Bihar News: खामोश हुआ विद्रोही तेवर

Bihar News: कलम की बदौलत बड़ेबड़े धन्नासेठों, मठाधीशों, माफियाओं, नौकरशाहों और सफेदपोशों की कलई खोलने वाले पत्रकार अजय विद्रोही ने जब अपनी कलम भूमाफिया अशोक सिंह पर चलाई तो अरबों की जमीन के लालच में उस ने अजय की कलम को हमेशाहमेशा के लिए शांत कर दिया.

29 सितंबर, 2015 की रात साढ़े 9 बजे के बाद पत्रकार अजय विद्रोही खाना खाने के बाद टहलने के लिए जैसे ही घर से बाहर सड़क पर आए, पड़ोस में रहने वाला दीपक सिंह मिल गया. सड़क पर खड़े हो कर वह उस से बातें करने लगे. तभी उन का बेटा शुभम फोन ले कर उन के पास आ कर बोला, ‘‘कोई अशोक अंकल हैं, वह आप से बात करना चाहते हैं.’’

बेटे से फोन ले कर जैसे ही अजय विद्रोही ने हैलो कहा, दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘भाई अजय, मैं अशोक सिंह…’’

‘‘हां भाई अशोक, बताएं… इतने दिनों बाद कैसे मेरी याद आई, जरूर कोई खास काम होगा तभी याद किया है?’’ अजय विद्रोही ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा.

‘‘हां, जरूरी काम है.’’ अशोक सिंह ने कहा.

‘‘बताओ, कहो तो अभी आ जाऊं?’’ अजय विद्रोही ने कहा.

‘‘नेकी और पूछपूछ. आ जाते तो काम हो जाता. हम सोच रहे हैं कि जिस मामले को ले कर हमारे बीच मतभेद चल रहे हैं, उस पर बैठ कर बातचीत कर लें, शायद बीच का कोई रास्ता निकल ही आए.’’ अशोक सिंह ने कहा.

‘‘ठीक है, मैं आ रहा हूं. मैं भी चाहता हूं कि मामला सुलझ जाए.’’ कह कर अजय ने फोन काट दिया. इस के बाद बेटे शुभम को आवाज दे कर कहा कि वह एक आदमी से मिलने जा रहे हैं. अभी थोड़ी देर में लौट आएंगे. बेटे से कह कर वह पैदल ही चल पड़े. उन्हें मठ के पास अशोक सिंह से मिलने जाना था, जो उन के घर से थोड़ी ही दूरी पर था.

वह तेज कदमों से बेफिक्री से चले जा रहे थे. अपने घर से वह कुछ दूर ही गए होंगे कि एक मोटरसाइकिल पीछे से आ कर धीरेधीरे उन के बराबर पर चलने लगी. उस पर 2 युवक सवार थे. बराबरी पर चल रही मोटरसाइकिल देख कर अजय कुमार ठिठके और जैसे ही उन्होंने उन की ओर देखा तो पीछे बैठा युवक उन्हें देख कर मुसकराया. उन्होंने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया और पहले से भी ज्यादा तेज गति से चल पड़े. मोटरसाइकिल सवार वहीं रुक गए. अजय भीड़भाड़ वाली चौक बाजार स्थित शराब की दुकान के पास पहुंचे थे कि मोटरसाइकिल सवार पीछे से आए और पीछे बैठे युवक ने अजय विद्रोही पर 2 गोलियां चला दीं. लोग कुछ समझ पाते, वे तेजी से चले गए. अजय विद्रोही गिर कर छटपटाने लगे थे.

गोलियों की आवाज सुन कर दुकानदारों ने दुकानों के शटर गिरा कर भाग लिए. पल भर में वहां गहरा सन्नाटा पसर गया. भागते हुए कुछ दुकानदारों ने देखा कि गोली किसी आदमी को मारी गई है और वह आदमी सड़क पर पड़ा तड़प रहा है तो वे उस के पास पहुंचे. पत्रकार अजय विद्रोही को बाजार के सभी दुकानदार जानते थे, इसलिए उन्होंने उन्हें पहचान लिया. इस के बाद अपना फर्ज समझते हुए लहूलुहान अजय कुमार को एक टैंपो में लादा और जिला चिकित्सालय ले गए. इस बीच उन के शरीर से काफी खून बह चुका था, जिस से रास्ते में ही उन्होंने दम तोड़ दिया.

चूंकि अजय विद्रोही को शहर के ज्यादातर लोग जानते थे, इसलिए कुछ ही देर में पूरे शहर में उन्हें गोली मारे जाने की खबर फैल गई. अजय के घर वाले भी खबर पा कर अस्पताल पहुंच गए. वहां जब उन्हें उन की मौत की जानकारी मिली तो वे रोनेबिलखने लगे. इस के बाद जैसेजैसे शहर के लोगों को पत्रकार अजय विद्रोही की हत्या की जानकारी होती गई, लोग अस्पताल पहुंचने लगे. कुछ ही देर में अस्पताल में भीड़ लग गई. किसी ने पुलिस को फोन द्वारा सूचना तो दे दी थी, लेकिन थाना सीतामढ़ी के थानाप्रभारी भुनेश्वर प्रसाद सिंह घंटों बाद अस्पताल पहुंचे. तब नाराज स्थानीय नेताओं और नागरिकों ने थानाप्रभारी को अस्पताल के अंदर नहीं जाने दिया. रात काफी होने के बावजूद माहौल पूरी तरह से गरम और विस्फोटक था.

भुवनेश्वर प्रसाद सिंह ने इस की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ ही देर में डीआईजी प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, एसपी हरिप्रसाद यश, एएसपी (अभियान) संजीव कुमार, डीएसपी राजीव रंजन भी जिला अस्पताल पहुंच गए थे. काफी देर तक नेताओं और पुलिस अधिकारियों के बीच नोकझोंक होती रही. जनता अजय विद्रोही की लाश पुलिस को सौंपने को तैयार नहीं थी. वह हत्यारों को 24 घंटे के अंदर गिरफ्तार करने की मांग कर रही थी. पुलिस अधिकारियों ने जब उन्हें आश्वासन दिया कि अजय के हत्यारे जल्द से जल्द गिरफ्तार किए जाएंगे, तब कहीं लाश पुलिस को सौंपी गई.

लाश कब्जे में ले कर पुलिस ने उसी रात आवश्यक काररवाई कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. यह घटना 29 सितंबर, 2015 की थी. पुलिस ने रात में ही घटनास्थल का निरीक्षण कर के वहां से 9 एमएम पिस्टल के 2 खोखे बरामद किए. 55 वर्षीय पत्रकार अजय कुमार विद्रोही बिहार के जिला सीतामढ़ी के मोहल्ला कोर्ट बाजार में अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शोभा शर्मा के अलावा 3 बच्चे थे. वह एक खोजी पत्रकार थे और जनहित के मुद्दों पर अननी कलम चलाते थे. यही वजह थी कि अगले दिन उन की हत्या के विरोध में नेताओं ने स्थानीय लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन करते हुए मेन रोड जाम कर दिया.

दुकानदारों ने भी अपनी दुकानें बंद कर लीं. भीड़ ने कई दुपहिया वाहनों में आग भी लगा दी थी. शहर का माहौल पूरी तरह विस्फोटक बन गया था. पुलिस ने तुरंत मृतक के बड़े बेटे शुभम शर्मा की ओर से अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302/120बी/364/34 के तहत मुकदमा दर्ज कर के आगे की काररवाई शुरू कर दी थी.

शहर की स्थिति को देखते हुए एसपी हरिप्रसाद यश ने शहर में आसपास के थानों की पुलिस और पीएसी बुला ली. शहर पुलिस छावनी में तब्दील हो चुका था. एएसपी (अभियान) संजीव कुमार और डीएसपी (सदर) राजीव रंजन स्थिति पर नजर रखे हुए थे.  प्रदर्शनकारी सीतामढ़ी नगर थाने के प्रभारी भुवनेश्वर प्रसाद सिंह को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें तत्काल निलंबित करने की जिद पर अड़े थे. आखिरकार एसपी को उन की मांग स्वीकार करनी पड़ी. उन्होंने तत्काल प्रभाव से भुवनेश्वर प्रसाद सिंह को लाइन हाजिर कर दिया.

उन के स्थान पर आशीष कांति को थाने का चार्ज दिया गया. चार्ज मिलते ही आशीष कांति ने सब से पहले घटनास्थल की जांच की. उन्होंने आसपास के लोगों से भी पूछताछ की. इसके बाद वह मृतक अजय विद्रोही के घर वालों से मिले. अजय की पत्नी शोभा शर्मा ने किसी से दुश्मनी होने की बात से इंकार किया. उस समय उन के घर का माहौल काफी गमगीन था, इसलिए वह ज्यादा कुछ नहीं पूछ सके. अब तक की जांच में हत्यारों के बारे में पता नहीं चला तो आशीष कांति ने अजय विद्रोही के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. एकएक नंबर की उन्होंने गहनता से जांच की तो पता चला कि उन के मोबाइल पर आखिरी फोन जिस नंबर से आया था, वह शहर में ऊंची पहुंच रखने वाले इस्टू हाऊस के मालिक अशोक सिंह का था.

अशोक के फोन आने के बाद ही अजय विद्रोही उन से मिलने चौक बाजार स्थित मठ की ओर जा रहे थे. इस बात की पुष्टि उन के बेटे शुभम ने भी की थी. चूंकि अशोक सिंह एक रसूखदार आदमी थे, इसलिए सिर्फ काल डिटेल्स के आधार पर उन पर हाथ नहीं डाला जा सकता था. लेकिन वह शक के घेरे में आ गए थे. थानाप्रभारी ने यह बात वरिष्ठ अधिकारियों को भी बता दी थी. वह अधिकारियों के निर्देश पर काररवाई करना चाहते थे. अधिकारियों ने कहा कि हत्यारा चाहे कितनी भी ऊंची रसूख वाला क्यों न हो, अगर उस के खिलाफ सबूत मिलते हैं तो उसे तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाए. इस के बाद आशीष कांति अशोक सिंह के खिलाफ सबूत जुटाने लगे.

आशीष कांति को मुखबिर से सूचना मिली कि घटना से कुछ देर पहले अशोक सिंह का भांजा दीपक सिंह अजय विद्रोही से बातें करते हुए देखा गया था. उस समय उस के हावभाव ठीक नहीं लग रहे थे, वह घबराया हुआ भी था. इस बात की तसदीक मृतक के बेटे शुभम ने भी की थी. पुलिस के शक के दायरे में दीपक भी आ गया. फिर क्या था, पुलिस ने 4 अक्तूबर, 2015 को दीपक को पूछताछ के लिए उस के घर से दबोच लिया. एएसपी (अभियान) संजीव कुमार सिंह के सामने दीपक से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ शुरू हुई. पहले तो वह उन्हें इधरउधर घुमाता रहा, लेकिन जब उन्होंने कुछ खास सबूत उस के सामने रखे तो उस के चेहरे का रंग फीका पड़ गया.

दीपक को अपना जुर्म कबूल करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं दिखाई दिया तो उस ने अजय विद्रोही की हत्या की साजिश में खुद के शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. दीपक से पूछताछ के बाद इस इस्टू हाउस के मालिक अशोक सिंह, भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल, जग्गा, शूटर रामबाबू सिंह, अजय सिंह, लोकेश सिंह, महेसी सिंह महेसिया और हरेंद्र बैठा के नाम सामने आए. केस का पूरी तरह से खुलासा हो चुका था. हत्या के इस मामले में शहर के रसूखदार लोगों के शामिल होने से पुलिस हैरान थी कि इन लोगों ने एक पत्रकार की हत्या क्यों की? यह अन्य अभियुक्तों के गिरफ्तार होने के बाद ही पता चल सकता था.

पूछताछ के बाद उसी दिन पुलिस ने आरोपी दीपक को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया, इस के 2 दिनों बाद 6 अक्तूबर को पुलिस ने योजनाबद्ध तरीके से इस्टू हाऊस के मालिक अशोक सिंह, जग्गा, रामबाबू सिंह, अजय सिंह और लोकेश को गिरफ्तार कर लिया. बाकी के 3 अरोपी जयप्रकाश अग्रवाल, महेसी सिंह महेसिया और हरेंद्र बैठा फरार हो गए थे. गिरफ्तार आरोपियों से पत्रकार अजय विद्रोही की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने सिलसिलेवार हत्या की जो कहानी पुलिस को बताई, वह इस प्रकार थी—

55 वर्षीय अजय शर्मा ‘विद्रोही’ के पूर्वज मूलरूप से राजस्थान के सीकर जिले के खाटू गांव के रहने वाले थे. करीब डेढ़ सौ साल पहले उन के परदादा रामदेव शर्मा किसी काम से सीतामढ़ी आए तो यहां की सभ्यता और संस्कृति उन्हें इतनी भा गई कि वह यहीं के हो कर रह गए. उन की 2 पीढि़यां यहीं जन्मीं और पलीबढ़ीं. पढ़लिख अजय कुमार ने सरकारी सेवा के बजाय पत्रकारिता को अपने जीवन का लक्ष्य चुना. अजय ने सीतामढ़ी में ही स्थानीय समाचार पत्रों में नौकरी की. नौकरी के बाद उन्होंने अपने नाम के आगे तखल्लुख ‘विद्रोही’ जोड़ लिया. इस के बाद वह स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करने लगे. वह अपनी लेखनी से भ्रष्टाचारियों की करतूतों को समाज के समाने उजागर करने लगे. जिस की वजह से शहर और समाज में उन की पहचान बनती गई. बाद में वह हिंदी अखबार दैनिक जागरण से जुड़ गए.

आखिरी दिनों में ‘विद्रोही’ सीतामढ़ी के दैनिक जागरण यूनिट के प्रभारी थे. यूनिट में अजय के मन के मुताबिक काम नहीं हुआ तो उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. इस के बाद उन्होंने हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘सिटी संदेश’ निकाला. इस अखबार के माध्यम से उन्होंने बड़ेबड़े धन्नासेठों, मठाधीशों, माफियाओं, नौकरशाहों और सफेदपोशों की कलई खोलनी शुरू कर दी, जिस की वजह से यह इन लोगों की आंखों की किरकिरी बन गए. लेकिन शहर में उन की लोकप्रियता बढ़ गई.

2 साल बाद वित्तीय संकट की वजह से उन का अखबार बंद हो गया. शहर में हर वर्ग के लोगों से उन का जुड़ाव हो गया था. चाहे नौकरशाह हो या राजनेता, चिकित्सक हो या व्यवसाई, अमीर हो या गरीब. सभी के बीच उन की एक अलग पहचान बन गई थी. शहर में होने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में उन की सहभागिता देखी जाती थी. उन्हें सिटीजन फोरम का महासचिव भी बना दिया गया था. यह जिम्मेदारी मिलने के बाद अजय ‘विद्रोही’ के कंधों पर सामाजिक दायित्वों का बोझ आ गया था. फोरम के माध्यम से उन्होंने जनसूचना अधिकार अधिनियम के तहत विभिन्न विभागों में 150 आरटीआई लगाईं. सीतामढ़ी शहर में थाना नगर के चौक बाजार स्थित मठ की 101 डिस्मिल जमीन पर भूमाफियाओं की नजरें टिकी थीं.

अजय को सूचना मिली कि भूमाफिया अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल द्वारा फरजी तरीके से मठ की वह जमीन लीज करा ली गई है. जमीन से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए उन्होंने थाना बथनाहा के मझौलिया गांव के रवि कुमार सिंह द्वारा संबंधित विभाग में आरटीआई लगवा कर सूचना मांगी. जानेमाने व्यवसाई अशोक सिंह की शहर में नूतन सिनेमा रोड स्थित चौक बाजार में इस्टू हाऊस नाम की मशहूर दुकान थी. इस्टू हाऊस में शराब और कबाब खुलेआम बिकता था. इस के अलावा यहां कई तरह के अनैतिक और गैरकानूनी धंधे चलते थे. शहर के बड़ेबड़े धन्नासेठों, माफियाओं, पत्रकारों, सफेदपोशों, अपराधियों और खाकी वर्दीधारियों का वहां बराबर उठनाबैठना था.

इसी वजह से अशोक सिंह पर किसी की भी हाथ डालने की हिम्मत नहीं होती थी. अजय विद्रोही भी कभीकभार वहां जाते थे. मालिक अशोक सिंह से उन का परिचय था. वह उस के कई काले धंधों के बारे में जानते थे. इन्हीं बातों को ले कर अशोक सिंह और अजय के बीच मतभेद पैदा हुए, तो अजय ने इस्टू हाऊस जाना बंद कर दिया. यही नहीं उन्होंने अशोक सिंह से बात करनी भी बंद कर दी. अजय विद्रोही ने पता कर लिया था कि मठ की 101 डिस्मिल जमीन मठ के महंथ दुखियादास के नाम थी. महंथ दुखियादास ने जीवित अवस्था में ही अपना उत्तराधिकारी बलवंतदास को बना दिया था, लेकिन अरबों रुपए की यह जमीन बलवंतदास के नाम स्थानांतरित नहीं की थी. महंथ बलवंतदास की मौत हो चुकी थी.

उन की मौत के बाद वह जमीन ऐसे ही पड़ी थी. उस जमीन पर अशोक सिंह की नजर गड़ी हुई थी. अरबों की जमीन हथियाने के लिए उस ने बाजपट्टी के भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल को अपनी योजना में शामिल किया. दोनों ने साजिश रच कर उस जमीन को हड़पने की योजना बना डाली. इस्टू हाऊस में जग्गा राउत कई सालों से नौकरी करता था. वह अशोक सिंह का बहुत वफादार आदमी था. इन लोगों ने बरियापुर के बीएलओ से साठगांठ कर के जग्गा राउत का फोटो लगवा कर मृत महंत दुखियादास के नाम से मतदाता पहचान पत्र बनवा लिया.

मतदाता पहचान पत्र बनने के बाद दोनों ने उसी के आधार पर जग्गा राउत का फोटो लगा कर मृत महंथ दुखियादास के नाम से पैनकार्ड भी बनवा लिया. एक तरह से इन लोगों ने फरजी तरीके से महंथ दुखियादास को जीवित कर दिया था. जाली दस्तावेजों के आधार पर महंत दुखियादास के नाम से अन्य कागजात भी तैयार करा लिए थे. इन्हीं कागजों के आधार पर 23 जून, 2014 को दोनों भूमाफियाओं ने जग्गा राउत को कथित महंत दुखियादास बना कर मठ की जमीन अपने नाम पर 61 सालों के लिए लीज पर करा ली.

जमीन की लीज कराने के बाद दोनों भूमाफियाओं ने इंडियन बैंक की राजोपट्टी शाखा से कई करोड़ का भी ले लिया. अजय विद्रोही को उन की यह पूरी कहानी मालूम हो चुकी थी. यही नहीं, अजय यह भी मांग करने लगे थे. इन दोनों भूमाफियाओं ने गैरकानूनी तरीकों से जो अकूत संपत्ति अर्जित की है, उस की जांच आर्थिक अपराध शाखा से कराई जाए. अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल को पता था कि सिटीजन फोरम के महासचिव और स्वतंत्र पत्रकार अजय विद्रोही की पहुंच बड़ेबड़े अधिकारियों तक है.

इसलिए उन्हें इस बात की आशंका थी कि अगर आरटीआई के माध्यम से दस्तावेज अजय के हाथ लग गए तो मठ की अरबों की जिस जमीन पर उन का कब्जा है, वह तो उन के हाथों से निकल ही जाएगी, जालसाजी कर के बैंक से उन्होंने जो लोन लिया है, वह भी लौटाना पड़ सकता है. इस से उन की बदनामी तो होगी ही, जेल भी जाना पड़ेगा. अजय विद्रोही की वजह से अशोक सिंह और जयप्रकाश अग्रवाल की परेशानी बढ़ गई थी. पहले तो उन्होंने अजय को खरीदने की कोशिश की, लेकिन वह बिकने को तैयार नहीं हुए. अशोक सिंह अजय के जिद्दी स्वभाव को जानते थे. उसे लगा कि अजय की जिद उस के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है, इसलिए उस ने अजय को हमेशाहमेशा के लिए रास्ते से हटाने का फैसला कर लिया.

यह काम अशोक सिंह के लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि उस के यहां बड़े और नामचीन अपराधियों का आनाजाना था. इस योजना में उस ने जयप्रकाश अग्रवाल और भांजे दीपक सिंह को भी शामिल कर लिया. अशोक सिंह ने सुपारी किलर रामबाबू सिंह से बात की. वह जिले की पुलिस के लिए सिरदर्द बना था. जिले के विभिन्न थानों में उस के खिलाफ कई गंभीर और संगीन मामले दर्ज थे. वह कई बार जेल भी जा चुका था.

घटना से सप्ताह भर पहले शूटर रामबाबू सिंह ने अपने साथियों अजय, लोकेश, हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया के साथ मिल कर पत्रकार अजय विद्रोही के घर से चौक स्थित मठ तक की रेकी की. उन्होंने इस बात की अच्छी तरह से जांचपरख कर ली कि अजय विद्रोही घर से कितने बजे और किन रास्तों से निकलते हैं. 27 सितंबर, 2015 को शूटर रामबाबू सिंह अपने साथियों अजय, लोकेश, हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया के साथ सीतामढ़ी पहुंचा. अशोक सिंह ने शहर के एक नामी होटल में उन के ठहरने का इंतजाम कर दिखाया. बदमाशों ने 2 दिनों बाद घटना को अंजाम का फैसला किया दीपक सिंह को अजय विद्रोही की मुखबिरी पर लगा दिया.

दीपक जानता था कि अजय रात में खाना खाने के बाद कुछ देर टहलते हैं. 29 सितंबर, 2015 की रात भी ऐसा ही हुआ. खाना खाने के बाद अजय विद्रोही बाहर टहलने के लिए निकले तो दीपक घर के बाहर टहलता मिल गया. वह पहले से ही बाहर खड़ा उन के निकलने का इंतजार कर रहा था. जेसे ही वह बाहर निकले, मुसकराता हुआ दीपक उन के पास पहुंच गया. थोड़ी देर वह इधरउधर की बातें करता रहा. उस समय उस का हावभाव बड़ा अजीब था.

उसी समय अजय विद्रोही के मोबाइल पर अशोक सिंह का फोन आया. उस समय उन का मोबाइल कमरे में था, जिसे ले जा कर उन्हें बेटे ने दिया. चूंकि अशोक सिंह का फोन काफी दिनों बाद आया था, इसलिए वह चौंके. अशोक ने पिछली बातों को भूल कर फिर से दास्ती का हाथ बढ़ाने की पेशकश की. अजय विद्रोही उस से मिलने चल पड़े. उधर दीपक ने अपने मामा अशोक को फोन कर के बता दिया कि अजय घर से निकल चुके हैं. अशोक ने यह सूचना शूटर रामबाबू सिंह को दे दी. रामबाबू ने यह सूचना अपने साथी अजय को दे दी. अजय लोकेश के साथ विद्रोही के घर पर पहले से ही नजर रखे हुए था. हरेंद्र बैठा और महेसी सिंह महेसिया साथियों की सुरक्षा के लिए दूसरी मोटरसाइकिल लिए चौक पर खड़े थे.

इशारा मिलते ही अजय मोटरसाइकिल ले कर विद्रोही के पीछे चल पड़े. उस की मोटरसाइकिल पर पीछे लोकेश बैठा था. वह अजय विद्रोही पर घात लगाए था. अजय विद्रोही का पीछा करता हुआ अजय चौक के पास पहुंच गया. उस के पीछेपीछे हरेंद्र और महेसी सिंह भी गाड़ी ले कर चल रहे थे. रात काफी हो चुकी थी. बाजार लगभग बंद हो चुका था. वारदात को अंजाम देने का उन के लिए यह अच्छा मौका था. अजय की मोटरसाइकिल जैसे ही अजय विद्रोही के करीब पहुंची, लोकेश ने 2 गोलियां उन के सीने में उतार दीं. गोली लगते ही वह सड़क पर गिर कर तड़पने लगे. इस के बाद चारों बदमाश फरार हो गए.

गोली चलने की आवाज सुन कर दुकानदारों ने शटर गिराने शुरू कर दिए. कुछ सहानुभूति दिखाने के लिए पत्रकार अजय विद्रोही के पास पहुंच गए. वे अजय को टैंपो द्वारा जिला चिकित्सालय ले गए, जहां डाक्टरों ने उन्हें घोषित कर दिया. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने हत्याकांड में शामिल अभियुक्तों में दीपक सिंह, अशोक सिंह, लोकेश सिंह और जग्गा को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया था. पुलिस दबाव के कारण 8 जनवरी, 2016 को अभियुक्त हरेंद्र बैठा ने कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था. इस के ठीक 2 दिनों बाद 10 जनवरी को महेसी सिंह महेशिया को पुसिल ने सीतामढ़ी से ही गिरफ्तार कर लिया था. उस ने भी अजय विद्रोही हत्याकांड में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली थी.

भूमाफिया जयप्रकाश अग्रवाल फरार चल रहा था. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की पकड़ से दूर था. इस मामले में राजस्व विभाग के एक अधिकारी को दोषी पाए जाने पर उसे निलंबित कर दिया गय था. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हुई थी. कलम की बदौलत सच उगलने पर अपनी जान गंवाने वाले अजय विद्रोही पहले पत्रकार नहीं थे. ऐसे न जाने कितने विद्रोहियों को मौत के मुंह में जाना पड़ा है. Bihar News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Agra Crime: केमिस्ट्री शिक्षक गिरफ्तार, यूट्यूब से सीखकर बना रहा सिंथेटिक ड्रग्स

Agra Crime: एक ऐसा मामला सामने आया है, जहां एक केमिस्ट्री का टीचर यूट्यूब पर वीडियो देखकर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था. जब इस टीचर के बारे में पता चला तो सभी हैरान थे. अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों एक टीचर सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से.

यह मामला यूपी के आगरा के खंदौली से सामने आया है, जहां आरोपी मनोज फिरोजाबाद जिले के थाना नारखी क्षेत्र के गांव मरसलगंज का रहने वाला है. फिलहाल 36 वर्षीय मनोज आगरा के थाना खंदौली क्षेत्र के नगला मट्टू में दिनेश उपाध्याय के मकान में किराए पर रह रहा था. वह इसी किराए के घर में सिंथेटिक ड्रग्स बना रहा था.पुलिस ने मनोज को अरेस्ट कर लिया है.

पुलिस के अनुसार, मनोज से करीब 700 लीटर से अधिक केमिकल और उपकरण बरामद किए हैं. जिस में पुलिस को 450 लीटर डिस्टिल्ड वाटर, 120 लीटर मिथाइल, 27.5 लीटर हाइड्रोब्रोमिक एसिड, 100 लीटर एथाइल, 50 लीटर एसीटोन, 40 लीटर हाइड्रोक्लोरिक एसिड, 9 लीटर एथेनाल. इस के अलावा और भी उपकरण पुलिस ने बरामद किए हैं. बताया जाता है कि इस केमिकल का इस्तेमाल एमडीएमए जैसे नशीले पदार्थ के लिए किया जाता है. पुलिस ने आरोपी को अरेस्ट कर लिया है और उस से विस्तार से पूछताछ की जा रही है. Agra Crime

Serial Killer: खौफनाक इरादों वाले सीरियल किलर्स

Serial Killers: भारत के कुछ खौफनाक सीरियल किलर्स के अपराधों के तौर तरीके और उन के द्वारा अंजाम दी गई वारदातों के बारे में सुन कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उन्होंने अपने शैतानी दिमाग से डर की जो दहशत फैलाई थी, उस से न केवल सामान्य लोगों की जिंदगी आतंक और भय से गुजरने लगी थी, बल्कि पुलिस महकमा भी सकते में आ गया था.

वैसे अपराधियों को कानूनी शिकस्त मिली, वे सलाखों के पीछे पहुंचा दिए गए. बावजूद इस के नए सिरे से अपराध की घटनाएं होती रहीं. वैसे खूंखार अपराधियों की बात करें तो उन में रमन राघव, चार्ल्स शोभराज, साइनाइड मोहन, देवेंद्र शर्मा, मोहिंदर सिंह पंढेर, एम. जयशंकर, डाक्टर डेथ और संतोष पोल के नाम प्रमुख हैं.

इन  में से कई अपराधियों पर फीचर फिल्में और टीवी सीरियल भी बन चुके हैं. जबकि एक सच्चाई तो यह भी है कि फिल्मों में उन के कुकर्मों और अपराधों को जितनी शिद्दत के साथ फिल्माया गया, वे उस से कहीं अधिक खूंखार और खौफनाक थे.

वैसे अपराधी देश के विभिन्न हिस्सों के रहे हैं. महानगर से ले कर छोटेमोटे कस्बाई इलाकों तक में उन का खौफ बना रहा है. उन में अधिकतर के अपराध सैक्स, हत्या और रेप जैसी वारदातों के रहे हैं.

रमन राघव : एक साइको किलर

मुंबई में 1960 के दशक का दौर था. तब बंबई नाम के इस महानगर में देश के कोनेकोने से लोग रोजगार की तलाश के लिए लगातार आ रहे थे. उन का वहां कोई ठौरठिकाना नहीं था, फिर भी उन के आने का सिलसिला बना हुआ था. वे महानगर में जहांतहां किसी तरह से रहने की जगह बनाते जा रहे थे, जहां सिर्फ सिर छिपाने की जगह थी. दैनिक क्रिया के लिए सार्वजनिक शौचालय थे. नहानेधोने के लिए भी वैसी खुले में कोई जगह थी. सोने के लिए सड़कों का फुटपाथ भी उन के लिए कम पड़ने लगा था.

रोजगार का इंतजाम हो जाने के बाद लोग जैसेतैसे चकाचौंध की जिंदगी में किसी तरह से गुजारा कर ले रहे थे. उन में अधिकतर गरीब और मजदूर किस्म के लोगों के छोटेछोटे परिवार थे. उन के नसीब में घरेलू परदा और सुरक्षा नाम मात्र की थी. वे कब किसी घटना या दुर्घटना के शिकार हो जाएं, कहना मुश्किल था. उन में या फिर उन से बाहर अपराधी किस्म के लोग भी थे, जिन की नजर भोलीभाली लड़कियों और अकेली औरतों पर रहती थी. ऐसा ही एक व्यक्ति रमन राघव था.

उस के बारे में बहुत अधिक रिकौर्ड तो नहीं है, सिवाय इस के कि उस ने कई जघन्य अपराध किए. हालांकि तब यह माना गया था कि वह दक्षिण भारत का रहने वाला था. 1965-66 के समय में मुंबई में फुटपाथ पर सोने वाले लोगों की हत्याओं की खबरों ने मुंबई पुलिस की नाक में दम कर रखा था. गरीब बस्तियों में उस के नाम का भय बना हुआ था. उस के ताबड़तोड़ अपराध ने सभी को सन्न कर दिया था. पुलिस उस के हुलिए तक से अनजान थी.

रात के अंधेरे में जब किसी बेसहारे की मौत हो जाती थी, तब पुलिस मरने वाले की शिनाख्त तो कर लेती थी, लेकिन उस हत्यारे तक नहीं पहुंच पाती थी. पुलिस को सभी कत्ल में एक जैसे तरीके के अलावा और कुछ नहीं मालूम हो पाया था. वह तरीका था लोगों के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया जाना. हत्यारा एक ही वार में व्यक्ति को मौत की नींद सुला देता था.

सिर्फ एक साल के अंदर ही करीब डेढ़ दरजन लोगों पर इस तरह के जानलेवा हमले हुए थे, जिन में 9 लोग मारे गए थे. इस अनजान हमलावर को पकड़ने में मुंबई पुलिस पूरी तरह से नाकाम थी. लोग शाम होते ही अपनेअपने घरों की ओर लौटने लगे थे. स्थिति यहां तक आ गई थी कि लोग अपनी सुरक्षा के लिए साथ में लकड़ी या डंडा रखने लगे थे. उस के बाद कुछ समय तक वारदातें नहीं हुईं.

पुलिस जांच में जुटी थी और कई घायलों की मदद से इस हमलावर का स्केच बनवाया गया, जिस के आधार पर मुंबई क्राइम ब्रांच पुलिस के 27 अगस्त, 1968 को इस खूंखार हत्यारे रमन राघव को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की. पुलिस पूछताछ में उस ने बताया कि 3 साल के अपने आपराधिक जीवन में करीब 40 लोगों को मौत के घाट उतार चुका था. जबकि पुलिस का मानना था कि यह आंकड़ा और भी ज्यादा हो सकता है. पुलिस ने पूछताछ में यह भी पाया कि रमन ने फुटपाथ पर सोए बुजुर्ग महिला, पुरुष, युवा और बच्चों सभी को अपना शिकार बनाया.

पूछताछ के दौरान पुलिस ने जब उस की मैडिकल जांच करवाई, तब डाक्टरों के पैनल ने उसे मानसिक रूप से विकृत बताया. फिर निचली अदालत ने लंबी सुनवाई के बाद उसे मौत की सजा सुना दी. इस सब के बीच रमन राघव ने सजा के खिलाफ कोई अपील भी नहीं की. हाईकोर्ट ने 3 मनोवैज्ञानिकों के पैनल से उस के मानसिक स्तर की फिर से जांच कराई.

मनोचिकित्सकों के पैनल द्वारा किए गए कई घंटों के इंटरव्यू के बाद निष्कर्ष निकला कि वह दिमागी रूप से बीमार है. ऐसे में उस की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया. इस के बाद उसे पुणे की यरवदा जेल में भेज दिया गया, जहां कई सालों तक उस का इलाज भी चला. साल 1995 में साइको किलर रमन राघव की किडनी की बीमारी के चलते सस्सून अस्पताल में मौत हो गई.

साल 2016 में उस की जीवनी पर एक हिंदी फिल्म ‘रमर 2.0’ भी बनी थी, जिस में मुख्य भूमिका रघुवीर यादव ने निभाई थी. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी एक अहम किरदार में थे.

डा. देवेंद्र शर्मा : बेरहमी से 100 जानें लेने वाला हैवान

सीरियल किलर डा. देवेंद्र शर्मा की हैवानियत को दिल्ली, गुड़गांव, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के लोग 2 दशक बाद भी याद कर सिहर जाते हैं. उस के खौफनाक किस्सों में किडनी रैकेट, फरजी गैस एजेंसी और कारों की चोरी के कारनामे आज भी सब की जुबान पर हैं. लोगों का कहना है कि उस ने 100 से ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया था, जिन में कैब ड्राइवर और दूसरी गाडि़यों के ड्राइवर थे. उन की लाशों को यूपी की मगरमच्छों वाली नहर में फेंक दिया था.

साल 2002 और 2004 के बीच उस के कारनामे ज्यादा चर्चित हुए. वह कारें और दूसरे वाहनों को चुराया करता था. उस ने करीब 40 ड्राइवरों को मौत के घाट उतार दिया था. हैरानी की बात यह थी कि वह एक आयुर्वेदिक चिकित्सक था. अपने पेशे से अलग लगातार आय के अन्य साधनों पर नजर रखे हुए था. हत्याओं में से 50 को कुबूल करने के बाद उसे 2008 में मौत की सजा सुना दी गई थी. वह ऐसा सीरियल किलर था, जो 50 कत्ल करने के बाद उस की गिनती भूल गया था. बाद में उस ने माना कि वह 100 से ज्यादा लोगों की जान ले चुका है.

वह 2004 में पकड़ा गया था. फिर जेल में अच्छे बर्ताव के कारण उसे जनवरी 2020 में 20 दिन की पैरोल मिली थी. पैरोल खत्म होने के बाद भी वह जेल नहीं पहुंचा बल्कि वह दिल्ली के मोहन गार्डन में छिप कर रहने लगा. यहां वह एक बिजनसमैन को चूना लगाने वाला था, लेकिन पुलिस को उस के यहां होने की भनक लगी और आखिर में उसे पकड़ लिया गया. दिल्ली में पकड़े गए देवेंद्र को किडनी मामले का अपराधी करार दिया गया था.

देवेंद्र शर्मा डाक्टरी की पढ़ाई पूरी करने के बाद राजस्थान में निजी प्रैक्टिस करता था. उस में उतनी आमदनी नहीं हो पाती थी, जितने कि वह उम्मीद किए हुए था. साल 1984 में देवेंद्र शर्मा ने आयुर्वेदिक मेडिसिन में अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर के राजस्थान में क्लीनिक खोला था. फिर 1994 में उस ने गैस एजेंसी के लिए एक कंपनी में 11 लाख रुपए का निवेश किया था. लेकिन कंपनी अचानक गायब हो गई, फिर नुकसान के बाद उस ने 1995 में फरजी गैस एजेंसी खोल ली.

उस के बाद शर्मा ने एक गैंग बनाया, जो एलपीजी सिलेंडर ले कर जाते ट्रकों को लूट लेता था. इस के लिए वे लोग ड्राइवर को मार देते और ट्रक को भी कहीं ठिकाने लगा देते. इस दौरान उस ने गैंग के साथ मिल कर करीब 24 मर्डर किए. वह अपने पेशे से ही जुड़ कर पैसा कमाने का काम करने लगा. उस के पास उन मरीजों की संख्या अच्छीखासी थी, जिन की किडनी खराब हो चुकी थी. उन्हें वह आयुर्वेदिक दवाइयां दिया करता था. उस ने उपचार करते हुए देखा कि बहुतों की दोनों किडनियां खराब हैं, जिसे ट्रांसप्लांट करने की जरूरत है.

फिर क्या था, देवेंद्र शर्मा किडनी ट्रांसप्लांट गिरोह में शामिल हो गया. वह किडनी डोनर का इंतजाम करने लगा. कार के ड्राइवर को इस का निशाना बनाया और उन्हें मार कर जरूरतमंदों को उस की किडनी बेच कर मोटा पैसा बनाने लगा. इस काम में उसे दोहरा लाभ हुआ. किडनी बेचने के साथसाथ देवेंद्र शर्मा ने लूटी हुई कारों से भी पैसे कमाए. उस ने 7 लाख रुपए प्रति ट्रांसप्लांट के हिसाब से 125 ट्रांसप्लांट करवाए. ड्राइवर की बौडी को नहर में फेंकने के बाद कैब को यूज्ड कार बता कर बेच देता.

वह फरजी गैस एजेंसी भी चलाने लगा. अपनी फरजी गैस एजेंसी के लिए जब उसे सिलेंडर चाहिए होते तो वह गैस डिलिवरी ट्रक को लूट लेता था और उस के ड्राइवर को मार देता था. देवेंद्र ने पूरी गैंग तैयार कर रखी थी. वे गाडि़यों की लूट से ले कर लाश को  ठिकाने लगाने के लिए उसे उत्तर प्रदेश में कासगंज स्थित हजारा नहर में फेंक दिया करता था. इस नहर में बड़ी संख्या में मगरमच्छ रहते हैं.

साइनाइड किलर मोहन : 20 महिलाओं की हत्या

सीरियल किलर मोहन कुमार को साइनाइड किलर के नाम से भी जाना जाता है. मोहन कुमार को 20 महिलाओं की हत्या के मामले में गिरफ्तार किया गया था. उन महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने के बाद, वह उन्हें गर्भनिरोधक गोलियां खिलाता था. दरअसल, वे गर्भनिरोधक गोलियां नहीं, बल्कि साइनाइड की गोलियां हुआ करती थीं. उस ने ये जुर्म साल 2005 से 2009 के बीच किए थे. उस के बारे में कहा जाता है कि वह कई बैंक धोखाधड़ी और वित्तीय घोटालों में भी शामिल था. उसे दिसंबर 2013 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

मोहिंदर सिंह पंढेर : निठारी हत्याकांड

साल 2005 और 2006 के बीच दिल्ली के नोएडा इलाके में निठारी हत्याकांड काफी चर्चा में रहा था. इस खौफनाक घटना की पूरे देश में बहुत चर्चा हुई. मोहिंदर सिंह पंढेर और सुरिंदर कोली दोनों पर निठारी में 16 से अधिक बच्चों की हत्या और बलात्कार का आरोप था.मोहिंदर सिंह पंढेर दिल्ली के नोएडा का एक धनी व्यापारी था. 2005 से 2006 के बीच निठारी गांव के 16 लापता बच्चों की खोपड़ी उस के घर के पीछे एक नाले में मिली थी. उस इलाके के सभी लापता बच्चों की लाशें पंढेर के घर के पास ही मिली थीं.

पुलिस ने पंढेर और उस के नौकर सुरिंदर कोली को गिरफ्तार कर लिया. दोनों पर रेप, नरभक्षण और मानव अंगों की तस्करी का आरोप लगाया गया था. कुछ आरोप सही थे तो कई अफवाहें भी थीं. कोली और पंढेर दोनों को 2017 में मौत की सजा सुनाई गई थी.

एम. जयशंकर : रेप और मर्डर

एम. जयशंकर पर 30 महिलाओं से रेप और 15 महिलाओं की हत्या का आरोप था. उस ने 2008 से 2011 के बीच रेप और हत्या की घटनाओं को अंजाम दिया था. उस ने तामिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में 30 बलात्कार, 15 हत्याएं और कई डकैती की घटनाओं को अंजाम दिया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बंगलुरु की एक जेल में बंद कर दिया गया था. हालांकि उसे  मानसिक रूप से बीमार भी बताया गया था. बाद में जेल से भागने के कई असफल प्रयासों के बाद एम. जयशंकर ने 2018 में आत्महत्या कर ली थी.

डाक्टर डेथ : महिलाओं को जिंदा दफनाने वाला

वैसे दुनिया भर में डाक्टर को प्राणरक्षक माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के सातारा में एक ऐसा डाक्टर सामने आया, जिसे ‘डाक्टर डेथ’ का नाम दिया गया. इस डाक्टर की कहानी इतनी खौफनाक थी कि उस के कारनामे उजागर होते ही सभी चौंक पड़े थे. डाक्टर ने पुलिस को बताया कि उस ने 5 औरतों को जिंदा दफना दिया था उन की कब्रों के ऊपर नारियल के पेड़ भी लगा दिए थे.

डाक्टर डेथ के इस सनकी रवैए का खुलासा 2016 में तब हुआ, जब उसे पुलिस ने एक कत्ल के मामले में गिरफ्तार किया था. महाराष्ट्र के पुणे से करीब 120 किलोमीटर दूर सातारा में रहने वाले इस कातिल डाक्टर की पहचान संतोष पोल के रूप में की गई थी. कातिल डाक्टर ने पुलिस को अपने कुबूलनामे में बताया कि वह साल 2003 से ऐसी वारदातों को अंजाम देता आया है.

संतोष पोल पेशे से एलेक्ट्रोपैथ डाक्टर था और उस के पास बैचलर औफ इलैक्ट्रोहोमियोपैथी मैडिसिन एंड सर्जरी (बीईएमएस) की डिग्री थी. इस के अलावा उस ने मुंबई के घोटवडेकर अस्पताल में 8 साल तक नौकरी भी की थी. वहां काम करने वाले वरिष्ठ डाक्टरों का मानना था कि वह मैडिकली सर्टिफाइड नहीं था. संतोष खुद को डाक्टर बताने के साथसाथ समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट भी बताता था.

साल 2016 में वेलम गांव की आंगनबाड़ी कार्यकत्री मंगला जेधे लापता हो गई. उस के परिजनों ने इस का आरोप संतोष पर लगा दिया था. शिकायत में नामजद होने के बाद पुलिस ने उसे पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन सबूत नहीं होने की वजह से उसे छोड़ दिया गया. मामले की चल रही जांच में सामने आया कि मंगला के फोन की आखिरी लोकेशन संतोष पोल के फार्महाउस के पास दिखी और मंगला का फोन ज्योति नाम की नर्स के पास से बरामद किया गया.

इस के बाद पूछताछ में ज्योति ने बताया कि संतोष पोल ने ही मंगला जेधे की हत्या की और उस के शव को दफना दिया. उधर संतोष को जैसे ही यह सब पता चला तो वह मुंबई भाग गया. ज्योति के द्वारा बताई गई जगह पर खुदाई की गई, तो एक कंकाल बरामद हुआ और लैब रिपोर्ट्स में साबित हो गया कि वह कंकाल मंगला जेधे का ही था. गिरफ्तारी के बाद संतोष ने बताया कि उस ने 13 सालों में 5 महिलाओं और एक पुरुष की हत्या की है. इस के बाद पुलिस के जरिए चारों महिलाओं के कंकाल बरामद कर लिए गए, लेकिन एक पुरुष का कंकाल बरामद नहीं हुआ.

संतोष ने उस की लाश नदी में फेंक दी थी. उस ने बताया कि वह महिलाओं को नशे का इंजेक्शन देता था, फिर नशे की हालत में रहने के दौरान ही उन्हें फार्महाउस में दफना देता था. साथ ही लाशों के सड़ने की गंध छिपाने के लिए उस ने कुछ मुर्गियां भी पाल रखी थीं. पुलिस ने इस ‘डाक्टर डेथ’ के घर से नशीली दवाएं, इंजेक्शन, ईसीजी मशीन और आरटीआई से जुड़े कुछ दस्तावेज बरामद किए थे.

संतोष ने बताया था कि वह हर हत्या के बाद एक जेसीबी बुलाता था और नारियल के पेड़ों को लगाने के लिए गड्ढे खुदवाता था, लेकिन इन गड्ढों में लाशें दफना कर उन के ऊपर नारियल के पेड़ लगा दिया करता था. Serial Killer

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने में कानून नाकाम

Delhi Crime News: एसिड अटैक रोकने  में कानून नाकाम   देश की राजधानी दिल्ली में अपनी छोटी बहन के साथ जा रही एक लड़की पर द्वारका मोड़ के पास एक लड़के ने एसिड अटैक कर दिया. लड़की ने इस मामले में 2-3 लोगों पर शक जाहिर किया. पुलिस ने सभी 3 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया.

लड़की के पिता ने बताया, ‘‘मेरी दोनों बेटियां सुबह स्कूल के लिए निकली थीं. कुछ देर बाद मेरी छोटी बेटी भागती हुई आई और उस ने बताया कि 2 लड़के आए और दीदी पर एसिड फेंक कर चले गए.  हर साल देश में एसिड अटैक के 1,000 से ज्यादा मामले सामने आते हैं. आरोपी पकड़े जाते हैं. पुलिस अपना काम करती है. इस के बावजूद लड़की की जिंदगी खराब हो जाती है. एसिड अटैक को ले कर साल 2013 में कानून बना था.

यह भी एसिड की शिकार लड़कियों की पूरी मदद नहीं कर पा रहा है. कानून के तहत एसिड हमलों को अपराध की श्रेणी में ला कर भारतीय दंड संहिता की धारा 326ए और धारा 326बी जोड़ी गई. इन धाराओं के तहत कुसूरवार पाए जाने पर कम से कम  10 साल की जेल की सजा का प्रावधान किया गया है. कुछ मामलों में उम्रकैद का भी प्रावधान रखा गया है. सुप्रीम कोर्ट ने साल 2013 में एक पीडि़ता की अर्जी पर सुनवाई के दौरान कहा था, ‘एसिड हमला हत्या से भी बुरा है.

इस से पीडि़त की जिंदगी पूरी तरह बरबाद हो जाती है.’ इस के बाद एसिड अटैक के पीडि़तों के इलाज और सुविधाओं के लिए भी नई गाइडलाइंस जारी की गई थीं. सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सरकारों को एसिड हमले के शिकार को तुरंत कम से कम 3 लाख रुपए की मदद देने का प्रावधान है. पीडि़ता का मुफ्त इलाज भी सरकार की जिम्मेदारी है.  देखने में यह बेहतर लगता है, पर हकीकत में इस को संभालना बहुत मुश्किल होता है. एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगी, इस के बाद भी एसिड मिल रहा है.

साल 2018 से साल 2020 के बीच देश में महिलाओं पर एसिड हमलों के 386 मामले दर्ज किए गए थे. इन में से केवल 62 मामलों के आरोपियों को कुसूरवार पाया गया था. एसिड अटैक की शिकार अपना मुकदमा सही से नहीं लड़ पाती हैं. उन के पास अच्छा वकील करने के लिए पैसे नहीं होते हैं.

एसिड अटैक की शिकार अंशु बताती हैं, ‘‘एसिड अटैक के बाद जिंदगी बेहद मुश्किल हो जाती है. इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं. सरकार से मिलने वाली मदद लेना बेहद मुश्किल होता है. वह मदद इतनी नहीं होती कि सही तरह से इलाज हो सके.  ‘‘इस के बाद जिंदगी में किसी का साथ नहीं मिलता. एसिड अटैक की शिकार लड़कियों के लिए सरकार को पुख्ता कदम उठाने चाहिए.’’

Hindi Crime Story: उधार के पैसे और हत्या

Hindi Crime Story: अपने परिजनों के राजनीतिक रसूख के चलते कोई बिगड़ैल नवाब अगर पैसे उधार लेकर आंखें दिखाने लगे, पैसे देना ना चाहे, तो उसका परिणाम जतिन राय जैसा हो सकता है.

रायपुर के खमताराई थाना इलाके में जतिन राय अभी नाबालिग ही था. उम्र थी 20 वर्ष और पार्षद अंजनी विभार का भतीजा था. चाचा भी प्रदेश में सत्ता में धमक रखते हैं.

राजधानी रायपुर के थाना खम्हारडीह इलाके में एक सूटकेस से जतिन राय नाम के युवक की लाश मिली. पुलिस इस हत्याकांड को अंजाम देने वाले प्रदीप नायक, सुजीत तांडी और केवी दिवाकर को गिरफ्तार तो कर लिया मगर संपूर्ण घटनाक्रम को देखें तो जहां यह घटना एक बड़ा संदेश देती है कि अगर परिजन राजनीति में है, प्रभावशाली है तो बच्चे किस तरह “बिगड़े नवाब” बन सकते हैं. दूसरी तरफ पुलिस हत्या जैसे गंभीर अपराध पर भी कैसा लचीला रुख अपनाती है और अगर राजनीतिक प्रभाव ना हो मुख्यमंत्री तक पहुंच नहीं हो तो कुंभकर्णी नींद में सोती रहती है.

अपनी मौत का सामान लेकर आया जतिन!

आरोपियों ने जो घटनाक्रम पुलिस के समक्ष बयां किया है उसके अनुसार जतिन राय को कहा गया था कि अपने साथ एक बड़ा सुटकेश ट्रॉली बैग लेकर आना. क्योंकि हमें कहीं बाहर जाना है. जतिन ने अपनी मां से बैग मांगा, उन्होंने बैग देने से मना कर दिया.दूसरी तरफ आरोपी बार-बार उसे कॉल कर बुला रहे थे.

जतिन ने आखिरकार अपने पड़ोसी अभय से एक बड़ा सूटकेस लिया और प्रदीप से मिलने के लिए निकला.आरोपी प्रदीप के बताए स्थान पर पहुंचने के बाद थोड़ी देर में अपने 20 हजार रुपए लौटाने को लेकर दोनों के बीच विवाद शुरू हुआ. फिर प्रदीप ने अपने साथियों के साथ मिलकर जतिन की गला दबाकर हत्या कर दी. उसकी लाश को उसी सूटकेस में भर दिया जिसे लेकर वह पहुंचा था. वे आरोपी जतिन का स्कूटर लेकर चंडीनगर में सुनसान इलाके के कुएं में लाश भरे बैग को डाल कर आराम से अपने अपने घर चले गए.

राजनीतिक रसूख!

9 फरवरी 2021को जतिन के लापता होने की शिकायत खमतराई थाने में परिवार ने दर्ज करवाई गई . मगर 5 दिनों तक पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही जहां परिजनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. थाने तक महापौर एजाज मेंबर और पर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा आ पहुंचे. मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के दरबार तक पहुंचा और पुलिस को तत्परता से आरोपियों को खोजने का निर्देश मिला.और कहते हैं न, जब पुलिस अपने पर आ जाए तो आरोपी बच नहीं सकते. इस घटनाक्रम में भी यही हुआ सख्ती बरतने पर प्रदीप, उसका साथी सूरज और केवी दिवाकर पुलिस के समक्ष सच स्वीकार कर लिया.

दरअसल, करीब एक महीने पहले हत्या के आरोपी प्रदीप ने अपनी बाइक गिरवी रखी थी. इसके बदले में उसे 30 हजार रुपए मिले थे. इसमें से 20 हजार रुपए मांगने पर प्रदीप ने जतिन को दिए थे. और अब इन रुपयों को जतिन लौटा नहीं रहा था. जब भी प्रदीप पैसा मांगता तो जतिन बहाने बनाने लगता और ऐसा व्यवहार करता कि रुपए तो नहीं मिलेंगे जो करना है कर लेना. हालांकि जतिन के परिवार वालों का कहना है कि प्रदीप, जतिन से चिढ़ता था, इसलिए उसकी हत्या की और अब झूठ ही रुपयों की देनदारी की बातें कर रहा है.

“क्राइम पेट्रोल” देख बनाया प्लान

इस सनसनीखेज हत्याकांड के संदर्भ में पुलिस ने हमारे संवाददाता को बताया कि इस हत्याकांड के पीछे जहां पैसों की लेनदेन थी, रुपए नहीं मिलने से नाराज प्रदीप को “क्राइम पेट्रोल” का एक एपिसोड देखकर यह सुझा कि क्यों ना जतिन राय को कुछ इस तरह सजा दे दी जाए. पुलिस के समक्ष यह भी सच सामने आ गया है कि प्रदीप घटना से पहले जतिन को लगातार फोन कर रहा था, वो उसे बुला रहा था, जतिन जाने से इनकार कर चुका था. मगर वह बार-बार दोस्ती की दुहाई दे रहा था.

जतिन जब प्रदीप के पास भनपुरी स्थित मकान में पहुंचा तो यहां दोस्तों ने उसका स्वागत किया और मिलकर शराब पार्टी की. प्रदीप ने जानबूझकर जतिन को ज्यादा शराब पिलाई. प्रदीप ने तीव्र आवाज में म्यूजिक चला रखा था ताकि किसी को कोई आभास ना मिले. इसके बाद हत्यारों ने मौका मिलते ही उसकी गला घोंट कर हत्या कर दी और जो सूटकेस जतिन लेकर आया था उसी में उसके शव को डालकर खम्हारडीह में फेंक दिया गया.

तीन दिन बाद कचरा बीनने वाले एक बच्चे की नजर कुएं में पड़े बैग और उसमें से निकले पैरों पर पड़ी थी. और मामला पुलिस तक पहुंचा. मगर पुलिस जांच में उदासीन रही जब जतिन राय के चाचा और परिजनों ने हंगामा किया तब जाकर पुलिस के उच्च अधिकारियों के कान में जूं रेंगी और मामले की जांच में में तेजी आई और अंततः मामले का खुलासा हुआ. Hindi Crime Story

Suspense Crime Story: दौलत की खातिर दांव पर लगी दोस्ती

Suspense Crime Story: 19मार्च, 2021 की रात 10 बजे शीला देवी अपने देवर आनंद प्रजापति के साथ जनता नगर चौकी पहुंचीं. उस समय इंचार्ज ए.के. सिंह चौकी पर मौजूद थे. उन्होंने शीला देवी को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम घबराई हुई क्यों हो? कोई गंभीर बात है क्या?’’

‘‘हां सर. हमें किसी अनहोनी की आशंका है.’’

‘‘कैसी अनहोनी? साफसाफ पूरी बात बताओ.’’

‘‘सर, दरअसल बात यह है कि रात 8 बजे मेरा बेटा शैलेश, उस का दोस्त अर्श गुप्ता व विनय घर पर नीचे कमरे में शराब पी रहे थे. कुछ देर बाद कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आईं. फिर वे लोग बाइक से कहीं चले गए.

‘‘उन के जाने के बाद मैं कमरे में गई, तो वहां खून से सनी चादर देखी. अनहोनी की आशंका से मैं घबरा गई. मैं ने इस की जानकारी पड़ोस में रहने वाले अपने देवर आनंद को दी, फिर उन के साथ सूचना देने आप के पास आ गई. आप मेरी मदद करें.’’

शीला देवी की बात सुनकर ए.के. सिंह को लगा कि जरूर कोई अनहोनी घटना घटित हुई है. उन्होंने यह सूचना बर्रा थानाप्रभारी हरमीत सिंह को दी फिर 2 सिपाहियों के साथ शीला देवी के बर्रा भाग 8 स्थित मकान पर पहुंच गए. उन के पहुंचने के चंद मिनट बाद ही थानाप्रभारी हरमीत सिंह भी आ गए. हरमीत सिंह ने ए.के. सिंह के साथ कमरे का निरीक्षण किया तो सन्न रह गए. कमरे के फर्श पर खून पड़ा था और पलंग पर बिछी चादर खून से तरबतर थी. कमरे का सामान भी अस्तव्यस्त था. खून की बूंदें कमरे के बाहर गली तक टपकती गई थीं.

निरीक्षण के बाद हरमीत सिंह ने अनुमान लगाया कि कमरे के अंदर कत्ल जैसी वारदात हुई है या फिर गंभीर रूप से कोई घायल हुआ है. शैलेश और उस का दोस्त या तो लाश को ठिकाने लगाने गए हैं या फिर अस्पताल गए हैं. कहीं भी गए हों, वे लौट कर घर जरूर आएंगे. अत: उन्होंने घर के आसपास पुलिस का पहरा लगा दिया तथा खुद भी निगरानी में लग गए. रात लगभग डेढ़ बजे शैलेश और उस का दोस्त अर्श गुप्ता वापस घर आए तो पुिलस ने उन्हें दबोच लिया और थाना बर्रा ले आए. दोनों के हाथ और कपड़ों पर खून लगा था. इंसपेक्टर हरमीत सिंह ने पूछा, ‘‘तुम दोनों ने किस का कत्ल किया है और लाश कहां है?’’

शैलेश कुछ क्षण मौन रहा फिर बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपने बचपन के दोस्त विनय प्रभाकर का कत्ल किया है. वह बर्रा भाग दो के मनोहर नगर में रामजानकी मंदिर के पास रहता था. उस की लाश को मैं ने अर्श की मदद से रिंद नदी में फेंक दिया है. पैट्रोल खत्म हो जाने की वजह से हम ने विनय की मोटरसाइकिल खाड़ेपुर-फत्तेपुर मोड़ पर खड़ा कर दी और वापस लौट आए.’’

‘‘तुम ने अपने दोस्त का कत्ल क्यों किया?’’ थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने शैलेश से पूछा.

इस सवाल पर शैलेश काफी देर तक हरमीत सिंह को गुमराह करता रहा. पहले वह बोला, ‘‘साहब, नशे में गलती हो गई. हम ने उस का कत्ल कर दिया.’’

फिर बताया कि उस के मोबाइल फोन में उस की महिला मित्र की कुछ आपत्तिजनक फोटो थीं. उन फोटो को विनय ने धोखे से अपने मोबाइल फोन में ट्रांसफर कर लिया था. वह उन फोटो को सोशल मीडिया पर वायरल करने की धमकी दे कर ब्लैकमेल कर रहा था, इसलिए हम ने उसे मार डाला. लेकिन थानाप्रभारी हरमीत सिंह को उस की इन दोनों बातों पर यकीन नहीं हुआ. सच्चाई उगलवाने के लिए उन्होंने सख्ती की तो दोनों टूट गए.

फिर उन्होंने बताया कि उन्होंने 10 लाख रुपए की फिरौती मांगने के लिए विनय की हत्या की योजना बनाई थी. कुछ माह पहले संजीत हत्याकांड की तरह शव को ठिकाने लगाने के बाद उसी के मोबाइल फोन से उस के घर वालों को फोन कर फिरौती मांगने की योजना थी. उस ने दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की थी. लेकिन फिरौती मांगने के पहले ही वे पकड़े गए.

शैलेश व अर्श की जामातलाशी में उन के पास से 3 मोबाइल फोन मिले, जिस में एक मृतक विनय का था तथा बाकी 2 शैलेश व अर्श के थे. उन के पास एक पर्स भी बरामद हुआ जिस में मृतक का फोटो, आधार कार्ड तथा कुछ रुपए थे. बरामद पर्स मृतक विनय प्रभाकर का था. शैलेश व अर्श गुप्ता की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त आलाकत्ल बांका तथा लाश ठिकाने लगाने में इस्तेमाल मोटरसाइकिल बरामद कर ली. बांका उस ने अपने कमरे में छिपा दिया था और पैट्रोल खत्म होने से उस ने मोटरसाइकिल खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ी कर दी थी.

फिरौती और हत्या के इस मामले में थानाप्रभारी हरमीत सिंह कोई कोताही नहीं बरतना चाहते थे. क्योंकि इस के पहले संजीत अपहरण कांड में बर्रा पुलिस गच्चा खा चुकी थी. अपहर्त्ताओं ने फिरौती की रकम भी ले ली थी और उस की हत्या भी कर दी थी. इस मामले में लापरवाही बरतने में एसपी व डीएसपी सहित 5 पुलिसकर्मियों को बर्खास्त कर दिया गया था. अत: उन्होंने घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी.

सूचना पा कर रात 3 बजे एसपी (साउथ) दीपक भूकर तथा डीएसपी विकास पांडेय थाना बर्रा पहुंच गए. उन्होंने घटना के संबंध में गिरफ्तार किए गए शैलेश व अर्श गुप्ता से विस्तार से पूछताछ की. फिर दोनों को साथ ले कर रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. इस के बाद कातिलों की निशानदेही पर नदी किनारे पड़ा विनय प्रभाकर का शव बरामद कर लिया.

विनय की हत्या बड़ी निर्दयतापूर्वक की गई थी. उस का गला धारदार हथियार से काटा गया था, जिस से सांस की नली कट गई थी और उस की मौत हो गई थी. मृतक विनय की उम्र 26 वर्ष के आसपास थी और उस का शरीर हृष्टपुष्ट था. 20 मार्च की सुबह 5 बजे बर्रा थाने के 2 सिपाही मृतक विनय के घर पहुंचे और उस की हत्या की खबर घर वालों को दी. खबर पाते ही घर व मोहल्ले में सनसनी फैल गई. घर वाले रिंद नदी के पुल पर पहुंचे. वहां विनय का शव देख कर मां विमला तथा बहन रीता बिलख पड़ीं. पिता रामऔतार प्रभाकर तथा भाई पवन की आंखों से भी अश्रुधारा बह निकली. पुलिस अधिकारियों ने उन्हे धैर्य बंधाया.

पवन ने एसपी दीपक भूकर को बताया कल शाम साढ़े 7 बजे किसी का फोन आने पर उस का भाई विनय यह कह कर अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से घर से निकला था कि अपने दोस्त से मिलने जा रहा है. उस के बाद वह घर नहीं लौटा. रात भर हम लोग उस के घर वापस आने का इंतजार करते रहे. उस का फोन भी बंद था. सुबह 2 सिपाही घर आए. उन्होंने विनय की हत्या की सूचना दी. तब हम लोग यहां आए. लेकिन समझ में नहीं आ रहा कि विनय की हत्या किस ने और क्यों की?

‘‘तुम्हारे भाई की हत्या किसी और ने नहीं, उस के बचपन के दोस्त शैलेश प्रजापति व उस के साथी अर्श गुप्ता ने की है. वह तुम लोगों से फिरौती के 10 लाख रुपए वसूलना चाहते थे. लेकिन शैलेश की मां ने ही उस का भांडा फोड़ दिया और दोनों पकड़े गए.’’

यह जानकारी पा कर पवन व उस के घर वाले अवाक रह गए. क्योंकि वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे कि शैलेश ऐसा विश्वासघात कर सकता है. निरीक्षण व पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम हाउस हैलट अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद वह शैलेश के उस कमरे में पहुंचे, जहां विनय का कत्ल किया गया था. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने जहां घटनास्थल का निरीक्षण किया, वहीं फोरैंसिक टीम ने भी बेंजाडीन टेस्ट कर साक्ष्य जुटाए.

चूंकि आरोपियों ने हत्या का जुर्म कबूल कर लिया था और आलाकत्ल बांका भी बरामद करा दिया था, अत: थानाप्रभारी हरमीत सिंह ने मृतक के भाई पवन को वादी बना कर भादंवि की धारा 302/201 तथा एससी/एसटी ऐक्ट के तहत शैलेश प्रजापति तथा अर्श गुप्ता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्हें न्यायसम्मत गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में दौलत की चाहत में दोस्त की हत्या की सनसनीखेज घटना का खुलासा हुआ.

कानपुर शहर का एक बड़ी आबादी वाला क्षेत्र है-बर्रा. इस क्षेत्र के बड़ा होने से इसे कई भागों में बांटा गया है. रामऔतार प्रभाकर अपने परिवार के साथ इसी बर्रा क्षेत्र के भाग 2 में मनोहरनगर में जानकी मंदिर के पास रहते थे. उन के परिवार में पत्नी विमला के अलावा 2 बेटे पवन कुमार, विनय कुमार तथा बेटी रीता कुमारी थी. रामऔतार प्रभाकर आर्डिनैंस फैक्ट्री में काम करते थे. किंतु अब रिटायर हो चुके थे. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

फैक्ट्री में रामऔतार प्रभाकर के साथ सोमनाथ प्रजापति काम करते थे. सोमनाथ भी बर्रा भाग 8 में रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शीला देवी के अलावा एकलौता बेटा शैलेश था. सोमनाथ भी रिटायर हो चुके थे. सोमनाथ बीमार रहते थे. उन्हें सुनाई भी कम देता था और दिखाई भी. उन की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. रामऔतार और सोमनाथ इस के पहले अर्मापुर स्थित फैक्ट्री की कालोनी में रहते थे. 3 साल पहले दोनों ने बर्रा क्षेत्र में जमीन खरीद ली थी और अपनेअपने मकान बना कर रहने लगे थे. मकान बदलने के बावजूद दोनों की दोस्ती में कमी नहीं आई थी. दोनों परिवार के लोगों का एकदूसरे के घर आनाजाना था.

रामऔतार का बेटा विनय और सोमनाथ का बेटा शैलेश बचपन के दोस्त थे. दोनों एकदूसरे के घर आतेजाते थे. विनय ने हाईस्कूल पास करने के बाद आईटीआई से मशीनिस्ट का कोर्स किया था. वह नौकरी की तलाश में था. जबकि शैलेश ड्राइवर बन गया था. वह बुकिंग की कार चलाता था.

शैलेश का एक अन्य दोस्त अर्श गुप्ता था. वह फरनीचर कारीगर था और गुजैनी गांव में रहता था. अर्श और शैलेश शराब के शौकीन थे. अकसर दोनों साथ पीते थे और लंबीलंबी डींग हांकते थे. उन दोनों ने विनय को भी शराब पीना सिखा दिया था. अब हर रविवार को शैलेश के घर शराब पार्टी होती थी. तीनों बारीबारी से पार्टी का खर्चा उठाते थे.

एक शाम खानेपीने के दौरान विनय ने शैलेश व अर्श को बताया कि उस की बहन रीता की शादी तय हो गई है. 27 अप्रैल को बारात आएगी. शादी में लगभग 10-12 लाख रुपया खर्च होगा. पिता व भाई ने रुपयों का इंतजाम कर लिया है. शादी की तैयारियां भी शुरू हो गई हैं. शैलेश व अर्श मामूली कमाने वाले युवक थे. वह शार्टकट से लखपति बनना चाहते थे. इस के लिए शैलेश उरई में पान मसाला का कारोबार करना चाहता था. उरई में वह जगह भी देख आया था. लेकिन कारोबार के लिए उस के पास पैसा नहीं था.

पैसा कहां से और कैसे आए, इस के लिए शैलेश और अर्श ने सिर से सिर जोड़ कर विचारविमर्श किया तो उन्हें विनय याद आया. विनय ने बताया था कि उस के यहां बहन की शादी है और घर वालों ने 10-12 लाख रुपए का इंतजाम किया है. दौलत की चाहत में शैलेश व अर्श ने दोस्त के साथ छल करने और फिरौती के रूप में 10 लाख रुपया वसूलने की योजना बनाई. संजीत हत्याकांड दोनों के जेहन में था. उसी तर्ज पर उन दोनों ने विनय की हत्या कर के उस के घर वालों से फिरौती वसूलने की योजना बनाई.

योजना के तहत 19 मार्च, 2021 की रात पौने 8 बजे शैलेश ने अर्श के मोबाइल से विनय प्रभाकर के मोबाइल पर काल की और पार्टी के लिए घर बुलाया. विनय की 5 दिन पहले ही लोहिया फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. फैक्ट्री से वह साढ़े 7 बजे घर लौटा था कि 15 मिनट बाद शैलेश का फोन आ गया. पार्टी की बात सुन कर वह शैलेश के घर जाने को राजी हो गया.

रात 8 बजे विनय अपनी पल्सर मोटरसाइकिल से बर्रा भाग 8 स्थित शैलेश के घर पहुंच गया. उस समय कमरे में शैलेश व अर्श गुप्ता थे और पार्टी का पूरा इंतजाम था. इस के बाद तीनों ने मिल कर खूब शराब पी. विनय जब नशे में हो गया तो योजना के तहत अर्श व शैलेश ने उसे दबोच लिया और उस की पिटाई करने लगे. विनय ने जब खुद को जाल में फंसा देखा तो वह भी भिड़ गया. कमरे से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. इसी बीच शैलेश ने कमरे में छिपा कर रखा बांका निकाला और विनय की गरदन पर वार कर दिया. विनय का गला कट गया और वह फर्श पर गिर पड़ा.

इस के बाद अर्श ने विनय को दबोचा और शैलेश ने उस की गरदन पर 2-3 वार और किए. जिस से विनय की गरदन आधी से ज्यादा कट गई और उस की मौत हो गई. हत्या करने के बाद उन दोनों ने शव को तोड़मरोड़ कर चादर व कंबल में लपेटा और फिर विनय की मोटरसाइकिल पर रख कर रिंद नदी में फेंक आए. वापस लौटते समय उन की बाइक का पैट्रोल खत्म हो गया, इसलिए उन्होंने बाइक को खाड़ेपुर मोड़ पर खड़ा कर दिया. फिर पैदल ही घर आ गए.

घर पर उन के स्वागत के लिए बर्रा पुलिस खड़ी थी, जिस से वे पकड़े गए. दरअसल, शैलेश की मां शीला ने ही कमरे में खून देख कर पुलिस को सूचना दी थी, जिस से पुलिस आ गई थी. 21 मार्च, 2021 को थाना बर्रा पुलिस ने आरोपी शैलेश प्रजापति व अर्श गुप्ता को  कोर्ट में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया, जहां से उन दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

True Crime Story: जब सोई मोहब्बत जागी

True Crime Story: शहाना स्कूल के समय से ही सरफराज से मोहब्बत करने  लगी थी. जब उस की शादी  सरफराज से नहीं हो सकी  तो वह सलीम से निकाह  कर के उस की हो गई,  लेकिन बाद में उस ने  सलीम से भी किनारा  कर लिया. इस के बाद  उस का निकाह नवाब से  हुआ लेकिन अपने प्यार के  चक्कर में उस ने नवाब को  ठिकाने लगवा दिया.

8दिसंबर, 2015 की देर रात उत्तराखंड के शहर जसपुर के थाना कुंडा में किसी राहगीर ने फोन द्वारा सूचना दी कि शेर अली बाबा की मजार के पास एक व्यक्ति की लाश पड़ी है. शेरअली बाबा की मजार काशीपुरजसपुर राष्ट्रीय राजमार्ग- 74 के किनारे है. लाश पड़ी होने की सूचना मिलते ही थाना कुंडा के थानाप्रभारी रमेश तनवार तुरंत पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश खून से लथपथ जसपुर की तरफ जाने वाली सड़क के किनारे पड़ी थी. वहीं पर कुछ लोग भी खड़े थे.

थानाप्रभारी ने वहां खड़े लोगों से मरने वाले शख्स की शिनाख्त करानी चाही, लेकिन कोई भी उसे नहीं पहचान सका. पुलिस ने मृतक की जेब की तलाशी ली तो जेब में एक परची मिली. उस पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. वह फोन नंबर किस का है, यह जानने के लिए थानाप्रभारी ने अपने फोन से वह नंबर मिलाया  तो दूसरी तरफ से शहाना नाम की औरत ने फोन रिसीव किया. उन्होंने उस महिला से जानकारी ली तो पता चला कि वह जसपुर के मोहल्ला छिपियान के नवाब की पत्नी शहाना परवीन है.

थानाप्रभारी ने शहाना से उन के पति के बारे में पूछा तो उस ने उलटे थाना प्रभारी से ही सवाल किया, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि आप कौन बोल रहे हैं और आप मेरे पति को क्यों पूछ रहे हैं?’’

‘‘देखिए, मैं थाना कुंडा का थानाप्रभारी बोल रहा हूं. दरअसल हमें शेर अली बाबा की मजार के पास एक आदमी की लाश मिली है. उसी लाश की जेब से यह आप का मोबाइल नंबर मिला है. कहीं यह लाश आप के किसी परिचित की तो नहीं है? आप यहां आ कर लाश को देख लीजिए.’’

थानाप्रभारी ने शहाना को लाश का जो हुलिया बताया था, वह जान कर शहाना रोने लगी, क्योंकि वह हुलिया उस के पति के हुलिए से मिल रहा था. उस का पति नवाब भी घर पर नहीं था. देर रात में अचानक शहाना के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर उस के परिवार वाले और मोहल्ले के कुछ लोग जमा हो गए. नवाब के साथ अनहोनी की बात सुनते ही वे सभी रात में ही शहाना के साथ अली बाबा की मजार के पास पहुंच गए. घटनास्थल पर पड़ी लाश देखते ही शहाना दहाड़े मार कर रोने लगी, क्योंकि वह लाश उस के पति नवाब की थी. उस जगह को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे नवाब का किसी वाहन से एक्सीडेंट हुआ था, लेकिन उस के घर वाले यह नहीं समझ पा रहे थे कि नवाब वहां तक पहुंचा कैसे?

पुलिस ने नवाब के घर वालों से पूछा तो उन्होंने बताया कि नवाब का हरिद्वार और लक्सर में ट्रांसपोर्ट का काम था. उस के घर आनेजाने का भी कोई नियत समय नहीं था. काम में व्यस्त होने की वजह से वह 2-4 दिनों बाद ही जसपुर आता था. 8 दिसंबर को वह घर जरूर आया था. घर से वह काशीपुर कैसे पहुंचा, इस की किसी को जानकारी नहीं थी. उस समय रात ज्यादा हो चुकी थी, इसलिए घर वालों से कुछ जानकारी लेने के बाद लाश को पोस्टमार्टम के लिए काशीपुर भिजवा दिया गया. अगले दिन से पुलिस इस केस की जांचपड़ताल में जुट गई. सुबहसुबह पुलिस फिर से उस जगह पहुंच गई, जहां लाश मिली थी, ताकि वहां से कोई सबूत वगैरह मिल सके.

घटनास्थल के आसपास पुलिस ने काफी खोजबीन की, लेकिन वहां से ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस के आधार पर पुलिस घटना की तह तक पहुंच पाती. मृतक का मोबाइल फोन भी गायब था. पुलिस ने सोचा कि दुर्घटना होने पर नवाब सड़क पर गिर गया होगा और उसे एक्सीडेंट करने वाले ने मजार के पास डाल दिया होगा. पुलिस ने मृतक के घर वालों से एक बार फिर बात की तो उन्होंने बताया कि नवाब एक मिलनसार व्यक्ति था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. वह उस की दुर्घटना वाली बात को मानने को तैयार नहीं थे. इस पर पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया.

नवाब के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई तो पता चला कि 8 दिसंबर को उस की कुछ नंबरों पर बातचीत हुई थी. जिनजिन नंबरों पर उस की बातचीत हुई थी, पुलिस उन नंबरों की जांच में जुट गई. उन में 2 नंबर संदिग्ध नजर आए. जांच के दौरान पता चला कि उन में से एक नंबर रामपुर जिले के गांव बैजनी निवासी खालिद का था, जबकि दूसरा नंबर जिला मुरादाबाद के थाना भगतपुर के गांव बहेड़ी के रहने वाले उस्मान का था.

पुलिस इन दोनों ही व्यक्तियों से पूछताछ करना चाहती थी, इसलिए एसएसपी केवल खुराना ने उन की तलाश कि लिए थानाप्रभारी रमेश सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसआई अशोक कुमार, कांस्टेबल मनोज कोहली, खेम सिंह, जगत सिंह, शहाना परवीन आदि को शामिल किया गया. यह पुलिस टीम खालिद और उस्मान के घरों पर गई तो वे दोनों ही अपने घरों से गायब मिले. उन के घरों से पुलिस को उन के बारे में यह जानकारी मिल गई कि दोनों काशीपुर में नौकरी कर रहे हैं.

पता चला कि खालिद हमदम अस्पताल में और उस्मान वहीं के सनराईज अस्पताल में कंपाउंडरी कर रहा है. यह जानकारी मिलते ही पुलिस टीम काशीपुर पहुंची. लेकिन वे वहां भी नहीं मिले. अस्पताल वालों ने बताया कि वे कई दिनों से अपनी ड्यूटी पर नहीं आ रहे हैं. इस के बाद पुलिस को इन दोनों पर शक हो गया. लिहाजा पुलिस ने उन की तलाश के लिए मुखबिर लगा दिए. करीब 2 सप्ताह बाद 25 दिसंबर को पुलिस को सुबहसुबह मुखबिर द्वारा सूचना मिली कि खालिद और उस्मान कहीं जाने की फिराक में काशीपुर बसअड्डे पर खड़े हैं. यह खबर मिलते ही पुलिस टीम तुरंत बस अड्डे पर पहुंच गई. दोनों वहां एक बैंच पर बैठे मिल गए.

पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया. दोनों को गिरफ्तार कर पुलिस कुंडा थाने ले आई. वहां उन से सख्ती से पूछताछ की तो दोनों जल्दी ही टूट गए. दोनों ने स्वीकार कर लिया कि नवाब की हत्या उन्होंने नवाब की पत्नी शहाना के प्रेमी सरफराज के कहने पर की थी. सरफराज एक प्रतिष्ठित परिवार से था. पुलिस बिना सबूत के उसे गिरफ्तार करना नहीं चाहती थी. इसलिए पुलिस ने सब से पहले सरफराज के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की काल डिटेल्स में एक नंबर ऐसा मिला, जिस पर वह दिन में करीब 40 बार बात करता था.

जांच में पता चला कि वह नंबर उसी मोहल्ले की रहने वाली शहाना का है. इस से पुलिस को यकीन हो गया कि सरफराज और शहाना के बीच जरूर प्रेमसंबंध रहे होंगे, तभी तो वे फोन पर इतनी ज्यादा बातें करते हैं. यानी खालिद और उस्मान ने पुलिस को जो बात बताई थी, उस में सच्चाई नजर आने लगी. इस से पुलिस को कुछ और ही कहानी नजर आने लगी. सरफराज जसपुर के ही मोहल्ला छिपियान में रहता था. पुलिस उस के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस को देखते ही उस के होश उड़ गए. पुलिस पूछताछ के लिए उसे भी थाने ले आई.

पुलिस ने सरफराज से पूछताछ की तो उस ने साफ कह दिया कि उस का इस केस से कोई लेनादेना नहीं है. इस पर पुलिस ने उस के फोन की काल डिटेल्स उस के सामने रखी. जिस में उस की शहाना से एक साल में 12995 बार बातें हुई थीं. अब सच्चाई सरफराज के सामने थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था. फिर भी वह खुद को बचाने के लिए यही कहता रहा कि उस की शहाना से दोस्ती है, इसलिए वह उस के साथ इतनी बातें फोन पर करता था. लेकिन नवाब की हत्या से उस का कोई संबंध नहीं है.

इस के बाद पुलिस टीम मृतक नवाब की पत्नी शहाना को पूछताछ के लिए थाने ले आई. शहाना भी पुलिस को घुमाने की कोशिश में लगी रही. लेकिन पुलिस ने जब उसे बताया कि उस का प्रेमी सरफराज पुलिस हिरासत में है और उस ने सब कुछ साफसाफ बता दिया है तो शहाना को सांप सूंघ गया. पुलिस उसे सरफराज के पास ले आई. दोनों को आमनेसामने बैठा कर बात की गई तो सरफराज टूट गया. उस ने बताया कि शहाना के कहने पर ही उस ने नवाब को ठिकाने लगवाया था. इस के बाद दोनों ने ही अपना गुनाह कबूल कर लिया. इन दोनों के प्यार से ले कर नवाब की हत्या तक की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

उत्तराखंड के जसपुर शहर के मोहल्ला छिपियान में हाजी फिदा हुसैन का परिवार रहता था. मुसलिम बाहुल्य इस शहर के अधिकांश मुसलिमों का लकड़ी का व्यापार है. फिदा हुसैन का भी लकड़ी का व्यापार था. उन के परिवार में 7 सदस्य थे. शहाना इन की दूसरे नंबर की बेटी थी. वह शुरू से ही पढ़ाईलिखाई में तेज थी. इसीलिए मदरसे की पढ़ाई के बाद फिदा हुसैन ने उस का दाखिला फैजएआम इंटर कालेज में करा दिया था. सरफराज ने भी उसी कालेज में दाखिला लिया था. इस से पहले भी वह मदरसे में शहाना के साथ ही पढ़ता था.

सरफराज फिदा हुसैन के घर के पास अगले नुक्कड़ पर रहने वाले शब्बीर मास्टर का बेटा था. पड़ोसी होने के नाते दोनों के घर वालों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. शब्बीर मास्टर का छोटा परिवार था. शब्बीर प्राइमरी स्कूल में टीचर थे. उन के परिवार में 3 बेटे थे, जिन में सरफराज सब से छोटा था. शब्बीर मास्टर तेजतर्रार व्यक्ति थे. इसलिए मोहल्ले क्या, शहर की पूरी बिरादरी में उन की अच्छी जानपहचान थी.

शब्बीर मास्टर अपने दोनों बेटों की शादी कर चुके थे. सरफराज अभी पढ़ रहा था, इसलिए उन्हें उस की ज्यादा चिंता नहीं थी. सरफराज के इंटरमीडिएट करने के बाद शब्बीर मास्टर ने उस के सामने शादी की बात रखी तो उस ने साफ कह दिया कि जब तक वह कोई कामधंधा नहीं कर लेता, शादी नहीं करेगा. उधर शुरू से साथसाथ पढ़ने के कारण शहाना और सरफराज के बीच नजदीकियां बढ़ गई थीं. उन की दोस्ती प्यार में बदल गई थी. और तो और दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा ली थीं.

उसी दौरान किसी के माध्यम से शब्बीर मास्टर को पता चला कि सरफराज और शहाना के बीच चक्कर चल रहा है. वह समझ गए कि सरफराज शादी के लिए मना क्यों कर रहा है. उन्होंने इस बारे में सरफराज से बात की तो उस ने कह दिया कि वह शहाना से प्यार करता है और उसी से निकाह करना चाहता है. शब्बीर मास्टर ने बेटे की खुशी के लिए शहाना के अब्बू फिदा हुसैन से बात भी की, पर वह तैयार नहीं हुए.

फिदा हुसैन की समाज में अच्छीखासी इज्जत थी. बेटी वाली बात कहीं समाज में न फैल जाए, इसलिए वह उस के लिए अच्छा लड़का तलाशने लगे, ताकि जल्द से जल्द उस की शादी कर सकें. थोड़ी भागादौड़ी कर के उन्हें उस के योग्य वर मिल भी गया. जसपुर के तत्कालीन चेयरमैन मोहम्मद उमर के बेटे सलीम से उन्होंने शहाना की शादी तय कर दी. अच्छी हैसियत वाले परिवार में शादी तय होने के बाद घर वाले गदगद थे. फिदा हुसैन इस बात से खुश थे कि उन की बेटी इतने संपन्न परिवार में खुश रहेगी.

शादी तो तय हो गई, लेकिन फिदा हुसैन को दुविधा इस बात की थी कि कहीं शहाना शादी करने से मना न कर दे. यदि उस ने ऐसा कर दिया तो बिरादरी में उन की किरकरी हो जाएगी. इसी बात को ध्यान में रखते हुए फिदा हुसैन ने अपने नजदीकी रिश्तेदारों को बुला कर शहाना को समझाने के लिए कहा. रिश्तेदारों के समझाने पर शहाना सलीम से शादी करने के लिए तैयार तो हो गई, लेकिन उस का दिल सरफराज पर ही लगा रहा. इस के बाद फिदा हुसैन ने शादी की तैयारी शुरु कर दी. उधर जब सरफराज को पता चला कि शहाना की शादी किसी और के साथ होने वाली है तो वह परेशान हो गया. उस ने शहाना से बात की तो शहाना ने कह दिया कि घर वालों और रिश्तेदारों की हठ के आगे उसे मजबूर होना पड़ा. शहाना का फैसला सुन कर सरफराज को दुख हुआ.

उधर बड़ी धूमधाम के साथ शहाना और सलीम का निकाह हो गया. यह सन 1997 की बात है. उस के निकाह के बाद सरफराज परेशान रहने लगा. वह शहाना से फोन पर बातें करता रहता था. शहाना भले ही सलीम की पत्नी बन गई थी लेकिन सरफराज के साथ गुजारे पलों की यादें उस के दिल से अभी भी धूमिल नहीं हो पाई थीं.

वह जब कभी मायके आती, उस की निगाहें हर वक्त सरफराज की राहों पर जमी रहतीं. इत्तफाक से कभी दोनों आमनेसामने पड़ जाते तो एकदूसरे के लिए तड़प उठते. मौका मिलने पर दोनों मुलाकात भी कर लेते. यही वजह थी कि शहाना मायके आने के बाद ससुराल नहीं जाना चाहती थी. वह सरफराज के प्यार में पागल सी हो गई थी. यह बात सलीम को पता चली तो वह परेशान हो उठा. सलीम ने शहाना को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा. जब शहाना नहीं मानी तो उस ने उस के साथ रिश्ता तोड़ दिया.

सलीम से रिश्ता टूटने के बाद सरफराज बहुत खुश हुआ. उसे उम्मीद थी कि अब तो उसे उस का खोया प्यार मिल जाएगा. फिदा हुसैन पहले से ही बेटी के कारनामों से तंग आ चुके थे. दोनों के मिलनेजुलने से मोहल्ले वालों ने उन का मोहल्ले में रहना दूभर कर दिया. शहाना अपने अब्बू पर सरफराज से निकाह कराने का दबाव डाल रही थी, लेकिन फिदा हुसैन को सरफराज से इतनी नफरत हो गई थी कि वह किसी भी कीमत पर उस से शहाना का निकाह करने को तैयार नहीं थे.

शहाना फिर से सरफराज की मोहब्बत में पागल हो गई थी. जब कोई उपाय नहीं सूझा तो अंत में फिदा हुसैन ने शब्बीर मास्टर से इस बारे में बात कर के सरफराज की शादी कहीं और करने की बात कही. शब्बीर मास्टर समझदार व्यक्ति थे. वह जानते थे कि समाज में इंसान की इज्जत की क्या कीमत होती है. यही सोच कर उन्होंने जल्दी ही सरफराज के लिए बिजनौर के स्योहारा कस्बे में एक लड़की देखी और उस का निकाह करा दिया.

सरफराज ने पिता के दबाव में शादी तो कर ली, लेकिन वह अपने दिल से शहाना को नहीं निकाल सका. लेकिन सरफराज के शादी करने की बात शहाना को बहुत बुरी लगी. उस ने उस से मिलनाजुलना बिलकुल बंद कर दिया. इस के बाद सरफराज भी अपनी गृहस्थी के चक्कर में फंस गया और कुछ दिनों के लिए शहाना को भूल गया. जवान बेटी के घर बैठने पर फिदा हुसैन भी चिंतित रहने लगे. उन्होंने अपनी पत्नी हुसना से कहा कि वह शहाना को दूसरे निकाह के लिए तैयार करे. शहाना सरफराज की मोहब्बत से टूट चुकी थी. वह यह भी जानती थी कि सारी जिंदगी मांबाप के सीने पर मूंग तो नहीं दली जा सकती.

उस ने अपने घर वालों की परेशानी समझ कर दूसरे निकाह के लिए हामी भर दी. शहाना के शादी के लिए तैयार होते ही उस के अब्बू फिदा हुसैन ने फिर से उस के लिए सही लड़का देखना शुरू कर दिया. उसी दौरान उन के एक करीबी रिश्तेदार ने जसपुर के ही मोहल्ले जटवारा के इमरान चौक में रहने वाले मोहम्मद असलम के बेटे नवाब के बारे बताया. नवाब का ट्रांसपोर्ट का अपना काम था. नवाब के कुल मिला कर 6 भाई और 4 बहनें थीं. भले ही मोहम्मद असलम का परिवार बड़ा था, लेकिन उस के सभी बेटे अपनेअपने काम से लगे हुए थे. शादी की बात पक्की होने के बाद 17 मई, 2000 को बड़ी धूमधाम के साथ नवाब और शहाना का निकाह हो गया.

शहाना नवाब के साथ निकाह कर के खुश थी. वह अपनी पुरानी जिंदगी भूल कर नई जिंदगी जीना चाहती थी. नवाब का अपना अच्छा कारोबार था. आमदनी भी अच्छी थी, इसलिए दोनों हंसीखुशी से रह रहे थे. शहाना परवीन लिखीपढ़ी थी, इसलिए उसे आंगनबाड़ी में सहायिका की नौकरी मिल गई. वह आसपास के बच्चों को पढ़ाने लगी. कहते हैं कि वक्त को बदलते देर नहीं लगती. शहाना के आंगनबाड़ी में लगते ही उस का फिर से घर से बाहर आनाजाना शुरू हो गया. उसी दौरान एक दिन उस का आमनासामना फिर से सरफराज से हो गया. सरफराज को सामने से आते देख शहाना ने उस से बचने की कोशिश की, लेकिन सरफराज उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

उस दिन सरफराज ने उस से केवल हालचाल पूछा और वहां से चला गया. लेकिन इस छोटी सी मुलाकात ने शहाना के दिल में पुरानी मोहब्बत को चिंगारी दिखा दी. शहाना कई दिनों तक उस की यादों में जीती रही. उस ने कई बार उस मुलाकात को भूलने की कोशिश की, लेकिन भुला नहीं सकी. हालांकि शहाना और सरफराज दोनों ही एकएक बच्चे के मांबाप बन चुके थे, लेकिन उन के दिलों में पुरानी मोेहब्बत शायद अभी भी जिंदा थी. दोनों के दिलों में छिपी मोहब्बत फिर से जागी तो वे फिर चोरीछिपे मिलने लगे. आंगनबाड़ी के बहाने शहाना कई घंटों तक घर से बाहर रहती थी. उसी दौरान मौका निकाल कर वह सरफराज के साथ इधरउधर मौजमस्ती करने लगी.

उसी बीच शहाना दूसरी बच्ची की भी मां बन गई. लेकिन अब उस का सरफराज से मिलनाजुलना और भी ज्यादा हो गया था. शहाना नवाब का भी पूरा ख्याल रखती थी. इसलिए वह उस पर पूरा भरोसा करता था. लेकिन उसे पता नहीं था कि पत्नी उस की पीठ पीछे क्या गुल खिला रही है? शहाना अपने मकान की ऊपरी मंजिल पर अकेली ही रहती थी. उस का पति नवाब अपने काम से चला जाता और उस की दोनों बेटियां अभी छोटी थीं.

इसी का लाभ उठा कर वह हर वक्त सरफराज से मोबाइल पर बतियाती रहती थी. जब उस के मोबाइल में बैलेंस खत्म हो जाता तो सरफराज रिचार्ज करा देता. उसी दौरान सरफराज ने नवाब से भी दोस्ती बढ़ा ली, ताकि वह उस के घर बिना किसी झिझक के आजा सके. लेकिन नवाब उस के मंसूबों को समझ नहीं पाया. नवाब के भाई जसपुर में ट्रांसपोर्ट का धंधा चलाते थे. इस धंधे में अच्छी कमाई थी, इसलिए नवाब ने हरिद्वार के लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. धंधे की वजह से वह अकसर घर से बाहर रहता था. ट्रांसपोर्ट के काम के साथ नवाब ने प्रौपर्टी खरीदनेबेचने का काम भी शुरू कर दिया था. इसी का लाभ उठाते हुए सरफराज और शहाना मौजमस्ती कर रहे थे.

उसी दौरान सरफराज ने भी नवाब के सहयोग से लक्सर में एक ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. सरफराज ने कुछ दिनों में नवाब के साथ इतनी गहरी दोस्ती कर ली कि वह हर वक्त उस के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता था. सरफराज कभीकभी नवाब के जिम्मे अपना औफिस छोड़ कर जसपुर आ जाता और शहाना के साथ मौजमस्ती करता. नवाब की हत्या से लगभग 5-6 महीने पहले सरफराज ने शहाना से कहा, ‘‘शहाना क्यों न हम आपस में शादी कर लें.’’

‘‘हम दोनों पहले से ही शादीशुदा हैं तो फिर यह आफत मोल लेने से क्या फायदा?’’ शहाना बोली, ‘‘सरफराज, तुम यह बात तो जानते ही हो कि नवाब के जीवित रहते मैं भला तुम्हारे साथ निकाह कैसे कर सकती हूं. यदि तुम यह चाहते हो तुम्हें कुछ करना पड़ेगा.’’

सरफराज अब शहाना के दिल की बात जान गया था. उस ने पक्का मन बना लिया कि शहाना को पाने के लिए वह कुछ भी करेगा. उधर शहाना भी सरफराज की मोहब्बत में पागल सी हो गई थी. वह यह भी भूल गई थी कि नवाब उसे कितना चाहता है. 2 बच्चों की मां होने के बावजूद उस की अच्छाबुरा सोचने की शक्ति पर पानी फिर गया था. इसी पागलपन में वह नवाब को अपने और सरफराज के बीच से हटाने के लिए भी राजी हो गई. अब से लगभग ढाई महीने पहले सरफराज का ड्राइवर मकसूद हादसे में घायल हो गया था. उसे इलाज के लिए काशीपुर के हमदम अस्पताल में भरती कराया गया था. यहीं पर सरफराज की मुलाकात खालिद व उस्मान से हुई. हालांकि खालिद और उस्मान दोनों अलगअलग अस्पतालों में काम करते थे, लेकिन दोनों में अच्छी दोस्ती थी.

खालिद उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के बैजनी गांव का था और उस्मान मुरादाबाद के रोशनपुर बहेड़ी गांव का था. खालिद ओटी टैक्नीशियन था तो उस्मान कंपाउंडर. उसी दौरान बातोंबातों में सरफराज ने उस्मान और खालिद के सामने जिक्र करते हुए पूछा कि कोई ऐसी भी दवा आती है, जिस के प्रयोग से इंसान खत्म हो जाए और किसी को पता भी न चले. इस पर खालिद ने बताया, ‘‘भाई काम सब हो जाते हैं, लेकिन उस के लिए कुछ खर्च करना पड़ता है. यह काम बहुत ही रिस्की होते हैं. आप को अगर किसी का काम कराना है तो पूरे एक लाख रुपए खर्च करने होंगे.’’

सरफराज के लिए एक लाख रुपए कोई मायने नहीं रखते थे. अपने प्यार को पाने के लिए वह कुछ भी खर्च करने को तैयार था. उस ने दोनों को 75 हजार रुपए दे कर नवाब की मौत का सौदा तय कर लिया. बाकी के 25 हजार रुपए उन्होंने काम हो जाने के बाद देने को कह दिया. बातचीत हो जाने के बाद सरफराज ने खालिद और उस्मान को प्रौपर्टी डीलर बताते हुए नवाब से उन की मुलाकात करा दी. उस ने नवाब से कह दिया कि यदि वह किसी प्रौपर्टी का सौदा इन से कराते हैं तो अच्छा कमीशन मिलेगा. नवाब खुश हो गया कि प्रौपर्टी बिकवाने पर उसे अतिरिक्त आमदनी होगी. नवाब शराब पीता ही था, इसलिए उस्मान और खालिद ने नवाब से दोस्ती गांठते हुए उसे शराब भी पिलानी शुरू कर दी.

8 दिसंबर, 2015 को योजना के अनुसार, सरफराज नवाब को साथ ले कर खालिद और उस्मान के पास काशीपुर पहुंचा. नवाब को उन दोनों के पास छोड़ कर वह खुद शहर में कुछ काम होने का बहाना कर के वहां से खिसक लिया. सरफराज के जाने के बाद उस्मान और खालिद ने नवाब को रामनगर रोड पर सड़क के किनारे ही शराब पिलाई. शराब पीने के बाद तीनों सनराइज अस्पताल पहुंचे. उस्मान उसी अस्पताल में कंपाउंडर था. उस ने अस्पताल के मालिक डा. सम्स से जसपुर जाने की बात कह कर उन की नैनो कार मांगी. डा. सम्स ने उसे अपनी कार दे दी. नवाब को उस कार में बिठा कर तीनों जसपुर की ओर चल दिए.

नवाब पर शराब का नशा चढ़ गया था. उसी का लाभ उठाते हुए दोनों ने उसे बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. इंजेक्शन के लगते ही नवाब बेहोश हो कर सीट पर लुढ़क गया. इस के बाद शेर अली बाबा की मजार के पास कार रोक कर उन्होंने उसे ब्लड प्रेशर बढ़ाने वाला 10 एमएल का पूरा इंजेक्शन लगा दिया और फिर उसे चलती कार से सड़क पर फेंक दिया. बाद में उन्होंने उसी कार से उसे 2-3 बार बेरहमी से कुचल दिया, जिस के बाद नवाब की मौके पर ही मौत हो गई. सरफराज ने घटना वाले दिन ही उस्मान को शहाना का नंबर लिख कर दे दिया था, जो उन्होंने नवाब की जेब में रख दिया था. जिस से पुलिस उस के घर वालों तक आसानी से पहुंच सके. उसी के द्वारा पुलिस ने शहाना को फोन कर के दुर्घटना वाली बात बताई थी.

नवाब को मौत के घाट उतारने के बाद उस्मान और खालिद, दोनों ही काशीपुर वापस चले आए थे. इस घटना को अंजाम देने के बाद ही उस्मान ने मोबाइल से सरफराज को बता दिया था कि उस का काम हो गया है. इस घटना के बाद से खालिद और उस्मान के साथसाथ सरफराज ने भी अपना मोबाइल बंद कर लिया था. सरफराज ने नवाब को मारने की सूचना शहाना परवीन को भी दे दी थी. इस केस का खुलासा होते ही पुलिस ने भादंवि की धारा 302/120 के तहत मुकदमा दर्ज कर अभियुक्तों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

एसएसपी केवल खुराना ने इस हत्याकांड का खुलासा करने वाली टीम को 2,500 रुपए का इनाम देने की घोषणा की थी. वहीं मृतक के घर वालों ने भी पुलिस को 5 हजार रुपए बतौर इनाम दिए. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

True Crime Story: दगाबाज महबूबा

True Crime Story: औरत अगर चरित्रहीन हो तो   बसेबसाए घर उजड़ जाते हैं. एक नहीं, कई जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. ऐसे में औरत तो परेशान होती ही है, ससुराल के ही नहीं,  मायके वाले भी दुखी होते हैं. मुराद अली से मेरी अच्छी दोस्ती थी. उस दिन वह अपने साथ अपने दोस्त नादिर अली को ले कर मेरे पास आया था. वह बड़ा परेशान था. मेरे पूछने

पर मुराद अली ने बताया, ‘‘वाकया नादिर अली के बड़े भाई कादिर अली के साथ हुआ है. इन दोनों भाइयों की खालिद रोड पर साझे में टायरों की काफी बड़ी दुकान है. कल कादिर अली को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.’’

‘‘किस जुर्म में गिरफ्तार किया है?’’ मैं ने पूछा तो वह बोले, ‘‘उन्हें उन की एक्स वाइफ के कत्ल के इलजाम में गिरफ्तार किया गया है. फिलहाल वह रिमांड पर पुलिस कस्टडी में हैं.’’

‘‘कादिर अली की एक्स वाइफ के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने नादिर अली से पूछा.

‘‘उस का नाम लुबना था. उस औरत ने भाईसाहब को जिंदगी भर दुख दिए और मरने के बाद भी उन्हें मुसीबत में डाल गई. तलाक भी एक तरह से उस ने जबरदस्ती लिया. उस ने एक ऐसा नाटक खेला था कि भाई को मजबूरन उसे तलाक देना पड़ा. बाद में तलाक को कानूनी हैसियत भी मिल गई. यह सब एक सोचीसमझी साजिश के तहत हुआ था. बेहद मक्कार और शातिर औरत थी वह.’’ नादिर अली ने नफरत से कहा.

‘‘तलाक वाली बात कितना अरसा पहले की है?’’

‘‘यह मई चल रहा है, तलाक जनवरी में हुआ था. भाई अच्छेखासे अपनी बेटी आरिफा के साथ रह रहे थे कि यह आफत गले पड़ गई.’’

‘‘आरिफा अपनी मरजी से बाप के साथ रह रही थी?’’

‘‘हां, उन की बेटी आरिफा 15 साल की है, वह बेटी की वजह से मजबूर थे. इसलिए अपनी बीवी लुबना की आवारगी और ज्यादती को जहर की तरह गले उतारते रहे. लेकिन जब लुबना ने सारी हदें पार कर दीं, वह भी सिर्फ भाई से जान छुड़ाने के लिए तो उन्होंने भी देर नहीं की और उस शातिर औरत को अपनी जिंदगी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. उन की बेटी आरिफा काफी समझदार है, वह मां की चालों और चरित्रहीनता को समझ गई थी. इसलिए उस ने खुद बाप के साथ रहने का फैसला किया था.’’

मुराद अली ने थोड़ा रुक कर कहा, ‘‘वकील साहब, तलाक वाली रात उन के घर में जिस तरह का तमाशा हुआ था, उस ने आरिफा को पूरी तरह मां के खिलाफ कर दिया था. उस ने बड़े सही वक्त पर सही फैसला लिया था.’’

‘‘तलाक का मंसूबा और तलाक वाली रात हुए ड्रामे की बात मैं कुछ समझ नहीं पाया. यह एक नहीं, दो बातें हैं?’’ मैं ने पूछा तो नादिर अली ने हिचकिचाते हुए कहा, ‘‘बताने में शरम आ रही है, पर आप भाई का केस लड़ रहे हैं, इसलिए बताना जरूरी है. ज्यादा डिटेल तो मैं नहीं जानता, पर मुझे जो पता है, बताए देता हूं.’’

उस ने बताया, ‘‘लुबना काफी दिनों से इस कोशिश में थी कि भाई उसे छोड़ दें, ताकि वह मनमाने ढंग से अय्याशी कर सके, पर भाईजी उस की हर ज्यादती सहते रहे. यह देख कर वह नीचता पर उतर आई और उस ने भाई के लिए एक जाल बुना. वह अपनी इंसानी कमजोरी के चलते उस में फंस गए और फिर उन के पास तलाक के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा.’’

‘‘जब कोई औरत छुटकारा पाने के लिए साजिश रचती है तो उस के पीछे कोई न कोई मकसद तो होना चाहिए. उस का क्या मकसद था?’’ मैं ने पूछा तो वह उत्तेजित हो कर बोले, ‘‘मकसद था जनाब, बड़ा बेशरमी भरा मकसद था. वह मेरे भाई की बीवी होने के बावजूद एक गैर इंसान से ताल्लुक बनाए हुए थी. उस से शादी करना चाहती थी. उस मरदूर का नाम जमाल बेरी है.

‘‘भाई को जब इस बात का पता चला तो उन्हें बहुत गुस्सा आया. उन्होंने उसे रोकने की कोशिश की तो वह नएनए हथकंडे अपनाने लगी, ताकि भाई तंग आ कर उसे छोड़ दें. जब पानी सिर से गुजर गया तो मजबूरन उन्हें लुबना को तलाक देना पड़ा. तलाक पाने के लिए उस ने घर की मुलजिमा रशना का इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यानी लुबना ने भाई से तलाक ले कर जमाल से शादी कर ली. इस तरह उस का मकसद पूरा हो गया?’’

‘‘नहीं, पिछले दिनों उन की मंगनी की खबर सुनी थी, अगर वह जिंदा रहती तो शादी भी हो जाती.’’ नादिर अली ने कहा.

कुछ और बातें पता कर के मै ंने फीस ली और उन्हें तसल्ली दे कर विदा कर दिया. पुलिस ने मुलजिम कादिर अली को अदालत में पेश कर के 7 दिनों का रिमांड लिया था. शाम को मैं थाने पहुंच गया. कादिर अली को देख कर मैं चौंका, क्योंकि उस का चेहरामोहरा नािदर अली से काफी मिलता था, उम्र में वह जरूर 2-4 साल बड़ा रहा होगा. वह उदास और परेशान था. यह जान कर कि मैं उन का वकील हूं, उन्होंने कहा, ‘‘बेग साहब, मैं बैठेबिठाए इस मुसीबत में फंस गया हूं, मेरा कहीं कोई कसूर नहीं है.’’

‘‘आप को पूरा यकीन है कि आप पूरी तरह निर्दोष हैं?’’

‘‘जी हां, वकील साहब, मुझे जानबूझ कर फंसाया गया है, मैं बेकसूर हूं.’’

‘‘अगर आप बेकसूर है तो आप जरूर इस केस से बाइज्जत बरी हो जाएंगे, यकीन रखिए. अगले 20 मिनट तक मैं उन से केस से संबंधित सवालजवाब करता रहा. उन्होंने मुझे कई सनसनीखेज बातें बताईं. वकालतनामे पर साइन ले कर मैं ने उन्हें सारी बातें समझा दीं कि वह पुलिस वालों की कोई पेशकश कबूल न करें और न ही उन की कोई मांग मानें. बस मजबूती से अपने बयान पर टिके रहें.’’

रिमांड खत्म होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश कर दिया. इसी पेशी पर मैं ने अपने वकालतनामे के साथ मुलजिम की जमानत की अरजी पेश कर दी, ‘‘जनाबेआला, मेरा मुवक्किल एक बाइज्जत शहरी है. उस का रिकौर्ड बिलकुल साफ है. उसे इस केस में जबरन फंसाया गया है. उस की जमानत की अरजी मंजूर की जाए.’’

इस्तेगासा के वकील ने कहा, ‘‘वारदात के वक्त मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और आते देखा गया था. इस का एक गवाह भी मौजूद है. साथ ही मौकाएवारदात पर मुलजिम की मौजूदगी के निशान भी पाए गए हैं. जबकि कुछ अरसा पहले मुलजिम के मकतूल के ताल्लुकात खतम हो चुके थे?’’

इसी तरह बहस चलती रही. कत्ल के मुलजिम को जमानत वैसे भी मुश्किल से मिलती है, इसलिए बहुत जोर देने पर भी कादिर अली की जमानत नहीं हो सकी. अदालत ने 15 दिनों बाद की तारीख दे कर मुलजिम को जेल भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना की मौत 9 मई की रात 8 से 9 बजे के बीच हुई थी. एक तेजधार वाला खंजर उस के सीने में उतार दिया गया था. मौत की वजह वही खंजर था. जब उस पर हमला किया गया था, वह नशे में थी. मारने से पहले उसे कोई ऐसी नशीली दवा दी गई थी, जिस से नींद आती है. मेरे पास 15 दिनों का समय था. मैं ने दौड़भाग कर के सार सबूत जुटा लिए, जो आप को अदालती काररवाही के दौरान पता चलेंगे.

अगली पेशी पर अदालत की काररवाही शुरू हुई तो जज ने जुर्म पढ़ कर सुनाया. मेरे मुवक्किल ने कत्ल के जुर्म से साफ इनकार कर दिया. इस के बाद मुलजिम का बयान दर्ज किया गया. वकील ने जिरह शुरू की, ‘‘मकतूल, जो पहले तुम्हारी बीवी थी और तुम्हारे व्यवहार से बहुत परेशान थी?’’

वह कुछ और पूछता मेरे मुवक्किल ने कहा, ‘‘वह मेरी बीवी जरूर थी, लेकिन मेरे व्यवहार से बिलकुल परेशान नहीं थी.’’

‘‘उस ने तुम से परेशान हो कर ही सहारा ढूंढ़ कर तलाक लिया था?’’

‘‘उस ने मुझ से तलाक जरूर लिया था, पर व्यवहार मेरा नहीं, उस का खराब था. वह मुझ से ठीक से बात तक नहीं करती थी, मेरे जज्बातों और मेरी जरूरतों की उसे जरा भी परवाह नहीं थी. जवान बेटी के सामने मैं उसे कुछ कह भी नहीं सकता था, इसलिए उस की हर ज्यादती चुपचाप बरदाश्त करता रहा. लेकिन जब पानी सिर के ऊपर से गुजर गया तो मुझे अपना रास्ता अलग करना पड़ा. जब तक वह मेरी बीवी थी, मैं ने उस पर अंधा यकीन किया. मैं जमाल को उस का बौस समझता रहा. मुझे तो बाद में पता चला कि उस का जमाल से अफेयर चल रहा था और वह उस से शादी करना चाहती थी.’’

वकील इस्तेगासा ने जख्मों पर नमक छिड़कते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह सच है कि तुम्हारी बीवी का जमाल से इश्क चल रहा था और वह जल्दी ही उस से शादी करना चाहती थी. उन की मंगनी भी हो गई थी. उस की मौत से तो तुम्हें खुशी हुई होगी?’’

‘‘इस में खुश होने की क्या बात है? जो औरतें अपना घर उजाड़ कर गलत राह पर चलती हैं, उन का यही अंजाम होता है. मुझे बिलकुल नहीं पता कि उस का किस ने, क्यों और कैसे कत्ल किया?’’

‘‘क्या तुम 9 मई यानी कत्ल वाली रात मकतूल के फ्लैट पर उस से मिलने नहीं गए थे?’’

‘‘रात को नहीं, शाम 7 बजे 5 मिनट के लिए मैं उस के फ्लैट पर उस की अमानत लौटाने गया था. वह अमानत क्या थी, यह मैं बताना नहीं चाहता.’’

इस्तेगासा वकील ने 2-4 सवाल और पूछ कर अपनी जिरह खत्म कर दी.

अब मेरी बारी थी. मुझे इस तरह से सवाल करने थे कि कादिर अली की बेगुनाही साबित हो जाए. मैं ने पूछा, ‘‘आप की शादी को कितना अरसा हुआ होगा, क्या आप दोनों में शुरू से ही अनबन थी?’’

‘‘मेरी शादी को 16 साल हो गए हैं. शुरू में तो सब ठीक रहा. इधर 2, ढाई साल से लुबना के व्यवहार में बदलाव आना शुरू हुआ था. वह मुझ से दूर रहने लगी थी और ज्यादा से ज्यादा समय घर से बाहर गुजारने लगी थी. उस ने मेकअप आर्टिस्ट की हैसियत से एक आर्ट एकेडमी जौइन कर ली.’’

‘‘कैसी आर्ट एकेडमी, क्या इस में आप की मरजी शामिल थी?’’

‘‘वह आर्ट एकेडमी ऐक्टिंग, मौडलिंग, संगीत आदि की ट्रेनिंग दे कर शौकीन लोगों को अदाकार बनाती है. उस का नाम है परफौरमैंस. लुबना ‘परफौरमैंस’ में मेकअप आर्टिस्ट के रूप में काम करने लगी थी. जबकि यह मुझे बिलकुल पसंद नहीं था. पर उस की लगातार जिद के आगे मैं मजबूर था.

इस की वजह यह थी कि मै ंने सुन रखा था कि ऐसी जगहों पर बहुत ज्यादा आजादी और बेशरमी होती है, वहां सारे गलत काम होते हैं. काश मैं ने इजाजत न दी होती.’’

‘‘क्या यह वही एकेडमी है, जिस का मालिक जमाल बेरी है?’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस का मालिक जमाल ही है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि लुबना का अफेयर अपने बौस से चल रहा था और आप से तलाक के बाद उस ने उस से मंगनी कर ली थी.’’

‘‘जी हां, परफौरमैंस की नौकरी के बाद ही लुबना बदल गई और मेरी जिंदगी में यह तबाही आई.’’

‘‘दोनों शादी करते, उस के पहले ही लुबना का कत्ल हो गया. अब मैं कुछ निजी सवाल पूछना चाहता हूं, जो बहुत जरूरी हैं, आप उन पर माइंड मत कीजिएगा. मकतूल और जमाल के अफेयर के बारे में आप को पता था?’’

‘‘नहीं, यह मुझे बहुत बाद में तब पता चला कि जब वह तलाक के लिए ड्रामा करने लगी यह सारी चाल जमाल के लिए चली गई थी.’’

‘‘क्या लुबना रात को देर से घर आती थी?’’

‘‘वह अकसर एकेडमी से रात को घर आती थी. मैं ने बहुत समझाया, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ. मैं ने उसे एकेडमी छोड़ने को कहा तो उस ने साफ मना कर दिया. इधर वह मेरी कोई बात नहीं मानती थी.’’

‘‘इस का मतलब मकतूल आप को शौहर नहीं मानती थी? आप ने उसे सख्ती से नहीं रोका?’’

‘‘कैसे रोकता? उस ने मुझे धमकी दी कि अगर ज्यादा रोकटोक की तो वह आर्ट एकेडमी में ही रहने लगेगी. उस समय मेरी बेटी भी मां की हमदर्द थी.’’

‘‘क्या आप अपनी बीवी की धमकी से डर गए थे?’’

‘‘जी, मैं शरीफ आदमी हूं. ऐसे हथकंडों से डर गया था. वैसे भी हम अजनबियों की तरह एक छत के नीचे रह रहे थे.’’

‘‘क्या आप दोनों के बीच मियांबीवी वाला रिश्ता नहीं रह गया था? जहां तक मुझे जानकारी है कि आप दोनों के बैडरूम अलगअलग थे?’’

‘‘आप ठीक कह रहे हैं. हमारे बीच मियांबीवी वाला रिश्ता खत्म हो चुका था. 2, ढाई साल से हमारे बैडरूम भी अलगअलग थे. लुबना मुझे शौहर नहीं मानती थी. मैं ने कभी उस के करीब जाना चाहा तो उस ने बेरुखी से झिड़क दिया. अब उसे मेरी निकटता की कोई जरूरत नहीं रह गई थी. हमारे बीच प्यारमोहब्बत का कोई रिश्ता नहीं बचा था. उस ने साफ कह दिया था कि वह मुझ से नफरत करती है. गुस्सा तो मुझे बहुत आता था, लेकिन बेटी की वजह से मैं खामोश रहता था. मैं उसे तलाक दे कर आजाद नहीं छोड़ना चाहता था.’’

‘‘फिर ऐसा क्य हुआ कि आप ने उसे तलाक दे दिया?’’

‘‘लुबना ने परफौरमैंस एकेडमी में स्टार बनने आई एक लड़की रशना को हमारे घर में केयरटेकर के रूप में रखवा दिया. रशना काफी खूबसूरत और जवान थी. पर वह उन लोगों में से थी, जो अपनी मंजिल पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

‘‘लुबना ने शायद उस से कहा था कि अगर वह कुछ दिनों तक उस के घर पर काम करेगी तो वह उसे स्टार बना देगी. यह मुझे बाद में पता चला कि लुबना उसे अपना ‘खास मकसद’ पूरा करने के लिए योजना बना कर हमारे घर लाई थी.

‘‘यह सब मुझे पता नहीं था. मैं तो उसे केयरटेकर ही समझता रहा. खैर मैं उसे रखने के सख्त खिलाफ था, लेकिन लुबना का कहना था कि वह एकेडमी में बहुत मसरूफ रहती है, इसलिए घर की देखभाल के लिए किसी का होना जरूरी है. उस ने जिद कर के रशना को रखवाया था.’’

मैं ने देखा, जज बड़ी दिलचस्पी से कादिर अली की बरबादी की दास्तान सुन रहे थे. इस्तेगासा वकील भी औब्जेक्शन कहना भूल सा गया था. अदालत में भी खामेशी और उत्सुकता थी.

कादिर अली ने बात आगे बढ़ाई, ‘‘रशना 25 साल की खूबसूरत व स्मार्ट लड़की थी, वह कपड़े भी स्टाइल वाले पहनती थी. लुबना ने उसे मेकअप करने में भी एक्सपर्ट कर दिया था. वह लुबना द्वारा तैयार की गई स्क्रिप्ट के अनुसार कदमदरकदम बढ़ रही थी. उसे आए महीना भी नहीं गुजरा था कि एक दिन वह अपने मकसद में कामयाब हो गई.

‘‘लुबना ने जानबूझ कर आरिफा को अपनी बहन के घर भेज दिया था. उस रात मैं और रशना घर में अकेले थे. लुबना एकेडमी से लौटी नहीं थी. रशना ने आकर्षित करने वाला खुला लिबास पहना था और जानबूझ कर वह बारबार मेरे करीब आने की कोशिश कर रही थी. मैं भी इंसान हूं, कोई फरिश्ता नहीं. बीवी के साथ को तरसा हुआ था. जब एक भूखे इंसान के सामने सजीसजाई थाली रख दी जाए तो वह कहां तक खुद को रोकेगा? उसे लालच आ ही जाएगा.’’

‘‘आप सही कह रहे हैं, एक तो आप अपनी बीवी की बेरुखी के सताए थे, दूसरी तरफ प्यार भरे इसरार पर आप का फिसलना कुदरती था.’’ मैं ने उसे स्पोर्ट किया.

‘‘लुबना ने मुझे बदनाम व रुसवा करने का पूरा मंसूबा बना लिया था. वह हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ना चाहती थी. संयोग था कि मैं उस दलदल में फंसने से बच गया. वह मेरे एकदम करीब आ गई थी, लेकिन अचानक मेरा जमीर जाग उठा, मैं ने जैसे ही झटके से उस से अलग हुआ, उसी समय लुबना चुपके से आ कर चीखनेचिल्लाने लगी.

‘‘हम दोनों बुरी तरह से बौखला उठे. बाद में पता चला कि रशना का बौखलाना भी ऐक्टिंग था. वह लुबना के पास जा कर कहने लगी, ‘‘साहब मुझ से जबरदस्ती कर रहे थे. सही वक्त पर आ कर आप ने मुझे बचा लिया?’’

लुबना ने फटाफट फोन कर के 6-7 लोगों को बुला लिया. आने वालों में उस की बहनें, आरिफा, एकेडमी का उस का असिस्टैंट उबेद जामी और रशना का बूढ़ा शराबी बाप भी शामिल था. लुबना चीखचीख कर कह रही थी, ‘‘मैं ऐसे चरित्रहीन आदमी के साथ कतई नहीं रह सकती. मुझे अभी तलाक चाहिए.’’

‘‘उस के साथ अन्य लोग भी मुझे ही बुराभला कहने लगे. मैं लुबना के खेल को समझ गया था, इसलिए मैं ने उसे उसी समय तलाक दे दिया. मेरी बेटी आरिफा भी मां की चाल समझ गई थी, क्योंकि रशना को उस ने जिद कर के घर में रखवाया था, इसलिए आरिफा ने भी मेरे साथ रहने का फैसला किया.’’

‘‘तो यह है आप की दुखभरी कहानी, जिस ने आप की जिंदगी बरबाद कर दी. लुबना को आप ने तलाक दे दिया, आरिफा आप के साथ रहने लगी, लेकिन रशना का क्या हुआ?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं ने उसे उसी समय घर से निकाल दिया. अब वह कहां है, मुझे मालूम नहीं.’’

मेरे सवालों से सारा मामला अदालत के सामने आ गया था. रशना के उस शर्मनाक ड्रामे में जमाल और लुबना की मिलीभगत थी, जिस की स्क्रिप्ट जमाल ने लिखी थी और डायरेक्शन लुबना का था.

मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘कादिर अली साहब, आप ने जनवरी में लुबना को तलाक दिया, उस के एक, डेढ़ महीने बाद ही उस ने मंगनी कर ली. मई में उस का कत्ल हो गया. इस से एक बात यह सामने आती है कि कोई ऐसा था, जो लुबना और जमाल की शादी से खुश नहीं था या वह खुद लुबना में रुचि ले रहा था. मंगनी के बाद उस ने नाराज हो कर उस का कत्ल कर दिया. यह सब तलाश करना पुलिस और अदालत का काम है.

‘‘आप ने इस्तेगासा की जिरह में बताया था कि आप कत्ल की शाम लुबना को उस की अमानत लौटाने गए थे. क्या आप उस के फ्लैट पर गए थे, जहां वह आप से अलग होने के बाद रह रही थी? वह फ्लैट जमाल बेरी का है, जहां वह अकसर लुबना से मिलने आया करता था. आप मुझे यह बताइए कि आप उस की कौन सी अमानत लौटाने गए थे?’’

‘‘वकील साहब, आप पूछ रहे हैं तो मुझे बताना ही पड़ेगा. एक दिन मैं सफाई कर रहा था तो मुझे मेज की दराज से एक ब्राउन रंग का लिफाफा मिला, जिस में लुबना के कुछ कागजात थे. साथ ही 20 हजार रुपए का एक क्रौस किया चेक था, जो मैं ने ही लुबना को एक बार दिया था. मै ंने यह बात आरिफा को बताई तो उस ने कहा कि वह ब्राउन लिफाफा चेक समेत लुबना तक पहुंचा देना चाहिए. इसलिए मैं उस शाम आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ लुबना के फ्लैट पर गया और उसे लिफाफा दे कर 5 मिनट में लौट आया.’’

‘‘क्या आरिफा और उस की दोस्त भी तुम्हारे साथ लुबना के फ्लैट पर गई थीं?’’

‘‘नहीं, आरिफा और उस की दोस्त नीचे गाड़ी में बैठी थीं. मैं नहीं चाहता था कि मांबेटी का सामना हो, इसलिए मैं उसे साथ नहीं ले गया था.’’

‘‘क्या आप वहां से सीधे घर आ गए थे?’’

‘‘नहीं, दरअसल उस दिन रौयल होटल में पैंटिंग्स की नुमाइश लगी थी. मेरी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा फाइन आर्ट की उस एग्जीविशन को देखना चाहती थीं, जिस का टाइम 7 से 10 बजे तक था.

चूंकि समय हो चुका था, इसलिए मैं फटाफट लुबना को लिफाफा दे कर नीचे आ गया और आरिफा तथा सबा को ले कर रौयल होटल चला गया. 7 बज कर 20 मिनट पर मैं होटल पहुंच गया था.’’

‘‘नुमाइश का समय 7 बजे से 10 बजे तक था. आप उन दोनों को छोड़ कर वापस आ गए होंगे?’’

‘‘नहीं साहब, उन की जिद पर मुझे भी उन के साथ पैंटिंग्स की एग्जीविशन देखनी पड़ी थी?’’

‘‘इस का मतलब आप वारदात के दिन शाम सवा सात बजे से 10 बजे तक रौयल होटल में नुमाइश देख रहे थे?’’

‘‘जी जनाब, उस दिन 7 बज कर 20 मिनट से रात 10 बजे तक मैं नुमाइश देखता रहा.’’

इस का मतलब उस दिन आप लुबना के फ्लैट से काफी दूर होटल रौयल में नुमाइश में थे?

‘‘जी जनाब.’’

इस के बाद मैं ने जिरह खत्म कर दी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, लुबना का कत्ल 9 मई को रात 8 से 9 बजे के बीच हुआ था. जबकि उस वक्त मेरा क्लाइंट घटनास्थल से काफी दूर होटल रौयल में था. इसलिए वह कत्ल नहीं कर सकता था. एक हिसाब से केस यहीं खत्म हो जाना चाहिए था, पर अभी कई सवाल बाकी थे. इस्तेगासा का पहला गवाह अमजद था. उस की फ्लैट के सामने दरजी की दुकान थी. उस ने अपने बयान में कहा कि उस ने मुलजिम को मकतूल के फ्लैट में जाते और निकलते देखा था. 1-2 सवाल पूछ कर इस्तेगासा वकील ने अपनी जिरह खत्म कर दी.

अपनी बारी पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘आप की दुकान मकतूल के फ्लैट के काफी करीब है, जैसा आप ने कहा है. क्या आप मकतूल और उस के मुलाकातियों को जानते थे?’’

‘‘मकतूल 3-4 महीने पहले ही वहां रहने आई थी. 1-2 बार वह मेरी दुकान पर भी आई थी. उन के मुलाकातियों में जमाल साहब को ही मैं ने देखा था.’’

‘‘क्या आप जमाल को जानते हैं?’’

‘‘जी, क्योंकि उस फ्लैट के मालिक वही हैं.’’

‘‘वारदात के दिन छुट्टी थी. सभी दुकानें बंद थी, फिर आप की दुकान कैसे खुली थी?’’

‘‘मुझे इमरजेंसी में शादी के कपड़े देने थे.’’

‘‘आप ने मुलजिम को बिल्डिंग में जाते देखा था, पर यह कैसे कह सकते हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में ही गया था? क्या आप ने उस का पीछा किया था?’’

‘‘नहीं, मैं ने पीछा नहीं किया था. सभी कह रहे हैं कि वह मकतूल के फ्लैट में गया था, इसलिए मैं भी कह रहा हूं.’’

‘‘मैं सब की बात नहीं, आप की बात कर रहा हूं. आप को कैसे पता चला कि वह मकतूल के फ्लैट गया था?’’

‘‘मुझे यह बात जमाल बेरी साहब ने बताई थी कि मुलजिम का नाम कादिर अली है और वह मकतूल से मिलने उस के फ्लैट पर आया था.’’

‘‘यह बात जमाल ने आप को कब बताई थी?’’

‘‘वारदात वाले दिन रात साढ़े 10 बजे. वह आए और फ्लैट में गए. घबरा कर वापस आए और मुझे बताया कि लुबना को किसी ने खंजर घोंप कर मार दिया है. इस के बाद कादिर अली का हुलिया और गाड़ी की पहचान बता कर पूछा कि इस तरह का कोई आदमी तो नहीं आया था? मैं ने ‘हां’ कहा तो उन्होंने कहा कि उसी कादिर अली ने लुबना का कत्ल कर दिया है.’’

उस ने इस बात को माना कि जमाल ने उसे तफ्सील से बताया तो उस ने ‘हां’ कहा था. अगली पेशी पर मामले की जांच करने वाला अफसर फजल शाह था. मैं ने पूछा, ‘‘आप को वारदात की खबर कब और किस ने दी थी?’’

‘‘मुझे जमाल बेरी ने रात 11 बजे वारदात की खबर दी थी. इस के बाद मैं करीब पौने 12 बजे मकतूल के फ्लैट पर पहुंचा था.’’

‘‘उस समय जमाल वेरी फ्लैट पर मौजूद था?’’

‘‘जी हां, जमाल वहां मौजूद था और उस ने टेलर अमजद को भी रोक रखा था.’’

‘‘क्या यह सच है कि जमाल ने ही आप से कहा था कि कादिर अली ने ही यह हत्या की है?’’

‘‘जी हां, जमाल ने ही कादिर अली की तरफ इशारा किया था. फिर मैं ने अमजद का बयान लिया. उस ने भी कहा कि कादिर अली को मकतूल के फ्लैट में जाते उस ने देखा था. टाइम का सही अंदाजा उसे नहीं था.’’

‘‘क्या आप यह बताना चाहेंगे कि जमाल बेरी ने यह कैसे तय कर लिया कि कत्ल कादिर अली ने ही किया था, क्या उस के पास कोई ठोस सबूत था?’’

‘‘जी हां, मकतूल के पास एक ब्राउन लिफाफा रखा मिला था, जिस में कादिर अली का दिया 20 हजार का चेक था.’’

‘‘यह वही लिफाफा तो नहीं, जिस की जिक्र मेरी जिरह में आ गया है?’’

‘‘जी हां, वह वही लिफाफा था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे तो आप ने क्या देखा?’’

‘‘मकतूल बिस्तर पर मरी पड़ी थी. उस के सीने में खंजर घोंपा हुआ था. लगता था, उस ने बचने के लिए कोई संघर्ष नहीं किया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार उस ने नशे की कोई दवा ली थी. सब चीजें अपनी जगह पर सुरक्षित थीं.’’

‘‘खंजर पर फिंगरप्रिंट मिले थे?’’

‘‘नहीं, मुलजिम ने चालाकी से प्रिंट साफ कर दिए थे.’’

‘‘कमरे के किसी हिस्से में भी मुलजिम के फिंगरप्रिंट नहीं मिले?’’

‘‘जी नहीं, कमरे में कहीं अंगुलियों के निशान नहीं मिले.’’

‘‘क्या कमाल की बात है. मुलजिम के पास इतना समय था कि अंगुलियों के निशान साफ कर वह समय पर रौयल होटल भी पहुंच गया.’’

‘‘हो सकता है, आप का क्लाइंट झूठ बोल रहा हो? वह वहां ज्यादा देर रुका हो.’’

‘‘एक बात सोच कर बताइए, आप के सामने मुलजिम ने दुखभरी कहानी सुना दी, सारे हालात बता दिए कि किस वजह से किस परिस्थिति में तलाक हुआ. क्या इस सब के बाद भी आप यह उम्मीद करते हैं कि मकतूल फ्लैट का दरवाजा खोल कर मुलजिम को अपने बैडरूम में ले जाएगी. जिस से वह सख्त नफरत करती थी, कभी नहीं ले जाएगी न? इस का मतलब साफ है कि जिस ने मकतूल का कत्ल किया है, वह उस का भरोसे का आदमी था. वह उसे तनहाई में अपने बैडरूम में ले गई. मेरा मुवक्किल वह आदमी नहीं हो सकता. आप क्या कहते हैं?’’

‘‘तो फिर ऐसा शख्स कौन हो सकता है?’’

‘‘यह पता लगाना आप का काम है, मेरा काम खत्म हुआ.’’

अगली पेशी पर विटनेस बौक्स में मकतूल का मंगेतर आर्ट एकेडमी का मालिक जमाल बेरी था.

इस्तगासा वकील की जिरह में कोई खास बात निकल कर सामने नहीं आई. जमाल बेरी ने जो बातें अपने बयान में कही थीं, वही रिपीट हुईं. उस के बाद मैं ने जिरह शुरू की. पहले मैं ने उस की मंगेतर की मौत पर दुख का इजहार किया. उस के बाद पूछा, ‘‘आप ने परफौरमैंस एकेडमी खोलने से पहले इस का कोई कोर्स किया था?’’

‘‘मैं ने कोई कोर्स तो नहीं किया, पर मैं स्टेज करता था और इस का तजुर्बा रखता हूं.’’

‘‘यानी आप के पास अच्छी तालीम है, क्या आप दीन, खुदा और रसूल पर भी यकीन रखते हैं?’’

‘‘हां खुदा रसूल पर पूरा यकीन रखता हूं.’’

‘‘इस के बावजूद आप ने मुलजिम की अच्छीभली शादीशुदा जिंदगी में दरार पैदा कर दी और उस की बीवी से ऐसी मोहब्बत बढ़ाई कि उन के बीच लड़ाईझगड़े करवा कर रशना वाली साजिश रच कर लुबना का तलाक करवा दिया. यही नहीं, एक बेगुनाह इंसान पर झूठे इलजाम लगवा दिए. ये बातें खुदा को सख्त नापसंद है. आप ने किसी का घर उजाड़ कर गुनाह नहीं किया?’’

‘‘मैं क्या कर सकता था. लुबना मुझ से बहुत ज्यादा मोहब्बत करती थी. मैं भी उसे चाहने लगा था. मोहब्बत में अंधे हो कर यह सब होता गया. वह मुझ से जल्द शादी करना चाहती थी और मकतूल की मुजरिम से जान छुड़ाने के लिए यह सब करना जरूरी था.’’

परेशानी और शर्मिंदगी उस के चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह काफी स्मार्ट और शानदार पर्सनाल्टी का मालिक था. मैं ने जिरह आगे बढ़ाई, ‘‘जमाल साहब, वारदात के दिन आप मकतूल के पास कब पहुंचे थे?’’

‘‘रात के करीब साढ़े 10 बजे मैं वहां पहुंचा था.’’

‘‘जब आप मकतूल के फ्लैट पर पहुंचे तो क्या हुआ था, क्या आप ने डोरबैल बजाई थी?’’

‘‘मैं ने डोरबैल बजाई, पर कोई नतीजा नहीं निकला. उस के बाद मैं ने हैंडल घुमाया तो दरवाजा खुल गया.’’

‘‘आप ने अंदर दाखिल हो कर आवाज दी होगी, जवाब न मिलने पर आप परेशान हो कर बैडरूम में गए होंगे, जहां वह अपने बैड पर मरी पड़ी थी, ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘जी हां, ऐसा ही हुआ था.’’

‘‘जब आप वहां पहुंचे थे तो आप की मंगेतर को मरे डेढ़, 2 घंटे हो चुके थे. इस का मतलब साफ है कि आप कातिल नहीं हैं? अब मैं मुलजिम की बेगुनाही की तरफ आता हूं. वारदात वाले दिन शाम 7 बजे मुलजिम मकतूल के फ्लैट पर ब्राउन लिफाफा देने गया था, जिस में एक चैक भी था. यह ब्राउन लिफाफा वही है, जिस की वजह से मुलाजिम पर कातिल होने का शक किया जा रहा है? आप ने टेलर अमजद से पूछताछ की और पुलिस के आने पर आप ने कादिर अली को कातिल की तरह पेश कर दिया. मैं गलत तो नहीं कह रहा?’’

‘‘नहीं, आप ठीक कह रहे हैं, हालात ऐसे ही पेश आए थे. मुझे यही लगा था.’’

‘‘आप एक आर्ट एकेडमी चला रहे हैं तो आप को रौयल होटल में होने वाली आर्ट एग्जीबिशन के बारे में पता ही रहा होगा?’’

‘‘जी हां, मुझे इन्वीटेशन भी मिला था, पर मेरा डिनर मकतूल के साथ तय था, इसलिए मैं वहां नहीं जा सका.’’

‘‘मुलजिम अपनी बेटी आरिफा और उस की दोस्त सबा के साथ शाम साढ़े 7 बजे से साढ़े 10 बजे तक एग्जीबिशन में था. एक मशहूर आर्टिस्ट शाहिद निजामी पूरे वक्त उस के साथ थे. वह उस की वहां मौजूदगी के गवाह हैं. जरूरत पड़ने पर उन्हें गवाही के लिए बुलाया जा सकता है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक मकतूल का कत्ल 8 बजे और 9 बजे के बीच हुआ था. इस अरसे मेरा मुवक्किल नुमाइश में था, इसलिए यह कहना बेवकूफी है कि उस ने मकतूल का कत्ल किया है.’’

‘‘अगर उस ने कत्ल नहीं किया तो कातिल कौन हो सकता है?’’ जमाल ने उलझ कर पूछा.

‘‘आप का जवाब देने से पहले मैं इस केस के इंक्वायरी अफसर से सवाल करना चाहूंगा.’’

जज ने फौरन इजाजत दे दी. मैं ने आईओ से पूछा, ‘‘आप ने वारदात की जगह से जो फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं, उस का रिकौर्ड आप के पास होगा? आप यह बताएं कि वहां किनकिन लोगों के निशान आप को मिले हैं?’’

‘‘हम ने 3 लोगों के फिंगरप्रिंट्स उठाए हैं. एक मकतूल लुबना, दूसरे उस के मंगेतर जमाल और तीसरे के बारे में कुछ पता नहीं चल सका है.’’ उस ने शर्मिंदगी से कहा.

‘‘मैं दावे से कह सकता हूं कि तीसरे नंबर के फिंगरप्रिंट्स जिन का पता नहीं चल सका, वह कातिल के हैं और कातिल तक मि. जमाल पहुंचाएंगे.’’

‘‘मैं… मैं कैसे?’’ वह हकलाया.

मैं ने जमाल से पूछा, ‘‘मि. जमाल, क्या आप किसी ऐसी लड़की या औरत के बारे में जानते हैं, जो आप से शादी करना चाहती है?’’

‘‘मेरी नजर में ऐसी कोई लड़की नहीं है.’’

‘‘कोई ऐसा शख्स है, जो मकतूल को बहुत पसंद करता था और उस से शादी करना चाहता था? एकेडमी में कोई ऐसा है, जिस की मकतूल से दोस्ती थी?’’

‘‘मेरी जानकारी में बस उबेद ऐसा शख्स है, जिस की लुबना से अच्छी बनती थी. उस वक्त लुबना से मेरी मंगनी नहीं हुई थी. मैं कैसे ऐतराज कर सकता था?’’

‘‘आप की मंगनी पर उस का क्या रिएक्शन था?’’

‘‘मेरी मंगनी के बाद वह एकदम बुझ सा गया था.’’

‘‘इस का मतलब मंगनी से उसे दुख पहुंचा था?’’

‘‘हो सकता है.’’

‘‘क्या यह वही उबेद है, जिसे लुबना ने रशना वाले ड्रामे के दिन फोन कर के घर बुलाया था?’’

‘‘जी हां, वही है. लौट कर उस ने मुझे बताया था कि काम हो गया.’’

‘‘यानी मुलजिम ने मकतूल को तलाक दे दिया?’’

‘‘जी हां, उस का यही मतलब था.’’

मैं ने अपना रुख जज की तरफ कर के कहा, ‘‘जनाब, अब तक की अदालती काररवाही मेरे मुवक्किल को बेगुनाह साबित करने को काफी है. फिर भी अदालत को निर्णय लेने में आसानी हो, मैं अगली पेशी पर मुलजिम की बेटी आरिफा उस की दोस्त सबा और आर्टिस्ट शाहिद निजामी को गवाही में पेश करूगा. आईओ साहब से रिक्वेस्ट है कि वह उबेद जामी के फिंगरप्रिंट्स जल्द हासिल कर के तीसरे नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाएं तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा?’’

जज ने आईओ और पुलिस को हिदायत दी कि उबेद को शामिल तफतीश किया जाए और अगली पेशी पर उसे हाजिर किया जाए. पुलिस ने बड़ी मुस्तैदी से उसी दिन उबेद को शामिल तफतीश कर के उस के फिंगरप्रिंट्स तीसरे नंबर के नामालूम फिंगरप्रिंट्स से मिलाए तो सारा मामला साफ हो गया. फिंगरप्रिंट्स के नमूने से उबेद के फिंगरप्रिंट्स मैच हो गए. पहले तो उबेद पुलिस को इधरउधर घुमाता रहा, जुर्म से इनकार करता रहा, पर जब पुलिस ने हाथ कड़े किए तो उस ने सच उगल दिया.

उबेद ने इकरारे जुर्म कर लिया कि लुबना को उसी ने सीने में खंजर घोंप कर मौत की नींद सुलाया था. यह कत्ल उस ने दास्ताने पहन कर किया था, इसलिए खंजर पर फिंगरप्रिंट नहीं आए थे. दूसरी जगहों पर फिंगर प्रिंट्स पाए गए थे. उबेद के बयान के मुताबिक, लुबना डबल गेम खेल रही थी. पहले तो वह उबेद से हंसतीबोलती रही, उस से दोस्ती बढ़ाती रही. जब उबेद उस की मोहब्बत में डूब गया तो जमाल को अपनी ओर आकर्षित देख कर वह उस की तरफ मुड़ गई. वह एकेडमी का मालिक था और उबेद से ज्यादा स्मार्ट था. मगर वह उबेद का सब्जबाग दिखाती रही. दोनों अपनीअपनी जगह पर लुबना को माशूका पा कर खुश थे. वह बारीबारी दोनों को खुश करती रही. दोनों यही समझते रहे कि वह बस उस के साथ सीरियस है.

अपने शौहर यानी कादिर अली से तलाक हासिल करने के बाद उस ने खुल्लमखुल्ला अपना फैसला जमाल के हक में दे दिया और उस के दिए हुए फ्लैट में रहने लगी. बाद में उस से मंगनी भी कर ली. उबेद को दुख भी हुआ और गुस्सा भी आया कि वह उसे इतने दिनों तक उल्लू बनाती रही. उस ने पुलिस को बयान देते हुए कहा, ‘‘मैं मोहब्बत में अपनी यह हार बिलकुल बरदाश्त नहीं कर पाया. वह मुझ से बड़ा प्यार जताती थी. मैं ने उल्लू बन कर उसे महंगेमहंगे तोहफे दिए थे. उस का धोखा मेरे दिल को लग गया. मैं ने तय कर लिया कि मैं बदला जरूर लूंगा.

‘‘मैं ने उसे बुझे दिल से मंगनी की मुबारकबाद दी. फिर कुछ दिन गुजरने के बाद मैं ने लुबना से रिक्वैस्ट की कि अपनी मोहब्बत मैं भूल जाऊंगा, बस वह एक घंटा तनहाई में मेरे साथ गुजारे. इस के बाद मैं उन की जिंदगी से दूर हो जाऊंगा. उसे पुरानी मोहब्बत का वास्ता दिया तो वह मान गई. हम ने जिंदगी के बहुत सारे रंगीन लम्हे साथ बिताए थे. उन्हीं की यादों को ताजा करते हुए उस ने मेरी बात मान ली.’’

आईओ ने पूछा, ‘‘तो तुम ने एक खास मकसद के लिए उस से मुलाकात की और चुपचाप वापस चले आए. यह नशे का क्या मामला था?’’

‘‘वारदात वाले दिन लुबना ने 8 बजे बुलाया था. और यह जता दिया था कि 9 बजे के पहले चले जाना होगा. मैं पूरी तैयारी के साथ उस के फ्लैट पर ठीक 8 बजे पहुंच गया. उस ने मेरे लिए चाय बनाई. मैं ने नजर बचा कर उस की चाय में नींद की गोलियां डाल दीं. चाय पी कर वह सिरदर्द की शिकायत करने लगी. मैं ने उसे सहारा दे कर उस के बैडरूम में ले जा कर बैड पर लिटा दिया. मेरी दी हुई दवा ने असर दिखाना शुरू कर दिया था. वह अपने होश में नहीं रही तो मैं ने अपने लिबास में छिपाया खंजर निकाला और दास्ताने पहन कर खंजर का घातक वार उस दगाबाज औरत के सीने पर कर दिया.’’

उबेद अपने जुर्म, अपने बदले की दास्तान सुना रहा था. उस के एकएक लफ्ज में नफरत की चिनगारियां निकल रही थीं, ‘‘वह बेवफा औरत इसी लायक थी. ऐसी दगाबाज औरतें ऐसे ही अंजाम की हकदार होती हैं. मुझे अपने किए पर कोई दुख, कोई पछतावा नहीं है. बस दुख इस बात का है कि मैं पकड़ा गया. हालांकि चाय के खाली कप मैं अपने साथ ले गया था, ताकि पुलिस को मुझ तक पहुंचने का कोई सुराग न मिले. लेकिन मेरी बदनसीबी की मैं पकड़ा गया.’’

उबेद के इकबाले जुर्म के बाद मेरे मुवक्किल की बेगुनाही पक्की हो गई और अगली पेशी पर आरिफा, सबा व शाहिद निजामी की गवाही के बाद कादिर अली बाइज्जत बरी हो गया. True Crime Story

 

Hindi Crime Story: जो सिर्फ दिमाग चलाते हैं

Hindi Crime Story: एक एनजीओ संचालक ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की टीम बना कर बौलीवुड फिल्म ‘स्पैशल 26’ की तरह एक बिल्डर के यहां छापा मार कर 21 लाख रुपए और गहने जिस तरह ठगे, हैरान करने वाली बात है. लेकिन क्या वे पुलिस से बच पाए?

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून की सड़कों पर रोज की तरह उस दिन भी वाहनों की आवाजाही लगी थी. रात के लगभग 9 बजे दिल्ली नंबर की एक चमचमाती सफेद रंग की एलैंट्रा कार नंबर- डीएल 3सी एक्यू 0504 सहारनपुर चौक से राजपुर की ओर चली जा रही थी. कार में 4 आदमी और 2 औरतें सवार थीं. सभी ने सफेद रंग की पैंट और कमीज पहन रखी थी.

कार कारगी चौक पहुंच एक किनारे खड़ी हो गई. कार के रुकते ही वहां पहले से खड़े 2 लोग उस के नजदीक आए तो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा युवक उन से मुखातिब हुआ, ‘‘सब ठीक है न?’’

‘‘यस, लाइन क्लियर है. बस आप लोगों का ही इंतजार था.’’ कह कर वे दोनों भी कार में सवार हो गए. इस के बाद कार फिर चल पड़ी तो कुछ देर में वह पौश इलाके सरकुलर रोड पर कोठी नंबर 92 के सामने जा कर रुकी.

यह कोठी बिल्डर यशपाल टंडन की थी. यशपाल प्रौपर्टी का काम करते थे. इस के अलावा बड़ीबड़ी कमेटियां भी डालते थे, जिस में लाखों रुपए का लेनदेन होता था.

यशपाल का अपना औफिस भी था, जिस में वह सुबह से शाम तक बैठते थे. कोई नहीं जानता था कि उस दिन यशपाल का वास्ता एक बड़ी मुसीबत से पड़ने वाला था. कार में बाद में सवार हुए दोनों लोगों को छोड़ कर बाकी सभी कार से नीचे उतरे. उन में से एक के हाथ में ब्रीफकेस था. कार से उतरे लोग कोठी के गेट पर जा कर खड़े हो गए. उन्होंने डोरबैल बजाई तो कुछ सेकैंड बाद दरवाजे पर यशपाल टंडन खुद आए. उन के दरवाजा खोलते सब से आगे खड़े एक आदमी ने पूछा, ‘‘आप यशपाल टंडन?’’

‘‘जी हां, लेकिन आप कौन?’’ उन्होंने पूछा तो उसी आदमी ने रौब जमाते हुए सख्त लहजे में कहा, ‘‘हम लोग प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से हैं. आइए अंदर बैठ कर बातें करते हैं.’’

टंडन सकपका गए. एकाएक उन की कुछ समझ में नहीं आया. आने वालों के तेवर उन्हें ठीक नहीं लग रहे थे. उन्होंने हकलाते हुए कहा, ‘‘ल…ल…लेकिन इस तरह.’’

‘‘कहा न, चलो अंदर चल कर बात करते हैं.’’ कहने के साथ ही टीम का नेतृत्व कर रहे उस आदमी ने साथियों से कहा, ‘‘दरवाजा बंद कर के इन्हें अंदर ले आइए और बाहर खड़े लोगोें से कहिए कि बिना इजाजत कोई अंदर न आने पाए.’’

हालात अचानक बदल गए थे. टंडन चुपचाप उन के साथ अंदर आ गए. ड्राइंगरूम में आते ही उन्होंने टंडन को सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘मि. टंडन, हमें तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है. हमें शिकायत मिली है कि तुम्हारे पास बहुत ब्लैकमनी है.’’

‘‘ऐसा तो कुछ भी नहीं है सर, जरूर आप को किसी ने गलत सूचना दी है.’’ टंडन ने सफाई देनी चाही तो टीम का नेतृत्व कर रहा आदमी बड़े ही आत्मविश्वास से बोला, ‘‘हमारी इन्फौरमेशन गलत नहीं है. हम तुम पर तभी से नजर रख रहे हैं, जब तुम्हारे दोस्त विजय मनचंदा के यहां आयकर का छापा पड़ा था, उस समय तुम खुद भी तो वहां मौजूद थे.’’

उस की इस बात पर यशपाल चौंके, क्योंकि उस अधिकारी ने जो कहा था, वह एकदम सही था. दरअसल 4 महीने पहले उन के दोस्त विजय मनचंदा के यहां जब आयकर विभाग ने छापा मारा था, तब वह भी वहां मौजूद थे. इतना ही नहीं, आयकर विभाग ने उन का पहचान पत्र ले कर उन्हें गवाह भी बना लिया था. वह घबरा गए. यह सब उन की पत्नी भी देखसुन रही थीं. वह भी घबरा गईं. टंडन और उन की पत्नी को सोफे पर एक तरह से बंधक बना कर बैठा दिया गया.

‘‘मि. टंडन, हमें कोऔपरेट कीजिए.’’ सामने बैठे आदमी ने कहा तो टीम में शामिल युवा लड़कियां टंडन दंपति के इर्दगिर्द खड़ी हो गईं, जबकि बाकी लोग कोठी की तलाशी लेने लगे. करीब आधा घंटे तक जब कुछ हाथ नहीं लगा तो उन्होंने सेफ की चाबी ले कर सारा सामान उलटपलट दिया. इस जांचपड़ताल में उन के हाथ संपत्ति के कुछ कागजात, नकदी और गहने लगे.

उन्हें जो भी मिला, वह सब एक स्थान पर रखते गए. उन के बारे में तरहतरह के सवाल भी करते रहे. टीम का नेतृत्व कर रहे अधिकारी ने यशपाल को गहरी नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘इन सब का हिसाब देने तुम्हें कल औफिस आना होगा. तुम्हारे खिलाफ एफआईआर तो होगी ही, जरूरत पड़ी तो गिरफ्तारी भी हो सकती है.’’

यशपाल के तो होश उड़ गए. उन्हें परेशान देख कर अधिकारी ने कहा, ‘‘हमारे पास एक बीच का रास्ता है.’’

‘‘क्या?’’ डरेसहमे यशपाल टंडन ने पूछा तो राजदाराना अंदाज में वह बोला, ‘‘अगर हमें 50 लाख रुपए मिल जाएं तो तुम आगे की काररवाई से बच सकते हो.’’

इस काररवाई से दहशत में आए यशपाल सोच में पड़ गए. गिड़गिड़ाने वाले अंदाज में उन्होंने कहा, ‘‘सर, मेरे पास इतनी बड़ी रकम नहीं है. कुछ कम हो जाए तो मैं कोशिश कर सकता हूं.’’

‘‘ठीक है, रकम कम करेंगे तो हम इन्हें अपने साथ ले जाएंगे.’’ उस ने गहनों की ओर इशारा कर के कहा.

यशपाल इजाजत ले कर सोफे से उठे और घर में रखे 6 लाख रुपए निकाल कर उन्हें दे दिए.

लेकिन छापा मारने वाली टीम ने उन्हें लेने से मना कर दिया. उन्होंने कहा कि इतने में बात नहीं बनेगी. इस के बाद टंडन ने फोन कर के अपने किसी परिचित व्यापारी से 10 लाख रुपए मंगा कर लिए. यह रकम लेने टंडन खुद दरवाजे तक गए थे. इतने पर भी बात नहीं बनी तो उन्होंने अपने किसी अन्य परिचित से 5 लाख रुपए और मंगा कर दिए.

टीम का मुखिया इतने पर भी संतुष्ट नजर नहीं आया. उस ने सारी नकदी और आभूषण एक बैग में रख लिए. इस के बाद चलने लगा तो कहा, ‘‘थोड़ी देर के लिए अपनी स्कूटी देना.’’

टंडन ने मना किया तो उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, हमारा कर्मचारी आ कर उसे दे जाएगा.’’

करीब सवा 2 घंटे की काररवाई के बाद पूरी टीम चली गई.

यशपाल टंडन के यहां ईडी का यह छापा 2 नवंबर, 2015 की रात पड़ा था. इस छापे से वह काफी परेशान थे. उन्होंने अपने परिचितों को फोन कर के इस छापे की जानकारी दी तो बिना पुलिस के रात में छापा मारना और स्कूटी मांग कर ले जाने वाली बात से उन लोगों को यह सब संदिग्ध लगा. जब यह साफ हो गया कि आयकर विभाग या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) रात में छापा नहीं मारता तो लगा कि उन के साथ कोई बड़ी गड़बड़ हुई है. परिचितों से सलाहमशविरा कर के यशपाल टंडन ने इस की सूचना पुलिस कंट्रौल रूम को दे दी.

फरजी ईडी टीम द्वारा छापे के बहाने लाखों रुपए ले जाने की घटना की सूचना पा कर थाना कोतवाली के प्रभारी एस.एस. बिष्ट और लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह पुलिस बल के साथ टंडन की कोठी पर पहुंच गए. अधिकारियों को भी सूचित कर दिया गया था. इस घटना से जिला पुलिस में हड़कंप मच गया था. एसपी (सिटी) अजय सिंह और सीओ मनोज कत्याल भी मौके पर पहुंच गए थे. सभी ने यशपाल से पूछताछ की तो उन्होंने पूरी घटना सिलसिलेवार बता दी. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यशपाल टंडन को छापे के बहाने शातिराना अंदाज में ठगा गया है. प्रवर्तन निदेशालय के क्षेत्रीय प्रमुख पी.के. चौधरी ने भी स्पष्ट कर दिया कि उन की किसी टीम ने छापा नहीं डाला है.

यशपाल बुरी तरह हताश हो गए. ठग पूरी तैयारी के साथ आए थे और बड़ी चालाकी से उन्हें ठग कर चले गए थे. मामला बेहद गंभीर था. थाना कोतवाली में यशपाल द्वारा दी गई तहरीर के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ अपराध संख्या- 304/2015 पर भादंवि की धारा 595, 419, 420, 120 बी, 406 व 506 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. सदानंद दाते को भी इस घटना की सूचना मिल गई थी. वह काफी हैरान थे. इस की वजह यह थी कि यह फिल्मी स्टाइल में किया गया अपनी तरह का एक अलग अपराध था. उन्होंने एसपी (सिटी) अजय सिंह से सलाह कर के इस मामले के खुलासे के लिए एक टीम का गठन करने का आदेश दिया.

इस स्पैशल औपरेशन ग्रुप की संयुक्त टीम में थानाप्रभारी एस.एस. बिष्ट, लक्खीबाग चौकीप्रभारी राकेश शाह, एसआई दिलबर सिंह, एएसआई सर्वेश कुमार, कांस्टेबल अरविंद भट्ट, मनमोहन सिंह, कुलवीर, सत्येंद्र नेगी, प्रमोद, गंभीर सिंह और महिला कांस्टेबल रजनी कोहली तथा सुमन को शामिल किया गया. इस का नेतृत्व खुद एसपी (सिटी) अजय सिंह कर रहे थे. पुलिस टीम तुरंत अपने काम में लग गई. यशपाल टंडन से हुई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने एक्सपर्ट से एक आरोपी का स्कैच भी बनवा कर जारी कर दिया.

यशपाल ने कार का जो नंबर बताया था, पुलिस ने अगले दिन उस की जांच की तो वह पंजाब प्रांत की किसी मोटरसाइकिल का निकला. 2 बातें स्पष्ट होती थीं, एक तो यह कि यशपाल को ठीक से नंबर याद नहीं था या फिर कार में फरजी नंबर प्लेट का इस्तेमाल किया गया था. यशपाल की स्कूटी पुलिस ने उसी दिन कारगी चौक से लावारिस अवस्था में खड़ी बरामद कर ली थी. उन की कोठी के बाहर बाईं ओर एसजीआरआर स्कूल था. उस के बाहर सीसीटीवी कैमरे लगे थे. पुलिस ने उस की रिकौर्डिंग चैक की, लेकिन उस से कार का नंबर पकड़ में नहीं आ सका.

राजधानी के मुख्य चौराहों पर भी सुरक्षा की दृष्टि से हाई डैफिनेशन कैमरे लगे हैं. पुलिस ने रात 9 से साढ़े 11 बजे तक की उन की फुटेज बारीकी से चैक की तो आशारोड़ी क्षेत्र के कैमरे में वह कार दिख गई, जिस में सवार हो कर कथित ईडी टीम के सदस्य आए थे. इस में कार का नंबर स्पष्ट नजर आ रहा था. इस तरह पुलिस को नंबर मिल गया. अब तक कई दिन बीत चुके थे. चूंकि नंबर दिल्ली का था, इसलिए एसआई राकेश शाह के नेतृत्व में एक टीम दिल्ली भेज दी गई.

दिल्ली पहुंची पुलिस टीम ने आरटीओ औफिस से कार के मालिक के बारे पता किया. पुलिस आरटीओ औफिस से मिले पते पर पहुंची तो वहां जो मिला, पता चला उस ने कार बेच दी थी. जिस व्यक्ति को उस ने कार बेची थी, पुलिस उस के पास पहुंची तो वहां भी निराश होना पड़ा, क्योंकि उस ने भी किसी अन्य को कार बेच दी थी. पुलिस टीम दिल्ली में ही डेरा डाले थी. कार आदर्शनगर निवासी पुष्पा को बेची गई थी. पुलिस खोजबीन करते हुए पुष्पा के यहां पहुंची तो उस ने बताया कि उस की कार को एक एनजीओ संचालक प्रदीप सिंह मांग कर ले गया था.

प्रदीप के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि वह अपने भाई बबलू और कुछ अन्य साथियों के साथ जहांगीरपुरी में एक औफिस खोल कर एनजीओ चलाता है. उस के यहां स्टाफ भी था. पुलिस ने पूछताछ कर के उस के बारे में जानकारी इकट्ठा कर ली. पुलिस को कार पुष्पा के यहां मिल गई थी. पुलिस को जो सुराग मिले थे, वे काम के थे. 25 नवंबर को पुलिस टीम जहांगीरपुरी स्थित फ्लैट नंबर डी 268 पर पहुंची. फ्लैट में औफिस चल रहा था. पुलिस को वहां प्रदीप तो नहीं मिला, उस के यहां काम करने वाली 2 लड़कियां मिल गईं.

ईडी के छापे में चूंकि 2 लड़कियां भी शामिल थीं, इसलिए पुलिस ने उन्हें शक के दायरे में रख कर पूछताछ शुरू कर दी. उन लड़कियों में एक श्रद्धानंद कालोनी निवासी बेबी पुत्री वीरेंद्र और दूसरी राखी पुत्री कल्लू थीं. दोनों बेहद साधारण परिवारों से थीं. वे दोनों कई महीने से इस एनजीओ में काम कर रही थीं. पुलिस ने उन से घुमाफिरा कर सवाल किए तो वे जवाब देने में उलझ गईं. उन्होंने जो सच बताया, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. इस फरजी छापे की योजना किस ने तैयार की थी, यह तो वे नहीं जानती थीं, लेकिन प्रदीप के साथ छापे में वे भी गई थीं. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर देहरादून आ गई. पुलिस प्रदीप के जहांगीरपुरी स्थित एमसीडी में फ्लैट नंबर 306 पर भी गई थी, लेकिन वहां ताला लगा था.

पुलिस ने दोनों लड़कियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि 2 नवंबर को प्रदीप छापा मारने की बात कह कर उन्हें अपने साथ ले गया था. उस के साथ उस का भाई बबलू और 2 दोस्त भी थे, जबकि 2 लोग उन्हें देहरादून में मिले थे. बेबी और राखी प्रदीप एवं बबलू के अलावा किसी और को नहीं पहचानती थीं. पुलिस ने यशपाल टंडन से लड़कियों का आमनासामना कराया तो उन्होंने उन्हें पहचान लिया. लड़कियों ने हैरान करने वाली बात यह बताई कि प्रदीप ने यह छापा फिल्म ‘स्पैशल-26’ की स्टाइल में मारा था. इस के लिए उस ने खुद तो रिहर्सल किया ही था, उन्हें भी रिहर्सल कराया था. उन्हें कई बार फिल्म भी दिखाई थी.

टीम असली लगे, इस के लिए उन्होंने सफेद रंग के कपड़े सिलवाए थे. अपनी बनाई योजना के अनुसार वे छापा मार कर चले गए थे. प्रदीप के पास ही पूरी रकम थी. छापा मारने के पहले जो 2 लोग देहरादून में मिले थे, वे देहरादून में ही रह गए थे. लड़कियों ने बताया था कि यशपाल टंडन ने टीम को पूरा सहयोग दिया था. उन्होंने खुद ही बताया था कि अमुकअमुक स्थान पर तलाशी लें. इस से यशपाल की भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी.

यशपाल कमेटी डलवाते थे. हो सकता था कि घाटा दिखाने के लिए उन्होंने ही यह योजना बनाई हो. इस मुद्दे पर उन से भी पूछताछ की गई, लेकिन इस में उन का कोई हाथ नहीं निकला. अलबत्ता लड़कियों और उन के बयानों में थोड़ा विरोधाभास जरूर बना रहा. अभी मामले का खुलासा पूरी तरह नहीं हो सका था. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 26 नवंबर को अपने औफिस में प्रेसवार्ता कर के इस फरजी छापे का खुलासा किया. इस के बाद पुलिस ने दोनों लड़कियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को विश्वास हो गया कि वारदात में स्थानीय लोगों का भी हाथ जरूर था. पुलिस टीम प्रदीप की तलाश में जुटी थी, लेकिन अगले कई दिनों तक वह हाथ नहीं आया. पुलिस प्रदीप और उस के भाई के मोबाइल नंबरों की जांच कर रही थी. लेकिन वे बंद हो चुके थे. पुलिस हर सूरत में पूरे मामले का परदाफाश करना चाहती थी. एसपी (सिटी) अजय सिंह समयसमय पर टीम के काम की समीक्षा करते रहते थे. देखते ही देखते घटना को घटे डेढ़ महीने से ज्यादा का समय बीत गया, लेकिन आरोपियों का कोई सुराग नहीं मिला. कोई महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लग जाए, इस के लिए पुलिस ने जेल में बंद राखी और बेबी से दोबारा पूछताछ की.

पुलिस आरोपियों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स पर भी काम कर रही थी. इस से कडि़यां जुड़ती चली गईं. इस कड़ी में एक नाम धर्मपाल भाटिया का सामने आया. धर्मपाल हरियाणा के जिला करनाल के हांसी रोड पर रहता था. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई और उस से पूछताछ के आधार पर देहरादून के थाना क्लेमन टाउन के गोकुल एन्कलैव में रहने वाले दीपक मनचंदा को भी 4 जनवरी, 2016 को गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दोनों से पूछताछ की. इन से पूछताछ में पुलिस को पता चला कि यह पूरी योजना एक महिला द्वारा तैयार की गई थी तो हैरानी बढ़ गई. सभी लोगों ने योजना बना कर जिस तरह फिल्मी अंदाज में छापा मारा था, पुलिस उलझ कर रह गई थी. ठगी का शिकार हुए यशपाल टंडन का उन का अपना कलैक्शन एजेंट ही उन्हें दगा दे गया था. दरअसल, दीपक मनचंदा यशपाल के दोस्त विजय मनचंदा का भतीजा था. इसी नाते उन्होंने भरोसा कर के उसे अपने यहां कमेटी का पैसा जुटाने और अन्य कामों के लिए रख लिया था. दीपक ने खूब मेहनत कर के काम किया, जिस से यशपाल टंडन को उस पर पूरा भरोसा हो गया. वह उस के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करने लगे.

जरूरी नहीं कि इंसान जैसा दिखता है, ठीक वैसा हो ही. दीपक के साथ भी ऐसा ही था. वह बुरी आदतों का शिकार था. उन में एक आदत अनापशनाप खर्च करना भी थी. यशपाल के लिए वह मोटी रकम इकट्ठा करता था. धीरेधीरे उस ने उन से 5 लाख रुपए उधार ले लिए. जब रुपए लौटाने की बात आई तो वह परेशान रहने लगा. दीपक मूलरूप से करनाल का ही रहने वाला था और कुछ सालों पहले ही देहरादून आया था. उस की जानपहचान धर्मपाल भाटिया और उस की पत्नी निशा उर्फ रेखा से थी. निशा तेजतर्रार महिला थी. एक दिन बातोंबातों में उस ने अपनी परेशानी दोनों को बताने के साथ यह भी बताया कि उस का मालिक काफी दौलतमंद आदमी है.

‘‘तुम उसी से पैसा क्यों नहीं कमाते?’’ निशा ने रहस्यमय अंदाज में कहा.

‘‘वह कैसे?’’ दीपक ने हैरानी से पूछा.

‘‘इस की तरकीब मैं तुम्हें बताऊंगी.’’ निशा ने कहा.

आश्वासन मिलने पर दीपक को थोड़ी राहत मिल गई. जहांगीरपुरी में रहने वाले प्रदीप और बबलू निशा के भाई थे. दोनों काफी शातिर थे. वे एनजीओ की आड़ में ब्लैकमेलिंग का धंधा करते थे. निशा और धर्मपाल ने इस मुद्दे पर उन से बात की तो काफी सोचविचार कर उन्होंने फिल्म ‘स्पैशल 26’ की स्टाइल में यशपाल टंडन को लूटने की सोची.

इस के बाद उन्होंने दीपक से बात की तो उस ने यशपाल के बारे में सब कुछ बता दिया. उस ने यह भी बताया कि यशपाल चूंकि कमेटी के साथ ब्याज पर भी रुपए देने का काम करते हैं, इसलिए उन के पास बिना हिसाबकिताब की मोटी रकम होती है. प्रदीप और निशा को वह सौफ्ट टारगेट लगे. प्रदीप स्मार्ट युवक था और अधिकारियों वाले अंदाज में रहता था.

सभी ने मिल कर यशपाल को प्रवर्तन निदेशालय के फरजी छापे के जरिए अपना शिकार बनाने का फैसला किया. प्रदीप ने इस योजना  में अपने एक दोस्त पंकज तिवारी, भांजे रमन और एनजीओ में काम करने वाली बेबी और राखी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया. प्रदीप, उस का भाई, दोस्त, भांजा और दोनों लड़कियों ने कई बार ‘स्पैशल 26’ फिल्म देखी. प्रदीप को अधिकारी की भूमिका में रहना था, जबकि बाकी को टीम के सदस्य के रूप में. योजना बन गई तो तय दिन 2 नवंबर के एक दिन पहले ही धर्मपाल दीपक के पास देहरादून पहुंच गया.

अगले दिन प्रदीप ने बहाने से पुष्पा की कार मांगी और बबलू, पंकज, रमन, बेबी और राखी के साथ शाम को दिल्ली से चल कर करीब 8 बजे देहरादून पहुंच गया. यशपाल और दीपक तय योजना के तहत उन्हें रास्ते में मिल गए. सभी लोग यशपाल की कोठी पर पहुंचे. चूंकि यशपाल दीपक को पहचानते थे, इसलिए वह धर्मपाल के साथ बाहर कार ही में रुक गया. यशपाल को उन के फरजी ईडी होने का शक न हो, इस के लिए प्रदीप ने उन्हें उन के दोस्त के यहां पूर्व में पड़े आयकर विभाग के छापे का जिक्र किया. यह बात दीपक उसे पहले ही बता चुका था. उन्होंने बेहद शातिराना अंदाज में 21 लाख कैश और गहने ठग लिए. जातेजाते वे स्कूटी भी ले गए, जिसे उन्होंने कारगी चौक पर छोड़ दिया.

इस के बाद दीपक अपने घर चला गया. धर्मपाल करनाल और बाकी लोग दिल्ली. प्रदीप ने कहा कि वह माल का बंटवारा बाद में करेगा. लेकिन वह सभी से शातिर निकला और अपने भाई के साथ पूरी रकम ले कर फरार हो गया. उस ने सिर्फ बेबी और राखी को 6 हजार रुपए खर्च के लिए दिए थे. पूछताछ के बाद पुलिस ने आरोपियों का सामना यशपाल टंडन से कराया. वह अपने दोस्त के भतीजे द्वारा दी गई दगा से आहत थे. एसएसपी डा. सदानंद दाते ने 5 जनवरी, 2016 को आरोपियों को मीडिया के सामने पेश कर के केस का खुलासा किया और पुलिस टीम को ढाई हजार रुपए इनाम देने की घोषणा की.

पुलिस ने बाद में गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक जेल गए आरोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी. बाकी अन्य आरोपी निशा उर्फ रेखा, प्रदीप, बबलू, पंकज और रमन की तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Suspense Story Hindi: चाय की तरह – खून पीने वाले ड्रैकुला

Suspense Story Hindi: ड्रैकुला, पिशाच अथवा चुड़ैल जैसे शब्दों की अवधारणा सदियों से चली आ रही है. कहानियों के माध्यम से ये शब्द लोगों के मन में दहशत भी पैदा करते रहे हैं. लेकिन हकीकत में डै्रकुला, पिशाच या चुडै़ल जैसा कुछ नहीं होता. वैसे मानवीय खून पीने वाले ड्रैकुला आज भी इंसानों के बीच मौजूद हैं.

अगर आप मानते हैं कि इंसानी खून पीने वाले ड्रैकुला महज किस्सेकहानियों का हिस्सा हैं तोआप गलतफहमी में हैं. क्योंकि दुनिया में 1-2 नहीं बल्कि 20 लाख से ज्यादा चलतेफिरते ऐसे जिंदा लोग हैं, जो रोज या अकसर चाय या काफी की तरह इंसानी खून पीते हैं. जिस तरह तमाम लोगों को शराब, स्मैक या अफीम की लत होती है, वैसे ही इन्हें रोजाना खून पीने की लत होती है. इन की सब से मुखर मौजूदगी उस अमेरिका में ही है जो आधुनिक विज्ञान और वैज्ञानिक सोच का गढ़ माना जाता है.

खून पीने वाले ये बिलकुल आम लोग हैं. इन में कोई क्लर्क है तो कोई बेकरी वाला तो कोई इमीग्रेशन महकमे का अधिकारी है तो कोई नर्स. कोई किसी स्कूल में कविताएं पढ़ाने वाली अध्यापिका है तो कोई मसाज करने वाली या कालगर्ल. यहां तक कि नियमित खून पीने वाले इन पिशाचों में पूरे रस्मोरिवाज से धार्मिक अनुष्ठान कराने वाला किसी धर्म का कोई व्यक्ति भी हो सकता है.

एक और हैरान करने वाली बात यह है कि न केवल दुनिया में नियमित खून पीने वाले लोग मौजूद हैं, बल्कि नियमित रूप से खून पिलाने वाले लोग भी मौजूद हैं. खून पिलाने वाले लोग भी बिलकुल हमारे आप के जैसे आम लोग ही हैं. दुनिया भर की तमाम कहानियों में भले ही ड्रैकुला, पिशाच या चुड़ैलें लोगों को मार कर उन का खून पीते हों, लेकिन हकीकत से इस का कुछ लेनादेना नहीं है. स्थिति यह है कि अब तो ज्यादातर ड्रैकुलाओं को सहमति से खून पिलाने वाले उपलब्ध हैं. यह बात खून पीने और पिलाने वाले की आपसी रजामंदी से तय होती है कि खून शरीर में से सीधे चीरा लगा कर पीया जाएगा या फिर सक्शन पाइप से गिलास में निकाल कर सिप करते हुए पीया जाएगा.

बीबीसी फ्यूचर के लिए इस विषय पर एक रिसर्च लेख लिखने वाले डेविड राबसन कहते हैं, ‘‘एक दिन अमेरिका के न्यू आरलींस के फ्रेंच क्वार्टर इलाके में मैं ने पाया कि जान एडगर ब्राउनिंग के ‘रक्तदान’ का एक खास सत्र शुरू होने वाला था. इसे चिकित्सीय अंदाज में शुरू किया गया. उन के एक जानकार ने एल्कोहल से उन की पीठ का एक हिस्सा साफ किया. फिर उन की पीठ पर डिस्पोजेबल छुरी से एक कट लगाया, जिस से शरीर से खून निकलने लगा. फिर उस ने उस निकलते खून को पीना शुरू कर दिया. इस तथाकथित ड्रैकुला ने ब्राउनिंग का थोड़ा सा खून पीने के बाद, खून पीना बंद कर दिया. उस ने उन के शरीर को फिर एल्कोहल से साफ किया और कटी हुई जगह पर पट्टी लगा दी.

क्योंकि पीने वाले के मुताबिक ब्राउनिंग के खून में मैटेलिक तत्वों की मात्रा कम थी, जिस से वह उस के टेस्ट के मुताबिक नहीं था. कह सकते हैं कि ड्रैकुला यूं ही किसी का खून नहीं पी लेते, वह खून उन के टेस्ट के अनुरूप भी होना चाहिए.’’

वास्तव में हर किसी के खून का स्वाद उस के खानपान, शरीर में पानी की मात्रा और ब्लडग्रुप से तय होता है. दरअसल, ब्राउनिंग, लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के रिसर्चर हैं. वह न्यूआरलींस रियल वैंपायर समुदाय पर हो रहे शोध से जुड़े हैं. अमेरिका में ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें खून पीने की लत है. पहले ब्राउनिंग मानते थे कि ब्लड फीडिंग महज एक तरह की तांत्रिक गतिविधि या कोई धार्मिक कर्मकांड है. लेकिन तब तक वह उन लोगों से नहीं मिले थे, जो सीधे किसी इंसान के शरीर से उस का खून पीते हैं. ऐसे में जब उन्होंने ब्लड फीडिंग के लिए खुद को डोनर के तौर पर पेश किया तो उन का नजरिया ही बदल गया.

यहां यह बता देना भी जरूरी है कि खून पीने वाले लोगों में से ज्यादातर का अलौकिक शक्तियों पर कोई भरोसा नहीं होता. कहने का मतलब यह कि ये लोग अपनी खुद की इच्छा के लिए खून पीते हैं. फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे लोग एक खास तरह की मन:स्थिति के शिकार होते हैं. क्योंकि नियमित रूप से खून पीने वाले लोगों को अगर कभी खून नहीं मिलता या मिलने में देर हो रही होती है तो इन की हालत बड़ी विचित्र हो जाती है. ये थकान, सिरदर्द और असहनीय पेट दर्द का शिकार होने लगते हैं. दरअसल खून पीते वक्त इन के दिलोदिमाग में पूरी ताकत से यह बात बैठी होती है कि उन्हें केवल इंसानों का खून पीने से ही राहत मिल सकती है.

दुनिया में मौजूद जीवित ड्रैकुलाओं का किस्से कहानियों के ड्रैकुलाओं से कोई संबंध नहीं है. वर्तमान में पूरी दुनिया में इंसानी रक्त पीने वाले जो लोग मौजूद हैं, वे वितृष्णाओं और विकृतियों की देन हैं. ऐसे लोगों ने आधुनिक वैज्ञानिक विकास को भी बहुत होशियारी से अपने पक्ष में इस्तेमाल किया है. मसलन इंटरनेट से पहले के जमाने में ये लोग जहां अलगथलग पड़े हुए थे, वहीं आज इन लोगों के समूहों ने अपनी वेबसाइटें बना रखी हैं. वेब पन्ने बना रखे हैं. इन लोगों का नेटवर्क भी खासा विकसित है. इंसानी खून पीने के अपने अलगअलग तरीकों और अलगअलग तरह की आदतों की वजह से इन के कई रूप हैं.

मसलन खून पीने वाली नर्सें, बार स्टाफ, सेके्रटरी या फिर ऐसे ही कई अन्य पेशेवर लोग सामान्य नौकरियां करते हैं. दूसरी तरफ सेठ ड्रैकुला जो बहुत रईस हैं, जो अपने लिए हर दिन पसंदीदा किस्म के खून का इंतजाम करते हैं. खून पीने वाले पिशाचों या ड्रैकुलाओं में जहां कुछ शर्मीले स्वभाव के होते हैं, वहीं कई धार्मिक किस्म के होते हैं, जिन का संबंध अलगअलग धर्मों से होता है. ऐसे लोग अपना जीवन पूरे धार्मिक भाव से ईमानदारी के साथ गुजारते हैं. कई लोग हर रोज उसी तरह शाम को खून पीते हैं, जैसे कई दूसरे लोग शाम को शराब पीते हैं.

कइयों के बारे में किसी को पता भी नहीं चलता कि वे किसी ब्लड बैंक से चुपचाप ब्लड खरीदते हैं और आराम से घर बैठ कर पीते हैं. कई लोग खून को चाय में मिला कर पीते हैं तो कई इसे विभिन्न किस्म की जड़ीबूटियों के साथ पीते हैं. कई लोग ऐसे भी हैं, जो इंसान के साथसाथ कभीकभार जानवर का खून भी पी लेते हैं. खासकर तब जब इंसान का खून उपलब्ध नहीं हो पाता. कई ऐसे लोग भी होते हैं, जो बहुत परोपकारी होते हैं. खून पीने वाले आज के ड्रैकुला माइथोलौजी की कथाओं की तरह न तो कब्रिस्तान जाते हैं और न वहां रहते हैं, बल्कि नाइट क्लब जाते हैं.

कई नाइट क्लबों में भी चुपचाप खून परोसा जाता है. ब्राउनिंग जैसे शोधकर्ताओं  ने पाया कि ऐसे कई ‘वैंपायर’ भी होते हैं, जिन के लिए खून पीना एक मनोवैज्ञानिक जरूरत बन जाती है. अपने शोध के दौरान ब्राउनिंग की एक ऐसे किशोर से मुलाकात हुई, जो मुश्किल से 13-14 साल का था. उस ने ब्राउनिंग को बताया कि वह हमेशा कमजोर महसूस करता था, दोस्तों के साथ खेलते हुए थक जाता था. एक दिन उस का अपने किसी दोस्त से झगड़ा हो गया.

इस झगड़े में उस के दोस्त को चोट लग गई, खून बहने लगा और उसी दौरान वह खून उस के मुंह, दांतों में लग गया, जिस से उसे लगा कि अचानक उस के अंदर ताकत आ गई है. खून के स्वाद ने खून की भूख बढ़ा दी. अब वह नियमित खून पीता है. किसी शराबी की तरह जब तक वह खून नहीं पीता, उस के शरीर में वह स्फूर्ति नहीं आती. कुल मिला कर यह विकृति एक मनोवैज्ञानिक नशा ही है. मिलिए ब्लट से. 28 साल की ब्लट कैटशेन ड्रैकुलाओं को अपना खून पिलाती हैं. मगर यह ऐसा नहीं कहतीं. यह खुद को एक ब्लड डोनर बताती हैं. ब्लट अमेरिका के मैक्सिको प्रांत के लूसियाना शहर में रहती हैं. वह हमारे आप के जैसी ही बिलकुल सामान्य महिला हैं. भिखारियों के प्रति दयालु, बच्चों से प्यार करने वाली सभ्य महिला, अपने से बड़ों की इज्जत करने वाली.

कहने का मतलब बिलकुल सामान्य और खुशमिजाज. लेकिन वह टेक्सास में रहने वाले अपने एक वैंपायर दोस्त के घर भी जाती रहती हैं, ताकि उसे अपना खून पिला सकें. माइकल वैकमील नाम का उन का यह दोस्त नियमित रूप से उन का खून पीता है. यह जानने की इच्छा स्वाभाविक है कि आखिर अलगअलग वैंपायरों को ब्लट अपना खून कैसे पिलाती होंगी? पीठ से निकाल कर या वह कहती होंगी कि सीधे चीरा लगा कर वह खून पी लें. हकीकत यह है कि ब्लट दोनों ही तरह से खून पिलाती हैं.

कई बार खून पीने के लिए वैंपायर उन की पीठ पर कट लगाते हैं. इस के बाद सीधे मुंह लगा कर खून पी लेते हैं तो कई बार पहले सक्शन कप की मदद से खून शरीर से निकाला जाता है, फिर आसानी से बातचीत करते हुए पीया जाता है. खून किस तरीके से पीया जाना है, यह दोनों की रजामंदी से तय होता है. Suspense Story Hindi

लेखक – निनाद गौतम