करनाल में खौफनाक वारदात : बेटे ने ड्रिल मशीन से मां बाप को मारा

Haryana Crime : एक बेटे ने इंसानियत की सभी हदें पार कर अपने ही मम्मीपापा की बेरहमी से हत्या कर दी. यह खबर जिस ने भी सुनी वह हैरान रह गया.

घटना हरियाणा (Haryana Crime) के करनाल जिले की है, जिस में एक बेटे ने प्रौपर्टी के लालच में आ कर अपने ही मम्मीपापा की ड्रिल मशीन से हत्या कर दी. बेटे ने ड्रिल मशीन से पाप के सिर और गले में सुराख कर दिए और जब इस खौफनाक मंजर को देख मम्मी चिल्लाई तो उस ने पहले मम्मी का गला दबाया और फिर ड्रिल मशीन से मम्मी के गले में भी सुराख कर दिया. मम्मी और पापा की हत्या करने के बाद उस ने दोनों लाशों को नहर में फेंक दिया.

तफ्तीश में हुआ खुलासा

पुलिस ने जब जांच की तो एक बड़ा खुलासा हुआ जिस में पता चला कि मम्मीपापा की हत्या करने से पहले बेटे क्राइम पेट्रोल और मर्डर की वैब सीरीज भी देखी थी. बेटे ने वैब सीरीज से कत्ल से ले कर बचने तक का उपाय तलाशा. हालांकि जब मम्मी इस के प्लान में शामिल नहीं हुई तो बेटे की सारी पोल खुल गई.

पुलिस तक कैसे पहुंचा मामला

हरियाणा (Haryana Crime) के करनाल जिले के गांव मेंकमालपुर रोड़ान में महेंद्र अपनी पत्नी राजबाला के साथ रहता था. 13 मार्च, से ले कर 15 मार्च, 2025 तक जब महेंद्र का घर बंद दिखा तो परिजनों को शक हुआ.

इस के बाद जब परिजनों ने दीवार पर चढ़ कर घर के अंदर देखा तो लोगों के रौंगटे खड़े हो गए. चारों तरफ खून फैला हुआ था. इस के तुरंत बाद ही पुलिस को सूचना दी गई.

पुलिस पहले तो इस मामले को लूट से जोड़ कर देख रही थी, लेकिन बाद में अंदर लाश को देख कर मामला उलझ गया. करनाल पुलिस जब जांच में लगी तो पाया कि पानीपत में 16 मार्च, 2025 को एक महिला की लाश मिली है. पुलिस को पता चला कि यह तो करनाल से गायब हुई राजबाला है.

इकबालिया बयान

बेटे हिम्मत ने पुलिस को बताया कि मैं और पापा कोर्ट में पेश हुए थे. कोर्ट में उस ने पापा को समझाने की कोशिश की, लेकिन पापा अपनी बात पर अड़े रहे. पापा ने मुझ से कहा कि मैं तुझे अपनी प्रौपर्टी में से बिलकुल हिस्सा नहीं दूंगा. इसी बात से नाराज हिम्मत ने तय कर लिया कि अब पापा को रास्ते से हटाना ही होगा.

कोर्ट से लौटने के बाद हिम्मत पेशी स्कूल चला गया और वहां से एक मिस्त्री के पास पहुंच कर एक ड्रिल मशीन ले आया. उस ने उस से कहा कि यह मशीन कल वापस कर दूंगा, आज कुछ काम है.

वारदात की रात

रात को हिम्मत दीवार फांद कर घर के अंदर घुस आया. उस ने देखा कि पापा फर्राटा पंखा लगा कर सोए हुए हैं. महेंद्र ने पंखे का तार हटाया और ड्रिल मशीन के तार बिजली बोर्ड के शाकेट में लगा दिए. इस के बाद पापा के पास जा कर उस ने पहले उन का मुंह दबाया जिस से वह चिल्ला न सकें. इस के बाद उस ने ड्रिल मशीन से पापा के सिर और गले में सुराख कर दिए.

ड्रिल मशीन की आवाज सुन कर मम्मी राजबाला की आंखें खुल गईं और जब वह कमरे में पहुंची तो देखा कि बेटे के हाथ में ड्रिल मशीन है और वह उसे अपने पापा के गले पर चला रहा है.

हैरान रह गई मां

यह सब देख राजबाला हैरान रह गई और जोर से चिल्लाने लगी. लेकिन हिम्मत ने मम्मी का मुंह दबा दिया, जिस से कि वह जोर से चिल्ला न सके. हिम्मत ने मम्मी से कहा कि मेरा पाप गंदा था इसलिए मैं ने उन का कत्ल कर दिया.

इसी बात को ले कर राजबाला जोरजोर से चिल्लाने लगी. इस से हिम्मत डर गया और सोचने लगा कि मम्मी ऐसे जोरजोर से चिल्लाएगी तो आसपड़ोस में सभी को पता चल जाएगा.

इस के बाद हिम्मत ने मम्मी का भी गला घोंट दिया और जब वह बेहोश हो गई, तो ड्रिल मशीन से उस के सिर में सुराख कर दिया.

हत्या के बाद

मम्मी और पापा की हत्या करने बाद हिम्मत ने घर का मेन गेट अंदर से खोला और बाहर खङी कार को ले आया. इस के बाद उस ने लाश को दरी में लपेट दिया.

कार को अंदर ला कर उस ने पहले कार में रजाई बिछा दी जिस से खून न टपके. इस के बाद कार में पापा महेंद्र की लाश को रखा और उस के ऊपर मम्मी की लाश को भी रख दिया.
इस के बाद हिम्मत ने घर के गेट पर ताला लगा दिया जिस से सभी को लगे कि पतिपत्नी घर से बाहर गए हुए हैं. फिर उस ने मम्मी और पाप की लाश नहर में ठिकाने लगा दीं.

साजिश में मम्मी को शामिल करना चाहता था हिम्मत

हिम्मत ने पापा का कत्ल करने से पहले क्राइम पैट्रोल और मर्डर से जुड़ी वैब सीरीज को देखा, जिस से कि वह पकड़ा न जाए. जब हिम्मत पापा का कत्ल करने के लिए गया, तब उस ने अपना मोबाइल किराए के मकान पर ही छोड़ दिया था ताकि उस की लोकेशन ट्रेस न हो.

कैसे पकड़ा गया कातिल बेटा

पुलिस ने जांच करते हुए सीसीटीवी फुटेज खंगालनी शुरू की. इसी दौरान हिम्मत घर के आसपास नजर आया, जिस से पुलिस को लगा कि कातिल बेटा ही है.

पुलिस ने जब हिम्मत से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. (Haryana Crime) खबर लिखे जाने तक आरोपी हिम्मत से पूछताछ जारी थी.पुलिस के द्वारा अभी और मां के कातिल बेटे से पूछताछ जारी थी. पुलिस महेंद्र की लाश वरामद नहीं कर पाई थी.

Crime Stories : इलैक्ट्रिक कटर मशीन से सालियों ने किए जीजा के 6 टुकड़े

Crime Stories : सीमा, प्रियंका और बबीता सगी बहनें थीं. तीनों की जिंदगी भी मजे से गुजर रही थी, इन की कोई आपराधिक पृष्ठभूमि भी नहीं थी. लेकिन तीनों बहनों ने जो जघन्य अपराध किया उसे जान कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाते. और वजह सिर्फ यह थी कि तीनों बहनों में से एक बहन सीमा गौना कर के ससुराल न जा पाए…

इसी 11 अगस्त की बात है. सुबह के करीब 9 बजे थे. सूर्यनगरी के नाम से विख्यात राजस्थान के जोधपुर शहर में नांदड़ी गोशाला के पीछे नगर निगम की एक टीम सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की हौदी की सफाई कर रही थी. सफाई करते समय टीम को कचरे की एक थैली मिली. इस थैली में इंसान के कटे हुए 2 हाथ और 2 पैर थे. कटे हाथपैर मिलने से वहां काम कर रहे सफाई कर्मचारियों में दहशत फैल गई. सफाई कर्मियों ने पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी. सूचना मिलते ही बनाड़ थाना पुलिस वहां पहुंच गई. वहां प्लांट सुपरवाइजर पूनमचंद बाल्मीकि और औपरेटर पप्पू मंडल ने बताया कि प्लांट में जाने वाली हौदी की सफाई करते समय कपड़े की एक थैली निकली.

थैली में किसी इंसान के कटे हुए 2 हाथ और 2 पैर हैं. सफेदलाल रंग इस थैली पर भाग्य लक्ष्मी टेक्सटाइल, कपड़े के व्यापारी, आनंदपुर कालू, जिला पाली छपा हुआ है. इंसान के कटे हाथपैर मिलने का मामला गंभीर था. पुलिस टीम ने संबंधित जानकारी उच्चाधिकारियों को दे दी. इस पर जोधपुर के डीसीपी (ईस्ट) धर्मेंद्र सिंह यादव, एडीसीपी (ईस्ट) भागचंद, मंडोर एसीपी राजेंद्र दिवाकर, बनाड़ थानाधिकारी अशोक आंजना मौके पर पहुंच गए. कटे हाथपैरों का निरीक्षण करने के बाद पुलिस ने अंदाजा लगाया कि अंग किसी पुरुष के हैं, जिन्हें किसी धारदार कटर मशीन से काटा गया है. निस्संदेह किसी व्यक्ति की निर्दयता से हत्या कर उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े कर फेंके गए थे.

पुलिस के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि मृतक का सिर और धड़ कहां है? क्योंकि केवल हाथपैरों से उस की शिनाख्त मुश्किल थी और बिना शिनाख्त के केस आगे नहीं बढ़ सकता था. इसलिए अधिकारियों ने डौग स्क्वायड और एफएसएल टीम को मौके पर बुला लिया, लेकिन पुलिस को तत्काल ऐसी कोई जानकारी नहीं मिल सकी, जिस से मृतक या कातिल के बारे में कुछ पता चल पाता. पुलिस ने कटे हुए हाथपैर एमजीएच अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिए. सब से पहले मृतक का सिर और धड़ मिलना जरूरी था. इस के लिए पुलिस ने आसपास के इलाकों और ट्रीटमेंट प्लांट हौदी से जुड़ी सीवरेज पाइप लाइनों में जेट मशीनों से धड़ व सिर की तलाश शुरू कराई.

इस के अलावा आसपास के जिलों में वायरलैस संदेश भेज कर गुमशुदा लोगों की जानकारी भी मांगी गई. पुलिस जांचपड़ताल में जुटी थी कि उसी दिन शाम करीब 4 बजे सूचना मिली कि ट्रीटमेंट प्लांट की सीवरेज लाइन में एक और थैली मिली है, जिस में कटा हुआ सिर है. इस पर पुलिस अधिकारी दोबारा प्लांट पर पहुंचे. जिस थैली में सिर मिला, उस पर नागौर जिले के मेड़ता सिटी की एक दुकान का पता छपा था. जरूरी जांच पड़ताल के बाद कटा सिर भी अस्पताल की मोर्चरी में भेज दिया गया. बनाड़ पुलिस थाने में एएसआई गोरधन राम की रिपोर्ट पर अज्ञात मुलजिमों के खिलाफ अज्ञात व्यक्ति की हत्या कर सबूत नष्ट करने का केस दर्ज कर लिया गया.

अपराध की गंभीरता को देखते हुए जांच पड़ताल के लिए पुलिस कमिश्नर के निर्देश पर एडीसीपी भागचंद के नेतृत्व में एसीपी राजेंद्र दिवाकर, बनाड़ थानाधिकारी अशोक आंजना और डांगियावास थानाधिकारी लीलाराम की टीम गठित की गई. धड़ की तलाश जरूरी थी. इस के लिए अधिकारियों ने सीवरेज प्लांट में आने वाले नाले में आधुनिक तकनीकी मशीनों से धड़ की तलाश शुरू कराई. उसी दिन रात को जोधपुर पुलिस को नागौर जिले से सूचना मिली कि चरणसिंह उर्फ सुशील चौधरी 10 अगस्त से लापता है. उस की गुमशुदगी का मामला मेड़ता सिटी थाने में दर्ज है. जोधपुर पुलिस ने चरणसिंह के फोटो मंगा कर सीवरेज लाइन में मिले कटे सिर के फोटो से मिलान किया, तो दोनों में समानता पाई गई.

जोधपुर पुलिस ने मेड़ता सिटी थाना पुलिस को सूचना भेज कर चरणसिंह के परिजनों को बुलाया. दूसरे दिन यानी 12 अगस्त को मिले कटे अंगों की शिनाख्त मेड़ता के खाखड़की गांव निवासी 27 वर्षीय चरणसिंह उर्फ सुशील जाट के रूप में हो गई. चरणसिंह के मामा के बेटे राजेंद्र गोलिया ने की. राजेंद्र गोलिया ने जोधपुर पुलिस को बताया कि 2 महीने पहले ही चरणसिंह राजस्थान सरकार के कृषि विभाग में सहायक कृषि अधिकारी के रूप में नियुक्त हुआ था. उस की पोस्टिंग नागौर जिले के डेगाना तहसील के खुडि़याला गांव में थी. चरणसिंह 10 अगस्त को घर से निकला था, लेकिन वापस नहीं लौटा. मिलने लगे सुराग कटे हुए अंगों की शिनाख्त हो जाने से पुलिस को तहकीकात में कुछ मदद मिली. पुलिस ने चरणसिंह के परिजनों से जरूरी पूछताछ की ताकि कत्ल के कारण और कातिलों का पता लगाया जा सके.

पूछताछ में पता चला कि 2013 में चरणसिंह की शादी बोरूंदा निवासी पोकर राम जाट की बेटी सीमा से हुई थी, लेकिन अभी गौना (शादी के बाद की एक रस्म) नहीं हुआ था. इन दिनों उस के गौने की बात चल रही थी. यह भी सामने आया कि चरणसिंह के परिवार और उस की ससुराल वालों के बीच बोरूंदा स्थित एक चूना भट्ठे को ले कर कुछ विवाद था. दरअसल, चरणसिंह के पिता नेमाराम कई सालों से बोरूंदा में पोकर राम के चूना भट्ठे पर काम करते थे. बाद में चरणसिंह की शादी पोकरराम की बेटी सीमा से हो गई. कुछ साल पहले पोकर राम को लकवा आ गया था, तब नेमाराम ने चूना भट्ठे का सारा काम संभाल लिया था.

बाद में इस भट्टे के मालिकाना हक को ले कर नेमाराम और पोकर राम के बीच विवाद हो गया. नेमाराम अपने बेटे चरणसिंह का गौना करवाना चाहते थे, जबकि पोकर राम के परिवार वाले पहले भट्ठे का विवाद सुलझाना चाहते थे. एक तरफ पुलिस मामले की गहराई में जा कर हत्या के कारणों और हत्यारों की तलाश में जुटी थी, वहीं दूसरी तरफ सीवरेज प्लांट से जुड़े नालों और पाइप लाइनों में चरणसिंह के धड़ की तलाश की जा रही थी. इस बीच, जोधपुर पुलिस को सूचना मिली कि मेड़ता सिटी में पब्लिक पार्क के पास एक लावारिस मोटरसाइकिल खड़ी मिली है, जो चरणसिंह की है. पुलिस ने इस पब्लिक पार्क के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली.

इन फुटेज में 10 अगस्त की शाम करीब 4:50 बजे सलवारसूट पहने 2 युवतियां मोटर साइकिल खड़ी करती नजर आईं. चरणसिंह की बाइक पर सवार हो कर आई 2 युवतियों से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्या की कडि़यां उस की ससुराल से जुड़ी हो सकती हैं. अब पुलिस ने अपनी जांच का फोकस मानव अंग मिलने वाले जोधपुर के नांदड़ी इलाके के साथसाथ मेड़ता और बोरूंदा पर केंद्रिंत कर दिया. इस में साइबर टीम के जरिए तकनीकी जानकारियां भी जुटाई गईं. 3 सगी बहनों के नाम आए सामने पुलिस ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए चरणसिंह की पत्नी के अलावा 2 सालियों, एक साले और चूना भट्टे से जुड़े कई लोगों से पूछताछ की.

गहन पूछताछ और जांच पड़ताल कर जरूरी सबूत जुटाने के बाद जोधपुर पुलिस ने 13 अगस्त को सहायक कृषि अधिकारी चरणसिंह उर्फ सुशील चौधरी की हत्या के मामले में उस की 23 वर्षीय पत्नी सीमा के अलावा 2 बड़ी सालियों 25 वर्षीया प्रियंका और 27 वर्षीया बबीता के साथ प्रियंका के बौयफ्रैंड भींयाराम जाट को गिरफ्तार कर लिया. भींया राम खींवसर थाना इलाके के गांव कांटिया का रहने वाला था जबकि तीनों बहनें सीमा, प्रियंका और बबीता बोरूंदा के डांगों की ढाणियों की रहने वाली थी. ये तीनों बहनें शादीशुदा थीं. पोकर राम जाट की इन तीनों बेटियों में सीमा का अभी गौना नहीं हुआ था. तीनों बहनों और भींयाराम की निशानदेही पर पुलिस ने उसी दिन शाम को मंडोर 9 मील इलाके में नाले की तलाशी करवाकर चरणसिंह का धड़ भी बरामद कर लिया.

पुलिस की पूछताछ में चरणसिंह की नृशंस हत्या के लिए राक्षसी बनीं तीनों सगी बहनों की सामने आई कहानी में फिल्मों की तरह थ्रिल भी था और सस्पेंस भी. इस में प्यार भी था और नफरत भी. कुल जमा 5 किरदारों की कहानी थी यह. ये किरदार थे पति चरणसिंह, उस की पत्नी सीमा, साली प्रियंका और बबीता. साथ ही प्रियंका से 15 साल बड़ा उस का बौयफ्रैंड भींयाराम. इसे कथा कहानी पटकथा कुछ भी कहें, इस में आजाद ख्याल तीनों बहनों की महत्वाकांक्षाएं शामिल थीं. अपनी इच्छा से आजाद जीवन जीने के लिए तीनों बहनों ने ऐसा खूनी खेल खेला, जिस के बारे में चरणसिंह तो क्या कोई भी सोच तक नहीं सकता था कि उस की पत्नी और सालियां ऐसी नृशंसता करेंगी. हत्या की आरोपी तीनों बहनों और भींयाराम से पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

बोरूंदा के डांगों के रहने वाले पोकर राम की 7 बेटियां हैं और एक बेटा. पोकर राम का बोरूंदा में चूना भट्टा था. इस से उस की ठीकठाक कमाई हो जाती थी. इसी कमाई से उस ने एकएक कर 7 बेटियों की शादी कर दी थी. इन में 4 बेटियां अपने ससुराल में पति और बच्चों के साथ सुखी हैं. बाकी रह गई 3 बेटियां सीमा, प्रियंका और बबीता. इन तीनों की भी शादी हो चुकी थी. इन में बबीता और प्रियंका ने अपनेअपने पति को छोड़ दिया था. सीमा सब से छोटी थी. उस की शादी 2013 में नागौर जिले के मेड़ता सिटी निवासी नेमाराम जाट के बेटे चरणसिंह उर्फ सुशील से हुई थी, लेकिन गौना नहीं होने के कारण सीमा अभी तक ससुराल नहीं गई थी.

तीनों बहनें पढ़ीलिखी थीं. सीमा वेटनरी (पशुपालन) सहायक थी. बबीता ने एएनएम (नर्सिंग) का कोर्स कर रखा था, लेकिन अभी उसे सरकारी नौकरी नहीं मिली थी. वह पटवारी भर्ती परीक्षा की तैयारी कर रही थी. प्रियंका भी स्नातक तक की पढ़ाई पूरी कर चुकी थी. वह एक मल्टी लेवल मार्केटिंग (एमएलएम) कंपनी से जुड़ी हुई थी और सौंदर्य व स्वास्थ्य संबंधी प्रसाधन सामग्री औनलाइन मंगा कर बेचने का काम करती थी. नागौर जिले के खींवसर थाना इलाके के कांटिया गांव का रहने वाला भींयाराम प्रियंका के साथ काम करता था. इसीलिए प्रियंका और भींयाराम की दोस्ती थी. भींयाराम पूर्व फौजी था. हालांकि वह प्रियंका से 15 साल बड़ा था, फिर भी दोनों में दोस्ती थी. प्रियंका और बबीता पतियों से अलग होने के बाद जोधपुर शहर के नांदड़ी इलाके में किराए पर रहती थीं. हालांकि इस बीच बबीता का रिश्ता दूसरी जगह तय हो गया था.

अगर चरणसिंह की बात करें तो वह प्रतिभाशाली युवक था. 10वीं और 12वीं की परीक्षा में मेरिट हासिल करने के बाद उस ने बीएससी की पढ़ाई की थी. इसी दौरान उस की शादी सीमा से हो गई थी. बाद में चरणसिंह ने जोधपुर के मंडोर स्थित कृषि विश्वविद्यालय में एसआरएफ के रूप में काम किया. इसी दौरान चरणसिंह अच्छी नौकरी हासिल करने के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं देता रहा. इसी के चलते उस का चयन बैंक अधिकारी के रूप में हो गया. उसे पहली नियुक्ति उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मिली. करीब 10-12 महीने काम करने के दौरान चरणसिंह का चयन राजस्थान के कृषि विभाग में सहायक कृषि अधिकारी के रूप में हो गया. इसी साल 23 मई को उस ने नौकरी ज्वाइन की थी.

चरणसिंह की शादी हुए 7 साल हो चुके थे. उस की उम्र भी 27 साल हो गई थी. साथ ही अच्छी सरकारी नौकरी भी मिल गई थी, लेकिन विवाहित होने के बावजूद वह पत्नी सुख से वंचित था. चरणसिंह के परिवार वाले काफी दिनों से सीमा का गौना कराने का दबाव डाल रहे थे, लेकिन सीमा के कहने पर उस के परिजन हर बार टाल जाते थे जबकि सीमा भी 23 साल की हो चुकी थी. चूंकि सीमा पत्नी थी, इसलिए चरणसिंह कई बार उस से मोबाइल पर बात कर लेता था. सीमा वैसे तो हंसहंस कर प्यार की बातें करती थी, लेकिन गौने के नाम पर भड़क जाती थी. चरणसिंह हंसमुख, स्मार्ट, सरकारी अधिकारी था, फिर भी पता नहीं किन कारणों से सीमा उसे पसंद नहीं करती थी. कहा जाता है कि वह समलैंगिंक थी. उस के किसी महिला से संबंध थे. वह पुरुषों से दूर रहना पसंद करती थी. इसीलिए वह गौना करा कर ससुराल नहीं जाना चाहती थी.

आरोप है कि सीमा के व्यवहार से परेशान चरणसिंह अपनी बड़ी साली प्रियंका से फ्लर्ट करता था. प्रियंका जीजासाली के रिश्ते को देखते हुए इस का विरोध नहीं कर पाती थी, लेकिन वह चरणसिंह की बातों से परेशान जरूर हो जाती थी. षडयंत्र ऐसा कि पुलिस भी चकरा गई कुछ दिन पहले जब चरणसिंह के परिवार की ओर से गौने का ज्यादा दबाव पड़ा, तो सीमा ने अपनी दोनों बड़ी बहनों प्रियंका और बबीता से कहा कि वह आत्महत्या कर लेगी लेकिन चरणसिंह के साथ नहीं जाएगी. इस पर बबीता और प्रियंका ने उस से कहा कि उसे आत्महत्या करने की जरूरत नहीं है, हम मिल कर उसे ही निपटा देंगे, जिस से तू परेशान है.

इस के बाद तीनों बहनें चरणसिंह की हत्या की साजिश रचने लगी. काफी सोचविचार के बाद उन्होंने अपनी योजना को अंतिम रूप दे दिया. चरणसिंह की हत्या को अंजाम देने के लिए उन्होंने बाजार से इलैक्ट्रिक ग्राइंडर कटर मशीन खरीदी. यह मशीन जोधपुर में प्रियंका व बबीता के मकान पर रख दी गई. योजना के तहत सीमा ने फोन कर चरणसिंह को 10 अगस्त को जोधपुर बुलाया. चरणसिंह उसी दिन अपनी मोटर साइकिल से जोधपुर पहुंच गया. सीमा उसे इंतजार करती मिली. वह चरणसिंह की मोटर साइकिल पर बैठ कर उसे अपनी दोनों बहनों के मकान पर नांदड़ी ले गई. वहां सीमा, प्रियंका व बबीता ने कुछ देर तो इधरउधर की बातें की, फिर चरणसिंह को शराब पिलाई. बाद में कोल्डड्रिंक में नींद की गोलियां मिला कर उसे पिला दी गईं.

कुछ ही देर में चरणसिंह अचेत हो गया, तो उसे एनेस्थीसिया का इंजेक्शन लगाया गया ताकि उस के होश में आने की कोई गुंजाइश ही न रहे. बाद में तीनों बहनों ने उसे गला दबा कर उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया. इस के बाद तीनों ने इलैक्ट्रिक ग्राइंडर कटर मशीन से चरणसिंह के शव को 6 टुकड़ों में काटा. इन टुकड़ों को 3 थैलियों में भर दिया गया. शव के टुकड़े करने के दौरान फर्श पर फैले खून को साफ करने के लिए पूरे घर को धो दिया गया. इस सब के बाद तीनों बहनें मकान पर ताला लगा कर चरणसिंह की मोटर साइकिल से बोरूंदा पहुंची. वहां सीमा को उतार दिया गया. फिर प्रियंका और बबीता उसी मोटर साइकिल से मेड़ता सिटी गईं. वहां इन दोनों ने पब्लिक पार्क के बाहर चरणसिंह की मोटर साइकिल खड़ी कर दी.

मेड़ता सिटी से दोनों बहनें बस से जोधपुर आ गईं. इन बहनों के पास केवल एक स्कूटी थी. जिस पर शव के टुकड़ों को ले जा कर ठिकाने लगाना जोखिम भरा काम था. इसलिए प्रियंका ने अपने बौयफ्रैंड भींयाराम को फोन कर के जरूरी काम होने की बात कह कर बुलाया. भींयाराम 10 अगस्त की रात कार ले कर उन के मकान पर पहुंचा, तो प्रियंका और बबीता ने उसे चरणसिंह की हत्या कर टुकड़े थैलियों में भर कर रखने की बात बताई. साथ ही उस से उन्हें ठिकाने लगाने में मदद मांगी. भींयाराम ने इस काम में उन का साथ देने से इनकार कर दिया, तो प्रियंका व बबीता ने कहा कि अगर वह साथ नहीं देगा, तो तीनों बहनें सुसाइड कर लेंगी और सुसाइड नोट में मौत का जिम्मेदार उसे बता देंगी.

डरासहमा भींयाराम आखिर उन का साथ देने को राजी हो गया. उस ने तीनो थैलियां अपनी कार की पिछली सीट पर रखीं. दोनों बहनें आगे की सीट पर बैठ गईं. इन्होंने चरणसिंह के कटे हाथपैर और सिर वाली 2 थैलियां नांदड़ी में अपने घर से करीब 100 मीटर दूर सीवरेज लाइन में डाल दीं. धड़ वाली तीसरी थैली इन्होंने रातानाड़ा पुलिस लाइन के पीछे नाले में डालने की सोची, लेकिन वहां पुलिस का नाका देख कर वे लोग नागौर रोड़ की तरफ निकल गए, वहां नाले में तीसरी थैली फेंक दी. इस के बाद तीनों नांदड़ी आ गए. प्रियंका ने रात को डर लगने की बात कह कर भीयाराम को रोकने की कोशश की, लेकिन उस ने रुकने से इनकार कर दिया और अपने घर चला गया. हाथपैर व सिर वाली 2 थैलियां 11 अगस्त को नांदड़ी गोशाला के पीछे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की हौदी की सफाई के दौरान मिली थी. चारों आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद 13 अगस्त को उन की निशानदेही पर धड़ वाली थैली बरामद की गई.

पुलिस ने 14 अगस्त को जोधपुर के एमजीएच अस्पताल में 5 डाक्टरों के मेडिकल बोर्ड से शव के 6 टुकड़ों का पोस्टमार्टम कराया. डाक्टरों की टीम ने शव के सभी 6 टुकड़ों के डीएनए सैंपल लिए ताकि पुष्टि हो सके कि ये एक ही व्यक्ति के थे. तीनों बहनें इतनी शातिर निकली कि जब चरणसिंह के लापता होने और मेड़ता सिटी थाने में गुमशुदगी दर्ज होने की खबरें सोशल मीडिया पर चलने लगीं, तो उन्होंने चरणसिंह के रिश्तेदारों को फोन कर पूछा कि वे कहां गायब हो गए? पुलिस ने 12 अगस्त को जब तीनों बहनों से अलगअलग पूछताछ की, तो वे पूरे आत्मविश्वास से पुलिस को छकाती रहीं और चरणसिंह की हत्या में अपना हाथ होने से इनकार करती रहीं.

बाद में पुलिस ने भींयाराम को भी हिरासत में ले लिया और सीसीटीवी फुटेज सहित अन्य कई सबूत उन के सामने रख कर पूछताछ की, तो वे टूट गईं और चरणसिंह की हत्या कर उस के शव के टुकड़े कर सीवरेज के नालों में फेंकने की बात स्वीकार कर ली. इस के बाद 13 अगस्त को चारों को गिरफ्तार कर लिया गया. पति चरणसिंह से नफरत करने वाली सीमा ने अपनी आजादी और शौक पूरे करने के लिए उसे मौत के घाट उतार कर खुद के साथ अपनी 2 बड़ी बहनों और एक बहन के दोस्त का जीवन बरबाद कर दिया. अपने पतियों की ना हो सकी तीनों बहनों ने पिता पोकर राम को बुढ़ापे में ऐसा दर्द दिया है कि वह जीते जी उसे सालता रहेगा.

(कहानी पुलिस सूत्रों और विभिन्न रिपोर्ट्स पर आधारित)

नोट-पुलिस ने सीमा के समलैंगिक संबंधों की पुष्टि की है, समाचार पत्रों में भी सीमा के समलैंगिक होने की बात छपी है.

 

Emotional Story : मशहूर टिकटॉक स्टार ने जिंदगी से हताश होकर कर लिया सुसाइड

Emotional Story : तमाम लोगों के लिए टिकटौक न सिर्फ प्रतिभा दिखाने का प्लेटफार्म था बल्कि आय का स्रोत भी बन चुका था. इस पर प्रतिबंध लगाने के बाद सरकार को चाहिए कि वह टिकटौक की तरह कोई दूसरा सोशल ऐप विकसित करे, जिस से लोगों को टिकटौक पर प्रतिबंध लगाने की कमी महसूस न हो.

कहते हैं जब इंसान जिंदगी से हताश और हर ओर से निराश हो जाता है तो वो मौत को गले लगाने की सोचने लगता है. सिया कक्कड़ ने कम उम्र में शोहरत और दौलत कमाने की उन ऊंचाइयों को छू लिया था, जहां तक कम लोग ही पहुंच पाते हैं. दिल्ली के गीता कालोनी इलाके की रहने वाली 16 साल की सिया कक्कड़ ने 24 जून, 2020 को अपने घर में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. सिया कक्कड़ वह लड़की थी, जिस ने कम उम्र में टिकटौक के कारण न सिर्फ शोहरत बटोरी थी बल्कि हर महीने कम से कम एकडेढ़ लाख रुपए कमा लेती थी. सिया कक्कड़ ने जिस दिन खुदकुशी की उस से एक दिन पहले ही 23 जून को टिकटौक पर एक वीडियो अपलोड किया था, जिस के बाद परिजनों ने देखा कि वह बेहद खुश नजर आ रही है.

उसी रात को सिया की अपने मैनेजर अर्जुन सरीन से भी एक गाने के सिलसिले में बात हुई थी. उस समय वह अच्छे मूड में और एकदम नौर्मल थी. अर्जुन को भी समझ नहीं आया कि आखिर क्या हुआ, जिस की वजह से सिया ने आत्मघाती कदम उठाया. सिया ने 20 घंटे पहले ही इंस्टाग्राम पर टिकटौक के अपने डांस की वीडियो स्टोरी पोस्ट की थी. इंस्टाग्राम पर उस ने जो स्टोरी अपलोड की थी, उस में सिया ने टिकटौक के लिए फेमस पंजाबी रैप सिंगर बोहेमिया के गाने पर अपने डांस का वीडियो बनाया था. सिया की उस पोस्ट को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह किसी तनाव या परेशानी से जूझ रही थी. सिया कक्कड़ ने मरने से पहले कोई सुसाइड नोट नहीं छोड़ा था, इसलिए उस की खुदकुशी की जांच करने वाली प्रीत विहार थाने की पुलिस को तत्काल उस की आत्महत्या के कारणों का पता नहीं चल सका.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सिया के शरीर पर किसी तरह की भी चोट के निशान नहीं पाए गए और यह भी साफ हो गया कि उस की मौत गले में पड़े फंदे के कारण दम घुटने से ही हुई. हालांकि पुलिस ने सिया के कमरे से उस का मोबाइल, लैपटौप और कुछ दस्तावेज जांच के लिए कब्जे में जरूर लिए लेकिन उस से कोई ज्यादा मदद नहीं मिल सकी. टिकटौक वीडियो से सिया ने सोशल मीडिया पर धूम मचा रखी थी. लोग उसे काफी पसंद करते थे. वह करीब 3 साल से वीडियो बना कर टिकटौक पर अपलोड करती थी और लाखों रुपए कमा रही थी. इंस्टाग्राम पर उसे 91 हजार लोग फौलो करते थे. टिकटौक पर सिया के 1.1 मिलियन फौलोअर्स थे. टिकटौक व इंस्टाग्राम के अलावा सिया, स्नैपचैट और यूट्यूब पर भी सक्रिय थी.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी था कि आखिर सिया कक्कड़ ने खुदकुशी क्यों की? पुलिस ने इस मामले के हर बिंदु पर गहराई से पड़ताल की तो लगा कि लौकडाउन की वजह से कुछ महीनों से घर में थी और पिछले कुछ दिन से भविष्य को ले कर डिप्रेशन में थी. लेकिन इतनी कम उम्र में शोहरत और पैसा कमाने वाली सिया इस तरह दुनिया छोड़ जाएगी, किसी ने सोचा भी नहीं था. सिया को जानने वाले उस के दोस्तों का कहना है कि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद से सिया काफी उदास रहने लगी थी. परिवार वालों को भी उस के डिप्रेशन में होने के बारे में पता चल गया था. क्योंकि उस के दादा और पिता पेशे से डाक्टर हैं, इसलिए सिया के डिप्रेशन को भांपना उन के लिए मुश्किल नहीं था. लेकिन उन्हें इस बात का एहसास बिलकुल भी नहीं था कि सिया डिप्रेशन के चलते इतना बड़ा कदम उठा लेगी.

दरअसल अब तक जो तथ्य सामने आए हैं उस के मुताबिक सिया कक्कड़ भारत में टिकटौक पर बैन लगने के बाद से ज्यादा डिप्रेशन में थी, क्योंकि टिकटौक के जरिए पैसा कमाना और कैरियर बनाने को उस ने अपना लक्ष्य बना लिया था. अचानक हुए बैन से उस के मन में अपने भविष्य को ले कर इतना अवसाद भर गया कि उस ने मौत को गले लगा लिया. यहां यह बताना जरूरी है कि भारत और चीन के बीच लगातार चल रहे सीमा विवाद और सैन्य झड़प के बाद भारत सरकार ने टिकटौक समेत 59 चाइनीज ऐप को भारत में प्रतिबंधित कर दिया था. लेकिन इस में सब से ज्यादा लोकप्रिय टिकटौक ऐप था, जो न सिर्फ इस के यूजर्स को शोहरत दिलाता था बल्कि उन की कमाई का भी जरिया बन गया था.

सिया कक्कड़ की तरह ही कुछ रोज बाद मेरठ के पल्लवपुरम स्थित ग्रीन पार्क में रहने वाली टिकटौक की एक और स्टार संध्या चौहान ने डिप्रेशन के कारण फांसी लगा कर अपनी जान दे दी. एक पुलिस सबइंस्पेक्टर की 22 साल की बेटी संध्या चौहान दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ती थी. लौकडाउन होने की वजह से वह अपने घर आई हुई थी, उस ने 6 जुलाई, 2020 को खुदकुशी का कदम उठाया. संध्या के पास से भी पुलिस को सुसाइड नोट नहीं मिला. लेकिन परिजनों ने जो बताया, उस के मुताबिक संध्या पिछले 2-3 महीने से डिप्रेशन में थी और उदास रहती थी. पुलिस ने संध्या का फोन जब्त करने के साथ उस के टिकटौक एकाउंट की जो छानबीन की, उस से इस बात की संभावना ज्यादा है कि संध्या अचानक भारत में टिकटौक बैन होने से अपसेट थी.

टिकटौक का बैन होना उन कलाकारों के लिए बड़ा झटका साबित हुआ जिन्होंने इसे अपनी कमाई और कैरियर का जरिया बनाने का मन बना लिया था. ऐसे में अपना सपना टूटता देख उन्हें सदमा लगा. सिया कक्कड़ हो या संध्या चौहान, ऐसी तमाम किशोरियां जो टिकटौक पर वीडियो अपलोड कर के शोहरत और पैसा कमाने की हसरत रखती थीं, उन के लिए टिकटौक पर बैन मानो किसी हसीन सपने के टूट जाने जैसा था. इसलिए टिकटौक के दूसरे साइड इफैक्ट को जानने से पहले यह समझना जरूरी है कि आखिर टिकटौक क्या बला है जो युवा पीढ़ी इस पर बैन लगने के बाद अवसाद में घिरती जा रही है.

टिकटौक आखिर क्या है?  टिकटौक एक सोशल मीडिया ऐप्लिकेशन है, जिस के जरिए स्मार्टफोन यूजर छोटेछोटे वीडियो (15 सेकेंड तक के) बना और शेयर कर सकते हैं. इस के स्वामित्व वाली कंपनी बाइट डांस है जिस ने सितंबर, 2016 में चीन में टिकटौक लौंच किया था. साल 2018 में टिकटौक की लोकप्रियता बहुत तेजी से बढ़ी और अक्तूबर 2018 में यह अमरीका में सब से ज्यादा डाउनलोड किया जाने वाला ऐप बन गया. गूगल प्ले स्टोर पर टिकटौक का परिचय शार्ट वीडियो फौर यू (आप के लिए छोटे वीडियो) कह कर दिया गया है.

टिकटौक मोबाइल से छोटेछोटे वीडियो बनाने में बनावटीपन नहीं है, ये रियल है और इस की कोई सीमाएं नहीं हैं. चाहे आप सुबह ब्रश कर रहे हों या नाश्ता बना रहे हों, आप जो भी कर रहे हों, जहां भी हों, टिकटौक पर आइए और 15 सेकेंड में दुनिया को अपनी कहानी बताइए. टिकटौक के साथ आप की जिंदगी और मजेदार हो जाती है. आप जिंदगी का हर पल जीते हैं और हर वक्त कुछ नया तलाशते हैं. आप अपने वीडियो को स्पेशल इफैक्ट फिल्टर, ब्यूटी इफैक्ट, मजेदार इमोजी स्टिकर और म्यूजिक के साथ एक नया रंग दे सकते हैं.

शोहरत और कमाई का जरिया बन गया टिकटौक भारत में टिकटौक के डाउनलोड का आंकड़ा 10 करोड़ से ज्यादा है. एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट के अनुसार इसे हर महीने लगभग 2 करोड़ भारतीय इस्तेमाल करते हैं. भारतीयों में टिकटौक की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 80 लाख लोगों ने गूगल प्ले स्टोर पर इस का रिव्यू किया है. दिलचस्प बात यह है कि टिकटौक इस्तेमाल करने वालों में एक बड़ी संख्या गांवों और छोटे शहरों के लोगों की है. इस से भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह भी है कि टिकटौक की दीवानगी 7-8 साल की उम्र के छोटेछोटे बच्चों तक के सिर चढ़ कर बोल रही थी.

इतना ही नहीं, लोकप्रियता के कारण अब यह इतना पसंद किया जाने लगा था कि श्रद्धा कपूर, टाइगर श्रौफ और नेहा कक्कड़ जैसे अधिकांश बौलीवुड सितारे भी टिकटौक पर आ गए थे. अब जरा जान लेते हैं कि टिकटौक की क्या खास बातें हैं. टिकटौक से वीडियो बनाते वक्त आप अपनी आवाज का इस्तेमाल नहीं कर सकते. आप को लिप सिंक करना होता है. जहां फेसबुक और ट्विटर पर ब्लू टिक पाने यानी अपना अकाउंट वेरिफाई कराने के लिए आम लोगों को खासी मशक्कत करनी पड़ती है, वहीं टिकटौक पर वेरिफाइड अकाउंट वाले यूजर्स की संख्या बहुत बड़ी है.

इस में ब्लू टिक नहीं बल्कि औरेंज टिक मिलता है. जिन लोगों को औरेंज टिक मिलता है, उन के अकाउंट में पौपुलर क्रिएटर लिखा दिखाई पड़ता है. साथ ही अकाउंट देखने से यह भी पता चलता है कि यूजर को कितने दिल मिले हैं, यानी अब तक कितने लोगों ने उसके वीडियो पसंद किए हैं. गांव से ले कर खेत खलिहान तक पहुंच टिकटौक की लोकप्रियता का अहम कारण यह था कि गांव से ले कर छोटे शहरों में रहने वाले प्रतिभाशाली गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों के लिए यह प्लेटफौर्म बौलीवुड के समानांतर बन कर उभरा था जो उन्हें न केवल शोहरत दिलाता था, बल्कि उन की कमाई का जरिया भी बन गया था. गांव, कस्बे से ले कर छोटे शहरों तक के लोग टिकटौक के चलते फेमस ही नहीं हुए, बल्कि लाखों रुपए महीना कमाने भी लगे थे.

उन लोगों के लिए टिकटौक अपनी प्रतिभा दिखाने को बड़ा जरिया बन चुका था, जो सिनेमा के सुनहरे परदे पर अपना हुनर दिखाना चाहते हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिलता. मसलन अगर कोई अच्छी कौमेडी करता है या अच्छा डांस करता है तो उस के लिए टिकटौक अपनी प्रतिभा को दिखाने का अच्छा मंच था. ऐसे बहुत से प्रतिभाशाली लोग इस के जरिए खूब पैसे भी कमा रहे थे. हरियाणा जैसे छोटे राज्य के रहने वाले एक ग्रामीण मजदूर साहिल के टिकटौक पर 3,03,200 फालोअर थे. उसे अपने वीडियो के जरिए हर महीने 3,000-5,000 रुपए तक मिल जाते थे, जो साहिल के लिए बड़ी रकम थी. लेकिन साहिल इस कोशिश में था कि उन का अकाउंट वेरिफाई हो जाए और उस के फौलोअर्स 10 लाख तक पहुंच जाएं. लेकिन इसी दौरान भारत सरकार ने टिकटौक पर भारत में प्रतिबंध लगा दिया.

लेकिन सिया कक्कड़ और संध्या चौहान की तरह हर कोई डिप्रेशन में नहीं गया. कुछ ऐसे भी स्टार हैं जिन्होंने टिकटौक से बतौर कलाकार अपनी पहचान बनाने के बाद अपनी तरक्की के लिए दूसरे दरवाजे तलाश कर लिए. समीक्षा सूद भी एक ऐसा ही नाम है. प्रोफैशनल मौडल और टीवी एक्ट्रैस बन चुकी समीक्षा सूद टिकटौक पर बेहतरीन वीडियो क्लिप और कौमेडी के जरिए अपनी खास पहचान रखती थी. उन्होंने टीवी सीरियल बाल वीर में अपने एक्टिंग के जौहर दिखाए हैं. टिकटौक पर उन के कुल सवा करोड़ फौलोअर्स हैं. जबकि इंस्टाग्राम पर उन के फौलोअर्स की संख्या 0.2 करोड़ है. वह हर महीने 8 से 10 लाख रुपए भी कमाती थीं. रानो निक नाम से टिकटौक पर पहचान बनाने वाली समीक्षा आज एक जानीमानी मौडल, फैशन ब्लौगर, यूट्यूबर और टिकटौक स्टार हैं.

इन दिनों वह कई टेलीविजन धारावाहिकों और विज्ञापनों में काम कर रही हैं. लेकिन समीक्षा सूद टिकटौक के बैन होने से निराश नहीं हैं क्योंकि उन्होंने पहचान बनाने के अब बहुत से रास्ते तलाश लिए हैं. दरअसल, टिकटौक ऐसा प्लेटफौर्म है, जहां कई आम यूजर्स ने बौलीवुड सेलेब्स से भी ज्यादा फैन फौलोइंग बना रखी है. कई ऐसे यूजर्स हैं, जिन के फौलोअर्स करोड़ों में हैं और उन के लाइक्स की संख्या अरबों में पहुंच गई है. वे हर माह लाखों रुपए कमाते थे. ऐसे में उन के लिए टिकटौक का भारत में बैन हो जाना किसी सदमे से कम नहीं है. लेकिन टिकटौक की इन सेलिब्रिटीज को अब इतनी पहचान मिल चुकी है कि बतौर कलाकार खुद को स्थापित करने में उन्हें ज्यादा मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा.

सिर्फ फायदे नहीं, खतरे भी हैं भले ही टिकटौक पर अब प्रतिबंध लगा हो लेकिन अश्लील वीडियो के कारण टिकटौक पर बैन लगाने की मांग कई बार उठ चुकी थी. अलगअलग राज्यों के उच्च न्यायालयों में वीडियो ऐप टिकटौक पर प्रतिबंध लगाने की मांग की जा चुकी थी. इस ऐप पर बेरोकटोक अश्लील विषयवस्तु अपलोड किए जाने से ले कर टिकटौक को अपराध के बढ़ावे की वजह बताया गया. ऐसा नहीं है कि टिकटौक में सब अच्छा ही है इस के कुछ दूसरे नुकसानदायक पहलू भी हैं. गूगल प्ले स्टोर पर कहा गया है कि इसे 13 साल से ज्यादा उम्र के लोग ही इस्तेमाल कर सकते हैं. लेकिन इस का पालन होता नहीं दिखा. भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में टिकटौक के जरिए जो वीडियो बनाए जाते हैं, उस में एक बड़ी संख्या 13 साल से कम उम्र के बच्चों की है.

इस के अलावा प्राइवेसी के लिहाज से भी टिकटौक खतरों से खाली नहीं है. क्योंकि इस में सिर्फ 2 प्राइवेसी सेटिंग की जा सकती है- पब्लिक और ओनली. यानी आप वीडियो देखने वालों में कोई फिल्टर नहीं लगा सकते. या तो आप के वीडियो सिर्फ आप देख सकेंगे या फिर हर वो शख्स जिस के पास इंटरनेट है. अगर कोई यूजर अपना टिकटौक अकाउंट डिलीट करना चाहता है तो वह खुद ऐसा नहीं कर सकता. इस के लिए उसे टिकटौक से रिक्वेस्ट करनी पड़ती है. चूंकि यह पूरी तरह सार्वजनिक है, इसलिए कोई भी किसी को फौलो कर सकता है, मैसेज कर सकता है.

ऐसे में आपराधिक या असामाजिक प्रवृत्ति के लोग छोटी उम्र के बच्चे या किशोरों को आसानी से गुमराह कर सकते हैं और आपत्तिजनक कमेंट कर सकते हैं. कई टिकटौक अकाउंट अडल्ट कंटेंट से भरे पड़े हैं. चूंकि इन में कोई फिल्टर नहीं है, इसलिए हर टिकटौक यूजर इन्हें देख सकता है, यहां तक कि बच्चे भी. टिकटौक जैसे चीनी ऐप्स के साथ सब से बड़ी दिक्कत यह है कि इस में किसी कंटेंट के लिए रिपोर्ट या फ्लैग का कोई विकल्प नहीं है. इसलिए सुरक्षा और निजता के लिहाज से यह खतरनाक हो सकता है. टिकटौक में दूसरी बड़ी समस्या साइबर बुलिंग की है. साइबर बुलिंग यानी इंटरनेट पर लोगों का मजाक उड़ाना, उन्हें नीचा दिखाना, बुराभला कहना और ट्रोल करना. इसी वजह से टिकटौक पर कोई काबू नहीं था.

जुलाई, 2018 में इंडोनेशिया ने इसीलिए टिकटौक पर बैन लगा दिया था, साथ ही वहां किशोरों की एक बड़ी संख्या इस का इस्तेमाल पोर्न सामग्री अपलोड और शेयर करने के लिए कर रही थी. बाद में कुछ बदलावों और शर्तों के बाद इसे दोबारा लाया गया था. ट्रोलिंग के अलावा टिकटौक पर पिछले कुछ समय से फेक न्यूज के वीडियो भी तेजी से फैल रहे थे, जिसे देखते हुए टिकटौक देश के लिए खतरा बन गया था. इस के अलावा यह ऐप हमारे डाटा की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन गया था. मसलन, जब हम टिकटौक या उस जैसा कोई ऐप डाउनलोड करते हैं तो प्राइवेसी की शर्तों पर ज्यादा ध्यान नहीं देते. बस, यस और अलाउ पर टिक करते चले जाते हैं. हम अपनी फोटो गैलरी, लोकेशन और कौंटैक्ट नंबर, इन सब का एक्सेस दे देते हैं. इस के बाद हमारा डेटा कहां जा रहा, इस का क्या इस्तेमाल हो रहा है, हमें कुछ पता नहीं चलता.

यह बात अब जगजाहिर है कि आजकल ज्यादातर ऐप्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से काम करते हैं. ऐसे में अगर आप इन्हें एक बार भी इस्तेमाल करते हैं तो ये आप से जुड़ी कई जानकारियां हमेशा के लिए अपने पास रख लेते हैं, इसलिए इन्हें ले कर ज्यादा सतर्क होने की जरूरत है. जब अपराध की वजह बना टिकटौक अपराधों की वजह बना जैसे आरोपों में सच्चाई भी है, क्योंकि टिकटौक कई तरह के अपराध की कुछ घटनाओं की वजह बना है. जरूरी नहीं कि टिकटौक से सभी को शोहरत व दौलत ही मिली हो, कुछ लोगों को इस के कारण जान भी गंवानी पड़ी.

दिसंबर 2019 में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के टिकरापारा थाना क्षेत्र के अंतर्गत गोदावरी नगर स्थित एक निजी हौस्टल में हुई 2 बहनों की हत्या इसी का परिणाम थी. इसी शहर की एक लड़की मंजू सिदार जो टिकटौक पर वीडियो बनाने के कारण चर्चित हुई थी, उसे शहर के राजगढ़ में रहने वाले अपने एक फैन शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ से इश्क हो गया. 21 मई, 2019 को दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली. लेकिन यह शादी मंजू के परिवार को मंजूर नहीं थी. इस के बाद दोनों के बीच अलगाव हो गया. लेकिन बात तब बिगड़ी जब चंद रोज बाद ही मंजू ने एक दूसरे युवक के साथ टिकटौक में वीडियो बना कर फेसबुक पर अपलोड किया. इस वीडियो के कारण दोस्तों और परिचितों में हुई अपनी बदनामी के कारण सैफ बदले की आग में जलने लगा. उस ने अपने 2 दोस्तों को पैसे का लालच दे कर मंजू की हत्या करने की योजना बनाई.

सैफ ने मंजू को काल कर मिलने की इच्छा जताई, फिर गुलाम के साथ हौस्टल के कमरे में जा कर करीब घंटे भर बातचीत करता रहा. इस दौरान मंजू ने सैफ के साथ रहने से साफ इनकार कर दिया. तब सैफ ने गुस्से में रोटी पकाने वाले लोहे के तवे से मंजू के सिर पर ताबड़तोड़ वार कर दिए. मंजू को बचाने के लिए उस की बहन मनीषा सिदार पर भी सैफ के साथी काली ने उसी तवे से हमला कर दिया. फिर आरोपितों ने गंभीर रूप से घायल बहनों का गला दबा कर हत्या कर दी. बाद में पुलिस ने इस हत्याकांड का परदाफाश करते हुए तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया था.

इसी तरह की एक घटना गाजियाबाद की है. दरअसल, टिकटौक पर चंद वीडियो डाल कर खुद को स्टार समझ लेने वाले कम उम्र के नौजवान इस ऐप के कारण खुद को फिल्मी हीरो और फिल्मी दुनिया का स्टार मानने की भूल करने लगते हैं. फिल्मी प्रेमकथाओं की तरह वे कभीकभी प्यार की दीवानगी में ऐसी जिद पर उतर जाते हैं, जो न सिर्फ उन की तबाही का सबब बन जाती है बल्कि उस से दूसरों की जान भी चली जाती है. मामला गाजियाबाद के टीला मोड़ थाना क्षेत्र का है, जहां 17 जून, 2020 को बीच सड़क पर एकतरफा प्यार में एक टिकटौक स्टार ने युवती को चाकू से गोद कर मौत के घाट उतार दिया. टिकटौक पर उस के चार लाख से अधिक फौलोअर्स थे.

घटनाक्रम कुछ यूं है कि टीला मोड़ थाना क्षेत्र के तुलसी निकेतन में बलदेव सिंह पत्नी और बेटी नैना (19) के साथ रहते थे. नैना 2019 में दिल्ली की सुंदर नगरी स्थित स्कूल से 12वीं पास कर नर्सिंग का प्रशिक्षण ले रही थी. 22 जून को उस की शादी थी. 17 जून, 2020 की रात करीब साढ़े 8 बजे नैना अपने मातापिता के साथ घर के पास ही दुकान से नया सिमकार्ड ले कर लौट रही थी. रास्ते में मांबेटी फास्टफूड खाने के लिए रुक गईं. इसी दौरान पीछे से आया सुंदर नगरी, दिल्ली निवासी शेरखान उर्फ शेरू नैना को खींच कर एक दुकान के किनारे ले गया और चाकुओं से गोद कर उस की हत्या कर दी. नैना की मां मदद के लिए चिल्लाती रहीं लेकिन लोग तमाशबीन बने रहे.

बाद में पुलिस ने शेरखान को गिरफ्तार कर लिया. पता चला वह टिकटौक सेलिब्रिटी है. टिकटौक पर शेरखान के 4 लाख से अधिक फौलोअर्स हैं और वह टीम-02 जिंदा जहर के नाम से अपना यूट्यूब अकाउंट भी चलाता है. नैना भी टिकटौक पर थी, लेकिन शेरखान और नैना एकदूसरे को फौलो नहीं करते थे. दोनों के बीच 2 साल पहले दोस्ती हुई. शेरखान का नैना के घर भी आनाजाना था. वह नैना से एकतरफा प्यार करने लगा था लेकिन नैना सिर्फ उसे अपना दोस्त मानती थी. इस बीच नैना के परिवार ने उस की शादी तय कर दी, जो 22 जून को होनी थी. शेरखान को गवारा नहीं था कि नैना किसी और की हो जाए. इसलिए उसने नैना से मिल कर अनुरोध किया कि वह शादी तोड़ दे. लेकिन नैना ने इनकार कर दिया.

नैना को अपनी बनाने के धुन में पहले तो उस ने फेसबुक पर नैना की फोटो डाल कर उसे बदनाम करना चाहा, लेकिन जब इस से भी बात नहीं बनी तो उस ने अपने एक दोस्त के साथ मिल कर नैना की हत्या कर दी. प्रेम अपराध भी नैना और मंजू की हत्या महज उदाहरण भर हैं. अगर खोज करें तो टिकटौक के कारण बहुत से घर तबाह हो रहे थे. क्योंकि कहीं पर पत्नी के टिकटौक वीडियो बनाने के जुनून से पति तलाक दे रहा था, तो कहीं लड़कियों के इस जुनून से परिवार की बदनामी हो रही थी. कुल मिला कर बच्चे हों या बूढ़े, आम हो या खास, पुलिस वाला या बस का चालक टिकटौक का नशा सभी के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

कई राज्यों में महिला और युवा पुलिसकर्मियों को वरदी में टिकटौक वीडियो बना कर अपनी वरदी से हाथ धोना पडा. टिकटौक के जूनून में कुछ लोगों ने एडवेंचर वीडियो बनाने के चक्कर में कहीं अपनी तो कहीं दूसरे की जान तक दांव पर लगा दी. अब जबकि सरकार ने टिकटौक को बैन कर दिया है तो ऐसे में इस के जरिए लाखों कमाने वाले लोग भी सरकार के फैसले के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन वे टिकटौक की तरह ही ऐसा कोई प्लेटफौर्म चाहते हैं, जहां उन के टैलेंट को मौके मिलते रहें, कमाई भी होती रहे और चीन की दखलअंदाजी भी न हो. ज्यादा चिंता सिर्फ उन लोगों को है, जिन की रोजीरोटी टिकटौक बन गया था.

लोगों का मानना है कि हमारे देश में टैलेंट भरा पड़ा है, लेकिन ऐसे लोगों को कोई प्लेटफौर्म तो मिले. टिकटौक ने ऐसे सभी लोगों को एक मंच दया था. भारत में प्रतिबंधित किए जाने के बाद टिकटौक ऐप को सब से ज्यादा नुकसान हुआ है, इसलिए हो सकता है आने वाले दिनों में टिकटौक संचालित करने वाली बाइटडांस लिमिटेड चीन से ही अपना नाता तोड़ ले. क्योंकि कंपनी ने कहा है कि टिकटौक कारोबार के कारपोरेट ढांचे में परिवर्तन करने के बारे में सोचा जा रहा है.

जिस तरह से इस ऐप के मूलरूप से चीनी ओरिजिन को ले कर पूरे विश्व में इस के खिलाफ प्रतिबंध का माहौल बना है, उस के बाद टिकटौक के लिए एक नया प्रबंधन बोर्ड बनाने और चीन के बाहर ऐप के लिए एक अलग मुख्यालय स्थापित करने जैसे विकल्पों पर काम शुरू हो जाए. लेकिन फिलहाल तो यही सच है कि गरीबों के लिए सिनेमा का रूपहला परदा बन कर उन्हें शोहरत और कमाई देने वाला मंच उन से छिन गया है.

—कथा विभिन्न स्रोतों से संकलित

 

Kerala News : 32 किलो सोने की स्‍मलिंग से जुड़े थे हाईप्रोफाइल लोगों के तार

Kerala News : सोने की तसकरी कोई नई बात नहीं है. अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर प्राय रोज ही सोन पकड़ा जाता है. लेकिन यूएई से केरल के तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे पर जो 32 किलो सोना पकड़ा गया, उस का मामला इसलिए चिंता का विषय है, क्योंकि सोने की इस तसकरी के तार मंत्रालय और वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों से जुड़े पाए गए. इसी साल जुलाई के पहले सप्ताह की बात है. केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एयर कार्गो से संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के वाणिज्य दूतावास के नाम से कुछ बैगों में राजनयिक सामान आया था.

यूएई का वाणिज्य दूतावास तिरुवनंतपुरम शहर के मनाक में स्थित है. सामान क्या शौचालयों में उपयोग होने वाले उपकरण थे, जो खाड़ी देश से आई फ्लाइट से आए थे. विमान से आए बैग उतार कर कार्गो यार्ड में रख दिए गए. इन बैगों को लेने के लिए 2 दिनों तक कोई भी संबंधित व्यक्ति हवाई अड्डे नहीं पहुंचा, तो कस्टम अधिकारियों ने भारतीय विदेश मंत्रालय से इजाजत ले कर 5 जुलाई को बैगों की जांच की. जांच के दौरान एक बैग में छिपा कर रखा गया 30 किलो से ज्यादा सोना मिला. सोने को इस तरह पिघला कर रखा गया था कि वह शौचालय के सामानों में पूरी तरह फिट हो जाए.

भारतीय बाजार में इस सोने की कीमत करीब 15 करोड़ रुपए आंकी गई. यूएई के वाणिज्य दूतावास ने बैग में मिला सोना अपना होने से इनकार कर दिया. इस पर सोने को सीज कर सीमा शुल्क विभाग ने मामले की जांच शुरू की. प्रारंभिक जांच में अधिकारियों को यह मामला सोने की तस्करी से जुड़ा होने का संदेह हुआ. अधिकारियों को शक हुआ कि इस संदिग्ध मामले में राजनयिक को मिलने वाली छूट का दुरुपयोग किया गया है. दरअसल, संयुक्त राष्ट्र के जिनेवा सम्मेलन में लिए गए फैसलों के तहत भारत सरकार की ओर से दूसरे देशों के राजनयिकों को कई तरह की छूट दी गई थीं. इस में उन की और उन के सामान की जांच पड़ताल की छूट भी शामिल है.

जांच शुरू करने के दूसरे दिन 6 जुलाई को कस्टम अधिकारियों ने संयुक्त अरब अमीरात के वाणिज्य दूतावास के एक पूर्व अधिकारी सरित पी.आर. से पूछताछ की. पूछताछ के बाद अधिकारियों को रहस्य की परतों में उलझा और दूसरे देशों से जुड़ा यह मामला काफी बड़ा होने का अंदाजा हो गया. इस मामले में एक महिला अधिकारी पर भी शक जताया गया. सीमा शुल्क अधिकारियों ने दूतावास के पूर्व अधिकारी सरित पी.आर. को गिरफ्तार कर शक के दायरे में आई महिला अधिकारी की तलाश शुरू कर दी. कस्टम अधिकारियों की प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ कि सरित पी.आर. ने पहले भी ऐसी कई खेप हासिल की थीं. इस मामले में केरल सरकार की एक महिला अधिकारी स्वप्ना सुरेश भी शामिल थी.

सोने की तस्करी का यह मामला केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन की जानकारी तक भी पहुंच गया. मुख्यमंत्री को अपने स्तर पर पता चला कि इस मामले में संदेह के दायरे में आई महिला अधिकारी स्वप्ना के संबंध राज्य के कई वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों से हैं. मुख्यमंत्री खुद भी उस महिला से परिचित थे. हालांकि बाद में मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस बात से इनकार किया कि सीएम उस महिला को जानते थे. विपक्ष ने उठाई आवाज इस बीच, यह मामला राजनीतिक स्तर पर उछल गया. विपक्षी दल भाजपा और कांग्रेस ने प्रदर्शन करते हुए केरल की वाम लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार को घेरने की कोशिश शुरू कर दी.

केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने 7 जुलाई को प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर मुख्यमंत्री कार्यालय में सोना तसकरी गिरोह के कथित प्रभाव की सीबीआई से जांच कराने का आग्रह किया. उन्होंने कहा कि एक महिला इस रैकेट की कथित सरगना है. यह महिला केरल सरकार के आईटी विभाग के तहत केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड में आपरेशंस मैनेजर के तौर पर 6 जुलाई, 2020 तक कार्यरत थी. संदेह है कि इस तसकरी की मास्टरमाइंड वही है. इस महिला के केरल के सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एम. शिवशंकर के साथ घनिष्ठ संबंध हैं. यह महिला कई बार मुख्यमंत्री के महत्वपूर्ण आयोजनों में भी नजर आई थी.

महिला का नाम स्वप्ना सुरेश है. सोना तसकरी रैकेट में स्वप्ना सुरेश का नाम आने पर केरल के प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री कार्यालय और आईटी सचिव ने स्वप्ना सुरेश का नाम हटाने के लिए अधिकारियों पर दबाव बनाया. शीर्ष स्तर पर संपर्कों के लिए जानी जाने वाली स्वप्ना सुरेश को आईटी सचिव एम. शिवशंकर संरक्षण दे रहे हैं. वे स्वप्ना के आवास पर अक्सर आते जाते हैं. सुरेंद्रन ने स्वप्ना की नियुक्ति की सीबीआई से जांच कराने की भी मांग की. राजनीतिक स्तर पर इस मामले के तूल पकड़ने पर केरल सरकार ने 7 जुलाई को सूचना प्रौद्योगिकी सचिव एम. शिवशंकर को मुख्यमंत्री के सचिव पद से हटा दिया. पद से हटाए जाने के बाद शिवशंकर एक साल की छुट्टी पर चले गए.

दूसरी ओर, सरकार ने स्वप्ना सुरेश को केरल स्टेट आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर से बर्खास्त कर दिया. मुख्यमंत्री कार्यालय ने स्वप्ना से किसी तरह के संबंध होने से इनकार किया. 8 जुलाई को केरल विधानसभा में विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने केरल सरकार की ओर से आयोजित स्पेस कौंक्लेव-2020 में पूरा ब्यौरा मीडिया के सामने रखते हुए कहा कि इस कौंक्लेव का प्रबंधन स्वप्ना सुरेश ही संभाल रही थी. स्वप्ना ने ही राज्य सरकार की ओर से गणमान्य लोगों को आमंत्रण पत्र भेजे थे. उन्होंने आरोप लगाया कि इसरो से संबंधित एक संस्था में कार्यक्रम प्रबंधक के रूप में स्वप्ना की नियुक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकती है. सोना तस्करी का यह मामला देशभर में चर्चित हो जाने और इस घटना का राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ने की संभावना को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 9 जुलाई को इस की जांच एनआईए को सौंप दी.

वहीं, भूमिगत हुई स्वप्ना सुरेश ने इस मामले में पहली बार औडियो संदेश जारी कर चुप्पी तोड़ी. उस ने कहा कि इस में मेरी कोई भूमिका नहीं है. मैं ने यूएई के राजनयिक राशिद खमीस के निर्देशों के अनुसार काम किया है. कार्गो परिसर में सामान को जब क्लियर नहीं किया गया, तो राशिद ने मुझे सीमा शुल्क अधिकारियों से संपर्क करने को कहा था. तब तक मुझे पता नहीं था कि यह खेप कहां से आई थी और इस में क्या था? सोना जब्त किए जाने का पता लगने पर राशिद के कहने पर वे बैग वापस भेजने की कोशिश भी की गई थी.

दूसरी ओर, गिरफ्तारी की आशंका से स्वप्ना सुरेश ने 9 जुलाई को केरल हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल की. अगले दिन सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने यह याचिका 14 जुलाई तक के लिए टाल दी. एनआईए ने 10 जुलाई को सोने की तस्करी के मामले को आतंकवाद से जोड़ते हुए 4 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. इस मामले में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम 1967 के तहत सरित पीआर, स्वप्ना सुरेश, संदीप नैयर के अलावा एर्नाकुलम के फैसल फरीद को आरोपी बनाया गया. इस के दूसरे ही दिन 11 जुलाई को एनआईए ने स्वप्ना सुरेश को हिरासत में ले लिया. इस के अलावा संदीप नैयर को भी गिरफ्तार कर लिया गया.

दोनों को अगले दिन 12 जुलाई को एनआईए की विशेष अदालत में पेश किया गया. अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया. विशेष अदालत ने एनआईए की अर्जी पर दोनों आरोपियों को 13 जुलाई को 8 दिन के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी की हिरासत में दे दिया. कहानी में आगे बढ़ने से पहले यह जानना जरूरी है कि सोना तसकरी के मामले में केरल में सियासी भूचाल लाने वाली हाई प्रोफाइल महिला स्वप्ना सुरेश है कौन? बहुत ऊंचे तक थी स्वप्ना सुरेश की पहुंच केरल के राजनीतिक गलियारों और ब्यूरोक्रेट्स के बीच अपना प्रभाव रखने वाली स्वप्ना सुरेश का जन्म यूएई के अबूधाबी में हुआ था. अबूधाबी में ही उस ने पढ़ाई की. इस के बाद उसे एयरपोर्ट पर नौकरी मिल गई. स्वप्ना ने शादी भी की, लेकिन जल्दी ही तलाक हो गया था.

इस के बाद वह बेटी के साथ रहने के लिए केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम आ गई. भारत आने के बाद स्वप्ना सुरेश ने तिरुवनंतपुरम में 2011 से 2 साल तक एक ट्रेवल एजेंसी में काम किया. वर्ष 2013 में उसे एयर इंडिया में एसएटीएस में एचआर मैनेजर पद पर नौकरी मिल गई. यह एयर इंडिया और सिंगापुर एयरपोर्ट टर्मिनल सर्विसेज का संयुक्त उद्यम है. साल 2016 में जब केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जालसाजी के एक मामले में उस की जांच शुरू की, तो वह अबूधाबी चली गई. फर्राटेदार अंग्रेजी और अरबी भाषा बोलने वाली स्वप्ना सुरेश ने अबूधाबी में यूएई महावाणिज्य दूतावास में नौकरी हासिल कर ली. पिछले साल यानी 2019 में उस ने यह नौकरी छोड़ दी.

कहा यह भी जाता है कि उसे नौकरी से निकाल दिया गया था. बताया जाता है कि एयर इंडिया एसएटीएस और अबूधाबी में यूएई महावाणिज्य दूतावास में काम करते हुए स्वप्ना सुरेश हवाई अड्डों और सीमा शुल्क विभाग के कई अधिकारियों के संपर्क में आ गई थी. उसे राजनयिक खेपों की आपूर्ति और हैंडलिंग के सारे तौरतरीके पता चल गए थे. यूएई के महावाणिज्य दूतावास में की गई नौकरी स्वप्ना सुरेश को जिंदगी के एक नए मोड़ पर ले गई. वहां उस ने बड़ेबड़े लोगों से अपनी जानपहचान बना ली थी. इस दौरान उस के यूएई से केरल आने वाले कई प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व भी किया. अबूधाबी में नौकरी से हटने के बाद वह अपने संपर्कों की गठरी बांध कर वापस केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम आ गई.

यूएई के अपने संपर्कों के बल पर इस बार वह तिरुवनंतपुरम में हाई प्रोफाइल तरीके से सामने आई. उस ने राजनीतिज्ञों और ब्यूरोक्रेट्स से अच्छे संबंध बना लिए. केरल के मुख्यमंत्री के सचिव वरिष्ठ आईएएस अधिकारी एम. शिवशंकर से उस के गहरे ताल्लुकात बन गए. कहा जाता है कि शिवशंकर उस के घर भी आतेजाते थे. आरोप यह भी है कि शिवशंकर की सिफारिश पर ही स्वप्ना को केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड में अनुबंध पर आपरेशंस मैनेजर की नौकरी मिली थी. स्वप्ना सुरेश केरल के बड़े होटलों में होने वाली पार्टियों में अकसर शामिल होती थी. अरबी समेत कई भाषाएं जानने वाली स्वप्ना केरल आने वाले अरब नेताओं की अगुवाई करने वाली टीम में शामिल रहती थी.

सोने की तस्करी का मामला सामने आने के बाद ऐसे कई वीडियो और फोटो वायरल हुए, जिन में स्वप्ना सुरेश केरल के मुख्यमंत्री, अरब नेताओं और वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिवशंकर के साथ दिखाई दी. एनआईए की हिरासत में भेजे जाने के बाद स्वप्ना सुरेश के बुरे दिन शुरू हो गए. 13 जुलाई को उस के खिलाफ धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस मामले में स्वप्ना के साथ 2 कंपनियों प्राइम वाटर हाउस कूपर्स और विजन टेक्नोलोजी को भी आरोपी बनाया गया. आरोप है कि स्वप्ना ने केरल के आईटी विभाग में नौकरी हासिल करने के लिए फर्जी अकादमिक डिग्री का इस्तेमाल किया था.

स्वप्ना के शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच करने की जिम्मेदारी कंसल्टिंग एजेंसी प्राइस वाटर हाउस कूपर्स और विजन टैक्नोलोजी पर थी. केरल के आईटी विभाग के अधीन केरल राज्य सूचना प्रौद्योगिकी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड की शिकायत पर दर्ज इस मामले में स्वप्ना पर आरोप है कि उस ने महाराष्ट्र के डा. बाबा साहेब आंबेडकर विश्वविद्यालय की बीकौम की फर्जी डिगरी से नौकरी हासिल की थी. मुख्यमंत्री सचिव शिव शंकर की करीबी थी स्वप्ना 14 जुलाई को यह बात काल डिटेल्स से सामने आई कि केरल के मुख्यमंत्री के सचिव पद से हटाए गए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिवशंकर ने स्वप्ना सुरेश सहित सोने की तसकरी के 2 आरोपियों से फोन पर बातचीत की थी.

उसी दिन कस्टम अधिकारियों की एक टीम ने आईएएस अधिकारी शिवशंकर के घर जा कर उन्हें नोटिस दिया और उन से पूछताछ की. बाद में शिवशंकर उसी दिन शाम को तिरुवनंतपुरम में सीमा शुल्क विभाग के कार्यालय पहुंचे, अधिकारियों ने उन से शाम से रात 2 बजे तक 9 घंटे पूछताछ की. कोच्चि से कस्टम कमिश्नर और अन्य अधिकारियों ने भी वीडियो कौंफ्रेंस के जरीए शिवशंकर से पूछताछ की. रात 2 बजे पूछताछ पूरी होने के बाद कस्टम अधिकारियों ने उन्हें घर ले जा कर छोड़ दिया. पूछताछ में शिवशंकर ने स्वीकार किया कि स्वप्ना सुरेश ने उन के पास काम किया था, और सरित पीआर उन का दोस्त है.

कस्टम अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि आईएएस अधिकारी ने अपने पद का दुरुपयोग कर सोना तस्करी के आरोपियों स्वप्ना सुरेश, संदीप नैयर और सरित पीआर को किसी तरह की मदद तो नहीं पहुंचाई थी. इस बीच, कस्टम अधिकारियों ने एक होटल के एक और 2 जुलाई के सीसीटीवी फुटेज हासिल किए, जहां आईएएस अधिकारी शिवशंकर और आरोपी ठहरे थे. कहा जाता है कि शिवशंकर के एक कर्मचारी ने इस होटल में कमरा बुक कराया था. शिवशंकर पर गंभीर आरोप लगने पर मुख्यमंत्री के निर्देश पर केरल के मुख्य सचिव डा. विश्वास मेहता के नेतृत्व में अधिकारियों के एक पैनल ने जांच शुरू कर दी. सोना तस्करों से कथित रूप से तार जुड़े होने की बातें सामने आने के बाद केरल सरकार ने 16 जुलाई को वरिष्ठ आईएएस अधिकारी शिवशंकर को निलंबित कर दिया.

इस मामले की जांच चल ही रही थी कि 17 जुलाई को यूएई वाणिज्य दूतावास से जुड़ा केरल पुलिस का एक जवान जयघोष अपने घर से करीब 150 मीटर दूर बेहोशी की हालत में पड़ा मिला. पुलिस ने संदेह जताया कि उस ने कलाई काट कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी. पुलिस ने उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया. जयघोष के परिजनों ने इस से एक दिन पहले ही उस के लापता होने की शिकायत थुंबा थाने में दर्ज कराई थी. परिजनों ने कहा था कि अज्ञात लोगों की ओर से धमकी दिए जाने के कारण वह खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा था. इस से पहले जयघोष ने वट्टियोरकावु थाने में अपनी सर्विस पिस्तौल जमा करा दी थी. जयघोष के मोबाइल पर जुलाई के पहले हफ्ते में स्वप्ना सुरेश ने भी फोन किया था.

केरल सोना तस्करी मामले की जांच कर रही एनआईए ने 18 जुलाई को आरोपी फैजल फरीद के खिलाफ इंटरपोल से ब्लू कौर्नर नोटिस जारी करने का अनुरोध किया. इस से पहले कोच्चि की विशेष एनआईए अदालत ने फरीद के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था. एनआईए ने विशेष अदालत को बताया था कि वे वारंट को इंटरपोल को सौंप देंगे, क्योंकि फरीद के दुबई में होने का संदेह है. एनआईए ने दावा किया कि फरीद ने ही संयुक्त अरब अमीरात के दूतावास की फरजी मुहर और फरजी दस्तावेज बनाए थे. एनआईए और कस्टम विभाग की प्रारंभिक जांच में जो तथ्य उभर कर सामने आए, उन के मुताबिक यूएई के वाणिज्य दूतावास के नाम पर सोने की तसकरी करीब एक साल से हो रही थी. इस तसकरी में एक पूरा गिरोह संलिप्त था.

स्वप्ना सुरेश इस गिरोह की मास्टर माइंड थी और गिरोह से दूतावास के कुछ मौजूदा और पूर्व कर्मचारी जुड़े हुए थे. यह गिरोह डिप्लोमैटिक चैनल के जरीए पिछले एक साल में खाड़ी देशों से तस्करी का करीब 300 किलो सोना भारत ला चुका था. तस्करी के सोने की पहली खेप का कंसाइनमेंट डिप्लोमेटिक चैनल के जरीए पिछले साल जुलाई में तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे पर आया था. इस साल जुलाई के पहले हफ्ते में पकड़े गए सोने सहित 13 खेप लाई गई थीं. सोने की तस्करी के मामले में नाम उछलने पर तिरुवनंतपुरम स्थित यूएई के वाणिज्य दूतावास में तैनात राजनयिक अताशे राशिद खमिस जुलाई के दूसरे हफ्ते में भारत छोड़ कर स्वदेश चले गए.

स्वप्ना सुरेश ने राशिद के इशारे पर ही काम करने की बात कही है. हालांकि, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और कस्टम विभाग सोना तस्करी मामले की जांच कर रहे हैं. मामले में कुछ और प्रभावशाली लोगों की गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं. लेकिन चिंता की बात यह है कि सोने की तस्करी में राजनयिक चैनल का दुरुपयोग किया जा रहा था. एक खास तथ्य यह भी है कि भारत में सोने की सब से ज्यादा तसकरी केरल में होती है. हालांकि अब जयपुर का एयरपोर्ट भी सोने की तस्करी का एक नया माध्यम बन कर उभर रहा है. जयपुर में जुलाई के ही पहले हफ्ते में 2 फ्लाइटों से लाया गया 32 किलो सोना पकड़ा गया था. इस मामले में 14 यात्रियों को गिरफ्तार किया गया था. सोने की तसकरी में केरल नंबर एक पर है. इस के अलावा मुंबई, दिल्ली, बैंगलुरु और चेन्नई एयरपोर्ट पर सोने की तसकरी के सब से ज्यादा मामले पकड़े जाते हैं.

 

Murder Story : दोस्त को कर्ज के 20 लाख रुपए नहीं लौटाने पडे़ इसलिए किया कत्ल

Murder Story : लौकडाउन सब से बड़ी मुसीबत बना पीनेपिलाने वालों के लिए. लेकिन पैसे वाले अपने लिए कोई न कोई राह निकाल ही लेते हैं. आकाश गुप्ता ने शराब का जुगाड़ कर के अपने दोस्तों सौरभ और सुनील को पिलाने के लिए बुलाया. दोनों आ भी गए लेकिन…

छत्तीसगढ़ के सरगुजा का शहर अंबिकापुर.रात के लगभग 8 बजे थे, कोरोना महामारी के चलते देशभर में लौकडाउन चल रहा था. जिधर देखो, उधर ही सन्नाटा. छत्तीसगढ़़ सरगुजा संभाग के ब्रह्म रोड, अंबिकापुर स्थित अपने आवास के बाहर खड़े सौरभ अग्रवाल ने मोबाइल से अपने चचेरे भाई सुनील अग्रवाल को काल लगाई. काल रिसीव हुई तो उस ने पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई? वैसे कर ही क्या सकते हो, चारों ओर तो सन्नाटा पसरा है.’’

हैलो के साथ सुनील ने दूसरी ओर से कहा, ‘‘घर पर बैठा हूं, टीवी पर कोरोना की खबरों के अलावा कुछ है ही नहीं. देखदेख कर बोर हो रहा हूं. कभी मौतों के आंकड़े आते हैं तो कभी मरीजों के. देख कर लगता है, जैसे अगला नंबर मेरा ही है.’’

हलकी हंसी के साथ सौरभ बोला, ‘‘आओ, आकाश के यहां चलते हैं. कह रहा था, टाइम पास नहीं हो रहा, सारी व्यवस्था कर रखी है उस ने.’’

सौरभ ने इशारे में सुनील को बता दिया. लेकिन वह तल्ख स्वर में बोला, ‘‘तू आकाश के चक्कर में मत रहा कर. उस की जुबान की कोई कीमत नहीं है. पिछले डेढ़ साल से चक्कर पर चक्कर कटवा रहा है, एक नंबर का बदमाश है.’’

‘‘भाई, समयसमय की बात है, कभी करोड़ों का आसामी था, उस के पिता की तूती बोलती थी सरगुजा में… समय का मारा है बेचारा. रही बात मकान की तो चिंता क्यों करते हो, पक्की लिखापढ़ी है, मकान तो उस के पुरखे भी खाली करेंगे.’’ सौरभ ने आकाश का पक्ष रखने की कोशिश की.

‘‘ठीक है, मैं आता हूं.’’ सुनील अग्रवाल ने बात बंद कर दी. सुनील उस का चचेरा भाई था, उम्र लगभग 40 वर्ष. दोनों में खूब छनती थी. दोनों मिलजुल कर अंबिकापुर में बिल्डिंग वर्क और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते थे. सौरभ अपनी इनोवा सीजी 15डी एच8949 पर आ कर बैठ गया. थोड़ी देर में सुनील अग्रवाल आ गया. दोनों कार से शहर का चक्कर लगा कर आकाश गुप्ता के घर पहुंच गए. हमेशा की तरह आकाश ने मुसकरा कर दोनों का स्वागत किया. तीनों के आपस में मित्रवत संबंध थे, एक ही शहर एक ही मोहल्ले में रहने के कारण एकदूसरे के काफी करीब थे. आपस में लेनदेन भी चलता था.

वह आकाश का पुश्तैनी घर था, जो अकसर खाली रहता था. जब पीनेपिलाने का प्रोग्राम बनता था तो सब दोस्त अक्सर यहीं एकत्र होते थे. फिर कैरम खेलने और पीनेपिलाने का दौर चलता था, इसी के चलते आकाश ने यह मकान 2. 30 करोड़ में सौरभ को बेच दिया था और पैसे भी ले लिए थे, मगर वह मकान को सुपुर्द करने में आनाकानी कर रहा था. बहरहाल, इन सब बातों को दरकिनार कर सुनील और सौरभ आकाश गुप्ता के घर पहुंचे और महफिल सज गई. आकाश ने बेशकीमती शराब, मुर्गमुसल्लम वगैरह मंगा रखा था. लौकडाउन के समय में ऐसी बेहतरीन व्यवस्था देख कर सौरभ अग्रवाल चहका, ‘‘अरे भाई क्या इंतजाम किया है, लग ही नहीं रहा लौकडाउन चल रहा है.’’ इस पर आकाश गुप्ता और सुनील अग्रवाल दोनों हंसने लगे.

बातचीत और पीनेपिलाने का दौर शुरू हुआ. इसी बीच अपने उग्र स्वभाव के मुताबिक सुनील अग्रवाल ने आकाश की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘यार, ये सब तो ठीक है मगर तू यह बता… सौरभ को मकान कब दे रहा है, 6 महीने हो गए.’’

यह सुन कर आकाश गुप्ता मुसकराते हुए बोला, ‘‘यार, तुम मौजमजा करने आए हो. मजे करो. कोरोना पर बात करो. ये मकान कहां जाएगा.’’

इस पर सौरभ बोला, ‘‘बात बिलकुल ठीक है. आज कोरोना की वजह से हुए लौकडाउन को 17वां दिन है. त्राहित्राहि मची है.’’

सौरभ की बात पर सुनील गंभीर हो गया और चुपचाप शराब का गिलास हाथों में उठा लिया. आकाश ने अपने एक साथी सिद्धार्थ यादव को भी बुला रखा था जो उन की सेवा में तैनात था, साथ ही हमप्याला भी बना हुआ था. हंसतेमुसकराते तीनों शराब पी रहे थे. तभी एकाएक सुनील अग्रवाल ने कहा, ‘‘यार, तूने यह आदमी कहां से ढूंढ निकाला, पहले तो तेरे यहां कभी नहीं देखा.’’

कुछ सकुचाते हुए आकाश गुप्ता ने कहा,

‘‘हां, नयानया रखा है  तुम्हारी सेवाटहल के लिए.’’

‘‘इसे कहीं देखा है…’’ सुनील ने शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए कहा

‘‘हां देखा होगा. मैं यहीं का हूं भैया, पास में ही मेरा घर है.’’

‘‘नाम  क्या  है  तेरा?’’

‘‘सिद्धार्थ… सिद्धार्थ यादव.’’

‘‘हूं, तू जेल गया था न, कब छूटा?’’ सुनील ने उस पर तीखी नजर डालते हुए कहा

‘‘मैं…अभी एक महीना हुआ है.’’ सिद्धार्थ ने हकलाते हुए दोनों की ओर देख कर कहा.

‘‘अरे, तुम भी यार… सिद्धार्थ बहुत काम का लड़का है. अब सुधर गया है.’’ कहते हुए आकाश गुप्ता ने दोनों के खाली गिलास फिर से भर दिए. दोनों पीते रहे. जब नशा तारी हुआ तो अचानक आकाश गुप्ता जेब से पिस्तौल निकालते हुए बोला, ‘‘आज तुम दोनों खल्लास, मेरा… मेरा मकान चाहिए. ब्याज  पर ब्याज …ब्याज पर ब्याज… आज तुम दोनों को मार कर यहीं दफन कर दूंगा.’

आकाश का रौद्र रूप देख सौरभ और सुनील दोनों के होश उड़ गए. वे कुछ कहते समझते, इस से पहले ही आकाश ने गोली चला दी जो सीधे सुनील अग्रवाल के सिर में लगी. वह चीखता हुआ वहीं ढेर हो गया. सुनील को गोली लगते देख सौरभ कांप  उठा और वहां से भागने लगा. यह देख पास खड़े सिद्धार्थ यादव ने गुप्ती निकाली और सौरभ अग्रवाल के पेट में घुसेड़ दी. उस के पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह वहीं गिर गया. आकाश ने उस पर भी एक गोली दाग दी. सुनील और सौरभ फर्श पर गिर कर थोड़ी देर तड़पते रहे और फिर मौत के आगोश में चले गए.

आकाश गुप्ता ने पिस्तौल जेब में रख ली. फिर उस ने सिद्धार्थ के साथ मिल कर सौरभ और सुनील की लाशों को घर में पहले से ही खोद कर रखे गए गड्ढे में डाल कर ऊपर से मिट्टी डाल दी. इस से पहले सिद्धार्थ यादव ने सौरभ और सुनील की जेब से पर्स, हाथ से अंगूठी, चेन, इनोवा गाड़ी की चाबी अपने कब्जे में ले ली थी. आकाश के निर्देशानुसार वह घर से निकला और इनोवा को चला कर आकाशवाणी मार्ग पर पहुंचा. उस ने इनोवा वहीं खड़ी कर उस में पर्स, मोबाइल रख दिया. लेकिन वह यह नहीं देख सका कि उस का चेहरा कैमरे की जद में आ गया है.

10 अप्रैल, 2020 शुक्रवार को देर रात तक जब सौरभ अग्रवाल और सुनील अग्रवाल घर नहीं पहुंचे तो घर वालों को चिंता हुई. देश के साथसाथ अंबिकापुर में भी लौकडाउन का असर था. सड़कें सूनी थीं. सौरभ के भाई सुमित अग्रवाल ने सौरभ व सुनील के कुछ मित्रों को उन के मोबाइल पर काल कर के दोनों के बारे में पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. दोनों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ थे. इस से घर वाले चिंतातुर थे. अगले दिन सुबह सुमित अग्रवाल ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से आकाश गुप्ता का मोबाइल नंबर ले कर उसे काल की और सौरभ व सुनील के बारे में पूछा. आकाश गुप्ता ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

यह बताने पर कि सौरभ व सुनील भैया दोनों रात भर घर नहीं आए तो आकाश ने नाटकीयता पूर्वक कहा, ‘‘अरे, यह तो चिंता की बात है… रुको, मैं पता लगाता हूं.’’

सभी को यह जानकारी थी कि आकाश गुप्ता से सौरभ के घनिष्ठ संबंध थे. ऐसे में आकाश ने उस के परिजनों का विश्वास जीतने का प्रयास किया. थोड़ी देर बाद वह स्वयं सौरभ अग्रवाल के घर आ पहुंचा और बातचीत में शामिल हो गया. जब सुबह भी सौरभ व सुनील का पता नहीं चल पाया तो तय हुआ कि इस बात की जानकारी पुलिस को दे दी जाए. सुनील और सौरभ के भाई सुमित थाने पहुंचे. उन्हें कोतवाल विलियम टोप्पो से मिल कर उन्हें पूरी बात बता दी. कोतवाल टोप्पो ने पूछा, ‘‘पहले कभी ऐसा हुआ था?’’

‘‘नहीं…सर, ऐसा कभी नहीं हुआ, दोनों रात 11 बजे तक घर आ जाया करते थे. दोनों के मोबाइल भी औफ हैं. हम ने सारे परिचितों से भी पूछताछ कर ली है.’’ सुमित अग्रवाल यह सब बताते हुए रुआंसा हो गया.

‘‘देखो, चिंता मत करो, तुम्हारी तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर हम खोजबीन शुरू करते हैं.’’ कोतवाल  विलियम टोप्पो ने आश्वासन दिया. कोतवाल दोनों के घर पहुंचे और जरूरी बातें पूछने के बाद उच्चाधिकारियों एसपी आशुतोष सिंह, एडीशनल एसपी ओम चंदेल और एसपी (सिटी) एस.एस. पैकरा को इस घटना की जानकारी दे दी. मामला अंबिकापुर के धनाढ्य परिवार से जुड़ा था. सौरभ और सुनील के गायब होने की खबर बहुत तेजी से फैली. पुलिस पर सम्मानित लोगों का प्रेशर बढ़ने लगा. दोपहर होते होते एसपी आशुतोष सिंह और सभी अधिकारी व डीएसपी फोरैंसिक टीम के साथ सौरभ अग्रवाल व सुनील के घर पहुंच गए. इस के साथ ही जांच तेजी से शुरू हो गई.

इसी बीच खबर मिली कि सौरभ व सुनील जिस इनोवा कार में घर से निकले थे, वह अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक के पास खड़ी है. यह सूचना मिलते ही कोतवाल विलियम टोप्पो आकाशवाणी चौक पहुंचे और गाड़ी की सूक्ष्मता से जांच की. गाड़ी में सुनील और सौरभ के पर्स व मोबाइल मिल गए. इस से मामला और भी संदिग्ध हो गया. पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच की तो एक शख्स गाड़ी पार्क करते और उस में से निकलते दिखाई दे गया. पुलिस ने तफ्तीश की तो पता चला वह शातिर अपराधी  सिद्धार्थ यादव उर्फ श्रवण है, जो फरवरी 2020 में ही एक अपराध में जेल से बाहर आया है. पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी.

पहले तो सिद्धार्थ एकदम भोला बन कर कहने लगा, ‘‘मैं तो घर पर था, कहीं गया ही नहीं.’’

मगर जब उसे सीसीटीवी में कैद उस की फुटेज दिखाई गई तो उस का चेहरा स्याह पड़ गया. उस के कसबल ढीले पड़ गए. आखिर उस ने पुलिस को चौंकाने वाली बात बताई. उस ने कहा कि सौरभ व सुनील अग्रवाल की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. सिद्धार्थ यादव के बयान के आधार पर पुलिस ने आकाश गुप्ता के यहां दबिश दी. वह शराब में डूबा घर पर बैठा था. पुलिस ने उसे गिरफ्त मे ले कर पूछताछ शुरू की. साथ ही सिद्धार्थ यादव की निशानदेही पर आकाश गुप्ता के घर में खोदे गए गड्ढे से सौरभ व सुनील की लाशें भी बरामद कर ली. हत्या में इस्तेमाल की गई पिस्तौल भी जब्त कर ली गई. तब तक यह खबर अंबिकापुर के कोनेकोने तक पहुंच गई थी. लौकडाउन के बावजूद आकाश गुप्ता के घर के बाहर लोगों का हुजूम जुट गया.

पुलिस हिरासत में आ कर आकाश गुप्ता का नशा हिरन हो गया था. थरथर कांपते हुए उस ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और पुलिस को सब कुछ बता दिया. आकाश के पिता काशी प्रसाद गुप्ता कभी शहर के बहुत बड़े आसामी थे, पांच बहनों में अकेले भाई आकाश को पिता की अर्जित धनसंपत्ति शौक में उड़ाने  के अलावा कोई काम नहीं था. धीरेधीरे वह करोड़ों की जमीनजायदाद बेचता रहा. उस ने अपना पुश्तैनी मकान भी सौरभ को 2 करोड़ 30 लाख रुपए में बेच दिया था. वह उस से रुपए भी ले चुका था, लेकिन उस की नीयत खराब हो गई थी.

वह चाहता था किसी तरह मकान उस के कब्जे में रह जाए. दूसरी तरफ 2016 में आकाश गुप्ता ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से 20  लाख रुपए का कर्ज  लिया था और इन 4 वर्षों में 50 लाख रुपए अदा करने के बावजूद उस से ब्याज के 50 लाख रुपए मांगे जा रहे थे. परेशान आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को विश्वास में लिया. उसे सिद्धार्थ की आपराधिक पृष्ठभूमि पता थी. आकाश ने धीरेधीरे सिद्धार्थ से घनिष्ठ संबंध बनाए और उसे बताया कि वह किस तरह करोड़पति से बरबादी की ओर जा रहा है. इस पर सिद्धार्थ यादव ने आकाश गुप्ता के साथ हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘ऐसा है तो क्यों ना सौरभ को रास्ते से हटा दिया जाए. आकाश को सिद्धार्थ की कही बात जम गई.

दोनों ने साथ मिल कर पहले सौरभ के अपहरण की योजना बनाई. लेकिन उस में बड़े पेंच देख कर तय किया कि हत्या ज्यादा आसान है. दोनों ने इसी योजना पर काम किया. सौरभ की हत्या की योजना बनने लगी तो सिद्धार्थ ने आकाश को पास के उपनगर  गंगापुर के रमेश अग्रवाल से मिलवाया. रमेश ने बरगीडीह निवासी शिव पटेल से 90 हजार रुपए में एक पिस्तौल व गोलियां दिला दीं. हत्या की योजना बना कर पहले ही यह तय कर लिया गया था कि सौरभ व सुनील को मार कर उन की लाशें घर में ही दफन कर दी जाएंगी. सिद्धार्थ और आकाश ने 4 अप्रैल से धीरेधीरे गड्ढा खोदने का काम शुरू कर दिया था.

आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को मोटी रकम देने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. सिद्धार्थ भी आकाश गुप्ता की रईसी से प्रभावित था और धारणा बना चुका था कि इस काम में उस की मदद कर के उस का जिंदगी भर का राजदार बन जाएगा और आगे की जिंदगी मौजमजे से गुजारेगा. 11 अप्रैल 2020 की देर शाम तक आकाश गुप्ता और सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सौरभ अग्रवाल, सुनील अग्रवाल की हत्या के आरोप में आकाश और सिद्धार्थ के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 302, 201, 120बी 34,25, 27 आर्म्स एक्ट  के तहत मामला दर्ज कर के आरोपियों को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें अंबिकापुर कारागार भेज दिया गया.

Maharashtra News : सैक्स रैकेट और अवैध धंधों से वसूली करने वाली प्रीति की हैरान करने वाली दास्तां

Maharashtra News : खिलाड़ी औरतों के लिए हनीट्रैप कमाई का सब से अच्छा माध्यम है. लेकिन यह जरूरी नहीं कि इस में कामयाबी मिलेगी ही, क्योंकि पुलिस भी अपराधों की गंध सूंघती रहती है. प्रीति ने नेताओं और पुलिस के कंधों पर हाथ रख कर करोड़ों कमाए, लेकिन…

लौकडाउन से अनलौक की ओर कदम बढ़ते ही महाराष्ट्र की उपराजधानी नागपुर में यूं तो अपराध की जबरदस्त ताक धिना धिन सुनी जा रही थी. हत्याओं का सिलसिला सा बन गया था. राज्य के गृहमंत्री के गृहनगर की इस हालत पर राजनीतिक तीरतलवार चलाने वाले तरकश कसने लगे थे. पुलिस और प्रशासन पर तोहमत लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे. कोरोना योद्धा के तौर पर शाबासी लूट चुकी शहर पुलिस ऐसी किसी तोहमत को तवज्जो नहीं देना चाहती थी. दावा यही कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की न जरूरत थी न ही होनी चाहिए.

शहर पुलिस ने बड़ेबड़े अपराधियों के अपराध के आशियानों को कुछ समय में ही बड़े स्तर पर ध्वस्त कर दिया था. ऐसे में एक मामला अचानक चर्चा में हौट हुआ. यह मामला चार सौ बीसी के खेल में पकड़ी गई प्रीति का. राजनीति के गलियारे में चहलकदमी के साथ समाजसेवा का नया मौडल बनी घूमती उस महिला के बारे में बड़ी चर्चा ये थी कि कई पुलिस वाले साहब उस के दबेल यानी उस के दबाव में थे. लिहाजा उस ने शहर व शहर के आसपास के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर दबावतंत्र बना कर कइयों की जिंदगी में जहर घोल दिया. पुलिस कभी उस का सत्कार करती थी तो कभी उस से सत्कार कराती थी.

समाजसेवा के चोले में हनी ट्रैपर घटना 5 जून, 2020 की है. एक शिकायतकर्ता पांचपावली पुलिस स्टेशन में बेबस मुद्रा में मदद की याचना ले कर पहुंचा. शिकायतकर्ता का नाम था उमेश उर्फ गुड्डू तिवारी. पांचपावली क्षेत्र में ही रहने वाले गुड्डू ने बताया कि उस का जीवन एकदम सामान्य था. वह एक स्कूल का कर्मचारी है. हर माह मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का हंसीखुशी गुजारा हो रहा था. लेकिन जब से वह प्रीति की सोहबत में आया, उस की दुनिया लुटने लगी. उमेश उर्फ गुड्डू ने उस वक्त को कोसा है, जब वह फेसबुक पर प्रीति से जुड़ा था.

प्रीति का आकर्षक फोटो देख गुड्डू ने उस पर सहज कमेंट किया था. उस कमेंट के जवाब में प्रीति ने फेसबुक पर ही गुड्डू को पर्सनल मैसेज भेज कर मोबाइल फोन नंबर का आदानप्रदान कर लिया. गुड्डू इस बात को ले कर भी खुद को दोष देता है कि एकदो बार फोन पर बात के बाद वह उस अनजानी महिला के सामने पूरी तरह से खुल गया. उस ने अपने घरपरिवार की बातें साझा कर दीं. यहां तक कि वैवाहिक जीवन में भी उस ने अरमानों के सूखे कंठ की वेदना को स्वर दे दिया. प्रीति ने गुड्डू को बताया कि नागपुर के जिस इलाके में वह रहता है, उस के पास ही वह भी रहती है. उस ने अपनी पहचान के दायरे के ट्रेलर के तौर पर कुछ लोगों के नाम गिनाए.

कुछ दिनों बाद दोनों के मिलने का सिलसिला मोहब्बत की परवाज भरने लगा. कभी प्रीति मिलने पहुंचती तो कभी गुड्डू को बुला लेती थी. एक दिन प्रीति ने गुड्डू से साफ कह दिया कि वह उस के साथ जीवन गुजारने को तैयार है. बशर्ते उसे अपनी पत्नी को तलाक देना होगा. भविष्य की योजना भी उस ने गुड्डू से साझा की. 50 वर्षीय गुड्डू जिंदगी के नए सफर पर चलने के लिए न केवल राजी हुआ बल्कि अति उत्साहित भी था. माल मिलते ही बदला रंग गुड्डू की शिकायत का लब्बोलुआब यह था कि प्रीति मनचाहा धन मिलते ही तेवर बदलने लगती थी. बतौर गुड्डू प्रीति ने उस से फ्लैट खरीदने के लिए रुपयों की मांग की थी. उस का कहना था कि जब तक गुड्डू की पत्नी का तलाक नहीं हो जाता, तब तक दोनों उस फ्लैट में मिलतेजुलते रहेंगे.

गुड्डू ने अग्रिम के तौर पर प्रीति को फ्लैट के लिए 2.60 लाख रुपए दे दिए. तय समय पर फ्लैट नहीं लिया गया तो गुड्डू ने रुपए वापस मांगे. बस यहीं से गुड्डू पर दबाव का नया सिलसिला चल पड़ा. फ्लैट के नाम पर लिए गए रुपए वापस लौटाना तो दूर प्रीति ने रुपयों की नई पेशकश रख दी. उस ने कहा कि सोशल मीडिया पर जितनी भी हौट बातें हुई हैं और फोन पर लाइव चैटिंग हुई है, उन का सारा हिसाब उस के पास है. अगर वह उस रिकौर्डिंग को पुलिस को सौंप दे तो कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. प्रीति की सीधी धमकी यह भी थी कि ज्यादा चूंचपड़ मत करना. मेरे हाथ काफी लंबे हैं. चुटकी बजा कर ऐसी जगह पर घुसेड़वा दूंगी, जहां से जीवन भर नहीं निकल पाएगा. और हां, अपनी इज्जत बचानी हो तो 5 लाख रुपए तैयार रखना.

प्रीति के ठग अंदाज का जिक्र करते हुए गुड्डू ने बताया कि उस ने डर के मारे प्रीति को 2.42 लाख रुपए और दिए, जिस से वह कहीं मुंह न खोले. लेकिन माल पाने के बाद तो वह और भी रंग बदलने लगी. रुपए और गिफ्ट ले कर यहांवहां बुलाने लगी. उस से दूर होने का प्रयास किया तो वह घर में आ कर पिटवा देने की धमकी देने लगी. कुछ ही दिनों में उस ने नकदी और गिफ्ट के रूप में 14.87 लाख रुपए ऐंठ लिए. आखिरकार उसे अपने बचाव में पुलिस की शरण लेनी पड़ी. पुलिस ने उस की शिकायत की शुरुआती पड़ताल करने के बाद प्रीति के खिलाफ भादंवि की धारा 420 व धारा 384 हफ्तावसूली के तहत केस दर्ज कर लिया.

मामला दर्ज करने के बाद पुलिस ने प्रीति के कामठी रोड स्थित प्रियदर्शिनी अपार्टमेंट के घर पर छापेमारी की. प्रीति वहां से चंपत हो गई थी. पुलिस ने उस के घर से काफी सामान और दस्तावेज बरामद किए. खुला भेद तो पुलिस भी रह गई दंग जिस पांचपावली पुलिस स्टेशन में प्रीति का आनाजाना लगा रहता था, उसी थाने की पुलिस उस के कारनामों की फेहरिस्त देख कर दंग रह गई. रिकौर्ड खंगालने पर पता चला कि प्रीति धोखाधड़ी के मामले में जेल की यात्रा कर चुकी है. उस के आपराधिक क्षेत्र के छोटेबड़े लोगों से भी करीबी संबंध है. उस के खिलाफ शहर के सीताबर्डी पुलिस स्टेशन में भादंवि की धारा 420, 406, 468, 467, 506, 507, 34 के  तहत प्रकरण दर्ज है.

धोखाधड़ी का वह प्रकरण शहर में काफी चर्चित हुआ था. इस के अलावा भंडारा के पुलिस स्टेशन में भी भादंवि की धारा 420 के तहत मुकदमा दर्ज था. शहर पुलिस के बड़े अधिकारियों के लिए यह जानकारी काफी चौंकाने वाली थी कि जिस महिला को वे केवल सामाजिक कार्यकर्ता समझ रहे थे वह ब्लैकमैलर है. यही नहीं वह पुलिस से संबंधों का नाजायज फायदा उठाती रहती है. शहर पुलिस की ओर से प्रीति के अपराधों की जानकारी जुटानी शुरू कर दी गई. बाकायदा प्रैस नोट जारी कर आह्वान किया गया कि इस महिला ने किसी से धोखाधड़ी की हो, तो तत्काल पुलिस से संपर्क करे.

इस बीच प्रीति फरार हो गई थी. पुलिस उसे ढूंढती रही. करीब हफ्ते भर प्रीति बचाव का रास्ता खोजती रही. उस ने वकील के माध्यम से जिला सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया. कोशिश यही थी कि पुलिस गिरफ्तारी से बचते हुए उसे न्यायालय से जमानत मिल जाए. लेकिन उस की कोशिशों पर पानी फिर गया. न्यायालय ने उस की अरजी खारिज कर दी. लिहाजा उस ने 13 जून को पांचपावली पुलिस स्टेशन में आत्मसमर्पण किया. उसे पुलिस तक पहुंचाने वालों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के अलावा पुलिस के कुछ नुमाइंदे भी शामिल थे.

गिरफ्तारी के बाद प्रीति को पुलिस रिमांड पर लिया गया. उस के खिलाफ पुलिस ने सबूत जुटाने शुरू किए. जांच में जुटी पुलिस यह जान कर दंग रह गई कि कुछ समय पहले तक मामूली मोपेड पर घूमने वाली प्रीति अब करोड़पति हो गई है. वह महंगी कारों से घूमती है. उस ने अपने करीबियों व रिश्तेदारों के नाम पर बेनामी संपत्ति खरीद रखी है. बंगला, खेती की जमीन के अलावा वह एक कंपनी की भी संचालक भी थी. अवैध वसूली के लिए उस ने बाकायदा एक संस्था रजिस्टर्ड करा रखी थी. लिहाजा पुलिस ने धर्मदाय आयुक्तालय, विजिलैंस विभाग के अलावा अन्य विभागों को पत्र लिख कर उस के बारे में आवश्यक जानकारी मांगी.

घर में हुआ अपमान तो कर लिया सुसाइड प्रीति के कारनामों की जानकारी जुटाई ही जा रही थी कि पुलिस अधिकारियों तक एक गुहार और पहुंची. गुहार यह कि एक व्यक्ति ने प्रीति और उस के साथियों के डर से सुसाइड कर लिया था. मृतक के परिवार को न्याय दिलाने के लिए यह शिकायत जूनी मंगलवारी निवासी वैशाली पौनीकर की थी. शिकायत के अनुसार वैशाली के पति सुनील पौनीकर ने अक्तूबर 2019 में सतीश सोनकुसरे से कुछ रकम कर्ज ली थी. सुनील पौनीकर मेस संचालक था. काम में घाटे के कारण उसे कर्ज लेना पड़ा था. सतीश सोनकुसरे ने कर्ज वापसी के लिए सुनील पर दबाव बनाया. लेकिन समय पर रुपए नहीं लौटा पाने पर उस ने प्रीति की मदद ली.

प्रीति यह भी दावा करती थी कि वह कर्ज वसूली का काम भी करती है. शहर के सारे बड़े पुलिस अफसर व नेता उस के पहचान के हैं. बतौर वैशाली पौनीकर, प्रीति ने सतीश सोनकुसरे से कर्ज वसूली की सुपारी ली थी. वह कुछ पुलिस कर्मचारियों की मदद से सुनील को प्रताडि़त करती थी. प्रीति की धमकी से किया सुसाइड एक दिन प्रीति सतीश सोनकुसरे और मंगेश पौनीकर को साथ ले कर सुनील के घर पर पहुंच गई. प्रीति ने सुनील को कर्ज नहीं लौटाने पर धमकी दी. उस के साथ कुछ पुलिस वाले भी थे, जो घर में आ कर मांबहन की गालियां दे गए. यहीं नहीं, वह बस्ती में नंगा घुमाने की धमकी दे रहे थे. धमकी और घिनौनी बातों से सुनील बुरी तरह आहत हुआ.

लिहाजा उस ने 27 नवंबर, 2019 की दोपहर ढाई बजे लकड़गंज थाना क्षेत्र के बाबुलवन प्राथमिक शाला के मैदान में जहर पी लिया. मेयो अस्पताल में उपचार के दौरान 30 नवंबर, 2019 को सुनील ने दम तोड़ दिया था. पुलिस ने आकस्मिक मौत का मामला दर्ज कर जांच जारी रखी. अब वैशाली पौनीकर की शिकायत पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर लकड़गंज थाने की पुलिस ने प्रीति व उस के साथियों के खिलाफ सुनील आत्महत्या मामले में आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण दर्ज कर तलाश शुरू कर दी. मेस संचालक को आत्महत्या के लिए उकसाने का प्रकरण लकड़गंज थाने में दर्ज हो ही रहा था कि जरीपटका थाने में एक और शिकायत पहुंची.

शिकायत यह थी कि आरोपी प्रीति ने धौंस दिखा कर 25 हजार रुपए ऐंठ लिए. शिकायतकर्ता पूर्णाबाई सडमाके का बेटा नीतेश वायुसेना में लिपिक था. 8 मार्च, 2019 को उस की प्रणिता से शादी हुई थी. शादी के 2 माह बाद ही प्रणिता की अपनी सास पूर्णाबाई से अनबन होने लगी. प्रणिता अपना सामान ले कर मायके चली गई. समझाने पर भी वह नहीं मानी. उस ने पुलिस के भरोसा सेल में पूर्णाबाई की शिकायत दर्ज करा दी. भरोसा सेल में पूर्णाबाई की प्रीति से भेंट हुई. प्रीति भरोसा सेल की एजेंट बन कर घूमती थी. उस ने विवाद निपटाने का झांसा दे कर पूर्णाबाई से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए नहीं देने पर उस के बेटे की नौकरी जाने का भय बताया. लिहाजा 17 अक्तूबर, 2019 को पूर्णाबाई ने प्रीति को 25 हजार रुपए दे दिए.

पूर्णाबाई ने प्रीति को फोन कर पूछताछ की. प्रीति ने बताया कि तुम्हारे बेटे का काम हो गया है. मैं ने मैडम को पैसे दे दिए हैं. बेटे से जुड़े मामले को ले कर एक बार पूर्णाबाई को भरोसा सेल की इंचार्ज इंसपेक्टर शुभदा शंखे ने पूछताछ के लिए बुलाया. उस दौरान पूर्णाबाई ने इंसपेक्टर शुभदा से सहज ही कह दिया कि मैं ने तो आप को 25 हजार रुपए दिए थे, फिर आप मुझ से इस तरह घुमावदार सवाल क्यों कर रही हो.  इंसपेक्टर शुभदा चौंकी. वह यह जान कर हैरान थी कि जिस प्रीति दास को वह सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर सम्मान देती रही, वह तो उस के नाम पर ही अवैध वसूलियां करने लगी है. लिहाजा, इंसपेक्टर शंखे ने पूर्णाबाई को शहर पुलिस के जोन-5 के उपायुक्त नीलोत्पल के पास भेजा.

पूर्णाबाई की शिकायत पर जरीपटका पुलिस ने आरोपी प्रीति के खिलाफ हफ्ता वसूली का मामला दर्ज कर लिया. 2 दिन बाद शहर पुलिस के पास एक और शिकायत पहुंची. शिकायतकर्ता युवती उच्चशिक्षित थी. उस के अनुसार उस के साथ एक युवक ने विवाह का झांसा दे कर दुष्कर्म किया था. प्रीति दास ने युवती को यह कह कर मदद का आश्वासन दिया था कि उस की पुलिस के बड़े अधिकारियों से खासी पहचान है. वह दुष्कर्म के आरोपी को सजा दिलाएगी. इस कार्य के लिए उस ने युवती से 25 हजार रुपए मांगे. रुपए मिलने के बाद प्रीति उस युवती से मिलती भी नहीं थी. ऐसे में एक रोज युवती ने प्रीति से तल्खी के साथ सवाल किया तो वह उसे धमकाने लगी. साथ ही यह औफर देने लगी कि उस की गैंग में शामिल हो जाए.

उस युवती का आरोप था कि प्रीति अकसर खूबसूरत युवतियों की मजबूरियों का फायदा उठाती है. युवतियों को पेश कर के वह रसूखदारों से मनचाहा माल वसूलती रहती है. 2 से 3 पुलिस कर्मचारी व अधिकारी को हनीट्रैप में फंसा देने का डर दिखा कर उसने कथित तौर पर लाखों की वसूली की है. उस ने यह भी बताया कि नागपुर में पश्चिम महाराष्ट्र के कई पुलिस अधिकारी बैचलर रहते हैं. उन का परिवार उन के गांव या शहर में है. लिहाजा उन्हें रात रंगीन कराने के एवज में प्रीति लगातार ब्लैकमेल करती रही है.

भंडारा पुलिस थाने में प्रीति के विरुद्ध दर्ज धोखाधड़ी के मामले में बताया गया कि वह नागपुर के बाहर के जिलों में खुद को बैंकर के तौर पर प्रचारित करती रही है. जरूरतमंदों को आसानी से लाखों का कर्ज दिलाने का झांसा देती रही है. उस के इस चक्रव्यूह में कुछ बैंक कर्मचारी व अधिकारी भी शामिल रहे हैं. दीवाने ही दीवाने प्रीति अपना पूरा नाम प्रीति ज्योतिर्मय दास लिखती है. 40 की उम्र की हो चली इस महिला के चेहरे से ही सादगी व शिष्टता झलकती है. लेकिन उस के शिकायतकर्ताओं की मानें, तो वह जैसी दिखती है वैसी है नहीं. उस की मित्रमंडली की फेहरिस्त में दीवाने ही दीवाने हैं.

उस के कारनामों के तराने न जाने कहांकहां गूंज रहे हैं. शिकायतकर्ता गुड्डू तिवारी की सुनें तो प्रीति कपड़ों की तरह रिश्ते बदलती है. लिबास ही नहीं, जरूरत हो तो वह जाति और धर्म भी बदल लेती है. कभी वह मसजिदों के इर्दगिर्द नजर आती है तो कभी गुरुद्वारे के आसपास. फर्राटेदार अंगरेजी तो बोलती ही है , मराठी और हिंदी में भी उस के तेवर तने रहते हैं. उस के जीवन में 4 लोगों के नाम प्रमुखता से जुड़े हैं. इन में एक मराठी, दूसरे कारोबारी हैं तो 2 मुसलिम हैं. चर्चा है कि अपना उल्लू सीधा करने के लिए उस ने संदीप दुधे, महेश गुप्ता, रफीक अहमद व मकसूद शेख से अलगअलग शादी रचाई. फिर उन को उस ने छोड़ दिया.

शिकायतकर्ता गुड्डू की शिकायत में इन नामों का जिक्र है. फिलहाल यह साफ नहीं हो पाया है कि प्रीति अपने पति से क्यों और कैसे दूर हुई. परिवार में उस की बुजुर्ग मां व बेटा है. खबर है कि प्रीति के पिता सेना में थे. पिता की मृत्यु के बाद उस की मां को अब पेंशन मिलती है. घर में अनुशासन व शिष्टाचार का पाठ तो मिलता रहा, लेकिन कहा जाता है कि प्रीति की हसरतों ने उसे नई राह पर ला दिया. उस की सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तसवीर पर लिखा है, ‘मेरी सादगी ही गुमनाम रखती है मुझे, जरा सा बिगड़ जाऊं तो मशहूर हो जाऊं.’

उसे करीब से जानने वालों का कहना है कि वह आपराधिक प्रवृत्ति की नहीं थी. लेकिन शोहरत और दौलत पाने का जुनून कुछ ऐसा सवार है कि वह हर हद से गुजर जाने का दंभ भरती है. वह अपनी सोशल इमेज चमकाने का निरंतर प्रयास करती रही. हालत यह है कि अब भी कुछ लोग उसे धोखेबाज मानने को तैयार नहीं है. प्रीति एक भाजपा पार्षद की सामाजिक संस्था से भी जुड़ी थी. लौकडाउन में जरूरतमंदों को राहत सामग्री देने के अभियान में वह पूरी ताकत के साथ जुटी रही. लिहाजा उस संस्था से जुड़े नेता ने तो उसे निर्दोष ठहराने का अभियान ही शुरू कर दिया है. दावे के साथ सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है— हमारी ताई को फंसाया जा रहा है. उस ने कोई अपराध नहीं किया है.

यह भी सुना जा रहा है कि प्रीति स्वयं को बैंकर बताती रही है. वह खुद को एक राजनीतिक दल के पदाधिकारियों द्वारा संचालित एक बैंक की संचालक के रूप में भी प्रचारित करती रही है. सदर क्षेत्र में उस बैंक के कार्यालय में उस के कारनामों के किस्से हैं. बैंक का मैनेजर भी सिर पर हाथ धरे रहता है. बैंक अधिकारी बताते हुए सीज किए हुए वाहन सस्ते में दिलाने के दावे के साथ धोखाधड़ी करने के उस के किस्से भी सुने जा रहे हैं. खास बात है कि प्रीति अकसर सादे लिबास में रहती है. उस का बर्ताव उच्चशिक्षित सा आकर्षक है.

हमपेशेवर सहेलियों ने की चुगली यह चर्चा भी जोरों पर है कि प्रीति के कारनामों की चुगली उस की हमपेशेवर सहेलियों ने की. राजनीति से ले कर सामाजिक कार्यों में ऐसी कई नईपुरानी कार्यकर्ता हैं, जिन की पहचान वसूली एजेंट के तौर पर है. अब सब के काम और सोच के तरीके अलगअलग हो गए हैं. इन में से कुछ को केवल यह बात खटक रही है कि प्रीति कम समय में बहुतों की चहेती बन गई. नेता, पुलिस से ले कर अन्य क्षेत्र के बड़े लोग भी उस के साथ उठनेबैठने लगे. प्रीति का सोशल मीडिया पर इमेज चमकाने का तरीका भी कइयों की आंखों में चुभने लगा था.

लिहाजा प्रीति की चुगली भी होने लगी थी. कभी वह इंसपेक्टर स्तर के अफसर के साथ बदनाम होती तो कभी नेता के घर उस के नाम पर पारिवारिक झगड़ा होता था. बताते हैं कि चुगली के चक्कर में एक पुलिस वाले ने प्रीति से कुछ बातों को ले कर सवाल किए थे, जिस पर वह थाने में ही भड़क गई थी. उस ने उस अफसर को भी खरीखोटी सुनाते हुए ज्यादा चूंचपड़ नहीं करने को कहा था. थाने में सिपाहियों के सामने हुए उस अपमान को अफसर भूल नहीं पाया. शहर में हनीट्रैप के कारनामों में लिप्त कुछ महिलाओं के लिए भी प्रीति आंख का कांटा बनी है. उन्हें लगता है कि यह कल की आई महिला सब को पीछे छोड़ कर काफी आगे निकल चुकी है.

सैक्स रैकेट, भोजनालयों, अवैध धंधों के अड्डों से पुलिस के नाम पर वसूली कर गुजारा करने वालों के लिए यह बात और भी खटकने वाली है कि प्रीति तो सीधे पुलिस अफसरों की गाडि़यों में ही घूमने लगी. आइडियाज क्वीन प्रीति को पहचानने वाले उसे अवैध वसूली की आइडियाज क्वीन भी कहते हैं. अपनी सोशल इमेज बनाते हुए वह सत्कार कार्यक्रम का आयोजन करती रही है. चर्चा के अनुसार वह सत्कार के लिए ऐसे लोगों की तलाश करती रहती है जो कार्यक्रम में  शौल, श्रीफल मिलने के बदले 10 से 20 हजार रुपए खर्च कर सकें.

कार्यक्रम आयोजन के नाम पर सहयोग के तौर पर वह हजारों रुपए जमा कर लेती है. उन कार्यक्रमों में पुलिस के बड़े अधिकारी या अन्य क्षेत्र के सम्मानित लोगों को आमंत्रित करती रही है. सत्कार कराने के इस खेल में भी वह मोटी रकम बटोरती है. बड़े पुलिस अफसरों के लिए मुखबिरी कर के भी वह अपने स्वार्थ साधती रही है. इस के अलावा विविध मामलों को ले कर वह अफसरों व नेता, मंत्री को निवेदन सौंपने में भी आगे रही है. पुलिस मित्र के तौर पर शहर के सभी 33 पुलिस थानों में उस की खास पहचान है. अफसरों की निजी पार्टी के अलावा नेताओं की पर्सनल बैठकों में वह शामिल होती रही है.

खुशियों के मौकों पर मनपा के बड़े नेता भी उस के साथ ठुमके लगाते दिखे. लिहाजा कइयों को यही लगता है कि प्रीति की प्रीत केवल उस से है. उसे होनहार कार्यकर्ता मानने वालों की भी कमी नहीं है. सत्कार करनेकराने का दौर कुछ ऐसा चला है कि शहर में जिम्मेदार वर्ग कहलाने वाले सभी क्षेत्रों के प्रतिष्ठितों के साथ वह मंच साझा कर चुकी है. नगर सेवक, महापौर, विधायक स्तर के जनप्रतिनिधि उस की खास मित्रमंडली में शामिल हैं. वह सब से पहले अपने शिकार के बारे में जानकारी लेती है. मनचाही खुशियों का दाना फेंक कर शिकार फांसने का गुर वह जान चुकी है.

हनीट्रैप के मामलों में उत्तर नागपुर में ही एक गिरोह चर्चा में रहा है. प्रीति का नाम आते ही वह हवा हो गया था. इस के अलावा कुछ आपराधिक मामलों में उस का नाम थानों तक पहुंचा, लेकिन पुलिस के रिकौर्ड में दर्ज नहीं हो पाया. बहरहाल कहा जा रहा है कि प्रीति के चक्कर में दास बने लोगों की लंबी कतार है. इन में कई सफेदपोश लोग भी हैं. उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही सारी हकीकत सामने आने लगेगी.

 

सैनिटरी पैड विवाद : प्रिंसिपल ने 68 लड़कियों के उतरवाए कपड़े

Social Crime : महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा को ले कर केंद्र और गुजरात सरकार भले ही लाख दावे करे लेकिन स्थिति इस के एकदम उलट है. गुजरात सरकार लड़कियों के मामले में कितनी संजीदगी दिखाती है, इस की एक झलक वहां के कच्छ शहर में स्थित एक इंस्टीट्यूट में घटी घटना से साफ झलकती है. इंस्टीट्यूट की प्रिंसपल ने जांच के नाम पर 68 छात्राओं के कपड़े उतरवा दिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृहराज्य गुजरात के कच्छ शहर में स्वामी नारायण संप्रदाय का सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट है.

इस इंस्टीट्यूट का नियम यह है कि जिस छात्रा को पीरियड आता है वह हौस्टल के कमरे के बजाय बेसमेंट में रहती है. पीरियड के खत्म हो जाने के बाद ही वह हौस्टल के कमरे में आती है. इतना ही नहीं पीरियड के दिनों में उसे पूजा करने की इजाजत भी नहीं होती और वह रसोईघर में भी नहीं घुस सकती. इतना ही नहीं ऐसी लड़कियों को उन दिनों क्लास में भी अंतिम बेंच पर बैठना पड़ता है और वह किसी लड़की को छू भी नहीं सकती. लेकिन फरवरी 2020 के दूसरे सप्ताह में इस इंस्टीट्यूट में घटी एक घटना ने 68 लड़कियों को अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर होना पड़ा.

हुआ यह कि इंस्टीट्यूट के गार्डन में प्रयोग किया हुआ सैनेटरी पैड मिला. वार्डन की निगाह जब उस पैड पर पहुंची तो उस ने सोचा कि यह पैड किसी लड़की ने टायलेट की खिड़की से गार्डन में फेंका होगा. तब वार्डन ने इंस्टीट्यूट की छात्राओं से इस बारे में पूछताछ की, लेकिन किसी भी छात्रा ने वह पैड फेंकने की बात नहीं स्वीकारी. यह बात वहां की प्रिंसपल के कानों तक पहुंची तो उन्हें यह बात बुरी लगी. इंस्टीट्यूट की प्रिंसपल ने सच जानने के लिए 13 फरवरी को 68 छात्राओं के कपड़े उतरवा कर के कच्छे चैक किए कि किनकिन छात्राओं को पीरियड हो रहे हैं और वह छात्रा कौन सी है जिस ने उसी तरह का पैड लगाया हुआ है जो गार्डन में मिला था.

यह जानकारी कच्छ यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक अधिकारियों को पता चली तो शर्मसार (Social Crime) कर देने वाली इस घटना को उन्होंने गंभीरता से लिया. इस के बाद तो सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट में हड़कंप मच गया.  यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस मामले की जांच के लिए 5 सदस्यों की एक कमेटी बनाई. इस कमेटी में शामिल वाइस चांसलर और 3 अन्य महिला प्रोफेसर ने सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट का दौरा कर अपनी जांच शुरू कर दी. इस जांच कमेटी ने छात्राओं आदि से पूछताछ करने के बाद अपनी जांच रिपोर्ट यूनिवर्सिटी प्रशासन को सौंप दी. रिपोर्ट के आधार पर प्रशासन ने इंस्टीट्यूट की प्रिंसपल सहित हौस्टल वार्डन और 2 हौस्टल असिसटैंट को दोषी ठहराते हुए उन्हें सस्पेंड कर दिया गया.

ज्ञात रहे कि स्वामीनारायण संप्रदाय के अनुयायी ने सन 2012 में लड़कियों के लिए एक कालेज की स्थापना की थी. जिस में लड़कियां को बीएससी, बीकौम, बीए की पढ़ाई की व्यवस्था की गई थी. बाद में सन 2014 में यह कालेज स्वामीनारायण कैंपस में शिफ्ट हो गया था. जिस में 12वीं कक्षा तक की लड़कियां पहले से ही पढ़ रही थीं. कालेज में करीब 1500 लड़कियां पढ़ती हैं. इस कैंपस में उच्च शिक्षा पाने वाली लड़कियों के लिए अलग हौस्टल की व्यवस्था नहीं है. कालेज की 68 छात्राएं भी कैंपस में पढ़ने वाली अन्य लड़कियों के साथ ही हौस्टल में रहती हैं.

क्योंकि यह इंस्टीट्यूट धार्मिक संप्रदाय का है इसलिए वहां रहने वाली लड़कियों के लिए जो नियम बनाए हैं उन का पालन करना सभी के लिए जरूरी है. लेकिन इस इंस्टीट्यूट की प्रिंसपल द्वारा 13 फरवरी, 2020 को की गई शर्मशार हरकत ने इस इंस्टीट्यूट को चर्चा के घेरे में खड़ा कर दिया. जिस का खामियाजा प्रिंसपल, हौस्टल वार्डन् और 2 हौस्टल असिसटेंट को भुगतना पड़ा.

 

UP News : पत्नी की हत्या कर शव पर एक क्विंटल का पत्थर बांधकर बांध में फेंका

UP News :कभीकभी अचानक ऐसा कुछ हो जाता है कि हम समझ तक नहीं पाते कि यह सब कैसे और क्यों हुआ. सच यह है कि यह वक्त की ताकत होती है, जो इंसान के कर्म के हिसाब से अपनी मौजूदगी का अहसास कराती है. भरत दिवाकर ने नमिता को ठिकाने लगाने की जो योजना बनाई थी, उस ने बनाते हुए सोचा भी नहीं होगा कि इस का उलटा भी हो सकता है. आखिर यह सब…,

15 जनवरी, 2020. उत्तर प्रदेश का जिला चित्रकूट. थाना भरतकूप के थानाप्रभारी संजय उपाध्याय अपने औफिस में बैठे थे. तभी भरतकूप के ही रहने वाले यशवंत सिंह उन के पास आए. यशवंत सिंह उत्तर प्रदेश पुलिस के रिटायर्ड सबइंसपेक्टर थे. यशवंत सिंह ने थानाप्रभारी को अपना परिचय दिया तो उन्होंने उन को सम्मान से कुरसी पर बैठाया. इस के बाद उन्होंने उन से आने का कारण पूछा तो यशवंत सिंह ने कहा, ‘‘सर, एक बहुत बड़ी प्रौब्लम आ गई है.’’

‘‘बताएं, क्या बात है?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘कल से मेरी बेटी नमिता का कहीं पता नहीं चल रहा है. मुझे आशंका है कि उस के पति पूर्व ब्लौक प्रमुख भरत दिवाकर ने उस की हत्या कर के लाश कहीं गायब कर दी है.’’

‘‘क्या?’’ यह सुनते ही एसओ संजय उपाध्याय चौंके, ‘‘आप की बेटी की हत्या कर के लाश गायब कर दी?’’

‘‘हां सर, भरत भी कल से ही लापता है. उस का भी कहीं पता नहीं है.’’ यशवंत सिंह ने बताया.

‘‘ठीक है, आप एक तहरीर लिख कर दे दें. मैं मुकदमा दर्ज कर आवश्यक काररवाई करता हूं. इस बारे में जैसे ही मुझे कोई सूचना मिलती है, आप को इत्तला कर दूंगा.’’ थानाप्रभारी ने कहा.

यशवंत सिंह ने अपने 35 वर्षीय दामाद भरत दिवाकर को नामजद करते हुए लिखित तहरीर दे दी. उस तहरीर के आधार पर पुलिस ने नमिता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद पुलिस ने जांचपड़ताल की तो मामला सही पाया गया. पड़ताल के दौरान एसओ उपाध्याय को पता चला कि 14 जनवरी, 2020 की रात करीब 10 बजे भरत दिवाकर को पत्नी नमिता के साथ गाड़ी में एक मिठाई की दुकान पर देखा गया था. उस के बाद से ही दोनों लापता थे. मामला गंभीर था. एसओ संजय उपाध्याय ने इसे बहुत संजीदगी से लिया. उन्होंने इस की सूचना एसपी अंकित मित्तल, एएसपी बलवंत चौधरी और सीओ (सिटी) रजनीश यादव को दे दी.

मामला समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व ब्लौक प्रमुख व उस की पत्नी के रहस्यमय ढंग से लापता होने से जुड़ा था. वैसे भी भरत दिवाकर कोई छोटामोटा आदमी नहीं था. वह खुद तो पूर्व ब्लौक प्रमुख था ही, उस की दादी दशोदिया देवी भी पूर्व ब्लौक प्रमुख थीं. दशोदिया देवी शहर की जानीमानी हस्ती थीं. इस परिवार का रुतबा था, शान थी, ऐसे में पुलिस का परेशान होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं थी. भरत दिवाकर और उस की पत्नी नमिता का पता लगना जरूरी था. उसी दिन सुबह 11 बजे के करीब भरत दिवाकर की बहन सुमन के मोबाइल पर एक काल आई थी. काल भरत दिवाकर के ड्राइवर रामसेवक निषाद ने की थी. उस ने सुमन को बताया कि भरत भैया रात करीब 2-3 बजे बरुआ सागर बांध पर आए थे. उन की गाड़ी में बोरे में कोई वजनी चीज थी. उन के साथ मैं भी था.

हम दोनों बोरे में भरी चीज को ले कर बांध के किनारे पहुंचे. वहां पहले से एक नाव खड़ी थी. हम दोनों बोरे को ले कर नाव पर सवार हुए और आगे बढ़ गए. बोरा बांध में पलटते वक्त अचानक नाव पानी में पलट गई. अपनी जान बचा कर मैं तो किसी तरह तैर कर पानी से बाहर निकल आया, लेकिन भैया पानी में डूब गए. रामसेवक निषाद की बाद सुन कर सुमन हतप्रभ रह गई. उस ने यह बात अपनी मां चुनबुद्दी देवी से बताई तो मां के भी होश फाख्ता हो गए. बीती रात से मांबेटी भरत के घर लौटने का इंतजार कर रही थीं. लेकिन वह घर नहीं लौटा. उस का फोन भी नहीं लग रहा था.

भरत दिन में भले ही कहीं भी रहता हो, शाम होते ही घर लौट आता था. जब वह रात भर घर नहीं लौटा तो उस के घर वालों को चिंता हुई. वे लोग उस की तलाश में जुट गए. उस के सारे यारदोस्तों से फोन कर के पूछ लिया गया, लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं चला. जब सुबह 11 बजे रामसेवक ने फोन से सुमन को सूचना दी तो घर वाले समझे कि भरत के साथ अनहोनी हो चुकी है. फिर क्या था, घर में कोहराम मच गया, रोनापीटना शुरू हो गया. ऐसे में सुमन ने थोड़े संयम से काम लिया.

उस ने भाई के साथ हुई अनहोनी की जानकारी समाजवादी पार्टी के जिलाध्यक्ष अनूप कुमार को दे कर मदद की गुहार लगाई. क्योंकि उस समय सुमन को यही ठीक लगा. भरत के बांध में डूबने की जानकारी होते ही वह भी सकते में आ गया. जिस बरुआ सागर बांध में घटना घटी थी, वह भरतकूप थाना क्षेत्र में पड़ता था. अनूप ने इस की जानकारी भरतकूप थाने के एसओ संजय उपाध्याय को दे दी. एसओ संजय ने शिवराम चौकीप्रभारी अजीत सिंह को सूचित किया और मौके पर पहुंचने के आदेश दिए. अजीत सिंह के मौके पर पहुंचने के कुछ देर बाद एसओ संजय सिंह पुलिस टीम के साथ बरुआ सागर बांध पहुंच गए.

बांध के किनारे भरत दिवाकर की सफेद रंग की कार यूपी26डी 3893 लावारिस खड़ी मिली. कार की तलाशी ली गई तो उस में एक पैर की लेडीज चप्पल मिली. सुमन ने चप्पल पहचान ली. वह चप्पल उस की भाभी की थी. पुलिस ने बरामद चप्पल साक्ष्य के तौर पर अपने कब्जे में ले ली. नमिता और भरत दिवाकर के गायब होने की खबर जिले भर में फैल गई. धीरेधीरे बांध पर लोगों की भीड़ जमा होने लगी. थोड़ी देर में  एएसपी बलवंत चौधरी, सीओ रजनीश यादव, कोतवाल अनिल सिंह, सपा के जिलाध्यक्ष अनूप कुमार और भरत दिवाकर के घर वाले भी पहुंच गए.

एएसपी बलवंत चौधरी ने एक नाव की व्यवस्था कराई. नाव के साथ ही एक गोताखोर और एक बड़े जाल का इंतजाम भी करवाया गया. पूरा इंतजाम हो जाने के बाद उन्होंने भरत का पता लगाने के लिए नाव में सवार हो कर बांध में उतरने का फैसला किया. पुलिस गोताखोर के साथ पूरा दिन बांध की खाक छानती रही लेकिन न तो भरत का कोई पता चला और न ही नमिता का. उधर पुलिस ने भरत दिवाकर के ड्राइवर रामसेवक निषाद को हिरासत में ले कर पूछताछ जारी रखी थी. लगातार चली कड़ी पूछताछ के बाद रामसेवक पुलिस के सामने टूट गया. उस ने जुर्म कबूलते हुए पुलिस को बताया कि भरत ने अपनी पत्नी नमिता की हत्या कर दी थी.

वे दोनों उस की लाश को बोरे में भर कर ठिकाने लगाने के लिए बरुआ बांध लाए थे. लाश ठिकाने लगाने में मैं ने उन का साथ दिया. गाड़ी में से लाश निकाल कर हम ने एक बोरे में भर दी. फिर हम ने दूसरे बोरे में करीब एक क्विंटल का पत्थर भर कर नमिता की कमर में बांध दिए, ताकि लाश पानी के ऊपर न आ सके और उस की मौत का राज सदा के लिए इसी बांध में दफन हो कर रह जाए. रामसेवक के बयान से साफ हो गया था कि भरत दिवाकर ने ही अपनी पत्नी नमिता की हत्या की थी और लाश ठिकाने लगाने के चक्कर में वह पानी में गिर कर डूब गया था. खैर, उस दिन पुलिस की मेहनत का कोई खास परिणाम नहीं निकला. शवों की बरामदगी के लिए एसपी अंकित मित्तल ने इलाहाबाद के स्टेट डिजास्टर रिस्पौंस फंड (एसडीआरएफ) से संपर्क कर मदद मांगी.

अगली सुबह यानी 16 जनवरी, 2020 की सुबह 11 बजे एसडीआरएफ की टीम चित्रकूट पहुंची और अपने काम में जुट गई. बांध काफी बड़ा और गहरा था. टीम को सर्च करते हुए सुबह से शाम हो गई, इस बीच नमिता की लाश तो मिल गई, लेकिन भरत दिवाकर का कहीं पता नहीं चला. बांध से नमिता की लाश मिलने के बाद पुलिस को यकीन हो गया कि भरत की लाश भी इसी बांध में कहीं फंसी पड़ी होगी. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के नमिता की लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. अगले दिन पुलिस को नमिता की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई.

रिपोर्ट में उस का गला दबा कर हत्या करने की पुष्टि हुई. यानी भरत दिवाकर ने नमिता की गला दबा कर हत्या की थी. अब सवाल यह था कि उस ने उस की हत्या क्यों की? इस का जवाब भरत से ही मिल सकता था, जबकि वह अभी भी लापता था. सच्चाई का पता लगाना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थी. आखिरकार नौवें दिन यानी 22 जनवरी को उस समय भरत दिवाकर का चैप्टर बंद हो गया, जब उस की लाश बांध के अंदर पानी में उतराती हुई मिली. इस से लोगों के बीच चल रही तरहतरह की अटकलों पर हमेशा के लिए विराम लग गया. नमिता हत्याकांड राज बन कर रह गया था. इस राज से परदा उठाना पुलिस के लिए लाजिमी हो गया था.

उधर पुलिस ने नमिता की लाश मिलने के बाद पति भरत दिवाकर और ड्राइवर रामसेवक निषाद के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 302, 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर रामसेवक को गिरफ्तार कर लिया था. उस ने भरत दिवाकर के साथ नमिता की लाश ठिकाने लगाने में उस का साथ दिया था. रामसेवक और घर वालों से हुई पूछताछ के बाद नमिता हत्याकांड की कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व एसआई यशवंत सिंह भरतकूप इलाके में परिवार के साथ रहते हैं. पत्नी विमला देवी और पांचों बच्चों के साथ वह खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे. उन के बच्चों में 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटियों में नमिता उर्फ मीनू तीसरे नंबर की थी. बेटा सब से बड़ा था. यशवंत सिंह ने उस की गृहस्थी बसा दी थी. चारों ननदों में से अर्चना की नमिता से ही अच्छी पटती थी. अर्चना नमिता की भाभी ही नहीं, अच्छी सहेली भी थी. वह अपने दिल की हर बात, हर राज भाभी से शेयर करती थी. भरत दिवाकर से प्रेम वाली बात जब नमिता ने अर्चना से बताई तो वह चौंके बिना नहीं रह सकी. ननद नमिता को उस ने बड़े प्यार से समझाया कि अपनी और घर की मानमर्यादा का खयाल जरूर रखे. कहीं कोई ऐसा कदम न उठाए जिस से जगहंसाई हो.

भाभी को उस ने विश्वास दिलाया कि वह कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जिस से मांबाप का सिर समाज में झुके. उस के बाद उस ने भाभी से अपने प्यार की कहानी सिलसिलेवार बता दी थी. बात नमिता के कालेज के दिनों की है. उन्हीं दिनों कालेज में भरत दिवाकर भी पढ़ता था. कालेज में नमिता की खूबसूरती के खूब चर्चे थे. नमिता के दीवानों में भरत दिवाकर भी था, जो उस की खूबसूरती पर फिदा था. कालेज में आने के बाद भरत पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय नमिता के पीछे चक्कर काटता रहता था. आखिरकार नमिता कुंवारे दिल को कब तक अपने दुपट्टे के पीछे छिपाए रखती. अंतत: उस के दिल के दरवाजे पर भरत दिवाकर के प्यार का ताला लग ही गया.

खूबसूरत नमिता ने भरत की आंखों के रास्ते उस के दिल की गहराई में मुकाम बना लिया था. दिन के उजाले में भरत की आंखों के सामने मानो हर घड़ी नमिता की मोहिनी सूरत थिरकती रहती थी. नमिता के दिल में भी ऐसी ही हलचल मची थी, जैसे किसी शांत सरोवर में किसी ने कंकड़ फेंक कर लहरें पैदा कर दी हों. भरत दिवाकर और नमिता के दिलों में मोहब्बत की मीठीमीठी लहरें उठने लगीं. दोनों एकदूसरे की सांसों में समा चुके थे. चाहत दोनों ओर थी, सो धीरेधीरे बातें शुरू हुईं और फिर दोनों मिलने भी लगे. इस से चाहत भी बढ़ती गई और नजदीकियां भी. प्यार की इस बुनियाद को पक्का करने के लिए दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया.

प्यार की राह में नमिता ने कदम आगे बढ़ा तो लिया था, लेकिन उस के अंजाम को सोच कर वह सिहर उठी थी. वह जानती थी कि उस के प्यार पर उस के पिता स्वीकृति की मोहर नहीं लगाएंगे. अपने प्यार को पाने के लिए उसे घर वालों से बगावत करनी होगी. इस के लिए वह मानसिक रूप से तैयार थी. आखिरकार सन 2014 में नमिता ने घरपरिवार से बगावत कर के प्यार की राह थाम ली और भरत दिवाकर की दुलहन बन गई. भरत और नमिता ने कोर्टमैरिज कर ली. अनमने ढंग से ही सही भरत के घर वालों ने नमिता को स्वीकार कर लिया था.

बेटी द्वारा उठाए कदम से यशवंत सिंह की बरसों की कमाई सामाजिक मानमर्यादा धूमिल हो गई थी. पिता ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन का अपना खून अपनों को ही कलंकित कर देगा. जिस दिन बेटी ने अपनी मरजी से पिता की दहलीज लांघी थी, उसी दिन से उन्होंने सीने पर पत्थर रख कर नमिता से हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया था. परिवार से उन्होंने कह दिया था कि आज के बाद नमिता हमारे लिए मर चुकी है. गलती से जिस ने भी उस से रिश्ता जोड़ने की कोशिश की, वह भी मरे के समान होगा. यशवंत सिंह के फैसले से सब डर गए और अपनेअपने दिलों से नमिता की यादों को सदा के लिए निकाल फेंका. उस दिन के बाद यशवंत सिंह के घर में नमिता नाम का चैप्टर बंद हो गया.

भरत दिवाकर नमिता को पा कर बेहद खुश था, नमिता भी खुश थी. दिवाकर की रगों में दशोदिया देवी के खानदान का खून दौड़ रहा था, जहां से राजनीति की धारा फूटती थी. लोग दशोदिया देवी की कूटनीति का लोहा मानते थे तो पौत्र कहां पीछे रहने वाला था. उसे जो पसंद आ जाता था, उसे हासिल कर के ही दम लेता था. इसी के चलते वह अपनी पसंद की दुलहन घर लाया था. भरत ने दादी से राजनीति का ककहरा सीख लिया था. राजनीति के अखाड़े में मंझा पहलवान बन कर उतरे भरत ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया. वह जानता था कि राजनीति अवाम पर हुकूमत करने के लिए एक सुरक्षा कवच है और बहुत बड़ी ताकत भी. वह इस ताकत को हासिल कर के ही रहेगा.

अपनी मेहनत और संपर्कों के बल पर उस ने पार्टी और कर्वी ब्लौक में अच्छी छवि बना ली थी. इस का परिणाम भरत के हक में बेहतर साबित हुआ. भरत दिवाकर कर्वी ब्लौक का प्रमुख चुन लिया गया. ब्लौक प्रमुख चुने जाने के बाद यानी सत्ता का स्वाद चखते ही उस के पांव जमीन पर नहीं रहे. सत्ता के गुरूर में भरत अंधा हो चुका था. इतना अंधा कि वह यह भी भूल गया था उस की एक पत्नी है, जिस ने अपने परिवार से बगावत कर के उस का दामन थामा था. पत्नी के प्रति फर्ज को भी वह भूल गया था. कल तक भरत जिस नमिता के पीछे भागतेभागते थकता नहीं था, अब उसे देखने के लिए उस के पास वक्त नहीं होता था. यह बात नमिता को काफी खलती थी. इस की एक खास वजह यह थी कि न तो उसे परिवार का प्यार मिल रहा था और न ही किसी का सहयोग.

घर भौतिक सुखसुविधाओं से भरा था. भरत के मांबाप ने नमिता को भले ही अपना लिया था, लेकिन उसे बहू का दरजा नहीं दिया गया था. कोई उस से बात तक करना पसंद नहीं करता था. ऐसे में पति का ही एक सहारा था. लेकिन वह भी सत्ता की चकाचौंध में खो गया था. अब नमिता को अपनी भूल का अहसास हो रहा था. मांबाप की बात न मान कर उस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली थी. अब वह वापस घर भी नहीं लौट सकती थी. पिता ने उस से सारे रिश्ते तोड़ कर सदा के लिए दरवाजा बंद कर दिया था.

नमिता को भविष्य की चिंता सताने लगी थी. चिंता करना इसलिए जायज था, क्योंकि वह भरत के बच्चे की मां बन चुकी थी. समय के साथ उस ने एक बेटी को जन्म दिया था, जिस का नाम तान्या रखा गया था. बेटी के भविष्य को ले कर नमिता चिंता में डूबी रहती थी. ससुराल की रुसवाइयां और पति की दूरियां नमिता के लिए शूल बन गई थीं. भरत कईकई दिनों तक घर से बाहर रहता था और जब लौटता था तो शराब के नशे में धुत होता था. पति का घर से बाहर रहना फिर भी नमिता ने सहन कर लिया था, लेकिन शराब पी कर घर आना उसे कतई बरदाश्त नहीं था.

एक रात वह पति के सामने तन कर खड़ी हो गई, ‘‘मैं नहीं जानती थी कि आप ऐसे निकलेंगे. आप ने मेरी जिंदगी नर्क से बदतर बना दी और खुद शराब की बोतलों में उतर गए. मैं सिर्फ इस्तेमाल वाली चीज बन कर रह गई हूं, जिसे इस्तेमाल कर के कपड़े के गट्ठर की तरह कोने में फेंक दिया गया है. कभी सोचा आप ने कि मैं आप के बिना कैसे जीती हूं?’’

दोनों हथेलियों से आंसू पोंछते हुए वह आगे बोली, ‘‘मैं ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस के लिए मैं अपना सब कुछ न्यौछावर कर रही हूं, वह शराबी निकलेगा, सितमगर निकलेगा. अरे मेरा न सही कम से कम बेटी के बारे में तो सोचते, जो इस दुनिया में अभीअभी आई है. कैसे जालिम पिता हो आप, ढंग से गोद में उठा कर प्यार भी नहीं कर सकते?’’

नशे में धुत भरत चुपचाप खड़ा पत्नी की डांट सुनता रहा. उस से ढंग से खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था. शरीर हवा में झूमता रहा. फिर वह बिस्तर पर जा गिरा और पलभर में खर्राटें भरने लगा. नमिता से जब बरदाश्त नहीं हुआ तो उस ने अपनी नाक पल्लू से ढंक ली. फिर उसे घूरती हुई बोली, ‘‘मेरी तो किस्मत ही फूटी थी जो इन से शादी कर ली. उधर मायका छूट गया और इधर… कितनी बदनसीब हूं मैं जो किसी के कंधे पर सिर रख कर आंसू भी नहीं बहा सकती.’’

उस दिन के बाद पति और पत्नी के बीच तल्खी बढ़ गई. छोटीमोटी बातों को ले कर दोनों के बीच विवाद होने लगे. पतिपत्नी के साथ हाथापाई की नौबत आने लगी. अब तो जब भी भरत शराब के नशे में घर लौटता, अकारण ही पत्नी के साथ मारपीट करता. दोनों के रोजरोज की किचकिच से घर युद्ध का मैदान बन गया था. बेटे और बहू के झगड़ों से तंग आ कर मांबाप ने उन्हें घर छोड़ कहीं और चले जाने को कह दिया. मांबाप का तल्ख आदेश सुन कर भरत गुस्से में तिलमिला उठा. उस ने सारा दोष पत्नी के मत्थे मढ़ दिया कि उसी की वजह से घर में अशांति फैली है. गलत वह खुद था न कि नमिता. लेकिन पुरुष होने के नाते उस की नजर में गलत नमिता थी, सो वह नमिता को ही मिटाने की सोचने लगा.

नमिता से छुटकारा पाने के लिए भरत ने मन ही मन एक खतरनाक योजना बना ली. योजना को अंजाम देने के लिए उस ने मोहल्ले में ही थोड़ी दूरी पर किराए का एक कमरा ले लिया और पत्नी और बेटी को ले कर वहां शिफ्ट कर गया. अपनी खतरनाक योजना में उस ने अपने ड्राइवर और ठेका पट्टी की देखभाल करने वाले रामसेवक निषाद को मिला लिया. दरअसल भरत का 5 साल का ब्लौक प्रमुख का कार्यकाल पूरा हो चुका था, ब्लौक प्रमुख की कुरसी जा चुकी थी. उस के बाद उसे भरतकूप थानाक्षेत्र स्थित बरुआ सागर बांध का ठेका पट्टा मिल गया था. उस ने वहां बड़े पैमाने पर मछलियां पाल रखी थीं. मछलियों के व्यापार से उसे काफी अच्छी आय हो जाती थी. इस की देखरेख उस ने अपने विश्वासपात्र ड्राइवर रामसेवक को सौंप रखी थी. वह मछलियों की रखवाली भी करता था और मालिक की गाड़ी भी चलाता था. यह बात अक्तूबर 2019 की है.

राजनीति के मंझे खिलाड़ी भरत दिवाकर ने पत्नी नमिता से छुटकारा पाने की ऐसी योजना बना रखी थी कि किसी को उस पर शक ही न हो. उस ने ऐसा जाल इसलिए बिछाया था ताकि उस का राजनीतिक कैरियर बचा रहे. इस के बाद उस ने पत्नी को विश्वास में लेना शुरू कर दिया. भरत ने नमिता को यकीन दिलाते हुए कहा, ‘‘नमिता, बीते दिनों जो हुआ उसे भूल जाओ. अब से हम एक नई जिंदगी की शुरुआत करते हैं, जहां हमारे अलावा चौथा कोई नहीं होगा. जो हुआ, अब वैसा कभी नहीं होगा. इसीलिए मैं ने घर वालों से दूर हो कर यहां अलग रहने का फैसला किया है.’’

पति की बातें सुन कर नमिता की आंखें भर आईं. दरअसल, भरत चाहता था कि नमिता उस के बिछाए जाल में चारों ओर से घिर जाए. अपने मकसद में वह कामयाब भी हो गया था. भोलीभाली नमिता पति के छलावे को नहीं समझ पाई थी. अपनी योजना के अनुसार भरत ने 14 जनवरी, 2020 को बेटी तान्या को बड़ी साली के घर पहुंचा दिया. रात 8 बजे के करीब भरत नमिता से बोला, ‘‘एक दोस्त के यहां पार्टी है. पार्टी में शहर के बड़ेबड़े नामचीन लोग शामिल हो रहे हैं, तुम भी अच्छे कपड़े पहन कर तैयार हो जाओ. बहुत दिन से मैं ने तुम्हें कहीं घुमाया भी नहीं है. आज पार्टी में चलते हैं.’’

यह सुन कर नमिता खुश हुई. वह फटाफट तैयार हो गई. रात करीब 9 बजे दोनों अपनी कार से मुलायमनगर की एक मिठाई की दुकान पर पहुंचे. वहां से भरत ने मिठाई खरीदी. यहीं पर भरत से एक चूक हो गई. मिठाई खरीदते समय उस की और नमिता की एक साथ की तसवीर सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. यही नहीं, वहां से निकलने के बाद दोनों ने एक होटल में खाना भी खाया. वहां भी खाना खाते समय दोनों सीसीटीवी में कैद हो गए. इसी सीसीटीवी फुटेज के जरिए पुलिस की जांच को गति मिली थी. बहरहाल, खाना खाने के बाद भरत और नमिता होटल से निकले. भरत ने ड्राइवर रामसेवक को इशारों में संकेत दिया कि कार बरुआ सागर बांध की ओर ले चले.

मालिक का इशारा पा कर उस ने यही किया. रामसेवक कार ले कर सुनसान इलाके में स्थित बांध की ओर चल दिया. भरत और नमिता कार की पिछली सीट पर बैठे थे. गाड़ी जैसे ही शहर से दूर सुनसान इलाके की ओर बढ़ी, तो निर्जन रास्ते को देख नमिता को पति पर शक हुआ क्योंकि उस ने पार्टी में जाने की बात कही थी. नमिता ने जैसे ही सवालिया नजरों से पति की ओर देखा तो वह समझ गया कि नमिता खतरे को भांप चुकी है. आखिर उस ने चलती कार में ही अपने मजबूत हाथों से नमिता का गला घोंट कर उसे मौत के घाट उतार दिया. योजना के मुताबिक, भरत ने पहले से ही कार की पीछे वाली सीट के नीचे एक प्लास्टिक का बड़ा बोरा रख लिया था. यही नहीं, बरुआ सागर बांध में लाश ठिकाने लगाने के लिए दिन में ही एक नाव की व्यवस्था भी कर ली थी.

इस काम के लिए भरत ने हरिहरपुर निवासी नाव मालिक रामसूरत से एक नाव की व्यवस्था करने के लिए कह दिया था. बदले में उस ने रामसूरत को कुछ रुपए एडवांस में दे दिए थे. रामसूरत ने भरत से नाव के उपयोग के बारे में पूछा तो उस ने डांट कर चुप करा दिया था. सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. लाश ठिकाने लगाने के लिए भरत रात 12 बजे के करीब कार ले कर बरुआ सागर बांध पहुंचा. बांध से कुछ दूर पहले रामसेवक ने कार रोक दी. दोनों ने मिल कर कार में से नमिता की लाश नीचे उतारी और उसे बोरे में भर दिया. फिर बोरे के मुंह को प्लास्टिक की एक रस्सी से कस कर बांध दिया.

उस के बाद बोरे के एक सिरे को भरत ने पकड़ लिया और दूसरा सिरा रामसेवक ने. दोनों बोरे को ले कर नाव के करीब पहुंच गए. वहां दोनों ने एक दूसरे बोरे में करीब एक क्विंटल का बड़ा पत्थर भर दिया, जिसे लाश की कमर में बांध दिया गया. ऐसा इसलिए किया गया ताकि लाश उतरा कर पानी के ऊपर न आने पाए और राज हमेशा के लिए पानी में दफन हो कर रह जाए. भरत दिवाकर और रामसेवक ने दोनों बोरों को उठा कर नाव में रख दिया. फिर दोनों नाव में इत्मीनान से बैठ गए. नाव की पतवार रामसेवक ने संभाल रखी थी. कुछ ही देर में दोनों नाव ले कर बीच मंझधार में पहुंच गए, जहां अथाह गहराई थी. भरत ने रामसेवक को इशारा किया कि लाश यहीं ठिकाने लगा दी जाए.

इत्तफाक देखिए, जैसे ही दोनों ने लाश नाव से गिरानी चाही, नाव में एक तरफ अधिक भार हो गया और वह पानी में पलट गई. नाव के पलटते ही लाश सहित वे दोनों भी पानी में जा गिरे. रामसेवक तैरना जानता था, इसलिए वह तैर कर पानी से निकल आया और बांध पर खड़े हो कर मालिक भरत की बाट जोहने लगा. घंटों बीत जाने के बाद जब वह पानी से बाहर नहीं आया तो रामसेवक डर गया कि कहीं मालिक पानी में डूब तो नहीं गए. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह अपने घर लौट आया और इत्मीनान से सो गया. अगली सुबह यानी 15 जनवरी को उस ने भरत की छोटी बहन सुमन को फोन कर के भरत के बरुआ सागर बांध में डूब जाने की जानकारी दी.

इधर बेटी के अचानक लापता होने से परेशान पिता यशवंत सिंह ने भरत दिवाकर को आरोपी मानते हुए भरतकूप थाने में शिकायत दर्ज करा दी. बाद में बरुआ सागर बांध से नमिता की लाश पाए जाने के बाद पुलिस ने भरत दिवाकर और रामसेवक निषाद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. घटना के 9 दिनों बाद उसी बरुआ सागर से भरत दिवाकर की भी सड़ीगली लाश बरामद हुई, जो भोलीभाली पत्नी नमिता की हत्या को राज बनाना चाहता था. प्रकृति में भरत दिवाकर को अपने तरीके से अनोखी मौत दे कर नमिता को हाथोंहाथ इंसाफ दे दिया.

—कथा में कुछ नाम परिवर्तित हैं. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana News : शक के चलते पति ने खाना बनाती भाजपा नेता पत्नी को मारी गोली

Haryana News : मुनेश गोदारा ने मेहनत और काबिलियत से भारतीय जनता पार्टी में खास मुकाम हासिल कर लिया था. लेकिन उस के पति सुनील गोदारा को शक था कि उस की पत्नी के एक नेता से अवैध संबंध हैं, इसलिए वह पत्नी से राजनीति छोड़ने को कहता था. मुनेश राजनीति में एक शख्सियत बन चुकी थी, सो उस ने राजनीति छोड़ने से साफ मना कर दिया. फिर एक दिन सुनील जानबूझ कर ऐसा अपराध कर बैठा कि…

हरियाणा प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा की प्रदेश महामंत्री 35 वर्षीय मुनेश गोदारा उभरती हुई एक राजनेत्री थी. इतने बड़े पद पर रहते हुए भी वह अपना काम स्वयं करने में यकीन रखती थी. चाहे वह घरेलू काम हो अथवा रसोई के, जब तक वह खुद से नहीं करती थी उसे चैन नहीं आता और बच्चे भी अधीर रहते थे. गुरुग्राम (हरियाणा) के सेक्टर-10ए, स्पेस सोसाइटी के 8वीं मंजिल पर रहने वाली मुनेश गोदारा कुछ ही देर पहले बड़े भाई सुनील कुमार जाखड़ के घर से हो कर आई थी. दरअसल, छोटे भाई के बेटे की तबीयत खराब थी, उसे ही देखने मुनेश अकेली मायके आई थी. उस के मायके वाले सेक्टर-83 में रहते थे जो कि उस के फ्लैट से थोड़ी दूरी पर स्थित था.

उस समय रात के लगभग 8 बज रहे थे. रात गहराती चली गई तो बड़े भाई सुनील जाखड़ ने मुनेश से कहा भी था कि आज रात वह वहीं रुक जाए और सुबह होते ही वह उसे घर पहुंचा देंगे. लेकिन मुनेश वहां रुकने के लिए तैयार नहीं हुई थी. उस ने बड़े भाई से कहा, ‘‘भैया, भतीजे को देखने आई थी, सो देख लिया. तुम तो मेरी दोनों बेटियों की आदत को जानते ही हो, घर नहीं पहुंची तो दोनों सिर पर पहाड़ उठा कर तांडव करने लगेंगी और बगैर कुछ खाएपीए भूखे ही सो जाएंगी. इसलिए मुझे जाना ही पड़ेगा. फिर कल सुबह मोंटी के दाखिला के लिए आर्मी स्कूल जाना होगा. तुम तो जानते हो भैया, आर्मी स्कूल है, वहां का नियमकानून बहुत सख्त होता है. जरा सी लापरवाही हुई तो बेटी का दाखिला होने से रुक भी सकता है और फिर भैया, आप ही बताओ किस लड़की को अपना मायका प्यारा नहीं होता.

अपना मायका सभी लड़कियों को प्यारा होता है. उन का बस चले तो जीवन भर यहीं रुक जाएं. इसलिए आज मत रोको. लेकिन मैं जल्दी ही आऊंगी तुम से मिलने, समझे.’’

बहन की शरारत भरी बातों को सुन कर सुनील खिलखिला कर हंस पड़े तो मुनेश से भी अपनी हंसी नहीं रोकी जा सकी. वह भी ठहाका मार कर हंसने लगी. फिर वहां से उठी और निजी वाहन से सेक्टर-93 स्थित अपने घर लौट आई. मायके से घर पहुंचने में मुश्किल से 20 मिनट का समय लगा था. उस समय रात के 9 बज रहे थे. मुनेश की दोनों बेटियां अपने कमरे में बैठी पढ़ रही थीं. फटाफट कपड़े बदल कर मुनेश सीधे रसोई में जा पहुंची और खाना पकाने में जुट गई थी. वह जान रही थी कि बेटियों के पेट में चूहों ने अपना करतब दिखाना शुरू कर दिया होगा. जरा सी और देर हुई तो उन दोनों से भूख सहन नहीं होगी.

उस समय तक उस का पति सुनील गोदारा अपनी ड्यूटी से लौटा नहीं था. वह एक सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी करता था. यहां एक बात साफ कर देना चाहता हूं मुनेश के पति और उस के भाई दोनों का ही नाम सुनील था. फर्क सिर्फ इतना कि मुनेश के पति के नाम के आगे गोदारा लगा हुआ था जबकि भाई के नाम के आगे जाखड़ था. मुनेश ने रोटियां बना ली थीं. गैस के दूसरे चूल्हे पर कड़ाही चढ़ा सब्जी के लिए तड़का लगाने जा रही थी. तभी उस के फोन की घंटी बजी. मुनेश ने स्क्रीन पर नजर डाली तो वह वीडियो काल थी. उस की छोटी बहन मनीषा ने काल की थी. मुनेश गैस बंद कर बहन से बात करने में मशगूल हो गई थी. उसी समय पति सुनील गोदारा ड्यूटी से घर लौट आया.

करीब 16 साल सेना में नौकरी करने के बाद वह वहां से रिटायर हो गया था. रिटायर होने के बाद से वह सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी कर रहा था. खैर, कमरे में घुसते ही सुनील गोदारा ने बेटियों से उन की मां के बारे में पूछा तो बड़ी बेटी प्रीति ने बता दिया मां रसोई में है, खाना पका रही है. बेटी का जवाब सुन कर सुनील जिस हालत में था, उसी हालत में रसोई की ओर बढ़ गया. सुनील का मजबूत जिस्म हवा में लहरा रहा था. उस के पांव यहांवहां पड़ रहे थे. उस ने रोज की तरह उस दिन भी जम कर शराब पी रखी थी. किचन के दरवाजे के पास पहुंचा तो देखा कि पत्नी दरवाजे की ओर अपनी पीठ कर के फोन पर किसी से हंसहंस कर बातें करने में व्यस्त थी. उसे पति के आने का आभास भी नहीं हुआ. ये देख कर सुनील का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया.

सुनील ने बीवी को एक भद्दी सी गाली दी. गाली की आवाज कान के पर्दों से टकराते ही मुनेश बुरी तरह से चौंक गई. उस के हाथ से फोन गिरतेगिरते बचा. फिर उस ने पलट कर देखा सामने पति सुनील खड़ा था. उस ने रोजाना की तरह आज भी जम कर शराब पी रखी थी. उस के पैर डगमगा रहे थे. मुनेश कुछ कहती इस के पहले ही सुनील उस पर चीखा, ‘‘हरामजादी, कुतिया… हजार बार मैं ने तुझे मना किया था कि तू अपनी आदत सुधार ले. उस कमीने से अपने रिश्ते तोड़ ले और अपनी घरगृहस्थी और बच्चों को संभालने में लग, लेकिन तू है कि तेरी मोटी बुद्धि में मेरी कोई बात आसानी से घुसती ही नहीं. लाख समझाता हूं, तेरे भेजे में घुसता ही नहीं. तेरे कारण मैं ने जिंदगी नर्क बना ली है.

तुझ से मैं तंग आ चुका हूं. रोजरोज की किचकिच से आज मैं किस्सा ही मिटा देता हूं. कहते ही नशे में चूर सुनील गोदारा ने होलेस्टर से अपनी सर्विस रिवाल्वर निकाली और 2 गोलियां बीवी के पेट और सीने में दाग दीं. गोली लगते ही मुनेश हाथ में फोन लिए फर्श पर धड़ाम से गिर गई और उस के मुंह से आखिरी शब्द निकला, ‘‘बहन… तेरे जीजा सुनील ने गोली मार दी है.’’ इतना कहते ही मुनेश की सांसें थम गईं. गोली की आवाज सुनते ही प्रीति और मोंटी दौड़ीभागी रसोई में पहुंची तो देखा मां चित अवस्था में फर्श पर पड़ी अपने ही खून में सनी दम तोड़ चुकी हैं. उस के पापा सुनील गोदारा वहां नहीं थे. दोनों को समझते देर न लगी कि पापा ने मम्मी की गोली मार कर हत्या कर दी और फरार हो गए. प्रीति और मोंटी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि ऐसे में वे क्या करें? मां की लाश के पास दोनों खड़ी जोरजोर से चीखचिल्ला रही थीं.

अचानक गोदारा के घर से रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी वहां जमा हो गए थे. हंसमुख मुनेश की हत्या की खबर सुन कर सभी हतप्रभ रह गए थे. इधर तब तक मनीषा ने बहन की हत्या की खबर बड़े भाई सुनील कुमार जाखड़ को दे दी थी. बहन की हत्या की खबर सुनते ही उन्हें जैसे काठ मार गया हो, ऐसे हो गए थे. सुनील आननफानन में अपने निजी वाहन से मुनेश के घर सेक्टर-93, स्पेस सोसाइटी पहुंच गए. इस बीच प्रीति अपने बाबा चंद्रभान गोदारा को मां की हत्या की खबर फोन से दे चुकी थी. वो चरखी दादरी में दादी के साथ रहते थे. बहू की हत्या की खबर सुनते ही पिता की बूढ़ी आंखे पथरा सी गईं. उन के पांव लड़खड़ा से गए और वो बिस्तर पर जा गिरे. उन्हें बेटे की घिनौनी करतूत पर घिन आ रही थी.

खैर, होनी को कौन टाल सकता है, जो होना है वो तो हो कर रहता है. बहू की हत्या की जानकारी होते ही ससुर चंद्रभान गोदारा आननफानन में सेक्टर-93 पहुंचे. अब तक यह खबर जंगल में आग की तरह समूचे गुरुग्राम में फैल चुकी थी. मुनेश कोई छोटीमोटी हस्ती नहीं थी. वह भाजपा किसान मोर्चा की प्रदेश महामंत्री थी. हरियाणा राज्य में तेजी से उभरती हुई राजनेत्री थी. राजनीति में उस ने अपना अच्छा मुकाम बना लिया था. बड़ेबड़े नेताओं से उस के अच्छे संबंध थे. इन्हीं के बल पर वह मजलूमों और गरीबों के हक की लड़ाई लड़ती थी. प्रदेश महामंत्री मुनेश गोदारा की हत्या की खबर मिलते ही सेक्टर-93 में धीरेधीरे भाजपा कार्यकर्ताओं और उस के शुभचिंतकों का जमावड़ा होने लगा था. ससुर चंद्रभान ने थाना सेक्टर-10 ए के थानेदार संजय कुमार को फोन कर के घटना की जानकारी दी.

घटना की सूचना मिलते ही थानेदार संजय कुमार आननफानन में फोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय रात के 11 बज रहे थे. मामला हाईप्रोफाइल था, इसलिए थानेदार संजय ने घटना की सूचना कमिश्नर मोहम्मद आकिल, डीसीपी (ईस्ट) चंद्र मोहन, डीसीपी (वेस्ट) सुमेर सिंह और एसीपी (सिटी) राजिंदर सिंह को दे दी थी. इधर भाजपा कार्यकर्ता हत्यारे पति सुनील गोदारा को जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की मांग कर रहे थे. घटना की सूचना मिलते ही पुलिस अधिकारी मौके पर पहुंच गए थे. मौके पर नारेबाजी कर रहे भाजपा कार्यकर्ताओं को उन्होंने समझाबुझा कर शांत किया और उन्हें भरोसा दिया कि जल्द से जल्द हत्यारा पकड़ लिया जाएगा. कानून को अपना काम करने दें. पुलिस अधिकारियों के आश्वासन के बाद वे शांत हुए.

पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. लाश चित अवस्था में थी. मृतका के हाथ में मोबाइल फोन था. पुलिस ने सब से पहले मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिया. फिर किचन की तलाशी ली. तलाशी के दौरान मौके से कारतूस के 2 खोखे बरामद हुए. पुलिस ने मृतका मुनेश की दोनों बेटियों प्रीति और मोंटी से हत्या के बारे में पूछताछ की. दोनों ने पिता के ऊपर आरोप लगाते हुए मां को गोली मारने की बात कही थी. मतलब साफ था कि पति सुनील गोदारा ने ही मुनेश की गोली मार कर हत्या की थी. घटना को अंजाम देने के बाद वह मौके से अपनी एसेंट कार में बैठ कर फरार हुआ था.

पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दी. मृतका के ससुर चंद्रभान गोदारा ने बहू की हत्या के लिए अपने बेटे सुनील गोदारा और भाजपा नेता बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु गुर्जर के खिलाफ लिखित शिकायत थानेदार संजय कुमार को दी. उन की तहरीर पर पुलिस ने तीनों आरोपियों सुनील गोदारा, बंटी गुर्जर और अनु गुर्जर के खिलाफ  भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर के उन की तलाश शुरू कर दी. ये बात 8 फरवरी, 2020 की है. अगले दिन आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग करते हुए भाजपा कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम कर दी थी. वह पुलिस के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. मामला तूल पकड़ने लगा था. पुलिस बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु को गिरफ्तार करने उस के घर कादरपुर गई तो दोनों पतिपत्नी मौके से फरार थे. आरोपियों को पकड़ना पुलिस के लिए चुनौती बनी हुई थी.

जांचपड़ताल में पुलिस को इतना पता चला था कि सुनील गोदारा और उस की बीवी मुनेश गोदारा के बीच रिश्ते काफी समय से खराब चल रहे थे. पत्नी मुनेश के भाजपा नेता बंटी गुर्जर से मधुर संबंध थे. यह बात बंटी गुर्जर की बीवी अनु को भी पता थी. लेकिन पति सुनील ये बात पसंद नहीं करता था. इसी बात को ले कर पतिपत्नी के बीच आए दिन विवाद होता रहता था. ये बात किसी से छिपी नहीं थी. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि मुनेश की हत्या प्रेम संबंधों की वजह से हुई है. मुनेश की कालडिटेल्स में बंटी के साथ लंबीलंबी बातचीत करना पाया गया था. यही हत्या की मूल वजह मान कर पुलिस ने अपनी जांच की दिशा आगे बढ़ाई.

आरोपी सुनील गोदारा को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस उस के संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही थी लेकिन वह पुलिस की पकड़ से बहुत दूर था. ऐसा नहीं था कि पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी हुई थी. उसे पकड़ने के लिए पुलिस ने मुखबिरों का जाल भी बिछा रखा था. सुनील की खोजबीन में मुखबिर जुट गए थे. बात 15 फरवरी, 2020 की है. दोपहर का वक्त था. थानेदार संजय कुमार थाने में मौजूद थे. तभी एक चौंका देने वाली खबर उन के खास मुखबिर ने दी. उस ने बताया कि मुनेश का हत्यारा सुनील गोदारा हयातपुर चौक पर घूमता हुआ देखा गया है. जल्दी करें तो पकड़ा जा सकता है. फिर क्या था? संजय कुमार मुखबिर की सूचना पर उस के द्वारा बताई गई जगह पर आवश्यक पुलिस बल के साथ पहुंच गए.

उन्होंने चौक को चारों ओर से घेर लिया ताकि आरोपी मौके से भाग न सके. सभी पुलिस वाले सादा पोशाक में थे, ताकि आरोपी उन्हें आसानी से पहचान न सके और हुआ भी यही. सुनील गोदारा गिरफ्तार कर लिया गया. उसे पुलिस थाना सेक्टर-10 ए पूछताछ के लिए ले कर आई. हत्यारे पति सुनील गोदारा के गिरफ्तार होने की सूचना थानेदार संजय कुमार ने पुलिस अधिकारियों को दे दी. तब एसीपी (सिटी) राजिंदर सिंह सूचना पा कर थाना सेक्टर- 10ए पूछताछ के लिए पहुंच चुके थे. उन्होंने सुनील से पूछताछ करनी शुरू की तो उस ने बिना हीलाहवाली के अपना जुर्म कबूल कर किया कि उसी ने बीवी की हत्या की थी.

हत्या की वजह उस ने बीवी का नैतिक पतन बताई थी. उस ने उन्हें बताया कि उस के लाख मना करने के बाद भी वह अपने आशिक से नैनमटक्का करने से बाज नहीं आ रही थी. जिस के कारण परिवार टूट रहा था, इस के बाद उस ने घटना की पूरी कहानी पुलिस को बता दी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया. वहां से जेल भेज दिया गया. सुनील के अलावा दोनों आरोपी बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु अभी भी पुलिस की पकड़ से दूर थे. मुनेश गोदारा हत्याकांड की कहानी कुछ इस तरह सामने आई—

35 वर्षीय मुनेश गोदारा मूल रूप से  हरियाणा की रहने वाली थी. उस के घर में मांबाप और 4 भाई बहनें थीं. सब से बड़ा भाई सुनील कुमार जाखड़, उस के बाद खुद मुनेश, उस से छोटा विमलेश और छोटी बहन मनीषा थी. बचपन से ही मुनेश कुशाग्र और प्रखर बुद्धि की थी. पढ़नेलिखने से ले कर बातचीत के कौशल तक सब कुछ अलग था. जिस काम को करने की एक बार वह ठान लेती थी अपनी हिम्मत और साहस के बदौलत उसे कर के ही दम लेती थी. समय के साथ जवान हुई मुनेश की शादी साल 2001 में चरखी दादरी (हरियाणा) के चंपापुरी में रहने वाले पूर्व फौजी चंद्रभान गोदारा के इकलौते बेटे सुनील गोदारा से हुई थी.

चंद्रभान की इलाके में बड़ी पहचान थी. नियम और उसूल के पक्के चंद्रभान ने सालों तक आर्मी में नौकरी करते हुए शराब को पीना तो दूर की बात, कभी हाथ तक नहीं लगाया था. न ही ऐसे लोगों को वह पसंद करते थे. वह इकलौते बेटे सुनील को भी अपनी तरह देखना चाहते थे. उन्होंने बेटे को अच्छी तालीम दिलाई और सीख भी दी कि जीवन में आगे बढ़ना है तो कभी शराब मत पीना. अपने को उस का गुलाम कभी मत बनने देना. यदि एक शराब ने अपना गुलाम बना लिया तो जीवन भर उस की गुलामी करते रहोगे. पिता की नसीहत को गांठ बांध कर सुनील ने अपने दिमाग में बैठा ली थी.

तब सुनील आर्मी में जाने की तैयारी कर रहा था. उसी दौरान बहू के रूप में मुनेश गोदारा परिवार में साक्षात लक्ष्मी बन कर आई थी. बीवी के आने के बाद सुनील के बंद भाग्य के दरवाजे खुल गए थे. उस की आर्मी की नौकरी पक्की हो गई थी. ससुर चंद्रभान बहू मुनेश को साक्षात लक्ष्मी मानते थे. उस के शुभ कदमों से घर में खुशियों ने अपने पांव पसार दिए थे. इसीलिए चंद्रभान उसे बहू कम बेटी ज्यादा मानते थे. रही बात सुनील की, तो वह परिवार से मिलने बीचबीच में घर आता रहता था. इस बीच मुनेश ने 2 बेटियों प्रीति और मोंटी को जन्म दिया. बाद के दिनों में चंद्रभान गोदारा रिटायर हो कर घर आ गए.

रिटायर आर्मी चंद्रभान गोदारा का घरसंसार बड़े हंसीखुशी से चल रहा था. पैसों की घर में कोई कमी नहीं थी. बेटा कमा रहा था, ससुर की अच्छीखासी पेंशन थी और क्या चाहिए था. प्रीति और मोंटी बड़ी हो रही थीं. बेटियां बड़ी और समझदार हुईं तो मुनेश गृहस्थ आश्रम से बाहर निकल कर समाज के लिए कुछ करने के लिए लालायित होने लगी थी. मुनेश की सहेली अनु गुर्जर भारतीय जनता पार्टी में काफी दिनों से जुड़ी हुई थी. उस के पति बंटी गुर्जर भाजपा के पुराने सिपाही थे. सहेली को देख कर ही मुनेश के मन में खयाल आया था कि वह भी राजनीति में कदम रखे और गरीब तथा बेसहारों के लिए एक मजबूत कदम बने. उन की बुलंद आवाज बने.

लेकिन यह मुनेश के लिए आसान नहीं था. वह यही सोच रही थी कि पता नहीं पति इस के लिए तैयार होंगे या नहीं. उन का साथ मिलेगा या नहीं. पति की मरजी के बिना राजनीति में कदम रखा तो घर में तूफान खड़ा हो सकता है. क्या करे? किस से सलाह मशविरा ले? उसी समय उस के मन में एक विचार कौंधा और उस की आंखों के सामने ससुर का चेहरा तैरने लगा. उसे विश्वास था कि ससुरजी उस की बातों को कभी नहीं टाल सकते. वह जरूर उस की भावनाओं को समझेंगे. एक दिन समय और अवसर देख कर मुनेश ने ससुरजी के सामने अपने मन के भाव प्रकट कर दिए. उस ने कहा कि उस की इच्छा है वह राजनीति में जाना चाहती है. इस के लिए आप की इजाजत और आशीर्वाद दोनों की जरूरत है. अगर आप इजाजत दें तो मैं अपने कदम आगे बढ़ाऊं.

ससुर चंद्रभान बहू की बात सुन कर असमंजस में पड़ गए. उन्होंने बहू की बातों पर विचार किया. काफी सोचने और समझने के बाद उन्होंने बहू को राजनीति में जाने की हरी झंडी दिखा दी. ससुर की ओर से मिली हरी झंडी से मुनेश के हौसले बुलंद हुए और उस ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. ये सब उस की सहेली अनु और उस के पति बंटी गुर्जर के द्वारा संभव हुआ था. इसलिए वह दोनों की अहसानमंद थी. ये बात साल 2013 की है. यहीं से मुनेश गोदारा के बुरे दिन शुरू हो गए. जिस के चलते उस के जीवन में उठापटक होने लगी. मुनेश ने कभी सोचा नहीं था कि जिस राजनीति की चकाचौंध में उस के पांव बढ़ते जा रहे हैं, इसी राजनीति के कारण एक दिन उस का हंसताखेलता घर तिनकातिनका बिखर जाएगा और उस की सांसों की डोर उस के जिस्म से जुदा हो जाएगी.

अपनी मेहनत और लगन की बदौलत मुनेश गोदारा ने कम समय में राजनीति के महारथियों के बीच अच्छीखासी जगह बना ली थी. जल्द ही उसे चरखी दादरी की जिलाध्यक्ष बना दिया गया. ये सब बंटी गुर्जर की मेहरबानियों की बदौलत संभव हुआ था. बंटी गुर्जर पार्टी का बड़ा नेता माना जाता था. पार्टी में उस की ऊंची पकड़ थी. बड़ेबड़े नेताओं से अच्छे संबंध थे. जिस दिन से बंटी गुर्जर ने मुनेश गोदारा को देखा था उसी दिन से उस की खूबसूरती पर मर मिटा था. बंटी गुर्जर के दिल में उस के लिए एक साफ्ट कार्नर बन गया था. जबकि इस के विपरीत मुनेश उस का दिल से सम्मान करती थी क्योंकि उसी की बदौलत उसे राजनीति में बड़ा कद और पद मिला था.

उस के इसी सम्मान को वह अपने लिए प्यार समझने की भूल कर बैठा था. बंटी को मुनेश से जब भी बात करने की तलब होती थी, वह कर लेता था. पार्टी में धीरेधीरे ये बात फैल गई थी कि नेताजी बंटी गुर्जर और जिलाध्यक्ष मुनेश गोदारा के बीच मोहब्बत की मीठी आंच पर प्यार की खिचड़ी पक रही है. उन के बीच में ईलूईलू चल रहा है. मुनेश अभी भी इस बात से अंजान थी कि नेताजी के मन में उसे ले कर क्या खिचड़ी पक रही है. फिजाओं में तैरती हुई मोहब्बत का यह पैगाम मुनेश के शौहर सुनील गोदारा तक जब पहुंचा तो वह आगबबूला हो गया था.

पहली बात तो यह थी कि उसे बीवी का राजनीति में जाना गवारा नहीं था. दूसरे जब उस ने सुना कि उस का अफेयर किसी नेता के साथ चल रहा है तो उस के तनबदन में आग लग गई. बीवी को उस ने समझाया था कि वह अपना ध्यान घरगृहस्थी और बच्चों के बीच में लगाए. ये राजनीति की दुनिया शरीफों के लिए नहीं है, उस का चक्कर छोड़ दे. राजनीति के जिस मुकाम तक मुनेश पहुंच चुकी थी वहां से वापस लौटना शायद उस के लिए उतना आसान नहीं था जितना आसान उस का पति समझता था. सालों का लंबा सफर तय कर के वह जिलाध्यक्ष से प्रदेश महिला मोर्चा की महामंत्री बन चुकी थी. यही नहीं, वह एक स्टार प्रचारक के रूप में विख्यात हो चुकी थी. दिल्ली विधानसभा के चुनाव में मुनेश ने कई प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया था. अपनी असीम महत्त्वाकांक्षा की वजह से ही वह राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के निकट तक पहुंच चुकी थी. इसी के बाद उसे भाजपा किसान मोर्चा का प्रदेश महामंत्री बना दिया गया था.

राजनीति की ऊंचाई पर पहुंची मुनेश ने पति से दो टूक कह दिया था कि राजनीति से वापस लौटना उस के लिए आसान नहीं होगा. वह सियासत में रह कर ही अपना घरसंसार और बच्चों की देखभाल अच्छी तरह से कर सकती है. लेकिन राजनीति से अलग होने के लिए उस पर दबाव न डाले. दोनों के बीच में यहीं से विवाद की नींव पड़ी थी. सुनील गोदारा एक सैनिक था. उस के रगों में भी एक आर्मी पिता का खून दौड़ रहा था. भला वो बीवी के इंकार को कैसे सहन कर सकता था. उस ने बीवी को समझाया कि अभी भी समय है, कुछ नहीं बिगड़ा है, वापस घर लौट आओ. सब कुछ ठीक हो जाएगा. मुनेश ने साफ मना कर दिया कि वह सियासत के बिना नहीं रह सकती.

इस दौरान मुनेश ने अपने नाम पर भिवानी के बाढड़ा इलाके में 2 फ्लैट खरीदे थे. पति को इस की जानकारी दे दी थी. पतिपत्नी के बीच बंटी गुर्जर के प्रेमसंबंधों को ले कर तूफान खड़ा हो चुका था. मुनेश ने पति को सफाई भी दी थी कि उन के बीच ऐसा कोई नाजायज रिश्ता नहीं है जिस से समाज में उन की हंसाई हो. उन के बीच के रिश्ते गंगा जल की तरह पवित्र हैं लेकिन सुनील इस बात को मानने के लिए कतई तैयार नहीं था कि बीवी जो कह रही है वो सच है. उस के मन में दोनों के बीच अनैतिक संबंधों को ले कर शक का बीज अंकुरित हो चुका था. मुनेश और सुनील के शांत और सुखद जीवन में बंटी को ले कर तूफान आ चुका था. बातबात पर पतिपत्नी दोनों के बीच तूतू, मैंमैं होती रहती थी. स्वर्ग जैसा घर नरक का अखाड़ा बन चुका था. इस बीच मुनेश ने समझदारी का परिचय दिया.

उस ने ससुर की सहमति पर चरखी दादरी वाला घर छोड़ दिया और परिवार सहित गुरुग्राम में स्पेस सोसाइटी के सैक्टर-93 में फ्लैट ले कर किराए पर रहने लगी. सासससुर चरखी दादरी में ही रहते थे. उन का जब बच्चों से मिलने का मन होता था, वे बच्चों के पास सेक्टर-93 आ जाते थे और उन से मिल कर वापस चरखी दादरी चले जाते थे. बात सन 2018 की है. सुनील गोदारा रिटायर हो कर घर आ गया था. रिटायर के बाद खाली बचे समय में उस ने एक सुरक्षा एजेंसी में गार्ड की नौकरी जौइन कर ली थी ताकि उस का समय अच्छे से बीते और 2 पैसों के लिए मोहताज न रहे. वैसे भी पतिपत्नी के बीच सालों से अनबन चलती चली आ रही थी.

उन के बीच मतभेद पराकाष्ठा पर थे. दोनों के प्यार के बीच नफरत ने जगह ले ली थी. ऐसे में उन के बीच एक और सर्पकाल कुंडली मार कर बैठ गया था जिस की आग में सुनील भड़क उठा था. दरअसल, मुनेश अपने नाम से भिवानी में लिए गए दोनों फ्लैट को बेच कर एक क्रेटा कार खरीदना चाहती थी, जिस से वह पार्टियों में शिरकत कर सके. हालांकि पति सुनील के पास उस की अपनी खुद की एसेंट कार थी लेकिन खराब रिश्तों के कारण मुनेश पति की कार में न तो बैठती थी और न ही उस कार को ले कर कहीं जाती थी.

भिवानी के बाढड़ा वाले फ्लैट बेचने को ले कर दोनों के बीच झगड़े होने लगे. पति सुनील कीमती फ्लैट बेचने को तैयार नहीं था जबकि मुनेश अपनी ही जिद पर अड़ी हुई थी कि वो फ्लैट बेच कर क्रेटा कार खरीदेगी तो खरीदेगी. उसे कार खरीदने से कोई नहीं रोक सकता. मुनेश की इस जिद ने सुनील के गुस्से को और भड़का दिया. उस ने भी बीवी से कह दिया कि देखता हूं तुम कैसे फ्लैट बेचती हो. इस बात को ले कर घर में पतिपत्नी के बीच महासंग्राम छिड़ गया था. सुनील की जिंदगी कड़वाहट से भर गई थी. एक तो बीवी के अफेयर को ले कर वह पहले से परेशान था. दूसरे करोड़ों रुपए के फ्लैट बीवी औनेपौने दामों में बेचने जा रही थी. बीवी की करतूतों से सुनील बुरी तरह से आजिज आ चुका था. जिंदगी को थोड़ा सूकून देने के लिए उस ने शराब को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था. वह शराब पीने लगा था.

इसी शराब के नशे में धुत हो कर 8 फरवरी, 2020 की रात 9 बजे के करीब सुनील घर लौटा तो कमरे में पत्नी को न पा कर उस ने दोनों बेटियों से उस के बारे में पूछा. बड़ी बेटी प्रीति ने पापा से कहा, ‘‘मां रसोई में खाना पका रही हैं.’’ बेटी का जवाब सुन कर सुनील लड़खड़ाता हुआ किचन की ओर हो लिया. उस समय मुनेश वीडियो कौल पर अपनी छोटी बहन मनीषा से हंसहंस कर बातें कर रही थी. सुनील समझा कि वह अपने प्रेमी बंटी गुर्जर से हंसहंस कर बातें कर रही है. फिर क्या था? सुनील शक की आग में धधक उठा. उस ने आपा खो दिया और ईर्ष्या की आग में जलते हुए अपनी सर्विस रिवाल्वर से 2 गोलियां मुनेश के पेट और सीने में दाग दीं.

गोली लगते ही मुनेश फोन को हाथ में पकड़े हुए फर्श पर जा गिरी और बहन से आखिरी बार कहा, ‘‘बहन…तेरे जीजा ने गोली मार दी है.’’ उस के बाद मुनेश का गरम जिस्म आहिस्ताआहिस्ता ठंडा पड़ने लगा. उस के प्राण पखेरू उड़ चुके थे. सुनील पुलिस से बचने के लिए अपनी एसेंट कार में सवार हो कर अपने एक दोस्त के घर जा कर छिप गया था. अगली सुबह 9 फरवरी को जब मुनेश गोदारा हत्याकांड ने तूल पकड़ा तो सुनील वहां से भी कार ले कर फरार हो गया था और कई दिनों तक यहांवहां छिपता रहा. आखिरकार 7 दिनों की लुकाछिपी के बाद यानी 15 फरवरी, 2020 को पुलिस के हत्थे चढ़ ही गया.

बहरहाल, गिरफ्तारी के बाद सुनील गोदारा ने बीवी की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. सुनील की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त रिवौल्वर भी बरामद कर लिया गया. बीवी की हत्या कर उस ने रिवौल्वर अपनी कार में छिपा कर रखी थी. उसे बीवी की हत्या का जरा भी अफसोस नहीं था. उस ने पुलिस को दिए अपने बयान में कहा था, ‘‘बीवी का अफेयर बंटी गुर्जर के साथ चल रहा था. मैं ने उसे समझाने की बारबार कोशिश भी की थी लेकिन वह नहीं मानी तो मजबूर हो कर मुझे यह कदम उठाना पड़ा. मुझे बीवी की हत्या का कोई अफसोस नहीं है.’’

कथा लिखे जाने तक पुलिस फरार चल रहे आरोपी बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु को गिरफ्तार कर जेल भेज चुकी थी. मृतका के ससुर चंद्रभान ने बंटी गुर्जर और उस की बीवी अनु के खिलाफ इस लिए मुकदमा दर्ज कराया था कि इन्हीं दोनों की वजह से उन की होनहार बहू असमय काल के गाल में जा समाई थी. तीनों आरोपी सुनील गोदारा, बंटी गुर्जर और अनु गुर्जर जेल की सलाखों के पीछे सजा काट रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधार

इश्क का जाल : प्रेमी कपल ने करोड़पति को फसाकर लूटे 20 लाख

Rajasthan News : किरण उन युवतियों में नहीं थी जो भावनाओं में बह कर अपना ही अहित कर लेती हैं. पति से तलाक लेने के बाद जब उस ने मायके से बाहर कदम निकाले तभी सोच लिया था कि उसे किस राह जाना है. जब उसे उसी की सोच वाला अक्षय मीणा मिल गया तो…

राजस्थान के जिला दौसा के गांव बीनावाला की रहने वाली किरण बैरवा गोरे रंग की खूबसूरत युवती थी. जब वह टाइट जींस टीशर्ट पहन कर निकलती थी तो देखने वाले ताकते रह जाते थे. किरण को अपने रूपसौंदर्य पर बहुत नाज था. वह जानती थी कि उस से कोई भी व्यक्ति दोस्ती करने को तैयार हो जाएगा, क्योंकि वह बला की खूबसूरत है. किरन को पाने के लिए पुरुषरूपी भंवरेउस के आसपास मंडराते रहते थे, मगर उस ने किसी को लिफ्ट नहीं दी. किरण के ख्वाब ऊंचे थे. खूबसूरत होने के साथ वह शातिरदिमाग भी थी. शादी योग्य होने पर घर वालों ने उस की शादी कर दी थी.

किरण को जैसा जीवनसाथी चाहिए था, उस का पति वैसा नहीं था. किरण ने उस के साथ सात फेरे जरूर लिए थे, मगर पति को मन से कभी नहीं स्वीकारा. ऐसे में मतभेद स्वभाविक बात थी. शादी के कुछ समय बाद ही किरण का पति से तलाक हो गया. तलाक के बाद वह मायके में आ कर रहने लगी. किरण ने अपने मांबाप को कह दिया कि वह पढ़ीलिखी है और कहीं नौकरी या कामधंधा कर के अपना गुजरबसर कर लेगी. मायके आने के बाद किरण नौकरी की तलाश के लिए गांव से दौसा आनेजाने लगी. शहर में उसे नौकरी तो नहीं मिली, मगर जैसा जीवनसाथी उसे चाहिए था, वैसा दोस्त जरूर मिल गया. उस का नाम अक्षय उर्फ आशू था. अक्षण मीणा के पिता दौसा के पूर्व पार्षद हैं. पिता के पैसों पर ऐश करने वाला अक्षय मीणा भी शातिरदिमाग और तेजतर्रार युवक था.

उस की किरण से मुलाकात हुई तो पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर मर मिटे. दोनों ने एकदूसरे को मोबाइल नंबर दे दिए. इस के बाद उन की फोन पर बातें होने लगीं. किरण का जब मन करता, तब अक्षय मीणा से मिलने गांव से दौसा शहर आ जाती. दो जवां दिल अगर एक दूसरे के लिए धड़कने लगें तो मिलन होने में देर नहीं लगती. ऐसा ही किरण और अक्षय के मामले में भी हुआ. 4-6 मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे के बारे में बहुत कुछ जान गए. अक्षय को जब पता चला कि किरण तलाकशुदा है तो वह बोला, ‘‘किरण, तुम मेरी हो. इसी कारण तुम्हारा अपने पति से तलाक हुआ है. हम दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.’’

अक्षय के मुंह से यह सुन कर किरण को उस पर विश्वास हो गया कि वह उस का बहुत खयाल रखेगा. फिर तो उस ने अक्षय को अपना तनमन सब कुछ न्यौछावर कर दिया. एक बार शारीरिक संबंध बने तो सारी लाजशरम जाती रही. जब मन चाहता, दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते. अक्षय ने किरण से वादा किया था कि वह उस से शादी करेगा और जीवन भर साथ निभाएगा. किरण तो अक्षय की दीवानी थी ही. मगर बगैर कामधाम किए मौजमस्ती से तो जिंदगी नहीं चलती. किरण और अक्षय दोनों ही शातिरदिमाग थे, एक रोज उन्होंने बातोंबातों में पैसा कमाने का उपाय ढूंढना शुरू कर दिया. अंत में दोनों ने पैसा कमाने की अलग राह चुन ली. वह राह थी तन सौंप कर ब्लैकमेल करने यानी हनीट्रैप की.

अक्षय और किरण ने टीवी और अखबारों में हनीट्रैप के तमाम केस देखे और सुने थे. ऐसी घटनाओं से प्रेरित हो कर उन्होंने भी ऐसा ही कुछ कर के पैसा कमाने की योजना बना ली. तय हुआ कि मोटा पैसा कमाने के बाद शादी कर लेंगे. योजना तैयार होने के बाद दोनों शिकार की तलाश में लग गए. उन की यह तलाश पूरी हुई दौसा शहर की रामनगर कालोनी निवासी विश्राम बैरवा पर. विश्राम बैरवा युवा प्रौपर्टी डीलर और ठेकेदार था. किरण ने कहीं से विश्राम बैरवा का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. यह सन 2016 की बात है. फोन नंबर से उस ने विश्राम के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली. फिर एक दिन उस ने बैरवा को फोन किया. विश्राम ने काल रिसीव की तो किरण बोली, ‘‘मैं किरण बैरवा बोल रही हूं, आप विश्रामजी बोल रहे हैं न?’’

‘‘हां जी, मैं विश्राम बैरवा बोल रहा हूं. कहिए, कैसे फोन किया. मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’ विश्राम ने कहा.

‘‘विश्रामजी, आप अच्छे आदमी हैं इसलिए फोन किया था. मैं तलाकशुदा हूं और यहीं दौसा में अपने चाचा आशू के साथ रहती हूं. लोगों से आप की बहुत तारीफ सुनी थी, इसलिए आप से बात करने की इच्छा हो रही थी तो फोन कर लिया. ’’

‘‘कोई बात नहीं, वैसे कोई काम हो तो बोलिए.’’

‘‘नहीं सर, कोई काम नहीं था, ऐसे ही फोन कर लिया, अगर आप को बुरा न लगा हो तो आगे भी फोन कर के आप का समय खराब करती रहूं.’’

किरण ने कहा तो विश्राम बोला, ‘‘आप से बात कर के खुशी होगी. जरूर फोन कीजिएगा.’’  इस के बाद किरण अकसर फोन कर के विश्राम बैरवा से इधरउधर की गप्पें मारने लगी. विश्राम भी उस से खुल कर बतियाने लगा था. इस तरह एक साल गुजर गया. अपनी बातों से किरण ने विश्राम पर ऐसा जादू कर दिया था कि वह उस से मिलने को आतुर रहने लगा. अब तक किरण और विश्राम की मोबाइल पर ही बातें हुई थीं, दोनों मिले नहीं थे.

एक बरस बाद जब एक रोज किरण ने विश्राम को फोन किया तो रुआंसे स्वर में बोली, ‘‘नमस्ते सर, किरण बोल रही हूं.’’

‘‘हां किरणजी, बोलिए. आज आवाज में वह चहक नहीं है, जो हमेशा होती है. तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं, मगर मुझे कुछ रुपए चाहिए थे. पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है, इलाज कराना है. मुझे नौकरी के लिए भी भागदौड़ करनी पड़ रही है. पैसों की तंगी है. अगर आप हेल्प कर देंगे तो मैं आप का एकएक रुपया चुका दूंगी.’’

‘‘किरण, पैसों की चिंता मत करो. मैं हूं न, सब संभाल लूंगा. मैं तुम से मिलता हूं. हम शाम को बैठ कर इस बारे में बात करेंगे.’’

शाम को किरण और विश्राम मिले. विश्राम ने किरण को 2 लाख रुपए नकद दे दिए. किरण रुपए ले कर धन्यवाद देते हुए बोली, ‘‘सर, मैं आप का एकएक रुपया चुकाऊंगी. नौकरी लगने दीजिए.’’

किरण की सहायता कर के विश्राम को यह सोच कर आत्मिक खुशी हुई कि उस ने एक जरूरतमंद महिला की मदद की है. कुछ दिनों बाद किरण फिर मां की बीमारी के बहाने विश्राम से 2 लाख रुपए ले आई.

कमरे पर पहुंचने के बाद उस ने अक्षय से कहा, ‘‘आशू, आज 2 लाख रुपए तो मां की बीमारी के बहाने से ले आई, मगर अब आगे बहाना नहीं चलने वाला. अब हमें विश्राम को फांसना पड़ेगा.’’

‘‘किरण, तुम सही कह रही हो. तुम्हें अब उसे अपने तन की चकाचौंध दिखानी पड़ेगी, तभी इस मुर्गे को हलाल किया जा सकेगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कल उसे कमरे पर बुला कर अपने जिस्म की गरमी देती हूं. फिर तुम देखना कि मैं उसे कैसे इशारों से नचाती हूं.’’ किरण हंस कर बोली. अगले दिन किरण ने विश्राम बैरवा को किसी बहाने से सिंगवाड़ा रोड, दौसा स्थित अपने कमरे पर बुलाया. विश्राम जब कमरे पर पहुंचा तो किरण ने उस का स्वागत हंस कर किया. चायपानी के बाद दोनों पासपास बैठ कर बातें करने लगे. बातचीत के दौरान किरण उस के शरीर से अपना जिस्म इस तरह टकरा देती थी, जैसे लापरवाही में ऐसा हो गया हो. इस से विश्राम के बदन में झुरझुरी दौड़ जाती थी. किरण यह सब इसलिए कर रही थी ताकि विश्राम उस के शरीर को भोगने के लिए मजबूर हो जाए. हुआ भी यही.

किरण ने उसे इस तरह उकसाया कि विश्राम खुद  पर नियंत्रण खो बैठा. विश्राम ने किरण से पूछा, ‘‘तुम्हारे आशू चाचा कहां हैं?’’

‘‘आशू चाचा कल तक आएंगे. आज बाहर गए हैं. यहां पर आज हम दोनों का राज है. हम जो चाहे, करेंगे.’’ किरण ने खुल कर कहा. यह सुन कर विश्राम खुश हो गया. उस ने किरण को बांहों में भर कर किस करना शुरू कर दिया. किरण भी अपने हाथों का कमाल दिखाने लगी. कुछ ही देर में दोनों बेलिबास हो गए और एकदूसरे के तन से खेलने लगे. हसरतें पूरी करने के बाद विश्राम ने किरण को चूम कर विदा ली. विश्राम के चले जाने के बाद किरण ने आशू को फोन कर कहा, ‘‘आ जाओ, मुर्गा फंस गया है.’’

आशू कमरे पर आ गया. किरण ने उसे सब कुछ विस्तार से बता दिया. इस के बाद वह बोली, ‘‘आशू, अब देखो मेरा खेल. कैसे विश्राम को नचाती हूं.’’

दोनों ने विश्राम को दुष्कर्म के मामले में फंसाने की धमकी दे कर रुपए ऐंठने की योजना बनाई. योजनानुसार अगले रोज किरण ने विश्राम को फोन कर 20 लाख रुपए मांगे. विश्राम ने कहा कि इतने रुपयों का क्या करोगी तो किरण बोली, ‘‘कुछ भी करूं, अगर पैसे नहीं दिए तो आप को बलात्कार के आरोप में अंदर करा दूंगी. इस के लिए मैं आप को शाम तक का समय देती हूं.’’

विश्राम कुछ कहता, उस से पहले ही किरण ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. विश्राम बैरवा इज्जतदार आदमी था. दौसा में उस का नाम था. अगर किरण उस के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देती तो उस की इज्जत मिट्टी में मिल जाती. विश्राम समझ गया कि वह किरण को जैसा समझता था, वह वैसी नहीं है. मगर जो नहीं होना था, वह हो चुका था. अब पछताने से क्या होने वाला था. विश्राम बैरवा ने अपना मानसम्मान इज्जत बचाने के लिए किरण की 20 लाख रुपए की डिमांड पूरी कर दी. किरण पैसे ले कर विश्राम से बोली, ‘‘मेरे दिल के दरवाजे हमेशा खुले हैं. कभी भी आ कर मेरे तन से रुपए की वसूली कर सकते हो.’’

विश्राम बैरवा क्या बोलता. वह 20 लाख दे कर समझ रहा था कि बला टली. मगर किरण उसे कहां छोड़ने वाली थी. वह अक्षय मीणा उर्फ आशू के साथ विश्राम के दिए रुपयों से ऐश की जिंदगी जीने लगी. दोनों दिल्ली, अहमदाबाद, नागपुर, मुंबई, गोवा आदि शहरों में घूमने गए और खूब अय्याशी की. किरण ने विश्राम बैरवा को अपने हुस्न के प्रेमजाल में ऐसा फांसा कि वह चाह कर भी किरण से दूर नहीं रह सका. किरण ने बातोंबातों में विश्राम से पहले ही पता कर लिया था कि वह करोड़पति है और उस का प्रौपर्टी का व्यवसाय अच्छा चल रहा है. एक बार शारीरिक संबंध बना कर विश्राम किरण के प्रेमजाल में ऐसा फंसा कि वह उस के हाथों की कठपुतली बन कर नाचने लगा.

किरण उसे बलात्कार के केस में फंसाने की धमकी दे कर कभी कैश तो कभी मांबाप और खुद के खाते में रुपए डलवा लेती थी. कभी बीमारी का बहाना कर के तो कभी होटल खोलने के नाम पर किरण विश्राम से पैसे ऐंठऐंठ कर उसे करोड़पति से रोड पर ले आई. विश्राम ने अपना घर, जमीन, गहने, फ्लैट सब कुछ बेच कर किरण की मांग पूरी की ताकि उस की इज्जत बची रहे. जबकि किरण ने रुपए ऐंठ कर आशू के साथ नागपुर और दिल्ली में होटल भी खोले, मगर होटल व्यवसाय का ज्ञान न होने के कारण उन का बिजनैस नहीं चल सका. दोनों होटल बंद कर के दौसा चले आए. होटल व्यवसाय में किरण व आशू की दोस्ती दिल्ली के कई लोगों से हो गई थी. लोग किरण और आशू को अच्छा बिजनैसमैन समझते थे. उन्हें इन की करतूत का पता नहीं थी.

विश्राम बैरवा सन 2016 से जनवरी 2020 तक किरण को करीब डेढ़ करोड़ रुपए दे चुका था. विश्राम की सारी जमीनजायदाद बिक गई थी. वह रोटीरोटी को मोहताज हो गया था. यह सब उस की एक गलती से हुआ था. विश्राम को बरबाद करने के बाद भी किरण उसे धमकी दे कर रुपए मांगती थी. वह कहती कि पैसे नहीं दिए तो बलात्कार के आरोप में जेल में सड़ा दूंगी. विश्राम ने किरण से कहा कि अब उस के पास फूटी कौड़ी तक नहीं है तो उसे रकम कहां से दे. मगर किरण अपना ही राग अलापती रहती कि कुछ भी करो, उसे पैसे चाहिए. अगर पैसे नहीं दिए तो…

विश्राम बैरवा के पास अब कुछ नहीं बचा था. किरण भी उसे हड़का रही थी. ऐसे में विश्राम ने निर्णय कर लिया कि अब इज्जत जाए तो जाए, उसे पुलिस की मदद लेनी ही पड़ेगी. अगर इस से पहले किरण ने उस के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी तो वह अपनी सफाई भी नहीं दे सकेगा और उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी. इसलिए वह एसपी प्रह्लाद कृष्णैया से मिला और उन्हें सारी बात विस्तार से बताई. एसपी साहब ने विश्राम की शिकायत को गंभीरता से लिया और कोतवाली दौसा के इंसपेक्टर श्रीराम मीणा को फोन पर निर्देश दिए कि विश्राम की रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ सख्त काररवाई करें.

कप्तान साहब के आदेश पर इंसपेक्टर श्रीराम मीणा ने 28 जनवरी, 2020 को विश्राम बैरवा की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस के बाद एसपी प्रह्लाद कृष्णैया ने एएसपी अनिल सिंह चौहान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में डीएसपी नरेंद्र कुमार, शहर कोतवाल श्रीराम मीणा, एसआई राजेश कुमार, कांस्टेबल बसंताराम, नवीन कुमार, गोपीराम, महिला कांस्टेबल रेखा, मंजू देवी आदि को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने किरण बैरवा के मोबाइल की लोकेशन खंगाली तो उस की लोकेशन पुष्कर, जिला अजमेर, राजस्थान की मिली. पुलिस टीम दौसा से पुष्कर आई और किरण बैरवा व उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू, निवासी सैंथल मोड़, दौसा को धर दबोचा.

पुष्कर के होटल में किरण व आशू शादी रचाना चाहते थे. दोनों के दोस्त शादी में शरीक होने दिल्ली से पुष्कर आए हुए थे. यहां यह भी बता दें कि शादी के खर्च के लिए भी किरण बैरवा ने विश्राम बैरवा को फोन कर पैसे मांगे, लेकिन किरण ने यह नहीं बताया कि वह शादी कर रही है. किरण ने विश्राम से पहले तो डेढ़ लाख रुपए मांगे, फिर वह 55 हजार रुपए तक आ गई. साइबर सैल की मदद से दौसा कोतवाली थाना पुलिस ने इस अनोखे जोड़े को 2 फरवरी, 2020 को पुष्कर के एक होटल से दबोच लिया. दिल्ली से जो बाराती आए थे, उन को भी प्रेमी जोड़े की असलियत पता नहीं थी. दिल्ली से आए इन के मित्रों को होटल का 67 हजार रुपए का बिल भी भरना पड़ा. क्योंकि उन्हें शादी में बुलाने वालों को तो पुलिस शादी से पहले ही पकड़ कर दौसा ले गई थी.

पुलिस पूछताछ में किरण और आशू मीणा ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अगले दिन 3 फरवरी को दोनों को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया और विस्तृत पूछताछ की. पूछताछ में ब्लैकमेलर प्रेमी जोड़े ने सारी कहानी बयान कर दी. किरण और आशू ने स्वीकार किया कि उन्होंने विश्राम बैरवा को हनीट्रैप में फांस कर उस से लाखों रुपए ऐंठे थे. पुलिस ने इस मामले की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए पीडि़त व आरोपियों की मोबाइल काल डिटेल्स तथा बैंक खातों की जानकारी जुटाई. बैंक खातों में विश्राम बैरवा के बैंक खाते से रुपए लेनदेन की बात सामने आई. पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर किरण बैरवा और उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

विश्राम बैरवा सब कुछ गंवा कर पुलिस के पास गया. अगर वह तभी पुलिस के पास चला जाता जब किरण ने ब्लैकमेलिंग की पहली किस्त 20 लाख मांगी थी तो आज सड़क पर नहीं आता.