Uttar Pradesh Crime: रहस्य में दफन हो गई सारा की मौत

Uttar Pradesh Crime: अमनमणि त्रिपाठी ने घर वालों की मरजी के बिना संभ्रांत परिवार की लड़की सारा सिंह से कोर्टमैरिज तो कर ली लेकिन बाद में ऐसे क्या हालात हुए कि वह उस से किनारा करने की सोचने लगा? फिर एक दिन…

पौ फटते ही सूरज की किरणें धरती को चूमने लगी थीं. चिडि़यों के मधुर कलरव से फिजाएं गूंज उठी थीं. कलियां भी मुसकान बिखरने लगी थीं तो वहीं चंचल मकरंद कलियों पर मंडराने लगे थे. चिडि़यों के मीठे स्वर जब सारा के कानों से टकराए तो वह अंगड़ाइयां लेती हुई बिस्तर से उतरी और तरोताजा होने के लिए गुसलखाने की ओर बढ़ी. कुछ देर बाद वहां से लौटी तो दीवार पर टंगी घड़ी पर नजर दौड़ाई. उस वक्त सुबह के साढ़े 6 बज रहे थे. फिर एक नजर घर में दौड़ाई, घर के बाकी लोग सो रहे थे.

फटाफट तैयार हो कर उस ने नाश्ता किया. उस समय वह बहुत खुश थी. बारबार दीवार घड़ी पर नजर डाल कर वह दरवाजे से ही सड़क की तरफ इस तरह से देखती जैसे उसे किसी के आने का इंतजार हो. दरवाजे से आ कर वह बेचैनी से लौन में चहलकदमी कर ने लगती. उस की जूतियों की खटपट से सारा की मां सीमा सिंह की नींद टूट गई.

बेटी को अलसुबह तैयार हुआ देख कर उन्होंने उस से पूछा, ‘‘बेटी, इतनी जल्दी तैयार हो कर कहां जा रही हो? रात तुम ने मुझे बताया नहीं कि सुबह तुम्हें कहीं जाना है?’’

‘‘जी मां, मैं बताना भूल गई थी. दरअसल बात यह है कि शादी की दूसरी सालगिरह पर अमन ने दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला जाने का कार्यक्रम बनाया है. आज हम पहले दिल्ली जाएंगे. फिर वहां से आगे की तैयारी करेंगे.’’

‘‘ठीक है, बेटा. जाओ, पर इतना लंबा सफर तुम कैसे तय करोगे?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मां, हम ने इस बार कार से जाने का मन बनाया है.’’ सारा मां को बता रही थी कि उसी समय उसे दरवाजे के बाहर किसी गाड़ी के आने की आवाज आई. वह कमरे से दरवाजे की तरफ गई. वहीं से वह चहक कर बोली, ‘‘मां गाड़ी आ गई.’’

सीमा सिंह ने बाहर की तरफ देखा तो एक कार के पास सफेद कमीज पहने दामाद अमनमणि त्रिपाठी खड़ा था. सारा अपना सूटकेस उठा कर मां को ‘बाय’ कहती हुई घर से निकल कर सफेद रंग की मारुति स्विफ्ट कार नंबर यूपी-53-बीआर-0060 में जा कर बैठ गई. सास को बायबाय कर के अमनमणि वहां से चला गया. इस के बाद अमनमणि ने कार दिल्ली की ओर दौड़ा दी. यह बात 9 जुलाई, 2015 की है. सीमा सिंह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर के घोसडि़या चौराहे के पास स्थित आलीशान कोठी में अपने परिवार के साथ रहती थीं.

उन के परिवार में 4 बच्चे थे, जिन में बेटी सारा तीसरे नंबर की थी. सीमा सिंह के पति अशोक कुमार सिंह की कई साल पहले स्वाभाविक मौत हो चुकी थी. उन की मौत के बाद बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी सीमा सिंह के कंधों पर आ गई थी. सीमा सिंह कोई मामूली हैसियत वाली महिला नहीं थीं. वह अधिवक्ता के अलावा अखिल भारतीय कांगे्रस पार्टी की सदस्य भी थीं. वह एक रईस खानदान की बहू थीं. धनदौलत की उन के घर में कोई कमी नहीं थी. बेटी सारा चंचल और बला की खूबसूरत थी. अपने आजादखयाल के चलते ही सारा सिंह ने कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी से अलीगंज स्थित आर्य समाज मंदिर में 27 जुलाई, 2013 को शादी की थी.

शादी की दूसरी सालगिरह को यादगार बनाने के लिए वह पति के साथ घूमने निकली थी. वैसे सारा लंबी दूरी की यात्रा हवाई जहाज से ही करती थी. लेकिन आज लंबे सफर के लिए कार से निकलने पर सीमा सिंह को हैरानी हुई. उसी दिन सीमा सिंह अपने बच्चों के साथ दोपहर का खाना खा रही थीं कि उसी बीच उन के छोटे बेटे सिद्धार्थ सिंह के मोबाइल पर किसी अंजान नंबर से काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही उस काल को रिसीव किया, काल डिसकनैक्ट हो गई. कुछ क्षण बाद उसी नंबर से फिर काल आई. सिद्धार्थ ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘तुम्हारे बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है.’’ इतना कहने के बाद दूसरी ओर से फोन डिसकनैक्ट हो गया.

सिद्धार्थ कुछ समझ नहीं पाया. उस ने मोबाइल मां की तरफ बढ़ाते हुए कहा कि किसी ने फोन कर के बताया है कि बहनोई का एक्सीडैंट हो गया है. बेटे के मुंह से एक्सीडैंट की बात सुन कर सीमा अचंभित हुई. क्योंकि अमनमणि के साथ उन की बेटी सारा भी थी.

बेटी की चिंता करते हुए वह उसी नंबर को रिडायल करने लगीं, जिस नंबर से बेटे के मोबाइल पर फोन आया था. वह नंबर मिला ही रही थीं कि उसी दौरान उन के मोबाइल पर सारा के मोबाइल से काल आई. सीमा सिंह ने झट काल रिसीव कर के कहा, ‘‘हैलो, बेटा सारा, क्या हुआ?’’

‘‘मम्मी सारा नहीं, मैं अमन बोल रहा हूं,’’ रोते हुए अमन बोला, ‘‘मम्मी हमारे साथ बड़ी दुर्घटना घट गई है.’’

‘‘रोओ मत बेटा, बताओ क्या हुआ?’’ सीमा सिंह बोलीं.

‘‘मम्मीजी, सारा अब इस दुनिया में नहीं रही. मैं इस के बिना कैसे जीऊंगा.’’ इतना कह कर अमनमणि बिलख-बिलख कर रोने लगा.

बेटी की मौत की खबर सुन कर सीमा सिंह एकदम सन्न रह गईं. वह बोलीं, ‘‘यह तुम क्या कह रहे हो?’’

रोतेरोते अमनमणि त्रिपाठी ने उन्हें बताया कि फिरोजाबाद के पास सिरसागंज इलाके में उस की कार का एक्सीडैंट हो गया.

‘‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता, यह झूठ है.’’ कहते हुए वह भी रोने लगीं. बहन की मौत की खबर पर सिद्धार्थ की आंखों से भी आंसू टपकने लगे.

सिद्धार्थ ने यह खबर बड़े भाई हर्ष को भी फोन कर के दे दी. वह शहर में किसी काम से निकला था. बड़े बेटे के घर आने के बाद सीमा सिंह बेटे व अपने शुभचिंतकों के साथ फिरोजाबाद के लिए रवाना हो गईं. शाम करीब 6-7 बजे वह फिरोजाबाद के सिरसागंज थाने पहुंच गईं. थानाप्रभारी अतर सिंह से उन्होंने बेटी और दामाद के बारे में पूछा. उन्होंने बताया कि एक्सीडैंट बहुत खतरनाक था. सारा की मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी. उस की डेडबौडी पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दी गई है और अमनमणि को ऋषि कुमार पांडेय के अपहरण वाले मामले में हिरासत में ले लिया गया है. सीमा सिंह दामाद से मिलना चाहती थीं, लेकिन थानाप्रभारी ने मिलने से मना कर दिया.

सीमा सिंह की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि पुलिस उन्हें दामाद से मिलने क्यों नहीं दे रही है? वह अमनमणि से मिल कर जानना चाहती थीं कि आखिर यह दुर्घटना कैसे हुई? उन के काफी अनुरोध करने के बाद पुलिस ने उन्हें अमनमणि से मिलने की इजाजत दी. अमन को एक कमरे में कैद कर के रखा गया था. अमन ने सीमा सिंह को बताया कि गाड़ी तेज गति से जा रही थी कि अचानक सामने से साइकिल सवार एक लड़की आ गई. उस लड़की को बचाने के चक्कर में गाड़ी पलटी खा कर गिर गई और सारा सदा के लिए चिरनिद्रा में चली गई.

दामाद की बात सीमा सिंह के गले नहीं उतर रही थी. क्योंकि दुर्घटना में अमनमणि को भी थोड़ीबहुत चोट आनी चाहिए थी, लेकिन उस के शरीर पर एक खरोंच तक नहीं आई थी. उस के कपड़ों पर धूलमिट्टी ही लगी हुई थी, जबकि वह खुद भी उसी कार में था. सीमा सिंह को तब और आश्चर्य हुआ, जब उन्हें थाने में ही अमनमणि त्रिपाठी के बाबा पूर्व विधायक श्यामनारायणमणि त्रिपाठी सहित गोरखपुर के उस के तमाम शुभचिंतक मिले. यह आश्चर्य की बात इसलिए थी कि गोरखपुर से फिरोजाबाद वे लोग इतनी जल्दी कैसे पहुंच गए? इस से सीमा सिंह को लगने लगा कि यह दुर्घटना नहीं हो सकती, बल्कि उन की बेटी सारा को सुनियोजित तरीके से मारा गया है.

अमनमणि त्रिपाठी समाजवादी पार्टी का नेता था, इसलिए सूचना मिलते ही मीडिया से जुड़े लोग वहां पहुंच गए. मीडिया ने इस मामले को खूब उछाला, जिस से यह मामला हाई प्रोफाइल बन गया. घटना की सूचना मिलते ही सारा के मामा एस.के. रघुवंशी, जो अखिलेश सरकार में गृहसचिव के पद पर तैनात हैं, वह भी मौके पर पहुंच गए. उन्हें भी कार दुर्घटना पर संदेह हो रहा था. सारा सिंह के मायके वाले उस की मौत को साजिश के तहत की गई हत्या मान रहे थे. 2 दिनों बाद सारा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली, जिस में सारा की मौत की वजह सिर और छाती में आई बड़ी चोट बताई गई.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के 9 दिनों बाद सीमा सिंह ने फिरोजाबाद के एसएसपी पीयूष श्रीवास्तव से मुलाकात की. उन्होंने उन्हें एक तहरीर देते हुए कहा कि उन की बेटी को इन लोगों ने एक साजिश के तहत मारा है. उस तहरीर के आधार पर एसएसपी ने सिरसागंज थाने में भादंवि की धारा 498ए, 302, 120बी के तहत अमनमणि त्रिपाठी, उस के पिता अमरमणि त्रिपाठी, मां मधुमणि त्रिपाठी आदि के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवा दिया. सपा के युवा नेता अमनमणि त्रिपाठी और रसूख खानदान की बेटी सारा सिंह की दोस्ती कैसे हुई? दोस्ती के रास्ते वे पतिपत्नी के रिश्ते में कैसे बंधे? इन सवालों के जवाब पाने के लिए हमें इन के अतीत के पन्नों में झांकना होगा.

30 वर्षीय अमनमणि त्रिपाठी पूर्व मंत्री और मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन सजा काट रहे सपा के कद्दावर नेता अमरमणि त्रिपाठी का बेटा है. अमनमणि के अलावा उन की 2 बेटियां थीं. अमनमणि दूसरे नंबर का था. अमरमणि त्रिपाठी की दोनों बेटियों को राजनीति से कोई सरोकार नहीं था, लेकिन बेटा अमनमणि त्रिपाठी पिता की राजनीतिक विरासत को आगे संभाल कर रखना चाहता था. पिता से ही उस ने राजनीति के सारे गुर सीख लिए थे. इस में उस के बाबा पूर्व मंत्री श्याम-नारायणमणि त्रिपाठी भीष्मपितामह के रूप में उस के साथ रहे.

धीरेधीरे अमनमणि का राजनीतिक कद बढ़ता गया. वह भी पिता के विधानसभा क्षेत्र लक्ष्मीपुर में लोगों का चहेता बनता गया. इस से अमनमणि लोकसभा चुनाव लड़ने की जुगत में लग गया. उस की मेहनत रंग लाई और पिछले लोकसभा चुनाव में उसे टिकट भी मिल गया. लेकिन उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा. उस के पिता के राजनीतिक बैरी कांगे्रस के कद्दावर नेता अखिलेश सिंह ने बाजी मार ली. चुनावी जंग में अमनमणि के साथ उस के खास दोस्त अमित कुमार उर्फ मानू पांडेय, संदीप त्रिपाठी, रवि शुक्ला, गौरव त्रिपाठी, संतोषमणि त्रिपाठी, आशीष शाही, राज त्रिवेदी, त्रिपुरारी मिश्रा, अनूप शंकर पांडेय, पंकज तिवारी, राजीव ऋषि तिवारी, के. सी. पांडेय, अरुण शुक्ला और अमरदीप शुक्ला ने जीजान से मेहनत की. ये हर वक्त साए की तरह उस के पीछेपीछे चलते रहे.

अमनमणि त्रिपाठी फेसबुक का शौकीन था. बात वर्ष 2012-13 की है. फुरसत के समय वह अपना काफी समय सोशल साइट फेसबुक पर बिताता था. सारा सिंह भी फेसबुक पर दोस्तों से बातें करती रहती थी. अमनमणि त्रिपाठी ने फेसबुक पर सारा सिंह का फोटो देखा तो उस की खूबसूरती पर वह ऐसा लट्टू हुआ कि उस ने उसी समय उसे अपने दिल में बसा लिया. अमनमणि त्रिपाठी के सब से करीबी कहे जाने वाले व्यवसाई मित्र दयालमुनि पांडेय थे. उस ने दयालमुनि पांडेय को सारा सिंह का फोटो दिखाते हुए अपने मन की बात बताई. दयालमुनि पांडेय सारा सिंह को अच्छी तरह से जानते थे. लिहाजा एक दिन उन्होंने सारा सिंह और अमनमणि का आमनेसामने परिचय करा दिया. उस के बाद अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती हो गई.

बताया जाता है कि सारा सिंह की एक व्यवसाई से शादी पक्की हो चुकी थी. उसी बीच अमनमणि और सारा सिंह के बीच दोस्ती की जड़ें गहराई तक पहुंच रही थीं. लखनऊ में अमरमणि त्रिपाठी की लारेंस टैरेस, हजरतगंज में आलीशान कोठी थी.  गोरखपुर छोड़ कर अमनमणि त्रिपाठी लखनऊ रहने लगा. उन दोनों की दोस्ती प्यार में बदल चुकी थी. अमनमणि सारा को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. सारा भी उस पर जान छिड़कती थी. पैसों की उस के पास कोई कमी नहीं थी. वह उस पर दोनों हाथों से पानी की तरह दौलत बहाने लगा था. उस पर इतना पैसा खर्च कर दिया कि उस का हाथ खाली हो गया. वह उसे बहुत ज्यादा चाहता था.

उस से सारा की दूरियां सही नहीं जाती थीं. वह जल्द से जल्द उस से शादी करना चाहता था. सारा का भी हाल कुछ ऐसा ही था. सारा ने अपनी प्रेम कहानी मां से बताई तो सीमा सिंह चौंक गईं. उन्होंने बेटी से कहा, ‘‘क्या तुम अमरमणि त्रिपाठी के बारे में जानती हो? वह मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है. ऐसे आदमी से मैं रिश्ता कतई नहीं जोड़ सकती.’’

मां का टका सा जवाब सुन कर सारा असमंजस में पड़ गई कि वह क्या करे? उस ने यह बात अमनमणि को बताई तो उस ने साफ तौर पर कह दिया कि लोग उस के परिवार के बारे में बिना सिरपैर की बातें करते हैं. उसने सारा से कह दिया कि वह उसे बेपनाह मोहब्बत करता है और शादी उसी से करेगा. उस के बाद वह सारा पर शादी का दबाव बनाने लगा. सारा भी अमनमणि को चाहती थी, लेकिन मां वाली बात से वह फैसला नहीं ले पा रही थी. अंत में उस ने अमनमणि के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर ही लिया. इस के बाद 27 जुलाई, 2013 को अलीगंज के आर्य समाज मंदिर में अमनमणि ने सारा सिंह से विवाह कर लिया. उस विवाह में अमनमणि के गांव के 2 दोस्त गवाह के रूप में मौजूद थे. दोनों ने ही इस शादी की भनक अपने घर वालों तक को नहीं लगने दी.

शादी के 10 दिनों बाद अमनमणि त्रिपाठी सारा से मिलने उस की आलीशान कोठी पर पहुंचा. उस वक्त सीमा सिंह घर पर मौजूद थीं और सारा अपने कमरे में थी. अपने यहां अमनमणि को देख कर सीमा चौंक गईं. वह सीमा सिंह से बोला, ‘‘आंटी सारा कहां है? मैं उसे लेने आया हूं.’’

‘‘लेने.’’ सीमा सिंह चौंकते हुए बोलीं, ‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे तुम्हारा उस पर कोई अधिकार हो.’’

‘‘हां अधिकार है, तभी तो कह रहा हूं. वह मेरी पत्नी है, यकीन न हो तो यह देख लो.’’ कह कर उस ने अपनी पैंट की जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस ने मंदिर में सारा के साथ की गई शादी की फोटो दिखाए, जिस में वह सारा की मांग में सिंदूर भरता हुआ नजर आ रहा था.

फोटो देख कर सीमा सिंह को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सारा को आवाज दी. मां की आवाज सुन कर सारा आई. उन्होंने अमनमणि द्वारा दिखाए फोटो के बारे में पूछा तो सारा ने सारी बात बता दी. बेटी का जवाब सुन कर उन्होंने अपना माथा पकड़ लिया. बेटी को जो करना था, सो वह कर चुकी थी. बात को तूल देने के बजाय सीमा चुप रहीं और अंत में उन्होंने उस रिश्ते को मजबूरी में स्वीकार कर लिया. लेकिन बेटी के इस फैसले से वह खुश नहीं थीं. समाज में सीमा सिंह की भी अपनी इज्जत थी. इस इज्जत को बनाए रखने के लिए वह सामाजिक रीतिरिवाज से यह शादी करना चाहती थीं.

इस संबंध में बात करने के लिए वह गोरखपुर पहुंच कर मैडिकल कालेज में अमनमणि के मातापिता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि से मिलीं. सीमा सिंह ने उन से अमनमणि और सारा द्वारा कोर्ट में शादी करने की बात बताई तो वे भड़क गए. उन्होंने साफ कह दिया कि यह शादी हरगिज मंजूर नहीं है. सीमा के साथ अमनमणि भी था. बेटे की इस करतूत पर अमरमणि ने वहीं पर बेटे के 2-4 थप्पड़ भी जड़ दिए. बात न बनने पर सीमा सिंह वहां से वापस लखनऊ लौट गईं. अमनमणि भी उन्हीं के साथ लखनऊ आ गया. मांबाप से नाखुश अमनमणि 4 महीने तक गोरखपुर नहीं लौटा.

बेटे के इस कदम को अमरमणि त्रिपाठी अपनी बेइज्जती समझ रहे थे. उन्होंने और उन के रिश्तेदारों ने अमनमणि को समझाते हुए सारा से रिश्ता तोड़ने के लिए दबाव डाला, पर अमनमणि सारा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुआ. संकट की इस घड़ी में अमनमणि के नजदीकी दोस्त मानू पांडेय ने उस की सब से ज्यादा मदद की. बाद में अमरमणि त्रिपाठी और मधुमणि को जब पता चला कि मानू ही अमनमणि की आर्थिक मदद कर रहा है तो अमरमणि ने मानू को आगाह करते हुए बेटे से दूर रहने की हिदायत दी. ऐसा न करने पर उसे मधुमिता शुक्ला जैसा हश्र करने की चेतावनी भी दे डाली.

मानू पांडेय अमरमणि त्रिपाठी के रुतबे से अच्छी तरह परिचित था. डर की वजह से उस ने अपने जिगरी दोस्त अमनमणि का साथ छोड़ दिया. वह उस से दूर हो गया. मानू के दूर होते ही अमनमणि की आर्थिक तंगी बढ़ गई. अमनमणि को पता नहीं था कि मानू उस से दूरी क्यों बना रहा है? वह मानू को जब भी बुलाता, वह कोई न कोई काम का बहाना बना देता था. मानू का यह व्यवहार उसे कतई पसंद नहीं था. इसी बात पर अमनमणि मानू से खफा हो गया.

दरअसल मानू पांडेय गोरखपुर जिले के थरुवापार गांव के रहने वाले ऋषि कुमार पांडेय का बेटा था. वैसे उस का नाम अमित कुमार पांडेय था, लेकिन प्यार से सब उसे मानू कहते थे. ऋषिकुमार पांडेय नगर निगम के रजिस्टर्ड ठेकेदार थे. मानू छात्र जीवन से ही नेता था. उसी दौरान वह बसपा के कद्दावर नेता रामभुआल निषाद के संपर्क में आया. इस के बाद उस का अनेक राजनीतिज्ञों के संपर्क होता गया. मानू पांडेय और अमनमणि के बीच दोस्ती होने की भी एक अलग कहानी है. बात 7 मई, 2012 की है. दोपहर के समय बाहुबली पप्पू निषाद नाम का प्रौपर्टी डीलर अपने मुकदमे की तारीख निपटा कर स्कौर्पियो से कचहरी से लौट रहा था. उस की गाड़ी में 5-6 लोग और सवार थे.

वह कचहरी से करीब 500 मीटर पूरब दिशा में पहुंचा था कि तभी 3 मोटरसाइकिलों पर सवार 6 जनों ने उस की कार को चारों तरफ से घेर लिया. उन के हाथों में हथियार थे. इस से पहले कि पप्पू निषाद कुछ समझ पाता, उन लोगों ने उस की गाड़ी पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी. अपनी जान बचाने के लिए पप्पू निषाद गाड़ी से कूद कर छात्रसंघ चौराहे के पास स्थित मेगामार्ट में फिल्मी स्टाइल में शीशा तोड़ कर घुस गया. तब कहीं जा कर उस की जान बची. पप्पू निषाद ने इस मामले में पूर्व मंत्री रामभुआल निषाद, उस के भाई मनोज निषाद के अलावा सूरज निषाद, मनीष कन्नौजिया, रामजीत यादव, गुड्डू कटाई और दिनेशचंद यादव को नामजद किया था.

लेकिन पुलिस तफ्तीश में अमित कुमार पांडेय उर्फ मानू पांडेय का नाम भी सामने आ रहा था. पुलिस ने नामजद आरोपियों को तो गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था, लेकिन मानू पांडेय का कहीं पता नहीं लग पा रहा था. उस की तलाश में पुलिस जीजान से जुटी थी. पुलिस से बचने के लिए मानू इधरउधर छिप रहा था. उसी दौरान उस के दोस्तों ने सलाह दी कि समाजवादी पार्टी के किसी कद्दावर नेता की मदद ली जाए तो बात बन सकती है. क्योंकि प्रदेश में सपा की सरकार थी. मानू सोचने लगा कि वह किस नेता से संपर्क करे. मानू के नाना हड़बड़ शुक्ला अमरमणि त्रिपाठी का कारोबार पिछले 25 सालों से देख रहे थे. उन दिनों अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी की राजनीति भी चमक रही थी. मानू अमनमणि से परिचित तो था, लेकिन संबंध ज्यादा गहरे नहीं थे.

नाना की मार्फत मानू की जब अमनमणि से मुलाकात हुई तो मानू ने उसे अपनी परेशानी बताते हुए मदद मांगी. बताया जाता है कि अमनमणि के संपर्क में आने के बाद पुलिस मानू को गिरफ्तार नहीं कर पाई. इस के बाद उन दोनों की दोस्ती काफी मजबूत हो गई थी. लेकिन इस गलतफहमी की वजह से उन के बीच दूरियां बढ़ गई थीं. उसी दौरान एक नई घटना घट गईं अमनमणि और सारा की शादी के समय मांग में सिंदूर भरते हुए फोटो फेसबुक पर किसी ने डाल दी. फिर वहीं से वह फोटो स्थानीय अखबार हिंदुस्तान ने अपने सभी संस्करणों में छाप दी. फोटो छपते ही अमनमणि बौखला गया.

उसे पता था कि शादी की यह फोटो मानू के अलावा और कि॒सी के पास नहीं है. इसलिए उसे विश्वास हो गया कि यह सब मानू पांडेय ने ही किया होगा. उस ने तय कर लिया कि वह उसे इस का सबक जरूर सिखाएगा. मानू पांडेय और अमनमणि त्रिपाठी की दोस्ती में दरार पड़ चुकी थी. यह दरार उन्हें दुश्मनी के मुकाम तक ले गई. अमनमणि त्रिपाठी एक रसूखदार बाप की औलाद था. बताया जाता है कि मानू की हत्या के लिए उस ने शूटर लगा दिए. अपनी जान की सलामती के लिए मानू और उस के घर वाले भूमिगत हो गए. उन के इधरउधर रहने के बाद उन का अंधियारीबाग वाला मकान खाली पड़ा था.

मौके का फायदा उठाते हुए अमनमणि ने उस मकान पर कब्जा जमा लिया. मानू को जब पता चला तो वह उस से अपना मकान खाली कराने में लग गया. एक साल की कड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मकान वापस मिला. उसी दौरान मानू की मां शीला पांडेय की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. उन्हें एक गंभीर बीमारी हुई थी. मानू पांडे और उस का बड़ा भाई अनुराग पांडेय दिल्ली में अपनी बहन के पास थे. दोनों भाइयों ने अपने पिता से कह दिया कि वह मां को दिल्ली ले कर आ जाएं. तब ऋषि पांडेय अपनी स्कौर्पियो से पत्नी को दिल्ली के लिए ले कर चल दिए.

5 अगस्त, 2014 की रात को मानू की मां शीला की तबीयत बेहद नाजुक हो गई. उस समय ऋषि पांडेय और उन की बड़ी बहू प्रियंका ही घर पर थे, वे उन्हें ले कर दिल्ली के लिए निकल गए. उन्होंने आक्सीजन मास्क लगवा दिया था, ताकि रास्ते में शीला को कोई परेशानी न हो. कहीं से यह सूचना अमनमणि त्रिपाठी को मिल गई तो वह अपने साथियों संदीप त्रिपाठी व रवि शुक्ला के साथ लालबत्ती लगी फौरच्यूनर गाड़ी से निकल गया. रात डेढ़ बजे के करीब लखनऊ के आवास विकास मुख्यालय के सामने उस ने अपनी गाड़ी ऋषि पांडे की गाड़ी के सामने रोक दी और पिस्टल की नोक पर ऋषि पांडेय का अपहरण कर के अपनी गाड़ी में बैठा लिया.

पत्नी की सीरियस हालत का हवाला देते हुए ऋषि पांडेय ने छोड़ने की काफी मनुहार की, लेकिन अमनमणि का दिल नहीं पसीजा. वह उन्हें हजरतगंज में स्थित अपनी कोठी में ले गया. वहां ले जा कर उस ने ऋषि पांडेय को एक कमरे में बंद कर दिया. उन तीनों ने उन की जम कर धुनाई की. फिर अमनमणि ने उन से 1 लाख रुपए की मांग की. वह जानता था कि पत्नी के इलाज के लिए दिल्ली जा रहे हैं तो उन के पास पैसे जरूर होंगे. अमनमणि त्रिपाठी उन पर पैसों के लिए दबाव बना रहा था कि तभी पता नहीं उस के दिमाग में क्या बात आई कि उस ने उन्हें अपने घर में रखना उचित नहीं समझा. उसी वक्त उन्हें गाड़ी में बैठा कर दूसरे ठिकाने पर ले जाने लगा. वह बीच रास्तें में था कि उस के किसी दोस्त का फोन आया.

उस ने बताया कि पुलिस को तुम्हारे बारे में पता चल चुका है. फोन आते ही अमनमणि ने अपनी योजना बदल दी. उस ने अपनी गाड़ी का रुख वीवीआईपी इलाके की तरफ कर दिया और वहीं पर चलती गाड़ी से धक्का मार कर उन्हें गिरा दिया और साथियों सहित फरार हो गया. उधर अनुराग पांडेय की पत्नी प्रियंका ने अपने ससुर के अपहरण की खबर पुलिस के अलावा दिल्ली में मौजूद अपने पति और देवर को दे दी थी. पिता के अपहरण की सूचना मिलते ही अनुराग और मानू रात में ही कार से लखनऊ के लिए रवाना हो गए. पुलिस भी ऋषि पांडेय को खोजने में जुट गई.

आखिर रात 3 बजे के करीब ऋषि पांडेय वीवीआईपी इलाके में सड़क के किनारे पड़े मिल गए. उन्होंने पुलिस को बता दिया कि अमरमणि त्रिपाठी के बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने ही अपने साथियों के साथ मिल कर उन का अपहरण किया था. जिस इलाके में ऋषि पांडेय मिले थे, वह इलाका थाना कैंट क्षेत्र में आता था. इसलिए वहीं पर अमनमणि त्रिपाठी, रवि शुक्ला और एक अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 304, 386, 323, 504, 506 के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

पुलिस ने थोड़े प्रयास के बाद रवि शुक्ला को गिरफ्तार कर लिया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. 30 अगस्त, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ न्यायालय में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया. पुलिस की पकड़ से अमनमणि त्रिपाठी और संदीप त्रिपाठी अभी भी दूर थे. पुलिस संदीप त्रिपाठी के ऊपर 5 हजार रुपए इनाम भी घोषित कर चुकी थी. 20 दिसंबर, 2014 को उत्तर प्रदेश एसटीएफ की गोरखपुर इकाई के प्रभारी सत्यप्रकाश सिंह ने संदीप त्रिपाठी को गोरखपुर के खोराबार इलाके के खिरवनिया गांव के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस के अन्य साथी भागने में सफल रहे.

टीम ने उस के कब्जे से एक पिस्टल, 5 कारतूस, 3 मोबाइल फोन और 6 सिम बरामद किए. 22 दिसंबर, 2014 को पुलिस ने उस के खिलाफ भी न्यायलय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया. तीसरे आरोपी अमनमणि की पुलिस सरगर्मी से तलाश कर रही थी. मार्च, 2015 में विधानसभा अध्यक्ष माताप्रसाद पांडेय का एक कार्यक्रम सिद्धार्थनगर जिले में आयोजित हुआ. वहां प्रदेश के बड़ेबड़े नेता पहुंचे थे. मंत्री शिवपाल यादव के ठीक बगल वाली सीट पर अमनमणि त्रिपाठी भी नजर आया तो प्रैस फोटोग्राफरों ने उस का फोटो खींच लिया.

दूसरे दिन समाचार पत्रों में इस तसवीर को प्रमुखता से छापा गया. पुलिस फिर उसे गिरफ्तार करने के लिए सक्रिय हुई तो वह फिर से भूमिगत हो गया. अदालत ने अमनमणि त्रिपाठी को भगोड़ा घोषित कर दिया. इस के बाद पुलिस ने अदालत से उस के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 82/83 (कुर्की) आदेश करा कर उस के गोरखपुर के कोतवाली इलाके के दुर्गाबाड़ी रोड आवास पर नोटिस चस्पा कर दिया. इस बीच सारा, पति की हकीकत जान चुकी थी. उसे जब पता चला कि उस का पति आपराधिक छवि का है तो उस के दिल को काफी ठेस पहुंची.

उस ने पति को समझाने की काफी कोशिश की कि वह गुनाह के रास्ते से तौबा कर के अच्छे रास्ते पर चले, पर वह पत्नी की बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देता. जब वह यही बात बारबार कहती तो वह उस की पिटाई कर देता. सारा यह सारी बातें मां से कह देती थी, तब सीमा सिंह नाराज होते हुए अमनमणि को फटकार सुनाती थी. ऐसा कई बार हुआ था. जब वह सारा की आए दिन पिटाई करने लगा तो सीमा सिंह ने गोमतीनगर में एक फ्लैट किराए पर दिलवा दिया और कहा कि जब तक तुम्हारे मांबाप इस रिश्ते को स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक तुम सारा को ले कर वहां रह सकते हो. लेकिन अमनमणि ने ऐसा नहीं किया.

वह इधरउधर रह कर सिर छिपाता रहा तो सारा मायके में रही. धीरेधीरे सारा और अमन के बीच दूरियां बढ़ती गईं. दूरियां बढ़ने की एक वजह यह भी थी कि अमन उस पर शक करने लगा था कि उस की पत्नी का झुकाव कहीं उसी व्यवसाई की ओर तो नहीं हो रहा है, जिस से उस की शादी होने वाली थी. शक के दौरान वह मौका मिलने पर पत्नी के दोनों मोबाइल के चारों नंबरों की काल डिटेल्स चेक करता रहता था. कोई भी नंबर उसे अंजान लगता तो वह उसे ले कर सारा के साथ झगड़ा और मारपीट करता. इन सब के पीछे खास वजह यह थी कि वह जान चुका था कि उस की सच्चाई पत्नी के सामने खुल चुकी है. वह उस की आपराधिक छवि को जान चुकी है.

पति से आजिज हो कर सारा मां से कहने लगी कि वह किसी तरह से अमनमणि से तलाक दिला दें. वह उस के साथ जीवन नहीं बिता सकेगी. रातरात भर वह अवारा दोस्तों के साथ घूमता है. बेटी की बात सुन कर सीमा सिंह को काफी आघात पहुंचा था. उन्होंने बेटी को तलाक दिलाने का फैसला ले लिया. बेटी ने जो गलती की थी, उस की सजा उसे मिल चुकी थी. इसलिए एक दिन उन्होंने अमनमणि को समझाते हुए कहा कि वह सारा को तलाक दे दे. अमनमणि ने उस समय तो उन की बात का जवाब नहीं दिया, पर बाद में उस ने सारा से कह दिया कि वह चाहे जो कर ले, पर उसे किसी कीमत पर तलाक नहीं देगा. यह बात जून, 2015 की थी.

उस के बाद पता नहीं क्या हुआ कि अचानक अमनमणि के व्यवहार में परिवर्तन आ गया. उस ने सीमा सिंह से वादा किया कि वह सारा को अब कोई परेशानी नहीं होने देगा, उसे बड़े प्यार से रखेगा. उस पर कभी हाथ भी नहीं छोड़ेगा. यही नहीं, उस ने हमेशाहमेशा के लिए अपने मांबाप का घर छोड़ने का भी वादा कर लिया. पति के अंदर आए इस बदलाव से सारा काफी खुश हुई. कोमल दिल की सारा ने पति को माफ कर दिया और नए तरीके से जिंदगी शुरू करने के ख्वाब देखने लगी.

अमन ने उस से कहा कि वह पिछली सालगिरह पर कोई खुशी नहीं मना पाया. उन की खुशियों में कोई भी शामिल नहीं हुआ. इस बार वह सालगिराह बड़ी धूमधाम से मनाएगा. उस ने इस मौके पर दिल्ली, चंडीगढ़ और शिमला घूमने का प्रस्ताव सारा के सामने रखा तो सारा ने हां कर दी. वह बड़ी खुश थी. लेकिन उसे क्या पता था कि जो खुशी पाने के लिए वह फूली नहीं समा रही, वह खुशी उसे कभी नहीं मिलेगी. पूरी योजना बनाने के बाद 9 जुलाई, 2015 की सुबह सफेद कलर की मारुति स्विफ्ट कार ले कर अमनमणि सारा की कोठी के सामने पहुंच गया. सारा चहकते हुए उस में बैठ गई.

अमनमणि उसे ले कर लखनऊ से दिल्ली जाने के लिए कह कर निकला. और दिन के एक बजे के करीब फिरोजाबाद के सिरसागंज इलाके में एक लड़की को बचाने के चक्कर में एक्सीडैंट हो गया. सारा की घटनास्थल पर ही मौत हो गई, लेकिन अमन को एक खरोंच तक नहीं आई. बहरहाल, घटना के बाद पुलिस ने अमनमणि त्रिपाठी को ऋषिकुमार पांडेय के अपहरण के केस में गिरफ्तार कर लिया था. पुलिस को उस की पिछले 11 महीने से तलाश थी. मृतका सारा सिंह की मां सीमा सिंह से टेलीफोन पर बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सारा की दुर्घटना में हुई मौत एक बड़ा षडयंत्र है.

यह स्वाभाविक मौत नहीं, बल्कि सीधेसीधे हत्या है. यह हत्या पूर्व मंत्री और आपराधिक छवि के सपा नेता अमरमणि त्रिपाठी और उन की पत्नी मधुमणि त्रिपाठी ने मिल कर की है. जिस क्षेत्र में घटना घटी है, उस के आसपास का क्षेत्र अमरमणि के प्रभाव वाला है. उस क्षेत्र में बड़ी संख्या में अमरमणि के रिश्तेदार भी रहते हैं. उन्होंने इस की सीबीआई जांच कराने की मांग की है.

कथा लिखे जाने तक मामले की जांच थाना पुलिस कर रही थी. कथा संकलन तक प्रदेश सरकार ने सीबीआई जांच की संस्तुति नहीं की थी. Uttar Pradesh Crime

—कथा में दयालमुनि पांडेय परिवर्तित नाम है, कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Dehradun Crime: मंगेतर की खातिर

Dehradun Crime: नीरज अपने जिगरी दोस्त राजेश की मंगेतर निशा को चाहने लगा था. राजेश के मना करने के बावजूद भी नीरज नहीं माना तो राजेश को अपने हाथ दोस्त के खून से रंगने ही पड़े.

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की एक कालौनी है अंसल ग्रीन विहार. इसी कालोनी की एक कोठी में 6 सितंबर, 2015 की सुबह अफरातफरी मच गई. इस कोठी में किसी ने एक युवक की हत्या कर दी थी. वह कोठी दुबई गए हुए एक परिवार की थी, जिसे ज्ञानेंद्र वर्मा नाम के एक शख्स ने 2 सितंबर को ही किराए पर लिया था. ज्ञानेंद्र इस कोठी में एक पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट शुरू करने वाले थे. इस की तैयारी के लिए वहां फरनीचर आदि का काम चल रहा था.

हत्या की बात घर में काम करने वाली बाई मन्नू के आने के बाद पता चली थी. 6 सितंबर को सुबह के समय बाई मन्नू जब काम करने के लिए आई तो उसे कोठी का मेन गेट रोजाना की तरह बंद मिला. गेट खुलवाने के लिए मन्नू ने ज्ञानेंद्र की पत्नी स्वरांजलि वर्मा के मोबाइल पर फोन किया. स्वरांजलि पति के साथ पहली मंजिल पर सो रही थीं. फोन की घंटी की आवाज ने उन की नींद तोड़ दी. उन्होंने फोन की स्क्रीन पर मन्नू का नंबर देखा तो समझ गईं कि वह गेट पर आ गई है. गेट की चाबी ग्राउंड फ्लोर पर सो रहे नीरज के पास थी.

स्वरांजलि ने ऊपर से ही नीरज को गेट खोलने के लिए आवाज दी. कई बार आवाज लगाने के बाद भी नीरज के कमरे से कोई आवाज नहीं आई तो वह खुद नीचे आईं और नीरज के कमरे का दरवाजा खटखटा कर आवाज देने लगीं. लेकिन इस के बावजूद भी दरवाजा नहीं खुला तो वह बुदबुदाने लगीं, ‘‘पता नहीं ऐसे घोड़े बेच कर क्यों सो रहा है.’’

उस कमरे का एक दरवाजा पीछे की तरफ भी था. वह खुला हुआ था. स्वरांजलि पिछले दरवाजे से कमरे में गईं तो देखा कि नीरज आैंधे मुंह कमरे के फर्श पर खून से लथपथ पड़ा था. यह देख कर स्वरांजलि घबरा गईं. वह तेज कदमों से पति के पास पहुंचीं और उन्हें नींद से जगा कर बात बताई. पत्नी की बात सुन कर उन की नींद उड़ गई थी. वह पत्नी के साथ नीचे आए और उन्होंने भी उस के कमरे में झांका तो वास्तव में नीरज लहूलुहान फर्श पर पड़ा था. ज्ञानेंद्र वर्मा ने तुरंत इस की सूचना पुलिस को दी.

इस के बाद ज्ञानेंद्र वर्मा व उन की पत्नी ने कालोनी में शोर मचा दिया. शोर सुन कर कुछ ही देर में कालोनी के तमाम लोग उस कोठी के पास जमा हो गए. यह कालोनी थाना राजपुर क्षेत्र में आती थी. इसलिए सुबहसुबह हत्या की खबर मिलते ही थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. पुलिस ने कमरे में जा कर देखा तो वहां एक युवक की लाश खून से लथपथ फर्श पर औंधे मुंह पड़ी थी. ज्ञानेंद्र वर्मा ने उस का नाम नीरज बताया. पूरे कमरे में खून ही खून था. सामने दीवार पर खून से लिखा था, ‘मेरी बहन से रेप किया है.’ इस के अलावा वहां पर तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, घर में इस्तेमाल होने वाले 2 चाकू पड़े थे.

देख कर लग रहा था कि इन्हीं सब चीजों से उस की हत्या की गई थी. थानाप्रभारी ने इस की सूचना एसएसपी पुष्पक ज्योति को दी तो वह भी नगर पुलिस अधीक्षक अजय सिंह को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने भी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. डौग स्क्वायड टीम को भी बुलवा लिया गया. खोजी कुत्ता लाश को सूंघने के बाद कोठी की बाउंड्री वाल के पास गया और भौंकने लगा. कुत्ते से हत्यारे के बारे में कोई क्लू नहीं मिला. लाश को देख कर लग रहा था कि हत्यारे ने उस की हत्या काफी खुन्नस में की थी. उस के गले पर, चेहरे, हाथ, छाती, पेट, सिर आदि पर 20 के करीब घाव थे. वहां पर जो चाकू पड़े थे, वे भी मुड़ गए थे. तवा और प्रेशर कुकर के ढक्कन पर भी खून के निशान थे.

तवे का हत्था टूटा हुआ था. लग रहा था कि हत्यारा कोई ऐसा आदमी रहा होगा, जो नीरज को अच्छी तरह जानता होगा. कोठी का गेट अंदर से बंद था तो हत्यारा कोठी से बाहर कैसे गया? यह जानने के लिए पुलिस ने कोठी का निरीक्षण किया तो कोठी की जो बाहरी दीवार थी, उस पर खून से सने पैरों के धब्बे दिखे, साथ ही दीवार के पास मृतक नीरज का आधार कार्ड मिला. लग रहा था कि हत्यारा शायद दीवार फांद कर गया होगा. क्योंकि खोजी कुत्ता भी वहीं जा कर भौंक रहा था.

घटनास्थल से सारे सबूत इकट्ठे करने के बाद पुलिस ने उस कोठी में किराए पर रह रहे ज्ञानेंद्र वर्मा से बात की तो उन्होंने बताया कि उन का सरस्वती पौलिटैक्निक के नाम से एक शिक्षण संस्थान है. वह अब उस संस्थान को इस कोठी में शिफ्ट करने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि मृतक नीरज ने उन के यहां से ही इलैक्ट्रिकल का 3 साल का डिप्लोमा किया था. वह मुरादाबाद के लाइनपार क्षेत्र में प्रकाश नगर का था. नीरज एक अच्छा छात्र था, इसलिए उस से उन के पारिवारिक संबंध हो गए थे. अपने डिप्लोमा का प्रमाण पत्र लेने व काम की तलाश में वह 3 सितंबर को यहां आया था. यहां सामान आदि शिफ्ट कराने में भी नीरज ने काफी सहयोग किया था.

इसी बीच 4 सितंबर शुक्रवार को उन के ससुर की तबीयत ज्यादा खराब हो गई थी. उन्हें कैंसर की शिकायत थी, तब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में एडमिट करवाया गया था. उन्हें देखने के लिए वह पत्नी स्वरांजलि के साथ दिल्ली चले गए थे. 5 सितंबर शनिवार को नीरज ने उन्हें वाट्सएप से बताया कि उस के मामा का लड़का उस के पास आया हुआ है. एक रात रुक कर वह अगले दिन चला जाएगा. इस पर उन्होंने कोई आपत्ति नहीं की. 5-6 सितंबर की रात एक, डेढ़ बजे मैं पत्नी के साथ दिल्ली से यहां लौट आए. कोठी का दरवाजा नीरज ने ही खोला था. थकान की वजह से पत्नी जल्द ही ऊपर के कमरे में सोने चली गईं.

उन्होंने अपने लिए खिचड़ी बनाई. खिचड़ी खा कर वह भी सोने के लिए कमरे में चले गए. मेन गेट की चाबी नीरज के पास ही थी. इसलिए सुबह के काम वाली बाई के आने के बाद गेट खोलने की जरूरत पड़ी तो पता चला कि नीरज कमरे में इस हालत में पड़ा है. ज्ञानेंद्र वर्मा से बात करने के बाद पुलिस ने नीरज की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और नीरज के घर वालों को खबर भेज कर देहरादून आने को कहा.

एसएसपी सुनयना ज्योति ने एसपी सिटी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी पंकज पोखरियालव अन्य तेजतर्रार पुलिसकर्मियों के अलावा साइबर सेल के इंचार्ज को भी शामिल किया. पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक नीरज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. दूसरा नीरज के यहां उस के मामा का जो लड़का आया था, उस पर भी शक हुआ. क्योंकि वारदात के बाद से वह गायब था. दीवार पर खून से जो मजमून लिखा था, उस से यही लग रहा था किसी लड़की के चक्कर में नीरज की हत्या की गई थी.

पुलिस ने नीरज के मामा के लड़के के बारे में जानकारी निकलवाई तो पता चला कि वह देहरादून आया ही नहीं था. फिर जो लड़का नीरज के पास आया था, वह कौन था? पुलिस यह जानने में जुट गई. सर्विलांस टीम ने नीरज की काल डिटेल्स की जांच की तो पता चला कि 3 सितंबर के बाद नीरज की एक नंबर पर 13 बार बात हुई थी. वह नंबर था राजेश सैनी का, जो मुरादाबाद के प्रकाशनगर का रहने वाला था और एक खास बात कि घटना के समय उस की लोकेशन भी राजपुर, देहरादून में ही थी. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो राजेश सैनी ने ही काल रिसीव की. उस ने बताया कि इस समय वह उत्तराखंड के शहर हल्द्वानी में है. पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हुआ.

लिहाजा एसएसपी ने एक पुलिस टीम मुरादाबाद भेज दी. देहरादून पुलिस मुरादाबाद के मझोला थाने की पुलिस की मदद से 7 सितंबर को राजेश सैनी के घर प्रकाश नगर पहुंच गई. पुलिस को राजेश सैनी अपने घर की छत पर सोता मिल गया. जबकि वह खुद को हल्द्वानी में होने की बात बता रहा था. पुलिस ने उस से नीरज की हत्या के बारे में पूछताछ की तो वह इस तरह से चौंका, जैसे उसे कुछ पता ही न हो. थानाप्रभारी पंकज पोखरियाल ने पूछा, ‘‘तुम तो कह रहे थे कि हल्द्वानी में हूं और निकले मुरादाबाद में. तुम यह झूठ क्यों बोले?’’

‘‘सर, मैं ने झूठ नहीं बोला. मैं पिछले 4-5 दिनों से हल्द्वानी में ही था. आज सुबह ही वहां से घर लौटा हूं.’’ राजेश ने सफाई दी.

‘‘इस दौरान तुम्हारी नीरज से फोन पर कोई बात हुई थी या नहीं?’’ थानाप्रभारी ने कहा.

‘‘नहीं सर, मेरी उस से कोई बात नहीं हुई. दरअसल हल्द्वानी जा कर मैं काम में इतना व्यस्त हो गया कि उस से बात नहीं कर पाया.’’ राजेश ने जवाब दिया.

राजेश का जवाब सुन कर थानाप्रभारी समझ गए कि यह सरासर झूठ बोल रहा है, क्योंकि 5-6 सितंबर को उस के फोन की लोकेशन देहरादून में थी और उस ने अपने फोन से नीरज से कई बार बात भी की थी. इस के अलावा भी उस की नीरज से 13 बार बात हुई थी. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने राजेश से सख्ती  से पूछताछ की तो राजेश को सच बोलने के लिए मजबूर होना पड़ा. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही देहरादून जा कर अपने खास दोस्त नीरज की हत्या की थी.

हत्यारा पुलिस के चंगुल में आ चुका था. उसे ले कर थानाप्रभारी देहरादून लौट आए. थाने में पूछताछ के दौरान राजेश ने अपने जिगरी दोस्त की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली. नीरज सैनी उत्तर प्रदेश के महानगर मुराराबाद के लाइनपार के मोहल्ला प्रकाशनगर की गली नंबर 3 का रहने वाला था. उस के पिता भूरा सिंह सैनी भारतीय खाद्य निगम में नौकरी करते हैं. भूरा सिंह के परिवार में पत्नी राजो के अलावा 4 बेटे थे, जिन में नीरज सैनी सब से छोटा था. नीरज ने देहरादून से सरस्वती पौलिटैक्निक से वर्ष 2013 में इलैक्ट्रिकल ट्रेड में डिप्लोमा किया था. यह पौलिटैक्निक ज्ञानेंद्र वर्मा चलाते थे.

नीरज मेहनती और अच्छे व्यवहार वाला था. इसलिए ज्ञानेंद्र वर्मा उस से बहुत प्रभावित थे. वह उसे अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे. बाद में ज्ञानेंद्र वर्मा का भी नीरज के घर आनाजाना हो गया था. नीरज भी जब कभी देहरादून आता तो उन के यहां ही रुकता था. नीरज की गली से एक गली पहले राजेश सैनी रहता था. एक ही मोहल्ले में रहने की वजह से राजेश और नीरज के बीच दोस्ती हो गई थी. और दोस्ती भी ऐसीवैसी नहीं, दांत काटी थी. दोनों का ही एकदूसरे के घर भी आनाजाना था. दोनों ही दोस्त अपने दिल की बातें एकदूसरे से शेयर करते थे.

करीब 6 महीने पहले राजेश के भाई रमेश की शादी नैनीताल में हुई थी. उसी दौरान वहीं निशा नाम की लड़की से राजेश का रिश्ता तय हो गया. उस शादी में नीरज भी गया था. निशा बेहद खूबसूरत थी. नीरज उसे मन ही मन चाहने लगा था. एक दिन उस ने राजेश को विश्वास में ले कर उस की मंगेतर निशा का फोन नंबर ले लिया. इस के बाद नीरज ने निशा से नजदीकी बढ़ाने के लिए संदीप राणा के नाम से फोन किया. उस ने यह भी बता दिया कि वह राजेश का दोस्त है. अपने होने वाले पति का जानकार होने की वजह से निशा उस से बातें कर लेती थी. फिर नीरज ने उसे मैसेज भी भेजने शुरू कर दिए. निशा को जो मैसेज भेजे जा रहे थे, उन का आशय वह समझ रही थी.

फिर एक दिन निशा ने यह बात राजेश को बताई कि संदीप राणा नाम का तुम्हारा कोई दोस्त उसे उल्टेसीधे मैसेज भेजता है. राजेश संदीप राणा नाम के किसी शख्स को जानता तक नहीं था. उस ने अपनी मंगेतर से संदीप राणा का फोन नंबर मांगा तो उस ने वह नंबर राजेश को दे दिया. नंबर देख कर राजेश चौंका, क्योंकि वह नंबर किसी और का नहीं, उस के जिगरी दोस्त नीरज का था. राजेश ने नीरज से शिकायत की तो उस ने झूठ बोलते हुए कहा कि उस ने मजे लेने के लिए निशा को फोन किए थे. इतना ही नहीं, उस ने राजेश से इस की माफी भी मांग ली. राजेश ने भी उसे माफ कर दिया.

इस के बाद नीरज ने निशा को फोन किया और शिकायत भरे लहजे में कहा, ‘‘निशाजी, राजेश मेरा बचपन का दोस्त है. आप ने मेरे बारे में उसे बता कर अच्छा नहीं किया. आप ने मेरी बचपन की दोस्ती में दरार डाल दी. आप को पता है कि वह अब मुझ से नाराज है और बोल तक नहीं रहा. जब आप ने बात बता ही दी है तो मैं भी अपने बारे में बताना चाहता हूं कि मैं एक डिप्लोमा इंजीनियर हूं. मैं ने देहरादून से डिप्लोमा किया है. कुछ ही दिनों में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल जाएगी, जबकि जिस राजेश के साथ तुम्हारी शादी तय हुई है, वह कुछ भी नहीं करता है.

‘‘देखो निशा, मैं आप को इसलिए फोन करता हूं कि आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो. आप मेरी अच्छी दोस्त हैं और फोन करना बंद मत करना.’’ नीरज ने इस तरह की लच्छेदार बातें कर के निशा को काफी प्रभावित कर लिया.

इस के बाद वह फिर से निशा को मैसेज भेजने और फोन कर के बातें करने लगा. निशा को भी उस से बातें करना अच्छा लगने लगा. निशा की नीरज से जो भी बातें होती थीं, वह उस ने अपने तक ही सीमित रखीं. उस ने राजेश को कुछ नहीं बताया, लेकिन राजेश को किसी तरह पता चल गया कि नीरज अब भी उस की मंगेतर से बातें करता है. तब उस ने निशा का सिम बदलवा दिया. लेकिन निशा ने अपना नया नंबर नीरज को दे दिया. यानी इन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी रहा. एक बार देर रात को राजेश ने मंगेतर निशा से बात करने के लिए उस का नंबर मिलाया तो वह व्यस्त मिला. उसी समय उस ने नीरज का नंबर मिलाया तो उस का नंबर भी व्यस्त मिला.

करीब आधेपौना घंटा तक दोनों के फोन व्यस्त रहने पर राजेश को शक हो गया कि वही दोनों आपस में बतिया रहे होंगे. इस से राजेश को विश्वास हो गया कि नीरज ने उस की मंगेतर का पीछा नहीं छोड़ा है. इसी बात को ले कर उस का नीरज से झगड़ा भी हो गया. यह बात घटना से 3-4 महीने पहले की है. इस बात को ले कर दोनों के बीच दरार पैदा हो गई थी. अब राजेश नीरज से रंजिश रखने लगा था. वह काफी परेशान था कि नीरज उस की बात क्यों नहीं मान रहा है. कुछ दिनों बाद नीरज ने राजेश को फिर से मना लिया.

घटना के करीब 10 दिन पहले राजेश ने नीरज से उस का मोबाइल फोन मांगते हुए कहा कि यार मेरा मोबाइल कहीं गिर गया है. तेरे पास 2 मोबाइल हैं. मैं बाहर जा रहा हूं. 3-4 दिनों बाद वापस आऊंगा, तब तक के लिए मुझे अपना एक मोबाइल दे दे. दोस्ती की खातिर नीरज ने अपना एक मोबाइल राजेश को दे दिया. लेकिन नीरज ने उस में से अपना सिम निकाल कर कहा, ‘‘तुम इस में दूसरा सिम डाल लेना.’’

राजेश बोला, ‘‘यार, तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता. 3-4 दिनों की तो बात है. क्या फर्क पड़ता है.’’

‘‘यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि इस में मेरे फोन आएंगे.’’ नीरज बोला, ‘‘तुम नया सिम डाल लेना.’’

राजेश ने उस की एक न सुनी और जबरदस्ती उस का फोन सिम सहित ले गया.

नीरज के मना करने के बाद भी राजेश नीरज का सिमकार्ड सहित मोबाइल ले कर चला गया. राजेश ने सब से पहले नीरज के फोन की काल डिटेल्स और मेल बौक्स चैक किया. मैसेज बौक्स में उसे तमाम मैसेज मिले, जो निशा और नीरज ने एकदूसरे को भेजे थे. इस के अलावा काल डिटेल्स से यह भी पता लग गया कि उन दोनों ने कबकब और कितनी देर तक बातें की थीं.  यह देख कर राजेश का खून खौल गया कि जिस दोस्त ने उस से कसम खाई थी, वही उस की पीठ में छुरा घोंप रहा है. वह नीरज को दगाबाज समझने लगा.

राजेश ने उसी दिन ठान लिया कि अब वह नीरज को सबक जरूर सिखाएगा. इस के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. अगले दिन राजेश ने नीरज का मोबाइल लौटा दिया. मोबाइल लौटाते समय राजेश ने उस से कहा, ‘‘तुम अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहे हो. मेरी निशा को अब भी फोन करते हो. मैं कहता हूं कि अब भी मान जाओ तो अच्छा रहेगा.’’

दोनों में फिर से कहासुनी हुई. नीरज बहुत चालाक था. उस ने किसी तरह राजेश को फिर से मना लिया.

नीरज ने देहरादून के जिस पौलिटैक्निक इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, वहां से उसे प्रमाण पत्र लेने 3 सितंबर को जाना था. 6 सितंबर को उस का देहरादून की ही एक निजी कंपनी में इंटरव्यू था. इसलिए उस ने राजेश से कह दिया कि अब देहरादून से लौट कर ही इस बारे में हम लोग बात करेंगे. यानी  3 सितंबर, 2015 को नीरज देहरादून चला गया. नीरज ने जिस इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा किया था, उस के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा ने अब अंसल ग्रीन विहार कालोनी में एक कोठी किराए पर ले ली थी. अपना इंस्टीट्यूट वह उसी कोठी में शिफ्ट कर रहे थे. सामान शिफ्ट कराने में नीरज ने भी ज्ञानेंद्र ने मदद की थी.

राजेश नीरज की रगरग से वाकिफ था. उसे उम्मीद थी कि वह उसे भले ही कितने वादे कर ले, लेकिन वह उस की मंगेतर से बात करना बंद नहीं करेगा. वह इसी असमंजस में था कि इस स्थिति में वह क्या करे. घुमाफिरा कर उस के दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि ऐसे दगाबाज दोस्त की तो एक ही सजा है, मौत.

यह खतरनाक निर्णय लेने के बाद वह भी 5 सितंबर की सुबह देहरादून के लिए चल पड़ा. देहरादून पहुंच कर राजेश ने नीरज को फोन किया, ‘‘नीरज, मैं भी देहरादून में ही हूं. तुम देहरादून में कौन सी जगह हो.’’

‘‘देखो राजेश, मैं इस समय व्यस्त हूं. मुरादाबाद आ कर ही बात हो सकेगी.’’ नीरज ने उसे टालते हुए कहा.

लेकिन राजेश भी कहां मानने वाला था. वह दोस्ती का वास्ता दे कर बोला, ‘‘देखो नीरज, मैं यहां पर अकेला बोर हो रहा हूं. देहरादून मेरा देखा हुआ नहीं है. जब तुम यहां पढ़ रहे थे तो तुम ने कितनी बार मुझे देहरादून बुलाया था और अब मैं आ गया हूं तो तुम मुंह फेर रहे हो.’’

नीरज राजेश की बातों में आ गया. वह बोला, ‘‘तुम इस समय कहां हो?’’

‘‘मैं घंटाघर पर हूं.’’

‘‘ठीक है, वहीं रहो, मैं थोड़ी देर में वहीं पहुंचता हूं.’’ तब नीरज औटो से घंटाघर चला गया और राजेश को जाखन ले गया. वहां दोनों ने शराब पी और वहीं पर खाना खाया.

खाना खाने के बाद राजेश नीरज से बोला, ‘‘यार, शराब में मजा नहीं आया. थोड़ीथोड़ी और हो जाए तो अच्छा रहेगा.’’ तब राजेश ने एक अद्धा शराब और खरीद ली. राजेश ने कहा कि इसे तुम्हारे कमरे पर पीएंगे. उस समय इंस्टीट्यूट के संचालक ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी के साथ दिल्ली गए हुए थे. वहां उन के ससुर की तबीयत खराब थी. नीरज वहां अकेला था. इसलिए नीरज राजेश को कमरे पर ले आया. वहीं पर दोनों ने शराब पी.

कोठी पर पहुंच कर नीरज ने फोन व मैसेज द्वारा अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा को बता दिया कि उस से मिलने उस के मामा का लड़का आया है. वह कल चला जाएगा. ज्ञानेंद्र ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की, क्योंकि वह उस पर बहुत विश्वास करते थे. ज्ञानेंद्र ने नीरज को बता दिया था कि वह पत्नी के साथ आज रात को ही देहरादून लौट आएंगे. नीरज और राजेश दोनों आपस में बातें करते रहे. निशा को ले कर दोनों में तकरार भी हुई. राजेश घटना को अंजाम देने की योजना बनाता रहा. लेकिन उसे मौका नहीं मिल रहा था, क्योंकि नीरज अपने सर ज्ञानेंद्र वर्मा के आने का इंतजार कर रहा था.

5-6 सितंबर की रात डेढ़ बजे ज्ञानेंद्र वर्मा अपनी पत्नी स्वरांजलि के साथ घर लौटे तो कोठी के गेट का ताला नीरज ने ही खोला. उन से चाय पीने के लिए पूछा तो उन्होंने मना कर दिया. उन्हें उस समय भूख लग रही थी. पत्नी पहली मंजिल पर अपने बैडरूम में चली गईं और वह खुद किचन में खिचड़ी बनाने लगे. तब नीरज उन्हीं के पास खड़ा बातें करता रहा. खिचड़ी खाने के बाद वह भी बैडरूम में जा कर सो गए. नीरज दिन भर का थका था. ज्ञानेंद्र के जाने के बाद वह भी अपने कमरे में चला गया.

जिस वक्त नीरज अपने सर से किचन में बातें कर रहा था, उस समय वह अपना मोबाइल कमरे में ही छोड़ गया था. तभी राजेश ने उस का मोबाइल चेक किया तो उस में फिर निशा को भेजे गए मैसेज मिले. यह देख कर राजेश का खून खौल गया. मैसेज पढ़ने के बाद उस ने उस का मोबाइल उसी जगह रख दिया, जहां से उठाया था. कमरे में आ कर नीरज जल्द ही सो गया, तभी राजेश ने शीशी में बची हुई शराब गटक ली. जब राजेश ने देख लिया कि नीरज गहरी नींद में सो गया है तो वह नीरज के तकिए पर सिर रख कर लेट गया. उसी समय उस ने नीरज को हिलाडुला कर देखा. जब उसे विश्वास हो गया कि नीरज गहरी नींद में है तो वह रसोई में गया और वहां से तवा, प्रेशर कुकर का ढक्कन, सब्जी काटने वाले चाकू उठा कर कमरे में आ गया.

राजेश ने गहरी नींद में सोए नीरज के सिर पर तवे से भरपूर वार किया. नीरज हड़बड़ा कर उठ बैठा. उस ने अपने सर ज्ञानेंद्र को आवाज दी. लेकिन कमरे में लगे शीशे के दरवाजों से आवाज बाहर नहीं जा सकी. नीरज दरवाजे की तरफ भागा तो राजेश ने पलंग पर पड़ी चुन्नी उस के गले में फंसा कर नीचे गिरा दिया. वह उस पर तवे से वार करने लगा. उस का सिर कट गया, जिस से उस की हिम्मत जवाब दे गई. तब नीरज ने राजेश से दया की भीख मांगी. लेकिन राजेश ने उसे नहीं बख्शा. उस के ऊपर खून सवार था. वह उसे हरगिज जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

इसलिए उस ने उस पर चाकू से वार करने शुरू कर दिए. वह इतने गुस्से से वार कर रहा था कि मारतेमारते चाकू मुड़ गए. फिर उस ने प्रैशर कुकर के ढक्कन से वार किए. जब राजेश ने देखा वह मर चुका है तो उस ने नीरज के खून से दीवार पर लिख दिया, ‘मेरी बहन के साथ रेप किया है.’ उस समय रात के 3 बज रहे थे. दोस्त को मौत के घाट उतारने के बाद उस ने इत्मीनान से हाथपैर मुंह धोया और अपने साथ लाए कपड़े बदले. खून से सने कपडे़ उस ने पौलीथिन में बांध कर अपने बैग में रख लिए. अब वह वहां से भागना चाहता था.

वह कोठी के गेट पर पहुंचा तो वहां ताला लगा था. फिर वह दीवार फांद कर सीधा बसअड्डा पहुंचा. वहां से बस पकड़ कर हरिद्वार आया. फिर हरिद्वार से बस पकड़ कर मुरादाबाद पहुंच गया. घर आ कर उस ने अपनी मां को बस इतना बताया कि वह गर्जिया देवी मंदिर, रामनगर से आ रहा है. इस के बाद कमरे में जा कर सो गया. अगले दिन 7 सितंबर, 2015 को देहरादून पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

राजेश सैनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर उस के खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. उसे 8 सितंबर, 2015 को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया. Dehradun Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, निशा परिवर्तित नाम है

 

UP Crime: मामूली बात पर

UP Crime: अरविंद और उन का परिवार मिलनसार स्वभाव का था. उन्होंने पड़ोस में रहने वाले एक युवक विपुल को इसलिए अपनी दुकान किराए पर देने से मना कर दिया कि किराए के लेनदेन से संबंध खराब हो सकते हैं. लेकिन विपुल ने इसे गलत तरीके से लेते हुए मन में रंजिश पाल ली. इस का नतीजा भी बहुत भयानक निकला.

6 सितंबर 2015 की शाम को अरविंद शर्मा बाहर से घर लौटे तो उन की पत्नी पूनम के चेहरे पर

परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. यह देख कर अरविंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पूनम, कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘परेशानी की ही बात है. लक्ष्य को बहुत देर हो गई. साइकिल ले कर गया था, अभी तक वापस नहीं आया.’’

‘‘इधर उधर घूम रहा होगा आ जाएगा.’’ वह हंसते हुए बोले.

‘‘पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ इस पर अरविंद पत्नी को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘घबराओ नहीं, थोड़ा इंतजार कर लो, वह आ जाएगा.’’

पूनम चिंतामग्न हो कर बैठ गई.

अरविंद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के रहने वाले थे. उन के पिता श्यामलाल शर्मा सेवानिवृत्त शिक्षक थे. कई साल पहले अरविंद का परिवार शामली से लगे मुजफ्फरनगर के थाना सिविल लाइन क्षेत्र की इंदिरा कालोनी में आ कर बस गया था. अरविंद खुद भी बेसिक शिक्षा विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे. उन के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बच्चे थे. 2 बेटियां वर्णिका, वैष्णवी और 11 साल का बेटा लक्ष्य. लक्ष्य शहर के डीएवी पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ता था. परिवार में इकलौता बेटा होने की वजह से वह सब का लाडला था. श्यामलाल शर्मा परिवार को एकसूत्र में बांधे हुए थे. संस्कारी और मिलनसार परिवार था. व्यवहारकुशल श्यामलाल व उन के बेटे अरविंद को मोहल्ले में इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

अरविंद सुबह औफिस जाते थे और शाम को घर आ जाते थे. 6 सितंबर को रविवार की वजह से घर पर ही थे, लेकिन दोपहर बाद किसी काम से बाहर चले गए थे. जब वह लौटे तो उन का एकलौता बेटा लक्ष्य घर पर नहीं था. लक्ष्य जिद कर के साइकिल ले कर बाहर चला जाता था, यह कोई नई बात नहीं थी. उस दिन भी वह साइकिल ले कर बाहर गया था. शाम का धुंधलका फैला, तो परिवार की चिंता बढ़ गई. अरविंद बेटे को ढूंढने के लिए बाहर सड़क की तरफ निकल गए, जबकि पूनम व उन की बेटियों ने आसपास के घरों में लक्ष्य को ढूंढा, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्य के लापता होने की खबर मोहल्ले में फैली तो लोग भी उसे ढूंढने में लग गए. वह कहां चला गया, इस बात को कोई नहीं जानता था. अरविंद का परिवार बेहद परेशान था. पूनम का बेटे के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखतीं, उन्हें लगता कि बेटा आ गया है. लोगों ने हर तरफ लक्ष्य के बारे में पूछताछ भी की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. वह पूरी रात परेशानी में बीती. अगले दिन लक्ष्य के लापता होने की सूचना थाना सिविल लाइन में दे दी गई. थाना प्रभारी चंद्र किरण यादव ने उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अगले दिन का इंतजार किया, परंतु उस दिन भी वह वापस नहीं आया. इस से इस आशंका को बल मिला कि लक्ष्य का अपहरण कर लिया गया है.

हालांकि शर्मा परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए कोई उन के बेटे का अपहरण करे, लेकिन इस के और भी कई कारण हो सकते थे. पुलिस इस इंतजार में थी कि यदि लक्ष्य का अपहरण किया गया होगा, तो फिरौती के लिए फोन या पत्र जरूर आएगा. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. इस तरह का कोई फोन परिवार के पास नहीं आया, तो यह मामला रंजिश का लगा. पुलिस ने अरविंद व उन के पिता से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि वह सीधेसादे लोग हैं. किसी से रंजिश तो दूर उन का कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ था.

इस से पुलिस उलझन में पड़ गई. बहरहाल पुलिस ने लक्ष्य के फोटो लगे इश्तहार बनवाए और सभी थानों में भिजवा दिए, पर इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अगले कई दिनों तक भी जब लक्ष्य नहीं मिला, तो लोगों में गुस्सा पनपने लगा. लक्ष्य के घरवालों और शुभचिंतकों ने एकत्र हो कर एसएसपी के.बी. सिंह से मुलाकात की. एसएसपी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को शीघ्र काररवाई के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) प्रबल कुमार सिंह व एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने थाना पुलिस को सुरागसी में लगा दिया.

एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने अभी तक के जांच बिंदुओं पर विचारविमर्श भी किया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हो न हो लक्ष्य को रंजिशन उठा कर मार दिया गया हो. वह साइिकल समेत लापता हुआ था, इस से जाहिर होता था कि वह विश्वास कर के किसी जानकार के साथ ही गया होगा. शर्मा परिवार रंजिश से इंकार कर रहा था, इसलिए इस थ्यौरी पर अविश्वास भी हो रहा था, फिर भी पुलिस अपने इस शक पर कायम रही.

चूंकि कुछ रंजिशें एक पक्षीय होती हैं, इसलिए पुलिस को लगा कि हो न हो मोहल्ले का ही कोई आदमी अरविंद या उन के परिवार से रंजिश रखता हो, इसलिए पुलिस ने आसपास के लोगों की फेहरिश्त तैयार की. इस फेहरिश्त में एक नाम विपुल सैनी का भी सामने आया. विपुल अरविंद के ही पड़ोसी जगलाल का बेटा था और डीजे (डिस्क जौकी) का काम करता था. पुलिस को पता चला कि उस की सोहबत अच्छी नहीं थी और वह आवारा व दबंग प्रवृत्ति का युवक था.

पुलिस अरविंद के घर पहुंची और उन से विपुल के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह भले ही बिगडै़ल प्रवृत्ति का युवक है, लेकिन उन के लिए अच्छा है. उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्य के लापता होने के बाद से विपुल लगातार उन के साथ उसे ढुंढवाने में साथ रहा है. आनेजाने वाले शुभचिंतकों को चाय पानी देने का जिम्मा भी उस ने ही संभाल रखा था. अगले दिन पुलिस को पता चला कि विपुल अपने घर से अचानक लापता हो गया है. पुलिस ने जब अरविंद से एक बार फिर से इस बारे में पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि विपुल को यह बात पता चल गई थी कि पुलिस उस के बारे में पूछताछ कर रही है. इस के तुरंत बाद अचानक लापता हो जाने से विपुल पूरी तरह शक के दायरे में आ गया.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की कालडिटेल्स के साथ पिछले कई दिनों की लोकेशन भी निकलवाई. नंबरों की जांच से पता चला कि लक्ष्य के लापता होने वाले दिन व रात 3 नंबरों पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस जांच में यह भी पता चल गया कि वह नंबर पंकज प्रजापति, कपिल और विक्की के नाम पर थे. इन में पंकज उसी कालोनी में रहता था, जबकि कपिल गांव अलमासपुर का और विक्की गांव गजावली का रहने वाला था.

लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये तीनों कपिल के जिगरी दोस्त थे और उसी की तरह आवारा थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि 6 सितंबर को विपुल व उस के दोस्तों की लोकेशन एक साथ थी. रात 12 बजे उन सभी की लोकेशन बागोवाली क्षेत्र में पाई गई. बागोवाली शहर की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र था. पुलिस समझ गई कि लक्ष्य का राज इन्हीं चारों के बीच छिपा था. 15 सितंबर को पुलिस ने एकएक कर के विपुल, कपिल व पंकज को उठा लिया. जबकि विक्की पुलिस के हाथ नहीं लग सका पुलिस उन से कई घंटे तक घुमाफिरा कर पूछताछ करती रही, लेकिन उन्होंने लक्ष्य के अपहरण में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

अलबत्ता पुलिस इतना जरूर समझ गई कि तीनों बेहद शातिर युवक थे. अंतत: जब पुलिस ने अपना परपंरागत तरीका अपनाया, तो तीनों टूट गए. उन लोगों ने न केवल मासूम लक्ष्य का अपहरण किया था, बल्कि उस की हत्या कर के शव भी गन्ने के खेत में फेंक दिया था. पुलिस तीनों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और उन की निशानदेही पर गन्ने के एक खेत से बोरे में बंद लक्ष्य का शव बरामद कर लिया, जो बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम लक्ष्य के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

लक्ष्य की हत्या से लोगों में जबर्दस्त आक्रोश था, इसलिए विपुल के घर पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. इस बीच उस के घर वाले लोगों के आक्रोश से डर का घर में ताला डाल कर फरार हो गए. पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तृत पूछताछ की. लक्ष्य की हत्या इतनी मामूली बात पर की गई थी कि पुलिस भी हतप्रभ रह गई. अरविंद के परिवार से विपुल के अच्छे रिश्ते थे. वह उन के पास अकसर आताजाता रहता था. इस नाते श्यामलाल से ले कर लक्ष्य तक सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. विपुल बिगड़ैल और आवारा था, लेकिन चूंकि अरविंद से वह अच्छा व्यवहार करता था, इसलिए वह उसे अच्छा मानते थे.

अरविंद की एक खाली दुकान थी. उसे वह किराए पर देना चाहते थे. यह बात जब विपुल को पता चली, तो उस ने दुकान किराए पर देने के लिए कहा. अरविंद सुलझे हुए व्यक्ति थे. पड़ोस का मामला था, इसलिए वह कतई नहीं चाहते थे कि दुकान की किराएदारी को ले कर उन के बीच कोई मनमुटाव हो, इसलिए उन्होंने प्यार से दुकान देने से मना कर दिया. विपुल को उन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. यह बात उसे बेहद नागवार गुजरी और वह अंदर ही अंदर अरविंद से चिढ़ने लगा. उठतेबैठते, सोतेजागते उस के दिमाग में अरविंद के इनकार के शब्द गूंजते रहते. प्रवृत्ति अच्छी न हो और सोच फितरती हो, तो जलन की अग्नि और तेज हो जाती है. विपुल के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा था.

उस की जलन की यह आग तब और भी बढ़ गई, जब उसे पता चला कि अरविंद ने अपनी दुकान एक अन्य युवक मोंटी को किराए पर दे दी है. विपुल को पता चला कि मोंटी अपनी दुकान का मुहूर्त 7 सितंबर को करेगा. विपुल ने मन ही मन में सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वह दुकान का मुहूर्त नहीं होने देगा. अरविंद को वह ऐसा दर्द देगा कि जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा. उस ने अपनी इस रंजिश को जाहिर नहीं होने दिया और उन से मेलभाव बनाए रखा. विपुल व उस के दोस्त कपिल की साझेदारी में कालोनी से थोड़ी दूरी पर डीजे की दुकान थी.

विपुल वहां अपने दोस्तों कपिल, पंकज व विक्की के साथ बैठ कर शराब पीता था. एक दिन ऐसी ही महफिल के दौरान उस ने अपने दोस्तों से सारी बात बता कर कहा, ‘‘मुझे मेरे पड़ोसी ने दुकान नहीं दी. मुझे उसे सबक सिखाना है.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई.’’ उस के एक दोस्त ने कहा.

‘‘नहीं, मैं जीते जी आग में जल रहा हूं. तुम लोग मेरा साथ दो, मैं उस के इकलौते बेटे को खत्म कर दूंगा.’’ विपुल ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा. कभीकभी शराबियों की दोस्ती बहुत गहरी होती है. उन सब का बहुत गहरा याराना था. वे सब विपुल  का साथ देने को तैयार हो गए.

अंतत: उन्होंने 6 सितंबर को लक्ष्य को मारने की योजना बना ली. अगले दिन विपुल ने अपने दोस्तों को फोन कर दिया कि वे शाम को दुकान पर पहुंचकर इंतजार करें. वह बहाने से अरविंद के बेटे को ले आएगा. उधर विपुल घर आया और लक्ष्य के घर से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. 6 सितंबर को रविवार था. लक्ष्य पूरे दिन घर पर ही रहा. शाम को वह जिद कर के साइकिल ले कर निकल गया. विपुल बाहर नजरें गड़ाए हुए था. उसे पूरी उम्मीद थी कि लक्ष्य साइकिल से बाहर जरूर आएगा.

लक्ष्य पर नजर पड़ते ही विपुल की आंखों में चमक आ गई. वह पैदल चल कर कालोनी के बाहर वाले रास्ते पर चला गया, तब तक लक्ष्य राउंड पूरा कर के वापस आ रहा था. विपुल को देखते ही लक्ष्य ने नमस्ते की, तो उस ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘कहां घूम रहा है लक्ष्य?’’

‘‘कुछ नहीं भैया जी. साइकिल चलाने आया था.’’

‘‘चल आ मैं तुझे नया वीडियो गेम खिलाता हूं. मैं ने अपनी दुकान पर लगाया है.’’ वीडियो गेम की बात पर लक्ष्य खुश हो गया. वह मासूम उस की चालाकी को समझ नहीं पाया और उस के साथ चल दिया. विपुल उसे ले कर सीधे कपिल की दुकान पर पहुंचा. वहां कपिल, पंकज व विक्की पहले से ही मौजूद थे. वहां पहुंचते ही लक्ष्य ने जिज्ञासा से कहा. ‘‘भैया अब तो मैं आप की दुकान पर खेलने आया करूंगा, मम्मी पापा भी नहीं रोकेंगे. कहां है नया वीडियो गेम?’’

‘‘अभी दिखाता हूं.’’ कहने के साथ ही उस ने अपने दोस्तों को इशारा कर दिया. उन्होंने लक्ष्य का मुंह दबा कर उसे जकड़ लिया. मामूली बात पर अंधे हुए विपुल ने दुकान में पड़ी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और लक्ष्य के गले में डाल कर कसनी शुरू कर दी. दम घ़ुटा तो लक्ष्य मौत के भय से छटपटा कर रह गया. उस ने उन के चंगुल से छूटने के लिए हाथ पैर चलाए, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई.

विपुल ने रस्सी तब तक उस के गले में कसी, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई. हत्या के तुरंत बाद इन लोगों ने लक्ष्य के शव को एक बोरे में बंद कर के कोने में सामान के पीछे छिपा दिया. इस के बाद उन्होंने रात होने का इंतजार किया. तकरीबन 12 बजे इन लोगों ने बोरे को उठाया और मोटरसाइकिल से बागोवाली क्षेत्र में गन्ने के खेत में फेंक आए. विक्की ने लक्ष्य की साइकिल भी एक स्थान पर छिपा दी. विपुल ने घर आ कर उस दिन के बाद अरविंद के साथ लक्ष्य को ढुंढवाने का सफल नाटक किया. इतना ही नहीं वह परिवार व पुलिस जांच की टोह लेने के लिए अधिकांश उन के घर पर ही रहता था. अरविंद के जो भी मिलने वाले आते थे, उन्हें चाय आदि पिलाने का जिम्मा भी उस ने ही उठा लिया था.

किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विपुल ऐसा बेहरम हो सकता है. बेटे के विछोह में पूनम व अरविंद की तड़प उसे सुकून दे रही थी. विपुल को जब एक दिन पता चला कि पुलिस उस के बारे में भी पूछताछ कर रही है, तो डर की वजह से वह लापता हो गया. यहीं से वह शक के दायरे में आया और पकड़ा गया. अगले दिन पुलिस ने चौथे हत्यारे विक्की को भी धर दबोचा. उस ने भी हत्या में शामिल होने की बात कुबूल ली. पुलिस को उस की निशानदेही पर लक्ष्य की साइकिल भी मिल गई. पुलिस ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के चारों आरोपियों को लोगों के गुस्से और हमले की आशंका के मद्देनजर भारी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामूली सी बात पर विपुल की बिगड़ैल प्रवृति और मन में उपजी रंजिश ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया. उस ने यह रंजिश न रखी होती, तो लक्ष्य भी जीवित होता और उस का व उस के दोस्तों का भविष्य भी चौपट होने से बच जाता. लक्ष्य के परिजनों का कहना था कि यदि विपुल ने अपनी नाराजगी बताई होती, तो वह उसे दुकान दे देते. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

Faridabad Crime: नकली नोट बनाने व चलाने में 2 गिरफ्तार

Faridabad Crime: एक ऐसा मामला सामने आया जहां अपराधी नकली नोट बनाकर खुलेआम चला रहे थे. आखिर पुलिस को कैसे पता चला इन शातिरों का और कैसे अपराधी कर रहे थे इन नोटों का इस्तेमाल. पूरा सच जानने के लिए पढ़ते हैं पूरी स्टोरी जो खोलेगी अनेक राज.

यह मामला हरियाणा के फरीदाबाद से सामने आया है, जहां पुलिस ने कम समय में अमीर बनने के लालच में नकली नोट छापने वाले 2 युवकों को गिरफ्तार किया है. पुलिस ने उन के कब्जे से अलगअलग कीमत के नकली नोट और एक आधुनिक प्रिंटर बरामद किया है, जिस का इस्तेमाल नकली नोट छापने में किया जा रहा था. यह काररवाई शहर में चल रही सतर्कता के दौरान की गई.

पुलिस के मुताबिक, बरामद नकली नोटों में 500 रुपए का एक, 200 रुपए के 5 नोट और 100 रुपए के 10 नोट शामिल हैं. पुलिस ने जब आरोपियों से पूछताछ की तो नकली नोटों के पूरे गिरोह का खुलासा हुआ. एक आरोपी नकली नोट छापता था, जबकि दूसरा उन्हें बाजार में चलाता था. दोनों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है. Faridabad Crime

Gurugram Crime: प्रेमी संग पति पर किया जानलेवा हमला

Gurugram Crime: कब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे, जहां महिलाएं अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की जान लेने पर उतारू हो जाती हैं. ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां बौयफ्रेंड के प्यार में पत्नी ने अपने ही पति पर जानलेवा हमला कर दिया. आखिर क्यों? क्या प्रेम में जान लेना ही आखिरी रास्ता था? पत्नी का यह कदम कई सवाल खड़े करता है. चलिए जानते हैं इस पूरी घटना की विस्तार से कहानी, जो आप को सोच ने पर मजबूर कर देगी.

यह हैरान कर देने वाली घटना दिल्ली से सटे गुरुग्राम से सामने आई है, जहां अवैध संबंधों के चलते पत्नी पूनम ने अपने प्रेमी मनखुश के साथ मिलकर अपने ही पति शिव शंकर पर कुल्हाड़ी से जानलेवा हमला कर दिया. पुलिस के अनुसार, पूनम ने अपने पति शिव शंकर को मंदिर दर्शन के बहाने घर से बुलाया था. फिर रास्ते में वीपीएस स्कूल के पास पति को स्कूटी से गिराकर उस पर हमला किया गया.
वहां पर मौजूद पूनम का प्रेमी मनखुश उर्फ मिंटू भी मौजूद था. दोनों वारदात को अंजाम दे कर मौके से फरार हो गए.

यह मामला तब सामने आया जब पुलिस को खोह गांव में एक स्कूल के पास एक व्यक्ति के गंभीर रूप से घायल होने की सूचना मिली. मौके पर पहुंची पुलिस टीम को पता चला कि घायल व्यक्ति को इलाज के लिए फरीदाबाद के अस्पताल में भरती कराया गया है. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अरेस्ट कर लिया है. दोनों बिहार के रहने वाले हैं और उन के बीच पिछले 6 महीनों से अवैध संबंध थे.

Assam Crime News: अंधविश्वास की आग में जिंदा जले दंपति

Assam Crime News: एक ऐसी शर्मनाक घटना सामने आई है, जिस ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. जादूटोना के चलते गांव के लोगों ने एक दंपति को जला कर मार डाला. आखिर क्या था इस जादूटोना का पूरा सच, जिस के लिए दंपति को जिंदा जला दिया गया? पूरा सच जानने के लिए पढ़िए आगे.

यह हैरान कर देने वाली घटना 30 दिसंबर, 2025 को असम के करबी आंगलोंग जिले में घटी.अंधविश्वास ने इंसानियत को शर्मसार कर दिया. रात होवराघाट क्षेत्र के बेलोगुरी मुंडा गांव में ग्रामीणों ने जादूटोना के शक में गार्दी बिरोवा और उन की पत्नी मीरा बिरोवा को निशाना बनाया. अफवाहों से भड़की भीड़ ने पहले तेजधार हथियारों से दंपति पर हमला किया और फिर उन के घर में आग लगा दी. आग की लपटों में घिरे दोनों जिंदा जल गए. उन की चीखें गूंजती रहीं, लेकिन अंधविश्वास के आगे इंसानियत खामोश रही.

गांव वालों का मानना था कि यह दंपति जादूटोना करता था, जिस से गांव के लोगों को नुकसान पहुंच रहा था. इसी अंधविश्वास के कारण दोनों को निशाना बनाया गया.

इस दर्दनाक घटना की सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुंची और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. इस मामले में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि गांव के लोग अंधविश्वास और अफवाहों पर भरोसा करते थे, जिस से उन्हें लगता था कि गांव में हो रही परेशानियों के पीछे यही दंपति जिम्मेदार है. फिलहाल पुलिस ने गांव वालों से शांति बनाए रखने की अपील की है.

पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है और बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत काररवाई की जा रही है. प्रशासन का कहना है कि अंधविश्वास के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके. Assam Crime News

Madhya Pradesh Crime: आईफोन में फंसा इश्क

Madhya Pradesh Crime:  सतपुड़ा की पहाडि़यों से घिरे मध्य प्रदेश के अमला को मध्य प्रदेश का शिमला भी कहा जाता है. 5 जुलाई, 2022 की सुबह अमला पुलिस स्टेशन के टीआई संतोष पंद्रे पुराने केस की फाइल को देख रहे थे, तभी केबिन के बाहर से आई आवाज ने उन का ध्यान फाइल से हटा दिया.

‘‘साब, क्या मैं अंदर आ सकती हूं?’’ दरवाजे पर एक अधेड़ उम्र की महिला अपने पति के साथ खड़ी थी.

उन्हें देखते ही टीआई ने कहा, ‘‘आइए, अंदर आ जाइए, कहिए कैसे आना हुआ?’’

‘‘साब, मेरा नाम लता काचेवार है. मेरे पति इस दुनिया में नहीं हैं. मेरा बेटा मानसिक रूप से बीमार है. हम लोग अमला नगर परिषद के वार्ड नंबर 10 में रहते हैं. मेरी 19 साल की बेटी मुसकान 3 जुलाई की सुबह बाजार से जरूरी सामान लेने के लिए घर से निकली थी, मगर अभी तक घर नहीं लौटी है,’’ यह कहते हुए लता फफक कर रो पड़ी.

टीआई ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, ‘‘आप चिंता मत कीजिए, पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी. मुसकान का हुलिया बताइए और अगर उस की कोई फोटो हो तो मुझे दे दीजिए. पुलिस उसे जल्द ही खोज निकालेगी.’’

‘‘साब, मुसकान के हाथ पर 3 स्टार वाला एक टैटू बना हुआ है और उस के बाल सुनहरे हैं और ये रही उस की फोटो,’’ लता ने अपनी बेटी की फोटो पर्स से निकालते हुए कहा.

टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो पर नजर डाली तो सुनहरे बालों की खूबसूरत नाकनक्श की मुसकान को देख क र समझ गए कि उम्र के इस मोड़ पर अकसर लड़केलड़कियों के कदम फिसल ही जाते हैं.

‘‘यदि तुम्हें किसी पर शक हो तो खुल कर बताओ, पुलिस तुम्हारे साथ है.’’ टीआई ने कहा.

‘‘साब, मेरी बेटी कभी घर और दुकान के अलावा कहीं नहीं जाती थी. किसी लड़के के साथ उस की दोस्ती भी नहीं थी. साब, पिछले 2 सालों से वह अमला के कृष्णा ज्वैलर्स के यहां सेल्सगर्ल का काम कर रही है.’’ लता ने टीआई को बताया.

टीआई ने मुसकान की जल्द ही पतासाजी का आश्वासन देते हुए लता को घर जाने को कहा.

लता जानती थी कि मुसकान अकसर खरीददारी के लिए कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी के साथ नागपुर आतीजाती थी और कई बार काम के सिलसिले में वहीं होटल में रुक भी जाती थी. लेकिन अब तो उस का पता ही नहीं चल पा रहा था.

दूसरे दिन सुबह तक मुसकान न तो घर लौटी और न ही उस से फोन पर संपर्क हो पाया तो लता ने कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी को फोन लगा कर बेटी के संबंध में जानकारी ली.

पुनीत ने लता को बताया कि मुसकान तो कल दुकान पर आई ही नहीं थी. इतना ही नहीं, पुनीत ने यह भी बताया कि वह 2-3 दिन छुट्टी पर जाने की बात भी कह रही थी.

पुनीत की बातें सुन कर लता के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मुसकान कहां चली गई.

उधर पुलिस ने मुसकान की गुमशुदगी दर्ज करने के बाद उस की पतासाजी के लिए सोशल मीडिया पर उस की सूचना प्रसारित कर दी. इस के अलावा विभिन्न थानों में भी उस की फोटो भेज दी. मगर मुसकान के बारे में कोई भी सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा.

अमला शहर की सीमा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से भी लगी हुई हुई है. ऐसे में आपराधिक घटनाओं की सूचनाओं के आदानप्रदान के लिए पुलिस विभाग का अंतरराज्यीय वाट्सऐप ग्रुप बना हुआ है.

7 जुलाई, 2022 को उसी वाट्सऐप ग्रुप में नागपुर काटोल पुलिस ने एक नौजवान युवती की लाश मिलने की पोस्ट शेयर की तो बैतूल जिले की एसपी सिमाला प्रसाद की नजर उस पोस्ट पर ठहर गई.

वह लाश महाराष्ट्र के नागपुर के पास काटोल पुलिस थाने के अंतर्गत चारगांव इलाके में ईंट भट्ठे के पास मिली थी. वह पीले रंग की टीशर्ट पहने थी, जिस पर अंगरेजी में लव लिखा हुआ था. उस के हाथ पर 3 स्टार का टैटू बना हुआ था. युवती के सिर पर हमले की वजह से चेहरे की पहचान आसानी से नहीं हो पा रही थी.

एसपी ने यह पोस्ट अमला पुलिस के सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की तो अमला पुलिस थाने के टीआई संतोष पंद्रे ने फोटो को गौर से देखा. मुसकान की मां लता ने उन्हें जो फोटो दिया था, उस से उस की कदकाठी काफी मेल खा रही थी.

टीआई ने मुसकान की मां लता को थाने बुला कर वह फोटो दिखाई तो उस के होश उड़ गए. पीली टीशर्ट और हाथ पर बने टैटू को देख कर वह जोर से चीखी, ‘‘मेरी बेटी कहां है और उस का ये हाल किस ने कर दिया?’’

इस के बाद पुलिस लता को ले कर नागपुर के काटोल पहुंच गई. काटोल पुलिस थाने के टीआई महादेव आचरेकर ने लता को युवती की लाश के कपड़े, अंगूठी और मोबाइल फोन दिखाया तो उस ने बताया कि ये सब उस की बेटी मुसकान के हैं.

महाराष्ट्र के किसी भी थाने में इस तरह के हुलिए वाली किसी लड़की की गुमशुदगी दर्ज नहीं थी.

इस वजह से पुलिस ने अंदाजा लगाया कि युवती शायद पड़ोसी राज्यों में से किसी शहर की रहने वाली हो.

इस पर नागपुर क्राइम ब्रांच ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की पुलिस से संपर्क किया और फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर दी. पोस्टमार्टम के बाद लाश की शिनाख्त न होने से काटोल पुलिस ने लाश दफना दी थी.

नागपुर (ग्रामीण) पुलिस के काटोल थाने में मुसकान की हत्या का मामला कायम कर लता से पूछताछ की और मुसकान के मोबाइल में मिले फोटो के आधार पर यह बात सामने आई कि मुसकान का प्रेम प्रसंग कृष्णा ज्वैलर्स के मालिक पुनीत सोनी से चल रहा था. लिहाजा काटोल पुलिस केस की जांच के लिए अमला आ गई.

पुलिस ने पुनीत सोनी से मुसकान की हत्या के संबंध में पूछताछ की तो पहले तो वह पूरे घटनाक्रम से अंजान बना रहा. पुलिस ने जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स रिपोर्ट सामने रखी तो वह बगलें झांकने लगा.

पुलिस ने उस के शोरूम पर काम करने वाले 17 साल के किशोर अन्नू से पूछताछ की तो वह डर गया और उस ने पल भर में ही पूरे रहस्य से परदा हटा दिया. पुलिस टीम ने पुनीत से सख्ती से पूछताछ की तो मुसकान की हत्या की सारी कहानी सामने आ गई.

अमला के सरदार वल्लभभाई पटेल वार्ड में रहने वाली मुसकान महत्त्वाकांक्षी थी, मगर परिवार की माली हालत के चलते उसे हायर सेकेंडरी परीक्षा पास करते ही सेल्सगर्ल की नौकरी करनी पड़ी.

कोरोना काल में मुसकान के पिता की मौत हो जाने के बाद परिवार की माली हालत खराब हो गई थी. मुसकान का बड़ा भाई आपराधिक किस्म का था. आए दिन उस के झगड़े होते रहते थे. इसी के चलते पिछले साल उस का किसी ने मर्डर कर दिया था.

बड़े भाई की मौत के बाद घर चलाना मुश्किल हो गया था. ऐसे में मुसकान कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर सेल्सगर्ल की नौकरी करने लगी.

मुसकान को कृष्णा ज्वैलर्स शोरूम पर काम करते हुए बमुश्किल महीना भर ही बीता था, मगर इस एक महीने में ही उसे एक बात साफ समझ में आ गई थी कि शोरूम के मालिक पुनीत की नजरें उसे ही घूरा करती हैं.

28 साल का पुनीत सोनी अपने पिता सुनील सोनी की एकलौती संतान होने के साथ हैंडसम भी था. मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में अमला नगर परिषद की गणेश कालोनी में रहने वाले पुनीत का ज्वैलरी का कारोबार आसपास के इलाकों में खूब चलता है.

19 साल की खूबसूरत मुसकान जब पुनीत के पास काम मांगने आई तो वह पहली ही नजर में पुनीत के दिल में उतर गई. वैसे तो पुनीत शादीशुदा होने के साथ एक बेटे का बाप भी था, लेकिन खूबसूरत लड़की को अपने सामने पा कर उस की चाहत इस कदर बढ़ चुकी थी कि वह अपने आप को रोक नहीं सका.

एक दिन शोरूम पर जब ग्राहक नहीं थे तो पुनीत ने अपने दिल का हाल मुसकान से कह ही दिया, ‘‘मुसकान, तुम बहुत खूबसूरत हो, तुम्हें देखता हूं तो मैं अपने दिल को काबू में नहीं रख पाता हूं.’’

कम उम्र में घरपरिवार के खर्च की जिम्मेदारी संभालने वाली मुसकान भी उस के प्यार के इजहार को नकार न सकी. ज्वैलरी शोरूम पर ही उन का प्यार परवान चढ़ने लगा.

पुनीत मुसकान की हर ख्वाहिश और जरूरतों का खयाल रखने लगा. पुनीत मुसकान को अपने प्यार के जाल में फंसा चुका था. वह आए दिन मुसकान को तरहतरह के गिफ्ट की पेशकश करता था. दुकान में 17 साल का एक लड़का अन्नू (परिवर्तित नाम) भी काम करता था. पुनीत और मुसकान के बीच मीडिएटर का काम अन्नू करता था.

पुनीत मुसकान के साथ संबंध बनाने को उतावला हो रहा था, मगर मुसकान अपने मातापिता के डर से इस के लिए राजी नहीं थी.

पिछले साल दीपावली के पहले की बात है. एक दिन मौका पा कर पुनीत मुसकान के घर जा कर उस की मां से बोला, ‘‘मांजी दीपावली के बाद सीजन शुरू होने वाला है. ज्वैलरी की खरीदारी के लिए मुसकान को नागपुर साथ ले जाना है, मुसकान को ग्राहकों की पसंदनापसंद का खूब अनुभव हो गया है.’’

बेटी की तारीफ सुन कर लता ने यह सोच कर हामी भर दी कि आखिर पुनीत उस का मालिक जो ठहरा, उस के साथ जाने में हर्ज ही क्या है.

मुसकान के घर वालों की सहमति मिलते ही एक दिन कार से पुनीत और मुसकान नागपुर के लिए चल पड़े. रास्ते में कार के सफर के दौरान उन्होंने खूब मस्ती की. नागपुर पहुंच कर दिन भर ज्वैलरी की खरीदारी की और पुनीत ने मुसकान को नए स्टाइलिश कपड़े दिलाए तो उस की खुशी दोगुनी हो गई.

मुसकान अपने आप पर फख्र कर रही थी कि पुनीत उस का कितना खयाल रखता है. शाम को एक होटल में कमरा ले कर दोनों ठहर गए. कमरे में पहुंचते ही पुनीत के सब्र का बांध टूट चुका था. उस ने मुसकान को अपनी बाहों में भरते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा प्यार पाने के लिए मैं कब से तड़प रहा था मेरी जान, आज मुझे अपनी प्यास बुझा लेने दो.’’

मुसकान ने भी हौले से पुनीत के सिर पर हाथ घुमाते हुए कहा, ‘‘थोड़ा सब्र करो. मैं तो पूरी रात तुम्हारे साथ हूं. मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें लुटा दूंगी.’’

प्यार के जोश और वासना की आग में 2 जिस्म कब एक जान हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला. रात भर होटल में अपनी हसरतों को पूरा करने के बाद दूसरे दिन सुबह दोनों अमला पहुंच गए.

एक बार शुरू हुआ वासना का खेल धीरेधीरे रफ्तार पकड़ चुका था. पुनीत ज्वैलरी की खरीदारी का बहाना बना कर मुसकान को अकसर ही नागपुर और दूसरे शहरों में ले जाने लगा.

मुसकान भी यह बात समझ चुकी थी कि शादीशुदा जिंदगी जीने वाला उस का प्रेमी पुनीत केवल उस के जिस्म से ही खेल रहा था, लिहाजा वह भी पुनीत से अपनी हर जायजनाजायज मांग रखने लगी थी.

धीरेधीरे वह पुनीत को ब्लैकमेल भी करने लगी. पुनीत यदि मुसकान की मांग पूरी करने में आनाकानी करता तो वह उसे बदनाम करने की धमकी देने लगती.

देखते ही देखते मुसकान की लाइफस्टाइल काफी मौडर्न हो चुकी थी. महंगे कपड़े और मोबाइल का शौक उस के सिर चढ़ कर बोल रहा था. बदनामी के डर से मुसकान की हर डिमांड पूरी करना पुनीत की मजबूरी बन चुकी थी.

जून महीने के अंतिम सप्ताह की बात है. रात के करीब 9 बजे जब  मुसकान अपने घर जाने लगी तो उस ने पुनीत से कहा, ‘‘मेरा मोबाइल बारबार हैंग हो जाता है, मुझे एक आईफोन दिला दो.’’

‘‘चलो देखते हैं, अभी तो घर निकलो बाद में बात करते हैं.’’ पुनीत ने उस समय तो बात टालने के मकसद से यह कह कर बात खत्म कर दी थी.

धीरेधीरे पुनीत को यह बात समझ आ गई थी कि दुकान की आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा वह मुसकान पर खर्च कर रहा है. पुनीत यह सोच कर हैरान था कि इसी तरह चलता रहा तो किसी दिन उस का ज्वैलरी का कारोबार ठप्प हो जाएगा.

प्रेमिका की आए दिन बढ़ने वाली डिमांड उस की परेशानी का सबब बन चुकी थी. इस बार 60-70 हजार के आईफोन की डिमांड से पुनीत मन ही मन तिलमिला गया था. उसे अब रातरात भर नींद नहीं आ रही थी.

आखिर में पुनीत ने मुसकान से छुटकारा पाने का कठोर निर्णय ले लिया था. अपनी इस योजना में उस ने दुकान पर काम करने वाले नौकर अन्नू को रुपयों का लालच देते हुए शामिल कर लिया था.

योजना के मुताबिक पुनीत ने 3 जुलाई की सुबह अचानक मुसकान को फोन किया, ‘‘हैलो मुसकान, जल्दी से तैयार हो जाओ, आईफोन लेने के लिए नागपुर चलना है.’’

मुसकान आईफोन मिलने की खुशी में पागल हो गई और जल्दी से तैयार हो कर घर से बाहर निकलते हुए मां से केवल इतना ही कह पाई, ‘‘मैं बाजार जा रही हूं, कुछ देर में वापस आती हूं.’’

कुछ ही देर में  पुनीत और अन्नू कार ले कर बाजार आ चुके थे. बाजार से मुसकान को कार में बिठा कर वे नागपुर के लिए रवाना हो गए.

कार पुनीत ही ड्राइव कर रहा था और मुसकान अगली सीट पर बैठी थी, जबकि पिछली सीट पर बैठा अन्नू मोबाइल पर गेम खेलने का नाटक कर रहा था.

कार से सफर के दौरान मुसकान को बीयर की पेशकश की गई, लेकिन उस ने इंकार कर दिया. पुनीत और अन्नू ने मिल कर शराब पी. कुछ ही घंटों में कार मध्य प्रदेश की सीमा से बाहर निकल चुकी थी.

रास्ते में सुनसान जगह पर पुनीत ने कार रोकी और बराबर की सीट पर बैठी मुसकान के गले में हाथ डाल कर प्यार का नाटक करने लगा. इसी दौरान पीछे बैठे हुए अन्नू ने उस का जोर से गला दबा दिया. मुसकान ने जोर से चीखने की कोशिश की, मगर पुनीत ने उस का मुंह हथेली से बंद कर दिया.

कुछ ही देर में जब वह बेहोश हो गई तो दोनों ने उसे कार से बाहर खींच लिया और सड़क पर पड़े पत्थर से उस का सिर कुचल कर मौत के घाट उतार दिया. मुसकान की लाश को सड़क के किनारे लुढ़का कर दोनों कार से अमला वापस आ गए.

पुनीत ने मुसकान की ब्लैकमेलिंग से तंग आ कर उसे प्रदेश के बाहर खत्म करने की योजना इसलिए बनाई ताकि किसी को उस पर शक न हो. मगर पुलिस की नजरों से वह ज्यादा दिन तक बच नहीं सका.

महाराष्ट्र के काटोल पुलिस के टीआई महादेव आचरेकर और मध्य प्रदेश के अमला पुलिस के टीआई संतोष पंद्रे की सूझबूझ से 11 जुलाई को मुसकान की हत्या के राज से परदा हट गया.

महाराष्ट्र पुलिस ने पुनीत सोनी और अन्नू को मुसकान की हत्या के जुर्म में भादंवि की धारा 302 और 201 के तहत दर्ज कर कोर्ट में पेश किया, जहां से पुनीत को नागपुर सैंट्रल जेल और अन्नू को बाल सुधार गृह भेज दिया. Madhya Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अन्नू परिवर्तित नाम है. Madhya Pradesh Crime

Hindi Stories: गुनाहों की प्रतीमा

Hindi Stories: प्रतिमा ने जिस मौजमस्ती का जीवन जीने के लिए प्रवीण नाईक से शादी की थी, वह सास ऊषा नाईक और जेठानीडा. नेहा नाईक के रहते संभव नहीं था. इस कांटे को दूर करने के लिए उस ने जो किया, वह गुनाहों की प्रतिमा बन गई. पर्यटकों के लिए स्वर्ग कहे जानेवाले गोवा के जिला वास्कोडिगामा शहर से मांगोर हिल जाने वाले रास्ते के बाईं ओर पहाडि़यों से घिरा मायामोले इलाका यहां का अत्यंत पौश इलाका माना जाता है. यहां एक से बढि़या एक मकान, फार्महाऊस और बहुमंजिली इमारतें हैं. पौश इलाका होने की वजह से यहां उच्च और संभ्रांत लोग रहते हैं. इन्हीं में एक परिवार नामदेव नाईक का भी था, जो एक खूबसूरत इमारत के डुप्लेक्स फ्लैट में रहता था.

कुछ दिनों पहले बीमारी की वजह से नामदेव नाईक का निधन हो गया तो उन के पीछे परिवार में पत्नी ऊषा नाईक, 2 बेटे सिद्धार्थ  नाईक, प्रवीण नाईक और उन की बहुएं डा. नेहा नाईक तथा प्रतिमा नाईक रहती थीं. सिद्धार्थ एवं नेहा की 6 महीने की एक बेटी भी थी. परिवार संपन्न और खुशहाल था. घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. सिद्धार्थ नाईक और प्रवीण नाईक, दोनों भाई मर्चेंट नेवी में नौकरी करते थे. नौकरी की वजह से दोनों भाइयों का ज्यादातर समय समुद्र के बीच बीतता था. साल में एक या 2 बार दोनों भाई बारीबारी से छुट्टियां ले कर घर आते थे. उन की अनुपस्थिति में घर की सारी जिम्मेदारियां मां ऊषा नाईक निभाती थीं.

29 जनवरी, 2015 की रात 3, साढ़े 3 बजे जब इमारत के सभी लोग सो रहे थे, तभी दरवाजा पीटने और चीखनेचिल्लाने के शोर से सभी की आंखें खुल गईं. शोर सुन कर घबराए लोग अपनेअपने फ्लैटों का दरवाजा खोल कर बाहर आए तो ऊषा नाईक की छोटी बहू प्रतिमा नाईक को बदहवास हालत में रोतेबिलखते देख कर हैरान रह गए. वह जेठानी की दुधमुंही बच्ची को सीने से चिपटाए जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘मेरी मदद करो. डाकुओं ने मेरे घर को लूट लिया. मेरी सास और जेठानी को मार डाला. उन्होंने मुझे भी मारापीटा, वे मुझे भी मारना चाहते थे, लेकिन संयोग से मैं बच गई.’’

प्रतिमा नाईक जो कह रही थी, उसे सुन कर इमारत में रहने वालों के होश उड़ गए. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक को साथ ले कर कुछ लोग ऊषा नाईक के फ्लैट पर पहुंचे तो वहां की स्थिति देख कर सभी की आंखें हैरत से फटी की फटी रह गईं. घर का सारा सामान बिखरा पड़ा था. ऊषा की लाश बैडरूम में तो डा. नेहा की लाश उन के बैडरूम में पड़ी थी. लूट और 2-2 हत्याओं का मामला था. अब तक पूरी सोसायटी के लोग एकत्र हो चुके थे. सोसायटी के सचिव बाबूराव नाईक ने घटना की सूचना ऊषा के दोनों बेटों, सिद्धार्थ और प्रवीण को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलेस पर प्रसारित की तो थाना वास्कोडिगामा पुलिस को तो घटना की जानकारी हो ही गई थी, इसी के साथ अधिकारियों को भी घटना की जानकारी हो गई थी.

मामला शहर की पौश कालोनी के एक उच्च और सभ्रांत परिवार से जुड़ा था, जिस में 2 लोगों की हत्याएं हो गई थीं, इसलिए सूचना मिलते ही थाना वास्कोडिगामा के सीनियर इंसपेक्टर सागर इकोसकर तुरंत सहायक इंसपेक्टर शैलेष नार्वेकर, संतोष देसाई, उदय परब, रामआसरे, रवि देसाई को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. थाना पुलिस के पहुंचने के थोड़ी देर बाद ही आईजी सुनील गर्ग, पुलिस कमिश्नर शेखर प्रभु देसाई, एडिशनल पुलिस कमिश्नर लौरेस डिसूजा प्रेस फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट ब्यूरो और डाग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस टीम के पहुंचने तक पूरी इमारत के लोग मृतका ऊषा के फ्लैट पर इकट्ठा हो गए थे.

सभी लोग परेशान थे. नाईक परिवार की छोटी बहू प्रतिमा की हालत तो बहुत ज्यादा खराब थी. उस के सिर पर किसी भारी चीज की चोट लगी थी, जिस से उस के सिर में बड़ा सा गुम्मड़ निकल आया था. पड़ोसी उसे सांत्वना दे कर संभाल रहे थे. वह इस तरह तड़प रही थी, जैसे उसे अंदरूनी चोटें भी लगी थीं. पुलिस ने उसे इलाज के लिए अस्पताल भिजवा दिया और छोटी बच्ची को संभालने के लिए पड़ोसियों के हवाले कर दिया. प्रतिमा को अस्पताल भिजवा कर थाना पुलिस मामले की जांच में जुट गई. अलमारी और शोकेस खुले पड़े थे. उस में रखा सामान कमरे में बिखरा पड़ा था.

अलमारी का लौकर खाली पड़ा था, इस का मललब उस में रखा सामान गायब था. उस में क्या रखा था, यह बताने वाला उस समय वहां कोई नहीं था. फ्लैट की लौबी के सोफे पर ऊषा नाईक की लाश पड़ी थी. डा. नेहा नाईक की लाश उन के बैडरूम में बेड पर पड़ी थी. लाशों के निरीक्षण से पुलिस को पता चला कि सासबहू की हत्याएं एक ही तरह से की गई थीं. उन के गले में रस्सी डाल कर कस दिया गया था. वह रस्सी भी पुलिस को फ्लैट से मिल गई थी. फर्श पर लालमिर्ची का पाउडर बिखरा था. पुलिस अधिकारियों के साथ आए जासूसी कुत्ते को लाशों को सुंघा कर छोड़ा गया तो पहले वह फ्लैट में ही घूमता रहा. कई चक्कर लगा कर वह फ्लैट से बाहर निकला तो भ्रमित सा हो गया.

इस तरह कुत्ते से पुलिस को कोई मदद नहीं मिल सकी. पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं और थाने आ कर लूट और हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. मामला गंभीर था, इसलिए मामले की जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी इंसपेक्टर सागर इकोसकर ने स्वयं संभाली. शुरुआती जांच में स्पष्ट हो चुका था कि मामला लूटपाट में हत्याओं का था. लूट के लिए लुटेरों ने 2 निर्दोष महिलाओं की हत्या कर दी थी. सोचने की बात यह थी कि अत्यंत सुरक्षित फ्लैट में लुटेरों ने प्रवेश कैसे किया? जांच में फ्लैट के दरवाजों और खिड़कियों के लौक सुरिक्षत पाए गए थे. जिस फ्लैट में वारदात हुई थी, वह ग्राउंड फ्लोर पर था. उस का एक दरवाजा आगे और एक पीछे की ओर था. पीछे वाले दरवाजे की ओर गहरी खाई थी, इसलिए उधर से लुटेरों के आने का कोई चांस नहीं था.

इसी तरह की बातें सागर इकोसकर को परेशान कर रही थीं. उन के दिमाग में जो भी सवाल घूम रहे थे, उन के जवाब परिवार में एकमात्र बची प्रत्यक्षदर्शी प्रतिमा ही दे सकती थी. इसलिए प्राथमिक इलाज के बाद उसे पूछताछ के लिए थाने ले आया गया. इस पूछताछ में प्रतिमा नाईक ने बताया कि इस घर में आए अभी उसे 8 महीने ही हुए हैं. इसलिए इस घर के बारे में उसे ज्यादा कुछ नहीं मालूम. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक अपनी 6 महीने की बेटी के साथ ग्राउंड फ्लोर पर अलगअलग कमरों में सोती थीं. उस का कमरा फर्स्ट फ्लोर पर था, इसएिल वह फर्स्ट फ्लोर पर सोती थी.

घटना की रात तीनों ने साथसाथ खाना खाया था. खाना खाने के बाद सभी ने एकएक गिलास दूध पिया. उस समय तक रात के साढ़े 9 बज गए थे. सभी लोग बैठे टीवी देख रहे थे, तभी उस की जेठानी की बेटी रोने लगी तो वह प्रतिमा और सास को गुडनाइट कह कर बेटी के साथ सोने चली गईं. डा. नेहा के जाने के बाद प्रतिमा भी फर्स्ट फ्लोर के अपने कमरे में सोने चली गई. ऊषा नाईक काफी देर तक टीवी देखती थीं, इसलिए वह बैठीं टीवी देखती रहीं. रात ढाई बजे के करीब अचानक उस की आंख खुली तो उसे ग्राउंड फ्लोर से उठापटक की आवाजें आती सुनाई दीं. ये कैसी आवाजें हैं, यह जानने के लिए प्रतिमा अपने कमरे से निकल कर नीचे आई तो वहां का नजारा देख कर सन्न रह गई.

4-5 नकाबपोश ऊषा नाईक और डा. नेहा को पकड़ कर उन के गले में रस्सी का फंदा डाल कर कस रहे थे. उन की मदद के लिए प्रतिमा आगे बढ़ी तो नकाबपोशों ने उसे भी पकड़ लिया और उस की पिटाई करने लगे. लुटेरों में किसी ने उस के सिर पर डंडे से मार दिया, जिस से उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. वह संभल पाती, लुटेरों ने उस के गले में रस्सी डाल कर कस दिया. गला कसने से प्रतिमा बेहोश हो गई. इस के बाद घर में क्या हुआ, उसे पता नहीं. यह संयोग था कि वह मरी नहीं. थोड़ी देर बाद उसे होश आया तो उस का सब कुछ खत्म हो चुका था. उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा की मौत हो चुकी थी. बच्ची जोरजोर से रो रही थी. प्रतिमा ने उसे उठा कर कर सीने से लगाया और फ्लैट के बाहर आ कर सारी बातें पड़ोसियों को बताईं.

प्रतिमा के बताए अनुसार, घर में लगभग 20 लाख रुपए के गहने थे. नकद के बारे में उसे पता नहीं था. प्रतिमा के बयान के आधार पर सागर इकोसकर ने मामले को अपराध क्रमांक 20/15 पर भादंवि की धारा 449/307/302/201डी, 120बी और 34 के तहत दर्ज कर के अब तक की जांच की जानकारी आईजी सुनील गर्ग और एसपी शेखर प्रभु देसाई को दी. इन अधिकारियों ने सागर इकोसकर को कुछ जरूरी दिशानिर्देश दे कर उन की मदद के लिए साऊथ गोवा के सातों थाने की पुलिस को लगा दिया. सागर इकोसकर ने सहयोगियों के साथ पूरे मामले पर गंभीरता से मंथन किया तो उन्हें जांच में मिले तथ्यों और प्रतिमा के बयानों में काफी अंतर नजर आया. उन के जेहन में कुछ ऐसे सवाल उभर कर आए, जो उन्हें बेचैन करने लगे थे.

पहली बात तो यह थी कि लुटेरे उस फ्लैट के अंदर कैसे पहुंचे? दूसरी बात यह कि अगर लुटेरों ने प्रतिमा की सास और जेठानी को मार दिया था तो प्रतिमा को क्यों छोड़ दिया? तीसरी बात यह कि उन की सुरक्षित अलमारी को बिना किसी तोड़फोड़ के कैसे खोला गया? चौथी सब से अहम बात यह थी कि मृतका ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक ने मरते समय किसी तरह का विरोध क्यों नहीं किया था? जब कि आमतौर पर मरते समय आदमी अपनी जान बचाने के लिए आखिरी समय तक संघर्ष करता है. डा. नेहा नाईक के बैड पर बिछी चादर एकदम ठीकठाक थी. उसी तरह ऊषा नाईक जिस सोफे पर मरी पड़ी थीं, उस सोफे का कवर भी जस का तस था. इस का मतलब यह था कि मरने वालों को मरने से पहले बेहोश किया गया था और ऐसा काम घर का ही कोई कर सकता था.

सभी सवालों पर जब गहराई से विचार किया गया तो शक के दायरे में प्रतिमा आ गई. इस की वजह यह थी कि परिवार में सिर्फ 4 लोग थे, जिन में 2 लोगों को मार दिया गया था. 6 महीने की बच्ची किसी तरह की साजिश कर नहीं सकती थी. अब सिर्फ प्रतिमा बचती थी. लेकिन समस्या यह थी कि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार का था, इसलिए सीधे प्रतिमा पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. असलियत का पता लगाने के लिए सागर इकोसकर और उन के सहयोगी प्रतिमा के बारे में जानकारी जुटाने में जुट गए. इस के बाद प्रतिमा के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली, वह काफी चौंका देने वाली थी.

सारी जानकारी जुटा कर पुलिस ने प्रतिमा नाईक को दोबारा पूछताछ के लिए थाने बुलाया तो वह पुलिस के एक भी सवाल का सही और संतोषजनक जवाब नहीं दे सकी. पुलिस के सवालों के आगे मजबूर हो कर अंतत: उस ने खुद ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद उस ने सास और जेठानी की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी. 27 वर्षीया प्रतिमा जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही महत्त्वाकांक्षी भी थी. गोलमटोल चेहरा, जवानी से भरपूर यौवन, कजरारी आंखों वाली प्रतिमा अपने मातापिता और 3 बहनों के साथ वास्कोवयना के मांगोर हिल स्थित अंबा बाई मंदिर के पास हिल क्रौस्ट इमारत की पहली मंजिल पर रहती थी.

एक साधारण परिवार में पैदा हुई प्रतिमा के सपने बहुत बड़े थे. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, लेकिन वह जिंदगी अमीरों जैसी जीना चाहती थी. प्रतिमा की एक बहन ने 2 साल पहले किसी अमीर घर के लड़के से प्रेम विवाह कर लिया था और ठाठ से रह रही थी. बहन की ही तरह वह भी प्रेम विवाह कर के ठाठ से जिंदगी जीना चाहती थी. लेकिन वह ससुराल इस तरह की चाहती थी, जहां सिर्फ उस की चले. वह अपनी मनमर्जी की जिंदगी जी सके. उसे कोई रोकनेटोकने वाला न हो. उस का अपना जीवनसाथी भी इस तरह का हो, जो उस की हर इच्छा पूरी कर सके. और यह सब सारे गुण उसे प्रवीण नाईक में दिखाई दिए थे.

9 महीने पहले प्रतिमा ने प्रवीण नाईक को अपने एक दोस्त के यहां पार्टी में देखा तो देखती ही रह गई. सभ्य, सुशील, गोरेचिट्टे, लंबेचौड़े, स्वस्थ, सुंदर प्रवीण नाईक को देख कर प्रतिमा को लगा कि वह जो चाहती है, वह सब कुछ इस आदमी में है. इस के बाद वह उस से जानपहचान बनाने के लिए उस के इर्दगिर्द मंडराने लगी. प्रवीण उस बीच छुट्टी पर आया था और दोस्त के बुलाने पर उस के यहां पार्टी में चला गया था. प्रतिमा का आगेपीछे घूमना प्रवीण को अच्छा लगा. उस के लिए यह एक सुखद अहसास था, जो उसे बहुत अच्छा लगा था. बाद में जब उस के दोस्त ने उन का परिचय कराया तो दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए.

इस के बाद दोनों की मुलाकातें शुरू हुईं तो प्रतिमा ने जल्दी ही प्रवीण को अपनी अदाओं से इस तरह आकर्षित कर लिया कि वह उस की हर बात के लिए राजी रहने लगा. वह उसे अपने घर पर भी ले जाने लगा. प्रतिमा ने प्रवीण का घर और उस की आर्थिक स्थिति को देखा तो वह उस से जल्द ही जल्द शादी करने के बारे में सोचने लगी. क्योंकि शादी के बाद ही प्रवीण का सब कुछ उस का अपना हो सकता था. वह प्रवीण पर विवाह के लिए दबाव बनाने लगी. प्रवीण मां और भाईभाभी से बात करने के बहाने विवाह को कुछ दिनों के लिए टालना चाहता था, लेकिन प्रतिमा इस के लिए तैयार नहीं थी. क्योंकि वह जल्दी से जल्दी प्रवीण की दुलहन बन कर उस की संपत्ति पर राज करना चाहती थी.

आखिर प्रतिमा की जिद के आगे प्रवीण को झुकना पड़ा. उस की मां और भाईभाभी राजी नहीं थे, लेकिन किसी तरह उन्हें मना कर प्रवीण ने प्रतिमा से शादी कर ली. इस तरह प्रवीण की दुलहन बन कर प्रतिमा कामत पैलेस में आ गई. आते ही सब से पहले उस ने अपने घूमनेफिरने के लिए प्रवीण से एक कार खरीदवाई. प्रवीण के पास पैसों की कहां कमी थी. उस ने उस के एक बार कहने पर कार खरीद दी. प्रतिमा के हाथों की मेहंदी भी नहीं छूटी थी कि उस ने एक काम ऐसा कर डाला कि घर के सभी लोगों की नजरों से वह उतर गई. अपनी जेठानी डा. नेहा के लाखों के गहनों पर प्रतिमा की नजर पड़ी तो अपने विवाह के एक सप्ताह बाद ही जेठानी की अनुमति ले कर वह उस के कमरे में सोने गई तो उसी बीच उन के सारे गहनों पर हाथ साफ कर दिया.

प्रतिमा आजाद खयाल की युवती थी. पति से तोहफे में मिली कार से वह अपने दोस्तों और सहेलियों को अकसर घुमाते हुए पार्टियां दिया करती थी. घर में रहती तो ज्यादातर अपने मोबाइल फोन से चिपकी रहती. यह सब उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक को पसंद नहीं था. डा. नेहा नाईक के गहनों की चोरी का राज खुला तो घर में काफी हंगामा हुआ. प्रतिमा की तरफ अंगुलियां उठीं तो खुद को निर्दोष साबित करने के लिए उस ने जहर खा कर आत्महत्या करने की कोशिश की. उस के इस नाटक से घर वाले डर गए और अपनी इज्जत की खातिर इस मामले को घर में ही रफादफा कर दिया.

उन गहनों को प्रतिमा पहन तो सकती नहीं थी, इसलिए उस ने उन्हें बेचने की योजना बनाई. इस योजना में उस ने अपनी एक सहेली के पति और अपने एक मुंहबोले भाई अभिजीत कोरगांवकर को शामिल किया. जेठानी के सारे गहने उन्हें सौंपते हुए उस ने कहा कि इन्हें बेच कर वे अपने हिस्से का पैसा ले कर उस के हिस्से का पैसा उस के खाते में डाल देंगे. अभिजीत कोरगांवकर वास्कोवयना में रहता था और किसी की कार चलाता था. उस ने वही किया, जैसा प्रतिमा ने उस से कहा था. प्रवीण जब तक घर में रहा, प्रतिमा मौजमस्ती करती रही. प्रवीण के जाते ही प्रतिमा को उस घर में घुटन सी महसूस होने लगी, क्योंकि घर में हुई चोरी की वजह से घर के किसी आदमी को उस पर विश्वास नहीं रह गया था. हर कोई उसे संदेह की नजरों से देखता था.

प्रतिमा की हर हरकत और काम पर उस की सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नजर रखती थीं. उसे कहीं भी आनेजाने, हर किसी से मिलने का हिसाब देना पड़ता था. उसे बताना पड़ता था कि वह कहां, क्यों और किस से मिलने गई थी. प्रतिमा पर लगने वाली यही पाबंदियां ऊषा नाईक और डा. नेहा नाईक के लिए काल बन गईं, क्योंकि सास और जेठानी उस की मौजमस्ती की जिंदगी में बाधा बन गई थीं. एक तो सास और जेठानी की रोजरोज की टोकाटाकी, दूसरे पति से लंबी दूरी उस से सहन नहीं हो रही थी. उसे लगने लगा कि ऐसी जिंदगी से क्या फायदा, जिस की जवानी और शबाब दोनों में घुन लग जाए.

विवाह रुपएपैसे और मौजमस्ती का वास्तविक आनंद क्या होता है? यह सास ऊषा नाईक और जेठानी डा. नेहा नाईक के रहते वह नहीं उठा सकती थी. वह ससुराल की धनदौलत पर कब्जा कर के अपने तरीके से मौजमस्ती करने के बारे में सोच रही थी. और यह सब तभी संभव हो सकता था, जब उस के रास्ते से सास और जेठानी हट जाएं. लेकिन वे जल्दी हटने वाली नहीं थीं. इसलिए इस के लिए उसे ही कुछ करना पड़ेगा. लेकिन वह क्या करे, कैसे करे, यह बात उस की समझ में नहीं आ रही थी. वह इन्हीं विचारों में खोई थी कि एक दिन टीवी प्रोग्राम के एक एपीसोड ने उस की सारी समस्या हल कर दी. उस एपीसोड में उस ने जो देखा, वही किया.

घटना की रात प्रतिमा ने सास और जेठानी के साथ खाना खाया. वह उन्हें पीने के लिए जो दूध लाई थी, उस में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिसे पीने के कुछ देर बाद डा. नेहा को नींद आने लगी. वह बेटी को ले कर अपने कमरे में सोने चली गईं. प्रतिमा सास ऊषा नाईक के साथ बैठी टीवी देखती रही. ऊषा नाईक जिस सोफे पर बैठी थीं, टीवी देखतेदेखते उसी पर लुढ़क गईं. उन के लुढ़कते ही प्रतिमा ने उठ कर टीवी बंद कर दिया. घर में सन्नाटा छा गया. प्रतिमा कपड़ा सुखाने वाली नायलौन की रस्सी काट लाई और सास के गले में लपेट कर कस दिया. बेहोशी की हालत में वह मर गईं. इस के बाद वैसा ही जेठानी के साथ किया.

सास और जेठानी की हत्या करने के बाद प्रतिमा ने अलमारी खोल कर उस के लौकर में रखे सारे गहने और नकदी निकाल कर एक कपड़े में बांध दिया. घर में लूट हुई है, यह दिखाने के लिए अलमारी का सारा सामान पूरे कमरे में फैला दिया. डौग स्क्वायड को भ्रमित करने के लिए उस ने कमरे के फर्श पर लालमिर्च पाउडर फैला दिया. अपने हिसाब से हत्या के सारे सबूतों को मिटा कर के वह आराम करने के लिए लेट गई. रात लगभग 2 बजे प्रतिमा ने अभिजीत कोरगांवकर को फोन कर के सारी बात बताई और उसे घर के पास बुलाया. वह आया तो उस ने गहनों और नकदी की पोटली उसे दे कर वापस भेज दिया.

अभिजीत के जाने के बाद प्रतिमा ने खुद को निर्दोष साबित करने के लिए अपने सिर पर एक भारी लकड़ी से जोर से प्रहार किया, जिस से उस के सिर पर गुम्मड़ निकल आया. गले पर नायलौन की रस्सी लपेट कर ऐसा निशान बनाया कि पुलिस का ध्यान लुटेरों की ओर चला जाए. अपने बचने की पूरी तैयारी करने के बाद उस ने मृतका डा. नेहा की बेटी को सीने से लगा कर जो किया, वह आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं. प्रतिमा नाईक से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर इकोसकर ने 3 फरवरी, 2015 को अभिजीत कोरगांवकर को भी गिरफ्तार कर लिया. उस की निशानदेही पर 10 लाख रुपए कीमत के गहने और नकदी बरामद कर ली.

उस ज्वैलर्स को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जिस ने 8 महीने पहले अभिजीत कोरगांवकर से प्रतिमा द्वारा दिए गए गहनों को खरीदा था. सारे सबूत जुटा कर सभी को मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रतिमा और अभिजीत जेल में थे. पुलिस मामले की जांच कर रही थी. पुलिस को शक है कि नाईक परिवार में हुई हत्याओं और लूट में प्रतिमा अकेली नहीं थी. उस ने पुलिस को गुमराह किया है, उस रात उस के साथ फ्लैट में जरूर कोई और था, वह उस का मुंहबोला भाई भी हो सकता है. लेकिन जांच पूरी हुए बगैर इस बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Punjab Crime: संत का खूनी कारनामा

Punjab Crime: संत से शादी करने के लिए जसपाल कौर को दशमेश से तलाक लेना पड़ता जबकि दशमेश तलाक देने वाला नहीं था. इस समस्या से निजात पाने के लिए संत ने जो खूनी साजिश रची, उस का परिणाम क्या निकला?

पंजाब के जिला लुधियाना के गांव सिंघवाला खुर्द के रहने वाले दशमेश सिंह के पिता का नाम बलवान सिंह तो मां का सुरजीत कौर था. उस के 5 भाई भगवंत, निरवैर, अशोकजीत, मनोरजीत और सुरिंदरजीत सिंह के अलावा एकलौती बहन कुलदीप कौर थी. इन में दशमेश चौथे नंबर पर था. बलवान सिंह खेतीबाड़ी करते थे. थोड़ीबहुत पढ़ाई कर के उन के सभी बेटे खेतीबाड़ी के काम में उन का हाथ बंटाने लगे थे. लेकिन कुछ दिनों बाद निरवैर, दशमेश और मनोरजीत को खेतीकिसानी का यह काम अच्छा नहीं लगा तो निरवैर जहां फौज में भरती हो गया, वहीं दशमेश और मनोरजीत समयसमय पर विदेश चले गए.

विदेश जाने से पहले ही दशमेश की शादी गांव कुंभड़ाखुर्द के रहने वाले परमल सिंह की बेटी जसपाल कौर से हो गई थी, जिस से वह 3 बच्चों का बाप बना. दशमेश की शादी के समय एक मजेदार घटना यह घटी थी कि बलवान सिंह गए तो थे अपने बड़े बेटे भगवंत सिंह के लिए लड़की देखने. लेकिन उसी समय उन्हें 2 लड़कियां और पसंद आ गई थीं, जो भगवंत की होने वाली ससुराल में रिश्तेदारी में आई थीं. दोनों सगी बहनें थीं और उन के नाम थे सतविंदर कौर और जसपाल कौर. भगवंत सिंह की शादी वाले दिन ही इन दोनों बहनों का भी बलवान सिंह के 2 बेटों, निरवैर सिंह और दशमेश सिंह से ब्याह हो गया था. इस तरह एक ही दिन बलवान सिंह के 3 बेटों की एक साथ शादियां हो गई थीं, जिस की गांवों में खूब चर्चा हुई थी.

निरवैर सिंह शादी से पहले ही फौज में भरती हो गया था, इस के बाद दशमेश ने भी कुछ दिनों तक सेना की नौकरी की. लेकिन अचानक सेना की नौकरी छोड़ कर वह ग्रीस चला गया, जहां 2 सालों तक रहा. ग्रीस से लौट कर साल भर घर पर रहा. उस के बाद वह फिर ग्रीस चला गया. इस बार वह 3 सालों बाद लौटा. कुछ महीने गांव में रहने के बाद बाद वह जर्मनी चला गया, जहां से पत्नी के बारबार बुलाने के बावजूद वह पूरे 8 सालों बाद लौटा. घर लौटने के कुछ दिनों बाद ही थाना खरड़ के अंतर्गत आने वाले एक पोखर में उस की लाश पड़ी मिली. दशमेश की लाश सब से पहले गांव वडाली के रहने वाले राजकुमार ने उस पोखर में औंधे मुंह पड़ी देखी थी.

लाश पर कपड़ों के नाम पर एकमात्र अंडरवीयर था. वह काफी सड़गल चुकी थी. लाश से उठने वाली दुर्गंध ने ही राजकुमार को अपनी ओर आकर्षित किया था. दुर्गंध की वजह से ही वह पोखर के पास गया था,तब उसे लाश दिखाई दी थी. पोखर में लाश पड़ी होने की सूचना पा कर थोड़ी ही देर में पुलिस उपाधीक्षक एच.पी. सिंह थानाप्रभारी सुरजीत सिंह के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. घटनास्थल पर लाश के पास ही पुलिस को पौलीथिन की एक छोटी थैली में एक पत्र मिला था. पत्र में जो लिखा था, उस के अनुसार वह मृतक का सुसाइड नोट लग रहा था. पत्र में लिखे अनुसार, दशमेश सिंह ने घरेलू कारणों से आत्महत्या की थी, जिस का जिम्मेदार उस ने स्वयं को ठहराया था.

इस के अलावा पुलिस को अन्य कोई सूत्र नहीं मिला था. पुलिस ने मौके की आवश्यक काररवाई करने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया था. इस के बाद थानाप्रभारी सुरजीत सिंह ने मृतक दशमेश सिंह के पिता बलवान सिंह से पूछताछ की तो उस समय उन्होंने केवल इतना ही कहा कि मरने वाला उन का बेटा दशमेश सिंह था, जो विदेश में रहता था. घर में ऐसी कोई परेशानी वाली बात नहीं थी, जिस से वह आत्महत्या जैसा संगीन कदम उठाता. जबकि सुरजीत सिंह को मामला आत्महत्या का ही लग रहा था, इसलिए उन्होंने इस मामले को गंभीरता से नहीं लिया. इस की एक वजह यह भी थी कि कुछ महीने पहले इस परिवार में आत्महत्या की एक और घटना घट चुकी थी.

दरअसल, दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह ने भी कुछ महीने पहले आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह एक बताए न जा सकने वाले कारण की वजह से आत्महत्या कर रहा है. इसी बात को ध्यान में रख कर पुलिस यह मान कर चल रही थी कि परिवार में इस तरह की मानसिक प्रवृत्ति बन चुकी है. उसी मानसिक प्रवृत्ति की वजह से दशमेश ने भी आत्महत्या की है. यही सोच कर पुलिस मामले की जांच करने के बजाय शांत हो कर बैठ गई.

बेटे की अंतिम क्रियाओं से फारिग हो कर बलवान सिंह थाना खरड़ पहुंचे और पुलिस से कहा कि दशमेश ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि गहरी साजिश के तहत उसे मार डाला गया है. स्थानीय पुलिस ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया तो वह एसएसपी साहब से मिले. उन्होंने बलवान सिंह की बातों को गौर से सुना और मामले की फाइल सुरजीत सिंह से ले कर सीआईए के इंसपेक्टर को सौंप दी. 2 सप्ताह की गहन छानबीन के बाद सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी जो रिपोर्ट एसएसपी साहब को सौंपी, उस के अनुसार दशमेश सिंह की साजिश के तहत हत्या की गई थी. रिपोर्ट में साजिश के लिए जिन 2 लोगों को दोषी ठहराया गया था, उन में एक उस क्षेत्र का बहुत ही सम्मानित एवं पूज्यनीय व्यक्ति था.

उस पर हाथ डालने से आसपास के गांवों के हजारों लोग पुलिस के खिलाफ खड़े हो सकते थे. उसी बीच सुरजीत सिंह का तबादला कर के इंसपेक्टर दीदार सिंह को खरड़ थाने का थानाप्रभारी बना दिया गया. उन के चार्ज संभालने के 3 दिनों बाद एसएसपी ने उन्हें अपने निवास पर बुला कर इस मामले की फाइल उन्हें सौंपते हुए कहा, ‘‘दीदार सिंह, इस मामले की गुप्तरूप से छानबीन कर के 2 हफ्तों में मुझे अपनी रिपोर्ट दो.’’

दीदार सिंह को फाइल देने से पहले एसएसपी साहब ने फाइल से सीआईए इंसपेक्टर की रिपोर्ट निकाल कर अपने पास रख ली थी.

दीदार सिंह ने फाइल संभालते हुए कहा, ‘‘जी सर, मैं पूरी छानबीन कर के निश्चित अवधि में अपनी रिपोर्ट अवश्य दे दूंगा.’’

इस के बाद एसएसपी साहब को सैल्यूट कर के वह कैंप औफिस से बाहर निकल आए.  थाने लौट कर उन्होंने फाइल का गहन अध्ययन किया. इस के बाद एएसआई गुरबख्श सिंह और एएसआई इकबाल सिंह की मदद से इस मामले की जांच में जुट गए. ठीक 11 दिनों बाद रिपोर्ट तैयार कर के उन्होंने एसएसपी साहब के सामने रख दी. दीदार सिंह की रिपोर्ट में भी दशमेश की आत्महत्या को हत्या करार देते हुए उन्हीं 2 लोगों पर शक जाहिर किया गया था, जिन का उल्लेख सीआईए इंसपेक्टर ने अपनी रिपोर्ट में किया था.

रिपोर्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ने के बाद एसएसपी साहब ने कहा, ‘‘दीदार सिंह, कल सुबह दशमेश के घर के किसी सदस्य को बुला कर उस का बयान दर्ज करो. उस के बाद जिला अटौर्नी की राय ले कर एफआईआर दर्ज करो. उस के बाद जरूरी काररवाई करो.’’

दीदार सिंह ने दशमेश के यहां संदेश भेजा तो बलवान सिंह अपने बेटे अशोकजीत के साथ थाने आ पहुंचे. उन्होंने अशोकजीत से तहरीर ले कर संदिग्ध लोगों के नामपते लिख कर अपनी संस्तुति के साथ वह तहरीर डीएसपी के माध्यम से जिला न्यायवादी के पास भिजवा दी. अगले ही दिन सहायक जिला न्यायवादी ज्ञानचंद ने इस पर टिप्पणी लिख कर भिजवा दिया कि इस मामले में भादंवि की धारा 302/34 के तहत प्राथमिकी दर्ज कर के छानबीन की जा सकती है. फिर क्या था, थाना खरड़ में दशमेश सिंह की हत्या का मुकदमा दर्ज हो गया. खरड़ थाना पुलिस ने हत्या का यह मामला जिन 2 लोगों के खिलाफ दर्ज किया था, उन में एक तो थी दशमेश सिंह की विधवा जसपाल कौर और दूसरा था उस इलाके का जानामाना संत इंदरजीत सिंह.

जैसे ही दोनों को मुकदमा दर्ज होने का पता चला था, वे भूमिगत हो गए थे. उन की तलाश में दीदार सिंह ने अनेक संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों ही उन के हाथ नहीं लगे, लेकिन इस से वे निराश नहीं हुए और अभियुक्तों की गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास करते रहे. अंतत: उन की कोशिश कामयाब हो ही गई. गांव ध्यानपुर के सरपंच पाला सिंह ने दोनों वांछित अभियुक्तों जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह को ला कर थानाप्रभारी दीदार सिंह के सामने पेश कर दिया. दरअसल जसपाल कौर और संत इंदरजीत सिंह पुलिसिया काररवाई से घबरा कर पाला सिंह की शरण में पहुंच गए थे. पाला सिंह के सामने दोनों ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए पुलिस की मारपीट से बचा लेने की गुहार की थी.

इस के बाद पाला सिंह दोनों को समझाबुझा कर थाने ले आए थे तब बयान दर्ज कर के पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को विधिवत गिरफ्तार कर अलगअलग हवालातों में बंद कर दिया था. अगले दिन दोनों को खरड़ के प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी एच.एस. मदान की अदालत में पेश कर के थाना खरड़ पुलिस ने पूछताछ के लिए 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. दीदार सिंह द्वारा की गई पूछताछ में इन लोगों ने जो कुछ बताया, उस से ढोंगी संत के घिनौने आपराधिक सिलसिले की एक ऐसी अमानवीय सनसनीखेज कहानी सामने आई, जो औरों के लिए एक सीख बन सकती है.

शादी के बाद सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. दशमेश सिंह अपनी पत्नी से खुश था तो जसपाल कौर को भी पति से कोई शिकायत नहीं थी. समयसमय पर उस ने 3 बच्चों को जन्म दिया. इस के बावजूद उस की सुंदरता में कोई कमी नहीं आई. जसपाल कौर जहां संतोषी युवती थी, वहीं दशमेश बहुत ज्यादा महत्त्वाकांक्षी था. उस पर हमेशा जिंदगी में आगे बढ़ने और अधिकाधिक पैसा कमाने की धुन सवार रहती थी. इस के लिए वह तरहतरह की योजनाएं बनाता रहता था. उन्हीं में से एक योजना यह भी थी कि बारबार भारत लौटने के बजाय कई सालों तक विदेश में रह कर ढेरों रुपया पत्नी को भेजता रहे, ताकि जब वह लौटे तो उसे फिर से विदेश जाने की जरूरत न पड़े.

उस ने यही किया भी. विदेश में लंबे समय तक रह कर वह भले ही घर नहीं आया था, लेकिन रुपए उसने इस कद्र भेजे थे कि उस के परिवार ने कल्पना नहीं की थी. पैसा भले ही खूब आ रहा था, लेकिन पति के बिना जसपाल कौर को सब सूना लगता था. उस ने 2 साल तो जैसेतैसे काट लिए, लेकिन उस के बाद उस का समय काटे नहीं कटता था. दशमेश को वह हर हफ्ते चिट्ठी लिखती और उस से वापस आने का आग्रह करती. दूसरी ओर दशमेश पर अधिक से अधिक पैसा कमाने की धुन सवार थी. इसलिए उस ने पत्नी की बातों पर जरा भी ध्यान नहीं दिया. शायद पत्नी की आहत भावनाओं की जैसे उसे जरा भी चिंता नहीं थी.

इस के बाद पति के विछोह में या अन्य किसी वजह से जसपाल कौर बीमार रहने लगी. गांव के डाक्टरों से ले कर लुधियाना के बड़े डाक्टरों तक से उस का इलाज कराया गया, लेकिन किसी की समझ में उस की बीमारी नहीं आई. जसपाल कौर की बड़ी बहन सतविंदर कौर, जो उस की जेठानी भी थी, ने अपने फौजी पति से कह कर गांव में ही अलग मकान ले लिया था, क्योंकि परिवार के साथ रहना उसे शुरू से ही पसंद नहीं था. छोटी बहन की बीमारी से वह भी परेशान थी.

एक दिन सतविंदर कौर ने जसपाल को अपने घर बुला कर कहा, ‘‘कुल्हैड़ गांव में एक संतजी हैं. वह किसी भी बीमारी का इलाज चुटकियों में कर देते हैं. बहुत पहुंचे हुए महात्मा हैं. अपनी समस्याएं ले कर दूरदूर से लोग उन के पास आते हैं और संतजी उन की परेशानियां चुटकी बजा कर दूर कर देते हैं.’’

‘‘दीदी, यह सब फालतू की बातें हैं.’’ जसपाल ने कहा.

‘‘इसीलिए तो मैं ने आज तक तुम से इस बारे में कोई बात नहीं की. पता नहीं तुम खुद को क्या समझती हो.’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है दीदी.’’

‘‘यह बात नहीं, वह बात नहीं. इतने डाक्टरों से इलाज करवा लिया, क्या हुआ, हो गई ठीक?’’

‘‘चंडीगढ़ के पीजीआई अस्पताल में दिखाने जाऊंगी. देखो, वहां के डाक्टर क्या कहते हैं.’’

‘‘कुछ नहीं कहेंगे, फालतू के टैस्ट कर के तेरा सत्यानाश कर देंगे. ऐसे ही मर जाएगी एक दिन तू.’’ सतविंदर ने बहन को डांटते हुए कहा, ‘‘अच्छा, एक बात बता, कभी मुझे बीमार होते देखा है? मेरी मान, किसी दिन मेरे साथ संतजी के पास चल. एक हफ्ते में तू भलीचंगी न हो जाए तो कहना.’’

‘‘जिस बीमारी का इलाज डाक्टर नहीं कर सके दीदी, भला एक संत उस का इलाज क्या करेगा? मेरी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा.’’

‘‘समझने की जरूरत भी नहीं है,’’ सतविंदर ने कहा, ‘‘आज तक किसी डाक्टर ने तुम्हें तुम्हारी बीमारी के बारे में बताया है? दरअसल तुम्हें कोई बीमारीवीमारी नहीं है. किसी ने कुछ कर करा दिया है. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि संतजी तुम्हें हफ्ते भर में भलीचंगी कर देंगे.’’

इस के बाद जसपाल कौर बहन सतविंदर कौर के साथ संतजी के यहां जा पहुंची थी.

संत का इतिहास कुछ इस तरह से था. एक बार दसवीं में फेल होने के बाद इंदरजीत सिंह ने पढ़ाई को तिलांजलि दे दी और गुरुद्वारा में जा कर पूजापाठ करने लगा. उस की इस पूजापाठ से गांव वाले उस की इज्जत करने लगे. इस से प्रेरित हो कर वह इस दिशा में और आगे बढ़ने की कोशिश करने लगा. उसी बीच एक ऐसी घटना घटी कि उस की इज्जत एकदम से बढ़ गई.

गांव की परमजीत कौर को दौरे पड़ते थे. एक दिन वह गुरुद्वारा में मत्था टेकने आई तो इंदरजीत ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बीमारी के लिए दवा तैयार कर रहा हूं. वाहेगुरु ने चाहा तो उस दवा से ठीक हो जाओगी.’’

इंदरजीत देसी दवा बनाने के नुस्खे वाली किताबें पढ़ा करता था. उन्हीं नुस्खों पर दवा तैयार कर के उस ने परमजीत कौर को दी. मनोवैज्ञानिक प्रभाव था या अन्य कोई वजह, संयोग से कुछ ही दिनों में परमजीत बिलकुल ठीक हो गई. इसी तरह के कुछ और मामले इंदरजीत ने सुलझाए तो गांव में उस का रुतबा बढ़ गया. इस के बाद वह कहने लगा कि उस ने अपनी अलौकिक शक्ति से ये कारगर दवाएं तैयार की थीं. इसी वजह से गांव में सब उसे सम्मान की दृष्टि से देखने लगे. लोग अब उसे संतजी कह कर बुलाने लगे.

धीरेधीरे संत इंदरजीत की शोहरत आसपास के इलाकों में फैल गई. अनुभव के आधार पर संत इंदरजीत की देसी दवाओं और जड़ीबूटियों की काफी जानकारी हो गई थी. आशीर्वाद लेने और अपने भविष्य के बारे में जानने के लिए आने वाले लोगों के अलावा लड़कियां और महिलाओं की एक ऐसी संख्या थी, जो जरा सी बीमारी के लिए भी दवा लेने उस के पास चली आती थीं. उन्हीं में एक सतविंदर कौर भी थी. वह संतजी से काफी प्रभावित थी. यही वजह थी कि वह अपनी छोटी बहन जसपाल कौर को भी समझाबुझा कर उस के पास ले आई थी. जसपाल कौर में ऐसा न जाने क्या था कि पहली ही नजर में वह संत इंदरजीत को भा गई थी. उसे लगा कि शायद यह उसी के लिए बनी है.

जसपाल कौर भी संत के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हुई थी. पति से सालों से दूर रह रही जसपाल को भी संत भा गया था. पहली ही नजर में दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित हो गए थे. फिर तो पहली नजर के इस प्यार ने उन के भीतर इस कदर कशिश बढ़ा दी कि दोनों 2-4 दिनों के अंतर से मिलने लगे. जसपाल न आ पाती तो इंदरजीत खुद उस के गांव पहुंच जाता. चाहत बढ़ी तो जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध बन गए. इस के बाद जसपाल की हर बीमारी उड़नछू हो गई. जसपाल के बताए अनुसार, संतजी के आगोश में आने के बाद वह पूरी दुनिया भूल गई थी. संत का सभी आदर करते थे. उस की तरफ अंगुली उठाने की हिम्मत किसी में नहीं थी. जसपाल कौर को ले कर जब उस की सच्चाई लोगों के सामने आने लगी तो पहले लोगों ने दबी जुबान में, फिर खुल कर इस मामले पर चर्चा करने लगे.

कुछ लोगों ने इस की चर्चा बलवान सिंह से भी की. बलवान सिंह ने इस बात को गंभीरता से लिया और जसपाल कौर को समझाना चाहा तो उस ने उन का घर छोड़ दिया और बड़ी बहन सतविंदर के साथ रहने लगी. बच्चों को भी वह अपने साथ नहीं लाई. बलवान सिंह गांव में अपनी रुसवाई नहीं करवाना चाहते थे, साथ ही विदेश में रह रहे बेटे को भी इस बारे में बता कर परेशान नहीं करना चाहते थे. लिहाजा वह जितना चुप रहे, जसपाल उतनी ही बागी होती गई.

फलस्वरूप तथाकथित संत इंदरजीत के प्रति लोगों के मन में गुस्सा पैदा होने लगा. जब यह गुस्सा बढ़ने लगा तो गांव में टिके रहना संत को खतरे से खाली नहीं लगा. उसे लगने लगा कि जसपाल के साथ उस के संबंधों को ले कर गांव में कभी भी विस्फोट हो सकता है, जो उन दोनों के लिए काफी महंगा साबित हो सकता है. यह सब सोच कर एक रात संत इंदरजीत ने गांव छोड़ दिया और खरड़ के नजदीकी गांव छिन्नाहर्षा में जा कर रहने लगा. जल्दी ही संत ने यहां भी अपनी प्रतिष्ठा कायम कर ली. जसपाल कौर भी उस के साथ थी. अब तक जसपाल की ससुराल वालों ने उस की तरफ से मुंह मोड़ लिया था. सब ने तय कर लिया था कि दशमेश के स्वदेश लौटते ही उस से जसपाल को तलाक दिलवा दिया जाएगा.

लेकिन दशमेश के छोटे भाई सुरिंदर सिंह को अपनी भाभी के इस गलत दिशा में उठे कदम काफी दुखी किया था. यह बात उस से बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस के बारे में सोचसोच कर उस का मन अवसाद से भर जाता था. एक दिन वह छिन्नाहर्षा स्थित संत के डेरे पर गया. जसपाल कौर और संत इंदरजीत बैठे बातें कर रहे थे. संत को नजरअंदाज कर के सुरिंदर ने जसपाल कौर के पैरों को छू कर कहा, ‘‘भाभी, मैं ने तुम्हें हमेशा मां के रूप में देखा है. मैं तुम से यह कहने आया हूं कि इस संत को छोड़ कर अपनी दुनिया में लौट चलो.’’

‘‘तुम अपने घर जाओ सुरिंदर, अब यही मेरी दुनिया है.’’ जसपाल कौर ने दो टूक जवाब दिया.

‘‘भाभी, तुम मुझ से ज्यादा समझदार हो. इस बात को तुम मुझ से बेहतर जानती हो कि औरत की जन्नत उस के पति का घर होती है.’’

‘‘देखो सुरिंदर, फालतू बातें करने की जरूरत नहीं है. मैं यहां खुश नहीं, बहुत ज्यादा खुश हूं. अब मुझे तुम लोगों से कुछ लेनादेना नहीं है.’’ जसपाल कौर झुंझला कर बोली.

‘‘क्या भैया से भी नहीं?’’ सुरिंदर ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘मुझ से और अपने बच्चों से भी तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है?’’

‘‘नहीं, तुम सब लोग मेरे लिए मर चुके हो.’’

‘‘भाभी, अगर ऐसा है तो तुम एक बात सुन लो, अगर तुम कल तक घर नहीं लौटी तो तुम्हारा यह देवर अपनी जान दे देगा.’’

‘‘अरे कल का इंतजार क्यों, आज ही अपनी जान दे दो. तुम जियो या मरो, मुझे कोई परवाह नहीं है. मेरे पास दुनिया का हर सुख है.’’ जसपाल कौर ने कहा.

देवरभाभी की इस बातचीत में संत इंदरजीत कुछ नहीं बोला. वह चुपचाप मंदमंद मुसकराता रहा. अगली रात सुरिंदर ने बहुत ज्यादा शराब पी कर आत्महत्या कर ली थी. मरने से पहले उस ने घर वालों के लिए जो संदेश छोड़ा था, उस में उस ने लिखा था कि वह आत्महत्या का कारण नहीं बता सकता. इस तरह यह मामला रफादफा हो गया था. क्योंकि किसी ने गहराई में जाने की कोशिश ही नहीं की थी. दशमेश को भी यही सूचना भेजी गई थी कि ज्यादा शराब पीने की वजह से सुरिंदर भगवान को प्यारा हो गया था. देखतेदेखते 6 महीने का समय बीत गया. संत इंदरजीत और जसपाल कौर का लगाव धीरेधीरे इतना गहरा हो गया कि लोगों का मुंह बंद करने के लिए उन्होंने शादी करने का मन बना लिया.

इस के लिए जरूरी था कि जसपाल कौर दशमेश से तलाक ले, जिस के लिए शायद वह किसी भी कीमत पर राजी न होता. इसी बात के हल के लिए संत ने मन ही मन खतरनाक योजना बना डाली. इस के बाद उस ने जसपाल से कहा, ‘‘तुम दशमेश को किसी तरह यहां बुलाओ. मैं कुछ इस तरीके से उस का पत्ता साफ करूंगा कि किसी को हम पर जरा भी शक नहीं होगा.’’

‘‘जैसा आप कहेंगे संतजी, मैं वैसा ही करूंगी. मैं दशमेश को बुलाने की कोशिश करती हूं.’’

संत के निर्देशानुसार जसपाल ने दशमेश को लगातार कई पत्र लिखे और फोन किए. इस पर भी दशमेश आने को राजी नहीं हुआ तो उस ने धमकी देते हुए कहा कि अगर अब वह वापस नहीं आया तो वह उसे छोड़ कर किसी और के साथ घर बसा लेगी. आशा के अनुरूप दशमेश भारत लौट आया. गांव पहुंचने पर पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो वह गुस्से में भरा संत इंदरजीत के डेरे पर जा पहुंचा. लेकिन संत ने उसे अपनी वाणी और शब्दजाल से ऐसा संतुष्ट किया कि उस का गुस्सा शांत हो गया. इस के बाद संत ने कोई बूटी घोल कर शरबत तैयार किया और उसे दशमेश को प्रेम से पिला दिया. उस के पीने के बाद वह उठनेबैठने और चलनेफिरने लायक नहीं रहा.

इस के बाद संत और जसपाल ने चारों तरफ यह बात फैला दी कि दशमेश भी संत का पक्का शिष्य बन गया है. संत ने क्षेत्र के अपने भक्तों में अपना ऐसा प्रभुत्व स्थापित कर लिया था कि उस की प्रचारित अफवाह पर सब ने यकीन कर लिया. अगर जसपाल कौर का मामला दरकिनार कर दिया जाए तो संत इंदरजीत अपने भक्तों के लिए किसी अवतार से कम नहीं था. अपने इसी प्रभाव का फायदा उठाते हुए एक रात संत इंदरजीत ने दशमेश को सल्फास घुली शराब पिला कर मौत की नींद सुला दिया और आधी रात के बाद जसपाल की मदद से उस की लाश को गांव वडाली को जाने वाले रास्ते पर स्थित एक पोखर में फेंक दिया.

लाश फेंकने से पहले उन्होंने दशमेश के शरीर पर अंडरवियर छोड़ कर उस के सारे कपड़े उतार लिए थे और खुद को बचाने के लिए उसी के साथ संत ने खुद की लिखावट बदल कर दशमेश की ओर से सुसाइड नोट भी लिख कर वहां छोड़ दिया था. संत इंदरजीत और जसपाल कौर अपराधी प्रवृत्ति के तो थे नहीं, जिस्मानी भूख मिटाने के चक्कर में बिना कुछ सोचेसमझे यह अपराध कर बैठे थे. शायद यही वजह थी कि बचने की तमाम कोशिश करने के बावजूद वे फंस गए थे. संत की करतूत जब उस के भक्तों के सामने आई तो सभी ने नफरत से उस की ओर से मुंह मोड़ लिया. दशमेश के कपड़े आदि बरामद करने के लिए जिस दिन पुलिस संत को ले कर छिन्नाहर्षा स्थित उस के आश्रम पहुंची, हजारों लोगों ने उस के विरुद्ध नारे लगाए और पुलिस प्रशासन से उसे और जसपाल कौर को फांसी दिलवाने की मांग की.

संत और जसपाल कौर को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था. दोनों का कहना था कि उन्हें सजा हो भी गई तो सजा के बाद वे दोनों बाहर आएंगे तो पतिपत्नी की तरह साथसाथ रहेंगे. रिमांड अवधि समाप्त होने पर थाना खरड़ पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें पटियाला की केंद्रीय जेल भेज दिया गया. पुलिस ने समय पर दोनों के खिलाफ आरोपपत्र तैयार कर अदालत में पेश कर दिया.  रोपड़ की अदालत में 3 साल केस चला. माननीय सेशन जज ने संत इंदरजीत और जसपाल कौर को दशमेश सिंह की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई, जिसे दोनों पटियाला की जेल में भुगत रहे हैं.

बहरहाल, यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगा कि आज पारंपरिक आस्थाओं और धर्मों से हट कर पाखंड और प्रपंच से ओतप्रोत एक ऐसी आडंबरी दुनिया रच दी गई है, जिस के स्वयंभू भगवान बन बैठे हैं. इस के संचालक अपने छल से न केवल लोगों को ठगते हैं, बल्कि उन्हें अपराध करना भी सिखाते हैं और खुद भी अपराध की राह पर चलने से नहीं कतराते. आज बहुत जरूरी है कि ऐसे ढोंगी संतोंबाबाओं की कुदृष्टि से समाज को बचाने में कोई कसर न छोड़ी जाए. Punjab Crime

 

Hindi Stories: खून सने इश्क की टेढीं राहें

Hindi Stories: तेजिंदर और हिम्मत सिंह को पतिपत्नी के रूप में देख कर एक वरिष्ठ वकील होते हुए भी मैं चकरा गया, इस की वजह यह थी कि उस ने हिम्मत और उस के जीजा को फांसी के तख्ते तक पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली थी. पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान की अदालतों में मैं ने 50 हजार से भी अधिक क्रिमिनल मुकदमे लड़े हैं. इन में कुछ ऐसे भी मुकदमे थे, जिन की चर्चा राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई थी.

आज मैं जिस मुकदमे की बात करने जा रहा हूं, उस तरह का रोचक और अनूठा मुकदमा मेरे पास दोबारा नहीं आया. अपनी तरह का वह एक ऐसा अनोखा मुकदमा था, जिसे मैं कभी भुला नहीं पाया. वह इतवार का दिन था. 6 दिनों के काम की थकान उतारने को मैं बिस्तर पर अधलेटा चाय की चुस्कियां लेते हुए टीवी देख रहा था. उस समय दिन के साढ़े 11 बज रहे थे. घर के किसी सदस्य ने आ कर बताया कि मुझ से मिलने के लिए हिम्मत सिंह नाम का कोई आदमी कोठी के गेट पर खड़ा है. हिम्मत एक कत्ल के मुकदमे में फंसा था, जिस की पैरवी मैं ने की थी. उस मुकदमे में वह बरी हो गया था. मुझे तुरंत वह सब याद आ गया. लगा, शुक्रिया अदा करने आया होगा. मैं ने उसे भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कह दिया.

कुछ देर बाद मैं सहज रूप से ड्राइंगरूम में पहुंचा तो वहां का दृश्य चौंकाने वाला था. मेरे ठीक सामने वाले सोफे पर तेजिंदर शादी के लाल सुर्ख जोड़े में बैठी थी और उस की बगल में हिम्मत सिंह बैठा था. वह भी खूब बनठन कर आया था. देखने से ही लग रहा था कि दोनों ने शादी कर ली है. हिम्मत सिंह के हाथ में बड़ा सा मिठाई का डिब्बा था. उस के चेहरे के भावों से ही लग रहा था कि उस के साथ बैठी औरत उस की पत्नी है. इस का मतलब तेजिंदर ने उस से शादी कर ली थी.

मेरे लिए यह अविश्वसनीय एवं विचित्र बात थी. मैं असमंजस में फंस गया था. इसलिए बिना किसी संबोधन के मैं ने सीधे पूछा, ‘‘क्या तुम दोनों ने शादी कर ली?’’

हिम्मत सिंह के बजाय जवाब तेजिंदर ने दिया, ‘‘जी हां वकील साहब, कल हम ने शादी कर ली. आज आप से आशीर्वाद लेने आए हैं. आप बहुत ही नेक इंसान हैं. आप हम दोनों को हमेशा सुखी रहने का आशीर्वाद दीजिए. मेरी जीत में आप का बहुत बड़ा योगदान है.’’

‘‘सचमुच तुम दोनों ने शादी कर ली?’’ मैं ने हिम्मत सिंह की ओर देखते हुए वही सवाल इस तरह दोबारा किया, जैसे तेजिंदर की बात पर मुझे विश्वास न हुआ हो.

तेजिंदर मेरी बात का आशय शायद समझ गई, इसलिए फटाक से बोली, ‘‘जी वकील साहब, मैं ने हिम्मत से सचमुच शादी कर ली है.’’

मुझ से रहा नहीं गया. आशीर्वाद की बात भूल कर मैं ने हिम्मत से पूछा, ‘‘क्यों भई, तुम ने उसी से शादी कर ली, जिस ने तुम्हें फांसी पर चढ़वाने का पूरा इंतजाम कर दिया था? यह सब क्या रहस्य है, मेरी कुछ समझ में नहीं आया?’’

‘‘इस के बारे में तो मैं यही कह सकता हूं वकील साहब कि औरत को समझ पाना दुनिया में किसी के वश का नहीं है. तेजिंदर ने न केवल मुझे फांसी के फंदे से बचाया, बल्कि अपने प्यार के फर्ज को निभाते हुए मेरा उजड़ा हुआ घर भी बसा दिया.’’ हिम्मत ने तेजिंदर की ओर देखते हुए कहा. हिम्मत की यह बात मुझे और ज्यादा हैरान करने वाली लगी. इतने दिनों से वकालत के पेशे में रहने के बावजूद मैं उस की बातों का एकदम से कोई मतलब नहीं निकाल सका. फिलहाल मैं ने दोनों को आशीर्वाद दे कर विदा कर दिया. उन के जाने के बाद मैं उन के बारे में गहराई से सोचने लगा.

लुधियाना की तहसील खन्ना में अपने पति बलवान सिंह के साथ रहती थी तेजिंदर कौर. जब वह मेरे पास आई थी तो उस पर 2 साथियों के साथ मिल कर अपने पति का कत्ल करने का आरोप था. उस समय उस ने मुझे जो बताया था, वह सब कुछ इस तरह था. तेजिंदर का पति बलवान सिंह खन्ना के किसी सरकारी औफिस में नौकरी करता था. वह सीधासादा आदमी था. तेजिंदर को पत्नी के रूप में पा कर वह जितना खुश था, उसी तरह उसे भी खुश रखने की कोशिश करता था. पत्नी की एकएक बात का खयाल रखता था. रात में भी वह उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करता.

इतना सब करने के बावजूद भी बलवान के खजाने में शायद किसी रत्न की कमी थी. भले ही वह पत्नी को हर सुख देने की कोशिश करता था, लेकिन तेजिंदर औरत थी. उसे जरूरत थी उस परमसुख की, जिस की चाह में औरतें किसी पर भी अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो जाती हैं. अफसोस की बात यह थी कि वह अनमोल सुख उसे बलावान सिंह से नहीं मिल पा रहा था. यही वजह थी कि इतना प्यार करने के बावजूद बलवान सिंह पत्नी का मन जीत लेना तो दूर, दिन पर दिन वह उस की उपेक्षा एवं नफरत का शिकार होता गया.

फिर एक समय ऐसा भी आ गया, जब तेजिंदर को बलवान से हद से ज्यादा नफरत हो गई. वह हर रात उसे नई उमंग एवं नए उत्साह से अपनी बांहों में समेटता और भरपूर प्यार करने की कोशिश करता, लेकिन अंत में तेजिंदर तड़पती और छटपटाती रह जाती. वह खर्राटे भरने लगता. ऐसे में तेजिंदर की उस के प्रति नफरत बढ़ती ही गई. वह उसे छोड़ कर कहीं और जाने पर गंभीरतापूर्वक विचार करने लगी. उन्हीं दिनों उन के बीच एक तीसरा आदमी आ टपका, जो बलवान सिंह का दोस्त हिम्मत सिंह था. कुछ दिनों पहले उस की पत्नी की अचानक मौत हो गई थी. इसी के बाद उस ने कहीं भी आनाजाना बंद कर दिया था.

एक दिन बलवान जबरदस्ती उसे अपने घर ले आया और उस का दुख कम करने की कोशिश करने लगा. इस कोशिश में उस ने तेजिंदर को भी शामिल कर लिया था. तेजिंदर लगातर उस के साथ रहती थी. उन की बातों से हिम्मत को काफी हौसला और हिम्मत आई. वह सोचने लगा कि अब वह पिछले गम को भुला कर सहज जिंदगी जिएगा. इस के बाद हिम्मत सिंह अकसर बलवान के घर जाने लगा. कभी ऐसा भी मौका आता, जब बलवान सिंह घर पर नहीं होता. ऐसे में अपना फर्ज निभाते हुए तेजिंदर उस की खूब आवभगत करती और पत्नी की मौत का गम भुलाने वाली बातें करती.

ऐसे में ही एक दिन जब हिम्मत उस के यहां आया तो कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद हिम्मत ने तेजिंदर का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘जब से रानो वाहेगुरु को प्यारी हुई है भाभी, मेरा इस दुनिया से जी भर गया था. सुबह उठ कर ऊपर वाले से यही दुआ करता था कि रानो की तरह मुझे भी अपने पास बुला ले. लेकिन अब तुम्हारी यह मनमोहिनी सूरत मेरे मन में ऐसी बस गई है कि मैं इस सूरत का गुलाम बन कर रह गया हूं. सच कहूं भाभी, तुम से ज्यादा खूबसूरत औरत इस दुनिया में दूसरी कोई नहीं हो सकती.’’

तेजिंदर को किसी पराए मर्द से इस तरह अपनी तारीफ सुनना अच्छा तो लगा, लेकिन इस मामले में समझ से काम लेना जरूरी था. जरा सी भूल उस की जिंदगी तबाह कर सकती थी. इस के बावजूद हिम्मत के मुंह से अपनी तारीफें सुनसुन कर वह उस की ओर खिंचने लगी. उस का मन करता कि वह हमेशा उस के पास बैठा उस की खूबसूरती की तारीफें करता रहे. दूसरी ओर हिम्मत जब तेजिंदर की तारीफें करता, उस वक्त उस की आंखों में एक निमंत्रण दिखाई देता था. तेजिंदर को यही लगता था कि अगर उस ने हिम्मत कर के हिम्मत के आगे आत्मसमर्पण कर दिया तो निश्चित ही वह उस की हर इच्छा पूरी कर देगा.

फिर एक दिन ऐसा हो भी गया. उस रात हिम्मत और बलवान ने घर पर महफिल जमा रखी थी. खातेपीते आधी रात हो गई तो बलवान ने हिम्मत को वहीं सो जाने को कहा. उसे बैडरूम में सुला कर बलवान पत्नी को साथ ले कर छत पर सोने चला गया. अप्रैल का महीना था, ठंडीठंडी हवा चल रही थी. जरा ही देर में बलवान और तेजिंदर गहरी नींद सो गए. रात को तेजिंदर को लगा, उसे कोई उठाने की कोशिश कर रहा है. जैसे ही उस की आंखें खुलीं, उठाने वाले ने फटाक से उस का मुंह अपने हाथ से बंद कर दिया. उस के बाद कान में धीरे से बोला, ‘‘भाभी, आज अपना प्यार दे दो या फिर जहर दे कर मुझे मेरी रानो के पास भेज दो.’’

तेजिंदर ने आवाज पहचान ली थी. लेटेलेटे उस ने तिरछी नजरों से बलवान को देखा. वह गहरी नींद सो रहा था. उस ने मुंह पर रखा हिम्मत कर हाथ हटा कर प्यार से कहा, ‘‘तुम नीचे चल कर अपने बिस्तर पर लेटो, मैं वहीं आ कर तुम से बात करती हूं.’’

हिम्मत चला लेकिन उस ने तेजिंदर के जिस्म को जैसे झकझोर कर रख दिया था. इस के बाद बिना आगेपीछे की सोचे वह हिम्मत के पीछेपीछे आ कर उस के बगल लेट गई. इस के बाद हिम्मत ने रानो की कमी तेजिंदर से पूरी कर ली. दूसरी ओर तेजिंदर को हिम्मत से जो सुख मिला, उस ने जीवन के प्रति उस का नजरिया ही बदल दिया. शादी के बाद उस ने पहली बार महसूस किया था कि जिंदगी इस तरह भी रंगीन हुआ करती है. अपनी इस नई सोच के साथ वह छत पर पहुंची तो बलवान सिंह पहले की ही तरह गहरी नींद में सो रहा था. एक बार झिझक मिटी तो सिलसिला शुरू हो गया. हिम्मत और तेजिंदर को जब भी मौका मिला, दोनों ने उस का फायदा उठा लिया.

कहते हैं, इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. बलवान सिंह को भी किसी तरह पत्नी और हिम्मत के संबंधों की भनक लग गई. पहले तो उस ने समाज की ऊंचनीच बता कर तेजिंदर को समझाया. कोई असर न होते देख उस ने तेजिंदर पर सख्ती करनी शुरू कर दी. लेकिन बलवान की ऐसी किसी भी कोशिश का तेजिंदर पर कोई असर नहीं हुआ. क्योंकि अब तक वह हिम्मत के प्यार में आकंठ डूब चुकी थी. वह पति के सामने ही हिम्मत के साथ के अपने संबंधों को स्वीकार करने लगी थी. इस स्थिति में कोई भी होता, आपा खो बैठता. बलवान भी अब और सख्त हो गया और भूत की तरह पत्नी के आगेपीछे घूमने लगा.

तेजिंदर के लिए यह बरदाश्त के बाहर की बात हो गई थी. आखिर एक दिन उस ने इस बारे में हिम्मत से बात की तो हिम्मत ने कहा, ‘‘पागल है साला, सारी सच्चाई जानता है, फिर भी अपना मुंह काला करवाने पर तुला है. मैं तो कहता हूं कि तुम अपने हिसाब से रहो. अगर ज्यादा चूंचपड़ करे तो झिड़क दिया करो.’’

‘‘हां, यह भी ठीक है. अब ऐसा ही करूंगी.’’ तेजिंदर ने कहा.

दूसरी ओर बलवान सिंह ने दूसरा ही इरादा बना रखा था. उस ने पत्नी को सही राह पर लाने के लिए और अधिक सख्ती शुरू कर दी. एकाध बार उस ने उस की पिटाई भी कर दी.

इस से तेजिंदर को उस से और ज्यादा नफरत हो गई. अगली मुलाकात में उस ने हिम्मत से साफ शब्दों में कह दिया, ‘‘अगर तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी बना कर रखना चाहते हो तो इस आदमी को हमेशा के लिए मेरी जिंदगी से निकाल दो.’’

‘‘उस से तलाक दिलवा दूं?’’ हिम्मत ने मन की बात जानने के लिए हंस कर पूछा.

‘‘मेरी बातों को हंसी से मत टालो. मैं पूरी तरह से गंभीर हूं. वह इस जनम में मुझे तलाक दे नहीं सकता. मेरी मानो तो उसे इस दुनिया से ही विदा कर दो. इस में मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी.’’

‘‘अरे तुम ने तो बहुत दूर तक सोच लिया. उसे मरवा कर खुद भी जेल जाओगी और मुझे भी भिजवाओगी.’’

‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर इस का कुछ नहीं किया गया तो वह निश्चित मुझे मार डालेगा. वह पागल होता जा रहा है. उस के अंदर का जानवर जाग उठा है.’’ कह कर तेजिंदर फूटफूट कर रोने लगी.

हिम्मत को उस के रोने के पीछे कोई बनावट नजर नहीं आई. उस के रोने में भय और मजबूरी साफ झलक रही थी. इसलिए उस की आंखों में खून उतर आया. वह तैश में आ कर बोला, ‘‘वह ऐसावैसा कुछ करे, उस के पहले ही मैं उस का टेंटुआ दबा दूंगा. तू चिंता मत कर, मैं आज ही गांव से अपने जीजा कुलवंत को बुलाए लेता हूं. इस के बाद हम दोनों बलवान की सारी पहलवानी निकाल देंगे. बस आज रात 9 बजे तुम किसी बहाने उसे रेलवे लाइन पर ले जाना.’’

‘‘ठीक है,’’ तेजिंदर ने खुश हो कर कहा, ‘‘ऐसा ही करूंगी. बस तुम तैयार रहना. और हां, तुम्हें यह काम बड़ी होशियारी से करना होगा. यह कांटा निकल गया तो जिंदगी भर मैं तुम्हारी, सिर्फ तुम्हारी हो कर रहूंगी.’’

इतना कह कर तेजिंदर ने हिम्मत का हाथ पकड़ लिया तो उस का हाथ अपने सीने पर रख कर हिम्मत ने कहा, ‘‘तुम अपने इस यार पर भरोसा रखो, यारी की है तो मरते दम तक निभाऊंगा भी.’’

यह 11 मई, 1979 की बात थी. घर पहुंच कर आगे की योजना और स्थितियों से निबटने के लिए तेजिंदर विचार करने लगी. इस के बाद सजधज कर बलवान सिंह का इंतजार करने लगी. शाम को ठीक साढ़े 5 बजे बलवान सिंह घर लौटा तो पत्नी को इस तरह सजीधजी देख कर उसे हैरानी हुई. इस से भी ज्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि आते ही उस की आवभगत में लग गई. उसे चाय दे कर उस से बड़े प्यार से बातें भी करने लगी.

बलवान उस में आए इस बदलाव के बारे में कुछ पूछता, उस ने खुद ही कहा, ‘‘मेरा बदला हुआ रूप देख कर तुम्हें हैरानी हो रही होगी न? दरअसल आज एक साधु बाबा आए थे. मुझे दुखी देख कर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारा अपने पति से झगड़ा रहता है न?’

‘‘यह बात उस ने कही या तुम ने खुद ही उस की बातों में आ कर कही?’’

‘‘भला मैं क्यों कहने लगी. फिर हमारा झगड़ा ही कहां है, मैं तो तुम्हारे दोस्त पर तरस खा कर उस से थोड़ा हंसबोल लेती थी, बस इतनी सी बात पर तुम मेरे चरित्र पर लांछन लगा कर मुझे परेशान करने लगे. जान से मारने की धमकियां देने लगे.’’

‘‘देखो तेजिंदर अब तुम बिना मतलब…’’

‘‘आप फिर बनाबनाया मूड खराब करने लगे. आज साधु बाबा जो कुछ मुझ से कह गए हैं, उस से हमारे बीच का झगड़ा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. बाबा ने कहा कि मैं हमेशा तुम्हारा सहयोग करूं, हमेशा तुम्हारी आवभगत करूं. उन्होंने कहा है कि अब हमारा बुरा वक्त टल गया है, जल्दी ही मुझे सारी खुशियां मिल जाएंगीं. अब आप रोजाना मेरा ऐसा ही रूप देखेंगे.’’

तेजिंदर ने ये बातें कुछ इस तरह कहीं कि बलवान को ताज्जुब होने के बावजूद उस का प्यार करने का यह अंदाज बहुत अच्छा लगा. वह खुशी से झूम उठा. तेजिंदर कौन सा षडयंत्र रच रही है, इस बात का उसे जरा भी अंदाजा नहीं हो सका. शाम को दोनों मुख्य बाजार की ओर घूमने भी गए.  खाना खाने के बाद रात करीब 10 बजे फिर से टहलने निकले. घर से थोड़ी दूर जाने पर तेजिंदर ने बलवान का हाथ पकड़ लिया और रेलवे लाइन की ओर चल पड़ी. उस की प्यारीप्यारी बातों में खोया बलवान यंत्रचालित सा उस के साथ आगे बढ़ता गया. उस समय चारों ओर गहन अंधेरा छाया था. बलवान घर लौटना चाहता था, लेकिन तेजिंदर ने चालाकी से उसे प्यार भरी बातों में उलझाए रखा. तभी उन्हें गुरु सिंह मिल गया.

वह पंजाब पुलिस में सिपाही था और उसी मकान में किराए पर रहता था, जिस में बलवान सिंह रहता था. उतनी रात को सुनसान जगह में उन्हें घूमते देख कर उस ने पूछा, ‘‘इतनी रात को आप लोग रेलवे लाइन की ओर क्या करने जा रहे हैं?’’

‘‘बस, ऐसे ही तेजिंदर का मन हो आया, इसलिए इधर चला आया. और क्या हालचाल है, ड्यूटी कर के आ रहे हो क्या?’’ बलवान ने पूछा.

लेकिन उस की बात का उत्तर दिए बगैर मुसकराता हुआ गुरु सिंह आगे बढ़ गया. तेजिंदर और बलवान बातें करते हुए थोड़ा और आगे बढ़ गए. उस समय दोनों एकदूसरे के हाथ में हाथ डाले रेलवे लाइन के बीचोबीच चल रहे थे. तेजिंदर ने देखा कि हिम्मत सिंह अपने जीजा कुलवंत के साथ रेलवे लाइन के दाईं ओर कच्चे रास्ते से चला आ रहा है. बलवान की नजर हिम्मत और कुलवंत पर पड़ती, उस के पहले ही वे उस के सामने आ कर खड़े हो गए. उन्हें देखते ही उस ने उन के इरादे भांप लिए. उसे तेजिंदर पर भी संदेह हो गया, इसलिए झटके से हाथ छुड़ा कर वह रतनहेड़ी गांव की ओर भागा.

लेकिन हिम्मत ने दौड़ कर उसे पकड़ लिया और उस के बाएं पैर पर गड़ासे से वार कर दिया. इस के बावजूद बलवान रेलवे लाइन पार करने में कामयाब हो गया. वह लंगड़ाता हुआ भागने लगा. वह भाग पाता, कुलवंत ने दौड़ कर उस के पेट में तलवार घुसेड़ दी. खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वह जमीन पर गिर कर तड़पने लगा. इस के बाद हिम्मत ने गंडासे से उस पर 4-5 वार कर दिए तो थोड़ी देर में उस ने दम तोड़ दिया. हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए हिम्मत और कुलवंत ने बलवान की लाश को उठा कर रेलवे लाइन के बीचोबीच रख दिया. उन का सोचना था कि रात में ट्रेन गुजरेगी तो उस के शरीर के टुकड़ेटुकड़े हो जाएंगे. तब लोग यही समझेंगे कि उस ने ट्रेन के नीचे आ कर आत्महत्या कर ली है.

तीनों वहां से लौट रहे थे तो मुख्य सड़क पर बलवान सिंह का ममेरा भाई नेगा सिंह मिल गया. उतनी रात को तेजिंदर को 2 गैरमर्दों के साथ घूमने के बारे में उस ने पूछा तो तेजिंदर ने उसे इस तरह झिड़क दिया कि वह अपना सा मुंह ले कर चला गया. इस के बाद हिम्मत और कुलवंत सलौदी की ओर चले गए तो तेजिंदर अपने घर आ गई. अगले दिन यानी 12 मई, 1979 की सुबह खन्नानगर में यह खबर जंगल की आग की तरह फैल गई कि बलवान सिंह रेलगाड़ी के नीचे कट कर मर गया. जितने मुंह उतनी बातें होने लगीं. कोई दुर्घटना कह रहा था तो कोई आत्महत्या मान रहा था. घटनास्थल पर भीड़ लग गई थी.

किसी ने बलवान सिंह की मौत के बारे में तेजिंदर को बताया तो रोतीबिलखती वह लाश के पास पहुंची. उस के वहां पहुंचने से पहले ही घटनास्थल पर एक सबइंसपेक्टर और 3 सिपाही आ चुके थे. आते ही उन्होंने लाश को कब्जे में ले कर अपनी कानूनी काररवाई शुरू कर दी थी. उन्होंने वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर के तमाम जानकारी भी जुटा ली थी. इसलिए तेजिंदर जब लाश से लिपट कर रोने का नाटक करने लगी तो वहां मौजूद सबइंसपेक्टर ने उस की ओर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि रात में तेजिंदर को मिले सिपाही गुरु सिंह ने पहले ही सब बता दिया था.

इसलिए सबइंसपेक्टर को उसी पर शक था. वह उसे थाने ले जाना चाहते थे. उसे थाने ले जाने के लिए उन्होंने बहाना बनाया कि उन्हें उस से कुछ कागजों पर दस्तखत करवाने हैं, जिस से बलवान के बाद उसे सरकारी नौकरी आसानी से मिल सके. तेजिंदर कभी थाने तो गई नहीं थी. उसे यह भी मालूम नहीं था कि थाने में पुलिस अपराधियों से किस तरह से पेश आती है? इसलिए पुलिस के रौद्ररूप के आगे वह ज्यादा देर टिक नहीं सकी और बलवान की हत्या का अपना अपराध उस ने स्वीकार कर के हिम्मत और कुलवंत के बारे में भी बता दिया.

हिम्मत को अपनी गिरफ्तारी की जरा भी उम्मीद नहीं थी. सबइंसपेक्टर ने कुलवंत और हिम्मत को तेजिंदर के सामने खड़े कर पूछताछ शुरू की तो पुलिस की परवाह किए बगैर वह एकदम से तेजिंदर पर टूट पड़ा. 4 सिपाहियों ने मिल किसी तरह तेजिंदर को उस के चंगुल से छुड़ाया. तेजिंदर को मारते समय वह कह रहा था, ‘‘तेजिंदर, तू ने जो तिरिया चरित्तर दिखाया है न, वह तुझे बहुत महंगा पड़ेगा. तू ने ही मुझ से कह कर अपना आदमी मरवाया और अब पुलिस को मेरा नाम भी बता दिया.’’

बहरहाल, शुरुआती पूछताछ में ही तेजिंदर वादामाफ गवाह बन गई. अदालत में चालान पेश हुआ तो उस ने हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ अपना बयान इस तरह दिया, जैसे किसी फिल्म की पटकथा सुना रही हो. बलवान सिंह पर किस ने किस तरह किस हथियार से वार किए थे, फटाफट बकती चली गई.  लुधियाना की सेशनकोर्ट में जब मुकदमा चला तो मैं हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह के वकील की हैसियत से अदालत में पेश हुआ. हर वकील अपने मुवक्किल को बचाना चाहता है. मैं ने भी दोनों को बचाने के लिए कानून के खूब तर्क दिए.

29 फरवरी, 1980 को सैशन जज ने इस मुकदमे का जो फैसला सुनाया, वह इस तरह से था :‘श्रीमती तेजिंदर कौर जाति की जाट है, जबकि उस का प्रेमी हिम्मत सिंह हरिजन. तेजिंदर कौर का कहना कि उस के हिम्मत सिंह से अवैधसंबंध हो गए थे, जिस की जानकारी उस के पति बलवान सिंह को हो गई थी, यह विश्वसनीय नहीं लगता. पंजाब का जाट अपनी पत्नी का अवैधसंबंध किसी और जाति के साथ होने की बात को बड़ी गंभीरता से लेता है.

‘अगर बलवान सिंह को इस की जानकारी होती तो वह और उस के रिश्तेदार पहले ही तेजिंदर कौर अथवा उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार चुके होते. तेजिंदर कौर ने अपने बयान में एक जगह कहा है कि एक बार वह और उस का प्रेमी पतिपत्नी के अंदाज में थे, तभी उस के पति ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया था, लेकिन तब थोड़ाबहुत झगड़ा करने के अलावा और कुछ नहीं हुआ था, यह भी अविश्वसनीय सा लगता है.

‘अपने बयान में तेजिंदर कौर ने यह भी कहा है कि हिम्मत और कुलवंत सिंह ने बलवान की मौत निश्चित हो जाने के बाद भी उस पर तलवार से अनगिनत वार किए, यह सब भी झूठ लगता है. तेजिंदर कौर के बयानों को सुन कर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि वादामाफ गवाह के रूप में उस का बयान अविश्वसनीय है.

‘उस ने हिम्मत और कुलवंत सिंह को फंसाने के लिए इस जघन्य हत्या की ऐसी कहानी गढ़ी है, जिस से उन दोनों को फांसी हो जाए. कहानी में पर्याप्त दम नहीं है और अभियोगपक्ष भी अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप साबित करने में असफल रहा है. लिहाजा हिम्मत सिंह और कुलवंत सिंह को संदेह का लाभ देते हुए बलवान सिंह की हत्या के आरोप से दोनों को बरी किया जाता है.’ फैसला आए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि हिम्मत सिंह और तेजिंदर कौर पतिपत्नी के रूप में मेरे सामने आ खड़े हुए थे. ऐसा कैसे संभव हुआ, यह फिलहाल मेरी समझ में नहीं आ रहा था. काफी प्रयास के बाद भी जब मैं इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं ढूंढ सका तो मैं ने 2 दिनों बाद अपने मुंशी को खन्ना भेज कर तेजिंदर को बुलवा लिया.

इस बार भी तेजिंदर हिम्मत सिंह के साथ ही आई. मेरे पूछने पर उस ने जो कुछ बताया, वह इस प्रकार था :

पुलिस ने थाने में जब तेजिंदर से पूछताछ की तो वह पुलिस की सख्ती के आगे टूट गई. लेकिन एक बात उस के हक में यह रही कि हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लेने के बाद भी उस का मानसिक संतुलन नहीं बिगड़ा. उसी का नतीजा था कि जब पुलिस ने उसे वादामाफ गवाह बना कर उसे अपने ही साथियों के खिलाफ गवाही देने को कहा तो उस ने मन ही मन तय कर लिया कि अदालत में वह हिम्मत और कुलवंत के खिलाफ इतना बढ़चढ़ कर बोलेगी कि उस के बयान पर जज साहब को यकीन नहीं होगा. तब शायद वह उस के बयान पर यकीन न कर के उन लोगों को बरी कर दें.

थाने में हिम्मत ने जब गालीगलौज करते हुए उस पर हमला किया था, तब उसे क्या पता था कि वह अपना त्रियाचरित्र दिखा रही थी, वह उसे बचाने की जबरदस्त योजना बना रही थी. आखिर वही सब हुआ, जैसा उस ने सोचा था. उस ने अदालत में जो बयान दिया था, जज साहब को सचमुच यकीन नहीं हुआ. संदेह का लाभ पा कर हिम्मत सिंह अपने जीजा के साथ बरी हो गया. उस समय भी दोनों उस से खफा थे. लेकिन जब उन के घर जा कर तेजिंदर ने असलियत बताई तो दोनों ने उस की तारीफ की. इस के बाद जब हिम्मत को उस पर विश्वास हो गया तो उस ने उस से शादी कर ली.

तेजिंदर की दास्तान सुन कर एक वरिष्ठ वकील होने के बावजूद एकबारगी मेरी बुद्धि चकरा गई. फिलहाल वह 2 नौजवान लड़कों की मां है, जिन में से एक की हाल ही में शादी हुई है. अपने परिवार के साथ वह खूब मजे का जीवन बसर कर रही है. वह नहीं चाहती कि अब कोई उस के पुराने जीवन के बारे में पूछे. Hindi Stories

—कथा में प्रमुख पात्रों के नाम परिवर्तित हैं.