Crime Story: दिखावटी रईस – निकला बड़ा ठग

Crime Story: कहते हैं कि इंसान बड़ा तिकड़मी होता है. कोई अपने तिकड़म अच्छे कामों के लिए लगाता है तो कोई अपने तिकड़म से दुनिया को झुकाने की फितरत रखता है. केरल के एक आदमी ने आसानी से पैसा कमाने के लिए जोरदार तिकड़म लगाया. 10 करोड़ की ठगी के मामले में 25 सितंबर, 2021 की रात को केरल की क्राइम ब्रांच ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

गिरफ्तारी के बाद जब उस के कारनामों का खुलासा हुआ तो लोग उस की चर्चा करते नहीं थक रहे हैं. क्योंकि अपने तिकड़म से उस ने देश के जानेमाने ठग नटवरलाल को भी पीछे छोड़ने की कोशिश की है. 51 साल के उस आदमी का नाम है मोनसन मावुंकल. वह केरल के जिला अलप्पुझा के चेरथला का रहने वाला है. इस ठग ने स्वयंप्रसिद्धि द्वारा अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई थी.

अपनी वेबसाइट पर उस ने जरा भी कंजूसी किए बगैर बड़ी ही उदारता के साथ अपनी पहचान इस तरह दी थी— डा. मोनसन मावुंकल, प्राचीन और दुर्लभ वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय सौदागर. विश्व शांति के प्रणेता और वर्ल्ड पीस काउंसिल का मेंबर. प्रवासी मलयाली फैडरेशन पेट्रन, पुरातत्त्वविज्ञान के मास्टर, डाक्टरेट इन कौस्मेटोलौजी और उस में पोस्टडाक्टरल, शिक्षाशास्त्री, प्राचीन ज्वैलरी के निर्यातक, मोटिवेशनल स्पीकर और प्रख्यात यूट्यूबर.

यह आदमी काम क्या करता था? कोच्चि में एक आलीशान कोठी किराए पर ले कर उस में उस ने प्राचीन और दुर्लभ वस्तुओं का म्यूजियम बना रखा था. इस के अलावा कोठी के एक फ्लोर पर वह सौंदर्य चिकित्सा करता था. वहां एक स्पा भी था. कोठी के विशाल कंपाउंड में उस की लगभग 30 कारें खड़ी थीं. उस की कारों के इस काफिले में पोर्शे बाक्सटर, रोल्स रायस, रेंजरोवर, लैंडक्रूजर, डौज, मर्सिडीज एस क्लास और लेक्सस जैसी महंगीं कारें थीं.

उस के म्यूजियम में जो दुर्लभ चीजें थीं, वह सोनेचांदी की प्राचीन ज्वैलरी के अलावा देशी और विदेशी प्रवासियों को अमूल्य और दुर्लभ नमूने भी बेचता था. उस की सूची में ईसा मसीह जो कपड़े पहनते थे, उस का एक टुकड़ा, जीसस को धोखा देने के लिए घूल जुडासन ने जो 30 चांदी के सिक्के दिए थे, वे सिक्के. मोहम्मद पैगंबर जिस कटोरे में खाते थे, वह कटोरा. टीपू सुलतान का सिंहासन, लियोनार्डो दा विंची और राजा रवि वर्मा के बनाए असली चित्र, छत्रपति शिवाजी महाराज हमेशा अपने साथ जो भगवद्गीता रखते थे, वह भगवद् गीता, मोजिस का अधिकार दंड, नारायण गुरु की लाठी, त्रावणकोर के महाराजा का सिंहासन, विश्वप्रसिद्ध पैलेस का ओरिजिनल टाइटल डीड.

दुनिया की पहली ग्रामोफोन मशीन, बाइबल की सर्वप्रथम छपी पहली कौपी, सद्दाम हुसैन अपने साथ जो कुरान शरीफ रखता था, वह पवित्र कुरान शरीफ, केरल का प्रसिद्ध शबरीमाला मंदिर जब बना था, तब की उस की धार्मिक विधियों के लिए दस्तावेज के रूप में जो ताम्रपत्र बनाया गया था, वह दुर्लभ ताम्रपत्र, इस तरह की अनेक दुर्लभ प्राचीन चीजें मोनसन मावुंकल के खजाने में थीं. छोटे ग्राहकों के लिए हाथीदांत की कलाकृतियां और व्हेल मछली की हड्डियों से बने खिलौने भी उस के म्यूजियम में थे. फिल्मी हीरो जैसे लगने वाले और अपनी बोलने की कला से सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करने की उस में गजब की शक्ति थी.

इस के अलावा उस के इस म्यूजियम और वैभवशाली 30 कारों के काफिले के कारण किसी को भी प्रभावित करने में उसे जरा भी दिक्कत नहीं होती थी. 2-3 सशस्त्र बौडीगार्ड हमेशा उस के साथ रहते थे. प्रसिद्धि का भूखा मोनसन डौन की स्टाइल में अपने फोटो वेबसाइट और सोशल मीडिया पर अकसर डालता रहता था. सामान्य आदमी तो ठीक, केरल के फिल्मी कलाकार, राजनेता और बड़ेबड़े पुलिस अधिकारी भी उस का म्यूजियम देखने आते थे.

उस से मिलने वालों में राज्य के डीजीपी लोकनाथ बेहरा, असिस्टेंट आईजीपी मनोज अब्राहम, सुपरस्टार मोहनलाल, कांग्रेस पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के. सुधाकरन, वर्तमान सरकार के मंत्री रोशी आंगस्टाइन, अहमद देवरकोविल, आईजी लक्ष्मण गुगुलोथ, पूर्व डीआईजी सुरेंद्रन, आईपीएस श्रीलेखा, सांसद हीबी एडन, पूर्व मंत्री मोना जोसेफ जैसे अनेक महारथियों के फोटोग्राफ्स उस के म्यूजियम में थे. इस तरह के वीआईपी मेहमानों के भव्य स्वागत में मोनसन मावुंकल कोई कसर नहीं छोड़ता था. इन लोगों के साथ के फोटो वह तुरंत सोशल मीडिया पर वायरल कर देता था. वह पुलिस अधिकारियों को छोटामोटा सामान उपहार में दे कर खुश रखता था.

पुलिस विभाग में चलने वाली चर्चाओं के अनुसार, मोनसन ने एक बड़े पुलिस अधिकारी को 55 लाख की कोरल एडमिरल कलाई घड़ी उपहार में दी थी. पुलिस विभाग से मधुर संबंध होने की वजह से उस की कोठी और अलप्पुझा जिले में स्थित उस के घर, दोनों जगहों पर पुलिस बीट बौक्स की व्यवस्था हो गई थी. आखिर यह ठग पकड़ा कैसे गया? जून, 2017 से नवंबर, 2020 के बीच मोनसन मावुंकल ने अलग अलग 6 लोगों से कुल 24 करोड़ रुपए उधार लिए थे. अंतरराष्ट्रीय हीरा व्यापारी और एंटीक बिजनैस डीलर के रूप में उस ने इन लोगों से अपना परिचय कराया था.

बाद में जब इन लोगों ने अपना पैसा वापस मांगना शुरू किया तो मोनसन मावुंकल इन से कहने लगा कि फारेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा) के अधिकारियों ने उस का पैसा रोक रखा है. उसे पाने के लिए केंद्र सरकार से उस की कानूनी लड़ाई चल रही है. उन लोगों को मोनसन की बात पर विश्वास नहीं था, इसलिए वे लोग उस के घर आए. आलीशान कोठी, लग्जरी कारों का काफिला, उस की आलीशान जीवनशैली और माननीय लोगों के साथ उस की फोटो देख कर उन्हें मोनसन की बात पर विश्वास हो गया. इस के अलावा विश्वास जमाने के लिए मोनसन मावुंकल ने उन लोगों को एचएसबीसी बैंक का स्टेटमेंट भी दिखाया.

मोनसन मावुंकल का पार्टनर कोई वी.आई. पटेल (यह वी.आई. पटेल कौन हैं, इस के बारे में केरल पुलिस आज तक पता नहीं कर सकी है) के साथ के उस के एकाउंट में छोटीमोटी नहीं, 2.62 लाख करोड़ की रकम जमा थी. मोनसन मावुंकल ने उन से यह भी कहा था कि 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल कर उस ने अपना पैसा पाने की बात भी की है. प्रवासी मलयाली फेडरेशन की वैश्विक महिला कोआर्डिनेटर रह चुकी अनीता पुल्लाइल इस समय इटली में रहती हैं. मोनसन मावुंकल के किसी लेनदार ने जब उन से व्यक्तिगत रूप से इस बारे में बात की तो उन्होंने सलाह दी कि उस चीटर के खिलाफ तुरंत पुलिस में शिकायत कर दीजिए. अगर आप को जरूरत महसूस हो तो मेरे नाम का भी उपयोग कर सकते हो.

अनीता ने यह भी कहा था कि पता चला है कि उस नालायक ने उस की कोठी में काम करने वाली नौकरानी की 17 साल की बेटी के साथ दुष्कर्म भी किया है. यह पता चलते ही उन्होंने उस शैतान से सारे संबंध तोड़ लिए हैं. इस के बाद उन लेनदारों ने मोनसन मावुंकल के खिलाफ शिकायत करने के साथसाथ उस शिकायत पर काररवाई के लिए राज्य के मुख्यमंत्री पी. विजयन के यहां शिकायत की. उन्हीं की शिकायत के आधार पर लोकल पुलिस को अंधेरे में रख कर राज्य की क्राइम ब्रांच ने इस मामले को अपने हाथ में लिया.

25 सितंबर, 2021 को मोनसन मावुंकल की बेटी की सगाई की आलीशान पार्टी थी. उसी रात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने उसे गिरफ्तार कर लिया. जिस समय उसे गिरफ्तार किया गया, उस की जेब में 3 महंगे आईफोन, दाहिने हाथ में एप्पल की घड़ी, बाएं हाथ में सोने का वजनदार लकी ब्रेसलेट और गले में मोटी सी सोने की चेन थी. अपनी स्वयंप्रसिद्धि के कारण मोनसन मावुंकल ने केरल में ‘हू इज हू’ की सूची में स्थान प्राप्त कर लिया था. गिरफ्तारी के बाद मोनसन मावुंकल मीडिया में छा गया.

अखबारों और टीवी चैनलों में उस के नेताओं के साथ के संबंध और पुलिस अधिकारियों से सांठगांठ की चर्चा लगातार चलने लगी. उस के बाद बहुत बड़ा घोटाला सामने आया. इस के अलावा भी अनेक रहस्य बाहर आएंगे, ऐसा सभी को लग रहा है. फोटोग्राफ्स में जो महानुभाव थे, वे सब ढीले पड़ गए और अपनीअपनी सफाई देने लगे कि यह आदमी इतना बड़ा ठग है, उन्हें पता नहीं था. राज्य के डीजीपी लोकनाथ बेहरा ने तो मोनसन मावुंकल के म्यूजियम में महाराजा के स्टाइल में हाथ में तलवार के साथ पोज दिया था.

लोकनाथ इसी साल रिटायर हुए हैं. उन के रिटायर होने के बाद सरकार ने उन्हें तुरंत कोच्चि मेट्रो का मैनेजिंग डायरेक्टर बना दिया था. मोनसन मावुंकल के गिरफ्तार होते ही वह पत्नी की बीमारी का कारण बता कर अपने घर ओडिशा चले गए हैं. जैसेजैसे सच्चाई बाहर आने लगी, झूठ और मात्र झूठ के आधार पर खड़ा किया गया मोनसन मावुंकल का साम्राज्य भरभरा कर गिरने लगा. हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद मोनसन मावुंकल ने किसी कालेज का मुंह नहीं देखा था. फिर भी उस के नाम के साथ डाक्टरेट की डिग्री लगी है. उस के म्यूजियम के खजाने में जो पौराणिक वस्तुएं थीं, वे ज्यादातर नकली थीं.

हाथीदांत और व्हेल की हड्डियों से बनी जो चीजें थीं, वे तिरुवनंतपुरम के एक कारीगर से ऊंट की हड्डियों से बनवाई गई थीं. उस कारीगर का भी इस पर पैसा बाकी है, इसलिए उस ने भी मुकदमा कर रखा है. उस की 30 कारों में से एक भी कार के पूरे कागज नहीं मिले. महंगी पोर्शे कार 2007 में करीना कपूर के नाम रजिस्टर्ड हुई थी. उस में पिता का नाम रणधीर कपूर और पता भी उन्हीं के घर का है. मोनसन मावुंकल की पत्नी शिक्षिका थी. 1981-82 में वे दोनों इडुक्की जिले के एक गांव में रहते थे. उस समय के उस के पड़ोसियों का कहना है कि मोनसन मावुंकल तो उन के गांव में इलैक्ट्रिशियन वायरमैन का काम करता था. 1998 में उस ने कोच्चि में पुरानी कारों के खरीदनेबेचने का धंधा शुरू किया. तभी चोरी की कार बेचने के आरोप में पुलिस ने उसे गिरफ्तार भी किया था.

छोटीमोटी धोखाधड़ी करते हुए उस ने एक पूरा आभासी साम्राज्य खड़ा कर लिया. अपने लेनदारों को मोनसन मावुंकल बड़े शान से 2.62 लाख करोड़ की जमा रकम वाला एचएसबीसी बैंक का स्टेटमेंट दिखाता था. पुलिस जांच में सामने आया है कि इस आदमी का तो बैंक में कोई एकाउंट ही नहीं है. कोफिन में अंतिम कील जैसी घटना उस की गिरफ्तारी के बाद बाहर आई. उस की कोठी में काम करने वाली नौकरानी की बेटी 17 साल की थी, तब मोनसन मावुंकल ने उस के साथ उच्च शिक्षा के लिए दाखिला दिलाने के नाम पर दुष्कर्म किया था. पुलिस से मोनसन मावुंकल के संबंधों के कारण वह गरीब पुलिस से शिकायत करने से डरती रही.

मोनसन मावुंकल पकड़ा गया तो उस ने एर्नाकुलम थाने में शिकायत की है कि अब तक उस के साथ दुष्कर्म का सिलसिला चलता रहा था. गिरफ्तारी के 2 दिन पहले भी उस नराधम ने उस लड़की के साथ दुष्कर्म किया था. क्राइम ब्रांच ने मोनसन मावुंकल के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 450, 506, 420, 421 के तहत कुल 14 एफआईआर दर्ज की हैं. इस में 19 अक्तूबर, 2021 को पोक्सो एक्ट के अंतर्गत भी मामला दर्ज किया गया था. डौन की तरह बौडीगार्ड के साथ मोनसन मावुंकल के फोटो खूब वायरल हुए थे. पुलिस जांच में पता चला कि सभी अंगरक्षकों के हाथों में जो हथियार दिख रहे थे, वे चाइनीज खिलौना राइफलें थीं. इस घटना का राजकीय प्रत्याघात भी जोरदार सामने आया है.

6 अक्तूबर, 2021 को केरल की विधानसभा में प्रश्नोत्तर के दौरान मोनसन मावुंकल एक बार फिर चर्चा में आया. राज्य के डीजीपी और अन्य उच्च अधिकारी मोनसन के म्यूजियम में क्या करने जाते थे, इस का जवाब देना मेरे लिए मुश्किल है. मुख्यमंत्री विजयन ने कहा. उन्होंने विश्वास दिलाया कि उस के दोनों घरों पर पुलिस बीट बौक्स की व्यवस्था किस ने कराई है, इस की जांच होगी.

विपक्षी नेता वी.डी. सतीश ने आक्रामक रुख अख्तियार करते हुए कहा है कि 2019 में पुलिस की इंटेलिजेंस विंग ने मोनसन मावुंकल को चीटर घोषित करते हुए जनवरी, 2020 में पूरी रिपोर्ट दी थी, फिर भी पुलिस ने उस के खिलाफ कुछ नहीं किया था. उसे राज्य के पुलिस अधिकारियों और सरकार की मदद मिलती रही थी. यह कह कर विपक्ष ने वाकआउट कर दिया था. लोगों को ठग कर इकट्ठा किया गया पैसा आखिर गया कहां? पुलिस अब इस दिशा में जांच कर रही है. पिछले 5 सालों में कोच्चि के पौश इलाके की प्रौपर्टी में जो बेनामी इनवैस्ट हुआ है, उस में सभी डीलरों का कहना है कि किसी ‘डाक्टर’ नाम के आदमी ने खासा बेनामी इनवैस्ट किया है.

पुलिस का मानना है कि वह डाक्टर कोई और नहीं, मोनसन मावुंकल ही होगा. इटली में रह रही अनीता पुल्लाइल भी पुलिस के शक के दायरे में है. वह बारबार केरल आ कर मोनसन मावुंकल से मिलती रहती थी. इस से पुलिस को आशंका है कि उस के माध्यम से मोनसन ने पैसा विदेश पहुंचाया है. पुलिस इस की भी जांच कर रही है. पुलिस का मानना है कि उन लेनदारों से अनीता ने जो शिकायत करने के लिए कहा था, उस समय मोनसन की पुलिस अधिकारियों से अच्छी सांठगांठ थी. इसलिए उन लोगों की शिकायत पर कुछ होगा नहीं, यह सोच कर उस ने यह सलाह दी थी.

दुनिया झुकती है, झुकाने वाला चाहिए, यह उक्ति मोनसन मावुंकल पर सच्ची ठहरती है. सारा नकली कारोबार कर के लोगों को ठगने और उन पर धाक जमाने के लिए नेताओं, अभिनेताओं और पुलिस अधिकारियों की तसवीरों का उपयोग किया, परंतु अंत में अपराध का घड़ा फूटा और अब वह नमूना जेल की सलाखें गिन रहा है.

Crime News: 7 साल बाद पकड़ में आए हत्यारें

Crime News: इफ्खिर अहमद सुनहरे सपनों की चाह में इंग्लैंड गया था. वहां उसे सब कुछ मिला भी. लेकिन 2 शादियों और मजहबी चक्रव्यूह के कारण वह अपनी ही बेटी का हत्यारा बन बैठा. इस चक्कर में वह तो जेल गया ही, उस की पत्नी फरजाना भी नहीं बच सकी. इफ्तिखार अहमद मूलत: पाकिस्तान के गुजरात क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव उत्ताम का निवासी था. वर्षों पहले जब वह युवा था, एक हसीन जिंदगी जीने का सपना संजो कर पाकिस्तान से इंग्लैंड आ गया था.

इफ्तिखार अहमद कोई खास पढ़ालिखा नहीं था, पर ड्राइविंग अच्छी जानता था, जो विदेश में आ कर उस के रोजगार का साधन बन गई. उस का बचपन भले ही बेहद गरीबी में गुजरा था, पर वह शुरू से महत्वकांक्षी था. बंदिशें उसे पसंद नहीं थीं. अलबत्ता अपने धर्म के प्रति वह पूरी तरह आस्थावान था. वह 6-7 वर्ष का था, तभी उस का रिश्ता उस के दूर के मामा की बेटी फरजाना से तय हो गया था. बड़ेबड़े सपने देखने वाला इफ्तिखार अकसर अपने दोस्तों से कहा करता था, ‘‘देखना एक दिन मैं बहुत बड़ा आदमी बनूंगा, दुनिया का हर ऐशोआराम मेरे कदमों में होगा.’’

दोस्त उसे टोक देते, ‘‘जमीन पर ही रह, हवा में मत उड़. घर में दो वक्त की रोटी नहीं, बनेगा बड़ा आदमी.’’

इफ्तिखार गुस्सैल स्वभाव का था. ऐसे तानें भला कैसे सुनता? उस ने दोस्तों से 2-4 हाथ कर लिए और चीख कर कहा, ‘‘तुम लोग यहीं सड़ते रहोगे. देखना, बड़ा हो कर मैं विदेश जाऊंगा. वहां जा कर हर कीमत पर अपने हालात बदल दूंगा.’’

खैर, किसी तरह बचपन अभावों में गुजरा. इफ्तिखार ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा और बचपन के सपनों में रंग भरने की कोशिश शुरू कर दी. यह अलग बात थी कि कुछ घर की माली हालात के चलते तो कुछ पढ़ाई में मन न लगने की वजह से वह जैसेतैसे नौवीं कक्षा ही पास कर पाया. पढ़ न पाने के कारण उसे कोई ढंग की नौकरी नहीं मिल सकती थी, ऊपर से घर वालोें का दबाव कि हमारा ना सही, अपना ही पेट भर ले. कोई और रास्ता न देख इफ्तिखार ने अपने एक जानकार ट्रक ड्राइवर के साथ कंडक्टरी शुरू कर दी. इसी दौरान उस ने ड्राइविंग भी सीख ली. धीरेधीरे हाथ साफ हो गया तो उस ने कंडक्टरी छोड़ दी और लाहौर आ कर किराए की टैक्सी चलाने लगा. उस ने 2 साल वहीं बिताए. फिर वह अपने घर वापस आ गया. इस बीच उस ने कुछ पैसे जोड़ लिए थे. अपना ख्वाब पूरा करने के लिए उस ने अपना पासपोर्ट बनवाया और फिर एक दिन फ्लाइट पकड़ कर इंग्लैंड आ गया.

इंग्लैंड में उसे हमवतन एजाज मिल गया, जिस ने उस की मदद की और उसे किराए पर चलाने के लिए टैक्सी दिलवा दी. इफ्तिखार मन लगा कर काम करने लगा. उसे यह बात अखरती थी कि उस की कमाई का ज्यादा हिस्सा तो टैक्सी मालिक के पास चला जाता है, सो उस ने बचत शुरू कर दी. 3-4 साल में उस ने काफी पैसे जोड़ लिए. कुछ पैसे कम पड़े तो एजाज ने मदद कर दी. पैसे एकत्र हो गए तो इफ्तिखार ने खुद की टैक्सी खरीद ली. अपनी टैक्सी आने के बाद सारा पैसा इफ्तिखार की जेब में आने लगा. पैसा आया तो उसे कई ऐब लग गए. इफ्तिखार को औरत के जिस्म का चस्का लग गया. वह अकसर देह बेचने वालियों के पास रातें बिताने लगा.

इसी दरम्यान उस की मुलाकात लोन एंडरसन नाम की एक लड़की से हुई, जो मूलत: डेनमार्क की रहने वाली थी और इंग्लैंड में एक बुकशौप में काम करती थी. दोनों की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हुआ तो फिर रुका नहीं. वे अकसर मिलते रहते थे. इफ्तिखार उसे अपनी टैक्सी में भी घुमाता था. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों एकदूसरे को दिल दे बैठे. इफ्तिखर ने एक दिन अपने प्यार का इजहार किया तो लोन एंडरसन ने भी अपने दिल की बात कह दी. लोन एंडरसन बेशक पश्चिमी देश की थी, पर सभ्य और शालीन थी. एक दिन जब दोनों एकांत में मिले तो इफ्तिखार ने उस के सामने शारीरिक दूरी खत्म करने की चाहत बयान करते हुए कहा, ‘‘इस के बिना हमारा प्यार अधूरा है. मैं इसे मुकम्मल कर देना चाहता हूं.’’

लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के चेहरे को गौर से देखा. फिर गंभीर आवाज में कहा, ‘‘शादी से पहले नहीं. मैं खुले विचारों की जरूर हूं, पर शादी के बाद ही अपना तन किसी पुरुष को सौपूंगी. इसीलिए मैं ने आज तक अपने नारीत्व की गरिमा को कायम रखा है.’’

‘‘शादी भी कर लेंगे, लेकिन आज दिल न तोड़ो.’’ इफ्तिखार ने गुजारिश की.

‘‘नहीं, कतई नहीं. मैं शादी से पहले इस की मंजूरी किसी हाल में नहीं दूंगी.’’ लोन एंडरसन ने साफ लहजे में सख्ती से मना कर दिया.

सुन कर इफ्तिखार का चेहरा उतर गया. वह मायूस हो गया. जबरदस्ती वह कर नहीं सकता था, सो मन मार कर रह गया. इस घटना के कुछ महीनों बाद आखिरकार इफ्तिखार और लोन एंडरसन ने कोपेनहेगन स्थित चर्च में शादी कर ली. यह सन 1981 के जून महीने की बात है. उसी रात दोनों ने एक होटल में हनीमून मनाया. 2 दिनों बाद इफ्तिखार होटल से उसे अपने घर ले आया. इस के बाद लोन एंडरसन के कहने पर इफ्तिखार उस के साथ डेनमार्क चला गया. वहां भी उस ने अपना टैक्सी ड्राइवर वाला काम कर लिया. दोनों खूब खुश थे और हंसीखुशी जिंदगी बिता रहे थे. शादी के एक साल बाद लोन एंडरसन ने इफ्तिखार के बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम टोनी एंडरसन रखा गया. इफ्तिखार चाहता था कि उसे अपनी मरजी का कोई मुसलिम नाम दे, पर लोन एंडरसन की इच्छा और डेनमार्क के नियम के चलते वह ऐसा नहीं कर पाया.

सन 1985 के जनवरी माह में इफ्तिखार के नाम पाकिस्तान से एक खत आया. खत उस के घर वालों ने भेजा था. इफ्तिखार और उस के परिवार के बीच पत्र व्यवहार चलता रहता था, इसलिए यह कोई खास बात नहीं थी. लेकिन इस पत्र को पढ़ कर वह सोच में पड़ गया. उसे गंभीर देख कर लोन एंडरसन ने कारण पूछा तो इफ्तिखार ने कहा, ‘‘मेरी मां बहुत बीमार है. मुझे पाकिस्तान जाना होगा.’’

‘‘बिलकुल जाओ, वैसे भी तुम्हें जाना चाहिए. आखिर वह तुम्हारी मां है.’’ लोन एंडरसन ने बिना कोई आपत्ति जताए कहा. उस वक्त वह यह बिलकुल नहीं समझ पाई कि इफ्तिखार उस से फरेब कर रहा है. हकीकत में उस की मां बीमार नहीं थी, बल्कि खत में लिखा था कि बचपन में फरजाना नाम की जिस लड़की से उस का निकाह तय हुआ था, वह अब जवान हो चुकी है. उस के घर वाले निकाह के लिए दबाव बना रहे हैं. इसलिए वह फौरन स्वदेश लौट आए और घर वालों द्वारा फरजाना के परिवार से किए वादे को पूरा करे.

खैर, इफ्तिखार अहमद जनवरी, 1985 के आखिर में अपनी पत्नी लोन एंडरसन और 3 साल के बेटे टोनी एंडरसन को डेनमार्क में छोड़ कर पाकिस्तान आ गया. पाकिस्तान आ कर उस ने फरजाना के साथ निकाह कर लिया. उस ने अपने घर वालों और फरजाना पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि वह पहले से शादीशुदा है और साथ ही एक बेटे का बाप भी. कुछ महीने इफ्तिखार पाकिस्तान में ही रहा. वजह यह कि उस पर दबाव था कि वह फरजाना को भी अपने साथ ले जाए. फरजाना का पासपोर्ट बनने और वीजा लगने में समय लग रहा था. अंतत: इफ्तिखार अपनी दूसरी पत्नी फरजाना को ले कर ब्रैडफोर्ड, इंग्लैंड आ गया. उस ने डेनमार्क में इंतजार कर रही लोन एंडरसन से कोई संपर्क नहीं किया.

कई महीने गुजर गए, इफ्तिखार नहीं लौटा तो लोन एंडरसन को चिंता हुई. पाकिस्तान का पता उस के पास था नहीं, जो वहां से कोई पूछताछ करती. अत: वह ब्रैडफोर्ड आई और इफ्तिखार के पुराने घर पर गई. वहां उसे पता चला कि इफ्तिखार ने पड़ोस में ही दूसरा घर ले लिया है. लोन एंडरसन वहां पहुंची तो फरजाना को देख कर उसे लगा कि इफ्तिखार की कोई रिश्तेदार होगी. उसी समय इफ्तिखार आ गया. उस ने यह बात छिपा ली कि फरजाना उस की बीवी है. इत्तफाक से तभी फरजाना की तबीयत खराब हो गई. इफ्तिखार और लोन एंडरसन उसे ले कर डाक्टर के पास गए. वहां पता चला कि फरजाना गर्भ से है. इस जानकारी के बाद इफ्तिखार लोन एंडरसन से सच नहीं छिपा पाया. उस ने बता दिया कि फरजाना उस की पत्नी है. वह पाकिस्तान निकाह करने गया था.

इस से लोन एंडरसन का दिल टूट गया. वह कुछ नहीं बोली और वापस डेनमार्क लौट गई. कुछ दिनों बाद वह अपने बेटे टोनी एंडरसन के साथ वापस आई और इफ्तिखार से कहा कि उस ने उस के साथ जो किया सो किया, पर वह उस के बेटे को पिता की सरपस्ती से दूर न करे. वह उसे अपने पास रखे. लेकिन इफ्तिखार इस के लिए राजी नहीं हुआ. उस ने कहा कि अगर बेटी होती तो वह उसे अपने पास रख लेता, पर बेटे को नहीं रखेगा. लोन एंडरसन ने उस पर कोई दबाव नहीं बनाया. वह बेटे को ले कर वापस लौट गई. अलबत्ता इस के बाद भी वह इफ्तिखार से संपर्क जरूर बनाए रही. दूसरी ओर इफ्तिखार बेखौफ फरजाना के साथ अपना गृहस्थ जीवन जी रहा था. 14 जुलाई, 1986 को फरजाना ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम रखा गया शेफीलिया अहमद.

इस के ठीक एक साल बाद फरजाना ने एक और बेटी को जन्म दिया. इस का नाम रखा गया अलेशा अहमद. फिर फरजाना ने एक बेटे को जन्म दिया. तीनों बच्चे कुछ बड़े हुए तो इफ्तिखार ब्रैडफोर्ड छोड़ कर परिवार सहित वारिंगटन आ बसा. शेफीलिया पढ़ाई में काफी होशियार थी. वह वकील बनना चाहती थी. वहीं उस से छोटी अलेशा की पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी. वह पिता के दबाव में जबरदस्ती पढ़ रही थी. बात 2003 की है. शेफीलिया का हाईस्कूल का आखिरी साल था. 11 सितंबर, 2003 को शेफीलिया की टीचर ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी कि वह एक सप्ताह से ना तो स्कूल आ रही है और ना ही घर पर है. घर वाले भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे रहे हैं.

पुलिस ने इफ्तिखार अहमद से पूछताछ की तो उस ने बताया कि शेफीलिया की उसे भी कोई खबर नहीं है. उन लोगों ने उस की सहेलियों से भी संपर्क किया, पर उस का कोई पता नहीं चला. शेफीलिया लापता है, इस की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी? यह पूछने पर इफ्तिखार अहमद ने कहा कि बेटी का मामला है. वह नहीं चाहता था कि शेफीलिया के गुम होने पर उस के परिवार वालों को किसी प्रकार की जगहंसाई का सामना करना पड़े. वैसे भी यह शेफीलिया के भविष्य का भी सवाल था. अगर एक बार चरित्र पर दाग लग जाता तो उन के समाज में शेफीलिया का निकाह होना मुश्किल है.

खैर, पुलिस ने प्रिंट मीडिया और इलैक्ट्रोनिक मीडिया में शेफालिया के गायब होने की सूचना प्रसारित करवा दी. पुलिस खुद भी अपने स्तर पर उस की खोज करने लगी. न्यूज चैनलों पर उस की खोज के लिए बड़े पैमाने पर कैंपेन चलाए गए. इस के तहत अंगे्रजी फिल्मों की अभिनेत्री शोभना गुलाटी ने टीवी पर शेफीलिया द्वारा लिखित कविताओं का पाठ किया. पर शेफीलिया का कोई सुराग नहीं मिल पाया. इसी तरह कई महीने बीत गए. 24 फरवरी, 2004 को पुलिस कंट्रोल में किसी ने सूचना दी कि वारिंगटन से करीब 110 किलामीटर दूर कंब्रिया के सेडविक शहर स्थित केंट नदी के किनारे किसी लड़की का सड़ागला शव पड़ा हुआ है. नदी में भारी बाढ़ आने की वजह से शव नदी के किनारे आ लगा था. पुलिस तुरंत नदी किनारे पहुंची.

सूचना सही थी, लेकिन लड़की की लाश इतनी सड़ गई थी कि उस की पहचान करना मुश्किल था. हां, लाश के बाएं हाथ में जिगजेग गोल्ड बे्रसलेट और हाथ की एक अंगुली में ब्ल्यू टोपाज रिंग अब भी मौजूद थी. इफ्तिखार अहमद ने बेटी की गुमशुदगी के समय इन चीजों का जिक्र किया था. पुलिस ने इस की सूचना इफ्तिखार अहमद को दी और तुरंत नदी पर आने को कहा. इफ्तिखार अहमद पत्नी फरजाना सहित वहां पहुंचा. उस ने गोल्ड ब्रेसलेट और रिंग को पहचानते हुए लाश की शिनाख्त अपनी 17 वर्षीया बेटी शेफीलिया अहमद के रूप में की. लाश की शिनाख्त हो गई तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया गया.

पोस्टमार्टम में मौत का कारण पता नहीं लग पाया. वजह थी, लाश का अत्यधिक सड़ जाना. पुलिस ने लाश का दूसरी बार पोस्टमार्टम करवाया, पर इस बार भी कोई परिणाम नहीं निकला. अब की बार पुलिस ने मृतका शेफीलिया के बाएं थाई बोन का डीएनए टेस्ट करवाया. इस से साफ हो गया कि लाश शेफीलिया की ही थी. वहीं निचले जबड़े को भी शेफीलिया के दंत चिकित्सक को दिखाया गया. उस ने भी पुष्टि कर दी कि लाश शेफीलिया की ही थी. पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच शुरू की तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं. इस जांच के लिए पुलिस ने इफ्तिखार अहमद, उस की पत्नी फरजाना, इफ्तिखार के साथी टैक्सी ड्राइवर व 5 अन्य परिचितों को हिरासत में ले लिया.

सभी से अलगअलग तरहतरह से पूछताछ की गई. पर उस की हत्या का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला. इस पर बिना चार्ज लगाए सभी को छोड़ दिया गया. बावजूद इस के पुलिस इंस्पेक्टर माइक फोरेस्टर ने जांच जारी रखी. जांच के दौरान इफ्तिखार के घर से शेफीलिया के सामान से उस की डायरी बरामद हुई, जिस में काफी कविताएं लिखी हुई थीं. उस की कविताओं में एक कविता ‘आई फील टे्रप्ड’ शीर्षक से थी. यह कविता शेफीलिया की मनोदशा व्यक्त करती थी. इस से उस के निराशाजनक जीवन का साफ पता चल रहा था.

जांच के दौरान ही इफ्तिखार की पड़ोसन शैला कोस्टेलो ने बताया था कि शेफीलिया को उस का परिवार उपेक्षित रखता था. परिवार द्वारा पीडि़त करने की वजह से वह कई बार घर से भाग गई थी. 2 बार पुलिस में उस के लापता होने की रिपोर्ट भी लिखाई गई थी. दोनों बार वह अपने बौयफ्रेंड के घर पर पाई गई थी. पड़ोसन ने यह भी बताया कि उस ने सुना था कि शेफीलिया के घर वाले उस की इसी उम्र में अरेंज मैरिज करने के लिए दबाव बना रहे थे. इफ्तिखार के घर से एक वीडियो भी बरामद हुआ. यह वीडियो उस समय का था, जब सन 2003 के शुरू में इफ्तिखार अहमद परिवार सहित पाकिस्तान गया था. इस वीडियो में शेफीलिया पाकिस्तान में मस्ती करती हुई दिखाई दे रही थी.

बहरहाल, शेफीलिया की हत्या की जांच चलती रही. जनवरी, 2008 में मृत्यु समीक्षक जोजफ द्वारा की गई जांच में कहा गया कि शेफीलिया की हत्या का केस बहुत ही जघन्य हत्याकांड की श्रेणी में आता है. उस ने शंका भी व्यक्त की कि हो सकता है, इस में उस के घर वालों का हाथ रहा हो. इस के बाद पुलिस ने फिर से इफ्तिखार से पूछताछ की. उस ने बताया कि यह सही है कि शेफीलिया गुस्सैल स्वभाव की जिद्दी लड़की थी. उसे पश्चिमी पहनावा पसंद था. जबकि उस का परिवार इस के खिलाफ था. उस पर रोक लगाई जाती थी तो वह विद्रोह पर उतर आती थी. पूछताछ के दौरान कोई ऐसी बात नहीं निकल कर आई कि इफ्तिखार पर शक किया जाता.

देखतेदेखते शेफीलिया की मौत को 7 साल बीत गए. पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पाई. पर कहते हैं कि पाप एक न एक दिन जरूर बेपरदा हो जाता है. आखिर शेफीलिया अहमद हत्याकांड के ताले की चाबी बन कर उस की छोटी बहन अलेशा सामने आई. शुरू से पढ़ाई चोर और बिगड़ैल मिजाज की अलेशा गलत सोहबत में पड़ गई थी. उस के खर्चे बेपनाह थे, जबकि घर से उसे नाममात्र का ही जेबखर्च मिलता था. अपने खर्चे पूरे करने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थी. यहां तक कि उस ने अपने खुद के ही घर में डकैती डलवा दी थी. यह घटना 25 अगस्त, 2010 की है. घटना के समय वह अपने मातापिता व भाईबहन के साथ घर में ही मौजूद रही, ताकि उस पर घर वालों या पुलिस को कोई शक न हो. इस के लिए उस ने अपने बौयफ्रेंडों के साथ मिल कर सुरक्षित योजना बनाई थी. इस डकैती में घर से काफी गहने व नकदी लूटी गई.

डकैती की सूचना पुलिस को दी गई तो उस ने जांच शुरू की. अलेशा से पूछताछ के दौरान उस के बदले हुए भाव को देखते ही पुलिस को उस पर शक हो गया था. पर वह सहज रूप से सच नहीं उगल पा रही थी. आखिर उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो वह टूटने लगी. आखिर उस ने सारा सच उगल दिया. साथ ही उस ने अपने घर वालों के भय से 7 साल से दिल में छिपा कर रखा अपनी बड़ी बहन शेफीलिया की हत्या का राज भी उगल दिया. बतौर अलेशा, शेफीलिया शुरू से आजाद ख्याल की थी. उसे पश्चिमी रहनसहन, खुलापन और पहनावा पसंद था. जबकि घर वाले इस सब के खिलाफ थे. वह चाहते थे कि शेफीलिया उन के मजहब की परंपरा के अनुसार आचरण अपनाए, घर की चारदीवारी तक सीमित रहे. बुर्का पहने और लड़कों से दोस्ती न करे. पर वह ऐसा नहीं करती थी.

वह पश्चिमी पहनावा पहनती और लड़कों से खुल कर दोस्ती करती. इसी वजह से इफ्तिखार अकसर उस की पिटाई तक कर देता था. उसे भूखा रखा जाता और अन्य तरीकों से भी प्रताडि़त किया जाता. इस से उस का स्वभाव विद्रोही हो गया. 15 वर्ष की होतेहोते उस का यह स्वभाव अपने चरम पर पहुंच गया था. अब जब भी उसे प्रताडि़त किया जाता, वह घर से भाग जाती. फिर 2-4 दिन में वापस लौट आती. उस का एक बौयफ्रेंड था मुश्ताक बगास. वह ब्लेकबर्न में रहता था और 28 साल का था. यानी वह उस से करीब 11 साल बड़ा था. 2002 में जब शेफीलिया का परिवार ब्लेकबर्न में रहता था, तब दोनों की दोस्ती हुई थी, जो प्यार के बाद शारीरिक संबंधों में बदल गई थी. इस की पहल शेफीलिया ने ही की थी.

बगास ने तो उसे रोका था कि अभी वह नाबालिग है और शादी से पहले यह उचित नहीं है, पर शेफीलिया ने जिद पकड़ ली थी. वह बोली, ‘‘मैं तुम्हें बेइंतहा प्यार करती हूं. फिर प्यार में किसी प्रकार की दीवार क्यों? जब मैं ने तुम्हें अपना मन सौंप दिया है तो तन सौंपने में क्या हर्ज है. आखिर शादी के बाद भी तो यही सब करना है. फिर शादी तक हम क्यों समय बर्बाद करें. जिंदगी मौजमस्ती का नाम है. कल किस ने देखा है. जो करना है, आज ही क्यों ना कर लें.’’

‘‘लेकिन यह गलत होगा.’’ बगास समझदार था और इस तरह का कोई फायदा नहीं उठाना चाहता था.

‘‘प्यार में गलत सही कुछ नहीं होता. फिर तुम कौन सा मुझ से जबरदस्ती कर रहे हो. मैं अपनी इच्छा से तुम्हें अपना सब कुछ सौंपना चाहती हूं.’’ शेफीलिया ने कहा. आखिर उस की दलीलों के आगे बगास की एक न चली और उस ने वैसा ही किया जैसा शेफीलिया चाहती थी.

अब जब भी शेफीलिया घर से भागती. बगास के घर ही पहुंच जाती. दोनों खुल कर मौजमस्ती करते. बातचीत के लिए बगास ने उसे एक मोबाइल फोन भी दे दिया था, जो वह छिपा कर रखती थी. मौका मिलने पर वह अपने दुखसुख की बात उस से कर लेती थी. शेफीलिया यूं तो कई बार घर से भागी थी, पर पुलिस में उस की रिपोर्ट 2-3 बार ही दर्ज कराई गई थी. दिसंबर, 2002 में उस ने बगास को स्कूल के लंच समय में मिलने के लिए बुलाया. उस दिन तो वह नहीं आया, पर अगले दिन दोनों मिले. शेफीलिया ने उसे अपने पिता द्वारा की गई पिटाई के निशान दिखाते हुए कहा, ‘‘अब सहन नहीं होता बगास. कुछ करो, वरना मैं यूं ही किसी दिन दम तोड़ दूंगी. अब हद हो गई है. मेरे घर वाले मेरा निकाह पाकिस्तान में मेरे कजिन से करना चाहते हैं, जो मुझ से 30 साल बड़ा है. मुझे अब सारा भरोसा तुम्हारे प्यार पर है, वरना…’’

बगास उस के हर दर्द से वाकिफ था. वह भी चाहता था कि शेफीलिया सदा खुश रहे. इसलिए वह उस की मदद करने को तैयार हो गया. दोनों ने घर से भागने का प्लान बना लिया. 2 जनवरी, 2003 को सुबहसवेरे ही बगास कार ले कर उस के घर से कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. उस ने मिसकाल दे कर शेफीलिया को अपने आने की सूचना दे दी. शेफीलिया मौका देख कर एक बैग में अपने कुछ कपड़े रख कर सावधानीपूर्वक घर की खिड़की से कूद कर बाहर आ गई और बगास की कार में जा बैठी. बगास ने फौरन कार आगे बढ़ा दी. इस बार वह शेफीलिया को अपने घर नहीं ले गया. क्योंकि पहले 2 बार शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद उसे वहां से बरामद कर चुके थे.

बगास शेफीलिया को ब्लेकबर्न में ही अपने भाई के घर ले गया. वहां रात में दोनों ने एकदूसरे को खूब प्यार किया. दोनों के बीच कई बार शारीरिक संबंध भी बने. इस दौरान शेफीलिया के पिता इफ्तिखार अहमद ने कई बार उसे फोन किया, पर उस ने कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन इफ्तिखार अहमद ने किसी तरह शेफीलिया का पता लगा ही लिया. वह सीधे बगास के भाई के घर पहुंचा और शेफीलिया को जबरदस्ती साथ ले आया. उस ने चलते समय बगास को चेतावनी भी दी, ‘‘अगर अब की बार मैं ने तुम्हें इस के साथ देख लिया तो इस के साथ तुझे भी काट डालूंगा.’’

घर आ कर इफ्तिखार ने शेफीलिया की खूब पिटाई की और फरमान सुना दिया कि 2-4 दिन में सब लोग पाकिस्तान चले जाएंगे. वहां उस का निकाह कर दिया जाएगा. शेफीलिया बेबस हो गई. वह घर में कैद थी. जनवरी, 2003 के आखिर में पूरा परिवार पाकिस्तान गया. वहां शेफीलिया के निकाह की तैयारी भी कर ली गई. शेफीलिया को इस से बचने का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उस ने अपनी इहलीला समाप्त करने की ठान ली. उस ने मौका देख ब्लीच पी लिया. इस से उस की हालत बिगड़ने लगी. लेकिन समय रहते घर वालों ने उसे बचा लिया. उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों को बताया गया कि अंधेरा होने के कारण शेफीलिया ने दवा की जगह कोई जहरीली चीज पी ली थी.

अभी तक इफ्तिखार के रिश्तेदारों को इस की भनक नहीं लगी थी. सो मई में वह शेफीलिया और परिवार सहित वापस इंग्लैंड लौट आया. यहां उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया. क्योंकि वह पूरी तरह ठीक नहीं हो पाई थी. न तो उस के गले से कुछ नीचे उतरता था, न ही वह कमजोरी के कारण ठीक से चल पाती थी. यहां कई सप्ताह तक उस का इलाज चला. उस के बगल वाले बेड की मरीज ने जब शेफीलिया से पूछा कि उस ने ब्लीच क्यों पी तो उस ने बताया कि जबरन उस की शादी उस से की जा रही थी, जिसे वह पसंद ही नहीं करती.

उस का पासपोर्ट भी उस के पिता ने छीन लिया था. इफ्तिखार ने यहां अस्पताल की एक एशियन मूल की नर्स को कहा कि वह गोरी नर्सों को न बताए कि शेफीलिया ने ब्लीच पी थी. उस नर्स ने शेफीलिया से कहा कि वह कैसे अपने घर वालों के साथ रहती है. उस की फैमिली तो लवलेस फैमिली है. स्वस्थ होने के बाद शेफीलिया पर फिर से शादी के लिए दबाव बनाया जाने लगा. पर उस ने साफ मना कर दिया. उस के पिता को उस पर शक भी होने लगा था कि वह गर्भ से है. उन्हें जब विश्वास हो गया कि अब वह किसी भी तरह नहीं मानेगी तो 11 दिसंबर, 2003 को इफ्तिखार और उस की पत्नी फरजाना ने शेफीलिया की खूब पिटाई की. अलेशा थोड़ी सी खुली खिड़की से सब देख रही थी. फरजाना ने अपने पति से कहा, ‘‘यह लड़की हमें कहीं का नहीं छोड़ेगी. बेहतर है, इसे खत्म कर दो.’’

इफ्तिखार इस के लिए तैयार हो गया तो फरजाना कंबल, चादर, टेप के 2 रोल, एक काला विग और बैग ले आई. इस के बाद इफ्तिखार ने एक प्लास्टिक बैग से शेफीलिया का मुंह तब तक दबाए रखा, जब तक कि उस ने दम नहीं तोड़ दिया. तत्पश्चात दोनों ने उस की लाश को चादर व कंबल में लपेट कर बैग में भर दिया. फिर दोनों ने मिल कर बैग को चारों तरफ से टेप से पैक कर दिया. इस के बाद दोनों ने लाश को बाहर खड़ी कार में रख दिया. इफ्तिखार अकेले ही कार ले कर चला गया. उस ने लाश केंट नदी में फेंक दी और घर लौट आया. इस के कई महीने बाद पुलिस ने लाश बरामद की. शक इफ्तिखार पर गया. पर उस के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला. यह केस यहीं दफन हो जाता अगर 7 साल बाद अलेशा सच उजागर न करती.

डकैती के आरोप में अलेशा को 6 महीने की सजा सुनाई गई. उस की सजा ज्यादा होती, पर उस ने मानवीयता दिखाते हुए अपनी बहन शेफीलिया की हत्या का राज खोला था, इस का उसे लाभ दिया गया. जज इरविन ने कहा, ‘‘जब सच्चाई व्यक्त करने की इच्छा होती है, तो कोई भी व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता. अलेशा ने कानून की मदद की है, इस के लिए उस का यह कदम सराहनीय है. इस से उस के मन को शांति मिलेगी, जो उस की आगे की जिंदगी को सामान्य बनाने में मदद करेगी.’’

खैर, अब फिर से इफ्तिखार अहमद तथा फरजाना को गिरफ्तार कर लिया गया. एक पेशी के दौरान जज जान स्मिथ ने कहा, ‘‘शेफीलिया हत्याकांड एक जघन्य कृत्य है. वह अपना जीवन अपने तरीके से जीना चाहती थी. वह होनहार थी और ला की पढ़ाई करना चाहती थी. उसे अपनी इच्छा से जीवन जीने का अधिकार था. पर उस के मातापिता उसे इस अधिकार से वंचित रखना चाहते थे. शेफीलिया 2 संस्कृतियों के बीच फंसी हुई थी. उसे अपने तरीके से जीने देना चाहिए था, पर उस के मातापिता ने जीवन की जगह उसे मौत दे दी. ये किसी भी तरह रहम के काबिल नहीं हैं.’’

कोर्ट में कई सुनवाई हुईं. इस दौरान शेफीलिया के जानकारों के भी बयान दर्ज किए गए. नार्थवेस्ट के नए चीफ प्रौसिक्यूटर नाजिर अफजल ने कोर्ट को बताया कि एशियन समाज में अभिभावक औनर क्राइम करने से नहीं डरते. शेफीलिया की हत्या के कई सुबूत मिले हैं. वह घरेलू हिंसा का शिकार हुई थी. घर वालों ने उस से अपनी मर्जी की जिंदगी जीने का अधिकार छीन लिया था. शेफीलिया के दोस्त साराह बैनट ने कोर्ट में बयान दिया कि शेफीलिया ने अपने बालों को रंग लिया था और नाखून बढ़ा लिए थे. इस पर उस की मां फरजाना ने कैमिकल की सहायता से उस के बालों का रंग धो दिया और उस के नाखून काट दिए थे. साथ ही उस की बेरहमी से पिटाई भी की थी. उसे गंदी गालियां भी दी जाती थीं. उस की मां उसे पकड़ती तो पिता उस की पिटाई करता था.

शेफीलिया के दूसरे दोस्त बुड्स ने बताया कि उसे शेफीलिया ने एक नोट दिया था. उस ने वही नोट कोर्ट में पढ़ कर सुनाया. उस में लिखा था, ‘‘पिछले कुछ सालों से घरेलू हिंसा का शिकार होना पड़ रहा है. वे मुझे कालेज जाने से रोकना चाहते थे. वे मुझ से जबरदस्ती नौकरी करवाना चाहते थे. मैं ने जेब खर्च से 2 हजार यूरो बचा कर अपने खाते में डलवाए तो मेरे पिता ने वे भी निकलवा लिए. मुझे डर रहता है, क्योंकि मेरे मातापिता मुझे पाकिस्तान ले जा कर मेरी शादी करवाना चाहते हैं. वे लोग मुझे वहीं छोड़ देना चाहते हैं. जबकि मुझे वह कल्चर कतई पसंद नहीं है. मुझे घर में घुटन होती है. मैं ने पिता द्वारा लाए गए कई रिश्ते ठुकरा दिए थे. इस कारण मुझे मार खानी पड़ती थी.’’

शेफीलिया की टीचर जोएनी कोड ने कोर्ट में बयान दिया, ‘‘शेफीलिया की मौत से करीब 11 महीने पहले उस के स्कूल से अनुपस्थित रहने पर जब मैं ने उसे फोन किया और पूछा कि क्या कोई चिंता की बात है? तब शेफीलिया ने हां कहा था. जब वह दूसरे दिन स्कूल लौटी तो मैं ने उस की गर्दन पर खरोचों के निशान देखे थे. उस के होंठों पर भी कट का निशान था. पूछने पर शेफीलिया ने बताया कि उस की मां ने उसे नीचे कर के पकड़े रखा और पिता ने पीटा. इसी से वे निशान आए थे. उसे अकसर कमरे में बंद कर के भूखा रखा जाता था. उस के उत्पीड़न की बात एक सोशल वर्कर को पता लगी तो वह स्कूल में उस से पूछताछ करने आया. पर शेफीलिया ने उसे कुछ नहीं बताया था.’’

7 सितंबर, 2011 को तमाम गवाहों के बयानों के बाद पुलिस ने इफ्तिखार अहमद और फरजाना के विरुद्ध कोर्ट में चार्जशीट पेश की. जिस में उन पर बेटी शेफीलिया की हत्या का चार्ज लगाया गया था. दोनों के खिलाफ ट्रायल मई, 2012 से 3 अगस्त, 2012 तक हुआ. इस दौरान इफ्तिखार अहमद और फरजाना ने अपना अपराध कुबूल लिया था. उन्होंने बताया कि शेफीलिया की हरकतों से वे तंग आ गए थे. वह हर तरह से उन की बदनामी करवाना चाहती थी. इसी कारण उन्हें उस की हत्या करनी पड़ी.

तमाम पेशियों के बाद 14 दिसंबर, 2014 को कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया. इफ्तिखार अहमद और फरजाना को शेफीलिया की हत्या का दोषी करार देते हुए दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई. सजा सुनते ही दोनों रो पड़े. Crime News

Crime Story : पत्नियों की अदला बदली – पैसे वालों का खेल

Crime Story : नए साल में दूसरे रविवार का दिन था. तारीख थी 9 जनवरी. कोट्टायम जिले के करुक्चल थाने में करीब 30 वर्षीया रमन्ना (बदला हुआ नाम) सुबहसुबह अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने आई थी. उस ने थानाप्रभारी से कहा, ‘‘साहब, मुझे पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करानी है.’’ यह सुनते ही चाय पीते हुए थानाप्रभारी झल्ला गए. उन्होंने समझा कि कोई घरेलू हिंसा या दहेज आदि का मसला होगा. महिला की आगे की बातें सुनने के बजाय उन्होंने उसे डपट दिया, ‘‘जाओ, घर जाओ और पति या घर के किसी सदस्य को साथ ले कर आना. सुबहसुबह पति से झगड़ कर आ गई हो. समझा दूंगा उसे…’’

रमन्ना वहीं खड़ीखड़ी थानाप्रभारी को चाय पीते देखती रही. थानाप्रभारी फिर बोले, ‘‘समझदार दिखती हो. पढ़ीलिखी भी लगती हो. घरेलू झगड़े को क्यों बाजार में लाना चाहती हो?’’

‘‘साहबजी, आप जो समझ रहे हैं, बात वह नहीं है. किसी लेडी पुलिस से मेरी शिकायत लिखवा दीजिए. ‘भार्या माट्टल’ की शिकायत है.’’

रमन्ना की गंभीरता भरी बातों के साथ मलयाली शब्द भार्या माट्टल सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए. इन शब्दों का अर्थ था बीवियों की अदलाबदली. दरअसल, ये 2 शब्द पुलिस के लिए अपराध की गतिविधियों में शामिल थे. भार्या माट्टल यानी वाइफ स्वैपिंग या बीवियों की अदलाबदली.

उन्होंने महिला को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा. उस के बैठने पर पूछा, ‘‘चाय पियोगी, मंगवाऊं?’’

‘‘हां,’’ कहते हुए सिर हिला दिया.

थानाप्रभारी ने कांस्टेबल को आवाज लगाई, ‘‘अरे, सुनो जरा एक कप चाय और लाना. और हां, एसआई मैडम को भी डायरी ले कर बुला लाना.’’

थोड़ी देर में एक लेडी पुलिस सबइंसपेक्टर थानाप्रभारी के पास आ चुकी थीं. चाय की एक प्याली भी महिला के सामने रखी थी. थानाप्रभारी ने उसे पीने के लिए इशारा किया और लेडी एसआई को उस की शिकायत लिखने को कहा. फिर वह कुरसी से उठ खड़े हुए. जातेजाते पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘रमन्ना.’’

‘‘टाइटल क्या है?’’

‘‘नायर…रमन्ना नायर.’’

‘‘ठीक है, तुम आराम से चाय पियो और मैडम को पूरी बात बताओ,’’ यह कह कर थानाप्रभारी वहां से चले गए.

थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी, लेडी एसआई और दूसरे पुलिसकर्मियों की मीटिंग हुई. तब तक रमन्ना थाने में ही ठहरी रही.

रमन्ना ने जो बात महिला एसआई को बताई थी, वह बड़ी गंभीर थी. सुन कर थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित हो गए थे कि क्या एक पति ऐसा भी कर सकता है. उन्होंने यह जानकारी डीएसपी (कांगनचेरी) आर. श्रीकुमार को दी तो डीएसपी ने इस मामले में उचित काररवाई करने के निर्देश दिए. थानाप्रभारी ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम बनाई. आरोपियों की गिरफ्तारियां भी जरूरी थी, ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके.

मामला बेहद संवेदनशील था. संभ्रांत व्यक्तियों के चरित्र हनन, निजी संबंधों के साथसाथ पार्टनर एक्सचेंज रैकेट के अलावा अननेचुरल सैक्स से भी जुड़ा हुआ था. इसी शिकायत में मैरिटल रेप भी शामिल था. उल्लेखनीय है कि इस से पहले केरल के कायमकुलम में भी साल 2019 में ऐसा ही मामला सामने आ चुका था. उन दिनों कायमकुलम से 4 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी. उस वक्त भी गिरफ्तार लोगों में से एक की पत्नी ने ही शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसे पति ने ही 2 लोगों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया था. पति ने उसे दूसरे अजनबियों के साथ सोने के लिए दबाव बनाया था.

रमन्ना द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत भी काफी चौंकाने वाली थी. उस ने पति के खिलाफ शिकायत लिखवाई थी कि वह पति के दबाव में आ कर दूसरे मर्दों के साथ सोने को विवश हो गई थी, जबकि पति के साथ प्रेम विवाह हुआ था. शिकायत में यह भी कहा कि उस के साथ अप्राकृतिक सैक्स भी किया गया. एक समय में 3 मर्दों के साथ हमबिस्तर होना पड़ा. इसे अनैतिक यौनाचार की भाषा में गु्रप सैक्स कहना ज्यादा सही होगा. इस तरह से वह पति के अतिरिक्त कुल 9 अलगअलग मर्दों के सैक्स की सामग्री बन चुकी थी. वे सारे मर्द उस के पति के दोस्त थे. रमन्ना ने साफ लहजे में कहा कि पति को इस के बदले में पैसे मिले थे.

कोट्टायम जिले की पुलिस ने मामले को काफी गंभीरता से लेते हुए तुरंत छापेमारी की योजना बनाई और देखते ही देखते 7 लोगों को धर दबोचा. उस के बाद जो बड़े पैमाने पर सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ, वह काफी सनसनीखेज और चौंकाने वाला था. उस की पूरे देश में चर्चा होने लगी.

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एक के बाद एक हुई गिरफ्तारियों के बाद एक बड़े सैक्स रैकेट का परदाफाश हुआ, जो सोशल साइट के विभिन्न प्लेटफार्मों के जरिए पतियों के ग्रुप द्वारा चलाए जा रहे थे. रिपोर्ट के मुताबिक करुक्चल में 7 लोगों को बीवियों की अदलाबदली के आरोप में 9 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था. उन में रमन्ना का पति भी था. गिरफ्तार किए गए लोग केरल के अलाप्पुझा, कोट्टायम और एर्नाकुलम के रहने वाले हैं. रिपोर्ट के मुताबिक इस रैकेट में बाकायदा वाट्सऐप पर ग्रुप बनाए गए थे, जिस से सैकड़ों लोग जुड़े हुए थे. इसी ग्रुप में आगे की योजना बनाई जाती थी. हैरानी की बात यह भी थी कि इस ग्रुप में केरल के एलीट क्लास के कई लोग भी शामिल थे.

इस पूरे मामले की तहकीकात के बाद चांगनचेरी के डिप्टी एसपी आर. श्रीकुमार ने बताया कि पहले तो वे इन ग्रुप्स में शामिल हो कर एकदूसरे से मिलते थे. बाद में निर्धारित ठिकाने पर सैक्स के लिए जुटते थे. इस के पीछे एक बड़ा रैकेट है. इस में कई और दूसरे लोगों की तलाश भी की जा रही है. पुलिस के अनुसार महिलाओं सहित भले ही कुछ समान विचारधारा वाले हों, लेकिन कुछ महिलाओं को उन के पतियों ने इस में जबरदस्ती शामिल कर रखा था. गिरफ्तार लोगों ने पूछताछ में बताया कि वे पहले टेलीग्राम और दूसरे मैसेंजर ग्रुप्स में शामिल होते हैं, और फिर 2 या 3 कपल आपस में मुलाकात करते हैं. इस के बाद महिलाओं की अदलाबदली होती है.

इन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस ने ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकट’ की तह में जा कर पता लगाया. पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकेट’ के नेटवर्क का मुख्य आधार टेलीग्राम और मैसेंजर ऐप था, जिस में एक गिरोह के 1000 से अधिक कपल बताए जा रहे हैं. उन के द्वारा सैक्स के लिए बड़े स्तर पर महिलाओं की अदलाबदली की जा रही थी. इस रैकेट में पैसों का भी औनलाइन लेनदेन होता है. कई लोग पैसों के लिए अपनी पत्नियों को सिंगल पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं, जबकि इस सैक्स में 2-3 पुरुष ही होते हैं.

पुलिस को जांच में पता चला कि इस रैकेट में राज्य के हर हिस्से के लोग शामिल थे, जिन में अधिकतर सदस्य धनवान और सुखीसंपन्न थे. सवाल सामान्य लोगों के जेहन में उठता रहता है कि पत्नियों की अदलाबदली क्यों और कैसे? वाइफ स्वैपिंग का एक पुराना इतिहास बहुपत्नी प्रथा के जमाने से रहा है. किंतु इस ने नए रूपरंग में 80-90 के दशक में एक यौन आनंद के तौर पर पैर पसारना शुरू कर दिया था. हालांकि इस में संभ्रांत किस्म के कपल ही शामिल हुए. इस के लिए उन्होंने बाकायदा पार्टियों का सहारा लिया. केरल का मामला भी बीवियों की अदलाबदली का ही है, लेकिन इसे पतियों ने कमाई का धंधा बना दिया, जिस में बीवी के नाम पर दूसरी सैक्स वर्कर को भी शामिल कर लिया गया था.

केरल की शिकायतकर्ता महिला रमन्ना की लव मैरिज हुई थी. खुशहाल जिंदगी गुजर रही थी. 2 बच्चे भी हुए. सब कुछ अच्छा चल रहा था. इस बीच पति की गल्फ में नौकरी लगी और वह विदेश चला गया. वहां पति को वाइफ स्वैपिंग के बारे में पता लगा. जब वापस केरल लौटा तब उस ने इस बारे में अपनी पत्नी को बताया. पत्नी ने इनकार कर दिया, लेकिन पति नहीं माना. उस ने काफी मना किया कि वह किसी और के साथ सैक्स नहीं करेगी, लेकिन पति के दबाव में आ कर ऐसा करने को राजी हो गई. पति द्वारा खुद को मारने की धमकी के इमोशनल ब्लैकमेलिंग के चलते न चाहते हुए भी मान गई.

उस के बाद से पति के दोस्तों के साथ सैक्स करने का सिलसिला शुरू हो गया. इस खेल के शुरू होते ही पति ने उसे डराधमका कर इसे कारोबार बना लिया. विरोध करने पर पति दूसरों के साथ किए गए उस के सैक्स वीडियो परिवार को दिखाने की धमकी दे दी. एक रोज पानी सिर से ऊपर तब चला गया, जब पति ने एक साथ 3 पुरुषों के साथ सैक्स करने के लिए भेज दिया. अप्राकृतिक सैक्स की पीड़ा से उस का शरीर जितना जख्मी हुआ, उस से कहीं अधिक उस का अंतरमन पीडि़त हो गया. और उस ने पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी.

रमन्ना ने यह भी बताया कि उस जैसी कई पत्नियों को उन की इच्छा के विरुद्ध ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जो आत्महत्या कर सकती हैं. यहां तक कि उन पर ऐसा करने के लिए जबरन दबाव बनाया जाता है. इस स्तर पर जांच में पुलिस ने भी पाया कि डाक्टरों और वकीलों के अलावा कई पेशेवर इन सोशल मीडिया ग्रुप में शामिल थे और उन्होंने अपनी फरजी पहचान बना रखी थी. इन में से कई ग्रुप में 5,000 से अधिक सदस्य शामिल थे, जहां से ग्राहक मिलते थे. सभी फेक अकाउंट के साथ जुड़े हुए थे. इन में सिंगल लोगों को दूसरे सदस्यों की पत्नियों को शेयर करने के लिए मोटी रकम देनी पड़ती थी.

केरल के लिए वाइफ स्वैपिंग का मामला कोई नया नहीं है. इस के पहले भी साल 2013 में नेवी अफसरों की पत्नियों की अदलाबदली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे. यह घटना साल 2012 की है, जब एक लेफ्टिनेंट की पत्नी ने पति और सीनियर अफसर पर सैक्सुअल-मेंटल हैरेसमेंट और वाइफ स्वैपिंग के गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि बाद में कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलने की वजह से मामला शांत पड़ गया था. दरअसल अपने पति को बचाने के लिए कोई भी महिला किसी और के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाती है. लेकिन इस बार के नए मामले में पूरी तरह से एक बड़ा गिरोह सक्रिय हो चुका था. केरल में यह सब पिछले 3 सालों से चल रहा था.

बौक्स एक नजर वाइफ स्वैपिंग पर वाइफ स्वैपिंग ही बीवियों की अदलाबदली है, जो पतिपत्नी की रजामंदी से होता है. सैक्स के दौरान बीवियां बदलने का चलन गैरकानूनी और गैर सामाजिक हो कर भी छिपे रूप में बना हुआ है. अब लोगों ने इसे पैसा कमाने का एक जरिया भी बना लिया है. इस में सैक्शुअल रिलेशनशिप बनाने के लिए बीवियों को एक रात या फिर कुछ रातों के लिए अदलाबदली कर लिए जाते हैं. इसे अपनाने के कई तरीके अपनाए जाते हैं, जिस में लकी ड्रा महत्त्वपूर्ण होता है. इस के लिए कपल एक ही जगह पर जुटते हैं और अपनीअपनी गाडि़यों की चाबी एक जगह डाल देते हैं. फिर अंधेरे में सब एकएक कर चाबी उठाते हैं. ऐसे में हर किसी के हाथ में किसी और की चाबी आ जाती है.

जिसे जो चाबी हाथ लगती है वह उस की बीवी के साथ सैक्स करने के लिए आजाद होता है. इसी तरह से हर व्यक्ति दूसरे की बीवी को ले कर अलगअलग कमरों में चले जाते हैं. कुछ मामले में यह खेल एक ही हाल में एक साथ ग्रुप सैक्स के रूप में भी होता है. मजे की बात यह है इस के लिए बीवियां भी पहले से मन बनाए होती हैं.

इस से जुड़े लोगों का तर्क होता है कि ऐसा कर वे एकदूसरे की सैक्शुअल डिजायर को पूरी करते हैं. कुछ कपल्स का मानना है कि इस से उन के वैवाहिक जीवन की नीरसता में ताजगी वापस आ जाता है. दोनों में इस बात का कोई मलाल नहीं होता है कि दूसरे की पार्टनर के साथ सैक्स कर चुके हैं. इसे वे प्यार के नजरिए से नहीं, बल्कि सैक्स की अनुभूति के रूप में लेते हैं. इसे वैसे लोगों के लिए वरदान कहा जाता है, जो कभी एक वक्त में एक रिलेशन में नहीं रह पाते हैं.

बताया जाता है कि वाइफ स्वैपिंग की शुरुआत 16वीं सदी से बताई जाती है. सब से पहले जौन डी और एडवर्ज केल ने वाइफ स्वैपिंग की थी. ये दोनों ही ब्लैक मैजिक करते थे या कहें खुद को सेल्फ डिक्लेयर्ड स्पिरिट मीडियम बताते थे. इस स्वैपिंग में जौन की पत्नी जेन प्रेगनेंट भी हो गई थी. अधिकतर पश्चिमी देशों में यह आम बात हो चुकी है. भारत में इसे यौन अपराध की श्रेणी में रखा गया है. खासकर  भारतीय समाज में तो यह किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है. चाहे आपसी रजामंदी हो या नहीं.

वाइफ स्वैपिंग को यदि एक शादीशुदा महिला की इच्छा के बगैर कराया जाए और एक से अधिक लोगों के साथ संबंध बनाने पर मजबूर किया जाए तो मजबूर कराने वाले लोगों पर आईपीसी की धारा 323, 328, 376, 506 के तहत केस दर्ज किया जाता है. यदि उत्पीडि़त महिला की आपबीती पुलिस नहीं सुने, तो 156 (3) सीआरपीसी में जुडीशियल मजिस्ट्रैट के सामने एप्लिकेशन दे कर ऊपर दी गई धाराओं में एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए जा सकते हैं.

इस मामले में पति पर रेप की धारा (376 आईपीसी) छोड़ कर बाकी सभी धाराओं में काररवाई की जा सकती है. सारे अपराध गैरजमानती होते हैं और इन अपराधों में महिला के सिर्फ यह कहने पर कि उस के साथ बिना सहमति के जोरजबरदस्ती से संबंध बनाए गए हैं, उस की गिरफ्तारी की जा सकती है. ऐसे अधिकतर मामलों में यह एक ट्रायल का विषय होता है, जिस में गवाही और क्रौस एग्जामिनेशन के बाद अदालत आरोपियों को सजा दे सकती है, या फिर सजा दे कर बरी भी कर सकती है.

उदाहरण के लिए यदि स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए दंड के संबंध में 328 आईपीसी का इस्तेमाल होता है, जिस में नशीले पेय की मदद से महिला से शारीरिक संबंध स्थापित किया गया हो तो अधिकतम 10 साल तक की सजा और जुरमाना किया जा सकता है. इसी तरह से 376डी आईपीसी में गैंगरेप के मामलों में सजा मिलती है. इस कृत्य में शामिल हर व्यक्ति को न्यूनतम 20 साल तक की सजा मिल सकती है. Crime Story

Superstition : लालच अधविश्वास और ठगी

Superstition : आढ़ती सुनील कुमार सूद की लाखों की कमाई थी. इस के बाद भी उस ने लालच में आ कर ऐसा कौन सा गुनाह कर डाला कि लाखों रुपए तो गंवाए ही, जेल भी पहुंच गया. लुधियाना पुलिस कंट्रोल रूम को 20 नवंबर, 2014 की शाम साढ़े सात बजे के करीब फोन द्वारा सुनील कुमार सूद ने सूचना दी. कि 3 लोगों ने धांधरा रोड पर उस से 12 लाख रुपए लूट लिए हैं, तुरंत उस की मदद की जाए. पुलिस कंट्रोल रूम ने तुरंत इस घटना की सूचना थाना सदर पुलिस को दी, क्योंकि घटनास्थल उसी थाना के अंतर्गत था.

थाना सदर पुलिस ने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने के साथ पुलिस चौकी बसंत एवेन्यू को दी, क्योंकि घटनास्थल वहां से करीब था. सरेआम हुई इस लूट की सूचना मिलते ही थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह, पुलिस चौकी बसंत एवेन्यू के चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह, हेडकांस्टेबल जसबीर सिंह, दलबीर सिंह, सुखविंदर सिंह के साथ धांधरा रोड स्थित घटनास्थल पर पहुंच गए.

लूट का शिकार हुए सुनील कुमार सूद अपने बेटों अंकुश और अंकुर के साथ वहां मौजूद थे. थानाप्रभारी जतेंद्रजीत सिंह ने उन से घटना के बारे में पूछा तो सुनील कुमार ने बताया, ‘‘मैं धंधरा गांव का रहने वाला हूं और गांव में ही मेरी आढ़त है. आज पूरे दिन लुधियाना से उगाही कर के मैं घर लौट रहा था तो एक व्यापारी ने पेमेंट देने के लिए फोन किया. उस समय मेरे पास पूरे दिन की उगाही के लगभग 12 लाख रुपए थे. इतनी बड़ी रकम ले कर मैं वापस नहीं जाना चाहता था.

‘‘इसलिए मैं ने गाड़ी रोक कर अपने बेटे अंकुश को फोन किया कि वह आ कर मुझ से रुपए ले जाए, क्योंकि मुझे कुछ और पेमेंट लेने जाना है. फोन कर के मैं गाड़ी से उतर कर बेटे का इंतजार करने लगा. उसी बीच 2 लड़कों ने मुझ से लुधियाना का एक पता पूछा. मैं ने पता बता दिया तो उन लड़कों ने कहा कि मैं उन्हें गाड़ी से लुधियाना तक छोड़ दूं.

‘‘मैं बेटे का इंतजार कर रहा था, इसलिए मैं ने मना कर दिया. मेरी उन लड़कों से बात हो रही थी कि तभी अंकुश आ गया. नोटों वाला बैग निकाल कर मैं ने बेटे को देने के लिए उस की ओर बढ़ाया. बेटा बैग पकड़ पाता, उस के पहले ही उन दोनों लड़कों ने झपट्टा मार कर नोटों वाला बैग मेरे हाथ से छीन लिया. मैं कुछ समझ पाता या उन का विरोध करता, तेजी से एक गोल्डन रंग की वरना कार आई, जिस में दोनों युवक सवार हो कर भाग गए. लेकिन उन के जातेजाते मैं ने कार का नंबर नोट कर लिया था.

इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह और सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह सुनील कुमार सूद से पूछताछ कर ही रहे थे कि एडीसीपी (क्राइम) हरिमोहन सिंह एडीसीपी-3 परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी (देहात) गुरप्रीत सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. इन अधिकारियों के वहां आने की वजह यह थी कि चंद रोज पहले ही बदमाशों ने शहर के एक नामी मिष्ठान व्यापारी के घर फिल्म स्पैशल 26 की तरह फर्जी इन्कमटैक्स अधिकारी बन कर चालीस लाख रुपए की लूट की थी.

आढ़ती सुनील कुमार सूद ने लूट की जो कहानी इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह को सुनाई थी, उन्हें वह काफी संदिग्ध लगी, क्योंकि उस की कहानी में काफी पेंच थे. मसलन वह आबादी से दूर सुनसान जगह पर खड़े हो कर अपने बेटे का इंतजार क्यों कर रहा था? अंधेरे में लुटेरों की कार का नंबर नोट कर लेना. उस ने जिस जगह पर लूट होने की बात बताई थी, वह जगह थोड़ा वीरान जरूर थी, लेकिन उस से कुछ ही दूरी पर मकान और दुकानें थीं, जिस की वजह से वहां चहलपहल थी. कोई भी आदमी, वह भी व्यापारी, चहलपहल वाली जगह छोड़ कर सुनसान में क्यों खड़ा होगा?

बहरहाल, इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह के आदेश पर चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने इस मामले को अपराध संख्या-178 पर भादंवि. की धारा 382-34 के तहत अज्ञात लुटेरों के खिलाफ दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच में मदद के लिए लालतो के चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह को भी लगा दिया था. पुलिस अधिकारियों ने तमाम नाकों और चंडीगढ़हरियाणा की सीमाओं पर कार का नंबर दे कर अलर्ट घोषित करा दिया. इसी के साथ अपने मुखबिरों को भी यह पता लगाने के लिए लगा दिया कि मामले की सच्चाई क्या है?

अगले दिन सुबह सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह ने आढ़ती सुनील कुमार सूद का दुगड़ी के इंडियन बैंक की जिस शाखा में खाता था, वहां सीसीटीवी फुटेज चैक की तो पता चला कि 20 नवंबर को उस का बेटा अंकुश 2 बार बैंक आयागया था. पहली बार वह 1 बज कर 42 मिनट पर बैंक में गया था और 1 बज कर 51 मिनट पर बाहर निकला था. दूसरी बार वह 3 बज कर 8 मिनट पर बैंक गया था तो 3 बज कर 28 मिनट पर बाहर निकला था. बैंक से जब उस के आनेजाने के बारे में पता किया गया तो पता चला कि उस दिन अंकुश ने इंडियन बैंक की उस शाखा से 10 लाख रुपए निकलवाए थे. इस बात ने सुनील कुमार सूद की उस बात को झूठा साबित कर दिया कि उस ने पूरे दिन घूमघूम कर व्यापारियों से उगाही की थी.

पुलिस को शुरू से ही यह मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने हेडकांस्टेबल जसबीर सिंह और सुखविंदर सिंह को सुनील के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी. दोनों ने अपने सूत्रों से जो जानकारी जुटाई, उस के अनुसार सुनील कुमार का उठनाबैठना गुरविंदर, राजवीर, कुलदीप और शिवपाल के साथ था. ये चारों युवक आपराधिक प्रवृत्ति के थे और पिछले लगभग 2 महीने से सुनील के संपर्क में थे. इन चारों के अलावा एक राजमिस्त्री बलबीर इधर कुछ दिनों से सुनील के पास कुछ ज्यादा ही आताजाता था.

दूसरी ओर सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह ने लूट में प्रयुक्त कार का पता लगा लिया था. वह कार फजिल्का के रहने वाले जतिंद्र सिंह की थी. जतिंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह कार उस ने दिल्ली से खरीदी थी और कुछ दिनों पहले गुरविंदर उस से मांग कर ले गया था. अब तक हुई जांच से काफी हद तक यह साफ हो गया था कि लूट नहीं हुई थी, बल्कि लूट का ड्रामा रचा गया था. अब सवाल यह उठा कि क्यों? इसी क्यों का पता लगाने के लिए चौकीप्रभारी पवित्र सिंह राजमिस्त्री बलबीर को पूछताछ के लिए पुलिस चौकी ले आए.

पूछताछ में पहले तो उस ने इस मामले में अनभिज्ञाता प्रकट की. उस ने कहा कि वह किसी सुनील कुमार सूद को नहीं जानता. चूंकि पवित्र सिंह को सच्चाई का पता चल गया था, इसलिए उन्होंने उस से स्वीकार करा लिया कि वह सुनील कुमार सूद को ही नहीं, गुरविंदर, राजवीर, कुलदीप और शिवपाल को भी जानता है. इस के बाद उस ने लूट के नाटक की जो कहानी सुनाई, वह अंधविश्वास, लालच और ठगी के तानेबाने में बुनी थी. लुधियाना के धंधरा गांव का रहने वाला बलबीर राजमिस्त्री का काम कर के अपने परिवार का गुजरबसर करता था. उस के लिए परेशानी यह थी कि काफी मेहनत करने के बाद भी उस की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था.

राजमिस्त्री का काम करने के साथसाथ उस ने मकान बनाने के छोटेमोटे ठेके भी लिए, लेकिन इस में भी उसे कोई खास लाभ नहीं हुआ. परेशान बलबीर पीरबाबाओं के यहां चक्कर लगाने लगा. उसे पूरा विश्वास था कि इन पीरबाबाओं की कृपा से एक न एक दिन उस के दिन जरूर बदल जाएंगे. किसी पीर की मजार पर एक दिन उसे किसी ने बताया कि वह एक ऐसे तांत्रिक को जानता है, जो तंत्रमंत्र से नोटों को दोगुना कर देता है. अगर किसी के पास सोनाचांदी है तो उसे भी वह अपने मंत्रों की ताकत से दोगुना कर देता है.

यह जानकारी मिलने के बाद बलबीर के मन में उथलपुथल मच उठी. उस ने उस आदमी से तांत्रिक से मिलवाने का आग्रह किया. काफी टालमटोल के बाद आखिर उस आदमी ने बलबीर को गिद्दड़बाहा के रहने वाले सुरजीत सिंह के बेटे गुरविंदर सिंह से मिलवा दिया. गुरविंदर सिंह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का काम करता था. बलबीर ने उस के कहने पर कुछ रकम अपने घर से तो कुछ ब्याज पर ले कर कुल 80 हजार रुपए दोगुना करने के लिए उसे दे दिए. वैसे तो गुरविंदर सिंह एक तांत्रिक के रूप में काफी प्रसिद्ध था, लेकिन उसे तंत्रमंत्र का कखग भी नहीं आता था. वह तंत्रमंत्र के नाम पर ठगी करता था.

वह अपने साथियों राजवीर सिंह उर्फ राजा, शिवाल सिंह उर्फ काला तथा कुलदीप सिंह उर्फ कीपा की मदद से अकल के अंधे, अंधविश्वास में जकड़े लालची लोगों को नोट दोगुने करने का झांसा दे कर उन के रुपए ठग लेता था. बहरहाल, घर बैठे जब 80 हजार का बलबीर नामक बकरा उस के पास आया तो उस ने उसे हलाल कर दिया. नोट ले कर एक लिफाफा बलबीर को थमा कर उस ने कहा, ‘‘इसे ले जा कर घर में पूजास्थल पर रख देना और 3 दिनों बाद खोलना. तुम्हारे रुपए दोगुने हो जाएंगे.’’

बलबीर लिफाफा ले कर घर आ गया और उसे पूजास्थल पर रख दिया. लेकिन जैसा तांत्रिक गुरविंदर सिंह ने कहा था, वैसा नहीं हुआ. लिफाफे में रुपयों की जगह राख निकली. बलबीर को समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ ठगी हुई है. लेकिन यह ऐसा मामला था कि वह पुलिस के पास भी नहीं जा सकता था. इसलिए उस ने गुरविंदर के पास जा कर अपने रुपए मांगे. तब गुरविंदर ने कहा कि उस ने उस के द्वारा बताए समय पर लिफाफा नहीं खोला, इसीलिए सारे रुपए राख हो गए. लेकिन जब बलबीर ने उसे धमकी दी कि वह उसे जगहजगह बदनाम कर देगा और पुलिस के पास भी जाएगा, तब जा कर गुरविंदर ने उस से रुपए लौटाने का वादा कर लिया. लेकिन जब काफी समय तक उस ने बलबीर के रुपए नहीं लौटाए तो बलबीर को चिढ़ होने लगी, क्योंकि उस पर ब्याज चढ़ रहा था.

बलबीर ने गुरविंदर पर रुपए लौटाने के लिए दबाव बनाया तो एक दिन गुरविंदर ने साफसाफ कह दिया. ‘‘भाई साफ बात तो यह है कि जब तक हमारे पास कोई नया शिकार नहीं आता, तब तक हम तुम्हारे रुपए नहीं लौटा सकते. अगर तुम्हें रुपयों की ज्यादा जल्दी है तो तुम्हीं कोई शिकार हमारे पास ले आओ.’’

इस के बाद बलबीर किसी शिकार की तलाश में लग गया. अचानक उसे आढती सुनील कुमार सूद की याद आई. सुनील उन दिनों संत समुंद्र सिंह नगर में नई कोठी बनवा रहा था. बलबीर उसे अच्छी तरह जानता था, क्योंकि कई दिनों तक उस ने उस की नई कोठी पर काम किया था. बलबीर जानता था कि सुनील लालची किस्म का आदमी है और नई कोठी बनवाने की वजह से उसे रुपयों की जरूरत भी है.

बलबीर सिंह नोट दोगुने करने की कहानी सुना कर सुनील पर चारा डालने लगा. जब सुनील उस के झांसे में नहीं आया तो गुरविंदर ने विश्वास जमाने के लिए अपने सहयोगियों शिवपाल और कुलदीप को भेजा. शिवपाल और कुलदीप ने सुनील को झूठी कहानियां गढ़ कर सुनाई कि वे किस तरह व्यापार में घाटा होने पर कंगाल हो गए थे और किस तरह तांत्रिक गुरविंदर ने उन का धन दोगुना कर के उन्हें बचाया था. इस तरह कुछ दिनों की मेहनत के बाद सुनील उन के जाल में फंस कर अपना धन दोगुना करवाने के लिए राजी हो गया.

योजना के अनुसार, 20 नवंबर, 2014 को सुनील ने गुरविंदर को परवोवाल रोड जी.के. एस्टेट स्थित अपने घर बुलाया. तय समय पर गुरविंदर अपने साथियों शिवपाल, कुलदीप और राजवीर के साथ सुनील के घर पहुंच गया. सभी ने एक खाली कमरे में आसन जमा कर तंत्रमंत्र का ड्रामा शुरू कर दिया. पूजा सामग्री के साथ कमरे में एक खाली कनस्तर भी रखा गया था. कुछ देर पूजापाठ करने के बाद गुरविंदर ने अभिमंत्रित जल खाली कनस्तर पर छिड़क कर उसे शुद्ध किया और सुनील द्वारा दिए गए 10 लाख रुपए उस में रख कर उस में ताला लगा चाबी सुनील को देते हुए कहा, ‘‘लो बच्चा, हम ने अपनी तंत्र शक्ति के माध्यम से तुम्हारा काम कर दिया है. कुछ देर में ये 10 लाख रुपए 20 लाख हो जाएंगे. लेकिन बच्चा हमें भूलना मत. कभीकभार सेवा कर दिया करना.’’

‘‘बिलकुल महाराज, मैं आप को आजीवन याद रखूंगा.’’ सुनील ने गुरविंदर के चरणों में माथा टेकते हुए कहा.

‘‘उठो बच्चा, ध्यान से सुनो. अब से ठीक 15 मिनट बाद यह ताला खोल रुपए निकाल लेना. इस में न एक सैकेंड की जल्दी होनी चाहिए और न देर.’’

सुनील को सारी बातें समझा कर गुरविंदर, शिवपाल, कुलदीप और राजवीर अपनी गाड़ी से चले गए. 15 मिनट बाद जब सुनील ने कनस्तर का ताला खोल कर देखा तो उस में रुपए की जगह एक थैले में राख भरी रखी थी. यह देख कर सुनील के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह समझ गया कि नोट दोगुने करने का लालच दे कर गुरविंदर उसे लूट ले गया है. वह इतना घबरा गया कि उस की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे? जब उसे कुछ नहीं सूझा तो आननफानन में उस ने लूट की झूठी कहानी गढ़ कर ठगों को गिरफ्तार कराने के लिए गाड़ी का नंबर दे कर पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा दिया.

लेकिन उस की कहानी में इतने पेंच थे कि इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह को ताड़ते देर नहीं लगी कि यह ड्रामा कर रहा है. बलबीर की निशानदेही पर पुलिस ने सुनील कुमार सूद, गुरविंदर, कुलदीप, राजवीर और शिवपाल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में सुनील कुमार ने बताया कि रुपए उस ने अपने हाथों से कनस्तर में रख कर ताला लगाया था और वहीं बैठा भी रहा. गुरविंदर ने रुपए कनस्तर से कब निकाल कर राख वाला झोला रख दिया, उसे पता ही नहीं चला.

सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर जतेंद्रजीत के आदेश पर चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने लूट के लिए दर्ज मुकदमे को खारिज कर नया मुकदमा पुलिस को गुमराह करने और झूठ बोलने की धाराओं के तहत दर्ज कराया. इस के बाद सभी अभियुक्तों को ड्यूटी मजिस्ट्रेट मिस शगुन की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में अभियुक्तों की निशानदेही पर सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह ने कार, 7 लाख 15 हजार रुपए नगद और खाली कनस्तर बरामद कर लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद 2 दिसंबर, 2014 को पुन: सभी अभियुक्तों को जिला मजिस्ट्रेट मनी अरोड़ा की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Superstition

— कथा पुलिस सूत्रों प

Crime Story : घिनौना खेल एक अपराधी का

Crime Story : गांव में दबंगई दिखाने के चक्कर में रामउजागर ऐसा हिस्ट्रीशीटर बदमाश बन गया कि उस के खिलाफ 45 मामले दर्ज हो गए. फिर उस ने पुलिस से बचने के लिए ऐसी फूलप्रूफ योजना बनाई कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बक्शा थाना क्षेत्र में एक गांव पड़ता है चुरावनपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जातियों की मिलीजुली आबादी है, लेकिन चौहानों की संख्या यहां दूसरी जातियों से ज्यादा है. इसी गांव के रामकिशोर चौहान ने अपने सभी बच्चों को ठीक से पढ़ायालिखाया.

वे चाहते थे कि उन के सभी बच्चे पढ़लिख कर किसी काबिल बनें. लेकिन उन के बेटे रामउजागर उर्फ कल्लू ने तो कुछ और ही सोच रखा था. घरपरिवार के दबाव के बावजूद वह ज्यादा नहीं पढ़लिख सका. जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ती गई, उस की सोच भी बदलती गई. वह खापी कर घर से निकलता और दिनभर मौजमस्ती कर के देर शाम घर लौट आता. धीरेधीरे गांव के कई आवारा लड़के उस की सोहबत में आ गए. इन लोगों के लिए गुंडागर्दी और लोगों से मारपीट करना आम बात हो गई. उस की इन हरकतों को देख कर रामकिशोर ने उस की नौकरी एक ईंट भट्टे पर लगवा दी, ताकि वह बुरी सोहबत से बचा रहे.

रामउजागर ने नौकरी तो कर ली, लेकिन इस काम में उस का मन नहीं लगता था. उसे आवारागर्दी में जो आनंद आता था, वह बंद हो गया. इसी बीच उसे शराब पीने की लत लग गई. अपनी इस लत को पूरी करने के लिए वह चोरी भी करने लगा. मारपीट करना तो उस की आदत में शामिल था ही. चोरीचकारी की शिकायतें भले ही रामकिशोर के पास नहीं आ पाती थीं, लेकिन बेटे द्वारा की गई मारपीट की बातें उन्हें अकसर पता चलती रहती थीं. इस से परिवार को भी कई तरह की मुशकिलों का सामना करना पड़ता था.  जब रामउजागर का आतंक बढ़ने लगा तो उस की शिकायतें थाने तक पहुंचने लगीं. एक बार उस की शिकायत पुलिस के पास पहुंची तो बक्शा थाने की पुलिस ने उसे उठा लिया.

उस के पास से पुलिस ने चाकू बरामद किया. पुलिस ने उस के खिलाफ 25 आर्म्स एक्ट का केस दर्ज किया. यह 1983 की बात है. यह छोटा सा मामला था, इसलिए जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जेल से आने के बाद सुधरने के बजाय वह और बिगड़ गया. वह बेखौफ हो कर वारदातें करने लगा, जिस से कुछ ही दिनों में उस पर बक्शा थाने में 9 केस दर्ज हुए और 1998 में वह थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश घोषित हो गया. हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद जब पुलिस का दबाव बढ़ने लगा तो रामउजागर जौनपुर से मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर चला गया. 22 अक्तूबर, 2014 को जौनपुर के पुलिस अधीक्षक बबलू कुमार अपने औफिस में बैठे दैनिक फाइलें निपटा रहे थे.

तभी पहरे पर तैनात सिपाही ने आ कर बताया कि उन से मध्य प्रदेश पुलिस के 2 पुलिसकर्मी मिलने आए हैं. साहब के हां करने पर उस ने उन दोनों को अंदर भेज दिया. पुलिस अधीक्षक ने उन दोनों को बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहिए, क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘सर, हम लोग मध्य प्रदेश, जबलपुर के थाना जीआरपी से आए हैं. रामउजागर चौहान जिस की उम्र करीब 50-55 वर्ष होगी, ने हमारे क्षेत्र में जहरखुरानी की कई वारदातों को अंजाम दिया है. पकड़े जाने पर वह कई बार जेल भी जा चुका है, लेकिन जमानत मिलने के बाद वह फिर से जहरखुरानी की घटनाओं को अंजाम दे रहा है. हमारे पास उस की कुर्की का आदेश है. हमें पता चला है कि इन दिनों वह जनपद जौनपुर के बक्शा थाना क्षेत्र के अपने गांव चुरावनपुर में छिपा हुआ है.’’

उन दोनों की बात सुन कर एसपी बबलू कुमार ने बक्शा थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को फोन मिलवा कर कहा कि रामउजागर चौहान के बारे में पता लगाएं और जबलपुर जीआरपी से आए सबइंस्पेक्टर आर.पी. सिंह की पूरी मदद करें. साथ ही अपनी काररवाई से भी अवगत कराएं. एसपी से बात होने के बाद थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने चुरावनपुर गांव का आपराधिक रजिस्टर मंगा कर उस पर नजर डाली तो उन्हें पहली ही नजर में पता चल गया कि रामउजागर बक्शा थाने का हिस्ट्रीशीटर है.

जबलपुर जीआरपी से आए सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह से बातचीत के बाद पता चला कि रामउजागर के खिलाफ 45 मुकदमे दर्ज हैं. प्रशांत कुमार तब आश्चर्य में रह गए, जब उन्हें पता चला कि रामउजागर तो 3 साल पहले ही मर चुका है. फाइल देखने के बाद प्रशांत कुमार ने गांव चुरावनपुर के प्रधान राजबहादुर पाल को फोन कर के थाने आने को कहा. ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ पाता, इस से पहले ही जबलपुर जीआरपी के सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह अपने सहयोगी के साथ थाना बक्शा पहुंच गए. उन्होंने एसपी बबलू कुमार का रेफरेंस दे कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को अपने आने का मकसद बता दिया.

थानाप्रभारी बक्शा और जबलपुर जीआरपी से आए आर.पी. सिंह रामउजागर के बारे में बातें कर ही रहे थे कि ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ गए. जब प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उन्हें बताया कि जबलपुर जीआरपी को उन के गांव के रामउजागर की तलाश है और वे उस के घर की कुर्की का आदेश ले कर आए हैं तो वह आश्चर्य से बोले, ‘‘साहब, वह तो 3 साल पहले मर चुका है, उस के घर की कुर्की कर के क्या होगा?’’

ग्रामप्रधान ने यह बात बड़े विश्वास से कही थी. उन का कहना था कि रामउजागर का अंतिम संस्कार उन के सामने किया गया था. ग्रामप्रधान की बात पर विश्वास कर के थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने उन से लिखित में रामउजागर का मृत्यु प्रमाणपत्र ले लिया. ग्रामप्रधान वापस लौट गया. ग्रामप्रधान द्वारा रामउजागर की मृत्यु के बारे में लिखित पत्र दिए जाने के बाद भी सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह यह मानने को तैयार नहीं थे कि वह मर चुका है. उन्होंने जातेजाते अपनी यह शंका थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को भी बता दी.

उन के जाने के बाद प्रशांत कुमार ने इस मुद्दे पर गहराई से सोचा तो उन्हें यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगी कि जब रामउजागर 3 साल पहले मर चुका है तो 1998 में खोली गई उस की चार्जशीट क्यों नहीं बंद की गई. मन में संदेह उठा तो उन्होंने पुराना रिकौर्ड चेक किया. उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि रामउजागर के मरने के बाद भी थाने में उस के खिलाफ 7 मुकदमें दर्ज हुए थे. सोचविचार के बाद प्रशांत कुमार ने अपने एक मुखबिर को सच्चाई पता लगाने का काम सौंपा. 2 दिन बाद मुखबिर ने थाने आ कर बताया कि रामउजागर मरा नहीं है, बल्कि उस ने पुलिस से बचने के लिए मरने का नाटक किया था. उस ने यह भी बताया कि वह अब भी अपराधों में लिप्त है. इतना ही नहीं, उस ने थानाप्रभारी को रामउजागर का मोबाइल नंबर भी दे दिया.

प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उस नंबर पर फोन लगाया. दूसरी ओर फोन की घंटी भी बजी और रिसीव भी किया गया. लेकिन थानाप्रभारी ने कोई बात करने के बजाय 2 बार ‘हैलो हैलो’ कह कर फोन काट दिया. इस से उन्हें यकीन हो गया कि रामउजागर वाकई जिंदा है. विश्वास होने के बाद उन्होंने यह बात एसपी बबलू कुमार को बता दी. यह जान कर उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि 45 अपराधों का आरोपी लोगों की नजरों में खुद को मरा हुआ साबित कर के अब भी अपराध कर रहा है. निस्संदेह मामला गंभीर था. उन्होंने  रामउजागर को पकड़ने के लिए क्राइम ब्रांच और थाना पुलिस की एक संयुक्त टीम बनाई, साथ ही आदेश दिया कि जैसे भी हो जल्दी से जल्दी रामउजागर को गिरफ्तार करें.

एसपी बबलू कुमार के निर्देश पर संयुक्त टीम ने रामउजागर को अपने जाल में फांसने की योजना बना ली. जब सारी तैयारी हो गई तो 9 नवंबर, 2014 को थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर उस से बात की. बातचीत के दौरान उन्होंने ठेठ गंवई अंदाज में कहा, ‘‘रामउजागर, मैं तुम्हारा भाई बोल रहा हूं. भाई बहुत बीमार है, चुपचाप आ कर मिल जाओ.’’

यह सुन कर रामउजागर ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कल शाम को आता हूं. ध्यान रखना किसी को कानोंकान खबर न हो. मैं भाई से मिल कर भोर में निकल जाऊंगा.’’

‘‘चिंता करने की जरूरत नहीं है, किसी को पता नहीं चलेगा.’’ कह कर प्रशांत कुमार ने फोन काट दिया.

बात होने के बाद पुलिस ने सारी तैयारी कर ली. दूसरे दिन यानी 10 नवंबर को पुलिस टीम ने थाना क्षेत्र के सरायहरखू रेलवे स्टेशन पर अपना जाल बिछा दिया. रामउजागर को पहचानने वाला एक मुखबिर पुलिस के साथ था. सभी लोग सादे कपड़ों में थे. ट्रेन आने से थोड़ी देर पहले थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर कहा, ‘‘कहां पहुंचे भैया, मैं स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘बस, थोड़ी देर में पहुंचने वाला हूं, मुझे गेट के पास मिलना.’’

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘और हां, मैं ने मुंह पर कपड़ा बांध रखा है, ताकि कोई पहचान न सके. इस बात का ध्यान रखना.’’

शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर सुलतानपुर की ओर से आने वाली गाड़ी जब प्लेटफार्म नंबर 1 पर आ कर रुकी और यात्री उतरनेचढ़ने लगे तो प्रशांत कुमार के नंबर पर फोन आया. फोन रामउजागर का ही था. वह बोला, ‘‘भैया, मैं ट्रेन से उतर गया हूं, तुम गेट के पास ही हो न?’’

‘‘हां, गेट पर ही खड़ा इंतजार कर रहा हूं.’’ कह कर थानाप्रभारी ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद पुलिस की नजर एक अधेड़ उम्र के आदमी पर पड़ी, जो मुंह पर कपड़ा लपेटे, एक बैग और एक ब्रीफकेस उठाए गेट की ओर आ रहा था. मुखबिर ने उसे पहचान कर बताया कि वही रामउजागर है. पुलिस ने उसे दबोच लिया. अचानक हुई इस काररवाई से रामउजागर हतप्रभ रह गया. हिरासत में ले कर रामउजागर के बैग और ब्रीफकेस की तलाशी ली गई तो उस के पास से 1 चाकू, 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात, एक फरजी पहचान पत्र और 205 ग्राम नशीला पाउडर बरामद हुआ. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

बक्शा बाजार से किसी तरह यह खबर रामउजागर के गांव चुरावनपुर पहुंच गई. सुन कर लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे लोग जिस रामउजागर के मृत्युभोज में शामिल हुए थे, वह जिंदा है और उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. इस बात की पुष्टि के लिए गांव के कुछ लोग रात 9 बजे ही थाना बक्शा पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें थाने में नहीं घुसने दिया. इस की जगह थानाप्रभारी ने उस इलाके के सिपाही को निर्देश दिया कि अगले दिन 9 बजे वह चुरावनपुर के ग्रामप्रधान और रामउजागर के पिता और भाई को थाने ले आए.

दूसरे दिन यानी 11 नवंबर, 2014 को रामउजागर के पिता रामकिशोर चौहान और ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल गांव के कुछ लोगों के साथ थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने एक सिपाही को बुला कर लौकअप से रामउजागर को लाने को कहा. उसे लाया गया तो उसे जीवित देख कर गांव के लोग आश्चर्यचकित रह गए. रामउजागर शरम के मारे सिर झुकाए खड़ा था. पूछताछ में रामउजागर ने अपनी जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी. रामउजागर की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद इलाके में कोई अपराध होने पर पुलिस पूछताछ के लिए उसे ही उठा कर लाती. पुलिस प्रताड़ना से तंग आ कर रामउजागर अपना गांव छोड़ कर जबलपुर चला गया.

वहीं पर उस की मुलाकात किशन नाम के एक युवक से हुई. किशन जबलपुर की गुप्तेश्वर रोड का रहने वाला था. रामउजागर ने उस से रोजी रोजगार की बात की तो वह बोला, ‘‘चिंता मत करो, ऐसा रोजगार बताऊंगा कि पैसे की कोई कमी न रहे. बस थोड़ी सी मेहनत और चालाकी की जरूरत है.’’

‘‘बताइए, क्या करना है.’’ रामउजागर ने विनती की, ‘‘बताओ दोस्त, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं. कभी भी तुम्हारा उपकार नहीं भूलूंगा.’’

इस पर किशन रामउजागर को पाउडर का एक पैकेट पकड़ाते हुए बोला, ‘‘यह लो और रेलवे स्टेशन की ओर निकल जाओ. वहां तुम्हें ट्रेनों में काम करना है. वहां जो भी ठीकठाक पैसे वाला आदमी दिखाई दे, उस से दोस्ती करो और चाय वगैरह में इस पाउडर में से थोड़ा सा मिला कर उसे चुपके से पिला देना. थोड़ी देर में वह बेहोश हो जाएगा. इस के बाद उस का माल ले कर चलते बनना.’’

‘‘और मान लो, अगर मैं पकड़ा गया तो?’’ रामउजागर ने कहा तो किशन बोला, ‘‘अरे भाई, पैसा कमाना है तो डर तो रहेगा ही, लेकिन सावधानी बरतेंगे तो पकड़े जाने का खतरा नहीं रहेगा. मैं ने रास्ता बता दिया है, आगे तुम्हारी मरजी.’’

कुछ देर शांत रहने के बाद रामउजागर उठा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया. स्टेशन पर पहुंच कर उस ने आसपास सरसरी नजर डाली तो एक व्यक्ति एक भारीभरकम बैग लिए बैठा दिखाई दिया. वह उसी की बगल में जा कर बैठ गया. कुछ देर खामोश बैठे रहने के बाद रामउजागर उस से गाडि़यों के बारे में बात करने लगा. बातों का सिलसिला जुड़ा तो वह अपना बैग उस के बैग के पास रखते हुए बोला, ‘‘खयाल रखना जरा, मैं कैंटीन से चाय ले कर आता हूं.’’

थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में चाय के 2 प्याले थे. उस ने एक प्याला उस आदमी को थमा दिया और दूसरा खुद ले कर उस के साथ बैठ गया. दोनों ने साथसाथ चाय पी. चाय पीने के बाद वह व्यक्ति एक ओर लुढ़कने लगा. यह देख रामउजागर ने इधरउधर नजर दौड़ाई. फिर उस आदमी को हिलाडुला कर देखा. चाय में नशीला पाउडर होने की वजह से उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस पर कोई प्रतिक्रिया न होती देख वह धीरे से अपना और उस का बैग ले कर वहां से चलता बना. जहर खुरानी का यह उस का पहला दिन था, इसलिए अपनी सफलता पर वह फूला नहीं समा रहा था. अपने ठिकाने पर आ कर जब उस ने बैग खोला तो उस में काफी मात्रा में नकदी और कपड़ों सहित कई कीमती सामान निकले.

बस फिर क्या था, उस दिन के बाद उस का जहरखुरानी का यह सिलसिला चल निकला. कभी इस शहर तो कभी उस शहर में वह वारदात पर वारदात को अंजाम देने लगा. इस तरह धीरेधीरे उस ने किशन से अलग हो कर अपना गिरोह बना लिया. उस के दोस्तों की संख्या भी अच्छीखासी हो गई. इसी बीच अचानक वह एक दिन वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. लेकिन जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जमानत मिलने के बाद वह फिर जौनपुर आ गया. लेकिन उस का अपराधी दिमाग उसे कहां शांत बैठने देने वाला था. बक्शा पुलिस ने उसे आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस मामले में भी उसे जमानत मिल गई.

जेल से बाहर आने के बाद वह मानिकपुर, बांदा आ गया और जहरखुरानी की वारदातों को अंजाम देने लगा. जौनपुर के अलावा वह बांदा, कानपुर, सुलतानपुर, सीतापुर, इलाहाबाद, वाराणसी में भी वारदातें करने लगा. धीरेधीरे उस का आतंक उत्तर प्रदेश से बाहर निकल कर मध्य प्रदेश और मुंबई तक फैल गया. पुलिस उस की कारगुजारियों से परेशान थी. रामउजागर इन प्रदेशों में ट्रेन और बस में सफर करने वाले सहयात्रियों के साथ मधुर संबंध बना कर उन्हें खानेपीने की चीजों में नशीला पदार्थ मिला कर उन के सामान पार कर देता था. उस के अपराधों का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा था. कई बार वह पकड़ा भी गया, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद वह केस की तारीखों पर नहीं जाता था. इस के लिए उस के खिलाफ कई वारंट भी निकाले गए.

अदालतों में न जाने से रामउजागर पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा था. आए दिन उस के घर पुलिस आने से उस के घर वाले भी परेशान थे. तभी अचानक एक दिन उस ने एक व्यक्ति की हत्या की खबर पढ़ी. हत्या सुलतानपुर के एक व्यक्ति की हुई थी, जिस की शिनाख्त नहीं हुई थी. इस खबर को पढ़ कर उस के दिमाग में साजिश का तानाबाना बुनने लगा. उन दिनों रामउजागर जौनपुर के ही कुल्हनामउ गांव में स्थित अपनी बहन की ससुराल आताजाता रहता था और लोगों से चोरीछिपे वह 2-4 दिन वहीं ठहर जाता था. घरपरिवार के लोग भी उस से वहीं आ कर मिल लिया करते थे. बहन के घर से उस ने चुपके से अपने घर संदेशा भिजवाया कि उस से कानपुर आ कर मिलें. वे लोग उस से मिलने आए तो उस ने उन्हें अखबार में छपी वह खबर दिखाई.

फिर कहा कि वे लोग सुलतानपुर जाएं और अज्ञात लाश की शिनाख्त उस की लाश के रूप में कर दें. इस से पुलिस के आए दिन घर आने का झंझट खत्म हो जाएगा. रामउजागर की राय पर उस के घर वालों ने ऐसा ही किया. लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर पुलिस ने उस व्यक्ति की लाश की शिनाख्त रामउजागर के रूप में कर दी. साथ ही बता भी दिया कि वह अपराधी प्रवृत्ति का था. पुलिस मामले में खानापूर्ति करना चाहती थी, इसलिए उस ने उन की बात सच मान ली. इस के बाद रामउजागर के घर वालों ने बाकायदा उस की तेरहवीं वगैरह की. कोर्ट में हाजिर न होने की वजह से रामउजागर के वारंट भी कटे हुए थे.

रामउजागर की तलाश में पुलिस उस के घर आती या फिर कुर्की वारंट का चक्कर होता तो घर वाले और ग्रामप्रधान उस के मरने की बात बता कर पल्ला झाड़ लेते. उधर रामउजागर अपना जहरखुरानी का काम बाकायदा करता रहा. पूछताछ में रामउजागर ने बताया कि उस से चांदी के जो जेवरात बरामद हुए हैं वे उस ने लखनऊ में चारबाग स्टेशन से वाराणसी जा रहे एक सेठ को नशीला पदार्थ खिला कर लूटे थे और उस का बैग ले कर सुलतानपुर स्टेशन पर उतर गया था. इस बैग में उसे 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात और 88 हजार रुपए नकद मिले थे.

पकड़े जाने के बाद रामउजागर को पत्रकारों के सामने पेश किया गया, जहां उस ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह लोगों को लूटने के लिए नशीले पदार्थों के अलावा बिस्किट आदि का भी प्रयोग करता था. बिस्किट और पैकेट के पेय पदार्थों में वह सिरिंज के जरिए नशीला पदार्थ डाल देता था. इस से लोगों को उस पर शक भी नहीं होता था. रामउजागर की कहानी उसी की जुबानी सुन पत्रकार भी दंग रह गए. 45 मामलों में वांछित शातिर अपराधी और बक्शा थाने के हिस्ट्रीशीटर व जौनपुर जिले के टापटेन अपराधियों की सूची में 5वें नंबर के इस अपराधी के पकड़े जाने से पुलिस खुश थी. जुर्म स्वीकारने के बाद पुलिस ने रामउजागर को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. Crime Story

Crime in Society : क्रिकेट खिलाड़ी ने बनाया चोरी का अर्द्धशतक

Crime in Society : एकांत बंसल क्रिकेट का उभरता हुआ खिलाड़ी था. उचित मार्गदर्शन मिलने पर उस की प्रतिभा निखर सकती थी लेकिन उस के सामने एक ऐसी समस्या आन पड़ी कि उस ने अपने कदम पिच के बजाय चोरी की तरफ बढ़ा दिए और…

रात के करीब ढाई बजे थे. दिल्ली के मध्य जिला के थाने पहाड़गंज को पुलिस नियंत्रण कक्ष से सूचना मिली कि क्षेत्र के नेहरू बाजार में एक दुकान का ताला तोड़ने वाले चोरों ने 2 चौकीदारों की पिटाई की है. यह सूचना मिलते ही थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एएसआई हरपाल सिंह नेहरू बाजार की ओर रवाना हो गए. नेहरू बाजार थाने से दक्षिणपूर्वी दिशा में करीब 2 किलोमीटर दूर महावीर मंदिर के पास है. पुलिस वहां पहुंची तो मंदिर के आसपास 2-3 लोग मिले. मंदिर के पास ही सड़क पर एक जगह खून पड़ा मिला. उन लोगों ने बताया कि एक दुकान का ताला तोड़ रहे कुछ चोरों ने 2 चौकीदारों को पीट कर घायल कर दिया.

जिन्हें पुलिस नियंत्रण कक्ष की वैन लेडी हार्डिंग अस्पताल ले गई है. जिस दुकान का चोर ताला तोड़ रहे थे पुलिस वहां भी गई. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. उस दुकान के शटर का एक ताला टूटा पड़ा था. यह बात 12-13 नवंबर, 2014 की रात की है. थानाप्रभारी एएसआई हरपाल सिंह को घटनास्थल पर छोड़ कर लेडी हार्डिंग अस्पताल पहुंच गए. वहां डाक्टरों ने बताया कि एक चौकीदार भगत शाह की अस्पताल में ही मौत हो गई है जबकि दूसरे घायल चौकीदार करन बहादुर शाह का इलाज चल रहा है. थानाप्रभारी करन बहादुर शाह के पास गए. वह बयान देने की हालत में था.

करन बहादुर ने पुलिस को बताया कि वह पहाड़गंज के 6 टूटी चौक पर चौकीदारी करता है. रात करीब 2 बजे उसे प्यास लगी तो वह नेहरू मार्केट में महावीर मंदिर के प्याऊ पर पानी पीने गया. उसे देख कर उस का चाचा भगत शाह भी उस के पास आ गया था. भगत शाह पास में ही स्थित रतन मार्केट सब्जीमंडी में चौकीदारी करता था. पानी पीने के बाद दोनों बातें कर रहे थे, तभी उन की नजर नेहरू बाजार में खड़ी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार पर गई. उस कार के पास ही 2 लड़के हाथ में लोहे की रौड लिए खड़े थे. एक उस सैंट्रो कार में था जबकि एक अन्य युवक एक दुकान के ताले तोड़ रहा था. यह देख कर वे चौंके. उन्होंने उन युवकों को टोका तो वे तीनों उन पर टूट पड़े और रौड से पिटाई करने लगे.

करन ने बताया कि एक हमलावर ने रौड से भगत शाह के सिर पर वार किया तो उन का सिर फट गया और वह नीचे गिर गए. दूसरे हमलावर ने उस के ऊपर वार किया तो उस ने हाथ से उस की रौड रोकने की कोशिश की जिस से उस के दाहिने हाथ के अंगूठे में चोट आ गई. अपनी जान बचाने के लिए वह रतन मार्केट सब्जीमंडी की तरफ भाग गया. फिर एक गली से निकल कर घटनास्थल की तरफ देखा तो वे हमलावर वहां नहीं दिखे. वे कार ले कर वहां से जा चुके थे. तब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां उस के चाचा भगत शाह खून में सने पड़े थे. किसी का फोन ले कर उस ने पुलिस के 100 नंबर पर काल की. थोड़ी देर में ही पीसीआर की गाड़ी वहां आ गई और उन्हें अस्पताल ले लाई.

करन बहादुर के बयान से पुलिस को इतना पता चल गया था कि बदमाश सिल्वर कलर की सैंट्रो कार में आए थे और दुकान में चोरी करने के लिए दुकान का एक ताला तोड़ भी चुके थे. उन्होंने यह मैसेज वायरलैस से पूरी दिल्ली में प्रसारित करा दिया कि 4 लड़के वारदात करने के बाद सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से भागे हैं. जहां भी वे दिखें, उन्हें ट्रेस किया जाए. इस के बाद उन्होंने अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के एसीपी ओमप्रकाश और डीसीपी परमादित्य को घटना की जानकारी दे दी. अगले दिन थानाप्रभारी को खबर मिली कि दिल्ली के नजफगढ़ की मेन मार्केट में जवाहर चौक पर स्थित एक ज्वैलरी शौप में 4 चोर ताले तोड़ कर उस में से 7 किलोग्राम से ज्यादा चांदी और सोने की ज्वैलरी तथा 35 हजार रुपए नकद ले गए.

चोरी करने से पहले उन्होंने वहां के चौकीदार को डराधमका दिया था. नजफगढ़ थाने में इस घटना की रिपोर्ट दर्ज हुई थी. उस चौकीदार ने पुलिस को बताया था कि वे चारों लुटेरे सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से आए थे. नजफगढ़ वाली घटना डीसीपी परमादित्य की जानकारी में आई तो उन्हें लगा कि कहीं नजफगढ़ में वारदात करने वाले वही तो नहीं हैं जो पहाड़गंज क्षेत्र में चौकीदार का मर्डर कर के भागे थे. क्योंकि दोनों ही वारदातों में एक बात समान थी कि बदमाशों की संख्या 4 थी और उन के पास सिल्वर कलर की सैंट्रो कार थी. उन बदमाशों के पास पहुंचने का एक ही रास्ता था कि किसी भी तरह उन की सैंट्रो कार का रजिस्ट्रेशन नंबर पता चल जाए. लेकिन दोनों ही जगहों के चौकीदारों को कार का नंबर पता नहीं था इसलिए यह केस खोलना किसी चुनौती से कम नहीं था.

डीसीपी परमादित्य ने इस केस को सुलझाने के लिए पहाड़गंज क्षेत्र के एसीपी ओमप्रकाश के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एसआई ओ.पी. मंडल, विनोद जैन, एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद कुमार, जितेंद्र राकेश, कांस्टेबल कुलदीप, समय सिंह को शामिल किया गया. इस के अलावा उन्होंने स्पैशल स्टाफ के इंचार्ज इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन की टीम को भी इस केस को सुलझाने में लगा दिया. दोनों पुलिस टीमें इस केस को खोलने में जुट गईं. पहाड़गंज के नेहरू बाजार में जिस जगह वारदात हुई थी, पुलिस ने उस जगह का एक बार फिर मुआयना कर के यह देखा कि उधर कहीं कोई सीसीटीवी कैमरे तो नहीं लगे हैं, जिस से उस सैंट्रो कार का नंबर मिल सके.

पुलिस को कुछ दुकानों के आगे सीसीटीवी कैमरे तो लगे मिले लेकिन उन में से कई कैमरे बंद थे. और जो कैमरे चालू थे, उन की रिकौर्डिंग की जांच की तो वे इस एंगल से थे कि कार का केवल ऊपर का भाग ही उन की जद में आ सका. कार का नंबर उन कैमरों में नहीं मिल सका. इस के बाद पुलिस ने नजफगढ़ मार्केट में जवाहर चौक पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग देखी तो वहां भी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार दिखी. एक कैमरे की रिकौर्डिंग में उस कार का नंबर दिखा, लेकिन वह स्पष्ट नहीं हो रहा था. उस नंबर को देखने की कोशिश की तो अधूरा नंबर 3409 ही पढ़ने में आया. इस अधूरे नंबर के माध्यम से उन बदमाशों तक पहुंचना आसान नहीं था. एसीपी ओमप्रकाश ने इस नंबर को भी दिल्ली के समस्त थानों में वायरलैस से फ्लैश करा दिया.

दोनों ही पुलिस टीमें अपनेअपने स्रोतों से उन बदमाशों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. इलाके के अनेक संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ की गई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका. इसी तरह करीब 2 महीने निकल गए. 15 जनवरी, 2015 को हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त को अपने एक मुखबिर द्वारा बदमाशों के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली. विष्णुदत्त ने उस सूचना से थानाप्रभारी राजकुमार को अवगत करा दिया. थानाप्रभारी ने आगे की काररवाई करने के लिए तुरंत 2 टीमें बनाईं. पहली टीम इंसपेक्टर सुखदेव मीणा के नेतृत्व में बनी, जिस में एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद को शामिल किया. जबकि दूसरी टीम एसआई विनोद नैन की देखरेख में बनाई जिस में हेडकांस्टेबल जितेंद्र, राकेश आदि सम्मिलित थे.

पहली टीम वीडियोकौन टावर के पास पचकुइयां रोड पर बैरीकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी तो दूसरी टीम को समयपुर बादली क्षेत्र में जीवन पार्क के नजदीक भेज दिया. पचकुइयां रोड पर जो टीम वाहनों की चैकिंग कर रही थी, उसे डीएल3सीए क्यू3409 नंबर की सैंट्रो कार आती दिखी. वह कार सिल्वर कलर की थी. पुलिस ने उसे रोका. उस कार में ड्राइवर के अलावा अगली सीट पर एक युवक और बैठा था. पूछने पर ड्राइवर ने अपना नाम राकेश कुमार और दूसरे युवक ने अपना नाम एकांत बंसल बताया. मुखबिर ने पुलिस को इन्हीं दोनों युवकों के बारे में सूचना दी थी. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

कार की तलाशी लेने पर पीछे वाली सीटों के नीचे से 2 रौड, गैस कटर, शटर खोलने का हैंडल, हथौड़ा, छेनी आदि औजार मिले. जिस सैंट्रो कार में वे बैठे थे, वह उन्होंने 16 अक्तूबर, 2014 को दिल्ली के पटेलनगर क्षेत्र से चुराई थी, जिस की वहां रिपोर्ट भी दर्ज है. उन्होंने बताया कि पहाड़गंज के नेहरू बाजार में चौकीदारों पर हमला और नजफगढ़ में ज्वैलरी की दुकान में चोरी की वारदात को उन्होंने ही अपने साथियों के साथ अंजाम दिया था. दोनों अभियुक्तों को पुलिस पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की दूसरी टीम जो जीवन पार्क गई थी, वहां से उस ने मनोज नाम के एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया. वह भी एकांत बंसल का साथी था.

वह जिस सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 से जीवन पार्क में स्थित अपने घर लौट रहा था. वह उस ने दिल्ली के राजेंद्रनगर से 15 जनवरी, 2015 यानी उसी दिन चुराई थी. तलाशी लेने पर उस की कार से एक गैस कटर, छोटा सिलेंडर, एक गदाड़ा, शटर खोलने का हैंडल आदि बरामद हुआ. उस ने भी बताया कि नजफगढ़ और पहाड़गंज की वारदातों में वह शामिल रहा. उसे भी हिरासत में ले कर पुलिस थाने लौट आई. चौकीदार भगत शाह की हत्या के मामले का खुलासा हो चुका था. 3 अभियुक्त पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे. मास्टरमाइंड एकांत बंसल था जो एक क्लब लेवल का क्रिकेट खिलाड़ी था. जबकि मनोज दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था. तीनों अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की तो उन से लूट और चोरी की 55 वारदातों का खुलासा हुआ.

एक क्रिकेट खिलाड़ी और राजनेता ने मिल कर चोरी की इतनी सारी वारदातों को कैसे अंजाम दिया और ये इस जरायम में कैसे आए, इस की एक रोचक कहानी सामने आई. 34 वर्षीय एकांत बंसल दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित संग तराशान इलाके में रहने वाले गुरुचरण बंसल का बेटा था. बचपन से ही उसे क्रिकेट खेलने का शौक था. क्रिकेट खेल में ज्यादा ध्यान देने की वजह से वह जूनियर कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. दिल्ली में वह कई क्लबों की तरफ से मैच खेलता था. उस ने बताया कि वह इशांत शर्मा जैसे कई बड़े खिलाडि़यों के साथ भी मैच खेल चुका है.

राष्ट्रीय खिलाडि़यों की तरह वह भी इस खेल में अपना नाम चमकाना चाहता था. लेकिन उस के हौसले उस समय पस्त हो गए जब पिता ने उस की शादी कर दी. पिता बूढ़े हो चुके थे, उन की इतनी कूवत नहीं थी कि वह अपने शादीशुदा बच्चों का भी खर्च उठा सकें. एकांत के सिर पर बीवी का खर्च भी आन पड़ा था. अब उस के सामने परेशानी यह थी कि वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था जिस से उसे कोई नौकरी मिल सके और उस के पास कोई तकनीकी ज्ञान भी नहीं था जिस के सहारे उस की रोजीरोटी चल सके. क्रिकेट खिलाड़ी होने की वजह से लोगों की नजरों में उस की अच्छी इमेज थी. इस की वजह से वह कोई ऐसा काम भी नहीं करना चाहता था जिस से उस की इज्जत धूमिल हो. इसी बीच उस के मातापिता की मौत हो गई. उन की मौत के बाद वह और परेशान रहने लगा.

उस के दूसरे भाई अलगअलग रह रहे थे. उस के सामने एक ही समस्या बनी हुई थी कि वह अपने घर का खर्च कैसे चलाए. काफी सोचनेसमझने के बाद एकांत चोरियां करने लगा. इस काम में जुट जाने के बाद उस ने क्रिकेट खेल की तरफ ध्यान नहीं दिया. इस के बाद वह इसी जरायम से पैसा कमाने लगा. चोर चाहे कितनी चालाकी से चोरी क्यों न करे, एक न एक दिन वह पकड़ में आ ही जाता है. एकांत भी एक दिन पुलिस की पकड़ में आ ही गया, जिस की वजह से उसे जेल जाना पड़ा.

रोहिणी स्थित जेल में ही सन 2008-09 में उस की मुलाकात राकेश कुमार नाम के व्यक्ति से हुई. वह दिल्ली के वजीरपुर क्षेत्र में रहता था. राकेश भी चोरी के आरोप में जेल गया था. साथसाथ जेल में रहने पर दोनों के बीच दोस्ती हो गई और जमानत पर रिहा होने के बाद दोनों ही मिल कर चोरियां करने लगे. वह बंद दुकानों के ताले तोड़ कर बड़ीबड़ी चोरियां करने लगे. चोरियों में मोटा माल हाथ लगने लगा तो उन के हौसले बढ़ने लगे. दोनों जने साथसाथ जेल भी गए. अब एकांत को जेल जाने से डर नहीं लगता.

जेल में ही इन की मनोज नाम के एक अन्य शख्स से मुलाकात हुई. समयपुर बादली के जीवन पार्क में रहने वाला 45 वर्षीय मनोज भी चोरी के मामले में जेल गया था. तीनों का पेशा एक ही था इसलिए जेल से बाहर आने पर तीनों ने मिल कर वारदात को अंजाम देने का फैसला कर लिया. मनोज ने अपने दोस्त अजय को भी अपनी टीम में शामिल कर लिया. फिर तो इस चौकड़ी ने दिल्ली में एक के बाद एक वारदातें करनी शुरू कर दीं. ये लोग किसी वाहन से रात में निकलते और वाहन को दुकान के आगे खड़ा कर के अपने साथ लाए औजारों से ताले तोड़ कर उस में रखा सामान, नकदी साफ कर देते थे.

इन के टारगेट पर मैडिकल स्टोर, ज्वैलरी शौप, सिगरेट शौप, जनरल स्टोर्स, साडि़यों की दुकान आदि रहते थे. चोरी किए सामान को यह आपस में बांट लेते थे. ज्वैलरी को मेरठ के एक ज्वैलर को बेचते थे. एक ही इलाके के बजाय ये दिल्ली के अलगअलग इलाकों में वारदात को अंजाम देते थे. कभीकभी तो ये एक ही रात में  3-4 वारदातें कर देते थे. मनोज के पास जब पैसा जमा हो गया तो उस ने राजनीति में पैर जमाने का निश्चय किया. सन 2003 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उस ने कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से संपर्क कर टिकट लेने की कोशिश की लेकिन जब उसे किसी भी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो उस ने निर्दलीय रूप से विधानसभा का चुनाव लड़ा, जिस में उसे 1500 वोट मिले. राजनीति में पैर न जमने पर वह फिर से अपने साथियों के साथ पुराने धंधे में उतर आया.

16 अक्तूबर, 2014 को इन्होंने पटेलनगर क्षेत्र से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल3सीए क्यू 3409 चुराई. इस कार का नंबर बदले बिना ही ये दिल्ली में इसे चलाते रहे लेकिन पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके. 12-13 नवंबर, 2014 की रात को ये इसी कार में बैठ कर वारदात के लिए निकले. इस बार वे पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित नेहरू बाजार में गए. वहां पर उन्होंने एक दुकान के आगे अपनी कार लगा दी. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. राकेश कार में ड्राइविंग सीट पर बैठा रहा तो मनोज और अजय हाथों में लोहे की रौड ले कर कार के पास खड़े हो कर निगरानी करने लगे. जबकि एकांत औजारों से उस दुकान के ताले तोड़ने लगा. उस ने दुकान का एक ताला तोड़ भी लिया था.

वह और ताले तोड़ रहा था तभी अचानक चौकीदार करन बहादुर और भगत शाह उधर आए. करन बहादुर और भगत शाह मूलरूप से नेपाल के रहने वाले थे. वे इस बाजार में पिछले 10-15 सालों से चौकीदारी कर रहे थे. फिलहाल वे संग तराशान इलाके में रह रहे थे. उन्होंने कार के पास 2 लोगों को खड़े देखा तो उन्हें शक हुआ कि रात 2 बजे ये हाथों में रौड लिए क्यों खड़े हैं. तभी उन की नजर एक दुकान की तरफ गई वहां भी एक आदमी तालों को तोड़ने में लगा था. वे समझ गए कि ये सेंधमार हैं. दोनों चौकीदारों ने आवाज दे कर उन से पूछा कि वे वहां क्या कर रहे हैं.

बदमाशों को डर हो गया कि ये चौकीदार उन की योजना को नाकाम कर सकते हैं, इसलिए वे तीनों रौड ले कर उन के पास आ गए और चौकीदारों पर रौड से हमला कर दिया. एक हमलावर ने भगत शाह के सिर पर वार किया जिस से वह वहीं गिर गया तथा दूसरा चौकीदार करन बहादुर जान बचा कर वहां से भाग गया. चौकीदार का सिर फटने के बाद बदमाशों ने सोचा कि शायद वह मर गया है, इसलिए चोरी करने के बजाय वे वहां से भाग खड़े हुए. पहाड़गंज से वे चारों नजफगढ़ मेनबाजार पहुंचे. रास्ते में उन की गाड़ी को पुलिस ने भी नहीं रोका. मेनमार्केट में पहुंच कर वे दुकानों के ऊपर लगे साइनबोर्डों को पढ़ कर सोचने लगे कि किस दुकान को निशाना बनाना सही रहेगा. तभी उन्हें जवाहर चौक पर एक ज्वैलरी शौप दिखी.

उस ज्वैलरी शौप के पास एक चौकीदार था. उन्होंने सब से पहले उस चौकीदार को काबू में कर के डराधमका दिया. इस के बाद उन्होंने दुकान के ताले तोड़ कर वहां से सोनेचांदी की करीब 7 किलोग्राम ज्वैलरी और 35 हजार रुपए कैश चुरा लिया. अपना काम करने के बाद वे पहाड़गंज लौट आए. रात में वे सभी एकांत के घर रुके और सुबह होने पर सभी अपनेअपने घर चले गए. बाद में उन्होंने चोरी के सामान का बंटवारा भी कर लिया था. 2 महीने बाद मनोज ने राजेंद्रनगर से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 चुराई.

दोनों जगहों की वारदातों में पुलिस को ऐसा सुबूत नहीं मिला था, जिस से पुलिस उन तक पहुंच पाती. इसलिए 13 नवंबर के बाद भी उन्होंने दिल्ली के अलगअलग क्षेत्रों में कई वारदातों को अंजाम दिया. आखिर मुखबिर की सूचना पर 15 जनवरी, 2015 को वे पुलिस के हत्थे चढ़ ही गए. पुलिस ने 16 जनवरी को अभियुक्त एकांत बंसल, राकेश कुमार और मनोज को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश कर के उन का 3 दिनों का रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन की निशानदेही पर 20 किलोग्राम चांदी और सोने की ज्वैलरी, 1 लाख 70 हजार रुपए नकद, चोरी की 2 सैंट्रो कारें, 2 मोटरसाइकिलें, 52 इंच के 2 एलईडी टीवी, 6 लैपटोप, 20 मोबाइल फोन, 30 किलोग्राम 5 व 10 रुपए के सिक्के, 4 गैस कटर, 5 म्यूजिक सिस्टम, भारी मात्रा में रेडीमेड कपड़े, ब्रांडेड कंपनियों के सिगरेट के पैकेट, चौकलेट आदि सामान बरामद किए. उन्होंने बताया कि वे दिल्ली के 20 से अधिक थानाक्षेत्रों में चोरी, डकैती, सेंधमारी की 55 वारदातों को अंजाम दे चुके हैं.

18 जनवरी को पुलिस ने चोरी का माल खरीदने वाले एक ज्वैलर को भी दिल्ली के मंगोलपुरी बसस्टाप से गिरफ्तार कर लिया. वह इन लोगों से मिलने दिल्ली आया था. उसे इन के गिरफ्तार होने की जानकारी नहीं थी. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 2 किलोग्राम चांदी एवं चांदी को मोल्डिंग करने वाली मशीन बरामद कर ली. 37 वर्षीय वह ज्वैलर चोरी का सामान खरीदने के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है. उस के खिलाफ 6 केस पहले से दर्ज थे. पांचवें अभियुक्त अजय को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी. चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच इंसपेक्टर सुखदेव मीणा कर रहे हैं. Crime in Society

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi News : भोली सूरत वाली कातिल प्रेमिका

Delhi News : उत्तरी दिल्ली से एक ऐसी हैरान कर देने वाली वारदात सामने आई है, जिसे सुनकर लोग सन्न रह गए. यहां एक युवती ने अपने पूर्व प्रेमी के साथ मिलकर अपने लिवइन पार्टनर की बेरहमी से न सिर्फ हत्या कर दी, उसे आग के हवाले कर दिया. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह थी, जिस ने एक प्रेमिका को इतना क्रूर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? चलिए जानते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह दर्दनाक घटना 5-6 अक्टूबर, 2025 की रात उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर थाना क्षेत्र के गांधी विहार इलाके की है. पुलिस के अनुसार, 21 वर्षीय अमृता चौहान नाम की युवती ने अपने पूर्व बौयफ़्रेंड सुमित कश्यप (27 वर्ष) के साथ मिलकर लिवइन पार्टनर रामकेश मीणा (32 वर्ष) की हत्या की और फिर उसे आग की घटना जैसा दिखाने की कोशिश की.

मृतक रामकेश मीणा उत्तरी दिल्ली के गांधी विहार में रह कर यूपीएससी परिक्षा की तैयारी कर रहा था. वह अपनी गर्ल फ्रेंड अमृता चौहान के साथ मई 2025 से लिवइन रिलेशन में रह रहा था. इसी दौरान रामकेश ने प्रेमिका के कुछ आपत्तिजनक वीडियो बनाए और उन्हें एक हार्ड डिस्क में सेव कर लिया.
जब अमृता को इस बात का पता चला तो उस ने रामकेश से वीडियो डिलीट करने की मांग की, लेकिन वह ऐसा करने से इनकार कर रहा था. इतना ही नहीं, उस ने प्रेमिका की बदनामी के लिए झूठी कहानियां भी फैलानी शुरू कर दीं.

डीसीपी राजा बांठिया के मुताबिक, बदनामी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर अमृता चौहान ने अपने पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप (27 वर्ष) से संपर्क किया और दोनों ने बदला लेने की योजना बनाई. जांच में खुलासा हुआ कि युवती, उस का पूर्व बौयफ्रेंड और उस का एक दोस्त संदीप कुमार (29 वर्ष) ने मिलकर रामकेश की हत्या की साजिश रची.
अमृता को क्राइम शो देखने का बेहद शौक था और उस ने उन शोज़ से मिले फोरैंसिक नालेज का इस्तेमाल रामकेश मीणा के प्रदर की परफेक्ट प्लानिंग की.

5-6 अक्टूबर, 2025 की रात तीनों रामकेश के फ्लैट पर पहुंचे. वहां पहले उन्होंने रामकेश के साथ झगड़ा किया फिर उसी दौरान गला घोंटकर और बेरहमी से पीटपीट कर उसे मार डाला.

हत्या के बाद शव को जलाने की साजिश रची गई ताकि यह घटना दुर्घटना लगे. अमृता के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप, जो मुरादाबाद में एलपीजी गैस वितरक का काम करता था ने आग लगाने की पूरी योजना बनाई. उस ने गैस सिलेंडर का रेगुलेटर खोल दिया, मृतक के शरीर पर तेल और शराब डालकर लाइटर से आग लगा दी और सिलेंडर को उस के सिर के पास रख दिया.

पुलिस के अनुसार, करीब एक घंटे बाद सिलेंडर में विस्फोट हुआ और शव पूरी तरह जल गया. शुरुआत में यह मामला हादसे का लगा, लेकिन जांच के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट और कौल डिटेल्स से सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने प्रेमिका अमृता चौहान, उस के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप और तीसरे आरोपी संदीप कुमार को गिरफ्तार कर लिया है. Delhi News

Kanpur Crime News : अपना अपराध दूसरे के सिर

Kanpur Crime News : परशुराम का पत्नी और बेटी के साथ गांव वापस आना उस के भाई जयराम को जरा भी अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उस ने अपने हिस्से की जमीन और घर बंटा लिया था. जमीन और घर पर कब्जा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है…

घर के अंदर का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. खून से लथपथ 3 लाशें पड़ी थीं. मृतकों में परशुराम यादव, उस की कथित पत्नी विमला देवी और मासूम बेटी हिमांशी थी. तीनों की हत्या गोली मार कर की गई थी. परशुराम और विमला की लाशें कमरे के अंदर खून में डूबी पड़ी थीं, जबकि मासूम हिमांशी की लाश बरामदे में पड़े तखत पर पड़ी थी.लकमरे से ले कर बरामदे तक खून ही खून फैला था. कमरे के अंदर का सामान अस्तव्यस्त था और फर्श पर चूडि़यों के टुकड़े बिखरे थे. वहां की हालत देख कर साफ लग रहा था कि मरने से पहले परशुराम और विमला का हत्यारों से जम कर संघर्ष हुआ था. दिल दहलाने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा में 13 दिसंबर, 2014 की रात घटी थी.

चूंकि हत्याएं गोली मार कर की गई थीं, इसलिए गांव वालों को तुरंत हत्याओं की जानकारी हो गई थी. मृतक के भाई जयराम सिंह ने हत्यारों को भागते देखा भी था, इसलिए गांव वालों की सलाह पर उस ने तुरंत घटना की सूचना थाना उसराहार पुलिस को दे दी थी. मामला 3-3 हत्याओं का था, इसलिए घटना की जानकारी होते ही रात को ही एसएसपी राकेश सिंह, सीओ अनिल यादव के साथ थाना ऊसराहार के थानाप्रभारी संजय यादव भी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम भी एसएसपी राकेश सिंह साथ लाए थे. पहले पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के बाद मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह से पूछताछ की गई.

जयराम सिंह ने बताया कि 2 मंजिला बने मकान में भूतल पर वह अपने परिवार के साथ रहता था, जबकि पहली मंजिल पर उस का बड़ा भाई परशुराम अपनी पत्नी विमला और 3 वर्षीया बेटी हिमांशी के साथ रहता था. रात में गोलियां चलने की आवाज सुन कर जब वह घर से बाहर निकला तो देखा रामकिशन और धर्मेंद्र तमंचा लिए 2 अन्य लोगों के साथ भागे जा रहे थे. मैं ने उन्हें अच्छी तरह पहचान लिया था. शोर भी मचाया था, लेकिन अन्य लोगों के आतेआते वे अंधेरे का फायदा उठा कर निकल गए.

‘‘ये रामकिशन और धर्मेंद्र कौन हैं, मृतक की उन से क्या दुश्मनी थी?’’ एसएसपी राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बड़े भाई परशुराम के रामकिशन की पत्नी विमला से नाजायज संबंध बन गए थे. रामकिशन ने विरोध किया तो परशुराम विमला को दिल्ली भगा ले गया और पत्नी बना कर रहने लगा. पिछली होली पर परशुराम गांव लौट आया तो रामकिशन आ धमका. उस ने गांव में पंचायत बुलाई और विमला को अपने साथ भेजने के लिए पंचायत से गुहार लगाई. लेकिन विमला ने रामकिशन के साथ जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद पंचायत क्या करती, बेइज्जत हो कर रामकिशन चला तो गया, लेकिन जातेजाते अंजाम भुगतने की धमकी देता गया. उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने ये तीनों हत्याएं की हैं.’’

फिंगर एक्सपर्ट टीम ने घटनास्थल से फिंगर प्रिंट उठा लिए तो खोजी कुत्ता टीम ने कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटनास्थल और लाशों को सूंघ कर भौंकता हुआ नीचे आया. जयराम सिंह के घर के सामने आ कर कुछ देर वह भौंकता रहा, उस के बाद जयराम सिंह को पकड़ लिया. इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि कहीं भाई और उस के परिवार की हत्या भाई ने ही तो नहीं की. क्योंकि अक्सर जर, जोरू जमीन के लिए इस तरह हत्याएं होती रही हैं. इन हत्याओं में जोरू भी थी और जरजमीन भी. हत्याओं की सही वजह क्या हो सकती थी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था.

इस पूछताछ के बाद एसएसपी राकेश सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी संजय यादव ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और जरूरी सुबूत जुटा कर थाने वापस आ गए, जहां उन्होंने मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह की तहरीर पर रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर खुद ही जांच शुरू कर दी. चूंकि जयराम सिंह ने तीनों हत्याओं का आरोप मृतका विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाया था, इसलिए थानाप्रभारी संजय यादव ने रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए गांव चौबिया स्थित उस के घर छापा मारा.

रामकिशन और उस का बेटा धर्मेंद्र घर पर ही मिल गया था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाना ऊसराहार ले आई. थाने पर जब रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र से परशुराम, उस की पत्नी और बेटी की हत्या के बारे में पूछा गया तो रामकिशन ने कहा कि यह सच है कि परशुराम से उस की दुश्मनी थी, क्योंकि वह उस की पत्नी विमला को भगा ले गया था और उस के साथ शादी कर ली थी. लेकिन जहां तक हत्याओं की बात है तो उस ने ये हत्याएं नहीं कीं. कोई अपने फायदे के लिए उस की दुश्मनी का फायदा उठा कर उसे फंसाना चाहता है.

‘‘ऐसा कौन हो सकता है, जो अपने फायदे के लिए तुम्हें फंसाएगा?’’ थानाप्रभारी संजय यादव ने पूछा.

‘‘साहब, पूरे यकीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मुझे परशुराम के भाई जयराम सिंह पर शक है. उसी ने मकान और जमीन हथियाने के लिए यह खूनी खेल खेला है.’’ रामकिशन ने कहा.

थानाप्रभारी संजय यादव असमंजस में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच्चा है और कौन झूठा? दोनों हत्याओं की वजह ऐसी बता रहे थे कि अविश्वास करने का सवाल ही नहीं उठता था. सचझूठ का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी संजय यादव ने अपने खास मुखबिर को रामकिशन और जयराम सिंह के पीछे लगा दिया. यही नहीं, वह खुद भी सुरागरसी करते रहे. थानाप्रभारी संजय यादव के उस खास मुखबिर ने जयराम सिंह और रामकिशन से दोस्त गांठ ली और वह उन के साथ खानेपीने लगे. एक दिन जयराम सिंह के साथ महफिल जमी तो मुखबिर ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘यार जयराम! तू ने खेल तो बहुत अच्छा खेला भाई. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.’’

‘‘कौन सा खेल?’’ जयराम शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए बोला.

‘‘अरे वही, जमीनजायदाद भी मिल गई और पुलिस से भी बच गए. बड़ी सफाई से हत्याओं का इल्जाम दूसरे के सिर मढ़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’ जयराम ने शराब का गिलास नीचे रख कर हैरानी से पूछा.

‘‘दोस्त हूं तुम्हारा, दिल की बात जान लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’ मुखबिर ने टकराने के लिए अपना गिलास ऊपर उठा कर कहा.

‘‘तुम जान गए हो तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम तो अपने हो. लेकिन किसी दूसरे के सामने जुबान मत खोलना.’’ जयराम ने गिलास से गिलास टकराते हुए कहा.

महफिल खत्म कर के मुखबिर सीधे थाना ऊसराहार पहुंचा. थानाप्रभारी संजय यादव थाने में ही मौजूद थे. मुखबिर के चेहरे की चमक देख कर ही संजय यादव समझ गए कि यह जरूरी संदेश लाया है. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बिठा कर पूछा, ‘‘कोई खुशखबरी?’’

‘‘जी सर, खुशखबरी ही है.’’

‘‘तो जल्दी बताओ, ताकि तुरंत काररवाई की जा सके.’’

‘‘साहब, परशुराम, उस की पत्नी विमला और बेटी हिमांशी का कत्ल उस के भाई जयराम सिंह ने ही किया है. मकान और जमीन हथियाने के लिए उसी ने तीनों को गोली मार कर मारा है और इल्जाम विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगा दिया है.’’

‘‘तुम यह बात इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो?’’ संजय यादव ने पूछा.

‘‘सर, अभी थोड़ी देर पहले हम दोनों की महफिल जमी थी. उसी में मुझे जुबान न खोलने की नसीहत देते हुए जयराम ने तीनों की हत्या की बात स्वीकार की है.’’

थानाप्रभारी संजय यादव को भी जयराम सिंह पर ही शक था. क्योंकि खोजी कुत्ते ने उसी को पकड़ा था. लेकिन जयराम सिंह ने हत्या की जो वजह बताई थी, उस से वह गुमराह हो गए थे. मुखबिर ने सच्चाई पता लगा ली तो उन्होंने देर करना उचित नहीं समझ. पुलिस बल के साथ वह गांव इकघरा पहुंचे और जयराम सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में उस से पूछताछ शुरू हुई तो पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन जब उन्होंने अपना अंदाज दिखाया तो उस ने तीनों हत्याओं का अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जयराम सिंह ने खून से सने कपडे़ और वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने भूसे वाली कोठरी में छिपा रखा था. जयराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने मुकदमे से रामकिशन और धर्मेंद्र का नाम हटा कर उस का नाम दर्ज कर दिया. इस के बाद पूछताछ एवं पुलिस जांच में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना चौबिया के गांव गंगापुरा में कुल्फ सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे बालकिशन और रामकिशन थे. कुल्फ सिंह के पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए उस की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी.

गुजरबसर के लिए वह अपने खेतों पर काम करने के बाद दूसरे के यहां मेहनतमजदूरी कर लेता था. दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी मेहनतमजदूरी कर के पिता की मदद करने लगे. बड़ा बेटा बालकिशन जवान हुआ तो कुल्फ सिंह ने उस का विवाह इटावा के ही थाना ऊसराहार के गांव इकघरा के रहने वाले हुकुम सिंह यादव की बेटी अमृता के साथ कर दिया. अमृता फैशन परस्त व खुले विचारों की लड़की थी. वह सासससुर के आगे परदा नहीं करती थी, जिस से नाराज हो कर सासससुर ने घरजमीन का बंटवारा कर के उसे अलग कर दिया.

बालकिशन से छोटे रामकिशन की शादी विमला के साथ हुई. गोरीचिट्टी आकर्षक कदकाठी की विमला थाना इकदिल के गांव तीरवा के रहने वाले राम सिंह की 3 संतानों में सब से छोटी थी. राम सिंह के पास अपनी इतनी जमीन थी कि उस में खेती कर के वह अपना गुजारा आसानी से कर रहा था. रामकिशन विमला को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, विमला वैसी ही थी. उस की मोहक मुसकान, कजरारी आंखे एवं गठीले बदन ने उसे दीवाना बना दिया था. लेकिन विमला अपनी इस शादी से खुश नहीं थी, क्योंकि उस का पति रामकिशन उम्र में उस से 10 साल बड़ा था. उस ने भी अपनी उम्र के युवक की कल्पना की थी, लेकिन रामकिशन वैसा नहीं था.

समय के साथ विमला एक बेटे की मां बनीं, नाम रखा धर्मेंद्र सिंह. बेटे के पैदा होने के बाद रामकिशन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने गांव से बाहर जा कर पैसा कमाने का विचार किया. मातापिता से बात की तो वे भी राजी हो गए. उस ने कुछ जरूरी सामान लिया और आगरा चला गया. वहां उसे एक बिल्डिंग बनवाने वाले ठेकेदार के यहां नियमित काम मिल गया. रामकिशन सुबह 9 बजे ड्यूटी पर जाता तो शाम को ही लौटता. वह अपनी तरह के अन्य मजदूरों के साथ कच्ची बस्ती में रहता था. सब मिलजुल कर खाना बनाते और एक साथ बैठ कर खाते. कभीकभी उन के बीच पीनेपिलाने का भी दौर चलता. धीरेधीरे रामकिशन को आगरा शहर पसंद आ गया. अब उस का एक ही लक्ष्य था, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना.

2-3 महीने में वह घर आता और जो कमा कर लाता, पिता के हाथों पर रख देता. विमला को खर्च के लिए अलग से पैसे देता. हफ्तादस दिन घर में रह कर वह नौकरी पर वापस चला जाता. गांव में विमला पति की यादों को दिल में संजोए बच्चे का मुंह देख कर दिन काट रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार वह जेठानी अमृता के घर चली जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात अमृता के भाई परशुराम से हुई. परशुराम जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हुकुम सिंह यादव था. हुकुम सिंह के 2 बेटे, परशुराम, जयराम और एक बेटी अमृता थी. हुकुम सिंह ने दोनों बेटों की शादी कर के घरजमीन का बंटवारा कर दिया था.

छोटा भाई जयराम तो परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहा था, जबकि परशुराम की जिंदगी में भूचाल आ गया था. बीमारी से उस की पत्नी सूर्यमुखी की मौत हो गई थी. वह तनहा जिंदगी काट रहा था. अकेला होने की वजह से अक्सर वह अपनी बहन अमृता के यहां चला जाता था. वहीं उस की मुलाकात बहन की देवरानी विमला से हुई. अमृता के घर विमला और परशुराम का आमनासामना हुआ तो इसी पहली मुलाकात में दोनों ही एकदूसरे को देख कर कुछ इस तरह मोहित हुए कि पलकें झपकाना भूल गए. विमला की आकर्षक देहयष्टि परशुराम की आंखों में बस गई. वहीं परशुराम का गठीला बदन देख कर विमला मंत्रमुग्ध सी हो गई.

बातचीत के दौरान परशुराम की नजरें विमला पर ही जमी रहीं. वह बारबार कनखियों से उसे ही ताकता रहा. विमला की नजरें जब भी उस की नजरों से टकरातीं, वह कुछ इस तरह मुसकराता कि विमला का दिल मचल उठता. उस की इस मुसकराहट से विमला के दिलोदिमाग में हलचल मचने लगी. उस दिन विमला अपने घर आई तो उसे लगा जैसे वह अपना कुछ खो आई है. परशुराम का अक्स उस के दिमाग में बस गया था. दूसरी ओर परशुराम का भी वही हाल था. उसे साफ महसूस हो रहा था कि विमला की आंखों में उस के लिए चाहत थी.

पति के दूर रहने से विमला को जब भी परशुराम की मुसकान याद आती, उस का मन विचलित होने लगता. रामकिशन ने उस की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था. महीनों हो गए थे, वह गांव नहीं आया था. पति की उपेक्षा से विमला व्याकुल रहने लगी थी. यही वजह थी कि उस ने परशुराम को खयालों में बसा लिया था. परशुराम से मिलने और उस से बातें करने का विमला का जब भी मन होता, वह जेठानी के यहां आ जाती. बहाना जेठानी से मिलने का होता था, जबकि नजरें परशुराम को खोजा करती थीं. जल्दी ही परशुराम और विमला के बीच अंतरंगता बढ़ गई और आंखों ही आंखों में इशारे भी होने लगे. एक दिन विमला ने कहा, ‘‘मैं रोज यहां आती हूं, जबकि तुम कभी हमारे घर नहीं आते. अब मैं तभी यहां आऊंगी, जब तुम मेरे घर आओगे…’’

‘‘अगर तुम्हारे सासससुर ने ऐतराज किया तो..?’’ परशुराम ने कहा.

‘‘मेरे सासससुर एक सप्ताह के लिए रिश्तेदारी में भागवत कथा सुनने गए हैं. मैं घर में बिलकुल अकेली हूं. इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है. तुम मेरे घर आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’ शरारत से आंखें नचाते हुए विमला ने कहा.

परशुराम समझ गया कि विमला क्या अच्छा लगने की बात कर रही है. आग दोनों ओर लगी थी. इसलिए अगले दिन परशुराम विमला के घर जा पहुंचा. विमला घर में सचमुच अकेली थी. इस का परिणाम यह निकला कि मर्यादा टूट गई. एक बार मर्यादा क्या टूटी, परशुराम अब महीने में पंद्रह दिन बहन के घर ही पड़ा रहने लगा. परशुराम बहन के घर क्यों पड़ा रहता है, इस बात की गांव में चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ाते बात रामकिशन के कानों तक पहुंची. रामकिशन ने परशुराम और विमला को अलग करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रेम दीवानी विमला ने परशुराम का साथ नहीं छोड़ा. तंग आ कर रामकिशन गांव में ही रहने लगा, जिस से दोनों को मिलने में परेशानी होने लगी.

तब किसी तरह एक दिन विमला ने परशुराम से मिल कर कहा, ‘‘परशुराम, अब मैं तुम्हारे लिए और मार नहीं खा सकती. तुम मजा ले कर दीदी के घर जा कर चैन से सो जाते हो, जबकि मेरा पति मुझे जानवरों की तरह पीटता है. अगर तुम मुझे सचमुच चाहते हो तो मुझे इस मारपीट से मुक्ति दिला दो. मुझे यहां से कहीं और ले चलो.’’

‘‘सच विमला.’’ परशुराम ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए पति और बेटे, दोनों को छोड़ने को तैयार हूं.’’

और फिर सचमुच एक दिन विमला ने अपना सामान समेटा और परशुराम के साथ भाग गई. परशुराम विमला को ले कर दिल्ली चला गया. वहां उस ने लक्ष्मीनगर में मदर डेयरी के पास झोपड़पट्टी में एक कमरा किराए पर लिया और विमला के साथ आराम से रहने लगा. रोजीरोटी के लिए वह सब्जी बेचने लगा. दूसरी ओर विमला के भाग जाने से रामकिशन की बड़ी बदनामी हुई. उस ने विमला को खोजने की खुद तो कोशिश की ही, थाने में भी परशुराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन विमला और परशुराम का कुछ पता नहीं चला. हार कर वह शांत हो कर बैठ गया.

लगभग 8 सालों बाद परशुराम मार्च, 2014 में अचानक अपने गांव इकघरा लौटा. साथ में उस की कथित पत्नी विमला और 3 साल की बेटी हिमांशी भी थी. गांव आ कर वह पत्नी और बेटी के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगा. जमीन का अपना आधा हिस्सा भी उस ने बंटा लिया. परशुराम का घर लौटना उस के छोटे भाई जयराम सिंह को अच्छा नहीं लगा. इस की वजह यह थी कि अभी तक घर और जमीन पर उसी का कब्जा था. उसे लगता था कि डर की वजह से परशुराम कभी लौट कर नहीं आएगा. विमला के आने की जानकारी रामकिशन को हुई तो वह इकघरा आया और गांव में पंचायत बैठा कर विमला को अपने साथ भिजवाने की गुहार लगाई. लेकिन विमला ने भरी पंचायत में उस के साथ जाने से मना कर दिया. बेटे धर्मेंद्र को देख कर भी उस का दिल नहीं पसीजा.

जब वह उसे छोड़ कर गई थी, तब वह 8 साल का था. अब वह 16 साल का हो गया था.  धर्मेंद्र ने भी मां से वापस चलने को कहा. समाज में हो रही बदनामी का भी वास्ता दिया, उस के बाद भी विमला राजी नहीं हुई. उस के बाद रामकिशन विमला और परशुराम को अंजाम भुगतने की धमकी दे कर वापस चला गया. भाई के आने से जयराम सिंह परेशान रहता था. उस का दिन का चैन और रातों की नींद छिन गई थीं. उस का सोचना था कि अगर परशुराम लौट कर न आता तो मकान और जमीन उसी की होती. लेकिन अब यह नामुमकिन था. इसी सोचविचार में जयराम सिंह ने एक रात एक तीर से 2 निशाने साधने की तरकीब निकाली.

उस ने बड़े भाई परशुराम, उस की कथित पत्नी विमला और बेटी हिमांशी की हत्या कर के इल्जाम विमला के पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाने की योजना बना डाली. योजना बना कर जयराम सिंह ने एक बदमाश से 4 हजार रुपए में एक तमंचा और 5 कारतूस खरीदे. 13 दिसंबर, 2014 की रात जब गांव में सन्नाटा पसर गया तो जयराम तमंचा लोड कर के पहली मंजिल पर पहुंचा और बरामदे में सो रही मासूम हिमांशी के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर परशुराम और विमला ने समझा कि बदमाश आ गए हैं. वे कमरे में दुबक गए.

इस के बाद जयराम सिंह कमरे में आया तो परशुराम ने भाई को पहचान लिया. वह उस से भिड़ गया. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. लेकिन मौका मिलते ही जयराम ने परशुराम के सीने में गोली मार दी. वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. विमला ने भी जयराम को पहचान लिया था. वह भी उसे से भिड़ गई. लपटाझपटी में विमला की चूडि़यां टूट कर बिखर गईं. वह चीख पाती, उस के पहले ही जयराम ने विमला के सीने में गोली मार दी. विमला भी खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी.

तीनों को मौत के घाट उतार कर जयराम ने तमंचा तथा खून से सने कपड़े भूसे की कोठरी में छिपा दिए और घर के बाहर आ कर जोरजोर से शोर मचाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी को जयराम ने बताया कि विमला के पति रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अन्य लोगों ने ये हत्याएं की हैं. भागते समय उस ने रामकिशन तथा धर्मेंद्र को पहचान लिया था. कुछ देर बाद ग्रामप्रधान अंगद सिंह यादव ने इन तीनों हत्याओं की सूचना थाना ऊसराहार पुलिस को दी.

पूछताछ के बाद 21 दिसंबर, 2014 को थाना ऊसराहार पुलिस ने अभियुक्त जयराम सिंह को इटावा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. Kanpur Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Rajasthan News : नीले ड्रम की मर्डर मिस्ट्री

Rajasthan News : शादी हो जाने के बाद हर पत्नी चाहती है कि वह अपने घर को अच्छे से संभाले और अपने पति व बालबच्चों की ठीक से देखभाल करे. 3 बच्चों की मां सुनीता भी ये सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही थी. फिर एक दिन ऐसा क्या हुआ कि सुनीता ने अपने पति हंसराम उर्फ सूरज की न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उस की लाश को नीले ड्रम में डाल कर ऊपर से नमक भी डाल दी. आखिर सुनीता ने क्यों की पति की हत्या?

बरसात आते ही ईंटभट्ठे के मुनीम जितेंद्र शर्मा के कहने पर हंसराम उर्फ सूरज 3 महीने के लिए शाहजहांपुर में स्थित अपने घर लौटने के बजाए बीवीबच्चों के साथ उसी के साथ राजस्थान के अलवर जिले के किशनगढ़ वास कस्बा चला आया. उसे भट्ठे पर लोग सूरज के नाम से जानते थे. वह अपनी पत्नी सुनीता और 3 बच्चों के साथ वहां की आदर्श नगर कालोनी में जितेंद्र शर्मा की मां मिथिलेश शर्मा के मकान में किराए पर रहने लगा.

जितेंद्र ने सूरज को एक दुकान पर काम भी दिलवा दिया. इस तरह से सूरज की आमदनी का जरिया बन गया और उस की दिनचर्या शुरू हो गई. वह सुबह काम पर जाता और शाम तक घर वापस लौटता था. घर में उस के पीछे पत्नी सुनीता और 3 बच्चे होते थे. बड़ा बेटा 8 साल का, जबकि 2 अन्य बच्चे 4 साल और डेढ़ साल के थे.

सूरज और सुनीता एक तरह से जितेंद्र के एहसान तले आ गए थे. जितेंद्र जबतब छत पर बने घर में सुनीता के पास आनेजाने लगा था. वह सूरज के नहीं रहने पर भी सुनीता के पास चला जाता था. बच्चों से प्यारदुलार करता था. जल्द ही सुनीता जितेंद्र से भावनात्मक लगाव महसूस करने लगी थी. यह लगाव कब सैक्स अपील की भावना में बदल गया, उन्हें पता ही नहीं चला. यानी उन के बीच अवैध संबंध बन गए. दोनों को जब एकांत की चाहत होती, तब जितेंद्र बच्चों को गेम खेलने के लिए अपना मोबाइल फोन दे कर कमरे से बाहर भेज दिया करता था.

सुनीता और जितेंद्र के बीच एक अनैतिक रिश्ता कायम हो चुका था. जबकि सूरज इस से बेखबर था.  सुनीता शुरू से ही अपने पति से संतुष्ट नहीं थी. वह भले ही 3 बच्चों का बाप बन गया था, लेकिन सुनीता की शारीरिक भूख को नहीं मिटा पाता था.

सूरज उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का रहने वाला था, लेकिन रोजीरोटी की तलाश में राजस्थान के खैरथल तिजारा जिलांतर्गत सूर्या ईंटभट्ठे पर काम करने आ गया था. वहीं उस की भट्ठे के मुनीम जितेंद्र से अच्छी जानपहचान हो गई थी. उन्हीं दिनों रंगीनमिजाज जितेंद्र की निगाह सुनीता पर पड़ी थी. उस के खिलते यौवन और सौंदर्य को देख कर मन ही मन उसे पाने की लालसा से भर गया था.

शायद यही कारण था कि जितेंद्र ने सूरज को परिवार समेत अपने गांव वापसी से रोक दिया था. यही नहीं, उस ने सूरज को शराब की ऐसी लत लगा दी कि वह जितेंद्र का पक्का यार बन गया. यह सब जितेंद्र ने सुनीता को हासिल करने के लिए किया था.

जितेंद्र एक तरह से अपनी योजना में सफल हो गया था और उस ने सुनीता के साथ जैसा रिश्ता कायम करना चाहता था, उस में उसे सफलता मिल गई थी. उस की जब इच्छा होती तो मौका निकाल कर सुनीता को अपनी बाहों में दबोच लेता था.

हालांकि जितेंद्र भी शादीशुदा था. वह एक 8 साल के बेटे आदित्य का पिता भी था. उस की पत्नी की करीब 12 साल पहले करंट लगने से मौत हो गई थी. बेटे की देखभाल उस की मां करती थी और जितेंद्र विधुर की जिंदगी गुजार रहा था.

यही कारण था कि वह स्त्रीसुख की आग में बेचैन रहता था. जब से उस ने सुनीता को देखा था, तभी से उसे पाने के लिए तड़प उठा था. इस के प्रयास में लग गया था और उस ने सुनीता को भट्ठे पर कम काम करवाने और शराबी सूरज को मुफ्त शराब पिला कर संतुष्ट कर दिया था.

वैसे जितेंद्र और सुनीता के बीच अवैध संबंध किशनगढ़ आने के पहले से बने हुए थे. जुलाई में बारिश के दिनों में जब सूरज ने सुनीता से वापस गांव चलने की बात कही, तब उस ने जितेंद्र के प्रस्ताव के साथ हां में हां मिला कर सूरज को राजी कर लिया था.

जितेंद्र ने जानबूझ कर सूरज को अपने घर के छत पर बना कमरा मां से कह कर किराए पर दिलवा दिया था. वहां उस की मां कभीकभार जाती थी. वह जगह सुनीता और जितेंद्र दोनों के लिए महफूज थी. सूरज और सुनीता के वहां रहने पर एक तरह से जितेंद्र की मौज आ गई थी.

बदले में वह उस की मदद करने लगा. एक बार जितेंद्र ने किराया ही अपनी जेब से दे दिया था. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह पत्नी से झगड़ पड़ा. उसे पहले से ही पत्नी के चालचलन और जितेंद्र से अधिक घुलनेमिलने से उस पर संदेह होने लगा था. किराए की बात पर उस का संदेह और गहरा हो गया. शराब के नशे में वह सुनीता पर सच उगलवाने का दबाव बनाने लगा था.

तब उलटे सुनीता पति सूरज से ही उलझ गई, गुस्से में बोली, ”तुम्हारे पास किराए का पैसा नहीं था और जब उस ने किराया चुका दिया है, तब उस का एहसान मानने के बजाए उसी पर लांछन लगा रहे हो.’’

”किराए में दोचार रोज देरी हो जाती तो इस से क्या हो जाता,’’ सूरज बोला.

”तुम्हें नहीं मालूम जितेंद्र की मां किराए के मामले में बहुत कड़क बुढिय़ा है. किराया नहीं मिलने पर तुरंत कमरा खाली करवा देती.’’ सुनीता बोली.

पत्नी के इस तर्क पर सूरज चुप लगा गया, किंतु कुछ दिनों बाद ही बेटे के एडमिशन को ले कर सुनीता पति से झगड़ पड़ी. दरअसल, उस के एडमिशन के लिए जितेंद्र ने पहल की थी. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह गुस्से में आ गया और बोला, ”जितेंद्र कौन होता है मेरे बेटे का एडमिशन करवाने वाला?’’

इस पर फिर सुनीता पहले की तरह पति को ताना देती हुई बोली, ”अगर कोई तुम्हें मदद कर रहा है तो इस में बुराई क्या है?’’

”बुराई उस की मदद में नहीं, उस की नीयत में है. उस ने तुम्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है…तुम मेरे कहने का मतलब अच्छी तरह से समझती हो,’’ सूरज नाराजगी के साथ बोला.

तभी जितेंद्र वहां आ गया. उस ने जब सुनीता और सूरज को तूतूमैंमैं करते देखा, तब माहौल को हलका बनाते हुए बोल पड़ा, ”तुम दोनों फिजूल में लड़ते रहते हो. इतना अच्छा मौसम है. चलो बाजार, आज दारू की बोतल और मछली लाते हैं. यहीं दारू पार्टी करेंगे. सुनीता मछली पकाएगी.’’

दारू और मछली का नाम सुनते ही सूरज के मुंह से लार टपकने लगी. वह तुरंत तैयार हो गया और उस के साथ दारू लाने के लिए बाजार चला गया. थोड़ी देर में जितेंद्र और सूरज दारू और मछली ले कर आ गए. दोनों वहीं दारू पार्टी करने लगे. मछली पका कर सुनीता लाई, तब जितेंद्र ने उसे भी एक पैग पीने को दे दिया. उस ने भी खुश हो कर 2-3 पैग दारू का आनंद लिया. शराब के नशे में जितेंद्र ने कहा कि उसे उस की माली हालत पर पर दया आती है, इसलिए वह उस की मदद करता है. अपनी बातों से उस ने सूरज को आश्वस्त किया कि सुनीता और उस के संबंधों को ले कर बेकार में संदेह करता है.

हालांकि यह कहना उस का एक झूठ ही था. हकीकत तो यह थी कि जितेंद्र अकसर सूरज को शराब पिलाता था. उस में सुनीता भी साथ देती थी और जब सूरज नशे में धुत हो जाता था, तब जितेंद्र उस की बीवी के साथ मौजमस्ती करता था. यह सब चलता रहा. सुनीता अपने अनैतिक संबंधों के बचाव में लोगों से पति को शराब की लत लग जाने का दुखड़ा सुनाने लगी थी. जब भी जितेंद्र की मां से मिलती, एक दुखड़ा सुनाती कि वह अपने शराबी पति से परेशान हो गई है. जितेंद्र की मां उसे नसीहत देती. समझाती थी कि वह पति से झगड़ा नहीं करे, बल्कि प्रेम से उसे समझाएबुझाए.

बात 15 अगस्त, 2025 की है. सूरज दुकान से घर लौट आया था. वह गुस्से से भरा हुआ कमरे में बैठा था. जैसे ही पत्नी आई, उस से झगड़ पड़ा. तभी मकान के नीचे बैठा जितेंद्र उस के कमरे में आ गया. वह बोला, ”क्यों झगड़ रहे हो?’’

”क्या करूं? मेरी जिंदगी नरक बन गई है. दारू पिलाओगे, तब बोलूंगा?’’ सूरज निराश भाव से बोला.

”हां, क्यों नहीं, लो अभी गया और ले कर आया.’’ जितेंद्र बोला.

”कहां से लाओगे, आज तो ड्राई डे है.’’

”तो क्या हुआ, मैं ने इंतजाम कर रखा है.’’ जितेंद्र बोला और वहां से चला गया. थोड़ी देर में लौटा, तब उस के हाथ में एक शराब की बोतल थी.

सूरज और जितेंद्र वहीं दारू पीने लगे. सुनीता गुमसुम उन्हें देखती रही. जितेंद्र ने इशारा किया, तब वह भी अपने लिए एक गिलास ले आई. सूरज उस रोज गुस्से में लगातार पैग पर पैग पिए जा रहा था. हर पैग के साथ सुनीता को गालियां बके जा रहा था. उस पर बदलचलनी का आरोप लगाए जा रहा था. हद तो तब हो गई, जब सूरज उस पर गिलास फेंक कर मार दिया. इस पर जितेंद्र बोला, ”क्यों उसे मारते हो? गलत बात है.’’

नशे में सूरज बोला, ”मैं उसे मारूं या प्यार करूं, तुम कौन होते हो इसे बचाने वाले?’’

”तुम्हें जो कुछ करना है वह मेरे सामने मत करो,’’ जितेंद्र डांटता हुआ बोला.

”मैं मारूंगा इसे, आज इस की सारी हेकड़ी निकाल दूंगा.’’ बोलते हुए उस ने सुनीता की गरदन पकड़ ली थी. सुनीता चीख पड़ी थी. चीख सुन कर जब उस का बेटा उसे बचाने आया था, तब सूरज ने बेटे की भी पिटाई शुरू कर दी. वह गुस्से में बावला हो गया था. बचाव करते हुए जितेंद्र बोल पड़ा, ”अरे बच्चे को मार डालेगा क्या? इतना क्यों पीट रहा है उसे?’’

तभी सूरज की नजर लोहे के एक औजार पर गई. उस ने झट से उसे उठा लिया. तब तक सुनीता और उस का बेटा बचाव में भागने लगे. वे सूरज के आक्रामक तेवर को देख कर समझ गए थे कि वह काफी गुस्से में है. कुछ भी कर सकता है. ऐसा ही जितेंद्र ने भी महसूस किया तो वह भी वहां से जाने को उठा. तब सूरज ने तीनों पर लोहे का औजार फेंक मारा.

उस ने अनापशनाप बकना शुरू कर दिया था. उस रोज नशे में उस ने यहां तक कह दिया कि उन के बीच नाजायज संबंध है. उसे अब खत्म कर के ही चैन लेगा. वह शराब के नशे में बकता हुआ इधरउधर चक्कर लगा रहा था. इसी बीच सुनीता ने जितेंद्र को इशारा किया. हाथों के इशारे से धीमी आवाज में बोली, ”अब क्या किया जाए? इस पर तो भूत सवार है.’’

”जो तुम को सही लगे.’’

फिर क्या था. जितेंद्र ने चक्कर काटते सूरज को दबोच लिया. सुनीता ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के गरदन पर जितेंद्र की पकड़ मजबूत होती चली गई. सुनीता ने उस को छटपटाने का मौका तक नहीं दिया. जितेंद्र ने एक हाथ से गरदन और दूसरे हाथ से सूरज का मुंह नाक ऐसे दबाई कि वह कुछ मिनट में ही बेजान हो गया. उस वक्त रात हो चुकी थी. सुनीता और जितेंद्र आपस में विचार करने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? शव को कैसे ठिकाने लगाया जाए?

तभी जितेंद्र को कमरे के बाहर छत पर रखे नीले ड्रम को देख कर एक आइडिया आया. क्यों न शव को ड्रम में डाल कर उस पर नमक डाल दिया जाए, ताकि शव जल्दी सडग़ल जाए. उसे यह आइडिया अचानक कुछ महीने पहले मेरठ के सौरभ हत्याकांड से आया. उस ने वही किया. फर्क इतना था कि सीमेंट का गाढ़ा घोल डालने के बजाय सूरज के शव को ड्रम में डाल कर उस में नमक का घोल डाल दिया. उस के मुंह को चादर से ढंक दिया.

संयोग से जब यह सब किया जा रहा था, तब सूरज का बेटा पेशाब के लिए उठा था. वह अर्धनिद्रा में था, उसे कुछ समझ में नहीं आया कि उस की मम्मी और जितेंद्र अंकल ड्रम के साथ क्या कर रहे हैं? जब उस ने पूछा कि वे क्या कर रहे हैं? तब अचानक जितेंद्र बोल पड़ा, ”तुम्हारे पापा को ठिकाने लगा रहे हैं. वह तुम्हें और मम्मी को मार रहा था न!’’

17 अगस्त, 2025 को जितेंद्र की मां मिथिलेश ने महसूस किया कि छत पर रहने वाले किराएदार सूरज के यहां सन्नाटा है, वहां से किसी की आवाज नहीं आ रही है. जबकि सुबह होते ही सुनीता और सूरज के बीच होने वाली बहस की आवाजें आने लगती थीं. कई बार बच्चों के रोने की भी आवाज सुनाई देती थी.

वह छत पर चली गई. कमरे में कोई नजर नहीं आ रहा था. वहां न तो सुनीता थी और न ही सूरज और उस के बच्चे. उस ने महसूस किया कि जितेंद्र भी बीती रात से अपने कमरे में नजर नहीं आया था. तभी वहां उसे अजीब सी दुर्गंध महसूस हुई. जो पास रखे नीले ड्रम से आ रही थी. उस ने तुरंत अपने पति राजेश शर्मा को यह बात बताई. पति ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर छत पर रखे ड्रम से दुर्गंध आने की सूचना पुलिस को दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना पा कर किशनगढ़ वास के एसएचओ जितेंद्र सिंह शेखावत, एसआई दिनेश कुमार मीणा, एएसआई ज्ञानचंद पुलिस दलबल के साथ आदर्शनगर कालोनी स्थित राजेश शर्मा के घर पहुंच गए. पुलिस टीम छत पर रखे नीले ड्रम के पास गई, जहां से दुर्गंध आ रही थी. एक पुलिसकर्मी ने उस का ढक्कन हटाया तो दुर्गंध और तेज हो गई. उस के भीतर चादर ठूंसी हुई थी. जब चादर बाहर निकली, तब दुर्गंध का तेज भभका निकला और अंदर लाश नजर आई.

लाश की पहचान सूरज के रूप में हुई, जो वहीं किराए पर रहता था. एसएचओ ने इस की सूचना किशनगढ़ वास के डीएसपी राजेंद्र सिंह निर्वाण को दे दी. वह थोड़ी देर में ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने उस के कमरे की तलाशी ली. वहां उन्हें सूरज का आधार कार्ड मिला, जिस पर उस का नाम हंसराज दर्ज था. उस पर उस के पिता का नाम खेमकरण और पता नवादिन नवाजपुर, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश लिखा था. मकान मालकिन को भी यह जान कर हैरानी हुई कि मृतक ने अपना असली नाम उसे नहीं बताया था.

उस वक्त सडऩे की स्थिति में आ चुके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस के सामने सवाल यह था कि मृतक की पत्नी सुनीता और बच्चे कहां गए? जांच और पूछताछ में यह भी मालूम हुआ कि मकान मालकिन का विधुर बेटा जितेंद्र शर्मा भी 16 सितंबर, 2025 से ही लापता है. उन का पता लगाने के लिए जांच टीमें गठित कर दी गईं. उन्हें पकडऩे के लिए टीमें पड़ोसी राज्य हरियाणा और उत्तर प्रदेश भेजी गईं. साथ ही सीसीटीवी के फुटेज निकलवाए गए.

दूसरी तरफ फरार जितेंद्र शर्मा 18 अगस्त को सुनीता और उस के तीनों बच्चों को ले कर अलवर जिले के रामगढ़ इलाके के आलावड़ा गांव जा पहुंचा. वहां लोगों ने एक ईंट भट्ठे पर काम मांगा. भट्ठे के मालिक को उन पर संदेह हो गया था. कारण उसे बीते दिनों किशनगढ़ वास में हत्या संबंधी जानकारी न्यूजपेपर और सोशल मीडिया के जरिए मिल चुकी थी, जिस में फरार लोगों के बारे में भी जिक्र किया गया था.

इस संदेह के आधार पर उस ने तुरंत स्थानीय पुलिस थाने को इस की सूचना दे दी. पुलिस वहां पहुंच गई और उन्हें वही हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन्हें किशनगढ़ वास लाया गया. थाने में पहले से ही सूरज के परिजन मौजूद थे. उन्होंने सूरज की लाश की पहचान कर ली थी. सूरज के पेरैंट्स और भाईबहनों का रोरो कर बुरा हाल था. थाना किशनगढ़ वास की पुलिस ने हंसराज उर्फ सूरज की हत्या का मामला उस के परिजनों की शिकायत पर दर्ज कर लिया गया. हत्याकांड में जितेंद्र शर्मा और सुनीता मुख्य आरोपी बनाए गए.

दोनों ने गहन पूछताछ में हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उन्होंने हत्या किस तरह से की, पुलिस इस की जांच के लिए उन्हें घटनास्थल पर ले गई. वहां आरोपियों द्वारा क्राइम सीन क्रिएट किया गया. उन के बयान लिए गए. अपने बयान में जितेंद्र ने बताया कि सूरज की पत्नी सुनीता के प्रेम में वह अंधा हो गया था. सुनीता भी उसे पसंद करने लगी थी. सूरज उन के प्रेम संबंधों में बाधक था, इसलिए उस की हत्या कर दी थी.

पुलिस ने जितेंद्र शर्मा और सुनीता से गहन पूछताछ के बाद उन्हें मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर दिया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Rajasthan News

 

 

MP News : साधना पटेल नहीं बन पाई बैंडिट क्वीन

MP News : पिछड़े तबके के बुद्धिविलास पटेल मध्य प्रदेश के विंघ्य इलाके के चित्रकूट के गांव बगहिया पुरवा के बाशिंदे थे. उन की 3 औलादों में साधना सब से बड़ी थी. हालांकि साधना पढ़ाईलिखाई में होशियार थी, लेकिन उस की ख्वाहिश जिंदगी में कुछ ऐसा करने की थी, जिस से लोग उसे याद रखें.

जिस उम्र में लड़कियां कौपीकिताबें सीने से लगाए शोहदों से बचती जमीन में आंखें धंसाए स्कूल जा रही होती थीं, उस उम्र में साधना अपने किसी बौयफ्रैंड के साथ जंगल में कहीं मौजमस्ती कर रही होती थी. जाहिर है कि बहुत कम उम्र में ही वह रास्ता भटक बैठी थी तो इस के जिम्मेदार पिता बुद्धिविलास भी थे, जिन के घर आएदिन डाकुओं का आनाजाना लगा रहता था. नामी और इनामी डाकू चुन्नी पटेल का तो उन से इतना याराना था कि जिस दिन वह घर आता था, तो तबीयत से दारू, मुरगा की पार्टी होती थी.

चुन्नी पटेल को साधना चाचा कह कर बुलाती थी और अकसर उस की उंगलियां बंदूक से खेला करती थीं. साधना की हरकतें देख चुन्नी पटेल अकसर कहा करता था कि एक दिन यह लड़की पुतलीबाई से भी बड़ी डाकू बनेगी. ऐसा हुआ भी और उजागर 18 नवंबर, 2019 को हुआ, जब सतना पुलिस ने 50,000 इनामी की इस दस्यु सुंदरी, जिसे ‘जंगल की शेरनी’ भी कहा जाता था, को कडियन मोड़ के जंगल से गिरफ्तार कर लिया.

ऐसे बनी डाकू

एक मामूली से घर की बला की खूबसूरत दिखने व लगने वाली साधना पटेल के डाकू बनने की कहानी भी उस की जिंदगी की तरह कम दिलचस्प नहीं. कम उम्र में ही साधना पटेल को सैक्स का चसका लग गया था, जिस से पिता बुद्धिविलास परेशान रहने लगे थे. बेटी को रास्ते पर लाने के लिए उन्होंने उसे अपनी बहन के घर भागड़ा गांव भेज दिया, लेकिन इस से कोई फायदा नहीं हुआ. उलटे, वह यह जान कर हैरान हो उठी कि चुन्नी चाचा का आनाजाना यहां भी है और उन के उस की बूआ से नाजायज संबंध हैं. तब साधना को पहली बार सैक्स को ले कर मर्दों की कमजोरी सम झ आई थी.

लेकिन सैक्स की अपनी लत और कमजोरी से वह कोई सम झौता नहीं कर पाई. बूआ के यहां कोई रोकटोक नहीं थी, इसलिए उस के जिस्मानी ताल्लुकात एक ऐसे नौजवान से बन गए, जो उस का मुंहबोला भाई था. एक दिन बूआ ने हमबिस्तरी करते दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया, तो साधना घबरा उठी. साधना को डर था कि बूआ के कहने पर चुन्नीलाल उसे और उस के आशिक को मार डालेगा, इसलिए वह जान बचाने के लिए बीहड़ों में कूद पड़ी.

यह साल 2015 की बात है, जब उस की मुलाकात नामी डकैत नवल धोबी से हुई. नवल धोबी औरतों के मामले में बड़ा सख्त था. उस का मानना था कि औरतें डाकू गिरोहों की बरबादी की बड़ी वजह होती हैं, इसलिए वह गिरोह में उन्हें शामिल नहीं करता था. कमसिन साधना पटेल को देखते ही नवल धोबी का मन डोल उठा और अपने उसूल छोड़ते हुए उस ने साधना को न केवल गिरोह में, बल्कि जिंदगी में भी शामिल कर लिया. अब तक साधना कपड़ों की तरह आशिक बदलती रही थी, लेकिन नवल की हो जाने के बाद उस ने इसी बात में बेहतरी और भलाई सम झी कि अब कहीं और मुंह न मारा जाए. कुछ दिन बड़े इतमीनान और सुकून से कटे.

इसी दौरान साधना ने डकैती के कई गुर और सलीके से हथियार चलाना सीखा. नवल के साथ मिल कर उस ने कई वारदातों को अंजाम भी दिया. नवल के साथ साधना का नाम भी चल निकला, लेकिन एक दिन पुलिस ने नवल को कई साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया, जिस से उस का गिरोह तितरबितर हो उठा. नवल की गिरफ्तारी साधना की बैंडिट क्वीन बन जाने की ख्वाहिश पूरी करने वाली साबित हुई.

साधना ने गिरोह के बाकी सदस्यों को ले कर अपना खुद का गिरोह बना डाला और बेखौफ हो कर वारदातों को अंजाम देने लगी. गिरोह के सभी सदस्य हालांकि उसे ‘साधना जीजी’ कहते थे, लेकिन कई मर्दों से वह सैक्स संबंध बनाती रही.

फिर आया एक मोड़

अपना खुद का गिरोह बनाने के शुरुआती दौर में साधना रंगदारी वसूलती थी, लेकिन यह भी उसे सम झ आ रहा था कि अगर नामी डाकू बनना है और खौफ बनाए रखना है तो जरूरी है कि किसी ऐसी वारदात को अंजाम दिया जाए जिस की चर्चा दूरदूर तक हो. इसी गरज से साल 2018 में साधना ने नयागांव थाने के तहत आने वाले पालदेव गांव के छोटकू सेन को अगवा कर लिया. छोटकू सेन से वह गड़े खजाने के बारे में पूछती रहती थी. लेकिन वह कुछ नहीं बता पाया तो साधना ने बेरहमी से उस की उंगलियां काट दीं.

साधना की गिरफ्त से छूट कर छोटकू ने उस के खिलाफ मामला दर्ज कराया तो इस कांड की चर्चा वाकई वैसी ही हुई जैसा कि वह चाहती थी. इस कांड के बाद साधना के नाम का सिक्का बीहड़ों में चल निकला और इसी दौरान उस की जिंदगी में पालदेव गांव का ही नौजवान छोटू पटेल आया. छोटू के पिता ने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखाते समय उस के अगवा हो जाने का अंदेशा जताया था.

कुछ दिनों बाद पुलिस को पता चला कि छोटू साधना का नया आशिक है और उसे अगवा नहीं किया गया है, बल्कि वह अपनी मरजी से साधना के साथ रह रहा है, तो पुलिस ने उसे भी डकैत घोषित कर उस के सिर 10,000 रुपए का इनाम रख दिया. छोटू 6 अगस्त, 2019 को गायब हुआ था, लेकिन हकीकत में इस के पहले भी वह साधना से मिला करता था और दोनों जंगल में रंगरलियां मनाते थे. बाद में छोटू गांव वापस लौट आता था.

सच जो भी हो, लेकिन यह तय है कि साधना वाकई छोटू से दिल लगा बैठी थी और उस की ख्वाहिश पूरी करने के लिए कभीकभी जींसशर्ट उतार कर साड़ी भी पहन लेती थी. छोटू भी उस पर जान देने लगा था, इसलिए उस के साथ रहने लगा था. सितंबर, 2019 में पुलिस ने नामी और 7 लाख रुपए के इनामी डाकू बबली कोल को उस के साथ व साले लवकेश को ऐनकाउंटर में मार गिराया तो राज्य में खासी हलचल मची थी. बबली कोल गिरोह के दबदबे और चर्चों के चलते साधना को कोई भाव नहीं देता था. अब तक हालांकि उस के खिलाफ आधा दर्जन मामले दर्ज हो चुके थे, लेकिन बबली के कारनामों के सामने वे कुछ भी नहीं थे.

बहरहाल, बबली कोल की मौत के बाद विंध्य के बीहड़ों में 21 साला साधना का एकछत्र राज हो गया, लेकिन जिस फुरती से पुलिस डाकुओं का सफाया कर रही थी, उस से घबराई साधना पटेल को अंडरग्राउंड हो जाना ही बेहतर लगा. छोटू के साथ वह  झांसी और दिल्ली में रही और पूरी तरह घरेलू औरत बन कर रही. हालांकि यह जिंदगी वह 4 महीने ही जी पाई. बड़े शहरों के खर्चे भी ज्यादा होते हैं, लिहाजा जब पैसों की तंगी होने लगी, तो उस ने फिर वारदात की योजना बनाई और बीहड़ लौट आई.

पुलिस को मुखबिरों के जरीए जब यह बात मालूम हुई तो उस ने जाल बिछा कर 17 नवंबर, 2019 को उसे गिरफ्तार कर लिया. उत्तर प्रदेश में भी साधना पटेल कई वारदातों को अंजाम दे चुकी थी, लेकिन वहां किसी थाने में उस के खिलाफ किसी ने मामला दर्ज नहीं कराया था. इस के बाद भी पुलिस ने उस पर 30,000 रुपए के इनाम का ऐलान किया था.

अब साधना पटेल जेल में बैठी मुकदमोें की सुनवाई और सजा के इंतजार में काट रही है, लेकिन उस की कहानी बताती है कि उस के डाकू बनने में सब से बड़ी गलती तो उस के पिता की ही है, जिन की मौत के बाद साधना बेलगाम हो गई थी.