Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

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