Crime Story : पूर्व डिप्टी सीएम के बेटे, बहू और पोती की हत्या बड़े बेटे ने की, मां ने खोला राज

Crime Story : पूर्व उपमुख्यमंत्री प्यारेलाल कंवर ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जो करोड़ों रुपए की संपत्ति उन्होंने अपने बच्चों के लिए जुटाई है, वही उन के परिवार में खून बहाने का जरिया बनेगी. काश! अपने जीते जी वह संपत्ति का बंटवारा कर जाते तो शायद…

छत्तीसगढ़ के औद्योगिक कोरबा जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है गांव भैंसमा. यह गांव छत्तीसगढ़ के पूर्व उपमुख्यमंत्री स्वर्गीय प्यारेलाल कंवर के गृहग्राम के रूप में जाना जाता है. कांग्रेस के महत्त्वपूर्ण आदिवासी क्षत्रप होने के कारण प्यारेलाल कंवर अविभाजित मध्य प्रदेश के दौरान सत्तर के दशक में पहली बार कांग्रेस सरकार में आदिम जाति कल्याण विभाग मंत्री बने. आगे राजस्व मंत्री के अलावा अस्सी के दशक में मध्य प्रदेश विधानसभा के उपाध्यक्ष और 90 के दशक में वह दिग्विजय सिंह मंत्रिमंडल में उपमुख्यमंत्री भी रहे. 21 अप्रैल, 2021 की सुबह की बात है. कोरबा के एसपी अभिषेक सिंह मीणा अभी सोए हुए ही थे कि उन का मोबाइल फोन बारबार बजने लगा.

उन्होंने फोन रिसीव किया तो देखा कोई अज्ञात नंबर था. उधर से आवाज आई, ‘‘सर, मैं गांव भैंसमा से बोल रहा हूं. यहां प्यारेलाल कंवर जी के बेटे और उन के परिवार के सदस्यों का मर्डर कर दिया गया है.’’

और फोन कट गया. एसपी अभिषेक सिंह मीणा को कोरबा जिले में पदस्थ हुए लगभग 2 साल हो चुके थे, इसलिए वह कोरबा के राजनीतिक और सामाजिक वातावरण को भलीभांति जानतेसमझते थे. वह जानते थे कि स्वर्गीय प्यारेलाल कंवर अविभाजित मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा नाम हुआ करते थे. उन के परिवार में हत्या की बात सुन उन्होंने मामले की गंभीरता को समझ कर अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को फोन किया. सारी जानकारी ले कर तत्काल घटनास्थल पर पहुंचने की हिदायत देते हुए कहा कि वह स्वयं भी 15 मिनट में घटनास्थल पर पहुंच रहे हैं. देखते ही देखते कोरबा जिले से निकल कर संपूर्ण छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश  में यह खबर आग की तरह फैल गई कि प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता प्यारेलाल कंवर के बेटे हरीश कंवर (36), उन की पत्नी सुमित्रा कंवर (32) और बेटी आशी (4 वर्ष) की अज्ञात लोगों ने नृशंस हत्या कर दी है.

पुलिस विभाग के अधिकारी घटनास्थल पर पहुंचे. इसी समय लोगों का हुजूम घटनास्थल के मकान के बाहर लगा हुआ था और लोग बड़े ही चिंतित घटना के संदर्भ में कयास लगा रहे थे. सूचना मिलते ही सुबह करीब 6 बजे राजनीति में प्यारेलाल कंवर के शिष्य रहे जय सिंह अग्रवाल,जो वर्तमान में कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में राजस्व एवं आपदा कैबिनेट मंत्री हैं, घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने परिजनों से बातचीत कर के मामले की गंभीरता को समझने के बाद पुलिस अधिकारियों से बातचीत की. एसपी अभिषेक सिंह मीणा घटनास्थल पर आ चुके थे. उन्होंने तत्काल डौग स्क्वायड टीम बुलवाई और पुलिस टीम को निर्देश दिया  कि जितनी जल्दी हो सके इस संवेदनशील हत्याकांड के दोषियों को पकड़ कर कानून के हवाले करना होगा.

एडिशनल एसपी कीर्तन राठौड़ की अगुवाई में एक पुलिस टीम बनाई  गई, जो मामले की जांच में जुट गई.  मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया गया. पुलिस ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. हत्यारों ने हरीश कंवर, उन की पत्नी सुमित्रा और बेटी आशी की हत्या किसी धारदार हथियार से की थी, इसलिए घर में खून ही खून बिखरा था. पुलिस अधिकारियों ने हरीश कंवर के भाइयों व परिवार के अन्य सदस्यों से बात की. परिवार के सभी लोग राजनीति में ऊंची पहुंच रखते थे और समाज में उन की प्रतिष्ठा थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों को इस बात का भी अंदेशा था कि कहीं इस घटना को ले कर लोगों का आक्रोश न फूट जाए. इसलिए पुलिस अधिकारी बड़ी ही तत्परता से इस तिहरे हत्याकांड की जांच में जुट गए.

पुलिस ने मौके की काररवाई करनी शुरू की. एसपी अभिषेक सिंह मीणा के निर्देश पर कई पुलिस टीमें अलगअलग ऐंगल से इस मामले की जांच में जुट गईं. जांच के दौरान खोजी कुत्ता घटनास्थल से करीब 100 मीटर दूर भैंसमा बाजार स्थल पर मौजूद एक पेड़ के पास जा कर ठहरा और वहां से चीतापाली की ओर जाने वाले मार्ग की ओर आगे बढ़ा. सीसीटीवी से मिला सुराग इस संकेत का पुलिस ने पीछा किया और कुत्ते का पीछा करते हुए पुलिस गांव ढोंगदरहा होते हुए सलिहाभाठा-नोनबिर्रा मार्ग तक पहुंची. आगे सलिहाभाठा डैम के पास जले हुए कपड़ों के अवशेष के पास जा कर कुत्ता रुक गया. पुलिस ने वह अवशेष जब्त कर लिए. पुलिस की एक टीम घटनास्थल के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों को तलाशने लगी.

पड़ोसी के घर के बाहर लगे सीसीटीवी की फुटेज देखी तो उस में 2 संदिग्ध लोग हरीश कंवर के घर में घुसते दिखाई दिए. पुलिस की दूसरी टीम को जांच में यह भी पता चला कि आज ही किसी ने डायल 112 नंबर पर फोन कर के इस मार्ग पर सड़क दुर्घटना की सूचना दी थी. मौके पर पहुंची एंबुलेंस ने परमेश्वर कंवर नामक युवक को करतला अस्पताल में भरती कराया है. यह जानकारी मिलने पर पुलिस ने आसपास के लोगों से पूछताछ की तो पुलिस को वहां कोई सड़क हादसा न होने की जानकारी मिली. इस के बाद पुलिस अस्पताल में भरती परमेश्वर कंवर के पास पहुंची. पमेश्वर कंवर मृतक हरीश कंवर के बड़े भाई हरभजन कंवर का साला था, जो ग्रैजुएशन की पढ़ाई कर रहा था.

जांच में पुलिस को उस की आंख और चेहरे के आसपास जख्म दिखे, जो दुर्घटना के नहीं लग रहे थे. लग रहा था जैसे वह किसी धारदार हथियार के हों. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका. इस से पुलिस को उस पर शक हो गया. उस से तिहरे हत्याकांड के बारे में पूछताछ की तो वह पुलिस को इधरउधर की बातें कर के खुद को बचाने की कोशिश करता रहा, मगर जब कड़ी पूछताछ हुई तो उस ने सच स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि अपने दोस्त सुरेंद्र कंवर की सलाह पर रामप्रसाद के साथ मिल कर उस ने यह वारदात की. उस से पूछताछ में पता चला कि यह कांड किसी और ने नहीं बल्कि हरीश कंवर के बड़े भाई हरभजन कंवर और उस की पत्नी धनकंवर ने कराया है.

पुलिस जांच में यह स्पष्ट हो गया कि हत्या हरीश के बड़े भाई हरभजन के सहयोग से  उस के साले मुख्य अभियुक्त परमेश्वर कंवर द्वारा अंजाम दी गई है. धीरेधीरे सारे तथ्य एकदूसरे से मिलते चले गए और उसी रोज शाम होतेहोते हरीश कंवर परिवार हत्याकांड से परदा उठ गया. परमेश्वर कंवर से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम ने उसी समय मृतक के भाई हरभजन कंवर, उस की पत्नी धनकंवर व नाबालिग बेटी रंजना को भी हिरासत में ले लिया. इन सभी से पूछताछ के बाद इस तिहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

स्वर्गीय प्यारेलाल कंवर के 4 बेटे और 3 बेटियां थीं. सब से बड़े बेटे हरबंश कंवर, दूसरे हरदयाल कंवर, तीसरे हरभजन कंवर और चौथे सब से छोटे थे हरीश कंवर. एक बेटी हरेश कंवर वर्तमान में जिला पंचायत, कोरबा की अध्यक्ष हैं. बाकी 2 बड़ी बेटियां शासकीय नौकरी में हैं. प्यारेलाल कंवर के दूसरे नंबर के पुत्र हरदयाल कंवर जो अधिवक्ता थे, का लगभग 5 साल पहले निधन हो चुका है. वर्तमान में हरवंश, हरभजन और हरीश कंवर प्यारेलाल के 3 बेटे जीवित थे. हरीश कंवर प्यारेलाल कंवर के रहते उन की विरासत को संभालते हुए कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय हुए और सन 2010 में जिला पंचायत का चुनाव लड़ा मगर पराजित हो गए.

उन्होंने प्यारेलाल कंवर के संरक्षण में राजनीति की शुरुआत की. आगे पूर्व मुख्यमंत्री अजीत कुमार जोगी के साथ अपनी तालमेल बिठा ली. अजीत जोगी का हरीश को पुत्रवत स्नेह मिलता था और हरीश ने अपने रामपुर विधानसभा क्षेत्र में अजीत जोगी और उन के बेटे अमित जोगी को बुला कर कुछ राजनीतिक कार्यक्रम किए थे. उन्होंने एक बहुचर्चित लैंको पावर प्लांट के खिलाफ आंदोलन कर स्थानीय भूविस्थापितों के लिए बिगुल फूंका था. आगे स्थितियां ऐसी बनती चली गईं कि कांग्रेस में गुटबाजी चरम पर पहुंच गई थी. ऐसे में जहां अजीत जोगी ने अपना एक अलग खेमा पूरे प्रदेश में तैयार कर लिया था, वहीं उन के 36 के संबंध स्थानीय बड़े नेताओं के साथ बने हुए थे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता डा. चरणदास महंत, भूपेश बघेल, जयसिंह अग्रवाल वगैरह अपने एक अलग खेमे में थे.

ऐसे में कांग्रेस के इस खेमे से हरीश कंवर की दूरी बनती चली गई और हरीश कंवर खुल कर छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रहे अजीत कुमार जोगी के स्थानीय झंडाबरदार बन गए. दूसरे खेमे ने हरीश कंवर को तवज्जो देनी बंद कर दी. आगे चल कर जब अजीत जोगी ने ‘जनता कांग्रेस जोगी’ पार्टी का गठन किया तो हरीश कंवर इस पार्टी में ग्रामीण अध्यक्ष, कोरबा बन कर शामिल हो गए और क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने लगे. पूरे परिवार की धमक थी राजनीति में दूसरी तरफ प्यारेलाल कंवर के अनुज श्यामलाल कंवर जो पुलिस में डीएसपी पद से सेवानिवृत्त हो चुके थे, वह कांग्रेस नेता डा. चरणदास महंत के क्षेत्रीय खेमे से जुड़ गए थे. इस तरह परिवार में भी खेमेबाजी सामने आ चुकी थी.

श्यामलाल कंवर सन 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से विधायक निर्वाचित हुए थे. इधर हरीश कंवर अजीत जोगी के पक्ष में चले गए और उन्होंने उन का झंडा थाम लिया था. सन 2018 के विधानसभा चुनाव में श्यामलाल कंवर को फिर विधानसभा का प्रत्याशी कांग्रेस पार्टी ने बनाया. दूसरी तरफ अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने भी अपना प्रत्याशी फूल सिंह राठिया को खड़ा कर दिया. कांग्रेस के इस झंझावात में श्यामलाल कंवर चारों खाने चित हो गए और तीसरे नंबर में आ कर ठहर गए. प्यारेलाल कंवर का परिवार राजनीति से अब दूर हो चुका था और सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा था. अजीत कुमार जोगी की पार्टी के धराशाई होने के बाद हरीश कंवर राजनीति के हाशिए पर आ गए थे और अपने गांव भैंसमा में उन्होंने खाद, बीज की एक दुकान खोल ली थी.

मूलरूप से काश्तकार परिवार प्यारेलाल कंवर के वंशज अपना जीवनयापन शांतिपूर्वक कर रहे थे. इसी बीच भैंसमा में एक ऐसा नृशंस हत्याकांड हुआ, जिसे कोरबा के इतिहास में कभी भी भुलाया नहीं जा सकेगा. धनकंवर को थी धन की लालसा दरअसल, हरभजन कंवर की पत्नी धनकंवर ने जब सुना कि हरीश कंवर ने पैतृक संपत्ति पर लगभग अपना कब्जा स्थापित कर लिया है तो उस ने पति हरभजन के कान भरने शुरू कर दिए. एक दिन वह मौका देख कर बोली, ‘‘ऐसे कैसे चलेगा, तुम क्या सब कुछ छोटे (हरीश) को दे दोगे, क्या हमारा उस पर कोई हक नहीं है.’’

हरभजन ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम्हें किस बात की कमी है, मैं तो किसान हूं. हमें चाहिए क्या, 2 वक्त की रोटी मिल ही जाती है. हमारे 2 बेटे हैं, फिर हमें क्या चिंता है.’’

पत्नी ने यह सुन कर कहा, ‘‘आप बहुत भोलेभाले हो. भोपाल की, यहां की करोड़ों रुपए की संपत्ति क्या अकेले हरीश की हो जाएगी, हमारा भी तो उस पर अधिकार है.’’

हरभजन ने समझाया, ‘‘अभी संपत्ति का कोई बंटवारा तो पिताजी ने किया नहीं था, सब कुछ हरीश की देखरेख में है, कहां कुछ कोई ले जाएगा.’’

पत्नी धनकंवर तड़प कर बोली, ‘‘ सचमुच आप बहुत ही भोले हो. वह सारी धान की  पैदावार को भी बेच देता है. लाखों रुपए का बोनस अपनी तिजोरी में भर रहा है और तुम भोलेभंडारी बन कर बैठे रहो. एक दिन हम लोगों को यह हरीश धक्के मार के घर से भी निकाल देगा, तब तुम पछताओगे.’’

यह सुन कर हरभजन ने नाराज होते हुए कहा, ‘‘तो मैं क्या करूं, तुम ही बताओ, हम ने उसे गोद में खिलाया है, मेरा सगा भाई है वह. उसे मैं क्या बोलूं और कैसे बोलूं.’’

पत्नी धनकुंवर ने कहा, ‘‘पैसों और जमीन जायजाद के मामले में मैं ने देखा है कि कोई किसी का नहीं होता, बड़े भैया के निधन के बाद क्या उन के परिवार वालों को मानसम्मान की जिंदगी मिल रही है? तुम खुद देखो हरीश सिर्फ अपने बीवीबच्चों की खुशी में ही लगा रहता है. अगर उसे अपने भाई के परिवार के प्रति जरा भी संवेदना होती तो क्या उस के परिवार की हालत इतनी खराब होती? अभी भी समय है बंटवारा कर लो…’’

‘‘मैं क्या छोटे को बंटवारे के बारे में कहूंगा. उस का रंगढंग तो तुम जानती ही हो, वह किसी की बात कहां सुनता है और सुन कर दूसरे कान से निकाल देता है.’’ हरभजन कंवर ने कहा.

‘‘मगर यह कैसे चल सकता है, मैं यह सब बरदाश्त नहीं कर सकती,’’ उफनती नदी की धारा की तरह कहती धनकुंवर अपने रोजाना के कामकाज में लग गई.

इधर रोजरोज के वादविवाद से त्रस्त  अंतत: हरभजन कंवर ने हथियार डाल दिए और कहा, ‘‘ठीक है, तुम्हें जैसा अच्छा लगे बताओ.’’

धनकंवर ने अपने भाई परमेश्वर कंवर, जोकि पास ही के गांव फत्तेगंज में रहता था और अकसर भैंसमा आया करता था, से धीरेधीरे बातचीत कर के उसे अपने मन मुताबिक बना लिया. भाई के साथ रची साजिश  धनकंवर ने एक दिन उस से कहा, ‘‘भाई, तुम बहन की कोई मदद नहीं कर रहे, ऐसा भाई भी किस काम का.’’

इस पर परमेश्वर ने कहा, ‘‘बहन आखिर तुम क्या चाहती हो, मुझे बताओ.’’

परमेश्वर की जानकारी में जमीनजायदाद का विवाद पहले ही आ चुका था. उसे लगता था कि जरूर यही कोई बात होगी जो बहन कहने वाली है.

…और हुआ भी यही. बहन धनकुंवर ने कहा, ‘‘छोटे (हरीश) ने सारी संपत्ति पर अधिकार जमा लिया है. क्या कुछ ऐसा करें कि बात बन जाए. तुम कोई ऐसा वकील देखो, जो हमें न्याय दिला सके.’’

परमेश्वर ने कहा, ‘‘वकील और कोर्ट कचहरी के चक्कर में तो न जाने कितना समय लग जाएगा. क्यों न हम…’’ कह कर परमेश्वर चुप हो गया. बहन धनकंवर ने परमेश्वर के मौन होने पर कहा, ‘‘चुप क्यों हो गए? क्या कहना चाहते हो?’’

परमेश्वर ने धीरे से कहा, ‘‘क्यों न हम हरीश को ही रास्ते से हटा दें.’’

‘‘क्या मतलब… क्या कहना चाहते हो?’’ वह बोली.

‘‘सीधी सी बात है, मैं कहना चाहता हूं हरीश का खात्मा.’’ उस ने बात स्पष्ट की.

सोच कर के धनकंवर ने कहा, ‘‘वाह, यह तो बहुत अच्छा होगा, मगर यह कैसे संभव होगा?’’

‘‘उस की फिक्र मत करो. हां, कुछ पैसा लगेगा, मैं अपने एक दोस्त को तैयार करता हूं, उसे मैं जैसे कहूंगा वह करेगा. तुम बस जीजाजी को संभाल लेना.’’

बहन ने कहा, ‘‘भाई, तुम उन की चिंता मत करो, मैं उन्हें समझाने की कोशिश करती हूं. मैं तो बारबार उन्हें कहती रहती हूं. मगर वह मेरी सुनते ही नहीं, अब मैं कोशिश करूंगी कि ठीक से उन्हें मना ही लूं.’’

इस चर्चा और घटनाक्रम के बाद परमेश्वर और बहन धनकंवर दोनों ने मिल कर हरीश कंवर की कहानी का पटाक्षेप करने की योजना बनानी शुरू कर दी. हरीश कुंवर के परिवार को खत्म करने की जो योजना बनी, उसे 21 अप्रैल 2021  दिन बुधवार सुबहसवेरे 4 बजे अमलीजामा पहनाया गया. हरीश (36 वर्ष), पत्नी सुमित्रा ( 32 ) अपनी 4 वर्षीय बेटी आशी के साथ अभी नींद में ही थे कि भाई हरभजन परिवार सहित सुबह हमेशा की तरह अपने कमरे से सुबह की सैर के लिए निकल गया. पिता हरभजन के निकलते ही उस की 16 वर्षीय बेटी रंजना (काल्पनिक नाम) ने अपने मामा परमेश्वर कंवर को मोबाइल पर मैसेज किया कि पापा सैर पर निकल गए हैं.

यह मैसेज मिलते ही परमेश्वर ने अपने दोस्त रामप्रसाद मन्नेवार को फोन किया और दोनों थोड़ी ही देर में भैंसमा स्थित हरीश कंवर के पैतृक आवास के पास आ गए. बेरहमी से किए 3 कत्ल यहां उन्हें खबर नहीं थी कि चौराहे पर एक दुकान पर सीसीटीवी कैमरा लगा है, जिस में दोनों के आने का वीडियो फुटेज रिकौर्ड हो गया है. दोनों हरीश कंवर के कमरे में चले गए और बकरी को रेतने का हथियार (कत्ता) निकाल कर हरीश पर हमला कर दिया. दोनों के एक साथ धारदार हथियार से हमला करने से हरीश कंवर हड़बड़ा कर खून से लथपथ उठ खड़े हुए. उन्होंने अपना बचाव करने की कोशिश की, मगर दोनों ने उन पर लगातार हमले किए.

हरीश ने साहस के साथ अपने आप को बचाने का खूब प्रयास किया और हमलावरों से हथियार छीनने की कोशिश की, मगर सफल नहीं हो पाए. अंतत: दोनों ने मिल कर हरीश को वहीं मौत की नींद सुला दिया. होहल्ला सुन कर हरीश कंवर की पत्नी सुमित्रा उठ खड़ी हुई और पति का बचाव करने आगे बढ़ी कि उन्हें भी दोनों ने मिल कर धारदार हथियार से हमला कर मार डाला. 4 साल की आशी चिल्लाहट सुन कर के उठ कर रो रही थी. दोनों हत्यारों ने बच्ची आशी की भी वहीं नृशंस हत्या कर दी. इस के बाद वे कमरे से बाहर निकले तो शोरगुल सुन कर हरीश की 82 वर्षीय मां जीवनबाई वहां पहुंचीं. उन्हें बहुत कम दिखाई देता था. वह चिल्लाहट सुन कर ‘क्या है…क्या हो गया’ पूछने लगीं तो उन्हें कोई जवाब न दिया. दोनों ने उन्हें धक्का देते हुए नीचे गिरा दिया और वहां से भाग खड़े हुए.

हत्याकांड को अंजाम दे कर दोनों बाहर आए तो सुबह के लगभग साढ़े 4 बज रहे थे. अभी चारों ओर अंधेरा ही था. परमेश्वर और रामप्रसाद घर के बाहर आए और दोनों ने यह योजना बनाई कि जब तक मामला शांत नहीं हो जाता, दोनों अलगअलग हो जाएं और जब स्थितियां ठीक होंगी तो मुलाकात की जाएगी. परमेश्वर आगे बढ़ा तो उसे यह खयाल आया कि उस के कपड़े खून से सन गए हैं और उस के चेहरे पर चोट आई है, जहां से खून बह रहा है. मगर वह आगे गांव सलिहाभाठा की ओर बढ़ गया. आगे सिंचाई विभाग के डैम के पास  उस ने अपने रक्तरंजित कपड़ों को जला दिया और डैम में नहाधो कर उस ने डायल 112 नंबर पर फोन कर के खुद का एक्सीडेंट होने की सूचना दे दी. फिर वह करतला अस्पताल में भरती हो गया.

दूसरी तरफ रामप्रसाद कोरबा जिला के समीप जिला चांपा जांजगीर के एक गांव में अपने रिश्तेदार के यहां चला गया. जहां से नगरदा थाना पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उरगा पुलिस के हवाले कर दिया. देर शाम को एसपी अभिषेक सिंह मीणा ने एसपी औफिस में एक पत्रकार वार्ता आयोजित कर सभी आरोपियों को प्रैस के समक्ष उपस्थित कर सारे घटनाक्रम से परदा उठा दिया. पुलिस ने हरीश कंवर, उन की सुमित्रा और बेटी आशी की हत्या के आरोप में आरोपियों हरभजन कंवर, पत्नी धनकंवर, बेटी रंजना, साले परमेश्वर कंवर और उस के दोस्त रामप्रसाद मन्नेवार और सुरेंद्र कंवर के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत गिरफ्तार कर कोरबा के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया, जहां से रंजना के अलावा सभी आरोपियों को जेल भेज दिया गया. रंजना को बाल सुधार गृह भेजा गया. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Jharkhand Crime News : पाताललोक वेबसीरीज देख कर किया दोस्त की पत्नी और बच्चों का कत्ल

Jharkhand Crime News : दूसरों की वजह से यदि उग्र स्वभाव का इंसान आंतरिक क्रोध के जाल में फंस जाए तो उसे बुरे करेक्टर याद आते हैं. दीपक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. ऐसे में उसे वेबसीरीज ‘पाताल लोक’ का करेक्टर हथौड़ा त्यागी याद आया और उस ने हथौड़ा उठा लिया. फिर तो उस ने…

पारसी व्यवसाई जमशेदजी नौशरवानजी टाटा द्वारा बसाया गया झारखंड का जमशेदपुर भारत के सब से प्रगतिशील औद्योगिक नगरों में एक है. इस शहर की बुनियाद सन 1907 में टाटा आयरन ऐंड स्टील कंपनी (टिस्को) की स्थापना से पड़ी. जमशेदपुर को टाटानगर भी कहते हैं. इस शहर में टिस्को के अलावा टेल्को, टायो, उषा मार्टिन, जेम्को, टेल्कान, बीओसी सहित आधुनिक स्टील ऐंड पावर के कई उद्योग और देश की नामी इकाइयां हैं. दीपक कुमार अपने परिवार के साथ इसी जमशेदपुर शहर में कदमा थाना इलाके में तीस्ता रोड पर क्वार्टर नंबर एन-97 में रहता था. परिवार में कुल 4 लोग थे.

दीपक, उस की पत्नी वीणा और 2 बेटियां. बड़ी बेटी श्रावणी 15 साल की थी और छोटी बेटी दिव्या 10 साल की. दीपक खुद करीब 40 साल का था और उस की पत्नी वीणा 36 साल की. मूलरूप से बिहार के खगडि़या जिले का रहने वाला दीपक टाटा स्टील कंपनी में फायर ब्रिगेड कर्मचारी था. पिछले कुछ सालों से नौकरी के सिलसिले में वह जमशेदपुर में रहता था, वेतन ठीकठाक था. साइड बिजनैस के रूप में वह ट्रांसपोर्ट का काम भी करता था. इसलिए घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी. लेकिन दोस्तों के धोखा देने और लौकडाउन में ट्रांसपोर्ट से आमदनी घटने से वह आर्थिक संकट में आ गया था.

इसी 12 अप्रैल की बात है. दीपक ने अपने दोस्त रोशन और उस की पत्नी आराध्या को लंच पर घर बुलाया. सुबह करीब साढ़े 9 बजे जब दीपक का फोन आया था, तब रोशन ने तबीयत ठीक न होने की बात कह कर मना कर दिया था, लेकिन दीपक के काफी इसरार करने पर रोशन ने कह दिया कि तबीयत ठीक रही, तो वह दोपहर बारह-एक बजे तक आने या नहीं आने के बारे में बता देगा. रोशन और उस की बीवी आराध्या से दीपक के पारिवारिक संबंध थे. दरअसल, रोशन आराध्या से प्यार करता था, लेकिन दोनों के घर वाले इस रिश्ते के लिए राजी नहीं थे. तब दीपक ने दोनों परिवारों को रजामंद कर के रोशन और आराध्या की शादी कराई थी.

दीपक का छत्तीसगढ़ में ट्रांसपोर्ट का काम था. वहां रोशन का भी ट्रक चलता था. आराध्या दीपक को मामा कहती थी. रोशन और आराध्या कुछ महीने पहले ही जमशेदपुर में शिफ्ट हुए थे. आराध्या या रोशन का फोन नहीं आया, तो दीपक ने दोपहर करीब एक बजे पत्नी वीणा के मोबाइल से आराध्या को फोन कर लंच पर जरूर आने का आग्रह किया. आराध्या मना नहीं कर सकी. उस ने कहा, ‘‘ठीक है. हम जरूर आएंगे.’’

दोपहर करीब ढाई बजे रोशन अपनी पत्नी आराध्या और एक साल की बेटी के साथ कार से कदमा में दीपक के घर पहुंचे. उन के साथ रोशन का साला अंकित भी था. अंकित दिल्ली रहता था. वह बहनबहनोई से मिलने जमशेदपुर आया था. रोशन और आराध्या दीपक के घर लंच पर जा रहे थे, अंकित घर में अकेला बोर होगा. सोच कर वे उसे भी अपने साथ लेते गए. घर पहुंचने पर दीपक ने गेट खोला. उस ने रोशन और उस की बीवी का गर्मजोशी से स्वागत किया. उन के साथ तीसरे युवक को देख कर दीपक ने रोशन की तरफ सवालिया नजरों से देखा. उस की नजरों को भांप कर रोशन ने हंसते हुए कहा, ‘‘यार, ये मेरा साला और मेरी बेगम साहिबा का भाई है. नाम है अंकित. दिल्ली से आया है.’’

रोशन, उस की बीवी और अंकित को ड्राइमरूम में सोफे  पर बैठने का इशारा करते हुए दीपक ने कहा, ‘‘आप लोग बैठो, मैं फ्रिज से ठंडा पानी ले कर आता हूं.’’

दीपक पानी लाने के लिए जाने लगा, तो आराध्या चौंक कर बोली, ‘‘मामा, आप पानी क्यों ला रहे हो? वीणा मामी को कह दो, वह ले आएंगी.’’

‘‘अरे यार, मैं तुम्हें बताना भूल गया. वीणा कुछ देर पहले मेरे भाई के घर रांची चली गई. साथ में दोनों बच्चों को भी ले गई,’’ दीपक ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘घर में अकेला मैं ही हूं. मुझे ही आप लोगों की आवभगत करनी पड़ेगी.’’

‘‘मामा, हमें शर्मिंदा मत कीजिए. आप ने हमें बेकार ही लंच पर बुलाया,’’ आराध्या ने नाराजगी भरे स्वर में कहा, ‘‘मामीजी घर पर नहीं हैं, तो हम लंच के लिए फिर कभी आ जाएंगे.’’

दीपक ने आराध्या को भरोसा दिलाते हुए कहा, ‘‘आप को लंच पर बुलाया है, तो बाजार से खाना ले आएंगे.’’

दीपक की इस बात पर आराध्या ने पति रोशन की ओर देखा. रोशन क्या कहता, उस ने फ्रिज से पानी लेने जा रहे दीपक को सोफे पर ही बैठा लिया और बातें करने लगे. घरपरिवार और बच्चों की बातें करते हुए वे ठहाके भी लगाते जा रहे थे. उन्हें बातें करते हुए 5-7 मिनट ही हुए थे कि आराध्या की बेटी ने पौटी कर दी. आराध्या बेटी को गोद में ले कर बाथरूम में चली गई. बाथरूम में उस ने बच्ची को साफ किया. पीछेपीछे रोशन भी बीवी की मदद के लिए बाथरूम में आ गया और उस ने बेटी का नैपकिन धोया. बाथरूम से ड्राइंगरूम में आते समय उन्हें चिल्लाने की आवाज सुनाई दी. वे तेज कदमों से ड्राइंगरूम में पहुंचे, तो दीपक हथौड़े से अंकित पर हमला कर रहा था.

रोशन कुछ समझ नहीं पाया कि अचानक ऐसी क्या बात हो गई, जो दीपक अंकित को मार रहा है. वह दीपक से पूछते हुएअंकित को बचाने लगा, तो दीपक ने उस की बच्ची को अपनी ओर खींचते हुए मारने की कोशिश की. रोशन बचाने लगा, तो दीपक ने उस पर भी हथौड़े से हमला कर दिया. इस से रोशन को भी चोटें लगीं. किसी तरह रोशन ने अपनी बेटी, पत्नी और साले को बचा कर वहां से बाहर निकाला. अंकित के सिर से खून बह रहा था. उस के सिर पर रुमाल बांध कर खून रोकने की कोशिश की गई. फिर वे कार से सीधे टाटा मैमोरियल हौस्पिटल पहुंचे. अंकित का तुरंत इलाज जरूरी था. उसे हौस्पिटल में भरती कराया गया. रोशन को भी डाक्टरों ने भरती कर लिया.

बाद में रोशन ने दीपक के साले विनोद को फोन कर पूरी बात बताई. विनोद को दाल में कुछ काला नजर आया. उस ने यह बात अपने छोटे भाई आनंद साहू को बताईं. दीपक की ससुराल जमशेदपुर के ही शास्त्रीनगर में थी. शाम करीब 4 बजे विनोद और उस के घर वाले दीपक के क्वार्टर पर पहुंचे. वहां गेट पर ताला लगा हुआ था, लेकिन अंदर एसी चल रहा था. विनोद और उस के घर वाले सोचविचार कर ही रहे थे कि इसी दौरान रिंकी को ढूंढते हुए उस की मां नीलिमा और मंझली बहन बिपाशा भी वहां पहुंच गईं. उन्होंने बताया कि रिंकी दीपक के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने आती थी. वह सुबह 11 बजे घर से निकली थी और अभी तक घर नहीं पहुंची.

रोजाना वह दोपहर एक बजे घर वापस आ जाती थी. बहनों की औनलाइन क्लास होने के कारण रिंकी उस दिन मोबाइल नहीं ले गई थी. जब रोजाना के समय पर रिंकी वापस घर नहीं पहुंची, तो घर वालों ने दीपक को फोन किया. दीपक ने कहा कि वह ट्यूशन पढ़ा कर जा चुकी है. इस के बाद भी दोपहर 3 बजे तक जब रिंकी घर नहीं पहुंची, तो नीलिमा और बिपाशा दीपक के क्वार्टर पर पहुंची थीं. चिंता में मांबेटी वहां से कदमा थाने पहुंचीं और पुलिस को पूरी बात बताई. पुलिस ने कोई घटना दुर्घटना होने की आशंका जताते हुए एक बार हौस्पिटल में देख आने की सलाह दी. वे टीएमएच गईं, लेकिन वहां कुछ पता नहीं चला, तो थकहार कर दोनों दोबारा दीपक के क्वार्टर पर आईं. यहां उन्हें विनोद और उस के घर वाले मिले.

विनोद ने रिंकी की मांबहन के साथ सोचविचार कर दीपक के क्वार्टर के दरवाजे पर लगा ताला तोड़ दिया. विनोद अंदर कमरे में गया और चिल्लाते हुए बाहर निकल आया. उस ने बताया कि वीणा और दोनों बेटियां मरी पड़ी हैं. यह सुन कर विनोद के साथ दूसरे लोग कमरे में गए. उन्होंने वीणा और दोनों बच्चियों को हिलायाडुलाया, लेकिन कोई हलचल नहीं हुई. उन की नब्ज भी ठंडी पड़ चुकी थी. वीणा और उस की दोनों बेटियों की लाश देख कर विनोद और उस के घर वाले रोने लगे. दीपक की पत्नी और बेटियों की लाश देख कर रिंकी की मां और बहन को शक हुआ. खोजबीन में रिंकी की एक चप्पल बाहर पड़ी मिल गई.

इस से संदेह और बढ़ गया. वे घर में रिंकी को तलाशने लगीं. उस की स्कूटी तो बालकनी में खड़ी मिली, लेकिन रिंकी नहीं मिली. मंझली बेटी बिपाशा मां को दिलासा देते हुए अलगअलग कमरों में बड़ी चीजें हटा कर देखने लगी. उस ने एक कमरे में पलंग का बौक्स खोला, तो उस में रिंकी की लाश पड़ी थी. उस के हाथ बंधे हुए और कपड़े अस्तव्यस्त थे. रिंकी की लाश देख कर नीलिमा और बिपाशा रोने लगीं. चारों हुईं हथौड़े का शिकार एक क्वार्टर में 4 लोगों की हत्या होने की बात पूरे शहर में फैल गई. सूचना मिलने पर कदमा थानाप्रभारी से ले कर डीएसपी, एसपी (सिटी) सुभाषचंद्र जाट और एसएसपी डा. एम. तमिलवाणन के अलावा फोरैंसिक टीम मौके पर पहुंच गई.

पुलिस अफसरों ने मौकामुआयना किया. एक कमरे की दीवार पर खून के छींटे मिले. तलाशी के दौरान कमरे में खून लगी हथौड़ी और खून से सना तकिया भी मिला. शराब की एक बोतल भी मिली. फोरैंसिक टीम ने फिंगरप्रिंट लिए और जरूरी सबूत जुटाए. मौके के हालात से लग रहा था कि वीणा और उस की दोनों बेटियों की हत्या कई घंटे पहले की गई थी. अनुमान लगाया गया कि सुबह करीब 11 बजे के बाद ट्यूशन टीचर रिंकी जब दीपक की बेटियों को पढ़ाने आई होगी, तो उस ने वीणा और दोनों बच्चियों की लाश देख ली होगी. इस पर दीपक ने भेद खुलने के डर से रिंकी को दूसरे कमरे में ले जा कर मार डाला होगा.

रिंकी की हत्या 11 से दोपहर 1 बजे के बीच की गई होगी, क्योंकि करीब एक बजे दीपक ने रोशन की पत्नी आराध्या को लंच पर बुलाने के लिए फोन किया था. 21 साल की रिंकी के अस्तव्यस्त कपड़े देख कर उस से दुष्कर्म किए जाने का अनुमान भी लगाया गया. पुलिस ने जरूरी जांचपड़ताल और लिखापढ़ी के बाद चारों शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिए. पुलिस की कार्रवाई में रात हो गई थी, इसलिए रात में पोस्टमार्टम नहीं हो सके. चारों हत्याओं में सीधा शक दीपक पर था और उस का कुछ अतापता नहीं था. अधिकारियों ने दीपक के ससुराल वालों से उस के बारे में पूछताछ की. पता चला कि वह उस दिन सुबह ही ससुराल गया था.

ससुर पारसनाथ साहू ने दामाद दीपक से जब बेटी और नातिनों के बारे में पूछा, तो उस ने कहा था कि वे रांची में उस के भाई के घर गई हैं. पारसनाथ ने पुलिस अफसरों को बताया कि कदमा तीस्ता रोड पर कुछ दिनों से चोरी की वारदातें हो रही थीं. इसलिए बेटी वीणा ने कुछ दिन पहले करीब 5 लाख रुपए के अपने कीमती जेवर सुरक्षा के लिहाज से उन के घर पर रख दिए थे. दीपक एक दिन पहले 11 अप्रैल की शाम को भी अपनी ससुराल गया था, तब वह बच्चों के साथ खेलता रहा फिर कुछ देर रुक कर चला गया था. इस के बाद दूसरे दिन सुबह वह दोबारा आया, तो उस ने अपने जेवर वापस मांगे. हम ने उसे जेवर दे दिए. जेवर ले कर वह चला गया.

पुलिस ने ससुराल वालों से दीपक का मोबाइल नंबर ले कर उस की लोकेशन पता कराई. करीब 3 बजे की उस की आखिरी लोकेशन जमशेदपुर में ही रमाडा होटल के पास बिष्टुपुर में मिली. फिर उस का मोबाइल बंद हो गया था. दीपक की बुलेट मोटरसाइकिल भी नहीं मिली. इसलिए अनुमान लगाया गया कि ससुराल से गहने ले कर वह बुलेट से फरार हो गया. जांचपड़ताल में पुलिस को रात के 10 बज गए. इसलिए क्वार्टर सील कर बाकी जांच अगले दिन करने का फैसला किया गया. 13 अप्रैल को सुबह से ही पुलिस इस मामले की जांचपड़ताल में जुट गई. दीपक के क्वार्टर की तलाशी में एक कमरे से सीमन लगा एक गमछा और रिंकी के कुछ कपड़े मिले. इसी कमरे में पलंग के बौक्स में रिंकी की लाश मिली थी.

जांचपड़ताल में यह भी पता चला कि 12 अप्रैल की सुबह दीपक ससुराल से जो जेवर ले कर आया था, वे जेवर उस ने सुबह करीब साढ़े 10 बजे कदमा उलियान स्थित आरके ज्वैलर्स पर बेच दिए थे. दीपक ज्वैलर का परिचित था. परिवार के जेवर वह इसी दुकान से बनवाता था. दुकानदार रमेश सोनी से उस ने जमीन खरीदने के लिए जेवर बेचने की बात कही थी. सारे जेवरों का वजन 109 ग्राम था. इन का सौदा 4 लाख 40 हजार रुपए में हुआ. रुपया देने के लिए दुकानदार ने 2-3 घंटे का समय मांगा. पुलिस ने अनुमान लगाया कि इस के बाद दीपक अपने क्वार्टर पर आ गया होगा. कुछ देर बाद ट्यूशन टीचर रिंकी घोष वहां पहुंची होगी. रिंकी ने कमरे में लाशें देख लीं, तो दीपक ने उस को पकड़ लिया होगा और दुष्कर्म करने के बाद उस की हत्या कर लाश पलंग के बौक्स में छिपा दी होगी.

रिंकी की लाश ठिकाने लगाने के बाद दोपहर करीब डेढ़ बजे दीपक वापस ज्वैलर के पास पहुंचा. ज्वैलर ने उसे 3 लाख रुपए नकद दिए. बाकी पैसे एकदो दिन में देने की बात कही, तो दीपक ने बाकी 1.40 लाख रुपए अपने भाई के बैंक खाते में ट्रांसफर करने को कहा. इस के लिए दुकानदार ने हामी भर ली. इस के बाद दीपक वापस अपने क्वार्टर पर आया होगा. कुछ देर बाद रोशन अपनी पत्नी, बेटी और साले के साथ लंच के लिए वहां पहुंच गया. वहां दीपक ने अंकित और रोशन पर जानलेवा हमला किया. इस से बच कर वे भाग गए, तो दीपक दोपहर 3 बजे अपने क्वार्टर पर ताला लगा कर बुलेट से फरार हो गया होगा.

शादी कराने वाला ही बना दुश्मन पुलिस को दीपक के ससुराल वालों से पूछताछ में पता चला कि दीपक का किसी ना किसी बात पर वीणा से झगड़ा होता रहता था. वह अपने पारिवारिक विवाद के लिए रोशन और उस की पत्नी आराध्या को दोषी मानता था. शायद इसीलिए दीपक ने पत्नी और दोनों बेटियों की हत्या करने के बाद रोशन और आराध्या को जान से मारने की नीयत से ही लंच पर बुलाया था, लेकिन रोशन के साथ उस का साला भी पहुंच गया. 2 पुरुषों के बीच दीपक का हमला कमजोर पड़ गया और रोशन के परिवार की जान बच गई. ससुराल वालों से ही पता चला कि दीपक अपने बड़े साले विनोद साहू को भी जान से मारने की फिराक में था.

उस ने फोन कर जमीन संबंधी कोई बात करने के लिए दोपहर में विनोद को अपने घर बुलाया था, लेकिन विनोद काम में व्यस्त होने के कारण नहीं जा सका था. विनोद ने कुछ साल पहले किसी लड़की से अफेयर के मामले में दीपक की पिटाई कर दी थी, तब से दीपक उस से रंजिश रखता था. दीपक के छोटे साले आनंद साहू के बयान पर कदमा थाने में दीपक के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. रोशन ने पहले ही दीपक के खिलाफ जानलेवा हमला करने की शिकायत थाने में दे दी थी. कोल्हान के डीआईजी राजीव रंजन सिंह ने जमशेदपुर पहुंच कर मौकामुआयना किया और रोशन सहित दीपक के ससुराल वालों से पूछताछ की. दूसरी ओर, पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिए.

सूचना देने और इतनी बड़ी घटना के बाद भी दीपक के परिवार से कोई भी जमशेदपुर नहीं आया. वीणा और उस की बेटियों के शवों का दाह संस्कार मायके वालों ने किया. रिंकी के शव की अंत्येष्टि उस के घर वालों ने की. पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि दीपक ने 12 अप्रैल की सुबह हथौड़े से वार कर पत्नी और बेटियों की हत्या की थी. उस ने वीणा के सिर में 2 जगह और चेहरे पर वार किए थे. फिर तकिए से उस का मुंह दबाया था. बड़ी बेटी श्रावणी के सिर में पीछे से चोट की गई थी. उस का भी गला दबाया गया था. दीपक सब से ज्यादा प्यार छोटी बेटी दिव्या को करता था. उस के सिर के पीछे तेज चोट मारी गई थी. इस से उस की कई हड्डियां टूट गई थीं.

दीपक को तलाशना जरूरी था. दोस्तों और ससुराल वालों से उस के छिपने के ठिकानों का पता लगा कर पुलिस ने अलगअलग टीमें बनाईं और जमशेदपुर व रांची के अलावा बिहार, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल तक उस की तलाश शुरू कर दी. कई जगह छापे मारे गए. इस के साथ ही उस की मोटरसाइकिल की तलाश भी शुरू की गई. पुलिस ने दीपक के भाई और बहनों से बात की और उन के मोबाइल नंबरों की जांच की. ट्यूशन टीचर रिंकी घोष की हत्या के आरोपी को गिरफ्तार करने की मांग को ले कर टाइगर्स क्लब के संस्थापक सदस्य आलोक मुन्ना के नेतृत्व में 15 अप्रैल को कदमा रंकिणी मंदिर से गोल चक्कर तक कैंडल मार्च निकाला गया.

इन लोगों की मांग थी कि हत्यारे को पकड़ कर अदालत में स्पीडी ट्रायल चलाया जाए और उसे फांसी दी जाए. 4-5 दिन की भागदौड़ के बाद 16 अप्रैल को दीपक धनबाद में पकड़ा गया. वह 12 अप्रैल की दोपहर जमशेदपुर से बुलेट ले कर निकला और राउरकेला पहुंचा. बुलेट उस ने राउरकेला में छोड़ दी. वहां से टैक्सी ले कर वह पुरी व रांची हो कर 15 अप्रैल को धनबाद पहुंचा, जहां एक होटल में रुका. दीपक अपने पास रखे पैसों में से डेढ़ लाख रुपए भाई मृत्युंजय के खाते में जमा कराना चाहता था. इस के लिए वह 16 अप्रैल को धनबाद में एक प्राइवेट बैंक में पैसे जमा कराने गया. बैंक में पैसे जमा होते ही दीपक के भाई के मोबाइल पर मैसेज आया.

पुलिस ने दीपक और उस के भाई का मोबाइल पहले ही सर्विलांस पर लगा रखा था. मैसेज आते ही पुलिस को दीपक का सुराग मिल गया. जमशेदपुर पुलिस ने धनबाद पुलिस को सूचना दे दी. धनबाद पुलिस बैंक में पहुंची. इसी दौरान दीपक दोबारा बैंक पहुंचा, तो पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस 16-17 अप्रैल की दरम्यानी रात उसे धनबाद से जमशेदपुर ले आई. जमशेदपुर में पुलिस ने दीपक से पूछताछ की तो उस के हथौड़ीमार नर पिशाच बनने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है. पहले दीपक परसुडीह थाना इलाके के गांव सोपोडेरा में मातापिता के साथ रहता था. वहां उन का आलीशान पैतृक मकान था. प्रभु उस का जिगरी दोस्त था साल 2004 में दीपक की शादी वीणा से हो गई.

बाद में 2012 में दीपक की टाटा स्टील में फायरमैन के पद पर नौकरी लग गई. इस के बाद वह जमशेदपुर के कदमा इलाके में रहने लगा. परिवार बढ़ने के साथ जिम्मेदारियां और खर्च भी बढ़ गए थे. एक दिन दीपक ने दोस्त प्रभु से कोई साइड बिजनेस कराने की बात कही. इस पर प्रभु ने उसे ट्रांसपोर्ट का काम करने की सलाह दी. प्रभु ने उसे काम तो बता दिया लेकिन इतना पैसा दीपक के पास नहीं था. इस पर प्रभु ने उस से कहा कि वह सोपोडेरा का अपना पुश्तैनी मकान बेच दे और उस का पैसा ट्रांसपोर्ट में लगा दे, तो अच्छी आमदनी होगी. दीपक को यह बात जंच गई.

दोस्तों ने ही दिया धोखा उस ने अपना मकान 40 लाख रुपए में बेच दिया. इस में से 20 लाख रुपए उस ने अपने भाई मृत्युंजय को दे दिए. बाकी के 20 लाख रुपए दीपक के पास रहे. करीब दो साल पहले प्रभु ने उसे 17 लाख रुपए में एक हाइवा (मालवाहक ट्रक) और एक बुलेट दिलवा दी. यह हाइवा उस ने प्रभु के मार्फत जोजोबेड़ा में चलवा दिया. इस से उसे अच्छी आमदनी होने लगी. पिछले साल कोरोना के कारण लौकडाउन हो जाने से उस की आमदनी कम हो गई. इस बीच, दीपक को पता चला कि प्रभु ने जो ट्रक दिलवाया था, उस पर 5 लाख रुपए रोड टैक्स बकाया है.

परिवहन विभाग का नोटिस आने पर उस ने कर्ज ले कर टैक्स जमा कराया. इस के लिए उस ने टिस्का कोआपरेटिव सोसायटी से साढ़े चार लाख रुपए और अपने पीएफ अकाउंट से डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया. दीपक की तनख्वाह 34 हजार रुपए महीना थी. सोसायटी से कर्ज लेने के बाद उसे केवल 8 हजार रुपए ही मिलने लगे. ट्रक से भी आमदनी कम हो गई थी. करीब छह महीने पहले प्रभु ने बताया कि उस का भांजा रोशन खुद का और उस का ट्रक पश्चिम बंगाल में खड़गपुर की एक स्टील कंपनी में चलवा रहा है. रोशन पहले से ही उस का दोस्त था.

उस की शादी भी उस ने ही कराई थी. कमाई की उम्मीद में दीपक ने भरोसा कर बिना किसी लिखापढ़ी के अपना ट्रक रोशन को सौंप दिया. रोशन ने दीपक का ट्रक तो कंपनी में लगवा दिया, लेकिन उसे कमाई का हिस्सा नहीं दिया. इस बीच, दीपक लगातार कर्जदार होता गया. दीपक अपनी इस बर्बादी के लिए प्रभु और रोशन को जिम्मेदार मानता था. उस ने उन से बदला लेने की योजना बनाई. दीपक अपने मोबाइल पर वेबसीरीज देखा करता था. पाताल लोक और असुर वेबसीरीज देख कर उस ने उन की हत्या करने का मन बनाया. वह एक वेबसीरीज पाताललोक के कैरेक्टर हथौड़ा त्यागी से काफी प्रभावित था.

इसीलिए उस ने हथौड़े से हत्या करने का फैसला किया. उस ने दोनों दोस्तों को मारने की तो योजना बना ली लेकिन इस बात से परेशान था कि वह पकड़ा गया और जेल चला गया, तो बीवीबच्चों का क्या होगा? काफी सोचविचार के बाद उस ने अपने परिवार को भी खत्म करने का निर्णय लिया. 12 अप्रैल को दीपक सुबह जल्दी उठ गया. देखा कि पत्नी वीणा पानी भर रही थी. वह बिस्तर पर ही बेचैनी से इधरउधर करवटें बदलता रहा. पानी भरने और छोटेमोटे घरेलू काम निपटाने के बाद सुबह करीब 8 बजे वीणा फिर बैड पर लेट गई. दीपक ने उसी दिन अपने परिवार और दोनों दोस्तों का काम तमाम करने का आखिरी फैसला कर लिया.

दीपक ने पहले से ही बैड के पास छिपा कर रखा हथौड़ा निकाला और वीणा के सिर में पीछे से वार कर दिया. वीणा चीखती, इस से पहले ही उस ने तकिए से उस का गला दबा दिया. वीणा की मौत हो गई. इस के बाद दीपक दूसरे कमरे में गया. वहां बैड पर दोनों बेटियां सो रही थीं. दीपक ने एक नजर उन्हें देखा. फिर बेरहमी से पहले बड़ी बेटी के सिर में हथौड़ी से वार कर के उसे मौत के घाट उतारा. फिर इसी तरह छोटी बेटी को भी मौत की नींद सुला दिया. पत्नी और दोनों बेटियों की हत्या के बाद उस ने रोशन को लंच पर आने के लिए फोन किया. इस के बाद दूसरे दोस्त प्रभु को फोन कर शाम 4 बजे जोजोबेड़ा में मिलने की बात कही.

दोनों दोस्तों से बात करने के बाद वह नहाधो कर ससुराल गया और अपने जेवर ले कर ज्वैलर्स के पास पहुंचा. जेवर बेच कर वह वापस घर आया. कुछ देर बाद ही रिंकी घोष उस के बच्चों को पढ़ाने आ गई. रिंकी ने वीणा और बच्चों की लाशें देख लीं, तो दीपक को भेद खुलने का डर हुआ. उस ने उस के भी सिर पर हथौड़ी से हमला कर उसे मार डाला. इस के बाद उस ने उस की लाश से दुष्कर्म किया और शव पलंग के बौक्स में छिपा दिया. रोशन की हत्या की योजना फेल हो जाने पर वह डर गया था. इसलिए अपने क्वार्टर पर ताला लगा कर बुलेट से भाग निकला. उस की प्रभु को मारने की योजना भी अधूरी रह गई.

जल्लाद बने दीपक की सनक में ट्यूशन टीचर रिंकी बेमौत मारी गई. वह जमशेदपुर में कदमा रामजनम नगर की रहने वाली नीलिमा घोष की 3 बेटियों में सब से बड़ी थी और जमशेदपुर वीमंस कालेज में बीए अंतिम वर्ष की छात्रा थी. मंझली बेटी बिपाशा केरला पब्लिक स्कूल में 10वीं और छोटी बेटी विशाखा 5वीं कक्षा में पढ़ती थी. दीपक की बड़ी बेटी श्रावणी बिपाशा की क्लासमेट थी. श्रावणी के कहने पर ही रिंकी 2 साल से दीपक के घर ट्यूशन पढ़ाने जाती थी. दीपक का भाई मृत्युंजय रांची में एसबीआई में ब्रांच मैनेजर था. बाद में वह एक निजी फाइनैंस कंपनी में क्रेडिट इंचार्ज के पद पर काम करने लगा था.

मृत्युंजय अब जमशेदपुर आना चाहता था. इस के लिए उस ने दीपक से कहा भी था. दीपक ने अपने ससुराल वालों को भी यह बात बताई थी. इस घटना से कुछ दिन पहले ही दीपक अपने परिवार के साथ पुरी घूम कर आया था. 11 अप्रैल की रात भी वह परिवार के साथ एक पार्टी में गया था और 10 बजे के बाद लौटा था. दीपक ने अपना परिवार उजाड़ दिया और रिंकी के परिवार की खुशियां छीन लीं. कानून उसे उस के किए की सजा देगा, लेकिन उस के ससुराल वाले और रिंकी के परिवार वाले जीवन भर इस दुख को नहीं भुला पाएंगे. दीपक ने पकड़े जाने पर पुलिस को बताया था कि उस का आत्महत्या करने का प्लान था. इसलिए जेल में अब उस पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है. Jharkhand Crime News

 

Crime Story Hindi : ढाई करोड़ की चोरी का रहस्य

crime story hindi : अपने घरेलू नौकर ब्रजमोहन की हत्या पर रेलवे इंजीनियर पुनीत कुमार ने कहा कि चोरों ने उन के यहां से 15-20 लाख रुपए की चोरी कर नौकर को मार डाला. लेकिन केस खुला तो उन के यहां से ढाई करोड़ रुपए नकद व ज्वैलरी चोरी की बात सामने आई. आखिर इतनी रकम पुनीत कुमार के पास कहां से आई?

कुछ इंसानों की फितरत ही धोखे और फरेब की होती है. वह अपने साथ अच्छा करने वालों के साथ भी बुरा करने से नहीं चूकते. ऐसे लोगों को अपनी करनी का फल तो जरूर भुगतना पड़ता है. लेकिन अपनी फितरत से वे दूसरों के लिए भी खतरा बन जाते हैं. फिरोजाबाद का रहने वाला ब्रजमोहन भी इसी तरह का व्यक्ति था. उस ने रेलवे में 5 साल नौकरी की. जिस इंजीनियर पुनीत कुमार के घर पर वह काम करता था, जिन के कहने पर उस की नौकरी स्थाई हुई. उस ने उसी के घर चोरी करने की योजना बना ली. ब्रजमोहन लालची स्वभाव का था. उस ने पुनीत कुमार की मदद करने की नहीं सोची, बल्कि उस की नजर उन के घर में आ रहे रुपयों पर थी.

यह लालच ब्रजमोहन के लिए जानलेवा साबित हुआ. जिन लोगों को उस ने चोरी के लिए बुलाया. वे ही उस की जान के दुश्मन बन बैठे. 26 मार्च, 2021 को लखनऊ के कैंट थानाक्षेत्र के बंदरियाबाग में रहने वाले इंजीनियर पुनीत कुमार के सरकारी आवास पर सरकारी नौकर ब्रजमोहन की हत्या कर दी गई. पुलिस ने घटनास्थल पर पहुंच कर जांच की तो पता चला कि बिजली के तार से पहले उस के गले को कसा गया, बाद में चाकू से रेत दिया गया था. उस के हाथ और पांव बंधे थे. पुनीत के घर का सामान बिखरा हुआ था. पता चला कि पुनीत कुमार के बैडरूम से 15-20 लाख रुपए कैश और कुछ जेवरात गायब थे.

पहली नजर में मामला चोरी के लिए हत्या का लग रहा था. पुनीत ने अपने नौकर की हत्या का मुकदमा कैंट थाने में लिखाया. इंजीनियर का सरकारी आवास लखनऊ के बहुत ही सुरक्षित बंदरियाबाग इलाके में था. इसलिए इस केस को सुलझाना पुलिस के लिए ज्यादा चुनौती भरा काम था. लखनऊ पुलिस कमिश्नर डी.के. ठाकुर ने जौइंट पुलिस कमिश्नर (अपराध) निलब्जा चौधरी की अगुवाई में एक टीम का गठन किया. इस टीम में डीसीपी (पूर्वी) और एडीशनल डीसीपी (पूर्वी) को भी अहम जिम्मेदारी दी गई. इस के साथ ही कैंट थाने की इंसपेक्टर नीलम राणा, एसआई जनीश वर्मा को मामले के परदाफाश की जिम्मेदारी सौंपी गई.

इंजीनियर पुनीत के घर नौकर की हत्या के समय पुनीत के फूफा चंद्रभान घर के दूसरे कमरे में टीवी देख रहे थे. उन को किसी बात का पता नहीं था. ऐसे में पुलिस को लग रहा था कि हो न हो नौकर ब्रजमोहन इस चोरी में हिस्सेदार रहा हो. पुलिस को यह समझ नहीं आ रहा था कि अगर नौकर चोरी में शामिल था तो उस की हत्या क्यों हो गई? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए पुलिस ने ब्रजमोहन के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स चैक करनी शुरू की. साथ ही पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज भी देखे. पता चला कुछ लोग एक टैक्सी से आए थे. पुलिस ने छानबीन शुरू की. पुनीत कुमार 2008 बैच के भारतीय रेलवे इंजीनियरिंग सर्विस (आईआरएसई) के अधिकारी हैं. उत्तर रेलवे की चारबाग स्थित निर्माण इकाई में उन का दबदबा है.

उन के पास इस समय 800 करोड़ रुपए से अधिक के रेलवे के प्रोजेक्ट्स हैं. पहले वह इसी कार्यालय में अधीक्षण अभियंता थे, बाद में प्रमोशन पा कर यहीं पर उप मुख्य निर्माण अभियंता के रूप में काम करने लगे. नौकर ब्रजमोहन उन के घर के कामकाज देखता था. फिरोजाबाद के कोलामऊ महरौना का रहने वाला ब्रजमोहन करीब 5 साल से पुनीत के यहां काम कर रहा था. एक साल पहले पुनीत ने ही ब्रजमोहन की नौकरी स्थाई की थी. वह पुनीत के ही आवास में बने सर्वेंट क्वार्टर में रहता था. उस का अपने गांव से बराबर संपर्क बना हुआ था. वह अपने साहब के घर रुपयोंपैसों की आवाजाही होते देखा करता था. उसे यह भी पता होता था कि वहां कितना पैसा रखा रहता है. यह पैसा देख कर उस के मन में लालच आ गया.

ब्रजमोहन की डोली नीयत इंजीनियर पुनीत के घर नकद रुपए देख कर नौकर ब्रजमोहन की नीयत डोलने लगी. एक दिन उसने अपने भांजे बहादुर को इस बारे में जानकारी दी और कहा कि यदि उस के मालिक पुनीत के यहां चोरी की जाए तो भारी मात्रा में नकदी के अलावा अन्य कीमती सामान मिल सकता है. बहादुर भी फिरोजाबाद के कोलमाई मटसैना का रहने वाला था. उसे अपने मामा की सलाह अच्छी लगी. लिहाजा बहादुर ने अपने साथ मैनपुरी जिले के भोजपुरा के रहने वाले अजय उर्फ रिंकू, ऊंची कोठी निवासी मंजीत और एक अन्य दोस्त अनिकेत के साथ मिल कर चोरी की योजना तैयार की.

योजना के अनुसार, ये लोग किराए की गाड़ी ले कर 25 मार्च को इंजीनियर पुनीत के घर पहुंच गए. नौकर ब्रजमोहन की मिलीभगत से इन को चोरी के लिए घर में घुसने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मंजीत घर के बाहर सीढि़यों पर खड़ा हो कर बाहर से आने वालों की निगरानी करने लगा. ब्रजमोहन, बहादुर और अजय घर के अंदर चले गए. इन लोगों ने जेवर और सारे पैसे एक जगह रख लिए. वहां पर नकदी और ज्वैलरी उम्मीद से ज्यादा मिली तो ब्रजमोहन ने अपने भांजे बहादुर से कहा, ‘‘देखो जितना हम ने बताया था, उस से अधिक पैसा मिल गया है. इसलिए जो ज्यादा पैसा मिला है, इस में कोई बंटवारा नहीं होगा. यह सब मेरा होगा. बाकी तुम सब बांट लेना.’’

‘‘जी मामाजी, जैसा आप कह रहे हो वैसा ही होगा. अब हम लोग जा रहे हैं. आप भी पुलिस को कुछ नहीं बताना,’’ बहादुर बोला.

‘‘हां ठीक है. पुलिस सब से पहले हम पर ही शक करेगी. इस से बचने के लिए तुम लोग मुझे कुरसी से बांध कर बेहोश कर दो. जिस से लगे कि चोरों ने नौकर को बांध कर चोरी की और बेहोश कर के भाग गए.’’ ब्रजमोहन ने सलाह दी. बहादुर और अजय ने ब्रजमोहन को कुरसी से बांध कर बेहोश कर दिया. इस के बाद दोनों जब रुपया रख रहे थे, तभी अजय बोला, ‘‘बहादुर, तू तो जानता है कि तेरे मामा डरपोक किस्म के हैं. कहीं ऐसा न हो कि पुलिस के आगे सब बक दे.’’

‘‘बात तो सही है, पर क्या किया जाए?’’ बहादुर ने कहा.

‘‘समय की मांग है कि हम अपने को बचाने के लिए मामा को ही रास्ते से हटा दें. इस से मामा को पैसा भी नहीं देना होगा और पुलिस हम तक भी नहीं पहुंच पाएगी.’’ अजय ने सलाह दी. दोनों ने मिल कर सब से पहले ब्रजमोहन का गला कस दिया. वह पहले से ही बेहोश था तो कोई विरोध नहीं कर पाया. न ही कोई आवाज हुई. दोनों को लगा कि कहीं वह जिंदा न बच जाए. इसलिए चाकू से उस का गला भी रेत दिया.

ब्रजमोहन को मारने के बाद तीनों वापस मैनपुरी चले गए. मैनपुरी में ये लोग बहादुर के जानने वाले उदयराज की दुकान पर पहुंचे. उदयराज की कपडे़ की दुकान थी. यहां सभी ने अपने कपडे़ बदले. वहीं पर इन लोगों से मोहन नाम का आदमी मिला, जिसे इन लोगों ने सारे रुपए दे दिए. वह रुपए ले कर अपने घर चला गया. इस के बाद चारों मोहन के घर गए और वहां पर रुपयों का बंटवारा हुआ. मंजीत रुपए ले कर अपने घर चला गया. उस ने रुपए अपनी पत्नी निशा को दिए और उसे इस बारे में बताया. निशा ने रुपए गमले और जमीन में दबा दिए, जिस से किसी को पता न चल सके.

पुलिस गंभीरता से केस की जांच में जुटी थी. सीसीटीवी फुटेज में जो टैक्सी दिखी थी, उसी के नंबर के सहारे वह टैक्सी चालक तक पहुंच गई. उस ने पुलिस को पूरी बात बताई. टैक्सी चालक से पूछताछ कर के पुलिस सब से पहले मंजीत के घर पहुंची. पुलिस ने मंजीत के पास से 40 लाख, उस की पत्नी निशा के पास से 16 लाख, उदयराज और मोहन के पास से 7-7 लाख रुपए बरामद किए. कहानी लिखे जाने तक मुख्य आरोपी बहादुर फरार था. पुलिस के लिए चौंकाने वाली बात यह थी कि इंजीनियर पुनीत कुमार ने अपने घर में चोरी के मामले में 15 से 20 लाख नकद और जेवर चोरी होने का जिक्र किया था. जबकि पुलिस आरोपियों के पास से 70 लाख बरामद कर चुकी थी. मुख्य आरोपी के पास अलग से पैसा बरामद होना था.

आरोपियों ने पुलिस को बताया कि उन्हें इंजीनियर पुनीत के यहां करीब ढाई करोड़ रुपए मिले थे. पुलिस इस बारे में छानबीन कर रही है. पुलिस अजय, बहादुर और उस के लंबे बाल वाले साथी को तलाश रही है.  पूरे मामले में जिस पुलिस टीम ने सब से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, उस में इंसपेक्टर नीलम राणा. एसआई अजीत कुमार पांडेय, रजनीश वर्मा, संजीव कुमार, हैडकांस्टेबल संदीप शर्मा, रामनिवास शुक्ला, आनंदमणि सिंह, ब्रजेश बहादुर सिंह, अमित लखेड़ा, विनय कुमार, पूनम पांडेय, सोनिका देवी और चालक घनश्याम यादव प्रमुख थे.

पुलिस ने इंजीनियर पुनीत कुमार के घर ढाई करोड़ रुपयों की चोरी की सूचना रेलवे विभाग और आयकर विभाग को भी दे दी. पुलिस का कहना है कि घर में ढाई करोड़ नकद रखने के मामले की जांच होगी. इस बात का अंदेशा है कि यह रकम रिश्वत की रही होगी. इसीलिए हत्या की रिपोर्ट लिखाते समय इंजीनियर पुनीत कुमार ने चोरी की रकम को कम कर के लिखाया था. शुरुआत में पुनीत कुमार ने कहा था कि 15 से 20 लाख की चोरी हुई है. पुलिस ने जब चोरों से 70 लाख नकद बरामद कर लिया तो पता चला कि कुल रकम ढाई करोड़ थी.

ब्रजमोहन को भी यही पता था कि चोरी की बात पूरी तरह से पुलिस को बताई नहीं जाएगी. ऐसे में यह लोग पुलिस के घेरे में नहीं आएंगे. लेकिन ब्रजमोहन से भी ज्यादा लालची उस के साथी निकले जिन्होंने ब्रजमोहन की हत्या कर दी. हत्या की विवेचना में चोरी दब नहीं सकी और अपराध करने वाले पकडे़ गए. crime story hindi

Real Crime Story in Hindi : बचपन के दोस्त का बांका से काट डाला गला

Real Crime Story in Hindi : दोस्ती में एक विश्वास होता है, भरोसा होता है. लेकिन शैलेश प्रजापति और अर्श गुप्ता ने पैसे के लिए उस विश्वास की धज्जियां उड़ा दीं, जिस की वजह से विनय…

19 मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए. शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था.

शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी. फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया. विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था.

20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया. पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा.

रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है.

निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए. चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली.

उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ. कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था. शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था. पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है.

दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई. योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा. इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए.

जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए. घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को कानपुर कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Real Crime Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

hindi crime story : रोहतक के अखाड़े में खूनी खेल

hindi crime story : मेहर सिंह अखाड़े में तैनात सुखविंदर न केवल अच्छा पहलवान था बल्कि बेहतरीन कोच भी था. उस की नजर अखाड़े की 17 वर्षीया पहलवान पूजा पर थी. पूजा ने जब उस की हरकतों की शिकायत मुख्य कोच मनोज मलिक से की तो कोच कमेटी ने उसे अखाड़े से हटा दिया. इस पर…

एक पुरानी कहावत है कि हर जुर्म की पृष्ठभूमि में जर, जोरू और जमीन मूल कारण होता है. हरियाणा के रोहतक स्थित जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में उस रात जो कुछ हुआ, उस की जड़ में कोई एक नहीं, बल्कि ये तीनों ही कारण छिपे थे. 12 फरवरी, 2021 की रात के करीब 9 बजे जाट कालेज का पूरा प्रांगण सैकड़ों लोगों की भीड़ से खचाखच भरा था. चारों तरफ चीखपुकार मची थी. महिलाओं की मर्मांतक चीखों से पूरा माहौल गमगीन था. कालेज के बाहर पुलिस और प्रशासन की गाडि़यों का हुजूम जमा था. सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यों और एंबुलैंस से पूरा इलाका किसी बड़े हादसे की ओर इशारा कर रहा था.

करीब 2 घंटे पहले मेहर सिंह अखाड़े में जो खूनी खेला गया था, उस के बाद वहां सिर्फ तबाही और मौत के निशान बचे थे. जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में जो हादसा हुआ था, उस की शुरुआत शाम करीब साढ़े 6 बजे हुई थी. मनोज कुमार मलिक, जो जाट कालेज रोहतक में डीपीई थे, अपनी पत्नी साक्षी मलिक व अपने 3 साल के बेटे सरताज के साथ अखाड़े में मौजूद थे. साक्षी मलिक एथलीट कोटे से रेलवे में कार्यरत थी. मनोज जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में हर शाम कुश्ती के खिलाडि़यों को प्रशिक्षण देने आते थे. उस शाम मनोज करीब 6 बजे खिलाडि़यों को अभ्यास कराने के लिए अपनी पत्नी साक्षी व बेटे सरताज को साथ ले कर जाट कालेज के अखाड़े आए थे.

साक्षी मैदान में जा कर अपने गेम की प्रैक्टिस कर रही थीं, बेटा सरताज भी उन के साथ था. अखाड़े वाले मैदान में ऊंची आवाज में स्टीरियो पर वार्मअप म्यूजिक बज रहा था. मनोज मलिक जिस वक्त अखाडे़ में पहुंचे वहां कोच प्रदीप मलिक, सतीश दलाल पहले से ही खिलाडि़यों को प्रशिक्षण दे रहे थे, महिला खिलाड़ी पूजा अखाडे़ में दावपेंच आजमा रही थी. साक्षी मैदान में अपनी एथलीट की प्रैक्टिस करने लगीं. बेटा सरताज उन के पास ही था. कोच सतीश दलाल खिलाड़ी पूजा से कुश्ती के दावपेंच को ले कर बात कर रहे थे. मनोज व प्रदीप मलिक आपस में बात करने लगे. इस के बाद प्रदीप जिम्नेजियम के ऊपर बने रेस्टहाउस में चले गए, जहां एक कमरे में पहले से ही कोच सुखविंदर मौजूद था.

प्रदीप मलिक ने सुखविंदर के कमरे में जा कर उस से बातचीत शुरू कर दी. जिम्नेजियम में भी ऊंची आवाज में म्यूजिक बज रहा था, जहां कई युवा पहलवान वार्मअप कर रहे थे. सुखविंदर से बातचीत के दौरान अचानक प्रदीप मलिक का फोन आ गया. फोन ले कर वह जैसे ही उठे, तभी अचानक सुखविंदर ने उन के सिर में गोली मार दी. गोली लगते ही प्रदीप लहरा कर जमीन पर गिर पड़े. सुखविंदर ने प्रदीप के शव को दरवाजे के सामने से हटा कर एक तरफ डाल दिया. गोली जरूर चली थी, लेकिन मैदान में चल रहे स्टीरियो साउंड के कारण किसी को पता नहीं चला कि गोली कहां चली और किस ने चलाई.

सुखविंदर ने जिम्नेजियम की छत से आवाज दे कर मुख्य कोच मनोज मलिक को, जो नीचे मैदान में थे, को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में उस ने प्रदीप को गोली मारी थी. जैसे ही मनोज मलिक कमरे में घुसे, सुखविंदर ने बिना कोई बात किए सीधे उन के सिर में गोली मार दी. उन की भी मौके पर ही मौत हो गई. सुखविंदर ने उन के शव को भी कमरे में एक तरफ डाल दिया. 2 लोगों को गोली मारने के बाद सुखविंदर ने जिम्नेजियम की बालकनी में जा कर कोच सतीश दलाल को बात करने के लिए आवाज दे कर उसी कमरे में बुला लिया. सतीश दलाल के कमरे में एंट्री करते ही उस ने उन्हें भी गोली मार दी. कुछ ही मिनटों में तीनों की हत्या के बाद भी सुखविंदर का जुनून कम नहीं हुआ.

उस कमरे में शवों को छिपाने के लिए और जगह नहीं बची थी, इसलिए उस ने उस कमरे में ताला लगा दिया. अगला निशाना थी पूजा सुखविंदर का अगला निशाना थी अखाड़े में पहलवानी कर रही महिला पहलवान पूजा. सुखविंदर ने पूजा को फोन किया कि मनोज मलिक और दूसरे कोच कुछ बात करने के लिए उसे जिम्नेजियम में बने कमरे में आने के लिए कह रहे हैं. जिस कमरे में उस ने पूजा को बुलाया, वह दूसरा कमरा था. पूजा जैसे ही उस कमरे में पहुंची सुखविंदर ने उसे भी गोली मार दी. गोली लगते ही उस की भी मौके पर ही मौत हो गई.

मनोज मलिक व पूजा की हत्या के बाद सुखविंदर के टारगेट पर थीं साक्षी मलिक, जो उस वक्त नीचे मैदान में प्रैक्टिस कर रही थी. सुखविंदर ने बालकनी से उन्हें भी आवाज दे कर बुलाया कि मनोज बुला रहे हैं. ऊपर आ जाओ आप से कुछ सलाह लेनी है. उस ने साक्षी को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में पूजा की हत्या कर उस की लाश रखी थी. साक्षी के कमरे में एंट्री करते ही बिना कोई सवालजवाब किए सुखविंदर ने सीधे सिर में गोली मार कर उन की भी हत्या कर दी. सुखविंदर के सिर पर मनोज मलिक के लिए नफरत का जुनून इस कदर हावी था कि वह मनोज के पूरे वंश को मिटाना चाहता था. दरअसल, सुखविंदर ने एक बार अखबार में खबर पढ़ी थी कि बेटे ने अपने पिता की हत्या के 20 साल बाद जवान हो कर हत्यारे को मौत के घाट उतार कर बदला लिया था.

इसलिए सुखविंदर मनोज के बेटे को जिंदा छोड़ना नहीं चाहता था, जिस से बाद में वह अपने पिता की मौत का बदला ले सके. साक्षी की हत्या के बाद वह नीचे गया और मैदान में खेल रहे सरताज को यह कहते हुए उठा लिया कि उस की मम्मी ऊपर बुला रही है. ऊपर लाने के बाद सुखविंदर ने सरताज को भी गोली मार दी. सरताज को मृत समझ कर सुखविंदर ने उस कमरे में भी ताला लगा दिया. दोनों कमरों का ताला लगाने के बाद वह मेनगेट पर तीसरा ताला लगा कर अखाड़े के मैदान में आ गया. अखाड़े में मौजूद सभी लोगों की हत्या के बाद सुखविंदर नीचे आ कर अपनी गाड़ी में बैठ गया. उस समय नीचे कोई नहीं था. वहां से वह सीधे जाट कालेज के सामने पहुंचा, जहां पर मेहर सिंह अखाड़े का एक दूसरा कोच अमरजीत भी पहुंच चुका था.

अमरजीत को उस ने अखाड़े के संबंध में बात करने के लिए बुलाया था. अमरजीत के कार से बाहर निकलते ही सुखविंदर ने सीधे उस के सिर में गोली मारनी चाही, लेकिन गोली चेहरे पर जा लगी. गोली लगते ही अमरजीत लहूलुहान हालत में मैडिकल मोड़ की तरफ भागा. सुखविंदर को लगा कि अब अगर वह वहां रुका तो पकड़ा जाएगा, इसलिए अमरजीत का पीछा करने के बजाय उस ने अपनी गाड़ी का रुख दिल्ली की ओर कर दिया. नफरत व जुनून के बाद अब उस के चेहरे पर सुकून साफ नजर आ रहा था. पहलवानों को हुआ शक जिस समय ये वारदात हुई थी, अखाड़े तथा जिम्नेजियम हाल में कई पहलवान

प्रैक्टिस कर रहे थे. अखाड़े के मुख्य कोच मनोज के चाचा का लड़का टोनी, मामा का लड़का विशाल, उस की 5 साल की बेटी फ्रांसी भी उस वक्त वहां प्रैक्टिस कर रहे थे. उन के साथ अन्य पहलवानों ने देखा कि प्रदीप मलिक के अलावा मनोज, सतीश, साक्षी, पूजा और सरताज ऊपर सुखविंदर के कमरे में गए थे, लेकिन काफी देर बाद भी नीचे नहीं आए. यही सोच कर कुछ लोग जब ऊपर गए तो उन्हें एक कमरे से कोच मनोज के बेटे सरताज के रोने की आवाज सुनाई दी. कुछ पहलवानों को बुला कर जब सब ने कमरे का ताला तोड़ा तो अखाड़े में हुए इस भीषण नरसंहार कर पता चला.

रेस्टरूम के दोनों तालाबंद कमरों के दरवाजे तोड़ने के बाद वहां एक के बाद एक कई लोग लहुलूहान मिले. सुखविंदर का कहीं नामोनिशान नहीं था. माजरा समझ में आते ही कुछ लोगों ने पुलिस को खबर कर दी. चंद मिनटों में पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस के आने से पहले ही साक्षी, पूजा, प्रदीप की मौत हो चुकी थी. मनोज, अमरजीत, सरताज और सतीश दलाल की सांसें चल रही थीं. उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां कुछ देर बाद मनोज और सतीश को भी डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. हरियाणा के रोहतक स्थित इस प्रसिद्ध अखाड़े में हुई गोलीबारी की वारदात की खबर तब तक जंगल की आग की तरह फैल गई थी.

इस गोलीबारी में 7 लोगों को गोली लगी थी, जिस में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि अमरजीत व मासूम सरताज गंभीर रूप से घायल थे. पुलिस काररवाई घटना की जानकारी मिलते ही पीजीआईएमएस थाने के एसएचओ राजू सिंधू  पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे. वारदात इतनी संगीन थी कि एसपी (रोहतक) राहुल शर्मा भी खबर मिलते ही फोरैंसिक टीम व दूसरे अधिकारियों को ले कर मौके पर पहुंच गए. मनोज मलिक के बडे़ भाई प्रमोज कुमार व दूसरे परिजन भी अपने परिचितों के साथ खूनी अखाड़े के बाहर जमा हो गए थे. रात के 9 बजतेबजते सभी मरने वालों के परिजन घटनास्थल पर भारी हुजूम के साथ मौजूद थे.

उसी रात पीजीआईएमएस थाने में मनोज मलिक के भाई प्रमोज की शिकायत पर सुखविंदर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. अमरजीत ने पुलिस को अपना बयान दिया कि उस पर सुखविंदर ने गोली चलाई है. पुलिस की टीमों ने पूरे शहर की घेराबंदी कर दी. लेकिन सुखविंदर पुलिस के हाथ नहीं लगा.  एसपी राहुल शर्मा ने उसी रात जाट कालेज स्थित जिम्नेजियम हाल में चल रहे अखाड़े में हुए गोलीकांड में आरोपी सुखविंदर को पकड़ने के लिए डीएसपी नरेंद्र कादयान व डीएसपी विनोद कुमार के नेतृत्व में विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया, जिस में पीजीआईएमएस थाना, सीआईए यूनिट, एवीटी स्टाफ और साइबर सेल को शामिल किया गया.

हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव और एडीशनल डीजीपी व रोहतक रेंज के आईजी संदीप खिरवार ने केस की मौनिटरिंग का काम अपने हाथ में ले लिया. इतना ही नहीं सुखविंदर की गिरफ्तारी पर डीजीपी ने उसी रात एक लाख रुपए के ईनाम की घोषणा भी कर दी. साइबर सेल को सुखविंदर के मोबाइल फोन की सर्विलांस से पता चला कि वह भाग कर दिल्ली पहुंच गया है. उस की तलाश में टीमों को दिल्ली रवाना कर दिया गया. अगली सुबह सभी पांचों मृतकों का पोस्टमार्टम हो गया. मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि सभी को करीब 20-25 फीट की दूरी से गोली मारी गई थी. गोली सभी के सिरों में लगी जरूर थीं, लेकिन पार नहीं हुई थीं.

पोस्टमार्टम में साक्षी के सिर से 2 और बाकी चारों के सिर से एकएक गोली मिली. घायल अमरजीत और सरताज को एकएक गोली लगी थी, जो आरपार हो गई थी. फोरैंसिकटीम ने बताया कि सुखविंदर ने वारदात को .32 बोर की रिवौल्वर से अंजाम दिया था. मृतकों के शरीर में 9 एमएम की गोलियां मिली थीं. चूंकि मासूम सरताज की हालत बेहद  गंभीर थी, इसलिए उसे रोहतक पीजीआई से पंडित भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर स्वास्थ्य संस्थान में रेफर कर वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया. उस की आंखों के बीच में गोली लगी थी जो सिर के पार निकल गई थी. उस का इलाज करने में डाक्टरों की एक विशेष टीम जुट गई थी.

शुरुआती जांच में एक बात साफ हो गई कि अखाडे़ में कई लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी को भी सुखविंदर के कमरे में चलने वाली गोलियों की आवाज इसलिए सुनाई नहीं दी, क्योंकि प्रैक्टिस के समय तेज आवाज में म्यूजिक चल रहा था. हालांकि हल्के धमाके का अंदाजा तो सब को हुआ था, लेकिन उन्हें यही लगा कि किसी शादी में पटाखे बज रहे होंगे. किसी को इस का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि सुखविंदर ने ऊपर कमरे में 5 लोगों की हत्या कर दी है. अखाड़े में मौजूद चश्मदीदों से पूछताछ व शुरुआती जांच में यह भी पता कि सुखविंदर का अखाड़े के दूसरे कोचों के साथ कोई विवाद था, जिस के कारण उस ने पूरी वारदात को अंजाम दिया.

जिद्दी और गुस्सैल था सुखविंदर सुखविंदर के बारे में पुलिस ने ज्यादा जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि वह मूलरूप से सोनीपत के बरौदा गांव का रहने वाला है. पुलिस की एक टीम तत्काल उस के घर पहुंची. वहां उस के परिजनों से पूछताछ हुई तो पता चला कि उस के पिता मेहर सिंह सेना से रिटायर्ड हैं. सुखविंदर शादीशुदा है. 6 साल पहले उस की शादी उत्तर प्रदेश की तनु के साथ हुई थी और उस का 4 साल का एक बेटा है. सुखविंदर जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव का था, इसलिए बेटा होने के बाद पत्नी से उस का झगड़ा होने लगा और 4 साल पहले वह पत्नी को उस के मायके छोड़ आया. तभी से वह मायके में है. जबकि उस का बेटा अपने दादादादी के पास है.

सुखविंदर की मां सरोजनी देवी ने बताया कि पिता मेहर सिंह ने उस की हरकतों के कारण उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. जिस के बाद से वह कभीकभार ही बेटे से मिलने के लिए घर आता था. पुलिस ने सुखविंदर को गिरफ्तार करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. लेकिन संयोग से वारदात के अगले ही दिन 13 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने समयपुर बादली इलाके में संदिग्ध अवस्था में कार में घूमते हुए एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था. उस के कब्जे से एक अवैध पिस्तौल तथा 5 कारतूस भी बरामद हुए थे.

उस से पूछताछ करने पर समयपुर बादली पुलिस को पता चला कि सुखविंदर नाम के उस शख्स ने एक दिन पहले रोहतक के मेहर सिंह अखाडे़ में 5 पहलवानों की नृशंस हत्या को अंजाम दिया है तो पुलिस ने उस के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर तत्काल इस की सूचना रोहतक पुलिस को दी. सूचना मिलते ही रोहतक पुलिस दिल्ली पहुंच गई. पीजीआईएमएस थाना पुलिस ने दिल्ली  की अदालत में अरजी दे कर सुखविंदर का ट्रांजिट रिमांड हासिल किया और उसे रोहतक ला कर अदालत में पेश किया. पुलिस ने अदालत से उस का 4 दिन का रिमांड ले लिया.

इस दौरान एसआईटी ने उसे साथ ले जा कर पूरे घटनाक्रम का सीन रिक्रिएट किया. पुलिस ने सुखविंदर के खिलाफ सभी साक्ष्य एकत्र किए और यह पता लगाया कि आखिर उस ने इस जघन्य हत्याकांड को क्यों अंजाम दिया था. उस से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने जर, जोरू और जमीन के लिए एक नहीं, बल्कि 6 हत्याओं को अंजाम दिया था. क्योंकि तब तक मनोज व साक्षी के 3 वर्षीय बेटे सरताज की भी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी. सुखविंदर की पिछले कुछ दिनों से मनोज मलिक से एक खास वजह से रंजिश चल रही थी. मनोज मलिक व उन की पत्नी साक्षी नामचीन खिलाड़ी थे. मनोज अपने जमाने के जानेमाने राष्ट्रीय स्तर के पहलवान रहे थे.

उन्होंने कई प्रतियोगिताएं जीती थीं. बाद में रोहतक के जाट कालेज में उन्हें सहायक शिक्षक यानी डीपीई की नौकरी मिल गई. जाट कालेज के पास ही उन्हें रोहतक के सब से प्रतिष्ठित मेहर सिंह अखाडे़ में कोच की नौकरी भी मिल गई. इस अखाडे़ में मनोज मलिक के अलावा कई अन्य कोच थे. उन्हीं में सुखविंदर भी एक था. वे सभी अखाडे़ में कुश्ती के लिए नए पहलवान तैयार करते थे. मनोज मलिक (39) मूलरूप से गांव सरगथल जिला सोनीपत के रहने वाले थे. मनोज मलिक और साक्षी 14 फरवरी, 2013 को शादी के बंधन में बंधे थे. शादी की 8वीं सालगिरह से 2 दिन पहले ही दोनों ने एक साथ इस दुनिया को छोड़ दिया था.

राष्ट्रीय स्तर की एथलीट थी साक्षी साक्षी एथलीट की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थी. बाद में उन्हें भी रेलवे में स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिल गई थी. मनोज मलिक पिछले कई सालों से अपनी पत्नी साक्षी मलिक व 3 साल के बेटे सरताज के साथ रोहतक में जाट कालेज व अखाड़े के पास देव कालोनी में रहते थे. मनोज मलिक और उन की पत्नी साक्षी चूंकि दोनों ही अच्छे खिलाड़ी थे. इसलिए वे अपने मासूम बेटे सरताज को भी कुश्ती का खिलाड़ी बनाना चाहते थे. ट्रैक और कुश्ती मैट पर अठखेलियां करता सरताज मांबाप के साथ अखाडे़ में जाता था. वह नए पहलवानों की आंखों का तारा बन गया था. कुल मिला कर उन दोनों का वैवाहिक जीवन सुखमय था.

मनोज को कभी सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस सुखविंदर को उन्होंने ही 2 साल पहले 15 हजार रुपए महीने पर अखाड़े में कोच की नौकरी पर रखा था, वह अपनी नीच हरकतों के कारण एक दिन न सिर्फ उन की हत्या कर देगा, बल्कि उन के परिवार के खात्मे का सबब बन जाएगा. बाद में खिलाडि़यों की शिकायत पर मनोज ने उसे हटा दिया था. बस इसी बात से गुस्साए सुखविंदर ने इस घटना को अंजाम दिया था. सामूहिक गोली कांड में मारे गए अखाड़े के एक अन्य कोच सतीश दलाल (28) मूलरूप से गांव माडोठी, जिला झज्जर हाल निवासी सांपला के रहने वाले थे. जानेमाने कुश्ती  खिलाड़ी सतीश दलाल इन दिनों मनोज मलिक के अखाड़े में कुश्ती के कोच का काम संभाल रहे थे.

इस हादसे में मारे गए महम चौबीसी के गांव मोखरा निवासी प्रदीप मलिक (28) भी थे. रामकुमार मलिक के 3 बेटों में प्रदीप सब से छोटे थे. प्रदीप का बड़ा भाई विक्रम सीआरपीएफ में तथा बीच वाला भाई संदीप बीएसएफ में नौकरी करता है. प्रदीप खेल कोटे से रेलवे में सीटीआई थे. उन की ड्यूटी रतलाम, मध्य प्रदेश में थी. विवाहित प्रदीप का एक बेटा है अग्निपथ, जो केवल 15 महीने का है. प्रदीप की पत्नी अंजलि गांव मोखरा में ही रहती है. परिवार का मुख्य काम खेतीबाड़ी है. प्रदीप मलिक गजब के पहलवान थे. वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय तथा महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के चैंपियन रहे थे. 77 किलोग्राम भार वर्ग में प्रदीप ने आल इंडिया रेलवे चैंपियनशिप भी जीती थी.

प्रदीप ने जाट कालेज रोहतक से बीए पास किया था. उन्हें जालंधर में प्रस्तावित राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियनशिप में भाग लेना था, इसी चैंपियनशिप के लिए वह दिल्ली में ट्रेनिंग कैंप में आए हुए थे. वहीं से छुट्टी ले कर रोहतक आए थे ताकि यहां कुश्ती के दावपेंच और अधिक गहरे से सीख सकें. प्रदीप का सुखविंदर के साथ कोई सीधा झगड़ा नहीं था. बस अखाड़े में उस की हरकतों को ले कर एक बार अखाड़े में जा कर उसे समझाया था तथा 2-4 बार वाट्सऐप पर बात हुई थी और उन्होंने सुखविंदर को अपना व्यवहार ठीक करने की सलाह दी थी. इसी से सुखविंदर प्रदीप से भी रंजिश रखने लगा था.

पूजा तोमर पर डालता था डोरे सामूहिक हत्याकांड में मारी गई प्रतिभाशाली युवा महिला पहलवान पूजा तोमर (17) यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. पूजा का परिवार मूलरूप से मथुरा के गांव सिहोरा का रहने वाला है, लेकिन फिलहाल वे मथुरा के लक्ष्मीनगर में रहते हैं. पूजा के पिता रामगोपाल और भाई विष्णु कपड़े की दुकान चलाते हैं. पूजा दमदार खिलाड़ी थी और परिवार वालों ने उन्हें करीब डेढ़ साल पहले रोहतक में जाट कालेज के पीछे बने अखाड़े में कोचिंग लेने के लिए भेजा था. पूजा 2014 से 2020 तक 57 किलो भार वर्ग की प्रतियोगिताओं में यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. 2019 और 2020 में पूजा नैशनल चैंपियन भी रहीं.

दरअसल, इस हादसे की असल वजह थी सुखविंदर का महिला पहलवानों से अश्लील व्यवहार तथा उन से संबंध बनाने का दबाव. मेहर सिंह अखाडे़ में कुश्ती सीखने वाली पूजा तोमर ने कुछ दिन पहले अपने परिवार व अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक से सुखविंदर की शिकायत की थी. पूजा ने अखाडे़ के कोच व अपने परिवार से सुखविंदर की जो शिकायत की थी, उस में बताया था कि सुखविंदर उसे परेशान कर रहा है और उस पर शादी का दबाव बना रहा है. दरअसल, अपनी पत्नी से दूर हो कर तनहा जीवन जी रहे सुखविंदर में अपोजिट सैक्स के प्रति एक कुंठा भर गई थी. वह किसी भी तरह अखाडे़ पर अपने आधिपत्य के साथ किसी महिला से संबंध बनाना चाहता था.

अखाड़े की महिला पहलवान से संबंध बनाने या शादी करने के उसे 2 फायदे नजर आ रहे थे. एक तो अखाड़े की पहलवान कुश्ती से नाम और पैसा कमा कर कमाई में उस का हाथ बंटाती. दूसरे उस की जिस्मानी जरूरत पूरी करने के लिए एक हृष्टपुष्ट औरत मिल जाती. पूजा चूंकि कम उम्र की आकर्षक युवती थी, इसलिए सुखविंदर को उस पर डोरे डालना आसान लगा. इस के लिए वह काफी दिनों से पूजा पर दबाव बना रहा था. जब पानी सिर से ऊपर पहुंच गया तो पूजा ने अपने परिवार से इस बात की शिकायत कर दी. परिवार वालों ने अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक को इस की सूचना दे कर अपनी बेटी को अखाडे़ से हटाने की बात कही तो मनोज मलिक को लगा कि ऐसा हुआ तो अखाड़े की शान और उन के नाम को बड़ा नुकसान और बदनामी होगी.

मनोज ने यह बात साथी कोचों से बताई तो सब ने एक राय से सुखविंदर को अखाडे़ से हटाने का फैसला कर लिया. इस के लिए उन सभी ने सुखविंदर को बुला कर पहले सामूहिक रूप से जम कर खरीखोटी सुनाई और फिर उस से साफ कह दिया कि वह 14 फरवरी तक अखाड़ा छोड़ दे. साथ ही उसी दिन से सुखविंदर को अखाड़े में आने से मना कर दिया. अपने हाथ से लड़की और अखाड़े की नौकरी निकलती देख सुखविंदर अपमान की आग में जलने लगा. और तभी उस ने फैसला कर लिया कि जो लोग उस की बरबादी का कारण बने हैं, उन सब की जिंदगी छीन लेगा.

वारदात को अंजाम देने के लिए 4 दिन पहले ही उस ने साजिश रच ली थी. उस ने सोचा कि उस का खुद का घर तो उजड़ चुका है, अब वह उन का भी घर उजाड़ देगा, जिन के प्रति उस के मन में रंजिश थी. सुखविंदर से पूछताछ में खुलासा हुआ कि पूजा ही नहीं, उस ने एक अन्य महिला पहलवान से भी ऐसी ही हरकत की थी. इन्हीं कारणों से मुख्य कोच मनोज मलिक, सतीश दलाल, प्रदीप मलिक ने सुखविंदर पर प्रतिबंध लगा दिया था. इस बात को ले कर सुखविंदर की अमरजीत से भी कहासुनी हुई थी. उसे बता दिया गया था कि अब अखाड़े से उस का कोई मतलब नहीं है और न ही उसे यहां से कोई पैसा मिलेगा.

बस यही बात सुखविंदर को नागवार गुजरी. उस का मानना था कि उस ने अखाड़े के लिए काफी मेहनत की थी, लेकिन अब उसे ही बाहर निकाला जा रहा है. इसी वजह से उस ने करीब 4 दिन पहले हत्याकांड की साजिश रच ली थी. हत्याकांड से साफ था कि आरोपित किसी भी सूरत में मनोज के परिवार को जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था. पहले से रची गई उस की साजिश का पता इस बात से भी चलता है कि सुखविंदर पिछले कई दिनों से प्रैक्टिस के दौरान बारबार कहता था कि कुछ बड़ा करूंगा. कुछ ऐसा करूंगा कि सब मुझे याद करेंगे. पीजीआईएमएस पुलिस ने आवश्यक पूछताछ के बाद आरोपी सुखविंदर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

लेकिन एक मामूली सी बात पर 6 लोगों की जिंदगी छीन लेने वाले सुखविंदर के कारण उस अखाड़े के दामन पर लगे खून के छींटों को शायद ही मिटाया जा सके, जहां से देश को नामचीन पहलवान मिले थे. hindi crime story

—कथा पुलिस की जांच, पीडि़तों के बयान व अभियुक्त के बयान पर आधारित

 

Crime Story : फिल्म इंडस्ट्री की आड़ में चल रहा था पोर्न फिल्मों का धंधा

Crime Story : बौलीवुड हो या साउथ की फिल्म इंडस्ट्री, फिल्मों में जाने के लिए तमाम युवक युवतियां प्रयास करते हैं. जो असफल रहते हैं, उन में से कई अभिनय के नाम पर पोर्न फिल्म बनाने वालों के चंगुल में फंस जाते हैं. फिल्म इंडस्ट्री की आड़ में पोर्न फिल्में अब भी बन रही हैं. यह भांडा तब फूटा जब..

कोरोना काल में मुसीबतों में फंसा रहा भारतीय फिल्म उद्योग अभी तक नहीं उभर पाया है. कुछ समय पहले अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में ड्रग्स एंगल का खुलासा होने के बाद बौलीवुड हिल गया था. नामी अभिनेत्रियों सहित सहित कई दूसरे लोगों की गिरफ्तारी से बौलीवुड में नशीले पदार्थों का काला कारोबार छाया रहा. इसी दौरान सैंडलवुड कहे जाने वाले कन्नड़ फिल्म उद्योग में भी ड्रग्स का जाल फैला होने का मामला सामने आया. कन्नड़ फिल्म उद्योग में ड्रग्स के मामले में कई नामी अभिनेत्रियों सहित दूसरे लोगों की गिरफ्तारियां हुईं.

फिल्म उद्योग में ड्रग्स के मामले अभी ठंडे भी नहीं पड़े थे कि अब बौलीवुड में पोर्न फिल्मों का मामला सामने आ गया है. पोर्न फिल्मों के मामले ने फिल्म उद्योग में फैले काले धंधों को उजागर करने के साथ वेब सीरीज के नाम पर ऐक्टिंग के लिए संघर्षरत युवाओं के शोषण की भी पोल खोल दी है. इसी साल 4 फरवरी की बात है. मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच के प्रौपर्टी सेल के प्रभारी सीनियर इंसपेक्टर केदारी पवार को पोर्न फिल्में बनाने के बारे में सूचनाएं मिलीं, तो वह चौंके. उन्होंने कोई भी काररवाई करने से पहले अपने उच्चाधिकारियों सहायक पुलिस आयुक्त मिलिंद भारंबे, अपर पुलिस आयुक्त विरेश प्रभु और पुलिस उपायुक्त शशांक सांडभोर को इस बारे में बताना मुनासिब समझा.

उच्चाधिकारियों के निर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर केदारी पवार ने इंसपेक्टर धीरज कोली, एपीआई लक्ष्मीकांत सांलुखे, सुनील माने, अमित भोसले, योगेश खानुरे, महिला अधिकारी अर्चना पाटील और सोनाली भारते आदि के अलावा मातहत पुलिस वालों की टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने 4 फरवरी की आधी रात मुंबई के मालवणी इलाके में मड आइलैंड स्थित ओल्ड फेरी मार्ग पर बने ग्रीन पार्क बंगले पर छापा मारा. पुलिस अधिकारी अपने वाहनों को बंगले से कुछ दूर खड़ा कर जब पैदल ही बंगले के बाहर पहुंचे, तो वहां न तो कोई सुरक्षा के इंतजाम नजर आए और न ही कोई चहलपहल दिखी. बंगले के कुछ कमरों में रोशनी जरूर थी. कुछ आवाजें भी आ रही थीं.

पुलिस अधिकारी बंगले के एक कमरे में पहुंचे, तो वहां का दृश्य देख कर सन्न रह गए. कमरे में कुल 5 लोग थे. 2 महिला और 3 पुरुष. बिस्तर पर एक महिला और एक पुरुष अर्धनग्न अवस्था में अश्लील हरकतें कर रहे थे. एक महिला उन का वीडियो बना रही थी. मौके के हालात देख कर साफ था कि वहां पोर्न फिल्म की शूटिंग हो रही थी. पुलिस ने मौके से दोनों महिलाओं और तीनों पुरुषों को हिरासत में लिया. इन महिलाओं में 40 साल की फोटोग्राफर यास्मीन खान और 33 साल की ग्राफिक डिजाइनर प्रतिभा नलावडे थी. पकड़े गए पुरुषों में भानु ठाकुर और मोहम्मद नासिर ऐसी फिल्मों में ऐक्टिंग करते थे. वहीं मोनू जोशी कैमरामैन और लाइटमैन का काम करता था.

मौके से पुलिस ने 6 मोबाइल हैंडसेट, एक लैपटौप, कैनन कंपनी का कैमरा, 2 मैमोरी कार्ड, कैमरे का लैंस, एलईडी हैलोजन, स्पौट लाइट स्टैंड, ट्रायपोड स्टैंड सहित करीब 5 लाख 68 हजार रुपए का सामान जब्त किया. इन के अलावा शूटिंग के लिए लिखे गए डायलौग्स और स्क्रिप्ट सहित कुछ इकरारनामे भी बरामद किए. कई केस हुए दर्ज पूछताछ के लिए पांचों लोगों को पुलिस मालवणी पुलिस थाने ले आई. एपीआई लक्ष्मीकांत सांलुखे ने इस मामले में पुलिस थाने में केस दर्ज कराया. पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 292, 293, 420 और 34 के अलावा स्त्री असभ्य प्रतिरूपण प्रतिषेध अधिनियम की विभिन्न धाराओं आदि में 5 फरवरी को मुकदमा दर्ज कर पांचों लोगों को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने पांचों लोगों से पूछताछ की, तो चौंकाने वाली बातें सामने आईं. पता चला कि मुंबई में पोर्न फिल्में बनाने वाला रैकेट चल रहा है. इस में कुछ नामी अभिनेता और अभिनेत्री भी शामिल हैं. ये अभिनेता, अभिनेत्री बी और सी ग्रेड की बौलीवुड फिल्मों में काम कर चुके हैं. ऐसी फिल्म प्रोडक्शन कंपनियां ऐक्टिंग के लिए स्ट्रगल कर रही युवतियों को हीरोइन बनाने का ख्वाब दिखातीं और उन से शौर्ट फिल्म में काम करने का एग्रीमेंट करती थी. एग्रीमेंट के बाद शूटिंग के दौरान ये लोग न्यूड सीन देने का दबाव डालते थे. मना करने पर एग्रीमेंट के आधार पर केस करने की धमकी देते थे. पांचों लोगों से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने पोर्न फिल्में बनाने और उन्हें ओटीटी प्लेटफार्म पर अपलोड करने के मामले में अभिनेत्री गहना वशिष्ठ को भी 6 फरवरी को गिरफ्तार कर लिया.

गहना वशिष्ठ की गिरफ्तारी से बौलीवुड भी सकते में आ गया. पुलिस का कहना था कि गहना वशिष्ठ के प्रोडक्शन हाउस में पोर्न फिल्मों की शूटिंग होती थी. गहना वशिष्ठ की गिरफ्तारी पर उस की लीगल टीम ने एक बयान में कहा कि वह निर्दोष हैं. बोल्ड फिल्मों और हार्डकोर पोर्न फिल्मों में अंतर होता है. मुंबई पुलिस ने इन दोनों को एक समझ लिया. हमें उम्मीद है कि अदालत दोनों फिल्मों में अंतर समझ कर गहना को न्याय देगी. गहना वशिष्ठ, यास्मीन खान, प्रतिभा नलावडे और बाकी तीनों गिरफ्तार पुरुष आरोपियों मोनू जोशी, भानु ठाकुर व मोहम्मद नासिर से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने पोर्न फिल्मों से कमाई गई 36 लाख 60 हजार रुपए की रकम भी बरामद की.

इन सभी से पूछताछ में पता चला कि पोर्न फिल्मों की शूटिंग भारत में मुंबई और दूसरी जगहों पर होती थी, लेकिन कानून की गिरफ्त से बचने के लिए इन फिल्मों के वीडियो विदेश के आईपी एड्रेस और सर्वर से अपलोड किए जाते थे. गहना वशिष्ठ की प्रोडक्शन कंपनी की ओर से ये वीडियो उमेश कामत को वी ट्रांसफर के जरिए भेजे जाते थे. उमेश उस लिंक को लंदन भेजता था. वहां से इन फिल्मों के वीडियो ओटीटी प्लेटफार्म पर अपलोड होते थे. वी ट्रांसफर दुनियाभर में ई फाइल भेजने का सब से सरल तरीका है. इस के जरिए 2 जीबी तक की बड़ी फाइलें भी मुफ्त में भेजी या मंगाई जा सकती हैं. पुलिस जांच में सामने आया कि उमेश कामत इस काम का कोआर्डिनेटर है और उस के जरिए ही पेमेंट मिलता था.

क्राइम ब्रांच को करीब 3 दरजन ऐसी फिल्मों के सबूत मिले, जो उमेश के जरिए लंदन भेजी गईं और वहां से अपलोड की गईं. उमेश कामत बौलीवुड की एक टौप अभिनेत्री के पति की कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर है. अभिनेत्री का पति इस कंपनी में चेयरमैन और नान एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर है. गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ जरूरी सबूत जुटाने के बाद पुलिस ने इस मामले में 8 फरवरी को उमेश कामत को भी गिरफ्तार कर लिया. उमेश और दूसरे आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि प्रत्येक ऐसे वीडियो के एवज में विदेशी अपलोडर्स से उन्हें 2 से ढाई लाख रुपए मिलते थे. इन में से करीब एक लाख रुपए कलाकारों, कैमरामैन और फिल्म एडिटर आदि को दिए जाते थे और बाकी एक से डेढ़ लाख रुपए का मुनाफा होता था.

विवादों की रानी गहना गहना वशिष्ठ से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि ऐसी फिल्मों के लिए उस ने ओटीटी के दरजनों ऐप बनाए थे. पुलिस ने जांच की, तो इन में से एक ऐप पर ही उस के 67 हजार से ज्यादा सब्सक्राइबर निकले. कोरोना काल में उस ने 85 से ज्यादा ऐसी फिल्में ओटीटी प्लेटफौर्म पर चलाई थीं. फरवरी में ही उस का 5-6 ऐसी फिल्में रिलीज करने का विचार था. पुलिस जांच में सामने आया कि फिल्म प्रोडक्शन कंपनी ने हौटहिट मूवीज नाम का एक ऐप भी बना रखा है. इस पर वे अपनी पोर्न फिल्म को अपलोड करते थे. इस ऐप के लिए बाकायदा 2 हजार रुपए तक सब्सक्रिप्शन फीस ली जाती थी.

8 फरवरी की रात पुलिस ने इस मामले में एक फोटोग्राफर श्याम बनर्जी उर्फ दिवांकर खासनवीस को गिरफ्तार किया. पोर्न फिल्म केस में यह 8वीं गिरफ्तारी थी. पुलिस का कहना है कि हौटहिट ऐप का संचालन 5 फरवरी को ग्रीन पार्क बंगला से गिरफ्तार महिला फोटोग्राफर यास्मीन खान और बाद में पकड़ा गया उस का पति फोटोग्राफर श्याम बनर्जी मिल कर करते थे. पुलिस की जांचपड़ताल में पोर्न फिल्म रैकेट के तार मुंबई से गुजरात के सूरत तक पहुंच गए. बाद में 10 फरवरी को पुलिस ने इस मामले में बी और सी ग्रेड बौलीवुड फिल्मों के अभिनेता तनवीर हाशमी को सूरत से गिरफ्तार किया.

पोर्न फिल्मों के मामले में गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई. वह पैसे कमाने की अंधी दौड़ में युवा पीढ़ी को पतन के रास्ते पर ले जाने की कहानी है. कोरोना काल में जब मार्च 2020 के चौथे सप्ताह में पूरे देश में लौकडाउन हो गया, तब देश की दोतिहाई आबादी अपने घरों में कैद हो कर रह गई.  इस दौरान लोगों के पास मनोरंजन के नाम पर केवल मोबाइल रह गए. मोबाइल पर इस दौरान पोर्न फिल्में देखने वालों की तादाद बढ़ गई. इस का फायदा उठा कर मुंबई के कुछ सी ग्रेड फिल्मकारों ने पोर्न फिल्में बनाने की योजना बनाई.

मई 2020 में जैसे ही अनलौक का पहला चरण शुरू हुआ, तो इन लोगों ने अपनी योजना को क्रियान्वित करने के लिए देसी पोर्न फिल्में बनाने का काम शुरू कर दिया. इन में अभिनेत्री गहना वशिष्ठ, अभिनेता तनवीर हाशमी और फोटोग्राफर यास्मीन खान आदि ने मुंबई में मलाड इलाके में मड आइलैंड के बंगलों को किराए पर लिया. उस समय फिल्मों व टीवी सीरियलों की शूटिंग बंद थी, तब इन बंद बंगलों में ऐसी फिल्मों की शूटिंग होने लगी. उस समय पुलिस और प्रशासन कोरोना से बचाव की जद्दोजहद में जुटा हुआ था. इसलिए पुलिस को इस सब की जानकारी नहीं मिली.

गहना वशिष्ठ पर 85 से ज्यादा पोर्न फिल्में पोर्न वेबसाइट या ऐप्स पर अपलोड करने का आरोप है. इन में कुछ नामी मौडल्स को भी शूट किया गया था. मौडल्स और खूबसूरत चेहरेमोहरे वाली युवतियों को शौर्ट फिल्मों के लिए बुला कर एग्रीमेंट किया जाता था. एग्रीमेंट कुछ सचाई कुछ कुछ मिनट की शूटिंग के बाद एक्टर्स को पोर्न सीन करने के लिए मजबूर किया जाता था. ऐसे सीन नहीं करने पर उन्हें कानूनी नोटिस भेजने की धमकी दी जाती थी. इस का कारण यह था कि 30-40 हजार रुपए मेहनताना का एग्रीमेंट करने वाली मौडल और युवतियां उस एग्रीमेंट को पढ़ती नहीं थी. उन से केवल एकदो दिन की शूटिंग होने के नाम पर जल्दी में दस्तख्त करा लिए जाते थे.

पेशे से फोटोग्राफर यास्मीन उर्फ रोवा खान ने भी 50 से ज्यादा पोर्न फिल्में बनाई हैं. ऐसी फिल्मों की शूटिंग आमतौर पर एक ही दिन में पूरी कर ली जाती थी. एडिटिंग में 2 से 3 दिन का समय लगता था. इस तरह करीब 20 से 30 मिनट की फिल्म तैयार हो जाती थी. इस के बाद ऐसी फिल्मों को विदेश के आईपी एड्रेस और सर्वर के जरिए ओटीटी प्लेटफार्म पर रिलीज कर दिया जाता था. पोर्न फिल्मों के इस मामले में कथा लिखे जाने तक पुलिस में 4 केस दर्ज हुए थे. इन में 2 युवतियों ने मालवणी पुलिस थाने में केस दर्ज कराया. एक ने वसई के अर्नाला पुलिस स्टेशन में शिकायत दी. यह शिकायत लोनावाला पुलिस स्टेशन को ट्रांसफर की गई है. एक केस महाराष्ट्र साइबर सेल में दर्ज हुआ है.

इन में एक मौडल ने शिकायत में कहा कि गहना के प्रोडक्शन हाउस की ओर से शूट किए वीडियो में उसे न्यूड पोज देने के लिए फोर्स किया गया. एक मौडल ने गहना के खिलाफ 3 पुरुषों के साथ सैक्स करने को मजबूर करने का आरोप लगाया है. झारखंड की एक युवती ने मालवणी पुलिस थाने में दी शिकायत में पोर्न फिल्म न करने पर 10 लाख रुपए का हर्जाना देने की धमकी देने का आरोप लगाया है. अभिनेत्री गहना वशिष्ठ को पैसों का लालच ही इस गंदे काम की तरफ खींच लाया. छत्तीसगढ़ के चिरमिरी की रहने वाली गहना का असली नाम वंदना तिवारी है.

16 जून, 1988 को जन्मी वंदना तिवारी ने भोपाल से कंप्यूटर साइंस में बीटेक किया था. सन 2012 में जब उस ने मिस एशिया बिकनी कांटेस्ट जीता, तब वह लोगों की नजर में आई थी. उस ने इस प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए सब से ज्यादा अंक हासिल किए थे.  बाद में उस ने मौडलिंग करते हुए करीब 80 विज्ञापनों में अपने जलवे दिखाए. इन में मोंटे कार्लो, फिलिप्स एरेना, शेवरले क्रूज कार, ड्रीम स्टोन ज्वैलरी, पलक साड़ीज आदि मुख्य थे. बाद में वह स्टार प्लस के सीरियल ‘बहनें’ में लीड रोल में नजर आई. क्रिकेट वर्ल्ड कप 2015 के लिए उस ने योगराज सिंह और अतुल वासन के साथ एक न्यूज चैनल पर ऐंकरिंग भी की.

गहना वशिष्ठ ने अपना फिल्मी कैरियर ‘फिल्मी दुनिया’ नामक हिंदी फिल्म से शुरू किया. बौलीवुड फिल्म इंडियन नेवर अगेन निर्भया, दाल में कुछ काला है, लखनवी इश्क, सविता बार्बी, निर्भया, उन्माद और द प्रौमिस में उस ने अभिनय किया. इस के अलावा गहना ने करीब एक दरजन तेलुगू फिल्मों में भी महत्त्वपूर्ण रोल किए. एक स्पैनिश फिल्म में भी उस ने काम किया. वह साउथ के एक नामी अभिनेता की गर्लफ्रैंड भी रही है. वह अल्ट बालाजी की वेब सीरीज ‘गंदी बात’, उल्लू ऐप के ‘मी टू’, अमेजन प्राइम के ‘मिरर द बिटर’, प्राइम फ्लिक्स के भाभीजी घर पर हैं आदि के अलावा ओटीटी प्लेटफार्म न्यूफ्लिक्स आदि पर भी नजर आई. उस ने कई म्यूजिक वीडियो में भी काम किया.

तिरंगा लपेट कर फोटो शूट कराने और मैरीकाम के ओलिंपिक मैडल जीतने पर न्यूड फोटो खिंचवाने के कारण गहना वशिष्ठ विवादों में रह चुकी है. सन 2018 में वह तब भी चर्चा में आई थी, जब उन्होंने बिग बौस की प्रतिभागी अर्शी खान को ले कर दावा किया था कि वे अपनी उम्र कम बताती हैं. गहना ने दावा किया था कि अर्शी ने 50 साल के आदमी से शादी की है और उन के खिलाफ भारत व पाकिस्तान के झंडों के अपमान सहित 10 आपराधिक मामले दर्ज हैं. गहना की कंपनी जीवी स्टूडियों का खेल गहना वशिष्ठ ने जीवी स्टूडियोज के नाम से अपनी प्रोडक्शन कंपनी बना रखी है.

मुंबई पुलिस गहना वशिष्ठ की कंपनी के सामने आए वीडियो को पोर्न बता रही है. वहीं, गहना की कंपनी का कहना है कि जीवी स्टूडियोज की ओर से निर्मित और निर्देशित वीडियो को इरोटिका के रूप में क्लासीफाइड किया जा सकता है. कंपनी का कहना है कि उन्होंने केवल ऐसी फिल्में बनाई हैं, जो कानूनन बनाई जा सकती हैं. पुलिस ने भारत में हार्ड पोर्न और उन के मेकर्स की बनाई फिल्मों के साथ गहना की इरोटिका फिल्मों को मिक्स कर दिया है जबकि इरोटिका, कामुक या बोल्ड फिल्मों के बीच एक कानूनी अंतर है. बी और सी ग्रेड बौलीवुड फिल्मों का अभिनेता तनवीर हाशमी अब तक 40 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय कर चुका है.

गुजरात के सूरत के रहने वाले 40 वर्षीय तनवीर ने 20 साल के अपने फिल्मी कैरियर में ‘रात की बात’, ‘जख्मी नागिन’, ‘द रीयल ड्रीम गर्ल’, ‘भीगा बदन’, ‘बेस्ट पार्टनर’, ‘परदा’, ‘गरम’, ‘नाइट लवर’, ‘रेडलाइट’, ‘कामवाली’, ‘रिक्शावाली’, ‘कुंआरा पेइंग गेस्ट’, ‘दूधवाली’ और  ‘की क्लब’ जैसी सैक्सी फिल्मों में काम किया है. तनवीर सूरत के बारदोली इलाके में बंगला किराए पर ले कर पोर्न फिल्में बनाता था. पिछले 20 साल से फिल्मी परदे पर नजर आने के कारण उस की एक खास दर्शक वर्ग में पहचान थी. अपनी इसी पहचान के दम पर वह वेब सीरीज बनाने के बहाने ऐक्टिंग के शौकीन युवकयुवतियों को अपने जाल में फांस कर पोर्न फिल्में बनाता था.

पहले उस ने मुंबई में ही ऐसी कुछ फिल्में बनाई, लेकिन मुंबई में शूटिंग के लिए बंगलों का किराया ज्यादा था. इसलिए वह सूरत और आसपास के इलाकों में कम किराए के बंगले ले कर ऐसी फिल्में बनाने लगा. इस के लिए वह मुंबई से मौडल और युवतियों को सूरत बुलाता था. तनवीर और गहना न्यूफ्लिक्स ओटीटी के लिए भी ऐसी फिल्में बनाते थे. इस के चार लाख से ज्यादा कस्टमर हैं. ओरल सैक्स का मामला तनवीर हाशमी सन 2015 में मुंबई के साकीनाका में हुए ओरल सैक्स कांड से भी जुड़ा हुआ रहा है. उस समय एक मौडल ने आरोप लगाया था कि उस के साथ साकीनाका पुलिस स्टेशन में एक पुलिस इंसपेक्टर ने ओरल सैक्स किया था.

उस समय इस मामले में तनवीर हाशमी सहित एक नामी टीवी सीरियल का प्रोड्यूसर भी पकड़ा गया था. तनवीर उस समय साकीनाका पुलिस स्टेशन के कुछ अधिकारियों का खबरी हुआ करता था. उस समय तनवीर के क्रेडिट कार्ड से ही अंधेरी के एक पांच सितारा होटल में कमरा बुक कराया गया था. होटल के इसी कमरे में पीडि़त मौडल को 2 लाख रुपए के साइनिंग अमाउंट के लिए बुलाया गया था. ऐन वक्त पर मौडल ने उस कमरे में जाने से इनकार कर दिया और अपने बौयफ्रैंड को फोन कर दिया. आरोप लगा कि मौडल को उस का बौयफ्रैंड जब होटल से बाइक पर ले जा रहा था, तो साकीनाका थाना पुलिस ने उन दोनों को अगवा कर लिया.

बाद में एक पुलिस इंसपेक्टर ने एक पुलिस चौकी में मौडल को ले जा कर ओरल सैक्स किया था. इस मामले में आरोपी पुलिस वालों की भी गिरफ्तारी हुई थी. पोर्न फिल्मों का मामला नया नहीं है. मुंबई पुलिस ने कुछ दिन पहले संदीप इंगले नामक एक कास्टिंग डायरेक्टर को गिरफ्तार किया था. वह खुद को फिल्म प्रोड्यूसर भी बताता था और प्रेम के नाम से सैक्स रैकेट भी चलाता था. उस ने सैक्स रैकेट चलाने के लिए कई वेबसाइट बनाई थीं. इन वेबसाइटों को सर्च करने पर लोग आरोपियों से संपर्क करते थे. इस मामले में मुंबई के पांच सितारा होटल से 8 युवतियां मुक्त कराई गई थीं. इन में कुछ युवतियां नामी मौडल थीं.

मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में भी पिछले साल जुलाई में पोर्न फिल्में बनाने का मामला सामने आया था. इंदौर पुलिस ने मौडल युवतियों की शिकायत पर मिलिंद डावर, अंकित सिंह चावड़ा, रैकेट के सरगना ब्रजेंद्र सिंह गुर्जर, गजेंद्र उर्फ गज्जू उर्फ गोवर्धन चंद्रावत आदि को गिरफ्तार किया था. ये लोग भी बंगलों और फार्महाउसों में पोर्न फिल्में बनाते और युवतियों का देह शोषण करते थे. मुंबई पोर्न फिल्म मामले में गिरफ्तार अभिनेत्री गहना वशिष्ठ के मकान और प्रोडक्शन हाउस की तलाशी में 3 मोबाइल फोन, 2 लैपटौप, 2 हार्ड डिस्क, 5 मैमोरी कार्ड, एक एडाप्टर, एक पेनड्राइव, प्रोडक्शन हाउस की रबर स्टैंप और एक कंपनी व कुछ कलाकारों के साथ एग्रीमेंट से जुड़े 10 करार पत्र सहित कई दस्तावेज मिले हैं.

गहना के एक बैंक खाते में एक आरोपी की ओर से रकम भेजे जाने के सबूत भी मिले हैं. पुलिस की ओर से इस मामले में गिरफ्तार और फरार आरोपियों के 2019 के बाद के बैंक खातों के लेनदेन के अलावा ईमेल, मोबाइल काल, वाट्सऐप चैट आदि की पड़ताल की जा रही है. गहना वशिष्ठ के कारोबारी पति सहित कई मौडल भी पुलिस जांच के दायरे में हैं. इस मामले में कुछ और गिरफ्तारियां होने के साथ बौलीवुड के चौंकाने वाले नए खुलासे होने की संभावना है. crime story

 

 

 

 

Parivarik Kahani in Hindi : ननदोइयों ने भाभी की हत्या कर शव को बैड बॉक्स में छिपाया

Parivarik Kahani in Hindi  : एक भाई डाक्टर, दूसरा इंजीनियर. साधनसंपन्न परिवार के. लेकिन लालच सिर चढ़ कर बोल रहा था, जिस के लिए 2 हत्याएं कर डालीं. दोनों ने सोचा भी नहीं था कि संपत्ति की जगह जेल तक..

करीब 10 साल पहले नेहा की शादी छत्तीसगढ़ के पूर्व वन मंत्री डी.पी. घृतलहरे के बेटे तरुण के साथ हुई थी. 30 जनवरी, 2021 को रात करीब साढ़े 9 बजे आकाश ने बहन नेहा को फोन लगाया. नेहा के फोन की घंटी तो बज रही थी, लेकिन वह काल रिसीव नहीं कर रही थी. आकाश ने कई बार ट्राई किया, लेकिन उस के फोन की घंटी तो बजती रही, लेकिन नेहा ने फोन रिसीव नहीं किया. आकाश परेशान हो गया कि पता नहीं नेहा इस समय कहां है जो फोन नहीं उठा रही. तब आकाश ने अपने बहनोई तरुण को फोन मिलाया. तरुण ने आकाश को बताया कि वह तो अपने गांव आया है और उस का छोटा भाई इंद्रजीत कहीं बाहर गया हुआ है.

घर पर इस समय नेहा और अनन्या ही हैं. 9 वर्षीय अनन्या उर्फ पिहू नेहा की बेटी थी. आकाश ने सोचा कि जब नेहा घर पर है तो वह फोन क्यों नहीं उठा रही. आकाश ने कोई एकदो बार नहीं बल्कि कई बार फोन किया था पर उस के फोन की घंटी तो बज रही थी लेकिन वह फोन उठा नहीं रही थी. यह बात उस ने अपने घर वालों को बताई तो घर के सभी लोग परेशान हो गए. आकाश का घर रायपुर जिले के खरोड़ा गांव में था, जबकि उस की बहन की ससुराल रायपुर के ही खम्हारडी कस्बे में थी. खम्हारडी उस के घर से कोई 40 किलोमीटर दूर था. आकाश ने तय किया कि वह अभी नेहा की ससुराल जाएगा. वह अपनी छोटी बहन को कार में बिठा कर खम्हारडी के लिए रवाना हो गया. करीब एक घंटे में वह नेहा की ससुराल पहुंच गया.

नेहा ऊंचा राजनीतिक रसूख वाले परिवार में ब्याही थी, उन का वहां आलीशान बंगला था. आकाश जब बंगले पर पहुंचा तो मेनगेट का ताला बंद था. उस ने मन ही मन सोचा कि बंगले के गेट का ताला क्यों बंद है, उस ने बंगले के बाहर से नेहा के फोन पर फिर से काल की. अब भी उस के फोन की घंटी बज रही थी लेकिन उस ने काल रिसीव नहीं की. आकाश को उस के बहनोई तरुण ने बता दिया था कि बंगले पर केवल नेहा और अनन्या ही हैं. लेकिन गेट पर लगे ताले से लग रहा था कि बंगले में कोई नहीं है. आकाश ने आसपास रहने वाले लोगों से मालूम किया कि नेहा कहीं गई हुई है क्या? लेकिन पड़ोसियों ने अनभिज्ञता जाहिर की.

आकाश ने उन्हें बताया कि वह साढ़े 9 बजे से नेहा को फोन लगा रहा है, फोन की घंटी तो जा रही है पर वह फोन रिसीव नहीं कर रही. पता नहीं इस समय वह कहां है. पड़ोसियों ने भी बताया कि नेहा इस तरह बंगले से अकेली कभी नहीं जाती. जब वह फोन नहीं उठा रही तो जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है. कुछ ही देर में बंगले के बाहर तमाम लोग जमा हो गए. आकाश को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. तभी कुछ लोगों ने सलाह दी कि क्यों न गेट का ताला तोड़ कर बंगले के अंदर देखा जाए. तब आकाश ने लोगों के सहयोग से बंगले के मेनगेट का ताला तोड़ दिया. लोगों के साथ जब वह बंगले में पहुंचा तो उसे नेहा के बैडरूम का भी ताला बंद मिला.

यह देख कर वह आश्चर्यचकित रह गया कि बंगले के बाकी सब कमरे खुले हुए हैं तो नेहा के कमरे का ही ताला क्यों बंद है. आकाश ने नेहा के कमरे का ताला भी तोड़ दिया. ताला तोड़ कर जैसे ही आकाश और अन्य लोग कमरे में घुसे तो वहां पर 2 लोग बैठे हुए मिले. उन में से एक नेहा का ननदोई डा. आनंद राय था. उस के साथ एक और व्यक्ति था. आकाश और अन्य लोग उस व्यक्ति को नहीं जानते थे. यह बात किसी की समझ में नहीं आई कि 2 तालों में बंद हो कर लोग नेहा के बैडरूम में क्यों बैठे हैं. आकाश और अन्य लोगों को देख कर आनंद राय और उस के साथी के चेहरे का रंग उड़ गया. आकाश ने जब उन से कमरे में बंद रहने की वजह पूछी तो वे कुछ जवाब नहीं दे पाए, बल्कि वहां से भागने की कोशिश करने लगे.

शक होने पर लोगों ने दोनों को पकड़ लिया. उन्हें शक होने लगा कि जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है. उन्होंने कमरे की तलाशी लेनी शुरू कर दी. जब उन्होंने बैड का बौक्स खोला तो बौक्स में नेहा और उस की बेटी अनन्या की लाशें औंधे मुंह पड़ी मिलीं. दोनों की लाशें देखने के बाद लोग समझ गए कि जरूर दोनों के मर्डर के पीछे इन  का ही हाथ है. लिहाजा लोगों ने उन्हें पकड़ लिया. इसी दौरान किसी ने खम्हारडी थाने में फोन कर के बता दिया कि किसी ने बंगले में पूर्व मंत्री डी.पी. घृतलहरे की बहू और नातिन की हत्या कर दी है.

मामला एक हाईप्रोफाइल परिवार से जुड़ा हुआ था, इसलिए सूचना पाते ही थानाप्रभारी ममता शर्मा हैडकांस्टेबल वेदव्यास दीवान, बच्चन सिंह ठाकुर, टीकम सिंह आदि को साथ ले कर घटनास्थल की तरफ रवाना हो गईं. थाने से घटनास्थल करीब एक किलोमीटर दूर था इसलिए वह कुछ देर में ही वहां पहुंच गईं.

इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी उन्होंने  एसपी अजय यादव को भी दे दी. थानाप्रभारी जब मौके पर पहुंचीं तो देखा कि कुछ लोग 2 लोगों को पकड़े हुए थे और नेहा व उस की बेटी की लाश बैड के बौक्स में पड़ी थीं.  लोगों ने पुलिस को बताया कि जब उन्होंने इस कमरे का ताला तोड़ा था तो ये दोनों इन लाशों के पास ही बैठे मिले थे. ये ही इन के कातिल हैं. पति भी संदेह के दायरे में पुलिस को पूछताछ में पता चला कि उन दोनों में से एक मृतका का सगा ननदोई डा. आनंद राय है. इस के बाद पुलिस के सामने ही लोग उन दोनों की पिटाई करने लगे. लोगों में आक्रोश भरा हुआ था. गुस्से में लोग कहीं दोनों को मार न डालें, इसलिए थानाप्रभारी ने बड़ी मुश्किल से उन्हें भीड़ के चंगुल से छुड़ा कर अपने कब्जे में लिया और उन्हें तुरंत थाने भिजवा दिया.

कुछ ही देर में फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट, पुलिस फोटोग्राफर और एसपी अजय यादव भी वहां पहुंच गए. आक्रोशित लोगों को एसपी साहब ने समझाया. मौकामुआयना करने से यह स्पष्ट पता चल रहा था कि मृत्यु से पहले नेहा ने अपने बचाव में जीजान लगा कर संघर्ष किया था. क्योंकि उस के चेहरे व शरीर पर खरोंचों के निशान थे. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने मौके से सुबूत जुटाए. पुलिस अधिकारियों ने भी मौके का बारीकी से मुआयना किया.

पुलिस अधिकारियों ने वहां मौजूद आकाश से बात की तो उस ने बताया कि जब वह यहां आया तो बंगले के बाहर वाले गेट पर ताला लगा हुआ था. जब वह ताला तोड़ कर अंदर आया तो नेहा के बैडरूम का ताला भी बाहर से बंद था. कमरे का ताला तोड़ा तो कमरे में  नेहा का ननदोई डा. आनंद राय और उस के साथ एक अन्य व्यक्ति बैठा हुआ मिला. उसे शक है कि बहन और भांजी की हत्या में इन दोनों का हाथ है.

उस समय मृतका नेहा का पति तरुण घर पर नहीं था, इसलिए पुलिस को इस बात का शक था कि कहीं पत्नी की हत्या में उस का हाथ तो नहीं है. आकाश इस दोहरे हत्याकांड की जानकारी अपने बहनोई तरुण को फोन द्वारा दे चुका था. वह थोड़ी देर में घर आ गया. जब तरुण को पता चला कि नेहा की लाश के पास आनंद राय और एक अन्य व्यक्ति बैठा मिला था, तो उसे भी विश्वास हो गया कि उस की पत्नी और बेटी की हत्या जरूर आनंद राय ने ही की होगी. यह शक उस ने पुलिस के सामने जाहिर भी कर दिया.

तरुण भले ही पत्नी की हत्या का आरोप अपने बहनोई आनंद राय पर लगा रहा था, लेकिन पुलिस की नजरों में तरुण भी संदिग्ध था. इसलिए एसपी अजय यादव ने थानाप्रभारी को आदेश दिया कि वह है तरुण पर नजर रखें, वह फरार न होने पाए. पूर्व वन मंत्री की बहू और नातिन की हत्या की खबर थोड़ी ही देर में रायपुर शहर में फैल गई. लोग तरुण के बंगले के बाहर पहुंच गए. ऐहतियात के तौर पर पुलिस ने वहां भारी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम कर दिया. दोनों लाशों के गले पर पड़े निशानों को देख कर लग रहा था कि दोनों की हत्या गला घोंट कर की गई है. हत्या किस ने और क्यों की, यह बात तो जांच के बाद ही पता चल सकती थी.

मौके की जरूरी काररवाई पूरी कर के पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दीं. इस के बाद पुलिस पूछताछ के लिए उन दोनों व्यक्तियों सहित मृतका के पति तरुण को भी अपने साथ थाने ले गई. पुलिस ने लोगों के चंगुल से छुड़ा कर जिन 2 लोगों को कस्टडी में लिया था, उन में से एक मृतका का ननदोई डा. आनंद राय था जबकि दूसरा युवक आनंद राय का भतीजा दीपक सायतोडे था. तलाश अजय राय की इन दोनों से पुलिस ने नेहा और उस की बेटी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो दोनों खुद को बेकसूर बताते रहे, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उन दोनों की हत्या उन्होंने नहीं बल्कि अजय राय ने की है.

अजय राय तरुण का दूसरा बहनोई था, आनंद राय का सगा भाई. पेशे से वह इंजीनियर था. पुलिस ने जब उसे तलाशा तो अजय घर पर नहीं मिला. एसपी अजय यादव के निर्देशन में पुलिस टीमें अपनेअपने स्तर से उसे तलाशने में जुट गईं. डा. आनंद राय और दीपक सायतोडे  पूछताछ में पुलिस को बारबार यही बयान देते रहे कि वह तो अजय राय के कहने पर साथ आए थे. इन दोनों की हत्या तो इंजीनियर अजय राय ने की है. पुलिस को लग रहा था कि वे दोनों अभी भी झूठ बोल रहे हैं. उन से विस्तार से पूछताछ के लिए पुलिस ने दोनों को पहली फरवरी, 2021 को कोर्ट में पेश कर के 5 दिन के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया.

उधर पुलिस की कई टीमें फरार इंजीनियर अजय राय की तलाश में जुटी हुई थीं.  सर्विलांस टीम भी अपने स्तर से जांच कर रही थी. इसी बीच जांच टीम को पता चला कि अजय ने उत्तर प्रदेश के शहर प्रयागराज से पहले बाईपास के नजदीक अपना मोबाइल फोन औन किया था. इसी क्लू के आधार पर क्राइम ब्रांच की एक टीम रायपुर से प्रयागराज पहुंच गई. जिस जगह पर अजय के फोन की लोकेशन मिली थी, वहां हाइवे पर एक पंक्चर वाले की दुकान थी. पुलिस ने उसे अजय का फोटो दिखा कर उस से पूछताछ की.

फोटो देखते ही पंक्चर वाला पहचान गया. क्योंकि 1-2 दिन पहले उसी शक्ल के एक व्यक्ति ने उस के फोन से किसी को फोन किया था. इस से रायपुर पुलिस को जांच में सफलता के कुछ आसार दिखाई देने लगे. पंक्चर वाले ने अपने मोबाइल में देख कर पुलिस को वह नंबर बता दिया, जिस पर उस ने बात की थी. पुलिस ने जांच की तो वह नंबर उत्तर प्रदेश के जिला अयोध्या स्थित सुलतानगंज के रहने वाले शिवप्रकाश का निकला. पुलिस टीम वहां से अयोध्या की तरफ रवाना हो गई. स्थानीय पुलिस के सहयोग से रायपुर पुलिस अयोध्या के सुलतानगंज में रहने वाले शिवप्रकाश के घर पहुंच गई. वहां से पुलिस ने अजय राय को गिरफ्तार कर लिया.

पता चला कि शिवप्रकाश अजय राय का गहरा दोस्त था. शिवप्रकाश आपराधिक प्रवृत्ति का था. कुछ दिनों पहले ही वह गांजे की तसकरी में जेल की सजा काट कर घर आया था. शिवप्रकाश घर पर नहीं मिला. यह बात 4 फरवरी, 2021 की है. इंजीनियर अजय राय को गिरफ्तार कर पुलिस रायपुर लौट आई. वहां उस ने अपने भाई डा. आनंद राय और भतीजे दीपक को पुलिस हिरासत में देखा तो समझ गया कि दोनों ने पुलिस को सब कुछ बता दिया होगा. पुलिस ने जब अजय राय से नेहा और उस की बेटी अनन्या की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने हत्या का आरोप अपने भाई आनंद व भतीजे दीपक पर लगाया.

कुछ देर तक वे एकदूसरे पर हत्या का आरोप मढ़ते रहे. लेकिन जब उन के साथ थोड़ी सख्ती बरती गई तो सभी सच बोलने लगे. पता चला कि इन तीनों ने ही सुनियोजित योजना के तहत नेहा और उस की बेटी की हत्याएं की थीं. उन तीनों से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह चौंकाने वाली थी—

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले का कस्बा खम्हारडी. इसी कस्बे के सतनाम चौक के पास एक बड़े राजनीतिज्ञ डी.पी. घृतलहरे का बंगला है. डी.पी. घृतलहरे छत्तीसगढ़ सरकार में वन मंत्री थे. वह जानीमानी शख्सियत थे. उन की 2 बीवियां थीं. पहली पत्नी वसंता से एक बेटी थी शशिप्रभा और दूसरी पत्नी प्रभादेवी से 4 बच्चे थे. जिन में 2 बेटियां थीं और 2 बेटे तरुण व इंद्रजीत.

दोनों बेटियों की वह शादी कर चुके थे. एक बेटी की शादी उन्होंने शहर के ही जानेमाने डाक्टर आनंद राय से की थी और दूसरी बेटी की शादी उन्होंने आनंद राय के भाई अजय राय के साथ की थी. अजय राय इंजीनियर था. दोनों बेटियां संपन्न परिवार में ब्याही थीं, इसलिए दोनों ही खुश थीं. बेटा तरुण शादी के योग्य हुआ तो उन्होंने उस की शादी जिले के ही खरोरागांव की रहने वाली नेहा से कर दी. नेहा भी एक संपन्न परिवार से थी. उस के पिता जमींदार थे. नेहा उच्चशिक्षित और समझदार थी. ससुराल आते ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल ली थीं.

डी.पी. घृतलहरे के दोनों दामाद उच्चशिक्षित और संपन्न जरूर थे, लेकिन वे लालची प्रवृत्ति के थे. किसी न किसी बहाने वे ससुराल से पैसे या अन्य महंगा सामान ऐंठते रहते थे. मंत्रीजी के पास अकूत संपत्ति थी इसलिए दोनों दामादों की नजर उन की संपत्ति पर लगी रहती थी. इसी दौरान 19 अप्रैल, 2020 को डी.पी. घृतलहरे का देहांत हो गया. उन की मौत के बाद घर के सभी लोग तो दुखी थे ही, लेकिन सब से ज्यादा परेशान तरुण की बुआ कुन्नीबाई थीं. इस की वजह यह थी कि तरुण के दोनों बहनोइयों की गिद्धदृष्टि उन की संपत्ति पर थी.

कुन्नीबाई को यह आशंका लगी रहती थी कि दोनों दामाद भाई की जुटाई संपत्ति को नोचखसोट न लें. कुन्नीबाई के पास खेती की करीब 17 एकड़ जमीन थी. उन्होंने इस संपत्ति का मुख्तियार तरुण को बना दिया था. तरुण की पत्नी नेहा अपनी दोनों ननदों और ननदोइयों की बहुत सेवा करती थी. जितना उस से बन पड़ता, वह  उन्हें गिफ्ट आदि दिया  करती थी. लेकिन वे लोग उस के द्वारा दिए गए सामान से कभी खुश नहीं होते थे. लालची जीजाओं का जाल डा. आनंद राय और इंजीनियर अजय राय इस की चर्चा अकसर अपनी पत्नियों से करते थे. दोनों उलाहना देते हुए कहा करते थे कि तुम्हारे पिता के घर में इतना सब कुछ होने के बावजूद तुम्हारे भाई और भाभी हम लोगों के बारे में तनिक भी नहीं सोचते.

यह तो सभी जानते हैं कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी अधिकार होता है. फिर तुम्हारे साथ यह दोहरा बरताव क्यों होता है. दोनों बहनें भी समझती थीं कि उन के पति जो कह रहे हैं वह बिलकुल सही है. एक तरह से वे अपनेअपने पतियों को मूक समर्थन देती थीं. संपत्ति को ले कर आनंद राय और अजय राय के मन में लालच ने अपना घर बना लिया था. नेहा अपने दोनों ननदोई की लालची नीयत से वाकिफ थी. अजय और आनंद ने कई बार नेहा को अपनी बातों के जाल में फंसाने की कोशिश की, लेकिन नेहा उन की बातों में नहीं आई. वह अपनी बुआ कुन्नीबाई को सारी बात बता देती थी. नेहा ने तय कर लिया था कि वह अपने ननदोइयों को संपत्ति हड़पने की चाल में नहीं फंसेगी.

नेहा के साथ दाल न गलने पर आनंद और अजय परेशान हो गए. तब उन के मन में खयाल आया कि जब नेहा नहीं फंस रही तो क्यों न तरुण को अपने जाल में फंसा कर इस संपत्ति को बेचने के लिए मजबूर किया जाए. तरुण अपने दोनों बहनोइयों की चाल में फंस गया. उन के बहकावे में आ कर वह अपनी प्रौपर्टी का सौदा करने को तैयार हो गया. इस के बाद अजय राय, आनंद राय और तरुण तीनों की आपस में खूब पटने लगी तो नेहा समझ गई कि उन्होंने तरुण को अपने जाल में फंसा लिया है. लिहाजा वह उन पर नजर रखने लगी.

एक दिन कमरे में बैठे तीनों जब संपत्ति  को बेचने के बारे में बातें कर रहे थे, तब नेहा परदे की ओट में उन की बातें सुन रही थी. नेहा को लगा कि यदि अब वह खामोश रही तो सारी संपत्ति हाथ से निकल जाएगी. वह उसी समय दरवाजे की ओट से निकल कर ड्राइंगरूम में पहुंच गई. उन तीनों के सामने अचानक नेहा के पहुंचते ही ड्राइंगरूम में सन्नाटा छा गया. नेहा को देखते ही अजय राय ने तुरंत टौपिक बदल दिया, लेकिन उन तीनों के चेहरों पर जो हवाइयां उड़ रही थीं, उस से नेहा समझ गई. फिर भी अनजान बनते हुए वह बोली, ‘‘आप तीनों के चेहरों पर हवाइयां कैसे उड़ रही हैं. आजकल तरुण से आप लोगों की बहुत ज्यादा पट रही है, आखिर इस की वजह क्या है?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है. दरअसल, काफी दिनों बाद साले साहब से रूबरू हुए तो घुलमिल कर बातें कर रहे थे.’’ आनंद

राय बोला.

‘‘लेकिन मुझे तो बात कुछ और ही नजर आ रही है. मेरे आने से पहले आप लोग प्रौपर्टी बेचने के बारे में कुछ बातें कर रहे थे,’’ नेहा कहा, ‘‘यदि मेरी बात गलत हो तो आप लोग बता दीजिए.’’

नेहा की बात सुन कर तीनों समझ गए कि उसे पूरी बात पता चल गई है. इसलिए वह हक्केबक्के हो कर एकदूसरे की तरफ देखने लगे. तभी अजय बोला, ‘‘दरअसल नेहा, जब तुम पूछ रही हो तो बताए देता हूं कि हमें बड़ी मुश्किल से इस बंगले का खरीदार मिला है, जो बंगले की अच्छी कीमत देने को तैयार है.

‘‘बारबार हमें ऐसा मौका नहीं मिलेगा. समझदारी इसी में है कि हम इसे बेच दें. हम लोग सोच रहे हैं कि इस बंगले को बेच कर जो रकम मिलेगी, उस से हम जमीन खरीद कर उस पर आलीशान फ्लैट्स बना कर

उन्हें बेच देंगे. इस से हमें करोड़ों रुपए का फायदा होगा.’’

‘‘जीजाजी, नेक सलाह के लिए हम आप के शुक्रगुजार हैं. लेकिन एक सलाह मेरी भी है कि आप दोनों जो स्कीम बता रहे हैं, उस की जगह अपनीअपनी संपत्ति बेच कर खुद कर लें. आप को लाखोंकरोड़ों का फायदा मिल जाएगा.’’ नेहा ने दोनों ननदोइयों से कहा.

‘‘देखो दामाद होने के नाते मैं आप दोनों का बड़ा सम्मान करती हूं लेकिन भविष्य में इस तरह की स्कीम और संपत्ति खरीदनेबेचने की बातें यहां कहने मत आना. आप मेरे पति को भी अपनी बातों में ले कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हुए हैं.’’ नेहा ने कहा और अपने पति से वहां से उठने का इशारा किया. नेहा की बात सुन कर आनंद राय और अजय के चेहरे सुर्ख हो गए. इस से उन्हें अपमान महसूस हुआ. उस समय रात हो गई थी. उन्होंने दीवार घड़ी की ओर देखा फिर दोनों भाई बंगले से बाहर निकल गए. तरुण या नेहा ने उन दोनों को रोकने की कोशिश नहीं की.

घर पहुंच कर दोनों भाइयों ने इस की शिकायत अपनीअपनी पत्नियों से की कि उन की भाभी नेहा ने किस तरह से उन का अनादर किया है. दोनों बहनों ने इस की शिकायत नेहा भाभी से की. जवाब में नेहा ने ननदों को पूरी बात बता दी. पर इतनी बेइज्जती होने के बाद भी अजय राय और आनंद राय ने तरुण के बंगले पर जाना बंद नहीं किया. सपत्ति का विवाद दिन प्रतिदिन बढ़ता गया. लालच में अंधे हो कर वे अपमान की गठरी सिर पर लिए घूमते रहे. जब बात नहीं बनी तो दोनों भाइयों ने एक दिन यहां तक कह दिया कि पिता की संपत्ति में बेटियों का भी हक होता है

इस पर नेहा बोली, ‘‘मैं कब मना कर रही हूं कि संपत्ति में बेटियों का हक नहीं होता, लेकिन जो संपत्ति ससुर की है वह उसी में से हिस्सा ले सकती हैं. पर तुम तो सास और बुआ की संपत्ति पर अपनी नजरें गड़ाए बैठे हो. यह बात सरासर गलत है. ऐसा मैं हरगिज नहीं होने दूंगी. बताओ, कानून की कौन सी किताब में यह बात लिखी है कि बुआ की संपत्ति पर दामादों का हिस्सा बनता है.

‘‘जब कुन्नीबाई बुआ ने अपनी मरजी से 17 एकड़ भूमि का मुख्तियार तरुण को बनाया है तो आप लोगों को क्यों जलन हो रही है. आप को हिस्सा लेना ही था तो ससुर के सामने मांग लेते. उस समय तो आप लोग नहीं बोले. अब वह नहीं हैं तो उन की संपत्ति पर नजरें गड़ाए हुए हो.’’

नेहा अपने दोनों ननदोइयों को इसी तरह बेइज्जत कर दिया करती थी. जिस से दोनों भाई नेहा से नफरत करने लगे थे. लालच में अंधा हुआ इंसान विवेकशून्य हो जाता है. दोनों भाइयों डा. आनंद राय और इंजीनियर अजय राय का भी यही हाल था. कोई रास्ता नहीं मिला तो अपनी मंशा पूरी करने के लिए उन्होंने एक आपराधिक योजना तैयार कर ली. उन्होंने सोचा कि क्यों न तरुण को ही रास्ते से हटा दिया जाए. लेकिन इस योजना पर उन्होंने विराम लगा दिया. इस की वजह यह थी कि तरुण की पत्नी नेहा साधनसंपन्न और दबंग परिवार से थी. उन्होंने सोचा कि तरुण के साथ कुछ भी किया तो वह उन्हें जीने नहीं देगी. वह कोई दूसरी योजना बनाने लगे.

नेहा ने अपने पति तरुण को भी समझा दिया था कि दोनों बहनोई लालची प्रवृत्ति के हैं. वे लालच में कुछ अहित भी कर सकते हैं. तरुण पत्नी की बात अच्छी तरह समझ गया था. लिहाजा उस ने अपनी बहनोइयों की बातों पर तवज्जो देनी बंद कर दी. जब कभी नेहा के ननदोई प्रौपर्टी को ले कर तरुण से बात करते तो नेहा खुद ही बीच में आ जाती और पति के बोलने से पहले ननदोइयों की बात काट देती थी. वह उन लोगों की निगाह में पति को अच्छा इंसान बनाना चाहती थी.

आनंद और अजय का लालच विकराल होता गया. नेहा उन के रास्ते का पत्थर बन गई थी. इस पत्थर को हटाए बिना उन्हें अपनी चाहत पूरी होती दिखाई नहीं दे रही थी. नेहा को रास्ते से हटाने के लिए ये लोग उचित अवसर की तलाश में रहने लगे. सोचविचार कर दोनों भाइयों ने एक खौफनाक साजिश रच डाली. इस साजिश में उन्होंने अपने भतीजे दीपक सायतोडे को भी शामिल कर लिया. योजना को दिया अंजाम आखिरकार 30 जनवरी, 2021 को उन्हें सही मौका मिल गया. इस के लिए उन्होंने कुछ दिनों तक रेकी भी की. जब उन लोगों को पता चला कि तरुण अपने गांव गया है और उस का छोटा भाई इंद्रजीत भी घर पर नहीं है, तो  मौका पा कर आनंद और अजय दीपक को ले कर खम्हारडी स्थित उन के बंगले पर पहुंच गए.

उस समय रात के करीब साढ़े 9 बजे थे. तीनों बेरोकटोक बंगले के मुख्य दरवाजे पर पहुंच गए. उस वक्त नेहा अपनी 9 साल की बेटी अनन्या उर्फ पीहू के साथ खेल रही थी. घंटी बजी तो अनन्या बोली, ‘‘देखो मम्मी, लगता है पापा आ गए हैं.’’

नेहा दरवाजा खोलने के लिए चली, तभी दोबारा घंटी बजी तो नेहा बोली, ‘‘रुको, आ रही हूं.’’

नेहा ने जैसे ही दरवाजा खोला. दोनों ननदोई और एक अपरिचित व्यक्ति सामने खड़े थे. उन्हें देखते ही वह बोली, ‘‘इस वक्त, खैरियत तो हैं?’’

‘‘हां, सब ठीक हैं. क्या हमें अंदर आने को नहीं कहोगी,’’ आनंद बोला.

नेहा एक तरफ होती हुई बोली, ‘‘आइए.’’

तीनों को वह ड्राइंगरूम में ले गई. तीनों सोफे पर बैठ गए. कुछ देर वह उन से औपचारिक बातें करती रही. फिर उन लोगों ने बातचीत का रुख संपत्ति और रुपयों की ओर मोड़ दिया. नेहा ने उस वक्त संयम से काम लिया, लेकिन वे तीनों योजना के तहत उस से झगड़ा करने लगे.

नेहा गुस्से में ड्राइंगरूप से उठ कर अपने बैडरूम में चली गई. उस के पीछेपीछे अजय राय, आनंद राय और दीपक भी पहुंच गए. उन तीनों को अपने पीछे आया देख कर नेहा बोली, ‘‘मैं इस समय आप लोगों से कोई बात नहीं करना चाहती. इस बारे में जो कुछ कहना हो तरुण से कहना.’’

तभी अजय दांत पीसते हुए बोला, ‘‘वह हमारी सुनता कहां है.’’

‘‘तो मैं क्या करूं. मेहरबानी कर के आप लोग यहां से चले जाइए.’’

यह सुन कर उन तीनों ने आंखों ही आंखों में इशारा किया. तभी दीपक ने पास बैठी अनन्या को उठा लिया और जूते का फीता निकाल कर उस के गले में कसने लगा. बेटी की जान बचाने के लिए नेहा उन से भिड़ गई. यह देख अजय और आनंद ने नेहा को काबू में करने का प्रयास किया. उन के बीच 15 मिनट तक हाथापाई होती रही. मौका पा कर आनंद ने नेहा के पैर जकड़ लिए और अजय ने अपने दोनों हाथों से नेहा का गला घोंट दिया. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. उधर दीपक ने अनन्या के गले को जूतों के फीते से कस दिया. बच्ची की भी मौत हो गई. दीपक ने अपनी संतुष्टि के लिए उसी फीते से एक बार फिर नेहा के गले को जोर से कसा.

वे लोग पूरी तसल्ली चाहते थे कि उन दोनों में से कोई जिंदा न रहे. इस की पुष्टि के लिए उन्होंने दोनों लाशों को उठा कर बाथरूम के टब में डाल कर यह देखा कि नाक या मुंह से पानी में बुलबुले तो नहीं निकल रहे. 5 मिनट तक पानी में कोई बुलबुला नहीं उठा तो उन्हें संतुष्टि हो गई कि दोनों की मौत हो चुकी है. इस के बाद तीनों ने चैन की सांस ली. फिर वे लाशों को उठा कर नेहा के बैडरूम में ले गए और दोनों लाशें औंधे मुंह दीवान के बौक्स में डाल दीं. इस के बाद तीनों ने सलाह  की कि इन्हें ठिकाने कैसे लगाया जाए. कुछ देर विचार करने के बाद उन्होंने तय किया कि दोनों लाशों को मंदिर हसौद नया रायपुर के सुनसान इलाके में ले जा कर ठिकाने लगा दिया जाए.

अजय राय यह कहता हुआ वहां से अपनी कार से चला गया कि वह उपयुक्त जगह ढूंढ कर आता है. तब तक रात भी गहरा जाएगी. वह नेहा के बैडरूम और बंगले का ताला बंद कर के चला गया. आनंद राय और दीपक दोनों ताले में बंद लाशों के पास ही बैठे रहे. उधर नेहा के भाई आकाश ने नेहा को फोन किया तो नेहा के फोन की घंटी तो बजती रही, लेकिन वह फोन नहीं उठा रही थी. कई बार काल करने के बाद भी जब नेहा ने फोन नहीं उठाया तो वह अपनी छोटी बहन को साथ ले कर कार से रात करीब साढ़े 11 बजे नेहा के बंगले पर  पहुंच गया.

दोनों लाशों को ठिकाने लगाने के लिए अजय राय भी एक सुनसान जगह देख कर लौट आया था. जब वह बंगले के पास पहुंचा तो उसे वहां भीड़ दिखाई दी. उस का माथा ठनका. उसे समझते देर नहीं लगी कि बंगले के बाहर लोगों का हुजूम क्यों लगा है. भाग गया अजय राय उस समय उस की कार बंगले से करीब आधा फर्लांग दूर थी. माजरा समझते ही उस ने यू टर्न लिया और वहां से  निकल गया. वह समझ गया कि हत्या का मामला खुल चुका है और पुलिस उस तक पहुंच जाएगी. ऐसे में उस ने शहर से बाहर भागने में ही अपनी भलाई समझी. वह कार से भंडारपुरी, कसडोल, बिलाईगढ़ होता हुआ बिलासपुर बसस्टैंड पहुंचा.

उस ने अपनी कार लौक कर के एक जगह छोड़ दी और फिर बस से प्रयागराज के लिए निकल गया. प्रयागराज में वह अपने एक परिचित के यहां रुका. कुछ दिन प्रयागराज में रुकने के बाद वह अयोध्या चला गया. अयोध्या में उस का एक दोस्त शिवप्रकाश रहता था. वह आपराधिक प्रवृत्ति का था. अयोध्या जाने से पहले उस ने प्रयागराज हाइवे पर पहुंच कर शिवप्रकाश से फोन पर बात करनी चाही. इस के लिए उस ने अपना मोबाइल औन किया. तभी उसे ध्यान आया कि अगर उस ने अपने मोबाइल से बात की तो वह पुलिस की पकड़ में आ जाएगा. इसलिए उस ने वहां मौजूद एक पंक्चर बनाने वाले से बात की. अजय ने उस से कहा कि उस का मोबाइल खराब हो गया है और उसे किसी से अर्जेंट बात करनी है.

यदि वह अपने फोन से उस की बात करा दे तो मेहरबानी होगी. बदले में वह 100 रुपए दे देगा. पंक्चर वाला तैयार हो गया और उस ने अपना मोबाइल अजय को दे दिया. अजय ने उस के मोबाइल से अपने दोस्त शिवप्रकाश से बात की. वह शिवप्रकाश का नंबर डिलीट करना भूल गया था. इस के बाद अजय अयोध्या में अपने दोस्त शिवप्रकाश के पास चला गया और वहीं पर रहने लगा. लेकिन वह वहां भी सुरक्षित नहीं रह सका और रायपुर पुलिस के चंगुल में फंस गया. पुलिस उसे अयोध्या से गिरफ्तार कर के ले आई. पुलिस ने बिलासपुर बसस्टैंड से उस की कार भी बरामद कर ली.

तीनों अभियुक्त पुलिस की गिरफ्त में आ चुके थे. पुलिस ने तीनों को 5 फरवरी, 2021 को कोर्ट में पेश कर 10 दिन की पुलिस रिमांड मांगी. पुलिस के अनुरोध पर कोर्ट ने तीनों आरोपियों को 15 फरवरी, 2021 तक के पुलिस रिमांड पर सौंप दिया. रिमांड अवधि में विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने तीनों को अदालत पर पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Parivarik Kahani in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Social Story in Hindi : किरायेदार ने पेट्रोल डालकर मालकिन और बच्चों को जिंदा जला डाला

Social Story in Hindi  : देश भर में चल रहे स्वच्छता अभियान के बीच अगर कोई स्वच्छ रहने की बात को अपनी इज्जत से जोड़ ले तो उस से बड़ा मूर्ख कौन होगा. निठल्ले बेरोजगार अवनीश ने भी यही किया. बात मानने के बजाए उस ने वह कर डाला जिस ने एक पूरे परिवार को…

कानपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है अकबरपुर. यह कानपुर (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. तहसील व जिला मुख्यालय होने के कारण कस्बे में हर रोज चहलपहल रहती है. इस नगर से हो कर स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय मार्ग जाता है जो पूर्व में कानपुर, पटना, हावड़ा तथा पश्चिम में आगरा, दिल्ली से जुड़ा है. इस नगर में एक ऐतिहासिक तालाब भी है जो शुक्ल तालाब के नाम से जाना जाता है. शुक्ल तालाब ऐतिहासिक वास्तुकारी का नायाब नमूना है. बताया जाता है कि सन 1553 में बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल ने शीतल शुक्ल को इस क्षेत्र का दीवान नियुक्त किया था.

दीवान शीतल शुक्ल ने सन 1578 में इस ऐतिहासिक तालाब को बनवाया था. इसी अकबरपुर कस्बे के जवाहर नगर मोहल्ले में सभासद जितेंद्र यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना यादव के अलावा बेटी अक्षिता (5 वर्ष) तथा बेटा हनू (डेढ़ वर्ष) था. जितेंद्र के पिता कैलाश नाथ यादव भी साथ रहते थे. वह पुलिस में दरोगा थे, लेकिन अब रिटायर हो चुके हैं. जितेंद्र यादव की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उन का अपना बहुमंजिला आलीशान मकान था. जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव पढ़ीलिखी महिला थी. वह नगर के रामगंज मोहल्ला स्थित प्राइमरी पाठशाला में सहायक शिक्षिका थी, जबकि जितेंद्र यादव समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे.

2 साल पहले उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सभासद का चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. वर्तमान में वह जवाहर नगर (वार्ड 14) से सभासद है. जितेंद्र यादव का अपने मकान के भूतल पर कार्यालय था, साथ ही पिता कैलाश नाथ यादव रहते थे, जबकि भूतल पर जितेंद्र अपनी पत्नी अर्चना व बच्चों के साथ रहते थे. मकान के दूसरी और तीसरी मंजिल पर 4 किराएदार रहते थे, जिन में 2 महिला पुलिसकर्मी अनीता व ऊषा प्रजापति थीं. मकान की देखरेख व किराया वसूली का काम कैलाश नाथ यादव करते थे. ऊषा का पति अवनीश प्रजापति मूलरूप से प्रयागराज जनपद के फूलपुर का रहने वाला था.

महिला कांसटेबल ऊषा पहले प्रयागराज में तैनात थी. उस के साथ उस का पति भी रहता था. अवनीश वहां लैब टैक्नीशियन था, लेकिन लौकडाउन लगने के कारण मई 2020 में उस की लैब बंद हो गई थी. ऊषा का ट्रांसफर भी प्रयागराज से कानपुर देहात जनपद के थाना अकबरपुर में हो गया था. उस के बाद वह पति अवनीश के साथ अकबरपुर कस्बे में सभासद जितेंद्र यादव के मकान में किराए पर रहने लगी थी. ऊषा की शादी अवनीश प्रजापति के साथ 4 साल पहले हुई थी. 4 साल बीत जाने के बाद भी ऊषा मां नहीं बन सकी थी. इस से उस का बेरोजगार पति अवनीश टेंशन में रहता था. अवनीश घर में ही पड़ा रहता था.

उस का काम केवल इतना था कि वह पत्नी ऊषा को ड्यूटी पर अकबरपुर कोतवाली स्कूटर से छोड़ आता था और ड्यूटी समाप्त होने पर घर ले आता था. ऊषा पुलिसकर्मी होने के बावजूद जितनी सरल स्वभाव की थी, उस का पति बेरोजगार होते हुए भी उतने ही कठोर स्वभाव का था. अवनीश की न तो किसी अन्य किराएदार से पटती थी और न मकान मालिक से. हां, वह सभासद जितेंद्र यादव से जरूर भय खाता था, जितेंद्र की पत्नी अर्चना यादव तो उसे फूटी आंख नहीं सुहाती थी. किराएदार की हरकतें सभासद की पत्नी अर्चना यादव तथा ऊषा के पति अवनीश प्रजापति के बीच पटरी नहीं बैठती थी. दोनों के बीच अकसर तनाव बना रहता था.

तनाव का पहला कारण यह था कि अवनीश साफसफाई से नहीं रहता था. वह मकान में भी गंदगी फैलाता रहता था. अर्चना यादव शिक्षिका थीं. वह खुद भी साफसफाई से रहती थीं और मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों को भी साफसफाई से रहने को कहती थीं. अन्य किराएदार तो अर्चना के सुझाव पर अमल करते थे, लेकिन अवनीश नहीं करता था. वह गुटखा और पान खाने का शौकीन था. पान खा कर उस की पीक कमरे के बाहर ही थूक देता था. कमरे के अंदर की साफसफाई का कूड़ा भी बाहर जमा कर देता था, जो हवा में उड़ कर पूरे फ्लोर पर फैल जाता था.

तनाव का दूसरा कारण अवनीश की बेशरमी थी. उस की नजर में खोट था. वह अर्चना को घूरघूर कर देखता था. उसे देख कर वह कभी मुसकरा देता, तो कभी कमेंट कस देता. उस की हरकतों से अर्चना गुस्सा करती तो कहता, ‘‘अर्चना भाभी, जब तुम गुस्सा करती हो तो तुम्हारा चेहरा गुलाब जैसा लाल हो जाता है और गुलाब मुझे बहुत पसंद है.’’

अर्चना ने अवनीश की हरकतों और गंदगी फैलाने की शिकायत अपने ससुर कैलाश नाथ यादव से की तो उन्होंने अवनीश को डांटाफटकारा और कमरा खाली करने को कह दिया. लेकिन अवनीश की पत्नी ऊषा ने बीच में पड़ कर मामले को शांत कर दिया. ऊषा प्रजापति ने मामला भले ही शांत कर दिया था, लेकिन अर्चना की शिकायत ने अवनीश के मन में नफरत के बीज बो दिए थे. वह मन ही मन उस से नफरत करने लगा था. अर्चना अपने बच्चों को भी अवनीश से दूर रखती थी. दरअसल, ऊषा की कोई संतान नहीं थी, अर्चना को डर था कि गोद भरने के लिए कहीं ऊषा व अवनीश उस के बच्चों पर कोई टोनाटोटका न कर दें.

एक रोज अर्चना किसी काम से छत पर जा रही थी. वह पहली मंजिल पर पहुंची तो अवनीश के कमरे के अंदरबाहर कूड़ा बिखरा देखा. इस पर उस ने गुस्से में कहा, ‘‘अवनीश कुत्ता भी पूंछ से जगह साफ कर के बैठता है, लेकिन तुम तो उस से भी गएगुजरे हो जो गंदगी में पैर फैलाए बैठे हो.’’

अर्चना की बात सुन कर अवनीश का गुस्सा बढ़ गया, ‘‘भाभी, मैं कुत्ता नहीं इंसान हूं. मुझे कुत्ता मत बनाओ. आप मकान मालकिन हैं, लेकिन इतना हक नहीं है कि आप मुझे कुत्ता कहें. आज तो मैं किसी तरह आप की बात बरदाश्त कर रहा हूं, लेकिन आइंदा नहीं करूंगा.’’

पति से की शिकायत इस बार अर्चना ने अपने सभासद पति जितेंद्र से अवनीश की शिकायत की. इस पर सभासद ने अवनीश को खूब फटकार लगाई, साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर उसे मकान में रहना है तो सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा. वरना मकान खाली कर दो. अर्चना द्वारा बारबार शिकायत करने से अवनीश के मन में नफरत और बढ़ गई. उसे लगने लगा कि अर्चना जानबूझ कर किराएदारों के सामने उस की बेइज्जती करती है. उस के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी. वह बेइज्जती का बदला लेने की सोचने लगा.

28 फरवरी, 2021 की सुबह अवनीश ने पान की पीक कमरे के बाहर थूक दी. पीक की गंदगी को ले कर अर्चना और अवनीश में जम कर तूतूमैंमैं हुई. ऊषा ने किसी तरह पति को समझा कर शांत किया और गंदगी साफ कर दी. झगड़ा करने के बाद अवनीश दिन भर कमरे में पड़ा रहा और अर्चना को सबक सिखाने की सोचता रहा. आखिर उस ने एक बेहद खतरनाक योजना बना ली. रात 8 बजे अवनीश अपनी पत्नी ऊषा को अकबरपुर कोतवाली छोड़ने गया. वहां से लौटते समय उस ने पैट्रोल पंप से एक बोतल में आधा लीटर पैट्रोल लिया और वापस घर लौट आया. उस ने ऊपरनीचे घूम कर पूरे मकान का जायजा लिया.

ग्राउंड फ्लोर स्थित कार्यालय में सभासद जितेंद्र यादव क्षेत्रीय लोगों के साथ क्षेत्र की समस्यायों के संबंध में बातचीत कर रहे थे, कैलाश नाथ भी अपने कमरे में थे. जायजा लेने के बाद अवनीश पहली मंजिल पर आया. वहां अर्चना यादव रसोई में थी. पास में उन की 5 साल की बेटी अक्षिता तथा 18 माह का बेटा हनू भी बैठा था. अर्चना खाना पका रही थीं, जबकि दोनों बच्चे खेल रहे थे. इस बीच सिपाही अनीता कोई सामान मांगने अर्चना के पास आई. फिर वापस अपने कमरे में चली गई. सही मौका देख कर अवनीश अपने कमरे में गया और वहां से पैट्रोल भरी बोतल ले आया.

फिर वह रसोई में पहुंचा और पीछे से अर्चना यादव व उस के बच्चों पर पैट्रोल उड़ेल दिया. उस समय गैस जल रही थी, अत: पैट्रोल पड़ते ही गैस ने आग पकड़ ली. अर्चना व उस के बच्चे धूधू कर जलने लगे. आग की लपटों से घिरी अर्चना चीखी तो महिला सिपाही अनीता ने दरवाजा खोला. सामने का खौफनाक मंजर देख कर वह सहम गई. वह उसे बचाने को आगे बढ़ी तो अवनीश ने उस पर वार कर दिया. अनीता चीखनेचिल्लाने लगी. भूतल पर सभासद जितेंद्र यादव साथियों सहित मौजूद थे. उन्होंने चीखपुकार सुनी तो पिता कैलाश नाथ व अन्य लोगों के साथ भूतल पर पहुंचे और आग की लपटों से घिरी पत्नी अर्चना व बच्चों के ऊपर कंबल डाल कर आग बुझाई.

भागने की कोशिश में इसी बीच पकड़े जाने के डर से अवनीश भागा और केबिल के सहारे नीचे आ गया. घर के बाहर सभासद की स्कौर्पियो कार खड़ी थी. उस ने उसे भी जलाने का प्रयास किया. इसी बीच सभासद के साथियों ने उसे दौड़ाया तो वह भागने लगा. भागते समय सड़क पार करते हुए वह मिनी ट्रक की चपेट में आ गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उपचार हेतु सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया. इधर सभासद जितेंद्र यादव ने गंभीर रूप से जली पत्नी और दोनों बच्चों को अपनी कार से प्राइवेट अस्पताल राजावत पहुंचाया. लेकिन डाक्टरों ने उन की गंभीर हालत देख कर जिला अस्पताल रेफर कर दिया.

सभासद  के पिता कैलाश नाथ यादव ने घटना की सूचना पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को दी तो हड़कंप मच गया. कुछ ही देर में कोतवाल तुलसी राम पांडेय, डीएसपी संदीप सिंह, एसपी केशव कुमार चौधरी, एएसपी घनश्याम चौरसिया तथा डीएम दिनेश चंद्र जिला अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने सभासद जितेंद्र यादव को धैर्य बंधाया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया. चूंकि अर्चना की हालत नाजुक थी. अत: जिलाधिकारी डा. दिनेश चंद्र ने अर्चना का बयान दर्ज कराने के लिए एसडीएम संजय कुशवाहा को जिला अस्पताल बुलवा लिया. संजय कुशवाहा ने अर्चना का बयान दर्ज किया. अर्चना ने कहा कि किराएदार अवनीश ने पैट्रोल डाल कर उसे और उस के दोनों मासूम बच्चों को जलाया है.

जिला अस्पताल में अर्चना व उस के बच्चों की हालत बिगड़ी तो डाक्टरों ने उन्हें कानपुर शहर के उर्सला अस्पताल में रेफर कर दिया. उर्सला अस्पताल में रात 11 बजे जितेंद्र के मासूम बेटे हनू ने दम तोड़ दिया. रात 1 बजे बेटी अक्षिता की भी सांसें थम गईं. उस के बाद 4 बजे अर्चना ने भी उर्सला अस्पताल में आखिरी सांस ली. इस के बाद तो परिवार में कोहराम मच गया. जितेंद्र पत्नी व मासूम बच्चों का शव देख कर बिलख पड़े. अर्चना की मां व भाई भी आंसू बहाने लगे. पहली मार्च को सभासद जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव व उस के मासूम बच्चों को किराएदार अवनीश द्वारा जिंदा जलाने की खबर अकबरपुर कस्बे में फैली तो सनसनी फैल गई.

चूंकि मामला सभासद के परिवार का था, उन के सैकड़ों समर्थक थे. अत: उपद्रव की आशंका से पुलिस अधिकारियों ने अकबरपुर कस्बे में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया. इधर अर्चना व उस के बच्चों की मौत की खबर अकबरपुर कोतवाल तुलसीराम पांडेय को मिली तो उन्होंने अवनीश व उस की पत्नी ऊषा की सुरक्षा बढ़ा दी. उन्होंने अवनीश को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर अपनी कस्टडी में ले लिया. पुलिस काररवाई सभासद जितेंद्र यादव की तहरीर पर कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने भादंवि की धारा 326/302 के तहत अवनीश प्रजापति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे बंदी बना लिया.

रिपोर्ट दर्ज होने के बाद डीएसपी संदीप सिंह ने अभियुक्त अवनीश से घटना के संबंध में पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज किया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का भी बारीकी से निरीक्षण किया तथा साक्ष्य जुटाए. 2 मार्च, 2021 को नगरवासियों ने मृतकों की आत्माओं की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला और अंडर ब्रिज के नीचे उन की फोटो पर पुष्प अर्पित किए. अनेक युवकों के हाथों में हस्तलिखित तख्तियां थी. उन की मांग थी कि हत्यारे को फांसी की सजा मिले. युवक सीबीआई जांच की भी मांग कर रहे थे. उन को शक था कि इस साजिश में कुछ और लोग भी शामिल हैं, जिन का परदाफाश होना जरूरी है.

3 मार्च, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त अवनीश प्रजापति को कानपुर देहात की माती कोर्ट में मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सभासद जितेंद्र यादव और उन के पिता इस हृदयविदारक घटना से बेहद दुखी हैं. जब सभासद जितेंद्र यादव से दर्द साझा किया गया तो वह फफक पड़े. बोले, ‘किस पर भरोसा करूं. चंद मिनटों में ही हमारा सब कुछ खत्म हो गया. किराएदार ऐसा कर सकता है, कभी सोचा नहीं था. अवनीश ने मेरे परिवार को योजना बना कर जलाया है. बदले की आग में उस ने हमारी दुनिया ही उजाड़ डाली.’ social story in hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Gujarat News : एक ही घर में तीन कत्ल करने वाले कातिल की स्टोरी

Gujarat News : हत्या के जुर्म में सुनाई गई सजा काटते वक्त पैरोल जंप कर गुजरात से आ कर रतलाम में बसा हत्यारा गैंगस्टर दिलीप देवले इसलिए हत्या कर देता था ताकि पुलिस को उस के खिलाफ कोई सबूत न मिल सके. देव दिवाली की रात भी उस ने 3 लोगों को इसीलिए मौत की नींद सुला दिया था  कि…

25 नंवबर, 2020 को देव दिवाली का त्यौहार होने के कारण एक ओर जहां रतलाम के लोग अपने आंगन में गन्ने से बने मंडप तले शालिग्राम और माता तुलसीजी का विवाह उत्सव मना रहे थे, वहीं दूसरी ओर शहर भर के बच्चे दीवाली की बची आतिशबाजी को खत्म करने के जतन में लगे हुए थे. चारों तरफ भक्ति के साथ धूमधड़ाके का माहौल था. लेकिन इस से अलग औद्योगिक थाना इलाके में कब्रिस्तान के पास बसे राजीव नगर में 4 युवक बेवजह ही सड़क पर यहां से वहां चक्कर लगाते हुए कालोनी के एक तिमंजिला मकान पर नजर लगाए हुए थे. यह मकान गोविंद सेन का था. लगभग 50 वर्षीय गोविंद सेन का स्टेशन रोड पर अपना सैलून था.

उन का रिश्ता ऐसे परिवार से रहा जिस के पास पुश्तैनी संपत्ति रही है इसलिए पारिवारिक बंटवारे में मिली बड़ी संपत्ति के कारण उन्होंने राजीव नगर में यह आलीशान मकान बनवा लिया था. इस की पहली मंजिल पर वह स्वयं 45 वर्षीय पत्नी शारदा और 21 साल की बेहद खूबसूरत बेटी दिव्या के साथ रहते थे. जबकि बाकी 5 मंजिल पर किराएदार रहते थे. उन की एक बड़ी बेटी भी थी, जिस की शादी हो चुकी थी. इस परिवार के बारे में आसपास के लोग जितना जानते थे, उस के हिसाब से गोविंद सिंह की पत्नी घर पर अवैध शराब बेचने का काम करती थी. जबकि उन की बेटी को काफी खुले विचारों के तौर पर जाना जाता था. लोगों का मानना था कि दिव्या एक ऐसी लड़की है जो जवानी में ही दुनिया जीत लेना चाहती थी.

उस की कई युवकों से दोस्ती की बात भी लोगों ने अपनी आंखों से देखी और सुनी थी. फिर हाथ कंगन को आरसी क्या, पिता के सैलून चले जाने के बाद दिन भर ही तो घर में अकेली रह जाती. मां शारदा और बेटी दिव्या से मिलने के लिए आने वालों की कतार लगी रहती थी. मोहल्ले वाले यह सब देख कर कानाफूसी करने के बाद ‘हमें क्या करना’ कह कर अनदेखी करते रहते थे. इसलिए 25 नवंबर की रात जब चारों ओर देव दिवाली की धूम मची हुई थी. राजीव नगर की इस गली मे घूम रहे युवक कोई साढे़ 7 बजे के आसपास गोविंद के घर के सामने से गुजरते हुए सीढ़ी चढ़ कर ऊपर चले गए तो सामने के मकान से देख रहे युवक ने इस बात पर खास ध्यान नहीं दिया.

जबकि उन का चौथा साथी गोविंद के घर जाने के बजाय कुछ दूरी पर जा कर खड़ा हो गया. रात कोई सवा 9 बजे गोविंद दूध की थैली लिए हुए थकाहारा सा घर की ओर लौटा. गोविंद सीढि़यां चढ़ कर ऊपर पहुंचे, जिस के कुछ देर बाद वे तीनों युवक उन के घर से निकल कर नीचे आ गए. जिस पड़ोसी ने इन को ऊपर जाते देखा था, संयोग से इन तीनों को वापस उतरते भी देखा तो यह सोच कर उस के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई कि घर लौटने पर इन युवकों को अपने घर में पहले से मौजूद देख कर गोविंद सेन की मन:स्थिति क्या रही होगी. तीनों युवकों ने नीचे खड़ी दिव्या की एक्टिवा स्कूटी में चाबी लगाने की कोशिश की, लेकिन संभवत: वे गलत चाबी लाए थे.

इसलिए उन में से एक वापस ऊपर जा कर दूसरी चाबी ले आया, जिस के बाद वे दिव्या की एक्टिवा पर बैठ कर चले गए. 26 नवंबर की सुबह के 8 बजे रतलाम में रोज की तरह सड़कों पर आवाजाही थी. लेकिन गोविंद सेन के घर में अभी भी सन्नाटा पसरा हुआ था. कुछ देर में उन के मकान में किराए पर रहने वाली युवती ज्वालिका अपने कमरे से बाहर निकल कर दिव्या के घर की तरफ बढ़ गई. गोविंद के मकान में किराए पर रहने वाली दिव्या की हमउम्र ज्वालिका एक प्राइवेट अस्पताल में नौकरी करती है. गोविंद की बेटी भी एक निजी कालेज से बीएससी की पढ़ाई के साथ नर्सिंग का कोर्स कर रही थी. महामारी के कारण आजकल क्लासेस बंद पड़ी थीं, इसलिए वह अपनी बड़ी बहन की कंपनी में नौकरी करने लगी.

ज्वालिका और दिव्या एक ही एक्टिवा का उपयोग करती थीं. जब जिस को जरूरत होती, वही एक्टिवा ले जाती थी. लेकिन इस की चाबी हमेशा गोविंद के घर में रहती थी. सो काम पर जाने के लिए एक्टिवा की चाबी लेने के लिए ज्वालिका जैसे ही गोविंद के घर में दाखिल हुई, चीखते हुए वापस बाहर आ गई. उस की चीख सुन कर दूसरे किराएदार बाहर आ गए और उन्हें पता चला कि गोविंद के घर के अंदर गोविंद, उस की पत्नी और बेटी की लाश पड़ी है. घबराए लोगों ने यह खबर नगर थाना टीआई रेवल सिंह बरडे को दे दी. जिस से कुछ ही देर में वह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए और मामले की गंभीरता को देखते हुए इस तिहरे हत्याकांड की खबर तुरंत एसपी गौरव तिवारी को दे दी.

चंद मिनट बाद ही एसपी गौरव तिवारी एएसपी सुनील पाटीदार, एफएसएल अधिकारी अतुल मित्तल एवं एसपी के निर्देश पर माणकचौक के थानाप्रभारी अयूब खान भी मौके पर पहुंच गए. तिहरे हत्याकांड की खबर पूरे रतलाम में फैल गई, जिस से मौके पर जमा भारी भीड़ के बीच मौकाएवारदात की जांच में एसपी गौरव तिवारी ने पाया कि शारदा का शव बिस्तर पर पड़ा था, जिस के सिर में गोली लगी थी. उन की बेटी दिव्या की लाश किचन के बाहर दरवाजे पर पड़ी थी. दिव्या के हाथ में आटा लगा हुआ था और आधे मांडे हुए आटे की परात किचन में पड़ी हुई थी. इस से साफ हुआ कि पहले बिस्तर पर लेटी हुई शारदा की हत्या हुई होगी. गोली की आवाज सुन कर दिव्या बाहर आई होगी तो हत्यारों ने उसे भी गोली मार दी होगी.

जांच में स्पष्ट हुआ कि दरवाजे के पास पड़ी गोविंद की लाश की हत्या सब से बाद में हुई थी. उन के पैर में जूते थे और हाथ में दूध की थैली. जिस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे 2 हत्या करने के बाद भागना चाहते होंगे, लेकिन भागते समय ही गोविंद घर लौट आए, जिस से उन की भी हत्या कर दी होगी. पड़ोसियों ने गोविंद को 9 बजे घर आते देखा था. उस के बाद 3 लोगों को घर से बाहर जाते देखा. इस से यह साफ हो गया कि हत्या 9 बजे के पहले की गई होगी. पुलिस ने जांच शुरू की तो गोविंद सेन के परिवार के बारे में जो जानकरी निकल कर सामने आई, उस से पुलिस को शक था कि हत्याएं प्रेम प्रसंग या अवैध संबंध को ले कर की गई होंगी.

लेकिन गोविंद के एक रिश्तेदार ने इस बात को पूरी तरह गलत करार देते हुए बताया कि गोविंद ने कुछ ही समय पहले गांव की अपनी जमीन 30 लाख रुपए में बेची थी. दूसरा घटना के दिन ही शारदा और दिव्या ने डेढ़ लाख रुपए की ज्वैलरी की खरीदारी की थी, जो घर में नहीं मिली. इस कारण पुलिस लूट के एंगल से भी जांच करने में जुट गई. चूंकि मौके पर संघर्ष के निशान नहीं थे और हत्यारे गोविंद की बेटी की एक्टिवा भी साथ ले गए थे. इस से यह साफ हो गया कि वे जो भी रहे होंगे, परिवार के परिचित रहे होंगे एवं उन्हें गाड़ी की चाबी आदि रखने की जगह भी मालूम थी. हत्यारों ने वारदात का दिन देव दिवाली का सोचसमझ कर चुना. इसलिए आतिशबाजी के शोर में किसी ने भी पड़ोस में चलने वाली गोलियों की आवाज पर ध्यान नहीं दिया था.

मामला गंभीर था इसलिए आईजी राकेश गुप्ता ने भी मौके का निरीक्षण करने के बाद हत्यारों की गिरफ्तारी पर 30 हजार रुपए के ईनाम की घोषणा कर दी. वहीं एसीपी गौरव तिवारी ने 10 थानों के टीआई और लगभग 60 पुलिसकर्मियों की एक टीम गठित कर दी, जिस की कमान  थानाप्रभारी अयूब खान को सौंपी गई. इस टीम ने इलाके के पूरे सीसीटीवी कैमरे खंगाल दिए, इस के अलावा घटना के समय राजीव नगर में स्थित मोबाइल टावर के क्षेत्र में सक्रिय 70 हजार से अधिक फोन नंबरों की जांच शुरू की. दिव्या को एक बोल्ड लड़की के रूप में जाना जाता था. उस की कई लड़कों से दोस्ती थी. कुछ दिन पहले उस ने एक अलबम ‘मैनूं छोड़ के…’ में काम किया था.

इस अलबम में भी उस की एक दुर्घटना में मौत हो जाती है. पुलिस ने उस के साथ काम करने वाले युवक अभिजीत बैरागी से पूछताछ की लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. घटना से ले कर चंद रोज पहले तक दिव्या ने जिन युवकों से फोन पर बात की थी, उन सभी से पुलिस ने पूछताछ की गई. गोविंद सेन की एक्टिवा देवनारायण नगर में लावारिस खड़ी मिली. तब पुलिस ने वहां भी चारों ओर लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज जमा कर हत्यारों का पता लगाने की कोशिश शुरू कर दी. जिस में दोनों जगहों के फुटेज से 2 संदिग्ध युवकों की पहचान कर ली गई. जिन्हें घटना से पहले इलाके में पैदल घूमते देखा गया था. और बाद में वही युवक गोविंद की एक्टिवा पर जाते हुए सीसीटीवी कैमरे में कैद हुए.

जाहिर है कि हर बड़ी घटना के आरोपी भले ही कितनी भी दूर क्यों न भाग जाएं, वे घटना वाले शहर में पुलिस क्या कर रही है. इस बात की जानकारी जरूर रखते हैं, यह बात एसपी गौरव तिवारी जानते थे. इसलिए उन्होंने जानबूझ कर जांच के दौरान मिले महत्त्वपूर्ण सुराग को मीडिया के सामने नहीं रखा था. दरअसल, जब पुलिस सीसीटीवी के माध्यम से हत्यारों के भागने के रूट का पीछा कर रही थी कि देवनारायण नगर में आ कर दोनों संदिग्धों ने गोविंद की एक्टिवा छोड़ दी थी. वहां पहले से एक युवक स्कूटर ले कर खड़ा था, जिसे ले कर वे वहां से चले गए. जबकि स्कूटर वाला युवक पैदल ही वहां से गया था.

इस से एसपी का शक था कि तीसरा युवक स्थानीय हो सकता है, जो आसपास ही रहता होगा. बात सही थी, वह अनुराग परमार उर्फ बौबी था, जो विनोबा नगर में रहता था. इंदौर से बीटेक करने के बाद भी उस के पास कोई काम नहीं था. वह इस घटना में शामिल था और पुलिस की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था. इसलिए जब उसे पता चला कि पुलिस को उस का कोई फुटेज नहीं मिला तो वह लापरवाही से घर से बाहर घूमने लगा. जिस के चलते नजर गड़ा कर बैठी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की. उस से मिली जानकारी के 4 दिन बाद ही पुलिस ने दाहोद (गुजरात) से लाला देवल निवासी खरेड़ी गोहदा और यहीं से रेलवे कालोनी रतलाम निवासी गोलू उर्फ गौरव को गिरफ्तार कर लिया.

उन से पता चला कि पूरी घटना का मास्टरमांइड दिलीप देवले है, जो खरेड़ी गोहद का रहने वाला है. यही नहीं पूछताछ में यह भी साफ हो गया कि जून 20 में दिलीप देवल ने ही अपने ताऊ के बेटे सुनीत उर्फ सुमीत चौहान निवासी गांधीनगर, रतलाम और हिम्मत सिंह देवल निवासी देवरादेनारायण के साथ मिल कर डा. प्रेमकुंवर की हत्या की थी. जिस से पुलिस ने सुनीत और हिम्मत को भी गिरफ्तार कर लिया. इन से पता चला कि तीनों हत्याएं लूट के इरादे से की गई थीं. दिलीप के बारे में पता चला कि वह रतलाम में ही छिप कर बैठा है. पुलिस को यह भी पता चला कि वह मिडटाउन कालोनी में किराए के एक मकान में रह रहा है और पुलिस तथा सीसीटीवी कैमरे से बचने के लिए पीछे की तरफ टूटी बाउंड्री से आताजाता है.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पीछे की तरफ खाचरौद रोड पर उसे घेरने की योजना बनाई, जिस के चलते 2 दिसंबर, 2020 को वह पुलिस को दिख गया. पुलिस टीम ने उसे ललकारा तो दिलीप ने पुलिस पर गोलियां चलानी शुरू कर दीं, जवाबी काररवाई में पुलिस ने भी गोलियां चलाईं. कुछ ही देर में मास्टरमाइंड दिलीप मारा गया. इस प्रकार से असंभव से लगने वाले तिहरे हत्याकांड के सभी आरोपियों को पुलिस ने महज 5 दिन में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. इस में टीम प्रभारी अयूब खान और 2 एसआई सहित 5 पुलिसकर्मी भी घायल हुए.

 

सिस्टर अभया हत्याकांड : 28 साल पुराने मामले के लिए दोषियों को कैसी सजा मिली

Kerala Crime News : 28 साल का समय बहुत होता है. इस बीच इस केस को खत्म कराने, बंद कराने, अदालत को गुमराह करने के हरसंभव प्रयास हुए. पुलिस, क्राइम ब्रांच यहां तक कि सीबीआई ने भी कातिलों का साथ दिया. लेकिन आखिरकार सिस्टर अभया को…

केरल के तिरुवनंतपुरम की सीबीआई कोर्ट में चल रहे सिस्टर अभया की हत्या के मुकदमे में पूरे 28 साल बाद सीबीआई के स्पैशल न्यायाधीश के. सनिल कुमार ने बुधवार 23 दिसंबर, 2020 को अपना फैसला सुनाया. इतनी देर से फैसला आने की वजह यह थी कि इस मामले की जांच बहुत लंबी चली. मामले की जांच पहले स्थानीय थाना पुलिस ने की. उस के बाद क्राइम ब्रांच ने की और जब मामला नहीं सुलझा तो जांच सीबीआई को सौंपी गई थी. सीबीआई की भी 4 अलगअलग टीमों ने जांच की. इस तरह कुल मिला कर 6 जांच एजेंसियों ने इस केस की जांच की. इस बीच कई सीबीआई अफसर भी बदले गए.

सीबीआई ने 3 बार क्लोजर रिपोर्ट लगाने की कोशिश की, पर कोर्ट ने उसे स्वीकर नहीं किया. सीबीआई की चौथी टीम ने इस मामले में एक चोर की गवाही पर जो चार्जशीट दाखिल की, उसी चोर की गवाही पर कोर्ट इस मामले में अंतिम नतीजे पर पहुंचा और हत्यारों को सजा सुनाई. इतनी लंबी जांच होने की वजह से ही हत्या के इस मामले को केरल की हत्या की सब से लंबी जांच का मामला कहा जा सकता है. सिस्टर अभया हत्याकांड में क्या फैसला आया, यह जानने से पहले आइए यह जान लें कि सिस्टर अभया कौन थी, उन की हत्या क्यों हुई और हत्या के इस मामले में इतनी लंबी जांच क्यों करनी पड़ी. 19 साल की सिस्टर अभया कोट्टायम के पायस टेन कौन्वेंट में प्री कोर्स की पढ़ाई कर रही थीं.

पिता थौमस और मां लीला ने उन का नाम बीना थौमस रखा था. पढ़ाई के लिए जब वह नन बनीं तो उन का नाम बदल कर अभया रख दिया गया. वह सेंट जोसेफ कौन्ग्रीगेशन औफ रिलीजियस सिस्टर्स की सदस्य थीं. 27 मार्च, 1992 की सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पढ़ने के लिए उठीं. क्योंकि उस दिन उन की परीक्षा थी, जिस की तैयारी करनी थी. उन्होंने 4 बजे का अलार्म लगा रखा था. उन्हें प्यास लगी थी. वह पानी लेने के लिए किचन में गईं. लेकिन वापस अपने कमरे में नहीं आईं. किचन में गईं सिस्टर अभया कमरे में नहीं लौटीं. उन के साथ रहने वाली अन्य ननें भी पढ़ने के लिए उठीं तो सिस्टर अभया कमरे में नहीं थीं. जबकि उस समय उन्हें कमरे में ही होना चाहिए था.

उन लोगों को अभया की चिंता हुई. उन्होंने उन की तलाश शुरू की. सिस्टर अभया को ढूंढते हुए वे किचन में पहुंची तो देखा फ्रिज का दरवाजा खुला हुआ था. उसी के पास पानी की एक बोतल खुली पड़ी थी और बोतल का पानी फर्श पर फैला था. उसी के पास अभया की एक चप्पल पड़ी थी. सिस्टर अभया की काफी तलाश की गई, पर उन का कुछ पता नहीं चला. जल्दी ही यह बात पूरे कंपाउंड में फैल गई कि सिस्टर अभया गायब हैं. सवेरा हो चुका था. उजाला होने पर किसी की नजर कौन्वेंट के ही कंपाउंड में बने कुएं के पास पड़ी अभया की दूसरी चप्पल पर पड़ी. कुएं के पास चप्पल पड़ी होने से अंदाजा लगाया गया कि कहीं सिस्टर अभया कुएं में तो नहीं गिर गईं.

इस के बाद स्कूल प्रशासन ने पुलिस और फायर ब्रिगेड को सूचना दी. पुलिस और फायर ब्रिगेड ने कुएं को खंगाला तो सिस्टर अभया की लाश मिली. अब तक सुबह के लगभग 10 बज चुके थे. पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. जांच में सिस्टर अभया की एक चप्पल फ्रिज के पास पड़ी मिली. फ्रिज का दरवाजा खुला था. पानी की खुली बोतल फर्श पर पड़ी थी और उस के पास पानी फैला था, जो यह बताता था कि फ्रिज से पानी की बोतल निकाली गई थी. सिस्टर अभया की दूसरी चप्पल कुएं के पास पड़ी मिली थी. सोचने की बात यह थी कि सिस्टर अभया कुएं के पास कैसे पहुंचीं? पुलिस ने कुछ लोगोें से पूछताछ भी की, पर कोई नतीजा नहीं निकला.

अंत में सब ने यही सोचा कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की होगी. क्योंकि वहां हत्या करने वाला कोई नहीं आ सकता था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उस में स्पष्ट लिखा था कि सिस्टर अभया की मौत पानी में डूबने से हुई है. उन के शरीर पर जो चोट लगी थी, उस के बारे में कहा गया कि वह चोट उन के कुएं में गिरने पर लगी है. स्थानीय पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सबूत मान कर अपनी फाइनल रिपोर्ट लगा दी कि सिस्टर अभया ने आत्महत्या की है. पुलिस और स्कूल प्रशासन ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट को सच मान कर बात खत्म कर दी. पर स्कूल के हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को न तो पुलिस जांच पर भरोसा था और न ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर.

इस की एक वजह यह थी कि एक नन ने उसी सुबह किचन के पास हौस्टल की प्रभारी सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य फादर जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. वह ननों का हौस्टल था, इसलिए वहां फादर का जाना वर्जित था. इस के अलावा सिस्टर अभया की एक चप्पल किचन में मिली थी तो दूसरी कुएं के पास. फ्रिज खोल कर उन्होंने पीने के लिए पानी की बोतल निकाल कर खोली तो थी, पर शायद पानी पी नहीं पाई थीं. क्योंकि अगर वह पानी पीतीं तो बोतल का ढक्कन लगा कर उसे साथ ले जातीं या फिर फ्रिज में रख देतीं. फ्रिज का दरवाजा भी खुला पड़ा था. अगर उन्हें कुएं में कूद कर आत्महत्या ही करनी थी तो वह फ्रिज का दरवाजा बंद कर के जा सकती थीं.

एक चप्पल किचन में और दूसरी कुएं के पास क्यों छोड़तीं. चप्पल पहन कर भी तो कुएं में कूद सकती थीं. इस के अलावा किचन का कुछ सामान भी अस्तव्यस्त था. उसे देख कर लग रहा था कि जैसे वहां हाथापाई हुई थी. इन्हीं वजहों से हौस्टल में रहने वाली अन्य ननों को पुलिस जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर भरोसा नहीं हुआ. घटनास्थल की स्थिति देख कर उन्हें लगता था कि उस रात वहां कुछ तो गड़बड़ हुई थी, जिस ने सिस्टर अभया के साथ कुछ उल्टासीधा किया था. परिणामस्वरूप हौस्टल की 67 ननोें ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. करुणाकरन को एक पत्र लिख कर अपील की कि उन्हें पुलिस जांच पर भरोसा नहीं है, इसलिए सिस्टर अभया की मौत के मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए.

ननों की इस अपील के बावजूद केरल सरकार ने इस मामले की जांच सीबीआई को देने के बजाय केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी. क्राइम ब्रांच ने पूछताछ शुरू की तो उस नन ने बताया कि उस रात उस रात उस ने हौस्टल के किचन में सिस्टर सेफी के अलावा 2 फादर, थौमस कोट्टूर और जोस पुथुरुक्कयिल को देखा था. इस के अलावा क्राइम ब्रांच को एक गवाह भी मिल गया था. वह गवाह था एक चोर, जिस का नाम था अदक्का राजा. उस रात वह कौन्वेंट में चोरी करने आया था. दरअसल वह चोर आकाशीय बिजली को रोकने के लिए छत पर लगे तांबे के तार को चुराने आया था. चोर अदक्का राजा छत पर चढ़ कर जब तार चोरी करने जा रहा था, उसी समय उस ने सिस्टर सेफी, फादर थौमस कोट्टूर और फादर जोस पुथुरुक्कयिल को टार्च लिए किचन के दरवाजे पर देखा था.

जब उस ने सिस्टर अभया की पूरी कहानी अखबारों में पढ़ी तो उसे समझते देर नहीं लगी कि उस रात सिस्टर अभया ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि इन्हीं तीनों ने उस की हत्या की थी. उस ने खुद क्राइम ब्रांच के औफिस जा कर यह बात क्राइम ब्रांच के अधिकारियों से बताई. लेकिन पुलिस ने उस की गवाही मानने के बजाय उसे चोरी के आरोप में जेल भेज दिया और क्राइम ब्रांच पुलिस ने भी वही रिपोर्ट दी, जो स्थानीय थाना पुलिस ने दी थी. क्राइम ब्रांच का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत कुएं में डूबने से हुई थी यानी उन्होंने आत्महत्या की थी. पर कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था. यही वजह थी कि जेमोन पुथेनपुरक्कल जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस जांच के खिलाफ न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इस मामले को ले कर विधानसभा में भी काफी हंगामा हुआ.

अंतत: जब यह मामला केरल हाईकोर्ट पहुंचा तो हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी. यह सन 1993 की बात है. जांच का आदेश मिलते ही सीबीआई की टीम सिस्टर अभया की मौत के रहस्य का पता लगाने में लग गई. सीबीआई ने भी अपनी जांच के बाद वही कहा, जो पुलिस और क्राइम ब्रांच ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. उस का कहना था कि उसे इस तरह का कोई पुख्ता सबूत नहीं मिला कि वह इसे हत्या का मामला माने. सीबीआई की इस टीम का ध्यान न तो उस नन की बात पर गया था, न चोर अदक्का राजा की बात पर. सीबीआई ने यह रिपोर्ट सन 1996 में दी थी. लेकिन हाईकोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को खारिज कर फिर से जांच के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की दूसरी टीम इस मामले की जांच में लगाई गई.

दूसरी टीम ने भी जांच कर के सन 1999 में रिपोर्ट दी कि उन्हें पता ही नहीं चल पा रहा है कि सिस्टर अभया की हत्या हुई या उन्होंने आत्महत्या की है. पर इस टीम ने इस मामले को संदिग्ध जरूर माना था. इस टीम का कहना था कि मामला है तो संदिग्ध, पर सबूत के अभाव में वह निश्चित रूप से कुछ कह नहीं सकती. हाईकोर्ट ने सीबीआई को फटकार लगा कर फिर से ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस के बाद सीबीआई की तीसरी टीम जांच में लगाई गई. इस तीसरी टीम ने जांच करने के बाद कोर्ट को बताया कि जांच में यह तो पता चल गया है कि मामला आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का है. लेकिन उन के पास ऐसा कोई पुख्ता सबूत नहीं है कि वह किसी को दोषी मान कर जांच आगे बढ़ाए. उस का कहना था कि इस मामले में अब तक सारे सबूत मिटाए जा चुके हैं.

कोर्ट ने सीबीआई की इस रिपोर्ट को भी खारिज कर दिया और एक बार फिर से डांट कर ईमानदारी और ढंग से जांच करने के आदेश दिए. इस बार सीबीआई ने किसी भी तरह का सबूत या सुराग देने वाले को 3 लाख रुपए ईनाम देने की घोषणा भी की थी. फिर भी सीबीआई के हाथ ऐसा कोई सबूत या सुराग नहीं लगा कि वह कोर्ट में यह साबित कर सके कि यह हत्या का मामला है. इसी बीच सीबीआई के एक अफसर वर्गीज पी. थौमस, जो इस मामले की जांच कर रहे थे और काफी तेजतर्रार अफसर माने जाते थे, ने एक दिन अचानक उन्होंने प्रैस कौन्फ्रैंस बुलाई. 19 जनवरी, 1994 को जब यह रिपोर्ट आई थी, तब उन्होंने कहा था कि वह समय से पहले अपनी नौकरी से इस्तीफा दे रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस मामले में ईमानदारी से जांच करने की इजाजत नहीं दी जा रही है.

केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के सुपरिटेंडेंट वी. त्यागराजन उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह सिस्टर अभया के मामले में अपनी जांच रिपोर्ट को सुसाइड में तब्दील कर के कोर्ट में सुसाइड ही दिखाएं. यह खुलासा होने के बाद तो हंगामा मच गया. सीबीआई पर काफी दबाव पड़ा तो वी. त्यागराजन को कोच्चि से हटा दिया गया. इस के बाद कोर्ट के आदेश पर सीबीआई की चौथी टीम को जांच पर लगाया गया. यह टीम केरल के कोच्चि स्थित सीबीआई औफिस के अफसरों की थी. सीबीआई की टीम ने इस केस में फादर कोट्टूर, फादर जोस पुथुरुक्कयिल और नन सिस्टर सेफी को संदिग्ध माना. साथ ही उन लोगों का नारको टेस्ट कराने का फैसला किया.

जब इस बात की जानकारी कौन्वेंट को हुई तो उस ने हौस्टल की रसोइया की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करा कर नारको टेस्ट रोकवाने का भी प्रयास किया. पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रोक लगाने से मना कर दिया. इस के बाद बेंगलुरु में इन तीनों का नारको टेस्ट कराया गया. तीनों का नारको टेस्ट डा. मालिनी ने किया. नारको टेस्ट के दौरान इन तीनों का जो इकबालिया बयान था, वह एक सीडी के तौर पर सीबीआई को सौंप दिया गया, जिसे सीबीआई ने कोर्ट में पेश किया. लेकिन बाद में पता चला कि सीबीआई ने तीनों के नारको टेस्ट की जो सीडी अदालत में पेश की थी, उस के साथ छेड़छाड़ की गई थी. इस का मतलब यह था कि फादर और नन सेफी ने नारको टेस्ट के दौरान जो कुछ भी कहा था, छेड़छाड़ कर के उसे बदल दिया गया था.

इस के बाद कोर्ट ने सीधे डा. मालिनी से संपर्क कर उन से कहा कि इस मामले की जो ओरिजनल रिकौर्डिंग है, वह उन्हें भेजें. पर डा. मालिनी ने अपने बर्थ सार्टिफिकेट को ले कर कुछ गलत काम किया था, इसलिए उसी समय उन्हें नौकरी से हटा दिया गया. इस के बाद यह मामला यहीं लटक गया. अब वह सीडी सही है या गलत, कोई जानकारी देने वाला नहीं था. लेकिन एक दिन अचानक वही सीडी केरल के एक लोकल चैनल पर चल गई. वह सीडी चैनल को कहां से और कैसे मिली, यह तो पता नहीं चल सका. जबकि कोर्ट ने कहा कि यह सीडी सीलबंद लिफाफे में हमें दो. उस सीडी में दोनों फादर और नन अपनी पूरी कहानी सुना रहे थे, जो नारको टेस्ट के दौरान उन्होंने बताई थी. इस के बाद सीबीआई की इस चौथी टीम का ध्यान चोर अदक्का राजा पर गया.

पहली बार सन 2008 में सीबीआई ने उसी अदक्का राजा की गवाही के आधार पर चार्जशीट दाखिल की. जिस के बाद पहली बार सन 2008 में सिस्टर अभया की हत्या के आरोप में दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथुरुक्कयिल और नन सेफी को गिरफ्तार किया गया. हालांकि गिरफ्तारी के बाद ये तीनों साल भर भी जेल में नहीं रहे और 2009 में हाईकोर्ट ने इन्हें जमानत पर छोड़ दिया था. इस के बाद यह मामला फिर रुक गया. सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की थी और सीडी में तीनों ने जो कहानी सुनाई थी, वह कुल मिला कर कुछ इस तरह थी. उस रात सुबह 4 बजे सिस्टर अभया पानी पीने के लिए किचन में गईं और पानी पीने के लिए फ्रिज से बोतल निकाल कर जैसे ही बोतल का ढक्कन खोल कर पानी पीना चाहा, तभी उन्हें किसी की आवाज सुनाई दी.

उन्होंने पलट कर देखा तो दोनों फादर थौमस कोट्टूर, जोस पुथरुक्कयिल, जिन्हें कोर्ट ने 2 साल पहले सबूतों के अभाव में बरी कर दिया था और सिस्टर सेफी आपत्तिजनक स्थिति में दिखाई दिए. उन लोगों को उस स्थिति में देख कर सिस्टर अभया सन्न रह गईं. इसी के साथ दोनों फादर और सिस्टर सेफी ने भी सिस्टर अभया को देख लिया था. अभया को देख कर तीनों घबरा गए. क्योंकि उन की चोरी पकड़ी गई थी. चोरी भी ऐसी कि अगर बात खुल जाती तो तीनों की बदनामी तो होती ही, उन्हें वहां से निकाल भी दिया जाता. इस के बाद वे कहीं के न रहते. इसलिए उन्होंने तुरंत निर्णय लिया कि क्यों न सिस्टर अभया की हत्या कर उन का मुंह हमेशाहमेशा के लिए बंद कर दिया जाए.

यह निर्णय लेते ही फादर थौमस कोट्टूर ने आगे बढ़ कर हैरानपरेशान खड़ी सिस्टर अभया का एक हाथ से गला और दूसरे हाथ से उन का मुंह दबोच लिया तो सिस्टर सेफी ने किचन में रखी कुल्हाड़ी उठा कर पूरी ताकत से सिस्टर अभया के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में सिस्टर अभया बेहोश हो कर गिर पड़ीं तो उन्हें लगा कि वह मर चुकी हैं. और यही सोच कर फादर थौमस और सिस्टर सेफी ने बेहोश पड़ी अभया को घसीट कर कौन्वेंट के कंपाउंड में बने कुएं में ले जा कर डाल दिया. उस समय यह किसी को पता नहीं था कि सिस्टर अभया जिंदा थीं या मर चुकी थीं. इस के बाद किचन में आ कर वहां फैले खून को साफ कर दिया. लेकिन सिस्टर अभया की चप्पल, फ्रिज के दरवाजे, फर्श पर पड़ी बोतल और वहां अस्तव्यस्त हुए सामान की ओर उन का ध्यान नहीं गया.

बाद में इन्हीं चीजों से लोगों कोे अभया के साथ कोई हादसा होने का शक हुआ. उसी समय चोर अदक्का राजा चोरी करने के इरादे से छत पर चढ़ा था. तभी उस ने इन तीनों को वहां देख लिया था. उस समय उस ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को पहचान भी लिया था. बाद में उस ने दोनों की शिनाख्त भी कर दी थी. फादर जोस अंधेरे में थे, इसलिए वह उन्हें पहचान नहीं पाया था. यह पूरी बातें नारको टेस्ट में सामने आई थीं. कोर्ट नारको टेस्ट को सबूत नहीं मानता, क्योंकि इस में आदमी जो भी बताता है, वह नशे की हालत में यानी अर्द्धबेहोशी की हालत में बताता है, इसलिए कोर्ट इसे पुख्ता सबूत नहीं मानता. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ.

कोर्ट ने नारको टेस्ट में दिए गए बयान को सही नहीं माना और तीनों को सन 2009 में जमानत पर रिहा कर दिया था. इस मामले की जिस पुलिस अधिकारी ने जांच की थी, उस पर भी संदेह था. बाद में पता चला कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी छेड़छाड़ की गई थी. उस रात सिस्टर अभया ने जो कपड़े पहने थे, वे भी गायब कर दिए गए थे. उन के  शरीर पर जो चोट के निशान थे, वे भी छिपाए गए थे. इस तरह इस मामले में हर कदम पर साक्ष्य और सबूत छिपाए और नष्ट किए गए. शायद इसीलिए सीबीआई ने इस मामले में एक पुलिस अधिकारी को भी साक्ष्य मिटाने के आरोप में आरोपी बनाया था, लेकिन बाद में वह हाईकोर्ट से बरी हो गए थे.

सन 2018 में फादर जोस पुथुरुक्कयिल इस केस में सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए. इस के बाद सन 2019 में हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति वी.जी. अरुण की बेंच ने इस मामले में हो रही देरी की ओर ध्यान दिया. उन्होंने निर्देश दिया कि इस केस को जल्द से जल्द निपटाया जाए. इस के बाद सीबीआई कोर्ट में इस केस मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई, जिस की वजह से घटना के 28 साल बाद कोर्ट किसी नतीजे पर पहुंच सका और न्यायाधीश के. सनिल कुमार के फैसले के साथ इस मामले का पटाक्षेप हुआ. श्री सनिल कुमार ने अपने फैसले में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्णा अय्यर को उद्धृत करते हुए अपना जो फैसला सुनाया वह इस प्रकार था.

उन का कहना था कि सिस्टर अभया की मौत का मामला निश्चय ही ऐसा था, जिस पर मलयाली भाषी केरल की पूरी एक पीढ़ी ने अपने जीवनकाल के दौरान घरघर खूब चर्चा सुनी. झूठ, फरेब, अपराध को छिपाना, राजनीतिक प्रभाव, अदालती काररवाई और बीचबीच में मामला बंद करने की रिपोर्ट सहित सब कुछ देखासुना था. न्यायाधीश जाते रहे, पर मुकदमा जस का तस रहा. रिकौर्ड में उपलब्ध साक्ष्य इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए इतने अधिक हैं कि परिस्थितियों की तारतम्यता की कड़ी कुल मिला कर आरोपियों के अपराध की ओर इशारा करती है और इस नतीजे पर पहुंचाती है कि आरोपियोें ने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया है.

गवाहोें और प्राप्त सबूतों से साबित होता है कि सिस्टर अभया की मौत सिर में लगी चोट और पानी में डूबने से हुई. अभया के शव परीक्षण से पता चला कि उस की गरदन के दोनों ओर नाखूनों की खरोंच के निशान थे, उन की गरदन पर जख्म भी था और सिर के पिछले हिस्से में भी जख्म था, मैडिकल विशेषज्ञों के अनुसार ये जख्म मौत से पहले के थे. गवाहों के बयानों और प्राप्त सबूतों के आधार पता चला कि अभया ने फादर थौमस कोट्टूर, सिस्टर सेफी और संभवत: एक दूसरे आरोपी को आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. अपने बचाव के लिए उन्होंने उस के सिर पर कुल्हाड़ी से हमला किया और उस की हत्या कर अपनी करतूतों पर परदा डालने के इरादे से उसे कुएं में फेंक दिया.

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अपना जीवन खत्म करने पर तुला व्यक्ति जो अपना जीवन तत्काल खत्म कर रहा हो, वह अपने साथी छात्रों के साथ मिल कर पढ़ाई करने की बात तो दूर वह अपने भविष्य को ले कर क्यों चिंता करेगा? अपनी परीक्षा को अच्छी तरह देने के बारे में सोच कर अच्छी नींद भी नहीं लेगा और न मन लगा कर पढ़ाई करेगा. ये सारी बातें आत्महत्या करने की बात को झुठलाती हैं. अदालत का कहना था कि अभया एक बुद्धिमान, धर्मनिष्ठ, ईमानदार, सादगी पसंद, दृढ़निश्चयी और अति शिष्टाचारी लड़की थी, जो हर तरह से कुशल थी और परोपकारी जीवन व्यतीत कर रही थी. उस के लिए खुद ही अपने जीवन का अंत कर लेना पूरी तरह से असंभव था, जैसी दलीलें बचाव पक्ष पेश कर रहा है.

इस मामले में गवाही देने वाला अदक्का राजू या अंडासू राजू जिसे ज्यादातर लोग इसी नाम से बुलाते थे, एक मामूली चोर था, वह आकाशीय बिजली रोकने के लिए कौन्वेंट की छत में लगी तांबे की छड़ की चोरी किया करता था. न्यायाधीश ने इस तथ्य का भी जिक्र किया है कि वह अपने बयान पर अडिग रहा कि उस ने फादर थौमस कोट्टूर और एक अन्य व्यक्ति को टौर्च के साथ किचन के पास खड़े देखा था. जबकि बचाव पक्ष ने राजू की पृष्ठभूमि के आधार पर उस की गवाही पर ही सवाल खड़े किए. लेकिन 2 वकीलों द्वारा जिरह करने के बावजूद वह अपनी बात पर कायम रहा. फैसले में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि किस तरह से गवाह राजू को अपने बयान से मुकरने और सिस्टर अभया की हत्या कबूल करने के लिए धमकियां मिलीं, यातना दी गई और मोटी रकम देने का प्रलोभन दिया गया, पर वह अपने बयान से टस से मस नहीं हुआ.

अदालत ने इस तथ्य को रिकौर्ड किया कि सिस्टर अभया की मौत वाली रात सिस्टर सेफी अकेली थीं. क्योंकि उन की साथिन रिट्रीट सेंटर गई थीं. उस रात और सवेरे रसोई घर में सामान्य स्थिति नहीं थी, जिस के बारे में अदालत को कौन्वेंट में रहने वाले अन्य लोगों ने, जो बाद में मुकर गए थे, की गवाही से पता चला था. एक महत्त्वपूर्ण जानकारी यह भी मिली थी कि सिस्टर सेफी ने अपने यौनाचार में लिप्त रहने के तथ्य को छिपाने के लिए स्त्रीरोग विशेषज्ञ से अपनी हाईमेनोप्लास्टी कराई थी. अदालत ने पाया कि सेफी ने यह प्रक्रिया सीबीआई द्वारा गिरफ्तार करने के बाद कराई थी. अदालत ने इस मामले के गवाहों में से एक गवाह कलारकोडे वेणुगोपाल को दिए गए फादर थौमस कोट्टूर के बयान का संज्ञान लिया. इस मामले में वेणुगोपाल ने कोट्टूर का नारको टेस्ट कराए जाने की संभावना के बारे में जानकारी मिलने पर थौमस कोट्टूर से संपर्क किया था.

तब उन्होंने भावावेश में वेणुगोपाल से कहा था कि वह लोहे या पत्थर से नहीं बने, वह भी मनुष्य हैं, जो एक समय पर सिस्टर सेफी के साथ पतिपत्नी की तरह रहे थे, अब उन्हें क्यों सूली पर चढ़ाया जा रहा है. बचाव पक्ष ने अदालत से वेणुगोपाल के बयान को भरोसेमंद न मानने का आग्रह किया था. पर अदालत ने कहा कि आरोपी का बर्ताव, उस की गवाही के दौरान उस की भावभंगिमाएं औैर अपनी गवाही के बुनियादी तथ्यों से टस से मस नहीं होने का तथ्य गवाह की विश्वसनीयता बता रहा था. अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अचानक बगैर किसी वजह से पूरा कौन्वेंट सामूहिक रूप से मुकर गया, सबूत भी गायब हो गए और कौन्वेंट की रसोइया अचम्मा ने नारको टेस्ट को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर कर दी.

अदालत ने यह टिप्पणी भी की कि उस ने स्वीकार किया कि उच्चतम न्यायालय में देश के महानतम वकीलों में शामिल वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे उस की ओर से पेश हुए थे. अदालत ने फैसले में कहा कि उस ने यह भी स्वीकार किया कि उस के मुकदमे का खर्च कौन्वेंट ने उठाया था. जबकि उसे मुकदमे के बारे में बिलकुल जानकारी नहीं थी. अदालत ने कहा कि इस से यह साबित होता है कि इस मुकदमे को किस अंतिम नतीजे पर पहुंचने से रोकने तथा अभियोजन के मामले की सुनवाई को पटरी से उतारने के लिए प्रभावशाली लोगों ने व्यवस्थित और संगठित तरीके से प्रयास किए.

न्यायाधीश श्री के. सनिल कुमार ने इस मामले के जांच अधिकारियों, डीएसपी के. सैमुअल और तत्कालीन एसपी केटी माइकल की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि इन की इस मामले में दिलचस्पी की वजह से साक्ष्य नष्ट हुए, मनगढ़ंत सबूत तैयार किए गए. यहां तक कि मुख्य गवाह अदक्का राजू को सिखायापढ़ाया गया और अन्य गवाहों पर दबाव डाले गए. अदालत ने भविष्य में इस तरह से हस्तक्षेप के खिलाफ सख्त चेतावनी देते हुए इस फैसले की प्रति राज्य पुलिस के मुखिया को भी देने का आदेश दिया. अंत में न्यायाधीश सनिल कुमार ने फादर थौमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी को सिस्टर अभया की हत्या, अपराध छिपाने और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास यानी जीवित रहने तक जेल में रहने की सजा सुनाई. साथ ही 5-5 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया.

थौमस कोट्टूर पर घर में बिना अनुमति घुस जाने का भी आरोप लगा. सिस्टर सेफी अब नन वाले कपड़े नहीं पहन सकेंगी. सिस्टर अभया को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ रहे लोगों में अकेले जीवित बचे मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल ने कहा कि आखिर सिस्टर अभया को न्याय मिल ही गया. यह इस बात का उदाहरण है कि किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि उस के पास पैसा और बाहुबल है तो वह न्याय से खिलवाड़ कर लेगा. जिस चोर अदक्का राजा की गवाही पर दोनों को सजा हुई, फैसला आने के बाद उस ने कहा कि उसे मुकरने के लिए बहुत प्रताडि़त किया गया. उस पर दबाव डाला गया, 3 करोड़ रुपए का लालच दिया गया. पर वह अपनी बात पर अडिग रहा. आखिर उस की भी तो बेटियां हैं. इस मामले में कुल 167 गवाह थे, जिन में से लगभग सब मुकर गए थे.