UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद

 

 

Crime Stories: प्यार में ऐसा तो नहीं होता

Crime Stories: बेडि़या समाज का दंगल सिंह अपनी प्रेमिका शिल्पा को भगा कर उस से शादी करना चाहता था, जबकि शिल्पा का कहना था कि वह समाज के रिवाज के अनुसार ही शादी करेगी. आखिर दोनों की इस लड़ाई का नतीजा क्या निकला महानगर मुंबई से सटे जनपद थाणे के कोपरी गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले गहरे नाले पर बने पुल पर अचानक काफी लोग एकत्र हो गए थे. इस की वजह उस गहरे नाले में पड़ी किसी आदमी के बैडशीट में बंधी एक गठरी थी, जिस में से पैर की अंगुलियां दिखाई दे रही थीं.

साफ था उस गठरी में लाश थी, इसलिए वहां एकत्र लोगों में से किसी ने इस बात की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. पुलिस कंट्रोल रूम ने यह सूचना वायरलैस द्वारा प्रसारित कर दी, इसलिए इस बात की जानकारी सभी पुलिस थानों और पुलिस अधिकारियों को हो गई.

चूंकि घटनास्थल नवी मुंबई के वाशी एपीएमसी थाने के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा मिली सूचना के आधार पर थाना एपीएमसी की सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे ने चार्जरूम में तैनात असिस्टैंट पुलिस इंसपेक्टर डी.डी. चासकर को बुला कर मामले की शिकायत दर्ज कर के शीघ्र घटनास्थल पर पहुंचने का आदेश दिया. डी.डी. चासकर ने तुरंत शिकायत दर्ज की और सहयोगियों को साथ ले कर घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से 3-4 किलोमीटर दूर था, इसलिए थोड़ी ही देर में यह पुलिस टीम घटनास्थल पर पहुंच गई.

घटनास्थल पर पहुंच कर पुलिस टीम ने नाले में पड़ी गठरी को निकलवा कर खोला तो उस में महिला की लाश थी. मृतका 25 साल से ज्यादा की नहीं लगती थी. उस के गले में काले रंग का धागा बंधा था, जिस में एक लौकेट भी पड़ा था. कपड़ों में उस के शरीर पर गुलाबी रंग का सलवारसूट था. हाथों में नए जमाने की अंगूठियां और स्टील की चूडि़यां थीं. शक्लसूरत और पहनावे से वह मध्यमवर्गीय परिवार की कामकाजी महिला लग रही थी. लाश अकड़ चुकी थी. बारीकी से देखा गया तो उस के गले पर हलके रंग का नीला निशान दिखाई दिया. इस तरह नाले में लाश मिलने और गले पर नीला निशान होने से पुलिस को मामला हत्या का लगा.

डी.डी. चासकर घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर के शिनाख्त कराने की कोशिश कर रहे थे, तभी नवी मुंबई के पुलिस कमिश्नर के.एस. प्रसाद, अपर पुलिस कमिश्नर फत्ते सिंह पाटिल, एडिशनल पुलिस कमिश्नर के.एल. शहाजी उपाय, असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर अरुण वालतुरे, सीनियर इंसपेक्टर माया मोरे, इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत, प्रमोद रोमण, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रणव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, प्रैस फोटोग्राफर तथा फिंगरप्रिंट ब्यूरो के सदस्य पहुंच गए.

प्रैस फोटोग्राफर और फिंगरप्रिंट ब्यूरो ने अपना काम निपटा लिया तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद डी.डी. चासकर से अब तक की प्रगति के बारे में पूछा. सारी जानकारी लेने के बाद इंसपेक्टर माया मोरे को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर सभी अधिकारी चले गए. वरिष्ठ अधिकारियों के जाने के बाद माया मोरे ने एक बार फिर लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. लेकिन उस भीड़ में से कोई भी मृतका की पहचान नहीं कर सका. इस से यह बात साफ हो गई कि मृतका वहां आसपास की रहने वाली नहीं थी.

हत्या कहीं और कर के लाश यहां ला कर फेंकी गई थी. जब लाश की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने घटनास्थल की काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए वाशी महानगर पालिका के सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. यह घटना 11 फरवरी, 2015 की सुबह की थी. थाने लौट कर थानाप्रभारी माया मोरे ने हत्याकांड के खुलासे के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से सलाह कर के इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में इंसपेक्टर प्रमोद रोमण, उल्हास कदम, असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रताप राव कदम, डी.डी. चासकर, सिपाही लहू भोसले, परदेशी, नितिन सोनवणे, सुधीर चव्हाण, देव सूर्यवंशी, पंकज पवार, रामफेतले फुड़े और चिकणे को शामिल किया गया.

इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए सब से जरूरी था मृतका की शिनाख्त, जो इस जांच टीम के लिए एक चुनौती थी. जैसा कि ऐसे मामलों में होता है, उसी तरह इस टीम ने भी सभी थानों से पता किया कि कहीं उस हुलिए कि किसी महिला की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. टीम की यह कोशिश बेकार गई, क्योंकि इस तरह की महिला की कहीं किसी थाने में कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. इस कोशिश में असफल होने के बाद पुलिस लाश का फोटो ले कर थाणे के साथसाथ मानपाड़ा, चेंबूर, उल्हासनगर और नवी मुंबई के सभी बीयर बारों और गेस्टहाऊसों में गई कि शायद कहीं कोई उस की पहचान कर दे. इस बार पुलिस टीम को सफलता तो मिल गई, लेकिन पूरी तरह नहीं.

पुलिस को जो जानकारी मिली, उस के अनुसार मृतका बारमेड थी और उस का नाम शिल्पा उर्फ किस्मत था. लेकिन पुलिस को यह पता नहीं चला कि वह रहने वाली कहां की थी? यह पता करने के लिए पुलिस टीम ने अधिकारियों की सलाह पर मृतका शिल्पा उर्फ किस्मत की लाश के फोटो सभी प्रमुख अखबारों में छपवाने के साथसाथ स्थानीय चैनलों पर भी प्रसारित कराए. इस का फायदा यह हुआ कि पुलिस को मृतका के बारे में सारी जानकारी मिल गई, जिस के बाद मामले का खुलासा कर के पुलिस ने हत्यारे को पकड़ लिया.

15 फरवरी, 2015 को राजस्थान के शकरपुरा के रहने वाले शाबीर गुदड़ावत अपनी पत्नी के साथ थाना वाशी एपीएमसी पहुंचे और इंसपेक्टर बालकृष्ण सावंत को बताया कि टीवी चैनलों एवं अखबारों में जिस लाश की फोटो दिखाई गई हैं, वह उन की बेटी शिल्पा उर्फ किस्मत से काफी मिलतीजुलती हैं. उस से उन की कई दिनों से बात भी नहीं हो सकी है. बालकृष्ण सावंत शाबीर गुदड़ावत और उन की पत्नी को वाशी महानगर पालिका के अस्पताल ले गए, जहां शिल्पा उर्फ किस्मत का शव रखा था. जब उन्हें लाश और उस के कपड़े दिखाए गए तो शाबीर जहां सिसक उठे, वहीं उन की पत्नी छाती पीटपीट कर रोने लगीं. बालकृष्ण सावंत ने उन्हें धीरज बंधाया और जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश कब्जे में ले ली.

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद अब पुलिस को हत्यारे की खोज करनी थी. शाबीर गुदड़ावत के अनुसार, शिल्पा की हत्या की सूचना उस की सहेली रिया ने दी थी. वह यहां उस के साथ करीब 4 सालों से रह रही थी. शाबीर गुदड़ावत से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने शिल्पा की सहेली रिया को थाने बुलाया. वह थाणे पश्चिम के लोकमान्य तिलक नगर की चाल नंबर 4 में रहती थी. वह बार में डांस करती थी. शिल्पा से उस की मुलाकात थाणे के रेडबुल बीयर बार में हुई थी. वहां शिल्पा बारमेड का काम करती थी. पहले दोनों  का परिचय हुआ, उस के बाद दोस्ती हुई. दोस्ती गहरी हुई तो दोनों साथसाथ रहने लगीं.

पूछताछ में रिया ने जो बताया, उस के अनुसार, 10 फरवरी, 2015 की रात 8 बजे के करीब शिल्पा यह कह कर घर से निकली थी कि उस के किसी ग्राहक का फोन आया है. वह उस से मिल कर थोड़ी देर में आ जाएगी. लेकिन वह गई तो लौट कर नहीं आई. उस ने उसे फोन किया तो उस का मोबाइल बंद बता रहा था. उस के न आने और मोबाइल बंद होने से वह परेशान हो उठी. वह उस की तलाश करने लगी, लेकिन जब कई दिनों तक उस के बारे में कुछ पता नहीं चला तो वह थाने जा कर उस की गुमशुदगी दर्ज कराने के बारे में सोचने लगी. वह थाने जाती, उस के पहले ही उसे अखबारों और टीवी चैनलों से उस की हत्या की सूचना मिल गई. इस के बाद उस ने इस बात की जानकारी उस के पिता शाबीर गुदड़ावत को दे दी.

जिस तेजी से जांच आगे बढ़ी थी, उसी तेजी से रुक भी गई. क्योंकि पुलिस को जो उम्मीद थी, रिया से वे जानकारियां नहीं मिल सकीं. पुलिस को उम्मीद थी कि रिया से कोई न कोई ऐसी जानकारी मिल जाएगी, जिस के सहारे वह शिल्पा के हत्यारे तक पहुंच जाएगी. मगर ऐसा नहीं हो सका. हत्यारे तक पहुंचने के लिए पुलिस को अभी और पापड़ बेलने की जरूरत थी. जांच आगे बढ़ाने के लिए पुलिस टीम ने एक बार फिर शिल्पा के पिता शाबीर को थाने बुला कर शिल्पा के बारे में एकएक बात बताने को कहा. क्योंकि पुलिस को लग रहा था कि उन से मिली जानकारी में जरूर कोई ऐसा आदमी मिल सकता है, जिस पर संदेह किया जा सके.

और हुआ भी वही. शाबीर गुदड़ावत ने जो बताया, उस के अनुसार शिल्पा का पूर्व पे्रमी और मंगेतर दंगल सिंह संदेह के घेरे में आ गया. दंगल सिंह और शिल्पा के प्यार की एक लंबी कहानी थी, जो घर वालों ने उन के बचपन में ही लिख दी थी. दंगल सिंह की 2 बहनें थीं, जो थाणे में रहती थीं और बारों में डांस करती थीं. वह जब कभी मुबंई आता था, अपनी दोनों बहनों के पास ही रहता था. इसलिए पुलिस को लगा कि उस की बहनों से दंगल सिंह के बारे में जानकारी मिल सकती है. लेकिन जब पुलिस टीम उन के घर पहुंची तो वहां ताला बंद था.

पड़ोसियों से पूछने पर पता चला कि उन के आने के कुछ घंटे पहले ही वे ताला बंद कर के गांव चली गई हैं. उन के इस तरह चले जाने से पुलिस टीम को लगा कि जरूर दाल में कुछ काला है. इस के बाद बालकृष्ण सावंत ने अपनी जांच तेज कर दी. उन्होंने शिल्पा के पिता शाबीर गुदड़ावत से दंगल सिंह के बारे में पूरी जानकारी ले कर असिस्टैंट इंसपेक्टर प्रतापराव कदम, सबइंसपेक्टर उल्हास कदम, सिपाही नितिन सोनवणे, देव सूर्यवंशी, खेतले और लहु भोसले की टीम बना कर दंगल सिंह को गिरफ्तार करने के लिए उस के गांव भेज दिया.

मुंबई पुलिस की यह टीम दंगल सिंह के घर उस की बहनों के पहुंचने से पहले ही पहुंच जाना चाहती थी, क्योंकि पुलिस को जो जानकारी मिली थी, उस के अनुसार दंगल सिंह जिस गांव में रहता था, वह गांव काफी खतरनाक था. वह ऐसा गांव था, जहां स्थानीय पुलिस जाने से घबराती थी. अगर दंगल सिंह को पता चल जाता कि मुंबई पुलिस उसे गिरफ्तार करने गांव आ रही है तो वह बचने के लिए कुछ भी कर सकता था. मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ. स्थानीय पुलिस का सहयोग न मिलने के बावजूद मुंबई पुलिस ने अपनी सूझबूझ से दंगल सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद पुलिस ने दंगल सिंह से मिली जानकारी के आधार पर उस की दोनों बहनों को झांसी के बसअड्डे से गिरफ्तार किया और सभी को ले कर नवी मुंबई आ गई.

पूछताछ में दंगल सिंह ने तो शिल्पा की हत्या का जुर्म स्वीकार कर ही लिया. उस की दोनों बहनों ने भी स्वीकार कर लिया कि उन्हें शिल्पा की हत्या की जानकारी हो गई थी. डर की वजह से वे इस बात की सूचना पुलिस को देने के बजाय घर में ताला बंद कर के गांव के लिए रवाना हो गई थीं. क्योंकि उन्हें आशंका हो गई थी कि पुलिस उन के यहां कभी भी पहुंच सकती थी. इस पूछताछ में शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

बेडि़या समाज का 29 वर्षीय दंगल सिंह मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित जिला शिवपुरी के गांव डबरापुर का रहने वाला था. उस के पिता का नाम भूप सिंह कर्मावत था, जो परिवार के साथ गांव में ही रहते थे. उन के परिवार में पत्नी, 3 बेटियां और एक बेटा दंगल सिंह था. भूप सिंह की 2 बेटियां महाराष्ट्र के जनपद थाणे में रहती थीं और मुंबई के बीयर बारों में डांस करती थीं. छोटी बेटी और बेटा दंगल सिंह गांव में ही रहता था. भूप सिंह की 2 बेटियां मुंबई में कमा रही थीं, इसलिए उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. दंगल सिंह उन का एकलौता वारिस था, इसलिए घर के सभी लोग उसे बड़ा प्यार करते थे.

गांव में भूप सिंह के पास ठीकठाक खेती की जमीन थी. फिर भी उस ने अपना नाचगाने का पेशा नहीं छोड़ा था. पहले इन की लड़कियां मुजरा करती थीं. अब मुजरे का चलन रहा नहीं, इसलिए इन की लड़कियां मुंबई जा कर बीयर बारों में डांस करने लगीं. भूप सिंह और शाबीर गुदड़ावत की पुरानी रिश्तेदारी थी. इसी वजह से भूप सिंह के घर बेटा और शाबीर गुदड़ावत के घर बेटी पैदा हुई तो दोनों ने बचपन में ही उन की शादी तय कर दी. शिल्पा शाबीर की सब से छोटी बेटी थी. अपने पेशे के हिसाब से वह भी नाचगाने में निपुण थी.

परिवार में छोटी होने की वजह से शिल्पा पर काम की कोई जिम्मेदारी नहीं थी. सुंदर वह थी ही, स्वभाव से भी चंचल थी. सयानी होने पर जब उसे पता चला कि दंगल सिंह से उस की शादी तय हो चुकी है तो वह उस से प्यार करने लगी. उन्हें मिलने में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. क्योंकि दोनों ही परिवारों का एकदूसरे के यहां खूब आनाजाना था. उन के मिलने में भी किसी को कोई ऐतराज नहीं था.

इस का नतीजा यह सामने आया कि शादी के पहले ही शिल्पा गर्भवती हो गई. बच्चा दंगल सिंह का है, यह जानते हुए भी उस के घर वालों ने शादी से मना कर दिया. शिल्पा और दंगल सिंह की शादी तो टूटी ही, दोनों परिवारों के संबंध भी टूट गए. दंगल सिंह ने घर वालों को बहुत समझाया, पर घर वाले किसी भी कीमत पर शादी के लिए राजी नहीं हुए. उन्होंने उसे शिल्पा से मिलने पर पाबंदी भी लगा दी. यह सन 2013 की बात है.

शिल्पा ने समय पर बेटी को जन्म दिया. बेडि़या समाज में बेटी का जन्म बहुत शुभ माना जाता है. इस की वजह यह है कि बेटी को ये लोग कमाई का जरिया मानते हैं. इस के बावजूद दंगल सिंह के घर वाले शिल्पा को अपनाने को तैयार नहीं हुए. शिल्पा की बेटी जब थोड़ी बड़ी हुई तो उसे उस के भविष्य को ले कर चिंता हुई. इसलिए वह बेटी को मातापिता के पास छोड़ कर मुंबई आ गई. मुंबई में उस के गांव की कई लड़कियां रहती थीं, जो मुंबई और नवी मुंबई में बीयर बारों में डांसर या बारमेड का काम कर के अच्छा पैसा कमा रही थीं. उन्हीं की मदद से शिल्पा को भी बीयर बार में बारमेड का काम मिल गया.

उस ने थाणे के रेडबुल बीयर बार में नौकरी शुरू की थी, तभी उस की मुलाकात रिया से हुई थी. रिया बार डांसर थी. दोनों में दोस्ती हुई तो वे थाणे के लोकमान्य तिलक नगर में किराए का मकान ले कर एक साथ रहने लगीं. शिल्पा के प्यार में पागल दंगल सिंह को जब पता चला कि शिल्पा मुंबई चली गई है तो वह उस से मिलने मुंबई आनेजाने लगा. उस की बहनें वहां रहती ही थीं, इसलिए उसे न वहां रहने में परेशानी हुई थी और न शिल्पा से मिलने में.

समय अपनी गति से चलता रहा. दंगल सिंह जब भी मुंबई आता, शिल्पा से मिलता और उस के साथ घूमताफिरता. उस के अब भी शिल्पा के साथ पहले जैसे ही संबंध थे. इस बार दंगल सिंह मुंबई आया तो उस ने अपनी बहनों से कहा कि वह शिल्पा से शादी कर के उसे अपने साथ ले जाएगा. तब उस की बहनों ने कहा कि शिल्पा बहुत ही स्वाभिमानी लड़की है. वह अपने मातापिता और समाज के खिलाफ कोई भी काम नहीं करेगी. इस के अलावा उस के मातापिता ने उस से विवाह के लिए जो रकम तय की थी, उसे वह कहां से देगा.

दंगल सिंह ने बहनों की बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने प्यार पर विश्वास कर के रात 8 बजे शिल्पा को फोन कर के मिलने के लिए बुलाया. शिल्पा दंगल सिंह से मिलने आई तो वह उसे नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित अपनी बहनों के घर ले आया. यह घर उस समय खाली पड़ा था. दंगल सिंह ने यहां आ कर पहले शिल्पा के साथ शारीरिक संबंध बनाए, उस के बाद वह शिल्पा पर शादी के लिए दबाव बनाने लगा. शिल्पा इस के लिए राजी नहीं थी. उस का कहना था कि वह समाज और घर वालों के खिलाफ जा कर उस से शादी नहीं कर सकती. अगर वह उस से शादी करना चाहता है तो अपने घर वालों को राजी कर के समाज के हिसाब से शादी करे.

बेडि़यों में शादी के लिए लड़कों की ओर से लड़की वालों को काफी दानदहेज दिया जाता है. दंगल सिंह के घर वाले राजी नहीं थे, जबकि उस के पास देने के लिए कुछ नहीं था. उस ने शिल्पा को समझाया कि वह समाज के हिसाब से शादी नहीं कर सकता, क्योंकि उस के पास देने को कुछ नहीं है. वह उसे प्यार करता था और अभी भी करता है. वह उस के बिना नहीं रह सकता. वह उस से शादी कर के समाज और घर वालों से दूर जा कर उस के साथ रहेगा. वह उस से बीयर बार की नौकरी छोड़ कर अपने साथ चलने को कहने लगा, पर शिल्पा इस के लिए राजी नहीं हुई.

काफी कहनेसुनने और समझाने पर भी जब शिल्पा नहीं मानी तो दंगल सिंह को गुस्सा आ गया. पहले तो उस ने उस की काफी पिटाई की. इस पर भी वह नहीं मानी तो उस ने उस का गला दबा दिया. सांस रुक जाने से शिल्पा मर गई. गुस्से में दंगल सिंह ने शिल्पा को मार तो दिया, लेकिन जब गुस्सा शांत हुआ तो उसे जेल जाने का डर सताने लगा. पुलिस और कानून से बचने के लिए दंगल सिंह शिल्पा की लाश को ठिकाने लगाने के बारे में सोचने लगा. काफी सोचविचार कर उस ने लाश को बैडशीट में लपेट कर बांधा और औटोरिक्शा से ले जा कर कोपर गांव और नवी मुंबई के बोनकोड गांव के बीच बहने वाले नाले में फेंक आया.

लाश को ठिकाने लगा कर दंगल सिंह अपनी बहनों के पास गया और गांव जाने की तैयारी करने लगा. जब उस की बहनों ने शिल्पा से शादी के बारे में पूछा तो उस ने रात घटी सारी घटना बता दी. हत्या की बात सुन कर बहनें डर गईं. दंगल सिंह तो उसी सुबह कुर्ला रेलवे स्टेशन से तुलसी एक्सप्रैस पकड़ कर गांव चला गया, जबकि बहनें 10 फरवरी को निकलीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने दंगल सिंह की बहनों को निर्दोष मान कर छोड़ दिया, जबकि उस के खिलाफ शिल्पा उर्फ किस्मत की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के नवी मुंबई के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. इंसपेक्टर बालकृष्ण अपने सहयोगियों की मदद से आरोप पत्र तैयार कर रहे थे. Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Gujrat News: फारेस्ट औफिसर ने किया परिवार दफन

Gujrat News: भावनगर के फारेस्ट औफिसर शैलेष खांभला का परिवार ऊपर से देखने में भले ही खुशहाल लगता था, लेकिन घर में ऐसी खामोश आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था. इसी बीच शैलेष ने एक ऐसी खूनी साजिश तैयार कर ली, जिस से उस ने न सिर्फ पत्नी बल्कि दोनों बच्चों की हत्या कर उन्हें दफन कर दिया. एक फारेस्ट अधिकारी ने आखिर ऐसा क्यों किया?

गुजरात के जिला भावनगर की फारेस्ट कालोनी की वह सुबह हर दिन से कुछ अलग सी थी. सूरज से निकलने वाली किरणें घरों की छतों पर इस तरह फैल रही थीं, मानो धीरेधीरे कोई राज खोल रही हों. जबकि इस कालोनी का वह घर, जिस में शैलेष खांभला अपनी पत्नी नयनाबेन, बेटे भव्य और बेटी पृथा के साथ रहता था. उस सुबह जैसे किसी अदृश्य परदे में लिपटा हुआ था. दूर से देखने में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर ऐसा कुछ था, जिसे हवा भी छूने से डर रही थी. शैलेष खांभला वन विभाग में एसीएफ यानी असिस्टेंट कंजर्वेटर औफ फारेस्ट था. साल भर पहले ही उस का इस पद पर प्रमोशन हुआ था. उस के बाद ही ट्रांसफर हो कर भावनगर आया था.

जयपुरिया शर्ट पहन कर औफिस जाने वाला, नियमों में विश्वास रखने वाला, दिखने में शांत, लोगों से कम बोलने वाला व्यक्ति था शैलेष. लोग कहते थे कि साहब बहुत सीधे हैं, गुस्सा बिलकुल नहीं करते. परिवार से बहुत प्यार करते हैं. और उस की पत्नी नयना एक ऐसी महिला थी, जो अपनी छोटी सी दुनिया को संभालने में ही दिनरात खोई रहती थी. बेटी पृथा 13 साल की थी तो बेटा भव्य 9 साल का. दोनों पढऩे में तो अच्छे थे ही, सभ्य और खुशमिजाज भी थे.

एक अफसर का परिवार होने के बावजूद यह परिवार बिलकुल साधारण दिखाई देता था. नौकरी की वजह से पति बाहर रहता था तो नयना बच्चों को ले कर सूरत के कापोद्रा में सासससुर के साथ रहती थी. बाहर से देखने में सब कुछ सामान्य लगता था. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो घर की दीवारों के अंदर ही चुपचाप सांसें लेती हैं. उन का किसी को पता तक नहीं चलता कि अंदर ही अंदर क्या हो रहा है, क्या मर रहा है और क्या जन्म ले रहा है?

शैलेष साल भर पहले ही प्रमोशन ले कर भावनगर आया था. यहां रहते हुए उस की दुनिया बदल गई थी, लेकिन यह बदलाव उस के घर में नहीं आया था, उस के औफिस में आया था. वन विभाग में ही नौकरी करने वाली एक युवती शैलजा (बदला हुआ नाम), जिस की उम्र शैलेष से भले कम थी, लेकिन उस का रूप अधिक था. आकर्षण ऐसा था कि देखने वाले की नजर उस पर ठहर जाए. वह विभाग की अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाती थी. मुसकरा कर बातें करती तो जैसे फूल झड़ते हों. बिलकुल अलग दुनिया से आई हुई लगती थी शैलजा.

प्यार की हुई शुरुआत

मिलने की शुरुआत काम की बातचीत से हुई. शैलजा को काम के सिलसिले में बारबार शैलेष के पास आना पड़ता था. बारबार पास यानी नजदीक आने से शैलेष उस की ओर आकर्षित होने लगा, क्योंकि शैलजा जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं अधिक खूबसूरत उस का बातचीत करने का ढंग था. शैलजा अच्छी लगने लगी तो शैलेष उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगे. शुरुआत हुई वाट्सऐप मैसेज से. आजकल सरकारी आदेश, सूचनाएं, नोटिस आदि वाट्सऐप से ही भेजे जाने लगे हैं. इसलिए औफिस के हर कर्मचारी का नंबर हर किसी के पास होता ही है. इसलिए शैलजा का नंबर भी शैलेष के पास था. शैलेष शैलजा को सरकारी संदेशों के साथसाथ गुडमार्निंग का संदेश भी भेजने लगा था.

गुडमार्निंग का संदेश भेजतेभेजते शैलेष उसे प्यार के द्विअर्थी संदेश भेजने लगा. शैलजा उस के इन संदेशों को अवाइड करने या विरोध करने के बजाय जवाब देने लगी तो शैलेष समझ गया कि शैलजा को वह पसंद हैं. उस के संदेशों से स्पष्ट हो रहा था कि उस ने शैलेष के प्यार के प्रपोजल को स्वीकार कर लिया था. शैलजा को पता था कि शैलेष शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप भी है, फिर भी वह शैलेष के प्यार के झांसे में आ गई थी.

जब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया तो उन की फोन पर बातें होने लगी थीं, जो घंटोंघंटों चलती थीं. फिर तो दोनों के दिलों ने एकदूसरे को इस तरह जकड़ लिया, जैसे जंगल की बेल किसी पेड़ को धीरेधीरे जकड़ लेती है. कहते हैं कि प्यार कभी अचानक नहीं होता. वह धीरेधीरे बढ़ता है, जैसे दीमक किसी लकड़ी में बढ़ता है. शैलेष के मन में भी शैलजा के प्यार का दीमक लग चुका था.

किस ने चुराईं खुशियां

किसी और की मुसकान ने उस के घर की खुशियां चुरा ली थीं. अब घर लौटने में उस का मन शांत नहीं रहता था. वह फोन को सीने से लगा कर सोने लगा था. पत्नी कभी कोई सवाल करती थी तो जवाब देने के बजाय चुप रह जाता था. अपने ही बच्चों से अब उसे कोई मतलब नहीं रह गया था. एक पिता अपने ही बच्चों से दूर होता गया था. एक हंसतेखेलते, सुखीसंपन्न परिवार में एक पुरुष की लंपटता की वजह से काफी कुछ बदल चुका था.

शैलजा शैलेष के जीवन में भावना बन कर नहीं आई थी, बल्कि जुनून बन कर आई थी. एक आग की तरह कि जिसे बुझाना भी चाहो तो वह और भड़क उठे. शैलेष का दिमाग पूरी तरह बदल चुका था. वह सोचने लगा था कि अगर शैलजा के प्यार को पाना है तो उस के लिए कुछ बड़ा करना होगा. कुछ ऐसा करना होगा कि उस के बाद उसे कोई रोकटोक न सके. दुनिया उसे एक अधिकारी, एक भरेपूरे परिवार वाला और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखती थी. हर किसी को लगता था कि शैलेष बहुत सुखी है.

उस की सुंदरसुघड़ पत्नी और 2 प्यारेप्यारे बच्चे हैं. अच्छीखासी कमाई है. संपन्न परिवार से भी है. लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद उस के अंदर अब एक और आदमी पैदा हो चुका था, जो प्यार नहीं, कब्जा चाहता था. किसी और की देह पर कब्जा. और कब्जा अकसर हिंसा से ही मिलता है. 26 अक्तूबर, 2025 को नयना बच्चों को ले कर सूरत से भावनगर पति के पास आ गई थी. उसे पति के स्वभाव और बातचीत से उस की हरकतों पर संदेह हो गया था, जिस की वजह से वह उस से लडऩेझगडऩे लगी थी. साथ रहने की जिद करने लगी थी.

एक पति पत्नी के साथ जैसा व्यवहार करता है, शैलेष नयना के साथ बिलकुल नहीं कर रहा था. इसलिए यह झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था. शैलेष के बदले व्यवहार से नयना को यकीन हो गया था कि शैलेष पूरी तरह बदल गया है. इसलिए नयना अब उस के साथ ही रहना चाहती थी, जबकि शैलेष उसे खुद से दूर ही रखना चाहता था. नयना ने पति की हरकतों को भांप कर तय कर लिया था कि अब वह उस के साथ ही रहेगी. जबकि शैलेष किसी भी हालत में साथ रखने को तैयार नहीं था. इसलिए नयना की जिद से वह परेशान हो उठा था. जब नयना किसी भी हालत में नहीं मानी तो शैलेष उस से छुटकारा पाने के उपाय ही नहीं सोचने लगा था, बल्कि योजना बनाने लगा था.

उसी योजना के तहत 2 नवंबर को शैलेष ने रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से कहा कि कूड़ा फेंकने और पानी भरने के लिए उसे घर के पीछे वाले खेत में एक बड़ा गड्ïढा खुदवाना है. खेत में गड्ïढा खुदवाना सामान्य बात थी. लेकिन वह गड्ïढा सामान्य नहीं था. वह गड्ïढा भविष्य का श्मशान था.

उसी दिन रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया ने शैलेष के सरकारी क्वार्टर से 20 फीट की दूरी पर जेसीबी से मिट्टी हटवा कर गहरा गड्ïढा खुदवा दिया. गड्ïढा छोटामोटा नहीं खुदवाया था, शैलेष ने पूरे साढ़े 6 फुट गहरा गड्ïढा खुदवाया था. गिरीश ने सोचा था कि शैलेष ने किसी खास काम यानी कूड़ा डालने और पानी भरने के लिए गड्ïढा खुदवाया होगा. तब किसे पता था कि वह गड्ïढा 3 जिंदगियों का अंतिम ठिकाना बनने वाला है.

4 नवंबर, 2025 से शैलेष का व्यवहार एकदम से बदल गया था. घर में कुछ बेचैनी सी फैल गई थी. उस का बदला व्यवहार देख कर पत्नी ने पूछा भी था कि सब ठीक तो है न? जवाब में उस ने कहा था, ”हां, सब ठीक ही है. कुछ तो नहीं है.’’ लेकिन उस के इस ‘कुछ तो नहीं है’ में एक ऐसा तूफान छिपा था, जिस में सब उड़ जाना था. जो बच्चे रोज उस के साथ खेलते थे, वे उस से दूर हो गए थे. वे अपने मन से नहीं दूर हुए थे, बल्कि शैलेष ने खुद उन्हें दूर कर दिया था. पिता के बातव्यववहार से उन्हें भी हवा से कुछ गड़बड़ होने का अहसास हो रहा था.

4 नवंबर की सुबह साढ़े 8 बजे के करीब रेंज फारेस्ट औफिसर ने शैलेष को फोन किया कि सर खेत में जो गड्ïढा खोदा था, उस में एक मोर गिर कर मर गया है. इसलिए गड्ïढा पटवाना जरूरी है. शैलेष भाग कर आया. उस ने कहा कि यहां तो कोई मोर नहीं है. आरएफओ हैरान रह गया था, क्योंकि उस ने अपनी आंखों से गड्ढे क में मरा हुआ मोर देखा था. वह खड़ा यही सोच रहा था कि शैलेष झूठ क्यों बोल रहा है? आखिर यह आदमी गड्ïढा भरवाने से मना क्यों कर रहा है?

जो भी राज था, वह शैलेष के मन में ही था. गड्ढे क का वह क्या करेगा, यह किसी को पता नहीं था. इसलिए लोगों को शक होने लगा था. उस रात भावनगर में हवा कुछ अलग ही चल रही थी. वह ऐसी हवा थी, जो शांत तो थी, पर डरावनी भी थी. घर में बच्चों की आवाजें धीमी पड़ गई थीं. नयना को कुछ बेचैनी सी हो रही थी. शैलेष का चेहरा ऐसा हो गया था, जैसे कोई आदमी अपनी परछाई से भी डर रहा हो.

औफिसर ने किए 3 मर्डर

4 नवंबर, 2025 की रात से ही शैलेष और नयना में साथ रहने को ले कर झगड़ा शुरू हो गया था, जो पूरी रात चलता रहा. बच्चे खापी कर सो गए थे, लेकिन न शैलेष की आंखों में नींद थी और न नयना की आंखों में, क्योंकि कमरे की चौखट पर खड़ा शैलेष अपने ही परिवार की मौत लिखने वाला था. उस ने सोचा कि सब से पहले पत्नी को ठिकाने लगाया जाए. क्योंकि पत्नी ही उस के प्यार की, उस के नए जीवन की सब से बड़ी बाधा थी. सब से बड़ा सवाल थी. सब से बड़ा सच थी. वही सवाल कर सकती थी कि वह यह क्या करने जा रहा है.

शैलेष और नयना की लड़ाई सुबह और बढ़ गई थी. नयना अपना अधिकार मांग रही थी. उसे क्या पता था कि थोड़ी देर में उसे अधिकार नहीं, मौत मिलने वाली है. यह काम कोई और नहीं, वही आदमी करेगा, जिस ने अग्नि के 7 फेरे लेते हुए उस की जानमाल और इज्जत की सुरक्षा करने की कसम खाई थी. वही अब उस की जान लेने वाला है, एक ऐसी औरत के लिए जो अभी उस की कोई नहीं थी. अभी सब कुछ वादों में था.

लड़तेझगड़ते अचानक शैलेष को गुस्सा आ गया. उस ने बैड पर पड़ा दूसरा तकिया उठाया और नयना के मुंह पर पूरी ताकत से इतनी मजबूती से दबाया कि उस की आवाज तक बाहर नहीं आ सकी. नयना ने जान बचाने के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन शैलेष की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उस ने हाथपैर पटक कर, थोड़ी देर छटपटा कर दम तोड़ दिया. जिस आदमी ने कभी बच्चों तक से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी, उस आदमी ने अपनी ही पत्नी की सांसें रोक दीं. जिस से पूरे जीवन साथ निभाने का वादा किया था, बीच में उस की जान ले कर उस का साथ छोड़ दिया.

कमरा फिर खामोश हो गया. एक ऐसी खामोशी, जिस में कोई रो तो सकता था, लेकिन कोई सुन नहीं सकता था. शायद मम्मी के कमरे से आने वाली छटपटाहट की आवाज सुन कर दोनों बच्चे, 13 साल की पृथा और 9 साल का भव्य जाग गए थे. कमरे से आने वाली धीमी आवाजों ने उन्हें डरा दिया था. बेटी थोड़ी बड़ी थी. उस ने पूछा, ”पापा, मम्मी को क्या हुआ?’’

शैलेष ने मुसकराने की कोशिश तो की, लेकिन उस की आंखों में पागलपन उतर चुका था. उस ने बेटी को समझाने या सांत्वना देने के बजाय दबोच लिया और उस के मुंह पर भी तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाना शुरू कर दिया. 13 साल की मासूम बच्ची कितना संघर्ष करती, एक वयस्क पुरुष के सामने कितनी देर टिक सकती थी? आखिर वही हुआ, जो शैलेष चाहता था. कुछ पलों में पृथा की भी सांसें रुक गईं. उस के बाद 9 साल के बेटे को भी उसी तरह खत्म कर दिया.

जिन हाथों ने पकड़ कर उसे चलना सिखाया था, उन्हीं हाथों ने बेटी और बेटे का जीवन लील लिया था. उन का मुंह दबाते समय पिता के हाथ भी नहीं कांपे थे. जब पत्नी और बच्चों की सांसें थम गईं तो शैलेष के अंदर का शैतान शांत हो गया. वही नहीं, घर भी शांत हो गया था. यह शांति मौत की थी. शैलेष खड़ा तीनों लाशों को ताक रहा था. उस की आंखों में उस समय एक ऐसा खालीपन था, जो अब कभी भरने वाला नहीं था. लगता था कि भीतर का सब कुछ मर चुका हो. लेकिन मन में कोई पछतावा नहीं था. अब उसे तीनों लाशों को ठिकाने लगाना था. इस की योजना उस ने पहले से बना रखी थी.

लाशों को ठिकाने लगाने के लिए शैलेष ने पहले से घर के पीछे 20 फीट की दूरी पर गड्ïढा खुदवा रखा था. अब उसे उन लाशों को उस गड्ढे क में डाल कर ऊपर से मिट्ठी डालनी थी. शैलेष ने तीनों लाशें उस गड्ढे क तक पहुंचाई, जिसे उस ने लाशों के हिसाब से ही खुदवाया था. लाशों में पत्थर बांध कर गड्ढे क में डाल दिया. इस के बाद घड़ी की ओर देखा तो साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने लाशों के ऊपर गद्ïदा डाल कर ऊपर से एक दरवाजा डाल दिया, जिस से गद्ïदा इधरउधर न खिसके. अब ऊपर से मिट्टी डालनी थी.

शैतान बन चुके शैलेष ने खुद ही अपने उस परिवार के ऊपर मिट्टी डाल कर दफना दिया, जिस के लिए अब तक जिया था. इस के बाद उस ने अमित को फोन कर के 2 डंपर बजरी मंगवाई कि गड्ढे क को भरवाना है. रेंज फारेस्ट अफसर ने कहा कि गड्ढे क से निकली मिट्टी तो है, उसी को जेसीबी से भरवा देते हैं. पर शैलेष ने बजरी मंगवा कर गड्ढे क में डलवा दी. इस तरह उस गड्ढे क में अपराध का एक इतिहास दफन हो गया था. ऊपर से सूखी घास और पुरानी बोरियां डाल कर गड्ढे को खेत का एक हिस्सा बना दिया था.

5 नवंबर, 2025 को हत्या हुई थी. इतना कुछ करने के बाद शैलेष घर से निकल गया. 7 नवंबर, 2025 की शाम को वह भावनगर के थाना भरतनगर पहुंचा और पत्नी, बेटे और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने अपना काम शुरू कर दिया. नयना, पृथा और भव्य के फोटो, आधार कार्ड आदि सारी जानकारी भावनगर जिले के तमाम थानों को भेज कर तलाश शुरू कर दी. 12 नवंबर, 2025 तक शैलेष नौकरी पर जाता रहा. उस के बाद छुट्टी ले कर सूरत चला गया. वह इस तरह रह रहा था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.

दूसरी ओर 8 नवंबर को पुलिस ने नयना के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई थी. उसी दिन शैलेष ने थाना भरतनगर जा कर पुलिस को बताया था कि सिक्योरिटी गार्ड ने बताया है कि उस ने नयना और दोनों बच्चों को एक औटोरिक्शा से जाते देखा था. इस के बाद पुलिस ने सिक्योरिटी गार्ड से पूछताछ की तो उस ने उन तीनों को देखने से साफ मना कर दिया. तब पुलिस ने फारेस्ट कालोनी तथा उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने के साथ नयना के मोबाइल की वह स्क्रीनशौट मंगाई, जिस में उस ने वह मैसेज छोड़ा था कि वह घर छोड़ कर बच्चों के साथ जा रही है.

सीसीटीवी फुटेज में ऐसा कोई औटो नजर नहीं आया, जिस में नयना और बच्चे जा रहे हों. तीनों पैदल भी जाते नहीं दिखाई दिए थे.

फोन से मिला सुराग

जांच में पता चला कि शैलेश ने खुद ही पत्नी के मोबाइल से एक मैसेज किया था, जिस में उस ने लिखा था कि वह किसी दूसरे के साथ रहने जा रही है. लेकिन फोन फ्लाइट मोड पर था, इसलिए वह मैसेज सेंड नहीं हो सका था. पुलिस को इस से थोड़ा शक हुआ और उसे आगे बढऩे की रोशनी मिल गई. तब पुलिस ने नयना के पुराने मैसेज से उस की भाषा का मिलान किया तो उस की भाषा अलग लगी. पुलिस को यहीं शक हुआ कि जो इंसान घर छोड़ कर भाग रहा हो, वह संदेश छोड़ कर क्यों जाएगा.

शैलेष शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि इस बीच शैलेष की रेंज फारेस्ट अफसर गिरीशभाई बनिया से अधिक बात हुई थी. 11 नवंबर को पुलिस ने शैलेष के घर की तलाशी ली, जिस में घर से एक छोटा कपड़ा कुरसी के नीचे से मिला था, जो किसी बच्चे का लगता था. उस का एक बटन टूटा हुआ था. कोने में पड़े 2 स्कूल बैग और घर बता रहा था कि बच्चे कई दिनों से गायब थे. 15 नवंबर को रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से मिलने पुलिस पहुंच गई.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ मे गिरीश बनिया ने बताया कि 2 नवंबर को शैलेष ने उस से कहा था कि उसे घर के पीछे खेत में पानी जमा करने और कूड़ा डालने के लिए एक गड्ïढा खुदवाना है. उस ने शैलेष के कहने पर गड्ïढा खुदवा दिया था. 6 नवंबर को फिर आदेश आया कि अब इस गड्ढे क में मिट्टी भरवा दो. बनिया की इस बात से पुलिस को लगा कि यह महज संयोग नहीं हो सकता. यह किसी योजना के तहत था.

शैलेष के कहने पर गड्ïढा भरवाने के लिए गए वनरक्षक विशाल पनोत ने बताया कि जब वह गड्ïढा भरवाने के लिए डंपर से मिट्टी गिरवाने लगा तो गड्ïढा देखने की गरज से उस ओर गया. तब शैलेष ने घबराई आवाज में कहा था कि इधर मत आओ, उस का पैर किसी सांप पर पड़ गया था. वह उसे काट सकता है. घर का रहा न घाट का एक जंगल के अधिकारी की इस तरह की बचकानी हरकत पुलिस को हजम नहीं हुई. डंपर के साथ आए विशाल से बात की गई तो उस ने बताया कि जब उस ने गड्ढे क में पड़े गद्ïदे के बारे में पूछा तो शैलेष ने बताया था कि गड्ढे क में एक नीलगाय गिर गई थी, उसे बाहर निकालने के लिए गद्ïदा डालना पड़ा था. जबकि गड्ढे क में डाली गई मिट्टी एक अलग ही कहानी कह रही थी.

नई, ताजी, जल्दबाजी में भरी गई मिट्टी साफ कह रही थी कि इस के नीचे कोई रहस्य छिपा है. मिट्टी डाल कर भले जमीन समतल कर दी गई थी, लेकिन जल्दबाजी में किया गया यह कारनामा पुलिस की आंखों में धूल नहीं झोंक सका. हर क्लू एक ही बात की ओर इशारा कर रहा था कि गड्ïढा हत्या से जुड़ा है और हत्या के रहस्य को इसी गड्ढे में जल्द से जल्द मिटाने की कोशिश की गई थी. सिक्योरिटी गार्ड, सीसीटीवी फुटेज, रेंज फारेस्ट अफसर, वनरक्षक और डंपर के साथ आए सहायक की बातों से पुलिस का शक अब यकीन में बदलने लगा था. तब पुलिस टीम फिर फारेस्ट कालोनी पहुंची. इस बार उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थीं.

गड्ढे में जहां मिट्टी और बजरी डाली गई थी, जेसीबी से मिट्टी हटाई जाने लगी. सभी टकटकी लगाए गड्ढे क को ताक रहे थे. जब मिट्टी के नीचे कपड़े का एक टुकड़ा दिखाई दिया तो वहां खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. कुछ ही देर में तीनों लाशें दिखाई दे गईं. ये लाशें नयनाबेन, पृथा और भव्य की थीं, जिन्हें तकिए से दम घोंट कर मारा गया था. इस घटना की खबर आग की तरह फैल गई. पूरे भावनगर में मातम था. पुलिस ने लाशें निकलवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी थीं.

लाशें मिलने के बाद स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं शैलेष ने ही की हैं. पर लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि एक पढ़ेलिखे, सभ्य, सरकारी मुलाजिम ने यह जघन्य अपराध क्यों किया? वह इतना क्रूर कैसे हो गया? अब पुलिस शैलेष को गिरफ्तार करना चाहती थी. पर वह घर में ताला बंद कर के गायब था. चूंकि मामला एक अधिकारी से जुड़ा था, इसलिए एसपी नितेश पांडे ने तुरंत थाना भरतनगर के इंसपेक्टर को भावनगर तथा सूरत में छापा मार कर शैलेष खांभला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चंद घंटों में शैलेष खांभला को सूरत से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस समय उस के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था. बस, एक अजीब सा खालीपन था, जैसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि उस ने क्या खोया और क्या पाया है. शैलेष की गिरफ्तारी की सूचना पा कर एसपी नितेश पांडे, रेंज आईजी गौतम परमार भी आ गए थे. सभी की मौजूदगी में शैलेष से पूछताछ की गई तो उस ने अपना हर अपराध स्वीकार कर लिया था.

इस पूछताछ में उस ने यही बताया कि पत्नी नयनाबेन साथ रहने की जिद कर रही थी, इसलिए आवेश में आ कर उस ने उस की हत्या कर दी थी. बच्चों की हत्या उस ने क्यों की, इस सवाल का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. पुलिस ने शैलजा से भी पूछताछ की. उस का कहना था कि शैलेष के मन में क्या था, उसे पता नहीं. रही बात प्यार करने की तो वह अलग बात है. पर उस ने शैलेष से न कभी साथ रहने की बात की है और न ही उस से कभी अपने परिवार की हत्या करने की बात की थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शैलजा को जाने दिया, क्योंकि पुलिस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था कि वह भी इस हत्या में शामिल थी. पुलिस ने शैलेष को 7 दिनों तक रिमांड पर भी रखा. इस बीच उस के खिलाफ जितने सबूत मिल सकते थे, जुटाए. यह भी पता किया कि इन हत्याओं में कोई और तो उस के साथ नहीं था. पता चला कि यह जघन्य अपराध उस ने अकेले ही किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे कोर्ट में दोबारा पेश कर के जेल भेज दिया गया था. शैलेष के इस कारनामे से उस की पूरी बिरादरी ही नहीं, घर वाले भी इस कदर नाराज हैं कि सभी यही चाहते हैं कि उसे सख्त से सख्त सजा मिले. Gujrat News

 

 

Suspense Crime Story: परदेसी पति की बेवफा पत्नी

Suspense Crime Story: उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना कैंपियरगंज के थानाप्रभारी चौथीराम यादव रात की गश्त से लौट कर लेटे ही थे कि उन के फोन की घंटी बजी. बेमन से उन्होंने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘‘सर मैं टैक्सी ड्राइवर किशोर बोल रहा हूं.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘जो भी कहना है, सुबह थाने में आ कर कहना. अभी मैं सोने जा रहा हूं.’’

‘‘सर, जरूरी बात है… मोहम्मदपुर नवापार सीवान के पास सड़क के किनारे एक औरत की लाश पड़ी है. उस के सीने से एक छोटा बच्चा चिपका है. अभी बच्चा जीवित है.’’ किशोर ने कहा.

लाश की बात सुन कर थानाप्रभारी की नींद गायब हो गई. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, मैं पहुंच रहा हूं. मेरे आने तक तुम वहीं रहना. बच्चे का खयाल रखना.’’

‘‘ठीक है सर, आप आइए. आप के आने तक मैं यहीं रहूंगा.’’

कह कर किशोर ने फोन काट दिया.

सूचना गंभीर थी, इसलिए थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने तुरंत इस घटना की सूचना अधिकारियों को दी और खुद जल्दीजल्दी तैयार हो कर सबइंसपेक्टर विनोद कुमार सिंह, कांस्टेबल रामउजागर राय, अवधेश यादव और जगरनाथ यादव के साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. अब तक उजाला फैल चुका था. घटनास्थल पर काफी लोग जमा हो चुके थे. घटनास्थल पर पहुंचते ही थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने सब से पहले उस बच्चे को उठाया, जो मरी हुई मां के सीने से चिपका सो रहा था. स्थिति यही बता रही थी कि वह मृतका का बेटा था. उठाते ही बच्चा जाग गया. वह बिलखबिलख कर रोने लगा. चौथीराम ने उसे एक सिपाही को पकड़ाया तो वह उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा.

पहनावे से मृतका मध्यमवर्गीय परिवार की लग रही थी. उस की उम्र यही कोई 25 साल के आसपास थी. उस के मुंह और सीने में एकदम करीब से गोलियां मारी गई थीं. मुंह में गोली मारी जाने की वजह से चेहरा खून से सना था. घावों से निकल कर बहा खून सूख चुका था. मृतका की कदकाठी ठीकठाक थी. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे कम से कम 2 तो रहे ही होंगे. पुलिस ने घटनास्थल से 315 बोर के 2 खोखे बरामद किए थे. खोखे वही रहे होंगे, जो 2 गोलियां मृतका को मारी गई थीं. घटनास्थल पर मौजूद लोग लाश की शिनाख्त नहीं कर सके थे. इस का मतलब मृतका वहां की रहने वाली नहीं थी.

पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की काररवाई कर रही थी कि अचानक वहां एक युवक आया और लाश देख कर जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने का मतलब था, वह मृतका का कोई अपना रहा होगा.

पुलिस ने उसे चुप करा कर पूछताछ की तो पता चला कि वह मृतका का भाई दीपचंद था. मृतका का नाम शीला था. कल सुबह वह ससुराल से अपने बेटे को ले कर मायके जाने के लिए निकली थी. शाम तक वह घर नहीं पहुंची तो उसे चिंता हुई. सुबह वह उसी की तलाश में निकला था. यहां भीड़ देख कर वह रुक गया. पूछने पर पता चला कि यहां एक महिला की लाश पड़ी है. वह लाश देखने आया तो पता चला वह लाश उस की बहन की है. उस के साथ उस का बेटा कृष्णा भी था.

पुलिस ने कृष्णा को उसे सौंप दिया. दीपचंद ने फोन द्वारा घटना की सूचना पिता वृजवंशी को दी तो घर में कोहराम मच गया. गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर वृजवंशी भी वहां पहुंच गया, जहां लाश पड़ी थी. बेटी की लाश और मासूम नाती कृष्णा को रोते देख वृजवंशी भी बिलखबिलख कर रोने लगा. उस से रहा नहीं गया और उस ने नाती को दीपचंद से ले कर सीने से चिपका लिया. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस दीपचंद के साथ थाने आ गई. थाने में उस की ओर से शीला की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. यह 23 जनवरी, 2014 की बात है.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने जांच शुरू की. हत्यारों ने सिर्फ शीला की हत्या की थी, उस के बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था. इस का मतलब उस का जो कुछ था, वह शीला से ही था. उसे सिर्फ उसी से परेशानी थी. ऐसे में उस का कोई प्रेमी भी हो सकता था, जो उस से पीछा छुड़ाना चाहता रहा हो.

शीला की ससुराल गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा सरहरी में थी. थानाप्रभारी चौथीराम दीपचंद को ले कर शीला की ससुराल जा पहुंचे. बनरहा पहुंचने में उन्हें करीब 2 घंटे का समय लगा. शीला की ससुराल में उस की सास और ससुर थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि 22 जनवरी, 2014 को शीला अपने मुंहबोले भाई पप्पू और उस के दोस्त के साथ मोटरसाइकिल से मायके के लिए निकली थी. कृष्णा को भी वह अपने साथ ले गई थी. इस के अलावा वे और कुछ नहीं बता सके थे. पूछताछ में सासससुर ने यह भी बताया था कि पप्पू अकसर उन के यहां आता रहता था. चौथीराम यादव ने दीपचंद से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि पप्पू उसी के गांव का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का लड़का था.

थानाप्रभारी बनरहा से सीधे दीपचंद के गांव अहिरौली जा पहुंचे. पप्पू के बारे में पता किया गया तो घर वालों ने बताया कि वह 22 जनवरी, 2014 को नौतनवा जाने की बात कह कर घर से निकला था. तब से लौट कर नहीं आया है. दीपचंद की मदद से पप्पू और शीला का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि 22 जनवरी की सुबह शीला ने पप्पू को फोन किया था. उस के बाद पप्पू का मोबाइल फोन बंद हो गया था. काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि दोनों में रोजाना घंटों बातें होती थीं. इस से साफ हो गया कि दोनों में संबंध थे. पप्पू ने ही किसी बात से नाराज हो कर दोस्त की मदद से शीला की हत्या की थी.

जांच कहां तक पहुंची है, थानाप्रभारी चौथीराम इस की जानकारी क्षेत्राधिकारी अजय कुमार पांडेय और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) डा. यस चेन्नपा को भी दे रहे थे. पप्पू के बारे में जब घर वालों से कोई जानकारी नहीं मिली तो थानाप्रभारी ने उस के बारे में पता करने के लिए उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर 2 फरवरी, 2014 को घटना के 10 दिनों बाद पुलिस ने मुखबिर के जरिए पप्पू और उस के दोस्त को मोटरसाइकिल सहित लोरपुरवा के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों नेपाल की ओर जा रहे थे.

पुलिस पप्पू और उस के दोस्त अवधेश को थाने ले आई. तलाशी में पुलिस को अवधेश के पास से 315 बोर का देशी तमंचा और कारतूस भी मिले. पुलिस ने दोनों चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. जबकि पप्पू उर्फ दुर्गेश के पास से सिर्फ 2 सिम वाला मोबाइल फोन मिला था. पुलिस दोनों से अलगअलग पूछताछ करने लगी. दोनों ने पहले तो शीला की हत्या से इनकार किया, लेकिन पुलिस के पास उन के खिलाफ इतने सुबूत थे कि ज्यादा देर तक वे अपनी बात पर टिके नहीं रह सके और सच्चाई कुबूल कर के शीला की हत्या की पूरी कहानी उगल दी. इस पूछताछ में पप्पू और अवधेश ने शीला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

जिला महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव अहिरौली में रहता था वृजवंशी. उस के परिवार में पत्नी फूलवासी के अलावा कुल 7 बच्चे थे. शीला उन में पांचवें नंबर पर थी. वृजवंशी के पास इतनी खेती थी कि उसी से उन के इतने बड़े परिवार का गुजरबसर हो रहा था. लेकिन बेटे बड़े हुए, उन्होंने काफी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले ली थीं. बेटों की शादियां हो गईं तो बेटों की मदद से वृजवंशी बेटियों की शादियां करने लगा. शीला जवान हुई तो वृजवंशी को उस की शादी की चिंता हुई. बाप और भाई उस के लिए लड़का ढूंढ पाते उस के पहले ही वह गांव में ही बचपन के साथी दुर्गेश उर्फ पप्पू से आंखें लड़ा बैठी. दोनों साथसाथ खेलेकूदे ही नहीं थे, बल्कि एक ही स्कूल में पढ़े भी थे.

दुर्गेश उर्फ पप्पू के पिता दूधनाथ भी खेती किसानी करते थे. उस के परिवार में पत्नी के अलावा एकलौता बेटा पप्पू और 3 बेटियां थीं. एकलौता होने की वजह से पप्पू को घर से कुछ ज्यादा ही लाडप्यार मिला, जिस की वजह से वह बिगड़ गया. जैसेतैसे उस ने इंटरमीडिएट कर के पढ़ाई छोड़ दी. इस के बाद गांव में घूमघूम कर आवारागर्दी करने लगा. शीला और पप्पू के संबंधों की जानकारी गांव वालों को हुई तो इस से वृजवंशी की बदनामी होने लगी. तब उसे चिंता हुई कि बात ज्यादा फैल गई  तो बेटी की शादी होना मुश्किल हो जाएगा. अब इस से बचने का एक ही उपाय था, शीला की शादी. वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगा. क्योंकि अब देर करना ठीक नहीं था.

उस ने कोशिश की तो गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा का रहने वाला दिनेश उसे पसंद आ गया. उस ने जल्दी से शीला की शादी उस के साथ कर दी. शीला विदा हो कर ससुराल आ गई. दिनेश मुंबई में रहता था. कुछ दिन पत्नी के साथ रह कर वह मुंबई चला गया. शीला को उस ने बूढ़े मांबाप के पास उन की सेवा के लिए छोड़ दिया, ताकि किसी को कुछ कहने का मौका न मिले. क्योंकि उन्हें तो पूरी जिंदगी साथ रहना है.

शीला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन पति के परदेस में रहने की वजह से वह अपने पहले प्यार दुर्गेश उर्फ पप्पू को कभी नहीं भूल पाई. शादी के बाद भी वह प्रेमी से मिलती रही. शीला का मुंहबोला भाई बन कर वह उस की ससुराल भी आता रहा. उस के सासससुर पप्पू को उस का भाई समझते थे, इसलिए उस के आनेजाने पर कभी रोक नहीं लगाई. जबकि भाईबहन के रिश्ते की आड़ में दोनों कुछ और ही गुल खिला रहे थे.

पप्पू ने बातचीत के लिए शीला को मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था. सासससुर रात में सो जाते तो शीला मिस्डकाल कर देती. इस के बाद पप्पू फोन करता तो दोनों के बीच घंटों बातें होतीं. शीला को कई बार पप्पू से गर्भ भी ठहरा, लेकिन पप्पू ने हर बार उस का गर्भपात करा दिया. बारबार गर्भपात कराने से तंग आ कर शीला उस के साथ रहने की जिद करने लगी. जबकि पप्पू को शीला से नहीं, सिर्फ उस की देह से प्रेम था. शीला जब भी उस से साथ रखने के लिए कहती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. शीला जब उस पर जोर डालने लगी तो वह दूर भागने लगा. उस का कहना था कि घर वाले उसे रहने नहीं देंगे. अपना अलग घर है नहीं. तब शीला ने पप्पू को 1 लाख रुपए जमीन खरीद कर घर बनाने के लिए दिए. इस की जानकारी न तो शीला के पति को थी, न सासससुर को.

पप्पू ने पैसे तो लिए, लेकिन उस ने जमीन नहीं खरीदी. जब भी शीला जमीन और घर के बारे में पूछती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. जब शीला को लगने लगा कि पप्पू उसे बेवकूफ बना रहा है तो वह बेचैन हो उठी. वह समझ गई कि उस से बहुत बड़ी भूल हो गई है. जिस के लिए उस ने घरपरिवार के साथ विश्वासघात किया, वह उस के साथ विश्वासघात कर रहा है. उस ने ठान लिया कि वह ऐसे आदमी को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी. वह पप्पू से अपने रुपए मांगने लगी.

शीला ने जब पैसे के लिए पप्पू पर दबाव बनाया तो वह विचलित हो उठा. उस की समझ में आ गया कि शीला उस की नीयत जान गई है. अब उस की दाल गलने वाली नहीं है. शीला के पैसे उस ने खर्च कर दिए थे.  लाख रुपए की व्यवस्था वह कर नहीं सकता था. इसलिए शीला से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. शीला की हत्या करना उस के अकेले के वश का नहीं था, इसलिए उस ने एक पेशेवर बदमाश अवधेश से बात की.

अवधेश महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव खजुही का रहने वाला था. पप्पू से उस की दोस्ती भी थी. पनियरा थाने में उस के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट और राहजनी के कई मुकदमे दर्ज थे. योजना के मुताबिक, अवधेश ने 315 बोर के देशी कट्टे का इंतजाम किया. इस के बाद दोनों को मौके की तलाश थी. 22 जनवरी, 2014 की सुबह 7 बजे शीला ने पप्पू को फोन कर के पूछा कि इस समय वह कहां है, तो उस ने कहा कि इस समय वह शहर में है. कुछ देर में उस के पास पहुंच जाएगा.

इस के बाद शीला ने फोन काट दिया. जबकि सही बात यह थी कि पप्पू उस समय नौतनवा में मौजूद था. उस ने शीला से झूठ बोला था. शीला से बात करने के बाद उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया. दुर्गेश उर्फ पप्पू को वह मौका मिल गया, जिस की तलाश में वह था. उस ने अवधेश को तैयार किया और मोटरसाइकिल से शीला की ससुराल बनरहा 11 बजे के आसपास पहुंच गया. शीला उसी का इंतजार कर रही थी. चायनाश्ता करा कर शीला मायके जाने की बात कह कर उन के साथ निकल पड़ी. उस ने सास से कहा था कि 2-1 दिन में वह लौट आएगी.

दिन में कुछ हो नहीं सकता था. इसलिए पप्पू को किसी तरह रात करनी थी. इस के लिए वह कुसुम्ही के जंगल स्थित बुढि़या माई के मंदिर दर्शन करने गया. वहां से निकल कर वह सब के साथ शहर में घूमता रहा. अचानक रात साढ़े 8 बजे पप्पू को कुछ याद आया तो उस ने मोबाइल औन कर के फोन किया. उस समय वह चिलुयाताल के मोहरीपुर में था. इस के बाद वे कैंपियरगंज पहुंचे.

रात साढ़े 10 बजे के करीब पप्पू सब के साथ मोहम्मदपुर नवापार पहुंचा तो ठंड का मौसम होने की वजह से चारों ओर सुनसान हो चुका था. पप्पू ने अचानक मोटरसाइकिल सड़क के किनारे रोक दी. शीला ने रुकने की वजह पूछी तो पप्पू ने कहा कि पेशाब करना है. पेशाब करने के बहाने वह थोड़ा आगे बढ़ गया तो अवधेश शीला के पास पहुंचा और कमर में खोंसा तमंचा निकाला और उस के सीने से सटा कर ट्रिगर दबा दिया.

गोली लगते ही शीला के मुंह से एक भयानक चीख निकली. तभी उस ने कट्टे की नाल उस के मुंह में घुसेड़ कर दूसरी गोली चला दी. इसी के साथ बच्चे को गोद में लिए हुए शीला जमीन पर गिरी और मौत के आगोश में समा गई. उस का मासूम बेटा सीने से चिपका सोता ही रहा. अपना काम कर के पप्पू और अवधेश चले गए. टैक्सी ड्राइवर किशोर सुबह उधर से गुजरा तो उस ने सड़क किनारे पड़ी शीला की लाश देख कर थानाप्रभारी चौथीराम यादव को सूचना दी.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, 315 बोर का तमंचा और मोबाइल फोन बरामद कर लिया था. थाने की सारी काररवाई निबटा कर थानाप्रभारी चौथीराम ने पप्पू और अवधेश को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Suspense Story: प्यार की खातिर दोस्त को दगा

Suspense Story: सुबह के साढ़े 6 बजे थे. बिहार के मुंगेर शहर में रहने वाला प्रेमनारायण सिंह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा तो पास में खड़ी पत्नी शिवानी की तरफ देख कर मुसकराया. पत्नी भी पति की तरफ देख कर मंदमंद मुसकराई. उधर प्रेमनारायण सिंह की बाइक घर से मुश्किल से डेढ़ सौ मीटर आगे ब्रह्मï चौक पहुंची थी कि अचानक किसी ने पीछे से उस पर लगातार 2 फायर कर दिए. गोली लगते ही वह सडक़ पर गिर कर बुरी तरह तड़पनेे लगा.

सुबह की फिजा में गोली चलने की आवाज दूरदूर तक गूंज उठी. गोली की आवाज सुन आसपास के घरों से कुछ लोग निकल कर लहूलुहान प्रेमनारायण सिंह के समीप पहुंचे. किसी ने उस के घर जा कर प्रेमनारायण को गोली लगने की बात कही तो प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी और अन्य लोग रोतेबिलखते घायल प्रेमनारायण सिंह के पास पहुंचे और उसे तुरंत एक निजी क्लिनिक ले गए, लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

शिवानी ने फोन कर के मुंगेर के पूरब सराय पुलिस चौकी में अपने पति की हत्या की सूचना दी तो चौकी इंचार्ज राजीव कुमार कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर क्लिनिक पहुंच गए और प्रेमनारायण सिंह की लाश अपने कब्जे ले कर घटना की सूचना एसएचओ को दे दी. हत्या की खबरसुन कर एसएचओ भी क्लिनिक पहुंच गए. लाश का प्रारंभिक निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस वारदात वाली जगह ब्रह्मï चौक के निकट पहुंची और वहां का बारीकी से मुआयना करने लगी. सडक़ पर जहां प्रेमनारायण गोली लगने के बाद गिरा था, वहां पर काफी खून था. उस की बाइक भी वहीं पड़ी थी. वहां उपस्थित लोगों से पूछताछ करने पर बस इतना पता चला कि कोई बाइक सवार प्रेमनारायण को गोली मार कर फरार हो गया था.

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

कई लोगों से पूछताछ के बाद भी कोई भी बाइक का नंबर या उसेे चलाने वाले बदमाशों का हुलिया नहीं बता पाया. चौकी इंचार्ज राजीव कुमार ने प्रेमनारायण सिंह की पत्नी शिवानी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति की इलाके में किसी से दुश्मनी नहीं है. घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद पुलिस वापस लौट आई. शिवानी की शिकायत पर प्रेमनारायण सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसएचओ ने इस घटना के बारे में मुंगेर के एसपी जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी को विस्तार से जानकारी दी तो उन्होंने इस सनसनीखेज हत्याकांड के रहस्य से परदा हटाने के लिए एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एसडीपीओ (सदर) राजीव कुमार, ओपी प्रभारी राजीव कुमार, कासिम बाजार एसएचओ मिंटू कुमार, जमालपुर एसएचओ सर्वजीत कुमार, पूरब सराय चौकी इंचार्ज राजीव कुमार तथा अन्य कई सिपाही शामिल थे.

टीम ने इस मर्डर केस को सुलझाने के लिए घटनास्थल और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर बारीकी से उस की जांच शुरू की तो उन्होंने फुटेज में 2 बाइक सवारों के अलावा कुछ संदिग्ध चेहरों की पहचान की. इस के अलावा मृतक प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच में एक संदिग्ध नंबर मिला, जिस पर घटना के पहले और उस के बाद शिवानी धड़ल्ले से बातें कर रही थी. जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो वह नंबर गौरव कुमार नाम के युवक का निकला.

हत्या के पीछे निकली लव क्राइम की कहानी

जब गौरव कुमार को थाने में बुला कर उस के और शिवानी के बीच मोबाइल पर चल रही लंबी बातचीत के बारे में पूछताछ की गई तो गौरव ने बताया कि वह प्रेमनारायण का दोस्त है, इसलिए उस का उन के घर आनाजाना है. इसी वजह से वह शिवानी से बातें करता है. लेकिन हैरत की बात थी कि जितनी वह शिवानी से बातें करता था, उतनी बातें शिवानी अपने पति से भी नहीं करती थी.

मामला संदेहास्पद लगा, इसलिए जब गौरव को थाने में बुला कर पूछताछ की गई तो थोड़ी देर के बाद उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में अपना जुर्म स्वीकार करते हुए पुलिस टीम को जो बातें बताईं, उस में पति पत्नी और वो के रिश्तों में उलझी लव क्राइम की एक दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई. उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में शामिल सभी लोगों के नामपते बताए, जिस में प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी तथा शूटर अभिषेक कुमार, इंद्रजीत कुमार, मोहम्मद इरशाद, राजीव, दीपक कुमार उर्फ दीपू थे. गौरव कुमार को हिरासत में लेने के बाद पुलिस टीम मृतक प्रेमनारायण के घर पहुंची और पति की मौत का नाटक कर रही शिवानी को हिरासत में ले लिया गया.

10 और 11 अगस्त को 2 आरोपी और 12 अगस्त को 3 आरोपियों को उन के ठिकानों पर दबिश डाल कर गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद इस हत्याकांड के पीछे जो खौफनाक कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है. 32 वर्षीय प्रेमनारायण सिंह मुंगेर के वार्ड नंबर 14 में अपनी पत्नी शिवानी और 4 साल की बेटी के साथ रहता था. करीब 5 साल पहले दोनों की शादी हुई थी. प्रेमनारायण मुंगेर में ही स्थित आईटीसी कंपनी में नौकरी करता था.

नौकरीपेशा होने की वजह से प्रेमनारायण सिंह के जीवन में हर प्रकार का सुखवैभव मौजूद था, लेकिन इस घर में उन के बड़े भाई का परिवार भी रहता था. शिवानी को जौइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं था. इस के अलावा शिवानी की सास भी रहती थी. शिवानी के ससुर की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी थी. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होने से शिवानी घर में अपनी मनमरजी से नहीं रह पाती थी. जबकि वह बिना किसी रोकटोक के आजाद रहना पसंद करती थी. ऐसा तभी संभव था, जब वह बाकी लोगों से अलग हो कर कहीं दूसरा घर खरीद लेते या किराए के मकान में रहने चले जाते.

प्रेमनारायण इस घर को छोड़ कर कहीं भी जाना नहीं चाहता था. यहां से जाने पर एक तो उसे घर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते, दूसरे उसे अपनी मां और भाईभाभी से अलग होना पड़ जाता, जोकि वह चाहता नहीं था. रोजरोज की इस घरेलू कलह से बचने के लिए प्रेमनारायण ने अपने एक दोस्त गौरव कुमार की मदद ली.

दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध का खेल

गौरव कुमार मुंगेर के नजदीक नंदलालपुर का रहने वाला था और उसी के साथ सिगरेट फैक्ट्री में काम करता था. दोनों के बीच खूब जमती थी. वे रोज अपने घरों का हाल अकसर एकदूसरे को बताते रहते थे. कहते हैं कि अपनी परेशानी बांटने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है. इसी कारण प्रेमनारायण अपनी परेशानी गौरव के साथ शेयर कर लेता था. प्रेमनारायण के घर का हाल जानने के बाद गौरव भी उस के घर की समस्या हल करने में मदद करने की कोशिश करता.

2023 के जनवरी महीने में गौरव ने प्रेमनारायण के घर आनाजाना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त का पक्ष ले कर शिवानी को मनाने का प्रयास करना शुरू किया, लेकिन कुछ ही मुलाकातों के बाद शिवानी की बातों का गौरव के दिलोदिमाग पर कुछ ऐसा जादू हुआ कि वह जिस दिन शिवानी से नहीं मिलता, उस के दिल को सुकून नहीं मिलता था. शिवानी जानती थी कि गौरव कुंआरा है. वह गौरव को पसंद करने लगी. गौरव को जब भी वक्त मिलता, वह शिवानी को समझाने के बहाने उस से मिलने आ जाता. कुछ ही दिनों में उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात हो गए. उधर गौरव और शिवानी दोनों ने प्रेमनारायण को सदा अंधरे में रखा.

गौरव और शिवानी बड़ी खामोशी से प्यार की पींगें बढ़ाते रहे. प्रेमनाराण को कभी गौरव और शिवानी के अवैध संबंधों की भनक तक नहीं लगी. जब उन के अंतरंग संबंध प्रगाढ़ हो गए तो उन्होंने प्रेमनारायण को अपने रास्ते से सदा के लिए हटाने का फैसला कर लिया. गौरव ने शिवानी को समझाया कि प्रेमनारायण की हत्या के बाद उस की जगह पर तुम्हारी नौकरी लग जाएगी.

कुछ समय के बाद जब मामला ठंडा पड़ जाएगा, तब हम दोनों आपस में शादी कर लेंगे. इस बीच हम दुनिया वालों की आखों में धूल झोंक कर मिलते रहेंगे. शिवानी इस बात के लिए तैयार हो गई. तब गौरव कुमार अपने कुछ जानकारों की मदद से कुछ शातिर बदमाशों से मिला, जो सुपारी ले कर हत्या की वारदात को अंजाम देते थे. बदमाशों से प्रेमनारायण की हत्या की बात 7 लाख रुपए में तय हो गई. शिवानी ने बदमाशों को देने के लिए 7 लाख रुपए गौरव को सौंप दिए.

सुपारी दे कर शूटरों से कराई हत्या

4 अगस्त, 2023 को बेगूसराय का शूटर अभिषेक कुमार और समस्तीपुर का शूटर इंद्रजीत तथा मोहम्मद इरशाद मुंगेर स्थित गौरव कुमार के ठिकाने पर पहुंचे. गौरव कुमार मुंगेर के मंगल बाजार स्थित माधोपुर में किराए का कमरा ले कर रहता था. मुस्सफिल थाना क्षेत्र के नंदलालपुर से 2 बदमाश राजीव कुमार तथा दीपक कुमार उर्फ दीपू भी वहां पहुंचे. इन दोनों ने 5 अगस्त को प्रेमनारायण के घर के बाहर मौजूद रह कर उस की रेकी की. 6 अगस्त, 2023 की सुबह प्रेमनारायण सिंह जैसे ही अपनी बाइक से ड्यूटी जाने के लिए घर से निकला. पीछे से अभिषेक कुमार भी बाइक चलाते हुए उस के निकट पहुंचा और पीछे बैठे इंद्रजीत ने प्रेमनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी.

घटना को अंजाम देने के बाद अभिषेक कुमार और शूटर इंद्रजीत मुख्य आरोपी गौरव कुमार के मंगल बाजार स्थित कमरे पर पहुंचे. वहां अपने हथियारों को छोड़ कर सभी मुंगेर से फरार हो गए. पुलिस एसआईटी की टीम ने गौरव के कमरे से 2 देशी पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और 2 चले हुए कारतूस के खोखे बरामद कर लिए. कथा लिखे जाने तक मुंगेर पुलिस ने इस घटना में शामिल आरोपी गौरव समेत कुल 7 बदमाशों को गिरफ्तार कर मुंगेर की जिला अदालत में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story Hindi: नाबालिग मोहब्बत का तीखा जहर

Crime Story Hindi: रोमिला अपनी बेटी सलोनी के साथ लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहती थी. उस का 3 मंजिल का मकान था. पहली दोनों मंजिलों पर रहने के लिए कमरे थे और तीसरी मंजिल पर गोदाम बना था, जहां कबाड़ और पुरानी चीजें रखी रहती थीं.

ईसाई समुदाय की रोमिला मूलत: सुल्तानपुर जिले की रहने वाली थी. उस ने जौन स्विंग से प्रेम विवाह किया था. सलोनी के जन्म के बाद रोमिला और जौन स्विंग के संबंध खराब हो गए. रोमिला ने घुटघुट कर जीने के बजाय अपने पति जौन स्विंग से तलाक ले लिया. इसी बीच रोमिला को लखनऊ के सरकारी अस्पताल में टैक्नीशियन की नौकरी मिल गई. वेतन ठीकठाक था. इसलिए वह अपनी आगे की जिंदगी अपने खुद के बूते पर गुजारना चाहती थी.

स्विंग से प्यार, शादी और फिर तलाक ने रोमिला की जिंदगी को बहुत बोझिल बना दिया था. कम उम्र की तलाकशुदा महिला का समाज में अकेले रहना सरल नहीं होता, इस बात को ध्यान में रखते हुए रोमिला ने अपने को धर्मकर्म की बंदिशों में उलझा लिया. समय गुजर रहा था, बेटी बड़ी हो रही थी. रोमिला अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर बड़ा बनाना चाहती थी. क्योंकि अब उस का भविष्य वही थी. सलोनी कावेंट स्कूल में पढ़ती थी, पढ़ने में होशियार. रोमिला ने लाड़प्यार से उस की परवरिश लड़कों की तरह की थी.

सलोनी भी खुद को लड़कों की तरह समझने लगी थी. वह जिद्दी स्वभाव की तो थी ही गुस्सा भी खूब करती थी. जन्म के समय ही कुछ परेशानियों के कारण सलोनी के शरीर के दाएं हिस्से में पैरालिसिस का अटैक पड़ा था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उस का असर करीब करीब खत्म हो गया था. सलोनी बौबकट बाल रखती थी. उस की उम्र हालांकि 15 साल थी पर वह अपनी उम्र से बड़ी दिखाई देती थी. वह लड़कों की तरह टीशर्ट पैंट पहनती थी. सलोनी के साथ पढ़ने वाले लड़के लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल करते थे. सलोनी ने भी मां से जिद कर के स्मार्टफोन खरीदवा लिया.

रोमिला जानती थी कि आजकल के बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगा कर फेसबुक और वाट्सएप जैसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं जो सलोनी जैसी कम उम्र लड़की के लिए ठीक नहीं है. लेकिन एकलौती बेटी की जिद के सामने उसे झुकना पड़ा. रोमिला सुबह 8 बजे अस्पताल जाती थी और शाम को 4 बजे लौटती थी. सलोनी भी सुबह 8 बजे स्कूल चली जाती थी और 2 बजे वापस आती थी. कठिन जीवन जीने के लिए रोमिला ने बेड की जगह घर में सीमेंट के चबूतरे बनवा रखे थे. मांबेटी बिस्तर डाल कर इन्हीं चबूतरों पर सोती थीं.

रोमिला को अस्पताल से 45 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. इस के बावजूद मांबेटी का खर्च बहुत कम था. रोमिला जो खाना बनाती थी वह कई दिन तक चलता था. मोबाइल फोन लेने के बाद सलोनी ने इंटरनेट के जरीए अपना फेसबुक पेज बना लिया था. वह अकसर अपने दोस्तों से चैटिंग करती रहती थी. इसी के चलते उस के कई नए दोस्त बन गए थे. उस के इन्हीं दोस्तों में से एक था पश्चिम बंगाल के मालदा का रहने वाला सुदीप दास. 19 साल का सुदीप एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता था.

उस के घर की हालत ठीक नहीं थी. उस का पिता सुधीरदास मालदा में मिठाई की एक दुकान पर काम करता था. जबकि मां कावेरी घरेलू महिला थी. उस का छोटा भाई राजदीप कोई काम नहीं करता था. सुदीप और उस के पिता की कमाई से ही घर का खर्च चलता था. सुदीप और सलोनी के बीच चैटिंग के माध्यम से जो दोस्ती हुई धीरेधीरे प्यार तक जा पहुंची. नासमझी भरी कम उम्र का तकाजा था. चैटिंग करतेकरते सुदीप और सलोनी एकदूसरे के प्यार में पागल से हो गए. स्थिति यह आ गई कि सुदीप सलोनी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा.

दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. सो दोनों खूब बातें करते थे. मोबाइल पर ही दोनों की मिलने की बात तय हुई. सितंबर 2013 में सुदीप सलोनी से मिलने लखनऊ आ गया. सलोनी ने सुदीप को अपनी मां से मिलवाया. रोमिला बेटी को इतना प्यार करती थी कि उस की हर बात मानने को तैयार रहती थी. 2 दिन लखनऊ में रोमिला के घर पर रह कर सुदीप वापस चला गया. अक्तूबर में सलोनी का बर्थडे था. उस के बर्थडे पर सुदीप फिर लखनऊ आया. अब तक सलोनी ने सुदीप से अपने प्यार की बात मां से छिपा कर रखी थी. लेकिन इस बार उस ने अपने और सुदीप के प्यार की बात रोमिला को बता दी.

सलोनी और सुदीप दोनों की ही उम्र ऐसी नहीं थी कि शादी जैसे फैसले कर सकें. इसलिए रोमिला ने दोनों को समझाने की कोशिश की. ऊंचनीच दुनियादारी के बारे में बताया. लेकिन सुदीप और सलोनी पर तो प्यार का भूत चढ़ा था. रोमिला को इनकार करते देख सुदीप बड़े आत्मविश्वास से बोला, ‘‘आंटी, आप चिंता न करें. मैं सलोनी का खयाल रख सकता हूं. मैं खुद भी नौकरी करता हूं और मेरे पिताजी भी. हमारे घर में भी कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

बातचीत के दौरान रोमिला सुदीप के बारे में सब कुछ जान गई थी. इसलिए सोचविचार कर बोली, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी सारी बातें अपनी जगह सही हैं. मुझे इस रिश्ते से भी कोई ऐतराज नहीं है. पर मैं यह रिश्ता तभी स्वीकार करूंगी जब तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगोगे. आजकल 10-5 हजार की नौकरी में घरपरिवार नहीं चलते. अभी तुम दोनों में बचपना है.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं आप की बात मान लेता हूं. लेकिन आप वादा करिए कि आप उसे मुझ से दूर नहीं करेंगी. जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो सलोनी को अपनी बनाने आऊंगा.’’ सुदीप ने फिल्मी हीरो वाले अंदाज में रोमिला से अपनी बात कही.

इस बार सुदीप सलोनी के घर पर एक सप्ताह तक रहा. इसी बीच रोमिला ने सुदीप से स्टांप पेपर पर लिखवा लिया कि वह किसी लायक बन जाने के बाद ही सलोनी से शादी करेगा. इस के बाद सुदीप अपने घर मालदा चला गया. लेकिन लखनऊ से लौटने के बाद उस का मन नहीं लग रहा था. जवानी में, खास कर चढ़ती उम्र में महबूबा से बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता. कामधाम, भूखप्यास, घरपरिवार सब बेकार लगने लगते हैं. सुदीप का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस की आंखों के सामने सलोनी का गोलगोल सुंदर चेहरा और बोलती हुई आंखें घूमती रहती थीं. वह किसी भी सूरत में उसे खोने के लिए तैयार नहीं था.

जब नहीं रहा गया तो 10 दिसंबर, 2013 को सुदीप वापस लखनऊ आया और रोमिला को बहका फुसला कर सलोनी को मालदा घुमाने के लिए साथ ले गया. हालांकि सलोनी की मां रोमिला इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. लेकिन सलोनी ने उसे मजबूर कर दिया. दरअसल मां के प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं होती थी. रोमिला के लिए बेटी ही जीने का सहारा थी. वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. इस लिए वह सलोनी की जिद के आगे झुक गई. करीब ढाई माह तक सलोनी सुदीप के साथ मालदा में रही.

मार्च, 2014 में सलोनी वापस आ गई. सुदीप भी उस के साथ आया था. बेटी का बदला हुआ स्वभाव देख कर रोमिला को झटका लगा. सलोनी उस की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी. पति से अलग होने के बाद रोमिला ने सोचा था कि वह बेटी के सहारे अपना पूरा जीवन काट लेगी. अब वह बेटी के दूर जाने की कल्पना मात्र से बुरी तरह घबरा गई थी.

लेकिन हकीकत वह नहीं थी जो रोमिला देख या समझ रही थी. सच यह था कि सलोनी का मन सुदीप से उचट गया था. उस का झुकाव यश नाम के एक अन्य लड़के की ओर होने लगा था. जबकि सुदीप हर हाल में सलोनी को पाना चाहता था. वह कई बार उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर चुका था. यह बात मांबेटी दोनों को नागवार गुजरने लगी थी. रोमिला ने अस्पताल से 1 मार्च, 2014 से 31 मार्च तक की छुट्टी ले रखी थी. उस ने अस्पताल में छुट्टी लेने की वजह बेटी की परीक्षाएं बताई थीं.

7 अप्रैल, 2014 की सुबह रोमिला के मकान के पड़ोस में रहने वाले रणजीत सिंह ने थाना गाजीपुर आ कर सूचना दी कि बगल के मकान में बहुत तेज बदबू आ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालकिन रोमिला काफी दिनों से घर पर नहीं है. सूचना पा कर एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही, सीनियर इंसपेक्टर रामराज कुशवाहा और सिपाही अरूण कुमार सिंह रोमिला के मकान पर पहुंच गए.

देखने पर पता चला कि मकान के ऊपर के हिस्से में बदबू आ रही थी. पुलिस ने फोन कर के मकान मालकिन रोमिला को बुला लिया. वहां उस के सामने ही मकान खोल कर देखा गया तो पूरा मकान गंदा और रहस्यमय सा नजर आया. सिपाही अरूण कुमार और एसएसआई रामराज कुशवाहा तलाशी लेने ऊपर वाले कमरे में पहुंचे तो कबाड़ रखने वाले कमरे में एक युवक की सड़ीगली लाश मिली.

पुलिस ने रोमिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह लाश मालदा, पश्चिम बंगाल के रहने वाले सुदीप दास की है. वह उस की बेटी सलोनी का प्रेमी था और उस से शादी करना चाहता था. जब सलोनी ने इनकार कर दिया तो सुदीप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. रोमिला ने आगे बताया कि इस घटना से वह बुरी तरह डर गई थी. उसे लग रहा था कि हत्या के इल्जाम में फंस जाएगी. इसलिए वह घर को बंद कर के फरार हो गई थी.

पुलिस ने रोमिला से नंबर ले कर फोन से सुदीप के घर संपर्क किया और इस मामले की पूरी जानकारी उस के पिता को दे दी. लेकिन उस के घर वाले लखनऊ आ कर मुकदमा कराने को तैयार नहीं थे. कारण यह कि वे लोग इतने गरीब थे कि उन के पास लखनऊ आने के लिए पैसा नहीं था. इस पर एसओ गाजीपुर ने अपनी ओर से मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच शुरू कर दी. प्राथमिक काररवाई के बाद सुदीप की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

8 अप्रैल 2014 को सुदीप की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जो सच सामने आया, वह चौंका देने वाला था. इस बीच सलोनी भी आ गई थी. रोमिला और उस की बेटी सलोनी ने अपने बयानों में कई बातें छिपाने की कोशिश की थी. लेकिन उन के अलगअलग बयानों ने उन की पोल खोल दी. एसपी ट्रांस गोमती हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय पुलिस विवेचना पर नजर रख रहे थे जिस से इस पूरे मामले का बहुत जल्दी पर्दाफाश हो गया. मांबेटी से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई वह कुछ इस तरह थी.

13 मार्च, 2014 की रात को सलोनी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. इसी बीच सुदीप उस से झगड़ने लगा. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने मांबेटी दोनों को कितनी बार समझाया है कि मुझे खीर में इलायची डाल कर खाना पसंद नहीं है. लेकिन तुम लोगों पर मेरी बात का कोई असर नहीं होता.’’

उस की इस बात पर सलोनी को गुस्सा आ गया. उस ने सुदीप को लताड़ा, ‘‘तुम मां से झगड़ने के बहाने तलाश करते रहते हो. बेहतर होगा, तुम यहां से चले जाओ. मैं तुम से किसी तरह की दोस्ती नहीं रखना चाहती.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं? मैं ने स्टांपपेपर पर लिख कर दिया है, तुम्हें मेरे साथ ही शादी करनी होगी. बस तुम 18 साल की हो जाओ. तब तक मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूंगा और फिर तुम से शादी कर के तुम्हें साथ ले जाऊंगा. अब तुम्हारी मां चाहे भी तो तुम्हारी शादी किसी और से नहीं करा सकती.’’ सुदीप ने भी गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो तुम्हें इतना मुंह लगा लिया.’’ कह कर सलोनी ऊपर चली गई. वहां उस की मां पहले से दोनों का लड़ाईझगड़ा देख रही थी.

‘‘सुदीप, तुम मेरे घर से चले जाओ.’’ रोमिला ने बेटी का पक्ष लेते हुए चेतावनी भरे शब्दों में कहा तो सुदीप उस से भी लड़नेझगड़ने लगा. यह देख मांबेटी को गुस्सा आ गया. सुदीप भी गुस्से में था. उस ने मांबेटी के साथ मारपीट शुरू कर दी. जल्दी ही वह दोनों पर भरी पड़ने लगा. तभी रोमिला की निगाह वहां रखी हौकी स्टिक पर पड़ी.

रोमिला ने हौकी उठा कर पूरी ताकत से सुदीप के सिर पर वार किया. एक दो नहीं कई वार. एक साथ कई वार होने से सुदीप की वहीं गिर कर मौत हो गई. सुदीप की मृत्यु के बाद मांबेटी दोनों ने मिल कर उस की लाश को बोरे में भर कर कबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद अगली सुबह दोनों घर पर ताला लगा कर गायब हो गईं. पुलिस को उलझाने के लिए रोमिला ने बताया कि वह यह सोच कर डर गई थी कि सुदीप का भूत उसे परेशान कर सकता है. इसलिए, वे दोनों हवन कराने के लिए हरिद्वार चली गई थीं.

सलोनी ने भी 14 मार्च को अपनी डायरी में लिखा था, ‘आत्माओं ने सुदीप को मार डाला. हम फेसबुक पर एकदूसरे से मिले थे. आत्माओं के पास लेजर जैसी किरणें हैं. वह हमें नष्ट कर देंगी. आत्माएं हमें फंसा देंगी.’ सलोनी ने इस तरह की और भी तमाम अनापशनाप बातें डायरी में लिखी थीं. रोमिला भी इसी तरह की बातें कर रही थी. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि मांबेटी हरिद्वार वगैरह कहीं नहीं गई थी बल्कि दोनों लखनऊ में इधरउधर भटक कर अपना समय गुजारती रही थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि इस मामले को कैसे सुलझाएं, क्योंकि सुदीप की लाश घर में पड़ी थी.

बहरहाल, उस की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो गया था कि मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का था. गाजीपुर पुलिस ने महिला दारोगा नीतू सिंह, सिपाही मंजू द्विवेदी और उषा वर्मा को इन मांबेटी से राज कबूलवाने पर लगाया. जब उन्हें बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुदीप की मौत का का कारण सिर पर लगी चोट को बताया गया है, तो वे टूट गईं. दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. रोमिला की निशानदेही पर हौकी स्टिक भी बरामद हो गई.

8 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने मां रोमिला को जेल और उस की नाबालिग बेटी सलोनी को बालसुधार गृह भेज दिया. जो भी जैसे भी हुआ हो, लेकिन सच यह है कि फेसबुक की दोस्ती की वजह से सुदीप का परिवार बेसहारा हो गया है.

पुलिस उस के परिवार को बारबार फोन कर के लखनऊ आ कर बेटे का दाह संस्कार कराने के लिए कह रही थी. लेकिन वे लोग आने को तैयार नहीं थे. सुदीप की लाश लखनऊ मेडिकल कालेज के शवगृह में रखी थी. एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही ने सुदीप के पिता सुधीर दास को समझाया और भरोसा दिलाया कि वह लखनऊ आएं, वे उन की पूरी मदद करेंगे. पुलिस का भरोसा पा कर सुदीप का पिता सुधीर दास लखनऊ आया. बेटे की असमय मौत ने उस का कलेजा चीर दिया था.

सुधीर दास पूरे परिवार के साथ लखनऊ आना चाहता था लेकिन उस के पास पैसा नहीं था. इसलिए परिवार का कोई सदस्य उस के साथ नहीं आ सका. वह खुद भी पैसा उधार ले कर आया था. सुधीर दास की हालत यह थी कि बेटे के दाह संस्कार के लिए भी उस के पास पैसा नहीं था. जवान बेटे की मौत से टूट चुका सुधीर दास पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रहा था. उन की हालत देख कर गाजीपुर पुलिस ने अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम किया और सुदीप का क्रियाकर्म भैंसाकुंड के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पर किया. सुदीप की अभागी मां कावेरी और भाई राजदीप तो उसे अंतिम बार देख भी नहीं सके.

क्रियाकर्म के बाद पुलिस ने ही सुधीर के वापस मालदा जाने का इंतजाम कराया. गरीबी से लाचार यह पिता बेटे की हत्या करने वाली मांबेटी को सजा दिलाने के लिए मुकदमा भी नहीं लड़ना चाहता. अनजान से मोहब्बत और उस से शादी की जिद ने सुदीप की जान ले ली. सुदीप अपने परिवार का एकलौता कमाऊ बेटा था. उस के जाने से पूरा परिवार पूरी तरह से टूट गया है. सलोनी और सुदीप की एक गलती ने 2 परिवारों को तबाह कर दिया है. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में आरोपी सलोनी का नाम परिवर्तित है.

Crime Stories: शादी पर दिया मौत का तोहफा

Crime Stories: ‘‘मैं जया को बेइंतहा चाहता था, बहुत प्यार करता था उस से. इतना प्यार कि मैं पागल हो गया था उस के लिए. अपने जीतेजी मैं उसे किसी और की जागीर बनते नहीं देख सकता था. इसलिए मैं ने उसे मौत के घाट उतार दिया.’’ कहतेकहते अनुराग पलभर के लिए रुका, फिर आगे बोला, ‘‘अब ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, फांसी हो जाएगी. मुझे फांसी भी मंजूर है. कम से कम एक बार में ही मौत तो आ जाएगी. वह किसी और की हो जाती तो मुझे रोजरोज मरना पड़ता.’’

पुलिस हिरासत में यह सब कहते हुए अनुराग नामदेव अपना गुनाह कुबूल कर रहा था या फिर अपनी मोहब्बत की दास्तां सुना कर दिल की भड़ास निकाल रहा था, समझ पाना मुश्किल था. उस की ये बातें सुन कर वहां मौजूद पुलिसकर्मी भी हैरान थे. वजह यह कि इस कातिल के चेहरे पर शर्मिंदगी या पछतावा तो दूर की बात, किसी भी तरह का डर नहीं था.पुलिस हिरासत में अच्छे अच्छे अपराधियों के कसबल ढीले पड़ जाते हैं, पर अनुराग का आत्मविश्वास वाकई अनूठा था. उस की हर बात जया से अपनी मोहब्बत के इर्दगिर्द  घूम रही थी. मानों दुनिया में उस के लिए जया और उस के प्यार के अलावा और कुछ था ही नहीं.

लालघाटी क्षेत्र भोपाल का वह हिस्सा है, जहां शहर खत्म हो जाता है और उपनगर बैरागढ़ शुरू होता है. लालघाटी का चौराहा और रास्ता दोनों भोपाल-इंदौर मार्ग पर पड़ते हैं, जहां चौबीसों घंटे आवाजाही रहती है. एयरपोर्ट भी इसी रास्ते पर है और शहर का चर्चित वीआईपी रोड भी इसी चौराहे पर आ कर खत्म होता है.पिछले 15 सालों में लालघाटी चौराहे और बैरागढ़ के बीच करीब 2 दर्जन छोटेबड़े मैरिज गार्डन बन गए  . इन्हीं में एक है सुंदरवन मैरिज गार्डन. शादियों के मौसम में यह इलाका काफी गुलजार हो उठता है. रास्ते के दोनों तरफ बारातें ही बारातें दिखती हैं. घोड़ी पर सवार दूल्हे, उन के आगे नाचतेगाते बाराती और आसमान छूती रंगबिरंगी आतिशबाजी. नजारा वाकई देखने वाला होता है. शादियों के चलते इस रास्ते पर ट्रैफिक जाम की समस्या आम बात है.

8 मई को सुंदरवन मैरिज गार्डन में रोजाना के मुकाबले कुछ ज्यादा रौनक और चहलपहल थी. रात 8 बजे से ही मेहमानों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था. इस मैरिज गार्डन में डा. जयश्री नामदेव और डा. रोहित नामदेव की शादी होनी थी. वरवधू दोनों ही भोपाल के हमीदिया अस्पताल में कार्यरत थे. डा. जयश्री बाल रोग विभाग में थीं और डा. रोहित सर्जरी डिपार्टमेंट में कार्यरत थे.

जयश्री और रोहित की शादी एक तरह से अरेंज मैरिज थी. जयश्री नामदेव 4 साल पहले ही जबलपुर मेडिकल कालेज से पीजी की डिग्री ले कर भोपाल के हमीदिया अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के पद पर तैनात हुई थीं. जयश्री के आने से पहले हमीदिया अस्पताल में एक ही डाक्टर नामदेव थे डा. रोहित. अब दूसरी नामदेव डा. जयश्री आ गई थीं. डा. जयश्री स्वभाव से बेहद हंसमुख और मिलनसार थीं. अस्पताल में स्वाभाविक तौर पर उन की खूबसूरती की चर्चा भी होती रहती थी.

अस्पताल में नामदेव सरनेम वाले 2 डाक्टर थे और दोनों कुंवारे. अगर दोनों शादी कर लें तो कितना अच्छा रहेगा. जयश्री और रोहित को ले कर अस्पताल में अकसर इस तरह का हंसीमजाक होता रहता था. डा. जयश्री के पिता घनश्याम नामदेव को जब पता चला कि उन्हीं की जाति का एक लड़का हमीदिया अस्पताल में डाक्टर है तो उन्होंने अपने स्तर पर पता लगा कर जयश्री की शादी की बातचीत चलाई.रोहित के पिता रघुनंदन नामदेव जिला हरसूद के गांव छनेरा के रहने वाले थे और सिंचाई विभाग में कार्यरत थे. जयश्री और  की शादी की बात चली तो रोहित के घर वाले भी तैयार हो गए. दोनों ही परिवारों के लिए यह खुशी की बात थी, क्योंकि नामदेव समाज में गिनती के ही लड़के लड़कियां डाक्टर हैं.

घनश्याम नामदेव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल के कर्मचारी थे, जो रिटायरमेंट के बाद भोपाल के करोंद इलाके में बस गए थे. करोंद में उन्होंने खुद का मकान बनवा लिया था. उन की पत्नी लक्ष्मी घरेलू लेकिन जिम्मेदार महिला थीं. नामदेव दंपति की एक ही बेटी थी जयश्री. होनहार और मेधावी जयश्री ने 2003 में प्री मेडिकल परीक्षा पास करने के बाद भोपाल के गांधी मैडिकल कालेज से एमबीबीएस किया था और फिर जबलपुर मैडिकल कालेज से पोस्ट ग्रेजुएट.

बहरहाल, डा. रोहित और डा. जयश्री की शादी तय हो गई. 3 फरवरी, 2014 को पुराने भोपाल के एक होटल में रोहित और जयश्री की सगाई की रस्म पूरी की गई. सगाई के बाद दोनों पक्ष शादी की तैयारियों में लग गए.घनश्याम की छोटी बहन अंगूरीबाई का विवाह सागर जिले के गढ़ाकोटा कस्बे में हुआ था. अब से डेढ़ साल पहले उस के पति कल्लूराम की कैंसर से मौत हो गई थी. बहनोई के अंतिम संस्कार का सारा  घनश्याम ने ही उठाया था. अंगूरीबाई के 2 बेटे थे अनुराग नामदेव और अंबर नामदेव. अंबर अभी पढ़ रहा था.  इस परिवार का खरचा कपड़ों के पुश्तैनी व्यापार से चलता था. लेकिन उन का यह व्यापार मामूली स्तर का था, जिसे कल्लूराम के छोटे भाई उमाशंकर नामदेव संभालते थे.

पति की मृत्यु के बाद अंगूरी की सारी दुनिया अपने दोनों बेटों के इर्दगिर्द सिमट कर रह गई थी, क्योंकि वह खुद भी कैंसर की चपेट में आ गई थी. बहन की वजह से घनश्याम उस के और उस के बच्चों को ले कर चिंतित रहते थे. समयसमय पर वह उन की हर मुमकिन मदद भी करते रहते थे.जब कल्लूराम जीवित थे तो  दफा उन्होंने घनश्याम से अनुराग की नौकरी के लिए बात छेड़ी थी. इस पर उन्होंने उसे भोपाल आ कर बैंकिंग की कोचिंग लेने को कहा था. अनुराग को सहूलियत यह थी कि रहने और खानेपीने के लिए मामा का घर था. घनश्याम ने कोचिंग की फीस देने के लिए भी कह दिया था. यह सन 2005 की बात है. तब जयश्री एमबीबीएस के दूसरे साल में थी.

मामा से बातचीत के बाद अनुराग भोपाल आ गया और सबधाणी कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करने लगा. मामा मामी और ममेरी बहन जयश्री उस का पूरा खयाल रखती थी. सभी को उस के घर के हालात की वजह से सहानुभूति थी. कोचिंग के दौरान एक बार अनुराग गंभीर रूप से बीमार पड़ा तो जयश्री और उस के मामा मामी ने उसे हमीदिया अस्पताल में भरती करवाया. उस की देखभाल से ले कर उस के इलाज का सारा खर्च भी उन्होेंने ही उठाया. मामा के यहां रहते हुए अनुराग जयश्री को एकतरफा प्यार करने लगा था.

कोचिंग के बाद अनुराग का चयन एचडीएफसी बैंक में पीओ के पद पर हो गया. उसे पोस्टिंग मिली सागर में. नौकरी जौइन करने के बाद वह सागर के पौश इलाके सिविल लाइंस में किराए का मकान ले कर रहने लगा. लेकिन सागर जाने के बाद भी भोपाल से उस का नाता नहीं टूटा. अनुराग जयश्री को प्यार से जया कहता था, लेकिन उस का यह प्यार एक भाई का नहीं, बल्कि एक ऐसे आशिक का था, जिसे न तो रिश्तेनातों का लिहाज था और न मान मर्यादाओं की परवाह.

दरअसल अनुराग मन ही मन जयश्री को चाहने लगा था और यह मान कर चल रहा था कि वह भी उसे चाहती है. नजदीकी रिश्तों में इस उम्र में दैहिक आकर्षण स्वाभाविक बात है, पर समझ आने के बाद वह खुद ब खुद खत्म हो जाता है. लेकिन अनुराग यह बात समझने को तैयार नहीं था कि हिंदू सभ्यता में सामाजिक रूप से भी और कानूनी रूप से भी ऐसे रिश्तों में प्यार, सैक्स और शादी सब कुछ वर्जित है.

अनुराग ने जब अपना प्यार जयश्री पर जाहिर किया तो वह सकते में आ गई. अनुराग उस का फुफेरा भाई था और जयश्री को सपने में भी उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. जयश्री ने अपने स्तर पर ही अनुराग को समझाने की कोशिश की. लेकिन अनुराग आसानी से समझने वालों में नहीं था. जब भी मौका मिलता, वह उस से अपने प्यार की दुहाई दे कर शादी की बात कहता रहता. जब अनुराग जयश्री पर बराबर दबाव बनाने की कोशिश करने लगा तो मजबूरी में उस ने यह बात अपने मातापिता को बता दी.

हकीकत जान कर लक्ष्मी और घनश्याम के पैरों तले से जमीन खिसक गई. फिर भी उन्होंने बेटी को सब्र और समझदारी से काम लेने की सलाह दी और जल्दी ही इस परेशानी का हल निकालने का भरोसा दिलाया. निकट की रिश्तेदारी का मामला था. ऐसे में इस का एक ही रास्ता था कि अंगूरी से बात की जाए, ताकि संबंध खराब न हों. बात की भी गई. बड़े भाई के उपकारों तले दबी अंगूरी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वह अनुराग को समझाएगी.

लेकिन अनुराग के तथाकथित प्यार का पागलपन समझने समझाने की हदें पार कर चुका था. मां के समझाने पर वह मान भी गया, पर दिखावे और कुछ दिनों के लिए. वक्त गुजरता रहा, लेकिन अनुराग के दिलोदिमाग से ममेरी बहन जयश्री की प्रेमिका की छवि नहीं मिट सकी. मायूस हो कर वह लुटेपिटे आशिकों की तरह दर्द भरे गानों और शेरोशायरी में अपने बीमार दिल की दवा ढूंढने लगा. लेकिन इस से उस का दर्द बढ़ता ही गया.

3 फरवरी को जयश्री और रोहित की सगाई थी. जयश्री के पिता घनश्याम ने इस की भनक अनुराग को नहीं लगने दी. लेकिन रोहित ने सगाई के 2 दिनों बाद 5 फरवरी को अपनी सगाई के फोटो फेसबुक पर शेयर किए तो उन्हें देख कर अनुराग बिफर उठा. उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने उस के जख्मों पर नमक छिड़क दिया हो.

उस ने बगैर वक्त गंवाए घनश्याम और जयश्री से संपर्क कर के न केवल शादी की अपनी बेहूदी ख्वाहिश जाहिर की, बल्कि न मानने पर उन्हें देख लेने की धमकी भी दे डाली. उस की बात सुन कर घनश्याम चिंता में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्योंकि कोई कानूनी काररवाई करते तो बदनामी का डर था. वैसे भी एक तो सगी बहन के लड़के का मामला था, दूसरे ऐसे मामलों में बात उछलने पर बदनामी लड़की की ही होती है.

डा. जयश्री इसलिए ज्यादा चिंतित नहीं थी, क्योंकि उन्होंने अपने मंगेतर डा. रोहित को अनुराग के बारे में सब कुछ बता दिया था. यह एक पढ़ीलिखी युवती का अपने भविष्य और दांपत्य के मद्देनजर समझदारी भरा कदम था. उधर फेसबुक पर जयश्री और राहुल की सगाई के फोटो देखदेख कर अनुराग का जुनून और बढ़ता जा रहा था. धमकी के बावजूद घनश्याम और जयश्री पर कोई असर न होता देख वह और भी बौखला गया था. उसे लग रहा था कि अब जयश्री उसे नहीं मिल पाएगी.

दूसरी ओर भोपाल में शादी की तैयारियों में लगे घनश्याम चिंतित थे कि कहीं अनुराग कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे. उस की बेहूदी हरकतों के बारे में सोचसोच कर कभीकभी वह यह सोच कर गुस्से से भी भर उठते थे कि जिस भांजे को बेटे की तरह रखा, वही आस्तीन का सांप निकला. उन के दिमाग में अनुराग की यह धमकी बारबार कौंध जाती थी कि अगर मेरी बात नहीं मानी तो अंजाम भुगतने को तैयार रहना.

उन के डर की एक वजह यह भी थी कि वह अनुराग के स्वभाव को जानते थे. लेकिन जवान बेटी का बाप होने की बेबसी उन्हें कोई कदम नहीं उठाने दे रही थी. इसलिए शादी के कुछ दिनों पहले उन्होंने अपने भतीजे शैलेंद्र नामदेव से इस बारे में सलाहमशविरा किया तो उस ने फोन पर अनुराग को ऊंचनीच समझाने की कोशिश की. इस पर अनुराग का एसएमएस आया कि तू अपनी दोनों बेटियों का खयाल रख, उन्हें अभी बहुत जीना है.

आखिरकार डरते सहमते 8 मई आ गई. उस दिन जयश्री और रोहित की शादी थी. रात के करीब 8 बजे रोहित और जयश्री स्टेज पर बैठे थे. परिचित और रिश्तेदार आने शुरू हुए तो 9 बजे तक मैरिज गार्डन में काफी भीड़ जमा हो गई. हर कोई खुश था. खासतौर से दोनों के घर वाले और हमीदिया अस्पताल के बाल रोग विभाग और शल्य चिकित्सा विभाग के डाक्टर्स और कर्मचारी. खाने के पहले या बाद में लोग स्टेज पर जा कर वरवधू को शुभकामनाएं और आशीर्वाद दे रहे थे. घनश्याम और लक्ष्मी भी लोगों की शुभकामनाएं लेते यहां वहां घूम रहे थे. उन की जिंदगी का वह शुभ समय नजदीक आ रहा था, जब उन्हें एकलौती बेटी के कन्यादान की जिम्मेदारी निभानी थी.

तभी अचानक भीड़ में अनुराग को देख कर लक्ष्मी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं तो वह पति को ढूंढने लगी. घनश्याम नहीं दिखे तो कुछ सोच कर वह एकांत में जा कर खड़ी हो गईं. उसे इस तरह खड़ा देख, उस की एक पड़ोसन ने आ कर पूछा भी कि क्या हुआ जो इस तरह घबराई हुई हो. इस पर लक्ष्मी ने इशारा कर के पड़ोसन को दरवाजे के पास खड़े अनुराग के बारे में बताया.

अनुराग एकदम सामान्य नजर आ रहा था और मेहमानों की तरह ही घूम रहा था. उस के गले में सफेद रंग का गमछा लटका था. तब तक रात के 10 बज चुके थे और भीड़ छटने लगी थी. इस के बावजूद स्टेज के पास वरवधू के साथ फोटो खिंचवाने वालों की लाइन लगी हुई थी. दूसरी ओर अनुराग की निगाहें स्टेज पर ही जमी थीं.

अचानक अनुराग स्टेज की तरफ बढ़ा और पास जा कर रोहित को बधाई दी. इस से पहले कि डा. रोहित उसे धन्यवाद दे पाते, अनुराग ने फुरती से रिवाल्वर निकाला और जयश्री की तरफ तान कर 2 फायर कर दिए. दोनों गोलियां जयश्री के सीने में धंस गईं. कोई कुछ समझ पाता, इस के पहले ही डा. जयश्री स्टेज पर गिर  पड़ीं. इसी बीच अनुराग ने अविलंब रोहित को निशाने पर ले लिया, लेकिन तब तक वह संभल चुके थे. नतीजतन गोली स्टेज के पीछे जा कर लगी, जिस के कुछ छर्रे रोहित के दोस्त कचरू सिसोदिया के पैर में लगे.

करीब 2 मिनट सकते में रहने के बाद जब लोगों को समझ में आया कि दुलहन पर गोली चली है तो उन्होंने गोली चलाने वाले अनुराग को पकड़ कर उस की धुनाई शुरू कर दी. उधर स्टेज पर रोहित जयश्री को संभाल रहे थे. इस बीच वहां मौजूद लेगों में से किसी ने पुलिस और अस्पताल में खबर कर दी थी. जयश्री को तुरंत अस्पताल ले जाया गया. लेकिन डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. फायर से भगदड़ मच गई थी. डर कर कई लोग वहां से भाग भी गए थे. जहां कुछ देर पहले तक हंसीमजाक चल रहा था, रौनक थी, वहां अब सन्नाटा पसर गया था. स्टेज पर रखे तोहफे और गुलदस्ते डा. जयश्री के खून से सन गए थे.

गुस्साई भीड़ ने अनुराग की जम कर धुनाई की थी, जिस से वह बेहोश हो कर गिर गया था. पुलिस आई तो पता चला कि वह जिंदा है. उसे तुरंत इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया. अब तक किसी को यह नहीं मालूम था कि अनुराग दुलहन का ममेरा भाई है. दूसरे दिन जिस ने भी सुना, स्तब्ध रह गया. अपनी ममेरी बहन को माशूका मानने वाले इस सिरफिरे आशिक की चलाई 2 गोलियों की गूंज भोपाल में ही नहीं, पूरे देश भर में सुनाई दी. जब जयश्री की मौत की पुष्टि हो गई तो रात 2 बजे रोहित और उस के पिता बारात वापस ले कर अपने गांव छनेरा चले गए. एक ऐसी बारात, जिस के साथ दुल्हन नहीं थी.

बाद में पता चला कि वारदात के दिन अनुराग सागर से अपने एक दोस्त की मोटरसाइकिल मांग कर लाया था और देसी रिवाल्वर उस ने कुलदीप नाम के एक दलाल से 17 हजार रुपए में खरीदी थी. कत्ल की सारी तैयारियां उस ने पहले ही कर ली थीं. सुंदरवन मैरिज गार्डन में प्रवेश के पहले ही वह पूरी रिहर्सल कर चुका था. उसे इंतजार बस मौका मिलने का था, जो उस वक्त मिल गया जब डा. रोहित और जयश्री स्टेज पर लोगों की शुभकामनाएं ले रहे थे.

पुलिस हिरासत में अनुराग ने बताया कि जैसे ही जयश्री ने राहुल के गले में माला डाली, मैं ने अपना आपा खो दिया था. मुझे नहीं मालूम कि लोगों ने मुझे मारा भी था. मैं तो खुद को भी गोली मारने वाला था, लेकिन मौका नहीं मिला. घायल अनुराग को हमीदिया अस्पताल के बजाय दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया गया था. दरअसल पुलिस को डर था कि कहीं अस्पताल के लोग उसे मार न डालें. क्योंकि जयश्री वहां काम करती थी. इस बीच कोहेफिजा थाना पुलिस ने उस के खिलाफ जयश्री की हत्या का मामला दर्ज कर लिया था.

दूसरे दिन पोस्टमार्टम के बाद जब जयश्री की अर्थी उठी तो नामदेव दंपत्ति का दुख देख सारा मोहल्ला रो उठा. लक्ष्मी और घनश्याम रह रह कर बेटी की अर्थी पर सिर पटक रहे थे. हमीदिया अस्पताल में भी मातम छाया था. एकतरफा प्यार में डूबा अनुराग दरअसल मनोरोगी बन गया था. जिस जुनून में उस ने वारदात को अंजाम दिया था, उसे इरोटोमेनिया भी कहते हैं और डिल्यूजन औफ लव भी. इस रोग में मरीज अपनी बनाई मिथ्या धारणा को ही सच मान कर चलता है और किसी के समझाने पर भी नहीं मानता. ऐसा मरीज बेहद शातिर और खतरनाक होता है.

जयश्री और अनुराग के बीच में क्या कभी प्रेमिल संबंध रहे थे, जैसा कि अनुराग कह रहा है, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. बहरहाल सच जो भी रहा हो, जयश्री के साथ चला गया. घनश्याम नामदेव ने बदनामी से बचने की जो कोशिश की थी, वह उन्हें काफी महंगी पड़ी. अगर वह वक्त रहते भांजे के खिलाफ कानूनी काररवाई करते तो जयश्री बच सकती थी. Crime Stories

West Bengal News: गुस्सैल प्रेमी से रहें अलर्ट

West Bengal News: अधिकांश लड़कियां आजकल बहुत जल्द ही अपने प्रेमी पर विश्वास कर लेती हैं. बातचीत के दौरान वह उस के स्वभाव को नहीं समझ पातीं. नादिया की रहने वाली इशिता मलिक अपने क्लासमेट 23 वर्षीय देशराज सिंह के जिद और गुस्से वाले स्वभाव को पहचान लेती तो शायद उसे अपनी जान गंवानी नहीं पड़ती.

जब इशिता मलिक ने प्रेमी देशराज सिंह से दूरी बना ली और बात तक करने से मना कर दिया तो देशराज उस से चिढ़ गया और उस ने इशिता को देख लेने की धमकी तक दे डाली थी. इतना ही नहीं, देशराज ने इशिता को सदासदा के लिए हटा देने की एक भयंकर योजना भी बना ली थी. इस के लिए वह छिप कर इशिता की हर गतिविधि पर नजर रखने लगा था. इस काम के लिए उस ने हथियार और गोलियों की व्यवस्था भी कर ली थी.

25 अगस्त, 2025 की दोपहर को देशराज अपने इसी इरादे के साथ पश्चिम बंगाल के जिला नादिया के कृष्णानगर सिटी में रहने वाली प्रेमिका इशिता के घर के आसपास की रेकी कर रहा था, जब उसे इस बात की पुष्टि हो गई कि इस समय इशिता घर में अकेली है, उस के फेमिली वाले बाहर गए हुए हैं तो वह पिस्तौल ले कर सीधे उस के दोमंजिले घर में चला गया. इशिता उस समय कमरे में बैठी पढ़ाई कर रही थी.

देशराज को एकाएक अपने सामने देख कर इशिता ने उस से गुस्से में कहा, ”देशराज, अब तुम ने मेरे घर तक आने की हिम्मत भी कर डाली. निकल जाओ अभी मेरे घर से वरना मैं चिल्लाचिल्ला कर लोगों को यहां बुला लूंगी.’’

यह सुन कर देशराज ने अपनी कमर से पिस्तौल निकाल कर उसे धमकाते हुए कहा, ”इशिता, आखिरी फैसला करने आया हूं. तुम मुझ से फिर से दोस्ती कर लो या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ.’’

”देशराज, मैं तुम जैसे इंसान से प्यार करने की बात तो दूर, दोस्ती करना भी पसंद नहीं करती. मुझे तुम से और तुम्हारी सूरत तक से नफरत है. दफा हो जाओ अभी मेरी नजरों से.’’ इशिता ने चीखते हुए कहा.

यह सुन कर देशराज उस के पास आया और उस के सिर से सटा कर 2 गोलियां चला दीं. जब इशिता जमीन पर मुंह के बल गिर गई तो उस ने एक और गोली उस के सिर पर मार दी और वहां से भाग गया. इस प्रकार इस जुनूनी प्यार का भयंकर अंत हो गया.

इत्तफाक से उसी समय इशिता की मम्मी कुसुम मलिक अपने बेटे के साथ घर लौट रही थीं. उन्होंने जब अपने घर से धमाके की आवाजें सुनीं तो उन का दिल अनजानी आशंका से भयभीत हो गया था. उन्होंने उसी समय एक युवक को अपने घर से बाहर निकलते देखा. कुसुम ने उस युवक से पूछा, ”भाई, तुम कौन हो? हमारे घर में गोलियों की आवाज कैसे सुनाई दे रही है?’’

तब उस युवक ने कुसुम से कहा, ”देखो आंटी, अभी मुझ से बात मत करो. मैं अपने होशोहवास में नहीं हूं. इस के बाद कुसुम ने देखा कि उस के हाथ में एक पिस्तौल थी. उस युवक ने उस के बाद पिस्तौल से हवा में फायर करने के लिए 2 बार स्ट्रिगर दबाया, मगर शायद पिस्तौल में गोलियां खत्म हो चुकी थीं, इसलिए फायर नहीं हो सके.

तब तक कुसुम और प्रतीक समझ चुके थे कि कुछ अनहोनी सी बात हमारे घर में अवश्य हो चुकी है. इसलिए प्रतीक चाह रहा था कि उस की मम्मी कुसुम इस युवक से यदि दूर ही रहे तो अच्छा होगा. प्रतीक अपनी मम्मी को उस युवक से दूर ले जाने की कोशिश कर रहा था. जब सामने कोई नहीं रहा तो वह युवक अपनी पिस्तौल लहराता हुआ अगले ही पल वहां से फरार हो चुका था. कुसुम मलिक अब तेजी से जीना चढ़ कर जब ऊपर के कमरे में पहुंचीं तो दरवाजा आधा खुला हुआ था. उस के बाद जब उन की नजर अंदर कमरे में पड़ी तो खौफनाक दृश्य देख कर उन की आंखें फटी रह गई थीं.

वह जोरजोर से चिल्लाने लगीं. सामने उन की बेटी इशिता मलिक लहूलुहान पड़ी थी. कुसुम मलिक की दर्दनाक चीखों की आवाजों को सुन कर वहां पर आसपास के लोग अब तक काफी संख्या में एकत्रित हो चुके थे. तभी किसी ने कृष्णानगर कोतवाली में इस हादसे की सूचना दे दी थी. अगले ही पल पश्चिम बंगाल के नादिया जिले की कोतवाली कृष्णानगर के एसएचओ अमलेंदु बिस्वास कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच चुके थे. दिन दोपहरी को हुई इस वारदात की सूचना पाते ही कृष्णानगर के एसपी के. अमरनाथ भी घटनास्थल पर पहुंच चुके थे.

ताज्जुब की बात तो यह थी कि जिस मकान में हत्या की गई थी, उस के बगल में ही एसपी और जिला मजिस्ट्रैट का औफिस था. दूसरी तरफ कृष्णानगर महाविद्यालय था. इतने हाईप्रोफाइल इलाके में घर में घुस कर की गई इस वारदात से स्थानीय निवासी आक्रोश और दहशत में आ गए थे. पुलिस ने विस्तृत छानबीन करनी प्रारंभ की तो उन्होंने देखा कि मृतका इशिता के सिर पर 3 गोलियां दागी गई थीं. 2 गोलियां दाईं ओर और एक गोली सिर के पीछे से मारी गई थी. एक घाव पर गन पाउडर स्पष्ट दिखाई दे रहा था, जबकि अन्य दोनों घावों पर गन पाउडर नहीं था.

अब तक घटनास्थल पर मृतका के पापा दुलाल मलिक भी पहुंच गए थे. पुलिस ने मृतका इशिता मलिक के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और मृतका के फेमिली वालों से शुरुआती पूछताछ करनी शुरू कर दी. मृतका की मम्मी कुसुम ने गोलियों की आवाज और घर में मिले उस अनजान युवक के बारे में बता दिया. मृतका के भाई ने पुलिस को बताया कि वह उस युवक को पहचानता था. उस ने बताया कि पहले जब हम लोग कांचरापाड़ा में रहते थे तो वह युवक वहां मैदान में खेलने आया करता था. उस ने यह भी बताया कि वह युवक उस की बहन के साथ कांचरापाड़ा में एक ही स्कूल में पढ़ता था.

उस ने पुलिस को यह जानकारी भी दी कि उस युवक का नाम देशराज सिंह है. मृतका के पापा दुलाल मलिक ने पुलिस को बताया कि हमें इस बारे में कुछ भी पता नहीं था कि आरोपी हमारी बेटी का दोस्त था भी या नहीं. हमें इस बारे में भी कुछ पता नहीं कि लड़के ने हमारी लड़की को फोन किया था या नहीं या उन दोनों का पहले से एकदूसरे से कोई संपर्क या जानपहचान थी या नहीं. हम ने तो उन दोनों को कभी भी एकदूसरे के साथ नहीं देखा था. पुलिस ने दुलाल मलिक की ओर से धारा 103(1), 3 (5) बीएनएस के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया.

कृष्णानगर के एसपी के. अमरनाथ इस जघन्य हत्याकांड का खुलासा करने के लिए तत्काल डीएसपी शिल्पी पाल के नेतृत्व में 15 सदस्यीय पुलिस टीम का गठन कर दिया और पूरी टीम को उचित दिशानिर्देश दे कर अपने खास मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया. गठित टीम ने देशराज सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि की जानकारी एकत्रित की. जांच में पता चला कि उत्तर 24 परगना के जेठिया-धरमपुर में रहने वाला 23 वर्षीय देशराज सिंह मूलरूप से उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के करौता का रहने वाला था. उस के पापा राघवेंद्र प्रताप सिंह बीएसएफ में हैडकांस्टेबल हैं और वर्तमान में राजस्थान के जैसलमेर में पोस्टेड हैं. देशराज सिंह वर्तमान में अपनी मम्मी पूनम सिंह और बहन के साथ रहकर 24 परगना जेठिया-धरमपुर में पढ़ाई कर रहा था.

पुलिस को यह जानकारी भी मिली कि देशराज के पापा राघवेंद्र प्रताप सिंह, चाचा सरजू सिंह तथा शैलेंद्र सिंह पर वर्ष 2020 में हत्या और साक्ष्य मिटाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज हुआ था. हालांकि जांच में आरोप सिद्ध न होने पर इस मुकदमे में अंतिम रिपोर्ट लगा दी गई थी. इस के बाद वर्ष 2024 में राघवेंद्र प्रताप सिंह और उस के भाई मनोज सिंह पर आईटी ऐक्ट के तहत 2 अलगअलग मुकदमे दर्ज हुए, जिस में पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल कर रखा है. देशराज के पिता राघवेंद्र प्रताप सिंह 4 भाई हैं.

पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि आरोपी देशराज सिंह और इशिता मलिक सहपाठी थे. धीरेधीरे दोनों के बीच प्रेम संबंध बन गए, लेकिन बाद में किसी बात पर दोनों के बीच विवाद हो गया और वे अलग हो गए. शायद उसी प्रतिशोध की भावना से देशराज सिंह ने इस खूनी घटना को अंजाम दिया था. बंगाल के कृष्णानगर से 3 अलगअलग पुलिस टीमें उत्तर प्रदेश भेज दी गई. इस से पहले बंगाल पुलिस ने 29 अगस्त, 2025 को गुजरात के जामनगर से हत्यारे देशराज सिंह के मामा कुलदीप सिंह को गिरफ्तार करने में कामयाबी हासिल कर ली थी. पता चला कि कुलदीप सिंह ने ही अपने जीजा राघवेंद्र प्रताप सिंह के कहने पर देशराज सिंह को हत्या के बाद फरजी दस्तावेजों के सहारे भागने में मदद की थी.

पुलिस ने कुलदीप सिंह से गहन पूछताछ की तो पुलिस को देशराज सिंह के ठिकाने के बारे में पता चला. इस के साथसाथ गहरे सदमे में होने के बावजूद भी मृतका इशिता मलिक के परिजन पुलिस को अपना पूरा सहयोग व कई जानकारियां उपलब्ध करा रहे थे. जिस के फलस्वरूप उत्तर प्रदेश पुलिस के सहयोग से बंगाल पुलिस ने सोमवार पहली सितंबर, 2025 सुबहसुबह नेपाल सीमा के पास उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले के नौतनवा कस्बे से आरोपी देशराज सिंह को गिरफ्तार कर लिया.

पकड़े जाने के समय हत्यारोपी देशराज सिंह फरजी दस्तावेजों के सहारे एक वाहन से नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था. पुलिस ने आरोपी देशराज सिंह को गिरफ्तार कर नादिया की अदालत में पेश किया. एसपी के. अमरनाथ ने मीडिया को बताया कि इशिता मलिक की हत्या करने के बाद देशराज सिंह अयोध्या गया और अपने अपराधी रिश्तेदारों की मदद से आधार कार्ड और सीमा सुरक्षा बल का एक फरजी पहचान पत्र जैसे कुछ फरजी दस्तावेज हासिल किए, ताकि नेपाल में शरण ले सके.

इस मामले में एक और नया मोड़ तब आया, जब आरोपी देशराज सिंह के पापा बीएसएफ के हैडकांस्टेबल राघवेंद्र प्रताप सिंह के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया. पुलिस इनवैस्टीगेशन में यह बात सामने आई कि राघवेंद्र ने अपने बेटे को पुलिस से छिपाने में मदद की थी. पुलिस को पूरा शक था कि हत्या के बाद भी बापबेटे के बीच में लगातार संपर्क बना हुआ था. राघवेंद्र प्रताप सिंह अपने साले कुलदीप सिंह के साथ लगातार फोन और वाट्सऐप पर संपर्क में रह कर आरोपी देशराज सिंह को भगाने में मदद कर रहा था.

इशिता मलिक हत्याकांड की जांच में ‘फ्री फायर’ नाम के एक मोबाइल गेम का खुलासा भी हुआ है. बंगाल पुलिस ने खुलासा किया कि आरोपी इस गेम के लिए जुनूनी हो गया था कि उस का मन हर समय एक आभासी दुनिया में भटकता रहता था. कल्पना और वास्तविकता की दुनिया उस के लिए इस कदर घुलमिल गई थी कि उसे अपनी प्रेमिका इशिता के सिर पर 3 गोलियां दागने में कोई दिक्कत नहीं हुई. इतना ही नहीं देशराज को वर्चुअल गेम्स में भी खून देखने की एक आदत सी हो गई थी. पुलिस इनवैस्टीगेशन और आरोपी देशराज सिंह से विस्तृत पूछताछ के बाद इशिता मर्डर की जो खौफनाक कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

पश्चिम बंगाल के जिला नादिया का कृष्णानगर एक बड़ी आबादी वाला शहर है. इसी शहर में मानिकपाड़ा के निवासी थे दुलाल मलिक. दुलाल मलिक पहले सेना में थे, जब उन के बच्चे स्कूल जाने के योग्य हुए तो उन्होंने कांचरपाड़ा के नजदीक एक मकान किराए पर ले लिया और वहां पर पत्नी कुसुम व बेटेबेटी के साथ रहने लगे. कांचरापाड़ा में केंद्रीय विद्यालय था, इसलिए दुलाल मलिक ने अपनी बेटी इशिता और प्रतीक का एडमिशन केंद्रीय विद्यालय कांचरापाड़ा में करा दिया था. वर्ष 2023 में इशिता जब हाईस्कूल में पढ़ रही थी, उसी समय उस की क्लास में देशराज सिंह ने भी एडमिशन लिया था.

देशराज के पापा बीएसएफ में थे, इसलिए उस का दाखिला भी केंद्रीय विद्यालय में आसानी से हो गया था. देशराज अपनी मम्मी पूनम सिंह व छोटी बहन सुहानी के साथ 24 परगना जेठिया धरमपुर में किराए के मकान में रहता था, जबकि उस के पापा बीएसएफ में हैडकांस्टेबल के पद पर सीमा पर तैनात थे. एक दिन इशिता की एक सहेली का जन्मदिन था, इसलिए उन्होंने एक कैफे में जन्मदिन की पार्टी रखी थी, जिस में क्लास के सभी लड़के और लड़कियां थे. वहां पर सहेली अपनी ओर से पार्टी दे रही थी.

थोड़ी देर के बाद जन्मदिन की पार्टी खत्म हो गई थी. सभी लड़केलड़कियां कैफे से बाहर निकल कर अपनीअपनी राह पर जाने लगे थे. कुछ के पास अपनी बाइक व स्कूटी थी. एकएक कर के सभी वहां से चले गए. वहां से इशिता का घर काफी दूरी पर था, इसलिए वह अपने घर जाने के लिए औटोरिक्शा तलाश करने लगी, लेकिन कोई औटो वाला नहीं मिल रहा था. इशिता को परेशान देख कर देशराज को लगा कि अभी इशिता से बात करने का सुनहरा अवसर है, इसे गंवाना नहीं चाहिए. इसलिए वह तुरंत इशिता के पास पहुंच गया और उस से बोला, ”इशिताजी, आप काफी परेशान दिखाई दे रही हैं, आखिर आप को अभी जाना कहा है?’’

”देशराजजी, आप यह बात खुद समझ सकते हैं कि अब शाम पूरी ढल चुकी है, लेकिन आटो वाले मेरे घर की तरफ जाने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं.’’ इशिता ने कहा.

”इशिताजी, आखिर आप रहती कहां पर हैं?’’ देशराज ने पूछा.

”वैसे तो हमारा पुश्तैनी घर कृष्णानगर मानिकपाड़ा में है. मेरे पापा आर्मी में थे, रिटायर हो गए हैं, इसलिए वहां पर पुराने घर को तोड़ कर नया घर बनवा रहे हैं. आजकल हम लोग कोचरापाड़ा में एक किराए के मकान में रह रहे हैं.’’ इशिता ने कहा.

अब देशराज का घर भी उसी तरफ था, इसलिए वह इस बात को सुन कर काफी खुश हो गया था. वह इशिता से बोला, ”अरे इशिताजी, यह तो सोने पे सुहागा जैसी बात हो गई है. देखो, कैसा संयोग है आप के पापा आर्मी में हैं दूसरी तरफ मेरे पापा बीएसएफ में हैं. मैं, मेरी मम्मी और मेरी छोटी बहन भी किराए पर जेठिया धरमपुर में रहते हैं. आप का घर पहले आएगा और मेरा बाद में. यदि आप को कोई आपत्ति न हो तो क्या आप मेरे साथ मेरी बाइक पर बैठ सकती हैं, मैं तुम्हें रास्ते में ही ड्रौप कर दूंगा.’’

”यह तो वाकई सोने में सुहागा हो गया है, जैसा कि अभीअभी आप ने भी कहा था. मुझे इस आप के नेक काम में भला क्या आपत्ति हो सकती है. आप की बाइक कहां है?’’ इशिता बोली.

”इशिताजी, मेरी बाइक देखिए, वह सामने खड़ी है. काले रंग की बुलेट है.’’ देशराज ने अपनी बाइक की तरफ बढ़ते हुए कहा.

”देशराजजी, आप तो बड़े दिलचस्प लगते हैं. बाइक चलाने के अलावा तुम्हारे और क्याक्या शौक हैं?’’ इशिता ने उस की बाइक पर बैठते हुए कहा.

”देखिए इशिताजी, अपना एक शौक तो आप जान ही चुकी हैं. दूसरा शौक ‘फ्री फायर’ वीडियो गेम है और तीसरा सब से महत्त्वपूर्ण शौक खूबसूरत लोगों से दोस्ती करना है.’’ यह कहते हुए देशराज ने अपनी बाइक आगे बढ़ा दी थी.

कुछ देर बाद इशिता ने बाइक रुकवाते हुए देशराज से कहा, ”देशराजजी, मेरा घर अब नजदीक में ही है, इसलिए मुझे आप यहीं पर उतार दीजिए.’’

”इशिता, मैं ने तो सोचा था कि तुम मुझे अपने घर में ले जाओगी, चायनाश्ता कराओगी, मगर तुम ने तो मेरा दिल ही तोड़ डाला.’’ देशराज ने कहा

”देशराजजी, यदि मेरे घर वालों ने या पड़ोसियों ने मुझे आप के साथ देख लिया तो लोग तरहतरह की बातें बनाएंगे. मैं क्या जवाब दूंगी उन सब को?’’ इशिता बोली

देशराज थोड़ी देर तक इशिता की आंखों में एकटक देखता रहा और उस के बाद उस ने अगले ही पल अपने दिल की बात जुबान से कह ही डाली, ”इशिता, तुम बहुत खूबसूरत हो, मुझे पहली ही नजर में तुम से प्यार हो गया है. आई लव यू इशिता.’’

यह सुनते ही इशिता के गोरेगोरे गालों पर लाज की एक अलग सी सुर्खी फैल गई. शरम के मारे उस की नजर झुक गई. वह धीमे से मुसकरा कर देशराज की बाइक से नीचे उतर गई.

”इशिता अब जातेजाते अपना मोबाइल नंबर तो बता दो,’’ देशराज ने विनयपूर्वक कहा.

इशिता ने जल्दी से अपना मोबाइल नंबर बताया, जिसे देशराज ने अपने मोबाइल में सेव कर लिया और इशिता मुसकराते हुए पलट कर तेजी से अपने घर की ओर बढ़ गई. देशराज उसे तब तक अपनी प्यासी नजरों से देखता रहा, जब तक इशिता उस की ओर से ओझल नहीं हो गई. उस दिन के बाद से क्लास में हो या कहीं बाहर अकेले, उन दोनों की नजदीकियां अब बढऩे लगी थीं. इधर इशिता अपनी पढ़ाई पर भी काफी फोकस बनाए रखती थी, क्योंकि 10+2 की परीक्षा पास करने के बाद उस का इरादा डौक्टरी की पढ़ाई करने का था, लेकिन दूसरी तरफ देशराज अपनी पढ़ाई की ओर अधिक ध्यान न दे कर मटरगश्ती करने में ज्यादा आगे रहा करता था.

इस के अलावा देशराज इशिता के प्रति कभीकभी काफी आक्रामक भी हो जाता था. वह चाहता था कि इशिता उस के अतिरिक्त किसी भी अन्य लड़के से दोस्ती करने की बात तो दूर बात भी न करे.

एक दिन की बात है. उस दिन शाम को इशिता लाइब्रेरी में जा कर अपनी पढ़ाई के लिए नोट्स तैयार कर रही थी. लाइब्रेरी में उस समय इशिता के अलावा और कोई नहीं था. देशराज उसे काफी समय से फोन कर रहा था, लेकिन उस ने अपना मोबाइल फोन पढ़ाई में व्यस्त होने के कारण साइलेंट मोड में रखा हुआ था. देशराज को पता था कि शाम को कभीकभी इशिता पढ़ाई करने लाइब्रेरी चली जाया करती है. इसलिए वह उसे ढूंढते हुए लाइब्रेरी पहुंच उस को पढ़ाई में व्यस्त देख कर देशराज उस पर भड़क गया.

”इशिता, मैं कब से तुम्हें फोन कर रहा हूं. क्या कर रही हो तुम यहां पर अकेले? चलो, मेरे साथ कहीं बाहर घूमने चलते हैं.’’

”देखो देशराज, हमारे फाइनल एग्जाम सिर पर हैं, इस के अलावा मैं नीट की परीक्षा की तैयारी में भी लगी हुई हूं. देख रहे हो न, मेरे आसपास किस तरह से किताबें फैली हुई हैं. तुम भी अभी अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो,’’ इशिता के उसे समझाते हुए कहा.

”अरे इशिता, क्या करोगी इतना सब पढ़लिख कर, हमारे पास में गांव में काफी खेती है. अपने घर का इकलौता बेटा हूं मैं, कोई बिजनैस कर लूंगा. ठाठ से रखूंगा तुम्हें, चलो तुम्हें चाट खिला कर लाता हूं.’’ देशराज ने कहा.

उस की इस बात को सुन कर इशिता को बड़ा गुस्सा आया, पर गुस्से पर काबू करते हुए वह बोली, ”देशराज, अब एग्जाम के केवल 5 दिन बाकी रह गए हैं. मुझे पढऩे दो, मैं अभी तुम्हारे साथ बिलकुल भी नहीं आ सकती.’’

”देखो इशिता, लोग इसलिए पढ़ाई करते हैं कि एक अच्छी नौकरी लग जाएगी ताकि ढेरों पैसे कमाए जा सकें, लेकिन मेरे घर में पैसों की कोई कमी नहीं है. जैसे ही मैं कोई नया बिजनैस शुरू करूंगा, तुम्हारे कदम पर दौलत का ढेर लगा दूंगा.’’ देशराज ने शेखी बघारते हुए कहा.

”देशराज, मेरे भी अपने खुद के सपने हैं, मैं अपने जीवन में अपने बलबूते पर कुछ बनना चाहती हूं. मेरी तो तुम से भी यही गुजारिश है कि अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. अपने दम पर कुछ बन कर दिखाओ, फेमिली वालों के दम पर तो सभी शेखी बघारने लगते हैं.’’ इशिता ने उसे समझाया.

लेकिन दूसरी तरफ देशराज को इशिता की बात का बहुत बुरा लगा और उस ने अगले ही पल एक झन्नाटेदार थप्पड़ इशिता के गाल पर दे मारा. यह देखकर इशिता भी एक पल के लिए जैसे सहम सी गई थी. उस ने तुरंत वहां से अपनी किताबें इकट्ठा कीं और गुस्से से पैर पटकती हुई वहां से चली गई. रास्ते भर इशिता देशराज के इस कृत्य से रोती रही. बस उसी दिन और उसी पल मन देशराज के लिए खट्टा हो गया था. इशिता को उस समय इस बात का पूरापूरा अहसास हो चुका था कि देशराज को न तो इशिता की भावनाओं की चिंता है और न ही वह स्वयं कुछ करना चाहता है. उसे तो केवल अपने फेमिली वालों की दौलत का घमंड था.

वह अपने आप को एक ऐसे वीडियो गेम के दुष्चक्र में फंसा चुका था कि वह कभी भी अपना और अपने साथसाथ इशिता का जीवन भी तबाह कर सकता था. धीरेधीरे इस का नतीजा यह हुआ कि देशराज अब इशिता के मन से काफी दूर जा चुका था. अब इशिता को यह महसूस होने लगा था कि उस ने देशराज के साथ प्रेम संबंध बढ़ा कर बहुत ही जल्दबाजी कर दी थी, क्योंकि देशराज कहीं से भी उस के सपनों का राजकुमार तो बिलकुल भी नहीं था. देशराज के लिए तो वीडियो गेम और उस के घर वालों की जमीन और दौलत का महत्त्व सर्वोपरि था.

इस के बाद देशराज ने कई बार इशिता से मिलने और बात करने की कोशिश भी की थी, लेकिन इशिता ने तो यह सोच लिया था कि जिस जीवनसाथी की उस ने अपने मनमस्तिष्क में कल्पना कर रखी थी, वह किसी भी रूप में उस का एक आदर्श प्रेमी या जीवनसाथी तो कतई नहीं हो सकता था. इसलिए इशिता ने इस भ्रमित प्रेम संबंध को तोडऩे के लिए देशराज से दूरी बनानी शुरू कर दी. देशराज बारबार उसे परेशान करता रहता था, इसीलिए अब इशिता ने अपना पुराना वाला सिम भी तोड़ कर फेंक दिया था.

धीरेधीरे समय गुजरता गया. 10+2 पास करने के बाद इशिता ने विक्टोरिया कालेज में दाखिला ले लिया था. यहां देशराज ने कई बार इशिता से मिल कर बात करने की कोशिशें की, परंतु इशिता ने उस से अब सारे रिश्ते ही खत्म कर लिए थे. वह अब पढ़ाई के साथ ही साथ नोट तैयार करने में भी लगी थी. इधर देशराज ने इशिता की एक सहेली से इशिता का नया मोबाइल नंबर भी ले लिया था. देशराज बारबार इशिता से बात कर माफी मांगा करता था, वह उस से अपने रिश्ते को दोबारा से बनाने के लिए हमेशा कहता रहता था. इशिता ने उसे इग्नोर कर दिया तो जुनूनी आशिक देशराज सिंह ने गोली मार कर उस की हत्या कर दी.

उस के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद से देशराज सिंह को गिरफ्तार कर लिया और उस की निशानदेही पर एक 7 एमएम का पिस्तौल भी बरामद कर लिया. कहानी लिखे जाने तक पश्चिम बंगाल पुलिस उस के पापा राघवेद्र प्रताप सिंह को भी गिरफ्तार कर चुकी थी और दोनों को जेल भेज दिया गया था.

बच्चों पर दुष्प्रभाव डाल रहा हैगरेना फ्री फायरगेम

गरेना फ्री फायर गेम जिसे ‘फ्री फायर बैटलग्राउंड’ या ‘फ्री फायर’ गेम के नाम से भी जाना जाता है, जो ऐक्शन-एडवेंचर बैटल रोयल गेम है, जो मोबाइल के लिए उपलब्ध कराया गया है. इस गेम को 111 डौट्स स्टूडियो द्वारा विकसित किया गया है और गारिना द्वारा प्रकाशित किया गया है. यह मोबाइल गेम 20 नवंबर, 2017 को बीटा रिलीज किया गया था और 4 दिसंबर, 2017 को आधिकारिक तौर पर एंड्राइड और आईओएस के जरिए जारी किया गया था. इस मोबाइल गेम के 500 मिलियन से अधिक उपयोगकर्ता हैं.

इस खेल में 50 से अधिक खिलाड़ी होते हैं, जो दूसरे खिलाडिय़ों को मारने के लिए हथियारों और उपकरणों की तलाश में एक द्वीप पर पैराशूट के सहारे गिरते हैं. इस में खिलाडिय़ों को अन्य खिलाडिय़ों को मार कर जीतना होता है. जो खिलाड़ी जीत जाता है उसे बूयाह (क्चह्रह्रङ्घ ्र॥) दिया जाता है. इस खेल में 4 नक्शे होते हैं. पहले का नाम बरमुडा है, जो सब से पुराना नक्शा है. दूसरे नक्शे का नाम परगेटारी है, तीसरा नक्शा कलाहारी है, जो हाल ही में प्रकाशित किया गया था. इस के अलावा बरमुडा का नया संस्करण लाया गया है. इस चौथे नक्शे का नाम बरमुडा रीमास्टर्ड है.

फ्री फायर एक वीडियो गेम है, जिस में विभिन्न प्रकार के इन-गेम इवेंट्स शामिल हैं. ये इवेंट्स पेड के रूप में हो सकते हैं या फिर खिलाडिय़ों को गेम में इनाम और बोनस कमाने का मौका दे सकते हैं. पेड इवेंट, जैसे कि एलिट पास के बाद बैटल पास की जगह आया है. डायमंड रौयल खिलाडिय़ों को एक्सक्लूसिव कौस्मेटिक्स और अन्य आइटम्स खरीदने की अनुमति दे देते हैं, जबकि दूसरे इवेंट्स में आमतौर पर सभी खिलाडिय़ों के लिए उपलब्ध रहते हैं और उन्हें भाग लेने के लिए कोई भुगतान करने की आवश्यकता नहीं होती है. इन इवेंट्स में खिलाडिय़ों को गेम में बिना भुगतान किए बेहतर आइटम्स को अनलौक करने का मौका मिलता है. इन आयोजनों का विषय और समय अलगअलग हो सकता है.

फायर गेम खेलने के कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. इस से फायर गेम खेलने की लत लग सकती है, जिस के कारण वास्तविक दुनिया की गतिविधियों की उपेक्षा होती है. गेम को खेलने के कारण बच्चे चिड़चिड़े, आक्रामक, सामाजिक रूप से अलगथलग होने लग जाते हैं. इस के अतिरिक्त गेमिंग में पैसे खर्च करने, आंखों की रोशनी कम होने और शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पडऩे जैसे खतरे भी सामने आने लगते है.ल इस गेम की लत से बच्चे दिन भर पढ़ाई करने के बजाय गेम खेलते रहते हैं और खेलना व परिवार के साथ वक्त बिताना छोड़ देते हैं. इस गेम को लंबे समय तक खेलने से मानसिक संतुलन तक बिगड़ सकता है.

बच्चे अपनी मनपसंद चीजें खरीदने के लिए खुद ही पैसे इस गेम में खर्च कर सकते हैं, जिस के कारण परिवार में वित्तीय संकट पैदा होने की आशंका बनी रहती है. इस से बच्चों को दूर रखने के लिए मातापिता को अपने बच्चों पर निगरानी रखने व बच्चों को ऐसे हिंसक गेम खेलने से रोकने के लिए बच्चों को समझाने की आज विशेष आवश्यकता है.

14 फरवरी, 2022 को भारत सरकार के इलेक्टौनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने भारत के संविधान के सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत भारत की गोपनीयता और सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाले 53 अन्य ऐप्स के साथ ‘गरेना फ्री फायर’ गेम पर प्रतिबंध लगा दिया था, प्रतिबंध लगाने के बावजूद यह गेम आज भी युवाओं और बच्चों के द्वारा खेला जा रहा है, जिस पर तत्काल रोक लगाए जाने की विशेष जरूरत है. West Bengal News

 

Rajasthan News: तीसरी शादी की चाहत

Rajasthan News: अनीता राज चंचल स्वभाव की थी. सासससुर के खिलाफ मुकदमा लिखवाने के बाद वह पति के साथ अलवर में रहने लगी. यहां मकान मालिक मानसिंह उर्फ वीरू से प्यार हो जाने के बाद वह पति को छोड़ वीरू जाटव के संग रहने लगी. इसी दौरान उस के नैन काशीराम प्रजापति से लड़ गए तो नए प्रेमी के साथ रहने के लिए उस ने ऐसी खूनी वारदात को अंजाम दिया कि…

काशीराम प्रजापति जब कई दिनों बाद अनीता राज से मिलने आया, तब वह उलाहना देती हुई बोली, ”लगता है अब तुम्हारा मुझ से मन भर गया है, कोई दूसरी फंसा ली क्या?’’

”अरे नहीं डार्लिंग, वैसा कुछ नहीं है मेरे मन में, तुम्हारा दूसरा पति वीरू ही अड़चन बना हुआ है. बड़ी मुश्किल से

मैं ने उस की टूटी दोस्ती में अपनी गांठ बांधी है.’’

”ऐसा क्यों किया?’’

”उसे हमारे संबधों पर शक हो गया है. हम पर निगरानी रखे हुए है. इस कारण मैं कई दिनों तक तुम से मिलने नहीं आया. उसे विश्वास में लेने के लिए ही उस के साथ दोबारा दोस्ती का हाथ मिलाया है.’’ काशीराम ने समझाया.

”मगर उसे दोबारा हमारे संबंधों पर शक हुआ तो?’’ अनीता चिंता जताती हुई बोली.

”तब मैं उस का परमानेंट इलाज कर दूंगा यानी खल्लास,’’ काशीराम तपाक से आक्रोश के साथ बोल पड़ा.

”तो देर किस बात की? जल्दी ही कर दो यह काम.’’ अनीता बोली.

अनीता की यह बात सुन कर काशीराम खुश हो गया, क्योंकि अब अनीता भी उस का साथ देने को तैयार हो गई थी. वह अनीता के चेहरे को चाहत भरी नजरों से निहारने लगा.

”मुझे क्या घूर रहे हो…मैं ने हां कह तो दिया, किंतु उस की मौत नैचुरल दिखनी चाहिए.’’

”वह कैसे होगा?’’ काशीराम बोला.

”और पास आओ बताती हूं… मैं ने सारा प्लान सोच रखा है!’’ अनीता काशीराम के शर्ट का कौलर अपनी ओर खींचती हुई बोली.

फिर दोनों के बीच आधे मिनट तक खुसरफुसर होती रही. भावावेश में काशीराम ने अनीता के होंठों को चूम लिया था. अलग होती हुई अनीता बोली, ”फिर उस के बाद हम लोग शादी कर लेंगे.’’

किंतु अभी भी काशीराम के मन में प्लान की सफलता को ले कर संदेह दूर नहीं हुआ था. उस ने अपनी शंका अनीता से जाहिर की.

”तुम्हें जरा भी संदेह है तो सुपारी किलर हायर कर लो, मैं 2 लाख रुपए देती हूं.’’ वह बोली.

उस के बाद अनीता उठ कर दूसरे कमरे में चली गई. जब वापस लौटी, तब उस की हाथ में 5-5 सौ के कुछ नोट थे. प्लान के मुताबिक तय तारीख 7 जून, 2025 को काशीराम ने अनीता को कौल किया. उसे आधी रात को घर का मुख्य दरवाजा खुला रखने को कहा. अनीता की हामी मिलने पर काशीराम रात के करीब 2 बजे भाड़े के 4 साथियों के साथ वीरू के घर के करीब पहुंच गया. वीरू राजस्थान के अलवर जिले के खेड़ली कस्बे में बाईपास रोड पर स्थित अपने घर में सोया हुआ था.

घर का मेन गेट खुला था. उस से पांचों अंदर दाखिल हो गए. सभी कमरे के बाहर बाउंड्री के भीतर चारपाई पर सो रहे वीरू के पास जा पहुंचे. काशी ने मानसिंह उर्फ वीरू के सिरहाने से तकिया एक झटके में खींच लिया और उस से वीरू का मुंहनाक दबा दिया. बाकी चारों ने और अनीता ने एक साथ वीरू के हाथपैर दबोच लिए. वीरू कुछ सेकेंड तक छटपटाया और उस की मौत हो गई.

तभी एक व्यक्ति की नजर एक 9 बच्चे पर पर गई, जो आंखें मलते हुए उन्हें देख रहा था.

”अरे यह तो वीरू का बेटा है… इस ने हमें देख लिया है. अब क्या होगा?’’

काशीराम के मुंह से अचानक चिंता के ये शब्द निकल पड़े.

वह अनीता के साथ उस के पास गया. उस के कानों में फुसफुसाया और उसे उस के कमरे में जा कर सुला दिया. अनीता अपने कमरे में चली गई. 9 वर्षीय बेटे को जागते हुआ देखा. वह गुमसुम था. कुछ बोल नहीं पा रहा था. उसे पुचकारते हुए समझाने लगी. उस ने कहा कि जो कुछ देखा, किसी को नहीं बताए. कोई पूछे भी तो कहना है कि वह सो रहा था, उसे कुछ नहीं मालूम. प्लान के मुताबिक 8 जून, 2025 की सुबह करीब साढ़े 4 बजे अनीता ने अपनी जेठानी को कौल कर कहा कि जल्दी आओ, वीरू की तबीयत खराब हो गई है. अस्पताल ले जाना होगा.

जल्द ही परिवार के कई लोग वहां पहुंच गए. उसे तुरंत खेड़ली के उपजिला चिकित्सालय ले जाया गया. अस्पताल में कुछ दूसरे परिजन भी पहुंच गए. उन में वीरू का भाई खेमचंद उर्फ गब्बर जाटव भी था. डौक्टर ने स्ट्रेचर पर वीरू की नब्ज टटोली और तुरंत मृत घोषित कर दिया. यह सुनते ही वहां मौजूद वीरू के फेमिली वाले सन्न रह गए. अनीता सदमे में आ कर वहीं धम्म से जमीन पर बैठ गई. उस के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. आंखें पथराई जैसी हो गई थीं. एक बूंद आंसू नहीं निकले थे. उसे फेमिली वालों ने संभाला. इसी बीच वहां काशीराम प्रजापति भी पहुंच गया.

वीरू के भाई गब्बर को यह बात गले नहीं उतर रही थी कि कुछ घंटे पहले ही रात के 10 बजे जब वह अपने नए घर में सोने गया था, तब तो वीरू एकदम भलाचंगा था. फिर अचानक उसे क्या हो गया? इस बारे में उस ने अनीता से जानना चाहा, किंतु वह कोई ठोस जवाब नहीं दे पाई. सकपकाती हुई सिर्फ इतना बताया कि खाना खाने के बाद वीरू सो गया था. आधी रात को उस की अचानक तबीयत बिगडऩे लगी थी. पहले तो उस ने गरमी से बेचैनी की शिकायत की थी. उसे खुली हवा में घर के बाहर बाउंड्री के खुले में सोने की इच्छा जताई और खुद वहां चारपाई पर जा कर लेट गया.

करीब 4 बजे उस ने आवाज लगाई और सीने में दर्द की शिकायत की. फिर उस ने अस्पताल ले जाने के लिए परिवार के सभी लोगों को फटाफट कौल कर बुलाया.  अनीता से बात करते हुए गब्बर वीरू की लाश को भी निहार रहा था. उसे उस के गले पर गहरा निशान नजर आया. जब इस बारे में अनीता से पूछा तो वह सकपका गई. उसी वक्त काशी का वहां पहुंचना भी गब्बर को कुछ अजीब लगा. उसे वीरू की मौत पर शक हो गया. उसे वीरू के चेहरे और गले पर जख्मों के निशान देख कर पहले ही उस की हत्या का संदेह हो गया था.

उस ने अस्पताल में मौजूद सभी लोगों के सामने एक तरह से अपना फरमान सुनाया, ”वीरू की लाश का पहले पोस्टमार्टम होगा, तभी उस का अंतिम संस्कार किया जाएगा.’’

इसी के साथ उस ने थाना खेड़ली को सूचना दे दी. सूचना पा कर एसएचओ धीरेंद्र सिंह गुर्जर अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने वीरू की लाश का मुआयना किया और वहां मौजूद फेमिली वालों से कुछ सवाल पूछे. गब्बर जाटव की शिकायत पर मानसिंह उर्फ वीरू की हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया. उस के मुंह, नाक और गरदन पर चोट के निशान पाए गए. मुंह और नाक से बाहर निकला खून सूख चुका था. शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

पुलिस टीम आगे की जांच के लिए मानसिंह उर्फ वीरू के घर यानी घटनास्थल पर भी गई. वहां से कई साक्ष्य जमा किए गए, जिस में वीरू के बिस्तर पर से मिला एक टूटा दांत भी था. पुलिस के लिए यह वीरू की हत्या का एक सबूत था. पुलिस टीम ने घटनास्थल के खड़ेली कस्बे में लगे करीब 200 सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखे गए. एक फुटेज में 7-8 जून की रात करीब 2 बजे एक बाइक पर कुछ लोग लद कर वीरू जाटव के घर की ओर जाते दिखाई दिए. उन में ही काशीराम प्रजापति भी नजर आया था. उसी रात 3 बजे के बाद वही लोग बाइक से वापस लौटते नजर आए.

वीरू के भाई गब्बर ने अपने भाई की हत्या का शक काशीराम और भाभी यानी वीरू की पत्नी अनीता पर ही जाहिर किया था. उस ने पुलिस को बताया था कि अनीता वीरू की दूसरी पत्नी है, जो बगैर ब्याहे उस के साथ कई सालों से रह रही थी. पुलिस ने दोनों के मोबाइल नंबरों की लोकेशन की भी जांच की. काशीराम की लोकेशन घटनास्थल की मिली. कौल के डिटेल्स से पता चला कि अनीता और काशीराम के बीच हर रोज की तरह उस रात भी बातचीत हुई थी.

पुलिस ने इन तकनीकी साक्ष्यों को जुटाने के बाद इस घटना की जानकारी अलवर जिले के आला पुलिस अधिकारियों को दे दी. एसपी संजीव नैन ने इस बाबत एडिशनल एसपी (रूरल) प्रियंका और सीओ (कठूमर) कैलाशचंद्र के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम में एसएचओ धीरेंद्र सिंह, एसएसआई रमेशचंद, कांस्टेबल राजवीर, भगत सिंह, प्रधान सिंह, सुरेश चंद, देवेंद्र सिंह शामिल किए गए थे. थाना खेड़ली की पुलिस टीम भी इस जांच में पहले से लगी हुई थी. जांच में अनीता और काशीराम के बीच लव अफेयर के बारे में भी पता चला, जबकि वह वीरू की दूसरी पत्नी थी.

वह करीब 4 साल से मानसिंह उर्फ वीरू के साथ खेड़ली कस्बे के बाइपास रोड पर वार्ड नंबर 19 स्थित नए मकान में रह रही थी. वहीं अनीता का 10 वर्षीय बेटा भी रहता था. जबकि वीरू की पहली पत्नी सपना देवी अपने 2 बेटों और एक बेटी के साथ खेड़ली में ही पुराने मकान में रहती थी. वीरू अपनी दोनों पत्नियों और उन के बच्चों का पूरा खयाल रखता था. हालांकि अपना अधिक समय अनीता के साथ ही गुजारता था. सपना से उस की बाकायदा शादी हुई थी, लेकिन अनीता के साथ वह लिवइन रिलेशनशिप में था.

अनीता पहले से शादीशुदा थी. उस का ससुराल राजस्थान के भरतपुर जिले में भुसावर के सेंदली गांव में थी. विवाह के कुछ समय बाद ही वह पति को अलवर जिले के खेड़ली कस्बे में ले आई थी. पति को अपने पक्ष में कर सासससुर एवं दूसरे परिजनों पर मुकदमा दर्ज कर दिया था. उस का पति फलों का ठेला लगता था. वहीं उस की मुलाकात वीरू से तब हुई थी, जब अनीता अपने पति के साथ उस के मकान में किराए पर रहने आई थी. वहीं रहते हुए अनीता के वीरू के साथ अवैध संबंध बन गए थे. पति को इस की जानकारी हुई तो उस ने विरोध किया, तब अनीता वीरू के साथ भाग गई. जिस से उस के पति की काफी जगहंसाई हुई.

अनीता भी एक बेटे की मां थी. उस ने पति के साथ अपने बेटे को भी ठुकरा दिया. वह 2 माह बाद वीरू के साथ गुजार कर वापस खेड़ली लौट आई थी. जबकि उस का पति अपने बेटे के साथ सेंदली लौट गया था. वीरू के एक गैरऔरत के साथ रहने का विरोध उस की ब्याहता सपना देवी और दूसरे करीबी परिजनों ने भी किया, लेकिन वह नहीं माना. वह अनीता के इश्क और हुस्न का दीवाना बना हुआ था. उस ने अपनी पत्नी सपना और भाई गब्बर की एक नहीं सुनी. यहां तक कि उस ने अनीता के लिए दूसरा घर दिलवा दिया और उस के साथ रहने लगा. आजीविका के लिए उस ने अनीता को जनरल स्टोर की दुकान भी खुलवा दी. अनीता वीरू से एक बेटे की मां भी बन गई.

वीरू और बेटे के साथ अनीता की जिंदगी मजे में गुजर रही थी. वह अपनी दुकान चलाती थी. जबकि वीरू अपने धंधे में घर से बाहर चला जाता था. एक बार अनीता की दुकान पर काशीराम आया. वह बातबात पर अनीता की दुकान, उस के काम करने के तौरतरीके, व्यवहार की तारीफ करता है. उस ने यह भी महसूस किया कि सामान खरीदने के बहाने से उस से दूसरी बातें भी करने लगा था, ताकि उस के साथ अधिक समय तक रह सके. अनीता को काशी की आंखों में अपने प्रति चाहत के डोरे नजर आए. जब कभी काशी उस के सामने होता तो उस के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. कई बार काशी सामान खरीदते हुए और पैसे के लेनदेन के बहाने से अनीता के हाथों को प्यार से छूनेसहलाने लगता था.

अनीता भी इस का बुरा नहीं मानती थी. एक बार तो हद हो गई, जब काशी उस की हथेली को पकड़ कर बोल पड़ा, ”इतनी अच्छी कलाई और हथेली है, छोडऩे को जी नहीं करता है.’’

इस तारीफ को सुन कर अनीता शरमा गई. उस ने झट से अपना हाथ खींच लिया और तेजी से मुड़ गई थी.

इस के जवाब में अनीता भी बोले बगैर नहीं रही, ”लगता है, तुम पहली बार किसी औरत को देख रहे हो?’’

यह कहना गलत नहीं था कि काशी ने अनीता के दिल में प्रेम की गुदगुदी के साथ देह में वासना की चिंगारी भड़का दी थी. आगे क्या होने वाला है, इस का उसे जरा भी अंदाजा नहीं था. दोनों जल्द ही एकदूसरे के साथ प्यार की रौ में बह गए. अनीता एक बार फिर गैरमर्द की बांहों में ऐसे समा गई थी, मानो उस का वीरू से मन भर गया हो. अनीता को उस वीरू का प्रेम फीका लगने लगा, जिस के साथ साल 2013 से ही रह रही थी. उसे छोड़ कर दमदार मर्दानगी वाले मर्द काशी के साथ गुलछर्रे उड़ाने लगी थी. करीब ढाई साल तो उन के अवैध रिश्ते वीरू की नजरों से छिपे रहे, लेकिन जब इस का उसे पता चला, तब उस ने विरोध जताना शुरू कर दिया.

विरोध में वह अनीता के साथ गालीगलौज और मारपीट करने लगा. यह सब अनीता के साथ आए दिन होने लगा था. यहां तक कि वीरू ने उस का मोबाइल फोन तक छीन लिया था और सिम तोड़ डाले थे, ताकि वह काशी से फोन पर भी बात नहीं कर सके. अनीता पर वीरू द्वारा की गई सख्ती को देखते हुए काशी ने एक तरीका निकाला. वह वीरू के पैरों पर जा गिरा और माफी मांग ली. कसम खाई कि वह अनीता से संबंध तोड़ लेगा. इसी के साथ उस ने वीरू के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया.

इस मेलमिलाप की खुशी में काशी ने वीरू को शराब की पार्टी दे डाली. वीरू ने पार्टी के जम कर मजे लिए और यह भूल गया कि काशी उस की प्रेमिका का प्रेमी है. वीरू को इस बात का जरा भी एहसास नहीं हुआ कि काशी की दोस्ती के पीछे अनीता की चाल है. पुलिस की जांच टीम ने वीरू के हत्यारों तक पहुंचने के लिए उस की पहली पत्नी सरिता देवी से भी पूछताछ की. उस ने बहुत दुखी मन से अपनी पीड़ा बताई, जिस से पुलिस को अंदाजा हुआ कि वीरू की हत्या में उस की भूमिका नहीं हो सकती है. जबकि पुलिस को अनीता में इस की कोई झलक नहीं दिखी. उसे वीरू की मौत का न कोई मलाल था और न ही कोई पीड़ा, सिर्फ चेहरे पर बनावटी उदासी थी.

पुलिस की पूछताछ का सिलसिला यहीं नहीं खत्म हुआ. घटना की रात घर में मौजूद अनीता के 9 वर्षीय बेटे से पूछताछ के लिए पुलिस उसे अकेले में ले गई और उसे हमदर्दी एवं प्यार दिखाते हुए वीरू के बारे में पूछताछ करने लगी. अनीता के बेटे ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर पुलिस की आंखों में चमक आ गई. दरअसल, उस ने घटना की रात जो कुछ अनिद्रा में देखा था, सचसच बता दिया. यह भी बताया कि उसे किसकिस ने कुछ नहीं बोलने की हिदायत दी थी? किस ने धमकी दी थी और अनीता ने किस तरह से उसे चुप रहने के लिए समझाया था.

बच्चे ने 7 जून, 2025 की शाम की बात पापा से अखिर बार हुई बात बताई थी. उस ने बताया कि पापा जब उस रात काम से घर आए थे, तब उन्होंने उसे अपना मोबाइल फोन चार्ज के लिए बिजली बोर्ड के साकेट में लगाने के लिए दिया था. उसी रात मम्मी ने उस पर जल्द सोने का दबाव डाला था और वह सो गया था. आधी रात को अचानक उस की नींद खुल गई थी और उस ने पापा की हत्या करते हुए कई लोगों को देख लिया था. उन में उस की मम्मी भी थी.

पुलिस के लिए अनीता और वीरू का बेटा ही चश्मदीद गवाह निकला. उस ने हत्याकांड की बहुत सारी बातें बता दी थीं, जिस से अनीता और उस के नए प्रेमी काशीराम पर बना शक और मजबूत हो गया था. इस संबंध में पुलिस ने अनीता से सख्ती से पूछताछ की. तब उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया और दूसरे आरोपियों के बारे में बताया, जिस में मुख्य आरोपी काशीराम प्रजापति था. पुलिस ने काशीराम को 16 जून, 2025 को सुपारी किलर बृजेश जाटव के साथ गिरफ्तार कर लिया. दोनों से सख्ती के साथ पूछताछ से पहले पुलिस ने उन्हें बता दिया कि अनीता ने जुर्म मान लिया है और उस के बेटे ने सब कुछ बता दिया है, इसलिए उस के बचने की कोई गुंजाइश नहीं है. इतना सुनते ही काशीराम भी डर गया और घटनाक्रम के बारे में विस्तार से बता दिया.

काशीराम प्रजापति पुलिस की सख्ती के आगे ज्यादा देर तक नहीं टिक पाया. उस ने बाकी 3 आरोपियों के नाम बताने के साथसाथ वीरू की हत्या करनी स्वीकार ली. उस ने सुपारी के लिए 2 लाख रुपए के बारे में भी बताया, जो अनीता ने देने का वादा किया था. एडवांस के रूप में उसे 40 हजार मिल गए थे. आरोपियों में बृजेश जाटव अलवर के कालवाड़ी का रहने वाला है. वह छोटामोटा कामधंधा करता है. पूछताछ के बाद अनीता, काशीराम प्रजापति और बृजेश को पुलिस ने अलवर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया. Rajasthan News

कथा संकलन तक पुलिस अन्य तीनों आरोपियों को सघनता से तलाश कर रही थी.