्टडी के सिलसिले में बाहर गया था.’’

औफीसर बोला, ”पर इन सब में सरिताजी और प्रिया ये सब कहां से आ गईं?’’

राज बोला, ”सर, अब मैं सब कुछ छोड़ चुका हूं और एक शरीफ जिम्मेदार इंसान बन कर अपनी लाइफ बिताना चाहता हूं. प्रिया को मैं दिलोजान से प्यार करता हूं. पर पता नहीं कैसे किसी को मेरे पास्ट के बारे में पता चल गया. जब मैं लंदन से इंडिया के लिए  निकलने ही वाला था कि मुझे कौल आया एक अनजान नंबर से. उसे मेरे बारे में सब पता है सर! और वो यह बात मेरे पेरेंट्स और मीडिया में लीक करने की धमकी दे रहा था. मैं ने बहुत रिक्वेस्ट की तो वो इस शर्त पर माना कि मैं किसी भी तरह प्रिया को रास्ते से हटा दूं. अब आप ही सोचिए सर, कि मैं कितनी मजबूरी में तैयार हुआ होऊंगा.’’

औफीसर ने घूरते हुए पूछा, ”तो क्या मीनू को तुम ने ही मारा है?’’

राज बोला, ”नहींनहीं सर! जिस दिन प्रिया और उस की फेमिली वाले यहां आने के लिए रवाना हुए थे, उसी दिन मुझे भी कौल आया कि मैं आधे रास्ते में ही प्रिया को किसी तरह मार दूं, पर मेरी हिम्मत न हुई और मैं ने बेहोशी का ड्रामा किया. बाद में फिर कब मीनू को किस ने मारा, मुझे नहीं पता. वह तो मुझे प्रिया का कौल आया कि मैं मुसीबत में हूं, मुझ से टेरेस पर आ कर मिलो तो मैं वहां जा कर उसे चुपचाप ले कर आ रहा था कि मैं ने सोचा कि क्यों न इसे बेहोश कर छिपा दूं कहीं पर, ताकि कातिल इस तक न पहुंच सके. मैं इसे अपने रूम तक लाने वाला था कि अचानक शोर मच गया और इसे सरिता के रूम में खाली देख सुलाने लगा कि सरिता बाथरूम से बाहर आई और मुझे यूं देख शोर मचाने लगी. तब मैं इतना डर गया था सर कि इन को पकड़ कर अपने रूम में ला कर बांध दिया.’’

औफीसर ने सोचते हुए कहा, ”कातिल जरूर प्रिया के ही परिवार से है. अब एक ही तरीका है उसे पकडऩे का कि हम ये सब बातें अभी छिपा के रखें. सरिताजी, आप प्लीज अभी इसी रूम में रहिए, आप को कुछ नहीं होगा और राज तुम भी यहीं रहोगे, ओके.’’ कह कर औफीसर नीचे आ गया, जहां सब सरिता को खोज रहे थे.

तभी धनराजजी बोले, ”हम सब इधर व्यस्त हैं, कहीं प्रिया को न कुछ हो जाए.’’

वीणा बोली, ”नहींनहीं, वहां पर तो अंजलि भाभी हैं.’’

औफीसर चुपचाप प्रिया के रूम की ओर दबे पांव चल पड़ा.

उस ने बिना आवाज किए एक विंडो के कर्टन से देखने की कोशिश की. अंदर का नजारा बड़ा ही भयानक था.

प्रिया बेहोश थी और उस के पास ही अंजलि दांत पीसते हुए अपने हाथों में रस्सी का फंदा तैयार कर रही थी.

वह फंदा डालती, इस के पहले ही औफीसर ने वहीं से उस के हाथ पर गोली चला दी. वह चीख के नीचे गिर पड़ी और इसी बीच औफीसर ने डोर लौक पर भी फायर कर दरवाजा खोला और अंदर चला गया.

उस ने कौल कर के तुरंत सब को यहां बुलाया.

सब वहां पहुचे तो देख कर दंग रह गए. अंजलि को रिवौल्वर की नोक पर रखा था औफीसर ने.

धनराजजी चिल्लाए, ”क्या हो रहा है ये?’’

औफीसर बोला, ”ये तो अंजलिजी बताएंगी हमें, क्यों बताएंगी न?’’

सख्त लहजे में कहते ही अंजलि जैसे फूट पड़ी, ”तो और क्या करती मैं? तुम्हारे पिताजी ने प्रिया के नाम 70 परसेंट जायदाद करने की शर्त पर तुम्हें पैसे दिए थे. शादी होते ही ये सब वो समेट कर ससुराल ले जाती. फिर मेरे और मेरी बेटी के पास क्या बचता.’’

औफीसर बोला, ”पर प्रिया भी तो आप की ही बेटी है.’’

अंजलि जहरीली हंसी हंसते हुए बोली, ”हां, सौतेली बेटी. मैं तो उसे बचपन में ही खत्म कर देती, पर वसीयत के हिसाब से इस के 21 वर्ष पूरे होने से पहले ही अगर ये मर जाती तो जायदाद ट्रस्ट के नाम हो जाती. इसीलिए इतना लंबा इंतजार किया. जब मुझे मेरी फ्रेंड के पति ने जो गल्फ में काम करते हैं, ने बताया कि राज ड्रग्स केस में मुजरिम है तो बस मैं ने सब सोच लिया कि कैसे राज को ब्लैकमेल कर के काम करवाना है. मैं ही प्रिया और राज को अनजान नंबर से कौल करती थी. वो तो उस मनहूस प्रिया को जाने क्या सूझा कि उस ने मीनू से अपना कमरा एक्सचेंज कर लिया. उफ्फ! मैं ने अपने ही हाथों अपनी बेटी मीनू का कत्ल कर दिया…’’ कह कर अंजलि रोने लगी.

यह सब सुन कर सब अंजलि को हिकारत भरी नजरों से देख रहे थे. विश्वास करना मुश्किल था कि कोई मां इस हद तक गिर सकती है.

धनराजजी बोले, ”मेरे पिताजी शुरू से तुम से शादी करने के खिलाफ थे. उन को शायद तुम्हारी बदनीयती का आभास हो गया था, इसीलिए उन्होंने प्रिया के नाम 70 परसेंट जायदाद रखवाई.’’

इतने में राज और सरिता भी नीचे आ गए.

राज ने सब से हाथ जोड़ कर माफी मांगी और बोला, ”मैं अपने अपराध की सजा तो पहले ही काट चुका था, पर सिर्फ अपने परिवार की बदनामी न हो, इस कारण ब्लैकमेल का शिकार बन गया.’’

औफीसर के इशारा करने पर साथ में मौजूद पुलिस फोर्स ने अंजलि को हिरासत में ले लिया.

शाम तक प्रिया को पूरी तरह होश आ गया था, जब उसे सब पता चला तो वह एकदम शौक्ड हो गई, ”ओह माम! आप ने ऐसा क्यों किया? काश! मुझ से सब अपने नाम पर करवा लेती तो आज मीनू जिंदा रहती.’’

धनराजजी ने उसे सांत्वना दी और बोले, ”अब ये सब भूल जाओ बेटी, नया सवेरा तुम्हारी राह देख रहा है, राज तुम्हें खुश भी रखेगा और महफूज भी! क्यों राज?’’

राज ने अपने हाथ जोड़ कर सिर झुका दिया और सब इसे बुरे सपने की तरह भूल कर प्रिया की शादी में लग गए

लेखक – मृणालिका दुबे

Hindi Stories: कातिल दरोगा

Hindi stories: फरियाद ले कर पुलिस चौकी पहुंची खूबसूरत ईशा को देख कर दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह इतना प्रभावित हुआ कि शादीशुदा होते हुए भी वह उसे चाहने लगा. इतना ही नहीं, खुद को अविवाहित बता कर उस ने ईशा से शादी भी कर ली. बाद में यही झूठ ऐसा जी का जंजाल बना कि वह एक खौफनाक अपराध कर बैठा. कानपुर के थाना काकादेव क्षेत्र में एक मोहल्ला है नवीन नगर. कौशलेश सचान अपनेपरिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विनीता के अलावा एक बेटा ऐश्वर्य राज, 2 बेटियां ईशा व प्रगति थीं. कौशलेश साधन संपन्न व्यक्ति थे. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी.

कौशलेश सचान की बड़ी बेटी का नाम वैसे तो ईशा था लेकिन घर में सब लोग उसे ईशू कहते थे. गोरी, तीखे नाकनक्श और बड़ीबड़ी आंखों वाली ईशा सुशील और विनम्र स्वभाव की थी. ईशा तनमन से जितनी खूबसूरत थी, पढ़नेलिखने में भी उतनी ही तेज थी. उस ने कानपुर के सरस्वती बालिका इंटर कालेज से प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट और एएनडी कालेज में बीए पास किया. ईशा की इच्छा थी कि वह आईएएस बने. इसलिए प्रथम श्रेणी में बीए पास करने के बाद उस ने आईएएस की तैयारी के लिए कोचिंग शुरू कर दी थी. लेकिन लगातार 3 साल तक परीक्षा देने के बाद भी वह सिविल सर्विस में न निकल सकी.

एक दिन ईशा अपनी मां विनीता के साथ जेके मंदिर गई. दर्शन करने के बाद जब वह गेट के बाहर निकली, तो एक झपटमार ने उस के गले की सोने की चेन खींच ली और साथ ही उस का पर्स भी छीन कर भाग निकला. बदहवास मांबेटी थाना नजीराबाद पहुंचीं. उस इलाके के चौकी इंचार्ज सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल उस समय थाने में ही थे. ईशा ने ज्ञानेंद्र सिंह को लूट की पूरी घटना बताई तो उन्होंने रिपोर्ट दर्ज कर के लुटेरे की तलाश शुरू कर दी. 3-4 दिन बाद ही ज्ञानेंद्र ने छोटे यादव नाम के लुटेरे को पकड़ लिया. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह की इस त्वरित काररवाई से ईशा काफी प्रभावित हुई.

बयान दर्ज कराने, लुटेरे और सामान की शिनाख्त करने के लिए ईशा को कई बार थाना नजीराबाद आनाजाना पड़ा. इसी आनेजाने में ईशा और दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. ज्ञानेंद्र सिंह जहां ईशा की खूबसूरती पर फिदा था, वहीं ईशा भी शरीर से हृष्टपुस्ट व स्मार्ट दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को देख कर उस की ओर आकर्षित हो गई थी. दोनों को एक अनजाना आकर्षण एकदूसरे की तरफ खींचने लगा था. दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को ईशा कुछ ज्यादा ही पसंद आ गई थी, इसलिए उस ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया था. वह जब तब ईशा से बातें करने लगा. ईशा को भी उस की रसभरी बातों में प्यार झलकता था. वह भी उस से खूब बातें करने लगी. धीरेधीरे दोनों की मुलाकातें भी होने लगीं. बात आगे बढ़ी तो दोनों साथसाथ सैरसपाटे के लिए भी जाने लगे. ज्ञानेंद्र ईशा को फिल्म भी दिखाता और रेस्तरां में खाना भी खिलाता.

सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र सिंह पटेल मूल रूप से चित्रकूट जिले के मऊ थाना अंतर्गत आने वाले गांव छिवलहा का रहने वाला था. उस का सलेक्शन 2007 के बैच में हुआ था. उस की पहली पोस्टिंग कानपुर के किदवई नगर थाने की साकेत नगर पुलिस चौकी में हुई थी. इस के बाद वह कानपुर शहर और देहात के कई थानों में तैनात रहा. कुछ समय वह क्राइम ब्रांच में भी रहा. ज्ञानेंद्र सिंह नौकरी के अलावा प्लौटिंग का भी काम करता था. इस काम में उस ने खूब पैसा कमाया. उस के पास 4-5 लग्जरी कारें थीं, जिन्हें उस ने एक ट्रैवलिंग एजेंसी में लगवा रखा था. ज्ञानेंद्र सिंह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस की शादी मध्य प्रदेश स्थित सतना जिले की बछरांवा निवासी नीलम के साथ हुई थी.

पत्नी और बच्चों के साथ वह साकेत नगर, कानपुर में रह रहा था. जबकि ईशा से उस ने खुद को अविवाहित बताया था. एक रोज ज्ञानेंद्र सिंह ईशा के घर पहुंचा, तो उस वक्त वह घर में अकेली थी. उस के मातापिता किसी काम से माल रोड गए हुए थे, और भाईबहन कालेज में थे. ज्ञानेंद्र सिंह और ईशा कमरे में बैठ कर बातचीत करने लगे. बातोंबातों में ज्ञानेंद्र ने ईशा की खूबसूरती के कसीदे काढ़ने शुरू कर दिए. यह देख उस ने ज्ञानेंद्र की बेचैन आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘ज्ञानेंद्र, क्या सचमुच मैं तुम्हें अच्छी लगती हूं? कहीं तुम मुझे खुश करने के लिए मेरी झूठी तारीफ तो नहीं कर रहे?’’

ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा को चाहत भरी नजरों से देखा, वह उसे ही अपलक निहार रही थी. ज्ञानेंद्र ने महसूस किया कि दिल की बात कहने का ऐसा मौका मुश्किल से ही मिलेगा. इसलिए वह ईशा की कलाई थामते हुए बोला, ‘‘ईशा, मुझे तुम से प्यार हो गया है. तुम्हारे बगैर सबकुछ सूनासूना सा लगता है. मुझे लगता है कि तुम्हारे दिल में भी मेरे लिए ऐसी ही फीलिंग्स हैं. अगर ऐसा है तो प्लीज मेरा प्यार स्वीकार कर लो.’’

‘‘ज्ञानेंद्र, तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये शब्द सुनने के लिए कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपने दिल की बात कहने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि मैं तुम से कितना प्यार करती हूं. आई लव यू ज्ञानेंद्र.’’

उस दिन दोनों ने अपनेअपने प्यार का इजहार कर दिया, इस के बाद जैसे दोनों की दुनिया ही बदल गई. समय के साथ उन की मोहब्बत दिन दूनी रात चौगुनी परवान चढ़ती गई. ज्ञानेंद्र जब ड्यूटी पर होता तो ईशा से मोबाइल पर बातें करता और जब समय मिलता तो उस के साथ घूमताफिरता. इस तरह दोनों एकदूसरे के इतना करीब आ गए कि उन्हें लगने लगा, अब एकदूसरे के बिना नहीं रहा जा सकता. अंतत: शुरुआत ईशा ने की. उस ने अपने दिल की बात घरवालों को बता कर ज्ञानेंद्र सिंह से शादी करने की इच्छा जाहिर की.

ईशा की बात सुन कर पहले तो उस की मां विनीता और पिता कौशलेश चौंके, लेकिन बाद में बेटी की खुशी के लिए राजी हो गए. दरअसल ईशा ने उन्हें समझाया था कि दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह उन की ही जातिबिरादरी का है. अच्छा कमाता है और पुलिस विभाग में अच्छे पद पर तैनात है. बेटी की मरजी जान कर वे लोग ईशा की शादी ज्ञानेंद्र से करने को राजी हो गए. सबइंसपेक्टर ज्ञानेंद्र से बात की गई तो उस ने बताया कि कुछ कारणों से उस ने अपने घर वालों से संबंध विच्छेद कर रखा है इसलिए उस के परिवार का कोई सदस्य शादी में शामिल नहीं हो पाएगा.

बहरहाल, बातचीत के बाद कौशलेश ने 10 मार्च, 2013 को अपनी बेटी ईशा का विवाह ज्ञानेंद्र सिंह के साथ कर दिया. शादी के बाद ज्ञानेंद्र उसे साकेत नगर स्थित अपने घर ले गया. उस वक्त उस की पत्नी नीलम मायके गई हुई थी. इस के बाद ईशा ज्यादातर मायके में ही रही. वह उसे अपने घर तभी ले जाता था, जब नीलम मायके गई होती थी. बहरहाल, हंसीखुशी से एक वर्ष कब बीत गया, पता ही न चला. इसी बीच ईशा ने एक खूबसूरत बच्ची को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने सान्या रखा. सान्या के जन्म से जहां ईशा के जीवन में बहार आ गई थी, वहीं ज्ञानेंद्र खोयाखोया सा रहने लगा था. दिखावे के तौर पर तो वह उसे प्यार करता था, लेकिन अंदर ही अंदर परेशान रहता था.

ईशा और ज्ञानेंद्र में पहली बार तकरार तब शुरू हुई जब वह अपनी बेटी सान्या का बर्थडे सर्टिफिकेट बनवाने नगर निगम पहुंची. दरअसल, ज्ञानेंद ने सर्टिफिकेट में पिता की जगह अपना नाम लिखवाने से मना कर दिया था. इस बात को ले कर ईशा और ज्ञानेंद्र में काफी विवाद हुआ. यहीं से ईशा को ज्ञानेंद्र पर शक हुआ. जब ईशा ने गुप्त रूप से ज्ञानेंद्र के संबंध में जानकारी हासिल की तो उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे पता चला कि ज्ञानेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का पिता है. वह अपनी पत्नी नीलम और बच्चों के साथ कानपुर में ही रहता है. वह उसे तभी अपने घर ले जाता है, जब नीलम मायके गई होती है.

उस दिन देर रात ज्ञानेंद्र सिंह घर आया तो ईशा ने उस से पूछा, ‘‘मैं कौन हूं तुम्हारी. पत्नी, प्रेमिका या रखैल?’’

‘‘यह तुम कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो? तुम पत्नी हो मेरी.’’ ज्ञानेंद्र ने जवाब दिया.

‘‘झूठ बोल रहे हो, तुम शादीशुदा और 2 बच्चों के पिता हो. तुम्हारी पत्नी का नाम नीलम है, जिस के साथ तुम वैवाहिक जीवन बिता रहे हो. तुम फरेबी और धोखेबाज हो. प्यार का नाटक कर के तुम ने मुझे धोखा दिया और मुझ से शादी कर ली. लेकिन अब मैं चुप नहीं बैठूंगी. तुम्हारे खिलाफ लड़ाई लड़ूंगी. जरूरत पड़ी तो रिपोर्ट भी दर्ज कराऊंगी.’’

ज्ञानेंद्र सिंह समझ गया कि ईशा को असलियत का पता चल गया है, इसलिए उस ने माफी मांग ली. फिर बोला, ‘‘ईशा तुम मेरी दूसरी पत्नी बन कर रह सकती हो. मैं तुम्हें पूरा सम्मान दूंगा. कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दूंगा. चाहो तो अपने और बेटी के नाम पर जितना चाहे पैसा जमा करा सकती हो. मैं खुशीखुशी जमा कर दूंगा.’’

‘‘मिस्टर ज्ञानेंद्र, पत्नी दूसरी पहली नहीं होती. पत्नी सिर्फ पत्नी होती है. अगर तुम मुझ से प्यार करते हो तो अपनी पत्नी नीलम को तलाक दे दो.’’

‘‘उसे तलाक देना आसान नहीं है.’’ ज्ञानेंद्र ने मजबूरी जाहिर की तो ईशा बोली, ‘‘मेरा क्या होगा. यह सोचा है तुम ने? अपनी पत्नी और बच्चों की चिंता थी तो मेरे साथ प्यार का स्वांग कर के धोखे से शादी क्यों की? अगर तुम ने नीलम को तलाक नहीं दिया तो इस का अंजाम अच्छा नहीं होगा. मैं जहर खा कर जान दे दूंगी या फिर तुम्हारे खिलाफ धोखाधड़ी से शादी रचाने और शारीरिक शोषण करने की रिपोर्ट दर्ज कराऊंगी.’’

ईशा की धमकी सुन कर ज्ञानेंद्र सिंह अंदर तक कांप गया.वह तनाव में रहने लगा. ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियां बढ़ना स्वभाविक था. फलस्वरूप दोनों में आएदिन झगड़ा होने लगा. लड़झगड़ कर ईशा मायके आ गई. आखिरकार इस गंभीर समस्या के निदान के लिए दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह ने ईशा के कत्ल की योजना बना डाली. अपनी इस योजना में उस ने अपने साथी मनीष कठेरिया, उस के भाई बच्चा और मनीष के साथी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को शामिल कर लिया. मनीष कठेरिया किदवई नगर में रहता था. वह दबंग किस्म का आदमी था. साकेत नगर में उस की ‘टेलीकाम विला’ नाम से मोबाइल शौप तथा ‘बालाजी ट्रैवल्स’ के नाम से ट्रैवलिंग एजेंसी थी. इस के अलावा वह कमेटी भी चलाता था. पुलिस से दोस्ती करना उस का शौक था.

दर्जनों थानेदारों से उस के दोस्ताना संबंध थे. जिन्हें वह मुफ्त में मोबाइल फोन और आनेजाने के लिए लग्जरी गाडि़यां मुहैया कराता था. इस सेवा के एवज में वह अपने काम निकलवाता था. ज्ञानेंद्र सिंह जब साकेत नगर चौकी इंचार्ज था, तभी उस की दोस्ती मनीष से हुई थी. धीरेधीरे दोनों की दोस्ती बढ़ती गई. अर्जुन जूही बारादेवी में रहता था और मनीष कठेरिया का दोस्त था. वह मनीष की ट्रैवलिंग एजेंसी में लग्जरी कार चलाता था. अर्जुन की प्रेमिका अवंतिका किदवई नगर में रहती थी. दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया था. मनीष कठेरिया ने ही अर्जुन और अवंतिका का परिचय दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह से कराया था. मनीष का भाई बच्चा गोविंद नगर में रहता था.

आर्थिक मदद के लिए वह मनीष के पास आता था. मनीष के कहने पर बच्चा हर काम करने के लिए तत्पर रहता था. मनीष की कमेटी का पैसा बच्चा ही वसूल किया करता था. वह हमेशा मारपीट पर आमादा रहता था. इसी बीच ज्ञानेंद्र सिंह का तबादला प्रतापगढ़ हो गया था. वहां वह आंसपुर (देवसरा) थाने में तैनात रहा. बाद में काम में लापरवाही बरतने के कारण उसे लाइन हाजिर कर दिया गया था. लाइन हाजिर होने के बाद वह पुलिस लाइन में ड्यूटी कर रहा था. ईशा की धमकी ने उस का दिन का चैन और रात की नींद हराम कर दी थी. उसे पता था कि ईशा ने रिपोर्ट दर्ज करा दी तो उस की नौकरी तो जाएगी ही उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह जल्द से जल्द ईशा का काम तमाम करना चाहता था. इस के लिए वह बराबर अपने दोस्तों से संपर्क बनाए हुए था. उस ने उन से मिल कर ईशा की हत्या की योजना बना ली थी.

अपनी योजना के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह 17 मई, 2015 को ईशा के घर नवीन नगर, काकादेव पहुंचा. वहां उस ने ईशा की मां, मौसी, मामा व अन्य घरवालों से माफी मांगी और वादा किया कि वह ईशा को शारीरिक या मानसिक पीड़ा नहीं पहुंचाएगा और जैसा वह कहेगी, वैसा ही करेगा. उस के कहने पर पहली पत्नी नीलम को तलाक भी दे देगा. उस ने यह भी कहा कि अगर किसी वजह से वह नीलम को तलाक न दे सका तो ईशा व उस की बेटी के भरणपोषण के लिए मोटी रकम देगा. ईशा के घरवालों ने इस समझौते को स्वीकार कर लिया. 18 मई, 2015 की शाम 4 बजे दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह अपने साथी मनीष कठेरिया के साथ लग्जरी कार से ईशा के घर पहुंचा और उस की मां विनीता के पैर छू कर बोला, ‘‘मांजी, हम ईशा को कुष्मांडा देवी के दर्शन कराने ले जाना चाहते हैं. हमें आप की इजाजत चाहिए.’’

ईशा ज्ञानेंद्र की पत्नी थी, सो उन्हें क्या ऐतराज हो सकता था. लिहाजा उन्होंने ईशा को ज्ञानेंद्र के साथ जाने की इजाजत दे दी. ईशा व ज्ञानेंद्र को रात 8 बजे तक मंदिर से वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन जब दोनों रात 10 बजे तक वापस नहीं आए तो ईशा की मां विनीता सचान को चिंता हुई. उन्होंने ईशा और ज्ञानेंद्र से मोबाइल पर बात करनी चाही, लेकिन दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ थे. रात भर विनीता बेटी के आने का इंतजार करती रहीं, लेकिन वह वापस नहीं लौटी. सुबह को परेशानहाल विनीता सचान थाना काकादेव पहुंचीं. थाने पर उस समय थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव मौजूद थे. उन्होंने सारी बात बताते हुए रिपोर्ट दर्ज करने की गुहार लगई. लेकिन विभाग का मामला होने की वजह से पुलिस ने उन्हें टरका दिया. इस पर विनीता सचान डीआईजी आशुतोष पांडेय से मिलीं और शक जताते हुए रिपोर्ट दर्ज कराने की विनती की.

डीआईजी आशुतोष पांडेय को मामला गंभीर लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी उदय प्रताप को तत्काल रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दे दिया. आदेश मिलते ही उदय प्रताप ने विनीता सचान की ओर से भादंवि की धारा 364 के तहत दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. 20 मई को काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को कौशांबी के थाना महेवाघाट द्वारा एक युवती की सिर विहीन लाश मिलने की सूचना दी गई. शक के आधार पर थानाप्रभारी विनीता सचान, उन के पुत्र ऐश्वर्य राज व अन्य घरवालों के साथ महेवाघाट थाना पहुंचे. पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी थी. विनीता सचान ने जब उस लाश को देखा तो वह फफक कर रो पड़ीं. यह लाश उन की बेटी ईशा की ही थी. विनीता ने लाश की पहचान ईशा के हाथ में बंधी कलाई घड़ी तथा बांह पर गुदे लव आकार के टैटू से की थी.

लाश की शिनाख्त होने पर महेवाघाट थाना पुलिस ने अपने यहां दर्ज हत्या के मामले को थाना काकादेव, कानपुर ट्रांसफर कर दिया. चूंकि ईशा की लाश की शिनाख्त हो चुकी थी, इसलिए काकादेव पुलिस ने अपहरण के इस मामले में धारा 302/201/120बी और जोड़ दी. साथ ही विनीता के बयान के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह के साथसाथ बच्चा, मनीष कठेरिया, अर्जुन और उस की कथित पत्नी अवंतिका को भी आरोपी बना दिया. चूंकि यह मामला पुलिस के एक दरोगा से जुड़ा था इसलिए डीआईजी आशुतोष पांडेय ने ईशा के हत्यारोपियों को गिरफ्तार करने, कत्ल में प्रयुक्त हथियार और सिर बरामद करने के लिए एक विशेष पुलिस टीम बनाई. इस टीम में सीओ स्वरूप नगर आतिश कुमार, क्राइम ब्रांच के सीओ अमित कुमार राय, प्रभारी आर.के. सक्सेना तथा काकादेव थानाप्रभारी उदय प्रताप यादव को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने ज्ञानेंद्र, बच्चा, मनीष कठेरिया तथा उस के साथी अर्जुन के ठिकानों पर ताबड़तोउ़ छापे मारे. लेकिन सभी आरोपी फरार थे. पुलिस टीम ने उन के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगा दिए. साथ ही करीब एक दर्जन लोगों को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. निर्दोष पाए जाने पर बाद में उन्हें छोड़ दिया गया. पुलिस टीम को ईशा के मोबाइल की लोकेशन आगरा में मिली. पुलिस टीम आगरा गई और हाइवे के एक ढाबे के कर्मचारी से ईशा का मोबाइल बरामद कर लिया. उस कर्मचारी ने बताया कि कुछ लोग यह मोबाइल खाना खाने के बाद मेज पर छोड़ गए थे. पुलिस टीम को समझते देर नहीं लगी कि हत्यारोपियों ने पुलिस को गुमराह करने के लिए ऐसा किया होगा.

25 मई, 2015 को पुलिस टीम ने हत्यारोपी अर्जुन व उस की प्रेमिका अवंतिका को छपेड़ा पुलिया, काकादेव से कार सहित गिरफ्तार कर लिया. अर्जुन अपनी प्रेमिका को स्विफ्ट डिजायर कार से घुमाने बिठूर जा रहा था. यह कार मनीष कठेरिया की थी. अर्जुन और अवंतिका के पास से ईशा का एक कंगन भी बरामद हुआ. पूछताछ में अर्जुन ने बताया कि घटना वाले दिन शाम 4 बजे ज्ञानेंद्र सिंह स्विफ्ट कार से ईशा के घर पहुंचा था. उस वक्त कार में मनीष और उस का भाई बच्चा भी मौजूद था. ईशा को साथ ले कर तीनों नौबस्ता आए. मनीष ने उसे व अवंतिका को फोन कर के वहीं बुला लिया.

सभी 6 लोग 2 गाडि़यों के साथ विधनू, घाटमपुर, फतेहपुर होते हुए कौशांबी की ओर बढ़े. रास्ते में एक सुनसान जगह पर ज्ञानेंद्र ने गाड़ी रोक दी. उसी वक्त मनीष ने ईशा को दबोच लिया और ज्ञानेंद्र ने तेज धार वाले चाकू से ईशा का सिर धड़ से अलग कर दिया. धड़ से खून का फव्वारा छूटा तो मनीष ने अपनी शर्ट उतार कर सिर को धड़ से बांध दिया. फिर ईशा के शरीर से कपड़े और जेवर उतार कर सिर को यमुना नदी में तथा धड़ को महेवाघाट यमुना पुल के पास फेंक दिया. तत्पश्चात गाड़ी की अदलाबदली कर के तथा कंगन दे कर उसे वापस भेज दिया गया. मनीष, बच्चा व दरोगा ज्ञानेंद्र दूसरी गाड़ी से कहीं चले गए. अर्जुन व अवंतिका का बयान दर्ज करने के बाद काकादेव पुलिस ने दोनों को जेल भेज दिया.

अब पुलिस टीम ने शातिर दिमाग ज्ञानेंद्र सिंह, उस के साथी मनीष कठेरिया व बच्चा को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया. इस से घबरा कर 30 मई को मनीष कठेरिया ने सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे 3 दिनों की रिमांड पर ले लिया. मनीष से कोहना व किदवई नगर थाने में कड़ाई से पूछताछ की गई, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ. दबाव बनाने के लिए पुलिस ने उस की मां उषा को थाने बुलवा लिया. दोनों को आमनेसामने बैठा कर पुलिस टीम ने पूछताछ शुरू की. जबान न खुलने पर पुलिस ने उस की मां उषा को जेल भेजने की धमकी दी. इस धमकी से मनीष टूट गया और उस ने जबान खोल दी.

वह पुलिस टीम को महेवाघाट थाना क्षेत्र ले गया. वहां उस ने एक गड्ढे से मृतक ईशा का पर्स व सोने का एक कंगन बरामद करा दिया. पर्स में कुछ नकदी व जरूरी कागजात थे. पुलिस टीम ने यहीं से मनीष की खून से सनी शर्ट भी बरामद कर ली, जिसे उस ने हत्या के बाद खून रोकने के लिए इस्तेमाल किया था. बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने मनीष को अदालत पर पेश कर के जेल भेज दिया. मनीष को जेल भेजने के बाद पुलिस टीम ने ईशा की हत्या के मुख्य आरोपी दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को पकड़ने की कवायद शुरू की. एसएसपी शलभ माथुर ने उसे पकड़ने के लिए 12 हजार का ईनाम घोषित कर दिया था. लेकिन दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह पुलिस की हर युक्ति को धता बता कर 8 जून को कोर्ट में हाजिर हो गया. पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम हाथ मलती रह गई.

दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा आत्मसमर्पण की बात कानपुर कोर्ट में फैली तो वकीलों का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वे झुंड बना कर सीजेएमएम कोर्ट जा पहुंचे. पुलिस जब ज्ञानेंद्र को ले जाने लगी तो वकील उस पर टूट पड़े और उसे लातघूंसों से जम कर पीटा, उन्होंने उस के कपड़े फाड़ दिए और मुंह पर थूका. बड़ी मसक्कत के बाद पुलिस उसे जेल ले जा सकी. कत्ल में इस्तेमाल हथियार और मृतका का सिर बरामद करने के लिए पुलिस टीम ने दरोगा ज्ञानेंद्र सिंह को 17 जून को 2 दिनों के रिमांड पर लिया. काफी जद्दोजहद के बाद ज्ञानेंद्र सिंह ने मुंह खोला. वह पुलिस टीम को महेवाघाट, कौशांबी में यमुना नदी के दूसरी तरफ ले गया, जहां उस ने जमीन में गड़े सर्जिकल चाकू, ईशा का मंगलसूत्र, चेन और अंगूठी बरामद कराई. ईशा के सिर के संबंध में पूछने पर ज्ञानेंद्र ने बताया कि उसे यमुना नदी की तेज धारा में फेंक दिया गया था.

सिर को बरामद करने के लिए पुलिस ने यमुना नदी में जाल डलवाया, लेकिन सिर बरामद नहीं हो सका था. पुलिस पूछताछ में ज्ञानेंद्र ने बताया कि ईशा उस पर पहली पत्नी नीलम को तलाक देने का दबाव बना रही थी. जिस से परेशान हो कर उस ने उसे ठिकाने लगा दिया. वह उसे मंदिर दर्शन कराने के बहाने ले गया था. रास्ते में कार के भीतर ही उस का काम तमाम कर दिया गया. फिर धड़ को महेवाघाट थाने के पास यमुना नदी के पास फेंक दिया गया और सिर यमुना नदी में. वारदात के वक्त मनीष कठेरिया, उस का भाई बच्चा, अर्जुन तथा उस की प्रेमिका अवंतिका उस के साथ थे.

19 जून, 2015 को काकादेव पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह को सीजेएमएम मीना श्रीवास्तव की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. अभियुक्त बच्चा फरार था. Hindi stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: डंस गया देहधंधे की कमाई का सांप

Crime Story: मानो ने देह की कमाई से जो रुपए कमाए थे, उस पर उस की एक परिचित कीर्ति देवी की नजर पड़ गई. फिर उन रुपयों को हड़पने के लिए उस ने जो किया, बेचारी मानो जान से गई…

मनजीत कौर उर्फ मानो पति शीशपाल सिंह को छोड़ कर अंबाला शहर के काजीवाड़ा में अकेली ही रहती थी. आसपड़ोस के लोग उसे एक धार्मिक और समाजसेवी औरत के रूप में जानते थे. इस की वजह यह थी कि वह गरीबों की काफी मदद करती थी और पीर की मजार पर भी नियमित जाती थी. मानो के घर के ठीक सामने वाली गली में रहते थे बलदेव राज. 13 दिसंबर, 2012 की सुबह 9 बजे बलदेव राज बगीचे से घूम कर लौट रहे थे तो उन्हें मानो के घर के सामने कुछ लोग खड़े दिखाई दिए. पूछने पर पता चला कि मानो का कत्ल हो गया है और उस की लाश घर के अंदर पड़ी है.

उत्सुकतावश बलदेव राज भी उस के घर चले गए. अंदर वाले कमरे में बिछी चारपाई पर मानो का शव पड़ा था. उस के बाएं कान, नाक और मुंह से खून रिस रहा था. गले पर नीला निशान था. कमरे का सामान भी इधरउधर बिखरा पड़ा था. बलदेव राज मोबाइल लिए थे. उन्होंने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दे दी. थोड़ी ही देर में चौकी नंबर 3 से एसआई महावीर सिंह 2 सिपाहियों के साथ वहां आ पहुंचे. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्होंने इस घटना की जानकारी थाना सिटी को दे दी. चौकी नंबर 3 इसी थाने के अंतर्गत आती थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी सिपाहियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल पर पहुंचते ही उन्होंने सब से पहले बलदेव राज के बयान के आधार पर तहरीर भिजवा कर अपराध क्रमांक 509 पर भादवि की धाराओं 302, 20 व 120 बी के तहत अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के बाद घटनास्थल की अन्य तमाम काररवाई निपटा कर मौके पर मौजूद लोगों के बयान दर्ज किए गए. उस के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया गया, जहां डाक्टरों ने पोस्टमार्टम के बाद मौत की वजह दम घुटना बताया.

मानो के 2 बेटे थे, जिन में से एक नशामुक्ति केंद्र में दाखिल था तो दूसरा देवेश हत्या के एक मामले में अंबाला जेल में सजा भुगत रहा था. दरअसल अंबाला शहर के जगाधरी गेट पुली से कुमाहार मोहल्ला को जाने वाली सड़क पर सरकारी अनाज का डिपो था. डिपो पर बलदेव उर्फ बल्ली निवासी काजीवाड़ा नौकरी करता था. 23 अक्टूबर, 2010 की बात है. दोपहर में डिपो पर सरकारी गेहूं आया था, जिसे बल्ली करीने से रखवाने लगा. तभी देवेश वहां आ गया. बल्ली उस के पड़ोस में रहता था, इसलिए उस पर वह अपना काफी अधिकार मानता था. आते ही उस ने कहा कि उसे 50 किलोग्राम गेहूं तुरंत चाहिए. बल्ली ने उस से डिपो के मालिक से बात करने को कहा. उस ने मालिक से बात की तो डिपो के मालिक हिमांशु ने उसे समझाया कि सरकारी गेहूं ऐसे नहीं दिया जाता, यह राशनकार्ड पर दर्ज सदस्यों के हिसाब से दिया जाता है.

इस पर देवेश हिमांशु से झगड़ा करने लगा. जरा ही देर में झगड़ा इतना बढ़ गया कि देवेश ने कपड़ों में छिपा कर रखा चाकू निकाल कर हिमांशु पर हमला कर दिया. बल्ली ने किसी तरह बीचबचाव कर के हिमांशु को बचाया. उसी बीच मौका पा कर देवेश भाग खड़ा हुआ. हिमांशु बुरी तरह घायल हो गया था. पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस ने उसे सिविल अस्पताल में भरती करवा कर उस के बयान के आधर पर थाना अंबाला सिटी में भादंवि की धाराओं 323, 324, 307 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज करा कर देवेश को गिरफ्तार कर लिया. बाद में हिमांशु की मौत हो गई तो इस मुकदमें में धारा 302 भी जोड़ दी गई.

देवेश पर कत्ल का मुकदमा चला, जिस में उसे सजा हो गई. वह अंबाला की जेल में सजा भुगत रहा है. जब उसे अपनी मां की हत्या की सूचना मिली तो मां का अंतिम संस्कार करवाने के लिए जेल प्रशासन से अनुमति मांगी, क्योंकि उस का भाई नशामुक्ति केंद्र में था. पुलिस उसे साथ ले कर आई और अंतिम संस्कार करा कर साथ ले कर चली गई. मानो की हत्या का मामला पुलिस के लिए सिरदर्द था, क्योंकि इस मामले में उस के पास कोई सुराग नहीं था. हत्यारों का पता लगाने की पुलिस ने काफी कोशिश की, मगर पुलिस के हाथ कोई सुराग नहीं लग पाया. इस से मीडिया में पुलिस की काफी किरकिरी हो रही थी. स्थानीय लोग भी इस बात से काफी खफा थे कि पुलिस के हाथ मानो के हत्यारों तक क्यों नहीं पहुंच पा रहे हैं.

मानो के पड़ोसियों ने एक बात नोट की थी कि उस की मौत के बाद उस के यहां आनेजाने वाले तमाम लड़केलड़कियां न जाने कहां गायब हो गए थे. वह एक धार्मिक एवं सामाजिक महिला के रूप में मशहूर थी, जबकि अब उस के यहां कोई नहीं आजा रहा था. यह बात पुलिस को भी बताई गई थी. इस के बावजूद तमाम रहस्य वहीं के वहीं थे. मैं उन दिनों अंबाला और पंचकूला जिले का संयुक्त रूप से पुलिस कमिश्नर था. थाना पुलिस मामलों को हल करने में असमर्थ रही तो मैं ने इस केस को हल करने का जिम्मा सीआईए (क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) को सौंप दिया.

सीआईए के इंचार्ज इंसपेक्टर कुलभूषण ने मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलते ही फाइल मंगा कर अब तक की जांच को गौर से अध्ययन किया. उस के बाद अपनी एक विशेष टीम बना कर मानो हत्याकांड की जांच में जुट गए. उन्होंने जेल में बंद मानो के बेटे देवेश से संपर्क किया और उस से यह जानने की कोशिश की कि किसी पर शक तो नहीं है. उस ने 4 लोगों के नाम लिए, जिन में एक उस हिमांशु का सगा भाई आशीष था, जिस की हत्या के आरोप में वह सजा काट रहा था. दूसरा था इनायत अहमद, निवासी रामनगर कालोनी अंबाला शहर, जो स्मैक के केस में जेल में बंद था. जेल में ही एक बार उस का देवेश से काफी झगड़ा हुआ था. तब उस ने उसे धमकी दी थी कि वह चाहे तो जेल में बैठेबैठे उस का खानदान तबाह कर सकता है.

तीसरा आदमी था जूनियर जौनी, निवासी जग्गी कौलोनी, अंबाला शहर और चौथा महेश निवासी कैथमाजरी, अंबाला शहर. पुलिस ने इन चारों लोगों को सीआईए के पूछताछ केंद्र में बुला कर मनोवैज्ञानिक तरीके से गहन पूछताछ की. पूछताछ में चारों निर्दोष पाए गए. अब मानो हत्याकांड का मामला फिर वहीं का वहीं आ कर अटक गया था. सीआईए के पास गए इस केस को 3 महीने से ज्यादा का समय गुजर गया. इस बीच शक के आधार पर जाने कितने लोगों से पूछताछ कर ली गई, लेकिन अपराधियों का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा. जो मुखबिर इस काम पर लगाए गए थे, वे भी किसी काम के नहीं निकले. जो थोड़ीबहुत सूचनाएं लाए भी, वे सब गलत साबित हुईं.

सीआईए जिला पुलिस की एक ऐसी अहम इकाई होती है, जहां पर न केवल सुयोग्य पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाता है, पूछताछ के तमाम वांछित साधन भी थानों के मुकाबले काफी ठीकठाक मुहैया कराए जाते हैं. यही वजह है कि किसी केस को हल करने में जब थाना पुलिस फेल हो जाती है तो केस सीआईए के हवाले कर दिया जाता है. ऐसे में सीआईए मामले को चुनौती की तरह लेती है और हर हाल में मामले को हल कर लेती है. मानो मर्डर केस एक ऐसी चुनौती बन गया था कि फिलहाल सीआईए के पास भी इस चुनौती का कोई तोड़ नहीं था. समूचा सीआईए विभाग हैरान था कि मानो को कत्ल करने वाले आखिर कौन लोग थे, जिन के बारे में पुलिस को कहीं से कोई जानकारी नहीं मिल रही थी.

उस दिन संयोग ही था कि एसआई गुरदयाल सिंह एक समारोह में गए थे और कुछ शराबियों ने खुद ही मानो मर्डर केस से पर्दा उठाने की बात कर दी. मजे की बात यह थी कि मानो मर्डर केस हल करने के लिए जिस विशेष टीम का गठन किया गया था, गुरदयाल सिंह उस टीम के वरिष्ठ सदस्य थे. फरवरी, 2013 के अंतिम सप्ताह में गुरदयाल सिंह अपने किसी रिश्तेदार के यहां किसी समारोह में गए थे. वहां ज्यादातर लोगों को मालूम नहीं था कि वह पुलिस में हैं. उन्होंने वरदी भी नहीं पहन रखी थी. शगुन डालने के बाद उन का कौफी पीने का मन हुआ तो वह बेयरे से कौफी मंगवा कर पीने के लिए एक किनारे खाली जगह पर जा कर बैठ गए.

वहीं से कुछ दूरी पर कुछ लोग शराब पीते हुए आपस में बातें कर रहे थे. अचानक गुरदयाल सिंह का ध्यान शराब पी रहे लोगों की बातों पर चला गया. बातें उन के कानों में क्या पड़ीं, उन्होंने उन की बातें सुनने के लिए कान खड़े कर लिए. उन में से एक कह रहा था, ‘‘यार, मानो के मरने से ऐश के सारे रास्ते बंद हो गए, क्या एक से बढि़या एक लड़की सप्लाई करती थी. मजे की बात यह कि उस पर किसी को शक नहीं होता था. वह एक धार्मिक और दयालु औरत थी, सोशल वर्कर थी, अपने भले के लिए लड़केलड़कियां उस के यहां आते हैं, आम लोग उस के बारे में यही सब जानते थे.’’

‘‘अपने ग्राहकों के अलावा अन्य किसी को अहसास नहीं होने देती थी कि वह देहधंधे से जुड़ी लड़कियां सप्लाई करती है.’’ दूसरे आदमी ने कहा.

इस के बाद तीसरे ने कहा, ‘‘जो भी था, उस के पास एकदम मस्त लड़कियां थीं, मस्ती का खेल खेलने के सब गुर जानती थीं. मानो का मर्डर क्या हुआ, साली सब की सब भाग कर न जाने कहां छिप गईं. अरे अपना धंधा तो मत चौपट करो, कहीं और अड्डा जमा कर पहले जैसी कमाई करती रहो, हम रंगीनमिजाजों का काम चलता रहे, कहीं कोई टकर जाए तो उसे समझाऊं. लेकिन पता नहीं सब कहां गायब हो गईं’’‘‘दरअसल, मानो हत्याकांड का रहस्य न खुल पाने से वे घबरा गई हैं. कहीं शक की वजह से पुलिस उन्हें पकड़ न ले, यही सोच कर वे इधरउधर भाग गई हैं. वैसे है न कमाल की बात कि दुनिया जानती है कि मानो की हत्या किस ने की? लेकिन पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी है.’’ पहले वाले ने कहा.

‘‘नहीं यार, ऐसा कैसे हो सकता है. तुम्हें शायद पता नहीं कि यह मामला पुलिस के लिए भारी सिरदर्दी बना हुआ है. पुलिस के बड़े अफसरों ने यह केस थाना से ले कर दूसरी किसी एजेंसी, मेरा ख्याल है सीआईए को दे रखा है. पुलिस की तो नींद उड़ा रखा है इस केस ने और तुम कह रहे हो कि कातिलों के बारे में दुनिया जानती है. 4 महीने हो गए हैं मानो का कत्ल हुए.’’

‘‘तो तुम्हें क्या लग रहा है कि मैं झूठ बोल रहा हूं? मैं जो कह रह हूं, एकदम सही कह रहा हूं.’’

‘‘ऐसा है तो बताओ जरा कौन हैं मानो के कातिल?’’

अपने इस साथी के सवाल पर उस आदमी ने गर्दन घुमा कर इस बात का जायजा लिया कि आसपास कोई उन की बातें तो नहीं सुन रहा. गुरदयाल सिंह अंधेरे में बैठे थे, शायद इस वजह से वह उन्हें दिखाई नहीं दिए. आश्वस्त हो कर उस ने कहा, ‘‘पीर की मजार पर जाते रहते हो न?’’

‘‘हां… हां, वहां तो हम लोग अक्सर जाया करते हैं. मानो भी तो वहां की परम भक्तिन थी, मजार पर जा कर लंगर लगवाया करती थी, गरीबों को कपड़े व पैसे भी दान किया करती थी. वहीं एक औरत आती है, जिसे सब माई कहते हैं.’’

‘‘हां… हां, माई के साथ उस का बेटा रहता है, वह भी अपनी मां के साथ वहां आने वालों की सेवा करता है.’’

‘‘बिलकुल सही पहचाना. उन्हीं लोगों ने मारा है मानो को.’’

‘‘इस का मतलब माई और उस के बेटे ने मानो को मारा है?’’

‘‘और लोग भी हो सकते हैं, लेकिन मेरी जानकारी के हिसाब से ये दोनों इस कत्ल में शामिल थे.’’

यह सुन कर गुरदयाल सिंह के हाथ जैसे बटेर आ गई. उन्होंने अंधेरे में ही एक किनारे जा कर धीमी आवाज में इंसपेक्टर कुलभूषण के मोबाइल पर बात की. इंसपेक्टर ने डीसीपी अशोक कुमार के नोटिस में बात लाई और डीसीपी ने दिशानिर्देश के लिए मेरा फोन मिला दिया. मैं ने सुझाव दिया कि शराबियों पर अभी बिलकुल हाथ मत डालना. मजारों पर अच्छे लोगों के अलावा बुरे लोग भी आते हैं, स्वार्थ की खातिर वह डेरा भी डाल देते हैं. मगर ऐसी जगहें पवित्र होती हैं और वहां का माहौल बड़ा नाजुक होता है. वहां पर पुलिस न भेज कर मुखबिरों का सहारा लिया जाए. मुखबिर जो जानकारियां ला कर दें, पहले उन की जांच की जाए, उस के बाद आगे की योजना बनाई जाए.

ऐसा ही किया गया. हालांकि इस बीच गुरदयाल सिंह ने किसी तरह उन शराबियों के नामपते और वे क्या काम करते हैं की तमाम जानकारी जुटा ली थीं. अंबाला में गुरदयाल सिंह के कुछेक ऐसे खास मुखबिर थे, जिन पर उन्हें काफी भरोसा था. सारी स्थिति समझा कर उन्होंने अपने उन मुखबिरों को मजार पर लगा दिया. वे वहां सेवा करने का दिखावा करते हुए माई और उस के बेटे की जासूसी करने लगे. वहां के लोगों से मुखबिरों को पता चला कि माई पहले बहुत खुश रहते हुए काफी जोश में काम किया करती थी. लेकिन मानो के कत्ल के बाद से वह बहुत सहमी सी रहने लगी है. मानो की बात छिड़ जाने पर वह एकदम से खामोश हो जाती है.

मुखबिरों की समझ में आ गया कि माई के भीतर ऐसा कुछ है, जो अंदर ही अंदर उसे खाए जा रहा है. मगर ऐसी कोई पुख्ता जानकारी अभी तक सामने नहीं आई थी कि जो यह साबित करती कि वाकई मानो का कत्ल उन्हीं लोगों ने किया था. ऐसी स्थिति में हम उन पर हाथ नहीं डाल सकते थे. ऐसे में शक हो जाने पर वे कहीं भाग कर भूमिगत भी हो सकते थे. उन की गिरफ्तारी का कोई सीधा रास्ता न देख कर हम ने एक योजना बनाई. अब तक मैं भी इस मामले से पूरी तरह जुड़ गया था. अपनी योजना के अनुसार, एसआई गुरदयाल सिंह से उन शराबियों से संपर्क किया, जिन्होंने समारोह में मानो के कत्ल में माई और उस के बेटे का हाथ होने की बात कही थी. उन्हें समझाया गया कि एक सच्चे नागरिक की तरह अपराध की पूरी कहानी बता कर पुलिस और कानून की मदद करना उन का फर्ज बनता है.

बात उन लोगों की समझ में आ गई तो उन से पूछा गया कि मानो मर्डर केस में वे पुलिस की क्या और कैसे मदद कर सकते हैं? इस से पहले कि वे इस संबंध में कुछ कहते, गुरदयाल सिंह ने कहा, ‘‘मेरी बात जरा गौर से सुनो, अगर माई और उस का बेटा वाकई मानो मर्डर केस में शामिल है तो उन्हें समझाओ कि वे किसी के माध्यम से पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दें. ऐसे में पुलिस उन से मारपीट करने के बजाय उन की मदद करेगी. इस केस में और लोग भी शामिल हुए तो माई और उस के लड़के को वादा माफ गवाह बना कर रिहा भी किया जा सकता है. हां, उन्होंने ऐसा नहीं किया और उन के खिलाफ सबूत हाथ लग जाने पर पुलिस ने उन्हें उठा लिया तो फिर न उन्हें कोई पुलिस के कहर से बचा सकता है और न ही इस केस में सजा होने से. तब पुलिस यही कोशिश करेगी कि उन्हें हर हाल में सजा हो.’’

गुरदयाल सिंह की इन बातों के जवाब में एक शराबी ने कहा, ‘‘ऐसा है साहब, मानो के कत्ल में माई और उस का बेटा बिलकुल शामिल है. माई से मेरा अच्छा परिचय है और उस ने खुद मुझ से यह बात बता कर अपने बचाव के लिए सलाह मांगी थी. तब मैं ने उसे समझाया था कि कानून के हाथ बड़े लंबे होते हैं, अपराध किया है तो एक न एक दिन पुलिस के हत्थे चढ़ेगी ही. आप की नसीहत जंच रही है, कहे तो मैं उस से बात कर के देखूं.’’

‘‘देख लो.’’ कहने के साथ ही गुरदयाल सिंह के चेहरे पर चमक आ गई. वह आशावान हो गए कि उन का तीर सही निशाने पर लगा है. सुखद परिणाम यह रहा कि अगले ही दिन माई अपने बेटे के साथ सीआईए औफिस आ पहुंची. जरा ही देर में उस ने अपने अपराध की पूरी कहानी सुना दी, जिस से मानो हत्याकांड का रहस्य इस तरह से खुला:

मनजीत कौर उर्फ मानो पहले ऐसी नहीं थी. लेकिन पति का सहारा उठ गया तो आमदनी का कोई साधन नहीं रहा. इस के बाद वह देहधंधा से जुड़ गई. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी. बच्चों की ठीकठाक परवरिश होने लगी. उम्र ढलने लगी तो वह अपने साथ अन्य लड़कियों को जोड़ कर उन की कमाई से कमीशन खाने लगी. उस के संपर्क में काफी अच्छीअच्छी कमसिन लड़कियां थीं, जिन की वजह से उसे पहले से भी ज्यादा कमाई होने लगी. इस बीच उस ने रहने का ठिकाना बदल कर अपनी बढि़या छवि बना ली.

पीर की मजार की काफी मान्यता थी. दूरदूर से लोग वहां शीश नवाने आते थे. सुबह से शाम तक भीड़ लगी रहती थी. मानो भी वहां आनेजाने लगी. दिखावे के लिए वह एक भक्तिन की तरह शीश नवाने और सेवा करने जाया करती थी. गरीबों में कपड़ेपैसे भी बांटा करती थी, जबकि असलियत में वह अपने धंधे को बढ़ाने में लगी रहती थी. माई का नाम था कीर्ति देवी. उस के पति का नाम खैरातीलाल था. वह मजार पर हर वक्त रहती थी, हमेशा रहने की वजह से मानो की उस से जानपहचान हो गई. धीरेधीरे माई को उस के धंधे के बारे में पता चल गया तो वह उस से रुपएपैसे ले कर उसे ब्लैकमेल करने लगी.

12 अक्टूबर, 2012 को मानो फल्गु मेले पर माई के यहां आई तो उस के साथ सिमरन, आशा बंगालन और लवली पंजाबन नामक लड़कियां थीं. उन्हें साथ ले कर मानो कुछ दिनों से इधरउधर घूम रही थी. जब वह माई के यहां आई थी तो उस के पास बहुत बड़ा बैग था, जो नोटों से भरा हुआ था. उस ने काफी गहने भी पहन रखे थे, जिन्हें देख कर माई के मन में कुछ लालच आ गया. इस के बाद माई ने अपने बेटे प्रदीप से बात की तो उस ने कहा कि मानो से उस का पैसा और गहने छीन लेते हैं. उस ने यह काम अपने घर में करने से मना करते हुए कहा कि मानो इन लड़कियों को हिस्सा देने के बाद अकेली अपने घर जाएगी, तब वहीं जा कर यह काम किया जाएगा. रात में मानो लौट गई तो प्रदीप ने अपने दोस्तों, सुल्तान और राजेश को बुला कर लालच दे कर अपनी योजना में शामिल कर लिया.

रात में प्रदीप ने 9 सौ रुपए में इंडिका कार टैक्सी के रूप में बुक कराई और रात के साढे़ 12 बजे सभी मानो के घर पहुंचे. टैक्सी उन्होंने उस के मकान से थोड़ी दूरी पर खड़ी करा दी थी. मानो के घर पहुंच कर माई ने आवाज लगा कर दरवाजा खुलवाया. मानो जाग रही थी. उस ने माई से इस तरह अचानक आने के बारे में पूछा तो माई बोली, ‘‘प्रदीप का झगड़ा हो गया है. जिन के बेटे को पीट कर आया है, वे रात में इसे मारने आ सकते हैं. इसलिए इसे आप के पास छोड़ने आई हूं, मैं अभी लौट जाऊंगी.’’

‘‘अरे रात को कैसे वापस जाएगी और हां, ये 2 लड़के कौन हैं?’’

‘‘प्रदीप के दोस्त हैं सुल्तान और राजेश. ये दोनों भी इस के साथ रहेंगे. जब तक खतरा टल नहीं जाता, लड़के को अकेला नहीं छोड़ सकती.’’

‘‘कोई बात नहीं, तीनों लड़के ऊपर जा कर सो जाएंगे. तुम मेरे साथ सो जाना. इतनी रात गए अकेली कहां जाएगी.’’

इस के बाद तीनों लड़के ऊपर की मंजिल में चले गए और माई नीचे मानो के पास लेट गई. तभी किसी का फोन आया, जिसे रिसीव करते हुए मानो ने कहा, ‘‘हां सिमरन, तू पूरी रात लगा ले, मालदार आसामी है, जितना खुश रखेगी, उतनी मोटी कीमत देगा. घबराने वाली कोई बात नहीं है, पुराना जानकार है मेरा. तड़के सूरज निकलने से पहले लौट आना.’’

इस के बाद मानो ने लाइट बंद कर दी. जरा ही देर में प्रदीप, सुल्तान और राजेश अंधेरे में रास्ता टटोलते हुए नीचे आ गए. उन्होंने मोबाइल की रोशनी में देखने का प्रयास किया कि मानो कहां लेटी है. रोशनी पड़ते ही मानो हड़बड़ा कर उठ बैठी. वह कुछ बोल पाती, उन लोगों ने उस के मुंह पर हाथ रख कर उसे दबोच लिया. सुल्तान ने उस का मुंह दबोचा तो प्रदीप और राजेश ने गला दबाना शुरू कर दिया. माई ने उस के पैरों को पकड़ लिया. खुद को छुड़ाने की खातिर मानो हाथपैर चलाने लगी. लेकिन जल्दी ही वह शिथिल पड़ गई. उस के मर जाने के बाद भी उन लोगों ने माई की चुन्नी मानो के गले में डाल जोरों से कस दिया. इस के बाद तकिया मुंह पर रख कर भी दबाया.

पूरा इत्मीनान हो गया कि मानो मर गई है तो उन्होंने उस के घर की तलाशी ली. बैड के नीचे बौक्स में नोटों से भरा बैग मिल गया. सोनेचांदी के काफी गहने भी उन के हाथ लगे. मानो के पास 3 मोबाइल थे, वे भी उन्होंने ले लिए. कुल 15 मिनट में एक कत्ल और लाखों की लूटपाट कर के वे इत्मीनान से वहां पहुंचे, जहां टैक्सी वाले को खड़ा कर के आए थे. टैक्सी से सभी अपने घर पहुंचे. पहुंचते ही सारा सामान और रुपए आपस में बराबरबराबर बांट लिया. नकद पैसों में सब के हिस्से में कुल 11-11 हजार रुपए ही आए, गहने उन्होंने अंदाजे से बांट लिए थे. उन की कीमत लाखों में थी. मानो के मोबाइल फोन बंद कर के प्रदीप ने कहीं छिपा दिए थे.

माई और प्रदीप से पूछताछ कर के उन की निशानदेही पर लूट का उन के हिस्से का सामान बरामद कर के हम ने उन्हें अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. 2 मार्च, 2013 को इस मामले के सहअभियुक्त राजेश पुत्र नारायणीराम, निवासी इंदिरा कालोनी, पाई रोड, पुंडरी को भी गिरफ्तार कर के उस के पास से लूट का हिस्सा बरामद कर उसे भी जेल भेज दिया गया. इस केस का अन्य अभियुक्त सुल्तान पुत्र लज्जा सिंह, निवासी पुंडरी के बारे में हमें पता चला कि वह चोरी के एक अन्य मामले में न्यायिक हिरासत के तहत कैथल की जिला जेल में बंद था. मानो मर्डर केस में ट्रांजिट रिमांड पर ला कर व्यापक पूछताछ करने के बाद उसे वापस जेल भेज दिया गया.

निर्धारित अवधि के भीतर इस केस का चालान अदालत में पेश कर दिया गया था. इन दिनों यह केस अंबाला की सेशन कोर्ट में चल रहा है. Crime Story

 

Firozabad Crime: प्यार की राह का रोड़ा – पति को बनाया पराया

Firozabad Crime: घटना उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के थाना टूंडला के गांव नगला राधेलाल की है. 30 अक्तूबर की सुबह जब हरभेजी सो कर उठी तो बराबर के कमरे में उन्हें कोई हलचल नहीं दिखी. उस कमरे में उन का बेटा गब्बर बहू विवेक कुमारी उर्फ लालपरी तथा पोते अनुज के साथ सोया था. गब्बर के 2 बच्चे हरभेजी के साथ ही सोए थे. हरभेजी जब गब्बर के कमरे में गईं तो अंदर का दृश्य देखते ही उन के मुंह से चीख निकल गई.

उन का 40 वर्षीय बेटा गब्बर पंखे से बंधे फंदे पर लटका हुआ था, उस के पैर कमरे के फर्श को छू रहे थे. गब्बर के चेहरे से खून टपक रहा था. मां हरभेजी ने बहू लालपरी को आवाज लगाई, लेकिन वह कमरे में नहीं मिली. न ही वहां उस का बेटा अनुज था. बहू की तलाश की गई पर उस का कोई पता नहीं चला. इस घटना से परिवार में कोहराम मच गया. मां के रोने की आवाज सुन कर उन के और बेटे भी वहां आ गए. कुछ ही देर में मोहल्ले के लोग वहां जमा हो गए. उसी दौरान किसी ने आत्महत्या करने की सूचना पुलिस को फोन द्वारा दे दी.

सूचना पर थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय फोर्स सहित घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने शव के साथ मकान का भी निरीक्षण किया. सूचना मिलने पर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां आ गए. निरीक्षण के उपरांत पुलिस ने निष्कर्ष निकाला कि गब्बर ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उस की पीटपीट कर हत्या करने के बाद शव को फंदे पर लटकाया गया है. गब्बर के साथ कमरे में उस की पत्नी ही सोई थी, जो वहां से फरार थी, इसलिए पूरा शक पत्नी पर ही था. अब सवाल यह था कि शव को अकेले पत्नी पंखे पर नहीं लटका सकती. इस काम में किसी ने उस की मदद जरूर की होगी.

पुलिस ने कमरे की तलाशी ली तो वहां एक ऐसी मैक्सी मिली, जिस पर खून लगा हुआ था. पता चला कि वह मैक्सी मृतक की पत्नी लालपरी की थी. लालपरी के कुछ कपड़े और अन्य सामान कमरे से गायब थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि वह पति की हत्या के बाद अपना सामान व अपने साथ सोए बच्चे को ले कर फरार हो गई है. पुलिस ने घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि रात को पतिपत्नी में किसी बात को ले कर झगड़ा हुआ था. झगड़े के समय लालपरी का प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा भी वहां मौजूद था. स्वामी टूंडला थाने के गांव बन्ना का रहने वाला था. उस समय परिवार के लोगों ने दोनों को समझाबुझा कर झगड़ा शांत करा दिया था. इस के बाद वे अपने कमरे में सोने के लिए चले गए थे.

मृतक के भाई योगेश ने पुलिस को बताया कि शादी के पहले से ही लालपरी के स्वामी से अवैध संबंध थे. मौके की जांच करने के बाद पुलिस ने गब्बर की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फिरोजाबाद भेज दी. पुलिस ने मृतक के भाई योगेश की ओर से विवेक कुमारी उर्फ लालपरी व उस के प्रेमी स्वामी उर्फ सुम्मा के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद पुलिस नामजद आरोपियों की तलाश में जुट गई. पुलिस ने कई संभावित स्थानों पर दबिश भी दी, लेकिन उन का कोई पता नहीं लगा. तब पुलिस ने मुखबिरों का जाल फैला दिया.

लालपरी की शादी गब्बर से हो जरूर गई थी लेकिन वह उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. वह अपने घर वालों की मरजी का विरोध भी नहीं कर सकी थी. यानी घर वालों की वजह से उस ने गब्बर से शादी कर जरूर ली थी लेकिन उस के दिल में तो उस का प्रेमी बसा था. यही वजह थी कि वह प्रेमी को शादी के बाद भी भुला न सकी. प्रेमी स्वामी उस के पति की गैरमौजूदगी में उस के घर आनेजाने लगा. जब पति काम पर चला जाता तो मौका देख कर लालपरी प्रेमी को फोन कर बुला लेती थी. इस के बाद दोनों ऐश करते थे लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी तो नहीं रहतीं.

लालपरी व स्वामी के संबंधों की जानकारी मोहल्ले के साथ ससुराल के लोगों को भी हो गई. इस की भनक जब गब्बर को लगी तो उस ने कई बार पत्नी को समझाया, लेकिन लालपरी की समझ में कुछ नहीं आया. इस बात को ले कर दोनों में कई बार झगड़ा भी हुआ, पर उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना जारी रखा. घटना के 3 सप्ताह बाद भी लालपरी और उस के प्रेमी स्वामी के बारे में पुलिस को कोई जानकारी नहीं मिली थी. 21 नवंबर, 2018 को पुलिस को एक जरूरी सूचना मिली कि लालपरी और उस का प्रेमी इस समय टूंडला से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित एफएच मैडिकल कालेज में मौजूद हैं. थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने एसआई नेत्रपाल शर्मा के नेतृत्व में तुरंत एक पुलिस टीम वहां भेज दी.

पुलिस को अस्पताल में स्वामी घायलावस्था में उपचार कराते मिला, जबकि उस की प्रेमिका लालपरी अस्पताल में उस की देखभाल कर रही थी. पता चला कि स्वामी एक सप्ताह पहले सड़क हादसे में घायल हो गया था. उस के सिर में गहरी चोट लगी थी. उस की प्रेमिका उसे गंभीर हालत में उपचार के लिए एफ.एच. मैडिकल कालेज ले कर आई थी. लेकिन उपचार के दौरान दोनों के बीच अस्पताल में ही किसी बात को ले कर झगड़ा हो गया था. झगड़े में वे दोनों गब्बर की हत्या को ले कर एकदूसरे पर आरोप लगा रहे थे.

करीब 3 सप्ताह पहले हुई गब्बर की हत्या की जानकारी मीडिया द्वारा अस्पताल के स्टाफ को मिल चुकी थी. उन की बातों से वहां के स्टाफ को यह शक हो गया कि गब्बर हत्याकांड में ये लोग शामिल हैं. इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी थी. पुलिस ने दोनों हत्यारोपियों को हिरासत में ले लिया. स्वामी और उस की प्रेमिका लालपरी को थाने ले जा कर उन से पूछताछ की गई. हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की खबर पा कर सीओ डा. अरुण कुमार सिंह भी वहां पहुंच गए. उन के सामने थानाप्रभारी बी.डी. पांडेय ने लालपरी और स्वामी से पूछताछ की तो उन्होंने गब्बर की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उन्होंने गब्बर की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी-

रोजाबाद जिले के गांव नगला राधेलाल के रहने वाले गब्बर की शादी करीब 9 साल पहले विवेक कुमारी उर्फ लालपरी से हुई थी. बाद में वह 3 बच्चों का बाप बन गया. गब्बर के पास खेती की थोड़ी जमीन थी, उस से बमुश्किल परिवार का गुजारा होता था. तब खाली समय में गब्बर राजमिस्त्री का काम कर लेता था. शादी से पहले ही लालपरी के पैर बहक गए थे. बन्ना गांव के रहने वाले स्वामी उर्फ सुम्मा से उस का चक्कर चल रहा था. करीब एक साल पहले की बात है. लालपरी का अपने प्रेमी स्वामी के साथ रंगरेलियां मनाते हुए अश्लील वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था. इस से गब्बर और उस के परिवार की बड़ी बदनामी हुई थी.

इस के बाद गब्बर को मोहल्ले के लोगों के ताने सुनने पड़े थे. गब्बर ने पत्नी से कहा कि वह स्वामी से संबंध खत्म कर ले, लेकिन वह इतनी बेशर्म हो चुकी थी कि उलटे पति से ही झगड़ने लगती थी. एक बार वह पति से झगड़ कर बन्ना स्थित कांशीराम कालोनी में जा कर रहने लगी थी. कुछ समय बाद जब लालपरी का गुस्सा शांत हो गया तो वह पति के घर लौट आई. वहां वह कुछ दिनों तक तो ठीक से रही लेकिन बाद में उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना फिर शुरू कर दिया. पति जब उसे टोकता तो उसे उस की बात बुरी लगती थी. एक तरह से उसे पति रास्ते का कांटा नजर आने लगा. उस कांटे से वह हमेशा के लिए निजात पाना चाहती थी, ताकि प्रेमी के साथ चैन से रह सके.

एक दिन उस ने इस सिलसिले में प्रेमी से बात करने के बाद पति को ठिकाने लगाने की तरकीब खोजी. लालपरी ने एक बार पति को मारने के लिए उस के खाने में जहर मिला दिया. जहर का असर होते ही गब्बर सिंह की हालत बिगड़ गई. घर वाले उसे इलाज के लिए तुरंत आगरा ले गए और उसे एक अस्पताल में भरती करा दिया. परिवार वालों को लालपरी पर शक तो था, लेकिन वे यह भी सोच रहे थे कि कहीं खाने में छिपकली तो नहीं गिर गई. बहरहाल, उन्होंने इस की जानकारी पुलिस को नहीं दी. उन्होंने लालपरी से इस बारे में पूछताछ की तो उस ने कहा कि हो सकता है उस की लापरवाही से खाने में कोई छिपकली वगैरह गिर गई हो. इस के लिए लालपरी ने घर वालों से माफी मांग ली.

अस्पताल से पति के घर वापस आने के बाद लालपरी ने रोरो कर गब्बर से भी माफी मांग ली. यह सब लालपरी का ड्रामा था. सीधेसादे गब्बर ने पत्नी को इस घटना के बाद भी माफ कर दिया और खुद पत्नी की तरफ से बेफिक्र हो गया. लालपरी भले ही अपने मतलब के लिए पति से माफी मांग लेती थी, लेकिन हकीकत यह थी कि वह दबंग थी. सीधेसादे गब्बर पर वह अकसर हावी रहती थी. स्वामी से उस के संबंधों को ले कर पति जब उस पर नाराज होता तो वह उलटे उस की शिकायत थाने में कर आती थी. कई बार वह पति व ससुरालियों के खिलाफ मारपीट की थाने में शिकायत दर्ज करा चुकी थी. इस के चलते पति व ससुराल वाले उस का कोई विरोध नहीं कर पाते थे.

समाज को दिखाने के लिए उस ने करवाचौथ का व्रत भी रखा था. लेकिन वह अब पति से हमेशा के लिए छुटकारा पाना चाहती थी. इस बारे में उस ने अपने प्रेमी स्वामी के साथ एक अंतिम योजना तैयार कर ली थी. 29 अक्तूबर, 2018 को स्वामी लालपरी के घर आया. गब्बर ने स्वामी से तो कुछ नहीं कहा, लेकिन पत्नी से झगड़ने लगा. स्वामी और घर वालों ने दोनों को समझा कर शांत कराया. उसी समय लालपरी ने स्वामी से कह दिया था कि इस कांटे को आज रात ही निकाल देना है. प्रेमिका की बात सुन कर स्वामी वहां से चला गया.

उस रात लालपरी अपने 6 साल के बेटे अनुज के साथ पति के कमरे में ही सोई थी. उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी नहीं लगाई. जब गब्बर गहरी नींद में सो गया तो लालपरी ने फोन कर के प्रेमी को बुला लिया. दोनों ने मिल कर सोते हुए गब्बर को दबोच लिया और मारपीट की, फिर गला दबा कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद इसे आत्महत्या का रूप देने के लिए दोनों ने उस की लाश पंखे पर लटका दी. उस ने अपने प्रेम संबंधों की राह में रोड़ा बने पति को हटा दिया. पुलिस ने स्वामी उर्फ सुम्मा और लालपरी से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया.

लालपरी ने प्यार की खातिर अपने घर को ही नहीं, अपनी मांग के सिंदूर को भी उजाड़ लिया. बच्चों के सिर पर भी मांबाप का साया नहीं रहा. बिलखते हुए बच्चों को देख कर लोग लालपरी को कोस रहे थे कि प्रेमी के साथ जाना था तो ऐसे ही चली जाती, पति को क्यों मार डाला. Firozabad Crime.

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: अपमान और नफरत की साजिश

Crime Stories: पहली मई, 2019 की बात है. दिन के करीब 12 बजे का समय था, जब महाराष्ट्र के अहमदनगर से करीब 90 किलोमीटर दूर थाना पारनेर क्षेत्र के गांव निधोज में उस समय अफरातफरी मच गई, जब गांव के एक घर में अचानक आग के धुएं, लपटों और चीखनेचिल्लाने की आवाजें आनी शुरू हुईं. चीखनेचिल्लाने की आवाजें सुन कर गांव वाले एकत्र हो गए. लेकिन घर के मुख्यद्वार पर ताला लटका देख खुद को असहाय महसूस करने लगे.

दरवाजा टूटते ही घर के अंदर से 3 बच्चे, एक युवक और युवती निकल कर बाहर आए. बच्चों की हालत तो ठीक थी, लेकिन युवती और युवक की स्थिति काफी नाजुक थी. गांव वालों ने आननफानन में एंबुलेंस बुला कर उन्हें स्थानीय अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन का प्राथमिक उपचार कर के उन्हें पुणे के सेसूनडाक अस्पताल के लिए रेफर कर दिया. साथ ही इस मामले की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से मिली जानकारी पर थाना पारनेर के इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने चार्जरूम में मौजूद ड्यूटी अफसर को बुला कर तुरंत इस मामले की डायरी बनवाई और बिना विलंब के एएसआई विजय कुमार बोत्रो, सिपाही भालचंद्र दिवटे, शिवाजी कावड़े और अन्ना वोरगे के साथ अस्पताल की तरफ रवाना हो गए. रास्ते में उन्होंने अपने मोबाइल फोन से मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी.

जिस समय पुलिस टीम अस्पताल परिसर में पहुंची, वहां काफी लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी. इन में अधिकतर उस युवक और युवती के सगेसंबंधी थे. पूछताछ में पता चला कि युवती का नाम रुक्मिणी है और युवक का नाम मंगेश रणसिंग लोहार. रुक्मिणी लगभग 70 प्रतिशत और मंगेश 30 प्रतिशत जल चुका था. अधिक जल जाने के कारण रुक्मिणी बयान देने की स्थिति में नहीं थी. मंगेश रणसिंग भी कुछ बताने की स्थिति में नहीं था.

इंसपेक्टर बाजीराव पवार ने मंगेश रणसिंग और अस्पताल के डाक्टरों से बात की. इस के बाद वह अस्पताल में पुलिस को छोड़ कर खुद घटनास्थल पर आ गए.

घटना रसोईघर के अंदर घटी थी, जहां उन्हें पैट्रोल की एक खाली बोतल मिली. रसोईघर में बिखरे खाना बनाने के सामान देख कर लग रहा था, जैसे घटना से पहले वहां पर हाथापाई हुई हो.

जांचपड़ताल के बाद उन्होंने आग से बच गए बच्चों से पूछताछ की. बच्चे सहमे हुए थे. उन से कोई खास बात पता नहीं चली. वह गांव वालों से पूछताछ कर थाने आ गए. मंगेश रणसिंग के भाई महेश रणसिंग को वह साथ ले आए थे. उसी के बयान के आधार पर रुक्मिणी के परिवार वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी.

इस मामले में रुक्मिणी का बयान महत्त्वपूर्ण था. लेकिन वह कोई बयान दर्ज करवा पाती, इस के पहले ही 5 मई, 2019 को उस की मृत्यु हो गई. मंगेश रणसिंग और उस के भाई महेश रणसिंग के बयानों के आधार पर यह मामला औनर किलिंग का निकला.

रुक्मिणी की मौत के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया, जिसे ले कर सामाजिक कार्यकर्ता और आम लोग सड़क पर उतर आए और संबंधित लोगों की गिरफ्तारी की मांग करने लगे. इस से जांच टीम पर वरिष्ठ अधिकारियों का दबाव बढ़ गया. उसी दबाव में पुलिस टीम ने रुक्मिणी के चाचा घनश्याम सरोज और मामा सुरेंद्र भारतीय को गिरफ्तार कर लिया. रुक्मिणी के पिता मौका देख कर फरार हो गए थे.

पुलिस रुक्मिणी के मातापिता को गिरफ्तार कर पाती, इस से पहले ही इस केस ने एक नया मोड़ ले लिया. रुक्मिणी और मंगेश रणसिंग के साथ आग में फंसे बच्चों ने जब अपना मुंह खोला तो मामला एकदम अलग निकला. बच्चों के बयान के अनुसार पुलिस ने जब गहन जांच की तो मंगेश रणसिंग स्वयं ही उन के राडार पर आ गया.

मामला औनर किलिंग का न हो कर एक गहरी साजिश का था. इस साजिश के तहत मंगेश रणसिंग ने अपनी पत्नी की हत्या करने की योजना बनाई थी. पुलिस ने जब मंगेश से विस्तृत पूछताछ की तो वह टूट गया. उस ने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए रुक्मिणी हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह रुक्मिणी के परिवार वालों और रुक्मिणी के प्रति नफरत से भरी हुई थी.

23 वर्षीय मंगेश रणसिंग गांव निधोज का रहने वाला था. उस के पिता चंद्रकांत रणसिंग जाति से लोहार थे. वह एक कंस्ट्रक्शन साइट पर राजगीर का काम करते थे. घर की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. फिर भी गांव में उन की काफी इज्जत थी. सीधेसादे सरल स्वभाव के चंद्रकांत रणसिंग के परिवार में पत्नी कमला के अलावा एक बेटी प्रिया और 3 बेटे महेश रणसिंग और ओंकार रणसिंग थे.

मंगेश रणसिंग परिवार में सब से छोटा था. वह अपने दोस्तों के साथ सारा दिन आवारागर्दी करता था. गांव के स्कूल से वह किसी तरह 8वीं पास कर पाया था. बाद में वह पिता के काम में हाथ बंटाने लगा. धीरेधीरे उस में पिता के सारे गुण आ गए. राजगीर के काम में माहिर हो जाने के बाद उसे पुणे की एक कंस्ट्रक्शन साइट पर सुपरवाइजर की नौकरी मिल गई.

वैसे तो मंगेश को पुणे से गांव आनाजाना बहुत कम हो पाता था, लेकिन जब भी वह अपने गांव आता था तो गांव में अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर इधरउधर घूमता और सार्वजनिक जगहों पर बैठ कर गप्पें मारता. इसी के चलते जब उस ने रुक्मिणी को देखा तो वह उसे देखता ही रह गया.

20 वर्षीय रुक्मिणी और मंगेश का एक ही गांव था. उस का परिवार भी उसी कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करता था, जिस पर मंगेश अपने पिता के साथ काम करता था. इस से मंगेश रणसिंग का रुक्मिणी के करीब आना आसान हो गया था. रुक्मिणी का परिवार उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. उस के पिता रामा रामफल भारतीय जाति से पासी थे. सालों पहले वह रोजीरोटी की तलाश में गांव से अहमदनगर आ गए थे. बाद में वह अहमदनगर के गांव निधोज में बस गए थे. यहीं पर उन्हें एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम मिल गया था.

बाद में उन्होंने अपनी पत्नी सरोज और साले सुरेंद्र को भी वहीं बुला लिया था. परिवार में रामा रामफल भारतीय के अलावा पत्नी, 2 बेटियां रुक्मिणी व 5 वर्षीय करिश्मा थीं.

अक्खड़ स्वभाव की रुक्मिणी जितनी सुंदर थी, उतनी ही शोख और चंचल भी थी. मंगेश रणसिंग को वह अच्छी लगी तो वह उस से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश करने लगा.

मंगेश रणसिंग पहली ही नजर में रुक्मिणी का दीवाना हो गया था. वह रुक्मिणी को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगा था. उस की यह मुराद पूरी भी हुई.

कंस्ट्रक्शन साइट पर रुक्मिणी के परिवार वालों का काम करने की वजह से मंगेश रणसिंग की राह काफी आसान हो गई थी. वह पहले तो 1-2 बार रुक्मिणी के परिवार वालों के बहाने उस के घर गया. इस के बाद वह मौका देख कर अकेले ही रुक्मिणी के घर आनेजाने लगा.

मंगेश रुक्मिणी से मीठीमीठी बातें कर उसे अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश करता. साथ ही उसे पैसे भी देता और उस के लिए बाजार से उस की जरूरत का सामान भी लाता. जब भी वह रुक्मिणी से मिलने उस के घर जाता, उस के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता. साथ ही उस के भाई और बहन के लिए भी खानेपीने की चीजें ले जाता था.

मांबाप की जानपहचान और उस का व्यवहार देख कर रुक्मिणी भी मंगेश की इज्जत करती थी. रुक्मिणी उस के लिए चायनाश्ता करा कर ही भेजती थी. मंगेश रणसिंह तो रुक्मिणी का दीवाना था ही, रुक्मिणी भी इतनी नादान नहीं थी. 20 वर्षीय रुक्मिणी सब कुछ समझती थी.

वह भी धीरेधीरे मंगेश रणसिंग की ओर खिंचने लगी थी. फिर एक समय ऐसा भी आया कि वह अपने आप को संभाल नहीं पाई और परकटे पंछी की तरह मंगेश की बांहों में आ गिरी.

अब दोनों की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एकदूसरे के लिए बेचैन रहने लगे. उन के प्यार की ज्वाला जब तेज हुई तो उस की लपट उन के घर वालों तक ही नहीं बल्कि अन्य लोगों तक भी जा पहुंची.

मामला नाजुक था, दोनों परिवारों ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों शादी करने के अपने फैसले पर अड़े रहे.

आखिरकार मंगेश रणसिंग के परिवार वालों ने उस की जिद की वजह से अपनी सहमति दे दी. लेकिन रुक्मिणी के पिता को यह रिश्ता मंजूर नहीं था. फिर भी वह पत्नी के समझाने पर राजी हो गए. अलगअलग जाति के होने के कारण दोनों की शादी में उन का कोई नातेरिश्तेदार शामिल नहीं हुआ.

एक सादे समारोह में दोनों की शादी हो गई. शादी के कुछ दिनों तक तो सब ठीकठाक चलता रहा, लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में दरार आने लगी. दोनों के प्यार का बुखार उतरने लगा था. दोनों छोटीछोटी बातों को ले कर आपस में उलझ जाते थे. अंतत: नतीजा मारपीट तक पहुंच गया.

30 अप्रैल, 2019 को मंगेश रणसिंग ने किसी बात को ले कर रुक्मिणी को बुरी तरह पीट दिया था. रुक्मिणी ने इस की शिकायत मां निर्मला से कर दी, जिस की वजह से रुक्मिणी की मां ने उसे अपने घर बुला लिया. उस समय रुक्मिणी 2 महीने के पेट से थी. इस के बाद जब मंगेश रणसिंग रुक्मिणी को लाने के लिए उस के घर गया तो रुक्मिणी के परिवार वालों ने उसे आड़ेहाथों लिया. इतना ही नहीं, उन्होंने उसे धक्के मार कर घर से निकाल दिया.

रुक्मिणी के परिवार वालों के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग नाराज हो गया. उस ने इस अपमान के लिए रुक्मिणी के घर वालों को अंजाम भुगतने की धमकी दे डाली.

बदमाश प्रवृत्ति के मंगेश रणसिंग की इस धमकी से रुक्मिणी के परिवार वाले डर गए, जिस की वजह से वे रुक्मिणी को न तो घर में अकेला छोड़ते थे और न ही बाहर आनेजाने देते थे.  रुक्मिणी का परिवार सुबह काम पर जाता तो रुक्मिणी को उस के छोटे भाइयों और छोटी बहन के साथ घर के अंदर कर बाहर से दरवाजे पर ताला डाल देते थे, जिस से मंगेश उन की गैरमौजूदगी में वहां आ कर रुक्मिणी को परेशान न कर सके.

इस सब से मंगेश को रुक्मिणी और उस के परिवार वालों से और ज्यादा नफरत हो गई. उस की यही नफरत एक क्रूर फैसले में बदल गई. उस ने रुक्मिणी की हत्या कर पूरे परिवार को फंसाने की साजिश रच डाली.

घटना के दिन जब रुक्मिणी के परिवार वाले अपनेअपने काम पर निकल गए तो अपनी योजना के अनुसार मंगेश पहले पैट्रोल पंप पर जा कर इस बहाने से एक बोतल पैट्रोल खरीद लाया कि रास्ते में उस के दोस्त की मोटरसाइकिल बंद हो गई है. यही बात उस ने रास्ते में मिले अपने दोस्त सलमान से भी कही.

फिर वह रुक्मिणी के घर पहुंच गया. उस समय रुक्मिणी रसोईघर में अपने भाई और बहन के लिए खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. घर के दरवाजे पर पहुंच कर मंगेश रणसिंग जोरजोर दरवाजा पीटते हुए रुक्मिणी का नाम ले कर चिल्लाने लगा. वह ताले की चाबी मांग रहा था.

दरवाजे पर आए मंगेश से न तो रुक्मिणी ने कोई बात की और न दरवाजे की चाबी दी. वह उस की तरफ कोई ध्यान न देते हुए खाना बनाने में लगी रही.

रुक्मिणी के इस व्यवहार से मंगेश रणसिंग का पारा और चढ़ गया. वह किसी तरह घर की दीवार फांद कर रुक्मिणी के पास पहुंच गया और उस से मारपीट करने लगा. बाद में उस ने अपने साथ लाई बोतल का सारा पैट्रोल  रुक्मिणी के ऊपर डाल कर उसे आग के हवाले कर दिया.

मंगेश की इस हरकत से रुक्मिणी के भाईबहन बुरी तरह डर गए थे. वे भाग कर रसोई के एक कोने में छिप गए. जब आग की लपटें भड़कीं तो रुक्मिणी दौड़ कर मंगेश से कुछ इस तरह लिपट गई कि मंगेश को उस के चंगुल से छूटना मुश्किल हो गया. इसीलिए वह भी रुक्मिणी के साथ 30 प्रतिशत जल गया.

इस के बावजूद भी मंगेश का शातिरपन कम नहीं हुआ. अस्पताल में उस ने रुक्मिणी के परिवार वालों के विरुद्ध बयान दे दिया. उस का कहना था कि उस की इस हालत के लिए उस के ससुराल वाले जिम्मेदार हैं.

उस की शादी लवमैरिज और अंतरजातीय हुई थी. यह बात रुक्मिणी के घर वालों को पसंद नहीं थी, इसलिए उन्होंने उसे घर बुला कर पहले उसे मारापीटा और जब रुक्मिणी उसे बचाने के लिए आई तो उन्होंने दोनों पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी.

अपमान और नफरत की आग में जलते मंगेश रणसिंग की योजना रुक्मिणी के परिवार वालों के प्रति काफी हद तक कामयाब हो गई थी. लेकिन रुक्मिणी के भाई और उस के दोस्त सलमान के बयान से मामला उलटा पड़ गया.

अब यह केस औनर किलिंग का न हो कर पति और पत्नी के कलह का था, जिस की जांच पुलिस ने गहराई से कर मंगेश रणसिंग को अपनी हिरासत में ले लिया.

उस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उस के विरुद्ध भादंवि की धारा 302, 307, 34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद रुक्मिणी के परिवार वालों को रिहा कर दिया गया. Crime Stories