Love Crime: प्रेम प्रसंग में टुकड़े – टुकड़े किया पति

Love Crime: चंदौसी शहर के जूता कारोबारी राहुल ने रूबी से लव मैरिज करने के बाद उसे हर तरह की सुखसुविधाएं दीं. लेकिन 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रूबी पति की आंखों में धूल झोंक कर 2-2 प्रेमियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी. प्यार में अंधी हो चुकी रूबी के इरादे एक दिन इतने खौफनाक हो गए कि….

रूबी की जिंदगी एक त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में फंस गई थी. वह प्रेमी अभिषेक व दूसरे प्रेमी गौरव और पति राहुल के बीच फंसी हुई थी. रूबी के लिए यह त्रिकोण नहीं, बल्कि 3 दिशाओं में बिखरा हुआ मन था. पति राहुल स्थिरता और परिवार में समन्वय  बनाए रखने के भ्रम के साथ परिवार को खुशहाल बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ था. इसी तरह उस की शादी के 15 साल बीत चुके थे. दूसरी तरफ अभिषेक, जो उस के पति और समाज में रूबी को बहन बता कर दिन में भैया रात में सैंया की कहावत को चरितार्थ कर रहा था. अपनी धनदौलत के सहारे रूबी की मस्त जवानी का इस्तेमाल कर रहा था. अभिषेक के साथ रूबी 15 साल पहले जैसे यौन आनंद लिए जाने में मस्त थी. अभिषेक बहुत समझदार था.

तीसरा आशिक गौरव ने कुछ महीने पहले इस कहानी में एंट्री की थी. वह जवानी के जुनून में इस तरह अंधा हो गया था, जैसे कि सांप केंचुली आने पर हो जाता है. रूबी से उस का संपर्क हुआ. इसी दौरान अभिषेक से भी मुलाकात हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. अभिषेक की तरह गौरव भी रूबी को बहन कहने लगा था और उस के बच्चे भी अभिषेक की तरह गौरव को भी मामा कहते थे. यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला संभल की सब से उन्नतशील तहसील चंदौसी का है. संभल के जिला बनने से पहले चंदौसी को ही जिला बनाने की मांग उठती रही थी. जिला होने के सभी मानक भी चंदौसी पूरे करती थी, लेकिन राजनीतिक खेल की वजह से संभल को जिला घोषित कर दिया गया था, लेकिन मुख्यालय काफी दूर बहजोई में बनाया गया.

चंदौसी की घनी आबादी के चुन्नी मोहल्ला में राहुल नाम का जूते का व्यापारी रहता था. वैसे यह इलाका जूतों के निर्माण के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसी चुन्नी मोहल्ले में 40 वर्षीय राहुल कुमार अपनी पत्नी रूबी (39 साल) 12 साल की बेटी और 10 साल के बेटे के साथ रह रहा था. राहुल एक मेहनती जूता व्यापारी था, सुबह से शाम तक कारीगरों से जूते बनवाता था. जूतों को राहुल थोक दुकानदारों को सप्लाई करता था. भागतेदौड़ते हुए भी वह जब भी घर लौटता, रूबी और दोनों बच्चों का चेहरा देख कर सारे दिन की थकान भूल जाता था. उस के चेहरे पर हमेशा संतोष की मुसकान रहती. रूबी, उस की पत्नी, घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. कभीकभी वह राहुल के बिजनैस में भी मदद कर दिया करती थी.

प्रेमिका के साथ मिलकर उसके पति की जान लेने वाला आरोपी

रूबी की आंखों में एक खालीपन था, एक ऐसी तन्हाई जो शादी के बंधन में भी उसे घेर लेती थी. राहुल का प्यार सच्चा था, लेकिन उस का जीवन बिजनैस की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि रूबी की भावनाओं को छूने का समय ही नहीं मिलता.

रूबी से हुआ प्यार

राहुल मूलरूप से संभल जिले के ही रजपुरा थाना क्षेत्र के गंवा कस्बे के रहने वाले जसवंत का इकलौता बेटा था. जसवंत के 4 बच्चे हुए, जिस में एक बेटा राहुल और 3 बेटियां हैं. राहुल के चाचा, ताऊ और बाकी रिश्तेदार वहीं रहते हैं. गवां कस्बे में रहने वाले राहुल के चाचा नेकराम बताते हैं कि राहुल जब केवल 15 साल का था, तभी उस के मम्मीपापा का बीमारी के चलते कुछ ही अंतराल में निधन हो गया.

घर संभालने के लिए राहुल ने राजमिस्त्री का काम शुरू कर दिया. पहले राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था. फिर धीरेधीरे काम सीख कर राजमस्त्री बन गया. बाद में इस ने टाइल्स लगाने का भी काम सीखा. राहुल ने मेहनत कर के परिवार को आगे बढ़ाया. बहनों की शादी की. काम के चलते इसे अलगअलग जगहों पर जाना पड़ता था. उसी बीच इस की मुलाकात चुन्नी मोहल्ले की रहने वाली रूबी से हुई.

चंदौसी के चुन्नी मोहल्ले में उस सुबह धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी थी. गली के कोने पर बन रहे नए मकान में राजमिस्त्री राहुल अपने औजार संभालते हुए काम पर लग चुका था. सिर पर गमछा बंधा था. हाथों में सीमेंट की महक आ रही थी. आंखों में अपने भविष्य के छोटेछोटे सपने थे. राहुल रोज की तरह ईमानदारी से काम कर रहा था. एक दिन मकान के आंगन से अचानक चूडिय़ों की हलकी सी खनक सुनाई दी. राहुल ने नजर उठाई. सामने खड़ी थी मकान मालिक की बेटी. सादे सूट में, खुले बालों और शांत आंखों वाली रूबी किसी सुबह की तरह ताजा लग रही थी. वह पानी का गिलास ले कर आई थी और संकोच से बोली, ”मिस्त्री साहब, पानी पी लीजिए.’’

राहुल ने पहली बार उसे देखा. जवान रूबी की सुंदरता ऐसी थी, जैसे किसी हलकी सुबह की पहली किरण जो धीरेधीरे पूरे आकाश को रंग दे देती हो. उस का चमकदार लाल कुरता, भरे गांव की पृष्ठभूमि में खिला कोई ताजा फूल सा सुंदर लग रहा था. गले के पास की खूबसूरत कढ़ाई उस के व्यक्तित्त्व की कोमलता को और उभार दे रही थी.

उस के कंधों तक बिखरे हलके घुंघराले बाल हवा के हर झोंके के साथ नाच उठते, जैसे बचपन की शरारतें अब भी उस के साथ खेल रही हों. उस की चाल में न तो शहर की बनावट थी, न ही किसी संकोच की दीवार. बस, आत्मविश्वास और सहजता की हलकी सी मुसकान थी, जो अनजाने में देखने वालों के मन में जगह बना लेती.

देखने में वह किसी फिल्मी दृश्य की हीरोइन लग रही थी. जवान रूबी के सपने उस की आंखों से झलक रहे थे, जैसे हर कदम के साथ वह भविष्य की नई कहानी बुन रही हो. रूबी ने फिर कहा, ”लो मिस्त्री साहब, पानी पी लो.’’

उस पल सब कुछ ठहर सा गया. उस ने मुसकरा कर पानी लिया. बस उसी एक पल में दोनों के दिल में जैसे कोई हलकी सी 2 दिलों को जोडऩे वाली प्रेम रेखा खिंच गई. दिन बीतते गए. राहुल ईंटों की दीवारें खड़ी करता और रूबी  कभीकभी उसे काम करते देखती. कभी चाय ले कर आ जाती, कभी घर के किसी काम का बहाना बन जाता. बातों का सिलसिला छोटा होता, पर आंखों में कहानियां लंबी होने लगीं.

धीरेधीरे रोज की मुलाकात छोटी बातों में बदलने लगी. पानी देना, चाय लाना या बस मुसकराना. राहुल को महसूस हुआ कि उस के भीतर का दिल रूबी पर आ गया है. राहुल को अपनी हैसियत का पूरा एहसास था. वह एक राजमिस्त्री था, रोज की मजदूरी पर जीने वाला. वहीं रूबी एक अच्छे घर की पढ़ीलिखी लड़की थी. फिर भी दिल ने बारबार दिमाग को चुप करा दिया. रूबी को राहुल की सादगी, उस का सम्मानपूर्ण व्यवहार और मेहनत भरी ईमानदारी अच्छी लगने लगी. उसे लगा कि यह आदमी दीवारें ही नहीं, भरोसा भी मजबूती से खड़ा करता है.

एक शाम जब काम खत्म हो चुका था और आसमान हलका गुलाबी हो चला था, रूबी ने हिम्मत कर के कहा, ”राहुल, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

राहुल कुछ पल चुप रहा. फिर बोला, ”रूबी, मैं बहुत साधारण हूं, पर दिल सच्चा है.’’

बस वही सच था, जिस ने दोनों को और करीब ला दिया.

यह प्यार चुपचाप पनपा. बिना शोर, बिना दिखावे के ईंट, सीमेंट और धूल के बीच 2 दिलों ने एकदूसरे के लिए जगह बना ली. मकान बन कर तैयार हो गया, लेकिन राहुल और रूबी के दिलों में जो निर्माण हुआ था, वह कहीं ज्यादा मजबूत था. चुन्नी मोहल्ले की उस गली में आज भी लोग उस मकान को देखते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उस की नींव में कहीं न कहीं रूबी की प्रेम कहानी भी गड़ी हुई है. दोनों का इश्क परवान चढ़ा. 2025 के हिसाब से देखें तो 15 साल पहले यानी कि 2010 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया.

इस चुन्नी मोहल्ले में रूबी का जहां मायका है, इसी गली में थोड़ा आगे कुछ घर छोड़ कर रूबी के राहुल ने भी यहां एक प्लौट खरीद कर मकान बना लिया. राहुल के घर और रूबी के मायके के बीच की गली मात्र 4 फीट चौड़ी है. गांव छोड़ कर कुछ सालों बाद ये लोग इस संकरी गली में बने मकान में रहने लगे.

दिल में बसा गौरव

एक दिन बारिश की झमाझम में रूबी बाजार से सब्जियां ले कर लौट रही थी. उस की साड़ी हलकी सी भीग चुकी थी और वह जल्दीजल्दी घर की ओर बढ़ रही थी, तभी मोहल्ले का युवक गौरव उसे देख कर रुक गया. उस ने अपनी छतरी रूबी की ओर बढ़ाई और मुसकराते हुए कहा, ”भाभीजी, भीग जाएंगी. लीजिए, मेरी छतरी ले लीजिए. मैं तो घर के पास ही हूं.’’

रूबी ने हिचकिचाते हुए छतरी ली, लेकिन उस की आंखों में गौरव की उस छोटी सी मदद ने एक अनजानी चिंगारी जला दी. अगले दिन रूबी ने छतरी लौटाने के बहाने गौरव के घर पर जाना तय किया. छतरी ले कर जा ही रही थी कि रास्ते में उसे गौरव मिल गया. वह बोला, ”अरे भाभीजी, आप ने क्यों कष्ट किया. छतरी लेने मैं ही घर आ जाता. इस बहाने से एक कप चाय भी मिल जाती.’’

रूबी ने कहा, ”अब तो यह अपनी छतरी संभालो. चाय के लिए फिर किसी दिन आ जाना, मेरा दरवाजा आप के लिए हमेशा खुला मिलेगा.’’

यह बस 2-3 मिनट की औपचारिक बातचीत थी, मगर रूबी को चलतेचलते लगा जैसे किसी ने लंबे सूखे दिन के बाद जरा सा पानी छिड़क दिया हो. एक दिन गौरव उस के घर पहुंच गया. रूबी घर में बिलकुल अकेली थी, उसी समय अचानक अभिषेक भी वहां आ गया. दोनों उस समय चाय पी रहे थे. रूबी ने गौरव से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा मुंह बोला भाई अभिषेक है. फिर गौरव की तरफ इशारा करते हुए रूबी ने कहा कि यह गौरव है. ये मोहल्ले में ही रहता है. मुझे बहन मानता है.

दोनों की यह पहली मुलाकात थी. उस के बाद अकसर रूबी के घर या बाहर भी कभीकभी कहींकहीं दोनों मिल जाया करते थे. औपचारिक बातचीत के साथसाथ उन दोनों में दोस्ती भी हो गई. रूबी की कोशिश रहती कि एक बार में उस के घर एक ही व्यक्ति से मुलाकात हो. दोनों एकदूसरे पर भरोसा भी करते थे. दिलचस्प बात यह कि इन दोनों के मन में कहीं न कहीं शक भी पनप रहा था कि भाई है या मेरी तरह आशिक. कुछ ही मुलाकातों में गौरव और रूबी एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

राहुल को गौरव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक दिन राहुल बाजार से घर पर आया. उस समय रूबी के साथ गौरव बैठा चाय पी रहा था. स्थिति बहुत आपत्तिजनक  तो नहीं थी, लेकिन शक पनप जाने के लायक काफी थी.

यह नजारा देख कर राहुल का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. इस से पहले कि वह कोई सवाल करता, गौरव ही बोल पड़ा, ”दीदी, चाय में तो मजा आ गया.’’

यह सुन कर राहुल सामान्य हो गया. 2-4 बातें गौरव से भी हुईं. फिर गौरव रुबी दीदी राहुल जीजा को नमस्ते कर के चला गया. चाय की इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात में रूबी ने गौरव से कहा कि उस दिन तुम्हारा स्टेप शानदार रहा, जिस से राहुल का गुस्सा शांत हो गया. नहीं तो यह हमारे बीच का प्यार परवान नहीं चढ़ पाता.

धीरेधीरे गौरव उस की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा, वह पूछता, ”भैया की दुकानदारी कैसी चल रही है? सीजन में तो जूते की अच्छी मांग होगी?’’

रूबी को यह अच्छा लगता कि कोई तो है जो उस के पति के बिजनैस के बारे में इतनी तल्लीनता से पूछ रहा है. बस धीरेधीरे दोनों की बातें, दोनों की आदतें और दोनों की बेचैनियां एकदूसरे में घुलने लगीं. राहुल मेहनती था, पर बिजनैस की चिंता, कर्ज की किस्तें और बढ़ता हुआ खर्च उस के स्वभाव को चिड़चिड़ा बना रहे थे. घर पर उस की बातचीत ज्यादातर पैसों, बिलों और थके हुए तानों के बीच उलझ जातीं. रूबी के दिल में कहीं यह बात बैठ गई कि उस की मुसकराहट अब पति के लिए जरूरी नहीं रही.

रूबी और गौरव दोनों को समझ में आ गया कि जो रिश्ता उन के बीच बन चुका है, वह नाम के बंधन से परे, दिल की गहराई में जड़ें जमा चुका है. एक दिन मौका पाते ही 2 जिस्म एक जान हो गए. फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा.

दोनों पकड़े गए रंगेहाथ

जब कभी राहुल बिजनैस के काम से बाजार चला जाता, गौरव घर आ जाता. बच्चे स्कूल में होते. दोनों मौजमस्ती करते. अभिषेक से भी ज्यादा आनंद वह गौरव के साथ महसूस कर रही थी. शाम का वक्त था. राहुल ने अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दबाजी में कहा, ‘मैं बाजार जा रहा हूं, कल शाम तक लौटूंगा’, इतना कह कर वह निकल गया. बच्चे सो चुके थे. घर में अब सिर्फ रूबी थी. उस ने तुरंत फोन कर के गौरव से घर आने को कहा.

मौके का फायदा उठाने के लिए गौरव रूबी के घर पहुंच गया.

”कितनी देर लगाई आज?’’ रूबी ने हलके से ठहाका लगाते हुए कहा.

पति की हत्यारोपी रूबी को पुलिस में ले जाते हुए 

”बाजार गया था, वहां ट्रैफिक में फंस गया था,’’ गौरव ने आतेआते अपनी शर्ट का एक बटन खोल दिया और उस के पास पहुंच कर उस की कमर में हाथ डाल दिया.

”अब सजा सुनाओ, कितना इंतजार करवाया?’’ रूबी ने भी उस के गले में बांहें डाल दीं.

”सजा तो बहुत कुछ बाकी है. पहले तो यह सजा पूरी करो.’’ गौरव ने उसे दीवार से सटा दिया.

रूबी की सांसें तेज हो गईं. उस ने गौरव के होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया. एक ऐसी भूख के साथ, जो सालों से दबी हुई थी. 15 साल पहले राहुल के साथ भी ऐसे ही पल आते थे, पर वो जल्दी खत्म हो जाते. अब कमरे में सिर्फ सांसों की आवाज थी. दोनों एकदूसरे में खोए हुए थे. ऐसे जैसे दुनिया में सिर्फ यही 2 लोग बचे हों. जल्दबाजी में वे दरवाजा बंद करना भी भूल गए थे. तभी अचानक राहुल आ गया.

राहुल हुआ लापता

दरअसल, राहुल को पूरा शक हो गया था कि उस की पत्नी गौरव के साथ रंगरलियां मनाती है, इसलिए वह जाने का बहाना कर के घर में ही अपने गोदाम में छिप गया था. यही घटना राहुल की हत्या का सबब बन गई. रूबी ने अपने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर अपने पति राहुल की हत्या की ऐसी योजना बनाई कि एक महीने तक पता ही नहीं चल सका कि राहुल कहां चला गया. उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

शायद कभी पता चलता भी नहीं, लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक हो, कोई न कोई ऐसा क्लू पुलिस के हाथ लग ही जाता है. फिर जमीन की तह से भी पुलिस अपराधी को खोज लेती है. राहुल ने राजमिस्त्री के काम से हट कर जूतों के कारोबार में कदम रखा था. घर से ही यह काम शुरू किया. वह अलगअलग जगहों पर जूते सप्लाई करता था. उस ने देहरादून में भी एक किराए की जगह ले रखी है. वहां भी बिजनैस को बढ़ा रहा था. देहरादून एक पर्यटक स्थल है.

कभीकभी वहां सैलानी बहुत बड़ी संख्या में आ जाते हैं, जिस के कारण होटल में ठहरने को जगह भी नहीं मिल पाती थी. इसलिए राहुल ने किराए पर एक कमरा ले लिया था. बिजनैस के सिलसिले में उस का हमेशा घर से बाहर आनाजाना लगा रहता. अभी कुछ दिन पहले राहुल की बुआ की बेटी की शादी थी. राहुल को शादी की तैयारी के लिए जाना था. इस के अलावा उसे कुछ खरीदारी भी करनी थी. 18 नवंबर, 2025 को उस ने अपनी पत्नी रूबी से कहा, ”मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं, कल तक लौट आऊंगा.’’

18 नवंबर का पूरा दिन बीत गया. 19 नवंबर आया, पर राहुल घर नहीं लौटा. पत्नी और बच्चे इंतजार कर रहे थे. हालांकि वो काम की वजह से कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. यह नौरमल बात थी, इसलिए बच्चों को उतनी चिंता नहीं थी. 20 नवंबर आया. बेटा और बेटी भी मम्मी से पापा के बारे में पूछ रहे थे. बेटी के अनुसार पापाजी का मोबाइल फोन कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था. कभी औन रहता तो कभी स्विच्ड औफ हो जाता.

शायद बैटरी खराब हो गई होगी. बच्चों के जिद करने पर रूबी ने जब पति को कौल किया तो उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कुछकुछ देर बाद और ट्राई किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ ही मिला. बेटी ने बताया कि पापा अपने फूफा के घर भी जाने वाले थे. हो सकता है कि काम पूरा करने के बाद वहीं चले गए हों. शादी के सामान की खरीदारी करवानी थी.

अब फूफा को कौल किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल तो यहां पर आया ही नहीं. बारीबारी से पत्नी कभी बच्चे बाकी रिश्तेदारियों में कौल करते रहे, लेकिन राहुल का कहीं कुछ पता नहीं चला. इसी तरह एक दिन और बीत जाता है. अब रूबी ने फैसला किया कि राहुल जहां भी काम के सिलसिले में जाते थे, वहां जा कर पता करेगी. इस के बाद रूबी बच्चों के खुद पति की खोज में निकल गई. 22 नवंबर, 2025 को यह देहरादून के उस किराए वाले मकान में भी पहुंच गई, जहां राहुल का अकसर आनाजाना होता था.

रूबी ने मकान मालिक से बात की. अभी तक 4 दिन बीत चुके थे. मकान मालिक ने कहा कि राहुल तो यहां पर कई दिनों से नहीं आए. समझ नहीं आ रहा था कि राहुल कहां चला गया. अंत में थकहार कर रूबी ने 24 नवंबर, 2025 को कोतवाली चंदौसी में पति के लापता होने की सूचना दर्ज कराई. पुलिस ने उस की हर एक डिटेल ली. राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस की जानकारी आसपास के दूसरे थानों में भी भिजवा दी.

ऐसे ही इस का भाई जुगनू है. उस के खिलाफ चंदौसी कोतवाली में कई मामले दर्ज हैं. जो चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के मामले बताए गए हैं. वह वर्तमान में मुरादाबाद जेल में बंद है. भाई के कारनामों में बहन रूबी का भी दखल रहता था. बताते हैं कि जब पुलिस जुगनू को पकडऩे के लिए जाती तो रूबी पुलिस से उलझ जाती थी. आसपास के लोग भी रूबी से दूरी बना कर रखते, इस डर से कि कब किस पर झूठा केस कर दे. रूबी कोई आम सुंदरी नहीं थी.

रूबी एक हेकड़ और दबंग महिला थी. बताते हैं कि साल 2016 में राहुल का अपने गांव में जमीन को ले कर विवाद हो गया था. उस समय रूबी अपने पति के साथ गांव के ही मकान में रहती थी. तब रूबी ने मोर्चा संभाला और विरोधियों को धूल चटाई थी. रूबी ने गांव के 3 लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए रजपुरा थाने में केस दर्ज करवाया था. इस में एक पिता, बेटा और भतीजे को नामजद कराया गया था. वह झगड़ा तो शांत हुआ. गांव के लोगों ने फैसला करा दिया था. नामजद लोगों को इस के लिए भरी पंचायत में माफी मांगनी पड़ी थी. ऊपर से रूबी ने उन तीनों से केस वापस लेने के लिए भारीभरकम रकम भी वसूल की थी.

घटना से करीब डेढ़ महीने पहले चंदौसी के सैनिक चौराहे के पास एक जमीन खाली कराने के लिए रूबी अपने प्रेमी अभिषेक के लिए मैदानेजंग में उतर आई थी. रूबी की हिम्मत, हौसला और तेवर देख कर विरोधी घबरा गए और उन्हें जमीन छोड़ कर भागना पड़ा था. रूबी के कारण ही प्रेमी अभिषेक को मोटी रकम का फायदा हुआ था.

बदले में रूबी को खुश करने के लिए अभिषेक ने भी अच्छीखासी रकम रूबी को दी थी. ऐसे ही विवाद का एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस में रूबी ने अभिषेक और गौरव के साथ मिल कर हंगामा किया था. उस समय उस का पति राहुल भी साथ था. इस की एक तसवीर भी वायरल हो रही है, जिस में रूबी को अपने दोनों प्रेमी और  पति के साथ कहीं पर हंगामा करते हुए देखा जा सकता है.

इसी तरह के कई अन्य विवादों में रूबी चंदौसी, रजपुरा, बनियाठेर थानों में लगभग 6-7 केस दर्ज करवा चुकी है. कुछ महीने पहले अभिषेक, रूबी और गौरव नैनीताल घूमने गए थे. वहां एक होटल में इन्होंने रात्रि विश्राम किया था. दोनों का टारगेट यह था कि इन में से कोई एक भी किसी काम से बाहर चला जाए तो दूसरा रूबी के साथ अपने प्रेम का टारगेट पूरा कर ले. शक तो दोनों को एकदूसरे पर हो ही गया था. यह सब आजमाने के लिए अभिषेक होटल से कोई बहाना कर के बाहर गया.

गौरव समझा 1-2 घंटे में तो घूम कर वापस आएगा, लेकिन अभिषेक कुछ ही मिनट बाद जैसे ही होटल के कमरे में घुसा, उस ने रूबी और गौरव को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उस समय उस ने गौरव से तो कुछ नहीं कहा, ऐसा बन गया जैसे उस ने कुछ देखा ही न हो. उस दिन के बाद से वह धीरेधीरे उन दोनों से किनारा करने लगा.

लाश के मिले टुकड़े

रूबी अब गौरव पर पूरी तरह से फिदा थी. इसलिए अभिषेक रूबी की प्रेम कहानी से बाहर हो गया और उस का संपर्क रूबी और गौरव दोनों से ही टूट गया. धीरेधीरे समय बीत रहा था. लेकिन राहुल का कुछ अतापता नहीं था. सभी लोग काफी चिंतित थे. अब दिन हफ्तों में बदलने लगे. 3 हफ्ते गुजर गए. सब की उम्मीद भी अब दम तोड़ चुकी थी. 27 दिन बाद यानी 15 दिसंबर, 2025 को राहुल के घर से करीब 800 मीटर दूर पतरौआ रोड है. यहीं पर एक ईदगाह स्थित है. इसी के पास रोड के साइड से एक नाला गुजरता है.

यह इलाका काफी सुनसान रहता है. आसपास खेतखलिहान है. कोई सीसीटीवी कैमरा भी दूरदूर तक नहीं है. सुबह के करीब 9 बजे के आसपास कुछ लोग इसी रास्ते से गुजर रहे थे. उन्होंने देखा कि नाले के पास काफी सारे कुत्ते इकट्ठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं. एकदूसरे पर भौंक रहे हैं और किसी चीज को ले कर छीनाझपटी भी कर रहे हैं. उन के पास एक बड़ा सा पौलीथिन बैग पड़ा था, जिस में कुछ भारीभरकम चीज रखी हो.

उस में से काफी तेज गंध भी आ रही थी. मामला संदिग्ध लगा तो एक व्यक्ति ने पुलिस कंट्रोल रूम का 112 नंबर डायल कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना चंदौसी कोतवाली में दे दी गई. सूचना मिलते ही कोतवाल अनुज तोमर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह 15 दिसंबर, 2025 की बात है. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां 2 टूरिस्ट बैग नाले में पड़े थे. एक को कुत्तों ने फाड़ दिया था, जिस में से मानव बौडी के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. जब खोला गया तो उस में से किसी आदमी का धड़ वाला भाग निकला. इस का हाथ, पैर, सिर सब कुछ गायब था.

पुलिस को दूसरे बैग के अंदर कुछ और भी सामान और एक पौलीथिन मिली. सामानों में ब्लैक और ग्रीन कलर की एक टीशर्ट थी. इस पर खून के धब्बे भी थे. एक अंडरवियर भी मिला और पौलीथिन में बायां हाथ अच्छे से सील पैक था, जिस वजह से नाले में पड़े रहने के बावजूद भी उस में पानी प्रवेश नहीं कर सका. शायद इस की बदबू बाहर न आ जाए, इस वजह से पैक किया हो. दिखने में लाश के ये अंग कई हफ्ते पुराने लग रहे थे. फोरैंसिक टीम को सूचित कर दिया गया.

फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य इकट्ठा करने शुरू कर दिए. इतनी देर में आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी जुटने लगे. पुलिस ने यहीं आसपास और भी छानबीन की. शायद और भी शरीर का हिस्सा भी मिल जाए. काफी तलाश के बाद भी सिर और शरीर के बाकी अंग कहीं नहीं मिले. घटनास्थल के फोटोग्राफ लिए गए और वीडियो भी बनाई गई. पुलिस द्वारा बरामद शरीर और बरामद कपड़ों को दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की गई.

कटर से काटी लाश

फोरैंसिक जांच के दौरान पुलिस को बहुत सारी चीजें पता चलीं. ऐसा लगा जैसे आराम से घटना अंजाम दी गई है. पूरी सफाई के साथ शरीर के टुकड़े किए गए. शरीर को काटने में तेजधार हथियार नहीं, बल्कि किसी मशीन का इस्तेमाल किया गया. 16 और 17 दिसंबर, 2025 तक यानी 2 दिन लगातार पुलिस की टीमें बौडी के विभिन्न अंगों को तलाश करती रहीं. पुलिस की कोशिश थी कि किसी तरह से सिर बरामद हो जाए तो मृतक की पहचान हो सके.

कोतवाल अनुज कुमार तोमर लगातार केस की जांच कर रहे थे. घटनास्थल पर बैग में जो हाथ मिला था, पुलिस द्वारा उस का ध्यान से निरीक्षण किया तो उस पर एक टैटू नजर आया. हाथ के बीच में ‘राहुल’ नाम लिखा हुआ था. अब राहुल कौन हो सकता है? राहुल या तो इस का ही नाम होगा या फिर इस के किसी करीबी का. उधर पुलिस की टीमें थाने में ऐसी पुरानी फाइल्स खंगाल रही थीं, जिन की गुमशुदगी लिखाई गई हो. चंदौसी थाने में ही एक केस फाइल मिला जूता कारोबारी राहुल कुमार का. 18 नवंबर, 2025 से गायब था. उस की गुमशुदगी उस की पत्नी रूबी द्वारा लिखाई गई थी.

पुलिस ने रूबी को बुला कर बरामद कपड़े व लाश के टुकड़े दिखाए. रूबी ने सब कुछ देख कर अपने पति के अवशेष होना स्वीकार नहीं किया. साफ इनकार कर दिया. थकहार कर पुलिस ने 18 दिसंबर, 2025 को लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस का सब से पहला काम था मृतक की पहचान पता करना. पुलिस के पास तो कोई ऐसी निशानी भी नहीं थी. अब पुलिस को शक हो चला था कि यह लाश राहुल की ही हो सकती है. क्योंकि एक तरफ तो राहुल गुमशुदा था और दूसरी तरफ लाश की बांह पर भी ‘राहुल’ के नाम का टैटू बना हुआ था.

जनपद संभल के थाना चंदौसी क्षेत्र में 24 नवंबर, 2025 को रूबी नाम की एक महिला ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद रूबी ने कभी पुलिस से कोई कौंटेक्ट नहीं किया, न ही उच्च अधिकारियों से शिकायत की कि पुलिस उस के पति को ढूंढने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए पुलिस का शक अब यकीन में बदलता जा रहा था, लेकिन कोई सबूत हाथ में आने से पहले वह रूबी पर हाथ डालना नहीं चाहती थी.

पुलिस ने लापता राहुल के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. पता चला कि राहुल का मोबाइल फोन घर पर ही 18 नवंबर, 2025 से ही स्विच औफ दिख रहा था. 19 दिसंबर, 2025 को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. पुलिस को राहुल की पत्नी रूबी पर शक हो रहा था. 20 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने रूबी से फिर पूछताछ की. उस के बात करने का तरीका अजीब था. जैसे कि वह जानबूझ कर दुखी होने का नाटक कर रही हो. जांच के दौरान पुलिस ने रूबी से उस का मोबाइल फोन मांगा, लेकिन वह मोबाइल  देने से इंकार कर रही थी.

पुलिस को मना करने की वजह भी नहीं बता रही थी. डांटडपट कर पुलिस ने मोबाइल लिया और इस की जांच की. सारे फोटोज, कौल डिटेल्स, चैटिंग सब कुछ चैक किया गया. इसी में ही रूबी के पति राहुल के साथ अलगअलग समय में लिए गए अनेक फोटो मिले. उसी दौरान पुलिस को 2 फोटो ऐसे मिले, जिन्होंने इस केस की परतें प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी. एक फोटो में राहुल वही टीशर्ट पहने दिखा, जो नाले के पास बैग में मिली थी.

जब पुलिस ने बरामद टीशर्ट रूबी को दिखाई थी तो उस ने उसे पहचानने से क्यों इंकार किया? मान लें कि वह कोई दूसरा टीशर्ट हो, किसी और का हो, फिर भी यह बोल सकती थी कि राहुल के पास ऐसा ही टीशर्ट है. पर उस ने बिलकुल ही पहचानने से मना कर दिया था.

पत्नी निकली कातिल

पुलिस ने थोड़ा ध्यान से देखा तो फोटो में राहुल के हाथ पर उस के नाम का टैटू गुदा था. इस से पुलिस को विश्वास कि नाले से बरामद लाश के टुकड़े राहुल के ही थे. इस से साफ हो गया कि रूबी अपने पति राहुल की गुमशुदगी और मौत को ले कर झूठ बोल रही है. अब पुलिस ने रूबी से अपने अंदाज में पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में रूबी सच बोलने के लिए मजबूर हो गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने पति राहुल की हत्या कराई थी. उस ने इस हत्याकांड की एक हृदयविदारक स्टोरी सुनाई.

18 नवंबर की रात को जब राहुल घर पर नहीं था. रूबी ने गौरव को अपने घर बुला लिया. रूबी को पता नहीं था कि वह कहीं गया नहीं है, घर में ही छिपा है. राहुल को मौके का इंतजार था. प्यार के नाम पर वासना का खेल शुरू होते ही राहुल अंदर आया. दरवाजा खुला था. क्योंकि दोनों इतने खोए हुए थे कि चिटकनी लगाना भी भूल गए थे. राहुल को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया.

एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई

उस की आंखें पहले रूबी पर टिकीं, जो अब तक चादर से जिस्म ढकने की कोशिश में सीने से लगाए बैठी थी. बाल बिखरे, होंठ कांपते हुए. फिर गौरव पर, जो बिस्तर के किनारे खड़ा था, हाथ में चादर का कोना पकड़े, लेकिन शरीर अभी भी नंगा था. राहुल का चेहरा पहले सफेद पड़ गया, फिर लाल. उस की आंखों में कुछ ऐसा था नफरत, सदमा, धोखा और शायद एक पल के लिए दया भी. वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था.

सन्नाटा तोड़ते हुए आवाज आई, ”राहुल…’’ यह कांपती आवाज रूबी की थी, ”तुम… तुम इतनी जल्दी?’’

राहुल ने जवाब नहीं दिया. उस ने बस एक बार फिर दोनों को देखा, जैसे कोई तसवीर देख रहा हो, जो कभी भूलना नहीं चाहता. फिर बिना एक शब्द बोले, वह मुड़ा. उस के कदम भारी थे. दरवाजे तक पहुंच कर वह रुका. पीठ फेर कर बोला, कपड़े पहन ले. वह आक्रोश से बुरी तरह तमतमा रहा था. फिर उस ने रूबी को बुरी तरह पीटा और सरेबाजार उस का जुलूस निकालने की धमकी दी.

कोतवाल अनुज तोमर

बस इसी से पगलाई रूबी ने गौरव को इशारा किया. गौरव ने लोहे की रौड उठा कर राहुल के सिर में मार दिया. वह वहीं गिर गया. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. रूबी भी पति पर हमला करने की पोजीशन ले चुकी थी. उस ने हथौड़ा ले कर उस के सिर पर मारमार कर सिर कुचल दिया. इस तरह दोनों ने मिल कर राहुल का  कत्ल कर दिया और अगले दिन बाजार से इलैक्ट्रिक कटर मशीन ला कर घर में ही अपने पति की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर डाले.

पुलिस ने रूबी और गौरव की निशानदेही पर कत्ल और सबूत मिटाने में इस्तेमाल किए गए कटर मशीन, हथौड़ा, मोबाइल फोन और लोहे की रौड जैसी चीजों को भी अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने धड़ का हिस्सा और एक बांह तो बरामद कर ली थी, लेकिन राहुल का सिर और उस के बाकी के हाथपांव बरामद नहीं हुए. रूबी और गौरव ने उस की लाश के अन्य हिस्सों को एक कार में ले कर बहजोई बबराला होते हुए राजघाट पहुंचे. वहां से गुजर रही गंगा नदी में राहुल के शरीर के बाकी टुकड़ों को फेंक दिया, जो अब बह कर दूर जा चुके हैं. शायद नष्ट भी हो चुके हों.

इस पूरे हत्याकांड की भनक उन्होंने बच्चों तक को नहीं लगने दी. राहुल की बेटी पापा के मर्डर में मम्मी और गौरव के अलावा अभिषेक को भी आरोपी मान रही है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि अभिषेक के रूबी से संबंध विच्छेद हो चुके थे. वह इस कहानी से अलग था. इस का इस घटना में कोई रोल नहीं है. चंदौसी शहर के लिए इतनी निर्मम हत्या का यह पहला मामला बताया जा रहा है.

गौरव ने जिस दुकान से बैग खरीदे थे, उस दुकानदार का नाम विनोद अरोड़ा है. उसे भी यह जान कर बहुत दुख हुआ कि उस के बैग का इस्तेमाल एक निर्मम हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर के फेंकने के लिए किया गया. गौरव को कटर देने वाला व्यक्ति जितेंद्र उर्फ जीतू तो उस समय बिलखबिलख कर रोने लगा, जब पत्रकारों ने उस से कहा कि तुम ने कटर गौरव को क्यों दिया था. उसे इस बात का बहुत दुख हुआ कि लोहे का सरिया काटने वाला कटर मानव शरीर को काटने में इस्तेमाल किया गया.

एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने 22 दिसंबर, 2025 को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में घटनाक्रम का खुलासा किया. पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव व रूबी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Love Crime

 

 

UP News: फरजी आईएएस निकला महाठग

UP News: फरजी आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम लोगों से कितनी मोटी ठगी कर रहा था, इस का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस ने मोटी सैलरी पर पीए और असिस्टेंट रख रखा था. साथ ही अत्याधुनिक हथियारों वाली सिक्योरिटी भी लगा रखी थी. 2 लग्जरी गाडिय़ां हमेशा उस के साथ चलती थीं. एक गरीब परिवार का युवक गौरव क्यों बना फरजी आईएएस और कैसे करता था करोड़ों रुपए की ठगी?

बिहार में स्थित सीतामढ़ी की एक अलग पहचान है. इसी जिले के मेहसौल के वार्ड नंबर 37 में किसान चलितर राम अपनी पत्नी जहरी देवी और 5 बेटों राजकुमार राम, हरिकिशोर राम, राजकिशोर राम, गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम और राजनंदन राम के साथ एक झोपड़ी में रहते थे. वह मेहनतमजदूरी कर के जैसेतैसे अपने परिवार का भरणपोषण करते थे. वक्त, हालात और गरीबी की आग में तप कर पांचों बच्चे बड़े हुए.

चलितर राम के पांचों बेटों में चौथे नंबर का बेटा ललित अपने सभी भाइयों से बेहद अलग स्वभाव का था. जिस गरीबी में वह पल कर बड़ा हुआ था, समाज की चकाचौंध से उस की आंखें चौंधिया जाती थीं. जब वह सड़कों पर दौड़ती चमचमाती कारों, चमचमाती बाइक्स, आलीशान और शानदार बिल्डिंग और लोगों की अमीरी में जीने की लग्जरी जिंदगी देखता था तो उस के सीने पर सांप लोट जाता था. अपने बारे में वह सोचता कि वह अमीर के घर में पैदा हुआ होता तो वह भी अच्छेअच्छे कपड़े पहनता, बढिय़ा खाना खाता, चमचमाती कारों में सैर करता और नोट पानी की तरह बहाता.

ललित के दिलोदिमाग पर गरीबी का गहरा असर हुआ और उस ने ठान लिया कि बड़ा हो कर वह इतना पैसा कमाएगा कि उस की कई पुश्तों तक गरीबी कभी नजदीक नहीं आएगी. सुख की मखमली चादर पर चैन की नींद जीवन भर सोएगा. उस के बाद से ललित अपने जीवन को संवारने में जुट गया. तब वह बहुत छोटा था. ललित छोटा ही था, लेकिन बहुत चालाक और बेहद शार्प दिमाग वाला था. इसी उम्र में कहीं सुना था कि शिक्षा विभाग के जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) की तनख्वाह के अलावा उस की ऊपरी आमदनी इतनी होती है कि उस की पूरी तनख्वाह वैसे के वैसे ही बची रहती है.

उस के दिमाग पर इस विचार ने इतनी गहरी छाप छोड़ी कि उस ने पढ़लिख कर शिक्षा विभाग का डीआईओएस बनने का सपना दिलोदिमाग में बैठा लिया था. उस दिन के बाद से ललित अपने लक्ष्य को पाने के लिए जीतोड़ मेहनत करने लगा और खूब मन लगा कर पढ़ाई करता था, जबकि उस के चारों भाई पापा के साथ मेहनतमजदूरी कर के परिवार का सहयोग करने में जुटे हुए थे. बेटे को पढ़ता देख चलितर राम भी उसे पढ़ाने में पानी की तरह पैसे बहाने लगे थे. ताकि उसे अपने सपने और अपने लक्ष्यों को हासिल करने में कोई दिक्कत न हो.

ललित ने साइंस साइड से पढ़ाई जारी रखी. इंटरमीडियट में वह अव्वल मार्क लाया. बीएससी में मैथ्स ले कर पढ़ाई शुरू की. युवा ललित के सपने आसमान जैसा बड़ा आकार लेने लगे थे. यारदोस्तों का दायरा बढऩे लगा था, उसी के अनुसार उस के जेब खर्चे भी बढऩे लगे थे. पापा की कमाई इतनी नहीं थी कि उसे पढ़ानेलिखाने के साथसाथ फिजूलखर्ची के लिए उसे अलग से पैसे दें. उन्हें तो उस के अलावा परिवार को भी देखना था.

छात्रा से की शादी

जब भी ललित पापा से जेब खर्च के लिए ज्यादा पैसे मांगता तो वह अपनी मजबूरी का रोना रो देते थे. गौरव कुमार को तो सिर्फ पैसों से मोहब्बत थी. घर से जब उस की जरूरतें पूरी नहीं हुईं तो उस ने साल 2017 में घर छोड़ दिया और बांका जिल में रहने लगा. इसी बीच वह रीगा थानाक्षेत्र के रामनगरा की रहने वाली पूजा नाम की लड़की को ले कर भाग गया था. दरअसल, ट्यूशन पढ़ाते हुए ललित को अपनी छात्रा पूजा से प्यार हो गया था और पूजा को अपने कलयुगी गुरु से. दोनों बालिग हो चुके थे और एकदूसरे से शादी भी करना चाहते थे.

पूजा जानती थी कि उस के फेमिली वाले इतनी आसानी से ललित को अपना दामाद नहीं बनाएंगे. दोनों ही अलगअलग जाति से थे, इसीलिए उन्होंने भाग कर अपना घर बसाने का फैसला किया था और भाग कर शादी करने के बाद वे बांका में रहने लगे. पूजा के पापा ने रीगा थाने में ललित के खिलाफ बेटी को बहलाफुसला कर भगा ले जाने का मुकदमा दर्ज कराया. यह गौरव कुमार उर्फ ललित के खिलाफ यह पहला मुकदमा था. मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस ने बांका से ललित और पूजा दोनों को हिरासत में ले कर कोर्ट में पेश किया.

फ्री कोचिंग का पांसा

चूंकि दोनों बालिग थे और न्यायालय के सामने साथ रहने की अपनी इच्छा जाहिर की तो न्यायालय ने उन्हें साथ रहने की इजाजत दे दी थी. बाद में पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट लगा कर यह मुकदमा समाप्त कर दिया था. ललित ने गलत रास्ते पर चलने लिए बांका में पहला कदम रखा था. शार्प दिमाग और मीठीमीठी बातें करने वाला तो वह पहले से था ही, उस ने लोगों को शिकार बनाने के लिए गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और कोचिंग देने की योजना बनाई थी.

यह योजना चल निकली तो प्रति छात्र से मात्र 30 रुपए ले कर कोचिंग शुरू किया और लोगों का विश्वास जीतने के लिए उस ने आदित्य-50 नाम से कोचिंग और ललित वेलफेयर एसोसिएशन नाम से एक संस्था खोल ली. ललित लोगों को दिखाना चाहता था कि वह समाज के लिए कुछ करना चाहता है, लेकिन उस की योजना कुछ और ही थी. जिस आदित्य-50 नाम से कोचिंग खोल लिया था, वहां गरीब परिवार के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था.

फिर पटना के शिक्षा विभाग में उस ने अपनी अच्छी पकड़ बना ली थी और मुफ्त कोचिंग के नाम पर विभाग से एक लैटर भी जारी करा लिया था. इन लैटर का इस्तेमाल कर उस ने अपने कोचिंग सेंटर में दाखिले के लिए जिले के सरकारी स्कूलों में प्रवेश परीक्षा तक आयोजित करानी शुरू कर दी थी. छात्रों को भरोसा दिलाने के लिए मैट्रिक और इंटरमीडियट के मेधावी छात्रछात्राओं को समयसमय पर सम्मानित भी करता रहा. जब उसे यह अहसास हो गया कि यहां के लोग उस पर अंधा विश्वास करने लगे हैं तो उस ने अपना असली काम करना शुरू किया, जो उस का मकसद था.

ललित लोगों को नौकरी दिलाने, बीएड कराने और विभिन्न कोर्सों में एडमिशन कराने का खेल खेल कर लोगों से पैसे लेने लगा. इसी दौरान राजेश नाम के एक छात्र को नौकरी दिलाने के नाम पर उस से 2 लाख रुपए लिए. महीनों बीत जाने के बाद भी जब राजेश को ललित की ओर से कोई माकूल जवाब नहीं मिला तो उसे गुरु ललित पर शक हो गया. वह अपने रुपए उस से वापस मांगने लगा तो ललित रुपए लौटाने में आनाकानी करने लगा.

राजेश को यह समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ गुरु ललित ने धोखा किया है. वह सीधा थाने पहुंच गया और अपनी आपबीती सुना कर कोतवाली में मुकदमा दर्ज करा दिया. जालसाजी और धोखाधड़ी का  मुकदमा दर्ज होते ही ललित के होश उड़ गए. सामने अपना भविष्य अंधकारमय दिखने लगा कि जीवन में वह कभी सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. उस के बाद पत्नी को साथ ले कर एक मई, 2022 की आधी रात में वह वहां से फरार हो गया. पुलिस जांच में पता चला कि बांका से उस ने करीब ढाई करोड़ रुपयों की ठगी की है.

जांच में यह पता चला कि उस ने अपने करीबियों तक को नहीं छोड़ा था. जिस मकान में वह किराए पर रहता था, उस के मालिक से भी 12 लाख की ठगी की थी. इस के बाद ललित भूमिगत हो गया और एक साल तक गायब रहा. इसी दौरान उस ने अपने साले अभिषेक कुमार सिंह से संपर्क साधा. शातिर गौरव कुमार उर्फ ललित जानता था कि उस का साला अभिषेक सौफ्टवेयर इंजीनियर है. कंप्यूटर की उसे अच्छी जानकारी है. अगर उसे अपने गिरोह में शामिल कर ले तो ठगी के धंधे में चार चांद लग जाएगा और धंधा भी खूब चलेगा.

साला बना हमराज

फरारी के दौरान ललित परिवार सहित सीतामढ़ी आया और किराए का कमरा ले कर रहने लगा. इसी बीच उस ने साले अभिषेक से संपर्क साधा. अभिषेक पहले तो उस से मिलने से इंकार करता रहा, लेकिन उस ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों में उलझा कर उस के उज्ज्वल भविष्य और लाखों रुपए की इनकम के सुनहरे सपने दिखा कर अपनी ओर खींच लिया. बहनोई का साथ देने के लिए वह तैयार हो गया.

दरअसल, गौरव अपनी कार्ययोजना को असल दिखाने के लिए जालसाजों से मिल कर उन्हें मोटी रकम दे कर फरजी दस्तावेज बनवाता था, लेकिन जब से उसे पता चला था कि जो काम वह जालसालों से मिल कर कराता है. वह काम कंप्यूटर के एआई से शतप्रतिशत कराया जा सकता है और उस पर जल्द किसी को शक भी नहीं हो सकता. तभी से वह साले अभिषेक से मिलने के लिए बेताब हो गया था. साले से मिलने के बाद उस ने अपने पूरे नेटवर्क को अच्छी तरह समझाया कि जो भी ठगी के धंधे में कमाई होगी, उस में से आधाआधा दोनों बांट लेंगे.

ललित साले की मदद से इस की टोपी उस के सिर और उस की टोपी इस के सिर पहना कर करोड़पति बन गया था. उस की लाइफस्टाइल बदल चुकी थी. महंगे कपड़े पहनना, लजीज खाना खाना, होटलों में रंगरलियां मनाना, चमचमाती कार में सैर करना, ऐपल कंपनी के महंगे 2 मोबाइल हाथों में ले कर घूमना और फेसबुक पर सुंदर लड़कियों से चैटिंग करना उस की आदत बन गई थी.

ललित की झोली में जब करोड़ों रुपए आ गए तो उस ने अपने सपने को जीवंत रूप देने के लिए एक फरजी रूपरेखा तैयार की. उस का सपना जिला विद्यालय निरीक्षक (डीआईओएस) से आईएएस बनना था, लेकिन बांका जिले में जब उस पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मुकदमा दर्ज हुआ था, तब से उस का सपना धरा का धरा रह गया था. वह जानता था कि इस जन्म में उस का सपना कभी पूरा नहीं हो सकता. तो क्यों न इसी चोले को पहन कर एक फरजी आईएएस बन कर सामने आऊं? उस की इस योजना पर साले अभिषेक ने भी हां में हां मिला दी थी.

ठगी की दुकान चलाने के लिए ललित को अपने साले अभिषेक जैसे एक और राजदार की जरूरत थी, जो उस के गुनाहों की कुंडली को अपनी आस्तीन में छिपा कर रख सके. उस के धोखाधड़ी और जालसाजी की इमारत को बुलंदियों तक पहुंचाने में मददगार साबित हो सके, कभी पकड़ा जाए तो राज को अपने सीने में दफना सके, सच न उगले.

गौरव कुमार उर्फ ललित किशोर राम के साले अभिषेक सिंह का एक ऐसा दोस्त था, जो उस का हमराज ज्यादा और दोस्त कम था. उस का नाम परमानंद गुप्ता था. वह गोरखपुर जिले के गोरखनाथ थानाक्षेत्र का रहने वाला था. अभिषेक और परमानंद के बीच में दांतकाटी रोटी जैसी दोस्ती थी. अकूत पैसों के लालच की चाशनी में डुबो कर अभिषेक ने अपने गिरोह में उसे भी शामिल कर लिया था. गौरव कुमार ने अपने मुखौटे के ऊपर एक और मुखौटा पहन लिया. अब उस ने ललित किशोर राम नाम को भूतकाल के गर्भ में दफना दिया और आईएएस गौरव कुमार सिंह के रूप में नया अवतरण लिया.

इस के लिए उस ने अपने साथ बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों से लैस बौडीगार्ड, 2 सफेद कलर की लग्जरी गाडिय़ां, 2 मंहगे आईफोन के साथ अपने स्टेटस को मेनटेन रखने के लिए हर महीने करीब 5 लाख रुपए पानी की तरह बहाने का फैसला लिया, ताकि लोगों को लगे कि वह सचमुच एक आईएएस अधिकारी बन गया है.

बना फरजी आईएएस

झूठ, मक्कारी, बेइमानी, हरामखोरी, ठगी और व्यभिचारी की दुकान सजाने के एक साल बाद यानी साल 2023 में ललित किशोर राम, अपने नाम को दफना कर आईएएस गौरव कुमार सिंह के रूप में प्रकट हुआ तो उस के हावभाव और लग्जरी लाइफस्टाइल को देख कर हर कोई हैरान रह गया था. सभी के मुख से यही निकलता था उस ने जो सपना देखा था, अपनी कड़ी मेहनत और लगन से हासिल कर लिया. आखिरकार उस के आईएएस बनने का सपना पूरा हो ही गया.

ललित उर्फ गौरव के आईएएस अधिकारी बनने पर उस के नातेरिश्तेदार और यारदोस्त गर्व से फूले नहीं समाए थे. जो कल तक चलितर राम की गरीबी पर तरस खा रहे थे, आज वही गौरव जैसे होनहार अफसर बनने पर उस की एक झलक पाने के लिए लालायित हो रहे थे, लेकिन उन्हें क्या पता था कि इस दिखावे के मुखौटे के पीछे का सच क्या है. जिसे वह एक आईएएस अफसर समझ रहे थे, वह एक बड़ा ठग था.

बहरहाल, महाठग और चरित्रहीन गौरव कुमार ने अपनी लाइफस्टाइल इतनी चमकदार बना दी थी कि कोई भी उसे आईएएस अधिकारी समझने में देर नहीं करता था. जब चलता कीमती ब्रांडेड कपड़े पहनता, 2-2 लग्जरी गाडिय़ों और बड़ी संख्या में प्राइवेट गार्ड के साथ चलता, महंगे होटलों में ठहरता, लोगों से मिलता और पटना की रहने वाली अपनी एक गर्लफ्रेंड के साथ रात भर होटलों में अय्याशी करता था. बात 15 अप्रैल, 2025 की है. ललित उर्फ गौरव पटना के जिस होटल में ठहरा था, उसी होटल में मोकामा के एक बड़े ठेकेदार मुकुंद माधव भी किसी जरूरी काम से आ कर ठहरे हुए थे. वह सरकारी विभाग से ठेका लेते थे और करोड़ों कमाते थे.

होटल के बाहर बड़ी संख्या में चमचमाती लग्जरी कारों और अत्याधुनिक हथियारों से लैस बड़ी संख्या में सुरक्षा गार्डों को देख कर मुकुंद माधव हैरान रह गया था. उस से जब रहा नहीं गया, तब उस ने होटल के मैनेजर से पूछा था कि यहां कोई वीआईपी परसन आया है क्या, बड़ी संख्या में जहांतहां सुरक्षा गार्ड तैनात हैं?

ऐसे फंसा ठेकेदार

उसी दौरान मुकुंद माघव को पता चला कि इसी होटल में एक आईएएस अधिकारी रुके हुए हैं और अपने मातहतों से मीटिंग ले रहे हैं. यह जान कर पता नहीं क्यों ठेकेदार मुकुंद बहुत प्रभावित हुआ और उन से मिलने की अपनी इच्छा जाहिर की. बातचीत के दौरान ही पता चला कि साहब के पर्सनल असिस्टेंट अभिषेक कुमार हैं. मुकुंद किसी तरह अभिषेक से मिला और मिल कर साहब से मीटिंग कराने की अपनी इच्छा जाहिर की. उस ने कहा कि आप की मीटिंग साहब से जरूर करा देंगे, लेकिन थोड़ा वक्त देना होगा आप को, क्योंकि साहब अभी मीटिंग ले रहे हैं. मीटिंग से फारिग होते ही आप की मुलाकात उन से करा दूंगा.

मुकुंद माधव इस पर रजामंद हो गया और गौरव साहब से मिलने के लिए इंतजार करने लगा. काफी इंतजार के बाद वह मौका उसे मिल ही गया, जिस के लिए वह बेताब था. मीटिंग खत्म होतेे ही गौरव ने असिस्टेंट अभिषेक को फोन किया और उसे अंदर बुलाया तो अभिषेक उसे ले कर गौरव के पास गया और परिचय कराते हुए कहा, ”साहब, ये मुकुंद माधवजी हैं, पेशे से एक ठेकेदार हैं और सरकारी विभागों के ठेके लेते हैं, आप से मिलने के लिए काफी बेताब थे.’’

”ठीक है, आप बाहर जाइए मैं मुकुंद साहब से मिल ले रहा हूं.’’ गौरव का आदेश पाते ही अभिषेक कमरे से बाहर निकल गया और इशारे से सामने खड़े मुकुंद माधव को सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठने का इशारा किया तो वह बेहद खुश हुआ और इधरउधर देख कर बड़े फख्र के साथ सामने खाली पड़ी कुरसी पर बैठ गया.

”तो आप क्या करते हैं, मुकुंद साहब. कुछ अपने बारे में बताएं?’’ गौरव ने मुकुंद से सवाल किया.

”सर, मैं पेशे से एक ठेकेदार हूं. सरकारी विभागों के टेंडर लेता हूं, निर्माण का कार्य कराता हूं.’’ सहज हो कर मुकुंद ने जबाव दिया.

”कितना कमा लेते होगे?’’

”क्या सर, क्यों मजाक कर रहे हैं. आप तो जानते ही हैं ठेकेदार की दुकान चलती ही कहां है? अफसरों को कमीशन देने के बाद जैसेतैसे दालरोटी का जुगाड़ हो जाता है, कहां कमाई होती है इस में.’’

”अरे मुकुंद साहब, कहां करोड़ 2 करोड़ के ठेके के चक्कर में पड़े हैं, मैं आप को केंद्र सरकार का 450 करोड़ रुपए का ठेका दिलवाता हूं. ऐसे ठेके तो मेरे कोई चाहने वाला भी नहीं पूछता है. आप बाहर की दुनिया में निकलो, यहां रुपए हवा में तैर रहे हैं, उन्हें पकड़ो.’’

”आप का मतलब नहीं समझा सर. बुरा न मानें तो मैं ये कहना चाहता हूं कि अपनी बात विस्तार से कहें तो कुछ समझ में बात आती?’’

”अरे भई, क्यों परेशान हुए जा रहे हो आप. मिलते रहना, बात भी समझ में आ जाएगी और काम भी खूब दिखेगा. अभी मुजफ्फरपुर से मीटिंग ले कर लौट रहा हूं. अफसरों को राइट टाइम कर के आ रहा हूं. काम के प्रति ये अफसर बहुत मनमानी करते हैं, थोड़ी छूट

क्या दे दो, इन्हें सिर पर सवार हो कर तांडव करने की आदत सी हो जाती है, इसलिए समयसमय पर इन्हें राइट टाइम करना होता है.’’

”ठीक सर.’’ मुकुंद माधव ने सपाट जवाब दिया, ”कैसे मुलाकात हो सकती है आप से?’’

”जब चाहो मिल सकते हो, मैं अपने पीए से बोल देता हूं वो आप को मेरा पर्सनल मोबाइल नंबर दे देगा, फोन कर के जब चाहो, आ कर मिल सकते हो.’’

”ओके सर.’’ मुसकरा कर मुकुंद ने जवाब दिया, ”मैं पीए साहब से नंबर ले लेता हूं और फिर जब भी मिलना होगा तो फोन कर के मिलने आ जाऊंगा.’’

ठेकेदार मुकुंद माधव तथाकथित आईएएस गौरव से मिल कर बहुत खुश था. उसे तो अपने ऊपर यकीन ही नहीं हो रहा था कि कोई ऐसा भी अधिकारी होगा, जो दूसरों के बारे में ऐसा सोचता होगा. उस दिन के बाद से मुकुंद माधव गौरव का मुरीद हो गया. इधर शातिर गौरव थोड़ी देर के बातचीत से मुकुंद माधव के बारे में पूरी जानकारी ले ली थी और जान चुका था पार्टी मोटा आसामी है, रुपए उगलेगा. उसे अपने ठगी के बोतल में कैद कर रखना होगा, इस के लिए उसे जो भी जुगत करना पड़े, वह सब करेगा. उस दिन के बाद से गौरव और मुकुंद माधव की नजदीकियां और बढ़ती गईं.

इस बीच में गौरव ने अपनी ठगी का नेटवर्क बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और मध्य प्रदेश तक फैला लिया था. ज्यादातर उस का समय गोरखपुर के गुलरिहा थाना क्षेत्र के झुंगिया लाला कालोनी में बीतता था. इसी इलाके में 25 हजार रुपए के रेंट पर 3 बीएचके का एक शानदार फ्लैट लिया था और पत्नी पूजा व दोनों बच्चों के साथ रहता था. कालोनीवासी फरजी आईएएस गौरव के रुतबे और ठाठबाट से बेहद प्रभावित थे.

उन्हें जान कर बड़ी खुशी हो रही थी कि उन के पड़ोस में एक आईएएस अधिकारी रहता है, जिस के प्रभाव से कालोनी का कायाकल्प हो गया था. मुश्किल से मुश्किल काम यूं चुटकियों में करा देता था. ये सब कुछ ललित किशोर राम उर्फ गौरव कुमार सिंह की सोचीसमझी रणनीति के तहत हो रहा था. उस का सोचना था कि ठगी की यह दुकान बहुत दिनों तक यूं नहीं चलती रहेगी, एक न एक दिन   भांडा फूटना ही है, तब पुलिस की पकड़ से बचने के लिए यहीं शरण लेनी होगी.

 

उस ने लखनऊ की पौश कालोनी आशियाना में 50 लाख रुपए में 2 बीएचके का शानदार फ्लैट ले रखा था और फेसबुक के जरिए गोरखपुर में 3 और लड़कियों को अपनी गर्लफ्रेंड बनाए हुए था. तीनों गर्लफ्रेंडों को लंबीलंबी सब्जबाग दिखा कर, यहांवहां होटलों में घुमा कर उन्हें प्रैगनेंट कर दिया था. वो भोलीभाली लड़कियां उसे आईएएस समझ के उस के साथ बिस्तर गरम करने को तैयार हो गई थीं और अपना जीवन उस महाठग को सौंप बैठी थीं. इधर, शातिर गौरव मुकुंद माधव को अपने जाल में फांसने के लिए 450 करोड़ का ठेका दिलाने का जाल फेंका. उसे विश्वास की बोतल में उतारने के लिए उस ने आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) के माध्यम से फरजी 450 करोड़ रुपए के टेंडर का पेपर तैयार कर के उस के वाट्सऐप पर भेजा.

एक अखबार की कटिंग भी भेजी. उस में 450 करोड़ रुपए के टेंडर के बारे में विज्ञप्ति दी हुई थी. यह देख कर उस की खुशियों का ठिकाना ही नहीं रहा. और वह टेंडर पाने के लिए गौरव के पीछे पड़ गया. गौरव तो यही चाहता था कि यह आसामी मेरे चंगुल में किसी तरह फंस जाए. गौरव ने टेंडर पाने के बदले उस से कुछ चढ़ावा चढ़ाने के लिए कहा तो वह आसानी से तैयार हो गया और उस ने पहली किस्त के तौर पर एक करोड़ रुपए कैश दिया.

यही नहीं 4-5 महीने में उस ने उसे करीब 5 करोड़ दे दिए. इस के साथ ही उस ने लग्जरी गाडिय़ां, ड्राइवर और दूसरे राज्य से निजी गार्ड भी इस ने गौरव के लिए दिलाए थे. इसी दौरान एक दिन की बात है. ठेकेदार मुकुंद माधव गौरव से मिलने शहर के लग्जरी होटल गया. देर रात होटल में एक 20 वर्षीय खूबसूरत युवती आई. होटल के सभी लोग उसे देखने लगे. वह भी ठगा सा उसे देखता रह गया. वह सीधी गौरव के कमरे में दाखिल हुई. वह युवती उस की गर्लफ्रेंड थी. तब गौरव ने उस से झूठ बोला और कहा कि वह उस की बहन की बेटी है. किसी काम से वह मिलने आई है. फिर वह वहां से उठा और गर्लफ्रेंड को ले कर दूसरे कमरे में चला गया और पूरी रात अपने कमरे बाहर नहीं आया.

अगली सुबह मुकुंद माधव, फिर उस से मिलने होटल आया तो उस के साथ के एक गार्ड ने उस गर्लफ्रेंड को ‘भाभी’ कह कर आपस में मजाक किया. इस के बाद सभी गार्ड आपस में हंसने लगे. यह सुन कर मुकुंद को बड़ा अजीब लगा. और उसे शक भी हुआ कि ये कैसा मजाक कर रहे हैं, फिर वह यह सोच कर चुप रह गया कि बड़े लोग हैं, उन के लिए यह आम बात होती है, मेरे से क्या लेनादेना. मेरे को तो मेरा काम होने से मतलब है. उस के बाद वह बिना मिले ही वहां से चला गया.

एसडीएम को पीटा

इस दौरान एक घटना और घटी थी. फरजी आईएएस गौरव अपना लावलश्कर ले कर भागलपुर जिले में विद्यालय निरीक्षण करने पहुंच गया था. वहां से निरीक्षण कर के वापस पटना लौट रहा था तो उसी इलाके के एक एसडीएम से उस की टक्कर हो गई. एसडीएम साहब उस से सवाल कर बैठे कि आप कौन हैं? कहां से आ रहे हैं? आप किस बैच के आईएएस हैं?

इतना सुुनना था कि गौरव का पारा आसमान पर चढ़ गया और उस ने आव देखा न ताव एसडीएम साहब के गाल पर 2 थप्पड़ जड़ दिए और कहा, ”दो टके के एसडीएम तुम्हारी इतनी मजाल कि एक आईएएस अधिकारी से उस की नियुक्ति के बारे में सवाल करे. हटो मेरे रास्ते से वरना ऐसी जगह तुम्हारा ट्रांसफर करवा दूंगा, जहां एक बूंद पानी के लिए तरह जाओगे, समझे.’’

उस के बाद गौरव अपने काफिले के साथ रवाना हो गया और एसडीएम साहब चुपचाप वहां से खिसक लिए और अपनी इज्जत बचाने के लिए किसी से भी इस का जिक्र तक नहीं किया.

धीरेधीरे साल बीत गया. न तो मुकुंद माधव को टेंडर मिला और न ही गौरव उसे अपनी बातों से संतुष्ट ही कर पा रहा था. तब उसे गौरव पर शक गहरा गया. उसे अपने साथ ठगे जाने का अहसास हुआ तो उस ने सामान्य तरीके से अपने रुपए वापस करने का दबाव बनाया, तब गौरव उसे अपनी गीदड़भभकियों से डरा कर चुप कराना चाहता था, लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया और बाद में रुपए लौटा देने का वायदा किया. इसी बीच नवंबर 2025 में बिहार में चुनाव होना तय हुआ तो प्रशासन सख्त हुआ और हवाला के जरिए आने वाले रुपयों पर नजर रखी जाने लगी.

बात 7 नवंबर, 2025 की सुबह लगभग सवा 7 बजे की है. गोरखपुर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म नंबर एक पर दिल्ली से चल कर वैशाली (बिहार) को जाने वाली सुपरफास्ट एक्सप्रैस वैशाली आ कर रुकी थी. थर्ड एसी बोगी में एक काले रंग की बड़ी अटैची ले कर मुकुंद माधव सवार हो गया था. वह गौरव से रुपए ले कर गोरखपुर से मुजफ्फरपुर जाने के लिए ट्रेन में सवार हुआ था. उसी समय जीआरपी इंसपेक्टर अनुज कुमार सिंह अपने हमराहियों के साथ ट्रेन में रुटीन चैक करने के लिए अंदर प्रवेश किए.

इंसपेक्टर अनुज के साथ खोजी कुत्ता भी था, जो जांच में उन की मदद करता था. जैसे ही कोच में घुसे तो सीट के नीचे उन्हें काले रंग की बड़ी अटैची दिखी. बोगी में सवार यात्रियों से उस अटैची के बारे में पूछा तो किसी ने भी नहीं कहा कि वो अटैची मेरी है. लेकिन सीट पर सामने बैठे मुकुंद माधव के माथे पर पसीना चुहचुहा उठा और वह थरथर कांपने लगा तो इंसपेक्टर अनुज को उस पर शक हुआ और उस से सवाल कर बैठे, ”क्या बात है आप इतना घबराए हुए क्यों हो? यह अटैची आप की है क्या और इस में क्या है?’’

इंसपेक्टर अनुज के किसी भी सवाल का उस ने उत्तर नहीं दिया तो उन्होंने अटैची सहित उस से नीचे उतरने को कहा. हमराही अटैची और मुकुंद माधव को ले कर ट्रेन से नीचे उतरे और सीधा जीआरपी थाने पहुंचे. अटैची बहुत भारी थी. थाने पहुंच कर इंसपेक्टर ने अपने हमराहियों से उसे खोलने के लिए आदेश दिया. अटैची खुली तो उसे देख कर सब की आंखें चौंधियां गईं. अटैची 500-500 के नोटों से भरी पड़ी थी.

रुपयों को ले कर पुलिस उस से पूछताछ करने लगी कि इस में कितने रुपए हैं और इन रुपयों को ले कर कहां जा रहे थे? इस पर उस ने जवाब दिया कि ये रुपए उस के एक दोस्त ने दिए हैं. इन्हें ले कर बिहार के मुजफ्फरपुर जा रहा था. इस बाबत उस से रसीद मांगी गई तो उस ने अपने पास रसीद न होने की बात कह कर अपनी लाचारी व्यक्त कर दी. पुलिस मुकुंद माधव के जवाब से संतुष्ट नहीं थी और सूचना आयकर विभाग को दे दी गई. आयकर विभाग के अधिकारी अपने साथ रुपए गिनने वाली 2 मशीनें ले कर आए और रुपयों की गिनती शुरू हुई. घंटों की गिनती में 99 लाख 90 हजार रुपए सामने आए.

ठीकठीक जवाब न देने पर पुलिस ने रुपए तो जब्त कर ही लिए, साथ ही साथ जेल भी भेज दिया. जेल जाने से पहले उस ने पुलिस को इतना जरूर बताया था कि उसे ये रुपए आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह ने दिए थे, जो गुलरिहा में रहते हैं. इस घटना के करीब 3 सप्ताह बाद गोरखपुर में एक ठेकेदार फरजी टेंडर के साथ पकड़ा गया. जब पुलिस ने उस से कड़ाई से पूछताछ की तो उस ने भी आईएएस गौरव कुमार सिंह का नाम लिया था कि उन्हीं के द्वारा टेंडर के सारे पेपर उपलब्ध कराए गए थे. उस के मुंह से यह सुन कर पुलिस चौंक गई.

पुलिस ने गौरव सिंह के बारे में पता लगाया तो आईएएस गौरव सिंह का कहीं किसी बैच में नाम आया ही नहीं. तो पुलिस अधिकारियों को उस पर शक हो गया. चूंकि मामला एक आईएएस अधिकारी से जुड़ा हुआ था, इसलिए डायरेक्ट उस पर हाथ नहीं डाला जा सकता था, इसलिए गोरखपुर के अधिकारियों ने जांच कराने का फैसला लिया. एसएसपी राजकरन नैय्यर ने एसपी (सिटी) अभिनव त्यागी को आईएएस गौरव सिंह के बारे में गोपनीय जांच कर के रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए.

एसपी (सिटी) ने गौरव के बारे जांच के लिए लोकल इंटेलीजेंस यूनिट (एलआईयू) विभाग को नामित किया. जांच का आदेश मिलते ही एलआईयू विभाग सक्रिय हो गया और आगे की काररवाई में जुट गया. इसी बीच गोरखपुर की रहने वाली एक अन्य प्रेमिका ने एसएसपी को एक शिकायती पत्र सौंपा. उस ने भी फरजी आईएएस गौरव सिंह के खिलाफ प्रेम के जाल में फांस कर गर्भवती बना कर मुंह मोड़ लेने की शिकायत की थी.

इधर एक महीने में एलआईयू विभाग ने आईएएस गौरव कुमार सिंह के खिलाफ जांच कर के रिपोर्ट एसएसपी राजकरन नैय्यर को सौंप दी थी. जांच रिपोर्ट पढ़ कर उन के पैरों तले से जैसे जमीन ही खिसक गई थी. आईएएस गौरव कुमार सिंह नाम का कोई भी आईएएस अधिकारी अस्तित्व में था ही नहीं. लोग जिसे आईएएस समझ रहे थे, वह बिहार के सीतामढ़ी जिले का रहने वाला महाठग था, जिस के शिकार करीब 40 लोग बन चुके थे और करोड़ों रुपए की ठगी कर चुका था. जिस में बिहार के मोकामा के रहने वाले ठेकेदार मुकुंद माधव को उस ने सब से ज्यादा चूना लगाया था.

पीए, सहायक अरेस्ट

7 दिसंबर, 2025 को मुकुंद माधव गौरव से मिलने उस के आवास गुलरिहा पहुंचा तो गेट पर ताला जड़ा मिला और वह परिवार सहित गायब था. फिर मुकुंद माधव गुलरिहा थाने पहुंचा और अपने ठगे जाने की लिखित तहरीर सौंपी. इधर जांच में साबित हो ही गया था कि गौरव कुमार सिंह कोई आईएएस अधिकारी नहीं, बल्कि एक महाठग है.

पुलिस ने बीएनएस की विविध धाराओं- 204, 205, 319(2), 318(4), 338, 336(3), 340(4), 351(3), 61(2), 316(2) के तहत गौरव कुमार सिंह और उस के 2 साथियों अभिषेेक सिंह व परमानंद गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जांच आगे बढ़ाई. मुकदमा दर्ज होते ही वह भूमिगत हो गया था, लेकिन पुलिस अपनी अथक मेहनत से 9 दिसंबर, 2025 को सुबह के समय गुलरिहा से उसे गिरफ्तार करने में सफल हो गई थी. उस की निशानदेही पर पीए बना उस का साला अभिषेक सिंह और सहायक परमानंद गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया था.

फरजी आईएएस गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम को गिरफ्तार करते ही पुलिस ने उस के दोनों मोबाइल फोन अपने कब्जे में ले लिए. दोनों फोन की जांच की गई तो उस के फोन में 4 गर्लफ्रेंड होने और उन से बातचीत करने के प्रमाण मिले थे. उसी से पता चला कि 4 में से 3 गर्लफ्रेंड प्रैग्नेंट थीं. यही नहीं, उस ने 5 महीने पहले अपने मोबाइल फोन का सारा डाटा डिलीट कर साक्ष्य मिटा दिए थे, ताकि पकड़े जाने पर पुलिस उस की सच्चाई तक कभी पहुंच न सके.

पूछताछ में उस ने बताया था कि वह पिछले कई सालों से यह धंधा कर रहा था. पुलिस ने उस के घर से कई फरजी दस्तावेज बरामद किए. इन दस्तावेजों को एआई के माध्यम से एडिट कर के तैयार किया गया था. 60 हजार रुपए तनख्वाह पाने वाला साला अभिषेक ही उस का पीए बन कर यह दस्तावेज तैयार करता था. तलाशी के दौरान घर से 2 लाख 96 हजार 500 रुपए नकद बरामद किए. फरजी आईएएस गौरव कुमार सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसी दिन शाम को एसएसपी राजकरन नैय्यर ने पुलिस लाइन स्थित वाइट हाउस में प्रैस कौन्फ्रैंस कर केस का खुलासा किया.

इस के बाद तीनों आरोपियों को अदालत में पेश कर गोरखपुर मंडलीय कारागार, बिछिया भेज दिया. कथा लिखे जाने तक फरजी आईएएस अधिकारी गौरव कुमार सिंह उर्फ ललित किशोर राम के खिलाफ जांच जारी थी. जांच में रोजाना नएनए कारनामे उजागर हो रहे हैं. एसएसपी राजकरन नैय्यर ने लोगों से अपील की है यदि कोई भी व्यक्ति गौरव से ठगी का शिकार बना है तो उस की शिकायत पुलिस से कर सकता है. उस का नाम और पता गुप्त रखा जाएगा. UP News

 

 

UP Crime News : 13 शादियां करने वाली लुटेरी दुलहन

UP Crime News : 26 वर्षीय सीमा ऐसी शातिर लुटेरी दुलहन थी जो आगरा के बिजनैसमैन के यहां से 75 लाख रुपए, जयपुर के ज्वैलर के घर से 36 लाख की ज्वैलरी व नकदी ले कर फरार हुई थी. वह हमेशा मोटी आसामी को ही जाल में फांसती थी. आप भी जानें कि शादी के बाद वह कैसे करती थी ससुराल के माल पर हाथ साफ?

मोबाइल फोन की घंटी बजी तो राकेश जैन ने हाथ में पकड़ा चाय का प्याला टेबल पर रख कर वहां रखा मोबाइल फोन उठा लिया और होंठों में बुदबुदाए, ‘इतनी सुबह किस ने फोन मिला दिया मुझे.’

मोबाइल स्क्रीन पर जो नंबर चमक रहा था, वह राकेश जैन के लिए अंजाना था. कुछ पल विचार करने के बाद उन्होंने काल रिसीव कर ली, ”हैलो! मैं राकेश जैन बोल रहा हूं, आप कौन हैं?’’

जवाब देने की बजाए दूसरी ओर से चहकता हुआ नारी स्वर उभरा, ”गुड मार्निंग राकेशजी, सुबहसुबह आप को डिस्टर्ब कर दिया मैं ने?’’

राकेश जैन नारी स्वर सुन कर हैरानी से बोले, ”जी, डिस्टर्ब की बात नहीं है, बस मैं आप को पहचान नहीं पाया हूं.’’

”जी, मेरा नाम सीमा उर्फ निक्की अग्रवाल है. मैं ने कल रात को मैरिज ऐप पर आप की प्रोफाइल देखी थी. रात को मैं ने आप को डिस्टर्ब नहीं किया कि आप आराम कर रहे होंगे. अब भी आप को फोन करने का समय गलत ही है. सुबहसुबह आदमी दैनिक कर्म में उलझा होता है, लेकिन क्या करूं, आप की प्रोफाइल देखने के बाद मैं रात भर बहुत बेचैन रही, इसलिए.’’

”कोई बात नहीं सीमाजी,’’ राकेश जैन ने सीमा की बात को काटते हुए कहा, ”मुझे सुबह 4 बजे उठने की आदत है, साढ़े 5 बजे तक मैं फ्रैश हो कर चाय पीने बैठ जाता हूं, अभी भी मैं चाय ही पी रहा था.’’

”मैं आ जाऊं चाय पीने?’’ सीमा ने कहते हुए जोरदार ठहाका लगाया.

”आ जाइए,’’ राकेश जैन मुसकरा कर बोले, ”आप का ही घर है.’’

”अभी मेरा कहां से हो गया जी.’’ सीमा ने बगैर झिझके कह दिया, ”आप मुझे अपने दिल और घर में जगह दे देंगे, तब कहूंगी यह मेरा घर है, मेरा और मेरे पिया का घर.’’

राकेश जैन के हृदय में गुदगुदी सी होने लगी. उन्हें समझते देर नहीं लगी कि सीमा ने उस की ‘मैरिज ऐप’ शादी के लिए डाली गई प्रोफाइल को पढऩे के बाद उस से रिश्ता जोडऩे का मन बना लिया है.

सीमा की बेबाकी, बात करने का सलीका राकेश जैन को अच्छा लगा.

उन्होंने सीमा के विषय में विस्तार से जानने के लिए गंभीर स्वर में पूछा, ”आप कहां रहती हैं सीमाजी?’’

”मैं उत्तराखंड के देहरादून में रहती हूं. मैं ने बीकाम कर लिया है और अब एलएलबी कर रही हूं. घर मैं मम्मीपापा और बहनें हैं, मैं बड़ी हूं घर में. ‘‘

”क्या आप ने मैट्रीमोनियल साइट पर मेरे द्वारा शादी के लिए डाली गई प्रोफाइल अच्छे से पढ़ ली है सीमाजी?’’ राकेश जैन ने झिझकते हुए पूछा.

”हां जी,’’ सीमा ने बताया, ”मैं ने पढ़ लिया है कि आप विधुर हैं. आप के पास 2 बच्चे हैं और आप की उम्र 37 साल के आसपास पहुंच चुकी है.’’

”इतना जान लेने के बाद क्या आप मुझ से शादी करने के लिए तैयार हैं?’’

”जी हां.’’ सीमा ने गंभीर स्वर में कहा, ”राकेशजी, बेशक मैं कुंवारी हूं, लेकिन मेरी इच्छा है कि मैं अपना तनमन उस व्यक्ति को समर्पित करूं, जिसे अपने बच्चों से मोह हो.’’

”तब आप को अपनी जीवनसंगिनी बनाने को मैं तैयार हूं.’’ राकेश जैन तुरंत बोले, ”लेकिन एक बार मैं आप से आमनेसामने बैठ कर बात करना चाहूंगा सीमाजी.’’

”मैं भी यही कहने वाली थी,’’ सीमा बेसब्री से बोली, ”आप समय निकाल कर देहरादून आ जाइए.’’

”ठीक है,’’ राकेश ने हामी भर दी, ”मैं कल ही बस से देहरादून आ जाता हूं.’’

”आ जाइए. मैं आप के स्वागत के लिए देहरादून बस अड्ïडे पर खड़ी मिलूंगी. आप बस में बैठें तो मुझे फोन द्वारा सूचित कर देना.’’

”ठीक है,’’ राकेश जैन ने खुश होते हुए गुड बाय कहा और काल डिसकनेक्ट कर दी.

देहरादून में रूबरू हो कर मिले दिल से दिल दूसरे ही दिन राकेश जैन देहरादून गए और सीमा अग्रवाल से मिल कर जयपुर लौट आए. सीमा अग्रवाल 26 साल की रूपवान युवती थी. पहली नजर में ही राकेश जैन को वह पसंद आ गई. सीमा से उन्होंने यह वादा किया कि घर जा कर वह इस रिश्ते को पक्का करने के लिए फेमिली वालों से बात करेंगे. शाम को राकेश जैन ने घर आ कर अपने पापा, बहनजीजा और मामा के कानों में सीमा अग्रवाल से मुलाकात की बात डालते हुए बताया कि वह सीमा से शादी करना चाहते हैं.

”अरे!’’ राकेश के जीजा खुश हो कर बोले, ”जब सीमा तुम्हें जंच गई है तो फिर देरी क्यों कर रहे हो राकेश, चटपट शादी कर डालो.’’

”जीजाजी, सीमा गरीब परिवार से है.’’

”यह तो अच्छी बात है, गरीब घर की लड़कियां संस्कारी होती हैं और वे शादी के बंधन को ताउम्र निभा कर चलने में ही अपनी भलाई समझती हैं. तुम शादी की तैयारी शुरू कर दो. यह शादी हम जयपुर में ही करेंगे, सीमा के परिवार वालों के ऊपर थोड़ा सा भी बोझ नहीं डालेंगे.’’ जीजा ने राकेश जैन को समझाया.

”ठीक है, जीजाजी. मैं अपनी हैसियत के अनुसार ही बड़ी धूमधाम से यह शादी करूंगा.’’ राकेश जैन ने उत्साहित हो कर कहा और यह बात फोन कर के सीमा को बता दी. इस के दूसरे दिन से ही राकेश जैन के घर शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. निश्चित दिन जयपुर के पौश इलाके मानसरोवर में राकेश जैन ने शानदार शादी का मंडप सजवाया. सीमा के घर वालों को पहले ही जयपुर बुला कर एक होटल में ठहरा दिया गया था. 23 फरवरी, 2023 को राकेश जैन और सीमा अग्रवाल की इस सजेधजे मंडप में बड़ी धूमधाम से शादी संपन्न हो गई. इस शादी में वरवधू के फेमिली वालों के अलावा जयपुर शहर के बड़ेबड़े ज्वैलर्स, व्यापारी और गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए.

सुबह सीमा की इसी मंडप से विदाई हुई. वह दुलहन बन कर राकेश जैन के घर जोतवाड़ा के एक आलीशान बंगले में आ गई. शादी की जितनी रस्में थीं, वह यहां निभाई गईं और रात को गुलाब चमेली के फूलों से सजाए गए सुहागसेज पर राकेश जैन और सीमा की सुहागरात भी मन गई. सीमा ने अपने कौमार्य की पूंजी राकेश जैन को समर्पित कर के एक अच्छी पत्नी होने का धर्म निभा दिया. राकेश जैन की पत्नी देवकी का 2 अप्रैल, 2022 को निधन हो गया था. वह 2 बच्चे छोड़ गई थी. सीमा ने देवकी का स्थान लिया तो उस के बच्चों को भी मां की तरह गले से लगा लिया.

राकेश जैन को लगा कि उन्होंने अच्छे कर्म किए होंगे जो सीमा जैसी नेक, पतिव्रता पत्नी दूसरी बार मिल गई है. सीमा में उन्हें पूर्वपत्नी देवकी जैसे ही गुण नजर आए थे. भविष्य के गर्भ में जो छिपा था, उसे राकेश जैन नहीं भांप पाए. वह सीमा को हर प्रकार का सुख देने का हर प्रयास करने लगे. उन का जयपुर में बड़े ज्वैलर्स के रूप में नाम था. रुपएपैसों की कोई कमी नहीं थी. परिवार में पापा और छोटा भाई था. घर में किसी बात की दिक्कत नहीं थी. सब कुछ 4 महीनों तक ठीकठाक चलता रहा. पांचवां महीना शादी के बाद जुलाई का आया तो सीमा ने अपना रंग बदलना शुरू कर दिया.

एक सुबह वह सो कर उठी तो सुबकने लगी. उस की आंखों से मोटेमोटे आंसू टपकने लगे. राकेश जैन नहाने के बाद पूजा करने के लिए घर के मंदिर की तरफ जा रहे थे. सीमा को रोते देखा तो घबरा कर उस के पास आ गए.

”क्या हुआ सीमा, तुम रो क्यों रही हो?’’ स्नेह से सीमा की ठोड़ी ऊपर उठाते हुए उन्होंने हैरानी से पूछा.

”राकेश, मुझे आज सुबह एक

भयानक सपना आया है.’’ सीमा ने रोते हुए बताया.

”कैसा सपना?’’ राकेश जैन ने पूछा.

”आप मुझे धक्के दे कर घर से निकाल रहे हैं…’’

”पगली, मैं भला तुम्हें घर से क्यों निकालूंगा, तुम्हें तो मैं देवकी जैसा ही प्यार करता हूं.’’

”नहीं राकेश, कहते हैं सुबह का सपना सच्चा होता है.’’ सीमा अपने आंसू साड़ी के पल्लू से पोंछते हुए बोली, ”मैं डर रही हूं, यदि आप ने मुझे घर से निकाल दिया तो मेरा क्या होगा.’’

”मैं ऐसा नहीं करूंगा सीमा. तुम्हें मैं ने दिल से अपनी पत्नी स्वीकार किया है, तुम सदैव इस घर में रहोगी.’’

”मुझे विश्वास नहीं है राकेश.’’ सीमा गरदन झटक कर बोली, ”आप ऐसा करिए, अपनी आधी जायदाद मेरे नाम लिख दीजिए.’’

”यह क्या कह रही हो सीमा, यह घर, यह धनदौलत सब तुम्हारा ही तो है.’’ राकेश जैन ने समझाया, ”मेरे बाद तुम्हीं तो इस की मालकिन बनोगी. उठो, फ्रैश हो कर ब्रेकफास्ट तैयार करो, मुझे जल्दी दुकान पर जाना है आज.’’

”मैं नहीं उठूंगी, आप मेरे नाम आधी प्रौपर्टी करवाइए पहले.’’ सीमा जिद्दी स्वर में बोली.

”यह मुमकिन नहीं है सीमा.’’ राकेश जैन अब गंभीर हो गए, ”हमारे खानदान में ऐसा आज तक नहीं हुआ है.’’

”चलो छोड़ो! आप मुझे आधी प्रौपर्टी की मालकिन नहीं बनाते तो अपने बिजनैस में फिफ्टी का हिस्सेदार बना लीजिए.’’

”यह क्या फिफ्टीफिफ्टी का तमाशा खडा कर रही हो.’’ राकेश जैन झल्ला कर बोले,  ”तुम उठ कर ब्रेकफास्ट बनाती हो या मैं पूजा कर भूखा ही दुकान पर चला जाऊं?’’

”चले जाओ.’’ सीमा गुस्से से बोली, ”यदि आप मेरे लिए कोई हिस्सेदारी तय नहीं करेंगे तो मैं कुछ भी काम नहीं करूंगी.’’

राकेश जैन सीमा को घूरते हुए मंदिर की तरफ बढ़ गए. पूजा कर लेने के बाद जब वह दुकान के लिए निकले तो सीमा को उन्होंने बिस्तर पर ही पड़े देखा. राकेश जैन यह सोच कर चुपचाप घर से निकल गए कि शाम तक सीमा को अपने किए पर शर्मिंदगी महसूस होगी. शाम को वह उन से माफी मांग लेगी. किंतु ऐसा नहीं हुआ. वह शाम को दुकान बंद कर के लौटे तो सीमा घर में नहीं थी. सीमा किसी को बताए बगैर घर से गई थी, राकेश जैन ने उसे फोन लगाया तो सीमा ने फोन उठा कर गुस्से में पूछा, ”क्यों फोन कर रहे हो मुझेï?’’

”कहां हो तुम… घर में बगैर बताए गई हो, हम सब परेशान हो रहे हैं.’’ राकेश जैन ने अपने गुस्से पर काबू रख कर प्यार से कहा, लेकिन सीमा के जवाब ने उन्हें ऊपर से नीचे तक हिला कर रख दिया.

”राकेश बाबू, तुम मुझे आधी प्रौपर्टी या बिजनैस में फिफ्टी का हिस्सेदार नहीं बनाना चाहते थे न, अब मैं ने अपने गुजारे के लिए तुम्हारी अलमारी में सेंध लगा कर अपना हिस्सा ले लिया है. मेरा पीछा मत करना, क्योंकि मैं ने तुम्हारे पापा और भाई पर देहरादून की कोतवाली में रेप का केस दर्ज करवा दिया है. मेरे खिलाफ जाओगे तो तुम्हारे पापा और भाई को जेल में सड़वा दूंगी.’’

राकेश जैन को सुनते ही चक्कर आ गया. वह धम्म से सोफे पर गिर पड़े. छोटे भाई और पापा ने उन्हें संभाला. जब वह थोड़ा सामान्य हुए तो उन्होंने अलमारी खोल कर देखी. अलमारी में से 36 लाख के जेवर और लाखों रुपए कैश सीमा अग्रवाल ले उड़ी थी. राकेश जैन ने अपने जीजा को इस वारदात की जानकारी दी तो वह घबराए हुए घर आ गए. अपने साले से ससुरजी और छोटे साले पर रेप केस करने की धमकी ने उन के होश उड़ा दिए. उन्होंने राकेश को साथ ले जा कर जोतवाड़ा थाने में सीमा अग्रवाल के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी और जयपुर (पश्चिम) के डीसीपी अमित कुमार से मुलाकात कर उन्हें भी सारी बात बता दी.

”लगता है, आप लुटेरी दुलहन के जाल में फंस गए हैं जैन साहब. आप ने थाने में शिकायत दर्ज करवा दी है. मैं सीमा अग्रवाल की तलाश में पुलिस टीम को निर्देश दे देता हूं. जल्दी ही सीमा को गिरफ्तार कर लिया जाएगा.’’

ऐसे पकड़ में आई लुटेरी दुलहन

डीसीपी अमित कुमार ने यह केस मुरलीपुरा के एसएचओ सुनील कुमार जांगिड के सुपुर्द कर एक स्पैशल टीम का गठन कर दिया. इस टीम में एसआई विश्वास शर्मा, कांस्टेबल योगेश सिंह, रोशन सिंह, महिला कांस्टेबल निलाक्षी और पूजा तिवारी को शामिल किया गया. यह स्पैशल टीम देहरादून गई. वहां की पुलिस के साथ सीमा के घर दबिश दी गई तो वह घर में मिल गई. जयपुर की स्पैशल पुलिस टीम सीमा को गिरफ्तार कर के जयपुर ले आई. उस से राकेश जैन के यहां से चोरी किए जेवर और नकदी बरामद हो गई. उस से पूछताछ के बाद पता चला कि राकेश जैन सीमा का पहला शिकार नहीं थे, इस से पहले सीमा ने आगरा के एक व्यवसायी और गुरुग्राम (हरियाणा) के एनआरआई को ठगी का शिकार बनाया था.

 

सीमा बहुत शातिर ठग थी. यह मैट्रीमोनियल साइट पर ऐसे व्यक्ति को ढूंढती, जिन्हें अपने लिए अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा स्त्री की तलाश रहती थी. किसी कारणवश ऐसे व्यक्तियों का विवाह नहीं हो पाता था या अधिक उम्र होने की वजह से उन के दरवाजे कोई पिता लड़की का रिश्ता ले कर नहीं आता था. सीमा ने 10 साल में 3 हाईप्रोफाइल ठगी की थीं. जयपुर के मशहूर ज्वैलर राकेश जैन को लाखों का चूना लगाने से पहले उस ने आगरा के एक बिजनेसमैन से 75 लाख की ठगी की थी. इस व्यवसायी की शादी नहीं हो पा रही थी. उस ने मैट्रीमोनियल साइट पर अपना रजिस्ट्रैशन कर रखा था.

सीमा ने उस से संपर्क किया और जब वह शादी के लिए तैयार हो गया तो एक सादे समारोह में सीमा ने उस से शादी कर ली और उस की दुलहन बन गई. शादी की पहली रात में ही सीमा ने व्यवसायी को पलंग से धकेल दिया और उसे नपुंसक बता कर उसे कोर्ट में घसीटने की धमकी दे डाली. अपनी इज्जत का जुलूस न निकले, इस के लिए उस ने सीमा को मुंह बंद रखने की कीमत 75 लाख रुपए दी. सीमा रुपए ले कर फुर्र हो गई.

हरियाणा गुरुग्राम का एक एनआरआई युवक भी उस के जाल में फंसा. यह युवक इंजीनियर था. सीमा ने उस से पहचान बनाई, उसे प्रेम जाल में फांसा, फिर उस की दुलहन बन कर उस के घर आ गई. इस एनआरआई की पत्नी बन कर सीमा ने इस के घर वालों का विश्वास जीता, फिर पति के ममेरे भाई पर आरोप लगा दिया कि उस ने उस की इज्जत पर हाथ डाला है. वह थाने में जाने की धमकी देने लगी तो इस मामले को दबाने के लिए घर वालों ने सीमा को 10 लाख रुपए दिए. यह घर उस के रहने लायक नहीं है, ऐसा कह कर सीमा उस युवक को छोड़ कर गुरुग्राम से देहरादून आ गई.

लुटेरी दुलहन सीमा से पूछताछ करने के बाद सक्षम न्यायालय में पेश करने पर उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस उस के द्वारा ठगे गए व्यक्तियों का ब्यौरा एकत्र कर रही थी ताकि इस लुटेरी दुलहन को सख्त से सख्त सजा दिलवाई जा सके.

13 दूल्हों को लूटने वाली लुटेरी दुलहन

तीखे नयननक्श वाली उस युवती का चेहरा धूप से तमतमा कर लाल हो गया था. साधारण सा सूट पसीने से पूरी तरह भीग कर युवती के शरीर से चिपक गया था. वह पूरी तरह थक चुकी थी. उस युवती के साथ एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति भी था, वह भी पसीने से नहाया लग रहा था. इन के पीछे कुछ दूरी पर 2 औरतें भी दिखाई दे रही थीं. वे भी काफी थकी हुई थीं और तेज धूप में धीरेधीरे अपने पांव आगे बढ़ा रही थीं.

”हमें और कितनी दूर चलना होगा बाबा, मेरी हिम्मत अब जवाब देने लगी है.’’ साथ वाली युवती ने माथे पर आया पसीना दुपट्टे से पोंछते हुए पूछा.

”वह सामने बस्ती दिखाई दे रही है पूजा. वहीं जाना है हमें.’’ अधेड़ व्यक्ति ने अंगुली से सामने दिखाई दे रहे घरों को दिखाते हुए बताया. वे चारों धीरेधीरे आगे बढऩे लगे. थोड़ी देर में वे उस बस्ती में पहुंच गए. यहां एक कुआं था, जिस पर एक औरत पानी भर रही थी.

आगुंतकों को इस बस्ती में देख कर वह औरत उन के करीब आ गई.

”किस के घर जाना है आप लोगों को?’’ उस औरत ने उन्हें सिर से पांव तक देखते हुए पूछा.

”यह सांडी का मोहल्ला नवाबगंज ही है न बहन?’’ अधेड़ ने पूछा.

”हां, यह नवाबगंज ही है.’’

”यहां नीरज गुप्ता रहते हैं, हमें उन के घर पहुंचा दोगी तो बड़ा एहसान होगा बहन.’’

”आइए, नीरज गुप्ता का घर मेरे घर के पास ही है.’’ औरत ने कहा और वह उन चारों को साथ ले कर नीरज गुप्ता के घर आ गई. उस ने बाहर से ही आवाज लगा कर कहा, ”भैया नीरज, देखो तो आप के घर कौन मेहमान आए हैं.’’

एक 30 वर्ष की उम्र वाला व्यक्ति घर से बाहर आया और हैरानी से उन चारों को देखने लगा. कुछ देर बाद वह बोला, ”कौन हैं आप लोग, मैं ने आप लोगों को पहचाना नहीं है.’’

”मेरा नाम प्रमोद है बेटा नीरज. यह मेरी बहू सुनीता है और यह मेरी पोती पूजा है. यह आशा है पूजा की मौसी. हम तुम्हारे घर पूजा की शादी का रिश्ता ले कर आए हैं नीरज बेटा.’’

”ओह!’’ वह व्यक्ति खुशी से चहका, ”अरे! आप लोग बाहर क्यों खड़े हैं. आइए, अंदर.’’

सभी अंदर आ गए. नीरज गुप्ता का घर बड़ा था और उस में एक संपन्न घर की तरह सारा सामान करीने से लगा दिखाई दे रहा था. नीरज गुप्ता ने उन्हें सोफे पर बिठा कर चाय पिलाई.

”मैं आप लोगों के लिए चाय बना कर लाता हूं.’’

”रहने दो बेटा,’’ सुनीता नाम की महिला जल्दी से बोली, ”हम दूर से पैदल ही चले आ रहे हैं, इसलिए सर्द मौसम में भी हमारे शरीर पसीने से नहा गए हैं. पहले पसीना सुखा लें, फिर चाय बना लेना.’’

नीरज गुप्ता ने बुजुर्ग से पूछा, ”दादाजी, आप को किस ने बताया कि नवाबगंज में मैं रहता हूं और मुझे शादी के लिए लड़की की तलाश है.’’

”मुझे हरदोई में एक चाय वाले भैया ने बताया था. तुम वहां जाते होगे और शादी की बात भी की होगी.’’ प्रमोद ने बताते हुए कहा.

”दादाजी, मैं साफ दिल का आदमी हूं. मेरी पहले शादी हो चुकी है, लेकिन मेरी पत्नी बीमारी के कारण चल बसी. मुझे अपने बच्चों के लिए दूसरी शादी करनी पड़ रही है. यदि आप को मेरी बात पर कोई ऐतराज न हो तो बात आगे बढ़ाइए.’’ नीरज ने बताया.

”हमें कोई ऐतराज नहीं है बेटा नीरज.’’ सुनीता बोली, ”मैं ने अपनी बेटी पूजा को 10 क्लास पढ़ाया है. घर के सारे काम सिखा दिए हैं, बदकिस्मती यह है कि मैं गरीब हूं, इसलिए लड़के वालों की मोटे दहेज वाली डिमांड पूरी नहीं कर सकी. पूजा की उम्र 26 साल हो गई है, यह जैसी है तुम्हारे सामने है. यदि तुम हां करो तो बात पक्की कर ली जाएगी.’’

”मांजी, मुझे पूजा पसंद है. मेरी दहेज की कोई डिमांड नहीं है. मेरे पास सब कुछ है, मैं इसे सोनेचांदी से लाद कर रानी की तरह रखूंगा. आप पूजा से पूछ लीजिए, क्या मैं इन्हें पसंद हूं?’’

पूजा की आंखों में तीखी चमक उभर आई, वह शरमाने की ऐक्टिंग करते हुए बोली, ”आप मुझे पंसद हैं जी.’’

बातचीत के दौरान तय हुआ कि कल पहली जनवरी, 2025 को हरदोई के रजिस्ट्रार कार्यालय में पूजा और नीरज गुप्ता कोर्ट मैरिज करेंगे. सुबह 10 बजे सभी वहां पहुंच जाएं. सब कुछ तय कर के वे चारों नवाबगंज से वापस हरदोई के लिए निकल गए. दूसरे दिन हरदोई रजिस्ट्रार कार्यालय में नीरज गुप्ता एक बैग बगल में दबा कर अपने कुछ परिचितों के साथ आ गया. यहां प्रमोद, पूजा उर्फ सोनम, उस की मां सुनीता और मौसी पहले से मौजूद थे. नीरज गुप्ता ने बैग से निकाल कर शादी का लाल जोड़ा, एक जोड़ी कान के कुंडल, नाक की नथ और 2 जोड़ी चांदी की भारी पायजेब पूजा को दीं.

”ये पहन कर मेरी दुलहन बन जाओ

पूजा. ये मेरी पत्नी के सोने के जेवर हैं और प्रमोदजी आप यह 2,750 रुपया खर्च के लिए रख लें. शादी होने के बाद मुंह मीठा करेंगे.’’ कहने के बाद नीरज गुप्ता कागजात तैयार करवाने के लिए रजिस्ट्रार कार्यालय में चला गया. आधा घंटा बाद वह कागज तैयार करवा कर वापस आए तो पूजा, उस का दादा प्रमोद, मम्मी सुनीता और मौसी वहां से गायब हो गए थे. नीरज गुप्ता और उन के परिचितों ने चारों को हर तरफ तलाश किया, लेकिन वे चारों वहां से नदारद हो गए थे.

नीरज गुप्ता को लगा वह ठगा गया है. वह अपना सिर पकड़ कर बैठ गया. 23 जनवरी, 2025 को नीरज गुप्ता ने हरदोई कोतवाली में प्रमोद, पूजा, सुनीता और आशा के खिलाफ जेवर और नकदी ठग लिए जाने की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. इस लुटेरी दुलहन पूजा उर्फ सोनम के खिलाफ पहले भी कोतवाली में धोखाधड़ी करने के मामले दर्ज थे. सीओ (सिटी) अंकित मिश्रा इन सभी की तलाश में जगहजगह छापेमारी कर रहे थे. नीरज गुप्ता से उन्हें यह मालूम हुआ कि पूजा की मम्मी सुनीता कोतवाली के गांव चिंतापुर मजरा काजीपुर में रहती है.

यह बात शादी का रिश्ता तय करने आए प्रमोद ने बातोंबातों में बता दी थी. गांव चिंतापुर मजरा काजीपुर में दबिश दी गई तो सुनीता हाथ आ गई. कोतवाली ला कर उस से सख्ती से पूछा गया तो उस ने पूजा, आशा और प्रमोद के पते पुलिस को बता दिए. पुलिस टीमें अलगअलग भेजी गईं तो सफलता मिल गई. लोनार के नस्यौली डामर से लुटेरी दुलहन पूजा, पिहानी के गांव सिमौर से आशा को गिरफ्तार कर लिया गया. बेहेटी चिरागपुर में प्रमोद नहीं मिला. वह फरार हो गया था.

पूछताछ में यह मालूम हुआ कि प्रमोद पूजा का दादा नहीं है, वह इस लुटेरे गैंग का बिचौलिया है, जो पूजा के लिए शादी के लिए इच्छुक धनी व्यक्तियों से शादी की बात करता था. सुनीता और आशा इस गैंग के लिए काम करती थीं, वह पूजा की मम्मी और मौसी का रोल निभाती थीं.

अनुराधा बनी 25 दूल्हों की दुलहन

पूछताछ में पता चला कि पूजा अब तक हरदोई, सीतापुर, लखीमपुर और शाहजहांपुर के 13 व्यक्तियों की दुलहन बन कर उन से लाखों रुपए की ठगी कर चुकी है. इन तीनों को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया गया. प्रमोद को पकडऩे के लिए हरदोई कोतवाली पुलिस जगहजगह छापेमारी कर रही थी. कथा संकलन तक वह फरार चल रहा था. फरजी शादी और दुलहन बदलने के किस्से से ले कर पिछले दिनों आई फिल्म ‘लापता लेडीज’ की दुलहनों की कहानी तो आप ने अवश्य सुनी होंगी, किंतु उत्तर प्रदेश के महाराजगंज की रहने वाली अनुराधा पासवान द्वारा एकदो नहीं, बल्कि पूरे 25 दूल्हों के अरमानों पर ही पानी फेरने की कहानी जिस ने भी सुनी दांतों तले अंगुली दबा ली.

राजस्थान के मान टाउन में रहने वाले विष्णु शर्मा ने इसी साल मार्च महीने में अपनी शादी के लिए कुछ लोगों से संपर्क किया था. जल्द ही उसे एक व्यक्ति अपने एक रिश्तेदार के साथ मिला. उन्होंने 23 वर्षीय युवती अनुराधा पासवान नाम की एक लड़की की तसवीर दिखाई और जितनी जल्द हो सके विवाह करने का दबाव बनाया. वे  खंडवा निवासी सुनीता और पप्पू मीणा थे. उन्होंने जिस लड़की की तसवीर दिखाई, वह भोपाल की रहने वाली थी. उन्होंने खुद को उस का रिश्तेदार बताया. विष्णु शर्मा को न केवल लड़की पसंद आ गई, बल्कि उन्होंने लड़की वालों की तमाम शर्तें और बातें भी मान लीं. शादी से पहले सवाई माधोपुर में एक एग्रीमेंट बनाया गया और 2 लाख रुपए लिए. चट मंगनी और पट ब्याह की तरह अप्रैल महीने में शादी की तारीख तय हो गई.

शादी कर विष्णु शर्मा बहुत खुश था. पत्नी ने अपने बातव्यवहार से परिवार के सदस्यों का दिल जीत लिया था. सास तारावती भी बहू के व्यवहार से बहुत खुश थीं. घर में खुशी का माहौल था, किंतु 3 दिन बाद वह अचानक लापता हो गई. सुबहसुबह विष्णु शर्मा के परिजनों की नींद खुली, तब उन्होंने खुद को गहरी नींद से जागने की स्थिति में पाया. उन्हें ऐसा महसूस हो रहा था मानो वे नशे में हों. सभी ने सिर में दर्द की शिकायत की. घर में सभी सदस्य थे, लेकिन नवविवाहता बहू नहीं थी. जल्द ही उस ने पाया कि कमरे की अलमारी खुली पड़ी है. उस में रखे कैश और जेवर गायब हैं. वह समझ गया कि उस की पत्नी ही सारा सामान ले कर फरार हो गई है.

वह तुरंत मान टाउन थाने गया. उस ने 3 मई, 2025 को थाने में लूट की रिपोर्ट दर्ज करवाई. विष्णु शर्मा ने बताया कि उस ने यह शादी बैंक से कर्ज ले कर की थी. उस ने मोबाइल भी उधार लिया था, जो अनुराधा ले कर भाग गई थी. पुलिस को इस तरह की घटनाओं की पहले भी शिकायतें मिल चुकी थीं. आरोपियों को पकडऩे के लिए पुलिस ने एक जाल बिछाया. मामले की गंभीरता को देखते हुए राजस्थान पुलिस ने एक विशेष टीम बनाई. टीम ने भोपाल में स्थानीय मुखबिरों की मदद से फरजी शादी गैंग से संपर्क किया. टीम के एक सिपाही को अविवाहित बता कर फरजी शादी कराने की योजना बनाई गई.

इसी दौरान एजेंट की दिखाई गई तसवीरों में फरार अनुराधा की पहचान हो गई. टीम ने भोपाल के कालापीपल स्थित पन्नाखेड़ी गांव में दबिश दे कर अनुराधा को गिरफ्तार कर लिया. अनुराधा ने हाल ही में एक और फरजी शादी की थी और भोपाल में रह रही थी.  विष्णु शर्मा को झांसा देने वाली दुलहन अनुराधा 20 मई, 2025 को सवाई माधोपुर पुलिस की गिरफ्त में आ गई. पूछताछ में उस ने कुबूल कर लिया कि उस ने गिरोह के साथ मिल कर एक नहीं बल्कि महज 7 महीने में 25 फरजी शादियां कीं और वहां से ज्वैलरी, नकदी पर हाथ साफ किया.

पुलिस से पूछताछ में उस ने बताया कि वह 8वीं तक पढ़ी है. उस के 2 बच्चे हैं. 6 साल की बेटी और 3 साल का बेटा. अनुराधा विशाल पासवान से 2017 लव मैरिज करने के बाद पति के साथ घर से अलग रहने लगी थी. वह एक अस्पताल में काम करती थी, लेकिन उस की ससुराल में आए दिन झगड़ा होता रहता था. फिर 2021 में वह ससुराल छोड़ कर फरार हो गई. पति विशाल भी उस के साथ चला गया. अनुराधा और विशाल ने परिवार से नाता तोड़ लिया.

एग डोनर से लुटेरी दुलहन तक का सफर

इसी बीच अनुराधा की एक सहेली ने बताया कि भोपाल में एक डोनर को अच्छी रकम मिलती है. जल्दी अमीर बनने के लालच में अनुराधा गोरखपुर से भोपाल आ गई.  भोपाल में कुछ दिन एग डोनर का काम करते हुए उस की गोलू नाम के युवक से मुलाकात हुई. गोलू एक ऐसे गिरोह का सदस्य था, जो फरजी शादी कराता था. उस ने अनुराधा को बताया कि इस काम में मोटी रकम मिल सकती है. इस गिरोह ने इस के लिए बाकायदा ट्रेनिंग दी और हर शादी के एवज में 50 हजार रुपए देने का वादा किया. गिरोह के सदस्यों ने अनुराधा पासवान को निर्देश दिए कि शादी के 7 दिनों में घर से फरार होना है. उस की जहां भी शादी होती थी, उस के लिए बाकायदा कौंट्रेक्ट होता था. इकरारनामे के जरिए शादी कराई जाती थी.

अनुराधा पासवान को अनाथ बताया जाता था. लोकल एजेंट के जरिए पूरा जाल बिछाया जाता था. इस गिरोह में गोलू, मजबूत सिंह यादव, रोशनी, रघुवीर और सुनीता के नाम सामने आए. ठगी का यह गिरोह दूल्हे के परिवार से 2 से 5 लाख रुपए लेते थे. इस के अलावा 7 दिनों के भीतर जितना कीमती सामान दूल्हे के घर से बटोरा जा सकता, अनुराधा बटोर कर फरार हो जाती थी. अनुराधा पासवान मूलरूप से उत्तर प्रदेश के महराजगंज की निवासी थी. लेकिन फिलहाल वह भोपाल में रह कर ठगी कर रही थी.

वह विवाह कर जब ससुराल जाती थी, तब खाने में नशीला पदार्थ मिला कर लूटपाट को अंजाम देती थी. अनुराधा पासवान दूल्हे और अपने ससुराल वालों के साथ बहुत ही प्यारी बातें करती थी और उन का भरोसा जीतने के लिए परिवार के हर सदस्य के साथ एक खास रिश्ता बना लेती थी. इस के बाद वह अपनी योजना का आखिरी काम कर डालती थी. इसी तरह 20 अप्रैल को सवाई माधोपुर निवासी विष्णु शर्मा ने भी अनुराधा से शादी की थी. शादी हिंदू रीतिरिवाजों के अनुसार दोस्तों और परिवार की मौजूदगी में हुई थी. शादी दलाल पप्पू मीणा के जरिए तय हुई थी, जिस के लिए विष्णु ने उसे 2 लाख रुपए भी दिए थे.

शादी के 2 हफ्ते के भीतर ही अनुराधा 1.25 लाख रुपए के जेवर, 30 हजार रुपए नकद और 30 हजार रुपए का मोबाइल ले कर फरार हो गई थी. UP Crime News

—कथा में राकेश जैन काल्पनिक नाम है.

 

 

UP Crime News : मम्मी और भाई पर टूटा प्यार का कहर

UP Crime News : रागिनी पड़ोस में ही रहने वाले सत्यजीत दिवाकर को दिल दे बैठी थी. फेमिली वालों की लाख पाबंदियों के बावजूद प्रेमी युगल अपने मिलने का मौका निकाल ही लेते थे. इन का प्यार एक दिन ऐसा कहर बन कर टूटा कि सत्यजीत के भाई सर्वजीत और मम्मी संगीता देवी की दिनदहाड़े हत्या कर दी गई. किस ने की इन दोनों की हत्या? पढ़ें, लव क्राइम की यह स्टोरी.

10 मार्च, 2025 को रागिनी अपने घर पर अकेली थी. तभी उस ने अपने प्रेमी सत्यजीत को फोन लगा दिया. रागिनी ने फोन लगाते ही उसे इशारा कर दिया था कि वह इस वक्त घर पर अकेली है. अगर तुम्हें आना है तो आसपास देख कर ही आना. आते वक्त तुम पर किसी की नजर न पड़े. उस वक्त सत्यजीत अपने घर पर ही मौजूद था. रागिनी का फोन आते ही वह घर से निकला और चारों और देखते हुए वह रागिनी के घर में घुस गया.

सत्यजीत को घर आया देख रागिनी को डर तो लग रहा था, लेकिन वह उस के प्यार में वह इस कदर पागल थी कि सत्यजीत के आते ही उस की बांहों में समा गई, ”यार, तुम्हारे बिना तो रहा नहीं जाता. एकएक पल तुम्हारी याद में कांटों सा अहसास कराते हैं.’’

सत्यजीत का भी यही हाल था. वह भी उस की चाहत में अपना सब कामधंधा छोड़ कर पागल सा हुआ जा रहा था. उस दिन एकांत के क्षणों में वह रागिनी के पास पहुंचा तो उस ने पल भर में अपना सारा प्यार उस पर उड़ेल दिया. वह दुनियादारी को भूल कर रागिनी को अपनी बांहों मे समेटे पागलों की तरह खड़ा रहा. उसी समय रागिनी की निगाह घर के दरवाजे पर पड़ी. उस की मम्मी शांति अचानक घर की ओर आती दिखाई दी. अपनी मम्मी को सामने से आते देख रागिनी का सारा प्यार काफूर हो गया. वह सत्यजीत की बांहों से निकल कर कमरे में जा पहुंची. लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि वह सत्यजीत के आने का क्या बहाना बनाएगी.

यही सोचतेसोचते रागिनी के दिमाग के तार झनझनाने लगे थे. मौका पाते ही सत्यजीत वहां से खिसक लिया था, लेकिन हड़बड़ाहट में वह अपनी चप्पलें नहीं पहन पाया था, जो रागिनी के कमरे के सामने ही रह गई थीं. सत्यजीत उन चप्पलों को ले कर परेशान था. शांति देवी आई और उस ने उन चप्पलों पर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे ही रागिनी की नजर उन चप्पलों पर पड़ी तो वह उन्हें छिपाने की फिराक में लग गई. वह उन को अभी छिपा भी नहीं पाई थी, तभी उस का भाई श्रवण घर आ गया. उस की जैसे ही नजर चप्पलों पर पड़ी तो वह देखते ही उन को पहचान गया. उस ने कई बार सत्यजीत को इसे पहने देखा था.

उस की चप्पलें अपने घर पर देखते ही उस का दिमाग घूम गया. उस के बाद उस ने उन चप्पलोंं के बारे में अपनी बहन रागिनी और मम्मी शांति से पूछा तो दोनों ने कह दिया कि वह चप्पलें किस की हैं, उन्हें कोई पता नहीं. श्रवण को पता था कि जब वह घर से बाहर गया था, तब वह चप्पलें वहां पर नहीं थीं, लेकिन उस के घर से जाते ही वह चप्पलें वहां पर कैसे आईं. तभी उस की मम्मी ने भी बताया कि वह भी काफी समय से खेतों पर गई हुई थी.

यह सब जानकारी लेने के बाद श्रवण ने वह चप्पलें उठा कर रख दीं. फिर वह गांव में निकल गया. तभी उसे सामने से सत्यजीत आता दिखाई दिया. उस ने उस के पैरों की तरफ देखा तो उस वक्त उस ने दूसरी चप्पलें पहन रखी थीं. उसे दूसरी चप्पलें पहने देख उस के दिमाग में पूरा शक पैदा हो गया कि उस की गैरमौजूदगी में वह जरूर उस के घर पर गया था. इस से पहले भी कई बार उसे सत्यजीत पर शक पैदा हुआ था कि उस के और उस की बहन रागिनी के बीच जरूर कुछ चक्कर चल रहा है. यह सोचते ही उस ने वह बात अपने दिल में ही रख ली थी.

अगली सुबह सत्यजीत अपने बड़े भाई सरबजीत को साथ ले कर अपनी चप्पलें लेने रागिनी के घर पहुंचा. उस वक्त घर पर रागिनी और उस की मम्मी शांति ही थी. सत्यजीत ने अपनी चप्पलें मांगीं तो उस ने देने से मना कर दिया. तभी घर पर श्रवण भी आ गया. श्रवण के घर आते ही बात बिगड़ गई. श्रवण ने सत्यजीत से वहां पर चप्पलें आने का कारण पूछा तो उस ने कोई जबाव नहीं दिया. उस के बाद दोनों के बीच कहासुनी शुरू हो गई. बातों ही बातों में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों में मारपीट की नौबत आ गई.

उस वक्त सत्यजीत और सरबजीत के सामने श्रवण की एक न चली. आपस में लड़ाईझगड़ा होने के बाद यह बात पुलिस तक जा पहुंची. लेकिन पुलिस ने इस बात को हलके में लिया. फिर दोनों पक्षों को समझाबुझा कर वापस भेज दिया. श्रवण और उस की मम्मी पुलिस की इस काररवाई से संतुष्ट नहीं थे. यह बात शांति देवी ने फोन पर अपने बड़े बेटे सनी को भी बता दी थी. सनी ने तभी मन में ठान लिया था कि वह किसी भी हाल में सत्यजीत को सबक सिखा कर ही रहेगा.

उस के मन में एक आत्मग्लानि पैदा हो गई थी. गांव में उस की बहन के बारे में तरहतरह की चर्चाएं हो रही थीं, जिसे वह बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. उस के मन में बदले की भावना बलवती हुई तो वह घर से कुल्हाड़ी ले कर निकल पड़ा. 10 मार्च, 2025 को रात के कोई 9 बजे का वक्त था. गांव के अधिकांश लोग अपनेअपने घरों में थे. सनी कुल्हाड़ी ले कर सीधा सत्यजीत के घर पहुंचा. वह सत्यजीत को भद्ïदीभद्ïदी गालियां देते हुए उस के घर का दरवाजा पीटने लगा. सनी को घर से निकलते देख उस की मम्मी शांति और उस का छोटा भाई श्रवण कुमार भी गंडासा ले कर उस के पीछे ही सत्यजीत के घर पर पहुंच गए.

जैसे ही सत्यजीत के भाई सरबजीत ने दरवाजा खोला, तीनों ने उस पर हमला बोल दिया. सरबजीत की मम्मी संगीता देवी उस के बचाव में आईं तो तीनों ने उन पर भी हमला बोल दिया. जिस के कारण दोनों बुरी तरह से घायल हो गए. दोनों को लहूलुहान करने के बाद तीनों सत्यजीत को तलाशने लगे, लेकिन तभी बाहर से गांव वालों का दबाव बना तो तीनों वहां से भाग गए. इस घटना की सूचना ग्राम प्रधान समीर को दी गई. ग्राम प्रधान समीर ने इस मामले की जानकारी थाना चरवा पुलिस को दी. सूचना पाते ही एसएचओ जगदीश सिंह पुलिस बल के साथ गांव काजू पहुंचे.

मौके पर पहुंचते ही पुलिस ने घायल सरबजीत उस की मम्मी संगीता को तत्काल एंबुलेंस से जिला अस्पताल में पहुंचाया. जहां पर सरबजीत को देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था. जबकि उस की मम्मी संगीता देवी ने उपचार के दौरान 2 घंटे बाद दम तोड़ दिया था. मृतका संगीता के पति संगम लाल दिवाकर मुंबई में रह कर टैक्सी चलाते थे. इस घटना की सूचना मिलने पर वह मंगलवार की सुबह फ्लाइट से प्रयागराज पहुंचे. अपने घर में एक साथ 2 मौतें होते देख वह फफकफफक कर रोने लगे. घर पर महिलाएं भी बिलखबिलख कर रो रही थीं.

डाक्टरों द्वारा दोनों को मृत घोषित करते ही पुलिस ने अपनी काररवाई करते हुए दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस मामले में पुलिस ने काजू गांव पहुंचते ही विस्तार से जानकारी हासिल की. इस मामले में मृतका संगीता के छोटे बेटे सत्यजीत की तरफ से थाना चरवा में बीएनएस की धारा 3(5), 333, 352, 109, 103(1) के तहत केस दर्ज कराया गया था. इस घटना की जानकारी मिलते ही एएसपी राजेश कुमार सिंह व एसपी बृजेश कुमार श्रीवास्तव भी गांव काजू पहुंचे.

जहां पर पहुंचते ही पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त परिवार से घटनाक्रम की जानकारी ली. फिर गांव की स्थिति को देखते हुए गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया था. इस मामले में आरोपियों की धरपकड़ के लिए एएसपी बृजेश कुमार सिंह ने सीओ राजेश कुमार के नेतृत्व में 4 पुलिस टीमों का गठन किया था. इस मामले में पुलिस की तरफ से काफी लापरवाही सामने आई थी. पीडि़त परिवार की शिकायत पर एएसपी बृजेश कुमार सिंह ने लापरवाही बरतने के आरोप में एसएचओ जगदीश कुमार, चौकी प्रभारी व बीट के एक सिपाही को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया था.

इस मामले में इस हत्याकांड के एक आरोपी श्रवण कुमार को पुलिस ने रात में ही अपनी हिरासत में ले लिया था, जिस से कड़ी पूछताछ की गई. इस हत्याकांड का मुख्य अभियुक्त सनी घटना को अंजाम देने के बाद ही फरार हो गया था. पुलिस को शक था कि वह ट्रेन से कहीं बाहर भी भाग सकता है. उसी को देखते हुए पुलिस ने प्रयागराज से पटना तक रास्ते में पडऩे वाले 13 रेलवे स्टेशनों पर उस की फोटो भिजवाई थी, ताकि वह आसानी से पकड़ में आ सके. सनी भी इतना शातिर था कि उस ने पुलिस को चकमा देने के लिए सफर के दौरान 3 ट्रेनें बदलीं. फिर भी वह पुलिस की नजरों से बच नहीं पाया.

पुलिस ने उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगा रखा था. तभी उस की लोकेशन वाराणसी देवरिया के भटनी रेलवे स्टेशन की मिली. वहां मौजूद आरपीएफ इंसपेक्टर प्रदीप पांडेय, व जीआरपी (भटनी) के एसएचओ दिनेश सिंह ने उस के फोटो के आधार पर उसे गिरफ्तार कर लिया. सनी को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उस से पूछताछ की. पुलिस पूछताछ के दौरान आरोपी सनी ने बताया कि उस ने कुल्हाड़ी से मांबेटों पर हमला किया था. दोनों को कुल्हाड़ी से घायल कर उस ने वह कुल्हाड़ी काजू गांव के एक खंडहर में छिपा दी थी. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस कुल्हाड़ी बरामद करने के लिए उसे उस के गांव काजू लाई.

उसी दौरान सनी ने वहां पर भी पुलिस को चकमा दे कर भागने की कोशिश की. सनी ने एक खंडहर में छिपाए झोले से कुल्हाड़ी निकालने के बहाने तमंचा निकाल कर पुलिस पर गोली चला दी. उस के बाद पुलिस ने जवाबी काररवाई करते हुए गोली चलाई, जो उस के बाएं पैर में लग गई. जिस से उस के पैर में काफी घाव हो गया. फिर पुलिस उसे इलाज के लिए मैडिकल कालेज ले गई, जहां पर उस का इलाज चल रहा था.  आरोपी सनी, श्रवण व संगमलाल के फेमिली वालों से मिली जानकारी के बाद इस घटना की जो सत्यता उभर कर सामने आई, उस के पीछे अवैध संबंधों से जुड़ी एक कहानी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला कौशांबी थाना चायल के अंतर्गत एक गांव पड़ता है काजू. इसी गांव में संगम लाल दिवाकर का परिवार रहता था. संगम लाल का छोटा परिवार था. संगम लाल मुंबई में टैक्सी ड्राइवर थे. उन का सब से बड़ा बेटा सरबजीत उर्फ कल्लू अपने पापा के साथ मुंबई में ही रह कर फरनीचर का काम करता था. उन की पत्नी संगीता दिवाकर अपने 2 बच्चों 16 वर्षीय आशीष उर्फ सत्यजीत और 10 साल की बेटी के साथ गांव में रहती थी. संगम लाल का गांव में आनाजाना बहुत ही कम हो पाता था. जबकि सरबजीत दिवाकर महीने 2 महीने में गांव का चक्कर लगाता रहता था.

सत्यजीत गांव में ही रह कर मेहनत- मजदूरी करता था. सरबजीत ने कई बार उसे अपने साथ मुंबई ले जाने का प्लान बनाया, लेकिन गांव में बहन और मम्मी के रहते वह उसे अपने साथ नहीं ले जाना चाहता था. सत्यजीत दिवाकर गांव में यूं ही खाली घूमता रहता था. संगम लाल के घर के पास ही था संतोष सरोज का घर. संतोष सरोज के पास गांव में थोड़ी जुतासे की जमीन थी. उन का परिवार भी छोटा ही था. उन का बड़ा बेटा सनी सरोज उन के साथ ही पटना में रह कर काम करता था. जबकि छोटा बेटा श्रवण सरोज गांव में ही अपनी मम्मी और बहन रागिनी के साथ रहता था.

श्रवण सुबह ही अपना खाना ले कर अपने काम पर चला जाता था. उस के बाद उस की मम्मी शांति देवी अपने खेतों पर काम करने चली जाती थी. तब रागिनी ही घर पर अकेली रह जाती थी. एक दिन की बात है, सत्यजीत किसी काम से संतोष सरोज के घर के सामने से निकल रहा था. उस वक्त रागिनी अपने घर के दरवाजे पर ही खड़ी थी. उसी वक्त सत्यजीत की नजर उस पर पड़ी. रागिनी को देखते ही उसे लगा कि वह काफी देर से उसे कनखियों से ताक रही थी. उस के देखने का अंदाज कुछ ऐसा था कि सत्यजीत उस के बारे में सोचने पर मजबूर हो गया.

उस के बाद अपना काम करने के बाद वह अपने घर भी पहुंच गया. लेकिन उस के दिमाग में बारबार एक ही बात चल रही थी कि रागिनी उसे इस तरह से क्यों ताक रही थी. सत्यजीत इतना भोला भी नहीं था कि वह लड़कियों की नजरों को पहचानने में बिलकुल ही अनाड़ी हो. उस की चाहत भरी नजरें देख सत्यजीत उसी शाम फिर से उस के घर के सामने से निकला तो वह उसे दिखाई नहीं दी. लेकिन वापस लौटते समय घर से निकला, रागिनी अपने घर के बाहर आ खड़ी हुई थी.

उसे घर से बाहर आते देख वह समझ गया कि उस के दिल में उस के प्रति जरूर कुछ चल रहा है. उस के बाद तो सत्यजीत उस के घर के सामने से निकलने का कोई न कोई बहाना देखने लगा था. उसी दौरान एक दिन दोनों की नजरें आमनेसामने मिलीं तो सत्यजीत दिवाकर को देखते ही रागिनी के चेहरे पर मुसकराहट उभर आई. उसे देखते ही सत्यजीत के दिल में उस के प्रति चाहत जाग उठी. फिर वह उसे पाने के लिए बेचैन हो उठा.

दोनों के दिलों में प्यार की चिंगारी भड़कते ही दोनों एकदूसरे के दीवाने हो चुके थे. दोनों ही जानते थे कि जिस राह पर वह चलना चाह रहे हैं, वह उन की मंजिल नहीं हो सकती. फिर भी दोनों ने एकदूसरे की बांह थाम लीं. दोनों के बीच जल्दी ही प्रेम प्रसंग की शुरुआत हो गई. इस के बाद दोनों अपने फेमिली वालों से चोरीछिपे मिलनेजुलने लगे थे. समय गुजरता गया और दोनों के बीच प्यार गहराता गया. शुरूशुरू में दोनों ने काफी कोशिश की कि उन के प्यार की भनक किसी को न लगे. लेकिन एक दिन ऐसा आया कि उन के प्यार की खबर उन के फेमिली वालों से पहले गांव वालों के सामने उजागर हो गई. फिर गांव में उन के प्यार के चर्चे होने लगे तो उन के फेमिली वालों को भी उन के प्यार की भनक लगने में देरी नहीं हुई.

गांव में यह बात सब से पहले रागिनी की मम्मी शांति देवी के सामने आई. इस बात की जानकारी होते ही उस ने रागिनी को प्यार से समझाया. मम्मी की बात सुनते ही रागिनी ने पूरी तरह से चुप्पी साध ली. उस ने अपनी मम्मी के सामने सफाई देते हुए बताया कि गांव में लोग उसे नाहक बदनाम करने में लगे हुए हैं. सत्यजीत और उस के बीच ऐसा कुछ भी नहीं चल रहा. यह बात सत्यजीत के सामने भी आई तो उस ने कुछ दिन के लिए उस के घर के सामने से निकलना ही बंद कर दिया. उस वक्त बात रफादफा हो गई. लेकिन कुछ ही दिनों बाद सत्यजीत फिर से उस की गलियों के चक्कर काटने लगा था.

रागिनी के बड़े भाई सनी सरोज का पटना से गांव आना बहुत ही कम होता था. कुछ समय पहले सनी अपने गांव आया तो उसे पता चला कि गांव में उस की बहन और सत्यजीत को ले कर काफी चर्चाएं हो रही हैं. इस बात को सुन कर सनी का दिमाग ही फिर गया था. उस ने कई बार सत्यजीत को प्यार से समझाया, ”सत्यजीत, यह बात ठीक नहीं है. तेरी वजह से हम लोगों को गांव में काफी जलालत झेलनी पड़ रही है. घर में जैसी मेरी बहन है, वैसे ही तेरे घर में भी तेरी बहन है. कल को तेरी बहन के साथ भी ऐसे ही होने लगे तो तुझे कैसा लगेगा. इसीलिए तेरी भलाई इसी में है कि मेरी बहन की तरफ आंख उठा कर भी मत देखना.’’

सनी के धमकी भरे शब्द सुन सत्यजीत उस वक्त तो वहां से चुपचाप खिसक लिया. उस के बाद वह कई दिनों तक घर से बाहर भी नहीं निकला. फिर सनी ने अपनी बहन को भी काफी डांटाफटकारा.  कुछ दिन गांव में रहने के बाद सनी फिर से पटना चला गया था. उस के जाते ही फिर से दोनों का मिलनाजुलना शुरू हो गया था. रागिनी ने तय कर लिया था कि वह किसी भी सूरत में प्रेमी सत्यजीत को नहीं छोड़ेगी. हालांकि रागिनी अपने बड़े भाई सनी को ठीक प्रकार से जानती थी कि वह एक दबंग प्रवृत्ति का है. वह पहले ही एक मर्डर कर चुका था.

साल 2023 की बात है. प्रयागराज एयरपोर्ट कोतवाली अंतर्गत कादिलपुर निवासी सुरजन यादव प्राइवेट लाइनमैन था. सुरजन यादव एक प्राइवेट गेस्टहाउस में लाइट सही करने गया हुआ था. उसी दौरान सुरजन वहां से अचानक गायब हो गया था. उस के बाद सुरजन के चचेरे भाई राजभान यादव ने 24 फरवरी, 2023 को पिपरी कोतवाली में सुरजन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. 18 मार्च, 2023 को चरवा कोतवाली के हौसी गांव स्थित एक कुएं में सुरजन का शव मिला था.

उस केस में जांचपड़ताल के दौरान पता चला था कि सनी ने ही सुरजन के भतीजे अजय यादव के साथ मिल कर उस की हत्या की थी. सुरजन की हत्या के आरोप में सनी को जेल जाना पड़ा था. उस के बाद 7 महीने बाद वह जमानत जेल से बाहर आया. फिर वह अपने पिता संतोष सरोज के साथ काम करने चला गया था. इस घटना से लगभग एक महीने पहले सरबजीत कुंभ स्नान करने के लिए घर आया था. सत्यजीत दिवाकर के प्रेम प्रसंग वाली बात उस के सामने भी आई थी. इस बात की जानकारी मिलने के बाद सरबजीत ने सत्यजीत को भी समझाया था.

लेकिन 10 मार्च को जैसे ही सत्यजीत के मोबाइल पर रागिनी का फोन आया तो वह अपने आप को रोक नहीं सका. रागिनी के कहने पर वह उस के घर उस से मिलने चला गया था. तभी सनी की मम्मी घर वापस आ गई, जिस के कारण वह हड़बड़ाहट में अपनी चप्पलें वहीं पर छोड़ आया था. उन्हीं चप्पलों से उपजा विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पंचायत तक पहुंच गया था. तब ग्राम प्रधान ने दोनों पक्षों को समझाबुझा कर घर भेज दिया था, लेकिन शांति देवी ग्राम प्रधान के फैसले से नाखुश थी. उस के बाद शांति देवी ने थाने में सत्यजीत के खिलाफ रागिनी के साथ छेड़छाड़ करने की लिखित तहरीर दे दी थी. इतना ही नहीं, शांति देवी ने बड़े बेटे सनी सरोज को फोन पर जारी जानकारी दे दी थी, जिसे सुन कर सनी गुस्से में पटना से रात में ही चल दिया था.

देर रात वह अपने घर पहुंचा. घर पहुंचते ही सनी ने जैसे ही सारी कहानी सुनी तो वह आगबबूला हो गया. इस के बाद उस ने अपने भाई श्रवण और मम्मी शांति के साथ संगम लाल के घर धावा बोल दिया था. पुलिस ने इस केस के आरोपी श्रवण और सनी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था. जबकि सनी की मम्मी शांति देवी कथा लिखने तक फरार थी. पुलिस उस की तलाश में जुटी थी. इस कहानी का दुखद अंत यह रहा कि सत्यजीत के प्रेम प्रसंग का खामियाजा उसे नहीं, बल्कि उस की मम्मी व भाई को भुगतना पड़ा.

सत्यजीत के प्यार की खातिर ही संगम लाल दिवाकर का परिवार टूट गया. उस के घर में एक साथ 2 मौतें होने के कारण दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था.

—कथा में रागिनी काल्पनिक नाम है

 

 

Crime Story : तीसरे पति की चाहत में दूसरे पति का मर्डर

Crime Story : पति की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद 3 बच्चों की मम्मी गीता यादव ने चरन सिंह से दूसरी शादी कर ली थी. इसी दौरान गीता की लाइफ में जबर सिंह आ गया. उस के आने से घर में ऐसा जलजला आया कि…

गीता यादव फितरती औरत थी. उसे बच्चों से तो हमदर्दी थी, लेकिन पति चरन सिंह फूटी आंख भी नहीं सुहाता था. पति रूपी बाधा को दूर करने के लिए एक रोज गीता ने प्रेमी जबर सिंह को उकसाया, ”जबर, हम कब तक परदेस में पड़े रहेंगे. कब तक हम मजदूरीधतूरी करते रहेंगे. तुम्हें मेरे साथ जीवन बिताना है तो कुछ करना होगा?’’

”क्या करना होगा?’’ जबर सिंह ने पूछा.

”तुम्हें मेरे सिंदूर को मिटाना होगा, ताकि मैं तुम्हारे हाथ का सिंदूर अपनी मांग में सजा सकूं. अभी तो मैं तुम्हारी रखैल ही हूं.’’

”चाहता तो मैं भी हूं, लेकिन पकड़े गए तो..?’’

”कुछ नहीं होगा. तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी. ऐसा प्लान बनाऊंगी कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

कुछ देर चुप्पी साधने के बाद वह फिर बोली, ”चरन सिंह जीवित नहीं रहेगा तो उस के घर तथा जमीनजायदाद पर भी उसी का कब्जा हो जाएगा. हम दोनों उसी घर में बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहेंगे.’’

”ठीक है. मैं तैयार हूं.’’ जबर सिंह ने सहमति जताई.

उस के बाद गीता और जबर सिंह ने कान से कान जोड़ कर चरन सिंह की हत्या का प्लान बनाया. तय हुआ कि इस बार जब गांव जाएंगे, तब योजना के तहत चरन सिंह को ठिकाने लगा देंगे. 14 नवंबर, 2024 को इटावा कोर्ट में गीता द्वारा पति के खिलाफ दर्ज कराए गए मारपीट के मुकदमे की तारीख थी. इसलिए गीता प्रेमी जबर सिंह के साथ सोनीपत से गांव रम्पुरा लौहरई आई. कोर्ट में तारीख पर गई, फिर शाम को वापस घर आ गई. उस ने घर में खाना पकाया और बच्चों को खिलाया. पति चरन सिंह से भी हमदर्दी भरी बातें कीं. चरन सिंह को लगा कि गीता को अपनी भूल का अहसास हो गया है. अब वह घर में बच्चों के साथ ही रहेगी, लेकिन यह उस की भूल थी.

गांव के बाहर प्राइमरी स्कूल था. यहां कई कमरे ऐसे थे, जिस में दरवाजे नहीं लगे थे. ऐसे ही एक कमरे में चरन सिंह का कब्जा था. यहां वह आलू का बीज रखे था, जिसे वह 2 दिन बाद खेत में लगाने वाला था. बीज की रखवाली के लिए वह रात में स्कूल वाले कमरे में सोता था. गीता ने इस की जानकारी पहले ही कर ली थी. 15 नवंबर, 2024 की शाम गीता पति चरन सिंह के साथ स्कूल वाले कमरे में सोने के लिए गई. इस की जानकारी गीता ने मोबाइल फोन के जरिए प्रेमी जबर सिंह को दे दी. योजना के तहत गीता चरन सिंह से मीठीमीठी बातें करती रही. चरन सिंह भी उस से बतियाता रहा. फिर वह सो गया. लेकिन गीता की आंखों में नींद नहीं थी. वह तो जबर सिंह के आने का इंतजार कर रही थी.

गीता क्यों बनी पति का काल

आधी रात को जब गांव के लोग गहरी नींद में सो गए, तब जबर सिंह लोहे की रौड ले कर घर से निकला. रौड का इंतजाम जबर सिंह ने गीता का फोन आने के बाद कर लिया था. जबर सिंह स्कूल पहुंचा तो गीता ने उस के कान में कुछ फुसफुसाया. इस के बाद गीता ने चरन सिंह के पैर दबोच लिए और जबर सिंह ने उस के सिर पर रौड से कई प्रहार किए. चरन सिंह की हल्की चीख निकली, फिर शांत हो गया. हत्या करने के बाद दोनों चरन सिंह के शव को स्कूल की टूटी बाउंड्री वाल के पास ले गए, फिर शव पर घासफूस डाल कर जलाने का प्रयास किया. इस के बाद जबर सिंह फरार हो गया और गीता अपने घर आ गई.

16 नवंबर, 2024 की सुबह पढऩे वाले बच्चे स्कूल पहुंचे तो उन्होंने बाउंड्री वाल के पास अधजला शव देखा. बच्चों ने शोर मचाया तो गांव वाले आ गए. ग्राम प्रधान सुधर सिंह ने थाना बसरेहर पुलिस को सूचना दी तो एसएचओ समित चौधरी पुलिस बल के साथ घटनास्थल आ गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को घटना से अवगत कराया तो एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा डीएसपी पुहुप सिंह मौकाएवारदात पर आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

अब तक ग्रामीणों ने शव की पहचान कर ली थी. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मृतक का नाम चरन सिंह है. वह रम्पुरा गांव का ही रहने वाला था. शव के पास मृतक की पत्नी गीता छाती पीटपीट कर रो रही थी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधाया, फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक चरन सिंह की उम्र 48 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर में प्रहार कर की गई थी. पहचान मिटाने के लिए शव को जलाने का प्रयास किया गया था. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर जांच की और सबूत जुटाए. निरीक्षण के बाद पुलिस ने चरन सिंह के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद मृतक की पत्नी गीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति चरन सिंह की हत्या उस के देवर मुन्नालाल ने की है. वह उस की जमीन हड़पना चाहता था. यह पता चलते ही पुलिस ने मुन्नालाल को हिरासत में ले लिया. अधिकारियों ने जब मुन्नालाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गीता झूठ बोल रही है. वह उसे फंसाना चाहती है. रोनेधोने का नाटक कर वह पुलिस को गुमराह करना चाहती है. जबकि हकीकत यह है कि गीता ने ही अपने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर भाई की हत्या की है.

उस का भाई चरन सिंह नाजायज रिश्तों का विरोध करता था. गीता अपने पति व 3 बच्चों को छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई थी. वह सोनीपत में उस के साथ रहने लगी थी. अवैध रिश्तों की बात पता चली तो पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ समित चौधरी ने गीता को हिरासत में ले लिया. गीता की 13 वर्षीया बेटी सान्या ने भी पुलिस को बताया कि उस के पिता की हत्या मम्मी गीता ने जबर सिंह के साथ मिल कर की है.

एसएचओ समित चौधरी ने थाने पर जब गीता से चरन सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई और त्रियाचरित्र दिखाने लगी, लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गई और उस ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया. दूसरे रोज पुलिस ने नाटकीय ढंग से जबर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया और हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड भी बरामद करा दी, जिसे उस ने स्कूल के पास झाडिय़ों में छिपा दिया था.

हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की सूचना एसएचओ समित चौधरी ने पुलिस अधिकारियों को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थित सभागार में प्रैसवार्ता की और हत्या का खुलासा किया. गीता यादव और उस के प्रेमी जबर सिंह से पूछताछ के बाद चरन सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियद पर रचीबसी निकली—

गीता 3 साल में हो गई विधवा

गीता के पिता रूपसिंह यादव औरैया जनपद के दिबियापुर कस्बे के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी गोमती के अलावा एक बेटा भागीरथ तथा 2 बेटियां गीता व अनीता थी. रूपसिंह बढ़ईगीरी का काम करता था. इस काम में बेटा भागीरथ भी उस की मदद करता था. रूपसिंह की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. बड़ी मुश्किल से परिवार चल पाता था.

भाईबहनों में सब से बड़ी गीता यादव थी. वह घर में सब की लाडली थी. इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. उस का रूपरंग तो साधारण था, लेकिन नैननक्श आकर्षक थे. गीता ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, फिर भी ऊंचे ख्वाब देखा करती थी. जब वह बनठन कर अपनी जवानी के जलवे बिखेरती हुई गलियों से गुजरती तो मनचलों के दिलों पर बिजली सी गिरती थी. गीता यादव आजादखयाल की जरूर थी, लेकिन मनचलों को अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह बस यही कल्पना करती कि उस का पति भी उसी की तरह हैंडसम और आजादखयाल का होगा.

गीता यौवन के भार से लद गई तो रूपसिंह को उस की शादी की चिंता हुई. रूपसिंह ने लड़का देखना शुरू किया तो उसे संजय के बारे में पता चला. संजय के पिता रामसिंह कानपुर के घाटमपुर कस्बे के रहने वाले थे. उन के 2 बेटे अजय व संजय थे. अजय का विवाह हो चुका था. संजय कुंवारा था. वह आटो चलाता था. संजय देखने में आकर्षक व शरीर से हृष्टपुष्ट था. कमाता भी था. अत: रूपसिंह ने संजय को अपनी बेटी गीता के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद रूपसिंह ने गीता का विवाह संजय के साथ कर दिया.

शादी के बाद गीता व संजय ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. सुखमय जीवन व्यतीत करते 5 साल कब बीत गए, दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला. इन 5 सालों में गीता ने एक बेटी को जन्म दिया. गीता ने उस का नाम सान्या रखा. नन्ही परी सान्या से गीता व संजय दोनों ही बेहद प्यार करते थे. उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं रखते थे. संजय घाटमपुर-कानपुर मार्ग पर आटो चलाता था. वह सुबह 8 बजे घर से निकलता, फिर रात 8 बजे तक ही घर वापस आता था. दोपहर का खाना वह होटल पर खाता था, जबकि रात का खाना पत्नी व बेटी के साथ ही खाता था. गीता उस के खानपान का विशेष ध्यान रखती थी.

जीवन सुखमय बीत रहा था. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था, जिस ने गीता की जिंदगी में अंधेरा कर दिया. उस दिन संजय सुबह आटो ले कर घर से निकला. दोपहर बाद गीता को खबर मिली कि संजय का एक्सीडेंट हो गया. उस के आटो में किसी लोडर चालक ने टक्कर मार दी. वह सीएचसी घाटमपुर में भरती है. गीता अपने ससुर रामसिंह के साथ अस्पताल पहुंची. लेकिन तब तक डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. बेटी सान्या अभी 3 साल की ही थी कि उस के सिर से पिता का साया उठ गया. गीता ने कुछ महीने तक तो आंसू बहाए, उस के बाद बेटी के भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सासससुर ने कुछ दिनों तक तो हमदर्दी जताई, उस के बाद उन का भी रवैया बदल गया.

विधवा बहू व उस की बेटी उन्हें बोझ लगने लगी थी. वह उसे ताने भी मारने लगे थे. सास कहती, ‘बहू उस के बेटे को खा गई.’ ससुर कहता, ‘अभागिन बहू ने उस के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया.’ गीता कब तक ससुराल वालों के ताने सहती. एक रोज उस ने बेटी को साथ लिया और मायके आ गई. मम्मीपापा ने उस के दर्द को समझा और उसे घर में शरण दे दी. गीता उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, अत: उस ने काम की तलाश शुरू कर दी. काफी प्रयास के बाद उसे बाल भारती स्कूल में आया की नौकरी मिल गई. नौकरी से वह अपना तथा बेटी का भरणपोषण करने लगी.

गीता भरी जवानी में विधवा हो गई थी. पेरेंट्स को चिंता सता रही थी कि वह पूरा जीवन कैसे बिताएगी. कोई न कोई सहारा उसे जरूर चाहिए. अत: रूपसिंह उस का घर बसाने के प्रयास में जुट गए. एक रोज एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें चरन सिंह के बारे में पता चला. चरन सिंह इटावा जिले के बसरेहर थाना के गांव रम्पुरा लौहरई का रहने वाला था. बड़ा भाई मुन्नालाल अपने परिवार के साथ अलग रहता था. दोनों भाइयों के बीच घर जमीन का बंटवारा हो चुका था. चरनसिंह किसान था. मनरेगा में भी मजदूरी कर लेता था. चरन सिंह उम्रदराज जरूर था, फिर भी रूपसिंह ने उसे पसंद कर लिया था. कारण उन की बेटी गीता भी विधवा और एक बेटी की मां थी.

दूसरे पति से खुश क्यों नहीं थी गीता

गीता और चरन सिंह का कोई मेल नहीं था. गीता 30 साल की थी तो चरन सिंह 40 साल का था. गीता दिखने में आकर्षक व सुंदर थी, जबकि चरन सिंह सांवले रंग का इकहरे बदन का था. इस बेमेल विवाह में गीता का विधवा होना तथा उस के पिता की गरीबी, चरन सिंह के लिए वरदान बन गई. मजबूरी में गीता का विवाह चरन सिंह से हो गया. मन मसोस कर गीता ने भी इस बेमेल संबंध को स्वीकार कर लिया. गीता जैसी जवान और सुंदर पत्नी पा कर अधेड़ उम्र का चरन सिंह अपने भाग्य पर इतरा उठा. गीता के घर संभालते ही चरन सिंह ने उसे घर की चाबी सौंप दी. वह गीता से तो प्यार करता ही था, उस की बेटी को भी भरपूर प्यार देता था. सान्या भी चरन सिंह को पापा कह कर बुलाती थी. अब चरन सिंह जो कमाता था, वह गीता के हाथ पर रखता था. दूसरे पति के रूप में गीता को चरन सिंह का सहारा मिल गया था. अत: उस के दिन सुख से बीतने लगे थे.

समय बीतता गया. गीता के एक बेटी पहले से थी. दूसरे पति चरन सिंह से उस ने एक के बाद एक 2 बेटों अमन व करन को जन्म दिया. इस तरह गीता अब 3 बच्चों की मां बन चुकी थी. गीता यादव अपने तीनों बच्चों से बेहद प्यार करती थी तथा उन के पालनपोषण में कोई कोताही नहीं बरतती थी. चरन सिंह भी अपने बेटों जैसा ही सान्या को भी प्यार देता था और उस की हर जिद पूरी करता था. गीता 3 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस के आकर्षण में कमी नहीं आई थी. वह अब भी हर रात पति का साथ चाहती थी. जबकि 2 बेटों के जन्म के बाद चरन सिंह की कामेच्छा कम हो गई थी.

5 साल भी नहीं बीते थे कि गीता की रातें काली होनी शुरू हो गईं. अब उस की समझ में आया कि चरन सिंह के हाथों से मंगलसूत्र पहनना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. ऐसी भूल, जिसे सुधारा भी नहीं जा सकता था. चरन सिंह तो बुझता हुआ दीया था. बुझने से पहले जिस तरह दीया भड़कता है, शादी के बाद चरन सिंह उसी तरह भड़का था. इसी अंतिम जोश में 2 बच्चे हो गए और खुद चरन सिंह बुझ गया. हर रात की असफलता चरन सिंह की रोजमर्रा बन गई तो शर्मिंदगी से बचने के लिए वह गीता का सामना करने से कतराने लगा. दिन में वह खेत पर रहता. शाम को दारू पी कर आता. कभी खाना खाता, कभी बिना खाए ही सो जाता. गीता रात भर करवटें बदलती रहती.

पति की उपेक्षा से गीता यादव का मन गृहस्थी में कम ही लगता था. अब तक उस की बेटी सान्या 10 वर्ष की उम्र पार कर चुकी थी. घर का कुछ काम वह संभाल लेती थी. दोनों भाइयों का भी खयाल रखती थी. पापा को भी नाश्तापानी खेत पर दे आती थी. वहीं गीता एक तरफ उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. चंचल चितवन की गीता के चेहरे पर अकसर उदासी के बादल छाए रहने से उस के घर से 4 घर दूर रहने वाला युवक जबर सिंह समझ गया कि अवश्य उसे कोई दुख कचोट रहा है. वह गीता को जब भी देखता, उसे बांहों में लेने को मचलने लगता. गीता भी उसे देख कभीकभी मुसकरा देती. इस से जबर सिंह को यकीन हो गया कि गीता उस से कुछ चाहती है.

जबर सिंह के पापा गजोधर की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बेटे गब्बर व जबर सिंह थे. गब्बर दूध का व्यवसाय करता था. जबकि जबर सिंह खेतीकिसानी के साथ मनरेगा में मजदूरी भी करता था. मनरेगा मे काम करने के दौरान ही जबर सिंह की दोस्ती गीता के पति चरन सिंह से हुई थी. हालांकि जबर सिंह और चरन सिंह की उम्र में 10-12 साल का फासला था. लेकिन दोनों शराब के लती थे, सो उन के बीच दोस्ती हो गई थी. जबर सिंह का आनाजाना गीता के घर बना रहता था. देखनेभालने में जबर सिंह गठीले बदन वाला युवक था. गीता का हमउम्र था. बातें भी लच्छेदार करता था. गीता को उस की बातें अच्छी लगती थीं. वह जब भी जबर सिंह को देखती, सोचने लगती कि काश! उस का पति भी मजबूत कदकाठी वाला और चुहलबाज होता तो उस की भी जिंदगी मजे से बीतती.

चरन सिंह कमजोर शौहर तो था ही, शराब का लती भी था. इसलिए गीता उस से मन ही मन नफरत करने लगी. पति से निराश हुई तो उस का झुकाव जबर सिंह की तरफ होने लगा. जबर सिंह जब भी आता था, गीता व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ खानेपीने की चीज जरूर लाता था. इस से गीता यही सोचती कि जबर सिंह उस का कितना खयाल रखता है. गीता का पति चरन सिंह उस के आनेजाने पर ऐतराज न करे, इसलिए जबर सिंह उस की आर्थिक मदद करता रहता था. चरन सिंह को दारू भी पिलाता था. उस के घर में बैठ कर एकदो पैग वह भी लगा लेता था. ऐसा वह गीता की नजदीकी हासिल करने के लिए करता था. इस बीच गीता और जबर के बीच नैनमटक्का चलता रहता था. कभीकभी चरन सिंह की नजर बचा कर वह गीता को छेड़ भी देता था.

इस के बावजूद चरन सिंह जब पत्नी और जबर सिंह को हंसीमजाक व बतियाते देख लेता था तो वह पत्नी पर नाराज होता था और लांछन लगाने लगता था. लेकिन जबर सिंह बीच में आ जाता और दारू का लालच दे कर चरन सिंह का गुस्सा शांत कर देता था. एक रोज जबर सिंह शाम को गीता के घर आया. उस के एक हाथ में बोतल तथा दूसरे में मीट की थैली थी. आते ही उस ने पूछा, ”भाभी, भैया नहीं दिख रहे हैं, आज मैं उन की मनपसंद चीज लाया हूं.’’

”ऐसी क्या चीज लाए हो, जिस से तुम्हारे भैया खुश हो जाएंगे?’’ गीता ने आंखें नचाईं.

”बकरे का मीट और शराब की बोतल.’’ जबर सिंह ने थैली और शराब दिखाते हुए गीता से कहा.

”लेकिन वो तो आज घर पर हैं नहीं.’’

”कहां गए हैं?’’ जबर ने पूछा.

”किसी काम से रिश्तेदारी में गए हैं. कल दोपहर तक वापस आएंगे.’’ गीता ने बताया.

”तब तो कल ही महफिल जमेगी.’’ जबर सिंह मायूस हो गया.

”अरे भैया नहीं तो क्या हुआ, मैं तो हूं. मैं मीट पका लूंगी. तुम मायूस क्यों होते हो.’’ कहते हुए उस ने मीट की थैली जबर सिंह के हाथ से ले ली. इस के बाद गीता ने पानी, गिलास तथा नमकीन जबर सिंह के आगे रख दी. गीता मटन पकाने लगी. जबर सिंह पैग बनाबना कर मजे से पीने लगा. रसोई का काम निपटा कर गीता पास आ बैठी तो नशे के सुरूर में जबर सिंह उस के हुस्न के कसीदे पढऩे लगा. गीता को उस की बातों में रस आ रहा था. जबर सिंह शराब का गिलास उठा कर बोला, ”भाभी, भैया न जानें क्यों शराब का नशा करते हैं, आप की मदभरी आंखों में इतना नशा है कि कोई भी शराब उस का मुकाबला नहीं कर सकती.’’

”ये तुम समझते हो, वो तो नहीं समझते.’’ गीता ने ठंडी आह भरी.

”मैं तो भाभी यह भी कहता हूं…’’ नशे की झोंक में वह गीता के पास खिसक आया फिर बोला, ”भाभी, तुम्हारे रस भरे होठों में इतनी तासीर है कि इन्हें अंगुली से छू कर शराब में अंगुली डुबो दो, नशा 4 गुना बढ़ जाएगा.’’

”वो कैसे?’’ गीता ने आंखें नचाते हुए पूछा.

”वो ऐसे भाभी,’’ जबर सिंह ने अपनी तर्जनी अंगुली गीता के निचले होंठ पर फिराई, फिर अंगुली शराब के गिलास में डुबो कर एक ही सांस में पूरी शराब गटक गया. जबर सिंह के इस स्पर्श ने गीता की देह में अंगारे भर दिए. कामाग्नि की आंच से उस का बदन सुलगने सा लगा. चारपाई से उठते हुए वह बोली, ”अब बस करो, बहुत पी चुके हो. मैं खाना ले कर आती हूं.’’

5 मिनट बाद ही गीता थाली परोस कर ले आई. जबर सिंह को लगा, शायद उस की हरकत से गीता नाराज है, इसलिए वह बिना कुछ बोले चुपचाप खाना खाता रहा और सामने बैठी गीता अपलक उसे देखती रही. देह की भड़की हुई प्यास उसे बेचैन किए थी. जबर सिंह का मजबूत बदन रहरह कर उस की कामनाओं को हवा दे रहा था. वह किसी तरह खुद को संभाले हुए थी. खाना खा कर जबर सिंह जाने लगा तो गीता फंसीफंसी आवाज में बोली, ”कैसे मर्द हो तुम? मुझ अकेली औरत को यूं तन्हा छोड़ कर जा रहे हो?’’

”तुम्हें डर लग रहा है तो मैं यहीं सो जाता हूं.’’ जबर सिंह बोला.

गीता के बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे. बच्चे जाग न जाएं और उस के खेल में खलल न डाल दें, सो उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. गीता ने जबर सिंह की कलाई पकड़ी और अपने कमरे में ले गई. फिर चारपाई की ओर इशारा करते हुए बोली, ”जबर सिंह, तुम इस पर लेट जाओ.’’

”खाट तो एक ही है, फिर तुम कहां सोओगी?’’ जबर ने उत्सुकता से पूछा.

”इसी चारपाई पर तुम्हारे साथ.’’ वासना ने गीता का विवेक हर लिया था. उस ने धक्का दे कर जबर सिंह को चारपाई पर गिरा दिया और स्वयं उस पर ढेर हो गई, ”बुद्धू, इतना भी नहीं समझते कि शबाब मिले तभी शराब पीने का मजा आता है.’’

जबर सिंह नशे में था तो गीता कामातुर थी. पका हुआ फल खुद ही गोद में आ गिरा था. जबर सिंह ने कामातुर गीता को अपनी बांहों में भर लिया और चारपाई पर लुढ़क गया. उस के बाद कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. काम पिपासा मिटाने के बाद ही दोनों एकदूसरे से अलग हुए. दोनों के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि थी. गीता यादव और जबर सिंह एक बार अवैध संबंधों के दलदल में समाए तो समाते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते. गीता ने जहां पति के साथ विश्वासघात किया था तो वहीं जबर सिंह ने दोस्ती में दगा दी थी. लेकिन उन दोनों को कोई मलाल न था.

जबर सिंह के बारबार घर आनेजाने पर चरन सिंह को शक हो गया कि जरूर इस का गीता के साथ कोई चक्कर चल रहा है, जिस से यह यहां इतने चक्कर लगाता है. एक दिन चरन सिंह ने इस बाबत पत्नी गीता से पूछा तो वह झूठ बोली, ”जरूर तुम्हें कोई वहम हो गया है. जैसा तुम सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है.’’

पति ने रंगेहाथ ऐसे पकड़ा गीता को

 

दिन भर का थकाहारा चरन सिंह शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे जबर सिंह पर पड़ी. वह उस की पत्नी गीता से हंसीठिठोली कर रहा था. गीता भी उस की बातों में सराबोर थी. यह देख कर चरन सिंह का गुस्सा सातवेें आसमान पर जा पहुंचा. वह चीखते हुए बोला, ”गीता, अपने यार से ही बतियाती रहेगी या फिर चायपानी को भी पूछेगी.’’

पति का कटाक्ष सुन कर गीता भी फट पड़ी, ”कैसी बातें करते हो, थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. जबर सिंह मेरा यार नहीं, गलीटोला के नाते देवर लगता है. वैसे भी जबर सिंह तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो, कामधंधा करते हो और शराब की महफिल सजाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का घर आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो उसे बेइज्जत कर भगा दो. ताकि दोबारा उस के कदम घर की ओर न बढ़ें.’’

”तेरी लोमड़ी चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तू चाहती है कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तू उस की भली बनी रहे. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तेरे दिल में उस के लिए जो प्यार उमड़ता है, उसे मैं भलीभांति जानता हूं. तेरे कारण ही वह कुत्ते की तरह पूंछ हिलाता हुआ चला आता है. मुझ से मिलने का तो बस बहाना होता है.’’

गीता और चरन सिंह की तूतूमैंमैं की भनक जबर सिंह के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर बरामदे में आ गया और बोला, ”चरन भैया, लगता है आप खेतों पर किसी से झगड़ कर आए हो. इसलिए मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भौजाई पर उतार रहे हो. लेकिन भैया, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लाल परी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

चरन सिंह शराब का लती था. जबर सिंह ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा. वह खुशी का मुखौटा ओढ़ कर बोला, ”जबर सिंह, मैं तेरी भौजाई से झगड़ नहीं रहा था. बीजखाद का इंतजाम करने की बात कर रहा था.’’

उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”गीता, कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम और जबर सिंह महफिल सजाएंगे.’’

पति की हांक सुन कर गीता मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा पति है. कुछ देर पहले लांछन लगा रहा था. जबर सिंह को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है?’’

गीता ने कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद चरन सिंह और जबर सिंह शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त जबर सिंह की निगाहें गीता पर ही टिकी रहीं. गीता भी मंदमंद मुसकरा कर जबर सिंह का नशा बढ़ाती रही. लेकिन गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिपता, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रोज चरन सिंह खेतों पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी जबर सिंह उस के घर आ गया. आते ही उस ने गीता को बांहों में भर लिया. दोनों काम वासना में अभी डूबे हुए ही थे कि चरन सिंह की पुकार सुन कर दोनों घबरा गए.

गीता ने अपने कपड़े तुरंत दुरुस्त किए और दरवाजा खोल दिया. घर में अंदर जबर सिंह मौजूद था. बिस्तर कुछ पल पहले गुजरे तूफान की चुगली कर रहा था. चरन सिंह सब समझ गया. उस ने गीता को धुनना शुरू किया तो जबर सिंह चुपके से खिसक लिया. चरन सिंह जान गया था कि जबर सिंह उस पर इतना मेहरबान क्यों था? अब उस ने जबर सिंह के साथ शराब पीना बंद कर दी और उस के घर आने पर पाबंदी भी लगा दी. देह की लगी पाबंदियों को भला कहां मानती है.

चरन सिंह ने जब एक रोज जबर सिंह को गीता के साथ बतियाते देख लिया तो उस ने जबर सिंह के साथ गालीगलौज व मारपीट की. साथ ही जबर सिंह को चेतावनी भी दे डाली कि वह उस की पत्नी का पीछा छोड़ दे, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा. यही नहीं, उस ने जबर की शिकायत भी उस के बड़े भाई गब्बर से कर दी. गब्बर सिंह ने भाई को समझाया और गीता से दूर रहने को कहा. लेकिन जबर सिंह ने भाई की बात नहीं मानी. वह गीता के इश्क में इतना अंधा हो चुका था कि उसे अपनी पत्नी बनाने के सपने देखने लगा था. दोनों के मिलने पर पाबंदी लगी तो वे मोबाइल फोन के जरिए एकदूसरे से बात करने लगे. गीता को मोबाइल फोन जबर सिंह ने ही मुहैया करा दिया था.

एक रात चरन सिंह ने पत्नी गीता को फोन पर बतियाते छत पर पकड़ा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. उस ने गीता से फोन छीन कर दूर फेंक दिया, फिर उस ने गीता को डंडे से जम कर पीटा. इस पिटाई से गीता का सिर फट गया. उस ने सुबह जा कर बसरेहर थाने में पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस पर पुलिस ने चरन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. 2 दिन बाद उसे जमानत मिली.

इस घटना के बाद गीता ने तय कर लिया कि वह पति की मार अब और सहन नहीं करेगी. वह उस के साथ रहेगी भी नहीं. गीता का नाजायज रिश्ता जबर सिंह के साथ बन ही चुका था, इसलिए उस ने जबर सिंह को तीसरे पति के रूप में चुन लिया और बच्चों का मोह त्याग कर जबर सिंह के साथ रहने की ठान ली. उस ने अपनी मंशा से जबर सिंह को भी अवगत करा दिया.

बच्चों को छोड़ प्रेमी के साथ भाग गई गीता

जबर सिंह तो गीता को पत्नी बनाने का प्रयास पहले से ही कर रहा था, अत: गीता ने प्रस्ताव रखा तो वह उसे पत्नी का दरजा देने को राजी हो गया. इस के बाद गीता और जबर सिंह ने गांव छोडऩे का निश्चय किया. उन्होंने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी. मौका देख कर एक रात गीता अपने तीनों बच्चों को घर में छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई. जबर सिंह गीता को सोनीपत (हरियाणा) ले गया. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. जीविका चलाने के लिए दोनों मेहनतमजदूरी करने लगे. वहां गीता को किसी तरह का डर नहीं था. गीता व जबर सिंह को सोनीपत में बसाने का काम जबर सिंह के एक दूर के रिश्तेदार ने किया था, जो पहले से वहां रहता था.

इधर चरन सिंह की सुबह आंखें खुलीं तो पत्नी घर से गायब थी. तीनों बच्चे भी मां को खोजने लगे. चरन सिंह ने गांव भर में गीता की खोज की, जब वह नहीं मिली तो वह समझ गया कि गीता जबर सिंह के साथ भाग गई है. उस ने यह बात पूरे गांव को भी बता दी. कुछ लोगों ने उसे रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. लेकिन उस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. गीता कई महीने तक जबर सिंह के साथ रही, उस के बाद उसे बच्चों की याद सताने लगी. उस से नहीं रहा गया, तब वह एक रोज गांव वापस आ गई. बच्चों ने मां को सामने देखा तो उन की आंखों से आंसू बहने लगे. गीता ने बच्चों को गले लगा लिया. चरन सिंह भी बच्चों की देखभाल के लिए परेशान था सो उस ने झगड़ा करने की बजाय गीता को बच्चों के साथ रहने के लिए समझाया. उस ने मारपीट के लिए क्षमा भी मांगी.

लेकिन जबर सिंह के पौरुष की दीवानी गीता ने चरन सिंह की बात ठुकरा दी. वह सप्ताह भर बच्चों के साथ रही, उस के बाद सोनीपत लौट गई. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गीता 2-4 महीने में जबर सिंह के साथ गांव आती और हफ्ता-10 दिन बच्चों के साथ रहती, फिर दोनों वापस चले जाते. गांव प्रवास के दौरान गीता का चरन सिंह से झगड़ा भी होता. कुछ समय बाद गीता का मारपीट वाले मुकदमे की कोर्ट में तारीखें पडऩे लगीं. अत: उसे इटावा कोर्ट में तारीख पर आना पड़ता. तारीख पर आने के बाद वह बच्चों से भी मिल लेती थी. तारीख पर चरन सिंह भी जाता था.

वहां कभी दोनों की नोंकझोंक होती तो कभी साथ बैठ कर बतियाते और खातेपीते भी थे, लेकिन गीता केस में सुलह को राजी नहीं होती थी. फिर 15 नवंबर की रात को गीता यादव ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति चरन सिंह की हत्या कर दी. चूंकि गीता यादव और जबर सिंह ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल लोहे की रौड भी बरामद करा दी थी, अत: एसएचओ समित चौधरी ने मृतक की बेटी सान्या की तहरीर के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 238(ए) के तहत गीता व जबर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

19 नवंबर, 2024 को पुलिस ने गीताजबर सिंह को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा में सान्या परिवर्तित नाम है