Bihar News: बेटे के कातिल पर आया मां को रहम

Bihar News: बिहार के गया शहर के हाईप्रोफाइल आदित्य मर्डर केस में अदालत ने हत्यारे रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव (25 साल), उस के साथी टेनी यादव उर्फ राजीव कुमार (23 साल), उस की मां मनोरमा देवी के सरकारी बौडीगार्ड राजेश कुमार (32 साल) को उम्रकैद तथा रौकी के पिता बिंदी यादव (55 साल) को 5 साल की कैद की सजा सुनाई है.

जदयू की निलंबित एमएलसी मनोरमा देवी और पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष बिंदी यादव के बिगड़ैल बेटे रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव ने पिछले साल 7 मई को गया के बड़े कारोबारी श्याम सचदेवा के बेटे आदित्य सचदेवा की गोली मार कर हत्या कर दी थी. आदित्य की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह रौकी की लैंडरोवर कार को ओवरटेक कर के आगे निकल गया था. सत्ता और दौलत के नशे में चूर रौकी को आदित्य की इस हरकत पर इतना गुस्सा आया कि उस ने उसे गोली मार दी थी.

मृतक आदित्य की मां चंदा सचदेवा ने अदालत से अनुरोध किया था कि उन के मासूम बेटे के हत्यारों को फांसी की सजा न दी जाए. वह नहीं चाहतीं कि फांसी दे कर उन की तरह एक और मां की गोद सूनी कर दी जाए. 31 अगस्त को जब आदित्य की हत्या के मामले में रौकी और उस के साथियों को दोषी ठहरा दिया गया तो चंदा सचदेवा ने रोते हुए कहा था कि आखिर उन के बेटे का क्या कसूर था, जो उसे इस तरह मार दिया गया? उस ने तो अभी ठीक से दुनिया भी नहीं देखी थी. बेटे की मौत के बाद से आज तक उन के आंसू नहीं थमे हैं.

society

शायद जिंदा रहने तक थमेंगे भी नहीं, इसीलिए वह नहीं चाहती थीं कि ऐसा दर्द किसी अन्य मां को मिले. उन्होंने अदालत का फैसला आने से पहले ही कहा था, ‘‘मेरा बेटा तो चला गया, पर मैं किसी और मां को ऐसा दर्द देने या दिलाने के बारे में कतई नहीं सोच सकती. रौकी को अदालत कड़ी से कड़ी सजा दे, पर फांसी न दे.’’ बाद में फैसला आने पर उन्होंने कहा, ‘‘अदालत ने जो फैसला सुनाया है, उस से मैं संतुष्ट हूं.’’

चंदा सचदेवा का कहना सही भी है. जवान बेटे के खोने का दर्द उन से बेहतर और कौन जान सकता है. वह अपना दर्द कम करने के लिए अन्य मां का बेटा नहीं छीनना चाहती थीं. सरकारी वकील सरताज अली ने बहस के दौरान कहा था कि यह बहुत जघन्यतम मामला है, इसलिए हत्यारे रौकी को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए. जज ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा था कि यह मामला रेयरेस्ट औफ रेयर नहीं है, इसलिए 3 आरोपियों को उम्रकैद और एक को 5 साल की कैद की सजा दी जाती है.

आदित्य के पिता श्याम सचदेवा कहते ने कहा कि सरकार, पुलिस और प्रशासन ने उन का पूरा साथ दिया. इसी का नतीजा है कि आज उन्हें इंसाफ मिला है. इस हत्याकांड की जांच और सुनवाई के दौरान तमाम उतारचढ़ाव आए. वारदात के 3 दिनों बाद 10 मई को रौकी को गिरफ्तार किया गया था. 6 जून को सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी. मुख्य आरोपी रौकी की जमानत की अर्जी को गया सिविल कोर्ट ने खारिज कर दिया था. इस के बाद रौकी ने पटना हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की थी.

19 अक्तूबर, 2016 को वहां से जमानत मिल गई थी. हाईकोर्ट द्वारा जमानत देने के विरोध में बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट गई, जहां रौकी की जमानत रद्द कर दी गई तो उसे दोबारा जेल जाना पड़ा. इस मामले में 29 लोगों की गवाही हुई थी.

क्यों मारा गया आदित्य

पिछले साल 7 मई की रात 8-9 बजे के बीच गया के कारोबारी श्याम कुमार सचदेवा का बेटा आदित्य सचदेवा अपने दोस्त की मारुति स्विफ्ट कार बीआर-02ए सी2699 से बोधगया से गया स्थित अपने घर की ओर आ रहा था. वह अपने दोस्तों के साथ बर्थडे पार्टी में बोधगया गया था. रास्ते में जेल के पास ही सत्तारूढ़ दल जदयू की एमएलसी मनोरमा देवी के बेटे रौकी अपनी लैंडरोवर कार से आदित्य की कार को ओवरटेक करने की कोशिश करने लगा.

काफी देर तक आदित्य ने उसे आगे नहीं जाने दिया. जब खाली सड़क मिली, रौकी ने उस की कार को ओवरटेक कर के आदित्य की कार रुकवा ली. इस के बाद उस ने उसे कार से उतार कर जम कर पिटाई की. पिटाई के बाद आदित्य और उस के साथियों ने उन से माफी मांग ली. वे अपनी कार की अेर जाने लगे तो बाहुबली बाप के बिगड़ैल बेटे रौकी ने पीछे से गोली चला दी, जो आदित्य के सिर में जा लगी. वह जमीन पर गिर पड़ा. थोड़ी देर तक वह तड़पता रहा, उस के बाद प्राण त्याग दिए.

आदित्य के दोस्तों के बताए अनुसार, रात पौने 8 बजे के करीब उन की कार ने एक लैंडरोवर एसयूवी कार को ओवरटेक किया. इस के बाद वह कार उन की गाड़ी के आगे जाने के लिए रास्ता मांगने लगी. उस कार से आगे निकल कर उन की कार सिकरिया मोड़ से गया शहर में पुलिस लाइन की ओर मुड़ गई.

इस के कुछ देर बाद लैंडरोवर कार आदित्य की स्विफ्ट कार के बगल में आई तो उस में बैठे लोगों ने शोर मचाते हुए कार रोकने का इशारा किया. कार चला रहे नासिर ने गाड़ी रोक दी तो उस कार से 4 लोग नीचे उतरे. उन में रौकी, बौडीगार्ड, ड्राइवर और एक अन्य आदमी था, जिसे वे नहीं पहचानते थे.

society

रौकी ने आदित्य की पिटाई तो की ही, पिस्तौल की बट से नासिर पर भी हमला किया, जिस से उस ने गाड़ी को भगाने की कोशिश की. गाड़ी कुछ ही दूर गई थी कि पीछे से गोली चलने की आवाज आई. वह गोली आदित्य को लगी, जिस वह सीट पर ही लुढ़क गया.

हत्यारे की गिरफ्तारी

हत्या के इस मामले में पुलिस ने रौकी उर्फ राकेश रंजन यादव, उस के पिता और मनोरमा देवी के पति बिंदेश्वरी यादव उर्फ बिंदी यादव को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. मनोरमा देवी का सरकारी बौडीगार्ड राजेश कुमार भी हत्या के इस मामले में शामिल था. पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया था. उस के पास से 70 राउंड गोली और कारबाइन जब्त कर ली गई थी. उस पर आरोप था कि उस ने रौकी को गोली चलाने से रोका नहीं था.

एडीजे मुख्यालय सुनील कुमार ने बताया था कि हथियार की फोरैंसिक जांच में पता चला था कि बौडीगार्ड के हथियार से गोली नहीं चलाई गई थी. पूछताछ में बौडीगार्ड ने बताया था कि रौकी ने ही आदित्य पर गोली चलाई थी. रौकी के पिता बिंदी यादव का पुराना आपराधिक रिकौर्ड रहा है. वह और उस का बेटा रौकी, दोनों ही रिवौल्वर रखते थे. गया के थाना रामपुर में आदित्य के भाई आकाश सचदेवा की ओर से आदित्य की हत्या का मुकदमा अपराध संख्या 130/2016 पर आईपीसी की धारा 341, 323, 307, 427, 120बी और 27 आर्म्स एक्ट के तहत दर्ज किया गया था.

जबकि पुलिस यह मुकदमा दर्ज करने में टालमटोल कर रही थी. लेकिन आदित्य के घर वालों का कहना था कि जब तक मुकदमा दर्ज नहीं होगा, वे लाश का अंतिम संस्कार नहीं करेंगे. सियासी और प्रशासनिक दांवपेच चलते रहे. पुलिस ने 5 बार मुकदमे का मजमून बदलवाया. आदित्य के पिता श्याम कुमार सचदेवा गया के बड़े कारोबारी हैं. वह मूलरूप से पंजाब के रहने वाले हैं. थाना कोतवाली के स्वराजपुरी रोड पर महावीर स्कूल के पास उन की सचदेवा इंटरप्राइजेज के नाम से पाइप की दुकान है.

कौन था आदित्य

आदित्य ने गया के नाजरथ एकेडमी कौनवेंट स्कूल से 12वीं की परीक्षा दी थी. उस की मौत के बाद उस का परीक्षाफल आया था. आदित्य के चाचा राजीवरंजन के अनुसार, उन का परिवार करीब 65 साल पहले पाकिस्तान से आ कर गया में बसा था. आदित्य से पहले उन के परिवार के एक अन्य सदस्य की हत्या हो चुकी थी. सन 1987 में उन के बड़े भाई हरदेव सचदेवा के बेटे डिंपल की हत्या पतरातू में कर दी गई थी. इस के बाद उन के छोटे भाई के छोटे बेटे को मार दिया गया.

7 मई को आदित्य की हत्या हुई थी. 10 और 11 मई की रात 2 बजे के करीब रौकी को उस के पिता बिंदी यादव के मस्तपुरा स्थित मिक्सचर प्लांट से गिरफ्तार किया गया था. उस के पास से हत्या में इस्तेमाल की गई विदेशी रिवौल्वर और गोलियों से भरी मैगजीन बरामद की गई थी. उस के पिस्तौल का लाइसैंस दिल्ली से जारी किया गया था. पूछताछ में रौकी ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. लेकिन बाद में वह अपने अपराध से मुकर गया था. उस का कहना था कि उस ने आदित्य की हत्या नहीं की. घटना के समय वह दिल्ली में था. वह तो मां के बुलाने पर गया आया था. अपनी मां के कहने पर ही उस ने आत्मसमर्पण किया था, पुलिस ने उसे गिरफ्तार नहीं किया.

जबकि एसएसपी का कहना था कि रौकी को गिरफ्तार किया गया था. आदित्य की हत्या के बाद एमएलसी मनोरमा देवी का पूरा परिवार और राजनीति चौपट हो गई. पहले बेटा रौकी हत्या के मामले में जेल गया, उस के बाद उस के पति बिंदी यादव को भी पुलिस ने हत्यारों को छिपाने और भगाने के आरोप में सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था.

इस के बाद रौकी की खोज में जब पुलिस ने मनोरमा के घर छापा मारा तो रौकी तो वहां नहीं मिला, लेकिन उन के घर से विदेशी शराब की 6 बोतलें बरामद हुई थीं. राज्य में शराबबंदी के बाद सत्तारूढ़ दल के एमएलसी के घर से शराब की बोतलें मिलने से सरकार को छीछालेदर से बचाने के लिए तुरंत मनोरमा देवी को जदयू से निलंबित कर दिया गया था.

हत्यारे की मां भी जेल में

मनोरमा देवी के घर से शराब मिलने के बाद आननफानन उन की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया गया था. 11 मई को जिला प्रशासन, पुलिस और उत्पाद विभाग के अफसरों की मौजूदगी में मनोरमा देवी के घर को सील कर दिया गया था, जबकि वह फरार थीं. जिस घर से शराब बरामद हुई थी, वह मनोरमा देवी के नाम था, इसलिए इस मामले में उन्हें आरोपी बनाया गया. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया गया था. पुलिस जांच से पता चला था कि रौकी ने जिस रिवौल्वर से आदित्य की हत्या की थी, वह इटली की बरेटा कंपनी का था. वह .380 बोर का था. पुलिस सूत्रों के अनुसार, आदित्य की हत्या करने के बाद रौकी पटना समेत राज्य के कई स्थानों पर छिपता रहा.

हत्या करने के तुरंत बाद रौकी भाग गया था. इस के बाद वह दिल्ली जाना चाहता था, लेकिन अचानक उस का प्लान बदल गया और वह गया चला गया. गिरफ्तारी के बाद उसे गया सैंट्रल जेल में रखा गया था, जहां उसे कैदी नंबर 22774 की पहचान मिली थी. उस के बाहुबली पिता बिंदी यादव को कैदी नंबर 22758 की पहचान मिली थी. दोनों को जेल के एक ही वार्ड में रखा गया था. आदित्य हत्याकांड की जांच के दौरान यह भी खुलासा हुआ था कि देशद्रोह के आरोपी बिंदी यादव को किस तरह से सरकारी बौडीगार्ड मुहैया कराया गया था.

जिला सुरक्षा समिति ने 9 फरवरी, 2016 को बिंदी यादव को भुगतान के आधार पर एक पुलिसकर्मी मुहैया कराया था. बिंदी पर आरोप था कि उस ने प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा-माओवादी को प्रतिबंधित बोर की कई हजार गोलियां और हथियार उपलब्ध कराए थे. इस मामले में वह लंबे समय तक गया जेल में बंद रहा था.

Pune Crime News: रासिला ने ऐसा सोचा भी न था

Pune Crime News: आईटी क्षेत्र में बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी का एक बड़ा नाम है. केरल की रहने वाली रासिला ओ.पी. इसी कंपनी के पुणे फेज-2 स्थित कंपनी में नौकरी करती थी. वह सौफ्टवेयर इंजीनियर थी. इस कंपनी के प्रोजेक्ट इतने महत्त्वपूर्ण होते हैं कि उन्हें पूरा करने के लिए कर्मचारियों और अधिकारियों को कभीकभी 24-24 घंटे तक काम करना पड़ता है. 29 जनवरी को रविवार था.

शहर के अधिकांश औफिस और प्रतिष्ठान बंद थे. लेकिन इंफोसिस कंपनी का एक प्रोजेक्ट इतना अर्जेंट था कि उसे पूरा करने के लिए कर्मचारियों को रविवार को भी औफिस आना पड़ा था. इस प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी पुणे और बंगलुरु टीम को सौंपी गई थी. रासिला भी उस दिन इसी प्रोजेक्ट की वजह से औफिस आई थी. बंगलुरु में कुछ कर्मचारी अपनेअपने घरों में बैठ कर उस की मदद कर रहे थे.

कंपनी का प्रोजेक्ट लगभग पूरा हो गया था. केवल कुछ ही औपचारिकताएं बाकी रह गई थीं कि शाम 7 बजे अचानक रासिला और बंगलुरु टीम के बीच फोन और ईमेल से होने वाली बातचीत बंद हो गई. बंगलुरु के कर्मचारी समझ नहीं पाए कि अचानक यह क्या हो गया.

तमाम कोशिशों के बाद भी रासिला और बंगलुरु के कर्मचारियों के बीच जब संपर्क नहीं हो पाया तो उन के मन में तरहतरह की आशंकाएं जन्म लेने लगीं. उन्होंने पुणे के बड़गांव में रहने वाले इंफोसिस सौफ्टवेयर के सीनियर एसोसिएट कंसलटेंट और रासिला के प्रोजेक्ट रिपोर्टिंग मैनेजर अभिजीत कोठारी को फोन किया.

उन्हें सारी बातें बता कर रासिला के विषय में पता लगाने के लिए कहा. अभिजीत ने उसी वक्त रासिला को फोन लगाया. उस के फोन की घंटी तो बज रही थी, पर वह फोन नहीं उठा रही थी. इस के बाद उन्होंने पुणे फेज-2 स्थित कंपनी के औफिस के लैंडलाइन पर फोन किया.

फोन एक सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया. उस ने अभिजीत को बताया कि वह ड्यूटी पर अभीअभी आया है. उस के पहले ड्यूटी पर सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया था. वह अपनी ड्यूटी पूरी कर के अपना चार्ज उसे दे कर चला गया है. अभिजीत कोठारी ने जब ड्यूटी पर मौजूद गार्ड से रासिला के बारे में पूछा तो गार्ड रासिला की केबिन में गया. इस के बाद उस गार्ड ने जो जानकारी दी, उसे सुन कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई.

फिर क्या था, कुछ ही देर में अभिजीत कोठारी इंफोसिस के औफिस पहुंच गए. उन्होंने देखा कि औफिस के अंदर रासिला की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. शव के आसपास काफी खून फैला था. चेहरा पूरी तरह किसी भारी और ठोस वस्तु से कुचला गया था. अभिजीत कोठारी ने मामले की जानकारी कंपनी के प्रमुख अधिकारियों और रासिला के परिवार वालों को देने के बाद थाना हिंजवाली पुलिस को दे दी थी.

थाना हिंजवाली के थानाप्रभारी अरुण वायकर अपने सहायकों के साथ तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. हत्या की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दे कर वह मामले की जांच में जुट गए. वह घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि पुणे शहर के डीसीपी गणेश शिंदे, एसीपी वैशाली जाधव भी घटनास्थल पर आ गईं.

उन के साथ डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट ब्यूरो के अधिकारी भी आए थे. सभी ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया तो पाया कि रासिला की हत्या की बड़ी बेरहमी से की गई थी. उस के गले में एक पीले रंग का तार लपेटा हुआ था. वह कंप्यूटर का तार था. पुलिस यह जानने की कोशिश करने लगी कि ऐसा कौन व्यक्ति हो सकता है, जिस ने इस की हत्या के बाद चेहरा तक कुचल दिया.

घटनास्थल की काररवाई पूरी कर के पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए पुणे के मसन अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद कंपनी के प्रोजेक्ट मैनेजर अभिजीत कोठारी की ओर से रासिला की हत्या का मुकदमा दर्ज कर मामले की जांच शुरू कर दी. शुरुआती जांच में पुलिस को पता चला कि रासिला जिस केबिन में बैठती थी, वह बेहद सुरक्षित थी.

उस का दरवाजा एक विशेष कार्ड के टच होने पर ही खुलता था. इस से पुलिस को यही लगा कि उस की हत्या में किसी ऐसे आदमी का हाथ है, जिस का उस केबिन में आनाजाना था. इस संबंध में पुलिस ने कंपनी के कर्मचारियों से पूछताछ की तो कंपनी का सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया पुलिस के शक के दायरे में आ गया. इस के बाद कंपनी के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी गई तो स्पष्ट हो गया कि सिक्योरिटी गार्ड भावेन ने ही रासिला की हत्या की थी.

एसीपी वैशाली जाधव के निर्देशन में जब पुलिस टीम सिक्योरिटी गार्ड भावेन के घर पर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. उस के घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पड़ोसियों ने बताया कि भावेन की मां की तबीयत अचानक खराब हो गई थी, इसलिए वह अपने गांव चला गया है. जिस सिक्योरिटी एजेंसी में उस की नियुक्ति थी, उस से संपर्क कर पुलिस ने भावेन के बारे में सारी जानकारी ले ली.

जहांजहां से भावेन के गांव जाने के साधन मिलते थे, उन सभी रास्तों पर नाकेबंदी करवा दी गई. इस के अलावा जांच टीम को 7 भागों में विभाजित कर उन्हें महानगर मुंबई और पुणे के विभिन्न इलाकों के लिए रवाना कर दिया गया. रासिला की हत्या पुणे पुलिस के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुकी थी. क्योंकि पिछले साल आईटी प्रोफेशनल महिला ज्योति कुमारी, नयना पुजारी, दर्शना टोगारी और अंतरा दास की कंपनी के सिक्योरिटी गार्डों द्वारा जिस तरह हत्याएं की गई थीं, उसे देख कर आईटी कंपनियों में काम करने वाली महिलाओं के भीतर डर का माहौल बन गया था.

इसलिए इस मामले का खुलासा करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर दबाव बढ़ गया था. यही वजह थी कि एसीपी वैशाली जाधव ने इस मामले की जांच अपने हाथों में ले ली थी. आखिरकार एसीपी वैशाली जाधव और उन की टीम की मेहनत रंग लाई और 8 घंटे की कोशिश के बाद सौफ्टवेयर इंजीनियर रासिला के हत्यारे भावेन सैकिया को महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया.

पुलिस टीम जिस समय छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंची थी, उस समय रात के लगभग 3 बज रहे थे. भावेन सैकिया अपना पूरा चेहरा कंबल के नीचे ढक कर टिकट खिड़की के पास बैठा खिड़की के खुलने का इंतजार कर रहा था. मुखबिर के इशारे पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया को ले कर पुलिस पुणे आ गई. उस से थोड़ी पूछताछ कर के उसे पुणे के प्रथम श्रेणी दंडाधिकारी ए.एस. वारूलकर के सामने पेश कर 4 फरवरी, 2017 तक की रिमांड पर ले लिया. पूछताछ में उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. उस ने इस हत्याकांड की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली.

27 वर्षीय भावेन सैकिया मूलरूप से असम के गांव ताती विहार का रहने वाला था. उस के पिता ने 3 शादियां की थीं. भावेन सैकिया उन की तीसरी पत्नी का बेटा था. भावेन महत्त्वाकांक्षी के साथ पढ़ाईलिखाई में भी होशियार था.

उस का स्वभाव उग्र था. इस वजह से उस की अपने सौतेले भाइयों से नहीं पटती थी. 12वीं कक्षा में अच्छे अंक पाने के बाद उस ने स्नातक की पढ़ाई करनी चाही पर उस के सौतेले भाई नहीं चाहते थे कि वह पढ़े. किसी न किसी बात को ले कर वह उस से झगड़ने लगते थे. फिर एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि सन 2013 में उस ने अपने सौतेले भाई की हत्या कर दी. हत्या के बाद वह घर से फरार हुआ तो वापस गांव नहीं लौटा.

सन 2014 में वह पुणे पहुंच गया और वहां की एक सिक्योरिटी एजेंसी में सिक्योरिटी गार्ड के पद पर उस की नौकरी लग गई. कंपनी की तरफ से भावेन की तैनाती इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी के औफिस में हो गई. उस ने औफिस के पास ही हिजवाड़ी जयरामनगर के फेज-3 में एक कमरा किराए पर ले लिया.

नौकरी के दौरान उस में काफी परिवर्तन आ गया था. औफिस में काम करने वाली लड़कियों को वह चाहत की निगाहों से देखता. खूबसूरत लड़कियां उस की कमजोरी बन गई थीं. किसी न किसी बहाने वह उन से बातें करता और उन्हें छूने की कोशिश करता था. इसी प्रकार की कोशिश जब उस ने रासिला ओ.पी. के साथ की तो उस ने भावेन की बात अनदेखी नहीं की, बल्कि उस से अपनी नाराजगी भी जता दी.

घटना के 2 दिन पहले रासिला ने भावेन सैकिया को अपने केबिन में बुला कर काफी डांटाफटकारा और उस की हरकतों की शिकायत ईमेल द्वारा उस की सिक्योरिटी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों से करने की भी धमकी दी. इस धमकी से भावेन काफी डर गया था. उसे लग रहा था कि रासिला उस की शिकायत जरूर कर देगी. उस की शिकायत पर उसे अपनी नौकरी जाने का डर था.

24 वर्षीय रासिला ओझम पोईल पुराईत उर्फ रासिला ओ.पी. मूलरूप से केरल राज्य के कालीकट जिले के गांव कुदमंगलम की रहने वाली थी. उस के पिता ओझम पोईल पुराईत उर्फ राजू ओ.पी. होमगार्ड में एक तृतीय श्रेणी कर्मचारी थे. परिवार में उस के और पिता के अलावा एक बड़ा भाई तेजस कुमार ओ.पी. था. मां पुष्पलता का देहांत उस समय हो गया, जब छोटी थी. दोनों भाईबहन का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता था. पिता से ही दोनों को मां का प्यार मिला था. घर की परिस्थतियों को देखते हुए दोनों बच्चों ने मन लगा कर पढ़ाई की.

रासिला और तेजस कुमार दोनों ने 98 प्रतिशत अंकों से 12वीं की परीक्षा पास की. इंजीनियरिंग की परीक्षाएं भी दोनों ने प्रथम श्रेणी से पास की थीं. इंजीनियरिंग के बाद तेजस कुमार को आबूधाबी की एयरलाइंस कंपनी में और रासिला की बंगलुरु की इंफोसिस सौफ्टवेयर कंपनी में असिस्टैंट इंजीनियर के पद पर नौकरी लग गई. अपने बच्चों को अच्छी जगह और अच्छे पद पर देख कर राजू ओ.पी. की सारी चिंताएं दूर हो गईं. रासिला की अच्छी पोस्ट देख कर तो उस की शादी के रिश्ते भी आने शुरू हो गए थे.

रासिला खूबसूरत तो थी ही, साथ ही वह कंपनी की जिस पोस्ट पर काम करती थी, उस की जिम्मेदारी भी अच्छी तरह निभा रही थी. अपने काम और व्यवहार से उस ने कंपनी के कई वरिष्ठ अधिकारियों के दिल में एक खास जगह बना ली थी. इस श्रेणी में एक बड़ा अधिकारी ऐसा था जो रासिला को अपने दिल में एक खास जगह देना चाहता था, पर रासिला को वह पसंद नहीं था. जिस के कारण वह अधिकारी रासिला से चिढ़ गया और उसे किसी न किसी बहाने परेशान करने लगा.

उस अधिकारी से परेशान हो कर रासिला ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से उस की शिकायत कर दी. साथ ही अपना इस्तीफा भी दे दिया. लेकिन कंपनी ने उस का इस्तीफा स्वीकार नहीं किया. बल्कि कंपनी ने रासिला का ट्रांसफर इंफोसिस कंपनी की पुणे ब्रांच में कर दिया और पुणे के हिजवाड़ी के जयरामनगर फेज-1 में उस के रहने की व्यवस्था भी कर दी. पुणे ब्रांच में रासिला को आए अभी 5 महीने ही हुए थे कि उसे औफिस के सिक्योरिटी गार्ड भावेन सैकिया से दोचार होना पड़ा.

घटना के दिन सारा औफिस बंद होने के बावजूद भी कंपनी द्वारा सौंपे गए प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए रासिला को अपने औफिस आना पड़ा था. दिन के 2 बजे जब वह अपने औफिस में पहुंची तो काफी खुश थी. उस समय सिक्योरिटी गार्ड भावेन अपनी ड्यूटी पर तैनात था. रासिला ने अपने एक्सेस कार्ड से केबिन का लौक खोला और केबिन के अंदर जा कर अपने बंगलुरु ब्रांच के कुछ साथियों के साथ औनलाइन जुड़ कर अपने प्रोजेक्ट की तैयारी में जुट गई थी.

इधर रासिला की धमकी और अपनी नौकरी को ले कर भावेन काफी परेशान था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे क्या न करे. शिकायत को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने से कैसे रोके इसी बारे में वह सोचने लगा. सोचविचार करने के बाद उस ने खतरनाक फैसला ले लिया.

उस समय रासिला औफिस में अकेली थी. बातचीत करने के लिए मौका अच्छा था. अपनी हरकतों की माफी मांगने के बहाने वह रासिला के केबिन में जाने में कामयाब हो गया. केबिन के अंदर पहुंचते ही उस ने रासिला से कहा, ‘‘मैडम, आप मेरी शिकायत मेरे अधिकारियों से नहीं करना वरना मेरी नौकरी चली जाएगी और मैं बेकार हो जाऊंगा.’’ वह गिड़गिड़ाया.

रासिला ने एक बार गार्ड के चेहरे को देखा. जिस पर मिलेजुले खौफ का असर स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था. हालांकि रासिला ने उस की हरकतों को नजरअंदाज कर दिया था. लेकिन वह उसे थोड़ा और सबक सिखाना चाहती थी, जिस से वह सुधर जाए. इसलिए वह गंभीर होते हुए बोली, ‘‘नौकरी चली जाएगी, बेकार हो जाओगे तो मैं क्या करूं. तुम्हें  लड़कियों को परेशान करने का बड़ा शौक है न, अब भुगतो, मैं ने तो तुम्हारी शिकायत तुम्हारी कंपनी के सीनियर अधिकारियों को ईमेल से कर दी है. अब जाओ गांव में ही बैठना.’’

यह सुन कर भावेन का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. अपने आपे से बाहर होते हुए उस ने इंटरनेट का वायर खींच कर रासिला के गले में डालते हुए कहा, ‘‘मैडम, यह तुम ने अच्छा नहीं किया. अब तुम्हें इस की सजा तो भुगतनी ही पड़ेगी.’’

रासिला उस का इरादा जान कर अपने बचाव के लिए काफी चीखीचिल्लाई. पर उस वक्त उस की मदद के लिए वहां कोई नहीं था. उस ने उस इंटरनेट वायर से रासिला का गला घोंट दिया. उस की हत्या करने के बाद उस ने अपने बूटों से ठोकरें मारमार कर उस का चेहरा लहूलुहान कर दिया.

रासिला की हत्या करने के बाद जब भावेन का गुस्सा शांत हुआ तो वह बाहर आ कर आराम से अपनी जगह बैठ गया. उसे पुलिस और कानून का डर लगने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अब कहां जाए. गांव जा नहीं सकता था, क्योंकि उस पर सौतेले भाई की  हत्या का आरोप था. पुणे और गांव की पुलिस से बचने के लिए उस के पास कोई रास्ता नहीं था. ऐसे में उसे बस आत्महत्या के अलावा और कोई चारा नहीं दिखा.

उस की ड्यूटी का टाइम भी पूरा हो चुका था. जैसे ही दूसरा सिक्योरिटी गार्ड शिफ्ट बदलने आया तो उसे जिम्मेदारी सौंप कर भावेन औफिस से निकल गया. आत्महत्या करने के लिए वह पुणे रेलवे स्टेशन पर पहुंचा ताकि किसी टे्रेन के सामने कूद कर जीवनलीला खत्म कर ले लेकिन ऐसा करने की उस की हिम्मत नहीं हुई.

फिर उस ने आत्महत्या करने के बजाय किसी दूसरे शहर में जाने का इरादा बनाया. अपने कमरे से उसे कुछ जरूरी सामान भी साथ लेना था. इसलिए कमरे पर पहुंच कर उस ने पड़ोसियों से झूठ कह दिया कि उस की मां की तबीयत खराब है. बैग में कपड़े आदि भर कर वह महानगर मुंबई के छत्रपति शिवाजी रेलवे स्टेशन पहुंचा. वहां से टिकिट ले कर उसे अपनी किसी मंजिल की ओर रवाना होना था. पर इस के पहले ही वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. भावेन मराली सैकिया से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने न्यायालय में पेश कर उसे जेल भेज दिया.

पुलिस ने रासिला ओ.पी. के शव को पोस्टमार्टम के बाद उस के पिता राजू ओ.पी. और परिजनों को सौंप दिया. पिता और परिवार वालों का कहना था कि रासिला की हत्या एक साजिश के तहत इंफोसिस कंपनी के ही एक बड़े अधिकारी ने कराई है, जिस की शिकायत उन्होंने हिजवाड़ी पुलिस थाने में दर्ज करवा दी.

पुलिस ने उन्हें भरोसा दिया कि रासिला की हत्या के मामले में जो भी दोषी होगा, उस के खिलाफ सख्त काररवाई की जाएगी. मामले की जांच थानाप्रभारी अरुण वायकर कर रहे थे. कथा लिखे जाने तक भावेन सैकिया की जमानत नहीं हो सकी थी. Pune Crime News

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Kanpur Crime: बदले का प्यार – क्या रीता को मिल पाया अपना प्यार

Kanpur Crime: 2 हत्याओं की बात थी, इसलिए सूचना मिलते ही एसपी (ग्रामीण) जयप्रकाश सिंह, सीओ अजय कुमार और थानाप्रभारी प्रयाग नारायण वाजपेयी गांव अज्योरी पहुंच गए थे. यह गांव उत्तर प्रदेश के महानगर कानपुर के थाना सजेती के अंतर्गत आता है. दोनों हत्याएं इसी गांव के श्रीपाल के घर हुई थीं. यह 19 अगस्त, 2017 की बात है.

पुलिस अधिकारी श्रीपाल के घर के अंदर  घुसे तो वहां की हालत देख कर दहल उठे. आंगन  में 2 लाशें खून से सनी अगलबगल पड़ी थीं. एक लाश युवक की थी तो दूसरी युवती की. युवक की उम्र 25 साल के आसपास थी, जबकि युवती की 20 साल के आसपास थी. दोनों लाशों के बीच 315 बोर का एक तमंचा और कारतूस के 2 खोखे भी पड़े थे.

पुलिस अधिकारी यह देख कर सोच में पड़ गए कि युवती की लाश पर तो घर वाले बिलख रहे थे, जबकि युवक की लाश पर वहां कोई रोने वाला नहीं था. एसपी जयप्रकाश सिंह ने श्रीपाल से इस बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘साहब, युवती मेरी बेटी रीता है और युवक मेरे दामाद बबलू का छोटा भाई पीयूष उर्फ छोटू. इसी ने गोली मार कर पहले रीता की हत्या की होगी, उस के बाद खुद को गोली मार आत्महत्या कर ली है. जब इस ने यह सब किया, तब घर में कोई नहीं था.’’

‘‘इस ने ऐसा क्यों किया?’’ जयप्रकाश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, पीयूष रीता से एकतरफा प्यार करता था और शादी के लिए परेशान कर रहा था. जबकि रीता उस से शादी नहीं करना चाहती थी. आज भी इस ने शादी के लिए ही कहा होगा, रीता ने मना किया होगा तो उस ने उसे मार डाला.’’ श्रीपाल ने कहा.

‘‘तुम ने पीयूष के घर वालों को इस घटना की सूचना दे दी है?’’

‘‘जी साहब, मैं ने फोन कर के इस के पिता और भाई को बता दिया है. लेकिन उन्होंने आने से साफ मना कर दिया है.’’ श्रीपाल ने कहा.

‘‘क्यों?’’ जयप्रकाश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, इस की हरकतों से पूरा परिवार परेशान था. यह घर वालों से रीता से शादी कराने के लिए कहता था, शराब पी कर झगड़ा करता था, इसलिए घर वाले इस से त्रस्त थे. यही वजह है कि इस की मौत की खबर पा कर भी कोई आने को तैयार नहीं है.’’

इस के बाद सीओ अजय कुमार ने पीयूष के पिता विश्वंभर को फोन किया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मिट्टी का तेल डाल कर आप उस की लाश को जला दीजिए. उस ने जो किया है, उस से मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहा. अब मैं उस का मुंह नहीं देखना  चाहता.’’

इस के बाद अजय कुमार ने उस के बडे़ भाई बबलू को फोन किया तो उस ने भी यह कह कर आने से मना कर दिया कि उस की हरकतों से परेशान हो कर उस ने तो पहले ही उस से संबंध खत्म कर लिए थे. अब तक फोरेंसिक टीम आ चुकी थी. उस ने अपना काम कर लिया तो थानाप्रभारी प्रयाग नारायण वाजपेयी ने दोनों लाशों का पंचनामा तैयार कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए हैलट अस्पताल भिजवा दिया.

इस के बाद रीता के घर वालों से विस्तार से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

कानपुर के कस्बा सजेती से 3 किलोमीटर की दूरी पर सड़क किनारे बसा है गांव अज्योरी. इसी गांव में श्रीपाल अपनी पत्नी, 2 बेटियों गुड्डी, रीता और 2 बेटों रविंद्र एवं अरविंद के साथ रहता था. उस के पास खेती की जो जमीन थी, उसी की पैदावार से वह अपना गुजरबसर करता था.

श्रीपाल की बड़ी बेटी गुड्डी ने दसवीं पास कर के पढ़ाई छोड़ दी तो उन्होंने कानपुर के थाना नौबस्ता के मोहल्ला मछरिया के रहने वाले विश्वंभर के बेटे बबलू से उस का विवाह कर दिया. विश्वंभर का अपना मकान था. भूतल पर किराने की दुकान थी, जिसे वह संभालते थे. बबलू नौकरी करता था, जबकि उस से छोटा पीयूष ड्राइवर था.

पीयूष ट्रक चलाता था. उसे जो भी वेतन मिलता था, वह खुद पर ही खर्च करता था. घर वालों को एक पैसा नहीं देता था. हां, अगर गुड्डी कुछ कह देती तो वह उस की फरमाइश पूरी करता था. देवरभाभी में पटती भी खूब थी. दोनों के बीच हंसीमजाक भी खूब होती थी. लेकिन इस हंसीमजाक में दोनों मर्यादाओं का खयाल जरूर रखते थे.

गुड्डी की छोटी बहन रीता बेहद खूबसूरत थी. उस की इस खूबसूरती में चारचांद लगाता था उस का स्वभाव. वह अत्यंत सौम्य और मृदुभाषी थी. जवानी की दहलीज पर उस ने कदम रखा तो उस की खूबसूरती और बढ़ गई. देखने वालों की निगाहें जब उस पर पड़तीं, ठहर कर रह जातीं. रीता तनमन से जितनी खूबसूरत थी, उतना ही पढ़ने में भी तेज थी. इस समय वह बीए फाइनल ईयर में पढ़ रही थी. अपने स्वभाव और पढ़ाई की वजह से रीता मांबाप की ही नहीं, भाइयों की भी आंखों का तारा थी.

पीयूष जब कभी भाई की ससुराल जाता, उस की नजरें रीता पर ही जमी रहतीं. मौका मिलने पर वह उस से हंसीमजाक और छेड़छाड़ भी कर लेता था. जीजासाली का रिश्ता होने की वजह से रीता ज्यादा विरोध भी नहीं करती थी. शरमा कर आंखें झुका लेती थी. इस से पीयूष को लगता था कि रीता उस में दिलचस्पी ले रही है.

इसी साल जून महीने की एक तपती दोपहर को पीयूष ट्रक ले कर हमीरपुर जा रहा था. घाटमपुर कस्बा पार करते ही उस का ट्रक खराब हो गया. उस ने ट्रक खलासी के हवाले किया और खुद आराम करने की गरज से भाई की ससुराल पहुंच गया. संयोग से उस समय रीता घर में अकेली थी. छोटे जीजा को देख कर रीता ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘आप चाय पिएंगे या शरबत?’’

‘‘चिलचिलाती धूप से आ रहा हूं. अभी कुछ भी पीने से तबीयत खराब हो सकती है.’’ अंगौछे से पसीना पोंछते हुए पीयूष ने कहा.

‘‘जीजाजी, आप आराम कीजिए मैं टीवी देख रही हूं. आप को जब भी कुछ पीना हो, बता दीजिएगा.’’ रीता ने कहा.

‘‘टीवी पर देहसुख वाली फिल्म देख रही हो क्या?’’ पीयूष ने हंसी की.

शरमाते हुए रीता ने कहा, ‘‘जीजाजी, आप इस तरह की फालतू बातें मत किया कीजिए.’’

‘‘रीता यह फालतू की बात नहीं, इसी में जिंदगी का सच है.’’

‘‘कुछ भी हो, मुझे इस तरह की बातों में कोई रुचि नहीं है.’’ कहते हुए रीता कमरे से चली गई.

थोड़ी देर आराम करने के बाद पीयूष ने पानी मांगा तो रीता गिलास में ठंडा पानी ले आई. उसे देख कर पीयूष ने कहा, ‘‘रीता, तुम सचमुच बहुत सुंदर हो. तुम्हें देख कर किसी का भी मन डोल सकता है. मेरा भी जी चाहता है कि तुम्हें अपनी बांहों में भर लूं.’’

रीता ने अदा से मुसकराते हुए कहा, ‘‘अभी धीरज रखो जीजाजी और आराम से पानी पियो. मुझे बांहों में भरने का सपना रात में देखना.’’

इस के बाद दोनों खिलखिला कर हंस पड़े. पीयूष मन ही मन सोचने लगा कि रीता उस की किसी भी बात का बुरा नहीं मानती है. इस का मतलब उस के दिल में भी वही सब है, जो वह उस के बारे में सोचता है. जिस तरह वह रीता को चाहता है, उसी तरह रीता भी मन ही मन उसे चाहती है.

रीता के प्यार में आकंठ डूबा पीयूष उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाने का ख्वाब देखने लगा. अब वह रीता के घर कुछ ज्यादा ही आनेजाने लगा. उसे रिझाने के लिए जब भी वह आता, कोई न कोई उपहार ले कर आता. थोड़ी नानुकुर के बाद रीता उस का लाया उपहार ले भी लेती. जबकि रीता जानती थी कि इन उपहारों को लाने के पीछे पीयूष का कोई न कोई स्वार्थ जरूर है.

दिन बीतने के साथ रीता को पाने की चाहत पीयूष के मन में बढ़ती ही जा रही थी. लेकिन रीता न तो उस के प्यार को स्वीकार रही थी और न ही मना कर रही थी. रीता के कुछ न कहने से पीयूष की समझ में नहीं आ रहा था कि रीता उस से प्यार करती भी है या नहीं?

इस बात को पता करने के लिए एक दिन पीयूष रीता के यहां आया और उस की खूबसूरती का बखान करते हुए उस का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘रीता, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं और अब तुम्हारे बिना नहीं रह सकता.’’

‘‘यह क्या कह रहे हैं जीजाजी आप?’’ रीता ने अपना हाथ छुड़ा कर कहा, ‘‘आप भले ही मुझ से प्यार करते हैं, लेकिन मैं आप से प्यार नहीं करती. आप से हंसबोल लेती हूं तो इस का मतलब यह नहीं कि मैं आप से प्यार करती हूं.’’

‘‘मजाक मत करो रीता,’’ पीयूष ने कहा, ‘‘रीता, तुम मेरी साली हो और साली तो वैसे भी आधी घरवाली होती है. लेकिन मैं तुम्हें पूरी तरह अपनी घरवाली बनाना चाहता हूं. इसलिए तुम मना मत करो.’’

‘‘हरगिज नहीं,’’ रीता गुस्से में बोली, ‘‘न तो मैं तुम से प्यार करती हूं और न तुम मेरी पसंद हो. मैं बीए कर रही हूं, जबकि तुम कक्षा 8 भी पास नहीं हो. मैं किसी पढ़ेलिखे लड़के से शादी करूंगी, किसी ड्राइवर से नहीं, इसलिए आप मुझे भूल जाओ.’’

रीता के इस तरह साफ मना कर देने से पीयूष का दिल टूट गया. लेकिन वह एकतरफा प्यार  में इस तरह पागल था कि उसे लगता था कि एक न एक दिन रीता मान जाएगी. इसलिए उस ने रीता के यहां आनाजाना बंद नहीं किया. यह बात अलग थी कि अब रीता उस से ज्यादा बात नहीं करती थी.

रीता ने पीयूष के एकतरफा प्यार की बात घर वालों को बताई तो सब परेशान हो उठे. यह एक गंभीर समस्या थी, इसलिए यह बात गुड्डी और उस के पति बबलू को भी बता दी गई. दोनों ने पीयूष को समझाया कि वह रीता को भूल जाए. इस पर पीयूष ने साफ कह दिया कि वह शादी करेगा तो सिर्फ रीता से करेगा, वरना जहर खा कर जान दे देगा.

पीयूष शराब भी पीता था. रीता ने उस के प्यार को ठुकराया तो वह कुछ ज्यादा ही शराब पीने लगा. वह जबतब शराब पी कर रीता से मिलने उस के घर पहुंच जाता और रीता पर शादी के लिए दबाव बनाता. रीता उसे खरीखोटी सुना कर शादी से मना कर देती थी.

पीयूष रीता के घर वालों पर भी शादी के लिए दबाव डाल रहा था. वह धमकी भी देता था कि अगर रीता से उस की शादी नहीं हुई तो अच्छा नहीं होगा. आखिर निराश हो कर पीयूष ने रीता के घर जाना बंद कर दिया. लेकिन वह उसे फोन जरूर करता था. रीता कभी फोन रिसीव कर लेती तो कभी काट देती. पीयूष दिनरात फोन करने लगा तो परेशान हो कर रीता ने अपना फोन नंबर ही बदल दिया.

रीता के यहां से इनकार होने पर पीयूष ने भाई और पिता से कहा कि वे रीता के पिता से बात कर के उस की शादी रीता से करा दें. अगर वे शादी के लिए तैयार नहीं होते तो गुड्डी को घर से निकाल दें. इस पर बात करने की कौन कहे, पिता और भाई ने पीयूष को ही डांटा.

पिता और भाई के मना करने से नाराज हो कर पीयूष ने काफी मात्रा में नींद की गोलियां खा लीं. उस की हालत बिगड़ने लगी तो उसे हैलट अस्पताल ले जाया गया, जहां डाक्टरों ने उसे बचा लिया. इस के बाद बबलू गुड्डी को ले कर परिवार से अलग हो गया और किराए का कमरा ले कर रहने लगा. विश्वंभर ने भी पीयूष से परेशान हो कर उस से बातचीत बंद कर दी.

पीयूष रीता के प्यार में इस तरह पागल था कि उसे जबरदस्ती हासिल करने के बारे में सोचने लगा. उस का एक साथी ड्राइवर अपराधी प्रवृत्ति का था. कई बार वह जेल भी जा चुका था. उसी की मदद से पीयूष ने 315 बोर का एक तमंचा और 4 कारतूस खरीदे. उस ने उसी से तमंचा चलाना भी सीखा.

पीयूष 19 अगस्त, 2017 की दोपहर घर पहुंचा और पिता से जबरदस्ती मोटरसाइकिल की चाबी ले कर मोटरसाइकिल निकाली और रीता के घर पहुंच गया. संयोग से उस समय घर में रीता अकेली थी. पीयूष ने रीता को आंगन में बुला कर उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘रीता, मैं तुम से आखिरी बार पूछ रहा हूं कि तुम मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

अपना हाथ छुड़ाते हुए रीता गुस्से में बोली, ‘‘मैं ने कितनी बार कहा कि मैं तुम से शादी नहीं कर सकती. आखिर यह बात तुम्हारी समझ में क्यों नहीं आती?’’

‘‘एक बार और सोच लो रीता. तुम्हारा मना करना कहीं तुम्हें भारी न पड़ जाए?’’

‘‘मैं ने एक बार नहीं, हजार बार सोच लिया है कि मैं तुम से शादी नहीं करूंगी.’’

‘‘तो फिर यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ पीयूष ने पूछा.

‘‘हां, यह मेरा आखिरी फैसला है.’’ रीता ने कहा.

‘‘तो फिर मेरा भी फैसला सुन लो. अगर तुम मेरी दुलहन नहीं बनोगी तो मैं तुम्हें किसी और की भी दुलहन नहीं बनने दूंगा.’’ कह कर पीयूष ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और रीता के सीने पर फायर कर दिया. गोली लगते ही रीता जमीन पर गिरी और तड़प कर मर गई.

रीता की हत्या करने के बाद पीयूष ने अपनी भी गरदन पर तमंचा सटा कर गोली चला दी. गोली उस के सिर को भेदती हुई उस पार निकल गई. कुछ देर तड़पने के बाद उस ने भी दम तोड़ दिया.

गोली चलने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले श्रीपाल के घर पहुंचे तो आंगन में 2-2 लाशें देख कर दहल उठे. पूरे गांव में शोर मच गया. श्रीपाल घर पहुंचे तो रीता के साथ पीयूष की लाश देख कर समझ गए कि पीयूष ने रीता की हत्या कर के आत्महत्या कर ली है. इस के बाद उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी.

पीयूष के घर वाले पुलिस के कहने के बाद भी उस की लाश लेने नहीं आए तो पुलिस ने रीता की लाश के साथ पीयूष की लाश को भी श्रीपाल के हवाले कर दिया. मजबूरी में श्रीपाल को बेटी की लाश के साथ पीयूष का अंतिम A करना पड़ा. थाना सजेती पुलिस ने इस मामले में रिपोर्ट तो दर्ज की, पर आरोपी द्वारा आत्महत्या कर लेने से फाइल बंद कर दी. Kanpur Crime

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Haryana Crime News: दोस्त बना जीजा, खतरनाक नतीजा

सुबह का उजाला अभी फैलना शुरू हुआ था कि ‘बचाओ बचाओ’ की मर्मभेदी चीख ने वहां मौजूद लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. चीखने वाले पर तेजधार हथियार से एक युवक ने हमला किया था, जिस से गंभीर रूप से घायल हो कर वह चीखा था. चीखने के साथ ही वह सड़क पर गिर पड़ा था और गिरते ही बेहोश हो गया था.

उस युवक के गिरते ही उस पर हमला करने वाला युवक लंबे फल का खून सना चाकू हाथ में लिए भागा था. सुबह का समय होने की वजह से वहां बहुत कम लोग थे, लेकिन जो भी थे, वे उस का पीछा करने या पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सके थे.

पर उन लोगों ने इतना जरूर किया कि हमलावर के भागने के बाद सड़क पर घायल पड़े युवक को पंचकूला के सैक्टर-6 स्थित जनरल अस्पताल पहुंचा दिया था. उसे देखते ही डाक्टरों ने मृत घोषित करने के साथ इस की सूचना पुलिस को दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना मौलीजागरां के एएसआई गुरमीत सिंह सुबह 7 बजे के करीब अस्पताल पहुंच गए थे. घटना की जानकारी ले कर उन्होंने थानाप्रभारी इंसपेक्टर बलदेव कुमार को सूचित किया तो सिपाही अमित कुमार के साथ वह भी अस्पताल पहुंच गए थे.

जरूरी काररवाई कर के बलदेव कुमार ने उन लोगों से बात की, जो मृतक को अस्पताल ले कर आए थे. वे 2 लोग थे, जिन में एक 19 साल का मोहम्मद चांद था और दूसरा था ड्राइवर अशोक कुमार. पूछताछ में चांद ने बताया था कि वह पंचकूला के सैक्टर-16 की इंदिरा कालोनी के मकान नंबर 1821 में रहता था और सैक्टर-17 की राजीव कालोनी स्थित शरीफ हलाल मीट शौप पर नौकरी करता था.

सुबह जल्दी जा कर चांद ही दुकान खोलता था. मृतक को ही नहीं, उस पर हमला करने वाले को भी वह अच्छी तरह से पहचानता था. वह सुबह 5 बजे दुकान पर पहुंचा तो मुर्गा सप्लाई करने वाली गाड़ी आ गई. गाड़ी के ड्राइवर अशोक कुमार ने मोहम्मद चांद को आवाज दे कर गाड़ी से मुर्गे उतारने को कहा.

मोहम्मद चांद गाड़ी के पीछे पहुंचा तो गाड़ी में बैठा ड्राइवर का सहायक इरफान उतर कर उस के पास आ गया. जैसे ही वह जाली वाला दरवाजा खोल कर मुर्गे निकालने के लिए आगे बढ़ा, शाहबाज हाथ में चाकू लिए वहां आया और इरफान के सिर पर उसी चाकू से वार कर दिया.

वार होते ही इरफान पीछे की ओर घूमा तो शाहबाज ने कहा, ‘तुम ने मेरी भोलीभाली बहन को अपनी मीठीमीठी बातों में फंसा कर मेरी मरजी के खिलाफ उस से शादी की है न? तो आज मैं तुझे उसी का सबक सिखा रहा हूं. आज मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’

society

इस के बाद शाहबाज ने इरफान की छाती, आंख के नीचे और कमर तथा पेट पर लगातार कई वार किए. इरफान ‘बचाओ…बचाओ’ की गुहार लगाते हुए नीचे गिर गया. शाहबाज का गुस्सा और उस के हाथ में चाकू देख कर कोई भी उस के पास जाने की हिम्मत नहीं कर सका.

लेकिन जैसे ही शाहबाज चला गया, मोहम्मद चांद और अशोक कुमार ने किसी तरह इरफान को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे देखते ही मरा हुआ बताया. ऐसा ही कुछ अशोक कुमार ने भी बताया था, लेकिन उस का कहना था कि वह आगे था. शोर सुन कर पीछे आया. तब तक शाहबाज अपना काम कर के जा चुका था.

इंसपेक्टर बलदेव कुमार ने हत्याकांड के चश्मदीद मोहम्मद चांद के बयान के आधार पर शाहबाज के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करने की अनुशंसा कर के तहरीर थाना भेज दी, जहां एफआईआर नंबर 101 पर भादंवि की धारा 302 के तहत यह केस दर्ज कर लिया गया. यह घटना 4 जून, 2016 की है.

उसी दिन पुलिस की एक टीम शाहबाज की तलाश में जुट गई. उस के बारे में पता करने के लिए विश्वस्त मुखबिर भी सक्रिय कर दिए गए थे. मुखबिर की ही सूचना पर शाहबाज को उसी दिन रात में गांव मक्खनमाजरा से गिरफ्तार कर लिया गया.

अदालत से कस्टडी रिमांड ले कर सब से पहले शाहबाज से उस चाकू के बारे में पूछा गया, जिस से उस ने इरफान का कत्ल किया था. 6 जून को उस की निशानदेही पर वह चाकू मौलीजागरां की एक कब्रगाह से बरामद कर लिया गया. उस ने वहां चाकू को पत्थरों के नीचे दबा कर रखा था. लेकिन उस पर लगा खून उस ने साफ कर दिया था.

इस के बाद शाहबाज से इरफान की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के रहने वाले शाहबाज और इरफान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए वे एक साथ खेलकूद कर बड़े हुए थे. कुछ दिनों पहले कामधंधे की तलाश में दोनों चंडीगढ़ आ गए. इरफान जहां अपने बड़े भाई के साथ आया था, वहीं शाहबाज अपने पूरे परिवार के साथ आया था. उस के परिवार में अब्बूअम्मी के अलावा एक छोटी बहन साहिबा थी.

चंडीगढ़ में दोनों पंचकूला की सीमा पर बसे गांव मौलीजागरां में थोड़ी दूरी पर अलगअलग किराए के मकान ले कर रहने लगे थे. मौलीजागरां जहां चंडीगढ़ में पड़ता है, वहीं मुख्य सड़क के उस पार की दुकानें हरियाणा के जिला पंचकूला के सैक्टर-17 की राजीव कालोनी के अंतर्गत आती हैं. उन्हीं में से एक दुकान पर शाहबाज जहां मुर्गे काटने का काम करने लगा था, वहीं इरफान को मुर्गे सप्लाई करने वाली गाड़ी पर सहायक की नौकरी मिल गई थी.

अपने हिसाब से दोनों का काम ठीकठाक चल रहा था. शाहबाज के अब्बू को भी नौकरी मिल गई थी. इरफान और शाहबाज हमउम्र थे. दोनों इतने गहरे दोस्त थे कि उन में सगे भाइयों जैसा प्यार था. एक दिन भी दोनों एकदूसरे से मिले बिना नहीं रह पाते थे. एकदूसरे के यहां आनाजाना, खाना खा लेना या फिर कभीकभार सो जाना आम बात थी.

साहिबा भी दोनों के साथ बचपन से खेलतीकूदती आई थी. मगर अब वह जवान हो चुकी थी. घर वाले उस के निकाह के बारे में सोचने लगे थे. देखनेदिखाने की बात चली तो साहिबा ने हिम्मत कर के शरमाते हुए घर वालों से कहा कि वह इरफान से प्यार करती है और उसी से निकाह करना चाहती है.

साहिबा की इस बात से शाहबाज के घर में तूफान सा आ गया. घर का कोई भी आदमी इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं था. शाहबाज ने साफ कहा, ‘‘इस से बड़ी जिल्लत मेरे लिए और क्या होगी कि लोग यह कह कर मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अपनी बहन का निकाह करने के लिए ही मैं ने इरफान से दोस्ती की थी. क्या निकाह के लिए सिर्फ वही रह गया है? दुनिया में और कोई लड़का नहीं है? मैं यह निकाह किसी भी कीमत पर नहीं होने दूंगा.’’

शाहबाज ने साहिबा को तो लताड़ा ही, इरफान से भी झगड़ा किया. इरफान ने उसे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि जो भी होगा, घर वालों की रजामंदी से होगा. लेकिन शाहबाज ने साफ कह दिया कि वह साहिबा को भूल जाए और किसी अन्य लड़की से निकाह कर ले, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

शाहबाज की इस धमकी का नतीजा यह हुआ कि कुछ दिनों बाद इरफान साहिबा को भगा ले गया और एक धार्मिक स्थल पर दोनों ने निकाह कर लिया. वह वापस आया तो साहिबा को शरीकेहयात बना कर आया. शाहबाज को इस मामले में सारी गलती इरफान की नजर आ रही थी. उस ने अपने दिलोदिमाग में बैठा लिया कि इरफान ने साहिबा के भोलेपन का फायदा उठा कर उसे अपनी बातों में फंसा लिया है.

शाहबाज इरफान से पहले से ही नाराज था, जलती पर घी का काम किया उस ने साहिबा को भगा कर. उस के अब्बू ने इस से बहुत ज्यादा शर्मिंदगी महसूस की. इसी की वजह उन्होंने 2 दिनों बाद ही मौलीजागरां का अपना निवास छोड़ दिया था और वहां से 20 किलोमीटर दूर जा कर कस्बा डेराबस्सी में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे. उन्होंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. शाहबाज को नौकरी की वजह से उधर जाना पड़ता था.

society

जिस मीट की दुकान पर शाहबाज काम करता था, इरफान रोजाना उधर मुर्गे की सप्लाई करने आता था. लेकिन निकाह के बाद वह उधर दिखाई नहीं दिया था. पता चला कि निकाह के दिन से ही उस ने छुट्टी ले रखी है.

4 जून, 2016 की बात है. साहिबा से इरफान को निकाह किए 5 दिन हो गए थे. सुबह के 5 बजे शाहबाज दुकान पर पहुंच कर मुर्गा काटने वाला चाकू तेज कर रहा था. तभी मुर्गेवाली गाड़ी आ कर उस की दुकान से थोड़ी दूरी पर सड़क के किनारे रुकी. इरफान उतर कर गाड़ी के पीछे की ओर आया.

शाहबाज ने उसे आते देखा तो उसे देख कर उस की आंखों में खून उतर आया. उस के पास सोचनेविचारने का वक्त नहीं था. वह मीट काटने वाला चाकू ले कर तेजी से भागता हुआ इरफान के पास पहुंचा और जरा सी देर में उसे मौत के घाट उतार कर भाग गया.

पहले तो उस ने कब्रिस्तान के पास एक जगह चाकू को साफ कर के पत्थरों के नीचे छिपा दिया. उस के बाद बचने के लिए इधरउधर छिपता रहा. लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया. उस ने कहा कि इरफान ने काम ही ऐसा किया था, जिस से उसे मारने का कोई अफसोस नहीं है. इरफान ने जो किया था, उस की उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शाहबाज को फिर से अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में बुड़ैल जेल भेज दिया गया.

बलदेव कुमार ने उस के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर समय से निचली अदालत में दाखिल कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर 13 सितंबर, 2016 से मामले की सुनवाई चंडीगढ़ के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश अतुल कसाना की अदालत में शुरू हुई.

6 अक्तूबर को अदालत ने शाहबाज के खिलाफ धारा 302 का चार्ज फ्रेम कर दिया. उस ने अदालत में खुद को बेकसूर बताते हुए दरख्वास्त की थी कि पुलिस ने एक झूठी कहानी गढ़ कर इस केस में उसे बिना मतलब फंसा दिया है. वह अपने उन बयानों से भी मुकर गया, जो उस ने कस्टडी रिमांड के दौरान पुलिस को दिए थे.

मामले की विधिवत सुनवाई शुरू होते ही अभियोजन पक्ष ने डा. अमनदीप सिंह, डा. गौरव, मोहम्मद चांद, इंतजाम अली, अशोक कुमार, इंसपेक्टर बलदेव कुमार, फोटोग्राफर फूला सिंह, हवलदार सतनाम सिंह, रमेशचंद, धर्मपाल एवं यशपाल के अलावा सीनियर कांस्टेबल कृष्णकुमार, एसआई गुरमीत सिंह, एसआई गुरनाम सिंह और डा. मनदीप सिंह के रूप में 15 गवाह अदालत में पेश किए.

इस के बाद अतिरिक्त पब्लिक प्रौसीक्यूटर ने अभियोजन पक्ष की गवाहियों के पूरी होने के बाद सीआरपीसी की धारा 293 के तहत फोरैंसिक साइंस लैबोरेटरी की रिपोर्ट के अलावा विसरा रिपोर्ट भी पेश की.

अभियोजन पक्ष की काररवाई पूरी होने के बाद 20 जनवरी, 2017 को कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 313 के तहत अभियुक्त शाहबाज का स्टेटमैंट रिकौर्ड किया गया. अभियुक्त ने उक्त सभी गवाहों को झूठ करार देते हुए यही कहा कि वह बेकसूर है. उसे झूठा फंसाया गया है.

बचाव पक्ष की ओर से साहिबा को पेश किया गया. कोड औफ क्रिमिनल प्रोसीजर की धारा 315 के अधीन दर्ज अपने बयान में साहिबा ने अदालत को बताया कि उस ने इरफान से प्रेम विवाह किया था, जिस का परिवार वालों ने पहले तो विरोध किया, लेकिन बाद में मान गए थे.

इरफान ने उसे बताया था कि उस की कुछ गलत लोगों से ऐसी दुश्मनी हो गई है कि वे मौका मिलने पर उस की जान ले सकते हैं. ऐसे में हो सकता है, इरफान को उन्हीं लोगों ने मारा हो, न कि शाहबाज ने.

बचाव पक्ष की ओर से अशोक कुमार को अविश्वसनीय करार देते हुए अदालत ने उसे मुकरा गवाह घोषित करने की गुहार लगाई गई, जो अदालत ने मान भी ली. यह भी दलील दी गई कि पुलिस द्वारा बरामद चाकू पर डाक्टर की रिपोर्ट के मुताबिक मानवीय खून नहीं लगा था.

31 जनवरी, 2017 को विद्वान जज अतुल कसाना ने इस मामले का फैसला सुनाते हुए खुली अदालत में कहा कि उन्होंने दोनों पक्षों को ध्यानपूर्वक सुनने के अलावा सभी साक्ष्यों को गौर से जांचापरखा है, जिन से यह केस शीशे की तरह साफ है. अशोक कुमार को भले मुकरा गवाह करार दिया गया है, लेकिन उस की गवाही को नकारा नहीं जा सकता.

वह भी एक तरह से इस केस का चश्मदीद गवाह था. भले ही उस की गवाही में बाद में कुछ विपरीत बातें सामने आईं, जिस वजह से उसे मुकरा गवाह घोषित किया गया. लेकिन उस की शुरू की गवाही अभियोजन पक्ष को पूरी तरह मजबूती देने में सहायक सिद्ध हुई है.

society

चाकू पर मानवीय खून का अंश होने की बात रिपोर्ट में पहले ही आ चुकी है. हालांकि अभियुक्त ने उसे फेंकने से पहले साफ कर दिया था. साहिबा को बचाव पक्ष ने गवाह के रूप में पेश कर के केस की दिशा बदलने का प्रयास किया. लेकिन उस की प्रेम विवाह वाली बात मान लेने से ही प्रौसीक्यूशन की कहानी को बल मिल जाता है.

लिहाजा यह अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में कामयाब रहा है और अभियुक्त शाहबाज खान मृतक मोहम्मद इरफान का कत्ल करने का दोषी पाया गया है. अभी वह जेल में है. सजा की बाबत सुनने के लिए उसे अगले दिन अदालत में पेश किया जाए.

अगले दिन शाहबाज को ला कर अदालत में पेश किया गया तो माननीय एडीजे अतुल कसाना ने उसे उम्रकैद के अलावा 10 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. Haryana Crime News

– कथा अदालत के फैसले पर आधारित 

Hindi Crime Stories: शादी से मना किया तो

Hindi Crime Stories: प्यार तो प्यार से ही होता है. किसी से जबरदस्ती प्यार नहीं किया जा सकता. अगर एकतरफा प्यार करने वाले गुरमीत सिंह की समझ में यह बात आई होती तो शायद आज वह अमनदीप की हत्या के आरोप में जेल में नहीं होता.

अमनदीप एक हाथ में दूध का पैकेट थामे सहेलियों से बातें करती हुई मोहाली के फेज-5 की मार्केट की पिछली गली से निकल कर बगल की कोठी नंबर 1869 की ओर बढ़ी. उसी में वह पेईंगगैस्ट के रूप में रहती थी. वह मार्केट से बाहर आई थी कि अचानक एक लड़के ने उस के नजदीक आ कर उस का हाथ पकड़ा और सहेलियों से अलग खींच ले गया. एक तरह से यह निहायत बेहूदगी थी, इसलिए सहेलियों ने शोर मचाना चाहा, लेकिन अमनदीप ने इशारे से उन्हें मना कर दिया. शायद लड़का उस का परिचित और घुलामिला था, वरना किस की मजाल थी कि इस तरह पैदल आ कर सरेराह चलती लड़की को पकड़ कर खींच ले जाए.

यही सोच कर अमनदीप की सहेलियां चुप हो गईं और ध्यान से उन्हें देखने लगीं कि क्या हो रहा है? उन्होंने देखा कि एक कोने में ले जा कर लड़के ने अमनदीप का हाथ छोड़ दिया और उस से बातें करने लगा. उन के हावभाव से यही लग रहा था कि वे प्यार से बातें कर रहे हैं. लड़का दोनों हाथ जोड़ कर अमनदीप से कोई गुजारिश कर रहा है. लग रहा था, वह उस से कोई बात मनवाने की कोशिश कर रहा है. इस बीच उस ने एकदो बार उस के पैर छूने की भी कोशिश की थी.

दोनों के बीच क्या बातें हो रही हैं, इस का अंदाजा अमनदीप की सहेलियों को बिलकुल नहीं हो रहा था. अलबत्ता अमनदीप के हावभाव से यह अनुमान जरूर लग रहा था कि लड़का जो भी कह रहा है, वह उसे मना करते हुए उसे समझाने की कोशिश कर रही है. एकाध बार वह नाराज होती भी लगी थी. अचानक पता नहीं क्या हुआ कि धांयधांय कर के एकसाथ कई गोलियां चलीं और अमनदीप जोर से चीख कर लहरा कर जमीन पर गिर पड़ी.

अमनदीप पर गोलियां उसी लड़के ने चलाई थीं, जो उसे पकड़ कर ले गया था और बातें कर रहा था. गोलियां चला कर हाथ में रिवौल्वर थामे वह पैदल ही भागने लगा तो पैरों से अपंग एक औरत ने लपक कर उसे पकड़ना चाहा. लेकिन लड़के ने उस का गला पकड़ कर गिरा दिया और खुद रिवौल्वर लहराते हुए चला गया. हाथ में रिवौल्वर होने की वजह से किसी भी आदमी की उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं हुई. अमनदीप के गिरते ही उस की सहेलियां चीखते ही उस की ओर दौड़ीं. खून से लथपथ पड़ी अमनदीप को उठा कर उन्होंने किसी की गाड़ी से फेज-4 के चीमा अस्पताल पहुंचाया. डाक्टरों ने अमनदीप को मृत घोषित कर इस घटना की सूचना पुलिस को दे दी.

थोड़ी ही देर में थाना फेज-1 की पुलिस अस्पताल पहुंच गई और लाश को कब्जे में ले लिया. उस के बाद सारी औपचारिक कानूनी काररवाई निपटा कर लाश को फेज-6 के सिविल अस्पताल ले जा कर मौर्चरी में रखवा दिया. घटना को वायरलैस द्वारा फ्लैश कर दिया गया था. इसलिए मोहाली  के एसएसपी गुरप्रीत सिंह भुल्लर, एसपी सिटी-1 आशीष कपूर, डीएसपी सिटी-1 आलम विजय सिंह और थाना फेज-1 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुखविंदर सिंह दलबल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. यह घटना 12 जनवरी, 2015 की रात के करीब 8 बजे की थी.

घटनास्थल पर की गई पूछताछ में पुलिस को कुछ खास जानकारी नहीं मिली. वहां मौजूद लोग तमाशबीन ही साबित हुए थे. मृतका की सहेलियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए पुलिस को एक अहम बात यह बताई कि हमलावर सफेद रंग की वरना कार में आया था.

निरीक्षण में घटनास्थल पर उसी तरह की एक वरना कार खड़ी भी दिखाई दे गई, जिस का नंबर था पीबी 05 एक्स 2114. वह कार लौक नहीं थी, लेकिन उस की चाबी भी इग्नीशन में नहीं लगी थी. कार की सीटों पर अन्य गाडि़यों की 2 नंबर प्लेट्स, लाल रंग की एक चुनरी और मिठाई का एक डिब्बा रखा था. उस कार के पास एक अन्य वरना कार खड़ी थी, जिस का नंबर था पी.बी. 05 एफ 0069. पुलिस ने क्रेन मंगवाई और दोनों कारें उठवा कर थाने ले गई.

अमनदीप की सहेलियों में उस की चचेरी बहन नवनीत कौर भी थी. उसी से तहरीर ले कर पुलिस ने अमनदीप की हत्या का मुकदमा थाना फेज-1 में दर्ज कर लिया. इस के बाद हमलावर का हुलिया फ्लैश कर के मोहाली से बाहर जाने वाली सभी सड़कों पर नाकाबंदी कर दी गई. संदेह के आधार पर कुछ लड़कों को थाने ला कर पूछताछ भी शुरू कर दी गई. इन लड़कों में एक ऐसा लड़का पुलिस के हाथ लग गया, जो न केवल हमलावर को जानता था, बल्कि फोन द्वारा वहां हो रही काररवाई की जानकारी भी उसे दे रहा था.

पकड़े जाने के बाद पहले तो वह कुछ भी जानने से मना करता रहा, लेकिन थाने ला कर जब उस के साथ थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने सारा रहस्य उगल दिया. उस लड़के ने जो बताया था, उस के अनुसार, हमलावर का नाम गुरमीत सिंह था. वह फिरोजपुर के थाना सदर के गांव रज्जोवाला के रहने वाले मोड़ा सिंह का बेटा था. वह मृतका अमनदीप से एकतरफा प्यार करता था और उस से शादी करने के सपने देखता था. इसलिए वह उस के पीछे हाथ धो कर पड़ा था.

जबकि अमनदीप कतई तैयार नहीं थी. कुछ दिनों पहले अमनदीप मोहाली आ कर रहने लगी तो गुरमीत उस के पीछे यहां भी पहुंच गया. यहां वह यह तय कर के आया था कि अमनदीप से वह साफसाफ बात करेगा. वह मान गई तो ठीक, वरना मामले को हमेशा के लिए खत्म कर देगा. लड़के का कहना था कि गुरमीत मार्केट में अचानक उसे मिल गया था. उस ने उसे सब कुछ बता कर कहा था कि अगर बात बढ़ जाती है तो वह उस की मदद के लिए आ जाएगा. इस के बाद गुरमीत अमनदीप को उस की सहेलियों से अलग ले जा कर बातचीत करने लगा था. उस ने शायद उस की बात मानने से मना कर दिया था, इसलिए गुरमीत उसे गोली मार कर भाग गया था. इस के बाद उस ने फोन कर के वहां की स्थिति के बारे में पूछा था. इस के बाद उस का फोन बंद हो गया तो अभी तक बंद है.

पुलिस को उस से गुरमीत का मोबाइल नंबर मिल गया था. अमनदीप की चचेरी बहन से उस के घर का पता और फोन नंबर मिल गया था. वह फिरोजपुर के गांव ढोलेवाल की रहने वाली थी. उस के पिता कुलबीर सिंह गांव के नंबरदार थे और फिरोजपुर से बीजेपी के पिछली जाति प्रकोष्ठ के प्रधान थे. अमनदीप का एक बड़ा भाई था मनप्रीत सिंह, जो शादीशुदा था. अमनदीप घर की एकलौती बेटी थी. वह पढ़नेलिखने में काफी होशियार थी. फिरोजपुर के देवसमाज कालेज से बीसीए एवं बीएड करने के बाद वह देवराज ग्रुप औफ कालेजेज से एमसीए कर रही थी.

यह उस का लास्ट सैमेस्टर चल रहा था, इसीलिए वह मोहाली इंडस्ट्रियल एरिया के एक इंस्टीट्यूट में पीएचपी प्रोग्रैमिंग कोर्स के आई थी. यह ट्रेनिंग पूरी होते ही घर वाले उस की शादी कर देना चाहते थे. लेकिन इस से पहले अमनदीप आईटी इंडस्ट्री में अच्छी नौकरी हासिल करना चाहती थी. कुलबीर सिंह को बेटी की मौत का समाचार मिला तो घर में कोहराम मच गया. परिवार के कुछ लोगों को ले कर वह रात में ही मोहाली के लिए रवाना हो गए.

अगले दिन मोहाली के सिविल अस्पताल में अमनदीप के शव का पोस्टमार्टम डा. कुलदीप सिंह और डा. विनीता नागपाल की टीम द्वारा किया गया. उसे 3 गोलियां लगी थीं. एक गोली दाहिने कंधे को चीरते हुए गाल को पार कर के दूसरी ओर जबड़े में फंस गई थी. दूसरी गोली उस के दिल को छेदते हुए फूड पाइप के पास पहुंच गई थी और तीसरी उस की बगल में लगी थी. तीनों ही गोलियां मृतका के लिए घातक सिद्ध हुई थीं. सभी गोलियां उस के शरीर में फंसी रह गई थीं. एक खूबसूरत लड़की को गोलियों से इस तरह छलनी देख कर पोस्टमार्टम करते समय एक ट्रेनी नर्स बेहोश हो गई थी.

खैर पोस्टमार्टम के बाद लाश घर वालों को सौंप दी गई थी. इस के बाद घर वाले लाश ले कर अपने गांव चले गए थे. लाश पहुंचते ही गांव का माहौल गमगीन हो गया था. मातापिता और भाई के अलावा अन्य रिश्तेदारों का भी रोरो कर बुरा हाल था. पूरा गांव लड़की के अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पउ़ा था. शाम को गांव के श्मशान घाट पर अमनदीप का अंतिम संस्कार करने के बाद गुरुद्वारा में अरदास की गई. अमनदीप पूरे गांव की लाडली बेटी थी. पढ़ाई में होशियार होने की वजह से सभी को उस पर फख्र था कि एक दिन वह पूरे गांव का नाम चमकाएगी.

शायद इसीलिए उस की इस दर्दनाक मौत से गांव का हर चेहरा उदास था. हर गांववासी को उस की इस मौत का गहरा दुख था. हत्यारे की पहचान हो गई थी. अब सिर्फ उसे गिरफ्तार करना बाकी था. मगर वह भूमिगत हो गया था. उसे गिरफ्तार करने के लिए पुलिस ने अपने मुखबिरों को सतर्क करने के साथ खुद भी उस की तलाश में जगहजगह छापामारी शुरू कर दी. इस के अलावा उस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए उस के घर वालों की धरपकड़ शुरू कर दी. इस काररवाई से पुलिस को यह जानकारी मिली कि हत्या में फिरोजपुर के ही गांव मोहेवाल के रहने वाले बलदेव सिंह का बेटा जगरूप भी शामिल था. इस के बाद पुलिस उस की भी तलाश में लग गई.

गुरमीत के बारे में जानकारी जुटाने के लिए पुलिस ने सोशल साइट फेसबुक पर भी उस का एकाउंट चैक किया. इस से पता चला कि गुरमीत सिंह छात्र राजनीति में भी सक्रिय था. उस का संबंध सोपू (स्टूडेंट और्गेनाइजेशन औफ पंजाब यूनिवर्सिटी) पार्टी से था. अपने फेसबुक एकाउंट पर उस ने सोपू पार्टी से जुड़े तमाम फोटो शेयर कर रखे थे. पुलिस गुरमीत के साथसाथ जगरूप की भी तलाश कर रही थी. छापेमारी के अलावा पुलिस ने दोनों के बारे में फोटो सहित अखबारों में छपवा कर लोगों से अपील की कि अगर इन के बारे में कुछ पता चलता है तो पुलिस वालों को सूचना दें. लेकिन पुलिस को इस का कोई फायदा नहीं मिला. इस के बाद पुलिस ने लुकआउट सर्कुलर जारी करा दिया, जिस से अपराधी देश से बाहर न जा सके.

इस बीच पुलिस को इस बात की जानकारी मिल गई थी कि फिरोजपुर के कस्बा ममदोर के रहने वाले गुरमीत की बूआ के बेटे अंगरेज सिंह ने 32 बोर का अपना लाइसैंसी रिवौल्वर उसे दिया था. जगरूप के बारे में ताजी जानकारी यह मिली कि गुरमीत को उस ने चंडीगढ़ के सेक्टर-49 की अपनी पीजी एकौमोडेशन में अपने साथ ठहराया था. इस के बाद गुरमीत रिवौल्वर ले कर अमनदीप से मिलने गया तो वह भी अपनी गाड़ी से उस के पीछेपीछे गया था. लेकिन गोली चलने के बाद लोग जमा हो गए तो उन्हें गाडि़यां निकालना मुश्किल हो गया था. तब गुरमीत के पीछेपीछे वह भी पैदल ही भाग निकला था.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने अंगरेज सिंह को भी अमनदीप मर्डर केस का अभियुक्त बना दिया था. हत्या हुए 72 घंटे बीत गए थे, जबकि कोई भी आरोपी हाथ नहीं लगा था. उस के बाद पुलिस ने सभी बैंक खाते सीज करवा दिए थे. अभी तक पुलिस चंडीगढ़, मोहाली के अलावा पंजाब के अन्य शहरों, कस्बों व गांवों में ही छापामारी कर रही थी, लेकिन अब अभियुक्तों की तलाश में दिल्ली और उत्तर प्रदेश में भी अनेक जगहों पर छापे मारे गए.

आखिर 16 जनवरी, 2015 को गुरमीत ने फिरोजपुर के एक राजनेता के साथ मोहाली आ कर थाना फेज-1 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर सुखविंदर सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. वारदात में इस्तेमाल रिवौल्वर भी उस ने पुलिस के हवाले कर दी थी. पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की तो उस के एकतरफा प्यार की बलि चढ़ी अमनदीप कौर की निर्मम हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी :

फिरोजपुर के गांव रज्जोवाला और ढोलेवाल एकदम आमनेसामने पड़ते हैं. रज्जोवाला में रहता था गुरमीत सिंह का परिवार. उस के परिवार में एक बड़ी बहन और एक छोटा भाई था. बहन की शादी हो चुकी थी, जबकि भाई पढ़ रहा था. बरसों पहले उस के पिता मोड़ा सिंह अपने साथ एक अन्य औरत को ले आए थे, जिस से पूरे गांव में बवाल हो गया था. इस के बाद शर्मिंदा हो कर मोड़ा सिंह और उन के साथ आई महिला ने आत्महत्या कर ली थी.

नरसरी क्लास से ले कर ग्यारहवीं तक गुरमीत और अमनदीप ढोलेवाल के सरकारी स्कूल में एकसाथ पढ़े थे. बारहवीं गुरमीत ने प्राइवेट की थी. इसी तरह बीए पार्ट-वन करने के बाद वह इधरउधर घूमते हुए राजनीति में जाने की कोशिश में लग गया था. अमनदीप को वह बचपन ही से पसंद करता आया था, इसीलिए उस से शादी के सपने देखा करता था.

अमनदीप पढ़ाई में होशियार थी, शायद इसीलिए अपने भविष्य के प्रति गंभीर थी. एक असफल व्यक्ति के रूप में वह गुरमीत को ज्यादा पसंद नहीं करती थी. जबकि गुरमीत ने उसे अपने दिलोदिमाग में पूरी तरह बसा लिया था. अमनदीप सफलता की सीढ़ी फलांगती हुई आखिर अपनी मंजिल के एकदम करीब पहुंच गई थी. अपने घर वालों की मरजी से उस ने शादी के लिए हामी भी भर दी थी.

इसी बात ने गुरमीत को परेशान कर दिया था. वह तुरंत अमनदीप से मिला और उसे समझाया, ‘‘हमारा जन्मजन्मांतर का साथ है अमन, बचपन से मैं ने तुम्हारे सिवाय किसी और के बारे में सोचा तक नहीं, इसलिए प्लीज मेरा दिल मत तोड़ो.’’

‘‘देखो गुरमीत, ऐसा सोच कर तुम खुद को धोखा देते रहे हो. हम दोनों पड़ोसी गांव से हैं, इसलिए भाईबहन जैसा रिश्ता है हमारा. फिर हमारी जाति भी अलग है. फालतू की बातें सोच कर क्यों अपना दिमाग खराब करते रहते हो. जिंदगी को सीरियसली लेना सीखो. मैं तुम्हारी भावनाओं की कदर करती हूं, मगर इस का मतलब यह नहीं कि मैं तुम से शादी कर लूं. ऐसा बिलकुल नहीं हो सकता.’’ अमनदीप ने भी उसे अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया था.

गुरमीत पर उस की किसी बात का कोई असर नहीं पड़ा. वह लगातार उस का पीछा करते हुए उसे शादी के लिए राजी करने की कोशिश करता रहा. आखिर अमनदीप परेशान हो गई तो उस ने मोहाली में रहने का फैसला किया. वहां उस की चचेरी बहन अपनी सहेलियों के साथ पहले से ही फेज-5 के एक पीजी में रह रही थी. अमनदीप भी आ कर उन्हीं के साथ रहने लगी. गुरमीत को उस ने इस बारे में कुछ नहीं बताया, लेकिन उस ने पता कर ही लिया.

पता चलने पर वह काफी नाराज हुआ. अंगरेज सिंह उस की बूआ का बेटा था. उस से उस की निभती भी खूब थी. उस के पास जा कर किसी शादी में जाने का बहाना बनाते हुए उस ने उस से उस का लाइसैंसी रिवौल्वर ले लिया. इस के बाद मिठाई की दुकान से एक किलोग्राम मिठाई और किसी दुकान से लाल रंग का दुपट्टा खरीद कर वह कार से मोहाली पहुंच गया. यह वरना कार उस के मामा की थी, जिस में उस ने अन्य नंबरों की 2 प्लेट्स भी तैयार  करवा कर रख ली थीं.

गुरमीत ने तय कर लिया था कि इस बार अमनदीप से वह आरपार की बात करेगा. वह मान गई तो दुपट्टा और मिठाई का डिब्बा थमाते हुए गुरुद्वारा ले जा कर उस से शादी कर लेगा. इस के बाद गाड़ी की नंबर प्लेट बदल कर वह उसे ले कर घुमाने चला जाएगा. और अगर वह नहीं मानी तो उसे सदा के लिए मौत की नींद सुला देगा. मोहाली पहुंच कर वह बगल ही में पड़ने वाले चंडीगढ़ के सेक्टर-49 स्थित अपने परिचित युवक जगरूप सिंह की पीजी एकौमोडेशन पर चला गया. जगरूप को उस के खतरनाक इरादों के बारे में बिलकुल पता नहीं था, हालांकि अमनदीप से प्यार करने और उस से शादी करने की कोशिश वाली बात उस ने उसे बता दी थी. जगरूप ने उसे समझाया भी था कि वह इस तरह किसी लड़की को जबरन शादी के लिए मजबूर नहीं कर सकता.

गुरमीत ने जगरूप की एक नहीं सुनी और वहीं रहते हुए अमनदीप के बारे में पता लगाने लगा. 12 जनवरी को किसी ने उसे फोन पर बताया कि अमनदीप अपनी सहेलियों के साथ मोहाली के फेज-5 की मार्केट में है. वह तुरंत मोहाली की ओर चल पड़ा. उसे समझाने के लिए जगरूप भी अपनी गाड़ी से उस के पीछेपीछे चल पड़ा. लेकिन उसे पहुंचने में देर हो गई. उस के आने से पहले ही गुरमीत ने अमनदीप से बातचीत कर के अपनी जैकेट से रिवौल्वर निकाल कर उस पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दी थीं. इस के बाद वहां भगदड़ मच गई थी.

गुरमीत के अनुसार, अमनदीप जब अपनी सहेलियों के साथ फेज-5 मार्केट के पीछे की ओर आई तो वह उस का हाथ पकड़ कर एक किनारे ले गया था और दयनीय भाव से गिड़गिड़ा कर बोला था, ‘‘अमनदीप, आज मैं शायद तुम से आखिरी बार मिलने आया हूं. तुम सिर्फ इतना बता दो कि मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’

‘‘गुरमीत, तुम समझने की कोशिश…’’

‘‘मुझे न कुछ सुनना है और न समझना. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं, पैर पड़ता हूं, मना मत करो. मेरा दिल बैठा जा रहा है, पता नहीं अभी मुझे क्या हो जाए.’’ कहते हुए गुरमीत ने अपने दोनों हाथ जोड़े और नीचे झुक कर अमनदीप के पैर छूने की भी कोशिश की.

अपनी बात मनवाने की वह लगातार कोशिश करता रहा. आखिर मैं अमनदीप ने कहा, ‘‘देखो गुरमीत, मेरे घर वालों ने मेरे लिए लड़का देख लिया है और मैं उन्हीं की मरजी से शादी करूंगी. तुम बेकार में मुझे परेशान मत करो.’’

‘‘ठीक है, लेकिन मैं भी निश्चय कर के आया हूं कि अगर तुम मेरी नहीं हो सकती तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’ कहने के साथ ही उस ने जैकेट से रिवौल्वर निकाली और तड़ातड़ 3 गोलियां अमनदीप के जिस्म में उतार दीं.

गुरमीत के अनुसार, अमनदीप की हत्या करने के बाद वह खुद को भी गोली मार कर अपनी इहलीला खत्म कर लेना चाहता था. लेकिन हड़बड़ाहट में उस ने रिवौल्वर में भरी सभी की सभी गोलियां चला दी थीं. 19 जनवरी को गुरमीत की बूआ का बेटा 26 वर्षीय अंगरेज सिंह गिरफ्तार हुआ तो उस ने बताया कि उस के रिवौल्वर में कुल 5 गोलियां थीं. लेकिन निरीक्षण में मौके पर पुलिस को 2 अन्य गोलियों के निशान अथवा खोखे नहीं मिले थे. अंगरेज को भी 2 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर पूछताछ की गई, लेकिन उस ने कोई नई बात नहीं बताई. 21 जनवरी को गुरमीत और अंगरेज का पुलिस रिमांड खत्म होने पर उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था.

23 जनवरी को अन्य वांछित अभियुक्त जगरूप सिंह ने भी अकेले ही थाने आ कर आत्मसमर्पण कर दिया था. पूछताछ में वह बेकसूर पाया गया, इसलिए अगले दिन यह कह कर उसे रिहा कर दिया गया कि इस वारदात में उस का कोई हाथ नहीं है. मामले की जांच करने वाले इंसपेक्टर सुखविंदर सिंह ने समय से दोनों दोषियों गुरमीत सिंह और अंगरेज सिंह के खिलाफ चालान तैयार कर के इलाका मजिस्ट्रेट के यहां पेश कर दिया, जहां से सैशन कमिट हो कर यह केस मोहाली के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सैशन जज दिलबाग सिंह जौहल की कोर्ट में चला. माननीय जज महोदय ने इस केस का फैसला महज 4 महीने में सुना दिया.

फैसला कुछ इस तरह से था. गुरमीत सिंह उर्फ गोरा को अमनदीप की हत्या के आरोप में आजीवन सश्रम कारावास और एक लाख रुपए जुरमाना तथा आर्म्स ऐक्ट 27(1) (बिना लाइसेंस का रिवौल्वर इस्तेमाल करने के लिए) 5 साल की कैद व 5 हजार रुपए जुरमाना की सजा सुनाई. अंगरेज सिंह को आर्म्स एक्ट 27बी के तहत 3 साल की कैद और 5 हजार रुपए जुरमाना की सजा सुनाई. जुरमाना की रकम से 5 हजार रुपए सरकारी खजाने में जमा करने के बाद शेष एक लाख 5 हजार रुपए की रकम अमनदीप के मातापिता को देने का आदेश दिया. Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: हुश्न की कीमत

Hindi Stories: लड़कियों के प्रति खासकर हसीन लड़कियों के प्रति सभी का रवैया एक जैसा होता है बेरहम और कांटेदार, जो उस हसीना के शरीर पर खराशें डाल देते हैं. ऐसा ही कुछ जरीना के साथ हुआ, जिस की वजह से वह डौली बन गई.

पहले मेरा नाम जरीना था. उन दिनों मेरे बदन पर ढंग के कपडे़ तक नहीं होते थे. हमारे घर में अच्छा खाना नहीं पकता था. लोग मेरे सिर पर सलीके से जमे हुए दुपट्टे और झुकी हुई निगाहों को देख कर मेरे बारे में दकियानूसी होने का फतवा लगा देते थे. कहने का मतलब कि हम बेहद गरीब थे. मैं अपने वालिदैन के साथ मलेर में रहती थी. यह शहर से कुछ फासले पर गरीबों की बस्ती थी. यहां हुकूमत की तरफ से क्वार्टर बना कर अलाट कर दिए गए थे. अब्बा को भी एक 80 गज का क्वार्टर अलाट हो गया था.

घर में हम 6 लोग थे—अब्बा, अम्मी, हम 2 बहनें और 2 भाई. मैं बहनभाइयों में सब से बड़ी थी. मैं समझती हूं कि लड़कियों को सब से बड़ी नहीं होना चाहिए, वरना उन की आधी उम्र दूसरों को समेटते हुए गुजर जाती है. कम से कम गरीब घराने में अव्वल तो लड़कियों की जरूरत ही नहीं होती. अगर हो भी तो तीसरे या चौथे नंबर पर हो. बहरहाल, अब्बा ने हम सब को एक पास के स्कूल में दाखिला दिला दिया था. जिंदगी बुरीभली गुजर रही थी. अब्बा एक औफिस में काम करते थे. मलेर से शहर का फासला लंबा था, इसलिए अब्बा 5 बजतेबजते घर से औफिस के लिए निकल जाते थे.

मैं ने अपनी कहानी शुरू तो कर दी है, लेकिन यह एक तल्ख कहानी है. अगर आप में हौसला है तो इसे पढ़ें. इस के बाद आप की मरजी है, चाहे गालियां दें या खामोश हो जाएं. लेकिन इतना जरूर जानती हूं कि आप इस बात से इनकार नहीं करेंगे कि इस कहानी के बेशुमार किरदारों में एक आप भी हैं. हां, आप जो एक ट्यूटर हैं, एक दुकानदार हैं, व्यापारी हैं, औफिस में काम करने वाले क्लर्क हैं, मालिक हैं. यह कहानी आप की है, क्योंकि इस समाज को आप ही ने बनाया है. आप चाहे कुछ भी हों, कोई भी हों, इस आईने में अपना चेहरा आप को घिनौना ही नजर आएगा.

हां तो, मैं उस से मुखातिब हो रही हूं, जो रोज स्कूल जाते समय हमारे रास्ते में खड़ा रहता था. उस वक्त हम दोनों बहनें ज्यादा बड़ी नहीं थीं. मेरी उम्र 15 बरस रही होगी और हसीना की 13 बरस. वह खड़ा रहने वाला नौजवान तकरीबन 20 का रहा होगा. वह एक अजीब मिजाज का नौजवान था. उस का गरेबान हमेशा खुला रहता था. बड़ेबड़े बालों को वह तेल लगा कर चिपकाए रखता था. तंग मोरी की पतलून और चारखाने की कमीज में उस का हुलिया बहुत फूहड़ लगता. उस के होंठों के दरम्यान हमेशा एक सिगरेट दबी रहती. वह हम दोनों को देख कर अजीब अंदाज से खंखारता और सीटियां बजाता हुआ पीछेपीछे चलने लगता. हम स्कूल के गेट तक पहुंच जातीं तो वह रफूचक्कर हो जाता. यह उस का रोजाना का काम था. हम दोनों बहनें इस सूरतेहाल से परेशान हो गई थीं.

उन दिनों मुझे जिंदगी के इन पहलुओं के बारे में ज्यादा मालूम नहीं था. घर में रेडियो हुआ करता था. कभीकभी हम नजदीकी सिनेमाघर में जा कर फिल्म देख लिया करती थीं. लेकिन उस जमाने की फिल्में भी बस यूं ही हुआ करती थीं. हम दोनों बहनें अकसर उसी के बारे में बातें करती थीं. हमारी समझ में नहीं आता था कि वह चाहता क्या है? एक दिन रोशी ने अचानक मुझे अहसास दिला दिया. उस ने यह अहसास इस तरह दिलाया था, जैसे अंधेरे में किसी के हाथों में मशाल दे दी जाए और उस मशाल की रोशनी में उसे सब कुछ दिखाई देने लगे. हुआ यों कि रोशी उस दिन स्कूल में कहीं से एक किताब ले आई थी.

रोशी उम्र में मुझ से 2 बरस बड़ी रही होगी, लेकिन पढ़ती मेरी क्लास में थी. उस ने पीरियड खत्म होते ही किताब मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा, ‘‘जरीना, यह देखो, इस में अच्छीअच्छी तसवीरें हैं.’’

मैं किताब देखने लगी. उस में वाकई खूबसूरत लड़कियों की तसवीरें थीं. एक से बढ़ कर एक लिबास पहने हुए. खूबसूरत लिबास पहने हुए खूबसूरत लड़कियां, जिन को देखने से खुशी महसूस होती थी.

‘‘अरे, ये तो वाकई बहुत प्यारीप्यारी लड़कियां हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘हां, हैं तो बहुत प्यारी, लेकिन इन में से कोई भी तुम्हारी तरह नहीं है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं ने चौंक कर किताब बंद कर दी.

‘‘तुम जरा अपने आप को आईने में देखो,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम्हें खुद अहसास हो जाएगा कि तुम कितनी खूबसूरत हो.’’

मेरा दिल जोरजोर से धड़क उठा. क्या मैं वाकई उतनी खूबसूरत हूं? यह अपने को देखने का जज्बा तो हर एक में हुआ करता है. आप किसी बच्चे की भी जरा सी तारीफ कर दें तो वह इठलाइठला कर चलना शुरू कर देता है.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो रोशी? पहले तो किसी ने ऐसी बात नहीं कही.’’

‘‘तो क्या हुआ? मैं सच कहती हूं. तुम्हारी वजह से हंगामा होगा, गोलियां चलेंगी. न जाने कितने नौजवान तुम पर मर मिटेंगे.’’

और उस वक्त मुझे अचानक अहसास हो गया कि वह नौजवान रास्ते में क्यों खड़ा रहता है. रोशी ने अनजाने में एक राज से परदा उठाया था, वरना मैं तो अभी तक उलझी हुई थी. मतलब यह था कि मैं बहुत खूबसूरत थी, इसीलिए वह नौजवान मेरे रास्ते में आया करता था. इस राज से परदा हटते ही अजीब किस्म की घबराहट होने लगी. अगर मैं खूबसूरत थी तो फिर उस को क्या? वह कौन होता था, मेरे रास्ते में खड़ा होने वाला? वह दिन स्कूल में बस इसी किस्म की बातें सोचते हुए गुजर गया.

अगले दिन वह नौजवान फिर दिखाई दिया. इस दफा पहली बार मेरे कदम लड़खड़ाए थे, वरना इस से पहले मैं उसे नजरअंदाज कर दिया करती थी. लेकिन आज एक कदम भी उठाना दूभर हो रहा था. मेरी बहन हसीना ने भी मेरी यह हालत महसूस कर ली थी.

‘‘अरे, क्या हो गया बाजी? चलो न. इतना आहिस्ताआहिस्ता क्यों चल रही हो?’’

मैं ने चौंक कर अपनी रफ्तार तेज कर दी. रोज की तरह वह नौजवान स्कूल के गेट से वापस हो गया था.

उस रात मैं ने अम्मी से उस नौजवान की शिकायत कर दी. अम्मी मेरी बात सुन कर बोलीं, ‘‘तुम्हारा वहम होगा जरीना. हो सकता है, उस का भी रास्ता वही हो.’’

‘‘नहीं अम्मी,’’ हसीना मेरी तरफ से बोली, ‘‘वह वाकई हम दोनों के लिए खड़ा रहता है और बाजी को यों घूरघूर कर देखता है कि क्या बताऊं.’’

अम्मी सोच में पड़ गईं. ऐसी बातें सुन कर गरीब मांएं आमतौर पर सोच में मुब्तिला हो जाती हैं, जबकि अमीर मांएं या तो मुसकरा कर बात टाल देती हैं या ऐसे आवारागर्द का फौरी तौर पर बंदोबस्त कर दिया जाता है. लेकिन मेरी अम्मी गरीब थीं, इसलिए सोचने लगीं और उन्होंने पहली बार मुझे ऐसी निगाहों से देखा, जिन की तपिश मुझे अपने चेहरे पर महसूस होने लगी थी. उन निगाहों में हैरानी भी थी और खौफ भी. बेटी के हुस्न की तारीफ भी और अंदेशे भी. उन निगाहों ने मुझे बेचैन कर दिया. वहां से उठ कर मैं कमरे में आ गई और कमरे में दाखिल होते ही आईना मेरे सामने था.

वह लकड़ी की अलमारी में लगा हुआ धुंधला सा आईना था. लेकिन उस वक्त वह मेरे वजूद से जगमगा रहा था. मैं ने पहली बार आईने को और आईने ने मुझे इस अंदाज से देखा था. मैं अपने आप पर फिदा होने लगी थी. एक खास किस्म का गुरूर, एक अजीब तरह की खुशी. क्या मैं वाकई इतनी खूबसूरत हूं? दूसरी सुबह वह नौजवान फिर दिखाई दिया. मुझे मालूम नहीं था कि अम्मी ने अब्बा से भी इस का जिक्र कर दिया होगा और न हमें यह मालूम था कि उस सुबह वह उस नौजवान की घात में थे. वह रोज की तरह हमारे पीछेपीछे चला और अब्बा न जाने किस तरफ से हाजिर हो कर उस की राह में आ गए.

उस दिन मुझे मालूम हुआ कि जब बेटी की इज्जत दांव पर हो तो एक दुबलेपतले इंसान में भी कितनी ताकत पैदा हो जाती है. अब्बा ने उस नौजवान को धुन कर रख दिया. यह मामला ऐसा था कि हर शख्स उन का साथ देने पर तैयार हो जाता. इसलिए राह चलते लोगों ने भी अब्बा का साथ दिया और वह नौजवान पिटपिटा कर वहां से चला गया. उस के बाद दोबारा वह दिखाई नहीं दिया.

वह तो फिर कभी मेरे रास्ते में नहीं आया, लेकिन आज मैं उसी से मुखातिब हूं. यह तुम ही थे, जिस ने मेरी जिंदगी के तालाब में पहला कंकड़ फेंका था. पहली बार दायरे बनाए थे, हालांकि तुम उस के बाद कभी दिखाई नहीं दिए. वक्त तुम्हें अपने बाजुओं में समेट कर किस तरफ ले गया, मुझे नहीं मालूम. लेकिन तुम ने जो कुछ भी किया, वह मुझे अभी तक याद है. और तुम…अब मैं तुम से मुखातिब हूं, तुम जो मेरे ट्यूटर बने थे. दुबलेपतले, चश्मा लगाए एक सभ्य नौजवान.

मैं ने नौवीं में पहुंच कर साइंस ले ली थी. खयाल था कि बड़ी हो कर डाक्टर बन जाऊंगी. आमतौर पर हर गरीब वालिदैन अपने बच्चों को डाक्टर बनाने के बारे में सोचते हैं या फिर उन्हें इंजीनियर बनाना चाहते हैं. वैसे उन्हें यह भी मालूम होता है कि इस दुनिया में हजार दूसरे काम भी हैं. बहरहाल मैं साइंस पढ़ रही थी.

मैं जहीन इतनी नहीं कि साइंस को बगैर किसी की मदद से पढ़ सकती और हमारी इतनी हैसियत भी नहीं थी कि हम कोई ट्यूटर रख सकते. एक दिन अब्बा के एक दोस्त ने उन्हें एक ट्यूटर की औफर कर दी. यह ट्यूटर उन के दोस्त का बेटा था.

‘‘भाई, अगर तुम चाहो तो मैं कामरान को तुम्हारे घर भेज दिया करूं.’’

‘‘वह तो ठीक है, लेकिन मैं…’’

‘‘ओहो, तुम से फीस कोई नहीं मांग रहा है. क्या मुझे तुम्हारी हालत मालूम नहीं है? तुम फीस की परवाह मत करो. बस बच्ची की तालीम पर ध्यान दो.’’

इस तरह कामरान ट्यूटर बन कर हमारे घर आने लगा. मैं ने महसूस किया कि मेरी खूबसूरती ने उसे बौखला कर रख दिया था. वह पहली मुलाकात में बस देखता ही रह गया और उस वक्त तक देखता रहा, जब तक अम्मी ने चाय की प्याली ला कर उस के सामने नहीं रख दी. वह खुद भी किसी बहाने से सामने वाली चौकी पर बैठ गईं.  उस 80 गज के क्वार्टर में पहले सिर्फ एक कमरा था, कमरे के साथ एक लाइन में किचन, बाथरूम और टायलेट बने हुए थे. लेकिन अब्बा ने दरवाजे के साथ एक छोटा सा कमरा और बनवा लिया था. उन दोनों कमरों के अलावा बाकी सेहन था. मैं उस सेहन में बैठ कर कामरान से पढ़ रही थी. एक चौकी भी उसी सेहन में रखी थी और अम्मी छालियां काटने के बहाने पानदान ले कर उस चौकी पर बैठ गई थीं.

गरीब घरानों की मांएं आमतौर पर इसी अंदाज से ट्यूटर और बेटी के सामने बैठ जाया करती हैं या फिर बहानेबहाने किसी को भी भेजती रहती हैं, जिस से यह मालूम हो सके कि वाकई पढ़ाई हो रही है या मोहब्बत का सबक याद कराया जा रहा है. कामरान ने उस दिन मुझे सिर्फ एक बार गहरी नजरों से देखा था. उस के बाद वह सिर झुकाए पढ़ाता रहा. कुछ देर बाद अम्मी को भी शायद उस की शराफत का अंदाजा हो गया था, इसलिए वह पानदान ले कर वहां से चली गईं. कई दिन बीत गए, अम्मी ने बैठना छोड़ दिया. कामरान अब किसी हद तक मुझ से इधरउधर की बातें कर लेता था. मैं ने महसूस किया कि वह बहुत देर तक मेरे पास बैठा रहता था. हुस्न में बहुत ताकत हुआ करती है.

यह वह जमाना था, जब मुझे अपनी उस ताकत का पूरी तरह ज्ञान हो गया था. आदमी के पास जब कोई दौलत आ जाए तो वह उसे बहुत सावधानी से बचाबचा कर रखता है. वक्त उसे दौलत के इस्तेमाल के तरीके सिखा देता है. मुझे भी यह आ गया था कि मैं किस तरह अपनी इस दौलत से फायदा उठा सकती हूं.

फिर एक दिन कामरान ने एक कदम आगे बढ़ा दिया. बातें वह करता ही था. उस दिन पहली बार मुझ से इजहारे मोहब्बत किया. क्या आप को इस पहली बार के जादू का अंदाजा है? यह ऐसा जादू होता है, जो आंखों के सामने खूबसूरत दृश्यों की चादर तान देता है. कानों में सुरीली घंटियां सी बजने लगती हैं. चेहरे पर चांद प्रकट हो जाता है. कान की लवें तपिश देने लगती हैं.

कामरान ने इजहारे मोहब्बत क्या किया, मेरे अंदर की दुनिया बदल गई. वह मेरी जिंदगी में पहला आदमी था, जिस ने सिर्फ देखते रहने पर संतोष न करते हुए एक कदम आगे बढ़ा दिया था. मैं लहक उठी थी. उस ने बड़े दिलकश अंदाज में कहा था, ‘‘मुझे नहीं मालूम कि मुझे इस किस्म की मोहब्बत करनी चाहिए कि नहीं, क्योंकि मैं तुम्हें पढ़ाने आता हूं. लेकिन जज्बा ऐसा होता है कि किसी बात की परवाह नहीं करता. इश्क अंधा होता है. मैं भी अंधा हो गया हूं. अगर तुम चाहो तो इस अंधे का हाथ थाम सकती हो, वरना हाथ को झटकने का भी अख्तियार है. तुम्हें याद होगा कि मैं ने जब तुम्हें पहली बार देखा तो मेरी क्या हालत हुई थी. जरीना! मैं तुम से मोहब्बत करने लगा हूं…बेपनाह मोहब्बत.’’

उस ने पहली बार मुझे अहसास दिलाया था कि हुस्न सिर्फ देखते रहने के लिए नहीं, बल्कि मोहब्बत करने के लिए हुआ करता है. हम लड़कियां पहली बार की मोहब्बत को नजरअंदाज नहीं करतीं. हर लड़की की जिंदगी में यह ‘पहली बार’ जरूर आता है. लिहाजा मैं भी उस की मोहब्बत का जवाब मोहब्बत से देने की पाबंद हो गई थी.

अब पढ़ाई के साथसाथ प्यार की बातें भी होने लगीं. इस किस्म की बातों का अपना अलग लुत्फ हुआ करता है. उसे पूरी तरह बयान भी नहीं किया जा सकता. बातें करते हुए डरेडरे अंदाज में इधरउधर देखना, एकदूसरे की खैरियत पूछना, एकदूसरे को अपनी मोहब्बत का बारबार यकीन दिलाते रहना, मौका देख कर एकदूसरे का हाथ थाम लेना, यह सब कुछ होता रहा. लेकिन बात इस से आगे नहीं बढ़ सकी.

इस किस्म की मोहब्बत का कोई साफ मकसद भी नहीं हुआ करता. उस वक्त यह खयाल नहीं होता कि इस सिलसिले को आगे किस तरह बढ़ाया जाए. तनहाई में मुलाकातें किस तरह की जाएं. कुछ लोग थोड़ी हिम्मत कर के अपने वालिदैन से अपना राज कह दिया करते हैं और ज्यादातर लोग खामोश रह कर अपने महबूब या महबूबा की शादी का नजारा करते हैं और बाद में कुछ दिनों तक उस की याद में आंसू बहाते रहते हैं. फिर वे खुद भी जमाने की भीड़ में कहीं गुम हो जाया करते हैं.

हमारी यह कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी. एक बार अम्मी ने मुझे उस से इस किस्म की बातें करते हुए देखसुन लिया और उस दिन बेचारे की छुट्टी कर दी गई. अम्मी का खयाल था कि यह सिलसिला एकतरफा है, यानी वह यह समझ रही थीं कि जो कुछ भी हुआ है, वह उसी मास्टर की तरफ से हुआ है. हर मां अपनी औलाद के लिए इसी किस्म की खुशफहमी में रहती है. उस के बाद कामरान से मेरी मुलाकात नहीं हो सकी. 1-2 बार मैं ने उस को देखा, लेकिन वह भी दूर से. बहुत उदास नजर आ रहा था. तो कामरान, आज मैं तुम से इसलिए मुखातिब हूं कि तुम ने पूरी तरह मेरे दिल में मोहब्बत के जज्बात जगाए थे.

कामरान के बाद जिंदगी कुछ उदास और बेजार सी हो गई. यह और बात है कि मुझ को अपनी अहमियत का पूरी तरह अंदाजा हो गया था. यह भी अजीब बात थी कि हसीना मेरी तरह हरगिज नहीं थी. देखने वाले मेरे बारे में यह कहा करते थे कि हसीना मेरा नाम होना चाहिए था. हसीना एक आम सी लड़की थी.

फिर वाकयात की रफ्तार में तेजी आ गई. कभीकभी ऐसा होता है कि वाकयात बहुत सुस्त रफ्तार हो जाते हैं. एकएक लम्हा बोझिल होने लगता है और कभीकभी पंख लगा कर उड़ने लगता है. एक दिन अचानक अब्बा का इंतकाल हो गया. घर का एक कोना हमेशा के लिए खाली हो गया. वह कोना मोहब्बत का था, हिफाजत के अहसास का था. उन की मौत के बाद पता चला कि जिंदगी कितनी बेरहम, कितनी दुश्वार है. यह तो रगों से लहू निचोड़ कर रगों को खुश्क कर देती है. हमारे तालीमी खर्चे थे और भूख थी, जो मौत की ही तरह बेरहम हुआ करती है.

मैं उस जमाने में मैट्रिक कर चुकी थी. लेकिन अब्बा के जाते ही तालीम का सिलसिला तोड़ देना पड़ा. इंसान पहले दिन से भूख को तरजीह देता आया है तो भूख की मांग यह थी कि तालीम छोड़ दो. अच्छे लिबास न इस्तेमाल करो और अच्छी जिंदगी से बाज आओ. हम ने यही किया, लेकिन यह भी कब तक चल सकता था?

अब सवाल यह था कि किया क्या जाए? दोनों भाइयों ने नौकरी की तलाश शुरू कर दी, लेकिन नौकरी इतनी आसानी से कहां मिल सकती थी और वह भी उन को, जिन का बाप एक मामूली हैसियत का इंसान रहा हो और वह मर गया हो.

हम सब सिसकती हुई जिंदगी गुजार रहे थे कि एक दिन एक लंबी सी स्याह कार हमारे दरवाजे पर आ कर रुकी. वह पहला मौका था कि हमारे दरवाजे पर कोई गाड़ी आई थी. दरवाजों की ओट से चेहरे झांकने लगे. बच्चों ने कार के गिर्द घेरा डाल दिया. पूरे मोहल्ले में एक शोर सा बरपा हो गया. हम जल्दी से दरवाजे पर आ गए. गाड़ी से उतरने वाली एक मोटी सी औरत थी, जिस ने कीमती साड़ी पहन रखी थी. उस के हाथों में सोने की चूडि़यां थीं. वह सीधे हमारे दरवाजे आ गई. उस की गाड़ी में एक बावर्दी ड्राइवर बैठा था.

‘‘तुम नसीमा हो न?’’ उस मोटी औरत ने अम्मी की तरफ इशारा किया.

‘‘हां,’’ अम्मी ने जल्दी से अपनी गरदन हिला दी, ‘‘लेकिन आप…’’

‘‘मैं साजिदा हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘तुम मुझे नहीं जानती, लेकिन मैं तुम से अच्छी तरह वाकिफ हूं.’’

अम्मी असमंजस में पड़ गईं, फिर भी उन्होंने एक तरफ हट कर उसे रास्ता दे दिया. वह मोटी औरत नाकभौं चढ़ाई हुई अंदर आ गई. उसे शायद घर से उठने वाली बू पसंद नहीं आई थी या इतने छोटे घर में उस का दम घुट रहा था. अम्मी ने उसे सेहन में रखी हुई चौकी पर बैठा दिया.

‘‘मैं अभी तक आप को पहचान नहीं सकी.’’ अम्मी ने कहा.

अम्मी की बात का जवाब देने के बजाय उस की निगाहें पूरे घर का जायजा ले रही थीं. मैं और मेरे सारे बहनभाई वहीं खड़े थे. मैं उस की निगाहों के अंदाज से शर्मिंदगी महसूस कर रही थी. वह छोटा सा घर उस की शान के काबिल नहीं था. जिस औरत के पास इतनी शानदार गाड़ी हो, उस का घर भी यकीनन बहुत शानदार होगा. चारों तरफ का जायजा लेने के बाद उस ने अपनी निगाहें मुझ पर गड़ा दीं. मुझे उस की निगाहों से कुछ बेचैनी सी होने लगी थी.

‘‘आप के शौहर के औफिस में शेरवानी साहब काम करते थे. आप ने उन का नाम जरूर सुना होगा?’’

अम्मी को याद आ गया, ‘‘हां हां, याद आया.’’

‘‘मैं उन की बीवी हूं,’’ उस औरत ने बताया, ‘‘मैं तो बहुत दिनों से यहां आने की सोच रही थी, लेकिन फुरसत ही नहीं मिलती थी. आज फुरसत मिली है तो आप लोगों से मिलने चली आई हूं.’’

‘‘आप की बहुत मेहरबानी.’’ अम्मी ने कहा और मेरे एक भाई को कोल्डड्रिंक लाने के लिए दौड़ा दिया.

वह औरत कुछ देर तक बातें करने के बाद चली गई. जातेजाते उस ने हम सब के हाथों पर 100-100 के नोट भी रखती गई. उस की कृपा दृष्टि मुझ पर ज्यादा ही महसूस हो रही थी. मुझे तो यों महसूस हो रहा था, जैसे वह सिर्फ मुझ से ही मिलने आई थी. वह चली तो गई, लेकिन अम्मी को परेशान कर गई. मैं ने महसूस किया कि उस के जाने के बाद वह बहुत देर तक उलझी रही थीं. मैं अम्मी के बाद घर में सब से बड़ी थी, इसलिए मुझे उन की परेशानी पूछने का हक हासिल था.

‘‘मुझे इस औरत का यहां आना अच्छा नहीं लगा.’’ अम्मी बोलीं.

‘‘क्यों? वह तो बहुत अच्छी औरत लग रही थी.’’ मैं ने न जाने क्यों उस की हिमायत की, ‘‘जरा सोचें, हमारे घर में आता ही कौन है और वह भी इतने पैसे वाली औरत…कितनी शानदार गाड़ी थी उस की और उस के हाथों में सोने की चूडि़यां कितनी थीं.’’

‘‘यही तो परेशानी की बात है कि यह सब कुछ जायज नहीं है.’’ अम्मी ने कहा.

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘ओहो, अब तू मुझ से बहस करेगी?’’

‘‘नहीं अम्मी, मैं बहस नहीं कर रही हूं. आप मुझे बताएं न. मैं अब बड़ी हो गई हूं. जब आप ही मुझे अच्छाबुरा नहीं बताएंगी तो कौन बताएगा?’’

‘‘तेरे अब्बा बताया करते थे कि शेरवानी साहब अच्छे आदमी नहीं हैं,’’ अम्मी ने कहा, ‘‘उन के पास बेपनाह दौलत है, जबकि जाहिर है नौकरी से इतनी दौलत कभी नहीं आ सकती.’’

‘‘बस अम्मी, इतनी सी बात? हो सकता है शेरवानी का नौकरी के अलावा और कोई कारोबार हो या जायदाद हो.’’

‘‘अच्छा, अच्छा… अब तू खामोश रह.’’

उस रात मैं और हसीना सोने से पहले उसी की बातें करती रही थीं.

वह खातून एक बार फिर मेरे घर आई. इस बार भी उस के आने से मोहल्ले में हंगामा बरपा हो गया. अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी थीं, लेकिन वह ऐसी औरत थी कि उस ने अम्मी के रवैए का बुरा नहीं माना. उस का ध्यान इस बार भी मुझ पर ही था और जहां तक मेरा सवाल था, मैं उस की दौलत की चमकदमक से प्रभावित हो चुकी थी. उस दिन उस ने एक अजीब हरकत की. उस ने उस वक्त मेरे हाथ में कागज का एक पुरजा थमा दिया, जब अम्मी उस के लिए चाय बनाने गई थीं. वह मुझे कागज देते हुए बोली, ‘‘इस को जल्दी से अपने पास रख लो. इस में मेरा पता है. किसी दिन आ जाना. तुम से जरूरी बात करनी है, लेकिन किसी को पता न चले.’’

मैं ने न जाने क्या सोच कर खामोशी अख्तियार कर ली. मैं ने अम्मी को भी नहीं बताया. अलबत्ता तनहाई में सोचती रही थी कि उस ने मुझे अपने घर क्यों बुलाया है? मैं उस के किस काम आ सकती हूं? मैं तो एक गरीब लड़की हूं और उस के लिए किसी भी तरह फायदेमंद नहीं हो सकती हूं. होना तो यह चाहिए था कि मैं उस की पेशकश को कबूल न करती. मैं ने अम्मी के विश्वास को कभी ठेस नहीं पहुंचाई थी, लेकिन उस की चमकदमक ने मुझे प्रभावित कर रखा था. इस के अलावा मेरे दिल में उत्सुकता भी जाग उठी थी. आखिर मैं ने बहुत सोचविचार के बाद उस के घर जाने का फैसला कर लिया.

अब सवाल यह था कि घर से किस तरह निकलूं. तालीम का सिलसिला खत्म हो चुका था. इसलिए मुझे अम्मी से झूठ बोलना पड़ा. मैं ने अम्मी से किसी सहेली के घर जाने का झूठ बोला था. और यह मेरी जिंदगी का पहला झूठ था. झूठ बोलते हुए शुरूशुरू में थोड़ी सी झिझक होती है, निगाहें झुकी रहती हैं, जुमले टूटटूट जाते हैं. फिर 2-4 बार के बाद यह झिझक खत्म हो जाती है. लहजे में आत्मविश्वास पैदा हो जाता है.

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ. मैं झिझक रही थी, मेरे जुमले टूट रहे थे, लेकिन अम्मी को कोई शक नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें मुझ पर विश्वास था. मैं घर से निकल पड़ी. उस औरत का पता मेरी मुट्ठी में दबा हुआ था. वह मेरा पहला सफर था. अब तो यह पता ही नहीं चलता कि मैं कहीं ठहरी हूं या सफर में हूं. बहरहाल, मैं उस के आलीशान मकान में पहुंच गई. उस मकान को देख कर आंखें फटी रह गई थीं. यकीन नहीं आता था कि मकान इतना बड़ा भी होता है. मैं जब मकान में दाखिल हुई तो मेरे जिस्म पर कंपकंपी छाई हुई थी.  मैं ने

अब तक अपने हुस्न से दूसरों को सम्मोहित होते देखा था, लेकिन उस वक्त दौलत की ताकत ने मुझे सम्मोहित कर दिया था. उस मकान में ऐसीऐसी चीजें थीं, जिन को मैं ने ख्वाब में भी नहीं देखा होगा, क्योंकि ख्वाब भी तजुर्बात से पैदा होते हैं. और मुझे कीमती कालीनों, खूबसूरत फानूसों, आरामदेह सोफे वगैरह का कहां तजुर्बा था? वह औरत मेरे साथसाथ चल रही थी. उस ने मुझे पूरे मकान की सैर करवाई. उस के होंठों पर एक ऐसी गहरी मुसकराहट थी, जिस का मतलब उस समय समझ में नहीं आया था. मकान देखने के बाद मैं उस के साथ लंबेचौड़े ड्राइंगरूम में आ गई.

‘‘चलो, बैठ जाओ,’’ उस ने सोफे की तरह इशारा किया, ‘‘तुम थक गई होगी.’’

मैं चुपचाप बैठ गई. नरमनरम सोफा ऐसा लग रहा था, जैसे ढेर से झाग ने मुझे समेट लिया हो. मेरे जिस्म की कंपकंपी अभी तक कम नहीं हुई थी.

‘‘घर कैसा लगा तुम्हें?’’ उस ने पूछा.

‘‘बहुत अच्छा,’’ मैं ने अटकते हुए जवाब दिया, ‘‘मैं ने ऐसा घर पहले कभी नहीं देखा था.’’

‘‘अगर तुम चाहो तो यह सब कुछ तुम्हारा हो सकता है.’’ उस ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘क्या?’’ मैं ने आंखें फाड़ कर उस की तरफ देखा, ‘‘मेरा…यह आप क्या कह रही हैं?’’

‘‘हां तुम्हारा…देखो जरीना, मैं ने एक खास मकसद से तुम्हें यहां बुलाया है, क्योंकि मैं समझती हूं, तुम एक समझदार लड़की हो. यहां जो कुछ देखोगी और सुनोगी, उस का जिक्र किसी से नहीं करोगी. देखो, आज हालात बहुत बदल गए हैं. आज की सब से बड़ी सच्चाई दौलत है. दौलत, जो पेट भर खाने को देती है. दौलत, जो लिबास मुहैया कराती है. दौलत, जो समाज में इज्जत बढ़ाती है. बाकी जो है, सब बकवास है. तुम्हारे हुस्न की मिसाल मिलनी मुश्किल है. लेकिन गरीबी ने तुम्हारा क्या हाल कर दिया है. तुम्हारे खूबसूरत गालों पर भूख ने जर्दी की तह जमा दी है. तुम्हारी खूबसूरत आंखें वीरान होने लगी हैं. तुम्हारा शानदार जिस्म अच्छे लिबास को तरस रहा है. क्या यह सब तुम्हें अच्छा लगता है?’’

‘‘नहीं..,’’ मैं ने अनजाने तौर पर अपनी गरदन हिला दी.

‘‘मैं जानती थी कि तुम्हारा यही जवाब होगा,’’ उस ने कहा, ‘‘आहिस्ताआहिस्ता आने वाली मौत किस को अच्छी लगती है और गरीबी ऐसी ही मौत है. तुम को शायद यह अंदाजा न हो कि मैं ने तुम्हारे यहां सिर्फ तुम्हारी वजह से आनाजाना शुरू किया है. मेरे शौहर शेरवानी ने तुम्हारा जिक्र किया था. मेरे शौहर और तुम्हारे अब्बू एक ही औफिस में काम करते थे. यह नौकरी तो सिर्फ एक आड़ है, वरना मेरे शौहर को नौकरी की कोई जरूरत नहीं है. तो एक दिन शेरवानी तुम्हारे अब्बू के साथ तुम्हारे घर गए थे. वहां उन्होंने तुम्हें देख लिया था. फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे अब्बू का इंतकाल हो गया और मुझे तुम्हारे घर जाने का मौका मिला. मैं यह चाहती थी कि मैं तनहाई में कुछ देर तुम से बातें कर लूं. सो आज मौका मिल गया है.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मैं ने हैरान हो कर पूछा. उस वक्त मेरी घबराहट कुछ कम हो गई थी.

‘‘इस सवाल का जवाब तुम्हें आईना देगा. तुम आईने में अपने आप को देख कर सवाल करो. आईने से यह पूछो कि क्या इतनी खूबसूरत आंखें वीरान होने के लिए हैं? क्या यह नायाब जिस्म इसलिए बनाया गया है कि अच्छे लिबास को तरसता रहे? क्या यह तरोताजा चेहरा भूख का सदमा बरदाश्त करने के लिए है? क्या तुम इसलिए हो कि 80 गज के एक घुटन भरे क्वार्टर में अपनी जिंदगी बिता दो? क्या तुम्हारा बेमिसाल हुस्न इसलिए है कि एक मामूली दर्जे का गंदा, कंगाल सा आदमी तुम्हें ब्याह कर ले जाए और तुम उस के गंदे घर में सिसकते हुए सारी जिंदगी गुजार दो? बताओ, क्या तुम्हें अच्छी जिंदगी पसंद नहीं है? क्या तुम यह सब हासिल करना नहीं चाहती, जो इस वक्त तुम्हारे इर्दगिर्द फैला हुआ है?’’

मैं उस की बातों के सम्मोहन में फंस गई थी. उस ने मुझे एक दूसरी किस्म के अहसास में मुब्तिला कर दिया था. इस से पहले लोगों ने यह तो अहसास दिला दिया था कि मैं बेहद हसीन हूं, लेकिन किसी ने यह नहीं बताया था कि ऐसा हुस्न 80 गज के क्वार्टर में नहीं रहता है. ऐसे हुस्न के लिए एक खूबसूरत मकान और उम्दा फर्नीचर चाहिए. इसलिए मुझे उस की बातें अच्छी लग रही थीं.

‘‘बताओ, क्या तुम यह सब नहीं चाहतीं?’’ उस ने फिर सवाल किया.

‘‘क्यों नहीं चाहती, मैं भी इंसान हूं. मेरी भी ख्वाहिशें हैं.’’ मैं ने कहा.

‘‘शाबाश! असल चीज इरादा है, ख्वाहिश है. अगर इरादा पुख्ता और ख्वाहिश में शिद्दत हो तो सब कुछ हासिल किया जा सकता है.’’

‘‘किस तरह?’’

‘‘हां, इस सवाल का जवाब जरा मुश्किल है, क्योंकि हो सकता है कि तुम्हारा जमीर जाग उठे. इज्जत वगैरह का खयाल आ जाए और तुम नाराज हो कर चल दो. मुझे मालूम है कि मैं ने अगर बता दिया तो वही होगा, जो मैं कह रही हूं यानी तुम नाराज हो जाओगी, मुझे बुराभला कहोगी, गालियां दोगी, लेकिन मुझे तुम्हारी नाराजगी की परवाह नहीं होगी. मैं बुरा नहीं मानूंगी, क्योंकि शुरूशुरू में ऐसा ही होता है. लेकिन इस घर के दरवाजे एक शानदार भविष्य ले कर तुम्हारे लिए खुले रहेंगे. तुम जब आना चाहो, यहां आ सकती हो.’’

‘‘आप बताएं तो सही, मुझे करना क्या होगा?’’

उस ने जो कुछ बताया, उस ने मेरे पूरे बदन में आग भर दी थी. मैं नहीं कह सकती थी कि वह आग लज्जत दे रही थी या उस की तपिश में तकलीफ हो रही थी. एक अजीब सी हालत थी. अहसास हो रहा था कि शायद मैं ने यहां आ कर गलती की है या शायद कोई गलती नहीं की. आदमी के पास जब एक कीमती शै है तो उसे ज्यादा से ज्यादा कीमत पर बेचने का हक हासिल है.

‘‘तो यह है दौलत हासिल करने का तरीका.’’ मैं ने अपनी हैरानी पर काबू पाते हुए पूछा.

‘‘हां, मुझे मालूम है कि इस वक्त तुम्हारी क्या हालत हो रही होगी. हमारे पास जबरदस्ती नाम की कोई चीज नहीं है. यहां सब कुछ अपनी मरजी से हुआ करता है. मैं यह बता दूं कि इस समाज में अच्छाईबुराई नाम की कोई चीज नहीं है. सब बकवास करते हैं. तुम इस मकान में आने वालों को देख लो तो तुम्हारे होश उड़ जाएं. ये वे लोग हैं, जिन के चर्चे अखबारों और रिसालों में होते हैं, जिन की पाकीजगी की कसमें खाई जाती हैं. जिन पर कौम विश्वास करती है. सब यहां आते हैं. रात के अंधेरों में आते हैं और सुबह होने से पहले चले जाते हैं, ताकि उन की पारसाई का भरम कायम रहे.

‘‘तुम इस शहर में इतने खूबसूरत मकान और गाडि़यां देखती हो तो यह सब कहां से आता है? किसी ने हलाल की कमाई से कोई महल नहीं बनवाया है. तुम मुझे किसी एक का नाम बता दो. अब जायज और नाजायज एकदूसरे में गड्डमड्ड हो कर रह गए हैं तो इस मौके का फायदा क्यों न उठा लिया जाए. मैं फिर यह कह रही हूं कि तुम पर जबरदस्ती नहीं कर रही, क्योंकि यह सौदा अपनी खुशी से होता है. तुम घर जाओ और जब तुम्हें जमीर और इज्जत वगैरह बेकार की बातें लगने लगें तो यहां चली आना. यह घर एक शानदार भविष्य के साथ तुम्हारा इंतजार करेगा.’’

मैं वहां से घर आ गई. उस औरत की बातों ने मुझे एक दोराहे पर खड़ा कर दिया था. बरसों की पढ़ाईलिखाई और घर के माहौल ने मुझे यह याद करा दिया था कि मैं ऐसी दौलत, ऐसी जिंदगी पर लात मार दूं. जमीर बहुत आला चीज है. औरत का सब कुछ उस की इज्जत हुआ करती है. लेकिन दूसरी तरफ उस की बातें मुझे अहसास दिला रही थीं कि शायद वह ठीक ही कह रही थी. हो सकता है कि आप को भी यह सब नागवार गुजर रहा हो. आप सोच रहे हों कि मुझे उस औरत को गाली दे कर वापस आ जाना चाहिए था. लेकिन क्यों?

मेरे घर में फाके होते हैं. हम लोग रूखी रोटी चाय के साथ भिगोभिगो कर खाते हैं तो क्या उस वक्त आप हमारे जमीर की दाद देने के लिए आते हैं? नहीं, आप ऐसा नहीं करते. आप को तो अहसास भी नहीं होता और जब हम अपनी मंजिल तय कर के अपना सफर शुरू कर देते हैं, उस वक्त आप समाज के ठेकेदार बन कर हमारे सामने आ जाते हैं. लेकिन ऐसे ठेकेदार कि हमारे खिलाफ तकरीर करते हुए आप की निगाहें हमारे जिस्मों को तौलती रहती हैं. खैर, तो मैं ने किसी से जिक्र नहीं किया, क्योंकि मुझे उस रास्ते पर सफर नहीं करना था. इस दौरान घर की हालत और भी बिगड़ चुकी थी. भाइयों ने मायूसी के बाद आवारागर्दी शुरू कर दी थी.

एक दिन अम्मी ने अपने दिल पर काबू करते हुए मुझे एक बात बताई, ‘‘बेटी, मेरा दिल तो नहीं चाहता, लेकिन क्या करूं? पेट की आग कम ही नहीं होती. दोनों बेटे तो किसी काम के नहीं रहे. सौ दफा समझा चुकी हूं कि जब अच्छी नौकरी नहीं मिल रही है तो कोई और काम कर लो. अब भूख और कंगाली बरदाश्त नहीं होती. मोहल्ले में जो अजीम साहब रहते हैं न, वह कल आए थे मेरे पास. बता रहे थे कि उन्होंने तुम्हारे लिए किसी फर्म में नौकरी की बात कर ली है. अभी 7 सौ रुपए मिलेंगे. बाद में तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

मैं ने तो नौकरी करने का कभी तसव्वुर भी नहीं किया होगा. अम्मी यह क्या कह रही थीं. मैं इनकार भी नहीं कर सकती थी. घर की मजबूरियां मेरे सामने खुली हुई किताब की तरह थीं, लिहाजा मैं ने नौकरी के लिए हामी भर दी. 7 सौ ही सही, उस में रूखीसूखी रोटी तो आ सकती थी. मेरे दोनों भाइयों को जब मेरी नौकरी के बारे में मालूम हुआ तो वे चुप रह गए. और ऐसा होना भी चाहिए. अगर वे ऐतराज करते तो घर का गुजारा कैसे होता?

तीसरे दिन मैं उस फर्म की फैक्ट्री में पहुंच गई. वहां मेरे अलावा और लड़कियां भी थीं. लेकिन वहां मेरा पहुंचना ऐसा था, जैसे आसमान से चांद उतर आया हो या फैक्ट्री में बहार आ गई हो. मैं उन के दरम्यान किसी शहजादी की तरह थी. पैकिंग के कागजात मेरे खूबसूरत हाथों में आ कर जगमगाने लगते थे. मेरे पास हुस्न की जो ताकत थी, उस ताकत ने फैक्ट्री में अपना हुनर दिखाना शुरू कर दिया था और उस फैक्ट्री के 2 आदमी मेरी जिंदगी में दाखिल हो गए. यह मेरे सफर का एक और पड़ाव था. अंदाजा हो गया कि रिश्ते किस झूठ के नाम हैं. असल चीज है हविस और दौलत. जिंदगी में इस के अलावा और कुछ नहीं है. हविस, जो हमेशा मुझ जैसी लड़की के पीछे लगी रहती है और दौलत जिस से रोटी, कपड़ा और मकान खरीदा जा सकता है.

और आज मैं तुम दोनों से भी मुखातिब हूं. तुम राशिद अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक के बेटे थे और इफ्तखार अली, जो इस फैक्ट्री के मालिक थे. मैं तुम दोनों के दरम्यान एक ऐसी नेमत की तरह थी, जिस को तुम दोनों हासिल करना चाहते थे. खुद बताओ, कहां गया तुम्हारा रिश्ता? बापबेटे का रिश्ता तो बहुत अजीम हुआ करता है. फिर तुम दोनों को क्या हो गया था? तुम दोनों ने मेरी खातिर एकदूसरे से रकाबत तक मोल ले ली थी. पूरी फैक्ट्री तुम दोनों का मजाक उड़ाती थी और मैं बदनाम हुई जा रही थी. तुम दोनों ने बारीबारी से मुझे इतनी सुविधाएं दीं कि मैं खुद को हवाओं में महसूस करने लगी थी.

आज मैं पूछती हूं कि तुम दोनों ने ऐसा क्यों किया? मेरी खातिर तुम्हारे दरम्यान बापबेटे की शिनाख्त क्यों खत्म हो गई थी? क्या हुस्न ऐसा जादू है, जो आंखों पर पट्टियां बांध देता है? वैसे मैं तुम दोनों की शुक्रगुजार हूं. अगर तुम ऐसा न करते तो अब तक मैं और मेरे घर वाले भूख से हलाक हो चुके होते. उस फैक्ट्री में काम करते हुए तीसरा दिन था कि एक औरत ने आ कर बताया कि राशिद अली मुझ से मिलना चाहता है. मैं उस वक्त तक राशिद अली को नहीं जानती थी. मेरे पूछने पर उस ने बताया कि राशिद अली उस फैक्ट्री के मालिक का बेटा है और फैक्ट्री की देखभाल उसी के जिम्मे है.

मेरी समझ में नहीं आया कि उस ने मुझे क्यों बुलाया है. शायद मेरे काम में कोई कोताही थी या वह मुझे किसी और काम में लगाना चाहता था. बहरहाल मैं उस के साथ हो ली. वह औरत मुझे एक शानदार कमरे में पहुंचा कर वापस चली गई. उस वक्त उस कमरे में सिवाय दौलत के इजहार के और कुछ नहीं था. यह दौलत कैसी चीज थी, जो मुझे प्रभावित करने पर तुली हुई थी. वह मेरे सामने रूप बदलबदल आ रही थी.

मैं उस औफिस को आंखें फाड़फाड़ कर देखती रही. सब कुछ इतना कीमती था कि सिर्फ उसी औफिस में मेरी जिंदगी भर की कमाई से कई गुना ज्यादा रकम लगी हुई थी. मैं अभी उन सब चीजों को देख रही थी कि राशिद कमरे में दाखिल हुआ. वह एक खूबसूरत नौजवान था. अच्छी सूरतशक्ल के बावजूद उस के चेहरे पर एक खास किस्म की अय्यारी का अक्स था. वह मेरे सामने आ कर खड़ा हो गया. मैं उसे देख कर सिटपिटा गई.

‘‘मैं राशिद अली हूं,’’ उस ने कहा, ‘‘यह फैक्ट्री मेरी है और मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम मुझे वहां काम करती हुई अच्छी नहीं लग रही थीं.’’

‘‘जी, क्या कहा आप ने?’’

‘‘हां, देखो, मैं बहुत साफ कहने वाला आदमी हूं. अपने दिल में कुछ छिपा कर नहीं रखता. मैं यह कह रहा हूं कि कुदरत ने तुम जैसी हसीना को इसलिए नहीं बनाया कि तुम मामूली से काम करती रहो. तुम्हें तो हुकूमत करने के लिए बनाया गया है.’’

‘‘पता नहीं, आप क्या कह रहे हैं?’’ मैं जल्दी से बोली.

वैसे मैं अच्छी तरह समझ गई थी कि वह क्या कह रहा था. वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था और मेरे पास इस ताकत के अलावा और था ही क्या, गोया उस ने भी मुझे मेरी ताकत का अहसास दिला दिया था. अपने हुस्न की तारीफ सुनते हुए मुझे अच्छा लग रहा था. इस से पहले जो लोग मेरी जिंदगी में आए और जिन्होंने मेरे हुस्न को सराहा था, वे मेरे ही तबके से ताल्लुक रखते थे. लेकिन राशिद अली एक दौलतमंद इंसान था. उस ने न जाने कितने मुल्कों की सैर की होगी. कितनी लड़कियों से उस का वास्ता पड़ा होगा और जब वह मेरे हुस्न की तारीफ कर रहा था तो इस का मतलब यह था कि मैं वाकई बेहद हसीन थी. राशिद के पास अगर दौलत थी तो मेरे पास हुस्न था. उस कमरे में हम दोनों बराबर के थे.

मैं उस के सामने तन कर खड़ी हो सकती थी. उसे अपनी अहमियत का अहसास दिला सकती थी.

‘‘आप ने मुझे क्यों बुलाया है?’’

‘‘सिर्फ यह कहने के लिए कि तुम आज से पैकिंग नहीं करोगी, बल्कि तुम्हें उस डिपार्टमेंट का इंचार्ज बना दिया गया है,’’ उस ने कहा, ‘‘और वक्त गुजरने के साथसाथ तुम्हारी और भी तरक्की होती रहेगी. मैं जानता हूं कि तुम में कितनी खूबियां हो सकती हैं.’’

मैं ने सोचा, उस से कह दूं कि खूबियां मुझ में नहीं, मेरे हुस्न में हैं. लेकिन गरदन झुका कर खामोश खड़ी रही. उस दिन के बाद से फैक्ट्री में काम करने वाली लड़कियां मुझ से ईर्ष्या करने लगी थीं. यह पहला मौका था कि किसी लड़की को इतनी जल्दी तरक्की मिल गई थी. लेकिन शायद उस फैक्ट्री में मुझ जैसी खूबसूरत लड़की भी पहली बार आई थी. मेरी तनख्वाह फौरी तौर पर 7 सौ से 12 सौ कर दी गई थी.

कुछ दिनों बाद मुझे फिर बुलाया गया. इस बार बेटे ने नहीं, बल्कि बाप ने बुलाया था. बापबेटे में ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता था. उस ने भी गुफ्तगू की शुरुआत मेरे हुस्न की तारीफ से की थी, लेकिन उस का अंदाज अलग था. उस की उम्र ने उसे होशबंदी सिखा दी थी. इसलिए वह जानता था कि किसी लड़की के लिए किस अंदाज का जाल बिछाना चाहिए.

‘‘मैं तुम्हें देखते ही समझ गया था कि तुम ऐसी लड़की नहीं हो, जो फैक्ट्री में रह कर अपनी जिंदगी तबाह कर दे,’’ उस ने कहा, ‘‘इसलिए मैं चाहता हूं कि तुम औफिस में आ जाओ. वहां तुम्हारी तरक्की की भी रोशन उम्मीदें हैं.’’

‘‘लेकिन सर, मुझे तो औफिस का कोई काम नहीं आता.’’ मैं ने कहा.

‘‘इस से कोई फर्क नहीं पड़ता,’’ इफ्तखार मुसकरा दिए, ‘‘शुरूशुरू में तो किसी को भी कुछ नहीं आता. आहिस्ताआहिस्ता सब कुछ आ जाता है.’’

फैक्ट्री की लड़कियों ने जब यह खबर सुनी तो मेरे खिलाफ उन के गुस्से की आग और तेज हो गई, लेकिन मुझे उन की परवाह नहीं थी. मैं ने तो अपना सफर शुरू कर दिया था और सफर में कामयाबी की शर्त यह होती है कि न तो पीछे मुड़ कर देखा जाए और न ही झिझक कर पांव रोक दिए जाएं. औफिस में मेरी तनख्वाह 15 सौ रुपए माहवार कर दी गई. हमारे सभी मसले हल हो सकते थे, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सका. औफिस में एक दिन कयामत आ गई. उन दोनों की बीवियां औफिस चली आईं. क्या तमाशा था कि सासबहू दोनों एक ही लड़की से परेशान हो कर औफिस चली आई थीं. मैं सास की भी सौतन हुई जा रही थी और बहू की भी. औफिस में अच्छाखासा हंगामा बरपा हो गया था और उसी दिन मुझे नौकरी से निकाल दिया गया. मैं आसमान में उड़तेउड़ते अचानक जमीन पर आ गिरी.

घर पहुंची तो मुझ से पहले मेरी बदनामी वहां पहुंच चुकी थी. किसी ने मेरे घर वालों को सूरतेहाल से आगाह कर दिया था. पूरा घर मेरे खिलाफ खड़ा था. खासतौर पर दोनों भाई बहुत नाराज हो रहे थे.

‘‘इस में मेरा क्या कुसूर है?’’ मैं ने उन लोगों से कहा, ‘‘अगर मैं खूबसूरत हूं तो यह खूबसूरती मैं ने अपनी मरजी से तो हासिल नहीं की. मेरा तो सिर्फ इतना कुसूर है कि मैं ने हालात से फायदा उठाते हुए तरक्की करनी चाही थी. इस के अलावा मैं ने कुछ नहीं किया.’’

‘‘लेकिन जो कुछ भी हुआ, वह हमारी इज्जत और शान के खिलाफ है.’’ एक भाई गुस्से से बोला.

‘‘आप लोग किस इज्जत और शान की बात कर रहे हैं?’’ मैं ने तल्ख हो कर कहा, ‘‘फर्ज करें, अगर मैं फैक्ट्री में काम करती और हर महीने अपनी तनख्वाह ला कर दिया करती और पूरा घर उस तनख्वाह से परवरिश पाता रहता तो क्या इज्जत और शान कायम रहती कि लड़की घर चला रही है, जबकि यह काम मर्दों का है?’’

‘‘लेकिन अब क्या होगा?’’ अम्मी ने परेशान हो कर अपने आप से सवाल किया.

मैं उन की परेशानी के मतलब से वाकिफ हो चुकी थी. उन की परेशानी इसलिए नहीं थी कि मैं बदनाम हो चुकी थी, बल्कि इस परेशानी की वजह यह थी कि नौकरी खत्म होने के बाद गुजारा किस तरह होगा. उस वक्त मुझे अहसास हो रहा था कि गरीबी जब हद से गुजर जाए तो हर वह शख्स काबिलेकबूल हो जाता है, जिस के हाथ में नोट हों, दूसरे हाथ में चाहे हविस की तलवार ही क्यों न हो. यह एक बेरहम हकीकत है और हमें उसे स्वीकार भी कर लेना चाहिए. मैं ने महसूस किया कि उस दिन के बाद से अम्मी कुछ उखड़ीउखड़ी रहने लगी थीं. दोनों भाई भी जराजरा सी बात पर नाराज हो रहे थे. हसीना ने मुंह फुला रखा था.

अम्मी ने अच्छे वक्त के कुछ जेवर बचा रखे थे. उन्हें भी बेच दिया गया. मैं कभीकभी खुद को आईने में देखती तो अपने आप पर तरस आने लगता था. खूबसूरत आंखें जो मुरझाने के लिए नहीं थीं, मुरझाई जा रही थीं. दिलकश रंग फीका पड़ता जा रहा था. कुदरत ने मुझे एक नेमत तो दी, लेकिन अफसोस, मैं उस की हिफाजत नहीं कर पा रही थी. फिर मेरी मुलाकात फिरोज से हो गई. यह मेरी आखिरी मुलाकात थी. उस के बाद मैं ने किसी से मुलाकात नहीं की. सिर्फ समझौता किया, सौदा किया. वह मेरे अब्बा के किसी दोस्त का लड़का था, जो किसी औफिस में मामूली सा नौकर था. इसलिए उस के जिस्म पर लिबास भी मामूली हुआ करता था. इस के बावजूद वह मुझे पसंद आ गया, क्योंकि पसंदीदगी का अमल हिमाकत से शुरू हो कर शर्मिंदगी पर खत्म हो जाता है.

वह सिर्फ एक बार हमारे घर आया था, लेकिन मुझ से मिलने के बाद उस का आनाजाना शुरू हो गया था. जब उस ने मेरी तरफ मोहब्बत का हाथ बढ़ाया तो मैं न जाने क्यों, उस के बढ़े हुए हाथ को झटक न सकी. कैसेकैसे लोगों ने मुझे हासिल करने की कोशिश की थी, लेकिन मैं ने उस का हाथ कबूल कर लिया था, जो एक मामूली सा क्लर्क था और जिस के जिस्म पर ढंग का लिबास भी नहीं होता था. हम दोनों छिपछिप कर मिलते रहे. मेरा खयाल था कि फिरोज हमारे घर के हालात से आगाह था और वह हम लोगों के लिए सहारा बन जाएगा. हम घंटों एकदूसरे के साथ बैठे पूरी दुनिया को फतह करने की बातें करते रहे. हम ने कैसेकैसे ख्वाब देखे थे. दुनिया की हर लड़की का ख्वाब एक जैसा होता है. एक मोहब्बत करने वाला शौहर, एक छोटा सा घर, उस में शरारतें करते हुए मासूम बच्चे.

फिरोज ने मुझ से कहा था, ‘‘मैं शायद दुनिया का खुशकिस्मततरीन इंसान हूं, क्योंकि मुझे दुनिया की खूबसूरततरीन लड़की से मोहब्बत हो गई है. तुम ने मुझे जिंदा रहने के अंदाज सिखा दिए हैं. देख लेना, मैं तुम्हारी मोहब्बत हासिल करने के बाद कितनी तरक्की करूंगा. औफिस के मालिक ने मुझ से कहा है कि मैं शार्टहैंड सीख लूं तो मेरी तनख्वाह बढ़ा दी जाएगी.’’

पहली बार मुझे झटका सा लगा. मेरा हुस्न इसलिए नहीं था कि किसी के तनख्वाह के इजाफे पर खुश होता रहे. फिरोज की सोच इस से बुलंद उड़ान नहीं भर सकती थी. मैं ने फिर भी उस से कुछ नहीं कहा, क्योंकि मैं पहली बार मोहब्बत के  तजुर्बे से गुजर रही थी. एक दिन फिरोज मुझे अपने एक दोस्त के घर ले गया. उस दोस्त के घर में कोई भी नहीं था. सिर्फ मैं थी और फिरोज. उस दिन पहली बार मेरे गालों पर सुर्खी उमड़ आई. मैं पहली बार एक ऐसी बात से वाकिफ हो गई, जिस से वाकिफ कराने के लिए राशिद अली, इफ्तखार अली और न जाने कितने लोग कोशिश करते रहे थे.

मैं जब फिरोज के साथ उस घर से वापस आई तो अपने आप को हार चुकी थी, लेकिन न जाने क्यों मुझे इत्मीनान सा था. यह इत्मीनान खुद फिरोज ने दिलाया था. उस ने कहा था कि वह बहुत जल्दी मुझे अपना लेगा और मैं खयालों में डूबी अपने घर आ गई. उस वक्त मेरे चलने का अंदाज बदल चुका था. मेरे लहजे में ठहराव पैदा हो गया था. मेरे अंदाजे में एक खास किस्म की खुशी थी. 4-5 दिनों के बाद घर में एक हादसा हो गया. अम्मी गुसलखाने में गिर पड़ी थीं. उन के कूल्हे की हड्डी टूट गई थी.

कंगाली में अगर जुकाम भी हो जाए तो उस का बोझ कंधों पर महसूस होने लगता है और यह तो कूल्हे की हड्डी थी, जिस के इलाज के खर्च इतने थे कि पूरे घर की चीजें फरोख्त हो जातीं.  उस वक्त दोनों भाई किसी काम नहीं आ सकते थे, क्योंकि उन के पास सिवाय बेकारी के और कोई काम न था. गरीबों के रिश्तेदार भी कम ही होते हैं या होते ही नहीं हैं. लिहाजा हम कहीं से भी कोई मदद हासिल नहीं कर सकते थे.

उस वक्त मुझे फिरोज का खयाल आया. वही हमारी मदद कर सकता था. वह मेरी मोहब्बत और जिस्म का रखवाला था. उस से कोई तकल्लुफ नहीं था. मोहब्बत के रिश्ते में यही तो एक लुत्फ है कि एकदूसरे से खुल कर बातें कर ली जाती हैं.

मैं फिरोज से मिलने पहुंच गई. वह मुझे घर पर ही मिल गया था और यह इत्तफाक था कि वह घर पर अकेला ही था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर खुशी के रंग दौड़ गए.

‘‘फिरोज, मैं तुम्हारे पास एक बहुत जरूरी काम से आई हूं.’’ मैं ने कहा.

‘‘बताओ, तुम्हारे लिए तो जान भी हाजिर है.’’

‘‘मेरी अम्मी गिर गई हैं. कूल्हे की हड्डी फ्रैक्चर हो गई है. तुम किसी भी तरह 5 हजार रुपए का बंदोबस्त कर दो.’’

एक लम्हे के लिए उस के चेहरे पर फीका सा रंग आ कर गुजर गया. वह कुछ सोचने लगा.

‘‘अब क्या सोचने लगे? क्या इतनी रकम नहीं है तुम्हारे पास?’’

‘‘नहीं, बात पैसों की नहीं है.’’

‘‘तो फिर क्या है?’’

‘‘मैं सोच रहा हूं कि तुम ने कुछ देर लगा दी,’’ वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘तुम्हें तो अपने हुस्न की कीमत वसूल करने के लिए बहुत पहले आ जाना चाहिए था.’’

बस, यह वह आखिरी जुमला था, जो जरीना ने सुना था, क्योंकि उस के बाद जरीना ‘डौली’ हो गई थी. जरीना के नकाब को उस ने अपने सिर से उतार फेंका था. जरीना ने जब यह जुमला सुना तो जमीनआसमान एक हो गए थे. हवाएं रुक गई थीं. सूरज बहुत जल्दी डूब गया था और वह सब कुछ हो गया था, जो नहीं होना चाहिए था. क्या मैं अपने हुस्न की कीमत वसूल करने गई थी? क्या मैं इतनी सस्ती थी? क्या लड़कियों के मुकद्दर में सिर्फ धोखे ही लिख दिए जाते हैं? क्या इस जमीन पर उगने वाले सारे रिश्ते झूठे हैं?

अब तो आप को यकीन हो गया होगा कि मैं इतनी तल्ख हकीकत क्यों हूं. बताइए, मैं उस वक्त क्या करती? हर तरफ तो आप जैसे लोगों की सल्तनत है और सल्तनत इतनी बड़ी कि कोई आप की हविस के दायरे से निकल ही नहीं सकता. आप चाहे कोई भी हों, लड़कियों के लिए और खासतौर पर हसीन लड़कियों के लिए आप का रवैया एक जैसा ही होता है, बेरहम और कांटेदार. आप के रवैए के नाखून हसीन जिस्मों पर खराशें डाल देते हैं. आप को मालूम है कि बाद में मैं ने क्या किया होगा? हां, मैं ने वही किया जो मुझे करना चाहिए था. मैं उस औरत के घर पहुंच गई, जिस ने कहा था कि मेरे लिए उस के दरवाजे खुले रहेंगे.

…और उस के दरवाजे खुले हुए थे. सब से पहले तो उस ने मुझे पुराने नाम से निजात दिलाई. जरीना से डौली हो गई. उस घर में और भी लड़कियां थीं, लेकिन मेरी तरह कोई नहीं थी. इसलिए मेरे हालात बहुत तेजी से बदलने लगे. मैं ने कहा था कि मुझे इस समाज में पारसा कोई नहीं दिखाई दिया. सब एक जैसे हैं.

उस मकान में जाने के बाद यह बात बिलकुल सच साबित हो रही है. वहां आने वाले व्यापारी, नेता, अफसर, लेखक, अदाकार, गर्ज यह कि हर पेशे के लोग वही लोग हैं, जो दूसरों के सामने कुछ और होते हैं, लेकिन मेरे बदन के आईने में उन के चेहरों की बनावट कुछ और हो जाती है. एक दफा खुद फिरोज भी आ चुका है, लेकिन मुझे देख कर भाग गया था. शुरूशुरू में मेरे घर वालों ने मुझ से ताल्लुक खत्म कर लिया था, लेकिन जब मैं ने उन के आगे पैसों के ढेर लगा दिए, एक खूबसूरत सा मकान उन के हवाले कर दिया तो उन्होंने भी समझौता कर लिया. यह एक तल्ख बात है, लेकिन है हकीकत. अब हम सब साथ रहते हैं. एक ही घर में, एक ही छत के नीचे.

मेरे दोनों भाई अब भी कोई काम नहीं करते. अब उन्हें जरूरत भी नहीं है. उन की जेबें हमेशा नोटों से भरी रहती हैं. मेरी अम्मी को आज अगर जुकाम भी होता है तो शहर भर के डाक्टर ‘बेगम साहिबा, बेगम साहिबा’ कहते हुए दौड़ लगा देते हैं. मेरी बहन हसीना को जब लिबास की जरूरत होती है तो मैं उस के लिए इतने लिबास खरीद देती हूं कि उस के लिए पसंद करना मुश्किल हो जाता है.

आप मेरी कहानी पढ़ कर मुझ पर अफसोस न करें, क्योंकि डौली बहुत खुश है. हो सकता है कि जरीना खुश न रहती, लेकिन मैं जरीना नहीं, डौली हूं. अगर आप को कभी मेरी जरूरत महसूस हो तो मेरा पता जानने की जद्दोजहद न करें. अपने इर्दगिर्द नजर डालें, आलीशान मकानों में कोई न कोई डौली आप को जरूर मिल जाएगी. Hindi Stories

लेखक – जरीना  

  

Hindi Stories: प्यार के दो रंग

Hindi Stories: आदमी की किस्मत उस के पसीने से लिखी होती है, जिस ने भी यह बात कही है, गलत नहीं कही. उस घर में जो रौनक, हुस्न और खुशबू थी, वह सनोवर के पसीने की बदौलत थी.

शाम को घर पहुंचा तो 6 बज रहे थे. 7 बजे किसी पार्टी में जाना था. मैं ने ड्राइंगरूम  में कदम रखा तो वह खुशबू से महक रहा था. बैडरूम में दाखिल हुआ तो मैं ने जोहरा को सिंगार मेज के बड़े आईने के सामने खड़ी देखा. वह अभीअभी नहा कर गुसलखाने से निकली थी. उस के बालों में नमी थी. उस के बाल गरदन तक बड़ी नफासत से तराशे हुए थे. उन से भीनीभीनी खुशबू फूट रही थी. वह मेकअप करने में मसरूफ थी. उस ने मुझे आईने में देखा और रस्मी अंदाज से बोली, ‘‘हैलो डियर.’’

‘‘हैलो…’’ मैं ने अपना ब्रीफकेस पलंग पर रख दिया, ‘‘पार्टी 7 बजे है और तुम अभी से तैयार हो रही हो?’’

‘‘मैं तैयार कहां हो रही हूं?’’ उस ने कहा, ‘‘सिर्फ पाउडर लगा रही थी. अभी मैं ब्यूटीपार्लर जा रही हूं.’’

‘‘ब्यूटीपार्लर?’’ मैं ने बैड पर बैठते हुए उस की तरफ देखा, ‘‘यह जो सिंगार मेज पर मेकअप के सामान की दुकान लगी है और हर महीने जो तुम 2 हजार रुपए का सामान खरीदती हो, वह मेरी समझ में नहीं आता. जब बातबात पर ब्यूटीपार्लर जाती हो तो फिर मेकअप का सामान मत खरीदा करो.’’

‘‘जब भी किसी पार्टी में जाती हूं तो ब्यूटीपार्लर से तैयार हो कर आती हूं. घर में रहती हूं या शौपिंग के लिए जाती हूं तो घर में मेकअप कर लेती हूं. यह बात तुम भूल जाते हो.’’

‘‘तुम्हें अपनी नजरों के सामने पा कर हर बात भूल जाता हूं.’’

‘‘तुम तैयार हो जाओ, तब तक मैं ब्यूटीपार्लर से हो आऊं.’’ वह बोली, ‘‘अपनी गाड़ी की चाबी तो देना.’’

वह गाड़ी की चाबी ले कर तेजी से बाहर निकल गई. उस ने न तो चाय के लिए पूछा था और न ही नौकरानी को बुला कर कहा था कि मेरे लिए चाय वगैरह बना दे. उसे मेरा खयाल कभी नहीं रहता था. वह तो अपने आप और अपनी दुनिया में गुम रहती थी. मैं उस की खुदगरजी का जैसे आदी हो गया था. वह घर में बीवी नहीं, महबूबा बन कर रह रही थी.

मैं गुसलखाने से बाहर आया. 7 बज गए थे. जोहरा 5-7 मिनट पहले ही ब्यूटीपार्लर से तैयार हो कर आई थी. मैं ने उस की सजधज देखी तो देखता ही रह गया. वह किसी दुलहन के अंदाज में बनसंवर कर आई थी. बेहद हसीन होने के बावजूद वह अपने आप को और भी हसीन बनाने की कोशिश करती थी, ताकि महफिलों में हर किसी की नजर में छा जाए.

उस का हुस्न रोजबरोज निखरता जा रहा था. इस की एक वजह यह थी कि उसे सारा दिन सजनेसंवरने और दावतों में जाने के सिवा कोई और काम नहीं था. मैं कभीकभी सोचता था कि क्या मैं ने जोहरा से सिर्फ इसलिए शादी की थी कि मेरी बीवी हसीन औरत हो? क्या औरत महज हुस्न व शबाब का नाम है? क्या मर्द को औरत के शबाब और जिस्म ही से दिलचस्पी होती है? उसे औरत से कुछ और नहीं चाहिए क्या?

मैं ने उस के करीब पहुंच कर उसे अपने बाजुओं में कैद कर लेना चाहा तो वह एकदम तेजी से पीछे हटी, ‘‘ओह नो डियर, मेरे बाल, कपड़े और मेकअप का सत्यानाश हो जाएगा.’’

‘‘और मेरे जज्बात का…’’ मैं ने क्षुब्ध हो कर पूछा.

‘‘उन्हें वापसी तक काबू में रखो,’’ वह मुसकराई, ‘‘मैं ने 500 रुपए दिए हैं ब्यूटीपार्लर वालों को.’’

जब हम गाड़ी में बैठे तो उस ने अपने पर्स से एक चिट निकाल कर मेरी तरफ बढ़ाई, ‘‘पहले आप यहां चलें. मेरी सहेली और उस के शौहर को साथ ले कर पार्टी में चलते हैं. वे भी इत्तफाक से इस पार्टी में बुलाए गए हैं.’’

‘‘यह क्या कोई नई चीज है?’’ मैं उस के हाथ से चिट ले कर पता पढ़ने लगा.

‘‘यह सनोवर है…’’

‘‘सनोवर!’’ मेरा दिल धड़क उठा. मैं ने अनजान बन कर पूछा, ‘‘कौन सनोवर? शायद यह नाम मैं पहली बार सुन रहा हूं.’’

‘‘लो, तुम मेरी सब से प्यारी सहेली और अपनी क्लासफेलो को भूल गए?’’ उस ने हैरत से मेरी तरफ देखा.

‘‘जब तुम मिल गईं तो किसी को याद रखने की जरूरत ही क्या है?’’ मैं ने कहा, ‘‘कुछ याद तो आ रहा है कि कोई लड़की सनोवर हमारे साथ पढ़ती थी. वही सनोवर थी न, जो बहुत काली चमकीली सी थी?’’

‘‘खैर, अब बहुत ज्यादा बनिए नहीं,’’ उस ने अपनी कमर की तरफ बढ़ते मेरे हाथ को पकड़ कर कहा, ‘‘तुम्हारे साथ उस का हर वक्त उठनाबैठना था. तुम उस के साथ कुछ ज्यादा ही बातें नहीं करते थे बल्कि उसे अपने नोट्स भी देते थे.’’

‘‘इस बात को 7-8 साल का अरसा हो गया है और मैं बहुत सारी पुरानी बातें भूल चुका हूं.’’ मैं ने गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘सनोवर से तुम्हारी मुलाकात कहां हो गई? इतने अरसे तक वह कहां गायब रही?’’

‘‘उस से कल मेरी मुलाकात जौहरी बाजार में हो गई थी.’’

‘‘वह तुम्हारी सब से प्यारी सहेली थी,’’ मैं बोला, ‘‘मगर अब नहीं रही. उस ने 7-8 बरसों में भूल कर भी तुम्हारी खबर नहीं ली. ऐसी बेवफा सहेली के यहां तुम किस लिए जा रही हो?’’

‘‘वह शादी के बाद अपने शौहर के साथ लंदन चली गई थी. करीब 3 साल पहले ही वापस आई है.’’

‘‘उस की शादी शायद कदूस से हुई थी,’’ मैं ने उसे याद दिलाया, ‘‘कदूस भी हमारा हमजमात और अच्छे दोस्तों में था. उस ने एक शहर में रहते हुए कभी मिलने की कोशिश नहीं की. दोनों मियांबीवी बड़े खुदगर्ज निकले.’’

‘‘तुम उन दोनों को तो इलजाम दे रहे हो, मगर जरा खुद भी तो सोचो कि तुम या मैं कितनी बार उन के यहां गए हैं.’’

‘‘तुम सच कहती हो.’’ कह कर मैं ने बात खत्म कर दी.

मैं सरोवर का सामना नहीं करना चाहता था, इसलिए कि मैं उस की मोहब्बत का मुजरिम था. मैं सोच रहा था कि सनोवर से जब सामना होगा, नजरें मिलेंगी तो निगाहों की जुबान न जाने कितने शिकवेशिकायतें करेंगी. क्या मेरे पास कोई जवाब होगा? क्या मैं उस के किसी सवाल का जवाब दे सकूंगा? उस से नजरें मिला सकूंगा? क्या मैं इस काबिल हूं कि उस के सामने जा सकूं?

मैं ने सिगरेट खरीदने के बहाने गाड़ी अचानक पान की दुकान के सामने रोक दी, इसलिए कि मेरे खयालों में सनोवर का चेहरा बारबार लहराने लगा था. दोएक बार मुझ से एक्सीडेंट होतेहोते रह गया था. मैं ने सिगरेट खरीदते वक्त सोचा कि जोहरा से कहूंगा कि वह गाड़ी चलाए. लेकिन मुझे यह कहने की नौबत नहीं आई. वह मेरे कहने से पहले ही स्टीयरिंग पर बैठ गई थी. मैं गाड़ी में बैठा तो उस ने इंजन स्टार्ट करते हुए कहा, ‘‘तुम आज गाड़ी बहुत बेतुके ढंग से चला रहे हो. 2 बार एक्सीडेंट होतेहोते बचा है. लगता है, तुम्हारा दिमाग कहीं और है, नजरें कहीं और…’’

‘‘तुम जो मेरे पास कयामतखेज हुस्न के साथ बैठी हो, उस की वजह से मैं किसकिस को काबू में रखूं?’’

‘‘आज तुम बहुत ज्यादा खुशामदाना बातें कर रहे हो. खैरियत तो है?’’ उस ने कातिल नजरों से मेरी ओर देखा.

मैं ने उस की बात को हंस कर टाल दिया. आदमी अपनी पहली मोहब्बत को कभी भुला नहीं सकता. मैं भी वह दिन नहीं भूला, जिस दिन मैं ने सनोवर के कदमों में अपना दिल रख दिया था. हम दोनों ने अपनी मोहब्बत का राज किसी पर जाहिर नहीं किया था. एकदूसरे से चुपकेचुपके मोहब्बत करते थे और चोरीछिपे मिलते थे. फाइनल इम्तिहान के बाद एक दिन सनोवर का टेलीफोन आया, ‘‘क्या तुम आज शाम मुझ से अजीज पार्क में मिल सकते हो?’’

मैं अजीज पार्क में पहुंच गया था उसे लेने के लिए. करीब ही मेरे दोस्त का एक फ्लैट था. वह 10 दिन के लिए अपनी बीवी को ले कर सैर पर गया था. फ्लैट की चाबी मेरे पास छोड़ गया था. मैं सनोवर को साथ ले कर उस फ्लैट पर पहुंचा था. फ्लैट में कदम रखते ही वह मेरे सीने पर सिर रख कर बिलख पड़ी थी. फिर फूटफूट कर रोने लगी. मैं हैरानपरेशान हो रहा था कि बात क्या है. मैं ने उस के बालों को सहलाया. उस से पूछा तो उस ने मेरे सीने को अपने आंसुओं से भिगो दिया. बड़ी मुश्किल से उस ने अपने आंसुओं और जज्बात पर काबू पाया. मैं खामोश खड़ा उस की तरफ देखता रहा, फिर पूछा, ‘‘क्या बात है सनोवर? तुम इतनी परेशान क्यों हो?’’

‘‘हमारी मोहब्बत की आजमाइश का वक्त आ गया है,’’ उस की आवाज भर्रा सी गई, ‘‘अब क्या होगा?’’

मैं अच्छी तरह से समझ गया था कि वह क्या कहना चाहती थी. उस ने जो इशारा किया था, वह साफ था. इधर मैं और जोहरा कुछ दिनों से एकदूसरे में दिलचस्पी लेने लगे थे. मेरा दिल सनोवर से कुछ भर सा गया था. शायद इसलिए भी कि हम तनहाई में कई बार मिले थे, मोहब्बत भरी बातें भी की थीं. उस ने मुझे अपने घर वालों की कमजोर माली हालात के बारे में बहुत कुछ बता दिया था. मैं ने उसे तसल्ली दी थी, ‘‘हमारी मोहब्बत हर आजमाइश में पूरी उतरेगी.’’

‘‘कदूस का रिश्ता आया है. वह मुझ से एक महीने के अंदरअंदर शादी करना चाहता है, इसलिए कि वह लंदन जाने वाला है.’’

‘‘कदूस का रिश्ता आया है?’’ मैं हैरत और खुशी से उछल पड़ा. मुझे यकीन नहीं आया, इसलिए कि जोहरा और कदूस एकदूसरे के गहरे मित्र थे. मेरा क्या, सनोवर और तमाम हमजमातों का खयाल था कि वे दोनों मोहब्बत करते थे. जोहरा की तरफ से निराश हो कर ही मैं सनोवर की तरफ झुका था.

इधर जोहरा से मेरी मुलाकातें होने लगी थीं. मेरा खयाल था कि वह चूंकि बड़े घराने और फ्री सोसाइटी की लड़की है और मैं लौन टेनिस का मशहूर खिलाड़ी हूं, इसलिए वह मुझ से मिलती है. सनोवर ने मुझे बहुत बड़ी खुशखबरी सुनाई थी. मैं ने अपनी खुशी को हैरत के नीचे दबाते हुए कहा, ‘‘यह कैसे हो सकता है सनोवर? कदूस मोहब्बत जोहरा से करे और शादी तुम से करने के लिए अपना रिश्ता भेजे? नामुमकिन.’’

‘‘शायद जोहरा और उस के घर वालों ने कदूस का रिश्ता कबूल करने से इनकार कर दिया हो.’’ सनोवर बोली.

‘‘जोहरा अगर कदूस से मोहब्बत करती है तो इनकार का सवाल ही पैदा नहीं होता. और फिर कदूस कोई ऐरागैरा नहीं है. वह एक ऐसा नौजवान है, जिस के सामने यकीनी तौर पर उज्जवल भविष्य है. उस का खानदान भी हर लिहाज  से बड़ा है.’’

‘‘जोहरा की बात छोड़ो, मेरी बात करो.’’ वह जख्म खाए लहजे में बोली, ‘‘कदूस में इतनी खूबियां हैं तो क्या मेरे मांबाप मेरा रिश्ता देने से इनकार कर देंगे? हरगिज नहीं. वे उस के बारे में रस्मी तौर पर जांच कर रहे हैं. 4-5 दिनों में जवाब देने वाले हैं.’’

‘‘मुझे उम्मीद नहीं है कि तुम्हारा उस से रिश्ता हो जाए.’’ मैं ने अपना खयाल जाहिर किया.

‘‘क्यों?’’ उस ने मेरे सीने से अपना सिर उठा कर मेरी आंखों में झांका तो उस की आंखों में शदीद हैरानी थी, ‘‘क्यों नहीं कबूल करेंगे? एक तरह से मेरे घर वाले तैयार हो गए हैं. क्या तुम्हारे वालिद के पास 2-3 लाख रुपए हैं?’’

‘‘कदूस ने किसी चीज की मांग नहीं की है. उस ने कहा है कि उसे किसी दहेज की जरूरत नहीं है.’’

‘‘यह कदूस कब से इतने ऊंचे खयालात का मालिक हो गया?’’

‘‘मेरा खयाल है कि वह जोहरा से इंतकाम लेने के लिए मुझ से शादी कर रहा है. मैं चाहती हूं कि तुम कल ही अपने घर वालों को मेरे यहां भेजो. दहेज की शर्त न रखो तो बात बन जाएगी. मैं कदूस से शादी करने से इनकार कर दूंगी.’’

वह फिर मेरे सीने से लग गई. मैं जोहरा के बारे में सोचने लगा. जोहरा सनोवर से कहीं ज्यादा हसीन थी. उस का रंग भी दूध की तरह उजला था. सब से बढ़ कर तो यह बात थी कि वह एक दौलतमंद घराने की लड़की थी. मुझे दहेज में हर चीज मिल सकती थी और साथ ही उस के डैडी मुझे अच्छी नौकरी भी दिला सकते थे. सनोवर से मैं मोहब्बत तो कर सकता था, पर शादी नहीं.

‘‘मेरे घर वाले इतनी जल्दी मेरी शादी करने पर शायद ही तैयार हों,’’ मैं ने बहाना पेश किया, ‘‘इसलिए कि मैं अब तक रोजगार वाला नहीं हुआ हूं और फिर मेरी छोटी बहन की शादी भी होनी है. क्या तुम्हारे घर वाले

2-1 साल तक रुक नहीं सकते?’’

सनोवर फिर रोने लगी थी. वह मुझे हर कीमत पर पाना चाहती थी और मैं था कि उसे खूबसूरती से टाल देना चाहता था. मैं ने उसे अपने बाजुओं के घेरे में कैद कर के कहा, ‘‘सनोवर, अगर तुम यह समझती हो कि मेरी मोहब्बत में कोई खोट है और मुझे आजमाना चाहती हो तो आजमा सकती हो. कहो तो मैं इस फ्लैट की बालकनी से छलांग लगा कर जान दे सकता हूं. खुदकुशी कर सकता हूं. कदूस को कत्ल कर सकता हूं, मगर तुम से शादी नहीं कर सकता, इसलिए कि मजबूरियां मेरी राह में रुकावट बनी हुई हैं.’’

‘‘तुम कत्ल कर सकते हो, अपनी जान दे सकते हो, मगर मुझ से शादी नहीं कर सकते? तुम यह क्यों नहीं कहते कि तुम मुझ से शादी करना ही नहीं चाहते? तुम्हें मुझ से मोहब्बत नहीं रही है. तुम्हारा दिल मुझ से भर चुका है.’’

‘‘तुम मेरी मोहब्बत पर, मुझ पर इलजाम लगा रही हो?’’ मैं ने उसे अपने सीने से अलग करते हुए कहा, ‘‘मैं बालकनी से छलांग लगाने जा रहा हूं, ताकि तुम्हें मेरी मोहब्बत का यकीन आ जाए.’’

मैं उसे एक तरफ हटा कर बालकनी की तरफ बढ़ने लगा तो उस ने लपक कर मेरा बाजू पकड़ लिया. वह भयभीत हो कर बोली, ‘‘नहीं एयाज, नहीं. मुझे माफ कर दो. मैं जज्बात की रौ में बह कर न जाने क्या कुछ कह गई. प्लीज, मुझे माफ कर दो.’’

वह फिर रोने लगी. उस की हिचकियां बंध गईं. मैं उसे काफी देर तक समझाता रहा. एक घंटे के बाद वह फ्लैट से निकली तो कदूस से शादी के लिए तैयार हो गई थी. उस ने रुखसत होते वक्त मुझ से कहा था कि वह कभी भी इस मोहब्बत को भुला नहीं सकेगी. तीसरे दिन मुझे कदूस मिला तो उस ने बताया कि उस ने न तो जोहरा से कभी मोहब्बत की और न ही शादी के बारे में कभी सोचा. वह चूंकि एक हसीन लड़की थी, इसलिए उस का साथ उसे अच्छा लगता था. वह तो सनोवर को पहले दिन से पसंद करता रहा था, मगर कभी उस ने उस पर अपनी मोहब्बत जाहिर नहीं की थी.

कोई 20 दिनों के बाद सनोवर और कदूस की शादी हो गई. उस के एक महीने बाद जोहरा से मेरी शादी भी हो गई. जोहरा को पा कर मैं बहुत खुश था, इसलिए कि वह अपने साथ दहेज में एक मकान और गाड़ी भी लाई थी. फिर मुझे जोहरा के वालिद की सिफारिश पर एक बड़ी फर्म में आलातरीन ओहदा मिल गया था. अब मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं थी. मैं एक हसीन और जवान दौलतमंद औरत का शौहर था.

3 साल पर लगा कर उड़ गए. फिर मैं महसूस करने लगा कि एक मर्द को महज औरत के शबाब की तलब ही नहीं होती, वह औरत से और भी बहुत कुछ चाहता है. मैं जो कुछ चाहता था, वह जोहरा मुझे न दे सकी थी. वह बीवी नहीं, महबूबा थी, दोस्त थी.

मैं ने उसे इशारों में बहुत कुछ समझाने की कोशिश की. उस ने या तो नहीं समझा, या समझा तो नजरअंदाज कर गई. मैं ज्यादती नहीं कर सकता था, इसलिए कि मुझे जो कुछ मिला था, वह सब उसी की बदौलत था. मैं ने हालात से समझौता कर लिया. फिर वह तिलिस्म टूटने लगा, जिस का मैं कैदी था. उजली और साफ रंगत, हुस्न और जिस्मानी कशिश का जोर टूटने लगा. मुझे सनोवर की याद आ जाती. मैं सनोवर से शादी कर लेता तो शायद वह सब मिल जाता, जो एक शौहर चाहता है.

कदूस के घर के सामने गाड़ी रुकी तो मैं ने उस घर की तरफ देखा. वह एक घर था, मामूली सा. जोहरा ने मुझे रास्ते में बताया था कि यूके से वापसी के बाद कदूस को बहुत अच्छा जौब नहीं मिल सका. घंटी बजाने के चंद लम्हे बाद दरवाजा खुला तो नजरों के सामने कदूस था. हम दोनों एकदूसरे से बड़ी गर्मजोशी से बगलगीर हो गए. कदूस मेरा हाथ पकड़ कर अंदर ले गया. मेरे पीछेपीछे जोहरा थी. घर में दाखिल होते ही मेरी अजीब सी कैफियत हुई. उस घर की फिजा में एक ऐसी महक थी, जो सिर्फ और सिर्फ औरत के वजूद से फूटती है. ऐसी महक मेरे घर की फिजा में क्यों नहीं है? आखिर मेरे घर में भी तो एक औरत रहती है. मेरा घर भी खुशबुओं में बसा रहता है, मगर वे खुशबुएं तो बाजार से खरीदी हुई होती हैं.

बैठक में सनोवर अपने बच्चों के साथ हमारे स्वागत के लिए खड़ी थी. हम दोनों की निगाहें चार हुईं. मेरा खयाल था कि वह मुझे देख कर शायद अपने जज्बात पर काबू न पा सके, मगर उस की आंखों में कुछ नहीं था. उस का चेहरा कोरे कागज की तरह नजर आ रहा था. वह इस तरह मिली, जैसे पहली बार मिल रही हो.

मैं यह सोचे बगैर न रह सका कि क्या उस के दिल के किसी कोने में मेरी तस्वीर नक्श नहीं है? क्या ऐसा मुमकिन है कि औरत अपनी पहली मोहब्बत को भुला दे? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह औरों के सामने अपनी मोहब्बत का इजहार न करना चाहती हो? औरत से बड़ा अदाकार कौन हो सकता है?

‘‘क्या तुम पार्टी में नहीं चल रही हो?’’ जोहरा ने हैरत से पूछा, ‘‘तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?’’

‘‘मैं पार्टी में चल रही हूं और तैयार हूं.’’ सनोवर ने मुसकरा कर जवाब दिया.

‘‘ऐं! इस हालत में?’’ जोहरा ने उसे नीचे से ऊपर तक हैरानी से देखा.

सनोवर गुलाबी रंग की साड़ी और उसी रंग का ब्लाउज पहने थी. उस के चेहरे पर मेकअप बिलकुल नहीं था. उस ने अपने लंबे, स्याह बालों का जूड़ा बांध रखा था. गले में मोतियों का एक हार और कानों में टौप्स थे. वह सादगी की मूरत बनी हुई थी. दूसरी तरफ जोहरा ब्यूटीपार्लर से सज कर आई थी. उस ने गहरे भूरे रंग की साड़ी और बगैर आस्तीन का नीची तराश का ब्लाउज पहना हुआ था. वह उस लिबास में अपने हुस्न और बदन की नुमाइश कर रही थी. मैं ने उन दोनों की तुलना की. मुझे जोहरा के मुकाबले सनोवर कहीं ज्यादा हसीन लगी. उस की सादगी के आगे जोहरा का हुस्न हलका पड़ गया था.

फिर सनोवर का कोई एक रूप नहीं था. उस का हर रूप अपने अंदर दिलकशी लिए हुए था. एक रूप तो ऐसी औरत का, जो घर की चारदीवारी में अपने आप को खुश और संतुष्ट महसूस करती है. दूसरा रूप एक वफादार बीवी का था. वह जब भी अपने हमसफर की तरफ देखती, उस की आंखों में मोहब्बत का नूर फैला हुआ होता था. उस की मोहब्बत और नजरें जैसे सिर्फ कदूस की अमानत हों. उस ने एक बार भी मेरी तरफ मोहब्बत भरी नजर से नहीं देखा था. उस ने जब भी मुझ से कोई बात की, या मेरी तरफ देखा तो एक अजनबी औरत की तरह. सनोवर एकदम से बदल जाएगी, मैं ने सोचा भी नहीं था.

उस का तीसरा रूप एक मां का था. उस के 2 प्यारेप्यारे बच्चे थे. उन बच्चों से उस घर में रौनक थी और वे उस गुलशन के महकते हुए फूल थे. मेरे भी दिल में बाप बनने की ख्वाहिश मौजूद थी. लेकिन जोहरा ने मुझ से कह दिया था कि वह 10 सालों तक मां बनने के बारे में सोच भी नहीं सकती. वह पहले जिंदगी के मजे लेना चाहती थी, इसलिए उसे बच्चों का झंझट पसंद नहीं था. बहरहाल, सनोवर के अनगिनत रूप थे. उस का हर रूप इतना हसीन था कि मुझे एक पछतावा सा हो रहा था और कदूस पर रश्क आ रहा था कि उसे कैसा अनमोल मोती मिल गया था.

पार्टी से वापसी पर जब हम ने उन्हें उन के घर छोड़ा तो उन्होंने रस्मी तौर पर किसी रोज घर आ कर खाना खाने की दावत दी. जोहरा बोली, ‘‘हम किसी रोज अचानक आ जाएंगे और चल कर किसी होटल में डिनर लेंगे.’’

‘‘होटल में क्यों? मैं घर पर ही खाना बना लूंगी.’’ सनोवर ने जवाब दिया.

‘‘घर पर क्या खाक लुत्फ आएगा?’’ जोहरा बोली, ‘‘होटल में तो पसंद की बहुत सारी डिशें मिल जाती हैं.’’

‘‘मैं तुम्हें तुम्हारी पसंद की सारी डिशें पका कर खिलाऊंगी.’’

एक दिन जोहरा उस का इम्तिहान लेने के लिए उस के यहां पहुंच गई. उस ने मुर्ग बिरियानी, कोरमा, शामी कबाब और पुडिंग की फरमाइश कर दी. सनोवर खाना पकाने में जुट गई. वह बावर्चीखाने में अकेली ही सारा काम कर रही थी. मैं, जोहरा और कदूस बैठक में बैठे टीवी पर सीरियल देख रहे थे और बातें भी करते जा रहे थे. जोहरा एक बार भी उठ कर बावर्चीखाने में नहीं गई. वह घर में भी बावर्चीखाने में झांकती तक नहीं थी. मेरे घर में नौकर थे, जो चाय तक बना कर देते थे. मैं चाहता था कि जोहरा बावर्चीखाने में जा कर उस का हाथ न बंटाए, मगर बातें तो करे. फिर मुझे खयाल आया कि वह जा भी कैसे सकती है? बावर्चीखाने में कदम रखेगी तो उस का मेकअप गरमी से खराब हो जाएगा और उस के लिबास पर दागधब्बे भी तो पड़ सकते हैं. उसे हर वक्त अपने मेकअप और लिबास का खयाल जो रहता है.

खाने में चूंकि देर थी, इसलिए सनोवर चाय बना कर ले आई. वह पसीने से नहाई हुई थी. पसीने के साफ व शफ्फाक कतरे उस की सुराहीदार गरदन और चेहरे पर मोतियों की तरह दमक रहे थे. वह ट्रे तिपाई पर रख कर चाय बनाने के लिए बैठ गई. उस ने चाय बनाने से पहले साड़ी के पल्लू से गरदन और चेहरे पर से पसीना पोंछा. मुझे उस का यह रूप भी बहुत भाया.

आदमी की किस्मत उस के पसीने ही से लिखी होती है—जिस ने भी यह बात कही है, गलत नहीं कही. उस घर में जो रौनक, हुस्न और खुशबू थी, वह उसी पसीने की बदौलत ही थी.

जोहरा ने सरोवर की तरफ देखते हुए कदूस से कहा, ‘‘आप मेरी सहेली पर बहुत जुल्म कर रहे हैं.’’

‘‘कैसा जुल्म?’’ कदूस ने चौंक कर जोहरा की तरफ देखा, ‘‘क्या कोई अपनी बीवी पर जुल्म भी कर सकता है?’’

‘‘यह जुल्म नहीं तो और क्या है? घर में एक भी नौकर नहीं है,’’ जोहरा कहने लगी, ‘‘सनोवर न सिर्फ सारा दिन बावर्चीखाने में अकेली काम करती है, बल्कि दूसरे तमाम कामकाज भी खुद ही करती है. वह 2 बच्चों को भी संभालती है. इसी वक्त देखिए, पसीने में किस बुरी तरह भीग गई है. आप इस गरीब के लिए दो-एक नौकर भी नहीं रख सकते? हमें देखिए. हम सिर्फ मियांबीवी हैं, पर घर में 3 नौकर हैं, एक नौकरानी भी.’’

‘‘मैं ने कभी सनोवर को नौकर रखने से मना नहीं किया, बल्कि उस से कितनी बार कहा है कि कोई नौकर रख लो. मगर यह मेरी बात सुनती ही नहीं है.’’

‘‘जिस घर में औरत हो, उस घर में नौकर का क्या काम?’’ सनोवर ने प्यालियों में चाय उड़ेलते हुए कहा, ‘‘औरत अगर घर का काम नहीं करेगी तो फिर क्या करेगी? मेरे खयाल में एक औरत को सब से ज्यादा खुशी घर के कामकाज और शौहर की खिदमत से होती है.’’

‘‘गरमी और पसीने से तुम्हारा दम नहीं घुटता?’’ जोहरा ने ताज्जुब से पूछा.

‘‘इस पसीने से तो बदन हलका हो जाता है और एक ताजगी आ जाती है.’’ सनोवर ने जवाब दिया.

‘‘हिश…’’ जोहरा बोली, ‘‘तुम क्या से क्या हो गई हो?’’

‘‘मैं औरत हो गई हूं,’’ सनोवर हंस पड़ी, ‘‘और तुम बेगम साहिबा हो गई हो. इसलिए तुम्हें यह सब कुछ अजीब लग रहा है.’’

सनोवर के यहां से निकल कर घर वापस आते समय जोहरा बोली, ‘‘सनोवर शुरू से ही कंजूस रही है और फिर उन के माली हालात भी शायद अच्छे नहीं हैं. इसलिए वह नौकर नहीं रख रही है. आजकल नौकर भी तो खूब पैसे लेते हैं.’’

‘‘कदूस की तनख्वाह बहुत अच्छी है. वह मुझे बता रहा था कि नौकरी छोड़ कर कोई कारोबार शुरू करने वाला है,’’ मैं बोला, ‘‘सनोवर दरअसल एक घरेलू औरत बन गई है. देखो न, उस ने खाना भी कितना अच्छा और लजीज पकाया था. वह एक अच्छी बावर्चिन भी है.’’

जोहरा मेरी तरफ देख कर बोली, ‘‘तुम आज भी दकियानूसी के दकियानूसी ही हो.’’

सनोवर के यहां हमारा आनाजाना कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. मैं किसी न किसी बहाने जोहरा को उस के यहां ले जाता था. सनोवर और कदूस मेरे यहां सिर्फ एक बार आए थे. मैं सनोवर के यहां इसलिए भी जाने लगा था कि उस के बच्चे मुझ से बहुत हिलमिल गए थे. मैं चाहता था कि जोहरा के दिल में भी बच्चों की ख्वाहिश जाग उठे.

मालूम नहीं, एक दिन मुझे क्या हुआ. मैं दफ्तर से निकल कर न चाहते हुए भी सनोवर के घर की तरफ चल पड़ा, यह जानते हुए कि घर पर कदूस नहीं होगा. मैं सनोवर से बहुत सारी बातें करना चाहता था.

सनोवर मुझे देख कर हैरान सी हुई. मुझे अंदर बिठाने में उसे दुविधा हो रही थी. फिर भी मुझे बैठक में बिठाया तो उस ने किसी अजनबी औरत की तरह मेरी तरफ सवालिया नजरों से देखा, ‘‘क्या आप को उन से कुछ काम था?’’

‘‘मैं आज तुम से कुछ बातें करना आया हूं सनोवर.’’ मैं ने कहा.

‘‘मैं आप की सनोवर नहीं, कदूस की बीवी, उन के बच्चों की मां और इस घर की मालकिन हूं.’’ उस ने तेज लहजे में जवाब दिया.

‘‘मैं तुम्हें वही समझता हूं, जो तुम ने कहा है. मैं पुराने जख्म ताजा करने नहीं आया हूं.’’

‘‘फिर किसलिए आए हो?’’

‘‘मैं तुम से वह बात कहने आया हूं, जो किसी और से कह नहीं सकता हूं,’’ मैं ने टूटे हुए लहजे में कहा, ‘‘मेरे दिल को सुकून उसी वक्त मिल सकता है, जब मैं अपनी गलती को कबूल कर लूं.’’

‘‘मगर मैं सुन कर क्या करूंगी? मेरे दिल में तो सिर्फ कदूस की तसवीर नक्श है,’’ वह बोली, ‘‘क्या आप जोहरा जैसी हसीन और अमीर औरत को पा कर खुश नहीं हैं?’’

‘‘मुझे एक औरत कहां मिली है सनोवर?’’ मैं ने एक सर्द आह भरी, ‘‘बकौल तुम्हारे एक बेगम साहिबा, महबूबा और मौडल गर्ल मिली है. मुझे तो तुम जैसी औरत की तलाश थी. मैं ने तुम्हें खो कर बहुत बड़ी सजा पाई है. उस का खामियाजा आज तक भुगत रहा हूं. क्या तुम मुझे माफ कर सकोगी कि मैं ने जोहरा को पाने के लिए तुम से झूठ बोला, तुम्हें धोखा दिया.’’

‘‘मैं ने आप को उसी रोज माफ कर दिया, जिस रोज मैं कदूस की हो गई. उस रोज से न तो मैं ने कभी पीछे पलट कर देखा और न आप को याद किया. आप आइंदा कभी मुझ से इस बारे में बात न करें.’’

मैं थोड़ी देर के बाद उस के वहां से निकला तो मेरे दिलोदिमाग फूल की तरह हलके हो गए थे. सीने पर जो बोझ था, वह हट गया था.

मैं घर पहुंचा तो कदूस की गाड़ी कोठी के अहाते में खड़ी देखी. मेरे दिल में शिकस्त की लहर ने सिर उठाया. क्या वह मेरी गैरमौजूदगी में जोहरा से मिलने आता रहता है? जोहरा ने कभी मुझ से कदूस के आनेजाने के बारे में नहीं बताया. जोहरा उस से यकीनन मिलती होगी. कदूस ने मुझ से शादी से पहले झूठ कहा था कि उसे जोहरा से कभी मोहब्बत नहीं थी. उस की किसी वजह से जोहरा से शादी न हो सकी तो उस ने सनोवर से शादी कर ली. आज उन की मोहब्बत जाग उठी है.

दोनों बैठक में मौजूद थे. मैं दूसरे रास्ते से अपने बैडरूम में गया. अलमारी से पिस्तौल निकाल कर दबे पांव बैठक की तरफ बढ़ा. मैं दरवाजे के पास पहुंच कर रुक गया. कदूस अजीब से लहजे में कह रहा था, ‘‘मैं सनोवर से शादी कर के पछता रहा हूं. वह दकियानूसी औरत है. उसे घर, शौहर और बच्चों के सिवा किसी और चीज में दिलचस्पी नहीं है. न कपड़े पहनने का, न तफरीह और पार्टियों का. वह कहती है कि औरत का बनावसिंगार उस के शौहर के लिए होता है, न कि दुनिया वालों के लिए. मुझे तो तुम दोनों पर रश्क आता है, जो बेफिक्री की जिंदगी गुजार रहे हो. न बच्चे, न झमेले. होटलों में खाना. दावतों में शिरकत करना. एयाज बड़ा खुशनसीब है कि उसे तुम जैसी बीवी मिली.’’

यह सब सुन कर मैं उलटे पांव बैडरूम में लौट गया और पिस्तौल वापस अलमारी में रख दी. फिर सामने के दरवाजे से बैठक में चला गया. अजीब बात थी कि अब मुझे जोहरा से शिकायत नहीं रह गई थी.

Hindi Crime Stories: पप्पू बन गया डौन

Hindi Crime Stories: अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिताने वाले आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू को कुछ मौकापरस्त नेताओं ने बंदूक उठाने को मजबूर किया था, आज वही नेता उस से खौफ खा रहे हैं और सरकार से उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं.

3 सितंबर, 2015 को राजस्थान के जिला नागौर की डीडवाना कोर्ट में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू के खिलाफ चल रहे नानूराम हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. उसे 15 सदस्यीय पुलिस टीम अजमेर जेल से डीडवाना ले कर आई थी. उस के 2 साथी श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड भी उस के साथ थे. कोर्ट में वैसे भी भारी संख्या में पुलिस तैनात रहती थी, लेकिन उस दिन रोज की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही पुलिस तैनात की गई थी.

फैसले की घड़ी आई तो कोर्ट में सन्नाटा छा गया. लेकिन माननीय जज ने सबूतों के अभाव में आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को इस केस से बरी कर दिया था. इस के बाद कोर्ट में मौजूद आनंदपाल सिंह के समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे इतने खुश हुए कि मिठाई मंगा कर न्यायालय परिसर में ही बांटने लगे. वे जो मिठाई बांट रहे थे, उस में से कुछ में उन्होंने नींद की दवा मिला दी थी, जिसे उन्होंने कमांडो सहित वैन में सवार उन 15 पुलिसकर्मियों को खिला दी, जो आनंदपाल सिंह को अजमेर जेल से लाए थे. लेकिन वैन के ड्राइवर को उन्होंने वह नींद की दवा वाली मिठाई नहीं दी थी.

मिठाई खाने के बाद पुलिस वालों ने आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को पुलिस वैन में बिठाया और अजमेर की ओर चल दिए. थोड़ी दूर जाने के बाद पुलिस वालों को नींद आने लगी. पुलिस वालों को ऊंघते देख आनंदपाल सिंह मंदमंद मुसकराया. उसे लगा कि अब उस की योजना सफल होने वाली है. पुलिस वैन जब डीडवाना और परवतसर के बीच गांगवा गांव के पास पहुंची तो सामने से सफेद रंग की एक जीप पुलिस की गाड़ी के सामने इस तरह आ कर रुकी कि पुलिस की गाड़ी आगे न निकल सके.

उस जीप से कुछ लोग उतर कर पुलिस वैन की तरफ लपके. पुलिस टीम जब तक कुछ समझ पाती, जीप में आए लोगों ने गोलियां दागनी शुरू कर दीं. नशीली दवा मिली मिठाई खाने से पुलिसकर्मी अर्धबेहोशी की हालत में थे, इसलिए वे उन का विरोध नहीं कर सके. उन लोगों ने पुलिस पर एके47 जैसे आधुनिक हथियारों से हमला किया था, जिस से 2 कमांडो और ड्राइवर शंभू सिंह घायल हो गए. पुलिस पर हमला कर के वे लोग आनंदपाल सिंह, श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड को पुलिस कस्टडी से छुड़ा ले गए. नशे की हालत में भी परवतसर थानाप्रभारी अनिल पांडे ने जवाबी फायरिंग की थी. एक गोली आनंदपाल सिंह के पैर में लगी थी. घायल आनंदपाल के साथी उसे गाड़ी में बिठा कर ले गए थे.

आनंदपाल सिंह कोई छोटामोटा बदमाश नहीं था. उस पर हत्या, फिरौती, गैंगवार जैसे संगीन मामलों के 28 मुकदमे दर्ज थे. दहशत के पर्याय बने इस बदमाश के अपने 2 साथियों के साथ फिल्मी स्टाइल में पुलिस कस्टडी से फरार होने पर पुलिस अधिकारियों के हाथपैर फूल गए. प्रदेश स्तर के पुलिस अधिकारियों तक जब इस कुख्यात बदमाश के फरार होने की खबर पहुंची तो तुरंत पूरे प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया. नागौर और आसपास के जिलों में नाकाबंदी कर दी गई. हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश से लगती राजस्थान की सीमाओं को भी सील कर दिया गया. मगर आनंदपाल और उस के दोनों साथी पुलिस के हाथ नहीं लगे.

न्यूज चैनलों पर आनंदपाल सिंह के फरार होने बहस होने लगी, पुलिस की निष्क्रियता से संबंधित खबरें चलने लगीं. जो राजनीतिज्ञ आनंदपाल के निशाने पर थे, खौफ खाने लगे. अपनी हिफाजत के लिए वे पुलिस की शरण में जा पहुंचे. उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि कहीं आनंदपाल सिंह उन्हें मार न दे. बदमाशों की गोली से घायल और नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश पुलिसकर्मियों को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में भरती करा दिया गया था. मीडिया इसे पुलिस की मिलीभगत बता रही थी. उस का कहना था कि 3 सितंबर, 2015 को पुलिस जब आनंदपाल को अजमेर जेल से डीडवाना लाई थी तो कई बदलाव किए गए थे. उस की सुरक्षा में केवल 15 पुलिसकर्मी ही तैनात थे, जिस में केवल 2 ही कमांडो थे.

जबकि इस के पहले जब भी आनंदपाल को पेशी पर लाया जाता था, 30 पुलिसकर्मियों के साथ एक दरजन कमांडो तैनात होते थे. आखिर इस बार उस की सुरक्षा में कमी क्यों की गई? इस पर सवाल उठ रहे थे. पुलिस की जो टीमें आनंदपाल की तलाश में लगी थीं, वे इस बात की भी जांच कर रही थीं कि पिछले दिनों आनंदपाल से जेल में मिलने कौनकौन आया था. लेकिन पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इतना खूंखार अपराधी जेल में मोबाइल और फेसबुक कैसे चला रहा था? और तो और पेशी के दौरान अदालत में भी आनंदपाल से संदिग्ध लोग मिलते रहते थे.

वह जेल से ही अपना गिरोह चला रहा था. सब कुछ जानते हुए भी पुलिस उस से कुछ नहीं कहती थी. वह बीकानेर जेल में था, तब उस के पास बंदूक तक पहुंच गई थी. यह जेल प्रशासन की मिलीभगत के बिना कैसे संभव हो सकता था. इस से साफ लगता है कि आनंदपाल को जेल में खुली छूट मिली थी. कुछ महीने पहले आनंदपाल का छोटा भाई रूपेंद्र सिंह चुरू जेल से पैरोल पर बाहर आया तो ऐसा गायब हुआ कि पुलिस उसे आज तक नहीं खोज पाई है. आनंदपाल या उस की गैंग के सदस्यों को पेशी पर लाने और वापस जेल तक ले जाने के दौरान पुलिस की गाडि़यां एस्कौर्ट करती थीं, इस के अलावा संबंधित थानों की पुलिस भी रास्ते की पहले से मौनिटरिंग करती थी. उन रास्तों पर नाकाबंदी भी रहती थी. अगर 3 सितंबर को भी इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था होती तो आनंदपाल को छुड़ाने आए बदमाश पहले ही कहीं न कहीं पकड़ लिए जाते.

आनंदपाल का इलाके में कितना प्रभाव था, इस का पता इसी बात से चलता है कि सन 2012 में जब वह गिरफ्तार किया गया था, तब उसे जब भी जेल से डीडवाना, चुरू, बीकानेर या नागौर की अदालतों में लाया जाता था, उस की गैंग के सदस्य निजी वाहनों से पुलिस वैन के आगेपीछे चलते थे. मीडिया द्वारा जब इस बात की जानकारी तत्कालीन एसपी लक्ष्मण गौड़ को हुई तो उन्होंने 2 वाहनों को पकड़ा. तब उन लोगों ने सफाई में कहा था कि उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे खुद आनंदपाल की सुरक्षा करते हैं.

जांच के बाद पुलिस अधिकारियों को पता चला है कि पुलिस जब भी आनंदपाल को जेल से कोर्ट लाती थी, पुलिसकर्मियों के लिए चायपानी और खानेपीने की व्यवस्था वही करता था. आखिर पुलिस उस पर आंख मूंद कर इस तरह विश्वास क्यों करती थी. मीडिया ने पुलिस पर यह भी आरोप लगाया है कि आनंदपाल के फरार होने के बाद भी पुलिस ने ढिलाई बरती. पुलिस के पास अत्याधुनिक हथियार थे, फिर भी आनंदपाल के साथी उसे ले उड़े. उस के फरार होने के करीब एक घंटे बाद पुलिस के बड़े अधिकारी सक्रिय हुए. आखिर ऐसा क्यों हुआ.

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी बड़े राजनेता ने अपने किसी दुश्मन को ठिकाने लगवाने के लिए पूरी योजना के तहत आनंदपाल सिंह को फरार कराया हो. बहरहाल आनंदपाल के फरार होने की कहानी किसी हिंदी फिल्म की कहानी जैसी है. जुर्म की दुनिया में कदम रखने के बाद आनंदपाल चंद सालों में दहशत का पर्याय बन गया था. जब उस ने अपराध की राह पर कदम रखा था, उस के पीछेपीछे उस के 2 छोटे भाई रूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह भी उसी राह पर चल पड़े थे. धीरेधीरे उस के पीछे करीब 300 गुंडों की फौज खड़ी हो गई थी. इस के बाद इन लोगों के कारनामों से आमजनों में खौफ पैदा हो गया तो दूसरे अपराधियों में जलन.

एकएक कर आनंदपाल के ऊपर हत्याएं, लूट, अपहरण और धमकाने के 28 मामले दर्ज हो गए. इस के अलावा तमाम मामले ऐसे थे, जिन की लोगों ने डर की वजह से रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई. आसपास के 5 जिलों में उस का एकछत्र राज स्थापित हो गया. उस के पास अत्याधुनिक हथियारों की खेप जमा हो गई. सन 2012 में जब आनंदपाल गिरफ्तार हुआ था तो उस के पास से एके 47 समेत 6 राइफलों के अलावा एक अमेरिकन कारबाइन और बुलेट प्रूफ जैकेट भी बरामद हुई थी. इस के गुर्गों बिजेंद्र ने भावता में हैडकांस्टेबल फैज मोहम्मद को जब गोली मारी थी, तब पुलिस ने उस के पास से एसएलआर बरामद की थी.

एसएलआर भारतीय सेना के पास होती है. कुचामन, डीडवाना, सीकर और चुरू जिलों में आनंदपाल का ऐसा खौफ था कि व्यापारी उस के नाम से ही फिरौती दे देते थे. इलाके में उस के गैंग का प्रभाव जमने से दूसरे बदमाश उस से दुश्मनी रखने लगे थे. राजू ठेहठ गैंग उस का सब से बड़ा विरोधी गैंग था. पिछले साल बीकानेर जेल में ठेहठ गैंग के लोगों ने आनंदपाल और उस के साथियों पर हमला कर दिया था. इस गैंगवार में आनंदपाल तो बच गया, लेकिन उस का दोस्त बलवीर बानूड़ा मारा गया. ठेहठ गैंग के भी 2 लोगों को गोली लगी थी. बाद में हमला करने वाले ठेहठ गैंग के 2 लोगों की आनंदपाल सिंह ने बीकानेर जेल में उन की ही पिस्तौल से हत्या कर दी थी.

हत्या के बाद आनंदपाल ने उन का सिर बड़े पत्थर से कुचल दिया था. इस घटना के बाद जेल में इतना खौफ पैदा हो गया था कि एक घंटे तक बीकानेर पुलिस भी जेल के अंदर नहीं गई थी. बाद में पुलिस ने काररवाई की थी. 3 साल जेल में रहने के बाद आनंदपाल जमानत पर बाहर आया तो उस ने 12 मार्च, 2015 को गैंगवार, धमकियों और आशंकाओं के बीच मीडिया के सामने बेबाक कह कर सब को चौंका दिया था कि राजनेता अपने फायदे के लिए गैंगवार कराते हैं. जेल में अपने दुश्मनों को मारने के बाद उस के बाहर के दुश्मनों में भी खौफ छा गया था. उन की सांसें हलक में अटक गईं. कौन जाने किस घड़ी आनंदपाल उन का काम तमाम कर दे.

नागौर के तत्कालीन एसपी राघवेंद्र सुहासा ने मई, 2015 में गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा था कि आनंदपाल व राजू ठेहठ खूंखार अपराधी हैं और दोनों में गैंगवार भी है. इसलिए इन के मामलों की सुनवाई वीडियो कौन्फे्रंसिंग के जरिए जेलों से ही करवाई जाए. मगर राजस्थान सरकार के गृह मंत्रालय ने एसपी राघवेंद्र सुहासा के पत्र को गंभीरता से नहीं लिया. आनंदपाल और उस के साथियों की ओर से दी गई नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश हुए 7 पुलिसकर्मियों को 7 सितंबर, 2015 को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. जबकि कमांडो शक्ति सिंह और ड्राइवर शंभू सिंह उपचाररत थे. जो पुलिसकर्मी अस्पताल से डिस्चार्ज हुए थे, उन्हें पूछताछ के लिए नागौर पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.

हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों से जांच अधिकारी ने अलगअलग पूछताछ की. उन्हें घटनास्थल पर भी ले जाया गया. अपने बचाव के लिए उन्होंने मनगढ़ंत कहानी गढ़ते हुए विरोधाभासी बयान दिए. जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दी. इस में सभी को दोषी माना गया है. आईजी मालिनी अग्रवाल ने चालानी गार्ड के तौर पर तैनात ड्राइवर शंभू सिंह, एसआई फूलचंद, कमांडो शक्ति सिंह, राजेंद्र सिंह, जगदीश शर्मा, अर्जुन राम, हरदीप, सुनील, गोपाल, सांवरमल, मुकेश, फोटोग्राफर राजेंद्र को सस्पेंड कर दिया है. इन में ड्राइवर शंभू सिंह के पैरों में और कमांडो शक्ति सिंह की जांघ में गोली लगी थी.

आईजी का कहना है कि प्रारंभिक तौर पर अपराधी की फरारी में इन्हें जिम्मेदार मानते हुए निलंबन की काररवाई की गई है. जांच के बाद इन्हें चार्जशीट दी जाएगी. इन की गिरफ्तारी भी हो सकती है. अगर इन का दोष साबित हो गया तो इन्हें नौकरी से भी बर्खास्त किया जा सकता है.

इस घटना को गंभीरता से लेते हुए 7 सितंबर को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने गृह विभाग एवं पुलिस अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिस में आनंदपाल सिंह की फरारी का मामला छाया रहा. मुख्यमंत्री ने पुलिस की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस आनंदपाल की गिरफ्तारी के लिए तेजी दिखाए. इस बैठक में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं मुखोपाध्याय, डीजीपी मनोज भट्ट सहित इंटैलीजेंस, जेल, कानून व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े अफसर मौजूद थे.

उधर विधायक हनुमान बेनीवाल ने सार्वजनिक निर्माण एवं परिवहन मंत्री यूनुस खान पर आरोप लगाया है कि उन के और आनंदपाल सिंह के बीच गहरे संबंध हैं. वही आनंदपाल का सहयोग करते रहे हैं. इस आरोप पर मंत्री यूनुस खान ने तुनक कर कहा कि उन के आनंदपाल से कोई संबंध नहीं हैं. वह सिर्फ उन के विधानसभा क्षेत्र डीडवाना का रहने वाला है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर हनुमान बेनीवाल इस का कोई सबूत ला दें तो वह राजनीति छोड़ देंगे. मंत्री यूनुस खान ने उलटा आरोप लगाया कि कुख्यात अपराधी आनंदपाल और विधायक हनुमान बेनीवाल में कोई अंतर नहीं है. बेनीवाल पर आनंदपाल सिंह की ही तरह हत्या, डकैती और लूटपाट के आरोप हैं. आनंदपाल की तरह बेनीवाल भी कई बार जेल जा चुके हैं.

बताया जाता है कि आनंदपाल की हिट लिस्ट में हनुमान बेनीवाल का भी नाम है. साथ ही श्रीगंगानगर के कई नेता भी उस के निशाने पर हैं. पुलिस कस्टडी से उस के फरार होने के बाद से ये सभी नेता परेशान हैं. यह इनपुट नागौर पुलिस ने जयपुर मुख्यालय को भेज दी है. इस के बाद मुख्यालय से सभी जिलों में अलर्ट जारी कर दिया गया है. सभी जिलों में सतर्कता बढ़ाने की सख्त हिदायत दी गई है.

सूत्रों के अनुसार, नागौर पुलिस को जेल स्टाफ तथा दूसरे कैदियों से जानकारी मिली थी कि आनंदपाल जेल में अकसर सीकर, नागौर व श्रीगंगानगर के कुछ लोगों का नाम लेता था. वह इन लोगों को अपना बड़ा दुश्मन बताता था और उन्हें खत्म करने के दावे करता था. इस के अलावा सीकर के कुछ व्यापारी व नागौर के कुछ नेता भी उस के निशाने पर बताए जा रहे हैं.

हालांकि पुलिस अधिकारी उस के पुराने रिकौर्ड के आधार पर यह भी कह रहे हैं कि आनंदपाल अमूमन जाटों व पूंजीपतियों को ही अपने टारगेट पर रखता है. आम लोगों को कभी नुकसान पहुंचाने की जानकारी नहीं मिली है. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अभी तो पूरे प्रदेश में हाईअलर्ट के चलते आनंदपाल कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, लेकिन उस के जो 300 गुर्गे हैं, वे अपने बौस के इशारे पर खून की होली खेलने से नहीं चूकेंगे.

आखिर यह आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू कौन है और वह खून की होली क्यों खेलना पसंद करता है? यह जानने के लिए हमें उस के अतीत में जाना होगा. राजस्थान के नागौर जिले में लाडनूं-डीडवाना रोड पर एक छोटा सा गांव है सांवराद, जहां ठाकुर हुकम सिंह चौहान रहते थे. आनंदपाल सिंह इन्हीं का बड़ा बेटा है. घर में सभी उसे पप्पू कहते थे. सीधासादा सरल स्वभाव का पप्पू मांबाप की आंखों का तारा था. गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद उस ने लाडनूं से 12वीं पास किया. इस के बाद वह डीडवाना चला गया, जहां उस ने बीए और बीएड किया. इस के बाद

वह सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया. पढ़ाई के साथ ही वह लाडनूं के गौशाला मार्केट में सीमेंट की दुकान भी चलाता था. इसी बीच चुरू जिला के सुजानगढ़ की राजकंवर से उस की शादी हो गई. वह एक बेटा व 2 बेटियों का बाप भी बन गया. उसी दौरान उस का झुकाव राजनीति की तरफ हो गया.

उस ने सन 1999-2000 में पंचायती राज चुनाव में सांवराद से पंचायत समिति का निर्दलीय चुनाव लड़ा. वह चुनाव जीत गया. इस के बाद उस ने भाजपा से प्रधान का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उस का मुकाबला कांग्रेस से पूर्व केबिनेट मंत्री हरजीराम बुरड़क के बेटे जगन्नाथ बुरड़क से था. दोनों के बीच कांटे की टक्कर थी. तमाम कोशिशों के बावजूद आनंदपाल जगन्नाथ बुरड़क से 2 वोटों से चुनाव हार गया. चुनाव जीतने के बाद जगन्नाथ प्रधान बन गया तो आनंदपाल लाडनूं पंचायत समिति का नेता प्रतिपक्ष बन गया.

नवंबर, 2000 में लाडनूं पंचायत समिति की स्थाई समितियों का चुनाव हुआ. इस चुनाव में विधायक हरजीराम बुरड़क और आनंदपाल के बीच तकरार हुई. तकरार की वजह लादु सिंह घुड़ीला का आवेदन पत्र जमा नहीं करना था. आनंदपाल खंड विकास अधिकारी से आवेदनपत्र जमा करने की जिद कर रहा था. तब विधायक ने खंड विकास अधिकारी रमेशचंद्र द्वारा आनंदपाल, जिला परिषद सदस्य खींवाराम घिंटाला और सुरजन सिंह घिरड़ौदा के खिलाफ सरकारी काम में बांधा डालने का मुकदमा लाडनूं थाने में दर्ज करा दिया. इस मुकदमे की तफ्तीश एएसआई चंद्राराम को सौंपी गई.

फिर अशोक सैनी नाम के व्यक्ति की ओर से आनंदपाल और उस के दोनों छोटे भाइयों के खिलाफ भादंवि की धारा 482 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया. यह मुकदमा संभवतया आनंदपाल को परेशान करने के लिए दर्ज कराया गया था, ताकि वह मुकदमे से डर कर अपने पैर पीछे खींच ले. मामला चूंकि गलत लग रहा था, इसलिए किसान नेता भागीरथ यादव और पूर्व विधायक दीपंकर शर्मा के नाती संजय शर्मा अशोक सैनी को एसपी नागौर गोविंद गुप्ता के पास ले गए.

अशोक सैनी ने एसपी को सारी सच्चाई बता दी. तब एसपी ने एसएचओ लाडनूं को इस मुकदमे में फाइनल रिपोर्ट लगाने के निर्देश दिए. लेकिन दूसरे ही दिन एक और मुकदमा उसी अशोक सैनी के हस्ताक्षर से आनंदपाल वगैरह के खिलाफ दर्ज हो गया. जिस एसपी ने अशोक सैनी वाले मामले में एसएचओ से फाइनल रिपोर्ट लगाने की बात कही थी. इस के बाद आनंदपाल और उस का सहयोग करने वालों पर मुकदमों की झड़ी लग गई.

9 जनवरी, 2001 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सभा में पत्थर फेंकने, 16 जनवरी, 2001 को कोलिया गांव में हुई लूट तथा 11 फरवरी, 2001 को लाडनूं में हुई खेराज की हत्या के मामले में आनंदपाल के खिलाफ रिपोर्टें दर्ज हुईं. धीरेधीरे पप्पू खूंखार डौन आनंदपाल सिंह सांवराद बन गया. आनंदपाल और उस के सहयोगियों के खिलाफ हत्या का जो मामला दर्ज हुआ था, उस के गवाह ने तो यहां तक कहा था कि उसे हत्या के मुकदमे में फंसाने की धमकी दे कर विधायक ने झूठा बयान दिलवा कर आनंदपाल वगैरह को फंसाया था, जबकि वह किसी को नहीं पहचाना था.

इस सब से पप्पू इतना व्यथित हुआ था कि वह खूंखार अपराधों की राह पर चल पड़ा. बस आनंदपाल ने उस के बाद अपने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर हाथ में बंदूक थाम ली थी. वह अपराध के दलदल में दिनबदिन धंसता चला गया था. आनंदपाल ने गरीबों को कभी परेशान नहीं किया. वह शोषितों, मजलूमों की सेवा को अपना परम धर्म समझता है. उसे आम आदमी से कोई शिकवा नहीं है. न ही वह उस वर्ग को परेशान करता है. लूट, डकैती, हत्या सहित दरजन भर से भी ज्यादा मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस को भी आनंदपाल की तलाश है.

आनंदपाल ने जब बंदूक उठाई थी तो धड़ाधड़ उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने लगे थे. पुलिस आनंदपाल को तलाश रही थी, मगर वह कहां हाथ आने वाला था. वह आंधी की तरह आता था और हत्या, लूट या डकैती को अंजाम दे कर तूफान की तरह चला जाता था. सांप के जाने के बाद पुलिस उस की लकीर पीटती रहती थी. पुलिस की नाक में आनंदपाल ने दम कर रखा था. आखिर आनंदपाल सिंह को पकड़ने का जिम्मा दबंग पुलिस अधिकारियों को सौंपा गया.

जयपुर पुलिस, एसओजी और एटीएस की संयुक्त टीमों ने फागी कस्बे के पास मोहब्बतपुरा गांव से आनंदपाल को गिरफ्तार कर लिया था. इस के कब्जे से एके 47 राइफल सरीखे खतरनाक हथियार, आटोमैटिक मशीन गन, बम और बुलेटप्रूफ जैकेट बरामद की गई. बता दें कि सरकारी सुरक्षा बलों के पास ही एके 47 राइफलें पाई जाती हैं.

अपराध जगत में आनंदपाल का जन्म वर्ष 2006 में हुआ था. उस ने डीडवाना में जीवनराम गोदारा नाम के छात्र नेता की गोलियों से भून कर हत्या कर दी थी. जीवनराम कालेज आतीजाती लड़कियों से छेड़छाड़ करता था. उस की इन हरकतों से छात्राएं परेशान थीं. वह बदमाश था, इसलिए उस से पंगा लेने की किसी में हिम्मत नहीं थी. जीवनराम की हरकतें बढ़ीं तो उसे समझाया गया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए, मगर वह बाज नहीं आया. मदन सिंह राठौड़ नाम के एक शख्स ने उस की हरकतों पर अंकुश लगाने की हिम्मत की तो जीवन ने पत्थरों से कुचल कर सरेआम उस की हत्या कर दी थी.

आनंदपाल को यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उस ने जीवनराम गोदारा की गोलियों से भून कर हत्या कर दी. जीवनराम गोदारा की हत्या के अलावा आनंदपाल के नाम डीडवाना में ही 13 मामले दर्ज हैं, जहां 8 मामलों में कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित किया हुआ था. सीकर के गोपाल फोगावट हत्याकांड को भी आनंदपाल ने ही अंजाम दिया था.

गोदारा और फोगावट की हत्या करने का मामला समयसमय पर विधानसभा में गूंजता रहा था. आनंदपाल के जुर्म की फेहरिस्त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब भी उस ने किसी को मौत के घाट उतारा, वह मुद्दा सरकार के लिए जवाब का विषय बन गया. सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, विपक्ष लचर कानून व्यवस्था और पनपते शराब माफियाओं के नाम पर सरकार को निशाने पर लेता रहा.

बीकानेर जेल में हुई गैंगवार को ले कर विधानसभा में खूब हंगामा हुआ था. आनंदपाल को ले कर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही. 29 जून, 2011 को आनंदपाल ने सुजानगढ़ में भोजलाई चौराहे पर गोलियां चला कर 3 लोगों को घायल किया था. उसी दिन गनौड़ा में शराब ठेके पर सेल्समैन के भाई की हत्या के आरोप में भी आनंदपाल का हाथ होने की बात सामने आई थी.

शेखावटी में अपराध के कभी 3 चेहरे हुआ करते थे. ये चेहरे थे— आनंदपाल सिंह, राजू ठेहठ और बलवीर बानूड़ा. अब 2 ही चेहरे बचे हैं. बलवीर बानूड़ा की हत्या के बाद आनंदपाल और राजू ठेहठ. अब इन दोनों में तनातनी चल रही है. राजू की गैंग में करीब 200 लोग हैं. उस पर भी 25 से ज्यादा केस दर्ज हैं. 8 अगस्त, 2013 को एटीएस ने उसे असम से पकड़ा था. वह अलवर जेल में बंद है.

राजू ठेहठ की अपराध की कहानी शुरू होती है 1997 से. तब बलवीर बानूड़ा और राजू ठेहठ दोस्त हुआ करते थे. दोनों शराब के धंधे से जुड़े थे. लेकिन सन 2005 में हुई एक हत्या ने दोनों दोस्तों के बीच दुश्मनी की दीवार खड़ी कर दी. शराब के ठेके पर बैठने वाले सेल्समैन विजयपाल की राजू ठेहठ से किसी बात पर कहासुनी हो गई. विवाद इतना बढ़ा कि राजू ने अपने साथियों के साथ मिल कर विजयपाल की हत्या कर दी. विजयपाल रिश्ते में बलवीर का साला लगता था. विजयपाल की हत्या से दोनों दोस्तों में दुश्मनी शुरू हो गई. बलवीर ने राजू के गैंग से निकल कर अपना अलग गिरोह बना लिया. बाद में वह आनंदपाल की गैंग में जा मिला. आनंदपाल का वह घनिष्ठ दोस्त बन गया. 15 फरवरी, 2012 को बलवीर गिरफ्तार हुआ था.

पिछले साल राजू ठेहठ के आदमियों ने बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल व बलवीर बानूड़ा पर हमला किया. जेल में हुए इस हमले से आनंदपाल को बचाने के चक्कर में बलबीर मारा गया. पुलिस का कहना है कि राजू ठेहठ पर गोलियां बरसाने वाला सुभाष मुंड वही है, जो हाल ही में आनंदपाल के साथ पुलिस कस्टडी से फरार हुआ है. बलबीर पर 16 केस दर्ज थे. पुलिस सूत्रों के अनुसार, आनंदपाल के गैंग में अनुराधा नाम की एक युवती भी शामिल थी. अनुराधा बड़े व्यापारियों के अपहरण का प्लान बना कर उन से फिरौती वसूलती थी. आरोप है कि इसी साल 9 अप्रैल, 2015 को अनुराधा ने सीकर के व्यापारी विनोद सर्राफ का अपहरण करवाया था. 22 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

कंप्यूटर ग्रैजुएट अनुराधा उर्फ अनुराग महला सीकर में कमोडिटी मार्केट का काम करती थी. उस की पढ़ाई दिल्ली और पिलानी में हुई थी. कहा जाता है कि कमोडिटी मार्केट में घाटा होने पर उस ने अपराध की दुनिया में कदम रखा. पहले वह जेल में राजू ठेहठ से मिली, लेकिन राजू ने अनुराधा को अपनी गैंग में शामिल करने से मना कर दिया. इस के बाद वह जेल में ही आनंदपाल से मिली और बताया कि वह उस के गैंग में काम करना चाहती है. आनंदपाल उसे इनकार नहीं कर सका. आनंदपाल और बलबीर बानूड़ा ने सब से पहले राजू ठेहठ के करीबी गोपाल फोगावट की हत्या की थी. दुश्मनी का खेल ऐसा चला कि पिछले 10 सालों में शेखावटी में 15 से ज्यादा हत्याएं हुईं. जेल तक में दोनों गैंगों के बीच गोलियां चलीं.

आनंदपाल की फरारी के बाद एक बार फिर से गैंगवार की आशंका पैदा हो गई है. पुलिस एड़ीचोटी  का जोर लगा रही है, मगर आनंदपाल उस की गिरफ्त से कोसों दूर है. आनंदपाल को मौकापरस्त राजनेताओं ने बंदूक उठाने पर मजबूर कर दिया, नहीं तो आज वह ऐसा खूंखार अपराधी नहीं होता. वह भी अपने बीवीबच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहा होता. आनंदपाल सिंह और उस के साथियों श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड की फरारी के बाद पुलिस ने थाना परवतसर में उन पर एक केस और दर्ज कर लिया है. पुलिस ने शुरुआत में आनंदपाल सिंह का सुराग देने वाले को 1 लाख रुपए और श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड का सुराग देने वाले को 50-50 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा के पैंफ्लेट चिपका दिए हैं.

इस के बावजूद अब तक राजस्थान पुलिस को आनंदपाल और उस के साथियों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला है. राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ने आनंदपाल के ऊपर घोषित इनाम की धनराशि एक लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दी है. अब देखना यह है कि यह घोषणा कोई रंग लाती है या नहीं? बहरहाल, उस के निशाने पर रहने वाले राजनेताओं व अन्य विरोधियों की नींद उड़ी हुई है. लोगों में अब यही चर्चा है कि पता नहीं आनंदपाल का अगला निशाना कौन होगा? Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

MP Crime: काली करतूतों से बुने रंगीन सपने

MP Crime: मीनाक्षी ने खुशहाल परिवार के व्यवसाई मनीष से प्रेम विवाह किया था. फिर ऐसा क्या हुआ कि यार के साथ मिल कर उसे पति की हत्या करानी पड़ी.

भोर की लालिमा फैलनी शुरू हुई ही थी कि उज्जैन के महाकाल मंदिर से उठते आरती के स्वर फिजा में गूंजने लगे. रोजाना की तरह घंटेघडि़यालों की गूंज के बीच इस दिन यानी 18 अगस्त, 2015 को भी उज्जैन अंगड़ाई लेने लगा. शहर की विवेकानंद कालोनी के विष्णुनगर की रहने वाली मीनाक्षी भी मंदिर से आने वाली आवाज सुन कर जाग गई. अब लेटे रहना उस के वश में नहीं था. उस ने जल्दी से बिस्तर छोड़ दिया.

आमतौर पर सुबहसुबह के इस शोर से जागने के बाद मीनाक्षी चिड़चिड़ा उठती थी लेकिन वह दिन उस के लिए कुछ खास था, तभी तो उसे पहली बार मंदिर के घंटों की आवाज मधुर लग रही थी. फ्रैश होने के लिए वह बाथरूम में घुस गई और करीब आधे घंटे बाद जब बाहर निकली तो उस का पति मनीष पहले की तरह गहरी नींद में सो रहा था. अपने गीले बालों का जूड़ा बांधते हुए उस ने पति को झकझोरते हुए उठाया. मनीष अलसाया सा उठ गया. उसे भी अपने औफिस जाना था इसलिए वह भी जाने की तैयारी में जुट गया. मीनाक्षी घर के रोजाना के काम करने लगी. काम निपटातेनिपटाते करीब साढ़े 9 बज गए.

सुबह के 10 बजने को थे. मनीष और मीनाक्षी दोनों के काम पर जाने का वक्त हो चुका था. इसलिए दोनों एक ही कमरे में तैयार हो रहे थे. इसी दौरान कंघी करते मनीष ने आईने में अपने पीछे खड़ी मीनाक्षी को कुरता पहनते देखा तो उसे शरारत सूझी. उसे छेड़ने के लिए वह पीछे मुड़ा ही था कि इस बीच मीनाक्षी का मोबाइल बज उठा. रिंगटोन सुन कर मीनाक्षी ने हवा में उठी अपनी बांहें नीचे झुका लीं. इस से मनीष अपनी सोची शरारत अधूरी रह जाने से मन मसोस कर रह गया.

‘‘हैलो, हां बस 5 मिनट में निकलने वाली हूं.’’ कहते हुए मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात खत्म की और जल्दी से कपड़े ठीक करने के बाद पैरों में सैंडिल डालते हुए बोली, ‘‘तुम तैयार हो मनीष?’’

‘‘हां.’’ मनीष ने भी कह दिया.

‘‘तो चलो.’’ कहते हुए मीनाक्षी कमरे से बाहर आ गई. मनीष भी कमरे से निकल आया तो मीनाक्षी ने दरवाजे पर ताला लगाया और पास बैठे सासससुर को उपेक्षा की नजर से देखती हुई मनीष के साथ घर से बाहर निकल गई.

मनीष मीणा उज्जैन की विवेकानंद कालोनी में रहने वाले आर.के. मीणा का एकलौता बेटा था. उज्जैन के टावर चौराहे के पास वसावड़ा पैट्रोल पंप के पीछे की गली में वह श्रीजी नाम से एक फाइनैंस कंपनी चलाता था. जबकि मीनाक्षी बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नाम के एनजीओ में काम करती थी. पतिपत्नी दोनों सुबह एक साथ स्कूटी पर घर से निकलते थे.

मनीष को टावर चौराहे पर उस के औफिस छोड़ कर मीनाक्षी अपने औफिस चली जाती थी. उस रोज भी वह हमेशा की तरह स्कूटी चला रही थी और मनीष पीछे बैठा था. हवा के झोंकों में उड़ते मीनाक्षी के खुले बाल मनीष के चेहरे से टकरा कर उस के मन में अजीब सी हलचल पैदा कर रहे थे. इस से रोमांचित हो कर मनीष ने अपनी बाहें पत्नी की कमर में डाल दीं. तभी मीनाक्षी ने उसे रूखे स्वर में टोका, ‘‘हम अपने कमरे में नहीं, सड़क पर हैं.’’

‘‘जानता हूं, मैं तुम्हें भगा कर नहीं लाया, बैंडबाजे के साथ तमाम लोगों के सामने ब्याह कर लाया हूं.’’ मनीष ने शरारत से कहा.

‘‘मुझे भी पता है. लेकिन शादीशुदा होने का मतलब यह तो नहीं कि सड़क पर ही कपड़े उतार दूं.’’ मीनाक्षी ने चिढ़ कर कहा.

मीनाक्षी के इस व्यवहार पर मनीष को गुस्सा आ गया. उस ने अपने हाथ वापस खींच लिए. इस के बाद वह टावर चौराहे तक न केवल चुप रहा, बल्कि मीनाक्षी ने जब स्कूटी रोकी तो बिना उस की ओर देखे अपने औफिस की तरफ चल पड़ा तो मीनाक्षी बोली, ‘‘सुनो, नाराज हो गए क्या?’’

मनीष कुछ नहीं बोला तो मीनाक्षी ने फिर पूछा, ‘‘नाराज हो गए?’’ मनीष फिर भी चुप रहा. इस पर मीनाक्षी ने हंसते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबा, आज शाम को जल्दी घर आ जाऊंगी. फिर अपनी सारी नाराजगी दूर कर लेना, ओके.’’

मनीष हलके से मुसकरा दिया और वापस मुड़ कर औफिस की तरफ चल पड़ा. उस के जाते ही स्कूटी मोड़ कर मीनाक्षी भी आगे बढ़ गई. कुछ दूरी पर जा कर उस ने सड़क के किनारे स्कूटी खड़ी कर के पीछे मुड़ कर मनीष की तरफ देखा. इस के बाद मोबाइल पर कोई नंबर डायल कर के 2-3 सेकेंड बात की और फिर तेजी से स्कूटी चला कर वहां से चली गई.

इधर मनीष ने रोज की तरह अपने औफिस से पहले पड़ने वाली चाय की एक दुकान पर चाय पी. इस के बाद वह पैट्रोल पंप के पास की गली में घुस गया. उस का औफिस उसी गली में था. उस समय सुबह के करीब साढ़े 10 बजे थे. वह औफिस पहुंच पाता, उस से पहले ही किसी ने उसे गोली मार दी. गली के दुकानदार मनीष को जानते थे. जैसे ही लोगों को इस घटना का पता चला, लोग वहां जमा हो गए और किसी ने फोन द्वारा इस की सूचना थाना माधोनगर को दे दी.

किसी को गोली मारने की खबर पा कर थानाप्रभारी एम.एस. परमार कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. वहां पता चला कि मनीष मीणा के सिर पर नजदीक से गोली मारी गई है. थानाप्रभारी ने गंभीर रूप से घायल मनीष को सिविल अस्पताल भेज दिया और घटना की जानकारी एसपी एम.एस. वर्मा, एएसपी अमरेंद्र सिंह और एसपी (सिटी) विजय डाबर को दे दी. थानाप्रभारी को किसी तरह मनीष की पत्नी और उस के घर वालों के फोन नंबर हासिल हो गए तो उन्होंने उन्हें भी फोन कर के अस्पताल बुला लिया. थानाप्रभारी को लोगों ने बताया कि गोली चलने की आवाज सुन कर जब वे दुकानों से बाहर आए तो उन्होंने एक मोटरसाइकिल पर सवार 2 युवकों को जाते देखा था.

घटनास्थल पर 7.65 एमएम कारतूस का एक खाली खोखा मिला. पुलिस को लगा कि यह हमलावरों द्वारा चलाई गई गोली का ही होगा. कुछ ही देर में एसपी, एएसपी और सीएसपी भी मौके पर पहुंच गए. उन्होंने भी घटना के बारे में लोगों से बात की. पुलिस द्वारा सूचना देने के कुछ देर में ही मनीष की पत्नी मीनाक्षी अस्पताल पहुंच गई. गंभीर अवस्था में घायल पति को अस्पताल में देख कर मीनाक्षी जोरजोर से रोने लगी. रोतेरोते ही वह बेहोश हो गई. उसी समय मनीष के मातापिता भी अस्पताल पहुंच गए.

मनीष की हालत इतनी गंभीर थी कि पुलिस उस का बयान तक नहीं ले सकती थी. डाक्टरों की टीम आईसीयू में उस का उपचार करने में लगी थी. बहरहाल पुलिस ने हत्या की कोशिश करने का मामला दर्ज कर घटना की जांच शुरू कर दी. उस गली में कुछ सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे. पुलिस ने उन कैमरों की फुटेज देखी तो उस में 2 लड़के मोटरसाइकिल पर दिखाई तो दे रहे थे, लेकिन तसवीर इतनी धुंधली थी कि न तो उन के चेहरे पहचाने जा सके और न ही मोटरसाइकिल का नंबर.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हमलावर काफी शातिर रहे होंगे. उधर मनीष की न तो बेहोशी टूट रही थी और न ही पुलिस को जांच की कोई दिशा मिल रही थी. चूंकि मनीष फाइनैंस एजेंसी के अलावा विवादित प्रौपर्टी की खरीदफरोख्त भी करता था. इसलिए पुलिस को लग रहा था कि उस की हत्या के पीछे कोई प्रौपर्टी विवाद हो सकता है. इस बिंदु को ध्यान में रखते हुए पुलिस इस बात की जांच की कि वह किनकिन लोगों से ज्यादा मिलताजुलता था और उस ने कौनकौन से विवादित प्रौपर्टी का सौदा किया था.

एसपी एम.एस. वर्मा ने साइबर सेल प्रभारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को मृतक और उस से जुड़े लोगों के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स की जांच करने की जिम्मेदारी सौंप दी. दीपिका शिंदे सेल के आरक्षक राहुल कुशवाहा के साथ इस काम में जुट गईं. दीपिका शिंदे ने सब से पहले मृतक मनीष के अलावा उस की पत्नी मीनाक्षी के मोबाइल नंबरों की भी काल डिटेल्स निकाल कर उस की स्कैनिंग की.

जांच में पता चला कि मनीष को टावर चौराहे पर छोड़ने के बाद मीनाक्षी ने जिस नंबर पर बात की थी, घटना के कुछ समय बाद उसी नंबर से मीनाक्षी के पास भी फोन आया था. इंसपेक्टर शिंदे ने दोनों फोन के समय के साथ मीनाक्षी के अस्पताल पहुंचने के समय का मिलान किया तो यह बात सामने आई कि पति को गोली मारे जाने की सूचना मिलने पर मीनाक्षी आश्चर्यजनक रूप से बहुत कम समय में ही अस्पताल पहुंच गई थी.

मीनाक्षी जिस एनजीओ में नौकरी करती थी, इंसपेक्टर शिंदे ने उस एनजीओ के संचालक से पूछताछ की तो पता चला कि मीनाक्षी उस रोज सुबह 10 बज कर 35 मिनट पर औफिस पहुंची थी और केवल 5 मिनट रुक कर वापस चली गई थी. इधर पुलिस जांच में कड़ी से कड़ी जोड़ने की कोशिश कर रही थी. घटना को हुए 3 दिन बीत चुके थे. मीनाक्षी पुलिस पर दबाव बनाने के लिए कुछ लोगों के साथ आईजी औफिस गई.

पति के हमलावरों की गिरफ्तारी की मांग को ले कर उस ने आईजी औफिस का घेराव करने की कोशिश की. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह उसे समझाया. उस के हंगामे को देखते हुए वह खुद पुलिस के शक के दायरे में आ गई. इसी के मद्देनजर आरक्षक राहुल कुशवाहा मीनाक्षी के फोन को सर्विलांस पर लगा कर उस की निगरानी करने लगे. इस से यह पता लग रहा था कि वह फोन पर किसकिस से बातें कर रही थी.

कुशवाहा मीनाक्षी के हर मूवमेंट की जानकारी इंसपेक्टर दीपिका शिंदे को दे रहे थे. इस से यह बात निकल कर सामने आ रही थी कि मनीष भले ही अस्पताल में जिंदगी और मौत से संघर्ष कर रहा था, लेकिन मीनाक्षी ने घटना के पहले और बाद में जिस मोबाइल नंबर पर बात की थी, उसी नंबर पर उस की अब भी लगातार लंबीलंबी बातें हो रही थीं. वह मोबाइल नंबर हनीफ का था.

जबकि घटना के बाद से 2 दिन तक मीनाक्षी अस्पताल नहीं आई थी. मनीष के मातापिता ही उस की देखभाल कर रहे थे. पुलिस ने जब उन से मीनाक्षी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि मीनाक्षी मनीष की जान बचाने के लिए घर पर रह कर 48 घंटे की अखंड पूजा कर रही है. उस का कहना था कि पूजा के बाद वह महाकाल से अपने पति को मौत के मुंह से वापस ले आएगी. लेकिन घटना के पांचवे रोज ही मनीष जिंदगी की जंग हार गया. उस की मौत के बाद पुलिस ने इस मामले में हत्या की धारा जोड़ कर जांच आगे बढ़ाई.

पुलिस को यह बात हजम नहीं हुई थी कि एक ओर तो वह अस्पताल में पति को उस के हाल पर छोड़ कर घर में थी, वहीं दूसरी ओर मोबाइल पर उस की किसी से लंबीलंबी बातें चल रहीं थी. इंसपेक्टर शिंदे ने एसपी एम.एस. वर्मा के सामने मीनाक्षी पर अपनी शंका व्यक्त की तो एसपी ने मीनाक्षी से पूछताछ करने के निर्देश दिए. एसपी के निर्देश पर पुलिस टीम मीनाक्षी के घर पहुंची तो मनीष के पिता ने मीनाक्षी को थाने ले जाने पर कड़ा विरोध जताया. लेकिन पुलिस ने उन की एक न सुनी. पुलिस मीनाक्षी को साइबर सेल ले आई. जैसे ही मीनाक्षी साइबर सेल पहुंची, आरक्षक राहुल ने उसे देखते ही पहचान लिया. क्योंकि उन्होंने उसे इसी साल अप्रैल महीने में अंबरनगर कालोनी के एक सूने मकान में अपने प्रेमी हनीफ के संग रंगरलियां मनाते पकड़ा था. तब मीनाक्षी के पति को भी साइबर सेल बुलाया गया था.

जिस युवक के साथ उसे पकड़ा गया था, वह मीनाक्षी के साथ एनजीओ में काम करता था. काल डिटेल्स से पता चला कि इसी हनीफ के साथ मीनाक्षी की फोन पर लंबीलंबी बातें हो रही थीं. इस बात की जानकारी मिलते ही पुलिस की एक टीम हनीफ की तलाश में उस के एनजीओ के औफिस पहुंची. पुलिस को देख कर हनीफ डर गया. उस ने झट से अपने मोबाइल का सिम और मेमोरी कार्ड निकाल कर अपने मुंह में छिपा लिया. लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा करते हुए देख लिया था. पुलिस ने हनीफ को हिरासत में ले कर उस के मुंह से सिमकार्ड और डाटा कार्ड निकलवा कर बरामद कर लिया.

जांच में यह भी पता चला कि घटना वाले दिन एनजीओ के हाजिरी रजिस्टर में हनीफ के औफिस आने का समय साढ़े 11 बजे का लिखा था, जिसे ओवर राइट कर के साढ़े 10 बनाया गया था. मनीष को गोली साढ़े 10 बजे के करीब मारी गई थी. इस से पुलिस समझ गई कि वह साढ़े 10 बजे औफिस में नहीं था. लेकिन उस ने अपनी मौजूदगी औफिस में दिखाने के लिए रिकौर्ड में छेड़खानी की कोशिश की थी. पुलिस हनीफ को हिरासत में ले कर साइबर सेल आ गई. उन दोनों से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने यह बात तो स्वीकार कर ली कि उन के आपस में प्रेमसंबंध हैं, लेकिन मनीष की हत्या की बात से दोनों मुकर गए.

काल डिटेल्स के आधार पर पुलिस को पता लग गया था कि जिस वक्त मनीष को गोली मारी गई थी, उस वक्त हनीफ के फोन की लोकेशन टावर चौराहे के पास थी. जबकि मनीष उस समय अपनी उपस्थिति अपने औफिस की बता रहा था. इस के बाद पुलिस ने उन दोनों से सख्ती से पूछताछ की. फलस्वरूप दोनों ने मनीष की हत्या की बात स्वीकार करते हुए पूरी कहानी सिलसिलेवार सुना दी, जो इस प्रकार निकली. विवेकानंद कालोनी निवासी आर.के. मीणा के एकलौते बेटे मनीष की करीब 5 साल पहले मीनाक्षी से मुलाकात हुई थी. दरअसल मनीष पहले एक एनजीओ चलाता था. मीनाक्षी उसी के एनजीओ में काम करती थी. मीनाक्षी तराना की रहने वाली थी. रोजरोज तराना से औफिस आनेजाने में उसे बड़ी परेशानी होती थी. इसलिए वह उज्जैन में किराए का मकान ले कर अकेली रहने लगी. यह बात मनीष भी जानता था.

मनीष उस का बौस था, सो वह मीनाक्षी के अकेलेपन का फायदा उठा कर उस के नजदीक आने की कोशिश करने लगा. इस में वह सफल भी हो गया. दरअसल मीनाक्षी को पता था कि मनीष एक रईस मातापिता की एकलौती संतान है. उसे लगा कि मनीष से मोहब्बत कर के उसे बड़ा फायदा हो सकता है, इसलिए उस ने मनीष के लिए अपने तनमन की लगाम ढीली छोड़ दी. इस के बाद उन दोनों के बीच की दूरियां कुछ ही मुलाकातों में खत्म हो गईं. मीनाक्षी मनीष के दिल और दिमाग पर छा गई.

मनीष के घर वाले बेटे के लिए किसी शरीफ परिवार की बहू चाहते थे. लेकिन जब उन्हें बेटे के द्वारा पता चला कि वह अपने ही औफिस में काम करने वाली मीनाक्षी को चाहता है तो उस की खुशी देख कर उन्होंने अपनी रजामंदी दे दी. इस तरह 2 साल पहले मीनाक्षी अपने बौस की पत्नी बन कर उस के घर आ गई.

चूंकि दोनों का प्रेमविवाह था, इसलिए शादी के बाद का शुरुआती वक्त तो पंख लगा कर बीत गया. शादी के कुछ समय बाद मनीष ने एनजीओ बंद कर के टावर चौराहे के पास श्रीजी फाइनैंस कंपनी खोल ली. कंपनी के माध्यम से मनीष केवल लोगों को विभिन्न बैंकों से लोन ही नहीं दिलवाता था, बल्कि उस ने विवादित प्रौपर्टी की खरीद- फरोख्त का काम भी शुरू कर दिया था.

मीनाक्षी चाहती तो अपने पति की कंपनी में सहयोग कर सकती थी, लेकिन उस ने ऐसा न कर के बेगमगंज इलाके में स्थित अरुणोदय सर्वेश्वरी कल्याण समिति नामक एनजीओ में नौकरी कर ली. मनीष ने मीनाक्षी के इस फैसले का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि वह अपनी फाइनैंस कंपनी के माध्यम से न केवल ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी कर रहा था, बल्कि विवादित प्रौपर्टियों में भी रुचि ले रहा था. इसलिए वह मीनाक्षी को कंपनी से दूर ही रखना चाहता था.

उस की योजना मीनाक्षी के लिए नया एनजीओ खुलवा कर लाखों कमाने की थी. लेकिन पति से अलग रह कर नौकरी करते हुए मीनाक्षी की मुलाकात खंदार मोहल्ले में रहने वाले हनीफ से हुई. हनीफ एकदूसरे एनजीओ में काम करता था. मुलाकात के बाद वे वाट्सएप के माध्यम से अपने विचारों का आदानप्रदान करते रहे. उन के बीच गहरी दोस्ती हो गई. दोनों दिनभर एकदूसरे के संपर्क में रहने लगे. फिर रोज ही उन की मुलाकातें होने लगीं.

मीनाक्षी बचपन से ही महत्त्वाकांक्षी थी. अपने बारे में बढ़ाचढ़ा कर बातें करना उस की आदत में शुमार था. उस ने हनीफ को भी यही बताया था कि मनीष करोड़पति है और उस की ज्यादातर प्रौपर्टी मेरे ही नाम पर है. हनीफ मीनाक्षी जैसी कितनी लड़कियों को रंगीन सपने दिखा कर उन का शारीरिक शोषण कर चुका था. इसलिए उसे लगा कि मीनाक्षी के हाथ आने पर वह आसानी से करोड़पति बन सकता है. उस ने मीनाक्षी के नजदीक आने की कोशिश करनी शुरू कर दी.

2 साल पहले मनीष के साथ मोहब्बत की कमसें खाने और उस से प्रेमविवाह करने वाली मीनाक्षी ने भी अपनी तरफ बढ़ते हनीफ के कदमों को रोकने की कोशिश नहीं की. इस बीच मीनाक्षी और हनीफ के बीच शारीरिक रिश्ते भी कायम हो गए. इस के बाद तो मीनाक्षी को मनीष में 50 कमियां और हनीफ में हजार अच्छाइयां नजर आने लगीं.

हनीफ दूसरे एनजीओ में काम करता था, इसलिए दोनों का आसानी से मिलना संभव नहीं हो पाता था. इसलिए मीनाक्षी ने उस की नौकरी अपने ही एनजीओ में लगवा दी. इस से दोनों का मिलना काफी आसान हो गया. काम के नाम पर हनीफ और मीनाक्षी औफिस से बाहर निकल जाते. इस के बाद हनीफ मीनाक्षी को ले कर अपने एक दोस्त के कमरे पर चला जाता. वहीं पर दोनों अपनी हसरतें पूरी करते. हसरतें पूरी कर के वह औफिस आ जाते थे.

इस तरह धीरेधीरे मीनाक्षी मनीष से दूर हो कर हनीफ के पास होती गई. लेकिन इन का खेल ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सका. हुआ यह कि हनीफ अकसर मीनाक्षी को ले कर अंबरनगर स्थित अपने एक दोस्त के कमरे पर जाता था. लेकिन रोजरोज का यह खेल मोहल्ले वालों की नजरों में आ गया. अप्रैल, 2015 में जब एक दिन मीनाक्षी और हनीफ उस दोस्त के यहां गए तो मोहल्ले वालों ने दोनों को पकड़ कर पुलिस को खबर कर दी. पुलिस आने पर विवाद की स्थिति बन गई. खबर मिलने पर मीनाक्षी का पति भी वहां आ गया. तब मीनाक्षी का कहना था कि वह अपने दोस्त के घर खाना खाने आई थी. बहरहाल पुलिस ने उन्हें हिदायत दे कर छोड़ दिया.

मीनाक्षी ने मनीष को लाख सफाई देने की कोशिश की, लेकिन मनीष समझ गया था कि मीनाक्षी जैसी लड़की केवल खाना खाने के लिए तो ऐसे गंदे माहौल में नहीं जा सकती. वह कभी अंडे को हाथ तक नहीं लगाती थी. वह हनीफ का मन रखने के लिए मांसाहार कैसे कर सकती है. घर पहुंच कर मनीष ने गुस्से में मीनाक्षी की पिटाई कर दी. इतना ही नहीं, उस ने मीनाक्षी को चेतावनी भी दे दी कि उस के 1-2 दोस्त जेल में बंद हैं, जिन के बाहर आते ही वह हनीफ को ठिकाने लगवा देगा. मीनाक्षी पति की आदत और पहुंच को जानती थी. इसलिए उसे विश्वास था कि वह हनीफ को जरूर मरवा देगा. इसलिए वह फिर हनीफ से मिली और उस ने उसे बता दिया कि मनीष उस की हत्या करवा सकता है.

हनीफ डर गया. उस के सोचा कि इस से पहले मनीष उस के खिलाफ कोई कदम उठाए, क्यों न मनीष को ही ठिकाने लगा दिया जाए. उस ने मीनाक्षी को अपनी योजना बताई तो वह राजी हो गई. क्योंकि वह जानती थी कि एक बार मनीष की नजरों में गिरने के बाद अब वह उस घर में कभी अपनी पुरानी हैसियत नहीं पा सकती. तब हनीफ ने मीनाक्षी को सलाह दी कि वह मनीष के साथ गहरे प्यार का नाटक कर उस का मकान और जायजाद सब अपने नाम करवा ले, ताकि मनीष की हत्या के बाद उस के मातापिता को घर से निकाल कर दोनों आपस में निकाह कर आराम से रह सकें.

मीनाक्षी को भी प्रेमी की बात पसंद आ गई. इसलिए घटना से कुछ दिनों पहले जब मनीष ने 35 लाख की एक जमीन खरीदी तो मीनाक्षी ने जिद कर के उस की रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली. इस के बाद हनीफ और मीनाक्षी ने मिल कर मनीष की हत्या की फूलप्रूफ योजना बनाई. इस के लिए हनीफ ने 2 महीने तक मनीष के औफिस के चारों तरफ रैकी कर गली में गोली मारने का फैसला किया. मीनाक्षी और मनीष जानते थे कि हत्या के बाद मीनाक्षी की काल डिटेल्स भी निकाली जाएगी, जिस के चलते हनीफ और मीनाक्षी से पुलिस पूछताछ कर सकती है. इसलिए पुलिस के सभी संभावित प्रश्नों के जवाब भी उन्होंने पहले से ही तैयार कर लिए थे.

यह सब करने के बाद हनीफ ने अपनी मौसी के लड़के रिजवान को साथ देने के लिए तैयार किया. दोनों ने कई बार मनीष की गली से मोटरसाइकिल ले कर तेजी से निकलने की प्रैक्टिस की. अंतत: परफेक्ट हो जाने के बाद 18 अगस्त, 2015 को हनीफ ने मनीष की हत्या कर दी. इतनी फूलप्रूफ योजना के तहत हत्या करने के बावजूद भी आखिर वे पुलिस के चंगुल में फंस ही गए. काली करतूतों की बुनियाद पर रंगीन सपने सजाने वाले हनीफ और मीनाक्षी से पूछताछ के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर के सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Bhopal Crime News: जब एक मजबूर मर्द से हो गई एक बड़ी गलती

Bhopal Crime News: 21 अप्रैल, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना मिसरोद के थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह कुशवाह गश्त से लौट कर क्वार्टर पर जाने की तैयारी कर रहे थे कि 35-36 साल का एक आदमी उन के सामने आ खड़ा हुआ. उस के सीने से खून रिस रहा था. ऐसा लग रह था, जैसे उसे चाकू मारे गए हों, पर ठीक से लगे न हों. वहां गहरे घाव के बजाय गहरे खरोंच के निशान थे. उसे देख कर राजबहादुर सिंह को यह आपसी मारपीट का मामला लगा.

उस व्यक्ति ने अपना नाम सौदान सिंह कौरव बताया था. राजबहादुर सिंह ने थाने आने की वजह पूछी तो उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं कौशलनगर के पास रहता हूं. आज रात 3 बजे 4 लोग मेरे घर में घुस आए और मेरी पत्नी मंगला से जबरदस्ती करने लगे. मैं ने और मेरी पत्नी ने विरोध किया तो उन्होंने हम दोनों की बुरी तरह से पिटाई कर दी. उस मारपीट में मेरी पत्नी को अधिक चोट लगी, जिस से वह बेहोश हो गई है.’’

घायल मंगला की मौत हो सकती थी, इसलिए थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह ने तुरंत एसआई राजकुमार दांगी को कौशलनगर भेजा. वहां पहुंच कर पता चला कि मकान की दूसरी मंजिल पर सौदान सिंह पत्नी मंगला और 2 बच्चों के साथ रहता था. राजकुमार कमरे पर पहुंचे तो देखा सामने पलंग पर मंगला लेटी थी. उन्होंने उसे नजदीक से देखा तो लगा वह मर चुकी है.

उन्होंने इधरउधर देखा तो कमरे की स्थिति देख कर कहीं से नहीं लगता था कि वहां किसी तरह का झगड़ा या मारपीट हुई थी. संदेह हुआ तो उन्होंने फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी राजबहादुर सिंह को दे दी. मामला लूट और दुष्कर्म की कोशिश के साथ हत्या का था, इसलिए राजबहादुर सिंह ने तुरंत यह बात एसपी सिद्धार्थ बुहुगुणा एवं एसडीओपी अतीक अहमद को बताई और खुद सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. अब तक वहां काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

राजबहादुर सिंह ने एक गहरी नजर सौदान सिंह के चेहरे पर डाली तो उन्हें उस के चेहरे पर छाए दुख के बादल बनावटी लगे. उन्हें अब तक की अपनी पुलिस की नौकरी में इतना तो अनुभव हो ही चुका था कि आदमी पत्नी के मरने पर किस तरह दुखी होता है.

उन्होंने सौदान सिंह के शरीर पर लगे चाकू के घावों को ध्यान से देखा तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि यह आदमी बहुत चालाक और मक्कार है. उस के घाव किसी दूसरे द्वारा मारे गए चाकू के नहीं हैं, इन्हें उस ने खुद चाकू मार कर बनाया है. लेकिन उन्होंने उस पर कुछ जाहिर नहीं होने दिया.

उन्होंने मकान का निरीक्षण किया तो 2 कमरों के उस के मकान में बाहर के कमरे में डबलबैड के आकार का लंबाचौड़ा बिस्तर जमीन पर था. इस के अलावा किचन में भी एक बिस्तर जमीन पर ही लगा था. उस की ओर इशारा करते हुए राजबहादुर सिंह ने पूछा, ‘‘इधर कौन सोया था?’’

‘‘साहब, मैं यहीं सोता हूं.’’ सौदान सिंह ने कहा.

‘‘तुम यहां सोए थे तो तुम्हें घटना के बारे में कैसे पता चला?’’crime news

‘‘साहब, बाहर के कमरे में शोर हुआ तो मेरी आंखें खुल गईं. मैं उठ कर वहां पहुंचा तो देखा 4 युवक मेरी पत्नी के साथ जबरदस्ती कर रहे थे. वह उन का विरोध कर रही थी. मैं ने मंगला को बचाने की कोशिश की तो उन्होंने चाकू से मेरे ऊपर हमला कर दिया. अपने मकसद में सफल होते न देख उन्होंने मंगला पर भी हमला कर दिया.’’ सौदान ने कहा.

‘‘तुम्हारे बच्चे कहां हैं?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, वे तो मेरे मातापिता के पास लटेरी में हैं.’’

सौदान सिंह के इतना कहते ही थानाप्रभारी को समझते देर नहीं लगी कि मंगला की हत्या का आरोपी उन के सामने खड़ा है. क्योंकि बच्चे घर में होते तो वह पत्नी की हत्या नहीं कर सकता था. इस के अलावा उस ने जो अलग बिस्तर लगाया था, बच्चों के होने पर माना जाता कि एकांत पाने के लिए लगाया होगा. लेकिन जब बच्चे घर पर नहीं हैं तो अलग बिस्तर लगाने की क्या जरूरत थी?

पड़ोसियों से पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि रात में किसी ने किसी तहर का शोरशराबा या चीखपुकार नहीं सुनी थी. राजबहादुर सिंह ने एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा को सारी जानकारी दी तो उन्होंने सौदान सिंह को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया.

राजबहादुर सिंह ने सौदान सिंह के मातापिता तथा मंगला के घर वालों को उस की हत्या की खबर दे दी थी. इस के बाद लाश का बारीकी से निरीक्षण कर घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. मंगला की हत्या की खबर पा कर सौदान सिंह का बड़ा भाई गोपाल सिंह तो भोपाल आ गया था, लेकिन मंगला के मायके से कोई नहीं आया था. राजबहादुर सिंह ने एक बार फिर सौदान सिंह से पूछताछ की, लेकिन मंझे हुए खिलाड़ी की तरह उस ने इस बार भी वही सारी बातें दोहरा दीं, जो वह पहले बता चुका था.

राजबहादुर सिंह ने कमरों के निरीक्षण में देखा था कि जिस कमरे में मंगला सोई थी, उस की कुंडी सहीसलामत थी. उसे बाहर से हाथ डाल कर नहीं खोला जा सकता था. सौदान सिंह ने बताया था कि रात को सोते समय बाहर वाला दरवाज अंदर से बंद था. राजबहादुर सिंह ने उस की आंखों में आंखें डाल कर पूछा, ‘‘रात को सोते समय दरवाजा अंदर से बंद था न?’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘दरवाजा अंदर से बंद था तो वे लोग अंदर कैसे आए, क्या तुम ने दरवाजा खोल कर उन्हें अंदर बुलाया था?’’

‘‘नहीं…नहीं साहब, मैं तो अंदर वाले कमरे में सो रहा था.’’ सौदान सिंह ने घबरा कर कहा.

‘‘तो क्या दरवाजा मंगला ने खोला था?’’

‘‘हो सकता है, उसी ने खोला हो?’’ सौदान सिंह के मुंह से यह जवाब सुन कर राजबहादुर सिंह ने कहा, ‘‘इस का मतलब उन चारों को मंगला ने बुलाया था. अगर उन्हें उस ने बुलाया था तो उस ने शोर क्यों मचाया, उस की रजामंदी से चारों चुपचाप अपना काम कर के जा सकते थे.’’

सौदान सिंह थानाप्रभारी की इस बात का जवाब नहीं दे सका तो उन्होंने डांट कर कहा, ‘‘जो सच्चाई है, उसे खुद ही बता दो, वरना पुलिस सच्चाई उगलवाएगी तो तुम्हारी क्या हालत होगी, शायद तुम नहीं जानते. वैसे सच्चाई का पता हम सभी को चल चुका है. लेकिन हम तुम्हारे मुंह से हकीकत सुनना चाहते हैं कि तुम ने अपनी पत्नी की हत्या क्यों और कैसे की है?’’

सौदान सिंह तुरंत राजबहादुर सिंह के पैरों पर गिर कर रोते हुए बोला, ‘‘साहब, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही मंगला की हत्या की है. साहब उस ने मुझे इस तरह मजबूर कर दिया था कि हत्या के अलावा मेरे पास कोई दूसरा उपाय ही नहीं बचा था. मैं मर्द हूं साहब, कितनी बेइज्जती सहता. बेइज्जती से तंग आ कर ही मैं ने उस की हत्या की है.’’

इस के बाद सौदान सिंह ने मंगला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

सौदान सिंह मध्य प्रदेश के जिला विदिशा के थाना लटेरी के गांव सुनखेड़ा का रहने वाला था. प्राइमरी तक पढ़ा सौदान गांव में पिता के सथ कारपेंटर का काम करता था. इस के अलावा खेती की थोड़ी जमीन भी थी. इस तरह कुल मिला कर उस के परिवार की आराम से गुजरबसर हो जाती थी. सौदान सिंह मातापिता के साथ खुश था. कोई 12 साल पहले उस की शादी भिंड की रहने वाली मंगला के साथ हो गई. पत्नी ने आते ही उस की जिंदगी बदल दी. वह इंटर तक पढ़ी थी. वह थी भी थोड़ी खूबसूरत. इसलिए उस के मित्र उस से जलने लगे थे.

जबकि सौदान उस से शादी कर के पछता रहा था. इस की वजह यह थी कि मंगला स्वच्छंद विचारों वाली थी. वह आजादी में विश्वास करती थी और ऐश की जिंदगी जीने की शौकीन थी. मंगला को अपनी सुंदरता का अहसास तब हुआ, जब गांव के लड़के उस के घर के चक्कर लगाने लगे. अपनी खूबसूरती का अहसास होते ही वह उन्हें अपनी खूबसूरती की झलक दिखा कर परेशान करने लगी थी. तभी घर वालों ने उस की शादी कर दी थी और इस तरह वह ससुराल आ गई.

ससुराल में मंगला सासससुर के रहते बिना सिर ढके से बाहर नहीं निकल सकती थी. जबकि स्वच्छंदता के लिए घर से बाहर जाना जरूरी था. इस के लिए मंगला ने अपने लिए पति के साथ शहर जाने का रास्ता निकाला. सौदान सिंह से ज्यादा पढ़ीलिखी और उस से अधिक सुंदर होने की धौंस दे कर मंगला ने कहा, ‘‘मैं इस गांव में तुम्हारे साथ कब तक रह कर अपनी जिंदगी बेकार करूंगी. शहर चलो, गांव में कुछ नहीं रखा है. यहां रह कर हम न अपने लिए और न बच्चों के लिए 2 पैसे बचा पाएंगे. शहर में कमा कर कुछ जमा कर लेंगे.’’

लेकिन सौदान सिंह गांव में रहने वाले अपने मांबाप को छोड़ कर शहर नहीं जाना चाहता था. पर मंगला की जिद के आगे उसे झुकना पड़ा. पत्नी के कहने पर 3 साल पहले सौदान सिंह भोपाल आ गया और कौशलनगर में किराए का मकान ले कर रहने लगा. उस ने टाइल्स लगाने का काम सीखा और इसे ही रोजीरोटी का साधन बना लिया.

सौदान सिंह अपने इस काम से इतना कमा लेता था कि उस की गृहस्थी अच्छे से चल रही थी. उस का सोचना था कि गांव से शहर आ कर मंगला सुधर जाएगी, लेकिन हुआ इस का उलटा. मंगला भोपाल आ कर सुधरने की कौन कहे, शहर आ कर उस की चाहतों ने और भी ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी. उसे यहां कोई कुछ कहने टोकने वाला नहीं था.

2 बच्चों की मां होने के बावजूद उसे जवानी के न याद आ गए थे. एक ही इशारे में वह मनचलों को घायल कर देती थी. वहां भी मंगला ने अपने चाहने वालों की लाइन लगा दी थी. इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं. सौदान सिंह को जब पत्नी की हरकतों का पता चला तो उस ने उसे डांटाफटकारा ही नहीं, समझाया भी, पर उस पर न पति के समझाने का असर हुआ न डांटनेफटकारने का. क्योंकि वह तो उसे गंवार, जाहिल और मंदबुद्धि ही नहीं समझती थी, बल्कि बातबात में कम पढ़ेलिखे होने का ताना भी मारती थी.

दरअसल, मंगला पति पर हावी हो कर अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहती थी. लेकिन सौदान सिंह अकसर मंगला को टोकता रहता था.  आखिर खीझ कर मंगला ने सौदान सिंह को नीचा दिखाने का निर्णय कर अपने आशिकों को उस के सामने ही घर बुलाने लगी. यही नहीं, उस के सामने वह प्रेमियों के साथ बैडरूम में चली जाती थी.

इतने से भी उसे संतोष नहीं होता था. वह उसी के सामने मोबाइल पर अपने चाहने वालों से अश्लील बातें करती थी. सौदान सिंह मर्द था, पत्नी की इन गिरी हुई हरकतों से उसे गुस्सा तो बहुत आता था, पर बच्चों के बारे में सोच कर उस गुस्से को पी जाता था. पहले मंगला पति की ही उपेक्षा करती थी, लेन बाद में वह बच्चों की भी उपेक्षा करने लगी थी. वह सुबह ही काम पर चला जाता था. उस के जाने के बाद मंगला आशिकों के साथ घूमने निकल जाती थी. अगर बाहर नहीं जाती तो मोबाइल पर ही घंटों अपने चाहने वालों से बातें करती रहती थी.

ऐसे में मंगला को बच्चों के खानेपीने की भी चिंता नहीं रहती थी. अगर सौदान सिंह कुछ कहता तो वह उस से मारपीट करने पर उतारू हो जाती थी. कई बार तो उस पर हाथ भी उठा दिया था. मंगला को प्रेमियों से मिलने में किसी तरह की परेशानी न हो, इस के लिए उस ने नौकरी कर  ली. यह नौकरी उस के एक प्रेमी चंदेश ने लगवाई थी.

चंदेश हीरा कटाई की उस कंपनी में पहले से नौकरी करता था, उसी की सिफारिश पर मंगला को यह नौकरी मिली थी. इसी नौकरी की आड़ में मंगला और चंदेश की रासलीला आसानी से चल रही थी.

नौकरी लग जाने के बाद मंगला सौदान सिंह को और भी ज्यादा जलील करने लगी थी. वह उस से कहती थी कि हीरे की कद्र जौहरी ही करते हैं.

इधर मंगला का एक पुराना प्रेमी अमन भी आने लगा था. वह उस का शादी से पहले का प्रेमी था. शादी से पहले ही उस के मंगला से अवैध संबंध थे. अमन जब भी आता था, उस के घर पर ही रुकता था. मंगला के बारे में जब मोहल्ले की महिलाओं को पता चला तो वे उस के बारे में तरहतरह की बातें करने लगीं.

इस बदनामी से बचने के लिए सौदान सिंह ने मंगला से गांव चलने को कहा तो उस ने उसे धकियाते हुए कहा, ‘‘तुझे गांव जाना हो तो जा, मैं अब यहीं रहूंगी. मुझे अब तेरी जरूरत भी नहीं है.’’

धीरेधीरे मंगला की तानाशाही बढ़ती जा रही थी, जिस से सौदान सिंह काफी परेशान रहने लगा था. वह कईकई दिनों तक उसे अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह जब भी उस के पास जाता, वह डांट कर कहती, ‘‘गंदे, जाहिल, तेरे शरीर से बदबू आती है. तू मेरे पास मत आया कर.’’crime news

सौदान सिंह को दुत्कार कर उस के सामने ही मंगला अपने प्रेमियों से हंसहंस कर अश्लील बातें करने लगी. पत्नी की इन हरकतों से तंग आ कर सौदान सिंह ने प्रण कर लिया कि अब इसे खत्म कर देगा. क्योंकि अगर अब यह उस की नहीं रही तो वह उसे किसी और के लिए भी नहीं छोड़ेगा. यही सोच कर उस ने 5 दिन पहले बच्चों को दादादादी के पास लटेरी पहुंचा दिया.

20 अप्रैल की रात खाना खा कर पतिपत्नी लेट गए. बच्चे घर पर नहीं थे, इसलिए सौदान सिंह ने मंगला से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. लेकिन तभी मंगला के किसी प्रेमी का फोन आ गया. सौदान ने मंगला के हाथ से मोबाइल छीन कर फोन काटना चाहा तो उस ने उसे तमाचा मार दिया. पतिपत्नी में झगड़ा होने लगा. सौदान सिंह ने गलती स्वीकार करते हुए एक बार फिर उस से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा जाहिर की. इस पर मंगला ने कहा, ‘‘अपनी औकात देखी है गंदी नाली के कीड़े. मेरे साथ संबंध बनाने के बारे में तूने सोच कैसे लिया. मैं तुझे अपना शरीर अब कभी नहीं छूने दूंगी.’’

मंगला की इस बात से सौदान सिंह हैरान रह गया. उस ने उसी समय तय कर लिया कि आज ही वह उसे खत्म कर देगा. उस ने लेट कर आंखें मूंद लीं. उस के बगल में लेटी मंगला अपने प्रेमी से फोन पर अश्लील बातें करती रही. करीब 45 मिनट तक मंगला ने फोन पर गंदीगंदी बातें कीं, जिन्हें सौदान सिंह सुनता रहा. मंगला फोन काट कर सो गई. करीब 3, साढे़ 3 बजे सौदान उठा और पलंग के नीचे छिपा कर रखी लोहे की रौड निकाल कर पूरी ताकत से उस के सिर पर वार कर दिया. उसी एक वार में वह बेहोश हो गई. उसी बेहोशी की हालत में मंगला के सीने पर बैठ कर उस ने उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

पुलिस से बचने के लिए सौदान सिंह ने सीने पर चाकू मार कर घाव किए और थाने पहुंच कर पुलिस को लूट और जबरदस्ती की झूठी कहानी सुना दी. अपने बचाव के लिए उस ने दूसरे कमरे में खुद ही बिस्तर बिछाया था. थानाप्रभारी ने सौदान सिंह की निशानदेही पर वह रौड बरामद कर ली थी, जिस से मंगला की हत्या की गई थी. पूछताछ और सारे साक्ष्य जुटा कर थाना मिसरौद पुलिस ने पत्नी के हत्यारे सौदान सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Bhopal Crime News