Love Stories in Hindi : प्रेमिका के चक्कर में शिकारी बन गया शिकार

Love Stories in Hindi : यह कहानी है पतिपत्नी और ‘वो’ के बीच एक लव ट्रायंगल की, जिस में सुनंदा नाम की महिला अपने प्रेमी सिद्धप्पा कटकरे के साथ मिल कर अपने पति बीरप्पा पुजारी की हत्या की कोशिश करती है. इस वारदात के बाद अचानक सिद्धप्पा गायब हो जाता है, लेकिन जब पुलिस उस की खोज करती है, तब पुलिस को सिद्धप्पा की लाश मिलती है. एक शिकारी खुद कैसे शिकार बन गया, यह हैरतअंगेज कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि एक ऐसी हकीकत है कि…

इस कहानी की शुरुआत होती है कर्नाटक के विजयपुरा जिले के इंडी टाउन के अक्क महादेवी नगर से. यहीं पर अपने बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता था बीरप्पा पुजारी. बीरप्पा किसान था. उस का छोटा सा परिवार था. परिवार में पत्नी सुनंदा के अलावा २ बच्चे थे. बीरप्पा को कई बार अपनी पत्नी पर शक हुआ कि उस की पत्नी का किसी दूसरे मर्द के साथ चक्कर चल रहा है, लेकिन वह बिना किसी सबूत के उस पर इलजाम लगा कर अपनी गृहस्थी में आग नहीं लगाना चाहता था. उस ने कई बार पत्नी को रंगेहाथों पकडऩे की कोशिश की, लेकिन वह किसी भी सूरत में सफल नहीं हो सका.

सुनंदा बहुत ही तेज किस्म की थी. उसे भी आभास हो गया था कि उस का पति उस की जासूसी करने पर लगा हुआ है, लेकिन वह हर वक्त पूरी तरह से अलर्ट रहती थी. फिर भी बीरप्पा के मन में पत्नी के प्रति शक पैदा हुआ तो वह छोटीछोटी बातों को ले कर उस के साथ लड़ाईझगड़े पर उतारू हो उठता था, जिस के कारण दोनों के संबधों में जहर घुलना शुरू हो गया यानी एक बसीबसाई गृहस्थी में कलह शुरू हो गई. सुनंदा काफी दिनों बाद अपने खेतों पर गई थी, तभी उस का इंतजार कर रहा प्रेमी सिद्धप्पा कटकरे उस के पास आया और बोला, ”क्या बात है भाभी, आज बहुत दिनों बाद खेतों पर आना हुआ.’’

”आज तो आ भी गई, लेकिन आगे मेरा खेतों पर आने का रास्ता पूरी तरह से बंद होने वाला है. बीरप्पा ने मेरे खेतों पर आने पर पाबंदी लगा दी है. किसी गांव वाले ने उस के कान भर दिए कि तुम्हारी बीवी तुम्हारे पीछे खेतों पर जा कर सिद्धप्पा के साथ मौजमस्ती करती है.’’ सुनंदा ने बताया.

”अरे, भाभी, तुम बीरप्पा की धमकी से डर गई?’’ सिद्धप्पा बोला.

”’डरूं नहीं तो हर रोज उस की मार खाती रहंंू? सिद्धप्पा अब तुम मेरे खेतों पर मत आया करो, तुम्हारे कारण मेरे घर में कलह पैदा हो गई है.’’

”लेकिन भाभी, मैं तो तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हंू. तुम से मिले बिना मुझे सब कुछ सूनासूना लगता है. तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी अधूरी है.’’

”प्यार तो मैं भी तुम्हें बहुत करती हूं, लेकिन क्या करूं, बीरप्पा ने मेरा जीना हराम कर रखा है.’’ कहतेकहते सुनंदा की आंखें भर आईं.

तब सुनंदा गंभीर हो कर बोली, ”देखो सिद्धप्पा, अगर तुम चाहते हो कि मैं तुम से पहले की तरह ही मिलतीजुलती रहूं तो तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. तुम्हें किसी भी तरह से हम दोनों के मिलन में बाधा बन रहे मेरे पति को हटाना होगा. तुम किसी भी तरह से बीरप्पा को खत्म कर दो. उस के बाद हम दोनों पतिपत्नी के रूप में गृहस्थ जीवन बिताएंगे.’’

”तुम ठीक कहती हो भाभी, मैं भी काफी समय से यही सोच रहा था, लेकिन तुम्हारे डर से अपना मुंह बंद किए हुए था. अगर तुम्हारी ऐसी ही मरजी है तो यह काम आप मुझ पर छोड़ दो. आप तो केवल मौका देख कर मुझे फोन कर देना. बाकी काम मैं अपने आप निपटा दूंगा.’’

उस दिन के बाद सुनंदा मौके की तलाश में जुट गई. फिर उसी दौरान ३१ अगस्त, २०२५ को उस योजना को अंजाम देने का प्लान तैयार कर लिया. उसी रात को कोई १२ बजे का वक्त था. बीरप्पा खापी कर गहरी नींद में सोया हुआ था. उसी दौरान उसे लगा कि उस के शरीर पर कोई बैठा हुआ है. अपने शरीर पर वजन महसूस होते ही बीरप्पा ने उठने की कोशिश की. लेकिन तब तक दूसरा आदमी उस के पैरों पर बैठ गया.

इस से पहले कि बीरप्पा कुछ माजरा समझ पाता, एक व्यक्ति ने उस का मुंह दबाते हुए उस का गला घोंटना शुरू कर दिया. वह बुरी तरह से छटपटाने लगा.

और सीने पर सवार हो गई पत्नी

तभी उस के पेट पर बैठे आदमी ने उस के गुप्तांगों को बुरी तरह से दबाना चालू किया. उस की सांसें बंद होती जा रही थीं. देखते ही देखते बीरप्पा बेहोशी की हालत में पहुंच गया.

जब उसे होश आया तो वह एक अस्पताल में भरती था. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उस के साथ क्या हुआ और किस ने उसे अस्पताल में कब भरती कराया. उस के होश में आते ही पास में खड़ी नर्स ने उसे आश्वासन दिया कि अब आप पूरी तरह से सही हो, चिंता की कोई बात नहीं. इस बात को सुन कर बीरप्पा की आंखें आंसुओं से सराबोर हो आई थीं. अपने को ठीक हालत में देख बीरप्पा ने अपनी पत्नी के बारे में पूछा तो पता चला कि उस की पत्नी ३१ अगस्त, २०२५ से ही गायब है.

बीरप्पा के होश में आते ही पुलिस ने उस से पूछताछ की. तब बीरप्पा ने पुलिस को जानकारी देते हुए बताया कि ३१ अगस्त की रात को वह खाना खा कर सो गया था. उस के सोने के बाद कुछ आदमी उस के घर में घुसे और उन्होंने उस का गला व गुप्तांग दबा कर मारने की कोशिश की. उस दौरान उस की पत्नी सुनंदा भी घर पर ही मौजूद थी. अपने पति को इस हालत में देखते हुए न तो उस ने कोई शोरशराबा किया और न ही उस ने उन लोगों से उसे बचाने की कोशिश की. उस ने बताया कि उसी दौरान उस की पत्नी ने कहा, ”इसे छोडऩा मत सिद्धू, इस की गरदन जोर से दबाओ. यह किसी भी सूरत में बचना नहीं चाहिए.’’

सुनंदा की बात सुनते ही उस व्यक्ति ने मेरे गले पर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर दी थी. बुरी तरह से गला दबते ही वह बेहोशी की हालत में चला गया था. बीरप्पा की बात सुनते ही पुलिस समझ चुकी थी कि उस के साथ घटित इस घटना में उस की पत्नी सुनंदा का ही हाथ था. इसी कारण वह घर से गायब हो गई थी. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने सुनंदा को हर जगह तलाशने की कोशिश की, लेकिन उस का कहीं भी अतापता न चल सका. पुलिस निरंतर सुनंदा की तलाश में जुटी थी. उसी दौरान पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

सुनंदा को गिरफ्तार करते ही पुलिस ने उस से कड़ी पूछताछ की तो उस ने सहज ही अपना जुर्म कुबूलते हुए पुलिस को बताया कि काफी समय से उस की सिद्धप्पा से गहरी दोस्ती थी. जिस के कारण उस का पति उस पर शक करते हुए उस के साथ मारपीट करता था. उस की मारपीट से तंग आ कर ही उस ने प्रेमी सिद्धप्पा के साथ मिल कर पति को मारने की योजना बनाई थी.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने उस के प्रेमी सिद्धप्पा को गिरफ्तार करने के लिए कई जगह पर दबिश दी, लेकिन वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. उस के बाद पुलिस ने उस की खोज में अपने मुखबिर लगा दिए, लेकिन इस से पहले कि पुलिस सिद्धप्पा तक पहुंच पाती, उस ने एक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी. उस ने उस वीडियो में जो कहा था, वह काफी हैरान कर देने वाला था. उस ने उस वीडियो के जरिए खुद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश की थी.

सिद्धप्पा ने कहा कि इस वारदात में मेरी कोई खास गलती नहीं. मैं ने जो भी किया, सुनंदा के कहने पर ही किया है. सुनंदा मुझे दिलोजान से चाहती थी. वह मेरे साथ श्रीशैलम मंदिर भी गई थी. वहां पर उस ने मेरे लिए मन्नत भी मांगी थी. वहां पर उस ने प्रार्थना की कि ३ महीने के भीतर हम पतिपत्नी की तरह साथ रहें. लेकिन इस वक्त वह उसे फंसाना चाहती है.

सिद्धप्पा ने वीडियो में कहा कि बीरप्पा को मौत की साजिश रचने में उस की पत्नी सुनंदा का हाथ था. जबकि वह इस मामले में खुद को निर्दोष साबित करना चाह रही है. वह जानता है कि उस के पास खुद को निर्दोष साबित करने का कोई सबूत नहीं है. फिर पुलिस प्रशासन भी महिलाओं का ही साथ देता है. अगर वह पुलिस के सामने हाजिर हो कर सब कुछ साफसाफ भी बता दे तो पुलिस सुनंदा का ही पक्ष लेगी. इसी कारण मेरे पास सिवाय अपनी जान देने के कोई दूसरा रास्ता नहीं.

सिद्धप्पा ने कहा कि सुनंदा कोई ढाई साल से उस के साथ रिलेशनशिप में थी. उस ने ही बीरप्पा को मौत की नींद सुलाने की साजिश रची थी. उस के दबाव में आ कर ही उस ने उस की पति को मौत की नींद सुलाने की कोशिश की थी. जब तक यह वीडियो पुलिस के हाथों तक पहुंचेगी, शायद तब तक मैं स्वयं भी मौत को गले लगा चुका होऊंगा. मेरी आत्महत्या की जिम्मेदारी भी सुनंदा की ही होगी. इस वीडियो ने सब को चौंका दिया था, क्योंकि वीडियो में सिद्धप्पा ने न सिर्फ खतरनाक साजिश का खुलासा किया था, बल्कि अपनी खुदकुशी का इशारा भी दे दिया था. इस वीडियो के जारी होते ही विजयपुरा के एसपी लक्ष्मण निंबर्गी की देखरेख में उस की तलाश शुरू की गई. फौरन ही सिद्धप्पा की तलाश में पुलिस की सक्रियता बढ़ गई थी.

वीडियो के जारी होते ही पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया. उसे तलाशने में पुलिस बल को लगा दिया था. पुलिस और उस के मुखबिर अभी उस की तलाश में जुटे थे. उसी दौरान इस घटना के लगभग १० दिन बाद पुलिस को जानकारी मिली कि सुनंदा के प्रेमी सिद्धप्पा की लाश एक पेड़ से लटकी हुई है. पुलिस के हत्थे चढऩे से पहले ही उस ने यह खौफनाक कदम उठा लिया था.

शिकारी कैसे हो गया शिकार

सिद्धप्पा की लाश उस के गांव के बाहर जंगल में एक पेड़ से लटकी हुई थी. उस वक्त तक उस की लाश की हालत बहुत ही खराब हो चुकी थी. जिस से साफ जाहिर था कि सिद्धप्पा ने यह कदम कई दिन पहले ही उठा लिया था. जबकि पुलिस उसे किसी भी कीमत पर जिंदा गिरफ्तार करना चाहती थी. इस की जानकारी मिलते ही लोकल पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. जांचपड़ताल से पता चला कि सिद्धप्पा ने खुद ही पुलिस के डर की वजह से खुदकुशी कर ली थी. फिलहाल सिद्धप्पा की मौत के साथ ही इस लव ट्रायंगल की कहानी के सारे सबूत ही दफन हो गए थे, जिस के सबूत पुलिस जुटाना चाह रही थी.

पुलिस ने मृतक सिद्धप्पा का शव पेड़ से उतार कर अपनी काररवाई पूरी करते हुए उस की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. मृतक ने अपने गले में रस्सी का फंदा डाल कर सुसाइड की वारदात को अंजाम दिया था, जिसे देख कर यह आशंका भी नहीं की जा सकती थी कि उसे मार कर लटकाया गया हो. इस मामले में बीरप्पा की तरफ से अपनी पत्नी सुनंदा और उस के प्रेमी सिद्धप्पा को अपनी मौत की साजिश रचने का आरोप लगा कर पुलिस को लिखित तहरीर दी थी. जिस के बाद पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कई लोगों को इस मामले से जोड़ते हुए शक के आधार पर काररवाई करने की योजना बनाई थी.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस पूछताछ के दौरान सिद्धप्पा के फेमिली वालों के साथ ही सुनंदा के बयानों के आधार पर इस केस की जो हकीकत सामने आई, वह इस प्रकार थी. बीरप्पा मयप्पा पुजारी कर्नाटक के जिला विजयपुरा के अंजूतागी गांव का रहने वाला था. सिद्धप्पा कटकरे भी बीरप्पा का ही पड़ोसी था. बीरप्पा पुजारी को इतनी खास जानकारी मिल चुकी थी कि उस की पत्नी का उस के पड़ोसी सिद्धप्पा कटकरे के साथ चक्कर चल रहा है.

बीरप्पा और सिद्धप्पा के खेत पासपास में ही थे. बीरप्पा अपने खेतों पर कम ही जाता था. उस की पत्नी सुनंदा ही ज्यादातर खेतों पर काम करने जाती थी. खेतों पर काम करने के दौरान ही उस की दोस्ती सिद्धप्पा से हो गई. सुनंदा की दोस्ती सिद्धप्पा के साथ हो जाने के बाद वह हर वक्त ही अपने खेतों पर पड़ा रहता था. गांव में अधिकांश लोग दोपहर में अपने घरों पर चले आते हैं, लेकिन सिद्धप्पा फिर भी सुनंदा के साथ दोस्ती होने के कारण उस के मिलने की चाहत में वहीं पर पड़ा रहता था. उसी दोस्ती के सहारे जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध भी बन गए थे. सिद्धप्पा के साथ संबंध बनते ही सुनंदा उस के प्यार में पागल हो गई. फिर दोनों फोन पर बातें करने लगे थे. सिद्धप्पा जब कभी भी मौका पाता, फोन कर के सुनंदा को खेतों पर बुला लेता और उस के साथ मौजमस्ती करने लगा था.

लेकिन दोनों के बीच लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. जैसे ही दोनों गांव वालों की नजरों में चढ़े, उन की गांव में चर्चा होने लगी थी. यह बात धीरेधीरे बीरप्पा के सामने भी पहुंच गई. यह बात सुनते ही बीरप्पा को बहुत दुख हुआ. बीरप्पा ने सुनंदा के साथसाथ सिद्धप्पा को भी हड़काया, लेकिन सिद्धप्पा फिर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.

बीरप्पा ने कई बार अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला खत्म नहीं हुआ. यह बात बीरप्पा को नागवार गुजरती थी. कई बार दोनों के बीच इस मामले को ले कर मनमुटाव भी हुआ, लेकिन उस के पास कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं था, जिस के आधार पर वह उस पर किसी प्रकार का लांछन लगा सके. पूरे गांव में सिद्धप्पा सुनंदा को ले कर चर्चे हो रहे थे. जिस के कारण गांव में बीरप्पा का रहना मुश्किल हो गया था.

जब गांव में उस की पत्नी के चरित्र को ले कर काफी चर्चा होने लगी तो पत्नी की हरकतों से तंग आ कर एक दिन बीरप्पा ने बहुत बड़ा कदम उठाया. उस ने अपनी बीवी की हरकतों से तंग आ कर अपनी जुतासे की जमीन बेचने का निर्णय लिया. गांव छोडऩे का पूरा मन बना कर उस ने अपने गांव की जमीन बेच दी. जमीन बेचते ही बीरप्पा ने अपना कुछ कर्ज भी चुकाया. फिर उस ने शहर की तरफ कदम बढ़ाया. वह अपनी गांव की जमीन बेच कर इंडी टाउन के अक्क महादेवी नगर में किराए के मकान में शिफ्ट हो गया.

प्रेमी के प्यार में पागल हो गई थी सुनंदा

अक्कमहादेवी नगर में आने के बाद बीरप्पा को उम्मीद थी कि वहां पर आ कर सब कुछ सही हो जाएगा. यही सोच कर उस ने वहां पर अपना काम भी लगा लिया था. लेकिन उसी दौरान उसे लगा कि सुनंदा गांव छोडऩे के बाद भी अपने पुराने रास्ते पर ही चल रही है. उस ने कई बार उसे फोन पर किसी से बात करते देखा तो उसे फिर से चिंता सताने लगी. उस ने सुनंदा का मोबाइल चैक किया तो पता चला कि वह फिर से सिद्धप्पा से संपर्क साधे हुए है. इसी बात पर दोनों के बीच जोरदार लड़ाई हुई. यह बात सुनंदा ने सिद्धप्पा से कही तो गुस्से में उस का पारा चढ़ गया. वह अपनी प्रेमिका के दर्द को सुन कर बौखला उठा. फिर उस दिन दोनों के बीच जो बात हुई, उस ने एक खतरनाक योजना को जन्म दिया.

सिद्धप्पा ने अपनी प्रेमिका के पति से छुटकारा पाने के लिए अपने साथ अपने एक दोस्त को भी शामिल कर लिया था. सिद्धप्पा ने सुनंदा के कमरे पर पहुंचने से पहले ही उसे सारी जानकारी दे दी थी. उसी जानकारी के बाद बीरप्पा के सोते ही सुनंदा ने अपने मकान का दरवाजा खुला छोड़ दिया था, ताकि बिना किसी शोरशराबे के प्रेमी सिद्धप्पा उस के घर में प्रवेश कर योजना को अंजाम दे सके. सिद्धप्पा अपने एक साथी के साथ प्रेमिका के घर पहुंच गया.

बीरप्पा को सोते देख सुनंदा ने सिद्धप्पा और उस के साथी को इशारा कर दिया. उस का इशारा पाते ही दोनों गहरी नींद में सो रहे बीरप्पा पर टूट पड़े, लेकिन बीरप्पा ने हिम्मत से काम लिया. उस ने दोनों के साथ डट कर मुकाबला किया.

बीरप्पा के सिर के पास ही दीवार से सटा हुआ फ्रिज रखा हुआ था. उस ने फुरती से अपने पैर बैड से सटा कर जोरदार धक्का मारा, जिस से वह सिरहाने रखे फ्रिज से टकराया. उस के टकराने से कमरे में एक जोरदार आवाज गूंजी, जिसे सुनते ही उस का मकान मालिक कमरे की तरफ आया. उसे देखते ही सिद्धप्पा अपने साथी के साथ घर से फरार हो गया, लेकिन उस के बाद भी वह जोरजोर से चीख रहा था. उस की चीख सुन कर सुनंदा ने उसी से सवाल किया कि आप चीख क्यों रहे हो.

तब तक शोरशराबा सुन कर आसपड़ोस के लोग उस के पास आ गए थे. उस के कुछ समय बाद बीरप्पा बेहोशी की हालत में चला गया. तब उस के किराएदार व पड़ोसियों ने उसे अस्पताल में भरती कराया. घटना के वक्त बीरप्पा की पत्नी उस की बगल में ही मौजूद थी, लेकिन उस ने एक बार भी हमलावरों से कुछ नहीं बोला.

बीरप्पा के बेहोश होते ही उस की पत्नी सुनंदा ने लोगों को बताया कि कुछ बदमाश घर में घुस आए थे. जिन्होंने घर में लूटमार करने के बाद बीरप्पा के साथ बुरी तरह से मारपीट भी की थी, लेकिन अस्पताल में बीरप्पा के होश में आते ही सब भेद खुल गया. बीरप्पा ने पुलिस को बताया कि घटना के वक्त उस की पत्नी ही उस के सीने पर चढ़ी बैठी थी. जबकि उस का प्रेमी सिद्धप्पा और उस का एक साथी उस का गला दबाने व उस के गुप्तांगों को दबा रहे थे.

सुनंदा ने प्लान बनाया था कि वह पति की हत्या कराने के बाद सिद्धप्पा के साथ मौजमस्ती मारेगी, लेकिन उस का फेंका पांसा उलटा पड़ गया. उस का पति तो किसी तरह से मौत के मुंह से वापस आ गया और उस का प्रेमी उसे छोड़ कर दुनिया से चला गया. स्टोरी लिखे जाने तक बीरप्पा एक निजी अस्पताल में भरती था. उस की हालत स्थिर बनी हुई थी. पुलिस की एक विशेष टीम ने बीरप्पा की पत्नी सुनंदा को गिरफ्तार कर लिया था. उस के बाद पुलिस ने उस से विस्तार से जानकारी जुटाने के बाद जेल भेज दिया था.

यह दुखद घटना टूटे हुए विश्वास और घरेलू अनसुलझे झगड़ों के गहरे परिणामों को उजागर करती है, जिस के कारण उन के २ बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया. Love Stories in Hindi

 

 

True Crime Stories : पछतावा

True Crime Stories : कबड्डी खेलते समय नासिर ने चौधरी आफताब की जो बेइज्जती की थी, उस का बदला लेने के लिए उस ने हैदर अली के साथ मिल कर नासिर के साथ ऐसा क्या किया कि उसे और हैदर अली को पछताना पड़ा. उन दिनों मैं जिला छंग के एक देहाती थाने में तैनात था. वह जगह दरिया के करीब थी. मई का महीना होने की वजह से अच्छीभली गरमी पड़ रही थी. अचानक एक दिन पास के गांव से एक वारदात की खबर आई.

कांस्टेबल सिकंदर अली ने बताया कि गुलाबपुर में एक गबरू जवान का बड़ी बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया है, जिस की लाश खेतों में पड़ी है. गुलाबपुर मेरे थाने से करीब एक मील दूर था. वहां से फैय्याज और यूनुस खबर ले कर आए थे. वे दोनों खबर दे कर वापस जा चुके थे.

मैं ने पूछा, ‘‘मरने वाला कौन है?’’

‘‘उस का नाम नासिर है, वह कबड्डी का बहुत अच्छा और माहिर खिलाड़ी था.’’ सिकंदर अली ने बताया. मैं 2 सिपाहियों के साथ गुलाबपुर रवाना हो गया. हमारे घोड़े खेतों के बीच आड़ीतिरछी पगडंडी पर चल रहे थे. जिस खेत में लाश पड़ी थी, वह गांव से एक फर्लांग के फासले पर था. कुछ लोग हमें वहां तक ले गए. वहां एक अधूरा बना कमरा था, न दीवारें न छत. जरूर कभी वहां कोई इमारत रही होगी. नासिर की लाश कमरे के सामने पड़ी थी. लाश के पास 8-9 लोग खड़े थे, जो हमें देख कर पीछे हट गए थे.

मैं उकड़ूं बैठ कर बारीकी से लाश की जांच करने लगा. बेशक वह एक खूबसूरत गबरू जवान था. उस की उम्र 23-24 साल रही होगी. वह मजबूत और पहलवानी बदन का मालिक था, रंग गोरा था और बाल घुंघराले. लाश देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस पर तेजधार हथियार या छुरे से हमला हुआ होगा. मारने वाले एक से ज्यादा लोग रहे होंगे. उस के हाथों के जख्म देख कर लगता था कि उस ने अपने बचाव की भरपूर कोशिश की थी. नासिर कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, इसलिए गुलाबपुर के लोग उसे गांव की शान समझते थे. लाश पर चादर डाल कर मैं लोगों से पूछताछ करने लगा.

नासिर का 60 साल का बाप वहीं था, उस की हालत बड़ी खराब थी, आंखें आंसुओं से भरी थीं. उस का नाम बशीर था. मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘चाचा, आप फिकर न करो, आप के बेटे का कातिल पकड़ा जाएगा.’’

उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा बेटा तो चला गया. कातिल के पकड़े जाने से मेरा बेटा लौट कर तो नहीं आएगा.’’

बेटे के गम ने उस की सोचनेसमझने की ताकत खत्म कर दी थी. उसे बस एक ही बात याद थी कि उस का जवान बेटा कत्ल हो चुका है. मुझे उस पर बड़ा तरस आया. मैं ने उसे एक जगह बिठा दिया और अपनी काररवाई करने लगा. सब से पहले मैं ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया. इस कत्ल का मुझे कोई सुराग नहीं मिला था. यहां तक कि वह हथियार भी नहीं, जिस से उस का कत्ल किया गया था.  मैं ने वारदात की जगह पर मौजूद लोगों के बयान लिए. लेकिन सिवाय नासिर की तारीफ सुनने के कोई जानकारी नहीं मिली. मैं ने नासिर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मेरे दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि इतनी रात को नासिर इस सुनसान जगह पर क्या कर रहा था. मेरे अंदाज से कत्ल रात को हुआ था. मैं ने मौजूद लोगों से घुमाफिरा कर कई सवाल किए, पर काम की कोई बात पता नहीं चली. मैं ने यूनुस और फैयाज से भी पूछताछ की. पर कुछ खास पता नहीं चला. इलियास जिस ने सब से पहले लाश देखी थी, उस से भी पूछा, ‘‘इलियास, तुम सुबहसुबह कहां जा रहे थे?’’

‘‘साहबजी, मैं कुम्हार हूं. मैं मिट्टी के बरतन बनाता हूं. मैं रोजाना सुबह मिट्टी के लिए घर से निकलता हूं. मेरा कुत्ता मोती भी मेरे साथ होता है. वह मुझे इस तरफ ले आया, तभी लाश पर मेरी नजर पड़ी. लाश देख कर मैं ने ऊंची आवाज में चीखना शुरू कर दिया. उस वक्त खेतों में लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. कुछ लोग जमा हो गए. मौजूद लोगों से पता चला कि बशीर लोहार के बेटे नासिर का किसी ने कत्ल कर दिया है.’’

बशीर लोहार का घर गांव के बीच में था. उस का छोटा सा परिवार था. घर में नासिर के मांबाप के अलावा एक बहन थी. बशीर ने अपने घर के बरामदे में भट्ठी लगा रखी थी. वहीं पर वह लोहे का काम करता था. जब मैं उस के घर पहुंचा तो वह मुझे घर के अंदर ले गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा बशीर, जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, बहुत अफसोसनाक है. मैं तुम्हारे गम में बराबर का शरीक हूं. मेरी पूरी कोशिश होगी कि जैसे भी हो, कातिल को कानून के हवाले करूं. लेकिन तुम्हें मेरी मदद करनी होगी. हर बात साफसाफ और खुल कर बतानी होगी.’’

उस की बीवी जुबैदा बोल उठी, ‘‘साहब, आप से कुछ भी नहीं छिपाएंगे. हमारी दुनिया तो अंधेरी हो ही गई है, लेकिन जिस जालिम ने मेरे बच्चे को मारा है, उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’’

‘‘आप दोनों को किसी पर शक है?’’

‘‘साहब, हमें किसी पर शक नहीं है. मेरा बेटा तो पूरे गांव की आंख का तारा था. अभी पिछले महीने ही उस ने कबड्डी का टूर्नामेंट जीता था. इस मुकाबले में 4 गांवों की टीमों ने हिस्सा लिया था. गुलाबपुर की टीम में अगर नासिर न होता तो यह जीत नजीराबाद के हिस्से में जाती. सुल्तानपुर और चकब्यासी पहले दौर में आउट हो गए थे. असल मुकाबला गुलाबपुर ओर नजीराबाद में था. जीतने पर गांव वाले उसे कंधे पर उठाए घूमते रहे. बताइए, मैं किस पर शक करूं?’’ बशीर ने तफ्सील से बताया.

‘‘नासिर कबड्डी का इतना अच्छा खिलाड़ी था, जहां 10 दोस्त थे, वहां एकाध दुश्मन भी हो सकता है.’’ मैं ने कहा.

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं साहब, पर मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है.’’ बशीर ने बेबसी जाहिर की.

‘‘मुझे उस दसवें आदमी की तलाश है, जिस ने नासिर का बेदर्दी से कत्ल किया है. जरूर यह किसी दुश्मन का काम है. हो सकता है, गांव के बाहर का कोई दुश्मन हो?’’ मैं ने कहा.

‘‘बाहर का भी कोई दुश्मन नहीं है साहब.’’ उस की बीवी जुबैदा ने कहा तो मैं सोच में पड़ गया. अचानक बशीर बोल उठा, ‘‘वह तो सारा दिन मेरे साथ काम में लगा रहता था. शाम को अखाड़े में कसरत वगैरह करता था.’’

‘‘यह अखाड़ा कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अखाड़ा ट्यूबवेल के पास है. उस टूटीफूटी इमारत के करीब, जहां यह वारदात हुई.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘मेरे अंदाज से कत्ल देर रात को हुआ है, इतनी रात को वह अखाड़े में क्या कर रहा था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात हमारी भी समझ में नहीं आ रही है.’’ जुबैदा बोली.

‘‘रात को क्या वह रोजाना की तरह समय पर सोया था?’’

‘‘सोया तो रोजाना की तरह ही था.’’ कहतेकहते जुबैदा रुक गई.

‘‘मुझे खुल कर बताओ, क्या बात है?’’ मैं ने कहा तो वह बोली, ‘‘आप हमारे साथ ऊपर छत पर चलिए. आप खुद समझ जाएंगे.’’

हम छत पर पहुंचे तो जुबैदा कहने लगी, ‘‘मैं रोजाना नासिर को उठाने छत पर आती थी और वह 2 पुकार में उठ जाता था. लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. मैं ने आगे बढ़ कर चादर उठाई तो उस के नीचे एक तकिया रखा हुआ था, जिस पर चादर ओढ़ाई हुई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सो रहा है.’’

मैं खामोश खड़ा रहा तो जुबैदा ने कहा, ‘‘इस का मतलब है कि पिछली रात नासिर अपनी मरजी से घर से निकला था. वह नहीं चाहता था कि किसी को उस के जाने के बारे में पता चले.’’ जुबैदा बोली.

‘‘नहीं जुबैदा, ऐसा नहीं है. वह पहले भी जाता रहा होगा, पर सुबह होने से पहले आ जाता रहा होगा. इसलिए तुम्हें पता नहीं चला. तुम्हारा बेटा रात के अंधेरे में कहीं जाता था और जल्द लौट आता रहा होगा, इसलिए तुम्हें खबर नहीं मिल सकी. मुझे तो किसी लड़की का चक्कर लगता है.’’ मैं ने कहा तो वे दोनों बेयकीनी से मुझे देखने लगे, ‘‘लड़की का चक्कर…’’

बशीर ने कहा, ‘‘साहब, नासिर ऐसा लड़का नहीं था. वह तो गुलाबपुर की लड़कियों और औरतों को बहनें समझता था. वह कभी किसी की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.’’

‘‘मैं मान नहीं सकता कि लड़की का चक्कर नहीं था. पिछली रात वह लड़की से मुलाकात करने ही खेत में पहुंचा था. अगर आप लोग लड़की का नाम बता दो तो केस जल्द हल हो जाएगा. मैं कातिलों तक पहुंच जाऊंगा, क्योंकि वही लड़की बता सकती है कि खेत में क्या हुआ था?’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जनाब, हम बड़ी से बड़ी कसम खा कर कह रहे हैं कि हम ऐसी किसी लड़की को नहीं जानते.’’ दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘मैं आप की बात का यकीन करता हूं, पर इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. मैं कहीं न कहीं से इस का सुराग लगा ही लूंगा. आप यह बताएं कि गुलाबपुर में नासिर का सब से करीबी दोस्त कौन है?’’

‘‘जमील से उस की गहरी दोस्ती थी.’’ बशीर ने कहा.

‘‘ठीक है, अब मैं पता कर लूंगा. दोस्त दोस्त का राज जानते हैं. मुझे जमील से मिलना है. तुम उसे यहां बुला लो?’’ मैं ने कहा.

‘‘उस का घर पड़ोस में है, मैं अभी बुलाता हूं.’’ बशीर ने कहा. उस ने वापस लौट कर बताया कि जमील 2 दिनों से टोबा टेक सिंह गया हुआ है.

‘‘ठीक है, कल वह वापस आएगा तो उस से पूछ लूंगा. अभी उस के घर वालों से बात कर लेता हूं.’’ मैं ने कहा.

सामने ही उस की परचून की दुकान थी. उस का बाप वहीं मिल गया. मैं ने करीब 15 मिनट तक उस से बात की, पर कोई काम की बात पता नहीं चल सकी. वह भी कबड्डी की वजह से नासिर का बड़ा फैन था. उसे उस की मौत का बहुत गम था. मेरा दिमाग गहरी सोच में था. मुझे पक्का यकीन था कि जरूर लड़की का चक्कर है. जहां लाश मिली थी, वहां एक अधूरा कमरा था. रात में मुलाकात के लिए वह बेहतरीन जगह थी. मुझे ऐसी लड़की की तलाश थी, जो नासिर से मोहब्बत करती थी और नासिर उस के इश्क में पागल था.  वह जगह गुलाबपुर के करीब ही थी, इसलिए लड़की भी वहीं की होनी चाहिए थी.

मेरी सोच के हिसाब से कातिल इस राज से वाकिफ था कि लड़की और नासिर वहां छिपछिप कर मिलते हैं. उसे इस बात का भी यकीन रहा होगा कि नासिर वहां जरूर आएगा. निस्संदेह कातिल उन दोनों की मोहब्बत और मिलन से सख्त नाराज रहा होगा. उस ने वक्त और मौका देख कर नासिर को मौत के घाट उतार दिया होगा. मुझे उस लड़की को तलाश करना था. दोपहर के बाद मैं ने हमीदा को थाने बुलाया. वह कस्बे में घरघर जा कर क्रीमपाउडर और परांदे वगैरह बेचा करती थी. हर घर की लड़कियों को वह खूब जानती थी और कई की राजदार भी थी. पहले भी वह मेरे कई काम करा चुकी थी.

मैं उसे कुछ पैसे दे देता था तो वह खुश हो जाती थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘हमीदा, तुम गुलाबपुर के हर घर से वाकिफ हो. मुझे नासिर के बारे में जानकारी चाहिए. तुम जो जानती हो, बताओ.’’

‘‘साहब, वह तो गुलाबपुर का हीरो था. बच्चाबच्चा उस पर जान देता था.’’ उस ने दुखी हो कर कहा.

‘‘मुझे गुलाबपुर की उस हसीना का नाम बताओ, जो उस पर जान देती थी और नासिर भी उस का आशिक रहा हो.’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘ओह, तो कत्ल की इस वारदात का ताल्लुक नासिर की मोहब्बत की कहानी से जुड़ा हुआ है.’’ उस ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘सौ फीसदी, उस के इश्क में ही कत्ल का राज छिपा है.’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

हमीदा कुछ सोचती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सच क्या है, यह तो नहीं कह सकती. पर मैं ने उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि रेशमा से उस का कुछ चक्कर चल रहा था. रेशमा शकूर जुलाहे की बेटी है.’’

मैं ने हमीदा को इनाम दे कर विदा किया. मैं पहले भी उस से मुखबिरी का काम ले चुका था. उस की खबरें पक्की हुआ करती थीं. अगले दिन गरमी कुछ कम थी. मैं खाने और नमाज से फारिग हो कर बैठा था कि जमील अपने बाप के साथ आ गया. मैं ने उस के बाप को वापस भेज कर जमील को सामने बिठा लिया. वह गोराचिट्टा, मजबूत जिस्म का जवान था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जमील, तुम्हें नासिर के साथ हुए हादसे का पता चल गया होगा?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखें भीग गईं. वह दुखी लहजे में बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपना सब से प्यारा दोस्त खो दिया है. पता नहीं किस जालिम ने उसे कत्ल कर दिया.’’

‘‘तुम उस जालिम को सजा दिलवाना चाहते हो?’’

‘‘जरूर, साहब मैं दिल से यही चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी मदद मुझे कातिल तक पहुंचा सकती है. जमील मुझे यकीन है कि बिस्तर पर तकिया रख कर वह पहली बार रात को घर से बाहर नहीं गया होगा. जरूर वह पहले भी जाता रहा होगा. यह खेल काफी दिनों से चल रहा था. तुम उस के दोस्त हो, राजदार हो, तुम्हें सब पता होगा. मैं सारी हकीकत समझ चुका हूं, पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

कुछ देर सोचने के बाद वह बोला, ‘‘आप का अंदाजा सही है, इस में एक लड़की है.’’

‘‘रेशमा नाम है न उस का?’’ मैं ने बात पूरी की तो वह हैरानी से मुझे देखने लगा. फिर बोला, ‘‘साहब, उस का नाम रेशमा ही है. दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे. धीरेधीरे उन की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया था. मैं उन का राजदार था या यूं कहिए मेरी वजह से ही ये मुलाकातें मुमकिन थीं. रेशमा हमारी दुकान पर सामान लेने आती थी. उसे पता था कि मैं कब दुकान पर रहता हूं. मैं ही रेशमा को बताया करता था कि उसे कब खेतों में पहुंचना है. नासिर उस की राह देखेगा, अगर वह आने को हां कह देती थी तो मैं नासिर को बता देता था. फिर वह उस जगह पहुंच जाता था. इस तरह उन दोनों की मुलाकात हो जाती थी.’’

‘‘क्या मुलाकात के वक्त तुम भी आसपास होते थे?’’

‘‘नहीं साहब, मैं कभी उस तरफ नहीं गया. हां, दूसरे दिन नासिर मुझे सब बता दिया करता था.’’

‘‘दोनों के बीच बात किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी?’’

‘‘दोनों की मोहब्बत शादी तक पहुंच गई थी. रेशमा जल्दी शादी करने का इसरार कर रही थी. नासिर भी शादी करना चाहता था, लेकिन उसे इतनी जल्दी नहीं थी. जबकि रेशमा जल्दी रिश्ता तय करने की बात कर रही थी.’’

‘‘रेशमा की जल्दी के पीछे भी कोई वजह रही होगी?’’

‘‘हां, दरअसल रेशमा की मां सरदारा बी उस का रिश्ता अपनी बहन के लड़के से करना चाहती थी और उस का बाप उस का रिश्ता अपने भाई के लड़के से करना चाहता था. पर बात सरदारा बी की ही चलनी थी, क्योंकि वह काफी तेज है. वही सब फैसले करती है. रिश्ता खाला के बेटे से न तय हो जाए, इस डर से रेशमा नासिर को जल्दी रिश्ता लाने को कह रही थी.’’ जमील ने तफ्सील से बताया.

‘‘एक बात समझ में नहीं आई जमील, तुम्हारे मुताबिक उन की मुलाकातों के तुम अकेले राजदार थे. जबकि कत्ल वाले दिन के पहले से तुम गांव से बाहर थे. फिर उस दिन दोनों की मुलाकात किस ने तय कराई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, जिस दिन मैं टोबा टेक सिंह गया था, उसी दिन मैं ने उन की दूसरे दिन की मुलाकात तय करा दी थी. नासिर ने दूसरे दिन मिलने को कहा था. मैं ने यह बात रेशमा को बता दी थी. उस के हां कहने पर मैं ने नासिर को भी प्रोग्राम पक्का होने के बारे में बता दिया था.’’

‘‘इस का मतलब प्रोग्राम के मुताबिक ही नासिर अगली रात रेशमा से मिलने खेतों में पहुंचा था. यकीनन वादे के मुताबिक रेशमा भी वहां आई होगी और उस रात नासिर के साथ जो खौफनाक हादसा हुआ, वह उस ने भी देखा होगा. उस का बयान कातिल तक पहुंचने में मदद कर सकता है. मुझे रेशमा का बयान लेना होगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘साहब, मामला बहुत नाजुक है. नासिर तो अब मर चुका है, आप रेशमा से इस तरह मिलें कि बात फैले नहीं. नहीं तो बेवजह वह मासूम बदनाम हो जाएगी.’’

‘‘तुम इस की चिंता न करो, मैं उस से बहुत सोचसमझ कर इस तरह मिलूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया जनाब, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

‘‘जमील, तुम एक बात का खयाल रखना, जो बातें हमारे बीच हुई हैं, उन का किसी से जिक्र मत करना.’’

जब मैं नासिर की लाश ले कर गुलाबपुर पहुंचा तो बशीर लोहार के घर तमाम लोग जमा थे. लाश देख कर एक बार फिर रोनापीटना शुरू हो गया. मौका देख कर मैं ने शकूर को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘शकूर, मुझे नासिर के कत्ल के सिलसिले में तुम से कुछ पूछना है. यहां खड़े हो कर बात करने से बेहतर है तुम्हारे घर बैठ कर बात की जाए.’’

उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं उस के साथ उस के घर चला आया. उस की बैठक में बैठा. उस की एक बेटी थी रेशमा और एक बेटा शमशाद. बेटा 12-13 साल का रहा होगा, जो उस वक्त बाहर खेल रहा था. थोड़ी बातचीत हुई थी कि सरदारा बी चाय की ट्रे ले कर आ गई. शकूर ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, चाय पीएं और सवाल भी पूछते रहें. ये मेरी बीवी सरदारा बी है, इस से भी जो पूछना है पूछ लें.’’

उन की बातचीत से मैं ने अंदाजा लगाया कि उन्हें रेशमा के इश्क के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मैं ने उन से नासिर के बारे में कुछ सवाल पूछे, उन दोनों ने उस की बहुत तारीफें कीं. बातचीत के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप की बेटी रेशमा कहां है?’’

‘‘वह घर में ही है जनाब, कल से उसे तेज बुखार है. हकीमजी से दवा ला कर दी, पर उस का कुछ असर नहीं हुआ.’’ सरदारा बी ने कहा.

‘‘रेखमा का बुखार हकीमजी की दवा से कम नहीं होगा. यह दूसरी तरह का बुखार है.’’ मैं ने कहा तो शकूर ने चौंक कर मेरी ओर देखा. मैं ने आगे कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं, यह इश्क का बुखार है. नासिर की मौत ने रेशमा के दिलोदिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया है.’’

दोनों उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे, ‘‘हमारी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह सब क्या है?’’

‘‘मैं समझाता हूं. यही सच्चाई है. रेशमा और नासिर एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे. दोनों रातों को मिलते भी थे. रेशमा को उस की मौत से बहुत दुख पहुंचा है.’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘मुझे बिलकुल यकीन नहीं आ रहा है.’’ सरदारा बी बोली.

हकीकत जान कर वे दोनों परेशान थे. मैं ने कहा, ‘‘परेशान न हों, आप के घर की बात इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी. रेशमा मेरी बेटी की तरह है और बिलकुल बेगुनाह है. मुझे उस की इज्जत का पूरा खयाल है. आप मुझे उस के पास ले चलो, मैं उस से कुछ बातें करूंगा. इस बात की कानोंकान किसी को खबर नहीं हो पाएगी. आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’

उन्होंने मुझे रेशमा के पास पहुंचा दिया. मैं ने उन दोनों को बाहर भेज दिया. वे दरवाजे के पीछे जा कर खड़े हो गए. मैं ने रेशमा से नरम लहजे में कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. दरअसल मैं तुम से नासिर के बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूं. वैसे मैं सब जानता हूं, फिर भी तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

‘‘मैं जो जानती हूं, सब बताऊंगी.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘कत्ल की रात तुम खेतों में नासिर से मिलने गई थीं, मुझे यह बताओ कि उस पर हमला किस ने किया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं उस रात नासिर से मिलने नहीं गई थी.’’ वह मजबूती से बोली. उस के लहजे में विश्वास और यकीन साफ झलक रहा था.

‘‘जमील ने मुझे बताया है कि तुम्हारी और नासिर की मुलाकात पहले से तय थी. यह बात इस से भी साबित होती है, क्योंकि नासिर तुम से मिलने खेतों में गया था.’’

‘‘यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि नासिर वहां क्यों गया था? जबकि उस ने खुद ही प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था.’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

‘‘प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था, यह तुम क्या कह रही हो?’’ उस की बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रही हूं थानेदार साहब, मुझे नहीं पता प्रोग्राम कैंसिल करने के बाद नासिर वहां क्यों गया था. कल से मैं यही बात सोच रही हूं.’’ रेशमा ने सोचते हुए कहा.

‘‘एक मिनट, तुम दोनों के बीच खबर का आदानप्रदान जमील ही करता था न, पर जमील पिछले 2 दिनों से गुलाबपुर में नहीं था. फिर प्रोग्राम कैंसिल होने की खबर तुम्हें किस ने दी?’’ मैं ने उसे देखते हुए पूछा.

‘‘इम्तियाज ने.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘इम्तियाज कौन है?’’

‘‘माजिद चाचा का बेटा.’’

‘‘क्या इम्तियाज को भी तुम दोनों के मोहब्बत की खबर थी?’’

‘‘नहीं जी, वह तो 8 साल का बच्चा है. हमारे पड़ोस में ही रहता है.’’

‘‘इम्तियाज ने तुम से क्या कहा था?’’

‘‘मुझे तो यह जान कर ही बड़ी हैरानी हुई थी कि नासिर ने इम्तियाज के हाथ यह पैगाम क्यों भिजवाया था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैं ने चेक करने के लिए उस से पूछा, कहां नहीं जाना है. इस पर उस ने कहा था कि वह इस से ज्यादा कुछ नहीं जानता. नासिर भाई ने कहा है कि रेशमा को कह दो कि आज नहीं आना है. कुछ जरूरी काम है.’’ उस ने रुकरुक कर आगे कहा, ‘‘मैं जमील की दुकान पर जा कर पता कर लेती, पर वह टोबा टेक सिंह चला गया था. इम्तियाज से कुछ पूछना बेकार था. बहरहाल मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं नासिर से मिलने नहीं जाऊंगी.’’

‘‘इस का मतलब है कि नासिर को पूरी मंसूबाबंदी से साजिश के तहत कत्ल किया गया है. मुझे यकीन है कि इम्तियाज उस आदमी को पहचानता होगा, जिस ने नासिर के हवाले से तुम्हारे लिए संदेश भेजा था.’’ मैं ने सोचते हुए कहा.

‘‘आप यह बात इम्तियाज से पूछें. मेरी तबीयत बहुत बिगड़ रही है. चक्कर आ रहे हैं.’’ वह कमजोर लहजे में बोली.

‘‘तुम आराम करो रेशमा, पर इन बातों का किसी से जिक्र मत करना और परेशान मत होना.’’ मैं ने उसे समझाया. जब मैं कमरे से निकला तो उस के मांबाप ने मुझे घेर कर पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कुछ पता चला?’’

‘‘कुछ नहीं, बल्कि सब कुछ पता चल गया है.’’

‘‘हमें भी तो कुछ बताइए न?’’ शकूर ने कहा.

‘‘पहले आप पड़ोस से इम्तियाज को बुलाएं.’’

थोड़ी देर में सरदारा बी इम्तियाज को बैठक में ले आई. वह 8 साल का मासूम सा बच्चा था. मैं ने उसे प्यार से अपने पास बिठा कर पूछा, ‘‘बेटा इम्तियाज, तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?’’

‘‘हां, आप पुलिस हैं.’’ वह मुझे गौर से देखते हुए बोला.

इधरउधर की एकदो बातें करने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम स्कूल जाते हो, एक अच्छे बच्चे हो, सच बोलने वाले. यह बताओ, परसों शाम को तुम ने रेशमा बाजी से कहा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैं ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा हुआ था न?’’

‘‘हां, ऐसा हुआ था साहब.’’ इम्तियाज बोला.

‘‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो. मैं तुम्हें टाफियां दूंगा. अब यह भी बता दो कि तुम ने रेशमा बाजी को कहां जाने से मना किया था?’’

‘‘यह मुझे नहीं पता.’’ वह मासूमियत से बोला, ‘‘आप को यकीन नहीं आ रहा है तो रब की कसम खाता हूं.’’

‘‘नहीं बेटा, कसम खाने की जरूरत नहीं है. मुझे तुम पर भरोसा है. तुम ने तो रेशमा बाजी से वही कहा था, जो नासिर भाई ने तुम से कहलवाया था, है न?’’

‘‘नहीं जी.’’ वह उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगा.

‘‘क्या नहीं?’’

‘‘यह बात मुझे नासिर भाई ने नहीं कही थी.’’

उस ने कहा तो मैं ने तपाक से सवाल किया, ‘‘फिर किस ने कही थी?’’

‘‘हैदर भाई ने.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है हैदर अली? सरदारा बी का भांजा हैदर अली जुलेखा का बेटा.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, जी वही हैदर भाई.’’ उस ने जल्दी से कहा.

सरदारा बी की बहन जुलेखा का घर भी गुलाबपुर में ही था. हैदर अली उसी का बेटा था और वह इसी हैदर से रेशमा की शादी करना चाहती थी. यह भी सुनने में आया था कि हैदर का दावा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. मैं सोचने लगा कि जब उसे रेशमा और नासिर की मोहब्बत का पता चला होगा तो उस ने अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाने की कोशिश की होगी. मुझे लगा कि अब केस हल हो जाएगा. जैसे ही वह मेरे हत्थे चढ़ेगा, उसे डराधमका कर मैं उस की जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

जब मैं जुलेखा के घर पहुंचा तो हैदर अली घर पर नहीं था. मैं ने जुलेखा से पूछा, ‘‘हैदर अली कहां गया है?’’

‘‘मुझे तो पता नहीं, बता कर नहीं गया है जी. वैसे आप हैदर को क्यों ढूंढ रहे हैं?’’ वह परेशान हो कर बोली.

उस की परेशानी स्वाभाविक थी. अगर पुलिस किसी के दरवाजे पर आए तो घर के लोग चिंता में पड़ जाते हैं. मैं जुलेखा को अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें यह पता है न कि गुलाबपुर में एक लड़के का कत्ल हो गया है?’’

‘‘जी…जी मालूम है, बशीर लोहार के जवान बेटे का कत्ल हो गया है. किसी जालिम ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा है.’’ उस ने कहा.

‘‘किसी ने नहीं, एक खास बंदे ने जिस की तलाश में मैं यहां आया हूं. तुम्हारा लाडला हैदर अली.’’

‘‘नहींऽऽ.’’ उस ने एक चीख सी मारी, ‘‘मेरा बेटा कातिल नहीं हो सकता. आप को कोई गलतफहमी हुई है थानेदार साहब.’’ वह रोनी आवाज में बोली.

‘‘हर मां का यही खयाल होता है कि उस का बेटा मासूम है. पर मैं तफ्तीश कर के पक्के सुबूत के साथ यहां आया हूं.’’

‘‘कैसा सुबूत साहब?’’ वह परेशान हो कर बोली.

‘‘हैदर अली को मेरे हाथ लगने दो, उसी के मुंह से सुबूत भी जान लेना.’’ मैं ने तीखे लहजे में कहा.

काफी देर राह देखने के बाद मैं ने गांव में अपने 2 लोग उस की तलाश में भेजे. पर वह कहीं नहीं मिला. इस का मतलब था, वह गांव छोड़ कर कहीं भाग गया था. गुलाबपुर में भी किसी को उस के बारे में कुछ पता नहीं था. हैदर अली के गांव से गायब होने से पक्का यकीन हो गया कि वारदात में उसी का हाथ था. मैं काफी देर तक गुलाबपुर में रुका रहा. फिर जुलेखा से कहा, ‘‘जैसे ही हैदर घर आए, उसे थाने भेज देना.’’

एक बंदे को उस की टोह में लगा कर मैं थाने लौट आया. अगले रोज मैं सुबह की नमाज पढ़ कर उठा ही था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कांस्टेबल न्याजू खड़ा था. पूछने पर बोला, ‘‘साहब, जिस सिपाही को हैदर के लिए गांव में छोड़ कर आए थे, उस ने खबर भेजी है कि वह देर रात घर लौट आया है.’’

‘‘न्याजू, तुम और हवलदार समद फौरन गुलाबपुर रवाना हो जाओ और हैदर अली को साथ ले कर आओ.’’ मैं ने उसे आदेश दिया.

तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा तो थोड़ी देर बाद हवलदार समद हैदर को गिरफ्तार कर के ले आया. उस के साथ रोती, फरियाद करती जुलेखा भी थी. मैं ने कहा, ‘‘देखो जुलेखा, रोनेधोने की जरूरत नहीं है. यह थाना है शोर मत करो.’’

‘‘साहब, आप मेरे जवान बेटे को पकड़ कर ले आए हैं, मैं फरियाद भी न करूं.’’ वह रोते हुए बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे बेटे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है, फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं. अगर वह बेकुसूर है तो अभी थोड़ी देर में छूट जाएगा. यह मेरा वादा है तुम से.’’

‘‘अल्लाह करे, मेरा बेटा बेगुनाह निकले.’’

‘‘मेरी सलाह है, तुम घर चली जाओ. अगर हैदर बेकुसूर है तो शाम तक घर आ जाएगा.’’

हैदर को मैं ने अपने कमरे में बुलाया. हवलदार समद भी साथ था. मैं ने उसे गहरी नजर से देखा और तीखे लहजे में कहा, ‘‘हैदर, इसी कमरे में तुम्हारी जुबान खुल जाएगी या तुम्हें ड्राइंगरूम की सैर कराई जाए.’’

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उतर गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं ने ऐसा क्या किया है?’’

‘‘क्या के बच्चे, मैं बताता हूं तेरी काली करतूत. तूने नासिर का कत्ल किया है.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने किसी का कत्ल नहीं किया.’’ वह घबरा उठा.

‘‘फिर नासिर का कातिल कौन है?’’ मैं ने उस की आंखों में देखते हुए कहा.

‘‘मुझे कुछ पता नहीं थानेदार साहब.’’ वह हकलाया.

‘‘तुम्हें यह तो पता है न कि रेशमा तुम्हारी बचपन की मंगेतर है.’’ मैं ने टटोलने वाले अंदाज में कहा.

‘‘जी, जी हां, यह सही है.’’ उस ने कहा.

‘‘और यह भी तुम्हें मालूम होगा कि मकतूल नासिर और तुम्हारी मंगेतर रेशमा में पिछले कुछ अरसे से इश्क का चक्कर चल रहा था?’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं थानेदार साहब?’’ उस ने नकली हैरत दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं जो कह रहा हूं, तुम अच्छी तरह समझ चुके हो. सीधी तरह से सच्चाई बता दो, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ मैं ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रहा हूं, मैं ने नासिर का कत्ल नहीं किया.’’ वह नजरें चुराते हुए बोला.

‘‘नासिर के कत्ल वाली बात पहले हो चुकी है. अभी मेरे इस सवाल का जवाब दो कि तुम्हें रेशमा और नसिर के इश्क की खबर थी या नहीं? सच बोलो.’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’’

‘‘तो क्या तुम इम्तियाज को भी नहीं जानते?’’

‘‘कौन इम्तियाज?’’ वह टूटी हुई आवाज में बोला.

‘‘माजिल का बेटा, रेशमा का पड़ोसी बच्चा. याद आया कि नहीं?’’ मैं ने दांत पीसते हुए कहा.

‘‘अच्छाअच्छा, आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं.’’

‘‘हां…हां, वही बच्चा, जिस के हाथ तुम ने रेशमा के लिए संदेह भेजा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैंने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा तो वह हैरानी से बोला, ‘‘मैं ने? मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की…’’

‘‘तुम्हारे इस कारनामे के 2 गवाह मौजूद हैं. एक तो इम्तियाज, जिस के हाथ तुम ने संदेश भेजा था, दूसरी रेशमा, जिस के लिए तुम ने यह पैगाम भेजा था. अब बताओ, क्या कहते हो?’’

मेरी बात सुन कर वह हड़बड़ा गया. हवलदार समद ने कहा, ‘‘आप इस नालायक को मेरे हवाले कर दें, एक घंटे में फटाफट बोलने लगेगा.’’

मैं ने हैदर अली को हवलदार के हवाले कर दिया. थोड़ी देर में उस की चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. एक घंटे के पहले ही हवलदार ने खुशखबरी सुनाई.

‘‘हैदर अली ने जुर्म कुबूल लिया है. आप इस का बयान ले लें.’’

‘‘मतलब यह कि उस ने नासिर के कत्ल की बात मान ली है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी नहीं, बात कुछ और ही है, आप उसी से सुनिए.’’

हैदर अली ने नासिर का कत्ल सीधेसीधे नहीं किया था. अलबत्ता वह एक अलग तरह से इस कत्ल से जुड़ा था. यह भी सच था कि नन्हे इम्तियाज से रेशमा को पैगाम उसी ने भिजवाया था. यह पैगाम उस ने चौधरी आफताब के कहने पर रेशमा को भिजवाया था, ताकि रेशमा वारदात की रात मुलाकात की जगह न पहुंच सके और नासिर को ठिकाने लगाने में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े. चौधरी आफताब नजीराबाद के चौधरी का बेटा था. वह भी कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था. हाल ही में खेले गए टूर्नामेंट में वह नजीराबाद से खेल रहा था. फाइनल मैच में नजीराबाद की बुरी तरह से हार हुई थी. कप और इनाम गुलाबपुर के हिस्से में आए. ढेरों तारीफ व जीत की खुशी भी नासिर के नाम लिखी गई.

एक कबड्डी का दांव नासिर और आफताब के बीच पड़ा था, जिस में नासिर ने चौधरी आफताब को इतनी बुरी तरह से रगड़ा था कि उस की नाक और मुंह से खून बहने लगा था. एक तो गांव की हार, ऊपर से अपनी दुर्गति पर उस का दिल गुस्से और बदले की आग से जलने लगा था. उस का वश चलता तो वह वहीं नासिर का सिर फोड़ देता. उस ने मन ही मन इरादा कर लिया कि नासिर से बदला जरूर लेगा. इस तरह उस का अपने सब से बड़े प्रतिद्वंदी से भी पीछा छूट जाएगा. आफताब से हैदर ने कह रखा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. किसी तरह उसे यह भी पता चल गया था कि नासिर और रेशमा के बीच मोहब्बत और मुलाकात का सिलसिला चल रहा है. इसलिए उस ने एक तीर से दो शिकार करने का खतरनाक मंसूबा बना लिया.

हैदर अली को रेशमा और नासिर के संबंध का शक तो था ही, पर जब आफताब ने इस बारे में उसे शर्मसार किया तो वह आपे से बाहर हो गया. चौधरी आफताब ने उसे समझाया कि जोश के बजाय होश और तरीके से काम लिया जाए तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी. हैदर अली ने चौधरी आफताब का साथ देने का फैसला कर लिया. हैदर अली ने अपने हाथों से नासिर का कत्ल नहीं किया था, पर वह इस साजिश का एक हिस्सा था. जिस में चौधरी के भेजे हुए दो लोगों ने तेजधार चाकू की मदद से नासिर का बेदर्दी से कत्ल कर दिया था. जब कातिल उसे मौत के घाट उतार रहे थे तो हैदर अली थोड़ी दूर अंधेरे में खड़ा यह खूनी तमाशा देख रहा था.

हैदर अली के इकबालेजुर्म और गवाही पर मैं ने उसी रोज खुद नजीराबाद जा कर नासिर के कत्ल के सिलसिले में चौधरी आफताब को भी गिरफ्तार कर लिया था. आफताब गांव के चौधरी का बेटा था, इसलिए उस की गिरफ्तारी को रोकने के लिए मुझ पर काफी दबाव डाला गया था, पर मैं ने उस के असर व पैसे की परवाह न करते हुए चौधरी आफताब और उस की निशानदेही पर उन दोनों कातिलों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख चौधरी ने मुझे धमकी दी थी, ‘‘मलिक साहब, आप को मेरी ताकत का अंदाजा नहीं है. मैं अपने बेटे को अदालत से छुड़वा लूंगा.’’

मैं ने विश्वास से कहा, ‘‘चौधरी साहब, मैं सिर्फ खुदा की ताकत और कानून से डरता हूं. आप को जितना जोर लगाना है, लगा लो. आप का होनहार बेटा अदालत से सीधा जेल जाएगा.’’

मैं ने हैदर अली, चौधरी आफताब और नासिर के दोनों कातिलों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट बनाई और उन्हें अदालत के हवाले कर दिया. दोनों कातिल अपने जुर्म का इकबाल कर चुके थे, इसलिए उन की बाकी जिंदगी जेल में ही गुजरनी थी. True Crime Stories

 

Crime News : 2 रूपए के लिए हैवान बना नौकर

Crime News : होटल मालकिन सुशीला ने अगर अपने नौकर नंदू को 2 रुपए दे दिए होते तो शायद हत्या जैसा यह जघन्य अपराध न होता. नौकरों पर इलजाम लगा देना बड़ा आसान होता है, पर उन के दबेकुचले मन के आक्रोश को समझना बहुत मुश्किल. नंदू के मामले में भी शायद ऐसा ही था. तारीख थी 5 नवंबर, 2014. सुबह के 8 बज रहे थे. उत्तराखंड के हरिद्वार की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वीटी अग्रवाल उस समय हर की पौड़ी पुलिस चौकी पर अपने अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के बारे में निर्देशित कर रही थीं, क्योंकि अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा को होने वाले महास्नान के कारण वहां जिलेभर की पुलिस की तमाम टीमें मौजूद थीं.

उसी बीच वहां मौजूद हर की पौड़ी पुलिस चौकी के प्रभारी मोहन सिंह के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली और मोबाइल का स्विच औन कर के ‘हैलो’ कहा तो दूसरी ओर से पूछा गया, ‘‘क्या पौड़ी पुलिस चौकी इंचार्ज से बात हो सकती है?’’

‘‘हां, बोल रहा हूं. बताइए क्या बात है?’’ मोहन सिंह ने कहा.

‘‘सर, आप को एक मर्डर की खबर देनी थी.’’ फोनकर्ता बोला.

‘‘भई मर्डर कहां और किस का हुआ है?’’ मोहन सिंह ने चौंक कर पूछा तो उस ने बताया, ‘‘सर, मर्डर जाह्नवी मार्केट के निकट होटल शेरेपंजाब की मालकिन सुशीला शर्मा का हुआ है. सुशीला रात को प्रतिदिन की तरह होटल में सोई थीं. आज सुबह उन की बर्फ तोड़ने वाले सुए से गोदी हुई लाश बेड पर पड़ी मिली है.’’

‘‘सुशीला शर्मा के घर वाले क्या वहां मौजूद हैं?’’ मोहन सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं सर, वहां पर सुशीला शर्मा का कोई घर वाला नहीं है. दरअसल वह पिछले कई महीने होटल में ही रात को सोती थीं. उन का होटल मैनेजर राहुल भी अक्सर होटल में ही सोता था.’’ फोन करने वाले ने बताया.

‘‘क्या राहुल वहां मौजूद है.’’ मोहन सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं सर, अभी मौके पर न तो राहुल है और न ही सुशीला का कोई घर वाला,’’ फोन करने वाले ने आगे बताया, ‘‘रोजाना की तरह आधे घंटे पहले होटल के नौकर दिलवर सिंह और संतराम भट्ट होटल पहुंचे थे. वहां उन्हें होटल का आधा शटर खुला मिला. वे दोनों अपने साथ होटल के बाहर सोने वाले नौकर सहदेव के साथ अंदर गए तो उन्होंने वहां का जो नजारा देखा, उसे देख कर तीनों के होश उड़ गए.’’

‘‘क्या सुशीला की हत्या की जानकारी उस के घर वालों को दे दी गई है?’’ मोहन सिंह ने पूछा तो फोन करने वाले ने बताया, ‘‘हां सर, होटल के पड़ोसी दुकानदारों ने फोन कर के सुशीला की हत्या की जानकारी गुरदासपुर में रहने वाले उन के पति सुरेश शर्मा और दिल्ली में रह रही उन की बेटी को दे दी है. प्लीज आप जल्दी आ जाइए.’’

‘‘आप कौन साहब बोल रहे हैं?’’ मोहन सिंह ने पूछा तो फोनकर्त्ता ने कहा, ‘‘देखिए सर, मैं ने आप को इस मर्डर की खबर दे कर एक जिम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभया है. आप मेरे बारे में जानकारी करने के बजाय घटनास्थल पर पहुंचे और अपनी जिम्मेदारी निभाएं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. मामला चूंकि चौकी क्षेत्र की होटल संचालिका की हत्या का था, इसलिए मोहन सिंह ने इस मामले की सूचना कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर पी.सी. मठपाल, सीओ चंद्रमोहन नेगी, एसपी सिटी सुरजीत सिंह पंवार और एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को दे दी. थोड़ी देर में सभी अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. तब तक शेरेपंजाब होटल के बाहर स्थानीय दुकानदारों, नेताओं और हर की पौड़ी पर आए श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

पुलिस ने सब से पहले वहां खड़ी भीड़ को हटाया और उस के बाद मौके का गहनता से निरीक्षण करने लगी. एसएसपी स्वीटी अग्रवाल और सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने अंदर जा कर सब से पहले लहूलुहान पड़े सुशीला के शव को देखा. शव के चेहरे, गरदन व शरीर के अन्य भागों पर सुए से निर्ममता से गोदे जाने के दरजनों घाव थे. मृतका की सलवार उतरी हुई थी. जिसे देख कर पुलिस को कुछ संदेह हुआ. इसी के मद्देनजर हर की पौड़ी पुलिस चौकी से एक महिला कांस्टेबल को बुला कर सुशीला के सारे शरीर का निरीक्षण कराया गया. पता चला कि मृतका के शरीर के सभी जेवर गायब थे. लाश को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे उस का गला भी दबाया गया हो.

घटनास्थल से बर्फ तोड़ने वाला वह सुआ मिल गया था, जिस से सुशीला की हत्या की गई थी. पुलिस ने उसे जब्त कर लिया. घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद सबइंसपेक्टर मोहन सिंह मृतका सुशीला की लाश का पंचनाम बनाने लगे और एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने होटल मैनेजर राहुल तथा नौकरों दिलवर, संतराम व सहदेव से पूछताछ करनी शुरू कर दी. हालांकि घटनाक्रम के हिसाब से शक की सुई लापता नौकर नंदकिशोर उर्फ नंदू पर जा रही थी, लेकिन इस केस में बड़ा पेंच यह फंस गया था कि किसी को यह मालूम नहीं था कि नंदू कहां का रहने वाला था और वह कहां से यहां आया था? हत्या के बाद नंदू के गायब होने से सुशीला की हत्या की गुत्थी और उलझ गई थी. घटनास्थल से मृतका के 2 मोबाइल फोन भी गायब थे.

बहरहाल, सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने सुशीला की लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय हरमिलाप अस्पताल भिजवा दिया और राहुल, संतराम, दिलवर व सहदेव को ले कर कोतवाली हरिद्वार लौट आए. कोतवाली में सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने उन चारों से हत्या की तह में जाने के लिए गहन पूछताछ की. तत्पश्चात पुलिस ने नौकर संतराम, निवासी गांव भटवाडा, जिला टिहरी गढ़वाल की ओर से धारा 302 के तहत हत्या का केस दर्ज कर लिया. इस के साथ ही गवाहों सहदेव, दिलवर और राहुल के बयानों के आधार पर जांच शुरू कर दी. जांच की जिम्मेदारी मोहन सिंह को सौंपी गई थी. पुलिस पूछताछ में सुशीला की हत्या की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी.

सुशीला शर्मा के पति सुरेश शर्मा मूलत: हापुड़, गाजियाबाद के रहने वाले थे. उन के फूफा देवीराम का हरिद्वार में होटल था. उन की कोई संतान नहीं थी. उन्होंने सुरेश को गोद ले लिया था. बाद में सुरेश हरिद्वार आ कर होटल चलाने लगे थे. सुरेश ने काफी मेहनत की और पैसा कमा कर किराए के होटल की इमारत अपनी पत्नी सुशीला के नाम से खरीद ली. इस बीच उन के 2 बेटियां और एक बेटा हुआ. बच्चों के बड़े होने के बाद सुशीला ने कांगे्रस पार्टी ज्वाइन कर ली और कांगे्रस के कार्यक्रमों में भाग लेने लगी. सन 2000 में सुशीला महिला कांगे्रस की प्रदेश सचिव बन गईं. सुशीला का दिन भर घर से बाहर रहना सुरेश को पसंद नहीं था, इसलिए दोनों में आपसी तनाव रहने लगा.

जब तनाव बढ़ता गया तो सन 2006 में सुरेश अपनी पत्नी सुशीला, दोनों बेटियों और बेटे को छोड़ कर गुरदासपुर, पंजाब चला गया और एक होटल में काम करने लगा. इस के बाद सुशीला ने अपनी दोनों बेटियों और बेटे की शादियां कर दीं. 3 साल पहले सुशीला के बेटे अंकुर की छत से गिर कर मौत हो गई. उस वक्त अंकुर की मौत को आत्महत्या माना गया था. पिछले 7 महीने से सुशीला घर छोड़ कर होटल में ही रहने लगी थी. होटल का मैनेजर राहुल निवासी हाथीखाना, हरिद्वार भी रात को अकसर होटल में ही सोता था. लेकिन पिछले 7 दिनों से वह होटल में नहीं सो रहा था. यह भी पता चला कि सुशीला का अपने नौकरों के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था. वह नौकरों को अक्सर डांटतीफटकारती रहती थी. इतना ही नहीं, उन्हें वेतन देने में भी परेशान करती रही थी.

इसी वजह से उस के होटल में नौकर बदलते रहते थे. जब पुलिस सुशीला से अपने नौकरों के सत्यापन के लिए कहती तो वह उन के फोटो देने और उन के सत्यापन कराने में आनाकानी करती. उस की इस आनाकानी की वजह से एक बार हरिद्वार पुलिस उस पर उत्तराखंड पुलिस अधिनियम-2007 के तहत जुर्माना भी कर चुकी थी. पता चला सुशीला फरार नौकर नंदू पर अपने मैनेजर राहुल से ज्यादा भरोसा करती थी. जांचअधिकारी मोहन सिंह के सामने परेशानी यह थी कि उस के पास न तो सुशीला के नौकर नंदू का कोई फोटो था और न ही उस के बारे में किसी को कोई जानकारी थी. नंदू के बारे में पुलिस को केवल इतनी ही जानकारी मिल सकी थी कि वह खुद को राजस्थान का रहने वाला और लावारिस बताता था.

सुशीला उसे 2 महीने पहले गंगाघाट से पकड़ कर अपने होटल में काम करवाने के लिए लाई थी. इस से पहले भी वह उस के होटल में काम कर चुका था. अभी 2 माह पहले ही नंदू दोबारा उस के होटल में काम करने आया था. इस के अलावा पुलिस के लिए सुशील की हत्या की वजह पता लगाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. सुशीला की हत्या उस के नौकर नंदू ने ही की थी या हत्यारा कोई और था, क्योंकि प्रौपर्टी विवाद या किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के चलते भी ऐसा हो सकता था. सुशीला की लाश आपत्तिजनक हालत में मिली थी, उस के शरीर के निचले हिस्से पर कपड़े नहीं थे, इस से संभावना दुष्कर्म की भी थी. यह बात मृतका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही पता चल सकती थी. पुलिस को उसी का इंतजार था.

सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने सुशीला के नौकर नंदू को पकड़ने के लिए अपने कुछ खास मुखबिरों को उस का हुलिया बता कर उस का पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी. इस के अलावा उन्होंने सुशीला के दोनों मोबाइल नंबरों को भी सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस से उन की लोकेशन पता चल सके. अगले दिन मोहन सिंह को मृतका सुशीला की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस की मौत का कारण सुए से हुए प्रहारों के कारण अधिक रक्त बह जाना और गला दबाना बताया गया. इसी तरह 3 दिन बीत गए, लेकिन पुलिस को नौकर नंदू के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. 9 नवंबर को मोहन सिंह को सर्विलांस के माध्यम से जानकारी मिली कि सुशीला शर्मा के एक मोबाइल से एक नंबर पर काल की गई थी.

जिस नंबर पर काल की गई थी, उस नंबर के बारे में जानकारी एकत्र की गई तो पता चला कि वह नंबर दुकानदार अंकुर अग्रवाल, निवासी निंबाड़ा, जिला चित्तौड़गढ़, राजस्थान का था. मोहन सिंह तुरंत सिपाहियों गुलशन, दिनेश चौधरी और आशीष बिष्ट को साथ ले कर निंबाड़ा जा पहुंचे और अंकुर से नंदू के बारे में पूछताछ की. उत्तराखंड पुलिस को देख कर अंकुर घबरा गया. अंकुर ने मोहन सिंह को बताया कि 2 वर्ष पूर्व नंदकिशोर उर्फ नंदू उस की दुकान पर नौकरी करता था. वह गांव रानीखेड़ा, थाना निंबाड़ा निवासी गोपाल लोहार का बेटा था.

अंकुर से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम नंदू के घर पहुंची. वहां नंदू के पिता गोपाल लोहार ने पुलिस टीम को निंबाड़ा थाने में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट दिखाते हुए बताया कि नंदू घर से 2 वर्ष से लापता है. उसे नहीं मालूम कि इस वक्त वह कहां है. मोहन सिंह ने नंदू के घर से उस की फोटो ली और लोगों को अजमेर, निंबाडा, चित्तौड़गढ़ तथा श्रीगंगानगर के बसस्टैंडों व रेलवे स्टेशनों पर दिखा कर नंदू का पता लगाने की कोशिश की. जब उस का कोई पता नहीं चला तो वह अपनी टीम के साथ हरिद्वार लौट आए.

13 नवंबर, 2014 को मोहन सिंह को पता चला कि सुशीला के मोबाइल के हिसाब से नंदू की लोकेशन चित्तौड़गढ़ की आ रही है. यह महत्त्वपूर्ण जानकारी थी. मोहन सिंह तुरंत अपनी टीम को ले कर चित्तौड़गढ़ के लिए निकल गए. नंदू को पहचानने वाला एक नौकर उन के साथ था. उस की निशानदेही पर नंदू को रेलवे स्टेशन पर घूमते हुए पकड़ लिया गया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस हरिद्वार ले आई. पूछताछ में नंदू ने सुशीला की हत्या करने की बात कुबूलते हुए जो कुछ बताया, वह कुछ इस तरह था.

नंदू के अनुसार, उस का बाप गोपाल लोहार नशे में बचपन से ही उसे खूब पीटता आया था. बाप की पिटाई से वह काफी परेशान रहता था. इसी चक्कर में उस ने घर छोड़ दिया और 2 साल तक निंबाड़ा के दुकानदार अंकुर अग्रवाल की दुकान पर नौकरी की. जब वहां से उस का मन उचट गया तो वह भाग कर ट्रेन से हरिद्वार आ गया और भिखारियों के साथ रह कर भीख मांग कर अपना पेट भरने लगा. तभी एक दिन उस पर सुशीला की नजर पड़ी. उसे वह भिखारी नहीं लगा. नंदू से बातचीत के बाद सुशीला शर्मा उसे अपने होटल शेरेपंजाब ले गई और काम पर रख लिया. कई महीने काम करने के बाद भी जब सुशीला ने उसे वेतन नहीं दिया तो वह वहां से काम छोड़ कर चला गया. इस के बाद उस ने अन्य 2-3 दुकानों पर काम किया.

2 महीने पहले हरिद्वार में ही सुशीला और नंदू का आमनासामना हो गया. सुशीला ने नंदू को समझायाबुझाया और 3 हजार रुपए महीना नियमित वेतन देने की बात तय कर के उसे अपने होटल ले आई. नंदू ठीक से अपना काम करने लगा. लेकिन जब वेतन देने की बात आई तो सुशीला पहले की ही तरह उसे वेतन देने में आनाकानी करने लगी. यहां तक कि वह सुलभ शौचालय में जाने के लिए उसे 2 रुपए तक नहीं देती थी. इस सब से वह बहुत परेशान था. घटना वाले दिन यानी 4 नवंबर को चाकू लगने से नंदू का हाथ कट गया. जब उस ने घाव पर बैंडैड लगाने के लिए सुशीला से 2 रुपए मांगे तो उस ने 2 रुपए भी देने से मना कर दिया. इस बात को ले कर उस ने 2-4 बातें कहीं तो सुशीला चिढ़ गई.

शाम को सुशीला और होटल मैनेजर राहुल ने उसे चिढ़ाते हुए उस का खाना भी फेंक दिया. इस से नंदू रात को बहुत गुस्से में था. जब उस ने सुशीला से छुट्टी मांगी तो उस ने छुट्टी देने से भी मना कर दिया. रात को डेढ़ बजे जब सुशीला होटल के अंदर सो रही थी तो नंदू ने वहीं रखी अलमारी से बर्फ तोड़ने वाला सुआ निकाला और गुस्से में उस के चेहरे, गले व शरीर पर कई ताबड़तोड़ वार कर दिए. जब सुशीला ने चिल्लाने का प्रयास किया तो नंदू ने उस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उस ने मृत सुशीला के कपड़े उतारे और उस के साथ दुराचार किया. इस के बाद उस ने सुशीला की चेन, अंगूठी, 2 मोबाइल व 6 हजार रुपए उठाए और हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर आ गया. वहां वह दिल्ली जा रही एक ट्रेन में बैठ गया.

दिल्ली होता हुआ नंदू चित्तौड़गढ़ पहुंचा. चित्तौड़गढ़ के बाद वह अजमेर और निंबाड़ा आदि जगहों पर घूमता रहा. यह सब वह पुलिस से छिपने के लिए कर रहा था. इसी के चलते जब वह चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर घूम रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. जांच अधिकारी मोहन सिंह ने नंदू के बयान दर्ज कर लिए और उस की निशानदेही पर सुशीला के गहने, मोबाइल और कुछ नगदी बरामद कर ली. 14 नवंबर को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने आरोपी नंदू को प्रैसवार्ता के दौरान मीडिया के सामने पेश किया. इस के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक नंदू जेल में था और मोहन सिंह इस मामले की चार्जशीट बनाने में जुटे थे.

हो सकता है नंदू के बयानों में सच्चाई न हो. यह बात अदालत में ही साबित होगी. लेकिन छोटी सी यह अपराध कथा उन लोगों के लिए प्रेरणा साबित हो सकती है, जो अपने नौकरों को इंसान नहीं समझते. यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि सालों से मन में दबा आक्रोश जब फूट कर निकलता है तो उस का अंजाम अच्छा नहीं होता. आक्रोश न चाहते हुए भी इंसान को अपराधी बना दे. Crime News

Crime Story : फिल्म देखकर रची अनूठी साजिश

Crime Story : मुनव्वर ने सहारनपुर की एक हिंदू लड़की सोनिया से शादी की थी, जो धर्म बदल कर इशरत बन गई थी. इशरत और मुनव्वर की 2 बेटियां थीं आरजू और अर्शिता. साथ ही 2 बेटे भी आकिब और शाकिब. सभी बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे. घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी, करोड़ों की प्रौपर्टी अलग से.

यह अलग बात है कि उस पर जमीनों पर जबरन कब्जा करने, अपहरण, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म और आर्म्स एक्ट के करीब दरजन भर केस चल रहे थे. 19 जनवरी, 2017 को मुनव्वर को एक रेप केस में जेल जाना पड़ा. मुनव्वर के जेल जाने से इशरत और बच्चे परेशान रहने लगे. ऐसे समय में इस परिवार के काम आया मुनव्वर का दोस्त शाहिद उर्फ बंटी. वह उन लोगों की मदद भी करता था और मुनव्वर के केस की पैरवी भी. इसी बीच बंटी ने सिनेमाघर में फिल्म ‘दृश्यम’ देखी, जिसे देख कर उस दिमाग घूम गया. उस ने अपने औफिस में बैठ कर इस फिल्म को 4-5 बार टीवी पर देखा और मुनव्वर के परिवार को मिटाने की फूलप्रूफ योजना बना डाली, ताकि उस की करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन सके.

शाहिद मेरठ का रहने वाला था, वहां उस के पिता का लोहे और स्टील के गेट बनाने का कारखाना था. उस ने मेरठ के ही 5 पेशेवर हत्यारों फिरोज, जुल्फिकार, जावेद, उस के भाई वाहिद और जसवंत को 3 लाख रुपए देने की बात कह कर हत्याएं करने के लिए तैयार किया. उन्हें योजना भी बता दी गई. शाहिद का चूंकि मुनव्वर के घर आनाजाना था और वह इशरत को बहन मानता था, इसलिए उस के लिए यह काम मुश्किल नहीं था. 20 अप्रैल को मुनव्वर के बच्चों की परीक्षाएं खत्म हुईं.

21 अप्रैल, 2017 को बंटी अपनी एसएक्स4 कार से मुनव्वर के घर पहुंचा. उस ने सोनिया उर्फ इशरत से कहा कि वह सहारनपुर जा रहा है, वह चाहे तो उसे उस की मांबहनों से मिलवा लाएगा. शादी के बाद इशरत कभी मायके नहीं गई थी, हां, मां और बहनों से फोन पर बात जरूर कर लेती थी. वह तैयार हो गई, लेकिन जवान बेटियों को वह अकेले छोड़ कर नहीं जाना चाहती थी. उस ने बेटों आकिब और शाकिब को घर पर छोड़ा और दोनों बेटियों आरजू और अर्शिता को साथ ले लिया.

बहन से मिलने के बाद 22 अप्रैल को इशरत बंटी के साथ दिल्ली लौटने लगी. तब तक रात हो गई थी. रास्ते में बंटी को दीपक मिला तो उस ने उसे भी कार में बैठा लिया.  रात साढ़े 11 बजे सभी दौराला के समोली गांव पहुंचे. वहीं से बंटी कार को अख्तियारपुर के जंगल में 3 किलोमीटर अंदर ले गया. इशरत ने वजह पूछी तो उस ने कह दिया कि हाइवे पर जाम मिलता है, यह शौर्टकट है. काली नदी के किनारे पहुंच कर बंटी ने कार रोक दी. जुल्फिकार, फिरोज, जावेद और वाहिद वहां पहले से ही मौजूद थे. उन लोगों ने इशरत और उस की दोनों बेटियों आरजू और अर्शिता को कार से बाहर निकाल कर गोली मार दी. इन लोगों ने वहां पहले ही 10 फुट गहरा गड्ढा खोद रखा था, जिस में तीनों की लाशें दफना दी गईं. गड्ढे के ऊपर घास डाल दी गई.

आकिब और शाकिब मां को फोन मिलामिला कर थक गए थे, लेकिन फोन नहीं मिल रहा था. 23 अप्रैल को मांबहनों का पता करने के लिए मुनव्वर का छोटा बेटा शाकिब कमल विहार स्थित बंटी के औफिस पहुंचा. वहां पर दीपक, जुल्फिकार और फिरोज वगैरह बैठे थे. उन्होंने शाकिब के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और उस के हाथपैर बांध कर उसे औफिस में डाल दिया. इस के बाद बंटी ने फोन कर के आकिब को भी वहीं बुला लिया. उस का भी यही हश्र किया गया. कई घंटे तक इसी तरह से पड़े रहने से दोनों भाई मर गए.

दोनों बच्चों की लाशें ठिकाने लगाने के लिए बंटी ने औफिस का फर्श खुदवा कर 3-4 फुट गहरा गड्ढा खुदवाया और दोनों की लाशों पर नमक डाल कर दफन कर दिया. ऊपर से फिर से फर्श बनवा दिया गया. चूंकि बंटी इस परिवार का करीबी था, इसलिए कई दिनों तक लापता परिवार को ढूंढने का ढोंग करता रहा. बाद में उस ने जेल जा कर यह बात मुनव्वर को बताई. मुनव्वर के कहने पर उस ने परिवार के गायब होने की बात कह कर 17 मई, 2017 को उसे पैरोल पर जेल से बाहर निकलवा लिया. बाहर आ कर मुनव्वर ने बंटी के उसी औफिस में बैठ कर परिवार को ढूंढने की योजना बनाई, जहां उस के बेटे दफन थे.

अगले दिन बंटी मुनव्वर को साथ ले कर थाना बुराड़ी पहुंचा और उस के परिवार के गायब होने की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुपारीकिलर बुराड़ी में ही ठहरे थे. 20 मई की सुबह बंटी मुनव्वर के घर पहुंच गया. बाद में जुल्फिकार, जावेद और फिरोज भी वहां पहुंच गए. मुनव्वर उन्हें जानता था. इन लोगों ने मुनव्वर को 3 गोलियां मार कर उस की हत्या कर दी. शाम को बंटी ने जानबूझ कर मुनव्वर के मोबाइल पर 3-4 काल कीं, लेकिन वह तो मृत पड़ा था. शाहिद उर्फ बंटी ने खेल तो बहुत सोचसमझ खेला, मोबाइल का इस्तेमाल भी नहीं किया लेकिन बदमाशों को किए गए उस के फोन ने पोल खोल दी और पूरे परिवार के हत्यारे पकडे़ गए. सब की लाशें भी बरामद हो गईं. Crime Story

Crime Story : फेसबुक की दोस्ती- जान का जंजाल

Crime Story : सोशल साइटों ने देशविदेश की दूरियां मिटा कर कितने ही दिलों को जोड़ा है. लेकिन सोशल साइटों से बने संबंधों के नतीजे हमेशा अच्छे ही निकलें, यह जरूरी नहीं है. रितेश संघवी और सोशलाइट वेंडी अल्बानो के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. सोशल साइटों पर दोस्ताना संबंध बनाते वक्त क्या सावधानी बरतना जरूरी नहीं है?

बैंकाक के जिला वात्ताना के शहर ख्लोंग तोई के सुखुमवित रोड नंबर 11 पर स्थित फाइवस्टार होटल फ्रेजर के मैनेजर 3 बजे के करीब होटल के रिसैप्शन पर खड़े कुछ कस्टमर्स से बातें कर रहे थे, तभी होटल के एक वेटर ने उन के पास आ कर बताया कि 17वीं मंजिल के कमरा नंबर 1701 का दरवाजा सुबह से बंद है. काफी कोशिशों के बाद भी न तो उस कमरे के कस्टमर ने दरवाजा खोला और न ही अंदर कोई प्रतिक्रिया हुई. होटल के उस कमरे के बारे में रिसैप्शन से जानकारी ली गई तो पता चला कि उस कमरे में एक अमेरिकी महिला एक भारतीय युवक के साथ ठहरी है.

Crime Story

दोनों पिछले 4 दिनों से उस कमरे में ठहरे थे. रिसैप्शनिस्ट ने होटल मैनेजर को यह भी बताया कि दोनों सुबह अकसर घूमनेफिरने के लिए बाहर निकल जाते थे तो शाम को काफी देर से लौटते थे. लेकिन उस दिन वे वापस नहीं लौटे थे. होटल के रजिस्टर में उन के बाहर आनेजाने की कोई एंट्री भी नहीं थी. इस का मतलब दोनों होटल के कमरे में ही थे. होटल के कमरे में होने के बावजूद उन दोनों ने न तो कमरे का दरवाजा खोला था और न ही अभी तक होटल की कोई सेवा ली थी. यह बात होटल के मैनेजर और उन के स्टाफ की समझ में नहीं आई. होटल मैनेजर कुछ कर्मचारियों को साथ ले कर 17वीं मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंचे.

कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंच कर मैनेजर और रिसैप्शनिस्ट ने भी कमरे की डोरबेल बजाई, दरवाजा खटखटाया. इंटरकौम पर रिंग दी, आवाजें दीं. लेकिन कमरे के अंदर कोई हलचल नहीं हुई. इस से मैनेजर और कर्मचारियों के मन में तरहतरह की आशंकाएं होने लगीं. उन्हें लगा कि कमरे के अंदर कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. कोई रास्ता न देख मैनेजर ने कमरे की दूसरी चाबी मंगवाई. दरवाजा खोल कर जब वे कमरे में दाखिल हुए तो वहां का दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए. कमरे के बाथरूम में महिला कस्टमर का शव औंधे मुंह पड़ा था. शव के आसपास ढेर सारा खून फैला था. उस का साथी कस्टमर कमरे से गायब था.

होटल फ्रेजर बैंकाक का जानामाना होटल है. इस होटल में पहली बार इस तरह की घटना घटी थी, इसलिए होटल का सारा स्टाफ परेशान हो उठा. जाहिर तौर पर यह हत्या का मामला था. होटल मैनेजमेंट ने इस मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस को दे दी. लुंपीग थाने की पुलिस ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया. पुलिस चंद मिनटों में ही घटनास्थल पर पहुंच गई. बाथरूम में औंधे मुंह पड़ी अमेरिकी महिला को उठा कर सीधा किया गया तो पता चला कि उस के सीने और पेट पर कई गहरे घाव थे. हत्यारे ने उस की हत्या बड़ी बेरहमी से की थी. घटनास्थल और मृतका के शव का निरीक्षण करने के बाद लुंपीग थाने की पुलिस ने होटल मैनेजमेंट से पूछताछ की तो पता चला कि जिस कमरे में यह घटना घटी थी, उस कमरे की बुकिंग औनलाइन कराई गई थी.

कस्टमर ने 9 फरवरी, 2012 की शाम 5 बजे होटल आ कर कमरे की चाबी ली थी. कमरे की चाबी लेते समय महिला ने होटल के रजिस्टर में अपना नाम वेंडी अल्बानो और साथ आए युवक का नाम रितेश संघवी लिखवाया था. कमरे की तलाशी लेने पर मृतका वेंडी अल्बानो के समान में उस का पासपोर्ट, लैपटौप और मोबाइल फोन तो मिला, लेकिन उस के साथी रितेश संघवी का कोई सामान वहां नहीं मिला. इस से स्पष्ट हो गया कि रितेश संघवी अल्बानो की हत्या कर के फरार हो गया था. इसीलिए उस ने अपना कोई सुबूत भी वहां नहीं छोड़ा था.

होटल के रजिस्टर और मृतका के पासपोर्ट से जानकारी मिली कि वह फ्लोरिडा, अमेरिका की रहने वाली थी. रितेश संघवी कहां का रहने वाला था, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. लेकिन इस के लिए लुंपीग पुलिस को अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ी. रितेश संघवी का बायोडाटा वेंडी अल्बानो के मोबाइल फोन और लैपटौप में मिल गया. वेंडी के मोबाइल फोन और लैपटौप पर उस के फेसबुक पर जाने से रितेश संघवी की पूरी प्रोफाइल खुल कर सामने आ गई. यह भी पता चल गया कि वह मुंबई का रहने वाला था. रितेश के प्रोफाइल, होटल के कर्मचारियों के बयानों और सीसीटीवी कैमरे की फुटेज को देख कर उस की शिनाख्त हो गई. मृतका वेंडी अल्बानो के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद लुंपीग पुलिस थाने लौट आई.

घटना की प्राथमिक औपचारिकता पूरी करने के बाद लुंपीग पुलिस ने वेंडी एस. अल्बानो की हत्या की सारी कडि़यां जोड़ीं और इस मामले की जानकारी अमेरिका की एफबीआई और भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई को दे कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई का दबाव देख कर सीबीआई ने इस मामले को गंभीरता से लिया. सीबीआई ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से रितेश संघवी का गिरफ्तारी का वारंट जारी करवा कर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी.

रितेश संघवी चूंकि मुंबई का रहने वाला था, इसलिए सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी का वारंट मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह को भेज दिया. सत्यपाल सिंह ने यह वारंट क्राइम ब्रांच (सीआईडी) के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर हिमांशु राय को सौंप दिया. हिमांशु राय ने रितेश संघवी की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा को सौंप दी. इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने निर्देश पर रितेश संघवी की तेजी से तलाश शुरू हो गई. उस के हर उस ठिकाने पर छापे मारी की गई, जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी. लेकिन यह कवायद साइबर सेल के काम नहीं आई.

इस पर साइबर सेल ने रितेश संघवी के घर वालों से पूछताछ की. उन लोगों ने उस की एक अलग ही कहानी बताई. उन के बताए अनुसार, रितेश संघवी 8 फरवरी 2012 से लापता था. घर से निकलते वक्त वह महाबलेश्वर जाने की बात कह कर गया था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. जब वे उसे हर जगह तलाश कर के थक गए तो 13 फरवरी 2012 की शाम 6 बजे डीवी मार्ग के पुलिस थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करवा दी थी. सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने अपने स्टाफ के साथ बड़े उत्साह से रितेश संघवी की खोज शुरू की थी, लेकिन यह जानने के बाद उन का जोश ठंडा पड़ने लगा. साइबर सेल के भरपूर प्रयासों के बाद भी रितेश संघवी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. धीरेधीरे समय निकलता जा रहा था.

मुखबिरों का नेटवर्क भी फेल होता नजर आ रहा था. इस के पहले कि वह रितेश संघवी तक पहुंच पातीं अथवा नए सिरे से मामले की तफ्तीश शुरू करतीं, मुंबई पुलिस में एक बड़ा फेर बदल हो गया. जिस के चलते रितेश संघवी का मामला दब सा गया. दरअसल, मुंबई पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह अपने पद से इस्तीफा दे कर राजनीति में चले गए थे. उन की जगह मुंबई के नए पुलिस कमिश्नर के रूप में राकेश मारिया की नियुक्ति हुई. राकेश मारिया कई सालों तक मुंबई क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रह चुके थे. उन्होंने तमाम पेचीदा मामलों को सुलझाया था.

इस बीच रितेश संघवी के मामले को 19 महीने बीत चुके थे. इस केस में कोई प्रगति न होते देख बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई ने भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई पर दबाव बनाया. चूंकि बात एक अमेरिकन महिला की हत्या की थी, इस लिए अमेरिका के काउंसलर ने सिंघवी की गिरफ्तारी के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुंबई के मुख्यमंत्री को पत्र भेजा. जब मुंबई के पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया पर कई तरफ से दबाव पड़ा तो उन्होंने इस मामले की तफ्तीश की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को सौंप दी.

के.एम. प्रसन्ना ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने इस केस से जुड़ी सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की जांच अधिकारी शालिनी शर्मा को अपने औफिस बुला कर पूरे मामले और अब तक की तफ्तीश को समझा. केस की बारीकियों पर विचारविमर्श करने के बाद उन्होंने शालिनी शर्मा को मामले की तफ्तीश नए सिरे से शुरू करने को कहा. इतना ही नहीं, उन्होंने उन की मदद के लिए एक स्पेशल टीम का भी गठन किया. इस स्पेशल टीम में उन्होंने अपने स्टाफ के 4 अनुभवी अफसरों को नियुक्त किया. वे थे क्राइम ब्रांच यूनिट 1 के असिस्टैंट इंसपेक्टर कुंभार, कांस्टेबल जगदाले, यूनिट 2 के इंसपेक्टर प्रकाश कोकणे और कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा. सीआईडी और क्राइम ब्रांच की नई टीम ने इस मामले को अपनी नाक का सवाल बना कर काररवाई शुरू की तो 15 दिनों में रितेश सिंघवी पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

दरअसल, क्राइम ब्रांच की इस टीम ने अपनी तफ्तीश में रितेश के परिवार और उस के दोस्तों को रखा. वजह यह थी कि इस टीम को रितेश संघवी की गुमशुदगी की बात झूठी लग रही थी. कारण यह कि रितेश संघवी को गायब हुए 2 साल के करीब हो गए थे, पर उस के परिवार और उस के दोस्तों के चेहरों पर किसी तरह की शिकन तक नहीं थी. यही सोच कर जांच टीम ने उस के 4-5 करीबी दोस्तों को जांच के दायरे में लिया. जांच टीम उन लोगों के मोबाइल फोन, फेसबुक और बैंक एकाउंट्स पर नजर रखने लगी. जांच अधिकारियों ने जब उन के फेसबुक, वाट्सऐप और बैंक के एकाउंटों की गहराई से जांचपड़ताल की तो पता चला कि रितेश संघवी के गायब होने के कुछ दिनों बाद ही उस के दोस्तों के एकाउंट से उस के एकाउंट में लगभग ढाई लाख रुपए ट्रांसफर हुए थे.

ट्रांसफर हुए रुपए कुछ दिनों के बाद रितेश संघवी के एकाउंट से निकाल लिए गए थे. ये रुपए कहां गए थे, जब इस की जांच की गई तो पता चला कि सारे रुपए गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र की बैंकों से निकाले गए थे. इस से यह बात साफ हो गई कि रितेश संघवी गोवा स्थित परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कहीं छिपा हुआ था. लेकिन वह कहां छिपा था, यह पता लगाना समुद्र में मोती ढूंढ़ने की तरह था. फिर भी जांच टीम ने हिम्मत नहीं हारी. पुलिस टीम गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में जा कर वहां के होटलों और दुकानों में उस का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछताछ करने लगी.

पुलिस टीम जब परभणी गंगाखेड़ इलाके की गलियों में रितेश संघवी की तलाश में खाक छान रही थी, तभी कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा के मोबाइल पर एक मैसेज आया. यह मैसेज उन के एक मुखबिर का था. उस ने मैसेज में बताया कि रितेश संघवी परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान चला रहा है. मैसेज में इस बात का भी जिक्र था कि रितेश ने अपना नाम और हुलिया बदल कर उसी इलाके में रंजीत के नाम से किराए का मकान ले रखा है. इस सूचना से जांच टीम के सदस्यों के चेहरों पर चमक आ गई. टीम ने कावेरी नाम की उस मोबाइल शौप को खोज निकाला. वहां रितेश संघवी उर्फ रंजीत मिल गया तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

उस के गिरफ्तार होते ही जांच टीम ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को दे दी. 28 सितंबर, 2014 को जांच टीम ने गिरफ्तार अभियुक्त रितेश संघवी को मुंबई ला कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश कर दिया. एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना ने उस से खुद विस्तृत पूछताछ की. 25 वर्षीय रितेश नरपतराज संघवी स्वस्थ, सुंदर और स्मार्ट युवक था. वह महानगर मुंबई के ग्रांट रोड पर अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ रहता था. उच्चशिक्षित और मिलनसार स्वभाव के रितेश संघवी का स्टेनलैस स्टील का कारोबार था, जिसे वह अपने पिता के साथ चलाता था. खुले विचारों का रितेश नए जमाने के साथ चलने में यकीन रखता था.

उस ने अपना प्रोफाइल फेसबुक और वाट्सऐप पर डाल रखा था. वह फेसबुक और वाट्सऐप पर नएनए दोस्त बना कर उन के साथ चैटिंग किया करता था. करीब 4 साल पहले 2010 के अंत में एक दिन उस ने अपना एकाउंट खोला तो उस में कई लोगों की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई हुई थी. रितेश संघवी ने उन की रिक्वेस्ट पढ़ कर उन्हें स्वीकार कर लिया. इस के बाद वह उन लोगों द्वारा पोस्ट किए गए कमेंट्स को पढ़ने लगा. तभी उस के पास एक विदेशी महिला का औनलाइन मैसेज आया. उस महिला ने अपना नाम वेंडी एस. अल्बानो बता कर लिखा था कि उस ने उस का प्रोफाइल देखा, जो उसे बहुत अच्छा लगा. वह उस से फ्रैंडशिप करना चाहती है.

रितेश संघवी को उस विदेशी महिला का मैसेज पढ़ कर खुशी हुई. लेकिन कोई जवाब देने से पहले उस ने उस का प्रोफाइल चैक कर लेना ठीक समझा. उस ने जब अल्बानो का प्रोफाइल देखा तो चौंका. वह अमेरिका के फ्लोरिडा की रहने वाली थी. उस की उम्र 50 साल के आसपास थी और उस की 2 शादियां हो चुकी थीं. साथ ही उस की 2 बेटियां भी थीं, जिन की शादी हो चुकी थी. बेटियां अपने पति के साथ रहती थीं. अल्बानो के पहले पति की एक रोड ऐक्सीडेंट में मौत हो गई थी तो दूसरे पति से उस ने तलाक ले लिया था. वह अपने घर में अकेली ही रहती थी. अपने से दोगुनी उम्र की वेंडी अल्बानो की यह रिक्वेस्ट रितेश संघवी को कुछ अजीब सी लगी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

पहले तो उस के दिमाग में वेंडी अल्बानो की इस रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कर देने की बात आई. लेकिन फिर उस ने यह सोच कर उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली कि उम्र के जिस मुकाम पर वह तनहा खड़ी है, वहां उसे एक ऐसे दोस्त की जरूरत है, जिस से बातें कर के वह अपना मन बहला सके. अगर उसे दोस्त बना कर वेंडी के मन को सुकून मिलता है तो इस में बुराई क्या है? काफी सोचविचार कर रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद रितेश संघवी और वेंडी अल्बानो की औनलाइन चैटिंग शुरू हो गई. पहले दिन वेंडी अल्बानो ने खुद को पेशे से इंटीरियर डिजाइनर बताया था. वह सोशलाइट महिला थी और उस की स्वयं की एक इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी थी, जिस में कई लोग काम करते थे. रितेश संघवी वेंडी अल्बानो से काफी प्रभावित हुआ.

बदले में उस ने भी अपना बायोडाटा उसे बता दिया. इस के बाद दोनों नियमित रूप से एकदूसरे के साथ चैटिंग करने लगे. चैटिंग के जरिए दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए. दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर भी एकदूसरे को दे दिए थे, जिस से दोनों की नजदीकियां और बढ़ गई थीं. जब भी मौका मिलता था, दोनों फोन पर बातें कर लिया करते थे. इस तरह दोनों को मोबाइल पर बातें करते और फेसबुक पर चैटिंग करते लगभग 6 महीने का समय बीत गया. अब तक दोनों एकदूसरे के गहरे दोस्त बन गए थे. शुरूशुरू में रितेश संघवी का वेंडी अल्बानो से कुछ खास लगाव नहीं था. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे दोनों एकदूसरे से करीब आने के साथ खुलते गए. दोनों के बीच उम्र और मर्यादा जैसी कोई बात नहीं रह गई. दोनों एकदूसरे से खूब खुल कर हंसीमजाक करने लगे.

मार्च, 2011 में वेंडी अल्बानो रितेश संघवी को सरप्राइज देते हुए अचानक मुंबई आ गई. वह होटल ताज में ठहरी थी. उस ने रितेश संघवी को बुला कर पहली बार उस से मुलाकात की. मुंबई घूमने के बाद वह अमेरिका चली गई. इस बीच दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. रितेश संघवी को वेंडी अल्बानो का मुंबई आना, उस के साथ घूमनाफिरना और उस का व्यवहार काफी अच्छा लगा. यही हाल वेंडी अल्बानो का भी था. इस के बाद अक्टूबर, 2011 में वेंडी अल्बानो ने रितेश संघवी को फोन कर के बताया कि वह फिर से भारत आना चाहती है. इस बार उस का इरादा पूरा भारत घूमने का था. इस में रितेश को क्या ऐतराज हो सकता था. वह आई तो रितेश संघवी ने एयरपोर्ट पर जा कर उस का स्वागत किया.

घर वालों को यह बता कर कि कुछ दिनों के लिए वह एक बिजनैस पार्टी के साथ बाहर जा रहा है, रितेश वेंडी अल्बानो के साथ भारत की सैर पर निकल पड़ा. कुछ दिन भारत में गुजार कर अल्बानो अमेरिका लौट गई. वेंडी अपने घर तो पहुंच गई, पर रितेश संघवी के साथ बिताए क्षणों को वह भुला नहीं पा रही थी. वह पहली ही मुलाकात से उस से दिल लगा बैठी थी. इसी वजह से वह साल भर में 2 बार भारत आई थी और रितेश संघवी के साथ मिल कर मौजमस्ती में अपना समय बिताया था. लेकिन 9 फरवरी, 2012 का आगमन वेंडी अल्बानो के लिए उस की जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुआ. क्योंकि अगली बार वेंडी अल्बानो ने भारत न आ कर बैंकाक घूमने की योजना बनाई.

इस के लिए उस ने बैंकाक के जानेमाने होटल फ्रेजर में अपने और रितेश संघवी के ठहरने के लिए औनलाइन डबलबेड वाला कमरा बुक करवाया. इस की जानकारी उस ने रितेश संघवी को भी दे दी. यह जान कर रितेश इसलिए काफी खुश हुआ, क्योंकि बैंकाक जाने की योजना सीधे न जा कर मुंबई हो कर जाने की थी. इसीलिए उस ने रितेश संघवी को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बुला लिया था. वहां से दोनों बैंकाक चले गए. वहां होटल फ्रेजर में दोनों की पहले ही बुकिंग थी. पहले की ही तरह इस बार भी रितेश संघवी अपने परिवार वालों से झूठ बोल कर वेंडी अल्बानो के साथ बैंकाक चला गया. वह घर पर कह कर गया था कि वह एक पार्टी के साथ बिजनैस के सिलसिले में महाबलेश्वर जा रहा है, जल्दी ही आ जाएगा.

12 फरवरी, 2012 की रात वेंडी अल्बानो और रितेश संघवी के लिए काफी हसीन और रंगीन थी. उस दिन बैंकाक में घूमनेफिरने के बाद, दोनों जब अपने कमरे आए तो बहुत खुश थे. रात 10 बजे वेंडी अल्बानो ने पहले शराब पी, फिर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस ने रितेश संघवी से सैक्स की इच्छा जाहिर की. सैक्स की इच्छा पूरी होने के बाद उस ने रितेश संघवी के सामने जो प्रस्ताव रखा, उसे सुन कर उस के होश उड़ गए. उस का गला सूख गया. वह अपनी जगह से उठा और थोड़ा सा पानी पीने के बाद बोला, ‘‘यह क्या कह रही हैं आप? मेरी और आप की शादी? यह कैसे मुमकिन है. हम दोनों की उम्र में जमीनआसमान का फर्क है.

आप की 2-2 जवान बेटियां और उन के परिवार हैं. अपनी इज्जत की नहीं तो मेरे परिवार की तो सोचो, लोग क्या कहेंगे? हम दोनों की जितनी दोस्ती है, बहुत है. इस से आगे जाना ठीक नहीं है. न मेरे लिए और न आप के लिए.’’

रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो को काफी समझाया. लेकिन वह उस की एक भी बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. अब वह शादी के लिए धमकियों पर उतर आई थी. उस का कहना था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह इंडिया जा कर उस के परिवार वालों को अपने और उस के संबंधों के बारे में बता देगी. इस के साथ ही वह अपने और उस के सैक्स संबंधों को दुष्कर्म बता कर उस के खिलाफ बैंकाक पुलिस में शिकायत दर्ज करवा देगी और उसे जेल भिजवा देगी. वेंडी अल्बानो की इस धमकी से रितेश संघवी के होश उड़ गए. वह बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर उस के परिवार वालों को यह बात पता चल गई कि फेसबुक वाली अमेरिकन दोस्त से उस का अवैधसंबंध था और उसी चक्कर में वह बैंकाक पुलिस की हिरासत में है तो उन के दिलों पर क्या बीतेगी. उन की समाज में क्या इज्जत रह जाएगी. वह खुद भी किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

यह सब सोच कर रितेश मन ही मन काफी डर गया. उस ने सोचा भी नहीं था कि फेसबुक और वाट्सऐप की दोस्ती इंसान को कितनी महंगी पड़ सकती है. बहरहाल अब उसे वेंडी अल्बानो नाम की उस मुसीबत से किसी भी तरह पीछा छुड़ाना था. लेकिन कैसे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. आखिर काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने वेंडी अल्बानो से छुटकारा पाने के लिए एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. 12/13 फरवरी, 2012 की रात को जब उस ने घड़ी देखी तो सुबह के 2 बजे रहे थे. नशे में धुत वेंडी अल्बानो गहरी नींद में सो रही थी. रितेश संघवी अपने बिस्तर से उठा और रूम के किचन में जा कर फल काटने वाला चाकू उठा लाया. इस के बाद वह नशे में धुत वेंडी को उठा कर कमरे के बाथरूम में ले गया और चाकू से गोद कर उस की हत्या कर दी.

वेंडी अल्बानो को मारने के बाद उस ने अपने कपड़े वगैरह ठीक किए और अपना सामान ले कर सुबह के 4 बजे चुपचाप होटल से निकल गया. होटल से निकल कर वह सीधा बैंकाक एयरपोर्ट पहुंचा और बिजनैस क्लास का टिकट ले कर हवाई जहाज से कोलकाता आ गया. कोलकाता से घरेलू उड़ान पकड़ कर वह मुंबई स्थित अपने घर आया. घर आ कर उस ने अपने साथ घटी घटना की सारी जानकारी अपने घर वालों को दे दी. घर वालों ने उसे बचाने के लिए भागदौड़ कर के हाईकोर्ट के एक वकील से संपर्क किया. हकीकत जान कर उस वकील ने रितेश को फरार होने की सलाह दी. इस पर रितेश संघवी गोवा चला गया. रितेश के जाने के बाद उस के घर वालों ने उसी शाम 6 बजे डीवी पुलिस थाने में रितेश की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

रितेश संघवी गोवा के परभणी, गंगाखेड़ इलाके में रहने लगा. अपने परिवार और दोस्तों की मदद से उस ने अपने रहने के लिए किराए का एक मकान और बिजनैस के लिए कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान खोल ली. उस ने अपना नाम और अपना हुलिया भी बदल लिया था. काफी समय निकल जाने के बाद रितेश को यकीन हो गया था कि पुलिस अब कभी भी उस तक नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन उस के इस यकीन की दीवारें कुछ महीनों बाद ही ढह गईं. आखिर वह मुंबई क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की गिरफ्त में आ गया. रितेश संघवी की गिरफ्तारी और उस से पूछताछ करने के बाद इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा की टीम ने उसे अपनी कस्टडी में दिल्ली ला कर सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई ने उसे बैंकाक की लुंपीग पुलिस थाने की पुलिस के हवाले कर दिया.

मुंबई क्राइम ब्रांच सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और उन की स्पैशल टीम ने इस मामले को जिस सूझबूझ से सुलझाया, उस के लिए अमेरिकन कांउसलर ने उन्हें प्रशस्तिपत्र दिया. साथ ही मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने भी अपनी तरफ से इस टीम को 30 हजार रुपए का इनाम घोषित किया. Crime Story

कथा लिखे जाने तक अभियुक्त रितेश संघवी बैंकाक की जेल में बंद था.

Uttarakhand Crime : अपहरण में कैसे हुई इतनी बड़ी भूल

Uttarakhand Crime : संजय बालियान ने हर्षित के अपहरण और फिरौती की जो योजना बनाई थी, उस में वह कामयाब भी रहा. लेकिन इस पूरे मामले में भूल कहां हुई कि अपराध की सफलता का जश्न मनाने के पहले ही वह साथियों समेत पकड़ा गया. भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में सहायक निदेशक के पद पर तैनात गिरीश तायल का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पौश इलाके इंजीनियर्स एनक्लेव स्थित आलीशान कोठी में रहता था. उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी तायल के अलावा 2 बड़ी बेटियां और एक बेटा हर्षित था. गिरीश तायल की तैनाती उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर में थी, इसलिए वह कभीकभी ही घर आ पाते थे.

आर्थिक रूप से समृद्ध तायल का बेटा हर्षित शहर के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा 12 में पढ़ता था. व्यक्ति कितना भी अमीर व गरीब क्यों न हो, समय उस के साथ अपने हिसाब से ही चाल चलता है. 29 नवंबर की ठंडक भरी शाम के करीबन सवा 7 बजे का वक्त था. 18 वर्षीय हर्षित तायल स्कूटी से अपने मोबाइल को रिचार्ज कराने के लिए जीएमएस रोड की तरफ घर से निकला. गिरीश तायल उस दिन घर पर ही थे. हर्षित को घर से निकले लगभग एक घंटा हो गया. इतनी देर तक वह वापस नहीं आया तो गिरीश को उस की चिंता हुई. उन के दिमाग में यह भी  खयाल आया कि कहीं वह अपने दोस्तों के साथ बातचीत में तो नहीं लग गया.

कुछ समय और बीता तो फिक्र की डगर पर चलना उन की मजबूरी हो गई. उन्होंने उस का मोबाइल मिलाया, लेकिन पूरी घंटी जाने के बाद भी उस ने फोन नहीं उठाया. उन्होंने दोबारा फोन किया तो उस का फोन बंद मिला. इस के बाद उन्होंने जितनी बार फोन किया, हर बार उस का फोन स्विच औफ ही बताया. गिरीश तायल परेशान हो गए कि हर्षित का फोन स्विच औफ क्यों हो गया है? लड़का हो या लड़की, जब तक बाहर जाने के बाद घर न आ जाए, तब तक मातापिता को चिंता सताती है. अगले आधे घंटे तक भी हर्षित घर नहीं आया तो गिरीश ने अपने परीचितों को यह बात बताई. परिचित उन के घर आ गए और हर्षित की खोज में निकल पड़े.

घर से निकलते समय हर्षित ने जीएमएस रोड की तरफ जाने की बात कही थी, इसलिए सभी जीएमएस रोड पर स्थित बाजार पहुंचे. परंतु वह वहां कहीं दिखाई नहीं दिया. बीचबीच में सभी उस के मोबाइल पर फोन भी कर रहे थे. जब वे वापस आने लगे तो एनक्लेव के सामने सड़क किनारे खड़ी हर्षित की स्कूटी देख कर चौंके. आश्चर्य की बात यह थी कि स्कूटी का लौक खुला था. गिरीश तायल ने इधरउधर देखा. हर्षित का कुछ पता नहीं था. चौंकाने वाली एक और बात यह थी कि हर्षित की चप्पलें भी वहीं पड़ी थीं. यह देख कर गिरीश व उन के परिचितों का दिल अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा.

गिरीश हताशपरेशान थे. करीब आधा घंटे बाद उन्होंने फिर से बेटे का मोबाइल नंबर मिलाया. घंटी गई तो गिरीश की परेशानी थोड़ा कम हुई. उन्हें लगा कि अब बेटे से बात हो कर वास्तविक स्थिति पता चल जाएगी. लेकिन इस बार भी घंटी बजने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया गया. बुरे खयालों का तूफान गिरीश को परेशान करने लगा. घर में विचारविमर्श के बाद गिरीश थाना बसंत विहार पहुंचे और थानाप्रभारी प्रदीप चौहान से बेटे के लापता होने की बात बताई. उन की शिकायत पर पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया. मामला एक अधिकारी के बेटे के लापता होने का था. थानाप्रभारी ने एसएसपी अजय रौतेला व एसपी (सिटी) अजय सिंह को भी बच्चे के गायब होने की बात बता दी.

एसएसपी ने थानाप्रभारी को जरूरी काररवाई के निर्देश दे कर उन के साथ स्पेशल औपरेशन गु्रप (एसओजी) की टीम को भी लगा दिया. एसओजी प्रभारी रवि कुमार व सबइंस्पेक्टर मुकेश त्यागी मामले की जांच में जुट गए. गिरीश तायल थाने से घर लौटे ही थे कि उन के मोबाइल की घंटी बजी. फोन हर्षित का था. उन्होंने जल्दी से रिसीव किया, ‘‘हैलो बेटा हर्षित, तुम कहां हो, क्या हुआ?’’

दूसरे ही पल तायल को झटका लगा. उधर से आवाज हर्षित की नहीं, बल्कि किसी और की थी, उस ने भारीभरकम आवाज में कहा, ‘‘आप का प्यारा बेटा नहीं, हम बोल रहे हैं.’’

‘‘कौन हो तुम और मेरा बेटा कहां है? वह ठीक तो है न?’’ गिरीश ने घबरा कर पूछा.

‘‘इतने सवालों का जवाब तो हम एकसाथ नहीं दे सकते.’’ कुछ पल रुक कर फोनकर्ता बोला, ‘‘आप इतना समझ लो कि अभी तक आप का बेटा बिलकुल सेफ है. उसे आगे भी सेफ रखना है या नहीं, यह आप मुझे बता देना. हम क्या चाहते हैं, यह बाद में फोन कर के बता देंगे. फिलहाल तुम इतना जान लो कि पुलिस के चक्कर में ज्यादा मत पड़ना, वरना…’’ इस के बाद उस ने फोन काट दिया. अब गिरीश व उन के घर वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उन के बेटे का अपहरण हो चुका है. घर वाले इस बात को ले कर परेशान हो रहे थे कि पता नहीं हर्षित किस हाल में होगा.

हर्षित रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुआ था. मामले की जांच के लिए पुलिस टीम भी उन के यहां पहुंच गई थी. गिरीश की अपहर्ता से जो बात हुई थी, पुलिस को नहीं बताई. इसी बीच हर्षित के मोबाइल से दोबारा फोन आया. गिरीश फोन ले कर पुलिस से हट कर दूसरे कमरे में चला गया. उस ने पूछा, ‘‘कैसा है मेरा बेटा?’’

‘‘वह बिलकुल ठीक है. अगर उसे ठीक देखना है तो हमें 5 करोड़ रुपए दे दो.’’

‘‘क…क…क्या..?’’ तायल के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह बोले, ‘‘मेरे पास इतने रुपए पूरे जन्म में भी नहीं होंगे.’’

‘‘कैसी बात करते हो इंजीनियर साहब, माल तो बहुत कमाया है तुम ने.’’

‘‘तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है. मैं कोई इंजीनियर नहीं हूं. मैं तो बीएसएनएल में हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ फोनकर्ता चौंका.

‘‘हां, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. इतनी रकम मैं भला कहां से लाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, तुम्हें दोबारा फोन करता हूं.’’ फोन कट गया. गिरीश को लग रहा था कि गलतफहमी के चलते उन के बेटे का अपहरण हुआ है. उन की आशंका सही साबित हुई. जब फोन दोबारा आया तो उस ने कहा, ‘‘हम ने पता किया है कि आप इंजीनियर नहीं हैं, लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. इतना जान लो कि रकम मोटी चाहिए. पुलिस के चक्कर में मत पड़ना, वरना उस की जान हमारे हाथ में है. पैसा कब और कहां पहुंचाना है, बाद में वाट्सऐप पर बता देंगे.’’

इतना कह कर अपहर्त्ता ने फिर फोन काट दिया. इस दौरान एसएसपी अजय रौतेला व एसपी भी तायल के घर पहुंच गए थे. तब तायल ने दबी जुबान से पुलिस को बता दिया कि हर्षित का अपहरण कर लिया गया है और करोड़ों रुपए की फिरौती मांगी जा रही है. पुलिस के लिए मामला बेहद गंभीर था. एसएसपी ने आला अधिकारियों को सनसनीखेज घटना की जानकारी दे दी. सूचना मिलते ही अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) राम सिंह मीणा व डीआईजी संजय गुंज्याल ने एसएसपी से मंत्रणा की. अधिकारियों ने हर्षित के घर वालों से भी बात की, लेकिन उन के रवैये ने पुलिस को निराश कर दिया. वह पुलिस को सहयोग करने को तैयार नहीं थे.

इस के बावजूद भी पुलिस ने अपने हिसाब से काररवाई करने का फैसला किया. पुलिस ने गुमशुदगी के मामले को अपहरण में बदल दिया. हर्षित के अपहरण की बात धीरेधीरे दबी जबान से खुली तो अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बन गई. उत्तराखंड में फिरौती के लिए बड़ी वारदात थी. कानूनव्यवस्था को ले कर भी सवाल उठ रहे थे. प्रदेश की राजधानी से मामला जुड़ा होने के चलते मुख्यमंत्री हरीश रावत के संज्ञान में भी मामला आ गया. उन्होंने पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू को अविलंब कार्रवाई करने के साथ ही हर्षित की सकुशल रिहाई के निर्देश दिए.

एडीजी राम सिंह मीणा के निर्देश पर हर्षित की बरामदगी के लिए पुलिस दलों का गठन का निर्णय लिया गया. पुलिस, एसटीएफ व एसओजी की टीमें जांच में जुट गईं. एसटीएफ टीम की कमान उस के एसएसपी डा. सदाकांत दाते ने संभाली. पुलिस टीम में सीओ (सिटी) मनोज कत्याल व कई थानाप्रभारियों के अलावा दरजन भर से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. पुलिस अपने काम में लग चुकी थी. पुलिस ने गिरीश को भी किसी तरह सहयोग करने के लिए तैयार कर लिया. पुलिस ने हर्षित के मोबाइल की लोकेशन हासिल की तो वह हरिद्वार की निकली. उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. इस से साफ था कि अपहर्त्ता उसे हरिद्वार ले गए हैं.

एक पुलिस टीम हरिद्वार के लिए रवाना कर दी गई. इस बीच अपहर्ता अलगअलग नंबरों से गिरीश तायल से बात करते रहे. अपहर्ताओं ने हर्षित का एक विडियो भी तायल को भेजा. वीडियो में वह बेहद डरा हुआ था और खुद को बचाने की गुहार कर रहा था. पुलिस को अपहर्त्ताओं की लोकेशन कभी देहरादून, कभी हरिद्वार, कभी सहारनपुर तो कभी मुजफ्फरनगर जिले की मिल रही थी. सभी जगह पुलिस टीमें भेज दी गई थीं. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि अपहर्त्ता बेहद चालाक थे और वह हर काल के बाद सिम कार्ड बदल देते थे. मोबाइल नंबरों के जो पते मिल रहे थे, वे सब फरजी निकल रहे थे.

फिरौती को ले कर अपहर्त्ता गिरीश तायल से सौदेबाजी करने लगे. तायल के गिड़गिड़ाने के बाद किसी तरह बात 34 लाख रुपए पर तय हो गई. डील पक्की हो जाने के बाद अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘सारी रकम हजार के नोटों में होनी चाहिए और उसे लाल रंग के सूटकेस में लाना. पैसे कहां पहुंचाने हैं, हम बाद में बता देंगे.’’

इस के बाद तायल ने इधरउधर से उधार ले कर व आभूषण बेच कर फिरौती की रकम का इंतजाम कर लिया और वे पैसे लाल रंग के एक सूटकेस में रख लिए. शाम के समय फिर अपहर्त्ताओं का फोन आया, ‘‘इंतजाम हुआ?’’

‘‘हो गया.’’

‘‘ठीक है, तुम रात को रेलवे स्टेशन से लाहौरी एक्सप्रैस से हरिद्वार की तरफ चलना. रास्ते में हम तुम्हें बता देंगे कि सूटकेस कहां फेंकना है. तुम अकेले ही आओगे. तुम्हारे साथ कोई दूसरा नहीं होना चाहिए.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगा.’’

अपहर्त्ता बेहद चालाकी बरत रहे थे और कई फोन का इस्तेमाल अलगअलग इलाकों से कर रहे थे. इस से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए थे. पुलिस की योजना थी कि फिरौती लेते समय अपहर्ताओं को दबोच लेंगे, लेकिन वह फिरौती लेने का अलग ही तरीका अपना रहे थे. पुलिस महानिदेशक राम सिंह मीणा भी पुलिस औपरेशन पर बराबर नजर रख रहे थे. डीआईजी संजय गुंज्याल की नजर सर्विलांस पर थी, जबकि एसएसपी अजय रौतेला व एसटीएफ के एसएसपी डा. सदाकांत के निर्देशन में पुलिस टीमें काम कर रही थीं.

पुलिस किसी भी तरह हर्षित की सकुशल बरामदगी के साथ अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. पुलिस टीमों ने वाट्सऐप पर अपना एक ग्रुप बना लिया, ताकि एकदूसरे को सूचना आदि शेयर की जा सके. सादी वरदी में पुलिसकर्मियों को रेलवे स्टेशन के अलावा लाहौरी एक्सपे्रस के कोच में तैनात करने का निर्णय लिया गया. ऐसा भी हो सकता था कि अपहर्त्ता स्टेशन पर ही फिरौती वसूल कर लेते. शाम के समय तायल स्टेशन पहुंच गए. रात्रि 1 बजे वह लाहौरी एक्सप्रैस में सवार हो गए. उसी डिब्बे में तायल से दूरी बना कर सादी वरदी में पुलिस टीम सीओ मनोज कात्याल के नेतृत्व में सवार हो गई. रेल ने रफ्तार पकड़ी तो अपहर्त्ता ने तायल को फोन किया,

‘‘मोतीचूर रेलवे स्टेशन के पास एक रेलवे पुल आएगा. वहां हम टौर्च की रोशनी दिखाएंगे. तुम्हें सूटकेस बाईं तरफ नीचे फेंकना है.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन मेरा बेटा…’’

‘‘वह कल सुबह सकुशल तुम्हें मिल जाएगा. कोई भी चालाकी नहीं, समझे.’’ अपहर्त्ता ने गुर्रा कर कहा.

‘‘कुछ देर में रेलवे पुल आया. गिरीश तायल ने डिब्बे के गेट पर जा कर बाहर की तरफ देखा. उन्हें हाथ से हिलती हुई टौर्च की रौशनी का संकेत नजर आया तो उन्होंने सूटकेस नीचे फेंक दिया. यह इलाका सुनसान था. अंधेरा इतना था कि कोई दिखाई नहीं दिया. सूटकेस फेंकने के बाद सूटकेस फेंकने की बात उन्होंने अपहर्त्ता को बता दी.

उधर टे्रन में बैठे सीओ ने यह बात एसएसपी को बताई. चूंकि पुलिस टीम वाट्सऐप पर एकदूसरे से संपर्क में थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर आननफानन में पुलिसकर्मी वहां पहुंचे, लेकिन तब तक सूटकेस कोई ले जा चुका था. तायल हरिद्वार जा कर रेल से उतर गए और वापस घर आ गए. पुलिस की सर्विलांस टीम अपहर्त्ताओं के फोन नंबरों के सहारे उन के पास तक पहुंचने की कोशिश में लगी थी.

अगली सुबह यानी पहली दिसंबर को तड़के तायल के पास एक अंजान नंबर से फोन आया. उन्होंने रिसीव किया तो दूसरी तरफ से हर्षित की आवाज आई. उस की आवाज सुनते ही तायल खुश हो गए. तायल ने उस से बात की तो उस ने बताया कि उसे अपहर्त्ताओं ने 5 बजे हरिद्वार सब्जी मंडी के पास छोड़ दिया था. वहां से पैदल चल कर वह एक चाय वाले के पास पहुंचा और उस से मोबाइल मांग कर उस ने उन्हें फोन किया. बेटे से बात करने के बाद वह पुलिस व घर वालों के साथ उस के पास पहुंच गए. बेटे को सकुशल पा कर तायल खुश थे. हर्षित की रिहाई सकुशल हो गई थी. अब पुलिस को अपहर्त्ताओं तक पहुंचना था. अपहर्त्ताओं ने जितने भी नंबरों का इस्तेमाल किया था, वे सभी नंबर सर्विलांस पर थे.

सभी नंबर बंद हो गए, लेकिन उन्होंने उन मोबाइलों में जो नए सिम डाले, वे पकड़ में आ गए. पुलिस को उन की लोकेशन हरिद्वार के जगजीतपुर की मिल रही थी. एसएसपी अजय रौतेला ने हरिद्वार की एसएसपी स्वीटी अग्रवाल से संपर्क कर सहयोग मांगा तो स्वीटी अग्रवाल ने जिला पुलिस की एक टीम को देहरादून पुलिस के साथ लगा दिया. लोकेशन के सहारे पुलिस टीमें एक घर तक पहुंच गईं. पुलिस के दस्तक देने पर एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला. पुलिस को अपने सामने देख कर उस व्यक्ति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

‘‘रकम का बंटवारा हो गया या अभी बाकी है.’’ उस व्यक्ति को घूरते हुए पुलिस ने पूछा और अंदर दाखिल हो गई. घर के अंदर अन्य लोग भी थे. अपने सामने पुलिस को देख कर सभी की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई थी. उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने सभी 5 अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. उन में एक युवती भी थी. अपहर्त्ताओं में हरिद्वार के जगजीतपुर निवासी संजय बालियान, उस का बेटा आशीष, बेटी मीनाक्षी, गुरदासपुर, पंजाब का आशी डेनियल व अमृतसर निवासी सरनजीत सिंह शामिल थे.

आशीष देहरादून में ही एक अस्पताल में फार्मासिस्ट था, जबकि सरनजीत सिंह देहरादून में ठेकेदरी के काम में मुंशी था. प्राथमिक पूछताछ के बाद अपहर्त्ताओं के पास से पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गईं 2 कारें, 6 मोबाइल फोन व फिरौती की रकम भी बरामद कर ली. एक और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि संजय बालियान ने वारदात में अपनी बेटी मीनाक्षी व बेटे आशीष को भी शामिल किया था. पुलिस सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई. देहरादून पुलिस के लिए निस्संदेह यह बड़ी सफलता थी. अधिकारियों ने अपहर्त्ताओं से विस्तृत पूछताछ की तो हर्षित के अपहरण की बड़ी ही दिलचस्प कहानी सामने आई.

दरअसल, मुख्य आरोपी संजय बालियान सरकारी विभागों में ठेकेदारी करता था. वह मूलरूप से जनपद मुजफ्फरनगर के गांव किचौरी शाहपुर का रहने वाला था, लेकिन कई सालों से हरिद्वार में रहने लगा था. उस ने देहरादून व हरिद्वार के कई विभागों में सड़क, शौचालय व छोटेमोटे कामों की ठेकेदारी करने के साथ ही प्रौपर्टी का काम भी शुरू कर दिया. इन कामों में उस ने काफी पैसा कमाया. पैसा आने पर उस की लाइफस्टाइल बदल गई. वह शानोशौकत की जिंदगी जीने लगा. अपने बच्चों को भी उस ने ऐसी ही आदत डाल दी. जिस से उस के खर्चे बढ़ गए. इसी दौरान उसे ठेकेदारी में घाटा हो गया.

धंधा सही चल रहा था तो उस ने करोड़पति बनने का जो सपना देखा था, वह उसे धूमिल होता नजर आ रहा था. वक्त ने उसे ऐसे आर्थिक झटके दे दिए कि वह उन से उबर नहीं पाया. वह दिनरात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि आखिर मोटी रकम कैसे कमाई जाए. उस का व्यवहार अपने बच्चों से दोस्ताना था. उस ने उन्हें अपने तरीके से जीने की पूरी आजादी दे रखी थी. इस का नतीजा यह निकला था कि बेटा आशीष अपने अंदाज में जिंदगी जीता था और बेटी मीनाक्षी अपने अंदाज में. आशीष के कदम बहक चुके थे. उस के अपने आवारा दोस्तों की मंडली थी. संजय के दिमाग में हर वक्त कोई लंबा हाथ मार कर रातोंरात करोड़पति बनने की ख्वाहिश हिलोरें लेती रहती थीं.

एक बार उस के दिमाग में विचार आया कि क्यों न किसी अमीर बाप के बेटे का अपहरण कर लिया जाए. इस काम में उस ने अपने बेटाबेटी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन हम अपहरण करेंगे किस का?’’ आशीष बोला.

‘‘मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूं, जिस ने मोटा माल कमा रखा है. उसी के बेटे का हम अपहरण कर लेंगे.’’ संजय बालियान ने मुसकरा कर कहा.

‘‘कौन है वह?’’

‘‘देहरादून में एक इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा. हमें उस से करोड़ों रुपए मिल सकते हैं.’’

‘‘लेकिन पापा क्या वह इस लायक होगा कि करोड़ों दे सके, क्योंकि लाखों के लिए तो काम करना बेकार है.’’‘‘वह मजबूत हैसियत वाला है. मैं ने भी उस का रसूख देखा है. देहरादून के इंजीनियर एनक्लेव में आलीशान कोठी है उस की.’’

‘‘तो क्या हम वहां से..?’’ आशीष ने जिज्ञासु बन कर पूछा तो संजय ने बताया, ‘‘हां हम यह काम देहरादून से ही करेंगे.’’

अपहरण की पृष्ठभूमि तैयार करने के बाद उन्होंने तय किया कि इस में देहरादून के भी किसी व्यक्ति को शामिल किया जाए. संजय पहले से ही अस्पताल में नौकरी करने वाले डेनियल व मुंशी सरनजीत को जानता था. डेनियल से संजय की मुलाकात अस्पताल आनेजाने के दौरान हुई थी. बाद में वह मीनाक्षी का भी दोस्त बन गया था. सरनजीत को संजय इसलिए जानता था, क्योंकि ठेकेदारी के दौरान वह मुंशी था. संजय ने बेटा, डेनियल व सरनजीत को करोड़पति बनने का सपना दिखा कर अपने साथ शामिल कर लिया. वे खुशीखुशी तैयार हो गए.

फिर सभी ने अपहरण की फूलप्रूफ योजना बना ली. योजना को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई बार बौलीवुड की फिल्में किडनैप और अपहरण देखीं. बीएससी कर रही मीनाक्षी को कंप्यूटर की अच्छी जानकारी थी. उस ने हाईटैक ढंग से पुलिस को चकराने की सोची और पुलिस के सर्विलांस सिस्टम को अच्छे से समझा. फिरौती की रकम मांगने के लिए उन्होंने कई कंपनियों के सिमकार्ड भी खरीद लिए. सभी सिम फरजी आईडी पू्रफों पर अलगअलग जिलों से लिए गए थे. पुलिस को चकमा देने के लिए हरिद्वार के अलावा देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर व छुटमलपुर जा कर फोन करने का प्लान बनाया.

इंजीनियर आर.के. राजा के बारे में संजय को ठेकेदारी करने के दौरान देहरादून में पता चल गया था कि वह बहुत अमीर है और उस का एक ही बेटा है. उस ने यह भी सुना था कि वह इंजीनियर्स एनक्लेव की किसी आलीशान कोठी में रहता है. अपहरण के लिए मीनाक्षी खुद मोहरा बनने को तैयार थी. वह कई बार देहरादून गई, लेकिन उन्होंने इंजीनियर राजा की कोठी समझ कर जिस कोठी को टारगेट किया, वह कोठी गिरीश तायल की थी. सभी रास्तों का नक्शा भी उस ने दिमाग में बैठा लिया. राजा के बेटे के रूप में उन्होंने हर्षित तायल की पहचान कर ली.

योजना को अंजाम देने के लिए सभी अकसर हरिद्वार से देहरादून जा कर सुबह दोपहर व शाम को एनक्लेव के बाहर ऐसी जगह खड़े हो जाते थे, जहां से तायल की कोठी दिखाई दे. उन की नजर में वह कोठी इंजीनियर राजा की थी. उन्होंने देखा कि हर्षित शाम को अकसर घर से बाहर निकलता है. ऐसे ही मौके पर उन्होंने उस का अपहरण करने की ठान ली. इस के लिए उन्होंने 21 नवंबर, 2014 की तारीख तय कर दी. अपहरण के लिए कार का इंतजाम जरूरी था. उन्होंने 2 कारों का इंतजाम करने की सोची. यह इसलिए सोचा कि अगर किसी एक पर शक हो जाए तो दूसरी का इस्तेमाल किया जाए.

21 नवंबर को संजय ने अपने एक परिचित से उस की सैंट्रो कार विवाह में जाने के बहाने मांग ली और देहरादून आ गया. मीनाक्षी का देहरादून में एक फेसबुक दोस्त था एहतेशाम. एहतेशाम ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर के देहरादून में अपना फाइनेंस व प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया था. उस के पास हुंडई वरना कार थी. मीनाक्षी अपने भाई के साथ उस से मिली और एक दिन के लिए उस से कार देने को कहा. एहतेशाम ने उसे इनकार नहीं किया और अपनी कार उसे खुशीखुशी दे दी. सभी लोग कारों में सवार हो कर इंजीनियर्स एनक्लेव के बाहर पहुंच गए.

शाम के वक्त हर्षित स्कूटी ले कर निकला. मीनाक्षी बाहर निकल कर खड़ी हो गई, बाकी लोग उस के वापस आने का इंतजार करने लगे. लगभग आधे घंटे बाद हर्षित फोन रिचार्ज करा कर वापस आ रहा था. जैसे ही वह एनक्लेव के बाहर पहुंचा, वहां पहले से खड़ी मीनाक्षी ने उसे हाथ दे कर रोका. हर्षित ने स्कूटी रोकी. मीनाक्षी ने दिलकश अंदाज में अपनी बात कह कर एक कागज का टुकड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘क्या आप मुझे यह पता बता देंगे?’’

हर्षित ने पता पढ़ कर कहा, ‘‘यह थोड़ा आगे पड़ेगा.’’

‘‘प्लीज, आप मुझे वहां तक छोड़ दीजिए, नहीं तो मैं अकेली भटक जाऊंगी.’’

मीनाक्षी के अंदाज पर हर्षित इंकार नहीं कर सका. उस की मूक सहमति पा कर मीनाक्षी उस की स्कूटी पर बैठ गई. हर्षित उस के बताए पते पर उसे छोड़ने के लिए चल दिया. तब बाकी लोगों ने कारों से उस का पीछा करना शुरू कर दिया. थोड़ा आगे जाने पर मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात करने का नाटक किया. उस ने इस तरह बातें कीं, जैसे सिग्नल न आने की वजह से बात करने में दिक्कत पेश आ रही हो. सुनसान जगह मिलते ही उस ने हर्षित से कहा, ‘‘प्लीज, 2 मिनट के लिए स्कूटी रोकिए, सिग्नल नहीं आ रहे. मुझे जरूरी बात करनी है.’’

हर्षित को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह जाल में उलझ चुका है. उस ने स्कूटी रोक दी. तभी एक कार में सवार अन्य लोग वहां आ कर रुके और उन्होंने बिना समय गंवाए हर्षित को खींच कर कार में डाल लिया. इस दौरान हर्षित की चप्पलें भी पैरों से निकल गईं. कार में आते ही डेनियल ने उस की पीठ में बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. अस्पताल में नौकरी करने के चलते उसे बेहोशी के इंजेक्शन की जानकारी थी. इस बीच हर्षित के मोबाइल पर कई बार उस के पापा का फोन आया. फोन में नंबर पापा के नाम से फीड था. लगातार फोन आने पर अपहर्त्ताओं ने उस का मोबाइल बंद कर दिया. वह उसे ले कर हरिद्वार में जगजीतपुर स्थित संजय के घर पहुंच गए. सभी को विश्वास था कि उठाया गया शिकार राजकीय निर्माण निगम के इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा है.

लेकिन जब उन्होंने 5 करोड़ की फिरौती मांगी तो पता चला कि उन्होंने आर.के. राजा के बेटे के धोखे में गिरीश तायल के बेटे हर्षित तायल का अपहरण कर लिया है. तब उन्होंने तायल से 5 के बजाए 2 करोड़ रुपए मांगे. बाद में डील 34 लाख रुपए में तय हो गई. योजना के अनुसार संजय मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, छुटमलपुर, देहरादून आदि जगहों से हर्षित के पिता को फोन किए. फिरौती की रकम मिलने पर अगले दिन अल सुबह वह हर्षित की आंखों पर पट्टी बांध कर कार से ले कर निकले. उसे किराए के लिए 200 रुपए दिए और सब्जी मंडी के पास छोड़ कर वापस आ गए.

अपना काम पूरा हो जाने के बाद उन्होंने अपहरण की बातचीत में इस्तेमाल किए गए मोबाइल सिमकार्ड तोड़ दिए. वाट्सऐप से हुई बातचीत का डाटा भी डिलीट कर दिया. अपनी सफलता से वे खुश थे, लेकिन अपराध की सफलता का जश्न बनाने से पहले ही पुलिस के शिकंजे में आ गए. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. उत्तराखंड पुलिस की यह बड़ी सफलता थी. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने खुलासा करने वाली टीम को एक लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. चार दिनों बाद पुलिस ने 2 अभियुक्तों संजय व डेनियल को 12 घंटे की पुलिस रिमांड पर लिया. उन की निशानदेही पर हर्षित का हेलमेट व अन्य साक्ष्य एकत्र किए. बाद में संजय व डेनियल को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है. Uttarakhand Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आ

Crime Story : दरिंदगी की पराकाष्ठा

Crime Story : समाज में ऐसे दरिंदों की कोई कमी नहीं है जो मौका मिलने पर छोटीछोटी बच्चियों को भी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते. ऐसे ज्यादातर मामलों में दरिंदगी की शिकार हुई बच्ची को मौत के घाट उतार दिया जाता है. नीरजा के साथ भी यही हुआ था.

पिथौरागढ़ निवासी विशंभरलाल अपने परिवार के साथ जब हल्द्वानी आए थे तो बहुत खुश थे. खुशी स्वभाविक ही थी. 18 नवंबर, 2014 को उन के साले विष्णु की शादी थी. विशंभरलाल भी बड़े व्यवसाई थे और विष्णु भी. खुशीखुशी शादी संपन्न भी हो गई. 20 नवंबर की रात विष्णु ने हल्द्वानी के शीशमहल इलाके के रामलीला मैदान में अपनी शादी की रिसैप्शन पार्टी रखी थी. शानदार पार्टी थी, जिस में कई सौ लोग आए हुए थे. जब पार्टी चल रही थी, तभी साढ़े 7 बजे विशंभरलाल की बेटी नीरजा अचानक लापता हो गई. 7 वर्षीया नीरजा दूल्हे की सगी भांजी थी और विशंभरलाल के परिवार की आंख का तारा. तुरंत उस की खोजबीन शुरू हो गई.

जब वह कहीं नहीं मिली तो रिसैप्शन पार्टी के रंग में भंग पड़ गया. दोनों परिवार, रिश्तेदार और उन के परिचित पार्टी भूल कर नीरजा की खोज में लग गए. जब घंटों तक नीरजा का कोई पता न चला तो उस के लापता होने की सूचना कोतवाली पुलिस को दी गई. पुलिस ने भी अपने स्तर पर बच्ची को हर जगह खोजा, लेकिन उस का कहीं पता न चला. ऐसे में संभावना व्यक्त की गई कि किसी ने नीरजा का अपहरण कर लिया है. इसी संभावना के चलते पुलिस ने थाना कोतवाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का केस दर्ज कर लिया. 21 नवंबर की सुबह से ही नीरजा की खोजबीन शुरू हो गई. बडे़ लोगों का मामला था, इसलिए पुलिस एसओजी टीम और एलआईयू की टीमें नीरजा को ढूंढने में लगी थीं.

बच्ची के पिता और मामा के परिवार और रिश्तेदार तो जीजान से उस की खोज में जुटे थे. लेकिन किसी का कोई भी प्रयास सार्थक नहीं रहा. अपहरण की संभावना इसलिए निर्मूल लग रही थी, क्योंकि फिरौती के लिए कोई फोन नहीं आया था. नीरजा के इस तरह रिसैप्शन पार्टी से गायब हो जाने से सभी आश्चर्य में थे. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि यह दुश्मनी का मामला भी हो सकता है और फिरौती के लिए अपहरण का भी. दुश्मनी की बात से विशंभरलाल और विष्णु दोनों ही इनकार कर रहे थे. दूसरी और फिरौती के लिए तीसरे दिन भी कोई फोन नहीं आया तो पुलिस की परेशानी और भी बढ़ गई. स्थानीय मीडिया इसे पुलिस की नाकामी बता कर सुर्खियों पर सुर्खियां बना रहा था.

ऐसी स्थिति में पुलिस ने दुश्मनी और अपहरण की ओर से ध्यान हटा कर अपनी जांच का केंद्रबिंदु शहर के नशेडि़यों, जुआरियों, भिखारियों और पाखंडी बाबाओं को बनाया. क्योंकि ऐसे लोग बच्चों को उठा कर बच्चा चोर गिरोहों को बेच देते हैं और इन गिरोहों के सदस्य उन्हें दूरदराज के प्रदेशों में बेच आते हैं. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. जब कई दिन बीत जाने पर भी नीरजा का कोई पता नहीं चला तो स्थानीय लोगों के सब्र का बांध टूट गया. पुलिस की लचर काररवाई से नाराज हल्द्वानी के लोग सड़कों पर उतर आए. धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. लोग पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. नरीमन तिराहे पर नैनीताल-काठगोदाम मार्ग जाम कर दिया. जिस से सारे शहर की रफ्तार थम गई.

जब नैनीताल काठगोदाम मार्ग पर 2 किलोमीटर लंबा जाम लग गया तो स्थानीय प्रशासन परेशान हो उठा. इस स्थिति से निपटने के लिए उच्चाधिकारियों ने लोगों को आश्वासन दे कर नीरजा का पता लगाने के लिए एक दिन का समय मांगा. प्रशासनिक आश्वासन के बाद लोगों ने धरना खत्म कर दिया. वादा किया था तो निभाना भी जरूरी हो गया था. मंगलवार 25 नवंबर को क्षेत्राधिकारी जी.सी. टम्टा के नेतृत्व में कई टीमें बना कर पुलिस फोर्स नीरजा की तलाश में जुट गई. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. घबराई हुई पुलिस अभी आगे की योजना बना रही थी कि एक घोड़ेतांगे वाले ने कोतवाली आकर पुलिस को बताया कि उस का घोड़ा छूट कर गोला नदी के जंगल की ओर भाग गया था.

वह उस के पीछे जंगल में गया तो वहां उस ने एक बच्ची की लाश पड़ी देखी. यह खबर सुन कर पुलिस के हाथपांव फूल गए. उसे विश्वास हो गया कि वह लाश नीरजा की ही होगी. पुलिस नीरजा के घर वालों और उस घोड़े वाले बुजुर्ग को साथ ले कर गोला नदी पार कर के जंगल में गई. घोड़े वाले ने जो जगह बताई थी, वहां एक बच्ची की लाश पड़ी थी. वह लाश नीरजा की ही थी. उस का मुंह खून से सना था. उस के अंडरगारमेंट के अलावा उस की टांगों पर भी खून के छींटे थे. जाहिरा तौर पर कहा जा सकता था कि बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ था और बाद में उस की हत्या कर दी गई थी. नीरजा के घर वाले यह देख कर गहरे सदमे में आ गए.

यह खबर मिलते ही एसएसपी सेंथल अबुदई, एएसपी श्वेता चौबे सहित तमाम बड़े पुलिस अफसर घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. दयाल शरण को भी बुलवा लिया गया. जिस ने भी मासूम नीरजा की लाश देखी, उसी का कलेजा मुंह को आ गया. बच्ची के साथ हुई दरिंदगी वाकई हैरान कर देने वाली थी. बहरहाल पुलिस ने घटना स्थल से साक्ष्य एकत्र करने की कवायद शुरू की तो वहां बीड़ी और टौफी के रैपर पड़े मिले, जिन्हें जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. दयाल शरण ने वहां से कुछ फिंगरप्रिंट भी लिए.

करीब 2 घंटे तक घटनास्थल की सूक्ष्म जांच के बाद पुलिस ने पंचनामा बना कर नीरजा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उधर नीरजा की हत्या की खबर मिलते ही शहर भर में आक्रोश फैल गया. उस के परिवार वालों का तो बहुत बुरा हाल था. इस बीच पुलिस ने इस केस में अपहरण के साथसाथ दुष्कर्म और हत्या की धाराएं भी जोड़ दी थीं. नीरजा की लाश का पोस्टमार्टम डाक्टरों के एक पैनल ने किया, जिस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. डाक्टरी रिपोर्ट में जो बताया गया था, उस ने सभी के होश उड़ा दिए.

रिपोर्ट के अनुसार, नीरजा की हत्या दुष्कर्म के बाद हुई थी. उस की मौत अत्यधिक खून रिसाव के कारण हुई थी. यहां तक कि दरिंदे ने हैवानियत की सभी हदें पार करते हुए मासूम बच्ची के हाथपैर तक तोड़ दिए थे. नाखूनों से उस का चेहरा बिगाड़ने की भी कोशिश की थी. उस के अंगों पर भी गहरे घाव थे. पोस्टमार्टम के बाद बच्ची की लाश उस के परिजनों को सौंप दी गई. बेटी की मौत और उस के साथ हुई हैवानियत से आहत नीरजा के घर वालों ने कहा कि वे तब तक लाश को नहीं उठाएंगे, जब तक पुलिस कातिल को नहीं पकड़ लेती. उधर नीरजा की मौत की खबर सुन कर उस की दादी और मां की हालत बिगड़ गई थी.

उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. एक नन्ही बच्ची के साथ हुए इस दर्दनाक हादसे से पूरा कुमांऊ शोक में डूब गया. कातिलों के प्रति मन में गुस्सा लिए हल्द्वानी के लोग फिर सड़कों पर उतर आए. ये लोग जल्दी से जल्दी कातिलों को गिरफ्तार कर के फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे थे. 26 नवंबर को पूरा हल्द्वानी दिन भर गुस्से की आग से सुलगता रहा. शहर के सभी सरकारी दफ्तर, शिक्षण संस्थान, बैंक और टेंपोटैक्सी सर्विस पूरी तरह बंद रहे. नीरजा की हत्या से उस के घर वाले इतने आहत थे कि पोस्टमार्टम हो जाने के बावजूद वे बच्ची की लाश तक ले जाने को तैयार नहीं थे. उत्तराखंड के एडीजी राम सिंह मीणा ने नीरजा के घर वालों को लाख मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कातिलों की गिरफ्तारी होने तक बच्ची की लाश उठाने से इनकार कर दिया.

मजबूरी में पुलिस को बच्ची की लाश को मोर्चरी में रखवाना पड़ा. उधर नीरजा के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या से नाराज लोगों ने हल्द्वानी के निकटवर्ती शहर काठगोदाम को भी पूरी तरह से बंद रखा. लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर के पूरे शहर में पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया. हालात इतने बिगड़ गए कि मासूम नीरजा के साथ हुए कुकृत्य और उस की हत्या का मामला विधानसभा तक भी पहुंचा. बुधवार 26 नवंबर को इस मामले को ले कर विपक्ष ने जम कर हंगामा किया. इस दौरान नियम 310 के तहत सदन में इस की चर्चा कराने की मांग पर अड़ा विपक्ष वेल में उतर कर धरने पर बैठ गया. विपक्षी नेताओं का कहना था कि इस घटना से यह बात स्पष्ट हो गई है कि प्रदेश में कानूनव्यवस्था चौपट हो चुकी है.

उन्होंने नियम-310 के तहत सदन की काररवाई स्थगित कर इस मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग की, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया. इस से खफा भाजपा विधायक अपनी बैंच पर खड़े हो गए. विधायक मदन कौशिक, बंधीधर भगत, हरबंस कपूर, संजय गुप्ता, यतीश्वरानंद, आदेश चौहान, सुरेंद्र सिंह जीना समेत तमाम सदस्यों ने इस मामले पर तुरंत चर्चा कराने की मांग की. इस पर संसदीय एवं विधायी कार्य मंत्री इंदिरा हृदयेश ने कहा कि तुरंत चर्चा कराने की स्थिति में सरकार के पास तुरंत जवाब उपलब्ध नहीं होगा. इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों के बीच हल्की नोकझोंक भी हुई. बाद में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार इस मार्मिक घटना की चर्चा के लिए तैयार है.

उन्होंने बताया कि अपराधियों को पकड़ने के लिए सरकार पूरी ताकत लगाएगी. हत्यारों को जल्द पकड़ने हेतु स्थानीय पुलिस की मदद के लिए एसटीएफ की टीम को हल्द्वानी भेजा गया है. दूसरी ओर मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और उस की हत्या को ले कर पूरे कुंमाऊ में आक्रोश का लावा फूट पड़ा. उत्तराखंड के सभी शहरों में विरोध प्रदर्शन और जाम की स्थिति बनी रही. जिले के कई संगठनों ने बच्ची की आत्मा की शांति के लिए कैंडिल मार्च निकाला. सभी स्कूल संस्थान बंद रहे, स्कूली बच्चों ने भी कैंडिल मार्च निकाल कर नीरजा को श्रद्धांजलि दी.

इस मामले ने पूरे शासन को हिला कर रख दिया था. जब पुलिस हत्यारों की खोज में हर तरह की खाक छान चुकी और कहीं कुछ पता नहीं चला तो उस का ध्यान घटनास्थल से मिले बीड़ी के बंडल और टौफी के रेपर पर जम गया. इस की तहकीकात के लिए पुलिस ने क्षेत्र के मजदूरों और डंपर चालकों का सत्यापन किया. इसी दौरान पुलिस की नजर 3 ऐसे संदिग्ध लोगों पर पड़ी, जो इस कांड के बाद देर रात घर आते थे और सवेरे ही घर से निकल जाते थे. जबकि इन तीनों में से एक शख्स ऐसा भी था, जो घटना वाले दिन के बाद अपने कमरे पर आया ही नहीं था. इस के साथ ही पुलिस को एक अहम जानकारी यह भी मिली कि घटनास्थल से जिस ब्रांड की बीड़ी के रैपर मिले थे, वे तीनों उसी ब्रांड की बीड़ी पीते थे. उन के साथ रहने वाले अन्य मजदूरों ने पुलिस को बताया कि वे तीनों ही नशेड़ी हैं और अफीम वगैरह खाते हैं.

इस जानकारी के बाद पुलिस उन तीनों की तलाश में लग गई. पुलिस ने देर रात उन के आवास पर छापा मारा तो उन में से 2 पुलिस के हत्थे चढ़ गए. इन में एक का नाम प्रेमपाल और दूसरे का जूनियर मसीह था. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई. कोतवाली में उन से कड़ी पूछताछ की गई. पुलिस पूछताछ में दोनों ने बताया कि इस अपराध को अंजाम देने वाला अख्तर अली है. पुलिस ने प्रेमपाल और मसीह से उस के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अख्तर अली उसी रात से गायब है, जिस रात घटना घटी थी.

पुलिस ने उन दोनों से अख्तर के किसी फोटो के बारे में पूछा. लेकिन उन के पास अख्तर अली का कोई फोटो नहीं था. उस का फोटो नहीं मिला तो पुलिस ने उन दोनों की मदद ले कर उस का स्केच बनवाया. स्केच की मदद से पुलिस ने उस की खोजबीन शुरू कर दी. साथ ही उस के पैंफ्लेट छपवा कर दीवारों पर भी लगवा दिए गए. अख्तर के साथियों से उस का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने उस के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह दिल्ली की पाई गई. अख्तर की लोकेशन मिलते ही एसटीएफ के एसपी डा. सदानंद दाते पुलिस टीम के साथ बुधवार शाम को ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए. लेकिन पुलिस दिल्ली पहुंची तो उस की लोकेशन लुधियाना आने लगी.

फलस्वरूप पुलिस टीम को लुधियाना जाना पड़ा. आखिरकार लोकेशन के आधार पर खोजबीन कर के उसे लुधियाना से गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपी के गिरफ्तार होने की सूचना उसी समय नीरजा के घर वालों को दे दी गई. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के समझाने के बाद नीरजा के घर वाले उस की लाश उठाने के लिए तैयार हुए. गुरुवार को फूलों से सजे वाहन में बच्ची के शव को पोस्टमार्टम हाउस से बरेली मार्ग होते हुए रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट ले जाया गया. यह हल्द्वानी में पहला ऐसा मामला था, जिस में हल्द्वानी ही नहीं, पूरे राज्य के वीआईपी, नेता, पत्रकार, वकील और अन्य गणमान्य लोगों के साथ बच्चेबूढ़े व महिला भी शामिल हुईं.

अगले दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत, राजस्व मंत्री यशपाल आर्य और आपदा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष प्रयाग भट्ट सांत्वना देने के लिए हल्द्वानी पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने उन की कारों के शीशे तोड़ दिए. यशपाल आर्य और प्रयाग भट्ट को तो चोटें भी आईं. पुलिस ने जैसेतैसे स्थिति को संभाला. मासूम नीरजा की अंतिम विदाई को अभी कुछ ही समय बीता था कि एसटीएफ की टीम आरोपी अख्तर को लेकर हल्द्वानी पहुंच गई. हल्द्वानी लाते ही अख्तर से कड़ी पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने बताया कि इस घिनौने अपराध में प्रेमपाल और जूनियर मसीह भी ने सहयोग किया था. लेकिन बच्ची जिस हालत में मिली थी, उस से पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था.

उन दोनों को पुलिस ने पहले ही हिरासत में ले रखा था. उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. डंपर चालक अख्तर अली उर्फ शमीम मूलरूप से बिहार के चंपारण जिले के बेतिया थाना के गांव महानाजनी का रहने वाला था, जो हल्द्वानी में रह कर डंपर चलाता था. 20 नवंबर को देर रात शादी के रिसैप्शन के दौरान अख्तर अली शराब के नशे में समारोह में घुस आया. उस ने वहीं खाना भी खाया. खाना खाते समय नीरजा उस की नजरों में चढ़ गई. नीरजा को देखते ही उस के मन में पाप घर कर गया और वह उस के अकेले होने का इंतजार करने लगा.

नीरजा जैसे ही अपने मांबाप से अलग हुई, उस ने उसे अपने विश्वास में ले कर टौफी दिलाने का लालच दिया. वह बच्ची को चुपचाप वहां मौजूद लोगों की नजरों से दूर ले गया. बाहर जा कर एक दुकान से उस ने टौफी खरीदी. इस के बाद वह उस मासूम को बहलाफुसला कर जंगल की तरफ ले गया. उसी जंगल के पास उसे प्रेमपाल और जूनियर मसीह मिल गए. उस वक्त वे दोनों भी नशे में थे. वे समझ गए कि अख्तर बच्ची को क्यों लाया है. वे उस के साथ चल दिए. तब तक मासूम नीरजा रोने लगी थी. उन शैतानों ने उस का मुंह बंद कर दिया और उसे उठा कर जंगल में ले गए. वहां अख्तर ने हैवानियत दिखाते हुए मासूम बच्ची का मुंह बंद कर के उस के साथ दुराचार किया और उसे वैसे ही छोड़ कर साथियों के साथ चला आया. घटना को अंजाम देने के बाद तीनों अपने कमरे पर लौट आए.

अगले दिन बच्ची की खोजबीन को देख कर अख्तर डर की वजह से पहले दिल्ली, फिर गुड़गांव और बाद में लुधियाना चला गया. अख्तर के दिल्ली चले जाने की बात प्रेमपाल और मसीह को मालूम थी. लेकिन फंसने के डर से दोनों ने अपना मुंह बंद रखा और अपनेअपने कमरे से गायब रहे, ताकि पुलिस उन से किसी तरह की पूछताछ न कर सके. बाद में प्रेमपाल और जूनियर मसीह पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे. इस केस में पुलिस ने साक्ष्य छिपाने व आरोपी को बचाने के जुर्म में प्रेमपाल व जूनियर मसीह को भी गिरफ्तार कर लिया. मूलरूप से पीलीभीत का रहने वाला प्रेमपाल घटना के समय काठगोदाम में रह रहा था. जबकि जूनियर मसीह कंटोपा, रुद्रपुर का निवासी था.

केस के खुलने के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को बी.डी. पांडे अस्पताल ले जा कर उन का मेडिकल कराया. उन की मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि तीनों ही चरस और शराब पीने के आदी थे. इस घटना को अंजाम देते समय तीनों नशे में थे. मासूम नीरजा के साथ ददिंरगी की हदें पार करने के बाद उसे तड़पता छोड़ कर तीनों वापस चले आए थे. अगले दिन सारे शहर में पुलिस की खोजबीन को देखते हुए मुख्य आरोपी अख्तर दिल्ली भाग गया था और उस ने अपना मोबाइल बंद कर लिया था, ताकि पुलिस उस का पीछा न कर सके.

कड़ी सुरक्षा के बीच अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें गुप्त रूप से जिला एवं सत्र न्यायाधीश एन.एस. धानिक की अदालत में पेश किया. उसी वक्त महिला संगठन ‘आशा’ की कुछ महिलाएं अदालत में पहुंच गईं. बी.डी. पांडे अस्पताल में जुटीं आशा संगठन की महिलाओं में आरोपियों के प्रति इतना गुस्सा था कि वे उन्हें एक बार जूता मारना चाहती थीं. वे मांग कर रही थीं कि आरोपियों को एक बार जूता मारने दिया जाए तो उन्हें तसल्ली मिल जाएगी. महिलाओं के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने किसी तरह उन्हें झांसा दिया और आरोपियों को अस्पताल के पीछे के रास्ते से निकाल कर अदालत में पेश किया.

तीनों आरोपियों पर भादंवि की धारा 376, 302, 363, 201 और पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे के अवलोकन के बाद जिला जज ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के आदेश दिए. इस मामले की विवेचना कर रहे एसआई दिनेश पंत ने बताया कि अदालत से आरोपियों की डीएनए जांच के लिए आवेदन किया गया है. आदेश मिलने के बाद डीएनए जांच कराई गई. जांच से साबित हो गया है कि दुराचार सिर्फ अख्तर ने ही किया था. प्रेमपाल और जूनियर मसीह ने मदद की थी. इस बीच पुलिस ने वारदात के दौरान पहने गए आरोपियों के कपड़े भी बरामद कर लिए थे. जिन्हें जिला जज के अवलोकन के बाद सील कर दिया गया.

पिछले कुछ समय से समाज में यौन अपराधों में दरिंदगी बढ़ती जा रही है. मासूम बच्चियों के मामले में तो अपराधी हैवानियत की सारी हदों को पार कर जाते हैं. ऐसे दरिंदो को जब तक त्वरित रूप से सख्त से सख्त सजा नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना संभव नहीं है. कानून को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और पुलिस को भी. Crime Story

—कहानी में नीरजा, उस के पिता और मामा के नाम बदल दिए गए हैं.

 

Delhi News : स्टिंग औपरेशन के जरिए ब्लैकमेलिंग

Delhi News : रामशरण और उससके साथियों ने स्टिंग औपरेशन के जरिए एक पैथलैब संचालक से 40 लाख रुपए ऐंठने में तो सफलता पा ली लेकिन डील के बाकी 60 लाख रुपए पाने के लिए उन्होंने दबाव डाला तो वे पुलिस के शिकंजे में ऐसे फंसे कि…

पश्चिमी दिल्ली के शकूरबस्ती इलाके के रहने वाले डी.के. रोहिल्ला के दोनों बेटे डाक्टर बन गए तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. एक बेटा डा. अतुल रोहिल्ला ने डेंटल सर्जन बनने के बाद शकूरपुर में अपना क्लीनिक खोल लिया. जबकि दूसरा बेटा डा. पंकज रोहिल्ला बालरोग विशेषज्ञ हो गया. दोनों के ही क्लीनिक अच्छे चल रहे थे. इस के अलावा इन्होंने वेस्ट पंजाबीबाग के लाल क्वार्टर्स में हेल्थकेयर मंत्र के नाम से एक पैथोलौजी लैब भी खोल ली. दोनों भाई अपने क्लीनिक के अलावा लैब पर भी समय देते हैं. इन की गैरमौजूदगी में पिता डी.के. रोहिल्ला भी पैथोलौजी लैब पर बैठते थे.

3 अक्तूबर, 2014 को डा. अतुल रोहिल्ला अपने भाई डा. पंकज रोहिल्ला के साथ दिल्ली से बाहर गए हुए थे. उन की गैरमौजूदगी में पैथोलौजी लैब पर डी.के. रोहिल्ला बैठे थे. तभी उन के पास एक महिला एक युवक के साथ आई. उस महिला की उम्र करीब 30-35 साल थी. महिला ने बताया कि उस के 5 बेटियां हैं और अब फिर से गर्भवती है. उस ने बताया कि वह अपने गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में जानना चाहती है कि उस का सही विकास हो रहा है या नहीं. उन की लैब में अल्ट्रासाउंड और एक्सरे करने की सुविधा नहीं थी इसलिए डी.के. रोहिल्ला ने उस महिला से कहा,

‘‘मैडम, यहां पर केवल खून की जांच होती है. बेहतर यही होगा कि आप किसी योग्य गायनेकोलौजिस्ट को दिखा कर कहीं अल्ट्रासाउंड कराएं. उस के बाद ही बच्चे के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी.’’

‘‘कौन सी लैब सही है, कौन सी गलत, यह हमें तो पता नहीं है. आप किसी सही लैब के बारे में बता दें तो मेहरबानी होगी जिस से मैं गर्भ में पल रहे शिशु की जांच करा सकूं.’’ वह महिला बोली. डी.के. रोहिल्ला को उस महिला पर दया आ गई. उन्होंने उसे कीर्तिनगर स्थित एक अल्ट्रासाउंड क्लीनिक का पता बताते हुए वहां भेज दिया. डी.के. रोहिल्ला की पैथोलौजी लैब पर अकसर इस तरह के लोग आते रहते थे, जिस टेस्ट की सुविधा उन के यहां उपलब्ध नहीं होती थी, उसे वह कहीं और से कराने को कह देते थे.

अगले दिन भी डी.के. रोहिल्ला ही अपनी पैथोलौजी लैब पर बैठे थे. शाम साढ़े 5 बजे के करीब उन की लैब में 5-6 युवक आए. उन के गले में एक टीवी न्यूज चैनल के आईडी कार्ड लटके हुए थे. उन युवकों के साथ वह महिला भी थी, जो एक दिन पहले उन के यहां अपने गर्भस्थ शिशु की जांच कराने आई थी. उन युवकों के हावभाव देख कर डी.के. रोहिल्ला चौंक गए. लैब में घुसते ही उन युवकों ने सब से पहले वहां काम करने वाले स्टाफ को यह कहते हुए जबरदस्ती बाहर कर दिया कि उन्हें रोहिल्लाजी से कोई जरूरी बात करनी है. डी.के. रोहिल्ला ने उन युवकों से कहा भी कि उन्हें जो भी बात करनी है, स्टाफ के सामने भी कर सकते हैं. लेकिन उन युवकों ने उन की एक नहीं सुनी. कह दिया कि वे उन से अकेले में ही बात करेंगे.

स्टाफ को बाहर निकालने के बाद उन युवकों में से एक ने डी.के. रोहिल्ला से कहा, ‘‘आप को पता है कि सरकार ने गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग परीक्षण करने पर बैन लगा रखा है, इस के बावजूद भी आप यह काम कर रहे हैं.’’

‘‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं. हमारे यहां तो अल्ट्रासाउंड मशीन तक नहीं है तो हम यह बात कैसे बता सकते हैं. जरूर ही आप को भूल हुई है.’’ 59 वर्षीय डी.के. रोहिल्ला घबरा कर बोले.

‘‘देखिए, आप हमें बेवकूफ नहीं बना सकते. यह लेडी कल आप के ही पास आई थी न?’’ दूसरा युवक बोला.

‘‘हां.’’

‘‘इस लेडी से आप ने गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण के बारे में जो बातें कही थीं, वह हमारे पास रिकौर्ड हैं. हम ने आप का स्टिंग औपरेशन कर लिया है. उन बातों से पता चलता है कि आप लंबे समय से इस गैरकानूनी धंधे में लगे हुए हैं.’’

‘‘जब मैं ने इस तरह की कोई बात कही नहीं है तो रिकौर्ड कैसे कर लिया?’’

‘‘यदि आप अपनी गलती नहीं मान रहे तो कोई बात नहीं, हम इसे अपने चैनल पर चलाएंगे. तभी तुम्हारे गोरखधंधे को लोग जानेंगे. पता तब चलेगा जब लैब चलाने वाले तुम सभी लोग जेल जाओगे और यह लैब भी सील होगी.’’

इतना सुनते ही डी.के. रोहिल्ला घबरा गए. कहीं इन लोगों ने उन की आवाज से मिलतीजुलती किसी और की आवाज तो रिकौर्ड नहीं कर ली. वह इस बात को अच्छी तरह से समझ रहे थे कि टीवी चैनल पर न्यूज चलते ही उन की लैब सील हो जाएगी. भले ही वह कितनी सफाई देते रहें, पुलिस उन की एक नहीं सुनेगी. जब तक रिकौर्डिड आवाज की जांच रिपोर्ट कोर्ट में आएगी, तब तक उन का काफी नुकसान हो जाएगा और बदनामी होगी अलग से. रोहिल्ला अब यही सोच रहे थे कि वह ऐसी हालत में क्या करें. तभी एक युवक आहिस्ता से बोला, ‘‘ये टेप चैनल पर न चले, इस का एक ही रास्ता है कि आप को एक करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे.’’

‘‘एक करोड़ऽऽ’’ रोहिल्ला चौंकते हुए बोले.

‘‘हां, यह कोई ज्यादा नहीं हैं. जानते हो, हमें भी इस में से अपने सीनियर्स को देना होगा, तभी यह न्यूज रुक सकती है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम जल्द से जल्द पैसों का इंतजाम कर दो, वरना…’’

मामला बड़ा ही पेचीदा होता जा रहा था. रोहिल्ला के दोनों बेटे दिल्ली से बाहर थे. उन की गैरमौजूदगी में वह कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने उन युवकों को बताया भी कि बेटे बाहर हैं. जब वे दिल्ली लौट आएं तो उन की मौजूदगी में ही बात करना सही रहेगा. इस पर तीसरे युवक ने कहा, ‘‘हम इस खबर को कल से रोके हुए हैं. इसे अब और ज्यादा रोकना संभव नहीं है. अब आप हमें सीधे बता दें कि आप को हमारी डील मंजूर है या नहीं.’’

‘‘आप लोग 5 मिनट रुकिए. मैं इस बारे में अपने बेटे से बात कर लूं.’’ कह कर रोहिल्ला ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस पर कोई नंबर मिलाते हुए एक कमरे में चले गए. उन्होंने बेटे डा. अतुल रोहिल्ला को फोन मिलाया था. उन्होंने अतुल को पूरे मामले से अवगत करा दिया. स्टिंग औपरेशन की बात सुन कर डा. अतुल भी परेशान हो गए. उन के पिता इस लफड़े में कैसे फंस गए, यह जानने से पहले उन्हें यह जरूरी हो गया कि इस मुसीबत से बाहर कैसे निकला जाए. डा. अतुल किसी भी तरह के पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे. काफी सोचनेसमझने के बाद उन्होंने अपने पिता से कह दिया कि किसी भी तरह वह इस मामले को निपटा लें.

डी.के. रोहिल्ला ने उन युवकों से मामले को रफादफा करने को कहा लेकिन वे एक करोड़ रुपए से कम पर तैयार नहीं हुए. तब रोहिल्ला ने कहा कि इतनी बड़ी रकम अभी उन के पास नहीं है. जैसेतैसे कर के वह उन्हें 40 लाख रुपए दे सकते हैं. बाकी पैसे बाद में दे देंगे. 40 लाख रुपए भी रोहिल्ला के घर में थोड़े ही रखे थे, जो निकाल कर उन्हें दे दें. उन्होंने अपने परिचितों, रिश्तेदारों को फोन कर के जैसेतैसे कर के इतने रुपए इकट्ठे कर के उन युवकों को दे दिए. 40 लाख रुपए ले कर वे रिपोर्टर वहां से चले गए. जाते समय उन्होंने रोहिल्ला से कह दिया कि बाकी के पैसों का इंतजाम भी वे जल्दी से कर लें.

उन युवकों के जाने के बाद डी.के. रोहिल्ला को इस बात की तसल्ली हुई कि फिलहाल स्टिंग औपरेशन की न्यूज वे लोग चैनल पर तो नहीं दिखाएंगे, लेकिन दूसरी ओर इस बात की फिक्र भी हो रही थी कि बाकी के 60 लाख रुपए का इंतजाम कहां से होगा. 5 अक्तूबर, 2014 की सुबह उन के दोनों बेटे डा. अतुल रोहिल्ला और डा. पंकज रोहिल्ला घर लौटे तो उन्होंने पूरी बात विस्तार से बताई. जो हो चुका था उस पर अफसोस करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. अब उन्होंने यह तय कर लिया कि उन की लैब पर जिन टेस्टों की सुविधा नहीं है, पेशेंट से उस के लिए स्पष्ट मना कर देंगे. उन टेस्टों को वह पेशेंट कहां से कराता है, यह उस की जिम्मेदारी है. वे उसे इस बारे में कोई सलाह भी नहीं देंगे. इस घटना से सीख ले कर डाक्टर बंधुओं ने क्लीनिकों पर बैठना शुरू कर दिया.

उधर जो तथाकथित पत्रकार डी.के. रोहिल्ला से 40 लाख रुपए ले गए थे, उन्होंने बाकी के 60 लाख रुपए लेने के लिए रोहिल्ला को फोन करना शुरू कर दिया. 60 लाख रुपए कोई मामूली रकम तो होती नहीं. उन्होंने जैसेतैसे कर के 40 लाख रुपए इकट्ठा कर उन्हें दिए थे. बकाया के 60 लाख रुपए देने के लिए उन के पास बारबार फोन आने लगे. पहले तो रोहिल्ला उन्हें टालते रहे, लेकिन जब वे लोग ज्यादा ही परेशान करने लगे तो रोहिल्ला ने इतने रुपए देने में असमर्थता जता दी. तब उन तथाकथित पत्रकारों ने उन्हें धमकाया कि अगर बाकी के पैसे नहीं दिए तो स्टिंग वाली टेप को न्यूज चैनल पर चलवा देंगे.

इस तरह के धमकी भरे फोन उन के पास अकसर आने लगे, जिस से परिवार के लोग परेशान रहने लगे. 40 लाख रुपए देने के बावजूद भी उन का उन तथाकथित पत्रकारों से पीछा नहीं छूट रहा था. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी हालत में वे क्या करें. तभी उन के एक दोस्त ने उन्हें इस की शिकायत पुलिस से करने की सलाह दी. तब 21 अक्तूबर, 2014 को डा. अतुल रोहिल्ला अपने पिता को ले कर मादीपुर पुलिस चौकी चले गए. वहां मौजूद एसआई अनूप को उन्होंने पूरी कहानी बता दी. जिन फोन नंबरों से रोहिल्ला के पास पैसे मांगने की काल आई थीं, वह फोन नंबर भी उन्होंने पुलिस को दे दिए.

मादीपुर पुलिस चौकी थाना पंजाबीबाग के तहत आती है, इसलिए डा. अतुल रोहिल्ला की तहरीर पर पंजाबीबाग में पैसे मांगने वालों के खिलाफ भादंवि की धारा 342, 384, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. इस के बाद पंजाबीबाग थाना पुलिस अभियुक्तों की तलाश में जुट गई. अभियुक्तों ने अपने फोन नंबर बंद कर लिए थे इसलिए पुलिस को उन के ठिकानों की जानकारी नहीं मिल पा रही थी. उधर दिल्ली पुलिस की दक्षिणपूर्वी रेंज की क्राइम ब्रांच यूनिट को खास मुखबिर से सूचना मिली कि दिल्ली और इस से सटे शहरों में एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो स्टिंग औपरेशन के जरिए लोगों से मोटी रकम की उगाही कर रहा है. उस गिरोह में कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए डीसीपी भीष्म सिंह ने एसीपी के.पी.एस. मल्होत्रा के निर्देशन में एक टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर सुनील कुमार, सबइंसपेक्टर रविंद्र तेवतिया, मनदीप, हेडकांस्टेबल राकेश रावत, विजय प्रताप, असलूप खान, कांस्टेबल मोहित, अशोक, उदय, सुनील पांडे, मनोज आदि को शामिल किया गया. पुलिस टीम को ब्लैकमेल करने वाले उन कथित पत्रकारों के फोन नंबर भी मिल गए थे. उन नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था, लेकिन वह फोन नंबर बंद थे. टीम उन नंबरों की काल डिटेल्स को खंगालने लगी.

काल डिटेल्स के जरिए पुलिस टीम को कुछ सुराग हाथ लग गए. उन सुरागों के जरिए 28 अक्तूबर को धनसिंह और रामशरण नाम के 2 युवकों को दिल्ली के राजेंद्रनगर स्थित सर गंगाराम अस्पताल के पास से हिरासत में ले लिया. क्राइम ब्रांच औफिस में जब इन दोनों युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने पंजाबीबाग क्षेत्र के डी.के. रोहिल्ला से 40 लाख रुपए ऐंठने की बात कुबूल कर ली. उन से पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि उन के गैंग में और लोग भी शामिल हैं. उन के साथियों के नामपते मालूम करने के बाद एक पुलिस टीम उन के ठिकानों पर भेज दी. तत्परता दिखाते हुए पुलिस ने उन के साथी जय कोचर और पुष्पा को भी गिरफ्तार कर लिया.

पता चला कि रामशरण और धनसिंह एक टीवी न्यूज चैनल से जुडे़ थे. एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल से जुड़े होने के बावजूद भी वे ब्लैकमेलिंग जैसे धंधे से कैसे जुड़े, इस की एक रोचक कहानी सामने आई. 32 वर्षीय रामशरण मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले का रहने वाला था. वह 12 साल की उम्र में किसी परिचित के साथ दिल्ली आया था. परिचित ने एक दुकान पर उस की नौकरी लगवा दी. बाद में उस ने करोलबाग के एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली. फिर वह करोलबाग में गऊशाला रोड पर किराए पर रहने लगा. पिछले दशक से जिस तरह टीवी न्यूज चैनलों की बाढ़ सी आई है, उसी तरह युवाओं का रुझान भी टीवी पत्रकारिता की तरफ बढ़ा है.

रामशरण भी टीवी पत्रकार बनना चाहता था, लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. वह बनठन कर रहता था. इसलिए उस के बातचीत और पहनावे से नहीं लगता था कि वह कम पढ़ालिखा है. कम पढ़ालिखा होने के बावजूद भी उस के ऊपर पत्रकार बनने की सनक सवार थी. इस बारे में उस ने अपने एक परिचित से बात की. परिचित की एकदो टीवी पत्रकारों से बातचीत थी.परिचित के साथ रामशरण नोएडा के फिल्म सिटी में स्थित एक टीवी न्यूज चैनल पहुंच गया. वहां उस ने खुद को दिल्ली के मध्य जिला से संवाददाता बनाने की गुजारिश की. बताया जाता है कि वहां उस की बात बन गई. उसे स्ट्रिंगर के रूप में काम मिल गया.

स्टिंगर वह होता है, जो अपने साधनों से न्यूज आदि कवरेज कर के न्यूज चैनल के औफिस भेजता है. न्यूज के हिसाब से उस स्ट्रिंगर को चैनल की तरफ से पेमेंट किया जाता है यानी वह न्यूज चैनल का स्थाई कर्मचारी नहीं होता. न्यूज चैनल से जुड़ कर रामशरण बहुत खुश हुआ. बताया जाता है कि उस ने कई लोगों के स्टिंग औपरेशन भी किए. रामशरण का एक दोस्त था धनसिंह, जो उत्तराखंड के गढ़वाल का रहने वाला था. 1999 में वह दिल्ली आया था. बाद में वह भी उस के साथ सहायक के रूप में काम करने लगा. दोनों लोग कम समय में ज्यादा पैसे कमाना चाहते थे. उन के दिमाग में स्टिंग औपरेशन के जरिए लोगों से पैसे ऐंठने की बात आई.

उन के पास स्टिंग औपरेशन करने के लिए कैमरे तो थे ही, इसलिए अब वह ऐसे लोगों को तलाशने लगे, जिन से रकम हासिल की जा सके. बताया जाता है कि दोनों ने मिल कर कई छोटेमोटे स्टिंग औपरेशन किए, जिस से उन की हिम्मत बढ़ी. करीब 3-4 महीने पहले इन दोनों के संपर्क में जय कोचर नाम का युवक आया. जय कोचर दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में रहता था. उसे भी अपने साथ मिला कर वह अपने काम को अंजाम देते रहे. छोटेमोटे स्टिंग औपरेशन से उन्हें मोटी कमाई नहीं हो पाती थी. लिहाजा अब वह ऐसी आसामी तलाशने लगे, जहां से मोटी रकम मिल सके.

अब उन्होंने क्लीनिक और पैथोलौजी लैब को निशाना बनाने का प्लान बनाया. इस काम में उन्होंने दिल्ली के किशनगंज में रहने वाले छोटेलाल की पत्नी पुष्पा को मिला लिया. 3 बच्चों की मां पुष्पा का पेट किसी वजह से बढ़ गया. फूला हुआ पेट देख कर लगता कि जैसे वह गर्भवती हो. पुष्पा किसी नर्सिंगहोम, पैथलैब में जाती और खुद को गर्भवती बताते हुए भ्रूण के लिंग परीक्षण की बात करती थी. उस के साथ रामशरण भी जाता था, वह खुद को पुष्पा का पति बताता था. लिंग परीक्षण से संबंधित होने वाली बात को रामशरण अपने खुफिया कैमरे में रिकौर्ड कर लेता था. बाद में उसी रिकौर्डिंग के जरिए वे लोग नर्सिंगहोम, पैथलैब संचालक से मोटी रकम वसूलते. उस रकम में से 2 हजार रुपए वे पुष्पा को दे देते थे.

छोटे से काम के बदले 2 हजार रुपए पा कर पुष्पा भी खुश रहती थी. मगर उसे यह पता नहीं था कि इस मामूली रकम के बदले वह क्या अपराध कर रही है. रिसर्च के दौरान उन्हें पता लगा कि पंजाबीबाग के लाल क्वार्टर्स में डा. रोहिल्ला की हेल्थकेयर मंत्र के नाम से पैथोलौजी लैब है. अगर वहां स्टिंग औपरेशन किया जाए तो मोटी रकम हासिल हो सकती है. पूरी योजना बना कर 3 अक्तूबर, 2014 को पुष्पा उक्त पैथोलौजी लैब पहुंची. उस समय वहां डा. पंकज रोहिल्ला के पिता डी.के. रोहिल्ला बैठे थे. पुष्पा ने उन्हें बताया कि उस के 5 बेटियां हैं. वह फिर से गर्भवती है. अब वह गर्भ में पल रहे शिशु की जांच कराना चाहती है. रोहिल्ला की लैब में अल्ट्रासाउंड करने की सुविधा नहीं थी.

उन्होंने उसे योग्य गायनेकोलौजिस्ट के पास जाने की सलाह दी. इस दौरान वह उन से शिशु के लिंग परीक्षण के संबंध में बात करती रही. रामशरण उस के पास खड़ा पूरी बात को रिकौर्ड करता रहा. उसी रिकौर्डिड बातचीत के जरिए उन लोगों ने डी.के. रोहिल्ला से एक करोड़ रुपए की मांग की. उन युवकों के गले में पड़े आईडी कार्ड देख कर डी.के. रोहिल्ला समझ गए थे कि वे लोग उस स्टिंग औपरेशन को न्यूज चैनल पर चलवा देंगे तो उन के खिलाफ पुलिस काररवाई तो होगी ही साथ ही लैब भी सील हो जाएगी इसलिए अपने बेटों से बात कर के उन्होंने उन युवकों को 40 लाख रुपए दे दिए थे.

रामशरण और उस के साथियों को विश्वास था कि जिस तरह से रोहिल्ला ने 40 लाख रुपए दिए हैं, उसी तरह वह बाकी 60 लाख भी दे देंगे. 60 लाख वसूलने के लिए ही वे लोग डी.के. रोहिल्ला और उन के बेटों को बारबार धमकी भरे फोन कर रहे थे. लेकिन इस से पहले कि वह उन से 60 लाख रुपए वसूल पाते, पुलिस के हत्थे चढ़ गए. रोहिल्ला से वसूली गई रकम में से जय कोचर को जो हिस्सा मिला था, उसी से उस ने नई स्विफ्ट कार खरीदी थी. पुलिस ने उस से वह कार भी बरामद कर ली. इस के अलावा पुलिस ने उन के कब्जे से 70 हजार रुपए नकद, स्टिंग औपरेशन में प्रयोग होने वाले कैमरे, 7 मोबाइल फोन आदि बरामद किए.

चूंकि इन के खिलाफ थाना पंजाबीबाग में रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए एसआई रविंद्र तेवतिया ने 29 अक्तूबर को चारों अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. उसी समय पंजाबीबाग थाना पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. अभियुक्तों ने पुलिस को बताया कि वे अब तक लगभग 50 स्टिंग औपरेशन कर चुके हैं. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें तीसहजारी कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है. Delhi News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा का नाटकीय रूपांतरण किया गया है.

 

Crime Story : खून से सनी नशे की लकीर

Crime Story : मनमोहन गली नंबर-24, बस्ती टोकावली, फिरोजपुर निवासी सुभाष ठाकुर का पुत्र था. मनमोहन की शादी 4 साल पहले बी1-5/6, गली नंबर-3, जनता कालोनी, जालंधर में रहने वाले चानन सिंह राजपूत की बेटी पूजा के साथ हुई थी. दोनों राजपूत परिवारों से थे, दोनों के बीच आपसी प्रेमप्यार था.

पूजा के पिता चानन सिंह आर्मी में थे. उन की 2 ही संतानें थीं, बेटा विनोद और बेटी पूजा. दोनों ही शादीशुदा थे और अपनेअपने परिवारों के साथ खुश थे. पूजा की शादी चानन सिंह ने 4 साल पहले मनमोहन के साथ की थी. पूजा बीए पास और अच्छे संस्कारों वाली समझदार लड़की थी. ससुराल आ कर उस ने पति ही नहीं, बल्कि सब का मन मोह लिया था. मनमोहन ने एमबीए कर रखा था. कोई अच्छी सरकारी नौकरी न मिलने के कारण वह हिंदुस्तान हाइड्रोलिक कंपनी में नौकरी कर रहा था.

मनमोहन की मां के निधन के बाद वह और उस के पिता जब काम पर चले जाते थे, तो पूजा दिन भर घर में अकेली रहती थी. घर का मुख्यद्वार पूरे दिन बंद रहता था, क्योंकि उन के यहां किसी का आनाजाना नहीं था. शाम को मनमोहन या उस के पिता के घर लौटने पर ही मुख्यद्वार खोला जाता था. लेकिन उस दिन मनमोहन घर लौटा तो ऐसा नहीं हुआ. मनमोहन के 2-3 बार डोरबैल बजाने के बाद भीतर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने दरवाजा थपथपाया तो दरवाजा हाथ रखते ही खुल गया.

यह देख कर मनमोहन को और अधिक आश्चर्य हुआ. असमंजस की स्थिति में  अपनी पत्नी पूजा को आवाज देते हुए उस ने घर के भीतर जा कर देखा तो कमरे का दृश्य देख उस के होश उड़ गए. भीतर पूरा सामान बिखरा पड़ा था. देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कमरे में 2 लोगों का आपस में जबरदस्त संघर्ष हुआ हो.b घर के सभी कमरे खुले हुए थे और उन का सामान बिखरा पड़ा था. घर में ऐसा क्या हुआ, यह जानने के लिए वह पूजा को लगातार आवाज देता रहा, पर पूजा कहीं नहीं दिखी. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. उस के काम से लौटने पर पूजा होंठों पर मुसकान लिए दरवाजा खोलती थी.

मनमोहन किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा. पागलों की तरह पूजा को आवाज देते हुए वह घर से बाहर निकल आया. उस की पड़ोसन ने बताया कि दोपहर को उन के घर कोई रिश्तेदार आया था और पूजा ने उस के लिए दरवाजा खोला था. आने वाला कौन था, यह वह नहीं बता सकी. हां, उस ने इतना जरूर बताया कि शाम को उसी ने दरवाजा अंदर की ओर धकेला था, क्योंकि कुत्ते घर के अंदर जाने की कोशिश कर रहे थे. पड़ोसन की बात सुन कर मनमोहन को चिंता हुई. उस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि आखिर ऐसा कौन रिश्तेदार था, जिस के घर आने के बाद यह हालत हुई. इस से भी बड़ा सवाल यह था कि पूजा कहां गई?

उस की समझ में यह भी नहीं आ रहा था कि घर बैठ कर पूजा का इंतजार करे या उस की तलाश में कहीं जाए. लेकिन जाए तो कहां जाए. फिर भी मनमोहन ने पड़ोसियों के साथ पूजा की तलाश की, उसे अस्पतालों में भी देखा. पर पूजा का पता नहीं चला. मनमोहन बदहवासी में कुछ सोचने का प्रयास कर रहा था कि तभी उस के पिता सुभाष भी घर पहुंच गए. वह पिछले एक सप्ताह से संगत के लिए हिमाचल स्थित बाबा बालक नाथ के डेरे पर गए हुए थे.

बेटे को यूं बदहवास देख और पूजा के गायब होने की बात सुन कर उन्हें भी चिंता होने लगी. इस के बाद पूरे मोहल्ले में पूजा के घर से लापता होने की बात फैल गई. सांत्वना और सहयोग के लिए पूरा मोहल्ला उन के घर आ जुटा था. अचानक एक पड़ोसी की नजर मनमोहन के कमरे में पड़े पर बैड पर गई तो वह चौंका. बंद बैड पर गद्दे के नीचे से किसी औरत की चोटी के बाल बाहर झांक रहे थे. उस के बताने पर वहां मौजूद सभी लोगों ने बैड को देखा.

गद्दे को उठा कर बैड का बौक्स खोला गया तो बौक्स के भीतर का दृश्य देख सभी लोगों के मुंह से चीख निकल गई. बैड के भीतर पूजा की लाश पड़ी थी. एकाएक किसी को भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. उस समय मनमोहन की जो हालत थी, उस का अनुमान लगाना मुश्किल था. वह बैड पकड़ कर वहीं फर्श पर बैठ गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि पूजा की हत्या कर के लाश बैड में किस ने छिपाई. काफी देर बाद लोगों के सांत्वना देने पर जब वह सामान्य हुआ. घर के अंदर के किसी भी सामान को छुए बिना सब से पहले उस ने इस घटना की सूचना थाना कैंट, फिरोजपुर पुलिस को दी. साथ ही उस ने पूजा की हत्या की खबर अपने ससुर चानन सिंह को भी दे दी. यह घटना 27 नवंबर, 2018 की है.

पूजा की हत्या की खबर मिलते ही उस के मातापिता वहां पहुंच गए. पुलिस ने क्राइम टीम सहित वहां पहुंच कर अपनी काररवाई शुरू कर दी. पूरे घर को सील कर दिया गया. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने जगहजगह से अंगुलियों के निशान उठाए. सबूतों की तलाश में घर की बारीकी से तलाशी ली गई. थाना कैंट एसएचओ इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने बड़ी बारीकी से लाश का मुआयना किया. पूजा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. उस के गले पर दबाव के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे.

इस घटना की सूचना मिलते ही एसपी (डी) बलजीत सिंह सिद्धू, डीएसपी जसपाल सिंह ढिल्लों, सीआईए प्रभारी तरलोचन सिंह ने भी घटनास्थल पर पहुंच कर मुआयना किया. क्राइम टीम का काम खत्म हो गया तो इंसपेक्टर जसबीर सिंह पूजा के पिता चानन सिंह को थाने ले गए. वहां उन के बयान पर अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 के तहत पूजा की हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया. इस के बाद पूजा की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया.

शुरुआती जांच में इंसपेक्टर जसबीर सिंह को मनमोहन के बयानों से पता चला कि उस के घर में किसी बाहरी व्यक्ति का आनाजाना बिलकुल नहीं था. रिश्तेदारों का आनाजाना भी न के बराबर था. इस परिवार की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. बापबेटा अपने काम से काम रखने वाले थे. ऐसे में शहर के व्यस्ततम इलाके में दिनदहाड़े किसी के घर में घुस कर उस की हत्या करने जैसी बात न तो पुलिस को हजम हो रही थी और न ही मोहल्ले वालों को.

इंसपेक्टर जसबीर को एक बात शुरू से ही खटक रही थी कि यह काम घर के ही किसी आदमी का हो सकता है. किसी बाहरी व्यक्ति की संभावना कम नजर आ रही थी. बहरहाल, पुलिस ने मनमोहन को शक के दायरे में रख कर जांच शुरू कर दी. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना के समय मनमोहन और उस के पिता सुभाष भले ही अपने घर के आसपास नहीं थे, पर यह काम पैसे दे कर किसी किराए के हत्यारे से भी करवा सकते थे.

घटना वाले दिन मनमोहन और सुभाष घटनास्थल से दूर थे. उन के फोन रिकौर्ड से भी पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा. मृतका पूजा के फोन रिकौर्ड भी चैक किए गए, सब बेदाग थे. पोस्टमार्टम के अनुसार पूजा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम के बाद उस की लाश घर वालों के हवाले कर दी गई. उसी शाम उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

पूजा की हत्या की खबर शहर भर में चर्चा का विषय बन गई थी. एसपी साहब खुद पलपल की रिपोर्ट ले रहे थे. लेकिन अभी तक पुलिस के हाथ खाली थे. पूजा का पति मनमोहन शुरू से ही शक के दायरे में था, इसलिए पुलिस ने मनमोहन और उस के पिता से कई बार अलगअलग घुमाफिरा कर पूछताछ की, लेकिन वे लोग निर्दोष लग रहे थे. पूजा के पति पर शक करने की वजह यह थी कि पूजा संतानहीन थी. शादी के 4 साल बाद भी उस की गोद नहीं भरी थी. पुलिस सोच रही थी कि कहीं संतानहीन पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए मनमोहन ने ही तो पूजा की हत्या नहीं कर दी.

पुलिस ने मनमोहन के अलावा उस के खास दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से भी पूछताछ की. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इस केस पर जिले के स्पैशल स्टाफ के अलावा और भी कई टीमें काम कर रही थीं. पुलिस के मुखबिर इस मामले में कोई खास जानकारी नहीं जुटा पाए थे. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने इस मामले को लूटपाट के नजरिए से भी देखा और इलाके के छोटेबड़े सभी हिस्ट्रीशीटरों से ले कर चोरों, जेबतराशों और उठाईगीरों को भी राउंडअप किया. लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. पूजा की हत्या हुए एक महीने से ऊपर का वक्त गुजर चुका था. धीरेधीरे यह केस ठंडे बस्ते की ओर बढ़ने लगा था.

हालांकि इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था. यह अलग बात है कि उन के तमाम प्रयासों के बाद भी कोई ऐसा सूत्र हाथ नहीं लगा था, जिस से इस मामले की कोई भी कड़ी जुड़ती नजर आती. लोग भी धीरेधीरे इस घटना को भूलने लगे थे. 2 महीने से भी ज्यादा गुजर चुके थे, तभी एक दिन एक ऐसा सूत्र खुद सामने से चल कर आया कि जसबीर सिंह की बांछें खिल गईं. इस सूत्र ने इस केस को एक नई दिशा दे दी थी. इस घटना के लगभग 2 महीने बाद मनमोहन घर की अलमारी के लौकर में कोई जरूरी कागजात ढूंढ रहा था, तभी अचानक उसे झटका सा लगा. अलमारी के लौकर में रखे कीमती जेवरात गायब थे.

मनमोहन ने इस बात की खबर इंसपेक्टर जसबीर सिंह को दी. जेवरात कैसे गायब हुए, यह तो वह ठीक से नहीं बता पाया, पर यह बात उस ने दावे के साथ कही कि जेवरात पूजा की हत्या से पहले ही गायब हुए थे. क्योंकि उस के और पूजा के अतिरिक्त जेवरातों की जानकारी किसी को नहीं थी. पूजा मरने के बाद जेवरात अपने साथ नहीं ले जा सकती थी. जाहिर है उस के सामने या उस की हत्या के बाद ही जेवरात गायब हुए होंगे.

यह भी संभव थी कि इन्हीं जेवरातों की वजह से पूजा की हत्या की गई हो. यह जबरदस्त पौइंट इंसपेक्टर जसबीर के सामने था. उन्होंने अपनी जांच का दायरा बदलते हुए शहर के सुनारों, खासकर उन सुनारों की तरफ मोड़ दिया जो चोरी का माल खरीदते थे. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने उन्हें मनमोहन के घर से गायब सामान की लिस्ट देते हुए सख्त चेतावनी दी कि अगर कोई चोर चोरी का सामान बेचने आए तो उन्हें खबर दें. और फिर एक दिन पुलिस की मेहनत रंग लाई.

20 फरवरी, 2019 को शहर के एक सुनार ने फोन द्वारा इंसपेक्टर जसबीर सिंह को सूचना दी कि अजय पटियाल नाम का एक व्यक्ति उस की दुकान पर मनमोहन के घर से चोरी हुए गहनों से मिलतेजुलते गहने बेचने आया है. इस सूचना पर इंसपेक्टर जसबीर सिंह एएसआई जसपाल सिंह, बलविंदर सिंह, हवलदार गुरतेज सिंह और जसवीर सिंह के साथ सुनार की दुकान पर पहुंचे. अजय को देख कर सभी चौंके. अजय मनमोहन का ही रिश्तेदार था. वह वीर नगर गली नंबर-1 निवासी उस के मामा का बेटा था. मजे की बात यह कि इंसपेक्टर जसबीर सिंह शक के आधार पर उसे 3 बार पूछताछ के लिए थाने बुला चुके थे, लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में उसे छोड़ना पड़ा था. बहरहाल, वे गहनों सहित अजय को गिरफ्तार कर थाने ले आए.

पूछने पर अजय ने बताया कि गहने उस के अपने हैं. फिर बताया कि गहने उस के किसी दोस्त के हैं और उस ने अपनी बीमार मां का इलाज करवाने के लिए उसे बेचने के लिए दिए थे. किस दोस्त ने गहने दिए थे, यह बात वह नहीं बता पाया. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने मनमोहन और उस के पिता सहित मृतक पूजा के मातापिता को भी थाने बुलवा कर जब गहनों की शिनाख्त करवाई तो उन्होंने तुरंत गहने पहचान लिए.

अजय से बरामद गहने पूरे नहीं थे, इसलिए इंसपेक्टर जसबीर ने अजय को अदालत में पेश कर उस का 2 दिन का रिमांड ले लिया. रिमांड के दौरान अजय से बाकी गहने भी बरामद कर लिए गए जो उस ने अपने घर में छिपा कर रखे थे. दरअसल, अजय नशे का आदी था. पूजा की हत्या उस ने नशे की पूर्ति के लिए की थी. इसे इत्तफाक समझा जाए या कुछ और कि घटना वाले दिन वह पूजा की हत्या के इरादे से मनमोहन के घर नहीं गया था. अजय के नशेड़ी होने की वजह से कोई रिश्तेदार उसे पसंद नहीं करता था. न ही कोई उसे अपने घर में घुसने देता था.

पूछताछ के दौरान अजय ने बताया कि उस दिन वह मनमोहन से कुछ रुपए उधार लेने उस के घर गया था. लेकिन मनमोहन अपने काम पर जा चुका था. पूजा घर में अकेली थी. पूजा ने अजय को इज्जत से बिठाया और उस के लिए चाय बनाने रसोईघर में चली गई. क्योंकि अजय रिश्ते में मनमोहन के मामा का बेटा था, चायपानी के लिए पूछना उस का फर्ज था. जिस समय अजय मनमोहन के घर आया था, उस समय पूजा अलमारी खोल कर उस में कुछ सामान रख रही थी. अजय के आ जाने की वजह से वह अलमारी खुली छोड़ कर चाय बनाने चली गई.

अचानक अजय की नजर खुली अलमारी पर पड़ी तो वह यह सोच कर अलमारी की ओर चला गया कि संभव है उस में रखे कुछ रुपए उस के हाथ लग जाएं. लेकिन अलमारी में रखे जेवर देख कर उस की आंखें चमक उठीं. गहने देख कर उसे लगा जैसे उस की कई दिन की नशापूर्ति का इंतजाम हो गया हो. उस ने अलमारी में रखे सारे गहने उठा लिए. तभी पूजा ने चाय ले कर कमरे में प्रवेश किया. अजय को गहने चोरी करते देख वह भौचक्की रह गई. हैरान हो कर उस ने अजय के हाथों से गहने छीनने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘भैयाजी, यह आप क्या कर रहे हैं?’’

अजय के सिर पर तो नशे का भूत सवार था, सो उस ने पूजा को एक ओर धकेलते हुए घर से भाग जाने की कोशिश की. पर पूजा ने उस का रास्ता रोक लिया. वह किसी भी कीमत पर अजय को वहां से गहने ले कर नहीं जाने देना चाहती थी. पूजा द्वारा विरोध करने पर अजय को ऐसा लगा जैसे वह उस की दुनिया छीन लेना चाहती हो. इसी छीनाझपटी में अजय ने पूजा का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया. पूजा की हत्या करने के बाद अजय घबरा गया. उस ने पूजा की लाश को एक सूटकेस में भरा और सूटकेस बैड में रख कर वहां से चुपचाप निकल आया.

काररवाई और पूछताछ के बाद पुलिस ने 22 फरवरी, 2019 को अजय को अदालत में पेश किया, जहां से अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

Swami Chaitanyananda : छात्राओं से यौन शोषण करने वाला पाखंडी

Swami Chaitanyananda : दिल्ली से एक ऐसा हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिस ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया है, जहां पाखंडी स्वामी चैतन्यानंद ने गरीब लड़कियों के साथ यौन शोषण किया. उस की हैवानियत का यह खेल दिल्ली से ले कर उड़ीसा तक चल रहा था. आखिर किस तरह से वारदात को अंजाम देता था स्वामी. चलिए जानते हैं इस क्राइम से जुड़ी पूरी स्टोरी विस्तार से.

अकसर ऐसे बाबाओं की करतूतें सामने आती रही हैं, जिन पर लोग आंखें मूंदकर भरोसा करते हैं. ऐसा ही आस्था के नाम पर लोगों के साथ खिलवाड़ करने वाले स्वामी चैतन्यानंद का परदाफाश हुआ. यह करीब 16 सालों तक अनेक लड़कियों के साथ यौन शोषण करता रहा. यह स्वामी माथे पर त्रिपुंड, बदन पर भगवा वस्त्र, केश विहीन सिर और बिलकुल धर्मगुरु सा हुलिया बनाकर रहता था, लेकिन इस के कारगुज़रियों ने सभी को हैरान कर दिया.

यह घटना दिल्ली से सामने आई है, जहां यह पाखंडी पिछले 16 सालों से दक्षिण पश्चिमी दिल्ली के वसंतकुंज में मौजूद नामी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट श्रीश्री जगदगुरु शंकराचार्य महास्थानाम दक्षिणामान्य श्री शारदा पीठम का चांसलर बना बैठा था. इसी इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाली लड़कियों के साथ यह ढोंगी यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग करता था. ईडब्ल्यूएस कोटे की लड़कियों को टार्गेट कर उन का यौन उत्पीड़न करता रहा और लड़कियां सालोंसाल बदनामी और करिअर चौपट होने के डर से चुप रहीं.

एयरफोर्स हैडक्वार्टर की शिकायत मिलने पर पीठम ने अपने ही चांसलर यानी बाबा चैतन्यानंद के खिलाफ दिल्ली पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई, जिस से उस की असलियत सामने आई.

फिलहाल बाबा फरार है, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उस की तलाश के लिए ‘औपरेशन इच्छाधारी’ शुरू कर दिया है. पुलिस उस के सुराग और करतूतों के सबूत जुटाने में लगी है. Swami Chaitanyananda