Hindi Kahani : अनुराधा सिंह मिंटू ऐसे बनी लेडी डौन

Hindi Kahani : सूरतशक्ल से भले ही बहुत ज्यादा खूबसूरत नहीं है, लेकिन है वह बहुत आकर्षक. कंधे तक झूलते बाल उस के सांवले लंबे चेहरे पर खूब फबते हैं. उस की नाजुक कलाइयों में शायद ही कभी किसी ने चूडि़यां देखी हों. लेकिन एके 47 को वह खिलौने जैसे चलाती थी. अनुराधा सिंह चौधरी जब भी लोगों को नजर आई, पैंट शर्ट या टीशर्ट जींस जैसे वेस्टर्न लुक में नजर आई. साड़ी सरीखा कोई परंपरागत भारतीय परिधान पहने भी उसे किसी ने नहीं देखा.  लंबीदुबली, पतली छरहरी 36 वर्षीय इस महिला के चेहरे से दुनिया भर की मासूमियत टपकती थी लेकिन वह थी कितनी खूंखार इस का अंदाजा उस के गुनाहों की लिस्ट देख कर लगाया जा सकता है.

राजस्थान के सीकर के फतेहपुर के गांव अलफसर के एक मध्यमवर्गीय जाट परिवार में जन्मी अनुराधा का घर का नाम मिंटू रखा गया था. जब वह बहुत छोटी थी, तभी उस की मां चल बसी. पिता रामदेव की कमाई बहुत ज्यादा नहीं थी, इसलिए वे नन्ही मिंटू को ले कर दिल्ली आ गए. यहां पैसा बरसा तो नहीं लेकिन कभी फांके की नौबत भी नहीं आई. मिंटू जैसेजैसे बड़ी और समझदार होती गई, उसे यह एहसास होता गया कि जिंदगी में अगर कुछ बनना है तो पढ़ाईलिखाई बहुत जरूरी है. लिहाजा उस ने दिल लगा कर पढ़ाई की और वक्त रहते बीसीए और फिर एमबीए की भी डिग्री ले ली.

निश्चित रूप से इस के पीछे उस की लगन का बड़ा हाथ था और तीक्ष्ण बुद्धि का भी जिस से अभावों में रहते और पढ़ते हुए उस ने कभी असफलता का मुंह नहीं देखा.  पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वह स्थाई रूप से सीकर वापस आई तो वही हुआ जो इस उम्र में लड़कियों के साथ होना आम बात है. अनुराधा को फैलिक्स दीपक मिंज नाम के युवक से प्यार हो गया. दिल्ली में रहते उस ने फर्राटे से अंगरेजी बोलने के साथसाथ यह भी सीख लिया था कि प्यार निहायत ही व्यक्तिगत मामला है और हर किसी को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का हक है. लिहाजा उस ने घर और समाज वालों के विरोध और ऐतराज की कोई परवाह नहीं की और दीपक से लवमैरिज कर ली.

यहां तक अनुराधा ने कुछ गलत नहीं किया था. दीपक के साथ वह खुश थी और आने वाली जिंदगी के सपने आम लड़कियों की तरह देखने लगी थी. शेयर बाजार का घाटा पहला मोड़ दीपक भी अनुराधा की तरह महत्त्वाकांक्षी था, जो सीकर में ही शेयर ट्रेडिंग का कारोबार करता था. अब पढ़ीलिखी अनुराधा भी उस के काम में हाथ बंटाने लगी तो उसे राहत मिली. लेकिन यह राहत जल्द ही आफत बन गई, क्योंकि शेयर मार्केट में खुद के लाखों और अपने क्लाइंट्स के करोड़ों रुपए इन दोनों ने तगड़े मुनाफे की उम्मीद में लगवा दिए थे. गलत नहीं कहा जाता कि शेयर मार्केट किसी का सगा नहीं होता, जिस ने इन दोनों के साथ जरूरत से ज्यादा सौतेलापन दिखाया.

मुनाफा तो रत्ती कौड़ी का भी नहीं हुआ, उलटे जब नुकसान होना शुरू हुआ तो पतिपत्नी दोनों घबरा उठे कि अब क्या करें. लेकिन अब करने को कुछ नहीं बचा था. कर्ज में डूबे दीपक और अनुराधा पर उन के कहने पर शेयरों में पैसे लगाने वाले रोजरोज तकाजा करने लगे थे, जिस से इन का खानापीना सोना तक दूभर हो चला था. अब अनुराधा को जिंदगी के असल मायने समझ आए कि पैसा कमाना कोई बच्चों का खेल नहीं और यूं ही शेखचिल्ली की तरह सपने देख कर कोई रातोंरात रईस नहीं बन जाता. उस की जिंदगी का यह ऐसा मोड़ था, जहां न तो पढ़ाईलिखाई काम आ रही थी और न ही प्यार कोई हिम्मत या ताकत दे पा रहा था. फिर किसी और से किसी तरह की उम्मीद लगाना एक फिजूल की बात थी.

लेनदारों के बढ़ते दबाब से निबटने के लिए उस ने जो रास्ता चुना या वह उसे आसानी और इत्तफाक से मिल गया था, जो हालांकि और भी ज्यादा सरदर्दी वाला था. लेकिन इस राह पर पहला कदम रखते ही उसे लगा कि जिंदगी के तमाम मकसद इसी से पूरे हो सकते हैं और यही रास्ता उसे मंजिल तक ले जा पाएगा जो फौरी तौर पर मौजूदा परेशानी से भी छुटकारा दिला रहा है. यह रास्ता जुर्म का था, जिस ने अनुराधा सिंह नाम की इस युवती की जिंदगी बदल डाली. जिंदगी सिर्फ अनुराधा की ही नहीं बल्कि राजस्थान के कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल सिंह की भी बदल गई, जिस से जुर्म का ककहरा अनुराधा ने सीखा था.

जब दीपक और अनुराधा लेनदारों के डर से मुंह छिपाने को मजबूर हो चले थे, तभी अनुराधा की मुलाकात राजस्थान के हिस्ट्रीशीटर बलबीर बानूड़ा से हुई. बलबीर खुद तो अनुराधा के लिए कुछ नहीं कर सका लेकिन जाने क्या सोच कर उस ने अनुराधा की मुलाकात आनद पाल सिंह से करवा दी. दोनों ने एकदूसरे को देखा, परखा और देखते ही देखते अनुराधा की सारी परेशानियां दूर हो गईं. आनंदपाल सिंह की दहशत राजस्थान में किसी सबूत या पहचान की मोहताज कभी नहीं रही, जिस के रसूख से सियासी गलियारे भी कांपते थे. राजपूत समुदाय के लोग उसे रौबिनहुड आज भी मानते हैं.

दूसरा मोड़ – आनंद की संगत आनंद ने अनुराधा को जुर्म की दुनिया के गुर और उसूल सिखाए तो उस के खुराफाती दिमाग की ट्यूबलाइट जोरों से चमकने लगी. अनुराधा ने देखा और महसूसा कि आनंद अपने रुतबे और दहशत को कैश नहीं करा पाता और थोड़े में ही संतुष्ट हो जाता है. उस का हुलिया और रहनसहन भी आम गुंडेमवालियों जैसा है तो उस ने आनंद को बदलना शुरू कर दिया. देखते ही देखते आनंद का हुलिया, आदतें, रहनसहन सब बदल गया और वह भी अपनी प्रेमिका की तरह फर्राटे से अंगरेजी बोलने लगा. कल तक देसी तरीके से रहने वाला यह जरायमपेशा मुजरिम फिल्मों के उन खलनायकों जैसा नजर आने लगा जो आलीशान इमारतों में रहते हैं. सर पर हैट लगाते टिपटौप दिखते हैं और अपराध करने का उन का अपना एक अलग स्टाइल होता है.

जैसे ही दीपक को पत्नी के एक जरायमपेशा गिरोह में शामिल होने की बात पता चली तो उस ने उस से नाता तोड़ लिया. अनुराधा के लिए भी अपने पहले प्यार के कोई माने नहीं रह गए थे. उस के अंदर की रूमानियत आनंद की संगत में कभी खत्म न होने वाली क्रूरता में बदल चुकी थी. इन दोनों ने फिर एकदूसरे से कभी कोई वास्ता नहीं रखा. हां, इतना जरूर हुआ था कि अब कोई उसे पैसे मांगने तंग नहीं करता था क्योंकि उस की पत्नी राजस्थान के डौन आनंदपाल सिंह की रखैल थी, जिस से पुलिस भी कांपती थी. न कहने की कोई वजह नहीं कि अनुराधा अब न केवल बिनब्याही पत्नी की हैसियत से बल्कि तेजतर्रार आला दिमाग की मालकिन होने की वजह से भी आनंद के गिरोह में नंबर 2 की हैसियत रखने लगी थी. जिस ने जरूरत से कम समय में हथियार चलाना सीख लिए थे.

गैंग और अपराध की दुनिया से जुड़े लोग उसे मैडम मिंज भी कहने लगे थे. यह सरनेम उसे पति से मिला था. अब अनुराधा ही किए जाने वाले अपराधों की प्लानिंग करने लगी थी. आनंद भी उस के ग्लैमर और अभिसार में डूबा अपनी पत्नी राज कंवर और बेटियों योगिता और चरंजीत कंवर चौहान को भूल चुका था. लेकिन तब तक एक बात वह अनुराधा को और अच्छे से सिखा चुका था कि अपराध की दुनिया उस कार सरीखी होती है जिस में रिवर्स गियर नहीं होता. खुद अनुराधा भी अब पीछे मुड़ कर देखने की ख्वाहिशमंद नहीं थी और कभी होती भी तो उस के जुर्मों का बढ़ता ग्राफ और मोटी होती पुलिसिया फाइल उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं देते. उसे दौलत चाहिए थी जो उस पर छमाछम बरस रही थी.

बहुत जल्द वह पेशेवर मुजरिम बन गई थी और उस का नाम भी चलने लगा था. वह जहां से गुजरती थी, वहां लोगों के सर अदब से झुकें न झुकें खौफ से जरूर झुक जाते थे. और यही शायद अपनी जिंदगी का मकसद भी उस ने बना लिया था, जिस के अंजाम से भी वह वाकिफ थी लेकिन भयभीत कभी नहीं रही. अब वह धड़ल्ले से वारदातों को अंजाम देने लगी थी, खासतौर से अपहरण कर फिरौती वसूलना उस का पसंदीदा अपराध था जिस की वह विशेषज्ञ हो चली थी. अनुराधा ने पहला अपराध कब किया, यह अब शायद वह भी न बता पाए.

लेकिन बाकायदा वह चर्चा और सुर्खियों में साल 2013 में आई थी, जब उस पर रंगदारी का पहला मामला दर्ज हुआ था. तब पुलिस ने उस पर पहली दफा 10 हजार रुपए का इनाम भी रखा था. इस वक्त तक आनंद के सर कोई 5 लाख रुपए का इनाम घोषित था जो उस की मौत तक बढ़तेबढ़ते 10 लाख रुपया हो गया था. जाहिर है, खुद के नाम से पहला मामला दर्ज होने तक अनुराधा के किए जुर्म आनंद के खाते में दर्ज हो रहे थे. करीब 10 साल इन दोनों ने बिना किसी खास दिक्कत के गुजारे. लेकिन राजस्थान में बबंडर उस वक्त खड़ा हुआ, जब एक चर्चित हत्याकांड के गवाह का अपहरण हो गया.

दरअसल, 27 जून, 2006 को जीवनराम गोदरा नाम के शख्स की हत्या आनंद ने कर दी थी जिस से पूरा राज्य हिल उठा था. वारदात के दिन डीडवाना में जीवनराम जब अपनी दुकान के नीचे कुछ दोस्तों के साथ बैठा था, तभी आनंद और उस के साथियों ने दिनदहाड़े उसे गोलियों से भून दिया था.  तीसरा मोड़ – एक गवाह का अपहरण  दिलचस्प बात यह है कि जीवनराम और आनंद कभी पक्के दोस्त हुआ करते थे. साल 1992 में आनंद की शादी की रस्म बिन्नाइकी या बिंदौरी (एक रस्म जिस में दूल्हा अपने मोहल्ले या गांव में घूमता है)  को कुछ दबंगों ने रोक लिया था, तब जीवनराम ने ही उस की मदद की थी जो उन दिनों छात्र नेता हुआ करता था.

तभी से गुस्साए आनंद ने जुर्म का रास्ता पकड़ लिया था, लेकिन जीवनराम से उस की दुश्मनी की ठोस वजह किसी को नहीं मालूम सिवाय इस के कि बाद में कभी जीवनराम ने उस के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल कर दिया था. इस हत्याकांड की गूंज राजस्थान विधानसभा में भी सुनाई दी थी. जीवनराम का भाई इंद्रचंद्र गोदारा इस हत्याकांड का गवाह था, जिस की गवाही आनंद को लंबा नपवा देती. अपने आशिक को बचाने के लिए अनुराधा ने साल 2014 में इंद्रचंद्र को अगवा कर लिया और पुणे ले गई. तब उस के साथ गिरोह के और मेंबर भी थे. इंद्रचंद्र को पुणे के एक फ्लैट में बंधक बना कर रखा गया था, जिस ने एक दिन मौका पा कर एक पर्ची खिड़की से नीचे फेंक दी, जिस पर लिखा था, ‘मैं किडनैप हो गया हू और मुझे मदद की जरूरत है.’

पर्ची जिस ने भी पढ़ी, उस ने औरों को बताया तो फ्लैट के बाहर भीड़ इकट्ठा हो गई और फ्लैट को घेर लिया. तब अनुराधा और उस के गुर्गे बमुश्किल वहां से भागने में कामयाब हो पाए थे. जैसेतैसे बचतेबचाते वह राजस्थान वापस आ गई और आनंद के जेल में होने के चलते खुद उस का गैंग चलाने लगी. इस दौरान उस ने कारोबारियों को अगवा कर फिरौती से खूब पैसा कमाया. लेकिन उसे झटका तब लगा जब पुलिस ने साल 2017 में एनकाउंटर में नाटकीय तरीके से मार गिराया. इस मौत पर खूब बवाल मचा था. राजनीति भी हुई थी और राजपूत समुदाय के लोगों ने सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन भी किया था. तब प्रशासानिक हलकों खासतौर से पुलिस महकमे में यह चर्चा गर्म रही थी कि आनंद के मरने से उस की दहशत कम नहीं हुई है. क्योंकि उस की वारिस अनुराधा अब इस गैंग की कमान संभालेगी.

लेकिन यह आशंका पूरी तरह सच नहीं निकली, क्योंकि डरीसहमी अनुराधा फरार हो गई. जान बचाने के खौफ और गैंग के टूट जाने से वह इधरउधर भागती रही तो लोग उसे भूलने लगे. क्योंकि आनंद नाम की दहशत से तो राजस्थान आजाद हो ही चुका था. कहते हैं, हर कामयाब मर्द के पीछे किसी औरत का हाथ होता है लेकिन अनुराधा पर यह कहावत उलटी बैठती थी, जिस की कामयाबी के पीछे हर बार मर्द का हाथ रहा. अब तक वह इतनी बदनाम और वांटेड हो चुकी थी कि चाह कर भी जुर्म की दुनिया नहीं छोड़ सकती थी. जिस दिन वह पहचान ली जाती तय है, उसी दिन पुलिस की मेहमानी करती भी नजर आती.

काला से मुलाकात चौथा मोड़ इसी फरारी के दौरान सहारा और संरक्षण ढूंढती अनुराधा लारेंस विश्नोई गैंग में शामिल हो गई. मकसद था जैसे भी हो पुलिस से बचना. हालांकि जुर्म की दुनिया में भी उस के खासे चर्चे और किस्से फैल चुके थे. इस नए गिरोह यानी लारेंस विश्नोई से उस की पटरी ज्यादा नहीं बैठी और जल्द ही वह काला जठेड़ी उर्फ संदीप के संपर्क में आई. आनंद की मौत से आया खालीपन उसे काला जठेड़ी से भरता नजर आया तो इस की वजहें भी थीं. दोनों में डील हुई और अनुराधा बगैर किसी एंट्रेंस एग्जाम के जठेड़ी गैंग में न केवल शामिल हो गई, बल्कि देखते ही देखते इस गैंग में भी उस ने वही जगह और रुतबा हासिल कर लिया, जो उसे आनंद के गैंग में हासिल था.

फर्क इतना भर आया कि दोनों ने इस डील के तहत हरिद्वार के एक मंदिर में विधिविधान से शादी कर ली. यह और बात है कि वे शुरू से ही रह तो पतिपत्नी की तरह ही रहे थे. काला जठेड़ी का असली नाम संदीप काला है, जो हरियाणा के सोनीपत के जठेड़ी गांव का रहने वाला है. गांव का नाम तो उस ने तखल्लुस की तरह जोड़ लिया था. संदीप को कम उम्र से ही जुर्म का चस्का सा लग गया था. 12वीं क्लास में आतेआते वह पेशेवर मुजरिम बन चुका था. पेट पालने के लिए उस ने केबल औपरेटर का काम शुरू किया था, लेकिन साल 2004 में झपटमारी के एक केस में वह पहली बार गिरफ्तार हुआ था.  कुछ साल बाद ही उस का नाम सांपला और गोहाना में हुई कत्ल की वारदातों से जुड़ गया. इस के बाद वह जुर्म की दुनिया का एक अहम और जरूरी नाम बनता गया.

हत्या, अपहरण, लूटपाट, जमीनों पर जायजनाजायज कब्जे और फिरौती वगैरह काला जठेड़ी की जिंदगी के हिस्से और किस्से बनते गए. नई दिल्ली और एनसीआर के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और पंजाब व उत्तराखंड में भी उस की तूती बोलने लगी थी. अपने गैंग में उस ने शूटरों की फौज भर रखी थी, जो उस की असली ताकत हुआ करते थे. पुलिस से आंख मिचौली काला के लिए रोजमर्रा की बात हो चली थी. दिनोंदिन उस का आतंक पुलिस के लिए सरदर्द बनता जा रहा था. क्योंकि ठिकाने बदलने में वह माहिर था. अनुराधा की आपराधिक जन्मपत्री से पूरे 36 गुण उस से मिले थे. उस में और आनंद में कई समानताएं अनुराधा को नजर आई थीं.

काला भी उस के व्यक्तित्व से प्रभावित हुआ था और उस के आला खुराफाती दिमाग का कायल हो गया था. काला की दहशत अपने इलाकों में ठीक वैसी ही थी, जैसी राजस्थान में आनंद की थी. उस के सर अगर 10 लाख का इनाम था तो काला पर भी हरियाणा पुलिस ने 7 लाख रुपए का इनाम रखा था. काला पर भी आनंद की तरह दरजनों मामले दर्ज थे. उस ने अनुराधा को अपने गिरोह में इसलिए भी आसानी से शामिल कर लिया था कि वह आनंद के गिरोह में काम कर चुकी थी इसलिए उसे हालात से निबटने का तजुर्बा था. दोनों को एकदूसरे की जरूरत थी, कारोबारी भी, जिस्मानी भी और जज्बाती भी. काला के गिरोह के मेंबर भी अनुराधा के एके 47 चलाने की स्टाइल से इतने इंप्रैस थे कि उन्होंने उसे रिवौल्वर रानी का खिताब दे दिया था. ठीक वैसे ही जैसे आनंद के गिरोह में मैडम मिंज का खिताब उसे मिला था.

पुलिस और खुफिया एजेंसियों से भी काला जठेड़ी और अनुराधा की जुगलबंदी की बात छिपी नहीं रह गई थी. लेकिन इन शातिरों को गिरफ्तार कर लेना कोई आसान काम भी नहीं था, जिन के खिलाफ मारे डर के कोई मुखबिरी करने भी तैयार नहीं होता था. फिर भी पुलिस की निगाह में तो यह नया क्रिमिनल कपल चढ़ चुका ही था. इंतजार था तो एक मुनासिब मौके का. काला को अनुराधा से एक फायदा आनंद की विरासत का भी मिला. राजस्थान में अब तक लेडी डौन के भी नाम से भी मशहूर हो चली अनुराधा ने फिर से अपहरण की वारदातों को अंजाम देना शुरू कर दिया, क्योंकि वह यहां के चप्पेचप्पे से वाकिफ हो गई थी.

कुछ दिन पहले तक यानी आनंद की मौत के बाद अकेले रहते उस की हिम्मत राह चलते आदमी को छेड़ने की नहीं पड़ती थी, पर काला का साथ मिलते ही वह फिर से अपने पुराने फार्म में वापस लौट आई थी. फिर जैसे ही सागर धनखड़ हत्याकांड में नामी पहलवान सुशील कुमार का नाम आया तो दिल्ली फिर गरमा उठी. क्योंकि इस वारदात में एक और गैंगस्टर नीरज बबाना का भी नाम आया और काला जठेड़ी का भी आया, जिस से अपनी जान को खतरा जेल में बंद सुशील पहलवान ने जताया था. (इस हाई प्रोफाइल मामले के बारे में पाठक मनोहर कहानियां के पिछले अंक में पढ़ चुके हैं) अब पुलिस की स्पैशल सेल ने काला की तलाश को मुहिम की शक्ल दे दी तो वह भागता फिरा और देश के कई हिस्सों में उस ने फरारी काटी. इस दौरान अनुराधा उस के साथ ही रही.

जठेड़ी गैंग की दिलचस्पी दिल्ली-एनसीआर की झगड़े वाली जमीनजायदाद पर ज्यादा रहती थी, क्योंकि इस में मुनाफा ज्यादा होता है और रिस्क कम. जमीनों से कब्जे हटवाना और कब्जे करवाना इस गैंग के बाएं हाथ का खेल होता था. इस काम को अंजाम हथियारों के दम पर दिया जाता था. बड़ेबड़े बिल्डर्स से ले कर छोटेमोटे भूमि स्वामी तक जठेड़ी जैसे गैंगस्टर की सेवाएं लेते हैं क्योंकि मामला अगर अदालत में जाए तो वक्त और पैसा दोनों बरबाद होते हैं और जितना पैसा मुकदमेबाजी में लगता है उतने में ये गैंगस्टर रातोंरात पैसा देने वाले के हक में इंसाफ करा देते हैं. क्लाइमेक्स अनुराधा इस काम में सहायक भर थी, लेकिन जैसे ही काला की तलाश में पुलिस की स्पैशल सेल जुटी तो वह फिर चिंतित हो उठी.

क्योंकि अगर आनंद की तरह काला भी किसी एनकाउन्टर में मारा जाता तो वह फिर बेसहारा हो जाती. दूसरे गिरफ्तारी की तलवार अब उस के सर पर भी लटकने लगी थी.  दिल्ली में डर और खतरा इस बात का भी था कि कहीं गैंगवार न हो जाए क्योंकि जेल में बंद रहते अपना गिरोह चला रहे नीरज बबाना गैंग की पुरानी दुश्मनी काला से थी. लेकिन लारेंस विश्नोई के गैंग का साथ उसे मिला हुआ था. यह वही लारेंस विश्नोई है, जिस ने फिल्म अभिनेता सलमान खान को धमकी दे कर खूब सुर्खियां बटोरी थीं. पहलवान से मुजरिम बन चुके सुशील ने भी काला की सेवाएं और सहायता कुछ मामलों में ली थी. सागर धनखड़ की हत्या के वक्त सुशील और उस के साथियों ने एक और शख्स सोनू महाल की पिटाई की थी, जो काला का राइट हैंड है और रिश्ते में उस का भांजा भी लगता है. इसलिए सुशील उस से डरा हुआ था.

इस के पहले 2 फरवरी, 2020 को काला ने पुलिस कस्टडी से फरार हो कर सब को चौंका दिया था. इस दिन गुड़गांव पुलिस उसे एक पेशी के लिए फरीदाबाद अदालत ले गई थी. वापसी में गुड़गांव रोड पर काला के गुर्गों ने फिल्मी स्टाइल में ताबड़तोड़ फायरिंग कर काला को छुड़ा लिया था, जिस से पुलिस की खासी किरकिरी हुई थी. यह मामला डबुआ थाने में दर्ज हुआ था. फरार हो कर वह कहां गया और छिपा, इस का अंदाजा कोई नहीं लगा पा रहा था. लेकिन यह अंदाजा हर किसी को था कि अनुराधा उस के साथ है. इन दोनों के नेपाल में होने का अंदेशा था, जबकि हकीकत में दोनों भारत भ्रमण करते आंध्र प्रदेश के अलावा पंजाब और मुंबई भी गए थे और बिहार के पूर्णिया में भी रुके थे. मध्य प्रदेश के इंदौर और देवास में भी इन्होंने फरारी काटी थी, हर जगह इन्होंने खुद को पतिपत्नी बताया और लिखाया था.

काला को घिरता देख अनुराधा ने 70 – 80 के दशक के मशहूर जासूसी उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक के एक किरदार विमल का सहारा लिया, जिस ने पुलिस से बचने के लिए सरदार का हुलिया अपना लिया था. अपनी नई पत्नी के कहने पर काला विमल की तर्ज पर सरदार बन गया. उस ने अपना नया नाम पुनीत भल्ला और अनुराधा का नाम पूजा भल्ला रखा. दिल्ली का होने के चलते दोनों सिख समुदाय के रीतिरिवाजों और बोलचाल के लहजे से खूब वाकिफ थे, इसलिए कोई उन पर आसानी से शक नहीं कर सकता था. सोशल मीडिया पर भी दोनों ने नए नामों से आईडी बना ली थी.

इतना ही नहीं, अनुराधा ने जठेड़ी गैंग के गुर्गों को यह हिदायत भी दी थी कि अगर उन में से कोई कभी पुलिस के हत्थे चढ़ जाए तो काला के बारे में यही बताए कि वह इन दिनों नेपाल में है और वहीं से गैंग चला रहा है. इस हिदायत का मकसद पुलिस को भटकाए और उलझाए रखना था, जिस से वह यह सोचते इन की ढूंढाई में ढील दे दे कि जब वे भारत में हैं ही नहीं तो तलाश में यहां वहां सर खपाने से क्या फायदा. आनंद पाल के गिरोह में रहते अनुराधा कई बार नेपाल भी गई थी और वहां के अड्डों से भी वाकिफ थी, इसलिए वह काला को भी 2 बार नेपाल ले गई थी. मकसद था विदेश भागने की संभावनाएं टटोलना और जमा पैसों की ट्रोल को रोकना.

असल में नेपाल से हवाला के जरिए पैसे कनाडा के एक गैंगस्टर गोल्डी बरार को भेजे जाते थे, जिन्हें गोल्डी ई वालेट के जरिए पैसा इन दोनों को वापस भेज देता था और जांच एजेंसियों को हवा भी नहीं लगती थी कि मनी ट्रोलिंग कैसे और कहांकहां से हो रही है. अनुराधा के इसी खुराफाती दिमाग का आनंद भी कायल था और अब काला भी हो गया था, जिसे अनुराधा ने सख्त हिदायत दे रखी थी कि वह भारत में फोन पर किसी से भी बात न करे. क्योंकि आजकल मुजरिम तक पहुंचने का सब से आसान और सहूलियत भरा जरिया और रास्ता यही होता है. अब काला को जिस से भी बात करनी होती थी तो वह विदेश में बैठे अपने किसी गुर्गे को बताता था कि उसे अमुक या फलां से बात करनी है.

विदेश में बैठा वह गुर्गा अपने एक फोन से अमुक या फलां को काल करता था और दूसरे से काला को, दोनों फोन के स्पीकर औन कर दिए जाते थे जिस से काला की बात आराम से यानी बिना किसी डर के अमुक या फलां से हो जाती थी. लेकिन इन दोनों को इल्म भी नहीं था कि पुलिस इन्हें पकड़ने के लिए कमर कस चुकी है जिसे आपरेशन ओपीडी- 4 नाम दिया गया है और उस की टीमें इन की टोह ले रही हैं और वही ट्रिक अपना रही हैं, जो इन्होंने अपना रखी है. काला और अनुराधा तक पहुंचने के लिए पुलिस की स्पेशल टीम ने लारेंस विश्नोई को मोहरा बनाया, जो जेल में बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों के जरिए विश्नोई तक एक फोन पहुंचाया, जिस से वह अपने गुर्गों से बात करता रहा और पुलिस खामोशी से तमाशा देखती रही. एक बार वही हुआ जो पुलिस चाहती थी कि विश्नोई ने काला से भी बात कर डाली.

उस का फोन सर्विलांस पर तो था ही, जिस से उस के सहारनपुर के अमानत ढाबे पर होने की लोकेशन मिली. पुलिस तुरंत हरकत में आई और आसानी से काला और अनुराधा को गिरफ्तार कर लिया. दोनों हतप्रभ थे. उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे चूहेदानी में फंस चुके हैं. बिलाशक पुलिस की स्पैशल सेल ने दिमाग से काम लिया, जिसे उम्मीद थी कि आज नहीं तो कल विश्नोई काला से जरूर बात करेगा और ऐसा ही हुआ भी. अनुराधा खुद को बहुत स्मार्ट और चालाक समझती रही थी, जो यह भूल चुकी थी कि कानून के हाथ वाकई बहुत लंबे होते हैं और यह कहने भर की बात नहीं है.

अब जेल में पड़ेपड़े अपनी गुजरी जिंदगी के बारे में सोचने का उस के पास वक्त ही वक्त है कि कैसे सीकर के छोटे से गांव में जन्मी मिंटू लेडी डौन बन गई और इस से उसे क्या हासिल हुआ.  दीपक से नाता तोड़ने के बाद वह भागती ही रही थी.  आनंद और काला के साथ रहते उसे पैसा तो खूब मिला लेकिन सुकून और औलाद के सुख से वह महरूम रही तो इस की जिम्मेदार भी वही है. जिस ने अपनी मरजी से जुर्म का रास्ता चुना था और दिलचस्प बात यह कि उस के दोनों आशिक भी कहीं के नहीं रहे. पहला एनकाउंटर में मारा गया तो दूसरा उसी की तरह जेल में पड़ा अपने गुनाहों की फेहरिस्त देखता अपने अंजाम का इंतजार कर रहा है. Hindi Kahani

 

Crime Ki Kahani : औलाद की खातिर किया सास ससुर का कत्ल

Crime Ki Kahani :  सूरज की गरमी के बढ़ने के साथ ही गांव धनुहावासियों की चिंता भी बढ़ती जा रही थी. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि लल्लूराम और उन की पत्नी सुशीला देवी अभी तक सो कर क्यों नहीं उठे. जबकि गांव में वही दोनों सब से पहले उठते थे. बालबच्चे थे नहीं,

इसलिए दोनों रात को जल्दी सो जाते थे. यही वजह थी कि वे सुबह जल्दी उठ भी जाते थे. लेकिन उस दिन सुबह दोनों में से कोई दिखाई नहीं दिया तो पड़ोस में रहने वाले उन के बड़े भाई जमुना प्रसाद पता लगाने के लिए उन के घर जा पहुंचे. वह यह देख कर हैरान रह गए कि बाहर ताला लगा है.

इस की वजह यह थी कि लल्लूराम कभी बाहर दरवाजे में ताला लगाते ही नहीं थे. वैसे तो वह जल्दी कहीं आतेजाते नहीं थे. अगर कभी किसी के शादीब्याह में जाना भी होता था तो घरद्वार सब भाई को ही सौंप कर जाते थे. अब तक 9 बज चुके थे. बिना बताए कहीं बाहर जाने का सवाल ही नहीं था. अगर गांव या खेतों की ओर कहीं गए होते तो अब तक आ गए होते. यह खबर सुन कर पूरा गांव लल्लूराम के घर के सामने इकट्ठा हो गया था.

दरवाजे पर जो ताला लगा था, वह एकदम नया था, इसलिए लोगों को किसी अनहोनी की आशंका हो रही थी. लल्लूराम का घर सड़क के किनारे था. लोगों ने विचार किया कि कहीं ऐसा तो नहीं कि रात में डकैतों ने इन के घर धावा बोल कर लूटपाट करने के साथ दोनों को खत्म कर दिया हो. यही सोच कर कुछ बुजुर्गों ने वहां खड़े लड़कों से कहा कि दरवाजे पर चढ़ कर ऊपर लगी जाली से देखो तो अंदर कोई दिखाई दे रहा है या नहीं?

बुजुर्गों के कहने पर 2 लड़कों ने दरवाजे पर चढ़ कर अंदर झांका तो उन के मुंह से चीख निकल गई. लल्लूराम और उन की पत्नी सुशीला देवी की रक्तरंजित लाशें अलगअलग चारपाइयों पर पड़ी थीं. तुरंत क्षेत्रीय थाना नैनी को फोन द्वारा इस घटना की सूचना दी गई.

सूचना मिलने के लगभग आधा घंटे बाद थाना नैनी के थानाप्रभारी रामदरश यादव सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर आ पहुंचे. पुलिस ने ताला तोड़वा कर दरवाजा खोलवाया. अंदर जाने पर पता चला कि बुजुर्ग दंपत्ति की हत्या बड़ी ही बेरहमी से की गई थी.

थानाप्रभारी ने इस घटना की सूचना उच्च अधिकारियों को दे कर लाश तथा घटनास्थल का निरीक्षण शुरू कर दिया. थोड़ी देर में डीआईजी एन.रवींद्र और एसएसपी मोहित अग्रवाल, एसपी यमुनापार लल्लन राय डाग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम के साथ वहां पहुंच गए.

घटनास्थल पर पहुंचे फोरेंसिक एक्सपर्ट प्रेम कुमार भारती ने खून के धब्बों का नमूना उठाने के साथ वहां पड़े 2 पत्थरों से अंगुलियों के निशान उठाए. उन पत्थरों पर खून लगा था. पुलिस का अंदाजा था कि पत्थरों से बुजुर्ग दंपत्ति की हत्या की गई थी. सारी औपचारिक काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने दोनों लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. यह 14 जून, 2013 की बात है.

काररवाई निपटा कर पुलिस ने मृतक लल्लूराम के बड़े भाई जमुना प्रसाद से पूछताछ शुरू की तो उन्होंने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार लल्लूराम निस्संतान थे. वह अपने काम से काम रखते थे. भाइयों में भी आपस में कोई झगड़ाझंझट नहीं था. हां, उन के पास रुपए पैसे की कोई कमी नहीं थी. इसलिए लगता यही है कि लूट के लिए पतिपत्नी को मारा गया है.

लल्लूराम के परिवार वालों के अनुसार, उन का मकान ही लगभग 20 लाख रुपए के आसपास था. इस के अलावा उन के पास कई बीघा जमीन थी, जो करोड़ों रुपए की थी. कुछ दिनों पहले ही उन्होंने अपना एक बीघा खेत 15 लाख रुपए में बेचा था. उन के पास लाखों के गहने भी थे. जबकि उन की करोड़ों की इस संपत्ति का कोई वारिस नहीं था. उन के बड़े भाई जमुना प्रसाद का बेटा रवि जरूर उन की तथा उन के खेतों की देखभाल के लिए उन्हीं के घर ज्यादा रहता था. दोनों भाइयों के घर अगलबगल ही थे, इसलिए रवि को चाचाचाची की देखभाल में कोई परेशानी नहीं होती थी.

लेकिन रवि एक नंबर का नशेड़ी था. वह हमेशा स्मैक के नशे में डूबा रहता था. उस की शादी भी हो चुकी थी और वह 3 बच्चों का बाप था. ये तीनों बच्चे उस की दूसरी पत्नी रेखा तिवारी से थे. उस की पहली पत्नी ने उस के नशेड़ीपने की वजह से ही तलाक ले लिया था. उस के बाद लल्लूराम की पत्नी यानी रवि की चाची सुशीला देवी ने उस की शादी अपनी बहन की बेटी रेखा से करा दी थी.

रेखा भी रवि के नशे से आजिज आ चुकी थी. यही वजह थी कि इधर वह बच्चों को ले कर करछना में रहने वाली अपनी बड़ी बहन के यहां रह रही थी.

एक तो रवि नशेड़ी था, दूसरे करता धरता भी कुछ नहीं था. इस के अलावा लल्लूराम के यहां रहने की वजह से उसे उन के घर के बारे में पूरी जानकारी थी, इसलिए पुलिस को पहले उसी पर संदेह हुआ. पुलिस ने उसे थाने ला कर हर तरह से पूछताछ की. लेकिन इस पूछताछ में रवि निर्दोष साबित हुआ. हत्याएं लूटपाट के इरादे से की गई थीं. लेकिन घर का कोई सामान गायब हुआ हो ऐसा लग नहीं रहा था.

अगर कुछ गायब हुआ भी था तो इस की जानकारी रवि की पत्नी रेखा से ही मिल सकती थी. क्योंकि लल्लूराम और सुशीला देवी के अलावा उस घर के बारे में सब से ज्यादा जानकारी रेखा को ही थी. पुलिस रेखा से पूछताछ करना चाहती थी, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आ रही थी. वह सिर्फ क्रियाकर्म वाले दिन ही दिखाई दी थी. उस के बाद गायब हो गई थी.

मामले के खुलासे के लिए एसपी यमुनापार लल्लन राय ने सीओ राधेश्याम राम के नेतृत्व में इंस्पेक्टर नैनी रामदरश यादव, एसआई वी.पी. तिवारी, हेडकांस्टेबल शशिकांत यादव, कांस्टेबल मोहम्मद खालिद, शिवबाबू आदि को ले कर एक टीम बनाई. इस टीम ने पहले तो अपने मुखबिरों को सक्रिय किया.

अपने इन्हीं मुखबिरों से पुलिस को पता चला कि नशेड़ी पति के अत्याचार से परेशान रेखा के संबंध धनुहा के ही रहने वाले बब्बू पांडेय से बन गए थे.

रेखा इस समय कहां है, पुलिस टीम ने यह पता किया तो जानकारी मिली कि उस का मंझला बेटा लक्ष्य काफी बीमार है, जिसे उस ने इलाहाबाद के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कर रखा है. उस के इलाज का सारा खर्च करछना का रहने वाला बब्बू पांडे का दोस्त रामबाबू पाल उठा रहा है.

पुलिस का माथा ठनका. रेखा के बेटे का इलाज एक गैर आदमी क्यों करा रहा है? पुलिस ने जब इस बारे में पता किया तो जो जानकारी मिली, उस के अनुसार पति की प्रताड़ना और ससुराल वालों की उपेक्षा से रेखा पति और ससुराल वालों से दूर होती चली गई थी. उसी बीच गांव के ही रहने वाले बब्बू पांडेय और उस के दोस्त रामबाबू पाल ने उस से सहानुभूति दिखाई तो दोनों से ही उस के घनिष्ठ संबंध बन गए थे.

इन बातों से पुलिस को लगा कि इस हत्याकांड में कहीं रेखा और उस से सहानुभूति दिखाने वालों का हाथ तो नहीं है. यह बात दिमाग में आते ही थाना नैनी पुलिस ने 18 जून की रात छापा मार कर बब्बू पांडेय और रामबाबू पाल को उन के घरों से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर दोनों से पूछताछ की जाने लगी. पहले तो दोनों कहते रहे कि उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया.

लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो उन्होंने स्वीकार कर लिया कि लल्लूराम तिवारी और उन की पत्नी सुशीला देवी की हत्या उन्हीं लोगों ने रेखा की मदद से की थी. रामबाबू पाल ने रेखा से अपने अवैध संबंध होने की बात भी स्वीकार कर ली. लेकिन बब्बू ने ऐसी कोई बात नहीं स्वीकार की. जबकि रेखा से उस के भी संबंध थे, क्योंकि उसी की वजह से रामबाबू पाल रेखा तक पहुंचा था.

रेखा को रामबाबू पाल और बब्बू पांडेय की गिरफ्तारी की सूचना मिली तो वह बच्चों को ले कर फरार हो गई. मगर जल्दी ही पुलिस ने उसे भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों से की गई पूछताछ में जो जानकारी मिली, उस के अनुसार यह कहानी कुछ इस प्रकार है.

मध्यप्रदेश के जिला रीवां के चाकघाट के गांव मरवरा की रहने वाली रेखा का विवाह सन 2010 में उस की सगी मौसी सुशीला देवी ने अपने जेठ जमुना प्रसाद के बेटे रवि से करा दिया था. रेखा विदा हो कर ससुराल आई तो उसे जल्दी ही पता चल गया कि उस का पति हद दर्जे का नशेड़ी है.  इस की वजह यह थी कि निस्संतान सुशीला देवी को रवि से सहानुभूति थी. इसीलिए वह उसे ज्यादातर अपने साथ रखती थीं.

रवि भी उन लोगों की हर तरह से देखभाल करता था. सुशीला देवी ने रेखा की शादी उस से यह सोच कर कराई थी कि रेखा अपनी है, इसलिए वह बुढ़ापे में उन की देखभाल ठीक से करेगी. लेकिन शादी के बाद मौसी को कोसने और अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहाने के अलावा रेखा के पास कोई उपाय नहीं था.

समय धीरेधीरे बीतता रहा और रेखा अंश, लक्ष्य और सुख, 3 बेटों की मां बनी. 3 बेटों का बाप बनने के बाद भी रवि की नशे की आदत छूटने के बजाय बढ़ती ही गई. रेखा मना करती तो वह उसे जानवरों की तरह पीटता.

रेखा के लिए एक परेशानी यह थी कि रवि उस के पास के पैसे भी छीन लेता था. शादी में मिले गहने तो उस ने पहले ही नशे की भेंट चढ़ा दिए थे. पति के उत्पातों से आजिज आ कर रेखा कभीकभी करछना में रहने वाली अपनी बड़ी बहन के यहां चली जाती थी. वक्त जरूरत मौसी सुशीला भी मदद कर देती थी. लेकिन जिस तरह की मदद की उम्मीद रेखा उन से करती थी, वह भी नहीं करती थी.

सासससुर ने तो पहले ही हाथ खींच लिए थे. इस तरह रेखा और उस के बच्चे उपेक्षित सा जीवन जी रहे थे. इस के लिए वह अपनी मौसी सुशीला को ही दोषी मानती थी.

पति और ससुराल वालों से त्रस्त रेखा अकसर करछना में रहने वाली अपनी बहन के यहां आतीजाती रहती थी. इसी आनेजाने में उस की मुलाकात उस के बहनोई राजू पांडेय तथा गांव के बब्बू पांडेय के दोस्त रामबाबू पाल से हुई. रामबाबू पाल से रेखा ने अपनी परेशानी बताई तो वह रेखा से सहानुभूति दिखाने के साथसाथ वक्तजरूरत उस की मदद भी करने लगा. इसी का नतीजा था कि दोनों के बीच संबंध बन गए.

बब्बू की वजह से रेखा के संबंध रामबाबू पाल से बन गए, बब्बू रामबाबू का पक्का दोस्त था. यही नहीं, गांव का होने की वजह से बब्बू रेखा के घर भी आताजाता था और रवि का दोस्त होने की वजह से रेखा को भाभी कहता था. भले ही रेखा ने दोनों से मजबूरी में शारीरिक संबंध बनाए थे, लेकिन संबंध तो बन ही गए थे.

मई के अंतिम सप्ताह में रेखा का मंझला बेटा 7 साल का लक्ष्य अचानक बीमार पड़ा. रेखा ने मौसा लल्लूराम और मौसी सुशीला देवी से बच्चे की बीमारी के बारे में बताया. लेकिन किसी ने खास ध्यान नहीं दिया. झोलाछाप डाक्टर से दवा ला कर उसे दी जाती रही. फायदा होने के बजाए धीरेधीरे उस की बीमारी बढ़ती गई. रवि को बेटे की बीमारी से कोई मतलब नहीं था. वह स्मैक पिए पड़ा रहता था.

रेखा ने देखा कि लक्ष्य की बीमारी को ससुराल में कोई गंभीरता से नहीं ले रहा है तो वह बेटों को ले कर अपनी बहन के यहां करछना चली गई. वहां उस ने बेटे की बीमारी के बारे में रामबाबू को बताया तो एक पल गंवाए बगैर वह उसे सीधे इलाहाबाद ले गया और एक प्राइवेट अस्पताल में भरती करा दिया.  जांचपड़ताल के बाद डाक्टरों ने लक्ष्य को जो बीमारी बताई, उस के इलाज पर लंबा खर्च आने वाला था.

डाक्टर की बात सुन कर रेखा रोने लगी. उसे रोता देख रामबाबू ने तड़प

कर कहा, ‘‘रेखा, तुम रो क्यों रही हो? मैं हूं न. मेरे रहते तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है. चाहे जैसे भी होगा, मैं लक्ष्य का इलाज कराऊंगा.’’

रेखा जानती थी कि रामबाबू के पास भी उतने पैसे नहीं हैं, जितने लक्ष्य के इलाज के लिए जरूरत है. रामबाबू की करछना बाजार में चाय की एक छोटी सी दुकान थी. उसी की कमाई से किसी तरह घर का खर्च चलता था. यही सब सोच कर रेखा ने कहा, ‘‘कहां से लाओगे इतने रुपए. यहां 10-20 हजार रुपए की बात नहीं है, डाक्टर ने लाख रुपए से ऊपर का खर्च बताया है. सासससुर के पास इतना पैसा है नहीं. पति बेकार ही है. जिन के पास पैसा है, उन से किसी तरह की उम्मीद नहीं की जा सकती.’’

‘‘रेखा, मन छोटा मत करो. मेरे खयाल से एक बार अपने मौसा मौसी से बात कर लो. पोते का मामला है, शायद वे इलाज के लिए पैसे दे ही दें.’’

‘‘वे लोग बहुत कंजूस है, फूटी कौड़ी नहीं देंगे,’’ रेखा ने कहा, ‘‘फिर भी तुम कह रहे हो तो गांव जा कर जरूर कहूंगी, बेटे के लिए उन के पैरों पर गिर कर रोऊंगीगिड़गिड़ाऊंगी. इस पर भी उन का दिल न पसीजा तो क्या होगा?’’

‘‘उस के बाद देखा जाएगा. कोई न कोई रास्ता तो निकालूंगा ही. वैसे भी तुम्हारी मौसी के पास पैसों की कमी नहीं है. करोड़ों की संपत्ति है उन के पास. कोई खाने वाला भी नहीं है. मुझे पूरा विश्वास है कि वह मना नहीं करेंगी.’’ रामबाबू ने कहा.

रामबाबू के कहने पर रेखा धनुहा जा कर लल्लूराम से मिली. उस ने रोते हुए उन से बेटे की बीमारी और इलाज पर आने वाले खर्च के बारे में बताया तो उन्होंने कहा, ‘‘इतनी बड़ी रकम मेरे पास नहीं है. तुम अपने ससुर से क्यों नहीं कहती.’’

सुशीला देवी ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया.

रेखा को पता था कि उस के ससुर जमुना प्रसाद की माली हालत जर्जर है. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते. रेखा क्या करती, इलाहाबाद वापस आ गई. रेखा का उतरा चेहरा देख कर ही रामबाबू समझ गया कि उस के वहां जाने का कोई फायदा नहीं हुआ. उस ने कहा, ‘‘मैं ने वहां भेज कर तुम्हें बेकार ही परेशान किया.’’

रामबाबू की बात सुन कर रेखा रोते हुए बोली, ‘‘मेरे मौसा और मौसी कंजूस ही नहीं, बेरहम भी हैं. इतना पैसा जोड़ कर रखे हैं, न जाने किसे देंगे. कल को मर जाएंगे, सब यहीं रह जाएगा. उन की कोई औलाद तो है नहीं, वे औलाद का दर्द क्या जानें.’’

‘‘पैसा उन का है. नहीं दे रहे हैं तो कोई कर ही क्या सकता है.’’ रामबाबू ने कहा.

‘‘कर क्यों नहीं सकता. अगर तुम मेरा साथ दो तो उन की सारी दौलत हमारी हो सकती है. लक्ष्य का इलाज भी हो जाएगा और मैं उस नशेड़ी को तलाक दे कर हमेशा हमेशा के लिए तुम्हारी हो जाऊंगी.’’ रेखा ने कहा.

‘‘इस के लिए करना क्या होगा?’’

‘‘हत्या, उन दोनों बूढ़ों की हत्या करनी होगी. आज नहीं तो कल, उन्हें वैसे भी मरना है. क्यों न यह शुभ काम हम लोग ही कर दें. बोलो, तुम मेरा साथ दे सकते हो?’’

‘‘तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं. मैं ही क्या, इस नेक काम में बब्बू भी हमारा साथ दे सकता है. इस के एवज में उसे भी कुछ दे दिया जाएगा.’’

‘‘ठीक है, बब्बू से बात कर लो. अब यह नेक काम हमें जल्द ही कर लेना चाहिए. ऐसे लोगों का ज्यादा दिनों तक जीना ठीक नहीं है. इस तरह के लोग इसी लायक होते हैं.’’ रेखा ने कहा.

रामबाबू ने फोन कर के बब्बू को भी वहीं बुला लिया. इस के बाद तीनों ने बैठ कर लल्लूराम और सुशीला देवी की हत्या कर के उन के यहां लूटपाट की योजना बना डाली.

उसी योजना के तहत रेखा अपनी ससुराल जा पहुंची. रात में खापी कर लल्लूराम और सुशीला गहरी नींद सो गए तो उस ने फोन कर के रामबाबू और बब्बू को बुला लिया. दरवाजा उस ने पहले ही खोल दिया था.

दोनों सावधानीपूर्वक अंदर पहुंचे और गहरी नींद सो रहे वृद्ध दंपत्ति के ऊपर भारीभरकम पत्थर पटक कर उन की जीवनलीला समाप्त कर दी. इस के बाद तीनों ने रुपए और गहने की तलाश में कमरों का एकएक सामान खंगाल डाला. लेकिन उन के हाथ कुछ भी नहीं लगा. रामबाबू और बब्बू लल्लूराम और सुशीला देवी की हत्या का पछतावा करते हुए भाग निकले.

अपराध स्वीकार करने के बाद पुलिस ने रेखा, रामबाबू पाल और बब्बू पांडेय के खिलाफ लल्लूराम और सुशीला देवी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के 21, जून को इलाहाबाद की अदालत में पेश किया. जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में नैनी जेल भेज दिया गया. इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी मोहित अग्रवाल ने 5 हजार रुपए का इनाम देने की घोषणा की. Crime Ki Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : एकतरफा प्रेमी ने ली प्रेमिका की सहेली की जान

Love Crime : 10 जुलाई, 2023 को रात के लगभग 8 बजे का वक्त रहा होगा, दिव्या रोज की तरह अपनी सहेली अक्षया यादव की स्कूटी पर बैठ कर कोचिंग से घर वापस लौट रही थी. उन दोनों सहेलियों में से किसी को जरा भी अनुमान नहीं था कि मौत दबे पांव उन की ओर बढ़ी आ रही है.

उसी समय अक्षया की स्कूटी के नजदीक से एक बाइक गुजरी. उस पर 4 नवयुवक सवार थे. बाइक पर सवार उन युवकों में से 2 के हाथ में देशी पिस्टल थी. उन चारों में से 2 को पहचानने में अक्षया और उस की सहेली दिव्या ने भूल नहीं की. वे दोनों आर्मी की बजरिया में रहने वाले सुमित रावत और उपदेश रावत थे.

एक नजर चारों तरफ देखने के बाद सुमित नाम के युवक ने रुकने का इशारा कर के अक्षया को बेटी बचाओ चौराहा (मैस्काट चिकित्सालय) के पास रोक लिया.

सडक़ पर ही सुमित और दिव्या में होने लगी नोंकझोंक

अक्षया के स्कूटी रोकते ही सुमित दिव्या से बात करने लगा. कुछ ही पल की बातचीत में दिव्या और सुमित में नोंकझोंक शुरू हो गई. दोनों के बीच सडक़ पर नोंकझोंक होती देख उधर से गुजर रहे कुछ राहगीरों ने महज शिष्टाचार निभाते हुए रुक कर सुमित को समझाने का प्रयास किया, लेकिन सुमित ने लोगों से दोटूक शब्दों में कह दिया कि अगर कोई भी हम दोनों के बीच में आया तो उसे सीधे यमलोक पहुंचा दूंगा.

इतना ही नहीं, सुमित और उस के साथ बाइक पर सवार हो कर आए अपराधी किस्म के साथी तमंचा दिखा कर राहगीरों को बिना किसी हिचकिचाहट के धमकाने लगे. सुमित को समझाने की कोशिश में लगे राहगीर उन युवकों के हाथों में तमंचा देख डर कर दूर हट गए.

राहगीरों के दूर हटते ही सुमित दिव्या को धमकाने लगा, “सोनाक्षी, मैं तुम्हें हमेशा के लिए भूल जाऊं, ये कभी नहीं हो सकता. और मेरे रहते किसी भी सूरत में तुम्हें अपने से मुंह नहीं फेरने दूंगा. अब अपनी जान की खैरियत चाहती हो तो चुपचाप जैसा में कहूं वैसा करो, वरना तुम्हारी लाश ही यहां से जाएगी.

अपनी आगे की जिंदगी का निर्णय खुद तुम्हें लेना है, मेरे साथ दोस्ती रखना चाहती हो याा नहीं? तुम और तुम्हारी मां ने मुकदमा दर्ज करा कर मुझे जेल भिजवा कर मेरी जिंदगी को तबाह कर के रख दिया है. अब बचा ही क्या है मेरी जिंदगी में.”

“सुमित, तुम कान खोल कर सुन लो, सिर्फ मेरी मां ही नहीं मैं भी तुम से नफरत करती हूं. मैं अपने जीते जी तुम जैसे घटिया इंसान से कभी भी दोस्ती नहीं रखूंगी, ये मेरा आखिरी निर्णय है.” दिव्या ने भी उसे साफ बता दिया.

दिव्या का यह फैसला सुन कर सुमित की त्यौरियां चढ़ गईं. उस ने दिव्या को भद्दी सी गाली देते हुए कहा, “साली, तू और तेरी मां अपने आप को समझती क्या है?”

दिव्या की जान खतरे में देख कर सडक़ चल रहे किसी राहगीर ने समूचे घटनाक्रम की सूचना माधोगंज थाने को दे दी.

दिव्या पर चली गोली से अक्षया की गई जान

इस से पहले कि पुलिस घटनास्थल पर पहुंच पाती, सुमित ने बिना एक पल गंवाए देशी कट्टे का रुख दिव्या की ओर कर गोली दाग दी, लेकिन दुर्भाग्यवश गोली दिव्या को न लग कर उस की सहेली अक्षया के सीने में जा धंसी. उस के शरीर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. इस के बाद वे सभी युवक वहां से फरार हो गए. मदद के लिए आगे आए राहगीर अक्षया को बगैर वक्त गंवाए आटोरिक्शा में डाल कर जेएएच अस्पताल ले गए.

यह खबर समूचे शहर में आग की तरह फैल गई. देखते ही देखते घटनास्थल पर लोगों का जमघट लग गया. मृतका स्व. मेजर गोपाल सिंह व पूर्व डीजीपी सुरेंद्र सिंह यादव की नातिन थी और घटनास्थल के करीब ही सिकंदर कंपू में रहती थी.

इसी दौरान किसी परिचित ने फोन से इस घटना की खबर अक्षया के पापा शैलेंद्र सिंह को दे दी. शैलेंद्र सिंह को जैसे ही अपनी एकलौती बेटी के गोली लगने की खबर लगी, वह और उन की पत्नी विक्रांती देवी हैरत में पड़ गए. क्योंकि वह काफी विनम्र स्वभाव की थी तो किसी ने उसे गोली क्यों मार दी? अक्षया को गोली मारे जाने की खबर से समूचे सिकंदर कंपू इलाके में सनसनी फैल गई.

सरेराह बेटी को गोली मारे जाने की सूचना मिलने के बाद शैलेंद्र सिंह कार से पत्नी विक्रांती देवी को साथ ले कर अस्पताल के लिए निकले, लेकिन रास्ते में उन की कार सडक़ खुदी होने से फंस कर रह गई. इस के बाद वे अपने दोस्त की गाड़ी से अस्पताल पहुंचे, लेकिन बेटी का इलाज शुरू होने से पहले ही उस ने दम तोड़ दिया.

हत्यारे अपना काम करके हथियार लहराते हुए मौकाएवारदात से चले गए. तब माधोगंज थाने के एसएचओ महेश शर्मा पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंचे. वहां पहुंचने के बाद उन्होंने आसपास के लोगों से घटना के बारे में पूछताछ की. घटनास्थल पर 2 पुलिसकर्मियों को छोड़ कर वह जेएएच अस्पताल की ओर चल पड़े. वारदात की सूचना उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी.

खबर पा कर एसपी राजेश सिंह चंदेल, एसपी (सिटी पूर्व, अपराध) राजेश दंडोतिया, एसपी (सिटी पश्चिम) गजेंद्र सिंह वर्धमान, सीएसपी विजय सिंह भदौरिया सहित क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर अमर सिंह सिकरवार भी अस्पताल पहुंच गए. वहां मौजूद मृतका के मम्मीपापा को ढांढस दिलाते हुए पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने उन्हें बताया कि हत्यारों पर ईनाम घोषित कर दिया गया है. सभी आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर लिया जाएगा.

उधर डाक्टरों के द्वारा अक्षया को मृत घोषित करते ही एसएचओ महेश शर्मा ने जरुरी काररवाई निपटाने के बाद अक्षया की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और मृतका की 16 वर्षीया सहेली दिव्या शर्मा निवासी बारह बीघा सिकंदर कंपू की तहरीर पर सुमित रावत, उस के बड़े भाई उपदेश रावत सहित 2 अज्ञात युवकों के खिलाफ भादंवि की धारा 307,34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर लिया.

पुलिस ने आरोपियों को पकडऩे के लिए तत्काल संभावित स्थानों पर दबिश देनी शुरू कर दी थी, लेकिन हत्यारे हाथ नहीं लगे. क्योंकि आरोपी घर छोड़ कर फरार हो चुके थे. अनेक स्थानों पर असफलता मिलने के बावजूद पुलिस टीम हताश नहीं हुई.

पुलिस आरोपियों की तलाश बड़ी ही सरगर्मी से कई टीमों में बंट कर कर रही थी, लेकिन शहर के बहुचर्चित अक्षया हत्याकांड के हत्यारे पता नहीं किस बिल में जा कर छिप गए थे. अक्षया की हत्या हुए तकरीबन 24 घंटे होने को थे, लेकिन उस के हत्यारों को पकडऩे की बात तो दूर, पुलिस को उन का कोई सुराग तक नहीं मिला था.

12 जुलाई, 2023 की सुबह का समय था, तभी एक मुखबिर ने पुलिस को बताया कि अक्षया के जिन हत्यारों को वह तलाश रही है, उन में से एक आरोपी उपदेश रावत कोट की सराय डबरा हाईवे पर अपनी ससुराल में छिपा हुआ है. यह खबर मिलते ही क्राइम ब्रांच व थाना माधोगंज की टीम ने मुखबिर के द्वारा बताई जगह पर छापा मार कर मुख्य आरोपी सुमित रावत के बड़े भाई उपदेश रावत को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने अलगअलग राज्यों से किए 7 आरोपी गिरफ्तार

10 हजार रुपए के ईनामी उपदेश को पुलिस टीम ने थाने ला कर उस से अक्षया यादव की हत्या के संदर्भ में पूछताछ शुरू की. पहले तो उपदेश अपने आप को निर्दोष बता कर पुलिस टीम को गुमराह करने की कोशिश करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती की तो वह टूट गया.

उस ने पूछताछ में खुलासा किया कि इस हत्याकांड में 7 लोग शामिल थे. उक्त वारदात को अंजाम देने से पहले हत्या का षडयंत्रकारी सुमित रावत 6 जुलाई को अपने दोस्तों के साथ कंपू स्थित होटल में रुका था. होटल में 7 जुलाई को विवाद होने पर वह अपने दोस्तों के साथ लाज में ठहरने चला गया था. इस वारदात से पहले तक लाज में ही ठहरा था.

यहीं पर हिस्ट्रीशीटर बाला सुबे के साथ बैठ कर दिव्या और उस की मां करुणा की हत्या की उस ने योजना बनाई थी. इन दोनों की हत्या के लिए हथियारों का इंतजाम भी बाला सुबे ने ही कराया था.

पूछताछ में यह भी पता चला कि हत्या वाले दिन से ठीक एक दिन पहले इस हत्याकांड में उस का नाम न आए, इसलिए शातिरदिमाग बाला सुबे एक दिन पहले ही महाराष्ट्र के धुले में अपने रिश्तेदार के यहां चला गया था. धुले में सुमित रावत व उस के सहयोगी विशाल शाक्य की फरारी की व्यवस्था बाला सुबे ने ही कर रखी थी.

योजनानुसार उपदेश और उस के छोटे भाई सुमित अपने 2 साथियों विशाल शाक्य व मनोज तोमर एक बाइक पर तथा दूसरी बाइक पर राकेश सिकरवार और अशोक गुर्जर ने सवार हो कर मृतका व उस की सहेली की रेकी की थी.

आरोपियों के नामों का खुलासा होने पर पुलिस ने बिना देरी किए सातों आरोपियों की कुंडली खंगाली और सभी आरोपियों सुमित रावत, उपदेश रावत,विशाल शाक्य, मनोज तोमर, राकेश सिकरवार, अशोक गुर्जर सहित बाला सुबे को अलगअलग राज्यों से हिरासत में ले लिया. मुख्य आरोपी सुमित रावत से की पूछताछ के बाद अक्षया हत्याकांड की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह कुछ इस तरह थी.

16 वर्षीय दिव्या ग्वालियर शहर के बारह बीघा सिकंदर कंपू के रहने वाले विवेक शर्मा की बेटी थी. दिव्या एक होनहार छात्रा थी. इन दिनों वह ग्यारहवीं की तैयारी कर रही थी. उस ने सुमित के बारे में अपनी मां से कुछ भी नहीं छिपाया था.

सुमित उस का 3 साल पुराना फेसबुक फ्रैंड अवश्य था, लेकिन अपराधी प्रवृत्ति का था. जैसे ही उसे सुमित की हकीकत पता चली तो उस ने उसे ब्लौक कर दिया. ब्लौक किए जाने के बाद सुमित दिव्या को फोन ही नहीं करने लगा, बल्कि उस ने प्यार का इजहार भी कर दिया.

सिरफिरा आशिक निकला सुमित रावत

दिव्या के लिए तो यह परेशानी वाली बात थी. वह उस से इसलिए नाराज थी कि पहले तो उस ने शरीफ युवक बन कर उस से दोस्ती की और जैसे ही सारी हकीकत सामने आई तो फोन पर प्यार का इजहार करने लगा. सुमित के इस दुस्साहस से नाराज दिव्या ने उसे जम कर लताड़ा और आइंदा कभी फोन न करने की हिदायत दी.

लेकिन सुमित नहीं माना. दिव्या द्वारा उस की काल रिसीव न करने पर वह उसे मैसेज करने लगा. इस से दिव्या और उस की मां करुणा को लगा कि सुमित अव्वल दरजे का बेशर्म और सिरफिरा लडक़ा है, यह मानने वाला नहीं है, इसलिए उन दोनों ने उस पर गौर करना बंद कर दिया और दिव्या अपनी पढ़ाई में मन लगाने लगी.

जब दिव्या सुमित की फोन काल और मैसेज की अनदेखी करने लगी तो सुमित उस की मम्मी करुणा शर्मा को फोन कर दिव्या से बात कराने की हठ करने लगा. करुणा शर्मा ने सख्ती दिखाते हुए बात कराने से उसे मना कर दिया तो कभी वह करुणा शर्मा के गुढ़ा स्थित सेंट जोसेफ स्कूल पहुंच कर हडक़ाने लगता था.

करुणा शर्मा पेशे से शिक्षक हैं, पति का निधन हो जाने के बाद से वह प्राइवेट स्कूल में नौकरी कर अपने बेटेबेटी का पालनपोषण कर रही हैं. उन के दिव्या के अलावा एक 12 वर्षीय बेटा है.

दिव्या काफी होशियार और समझदार लडक़ी थी. उस का पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई और कैरियर पर रहता था. अपनी इसी इच्छा को पूरा करने के लिए उस ने अपनी सहेली के साथ लक्ष्मीबाई कालोनी में कोचिंग जौइन कर रखी थी और बारह बीघा सिकंदर कंपू क्षेत्र में सुकून के साथ अपनी मां और छोटे भाई के साथ रह रही थी.

दिव्या के साथ उस की मम्मी को भी धमकाना शुरू कर दिया सुमित ने

बेहद हंसमुख और खूबसूरत दिव्या का अधिकांश समय पढ़ाईलिखाई में बीतता था. दिन में फुरसत के वक्त वह सोशल मीडिया फेसबुक पर बिता देती थी. फेसबुक का उपयोग करते वक्त क्याक्या ऐहतियात बरतनी चाहिए, उस के बारे में भी उसे जानकारी थी. इसलिए अंजान लोगों और खासकर लडक़ों से वह दोस्ती नहीं करती थी. लेकिन सुमित के मामले में वह भूल कर बैठी, जिसे वक्त रहते उस ने सुधार लिया था.

हालांकि सुमित से चैटिंग के दौरान दिव्या ने अंतरंग बातें कर ली थीं, जो स्वाभाविक भी थी, क्योंकि वह तो उसे बेहद शरीफ समझ रही थी. उसे इस बात का कतई अहसास नहीं था कि इस मासूम से चेहरे के पीछे हैवानियत और वहशीपन छिपा है, लेकिन जैसे ही दिव्या ने सुमित से दूरी बनानी शुरू की तो उस ने उस की मम्मी के साथ बदसलूकी और उन्हें धमकाना शुरू कर दिया. तब दिव्या को अपनी ग़लती का अहसास हुआ.

सुमित दिव्या शर्मा के पीछे इस कदर हाथ धो कर पड़ा था कि उस की कारगुजारियों का खुल कर विरोध करने वाली करुणा शर्मा को भी उस ने नहीं छोड़ा था. सुमित ने उन के साथ भी सरेराह उसी रास्ते पर कट्टा अड़ा कर छेड़छाड़ की थी, जहां दिव्या की सहेली अक्षया यादव की हत्या को अंजाम दिया था.

तब अंत में दिव्या ने कंपू थाने में सुमित रावत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी. उस की शिकायत पर पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

बात 18 नवंबर, 2022 की है. रोज की तरह सेंट जोसेफ स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका करुणा शर्मा अपने नाबालिग बेटे के साथ सुबह के समय स्कूल जा रही थीं. वह जैसे ही कंपू थाना क्षेत्र स्थित हनुमान सिनेमा तिराहे के निकट पहुंची ही थी कि तभी अचानक सुमित रावत आ धमका. उस ने उन का रास्ता रोक कर सरेराह बिना किसी संकोच के उन के साथ छेड़छाड़ शुरू कर दी.

मां के साथ सुमित रावत द्वारा की जा रही छेड़छाड़ को देख कर बेटा बुरी तरह से खौफजदा हो गया था. करुणा ने सुमित की इस हरकत का खुल कर विरोध किया तो वह बौखला गया. उस ने कट्टा निकाल कर करुणा के सीने से लगा दिया. सुमित खुलेआम कट्टे की नोंक पर राहगीरों के सामने करुणा के साथ छेड़छाड़ करता रहा, लेकिन कोई मदद के लिए आगे नहीं आया.

सुमित जान से मारने की धमकी दे कर कट्टा लहराते हुए भाग गया. इस घटना के बाद करुणा ने थाने पहुंच कर सुमित के खिलाफ भादंवि की धारा 341, 354, 345, 506 के तहत प्राथमिकी दर्ज करा दी. इस के बाद पुलिस ने सुमित को दबोच कर जेल भेज दिया था. करुणा शर्मा अभी तक उस घटना को नहीं भूल सकी हैं.

उधर अक्षया यादव हत्याकांड में संलिप्त सातों आरोपियों को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त 2 देशी कट्टे और बाइक बरामद करने के बाद मुख्य अभियुक्त सुमित रावत , उपदेश रावत, विशाल शाक्य सहित बाला सुबे को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया, जबकि अन्य तीन आरोपियों के नाबालिग होने की वजह से बाल न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन तीनों को बाल सुधार गृह भेज दिया गया है.

गौरतलब बात है कि सुमित रावत पर पुलिस के मुताबिक 2 हत्या सहित आधा दरजन प्रकरण दर्ज हैं. इसी क्रम में बाला सुबे पर 27 आपराधिक मामले, उपदेश रावत पर मारपीट और गोली चलाने के 7 मामले, विशाल शाक्य पर गोली चलाने का एक प्रकरण दर्ज है.

72 घंटे में पुलिस की आधा दरजन टीमों के द्वारा महाराष्ट्र, दिल्ली और धौलपुर से अक्षया यादव हत्याकांड में शामिल सातों आरोपियों को दबोचे जाने के बाद एडिशनल डीजीपी डी. श्रीनिवास वर्मा, एसपी राजेश सिंह चंदेल व एडिशनल एसपी राजेश डंडोतिया ने संयुक्त रूप से प्रैस कौन्फ्रैंस कर पत्रकारो को अपराधियों के बारे में जानकारी दी.

उन्होंने बताया कि मुख्य आरोपी सुमित रावत को जब पुलिस की टीम ग्वालियर ले कर आ रही थी, तभी उस ने घाटीगांव पनिहार के बीच लघुशंका के बहाने पुलिस का वाहन रुकवाया और वाहन से उतरते ही भागने का प्रयास किया. इस प्रयास में गिर जाने से उस के पैर में फ्रैक्चर हो गया था, अत: उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. 17 जुलाई को अस्पताल ने उसे डिस्चार्ज कर दिया तो न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया है.

हकीकत यह थी कि सुमित दिव्या से एकतरफा प्यार करने लगा था और उस के इंकार करने से बुरी तरह बौखला गया था. फेसबुक की दोस्ती में ऐसे अपराध वर्तमान दौर में आम हो चले हैं, जिन का शिकार दिव्या जैसी भोलीभाली लड़कियां हो रही है. ऐसे में उन्हें और ज्यादा संभल कर रहने की जरूरत है.

दिव्या उस का पहला प्यार था और उस के ठुकरा देने से वह उस से नफरत करने लगा था. उस की इसी नफरत की आग ने बेकुसूर छात्रा अक्षया यादव की जान ले ली. हालांकि अक्षया की हत्या के बाद उस के मातापिता की शेष जिंदगी तो अब दर्द में ही निकलेगी.

ताउम्र ये सवाल चुभेगा कि हमारी लाडली बिटिया ही क्यों? लेकिन पुलिस के लिए यह सिर्फ एक केस नंबर रहेगा. कुछ समय बाद ये नंबर भी शायद ही किसी को याद रहे. बेटी के बदमाशों के हाथों मारे जाने के गम का बोझ तो मातापिता को ही उठाना होगा. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में मनोज तोमर, राकेश सिकरवार और अशोक गुर्जर परिवर्तित नाम हैं.

Hindi Social stories : रियल लाइफ में तवायफ का किरदार

Hindi Social stories : रील लाइफ में तो कई अभिनेत्रियों ने तवायफ का किरदार निभाया, जिन्हें दर्शकों ने खुले मन से सराहा भी. इस के विपरीत आखिर ऐसी क्या वजह रहीं, जो अनेक अभिनेत्रियों को रियल लाइफ में जिस्मफरोशी के धंधे में उतरना पड़ा…

बौलीवुड की तमाम शीर्ष और सफल अभिनेत्रियां कभी न कभी तवायफ या वेश्या के किरदार में जरूर नजर आई हैं. यहां तक कि स्वस्थ पारिवारिक भूमिकाओं के लिए पहचानी जाने वाली जया बच्चन भी इस से अछूती नहीं रह पाईं. साल 1972 में प्रदर्शित फिल्म ‘बंसी बिरजू’ में वह तवायफ के रोल में नजर आई थीं. इस फिल्म में उन के अपोजिट अमिताभ बच्चन थे, जो उस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में जमने के लिए हाथपैर मार रहे थे. ‘बंसी बिरजू’ अच्छे विषय पर आधारित होने के बाद भी चली नहीं और इस के बाद जया बच्चन ने इस शेड को नहीं दोहराया.

तवायफ समाज का जरूरी और महत्त्वपूर्ण हिस्सा शुरू से ही रही है, जिसे फिल्मों में तरहतरह से दिखाया गया है. मीना कुमारी की ‘पाकीजा’ से ले कर रेखा की ‘उमराव जान’ तक फिल्मी तवायफों ने दर्शकों का ध्यान अपनी तरफ खींचा है. रेखा ने तो रिकौर्ड दरजन भर फिल्मों में तवायफ की भूमिका निभाई है. ‘मुकद्दर का सिकंदर’ की जोहरा बाई लोगों के जेहन में लंबे वक्त तक बसी रही थी और नीचे के दर्शकों की पहली पसंद थी. पूजा भट्ट ने ‘सड़क’ फिल्म से वाहवाही बटोरी थी तो अपने करियर के उठाव के दौरान रति अग्निहोत्री ने भी ‘तवायफ’ फिल्म से अपने अभिनय की तारीफ उस समय आम दर्शक से करवा ली थी.

इस सवाल का जबाब ढूंढना बड़ा मुश्किल काम है कि क्यों तवायफ की भूमिका लगभग हर किसी एक्ट्रैस ने निभाई और उस रोल में दर्शकों ने उसे पसंद भी किया. फिर वो विद्या बालन अभिनीत ‘बेगम जान’ हो या फिर शर्मीला टैगोर की ‘आराधना’ हो, जिस में एक तवायफ के अंदर की ममता को दर्शक कभी भूल नहीं पाए. बात सिर्फ इन मानवीय और स्त्रियोचित संवेदनाओं की ही नहीं है, बल्कि तवायफों की भूमिका से जुड़ा एक दिलचस्प सच यह भी है कि इस में अभिनय प्रतिभा के प्रदर्शन की संभानाएं दूसरी किसी भूमिका से ज्यादा रहती हैं. यानी अभिनय की संपूर्णता इसी से है.

सच जो भी हो, पर हर फिल्म में यह भी दिखाया गया कि कोई भी औरत अपनी मरजी से तवायफ नहीं बनती, बल्कि मर्दों के दबदबे वाला समाज उसे किसी कोठे की जीनत बनने को मजबूर कर देता है या फिर वह सिर्फ पेट पालने या घर की जिम्मेदारियां निभाने के लिए इस घृणित और गंदे पेशे में आई. यानी यह बात हवाहवाई और फिजूल की है कि हर औरत के अंदर एक वेश्या या तवायफ होती है. हां, यह जरूर हर कोई मानता है कि एक तवायफ के अंदर एक औरत का वजूद हमेशा रहता है. फिल्मों के मद्देनजर तवायफ और वेश्या में एक बड़ा मौलिक फर्क यह है कि जरूरी नहीं कि हर तवायफ जिस्मफरोशी करती ही हो.

जिस्मफरोशी के धंधे पर बनी पहली सार्थक फिल्म ‘मंडी’ थी, जिस में शबाना आजमी, स्मिता पाटिल और नीना गुप्ता जैसी सधी अभिनेत्रियां थीं. श्याम बेनेगल की इस फिल्म का भी अपना अलग फ्लेवर था, जो यह तो एहसास करा गया था कि सभ्य समाज और राजनीति भी देहव्यापार के कितने नजदीक हैं. और नजदीक भी क्या, दरअसल उस का ही तिरस्कृत हिस्सा है, शरीर का ऐसा अंग है जो काट कर फेंक दिए जाने के बाद भी जिंदा रहता है. चेतना से आई क्रांति

‘मंडी’ से भी 13 साल पहले 1970 में बी.आर. इशारा निर्देशित फिल्म ‘चेतना’ प्रदर्शित हुई थी. रेहाना सुलताना और अनिल धवन अभिनीत इस फिल्म में एक वेश्या अपने प्रेमी के साथ घर बसाने का फैसला कर लेती है लेकिन सफल नहीं हो पाती. रेहाना ने कालगर्ल के रोल में जान डाल दी थी. उस समय इस फिल्म के बोल्ड सीन काफी चर्चित हुए थे और लोगों को समझ आया था कि एक मौडल कैसे पैसा कमाने के लिए दूसरों की रातें रंगीन करती है और दिन में धर्मस्थलों में माथा टेकती रहती है. बौक्स औफिस पर पैसा बरसाने बाली ‘चेतना’ फिल्म की दूसरी खूबी यह थी कि इस ने देहव्यापार के धंधे के नए तौरतरीके उधेड़ कर रख दिए थे. 1970 के दशक में कोठे उजड़ने लगे थे और शहर के बदनाम इलाके आबाद होने लगे थे.

इसी दौर में कालगर्ल्स की खेप आनी शुरू हो गई थी, जो मौडर्न और स्टाइलिश होती हैं. वे अपनी मरजी से धंधा करती हैं और अपनी फीस से कोई समझौता नहीं करतीं. यह कालगर्ल पढ़ीलिखी थोड़ी दार्शनिक और थोड़ीथोड़ी बुद्धिजीवी भी होती थीं, जो ग्राहक के साथ मांग पर सैरसपाटे के लिए भी चली जाती थीं. खूबी यह भी थी और है भी कि कालगर्ल इसे एक बेहतर वैकल्पिक प्रोफेशन मानती है और किसी तरह का अपराधबोध नहीं रखती. वह भावनात्मक के साथसाथ पुरुष के सैक्स स्वभाव और जरूरत को भी समझती है, जो इस पेशे की एक जरूरी और अच्छी बात भी है.

रेहाना सुलताना का फिल्मी सफर बहुत लंबा नहीं चला. ‘चेतना’ के बाद वह कम ही फिल्मों में दिखीं. लेकिन जातेजाते युवतियों के लिए यह मैसेज दे गईं कि मौडलिंग और फिल्मी दुनिया में जिस्म को दांव पर लगा कर भी जगह बनाई जा सकती है. जरूरत है बस थोड़े से टैलेंट, खूबसूरती और बड़े जोखिम उठाने की हिम्मत की. 70 के दशक में देश भर से एक्ट्रैस बनने के लिए लड़कियां मुंबई की ट्रेन पकड़ने लगी थीं. इन में से कुछ जगह बना पाने में कामयाब हुईं और कई गुमनामी और कमाठीपुरा जैसे बदनाम रेड लाइट इलाके की गलियों की खिड़की से झांकते ग्राहकों को इशारे करती नजर आईं. मुंबई की चकाचौंध और दौलत व शोहरत की कशिश कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही.

हीरोइन बनने के लालच में आई अनेक युवतियां कोई भी समझौता करने लगीं. लेकिन मिलने के नाम पर अधिकांश को सी ग्रेड या एक्स्ट्रा के रोल मिले, इस के एवज में भी उन्हें निर्मातानिर्देशकों और दलालों का बिस्तर गर्म करना पड़ा. स्याह पहलू श्वेता का ऐसी ही एक एक्ट्रैस है श्वेता बसु प्रसाद, जिस ने इसी साल जनवरी में जिंदगी के 30 साल पूरे किए हैं. श्वेता हालांकि कोई बड़ा या जानामाना नाम नहीं है लेकिन प्रतिभा उस में है, जिसे उस ने साबित भी किया. महत्त्वाकांक्षी श्वेता ने पत्रकारिता का भी कोर्स किया है और कुछ दिन एक मशहूर अखबार में लेखन भी किया.

जमशेदपुर के मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती इस खूबसूरत लड़की ने पहली बार बाल कलाकार के रूप में ‘मकड़ी’ फिल्म में काम किया था. साल 2002 में प्रदर्शित हुई इस फिल्म के निर्मातानिर्देशक विशाल भारद्वाज थे. भूतप्रेत वाली इस फिल्म में श्वेता चुन्नी और मुन्नी नाम की जुड़वां बहनों के रोल में खासी सराही गई थी. उसे सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला था. इस के बाद उस ने कुछ तमिल, तेलुगू और बंगाली फिल्मों में भी काम किया, लेकिन उम्मीद के मुताबिक उसे नाम और दाम नहीं मिला. कुछ टीवी धारावाहिकों में भी वह नजर आई लेकिन इस से भी उस के डगमगाते करियर को सहारा नहीं मिला.

देह व्यापार में क्यों आई श्वेता छोटेमोटे रोल करती श्वेता को लोग भूल ही चले थे कि साल 2014 में हैदराबाद से एक सनसनीखेज खबर आई कि मशहूर एक्ट्रैस श्वेता प्रसाद बंजारा हिल इलाके के एक बड़े होटल से देहव्यापार करती हुई पकड़ी गई. बात सच थी गिरफ्तारी के बाद उसे सुधारगृह भेज दिया गया, जहां वह बच्चों को संगीत और कला का प्रशिक्षण देती रही. मीडिया और बौलीवुड में वह उत्सुकता और आकर्षण का विषय बन गई. हर कोई जानना चाह रहा था कि वह इस घृणित पेशे में क्यों आई. इन्हीं दिनों में श्वेता का एक बयान खूब वायरल हुआ था, जिस में वह यह कहती नजर आ रही थी कि मैं अपने ही कुछ गलत फैसलों के चलते कंगाल हो गई थी.

मुझे अपने परिवार को भी संभालना था और कुछ अच्छे काम भी करने थे. लेकिन मेरे लिए सारे दरवाजे बंद थे, इसलिए कुछ लोगों ने मुझे वेश्यावृत्ति का रास्ता दिखाया. मैं कुछ नहीं कर सकती थी और न ही मेरे पास कोई और चारा था, इसलिए मैं ने यह काम किया. सुधारगृह से छूटने के बाद वह इस बयान से मुकर गई और नएनए बयान देती रही, जिन के कोई खास मायने नहीं थे. लेकिन दाद देनी होगी श्वेता की हिम्मत और आत्मविश्वास को, जो वह देहव्यापार के आरोप में पकड़े जाने के बाद भी टूटी नहीं और उसे जो भी रोल मिला, वह उस ने स्वीकार लिया. साल 2018 में उस ने फिल्मकार रोहित मित्तल से शादी की, लेकिन एक साल बाद ही वह टूट गई.

‘चेतना’ फिल्म की सीमा और श्वेता की असल जिंदगी में काफी समानताएं दिखती हैं, पर फिल्म के और जिंदगी के दुखांत में जमीन आसमान का अंतर होता है, जो दिख भी रहा है. वेश्या होने का दाग आसानी से नहीं धुलने वाला पर श्वेता अभी भी जिस लगन से काम कर रही है. उस के लिए वह शुभकामनाओं की हकदार तो है कि कड़वा अतीत भूल कर मकड़ी जैसा कारनामा एक बार फिर कर दिखाए. कड़वी मिष्ठी  श्वेता को तो हैदराबाद सेशन कोर्ट ने देह व्यापार के आरोप से बाइज्जत बरी कर दिया था, लेकिन सन 2014 में ही एक और एक्ट्रैस मय पुख्ता सबूतों के देहव्यापार के आरोप में रंगेहाथों धरी गई थी, जिस का नाम था मिष्ठी मुखर्जी.

भरेपूरे गुदाज बदन की मालकिन मिष्ठी थी तो बंगाली फिल्मों की सी ग्रेड की अभिनेत्री, लेकिन 2012 में राकेश मेहता निर्देशित एक हिंदी फिल्म ‘लाइफ की तो लग गई’ में वह नजर आई थी और मुंबई में ही बस गई थी. हैरानी की बात यह है कि इस फिल्म की समीक्षाओं में कहीं उस का जिक्र नहीं हुआ. मिष्ठी की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं. मुंबई के पौश मीरा टावर के सी विंग में फ्लैट नंबर 502 में वह परिवार सहित रह रही थी. इस फ्लैट का किराया ही 80 हजार रुपए महीना था. मिष्ठी आलीशान जिंदगी जी रही थी. मीरा टावर में लगभग 75 फ्लैट्स आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के हैं. इस अपार्टमेंट में हंगामा 9 जनवरी, 2014 को तब मचा था, जब एक छापामार काररवाई में ओशिवरा पुलिस ने मिष्ठी को अपने बौयफ्रैंड दिल्ली के फैशन डिजाइनर राकेश कटारिया के साथ आपत्तिजनक हालत में पकड़ा था.

इस छापे में पुलिस ने कोई ढाई लाख ब्लू फिल्मों की सीडी बरामद की थीं. पुलिस के मुताबिक ये सीडी दक्षिण भारत से ला कर मुंबई और ठाणे में बेची जाती थीं. देह व्यापार में सहयोग देने के आरोप में पुलिस ने मिष्ठी, उस की मां सहित पिता चंद्रकांत मुखर्जी और भाई समरत को भी गिरफ्तार किया था. पुलिस के मुताबिक इस फ्लैट का इस्तेमाल ब्लू फिल्में बनाने में भी किया जाता था. बाद में मिष्ठी और उस के परिवारजनों ने सफाई दी थी, लेकिन तब तक एक और एक्ट्रैस के दामन में जिस्मफरोशी का दाग लग चुका था. इस मुकदमे का फैसला हो पाता, इस के पहले ही महज 27 साल की उम्र में मिष्ठी किडनी फेल हो जाने से 4 अक्तूबर, 2020 को इस दुनिया से चल बसी.

लोगों को इस कांड के अलावा यह भर याद रहा कि उस ने कुछ क्षेत्रीय फिल्मों सहित हिंदी फिल्म ‘मैं कृष्णा हूं’ में एक गाना गाया था. बाद में अंदाजा भर लगाया गया, जो सच के काफी करीब है कि अगर वह ब्लू फिल्मों का कारोबार कर रही थी या सैक्स रैकेट चला रही थी तो अपने परिवार के खर्चे पूरे करने के लिए इस गैरकानूनी रास्ते पर चल पड़ी थी. ऐश के ऐश ऐसा ही रास्ता दक्षिण भारत की उभरती एक्ट्रैस ऐश अंसारी ने भी चुना था, जो साल 2013 में जोधपुर के तख्त विलास होटल में रंगेहाथों जिस्मफरोशी करते पकड़ी गई थी. इस छापे में 9 लोग पकड़े गए थे. यह भी एक हाइटेक मामला था और औनलाइन चलता था.

पुलिस के मुताबिक, ऐश अपने ग्राहकों को खुश करने गई थी और इस गिरोह का हिस्सा थी. सैक्सी ऐश ने बचाव में शाहरुख खान के साथ अपनी कुछ तसवीरें पुलिस को दिखाई थीं, जो जाहिर है एक बचकानी और फिजूल की बात थी. दरअसल, वह शाहरुख खान के साथ  ‘ओम शांति ओम’ और ‘चलते चलते’ जैसी फिल्मों में काम कर चुकी थी. इस के अलावा उस ने साउथ की भी कुछ फिल्मों में काम किया है. ‘बूम बूम’ नाम के म्यूजिक वीडियो से भी उस ने धूम मचाई थी. ऐश ने यह रास्ता परिवार के लिए नहीं, बल्कि जल्द अमीर बनने के चक्कर में चुना था. लेकिन पकडे़ जाने के बाद वह ऐसी गायब हुई कि फिर फिल्मों में नजर नहीं आई. मुमकिन है उस का जमीर उसे कचोटने लगा हो.

ऐश में एक खास बात सैक्सी फिगर के साथसाथ उस के असामान्य उभार हैं जो किसी को भी पागल और मदहोश कर देने के लिए काफी हैं. देह के शौकीनों में उस की डिमांड ज्यादा थी और इस की कीमत वह वसूल भी रही थी. घर को ही बनाया अड्डा पर्यटन स्थलों के रिसोर्ट और भव्य होटलों के अलावा कुछ अभिनेत्रियों ने घर से देह व्यापार करना ज्यादा सुरक्षित समझा. इन में एक उल्लेखनीय नाम साउथ की ही भुवनेश्वरी का है, जो अब से 20 साल पहले तक एक उभरता नाम हुआ करता था. अक्तूबर, 2009 में एक छापे में उसे चेन्नई में गिरफ्तार किया गया था.

बोल्ड सीन देने के लिए पहचानी जाने वाली इस खूबसूरत बला और बाला के गिरोह में कई और सी ग्रेड की एक्ट्रैस भी शामिल थीं. भुवनेश्वरी ने टीवी धारावाहिकों से भी नाम कमाया था.  रियल लाइफ में देहव्यापार करने वाली इस एक्ट्रैस ने रील लाइफ में भी वेश्या का किरदार तमिल फिल्म ‘लड़के’ में निभाया था. अब 46 की हो चुकी भुवनेश्वरी भी गायब है, जिस ने फिल्मों से ज्यादा नाम और दाम वेश्यावृत्ति से कमाया और इसे बेहद सहजता से उस ने लिया और जिया. दक्षिण भारतीय फिल्मों की वैंप के खिताब से नवाजी गई इस एक्ट्रैस ने कभी दुनिया जहान का लिहाज नहीं किया. उस पर भी कभी देहव्यापार के आरोप अदालत में साबित नहीं हो पाए, लेकिन बदनामी से वह खुद को बचा नहीं पाई.

28 साल की होने जा रही तमिल और तेलुगू फिल्मों की अभिनेत्री श्री दिव्या भी घर से ही सैक्स रैकेट चलाते पकड़ी गई थी.  ‘बीटेक बाबू’ उस के करियर की चर्चित फिल्म थी. महज 3 साल की उम्र से परदे पर पांव रख चुकी इस हौट एक्ट्रैस ने कोई डेढ़ दरजन फिल्मों में काम किया, जिन में से कुछ में उस ने अपने अभिनय की छाप भी छोड़ी. साल 2014 में पड़े गुंटूर के चर्चित छापे में पकड़ी गई दिव्या को कुदरत ने अजीम खूबसूरती से नवाजा भी है. लेकिन ज्यादा  पैसों के लालच से वह भी नहीं बच सकी. पतली कमर वाली दिव्या भी गिरोहबद्ध तरीके से जिस्मफरोशी के कारोबार में गले तक डूब चुकी थी. छापे में कई दूसरी मौडल और एक्ट्रैस मय ग्राहकों के पकड़ी गई थीं.

शर्म से दूर शर्लिन चोपड़ा हैदराबादी गर्ल के नाम से मशहूर हुई शर्लिन चोपड़ा फिल्मों से कम, गरमागरम फोटो सेशन और हर कभी वायरल होते अपने कामुक वीडियोज के चलते ज्यादा जानीपहचानी जाती है. विवादों में रहना उस का खास शगल है. प्लेबौय मैगजीन के लिए नग्न फोटो देने वाली 37 वर्षीया इस एक्ट्रैस ने फिल्मों से ज्यादा गौसिप से अपनी पहचान बनाई. रूपेश पाल की थ्री डी फिल्म ‘कामसूत्र’ में उस ने उन्मुक्त दृश्य दिए हैं. रियल्टी शो बिग बौस सीजन-3 की प्रतिभागी भी वह रह चुकी है. उस के नाम छोटे बजट की 3 फिल्में ‘टाइम पास’, ‘रेड स्वास्तिक’ और ‘गेम’ ही हैं जो न के बराबर चलीं.

मौडलिंग से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शर्लिन कभी देह व्यापार के किसी छापे में तो नहीं पकड़ी गई, बल्कि उस ने खुद ही उजागर किया था कि वह देह व्यापार करती है और पैसों के लिए कई मर्दों के साथ उस ने सैक्स किया है. सुर्खियों में बने रहने को ऐसे कई विवादों से उस ने खुद को जोड़े रखा.  फिल्मकार साजिद खान पर आरोप लगाते हुए उस ने अप्रैल 2015 में कहा था कि एक मुलाकात में साजिद ने पेंट से अपना प्राइवेट पार्ट निकाल कर उसे छूने के लिए कहा था. तब उस ने बिना घबराए साजिद को कहा था कि मैं जानती हूं कि प्राइवेट पार्ट कैसा होता है और उन से मिलने का उस का ऐसा कोई मकसद या इरादा नहीं है.

इस बयान से फिल्म इंडस्ट्री में तहलका मच गया था, जो सच और झूठ की बाउंड्री लाइन पर खड़ा था. यानी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसा होना न तो नामुमकिन है और न ही ऐसा होने पर कोई मौडल एक्ट्रैस ऐसी आपबीती इतने खुले लफ्जों में बयां कर सकती है. नैतिकता तो लोगों की निगाह में यह है कि ऐसा किसी लड़की के साथ हो भी तो उसे खामोश रहना चाहिए. शर्लिन ने दो टूक कहा तो इसे पब्लिसिटी स्टंट कह कर हवा में उड़ा दिया गया. रियल और रील में फर्क दरजनों और ऐसी फिल्म एक्ट्रैस हैं, जो देहव्यापार करते पकड़ी गई हैं. दिलचस्प बात यह है कि ये सभी सी ग्रेड की असफल और महत्त्वाकांक्षी युवतियां हैं. लगभग सभी ने रियल लाइफ में यह किरदार निभाया तो इस की वजह साफ है कि पैसा कमाने का इस से बेहतर शार्टकट और कोई है भी नहीं.

लग्जरी जिंदगी जीने की आदी इन नायिकाओं के पास अपने खर्च पूरे करने का कोई दूसरा जरिया होता भी नहीं. परदे पर इन्हें देख चुके शौकीन पैसे वाले भी मुंहमांगे दाम इन्हें देने को तैयार रहते हैं. इन तवायफों को एक रात का अपने नाम, हैसियत और शोहरत के मुताबिक एक से 5 लाख रुपया तक मिलता भी है. अब तो बी ग्रेड के शहरों में भी इन की मांग बढ़ने लगी है और ये वहां जाती भी हैं. आनेजाने, हवाई जहाज और फाइवस्टार होटलों में ठहरने का खर्च या तो ग्राहक उठाता है या फिर वह दलाल, जो इन के और ग्राहक के बीच कड़ी का काम करता है. ठीक वैसे ही जैसे ‘चेतना’ फिल्म में रेहाना सुलताना के लिए एक दलाल करता था. Hindi Social stories

Social Stories in Hindi : बेटी ने मातापिता को नींद की गोलियां देकर कराई 13 लाख की चोरी

Social Stories in Hindi : मांबाप के मना करने के बावजूद भी खूशबू अपने प्रेमी विनय यादव को छोड़ना नहीं चाहती थी. फिर एक दिन उस ने अपने प्यार के लिए अपने ही घर में एक ऐसा अपराध किया कि…

गांव की एक बहुत प्रचलित कहावत है, ‘भूख न देखे रूखा भात, प्यार न जाने जातपात और नींद न देखे टूटी खाट’. वास्तव में पे्रम जाति और धर्म का बंधन नहीं देखता है. कई बार वह ऊंचनीच और नातेरिश्तों को भी भूल जाता है. ऐसे में प्यार की पगडंडी पर चल कर कभीकभी ऐसे कदम भी उठ जाते हैं, जो अपराध को भी बढ़ावा देने से पीछे नहीं हटते. लखनऊ शहर के रसूलपुर आशिक अली के रहने वाले मनोज कुमार की 19 साल की बेटी खुशबू कुमार की कहानी भी कुछ इसी तरह की है. खुशबू की शहर के ही लालशाह का पुरवा मलौली के रहने वाले विनय यादव के साथ दोस्ती हो गई थी. 21 साल का विनय खुशबू को बेहद प्यार करता था.

लेकिन उन के बीच जातपात की गहरी खाई थी. दोनों ही परिवारों को इन की दोस्ती पसंद नहीं थी. इस के बाद भी विनय और खुशबू किसी भी तरह एकदूसरे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. लेकिन परेशानी यह थी कि उन्हें साथ रहने का रास्ता नहीं दिख रहा था. अच्छी बात यह थी कि विनय और खुशबू के बीच एक सामंजस्य बना हुआ था. दोनों ही मिल कर अपने दिल की बात कर लेते थे. इस बात की खबर जब खुशबू के घर वालों को होती तो वे विनय के घर वालों से शिकायत करते, जिस से दोनों परिवारों के बीच तनातनी हो जाती थी. जिसे प्रेमी युगल भी घबरा जाते. खुशबू पर भी मनोज इस बात का दबाव बनाता कि वह विनय से मिलना छोड़ दे.

एक दिन खुशबू ने विनय से कहा, ‘‘विनय, तुम अब यह देखो कि हम लोग कैसे एक साथ रह सकते हैं. क्योंकि अब घर में परेशानियां बढ़ने लगी हैं. हमारा तुम्हारा इस तरह मिलना संभव नहीं हो पाएगा. मैं कब तक घर वालों से झगड़ा करती रहूंगी.’’

‘‘खुशबू तुम्हें लगता है कि जैसे मैं कुछ सोचता नहीं. ऐसी बात नहीं है. पर मेरी समझ में कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा. पहले तो सिटी में नौकरी कर लेता था. लौकडाउन हुआ तो नौकरी चली गई. अब तो अपने खर्च उठाना और भी मुश्किल हो गया है. अपने पास घर और नौकरी दोनों नहीं होगी तो काम ही नहीं चलेगा.’’ विनय ने खुशबू को अपनी परेशानी से अवगत कराते हुए समझाया. खुशबू को वह समय याद आ रहा था जब उस की पहली मुलाकात विनय से हुई थी. विनय उसे हर लड़के से अलग लगता था. हमेशा उस का खयाल रखता और बहुत सारी चीजें भी देता रहता था. खुशबू और विनय के बीच जब थोड़ी दोस्ती बढ़ गई तो खुशबू उस के साथ शादी और बाकी जीवन गुजरबसर करने के सपने देखने लगी.

खुशबू ने सोचा था कि जब उस के घर परिवार के लोग इस दोस्ती और प्यार को शादी के रिश्ते में बदलने नहीं देंगे तो वह गांव छोड़ कर विनय के साथ शहर चली जाएगी. वहां दोनों साथसाथ रहेंगे. विनय नौकरी करेगा और वह घर को संभालेगी. विनय के वापस आने का इंतजार करेगी. ऐसे ही हसीन सपनों में दोनों का समय गुजर रहा था. अब दोनों ही अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने का इंतजार कर रहे थे. इसी बीच पिछले साल कोरोना महामारी बढ़ने पर लौकडाउन लग गया तो दुकानें, होटल, फैक्ट्री आदि पिछले साल बंद हो गईं, जिस से बहुत सारे लोग घर बैठ गए. शुरुआत में लगा कि 10-20 दिनों में लौकडाउन खत्म जाएगा. उस के बाद बाजार और कामधंधे शुरू हो जाएंगे. लेकिन धीरेधीरे करीब 3 माह का समय बीत गया था. सारा कारोबार चौपट हो चुका था.

3 माह के बाद जब विनय अपने काम पर वापस गया तो उसे बताया गया कि अब औफिस में काम कम हो गया है. लिहाजा अब उस की वहां जरूरत नहीं रह गई. उस के बाद जब विनय ने अपने 3 माह का बकाया वेतन मांगा तो कहा गया कि जब तुम ने काम हीं नहीं किया तो वेतन किस बात का. तुम ने मार्च महीने में 20 दिन काम किया था. उन 20 दिनों का पैसा ले लो और अब नौकरी पर नहीं आना है. विनय का गांव तो लखनऊ से 20-22 किलोमीटर ही दूर था. ऐसे में वह रोज साइकिल और आटो से आताजाता था. खुशबू को साथ रखने की योजना की वजह से उस ने उस समय लखनऊ में एक कमरा किराए पर ले लिया था.

इस का भी 5 हजार रुपए देना पड़ता था. ऐसे में जब वह वहां अपना रखा सामान लेने गया तो मकान मालिक ने 15 हजार रुपए किराए के मांगे. विनय के पास उतना तो नहीं था. उसे 10 हजार औफिस से मिले थे, उसी में से 8 हजार मकान मालिक को दे कर अपना सामान साथ ले आया. कोरोना के बाद शहर से जैसे उस का नाता टूट गया. कोरोना ने जिस तरह से काम धंधों पर रोक लगाई, उस से विनय और खुशबू जैसे युवाओं के सामने भी अपने भविष्य को ले कर प्रश्नचिह्न लगा दिए. बेरोजगारी ने आगे के सभी रास्ते बंद कर दिए. यह उम्मीद थी कि 3 महीने के बाद जब लौकडाउन खुलेगा तो सब कुछ पटरी पर आ जाएगा. लेकिन इस के बाद भी कोई कामधंधा नहीं बढ़ा. मार्च, 2021 में जब कोरोना का संकट फिर से बढ़ा तो विनय को जो कामधंधा मिल जाता था, वह भी बंद हो गया.

विनय और खुशबू अपने जीवन को ले कर गंभीर थे. एक दिन विनय ने कहा, ‘‘खुशबू, अगर हमारे पास 15-20 लाख रुपए होते तो हम अपना काम भी शुरू कर लेते और एक रहने की जगह भी बना लेते, जिस से कम से कम हमें किराया तो नहीं देना पड़ता.’’

‘‘विनय, पैसे तो मिल सकते हैं. बस सावधानी बरतने की जरूरत है. और यदि हम पकड़े न जाएं तो मदद हो सकती है.’’ खुशबू ने कहा.

‘‘तुम रास्ता बताओ. बाकी हम कर लेंगे. किसी को कुछ पता नहीं चलेगा.’’ विनय ने उत्सुकता दिखाई और खुशबू को पूरा भरोसा दिलाते हुए कहा.

‘‘देखो विनय, मेरे घर में इतने रुपए और जेवर रखे हैं, जिन को मिला कर जितने पैसों की तुम बात कर रहे हो उतने हो जाएंगे. हम लोग एक दिन वह रुपए किसी तरह चोरी कर लें. चोरी होने से यह भी नहीं पता चलेगा कि किस ने यह काम किया है. फिर जब सब काम हो जाएगा, तब हम साथसाथ रहने लगेंगे.’’ खुशबू बोली. खुशबू को उस के घर वाले भी मानसिक रूप से इतना परेशान करते थे कि वह किसी भी तरह से अपने घर में रहने को तैयार नहीं थी. अपने घर में चोरी की योजना बनाते समय उसे किसी भी तरह का डर या संकोच भी नहीं हुआ.

इधर विनय ने अपने साथी गांव के रहने वाले शुभम यादव को भी इस योजना में शामिल कर लिया. खुशबू के साथ योजना बनाते समय विनय ने उसेनींद की 8 गोलियां ला कर दीं और कहा कि 4-4 गोलियां काढे़ में डाल कर रात में अपने मम्मी और पापा को पिला देना. जिस से वे रात भर गहरी नींद में सोते रहेंगे. खुशबू ने 28 मई, 2021 की रात ऐसा ही किया. जब उस के मातापिता गहरी नींद में सो गए तो विनय और शुभम ने खुशबू के साथ मिल कर उस के घर से 13 लाख रुपए नकद और 3 लाख के जेवर चोरी कर लिए. जेवर और रुपए ले कर विनय और शुभम चले गए. सुबह जब खुशबू के पिता मनोज कुमार सो कर उठे तो देखा कि उन की अलमारी टूटी हुई थी और उस में रखी नकदी व जेवर गायब थे.

वह थाना गोसाईंगंज गए. वहां पर उन्होंने यह जानकारी थानाप्रभारी अमरनाथ वर्मा को दी तो थानाप्रभारी ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 457 और 380 आईपीसी के तहत अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया. लखनऊ के पुलिस कमिशनर धु्रवकांत ठाकुर के निर्देशन में डीसीपी ख्याति गर्ग, एडिशनल डीसीपी (साउथ) पुर्णेंदु सिंह, एसीपी स्वाति चौधरी, इंसपेक्टर गोसाईंगंज अमरनाथ वर्मा ने अपनी टीम के साथ चोरों को पकड़ने का काम शुरू किया. पुलिस टीम में एसआई जय सिंह, दीपक कुमार पांडेय, विवेक कुमार, फिरोज आलम सिद्दीकी, अनिल कुमार, हैडकांस्टेबल अमीर हमजा, अकबर, सुशील चौहान, अंकित यादव, राजेश कुमार, पूनम शर्मा, मजीत सिंह, सुनील कुमार और रवींद्र कुमार शामिल थे.

मोबाइल की काल डिटेल्स में खुशबू और विनय के बीच बातचीत और रात में दोनों की लोकेशन एक होने से पुलिस का शक खुशबू पर गया. पुलिस ने खुशबू से पूछताछ की तो उस ने सच कबूल लिया. खुशबू की बताई बातों के आधार पर पुलिस ने पहले विनय और फिर शुभम को हिरासत में ले लिया. सभी ने अपना अपराध कबूल कर लिया. पुलिस ने विनय, खुशबू और शुभम की निशानदेही पर चोरी गए रुपए और जेवर बरामद कर लिए. इस के बाद इन सभी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Social Stories in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Stories : लड़कियों को किडनैप कर जबरन कराया जाता था जिस्मफरोशी धंधा करवाया

Crime Stories : औनलाइन सैक्स रैकेट चलाने वाले गिरोह से 12 साल की मानसी को बरामद करने पर पुलिस को ऐसी चौंकाने वाली जानकारी मिली कि…

22  जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने बताया कि मानसी तो काफी देर पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है. जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करतेकरते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला. करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी.

क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी. जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे. उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली.

12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे. जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.    आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Stories

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

 

Crime Kahani : कुख्यात बदमाश ने घात लगाकर दो पुलिस अधिकारियों की कर दी हत्या

Crime Kahani : फिरोजपुर निवासी कुख्यात बदमाश जयपाल भुल्लर ने जगराओं में 2 पुलिस अधिकारियों की हत्या कर अपने आतंक का रौब दिखाने की कोशिश की है. अब पंजाब सहित 8 राज्यों की पुलिस उस के पीछे पड़ी है. जगराओं की घटना ने पंजाब पुलिस के 4 सालों में 3300 से ज्यादा गैंगस्टरों को गिरफ्तार करने के दावे पर भी सवालिया निशान लगा दिया है.

पंजाब का लुधियाना शहर हौजरी और गर्म कपड़ों के थोक व्यापार के लिए पूरे भारत में जाना जाता है. लुधियाना और उस के आसपास गर्म कपड़े बनाने के सैकड़ों छोटेबड़े उद्योग हैं. हर साल सर्दियों की शुरुआत से पहले ही खरीदारी के लिए यहां देश भर के व्यापारी आते हैं. इसी लुधियाना शहर से करीब 45 किलोमीटर दूर एक शहर जगराओं है. इसी साल 15 मई की बात है. पुलिस के सीआईए स्टाफ के एएसआई दलविंदर सिंह और भगवान सिंह को शाम को करीब 6 बजे सूचना मिली कि जगराओं की नई दाना मंडी में एक ट्र्रक में नशे की बड़ी खेप आई है. इस सूचना पर दोनों एएसआई एक होमगार्ड जवान राजविंदर के साथ अपनी निजी स्विफ्ट कार से मौके पर रवाना हो गए.

नई दाना मंडी जगराओं में मोगा रोड पर है. एक आम आदमी की तरह कपड़े पहने हुए पुलिस के मुलाजिम 15-20 मिनट बाद जब वहां पहुंचे तो उन्होंने वहां एक कैंटर ट्र्रक खड़ा देखा. पुलिस वाले अपनी गाड़ी एक तरफ साइड में खड़ी कर उस ट्र्रक के पास पहुंचे और आसपास खड़े लोगों से पूछताछ करने लगे. वहां मौजूद लोगों से उन्हें कुछ पता नहीं चला, तो एएसआई भगवान सिंह ट्र्रक में आगे बने ड्राइवर केबिन में चढ़ गए. भगवान सिंह ने ट्र्रक में ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स को पहचान लिया. उसे देखते ही बोले, ‘‘ओय पुत्तर, तू तो जयपाल भुल्लर है. नामी गैंगस्टर.’’

वह शख्स भी भगवान सिंह की बात सुन कर समझ गया कि यह पुलिसवाला है. उस ने फुरती से अपने कपड़ों में से पिस्तौल निकाली और उस की कनपटी पर गोलियां मार दीं. गोलियां लगने से भगवान सिंह ट्र्रक से नीचे गिर गए. उन के सिर से खून बह निकला. गोली की आवाज सुन कर ट्र्रक के पास खड़े दूसरे एएसआई दलविंदर सिंह तेजी से ट्र्रक में चढ़ने लगे, तो पास में खड़ी एक आई-10 कार में सवार कुछ लोग बाहर निकल आए. वे लोग उन पुलिस वालों से मारपीट करने लगे. मारपीट के दौरान एक शख्स ने दलविंदर सिंह को भी गोली मार दी. गोली लगने से वह भी लहूलुहान हो गए. इस के बाद भी बदमाश नहीं रुके बल्कि दलविंदर और होमगार्ड जवान राजविंदर सिंह से मारपीट करते रहे. राजविंदर जैसेतैसे बदमाशों से अपनी जान बचा कर भाग निकला.

जब यह घटनाक्रम चल रहा था तो मंडी में कुछ युवक क्रिकेट खेल रहे थे. उन युवकों ने गोलियां चलने की आवाज सुनी तो वे वीडियो बनाने लगे और बदमाशों को पकड़ने के लिए दौड़े. इस पर बदमाशों ने गोलियां चला कर उन युवकों को धमकाया. उन युवकों के डर कर रुक जाने पर बदमाशों ने ट्र्रक से सामान निकाल कर अपनी आई-10 कार में रखा. इस के बाद बदमाशों ने वहां लहूलुहान पड़े पुलिस के दोनों मुलाजिमों की पिस्तौलें निकालीं और उस ट्र्रक व कार में सवार हो कर भाग गए. पुलिस के दोनों एएसआई गोलियां लगने से तड़प रहे थे. बदमाशों के भागने के बाद वहां लोगों की भीड़ जुट गई. पुलिस को सूचना दी गई. पुलिस ने घायल पड़े दोनों एएसआई को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

सरेआम दिनदहाड़े पुलिस के 2 अधिकारियों की गोलियां मार कर हत्या कर देने की घटना से पूरे शहर और आसपास के इलाकों में सनसनी फैल गई. अफसरों ने पहुंच कर मौकामुआयना किया. जांच शुरू कर दी गई. बदमाशों की तलाश में शहर के सभी रास्तों पर नाके लगा दिए. पूरे पंजाब में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया. बदमाशों की तलाश में भागदौड़ कर रही पुलिस को कुछ ही देर बाद मोगा रोड पर एक ढाबे के बाहर वह ट्र्रक खड़ा मिल गया, जिसे बदमाश भगा ले गए थे. ट्र्रक में अफीम और चिट्टा बरामद हुआ. ट्र्रक के पिछले हिस्से में तलाशी के दौरान पुलिस को कई ब्रांडेड कपड़े मिले. इस से यह अंदाज लगाया गया कि ट्र्रक में कई लोग सवार थे. पुलिस ने वह ट्र्रक जब्त कर लिया.

ट्र्रक के नंबर की जांचपड़ताल की, तो वह फरजी निकला. यह नंबर फरीदकोट के एक जमींदार की मर्सिडीज कार का निकला. जांच में पता चला कि यह ट्र्रक मोगा के गांव धल्ले के रहने वाले एक शख्स के नाम पर था. उस ने ट्र्रक दूसरे को बेच दिया. इस के बाद भी यह ट्र्रक 2 बार आगे बिकता रहा. पुलिस अधिकारियों ने बदमाशों की चंगुल से जान बचा कर भागे होमगार्ड जवान राजविंदर सिंह से पूछताछ की, तो पता चला कि ड्रग्स की सूचना पर वे मौके पर गए थे. वहां ट्र्रक की चैकिंग के दौरान एएसआई भगवान सिंह ने जयपाल भुल्लर को पहचान लिया था. इस पर जयपाल ने उसे गोलियां मार दी थीं.

बाद में एएसआई दलविंदर आगे बढ़े तो जयपाल के साथी बदमाशों ने उन पर भी गोलियां चला दीं. होमगार्ड जवान राजविंदर सिंह के परचा बयान पर पुलिस ने जयपाल भुल्लर और उस के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. दूसरे दिन पुलिस ने दोनों शहीद एएसआई भगवान सिंह और दलविंदर सिंह के शवों का सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया. इस के बाद शव उन के घरवालों को सौंप दिए. दलविंदर का शव उन के घर वाले अपने पैतृक गांव तरनतारन ले गए. भगवान सिंह का अंतिम संस्कार जगराओं में शेरपुरा रोड पर राजकीय सम्मान से किया गया. उन के 11 साल के बेटे ने मुखाग्नि दी.

भगवान सिंह के अंतिम संस्कार में डीजीपी (रेलवे) संजीव कालड़ा, आईजी नौनिहाल सिंह, डीसी वरिंदर शर्मा, एसएसपी चरणजीत सिंह सोहल, कैप्टन संदीप संधु, विधायक सरबजीत सिंह मानूके आदि मौजूद रहे. डीजीपी ने ट्वीट कर दोनों शहीद पुलिसकर्मियों के परिवार वालों को एकएक करोड़ रुपए और आश्रित को नौकरी देने का ऐलान किया. पुलिस ने जांचपड़ताल के लिए मौके के आसपास और बदमाशों के भागने के रास्तों की सीसीटीवी फुटेज देखी. इन से साफ हो गया कि दोनों पुलिस मुलाजिमों की हत्या कुख्यात गैंगस्टर जयपाल भुल्लर और उस के साथियों ने की थी. पुलिस ने जयपाल के 3 साथियों की पहचान खरड़ निवासी जसप्रीत सिंह जस्सी, लुधियाना के सहोली निवासी दर्शन सिंह और मोगा के माहला खुर्द निवासी बलजिंदर सिंह उर्फ बब्बी के रूप में की.

जगराओं पुलिस ने इन चारों पर हत्या, इरादा कत्ल और असलाह ऐक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. पुलिस ने इन चारों के पोस्टर जारी कर ईनाम भी घोषित कर दिया. पंजाब के डीजीपी दिनकर गुप्ता ने जयपाल पर 10 लाख रुपए, बलजिंदर सिंह उर्फ बब्बी पर 5 लाख रुपए, जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी और दर्शन सिंह पर 2-2 लाख रुपए का ईनाम घोषित किया. जयपाल भुल्लर का नाम पंजाब पुलिस के लिए नया नहीं है. पुलिस का हर नयापुराना मुलाजिम उस के नाम से परिचित है. जयपाल पर हत्या, अपहरण, डकैती, तसकरी, फिरौती आदि संगीन अपराधों के 45 से ज्यादा मामले दर्ज हैं. बलजिंदर उर्फ बब्बी के खिलाफ हत्या का केस दर्ज है. जस्सी और दर्शन कुख्यात तसकर हैं. जयपाल पंजाब सहित कई राज्यों का मोस्टवांटेड अपराधी है.

जयपाल का दोनों एएसआई की हत्या की वारदात से 5 दिन पहले ही पुलिस से आमनासामना हुआ था. 10 मई को लुधियाना के दोराहा में जीटी रोड पर नाकेबंदी के दौरान पुलिस ने कार में सवार 2 युवकों को रोका था. चैकिंग के दौरान बहसबाजी होने पर दोनों युवकों ने वहां तैनात एएसआई सुखदेव सिंह और हवलदार सुखजीत सिंह को हमला कर घायल कर दिया था. बाद में दोनों युवक कार से भाग गए थे. भागते समय ये युवक एएसआई सुखदेव सिंह से पिस्तौल भी छीन ले गए थे. पुलिस वालों से मारपीट करने वाले दोनों युवक करीब 25-30 साल के पगड़ीधारी सिख थे. उन्होंने सफेद कुरतापायजामा पहन रखा था. हाथापाई के दौरान एक युवक का पर्स गिर गया था. इस पर्स में गुरप्रीत सिंह के नाम से ड्राइविंग लाइसैंस मिला था.

पुलिस को बाद में जांच में पता चला कि इस घटना में हमलावरों में एक युवक जयपाल था. पर्स भी उसी का गिरा था. पर्स में मिले ड्राइविंग लाइसैंस पर फोटो जयपाल की लगी थी, लेकिन फरजी नाम गुरप्रीत सिंह लिखा हुआ था. खास बात यह थी कि जगराओं में दोनों एएसआई की हत्या की वारदात के वक्त जयपाल क्लीन शेव था. यानी उस ने 5 दिन में ही अपना हुलिया बदल लिया था. वह बारबार हुलिया बदल कर ही पुलिस को चकमा देता रहता था. पुलिस ने जयपाल और उस के साथियों की तलाश में छापे मारे, तो पता चला कि गैंगस्टर जयपाल भुल्लर जोधां के गांव सहोली में अपने साथी कुख्यात तसकर दर्शन सिंह के खेतों में पिछले डेढ़ महीने से रहा था. दोराहा नाके पर हुई घटना से पहले वह केशधारी सरदार के रूप में रहता था. बाद में उस ने अपना रूप बदल कर चेहरा क्लीन शेव कर लिया.

जयपाल की तलाश में पुलिस ने सर्च अभियान शुरू किया. पुलिस को इनपुट मिले थे कि वारदात करने से पहले और बाद में जयपाल लुधियाना के आसपास के गांवों में आताजाता रहा है. इन गांवों में उस के ठिकाने हैं. इसे देखते हुए 17 मई को एडिशनल डीपीसी जसकिरणजीत सिंह तेजा, एसीपी जश्नदीप सिंह और डेहलो थानाप्रभारी सुखदेह सिंह बराड़ के नेतृत्व में पुलिस ने करीब डेढ़ दरजन गांवों में एकएक घर की तलाशी ली. इस दौरान किराएदारों का भी रिकौर्ड जुटाया गया और खासतौर से आई-10, आई-20, सियाज, फौरच्युनर और एंडेवर गाडि़यों की तलाशी ली गई.

दूसरी ओर, कुछ सूचनाओं के आधार पर लुधियाना और जगराओं पुलिस ने चंडीगढ़ में छापे मारे. इन छापों में कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया. इन लोगों से पता चला कि जयपाल फरजी ड्राइविंग लाइसैंस दिखा कर कई महीने तक चंडीगढ़ में एक एनआरआई के मकान में किराए पर भी रहा था. जयपाल के छिपने के ठिकानों का पता लगाने के लिए पुलिस की आर्गनाइज्ड क्राइम कंट्र्रोल यूनिट (ओक्कू) टीम ने उस के भाई अमृतपाल को बठिंडा जेल से प्रोडक्शन वारंट पर हासिल किया. उस से पूछताछ की, लेकिन कोई पते की बात मालूम नहीं हो सकी. बाद में पुलिस ने उसे वापस जेल भेज दिया.

बदमाशों की तलाश में पुलिस ने लुधियाना, अमृतसर और मालेरकोटला सहित कई शहरों में छापे मारे और कई लोगों से पूछताछ की. विभिन्न जेलों में बंद जयपाल के साथियों से भी पूछताछ की. इन में पता चला कि दोनों पुलिस मुलाजिमों की हत्या की वारदात तक जयपाल करीब 6 महीने से जगराओं के गांव कोठे बग्गू में किराए के मकान में रह रहा था. वह इसी मकान से नशीले पदार्थों की तसकरी का धंधा चला रहा था. यह किराए का मकान हाईवे से केवल 5 मिनट के रास्ते पर था. इस रास्ते पर कोई सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगे हुए थे. शायद इन्हीं सब बातों को देख कर जयपाल ने फरजी आईडी प्रूफ से इस गांव में किराए पर मकान लिया था. यह मकान कनाडा में रह रहे एनआरआई हरदीप सिंह का था.

पुलिस ने 19 मई, 2021 को जयपाल के साथी ईनामी बदमाश दर्शन सिंह के मकान की तलाशी ली. इस में जिम की एक किट बरामद हुई. इस किट में हथियार और 300 कारतूस मिले. इस के अलावा अलगअलग वाहनों की 8-10 आरसी भी मिलीं. ये आरसी उन वाहनों की थीं, जो हाईवे पर लूटे या चोरी किए गए थे. पुलिस ने दर्शन सिंह की पत्नी सतपाल कौर को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. जयपाल ने छिपने के लिए पंजाब के अलावा राजस्थान में भी ठिकाने बना रखे थे. इसलिए पुलिस ने पंजाब और राजस्थान के उस के छिपने के संभावित ठिकानों पर भी छापे मारे. इस के अलावा ओक्कू टीम ने जयपाल के साथी गगनदीप जज को बठिंडा जेल से प्रोडक्शन वारंट पर हासिल किया.

गगन ने जयपाल के साथ मिल कर फरवरी 2020 में लुधियाना में एक कंपनी से 32 किलोग्राम सोना लूटा था. गगनदीप को जयपाल के लगभग हर राज पता थे. इसी उम्मीद में उस से पूछताछ की गई, लेकिन पुलिस उस से भी कुछ नहीं उगलवा सकी. गगन से मिली कुछ जानकारियों के आधार पर पुलिस ने जयपाल की तलाश में उत्तर प्रदेश और राजस्थान के 8-10 गांवों में छापे मारे, लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ. दर्शन सिंह के मकान पर दोबारा सर्च की गई. इस दौरान पुलिस को कुछ कारतूस और मिले. पुलिस ने 20 मई को दर्शन सिंह की पत्नी सतपाल कौर को गिरफ्तार कर लिया और मोगा के रहने वाले कैंटर मालिक गुरप्रीत सिंह लक्की को नामजद कर लिया.

2 पुलिसकर्मियों की हत्या की वारदात के एक सप्ताह बाद भी जयपाल और उस के साथियों का कोई सुराग नहीं मिलने पर पंजाब पुलिस ने अन्य राज्यों की पुलिस से संपर्क किया. इस के बाद 8 राज्यों की पुलिस की कोऔर्डिनेशन टीम बनाई गई. इस में पंजाब के अलावा हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के चुनिंदा पुलिस अफसरों को शामिल किया गया. जयपाल के साथ फरार उस के साथी खरड़ निवासी जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी की पत्नी लवप्रीत कौर को मोहाली की सोहाना थाना पुलिस ने 20 मई को गिरफ्तार कर लिया.

मोहाली में पूर्वा अपार्टमेंट में उस के फ्लैट से करीब 8 बैंकों की पासबुक और दूसरे अहम दस्तावेज मिले. पुलिस ने बैंकों से स्टेटमेंट निकलवाई, तो पता चला कि इन खातों में करोड़ों रुपए का लेनदेन हो रहा था. कहा जाता है कि लवप्रीत इस फ्लैट में अकेली रहती थी जबकि उस की ससुराल खरड़ गांव में है. लोगों को गुमराह करने के लिए जसप्रीत उस से अलग रहता था, लेकिन असल में उस का पत्नी लवप्रीत से लगातार संपर्क था. वह इसी फ्लैट में आ कर पत्नी से मिलता था. लगातार चल रहे तलाशी अभियान के दौरान पुलिस ने जयपाल को शरण देने और उस की मदद करने वाले 5 लोगों को 21 मई को गिरफ्तार कर लिया. इन से कई हथियार और कारतूसों के अलावा 29 वाहनों की फरजी आरसी, 8 खाली आरसी कार्ड, टेलीस्कोप, पंप एक्शन गन आदि भी बरामद हुए.

गिरफ्तार आरोपियों में कैंटर मालिक मोगा के गांव धल्ले का रहने वाला गुरुप्रीत सिंह उर्फ लक्की और उस की पत्नी रमनदीप कौर, दर्शन सिंह का दोस्त सहोली गांव निवासी गगनदीप सिंह, जगराओं के आत्मनगर का रहने वाला जसप्रीत सिंह और सहोली गांव के रहने वाले नानक चंद धोलू शामिल रहे. इन से पूछताछ में पता चला कि जयपाल और उस के साथी गाडि़यां लूटने और चोरी करने के बाद उन की फरजी आरसी और नंबर प्लेट तैयार करते थे. फरजी आरसी तैयार करने के लिए उन्होंने एक माइक्रो मशीन ले रखी थी. जयपाल गिरोह के बदमाश कोई भी वारदात करने से पहले गाड़ी लूटते या चोरी करते थे और उस की फरजी आरसी व नंबर प्लेट मशीन से तैयार कर खुद ही बदल लेते थे ताकि अगर किसी कारणवश गाड़ी रास्ते में छोड़नी पड़े, तो पुलिस नंबरों में उलझी रहे.

सहोली गांव का रहने वाला गिरफ्तार नानक चंद धोलू मोबाइल सिम उपलब्ध कराता था. आरोपियों से पूछताछ में पता चला कि जयपाल का फरार साथी जसप्रीत सिंह उर्फ जस्सी गवाहों को अपने बयान बदलने के लिए धमकाता भी था. पूछताछ के बाद पुलिस ने जयपाल और जसप्रीत सिंह के सोशल मीडिया अकाउंट ब्लौक करवा दिए. पता चला था कि ये बदमाश अपने सोशल मीडिया अकाउंट के जरिए युवाओं को जोड़ते और गैंग में शामिल होने के लिए तैयार करते थे. फिरोजपुर निवासी जयपाल भुल्लर पंजाब ही नहीं कई राज्यों में खौफ का पर्यायवाची नाम है. जिस जयपाल के पीछे 8 राज्यों की पुलिस लगी हुई थी, उस जयपाल के पिता भूपिंदर सिंह पंजाब पुलिस में इंसपेक्टर थे.

कहा जाता है कि पिता के कारण ही जयपाल के पुलिस महकमे में कई मुलाजिम अच्छे जानकार हैं. इसलिए वह पुलिस की आंखों में धूल झोंकता रहता था. उस के खिलाफ पुलिस रिकौर्ड 45 से ज्यादा अपराध दर्ज हैं. जयपाल पंजाब के कुख्यात गैंगस्टर विक्की गौंडर का साथी रहा था. विक्की गौंडर और प्रेमा लाहौरिया की मौत के बाद जयपाल ने गैंग की कमान संभाल ली थी. जयपाल पर मुख्यरूप से फिरोजपुर के सेखों करमती सहित दोहरे हत्याकांड, तरनतारन और लुधियाना में हत्या, सुक्खा काहलवां हत्याकांड, लुधियाना में व्यवसाई पंकज अग्निहोत्री के घर से 60 लाख की लूट, राजस्थान के किशनगढ़ में 2 करोड़ के तांबे से लदे ट्र्रक की लूट, लुधियाना में चिराग अपहरण केस, एयरटेल शोरूम में डकैती आदि के मामले दर्ज हैं.

पिछले साल फरवरी के महीने में लुधियाना की आईआईएफएल गोल्ड लोन कंपनी में 32 किलोग्राम सोने की लूट हुई थी. यह वारदात जयपाल ने अपने साथियों के साथ मिल कर की थी. जयपाल ने यह वारदात केशधारी सिख के वेश में अपने सगे भाई अमृतपाल और सब से विश्वसनीय साथी गगनदीप जज के साथ मिल कर की थी. वारदात के बाद जयदीप चंडीगढ़ में पगड़ी बांध कर और दाढ़ी बढ़ा कर एक फ्लैट में छिपा रहा था. पुलिस उसे 11 साल पुरानी क्लीन शेव फोटो के आधार पर ढूंढ रही थी. बाद में पुलिस ने छापा मारा तो अमृतपाल और गगनदीप जज पकड़े गए लेकिन जयपाल भाग निकला था. इस लूट का 17 किलोग्राम सोना अब तक बरामद नहीं हुआ है.

नानकसर में वर्ष 2015 में पुलिस की वरदी में बदमाशों ने कैश वैन लूट ली थी. इस वारदात में भी जयपाल का हाथ होने की आशंका है. वारदात के 6 साल बाद भी पुलिस इस की पुष्टि नहीं कर सकी है. सितंबर 2020 में जयपाल का नाम तब भी सामने आया था, जब जगराओं के मशहूर ढाबा मालिक से विदेशी नंबर से फोन कर 25 लाख रुपए की फिरौती मांगी गई थी. बाद में पुलिस ने एक आरोपी राघव नागपाल को पकड़ा था, लेकिन जयपाल के बारे में पुलिस को कोई सुराग नहीं मिले थे. जयपाल के गैंग में अनेक कुख्यात बदमाश शामिल रहे हैं. गांव हवेलियां का रहने वाला तसकर गुरजंट भोलू जनवरी 2016 में पकड़ा गया तो उस ने बताया कि वह जयपाल के लिए नशीले पदार्थों की तसकरी करता था.

भोलू बाद में पटियाला जेल में सुपरिंटेंडेंट की मदद से कैदियों से फिरौती वसूलने लगा. उस ने मुजफ्फरनगर बालिका गृह रेप केस के मुख्य आरोपी ब्रजेश सिंह ठाकुर से भी 10 लाख रुपए की फिरौती वसूली थी. इस का खुलासा होने पर उसे अमृतसर जेल भेज दिया गया. जयपाल के साथी हथियार सप्लायर रणजीत डुपला को 4 करोड़ रुपए के विदेशी हथियारों के साथ फरीदकोट पुलिस ने पकड़ा और उस पर अनलाफुल ऐक्टिविटी ऐक्ट लगाया था. लेकिन उस ने मिलीभगत कर 82 दिन में ही यह ऐक्ट हटवा लिया और जमानत ले कर अमेरिका भाग गया. बाद में ओकू ने उस पर पिछले साल फिर से अनलाफुल ऐक्टिविटी ऐक्ट लगाया.

पंजाब के फिरोजपुर का रहने वाला चंदू गैंगस्टर जयपाल का शार्पशूटर है. वह किशनगढ़ डकैती में पकड़ा गया था, तब से जेल में है. नाभा जेल में रहते हुए वह बड़े ठेकों में दखल देता था और बड़े ठेकेदारों से वसूली करता था. सितंबर 2020 में नाभा जेल में उस के पास मोबाइल मिला था. अब वह बठिंडा जेल में है. जयपाल का दूसरा शार्पशूटर फरीदकोट निवासी तीर्थ ढिलवां 4 मार्च, 2018 को पकड़ा गया था. उस के खिलाफ अपहरण, लूटपाट व हत्या जैसे करीब 2 दरजन मामले दर्ज हैं. पहली मई 2016 को हिमाचल प्रदेश के परवाणु में हुई जसविंदर रौकी की हत्या में जयपाल के साथ उस का भी नाम आता है. रौकी फाजिल्का का नेता और गैंगस्टर था.

यह पंजाब पुलिस, ओकू और इंटेलिजेंस की नाकामयाबी रही कि मोस्टवांटेड गैंगस्टर लुधियाना के गांव भुट्टा में अमृतसर के एक व्यक्ति के नाम पर जमीन खरीद कर अपनी कोठी बनवा रहा था. यह भी पुलिस के लिए फेलियर रहने वाली बात रही कि 10 मई, 2021 को दोराहा नाके पर एक एएसआई और हवलदार पर हमला कर उन से हथियार छीन ले जाने की घटना के 5 दिन बाद तक पुलिस जयपाल का पता नहीं लगा सकी थी, जबकि जयपाल उस जगह से कुछ किलोमीटर दूर गांव कोठे बग्गू में रह रहा था. पुलिस को जांच में यह भी पता लग गया था कि इस वारदात में जयपाल और उस का साथी जस्सी शामिल था. इसी का नतीजा रहा कि जयपाल ने 5 दिन बाद ही 15 मई को जगराओं में 2 एएसआई को मौत की नींद सुला दिया.

बदमाश दर्शन सिंह कुख्यात तसकर है. उस के खिलाफ भी कई मामले दर्ज हैं. उस के नजदीकी रिश्तेदार पंजाब पुलिस में एसपी के पद पर हैं. दर्शन सिंह जेल भी जा चुका है. करीब 5 साल पहले हत्या के मामले में अच्छा चालचलन बता कर लुधियाना की ब्रोस्टल जेल से 2 साल 4 महीने की उस की सजा माफ कर दी गई थी. जेल से बाहर आने के बाद वह जयपाल के साथ मिल कर नशा तसकरी और लूटपाट की बड़ी वारदातें करने लगा. पंजाब पुलिस की ओकू टीम ने दोनों एएसआई की हत्या की वारदात में शामिल गैंगस्टर दर्शन सिंह और बलजिंदर सिंह उर्फ बब्बी को 29 मई, 2021 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले से गिरफ्तार कर लिया.

इन को पनाह देने वाले हरचरण सिंह को भी पकड़ लिया गया है. पुलिस को इन का सुराग इन के रिश्तेदारों के मोबाइल फोन टेप करने से लगा. जयपाल भले ही कितना भी छिप ले, कभी तो वह पकड़ा जाएगा. कथा लिखे जाने तक पुलिस उस की तलाश में जुटी हुई थी. जयपाल आजकल नशीले पदार्थों की तसकरी में लिप्त था. जयपाल ने अपने साथियों के साथ जगराओं में 2 पुलिसकर्मियों की हत्या की जो वारदात की है, उस ने पंजाब सरकार के उन दावों पर सवालिया निशान लगा दिए हैं कि 4 साल में 3300 से ज्यादा गैंगस्टर पकड़े गए हैं. जगराओं की वारदात से यह साफ हो गया है कि पंजाब में गैंगस्टर बेखौफ हैं. Crime Kahani

 

Real Crime Story in Hindi : सीरियल किलर महिलाओं के साथ दुष्कर्म कर गला दबाकर करता था हत्या

Real Crime Story in Hindi : माइना रामुलु अपनी पत्नी रेखा को बहुत प्यार करता था. लेकिन आर्थिक अभाव के चलते रेखा किसी के साथ भाग गई. इस से माइना के मन में महिलाओं के प्रति ऐसी नफरत पैदा हो गई कि उस ने एकएक कर के 18 महिलाओं की हत्या कर दी. हत्या करने का उस का ऐसा तरीका था कि…

हैदराबाद के जुबली हिल्स थाने के इंसपेक्टर राजशेखर रेड्डी अपने औफिस में बैठे आगंतुकों से मुखातिब हो रहे थे. उन के बीच एक 55 वर्षीय व्यक्ति चिंतित और परेशान सा बैठा हुआ था. इंसपेक्टर रेड्डी ने उस से पूछा, ‘‘हां बताइए, यहां कैसे आना हुआ?’’

‘‘सर, मेरा नाम कावला अनाथैया है.’’ उस व्यक्ति ने अपना परिचत देते हुए कहा, ‘‘मैं यूसुफगुड़ा का रहने वाला हूं.’’

‘‘हूं.’’

‘‘सर, मेरी पत्नी कमला बैंकटम्मा 2 दिनों से लापता है. मैं ने उसे अपने स्तर पर हर जगह खोजने की कोशिश की, लेकिन कहीं पता नहीं चला. मैं बहुत परेशान हूं. मेरी पत्नी को ढूंढने में मेरी मदद कीजिए, सर. मैं आप का जीवन भर आभारी रहूंगा.’’

‘‘क्या उम्र होगी आप की पत्नी की?’’ कुछ सोचते हुए इंसपेक्टर रेड्डी ने कावला से सवाल किया.

‘‘यही कोई 50 साल.’’

‘‘50 साल!’’ जबाव सुन कर वह चौंक गए, ‘‘फिर कहां गायब हो सकती हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि आप दोनों के बीच झगड़ा हुआ हो और वह नाराज हो कर घर छोड़ कर चली गई हों?’’

‘‘नहीं साहब, हमारे बीच कोई झगड़ा नहीं हुआ.’’ कावला अनाथैया दोनों हाथ जोड़ बोला, ‘‘कह रही थी काम से जा रही हूं शाम तक लौट आऊंगी. शाम होने के बाद भी जब घर नहीं लौटी तो चिंता हुई. मैं ने अपनी जानपहचान वालों के वहां फोन कर के पता किया लेकिन वह कहीं नहीं मिली.’’

‘‘ठीक है, एक एप्लीकेशन लिख कर दे दीजिए. उन्हें खोजने की हरसंभव कोशिश करेंगे.’’

‘‘ठीक है, साहब. मैं अभी लिख कर देता हूं.’’ उस के बाद कावला अनाथैया कक्ष से बाहर निकला और एक तहरीर थानाप्रभारी रेड्डी को दे दी. इंसपेक्टर राजशेखर रेड्डी ने गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर के जांचपड़ताल शुरू कर दी. यह बात पहली जनवरी, 2021 की थी. पुलिस बैंकटम्मा की तलाश में जुट गई थी. 3 दिनों की तलाश के बाद भी बैंकटम्मा का कहीं पता नहीं चला तो पुलिस ने जिले के सभी थानों में उस की गुमशुदगी के पोस्टर चस्पा करा दिए और पता बताने वाले को उचित ईनाम देने की घोषणा भी की. बात 4 जनवरी, 2021 की है. इसी जिले के घाटकेसर थानाक्षेत्र के अंकुशपुर गांव के निकट रेलवे ट्रैक के पास एक 50 वर्षीय महिला की लाश पाई गई. लाश की सूचना पा कर घाटकेसर पुलिस मौके पर पहुंच गई और आवश्यक काररवाई में जुट गई.

महिला के शरीर पर किसी प्रकार का कोई चोट का निशान नहीं था. लाश की पुलिस ने सूक्ष्मता से पड़ताल की तो उस के गले पर किसी चौड़े चीज से गला घोंट कर हत्या किए जाने का प्रमाण मिला था. यह देख कर पुलिस दंग रह गई थी. दरअसल, 25 दिन पहले 10 दिसंबर, 2020 को साइबराबाद थानाक्षेत्र के बालानगर के एक कैंपस के पास 40-45 साल की एक महिला की लाश पाई गई थी. हत्यारे ने उस महिला की भी इसी तरह गला घोंट कर हत्या की थी और उस की लाश सुनसान कैंपस में फेंककर फरार हो गया था. दोनों महिलाओं की हत्या करने का तरीका एक जैसा था. लाश को देख कर यही अनुमान लगाया जा रहा था कि दोनों महिलाओं का हत्यारा एक ही है.

बहरहाल, पुलिस यही मान कर चल रही थी कि हत्यारे ने महिला की हत्या कहीं और कर के लाश छिपाने के लिए यहां फेंक दी होगी. चूंकि जुबली हिल्स पुलिस ने कावला अनाथैया की पत्नी कमला बैंकटम्मा की गुमशुदगी के पोस्टर जिले के सभी थानों में चस्पा कराए थे. उस पोस्टर वाली महिला की तसवीर से काफी हद तक इस महिला का चेहरा मिल रहा था तो साइबराबाद पुलिस ने जुबली हिल्स पुलिस को फोन कर के मौके पर बुला लिया, ताकि लाश की शिनाख्त आसानी से कराई जा सके. सूचना मिलने के कुछ ही देर बाद जुबली हिल्स पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. लाश की पहचान के लिए पुलिस अपने साथ कावला अनाथैया को भी साथ लेती आई थी.

लाश देखते ही कावला अनाथैया की चीख निकल गई. उन्होंने उस लाश की पहचान अपनी पत्नी कमला बैंकटम्मा के रूप में की. लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेजवा दिया और गुमशुदगी को हत्या की धारा 302 में तरमीम कर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत कर लिया. कमला बैंकटम्मा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट अगले दिन यानी 5 जनवरी, 2021 को आ गई थी. रिपोर्ट पढ़ कर इंसपेक्टर राजशेखर रेड्डी चौंक गए थे. रिपोर्ट में बैंकटम्मा की मौत का कारण दम घुटना बताया गया. इस के अलावा उन के साथ दुष्कर्म होने का उल्लेख भी किया गया था. घटना से 25 दिनों पहले बालानगर क्षेत्र में पाई गई महिला के साथ भी हत्यारे ने दुष्कर्म किया था.

दोनों हत्याओं में काफी समानताएं पाई गई थीं. जांचपड़ताल से पुलिस ने पाया कि दोनों हत्याएं एक ही हत्यारे ने की थीं. इस घटना ने तकरीबन 7-8 साल पुरानी घटना की यादें ताजा कर दी थीं. उस समय हैदराबाद के विभिन्न इलाकों में ऐसी ही महिलाओं की लाशें पाई जा रही थीं, जिस में हत्यारा महिला के साथ दुष्कर्म करने के बाद उस की गला घोंट कर हत्या कर देता था. काफी खोजबीन के बाद पुलिस ने उस सिरफिरे हत्यारे को ढूंढ निकाला था. उस किलर का नाम माइना रामुलु के रूप में सामने आया था, जो संगारेड्डी जिले के बोरामंडा इलाके के कंडी मंडल का रहने वाला था. कई सालों तक जेल में बंद रहने के बाद वह हैदराबाद हाईकोर्ट से साल 2018 में जमानत पर रिहा हुआ था. उस के बाद वह भूमिगत हो गया था.

पिछली घटनाओं की कडि़यों को पुलिस ने इन घटनाओं से जोड़ कर देखा तो आईने की तरह तसवीर साफ हो गई. सभी हत्याओं की कडि़यां चीखचीख कर कह रही थीं कि सिरफिरा हत्यारा माइना रामुलु ही इन हत्याओं को अंजाम दे रहा है. पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार ने हैदराबाद टास्क फोर्स, जुबली हिल्स पुलिस और घाटकेसर पुलिस को खूंखार किलर माइना रामुलु को गिरफ्तार करने के लिए लगा दिया. पुलिस की तीनों टीमें दिनरात रामुलु के ठिकानों पर छापा मार रही थीं, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चल रहा था. आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई. 22 दिनों बाद यानी 26 जनवरी, 2021 को पुलिस खूंखार सीरियल किलर माइना रामुलु को जुबली हिल्स इलाके से गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई.

माइना रामुलु को गिरफ्तार कर के पुलिस टीम जुबली हिल्स थाने ले आई. इंसपेक्टर राजशेखर रेड्डी ने इस की सूचना पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार को दे दी. महिलाओं के दुश्मन सिरफिरे कातिल माइना रामुलु की गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही सीपी अंजनी कुमार पूछताछ करने थाने पहुंच गए थे. पुलिस अधिकारियों ने हत्यारे रामुलु से 3-4 घंटों तक कड़ाई से पूछताछ की. चूंकि रामुलु पहले भी ऐसे ही कई मामलों में पकड़ा जा चुका था, इसलिए वह सच बताने में ही अपनी भलाई समझता था. सो उस ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कबूल कर लिया कि उसी ने कमला बैंकटम्मा की हत्या की थी. हत्या करने के बाद उस की ज्वैलरी लूट ली थी. फिर उस ने सिलसिलेवार पूरी कहानी पुलिस अधिकारियों को बता दी.

अगले दिन 27 जनवरी को पुलिस कमिश्नर अंजनी कुमार ने पुलिस लाइंस में प्रैस कौन्फ्रैंस आयोजित की. पत्रकारों को जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि माइना रामुलु एक सीरियल किलर है. इस ने बोवेनपल्ली, चंदा नगर और डंडीगल थानाक्षेत्र में सर्वाधिक हत्याएं की थीं. उस पर विभिन्न मामलों के कुल 21 मुकदमे दर्ज हैं, जिन में 16 मामले महिलाओं की हत्याओं के और 4 चोरियों के हैं. वह कई बार जेल की हवा खा चुका है. हत्या के एक मामले में उसे आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई जा चुकी है. साल 2018 में जेल से जमानत पर रिहा होने के बाद से वह फरार हो गया था. फरारी के दौरान इस ने 2 और महिलाओं को अपने नापाक इरादों का शिकार बना लिया और बड़ी बेरहमी से उन का कत्ल कर डाला.

घंटों चली वार्ता के दौरान पत्रकारों के सामने सीपी अंजनी कुमार ने किलर रामुलु की करतूतों की कुंडली खोलते रहे. उस के बाद पुलिस ने हत्यारोपी को अदालत में पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया. पुलिस पूछताछ में 18 महिलाओं के कातिल माइना रामुलु ने दिल दहलाने वाला जो बयान दिया था, उसे सुन कर सभी पुलिस अधिकारियों के रोंगटे खड़े हो गए थे. नफरत की आग में जलते हुए माइना रामुलु एक गुनाह की दास्तान 18 बेगुनाह महिलाओं के खून से लिखेगा, किसी ने सोचा भी न था. आखिर उस के दिल में दबी नफरत की कौन सी चिंगारी सुलग रही थी, जिस में वह आहिस्ताआहिस्ता जल रहा था? आइए पढ़ते हैं यह कहानी.

45 वर्षीय माइना रामुलु मूलरूप से संगारेड्डी जिले के बोरामंडा इलाके के कंडी मंडल के रहने वाले चंद्रियाय का बेटा था. चंद्रियाय के 4 बेटों में माइना रामुलु सब से बड़ा था. 6 सदस्यीय परिवार में चंद्रियाय इकलौते कमाने वाले थे. उन की कमाई इतनी नहीं थी कि परिवार की जीविका चलाने के बाद उन्हें बेहतर जिंदगी दे सके. बड़े होने के नाते यह बात रामुलु समझता था. रामुलु गरीबी की चादर ओढ़तेओढ़ते ऊब चुका था. वह मुफलिसी वाली जिंदगी नहीं, बल्कि रईसजादों वाली ठाठबाट की जिंदगी जीना चाहता था. सड़कों पर चमचमाती कार देख कर उस का भी मन होता था कि वह भी ऐसी ही कार में आराम से घूमेफिरे. ऐश की जिंदगी जिए.

इन सब के लिए ढेर सारे पैसों की जरूरत होती है, वह पैसा न तो उस के पास था और न ही उस के मांबाप के पास. लिहाजा वह अपना मन मसोस कर रह जाता था. धीरेधीरे माइना रामुलु जवानी की दहलीज पर कदम रखता जा रहा था. 21 साल का हुआ तो उस के मांबाप ने यह सोच कर बेटे की गृहस्थी बसा दी कि जिम्मेदारी जब सिर पर पड़ेगी तो कमाने लगेगा. लेकिन हुआ इस का उल्टा. माइना रामुलु के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी. रामुलु की पत्नी रेखा उस से 4 कदम आगे निकली. आंखों में जो रईसी का ख्वाब लिए ससुराल की दहलीज पर उतरी थी, उस का ख्वाब धरा का धरा रह गया. उस के अरमानों का महल रेत की तरह भरभराकर ढह गया था. आंसू आंखों से सूखने का नाम नहीं ले रहे थे.

रेखा की आंखों से निकले आंसुओं से रामुलु के घर की खुशियां बह गई थीं. आए दिन घर में कलह होती थी. रामुलु के मांबाप नई बहू के व्यवहार से परेशान थे. हर घड़ी वे यही सोचते रहते थे कि इस से अच्छा तो कुंवारा ही था. कम से कम बहू के रूप में यह मुसीबत तो नहीं आती, जो दिनरात का चैन छीन चुकी है. चंद्रियाय के घर से मुसीबत जाने का नाम ही नहीं ले रही थी. जैसेतैसे रामुलु की शादी का एक साल बीता. एक दिन अचानक रामुलु की पत्नी रेखा ससुराल पक्ष के एक परिचित के साथ भाग गई. घर से बहू के भाग जाने से पूरे गांव में रामुलु और उस के घर वालों की बड़ी बदनामी हुई. इस बदनामी को रामुलु के पिता सहन नहीं कर पाए और दिल का दौरा पड़ने से उन की मृत्यु हो गई.

पिता की मौत से रामुलु को गहरा झटका लगा. वह सोचता था कि उसी की वजह से पिता की मौत हुई थी. वह अपने आप को हर घड़ी कोसता रहता. उसी समय उस के दिल में औरत से घृणा हो गई. यह बात साल 2000 के करीब की है. पत्नी की बेवफाई से रामुलु अंदर तक टूट गया था. भले ही पत्नी से उस की पटती नहीं थी, लेकिन उसे दिल की गहराइयों से प्यार करता था. उस की खुशियों का खयाल रखता था. सपने में भी उस ने नहीं सोचा था कि उस की पत्नी इस तरह उस के प्यार को ठोकर मार कर पराए मर्द के साथ भाग जाएगी. उस का चेहरा आंखों के सामने आते ही क्रोध से पागल हो जाता था. गुस्से की ज्वाला में जलते रामुलु ने कसम खा ली कि जिस तरह उस की पत्नी उसे ठुकरा कर पराए मर्द के साथ भाग गई है, उसी तरह उस के किए की सजा हर औरत को भुगतनी होगी.

उसी दिन से माइला रामुलु के दिल में औरतों के लिए नफरत की विषबेल पनप गई. बदनामी की तपिश में जलता हुआ माइला रामुलु धीरेधीरे ताड़ी और शराब का आदी बन गया. हर समय वह शराब और ताड़ी के नशे में डूबा रहता. बात 2003 की है. रामुलु कच्ची दारू पीने तुरपान इलाके में गया. वहां उस की मुलाकात दामिनी से हुई. दामिनी दारू भट्ठी पर काम करती थी. उसे देखते ही रामुलु के जिस्म में वासना के कीड़े कुलबुलाने लगे. वह रोज ही दारू पीने दामिनी की भट्ठी पर आया करता था. धीरेधीरे उस ने दामिनी को अपने प्यार के जाल में फंसा लिया. एक दिन धोखे से वह दामिनी को जंगल में ले गया. वहां उस के साथ मुंह काला किया और उस की साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश वहीं छोड़ कर फरार हो गया.

इस के बाद तो माइना रामुलु के जुर्म के रास्ते खुल गए. वह किसी औरत को अपना शिकार बनाता तो उस समय उस के शरीर पर जो भी गहने होते, उन्हें भी लूट लेता. साल 2003 से 2009 तक हैदराबाद के विभिन्न थानाक्षेत्रों तुरपान, रायदुर्गम, संगारेड्डी, डुंडीगल, नरसापुर, साइबराबाद और कोकाटपल्ली में करीब 7 औरतों की हत्या कर के पुलिस को उस ने सकते में डाल दिया था. सातों महिलाओं की एक ही तरीके से साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर हत्या की गई थी. पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि हत्यारा कोई एक है और वह भी सिरफिरा, जो सिर्फ महिलाओं को ही अपना शिकार बनाता है. पुलिस ने पहली बार नरसंगी और कोकटपल्ली इलाकों में सन 2009 में हुई अलगअलग जगहों पर हुई हत्याओं को गंभीरता से लिया था.

कोकाटपल्ली के इंसपेक्टर राधाकृष्ण राव ने अपने 3 काबिल सिपाहियों की मदद से 20-25 दिनों की कड़ी मेहनत से हत्या की कड़ी सुलझा ली थी और आरोपी माइना रामुलु को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पुलिस ने पहली बार शातिर माइना रामुलु के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की थी. 2 साल बाद 2011 के फरवरी में अदालत ने आरोपी माइना रामुलु को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई. साथ ही 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने के आदेश दिए थे. जुरमाना न भरने की दशा में 6 महीने की अतिरिक्त सजा भी सुनाई. कुछ दिनों तक तो शातिर माइना रामुलु सलाखों के पीछे कैद रहा. इसी दौरान उस ने पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे बिताने से बचने के लिए फिल्मी अंदाज में एक बेहद शार्प योजना बनाई.

उस ने मानसिक रोगी की तरह कैदियों से व्यवहार करना शुरू कर दिया. जुर्म की दुनिया के माहिर खिलाड़ी रामुलु ने ऐसा अभिनय किया कि लोगों को लगा कि वह वाकई में बीमार है. इस के बाद उसे जेल से निकाल कर एर्रागड्डा मेंटल हास्पिटल में भरती करा दिया गया. यह नवंबर, 2011 की बात है. एक महीने तक वहां रहने के बाद माइना रामुलु 30 दिसंबर, 2011 की रात पुलिस को चकमा दे कर अस्पताल से भाग गया. यही नहीं, अपने साथ वह 5 अन्य कैदियों को भी भगा ले गया, जो मानसिक बीमारी का इलाज करा रहे थे. उस के दुस्साहसिक कारनामों से पुलिस महकमे के होश उड़ गए. इस सिलसिले में एसआर नगर पुलिस स्टेशन में माइना रामुलु के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.

पुलिस कस्टडी से फरार रामुलु फिर अपने शिकार में जुट गया था. सन 2012 में चंदानगर में 2 और 2013 में बोवेनपल्ली के डुंडीगल में 3 महिलाओं की हत्याएं कीं. पांचों महिलाओं की हत्याएं एक ही तरीके साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर की गई थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में महिलाओं की हत्या से पहले दुष्कर्म किए जाने की बात भी सामने आई थी. पुलिस जांच में महिलाओं की हत्या एक ही तरीके से की गई थी. यह तरीका शातिर किलर माइना रामुलु का था. पुलिस को समझते देर न लगी कि इन हत्याओं के पीछे माइना रामुलु का हाथ है. पुलिस ने इन हत्याआें पर फिर से ध्यान देना शुरू किया. आखिरकार 13 मई, 2013 में बोवेनपल्ली पुलिस रामुलु को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई.

जुर्म के साथसाथ सचमुच माइना रामुलु कानून का एक माहिर खिलाड़ी था. उस के पास एक अच्छा वकील था या फिर उस के सिर पर किसी और ताकतवर व्यक्ति का हाथ, यह बात पुलिस के लिए भी पहेली बनी हुई है. 5 साल बाद उस ने 2018 में तेलंगाना हाईकोर्ट में अपनी सजा कम कराने के संबंध में अपील की. वह अपनी सजा को कम करवाने में कामयाब रहा. 2018 के अक्तूबर में माइना रामुलु के पक्ष में फैसला आया और उसे जेल से रिहा कर दिया गया. एक बार फिर उस ने कानून के मुंह पर तमाचा मार दिया था. जेल से रिहा होने के बाद रामुलु कुछ दिन शांत रहा और पत्थर काटने का काम करने लगा, ताकि लोगों को यकीन हो जाए कि वह सुधर गया है. यह उस का एक छलावा था. काम करना तो एक बहाना था, इस के पीछे उस की मंशा शिकार की तलाश करना था.

यह शिकार उसे यूसुफगुडा निवासी 50 वर्षीया कमला बैंकटम्मा के रूप में मिली. बैकटम्मा से रामुलु की मुलाकात दिसंबर, 2020 में एक शराब की भट्ठी पर हुई थी. सम्मोहन कला से उस ने बैंकटम्मा को अपनी ओर खींच लिया था. बस शिकार को अंतिम रूप देना शेष था. 30 दिसंबर, 2020 की शाम थी. यूसुफगुडा के अहाते में कुछ लोग ताड़ी पी रहे थे. बैंकटम्मा और रामुलु ने भी ताड़ी पी. दोनों पर जब हलका सुरूर चढ़ा तो रामुलु के जिस्म में वासना की आग धधक उठी और वह बैंकटम्मा को अपनी आगोश में लेने के लिए बेताब हो उठा. लेकिन वहां लोग थे, इसलिए वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ. इस बीच सूरज डूबने लगा था और रात की काली चादर फैला चुकी थी. रामुलु बैंकटम्मा को ले कर कंपाउंड से बाहर निकल गया.

वे दोनों शहर के बाहरी इलाके में किसी सुनसान जगह की तलाश में चल पड़े. यूसुफगुडा से ये दोनों घाटकेश्वर इलाके के अंकुशापुर पहुंचे. यह एक सुनसान जगह थी. दोनों ने यहां पहुंच कर थोड़ी और ताड़ी पी. इस के बाद रामुलु पूरी तरह बहक गया और बैंकटम्मा को अपनी हवस का शिकार बना डाला. फिर उस की साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी और लाश रेलवे लाइन के पास ठिकाने लगा कर फरार हो गया. हैदराबाद की तेजतर्रार पुलिस शातिर माइना रामुलु को वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर गिरफ्तार करने में कामयाब हो ही गई. शातिर दिमाग वाला माइना रामुलु शायद यह भूल गया था कि उसे जनम देने वाली भी तो एक औरत ही है.

अगर उस की पत्नी ने उस के साथ धोखा किया था, तो सजा उसे मिलनी चाहिए थी न कि बेकसूर उन 18 महिलाओं को, जिन का न तो कोई दोष था और न ही उन्होंने उस का कोई अहित किया था. रामुलु ने जो किया उस के किए की सजा सलाखों के पीछे काट रहा है. समाज के ऐसे दरिंदों की यही सजा होनी चाहिए. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था. Real Crime Story in Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Social Crime News : रसूखदार कानूनगो की पोर्न स्टोरी

Social Crime News : रिटायर्ड कानूनगो और नेता रामबिहारी राठौर अय्याश प्रवृत्ति का था. वह नाबालिग बच्चों के साथ न सिर्फ कुकर्म करता था बल्कि वीडियो भी बना लेता था. फिर एक दिन ऐसा हुआ कि…

10 जनवरी, 2021 की सुबह 9 बजे रिटायर्ड लेखपाल रामबिहारी राठौर कोतवाली कोंच पहुंचा. उस समय कोतवाल इमरान खान कोतवाली में मौजूद थे. चूंकि इमरान खान रामबिहारी से अच्छी तरह परिचित थे. इसलिए उन्होंने उसे ससम्मान कुरसी पर बैठने का इशारा किया. फिर पूछा, ‘‘लेखपालजी, सुबहसुबह कैसे आना हुआ? कोई जरूरी काम है?’’

‘‘हां सर, जरूरी काम है, तभी थाने आया हूं.’’ रामबिहारी राठौर ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर बताओ, क्या जरूरी काम है?’’ श्री खान ने पूछा.

‘‘सर, हमारे घर में चोरी हो गई है. एक पेन ड्राइव और एक हार्ड डिस्क चोर ले गए हैं. हार्ड डिस्क के कवर में 20 हजार रुपए भी थे. वह भी चोर ले गए हैं.’’ रामबिहारी ने जानकारी दी.

‘‘तुम्हारे घर किस ने चोरी की. क्या किसी पर कोई शक वगैरह है?’’ इंसपेक्टर खान ने पूछा.

‘‘हां सर, शक नहीं बल्कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानतापहचानता हूं. वैसे भी चोरी करते समय उन की सारी करतूत कमरे में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद है. आप चल कर फुटेज में देख लीजिए.’’

‘‘लेखपालजी, जब आप चोरी करने वालों को अच्छी तरह से जानतेपहचानते हैं और सबूत के तौर पर आप के पास फुटेज भी है, तो आप उन का नामपता बताइए. हम उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लेंगे और चोरी गया सामान भी बरामद कर लेंगे.’’

‘‘सर, उन का नाम राजकुमार प्रजापति तथा बालकिशन प्रजापति है. दोनों युवक कोंच शहर के मोहल्ला भगत सिंह नगर में रहते हैं. दोनों को दबंगों का संरक्षण प्राप्त है.’’ रामबिहारी ने बताया. चूंकि रामबिहारी राठौर पूर्व में लेखपाल तथा वर्तमान में कोंच नगर का भाजपा उपाध्यक्ष था, अत: इंसपेक्टर इमरान खान ने रामबिहारी से तहरीर ले कर तुरंत काररवाई शुरू कर दी. उन्होंने देर रात राजकुमार व बालकिशन के घरों पर दबिश दी और दोनों को हिरासत में ले लिया. उन के घर से पुलिस ने पेन ड्राइव व हार्ड डिस्क भी बरामद कर ली. लेखपाल के अनुरोध पर पुलिस ने उस की पेन ड्राइव व हार्ड डिस्क वापस कर दी.

पुलिस ने दोनों युवकों के पास से पेन ड्राइव व हार्ड डिस्क तो बरामद कर ली थी. लेकिन 20 हजार रुपया बरामद नहीं हुआ था. इंसपेक्टर खान ने राजकुमार व बालकिशन से रुपयों के संबंध में कड़ाई से पूछा तो उन्होंने बताया कि रुपया नहीं था. लेखपाल रुपयों की बाबत झूठ बोल रहा है. वह बड़ा ही धूर्त और मक्कार इंसान है. इंसपेक्टर इमरान खान ने जब चोरी के बाबत पूछताछ शुरू की तो दोनों युवक फफक पड़े. उन्होंने सिसकते हुए अपना दर्द बयां किया तो थानाप्रभारी के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. बालकिशन व राजकुमार प्रजापति ने बताया कि रामबिहारी इंसान नहीं हैवान है. वह मासूमों को अपने जाल में फंसाता है और फिर उन के साथ कुकर्म करता है.

एक बार जो उस के जाल में फंस जाता है, फिर निकल नहीं पाता. वह उन के साथ कुकर्म का वीडियो बना लेता फिर ब्लैकमेल कर बारबार आने को मजबूर करता. 8 से 14 साल के बीच की उम्र के बच्चों को वह अपना शिकार बनाता है. गरीब परिवार की महिलाओं, किशोरियों और युवतियों को भी वह अपना शिकार बनाता है. राजकुमार व बालकिशन प्रजापति ने बताया कि रामबिहारी राठौर पिछले 5 सालों से उन दोनों के साथ भी घिनौना खेल खेल रहा था. उन दोनों ने बताया कि जब उन की उम्र 13 साल थी, तब वे जीवनयापन करने के लिए ठेले पर रख कर खाद्य सामग्री बेचते थे.

एक दिन जब वे दोनों सामान बेच कर घर आ रहे थे, तब लेखपाल रामबिहारी राठौर ने उन दोनों को रोक कर अपनी मीठीमीठी बातों में फंसाया. फिर वह उन्हें अपने घर में ले गया और दरवाजा बंद कर लिया. फिर बहाने से कोल्डड्रिंक में नशीला पदार्थ मिला कर पिला दिया. उस के बाद उस ने उन दोनों के साथ कुकर्म किया. बाद में उन्होंने विरोध करने पर फरजी मुकदमे में फंसा देने की धमकी दी. कुछ दिन बाद जब वे दोनों ठेला ले कर जा रहे थे तो नेता ने उन्हें पुन: बुलाया और कमरे में लैपटाप पर वीडियो दिखाई, जिस में वह उन के साथ कुकर्म कर रहा था.

इस के बाद उन्होंने कहा कि मेरे कमरे में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं और मैं ने तुम दोनों का वीडियो सुरक्षित रखा है. यदि तुम लोग मेरे बुलाने पर नहीं आए तो यह वीडियो सोशल मीडिया पर डाल दूंगा. इस के बाद नेताजी ने कुछ और वीडियो दिखाए और कहा कि तुम सब के वीडियो हैं. यदि मेरे खिलाफ किसी भी प्रकार की शिकायत की, मैं उलटा मुकदमा कायम करा दूंगा. युवकों ने बताया कि डर के कारण उन्होंने मुंह बंद रखा. लेकिन नेताजी का शोषण जारी रहा. हम दोनों जैसे दरजनों बच्चे हैं, जिन के साथ वह घिनौना खेल खेलता है.

उन दोनों ने पुलिस को यह भी बताया कि 7 जनवरी, 2021 को नेता ने उन्हें घर बुलाया था, लेकिन वे नहीं गए. अगले दिन फिर बुलाया. जब वे दोनों घर पहुंचे तो नेता ने जबरदस्ती करने की कोशिश की. विरोध जताया तो उन्होंने जेल भिजवाने की धमकी दी. इस पर उन्होंने मोहल्ले के दबंग लोगों से संपर्क किया, फिर नेता रामबिहारी का घिनौना सच सामने लाने के लिए दबंगों के इशारे पर रामबिहारी की पेन ड्राइव व हार्ड डिस्क उस के कमरे से उठा ली. यह दबंग, रामबिहारी को ब्लैकमेल कर उस से लाखों रुपया वसूलना चाहते थे. पूर्व लेखपाल व भाजपा नेता रामबिहारी का घिनौना सच सामने आया तो इंसपेक्टर इमरान खान के मन में कई आशंकाएं उमड़ने लगीं.

वह सोचने लगे, कहीं रामबिहारी बांदा के इंजीनियर रामभवन की तरह पोर्न फिल्मों का व्यापारी तो नहीं है. कहीं रामबिहारी के संबंध देशविदेश के पोर्न निर्माताओं से तो नहीं. इस सच को जानने के लिए रामबिहारी को गिरफ्तार करना आवश्यक था. लेकिन रामबिहारी को गिरफ्तार करना आसान नहीं था. वह सत्ता पक्ष का नेता था और सत्ता पक्ष के बड़े नेताओं से उस के ताल्लुकात थे. उस की गिरफ्तारी से बवाल भी हो सकता था. अत: इंसपेक्टर खान ने इस प्रकरण की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. सूचना पाते ही एसपी डा. यशवीर सिंह, एएसपी डा. अवधेश कुमार, डीएसपी (कोंच) राहुल पांडेय तथा क्राइम प्रभारी उदयभान गौतम कोतवाली कोंच आ गए.

पुलिस अधिकारियों ने दोनों युवकों राजकुमार तथा बालकिशन से घंटों पूछताछ की फिर सफेदपोश नेता को गिरफ्तार करने के लिए डा. यशवीर सिंह ने डीएसपी राहुल पांडेय की निगरानी में एक पुलिस टीम का गठन कर दिया तथा कोंच कस्बे में पुलिस बल तैनात कर दिया. 12 जनवरी, 2021 की रात 10 बजे पुलिस टीम रामबिहारी के भगत सिंह नगर मोहल्ला स्थित घर पर पहुंची. लेकिन वह घर से फरार था. इस बीच पुलिस टीम को पता चला कि रामबिहारी पंचानन चौराहे पर मौजूद है. इस जानकारी पर पुलिस टीम वहां पहुंची और रामबिहारी को नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया.

उसे कोतवाली कोंच लाया गया. इस के बाद पुलिस टीम रात में ही रामबिहारी के घर पहुंची और पूरे घर की सघन तलाशी ली. तलाशी में उस के घर से लैपटाप, पेन ड्राइव, मोबाइल फोन, डीवीआर, एक्सटर्नल हार्ड डिस्क तथा नशीला पाउडर व गोलियां बरामद कीं. थाने में रामबिहारी से कई घंटे पूछताछ की गई. रामबिहारी राठौर के घर से बरामद लैपटाप, पेन ड्राइव, मोबाइल, डीवीआर तथा हार्ड डिस्क की जांच साइबर एक्सपर्ट टीम तथा झांसी की फोरैंसिक टीम को सौंपी गई. टीम ने झांसी रेंज के आईजी सुभाष सिंह बघेल की निगरानी में जांच शुरू की तो चौंकाने वाली जानकारी मिली. फोरैंसिक टीम के प्रभारी शिवशंकर ने पेन ड्राइव व हार्ड डिस्क से 50 से अधिक पोर्न वीडियो निकाले. उन का अनुमान है कि हार्ड डिस्क में 25 जीबी अश्लील डाटा है.

इधर पुलिस टीम ने लगभग 50 बच्चों को खोज निकाला, जिन के साथ रामबिहारी ने दरिंदगी की और उन के बचपन के साथ खिलवाड़ किया. इन में 36 बच्चे तो सामने आए, लेकिन बाकी बच्चे शर्म की वजह से सामने नहीं आए. 36 बच्चों में से 18 बच्चों ने ही बयान दर्ज कराए. जबकि 3 बच्चों ने बाकायदा रामबिहारी के विरुद्ध तहरीर दी. इन बच्चों की तहरीर पर थानाप्रभारी इमरान खान ने भादंवि की धारा 328/377/506 तथा पोक्सो एक्ट की धारा (3), (4) एवं आईटी एक्ट की धारा 67ख के तहत रामबिहारी राठौर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा उसे न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया. भाजपा नेता रामबिहारी के घिनौने सच का परदाफाश हुआ तो कोंच कस्बे में सनसनी फैल गई.

लोग तरहतरह की चर्चाएं करने लगे. किरकिरी से बचने के लिए नगर अध्यक्ष सुनील लोहिया ने बयान जारी कर दिया कि भाजपा का रामबिहारी से कोई लेनादेना नहीं है. रामबिहारी ने पिछले महीने ही अपने पद व प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था, जिसे मंजूर कर लिया गया था. इधर सेवानिवृत्त लेखपाल एवं उस की घिनौनी करतूतों की खबर अखबारों में छपी तो कोंच कस्बे में लोगों का गुस्सा फट पड़ा. महिलाओं और पुरुषों ने लेखपाल का घर घेर लिया और इस हैवान को फांसी दो के नारे लगाने लगे. भीड़ रामबिहारी का घर तोड़ने व फूंकने पर आमादा हो गई. कुछ लोग उस के घर की छत पर भी चढ़ गए.

लेकिन पुलिस ने किसी तरह घेरा बना कर भीड़ को रोका और समझाबुझा कर शांत किया. कुछ महिलाएं व पुरुष कोतवाली पहुंच गए. उन्होंने रामबिहारी को उन के हवाले करने की मांग की. दरअसल, वे महिलाएं हाथ में स्याही लिए थीं, वे रामबिहारी का मुंह काला करना चाहती थी. लेकिन एसपी डा. यशवीर सिंह ने उन्हें समझाया कि अपराधी अब पुलिस कस्टडी में है. अत: कानून का उल्लंघन न करें. कानून खुद उसे सजा देगा. कड़ी मशक्कत के बाद महिलाओं ने एसपी की बात मान ली और वे थाने से चली गईं. रामबिहारी राठौर कौन था? वह रसूखदार सफेदपोश नेता कैसे बना? फिर इंसान से हैवान क्यों बन गया? यह सब जानने के लिए हमें उस के अतीत की ओर झांकना होगा.

जालौन जिले का एक कस्बा है-कोंच. तहसील होने के कारण कोंच कस्बे में हर रोज चहलपहल रहती है. इसी कस्बे के मोहल्ला भगत सिंह नगर में रामबिहारी राठौर अपनी पत्नी उषा के साथ रहता था. रामबिहारी का अपना पुश्तैनी मकान था, जिस के एक भाग में वह स्वयं रहता था, जबकि दूसरे भाग में उस का छोटा भाई श्यामबिहारी अपनी पत्नी व बच्चों के साथ रहता था. रामबिहारी पढ़ालिखा व्यक्ति था. वर्ष 1982 में उस का चयन लेखपाल के पद पर हुआ था. कोंच तहसील में ही वह कार्यरत था. रामबिहारी महत्त्वाकांक्षी था. धन कमाना ही उस का मकसद था. चूंकि वह लेखपाल था, सो उस की कमाई अच्छी थी. लेकिन संतानहीन था. उस ने पत्नी उषा का इलाज तो कराया लेकिन वह बाप न बन सका.

उषा संतानहीन थी, सो रामबिहारी का मन उस से उचट गया और वह पराई औरतों में दिलचस्पी लेने लगा. उस के पास गरीब परिवार की महिलाएं राशन कार्ड बनवाने व अन्य आर्थिक मदद हेतु आती थीं. ऐसी महिलाओं का वह मदद के नाम पर शारीरिक शोषण करता था. वर्ष 2005 में एक महिला ने सब से पहले उस के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. लेकिन रामबिहारी ने उस के घरवालों पर दबाव बना कर मामला रफादफा कर लिया. कोंच तहसील के गांव कुंवरपुरा की कुछ महिलाओं ने भी उस के खिलाफ यौनशोषण की शिकायत तहसील अफसरों से की थी. तब रामबिहारी ने अफसरों से हाथ जोड़ कर तथा माफी मांग कर लीपापोती कर ली.

सन 2017 में रामबिहारी को रिटायर होना था. लेकिन रिटायर होने के पूर्व उस की तरक्की हो गई. वह लेखपाल से कानूनगो बना दिया गया. फिर कानूनगो पद से ही वह रिटायर हुआ. रिटायर होने के बाद वह राजनीति में सक्रिय हो गया. उस ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली. कुछ समय बाद ही उसे कोंच का भाजपा नगर उपाध्यक्ष बना दिया गया. रामबिहारी तेजतर्रार था. उस ने जल्द ही शासनप्रशासन में पकड़ बना ली. उस ने घर पर कार्यालय बना लिया और उपाध्यक्ष का बोर्ड लगा लिया. नेतागिरी की आड़ में वह जायजनाजायज काम करने लगा. वह कोंच का रसूखदार सफेदपोश नेता बन गया.

रामबिहारी का घर में एक स्पैशल रूम था. इस रूम में उस ने 5 सीसीटीवी कैमरे लगवा रखे थे. घर के बाहर भी कैमरा लगा था. कमरे में लैपटाप, डीवीआर व हार्ड डिस्क भी थी. आनेजाने वालों की हर तसवीर कैद होती थी. हनक बनाए रखने के लिए उस ने कार खरीद ली थी और पिस्टल भी ले ली थी. रामबिहारी अवैध कमाई के लिए अपने घर पर जुआ की फड़ भी चलाता था. उस के घर पर छोटामोटा नहीं, लाखों का जुआ होता था. खेलने वाले कोंच से ही नहीं, उरई, कालपी और बांदा तक से आते थे. जुए के खेल में वह अपनी ही मनमानी चलाता था.

जुआ खेलने वाला व्यक्ति अगर जीत गया तो वह उसे तब तक नहीं जाने देता था, जब तक वह हार न जाए. इसी तिकड़म में उस ने सैकड़ों को फंसाया और लाखों रुपए कमाए. इस में से कुछ रकम वह नेता, पुलिस, गुंडा गठजोड़ पर खर्च करता ताकि धंधा चलता रहे. रामबिहारी राठौर जाल बुनने में महारथी था. वह अधिकारियों, कर्मचारियों एवं सामान्य लोगों के सामने अपने रसूख का प्रदर्शन कर के उन्हें दबाव में लेने की कोशिश करता था. बातों का ऐसा जाल बुनता था कि लोग फंस जाते थे. हर दल के नेताओं के बीच उस की घुसपैठ थी. उस के रसूख के आगे पुलिस तंत्र भी नतमस्तक था. किसी पर भी मुकदमा दर्ज करा देना, उस के लिए बेहद आसान था.

रामबिहारी राठौर बेहद अय्याश था. वह गरीब परिवार की महिलाओं, युवतियों, किशोरियों को तो अपनी हवस का शिकार बनाता ही था, मासूम बच्चों के साथ भी दुष्कर्म करता था. वह 8 से 14 साल की उम्र के बच्चों को अपने जाल में फंसाता था. बच्चे को रुपयों का लालच दे कर घर बुलाता फिर कोेल्ड ड्रिंक में नशीला पाउडर मिला कर पीने को देता. बच्चा जब बेहोश हो जाता तो उस के साथ दुष्कर्म करता. दुष्कर्म के दौरान वह उस का वीडियो बना लेता. कोई बच्चा एक बार उस के जाल में फंस जाता, तो वह उसे बारबार बुलाता. इनकार करने पर अश्लील वीडियो वायरल करने की धमकी देता, जिस से वह डर जाता और बुलाने पर आने को मजबूर हो जाता.

वह जिस बच्चे को जाल में फंसा लेता, उसे वह दूसरे बच्चे को लाने के लिए कहता. इस तरह उस ने कई दरजन बच्चे अपने जाल में फंसा लिए थे, जिन के साथ वह दरिंदगी का खेल खेलता था. वह स्वयं भी सेक्सवर्धक दवाओं का सेवन करता था और किसी बाहरी व्यक्ति को अपने कमरे में नहीं आने देता था. रामबिहारी राठौर के घर सुबह से देर शाम तक कम उम्र के बच्चों का आनाजाना बना रहता था. उस के कुकृत्यों का आभास आसपड़ोस के लोगों को भी था. लेकिन लोग उस के बारे में कुछ कहने से सहमते थे. कभी किसी ने अंगुली उठाई तो उस ने अपने रसूख से उन लोगों के मुंह बंद करा दिए.

किसी के खिलाफ थाने में झूठी रिपोर्ट दर्ज करा दी तो किसी को दबंगों से धमकवा दिया. बाद में उस की मदद का ड्रामा कर के उस का दिल जीत लिया. लेकिन कहते हैं, गलत काम का घड़ा तो एक न एक दिन फूटता ही है. वही रामबिहारी के साथ भी हुआ. दरअसल रामबिहारी ने मोहल्ला भगत सिंह नगर के 2 लड़कों राजकुमार व बालकिशन को अपने जाल में फंसा रखा था और पिछले कई साल से वह उन के साथ दरिंदगी का खेल खेल रहा था. इधर रामबिहारी की नजर उन दोनों की नाबालिग बहनों पर पड़ी तो वह उन्हें लाने को मजबूर करने लगा. यह बात उन दोनों को नागवार लगी और उन्होंने साफ मना कर दिया. इस पर रामबिहारी ने उन दोनों का अश्लील वीडियो वायरल करने तथा जेल भिजवाने की धमकी दी.

रामबिहारी की धमकी से डर कर राजकुमार व बालकिशन प्रजापति मोहल्ले के 2 दबंगों के पास पहुंच गए और रामबिहारी के कुकृत्यों का चिट्ठा खोल दिया. उन दबंगों ने तब उन को मदद का आश्वासन दिया और रामबिहारी को ब्लैकमेल करने की योजना बनाई. योजना के तहत दबंगों ने राजकुमार व बालकिशन की मार्फत रामबिहारी के घर में चोरी करा दी. उस के बाद दबंगों ने रामबिहारी से 15 लाख रुपयों की मांग की. भेद खुलने के भय से रामबिहारी उन्हें 5 लाख रुपए देने को राजी भी हो गया. लेकिन पैसों के बंटवारे को ले कर दबंगों व पीडि़तों के बीच झगड़ा हो गया.

इस का फायदा उठा कर रामबिहारी थाने पहुंच गया और चोरी करने वाले दोनों लड़कों के खिलाफ तहरीर दे दी. तहरीर मिलते ही कोंच पुलिस ने चोरी गए सामान सहित उन दोनों लड़कों को पकड़ लिया. पुलिस ने जब पकड़े गए राजकुमार व बालकिशन से पूछताछ की तो रामबिहारी राठौर के घिनौने सच का परदाफाश हो गया. पुलिस जांच में लगभग 300 अश्लील वीडियोे सामने आए हैं और लगभग 50 बच्चों के साथ उस ने दुष्कर्म किया था. जांच से यह भी पता चला कि रामबिहारी पोर्न फिल्मों का व्यापारी नहीं है. न ही उस के किसी पोर्न फिल्म निर्माता से संबंध हैं. रामबिहारी का कनेक्शन बांदा के जेई रामभवन से भी नहीं था.

13 जनवरी, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त रामबिहारी राठौर को जालौन की उरई स्थित कोर्ट में मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रोंं पर आधारित