Crime Stories: बेईमान हुए इमानदार रिश्ते

Crime Stories: ताऊ और ताई तो शालू को पढ़ालिखा कर उस की जिंदगी रौशन करना चाहते थे जबकि वह कशिश के प्यार में पड़ कर अपने शुभचिंतक ताऊ और ताई को धोखा दे रही थी. इस के बाद उस ने क्या किया…

बच्चे पढ़लिख कर कामयाबी के शिखर पर पहुंच जाएं हर मातापिता के लिए यह बेहद खुशी की बात होती है. उन्हें लगता है कि उन की जिंदगी भर की मेहनत कामयाब हो गई. उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग में सहायक अभियंता शनसवीर सिंह और उन की पत्नी निर्मला खुश थीं कि उन का युवा बेटा पुलकित सिंह भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) में सलैक्शन के बाद लेफ्टिनेंट बन गया था.

11 जून, 2015 को देहरादून आयोजित पासिंग आउट परेड में जब उन्होंने अपनी आंखों से बेटे के कंधों पर स्टार लगते देखे तो दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. शिक्षा के बल पर उन्होंने बेटे को इस मुकाम तक पहुंचा दिया था. मृदुभाषी शनसवीर खुद तो उच्च शिक्षित थे ही, उन की पत्नी निर्मला भी उच्च शिक्षित थीं. उन्होंने एमएससी (फिजिक्स) व बीएड की डिग्रियां ली थीं और शिक्षिका रही थीं, लेकिन सन 2000 में उन्होंने पारिवारिक कारणों से नौकरी को अलविदा कह दिया था.

शनसवीर जनपद मेरठ की मवाना रोड स्थित पौश कालोनी डिफैंस कालोनी की कोठी नंबर सी-53 में रहते थे. उन के 2 ही बच्चे थे, बड़ी बेटी प्रिंसी और उस से छोटा पुलकित. प्रिंसी ने एमबीबीएस, एमडी किया था, जिस का उन्होंने विवाह कर दिया था. प्रिंसी के पति भी डाक्टर थे. प्रिंसी दिल्ली के राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर सीनियर रेजीडेंट डाक्टर नियुक्त थीं. शनसवीर सिंह मूलरूप से मुजफ्फरनगर जिले की जानसठ तहसील के गांव जंघेड़ी के रहने वाले थे. उन के पिता वेद सिंह किसान थे. शनसवीर 5 भाइयों में चौथे नंबर पर थे. उन के अन्य भाई गांव में ही रहते थे. इन में सुभाष की तबीयत खराब रहती थी, उन का नियमित उपचार चल रहा था.

शारीरिक कमजोरी की वजह से वह ठीक से चलफिर नहीं पाते थे. कुछ महीने पहले शनसवीर ने मेरठ में ही उन का औपरेशन कराया था. कुछ दिन मेरठ रह कर वह गांव चले गए थे. जबकि उन की पत्नी सविता शनसवीर के साथ ही रह रही थीं. उन के सब से छोटे भाई सुखपाल की युवा बेटी शालू सिंह उन्हीं के पास रह कर पढ़ रही थी. वह एक इंजीनियरिंग कालेज से बीबीए कर रही थी. शनसवीर की पोस्टिंग वर्तमान में जिला संभल में थी. वह वहीं रहते भी थे. हफ्ते-10 दिन में घर आ जाया करते थे.

शनसवीर परिवार के अपने नजदीकी लोगों को साथ ले कर चलने वाले व्यक्ति थे. यही वजह थी कि वह एक भाई का इलाज करा रहे थे तो दूसरे भाई की बेटी को अपने पास रख कर पढ़ा रहे थे. दरअसल निर्मला चाहती थीं कि उन के बच्चों की तरह शालू भी पढ़ाई कर के कुछ बन जाए. वह शालू को बहुत प्यार करती थीं. प्रिंसी और पुलकित के बाद शालू ही उन के प्यार की एकलौती हकदार थी. निर्मला उस की सभी जरूरतें बिना किसी भेदभाव के पूरा करती थीं.

सिंह दंपति बेटे की पासिंग आउट परेड देखने के लिए देहरादून गए थे. 14 जून को वापस आए तो पुलकित भी उन के साथ था. अगले दिन शनसवीर अपनी ड्यूटी पर चले गए, जबकि पुलकित एक विवाह समारोह में शामिल होने के लिए दिल्ली और वहां से चंडीगढ़ चला गया. शनसवीर के ड्यूटी पर चले जाने के बाद कोठी में 3 लोग ही रह गए थे. एक उन की पत्नी निर्मला, दूसरी निर्मला की देवरानी सविता और तीसरी उन की भतीजी 20 वर्षीया शालू.

शनसवीर आदतन प्रतिदिन संभल से पत्नी को फोन करते रहते थे. 17 जून को भी उन्होंने दिन में 2 बार उन से बात की. इस के बाद रात 10 बजे उन्होंने पत्नी का मोबाइल मिलाया तो वह स्विच औफ आया. इस पर उन्होंने घर का लैंडलाइन फोन मिलाया तो फोन भतीजी शालू ने उठाया. आवाज पहचान कर वह बोले, ‘‘अपनी ताई से बात कराओ.’’

‘‘नमस्ते ताऊजी, वह तो घर पर नहीं हैं.’’ शालू ने कहा तो शनसवीर चौंके. क्योंकि उस वक्त निर्मला को घर पर ही होना चाहिए था.

‘‘कहां हैं वह?’’

‘‘पता नहीं, मुझे तो बहुत फिक्र हो रही है.’’ शालू के जवाब से उन की चिंता बढ़ी तो उन्होंने पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’

‘‘वह मिठाई ले आने की बात कह कर करीब 7 बजे गई थीं, लेकिन अभी तक आई नहीं हैं.’’

‘‘और तुम मुझे अब बता रही हो?’’ उन्होंने नाराजगी प्रकट करते हुए कहा और शालू से निर्मला को आसपड़ोस में देखने को कहा.

उन्होंने सोचा कि हो सकता है, कहीं उन्हें बातों में वक्त लग गया हो. यह बात सच थी कि निर्मला को मिठाई लेने दुकान पर जाना था, क्योंकि उन्होंने फोन पर यह बात दिन में उन्हें बताई थी कि मोहल्ले के कुछ लोगों को बेटे के अफसर बनने की खुशी में मिठाई दे कर आनी है. इस तरह बिना बताए इतनी देर तक निर्मला कहां हैं, इस बात ने शनसवीर को चिंता में डाल दिया था. कुछ देर बाद उन्होंने शालू को पुन: फोन किया. उस ने बताया कि वह पड़ोस में सब के यहां पूछ आई है, वह किसी के यहां नहीं हैं.

शनसवीर ने फोन पर शालू से ही बात की, क्योंकि जेठ होने की वजह से सविता उन से टेलीफोन पर भी बात नहीं करती थी. उन्होंने शालू से पुन: फोन कर के कहा, ‘‘मनोरमा के यहां देख आओ, शायद वहां हों?’’

‘‘नहीं ताऊजी, वह तो खुद ही उन्हें पूछने आई थीं. वह इंतजार कर के चली गईं.’’

शालू के इस जवाब से वह और भी चिंतित हो गए. दरअसल मनोरमा पड़ोस में ही साकेत में ही रहती थीं और निर्मला की सहेली थीं. परेशान हाल शनसवीर ने प्रिंसी को इस उम्मीद में फोन किया कि शायद मां ने बेटी को ही कुछ बताया हो. डा. प्रिंसी ने बताया कि उस की मां से दिन में बात हुई थी शाम को नहीं हुई. शनसवीर ने मनोरमा को फोन किया तो उन्होंने बताया कि वह निर्मला से मिलने गई थीं, लेकिन वह घर पर नहीं मिली थीं.

परेशान शनसवीर आधी रात के बाद संभल से चल कर मुंहअंधेरे मेरठ पहुंच गए. इस बीच न तो निर्मला घर आई थीं और न ही उन का मोबाइल औन हुआ था. निर्मला के इस तरह गायब होने से घर में शालू व सविता भी परेशान थीं. शनसवीर के आने पर उन दोनों ने उन्हें बता दिया कि उन्हें निर्मला के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है. निर्मला के बैडरूम में ताला लगा हुआ था. शालू ने बताया कि चाबी वह साथ ले गई हैं. बैडरूम में ताला लगाने का औचित्य शनसवीर की समझ में नहीं आया. उन्होंने किसी तरह दरवाजा खोला. बैडरूम बिलकुल सामान्य था. पत्नी कहीं किसी दुर्घटना की शिकार न हो गई हों, यह सोच कर उन्होंने शहर के अस्पतालों में भी पता किया. लेकिन उन का कोई पता नहीं चल सका. इस बात का पता चलने पर उन के कई परिचित भी आ गए थे.

शनसवीर ने पुलिस कंट्रोल रूम को पत्नी के लापता होने की सूचना दे दी थी. पुलिस उन के घर आई और थाने चल कर गुमशुदगी दर्ज कराने को कहा. वह अपने परिचित महेश बालियान के साथ थाना लालकुर्ती पहुंचे और पत्नी की गुमशुदगी दर्ज करा दी. उन्होंने पत्नी का एक फोटो भी पुलिस को दे दिया. निर्मला रहस्यमयी ढंग से कहां लापता हो गई थीं, कोई नहीं जानता था. उन के अपहरण की आशंका जरूर थी, लेकिन शनसवीर के पास कोई भी संदिग्ध फोन नहीं आया था. अगले दिन शनसवीर की बेटी डा. प्रिंसी व दामाद भी घर आ गए. इस बीच पुलिस अधिकारियों को यह बात पता चली तो डीआईजी रमित शर्मा व एसएसपी डी.सी. दुबे ने अधीनस्थों को इस मामले में जल्द काररवाई करने के निर्देश दिए.

एसपी (सिटी) ओ.पी. सिंह व एसपी संकल्प शर्मा के निर्देशन में थाना लालकुर्ती के थानाप्रभारी विजय कुमार पुलिस टीम के साथ शनसवीर के घर पहुंचे. निर्मला के लापता होने के वक्त चूंकि उन की देवरानी सविता व भतीजी शालू ही घर पर थे, इसलिए पुलिस ने दोनों से पूछताछ कर के उन के लापता होने का पूरा घटनाक्रम पता लगाया. पुलिस ने जांच को आगे बढ़ाने के लिए निर्मला और परिवार के अन्य सदस्यों के मोबाइल नंबर हासिल कर लिए. उन सभी नंबरों की जांच के लिए क्राइम ब्रांच के प्रभारी श्यामवीर सिंह व उन की टीम को लगा दिया गया.

जांच में अगले दिन पता चला कि निर्मला के फोन की अंतिम लोकेशन कालोनी की ही थी. इस के बाद उन का मोबाइल बंद हो गया था. एक और खास बात यह थी कि शालू का भी मोबाइल निर्मला के लापता होने के बाद से लगातार बंद था. पुलिस को निर्मला के लापता होने की कोई खास वजह समझ में नहीं आ रही थी. इसलिए उस ने अपनी जांच परिवार के इर्दगिर्द ही समेट दी. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थाना की थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने एकएक कर के परिवार के सभी सदस्यों से पूछताछ की. सविता घर में ही रहती थी, बाहरी दुनिया से उसे ज्यादा मतलब नहीं था. निर्मला को ले कर वह अपने बयान पर कायम थी कि उसे नहीं पता कि वह कहां चली गईं.

पुलिस ने शालू से उस का मोबाइल बंद होने की वजह पूछी तो वह कोई खास जवाब नहीं दे सकी. जबकि इस के पहले प्रतिदिन उस के मोबाइल का जम कर इस्तेमाल होता था. पुलिस ने उसे शक के दायरे में ले लिया. शालू तेजतर्रार युवती थी. शालू निर्मला की सगी भतीजी थी. उन के गायब होने में उस का कोई हाथ हो सकता है, यह सोचा भी नहीं जा सकता था. लेकिन मोबाइल उस की चुगली कर रहा था. अपने इस शक को पुलिस ने शनसवीर को भी बता दिया.

शनसवीर के पास भतीजी पर शक करने की कोई वजह तो नहीं थी, लेकिन उस की एक बात में उन्हें भी झोल नजर आ रहा था. दरअसल उस ने बताया था कि निर्मला की सहेली मनोरमा जब घर आई थीं तो बैठ कर इंतजार कर के चली गई थीं. जबकि मनोरमा का कहना था कि वह निर्मला को पूछने के लिए आईं तो शालू ने बिना दरवाजा खोले ही कह दिया था कि पता नहीं वह कब आएंगी, आप कब तक बैठ कर इंतजार करेंगी. दोनों की बातों में भिन्नता थी. सविता से इस बारे में पूछा गया तो उस ने बताया कि वह घर के अंदर थी. मनोरमा कब आई थीं, उसे पता नहीं. मामला परिवार का था, इसलिए सभी ने शालू से पूछताछ की, लेकिन उस ने निर्मला के बारे में कोई जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

इस बीच पुलिस ने शालू के मोबाइल की काल डिटेल्स में मिले एक ऐसे नंबर को जांच में शामिल कर लिया, जिस पर वह सब से ज्यादा बातें करती थी. वह नंबर कशिश पुत्र चंद्रपाल निवासी गांव सलारपुर का था. यह गांव मेरठ के ही थाना इंचौली के अंतर्गत आता था. इस में चौंकाने वाली बात यह थी कि घटना वाली शाम इस नंबर की लोकेशन कालोनी की ही पाई गई थी. इस से पहले भी कई बार इस की लोकेशन कालोनी की पाई गई थी. इस का मतलब वह शालू के पास आता रहता था. अब शालू पूरी तरह शक के दायरे में आ गई थी. निस्संदेह कुछ ऐसा जरूर था, जो वह सभी से छिपा रही थी.

पुलिस एक बार फिर 20 जून को शनसवीर के घर पूछताछ करने पहुंच गई. सीओ स्वर्णजीत कौर व महिला थानाप्रभारी रश्मि चौधरी ने शालू से पूछताछ की, ‘‘तुम कशिश को जानती हो?’’

इस पर वह चौंकी जरूर, लेकिन बहुत जल्दी उस ने बड़े आत्मविश्वास से जवाब दिया, ‘‘जी हां, वह मेरे साथ पढ़ता है.’’

‘‘17 तारीख को क्या वह यहां आया था?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

पुलिस जानती थी कि उस का यह जवाब बिलकुल झूठ है.

‘‘सोच कर बताओ?’’

‘‘नहीं, वह यहां नहीं आया था.’’

सविता ने भी घर में किसी के आने से इनकार कर दिया था. अलबत्ता चिंतामग्न जरूर थी. पुलिस ने अपना सारा ध्यान शालू पर जमा दिया. पुलिस समझ गई थी कि शालू जरूरत से ज्यादा चालाक लड़की है. पुलिस सख्ती नहीं दिखाना चाहती थी. ऐसी स्थिति में उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लेना जरूरी था. पुलिस ने शनसवीर को असलियत बता कर उसे हिरासत में ले लिया. पुलिस अब उस के जरिए ही कशिश तक पहुंचना चाहती थी. उस शाम एक और नंबर की लोकेशन भी कालोनी में थी. उस नंबर पर भी कशिश की बातें होती थीं. वह नंबर गौरव उर्फ राजू पुत्र चंद्रसेन का था. वह भी गांव सलारपुर का रहने वाला था.

पुलिस समझ गई कि इस तिगड़ी के बीच ही निर्मला के लापता होने का राज छिपा है. सविता गांव की भोली सूरत वाली औरत थी. पुलिस को उस पर ज्यादा शक नहीं था. पुलिस शालू को ले कर कशिश की तलाश में कालेज पहुंची. कशिश उस दिन कालेज नहीं आया था. पुलिस ने शालू से कशिश को फोन कर के कालेज बुलाने को कहा. उस की बात तो हुई, लेकिन कशिश ने बताया कि वह मोदीनगर में है. इसलिए अभी नहीं आ सकता. पुलिस ने कशिश की लोकेशन पता लगाई तो पता चला कि वह गांव में ही है. पुलिस उस के गांव पहुंची और कशिश के साथसाथ गौरव को भी हिरासत में ले लिया.

तीनों को थाने ला कर अलगअलग बैठा कर पूछताछ की गई तो उन के बयानों में भिन्नता नजर आई. इस के बाद पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने ऐसे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया, जिसे सुन कर पुलिस भी सन्न रह गई. ये लोग निर्मला की हत्या कर के उन की लाश को ठिकाने लगा चुके थे. इस हत्या में उन का साथ भोली दिखने वाली निर्मला की देवरानी सविता ने भी दिया था. वह पूरे राज को छिपाए हुए थी. पुलिस ने उसे भी हिरासत में ले लिया.

निर्मला की हत्या का पता चला तो परिवार में कोहराम मच गया. पुलिस ने कशिश की निशानदेही पर डिफैंस कालोनी से करीब 20 किलोमीटर दूर मोदीपुरम-ललसाना मार्ग पर एक स्थान से निर्मला का शव बरामद कर लिया. उन के गले में अभी भी दुपट्टा कसा हुआ था और हाथ बंधे हुए थे. पुलिस ने शव का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस ने पकड़े गए लोगों के खिलाफ शनसवीर की तहरीर पर भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत मुकदमा दर्ज कर सभी को विधिवत गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद सभी से विस्तृत पूछताछ की गई. निर्मला शालू को बहुत प्यार करती थीं. ऐसी स्थिति में आखिर सगी भतीजी ही उन की कातिल क्यों बनी, इस के पीछे एक चौंकाने वाली कहानी थी.

लोक निर्माण विभाग में नौकरी लगने के साथ ही शनसवीर परिवार को साथ रखने लगे थे. बाद में उन की तैनाती मेरठ में हुई तो उन्होंने डिफैंस कालोनी में अपनी कोठी बना ली. शनसवीर और उन की पत्नी उस सोच के व्यक्ति थे, जो परिवार को साथ ले कर चलते हैं और सभी की कामयाबी का ख्वाब देखते हैं. कई साल पहले वह छोटे भाई सुभाष की बेटी शालू को अपने साथ मेरठ ले आए कि शहर में अच्छी पढ़ाई कर के वह कुछ बन जाएगी. शालू बचपन से तेजतर्रार थी, यह बात सिर्फ उस की आदतों में लागू होती थी न कि पढ़ाई के मामले में. शनसवीर के परिवार में रह कर उस ने 8वीं तक की पढ़ाई की. बाद में वह गांव वापस चली गई. वहां रह कर उस ने मुजफ्फरनगर से इंटर किया. आगे की पढ़ाई वह अच्छे से कर सके, इसलिए निर्मला जून, 2013 में उसे अपने पास मेरठ ले आईं.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए मेरठ के एक इंस्टीट्यूट में उस का दाखिला करा दिया गया. इस बीच निर्मला की बेटी प्रिंसी ने सीपीएमटी का एग्जाम पास कर लिया. इस के बाद उस ने एमबीबीएस और एमडी किया. बाद में उस का विवाह हो गया और वह राममनोहर लोहिया अस्पताल में बतौर चिकित्सक अपनी सेवाएं देने लगी. साल 2014 में शनसवीर का बेटा पुलकित भी आईएमए में प्रशिक्षण के लिए चला गया.

इस बीच शनसवीर का स्थानांतरण संभल हो गया था. वहां से वह घर आते रहते थे. निर्मला भी कभीकभी उन के पास चली जाया करती थीं. रिश्तों में कोई दूरी महसूस न हो, इसलिए निर्मला शालू का हर तरह से खयाल रखती थीं. शालू उन लड़कियों में से थी, जो आजादी का नाजायज फायदा उठाती हैं. उस ने भी ऐसा ही किया. उस की दोस्ती अपने ही कालेज में पढ़ने वाले कशिश से हो गई. उन के बीच मोबाइल से ले कर घरेलू फोन तक पर बातों का लंबा सिलसिला चलने लगा.

निर्मला जब पति के पास संभल चली जातीं तो शालू की आजादी और बढ़ जाती. कुछ महीने पहले शनसवीर अपने भाई सुभाष का औपरेशन कराने के लिए मेरठ ले आए. उन के साथ उन की पत्नी सविता भी आई. औपरेशन के बाद सुभाष कुछ दिनों कोठी में रहे, उस के बाद गांव चले गए, जबकि सविता वहीं रहती रही. उधर शालू की कशिश से दोस्ती प्यार में बदल गई. दोस्ती और प्यार तक तो ठीक था, लेकिन दोनों के कदम मर्यादा की दीवारों को लांघ चुके थे. हालात बिगड़ने तब शुरू हुए, जब कशिश उस से मिलने कोठी पर भी आने लगा. अभी तक उस के और शालू के संबंध निर्मला से पूरी तरह छिपे थे. सविता यह बात किसी को न बताए. शालू ने निर्मला की बुराइयां कर के उसे अपने पक्ष में कर लिया था.

निर्मला व सविता की आर्थिक स्थिति में जमीनआसमान का अंतर था. यह बात सविता को अंदर ही अंदर कचोटती थी. जलन की यही भावना थी, जो उस ने शालू की हरकतों को निर्मला से पूरी तरह छिपा लिया था और उसे बिगड़ने की पूरी छूट दे दी थी. वह नहीं जानती थी कि बाद में इस का अंजाम भयानक भी हो सकता है. निर्मला सभी का भला करने की सोच रही थीं. उन के मन में अविश्वास जैसी कोई बात नहीं थी. लेकिन वह नहीं जानती थीं कि उन के लिए दोनों के दिलों में जहर भरा  है. निर्मला बहुत सुलझी हुई महिला थीं, पर रिश्तों के विश्वास के मामले में वह अपने ही घर में धोखा खा रही थीं.

शालू इंस्टीट्यूट जाने के बहाने न सिर्फ कशिश के साथ घूमतीफिरती थी, बल्कि निर्मला के पति के पास संभल चले जाने या बाजार आदि जाने के बाद उसे घर में ही बुला कर उस के साथ वक्त बिताती थी. निर्मला कभी सविता से शालू के बारे में कुछ पूछतीं तो वह उस की कोई शिकायत नहीं करती थी. ऐसी बातें छिपी नहीं रहतीं. एक दिन निर्मला को यह बातें किसी तरह पता चलीं तो उन्होंने शालू को जम कर लताड़ा और उसे जमाने की ऊंचनीच समझाई. शालू ने उन्हें यह समझाने की कोशिश की कि कशिश केवल उस का सहपाठी है, इसलिए कभीकभी कालेज की कापीकिताब देनेलेने के लिए आ जाता है.

देवर की बेटी को वह उस के अच्छे भविष्य के लिए अपने साथ रख कर पढ़ा रही थीं. सामाजिक व नैतिक रूप से उसे सही रास्ते पर रखने की जिम्मेदारी उन्हीं की थी. उन्होंने ऐसा ही किया भी. शालू ने कशिश से अपने रिश्ते खत्म करने की बात कह कर झूठी कसमें भी खा लीं. कसमें खाने व झूठ बोलने से शालू का गहरा नाता था. पकड़ में आई शालू की पहली गलती थी, इसलिए उन्होंने यह बातें पति व अन्य से छिपा लीं. शालू ने वादा तो किया, लेकिन वह उस पर लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी.

कशिश ने फिर से घर आना शुरू किया तो निर्मला ने परिवार के लोेगों को यह बात बता दी. सभी ने शालू को समझाया. गैर युवक घर में आता है, सविता ही इस बारे में कुछ बता सकती थी. लेकिन उस का कहना था कि शालू उस के सो जाने के बाद उसे बुलाती होगी. इसलिए उसे पता नहीं चलता. जबकि यह कोरा झूठ था. सविता जानती थी कि कशिश कब आताजाता था. शालू की हरकतें पता चलने पर शनसवीर उसे मेरठ में रखने के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने अपना इरादा बताया तो निर्मला शालू के पक्ष में आ गईं. उन्होंने कहा कि उसे एक आखिरी मौका देना चाहिए. दरअसल वह नहीं चाहती थीं कि शालू की पढ़ाई बीच में छूटे और उस का भविष्य खराब हो.

कुछ दिन तो सब ठीक रहा, लेकिन शालू ने फिर से पुराना ढर्रा अख्तियार कर लिया. वह फोन पर अकसर लंबीलंबी बातें करती, जिस के लिए निर्मला उसे डांट देती थीं. उसी बीच शनसवीर मेरठ आए और निर्मला को ले कर बेटे की परेड में शामिल होने देहरादून चले गए. वहां से वापस आ कर वह संभल चले गए. एक दिन निर्मला शालू की अलमारी में किताबें देखने लगीं तो उन्हें अलमारी में छिपा कर रखे गए कुछ ऐसे कागज मिले, जिन्हें देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वे महिला चिकित्सकों की रिपोर्टें थीं. उन पर शालू का नाम भी लिखा था. दरअसल शालू प्यार में नैतिकता की सारी हदें लांघ गई थी. शालू इस हद तक गिर जाएगी, निर्मला को कतई उम्मीद नहीं थी.

उन्होंने उसे बुला कर न सिर्फ थप्पड़ जड़ दिया, बल्कि इस बारे में पूछा तो रिपोर्ट देख कर उस के होश उड़ गए. उस के मुंह से शब्द नहीं निकले. निर्मला गुस्से में थीं. उस दिन उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें बरदाश्त नहीं कर सकती. सब को तुम्हारी असलियत बता कर गांव भेज दूंगी. तूने अब मेरा भरोसा तोड़ दिया है.’’

शालू की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई. वह चालाक तो थी ही, उस ने रोने का नाटक किया और निर्मला के पैर पकड़ कर माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने अब सही रास्ते पर चलने की कसमों की झड़ी लगा दी. यह 16 जून, 2015 की बात थी. शालू अपनी हरकत पकड़े जाने से बहुत डर गई. सविता से भी यह बातें छिपी नहीं थीं. उस ने शालू से कहा कि अब उसे कोई नहीं बचा सकता. शालू अपनी आजादी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी.

इसलिए मन ही मन उस ने एक खतरनाक निर्णय ले लिया और वह फैसला कशिश को फोन पर बता कर कहा, ‘‘कशिश मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती. ताई ने अगर ये बातें सब को बता दीं तो मुझे हमेशा के लिए गांव जाना पड़ जाएगा. तुम किसी भी तरह उन्हें रास्ते से हटा दो. उन के मरने के बाद कोठी में तुम आजादी से आ सकोगे. वैसे भी उन के बाद यहां सब मेरा है.’’

कशिश के सिर पर भी शालू के प्यार का जुनून सवार था. दोनों ने निर्मला को रास्ते से हटाने की योजना बना ली. अपनी इस योजना में कशिश ने गांव के ही अपने दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. उधर शालू ने सविता को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया. सविता ने भी सोचा कि निर्मला के दुनिया से चले जाने के बाद घर पर उस का एकक्षत्र राज हो जाएगा. इस बीच शालू निर्मला पर उस वक्त नजर रखती थी, जब वह फोन पर पति व बेटी से बातें करती थीं. उन्होंने शालू की हरकत किसी को नहीं बताई थी. जब वह बात करती थीं तो शालू हाथ जोड़ कर उन के सामने खड़ी हो जाती थी. यह शालू की योजना का हिस्सा था.

योजना के अनुसार 17 जून को कशिश कालोनी में आया. शालू बहाने से बाहर आ कर उस से मिली तो वह नींद की गोलियां उसे देते हुए बोला, ‘‘जब अपना काम कर लेना तो फोन कर देना.’’

‘‘ठीक है, मैं तुम्हें फोन कर दूंगी.’’

दोपहर बाद निर्मला अपने बैडरूम में थीं, तभी शालू उन के लिए शरबत बना कर ले आई. उस में उस ने नींद की कई गोलियां मिला दी थीं. निर्मला को चूंकि मालूम नहीं था, इसलिए उन्होंने शरबत पी लिया. शरबत ने अपना असर दिखाया और वह जल्दी ही सो गईं. नींद की गोलियां ज्यादा डाली गई थीं. इसलिए कुछ देर में उन की नाक से खून और मुंह से झाग आने लगा. यह देख कर शालू खुश थी. उस ने कशिश को फोन किया और उस के आने का इंतजार करने लगी. कशिश व गौरव वैगनआर कार से घर आ गए. सविता ने गला दबाने के लिए उन दोनों को दुपट्टा ला कर दे दिया. कशिश व गौरव ने दुपट्टे से निर्मला का गला दबा दिया.

इस दौरान शालू व सविता ने निर्मला के पैरों को जकड़ लिया था. निर्मला गोलियों की हैवी डोज के चलते विरोध के काबिल नहीं बची थीं. हत्या के बाद चारों ने मिल कर निर्मला के शव को कार में रख दिया. कार कोठी के अंदर आ गई थी. सविता घर पर ही रही, जबकि कशिश, गौरव व शालू एक सुनसान स्थान पर शव को छिपा कर लौट गए. कशिश व गौरव अपने घर चले गए. जबकि शालू ने वापस आ कर निर्मला के बैडरूम को साफ कर के बाहर से ताला लगा दिया. उस ने उन के मोबाइल का स्विच्ड औफ कर के उसे छिपा दिया. उस ने अपना भी मोबाइल बंद कर दिया. उस ने कशिश को समझा दिया था कि यहां वह सब संभाल लेगी और अपने हिसाब से उस से बात करेगी.

शाम को निर्मला की सहेली मनोरमा उन्हें पूछने के लिए आई तो बिना दरवाजा खोले ही शालू ने उन के घर में न होने की बात कह कर उन्हें लौटा दिया. शालू व सविता ने राज छिपाए रहने की पूरी योजना बना ली थी. शालू ने सविता को समझा दिया था कि वह अपनेआप ही सब संभाल लेगी. 10 बजे शनसवीर का फोन आया तो शालू ने उन से निर्मला के लापता होने की बात बता दी. शालू व सविता ने हत्या के राज को पूरी तरह छिपाए रखा. वह अपने इस झूठ के नाटक में कामयाब रही थी, लेकिन मोबाइल ने उस की पोल खोल दी. पुलिस ने वैगनआर कार भी बरामद कर ली. सभी आरोपियों को पुलिस ने अगले दिन यानी 21 जून को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रिश्तों की इस हत्या से हर कोई हैरान था. खून के रिश्तों में मदद का ऐसा अंजाम होगा, यह शनसवीर ने कभी नहीं सोचा था. वैसे भी रिश्तों में हुई घटनाएं बहुत दर्द देती हैं. यह दर्द तब और भी बढ़ जाता है, जब उसे देने वाले अपने होते हैं. शालू ने अपनी आजादी का नाजायज फायदा न उठा कर केवल पढ़ाई पर ध्यान लगाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

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साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Hindi Stories: पिता की डायरी

Hindi Stories: पिता के प्यार को समझना उतना आसान नहीं होता, जितनी आसानी से मां के प्यार को समझा जा सकता है. पिता का प्यार क्या होता है, यह मैं ने उस दिन जाना, जब मैं…

वह दिल्ली की दिसंबर की ठंड से कांपती सुबह थी, जब मैं अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. मैं तंग आ चुका था अपनी जिंदगी से. खासतौर पर अपने पिता के व्यवहार से तो मैं इतना थक गया था कि अब उन की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था. सच तो यह था कि मुझे न सिर्फ अपने पिता से, बल्कि अपने पूरे परिवार से नफरत हो गई थी. घर जाता तो वहां मेरा दम घुटता था. इसलिए मैं ने फैसला कर लिया था कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगा.

बचपन से ले कर आज तक मुझे हर कदम पर समझौता करना पड़ा था. और तो और अब मैं अपनी पसंद की लड़की से शादी भी नहीं कर सकता था. यह तो हद ही हो गई थी. शादी न करने की वजह थी, मेरे महान पिता की यह सोच कि लड़की बड़े घर की है, ज्यादा पढ़ीलिखी है, हाईक्लास. बड़ी सोसायटी में उठनेबैठने वाली. वह हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर सकेगी. उन का कहने का अंदाज कुछ ऐसा था, जैसे लड़की न हो कर कोई सोफा सेट हो, जिसे घर में फिट करने की बात कर रहे हों. भला यह भी कोई वजह होती है किसी लड़की को रिजैक्ट करने की?

शायद वह चाहते थे कि मैं ऐसी लड़की से शादी करूं, जो अंगूठा छाप हो. छोटे से दो बाई दो के कमरे में रहती हो और दिमाग से पैदल हो. मतलब अगर उसे सोसायटी की समझ आ गई, तो फिर वह घर की बहू बनने लायक नहीं रहेगी. ऐसे महान विचार थे मेरे पिता के.

अरे सोचना तो लड़की वालों को चाहिए था कि वे अपनी मौडर्न, स्मार्ट, एजूकेटिड लड़की को कैसे घर में दे रहे हैं. लेकिन यहां तो मामला ही उलटा था. सच कहूं तो इस मामले में मेरी लाइफ का बैंड बज गया था. उस लड़की का नाम सोनिया था, जिसे मैं प्यार करता था. नाम में ही इतना फर्क था, मतलब कहां सोनिया और कहां हरिलाल यानी मैं. पिता का नाम रामलाल और बेटे का नाम हरिलाल. अपने नाम को भी मैं ने लाइफ में बहुत झेला था. कालेज में सब मजाक उड़ाते थे. फिर मुझे खुद ही अपना नामकरण करना पड़ा. मैं हरिलाल से हैरी बन गया. यह अलग बात है कि इस के लिए मुझे गवर्नमेंट के गजट से ले कर न्यूजपेपर के क्लासीफाइड एडवरटाइजमेंट तक सब जगह अपना नाम प्रिंट कराना पड़ा. तब कहीं मैं हरिलाल से हैरी बना.

हां, तो मैं अपने पिता यानी रामलालजी की बात कर रहा था. मेरे पिता की दिल्ली के नवीन शाहदरा में हार्डवेयर की एक छोटी सी दुकान थी. वह रोजाना अपने पुराने बजाज चेतक स्कूटर से दुकान आतेजाते थे. उस स्कूटर को पुराना बोलना भी ‘पुराने’ शब्द का अपमान था. बाबा आदम के जमाने का स्कूटर था, जिस के हौर्न को छोड़ कर सब कुछ बजता था. मैं अपने पिता को उस स्कूटर पर आतेजाते देखता तो बड़ी शर्म महसूस होती. यारदोस्तों के सामने उन्हें अपना पिता बताने में भी मुझे शर्म आती. लेकिन पिताजी को अपने उस पुराने स्कूटर पर भी गर्व था.

‘‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन.’’ वह गर्व से कहते, ‘‘पुरानी चीजें सोना होती हैं सोना. अब तो ऐसे मजबूत स्कूटर बनने ही बंद हो गए.’’

उन्होंने जीवन में एक ही अच्छा काम किया था कि मेरी ग्रैजुएशन कंपलीट करा दी थी. आगे की पढ़ाई के लिए भी उन्होंने पूरा सहयोग दिया. निस्संदेह उन का सहयोग न होता तो मैं पीएचडी न कर पाता.

अरे हां, मैं अपना इंट्रोडक्शन तो दे ही नहीं पाया. मैं ने इंगलिश लिटरेचर में पीएचडी कर ली थी. खास बात यह कि मेरा फर्स्ट ग्रेड था. अब मुझे आसानी से किसी भी डिग्री कालेज में लेक्चरर का जौब मिल सकता था. इसलिए घर छोड़ते वक्त मैं ने अपने सर्टिफिकेट की फाइल साथ ले ली थी. कहानी की बैकग्राउंड और कैरेक्टर मैं ने आप को अच्छी तरह समझा दिए हैं. अब आप वह बात सुनिए, जिस की वजह से यह कहानी लिख रहा हूं.

सुबहसुबह घर छोड़ कर भागते समय मुझ से एक गड़बड़ हो गई. दरअसल मैं ने घर में अपनी जैकेट ढूंढ़ी, लेकिन मुझे मेरी जैकेट नहीं मिली. ठंड बहुत थी, इसलिए मैं ने जल्दबाजी में पापा का ही कोट पहन लिया और अपने सर्टिफिकेट की फाइल ले कर घर छोड़ दिया. मैं ने आखिरी बार अपनी मां और अपने से 4 साल छोटी बहन को देखा, जो एकदूसरे से चिपटी गहरी नींद सो रही थीं. उन्हें पता ही नहीं था कि थोड़ी देर बाद घर में कितना कोहराम मचने वाला है.

अपने पिता के तो मैं ने आखिरी बार दर्शन करने भी जरूरी नहीं समझे थे. मैं घर से निकल कर पैदल ही जल्दीजल्दी मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ा. मुझे मैट्रो पकड़ कर सब से पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचना था और फिर वहां से ट्रेन पकड़ कर कुछ दिनों के लिए कहीं दूरदराज के इलाके में निकल जाना था. मैं ने सोच रखा था कि कुछ दिन अकेले रह कर आगे की प्लानिंग करूंगा. तब तक घर में भी सब कुछ शांत हो जाएगा.

उस दिन ठंड कुछ ज्यादा ही थी. कोट में भी मुझे जबरदस्त ठंड लग रही थी. मैं ने देखा कई लोग बाइक पर आजा रहे थे. उन्हें बाइक पर आतेजाते देख कर मुझे अपनी चाहत याद आ गई. दरअसल पिछले कई सालों से मेरी इच्छा थी कि एक बाइक खरीदूं. लेकिन इच्छा पूरी नहीं हो पाई थी. पापा हर साल कहते थे कि मुझे बाइक दिलाएंगे, लेकिन बाइक आज तक नसीब नहीं हुई थी. जबकि तमाम फटीचर बाइक लिए घूमते थे. मुझे अभी भी सर्दी लग रही थी. मेरे लिए मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था. मुझे लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. वरना कोट में इतनी ठंड लगने का सवाल ही नहीं था.

मैं एक टीन शेड के नीचे जा कर खड़ा हुआ और जल्दी से कोट उतार कर देखा कि आखिर समस्या क्या है? कोट का अंदर का हाल देख कर मैं हैरान रह गया. उस का अंदर का अस्तर बिलकुल फटा हुआ था, इसीलिए उस में सर्दी नहीं रुक रही थी. मुझे हैरानी हुई, पापा रोजाना वही कोट पहन कर दुकान पर जाते थे. अचानक मुझे याद आया. कई सालों पहले जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था, तब पापा ने वह कोट लाल किले की उस मार्केट से खरीदा था, जहां पुराने कपड़ों की सेल लगती थी. वह कोट भी पुराना था. ताज्जुब की बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने चांदनी चौक के कपड़े के एक बड़े शोरूम पर जा कर मेरे लिए ब्लेजर का कपड़ा खरीदा था, जिस की सिलाई ही एक हजार से ज्यादा चली गई थी.

उस के बाद मेरे तो कई कोट बने, लेकिन उन का वही एक कोट आज तक चल रहा था. कोट के फटे हुए स्तर ने मुझे अंदर तक हिला दिया था. कोट उतार कर मैं अभी देख ही रहा था कि तभी एक घटना और घटी. कोट की पौकेट से पापा का पर्स निकल कर नीचे गिर गया. मैं ने जल्दी से पर्स उठाया और उसे खोल कर देखने लगा कि उस में कितने रुपए हैं? रुपए तो उस में सिर्फ 780 ही थे, लेकिन पर्स के अंदर एक पतली सी छोटी डायरी थी. इस डायरी को पापा किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते थे. आज वही डायरी मेरे हाथ लग गई थी. मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई खजाना मेरे हाथ लग गया हो.

मैं ने जल्दी से डायरी खोल कर पढ़ी. उस पतली सी डायरी के तीसरे पन्ने पर ‘मां के गहनों’ से संबंधित कुछ जानकारी थी, जिस से पता चलता था कि मेरी ग्रैजुएशन के लिए उन्हें वे सारे गहने बेचने पड़े थे, आगे के पन्नों पर तो ऐसी जानकारी थी, जिस ने मुझे बिलकुल ही हिला कर रख दिया. पता चला कि मेरी आगे की पढ़ाई और पीएचडी के लिए तो उन्होंने अपनी दुकान तक गिरवी रखी हुई थी. हकीकत जान कर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. मुझे पढ़ाने के लिए पापा ने इतना सब कुछ किया और मुझे पता ही नहीं था.

तभी उस डायरी में मुझे एक कागज दिखाई दिया. कागज क्या किसी न्यूज पेपर की कटिंग थी. मैं ने खोल कर देखा. वह एक बाइक कंपनी का विज्ञापन था, जिस में लिखा था कि अपनी पुरानी बाइक या स्कूटर के बदले नई बाइक ले सकते हैं. इस का मतलब पापा कुछ भी नहीं भूले थे. उन के बारे में सोच कर मेरी आंखों में आंसू आ गए. जो पापा इतनी मुश्किलों में भी मेरे लिए इतना सोचते थे, मैं उन्हीं को छोड़ कर भाग रहा था. एकाएक मेरी दिशा बदल गई. मैं मैट्रो स्टेशन की जगह अब वापस अपने घर की तरफ भागा. मैं ने पापा के कोट को कस कर अपने सीने से चिपकाए हुए था. अब मुझे उस में बिलकुल भी सर्दी नहीं लग रही थी. मैं ने जोर से अपने घर का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुआ. मैं सब से पहले पापा को देखना चाहता था.

घर का माहौल एकदम सामान्य था. मां और मेरी छोटी बहन जाग गई थीं और अपना रूटीन का काम कर रही थीं. मां किचन में जल्दीजल्दी नाश्ता बना रही थीं, जबकि छोटी बहन घर की सफाई में लगी थी. उन्हें पता ही नहीं चला था कि मैं घर छोड़ कर भागा था.

‘‘पापा कहां हैं?’’ मैं ने घर में घुसते ही मां से पूछा.

‘‘अरे,’’ मां चिल्लाईं, ‘‘तू सुबहसुबह कहां चला गया था? फोन भी नहीं लग रहा था तेरा. इतनी बेखयाली में था कि जातेजाते कोट भी अपने पापा का पहन गया. वह चिल्लाते हुए अपना कोट ढूंढ़ रहे थे. उन की सब से ज्यादा जान तो उस डायरी में अटकी थी, जिसे वह किसी को छूने नहीं देते.’’

‘‘लेकिन पापा हैं कहां?’’

‘‘पता नहीं, आज सुबह से ही पता नहीं उन के दिमाग में क्या चल रहा था?’’ मां गुस्से में ही बोलीं, ‘‘बड़े खुश नजर आ रहे थे. अभी थोड़ी देर पहले घर से निकले हैं. बोल कर गए हैं, मैं जरा कश्मीरी गेट तक जा रहा हूं. आज तो नाश्ता भी नहीं कर के गए.’’

‘‘कश्मीरी गेट?’’ मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

मैं वापस उलटे पैर घर से बाहर भागा.

‘‘अरे…अरे.’’ मां चिल्लाईं, ‘‘अब तू कहां जा रहा है? नाश्ता तो करता जा. हद है दोनों बापबेटों से. कोई भी कुछ काम बता कर नहीं करता. इस घर में सब से बड़ी पागल तो बस मैं हूं.’’

जब मां के आखिरी शब्द मेरे कान में पड़े, तब तक मैं घर से बाहर निकल चुका था. मैं ने घर के बाहर देखा, पापा की स्कूटर नहीं थी. मैं कश्मीरी गेट का नाम सुन कर ही समझ गया था कि पापा कहां गए हैं. मैं सीधे कश्मीरी गेट के उस बाइक के शोरूम पर पहुंचा, जहां का विज्ञापन मैं ने पापा की डायरी में देखा था. उम्मीद के मुताबिक पापा वहां मौजूद थे और शोरूम के सेल्स मैनेजर से बहस कर रहे थे. दरअसल सेल्स मैनेजर उन के खटारा स्कूटर को लेने से मना कर रहा था. उस की निगाह में वह स्कूटर नहीं था. जबकि पापा उसे उस स्कूटर की अच्छाई गिनवा रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि उस स्कूटर का पैसा लगा कर वह उन से बाकी पैसा ले ले और बाइक दे दे.

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने पापा से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ूं. हमारे पापा हमारे लिए कितनी कुर्बानियां देते हैं और हमें वे सब मामूली बातें लगती हैं. मैं भाग कर पापा के पास पहुंचा और उन्हें अपने सीने से लिपटा लिया.

‘‘अरे बंटी,’’ वह मुझे बंटी ही कहते थे, ‘‘तू कब आया? देख मैं तेरे लिए नई बाइक लेने की कोशिश कर रहा हूं. अच्छा हुआ तू आ गया, तू अपने लिए बाइक पसंद कर ले. मैं पैसा ले कर आया हूं.’’

‘‘नहीं पापा.’’ मैं बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई रोक पाया, ‘‘मुझे अब बाइक नहीं चाहिए. आप शायद भूल गए हैं कि अब आप के बेटे हरिलाल ने पीएचडी कर ली है. मैं हरिलाल से डा. हरिलाल बन गया हूं. जल्द ही मुझे किसी बड़े कालेज में जौब भी मिल जाएगी. आप ही सोचिए डा. हरिलाल बाइक पर कैसे घूम सकता है? उसे तो कार चाहिए. कार भी बड़ी वाली. चिंता मत करिए मैं जल्द ही अपने वेतन से कार खरीदूंगा. फिर आप को उस में सैर कराऊंगा.’’

पापा हंस पड़े. उन की हंसी किसी बच्चे जैसी थी.

‘‘चलो, अब घर वापस चलते हैं.’’

उन्होंने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट करना चाहा.

‘‘नहीं.’’ मैं ने उन्हें स्कूटर स्टार्ट करने से रोका, ‘‘आज आप का यह स्कूटर मैं चलाऊंगा. आखिर डा. हरिलाल को भी तो ड्राइविंग अच्छे से आनी चाहिए. आगे चल कर कार भी तो ड्राइव करनी है.’’

पापा हंस पड़े. थोड़ी देर बाद मैं पापा को स्कूटर की पीछे वाली सीट पर बिठा कर घर की तरफ दौड़ा जा रहा था. जिस स्कूटर को देख कर मुझे शर्म आती थी, उसी स्कूटर को आज डा. हरिलाल गर्व से चला रहा था, क्योंकि वह मेरे पापा का स्कूटर था.

‘‘मुझे तुझ से कुछ कहना है बेटा.’’ स्कूटर के पीछे बैठेबैठे पापा ने कहा.

‘‘क्या?’’

‘‘मैं ने सोनिया से तेरी शादी के लिए मना किया, तुझे बुरा तो नहीं लगा?’’

‘‘बिलकुल भी नहीं.’’ मैं ने निस्संकोच भाव से कहा, ‘‘आप की बात बिलकुल सही है. हमारी और उन की फैमिली में बहुत फर्क है. अब कहां डा. हरिलाल और कहां सोनिया?’’

मेरी बात सुन कर वह फिर हंस पड़े.

उन की हंसी में मुझे बारिश की बूंदों की खनक महसूस हो रही थी. सचमुच उस एक सुबह ने मेरी पूरी दुनिया बदल डाली. मेरे और सोनिया के प्यार का जरूर ‘द एंड’ हो गया था, लेकिन मेरे पापा के साथ मेरी एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई थी. Hindi Stories

 

Madhya Pradesh Crime: आईफोन में फंसा इश्क

Madhya Pradesh Crime:  सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरे मध्य प्रदेश के अमला को मध्य प्रदेश का शिमला भी कहा जाता है. 5 जुलाई, 2022 की सुबह अमला पुलिस स्टेशन के टीआई संतोष पंद्रे पुराने केस की फाइल को देख रहे थे, तभी केबिन के बाहर से आई आवाज ने उन का ध्यान फाइल से हटा दिया.

‘‘साब, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?’’ दरवाजे पर एक अधेड़ उम्र की महिला अपने पति के साथ खड़ी थी.

उन्हें देखते ही टीआई ने कहा, ‘‘आइए, अंदर आ जाइए, कहिए कैसे आना हुआ?’’

‘‘साब, मेरा नाम लता काचेवार है. मेरे पति इस दुनिया में नहीं हैं. मेरा बेटा मानसिक रूप से बीमार है. हम लोग अमला नगर परिषद के वार्ड नंबर 10 में रहते हैं. मेरी 19 साल की बेटी मुसकान 3 जुलाई की सुबह बाजार से जरूरी सामान लेने के लिए घर से निकली थी, मगर अभी तक घर नहीं लौटी है,’’ यह कहते हुए लता फफक कर रो पड़ी.

टीआई ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘आप चिंता मत कीजिए, पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी. मुसकान का हुलिया बताइए और अगर उस की कोई फोटो हो तो मुझे दे दीजिए. पुलिस उसे जल्द ही खोज निकालेगी.’’

‘‘साब, मुसकान के हाथ पर 3 स्टार वाला एक टैटू बना हुआ है और उस के बाल सुनहरे हैं और ये रही उस की फोटो,’’ लता ने अपनी बेटी की फोटो पर्स से निकालते हुए कहा.

टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो पर नजर डाली तो सुनहरे बालों की खूबसूरत नाकनक्श की मुसकान को देख क र समझ गए कि उम्र के इस मोड़ पर अकसर लड़केलड़कियों के कदम फिसल ही जाते हैं.

‘‘यदि तुम्हें किसी पर शक हो तो खुल कर बताओ, पुलिस तुम्हारे साथ है.’’ टीआई ने कहा.

‘‘साब, मेरी बेटी कभी घर और दुकान के अलावा कहीं नहीं जाती थी. किसी लड़के के साथ उस की दोस्ती भी नहीं थी. साब, पिछले 2 सालों से वह अमला के कृष्णा ज्वैलर्स के यहां सेल्सगर्ल का काम कर रही है.’’ लता ने टीआई को बताया.

टीआई ने मुसकान की जल्द ही पतासाजी का आश्वासन देते हुए लता को घर जाने को कहा.

लता जानती थी कि मुसकान अकसर खरीददारी के लिए कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी के साथ नागपुर आतीजाती थी और कई बार काम के सिलसिले में वहीं होटल में रुक भी जाती थी. लेकिन अब तो उस का पता ही नहीं चल पा रहा था.

दूसरे दिन सुबह तक मुसकान न तो घर लौटी और न ही उस से फोन पर संपर्क हो पाया तो लता ने कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी को फोन लगा कर बेटी के संबंध में जानकारी ली.

पुनीत ने लता को बताया कि मुसकान तो कल दुकान पर आई ही नहीं थी. इतना ही नहीं, पुनीत ने यह भी बताया कि वह 2-3 दिन छुट्टी पर जाने की बात भी कह रही थी.

पुनीत की बातें सुन कर लता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मुसकान कहां चली गई.

उधर पुलिस ने मुसकान की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उस की पतासाजी के लिए सोशल मीडिया पर उस की सूचना प्रसारित कर दी. इस के अलावा विभिन्न थानों में भी उस की फोटो भेज दी. मगर मुसकान के बारे में कोई भी सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा.

अमला शहर की सीमा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी लगी हुई हुई है. ऐसे में आपराधिक घटनाओं की सूचनाओं के आदानप्रदान के लिए पुलिस विभाग का अंतरराज्यीय वाट्सऐप ग्रुप बना हुआ है.

7 जुलाई, 2022 को उसी वाट्सऐप ग्रुप में नागपुर काटोल पुलिस ने एक नौजवान युवती की लाश मिलने की पोस्ट शेयर की तो बैतूल जिले की एसपी सिमाला प्रसाद की नजर उस पोस्ट पर ठहर गई.

वह लाश महाराष्ट्र के नागपुर के पास काटोल पुलिस थाने के अंतर्गत चारगांव इलाके में ईंट भट्ठे के पास मिली थी. वह पीले रंग की टीशर्ट पहने थी, जिस पर अंगरेजी में लव लिखा हुआ था. उस के हाथ पर 3 स्टार का टैटू बना हुआ था. युवती के सिर पर हमले की वजह से चेहरे की पहचान आसानी से नहीं हो पा रही थी.

एसपी ने यह पोस्ट अमला पुलिस के सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की तो अमला पुलिस थाने के टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो को गौर से देखा. मुसकान की मां लता ने उन्हें जो फोटो दिया था, उस से उस की कदकाठी काफी मेल खा रही थी.

टीआई ने मुसकान की मां लता को थाने बुला कर वह फोटो दिखाई तो उस के होश उड़ गए. पीली टीशर्ट और हाथ पर बने टैटू को देख कर वह जोर से चीखी, ‘‘मेरी बेटी कहां है और उस का ये हाल किस ने कर दिया?’’

इस के बाद पुलिस लता को ले कर नागपुर के काटोल पहुंच गई. काटोल पुलिस थाने के टीआई महादेव आचरेकर ने लता को युवती की लाश के कपड़े, अंगूठी और मोबाइल फोन दिखाया तो उस ने बताया कि ये सब उस की बेटी मुसकान के हैं.

महाराष्ट्र के किसी भी थाने में इस तरह के हुलिए वाली किसी लड़की की गुमशुदगी दर्ज नहीं थी.

इस वजह से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि युवती शायद पड़ोसी राज्यों में से किसी शहर की रहने वाली हो.

इस पर नागपुर क्राइम ब्रांच ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की पुलिस से संपर्क किया और फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर दी. पोस्टमार्टम के बाद लाश की शिनाख्त न होने से काटोल पुलिस ने लाश दफना दी थी.

नागपुर (ग्रामीण) पुलिस के काटोल थाने में मुसकान की हत्या का मामला कायम कर लता से पूछताछ की और मुसकान के मोबाइल में मिले फोटो के आधार पर यह बात सामने आई कि मुसकान का प्रेम प्रसंग कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी से चल रहा था. लिहाजा काटोल पुलिस केस की जांच के लिए अमला आ गई.

पुलिस ने पुनीत सोनी से मुसकान की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो पहले तो वह पूरे घटनाक्रम से अंजान बना रहा. पुलिस ने जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स रिपोर्ट सामने रखी तो वह बगलें झांकने लगा.

पुलिस ने उस के शोरूम पर काम करने वाले 17 साल के किशोर अन्नू से पूछताछ की तो वह डर गया और उस ने पल भर में ही पूरे रहस्य से परदा हटा दिया. पुलिस टीम ने पुनीत से सख्ती से पूछताछ की तो मुसकान की हत्या की सारी कहानी सामने आ गई.

अमला के सरदार वल्लभभाई पटेल वार्ड में रहने वाली मुसकान महत्त्वाकांक्षी थी, मगर परिवार की माली हालत के चलते उसे हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करते ही सेल्सगर्ल की नौकरी करनी पड़ी.

कोरोना काल में मुसकान के पिता की मौत हो जाने के बाद परिवार की माली हालत खराब हो गई थी. मुसकान का बड़ा भाई आपराधिक किस्म का था. आए दिन उस के झगड़े होते रहते थे. इसी के चलते पिछले साल उस का किसी ने मर्डर कर दिया था.

बड़े भाई की मौत के बाद घर चलाना मुश्किल हो गया था. ऐसे में मुसकान कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर सेल्सगर्ल की नौकरी करने लगी.

मुसकान को कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर काम करते हुए बमुश्किल महीना भर ही बीता था, मगर इस एक महीने में ही उसे एक बात साफ समझ में आ गई थी कि शोरूम के मालिक पुनीत की नजरें उसे ही घूरा करती हैं.

28 साल का पुनीत सोनी अपने पिता सुनील सोनी की एकलौती संतान होने के साथ हैंडसम भी था. मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में अमला नगर परिषद की गणेश कालोनी में रहने वाले पुनीत का ज्वैलरी का कारोबार आसपास के इलाकों में खूब चलता है.

19 साल की खूबसूरत मुसकान जब पुनीत के पास काम मांगने आई तो वह पहली ही नजर में पुनीत के दिल में उतर गई. वैसे तो पुनीत शादीशुदा होने के साथ एक बेटे का बाप भी था, लेकिन खूबसूरत लड़की को अपने सामने पा कर उस की चाहत इस कदर बढ़ चुकी थी कि वह अपने आप को रोक नहीं सका.

एक दिन शोरूम पर जब ग्राहक नहीं थे तो पुनीत ने अपने दिल का हाल मुसकान से कह ही दिया, ‘‘मुसकान, तुम बहुत खूबसूरत हो, तुम्हें देखता हूं तो मैं अपने दिल को काबू में नहीं रख पाता हूं.’’

कम उम्र में घरपरिवार के खर्च की जिम्मेदारी संभालने वाली मुसकान भी उस के प्यार के इजहार को नकार न सकी. ज्वैलरी शोरूम पर ही उन का प्यार परवान चढ़ने लगा.

पुनीत मुसकान की हर ख्वाहिश और जरूरतों का खयाल रखने लगा. पुनीत मुसकान को अपने प्यार के जाल में फंसा चुका था. वह आए दिन मुसकान को तरहतरह के गिफ्ट की पेशकश करता था. दुकान में 17 साल का एक लड़का अन्नू (परिवर्तित नाम) भी काम करता था. पुनीत और मुसकान के बीच मीडिएटर का काम अन्नू करता था.

पुनीत मुसकान के साथ संबंध बनाने को उतावला हो रहा था, मगर मुसकान अपने मातापिता के डर से इस के लिए राजी नहीं थी.

पिछले साल दीपावली के पहले की बात है. एक दिन मौका पा कर पुनीत मुसकान के घर जा कर उस की मां से बोला, ‘‘मांजी दीपावली के बाद सीजन शुरू होने वाला है. ज्वैलरी की खरीदारी के लिए मुसकान को नागपुर साथ ले जाना है, मुसकान को ग्राहकों की पसंदनापसंद का खूब अनुभव हो गया है.’’

बेटी की तारीफ सुन कर लता ने यह सोच कर हामी भर दी कि आखिर पुनीत उस का मालिक जो ठहरा, उस के साथ जाने में हर्ज ही क्या है.

मुसकान के घर वालों की सहमति मिलते ही एक दिन कार से पुनीत और मुसकान नागपुर के लिए चल पड़े. रास्ते में कार के सफर के दौरान उन्होंने खूब मस्ती की. नागपुर पहुंच कर दिन भर ज्वैलरी की खरीदारी की और पुनीत ने मुसकान को नए स्टाइलिश कपड़े दिलाए तो उस की खुशी दोगुनी हो गई.

मुसकान अपने आप पर फख्र कर रही थी कि पुनीत उस का कितना खयाल रखता है. शाम को एक होटल में कमरा ले कर दोनों ठहर गए. कमरे में पहुंचते ही पुनीत के सब्र का बांध टूट चुका था. उस ने मुसकान को अपनी बाहों में भरते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मैं कब से तड़प रहा था मेरी जान, आज मुझे अपनी प्यास बुझा लेने दो.’’

मुसकान ने भी हौले से पुनीत के सिर पर हाथ घुमाते हुए कहा, ‘‘थोड़ा सब्र करो. मैं तो पूरी रात तुम्हारे साथ हूं. मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें लुटा दूंगी.’’

प्यार के जोश और वासना की आग में 2 जिस्म कब एक जान हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला. रात भर होटल में अपनी हसरतों को पूरा करने के बाद दूसरे दिन सुबह दोनों अमला पहुंच गए.

एक बार शुरू हुआ वासना का खेल धीरेधीरे रफ्तार पकड़ चुका था. पुनीत ज्वैलरी की खरीदारी का बहाना बना कर मुसकान को अकसर ही नागपुर और दूसरे शहरों में ले जाने लगा.

मुसकान भी यह बात समझ चुकी थी कि शादीशुदा जिंदगी जीने वाला उस का प्रेमी पुनीत केवल उस के जिस्म से ही खेल रहा था, लिहाजा वह भी पुनीत से अपनी हर जायजनाजायज मांग रखने लगी थी.

धीरेधीरे वह पुनीत को ब्लैकमेल भी करने लगी. पुनीत यदि मुसकान की मांग पूरी करने में आनाकानी करता तो वह उसे बदनाम करने की धमकी देने लगती.

देखते ही देखते मुसकान की लाइफस्टाइल काफी मौडर्न हो चुकी थी. महंगे कपड़े और मोबाइल का शौक उस के सिर चढ़ कर बोल रहा था. बदनामी के डर से मुसकान की हर डिमांड पूरी करना पुनीत की मजबूरी बन चुकी थी.

जून महीने के अंतिम सप्ताह की बात है. रात के करीब 9 बजे जब  मुसकान अपने घर जाने लगी तो उस ने पुनीत से कहा, ‘‘मेरा मोबाइल बारबार हैंग हो जाता है, मुझे एक आईफोन दिला दो.’’

‘‘चलो देखते हैं, अभी तो घर निकलो बाद में बात करते हैं.’’ पुनीत ने उस समय तो बात टालने के मकसद से यह कह कर बात खत्म कर दी थी.

धीरेधीरे पुनीत को यह बात समझ आ गई थी कि दुकान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा वह मुसकान पर खर्च कर रहा है. पुनीत यह सोच कर हैरान था कि इसी तरह चलता रहा तो किसी दिन उस का ज्वैलरी का कारोबार ठप्प हो जाएगा.

प्रेमिका की आए दिन बढ़ने वाली डिमांड उस की परेशानी का सबब बन चुकी थी. इस बार 60-70 हजार के आईफोन की डिमांड से पुनीत मन ही मन तिलमिला गया था. उसे अब रातरात भर नींद नहीं आ रही थी.

आखिर में पुनीत ने मुसकान से छुटकारा पाने का कठोर निर्णय ले लिया था. अपनी इस योजना में उस ने दुकान पर काम करने वाले नौकर अन्नू को रुपयों का लालच देते हुए शामिल कर लिया था.

योजना के मुताबिक पुनीत ने 3 जुलाई की सुबह अचानक मुसकान को फोन किया, ‘‘हैलो मुसकान, जल्दी से तैयार हो जाओ, आईफोन लेने के लिए नागपुर चलना है.’’

मुसकान आईफोन मिलने की खुशी में पागल हो गई और जल्दी से तैयार हो कर घर से बाहर निकलते हुए मां से केवल इतना ही कह पाई, ‘‘मैं बाजार जा रही हूं, कुछ देर में वापस आती हूं.’’

कुछ ही देर में  पुनीत और अन्नू कार ले कर बाजार आ चुके थे. बाजार से मुसकान को कार में बिठा कर वे नागपुर के लिए रवाना हो गए.

कार पुनीत ही ड्राइव कर रहा था और मुसकान अगली सीट पर बैठी थी, जबकि पिछली सीट पर बैठा अन्नू मोबाइल पर गेम खेलने का नाटक कर रहा था.

कार से सफर के दौरान मुसकान को बीयर की पेशकश की गई, लेकिन उस ने इंकार कर दिया. पुनीत और अन्नू ने मिल कर शराब पी. कुछ ही घंटों में कार मध्य प्रदेश की सीमा से बाहर निकल चुकी थी.

रास्ते में सुनसान जगह पर पुनीत ने कार रोकी और बराबर की सीट पर बैठी मुसकान के गले में हाथ डाल कर प्यार का नाटक करने लगा. इसी दौरान पीछे बैठे हुए अन्नू ने उस का जोर से गला दबा दिया. मुसकान ने जोर से चीखने की कोशिश की, मगर पुनीत ने उस का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

कुछ ही देर में जब वह बेहोश हो गई तो दोनों ने उसे कार से बाहर खींच लिया और सड़क पर पड़े पत्थर से उस का सिर कुचल कर मौत के घाट उतार दिया. मुसकान की लाश को सड़क के किनारे लुढ़का कर दोनों कार से अमला वापस आ गए.

पुनीत ने मुसकान की ब्लैकमेलिंग से तंग आ कर उसे प्रदेश के बाहर खत्म करने की योजना इसलिए बनाई ताकि किसी को उस पर शक न हो. मगर पुलिस की नजरों से वह ज्यादा दिन तक बच नहीं सका.

महाराष्ट्र के काटोल पुलिस के टीआई महादेव आचरेकर और मध्य प्रदेश के अमला पुलिस के टीआई संतोष पंद्रे की सूझबूझ से 11 जुलाई को मुसकान की हत्या के राज से परदा हट गया.

महाराष्ट्र पुलिस ने पुनीत सोनी और अन्नू को मुसकान की हत्या के जुर्म में भादंवि की धारा 302 और 201 के तहत दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से पुनीत को नागपुर सैंट्रल जेल और अन्नू को बाल सुधार गृह भेज दिया. Madhya Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अन्नू परिवर्तित नाम है. Madhya Pradesh Crime

Love Story: क्या इश्क में अंधी लाली खुद को संभाल पाई

Love Story: सतपाल गहरी नींद में सोया हुआ था. उस की पत्नी उर्मिला ने उसे जगाने की कोशिश की. वह इतनी ऊंची आवाज में बोली थी कि साथ में सोया उस का 5 साला बेटा जंबू भी जाग गया था. वह डरी निगाहों से मां को देखने लगा था. ‘‘क्या हो गया? रात को तो चैन से सोने दिया करो. क्यों जगाया मुझे?’’ सतपाल उखड़ी आवाज में उर्मिला पर बरस पड़ा.

‘‘बाहर गेट पर कोई खड़ा है. जोरजोर से डोर बैल बजा रहा है. पता नहीं, इतनी रात को कौन आ गया है? मुझे तो डर लग रहा है,’’ उर्मिला ने घबराई आवाज में बताया. ‘‘अरे, इस में डरने की क्या बात है? गेट खोल कर देख लो. तुम सतपाल की घरवाली हो. हमारे नाम से तो बड़ेबड़े भूतप्रेत भाग जाते हैं.’’

‘‘तुम ही जा कर देखो. मुझे तो डर लग रहा है. पता नहीं, कोई चोरडाकू न आ गया हो. तुम भी हाथ में तलवार ले कर जाना,’’ उर्मिला ने सहमी आवाज में सलाह दी. सतपाल ने चारपाई छोड़ दी. उस ने एक डंडा उठाया. गेट के करीब पहुंच कर उस ने गेट के ऊपर से झांक कर देखा, तो कांप उठा. बाहर उस की छोटी बहन खड़ी सिसक रही थी.

सतपाल ने हैरानी भरे लहजे में पूछा, ‘‘अरे लाली, तू? घर में तो सब ठीक है न?’’

लाली कुछ नहीं बोल पाई. बस, गहरीगहरी हिचकियां ले कर रोने लगी. सतपाल ने देखा कि लाली के चेहरे पर मारपीट के निशान थे. सिर के बाल बिखरे हुए थे.

सतपाल लाली को बैडरूम में ले आया. वह बारबार लाली से पूछने की कोशिश कर रहा था कि ऐसा क्या हुआ कि उसे आधी रात को अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा? उर्मिला ने बुरा सा मुंह बनाया और पैर पटकते हुए दूसरे कमरे में चली गई. उसे लाली के प्रति जरा भी हमदर्दी नहीं थी.

लाली की शादी आज से 10 साल पहले इसी शहर में हुई थी. तब उस के मम्मीपापा जिंदा थे. लाली का पति दुकानदार था. काम अच्छा चल रहा था. घर में लाली की सास थी, 2 ननदें भी थीं. उन की शादी हो चुकी थी. लाली के पति अजय ने उसे पहली रात को साफसाफ शब्दों में समझा दिया था कि उस की मां बीमार रहती हैं. उन के प्रति बरती गई लापरवाही को वह सहन नहीं करेगा.

लाली ने पति के सामने तो हामी भर दी थी, मगर अमल में नहीं लाई. कुछ दिनों बाद अजय ने सतपाल के सामने शिकायत की.

जब सतपाल ने लाली से बात की, तो वह बुरी तरह भड़क उठी. उस ने तो अजय की शिकायत को पूरी तरह नकार दिया. उलटे अजय पर ही नामर्दी का आरोप लगा दिया.

अजय ने अपने ऊपर नामर्द होने का आरोप सुना, तो वह सतपाल के साथ डाक्टर के पास पहुंचा. अपनी डाक्टरी जांच करा कर रिपोर्ट उस के सामने रखी, तो सतपाल को लाली पर बेहद गुस्सा आया. उस ने डांटडपट कर लाली को ससुराल भेज दिया. लाली ससुराल तो आ गई, मगर उस ने पति और सास की अनदेखी जारी रखी. उस ने अपनी जिम्मेदारियों को महसूस नहीं किया. अपने दोस्तों के साथ मोबाइल पर बातें करना जारी रखा.

आखिरकार जब अजय को दुकान बंद कर के अपनी मां की देखभाल के लिए घर पर रहने को मजबूर होना पड़ा, तब उस ने अपनी आंखों से देखा कि लाली कितनी देर तक मोबाइल फोन पर न जाने किसकिस से बातें करती थी. एक दिन अजय ने लाली से पूछ ही लिया कि वह इतनी देर से किस से बातें कर रही थी?

पहले तो लाली कुछ भी बताने को तैयार नहीं हुई, पर जब अजय गुस्से से भर उठा, तो लाली ने अपने भाई सतपाल का नाम ले लिया. उस समय तो अजय खामोश हो गया, क्योंकि उसे मां को अस्पताल ले जाना था. जब वह टैक्सी से अस्पताल की तरफ जा रहा था, तब उस ने सतपाल से पूछा, तो उस ने इनकार कर दिया कि उस के पास लाली का कोई फोन नहीं आया था.

अजय 2 घंटे बाद वापस घर में आया, तो लाली को मोबाइल फोन पर खिलखिला कर बातें करते देख बुरी तरह सुलग उठा था. उस ने तेजी से लपक कर लाली के हाथ से मोबाइल छीन कर 4-5 घूंसे जमा दिए. लाली चीखतीचिल्लाती पासपड़ोस की औरतों को अपनी मदद के लिए बुलाने को घर से बाहर निकल आई.

अजय ने उसी नंबर पर फोन मिलाया, जिस पर लाली बात कर रही थी. दूसरी तरफ से किसी अनजान मर्द की आवाज उभरी. अजय की आवाज सुनते ही दूसरी तरफ से कनैक्शन कट गया.

अजय ने दोबारा नंबर मिला कर पूछने की कोशिश की, तो दूसरी तरफ से मोबाइल स्विच औफ हो गया. अजय ने लाली से पूछा, तो उस ने भी सही जवाब नहीं दिया.

अजय का गुस्से से भरा चेहरा भयानक होने लगा. उस के जबड़े भिंचने लगे. वह ऐसी आशिकमिजाजी कतई सहन नहीं करेगा. लाली घबरा उठी. उसे लगा कि अगर वह अजय के सामने रही और किसी दोस्त का फोन आ गया, तो यकीनन उस की खैरियत नहीं. उस ने उसी समय जरूरी सामान से अपना बैग भरा और अपने मायके आ गई.

लाली ने घर आ कर अजय और उस की मां पर तरहतरह के आरोप लगा कर ससुराल जाने से मना कर दिया. कई महीनों तक वह अपने मायके में ही रही. अजय भी उसे लेने नहीं आया. इसी तनातनी में एक साल गुजर गया. आखिरकार अजय ही लाली को लेने आया. उस ने शर्त रखी कि लाली को मन लगा कर घर का काम करना होगा. वह पराए मर्दों से मोबाइल फोन पर बेवजह बातें नहीं करेगी.

सतपाल ने बहुत समझाया, मगर लाली नहीं मानी. लाली का तलाक हो गया. सतपाल ने उस के लिए 2 लड़के देखे, मगर वे उसे पसंद नहीं आए.

दरअसल, लाली ने शराब का एक ठेकेदार पसंद कर रखा था. उस का शहर की 4-5 दुकानों में हिस्सा था. वह शहर का बदनाम अपराधी था, मगर लाली को पसंद था. काफी अरसे से लाली का उस ठेकेदार जोरावर से इश्क चल रहा था. जोरावर सतपाल को भी पसंद नहीं था, मगर इश्क में अंधी लाली की जिद के सामने वह मजबूर था. उस की शादी जोरावर से करा दी गई.

जोरावर शराब के कारोबार में केवल 10 पैसे का हिस्सेदार था, बाकी 90 पैसे दूसरे हिस्सेदारों के थे. उस की कमाई लाखों में नहीं हजारों रुपए में थी. वह जुआ खेलने और शराब पीने का शौकीन था. वह लाली को खुला खर्चा नहीं दे पाता था. अब तो लाली को पेट भरने के भी लाले पड़ गए. उस ने जोरावर से अपने खर्च की मांग रखी, तो उस ने जिस्म

बेच कर पैसा कमाने का रास्ता दिखाया. लाली ने मना किया, तो जोरावर ने घर में ही शराब बेचने का रास्ता सुझा दिया. अब लाली करती भी क्या. अपना मायका भी उस ने गंवा लिया था. जाती भी कहां? उस ने शराब बेचने का धंधा शुरू कर दिया. उस का जवान गदराया बदन देख कर मनचले शराब खरीदने लाली के पास आने लगे. उस का कारोबार अच्छा चल निकला.

जोरावर को लगा कि लाली खूब माल कमा रही है, तो उस ने अपना हिस्सा मांगना शुरू कर दिया. लाली ने पैसा देने से इनकार कर दिया. उस रात दोनों में झगड़ा हुआ. लाली जमा किए तमाम रुपए एक पुराने बैग में भर कर घर से भाग निकली. जोरावर ने देख लिया था. वह भी पीछेपीछे तलवार हाथ में लिए भागा. वह किसी भी सूरत में लाली से रुपए लेना चाहता था.

जोरावर नशे में था. उस के हाथों में तलवार चमक रही थी. वह उस की हत्या कर के भी सारा रुपया हासिल करना चाहता था. लाली बदहवास सी भागती हुई सड़क पर आ गई. उस ने पीछे मुड़ कर देखा, तो जोरावर तलवार लिए उस की तरफ भाग रहा था. उस ने बचतेबचाते सड़क पार कर ली.

लेकिन जब जोरावर सड़क पार करने लगा, तो वह किसी बड़ी गाड़ी की चपेट में आ गया और मारा गया. रात के 3 बज रहे थे. किसी ने भी जोरावर की लाश की तरफ ध्यान तक नहीं दिया.

सतपाल के यहां आ कर लाली ने रोतेसिसकते अपनी दुखभरी दास्तान सुनाई, तो सतपाल की भी आंखें भर आईं. मगर उसी पल उस ने अपनी बहन की गलतियां गिनाईं, जिन की वजह से उस की यह हालत हुई थी. ‘‘हां भैया, अजय का कोई कुसूर नहीं है. मैं ने ही अपनी गलतियों की सजा पाई है. अजय ने तो हर बार मुझे समझाने, सही रास्ते पर लाने की कोशिश की थी, इसलिए अब भी मैं अजय के पास ही जाना चाहती हूं,’’ लाली ने इच्छा जाहिर की.

‘‘अब तुझे वह किसी भी हालत में नहीं अपनाएगा. उस ने तो दूसरी शादी भी कर ली होगी,’’ सतपाल ने अंदाजा लगाया. ‘‘बेशक, उस ने शादी कर ली हो. उस के घर में नौकरानी बन कर रह लूंगी. मुझे अजय के घर जाना है, वरना मैं खुदकुशी कर लूंगी,’’ लाली ने अपना फैसला सुना दिया.

सतपाल बोला, ‘‘ठीक है लाली, पहले तू 4-5 दिन यहीं आराम कर.’’ एक हफ्ते बाद सतपाल ने लाली

को मोटरसाइकिल पर बैठाया और दोनों अजय के घर की तरफ चल दिए. अजय घर पर अकेला ही सुबह का नाश्ता तैयार कर रहा था. सुबहसवेरे लाली को अपने भाई सतपाल के साथ आया देख वह बुरी तरह भड़क उठा.

दोनों को धक्के मार कर घर से बाहर निकालते हुए अजय ने कहा, ‘‘अब तुम लोग मेरे जख्मों पर नमक छिड़कने आए हो. चले जाओ यहां से. अब तो मेरी मां भी मर चुकी है. मेरी पत्नी तो बहुत पहले मर चुकी थी. अब मेरा कोई नहीं है.’’

सतपाल ने लाली को घर चलने को कहा, तो वह वहीं पर रहने के लिए अड़ गई. सतपाल अकेला ही घर चला गया. लाली सारा दिन भूखीप्यासी वहीं पर खड़ी रही. रात को अजय वापस आया. लाली को खड़ा देख वह बेरुखी से बोला, ‘‘अब यहां खड़े रहने का कोई फायदा नहीं है.’’

‘‘अजय, मैं ने तो अपनी गलतियों को पहचाना है और मैं तुम्हारी सेवा करने का मौका एक और चाहती हूं.’’ मगर अजय ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया और घर का दरवाजा बंद कर लिया. अगली सुबह अजय ने दरवाजा खोला, तो लाली को बाहर बीमार हालत में देख चौंक उठा. वह बुरी तरह कांप रही थी. वह उसे तुरंत डाक्टर के पास ले गया. बीमार लाली को देख कर अजय को लगा कि ठोकर खा कर लाली सुधर गई है, इसलिए उस ने उसे माफ कर दिया. Love Story

Hindi Stories: उतावली – क्या कमी थी सारंगी के जीवन में

Hindi Stories: ‘‘मैं क्या करती, उन से मेरा दुख देखा नहीं गया तो उन्होंने मेरी मांग में सिंदूर भर दिया.’’ सारंगी का यह संवाद सुन कर हतप्रभ सौम्या उस का मुंह ताकती रह गई. महीनेभर पहले विधवा हुई सारंगी उस की सहपाठिन थी. सारंगी के पति की असामयिक मृत्यु एक रेल दुर्घटना में हुई थी.

सौम्या तो बड़ी मुश्किल से सारंगी का सामना करने का साहस जुटाती दुखी मन से उस के प्रति संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करने आई थी. उलझन में थी कि कैसे उस का सामना करेगी और सांत्वना देगी. सारंगी की उम्र है ही कितनी और ऊपर से 3 अवयस्क बच्चों का दायित्व. लेकिन सारंगी को देख कर वह भौचक्की रह गई थी. सारंगी की मांग में चटख सिंदूर था, हथेलियों से कलाइयों तक रची मेहंदी, कलाइयों में ढेर सारी लाल चूडि़यां और गले में चमकता मंगलसूत्र. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ.

विश्वास होता भी कैसे. तीजत्योहार पर व्रतउपवास रखने वाली, हर मंदिरमूर्ति के सामने सिर झुकाने वाली व अंधभक्ति में लीन रहने वाली सारंगी को इस रूप में देखने की कल्पना उस के मन में नहीं थी. वह तो सोचती आई थी कि सारंगी सूनी मांग लिए, निपट उदास मिलेगी. सारंगी की आंखों में जरा भी तरलता नहीं थी और न ही कोई चिंता. वह सदा सुहागन की तरह थी और उस के चेहरे पर दिग्विजयी खुशी फूट सी रही थी. सब कुछ अप्रत्याशित.

एक ही बस्ती की होने से सारंगी और सौम्या साथसाथ पढ़ने जाती थीं. दोनों का मन कुछ ऐसा मिला कि आपस में सहेलियों सा जुड़ाव हो गया था. सौम्या की तुलना में सारंगी अधिक यौवनभरी और सुंदर थी. उम्र में उस से एक साल बड़ी सारंगी, पढ़ाई में कमजोर होने के कारण वह परीक्षाओं में पास होने के लिए मंदिरों और देवस्थानों पर प्रसाद चढ़ाने की मनौती मानती रहती थी. सौम्या उस की मान्यताओं पर कभीकभी मखौल उड़ा देती थी. सारंगी किसी तरह इंटर पास कर सकी और बीए करतेकरते उस की शादी हो गई. दूर के एक कसबे में उस के पति का कबाड़ खरीदनेबेचने का कारोबार था.

शुरूशुरू में सारंगी का मायके आनाजाना ज्यादा रहा. जब आती तो गहनों से लद के सजीसंवरी रहती थी. खुशखुश सी दिखती थी.

एक दिन सौम्या ने पूछा था, ‘बहुत खुश हो?’

‘लगती हूं, बस’ असंतोष सा जाहिर करती हुई सारंगी ने कहा.

‘कोई कमी है क्या?’ सौम्या ने एकाएक तरल हो आई उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘पूछो मत,’ कह कर सारंगी ने निगाहें झुका लीं.

‘तुम्हारे गहने, कपड़े और शृंगार देख कर तो कोई भी समझेगा कि तुम सुखी हो, तुम्हारा पति तुम्हें बहुत प्यार करता है.’

‘बस, गहनों और कपड़ों का सुख.’

‘क्या?’

‘सच कहती हूं, सौम्या. उन्हें अपने कारोबार से फुरसत नहीं. बस, पैसा कमाने की धुन. अपने कबाड़खाने से देररात थके हुए लौटते हैं, खाएपिए और नशे में. 2 तरह का नशा उन पर रहता है, एक शराब का और दूसरा दौलत का. अकसर रात का खाना घर में नहीं खाते. घर में उन्हें बिस्तर दिखाई देता है और बिस्तर पर मैं, बस.’ सौम्या आश्चर्य से उस का मुंह देखती रही.

‘रोज की कहानी है यह. बिस्तर पर प्यार नहीं, नोट दिखाते हैं, मुड़ेतुड़े, गंदेशंदे. मुट्ठियों में भरभर कर. वे समझते हैं, प्यार जताने का शायद यही सब से अच्छा तरीका है. अपनी कमजोरी छिपाते हैं, लुंजपुंज से बने रहते हैं. मेरी भावनाओं से उन्हें कोई मतलब नहीं. मैं क्या चाहती हूं, इस से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं.

‘मैं चाहती हूं, वे थोड़े जोशीले बनें और मुझे भरपूर प्यार करें. लेकिन यह उन के स्वभाव में नहीं या यह कह लो, उन में ऐसी कोईर् ताकत नहीं है. जल्दी खर्राटे ले कर सो जाना, सुबह देर से उठना और हड़बड़ी में अपने काम के ठिकाने पर चले जाना. घर जल्दी नहीं लौटना. यही उन की दिनचर्या है. उन का रोज नहानाधोना भी नहीं होता. कबाड़खाने की गंध उन के बदन में समाई रहती है.’

सारंगी ने एक और रहस्य खोला, ‘जानती हो, मेरे  मांबाप ने मेरी शादी उन्हें मुझे से 7-8 साल ही बड़ा समझ कर की थी लेकिन वे मुझ से 15 साल बड़े हैं. जल्दी ही बच्चे चाहते हैं, इसलिए कि बूढ़ा होने से पहले बच्चे सयाने हो जाएं और उन का कामधंधा संभाल लें. लेकिन अब क्या, जीवन तो उन्हीं के साथ काटना है. हंस कर काटो या रो कर.’

चेहरे पर अतृप्ति का भाव लिए सारंगी ने ठंडी सांस भरते हुए मजबूरी सी जाहिर की. सौम्या उस समय वैवाहिक संबंधों की गूढ़ता से अनभिज्ञ थी. बस, सुनती रही. कोई सलाह या प्रतिक्रिया नहीं दे सकी थी.

समय बीता. सौम्या बीएड करने दूसरे शहर चली गई और बाहर ही नौकरी कर ली. उस का अपना शहर लगभग छूट सा गया. सारंगी से उस का कोई सीधा संबंध नहीं रहा. कुछ वर्षों बाद सारंगी से मुलाकात हुई तो वह 2 बच्चों की मां हो चुकी थी. बच्चों का नाम सौरभ और गौरव बताया, तीसरा होने को था परंतु उस के सजनेधजने में कोई कमी नहीं थी. बहुत खुश हो कर मिली थी. उस ने कहा था, ‘कभी हमारे यहां आओ. तुम जब यहां आती हो तो तुम्हारी बस हमारे घर के पास से गुजरती है. बसस्टैंड पर किसी से भी पूछ लो, कल्लू कबाड़ी को सब जानते हैं.’

‘कल्लू कबाड़ी?’

‘हां, कल्लू कबाड़ी, तेरे जीजा इसी नाम से जाने जाते हैं.’ ठट्ठा मार कर हंसते हुए उस ने बताया था.

सौम्या को लगा था कि वह अब सचमुच बहुत खुश है. कुछ समय बाद आतेजाते सौम्या को पता चला कि सारंगी के पति लकवा की बीमारी के शिकार हो गए हैं. लेकिन कुछ परिस्थितियां ऐसी थीं कि वह चाहते हुए भी उस से मिल न सकी. लेकिन इस बार सौम्या अपनेआप को रोक न पाई थी. सारंगी के पति की अचानक मृत्यु के समाचार ने उसे बेचैन कर दिया था. वह चली आई. सोचा, उस से मिलते हुए दूसरी बस से अपने शहर को रवाना हो जाएगी.

बसस्टैंड पर पता करने पर एक दुकानदार ने एक बालक को ही साथ भेज दिया, जो उसे सारंगी के घर तक पहुंचा गया था. और यहां पहुंच कर उसे अलग ही नजारा देखने को मिला.

‘कौन है वह, जिस से सारंगी का वैधव्य देखा नहीं गया. कोई सच्चा हितैषी है या स्वार्थी?’ सनसनाता सा सवाल, सौम्या के मन में कौंध रहा था.

‘‘सब जान रहे हैं कि कल्लू कबाड़ी की मौत रेल दुर्घटना में हुई है लेकिन मैं स्वीकार करती हूं कि उन्होंने आत्महत्या की है. सुइसाइड नोट न लिखने के पीछे उन की जो भी मंशा रही हो, मैं नहीं जानती,’’ सारंगी की सपाट बयानी से अचंभित सौम्या को लगा कि उस की जिंदगी में बहुत उथलपुथलभरी है और वह बहुतकुछ कहना चाहती है.

सौम्या अपने आश्चर्य और उत्सुकता को छिपा न सकी. उस ने पूछ ही लिया, ‘‘ऐसा क्या?’’

‘‘हां सौम्या, ऐसा ही. तुम से मैं कुछ नहीं छिपाऊंगी. वे तो इस दुनिया में हैं नहीं और उन की बुराई भी मैं करना नहीं चाहती, लेकिन अगर सचाई तुम को न बताऊं तो तुम भी मुझे गलत समझोगी. विनय से मेरे विवाहेतर संबंध थे, यह मेरे पति जानते थे.’’

‘‘विनय कौन है?’’ सौम्या अपने को रोक न सकी.

‘‘विनय, उन के दोस्त थे और बिजनैसपार्टनर भी. जब उन्हें पैरालिसिस का अटैक हुआ तो विनय ने बहुत मदद की, डाक्टर के यहां ले जाना, दवादारू का इंतजाम करना, सब तरह से. विनय उन के बिजनैस को संभाले रहे. और मुझे भी. जब पति बीमार हुए थे, उस समय और उस के पहले से भी.’’

सौम्या टकटकी लगाए उस की बातें सुन रही थी.

‘‘जब सौरभ के पापा की शराबखोरी बढ़ने लगी तो वे धंधे पर ठीक से ध्यान नहीं दे पाते थे और स्वास्थ्य भी डगमगाने लगा. मैं ने उन्हें आगाह किया लेकिन कोई असर नहीं हुआ. एक दिन टोकने पर गालीगलौज करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए तो मैं ने गुस्से में कह दिया कि अगर अपने को नहीं सुधार सकते तो मैं घर छोड़ कर चली जाऊंगी.’’

‘‘फिर भी कोई असर नहीं?’’ सौम्या ने सवाल कर दिया.

‘‘असर हुआ. असर यह हुआ कि वे डर गए कि सचमुच मैं कहीं उन्हें छोड़ कर न चली जाऊं. वे अपनी शारीरिक कमजोरी भी जानते थे. उन्होंने विनय को घर बुलाना शुरू कर दिया और हम दोनों को एकांत देने लगे. फिसलन भरी राह हो तो फिसलने का पूरा मौका रहता है. मैं फिसल गई. कुछ अनजाने में, कुछ जानबूझ कर. और फिसलती चली गई.’’

‘‘विनय को एतराज नहीं था?’’

‘‘उन की निगाहों में शुरू से ही मेरे लिए चाहत थी.’’

‘‘कितनी उम्र है विनय की?’’

‘‘उन से 2 साल छोटे हैं, परंतु देखने में उम्र का पता नहीं चलता.’’

‘‘और उन के बालबच्चे?’’

‘‘विधुर हैं. उन का एक बेटा है, शादीशुदा है और बाहर नौकरी करता है.’’

सौम्या ने ‘‘हूं’’ करते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पति ने आत्महत्या क्यों की?’’

‘‘यह तो वे ही जानें. जहां तक मैं समझती हूं, उन में सहनशक्ति खत्म सी हो गई थी. पैरालिसिस के अटैक के बाद वे कुछ ठीक हुए और धीमेधीमे चलनेफिरने लगे थे. अपने काम पर भी जाने लगे लेकिन परेशान से रहने लगे थे. मुझे कुछ बताते नहीं थे. उन्हें डर सताने लगा था कि विनय ने बीवी पर तो कब्जा कर लिया है, कहीं बिजनैस भी पूरी तरह से न हथिया ले. एक बार विनय से उन की इसी बात पर कहासुनी भी हुई.’’

‘‘फिर?’’

‘‘फिर क्या, मुझे विनय ने बताया तो मैं ने उन से पूछा. अब मैं तुम्हें क्या बताऊं, सौम्या. कूवत कम, गुस्सा ज्यादा वाली बात. वे हत्थे से उखड़ गए और लगे मुझ पर लांछन लगाने कि मैं दुश्चरित्र हूं, कुल्टा हूं. मुझे भी गुस्सा आ गया. मैं ने भी कह दिया कि तुम्हारे में ताकत नहीं है कि तुम औरत को रख सको. अपने पौरुष पर की गई

चोट शायद वे सह न सके. बस, लज्जित हो कर घर से निकल गए. दोपहर में पता चला कि रेललाइन पर कटे हुए पड़े हैं.’’

बात खत्म करतेकरते सारंगी रो पड़ी. सौम्या ने उसे रोने दिया.

थोड़ी देर बाद पूछा, ‘‘और तुम ने शादी कब की?’’

‘‘विनय से मेरा दुख देखा नहीं जाता था, इसलिए एक दिन मेरी मांग…’’ इतना कह कर सारंगी चुप हो गई और मेहंदी लगी अपनी हथेलियों को फैला कर देखने लगी.

‘‘तुम्हारी मरजी से?’’

‘‘हां, सौम्या, मुझे और मेरे बच्चों को सहारे की जरूरत थी. मैं ने मौका नहीं जाने दिया. अब कोई भला कहे या बुरा. असल में वे बच्चे तीनों विनय के ही हैं.’’

कुछ क्षण को सौम्या चुप रह गई और सोचविचार करती सी लगी. ‘‘तुम ने जल्दबाजी की, मैं तुम्हें उतावली ही कहूंगी. अगर थोड़े समय के लिए धैर्य रखतीं तो शायद, कोई कुछ न कह पाता. जो बात इतने साल छिपा कर रखी थी, साल 2 साल और छिपा लेतीं,’’ कहते हुए सौम्या ने अपनी बायीं कलाई घुमाते हुए घड़ी देखी और उठ जाने को तत्पर हो गई. सारंगी से और कुछ कहने का कोई फायदा न था. Hindi Stories

Suspense Story: प्यार की खातिर दोस्त को दगा

Suspense Story: सुबह के साढ़े 6 बजे थे. बिहार के मुंगेर शहर में रहने वाला प्रेमनारायण सिंह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा तो पास में खड़ी पत्नी शिवानी की तरफ देख कर मुसकराया. पत्नी भी पति की तरफ देख कर मंदमंद मुसकराई. उधर प्रेमनारायण सिंह की बाइक घर से मुश्किल से डेढ़ सौ मीटर आगे ब्रह्मï चौक पहुंची थी कि अचानक किसी ने पीछे से उस पर लगातार 2 फायर कर दिए. गोली लगते ही वह सडक़ पर गिर कर बुरी तरह तड़पनेे लगा.

सुबह की फिजा में गोली चलने की आवाज दूरदूर तक गूंज उठी. गोली की आवाज सुन आसपास के घरों से कुछ लोग निकल कर लहूलुहान प्रेमनारायण सिंह के समीप पहुंचे. किसी ने उस के घर जा कर प्रेमनारायण को गोली लगने की बात कही तो प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी और अन्य लोग रोतेबिलखते घायल प्रेमनारायण सिंह के पास पहुंचे और उसे तुरंत एक निजी क्लिनिक ले गए, लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

शिवानी ने फोन कर के मुंगेर के पूरब सराय पुलिस चौकी में अपने पति की हत्या की सूचना दी तो चौकी इंचार्ज राजीव कुमार कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर क्लिनिक पहुंच गए और प्रेमनारायण सिंह की लाश अपने कब्जे ले कर घटना की सूचना एसएचओ को दे दी. हत्या की खबरसुन कर एसएचओ भी क्लिनिक पहुंच गए. लाश का प्रारंभिक निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस वारदात वाली जगह ब्रह्मï चौक के निकट पहुंची और वहां का बारीकी से मुआयना करने लगी. सडक़ पर जहां प्रेमनारायण गोली लगने के बाद गिरा था, वहां पर काफी खून था. उस की बाइक भी वहीं पड़ी थी. वहां उपस्थित लोगों से पूछताछ करने पर बस इतना पता चला कि कोई बाइक सवार प्रेमनारायण को गोली मार कर फरार हो गया था.

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

कई लोगों से पूछताछ के बाद भी कोई भी बाइक का नंबर या उसेे चलाने वाले बदमाशों का हुलिया नहीं बता पाया. चौकी इंचार्ज राजीव कुमार ने प्रेमनारायण सिंह की पत्नी शिवानी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति की इलाके में किसी से दुश्मनी नहीं है. घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद पुलिस वापस लौट आई. शिवानी की शिकायत पर प्रेमनारायण सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसएचओ ने इस घटना के बारे में मुंगेर के एसपी जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी को विस्तार से जानकारी दी तो उन्होंने इस सनसनीखेज हत्याकांड के रहस्य से परदा हटाने के लिए एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एसडीपीओ (सदर) राजीव कुमार, ओपी प्रभारी राजीव कुमार, कासिम बाजार एसएचओ मिंटू कुमार, जमालपुर एसएचओ सर्वजीत कुमार, पूरब सराय चौकी इंचार्ज राजीव कुमार तथा अन्य कई सिपाही शामिल थे.

टीम ने इस मर्डर केस को सुलझाने के लिए घटनास्थल और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर बारीकी से उस की जांच शुरू की तो उन्होंने फुटेज में 2 बाइक सवारों के अलावा कुछ संदिग्ध चेहरों की पहचान की. इस के अलावा मृतक प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच में एक संदिग्ध नंबर मिला, जिस पर घटना के पहले और उस के बाद शिवानी धड़ल्ले से बातें कर रही थी. जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो वह नंबर गौरव कुमार नाम के युवक का निकला.

हत्या के पीछे निकली लव क्राइम की कहानी

जब गौरव कुमार को थाने में बुला कर उस के और शिवानी के बीच मोबाइल पर चल रही लंबी बातचीत के बारे में पूछताछ की गई तो गौरव ने बताया कि वह प्रेमनारायण का दोस्त है, इसलिए उस का उन के घर आनाजाना है. इसी वजह से वह शिवानी से बातें करता है. लेकिन हैरत की बात थी कि जितनी वह शिवानी से बातें करता था, उतनी बातें शिवानी अपने पति से भी नहीं करती थी.

मामला संदेहास्पद लगा, इसलिए जब गौरव को थाने में बुला कर पूछताछ की गई तो थोड़ी देर के बाद उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में अपना जुर्म स्वीकार करते हुए पुलिस टीम को जो बातें बताईं, उस में पति पत्नी और वो के रिश्तों में उलझी लव क्राइम की एक दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई. उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में शामिल सभी लोगों के नामपते बताए, जिस में प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी तथा शूटर अभिषेक कुमार, इंद्रजीत कुमार, मोहम्मद इरशाद, राजीव, दीपक कुमार उर्फ दीपू थे. गौरव कुमार को हिरासत में लेने के बाद पुलिस टीम मृतक प्रेमनारायण के घर पहुंची और पति की मौत का नाटक कर रही शिवानी को हिरासत में ले लिया गया.

10 और 11 अगस्त को 2 आरोपी और 12 अगस्त को 3 आरोपियों को उन के ठिकानों पर दबिश डाल कर गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद इस हत्याकांड के पीछे जो खौफनाक कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है. 32 वर्षीय प्रेमनारायण सिंह मुंगेर के वार्ड नंबर 14 में अपनी पत्नी शिवानी और 4 साल की बेटी के साथ रहता था. करीब 5 साल पहले दोनों की शादी हुई थी. प्रेमनारायण मुंगेर में ही स्थित आईटीसी कंपनी में नौकरी करता था.

नौकरीपेशा होने की वजह से प्रेमनारायण सिंह के जीवन में हर प्रकार का सुखवैभव मौजूद था, लेकिन इस घर में उन के बड़े भाई का परिवार भी रहता था. शिवानी को जौइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं था. इस के अलावा शिवानी की सास भी रहती थी. शिवानी के ससुर की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी थी. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होने से शिवानी घर में अपनी मनमरजी से नहीं रह पाती थी. जबकि वह बिना किसी रोकटोक के आजाद रहना पसंद करती थी. ऐसा तभी संभव था, जब वह बाकी लोगों से अलग हो कर कहीं दूसरा घर खरीद लेते या किराए के मकान में रहने चले जाते.

प्रेमनारायण इस घर को छोड़ कर कहीं भी जाना नहीं चाहता था. यहां से जाने पर एक तो उसे घर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते, दूसरे उसे अपनी मां और भाईभाभी से अलग होना पड़ जाता, जोकि वह चाहता नहीं था. रोजरोज की इस घरेलू कलह से बचने के लिए प्रेमनारायण ने अपने एक दोस्त गौरव कुमार की मदद ली.

दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध का खेल

गौरव कुमार मुंगेर के नजदीक नंदलालपुर का रहने वाला था और उसी के साथ सिगरेट फैक्ट्री में काम करता था. दोनों के बीच खूब जमती थी. वे रोज अपने घरों का हाल अकसर एकदूसरे को बताते रहते थे. कहते हैं कि अपनी परेशानी बांटने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है. इसी कारण प्रेमनारायण अपनी परेशानी गौरव के साथ शेयर कर लेता था. प्रेमनारायण के घर का हाल जानने के बाद गौरव भी उस के घर की समस्या हल करने में मदद करने की कोशिश करता.

2023 के जनवरी महीने में गौरव ने प्रेमनारायण के घर आनाजाना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त का पक्ष ले कर शिवानी को मनाने का प्रयास करना शुरू किया, लेकिन कुछ ही मुलाकातों के बाद शिवानी की बातों का गौरव के दिलोदिमाग पर कुछ ऐसा जादू हुआ कि वह जिस दिन शिवानी से नहीं मिलता, उस के दिल को सुकून नहीं मिलता था. शिवानी जानती थी कि गौरव कुंआरा है. वह गौरव को पसंद करने लगी. गौरव को जब भी वक्त मिलता, वह शिवानी को समझाने के बहाने उस से मिलने आ जाता. कुछ ही दिनों में उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात हो गए. उधर गौरव और शिवानी दोनों ने प्रेमनारायण को सदा अंधरे में रखा.

गौरव और शिवानी बड़ी खामोशी से प्यार की पींगें बढ़ाते रहे. प्रेमनाराण को कभी गौरव और शिवानी के अवैध संबंधों की भनक तक नहीं लगी. जब उन के अंतरंग संबंध प्रगाढ़ हो गए तो उन्होंने प्रेमनारायण को अपने रास्ते से सदा के लिए हटाने का फैसला कर लिया. गौरव ने शिवानी को समझाया कि प्रेमनारायण की हत्या के बाद उस की जगह पर तुम्हारी नौकरी लग जाएगी.

कुछ समय के बाद जब मामला ठंडा पड़ जाएगा, तब हम दोनों आपस में शादी कर लेंगे. इस बीच हम दुनिया वालों की आखों में धूल झोंक कर मिलते रहेंगे. शिवानी इस बात के लिए तैयार हो गई. तब गौरव कुमार अपने कुछ जानकारों की मदद से कुछ शातिर बदमाशों से मिला, जो सुपारी ले कर हत्या की वारदात को अंजाम देते थे. बदमाशों से प्रेमनारायण की हत्या की बात 7 लाख रुपए में तय हो गई. शिवानी ने बदमाशों को देने के लिए 7 लाख रुपए गौरव को सौंप दिए.

सुपारी दे कर शूटरों से कराई हत्या

4 अगस्त, 2023 को बेगूसराय का शूटर अभिषेक कुमार और समस्तीपुर का शूटर इंद्रजीत तथा मोहम्मद इरशाद मुंगेर स्थित गौरव कुमार के ठिकाने पर पहुंचे. गौरव कुमार मुंगेर के मंगल बाजार स्थित माधोपुर में किराए का कमरा ले कर रहता था. मुस्सफिल थाना क्षेत्र के नंदलालपुर से 2 बदमाश राजीव कुमार तथा दीपक कुमार उर्फ दीपू भी वहां पहुंचे. इन दोनों ने 5 अगस्त को प्रेमनारायण के घर के बाहर मौजूद रह कर उस की रेकी की. 6 अगस्त, 2023 की सुबह प्रेमनारायण सिंह जैसे ही अपनी बाइक से ड्यूटी जाने के लिए घर से निकला. पीछे से अभिषेक कुमार भी बाइक चलाते हुए उस के निकट पहुंचा और पीछे बैठे इंद्रजीत ने प्रेमनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी.

घटना को अंजाम देने के बाद अभिषेक कुमार और शूटर इंद्रजीत मुख्य आरोपी गौरव कुमार के मंगल बाजार स्थित कमरे पर पहुंचे. वहां अपने हथियारों को छोड़ कर सभी मुंगेर से फरार हो गए. पुलिस एसआईटी की टीम ने गौरव के कमरे से 2 देशी पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और 2 चले हुए कारतूस के खोखे बरामद कर लिए. कथा लिखे जाने तक मुंगेर पुलिस ने इस घटना में शामिल आरोपी गौरव समेत कुल 7 बदमाशों को गिरफ्तार कर मुंगेर की जिला अदालत में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime News Hindi: रिश्तों का कत्ल – बेटा बना हत्यारा

Crime News Hindi: आजकल के बच्चे यह नहीं समझते कि पिता केवल बच्चों का जन्मदाता ही नहीं होता, बल्कि उन का पालनहार होता है. ऐसे में अगर बेटा पिता का बेरहमी से कत्ल करने के साथ ही साथ उस के गुप्तांगों को भी कुचल दे तो बेरहमी की सीमा का पता लगता है. यह एक बाप का नहीं, बापबेटे के रिश्ते और भरोेसे का भी कत्ल होता है. ऐसी घटनाएं आजकल तेजी से बढ़ने लगी हैं. लखनऊ जिले के निगोहां  थाना क्षेत्र के रंजीत खेड़ा गांव में ऐसी ही घटना ने दिल को झकझोर कर रख दिया है.

‘‘यह खेती और जमीन मेरी है. इस का मैं मालिक हूं. मैं जिसे चाहूंगा, उसे दूंगा. तुम्हारे कहने से मैं इस को तुम्हें हरगिज नहीं दूंगा.’’ 70 साल के महादेव ने अपने बेटे जगदेव के साथ रोजरोज की लड़ाई से तंग आ कर यह इसलिए कहा कि ऐसी धमकी से बेटे जगदेव के मन में डर बैठेगा. वह पिता की बात मानेगा.

‘‘हमें पता है, तुम ने जमीन बेचने का बयाना ले लिया है. लेकिन इतना सुन लो कि उस में से मेरा हिस्सा मुझे भी चाहिए.’’ महादेव के बडे़ बेटे जगदेव ने पिता को अपना फैसला सुनाते हुए कहा.

बयाना वह पैसा होता है, जो जमीन बेचने के लिए अग्रिम धनराशि होती है. इस के बाद जब जमीन खरीदने वाला पूरा पैसा चुका देता है तो जमीन की लिखतपढ़त की जाती है. जगदेव को यह लग रहा था कि जब बयाने में ही उस का हिस्सा नहीं मिलेगा तो जमीन बिकने पर मिलने वाली रकम में भी उसे हिस्सा नहीं मिलेगा. ऐसे में वह बयाने की रकम से ही हिस्सा लेने की जिद करने लगा. जबकि महादेव जगदेव को हिस्सा नहीं देना चाहता था. जगदेव का अपने पिता के साथ मतभेद रहता था. उसे बारबार यह लगता था कि उस के पिता उस के बजाए छोटे भाईबहनों को अधिक चाहते हैं.

इस के अलावा उसे इस बात की नाराजगी रहती थी कि उस के पिता के संबंध उन्नाव में रहने वाली गायत्री नाम की महिला के साथ थे. जबकि गायत्री और महादेव के ऐेसे कोई संबंध नहीं थे. हमउम्र होेने के कारण दोनों एकदूसरे के साथ खुल कर बातें कर लेते थे. एकदूसरे का सुखदुख बांट लेते थे. बेटा जगदेव यह नहीं समझ पा रहा था कि 70 साल की उम्र में उस के पिता से क्या संबंध हो सकते हैं. उसे इस उम्र में भी पिता का किसी औरत से बात करना खराब ही लगता था. उसे सब चरित्रहीन ही दिखते थे. महादेव सारे पैसे अपने पास रखना चाहते थे. कारण यह था कि उन्हें लगता था कि अगर उन के पास पैसे नहीं होंगे तो कोई भी बुढ़ापे में सहारा नहीं देगा.

वैसे महादेव ने अपनी जमीन का ज्यादातर हिस्सा अपने बेटों को दे दिया था. कुछ जमीन ही उस ने अपने पास रखी थी. इस के अलावा थोड़ी सी जमीन वह बेचने की सोच रहा था. इसी जमीन के टुकड़े के बिकने पर मिले पैसों के कारण विवाद बढ़ गया था. गांव में रहने वाले बूढे़ लोगों के पास जमीन का ही सहारा होता है. आमतौर पर बूढ़े होते मांबाप की जमीन पर बेटों का कब्जा हो जाता है और बूढे़ बिना किसी आश्रय के जीवन गुजारने को मजबूर हो जाते हैं. जब तक मातापिता जीवित रहते हैं तब तक तो थोड़ाबहुत काम चल भी जाता है, पर दोनों में से कोई एक बचता है तो उस का जीवन कठिन हो जाता है.

घर में बेटे के साथ रोजरोज के झगड़े से तंग आ कर महादेव ने सोचा कि अब वह अपने ही बनाए घर में नहीं रहेगा. महादेव ने अपने खेत में एक कमरा बना रखा था, जहां ट्यूबवैल था. बेटे से रोज के झगडे़ को खत्म करने के लिए वह खेत में बने कमरे में रहने लगा. यह गांव से बाहर सुनसान जगह पर था. उसे यहां मच्छर और जंगली जानवरों का डर रहता था. पर घर में बेटे की गाली और मार खाने से यहां जंगल में अकेले रहने में उसे सुकून महसूस होता था. महादेव का दूसरा बेटा गया प्रसाद गांव में कम ही रहता था. वह मजदूरी करने शहर ही जाता था. ऐसे में उस का घर के मामलों में दखल कम रहता था.

महादेव की दोनों बेटियां श्वेता और बिटाना अपने मांबाप के करीब रहती थीं. उन की भी भाइयों से कम ही बनती थी. ऐसे में परिवार में आपस में कोई सामंजस्य नहीं था. महादेव लखनऊ जिले के निगोहां थानाक्षेत्र के रंजीत खेड़ा गांव में रहता था. उस की उम्र 70 साल के करीब थी. महादेव के 2 बेटे जगदेव  प्रसाद और गया प्रसाद और 2 बेटियां श्वेता और बिटाना थीं. सभी बच्चों की शादी हो चुकी थी. महादेव का उन्नाव आनाजाना था. वहां रहने वाली गायत्री (बदला हुआ नाम) से उस के नजदीकी रिश्ते थे. यह बात बेटे जगदेव को नागवार लगती थी. वह इस बात को ले कर अकसर अपने पिता को ताना मारता रहता था.

इस बात से नाखुश पिता महादेव घर की जगह खेत पर बने कमरे में पत्नी शांति देवी के साथ रहता था. 26 अगस्त, 2021 की रात शांति देवी और महादेव अगलबगल सो रहे थे. शांति देवी को ठीक से नींद नहीं आती थी तो डाक्टर की सलाह पर वह नींद की गोली खा कर सोती थी. ऐसे में उसे अपने आसपास का पता नहीं होता था.27 अगस्त की सुबह जब वह उठी तो देखा कि उस के बगल में सो रहे महादेव की किसी ने हत्या कर दी है. खून से लथपथ पति का शव देख कर शांति देवी चीख पड़ी. उस के चिल्लाने की आवाज सुन कर गांव के लोग वहां पहुंच गए.

घटना की सूचना गांव के लोगों ने निगोहां थाने की पुलिस को दी. पुलिस ने महादेव के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद महादेव के बेटे जगदेव की लिखित तहरीर पर भादंवि की धारा 302 के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामले की सूचना मिलने के बाद एसपी (ग्रामीण) हृदेश कुमार और सीओ निगोहां नईमुल हसन ने हत्या की गुत्थी को सुलझाने के लिए थानाप्रभारी जितेंद्र प्रताप सिंह व एसआई राम समुझ यादव के साथ एक पुलिस टीम का गठन किया.

थानाप्रभारी जितेंद्र प्रताप सिंह हत्या के कुछ दिन पहले ही निगोहां थाने में नई पोस्टिंग पर आए थे. ऐसे में आते ही हत्या की गुत्थी सुलझाने का दायित्व संभालना पड़ा. महादेव की दोनों बेटियों श्वेता और बिटाना का शक भाई के साथ रहने वाली महिला पर था. क्योंकि पिता को बिना शादी के उस का साथ रहना पसंद नहीं था. पुलिस की टीम ने जब गांव के लोगों और महादेव के घर वालों से अलगअलग बातचीत की तो मामले का हैरतअंगेज खुलासा हुआ. घरपरिवार की शंका से अलग आरोपी सामने आया. पुलिस ने जब गहरी छानबीन की तो पता चला कि महादेव की हत्या उस के बेटे जगदेव ने की है.

पुलिस की पूछताछ में जगदेव ने बताया कि जब पिता ने उसे जमीन में हिस्सा देने से मना किया और जमीन बेचने के लिए जो बयाना लिया था, उस में भी हिस्सा नहीं दिया था. उसे लगता था कि ऐसा वह किसी के बहकावे में आ कर कर रहे थे. जिस से वह तनाव में रहने लगा. 32 साल के जगदेव ने सोचा कि क्यों न वह अपने पिता का कत्ल कर दे, जिस से रोजरोज का झंझट ही खत्म हो जाए. जगदेव यह जानता था कि उस की मां नींद की दवा खा कर सो जाती है. उसे अपने आसपास का कुछ पता नहीं रहता था.

26 अगस्त, 2021 की रात करीब ढाई बजे जगदेव अपने पिता के कमरे तक पहुंच गया. वहां मां सो रही थी. पास में ही अलग चारपाई पर पिता महादेव भी सो रहे थे. जगदेव ने सब से पहले पिता के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया, जिस से वह आवाज न कर सकें. इस के बाद पत्थर से प्रहार कर के सिर को फोड़ दिया. पिता जीवित न रह जाएं, इस कारण उस ने पिता के निजी अंगों पर भी प्रहार कर के उन की हत्या कर दी. इस के बाद वह चुपचाप वहां से भाग गया. सुबह जब उस की मां ने शोर मचाया और गांव के लोग जमा हो गए तो जगदेव भी वहां पंहुचा और उस ने पुलिस को अपने पिता की हत्या की तहरीर दी. उस समय किसी को भी यह शंका नहीं थी कि उस ने ही पिता के साथ ऐसा किया होगा. जगदेव को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उसे जेल भेज दिया.

Property Dispute: परिवार के 5 जनों को डसने वाला आस्तीन का सांप

Property Dispute: उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के मुरादनगर से सटा गांव है बसंतपुर सैंथली. यहां भी तेजी से शहरीकरण के चलते जमीनों के दाम आसमान छूने लगे हैं. बिल्डर आते हैं, किसानों को लुभाते हैं और उस भाव में खेतीकिसानी की जमीनों के सौदे करते हैं, जिस की उम्मीद किसानों ने कभी सपने में भी नहीं की होती.

एक बीघा के 50 लाख से ले कर एक करोड़ रुपए सुन कर किसानों का मुंह खुला का खुला रह जाता है कि इतना तो वे सौ साल खेती कर के भी नहीं कमा पाएंगे. और वैसे भी आजकल खेतीकिसानी खासतौर से छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे का सौदा साबित होने लगी है. लिहाजा वे एकमुश्त मिलने वाले मुंहमांगे दाम का लालच छोड़ नहीं पाते और जमीन बेच कर पास के किसी कसबे में बस जाते हैं. इसी गांव का एक ऐसा ही किसान है 48 वर्षीय लीलू त्यागी, जिस के हिस्से में पुश्तैनी 15 बीघा जमीन में से 5 बीघा जमीन आई थी. बाकी 10 बीघा 2 बड़े भाइयों सुधीर त्यागी और ब्रजेश त्यागी के हिस्से में चली गई थी.

जमीन बंटबारे के बाद तीनों भाई अपनीअपनी घरगृहस्थी देखने लगे और जैसे भी हो खींचतान कर अपने घर चलाते बच्चों की परवरिश करने लगे. बंटवारे के समय लीलू की शादी नहीं हुई थी, लिहाजा उस पर घरगृहस्थी के खर्चों का भार कम था. गांव के संयुक्त परिवारों में जैसा कि आमतौर पर होता है, दुनियादारी और रिश्तेदारी निभाने की जिम्मेदारी बड़ों पर होती है, इसलिए भी लीलू बेफिक्र रहता था और मनमरजी से जिंदगी जीता था. साल 2001 का वह दिन त्यागी परिवार पर कहर बन कर टूटा, जब सुधीर अचानक लापता हो गए. उन्हें बहुत ढूंढा गया पर पता नहीं चला कि उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया.

कुछ दिनों की खोजबीन के बाद त्यागी परिवार ने तय किया कि सुधीर की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी जाए. लेकिन इस पर लीलू बड़ेबूढ़ों के से अंदाज में बोला, ‘‘इस से क्या होगा. उलटे हम एक नई झंझट में और फंस जाएंगे. पुलिस तरहतरह के सवाल कर हमें परेशान करेगी. हजार तरह की बातें समाज और रिश्तेदारी में होंगी. उस से तो अच्छा है कि उन का इंतजार किया जाए. हालांकि वह किसी बात को ले कर गुस्से में थे और मुझ से यह कह कर गए थे कि अब कभी नहीं आऊंगा.’’

परिवार वालों को लीलू की सलाह में दम लगा. वैसे भी अगर सुधीर के साथ कोई अनहोनी या हादसा हुआ होता तो उन की लाश या खबर मिल जानी चाहिए थी और वाकई पुलिस क्या  कर लेती. वह कोई दूध पीते बच्चे तो थे नहीं, जो घर का रास्ता भूल जाएं.  यह सोच कर सभी ने मामला भगवान भरोसे छोड़ दिया.  उन्हें चिंता थी तो बस उन की पत्नी अनीता और 2 नन्हीं बेटियों पायल और पारुल की, जिन के सामने पहाड़ सी जिंदगी पड़ी थी.

यह परेशानी भी वक्त रहते दूर हो गई, जब गांव में यह चर्चा शुरू हुई कि अब सुधीर के आने की तो कोई उम्मीद रही नहीं, अनीता कब तक उस की राह ताकती रहेगी. इसलिए अगर लीलू उस से शादी कर ले तो उन्हें सहारा और बेटियों को पिता मिल जाएगा. घर की खेती भी घर में रहेगी. गांव और रिश्ते के बड़ेबूढ़ों का सोचना ऐसे मामले में बहुत व्यावहारिक यह रहता है कि जवान औरत कब तक बिना मर्द के रहेगी. आज नहीं तो कल उस का बहकना तय है, इसलिए बेहतर है कि अगर देवरभाभी दोनों राजी हों तो उन की शादी कर दी जाए.

बात निकली तो जल्द उस पर अमल भी हो गया. एक सादे समारोह में लीलू और अनीता की शादी हो गई जो कोई नई बात भी नहीं थी. क्योंकि गांवों में ऐसी शादियां होना आम बात है, जहां देवर ने विधवा भाभी से शादी की हो. इतिहास भी ऐसी शादियों से भरा पड़ा है. देखते ही देखते अपने देवर की पत्नी बन अनीता विधवा से फिर सुहागन हो गई और वाकई में पारुल और पायल को चाचा के रूप में पिता मिल गया. इस के बाद तो बड़े भाई सुधीर की जमीन भी लीलू की हो गई. जल्द ही लीलू और अनीता के यहां बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम विभोर रखा गया. घर में सब उसे प्यार से शैंकी कहते थे.

कभीकभार जरूर गांव के कुछ लोगों में यह चर्चा हो जाती थी कि चलो जो हुआ सो अच्छा हुआ, लेकिन कभी सुधीर अगर वापस आ गया तो क्या होगा. मुमकिन है जी उचट जाने से वह साधुसंन्यासियों की टोली में शामिल हो गया हो और वहां से भी जी उचटने के कारण कभी घर आ जाए. फिर अनीता किस की पत्नी कहलाएगी? सवाल दिलचस्प था, जिस का मुकम्मल जबाब किसी के पास नहीं था. पर एक शख्स था जो बेहतर जानता था कि सुधीर अब कभी वापस नहीं आएगा. वह शख्स था लीलू.

इसी तरह 5 साल गुजर गए. अब सब कुछ सामान्य हो गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही साल 2006 में पारुल की मृत्यु हो गई. घर और गांव वाले कुछ सोचसमझ पाते, इस के पहले ही लीलू ने कहा कि उसे किसी जहरीले कीड़े ने काट लिया था और आननफानन में उस का अंतिम संस्कार भी कर दिया. गांवों में ऐसे यानी सांप वगैरह के काटे जाने के हादसे भी आम होते हैं, इसलिए कोई यह नहीं सोच पाया कि यह कोई सामान्य मौत नहीं, बल्कि सोचसमझ कर की गई हत्या है. और आगे भी त्यागी परिवार में ऐसी हत्याएं होती रहेंगी, जो सामान्य या हादसे में हुई मौत लगेंगी और हैरानी की बात यह भी रहेगी किसी भी मामले में न तो लाश मिलेगी और न ही किसी थाने में रिपोर्ट दर्ज होगी.

इस के 3 साल बाद ही पायल भी रहस्यमय ढंग से गायब हो गई तो मानने वाले इसे होनी मानते रहे. लेकिन अनीता अपनी दोनों बेटियों की मौत का सदमा झेल नहीं पाई और बीमार रहने लगी, जिस का इलाज भी लीलू ने कराया. अब सुधीर की जमीन का कोई वारिस नहीं बचा था, सिवाय अनीता के, जो अब हर तरह से लीलू और बड़े होते शैंकी की मोहताज रहने लगी थी. लीलू की तो जान ही अपने बेटे में बसती थी और वह उसे चाहता भी बहुत था. लेकिन यह नहीं देख पा रहा था कि उस के लाड़प्यार के चलते शैंकी गलत राह पर निकल पड़ा है.

और देख भी कैसे पाता क्योंकि वह खुद ही एक ऐसे रास्ते पर चल रहा था, जिसे कलयुग का महाभारत कहा जा सकता है और वह उस का धृतराष्ट्र है, जो पुत्र मोह में अंधा हो गया था. इसी अंधेपन का नतीजा था कि बीती 9 जुलाई को लीलू गाजियाबाद के सिहानी गेट थाने में पुलिस वालों के सामने खड़ा गिड़गिड़ा रहा था कि शैंकी मेरा इकलौता बेटा है, आप जितने चाहो पैसे ले लो लेकिन उसे छोड़ दो. बेटा छूट जाए, इस के लिए वह 10 लाख रुपए देने को तैयार था. लेकिन जुर्म की दुनिया में दाखिल हो चुके बिगड़ैल शैंकी ने जुर्म भी मामूली नहीं किया था, लिहाजा उस का यूं छूटना तो नामुमकिन बात थी.

दरअसल, शैंकी ने केन्या की एक लड़की, जिस का नाम रोजमेरी वाजनीरू है, से 7 जुलाई को 12 हजार रुपए नकद और एक मोबाइल फोन लूटा था. रोजमेरी से उस का संपर्क सोशल मीडिया के जरिए हुआ था. जब वह दिल्ली आई तो शैंकी बहाने से उसे अपनी कार में बैठा कर गाजियाबाद ले गया और हथियार दिखा कर लूट की इस वारदात को अंजाम दिया. दूसरे दिन सुबह रोजमेरी ने सिहानी गेट थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई तो शैंकी पकड़ा गया. वारदात में उस का साथ देने वाला शुभम भी गिरफ्तार किया गया था. वह भी मुरादनगर का रहने वाला है.

दोनों से वारदात में इस्तेमाल किए गए हथियार, 11 हजार रुपए नकद और वह कार भी बरामद की गई थी, जिस में बैठा कर रोजमेरी से लूट की गई थी. कुछ दिनों बाद दोनों को अदालत से जमानत मिल गई थी. लेकिन अब खुद जेल में बंद लीलू को जमानत मिल पाएगी, इस में शक है. क्योंकि उस के गुनाहों के आगे तो बेटे का गुनाह कुछ भी नहीं. बीती 24 सितंबर को लीलू को गाजियाबाद पुलिस ने अपने भतीजे रेशू की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया तो सख्ती से पूछताछ में उस ने खुलासा किया कि उस ने कोई एकदो नहीं बल्कि 20 साल में एकएक कर 5 हत्याएं की हैं. और ये पांचों ही उस के अपने सगे हैं.

यह सुन कर पुलिस वालों के मुंह तो खुले के खुले रह गए, साथ ही जिस ने भी सुना उस के भी होश उड़ गए कि कैसा कलयुग आ गया है, जिस में जमीन के लालच में एक सगे भाई ने दूसरे सगे बड़े भाई और 2 भतीजियों जो अनीता से शादी के बाद उस की बेटियां हो गई थीं, सहित 2 सगे भतीजों को भी इतनी साजिशाना और शातिराना तरीके से मारा कि किसी को उस पर शक भी नहीं हुआ. रेशू की हत्या के आरोप में वह कैसे पकड़ा गया, इस से पहले यह जान लेना जरूरी है कि इस के पहले की 4 हत्याएं उस ने कैसे की थीं. इन में से 2 का जिक्र ऊपर किया जा चुका है.

अपने बड़े भाई सुधीर की हत्या लीलू ने एक लाख की सुपारी दे कर मेरठ में करवाई थी और लाश को नदी में बहा दिया था. इसलिए अनीता से शादी करने के बाद वह बेफिक्र था कि सुधीर आएगा कहां से, उसे तो मौत की नींद में वह सुला चुका है. यह कातिल कितना खुराफाती है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह 20 साल पहले ही अपने गुनाहों की स्क्रिप्ट लिख चुका था और हरेक कत्ल के बाद किसी को शक न होने पर उस के हौसले बढ़ते जा रहे थे.

जब शैंकी पैदा हुआ तो उसे लगा कि सुधीर की जमीन उस की बेटियों के नाम हो जाएगी, लिहाजा पहले उस ने पारुल को खाने में जहर दे कर मारा और फिर पायल की भी हत्या कर उस की लाश को नदी में बहा दिया. इस दौरान जमीनजायदाद का धंधा करने के लिए उस ने अपने हिस्से की जमीन बेच दी और मुरादनगर थाने के सामने एक आलीशान मकान भी बनवा लिया. जब इस निकम्मे और लालची से दलाली का धंधा नहीं चला तो उस की नजर दूसरे भाई ब्रजेश की जमीन पर जा टिकी. उसे लगा कि अगर ब्रजेश और उस के बेटों व पत्नी को भी इसी तरह ठिकाने लगा दिया जाए तो उस की ढाई करोड़ की जमीन भी उस की हो जाएगी.

नेकी तो नहीं बल्कि बदी और पूछपूछ की तर्ज पर उस ने साल 2013 में  ब्रजेश के छोटे बेटे 16 वर्षीय नीशू की भी हत्या कर लाश नदी में बहा दी और अपनी गोलमोल बातों से पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से ब्रजेश को रोक लिया था. यह उस के द्वारा की गई चौथी हत्या थी. अब तक उसे समझ आ गया था कि और साल, 2 साल या 4 साल लगेंगे, लेकिन जमीन तो उस की हो ही जाएगी. असल में वह चाहता था कि पूरे कुटुंब की जमीन उस के बेटे शैंकी को मिल जाए, जिस से उसे जिंदगी में मेहनत ही न करनी पड़े जैसे कि उसे नहीं करनी पड़ी थी. जाहिर है रेशू की हत्या के बाद वह ब्रजेश और उन की पत्नी को भी ऊपर पहुंचा देने का मन बना चुका था.

ब्रजेश का बेटा 24 वर्षीय रेशू बीती 8 अगस्त को गायब हो गया था. यह उन के लिए एक और सदमे वाली बात थी. क्योंकि नीशू को गुजरे 8 साल बीत गए थे, अब रेशू ही उन का आखिरी सहारा बचा था जिस की सलामती के लिए वे दिनरात दुआएं मांगा करते थे. लेकिन यह अंदाजा दूसरों की तरह उन्हें भी नहीं था कि परिवार को डसने वाला सांप आस्तीन में ही है. लीलू ने इस बाबत और लोगों को भी अपनी साजिश में शामिल कर लिया था. उस ने योजना के मुताबिक रेशू को फोन कर गांव के बाहर मिलने बुलाया और घूमने चलने के बहाने कार में बैठा लिया. इस आई ट्वेंटी कार में इन दोनों के अलावा विक्रांत, सुरेंद्र त्यागी, राहुल और लीलू का भांजा मुकेश भी मौजूद था.

चलती कार में ही इन लोगों ने रेशू की हत्या रस्सी और लोहे की जंजीर से गला घोंट कर दी और उसे सीट पर जिंदा लोगों की तरह बिठा कर बुलंदशहर की तरफ चल पड़े. कहीं किसी को शक न हो जाए, इसलिए कुछ दूर जंगल में कार रोक कर इन्होंने रेशू की लाश को कार की डिक्की में डाल दिया. असल काम हो चुका था, बस लाश और ठिकाने लगानी बाकी थी. इस के लिए मूड बनाने के लिए इन लोगों ने बुलंदशहर में विक्रांत के ट्यूबवैल पर जोरदार पार्टी की. जब रात गहराने लगी तो इन वहशियों ने रेशू की लाश को एक बोरे में ठूंसा और बोरा पहासू इलाके में ले जा कर गंगनहर में बहा दिया. इस के बाद सभी अपनेअपने रास्ते हो लिए.

आरोपियों में से सुरेंद्र त्यागी हापुड़ का रहने वाला है और पुलिस में दरोगा पद से रिटायर हुआ है जबकि राहुल उस का नौकर था. लीलू ने सुरेंद्र को रेशू की हत्या की सुपारी दी थी, जिस ने बुलंदशहर के आदतन अपराधी विक्रांत को भी इस वारदात में शामिल कर लिया था. इन दोनों का याराना विक्रांत के एक जुर्म में जेल में बंद रहने के दौरान हुआ था. लीलू ने हत्या के एवज में 4 लाख रुपए नकद दिए थे और बाकी बाद में एक बीघा जमीन बेचने के बाद देने का वादा किया था. रेशू के लापता होने के बाद ब्रजेश ने बेटे को काफी खोजा और फिर थकहार कर 15 अगस्त को मुरादनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज करा दी. हालांकि लीलू ने इस बार भी उन्हें यह कह कर रोकने की कोशिश की थी कि पुलिस में रिपोर्ट लिखाने से क्या फायदा होगा.

लेकिन फायदा हुआ. 24 सितंबर को वह पकड़ा गया और अपने साथियों सहित जेल में है. लीलू इत्तफाकन पकड़ा गया, नहीं तो पुलिस भी हार मान चुकी थी कि अब रेशू नहीं मिलने वाला. पुलिस के पास रेशू को ढूंढने का कोई सूत्र नहीं था, सिवाय इस के कि उस के और लीलू के फोन की लोकेशन एक ही जगह की मिल रही थी, जो उसे हत्यारा मानने के लिए पर्याप्त नहीं था. लेकिन इनवैस्टीगेशन के दौरान एक औडियो रिकौर्डिंग पुलिस के हत्थे लग गई, जिस में लीलू रेशू की हत्या का प्लान बाकी चारों में से किसी को बता और समझा रहा था. फिर लीलू ने 5 हत्याओं की बात कुबूली. हत्याओं में 2-3 साल का गैप वह इसीलिए रखता था कि हल्ला न मचे और लोग पिछली हत्या का दुख भूल जाएं.

पुलिस हिरासत में लीलू कभी यह कहता रहा कि उसे उन हत्याओं का कोई मलाल नहीं. तो कभी यह कहता रहा कि सजा भुगतने के बाद वह भाईभाभी की सेवा कर किए गए जुर्म का प्रायश्चित करना चाहता है. हैरानी की बात सिर्फ यह है कि 5 हत्याओं का यह गुनहगार लीलू जेल से छूट जाने की उम्मीद पाले बैठा है. वह शायद इसलिए कि 5 में से एक भी लाश बरामद नहीं हो सकी. लेकिन अब लोगों की मांग है कि ऐसे आस्तीन के सांप का जिंदा रहना ठीक नहीं है, लिहाजा उसे फांसी की सजा मिलनी चहिए. यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह जरूर एक बड़ी कानूनी खामी साबित होगी. Property Dispute