Delhi News: आरजू की लाश पर सजाई सेज

Delhi News: आरजू और नवीन ने भले ही प्यार कर के जीवन भर साथ निभाने का वादा कर लिया था, लेकिन उन की शादी में अड़चन यह थी कि वे एक ही मोहल्ले के रहने वाले थे. नवीन तो घर वालों के कहने पर मान गया, लेकिन आरजू जिद पर अड़ी थी. तब उस से छुटकारा पाने के लिए नवीन ने जो किया, उस से उसे क्या मिला.

आरजू चौहान अमूमन सुबह जल्दी उठ जाती थी, लेकिन 2 फरवरी को उस की आंख थोड़ी देर से खुली तो वह नहाधो कर कालेज जाने की तैयारी करने लगी. वह अशोक विहार स्थित लक्ष्मीबाई कालेज में बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. कालेज जाने में देर न हो जाए, आरजू ने नाश्ता तक नहीं किया. केवल चाय पी कर साढ़े 8 बजे घर से निकल गई. कालेज से वह अकसर दोपहर 2 बजे तक घर आ जाती थी. लेकिन जब कभी उसे आखिरी पीरियड अटैंड करना होता था तो घर आने में उसे 4 बज जाते थे.

लेकिन जब उस दिन वह 4 बजे तक घर नहीं लौटी तो उस की मां कविता ने उसे फोन किया कि इस समय वह कहां है और कब तक घर आएगी? लेकिन उस का फोन बंद था. कई बार फोन करने पर भी बात नहीं हो सकी तो वह परेशान हो उठीं कि पता नहीं आरजू ने फोन क्यों बंद कर दिया है.

आरजू के पिता संजीव चौहान उस समय घर पर ही थे. पत्नी को परेशान देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘क्या बात है, क्यों परेशान हो रही हो?’’

‘‘आरजू अभी तक कालेज से नहीं आई है. उस का फोन मिलाया तो वह भी बंद है.’’ कविता ने कहा.

‘‘हो सकता है, फोन की बैटरी डिस्चार्ज हो गई हो. तुम परेशान मत होओ. अब वह बच्ची नहीं है, जो तुम उस की इतनी चिंता कर रही हो?’’ संजीव चौहान ने पत्नी को समझाया.

एक घंटा और बीत गया, पर आरजू घर नहीं आई. मां ने फिर फोन किया. इस बार भी उस का फोन बंद मिला. उन्होंने यह बात पति को बताई तो उन्होंने भी अपने फोन से उसे फोन किया. उन्हें भी फोन बंद मिला. अब वह भी परेशान हो गए. आरजू की एक सहेली सिमरन का फोन नंबर कविता चौहान के पास था. उन्होंने सिमरन को फोन किया तो उस ने कहा, ‘‘आंटी, आज मैं कालेज नहीं गई थी, इसलिए मुझे कुछ नहीं पता.’’

इस के बाद आरजू की दूसरी सहेली राधिका को फोन कर के आरजू के बारे में पूछा गया तो पता चला कि वह भी उस दिन छुट्टी पर थी. जैसेजैसे अंधेरा बढ़ता जा रहा था, चौहान दंपति की चिंता बढ़ती जा रही थी. जवान बेटी का मामला था, इसलिए वह ज्यादा शोरशराबा भी नहीं करना चाहते थे. यहां तक कि उन्होंने आरजू के बारे में अपने परिवार वालों को भी नहीं बताया था.

जवान बेटी के अचानक गायब हो जाने से मांबाप के दिल पर क्या गुजरती है, इस बात को संजीव चौहान और उन की पत्नी कविता से ज्यादा और कौन महसूस कर सकता था. बेटी को इधरउधर तलाशतेतलाशते रात के 11 बज गए, पर उस के बारे में कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली. रात साढ़े 11 बजे संजीव पत्नी को ले कर थाना मौडल टाउन पहुंचे. थानाप्रभारी रामअवतार यादव को उन्होंने बेटी आरजू के बारे में पूरी बात बताई. आरजू कोई दूधपीती बच्ची नहीं थी, जो उस के कहीं खो जाने की आशंका थी. जवान लड़की के गायब होने पर ज्यादातर लोग यही सोचते हैं कि वह अपने प्रेमी के साथ भाग गई होगी या फिर उस के साथ कोई अनहोनी घट गई होगी.

इसलिए आरजू के गायब होने के मामले में भी थानाप्रभारी ने यही सोचा कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड के साथ कहीं चली गई होगी, 2-4 दिनों में घूमघाम कर खुद ही घर आ जाएगी. उन्होंने बातों ही बातों में संजीव चौहान से जानना भी चाहा कि उस की किसी लड़के से दोस्ती तो नहीं थी. संजीव चौहान ने इस के लिए मना कर दिया था. संजीव चौहान की तहरीर ले कर उन्होंने कहा कि वह परेशान न हों. उन की बेटी जल्द ही आ जाएगी. पुलिस को बेटी की गुमशुदगी की सूचना देने के बाद चौहान दंपति घर लौट आया. रामअवतार यादव ने यह मामला सबइंसपेक्टर अमित राठी के हवाले कर दिया.

अमित राठी ने आरजू चौहान की गुमशुदगी की काररवाई में उस का हुलिया बता कर दिल्ली के समस्त थानों को वायरलैस से मैसेज प्रसारित करा दिया.बेटी की चिंता में चौहान दंपति की नींद आंखों से उड़ चुकी थी. उन के अलावा उन की बेटी पायल और बेटा कृष्णा भी परेशान था. सवेरा होते ही संजीव चौहान बेटी की तलाश में निकल पड़े. पहले वह लक्ष्मीबाई कालेज गए, जहां आरजू पढ़ती थी. वह प्रिंसिपल से मिले तो उन्होंने तुरंत कालेज के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवाई. उस फुटेज से पता चला कि सुबह 9 बज कर 2 मिनट पर आरजू कालेज आई थी.

अंदर आने की पुष्टि होने पर पिं्रसिपल ने उन प्रोफेसरों को बुलवाया, जो पहले और दूसरे पीरियड में आरजू को पढ़ाती थीं. उन्होंने बताया कि आरजू ने केवल पहला पीरियड अटैंड किया था. अब सवाल यह था कि पहला पीरियड अटैंड कर के वह कहां चली गई थी? संजीव चौहान ने आरजू के साथ पढ़ने वाली कुछ लड़कियों से बात की तो 2 लड़कियों ने बताया कि आरजू से मिलने अकसर नवीन खत्री आता रहता था. कल भी वह अपनी मारुति स्विफ्ट डिजायर कार से आया था.

संजीव चौहान के घर से करीब डेढ़ सौ मीटर दूर रहने वाले नवीन खत्री और आरजू के बीच कई सालों से गहरी दोस्ती थी. उन की यह दोस्ती बाद में प्यार में बदल गई थी. वे दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन एक ही गांव के होने की वजह से दोनों के घर वाले तैयार नहीं थे. करीब 4 महीने पहले संजीव के घर पंचायत हुई थी, जिस में नवीन के घर वाले भी आए थे. पंचायत में तय हुआ था कि आज के बाद दोनों बच्चे आपस में नहीं मिलेंगे और दोनों के ही घर वाले अपनेअपने बच्चों को संभालेंगे.

यह जानकारी मिलने के बाद संजीव घर आ गए. आरजू के लापता होने की बात अभी तक संजीव के घर वालों के अलावा किसी और को नहीं पता थी. बदनामी के डर से संजीव चौहान ने अपने नातेरिश्तेदारों तक को बेटी के बारे में नहीं बताया था. वह खुद ही उसे ढूंढ रहे थे. कालेज से उन्हें नवीन खत्री के बारे में जो जानकारी मिली थी, अगर वह उस के बारे में उस से पूछते तो बात मोहल्ले में फैल सकती थी. इसलिए उन्होंने उस से या उस के घर वालों से बात करना उचित नहीं समझा. 3 फरवरी को भी वह बेटी को तलाशते रहे, लेकिन कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

चौहान परिवार दर्द को जितना दबाने की कोशिश कर रहा था, वह उतना ही बढ़ता जा रहा था. अब उन्होंने बात को ज्यादा दबाना उचित नहीं समझा और परिवार वालों को बेटी के गायब होने के बारे में बता दिया. उन्हें यह भी बता दिया था कि कालेज की लड़कियों से पता चला है कि आरजू कालेज से नवीन खत्री के साथ कार से गई थी. नवीन की शादी तय हो चुकी थी और अगले दिन यानी 5 फरवरी को उस की शादी थी.

परिवार वालों की सलाह पर कविता चौहान ने बेटी के बारे में पता करने के लिए नवीन के बड़े भाई संदीप खत्री को फोन किया. फोन संदीप की बहन ने उठाया. कविता ने कहा कि उन्हें नवीन से बात करनी है तो उस ने कहा, ‘‘नवीन तो शादी की तैयारी में लगा है, आप चाहें तो मम्मीपापा से बात कर लें.’’

‘‘कराओ,’’ कविता ने कहा.

‘‘लो संदीप भैया आ गए, आप उन्हीं से बात कर लीजिए.’’ नवीन की बहन ने कहा.

‘‘देखो बेटा, आरजू 2 दिनों से घर नहीं आई है. पता चला है कि वह तुम्हारे भाई के टच में थी. नवीन ही उसे कालेज से ले गया है. अगर आप लोग नहीं बताते तो मैं पुलिसिया काररवाई करूंगी.’’ कविता ने कहा.

‘‘नहीं आंटी, वह नवीन के टच में नहीं थी. किसी ने आप को गलत बताया है. आप बेवजह नवीन पर शक कर रही हैं. कल उस की शादी है. रही बात आरजू की तो हम उसे ढूंढने में आप की मदद करेंगे, क्योंकि आप की इज्जत हमारी इज्जत है. इज्जत के लिए हम कुछ भी करेंगे.’’ संदीप ने कहा.

‘‘ठीक है, आज शाम 5 बजे तक मेरी बेटी मेरे पास आ जानी चाहिए.’’ कविता ने कहा.

‘‘आंटी, मैं इस बारे में एसएचओ से बात कर के आरजू को ढूंढने की कोशिश करता हूं.’’ संदीप ने भरोसा दिलाया.

संदीप ने आरजू को ढूंढने की बात कविता से कह तो दी, लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह उसे कहां ढूंढे. भाई की शादी थी, सारे काम वही देख रहा था. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो वह दादी के साथ संजीव चौहान के बड़े भाई राजपाल के घर पहुंचा. उन से कहा कि कविता आंटी उस पर आरजू को ढूंढने का दबाव डाल रही हैं, आखिर वह उसे कहां ढूंढे. राजपाल की पत्नी के भतीजे की नारायणा में शादी थी. वह पत्नी के साथ शादी में जाने की तैयारी कर रहे थे, इसलिए उन्होंने कहा कि वह इस बारे में शादी से लौटने के बाद ही कुछ करेंगे. संदीप घर लौट आया.

संजीव चौहान और उन की पत्नी कविता का बेटी की चिंता में रोरो कर बुरा हाल था. संदीप से बात किए उन्हें कई घंटे हो चुके थे. उधर से उन के पास कोई फोन नहीं आया था. आखिर उन्होंने ही फिर से संदीप को फोन किया, ‘‘संदीप क्या हुआ, अभी तक तुम ने आरजू के बारे में कुछ नहीं बताया.’’

‘‘आंटी, मैं उसे कहां से ढूंढू. हम राजपाल अंकल के पास गए थे. वह शादी में जा रहे थे. उन के लौटने के बाद ही बात करेंगे.’’ संदीप ने कहा.

‘‘मगर तुम ने तो कहा था कि एसएचओ से बात कर के आरजू को ढूंढोगे.’’ कविता ने कहा.

‘‘आंटी, कल हमारे यहां शादी है. बताओ, मैं उसे कहां से लाऊं?’’

‘‘देखो, मैं इस बात की गारंटी देती हूं कि मेरी बेटी घर आ जाएगी तो मैं शादी में कोई विघ्न नहीं डालूंगी.’’ उन्होंने कहा.

संदीप ने फोन अपनी दादी राजरानी को दे दिया. राजरानी से बात करते समय कविता की आंखों में आंसू भर आए. उन्होंने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैं बहुत दुखी हूं. 3 दिन हो गए मेरी बच्ची घर नहीं आई.’’

‘‘दुख तो हमें भी है. हम ने नवीन को इतना टाइट कर दिया था कि वह 3 महीने से अपनी बहन के घर है. वहीं पर वह अपना काम भी कर रहा है. यहां आता भी नहीं. अब यह उस बच्ची को कहां से लाए?’’ राजरानी ने कहा.

‘‘मुझे पता चला है कि एक हफ्ते पहले नवीन बाइक से आरजू का बस का पास बनवाने ले गया था. अभी भी वह उस के साथ घूमती थी. आप कैसे कह रही हैं कि वह आरजू से नहीं मिलता था. संदीप ने भी कहा था कि अपनी इज्जत के लिए वह कुछ भी करेगा.’’ कविता ने कहा.

‘‘कह दिया होगा तो वह गारंटी थोड़े ही लेगा. वह माचिस की डिब्बी में तो है नहीं, जो निकाल कर दे दें. लड़की की जो फ्रैंड हैं, उन से भी पूछ लो. यह भी हो सकता है कि तुम्हारी रिश्तेदारी में जहां शादी हो रही है, वह वहीं पहुंच जाए. शांति रखो सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘मैं शांति ही तो रखे हुए हूं. मैं ने पुलिस के पास अभी नवीन का नाम तक नहीं लिखवाया है. मुझे मेरी बेटी दिलवा दो. मैं बहुत सहयोग करूंगी. मेरी बेटी तुम्हारी शादी में विघ्न भी नहीं डालेगी.’’ कहतेकहते कविता रो पड़ीं.

अगले दिन नवीन की शादी थी. कविता ने सोचा कि हो सकता है शादी के बाद वह बेटी को ढूंढने में मदद करें, इसलिए उन्होंने एक दिन और चुप रहना उचित समझा. 6 फरवरी की शाम तक संदीप खत्री और उस के घर वालों ने कोई जवाब नहीं दिया तो चौहान दंपति के सब्र का बांध टूट गया. संजीव चौहान थाने पहुंचे और उन्होंने शक के आधार पर नवीन खत्री के खिलाफ बेटी के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी.

अपहरण की रिपोर्ट दर्ज होते ही पुलिस काररवाई तेज हो गई. डीसीपी विजय सिंह ने एसीपी (मौडल टाउन) के नेतृत्व में एक टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी रामअवतार यादव, अतिरिक्त थानाप्रभारी सुधीर कुमार, एसआई संदीप माथुर, अमित राठी, विश्वप्रताप शर्मा, हैडकांस्टेबल रंधीर सिंह, जयभगवान, कांस्टेबल शिवकुमार, नवीन, राजेश को शामिल किया गया. रिपोर्ट नामजद थी, इसलिए पुलिस टीम गांव राजपुर, गुड़मंडी में नवीन के घर जा पहुंची. वह घर पर नहीं मिला. उस की मां और दादी ने बताया कि वह अपनी नईनवेली दुलहन को ले कर हनीमून मनाने गोवा गया है.

पुलिस टीम लौट आई. उस के गोवा से लौटने के बाद ही उस से आरजू के बारे में पूछताछ की जा सकती थी. इस बीच पुलिस ने आरजू और नवीन खत्री के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवा लिया था. उस दिन रात 10 बजे के करीब पुलिस टीम को खबर मिली कि नवीन आजादपुर से मौडल टाउन की ओर डीटीसी की एक बस से आ रहा है. इस खबर पर थानाप्रभारी चौंके, क्योंकि उन्हें तो उस के गोवा जाने की खबर मिली थी. उन के पास नवीन खत्री का फोटो था ही, इसलिए वह मौडन टाउन-2 के बस स्टाप पर खड़े हो कर आजादपुर से आने वाली बसों की तलाशी लेने लगे. आखिर एक बस में उन्हें नवीन खत्री मिल गया. पुलिस को देखते ही उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन बस के दोनों दरवाजों पर पुलिस के तैनात होने की वजह से उस की कोशिश सफल नहीं हो सकी. उसे हिरासत में ले कर पुलिस टीम थाने ले आई.

आरजू के बारे में पूछने पर उस ने कहा, ‘‘4 महीने पहले जब पंचायत बैठी थी, तभी से मैं ने उस से बातचीत बंद कर दी थी. अब तो मेरी शादी भी हो चुकी है. उस दिन वह कालेज से कहां गई, मुझे नहीं पता.’’

‘‘लेकिन कालेज के गेट पर लगे सीसीटीवी कैमरे की रिकौर्डिंग में आरजू तुम्हारे साथ जाती दिखाई दी है.’’ इंसपेक्टर सुधीर कुमार ने कहा.

‘‘नहीं सर, ऐसा नहीं हो सकता. मैं तो उस दिन सुबह से ही अपनी शादी के कार्ड बांट रहा था.’’ नवीन ने कहा.

नवीन और आरजू के नंबरों की काल डिटेल्स से पता चला था कि 2 फरवरी, 2016 को सुबह 9 से साढ़े 9 बजे के बीच उस की आरजू से बात हुई थी. उस समय उस के फोन की लोकेशन भी लक्ष्मीबाई कालेज के आसपास थी. इस से साफ लग रहा था कि नवीन झूठ बोल रहा है. पुलिस ने उसे सारे सबूत दिखा कर पूछताछ की तो उसे सच बोलना पड़ा. उस ने मान लिया कि उस ने आरजू की हत्या कर दी है और इस वक्त लाश उस के घर में ही पड़ी है.

पुलिस को हैरानी इस बात की थी कि शादी वाले घर में 5 दिनों से लाश कैसे रखी है? पुलिस उसे ले कर उस के घर पहुंची तो मकान में कमरों और किचन के बीच वेंटिलेशन के लिए कुछ खाली जगह छूटी थी, उसी खाली जगह में पानी के पाइप लगे थे. उसे शाफ्ट कहते हैं. उसी शाफ्ट में उस ने आरजू की लाश छिपा कर रखी थी, जिसे उस ने बरामद करा दी. घर से आरजू की लाश बरामद होने पर नवीन के घर वाले भी हैरान रह गए.

आरजू की लाश बरामद होने की जानकारी थानाप्रभारी ने डीसीपी व अन्य अधिकारियों को दी तो जिला स्तर के सभी अधिकारी मौके पर पहुंच गए. क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी मौके पर बुला लिया गया. लाश देख कर ही लग रहा था कि हत्या कई दिनों पहले की गई थी. लाश से दुर्गंध भी आ रही थी. उस के गले में उस समय भी एक दुपट्टा लिपटा था.

थाने का माहौल गमगीन हो गया था. पुलिस अधिकारियों ने पीडि़त पक्ष को आश्वासन दिया कि नवीन के अलावा इस केस में जो भी दोषी पाए जाएंगे, उन के खिलाफ भी काररवाई की जाएगी. किसी तरह समझाबुझा कर पुलिस ने उन्हें शांत किया. इस के बाद उन्होंने लाश पोस्टमार्टम के लिए बाबू जगजीवनराम मैमोरियल अस्पताल भेज दी.

7 फरवरी को पुलिस ने नवीन खत्री को रोहिणी न्यायालय में ड्यूटी मेट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट सोनाली गुप्ता के समक्ष पेश कर के पूछताछ के लिए 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि में अभियुक्त नवीन खत्री से विस्तार से पूछताछ की गई तो आरजू चौधरी की हत्या की रोंगटे खड़े कर देने वाली प्रेम, धोखा और छुटकारे की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली. संजीव चौहान उत्तरीपश्चिमी जिले के गांव राजपुरा, गुड़मंडी में अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी कविता के अलावा 2 बेटियां और एक बेटा था. आरजू उन की दूसरे नंबर की बेटी थी. बड़ी बेटी पायल पढ़लिख कर दिल्ली के ही एक निजी स्कूल में टीचर हो गई थी.

दूसरी बेटी आरजू दिल्ली विश्वविद्यालय के लक्ष्मीबाई कालेज में बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. वह कालेज बस से आतीजाती थी. कभीकभी वह अपनी सहेलियों के साथ कमलानगर मार्केट घूमने चली जाती थी. एक दिन आरजू कालेज की एक दोस्त के साथ कमलानगर मार्केट घूमने गई थी, तभी वहां उस की मुलाकात नवीन खत्री से हो गई. नवीन को वह पहले से जानती थी, क्योंकि वह उसी के मोहल्ले में रहता था. लेकिन वह उस से कभी मिली नहीं थी.

नवीन भी राजपुरा गांव के राजकुमार का बेटा था. उस दिन रैस्टोरेंट में नवीन और आरजू की पहली बार बात हुई तो आरजू के खानेपीने का बिल नवीन ने ही चुकाया. उस दौरान दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. यह करीब 2 साल पहले की बात है.

पहली मुलाकात में ही आरजू नवीन को भा गई थी. उस से नजदीकियां बढ़ाने के लिए वह उसे जबतब फोन करने लगा. कभीकभी आरजू जैसे ही कालेज के लिए घर से निकल कर मेनरोड तक पहुंचती, नवीन मोटरसाइकिल ले कर आ जाता. उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाने के लिए कहता कि उसे लक्ष्मीबाई कालेज के सामने से होते हुए करोलबाग जाना है. तब आरजू उस की मोटरसाइकिल पर बैठ जाती.

इस तरह आरजू और नवीन के बीच दोस्ती हो गई, जो बाद में प्यार में बदल गई. इस के बाद वह अकसर नवीन की मोटरसाइकिल पर घूमने लगी. नवीन भी उस पर खूब पैसे खर्च करने लगा. राजपुरा गांव के कुछ लोगों ने आरजू को नवीन के साथ घूमते देखा तो इस की चर्चा गांव में होने लगी. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों के ही घर वालों को उन के प्यार की जानकारी हो गई. तब उन्होंने अपनेअपने बच्चों को समझाने की कोशिश की. लेकिन आरजू और नवीन अपनी प्यार की धुन में रमे थे, उन के बारे में लोग क्या कह रहे हैं, इस की उन्हें परवाह नहीं थी. हां, उन्होंने मिलने में अब ऐहतियात बरतनी शुरू कर दी थी.

प्यार कर लिया, साथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं, लेकिन इस बात पर गौर नहीं किया कि वे एक ही मोहल्ले में रहते हैं, जिस की वजह से शादी होना असंभव है. गांव के रिश्ते से एक तरह से वे भाईबहन लगते थे. अगर यह बात वे पहले सोच लेते तो उन की मोहब्बत परवान न चढ़ती. संजीव चौहान को लगा कि नवीन ने ही उन की बेटी को बहका कर अपने जाल में फांस लिया है. इसलिए उन्होंने फोन कर के नवीन के घर वालों से शिकायत की. इस के बाद नवीन के घर वाले कुछ परिचितों को ले कर संजीव चौहान के घर पहुंचे. यह करीब 4 महीने पहले की बात है.

एक ही गांव का होने की वजह से शादी होना असंभव था, इसलिए सब ने यही कहा कि दोनों के घर वाले अपनेअपने बच्चों को समझाएं. कहा जाता है कि अपने घर वालों की इज्जत को देखते हुए आरजू ने नवीन से बात करनी बंद कर दी थी. उस ने उस से दूरियां बना ली थीं. इस के बाद उस ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगा दिया था. कल्पनाओं की दुनिया में नाम कमाने के लिए उस ने किंग्सवे कैंप स्थित एक इंस्टीट्यूट में एनिमेशन के कोर्स में दाखिला भी ले लिया था. कालेज से लौटने के बाद वह एनिमेशन सीखने जाती थी.

आरजू और नवीन भले ही घर वालों के दबाव में एकदूसरे से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन पुरानी यादों को भूलना इतना आसान नहीं था. जब कभी वे घर पर एकांत में होते तो उन की पुरानी यादें दिमाग में घूमने लगतीं. वे यादें उन्हें फिर से मिलने के लिए उकसा रही थीं. नतीजा यह हुआ कि दोनों ही खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाए और फोन पर बातें ही नहीं करने लगे, बल्कि मिलने भी लगे.

अब आरजू नवीन पर शादी का दबाव डालने लगी, मगर नवीन कोई न कोई बहाना बना कर उसे टालता रहा. पंचायत के फैसले के बाद नवीन दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली के नागल देवत में अपनी बहन के घर रहने लगा था. वह वहीं से आरजू से फोन पर बात कर के निश्चित जगह पर उस से मिल लेता था. जबकि घर वाले सोच रहे थे कि बच्चों ने संबंध खत्म कर लिए हैं.

इस बीच नवीन के घर वालों ने दिल्ली के द्वारका सेक्टर-5 स्थित विश्वासनगर की एक लड़की से उस की शादी तय कर दी थी. इतना ही नहीं, 5 फरवरी, 2016 को विवाह की तारीख भी निश्चित कर दी. यह बात आरजू को पता चली तो वह नवीन पर बहुत नाराज हुई. उस ने उसे धमकी दी, ‘‘मैं किसी और से तुम्हारी शादी कतई नहीं होने दूंगी.’’

आरजू की इस धमकी से नवीन डर गया. आरजू की धमकी वाली बात नवीन के घर वालों को पता चली तो वे भी परेशान हो उठे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि इस बला से कैसे छुटकारा पाया जाए. जैसेजैसे नवीन की शादी की तारीख नजदीक आ रही थी, उन की चिंता बढ़ती जा रही थी. नवीन को इस बात का डर था कि वह उस की शादी में पहुंच कर लड़की वालों के यहां कोई बवंडर न खड़ा कर दे. अब आरजू उस के लिए मुसीबत बन गई थी.

तमाम रिश्तेदारों और परिचितों को वह शादी के कार्ड दे चुका था. बाकी बचे लोगों को 2 फरवरी को उसे कार्ड बांटने और दोपहर को नांगल देवत से अपनी बहन को लाने जाना था. उसी दिन उस की आरजू से बात हुई तो उस ने उस पर शादी का दबाव ही नहीं डाला, बल्कि धमकी भी दी. उस की धमकी से परेशान नवीन ने उसी समय आरजू से हमेशा के लिए छुटकारा पाने का निर्णय ले लिया. 2 फरवरी को आरजू अपने नियत समय पर कालेज चली गई. उसी दौरान उस की नवीन से बात हुई तो उस ने 9, साढ़े 9 बजे उस से कालेज के गेट पर मिलने को कहा. पहला पीरियड अटैंड करने के बाद आरजू कालेज के गेट पर इंतजार कर रहे अपने प्रेमी नवीन के पास पहुंच गई.

आरजू को अपनी स्विफ्ट डिजायर कार में बिठा कर नवीन करोलबाग, धौलाकुआं, रिंगरोड से मुनीरका होते हुए देवली गांव पहुंचा. वहां पर नवीन की बुआ रहती हैं. कार को सड़क पर खड़ी कर के वह अकेला ही बुआ के यहां कार्ड देने गया. आरजू बारबार उस से यही कह रही थी कि तुम शादी के कार्ड बांट तो रहे हो, लेकिन मैं यह शादी होने नहीं दूंगी. नवीन ने तो कुछ और ही सोच रखा था, इसलिए उस की धमकी को उस ने गंभीरता से नहीं लिया.

साढ़े 12 बजे वह देवली से निकला. दोपहर तक उसे अपनी बहन के घर पहुंचना था. साढ़े 12 बजे उसे देवली में ही बज गए. बहन के यहां पहुंचने में उसे 2 घंटे और लगने थे, इसलिए वह कार को तेजी से चलाते हुए सैनिक फार्म, साकेत, महरौली होते हुए वसंतकुंज पहुंचा. वहां बाजार में बीकानेर की दुकान पर उस ने आरजू को गोलगप्पे खिलाए. सवा 2 बजे वह बहन के गांव के लिए निकला. इस बीच आरजू शादी की बात को ले कर उस से बहस करती रही.

नांगल देवत गांव से पहले केंद्रीय विद्यालय के पास सुनसान सड़क पर उस ने कार रोक दी. आरजू उसे बारबार धमकी दे रही थी. नवीन बेहद गुस्से में था. उस ने आरजू के गले में पड़ी चुन्नी के दोनों सिरे पकड़ कर कस दिए. कुछ ही देर में उस की मौत हो गई. गला दबाते समय आरजू की नाक और मुंह से थोड़ा खून तो निकला ही, उस का यूरिन भी निकल गया था.

आरजू के मरते ही नवीन के हाथपैर फूल गए. नाक व मुंह से निकले खून को आरजू के बैग से पोंछा. आरजू के पास 2 मोबाइल फोन थे. उस ने दोनों के सिमकार्ड निकाल लिए. इस के बाद उस की लाश कार की डिक्की में डाल दी. कार की अगली सीट पर निकले उस के यूरिन को उस ने पहले अखबार से, फिर बोतल के पानी से साफ किया.

बहन के यहां पहुंचने में उसे देर हो चुकी थी. वह बहन के यहां पहुंचा तो बहन अपने दोनों बच्चों के साथ तैयार बैठी थी. फटाफट उन्हें गाड़ी में बिठा कर अपने घर ले आया. हत्या करने के बाद भी वह बहन से सामान्य रूप से बातें करता आया था. चूंकि कार में लाश थी, इसलिए उस ने उस की चाबी अपने पास ही रखी. उस के दिमाग में एक ही बात घूम रही थी कि वह लाश को ठिकाने कहां और कैसे लगाए. नवीन का जो मकान बना हुआ था, उस के ग्राउंड फ्लोर पर पार्किंग है.

पहली मंजिल पर वह खुद रहता है. दूसरी मंजिल पर उस के मातापिता और दादी रहती हैं और तीसरे फ्लोर पर उस का बड़ा भाई संदीप पत्नी के साथ रहता है. 2 फरवरी को नवीन की शादी का दहेज का सामान आ गया था. वह सारा सामान ग्राउंड फ्लोर पर ही रखा हुआ था. 5 फरवरी को उस की बारात जानी थी. घर वालों ने रात को दहेज का सामान के कमरे में सेट कर दिया था. इस के बाद सभी अपनेअपने कमरों में जा कर सो गए. लेकिन नवीन को नींद नहीं आ रही थी. वह लाश को ठिकाने लगाने के बारे में ही सोच रहा था.

उस के मकान की रसोई और अन्य कमरों की वेंटिलेशन के लिए कुछ जगह खाली छोड़ी गई थी. इसे वे शाफ्ट कहते थे. लाश छिपाने के लिए नवीन को वही जगह उपयुक्त लगी. सुबह करीब 5 बजे नवीन उठा और अपनी कार की डिक्की से आरजू की लाश निकाल कर शाफ्ट में डाल दी. लाश के ऊपर उस एक पौलीथिन डाल दी. शाफ्ट में एग्जास्ट फैन लगा था. उस की हवा से कहीं पौलीथिन लाश से हट न जाए, उस के ऊपर घर में पड़ा टूटा कांच डाल दिया.

अपने ही घर में लाश को ठिकाने लगा कर नवीन को थोड़ी तसल्ली हुई. अगले दिन वह आरजू का पौकेट पर्स, मोबाइल फोन हैदरपुर बाईपास के नजदीक गहरे नाले में फेंक आया. उधर आरजू के मांबाप को जब पता चला कि 2 फरवरी को उन की बेटी नवीन के ही साथ गई थी तो कविता चौहान ने नवीन के भाई संदीप से बात की. कविता के दबाव पर संदीप और उस के पिता ने नवीन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने आरजू की हत्या कर दी है और उस की लाश को जंगल में फेंक आया है. उस ने यह नहीं बताया कि लाश घर के शाफ्ट में रखी है.

कार में हत्या का सबूत न रह जाए, इस के लिए उस की धुलाई होनी जरूरी थी. दिल्ली के पीतमपुरा गांव में नवीन के रिश्ते के मामा कृष्ण रहते थे. संदीप ने फोन कर के आरजू की हत्या करने वाली बात उन्हें बताई तो उन्होंने तसल्ली दी कि चिंता न करें, आगे का काम वह देख लेगा. 5 फरवरी को नवीन के भात भरने की रस्म पूरी करने के लिए कृष्ण राजपुरा गांव पहुंचा तो वह अपने साथ अपने गांव ही के नवीन को भी साथ लाया था, वह उन का नजदीकी था. भात भरने की रस्म के बाद कृष्ण और नवीन उस की स्विफ्ट डिजायर कार पीतमपुरा ले गए. इसी चक्कर में वे उस की बारात तक नहीं गए. पीतमपुरा में उन्होंने कार की अंदरबाहर अच्छी तरह सफाई करा दी. 6 फरवरी को कार संदीप के घर पहुंचा दी.

शाफ्ट में रखी लाश की बदबू घर में फैलने लगी तो नवीन थोड़ीथोड़ी देर में परफ्यूम छिड़क देता था. परफ्यूम की बोतल खत्म हो गई तो वह बाजार से तेज सुगंध वाले परफ्यूम की 2 दरजन बोतलें खरीद लाया, जिन में से वह 17 बोतलें छिड़क चुका था. मेहमान और घर वाले यही समझ रहे थे कि नवीन यह सब शादी की खुशी में कर रहा है. सच्चाई तो तब सामने आई, जब पुलिस ने घर से आरजू की लाश बरामद की.

नवीन खत्री ने अपनी नईनवेली दुलहन के साथ हनीमून के लिए गोवा जाने का प्रोग्राम बनाया था. उस की 6 फरवरी की शाम को दिल्ली से गोवा की फ्लाइट थी. लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही उस की फ्लाइट चली गई तो निराश हो कर वह घर लौट आया. इस के बाद किसी काम से वह आजादपुर गया था. रात 10 बजे वह वहां से बस से मौडल टाउन के लिए लौट रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

नवीन खत्री से पूछताछ के बाद पुलिस ने 12 फरवरी को नवीन खत्री के पिता राजकुमार, भाई संदीप खत्री, रिश्ते के मामा कृष्ण और नवीन को भादंवि की धारा 201, 202, 212 के तहत गिरफ्तार कर लिया. सभी को महानगर दंडाधिकारी श्री सुनील कुमार की कोर्ट में पेश किया गया. पुलिस ने राजकुमार, संदीप खत्री, कृष्ण और नवीन पर जमानती धाराएं लगाई थीं, इसलिए इन चारों को उसी समय कोर्ट से जमानत मिल गई, जबकि नवीन खत्री को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

नवीन खत्री के पिता राजकुमार हाल ही में जेल से पैरोल पर बाहर आया था. उस ने सन 2005 में गांव के ही अजय का मामूली बात पर कत्ल कर दिया था. हत्या के इस मामले में उस के परिवार के 6 सदस्य जेल गए थे. बहरहाल, कथा लिखने तक प्रेमिका की हत्या करने वाले नवीन खत्री की जमानत नहीं हुई थी. केस की जांच इंसपेक्टर सुधीर कुमार कर रहे हैं. Delhi News

—कथा पुलिस सूत्रों और आरजू के घर वालों के बयानों पर आधारित

 

Bihar News: खामोश हुआ विद्रोही तेवर

Bihar News: कलम की बदौलत बड़ेबड़े धन्नासेठों, मठाधीशों, माफियाओं, नौकरशाहों और सफेदपोशों की कलई खोलने वाले पत्रकार अजय विद्रोही ने जब अपनी कलम भूमाफिया अशोक सिंह पर चलाई तो अरबों की जमीन के लालच में उस ने अजय की कलम को हमेशाहमेशा के लिए शांत कर दिया.

29 सितंबर, 2015 की रात साढ़े 9 बजे के बाद पत्रकार अजय विद्रोही खाना खाने के बाद टहलने के लिए जैसे ही घर से बाहर सड़क पर आए, पड़ोस में रहने वाला दीपक सिंह मिल गया. सड़क पर खड़े हो कर वह उस से बातें करने लगे. तभी उन का बेटा शुभम फोन ले कर उन के पास आ कर बोला, ‘‘कोई अशोक अंकल हैं, वह आप से बात करना चाहते हैं.’’

बेटे से फोन ले कर जैसे ही अजय विद्रोही ने हैलो कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘भाई अजय, मैं अशोक सिंह…’’

‘‘हां भाई अशोक, बताएं… इतने दिनों बाद कैसे मेरी याद आई, जरूर कोई खास काम होगा तभी याद किया है?’’ अजय विद्रोही ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा.

‘‘हां, जरूरी काम है.’’ अशोक सिंह ने कहा.

‘‘बताओ, कहो तो अभी आ जाऊं?’’ अजय विद्रोही ने कहा.

‘‘नेकी और पूछपूछ. आ जाते तो काम हो जाता. हम सोच रहे हैं कि जिस मामले को ले कर हमारे बीच मतभेद चल रहे हैं, उस पर बैठ कर बातचीत कर लें, शायद बीच का कोई रास्ता निकल ही आए.’’ अशोक सिंह ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं आ रहा हूं. मैं भी चाहता हूं कि मामला सुलझ जाए.’’ कह कर अजय ने फोन काट दिया. इस के बाद बेटे शुभम को आवाज दे कर कहा कि वह एक आदमी से मिलने जा रहे हैं. अभी थोड़ी देर में लौट आएंगे. बेटे से कह कर वह पैदल ही चल पड़े. उन्हें मठ के पास अशोक सिंह से मिलने जाना था, जो उन के घर से थोड़ी ही दूरी पर था.

वह तेज कदमों से बेफिक्री से चले जा रहे थे. अपने घर से वह कुछ दूर ही गए होंगे कि एक मोटरसाइकिल पीछे से आ कर धीरेधीरे उन के बराबर पर चलने लगी. उस पर 2 युवक सवार थे. बराबरी पर चल रही मोटरसाइकिल देख कर अजय कुमार ठिठके और जैसे ही उन्होंने उन की ओर देखा तो पीछे बैठा युवक उन्हें देख कर मुसकराया. उन्होंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और पहले से भी ज्यादा तेज गति से चल पड़े. मोटरसाइकिल सवार वहीं रुक गए. अजय भीड़भाड़ वाली चौक बाजार स्थित शराब की दुकान के पास पहुंचे थे कि मोटरसाइकिल सवार पीछे से आए और पीछे बैठे युवक ने अजय विद्रोही पर 2 गोलियां चला दीं. लोग कुछ समझ पाते, वे तेजी से चले गए. अजय विद्रोही गिर कर छटपटाने लगे थे.

गोलियों की आवाज सुन कर दुकानदारों ने दुकानों के शटर गिरा कर भाग लिए. पल भर में वहां गहरा सन्नाटा पसर गया. भागते हुए कुछ दुकानदारों ने देखा कि गोली किसी आदमी को मारी गई है और वह आदमी सड़क पर पड़ा तड़प रहा है तो वे उस के पास पहुंचे. पत्रकार अजय विद्रोही को बाजार के सभी दुकानदार जानते थे, इसलिए उन्होंने उन्हें पहचान लिया. इस के बाद अपना फर्ज समझते हुए लहूलुहान अजय कुमार को एक टैंपो में लादा और जिला चिकित्सालय ले गए. इस बीच उन के शरीर से काफी खून बह चुका था, जिस से रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया.

चूंकि अजय विद्रोही को शहर के ज्यादातर लोग जानते थे, इसलिए कुछ ही देर में पूरे शहर में उन्हें गोली मारे जाने की खबर फैल गई. अजय के घर वाले भी खबर पा कर अस्पताल पहुंच गए. वहां जब उन्हें उन की मौत की जानकारी मिली तो वे रोनेबिलखने लगे. इस के बाद जैसेजैसे शहर के लोगों को पत्रकार अजय विद्रोही की हत्या की जानकारी होती गई, लोग अस्पताल पहुंचने लगे. कुछ ही देर में अस्पताल में भीड़ लग गई. किसी ने पुलिस को फोन द्वारा सूचना तो दे दी थी, लेकिन थाना सीतामढ़ी के थानाप्रभारी भुनेश्वर प्रसाद सिंह घंटों बाद अस्पताल पहुंचे. तब नाराज स्थानीय नेताओं और नागरिकों ने थानाप्रभारी को अस्पताल के अंदर नहीं जाने दिया. रात काफी होने के बावजूद माहौल पूरी तरह से गरम और विस्फोटक था.

भुवनेश्वर प्रसाद सिंह ने इस की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ ही देर में डीआईजी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, एसपी हरिप्रसाद यश, एएसपी (अभियान) संजीव कुमार, डीएसपी राजीव रंजन भी जिला अस्पताल पहुंच गए थे. काफी देर तक नेताओं और पुलिस अधिकारियों के बीच नोकझोंक होती रही. जनता अजय विद्रोही की लाश पुलिस को सौंपने को तैयार नहीं थी. वह हत्यारों को 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी. पुलिस अधिकारियों ने जब उन्हें आश्वासन दिया कि अजय के हत्यारे जल्द से जल्द गिरफ्तार किए जाएंगे, तब कहीं लाश पुलिस को सौंपी गई.

लाश कब्जे में ले कर पुलिस ने उसी रात आवश्यक काररवाई कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. यह घटना 29 सितंबर, 2015 की थी. पुलिस ने रात में ही घटनास्थल का निरीक्षण कर के वहां से 9 एमएम पिस्टल के 2 खोखे बरामद किए. 55 वर्षीय पत्रकार अजय कुमार विद्रोही बिहार के जिला सीतामढ़ी के मोहल्ला कोर्ट बाजार में अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शोभा शर्मा के अलावा 3 बच्चे थे. वह एक खोजी पत्रकार थे और जनहित के मुद्दों पर अननी कलम चलाते थे. यही वजह थी कि अगले दिन उन की हत्या के विरोध में नेताओं ने स्थानीय लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन करते हुए मेन रोड जाम कर दिया.

दुकानदारों ने भी अपनी दुकानें बंद कर लीं. भीड़ ने कई दुपहिया वाहनों में आग भी लगा दी थी. शहर का माहौल पूरी तरह विस्फोटक बन गया था. पुलिस ने तुरंत मृतक के बड़े बेटे शुभम शर्मा की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/120बी/364/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी थी.

शहर की स्थिति को देखते हुए एसपी हरिप्रसाद यश ने शहर में आसपास के थानों की पुलिस और पीएसी बुला ली. शहर पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था. एएसपी (अभियान) संजीव कुमार और डीएसपी (सदर) राजीव रंजन स्थिति पर नजर रखे हुए थे.  प्रदर्शनकारी सीतामढ़ी नगर थाने के प्रभारी भुवनेश्वर प्रसाद सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें तत्काल निलंबित करने की जिद पर अड़े थे. आखिरकार एसपी को उन की मांग स्वीकार करनी पड़ी. उन्होंने तत्काल प्रभाव से भुवनेश्वर प्रसाद सिंह को लाइन हाजिर कर दिया.

उन के स्थान पर आशीष कांति को थाने का चार्ज दिया गया. चार्ज मिलते ही आशीष कांति ने सब से पहले घटनास्थल की जांच की. उन्होंने आसपास के लोगों से भी पूछताछ की. इसके बाद वह मृतक अजय विद्रोही के घर वालों से मिले. अजय की पत्नी शोभा शर्मा ने किसी से दुश्मनी होने की बात से इंकार किया. उस समय उन के घर का माहौल काफी गमगीन था, इसलिए वह ज्यादा कुछ नहीं पूछ सके. अब तक की जांच में हत्यारों के बारे में पता नहीं चला तो आशीष कांति ने अजय विद्रोही के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. एकएक नंबर की उन्होंने गहनता से जांच की तो पता चला कि उन के मोबाइल पर आखिरी फोन जिस नंबर से आया था, वह शहर में ऊंची पहुंच रखने वाले इस्टू हाऊस के मालिक अशोक सिंह का था.

अशोक के फोन आने के बाद ही अजय विद्रोही उन से मिलने चौक बाजार स्थित मठ की ओर जा रहे थे. इस बात की पुष्टि उन के बेटे शुभम ने भी की थी. चूंकि अशोक सिंह एक रसूखदार आदमी थे, इसलिए सिर्फ काल डिटेल्स के आधार पर उन पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. लेकिन वह शक के घेरे में आ गए थे. थानाप्रभारी ने यह बात वरिष्ठ अधिकारियों को भी बता दी थी. वह अधिकारियों के निर्देश पर काररवाई करना चाहते थे. अधिकारियों ने कहा कि हत्यारा चाहे कितनी भी ऊंची रसूख वाला क्यों न हो, अगर उस के खिलाफ सबूत मिलते हैं तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए. इस के बाद आशीष कांति अशोक सिंह के खिलाफ सबूत जुटाने लगे.

आशीष कांति को मुखबिर से सूचना मिली कि घटना से कुछ देर पहले अशोक सिंह का भांजा दीपक सिंह अजय विद्रोही से बातें करते हुए देखा गया था. उस समय उस के हावभाव ठीक नहीं लग रहे थे, वह घबराया हुआ भी था. इस बात की तसदीक मृतक के बेटे शुभम ने भी की थी. पुलिस के शक के दायरे में दीपक भी आ गया. फिर क्या था, पुलिस ने 4 अक्तूबर, 2015 को दीपक को पूछताछ के लिए उस के घर से दबोच लिया. एएसपी (अभियान) संजीव कुमार सिंह के सामने दीपक से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह उन्हें इधरउधर घुमाता रहा, लेकिन जब उन्होंने कुछ खास सबूत उस के सामने रखे तो उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया.

दीपक को अपना जुर्म कबूल करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई दिया तो उस ने अजय विद्रोही की हत्या की साजिश में खुद के शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. दीपक से पूछताछ के बाद इस इस्टू हाउस के मालिक अशोक सिंह, भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल, जग्गा, शूटर रामबाबू सिंह, अजय सिंह, लोकेश सिंह, महेसी सिंह महेसिया और हरेंद्र बैठा के नाम सामने आए. केस का पूरी तरह से खुलासा हो चुका था. हत्या के इस मामले में शहर के रसूखदार लोगों के शामिल होने से पुलिस हैरान थी कि इन लोगों ने एक पत्रकार की हत्या क्यों की? यह अन्य अभियुक्तों के गिरफ्तार होने के बाद ही पता चल सकता था.

पूछताछ के बाद उसी दिन पुलिस ने आरोपी दीपक को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया, इस के 2 दिनों बाद 6 अक्तूबर को पुलिस ने योजनाबद्ध तरीके से इस्टू हाऊस के मालिक अशोक सिंह, जग्गा, रामबाबू सिंह, अजय सिंह और लोकेश को गिरफ्तार कर लिया. बाकी के 3 अरोपी जयप्रकाश अग्रवाल, महेसी सिंह महेसिया और हरेंद्र बैठा फरार हो गए थे. गिरफ्तार आरोपियों से पत्रकार अजय विद्रोही की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने सिलसिलेवार हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी—

55 वर्षीय अजय शर्मा ‘विद्रोही’ के पूर्वज मूलरूप से राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव के रहने वाले थे. करीब डेढ़ सौ साल पहले उन के परदादा रामदेव शर्मा किसी काम से सीतामढ़ी आए तो यहां की सभ्यता और संस्कृति उन्हें इतनी भा गई कि वह यहीं के हो कर रह गए. उन की 2 पीढि़यां यहीं जन्मीं और पलीबढ़ीं. पढ़लिख अजय कुमार ने सरकारी सेवा के बजाय पत्रकारिता को अपने जीवन का लक्ष्य चुना. अजय ने सीतामढ़ी में ही स्थानीय समाचार पत्रों में नौकरी की. नौकरी के बाद उन्होंने अपने नाम के आगे तखल्लुख ‘विद्रोही’ जोड़ लिया. इस के बाद वह स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करने लगे. वह अपनी लेखनी से भ्रष्टाचारियों की करतूतों को समाज के समाने उजागर करने लगे. जिस की वजह से शहर और समाज में उन की पहचान बनती गई. बाद में वह हिंदी अखबार दैनिक जागरण से जुड़ गए.

आखिरी दिनों में ‘विद्रोही’ सीतामढ़ी के दैनिक जागरण यूनिट के प्रभारी थे. यूनिट में अजय के मन के मुताबिक काम नहीं हुआ तो उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. इस के बाद उन्होंने हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘सिटी संदेश’ निकाला. इस अखबार के माध्यम से उन्होंने बड़ेबड़े धन्नासेठों, मठाधीशों, माफियाओं, नौकरशाहों और सफेदपोशों की कलई खोलनी शुरू कर दी, जिस की वजह से यह इन लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए. लेकिन शहर में उन की लोकप्रियता बढ़ गई.

2 साल बाद वित्तीय संकट की वजह से उन का अखबार बंद हो गया. शहर में हर वर्ग के लोगों से उन का जुड़ाव हो गया था. चाहे नौकरशाह हो या राजनेता, चिकित्सक हो या व्यवसाई, अमीर हो या गरीब. सभी के बीच उन की एक अलग पहचान बन गई थी. शहर में होने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में उन की सहभागिता देखी जाती थी. उन्हें सिटीजन फोरम का महासचिव भी बना दिया गया था. यह जिम्मेदारी मिलने के बाद अजय ‘विद्रोही’ के कंधों पर सामाजिक दायित्वों का बोझ आ गया था. फोरम के माध्यम से उन्होंने जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत विभिन्न विभागों में 150 आरटीआई लगाईं. सीतामढ़ी शहर में थाना नगर के चौक बाजार स्थित मठ की 101 डिस्मिल जमीन पर भूमाफियाओं की नजरें टिकी थीं.

अजय को सूचना मिली कि भूमाफिया अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल द्वारा फरजी तरीके से मठ की वह जमीन लीज करा ली गई है. जमीन से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए उन्होंने थाना बथनाहा के मझौलिया गांव के रवि कुमार सिंह द्वारा संबंधित विभाग में आरटीआई लगवा कर सूचना मांगी. जानेमाने व्यवसाई अशोक सिंह की शहर में नूतन सिनेमा रोड स्थित चौक बाजार में इस्टू हाऊस नाम की मशहूर दुकान थी. इस्टू हाऊस में शराब और कबाब खुलेआम बिकता था. इस के अलावा यहां कई तरह के अनैतिक और गैरकानूनी धंधे चलते थे. शहर के बड़ेबड़े धन्नासेठों, माफियाओं, पत्रकारों, सफेदपोशों, अपराधियों और खाकी वर्दीधारियों का वहां बराबर उठनाबैठना था.

इसी वजह से अशोक सिंह पर किसी की भी हाथ डालने की हिम्मत नहीं होती थी. अजय विद्रोही भी कभीकभार वहां जाते थे. मालिक अशोक सिंह से उन का परिचय था. वह उस के कई काले धंधों के बारे में जानते थे. इन्हीं बातों को ले कर अशोक सिंह और अजय के बीच मतभेद पैदा हुए, तो अजय ने इस्टू हाऊस जाना बंद कर दिया. यही नहीं उन्होंने अशोक सिंह से बात करनी भी बंद कर दी. अजय विद्रोही ने पता कर लिया था कि मठ की 101 डिस्मिल जमीन मठ के महंथ दुखियादास के नाम थी. महंथ दुखियादास ने जीवित अवस्था में ही अपना उत्तराधिकारी बलवंतदास को बना दिया था, लेकिन अरबों रुपए की यह जमीन बलवंतदास के नाम स्थानांतरित नहीं की थी. महंथ बलवंतदास की मौत हो चुकी थी.

उन की मौत के बाद वह जमीन ऐसे ही पड़ी थी. उस जमीन पर अशोक सिंह की नजर गड़ी हुई थी. अरबों की जमीन हथियाने के लिए उस ने बाजपट्टी के भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल को अपनी योजना में शामिल किया. दोनों ने साजिश रच कर उस जमीन को हड़पने की योजना बना डाली. इस्टू हाऊस में जग्गा राउत कई सालों से नौकरी करता था. वह अशोक सिंह का बहुत वफादार आदमी था. इन लोगों ने बरियापुर के बीएलओ से साठगांठ कर के जग्गा राउत का फोटो लगवा कर मृत महंत दुखियादास के नाम से मतदाता पहचान पत्र बनवा लिया.

मतदाता पहचान पत्र बनने के बाद दोनों ने उसी के आधार पर जग्गा राउत का फोटो लगा कर मृत महंथ दुखियादास के नाम से पैनकार्ड भी बनवा लिया. एक तरह से इन लोगों ने फरजी तरीके से महंथ दुखियादास को जीवित कर दिया था. जाली दस्तावेजों के आधार पर महंत दुखियादास के नाम से अन्य कागजात भी तैयार करा लिए थे. इन्हीं कागजों के आधार पर 23 जून, 2014 को दोनों भूमाफियाओं ने जग्गा राउत को कथित महंत दुखियादास बना कर मठ की जमीन अपने नाम पर 61 सालों के लिए लीज पर करा ली.

जमीन की लीज कराने के बाद दोनों भूमाफियाओं ने इंडियन बैंक की राजोपट्टी शाखा से कई करोड़ का भी ले लिया. अजय विद्रोही को उन की यह पूरी कहानी मालूम हो चुकी थी. यही नहीं, अजय यह भी मांग करने लगे थे. इन दोनों भूमाफियाओं ने गैरकानूनी तरीकों से जो अकूत संपत्ति अर्जित की है, उस की जांच आर्थिक अपराध शाखा से कराई जाए. अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल को पता था कि सिटीजन फोरम के महासचिव और स्वतंत्र पत्रकार अजय विद्रोही की पहुंच बड़ेबड़े अधिकारियों तक है.

इसलिए उन्हें इस बात की आशंका थी कि अगर आरटीआई के माध्यम से दस्तावेज अजय के हाथ लग गए तो मठ की अरबों की जिस जमीन पर उन का कब्जा है, वह तो उन के हाथों से निकल ही जाएगी, जालसाजी कर के बैंक से उन्होंने जो लोन लिया है, वह भी लौटाना पड़ सकता है. इस से उन की बदनामी तो होगी ही, जेल भी जाना पड़ेगा. अजय विद्रोही की वजह से अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल की परेशानी बढ़ गई थी. पहले तो उन्होंने अजय को खरीदने की कोशिश की, लेकिन वह बिकने को तैयार नहीं हुए. अशोक सिंह अजय के जिद्दी स्वभाव को जानते थे. उसे लगा कि अजय की जिद उस के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, इसलिए उस ने अजय को हमेशाहमेशा के लिए रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

यह काम अशोक सिंह के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि उस के यहां बड़े और नामचीन अपराधियों का आनाजाना था. इस योजना में उस ने जयप्रकाश अग्रवाल और भांजे दीपक सिंह को भी शामिल कर लिया. अशोक सिंह ने सुपारी किलर रामबाबू सिंह से बात की. वह जिले की पुलिस के लिए सिरदर्द बना था. जिले के विभिन्न थानों में उस के खिलाफ कई गंभीर और संगीन मामले दर्ज थे. वह कई बार जेल भी जा चुका था.

घटना से सप्ताह भर पहले शूटर रामबाबू सिंह ने अपने साथियों अजय, लोकेश, हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया के साथ मिल कर पत्रकार अजय विद्रोही के घर से चौक स्थित मठ तक की रेकी की. उन्होंने इस बात की अच्छी तरह से जांचपरख कर ली कि अजय विद्रोही घर से कितने बजे और किन रास्तों से निकलते हैं. 27 सितंबर, 2015 को शूटर रामबाबू सिंह अपने साथियों अजय, लोकेश, हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया के साथ सीतामढ़ी पहुंचा. अशोक सिंह ने शहर के एक नामी होटल में उन के ठहरने का इंतजाम कर दिखाया. बदमाशों ने 2 दिनों बाद घटना को अंजाम का फैसला किया दीपक सिंह को अजय विद्रोही की मुखबिरी पर लगा दिया.

दीपक जानता था कि अजय रात में खाना खाने के बाद कुछ देर टहलते हैं. 29 सितंबर, 2015 की रात भी ऐसा ही हुआ. खाना खाने के बाद अजय विद्रोही बाहर टहलने के लिए निकले तो दीपक घर के बाहर टहलता मिल गया. वह पहले से ही बाहर खड़ा उन के निकलने का इंतजार कर रहा था. जेसे ही वह बाहर निकले, मुसकराता हुआ दीपक उन के पास पहुंच गया. थोड़ी देर वह इधरउधर की बातें करता रहा. उस समय उस का हावभाव बड़ा अजीब था.

उसी समय अजय विद्रोही के मोबाइल पर अशोक सिंह का फोन आया. उस समय उन का मोबाइल कमरे में था, जिसे ले जा कर उन्हें बेटे ने दिया. चूंकि अशोक सिंह का फोन काफी दिनों बाद आया था, इसलिए वह चौंके. अशोक ने पिछली बातों को भूल कर फिर से दास्ती का हाथ बढ़ाने की पेशकश की. अजय विद्रोही उस से मिलने चल पड़े. उधर दीपक ने अपने मामा अशोक को फोन कर के बता दिया कि अजय घर से निकल चुके हैं. अशोक ने यह सूचना शूटर रामबाबू सिंह को दे दी. रामबाबू ने यह सूचना अपने साथी अजय को दे दी. अजय लोकेश के साथ विद्रोही के घर पर पहले से ही नजर रखे हुए था. हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया साथियों की सुरक्षा के लिए दूसरी मोटरसाइकिल लिए चौक पर खड़े थे.

इशारा मिलते ही अजय मोटरसाइकिल ले कर विद्रोही के पीछे चल पड़े. उस की मोटरसाइकिल पर पीछे लोकेश बैठा था. वह अजय विद्रोही पर घात लगाए था. अजय विद्रोही का पीछा करता हुआ अजय चौक के पास पहुंच गया. उस के पीछेपीछे हरेंद्र और महेसी सिंह भी गाड़ी ले कर चल रहे थे. रात काफी हो चुकी थी. बाजार लगभग बंद हो चुका था. वारदात को अंजाम देने का उन के लिए यह अच्छा मौका था. अजय की मोटरसाइकिल जैसे ही अजय विद्रोही के करीब पहुंची, लोकेश ने 2 गोलियां उन के सीने में उतार दीं. गोली लगते ही वह सड़क पर गिर कर तड़पने लगे. इस के बाद चारों बदमाश फरार हो गए.

गोली चलने की आवाज सुन कर दुकानदारों ने शटर गिराने शुरू कर दिए. कुछ सहानुभूति दिखाने के लिए पत्रकार अजय विद्रोही के पास पहुंच गए. वे अजय को टैंपो द्वारा जिला चिकित्सालय ले गए, जहां डाक्टरों ने उन्हें घोषित कर दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने हत्याकांड में शामिल अभियुक्तों में दीपक सिंह, अशोक सिंह, लोकेश सिंह और जग्गा को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. पुलिस दबाव के कारण 8 जनवरी, 2016 को अभियुक्त हरेंद्र बैठा ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था. इस के ठीक 2 दिनों बाद 10 जनवरी को महेसी सिंह महेशिया को पुसिल ने सीतामढ़ी से ही गिरफ्तार कर लिया था. उस ने भी अजय विद्रोही हत्याकांड में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली थी.

भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल फरार चल रहा था. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की पकड़ से दूर था. इस मामले में राजस्व विभाग के एक अधिकारी को दोषी पाए जाने पर उसे निलंबित कर दिया गय था. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. कलम की बदौलत सच उगलने पर अपनी जान गंवाने वाले अजय विद्रोही पहले पत्रकार नहीं थे. ऐसे न जाने कितने विद्रोहियों को मौत के मुंह में जाना पड़ा है. Bihar News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: एक अनूठी प्रेम कहानी – बाजीराव मस्तानी

Hindi Stories: संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ आई और सफल भी रही. निस्संदेह लोगों ने इस प्रेमकहानी को पसंद किया. लेकिन सच यह है कि बाजीराव और मस्तानी के प्रेम को उस जमाने में कोई समझ नहीं पाया था, इसीलिए उन के अपनों ने ही उन्हें एक नहीं होने दिया. फिर भी ये दोनों पात्र ऐतिहासिक आईने में अमर हैं.

प्रेम कहानियां मानव मन को हमेशा से प्रभावित करती रही हैं. कुछ प्रेम कहानियां तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर अमर भी हो गई हैं. लेकिन यह दुख की ही बात है कि मराठा पेशवा बाजीराव प्रथम और उन की प्रेमिका मस्तानी की अद्भुत प्रेम कथा के बारे में हम उतना नहीं जानते, जितना हमें जानना चाहिए 18वीं सदी के इन ऐतिहासिक पात्रों ने भारत के भाग्य का फैसला किया था.

पेशवा बाजीराव मराठा साम्राज्य के ऐसे नायक थे, जिन्होंने अपने बहुत कम समय के शासनकाल में मराठा साम्राज्य को महाराष्ट्र की सीमा से निकाल कर पूरे हिंदुस्तान में फैला दिया था. इस अजेय योद्धा के रणकौशल और वीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 39 साल की उम्र में 41 युद्ध लड़े और किसी भी युद्ध में पराजित नहीं हुए. बाजीराव की बहादुरी को देखते हुए उन्हें ‘इंडियन नेपोलियन’ कहना गलत नहीं होगा. वैसे नेपोलियन कई युद्धों में पराजित हुआ था, लेकिन बाजीराव प्रथम हमेशा अजेय रहे.

सन 1720 में मुगल सम्राट औरंगजेब की मौत के बाद उत्तर भारत में ही नहीं दक्खिन में भी राजनीतिक शून्यता का आलम छा गया था, जिसे पेशवा बाजीराव ने एक झटके में दूर कर के दिल्ली पर मराठों का कब्जा कायम कर दिया था. मुगल सम्राट और सूबेदार जिन्हें अपनी बारूदी ताकत पर नाज था, बाजीराव प्रथम के रहमोकरम पर जीने को मजबूर हो गए थे.

मस्तानी के प्रेम में व्याकुल रहे बाजीराव इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने प्रेम को पवित्र रखा, उसे कभी वासना में नहीं डूबने दिया. वह ऐसा दौर था, जब ज्यादातर राजा, नवाब, रासरंग में डूब कर रंगरेलियां मनाने में व्यस्त रहते थे, लेकिन बाजीराव के लिए उन की प्रेमिका मस्तानी कभी भी उन की कमजोरी नहीं बनीं, बल्कि उन के अदम्य साहस, पराक्रम में पलपल की हमसफर और प्रेरणास्रोत रहीं.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेम कहानी जानने से पहले हमें उन के बारे में जान लेना चाहिए. बाजीराव प्रथम चितपावन ब्राह्मण कुल के पराक्रमी योद्धा थे, जिन्होंने अपनी वंश परंपरा की उपलब्धियों में चार चांद लगा दिए थे. सन 1707 के बाद छत्रपति मराठा सम्राट की हैसियत दिनोंदिन गिरती जा रही थी. तभी अष्टप्रधान मंत्रिमंडल के प्रधानमंत्री पेशवा सत्ता के सिरमौर बन गए. शिवाजी ने जिस मराठा स्वराज की नींव रखी थी, उन के बाद उन के उत्तराधिकारी उतने योग्य साबित नहीं हो सके. जबकि पेशवाओं ने इन कमियों को अपनी काबिलियत बना लिया था.

बालाजी विश्वनाथ ने जो सपना देखा था, उसे उन के योग्य पुत्र बाजीराव ने तूफान की गति से पूरा कर दिखाया. जब मुगल सत्ता पतन पर थी, तभी सन 1720 में बाजीराव प्रथम ने मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उस समय की स्थिति को देखसमझ कर उन्होंने घोषणा कर दी कि मुगल वृक्ष अब पतन की ओर है, इस की शाखाओं को काटने के बजाय इस की जड़ों पर प्रहार कर के पूरे वृक्ष को ही उखाड़ फेंका जाए तो बेहतर होगा.

इस के बाद मराठा जांबाज सेनापतियों की सैनिक टुकडि़यों ने पूरे उत्तर भारत को रौंदना शुरू कर दिया. मराठा सैनिकों के घोड़ों के टापों से सुदूर उत्तर भारत की रियासतें धूल के गुबार से ढकती चली गईं. मुगल सम्राट मुहम्मद शाह रंगीला, हैदराबाद के पहले निजाम चिन किलीज खां, और अवध के नवाब ने बाजीराव की फौज को दिल्ली की ओर जाने से रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन उन की कोशिश नाकाम रही. बात तब की है जब उत्तर भारत, खासकर मुगल दरबार, जो उस समय के कमजोर शासक की करतूतों से षड्यंत्रों का अड्डा बना हुआ था, की कमजोरी का फायदा उठा कर मुगल सेनापति अन्य रियासतों पर कब्जा करने के मंसूबे पाल रहे थे.

बाजीराव की प्रेमिका मस्तानी को ले कर इतिहास में तरहतरह की बातें कही जाती हैं, लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना है कि मस्तानी छत्रसाल की फारसी बेगम की बेटी थी. कुछ लोग उसे हैदराबाद के नवाब की दरबारी नर्तकी भी मानते हैं. मस्तानी उत्तर मध्यकाल की बहुत ही खूबसूरत शख्सियत थी, जिस की मिसाल कहीं नहीं थी. मस्तानी अपने अद्वितीय सौंदर्य, संगीत और नृत्यकला के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी तीरंदाजी, घुड़सवारी, तलवारबाजी और रणकौशल के लिए भी इतिहास में अमर है. बाजीराव के साथ उस ने तमाम युद्ध अभियानों में अपना पराक्रम दिखाया. युद्ध के मैदान में उस का साहस, वीरता और कौशल बाजीराव जैसा ही था, जो खुद असंभव रणनीति बना कर दुश्मनों के छक्के छुड़ाने में माहिर था.

जाहिर है ऐसी काबिलियत की धनी मस्तानी बाजीराव के दिलोदिमाग में छा गई होगी. पहले परिचय के साथ ही प्रेम की जो कहानी शुरू हुई, वह मरते दम तक जरा भी मंद नहीं पड़ी. दोनों जैसे एकदूसरे को पा कर धन्य हो गए थे. बाजीराव का जीवन युद्धों में बीत रहा था. लेकिन मस्तानी ने महिला हो कर भी उन नाजुक घडि़यों में हमेशा बाजीराव का साथ दिया था. इस प्रेमकथा एक सच यह भी है कि बाजीराव का साथ निभाने के लिए मस्तानी को बहुत कष्ट उठाने पड़े थे.

प्यार अगर सच्चा हो तो उस में कष्ट कोई मायने नहीं रखते. कुछ ऐसी ही बातें बाजीराव और मस्तानी के प्रेम में नजर आती हैं. बारूदों की गंध, तलवारों की टंकारों और खून से लथपथ युद्ध के मैदानों में भी प्रेम की सुकोमल भावनाओं की उपस्थिति सचमुच बहुत विलक्षण लगती है. शायद ऐसे माहौल में भी बाजीराव और मस्तानी कुछ पल निकाल कर एकदूसरे को प्रेमिल सहारा देते थे. मस्तानी ने बाजीराव के सपनों में बाधा खड़ी करने के बजाय मराठा साम्राज्य के चमत्कारिक प्रसार में योगदान किया था. लेकिन 18वीं सदी का रूढि़वादी समाज और शाही सोच प्रेम की भावनाओं को समझने में कतई समर्थ नहीं रहे. इसीलिए उन के रास्तों में लोगों, खासकर करीबी लोगों ने अनगिनत बाधाएं खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

मस्तानी के बारे में एक मान्यता यह भी है कि वह गुजरात के मुगल सूबेदार शुजाअत खां की दरबारी नर्तकी थी. 1724 में जब चिमनाजी अप्पा ने गुजरात पर हमला किया तो वह शुजाअत खां को मार कर मस्तानी को लूट लाया. बाद में मस्तानी को उस ने पेशवा बाजीराव की सेवा में सौंप दिया. गुजराती लोक गीतों में उसे अफगानी गुर्जर नर्तक जाति की माना जाता है. उसे ‘भवन कांचरी’ नृत्यांगना भी कहा जाता है. यहीं से वह छत्रसाल की रक्षा के लिए बाजीराव के साथ बुंदेलखंड गई. जैतपुर के युद्ध में उस के अदम्य साहस से खुश हो कर छत्रसाल ने उसे अपनी बेटी बना लिया था.

दूसरी मान्यता यह है कि मस्तानी राजपूत राजा छत्रसाल की ईरानी बेगम की बेटी थी. बचपन से ही उस ने नृत्य संगीत और शाही जिंदगी के हर रंग और अच्छेबुरे पहलुओं को जिया और सहा. सन 1728 में जब इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मुहम्मद खां बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला कर के छत्रसाल के बेटे जगतराज को बंदी बना लिया. इस स्थिति में बुजुर्ग राजपूत शासक ने मुहम्मद खां बंगश के सामने घुटने टेकने के बजाय उसे सबक सिखाने के लिए पेशवा बाजीराव प्रथम को सहायता प्रस्ताव भेजा.

बाजीराव तुरंत अपनी सेना सहित छत्रसाल की मदद के लिए आए और जैतपुर के युद्ध में उन्होंने मुहम्मद खां बंगश को बुरी तरह हरा दिया. इसी युद्ध में पहली बार बाजीराव ने मस्तानी को लड़ते देखा था, उसी समय वह उस के रूपसौंदर्य के साथसाथ उस के हुनर और काबिलियत पर फिदा हो गए थे. पहली नजर का यह प्यार आजीवन चला. छत्रसाल ने झांसी, ओरछा, बांदा की जागीर के साथसाथ बाजीराव के शादी के प्रस्ताव पर अपनी बेटी का हाथ भी उन्हें थमा दिया.

बाजीराव और मस्तानी एकदूसरे पर मर मिटे थे. बाजीराव उसे अपने साथ पूना ले आए, लेकिन मजहब की दीवारों और षड्यंत्रोंकुचक्रों ने उन का जीना मुहाल कर दिया. दोनों का अटूट प्रेम किसी से बरदाश्त नहीं हुआ. सन 1739 में नाना साहेब, चिमना जी अप्पा, राधा देवी और काशीबाई के षड्यंत्र सफल हुए. परिणामस्वरूप पेशवा को युद्ध अभियान में अकेले पूना से बाहर जाना पड़ा. उन की अनुपस्थिति में इन लोगों ने मस्तानी को पूना के पार्वती बाग में कैद कर लिया. बाजीराव इस खबर से भले ही टूट गए, लेकिन मस्तानी ने हिम्मत नहीं हारी.

किसी तरह आजाद हो कर मस्तानी पटास पहुंची. बाजीराव उसे सामने देख कर बहुत खुश हुए. लेकिन यह अंतिम मिलन ज्यादा देर तक नहीं चल सका. मस्तानी के पीछेपीछे पेशवा की मां राधा देवी और पटरानी काशी बाई भी पटास पहुंच गए और बाजीराव प्रथम पर दबाव डालना शुरू किया. एक तरफ मां की डांटफटकार और मराठा साम्राज्य की सौगंध दिलाई जा रही थी तो दूसरी तरफ काशीबाई के अविरल आंसू बाजीराव को धर्मसंकट में डाल रहे थे. भारी मन से बाजीराव ने मस्तानी को खुद से दूर कर के पूना भेज दिया. इस बिछोह का बाजीराव पर गहरा असर पड़ा.

एक ओर युद्ध उन्हें चैन नहीं लेने दे रहे थे, दूसरी ओर परिवार के लोग जिंदगी के खालीपन को बढ़ाने पर आमादा थे. जिन की वजह से बाजीराव को अपनी रूहानी प्रेरणा और ताकत मस्तानी को खुद से अलग करना पड़ा. बाजीराव मस्तानी की प्रेमकहानी ने भारतीय राजनीति को बहुत ही प्रभावित किया है लेकिन दुख की बात यह है कि यह प्रेम कहानी इतिहास के पन्नों में ही दर्ज हो कर खो गई. मस्तानी नफरत की शिकार होती चली गई. पावल में बनी उस की खंडहरनुमा कब्र को देख कर शायद ही कोई विश्वास कर सके कि यहां वह शख्सियत चिर निद्रा में दफन है, जिस की जिंदगी ने हिंदुस्तान के इतिहास की दशा और दिशा को बदल कर रख दिया था.

बाजीराव की मां राधा देवी, पत्नी काशीबाई, भाई चिमनाजी अप्पा और पुत्र अंजाने में इस प्रेम के दुश्मन बन बैठे थे. सच्चा प्यार कभी आसान नहीं होता, इसलिए बाजीराव और मस्तानी ने इस चुनौती को हंसतेहंसते स्वीकार किया था. सभी जानते हैं कि बाजीराव, मस्तानी को बुंदेलखंड से पूना ले आए थे. उस समय पेशवा पूना से और छत्रपति सतारा से अपना काम संभालते थे.

चूंकि मस्तानी की मां छत्रसाल की फारसी मुसलिम बेगम थीं, इसलिए मस्तानी को मराठा समाज कभी स्वीकार नहीं कर पाया. स्वयं बाजीराव का कट्टर ब्राह्मण समाज इस विवाह को मान्यता देने को तैयार नहीं था. बाजीराव के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी. एक ओर घरसमाज का विरोध था, दूसरी ओर मराठा साम्राज्य की पूरी जिम्मेदारी. वह चक्की के 2 पाटों के बीच फंस कर तड़पते रहे. एक तरफ मस्तानी का अनन्य प्रेम था, तो दूसरी ओर मराठा साम्राज्य के सपने थे, जिन्हें पूरा करना उन की सब से बड़ी प्राथमिकता थी. सन 1734 ई में उन्होंने मस्तानी के लिए अलग महल बनवाया. जहां उन्होंने इबादत के लिए मसजिद भी बनवाई थी. यह आज भी देखी जा सकती है.

बाजीराव ने मस्तानी से विवाह कर के उसे ब्याहता पत्नी का सम्मान दिया था. पटरानी चूंकि काशीबाई थी, इसलिए वह अपने ईर्ष्यालु स्वभाव की वजह से बाजीराव के कंधे से कंधा मिला कर साथ नहीं दे पाईं. उस समय समाज को पूरी तरह से दरकिनार करना पेशवा बाजीराव जैसे शक्तिशाली पुरुष के लिए भी संभव नहीं था. अप्रैल 1740 में बाजीराव जब अपने 1 लाख सैनिकों के साथ युद्ध के लिए दिल्ली आ रहे थे तो उन की सेना ने इंदौर के पास खरगोन में पड़ाव डाला. वहीं पर बाजीराव को तेज बुखार आया, जिस की वजह से उन की मृत्यु हो गई. वहीं पर नर्मदा नदी के किनारे उन का अंतिम संस्कार किया गया. बाद में सिंधिया ने वहां उन की याद में छतरी बनवाई.

मातापिता की मौत के बाद शमशेर बहादुर की परवरिश उस की सौतेली मां काशीबाई ने की थी. शमशेर बहादुर ने मराठा साम्राज्य के विस्तार में अपनी वीरता का परिचय भी दिया था. सिर्फ 39 साल की आयु में बाजीराव ने जीवन के सब रंग देख लिए थे. एक तरफ पेशवा के रूप में उन्होंने आकाश की बुलंदियों को छुआ तो दूसरी ओर पारिवारिक अंतर्कलह ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया था.

बाजीराव की मौत की खबर को मस्तानी सहन नहीं कर सकी और फिर जल्दी ही उस की भी जीवनलीला समाप्त हो गई. कहा जाता है कि इस दुखद खबर से व्यथित हो कर उस ने हीरा निगल लिया था, जिस से उस की मृत्यु हो गई थी. कुछ इतिहासकार उस की मौत की वजह विषपान मानते हैं. पूना से 65 किलोमीटर दूर पावल में मस्तानी की कब्र आज भी देखी जा सकती है.

इस प्रेम कहानी का दुखद अंत यह साबित करता है कि समाज चाहे कितना भी विकसित हो जाए, लेकिन सोच अथवा नजरिए को बदलने का संघर्ष सभी को करना पड़ता है. योग्यता भी अक्सर दकियानूसी सोच के आगे घुटने टेक देती है. बाजीराव चाहते तो अन्य योद्धाओं की तरह भोगविलास का जीवन व्यतीत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने प्रेम को सम्मान देने की कोशिश की और मरते दम तक इसी संघर्ष में बहादुरी से जूझते रहे.

यह भी दुख की ही बात है कि मस्तानी का चरित्र चित्रण अधूरा है. इतिहास में बहुत कम लोगों ने उस के बारे में लिखा है. उस समय के ऐतिहासिक दस्तावेज शायद इस घटना को मराठा गौरव के विपरीत मान कर इसे दबाने के लिए मौन रहे, लेकिन इश्क और मुश्क कब छिपे हैं? एक न एक दिन दुनिया उन की हकीकत से रूबरू हो ही जाती है. इसीलिए इतिहास में इन गुम पात्रों को फिल्मी रूपहले परदे पर साकार करने की कोशिशें भी होती रही हैं, लेकिन इस में इतिहास को किस तरह पेश किया जाता है यह अलग विषय है.

यहां काशीबाई के चरित्र की चर्चा किए बगैर यह कहानी अधूरी रहेगी. देखने में तो काशीबाई घोर स्वार्थी और षड्यंत्रकारी लगती थी, लेकिन इस में उस का क्या दोष था? वह बाजीराव की पटरानी थी. पति पर उस का हक था. वह अपने पति के प्रेम को पाने के लिए हमेशा तरसती रही. काशीबाई जिस हक की हकदार थी, वह उसे कभी नहीं मिला.

इसीलिए उस ने जो कुछ भी किया, वह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल ही था. काशीबाई में मानवीय चरित्र की अनेक कमियां हो सकती हैं, लेकिन यह भी सच है कि उस ने भी बाजीराव को दिल की गहराइयों से चाहा था. लेकिन उस की चाहत की कभी कद्र नहीं हुई. बाजीराव और मस्तानी नायकनायिका बन गए, जबकि काशीबाई खलनायिका बन कर इतिहास के अंधेरों में खो गई. Hindi Stories

Patna News: बुलाया शादी के लिए – मार दी गोली

Patna News: पटना के रहने वाले रजनीश ने शादी डौटकौम पर इंदौर की सृष्टि जैन का प्रोफाइल और फोटो देखा तो उसे मिलने के लिए फ्लाइट का टिकट भेज कर पटना बुला लिया. लेकिन सृष्टि के पटना आने पर ऐसा क्या हुआ कि रजनीश को अपने हाथ उस के खून से रंगने पड़े.

25 जनवरी की सुबह के 10 बज रहे थे. सोमवार का दिन होने की वजह से सड़कों पर कुछ ज्यादा ही भीड़भाड़ थी. पटना के मीठापुर का भी वही हाल था. सड़कों पर भीड़भाड़ की वजह से गाडि़यां सरकसरक कर चल रही थीं. उसी भीड़ में एक औटो भी हौर्न बजाता हुआ आगे निकलने की कोशिश में लगा था. उस में एक लड़की बैठी थी, जो औटो ड्राइवर से बारबार जल्दी से जल्दी पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन पर पहुंचाने को कह रही थी. लेकिन भीड़ की वजह से औटो आगे बढ़ नहीं पा रहा था. औटो में बैठी लड़की कभी अपनी घड़ी देखती तो कभी औटो से सिर बाहर निकाल कर पीछे की ओर देखती.

जैसे ही औटो चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास पहुंचा, एक सफेद रंग की बुलेट मोटरसाइकिल पीछे से आ कर औटो के साथसाथ चलने लगी. उस पर 2 युवक सवार थे. उन्हें देख कर लड़की घबरा गई और उस ने ड्राइवर से औटो भगाने को कहा. लेकिन भीड़ की वजह से औटो ड्राइवर औटो भगा नहीं सका. इसी बीच मोटरसाइकिल पर पीछे बैठे युवक ने पिस्तौल निकाली और औटो में बैठी लड़की को लक्ष्य बना कर 4 गोलियां दाग दीं.

लड़की पर गोलियां दाग कर मोटरसाइकिल सवार जिस तरह पीछे से आराम से आए थे, उसी तरह आराम से आगे बढ़ गए. उन्हें रोकने की कोई हिम्मत भी नहीं कर सका. गोलियां लगने से लड़की चीखी तो औटो ड्राइवर ने औटो रोका और लड़की की मदद करने के बजाय वह औटो ही छोड़ कर भाग गया. गोलियां चलने से बाजार में अफरातफरी मच गई थी. लोग दुकानें बंद करने लगे थे. थोड़ी देर में अफरातफरी थमी तो लोगों को पता चला कि औटो में बैठी लड़की पर गोलियां चलाई गई थीं. वह अभी भी उसी में घायल पड़ी है. कुछ लोगों ने तुरंत उसे अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

पुलिस को सूचना दी गई. पहले पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया, उस के बाद अस्पताल गई. शिनाख्त के लिए लड़की के पर्स और बैग की तलाशी ली गई तो उन में से मिले कागजातों से पता चला कि लड़की का नाम सृष्टि जैन था. वह इंदौर के स्नेहनगर की रहने वाली थी. 23 जनवरी को वह गो एयर की फ्लाइट से दिल्ली से पटना आई थी और मीठापुर के मणि इंटरनेशनल होटल में ठहरी थी. 24 जनवरी को उसे फ्लाइट से दिल्ली जाना था, लेकिन उस ने फ्लाइट का टिकट कैंसिल करा कर 25 जनवरी को पटना से इंदौर जाने के लिए पटनाइंदौर एक्सप्रैस का टिकट करवाया था. 25 जनवरी की सुबह 10 बजे वह होटल छोड़ कर औटो से पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन जा रही थी, तभी रास्ते में उसे गोली मार दी गई थी.

इस के बाद 11 बजे के करीब उस की मां ममता जैन ने सृष्टि के मोबाइल पर फोन कर के पता करना चाहा कि क्या वह ट्रेन में बैठ गई है तो किसी पुलिस वाले ने फोन रिसीव कर के उन्हें बताया कि सृष्टि को गोली मार दी गई है और वह अस्पताल में है. जिस समय सृष्टि को गोली मारी गई थी, औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह औटो छोड़ कर भाग गया था. पुलिस ने उस के औटो में लिखे पुलिस कोड जे-647 से उस का मोबाइल नंबर और पता ले कर उसे फोन किया. वह परसा बाजार के पूर्वी रहीमपुर गांव का रहने वाला था. थाने आने पर औटो ड्राइवर राजकपूर सिंह से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि लड़की पर गोली चलाए जाने के बाद वह काफी डर गया था.

वह उस लड़की को ले कर स्टेशन जा रहा था, तभी चाणक्य लौ यूनिवर्सिटी के पास बुलेट मोटरसाइकिल से 2 लड़के आए और उन में से पीछे बैठे लड़के ने लड़की को गोली मार दी थी. गोली मार कर वे करबिगहिया की ओर गए थे. पुलिस ने जब सृष्टि के पिता सुशील जैन से बातचीत की तो उन्होंने बताया कि शादी डौटकौम पर 20 दिनों पहले उन की छोटी बेटी शगुन ने मृतका सृष्टि का प्रोफाइल डाला था. बिहार का कोई लड़का उसे पसंद आ गया था तो वह उसी से मिलने पटना आई थी.

जब सृष्टि की बहन शगुन से पूछताछ की गई तो उस ने बताया था कि शादी डौटकौम पर सृष्टि का प्रोफाइल देख कर पटना के रजनीश की ओर से उस के लिए विवाह का प्रस्ताव आया था. रजनीश सृष्टि को अपने घर वालों से मिलवाना चाहता था, इसीलिए उस ने सृष्टि को पटना बुलवाया था. रजनीश ने ही सृष्टि के लिए फ्लाइट का टिकट भी भेजा था और पटना में ठहरने के लिए होटल का भी इंतजाम किया था. 23 जनवरी की सुबह 11 बज कर 35 मिनट पर वह पटना पहुंची थी और मणि इंटरनेशनल होटल के कमरा नंबर 106 में ठहरी थी.

उसी दिन दोपहर 2 बज कर 10 मिनट पर रजनीश सिंह ने अपने दोस्त राहुल के साथ उसी होटल में कमरा नंबर 107 बुक कराया था. होटल के रजिस्टर में उस ने अपने पिता का नाम राजेश्वर प्रसाद सिंह और पता राघौपुर, जिला वैशाली लिखा था. 24 जनवरी को सभी होटल से निकल गए थे, लेकिन कुछ देर बाद सृष्टि होटल लौट आई थी और इस बार वह कमरा नंबर 103 में ठहरी थी. उस ने होटल मैनेजर को बताया था कि उस का टिकट कंफर्म नहीं हुआ, इसलिए वह वापस आ गई थी.

24 जनवरी को एक बार फिर रजनीश अपने दोस्त राहुल के साथ होटल पहुंचा और सीधे सृष्टि के कमरे में गया. होटल के मैनेजर राजकुमार के अनुसार, इस बार रजनीश सृष्टि के कमरे पर गया तो दोनों के बीच किसी बात को ले कर बहस होने लगी. जल्दी ही इस बहस ने तल्खी का रूप ले लिया. इस कहासुनी में सृष्टि बारबार कह रही थी कि अब वह उस के पीछे नहीं आएगा. जबकि रजनीश उसे धोखेबाज कह रहा था. उस का कहना था कि उस ने उस के 1 लाख रुपए ठग लिए हैं.

रजनीश से मिलने के बाद सृष्टि ने अपने घर वालों को फोन कर के बताया था कि रजनीश उसे ठीक आदमी नहीं लगता. उस के पास पिस्तौल भी है, जिसे ले कर वह घूमता है. वह एयरपोर्ट पर भी पिस्तौल ले कर आया था. वह ऐसे आदमी से कतई विवाह नहीं करेगी, बाकी बातें वह इंदौर लौट कर बताएगी. सृष्टि की मां ममता जैन ने बताया था कि रजनीश ने उन से भी फोन पर मीठीमीठी बातें की थीं. वापस आने के लिए सृष्टि 24 जनवरी को फ्लाइट पकड़ने के लिए एयरपोर्ट पर गई थी, लेकिन फ्लाइट नहीं मिली. इस के बाद उस ने पटनाइंदौर एक्सप्रैस से 25 जनवरी को लौटने का टिकट लिया था.

सृष्टि के पिता सुशील जैन मूलरूप से राजस्थान के उदयपुर के रहने वाले थे. 4 साल पहले ही वह इंदौर आ कर रहने लगे थे. यहां वह एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे. उन के परिवार में पत्नी ममता जैन के अलावा 2 बेटियां, बड़ी सृष्टि और छोटी शगुन थी. सृष्टि ने उदयपुर से एमबीए किया था, जबकि शगुन 12वीं में पढ़ रही थी. उन का परिवार इंदौर के स्नेहनगर में रहता था. इस के पहले वह खातीवाला टैंक में अनमोल पैलेस में फ्लैट नंबर 402 में रहते थे. इंदौर की कई कंपनियों में काम करने के बाद सृष्टि दिल्ली में इंडिया बुल्स कंपनी में टीम लीडर के पद पर काम कर रही थी. पिछले महीने उस ने यह नौकरी छोड़ दी थी और दूसरी कंपनी में नौकरी पाने की कोशिश कर रही थी. नौकरी छोड़ने के बाद सृष्टि इंदौर आ कर मांबाप के साथ रह रही थी.

लाश के निरीक्षण के दौरान पुलिस ने देखा था सृष्टि के हाथ पर ‘आर एस’ अक्षर का टैटू बना था, जिस से अंदाजा लगाया कि यह ‘रजनीश सृष्टि’ लिखा है. उस के दूसरे हाथ पर ‘सम लव वन, सम लव यू, आई लव यू, दैट इज यू’ लिखा था. पुलिस ने होटल के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज निकलवा कर चेक की तो उस में सृष्टि से जुड़ी कई बातें सामने आईं. फ्लाइट न मिलने पर जब वह होटल लौटी तो उस की मुलाकात बंगलुरु के रहने वाले सुरेश रेड्डी से हुई. फुटेज में वह होटल के रिसैप्शन काउंटर के पास वाले सोफे पर रेड्डी के साथ बैठी हुई दिखाई दे रही थी.

सृष्टि ने रेड्डी के साथ सैल्फी लेने की बात कही तो पहले तो उस ने मना कर दिया. बातचीत में सृष्टि ने उसे बताया था कि वह इंदौर से पटना आई है. वह एक मोबाइल फोन खरीदना चाहती है, वह चल कर खरीदवा दे. इस के बाद रेड्डी उसे औटो से बाजार ले गया था. रेड्डी अपनी कंपनी के काम से पिछले 15 दिनों से उस होटल में ठहरा था. फुटेज से यही लगता था कि 24 जनवरी को सृष्टि और रेड्डी की मुलाकात थोड़ी ही देर में दोस्ती में बदल गई थी. होटल से निकलने के बाद उन्होंने 10 हजार रुपए का मोबाइल फोन खरीदा था. मोबाइल का बिल रेड्डी के नाम से बना था. इस के बाद दोनों नाइट शो फिल्म देख कर देर रात होटल लौटे थे. होटल स्टाफ ने भी पुलिस को उन के देर से लौटने की बात बताई थी.

पुलिस सूत्रों के अनुसार, सृष्टि के मोबाइल फोन के मेमोरी कार्ड से पुलिस को कुछ आपत्तिजनक वीडियोज मिले थे, लेकिन पुलिस इस बारे में कुछ नहीं बता रही है. मेमोरी कार्ड से पता चलता है कि सृष्टि विवाहित थी. लेकिन वह औनलाइन साथी की तलाश में थी. रजनीश की तरह सृष्टि ने भी अपने प्रोफाइल में खुद के बारे में गलत जानकारियां दी थीं. सृष्टि के परिवार वालों ने पुलिस को बताया था कि उदयपुर में पढ़ाई के दौरान ही सृष्टि ने प्रेमविवाह कर लिया था, लेकिन वह शादी कुछ समय बाद ही टूट गई थी और सन 2011 में सृष्टि ने अपने पति से तलाक ले लिया था.

सोचने वाली बात यह है कि अगर रजनीश से सृष्टि की पहले से जानपहचान नहीं थी तो किसी अजनबी के बुलाने पर वह इंदौर से पटना कैसे चली गई? रजनीश सृष्टि के पड़ोस वाले कमरे में ही रात में ठहरा था. लेकिन यह बात उस ने अपने घर वालों को नहीं बताई थी. दोनों के बीच कहीं पहले से तो कोई रिश्ता नहीं था? आखिर रजनीश बारबार सृष्टि पर एक लाख रुपए ठगने का आरोप क्यों लगा रहा था? केवल विवाह के प्रस्ताव ठुकराने से कोई किसी लड़की की हत्या क्यों करेगा?

सृष्टि की हत्या के 8 दिनों बाद 2 फरवरी को सृष्टि के हत्यारे रजनीश को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. वह अपनी पत्नी और  दोनों बच्चों के साथ कंकड़बाग में अपने किसी रिश्तेदार के यहां गया था, तभी पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. पुलिस को उस के वहां आने की जानकारी पहले से थी, इसलिए सादे लिबास में वहां पुलिस वालों को तैनात कर दिया गया था. उस के आते ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया था. वह पटना से हो कर दिल्ली भागने की फिराक में था. पूछताछ में रजनीश ने पुलिस को बताया था कि सृष्टि उसे ब्लैकमेल करने लगी थी. लोगों को ब्लैकमेल करना उस की आदत में शुमार था. इस काम में उस का परिवार भी उस का साथ देता था. पुरुषों को फंसा कर वह रुपए ऐंठती थी. यहां आ कर उस ने उस से गहने खरीदने को कहा था.

सृष्टि के बारबार बदलते बातव्यवहार से ही रजनीश को उस पर शक हो गया था, जिस से उस ने गहने खरीदने से मना कर दिया था, इसी बात से सृष्टि उस से नाराज हो गई और होटल में ही उस से बहस करने लगी, जो जल्दी तल्खी में बदल गई. बात ज्यादा बढ़ी तो वह रजनीश को गालियां देने लगी. इस के बाद सृष्टि ने अपना सामान उठाया और अकेली ही औटो से स्टेशन की ओर चल पड़ी. रजनीश के पास पिस्तौल थी ही, उस ने देखा कि सृष्टि उसे धोखा दे कर जा रही है तो उस ने बुलेट से जा कर रास्ते में उसे गोली मार दी.

राघौपुर के वीरपुर बरारी टोला का रहने वाला रजनीश किसान राजेश्वर प्रसाद सिंह का बेटा है. पुलिस ने उस के गांव वाले घर पर छापा मारा तो वहां से 7.65 बोर की गोलियों के 6 खोखे मिले हैं. रजनीश की 13 साल पहले किरण सिंह से शादी हुई थी. उस के 2 बच्चों में बड़ा बेटा प्रियांशु 12 साल का और छोटा बेटा कुणाल 9 साल का है.  रजनीश की गिरफ्तारी से किरण काफी परेशान है. उस का कहना है कि उस के पति किडनी के मरीज हैं, अगर उन्हें समयसमय पर दवाएं नहीं दी गईं तो उन की जान जा सकती है.

14 दिसंबर, 2007 में किरण ने दिल्ली के अपोलो हौस्पिटल में अपनी किडनी दान की थी. दूसरी किडनी रजनीश के बड़े भाई अनिल ने 4 मार्च, 2015 को दी थी, जिस की वजह से उसे दिन में 3 बार दवा खानी पड़ती है. पीने के लिए उसे मिनरल वाटर दिया जाता है. सृष्टि के पिता का कहना है कि रजनीश पुलिस को बेमतलब की कहानियां गढ़ कर सुना रहा है. हत्या को ले कर भी वह पुलिस को बरगला रहा है. सृष्टि की मां का कहना है कि किसी अनजान लड़की से 5-10 दिनों की बातचीत में रजनीश ने ढाई लाख रुपए से ज्यादा उस पर कैसे और क्यों खर्च कर दिए?

4 जनवरी को सृष्टि की बहन शगुन ने उस की शादी का प्रोफाइल शादी डौटकौम वेबसाइट पर डाला था. उस के 10 दिनों बाद रजनीश की ओर से शादी का प्रस्ताव आया था. रजनीश ने बताया था कि उस के पिता की मोटरसाइकिल की एजेंसी है, जिस का सालाना कारोबार 70-80 लाख रुपए का है. अपने बारे में उस ने बताया था कि वह आईपीएस की तैयारी कर रहा है. उस के इसी प्रोफाइल और प्रस्ताव के बाद ही सृष्टि उस से मिलने पटना आई थी.

पुलिस सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रजनीश की तरह सृष्टि ने भी शादी के वेबसाइट पर अपने बारे में गलत जानकारियां दे रखी थीं. उस ने पहले विवाह और तलाक के बारे में बिलकुल नहीं बताया था. रजनीश तो गलत था ही, सृष्टि भी अपने बारे में गलत जानकारी दे कर दोबारा शादी की फिराक में थी. पुलिस पूछताछ में रजनीश ने सृष्टि की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस ने सृष्टि से हुई जानपहचान के बारे में पुलिस को जो बताया था, उस के अनुसार, उस ने सृष्टि पर काफी रुपए खर्च कर दिए थे. इस के बाद भी वह उस से और कई चीजें खरीदने को कह रही थी. इस से उसे लगा कि यह काफी खर्चीली है. अब तक वह उस से करीब 2 लाख रुपए खर्च करवा चुकी थी.

24 जनवरी को रजनीश ने सृष्टि के पास एक नया मोबाइल फोन देखा, जिस में सृष्टि ने सुरेश रेड्डी के साथ सैल्फी ले रखी थी. वह फोटो देख कर उस के दिल को काफी गहरी ठेस लगी. रजनीश की अपनी पत्नी से बिलकुल नहीं पटती थी, इसीलिए वह दूसरी शादी के बारे में सोच रहा था. पहली नजर में सृष्टि रजनीश को बहुत अच्छी लगी थी, जिस से उस ने उस से विवाह करने का मन बना लिया था. विवाह के बाद वह उस के साथ दिल्ली में रहना चाहता था. लेकिन जब वह उस की ऊलजुलूल मांगों को पूरी नहीं कर सका तो सृष्टि ने उस से विवाह करने से मना कर दिया था.

पुलिस को दिए अपने बयान में रजनीश ने बताया था कि सृष्टि की हत्या कर के वह मीठापुर से सीधा अनीसाबाद होते हुए हाजीपुर चला गया था. रास्ते में महात्मा गांधी पुल से उस ने अपना मोबाइल फोन, टैबलेट और पिस्तौल का लाइसेंस गंगा नदी में फेंक दिया था. इसी के साथ अपनी बुलेट मोटरसाइकिल को नाव पर रख कर गंगा नदी के बीच में डुबो दिया था. इस के बाद वह हाजीपुर, वैशाली और पटना में ठिकाने बदलबदल कर समय गुजारता रहा.

रजनीश के बड़े भाई अनिल सिंह ने पुलिस को दिए बयान में कहा था कि रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट कराई गई है, जिस से वह शारीरिक रूप से काफी कमजोर है. ऐसे में वह किसी की हत्या कैसे कर सकता है? उसे दिन में 4 बार दवाइयां खानी पड़ती हैं और मिनरल वाटर पीना पड़ता है. ट्रांसपोर्टर का कारोबार करने वाले अनिल का कहना है कि तबीयत खराब रहने की वजह से रजनीश गांव पर ही ब्याज पर रुपए देने  का काम करता था. उसे हत्या के इस मामले में फंसाया गया है. बहरहाल, रजनीश पुलिस की गिरफ्त में है और सृष्टि की मौत हो चुकी है. सृष्टि के पिता इस हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

पुलिस का कहना है कि रजनीश के तार किडनी बेचने वाले गिरोह से जुड़े हो सकते हैं. शादी के बहाने रजनीश ने अपहरण की नीयत से सृष्टि को पटना बुलाया था, लेकिन उस से बातचीत के बाद सृष्टि को कुछ खतरा महसूस हुआ तो उस ने वापस जाने में ही अपनी भलाई समझी. लेकिन वह लौट नहीं पाई, क्योंकि रजनीश को उस से खतरा था. रजनीश पहले भी एक बच्चे के अपहरण के मामले में जेल जा चुका है. वैशाली के थाना जोरावरपुर में उस पर अपहरण का केस दर्ज है. कुछ दिनों पहले ही वह जमानत पर छूटा था. अगवा किए गए बच्चे का अब तक कोई सुराग नहीं मिल सका है. पुलिस जांच में पता चला है कि बच्चे का अपहरण किडनी निकालने के मकसद से किया गया था.

जांच के बाद पुलिस ने उस का खाता सील कर दिया था, जिस में 90 लाख रुपए जमा थे. उस के घर से फरजी स्टांप और कई सरकारी अफसरों की मुहरें बरामद हुई थीं. रजनीश खुद भी 2 बार किडनी ट्रांसप्लांट करवा चुका है. पुलिस यह पता कर रही है कि जिस डाक्टर ने उस की किडनी ट्रांसप्लांट की थी, कहीं रजनीश उस डाक्टर या अस्पताल के साथ मिल कर किडनी बेचने का रैकेट तो नहीं चला रहा था? पुलिस को जानकारी मिली है कि सृष्टि ने दिल्ली में किसी डाक्टर के यहां भी काम किया था. हो सकता है रजनीश की किडनी ट्रांसप्लांट के दौरान उन की जानपहचान हुई हो? दोनों के बीच रुपयों को ले कर होटल में हुई बहस कहीं किडनी खरीदबिक्री के रैकेट से तो नहीं जुड़ी थी?

रजनीश भी पिछले कुछ दिनों से दिल्ली में ही रह रहा था और किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाले मरीजों को किडनी मुहैया कराने की दलाली का काम करने लगा था. इस काम से उस ने काफी पैसे कमाए थे. वह जब भी अपने गांव वीरपुर आता था, दोस्तों पर खूब पैसा खर्च करता था. लेकिन सृष्टि के पिता का कहना है कि सृष्टि और रजनीश की पहले से जानपहचान और प्रेम प्रसंग की बात बिलकुल गलत है. एसएसपी मनु महाराज के अनुसार, पुलिस रिकौर्ड के मुताबिक रजनीश का आपराधिक रिकौर्ड रहा है. उस के बीमार और कमजोर होने की वजह से पुलिस उस से फिलहाल सख्ती से पूछताछ नहीं कर पा रही है. Patna News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Agra Crime: केमिस्ट्री शिक्षक गिरफ्तार, यूट्यूब से सीखकर बना रहा सिंथेटिक ड्रग्स

Agra Crime: एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक केमिस्ट्री का टीचर यूट्यूब पर वीडियो देखकर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था. जब इस टीचर के बारे में पता चला तो सभी हैरान थे. अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों एक टीचर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह मामला यूपी के आगरा के खंदौली से सामने आया है, जहां आरोपी मनोज फिरोजाबाद जिले के थाना नारखी क्षेत्र के गांव मरसलगंज का रहने वाला है. फिलहाल 36 वर्षीय मनोज आगरा के थाना खंदौली क्षेत्र के नगला मट्टू में दिनेश उपाध्याय के मकान में किराए पर रह रहा था. वह इसी किराए के घर में सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था.पुलिस ने मनोज को अरेस्ट कर लिया है.

पुलिस के अनुसार, मनोज से करीब 700 लीटर से अधिक केमिकल और उपकरण बरामद किए हैं. जिस में पुलिस को 450 लीटर डिस्टिल्ड वाटर, 120 लीटर मिथाइल, 27.5 लीटर हाइड्रोब्रोमिक एसिड, 100 लीटर एथाइल, 50 लीटर एसीटोन, 40 लीटर हाइड्रोक्लोरिक एसिड, 9 लीटर एथेनाल. इस के अलावा और भी उपकरण पुलिस ने बरामद किए हैं. बताया जाता है कि इस केमिकल का इस्तेमाल एमडीएमए जैसे नशीले पदार्थ के लिए किया जाता है. पुलिस ने आरोपी को अरेस्ट कर लिया है और उस से विस्तार से पूछताछ की जा रही है. Agra Crime

Crime News: कला का पुजारी, कलाकार का कातिल

Crime News: मौडर्न आर्ट से नाम कमाने वाले चिंतन उपाध्याय ने एक नायक बन कर हेमा हिरानी से प्यार ही नहीं किया, जीवनसाथी भी बनाया. लेकिन जब उन के प्यार में दरार आई तो चिंतन को खलनायक बनते देर नहीं लगी.

21 नवंबर को जयपुर के जवाहर कला केंद्र में जयपुर आर्ट समिट की शुरुआत हुई. समिट के पहले दिन गाय की डमी को एक बैलून के सहारे आसमान में लटकाया गया था. गाय की डमी वाली यह कलाकृति सिद्धार्थ करवाल की थी. जिस समय यह समिट शुरू हुआ था, उस समय देश भर में बीफ को ले कर काफी विवाद चल रहा था. पीपुल फार एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी तमाम कार्यकर्ताओं के साथ समिट में पहुंचे और गाय की उस कलाकृति को ले कर हंगामा करने लगे. सूचना मिलने पर थाना बजाजनगर की पुलिस ने वहां जा कर कलाकृति को उतरवा लिया.

पुलिस को हंगामा करने वालों पर काररवाई करनी चाहिए थी, लेकिन पुलिस ने इस के बजाय कलाकारों से ही धक्कामुक्की नहीं की, बल्कि एक कलाकार अनीश अहलूवालिया के तो बाल तक पकड़ कर खींचे. जबकि कलाकार सिद्धार्थ करवाल, जिस की कलाकृति पर यह हंगामा हुआ था, उन का कहना था कि हम ने तो गाय की पीड़ा को दर्शाया है. आज धरती पर गाय को न कच्ची जमीन मुहैया है, न ही चारा. जब तक गाय दूध देती है, तब तक लोग उसे खिलाते हैं, उस के बाद खुला छोड़ देते हैं. हम ने अपनी कलाकृति के माध्यम से यह जताना चाहा है कि अगर यही हालात रहे तो आगे चल कर गाय जमीन छोड़ कर आसमान में रहना पसंद करेगी. हालात बदलने के लिए मैं ने यह बात अपनी कला के माध्यम से कहने की कोशिश की है.

दूसरी ओर पीपुल फौर एनीमल संस्था के संयोजक सूरज सोनी का कहना था कि गाय की डमी को इस तरह आकाश में लटका कर आखिर कलाकार क्या संदेश देना चाहते हैं. इस कृति पर ऐसा कोई स्पष्ट संदेश लिखा भी नहीं गया था. यह जनभावना को आहत करने वाला काम है. गाय को पूजनीय मानने वाला समाज इसे सहन नहीं करेगा. सोनी ने मुख्यमंत्री औफिस को फैक्स भेज कर मामले की जांच की भी मांग की थी.

हंगामे के दौरान कलाकार अनीश अहलूवालिया और चिंतन उपाध्याय ने सिद्धार्थ करवाल की इस कलाकृति को सही ठहराते हुए पुलिस से उलझने की कोशिश की थी. इसलिए पुलिस दोनों कलाकारों को थाने ले गई. लेकिन वहां इन दोनों को यह हिदायत दे कर छोड़ दिया गया कि वे गाय की डमी को दोबारा हवा में नहीं लटकाएंगे. थाना बजाजनगर के थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता का कहना था कि गाय की डमी उतरवाने के साथ ही विरोध करने वाले शांत हो गए थे. एक तरह से यह विवाद यहीं खत्म हो गया था. बात खत्म हो गई थी सो थाने में कोई मामला भी दर्ज नहीं किया गया. इस के बावजूद यह मामला पूरे देश में मीडिया की सुर्खियां बन गया.

मीडिया द्वारा इस घटना की जानकारी राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को मिली तो उन्होंने ट्वीट कर के कलाकारों के साथ हुई अभद्रता पर दुख जताया. उन्होंने लिखा कि मैं इस घटना से आहत हूं. जयपुर के पुलिस कमिश्नर जंगा श्रीनिवास ने कलाकारों से व्यक्तिगत रूप से बात कर के अभद्रता के लिए माफी मांगी. विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय संयोजक नरपत सिंह ने भी कलाकारों का समर्थन करते हुए कहा कि विरोध का यह तरीका गलत है. विहिप इस विरोध में शामिल नहीं है. कलाकारों से अभद्रता के मामले में थाना बजाजनगर थानाप्रभारी महेंद्र कुमार गुप्ता और कांस्टेबल सुमेर सिंह को लाइन हाजिर कर दिया गया.

यह कहानी ऊपर वाले मामले में विरोधियों का डट कर सामना करने वाले कलाकार चिंतन उपाध्याय की है. उन की आगे की इस कहानी में एक नायिका भी है. वह भी कलाकार है. चिंतन भी मौडर्न आर्ट बनाते हैं और नायिका भी. दोनों की चरचा देश में ही नहीं, विदेशों तक है. चित्र बनातेबनाते ही दोनों के दिल मिल गए. प्यार इतना बढ़ा कि शादी कर ली. लेकिन शादी के बाद धीरेधीरे उन के प्यार का रंग हलका पड़ता गया और आगे चल कर उन की यह प्रेम कहानी खूनी बन गई.

12 दिसंबर को मुंबई के उत्तरी उपनगर कांदीवली की धानुकवाड़ी के एक नाले में गत्ते के डिब्बों में बंद पौलीथिन में लिपटी 2 लाशें मिलीं. नाले में पड़े उन डिब्बों की सूचना किसी सफाई करने वाले ने पुलिस को दी थी. पुलिस ने मौके पर पहुंच कर दोनों लाशें बरामद कीं. इन में एक लाश महिला की थी और दूसरी पुरुष की. लाशों के निरीक्षण में पुलिस को लगा कि दोनों को गला घोंट कर मारा गया है. उस के बाद लाशों को पौलीथिन में लपेट कर डिब्बों में भर कर फेंका गया था. महिला के दोनों हाथ बंधे थे और शरीर पर पूरे कपड़े नहीं थे. वैसी ही हालत पुरुष लाश की भी थी. दोनों लाशें पूरी तरह क्षतविक्षत नहीं हुई थीं, जिस से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि  इन की हत्या एक दिन पहले ही हुई है.

अगले दिन यानी 13 दिसंबर को दोनों लाशों की शिनाख्त हो गई. महिला की लाश मशहूर कलाकार चिंतन उपाध्याय की ही तरह प्रसिद्ध कलाकार उन की पत्नी हेमा उपाध्याय की थी, जबकि दूसरी लाश हेमा के वकील हरीश भंबानी की थी. हेमा और हरीश दोनों ही 11 दिसंबर की शाम से लापता थे. हेमा उपाध्याय के घरेलू नौकर हेमंत मंडल ने पुलिस को 11 दिसंबर की शाम को ही हेमा के लापता होने की सूचना दे दी थी. हेमा के घर वालों ने भी उसी दिन पुलिस को उन की गुमशुदगी के बारे में तहरीर दे दी थी. कलाकार हेमा उपाध्याय की लाश मिलने के बाद देश के कला जगत में सनसनी फैल गई थी.

पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ हत्या और सबूत मिटाने का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी. दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करा कर लाशें उन के घर वालों को सौंप दी गई थीं. घर वालों ने उसी दिन यानी 13 दिसंबर को ही उन का अंतिम संस्कार कर दिया था. एक तरफ मृतकों का अंतिम संस्कार हो रहा था तो दूसरी ओर पुलिस ने उन्हें मारने वालों में से 3 लोगों को हिरासत में ले लिया था, जिन के नाम थे, प्रदीप राजभर, विजय राजभर और आजाद राजभर.

इन से की गई पूछताछ के बाद मुंबई पुलिस ने स्पेशल टास्क फोर्स की मदद से उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी के थाना बड़ागांव के अंतर्गत आने वाले गांव कविरामपुर से शिवकुमार राजभर उर्फ साधु को गिरफ्तार किया. पुलिस ने गिरफ्तार किए गए लोगों से हेमा और हरीश के कई एटीएम कार्ड और मोबाइल फोन बरामद कर किए. पुलिस को शुरुआती जांच में ही पता चल गया था कि हेमा उपाध्याय के अपने पति चिंतन उपाध्याय से संबंध अच्छे नहीं थे. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय से भी लंबी पूछताछ की थी. लेकिन सबूत न मिलने की वजह से उन्हें छोड़ दिया गया था. जबकि हेमा के घर वालों ने पहले ही चिंतन पर संदेह जताया था. पुलिस ने चिंतन को छोड़ जरूर दिया था, लेकिन चोरीछिपे उन पर नजर रखे हुए थी.

21 दिसंबर की शाम पुलिस ने चिंतन को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुलाया. रात भर पूछताछ चलती रही. इस पूछताछ में उस ने जो भी बयान दिया, उन में कुछ बातें विरोधाभासी थीं, जिस के बाद 22 दिसंबर को पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 302, 201 एवं 120 के तहत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने चिंतन को उसी दिन अदालत में पेश किया और पूछताछ एवं सबूत जुटाने के लिए एक जनवरी, 2016 तक के लिए रिमांड पर ले लिया.

पहले गिरफ्तार किए गए 4 आरोपी भी रिमांड पर चल रहे थे. इन सभी से पूछताछ में मुख्य अभियुक्त के रूप में विद्याधर राजभर उर्फ गोटू का नाम सामने आया. अब पुलिस विद्याधर को पकड़ने की कोशिश करने लगी. लेकिन लाख कोशिश के बाद भी वह पुलिस की पकड़ में नहीं आया. गिरफ्तार लोगों से की गई पूछताछ में इस बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी. हेमा उपाध्याय चिंतन से शादी से पहले हेमा हिरानी थीं. हेमा का जन्म सन 1972 में गुजरात के बड़ौदा में हुआ था. सन 1992 में हेमा जब बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री (पेंटिंग) की पढ़ाई कर रही थीं, तभी उन का परिचय चिंतन उपाध्याय से हुआ.

चिंतन उपाध्याय राजस्थान का रहने वाला था. उस का जन्म सन 1972 में बांसवाड़ा जिले के परतापुर गांव में हुआ था. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय विख्यात चित्रकार और सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं. वह नेशलन ललित कला अकादमी, नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार सहित कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित हैं. पिता की चित्रकारी, कूची और कैनवास को देखदेख कर चिंतन में भी चित्रकारी के प्रति रुचि बढ़ती गई. उस ने भी पेंटिंग में फाइन आर्ट की बैचलर डिग्री के लिए बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया.

चिंतन और हेमा एक ही बैच में पढ़ रहे थे. उन की उम्र भी लगभग बराबर थी. साथसाथ पढ़ाई करते और पेंटिंग बनातेबनाते दोनों एकदूसरे के साथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे. उन का प्यार परवान चढ़ता गया. सन 1995 में दोनों ने बैचलर डिग्री की पढ़ाई पूरी कर के पेंटिंग से फाइन आर्ट की मास्टर डिग्री के लिए उसी यूनिवर्सिटी में प्रवेश ले लिया. 2 सालों की मास्टर डिग्री की पढ़ाई के दौरान चिंतन और हेमा अपने प्यार की पेंटिंग को भी अनेक रंगों से सजाते रहे. अपने प्यार की कल्पनाओं को ड्राइंग शीट और कैनवाश पर उतारते रहे.

सन 1997 में दोनों ने मास्टर डिग्री हासिल कर ली. इस बीच उन्होंने अपनी बनाई पेंटिंग से देश के कला जगत में अपनी अच्छी पहचान बना ली थी. अब तक उन का प्यार इतना बढ़ चुका था कि वे एकदूसरे के बिना रह नहीं पाते थे. शायद यही वजह थी कि सन 1998 में हेमा और चिंतन ने शादी कर ली और मुंबई में बस गए. शादी करने के बाद मन को संतोष मिला तो हेमा और चिंतन की कलाकृतियों में और भी निखार आ गया. देश की अनेक ख्यातिनाम आर्ट गैलरियों में उन के चित्रों की प्रदर्शनियां लगने लगीं. उन के चित्रों की सराहना भी खूब होती थी. हेमा उपाध्याय अपनी कलाकृतियों के साथ फोटोग्राफी के लिए भी जानी जाने लगीं.

कला में सफलता मिलने के बाद हेमा और चिंतन आर्थिक रूप से मजबूत हुए तो उन्होंने मुंबई के पौश इलाके जुहू में एक करोड़ 20 लाख रुपए में एक फ्लैट खरीद लिया. इस फ्लैट में हेमा का हिस्सा 15 प्रतिशत और चिंतन का हिस्सा 85 प्रतिशत था. चिंतन ने हेमा के साथ मुंबई में फ्लैट भले ही ले लिया था, लेकिन जयपुर से उन्होंने नाता पहले की ही तरह बनाए रखा. निर्माणनगरी में रहने वाले अपने पिता विद्यासागर उपाध्याय के यहां वह बराबर आतेजाते रहे. इस की एक वजह यह भी थी कि मुंबई और दिल्ली की तरह जयपुर का भी कला की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थान है. अपने काम के सिलसिले में चिंतन देश के विभिन्न शहरों के अलावा विदेश भी जाते रहते थे.

हेमा और चिंतन का वैवाहिक जीवन हंसीखुशी से बीत रहा था. दोनों अपनेअपने काम से भी खुश थे. इसी बीच गुजरात दंगों के दौरान चिंतन उपाध्याय पूरे देश में उस समय सुर्खियों में आए, जब उन्होंने बड़ौदा की अलकापुरी सृजन आर्ट गैलरी में न्यूड हो कर प्रदर्शन किया. एक तरफ तो हेमा और चिंतन का कैरियर ऊंचाइयां चढ़ रहा था, दूसरी ओर उन के बीच आत्मीयता घटती जा रही थी. चिंतन का कहना था कि उन्हें हेमा से जो शांति और समर्पण मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा था. अब तक दोनों के बीच झगड़े होने लगे थे.

सन 1992 से 1998 के बीच के 6 सालों में प्यार की दीवारें जितनी मजबूत हुई थीं, अब वे दरकने लगी थीं. झगड़े शुरू हुए तो प्यार और विश्वास घटने लगा. शादी के 12 साल बीततेबीतते दोनों के संबंध टूटने की कगार पर आ गए. चिंतन ने पुलिस को बताया कि हेमा उस से हमेशा गाली दे कर बात करती थी. यह अमानवीय तो था ही, दिल को भी गहरा धक्का लगता था. जबकि पुलिस का कहना है कि चिंतन की खुद की सोच बड़ी घटिया थी, जिस से वह हेमा को परेशान करता था. इसी वजह से सन 2010 में हेमा ने मुंबई की अदालत में तलाक का मुकदमा दायर करा दिया था.

इस के बाद मुंबई के जुहू स्थित फ्लैट में चिंतन और हेमा रहते तो एक ही साथ थे, लेकिन अगलअलग कमरों में. हेमा की ओर से तलाक के मुकदमे की पैरवी एडवोकेट हरीश भंबानी कर रहे थे. तलाक के मुकदमे के दौरान ही हेमा ने सन 2013 में चिंतन उपाध्याय के खिलाफ उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई थी. हेमा ने अरोप लगाया था कि चिंतन उन के कमरे की दीवारों पर अश्लील चित्र बनाते हैं. आरोप के अनुसार चिंतन ने दीवार पर जो अश्लील चित्र बनाए थे, उस में महिला को कुत्ते के साथ अश्लील मुद्रा में दिखाया गया था.

हालांकि बाद में अदालत ने हेमा की इस शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि चिंतन का बैडरूम उन की व्यक्तिगत जगह है, उस में वह कुछ भी कर सकते हैं. हेमा ने अदालत से चिंतन से 2 लाख रुपए महीने गुजाराभत्ता दिलाने का अनुरोध किया था. लेकिन अदालत ने अपने फैसले में चिंतन उपाध्याय को हेमा को गुजारेभत्ते के रूप में हर महीने 40 हजार रुपए देने का आदेश दिया था. जनवरी, 2015 में हेमा ने पारिवारिक अदालत में एक याचिका दायर कर के अनुरोध किया था कि फाइनल सैटलमेंट के रूप में उसे चिंतन से 5 करोड़ रुपए दिलाए जाएं.

अगर चिंतन इतनी रकम एक साथ नहीं दे पाते तो वह 5 लाख रुपए हर महीने दें. दोनों के बीच सन 2014 में तलाक हुआ था, लेकिन भरणपोषण और संपत्ति के हिस्से का विवाद अभी भी अदालतों में चल रहा था. कहा जा रहा है कि अदालतों के चक्कर लगातेलगाते और मुकदमों में लाखों रुपए खर्च होने से चिंतन परेशान था. इसीलिए उस ने हेमा को मारने की साजिश रची. हेमा को मारने के लिए उस ने किराए के हत्यारे के रूप में विद्याधर राजभर को चुना.

विद्याधर राजभर उर्फ गोटू उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. चिंतन पिछले कई सालों से उसे जानता था. मुंबई के कांदिवली में उस की फोटोफ्रेमिंग की वर्कशौप और वेयरहाउस था. वह फाइबर ग्लास बनाने और बेचने का भी काम करता था, साथ ही इमिटेशन ज्वैलरी सहित कई अन्य कामधंधे भी करता था. कई सालों पहले विद्याधर राजभर काम की तलाश में जयपुर आया था, तब चिंतन ने ही उसे काम दिलवाया था. उस ने कई सालों तक जयपुर में काम किया. इसी बीच पेंटिंग से जुड़े कामों की वजह से वह चिंतन के पिता के संपर्क में आया. जयपुर में रहते हुए ही विद्याधर की चिंतन से अच्छी दोस्ती हो गई थी. बाद में विद्याधर मुंबई जा कर बस गया.

चिंतन के माध्यम से ही विद्याधर की मुलाकात मुंबई में हेमा उपाध्याय से हुई थी. चिंतन के साथ हेमा के लिए भी वह पेंटिंग की फोटोफ्रेमिंग का काम करने लगा. इसी वजह से उस का चिंतन हेमा के जुहू स्थित फ्लैट पर आनाजाना था. विद्याधर राजभर का चिंतन और हेमा से कारोबारी लेनदेन भी था. एक बार विद्याधर के पिता गंभीर रूप से बीमार हुए थे तो चिंतन ने दोस्ती के नाते उस की आर्थिक मदद की थी. चिंतन ने उसे 5 लाख रुपए उधार दिए थे. बाद में विद्याधर ने यह रकम नहीं लौटाई. हेमा से भी विद्याधर ने कुछ रकम उधार ले रखी थी. पैसों के लेनदेन को ले कर हेमा और विद्याधर के बीच कई बार विवाद भी हुआ था. हेमा ने कई बार उस से रकम लौटाने को कहा था.

चिंतन उपाध्याय को यह बात पता थी. इसलिए उस ने विद्याधर राजभर से हेमा की हत्या का सौदा किया. विद्याधर ने हेमा की हत्या के लिए पहले 30 लाख रुपए मांगे थे. बाद में वह बाईस लाख रुपए पर आ गया था. चिंतन के दबाव पर वह 10 लाख रुपए नकद और उधारी वाले 5 लाख रुपए के माफ करने पर हेमा की हत्या के लिए राजी हो गया था. इस के बाद चिंतन ने विद्याधर राजभर को हेमा की हत्या की सुपारी देते हुए कुछ रकम एडवांस भी दे दी थी.

यह करीब 3 महीने पहले की बात है. चिंतन ने हेमा की हत्या की साजिश रच कर एक दिन विद्याधर को जयपुर बुलाया. विद्याधर जयपुर के निर्माणनगर स्थित चिंतन के घर आया तो उस ने स्कैच बना कर उसे हत्या की पूरी योजना समझाई कि हेमा की हत्या कैसे करनी है. चिंतन से सौदा तय होने के बाद विद्याधर राजभर ने सब से पहले शिवकुमार राजभर उर्फ साधु से बात की, क्योंकि यह काम उस के अकेले के वश का नहीं था. साधु उस के अच्छे परिचितों में था. वह फाइबर की मूर्तियां बनाने के कारखाने में काम करता था. पिछले कई सालों से वह मुंबई के पश्चिमी कांदीवली इलाके में रहता था. हेमा की हत्या के लिए साधु राजी हो गया तो विद्याधर ने प्रदीप राजभर और आजाद राजभर को भी हेमा की हत्या में साथ देने के लिए राजी कर लिया.

इस के बाद मुंबई में चैंबूर स्थित एक रेस्तरां में चिंतन ने विद्याधर राजभर के साथ मीटिंग कर के हेमा की हत्या की साजिश को अंतिम रूप दिया. इस मीटिंग में टैंपो चालक विजय राजभर भी मौजूद था. विजय राजभर ने ही दोनों लाशों के डिब्बों को ले जा कर नाले में फेंका था. पुलिस ने बाद में इसे भी गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस ने चैंबूर स्थित उस रेस्तरां की सीसीटीवी फुटेज की भी जांच की थी. येजना के अनुसार, 11 दिसंबर को विद्याधर राजभर ने हेमा को फोन कर के कहा कि उस के पास चिंतन के खिलाफ कुछ अहम सबूत हैं. उन सबूतों को वह उन्हें दिखाना चाहता है. इस के लिए उस ने हेमा को कांदीवली स्थित अपने वेयरहाउस में रात को बुलाया.

सबूत हासिल करने के लिए हेमा अपने वकील हरीश भंबानी को साथ ले कर विद्याधर के वेयरहाउस पहुंचे तो वहां अन्य 3-4 लोगों को देख कर हैरानी हुई, लेकिन उन्हें किसी खतरे का अहसास नहीं था, इसलिए वे दोनों निश्चिंत थे. विद्याधर कुछ देर तक हेमा को अपनी बातों में उलझाए रहा. उस के बाद उस ने अपने साथियों की मदद से हेमा और हरीश को क्लोरोफार्म सुंघा कर बेहोश कर दिया. बेहोश होने के बाद दोनों की गला घोंट कर हत्या कर दी गई. दोनों के मर जाने के बाद उन की जेबों का सारा सामान, मोबाइल आदि निकाल कर कपड़े उतार दिए गए, फिर दोनों लाशों के हाथपैर बांध कर पौलीथिन में लपेट कर गत्ते के डिब्बों में भर दिया गया, जिन्हें विजय राजभर टैंपो से उसी रात नाले में फेंक आया.

रिमांड अवधि पूरी होने के बाद पुलिस ने चिंतन और पकड़े गए अन्य अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां पुलिस ने चिंतन का रिमांड बढ़ाने की मांग की तो अदालत ने बाकी लोगों को जेल भेज कर चिंतन का रिमांड 1 जनवरी तक बढ़ा दिया. 1 जनवरी को रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे दोबारा अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे 11 जनवरी तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. पुलिस ने चिंतन उपाध्याय के दिल्ली स्थित मकान से कई अहम सबूत जब्त किए हैं. इन में पैन ड्राइव, आईपौड और कुछ संदिग्ध पेंटिंग शामिल हैं. पुलिस की एक टीम ने जयपुर जा कर भी जांचपड़ताल की है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय से निर्माणनगर स्थित घर पर करीब ढाई घंटे तक पूछताछ की गई.

पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई है कि दिल्ली शिफ्ट होने के बाद चिंतन उपाध्याय मुंबई में कभी 3 दिन से ज्यादा नहीं रुकता था, लेकिन 2 से 6 दिसंबर के बीच वह मुंबई में ही रहा. इस के अलावा हेमा और हरीश के लापता होने के अगले दिन 12 दिसंबर को उस ने हरीश के घर वालों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था. चिंतन ने 6 दिसंबर को विद्याधर राजभर को एक एसएमएस किया था, लेकिन पुलिस के थाने बुलाने से पहले उस ने वह एसएमएस डिलीट कर दिया था.

कथा लिखे जाने तक विद्याधर राजभर पुलिस के हाथ नहीं लगा था. इस के अलावा एक अन्य व्यक्ति के भी इस दोहरे हत्याकांड में शामिल होने की बात सामने आई है. पुलिस का कहना है कि चिंतन उपाध्याय ने ही हेमा की हत्या की साजिश रची थी. उसी साजिश के तहत विद्याधर राजभर ने अपने साथियों के साथ हेमा और उन के एडवोकेट हरीश भंबानी की हत्या की थी. विद्याधर के पकड़े जाने पर ही इस मामले की सारी गुत्थी सुलझेगी.

बहरहाल, हेमा उपाध्याय की हत्या से भारतीय कला जगत में सन्नाटा पसरा हुआ है. कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि चिंतन जैसा प्रतिभाशाली कलाकार एक प्रतिभाशाली कलाकार की हत्या भी करा सकता है. चिंतन के पिता विद्यासागर उपाध्याय का कहना है कि मेरा बेटा बेकसूर है. पुलिस को उस के बारे में गलत जानकारी दी गई है. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Story: एक थीं नूर इनायत खान

Hindi Story: नूर इनायत खान का नाम द्वितीय विश्व महायुद्ध के इतिहास में गुप्तचर के रूप में शहीद होने के कारण स्वर्णाक्षरों में अंकित है. नूर इनायत खान का पूरा नाम नूर उन निसा इनायत खान था. उन के पिता हजरत इनायत खान भारतीय तथा मैसूर के शासक टीपू सुल्तान के वंशज थे. उन की मां अमेरिकी थीं. नूर 4 भाई बहनों में सब से बड़ी थीं. उन का जन्म 1 जनवरी, 1914 को मास्को में हुआ था. नूर के पिता सूफी मतावलंबी तथा धार्मिक शिक्षक थे. उन्होंने भारत के सूफी मत का पाश्चात्य देशों में प्रचारप्रसार किया. नूर की रुचि अपने पिता की भांति, संगीतकला के माध्यम से पिता की विरासत को आगे बढ़ाने में थी.

पहले विश्वयुद्ध के बाद नूर के पिता परिवार सहित मास्को से लंदन आ गए थे. नूर का बचपन वहीं बीता. नाटिंगहिल के एक नर्सरी स्कूल में उन की पढ़ाई शुरू हुई. 1920 में वे सब फ्रांस में पैरिस के निकट सुरेसनेस में रहने लगे. 1927 में पिता की मृत्यु के बाद 13 साल की छोटी सी उम्र में ही नूर के कंधों पर मां और 3 छोटे भाईबहनों की जिम्मेदारी आ गई.

स्वभाव से शांत, शर्मीली, संवेदनशील नूर ने जीविका के लिए संगीत को माध्यम चुना. वे पियानो पर सूफी संगीत का प्रचारप्रसार करने लगीं. वीणा बजाने में भी वे निपुण थीं. उन्होंने कविताएं, बच्चों के लिए कहानियां लिखीं, साथ ही साथ, फ्रैंच रेडियो में भी वे नियमित रूप से योगदान करने लगीं. 1939 में जातक कथाओं से प्रेरित हो कर उन्होंने ट्वंटी जातका टेल्स लिखी.

crime

लंदन में पुस्तक का प्रकाशन हुआ. द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने पर वे अपने परिवार के साथ समुद्रीमार्ग से ब्रिटेन के फ्रालमाउथ कार्नवाल आ गईं.

संवेदनशील, शांतिप्रिय, सूफीवाद की अनुयायी नूर को नाजियों द्वारा किए जा रहे क्रूर, बर्बर अत्याचारों से गहरा आघात पहुंचा. उन्होंने अपने छोटे भाई के साथ मिल कर नाजी अत्याचारों के विरुद्ध लड़ने का फैसला किया.

नूर ने 19 नवंबर, 1940 को ब्रिटेन की एयरफोर्स में महिला सहायक के रूप में कार्यभार संभाला. वहां पर उन्होंने वायरलैस औपरेटर का प्रशिक्षण लिया. जून 1941 में बमवर्षक प्रशिक्षण विद्यालय की चयनसमिति के समक्ष सशस्त्र बल अधिकारी पद के लिए आवेदनपत्र प्रस्तुत किया. वहां पर सहायक अनुभाग अधिकारी के पद पर उन की नियुक्ति हो गई.

फ्रैंच भाषा की अच्छी जानकारी होने के कारण ‘स्पैशल औपरेशंस ग्रुप’ के अधिकारियों का ध्यान उन की तरफ गया. उन को वायरलैस औपरेशन के द्विभाषी अनुभवी गुप्तचर के रूप में प्रशिक्षित किया गया. जून 1943 में वे डायना राउडेन (कोड नेम पादरी), सेसीली लेफोर्ट (कोड नेम एलिस शिक्षक) के साथ फ्रांस आ गई. उन का कोड नेम मेडेलीन था. वे फ्रांसिस सुततील (कोड नेम प्रोस्पर) के नेतृत्व में काम करने लगीं.

नूर एक चिकित्सकीय नैटवर्क में नर्स के रूप में शामिल हो गईं. वे वेश बदल कर भिन्नभिन्न स्थानों से ब्रिटिश अधिकारियों को महत्त्वपूर्ण सूचनाएं भेजने लगीं. द्वितीय विश्वयुद्ध में वे पहली एशियन महिला गुप्तचर थीं. नूर विंस्टन चर्चिल के विश्वासपात्रों में से एक थीं. उन्होंने 3 महीने से ज्यादा समय तक अपना गुप्त नैटवर्क चलाया. वे ब्रिटेन में नाजियों की गुप्त जानकारी भेजती रहीं. एक कामरेड की गर्लफ्रैंड ने ईर्ष्या के कारण उन की जासूसी की और उन को पकड़वा दिया. 13 अक्तूबर, 1943 को उन्हें जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया.

खतरनाक कैदी के रूप में उन को भीषण यातनाओं से गुजरना पड़ा. उन्होंने 2 बार जेल से भागने की कोशिश की लेकिन बंदी बना ली गईं.

गेस्टोपो के पूर्व अधिकारी हैंस किफर ने उन से गुप्त सूचनाएं प्राप्त करने का अथक प्रयास किया लेकिन नूर के मुंह से वे कुछ भी नहीं उगलवा पाए. 25 नवंबर, 1943 को एसओई गुप्तचर जौन रेनशा और लियोन के साथ वे सिचरहिट्टसडिंट्स, पैरिस के हैडक्वार्टर से भाग निकलीं. लेकिन ज्यादा दूर तक भाग नहीं सकीं और पकड़ ली गईं. 27 नवंबर, 1943 को नूर को पैरिस से जरमनी ले जाया गया. वहां उन्हें फोर्जेम जेल में रखा गया. वहां भी अधिकारियों ने उन को कठोर यातनाएं दीं. भेजी गई गुप्त सूचनाओं की जानकारी प्राप्त करने के प्रयास किए, लेकिन नूर ने कोई राज नहीं खोला.

11 सितंबर, 1944 को नूर को 3 और साथियों के साथ जरमनी के डकाऊ यातना शिविर में ले जाया गया.

13 सितंबर, 1944 को चारों के सिर पर गोली मारने का आदेश हुआ. पहले नूर के 3 अन्य साथियों के सिर पर गोली मार कर मौत की नींद सुला दिया गया. उस के बाद जरमनी फोर्स ने नूर को डराधमका कर ब्रिटेन भेजे गए संदेशों के बारे में जानकारी हासिल करनी चाही लेकिन निर्भीक, साहसी नूर ने अंत तक कुछ भी बताने से इनकार कर दिया. हार कर सिर में गोली मार कर उन की भी हत्या कर दी गई.

अंतिम सांस लेने से पहले नूर के होंठों पर एक शब्द था-स्वतंत्रता. लाख कोशिशों के बावजूद जरमन सैनिक राज उगलवाने की बात तो दूर, उन का असली नाम तक नहीं जान पाए थे. मृत्यु के समय उन की आयु केवल 30 साल की थी. वास्तव में वे एक शेरनी थीं, जिन्होंने आखिरी सांस तक अपना मुंह नहीं खोला.

सम्मान

  • इस भारतीय महिला गुप्तचर को मरणोपरांत 1949 में जौर्ज क्रौस से सम्मानित किया गया
  • फ्रांस ने उन्हें अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान क्रोक्स डी गेयर प्रदान किया.
  • मेंसेंड इन डिस्पैचीज (ब्रिटिश गैलेंटरी अवार्ड).

स्मारक

लंदन के गौर्डन स्क्वैयर में नूर की तांबे की प्रतिमा स्थापित की गई है. यह वह जगह है जहां पर नूर बचपन में रहती थीं. यह पहला अवसर है जब ब्रिटेन में किसी मुसलिम अथवा एशियाई महिला की प्रतिमा स्थापित की गई है. 8 नवंबर, 2012 को प्रतिमा को अनावृत किया गया था. महारानी एलिजाबेथ की द्वितीय बेटी राजकुमारी एनी ने अनावरण किया था. इस प्रतिमा का निर्माण लंदन के कलाकार न्यूमेन ने किया है.

भारतीय मूल की पत्रकार श्रावणी बासु ने नूर की जीवनी को अपनी किताब स्पाई प्रिंसेस यानी जासूस राजकुमारी नूर इनायत खान में संजोने का प्रयास किया है. ब्रिटिश साम्राज्य की विरोधी होने के बावजूद नूर ने ब्रिटेन के लिए जासूसी कर एक अद्वितीय मिसाल कायम की थी. Hindi Story

Suspense Love Story: प्रेमजाल

Suspense Love Story: उद्योगपति का बेटा अंकुर सोच भी नहीं सकता था कि उसे प्यार करने वाली, उस पर जान छिड़कने वाली शमा का एक दूसरा रूप भी है. यह रहस्य तब खुला जब एक दिन भूलवश शमा का मोबाइल उस की गाड़ी में रह गया. फिर तो मोबाइल के वाट्सअप से ऐसे राज खुले कि…

आधी रात हो जाने के बाद भी अंकुर की आंखों में नींद नहीं थी. शाम की घटना ने उसे इस कदर बेचैन कर दिया था कि वह सो नहीं पा रहा था. उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि कोई लड़की इस तरह का छलावा भी कर सकती है? शमा केवल उस की दोस्त ही नहीं थी बल्कि वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाना चाहता था. जबकि वह दोस्ती और प्यार का खेल इस तरह खेल रही थी कि अंकुर विश्वास ही नहीं कर पा रहा था. रविवार का दिन था, दोनों ने एक दिन पहले ही तय कर लिया था कि रविवार को मल्टीप्लेक्स सिनेमा घर में मूवी देखेंगे. शमा आटो में बैठ कर थिएटर पहुंच गई थी. अंकुर पहले से ही 2 टिकट ले कर उस का इंतजार कर रहा था.

‘‘हाय शमा.’’ कहते हुए अंकुर ने अपने पर्स से पैसे निकाल कर आटो वाले को दिए. पर्स जेब में रखते हुए वह मुड़ा तो शमा चहकी, ‘‘मैं लेट तो नहीं हुई अंकुर?’

‘‘अरे नहीं, बिलकुल सही टाइम पर आई हो.’’

‘‘चलो चलते हैं.’’ शमा ने अंकुर का हाथ थामते हुए कहा.

‘‘हांहां चलो.’’ कहते हुए अंकुर शमा के साथ थिएटर में चला गया.

शमा जब कभी आटो पर आती थी तो किराया अंकुर ही देता था. अगर कभी वह मैट्रो में आती थी तो अंकुर स्टेशन के बाहर कार में उस का इंतजार करते हुए मिलता था. शमा एक बड़े पब्लिक स्कूल में अध्यापिका थी. उस का ताल्लुक एक मध्यमवर्गीय परिवार से था. जबकि अंकुर एक रईस परिवार का बेटा था. शमा उसे बहुत ही संस्कारवान, पढ़ीलिखी और समझदार लड़की जान पड़ती थी. उसे लगता था कि वह उस की जीवनसंगिनी बनने के योग्य है. अंकुर की यह धारणा पिछले 2 सालों से बनी हुई थी.

थिएटर पूरी तरह से भरा हुआ था. उन दोनों ने जैसे ही हाल में प्रवेश किया, फिल्म सेंसर बोर्ड का सर्टिफिकेट परदे पर चल रहा था. यानी मूवी बस शुरू ही हुई थी. गेटकीपर ने टौर्च जला कर उन्हें उन की सीटों का रास्ता दिखाया. दोनों अपनी सीटों पर बैठ गए. अंकुर को शमा के साथ मूवी देखने में कुछ अलग ही मजा आता था. इधरउधर कार में घूमने या किसी रेस्तरां में बैठने के बजाय उसे थिएटर में पासपास बैठना ज्यादा अच्छा लगता था. शमा का हाथ अपने हाथों में ले कर मूवी देखने में यह मजा दोगुना हो जाता था. जब परदे पर कोई प्यारभरा गीत चलता था या कोई रोमांटिक दृश्य चल रहा होता था तो उसे लगता था जैसे परदे पर वह और शमा ही हों. उस वक्त दोनों उन दृश्यों में खो जाते थे.

शमा से अंकुर की मुलाकात उस के स्कूल के एक कल्चरल प्रोग्राम में ही हुई थी. उस प्रोग्राम में अंकुर विशिष्ट अतिथि के तौर पर आया था. उस प्रोग्राम के लिए उस के उद्योगपति पिता ने बतौर प्रायोजक बड़ा आर्थिक सहयोग दिया था. इसी नाते उस के पिता को विशिष्ट अतिथि बनाया गया था. लेकिन ऐन वक्त पर उन्हें उद्योगपतियों के एक सम्मेलन में भाग लेने के लिए बाहर जाना पड़ गया था. पापा ने स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट से विनम्रतापूर्वक क्षमा मांगते हुए कहा था कि वे जरूरी काम से बाहर हैं, इसलिए प्रोग्राम में नहीं आ पाएंगे.

स्कूल कमेटी के प्रेसीडेंट को बड़ी निराशा हुई. उन्हें यह अच्छा नहीं लग     रहा था कि प्रोग्राम के प्रायोजक ही प्रोग्राम में मौजूद न हों. आखिर तय हुआ कि उन की गैरमौजूदगी में प्रतिनिधि के तौर उन का बेटा अंकुर प्रोग्राम में मौजूद रहेगा. लंदन से एमबीए करने के बाद अंकुर ने पापा की टैक्सटाइल इंडस्ट्रीज में बैठना शुरू कर दिया था. निर्धारित दिन अंकुर ही प्रोग्राम में आया. बहुत बड़े स्कूल कैंपस में रखे गए प्रोग्राम में क्षेत्र के सांसद मुख्य अतिथि थे और भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी विशिष्ट अतिथि. विद्यार्थियों के घर वालों के अलावा भी विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्टजनों को प्र्रोग्राम में बुलाया गया था. कुल मिला कर वहां करीब 15 सौ के आसपास लोग मौजूद थे.

प्रोग्राम की एंकरिंग स्कूल की खूबसूरत और ऊर्जावान अध्यापिका शमा कर रही थीं.

‘‘और अब मैं गुजारिश करूंगी आज के प्रोग्राम की शान युवा उद्यमी अंकुर गुप्ता से कि वे मंच पर आएं.’’ शमा ने एक विशेष अंदाज में अंकुर का नाम मंच से पुकारा, तो वह उस से खासा प्रभावित हुआ. मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथि के भाषण खत्म हो चुके थे. अंकुर यंत्रवत उठा और मंच की ओर चल पड़ा.

शमा ने मंच की सीढि़यों पर ही हाथ आगे बढ़ा कर अंकुर का स्वागत किया. हुस्न की मलिका सी शमा के हाथों की गरमी अंकुर ने अपने हाथों में महसूस की. गजब की खूबसूरत थी वह. पलभर के लिए अंकुर की नजरें उस से मिलीं. उस की बातचीत से उसे लगा कि शमा बहुत ही तहजीब वाली संस्कारवान लड़की है. अंकुर मंच के डायस पर खड़ा था और पूरा विद्यालय प्रांगण उस के स्वागत में बज रही तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था. अन्य अतिथियों के संबोधन के बाद उस ने अपने अनुभवों और आधुनिक विचारों से परिपूर्ण भाषण दिया. अंकुर अच्छा वक्ता था. हर क्षेत्र की खबरों से वह अपडेट रहता था और अच्छा बोल लेता था. वह कालेज स्टूडेंट यूनियन का प्रेसीडेंट भी रह चुका था.

शमा भी अंकुर से खासी प्रभावित हुई. अंकुर उसे पहली ही नजर में भा गया था. स्कूल प्रोग्राम के बाद शमा से अंकुर की फिर मुलाकात हुई. शिष्टाचारवश वह उसे गाड़ी तक छोड़ने गई थी. उन चंद मिनटों की मुलाकात में ही शमा ने उसे अपना परिचय दे दिया था. उस ने बताया कि वह एक मध्यम वर्गीय शर्मा परिवार से ताल्लुक रखती है. उस के पापा एक न्यूज चैनल में कैमरामैन हैं. वह 2 बहनों और एक भाई में सब से छोटी है. अध्यापन उस का शौक भी है और रोजगार भी.

‘कभी हमारे औफिस आइए.’’ अंकुर ने अपना विजिटिंग कार्ड शमा को देते हुए कहा.

‘‘जरूर, कभी आऊंगी.’’ शमा मुसकान बिखेरते हुए बोली.

उस दिन शमा से हुई मुलाकात अंकुर को बेचैन कर गई थी. रहरह कर उस की आंखों के सामने शमा का खूबसूरत चेहरा घूम रहा था. शमा मिले भी तो कहां मिले. उस ने अपना कार्ड तो शमा को दिया था पर उस का अतापता नहीं पूछा था. न ही मोबाइल नंबर लिया था.

एक दिन अचानक वाट्सअप पर आए एक मैसेज ने अंकुर को चौंका दिया. ‘‘हैलो सर, गुड मौर्निंग.’’

बिलकुल नया नंबर था. अंकुर समझ नहीं पाया कि ये किस का नंबर है. उस ने चैट की डीपी में देखा, किसी लड़की की तसवीर लगी थी. उस ने उसे क्लोज कर के देखा, वह शमा ही थी.

‘वेरी गुड मौर्निंग जी.’ अंकुर ने लिखा.

दूसरी ओर शमा आनलाइन थी. उस ने फिर टाइप किया, ‘कैसे हैं सर आप?’

‘फाइन. आप कैसी हैं, शमाजी?’ अंकुर ने पूछा.

‘मैं भी ठीक हूं सर. पर आप मुझे शमाजी मत बोलिए. सिर्फ शमा चलेगा.’

‘ओके. और आप मुझे सर नहीं, अंकुर बोलें. आप मुझे इतना बड़ा मत बनाइए.’ अंकुर ने लिखा.

और शमा ने मुसकान वाली स्माइली के साथ लिखा, ‘ओके, अंकुर सर.’

उस दिन पहली मोबाइल चैट के बाद अंकुर और शमा नजदीक आते चले गए. मोबाइल चैट के बाद मुलाकात. फिर मुलाकात दोस्ती में और दोस्ती प्यार में बदल गई.

अंकुर और शमा की मुलाकातों का सिलसिला चल रहा था. वह जब भी मिलती अंकुर विदा होते हुए कहता, ‘‘फिर कब और कहां मिलना है?’’

‘‘अभी एक हफ्ते तो बहुत बिजी हूं. बहुत सारे काम करने हैं.’’

‘‘यानी एक हफ्ते की छुट्टी.’’

‘‘अरे यार छुट्टी क्यों? मोबाइल है न, मैसेज कर लेना. फ्री हुई तो बात कर लूंगी.’’ शमा कहती.

और आज अंकुर ने शमा के साथ मूवी देखने का प्रोग्राम बनाया था. बहुत ही रोमांटिक लव स्टोरी वाली मूवी थी. दोनों ने मूवी में खूब एंजौय किया.

थिएटर से बाहर आ कर अंकुर ने शमा से कहा, ‘‘एकएक कप कौफी पीते हैं, सामने ही कैफे कौफीडे है.’’

‘‘हां अंकुर, यह ठीक रहेगा. मेरा भी बहुत मन कर रहा है. आज ठंड भी बहुत है.’’

‘तो चलो, देर किस बात की, आप की ठंड दूर किए देते हैं.’

अंकुर ने टेढ़ी नजरों से शरारतपूर्ण अंदाज में कहा तो शमा ने प्यार भरा एक घूंसा अंकुर की बाजू पर दे मारा. और बोली, ‘‘तुम कभी नहीं सुधरोगे.’’

‘‘तुम मुझे सुधारना क्यों चाहती हो शमा?’ अंकुर ने शरारत से कहा, तो शमा ने उस की बाजू पर एक और घूंसा जड़ दिया.

‘‘चलो, शमा मैं तुम्हें घर छोड़ देता हूं.’’ अंकुर ने कैफे कौफीडे से निकलते हुए कहा.

‘‘घर नहीं, घर के नजदीक बोलो.’’

‘‘ओके बाबा, घर के नजदीक.’’ अंकुर ने कहा.

शमा का घर अंकुर के रास्ते में ही पड़ता था. कभीकभी वह शमा को उस के घर के नजदीक बने मदर डेयरी बूथ के पास छोड़ देता था. वहीं से शमा का घर चंद कदमों की दूरी पर था.

‘‘ओके डार्लिंग, सीयू, मिलते हैं. अपना खयाल रखना.’’ कार से उतरते हुए शमा ने अंकुर से कहा.

‘‘ओके जरूर रखूंगा. आप का आदेश सिर आंखों पर.’’ अंकुर ने कहा, तो शमा उस की नाक खींचते हुए बोली, ‘‘नाटी बौय.’’

अंकुर कुछ ही दूरी पर गया था कि उस की नजर बराबर वाली सीट पर पड़ी. उस ने देखा शमा का मोबाइल सीट पर पड़ा रह गया था. वह मोबाइल ले जाना भूल गई थी. लेकिन अब क्या करे, शमा को मोबाइल कैसे लौटाए? उस के पास कोई और नंबर भी नहीं था, जिस पर काल कर के शमा को बता देता. शमा के घर वह जा नहीं सकता था. अंकुर ने सोचा शमा खुद ही काल करेगी, तभी बता दूंगा. एक पल के लिए उस के मन में खयाल आया, चलो देखते हैं मोबाइल में क्या कुछ है? लेकिन दूसरे पल उस ने सोचा इस तरह चोरीछिपे किसी का मोबाइल देखना गलत है. फिर सोचा देख भी ले तो क्या गलत है? आखिर उस ने घर के रास्ते में ही कार को साइड में पार्क किया.

शमा का मोबाइल उस ने अपने हाथ में लिया. कीपैड का पासवर्ड उसे पता था. उस ने कई बार शमा को खोलते हुए देखा था, लेकिन कभी इस का फायदा नहीं उठाया था. शमा के मोबाइल का पासवर्ड ‘शमा 22’ था. यानी नाम और उस के बर्थडे की तारीख. अंकुर ने शमा टाइप किया तो मोबाइल का लौक खुल गया. मोबाइल को खुला देख अंकुर की इच्छा उस का वाट्सअप खोलने की हुई. उस ने वाट्सअप खोला. उसे यह देख कर घोर आश्चर्य हुआ कि उस में एक भी नया मैसेज नहीं था. शमा उस के साथ पिछले 5-6 घंटे से थी. शमा ने एक बार भी मोबाइल नहीं छुआ था. इस का मतलब शमा वाट्सअप ज्यादा यूज नहीं करती थी. एक पल के लिए उसे बहुत अच्छा लगा.

‘कहीं ऐसा तो नहीं कि नेटवर्क काम नहीं कर रहा हो.’ अंकुर बुदबुदाया. उस ने स्क्रीन को नीचे कर के देखा. फिर देख कर बोला, ‘ओहो, डाटा नेट ही बंद कर रखा है.’ अंकुर ने जैसे ही मोबाइल डाटा के आइकोन को टच किया, नेट शो करने लगा. जैसे ही नेट औन हुआ, एक साथ 8-10 अलगअलग नंबरों से कई मैसेज आ गए. इस का मतलब शमा का फोन कई नंबरों के चैट पर था. अंकुर यह जानने को बेचैन हुआ कि वे किन कं नंबर हैं? पलभर के लिए उसे लगा कि कहीं गलत तो नहीं कर रहा, किसी के मोबाइल को खोल कर? कई सवाल उस के दिमाग में कौंधे. आखिर उस से रहा नहीं गया और उस ने सभी चैट पढ़ने का निर्णय कर लिया.

चैट पढ़ कर अंकुर सन्न रह गया. मानों उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई हो. उस की स्थिति काटो तो खून नहीं वाली थी. जिस शमा को वह बहुत संस्कारवान समझता था, जिसे वह अपनी जीवन संगिनी बनाने के बारे में सोचने लगा था, उस का दूसरा रूप उस के सामने था. मोबाइल में कई लड़कों के मैसेज थे.

‘‘यार शमा तुम ने 3 घंटे मैसेज नहीं करने को कहा था, अब नहीं रहा जा रहा, कहां हो. अपने पापा के साथ क्या कर रही हो आज.’’ एक नंबर से मैसेज था. तो दूसरे में ‘‘शमा डार्लिंग, अपना मोबाइल संभाल कर रखा करो. आखिर बहन को देती ही क्यों हो, जो 5-6 घंटे के लिए बैन करना पड़े.’’ शमा ने भी कई चैट में रोमांटिक बातें कर रखी थीं. अंकुर का सिर चकरा गया. कई चैट में अश्लील जोक्स और पोर्न मूवी की छोटीछोटी क्लिपिंग भी थीं.

कुछ नंबरों पर शमा और कुछ लड़कों के अंतरंग चित्र थे. इन चित्रों को शमा ने आदान प्रदान किया था. अंकुर ने देखा कुछ लड़के तो उस के परिचित थे, जिन्हें वह अच्छी तरह से जानता था. ज्यादातर अमीर घरानों के बिगड़ैल लड़के थे. अंकुर की समझ में आ गया था कि शमा अपनी खूबसूरती और अदाओं से अमीरजादों पर अपना दिल लुटाती है और अमीरजादे उस पर अपनी दौलत. अंकुर ज्योंज्यों शमा के मोबाइल के चैट पढ़ता जा रहा था, उस का माथा घूम रहा था. उस ने शमा की एक सहेली की चैट खोली. दोनों ने एकएक पल सांझा किया हुआ था.

सहेली की चैट में अपना नाम देख कर अंकुर चौंक गया था. शमा ने लिखा था कि प्रसिद्ध टैक्सटाइल मिल ओनर का पुत्र अंकुर उस पर जान छिड़कता है.

‘‘ओ गौड!’’ अंकुर ने माथा पीट लिया.

शमा ने अपनी सहेली को वह सेल्फी भी भेज रही थी, जो शमा ने अंकुर के साथ अंतरंग पलों में ली थी. वह इस खयाल से ही कांप गया कि वह सेल्फी किसी के हाथ लग गई तो उस के परिवार की बड़ी बदनामी होगी. जबकि शमा बड़ी बेशर्मी से उस सेल्फी को अपनी सहेली से शेयर कर चुकी थी. अंकुर के मन में आया कि शमा का मोबाइल ही तोड़ कर फेंक दें. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. लेकिन अगले ही पल उस ने सोचा इस से होगा क्या? सेल्फी तो उस की सहेली के पास भी भेजी गई है. शमा उस सेल्फी को ले कर कुछ भी कर सकती है. हो सकता है ब्लैकमेल करे?

वह सोचने लगा कि शमा से छुटकारा कैसे पाए? क्योंकि वह आसानी से तो पीछा छोड़ेगी नहीं. जीवनसंगिनी बनाना तो दूर वह तो दोस्ती के भी काबिल नहीं है. इसी उधेड़बुन में अंकुर लगातार शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर अलगअलग चैट पढ़ता जा रहा था. आखिर में उस ने एक बहुत बिगड़े अमीरजादे की चैट खोली. लिखा था, ‘‘शमा तुम मुझे यूं ब्लैकमेल नहीं कर सकती. जो भी हम दोनों के बीच था, उस में हम दोनों की सहमति थी. तुम्हारा मन मुझ से भर गया तो तुम ने मुझे छोड़ दिया. जब तक मैं ने तुम पर पैसा लुटाया तब तक तुम मुझ पर मर मिटने का नाटक कर रही थीं. और अब जब तुम्हें नएनए लड़के मिल गए तो मुझे दूध से मक्खी की तरह निकल फेंका.’’

यह सब पढ़ते ही अंकुर का सिर चकरा गया. ‘उफ्फ, इतना गंदा खेल.’ वह बुदबुदाया. उसे शमा पर गुस्सा आया और खुद पर खीझ. आखिर वह शमा के प्रेमजाल में फंसा ही क्यों? जो हुआ सो हुआ, पर अब इस बला से कैसे छुटकारा मिले? वह सोच ही रहा था कि उस के दिमाग में एक आइडिया आया. उस ने सभी चैट की फोटो शमा के मोबाइल से अपने मोबाइल में फारवर्ड किए और शमा के मोबाइल से अपनी चैट डिलीट कर दी. अंकुर ने उस लड़के का मोबाइल नंबर भी नोट कर लिया, जिस ने शमा पर गुस्सा निकाल रखा था.

उस ने तय कर लिया कि वह शमा को इस बात का एहसास तक नहीं होने देगा कि उस की हरकतों को वह जान गया है. वह शमा को उसी के बुने जाल में फंसा कर छुटकारा पाएगा. उस ने शमा के मोबाइल के वाट्सअप पर सभी चैट को अनरीड कर दिया. यानी अब फिर से ये लगने लगा था कि उस की चैट किसी ने पढ़ी नहीं है. यह वाट्सअप का नया वर्जन था, जिस का उस ने फायदा उठाया.

तभी अंकुर के मोबाइल की घंटी बजी. यह कोई नया नंबर था. उस ने मोबाइल को औन किया.

‘‘अंकुर.’’ उधर से आवाज आई. वह शमा ही थी.

‘‘क्या हुआ शमा, ये किस का नंबर है. तुम्हारा मोबाइल कहां गया.’’

‘‘अरे यार, तुम से मिल कर होश कहां रहता है. होशोहवास खो देती हूं.’’

‘‘क्या हुआ बताओ ना?’’

‘‘तुम अपनी गाड़ी में देखो, वहीं पड़ा होगा मेरा मोबाइल. भूल गई हूं शायद.’’

‘‘अरे हां, ये पड़ा है. चलो कल ले लेना ओके.’’

‘‘नहीं, अभी वापस आओ, मुझे अभी चाहिए.’’ शमा ने बड़ी आतुरता से कहा.

‘‘सुबह औफिस जाते हुए दे दूंगा भई, विश्वास रखो.’’ अंकुर ने उसे समझाने की कोशिश की.

‘‘नहीं अभी वापस आ कर दे कर जाओ. मुझे चाहिए.’’ शमा ने घबराई हुई सी आवाज में कहा.

‘‘ओके, आता हूं.’’

शमा की घबराई हुई आवाज और मोबाइल के प्रति इतनी व्याकुलता अंकुर को समझ आ रही थी.

अंकुर ने कार का यूटर्न लिया और फिर से शमा के घर की तरफ चल पड़ा.

शमा मदर डेयरी बूथ पर ही मिल गई. अंकुर की कार देखते ही वह उस तरफ लपकी.

‘‘अंकुर, बड़ी मुश्किल से कुछ काम का बहाना कर के घर से बाहर आई हूं.’’

‘‘ओके बेबी. इस में घबराने वाली क्या बात थी.’’ अंकुर ने कहा.

‘‘चलो छोड़ो, अभी जल्दी में हूं. चलती हूं.’’ कह कर शमा ने अपना मोबाइल लिया और वापस चली गई.

घर आ कर अंकुर ने जरूरी काम निपटाए और अपने बैडरूम में आ गया. उस के मन में कई तरह की उथलपुथल चल रही थी. उस ने शमा के मोबाइल से फारवर्ड की गई सभी फोटो कंप्यूटर में डाउनलोड कीं. कई लड़कों के साथ शमा के अंतरंग पलों की सेल्फी थीं. उस ने फोटोशौप में जा कर सभी सेल्फी में लड़कों के चेहरों को धुंधला कर दिया. अब सिर्फ शमा ही दिख रही थी. लड़कों के चेहरों के सिवा सब कुछ पूर्ववत था. इस के बाद अंकुर ने अपने कंप्यूटर के कलर प्रिंटर से कुछ कलर प्रिंट निकाले. इस के बाद उस ने एक मोबाइल नंबर डायल किया. यह नंबर उस लड़के का था, जो शमा की हरकतों से परेशान था. अगले दिन अंकुर ने प्रिंटर से निकाले सारे कलर प्रिंट उस लड़के को निर्धारित जगह पर भिजवा दिए.

शमा के स्कूल में हलचल मची थी. स्कूल खुलते ही देखा गया कि बहुत सारे रंगीन पैंफ्लेट स्कूल कैंपस में बिखरे पड़े हैं. इन पर शमा के अंतरंग पलों की वे तमाम फोटो थीं, जो उस ने खुद सेल्फी के रूप में ली थीं. पूरे स्कूल में एक ही चर्चा थी. शमा मैडम ऐसी है. शमा जैसे ही स्कूल पहुंची, एक बच्चा बड़े ही भोलेपन से एक पैंफ्लेट उस के हाथों में थमा कर बोला, ‘‘मैडम आप की सेल्फी बहुत अच्छी है.’’ शमा ने देखा तो जड़ हो गई. मारे शरम के उस से हिला नहीं गया. वह खुद को अपने ही बुने जाल में फंसा हुआ महसूस कर रही थी. Suspense Love Story

लेखक – रवि चमडि़या  

 

 

Bihar Crime Story: शहाबुद्दीन – आतंक का अंजाम

Bihar Crime Story: कभी बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत अपनी सरकार चलाने वाले शहाबुद्दीन के लिए कहा जाता है कि अपराध उन के लिए धंधा नहीं, मनोरंजन था. शायद इसीलिए वहां के लोग उन का नाम लेने से डरते थे. अगर कभी जरूरत पड़ती थी तो लोग उन्हें साहब कहते थे. आज वही साहब अपने किए की सजा जेल में भुगत रहे हैं.

11 दिसंबर, 2015 को सीवान की जिला जेल की विशेष अदालत के बाहर सुबह से ही काफी गहमागहमी थी. जेल परिसर से 300 मीटर की दूरी तक पुलिस फैली हुई थी. शहर में भी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे. इस की वजह यह थी कि उस दिन 11 साल पहले सीवान में दिल दहला देने वाले तेजाब कांड का फैसला आने वाला था. इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के बाहुबली शहाबुद्दीन प्रमुख अभियुक्त थे.

पीडि़त चंद्रकेशर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू, उन की पत्नी कलावती, अभियुक्तों के घर वाले, तमाम पत्रकार और फोटोग्राफर जेल के बाहर बेचैनी से टहल रहे थे. इस हत्याकांड में सीवान के बाहुबली सांसद शहाबुद्दीन उर्फ शहाबु उर्फ साहब के अलावा 10 अन्य लोग शामिल थे, जिन में से 7 अभियुक्तों के फैसले सुरक्षित रखे गए थे. साढ़े 11 बजे विशेष अदालत के चतुर्थ अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव जेल पहुंचे. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह और बचाव पक्ष के वकील अभय कुमार राजन भी समय से पहुंच गए थे. अभियुक्त शहाबुद्दीन और उन के 3 साथी शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह, जिन्हें सजा सुनाई जानी थी, अदालत के कटघरे में खड़े थे.

इस मामले की सारी काररवाई पहले ही पूरी हो चुकी थी, सिर्फ फैसला सुनाना बाकी था. इसलिए अदालती काररवाई पूरी कर के न्यायाधीश अजय कुमार श्रीवास्तव ने फैसला सुना दिया. विशेष लोक अभियोजक जयप्रकाश सिंह ने पत्रकारों को फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन को भादंवि की धारा 302/364ए/201/120बी का दोषी तथा अन्य अभियुक्तों शेख असलम, शेख आरिफ हुसैन उर्फ मुन्ना मियां उर्फ सोनू और राजकुमार साह को भादंवि की धारा 364ए व 323 (फिरौती के लिए अपहरण व मारपीट) का दोषी मानते हुए सभी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है.

जबकि बाकी बचे सातों अभियुक्तों आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां, अजमेर मियां, नगेंद्र तिवारी, मदन शर्मा उर्फ छोटेलाल शर्मा और कन्हैयालाल का फैसला सुरक्षित रख लिया गया था. फैसला आते ही अभियुक्तों के घर वालों के चेहरे उतर गए. वहीं पीडि़त चंद्रकेश्वर प्रसाद और कलावती की बूढ़ी आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. इस फैसले से वे खुश तो थे, लेकिन अभी उन के एक और बेटे की हत्या का फैसला आना बाकी है, जिसे जेल में बंद मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर गोली मार कर हत्या कर दी गई थी.

आखिर 11 साल पहले ऐसा क्या हुआ था, जिस की वजह से सीवान के सांसद शहाबुद्दीन और उन के सहयोगियों को चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के बेटों की हत्या के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. छपरा जिले के नटवर सेमरिया में रहते थे चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू. वहां उन का छोटामोटा व्यवसाय था. अपनी छोटी सी गृहस्थी में वह खुश थे. उन के परिवार में पत्नी कलावती के अलावा 6 बच्चे थे, जिन में 2 बेटियां मंजरीरानी, प्रीति और 4 बेटे राजीव रोशन, गिरीशराज उर्फ निक्कू, सतीशराज उर्फ सोनू तथा नितीशराज उर्फ मोनू थे. इन में नितीशराज विकलांग था.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने परिवार सहित छपरा के उस छोटे से गांव से निकल कर सीवान में रहने का मन बना लिया था. इस की वजह यह थी कि सीवान के दरौली थानाक्षेत्र के कुमटी भिटौली के रहने वाले जिन रमाशंकर प्रसाद के यहां उन की ससुराल थी, उन की सिर्फ 3 बेटियां ही थीं. रमाशंकर प्रसाद सीवान में पेशकार थे. रिटायर होने के बाद उन्होंने अपने दूसरे नंबर की बेटी कलावती और उस के पति चंद्रकेश्वर प्रसाद को अपने पास रहने के लिए कुमटी भटौली बुला लिया था. वजह यह थी कि उन की देखभाल के लिए किसी का पास रहना जरूरी था. चंद्रकेश्वर प्रसाद सीवान आए तो उन के ससुर ने उन के लिए वहां के नया बाजार की गल्ला पट्टी में एक दुकान खरीद दी.

उसी में उन्होंने किराना की दुकान खोल ली थी. धीरेधीरे दुकान चल निकली तो चंद्रकेश्वर प्रसाद की गृहस्थी फिर से जम गई. बात सन 1996 की है. चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास रुपए इकट्ठा हुए तो उन्होंने सीवान शहर में डहरिया स्टैंड के पास रामनाथ गौड़ से एक कट्ठा 9 धूर जमीन खरीद ली. यह रामनाथ गौड़ का पुराना कटरा था. इस में 7 दुकानें थीं, जो किराए पर उठी हुई थीं. रामनाथ गौड़ ने अपनी यह जमीन और दुकानें इसलिए बेच दी थीं, क्योंकि किराएदार उन्हें समय पर किराया नहीं दे रहे थे. उन में से एक किराएदार नागेंद्र तिवारी ने तो एक दुकान पर कब्जा ही कर रखा था. उन्होंने उस के खिलाफ न्यायालय में मुकदमा भी दायर कर रखा था.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने कटरा खरीदा तो उन्होंने सभी दुकानदारों से दुकानें खाली करने को कहा. 5 दुकानदानों ने तो दुकानें खाली कर दीं, लेकिन नागेंद्र तिवारी ने दुकान खाली नहीं की. चंद्रकेश्वर प्रसाद ने वहां एक और दुकान खोली, बाकी में गोदाम बना दिए. इस दुकान का कामधाम उन का बड़ा बेटा गिरीशराज उर्फ निक्कू देखने लगा. इस दुकान का उद्घाटन उन्होंने सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन और मंत्री अवधबिहारी चौधरी से कराया था. उस समय शहर की और भी बड़ीबड़ी हस्तियां वहां मौजूद थीं.

इस के करीब 4 साल बाद चंद्रकेश्वर ने उस जमीन पर नए सिरे से निर्माण कराने का फैसला किया, लेकिन नागेंद्र तिवारी का कब्जा उन के रास्ते का रोड़ा बन गया. उन्होंने उस से कई बार दुकान खाली करने को कहा, लेकिन वह उन की बात सुन ही नहीं रहा था. नागेंद्र को डर सता रहा था कि कहीं दुकान उस के कब्जे से निकल न जाए. इसी डर की वजह से उस ने साजिश रच कर फरजी कागजात तैयार कराए और वह विवादित दुकान मदन शर्मा को बेच दी. इस से वह दुकान मदन शर्मा के कब्जे में आ गई.

मदन शर्मा मोटर मैकेनिक था. लेकिन उस के संबंध शहर के बड़ेबड़े दबंगों से थे. शहाबुद्दीन का तो वह खास चेला था. चंद्रकेश्वर प्रसाद को जब पता चला कि नागेंद्र तिवारी ने दुकान मदन शर्मा को बेच दी है और उस ने दुकान पर कब्जा कर लिया है तो उन्होंने दुकान पर अपना ताला लगा दिया. मदन को यह बात बहुत खराब लगी. अगस्त, 2004 के पहले सप्ताह में चंद्रकेश्वर प्रसाद के पास फोन आया कि वह दुकान का ताला खोल दें, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा. धमकी के अगले दिन इस का नतीजा भी सामने आ गया. मदन शर्मा करीब आधा दरजन लोगों को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पहुंच ॒या और चाबी मांगने लगा.

चंद्रकेश्वर प्रसाद ने चाबी देने से मना किया तो उस ने जबरदस्ती चाबी छीन ली और जा कर दुकान खोल ली. मदन शर्मा ने कहा कि अगर दुकान नहीं देना चाहते तो उसे 2 लाख रुपए दें. यह साहब (सांसद शहाबुद्दीन) का हुक्म है. साहब यानी शहाबुद्दीन का नाम सामने आया तो चंद्रकेश्वर प्रसाद को लगा, अब उन का काम आसान हो गया, क्योंकि उन्होंने ही उन की दुकान का उद्घाटन किया था. उन दिनों शहाबुद्दीन सीवान जेल में बंद थे. 12 अगस्त, 2004 को चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन से मिलने सीवान जेल पहुंचे और पूरी बात बता कर कहा कि वह न दुकान छोड़ेंगे और न 2 लाख रुपए देंगे. दुकान किराए पर दे सकते हैं, इस पर शहाबुद्दीन ने नाराज हो कर उन्हें भगा दिया.

चंद्रकेश्वर प्रसाद शहाबुद्दीन के पास से अपना सा मुंह ले कर वापस आ गए. घर में तय हुआ कि वह न रुपए देंगे और न दुकान छोड़ेंगे. 2 दिनों बाद 14 अगस्त की सुबह पता चला कि चंद्रकेश्वर प्रसाद के पटना वाले भाई के यहां बेटा पैदा हुआ है. घर में पत्नी और बेटे थे ही, वह भाई के पास पटना चले गए. तब क्या पता था कि उन के लौटने तक यहां कयामत आ जाएगी. उन के जाने के 2 दिनों बाद यानी 16 अगस्त की सुबह करीब 10 बजे मदन शर्मा आफताब, झब्बू मियां, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ आरिश हुसैन, मसकूद मियां को साथ ले कर चंद्रकेश्वर प्रसाद की दुकान पर पहुंचा. दुकान पर उस समय राजीव रोशन उर्फ बंटू और सतीश राज उर्फ सोनू मौजूद थे. राजीव ने सभी को इज्जत के साथ बैठा कर चायपानी पिलाया.

चायपानी के बाद जब इन लोगों ने 2 लाख रुपए मांगे तो राजीव को लगा बात बिगड़ सकती है. चालाकी से उस ने मामले को निपटाने की गरज से कहा कि इस समय वह ज्यादा से ज्यादा 25 हजार रुपए दे सकता है. उस के पास इस से ज्यादा पैसे नहीं हैं. उस ने इतना ही कहा था कि आफताब ने उसे ऐसा थप्पड़ मारा कि राजीव की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. इस के बाद तो उस की लाठीडंडों, लातजूते से पिटाई होने लगी.

भाई को पिटता देख कर सतीश डर गया और रोने लगा. भाई को कैसे बचाए, उस की समझ में नहीं आ रहा था. वह भाग कर गोदाम में गया तो वहां बोतल में भर कर रखे टौयलेट साफ करने वाले तेजाब पर उस की नजर पड़ी. एक बोतल तेजाब ले कर वह वापस लौटा और उसे प्लास्टिक के एक मग में डाल कर भाई को पीट रहे बदमाशों को लक्ष्य बना कर हवा में उछाल दिया. इस के छींटें बदमाशों पर भी पड़े और राजीव पर भी. तेजाब की जलन से बदमाशों की पकड़ ढीली पड़ी तो वह भाग कर एक मकान के पीछे छिप गया. इस के बाद बदमाशों ने सतीश को पकड़ लिया और बोलेरो में डाल कर गए.

इस बात की जानकारी जेल में बंद सांसद शहाबुद्दीन को हुई तो उन्होंने फरमान जारी कर दिया कि सभी को उठा लो. अब तेजाब का बदला तेजाब से ही लिया जाएगा. शहाबुद्दीन का फरमान जारी होते ही उन के गुर्गों ने राजीब की तलाश शुरू कर दी. राजीव जब नहीं मिला तो चंद्रकेश्वर प्रसाद का बड़हरिया स्थित गोदाम लूट लिया गया और पूरे कटरे में आग लगा दी गई. इस के बाद वे चंद्रकेश्वर की दुकान पर पहुंचे. जहां गिरीश बैठा मिल गया. गिरीश कुछ समझ पाता, इस से पहले ही शहाबुद्दीन के लोगों ने उसे खींच कर मोटरसाइकिल पर बैठाया और ले कर चले गए.

शहाबुद्दीन के आदमी सतीश और गिरीश का अपहरण कर के ले जा रहे थे तो संयोग से रामराज मोड़ के पास राजीव भी मिल गया. उन लोगों ने उसे भी पकड़ लिया और तीनों को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले गए. तीनों भाइयों को एक कमरे में बंद कर दिया गया. रात को जेल में बंद शहाबुद्दीन प्रतापपुर पहुंचे तो राजीव, गिरीश और सतीश को उन के सामने पेश किया गया. शहाबुद्दीन ने राजीव को एक किनारे खड़ा कर दिया. उन्होंने गिरीश और सतीश को एक साथ खड़ा कराया. इस के बाद तेजाब से भरे 2 बड़े गैलन ला कर वहां रख दिए गए. राजीव की आंखों के सामने ही शहाबुद्दीन के कहने पर दोनों गैलन का तेजाब गिरीश और सतीश के ऊपर उड़ेल दिया गया. तेजाब की जलन से तड़पतड़प कर दोनों भाइयों ने दम तोड़ दिया.

शहाबुद्दीन ने राजीव को इसलिए जिंदा रखा कि जब उस का बाप आएगा और बड़हरिया वाली जमीन की रजिस्ट्री करेगा, तब उसे छोड़ा जाएगा. गिरीश और सतीश की लाशों को ईंटभट्ठे की चिमनी के हवाले कर दिया गया, जिस में वे जल कर स्वाहा हो गईं. शहाबुद्दीन वापस जेल चले गए. राजीव के दोनों हाथ बांध कर उसे कमरे में बंद कर के उन के आदमी वापस चले गए. रात को बेटे घर नहीं आए तो कलावती परेशान हुईं. चंद्रकेश्वर प्रसाद भी नहीं थे जो पता करते कि बच्चे घर क्यों नहीं आए. अगले दिन जब चंद्रकेश्वर प्रसाद के बेटों की निर्मम हत्या की दबी जुबान से चर्चा होने लगी तो मुसाफिर चौधरी खुल कर शहाबुद्दीन के विरोध में उतर आए. इस पर शहाबुद्दीन के गुरगों ने गोली मार कर उन की हत्या कर दी.

बेटों की हत्या की खबर पटना गए चंद्रकेश्वर प्रसाद को मिली तो वह सन्न रह गए. वह सीवान लौटे तो सचमुच उन की दुनिया उजड़ चुकी थी. कलावती की ओर से थाना मुफस्सिल में नागेंद्र तिवारी और मदन शर्मा के खिलाफ तहरीर दी गई. इस पर अपराध संख्या 131/2004, पर भादंवि की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. पुलिस ने जब इस मामले की जांच की तो इस कांड में मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथसाथ सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन, राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन, आफताब मियां, मकसूद मियां, झब्बू मियां और अजमेर मियां शामिल पाए गए. घटना को सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था.

मदन शर्मा और नागेंद्र तिवारी के साथ मुकदमे में इन नामों को भी जोड़ दिया गया. 6 सालों बाद अचानक राजीव घर लौटा, तो उसे जिंदा देख कर घर वाले दंग रह गए. उस ने मांबाप को बताया कि वह शहाबुद्दीन और उस के गुरगों के डर से छिप कर रह रहा था. यही नहीं, उस ने दोनों भाइयों की सांसद शहाबुद्दीन की शह पर अपने सामने दर्दनाक मौत देने की बात बताई तो मांबाप का कलेजा कांप उठा.

राजीव राज को अदालत में पेश कर के बयान दिलाया गया तो साफ हो गया कि दिल दहला देने वाली इस घटना को शहाबुद्दीन की शह पर अंजाम दिया गया था. राजीव के बयान के आधार पर विशेष अदालत ने इस मुकदमे में 4 जून, 2010 को भादंवि की धारा 120बी और 364ए भी जोड़ दी. बाद में पटना हाईकोर्ट के आदेश पर 1 मई, 2014 को इस मामले में भादंवि की धारा 302, 201 और 120बी के अंतर्गत मुकदमा चलाए जाने का आदेश हुआ.

राजीव ही एकमात्र पूरी घटना का चश्मदीद गवाह था. उस के इस तरह जिंदा वापस आने और बयान देने से शहाबुद्दीन की नींद उड़ी हुई थी. आखिरकार वही हुआ, जिस का सभी को डर था. 16 जून, 2014 को राजीव की गोली मार कर हत्या कर के रास्ते का कांटा साफ कर दिया गया. मोहम्मद शहाबुद्दीन, उस के बेटे ओसामा और अज्ञात के खिलाफ थाना सीवान नगर में राजीव की हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया. आगे क्या हुआ, यह जानने से पहले आइए थोड़ा पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन के बारे में जान लें, जिसे कभी बिहार के मुख्यमंत्री रहे लालू प्रसाद यादव एके 47 कहते थे और अपना दाहिना हाथ बताते थे.

48 वर्षीय मोहम्मद शहाबुद्दीन मूलरूप से सीवान के थाना हुसैनगंज के गांव प्रतापपुर के रहने वाले हैं. उन के पिता का नाम मोहम्मद हसीबुल्लाह था. शरारती और उद्दंड शहाबुद्दीन में बचपन से ही किसी चीज को पाने की सनक पैदा हो जाती तो वह उसे पा कर ही दम लेता था. शहाबुद्दीन के पिता हसीबुल्लाह एक वेंडर थे. परिवार बड़ा था, जबकि घर में कमाने वाला सिर्फ एक था. इसलिए सब की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं. अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए छोटेमोटे अपराध करते हुए शहाबुद्दीन बड़ा हुआ, लेकिन पढ़ाई में वह ठीक था. उस ने राजनीति विज्ञान में एमए और पीएचडी की. इस के बाद हिना शहाब से उस का निकाह हुआ. इस समय उन के मोहम्मद ओसामा नाम का एक बेटा और 2 बेटियां हैं.

शहाबुद्दीन 18 साल का था, तभी से अपराध की राह पर चल पड़ा था. थाना सीवान में 6 मई, 1985 को उस के नाम पहला मुकदमा दर्ज हुआ. इस के 4 दिनों बाद ही हत्या के प्रयास, आर्म्स एक्ट और अन्य कई मामले भी दर्ज हुए. एक बार अपराध की डगर पर पांव पड़ा, तो फिर उस ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. अपराध की दुनिया में शहाबुद्दीन नाम का सिक्का चला तो वह अपराधियों की आंखों का तारा बन गया. धनबाद के कोयला माफिया और तत्कालीन बाहुबली विधायक सूर्यदेव सिंह ने उसे अपने यहां पनाह दी. सूर्यदेव सिंह का साथ छोड़ने के बाद लोजपा के विधायक रामा सिंह के साथ जुगसलाई थानाक्षेत्र में तिहरा हत्याकांड में उस का नाम आया तो वह सुर्खियों में आ गया.

सन 1987 से 1990 तक शहाबुद्दीन ने झारखंड के कोयलांचल में काम किया. उस के बाद सीवान लौट कर अपना एक गैंग बनाया. इस के बाद तो शहाबुद्दीन के नाम से सीवान की जनता कांपने लगी. जब हद हो गई तो शहाबुद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया. जेल में रहते हुए उन्होंने 1989 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीते. अब वह अपराधी से माननीय बन गए. इस के बाद तो उन की ताकत दोगुनी हो गई. सन 1995 में वह जनता दल के टिकट से जीरादेई से विधानसभा का चुनाव जीते. हत्या और अपराध के क्षेत्र में नाम कमा कर 1996 में वह सांसद चुने गए. इस के बाद लालूप्रसाद यादव ने उन्हें अपनी पार्टी में शामिल किया. लेकिन उसी बीच मुन्ना चौधरी के अपहरण से पूरा सीवान इलाका हिल गया.

सीवान के थाना मुफस्सिल में सांसद शहाबुद्दीन सहित कई लोगों के खिलाफ अवध चौधरी ने अपने बेटे मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था. उन्होंने हिम्मत कर के सांसद शहाबुद्दीन के खिलाफ मुकदमा तो दर्ज करा दिया, लेकिन हुआ वही, जिस का डर था. अंत में शहाबुद्दीन के डर से वह वही करने को तैयार हो गए, जो वह चाहते थे. अवध चौधरी और उन की पत्नी चंबा देवी ने दिल पर पत्थर रख कर सांसद शहाबुद्दीन के पक्ष में गवाही दी. इस तरह मांबाप की गवाही से मुन्ना के अपहरण और हत्या का मुकदमा कमजोर हो गया.

लेकिन यह भी सच है कि पाप का घड़ा एक न एक दिन भर कर फूट जाता है. शहाबुद्दीन के पापों का भी घड़ा भर गया था. आखिर उन्हें सीवान के छोटेलाल साह के अपहरण के मामले में आजीवन करावास की सजा हुई. वह जेल भेज दिए गए. शहाबुद्दीन के जेल जाते ही उन के सताए लोग सीना तान कर पुलिस के सामने आ गए. मुन्ना चौधरी के मांबाप और गवाह शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाही देने को तैयार हो गए  शहाबुद्दीन के खिलाफ गवाहों को दोबारा गवाही देने की हिम्मत राजकुमार शर्मा ने दिखाई. राजकुमार शर्मा मुन्ना चौधरी का अजीज दोस्त था. वह उसी के गांव में रहता था. जिस समय मुन्ना का अपहरण हुआ था, उस समय वह भी उस के साथ था. शहाबुद्दीन के गुरगों ने उसे भी पकड़ना चाहा था, लेकिन वह भागने में कामयाब हो गया था.

लेकिन शहाबुद्दीन भी राजकुमार शर्मा के पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे. उस समय बिहार में राजद यानी लालू प्रसाद की सरकार थी. शहाबुद्दीन को उन का दाहिना हाथ माना जाता था. लालू प्रसाद की सरकार पर दबाव डाल कर उन्होंने राजकुमार शर्मा पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित करवा दिया. हालांकि विपक्षियों ने इस का घोर विरोध किया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ. राज्य में जनता दल (युनाइटेड) की सरकार बनी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने तो शहाबुद्दीन की उलटी गिनती शुरू हो गई, क्योंकि वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभते थे. उन पर पुलिस और अदालत का शिकंजा कसने लगा. मौके का फायदा राजकुमार ने उठाया और सरकारी गवाह बन गया. उसे सरकारी गवाह बनाने में सीवान के अनुमंडल आरक्षी उपाधीक्षक सुधीर कुमार ने अहम भूमिका निभाई.

अवध चौधरी के बयान के बाद शहाबुद्दीन के साथियों रामा चौधरी, मनोजदास, जवाहर चौधरी, मुन्नू चौधरी और पप्पू श्रीवास्तव के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया था. यही नहीं, 2 बार बयान दर्ज कराने के बाद अवध चौधरी को धमकी भी मिली थी. यह धमकी सियाड़ी मठिया निवासी मुखिया हरेंद्र चौधरी और गोपालगंज जिले के बरी निवासी अजय चौधरी ने विशुनपुरा निवासी हरेराम चौधरी के जरिए दिलाई थी. हरेराम चौधरी शहाबुद्दीन के खासमखास थे. पुलिस ने धमकी देने पर तीनों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद तीनों को जेल भेज गया था.

शबाहुद्दीन को जिस छोटेलाल साह के अपहरण में आजीवन कारावास की सजा हुई थी, वह मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माले) का कार्यकर्ता था. सीवान के थाना असंवा के नोनिया टोला निवासी दीनानाथ साह के 35 वर्षीय बेटे छोटेलाल साह को शहाबुद्दीन ने 2 मई, 1999 की शाम साढ़े 3 बजे आंदर ढाला के पास उस समय अगवा कर लिया था, जब वह शीतल पासवान के साथ अपने घर जा रहा था. शहाबुद्दीन उस से इसलिए नाराज था, क्योंकि उस ने लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के पक्ष में प्रचार तो किया ही, मतगणना केंद्र पर माले एजेंट के रूप में शहाबुद्दीन का विरोध भी किया था. जब इस की जानकारी शहाबुद्दीन को मिली तो उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए उस का अपहरण कर लिया था. आज तक उस का पता नहीं चला है.

छोटेलाल साह के अपहरण के 8 साल बाद जो फैसला आया, उस में सत्र न्यायाधीश ज्ञानेश्वर श्रीवास्तव ने शहाबुद्दीन को आजीवन कारावास के साथ 10 हजार रुपए आर्थिक दंड की सजा भी सुनाई थी. जब बिहार का डीजीपी डी.पी. ओझा को बनाया गया तो उन्होंने शहाबुद्दीन के अपराध की सभी फाइलों को इकट्ठा कर 30 जुलाई, 2003 को गिरफ्तारी का आदेश जारी कर दिया. आदेश होते ही वह फरार हो गए. 12 अगस्त, 2003 को उन्होंने अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया लेकिन इस का परिणाम अच्छा नहीं आया. डीजीपी ओझा को पद से हटा दिया गया.

31 मार्च, 2007 को दिनदहाड़े एक ऐसी घटना घटी, जिस ने सीवान को ही नहीं, पूरे बिहार को हिला कर रख दिया था. हुआ यह कि उस दिन सीवान के अति व्यस्त क्षेत्र तीनमुहाने पर स्थित लोकनायक जयप्रकाश की प्रतिमा के ठीक सामने कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिनवादी (लिबरेशन) के 2 कामरेड युवा नेता चंद्रशेखर और श्यामनारायण बिहार में फैली अराजकता और हिंसा के खिलाफ 2 अप्रैल, 2007 को बिहार बंद के पक्ष में नुक्कड़ सभा कर रहे थे. दोपहर का समय था. वहां हजारों की भीड़ जमा थी.

उसी समय अत्याधुनिक हथियारों से लैस गाडि़यों से कुछ बदमाश आए और चंद्रशेखर तथा श्यामनारायण को गोलियों से छलनी कर दिया. बदमाशों के भागते समय एक रिक्शाचालक भूटाली मियां सामने आ गया, तो बदमाशों ने उसे भी गोलियों से भून दिया. इस के बाद भाकपा माले लिबरेशन के सीवान जिला प्रभारी रमेश सिंह कुशवाहा ने शहाबुद्दीन और उन के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया. इस मामले में भी शहाबुद्दीन को उम्रकैद की सजा हुई है. सत्ता बदलते ही शहाबुद्दीन का आतंक खत्म होता गया. सजा होने की वजह से वह सन 2009 का चुनाव भी नहीं लड़ पाए. अपनी जगह उन्होंने पत्नी हिना शहाब को चुनाव लड़ाया, लेकिन लोगों ने उसे नकार दिया और नतीजा यह निकला कि हिना चुनाव हार गईं.

तेजाब हत्याकांड में काल डिटेल्स, शहाबुद्दीन के अपराधों और राजीवराज रोशन की गवाही पर शहाबुद्दीन को भादंसं की धारा 302, 201, 364ए व 120बी का दोषी पाया गया था. अन्य अभियुक्तों राजकुमार साह, आरिफ और शेख असलम को भादंसं की धारा 302 व 201 से मुक्त करते हुए अपहरण का दोषी माना गया था. इस के अलावा इस मामले के बाकी 7 अभियुक्तों का फैसला सुरक्षित रखा गया है. उन का फैसला आगामी दिनों में सुनाया जाएगा.

सजा पाए शहाबुद्दीन के अधिवक्ता अभय कुमार राजन का कहना है कि हम इस फैसले के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में अपील करेंगे. हमें उम्मीद है कि वहां से हमें न्याय मिलेगा. इस मामले में सच्चाई यह है कि शहाबुद्दीन 13 अगस्त, 2003 से जेल में बंद थे. घटना वाले दिन वह बाहर कैसे आ गए. अगर इस मामले में शहाबुद्दीन दोषी हैं तो जेल प्रशासन भी बराबर का दोषी है. जबकि जेल प्रशासन का कहना है कि शहाबुद्दीन जेल से बाहर नहीं गए थे. ऐसे में उन्होंने घटना को अंजाम कैसे दिया? इस के साथ पैसे मांगने वाली काल डिटेल्स भी पूरी नहीं है.

अपने 3 बेटों को खोने वाले चंद्रकेश्वर प्रसाद का कहना है कि उन का तो वैसे भी सब कुछ लुट चुका है. अब उन के पास बरबाद होने को बचा ही क्या है. लेकिन शहाबुद्दीन और उन के साथियों को सजा मिलने से सुकून जरूर मिला है.

कहा जाता है कि शहाबुद्दीन के लिए अपराध धंधा नहीं, बल्कि मनोरंजन भी था. किसी की हत्या करने में उन्हें मजा आता था. बिहार के सीवान में आतंक की बदौलत उन की अपनी सरकार चलती थी. आतंक इतना था कि लोग उन का नाम लेने में डरते थे. पहली बात तो कोई उन का नाम लेना ही नहीं चाहता था. अगर जरूरत भी पड़ती तो नाम लेने के बजाय साहब कहता था. आज वही साहब अपनी करनी की सजा जेल की सलाखों के पीछे भुगत रहा है. कानून को अपनी जागीर समझने वालों का अंत में यही हश्र होता है. Bihar Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Stories: रोहित वेमुला – दलित छात्र की बेबस मौत  

Hindi Crime Stories: हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या की गूंज पूरे देश में सुनाई दी. इस के लिए तथाकथित रूप से जिम्मेदार भाजपा यह सोच कर परेशान है कि क्या एक छात्र की मौत इतनी हंगामाखेज हो सकती है. आखिर कौन जिम्मेदार है रोहित की आत्महत्या का?

निजाम का शहर कहिए या नवाबों का, हैदराबाद दक्षिण भारत का एक महत्त्वपूर्ण शहर है. एक ओर विश्वप्रसिद्ध चारमीनार इस शहर की ऐतिहासिक पहचान है तो दूसरी ओर संभवत: विश्व का यह अकेला ऐसा शहर है, जिस में 9 सरकारी विश्वविद्यालय हैं.  इन्हीं 9 विश्वविद्यालयों में एक है केंद्रीय विश्वविद्यालय, जो इस शहर की गहमागहमी से दूर, शांत इलाके गाची बावली में स्थित है.

17 जनवरी की आधी रात बीत चुकी थी. तभी गाची बावली पुलिस स्टेशन को सूचना मिली कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के न्यू रिसर्च हौस्टल में एक छात्र ने आत्महत्या कर ली है. गाची बावली थाने के इंसपेक्टर जे. रमेश कुमार तुरंत अपने सहयोगियों के साथ न्यू रिसर्च हौस्टल पहुंच गए. हौस्टल के कमरा नंबर 207 में उन्हें एक छात्र फंदे से लटका हुआ मिला जिस की पहचान रोहित वेमुला के रूप में हुई. उन्होंने अपनी काररवाई शुरू कर दी. जैसेजैसे छात्रों को कैंपस में पुलिस की मौजूदगी और रोहित वेमुला की आत्महत्या की सूचना मिलती गई, वे हौस्टल में एकत्र होते गए.

पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजना चाहती थी, मगर छात्रों की मांग थी कि पहले रोहित को आत्महत्या के लिए उकसाने वाले लोगों के विरुद्ध काररवाई की जाए. छात्रों का आक्रोश बढ़ता जा रहा था. उन के आक्रोश की जानकारी पा कर पुलिस के बड़े अफसर भी पहुंच गए. छात्रों के बढ़ते आक्रोश को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स के 200 जवानों को बुला लिया गया. तब तक सुबह के 7 बज चुके थे. काफी कोशिशों के बाद पुलिस रोहित की लाश को पोस्टमार्टम के लिए उस्मानिया जनरल अस्पताल ले जाने में सफल हो पाई.

जैसेजैसे दिन चढ़ता गया, रोहित की आत्महत्या का समाचार फैलता गया. इस के साथसाथ हैदराबाद से ले कर दिल्ली, चेन्नै और कश्मीर तक राजनीतिक भूचाल आ गया. आखिर रोहित वेमुला को आत्महत्या क्यों करनी पड़ी, यह एक बड़ा सवाल है. गुंटूर के एक कस्बे गुरुतला के रहने वाले मनीकुमार और राधिका की 3 संतानों में से दूसरे नंबर का था रोहित वेमुला. रोहित जाति से दलित था. लेकिन पढ़ाई में बहुत तेज. अपनी स्कूली शिक्षा अच्छे नंबरों से पास करने के बाद उस ने स्नातक की डिग्री भी गुंटूर से ही ली थी. इस के बाद उस ने सन 2012 में हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में एमएससी लाइफ साइंस में प्रवेश लिया. अप्रैल 2014 में उसे सीएसआईआर द्वारा जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए चुन लिया गया.

रोहित वेमुला पढ़ाई के साथसाथ सामाजिक गतिविधियों में भी भाग लेता था. इस के साथ ही वह दलित व पिछड़ों के हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी संघर्षरत था. वह अंबेडकर छात्र संगठन से भी जुड़ा हुआ था. अंबेडकर छात्र संगठन विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के हितों के लिए संघर्ष करने वाली एक संस्था है. इस संगठन का भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के साथ हमेशा टकराव रहता है. अंबेडकर छात्र संगठन जहां एक ओर दलित छात्रों के हितों को प्राथमिकता देता है, वहीं दूसरी ओर एबीवीपी हिंदूवादी छात्रों के हितों के रक्षक के तौर पर काम करता है.

जिस समय रोहित वेमुला को स्कौलरशिप मिली, तब भारतीय राजनीति एक बार फिर करवट ले रही थी. देश में आम चुनाव हो रहे थे. 16 मई, 2014 को घोषित चुनाव परिणाम में भाजपा विजयी हुई थी. सन 2014 के आम चनुव में भाजपा को मिली विजय के बाद भाजपा के समर्थकों और उस से संबंधित संगठनों में एक विचित्र सी उग्रता आ गई है. सोशल मीडिया हो या संचार का कोई और माध्यम, ये लोग विरोध का स्वर सुनना पसंद नहीं करते. मई, 2014 के बाद से देश में कई घटनाएं ऐसी हुईं, जिस में आम जनता को इन की असहिष्णुता का सामना करना पड़ा. यहां तक कि केंद्र में भाजपा सरकार के कुछ मंत्री भी इस का समर्थन करते नजर आए.

जुलाई, 2015 में दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में एक डाक्युमेंट्री ‘मुजफ्फरनगर अभी बाकी’ का छात्रों के लिए प्रदर्शन किया जा रहा था. जैसे ही यह सूचना अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नवनिर्वाचित छात्र यूनियन के अध्यक्ष सनी डेडा को मिली, वह यूनियन कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंच गए और जबरन डाक्युमेंट्री का प्रदर्शन रुकवा दिया. सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में हुई यह दबंगई कोई मामूली घटना नहीं थी. इस से यह उजागर होता था कि आने वाले दिनों में विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों आदि में केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा का समर्थक वर्ग अपने विरोधियों के स्वर दबाने का प्रयास करेगा.

ऐसे लोगों को अपरोक्ष रूप से शह मिल रही थी भाजपा के केंद्रीय नेताओं व मंत्रियों के बयानों से, जो समयसमय पर अपने बयानों से विषवमन कर रहे थे. इन लोगों में प्रमुख थे योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची, साक्षी महाराज व महेश शर्मा आदि. यह सिलसिला अभी थमा नहीं है, शायद थमेगा भी नहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इन लोगों को रोकने का कोई प्रयास नहीं करते. किरोड़ीमल कालेज में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की दबंगई का समाचार जब दूसरे शिक्षण संस्थानों में पहुंचा तो अंबेडकर छात्र संगठन ने इस के विरोध में प्रदर्शन किया. ऐसा ही प्रदर्शन हैदराबाद के केंद्रीय विश्वविद्यालय में 3 अगस्त, 2015 को किया गया था. इस प्रदर्शन को भी एबीवीपी ने रोकने का प्रयास किया था.

रोहित वेमुला इस के पहले से ही केंद्रीय विश्वविद्यालय हैदराबाद प्रशासन के निशाने पर था, क्योंकि वह अंबेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन के बैनर तले छात्रों के हितों से संबंधित मसले जोरशोर से उठाता रहता था. जबकि यह भाजपा की विचारधारा के विरुद्ध था. इस के चलते ही विश्वविद्यालय ने जुलाई, 2015 से रोहित की 25 हजार रुपए प्रतिमाह की छात्रवृत्ति कागजी काररवाही पूरी न होने का बहाना बना कर रोक दी थी, जो अभी तक रुकी हुई थी. यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि जब से स्मृति ईरानी ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय का पदभार संभाला है, शिक्षा संस्थानों में सरकारी दखल बढ़ा है. इस से पहले की ही एक घटना थी, चेन्नै स्थित भारतीय तकनीकी संस्थान की.

मद्रास आईआईटी ने एक शिकायत के आधार पर छात्र संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता समाप्त कर दी थी, जिस में कहा गया था कि यह संगठन केंद्र सरकार की नीतियों के विरुद्ध कार्य करने के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदुओं के विरुद्ध घृणा फैला रहा है. इस मामले में भी स्मृति ईरानी का नाम आया था और कहा गया था कि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की संस्तुति और परोक्ष हस्तक्षेप के कारण ही आईआईटी प्रशासन ने दलित छात्रों के संगठन अंबेडकर पेरियार सर्किल की मान्यता रद्द की थी.

केंद्र सरकार का शिक्षा संस्थानों व शिक्षा नीतियों में दखलंदाजी करने का यह कोई पहला मामला नहीं था. नोबेल पुरस्कार विजेता और महान अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने भी इसीलिए नालंदा विश्वविद्यालय के उपकुलपति का पद त्याग दिया था. यही बात हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के मामले में सामने आई. 3 अगस्त, 2015 को हुए प्रदर्शन के दौरान एबीवीपी और एएसए के बीच हुई झड़प को संज्ञान में लेते हुए एबीवीपी नेता सुशील कुमार के इस बयान के आधार पर कि रोहित और उस के साथियों ने उसे चोट पहुंचाई है, जिस के कारण उसे अस्पताल में भरती होना पड़ा, के आधार पर रोहित और उस के 4 साथियों के विरुद्ध जांच बैठा दी गई.

17 अगस्त, 2015 को केंद्रीय श्रम मंत्री व सिकंदराबाद के सांसद बंडारू दत्तात्रेय, जोकि भाजपा में शामिल होने से पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं, ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को एक पत्र लिखा. इस पत्र में कहा गया था कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय पिछले कुछ समय से जातिवादी, अतिवादी और राष्ट्रविरोधी तत्वों की पनाहगाह बन गया है, इसलिए यहां पर ऐसा करने वालों के विरुद्ध काररवाई की जाए.

यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि एबीवीपी का नेता होने के कारण सुशील कुमार के श्रम मंत्री से अच्छे संबंध हैं. बंडारू दत्तात्रेय के पत्र के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय जिस की प्रमुख स्मृति ईरानी हैं, ने 3 सितंबर को विश्वविद्यालय को पत्र लिख कर एएसए के खिलाफ काररवाई करने को कहा. इस पत्र के मिलते ही विश्वविद्यालय ने रोहित वेमुला सहित 5 छात्रों को जांच पूरी होने तक के लिए निलंबित कर दिया. मगर मानव संसाधन मंत्रालय की दखलंदाजी यहीं नहीं रुकी और 14 सितंबर, 6 अक्तूबर, 20 अक्तूबर और 19 नवंबर को विश्वविद्यालय प्रशासन को एक के बाद एक 5 रिमाइंडर भेज कर दोषियों के विरुद्ध शीघ्र काररवाई की बात दोहराई गई.

अंतत: विश्वविद्यालय की ओर से 7 जनवरी को मंत्रालय के पत्र पर काररवाई करते हुए पांचों छात्रों को विश्वविद्यालय से निष्काषित कर के तुरंत हौस्टल छोड़ने का फरमान जारी कर दिया गया. इस फरमान के जरिए इन पांचों छात्रों को निष्काषित करने के साथ ही प्रशासनिक बिल्डिंग, लाइब्रेरी, मैस, विश्वविद्यालय कैंपस और वहां के सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया. विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फरमान के विरोध में छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. इन प्रदर्शनों को धार देने के लिए छात्रों ने जौइंट कमेटी फौर सोशल एक्शन बना ली.

7 जनवरी को जिस दिन रोहित का निष्कासन हुआ था, उस दिन से ही वह अपने चारों अन्य साथियों के साथ धरना देते हुए कैंपस में खुले में रात गुजार रहा था. 17 जनवरी को रविवार का दिन था. सभी छात्र बैठे बातें कर रहे थे. रोहित भी वहां मौजूद था. बातोंबातों में जिक्र निकला कि 30 जनवरी को रोहित का जन्मदिन है, वह 27 साल का हो जाएगा. इस पर रोहित ने कहा कि उस की छात्रवृत्ति गत जुलाई से रुकी हुई है और उस पर काफी कर्ज हो गया है. उस के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वह अपने जन्मदिन की पार्टी  कर सके.

उस के लहजे से मायूसी झलक रही थी. प्रशासन व एबीवीपी के समर्थकों द्वारा किया गया अपमान उसे दुखी कर रहा था. शाम साढ़े 7 बजे वह सब की नजरें बचा कर न्यू रिसर्च हौस्टल के कमरा नंबर 207 में गया, जहां उस ने एक पत्र लिखा—

‘मैं हमेशा से एक लेखक बनना चाहता था. विज्ञान का लेखक, कार्ल सगन की तरह.

मैं विज्ञान से, तारों से, प्रकृति से प्रेम करता हूं, लेकिन इस के बाद भी मैं लोगों से प्यार करता हूं. यह जाने बिना भी कि मेरे लोगों को दूसरे से अलगथलग कर दिया गया है. हमारी भावनाओं को महत्त्व नहीं दिया जाता. हमारा प्रेम बनावटी है. हमारे विश्वास अंधे हैं. हमारी पहचान झूठी प्रथाओं द्वारा बनाई जाती है. वास्तव में यह बहुत कठिन हो गया है कि बिना दुख का सामना किए प्रेम किया जाए. मानव की योग्यता उस की तात्कालिक पहचान और निकट संभावनाओं तक सीमित कर दी गई है. वोट के तौर पर, गिनती के तौर पर, वस्तु के तौर पर. मनुष्य को एक विचार के तौर पर कतई नहीं लिया जाता. हर क्षेत्र में, शिक्षा में, सड़कों पर, राजनीति में और मरने व जीने में हमें अलग कर दिया गया है.

मैं इस प्रकार का पत्र पहली बार लिख रहा हूं. यह पहल भी है और अंत भी, मेरे अंतिम पत्र का. अगर आप के अनुकूल बात मैं नहीं लिख सका तो मुझे क्षमा करना. मेरा जन्म एक खतरनाक दुर्घटना थी. मैं जीवन भर अपने बचपन की तनहाई से निकल नहीं पाया. मैं एक ऐसा बच्चा था, जिसे बचपन से ही दुत्कारा गया. हो सकता है मैं गलत होऊं. मैं सारी जिंदगी संसार को नहीं समझ पाया हूं. नहीं समझ सका हूं प्यार, दर्द, जीवन और मृत्यु को. इस की कोई जल्दी भी नहीं थी. मगर इस पूरे समय में मैं ने पाया कि कुछ लोगों के लिए जीवन अभिशाप है. मुझे इस समय की चोट नहीं पहुंची, न मैं दुखी हूं. बस मेरे पास कुछ नहीं है, अपने बारे में कोई चिंता नहीं है, यह दयनीय है. यही कारण है जो मैं ऐसा कर रहा हूं.

लोग मुझे स्वार्थी, मूर्ख समझ सकते हैं, परंतु मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे बारे में लोग क्या सोचते हैं. मैं मौत के बाद की कहानियों में या भूतप्रेत में विश्वास नहीं करता. अगर इस संसार में कुछ है, जिस पर मेरा विश्वास है, वह यह कि मैं तारों की यात्रा कर सकता हूं और दूसरी दुनिया को जान सकता हूं. अगर कोई मेरे लिए कुछ कर सकता है तो वह जान ले कि पिछले 7 माह से मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिली, जोकि 1 लाख 75 हजार रुपए बनती है. अगर हो सके तो यह मेरे परिवार को दिलवा देना. मेरे ऊपर 40 हजार रुपए रामजी के उधार हैं. उस ने कभी भी मुझ से रुपए नहीं मांगे. मेरा अंतिम संस्कार शांति से और सादे तरीके से करना, ठीक उसी तरह से जिस तरह मैं इस दुनिया में आया और इस दुनिया से जा रहा हूं. मेरे लिए कोई आंसू नहीं बहाना. जान लें कि जिंदा रहने के मुकाबले मर कर मैं खुश हूं.

भाई उमा, मैं यह सब तुम्हारे कमरे में कर रहा हूं इस के लिए मुझे माफ करना. एएसए परिवार से भी उन्हें मायूस करने के लिए माफी चाहता हूं. आप सब मुझ से बहुत प्यार करते हैं, यह मैं जानता हूं. मैं कामना करता हूं कि आप सब का भविष्य सुनहरा हो. अंतिम बार जय भीम.

हां, मैं औपचारिकताएं लिखना भूल गया. मेरी आत्महत्या के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है. किसी ने भी मुझे ऐसा करने के लिए नहीं उकसाया, न अपने कृत्यों से, न शब्दों से. यह मेरा निर्णय है. इस के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं. मेरे दोस्तों और दुश्मनों को परेशान मत करना, मेरे जाने के बाद.’ इस के बाद रोहित वेमुला ने एएसए के नीले झंडे को अपने शरीर पर लपेट कर छत में लगे कुंडे से लटक कर अपना जीवन समाप्त कर लिया. आधी रात के बाद जब उमा, प्रशांत के साथ कमरा नंबर 207 में आया तो उसे रोहित द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने का पता चला, जिस की सूचना पुलिस को दे दी गई.

रोहित के साथी प्रशांत ने थाना गाची बावली में उस की आत्महत्या के लिए 3 लोगों को जिम्मेदार ठहराते हुए एफआईआर दर्ज कराई. इन के नाम हैं—केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय, उपकुलपति अप्पा राव और एबीवीपी नेता सुशील कुमार. 18 जनवरी को जैसे ही यह समाचार देश में फैला, इस मामले की परतें उधड़ने लगीं. एक कमजोर शिक्षा मंत्री की काररवाई के नतीजे के तौर पर इसे आत्महत्या न मान कर हत्या माना गया. क्योंकि शिक्षा से संबंधित शिकायतों पर जो मंत्रालय काररवाई नहीं करता, उसी ने एक दूसरे मंत्री के पत्र पर ताबड़तोड़ पत्र लिख कर काररवाई करने की मांग की.

यह पहला अवसर नहीं है जब बंडारू दत्तात्रेय जैसे केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता ने विरोधी विचारधारा के लोगों व छात्रों को राष्ट्रदोही व अवांछित तत्व करार दिया हो. 14 मई, 2014 के बाद से भाजपा नेता कई विश्वविद्यालयों के बारे में कह चुके हैं कि ये राष्ट्रद्रोही तत्वों की पनाहगाह हैं. मजे की बात यह कि ये सारे विश्वविद्यालय वे हैं, जिन की शिक्षा के क्षेत्र में विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान है. आईआईटी मद्रास हो, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय हो या अब हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, भाजपाइयों को इस प्रकार के सारे संस्थान राष्ट्रद्रोहियों के गढ़ नजर आते हैं.

रोहित की आत्महत्या केवल एक छात्र की मौत नहीं है. यह मौत दर्शाती है दलित छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को. भाजपा के शासनकाल में यह भेदभाव अपने चरम की ओर अग्रसर है. कहने को तो मोदीजी अंबेडकर को महान नेता बताते हुए उन का गुणगान करते हैं, मगर उन के अधीनस्थ मंत्री व नेता अंबेडकरवादियों को राष्ट्रविरोधी कहते नहीं थक रहे हैं.

क्या यह असहिष्णुता नहीं है कि कालेज में हुए विरोध प्रदर्शन के कारण एक समुदाय को राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाए, उन का भविष्य चौपट कर दिया जाए? और अब जब इस मामले में सीधे तौर पर बंडारू दत्तात्रेय और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी की भूमिकाएं शक के दायरे में हों तो भाजपा कह रही है कि इस मामले को तूल नहीं दिया जाए, यह तो छात्र के मन में उपजी निराशा का परिणाम था. इस का दलित या गैरदलित राजनीति से कोई संबंध नहीं है.

अपनी बात को सही साबित करने के लिए 20 जनवरी को स्मृति ईरानी ने प्रेस कौन्फ्रैंस की, जिस में कहा गया कि रोहित के निष्कासन का निर्णय जिस उपसमिति ने किया था, उस का मुखिया एक दलित ही था और यह एक दलित द्वारा दलित के विरुद्ध की गई काररवाई थी. स्मृति ईरानी के इस बयान को दिए 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के दलित प्रोफेसरों ने ईरानी के बयान का खंडन करते हुए कहा कि जिस उपसमिति ने रोहित और उस के 4 साथियों के निष्कासन का निर्णय लिया था, उस में कोई भी दलित नहीं था, सारे के सारे सदस्य गैरदलित थे.

यहां तक कि स्मृति ईरानी के बयान को भ्रामक बताते हुए विश्वविद्यालय के 15 प्रोफेसरों ने अपने प्रशासनिक पदों से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्री का यह कहना कि उपरोक्त निर्णय में दलित फैकल्टी की सहमति शामिल थी, एकदम निराधार और झूठ है. यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि विश्वविद्यालय की एग्जीक्यूटिव काउंसिल में किसी भी दलित को प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है. मंत्री महोदया देश को गुमराह कर रही हैं. मुद्दों को भटका कर अपनी जिम्मेदारी से भाग रही हैं.

बात को बढ़ती देख दलित छात्रों के समर्थन में राजनीतिक दल भी कूद गए. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, कम्युनिस्ट ए. राजा और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी छात्रों के समर्थन में हैदराबाद विश्वविद्यालय पहुंचे. साथ ही रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले को ले कर देश भर में विरोध प्रदर्शन किए गए. विश्व भर के 150 से ज्यादा विख्यात शिक्षाविदों ने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय द्वारा की गई काररवाही की कड़े शब्दों में निंदा की.

जहां एक ओर प्रधानमंत्री अपने भाषण में भारत को विश्वगुरु बनाने की जोरशोर से घोषणा करते हैं, वहीं दूसरी ओर देश में इस तरह की घटनाएं हो रही हैं, जो एक सभ्य समाज के लिए कलंक है. गाहेबगाहे ऐसी घटनाओं के पीछे अधिकतर प्रधानमंत्री के सिपहसालारों की कारगुजारियां नजर आती हैं. पुलिस ने केंद्रीय श्रम मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और 2 अन्य के खिलाफ भादंवि की धारा 306 के तहत केस दर्ज कर लिया है. अब देखना यह है कि कानून आगे का अपना काम करता है या नहीं? मोदीजी अपने उतावले मंत्रियों के विरुद्ध काररवाई करने का मन बनाते हैं या नहीं? वैसे इस की उम्मीद कम ही है कि प्रधानमंत्री इस बार भी कोई कदम उठाएंगे.

लगता है, जिस प्रकार रोहित ने अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि मेरे ऊपर इस का कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है, ठीक उसी प्रकार मोदीजी भी सोचते हैं कि कोई कुछ भी कहता रहे, उन पर इस का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. वैसे बताते चलें कि 22 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ की अंबेडकर यूनिवर्सिटी में भाषण देते हुए भावुक हो कर रोहित वेमुला का नाम ले कर कहा है कि भारत मां ने एक लाल खोया है. लेकिन उन वे आंसू राजनीति से प्रेरित थे. उस राजनीति से प्रेरित जिस का कोई चालचरित्र और चेहरा नहीं होता, जो गिरगिट की तरह रंग बदलता है.

हालांकि सरकार ने इस मामले की जांच के लिए एक आयोग भी बैठा दिया है और रोहित वेमुला के परिवार को 8 लाख रुपए सहायता राशि देने की भी घोषणा की है. जबकि धरना और विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रोहित वेमुला के परिवार को 50 लाख रुपए और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने की मांग की है. बौक्स 3 अगस्त को जब इस घटनाक्रम की शुरुआत हुई तो उस समय केंद्रीय विश्वविद्यालय के उपकुलपति आर.पी. शर्मा थे. कहा जाता है कि उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने जो जांच कमेटी बनाई थी, उस ने पांचों दलित छात्रों को क्लीन चिट दे दी थी. क्योंकि एबीवीपी से जुड़ा छात्र सुशील कुमार जिस अस्पताल में दाखिल हुआ था, उस के रिकौर्ड के अनुसार वह वहां पर अपेंडीसाइटिस के औपरेशन के लिए दाखिल हुआ था, उस के शरीर पर कोई चोट का निशान नहीं था.

23 सितंबर, 2015 को नए उपकुलपति अप्पा राव ने इस विश्वविद्यालय का कार्यभार संभाल लिया है. उसी समय मानव संसाधन विकास मंत्रालय बहुत गतिशील हो गया. 24 सितंबर को ही रिमाइंडर भेज दिया कि जवाब दें कि दलित छात्र रोहित वेमुला और उस के साथियों के विरुद्ध क्या काररवाई हुई. इस के बाद एक के बाद एक पांच रिमाइंडर भेजे गए. आखिरकार 7 जनवरी को इन पांचों छात्रों रोहित वेमुला, डी प्रशांत, पी. विजय कुमार, शैषैया चेमुदुगुंटा और सुकन्ना को निलंबित कर दिया गया था, जिस के परिणामस्वरूप रोहित ने आत्महत्या की थी.