मुंगेर गोलीकांड : लेडी सिंघम लिपि सिंह का एक्शन रहा कहीं महीनों तक

Bihar News : पूर्व आईएएस अधिकारी मौजूदा सांसद रामचंद्र प्रसाद सिंह की बेटी आईपीएस लिपि सिंह ने एक तेजतर्रार पुलिस अफसर के रूप में अपनी पहचान बनाई थी. लोग उन्हें लेडी सिंघम के नाम से जानते थे, लेकिन मुंगेर गोलीकांड उन के गले की ऐसी हड्डी बना कि…

जयकारा लगाते हुए माता के भक्त दुर्गा मां की प्रतिमा विसर्जन के लिए दीनदयाल उपाध्याय चौक से बाटला चौक की ओर मस्ती में बढ़ते जा रहे थे. उस वक्त रात के साढ़े 11 बज रहे थे. सैकड़ों भक्तों के पीछेपीछे सीआईएसएफ के जवान और जिले के कई थानों की फोर्स मार्च करती हुए बढ़ रही थी. माता के भक्तों पर पुलिस का दबाव था कि वे जल्द से जल्द मूर्ति विसर्जित कर शहर को भीड़ से मुक्ति दें, ताकि चल रही चुनाव प्रक्रिया आसानी से कराई जा सके. हालांकि मूर्ति विसर्जन कराने के लिए पुलिस के पास 2 दिनों का पर्याप्त समय था, इस के बावजूद पुलिस जल्दबाजी में थी कि जल्द से जल्द मूर्ति विसर्जित करा कर फुरसत पा ली जाए.

दरअसल, पुलिस का भारी दबाव भक्तों पर इसलिए भी था क्योंकि शहर में चुनाव का दौर चल रहा था, दूसरे कोरोना प्रोटोकाल भी. भीड़भाड़ अधिक होने से कोरोना की महामारी फैलने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था. इसलिए एसपी लिपि सिंह चाहती थीं कि सब कुछ शांतिपूर्वक संपन्न हो जाए. भक्त माता का जयकारा लगाते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे. लेकिन पुलिस के भारी दबाव से अचानक माहौल गरमा गया और भक्तों की ओर से किसी ने पुलिस पर पत्थर उछाल दिया. वह पत्थर एक पुलिस वाले के सिर पर जा गिरा और वह जख्मी हो गया. एक तो पुलिस पहले से ही माता के भक्तों से नाराज थी. साथी को चोटिल देख कर पुलिस फोर्स आपे से बाहर हो गई.

गुस्साई फोर्स ने भक्तों पर लाठियां बरसानी शुरू कर दीं. अचानक लाठीचार्ज से भक्त मूर्ति को चौक के बीचोंबीच छोड़ जान बचा कर इधरउधर भागने लगे और आत्मरक्षा में पुलिस पर पत्थर फेंकने लगे. जवाबी काररवाई में पुलिस ने हवाई फायर झोंक दिए. गोलियों की तड़तड़ाहट से भक्तों की भीड़ बेकाबू हो गई और फिर इधरउधर भागने लगी. इसी भगदड़ में 21 साल के युवक अनुराग कुमार पोद्दार की गोली लगने से मौत हो गई. साथी की मौत होते ही माहौल और बिगड़ गया. शहर में अशांति की आग फैल गई. आग की लपटों पर काबू पाने के लिए रातोंरात शहर भर में चप्पेचप्पे पर भारी फोर्स लगा दी थी. जैसेतैसे रात बीती. पुलिस ने फोर्स के बल पर उपद्रवियों पर काबू तो पा लिया था, लेकिन माहौल तनावपूर्ण बना हुआ था.

बिगडे़ माहौल के लिए शहरवासी पुलिस कप्तान लिपि सिंह को दोषी मान रहे थे. उन का कहना था पुलिस फोर्स के पीछे चल रही एसपी लिपि सिंह के आदेश पर ही पुलिस ने गोली चलाई थी, जिससे एक युवक की मौत हुई थी. यह घटना बिहार के मुंगेर जिले के थाना कोतवाली क्षेत्र में 26 अक्तूबर, 2020 की रात में घटी थी. अगले दिन मृतक अनूप पोद्दार के पिता की तहरीर पर कोतवाली थाने में धारा 304 आईपीसी के साथ मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के अलावा पब्लिक की ओर से 6 और मुकदमे दर्ज किए गए. मुकदमा दर्ज तो कर लिया गया, लेकिन इस काररवाई से उपजी चिंगारी अभी भी सुलग रही थी. कहने का मतलब यह है कि मुकदमा दर्ज होने के बावजूद आक्रोशित जनता एसपी लिपि सिंह को गिरफ्तार करने की अपनी मांग पर अड़ी हुई थी.

जिस का खतरनाक नतीजा 29 अक्तूबर को वीभत्स तरीके से सामने आया, जिस की कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी. पुलिसिया काररवाई से असंतुष्ट जनता ने पूरबसराय थाने को आग के हवाले कर दिया. यहां तक कि एसपी कार्यालय में काम अवरुद्ध कर दिया. जब मामले की जानकारी डीआईजी मनु महाराज को मिली तो भारी फोर्स सहित वह मुंगेर जा पहुंचे और कानूनव्यवस्था अपने हाथों में ले कर दीनदयाल उपाध्याय चौक से बाटला चौक तक पैदल फ्लैग मार्च किया. फ्लैग मार्च के दौरान नागरिकों से अपील की गई कि कानून अपने हाथों में न लें, पुलिस को अपने तरीके से काम करने दें, मृतक के साथ न्याय होगा, कानून पर विश्वास रखें.

उन की अपील का नागरिकों पर गहरा असर पड़ा और वे अपनेअपने घरों को लौट गए. इस पर पुलिस की ओर से उपद्रवियों पर कुल 9 मुकदमे दर्ज किए गए. शहर का माहौल बुरी तरह खराब हो गया था. घटना के लिए एसपी लिपि सिंह को ही दोषी ठहराया जा रहा था. यह मामला यहीं नहीं रुका, मगध के डीआईजी मनु महाराज से होते हुए बात चुनाव आयोग तक पहुंच गई थी. चुनाव आयोग ने इस पर कड़ा एक्शन लेते हुए जिलाधिकारी राजेश मीणा और एसपी लिपि सिंह को तत्काल प्रभाव से पद से हटा दिया और वेटिंग लिस्ट में डाल दिया. फिर दोनों पदों पर नई तैनाती कर दी गई.

नई जिलाधिकारी रचना पाटिल तो मानवजीत सिंह ढिल्लो को एसपी की कमान मिली. उधर मगध डिवीजन के कमिश्नर सुशील कुमार को डीआईजी मनु महाराज ने घटना की जांच कर एक हफ्ते में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया. काररवाई चल ही रही थी कि पुलिस की पिटाई से घायल बड़ी दुर्गा महारानी के कार्यकर्ता शादीपुर निवासी कालू यादव उर्फ दयानंद कुमार ने मुंगेर के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी न्यायालय में परिवाद दायर किया. यह अभियोग वाद संख्या- 779/2020 पर दायर हुआ. दायर वाद में कुल 7 आरोपी बनाए गए. उन आरोपियों के नाम लिपि सिंह (एसपी), खगेशचंद्र झा (सीओ), कृष्ण कुमार और धर्मेंद्र कुमार (एसपी के अंगरक्षक), संतोष कुमार सिंह (थानाप्रभारी कोतवाली), शैलेष कुमार (थानाप्रभारी कासिम बाजार) और ब्रजेश कुमार (थानाप्रभारी मुफस्सिल) थे.

एसपी लिपि सिंह एक बार फिर चर्चाओं में आ घिरी थीं. जलियावाला बाग कांड को याद कर के लोगों ने उन्हें जनरल डायर की उपाधि दी. हालांकि एसपी लिपि सिंह ने खुद पर लगाए गए आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कहा, ‘‘अनुराग की मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई थी बल्कि जुलूस में शामिल उपद्रवियों की ओर से की गई फायरिंग से हुई थी. जांचपड़ताल में घटनास्थल से 3 देशी कट्टे और 12 खोखे भी मिले थे. पुलिसिया जांच चल रही है. बहुत जल्द दूध का दूध और पानी का पानी सामने आ जाएगा.’’

इस घटना में जांच के दौरान नतीजा सामने क्या आया है, कहानी यहीं ब्रेक कर के आइए जानते हैं लिपि सिंह के बारे में. आईपीएस लिपि सिंह कौन हैं? लिपि सिंह के पिता कौन हैं? आईपीएस लिपि सिंह के सिर पर किस का ताकतवर हाथ है? लोग उन्हें ‘लेडी सिंघम’ क्यों कहते हैं? ऐसे तमाम सवाल हैं जिन्हें जानने के लिए हमें आईपीएस लिपि सिंह की जीवन की संघर्षमय कहानी को पाठकों के सामने परोसना होगा. आइए जानते हैं लेडी सिंघम कही जाने वाली आइपीएस लिपि सिंह की कहानी—

लिपि सिंह मूलरूप से बिहार के नालंदा जिले के मुस्तफापुर गांव की रहने वाली हैं. यह गांव मालती पंचायत क्षेत्र में पड़ता था. इसी गांव के रहने वाले रामचंद्र प्रसाद सिंह (आर.सी.पी. सिंह) और गिरिजा सिंह की बेटी हैं लिपि सिंह. आर.सी.पी. सिंह की 2 बेटियां हैं, जिन में लिपि सिंह बड़ी और उस से छोटी एक और बेटी है, जो दिल्ली में रह कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही है. आर.सी.पी. सिंह खुद एक आईएएस अधिकारी थे. राजनीति में आना महज उन का इत्तफाक था. दरअसल, सर्विस के दौरान यूपी काडर में लंबे समय तक उन्होंने काम किया. नीतीश कुमार जब केंद्र में मंत्री बने तो आर.सी.पी. सिंह दिल्ली में उन के प्राइवेट सेक्रेट्री थे. इस दौरान दोनों ने लंबे समय तक काम किया.

साल 2005 में जब नीतीश कुमार पहली बार बिहार में मुख्यमंत्री बने, तब आर.सी.पी. सिंह मुख्य सचिव बन कर आए. कहा जाता है कि आर.सी.पी. सिंह ने नीतीश कुमार के कहने पर नौकरी छोड़ दी और जेडीयू पार्टी जौइन कर ली थी. नीतीश कुमार ने बाद में उन्हें राज्यसभा का सांसद बनाया और फिलहाल वह पार्टी में नंबर 2 की हैसियत रखते हैं. आर.सी.पी. सिंह का परिवार शुरू से ही शिक्षा का महत्त्व जानता था. खुद भी वह एक काबिल आईएएस अफसर थे और वह चाहते थे कि बेटियां भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चलें. बेटियों की शिक्षा पर उन्होंने पानी की तरह पैसा बहाया और उन्हें काबिल बनाया.

लिपि सिंह चाहती थी कि वह भी अपने पिता की ही तरह एक आईएएस अधिकारी बने. भविष्य संवारने के लिए उन्होंने दिल्ली का रुख किया. वहां हौस्टल में रह कर आगे की पढ़ाई जारी रखी और कंपटीशन की तैयारी में जुट गईं. इस के लिए वह दिनरात मेहनत करती थीं. उन्होंने 2015 में यूपीएससी की परीक्षा दी. परीक्षा में लिपि का 114वां रैंक आया और 2016 में आईपीएस अफसर बनीं. हालांकि इस से पहले भी लिपि का चयन इंडियन औडिट अकाउंट सर्विस में हुआ था. तब उन्होंने वाणिज्य सेवा में सफलता हासिल की थी और देहरादून में प्रशिक्षण के दौरान अवकाश ले कर दोबारा यूपीएससी की परीक्षा देनी चाही ताकि आईएएस या आईपीएस बन सकें, लेकिन लिपि को एकेडमी से छुट्टी नहीं मिली तो पक्के इरादों वाली लिपि ने इंडियन औडिट एकाउंट से इस्तीफा दे दिया और कंपटीशन की तैयारी में जुट गईं.

जिस का नतीजा बेहतर आया और अपने सपने को पूरा किया. इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से कानून की भी शिक्षा ली थी. सपनों को पूरा करने में पिता आर.सी.पी. सिंह का काफी योगदान रहा. लिपि को बेहतर भविष्य देने वाले उन के पिता गुरु भी थे. गुरुस्वरूप पिता ने बेटी को एक ही शिक्षा दी थी कि अपनी मंजिल पाने के लिए लक्ष्य को मन की आंखों से साधो. मंजिल खुदबखुद मिल जाएगी. पिता का दिया गुरुमंत्र लिपि हमेशा याद रखती थी. लिपि सिंह एक संघर्षशील और कर्मठी युवती थी. ट्रेनिंग पूरी होने के बाद इन की पहली पोस्टिंग इन के गृह जनपद नालंदा में हुई थी. यह नालंदा जिले की पहली महिला आईपीएस अधिकारी बनी थीं. ट्रेनिंग में अच्छा काम करने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इन्हें बिहार कैडर अलाट किया था.

कहा जाता है यह सब सांसद पिता आर.सी.पी. सिंह की बदौलत हुआ था. आईपीएस लिपि सिंह ने पुलिस फोर्स जौइन करने के बाद कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उन का डंडा कानून के हिसाब से पुलिस महकमा, बालू माफिया और अपराधियों के खिलाफ लगातार चलता रहा है. महज कुछ ही साल की सर्विस में इस लेडी अफसर ने ऐसा काम किया कि पुलिसकर्मी, बाहुबली से ले कर अपराधी तक खौफ खा रहे थे. जिस जिले में इन की तैनाती होती थी, अपने विभाग के सिस्टम की गंदगी को अपने तरीके से साफ करने में कोई कोताही नहीं बरतती थीं. नालंदा से लिपि सिंह का पहली बार स्थानांतरण पटना के बाढ़ सर्किल में हुआ. बाढ़ इलाके की लिपि सिंह एडिशनल एसपी थीं.

जिस क्षेत्र में इन का स्थानांतरण हुआ था, वहां बाहुबली विधायक अनंत सिंह का कानून चलता था.  इन का खौफ इतना था कि कोई इन के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोलता था. दबदबा इतना कि लोग इन से डरते थे. इन के हुक्म के बिना पत्ता भी नहीं हिलता थे. एक दौर था जब अनंत सिंह नीतीश कुमार की सरकार में छोटे सरकार के नाम से जाने जाते थे. ऐसी जगह पर लिपि सिंह का स्थानांतरण होना दांतों के बीच जीभ के होने के समान था. आखिरकार जिस बात का डर था, हुआ वही. लिपि सिंह का कार्यकाल बाहुबली अनंत सिंह से टकराहट के साथ शुरू हुआ था. दरअसल, 2019 में हुए आम चुनाव के दौरान अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी ने चुनाव आयोग में शिकायत कर दी थी.

आरोप था कि लिपि सिंह अनंत सिंह के करीबियों को जानबूझ कर परेशान कर रही थीं. इस के बाद चुनाव आयोग के आदेश पर लिपि सिंह का ट्रांसफर एंटी टेरेरिज्म स्क्वायड (एटीएस) में कर दिया गया था. लेकिन चुनाव के बाद इन्हें एक बार फिर बाढ़ इलाके का सर्किल दे कर उसी पद पर यानी एडिशनल एसपी नियुक्त कर दिया गया था. लिपि सिंह को दोबारा उसी पद पर देख अनंत सिंह का लोहे का मजबूत किला हिल गया था. इस के बाद लिपि सिंह ने लोहा लिया बाहुबली कहे जाने वाले विधायक अनंत सिंह से. खुद को बब्बर शेर समझने वाले अनंत सिंह लिपि सिंह के खौफ से डर कर घर छोड़ कर फरार होने पर मजबूर हो गए थे.

आखिर बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने ऐसा किया क्या था, जिस से उन्हें फरार होना पड़ा था. दरअसल, लिपि सिंह को मुखबिर के जरिए सूचना मिली थी कि बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने अपने एक दुश्मन को मौत के घाट उतारने के लिए अपने गांव वाले घर नदवां में एके-47 राइफल, बड़ी मात्रा में कारतूस और देशी बम छिपा रखे हैं. इन्होंने अनंत सिंह के पैतृक गांव नदवां में उन के घर पर छापेमारी की. घर पर की गई छापेमारी के दौरान एक एके-47 राइफल, 22 जिंदा कारतूस और 2 देशी बम बरामद कर सनसनी फैला दी. उस के बाद लिपि सिंह ने अनंत सिंह के खिलाफ यूएपीए यानी अनलाफुल एक्टीविटीज प्रिवेंशन ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

मुकदमा दर्ज होने के बाद अनंत सिंह को गिरफ्तार किया जाना था. पुलिस उन की गिरफ्तारी के लिए पटना स्थित सरकारी आवास गई, लेकिन अनंत सिंह फरार हो गए. उन पर काररवाई करने के लिए उन के दाहिने हाथ कहे जाने वाले लल्लू मुखिया के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया. पर पुलिस जब उसे गिरफ्तार करने पहुंची, तो वह भी गायब हो गया. फिर लिपि सिंह कोर्ट गईं और वहां से उन्होंने लल्लू मुखिया की संपत्ति कुर्क करने का आदेश ले लिया. उस के बाद इस की काररवाई भी शुरू कर दी. चूहे और बिल्ली के इस खेल में लिपि सिंह ने अनंत सिंह को जेल भेज कर अपना लोहा मनवा लिया. उन्होंने दिखा दिया कि एक औरत कभी कमजोर नहीं होती है.

जब वह कानूनी जामा पहनी हो तो और भी नहीं. फिर क्या था बिहार में आईपीएस लिपि सिंह अपने कारनामों से सुर्खियों में छाई रहीं. बहरहाल, लौह इरादों वाली अफसर लिपि सिंह ने चट्टान जैसे भारीभरकम अनंत सिंह को धूल चटा दी थी. अत्याधुनिक और खतरनाक असलहा एके-47, जिंदा कारतूस और बम बरामदगी के जुर्म में अब तक वह जेल की सलाखों के पीछे कैद है. इस मामले में अदालत में गवाही चल रही है. लिपि सिंह ने पहली बार अदालत में हाजिर हो कर अपना बयान दिया था. इस मामले में आगे क्या होगा, यह तो वक्त ही बताएगा, लेकिन मुंगेर गोलीकांड में सीआईएसएफ की ओर से की गई जांच में पुलिस की तरफ से 13 राउंड 5.56 एमएम इंसास राइफल से गोली चलाने का उल्लेख किया गया है और यह रिपोर्ट ईमेल के जरिए डीआईजी को भेज दी गई है.

फिलहाल आईपीएस लिपि सिंह और डीएम राजेश मीणा को पद से हटा कर प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया है. अब देखना यह है कि ये दोनों अधिकारीकब तक प्रतीक्षा सूची में बने रहेंगे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

पत्नी ने रचाई साजिश : 5 लाख की सुपारी देकर कराया पति का खौफनाक कत्ल

Crime News : मौडर्न और महत्त्वाकांक्षी विनीता ने प्रवक्ता पति के होते 2-2 प्रेमी बना लिए थे. जब वह चेन मार्केटिंग कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ने के बाद तो वह अवधेश को 2 कौड़ी का समझने लगी थी. आखिर उस ने अपने मन की करने के लिए…

42 वर्षीय अवधेश सिंह जादौन फिरोजाबाद जिले के भीतरी गांव के निवासी थे. वह बरेली जिले के सहोड़ा में स्थित कुंवर ढाकनलाल इंटर कालेज में हिंदी लेक्चरर के पद पर तैनात थे. नौकरी के चलते ढाई वर्ष पहले उन्होंने बरेली के कर्मचारीनगर की निर्मल रेजीडेंसी में अपना निजी मकान ले लिया था, जिस में वह अपनी पत्नी विनीता और 6 वर्षीय बेटे अंश के साथ रहते थे. 12 अक्तूबर, 2020 को अवधेश से फोन पर गांव में रह रही उन की मां अन्नपूर्णा देवी ने बात की थी. अवधेश उस समय काफी परेशान थे. मां ने उन्हें दिलासा दी कि जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. इस के बाद उन्होंने अवधेश से बात करनी चाही, लेकिन बात न हो सकी. उन का मोबाइल बराबर स्विच्ड औफ आ रहा था. अन्नपूर्णा को चिंता हुई तो वह 16 अक्तूबर को बरेली पहुंच गईं. जब वह बेटे के मकान पर पहुंची, तो वहां मेनगेट पर ताला लगा मिला.

पड़ोसियों से पूछताछ की तो पता चला कि 12 अक्तूबर, 2020 को कुछ लोग कार से अवधेश के मकान में आए थे. तब से उन्हें नहीं देखा. अन्नपूर्णा का दिल किसी अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा. वह वहां से स्थानीय थाना इज्जतनगर पहुंच गईं और थाने के इंसपेक्टर के.के. वर्मा को पूरी बात बताई. यह भी बताया कि अवधेश को अपने ससुरालीजनों से खतरा था. यह बात अवधेश ने 12 अक्तूबर को फोन पर बात करते समय मां को बताई थी. उस की पत्नी विनीता भी अपने बच्चे के साथ गायब थी. इस पर अन्नपूर्णा से लिखित तहरीर ले कर इंसपेक्टर वर्मा ने थाने में अवधेश सिंह जादौन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करा दी.  फिरोजाबाद के फरिहा में 4/5 दिसंबर, 2019 की रात एक ज्वैलर्स की दुकान में हुई चोरी के मामले में पुलिस के एसओजी प्रभारी कुलदीप सिंह ने नारखी थाना क्षेत्र के धौकल गांव निवासी हिस्ट्रीशीटर शेर सिंह उर्फ चीकू को पकड़ा.

25 अक्तूबर, 2020 की शाम शेर सिंह को उठा कर जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बरेली के हिंदी प्रवक्ता अवधेश सिंह की हत्या करना स्वीकार किया. अवधेश की पत्नी विनीता ने अवधेश की हत्या के लिए उसे 5 लाख की सुपारी दी थी. इस में विनीता के पिता थाना नारखी के खेरिया खुर्द गांव निवासी रिटायर्ड फौजी अनिल जादौन, भाई प्रदीप जादौन, बहन ज्योति, विनीता का आगरा निवासी प्रेमी अंकित और शेर सिंह के 2 साथी भोला और एटा निवासी पप्पू जाटव शामिल थे. हत्या में कुल 8 लोग इस शामिल थे. शेर सिंह ने बताया कि बरेली में हत्या करने के बाद लाश को सभी लोग फिरोजाबाद ले कर आए और यहां नारखी में रामदास नाम के व्यक्ति के खेत में गड्ढा खोद कर दफना दिया था.

अवधेश मिला पर जीवित नहीं इस खुलासे के बाद फिरोजाबाद पुलिस ने बरेली की इज्जतनगर पुलिस को सूचना दी. अवधेश की मां अन्नपूर्णा को बुला कर 26 अक्तूबर, 2020 को फिरोजाबाद पुलिस ने तहसीलदार की उपस्थिति में उस खेत में बताई गई जगह पर खुदाई करवाई तो वहां से अवधेश की लाश मिल गई. चेहरा बुरी तरह जला हुआ था. शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अवधेश की लाश मिलने के बाद उसी दिन इज्जतनगर थाने में विनीता, ज्योति, अनिल जादौन, प्रदीप जादौन, अंकित, शेर सिंह उर्फ चीकू, भोला सिंह और पप्पू जाटव के विरुद्ध भादंवि की धारा 147/302/201 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. इस के बाद हत्याभियुक्तों की तलाश में ताबड़तोड़ दबिश दी गई, लेकिन सभी अपने घरों से लापता थे.

उन सब के मोबाइल नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए गए. सभी के मोबाइल बंद थे. बीच में किसी से बात करने के लिए कुछ देर के लिए खुलते तो फिर बंद हो जाते. उन की लोकेशन जिस शहर की पता चलती, वहां पुलिस टीम भेज दी जाती. लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही हत्यारे वहां से निकल जाते थे. 31 अक्तूबर, 2020 को एक हत्यारोपी पप्पू जाटव उर्फ अखंड प्रताप को इंसपेक्टर के.के. वर्मा ने गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी बयान में वहीं कहा, जो शेर सिंह ने कहा था. इस बीच 5 नवंबर को इज्जतनगर पुलिस ने सभी आरोपियों के गैरजमानती वारंट हासिल कर लिए. अगले ही दिन इस से डर कर अवधेश की पत्नी विनीता ने अपने वकील के माध्यम से थाने में आत्मसमर्पण कर दिया.

पूछताछ में वह अपने मृतक पति अवधेश को ही गलत साबित करने पर तुल गई. जबकि उस की सारी हकीकत सब के सामने आ गई. जब उस से क्रौस क्वेशचनिंग की गई. कई सवालों पर वह चुप्पी साध गई. अनिल जादौन परिवार के साथ फिरोजाबाद के गांव खेरिया खुर्द में रहते थे. वह सेना से रिटायर थे. परिवार में पत्नी रेखा और 3 बेटियां विनीता, नीतू और ज्योति व एक बेटा प्रदीप था. अनिल के पास पर्याप्त कृषियोग्य भूमि थी. तीनों बेटियां काफी खूबसूरत थीं और सभी ने स्नातक तक पढ़ाई पूरी कर ली थी. 2010 में नीतू का अफेयर गांव के ही पूर्व प्रधान के बेटे के साथ हो गया. जिस पर काफी बवाल हुआ. इस पर अनिल ने जल्द से जल्द अपनी बेटियों का विवाह करने का फैसला कर लिया. नारखी थाना क्षेत्र के ही गांव भीतरी में बाबू सिंह का परिवार रहता था.

परिवार में पत्नी अन्नपूर्णा और 2 बेटे रमेश और अवधेश थे. रमेश का विवाह हो चुका था और वह परिवार के साथ जयपुर में रह कर नौकरी कर रहा था. अविवाहित अवधेश हिंदी प्रवक्ता के पद पर नौकरी कर रहा था. नौकरी के चक्कर में उस की उम्र अधिक हो गई थी. अवधेश विनीता से 12 साल बड़ा था. फिर भी अनिल विनीता की शादी उस से करने को तैयार हो गए. अनिल ने विनीता से बात की तो वह मना करने लगी कि 12 साल बड़े लड़के से शादी नहीं करेगी. अनिल ने जब समझाया कि वह सरकारी नौकरी में है, उस के पास पैसों की कमी नहीं है तो वह शादी के लिए तैयार हो गई. 2011 में अवधेश का विनीता से विवाह हो गया. उसी दिन ज्योति का भी विवाह हुआ. विनीता मायके से ससुराल आ गई. विनीता पढ़ीलिखी आजाद खयालों वाली युवती थी. जबकि अवधेश सीधेसादे सरल स्वभाव का था. दोनों एक बंधन में तो बंध गए थे लेकिन उन के विचार, उन की सोच बिलकुल एकदूसरे से अलग थी.

पति सीधा था पत्नी मौडर्न विनीता को ठाठबाट से रहना पसंद था. जबकि अवधेश को साधारण तरीके से जीवन जीना अच्छा लगता था. दोनों की सोच और खयाल एक नहीं थे तो उन में आए दिन मनमुटाव और विवाद होने लगा. विनीता की अपनी सास अन्नपूर्णा से भी नहीं बनती थी. अवधेश अपनी मां की बात मानता था. विनीता इस बात को ले कर भी चिढ़ती थी. दोनों के बीच विवाद कम होने का नाम नहीं ले रहे थे. 6 साल पहले विनीता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने अंश रखा. ढाई वर्ष पहले बरेली के इज्जतनगर थाना क्षेत्र के कर्मचारी नगर की निर्मल रेजीडेंसी में अवधेश ने अपना निजी मकान ले लिया. पहले वह मकान विनीता के नाम लेना चाहता था.

लेकिन उस की बातें और हरकतों से उस का मन बदल गया. वह विनीता व बेटे के साथ अपने नए मकान में आ कर रहने लगा. बढ़ते आपसी विवादों में विनीता अवधेश से नफरत करने लगी थी. उस ने शादी से पहले सोचा था कि अवधेश उस के कहे में चलेगा, उस की अंगुलियों के इशारे पर नाचेगा, लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. पैसों के लिए उसे अवधेश का मुंह देखना पड़ता था. अवधेश अपनी सैलरी से विनीता को उस के खर्च के लिए 3 हजार रुपए महीने देता था. उस में विनीता का गुजारा नहीं होता था. अपने खर्चे को देखते हुए विनीता ने घर में ही ‘रिलैक्स जोन’ नाम से एक ब्यूटीपार्लर खोल लिया. विनीता अपनी छोटी बहन ज्योति की ससुराल जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात सिपाही अंकित यादव से हो गई.

अंकित यादव बिजनौर का रहने वाला था. उस समय उस की पोस्टिंग मैनपुरी में थी. अंकित अविवाहित था और काफी स्मार्ट था. विनीता से उस की बात हुई तो वह उस के रूपजाल में उलझ कर रह गया. फिर दोनों मोबाइल पर बातें करने लगे. एक दिन अंकित विनीता से मिलने बरेली आया. दोनों एक होटल में मिले. उस दिन से दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए. विनीता से मिलने वह अकसर बरेली आने लगा. विनीता का भाई प्रदीप एक मल्टीलेवल मार्केटिंग कंपनी में नौकरी करता था. उस ने विनीता से कहा कि वह मल्टीलेवल मार्केटिंग से जुड़ी कंपनी ‘वेस्टीज’ से जुड़ जाए. इस में कम समय में ज्यादा पैसा कमाने का मौका मिलता है. चेन मार्केटिंग कंपनियां कंपनी से जुड़ने वाले लोगों को बड़ेबडे़ सपने दिखाती हैं.

विनीता ने भी कंपनी से जुड़ने का फैसला कर लिया. वह कई मीटिंग में गई और मीटिंग में जाने के बाद उस पर चेन मार्केटिंग के जरिए जल्द से जल्द पैसा कमा कर रईस बनने का नशा सवार हो गया. इस के लिए उस ने इसी साल की शुरुआत में कंपनी जौइन कर ली. इस के लिए विनीता ने किसी बड़ी महिला अधिकारी की तरह अपनी वेशभूषा बनाई. शानदार सूटबूट में चश्मा लगा कर जब वह इंग्लिश में बड़े विश्वास के साथ अपनी बात किसी भी व्यक्ति के सामने रखती तो वह उस का मुरीद हो जाता और उस के कहने पर कंपनी जौइन कर लेता. भाई प्रदीप की लाल टीयूवी कार विनीता अपने पास रखने लगी. वह इसी कार से लोगों से मिलने जाती थी.

लग्जरी कार से सूटेडबूटेड महिला को उतरता देख कर लोगों पर इस का काफी गहरा प्रभाव पड़ता. घर की चारदीवारी से विनीता बाहर निकली तो उस ने अपने लिए पैसों का इंतजाम करना शुरू कर दिया. अब लोग विनीता से मिलने घर पर भी आने लगे. विनीता की चल पड़ी दुकान अवधेश तो दिन में कालेज में होता था और शाम को ही लौटता था. उसे पड़ोसियों से पता चलता तो अवधेश और विनीता में विवाद होता. विनीता पहले जब अवधेश से नहीं डरीदबी तो अब तो वह खुद का काम कर रही थी. ऐसे में अवधेश को ही शांत होना पड़ता था. दोनों  के बीच की दूरियां गहरी खाई में तब्दील होती जा रही थीं. दूसरी ओर विनीता की बहन ज्योति का अपनी ससुरालवालों से मनमुटाव हो गया था. वह काफी समय से मायके में रह रही थी. विनीता ने उसे अपने पास रहने के लिए बुला लिया. इस से भी अवधेश खफा था.

लौकडाउन के दौरान फेसबुक पर विनीता की दोस्ती अमित सिसोदिया उर्फ अंकित से हुई. अमित आगरा का रहने वाला था और वेस्टीज कंपनी से ही जुड़ा था, जिस से विनीता जुड़ी थी. अमित विवाहित था और एक बेटे का पिता भी था. दोनों की फेसबुक पर बातें हुईं तो पता चला कि अमित विनीता के भाई प्रदीप का दोस्त है. इस के बाद दोनों खुल कर बातें करने लगे और मिलने भी लगे. दोनों अलगअलग शहरों में होने वाले कंपनी के सेमिनार में भी साथ जाने लगे. अमित और विनीता की सोच और विचार काफी मिलते थे. एक साथ रहने के दौरान विनीता को यह बात महसूस हो गई थी. दोनों ही जिंदगी में खूब पैसा कमाना चाहते थे. दोनों साथ बैठते तो कल्पनाओं की ऊंची उड़ान भरते. एक दिन अमित ने विनीता का हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, ‘‘विनीता, हम दोनों बिलकुल एक जैसे है.

एक जैसा सोचते हैं, एक जैसा काम करते है और एक ही उद्देश्य है, एकदूसरे का साथ भी हमें भाता है. क्यों न हम हमेशा के लिए एक हो जाएं.’’

विनीता पहले हलके से मुसकराई, फिर गंभीर मुद्रा में बोली, ‘‘हां अमित, मैं भी ऐसा ही सोच रही थी. यह भी सोच रही थी कि तुम मेरी जिंदगी में पहले क्यों नहीं आए, आ जाते तो मुझे कष्टों से न गुजरना पड़ता.’’ कुछ पलों के लिए रुकी, फिर बोली, ‘‘खैर अब भी हम एक हो सकते हैं ठान लें तो.’’

विनीता की स्वीकृति मिलते ही अमित खुश हो गया, ‘‘तुम ने कह दिया तो अब हमें एक होने से कोई नहीं रोक सकता.’’ कह कर अमित ने विनीता को बांहों में भर लिया. विनीता भी उस से लिपट गई. अमित को पा कर जैसे विनीता ने राहत की सांस ली. उसे ऐसे ही युवक की तलाश थी जो उस के जैसा हो, उसे समझता हो और उस के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाए. दूसरी ओर वह अंकित यादव से भी संबंध बनाए हुए थी. विनीता दिनरात एक कर के अपने मार्केटिंग के बिजनैस में सफल होना चाहती थी. इसलिए वह इस में लगी रही. कुछ महीनों में ही उस ने अपने अंडर में एक हजार लोगों की टीम खड़ी कर दी. कंपनी ने उसे कंपनी का ‘सिलवर डायरेक्टर’ घोषित कर दिया.

विनीता खुशी से फूली नहीं समाई. कंपनी ने उसे एक स्कूटी भी इनाम में दी. विनीता अपनी कंपनी के कार्यक्रमों और उस के रिकौर्डेड संदेशों को अपने फेसबुक अकाउंट पर डालती रहती थी. कंपनी से जुड़ने के लिए लोगों से अपील भी करती थी कि उस के पास बिजनैस करने का एक अनोखा आइडिया है, जिस में महीने में 5 से 50 हजार तक कमा सकते हैं. जो कमाना चाहते हैं, उस से मिलें. विनीता की जिंदगी में सब कुछ अब अच्छा ही अच्छा हो रहा था. बस खटकता था तो अवधेश. उस के साथ होने वाली कलह. अब विनीता अवधेश से छुटकारा पाने की सोचने लगी थी. उस की जिंदगी में अमित आ चुका था, वह उस के साथ जिंदगी बिताने का सपना देखने लगी थी. अमित भी उस से कई बार कह चुका था कि वह कहे तो अवधेश को ठिकाने लगा दिया जाए. वह ही मना कर देती थी.

अवधेश के मरने से उसे हमेशा के लिए छुटकारा तो मिलता ही साथ ही अवधेश का मकान और सरकारी नौकरी भी मिल जाती. यही सोच कर उस ने आगे की योजना बनानी शुरू कर दी. इस में उस ने अपने पिता व भाई से साफ कह दिया कि वह अवधेश के साथ नहीं रहना चाहती. उसे मारने से उसे मकान और उस की सरकारी नौकरी भी मिलेगी. विनीता के पिता अनिल ने एक बार कहा भी कि वह अपना बसा हुआ घर न उजाड़े, लेकिन विनीता नहीं मानी. विनीता की जिद और लालच के लिए वे सभी उस का साथ देने को तैयार हो गए. विनीता का एक मुंहबोला चाचा था शेर सिंह उर्फ चीकू. वह उस के पिता अनिल का खास दोस्त था. शेर सिंह नारखी थाने का हिस्ट्रीशीटर था, उस पर वर्तमान में 16 मुकदमे दर्ज थे.

विनीता ने शेर सिंह से कहा कि उसे उस के पति अवधेश की हत्या करनी है. शेर सिंह ने उस से 5 लाख रुपए का इंतजाम करने को कहा तो विनीता ने हामी भर दी. अवधेश ने कार खरीदने के लिए घर में रुपए ला कर रखे थे. सोचा था कि नवरात्र में बुकिंग करा देगा और धनतेरस पर गाड़ी खरीद लेगा. उन पैसों पर विनीता की नजर पड़ गई. उन रुपयों में से 70 हजार रुपए निकाल कर विनीता ने शेर सिंह को दे दिए, बाकी पैसा बाद में देने को कहा. इस के बाद शेर सिंह ने अपने गांव के ही भोला सिंह और एटा के पप्पू जाटव को हत्या में साथ देने के लिए तैयार कर लिया. शेर सिंह ने विनीता, विनीता के पिता अनिल, भाई प्रदीप और प्रेमी अमित सिसोदिया के साथ मिल कर अवधेश की हत्या की योजना बनाई. विनीता ने बाद में ज्योति को इस बारे में बता कर उसे भी अपने साथ शामिल कर लिया.

12 अक्तूबर, 2020 की रात अवधेश रोज की तरह टहलने के लिए निकले. उस के जाने के बाद विनीता ने हत्या के उद्देश्य से पहुंचे शेर सिंह, भोला, पप्पू जाटव, अनिल, प्रदीप और अमित को घर के अंदर बुला लिया. सभी घर में छिप कर बैठ गए. कुछ देर बाद जब अवधेश लौटे तो घर में घुसते ही सब ने मिल कर उसे दबोच लिया. विनीता अपने बेटे अंश को ले कर ऊपरी मंजिल पर चली गई. नीचे सभी ने अवधेश को पकड़ कर उस का गला घोंट दिया. अवधेश के मरने के बाद विनीता नीचे उतर कर आई. अवधेश की लाश को बड़ी नफरत से देख कर गाली देते हुए उस में कस के पैर की ठोकर मार दी. देर रात अमित ने लाश को सभी के सहयोग से अपनी आल्टो कार में डाल लिया. इस के बाद प्रदीप की टीयूवी कार जो विनीता के पास रहती थी, सब उस में सवार हो गए.

प्रदीप कार चला रहा था. उस के पीछे थोड़ी दूरी पर अंकित चल रहा था. लगभग साढ़े 3 घंटे का सफर तय कर के अवधेश की लाश को ले कर वे फिरोजाबाद में नारखी पहुंचे. लेकिन तब तक उजाला हो चुका था. इसलिए लाश को कहीं दफना नहीं सकते थे. इन लोगों ने पूरा दिन ऐसे ही निकाला. इस बीच लाश को जलाने के लिए बाजार से तेजाब खरीद कर लाया गया. अंधेरा होने पर नारखी में रामदास के खेत में गड्ढा खोद कर अवधेश की लाश को उस में डाल दिया गया. फिर लाश पर तेजाब डाल दिया गया, जिस से लाश का चेहरा व कई हिस्से जल गए. लाश को दफनाने के बाद सभी वहां से लौट आए. विनीता बराबर वीडियो काल के जरिए उन लोगों के संपर्क में थी. 14 अक्तूबर, 2020 को वह भी बेटे अंश को ले कर घर से भाग गई.

शेर सिंह पकड़ा गया तो घटना का खुलासा हुआ. उस ने विनीता के प्रेमी अंकित का नाम लिया. घटना की खबर अखबारों की सुर्खियां बनीं तो विनीता के प्रेमी सिपाही अंकित यादव ने देखा. अंकित ने अपना नाम समझा. उसे लगा कि पुलिस को विनीता की काल डिटेल्स से उस के बारे में पता लग गया है. अब वह भी इस हत्याकांड की जांच में फंस जाएगा. दूसरी ओर अंकित नाम आने पर विनीता के शातिर दिमाग ने खेल खेला. अपने प्रेमी अमित सिसोदिया को बचाने के लिए वह अंकित को ही फंसाने में लग गई. 26 अक्तूबर, 2020 को वह अंकित यादव से मिलने संभल गई. 2 महीने से अंकित संभल की हयातनगर चौकी पर तैनात था. वहां वह उस से मिली. कुछ सिपाहियों ने उसे उस के साथ देखा भी. विनीता उस से मिल कर चली गई. अंकित भयंकर तनाव में आ गया.

27 अक्तूबर, 2020 को उस ने अपने साथी सिपाही की राइफल ले कर उस से खुद को गोली मार ली. अंकित के आत्महत्या कर लेने की बात विनीता को पता चल गई थी. इसलिए जब उस ने आत्मसमर्पण किया तो वह सारा दोष अंकित यादव पर डालती रही. वह अपने प्रेमी अमित सिसोदिया उर्फ अंकित को बचाना चाहती थी. समर्पण से पहले विनीता ने अपना मोबाइल भी तोड़ दिया था, ताकि पुलिस उस मोबाइल से कोई सुराग हासिल न कर सके. गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद से सभी आरोपियों में इस बात का खौफ है कि पुलिस उन की संपत्तियों को तोड़फोड़ सकती है, कुर्क कर सकती है. इसलिए बारीबारी से सभी आत्मसमर्पण करने की तैयारी में लग गए.

फिलहाल कथा लिखे जाने तक पुलिस शेष आरोपियों की तलाश में जुटी हुई थी. शेर सिंह की रिमांड 20 नवंबर को मिलनी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों व मीडिया में छपी रिपोर्टों के आधा

विकास दुबे : अपराध से राजनीति का सफर और फिर हत्याकांड

Crime News : विकास दुबे को कांग्रेस, सपा, बसपा और भाजपा सभी के नेताओं ने संरक्षण दिया ओर अपनेअपने हिसाब से पालते रहे. उस वक्त उस से जुड़े नेताओं ने सोचा भी नहीं होगा कि वह भस्मासुर बन जाएगा. सरकार को चाहिए कि विकास दुबे की जांच वहां तक कराए, जहां तक उस की आंतों में नेताओं का पिलाया रस बहता नजर न आए…

2 जुलाई, 2020 की शाम 7 बजे डीएसपी (बिल्हौर) देवेंद्र मिश्रा को सूचना मिली कि कुख्यात अपराधी विकास दुबे अपने गांव बिकरू में मौजूद है. खबर पाते ही वह सक्रिय हो गए. दरअसल विकास के पड़ोसी गांव मोहनी निवादा निवासी राहुल तिवारी ने थाना चौबेपुर में विकास दुबे के विरुद्ध मारपीट करने, बंधक बनाने, अपहरण तथा जानलेवा हमले की तहरीर दी थी. इस पर थानाप्रभारी विनय कुमार ने 1 जुलाई, 2020 को थाना चौबेपुर में भादंवि की धारा 307 के तहत विकास दुबे व उस के गुर्गों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और इस की सूचना डीएसपी (बिल्हौर) देवेंद्र मिश्रा को दे दी. अत: उन्हें विकास के गांव में होने की सूचना मिली तो उन्होंने जल्दी से जल्दी गिरफ्तार करने का फैसला कर लिया.

डीएसपी देवेंद्र मिश्रा ने अपने सर्किल के शिवराजपुर, बिठूर और चौबेपुर के थानाप्रभारियों महेश यादव, कौशलेंद्र प्रसाद सिंह और विनय कुमार को तलब किया, फिर 25000 हजार के इनामी कुख्यात हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को दबोचने की रूपरेखा बनाई. इस के लिए पूरी फोर्स को थाना चौबेपुर में एकत्र किया गया. दबिश के लिए जाने वाली पुलिस पार्टी में 20 पुलिसकर्मियों को सम्मिलित किया गया. इन में तेजतर्रार चौकी इंचार्ज, दरोगा व पुलिस के सिपाही थे. एक होमगार्ड भी था. 2 जुलाई की रात 12 बजे डीएसपी देवेंद्र मिश्रा की अगुवाई में 3 थानों शिवराजपुर, बिठूर और चौबेपुर के थानाप्रभारियों के साथ 20 पुलिसकर्मियों की टीम 2 जीपों में सवार हो कर हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पकड़ने के लिए बिकरू गांव को रवाना हो गई.

बिकरू गांव थाने से 40 किलोमीटर दूर है. इसलिए पुलिस पार्टी रात एक बजे बिकरू गांव पहुंची. उस समय गांव में सन्नाटा पसरा था. लोग घरों में गहरी नींद सो रहे थे. विकास के घर के सामने जेसीबी मशीन खड़ी थी, जिस से रास्ता बंद था. अत: पुलिस पार्टी ने जीपें वहीं खड़ी कर दीं और पुलिस के जवान जीपों से उतर गए. तभी सामने के मकान की छत से फायरिंग शुरू हो गई. ताबड़तोड़ फायरिंग से पुलिसकर्मी संभल नहीं पाए और जान बचाने के लिए आसपास के घरों में जा छिपे. लेकिन कुख्यात अपराधी विकास दुबे ने कड़ी घेराबंदी कर रखी थी. इसलिए घर में दुबके जवानों को वहीं छलनी कर दिया गया.

डीएसपी देवेंद्र मिश्रा जान बचाने के लिए जिस घर में गए, वह विकास के मामा प्रेम प्रकाश पांडेय का था. वहां उस का मामा और चचेरा भाई शार्पशूटर अतुल दुबे मोर्चा संभाले थे. दोनों ने देवेंद्र मिश्रा की पिस्टल छीन ली और निर्दयता से गोलियां दाग कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. मुठभेड़ के दौरान चौबेपुर थानाप्रभारी विनय कुमार ने पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दी कि दबिश के दौरान पुलिस पार्टी अपराधियों के जाल में फंस गई है. अपराधी ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रहे हैं. जान बचाना मुश्किल हो रहा है. कई जवान घायल हो गए हैं और कई की जान चली गई है, तुरंत भारी पुलिस फोर्स भेजी जाए.

थानाप्रभारी विनय कुमार की इस सूचना से पुलिस अधिकारी दंग रह गए. सूचना के एक घंटे बाद एडीजी (कानपुर जोन) जय नारायण सिंह, आईजी मोहित अग्रवाल और एसएसपी दिनेश कुमार पी. भारी पुलिस फोर्स के साथ वहां पहुंच गए और गांव को चारों तरफ से घेर कर सर्च औपरेशन शुरू कर दिया गया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया तो सिहर उठे. क्योंकि घटनास्थल के आसपास घरों तथा सड़क पर पुलिस के जवानों की लाशें पड़ी थीं और कई घायल पड़े थे. एक घर के बाथरूम का दृश्य तो दिल दहला देने वाला था. बाथरूम में एक के ऊपर एक 5 पुलिस जवानों की लाशें पड़ी थीं. शायद हत्या के बाद उन्हें घसीट कर वहां लाया गया था.

पुलिस अधिकारियोें ने घायल पड़े पुलिस जवानों को तत्काल कानपुर के रीजेंसी अस्पताल भिजवाया और मृतकों के शवों को पोस्टमार्टम हाउस लाला लाजपतराय अस्पताल भेजा गया. वहां पर भारी फोर्स तैनात करा दी. शहीद हुए पुलिस जवानों में डीएसपी देवेंद्र मिश्रा, शिवराजपुर थानाप्रभारी महेश यादव, उपनिरीक्षक शिवराजपुर नेबू लाल, मंधना चौकी इंचार्ज अनूप कुमार सिंह, हेड कांस्टेबल सुलतान सिंह, सिपाही बबलू, राहुल कुमार और जीतेंद्र कुमार थे. गंभीर रूप से घायल पुलिस जवान जिन्हें रीजेंसी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, उन में बिठूर थानाप्रभारी कौशलेंद्र प्रताप सिंह, सबइंसपेक्टर चौबेपुर सुधाकर पांडेय, बिठूर थाने का सिपाही अजय सिंह तोमर, थाना शिवराजपुर का सिपाही अजय कश्यप, बिठूर थाने का सिपाही शिवमूरत और होमगार्ड जयराम पटेल थे.

सुबह घटना की सूचना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को मिली तो उन के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. उन्होंने तत्काल डीजीपी हितेशचंद्र अवस्थी और एडीजी (ला एंड आर्डर) प्रशांत कुमार को घटनास्थल पहुंचने और ग्राउंड रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया. आदेश पा कर दोनों आला अधिकारी लगभग 10 बजे बिकरू गांव पहुंच गए. वहां का खूनी मंजर देख कर वह दहल उठे. अब तक सर्च औपरेशन कर रही पुलिस टीम ने मंदिर में छिपे 2 अपराधी अतुल दुबे और प्रेम प्रकाश पांडेय को मार गिराया. इन में अतुल दुबे कुख्यात अपराधी विकास दुबे का चचेरा भाई था और प्रेम प्रकाश पांडेय मामा था. डीजीपी हितेशचंद्र अवस्थी ने निरीक्षण के दौरान कहा कि शहीद पुलिसकर्मियों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा. जिस बर्बरता के साथ हत्याएं की गई हैं, उन के साथ भी वैसा ही बर्ताव किया जाएगा.

इधर पुलिसकर्मियों के शहीद होने की खबर पा कर मृतकों के घर वाले सुबह से ही पोस्टमार्टम हाउस पहुंचने लगे थे. दोपहर होतेहोते पोेस्टमार्टम हाउस में घर वालों की रोनेचीखने की आवाजें सुनाई देने लगीं. उन के रोनेचीखने की स्थिति यह थी कि सुन कर पत्थर दिल भी द्रवित हो जाते. कई पुलिसकर्मी भी दहाड़ मार कर रो रहे थे. पोस्टमार्टम की कार्रवाई 8 डाक्टरों की टीम ने वीडियोग्राफी के साथ पूरी की. पोस्टमार्टम के बाद शवों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए फूलमाला से सजे वाहनों में रख कर पुलिस लाइन ले जाया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 3:30 बजे कानपुर पहुंचे. सब से पहले वह घायल पुलिस जवानों से मिलने रीजेंसी अस्पताल गए, फिर बलिदानियों को नमन करने पुलिस लाइन पहुंचे.

उन के साथ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना, कैबिनेट मंत्री कमल रानी वरूण, विधायक महेश त्रिवेदी और उच्च शिक्षा राज्यमंत्री नीलिमा कटियार भी थीं. सभी ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की. इस के बाद मुख्यमंत्री ने प्रैस वार्ता की, जिस में उन्होंने घोषणा की कि हर मृतक के परिवार को एक करोड़ रुपए की आर्थिक मदद और परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी दी जाएगी. साथ ही असाधारण पेंशन देने की भी घोषणा की. मुख्यमंत्री ने मृतकों के स्वजनों को आश्वस्त किया कि संकट की इस घड़ी में सरकार उन के साथ है.  हर गुनहगार को कठोर सजा मिलेगी. उन्होंने कहा डीजीपी को आदेश दिया गया है कि वह तब तक कानपुर में डेरा डाले रहें, जब तक गुनहगारों को पकड़ा नहीं जाए या मुठभेड़ में मारा नहीं जाए.

अपराधियों की मुठभेड़ में शहीद हुए देवेंद्र मिश्र मूल रूप से बांदा जिले के थाना गिरवां के सहेवा गांव के रहने वाले थे. उन के पिता स्व. महेश मिश्र शिक्षक थे. देवेंद्र मिश्र 3 भाइयों में सब से बड़े थे. देवेंद्र मिश्र सिपाही पद पर भर्ती हुए थे. अपनी लगन और मेहनत से वह सिपाही से दरोगा और दरोगा से डीएसपी बने थे. उन के परिवार में पत्नी शशि के अलावा 2 बेटियां हैं. शहीद हुए शिवराजपुर थाने के प्रभारी निरीक्षक महेश यादव मूलरूप से रायबरेली जिले के वनपुरवा रामपुर कलां के रहने वाले थे. उन के परिवार में पत्नी सुमन के अलावा 2 बेटे हैं. यादव परिवार सहित थाने के सरकारी आवास में रहते थे. वह 2012 बैच के दरोगा थे. एसएसपी कानपुर के पीआरओ रहने के बाद उन्हें थाने का चार्ज मिला था.

शहीद हुए शिवराजपुर थाने के उपनिरीक्षक नेबू लाल प्रयागराज के भीटी गांव के रहने वाले थे. उन के पिता कालिका प्रसाद किसान थे. कालिका प्रसाद के 4 बेटों में नेबू लाल सब से बड़े थे. वह 1990 में पुलिस महकमे में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे. उन्होंने 2009 में रैंकर्स परीक्षा पास की थी. 2 साल की ट्रेनिंग पूरी करने के बाद साल 2013 में उन्हें कानपुर में तैनाती मिली थी. उन की पत्नी श्यामा देवी गांव में रहती हैं. उन के 4 बेटे हैं जिन में बड़ा बेटा अरविंद एमबीबीएस की तैयारी कर रहा है. शहीद हुए मंधना चौकी इंचार्ज अनूप कुमार सिंह मूल रूप से प्रतापगढ़ जिले के थाना मानधाता क्षेत्र में आने वाले गांव वेलारी के रहने वाले थे. उन के पिता रमेश बहादुर सिंह किसान हैं. अनूप कुमार ने 2015 के बैच में ट्रेनिंग की थी.

उन की पहली पोस्टिंग कानपुर हुई. उन्हें पहले बिठूर थाने की टिकरा चौकी का इंचार्ज बनाया गया. बाद में जनवरी 2020 में उन का तबादला मंधना चौकी कर दिया गया. अनूप कुमार कानपुर शहर के चर्चित समाजवादी पार्टी के नेता चंद्रेश सिंह के चचेरे भाई थे. शहीद आरक्षी सुलतान सिंह मूलरूप से झांसी जिले के बूढ़ा भोजला के रहने वाले थे. उन की मां का निधन बचपन में ही हो गया था. उन्होंने अपनी शिक्षा मऊरानीपुर में नाना के घर पूरी की और वहीं से पुलिस में भर्ती हुए. सुलतान की बीवी बूढ़ा भोजला में रहती है. उन की 7 साल की बेटी सीमा सिंह है जिसे सुलतान डाक्टर बनाना चाहते थे. बिठूर थाने के शहीद सिपाही बबलू आगरा जिले के पोखर पांडे नगलां लोहिया के रहने वाले थे.

उन के पिता छोटेलाल दिव्यांग हैं और घर पर रहते हैं. बबलू 4 भाइयों में तीसरे नंबर के थे. 2 बड़े भाइयों रमेश व दिनेश की शादी हो चुकी है. बबलू की शादी भी राजस्थान में तय हो चुकी थी. शहीद सिपाही राहुल कुमार मूलरूप से औरैया जिले के रूरूकलां के रहने वाले थे. उन के पिता ओमकार दरोगा पद से रिटायर हुए थे. राहुल कुमार 3 भाइयों में मंझले थे. 2016 बैच की ट्रेनिंग के बाद उन की पहली पोस्टिंग कल्याणपुर कानपुर हुई थी. जनवरी 2020 में उन का तबादला बिठूर हो गया था. उन के परिवार में बीवी दिव्या के अलावा एक माह की बच्ची है. वर्ष 2018 बैच के शहीद हुए सिपाही जितेंद्र कुमार सिंह मथुरा के रिफाइनरी थाने के बरारी गांव के रहने वाले थे. उन के पिता तीर्थपाल मजदूरी करते हैं.

4 भाई बहनों में वह सब से बड़े थे. वर्तमान में उन का परिवार हाइवे के गांव विरजापुर में रह रहा है. परिवार संभालने की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी. कुख्यात अपराधी विकास दुबे और उस के गैंग के सदस्यों को पकड़ने के लिए पुलिस, पुलिस अधिकारियों और एसटीएफ ने बिकरू गांव में डेरा डाल दिया. तलाशी के दौरान पुलिस ने विकास दुबे के घर व अन्य घरों में जम कर तोड़फोड़ की. इस के अलावा उस के आसपास के जिलों के ठिकानों पर भी दबिश दी. लखनऊ के कृष्णा नगर, इंद्रलोक कालोनी स्थित उस के मकान पर भी पुलिस ने दबिश दी, पर विकास नहीं मिला. उस की बीवी ऋचा दुबे व मां सरला घर पर थीं. मां विकास से काफी नाराज थी. उस ने कहा विकास आतंकी है, मिल जाए तो मार दो. उसे बहुत समझाया पर वह नहीं माना, ऐसा बेटा परिवार के लिए कलंक है.

इस वीभत्स घटना के बाद पुलिस ने थाना चौबेपुर में 2 रिपोर्ट दर्ज की. पहली रिपोर्ट एसपी (पश्चिम) अनिल कुमार ने दर्ज कराई. यह रिपोर्ट विकास दुबे, प्रेम प्रकाश पांडेय, अतुल दुबे सहित 30-35 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कराई गई. इस रिपोर्ट में पुलिस ने हत्या, लूट, सरकारी कार्य में बाधा डालने, लोक सेवक को गंभीर चोट पहुंचाने, दफा 34 तथा 7 क्रिमिनल एक्ट सहित कई अन्य गंभीर धाराएं लगाई गईं. दूसरी एफआईआर पुलिस एनकाउंटर की दर्ज हुई, जिस में 2 आरोपितों की मौत दिखाई गई. विकास दुबे कौन था. वह अपराधी कैसे बना. पुलिस की उस से क्या खुन्नस थी. उस ने 8 जाबांज पुलिस कर्मियों को कैसे और क्यों मौत के घाट उतारा. यह सब जानने के लिए उस के अतीत की ओर जाना होगा.

कानपुर जिले के चौबेपुर थाना क्षेत्र में एक ब्राह्मण बाहुल्य गांव है बिकरू. रामकुमार दुबे अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सरला देवी के अलावा 3 बेटे विकास, दीप प्रकाश, अविनाश और 2 बेटियां थीं. रामकुमार किसान थे. कृषि उपज से वह अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. ब्राह्मण समाज के लोग उन की इज्जत करते थे. रामकुमार दुबे का बड़ा बेटा विकास बचपन से ही तेजतर्रार और झगड़ालू प्रवृत्ति का था. उस ने जवानी की डगर पर कदम रखते ही युवा लड़कों का एक गैंग बना लिया. उस का यह गिरोह छोटेमोटे अपराध करने लगा.

विकास पर पहला मुकदमा साल 1990 में कायम हुआ, जब उस ने पड़ोसी गांव के पिछड़ी जाति के रसूखदारों को पीटा. कथित रूप से उन लोगों ने उस के पिता को बेइज्जत किया था. इस मामले में शिवली पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया लेकिन तत्कालीन कांग्रेस विधायक नेकचंद्र पांडेय ने उसे थाने से ही छुड़वा लिया. इस राजनीतिक संरक्षण से उस का हौसला बढ़ गया. अपराध की दुनिया में कदम रखने के बाद विकास दुबे ने इसी राजनीतिक संरक्षण का फायदा उठा कर जमीनों की सौदेबाजी को अपना मुख्य कारोबार बना लिया. बेशकीमती जमीनों के मालिकों को धमका कर कम कीमत में खरीद लेना विकास का शगल था. जल्दी ही वह कुख्यात भूमाफिया बन बैठा. कानपुर देहात, कानपुर नगर, इटावा, औरैया आदि में उस की बादशाहत कायम हो गई.

वर्ष 2000 में रंजिश के चलते विकास दुबे ने शिवली थाना क्षेत्र के ताराचंद्र इंटर कालेज के सहायक प्रबंधक सिद्धेश्वर पांडेय की हत्या करा दी. इस में विकास का नाम आया और वह जेल भी गया. जेल में रहते उस ने अपने गुर्गों से रामबाबू को निपटवा दिया. इस मामले में भी उस का नाम आया और रिपोर्ट दर्ज हुई. विकास को शक था कि रामबाबू मुखबिरी करता है. लेकिन विकास वर्ष 2001 में तब सुर्खियों में आया जब उस ने 11 नवंबर, 2001 को शिवली थाने के अंदर पुलिस कर्मियों की मौजूदगी में भाजपा के दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री संतोष शुक्ला की हत्या कर दी. संतोष शुक्ला से उस की जुलूस निकालने के दौरान कहासुनी हो गई थी. इसी से खफा हो कर विकास ने उन्हें मौत की नींद सुला दिया. इस घटना के बाद वह पूरे प्रदेश में चर्चित हो गया. इस मामले में पुलिस ने अदालत में चार्जशीट दायर की लेकिन गवाहों के अभाव में विकास को सजा नहीं हुई और जेल से छूट गया.

2002 में बसपा सरकार में विकास का खूब सिक्का चला. उस ने बिकरू, शिवली, कंजती सहित 10 गांवों में अपनी दहशत कायम कर ली. इसी दहशत के चलते विकास 15 साल तक जिला पंचायत के सदस्य पद पर कायम रहा. वह खुद तो बिकरू का प्रधान रहा ही, आरक्षित सीट होने पर अपने समर्थक रामकुमार की बीवी को निर्विरोध प्रधान बना दिया. वर्ष 2015 में विकास ने अपनी पत्नी ऋचा दुबे को घुमई से जिला पंचायत सदस्य के लिए खड़ा किया और सपा के समर्थन से जीत दिलाई. यद्यपि इस सीट पर विकास का चचेरा भाई अनुराग दुबे काबिज होना चाहता था. विकास दुबे शातिर दिमाग था. वह जिस पार्टी की सत्ता प्रदेश में होती, उसी पार्टी का दामन थाम लेता. पार्टी के नेता उसे हाथोंहाथ लेते. सत्ता पक्ष का नेता बन कर वह पुलिस पर रौब गांठता और अवैध कारोबार करता. अपनी हनक के चलते उस ने बिकरू गांव को चमका दिया था.

गांव की हर गली पक्की थी और गांव की सड़क मुख्य मार्ग से जुड़ी थी. उस के संबंध बसपा, सपा, कांग्रेस और भाजपा नेताओं से थे, सो वह इन नेताओं की मदद से हर काम करा लेता था. जमीन के अवैध कारोबार के अलावा विकास व्यापारी, कारोबारियों और फैक्ट्री मालिकों से जबरन वसूली भी करता था. इस अवैध कमाई से विकास ने कई शहरों में मकान बनवाए और प्लौट खरीदे. लखनऊ के कृष्णा नगर में विकास के 2 मकान हैं. जिस में एक में वह खुद बीवीबच्चों के साथ रहता था और दूसरे मकान में उस की बीमार मां सरला और भाई दीप प्रकाश बीवी बच्चों के साथ रहता था. विकास दुबे अब तक कुख्यात हिस्ट्रीशीटर बन चुका था. चौबेपुर थाने में उस की हिस्ट्रीशीट फाइल नं 152 ए में दर्ज थी.

उस पर हत्या, हत्या का प्रयास, बलवा, अपहरण, वसूली आदि के 60 मुकदमे दर्ज थे. बिकरू गांव और आसपास के दर्जनों गांवों में उस का खौफ था. वह गांव वालों से कहता था कि उस के गांव में पुलिस नहीं सेना ही प्रवेश कर सकती है. वह अपने घर पर दरबार लगाता था. अंतिम निर्णय उसी का होता था. बिकरू गांव में विकास ने 2 हजार वर्ग फीट में आलीशान मकान बनाया था. सुरक्षा की दृष्टि से मकान के चारों ओर बाउंड्रीवाल थी, जिस पर कंटीले तार लगे थे. मकान के सामने बड़ा फाटक और 3 अन्य गेट थे. सीसीटीवी कैमरा भी लगाया गया था. इस मकान में उस के अपाहिज पिता रामकुमार व 2 सेवादार कल्लू व उस की बीवी राखी रहती थी.

विकास दुबे की पिछले कुछ समय से राहुल तिवारी से खुन्नस चल रही थी. दरअसल राहुल के ससुर शिवली कस्बा निवासी लल्लन बाजपेई की जमीन का विकास ने जबरन दानपात्र में बैनामा करा लिया था. इसे ले कर राहुल ने कोर्ट में मुकदमा दायर किया. इसी खुन्नस में विकास दुबे व उस के गुर्गों ने राहुल तिवारी को बंधक बना कर पीटा और मुकदमा वापस लेने की बात कही. बात न मानने पर जान से मारने का प्रयास किया. राहुल ने इस संबंध में 1 जुलाई को धारा 307 के तहत मुकदमा दर्ज कराया था. डीएसपी देवेंद्र मिश्र ने इसी मुकदमे में विकास दुबे व उस के गुर्गों को गिरफ्तार करने की योजना बनाई थी और 20 पुलिसकर्मियों के साथ दबिश के लिए बिकरू गांव पहुंचे थे. लेकिन किसी पुलिस वाले ने पुलिस पार्टी की दबिश की खबर विकास दुबे को पहले ही दे दी थी.

इस पर विकास ने अपने गुर्गों को आग्नेय अस्त्रों के साथ छतों पर खड़ा कर दिया और जेसीबी मशीन लगा कर रास्ता अवरुद्ध कर दिया. रात 1 बजे पुलिस पार्टी जैसे ही आई, विकास और उस के गुर्गों ने फायरिंग शुरू कर दी और 8 पुलिसकर्मियों को भून डाला और उन के आधुनिक हथियार छीन लिए. कुछ पुलिसकर्मी घायल हुए और कुछ जान बचा कर भागे. जिन्होंने आलाअधिकारियों को सूचना दी. उस के बाद बिकरू गांव छावनी में तब्दील हो गया. पुलिस ने 2 अपराधियों को मार गिराया. एसटीएफ क्राइम ब्रांच व पुलिस की टीमें कुख्यात अपराधी विकास दुबे व उस के गुर्गों को पकड़ने के लिए एड़ीचोटी का जोर लगा रही हैं लेकिन वह पकड़ा नहीं जा सका.

पुलिस जहां उसे जिंदामुर्दा पकड़ना चाहती है, वहीं शातिर विकास दुबे अदालत में सरेंडर की फिराक में है. क्योंकि उसे डर है कि पुलिस के हाथ लगा तो एनकाउंटर हो जाएगा. कथा संकलन तक प्रशासन ने हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे का बिकरू गांव स्थित मकान को जेसीबी द्वारा जमींदोज कर दिया था. पुलिस के साथ जो होना था, हो गया. बात तो तब है जब किसी भी दबाव को नकार कर पुलिस विकास दुबे और उस के साथियों के साथ भी ऐसा ही कर के दिखाए. साथ ही पुलिस के उस खबरी को भी ऐसा सबक सिखाए कि उस की आखिरी सांस भी उधार की हो.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Chhattisgarh Crime : शराब पिला कर दोस्तों को क्यों मारी गोली

Chhattisgarh Crime : लौकडाउन सब से बड़ी मुसीबत बना पीनेपिलाने वालों के लिए. लेकिन पैसे वाले अपने लिए कोई न कोई राह निकाल ही लेते हैं. आकाश गुप्ता ने शराब का जुगाड़ कर के अपने दोस्तों सौरभ और सुनील को पिलाने के लिए बुलाया. दोनों आ भी गए लेकिन…

छत्तीसगढ़ के सरगुजा का शहर अंबिकापुर.रात के लगभग 8 बजे थे, कोरोना महामारी के चलते देशभर में लौकडाउन चल रहा था. जिधर देखो, उधर ही सन्नाटा. छत्तीसगढ़़ सरगुजा संभाग के ब्रह्म रोड, अंबिकापुर स्थित अपने आवास के बाहर खड़े सौरभ अग्रवाल ने मोबाइल से अपने चचेरे भाई सुनील अग्रवाल को काल लगाई. काल रिसीव हुई तो उस ने पूछा, ‘‘क्या कर रहे हो भाई? वैसे कर ही क्या सकते हो, चारों ओर तो सन्नाटा पसरा है.’’

हैलो के साथ सुनील ने दूसरी ओर से कहा, ‘‘घर पर बैठा हूं, टीवी पर कोरोना की खबरों के अलावा कुछ है ही नहीं. देखदेख कर बोर हो रहा हूं. कभी मौतों के आंकड़े आते हैं तो कभी मरीजों के. देख कर लगता है, जैसे अगला नंबर मेरा ही है.’’

हलकी हंसी के साथ सौरभ बोला, ‘‘आओ, आकाश के यहां चलते हैं. कह रहा था, टाइम पास नहीं हो रहा, सारी व्यवस्था कर रखी है उस ने.’’

सौरभ ने इशारे में सुनील को बता दिया. लेकिन वह तल्ख स्वर में बोला, ‘‘तू आकाश के चक्कर में मत रहा कर. उस क ी जुबान की कोई कीमत नहीं है. पिछले डेढ़ साल से चक्कर पर चक्कर कटवा रहा है, एक नंबर का बदमाश है.’’

‘‘भाई, समयसमय की बात है, कभी करोड़ों का आसामी था, उस के पिता की तूती बोलती थी सरगुजा में… समय का मारा है बेचारा. रही बात मकान की तो चिंता क्यों करते हो, पक्की लिखापढ़ी है, मकान तो उस के पुरखे भी खाली करेंगे.’’ सौरभ ने आकाश का पक्ष रखने की कोशिश की.

‘‘ठीक है, मैं आता हूं.’’ सुनील अग्रवाल ने बात बंद कर दी. सुनील उस का चचेरा भाई था, उम्र लगभग 40 वर्ष. दोनों में खूब छनती थी. दोनों मिलजुल कर अंबिकापुर में बिल्डिंग वर्क और प्रौपर्टी डीलिंग का काम करते थे. सौरभ अपनी इनोवा सीजी 15डी एच8949 पर आ कर बैठ गया. थोड़ी देर में सुनील अग्रवाल आ गया .

दोनों कार से शहर का चक्कर लगा कर आकाश गुप्ता के घर पहुंच गए. हमेशा की तरह आकाश ने मुसकरा कर दोनों का स्वागत किया. तीनों के आपस में मित्रवत संबंध थे, एक ही शहर एक ही मोहल्ले में रहने के कारण एकदूसरे के काफी करीब थे. आपस में लेनदेन भी चलता था. वह आकाश का पुश्तैनी घर था, जो अकसर खाली रहता था. जब पीनेपिलाने का प्रोग्राम बनता था तो सब दोस्त अक्सर यहीं एकत्र होते थे. फिर कैरम खेलने और पीनेपिलाने का दौर चलता था, इसी के चलते आकाश ने यह मकान 2. 30 करोड़ में सौरभ को बेच दिया था और पैसे भी ले लिए थे, मगर वह मकान को सुपुर्द करने में आनाकानी कर रहा था.

बहरहाल, इन सब बातों को दरकिनार कर सुनील और सौरभ आकाश गुप्ता के घर पहुंचे और महफिल सज गई. आकाश ने बेशकीमती शराब, मुर्गमुसल्लम वगैरह मंगा रखा था. लौकडाउन के समय में ऐसी बेहतरीन व्यवस्था देख कर सौरभ अग्रवाल चहका, ‘‘अरे भाई क्या इंतजाम किया है, लग ही नहीं रहा लौकडाउन चल रहा है.’’ इस पर आकाश गुप्ता और सुनील अग्रवाल दोनों हंसने लगे. बातचीत और पीनेपिलाने का दौर शुरू हुआ. इसी बीच अपने उग्र स्वभाव के मुताबिक सुनील अग्रवाल ने आकाश की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘यार, ये सब तो ठीक है मगर तू यह बता… सौरभ को मकान कब दे रहा है, 6 महीने हो गए.’’

यह सुन कर आकाश गुप्ता मुसकराते हुए बोला, ‘‘यार, तुम मौजमजा करने आए हो. मजे करो. कोरोना पर बात करो. ये मकान कहां जाएगा.’’

इस पर सौरभ बोला, ‘‘बात बिलकुल ठीक है. आज कोरोना की वजह से हुए लौकडाउन को 17वां दिन है. त्राहित्राहि मची है.’’

सौरभ की बात पर सुनील गंभीर हो गया और चुपचाप शराब का गिलास हाथों में उठा लिया. आकाश ने अपने एक साथी सिद्धार्थ यादव को भी बुला रखा था जो उन की सेवा में तैनात था, साथ ही हमप्याला भी बना हुआ था. हंसतेमुसकराते तीनों शराब पी रहे थे. तभी एकाएक सुनील अग्रवाल ने कहा, ‘‘यार, तूने यह आदमी कहां से ढूंढ निकाला, पहले तो तेरे यहां कभी नहीं देखा.’’

कुछ सकुचाते हुए आकाश गुप्ता ने कहा,

‘‘हां, नयानया रखा है  तुम्हारी सेवाटहल के लिए.’’

‘‘इसे कहीं देखा है…’’ सुनील ने शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए कहा

‘‘हां देखा होगा. मैं यहीं का हूं भैया, पास में ही मेरा घर है.’’

‘‘नाम  क्या  है  तेरा?’’

‘‘सिद्धार्थ… सिद्धार्थ यादव.’’

‘‘हूं, तू जेल गया था न, कब छूटा?’’ सुनील ने उस पर तीखी नजर डालते हुए कहा

‘‘मैं…अभी एक महीना हुआ है.’’ सिद्धार्थ ने हकलाते हुए दोनों की ओर देख कर कहा.

‘‘अरे, तुम भी यार… सिद्धार्थ बहुत काम का लड़का है. अब सुधर गया है.’’ कहते हुए आकाश गुप्ता ने दोनों के खाली गिलास फिर से भर दिए. दोनों पीते रहे. जब नशा तारी हुआ तो अचानक आकाश गुप्ता जेब से पिस्तौल निकालते हुए बोला, ‘‘आज तुम दोनों खल्लास, मेरा… मेरा मकान चाहिए. ब्याज  पर ब्याज …ब्याज पर ब्याज… आज तुम दोनों को मार कर यहीं दफन कर दूंगा.’

आकाश का रौद्र रूप देख सौरभ और सुनील दोनों के होश उड़ गए. वे कुछ कहते समझते, इस से पहले ही आकाश ने गोली चला दी जो सीधे सुनील अग्रवाल के सिर में लगी. वह चीखता हुआ वहीं ढेर हो गया. सुनील को गोली लगते देख सौरभ कांप  उठा और वहां से भागने लगा. यह देख पास खड़े सिद्धार्थ यादव ने गुप्ती निकाली और सौरभ अग्रवाल के पेट में घुसेड़ दी. उस के पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह वहीं गिर गया. आकाश ने उस पर भी एक गोली दाग दी. सुनील और सौरभ फर्श पर गिर कर थोड़ी देर तड़पते रहे और फिर मौत के आगोश में चले गए.

आकाश गुप्ता ने पिस्तौल जेब में रख ली. फिर उस ने सिद्धार्थ के साथ मिल कर सौरभ और सुनील की लाशों को घर में पहले से ही खोद कर रखे गए गड्ढे में डाल कर ऊपर से मिट्टी डाल दी. इस से पहले सिद्धार्थ यादव ने सौरभ और सुनील की जेब से पर्स, हाथ से अंगूठी, चेन, इनोवा गाड़ी की चाबी अपने कब्जे में ले ली थी. आकाश के निर्देशानुसार वह घर से निकला और इनोवा को चला कर आकाशवाणी मार्ग पर पहुंचा. उस ने इनोवा वहीं खड़ी कर उस में पर्स, मोबाइल रख दिया. लेकिन वह यह नहीं देख सका कि उस का चेहरा कैमरे की जद में आ गया है.

10 अप्रैल, 2020 शुक्रवार को देर रात तक जब सौरभ अग्रवाल और सुनील अग्रवाल घर नहीं पहुंचे तो घर वालों को चिंता हुई. देश के साथसाथ अंबिकापुर में भी लौकडाउन का असर था. सड़कें सूनी थीं. सौरभ के भाई सुमित अग्रवाल ने सौरभ व सुनील के कुछ मित्रों को उन के मोबाइल पर काल कर के दोनों के बारे में पूछताछ की, लेकिन कोई जानकारी नहीं मिली. दोनों के मोबाइल भी स्विच्ड औफ थे. इस से घर वाले चिंतातुर थे. अगले दिन सुबह सुमित अग्रवाल ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से आकाश गुप्ता का मोबाइल नंबर ले कर उसे काल की और सौरभ व सुनील के बारे में पूछा. आकाश गुप्ता ने इस बारे में अनभिज्ञता जाहिर करते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

यह बताने पर कि सौरभ व सुनील भैया दोनों रात भर घर नहीं आए तो आकाश ने नाटकीयता पूर्वक कहा, ‘‘अरे, यह तो चिंता की बात है… रुको, मैं पता लगाता हूं.’’

सभी को यह जानकारी थी कि आकाश गुप्ता से सौरभ के घनिष्ठ संबंध थे. ऐसे में आकाश ने उस के परिजनों का विश्वास जीतने का प्रयास किया. थोड़ी देर बाद वह स्वयं सौरभ अग्रवाल के घर आ पहुंचा और बातचीत में शामिल हो गया. जब सुबह भी सौरभ व सुनील का पता नहीं चल पाया तो तय हुआ कि इस बात की जानकारी पुलिस को दे दी जाए. सुनील और सौरभ के भाई सुमित थाने पहुंचे. उन्हें कोतवाल विलियम टोप्पो से मिल कर उन्हें पूरी बात बता दी.

कोतवाल टोप्पो ने पूछा, ‘‘पहले कभी ऐसा हुआ था?’’

‘‘नहीं…सर, ऐसा कभी नहीं हुआ, दोनों रात 11 बजे तक घर आ जाया करते थे. दोनों के मोबाइल भी औफ हैं. हम ने सारे परिचितों से भी पूछताछ कर ली है.’’ सुमित अग्रवाल यह सब बताते हुए रुआंसा हो गया.

‘‘देखो, चिंता मत करो, तुम्हारी तहरीर पर रिपोर्ट दर्ज कर हम खोजबीन शुरू करते हैं.’’ कोतवाल  विलियम टोप्पो ने आश्वासन दिया. कोतवाल दोनों के घर पहुंचे और जरूरी बातें पूछने के बाद उच्चाधिकारियों एसपी आशुतोष सिंह, एडीशनल एसपी ओम चंदेल और एसपी (सिटी) एस.एस. पैकरा को इस घटना की जानकारी दे दी. मामला अंबिकापुर के धनाढ्य परिवार से जुड़ा था. सौरभ और सुनील के गायब होने की खबर बहुत तेजी से फैली. पुलिस पर सम्मानित लोगों का प्रेशर बढ़ने लगा. दोपहर होते होते एसपी आशुतोष सिंह और सभी अधिकारी व डीएसपी फोरैंसिक टीम के साथ सौरभ अग्रवाल व सुनील के घर पहुंच गए. इस के साथ ही जांच तेजी से शुरू हो गई.

इसी बीच खबर मिली कि सौरभ व सुनील जिस इनोवा कार में घर से निकले थे, वह अंबिकापुर के आकाशवाणी चौक के पास खड़ी है. यह सूचना मिलते ही कोतवाल विलियम टोप्पो आकाशवाणी चौक पहुंचे और गाड़ी की सूक्ष्मता से जांच की. गाड़ी में सुनील और सौरभ के पर्स व मोबाइल मिल गए. इस से मामला और भी संदिग्ध हो गया. पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच की तो एक शख्स गाड़ी पार्क करते और उस में से निकलते दिखाई दे गया. पुलिस ने तफ्तीश की तो पता चला वह शातिर अपराधी  सिद्धार्थ यादव उर्फ श्रवण है, जो फरवरी 2020 में ही एक अपराध में जेल से बाहर आया है. पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया और पूछताछ शुरू कर दी.

पहले तो सिद्धार्थ एकदम भोला बन कर कहने लगा, ‘‘मैं तो घर पर था, कहीं गया ही नहीं.’’

मगर जब उसे सीसीटीवी में कैद उस की फुटेज दिखाई गई तो उस का चेहरा स्याह पड़ गया. उस के कसबल ढीले पड़ गए. आखिर उस ने पुलिस को चौंकाने वाली बात बताई. उस ने कहा कि सौरभ व सुनील अग्रवाल की गोली मार कर हत्या कर दी गई है. सिद्धार्थ यादव के बयान के आधार पर पुलिस ने आकाश गुप्ता के यहां दबिश दी. वह शराब में डूबा घर पर बैठा था. पुलिस ने उसे गिरफ्त मे ले कर पूछताछ शुरू की. साथ ही सिद्धार्थ यादव की निशानदेही पर आकाश गुप्ता के घर में खोदे गए गड्ढे से सौरभ व सुनील की लाशें भी बरामद कर ली.

हत्या में इस्तेमाल की गई पिस्तौल भी जब्त कर ली गई. तब तक यह खबर अंबिकापुर के कोनेकोने तक पहुंच गई थी. लौकडाउन के बावजूद आकाश गुप्ता के घर के बाहर लोगों का हुजूम जुट गया. पुलिस हिरासत में आ कर आकाश गुप्ता का नशा हिरन हो गया था. थरथर कांपते हुए उस ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और पुलिस को सब कुछ बता दिया. आकाश के पिता काशी प्रसाद गुप्ता कभी शहर के बहुत बड़े आसामी थे, पांच बहनों में अकेले भाई आकाश को पिता की अर्जित धनसंपत्ति शौक में उड़ाने  के अलावा कोई काम नहीं था.

धीरेधीरे वह करोड़ों की जमीनजायदाद बेचता रहा. उस ने अपना पुश्तैनी मकान भी सौरभ को 2 करोड़ 30 लाख रुपए में बेच दिया था. वह उस से रुपए भी ले चुका था, लेकिन उस की नीयत खराब हो गई थी. वह चाहता था किसी तरह मकान उस के कब्जे में रह जाए. दूसरी तरफ 2016 में आकाश गुप्ता ने सौरभ के पिता बलराज अग्रवाल से 20  लाख रुपए का कर्ज  लिया था और इन 4 वर्षों में 50 लाख रुपए अदा करने के बावजूद उस से ब्याज के 50 लाख रुपए मांगे जा रहे थे. परेशान आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को विश्वास में लिया. उसे सिद्धार्थ की आपराधिक पृष्ठभूमि पता थी. आकाश ने धीरेधीरे सिद्धार्थ से घनिष्ठ संबंध बनाए और उसे बताया कि वह किस तरह करोड़पति से बरबादी की ओर जा रहा है.

इस पर सिद्धार्थ यादव ने आकाश गुप्ता के साथ हमदर्दी जताते हुए कहा, ‘‘ऐसा है तो क्यों ना सौरभ को रास्ते से हटा दिया जाए. आकाश को सिद्धार्थ की कही बात जम गई. दोनों ने साथ मिल कर पहले सौरभ के अपहरण की योजना बनाई. लेकिन उस में बड़े पेंच देख कर तय किया कि हत्या ज्यादा आसान है. दोनों ने इसी योजना पर काम किया. सौरभ की हत्या की योजना बनने लगी तो सिद्धार्थ ने आकाश को पास के उपनगर  गंगापुर के रमेश अग्रवाल से मिलवाया. रमेश ने बरगीडीह निवासी शिव पटेल से 90 हजार रुपए में एक पिस्तौल व गोलियां दिला दीं.

हत्या की योजना बना कर पहले ही यह तय कर लिया गया था कि सौरभ व सुनील को मार कर उन की लाशें घर में ही दफन कर दी जाएंगी. सिद्धार्थ और आकाश ने 4 अप्रैल से धीरेधीरे गड्ढा खोदने का काम शुरू कर दिया था. आकाश गुप्ता ने सिद्धार्थ को मोटी रकम देने का लालच दे कर अपने साथ मिला लिया. सिद्धार्थ भी आकाश गुप्ता की रईसी से प्रभावित था और धारणा बना चुका था कि इस काम में उस की मदद कर के उस का जिंदगी भर का राजदार बन जाएगा और आगे की जिंदगी मौजमजे से गुजारेगा.

11 अप्रैल 2020 की देर शाम तक आकाश गुप्ता और सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने सौरभ अग्रवाल, सुनील अग्रवाल की हत्या के आरोप में आकाश और सिद्धार्थ के विरुद्ध भारतीय दंड विधान की धारा 302, 201, 120बी 34,25, 27 आर्म्स एक्ट  के तहत मामला दर्ज कर के आरोपियों को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें अंबिकापुर कारागार भेज दिया गया.

Uttar Pradesh News : सूटकेस में सिमट गया चचेरे भाईबहन का प्यार

Uttar Pradesh News : 25 वर्षीय शिल्पा और 22 वर्षीय अमित तिवारी चचेरे भाईबहन थे, लेकिन दोनों ही एकदूसरे को प्यार करते थे. घर वालों की बंदिशों को तोड़ कर एक दिन शिल्पा सूरत से प्रेमी अमित के पास दिल्ली आ गई. दोनों हंसीखुशी से लिवइन रिलेशन में रहने लगे. इसी दौरान एक दिन शिल्पा की लाश सूटकेस में मिली. आखिर किस ने की उस की हत्या?

अमित तिवारी के कदम लडख़ड़ा रहे थे. वह अभीअभी शराब के ठेके से पूरा पव्वा खरीद कर गले से नीचे उतार चुका था. न पानी, न सोडा. और तो और अमित ने शराब की कड़वाहट कम करने के लिए चखना भी नहीं खरीदा था, जबकि ठेके के साथ ही ‘चखना फैक्ट्री’ नाम से एक दुकान थी, जहां नमकीन आइटम के ढेरों पैकेट सजा कर रखे हुए थे. पूरी शराब नीट पीने के बाद अमित पर गहरा नशा सवार हो गया था. वह सड़क पर लडख़ड़ा कर चल रहा था. वह गिरने वाला ही था, लेकिन बिजली के एक खंबे का सहारा ले कर थोड़ी देर के लिए नहीं खड़ा रहा. इस वजह से गिरने से बच गया.

कुछ ही देर बाद वह सड़क पर पैदल ही चलने लगा तो उस की चाल में लडख़ड़ाहट आना स्वाभाविक थी. वह चल रहा था, लडख़ड़ाते हुए, झूमते हुए. अब तो उस के होंठों पर एक फिल्मी तराना भी आ गया था— ‘पी ले..पी ले… ओ मोरे राजा, पी ले पी ले ओ मोरे जानी…’

मस्ती में गाते हुए अमित अपने घर के दरवाजे पर जब पहुंचा, उस वक्त रात के पौने 12 बज चुके थे. घर का दरवाजा बंद था. अमित ने इसे धकेला तो वह खुल गया. अंदर जीरो वाट का बल्ब जल रहा था. अमित लडख़ड़ाते हुए अपने बिस्तर की तरफ बढ़ा तो उस की नजर बैड पर सो रही शिल्पा पर चली गई. वैसे शिल्पा उस की चचेरी बहन थी, लेकिन फिलहाल वह उस की प्रेमिका थी, जो नींद की आगोश में सोई हुई थी. नींद की वजह से उसे अपने कपड़ों का होश नहीं था. उस की सलवार घुटनों से ऊपर सरक गई थी, जिस की वजह से उस की मखमली टांगें नग्न हो गई थीं. पेट से ऊपर तक उस का कुरता भी हट गया था.

सुतवां पेट और उस की खूबसूरत नाभि नशे में भी उस के होश उड़ा रही थी. शराब के बाद लाजवाब शवाब की कामना हर शराबी पुरुष के मन में पैदा होती है, जो जल्दी से हासिल नहीं होता. लेकिन यहां तो शवाब अद्र्धनग्न हालत में शराबी के सामने था. अमित की रगों में खून उबाल मारने लगा, उस की सांसें अनियंत्रित होने लगीं. वह लडख़ड़ाती चाल से आगे बढ़ा और प्रेमिका के पास लेट गया. उस ने अपना हाथ बढ़ा कर उस की गुदाज देह को अपनी तरफ खींचा तो प्रेमिका शिल्पा कुनमुनाई, उस की नींद से बोझिल आंखें हलकी सी खुलीं, फिर बंद हो गईं. उस ने नींद की खुमारी में अपनी बांहें अमित की गरदन में डाल दीं और उस के सीने से चिपक गई.

उस की गर्म सांसें अमित की चौड़ी छाती से टकराईं तो अमित की वासना और ज्यादा भड़क गई. उस ने शिल्पा को अपनी आगोश में समेट लिया और उस की देह पर छाता चला गया. रात को अमित ने प्रेमिका के साथ जी भर कर मौजमस्ती की, फिर उसे गहरी नींद आ गई, जब उस की आंखें खुलीं उस वक्त दिन के साढ़े 10 बज चुके थे. भरपूर अंगड़ाई ले कर वह उठने के लिए पांव नीचे रखने ही वाला था कि एक मधुर आवाज उस के कानों में पड़ी, ‘चाय… गरमागरम चाय’. अमित ने तिरछी नजर से देखा. शिल्पा उस की ओर चाय का कप बढ़ा रही थी. हाथ बढ़ा कर उस ने चाय का कप ले लिया. शिल्पा मुसकराती हुई उस के सामने बैठ गई. अमित ने उसे देखा.

वह नहा चुकी थी. उस के लंबे घने केशों से अभी भी पानी की बूंदे टपक रही थीं. उस के तन पर इस वक्त साफ धुला हुआ पिंक रंग का सूट था. उस ने हलका सा मेकअप किया था. अमित ने चाय का घूंट भरा. चाय बहुत बढिय़ा बनाई गई थी. एक ही घूंट ने अमित में ताजगी भर दी. शिल्पा उस के सामने बैठी मुसकरा रही थी. अमित उस के सामने बैठा जरूर था, लेकिन वह कहीं विचारों में खो गया था.

”हैलो!’’ शिल्पा ने उस की आंखों के सामने चुटकी बजाई, ”यहां मैं भी हूं जनाब.’’

अमित ने चौंकते हुए बोला, ”ओह! सौरी मैं कहीं खो गया था.’’

”सौरीवौरी छोड़ो और मेरी एक बात यह मान लो कि अब तुम बाहर से शराब पी कर मत आया करो. घर पर बैठ कर थोड़ीबहुत पी लिया करो. मैं पिछले 3 महीने से देख रही हूं कि तुम शराब ज्यादा पीने लगे हो.’’ शिल्पा ने अमित को समझाया.

”ठीक है मेरी जान, मैं ऐसा ही करूंगा.’’ अमित बोला.

कह कर अमित ने शिल्पा का चेहरा चूम लिया. शिल्पा ने उस के गले में प्यार से बांहें डाल दीं, ”तुम मेरी बाहों में हमेशा यूं ही खिलेखिले और मुसकराते रहोगे, मैं वादा करती हूं कि तुम्हारे हर सुखदुख में पूरा साथ दूंगी. अब उठो और फ्रेश हो जाओ, मैं तुम्हारे लिए नाश्ता बनाती हूं.’’

”हां, अब पेट की भूख सताने लगी है.’’ अमित शिल्पा की बाहों से निकलते हुए उठ खड़ा हुआ और टावेल उठा कर वह बाथरूम की तरफ बढ़ गया.

सूटकेस में निकली लाश

26 जनवरी, 2025. जब देश 76वां गणतंत्र दिवस मनाने के लिए पूरे हर्षोल्लास से तैयार था. भोर के 4-सवा 4 बजे के बीच पुलिस कंट्रोल रूम को एक चौंका देने वाली सूचना मिली, ‘गाजीपुर आईएफसी पेपर मार्केट के पास शिवाजी रोड और अंबेडकर चौक के बीच में खाली पड़ी जगह पर जमा कूड़े के ढेर पर एक सूटकेस जली अवस्था में पड़ा है, जिस में किसी की लाश दिखाई दे रही है.’

कंट्रोल रूम से यह जानकारी पूर्वी दिल्ली के गाजीपुर थाने में दी गई तो वहां के एसएचओ निर्मल झा पुलिस टीम के साथ थाने से सूचना में बताए गए पते पर रवाना हो गए. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे, वहां पर अच्छीखासी भीड़ लग चुकी थी. अभी दिन का उजाला नहीं फैला था, लेकिन सब से पहले जिस ने भी उस सूटकेस में जली लाश को देखा था, उस से यह बात आसपास की बस्ती तक पहुंच गई थी और लोग बिस्तरों से निकल कर वहां आ गए थे. सभी यह जानने को उत्सुक थे कि यह सूटकेस यहां कूड़े के ढेर पर कौन ले कर आया और इसे आग के हवाले क्या उसी व्यक्ति ने किया और इस में जो लाश है, वह किस की है.

पुलिस ने भीड़ को पीछे हटाया. एसएचओ श्री झा उस सूटकेस के पास आए, जो पूरी तरह जल चुका था. उस के स्टील के हैंडल आदि साफ दिखाई दे रहे थे. वह आग में जले नहीं थे. जले सूटकेस में एक लाश दिखाई दे रही थी, जो झुलस कर काली पड़ गई थी. लाश को पहचानना नामुमकिन था, लेकिन उस लाश से यह अनुमान लगाया जा सकता था कि लाश किसी युवती की है. उसे सूटकेस में जबरन ठूंसा गया था, वह जिस अवस्था में ठूंसी गई थी, उसी अवस्था में अभी भी थी. झुलस जाने के कारण वह पहचानी नहीं जा सकती थी.

एसएचओ निर्मल झा ने वहां बारीकी से जांच की, लेकिन वहां कोई ऐसा सूत्र उन्हें नहीं मिला, जिस से मृतका और कातिल के बारे में कुछ पता चल सके, लेकिन पुलिस को यह सिखाया जाता है कि राख के ढेर में भी सूई की तलाश की जा सकती है. निर्मल झा की नजरें वहां कुछ दूरी पर लगे सीसीटीवी कैमरे पर चली गई थीं. उन्हें विश्वास था उस सीसीटीवी कैमरे से इस सूटकेस को यहां फेंकने वाले का कुछ सुराग अवश्य मिलेगा. उन्होंने पूरी जांच के बाद ईस्ट डिस्ट्रिक्ट के डीसीपी अभिषेक धानिया को इस घटना की जानकारी दे दी. एसएचओ ने तब फोरैंसिक टीम को भी घटनास्थल पर आने के लिए फोन कर दिया.

थोड़ी ही देर में डीसीपी अभिषेक धानिया वहां घटनास्थल पर पहुंच गए. एसएचओ निर्मल झा ने उन्हें सैल्यूट करने के बाद वह सूटकेस दिखाया, जो वहां फेंका गया था और उसे नष्ट करने के लिए आग के हवाले भी कर दिया गया था. डीसीपी धानिया ने सूटकेस सहित जली हुई लाश को ध्यान से देख कर कहा, ”यह युवती ज्यादा उम्र की नहीं लगती मिस्टर झा, इस की हत्या कर के जिस ने भी इसे सूटकेस में भर कर यहां फेंका है, वह इस का पति या प्रेमी हो सकता है. हमें दोनों को ध्यान में रख कर जांच करनी होगी. किसी महिला से पीछा छुड़ाने के लिए प्रेमी या पति ही ऐसा काम करते हैं.’’

”आप ठीक कह रहे हैं सर.’’ निर्मल झा बोले, ”इस की हत्या कर के लाश को ठिकाने लगाने के लिए इस के प्रेमी या पति ने इसे सूटकेस में ठूंसा और इस निर्जन नजर आने वाले स्थान पर ला कर सूटकेस सहित जला डाला. वह लाश की शिनाख्त मिटाने के मकसद से ऐसा कर गया. मेरे विचार से वह यहीं आसपास का ही होगा.’’

”यह आप किस आधार पर कह रहे हैं?’’ डीसीपी ने एसएचओ की ओर प्रश्नसूचक नजरों से देखते हुए पूछा.

”सर, आज 26 जनवरी है यानी हमारा गणतंत्र दिवस. इस के लिए 2 दिन पहले से ही हर बोर्डर, हर नाके पर पुलिस के बैरिकेड लग जाते हैं. कड़ी जांच होती है, हर वाहन को चैक किया जाता है. ऐसे में कोई इस सूटकेस को किसी वाहन में दूर से ले कर यहां नहीं आ सकता. मैं ने इसी से अनुमान लगाया है कि वह शख्स यहीं आसपास का ही होगा.’’

”गुड.’’ डीसीपी अभिषेक धानिया ने निर्मल झा की प्रसंशा की, ”आप का सोचना ठीक ही है. कड़ी चैकिंग के बीच कोई हत्यारा लाश ले कर दूर से यहां नहीं आएगा, वह आसपास का ही होगा. आप फोरैंसिक जांच करवा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए नजदीक के हौस्पिटल भेज दीजिए. मैं आप को इस ब्लाइंड केस को सौल्व करने के लिए नियुक्त कर रहा हूं, आप का साथ देने के लिए स्पैशल स्टाफ को भी मैं आप के साथ लगा रहा हूं. आप को हत्यारे का पता लगा कर उसे जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाना है.’’

”मैं आप के विश्वास पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा सर.’’ श्री निर्मल झा गंभीर स्वर में बोले.

डीसीपी धानिया कुछ जरूरी हिदायतें दे कर वहां से चले गए. फोरैंसिक टीम अपना काम निपटाने में लगी हुई थी. इस बीच निर्मल झा ने वहां उपस्थित भीड़ के पास जा कर इस सूटकेस के विषय में पूछा, ”क्या इस सूटकेस को यहां फेंकते हुए किसी ने देखा है?’’

सीसीटीवी फुटेज से मिली जांच को दिशा

भीड़ ने इस के लिए इंकार में सिर हिला दिया. तभी भीड़ में से एक अधेड उम्र का व्यक्ति आगे आया, ”सर, यह सूटकेस यहां रात को डेढ़ से 2 बजे के करीब ला कर जलाया गया है.’’

”तुम यह किस आधार पर कह रहे हो?’’ श्री झा ने हैरानी से पूछा.

”सर, मैं रात को लघुशंका के लिए उठा था, मेरा टौयलेट छत पर है, मैं वहां गया और मैं ने लघुशंका की. जब मैं वहां से लौटने लगा तो मुझे कूड़े के ढेर पर कुछ जलता हुआ दिखाई दिया. मेरा ध्यान एकाएक इधर इसलिए गया कि आग की लपटें बहुत ऊपर तक उठ रही थीं यानी कुछ ही देर पहले वह आग भड़की थी. मैं ने ज्यादा ध्यान यूं नहीं दिया कि अकसर यहां कूड़े में आग लगती रहती है. कुछ ऐसा ही समझ कर मैं नीचे कमरे में चला गया और सो गया. सुबह कालोनी में यह शोर हुआ कि कूड़े पर किसी सूटकेस को जलाया गया है, उस सूटकेस में लाश थी, जो बुरी तरह जल गई है. मैं यही देखने यहां आ गया.’’

”इस पर तुम ने कमरे में जा कर घड़ी देखी थी या लघुशंका को उठते समय घड़ी में समय देखा था?’’

”सर, लघुशंका कर के लौटने पर मैं ने मोबाइल में टाइम देखा था. उस वक्त 2 बजने में 10 मिनट शेष थे.’’ अधेड़ ने बताया.

”इस का मतलब यहां सूटकेस रात को डेढ़ बजे के बाद ही फेंका गया और जलाया गया है.’’

”हां साहब.’’ उस व्यक्ति ने सिर हिला कर कहा.

”तुम्हारी बात की पुष्टि हम जांच करेंगे तो हो जाएगी.’’ श्री झा ने कहा. अब तक फोरैंसिक टीम अपना काम निपटा चुकी थी. एसएचओ ने सूटकेस सहित लाश लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दी. फिर वह वहां एक सिपाही का पहरा लगवा कर वापस थाना गाजीपुर के लिए लौट आए. थाने में यह ब्लाइंड मर्डर केस बीएनएस की धारा 103(1), 238 (ए) के तहत दर्ज कर लिया गया. डीसीपी (पूर्वी जिला) अभिषेक धानिया के निर्देश पर पुलिस की स्पैशल स्टाफ और गाजीपुर थाने के एसएचओ निर्मल झा अपनी टीम के साथ सूटकेस में मिली लाश के केस पर काम करने के लिए पूरी मुस्तैदी से जुट गए थे.

सब से पहले उन्होंने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की. कैमरे में सड़क से रात के एक बजे से 2 बजे के बीच जितने वाहन गुजरे थे, उन्हें देख कर नोट किया गया. इन में बड़े वाहन नहीं थे. कुछ स्कूटर और कारें वहां से रात को एक से 2 बजे के बीच सड़क पर आतेजाते दिखाई दिए. पुलिस टीम ने सिर्फ कारों को फोकस किया. इन में जो कारें संदिग्ध नजर आईं, उन के नंबर को आटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन तकनीक द्वारा जांच कर के नोट कर लिया गया.

टीम ने इन कारों के रजिस्ट्रैशन नंबर से इन के मालिकों का पता मालूम किया और इन की जांचपड़ताल शुरू कर दी. लगभग सभी कारों के मालिकों को जांच में सही पाया गया, लेकिन एक कार के मालिक तक टीम लोनी (उत्तर प्रदेश) में उस के घर पहुंची तो उस ने बताया, ”साहब, मैं ने अपनी हुंडई वेरना कार कुछ दिन पहले अमित तिवारी नाम के व्यक्ति को बेच दी थी. मेरी कार का नंबर- यूपी16ईटी 0329 है, जिसे अब अमित कैब के रूप में इस्तेमाल कर रहा है.’’

”यह अमित कहां रहता है?’’ एसएचओ निर्मल झा ने पूछा.

”अमित तिवारी पुत्र गुलाब शंकर तिवारी, एसबीआई बिल्डिंग, थर्ड फ्लोर मंगल बाजार रोड, खोड़ा कालोनी, गाजीपुर. साहब, कार के सौदे में यहीं एड्रैस लिखवाया गया था मुझे.’’ उस व्यक्ति ने बताया.

यह एड्रैस पुलिस टीम को चौंका गया. कारण जिस सूटकेस को युवती की लाश सहित जिस जगह जलाया गया था, वह जगह खोड़ा रोड पर गाजीपुर पेपर मार्केट ही थी. पुलिस टीम तुरंत बिना देर किए अमित तिवारी की तलाश में उपरोक्त पते पर पहुंच गई. अमित तिवारी उस वक्त अपना बैग तैयार कर रहा था. वह कहीं जाने की फिराक में लग रहा था. दरवाजे पर पुलिस के दरजनों लोगों को देख कर उस के चेहरे का रंग उड़ गया. वह बुरी तरह घबरा गया.

”आप?’’ वह कांपते स्वर में बोला

”हां, हम.’’ एसएचओ मुसकराए, ”कहां भागने की तैयारी हो रही है अमित तिवारी?’’

”आ…प मेरा नाम कैसे जानते हैं?’’ अमित तिवारी घबराते हुए बोला.

”हम तुम्हारे बारे में बहुत कुछ जानते हैं तिवारी.’’ श्री निर्मल झा ने अंधेरे में तीर चलाया, ”रात को तुम ने जिस सूटकेस में अपनी प्रेमिका की लाश गाजीपुर की पेपर मार्किट के पास जलाई थी, यह भी हमें मालूम है. अब तुम चुपचाप थाने चलो. बाकी पूछताछ वहीं कर लेंगे.’’

”मैं ने किसी सूटकेस को नहीं जलाया, मैं तो कल रात अपने कमरे में ही सो रहा था.’’

”फिर तुम्हारी हुंडई वरना कार रात डेढ़ बजे पेपर मार्केट, गाजीपुर कौन चला कर ले गया था?’’

”म…मैं नहीं जानता सर.’’ अमित हकलाया.

श्री निर्मल झा ने इशारा किया तो 2 पुलिस वालों ने अमित तिवारी को दबोच लिया. वह चीखता रहा, लेकिन इस की परवाह न कर के पुलिस टीम उसे थाने ले गई. थाने में उस से सख्ती से पूछताछ हुई तो उस ने अपना जुर्म कुबूल करते हुए कहा, ”सर, मैं ने शिल्पा की हत्या की थी, वह मुझ पर शादी के लिए दवाब बना रही थी. शनिवार को रात साढ़े 8 बजे मेरा उस से शादी की बात पर झगड़ा हुआ तो गुस्से में मैं ने उस का गला दबा कर जान से मार डाला.’’

शिल्पा को चचेरे भाई से हुआ प्यार

कहतेकहते अमित रोने लगा. रोते हुए ही बोला, ”सर, मैं ने शिल्पा को कभी दिल से नहीं चाहा, वही मेरे प्यार में पागल हो कर एक महीने पहले घर से भाग कर मेरे पास खोड़ा कालोनी (गाजियाबाद) में आ गई थी. वह मेरे साथ रहने लगी तो जवान होने के कारण हम बहक गए. हमारे बीच अनैतिक संबंध बन गए. बस यहीं मुझ से चूक हो गई. वह मुझ पर शादी के लिए दबाव बनाने लगी. मुझे धमकी देने लगी कि मैं शादी नहीं करूंगा तो रेप केस में फंसा देगी.. मुझे जेल में सड़ा देगी. आखिर तंग आ कर मैं ने उस की हत्या करने का निर्णय लिया और उसे मार डाला.’’

”उस का परिवार कहां रहता है, वह कहां से भाग कर तुम्हारे पास आई थी?’’ श्री झा ने पूछा.

”सर, मैं उस का चचेरा भाई हूं. हमारा परिवार प्लौट नंबर ए-19 खसरा नंबर 2020, शिवा ग्लोबल सिटी-4, मेन रोड, थाना बादलपुर, दादरी गौतमबुद्ध नगर में रहता है. शिल्पा के पिता गुजरात में नौकरी करते हैं तो उस का परिवार इस वक्त गुजरात के सूरत में ही है. शिल्पा वहीं से नवंबर, 2024 में भाग कर मेरे पास आई थी.’’

”तुम को शिल्पा की लाश सूटकेस में रखने का आइडिया किस ने दिया?’’

”मेरे दोस्त अनुज का आइडिया था. शिल्पा की हत्या करने के बाद मैं ने यह बात अनुज शर्मा को बता कर उस से लाश को ठिकाने लगाने के लिए सहयोग मांगा था. अनुज मेरे पास तुरंत आ गया. उस ने ही आइडिया दिया कि सूटकेस में लाश रख कर कैब से ले जाते हैं और उत्तरी पश्चिम उत्तर प्रदेश के इलाके में किसी नदी में इसे फेंक आते हैं.

”मेरे पास बड़ा सूटकेस था. मैं ने अनुज के सहयोग से लाश सूटकेस में रखी. हम पहले रास्ते की रैकी करने कैब से दोनों ही यूपी बौर्डर गए. वहां 26 जनवरी के चलते बहुत सख्त चैकिंग चल रही थी. हमारी वैन की भी 2 बार चैकिंग हुई तो हम घबरा गए. हमें लगा, यदि तलाशी में पुलिस को लाश वाला सूटकेस मिलेगा तो हम फंस जाएंगे. हम ने दूर जाने का प्लान छोड़ दिया.

”हम रात को एक बजे सूटकेस कैब की डिक्की में रख कर गाजीपुर की पेपर मार्किट की तरफ आए. हम ने एक पेट्रोल पंप से 160 रुपए का डीजल बोतल में भरवा दिया. हम गाजीपुर के शिवाजी रोड, खोड़ा रोड़ के नजदीक, आईएफसी पेपर मार्केट की तरफ आए. वहां कूड़े का ढेर लगा था. चारों ओर सन्नाटा था. हम ने कार की डिक्की से सूटकेस कूड़े के ढेर पर रखा, ऊपर घासफूस डाल कर उस पर डीजल डाला और आग लगा दी.

”आग की लपटें उठीं तो हम कैब ले कर वहां से भाग निकले. अनुज रात को ही अपने घर चला गया और मैं सो गया. आज मैं प्रयागराज भाग जाना चाहता था कि आप के द्वारा पकड़ा गया.’’

”अनुज का एड्रैस दो हमें.’’ श्री झा ने पूछा.

अमित तिवारी ने अनुज शर्मा का पता नोट करवा दिया. अनुज, डी-162, करण विहार, खोड़ा कालोनी में रहता था.

पुलिस ने उस के घर दबिश दी तो वह घर में ही मिल गया. उसे हिरासत में थाना गाजीपुर लाया गया. अनुज शर्मा की उम्र 22 साल थी, उस के पिता जगदीश शर्मा गांव में रहते थे. अनुज यहां वेल्डर का काम करता था. कभीकभी कैब भी चला लेता था. शिल्पा अमित से 3 साल बड़ी थी. अमित 22 साल का था और शिल्पा 25 साल की थी. पुलिस ने उस के परिवार को उस की हत्या की जानकारी फोन द्वारा दे दी. उन्हें गाजीपुर थाने आने को कह दिया गया.

शिल्पा की लाश का पोस्टमार्टम होने के बाद लाश को उस के घर वालों को सौंपना आवश्यक था. अमित तिवारी और अनुज शर्मा उर्फ भोला को डीसीपी अभिषेक धानिया के समक्ष पेश किया गया तो उन्होंने 24 घंटे में इस ब्लाइंड केस को हल करने के लिए इस केस को हैंडिल करने वाले स्पैशल पुलिस स्टाफ और गाजीपुर थाने के एसएचओ निर्मल झा को शाबासी दी. प्रैस कौन्फ्रैंस करने के बाद डीसीपी अभिषेक धानिया ने दोनों आरोपियों को जेल भिजवा दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस आगे की काररवाई निपटाने में व्यस्त हो गई थी.

 

 

Family Story : तीन बेटियों का गला दबाया और फिर मां ने खुद भी अपनी जान ले ली

Family Story : बेटे के चक्कर में सास विमला, पति कुलदीप और उन के घर वाले भूल गए थे कि 4 प्राणियों की जिंदगी को नरक बनाने से बेटा नहीं मिल जाएगा. साधना का गुनाह यह था कि उस ने 3 बेटियां जनी थीं. आखिर साधना कब तक सहती. उस ने…

उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया. इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’

बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी. उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई.

पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी. उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. वह कमरे के पास पहुंचे तो दोनों के मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को. पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में एक लोहे का कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था. थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.

उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा. मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

इधर फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है. जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को उठने नहीं देंगे. बेटे की बात का सिपाही लाल ने भी समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका साधना के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी अपने जिगर के टुकड़ो को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी. थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की.

कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से. साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने भी कसने लगी थी.

घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता. गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे.

सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी. बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ थाना सहायल में घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने कसने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी. अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा.

उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी. 1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

दूसरे सिरे को फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे और आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई. घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप 11 बजे घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी.

सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Rajasthan News : राजनीति की आड़ में चल रहा था सैक्स रैकेट

Rajasthan News : सुनीता वर्मा और पूजा उर्फ पूनम चौधरी भाजपा और कांग्रेस पार्टी की नेता थीं. क्षेत्र में उन का मानसम्मान था, साथ ही अच्छीखासी पहचान भी. लेकिन राजनीति की आड़ में दोनों महिला नेता ऐसा घिनौना काम कर रही थीं, जिस के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. जब सच्चाई सामने आई तो…

राजस्थान में बलात्कार के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं. मासूम बच्चियों से ले कर विवाहित महिलाएं तक शिकार बन रही हैं. बढ़ती वारदातों से ऐसा लगता है जैसे अपराधियों को न तो खाकी वर्दी का डर है और न ही सरकार का. घटना के बाद विपक्षी पार्टियों के लोग हायतौबा मचाते हैं और फिर थोड़े दिन बाद मामला शांत हो जाता है. पिछले दिनों राजस्थान के सवाई माधोपुर शहर में एक ऐसा मामला सामने आया जो राजस्थान में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में चर्चित हो गया. ताज्जुब की बात यह कि इस सनसनीखेज अपराध में सत्तापक्ष और विपक्ष की जिलास्तर की महिला नेता शामिल थीं.

जिन महिलाओं की हम बात कर रहे हैं, वे दोनों सवाई माधोपुर में रहती थीं. उन में सुनीता वर्मा भारतीय जनता पार्टी (महिला मोर्चा) की जिलाध्यक्ष थी तो दूसरी पूजा उर्फ पूनम चौधरी कांग्रेस सेवा दल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष थी. चूंकि दोनों ही जिला स्तर की नेता थीं, इसलिए उन की क्षेत्र में अच्छी साख थी. पूजा और सुनीता वर्मा लोगों के सरकारी काम कराने में मदद करती थीं. लोग उन पर भरोसा करते थे और दोनों को गरीबों की मसीहा मानते थे. अलगअलग राष्ट्रीय पार्टियों की जिलाध्यक्ष थीं, इसलिए जिले के सरकारी महकमों में उन की अच्छी जानपहचान थी. एक दिन कांग्रेस सेवादल (महिला प्रकोष्ठ) की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी नेम सिंह के घर पहुंची.

दरअसल, नेम सिंह पूनम से कई बार कह चुका था कि उसे किसी बैंक से लोन दिला देंगी तो वह कोई व्यवसाय शुरू कर देगा. पूनम ने नेम सिंह को भरोसा दिया था कि वह उस का लोन करा देगी. नेम सिंह की एक 16 वर्षीय बेटी थी उर्मिला. वह गरीब परिवार में जन्मी जरूर थी, लेकिन थी गोरीचिट्टी और खूबसूरत. पूनम ने नेम सिंह से कहा, ‘‘तुम्हारी बेटी उर्मिला दिन भर घर में पड़ी क्या करती है. इसे हमारे साथ भेज दो. साथ रहने पर दुनियादारी सीख जाएगी. देखना, इस की जिंदगी ही बदल जाएगी.’’

नेम सिंह पूनम को बड़ी नेता समझता था. उस ने सोचा कि संभव है अपनी ऊंची पहुंच के चलते पूनम उर्मिला की कहीं नौकरी लगवा दें. इसलिए उस ने बिना किसी झिझक के उर्मिला को पूनम के साथ भेज दिया. पूनम उर्मिला को भाजपा की नेता सुनीता वर्मा के पास ले कर पहुंची और कहा कि इस लड़की का नाम उर्मिला है. यह बहुत अच्छी लड़की है. आप इसे अपने पास रखो और इस की जिंदगी बना दो. उर्मिला बन गई सुनीता की हुंडी उर्मिला को देख कर सुनीता की आंखों में चमक आ गई क्योंकि वह खूबसूरत थी. सुनीता वर्मा ने मन ही मन सोचा कि लड़की काम की है. सुनीता उसे प्यार से रखने लगी. शहर में वह जहां भी जाती, उर्मिला साथ होती थी. जिला उद्योग केंद्र, कलेक्ट्रेट और बैंक वगैरह भी सुनीता उर्मिला को साथ ले जाती.

सुनीता वर्मा के घर पर एफसीआई का कर्मचारी हीरालाल मीणा आता रहता था. वह उस का जानकार था. साल 2013 में सुनीता वर्मा ने बतौर निर्दलीय विधानसभा का चुनाव लड़ा था. हीरालाल ने उस वक्त उस का तनमनधन से साथ दिया था. सुनीता वर्मा वह चुनाव तो नहीं जीत पाई, मगर उस की जानपहचान का दायरा बढ़ गया था. चुनाव हारने के बाद भी हीरालाल का सुनीता के घर बदस्तूर आनाजाना जारी रहा. हीरालाल ने जब सुनीता के साथ एक किशोर युवती को देखा तो उस के बारे में पूछा. तब सुनीता ने बताया कि इस का नाम उर्मिला है और अब यह उस के साथ ही रहेगी.

हीरालाल का अधेड़ मन उर्मिला का सामीप्य पाने को लालायित हो उठा. अपने मन की बात उस ने सुनीता को बता दी. साथ ही यह भी कहा कि वह इस के लिए कुछ भी करने को तैयार है. लालची सुनीता तैयार हो गई और उस  ने एक दिन उर्मिला को हीरालाल मीणा के साथ एक कमरे में बंद कर दिया. हीरालाल ने उस मासूम से बलात्कार किया. सुनीता ने उस का वीडियो बना लिया और फोटो भी खींच लिए. इज्जत लुटने के बाद उर्मिला रोने लगी. तब सुनीता ने उसे वीडियो एवं अश्लील फोटो दिखा कर कहा, ‘‘अगर किसी से इस घटना की चर्चा की तो यह वीडियो और फोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर दूंगी. तब तुम किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहोगी. रोनाधोना बंद कर और भूल जा इस घटना को. यही तेरे लिए बेहतर होगा.’’

उर्मिला अपनी ब्लू फिल्म व अश्लील फोटो देख कर अंदर तक कांप गई. वह इतनी नादान नहीं थी कि कुछ समझती न हो. वह समझ गई कि अगर उस ने घर पर किसी को बताया तो यह अश्लील वीडियो और फोटो वायरल कर देगी. तब वह और उस का परिवार किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे. सुनीता वर्मा अब उर्मिला का भरपूर लाभ उठाना चाहती थी. लिहाजा उस ने डराधमका कर उसे और भी कई सरकारी मुलाजिमों के सामने पेश कर उन से अपने काम निकलवाए. उर्मिला उस के हाथ की ऐसी कठपुतली बन गई थी, जो चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती थी.

एक दिन सुनीता ने डराधमका कर उर्मिला को घर भेज दिया. वह डरीसहमी घर चली गई. उस का मन तो कर रहा था कि अपनी मम्मी को सब कुछ बता दे. मगर वीडियो और फोटो वायरल होने की बात ध्यान में आते ही उस ने चुप रहने में ही भलाई समझी. उर्मिला चुप रहने लगी. एक दिन उस की मम्मी ने वजह पूछा तो कह दिया, ‘‘दिन भर इधरउधर घूमने से थक गई हूं. थोड़ी कमजोरी है, ठीक हो जाएगी.’’

‘‘ठीक है बेटी, अगर लोन मिल जाएगा तो हमारे दिन फिर जाएंगे. तुम सुनीता दीदी के साथ रहो. वह काम करवा देंगी, अच्छी इंसान हैं?’’ मम्मी ने कहा तो उर्मिला मन ही मन सोचने लगी कि सुनीता औरत के नाम पर वह कलंक है जो अपनी बेटी की उम्र की लड़की को लोगों के साथ सोने को मजबूर करती है, अश्लील वीडियो, फोटो बनवा कर ब्लैकमेल करती है. धमकाती है. सुनीता वर्मा ने अगले रोज उर्मिला को अपने घर बुला कर एकांत में कहा, ‘‘तूने अपने साथ घटी घटना के बारे में घर पर किसी को बताया तो नहीं है?’’

‘‘नहीं, मैं ने किसी को नहीं बताया.’’ उर्मिला ने कांपते स्वर में कहा.

‘‘वेरी गुड. मुझे तुम से यही उम्मीद थी. कभी भी भूल कर भी किसी को भी नहीं बताना. वर्ना यह वीडियो और फोटो…’’ सुनीता ने धमकाया.

‘‘मैं किसी से नहीं कहूंगी.’’ उर्मिला बोली.

‘‘जब तक तुम मेरा कहना मानोगी तब तक इन्हें वायरल नहीं करूंगी. ठीक है. तुम चिंता न करो?’’ सुनीता ने कहा तो उर्मिला की जान में जान आई. सुनीता वर्मा के पास कई लड़कियां आती थीं. वे सब भी उर्मिला की तरह सुनीता के इशारों पर नाच रही थीं. हीरालाल ने उर्मिला को कई लोगों के साथ भेजा. जिन्होंने उस के साथ बलात्कार किया. 5 हजार का उधार चुकाने को सुनीता ने इलैक्ट्रिशियन से किया सौदा सुनीता वर्मा के घर पर राजूराम रेगर नाम का इलैक्ट्रिशियन आता था. उस ने सुनीता के घर बिजली का कोई काम किया था, जिस का सुनीता को 5 हजार का भुगतान करना था. मगर सुनीता ने उसे रुपए नहीं दिए. कह दिया कि दोचार दिन में दे दूंगी.

राजू अपने पैसे मांगने सुनीता के घर आने लगा. तब सुनीता ने राजू रेगर से कहा कि मेरे साथ जो लड़की रहती है उस के तन का स्वाद चखा देती हूं 5 हजार रुपए वसूल हो जाएंगे. राजू रेगर ने उर्मिला को देखा था. वह सुंदर, खिलती कली थी. सुनीता ने उर्मिला को धमका कर राजू के साथ भेजा. राजू उर्मिला को होटल स्वागत में ले गया और उस के साथ मौजमस्ती की. सुनीता वर्मा की तरह पूनम उर्फ पूजा चौधरी भी नाबालिग उर्मिला को डराधमका कर अपने साथ ले गई और एक व्यक्ति के आगे परोस दिया. उस व्यक्ति ने पीडि़ता से रेप किया.

कई ऐसे सरकारी कर्मचारी थे, जो सुनीता और पूनम का काम करते थे. कुछ ऐसे लोग थे जिन से पैसा ले कर सुनीता व पूनम पीडि़ता को उन के हवाले कर देती थीं. वे लोग उर्मिला को किसी होटल या कमरे पर ले जा कर उस के साथ यौन संबंध बनाते और फिर उसे  सुनीता या पूनम चौधरी के पास छोड़ देते थे. उर्मिला करीब 8-10 लोगों के साथ भेजी गई थी. घर वालों ने लिखाई रिपोर्ट उर्मिला पिछले काफी महीनों से यह सब सह रही थी. मगर हर चीज एक हद होती है. जब वह नाबालिग लड़की थक गई तो घर पर मां के पास रोने लगी. मां ने पूछा तो उस ने सुनीता व पूनम की काली करतूत के बारे में सारी बातें बता दीं. मां ने बेटी की पीड़ा सुनी तो उस का दिल दहल गया.

बेटी के साथ इतना कुछ घटित हो गया और उसे पता तक नहीं चला. इस के बाद मां ने तय कर लिया कि उस की नाबालिग बेटी की जिंदगी को नरक बनाने वालों को सजा दिला कर रहेगी. उर्मिला की मां ने अपने पति वगैरह को सारी बात बताई. इस के बाद घर वाले 22 सितंबर, 2020 को नाबालिग उर्मिला को ले कर महिला थाना सवाई माधोपुर गए और सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, हीरालाल मीणा, पूनम उर्फ पूजा चौधरी और अन्य लोगों के खिलाफ यौनशोषण की रिपोर्ट दर्ज करा दी. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने जांच शुरू की. सवाई माधोपुर के एसपी ओम प्रकाश सोलंकी ने महिला थाने में दर्ज रिपोर्ट का अध्ययन किया और अपने नेतृत्व में एक टीम गठित कर जांच शुरू की. पुलिस ने साक्ष्य एकत्रित किए, पीडि़ता द्वारा बताए गए होटल में जा कर रिकौर्ड चैक किया.

इस के बाद भाजपा महिला मोर्चा अध्यक्ष सुनीता वर्मा उर्फ संपति बाई, सहयोगी हीरालाल मीणा को गिरफ्तार कर लिया. इन दोनों को कोर्ट में पेश कर रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई. पूछताछ में सामने आया कि राजू रेगर निवासी खड्डा कालोनी, सवाई माधोपुर ने सुनीता से बिजली फिटिंग के रुपए मांगने पर नाबालिग लड़की को साथ भेज दिया था,जिसे होटल में ले जा कर उस ने रेप किया था. पुलिस ने राजू रेगर को भी गिरफ्तार कर लिया. सुनीता और हीरालाल ने 2 सरकारी कर्मचारियों के नाम भी बताए. उन में से एक जिला उद्योग केंद्र का क्लर्क संदीप शर्मा और दूसरा कलेक्टर कार्यालय का चपरासी श्योराज मीणा था. पुलिस ने इन दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया.

पूनम उर्फ पूजा चौधरी को अपने खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिली तो वह घर से फरार हो गई थी. पुलिस को पता चला कि पूनम चौधरी बिहार की रहने वाली है. इसलिए अनुमान लगाया गया कि शायद वह बिहार भाग गई है. लोगों ने 30 सितंबर, 2020 तक पूनम चौधरी को सवाई माधोपुर में देखा गया था. तब पुलिस ने उसे क्यों नहीं गिरफ्तार किया? लोगों में इस बात की चर्चा होने लगी कि कहीं पुलिस के ऊपर सत्तासीन लोगों का दबाब तो नहीं था?

निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों से थे रिश्ते जांच में पुलिस को यह भी पता चला कि पूनम चौधरी को अप्रैल, 2020 में उस की निष्क्रियता को देख कर पार्टी हाईकमान ने जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया था. पूनम की सवाई माधोपुर में सीमेंट की फैक्ट्री भी है. पूनम ने उर्मिला को उस फैक्ट्री के पास ले जा कर अपनी पहचान के आदमी के साथ भेज कर दुष्कर्म कराया था. सरकारी कर्मचारियों संदीप शर्मा और श्योराज मीणा ने पुलिस को बताया कि सुनीता वर्मा उन के पास कामकाज के लिए आती रहती थी. इसी से उन की जानपहचान थी. वह जिला उद्योग केंद्र व श्रम विभाग में लोन, सब्सिडी, श्रम डायरी सहित विभिन्न योजनाओं का लाभ दिलाने का काम करती थी.

आरोपी संदीप शर्मा ने इसी का फायदा उठा कर राज नगर स्थित नर्सिंग होम के पास अपने मकान में उर्मिला के साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया था. सुनीता वर्मा कलेक्टर कार्यालय में ज्ञापन वगैरह देने जाती रहती थी. चपरासी श्योराज मीणा सुनीता वर्मा को कलेक्टर से मुलाकात के लिए भेजता था. इसी दौरान दोनों की जानपहचान हो गई थी. श्योराज मीणा लौकडाउन के दौरान सुनीता वर्मा के साथ लोगों को मास्क व सेनेटाइजर भी वितरित करता था. श्योराज मीणा ने लौकडाउन के समय सुनीता वर्मा के औफिस में ही नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया था. पीडि़त उर्मिला ने दूसरे कई लोगों द्वारा भी देह शोषण के आरोप लगाए. लेकिन मुकदमा दर्ज होने के बाद जब यह खबर मीडिया की हाईलाइट बनी तो वे लोग फरार हो गए.

अगर पीडि़त के घर से रुपए गायब नहीं हुए होते तो शायद यह मामला अभी प्रकाश में नहीं आता. दरअसल, हुआ यह कि नेमसिंह के घर से कुछ रुपए गायब हो गए थे. इस बारे में उन्होंने बेटी उर्मिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रुपए उस ने चोरी किए थे. उर्मिला ने पिता से कहा कि ये रुपए सुनीता वर्मा ने मंगाए थे. रुपए क्यों मंगाए थे, यह पूछने पर बालिका ने सारा राज फाश कर दिया कि किस तरह उसे जिंदगी बनाने और अच्छे घर में शादी का प्रलोभन दे कर कई लोगों के साथ सोने पर मजबूर किया गया. ब्लैकमेलिंग के लिए उन्होंने उस की अश्लील वीडियो बना ली थी और उसे आधार बना कर उसे ब्लैकमेल कर रही थीं. सुनीता ने ही उसे घर से पैसे लाने के लिए मजबूर किया था.

पीडि़त बालिका और उस की मां ने बताया कि सुनीता और पूनम के पास करीब 30-35 लड़कियां हैं, जो उन के इशारों पर शहर से बाहर भी जाती हैं. इन लड़कियों को सरकारी कर्मचारी, अधिकारी और सफेदपोश लोगों के पास भेजा जाता है, जहां उन का देह शोषण किया जाता है. पीडि़ता ने दावा किया कि कई बड़े सफेदपोश राजनेता और अधिकारी भी इस सैक्स रैकेट में शामिल हैं. सूत्रों के मुताबिक यह धंधा सुनीता वर्मा और पूनम चौधरी मिल कर करती थीं. चर्चा तो यह भी रही कि लड़कियों के साथ गलत काम करने वाले पुरुषों को भी ये दोनों महिला नेता अश्लील वीडियो व फोटो के माध्यम से ब्लैकमेल करती थीं.

बदनामी के डर से वे लोग रुपए दे कर पीछा छुड़ाते थे, क्योंकि पुलिस के पास जा कर बेइज्जती के अलावा कुछ नहीं मिलना था. दोनों ब्लैकमेलर नेत्रियां मौज की जिंदगी जीती थीं. उन्होंने अच्छीखासी प्रौपर्टी बना ली थी. जब इस घटना की खबरें अखबारों में प्रकाशित हुई तो लोग हैरान रह गए. 2 राजनैतिक पार्टियों की जिलाध्यक्ष वह भी महिलाएं ऐसा काम कर रही थीं, जिस के बारे में किसी ने कभी सोचा तक नहीं था. पूछताछ पूरी होने के बाद पुलिस ने सुनीता वर्मा, हीरालाल मीणा, संदीप शर्मा, श्योराज मीणा और राजूलाल रेगर को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पूजा उर्फ पूनम चौधरी और अन्य आरोपी भी पकड़े जाएंगे.

पीडि़ता के परिवार का कहना है कि उन्होंने सभी दुष्कर्मियों के बारे में पुलिस को बता दिया था, इस के बावजूद पुलिस ने सिर्फ 5 लोगों को गिरफ्तार किया. इस घटना के प्रकाश में आने के बाद कयास लगाया जा रहा है कि अन्य पीडि़त युवतियां रिपोर्ट दर्ज करा कर अपने परिवार की रहीबची इज्जत दांव पर नहीं लगाना चाहतीं, इसलिए चुप हैं. सैक्स रैकेट की पड़ताल में जुटी पुलिस को पता चला कि अब तक वह जिस पूजा को खोज रही थी, हकीकत में वह कांगे्रस सेवादल महिला प्रकोष्ठ की पूर्व जिलाध्यक्ष पूनम चौधरी है. पूनम ने इस खेल को पूजा के रूप में अपनी छद्म पहचान बना कर अंजाम दिया था.

पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि इस सैक्स रैकेट गिरोह ने नाबालिग उर्मिला को जयपुर में बेचने का सौदा कर लिया था. इस के लिए उसे जयपुर भेजने की तैयारी थी. हीरालाल उसे सवाई माधोपुर बस स्टैंड तक छोड़ने गया, लेकिन पीडि़ता जैसेतैसे उस से बच निकली. पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि जयपुर में किन लोगों से बालिका का सौदा किया गया था. पीडि़त उर्मिला कक्षा 9 में पढ़ती थी. कोराना काल में स्कूल बंद थे. ऐसे में वह अपनी जिंदगी बनाने इन के लिए महिला नेत्रियों की शरण में गई थी. लेकिन उन्होंने उस की जिंदगी तबाह कर डाली.

 

Chhattisgarh Crime News : प्रेमी और मौसेरी बहन के संग मिलकर की मां की हत्या

Chhattisgarh Crime News :पति की मौत हो जाने के बाद चंदना ने अपनी एकलौती बेटी रिया के नाम 7 लाख रुपए बैंक में जमा करा दिए थे ताकि वह उस की शादी में काम आ सकें. लेकिन बेटी रिया अपने स्कूल में पढ़ने वाले देवदीप गुप्ता के साथ प्यार की पींग बढ़ा रही थी. उसी प्रेमी की खातिर रिया ने मौसेरी बहन आयशा के साथ मां की ममता का ऐसा गला घोंटा कि…

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के थाना सकरी इलाके में स्थित है उसलापुर गुप्ता कालोनी. इसी कालोनी में पथरिया चुनचुनिया की पंचायत सचिव चंदना डडसेना अपनी 17 वर्षीया एकलौती बेटी रिया डडसेना के साथ रहती थी. इस कालोनी में उन्होंने 2 माह पहले ही किराए पर कमरा लिया था. इस से पहले वह परिवार सहित पथरिया में स्थित अपनी ससुराल में रह रही थीं. उन की ससुराल में सास के अलावा कोई नहीं था. ससुर की मृत्यु हो चुकी थी. पति विजय डडसेना की बदमाशों ने जेल में हत्या कर दी थी. पति और ससुर की मौत के बाद चंदना ने अपनी सास को अपने साथ रखा, बिलकुल मां की तरह क्योंकि उन के अलावा सास की देखभाल करने वाला कोई नहीं था.

बहरहाल, उस दिन तारीख थी 22 अगस्त, 2020. रिया मां चंदना से कह कर अपनी मौसेरी बहन आसना जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ कोटा (राजस्थान) टूर पर गई. घर पर चंदना डडसेना अकेली थीं. इन की सास बीते कई दिनों से पथरिया में रह रही थीं. रिया ने 24 अगस्त, 2020 की रात 10 बजे के करीब मां को फोन कर हालचाल पूछना चाहा, लेकिन उन का फोन बंद आ रहा था. उस ने जितनी बार फोन मिलाया, हर बार फोन स्विच्ड औफ आया. इस से रिया थोड़ी परेशान हो गई कि मां का फोन बंद क्यों आ रहा है? वह कभी अपना फोन बंद नहीं रखती थीं.

दरअसल, रिया मां को फोन कर के यह बताना चाहती थी कि वह कोटा से वापस लौट आई है और इस समय नानी के यहां रुकी हुई है, सुबह घर लौट आएगी. पर मां से बात न होने पर वह बुरी तरह परेशान हो गई. रात काफी हो गई थी. रिया समझ नहीं पा रही थी कि इस समय किस के पास फोन कर के मां के बारे में पता लगाए. जब कुछ समझ में नहीं आया तो वह सो गई. उस ने नानी से भी कुछ नहीं बताया. अगली सुबह रिया ने अपने पड़ोसी अंकल इंजीनियर रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के कहा, ‘‘अंकल, रात से मां का फोन बंद आ रहा है. मुझे बहुत डर लग रहा है कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो हो नहीं हुई है. अंकल प्लीज, घर जा कर मां को देख लो. हो सके तो मां से मेरी बात करा दीजिए प्लीज.’’

रिया के आग्रह पर पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी ने हां कर दी. उन्होंने यह भी कहा कि घर पहुंच कर तुम्हारी मां से मैं बात करा दूंगा. उन के आश्वासन के बाद रिया ने फोन काट दिया. एक घंटे बाद रामेश्वर अपनी पत्नी के साथ चंदना डडसेना के घर पहुंचे. उन के घर का मुख्यद्वार अंदर की ओर खुला हुआ था. वहीं से उन्होंने ‘भाभीजी… भाभीजी’ कह कर चंदना को पुकारा और खड़े हो गए. आवाज लगाने के बाद जब अंदर से कोई हलचल नहीं हुई तो ‘भाभीजी… भाभीजी’ आवाज देते हुए पतिपत्नी अंदर घुस गए. अंदर गहरा सन्नाटा पसरा था. इधरउधर देखते हुए वह चंदना के बैडरूम में पहुंचे.

दरवाजे के ऊपर बाहर से सिटकनी चढ़ी हुई थी. रामेश्वर सूर्यवंशी ने सिटकनी खोली और दरवाजे से ही अंदर की ओर झांक कर कमरे का निरीक्षण किया. जैसे ही उन की नजर बैड के पास नीचे फर्श पर गई, पतिपत्नी दोनों के होश फाख्ता हो गए. वहां से दोनों उलटे पांव बाहर की ओर भागे. दरअसल फर्श पर चंदना डडसेना की लाश पड़ी थी. उन के गले में दुपट्टा लिपटा था. दोनों पैर एक रंगीन चादर से बंधे हुए थे. लाश के पास ही उन का फोन पड़ा था. बाहर आ कर पतिपत्नी दोनों ने थोड़ी राहत की सांस ली. जब रामेश्वर सूर्यवंशी सामान्य हुए तो उन्होंने रिया को फोन कर के घटना की सूचना दी और जल्द से जल्द घर पहुंचने के लिए कहा. फिर उन्होंने 100 नंबर पर डायल कर घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी.

घटनास्थल (उसलापुर गुप्ता कालोनी) सकरी थाना क्षेत्र में पड़ता था. सकरी थाना प्रभारी रविंद्र यादव सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. थोड़ी देर बाद सीएसपी आर.एन. यादव भी आ गए. इधर मां की मौत की जानकारी मिलते ही रिया भी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल के साथ घर पहुंच गई. उस का रोरो कर बुरा हाल था. रिया को रोते हुए देख कर आयशा भी खुद को नहीं संभाल पाई. उस ने भी रोरो कर अपनी आंखें सुजा लीं. चंदना कोई साधारण महिला नहीं थीं. वह चुनचुनिया की पंचायत सचिव थीं. अपने अच्छे व्यवहार से उन्होंने लोगों के बीच अच्छी पकड़ बना रखी थी. थोड़ी ही देर में चंदना की हत्या की खबर पूरी कालोनी में फैल गई थी. जिस ने भी उन की हत्या की खबर सुनी, दौड़ेभागे उन के आवास पहुंच गए.

मौके से पुलिस को मृतका के मोबाइल के अलावा कुछ नहीं मिला. वह भी स्विच्ड औफ था. घर की अलमारी खुली हुई थी. अलमारी के अंदर सामान तितरबितर था. देखने से ऐसा नहीं लग रहा था कि हत्या लूट की वजह से हुई हो. अगर लूट की वजह से घटना घटी होती तो मृतका और लुटेरों के बीच संघर्ष के निशान जरूर मिलते, लेकिन मौके से संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले थे. इस में पुलिस को कहानी कुछ और ही नजर आई. पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दी. थाने पहुंच कर थानाप्रभारी रविंद्र यादव ने रामेश्वर सूर्यवंशी की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर आगे की काररवाई शुरू कर दी.

मृतका की बेटी रिया से पुलिस ने किसी पर शक होने की बात पूछी तो उस ने अपने पापा के पुराने दोस्त और पड़ोसी रामेश्वर सूर्यवंशी पर ही मां की हत्या का आरोप लगा दिया. जबकि रिया के फोन करने पर रामेश्वर ही सब से पहले उस के घर पहुंचे थे और उन्होंने ही चंदना की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. लेकिन जब मृतका की बेटी ने उन पर ही शक जताया तो रिया के बयान के आधार पर पुलिस रामेश्वर सूर्यवंशी को हिरासत में ले कर पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस पूरी रात सूर्यवंशी से पूछताछ करती रही लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. जब हत्या में उन की कोई भूमिका सामने नहीं आई तो पुलिस ने उन्हें कुछ हिदायत दे कर इस शर्त पर छोड़ दिया कि दोबारा बुलाए जाने पर थाने आना होगा.

अगले दिन चंदना की पोस्टमार्टम रिपोर्ट थानाप्रभारी रविंद्र यादव के पास आ गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाने और नशीली दवा खिलाने की बात लिखी थी. इसलिए मृतका का विसरा सुरक्षित रख लिया गया. मतलब साफ था कि सचिव की हत्या लूट के लिए नहीं, बल्कि किसी और वजह से की गई थी. हत्या की वजह क्या हो सकती है, यह जांच का विषय था. पुलिस को भटकाने के लिए हत्यारों ने हत्या जैसे जघन्य अपराध को लूट की ओर ले जाने की कोशिश की थी. पुलिस का शक मृतका के करीबियों पर बढ़ गया था. पुलिस ने रिया से दोबारा पूछताछ की तो इस बार उस का बयान बदल गया. रिया के बदले बयान ने उसे शक के घेरे में खड़ा किया.

शक के आधार पर पुलिस ने रिया को निशाने पर ले लिया और उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया. यही नहीं, पुलिस ने गोपनीय तरीके से उस की छानबीन भी शुरू कर दी थी. उसी शाम मुखबिर के जरिए पुलिस को एक ऐसी चौंका देने वाली सूचना मिली, जिसे सुन कर पुलिस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. रिया ने पूछताछ में पुलिस को बताया था कि जिस दिन उस की मां की हत्या हुई, उस दिन वह घर पर नहीं थी, बल्कि अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और दोस्त देवदीप गुप्ता के साथ घटना से 2 दिन पहले कोटा घूमने गई थी. वह झूठ बोल रही थी. दरअसल, रिया घर छोड़ कर कहीं गई ही नहीं थी.

यह सुन कर पुलिस हैरान रह गई कि रिया ने झूठ क्यों बोला कि वह घटना से 2 दिन पहले घूमने गई थी. इस का मतलब वह घटना के बारे में बहुत कुछ जानती थी या घटना में उस का कहीं न कहीं हाथ था. रिया की काल डिटेल्स से भी बात स्पष्ट हो गई थी कि वह उस दिन कहीं नहीं गई थी, बल्कि घर पर ही थी. इस बात की पुष्टि हो जाने के बाद पुलिस की नजर पूरी तरह रिया पर जा टिकी. रिया से दोबारा पूछताछ करनी जरूरी थी, लिहाजा 29 अगस्त, 2020 को पुलिस रिया को पूछताछ के लिए घर से थाने ले आई और उस से कड़ाई से पूछताछ शुरू की तो वह जल्द ही टूट गई और अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि उसी ने मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप गुप्ता के साथ मिल कर अपनी मां की हत्या की थी.

पुलिस को भटकाने के लिए उस ने घटना को लूट की ओर मोड़ने की कोशिश की थी. अलमारी में रखे मां के सोनेचांदी के जेवरात वह अपने साथ ले गई थी. रिया के बयान के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस की मौसेरी बहन आयशा जायसवाल और प्रेमी देवदीप गुप्ता को गिरफ्तार कर उन की निशानदेही पर जेवरात बरामद कर लिए. तीनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने सचिव चंदना की हत्या की कहानी कुछ इस तरह बताई—

45 वर्षीय चंदना डडसेना मूलरूप से बिलासपुर के पथरिया की रहने वाली थी. एकलौती बेटी रिया और सास यही उस का घरसंसार था. वह सास और बेटी का चेहरा देख कर जी रही थी, यही उस के जीने का सहारा भी थे. दोनों की जिम्मेदारी चंदना के कंधों पर थी. अपना दायित्व समझ कर चंदना उसे ईमानदारी से निभा रही थी. चंदना के कंधों पर जिम्मेदारी का यह बोझ उस समय आया, जब रिया 5-6 साल की रही होगी. उन्हीं दिनों मासूम रिया के सिर से पिता और चंदना के सिर से पति का साया उठ गया था. जेल के अंदर कैदियों ने पीटपीट कर उन की हत्या कर दी थी.

चंदना डडसेना के पति का नाम विजय डडसेना था. वह पथरिया चुनचुनिया पंचायत क्षेत्र के एक इंटर कालेज में सरकारी अध्यापक थे. खुद्दार और स्वाभिमानी विजय डडसेना अपने कुशल व्यवहार के लिए इलाके में मशहूर थे. अपने कर्तव्य के प्रति हमेशा सजग और कानून का पालन करने वाले थे. इन से जब कोई गलत और अनुचित बात करता था, तो वह उस का विरोध करते थे. उस दिन 4 अप्रैल, 2009 की तारीख थी जब विजय डडसेना के जीवन में काल कुंडली मार कर बैठा. उन दिनों बिलासपुर में पंचायती चुनाव होने वाला था. उसी संबंध में चुनाव से पहले एक मीटिंग आयोजित की गई थी. उस मीटिंग में एसडीएम और तमाम अधिकारियों के साथ अध्यापक विजय डडसेना भी मौजूद थे. चुनाव में उन की भी ड्यूटी लगी थी. मीटिंग चुनावी प्रशिक्षण के लिए आयोजित की गई थी.

विजय डडसेना का किसी बात को ले कर एसडीएम से विवाद हो गया था. दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि नाराज एसडीएम ने उन्हें जेल भिजवा दिया. कुछ दिनों बाद जेल में उन की कैदियों के साथ लड़ाई हो गई. गुट बना कर कैदियों ने जेल में ही अध्यापक विजय डडसेना की पीटपीट कर हत्या कर दी. अध्यापक विजय डडसेना की हत्या से बिलासपुर में तूफान खड़ा हो गया था. उन की हत्या के विरोध में कई दिनों तक सामाजिक संगठनों ने आंदोलन दिया. आंदोलन पर विराम लगाने के लिए अनुकंपा के आधार पर सरकार ने मृतक की पत्नी चंदना डडसेना को सरकारी नौकरी और 15 लाख रुपए मुआवजा देने की घोषणा की थी.

बाद के दिनों में पथरिया चुनचुनिया पंचायत में चंदना डडसेना की सचिव पद पर नियुक्ति हो गई थी. मुआवजे के 15 लाख रुपए में से 7 लाख बेटी रिया को और 8 लाख रुपए में से आधीआधी रकम सास और बहू को मिल गई थी. इस के बाद से चंदना की जिम्मेदारी और बढ़ गई थी, चूंकि रिया चंदना की एकलौती औलाद थी, इसलिए वह जिद्दी भी थी. जिस काम के लिए वह जिद पर अड़ जाती थी, उसे पूरा कर के ही मानती थी. बेटी की जिद के सामने मां को झुकना पड़ता था. वह जानती थीं ऐसा नहीं करती, तो बेटी से सदा के लिए हाथ धो बैठती, इसलिए बेटी के सामने झुकना उन की मजबूरी थी. वह वही करती थीं, जो बेटी कहती थी.

17 वर्षीया रिया जिस स्कूल में पढ़ती थी, उसी स्कूल में देवदीप गुप्ता भी पढ़ता था. फर्क सिर्फ इतना था वह दसवीं में थी तो देवदीप 12वीं में था. देवदीप रिया के मोहल्ले में रहता था. 4 भाई बहनों में वह दूसरे नंबर का था. पिता की सरकारी नौकरी थी. घर में पिता की कमाई से अच्छे पैसे आते थे. मां पर दबाव बना कर देवदीप पैसे ऐंठता और अपने आवारा दोस्तों के साथ दिन भर गलीमोहल्लों में घूमता था. यही उस की दिनचर्या थी. बहरहाल, स्कूल के दिनों में घर जातेआते रास्ते में दोनों के बीच परियच बढ़ा. यह परिचय बाद में दोस्ती में बदल गया और फिर दोस्ती प्यार में. चूंकि देवदीप गुप्ता रिया के ही मोहल्ले का ही रहने वाला था और एक ही स्कूल में पढ़ता था, यह बात रिया की मां चंदना जानती थी. पढ़ाई के बहाने से रिया देवदीप को घर बुलाती थी और दोनों घंटों साथ समय बिताते थे.

शुरू के दिनों में चंदना ने बेटी को देवदीप से मिलने के लिए मना नहीं किया, लेकिन उन्होंने अपनी आंखें भी बंद नहीं की थीं. उस के घर आने के बाद वह दोनों पर नजर रखती थीं. आखिरकार चंदना को बेटी के प्यार के बारे में पता चल ही गया. बेटी के प्यार के बारे में जानते ही वह उस के प्रति सख्त हो गईं और उसे साफतौर पर देवदीप से मिलने पर मना कर दिया. यही नहीं, देवदीप के घर आने पर भी पाबंदी लगा दी. उम्र के जिस मोड़ से रिया गुजर रही थी, उस उम्र में अकसर बच्चों के पांव फिसल जाते हैं. ऐसे में कहीं कोई ऊंचनीच हो जाए तो समाज में वह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगी. चंदना को इसी बात का डर सता रहा था, इसीलिए उन्होंने बेटी को देवदीप से मिलने और बात करने से मना कर दिया था.

मां की यह बात रिया को काफी नागवार लगी थी. रिया ने यह बात प्रेमी देवदीप को बता दी. यही नहीं वह अपने दिल की हर बात अपनी मौसेरी बहन आयशा जायसवाल से भी शेयर करती थी. दोनों हमउम्र भी थीं और हमराज भी. एकदूसरे के दिल की बातें सीने में दफन कर लेती थीं. उस दिन के बाद से चंदना की बेटी पर सख्ती कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी. बेटी से कहीं भी जानेआने पर उस से हिसाब लेने लगी थीं. मसलन कहां जा रही है? वहां काम क्या है? घर कब लौटोगी? वगैरह…वगैरह. अचानक मां के बदले तेवर से रिया परेशान हो गई. मां की टोकाटाकी उसे कतई पसंद नहीं थी. मां के इस रवैए से उस के मन में नकारात्मक सोच पैदा हो गई.

वह यह भी सोच रही थी कि मां उस के प्रेमी देवदीप को पसंद नहीं करती, मां के जीते जी वह देवदीप को अपना जीवनसाथी नहीं बना सकती तो क्यों न मां को ही हमेशा के लिए अपने रास्ते हटा दे. न रहेगा चंदना नाम का कांटा, न चुभेगा पांव में. उस के बाद तो जीवन भर मजे ही मजे रहेंगे. रिया के कच्चे दिमाग में खतरनाक योजना अंतिम रूप ले चुकी थी. जल्द से जल्द वह इस काम को अंजाम देना चाहती थी. वह यह भी जानती थी कि इस काम को अकेली पूरा नहीं कर सकती. इसलिए उस ने अपनी इस खतरनाक योजना में मौसेरी बहन आयशा और प्रेमी देवदीप को भी शामिल कर लिया. आयशा ने रिया का विरोध करने के बजाए उस का साथ देने के लिए हामी भर दी थी.

सब कुछ उस की योजना के मुताबिक चल रहा था. 23 अगस्त, 2020 को रिया आयशा को घर बुला लाई. उस के आने से रिया की हिम्मत दोगुनी हो गई थी. दोनों ने मिल कर रात भर चंदना को मौत के घाट उतारने की योजना बनाई. रिया बेसब्री से अगली सुबह होने का इंतजार कर रही थी कि कब सुबह हो और मां को मौत के घाट उतारा जाए. मां के लिए उस के दिल में जरा भी रहम नहीं था. अगली सुबह 10 बजे रिया और आयशा बाजार गईं. उस दिन चंदना ड्यूटी नहीं गई थीं, घर पर ही थीं. मैडिकल की दुकान से दोनों ने नींद की 10 गोलियां खरीदीं और घर ला कर अलमारी में छिपा दीं.

दोपहर करीब साढ़े 12 बजे रिया ने 3 कप चाय बनाई. एक प्याली खुद ली, दूसरी प्याली आयशा को दी और तीसरी प्याली मां को दी. उस ने मां की चाय में चुपके से नींद की सारी गोलियां डाल दी थीं. चाय पीने के थोड़ी देर बाद ही दवा ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. चंदना अचेत हो कर बिस्तर पर गिर गईं. दोनों को बड़ी बेसब्री इसी पल का इंतजार था. रिया ने मां को हिला कर देखा, उन के जिस्म में कोई हरकत नहीं थी. फिर क्या था, दोनों ने मिल कर चुन्नी से चंदना का गला घोंट दिया. कुछ ही पलों में चंदना की मौत हो गई. लेकिन रिया को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि उस की मां मर चुकी है. फिर खुद कलयुगी बेटी ने मां के पैरों में बिजली का तार फंसा कर 10 मिनट तक करंट दौड़ाया ताकि मां की मौत पक्की हो जाए.

इस के बाद रिया को यकीन हुआ कि उस के रास्ते का कांटा हमेशा के लिए निकल चुका है. उस के बाद लाश ठिकाने लगाने के लिए उस ने मदद के लिए प्रेमी देवदीप को फोन किया. देवदीप रिया के घर पहुंचा. तीनों ने चंदना की लाश एक चादर में बांध कर बैड के नीचे डाल दी. फिर रिया ने अलमारी में रखे लाखों के सोनेचांदी के गहने निकाले और एक पोटली में बांध कर तीनों घर से निकल गए, ताकि यह लगे कि लूट के चलते घटना घटी है. जाने से पहले रिया ने मां का फोन स्विच्ड औफ कर दिया था. यह सब करतेकरते दोपहर के 2 बज गए थे. उस के बाद रिया प्रेमी देवदीप और मौसेरी बहन आयशा के साथ दिन भर इधरउधर घूमती रही. गहने उस ने देवदीप के हवाले कर दिए थे. फिर घूमतेटहलते रात में रिया और आयशा नानी के घर पहुंच गईं.

रिया ने नानी से झूठ बोला कि वह पिकनिक पर आयशा के साथ कोटा गई थी. लौटते वक्त मां को फोन लगाया तो मां के फोन की घंटी बजती रही लेकिन उन्होंने काल रिसीव नहीं किया, इसलिए यहां चली आई. फिर नानी के घर से रिया ने अपने पड़ोसी इंजीनियर अंकल रामेश्वर सूर्यवंशी को फोन कर के मां के फोन न उठाने वाली बात बता कर उन्हें घर जा कर पता लगाने को कहा. ताकि मौका मिलते ही उन्हें फंसा कर खुद को बेदाग साबित कर दे. लेकिन कानून के लंबे हाथों से वह बच नहीं पाई और सलाखों के पीछे पहुंच गई. वह खुद तो जेल गई ही, साथ में अपनी बहन और दोस्त को भी जेल ले गई.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने देवदीप से सारे गहने बरामद कर लिए थे. कलयुगी बेटी की करतूतों पर पूरा शहर थूथू कर रहा था. लोग यही कह रहे थे कि ऐसी औलाद से तो बेऔलाद होना ही अच्छा है.

—कथा में रिया परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Agra Crime News : कोल्ड ड्रिंक में कीटनाशक मिलाकर पत्नी के प्रेमी को पिलाया

Agra Crime News : कर्ज वसूलने के चक्कर में शिशुपाल का सोहनवीर के घर आनाजाना हुआ तो उसी दौरान सोहनवीर की पत्नी चंचल से उस के संबंध बन गए. इस का जो नतीजा निकला वह…

चंचल, जैसा नाम वैसा ही स्वभाव था उस 35 वर्षीय खूबसूरत नारी का. 12 वर्ष पहले उस का विवाह आगरा के सिकंदरा थाना क्षेत्र के गांव पनवारी में रहने वाले सोहनवीर सिंह से हुआ था. सोहनवीर प्राइवेट नौकरी करता था. उस की इतनी कमाई नहीं थी कि घर का खर्च आसानी से चल पाता. चंचल इस से खुश नहीं थी लेकिन अपना भाग्य मान कर वह पति सोहनवीर के साथ निर्वाह कर रही थी. सोहनवीर पत्नी भक्त था, वह चंचल से बेइंतहा प्यार करता था. पति के इस बर्ताव ने आहिस्ताआहिस्ता चंचल के स्वभाव को बदल दिया. एक शाम जब सोहनवीर लौटा तो चंचल ने उसे हाथपैर धोने के लिए गरम पानी दिया. हाथमुंह धो कर सोहनवीर रसोई में चंचल के पास ही बैठ गया, जहां चंचल उस के लिए गरम रोटियां सेंक रही थी.

खाना खा कर सोहनवीर उठा और बैड पर जा कर लेट गया. सारा काम खत्म करने के बाद चंचल भी उस के पास आ कर बैड पर लेट गई. चंचल को पति के मुंह से शराब की गंध महसूस हुई तो बोली, ‘‘तुम ने शराब पी है?’’

‘‘हां आज ज्यादा ठंड लग रही थी इसीलिए, लेकिन कल से नहीं पीऊंगा, वादा करता हूं.’’ सोहनवीर गलती मान कर बोला.

‘‘आज माफ किए देती हूं, आइंदा शराब पी कर घर में आए तो घर में घुसने नहीं दूंगी. फिर ठंड में सारी रात बाहर ही ठिठुरते रहना, समझे.’’ चंचल ने आंखें दिखा कर कहा.

उस रात सोहनवीर ने चंचल से वादा तो किया कि दोबारा शराब को हाथ नहीं लगाएगा, लेकिन वो वादा रात के साथ ही कहीं खो गया. अगले दिन सोहनवीर शराब के नशे में घर लौटा तो पतिपत्नी के बीच कहासुनी हो गई. इस के बाद चंचल फिर से पति सोहनवीर से चिढ़ने लगी. अब सोहनवीर चंचल को जरा भी नहीं सुहाता था. वह उस से हमेशा कटीकटी रहने लगी. सोहनवीर चूंकि चंचल का पति था, इसलिए वह चाहे जैसा भी था, उसे उस के साथ रहना ही था. दिन गुजरते गए, समय पंख लगा कर उड़ने लगा. लाख कोशिशों के बाद भी चंचल सोहनवीर की शराब छुड़वा पाने में असफल रही. समय के साथ चंचल एक बेटे और एक बेटी की मां भी बन गई.

इस बीच सोहनवीर शराब का आदी हो गया था. शराब के चक्कर में उस ने कई लोगों से पैसे भी उधार लिए थे. वह पहले उधार लिए गए पैसे चुका नहीं पाता था, फिर से उधार मांगने लगता था. इसी के चलते लोगों ने उसे उधार देना बंद कर दिया था. लोग तगादा करते तो सोहनवीर उन के सामने आने से बचने लगा. इस पर लोग उस के घर के बाहर आ कर तगादा करने लगे. सोहनवीर घर नहीं होता तो लोग चंचल को ही बुराभला बोल कर चले जाते थे. चंचल चुपचाप सब के ताने सुनती, फिर दरवाजा बंद कर के रोती रहती. पति से कुछ कहती तो उस के सितम उस के जिस्म पर उभर कर दिखाई देने लगते. एक दिन दोपहर में सोहनवीर कमरे में खाना खा रहा था. तभी किसी ने जोरजोर से दरवाजे की कुंडी बजाई. सोहनवीर समझ गया कि कोई लेनदार दरवाजे पर आया है. उस ने चंचल से कहा, ‘‘तुम जा कर देखो और मुझे पूछे तो दरवाजे से ही चलता कर देना.’’

‘‘हां, यही काम तो है मुझे कि हर किसी से झूठ बोलती रहूं.’’ कह कर चंचल झल्ला कर उठी.

सोहनवीर उसे लाल आंखों से घूर रहा था. चंचल ने दरवाजा खोला तो सामने एक व्यक्ति खड़ा था. उसे देख कर चंचल ने पूछा, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं शिशुपाल सिंह हूं. कहां है सोहनवीर, जब से पैसा लिया है, दिखाई ही नहीं दे रहा.’’ शिशुपाल रूखे स्वर में बोला.

‘‘वो तो घर पर नहीं हैं, आप बाद में आ जाना.’’

‘‘मेरा यही काम है क्या. लोगों को पैसा दे कर भलाई करूं और जब पैसे लेने का वक्त आए तो देनदार घर से गायब मिले. कहे देता हूं, इस तरह नहीं चलेगा. अपने आदमी को कहना मेरा पैसा वापस कर दे, वरना अच्छा नहीं होगा.’’ शिशुपाल कड़क कर बोला.

‘‘आप नाराज क्यों होते हैं, वो आएंगे तो मैं बोल दूंगी. मैं ने तो आप को पहली बार देखा है.’’ चंचल बोली.

और भी हिदायतें दे कर शिशुपाल सिंह वहां से चला गया. चंचल ने दरवाजा बंद किया और फिर से आ कर रोटियां सेंकने लगी.

‘‘सारी उम्र लोगों की गालियां सुनवाते रहना लेकिन ये दारू मत छोड़ना.’’ चंचल गुस्से में पति से बोली.

‘‘ऐ तू मुझे आंखें दिखाती है, साली मैं तेरा मर्द हूं. जानती है पति परमेश्वर होता है. तू है कि मुझे ही आंखें दिखा रही है.’’ सोहनवीर चिल्ला कर बोला.

‘‘पति के अंदर परमेश्वर वाले गुण हों तभी तो. तुम में पति जैसा है कुछ.’’ चंचल बोली तो सोहनवीर उस के बाल पकड़ कर रसोई से बाहर ले आया और लातघूंसों से बुरी तरह पिटाई करने लगा. चंचल रोतीबिलखती खुद को पति के हाथों से छुड़ाती रही लेकिन सोहनवीर उसे तब तक पीटता रहा, जब तक खुद थक नहीं गया. चंचल रात भर दर्द से तड़पती रही और सोहनवीर शराब पी कर एक ओर लुढ़क गया. 3-4 दिन बाद शिशुपाल एक बार फिर से पैसों की वसूली के लिए सोहनवीर के घर आया तो इत्तेफाक से दरवाजा खुला था. शिशुपाल भीतर घुसता चला आया. चंचल आइने में देख कर बाल संवार रही थी. शिशुपाल पर नजर पड़ी तो उस ने मुसकरा कर कहा, ‘‘अरे शिशुपालजी आप! अरे आप खड़े क्यों हैं, बैठिए न.’’

शिशुपाल चुप था और एकटक चंचल की ओर देख रहा था. चंचल उस के करीब आई और कुरसी उठा कर उस की ओर सरकाते हुए बोली, ‘‘आप बैठिए, मैं आप के लिए चाय बना कर लाती हूं.’’

‘‘नहीं, मुझे चाय नहीं पीनी. मैं तो सोहनवीर से मिलने आया था. कहां है वो मेरे पैसे कब देगा?’’ शिशुपाल ने पूछा.

‘‘आप के पैसे मिल जाएंगे, चिंता मत कीजिए.’’ चंचल अब भी मुसकरा रही थी. वह रसोई में चली गई और 2 कप चाय और प्लेट में बिस्कुट, नमकीन ले आई. उस ने शिशुपाल की ओर चाय का कप बढ़ाते हुए कहा, ‘‘कितने रुपए हैं आप के?’’

‘‘आप को नहीं मालूम.’’ शिशुपाल ने कप हाथ में ले कर पूछा.

‘‘जब पति पत्नी को सारी बातें बताए, तभी उसे हर बात की जानकारी रहती है. जो आदमी पत्नी को सिवाय पैर की जूती के कुछ नहीं समझता वो…खैर जाने दीजिए मैं भी कहां आप से अपना रोना ले कर बैठ गई.’’ चंचल बोल रही थी, शिशुपाल खामोशी से उस की बातें सुन रहा था. काफी देर तक इंतजार के बाद भी सोहनवीर घर नहीं आया तो शिशुपाल जाने लगा. चंचल ने उसे थोड़ी देर और रुकने के लिए कहा, लेकिन वह नहीं रुका. चंचल ने उस का मोबाइल नंबर ले लिया और बोली, ‘‘वो आएंगे तो मैं आप को फोन कर के बता दूंगी.’’

शिशुपाल वहां से चला गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि सोहनवीर की पत्नी चंचल उस पर इतनी मेहरबान क्यों हो गई. फिर उस ने सिर को झटका और सोचने लगा कि उसे तो अपने पैसे चाहिए चाहे पत्नी दे या पति. सोचता हुआ वह अपने घर पहुंच गया. शिशुपाल सिंह संपन्न किसान था. करीब 18 साल पहले उस का विवाह सीता से हुआ था. सीता से उसे 2 बेटे और एक बेटी हुई. करीब डेढ़ साल पहले आपसी विवाद के कारण सीता हमेशा के लिए घर छोड़ कर चली गई. शिशुपाल अकेला पड़ गया. गांव के लोगों को वह ब्याज पर पैसा देता था. एक दिन सोहनवीर ने उस से किसी जरूरी काम के लिए पैसे उधार मांगे तो शिशुपाल ने दे दिए. पैसे उधार मिलने के बाद सोहनवीर ने शिशुपाल की तरफ जाना ही छोड़ दिया. काफी समय बीतने के बाद सोहनवीर शिशुपाल से नहीं मिला तो शिशुपाल सोहनवीर के घर तक पहुंच गया.

सोहनवीर घर पर नहीं मिला तो चंचल ने शिशुपाल की आवभगत की. शिशुपाल उस दिन ये कह कर चला गया कि 4 दिन बाद फिर आएगा. 4 दिन गुजर गए. चंचल को आज शिशुपाल का इंतजार था. पति और बच्चे तो सुबह ही चले गए थे. उन के जाने के बाद चंचल ने घर का सारा काम खत्म किया और खुद सजसंवर कर बैठ गई. अपने बताए समय पर शिशुपाल सोहनवीर के घर पहुंच गया. दरवाजे की कुंडी खड़की तो चंचल ने घड़ी की ओर देखा, ठीक 11 बज रहे थे. चेहरे पर मुसकान बिखेर कर एक बार वह आइने के सामने आ कर मुसकराई, फिर मन ही मन लजाई, उस ने साड़ी के पल्लू से खुद को लपेटा और सामने के बालों को गोल कर गालों पर गिरा लिए. चंचल का निखरा गोरा बदन दूध की तरह दमक रहा था.

उस ने दरवाजा खोला तो सामने शिशुपाल खड़ा था. उसे देखते ही चंचल ने मुसकान बिखेरी और निगाहें नीची कर लीं. फिर आहिस्ता से बोली, ‘‘अंदर आइए न.’’

‘‘जी, सोहनवीर नहीं है क्या?’’ शिशुपाल ने हिचकिचा कर पूछा.

‘‘मैं तो हूं, आप की ही राह देख रही थी.’’ चंचल बोल पड़ी.

‘‘जी आप मेरी राह!’’ शिशुपाल चौंका तो चंचल ने बिना किसी हिचक के उसे हाथ बढ़ा कर अंदर आने का इशारा किया. शिशुपाल अंदर आ गया तो चंचल ने अंदर से कुंडी लगा दी और पलट कर शिशुपाल से बोली, ‘‘आप अभी तक खड़े हैं.’’

चंचल ने कुरसी निकाल कर देनी चाही तो शिशुपाल बोला, ‘‘आज मैं अपने पैसे ले कर ही जाऊंगा, बुलाओ सोहनवीर को जो मुंह छिपा कर बैठा है.’’

‘‘आप के तो दिमाग में दिन रात पैसा ही पैसा सवार रहता है. ये देखो कितना पैसा है मेरे पास.’’ चंचल ने स्वयं ही साड़ी का पल्लू हटा कर उस से कहा. यह देख शिशुपाल ठगा सा देखता रह गया. उस की निगाहें चंचल के तराशे हुए जिस्म पर थीं. वह अपलक देखे जा रहा था.

‘‘सचमुच सांचे में तराशा हुआ बदन है तुम्हारा.’’ शिशुपाल बोला. चंचल ने झट से पल्लू से खुद को लपेट लिया. शिशुपाल चंचल के दिल की मंशा जान चुका था. उस ने चंचल को लपक कर अपनी ओर खींचा और बाजुओं में जकड़ लिया. चंचल के सारे बदन में एक अजीब सा रोमांच उठने लगा. उस ने दोनों बांहें शिशुपाल के कंधों पर जमा लीं. शिशुपाल ने चंचल को बांहों में उठा कर पलंग पर लिटा दिया. वह सुहागन हो कर भी शादीशुदा औरत की सारी मर्यादाएं भूल कर वासना के अंधे कुंए में कूद पड़ी थी, जिस में कूदने के बाद चंचल ने असीम आनंद का अनुभव किया.

वह शिशुपाल की दीवानी हो गई. उस ने कहा, ‘‘अब बताओ इस दौलत में सुख है या फिर तुम्हारी तिजोरी वाली दौलत में?’’

‘‘सच कहूं तो मैं ने जब पहली बार तुम्हें देखा था तो तिजोरी की दौलत को भूल गया था और तुम्हारी इस दौलत का दीवाना हो गया था.’’

शिशुपाल की बांहों की गरमी पा कर चंचल को लगने लगा था कि अब उसे दुनिया की सारी खुशियां मिल गईं. चंचल अब शिशुपाल के वश में हो चुकी थी. जब जी करता दोनों एकदूसरे में समा जाते थे. 21 जुलाई, 2020 की सुबह शिशुपाल खेत से चारा लाने की बात कह कर घर से निकला लेकिन दोपहर तक नहीं लौटा. घरवालों ने उसे सभी जगह तलाशा, लेकिन कोई पता नहीं चला. कई दिन बाद भी जब शिशुपाल का पता नहीं लगा तो उस के भाई नवल सिंह ने 30 जुलाई को सिकंदरा थाने में शिशुपाल के गुम होने की सूचना दी. जिस पर इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने गुमशुदगी दर्ज कर जांच एसआई अमित कुमार को सौंप दी.

पुलिस ने हर जगह शिशुपाल का पता किया लेकिन कुछ पता नहीं लगा. इस पर पुलिस ने जानकारी जुटा कर पता किया कि शिशुपाल से कौनकौन मिलने आता है और शिशुपाल कहांकहां जाता था. इसी जांच में सोहनवीर पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पता चला कि शिशुपाल हर रोज सब से ज्यादा समय सोहनवीर के घर बिताता था. शिशुपाल और सोहनवीर के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स की जांच की गई तो जानकारी मिली कि घटना वाले दिन सुबह साढ़े 10 बजे दोनों के बीच बात हुई थी. फोन सोहनवीर ने किया था. उसी के बाद से शिशुपाल लापता हो गया था.

12 अगस्त, 2020 को इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने पुलिस टीम के साथ जा कर सोहनवीर सिंह को उस के घर से हिरासत में ले लिया. थाने  ला कर जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो उस ने शिशुपाल की हत्या कर देने की बात स्वीकार कर ली. इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने उस की निशानदेही पर अंशुल एपीआई के पास निर्माणाधीन इमारत के पास सीवर नाले से शिशुपाल की लाश बरामद कर ली. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद वह थाने लौट आए. पुलिस ने सोहनवीर के खिलाफ भादंवि की धारा 302/201 के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद उस से विस्तृत पूछताछ की.

पूछताछ में पता चला कि शिशुपाल और चंचल के नाजायज रिश्ते की इमारत जैसेजैसे बनती गई, वह लोगों की नजरों में आने लगी थी. लोगों की नजरों में बात आई तो सोहनवीर तक पहुंचते देर नहीं लगी. तब सोहनवीर ने अपने घर की इज्जत पर हाथ डालने वाले शिशुपाल को जान से मार देने का फैसला कर लिया.  उस ने घटना से 1-2 दिन पहले मोबाइल पर शिशुपाल से बात की और कहा कि कुछ परेशानी थी, इस वजह से वह उस का पैसा नहीं दे पाया लेकिन अब जल्द ही दे देगा. शिशुपाल तो वैसे भी अपनी दी गई रकम का ब्याज उस की पत्नी के बदन से वसूल रहा था. इसलिए उस ने कह दिया कि ठीक है जब पैसा हो जाए दे देना.

21 जुलाई, 2020 की सुबह शिशुपाल चारा लाने के लिए घर से खेत की तरफ जाने के लिए निकला. वह खेत पर था तब करीब साढ़े 10 बजे सोहनवीर ने फोन कर के उसे मिलने के लिए बुलाया. शिशुपाल उस के पास पहुंचा तो सोहनवीर उसे अंशुल एपीआई के पास निर्माणाधीन इमारत में ले गया. वहीं पर उस ने कोल्ड ड्रिंक में कीटनाशक मिला कर शिशुपाल को पिला दी, जिसे पीने के कुछ ही देर में शिशुपाल की मौत हो गई. सोहनवीर ने शिशुपाल की लाश इमारत के पास वाले सीवर नाले में डाल दी और घर चला गया. कागजी खानापूर्ति करने के बाद इंसपेक्टर अरविंद कुमार ने सोहनवीर को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में चंचल परिवर्तित नाम है)

 

Crime News : दोस्त का अपहरण करके मांगी 30 लाख की फिरौती

Crime News : पुलिस ने अगर संजीत के पिता चमन सिंह की बात पर जरा सा भी यकीन किया होता तो न तो संजीत की जान जाती और न 30 लाख रुपए. इस के बजाय पुलिस यही कहती और मानती रही कि संजीत अपनी किसी गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. इस का नतीजा…

कानपुर दक्षिण में काफी बड़े क्षेत्र में फैला एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है बर्रा. बड़े क्षेत्र को देखते हुए इसे कई भागों में बांटा गया है. चमन सिंह यादव अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के बर्रा 5 की एलआईजी कालोनी में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कुसुमा देवी के अलावा एक बेटा था संजीत और एक बेटी रुचि यादव. चमन सिंह एक फैक्ट्री में काम करते थे. वह धनवान तो नहीं थे, पर घर में किसी चीज की कमी भी नहीं थी. चमन सिंह मृदुभाषी थे सो अड़ोसीपड़ोसी सभी से मिलजुल कर रहते थे. चमन सिंह खुद तो ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन उन्होंने बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई थी. बेटी रुचि डीबीएस कालेज गोविंद नगर से बीएससी कर के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटी थी, जबकि बेटे संजीत ने बीएससी नर्सिंग कर रखा था.

वह नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथोलौजी विभाग में बतौर लैब टेक्नीशियन कार्यरत था. उस का काम था मरीजों के खून का नमूना जांच हेतु एकत्र करना. फिर उसे जांच के लिए पैथोलौजी लैब ले जाना और जांच रिपोर्ट लाना. चमन सिंह की बेटी रुचि जौब की तलाश में थी, चमन सिंह बेटी का ब्याह कर देना चाहते थे. इस में उन की पत्नी कुसुमा की भी सहमति थी. इसी कवायद में चमन सिंह को रुचि के लिए राहुल यादव पसंद आ गया. राहुल बर्रा विश्व बैंक कालोनी में रहता था. उस के पिता राजेंद्र यादव पीएसी में तैनात थे. राहुल पसंद आया तो उन्होंने बेटी का रिश्ता तय कर दिया. रिश्ता तय हुआ तो चमन सिंह बेटी की शादी की तैयारी में जुट गए. उन्होंने बेटी के लिए जेवरात बनवा लिए तथा कैश का भी इंतजाम कर लिया.

संजीत का सपना था कि वह अपनी बहन को कार से ससुराल भेजेगा. कार खरीदने के लिए उस ने बैंक से 2 लाख का कर्ज भी ले लिया था. रुचि की शादी की तैयारियां चल ही रही थीं कि इसी बीच चमन सिंह को पता चला कि राहुल रुचि के लिए ठीक लड़का नहीं है. चमन सिंह ने अपने स्तर से पता लगाया तो बात सच निकली. इस के बाद उन्होंने पत्नी व बच्चों के साथ इस गंभीर समस्या पर विचारविमर्श किया और रुचि के भविष्य को देखते हुए रिश्ता तोड़ दिया. रिश्ता टूटने से राहुल और उस के घर वाले बौखला गए. राहुल, रुचि के पिता व भाई को मनाने में जुट गया, परंतु बात नहीं बनी. हर रोज की तरह 22 जून, 2020 को भी संजीत अस्पताल गया, लेकिन जब वह रात 10 बजे तक वापस घर नहीं आया, तब चमन सिंह व उस की पत्नी कुसुमा को चिंता हुई.

दरअसल संजीत रात 9 बजे तक हर हाल में घर आ जाता था. कभी उसे अस्पताल में रुकना होता था या कहीं और जाना होता तो वह अपनी मां या बहन को फोन कर के बता देता था. 10 बज गए थे. न वह आया था, न ही फोन पर बताया था. ताज्जुब की बात यह थी कि उस का मोबाइल फोन भी बंद था. ज्योंज्यों समय बीतता रहा था, चमन सिंह, उन की पत्नी कुसुमा और बेटी रुचि की धड़कनें बढ़ती जा रही थीं. रुचि ने संजीत के अस्पताल फोन किया तो पता चला वह 7 बजे ही अस्पताल से चला गया था. पैथोलाजी लैब वह गया ही नहीं था. रुचि ने भाई के दोस्तों जिन्हें वह जानती थी, सब को फोन किया, कोई जानकारी नहीं मिली. मांबेटी और पिता रात भर फोन पर फोन करते रहे, लेकिन कहीं से भी संजीत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

सुबह का उजाला फैला तो पूरी कालोनी में संजीत के लापता होने की खबर फैल गई. पड़ोसी सांत्वना देने घर पहुंचने लगे. चमन सिंह ने कुछ खास पड़ोसियों से विचारविमर्श किया फिर बेटी रुचि को साथ ले कर जनता नगर पुलिस चौकी पहुंच गए. उस समय चौकी इंचार्ज राजेश कुमार चौकी पर मौजूद थे. चमन सिंह ने उन्हें एकलौते बेटे संजीत के लापता होने की जानकारी दी. साथ ही अपहरण की आशंका भी जताई. राजेश कुमार ने चमन सिंह से तहरीर ले ली, फिर पूछा, ‘‘तुम्हारी किसी से दुश्मनी या जमीन वगैरह की रंजिश तो नहीं है. संजीत का लेनदेन में किसी से झगड़ाफसाद तो नहीं हुआ था.’’

‘‘सर, हम सीधेसादे लोग हैं. हमारी या बेटे संजीत की न तो किसी से रंजिश है, न ही लेनदेन का झगड़ा है.’’

‘‘तुम्हें किसी पर शक है?’’ चौकीप्रभारी राजेश कुमार ने पूछा.

‘‘हां सर, मुझे राहुल यादव पर शक है.’’ चमन सिंह ने बताया.

‘‘वजह बताओ?’’ राजेश कुमार ने अचकचा कर पूछा.

‘‘सर, राहुल यादव, विश्व बैंक कालोनी बर्रा में रहता है. उस के पिता पीएसी में तथा चाचा मैनपुरी में दरोगा है. राहुल के साथ मैं ने अपनी बेटी रुचि का विवाह तय किया था. लेकिन कुछ कारणों से हम ने रिश्ता तोड़ दिया था. रिश्ता टूटने से राहुल बौखला गया. मुझे शक है कि इसी बौखलाहट में उस ने संजीत का अपहरण किया है.’’

‘‘ठीक है, तुम जाओ. मैं इस मामले को देखता हूं.’’ कह कर राजेश कुमार ने चमन सिंह को टरका दिया. उन्होंने न तो गुमशुदगी दर्ज की और न ही किसी से कोई पूछताछ की.

24 जून की सुबह 10 बजे चमन सिंह आशंका जताते हुए राहुल के खिलाफ नामजद तहरीर ले कर चौकी पहुंचे. तहरीर पढ़ते ही चौकीप्रभारी राजेश कुमार भड़क उठे, ‘‘तुम्हारा बेटा गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती करने गया होगा. किसी पर गलत आरोप लगाओगे तो भुगतना पड़ेगा. गलत होने पर मैं तुम्हारे खिलाफ मानहानि का मुकदमा लिख दूंगा, समझे.’’

चमन सिंह समझ गए कि यहां कोई काररवाई संभव नहीं है. अत: वह थाना बर्रा जा कर थानाप्रभारी रणजीत राय से मिले. उन्होंने उन्हें जनता नगर चौकी में दी गई तहरीर के आधार पर गुमशुदगी दर्ज न करने की बात बताई. इस पर वह नाराज होते हुए बोले, ‘‘हथेली पर सरसों मत उगाओ. तुम्हारा बेटा मिल जाएगा.’’

थाने से निराशा हाथ लगी तो चमन सिंह डीएसपी (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता और एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता से मिले और अपनी परेशानी बताई. लेकिन जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों ने भी उस के आंसुओं को नजरअंदाज कर दिया. दरअसल, पुलिस यह मान रही थी कि संजीत मौजमस्ती करने कहीं चला गया है. अगर उस का अपहरण हुआ होता तो अब तक फिरौती के लिए फोन आ गया होता. पुलिस की खुमारी तब टूटी जब 29 जून को फिरौती के लिए अपहर्त्ताओं का फोन आया. उन्होंने संजीत को सहीसलामत लौटाने के लिए 30 लाख रुपए मांगे थे. चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बताई. पुलिस ने उन्हें रुपयों का इंतजाम करने को कहा.

एक साधारण परिवार के लिए 30 लाख रुपए का इंतजाम करना आसान नहीं था. लेकिन सवाल एकलौते बेटे का था. चमन सिंह ने बेटी रुचि की शादी के लिए जो रकम सहेज कर रखी थी, वह और बेटी की शादी के लिए बनवाए गए जेवर बेच कर पैसा एकत्र किया. पर 30 लाख की रकम पूरी नहीं हो पाई. इस पर उन्होंने गांव की जमीन और मकान बेच दिया. पैसा एकत्र हो गया तो चमन सिंह ने यह बात पुलिस को बता दी. इस बीच अपहर्त्ताओं  के फोन पर फोन आ रहे थे. उन का कहना था कि चाहे जैसे भी हो, 30 लाख रुपए जमा कर लो, बेटा अमित मिल जाएगा. रुचि हर रोज सारी बात पुलिस को बता रही थी. इस बीच संजीत के अपहरण को 3 हफ्ते बीत गए थे. इसे पुलिस की कमजोरी ही कहा जाएगा कि वह अपहर्त्ताओं का नंबर तक ट्रेस नहीं कर पाई थी.

रकम का इंतजाम हो जाने पर यह बात पुलिस को बता दी गई. इस पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने अपहर्त्ताओं को रंगेहाथों पकड़ने के लिए योजना तैयार की. इस के लिए क्राइम ब्रांच की टीम और सर्विलांस टीम को भी साथ लिया गया. चमन सिंह के परिवार को तो अपहर्त्ताओं के फोन का इंतजार था ही, पुलिस भी इंतजार कर रही थी. लेकिन अपहर्त्ताओं का फोन आया 12 जुलाई को. चमन सिंह ने उन्हें बता दिया कि रकम तैयार कर ली गई है. इस पर उन्होंने कहा कि 30 लाख की रकम बैग में भर कर तैयार रखो. जल्दी ही बता दिया जाएगा कि रकम कहां और कैसे देनी है. रुचि ने यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी.

उन्होंने पूरी टीम को सादे कपड़ों में तैयार रहने के लिए अलर्ट कर दिया.  लेकिन उस दिन अपहर्त्ताओं का फोन नहीं आया. उन का फोन आया 13 जुलाई की दोपहर में. अपहर्त्ताओं ने चमन सिंह से कहा कि शाम 5 बजे रकम का बैग ले कर वह गुजैनी हाइवे के फ्लाईओवर पर पहुंच जाएं. फ्लाईओवर से बैग नीचे फेंकना है. वे लोग पुल के नीचे रहेंगे. रकम मिलते ही संजीत को छोड़ दिया जाएगा. यह बात भी एसपी अपर्णा गुप्ता को बता दी गई. उन्होंने पुलिस टीम को तैयार रहने का आदेश दे दिया. ठीक 6 बजे पुलिस की 2 गाडि़यां फ्लाईओवर पर पहुंच गईं. एक गाड़ी में पुलिस जवानों के साथ अपर्णा गुप्ता थीं और दूसरी में सहयोगियों के साथ थानाप्रभारी रणजीत राय थे.

तभी रकम का बैग ले कर चमन सिंह मोटरसाइकिल से वहां पहुंच गया. मोटरसाइकिल खड़ी कर के उस ने नीचे झांका. तभी अपहर्त्ताओं का फोन आ गया कि चंद कदम आगे जा कर बैग नीचे फेंक दो. चमन सिंह ने बैग नीचे फेंक दिया तो अपहर्त्ताओं का फिर फोन आया. उन्होंने कहा कि थोड़ा आगे जा कर हनुमान मंदिर है, वहीं पहुंचो. संजीत मिल जाएगा. इस बीच पुलिस की निगाहें चमन सिंह पर ही जमी थीं. जैसे ही उस ने बैग फेंका, पुलिस अपहर्त्ताओं को पकड़ने के लिए दौड़ी, लेकिन नीचे जाने का रास्ता लंबा था. पुलिस के वहां पहुंचने तक अपहर्त्ता बैग ले कर भाग गए थे. उधर चमन सिंह आंखों में आस समेटे मंदिर पर पहुंचा. लेकिन संजीत वहां नहीं मिला. पुलिस औपरेशन पूरी तरह फेल रहा.

चमन सिंह का परिवार अवाक रह गया. जैसेतैसे जुटाई 30 लाख की रकम तो गई ही, बेटा भी नहीं मिला. इस पर रुचि पिता के साथ जा कर आईजी मोहित अग्रवाल से मिली. रुचि ने पूरी बात आईजी को बताई. साथ ही संदेह भी व्यक्त किया कि पुलिस अपहर्त्ताओं से मिली हुई थी. संभव है पैसों का बैग भी पुलिस के ही पास हो. चमन सिंह और रुचि की शिकायत पर आईजी मोहित अग्रवाल उसी समय थाना बर्रा पहुंचे. उन्होंने थानाप्रभारी रणजीत राय से पूछताछ की. उन की बातों से संतुष्ट न होने पर उन्होंने रणजीत राय को सस्पेंड कर के हरमीत सिंह को थानाप्रभारी नियुक्त कर दिया.

इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने क्राइम ब्रांच व सर्विलांस टीम की मदद से जांच प्रारंभ की. उन्होंने पहले अपहृत संजीत के परिवार वालों से पूछताछ की, फिर संजीत के मोबाइल नंबर को खंगाला, जिस से पता चला अपहरण वाले दिन यानी 22 जून को संजीत के मोबाइल फोन पर एक नंबर से 5 काल आई थीं. 2 बार काल करने वाले ने बात की थी और 3 बार संजीत ने उसी नंबर पर बात की थी. रात पौने 8  बजे संजीत की उस नंबर पर आखिरी बार बात हुई थी. पौने 9 बजे संजीत का मोबाइल और संदिग्ध नंबर के मोबाइल का स्विच्ड औफ हो गया था. फिरौती के लिए अलग नंबर प्रयोग किया गया था. उस नंबर से 22 बार काल की गई थी.

इस जानकारी के बाद पुलिस टीम ने सिम बेचने वाले दुकानदार का पता लगाया तो पता चला उस की सिम कार्ड की दुकान चकरपुर में हैं. पुलिस ने उसे उठा कर कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने 6 सिम कार्ड बेचने की बात कही. सर्विलांस टीम ने सभी मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवानी शुरू की. साथ ही उन नंबरों को लिसनिंग पर भी लगा दिया. इस के बाद पुलिस ने धनवंतरि अस्पताल की पैथालौजी के 2 कर्मचारियों को हिरासत में लिया. उन में से एक की संदिग्ध नंबर पर बात हुई थी. उस कर्मचारी से सख्ती से पूछताछ की गई तो पता चला, वह संदिग्ध नंबर कुलदीप गोस्वामी का था, जो कुछ माह पहले धनवंतरि अस्पताल में काम करता था. लौकडाउन में विवाद होने पर उस ने नौकरी छोड़ दी थी. कुलदीप गोस्वामी पुलिस की रडार पर आया तो उस की तलाश शुरू की गई.

23 जुलाई, 2020 की सुबह 10 बजे थानाप्रभारी हरमीत सिंह को सूचना मिली कि कुलदीप गोस्वामी अपने साथियों के साथ अंबेडकर नगर के पटेल चौक पर मौजूद है. इस सूचना पर हरमीत सिंह क्राइम ब्रांच की टीम के साथ पटेल चौक पहुंच गए. पुलिस को देख कर एक युवती और 4 युवक भागने लगे. लेकिन क्राइम ब्रांच की टीम ने घेराबंदी कर युवती सहित 4 युवकों को गिरफ्तार कर लिया और सुरक्षा की दृष्टि से थाना बर्रा न ले जा कर सीओ औफिस गोविंद नगर ले आए. उन से पूछताछ की गई तो युवकों ने अपना नाम कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह और रामजी शुक्ला बताया. युवती ने अपना नाम प्रीति शर्मा बताया. पकड़े गए सभी युवक थे. उन की उम्र 25 से 30 वर्ष के बीच थी.

पकड़े गए युवकों से जब संजीत यादव के अपहरण के संबंध में पूछा गया तो सब ने मौन धारण कर लिया और एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. इस पर उन्हें तराशा गया, आखिर उन्होंने जुबान खोली और बताया कि संजीत अब इस दुनिया में नही है. इन लोगों ने आगे बताया कि अपहरण के 4 दिन बाद उस की हत्या कर दी थी. फिर उस के शव को बोरी में भर कर पांडव नदी में फेंक दिया था. यह सुनते ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह के होश उड़ गए. उन्होंने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही आईजी मोहित अग्रवाल, एसएसपी दिनेश कुमार पी, तथा एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने अपहर्ताओं से पूछताछ की, फिर शव बरामदगी के लिए फ्लड कंपनी बटालियन की 6 बोट तथा 35 गोताखोरों को बुला कर उन्हें पांडव नदी में उतारा गया.

गोताखोरों ने 30 किलोमीटर तक शव को तलाशा, लेकिन शव बरामद नहीं हो सका. इधर अपहर्ताओं की निशानदेही पर पुलिस ने सड़क किनारे झाड़ी में छिपाई गई संजीत की मोटरसाइकिल, अपहरण व हत्या में प्रयुक्त कार, कार में रखा बैग तथा 4 मोबाइल फोन बरामद किए. पुलिस अब तक फिरौती के 30 लाख रुपए बरामद नहीं कर पाई थी. इस बाबत अपहर्ताओं से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि पुलिस के डर से वे नोटों से भरा बैग नहीं ले जा पाए थे. अब सवाल था, जब नोटों से भरा बैग अपहर्ताओं ने नहीं उठाया, तो बैग क्या पुलिस ने गायब कर दिया.

पुलिस अधिकारियों को डर था कि हत्या की खबर फैलते ही बर्रा क्षेत्र में सनसनी फैल जाएगी. लोग सड़क पर उपद्रव मचाएंगे. नेता आग में घी डालने का काम करेंगे, अत: पुलिस अधिकारियों ने पहले क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की, फिर रात 11 बजे चमन सिंह के घर जा कर अपहर्ताओं के पकड़े जाने तथा संजीत की हत्या कर शव को पांडव नदी में बहाने की जानकारी दी. संजीत की हत्या की खबर सुन कर घर में कोहराम मच गया. चमन सिंह, कुसुमा और रुचि चीखनेचिल्लाने लगी. उन की चीखपुकार सुन कर रात के सन्नाटे में मोहल्ले के लोग घरों से निकल आए.

देखते ही देखते सैकड़ों की भीड़ चमन सिंह के घर आ पहुंची. हत्या की जानकारी मिलने पर लोगों का गुस्सा भड़क उठा. मांबेटी की चीखों से महिलाएं द्रवित हो उठीं. रुचि पुलिस अधिकारियों के पैर पकड़ कर बोली, ‘‘आप लोग, जिंदा तो मेरे भाई को ला नहीं पाए, कम से कम मुर्दा ही ला दो. ताकि आखिरी बार उसे राखी बांध सकूं.’’ उस की इस बात पर पुलिस अधिकारी द्रवित हो गए. उन्होंने रुचि को धैर्य बंधाया. 24 जुलाई, 2020 की सुबह 11 बजे आईजी मोहित अग्रवाल तथा एसएसपी दिनेश कुमार पी ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैस वार्ता बुलाई और अपहर्ताओं को प्रिंट तथा इलेक्ट्रौनिक मीडिया के सामने पेश कर संजीत के अपहरण और हत्या का खुलासा कर दिया.

मीडिया के तीखे सवालों के आगे पुलिस अधिकारी बेबस नजर आए. चूंकि अपहर्ताओं ने अपहरण और हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था, अत: थाना बर्रा पुलिस ने पहले से दर्ज अपहरण के मामले में राहुल यादव का नाम हटा दिया और उसी क्राइम नंबर पर भादंवि की धारा 364/302/201/120बी के तहत कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हेें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस जांच तथा अभियुक्तों के बयानों से पैसे के लिए दोस्ती का कत्ल करने की घटना प्रकाश में आई.

कानपुर शहर के बर्रा भाग 5 में रहने वाला संजीत यादव नौबस्ता स्थित धनवंतरि अस्पताल के पैथालौजी विभाग में काम करता था. उसी के साथ कुलदीप गोस्वामी तथा ज्ञानेंद्र सिंह काम करते थे. कुलदीप का दोस्त नीलू सिंह था, जबकि ज्ञानेंद्र का दोस्त रामजी शुक्ला था. सभी में खूब पटती थी और सप्ताह में एक बार बीयर पार्टी होती थी. दोस्तों के बीच संजीत धनवान होने का बखान करता था. उस ने दोस्तों को बताया था कि उस के 2 ट्रक चलते हैं, 2 कार हैं, गांव में जमीनमकान है. नौकरी तो वह समय काटने के लिए करता है. जल्द ही अपनी पैथालौजी खोल लेगा.

संजीत का दोस्त ज्ञानेंद्र सिंह दबौली में रहता था. उस के पिता श्रीकृष्ण यादव धनाढ्य थे. उस ने पिता से अस्पताल खोलने के लिए पूंजी लगाने का अनुरोध किया था. लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया था. बीएससी नर्सिंग पास ज्ञानेंद्र सिंह महत्त्वाकांक्षी था. वह अमीर बनना चाहता था. पर 10-12 हजार की नौकरी से अमीर नहीं बना जा सकता था. यद्यपि वह ठाटबाट से रहता था. कार से आताजाता था. जनवरी 2020 में कुलदीप और ज्ञानेंद्र सिंह ने धनवंतरि अस्पताल से नौकरी छोड़ दी. ज्ञानेंद्र सिंह संविदा पर हैलट अस्पताल में काम करने लगा जबकि कुलदीप स्वरूपनगर में डा. एस.के. कटियार के यहां नौकरी करने लगा. कुलदीप सरायमीता पनकी में रहता था. उस के पिता प्रेम गोस्वामी किराए की गाड़ी चलाते थे. उस की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी.

कुलदीप की दोस्ती सचेंडी के गज्जापुरवा निवासी नीलू सिंह से थी. वह फरजी काम करता था. उस की मां की मौत हो चुकी थी और पिता चंद्रप्रकाश सरिया मिल में काम करते थे. 3 भाइयों में वह दूसरे नंबर का था. नीलू की एक महिला मित्र थी प्रीति शर्मा. वह हनुमान पार्क कौशलपुरी की रहने वाली थी. उस ने अपने पति को छोड़ दिया था और पनकी में अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी थी. नीलू सिंह का उस के घर आनाजाना था. वह अपनी अवैध कमाई उसी पर खर्च करता था. उस ने कुलदीप से भी उस की दोस्ती करा दी थी. ज्ञानेंद्र सिंह का दोस्त रामजी शुक्ला अंबेडकर नगर (गुजैनी) में रहता था. वह तेजतर्रार और अपराधी प्रवृत्ति का था. उस के पिता योगेश शुक्ला फैक्ट्रीकर्मी थे. छोटा भाई श्यामजी है.

दोनों भाइयों को राजनैतिक संरक्षण प्राप्त था, जिस से क्षेत्र में उन का दबदबा था. ज्ञानेंद्र सिंह ने उस से दबंगई की वजह से ही दोस्ती की थी. ज्ञानेन्द्र सिंह को 2 टीवी सीरियल सावधान इंडिया और क्राइम पैट्रोल बेहद पसंद थे. इन सीरियलों को देख कर उस ने अपहरण कर फिरौती वसूलने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने कुलदीप, रामजी शुक्ला, नीलू सिंह व उस की प्रेमिका प्रीति शर्मा को शामिल किया. प्रीति को 3 लाख रुपए देने का लालच दिया गया. एक रोज सब ने सिर से सिर जोड़ कर माथापच्ची की तो संजीत यादव के अपहरण और फिरौती की बात तय हुई. क्योंकि उस के बताए अनुसार संजीत धनवान था.

योजना के तहत नीलू सिंह ने महिला मित्र प्रीति शर्मा के साथ जा कर 15 जून को रतनलाल नगर में ब्रोकर रवींद्र तिवारी की मार्फत 15 हजार रुपया मासिक किराए पर सुनील श्रीवास्तव का मकान ले लिया. मकान किराए पर लेते समय प्रीति को उस ने अपनी पत्नी बताया था. इस मकान में प्रीति अपनी मां सिम्मी के साथ रहने लगी. नीलू ने ही फरजी आईडी पर 6 सिम और 4 चाइनीज मोबाइल खरीदे और ज्ञानेंद्र को दे दिए. ज्ञानेंद्र ने चारों मोबाइल आपस में बांट लिए. ये मोबाइल अपहरण में इस्तेमाल करने के लिए थे. इधर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को बेहोश करने के लिए नशे के इंजेक्शन, मुंह पर लगाने के लिए टेप तथा नींद की गोलियां हैलट अस्पताल के सामने मैडिकल स्टोर से खरीदीं.

मैडिकल स्टोर के कर्मचारी ज्ञानेंद्र को जानते थे इसलिए उन्होंने डाक्टर का पर्चा नहीं मांगा. ज्ञानेंद्र ने इस सामान को बैग में सुरक्षित कर कार में रख लिया. 22 जून की शाम 7बज कर 47 मिनट पर ज्ञानेंद्र सिंह ने संजीत को फोन कर के बताया कि आज उस का जन्मदिन है, पार्टी करने चलते हैं. पार्टी के नाम पर संजीत तैयार हो गया. इस के बाद दोनों का फोन पर संपर्क बना रहा. ज्ञानेंद्र अपनी फोर्ड फीगो कार ले कर शिवाजी पुलिया नौबस्ता के पास खड़ा हो गया. उस समय कार में ज्ञानेंद्र के अलावा कुलदीप, नीलू तथा रामजी शुक्ला मौजूद थे. कुछ देर बाद संजीत आया तो इन लोगों ने उसे कार में बिठा लिया.

कार में ही उन लोगों ने संजीत को शराब पिलाई. उसी में नशीली गोलियां मिला दी गई थीं. बेहोश होेने पर ये लोग उसे रतनलाल नगर स्थित किराए वाले मकान पर ले आए. यहां प्रीति पहले से मौजूद थी. उसी ने दरवाजा खोला. कमरे में ला कर इन लोगों ने संजीत के हाथपैर बांधे, मुंह पर टेप लगाया और नशीला इंजेक्शन लगा दिया. इस के बाद बारीबारी से सब उस की निगरानी करने लगे. 26 जून की रात 10 बजे खाना खाते वक्त संजीत ने भागने का प्रयास किया और गेट तक पहुंच गया. लेकिन नीलू सिंह ने उसे दबोच लिया. इस के बाद ज्ञानेंद्र, कुलदीप व रामजी शुक्ला आ गए. सभी ने मिल कर संजीत का गला घोंट दिया. फिर शव को बोरी में भर कर, कार की डिक्की में रखा और सवेरा होने के पहले ही पांडव नदी में फेंक आए. फिर नीलू को छोड़ कर सब अपनेअपने घर चले गए.

संजीत की हत्या के बाद अपहर्त्ताओं ने फिरौती के लिए फोन किया और 30 लाख रुपए की मांग की. 13 जुलाई को उन्होंने फिरौती की रकम ले भी ली. अपहर्त्ताओं ने पुलिस से बचने का भरसक प्रयास किया, लेकिन बच नहीं पाए और पकड़े गए. इधर संजीत की हत्या की खबर प्रिंट मीडिया में छपी और टीवी चैनलों में दिखाई जाने लगी तो राजनीतिक भूचाल आ गया. सपा, बसपा व कांग्रेस के बड़े नेता प्रदेश की कानूनव्यवस्था पर सवाल खड़े करने लगे तो सीएम योगी तिलमिला उठे. मुख्यमंत्री ने आईजी मोहित अग्रवाल से संजीत प्रकरण की जानकारी जुटाई, साथ ही पुलिस की भूमिका की भी जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने लापरवाह पुलिस अधिकारियों व पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करने का फरमान जारी कर दिया.

एसएसपी दिनेश कुमार पी का भी तबादला झांसी कर दिया गया. शासन के आदेश पर एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता, डीएसपी मनोज कुमार गुप्ता, पूर्व बर्रा थानाप्रभारी रणजीत राय, चौकी प्रभारी राजेश कुमार, दरोगा योगेंद्र सिंह, सिपाही अवधेश, भारती, दिशू, विनोद कुमार, सौरभ, मनीष और शिव प्रताप को सस्पेंड कर दिया गया. लेकिन मृतक संजीत की बहन रुचि ने मीडिया से रूबरू हो कर कहा कि सस्पेंड पुलिसकर्मियों की लापरवाही से उस के भाई की हत्या हो गई. इसलिए ये पुलिसकर्मी उतने ही दोषी हैं, जितने अपहर्त्ता. उस की शासन से मांग कि केवल निलंबन से काम नहीं चलेगा. उन पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जाए.

25 जुलाई, 2020 को थाना बर्रा पुलिस ने अभियुक्त ज्ञानेंद्र सिंह, कुलदीप गोस्वामी, नीलू सिंह, रामजी शुक्ला तथा प्रीति शर्मा को कानपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा संकलन तक पुलिस न तो शव बरामद कर सकी थी और न ही नोटों भरा बैग. बैग बरामदगी तथा जांच हेतु पुलिस हेडक्वार्टर से एडीजी वी.पी. जोगदंड को भेजा गया. उन्होंने जांच शुरू कर दी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित