Love Crime Story: प्रेमिका की वादाखिलाफी पर प्रसाद ने सोचा कि वह प्रेमिका को मार कर खुद को भी खत्म कर लेगा. उस ने प्रेमिका को तो मार दिया लेकिन जब अपनी बारी आई तो…

उस दिन शाम के यही कोई साढ़े 7 बज रहे थे. अंधेरा धीरेधीरे शहर को आगोश में लेने लगा था. उसी समय दीपक सोसाइटी परिसर में स्थित पार्क में बैंच पर बैठे एक युवक और युवती किसी बात पर बहस करने लगे. यह सोसाइटी मुंबई शहर के उपनगर लालबाग लोवर परेल में स्थित है. सोसाइटी में आनेजाने वालों ने उन की बातों पर ध्यान नहीं दिया. लेकिन जातेजाते वे उन पर एक नजर जरूर डाल लेते थे. उन्हें लगता था, किसी बात पर बहस कर रहे होंगे. लेकिन जब बहस के दौरान युवक ने चाकू से युवती पर हमला कर दिया और युवती चीख कर बैंच से नीचे गिर पड़ी, तब लोगों का ध्यान उन की ओर गया. यह बात 28 जून, 2015 की है.

फिल्मी अंदाज में घटी इस घटना से लोग हैरान तो रह ही गए, दहशत में भी आ गए. जब तक लोग उस युवती के पास पहुंचते, तब तक वह युवक एक्टिवा स्कूटर से भाग निकला था. थोड़ी ही देर में सोसायटी के तमाम लोग वहां आ गए. उसी बीच किसी ने फोन द्वारा इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. यह क्षेत्र थाना काला चौकी के अंतर्गत आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा इस की सूचना थाना काला चौकी पुलिस को दे दी गई. खबर मिलते ही सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे, असिस्टैंट इंसपेक्टर सखाराम वनकर और सबइंसपेक्टर योगेश काले के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे थे.

पुलिस को पार्क में एक युवती पड़ी मिली, जिस के पेट और गले पर हुए घावों से काफी मात्रा में खून बह गया था. पुलिस को लग रहा था कि लड़की मर चुकी है. फिर औपचारिकता पूरी करने के लिए वह उसे नजदीक के केईएम अस्पताल ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे ने घटना की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी और खुद मामले की तफ्तीश करने लगे. दूसरी ओर हत्या की सूचना मिलते ही मुंबई जोन के एडिशनल कमिश्नर अशोक दुधे और असिस्टैंट पुलिस कमिश्नर विजय वागवे भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, लेकिन वहां ऐसा कोई सबूत नहीं मिला, जिस से हत्यारे तक पहुंचने में मदद मिलती. पूछताछ में लोगों ने बताया था कि मृतका और हत्यारे के बीच किसी बात को ले कर बहस हो रही थी. युवक कौन था, यह कोई नहीं बता सका था. मृतक युवती की भी शिनाख्त नहीं हो पाई थी. सीनियर इंसपेक्टर सूर्यकांत तरडे को दिशानिर्देश देने के बाद आला अधिकारी वहां से चले गए. उन के जाने के बाद इंसपेक्टर सूर्यकांत ने थाने के तेजतर्रार पुलिस अधिकारियों के साथ मीटिंग की और इस मामले की जांच असिस्टैंट इंसपेक्टर सखाराम वनकर को सौंप दी.

इंसपेक्टर सखाराम वनकर अपनी पुलिस टीम के साथ मामले की जांच की शुरुआत करते, इस के पहले ही एक युवक ने उन के पास आ कर अपना नाम प्रसाद उर्फ दिगंबर विनायक सावंत बताते हुए कहा कि दीपक सोसाइटी के पार्क में जिस युवती की हत्या हुई थी, उस का नाम एकता अंकुश तलवडकर था और उस की हत्या उस ने ही की थी. उस की बातें सुन कर इंसपेक्टर सखाराम ने प्रसाद को गौर से देखा और हिरासत में ले लिया. उस समय वह शराब के नशे में था. जिस हत्यारे का सुराग पाने के लिए वह परेशान थे, वह इतनी आसानी से मिल जाएगा, ऐसा उन्होंने सोचा भी नहीं था.

प्रसाद से पूछताछ के बाद पुलिस को उस का और मृतका एकता अंकुश का पता मिल गया था. फोन कर के पुलिस ने दोनों के घर वालों को थाने बुला लिया. प्रसाद की करतूत पर जहां उस के घर वाले हैरान थे, वहीं एकता के पिता और भाई अस्पताल में बिलखबिलख कर रो रहे थे. पुलिस उन्हें दिलासा दे रही थी. थाने में दोनों परिवारों के लोग और नातेरिश्तेदार एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप लगा रहे थे. एकता के परिवार वालों का कहना था कि प्रसाद सावंत उन की बेटी से एकतरफा प्रेम करता था और उस से शादी करना चाहता था. उस के मना करने के बाद उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

जबकि प्रसाद के घर वालों का कहना था कि एकता कई सालों से प्रसाद से प्यार करती थी. उस ने प्रसाद को तरहतरह के सपने दिखाए थे. अचानक उस ने उसे धोखा दे दिया. जिस से हताश हो कर उस ने यह कदम उठाया था. यह सच था कि प्रसाद ने एकता की हत्या की थी. उस ने हत्या क्यों की? यह प्रसाद से पूछताछ के बाद ही पता चल सकता था. चूंकि प्रसाद उस समय शराब के नशे में था, इसलिए पुलिस उस के नशा उतरने का इंतजार करने लगी. 1-2 घंटे बाद प्रसाद का नशा उतर गया तो पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने एकता की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

26 वर्षीय प्रसाद उर्फ दिगंबर विनायक सावंत महाराष्ट्र के जनपद रत्नागिरी की तालुका राजापुर तलगांव का रहने वाला था. उस के पिता विनायक सावंत एक किसान थे. उन के पास खेती की अच्छीखासी जमीन थी. परिवार में उस के मातापिता के अलावा एक बड़ा भाई था. प्रसाद सावंत काफी तेजतर्रार और महत्त्वाकांक्षी युवक था. उस का ध्यान खेती में कम, पढ़ाईलिखाई की तरफ ज्यादा था. उसे बचपन से चित्रकारी का शौक था. विनायक सावंत उस के इस शौक को उस के सपनों की उड़ान तक ले जाना चाहते थे. लेकिन उन के सामने परेशानी यह थी कि वह जिस गांव और तालुका में रहते थे, वहां कोई अच्छा स्कूल और कालेज नहीं था.

इस के लिए उन्होंने भांडूप में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार से बात की. उस ने प्रसाद सावंत का दाखिला भांडूप के एक अच्छे स्कूल में करा दिया. कहते हैं कि पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं. प्रसाद सावंत शुरू से ही होनहार था. वह हर कक्षा में अच्छे नंबरों से पास होता आया था. चित्रकारी और फोटोग्राफी के शौक को उस ने अपनी पढ़ाई के दौरान भी जारी रखा. पढ़ाई पूरी करने के बाद उस ने फोटोग्राफी और वीडियो का कोर्स किया. इस के बाद वह अपने रिश्तेदार का घर छोड़ कर परेल के पेरू कंपाउंड स्थित एक चाल में किराए पर रहने लगा. बाद में एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में मैनेजर के पद पर उस की नौकरी लग गई. उस कंपनी में 6 लड़के काम करते थे, जिन में सब से अच्छा रिस्पौंस प्रसाद सावंत को मिलता था.

कंपनी उस के कामकाज से बहुत खुश थी. अच्छी पगार के अलावा कंपनी की तरफ से उसे एक गाड़ी भी मिली थी. नौकरी लगने के बाद प्रसाद के रहनसहन में फर्क आ गया था. उस का रहनसहन देख कर उस के लिए बढि़या रिश्ते आने लगे थे. लेकिन वह उन रिश्तों को ठुकरा देता था, क्योंकि उस के दिल में तो सिर्फ एकता तलवडकर बसी हुई थी. वह उसी के साथ जिंदगी बिताने का सपना संजोए था. 22 वर्षीया एकता तलवडकर देखने में जितनी सुंदर और खूबसूरत थी, उतनी ही चंचल भी थी. वह परेल डिलाइट रोड पर स्थित म्हाण कालोनी में रहने वाले अंकुश तलवडकर की बेटी थी. धार्मिक प्रवृत्ति के अंकुश तलवडकर के परिवार में बेटी एकता के अलावा एक बेटा था.

वह बेटे का विवाह कर चुके थे. उन की पत्नी का देहांत उस समय हो गया था, जब एकता छोटी थी. बिन मां की बेटी एकता की हर छोटीबड़ी चीजों का पिता बड़ा खयाल रखते थे. अपनी पढ़ाई खत्म करने के बाद एकता भी एक ऐडवेंचर टुअर्स ऐंड ट्रैवल्स कंपनी में नौकरी करने लगी थी. जिस की वजह से उसे अकसर बाहर रहना पड़ता था. प्रसाद और एकता की लव स्टोरी आज से लगभग 11 साल पहले सन 2004 में उस समय शुरू हुई थी, जिस समय दोनों एक साथ भांडूप के स्कूल में पढ़ते थे. उस समय एकता का परिवार भांडूप में उसी जगह रहता था, जहां प्रसाद सावंत के रिश्तेदार रहते थे.

प्रसाद उस से एक क्लास सीनियर था. जिस से वह एकता की पढ़ाई में भी सहयोग कर देता था. वह एकता के घर भी आयाजाया करता था. जब तक दोनों कम उम्र के थे, उन का रिश्ता दोस्ती का था. लेकिन जैसेजैसे उन की उम्र बढ़ी, वैसेवैसे उन की सोच में भी बदलाव आने लगा. स्कूल और कालेज की पढ़ाई दोनों ने साथसाथ पूरी की थी. इस के बाद नौकरी कर के दोनों ही अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे. अलगअलग नौकरी करने की वजह से उन का रोजरोज मिलना नहीं हो पाता था, लेकिन फोन पर बातें कर के वह 1-2 दिन में मिलने का कार्यक्रम जरूर बना लेते थे.

दोनों एकदूसरे के दिलों में उतर चुके थे. बात यहां तक पहुंच गई थी कि दोनों एकदूसरे को अपने जीवनसाथी के रूप में देखने लगे थे. जब भी उन की मुलाकात होती, वे अपने भविष्य के विषय में तानेबाने बुनते. दोनों ने शादी कर के साथ रहने का फैसला जरूर कर लिया था, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. उन के प्यार को जमाने की नजर लग गई. उन के सारे सपने टूट कर उस समय बिखर गए, जिस समय उन के प्यार पर उन के परिवार वालों ने ऐतराज जताया. जैसेजैसे समय आगे बढ़ रहा था, उन का प्यार परिपक्व होता जा रहा था, लेकिन जब एकता के इस प्यार की जानकारी उस के पिता अंकुश तलवडकर को हुई तो उन्हें यह अच्छा नहीं लगा.

मामला काफी नाजुक था, इसलिए उन्होंने बेटी को अपने पास बुला कर प्रेम से प्रसाद के बारे में पूछा. एकता ने भी बिना किसी संकोच के पिता को अपने मन की बात कह दी, ‘‘पापा, प्रसाद से मैं प्यार करती हूं और उस से शादी करना चाहती हूं.’’

‘‘यह संभव नहीं है बेटी.’’ अंकुश तलवडकर ने एकता को प्यार से समझाते हुए कहा.

‘‘क्यों पापा, प्रसाद में बुराई क्या है? परिवार अच्छाखासा संपन्न है, उस की अच्छी नौकरी है और वह मुझ से प्यार भी करता है.’’ एकता बोली.

‘‘तुम्हारी इस बात पर मुझे कोई संदेह नहीं है बेटी,’’ अंकुश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘मुझे तुम पर नाज है. मुझे पता है कि तुम समझदार और होशियार हो. तुम जो करोगी, ठीक ही करोगी. लेकिन बेटी, समाज में मेरी भी कुछ इज्जत और मानसम्मान है. क्या तुम चाहती हो कि तुम्हारी वजह से समाज में मेरी गरदन झुक जाए. ऐसी बेइज्जती से तो मेरा मर जाना ही ठीक होगा.

‘‘मैं ने तुम्हारी मां को मरते समय वचन दिया था कि तुम्हारा और तुम्हारे भविष्य का खयाल रखूंगा. मैं तुम्हारी शादी अपनी बिरादरी के किसी अच्छे लड़के से करना चाहता हूं. मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. हम जो भी कदम उठाएंगे, तुम्हारी भलाई के लिए उठाएंगे. अब तुम सोचो कि तुम्हें क्या करना है?’’

अंकुश ने तो अपने मन की बात बेटी से कही ही, भाई ने भी उसे बहुत समझाया. पिता और भाई की बातों से वह अंदर तक हिल गई. इस के बाद उस में अपने पिता और भाई के फैसले का विरोध करने की शक्ति नहीं रही. एक तरह से एकता ने अपने पिता को मूक सहमति दे दी कि वह उन की बातों से सहमत है. एकता की मनोदशा देख कर उन्होंने दौड़धूप कर अपने एक रिश्तेदार के बेटे से उस की शादी तय कर दी. एकता ने अपने दिल को यह सोच कर समझा लिया कि जो सपने सच न हो और वह परिवार के मानसम्मान और मर्यादा पर टिके हों, उन्हें देखने से क्या फायदा?

यही सोच कर वह प्रसाद को भूलने की कोशिश करने लगी. अब उस ने प्रसाद से मिलनाजुलना कम कर दिया. लेकिन वह प्रसाद को भुला नहीं पा रही थी. वह जब भी प्रसाद से मिलती, उस का चेहरा बुझाबुझा और मुरझाया हुआ सा रहता. वह उस से बात भी बहुत कम और नपेतुले शब्दों में करती थी. प्रसाद प्रेमिका के इस बदले व्यवहार को समझ नहीं पा रहा था. उस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि अचानक एकता को क्या हो गया? पूछने पर भी वह कुछ नहीं बताती थी. आखिर एक दिन प्रसाद ने उस के मन की बात जान ही ली.

तब एकता ने प्रसाद के कंधे पर अपना सिर रख कर सिसकते कहा, ‘‘प्रसाद, हमें एकदूसरे को भूल जाना चाहिए, क्योंकि मेरे घर वालों को हमारा मिलनाजुलना पसंद नहीं है. उन्होंने मेरा रिश्ता कहीं और तय कर दिया है.’’

‘‘क्या?’’ प्रसाद को उस की इस बात से जोरदार झटका लगा. उस ने कहा, ‘‘यह तुम क्या कह रही हो? तुम ने कुछ नहीं कहा.’’

‘‘मैं क्या कहती, उन के सामने मैं बेबस थी. मैं ने उन्हें अपने प्यार के बारे में बताया तो, लेकिन उन की बातों का विरोध नहीं कर पाई,’’ एकता उदास हो कर बोली, ‘‘प्रसाद, यहां अपनी नहीं, समाज की चलती है, मर्यादाओं की चलती है. यहां प्यार और मोहब्बत की कोई कीमत नहीं है. हम दोनों से जो गलती हुई है, उसे सुधार लेना चाहिए. हम लोग एक अच्छे परिवार से हैं, इसलिए हमारे घर वालों को हम से काफी उम्मीदें हैं. हमें उन की उम्मीदों पर खरा उतरना चाहिए. अब तक हमारे बीच जो कुछ हुआ, उसे भूल कर हमें घर वालों की इच्छा के अनुसार चलना चाहिए.’’

‘‘ऐसा कभी नहीं होगा एकता. मैं तुम्हें कभी नहीं भूल सकता. मैं चाचाजी से बात करूंगा. उन से विनती करूंगा, हाथ जोड़ूंगा, पैर पकड़ूंगा और तुम्हारा हाथ मांगूंगा.’’ प्रसाद ने तड़प कर कहा. वह एकता के पिता को चाचा कहता था.

एकता ने प्रसाद को लाख समझाया, इस के बावजूद प्रसाद एकता के घर जा कर उस के पिता और भाई से मिला. एकता के पिता ने ऐसा करने से मना कर दिया तो उस ने बात करने के लिए अपने मांबाप को एकता के घर भेजा. लेकिन एकता के पिता उन की भी कोई बात सुनने को तैयार नहीं हुए. इस बात से प्रसाद के घर वाले इतने खफा हुए कि उन्होंने प्रसाद को डांटफटकार कर घर से बाहर निकाल दिया. शादी की बात असंभव होने पर प्रसाद के दिल को गहरा धक्का लगा. वह एकता के बिना अपनेआप को अधूरा समझने लगा. यह बात इस घटना के कुछ दिनों पहले की थी. एकता के परिवार वालों के व्यवहार से आहत प्रसाद ने फैसला कर लिया कि वह एकता के साथ जी नहीं सकता तो उस के साथ मर तो सकता हूं.

उस ने अपने मन में यह बात तय कर ली कि वह एकता को अपने साथ ले कर इस दुनिया से हमेशा के लिए चला जाएगा. यह सोच कर वह मुंबई चोर बजार से एक तेजधार वाला चाकू खरीद लाया. इस के बाद वह एकता की तलाश में लग गया. काफी कोशिश के बाद भी वह उस से नहीं मिल पा रहा था. एक दिन उसे पता चला कि वह अपनी कंपनी के मालिक आगंस्टर मांजरा रोहिटन के साथ पिकनिक पर पुणे के हिजवाड़ी गई है और 2-3 दिनों बाद लौटेगी. घटना वाले दिन प्रसाद सावंत का मन काफी उदास था. वह कई बार एकता के औफिस के चक्कर लगा चुका था. लगभग 3 बजे एकता अपने साथ स्कूल की बच्चियों को ले कर अपने बौस के साथ पुणे से बाहर निकली.

नवी मुंबई, चेंबूर में टूर वाली बच्चियों को ड्रौप करते हुए लगभग 6 बजे वह अपने बौस के साथ अपने औफिस पहुंची तो वहां उस ने प्रसाद को अपनी एक्टिवा स्कूटर पर बैठे देखा. एकता को देख कर प्रसाद उस के पास पहुंचा और यह कह कर के उसे अपनी स्कूटर पर बैठा लिया कि उसे उस से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. एकता उस के पीछे स्कूटर पर बैठ गई. उसे वह लालबाग लोवर परेल इलाके में स्थित दीपक सोसाइटी के पार्क में ले गया. पार्क में कुछ समय तक वह उस से इधरउधर की बातें करता रहा.

उस के बाद वह अपने असली मुद्दे पर आते हुए बोला, ‘‘एकता, अब अपने वादे और कसमों को निभाने का समय आ गया है. हमें समाज और परिवार के सारे बंधनों को तोड़ कर एक हो जाना चाहिए. क्योंकि जीतेजी तो हम दोनों कभी एक नहीं हो पाएंगे, लेकिन साथसाथ मर तो सकते हैं.’’

यह कह कर प्रसाद ने अपनी जेब में रखा चाकू निकाल लिया. प्रसाद के हाथ में खुला चाकू देख कर एकता घबरा गई. वह प्रसाद को समझाते हुए बोली, ‘‘प्रसाद पागल मत बनो. आत्महत्या करना कोई समाधान नहीं है. समय आने पर हम दोनों मिल कर कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे.’’

लेकिन प्रसाद ने एकता की बातों पर ध्यान नहीं दिया. उस पर तो प्यार का जुनून सवार था. उस ने वह चाकू एकता के पेट में घुसेड़ दिया. इस के बाद दूसरा वार उस के गले पर किया. चाकू लगते ही एकता चीखी. उस ने एकता पर तो वार कर दिए, लेकिन जब अपनी बारी आई तो वह डर गया और खुद पर चाकू का वार नहीं कर सका. डर की वजह से वह अपनी एक्टिवा से भाग गया. वहां से वह कुछ ही दूर गया था कि उसे अपने अपराध का अहसास हुआ और उस की आत्मा एकता के लिए तड़प उठी. वह एक बार में गया और वहां उस ने खूब शराब पी. नशा चढ़ने पर वह पुलिस थाने गया और अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

प्रसाद उर्फ दिगंमर विनायक सावंत से विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर उसे बाकायदा गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद उसे न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उसे आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक प्रसाद सांवत जेल में बंद था और अपने किए गुनाहों के लिए पश्चाताप कर रहा था. Love Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...