Moradabad Crime News: मां पर भारी, बेटी का प्यार

Moradabad Crime News: शिवानी को यह बात पसंद नहीं थी कि उस की मां कुसुम उस के प्यार पर अंकुश लगाए. कुसुम ने बेटी पर जब सख्ती की तो शिवानी ने भी ऐसा कदम उठाया कि वह कोख का कलंक बन बैठी मुरादाबाद महानगर के मोहल्ला बंगला गांव की रहने वाली कुसुम ने बृहस्पतिवार को व्रत रखा था. जिस दिन उस का व्रत होता था उस दिन वह मोहल्ले के मंदिर में जरूर जाती थी. लिहाजा उस दिन भी वह मंदिर गई. मंदिर से लौटतेलौटते रात के 8 बजे गए.

उसी समय मोहल्ले की बिजली गुल हो गई. वह अंधेरे में अपने दरवाजे पर पहुंची. इस से पहले कि वह दरवाजा खुलवा कर घर में जाती, उसी समय किसी ने उस के पीछे से सिर पर किसी चीज से वार किया. वार इतनी जोर से किया गया था कि उस का सिर फट गया और वह चीख कर नीचे गिर गई. यह बात 7 मई, 2015 की है. चीखने की आवाज सुन कर उस की बेटी शिवानी दरवाजा खोल कर बाहर आई. उस ने दरवाजे के बाहर की सीढि़यों पर मां को पड़ी देखा तो घबरा गई.

वह मां को उठाने लगी, तभी उस के हाथ खून से सन गए. इस के बाद तो उस की चीख निकल गई. वह जोरजोर से रोने लगी. रोने की आवाज सुन कर उस की भाभी रीना और आसपड़ोस के लोग आ गए. लहूलुहान हालत में कुसुम को देख कर लोग हैरान रह गए. लोग तुरंत ही उसे नजदीक में ही स्थित डी.एल. अस्पताल ले गए. वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. कुसुम राजकुमार की पत्नी थी. राजकुमार और उस के दोनों बेटे सचिन व अमन शहर के ही चौमुखापुल पर स्थित गारमेंट की अलगअलग दुकानों में नौकरी करते थे. जैसे ही उन्हें घटना की जानकारी मिली, वे घर पहुंच गए.

उसी समय किसी ने फोन द्वारा इस वारदात की खबर पुलिस को भी दे दी थी. पुलिस चौकी घटनास्थल से थोड़ी ही दूर पर थी, इसलिए पुलिस चौकी पर मौजूद पुलिसकर्मी तुरंत तारों वाली गली में उस जगह पर पहुंच गए, जहां कुसुम पर हमला किया गया था. पुलिस वालों को जब पता चला कि घायल महिला कुसुम को लोग डी.एल. अस्पताल ले गए हैं तो पुलिस वाले भी वहीं पहुंच गए. वहां उन्हें जानकारी मिली कि कुसुम मर चुकी है तो उन्होंने इस की सूचना थाना नागफनी को दे दी.

हत्या की बात सुनते ही थानाप्रभारी अस्पताल पहुंच गए. तब तक मोहल्ले के सैकड़ों लोग डी.एल. अस्पताल के सामने जमा हो चुके थे. घटना को ले कर उन के मन में आक्रोश था. खबर मिलते ही एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, महेश सिंह राणा भी भारी पुलिस बल के साथ वहां पहुंच गए. अस्पताल में ही मृतका कुसुम की बेटी शिवानी चीखचीख कर आरोप लगा रही थी कि उस की मां की हत्या पड़ोस में रहने वाले अनिल ने की है. पुलिस ने सब से पहले घटनास्थल की जरूरी काररवाई पूरी कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस के बाद शिवानी से बात की तो उस ने बताया कि अनिल ने ही लोहे की रौड मार कर मां की हत्या की है. हाथ में रौड थामे भागते हुए अनिल को उस ने अपनी आंखों से देखा था. पुलिस ने जब उस से इस की वजह पूछी तो उस ने बताया कि अनिल काफी दिनों से उस की मां के पीछे पड़ा था. मां ने उस के खिलाफ कई बार थाने में लिखित शिकायत भी की थी, लेकिन पुलिस ने उन की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया था. शिवानी ही नहीं, उस के घर के सभी लोग हत्या का आरोप अनिल पर ही लगा रहे थे. मृतका के बेटे सचिन ने अनिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए एक तहरीर भी दी.

उस की तहरीर के आधार पर अनिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. एसएसपी ने हत्या के इस केस को खोलने के लिए सीओ महेश सिंह राणा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी. अनिल चूंकि मृतका के पड़ोस की नेता वाली गली में रहता था, इसलिए पुलिस टीम उस के घर पहुंच गई. लेकिन वह घर पर नहीं मिला. घर वालों ने बताया कि वह दिल्ली गया हुआ है. घर पर अनिल के न मिलने पर पुलिस को भी उस पर शक हुआ कि वह वारदात कर के कहीं भाग गया है. पुलिस ने उस के घर वालों से अनिल का दिल्ली का ठिकाना मालूम किया तो उन्होंने अनभिज्ञता जता दी. पुलिस ने उस के घर वालों को हिदायत दी कि वे किसी भी तरह अनिल के पास खबर कर दें कि वह जल्द से जल्द थाने में आ कर मिले.

अनिल का मोबाइल नंबर ले कर सीओ अपने कार्यालय लौट आए. उस के फोन नंबर को उन्होंने सर्विलांस पर लगवाया तो उस की मौजूदा लोकेशन दिल्ली की ही आ रही थी. सीओ महेश राणा ने अनिल से फोन पर बात की और उसे विश्वास में ले कर कहा कि तुम से बहुत जरूरी बात करनी है. इसलिए जल्द से जल्द मुरादाबाद आ जाओ. अगर नहीं आए तो समझ लो कि तुम्हारे घर वाले इस का खमियाजा भुगतेंगे. अनिल समझ नहीं पा रहा था कि सीओ साहब ने उस से इस तरह क्यों बात की? ऐसी क्या बात हो गई, जो वह उसे थाने में बुला रहे हैं. इस के तुरंत बाद अनिल ने अपने घर वालों को फोन किया तो उसे पता चला कि किसी ने तारों वाली गली में कुसुम की हत्या कर दी है. अब उस की बेटी शिवानी कह रही है कि हत्या अनिल ने की है.

अनिल को जब पता चला कि कुसुम की हत्या में उस का नाम आ रहा है तो वह परेशान हो गया. अब वह समझ गया कि यदि वह मुरादाबाद नहीं पहुंचा तो पुलिस उस के घर वालों को जरूर परेशान करेगी. इसलिए वह अगले दिन यानी 8 मई को ही बस से मुरादाबाद के लिए चल पड़ा. अनिल जानता था कि कुसुम की हत्या उस ने नहीं की है, इसलिए उसे कोई डर नहीं है. मुरादाबाद पहुंचने के बाद वह अपने घर जाने के बजाय सीधे थाना नागफनी पहुंच गया. थानाप्रभारी ने सीओ महेश राणा को अनिल के थाने में पहुंचने की जानकारी दी तो वह भी थाने पहुंच गए. उधर मोहल्ले के लोगों ने पोस्टमार्टम के बाद कुसुम की लाश को बंगला गांव चौराहे पर रख कर जाम लगा दिया.

लोगों का कहना था कि जब रिपोर्ट अनिल के खिलाफ लिखी जा चुकी है तो पुलिस उसे गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है. अनिल पुलिस का मुखबिर भी था, इसलिए लोगों को शक था कि पुलिस उसे बचा रही है. शहर के व्यस्त चौराहे पर जाम लगने से उधर से गुजरने वाले वाहनों की गति थम गई. कचहरी तक वाहनों की कतार लग गई. पुलिस प्रशासन तुरंत हरकत में आ गया. पुलिस अधिकारी आंदोलनकारियों को समझाने में लग गए, लेकिन लोग उन की बात सुनने को तैयार नहीं थे. मृतका की बेटी शिवानी अनिल के गिरफ्तार न करने पर पुलिस पर बरस रही थी. जब एसएसपी लव कुमार ने लोगों को अनिल को हिरासत में ले लिए जाने की जानकारी दी, तब लोगों ने जाम हटाया.

अनिल पुलिस के कब्जे में था, इसलिए पुलिस को उम्मीद थी कि अब केस खुल जाएगा. पुलिस ने अनिल से कुसुम की हत्या की बावत पूछताछ की तो उस ने बताया कि कुसुम की हत्या में उस का कोई हाथ नहीं है. जिस समय उस की हत्या हुई थी, उस समय वह दिल्ली में था. मगर पुलिस को उस की बातों पर विश्वास नहीं हुआ. लिहाजा उस से सख्ती से पूछताछ की गई. वह बारबार एक ही बात दोहराता रहा. उस ने कहा कि जिस समय कुसुम की हत्या होने की बात कही जा रही है, उस समय वह दिल्ली के शाहदरा इलाके में मैट्रो स्टेशन के पास स्थित दुकान से शराब खरीदने गया था.

लेकिन वह दुकान बंद मिली तो थोड़ी दूर स्थित एक होटल में खाना खाने चला गया. पुष्टि के लिए पुलिस टीम अनिल को दिल्ली ले गई. साथ में वह मृतका के पति राजकुमार और बेटे सचिन को भी साथ ले गई. जिस दुकान से अनिल शराब खरीदने गया था, उस दुकान के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की जांच की गई. उस फुटेज में अनिल दिख गया. इस के बाद पुलिस उस होटल पर भी गई, जहां अनिल ने खाना खाया था.उस होटल के सीसीटीवी फुटेज से पता चला कि उस दिन शाम 7:55 से 8:05 बजे के बीच अनिल की मौजूदगी उस होटल में थी. इस से एक बात साफ हो गई कि कुसुम की हत्या के समय अनिल की मौजूदगी मुरादाबाद में नहीं थी यानी कुसुम का हत्यारा कोई और ही था.

पुलिस टीम दिल्ली से मुरादाबाद लौट आई. मुरादाबाद पहुंचने पर अनिल ने पुलिस को एक महत्त्वपूर्ण जानकारी दी. उस ने बताया कि कुसुम की बेटी शिवानी और पड़ोस में ही रहने वाले विक्की के बीच कई सालों से चक्कर चल रहा है. यह जानकारी मिलते ही सीओ महेश राणा का माथा ठनका कि कहीं यह मामला लव ऐंगल का तो नहीं है. अनिल के बेकसूर साबित होने पर उन्होंने उसे घर भेज दिया और उसी दिन शिवानी व पड़ोसी युवक विक्की के फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स देख कर पुलिस हैरान रह गई.

उस से पता चला कि उन दोनों की एकदूसरे से अकसर बातें होती रहती थीं और काफी देर तक. घटना से कुछ देर पहले और बाद में भी दोनों की बातें हुई थीं. इस से पुलिस को शिवानी और विक्की पर शक हो गया. पूछताछ के लिए पुलिस दोनों को थाने ले आई. दोनों से कुसुम की हत्या के बारे में पूछा गया तो शिवानी पुलिस पर हावी होते हुए बोली, ‘‘सर, मेरी ही मां की हत्या हुई है और आप मुझ से ही इस तरह पूछ रहे हैं, जैसे मैं ने ही उन्हें मारा है. जिस ने मारा था, उसे तो आप ने छोड़ दिया. आप ही बताइए, भला मैं अपनी मां को क्यों मारूंगी? आप मुझे ज्यादा तंग करेंगे तो एसएसपी साहब से आप की शिकायत कर दूंगी.’’

‘‘देखो, तुम जिस से चाहो शिकायत कर देना, हमें तो केस की जांच करनी है,’’ सीओ महेश सिंह राणा ने कहा. ‘‘अब तुम यह बताओ कि तुम्हारी विक्की से फोन पर इतनी बातें क्यों होती हैं. यह तुम्हारा कोई रिश्तेदार है क्या?’’

‘‘सर, फोन पर क्या रिश्तेदारों से ही बातें हो सकती हैं. हम किसी से भी बात कर सकते हैं. विक्की हमारे मोहल्ले में रहता है. अगर इस से बात कर लेती हूं तो कोई आपत्ति या गुनाह है क्या.’’ शिवानी बोली.

‘‘हमें भला क्यों आपत्ति होगी, लेकिन यह तो बताना ही होगा कि तुम्हारी मां की हत्या से पहले और बाद में उस से क्या बातें हुईं थीं?’’ सीओ ने पूछा तो शिवानी के चेहरे का रंग उड़ गया. वह खुद को संभालते हुए बोली, ‘‘नहीं, मेरी इस से कोई बात नहीं हुई. किसी ने गलत बताया होगा.’’

‘‘गलत नहीं बताया. यह देखो, तुम ने कबकब इस से बात की है, इस में पूरी डिटेल्स है.’’ सीओ ने काल डिटेल्स उस के सामने रखते हुए कहा.

शिवानी अब झूठ नहीं बोल सकती थी, क्योंकि उन्होंने सच्चाई उस के सामने रख दी थी. उस की चुप्पी से सीओ राणा समझ गए कि उन की जांच सही दिशा में जा रही है. इस के बाद उन्होंने उस से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की तो शिवानी ने कबूल कर लिया कि मां की हत्या उस ने ही कराई थी. उस ने इस हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

शिवानी मुरादाबाद के मोहल्ला बंगला गांव के रहने वाले राजकुमार की बेटी थी. शिवानी के अलावा राजकुमार के 2 बेटे थे, सचिन और अमन. राजकुमार शहर में ही चौमुखापुल बाजार में एक कपड़े की दुकान पर नौकरी करता था. उस के दोनों बेटे जब इंटरमीडिएट से ज्यादा नहीं पढ़ सके तो उस ने उन्हें भी उसी मार्केट में गारमेंट्स की अलगअलग दुकानों पर नौकरी पर लगवा दिया. तीनों जनों के कमाने से घर में अच्छी रकम आने लगी तो राजकुमार वे पैसे शराब पीने में उड़ाने शुरू कर दिए. बंगला गांव की ही नेता वाली गली में अनिल रहता था. उस की और राजकुमार की अच्छी दोस्ती थी. दोस्ती के नाते दोनों शाम को अकसर साथ बैठ कर शराब पीते थे.

शराब की महफिल राजकुमार के घर पर ही जमती थी. बताया जाता है कि उसी दौरान अनिल और राजकुमार की बीवी कुसुम के बीच नाजायज ताल्लुकात हो गए. उन के ये संबंध कई सालों तक जारी रहे. उसी दौरान शिवानी को घर पर ट्यूशन पढ़ाने के लिए नरेंद्र उर्फ विक्की नाम का युवक आता था. वह वकालत की पढ़ाई कर चुका था और नौकरी की तैयारी कर रहा था. ट्यूशन पढ़ातेपढ़ाते विक्की शिवानी को प्यार करने लगा. एक दिन उस ने अपने दिल की बात शिवानी को बताई तो वह उस के प्रस्ताव को नहीं ठुकरा सकी. इस तरह दोनों प्यार की पींगें बढ़ाने लगे.

उधर मां अनिल के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी तो इधर शिवानी विक्की के प्यार की नदी में तैरना सीख रही थी. लेकिन इस से पहले कि वह अच्छी तैराक बन पाती, कुसुम को उस की सच्चाई किसी तरह पता चल गई. फिर क्या था, कुसुम ने उस का ट्यूशन बंद करा दिया और उस के लिए लड़का देखने लगी, ताकि जल्दी से उस के हाथ पीले कर के चिंतामुक्त हो सके. शिवानी ने शादी के लिए मना भी किया, लेकिन कुसुम और उस के पति ने एक न सुनी. उन्हें शहर के ही लाइन पार इलाके में एक लड़का मिल गया. फिर नवंबर, 2014 में उस के साथ उस की शादी कर दी गई.

शिवानी बेमन से ससुराल चली जरूर गई, लेकिन उस का ससुराल में मन नहीं लगता था. किसी न किसी बहाने से वह मायके आ जाती. शादी करने के बाद कुसुम को लग रहा था कि शिवानी विक्की को भूल गई होगी, लेकिन यह उस की भूल थी. शिवानी के दिल में विक्की पूरी तरह से बसा था. मायके आने के बाद वह चोरीछिपे उस से मिल लेती थी. उधर अनिल और कुसुम के बीच मतभेद हो गए. दरअसल अनिल ने शिवानी की शादी में कुसुम को कुछ रुपए दिए थे. अब उसे पैसों की जरूरत थी तो उस ने कुसुम से अपने पैसे मांगे, लेकिन वह पैसे देने में आनाकानी कर रही थी. इसी बात को ले कर उन दोनों की आपस में कई बार कहासुनी भी हुई थी, जिस की शिकायत कुसुम ने पुलिस से भी की थी.

उधर शिवानी की विक्की के साथ फिर से नजदीकियां बढ़ती जा रही थीं. वह पति के बजाय विक्की के साथ ही अपना जीवन बिताना चाहती थी. कुसुम को जब पता चला कि शिवानी का विक्की के साथ चक्कर अब भी चल रहा है तो उस ने शिवानी को समझाया, पर वह विक्की को छोड़ने को कतई तैयार नहीं थी. तब उस ने बेटी से कह दिया कि वह अपनी ससुराल में ही रहे. बारबार यहां न आया करे. शिवानी को मां की यह बात बहुत बुरी लगी. वह महसूस करने लगी कि मां ही उस के प्यार में रोड़ा बनी हुई है. इस के बाद उस ने विक्की के साथ मिल कर मां को ही ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 5 मई, 2015 को नरेंद्र उर्फ विक्की ने बाजार से लोहे की एक रौड खरीद ली. शिवानी को मालूम था कि उस की मां शाम के समय बाजार से सामान खरीदने जरूर निकलती है. विक्की का घर उस के घर के पास ही था. इसलिए योजना आसानी से सफल होने की उम्मीद थी. 7 मई, 2015 को कुसुम का व्रत था. वह शाम को मोहल्ले में ही स्थित मंदिर गई. उसी दौरान इलाके की बिजली गुल हो गई. 8 बजे के करीब शिवानी को पता था कि मां मंदिर गई हुई है और बिजली भी गुल है, इसलिए उस ने मौके का फायदा उठाने के लिए प्रेमी विक्की को फोन कर दिया. विक्की लोहे की रौड ले कर शिवानी के घर के पास ही एक जगह छिप कर कुसुम के मंदिर से लौटने का इंतजार करने लगा.

गली में उस समय सन्नाटा था. उसे कुसुम आती दिखाई दी तो वह सतर्क हो गया और जैसे ही वह अपने दरवाजे की सीढि़यां चढ़ने को हुई, विक्की ने रौड से एक जोरदार वार उस के सिर पर कर दिया, जिस से कुसुम वहीं गिर गई. विक्की तुरंत वहां से भाग गया. मां के चीखने की आवाज सुन कर शिवानी समझ गई कि विक्की ने काम कर दिया है. वह तुरंत घर से बाहर आई और रोने का नाटक करने लगी. रोते समय वह बारबार अनिल का नाम ले रही थी कि उसी ने मां को मारा है. शिवानी ने इस केस में अनिल को फंसाने की साजिश इसलिए रची थी कि उस की मां और अनिल का कई बार झगड़ा भी हुआ था. इस वजह से पुलिस समझ जाएगी अनिल ने ही यह हत्या की होगी.

शिवानी ने प्रेमी को बचाने की योजना तो फूलप्रूफ बनाई थी, लेकिन पुलिस की जांच के आगे उस की सारी चालाकी धरी की धरी रह गई. उस से पूछताछ करने के बाद उस के प्रेमी नरेंद्र उर्फ विक्की ने भी अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. पुलिस ने दोनों अभियुक्तों को कुसुम की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला कारागार भेज दिया गया. शिवानी ने अपने स्वार्थ के लिए अपनी मां की हत्या तो करा दी, लेकिन अब उसे इस का अफसोस हो रहा है. Moradabad Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

 

Hindi Stories: क्षितिज का रोमांच – पैराग्लाइडिंग

Hindi Stories: पैराशूट के सिद्धांत पर बना पैराग्लाइडर मानव की आकाश में पक्षियों की तरह उड़ने की चाह को पूरा कर रहा है, शायद इसीलिए दिनोंदिन इस की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है. इस की रैलिया आयोजित होने लगी है…

भारत में यूरोप के 2 खेल, कार रैली और हैंग ग्लाइडिंग बहुत लोकप्रिय हुए हैं. कार रैली की शुरुआत भारत में सन 1980 में हुई तो हैंग ग्लाइडिंग की शुरुआत 1984 में. देश में कार रैली शुरू करने का श्रेय मुंबई के नाजिर हुसैन को जाता है. वह खुद सफल कार रैली चालक रह चुके हैं. जबकि आकाशीय जोखिम भरे हैंग ग्लाइडिंग खेल की शुरुआत भारत में पुणे के ईएमई में कार्यरत मेजर विवेक मुंडकर ने की. पैरा ग्लाइडिंग के बारे में पाठकों को अन्य जानकारी दें, पहले आइए हैंग ग्लाइडिंग के बारे में  बता दें. यूं तो हैंग ग्लाइडिंग की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रैली 1984 में आयोजित हुई, पर इस खेल से देशवासियों को परिचित करवाने में मेजर विवेक मुंडकर की अहम भूमिका रही है.

मेजर ने इस खेल के बारे में जो बताया, उस के अनुसार, सन 1975 की बात है. तब उन की पोस्टिंग पूना के सीएमई कालेज में थी. उन दिनों उन के चचेरे भाई अमेरिका से आए हुए थे. उन्होंने उन्हें आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के बारे में काफी जानकारी दी. इस साहसिक खेल के बारे में उन्होंने पहले भी बहुत कुछ सुन रखा था. उन के भाई अमेरिका से हैंग ग्लाइडर की ड्राइंग भी लाए थे, साथ ही कुछ नोट्स भी. उन्होंने भारत में अपने प्रयत्न से पहला हैंग ग्लाइडर बनाया.

पूना में उन्होंने बनेर नामक स्थान पर, जहां कुछ ऊंची पहाडि़यां हैं, पहली बार उड़ान भरी. यह 1976 की गरमियों की बात है. पहली बार हवा में पक्षियों की तरह उड़ना उन्हें कितना रोमांचक लगा था, इसे वह शब्दों में व्यक्त नहीं कर सके. 1500 रुपए से बने हैंग ग्लाइडर में बहुत सी कमियां थीं, जिस के कारण पहली उड़ान में उन्हें बहुत चोटें आईं. मेजर को पक्षियों की तरह आकाश में उड़ता देख प्रिंट मीडिया ने इस आकाशीय खेल के बारे में पत्रपत्रिकाओं में काफी लिखा. अखबारों में इस खेल के बारे में लेख प्रकाशित होने के बाद बहुत से लोग, जिन में सेना व सिविलियन शामिल थे, उन से इस खेल का प्रशिक्षण ले कर आकाश में उड़ने लगे. यह खतरे का खेल था तथा इस के लिए बेहतर हैंग ग्लाइडरों की जरूरत थी.

इस खेल के बारे में जानकारी पाने के लिए आर्मी की ओर से उन्हें इंग्लैंड के बेल्स नामक स्थान पर 45 दिनों के लिए ट्रेनिंग कोर्स पर मई 1979 में भेजा गया. अपना प्रशिक्षण पूरा कर वह पूना लौटे. इस बार उन्होंने ब्रिटेन से 3 अच्छे ग्लाइडर खरीदे. इन ग्लाइडरों से उन्होंने हेरियर नामक ग्लाइडर का डिजाइन चुन कर पूना में स्वयं अपने ग्लाइडर बनाने शुरू किए. इन का नामकरण भारतीय पक्षी गरुड़ के नाम पर किया गया. विश्व के अच्छे हैंग ग्लाइडर पायलटों में विश्व कीर्तिमान स्थापित करने वालों में अमेरिका के लेरी ट्यूडर (225.5 मील) और महिला पायलटों में ब्रिटेन की जूड़ी लीडन (146 मील) ने लंबी दूरी तय की.

हिमाचल प्रदेश खूबसूरत पहाड़ी राज्य है. यहां के बर्फीले ऊंचे पहाड़, घने वन, सर्पीली सड़कें, ऊबड़खाबड़ रास्ते, साल भर नदियों में बहता पानी प्रदेशवासियों के लिए प्रकृति का वरदान है. हिमाचल में हर साल देशविदेश के खेलप्रेमी पर्वतारोहण, बर्फ पर फिसलने का खेल स्कीइंग, वेब से बहती नदी की उफनती लहरों में राफ्टिंग, सर्पीली सड़कों पर कार रैली, ऊबड़खाबड़ रास्तों पर ट्रेकिंग और मछली आखेट जैसी प्रतियोगिताओं में भाग लेने आते हैं.

अब यहां की ऊंची बंजर घाटियां, जो सालों से उपेक्षित थीं, आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के कारण न केवल विश्व के मानचित्र पर अंकित हुई हैं, बल्कि खेलप्रेमियों में चर्चित हुई हैं. भारत तथा विदेशों के खेल प्रेमी हर साल इस जोखिम भरे खेल में भाग लेने आ रहे हैं. हिमाचल प्रदेश भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां यह खेल खेला जाता है. इस खेल को करीब से देखने के लिए खेलप्रेमी ‘बिलिंग’ पहुंचते हैं. पाठकों के लिए बिलिंग नया नाम है. आइए, पहले बिलिंग चलते हैं.

पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर पठानकोट से 145 किलोमीटर दूर बीड़ रोड नामक स्थान आता है, जहां से एक पक्की सड़क चढ़ाई का मार्ग पार करती घने जंगलों के बीच से गुजर कर समुद्रतल से 2400 मीटर ऊंची बिलिंग घाटी को छूती है. यह घाटी सन 1984 तक उपेक्षित रही है. कभीकभार कोई गद्दी अपने भेड़बकरियों के रेवड़ सहित यहां से गुजर जाता था, क्योंकि बिलिंग बंजर, वीरान घाटी, जहां पानी की बूंद तक नहीं थी, जा कर कोई क्या करेगा? यही बिलिंग घाटी सन 1984 की गर्मियों में एक अनोखे साहसिक आकाशीय खेल हैंग ग्लाइडिंग के कारण विश्व के मानचित्र पर उभर कर आई. इस खेल को देखने के लिए पहली बार हजारों लोगों के पांव इस निर्जन घाटी पर पड़े.

बिलिंग घाटी ऊपर से समतल है. यहां एक साथ 40 हैंग ग्लाइडर खड़े करने की व्यवस्था है. दक्षिणपूर्व की ओर से 2 पायलट एक साथ उड़ान भर सकते हैं. इस खेल में कई किलोमीटर दूरी तक उड़ान भरी जा सकती है. अच्छी व सफल ग्लाइडिंग के लिए साफ आसमान और खिली हुई धूप का होना जरूरी है. हैंग ग्लाइडर के पायलट को थरमल (गर्म हवा के बुलबुले) ढूंढने आवश्यक हैं. इन के मिलने से ही पायलट 10-12 हजार फुट की ऊंचाई तक उड़ सकता है. बिलिंग घाटी की खोज मुंबई के दीपक महाजन और इंग्लैंड के जौन बाव ने सन 1983 में की थी. दोनों सफल पायलट थे. हिमाचल में 6 माह तक इन दोनों पायलटों ने कई घाटियों का सर्वे किया तथा अंत में बिलिंग घाटी को हैंग ग्लाइडिंग रैली के लिए उत्तम घोषित किया.

वेस्टर्न हिमालयन हैंग ग्लाइडिंग एसोसिएशन, पालमपुर द्वारा पहली बार 28 मई से 4 जून तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैंग ग्लाइडिंग रैली का आयोजन किया गया. इस रैली में अमेरिका, ब्रिटेन, इटली, फ्रांस, स्विटजरलैंड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया आदि देशों से 32 दिग्गज पायलटों ने भाग लिया. भारत की ओर से दीपक महाजन, कमांडर मोहन कुट्टी, मेजर विवेक मुंडकर, हवलदार शीश कुठियाल, लेफ्टिनेंट कर्नल वी.एस. प्रसाद, स्क्वाड्रन लीडर आर.पी. देव, शोएब अहमद आदि पायलटों ने उड़ान भरी.

इस प्रथम अंतरराष्ट्रीय हैंग ग्लाइडिंग रैली में पश्चिमी जर्मनी के पायलट रोमन मैनीज की लैंडिंग करते हुए मृत्यु हो गई थी, जिससे वहां तत्काल चिकित्सा सहायता उपलब्ध न होने से रैली में भाग ले रहे विदेशी पायलटों में रोष फैल गया. यह रैली निजी एसोसिएशन द्वारा फोर स्क्वैयर सिगरेट कंपनी के सहयोग से आयोजित की गई थी. अखबारों ने रैली आयोजकों की इस लापरवाही के लिए कटु आलोचना की. इन बातों को ध्यान में रखते हुए हिमाचल पर्यटन निगम एवं एयरो स्पोर्ट्स सोसायटी औफ हिमाचल प्रदेश ने हैंग ग्लाइडिंग रैली का आयोजन अपने हाथों में ले कर कुछ सालों तक इसे राष्ट्रीय स्तर पर ही आयोजित करने का निर्णय लिया. क्योंकि विदेशी पायलटों के मुकाबले भारतीय पायलटों के उड़ने का अभ्यास न के बराबर था.

सन 1985 से 1989 तक हिमाचल प्रदेश में 5 राष्ट्रीय स्तर की रैलियां संपन्न हुईं. वर्ष 1990 में हैंग ग्लाइडिंग रैली न करवा कर मई 1991 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हैंग ग्लाइडिंग रैली आयोजित की गई. सन 1991 में संपन्न हैंग ग्लाइडिंग अंतिम रैली थी. इस के बाद बिलिंग घाटी पर हैंग ग्लाइडर के स्थान पर पैराग्लाइडिंग रैली की शुरुआत हुई. खेल क्षितिज पर नया खेल पैराग्लाइडिंग हैंग ग्लाइडिंग का ही परिष्कृत रूप है. हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा यह खेल कम जोखिम भरा तथा कई अर्थों में सुविधाजनक है. इस की शुरुआत सन 1980 में फ्रांस से हुई थी. वर्ष 1985 तक यह खेल लोकप्रियता के शिखर चूमता हुआ यूरोप के सभी देशों में खेला जाने लगा.

पैराशूट के सिद्धांत पर बना पैराग्लाइडर मानव की आकाश में पक्षियों की तरह उड़ने की चाह को नई दिशा प्रदान करने में सक्षम सिद्ध हुआ. पैराशूट में आदमी हवाई जहाज से छलांग लगाता है और पैराग्लाइडिंग में वह ऊंची घाटी से नीचे कूद कर हवा में तैर जाता है. भारत में पैराग्लाइडिंग शुरू करने का श्रेय दिल्ली के केशव जैनी तथा विजय जैनी बंधुओं को जाता है. कनाट प्लेस दिल्ली में इन का आयातनिर्यात का व्यवसाय है. शनिवार व रविवार को वे दिल्ली से 60 किलोमीटर दूर औच नामक स्थान पर पैराग्लाइडिंग का अभ्यास करते थे.

जैनी बंधुओं को इस रोमांचक खेल की जानकारी उन के एक रिश्तेदार ने दी थी, जो सेना में कैप्टन थे. फिर तो उन्होंने विदेशी खेल पत्रपत्रिकाओं से इस खेल के बारे में काफी जानकारी प्राप्त की. वे भारत में हैंग ग्लाइडिंग की लोकप्रियता से परिचित थे. हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा उन्हें पैराग्लाइडिंग काफी सुविधाजनक खेल लगा. उन्होंने भारत में इस खेल को शुरू करने का मन बना लिया. भारत सरकार के पर्यटन विभाग की अनुमति से उन्होंने ब्रिटेन के इस खेल के 2 प्रशिक्षक आर. स्कौट तथा डी. हापकिन को भारत में प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया. इसी के साथ उन्होंने ब्रिटेन से 4 पैराग्लाइडर भी खरीदे.

जैनी बंधुओं ने ब्रिटेन से आए प्रशिक्षकों की देखरेख में 11 मई से 13 मई, 1991 तक इस खेल का प्रशिक्षण प्राप्त किया. फिर पहली बार भारत की ओर से 19 मई, 1991 को बिलिंग घाटी से सफल उड़ान भरी. उन दिनों बिलिंग घाटी पर दूसरी अंतरराष्ट्रीय हैंग ग्लाइडिंग रैली की प्रतियोगिता संपन्न हुई थी, जिस में भाग लेने के लिए आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, स्विटजरलैंड, स्वीडन, नार्वे, इटली, अमेरिका आदि देशों से 33 पायलट आए थे. इन में 3 महिलाएं भी शामिल थीं.

विदेशी पायलटों ने पैराग्लाइडिंग में भी शौकिया भाग लिया. इस प्रकार बिलिंग घाटी, जो हैंग ग्लाइडिंग खेल के कारण विख्यात थी, एक अन्य नए आकाशीय खेल पैराग्लाइडिंग से जुड़ गई. सन 1991 के बाद से बिलिंग घाटी पर प्रतिवर्ष पैराग्लाइडिंग खेल खेला जा रहा है. कई सालों से प्री वर्ल्ड कप रैली संपन्न होती रही, लेकिन इस बार अक्तूबर में वर्ल्ड कप पैराग्लाइडिंग का आयोजन हिमाचल पर्यटन निगम एवं एयरो स्पोर्ट्स सोसायटी औफ हिमाचल प्रदेश कर रही है.

हैंग ग्लाइडिंग की तरह पैराग्लाइडिंग में भी लीवर लगा होता है, जिस से पायलट आसानी से दाएंबाएं मुड़ सकता है. हैंग ग्लाइडिंग की तरह पैराग्लाइडिंग करते समय पायलट के पास अल्ट्रामीटर और बैरोमीटर यंत्र होते हैं, जिन से वह ऊंचाई और वायु दाब का पता लगाता है. पैराग्लाइडिंग में भी पायलट को थर्मल ढूंढने जरूरी हैं, जिन की सहायता से वह 12 हजार फुट की ऊंचाई तक उड़ान भर सकता है. पैराग्लाइडर उच्चकोटि के नायलोन अथवा डेकोरन से बनाया जाता है, जिस के फटने की आशंका बहुत कम होती है.

दुर्भाग्य से कहीं छेद भी हो जाए तो उस का विस्तार आगे नहीं होता. इस कारण दुर्घटना की गुंजाइश कम रहती है. पैराग्लाइडर में और भी कई खूबियां हैं, जिन के कारण हैंग ग्लाइडिंग की अपेक्षा पायलट पैराग्लाइडर उड़ाना अधिक पसंद कर रहे हैं. हैंग ग्लाइडर और पैराग्लाइडर में बड़ा अंतर इस के भार से है. हैंग ग्लाइडर का भार 70 से 80 पौंड होता है, जबकि पैराग्लाइडर का भार 20 से 25 पौंड तक. पैराग्लाइडर का भार कम होने से उसे पायलट आसानी से उठा कर पहाड़ी पर चढ़ सकता है. इसे एक थैले में पैक किया जा सकता है.

हैंग ग्लाइडर को ऊंची पहाड़ी तक ले जाने के लिए वाहन की आवश्यकता होती है. जहां वाहन न जा सके, वहां हैंग ग्लाइडर को उठा कर चढ़ाई चढ़ना असंभव है. इस का आकार इतना विशाल होता है कि चौड़ी सड़क के बिना इसे गंतव्य तक पहुंचाना मुश्किल है. हैंग ग्लाइडिंग व पैराग्लाइडिंग में सब से बड़ा अंतर टैंडम फ्लाइट का है. हैंग ग्लाइडर का पायलट अकेला हवा में उड़ता है, जबकि पैराग्लाइडर का पायलट अपने साथ एक व्यक्ति को ग्लाइडर पर बिठा कर उड़ान भर सकता है.

जिन लोगों को हवाईजहाज में यात्रा करने का अवसर नहीं मिला है, वे अपना शौक टैंडम फ्लाइट से पूरा कर सकते हैं. अब कई स्थानीय युवक पैराग्लाइडिंग में माहिर हो गए हैं. टैंडम फ्लाइट से उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. यह फ्लाइट 10-12 मिनट की ही होती है, पर यह जिंदगी की यादगार बन जाती है. कमजोर हृदय वाले टैंडम फ्लाइट का मजा नहीं ले सकते. बिलिंग के अलावा कुल्लू घाटी के प्रसिद्ध पर्यटनस्थल मनाली के पास सोलंगनाला में भी टैंडम फ्लाइट होती है. देशविदेश के पर्यटक हवा में उड़ने के रोमांच का मजा लेते हैं.

पैराग्लाइडर की इन्हीं खूबियों के कारण अब महिलाएं भी पुरुष पायलटों के साथ पैराग्लाइडिंग में पीछे नहीं रही हैं. इस बार अक्तूबर महीने में हो रहे वर्ल्ड कप में कई महिला पैराग्लाइडिंग की कलाबाजियां दिखा कर हजारों दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देंगी. पैराग्लाइडर पायलटों का खेल शुरू होने से पहले ब्लड ग्रुप ले कर खून की व्यवस्था की जाती है, ताकि दुर्घटना होने की स्थिति में खून की व्यवस्था में परेशानी न हो. इस के अतिरिक्त सभी पायलटों का व्यक्तिगत बीमा और ग्लाइडर का बीमा किया जाता है. Hindi Stories

लेखक – अशोक सरीन 

Crime Kahani: प्रेमिका का एसिड अटैक – सोनम ने की प्रेम की हद पार

Crime Kahani: पहली मंजिल पर रह रहे किराएदार के कमरे से सुबहसुबह तेज चीखने की आवाज भूतल पर रह रहे मकान मालिक सुरेशचंद्र की पत्नी ने सुनी. आवाज सुन कर एक बार तो वह सोच में पड़ गईं. लेकिन दूसरे ही पल लगातार आ रही चीखों को सुन कर वह एक ही सांस में सीढि़यां चढ़ कर किराएदार नर्स सोनम पांडेय के कमरे में पहुंच गईं. क्योंकि चीख उसी के कमरे से आ रही थी. वहां का दृश्य देख कर उन की आंखें आश्चर्य से फटी रह गईं. पीछेपीछे मकान मालिक सुरेशचंद्र भी वहां पहुंच गए.

कमरे के फर्श पर सोनम और देवेंद्र झुलसे हुए पड़े थे. वहीं पर एक स्टील का डब्बा पड़ा था. कमरे में तेजाब की तेज दुर्गंध आ रही थी. दोनों ही तेजाब की जलन और दर्द से तड़प रहे थे. उस समय सुबह के यही कोई 7 बज रहे थे. इसी बीच झुलसी हालत में ही देवेंद्र ने अपने दोस्त शिवम को फोन किया.

कुछ ही देर में शिवम आटो ले कर वहां पहुंच गया. वह आननफानन में घायल देवेंद्र को आटो में ले कर अस्पताल जाने लगा. इस पर मकान मालिक सुरेशचंद्र ने उस से कहा कि वह घायल सोनम को भी साथ ले जाए. क्योंकि इलाज की उसे भी जरूरत है. तब शिवम ने कहा, ‘‘मैं पहले देवेंद्र को अस्पताल में भरती करा दूं वह ज्यादा झुलस गया है. इस के बाद सोनम को ले जाऊंगा.’’ इस तरह वह देवेंद्र को वहां से ले कर चला गया.

जब शिवम सोनम को काफी देर तक लेने नहीं आया तो सुरेशचंद्र ने इस की सूचना थाना हरीपर्वत के थानाप्रभारी अरविंद कुमार को दे दी. थानाप्रभारी सूचना मिलते ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने तेजाब से झुलसी सोनम को एक निजी अस्पताल में भरती कराया. वहीं अस्पताल में भरती 80 फीसदी झुलसे देवेंद्र की उपचार के दौरान दोपहर करीब ढाई बजे मौत हो गई.

पुलिस ने मरने से पहले देवेंद्र के मजिस्ट्रैट के सामने बयान दर्ज करा लिए थे. उस ने अपने बयान में सोनम पांडेय को एसिड अटैक के लिए जिम्मेदार बताया था. देवेंद्र के घर वालों को जब यह जानकारी उस के दोस्त शिवम ने दी तो उस के घर में रोना शुरू हो गया. वह 5 बहनों के बीच अकेला भाई था, रोतेरोते मां और बहनों की हालत बिगड़ गई. दरअसल, यह मामला उत्तर प्रदेश के आगरा शहर के थाना हरीपर्वत क्षेत्र स्थित शास्त्रीनगर का है.

देवेंद्र ने अपने बयान में बताया था कि 25 मार्च, 2021 की सुबह सोनम ने उसे अपने कमरे में लगे पंखे को ठीक करने के लिए बुलाया था. जैसे ही देवेंद्र कमरे में आया तो सोनम ने स्टील के डब्बे में रखा तेजाब उस के ऊपर उड़ेल दिया. अचानक हुए इस हमले से वह खुद को बचा नहीं सका. एसिड अटैक के दौरान नर्स सोनम पर भी तेजाब गिर गया था, जिस से वह भी झुलस गई थी. अब प्रश्न यह था कि सोनम ने देवेंद्र के ऊपर एसिड अटैक क्यों किया?

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पुलिस ने मकान मालिक सुरेशचंद्र से बात की तो उन्होंने पुलिस को बताया कि सोनम पहले शास्त्रीनगर में ही स्थित किसी दूसरे मकान में रहती थी. 5 महीने से वह उन के मकान में किराए पर रह रही थी. देवेंद्र को वह अपना पति बताती थी. वह कमरे पर उस के पास 10-12 दिनों में आता और 1-2  दिन रुक कर चला जाता था. उस का कहना था कि पति बाहर काम करते हैं.

वहीं सूचना पा कर अस्पताल पहुंचे देवेंद्र के घर वालों ने इन सब बातों से अनभिज्ञता जताई. उन का कहना था कि  सोनम के देवेंद्र से संबंध होने की उन्हें जानकारी नहीं थी. उन्होंने बताया कि देवेंद्र अविवाहित था और उस की 28 अप्रैल को शादी होने वाली थी. देवेंद्र की मां कुसुमा ने सोनम पांडेय पर बेटे की हत्या का आरोप लगाया. सोनम के कमरे की तलाशी के दौरान पुलिस ने स्टील का एक डब्बा बरामद किया. संभवत: इस एक लीटर वाले डब्बे में दूध लाया जाता होगा. इस में ही तेजाब रखा हुआ था. इस डब्बे की तली में तेजाब भी मिला. वहीं कमरे से देवेंद्र के जले हुए कपड़े व जूते भी मिले. पुलिस ने इन साक्ष्यों को जब्त कर जरूरी काररवाई के बाद फोरैंसिक लैब भेज दिया.

घटना की जानकारी मिलने पर एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे ने घटनास्थल का निरीक्षण किया व अस्पताल भी गए. उन्होंने पत्रकारों को बताया कि सोनम और देवेंद्र के बीच प्रेम संबंध थे. आरोपी युवती को गिरफ्तार कर लिया गया है. चूंकि वह भी एसिड की चपेट में आ कर झुलसी है, इसलिए इलाज के लिए उसे अस्पताल में भरती कराया गया है.

पुलिस ने जरूरी काररवाई करने के बाद देवेंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया. पुलिस ने मामले की गहनता से जांच की. जांच में पता चला कि सोनम पांडेय मूलरूप से उत्तर प्रदेश के औरैया जिले के भागूपुर की रहने वाली शादीशुदा युवती है. सोनम की शादी करीब 10 साल पहले गुजरात में हुई थी. शादी के कुछ दिनों बाद ही पतिपत्नी के बीच लड़ाईझगड़ा रहने लगा. इस दौरान वह एक बेटे की मां भी बन गई. शादी के 2 साल बाद ही वह अपने बेटे को ले कर अपने मायके आ गई.

कुछ समय बाद वह आगरा आ कर नर्स की नौकरी करने लगी थी. वह सिकंदरा बाईपास स्थित एक अस्पताल में नर्स थी. बेटा ननिहाल में ही रह रहा था. सोनम ने अब तक अपने पति से तलाक नहीं लिया था. उस ने अपने साथी कर्मचारियों को भी अपने शादीशुदा होने के बारे में नहीं बताया था. 28 वर्षीय देवेंद्र राजपूत मूलरूप से उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले के सहावर क्षेत्र के गांव बाहपुर का रहने वाला था. देवेंद्र चिकित्सा क्षेत्र में बचपन से ही रुचि रखता था. इसलिए उस ने लैब टैक्नीशियन का कोर्स किया था.

सुनहरे भविष्य की तलाश में वह आगरा आ गया था और पिछले 8 साल से लाल पैथ लैब में सहायक के पद पर काम कर रहा था. वह आगरा के ही खंदारी इलाके में किराए पर रहता था. चूंकि सोनम और देवेंद्र एक ही फील्ड से जुड़े थे, एक दिन काम के दौरान दोनों की जानपहचान हो गई. साथसाथ काम करते पहले दोनों में दोस्ती हुई, जो बाद में प्यार में बदल गई.

पिछले 3 सालों से दोनों लिवइन रिलेशन में रह रहे थे. सोनम ने अपने मकान मालिक को बता रखा था कि देवेंद्र उस का पति है. इस तरह देवेंद्र का जब मन होता, वह सोनम से मिलने उस के कमरे पर चला जाता था. इसी बीच सोनम को पता चला कि देवेंद्र की शादी कहीं और तय हो गई है. इस जानकारी से सोनम का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. क्योंकि वह देवेंद्र पर शादी करने का दबाव बना रही थी. सोनम ने घटना से कुछ दिन पहले देवेंद्र से कहा, ‘‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं और तुम से शादी करना चाहती हूं.’’

देवेंद्र को सोनम के बारे में पता चल चुका था कि वह शादीशुदा है और उस के एक बच्चा भी है. देवेंद्र तो सोनम के साथ पिछले 3 साल से केवल टाइम पास कर रहा था. देवेंद्र ने उसे समझाते हुए कहा,‘‘सोनम तुम शादीशुदा हो. तुम्हारे एक बेटा भी है. और तुम ने अब तक अपने पति से तलाक भी नहीं लिया है. ऐसे में हम शादी कैसे कर सकते हैं? ऐसी स्थिति में मेरे घर वाले भी शादी के लिए तैयार नहीं होंगे. फिर मेरी भी शादी तय हो चुकी है.’’

देवेंद्र की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया. सोनम अपना आपा खो बैठी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह अपने प्रेमी को किसी और का हरगिज नहीं होने देगी. अपने खतरनाक मंसूबे की भनक उस ने देवेंद्र को नहीं लगने दी. इस बीच देवेंद्र ने सोनम के कमरे और उस से मिलनाजुलना भी बंद कर दिया. अपनी योजना को अंजाम देने के लिए सोनम ने 25 मार्च, 2021 की सुबह देवेंद्र को फोन कर कमरे का पंखा ठीक करने के बहाने अपने पास बुलाया था.

देवेंद्र सोनम के कमरे पर पहुंचा तो उन दोनों के बीच शादी की बात को ले कर गरमागरमी हुई. इस के बाद सोनम ने स्टील के डब्बे में पहले से लाए तेजाब से देवेंद्र पर अटैक कर दिया, जिस से वह गंभीर रूप से सिर से पैर तक झुलस गया. जानकारी मिलने पर घटना के दूसरे दिन सोनम के पिता आगरा आ गए. उन्होंने घायल बेटी को एस.एन. मैडिकल कालेज में भरती कराया. वहां उपचार होने से उस की हालत में सुधार हुआ. हालांकि उस समय तक उस के बयान दर्ज नहीं हो सके थे.

प्रेमिका के तेजाबी हमले ने एक साथ 3 परिवारों के अरमानों को झुलसा दिया. 5 बहनों में इकलौता भाई और एक मां से उस का घर का चिराग छीन लिया. मां और बहनें देवेंद्र के सिर पर सेहरा बांधने की तैयारी में जुटी थीं. शादी के कार्ड भी छप गए थे.

शादी में बुलाने वालों को कार्ड भेजने की तैयारी चल रही थी. वहीं कासगंज की रहने वाली जिस युवती से देवेंद्र का रिश्ता तय हो गया था और एक महीने बाद दोनों को फेरे लेने थे, उस के अरमानों को भी तेजाब से हमेशा के लिए झुलसा दिया. पोस्टमार्टम के बाद देवेंद्र का शव रात 9 बजे जब घर पहुंचा तो बेटे का शव देख कर मां बेहोश हो गईं. वहीं पांचों बहनें अपने छोटे भाई के शव से लिपट कर रोने लगीं. पूरे गांव में शोक का माहौल था. उधर जिस घर में देवेंद्र की बारात जानी थी वहां उस की मौत की खबर पहुंचने से कोहराम मच गया.

दूसरे दिन शुक्रवार की सुबह देवेंद्र का शोकपूर्ण माहौल में अंतिम संस्कार किया गया. सभी का कहना था कि देवेंद्र की हत्यारोपी को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए. कहानी लिखे जाने तक प्रेमिका का इलाज चल रहा था. ठीक होने पर उसे जेल जाना पड़ेगा. देश भर में हर साल एसिड अटैक की तमाम घटनाएं होती हैं, वह भी तेजाब पर बैन लगाए जाने के बाद. एसिड अटैक एक खतरनाक अपराध है, जो महिला हो या पुरुष सभी की जिंदगी तबाह कर देता है. सुप्रीम कोर्ट के सख्त आदेशों के बाद भी देश में गैरकानूनी रूप से होने वाली एसिड की बिक्री पर रोक नहीं लगाई जा सकी है.

एसिड बिक्री को ले कर जो कानून हैं, उन्हें सख्ती के साथ जमीन पर उतारा जाना बेहद जरूरी है. एसिड अटैक से पीडि़त व्यक्ति के निजी, सामाजिक, पारिवारिक और आर्थिक जीवन पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है. Crime Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: औनलाइन चलता सेक्स रैकेट

Crime Story: 22 जनवरी, 2021 की बात है. 12 साल की मानसी पास की दुकान से चिप्स लेने गई थी. जब वह काफी देर बाद भी घर नहीं लौटी तो घर वालों को उस की चिंता हुई. घर वाले उस दुकानदार के पास पहुंचे, जिस के पास वह अकसर खानेपीने का सामान लाती थी. उन्होंने उस दुकानदार से मानसी के बारे में पूछा तो दुकानदार ने  बताया कि मानसी तो काफी देर  पहले ही चिप्स का पैकेट ले कर जा चुकी है.

जब वह चिप्स ले कर जा चुकी है तो घर क्यों नहीं पहुंची, यह बात घर वालों की समझ में नहीं आ रही थी. उन्होंने आसपास के बच्चों से उस के बारे में पूछा, लेकिन उन से भी मानसी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.

घर वालों की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर मानसी गई तो गई कहां. उन्होंने उसे इधरउधर तमाम संभावित जगहों पर ढूंढा लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. तब उन्होंने इस की सूचना पश्चिमी दिल्ली के थाना राजौरी गार्डन में दे दी. चूंकि मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने का था, इसलिए पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लिया. पुलिस ने मानसी के पिता की तरफ से गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली.

डीसीपी (पश्चिमी दिल्ली) उर्विजा गोयल को जब 12 वर्षीय मानसी के गायब होने की जानकारी मिली तब उन्होंने थाना पुलिस को इस मामले में तीव्र काररवाई करने के आदेश दिए. डीसीपी का आदेश पाते ही थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच के लिए एएसआई विनती प्रसाद के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित कर दी.

एएसआई विनती प्रसाद ने सब से पहले लापता बच्ची के घर वालों से उस के बारे में विस्तार से जानकारी ली. इतना ही नहीं, उन्होंने घर वालों से यह भी जानना चाहा कि उन की किसी से कोई रंजिश तो नहीं है. घर वालों ने उन से साफ कह दिया कि उन की किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. इस के बाद पुलिस अपने स्तर से मानसी को तलाशने लगी. जिस जगह से मानसी गायब हुई थी, पुलिस ने उस क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखी. इस के अलावा स्थानीय लोगों से भी बच्ची के बारे में जानकारी हासिल की. पुलिस ने सोशल मीडिया पर भी निगरानी कर दी, लेकिन कहीं से भी मानसी के बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

पुलिस टीम को जांच करतेकरते करीब 2 महीने बीत चुके थे. जब बच्ची कहीं नहीं मिली तो पुलिस ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग के एंगल को ध्यान में रखते हुए केस की जांच शुरू कर दी. यानी पुलिस को यह शक होने लगा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि बच्ची जिस्मफरोशी गैंग के चंगुल में फंस गई हो. इस बिंदु पर जांच करते करते पुलिस टीम ने कई जगहों पर दबिशें दीं, लेकिन लापता बच्ची का सुराग नहीं मिला.

करीब 2 महीने बाद पुलिस को सूचना मिली कि मानसी का अपहरण करने के बाद उसे दिल्ली के मजनूं का टीला इलाके में रखा गया है और वहीं पर उस से जिस्मफरोशी का धंधा कराया जा रहा है. यह सूचना रोंगटे खड़े कर देने वाली थी. क्योंकि मानसी की उम्र केवल 12 साल थी और इस उम्र में उस बच्ची के साथ जिस तरह का कार्य कराने की जानकारी मिली, वह मानवता को शर्मसार करने वाली ही थी.

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जांच अधिकारी विनती प्रसाद ने यह खबर अपने उच्चाधिकारियों को दी फिर उन्हीं के दिशानिर्देश पर पुलिस टीम ने 17 मार्च, 2021 को मजनूं का टीला इलाके में एक घर पर दबिश दी. मुखबिर की सूचना सही निकली. मानसी वहीं पर मिल गई. पुलिस ने मानसी को सब से पहले अपने कब्जे में लिया. इस के बाद पुलिस ने वहां 2 महिलाओं सहित 4 लोगों को गिरफ्तार किया.

पुलिस ने उन सभी से पूछताछ की तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे बड़े स्तर पर एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराते थे और उन का धंधा ज्यादातर वाट्सऐप ग्रुप और इंटरनेट के माध्यम से चलता है. उन के पास से पुलिस ने 5 मोबाइल फोन बरामद किए. फोनों की जांच की गई तो तमाम वाट्सऐप ग्रुप में ऐसी लड़कियों के अनेक फोटो मिले, जिन से वे जिस्मफरोशी कराते थे. पुलिस ने गिरफ्तार किए हुए उन चारों लोगों से पूछताछ की तो पता चला कि उन में से संजय राजपूत और कनिका राय मजनूं का टीला के रहने वाले थे जबकि अंशु शर्मा  मुरादाबाद का और सपना गोयल मुजफ्फरनगर की.

ये सभी औनलाइन सैक्स रैकेट चलाते थे. जांच में पता चला कि इन लोगों के काम करने का तरीका एकदम अलग था. यह गिरोह सोशल साइट पर ज्यादा सक्रिय था. गैंग के लोग 150 से ज्यादा वाट्सऐप ग्रुप में सक्रिय थे. एस्कौर्ट सर्विस मुहैया कराने वाली लड़की के फोटो ये वाट्सऐप ग्रुप में शेयर करते थे. इस के बाद ग्रुप से जो कस्टमर इन के संपर्क में आता था, उस से यह पर्सनल चैटिंग करने के बाद पैसों की डील फाइनल करते थे. फिर औनलाइन ही पेमेंट अपने खाते में ट्रांसफर कराने के बाद कस्टमर के बताए गए स्थान पर ये लड़की को सप्लाई करते थे.

इस तरह यह गैंग देश के अलगअलग बड़े शहरों में लड़कियों की सप्लाई करते था. इतना ही नहीं, फाइव स्टार होटलों में भी इन के पास से लड़कियां सप्लाई की जाती थीं. आरोपियों ने बताया कि उन के गैंग के सदस्य अलगअलग जगहों से लड़कियां उन के पास लाते थे. मानसी का भी गैंग के 2 लोगों ने अपहरण उस समय किया था, जब वह दुकान पर गई थी. उस का अपहरण करने के बाद वह उसे अपने घर पर ले गए थे.

उन्होंने मानसी से कहा था कि आज उन के यहां पर जन्मदिन है इसलिए वह बच्चों को इकट्ठा कर के केक काटेंगे. उन्होंने मानसी को केक खाने को दिया. केक खाते ही मानसी को नशा हो गया. इस के बाद दोनों मानसी को मजनूं का टीला ले गए, वहां पर संजय राजपूत, अंशु शर्मा, सपना गोयल और कनिका राय मिली. 12 साल की बच्ची को देख कर ये चारों खुश हो गए कि अब इस से मोटी कमाई की जा सकती है. क्योंकि वह तो उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझ रहे थे.

जब मानसी पर हल्का नशा सवार था, तभी उस के साथ रेप किया गया. होश आने पर मानसी दर्द से कराहती रही. इस के बाद भी इन लोगों को उस पर दया नहीं आई. उन्होंने उसी रात उसे किसी दूसरे ग्राहक के सामने पेश किया. इस तरह वह मानसी का शारीरिक शोषण करते रहे. जब वह विरोध करती तो ये लोग उसे प्रताडि़त करते थे. इस तरह मानसी इन लोगों के चंगुल में बुरी तरह फंस चुकी थी. वहां से निकलने का उस के पास कोई उपाय नहीं था.

आरोपियों के 2 अन्य साथी फरार हो चुके थे. पुलिस ने उन की तलाश में अनेक स्थानों पर दबिश दी, लेकिन उन का पता नहीं चला. आरोपी 35 वर्षीय संजय राजपूत, 21 वर्षीय अंशु शर्मा, 24 साल की सपना गोयल और 28 साल की कनिका राय से विस्तार से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अभियुक्तों के पास से बरामद की गई 12 वर्षीय मानसी को पुलिस ने उपचार के लिए अस्पताल में भरती करा दिया. मानसी ने अपने साथ घटी सारी घटना पुलिस को बता दी.

आरोपियों को जेल भेजने के बाद पुलिस गंभीरता से इस बात की जांच करने में जुट गई. इस गैंग के तार देश में किनकिन लोगों से जुड़े थे और इन्होंने अब तक कितनी लड़कियों का अपहरण किया था. Crime Story

(कथा में मानसी परिवर्तित नाम है)

Agra News: मिटा दिया साया – पिता बने भविष्य पर बोझ

Agra News: रात लगभग 2 बजे सुनील कुमार के घर में कोहराम मच गया. बरामदे में सुनील कुमार की लहूलुहान लाश पड़ी थी. लाश के पास में ही उस की पत्नी आशा देवी बैठी रो रही थी. शोर सुन कर आसपास के लोग भी आ गए. बेटे अनुज ने उसी समय थाना चित्राहाट में फोन कर घटना की जानकारी दी. यह घटना आगरा के चित्राहाट थाना क्षेत्र के नाहि का पुरा गांव में 25 मार्च, 2021 की रात को हुई थी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी महेंद्र सिंह भदौरिया उसी समय टीम के साथ गांव में जा पहुंचे. उन्होंने अनुज से घटना के बारे में जानकारी ली. इस के बाद उन्होंने घटना की जानकारी एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट को दी. वह भी कुछ ही देर में घटनास्थल पर पहुंच गए. पूछताछ में अनुज ने पुलिस को बताया कि रोजाना की तरह पिता रात को बरामदे में चारपाई पर सो रहे थे. जबकि परिवार के अन्य सदस्य ऊपरी मंजिल पर सोए हुए थे.

रात लगभग 2 बजे पिता की चीख सुन कर आंखें खुल गईं. वह और मां दोनों बरामदे की ओर दौड़े. बरामदे में गांव का अनवर जो हमारे परिवार से रंजिश मानता है, पिता के सिर पर कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ प्रहार कर रहा था. उन लोगों ने रोकने का प्रयास किया तो वह जान से मारने की धमकी देता हुआ भाग गया. सिर से निकले खून के छींटों से दीवार भी लाल हो गई थी. अचानक हुए हमले से पिता अपना बचाव नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. घटनास्थल की काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

घर वालों के अनुसार 21 मार्च को खेत पर अनुज और अनवर के बेटे विजय के बीच विवाद हो गया था. अनवर ने अपने बेटे विजय का पक्ष लेते हुए अनुज के सिर में ईंट मार दी थी, जिस से सिर से खून बहने लगा. इतना ही नहीं अनवर ने धमकी दी, ‘‘मैं तेरा काल हूं, तेरी बलि चढ़ाऊंगा.’’

घर आ कर अनुज ने पिता सुनील कुमार को घटना की जानकारी दी. इस पर सुनील अपने घायल बेटे को ले कर अनवर के घर पहुंचा. शिकायत करने पर अनवर के घर वालों ने गालीगलौज करने के साथ ही पितापुत्र को जान से मारने की धमकी दी थी. इस के बाद थाना चित्राहाट में घटना की अनवर के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करा दी थी. लेकिन बाद में गांव के लोगों ने बीच में पड़ कर सुलह करा दी थी. इस के बाद अनवर ने वारदात को अंजाम दे दिया.

पीडि़त घर वालों ने पुलिस को बताया कि यदि आरोपी अनवर जल्द गिरफ्तार नहीं किया गया तो अनुज के साथ भी अनहोनी हो सकती है. अनुज की तरफ से अनवर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया.

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44 वर्षीय सुनील कुमार पूर्व प्रधान रामप्रकाश का बेटा था. सुनील के परिवार में पत्नी आशा देवी के अलावा बेटा अनुज और 2 बेटियां थीं. परिवार ने अनवर की धमकी को हलके में लिया था. मुकदमा दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपी अनवर की तलाश में जुट गई. आरोपी के घर पर दबिश दी गई, लेकिन वह नहीं मिला. फरार आरोपी की गिरफ्तारी के लिए एसपी (पूर्वी) अशोक वेंकट ने पुलिस की टीम का गठन किया.

पुलिस टीम में थानाप्रभारी (बाह) विनोद कुमार पवार, थानाप्रभारी (जैतपुर) योगेंद्र पाल सिंह, थानाप्रभारी (चित्राहाट) महेंद्र सिंह भदौरिया, सर्विलांस टीम के प्रभारी नरेंद्र कुमार व उन की टीम को शामिल किया गया. पुलिस जहां अनवर की गिरफ्तारी का प्रयास कर रही थी, वहीं वह घटना के संबंध में गहराई से जांचपड़ताल में जुटी थी. इस संबंध में पुलिस को गांव वालों ने बताया कि सुनील अय्याश किस्म का व्यक्ति था. गांव के अलावा आसपास के गांवों में कई महिलाओं से उस के अवैध संबंध थे. वह उन पर खूब पैसा खर्च करता था. इस के लिए वह पहले अपनी जायदाद बेच चुका था.

हाल ही में उस ने बेटी की शादी के नाम पर कुछ जमीन का सौदा भी कर दिया था. इसी को ले कर घर में क्लेश हो रहा था. सुनील की बेटी व बेटा भी इस बात से नाराज थे. पुलिस का मानना था कि बच्चों के बीच हुए विवाद के बाद जब दोनों पक्षों में सुलह हो गई थी तब अनवर ने सुनील की हत्या क्यों की? और वह भी अकेले. हत्या जैसी घटना को अकेले अनवर अंजाम नहीं दे सकता था.

उस का कोई साथी भी इस में जरूर शामिल होगा. लेकिन मृतक के घर वालों से पूछताछ के साथ ही अनुज ने रिपोर्ट में भी केवल अनवर को ही नामजद किया था. इस बीच आरोपी अनवर की तलाश में जुटी पुलिस की टीमों के हाथ कई अहम सुराग लगे, जिस से वह पुलिस की पकड़ में आ गया. अनवर को पुलिस थाने ले लाई. उस से कड़ाई से पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने पुलिस को बताया कि सुनील की हत्या के बाद वह मौके पर पहुंचा था. मृतक का शव चारपाई से उस ने ही उतरवा कर जमीन पर रखवाया था. उस के बाद सुनील के घर वालों की कानाफूसी पर वह वहां से निकल गया था.

मृतक की पत्नी से भी पुलिस को अहम सुराग मिले थे, जिस से इस हत्याकांड में बेटा व बेटी के लिप्त होने की बात सामने आई थी. पुलिस ने सुनील की हत्या के आरोप में मृतक के बेटे अनुज, बेटी अल्पना के साथ ही अल्पना के प्रेमी संजेश तथा संजेश के दोस्त मदन यादव को 29 मार्च, 2021 को गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने हत्या में शामिल आरोपियों की गिरफ्तारी से पहले उन के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाए और 30 मार्च को सुनील हत्याकांड का परदाफाश कर दिया. चारों आरोपियों ने हत्या में शामिल होने का जुर्म कबूल करते हुए हत्या में प्रयुक्त चारपाई का पाया, जिस से सुनील के सिर को कूंच कर हत्या की गई थी, को एक खेत से हत्यारोपियों की निशानदेही पर बरामद कर लिया.

पुलिस पूछताछ में हत्यारोपियों ने सुनील कुमार की हत्या की जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुनील कुमार अपनी जायदाद  बेचबेच कर अपने शौक पूरे कर रहा था. पिता की हरकतों से परिवार में क्लेश चल रहा था. हाल ही में सुनील ने अपनी 6 बीघा जमीन का 20 लाख रुपए में सौदा किया था. इस बात की जानकारी घर वालों को जैसे ही हुई, उन्होंने इस का कड़ा विरोध किया. ननिहाल वालों को भी इस संबंध में बताया, उन्होंने भी सुनील को समझाया लेकिन उन के समझाने का भी सुनील पर कोई असर नहीं हुआ.

इस पर बेटे अनुज और बेटी अल्पना को अपने भविष्य की चिंता सताने लगी. यदि पिता संपत्ति बेचबेच कर इसी तरह बरबाद करते रहे तो परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. तब दोनों भाईबहनों ने पिता सुनील का पुरजोर विरोध किया तो सुनील ने अनुज और अल्पना के साथ मारपीट कर दी. संपत्ति के विवाद में आए दिन हो रहे गृह क्लेश के बीच 21 मार्च को गांव में बच्चों के विवाद में अनुज का अनवर से झगड़ा हो गया. इसी घटना को आधार बना कर अनुज और अल्पना ने अपने पिता सुनील की हत्या की योजना बना डाली.

अल्पना के पिछले 6 सालों से सूरजनगर गांव के संजेश से प्रेम संबंध थे. उधर सुनील अल्पना की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहा था, जबकि अल्पना संजेश से प्यार करती थी और उसी से शादी करना चाहती थी.

अनुज और अल्पना ने प्रेमी संजेश के साथ पिता सुनील कुमार की हत्या की साजिश रची. अल्पना ने संजेश को बताया कि पिता को हम दोनों के प्रेम संबंधों का पता चल गया है और वह उस की शादी के लिए रिश्ता तलाश रहे हैं, साथ ही वह अपने शौक पूरा करने के लिए जमीन भी बेच रहे हैं. यदि उन्होंने इसी तरह सारी जमीन बेच दी तो हमारे लिए कुछ नहीं बचेगा. उन्होंने 20 लाख रुपए में जमीन बेचने का सौदा भी कर लिया है. यदि उन्हें जल्दी से रास्ते से नहीं हटाया गया तो हम लोगों को पछताना पड़ेगा.

सुनील ने कुछ दिन पहले अल्पना व अनुज के साथ मारपीट की थी. ये बात संजेश को बुरी लगी थी. तब प्रेमी संजेश ने अपनी प्रेमिका अल्पना की खातिर सुनील को ठिकाने लगाने के लिए अपने गांव के ही दोस्त मदन यादव को तैयार कर लिया. 25 मार्च, 2021 की रात को संजेश की फोन काल पर ही मदन यादव सुनील की हत्या करने के लिए वहां पहुंच गया. रात 2 बजे घर के बरामदे में सो रहे सुनील के सिर पर चारपाई के पाए से ताबड़तोड़ वार कर उस की हत्या कर दी. हत्या को अंजाम देने के बाद संजेश और मदन अपने घर चले गए. उन के जाने के बाद योजनानुसार अनुज ने शोर मचाया.

पुलिस जब चारों आरोपियों अनुज, अल्पना, संजेश और मदन यादव को गिरफ्तार कर न्यायालय ले जा रही थी, तो वे हंस रहे थे. पिता की हत्या के बाद बेटे अनुज और बेटी अल्पना के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Stories: अधूरी औरत

Hindi Stories: मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछली तरफ शीशम के पेड़ के नीचे बैठी देखा था…

स्वा स्थ्य विभाग ने मेरी बदली नसीरपुर कर दी. मुझे पता चला कि 3 घंटे का सफर बस से, और आगे एक घंटा तांगे से जाना होगा. मैं ने अपने आने की खबर भिजवा दी और कोई 2 बजे के करीब बस में सवार हो गया. मेरा खयाल था कि शाम तक गांव पहुंच जाऊंगा, मगर यह सब गलत हो गया. जिस बस में मैं सवार था, वह इतनी भरी हुई थी कि बाद में चढ़ने वाले लोगों को खड़े होने की भी मुश्किल से जगह मिली थी.

बरसात का मौसम था. मैं ने किताब निकाली और पढ़ने लगा. किताब में मैं इस कदर खोया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि बस कहांकहां रुकी. जब बस एक जगह अचानक झटके खाने के बाद रुक गई तो मुसाफिरों में खलबली सी मची और शोर होने लगा. तब मैं ने चौंक कर पूछा कि क्या मामला है? मालूम हुआ कि बस में खराबी आ गई है. क्लीनर खराब हुए पुर्जे को ठीक कराने के लिए वापस 6 मील ले जाएगा. मुसाफिरों में काफी बेदिली फैली, मगर अब इंतजार के सिवा कोई चारा नहीं था. मुसाफिर बस से उतर कर इधरउधर टहलने लगे. मैं भी वक्त गुजारने के लिए इधरउधर घूमता रहा.

क्लीनर साहब की वापसी रात 9 बजे के करीब हुई और 10 बजे के करीब बस ने दोबारा सफर शुरू किया. जब बस बसअड्डे पर पहुंची तो वहां कोई तांगा मौजूद नहीं था. अब मेरे पास कस्बे तक पैदल मार्च करने के अलावा और कोई चारा नहीं था. मैं ने सामान कंधे पर डाला और पैदल ही चल पड़ा. अब तक देर इतनी हो गई थी कि बारबार यह खयाल आ रहा था कि कहीं चौकीदार क्लीनिक में इंतजार कर के चला न गया हो. उस वक्त मौसम अचानक खुशगवार हो गया था. ठंडी हवा चलने लगी, कभीकभी बिजली भी चमक उठती. बारिश किसी भी वक्त शुरू हो सकती थी.

मैं तेजतेज कदम उठाने लगा. जैसे ही कस्बा नजर आया, बूंदाबांदी शुरू हो गई. क्लीनिक कस्बे से बाहर पक्की इमारत में था. मैं तकरीबन दौड़ता हुआ क्लीनिक पहुंचा, मगर वही हुआ, जिस का डर था. चौकीदार इंतजार कर के जा चुका था. शायद उसे अब मेरे आने की उम्मीद नहीं रही होगी. मैं बरामदे में खड़ा हो कर सोचने लगा. थोड़े फासले पर एक हवेली नजर आई. बाकी मकान ज्यादातर कच्चे थे. अब तक बारिश काफी तेज हो गई थी. इस तरह बरामदे में खड़े हो कर रात गुजारना मुश्किल था. मैं ने सोचा, क्यों न हवेली में रात बिताई जाए.

मैं बारिश में भीगता हुआ हवेली पर जा पहुंचा और जोरजोर से गेट खटखटाने लगा. काफी देर तक किसी ने गेट नहीं खोला. दरअसल गेट से काफी आगे जा कर कमरे थे. इसलिए शायद आवाज उन तक नहीं पहुंच रही थी. मैं बारिश में भीग गया था. मैं हवेली के पीछे चला गया. वहां जानवर बंधे थे. मैं उन के बीच से गुजरता हुआ आगे बढ़ने लगा. अचानक मेरी नजर एक औरत पर पड़ी. वह अर्धनग्न अवस्था में शीशम के पेड़ के नीचे बैठी थी. आंखें उस ने बंद कर रखी थीं और होंठों ही होंठों में कुछ बुदबुदा रही थी. औरत जवान और खूबसूरत थी. मैं ने फौरन अपनी निगाहें फेर लीं और वापस हो लिया.

मैं सख्त हैरान था कि आधी रात के वक्त वह दरख्त के नीचे क्या कर रही थी. भूतप्रेत पर मुझे यकीन नहीं था. उस वक्त मैं ने मुनासिब नहीं समझा कि आगे बढ़ कर उस औरत से कुछ पूछूं. मैं वापस क्लीनिक पर आ गया. वह रात मैं ने बरामदे में बैठ कर बिता दी. इस बीच मेरे दिमाग पर उस औरत के बारे में जानने का भूत सवार हो गया. गांव नसीरपुर की जिंदगी किसी ऐसे गरम मकान में रहने की तरह थी, जिस की दीवारें नजर नहीं आतीं. ऐसा महसूस होता था, जैसे वह हुकूमत की भूलीबिसरी बस्ती हो. गांव बुनियादी सुविधाओं से वंचित था. मच्छर इस कदर थे कि चाहे कितनी भी मात्रा में कुनैन का इस्तेमाल क्यों न कर लो, बुखार जरूर हो जाता था. बुखार भी ऐसा, जो आदमी की सारी ताकत खत्म कर देता था.

शुरू में इक्कादुक्का मरीज बुखार की शिकायत ले कर आते रहे. क्योंकि ज्यादातर लोग डाक्टरी इलाज को मानते ही नहीं थे. इसी दौरान गांव की मसजिद के मौलवी साहब बहुत सख्त बीमार हो गए. उन की टांग पर एक पुराना जख्म था, जिस की वजह से उन्हें बुखार रहने लगा. सब लोग जहरबाद समझते रहे. मैं ने मौलवी साहब का इलाज किया. पहले एक छोटा सा औपरेशन किया, फिर इंजेक्शन लगाने शुरू कर दिए. मौलवी साहब की सेहत बहाल होने लगी. गांव से हो कर मेरी चर्चा आसपास के गांवों तक जा फैली तो दूरदूर से लोग आने लगे. इस से पहले गांव वालों का इलाज काका करता था.

काका गांव का नाई था. वह जर्राह भी था. यह सब कुछ उस ने अपने बाप से सीखा था. जर्राह से ज्यादा वह मुझे मालिशिया लगता था, क्योंकि वह ज्यादातर लोगों का इलाज मालिश से किया करता था. सिरदर्द में सिर की मालिश, पेट के दर्द में भी वह मरीज को लिटा कर तेल से पेट की मालिश करता था. चोट की हालत में भी मालिश करता. गांव वालों के इसरार पर उस ने दांत भी उखाड़ने शुरू कर दिए थे. जब 2-3 आदमियों के दांत उस ने गलत उखाड़ दिए तो मैं ने उस को जा कर समझाया कि अब बस कर दे.

एक वक्त में इतने ज्यादा काम तो शहर के डाक्टर भी नहीं करते. वहां भी अब हर बीमारी का स्पैशलिस्ट होता है. यही बड़े डाक्टर की पहचान है. उस ने दांत का डाक्टर बनने का खयाल छोड़ दिया और सिर्फ हड्डियों और जर्राही का स्पैशलिस्ट बनने पर संतोष कर लिया. उस गांव के चौधरी मलिक अल्लाहबख्श थे. गांव वालों का कहना था कि वह बहुत नेक इंसान थे. उस गांव के लोग ही नहीं, आसपास के गांव वाले भी उन की बड़ी इज्जत करते थे. उन की उम्र कोई 70 बरस के करीब थी. अब वह अक्सर बीमार रहते थे. 1-2 बार इलाज के सिलसिले में मुझे उन की खिदमत में हाजिर होना पड़ा था. वह मेरी बड़ी इज्जत करते थे. कभीकभी वैसे भी गपशप के लिए हवेली में बुला लेते थे.

हवेली में उन के बेटे से भी मुलाकात हुई. उस का नाम था मलिक असद. वह 30-35 बरस का मजबूत कदकाठी का आदमी था. उस के बाल घुंघराले और आंखें स्याह थीं. रंग सांवला था. चेहरा सख्त था. वह तबीयत का भी बड़ा जालिम था. मैं ने खुद उसे 1-2 बार हवेली में मजदूरों की पिटाई करते देखा था. गांव के लोग उस से डरते थे और उसे बुरा कहते थे. एक दिन बड़े चौधरी साहब ने बुला भेजा. नौकर ने मुझे एक बड़े से कमरे में ले जा कर बिठाया. उस कमरे में बहुत सी कुर्सियां और मोढ़े रखे थे. जब भी गांव का कोई मसला खड़ा होता, चौधरी वहीं सब को इकट्ठा करते थे. चौधरी साहब आए और बेंत से बनी आरामकुर्सी पर बैठ गए.

थोड़ी देर वह कुछ सोचते रहे, फिर बड़ी राजदारी से बोले, ‘‘डाक्टर पुत्तर, मेरी बहू बीमार है. अजीब सी बीमारी है. उसे कुछ पता नहीं चलता. कभी तो वह बिलकुल ठीक होती है, कभी वह पूरापूरा दिन कमरे में सोई पड़ी रहती है. जब जागती है तो सब से झगड़ने लगती है. मैं उस की वजह से बहुत परेशान हूं. मेरा दिल कहता है, तुम उस का इलाज कर सकते हो.’’

‘‘चौधरी साहब, आप अल्लाह पर भरोसा रखें. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करूंगा. आप मुझे मरीज दिखाएं.’’

मैं वाकई दिल से बड़े चौधरी की इज्जत करता था. चौधरी साहब मुझे पहली बार हवेली के अंदर ले गए. वह एक बैडरूम था. कमरे में एक दीवान और 2-3 कुर्सियां पड़ी थीं. एक बैड था, जिस पर एक औरत लेटी थी. जैसे ही चौधरी साहब ने उसे सीधी किया, मेरी तो जान ही निकल गई. हथेलियों में पसीना आने लगा. यह वही औरत थी, जिसे मैं ने पहली रात हवेली के पिछवाड़े पेड़ के नीचे देखा था. मैं ने अपने आप पर काबू पाया और सोचने लगा कि यह औरत चौधरी की बहू है यानी मलिक असद की बीवी है. यह उस रात क्या कर रही थी? मेरी दिलचस्पी, जाहिर है, अपनी चिंता को पहुंच गई थी.

औरत बेसुध पड़ी थी. मैं ने और चौधरी साहब ने उसे जगाने की पूरी कोशिश की, मगर वह नहीं जागी. जाहिर तौर पर उसे कोई बीमारी नजर नहीं आ रही थी. बुखार भी नहीं था. मैं ने सुई चुभो कर देखी तो वह तकलीफ महसूस कर रही थी. ब्लडप्रेशर कुछ कम था, मगर उस की सूजी हुई आंखें मुझे शक में डाल रही थीं. मैं ने उस के खून का नमूना ले कर चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप फिक्र न करें. मैं खून टेस्ट करने के बाद ही आप को बता सकूंगा कि इन्हें क्या तकलीफ है. आप इस दौरान इन्हें कोई दवा न दें. खास ध्यान रखें कि यह कोई भी चीज न खाएं. सुबह इन को क्लीनिक भेज दें, तब तक ब्लड टेस्ट की रिपोर्ट मेरे सामने होगी.’’

चौधरी साहब की हवेली से निकलने के बाद मेरे जेहन में यही बात बारबार आ रही थी कि यह औरत नशा जरूर करती है. मैं ने क्लीनिक आते ही खून टेस्ट करना शुरू कर दिया, क्योंकि मैं खुद उस गुत्थी को सुलझाना चाहता था. खून की रिपोर्ट से जाहिर हो गया कि चौधरी की बहू को नशे की लत पड़ चुकी थी. यह जान कर मुझे खुद भी अफसोस होने लगा. बहरहाल मैं खुद को कल के लिए तैयार कर चुका था. अगले दिन मैं शाम तक इंतजार करता रहा, मगर चौधरी की बहू क्लीनिक पर नहीं आई. इस का मतलब साफ था कि वह खुद आना नहीं चाहती थी और उसे अपनी इस आदत के जाहिर होने का अंदेशा था. लेकिन उस नशे से वह मौत के मुंह में जा सकती थी.

शाम को मैं चौधरी साहब से मिलने गया. उन्हें बताया कि मरीजा क्लीनिक पर नहीं आई तो वह बहुत हैरान हुए. उन्होंने नौकरानी को बुला कर बुराभला कहा और फिर खुद जा कर बहू को लिवा लाए. उस वक्त वह बहुत अच्छे कपड़े पहने हुए थी. उस के रखरखाव में एक खास शान थी. उस की बड़ीबड़ी आंखें मेरे चेहरे पर जमी हुई थीं, जिन में एक खास किस्म की वहशत और गुस्सा था. उस के खुश्क होंठ एकदूसरे से जुडे़ थे. वह अपने चेहरे पर आई जुल्फों की लट सिर के झटके से बारबार पीछे की तरफ लौटाती रही. वह खामोश बैठी रही, जैसे किसी से बात करना ही न चाहती हो.

मैं ने जरा हौसले के साथ उस खामोशी को तोड़ते हुए कहा, ‘‘अब आप की तबीयत कैसी है?’’

उस ने अपनी पलकें उठाईं और मेरी तरफ देखा. मैं आज तक उन आंखों को नहीं भूल सका. उस की आंखों में एक अजीब सी मस्ती थी, जैसे इंद्रधनुष आंखों में उतर आया हो. उस ने बड़ी अदा से कहा, ‘‘मेरी तबीयत पहले से बेहतर हो रही है. मुझे किसी दवा की जरूरत नहीं.’’

यह कह कर वह उठी और तेजी के साथ दरवाजे से बाहर निकल गई. मैं ने हैरत से चौधरी साहब की तरफ देखा. वह भी मेरी तरफ देख रहे थे. उन के चेहरे पर गुस्से और शर्मिंदगी के आसार साफ नजर आ रहे थे. मैं चूंकि सूरतेहाल को समझने लगा था, इसलिए मैं ने चौधरी साहब से कहा, ‘‘आप की बहू को कोई घरेलू परेशानी है. है तो यह आप के घर का मसला, लेकिन डाक्टर के लिए यह सब जानना बहुत जरूरी होता है. आप जब तक मुझे सब कुछ बताएंगे नहीं, मेरे लिए उन का इलाज करना मुश्किल हो जाएगा.’’

पहले तो चौधरी साहब परेशान नजर आने लगे. जोरजोर से हुक्का गुड़गुड़ाते रहे, जैसे किसी फैसले पर पहुंच रहे हों. फिर उन्होंने आहिस्ताआहिस्ता कहना शुरू किया, ‘‘मेरी बहू दरअसल बांझ है. 5 साल शादी को हो गए हैं, मगर औलाद नहीं हुई. बेचारी बड़ी परेशान रहती है. जब से मलिक असद की दूसरी शादी की तैयारी की बात सुनी है, बहुत चिड़चिड़ी हो गई है. बातबात पर लड़तीझगड़ती है. कमरा बंद कर के दिन भर पड़ी रहती है.’’

‘‘चौधरी साहब, आप की बहू कोई दवा इस्तेमाल कर रही है, जो अगर जल्दी बंद न की गई तो बहुत देर हो जाएगी. इस से उस की जिंदगी को भी खतरा हो सकता है. आप पता कराएं कि वह क्या चीज खा रही है. घर के किसी न किसी शख्स को तो पता ही होगा. आखिर वह दवा या कोई और चीज कहीं से तो खरीदी जाती है.’’

मेरी बात सुन कर चौधरी साहब ने जोरजोर से ‘रज्जो…रज्जो…’ पुकारना शुरू कर दिया. एक लड़की भागीभागी दरवाजे से दाखिल हुई. रज्जो चौधरी साहब की नौकरानी का नाम था. वह घबराई हुई चौधरी साहब को देखने लगी. मैं ने उसे संभलने का मौका दिए बगैर जोर से कहा, ‘‘रज्जो, जो दवा तुम बीबीजी को ला कर देती हो, वह शीशी ले कर आओ.’’

वह बौखला कर बोली, ‘‘जी…नहीं, मैं नहीं ला कर देती. वह खुद मेरे साथ जा कर मलंग बाबा से लाती हैं. कसम कुरान की, मलंग बाबा पुडि़या पर दम कर के बीबी जी को देते हैं.’’

मेरा चलाया हुआ तीर निशाने पर सीधा जा लगा था. मैं ने नरम पड़ते हुए कहा, ‘‘जाओ, एक पुडि़या ला कर मुझे दिखाओ. खबरदार, बीबीजी को पता न लगे.’’

रज्जो ने चौधरी साहब की तरफ देखा. चौधरी साहब ने इशारा किया तो वह चली गई. कोई एक घंटे बाद रज्जो ने हमें वह पुडि़या लाकर दी. मैं उस पुडि़या को ले कर क्लीनिक आ गया. वह अफीम की पुडि़या थी. उस से साफ जाहिर था कि मलंग बाबा कोई धोखेबाज था और चौधरी की बहू को नशे की आदी बना रहा था. मैं उसी वक्त हवेली वापस आया, क्योंकि मलंग बाबा का अड्डा बंद कराना न सिर्फ नेकी का काम था, बल्कि लोगों को मौत के मुंह से निकालना भी था.

चौधरी साहब को जैसे ही सूरतेहाल मालूम हुई, उन्होंने तांगे का बंदोबस्त किया और हम पुलिस चौकी चल दिए. पुलिस चौकी कस्बे से 3 मील के फासले पर थी. चौकी का इंचार्ज चौधरी से परिचित था. उसे हालात बताए गए तो उस ने फौरन एक छापामार पार्टी के साथ रात को मलंग बाबा के अड्डे पर धावा बोल दिया.  मलंग बाबा और उस के 2 नौजवान साथी गिरफ्तार हुए. उन के अड्डे से अफीम बरामद हुई. अगले दिन पुलिस से पता चला कि मलंग बाबा जेल से भागा हुआ फरार कैदी था. एक साल से वह भेष बदल कर यह धंधा कर रहा था. गांव के लोगों को ताबीज के बहाने अफीम दे कर बेवकूफ बना रहा था. चौधरी की बहू से तो वह खूब रकम हथिया रहा था.

जैसे ही चौधरी की बहू की अफीम की खुराक बंद हुई, उस का सारा बदन टूटने लगा. बुखार में जिस्म तपने लगा. उस की आंखों में खौफ छा गया. वह मेरे पांव पड़ती कि मैं उस को अफीम दे दूं या मौत का टीका लगा दूं. उस के शरीर की दुर्दशा देख कर और बुखार की तपिश को कम करने के लिए मैं कभीकभी उसे नींद का इंजेक्शन लगा देता, मगर जब वह जागती तो फिर वैसे ही तड़पने लगती. मैं ने और बड़े चौधरी साहब ने कई रातें उस के बिस्तर के पास बैठ कर गुजार दीं. इस बीच मैं ने देखा कि चौधरी का बेटा मलिक असद न तो उस की परवाह करता था और न ही उस के पास ठहरता था. यह मेरे लिए बड़ी हैरत की बात थी.

मेरे दिल में उस के लिए नफरत के जज्बात उभरने लगे. उन दिनों चौधरी साहब तख्तपोश पर बैठे रहते और मैं मरीजा के सिरहाने बेबस हो कर बैठा रहता. मेरे हाथ चौधरी साहब ने वैसे ही बांध रखे थे. मैं उसे अस्पताल नहीं ले जा सकता था, जहां उसे बचाने की कोशिश की जाती. मैं बाहर से किसी मदद का इंतजाम भी नहीं कर सकता था, क्योंकि यह चौधरी की इज्जत का मामला था. मैं सिर्फ अपनी जानकारी के मुताबिक इलाज करता रहा, मगर शायद अल्लाह ने चौधरी साहब की दुआएं सुन ली थीं. 10 दिनों के बाद उन की बहू की हालत में तब्दीली आनी शुरू हो गई. वह संभलने लगी. अब वह न तो जिद करती और न ही उठउठ कर भागती और न शोर मचाती. उसे सुकून आना शुरू हो गया.

अब उस ने मेरी तरफ बड़ी एहसानमंद निगाहों से देखना शुरू कर दिया. उस की हालत को पूरी तरह संभलने में 3 महीने लग गए. इस दौरान मैं हर रात चौधरी साहब की हवेली में जाता रहा. मैं ने महसूस किया कि छोटा चौधरी कईकई दिनों और रातों को घर से गायब रहता था. एक दिन मैं अपने क्लीनिक में मरीजों से फारिग हुआ ही था कि चौधरी साहब की बहू अपनी नौकरानी के साथ क्लीनिक में तशरीफ ले आई. पहले तो वह कुछ देर खामोश बैठी रही, फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आपने मुझे दोबारा जिंदगी दी है, लेकिन आप ने ऐसा क्यों किया? मैं तो खुद अपनी जिंदगी खत्म करना चाहती थी. आप ने मुझे बचा कर मेरे दुख के सफर को और लंबा कर दिया. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आप को अपना मसीहा कहूं या दुश्मन?’’

मिसेज मलिक असद की बातें सुन कर पहले तो मैं एक लम्हे के लिए चुप रह गया. लेकिन मैं ने बाद में हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मिसेज मलिक, मेरा कोई कमाल नहीं. कुदरत को यही मंजूर था. अल्लाह ने आप को दोबारा जिंदगी दी है. वही इस के भेद जानता है. वैसे आप इतनी मायूस क्यों हैं?’’

मिसेज मलिक ने मेरी तरफ देख कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, आप ने मुझे मौत के मुंह से निकाला है तो मैं आप को बताना चाहती हूं कि कई बार आदमी उन हालात से दोचार हो जाता है, जहां आगे कोई रास्ता नहीं होता. वह जीना नहीं चाहता. मैं किस के लिए जीऊं? आप को पता है कि औरत मां बन कर ही पूरी औरत बनती है.’’

मैं चाहता था कि वह अपने दिल का दर्द खुल कर कह दे. एक तो उस के अंदर का गुबार निकल जाएगा, दूसरे शयद इस मामले में मैं कोई मदद कर सकूं. मैं ने बात बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप बताएं आप को क्या दुख है? अल्लाह ने आप को सेहत बख्शी है तो आप की दूसरी तकलीफें भी रफा कर देगा.’’

मेरी बातों का यह असर हुआ कि उस ने बिलखबिलख कर रोना शुरू कर दिया. फिर कहने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, आज से 5 साल पहले बडे़ चौधरी साहब ने बड़े अरमानों से मुझे अपनी बहू बनाया था. मगर आज सोचती हूं कि काश, मेरी शादी न हुई होती. एक साल तो हंसीखुशी से गुजर गया, लेकिन उस के बाद मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. चौधरी के तमाम रिश्तेदार और गांव के तमाम लोगों की नजरें मुझे तीर की तरह चुभने लगीं.

‘‘जो लोग मेरे आगेपीछे फिरते थे, वही मुझे ताना देने लगे कि मैं बांझ हूं. पहले छोटा चौधरी, फिर घर वाले और जब बड़े चौधरी ने भी आंखें फेर लीं तो मुझे अपने आप से नफरत होने लगी. मैं ने कोई पीरफकीर न छोड़ा. दूरदूर तक तावीज करवाए, मगर मेरे यहां बच्चा न हुआ.

‘‘फिर उस मलंग बाबा ने मुझे अफीम पर लगा दिया. मुझे भी नशे में रहना अच्छा लगने लगा. अब आप ने मुझ से वह भी छीन लिया. खुदा के लिए मुझे जहर ही दे दें. अगले माह छोटे चौधरी की दूसरी शादी होने वाली है. मैं इस से पहले अपने आप को खत्म करना चाहती हूं. अब आप खुद बताएं, मैं आप को हमदर्द कहूं या दुश्मन?’’

चौधरी की बहू की बातें सुन कर मेरे दिल में भी उस के बारे में हमदर्दी के जज्बात उभरने लगे. अगर खुदा ने उस को औलाद की दौलत नहीं दी तो इस में उस बेचारी का क्या कसूर? इस के बावजूद मैं ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘आप मायूस क्यों होती हैं? अल्लाह बड़ा कारसाज है. आप ने इस सिलसिले में कोई इलाज करवाया है? अब तो जमाना बहुत तरक्की कर गया है. आप शहर जा कर इलाज करवाएं. सब ठीक हो जाएगा इंशाअल्लाह.’’

मेरी बातें सुन कर मिसेज मलिक ने बड़ी उदासी से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब क्या फायदा? अब तो उस के दिन भी तय होने वाले हैं.’’

‘‘आप ऐसा करें कि शहर में एक तजुर्बेकार लेडी डाक्टर मेरी परिचित हैं. आप उन से जांच करवाएं और रिपोर्ट मुझे ला कर दें. आप इस काम के लिए फौरन, बल्कि कल ही शहर चली जाएं.’’

पहले तो मिसेज मलिक टालमटोल से काम लेती रहीं, मगर मेरे मजबूर करने पर उन्होंने वादा कर लिया.

तीसरे दिन मिसेज मलिक बड़ी खुशखुश मेरे क्लीनिक में आईं और लिफाफा मेरे हाथ में दे कर कहा, ‘‘डाक्टर साहब, अब बताएं कि मैं क्या करूं?’’

मैं ने लिफाफा खोला और रिपोर्ट पढ़ने लगा. साथसाथ मेरी हैरत में इजाफा होता चला गया, क्योंकि रिपोर्ट में डाक्टर ने लिखा था कि मिसेज मलिक में किसी किस्म का कोई नुक्स नहीं है. अगर औलाद नहीं हो रही है तो उन के शौहर की जांच करवाई जाए. इस रिपोर्ट को पढ़ने के बाद हम दोनों एकदूसरे की तरफ हैरत से देख रहे थे. मिसेज मलिक की आंखों में आंसू थे और मैं सोचने लगा था कि यह औरत नासमझी में अपने आप को कितनी बड़ी सजा दे रही थी, बल्कि अपनी जान तक देने पर तैयार थी. मैं ने मिसेज मलिक को तसल्ली दी.

अगले दिन मैं हवेली गया. मैं छोटे चौधरी से तनहाई में बात करना चाहता था, मगर पता चला कि वह हवेली में मौजूद नहीं था. मैं पैगाम दे कर लौट आया कि जब छोटे चौधरी आएं तो मुझे खबर भेज दें.

रात को छोटे चौधरी से मुलाकात हुई. मैं ने बड़ी नरमी से बातचीत करते हुए कहा, ‘‘चौधरी साहब, आप के यहां औलाद नहीं हुई. आप को इस बारे में पता है कि इस की क्या वजह है?’’

यह सुनते ही चौधरी के तेवर बदलने लगे. उस के चेहरे की लकीरें गहरी होने लगीं और वह बड़े गुस्से से बोला, ‘‘डाक्टर, मुझे पता है, मेरी बीवी बांझ है. तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं. यह हमारा निजी मामला है.’’

‘‘नहीं चौधरी साहब, आप को यही तो गलतफहमी है. आप की बीवी बिलकुल ठीक है. वह बच्चा पैदा करने की पूरी खूबी रखती है. आप को अपना इलाज करवाना होगा.’’

मेरे यह कहने की देर थी कि चौधरी आगबबूला हो गया, ‘‘डाक्टर, यह बात अब दोबारा नहीं कहना, नहीं तो तुम्हारी लाश किसी को नहीं मिलेगी. और दित्तू, डाक्टर को हवेली से बाहर निकाल दे.’’

इस से पहले कि मैं कुछ कहता, 2 आदमियों ने मुझे बांहों से घसीट कर हवेली से बाहर कर दिया. मैं चौधरी की बेवकूफी पर अफसोस करता हुआ क्लीनिक वापस आ गया. सारी रात मुझे नींद नहीं आई. मैं सोचता रहा कि ये लोग कितने बेवकूफ हैं. इन के भले की बात भी इन को बुरी लगती है. अगले दिन मैं ने मिसेज असद मलिक से उन लोगों का पता पूछा, जहां चौधरी असद मलिक की शादी हो रही थी. वह कस्बा नसीरपुर गांव से 15 मील दूर था. लड़की का वालिद नंबरदार था. उम्र 60 साल थी. बीवी की मौत हो गई थी. 1 बेटी और 2 बेटों की शादी हो गई थी. सिर्फ 1 ही बेटी रह गई थी. मैं ने नंबरदार यूसुफ को अपना परिचय दिया तो वह बड़ी भलमनसाहत से पेश आया.

मैं ने नंबरदार से अर्ज की, ‘‘आप की बेटी की शादी मलिक असद से तय हो गई है और जल्दी ही शादी भी होने वाली है. आप की जानकारी में यह बात भी जरूर होगी कि चूंकि मलिक असद की पहली बीवी से औलाद नहीं है, इसीलिए वह दूसरी शादी कर रहे हैं. मगर मैं डाक्टर होने के नाते अपना फर्ज समझता हूं कि आप को सच्चाई से आगाह कर दूं. मलिक असद की बीवी बांझ नहीं है. वह पूरी तरह सेहतमंद है और औलाद पैदा करने के काबिल है. मेरे पास इस का सबूत मौजूद है. अगर आप इस बात को बुनियाद बना कर शादी कर रहे हैं तो अपनी बेटी की जिंदगी में कांटे बो रहे हैं. आप मेरी बात समझ गए होंगे. मैं ने अपना फर्ज अदा कर दिया है. अब आप जैसा मुनासिब समझें, फैसला करें.’’

मेरी बातें सुन कर नंबरदार परेशान हो गया. काफी देर चुपाचाप हुक्का पीता रहा. फिर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, आप के कहने का मतलब है कि मलिक असद ही औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है?’’

‘‘मेरा मतलब है कि मलिक असद को इलाज की जरूरत है. अगर वह इलाज करवा ले तो उस की पहली बीवी से औलाद हो सकती है. अगर दूसरी शादी सिर्फ औलाद की खातिर हो रही है तो आप पहले छानबीन कर लें.’’

नंबरदार सिर झुका कर सोचता रहा. फिर कहने लगा, ‘‘ठीक है डाक्टर साहब, मैं ने आप की बात सुन ली है. आप की मेहरबानी कि आप ने ये बातें बता दीं. मैं सोच कर जवाब दूंगा.’’

मैं नंबरदार को सलाम कर के खुशखुश वापस आ गया. दूसरे दिन जब मैं ने मिसेज मलिक को सारी बातें बताईं तो वह भी बहुत खुश हुई और उस की आंखों में मेरे लिए शुक्रगुजारी के आंसू आ गए. मैं ने उसे समझाया कि बात अभी खत्म नहीं हुई. उसे बड़ी समझदारी और खिदमत से अपने शौहर का दिल जीतना होगा. उस के दिल में अपने लिए जगह बनानी होगी और उसे इलाज पर राजी करना होगा.

2 ही दिन गुजरे थे. मैं शाम के वक्त खेतों में सैर कर रहा था. शाम के वक्त मैं रोज गांव से बाहर निकल जाता था. हलकीहलकी ताजी हवा और पत्तों की सरसराहट से मुझे अजीब सा सुकून मिलता था. मैं अपनी धुन में चला जा रहा था कि एकदम मेरे सामने मलिक असद आ खड़ा हुआ. उस के साथ 2 आदमी और थे. दोनों आदमियों के हाथों में लाठियां थीं. मलिक असद की आंखों में गुस्सा भरा था—‘‘डाक्टर, मैं ने तुम्हें समझाया था कि यह बात दोबारा न करना, वरना तुम्हारी लाश नहीं मिलेगी. अब तैयार हो जाओ. तुम्हें मैं दूसरी दुनिया में पहुंचा दूंगा. तुम्हें मलिक असद का पता नहीं है.’’

उस ने अपने आदमियों को इशारा किया. बस मुझे इतना याद है कि एक लाठी मेरे सिर पर लगी. उस के बाद मुझे होश नहीं रहा. जब होश आया तो मैं अस्पताल के कमरे में एक बैड पर लेटा था. मेरे पास कमरे में बड़े चौधरी और उन की बहू थी. मुझे होश में आते देख कर बड़े चौधरी ने मेरे पांव पकड़ लिए और मिसेज मलिक असद सजदे में गिर गईं. चौधरी साहब कहने लगे, ‘‘पुत्तर डाक्टर, मुझे माफ कर दो. मैं बहुत शर्मिंदा हूं. तुम चाहो तो मेरे बेटे को पुलिस के हवाले कर दो. मगर यकीन करो, अगर मुझे इस का पता होता तो मैं अपने बेटे की जान ले लेता और तुम्हें नुकसान न पहुंचने देता.’’

इस दौरान मिसेज असद भी सजदे से उठ गई थीं. मेरी एक टांग पर पलस्तर चढ़ा था. मैं ने फाइल पढ़ी तो पता चला कि सिर के जख्म पर 10 टांके लगे थे और बाईं टांग टूट गई थी. इस के बावजूद मैं मुसकरा रहा था, ‘‘चौधरी साहब, आप का इस में कोई कसूर नहीं. मैं इस वाकये की कोई रिपोर्ट नहीं करना चाहता. मैं सिर्फ छोटे चौधरी से मिलना चाहता हूं.’’

मेरी बात सुन कर बड़े चौधरी की आंखों में आंसू आ गए. वह अपने आंसू पोंछते हुए कमरे से बाहर चले गए. मिसेज मलिक ने मुझे बताया, ‘‘आप से लड़ाई की इस घटना से पहले नंबरदार और उस के भाई हवेली में आए थे और मलिक असद के सामने बड़े चौधरी से कहने लगे थे, ‘आप के बेटे में नुक्स है. वह औलाद पैदा करने के काबिल नहीं है. आप ने हम से गलतबयानी की है, बल्कि हमें धोखा दिया है. हम यह रिश्ता तोड़ने आए हैं.’

‘‘यह सुन कर मलिक असद उन से झगड़ पड़ा. अगर बड़े चौधरी न होते तो वे लोग भी जख्मी हो जाते. बडे़े चौधरी ने हालात को संभाला और उन से कहने लगे कि आप लोगों से मैं ने कोई झूठ नहीं बोला है, आप लोगों को यह बात किस ने बताई है?

‘‘जब नंबरदार ने आप का नाम बताया तो बड़े चौधरी चुप रह गए. इसी दौरान मलिक असद गुस्से में बाहर निकल गया. मुझे शक हुआ. मैं ने अपनी नौकरानी से कहा कि वह मलिक असद का पीछा करे. उस ने मुझे आ कर बताया कि उन लोगों ने आप को जख्मी कर दिया है.

‘‘मैं ने फौरन बड़े चौधरी को बताया और हम अपने आदमियों के साथ वहां पहुंचे तो आप की हालत काफी खराब थी. फौरन तांगा मंगवाया और सड़क पर आ कर गाड़ी का बंदोबस्त किया. यहां अस्पताल में आ कर भी हम बहुत परेशान रहे. आप को पूरे 6 दिनों बाद होश आया है. इस दौरान पुलिस भी हमें परेशान करती रही.’’

मैं मिसेज मलिक की बातें सुन कर मुसकराता रहा. मुझे पूरे 15 दिन अस्पताल में रहना पड़ा. इस दौरान मलिक असद को बड़े चौधरी लिवा लाए. वह भी अपने किए पर शर्मिंदा था. मैं उस से बहुत प्यार से मिला. मैं ने जाहिर नहीं होने दिया कि उस ने मुझ पर बहुत ज्यादती की है. इस का यह असर हुआ कि वह दिनरात मेरे पास रहने लगा. मैं ने इस दौरान डाक्टर राशिद से उस की मुलाकात कराई और उन से सिफारिश की कि वह उस का इलाज करें. मैं ठीक हो कर गांव आ गया और अपने काम में खो गया. इस वाकए का यह असर हुआ कि मुझे चौधरी की हवेली में ही रहने के लिए जाना पड़ा. खानापीना भी वहीं होने लगा.

मलिक असद और उस की बीवी बड़ी खुशगवार जिंदगी बिताते रहे. मैं जब तक उस गांव में तैनात रहा, मिसेज मलिक ने मुझे सगी बहन का प्यार दिया. 2 सालों बाद मुझे पता चला कि मलिक असद के घर एक फूल सी बच्ची पैदा हुई है तो उस वक्त की मेरी खुशी का अंदाजा आप लगा सकते हैं. Hindi Stories

लेखक – डा. फरहान  

Social Story: अवनीश का खूनी खेल – कर्मो की मिली सजा

Social Story: कानपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर एक बड़ा कस्बा है अकबरपुर. यह  (देहात) जिले के अंतर्गत आता है. तहसील व जिला मुख्यालय होने के कारण कस्बे में हर रोज चहलपहल रहती है. इस नगर से हो कर स्वर्णिम चतुर्भुज राष्ट्रीय मार्ग जाता है जो पूर्व में कानपुर, पटना, हावड़ा तथा पश्चिम में आगरा, दिल्ली से जुड़ा है.

इस नगर में एक ऐतिहासिक तालाब भी है जो शुक्ल तालाब के नाम से जाना जाता है. शुक्ल तालाब ऐतिहासिक वास्तुकारी का नायाब नमूना है. बताया जाता है कि सन 1553 में बादशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल ने शीतल शुक्ल को इस क्षेत्र का दीवान नियुक्त किया था. दीवान शीतल शुक्ल ने सन 1578 में इस ऐतिहासिक तालाब को बनवाया था.

इसी अकबरपुर कस्बे के जवाहर नगर मोहल्ले में सभासद जितेंद्र यादव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी अर्चना यादव के अलावा बेटी अक्षिता (5 वर्ष) तथा बेटा हनू (डेढ़ वर्ष) था. जितेंद्र के पिता कैलाश नाथ यादव भी साथ रहते थे. वह पुलिस में दरोगा थे, लेकिन अब रिटायर हो चुके हैं. जितेंद्र यादव की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उन का अपना बहुमंजिला आलीशान मकान था.

जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव पढ़ीलिखी महिला थी. वह नगर के रामगंज मोहल्ला स्थित प्राइमरी पाठशाला में सहायक शिक्षिका थी, जबकि जितेंद्र यादव समाजवादी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे. 2 साल पहले उन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में सभासद का चुनाव लड़ा था और जीत हासिल की थी. वर्तमान में वह जवाहर नगर (वार्ड 14) से सभासद है. जितेंद्र यादव का अपने मकान के भूतल पर कार्यालय था, साथ ही पिता कैलाश नाथ यादव रहते थे, जबकि भूतल पर जितेंद्र अपनी पत्नी अर्चना व बच्चों के साथ रहते थे.

मकान के दूसरी और तीसरी मंजिल पर 4 किराएदार रहते थे, जिन में 2 महिला पुलिसकर्मी अनीता व ऊषा प्रजापति थीं. मकान की देखरेख व किराया वसूली का काम कैलाश नाथ यादव करते थे. ऊषा का पति अवनीश प्रजापति मूलरूप से प्रयागराज जनपद के फूलपुर का रहने वाला था. महिला कांसटेबल ऊषा पहले प्रयागराज में तैनात थी. उस के साथ उस का पति भी रहता था. अवनीश वहां लैब टैक्नीशियन था, लेकिन लौकडाउन लगने के कारण मई 2020 में उस की लैब बंद हो गई थी.

ऊषा का ट्रांसफर भी प्रयागराज से कानपुर देहात जनपद के थाना अकबरपुर में हो गया था. उस के बाद वह पति अवनीश के साथ अकबरपुर कस्बे में सभासद जितेंद्र यादव के मकान में किराए पर रहने लगी थी. ऊषा की शादी अवनीश प्रजापति के साथ 4 साल पहले हुई थी. 4 साल बीत जाने के बाद भी ऊषा मां नहीं बन सकी थी. इस से उस का बेरोजगार पति अवनीश टेंशन में रहता था. अवनीश घर में ही पड़ा रहता था. उस का काम केवल इतना था कि वह पत्नी ऊषा को ड्यूटी पर अकबरपुर कोतवाली स्कूटर से छोड़ आता था और ड्यूटी समाप्त होने पर घर ले आता था.

ऊषा पुलिसकर्मी होने के बावजूद जितनी सरल स्वभाव की थी, उस का पति बेरोजगार होते हुए भी उतने ही कठोर स्वभाव का था. अवनीश की न तो किसी अन्य किराएदार से पटती थी और न मकान मालिक से. हां, वह सभासद जितेंद्र यादव से जरूर भय खाता था, जितेंद्र की पत्नी अर्चना यादव तो उसे फूटी आंख नहीं सुहाती थी. सभासद की पत्नी अर्चना यादव तथा ऊषा के पति अवनीश प्रजापति के बीच पटरी नहीं बैठती थी. दोनों के बीच अकसर तनाव बना रहता था. तनाव का पहला कारण यह था कि अवनीश साफसफाई से नहीं रहता था. वह मकान में भी गंदगी फैलाता रहता था.

अर्चना यादव शिक्षिका थीं. वह खुद भी साफसफाई से रहती थीं और मकान में रहने वाले अन्य किराएदारों को भी साफसफाई से रहने को कहती थीं. अन्य किराएदार तो अर्चना के सुझाव पर अमल करते थे, लेकिन अवनीश नहीं करता था. वह गुटखा और पान खाने का शौकीन था. पान खा कर उस की पीक कमरे के बाहर ही थूक देता था. कमरे के अंदर की साफसफाई का कूड़ा भी बाहर जमा कर देता था, जो हवा में उड़ कर पूरे फ्लोर पर फैल जाता था.

तनाव का दूसरा कारण अवनीश की बेशरमी थी. उस की नजर में खोट था. वह अर्चना को घूरघूर कर देखता था. उसे देख कर वह कभी मुसकरा देता, तो कभी कमेंट कस देता. उस की हरकतों से अर्चना गुस्सा करती तो कहता, ‘‘अर्चना भाभी, जब तुम गुस्सा करती हो तो तुम्हारा चेहरा गुलाब जैसा लाल हो जाता है और गुलाब मुझे बहुत पसंद है.’’

अर्चना ने अवनीश की हरकतों और गंदगी फैलाने की शिकायत अपने ससुर कैलाश नाथ यादव से की तो उन्होंने अवनीश को डांटाफटकारा और कमरा खाली करने को कह दिया. लेकिन अवनीश की पत्नी ऊषा ने बीच में पड़ कर मामले को शांत कर दिया. ऊषा प्रजापति ने मामला भले ही शांत कर दिया था, लेकिन अर्चना की शिकायत ने अवनीश के मन में नफरत के बीज बो दिए थे. वह मन ही मन उस से नफरत करने लगा था. अर्चना अपने बच्चों को भी अवनीश से दूर रखती थी. दरअसल, ऊषा की कोई संतान नहीं थी, अर्चना को डर था कि गोद भरने के लिए कहीं ऊषा व अवनीश उस के बच्चों पर कोई टोनाटोटका न कर दें.

एक रोज अर्चना किसी काम से छत पर जा रही थी. वह पहली मंजिल पर पहुंची तो अवनीश के कमरे के अंदरबाहर कूड़ा बिखरा देखा. इस पर उस ने गुस्से में कहा, ‘‘अवनीश कुत्ता भी पूंछ से जगह साफ कर के बैठता है, लेकिन तुम तो उस से भी गएगुजरे हो जो गंदगी में पैर फैलाए बैठे हो.’’

अर्चना की बात सुन कर अवनीश का गुस्सा बढ़ गया, ‘‘भाभी, मैं कुत्ता नहीं इंसान हूं. मुझे कुत्ता मत बनाओ. आप मकान मालकिन हैं, लेकिन इतना हक नहीं है कि आप मुझे कुत्ता कहें. आज तो मैं किसी तरह आप की बात बरदाश्त कर रहा हूं, लेकिन आइंदा नहीं करूंगा.’’

इस बार अर्चना ने अपने सभासद पति जितेंद्र से अवनीश की शिकायत की. इस पर सभासद ने अवनीश को खूब फटकार लगाई, साथ ही चेतावनी भी दी कि अगर उसे मकान में रहना है तो सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा. वरना मकान खाली कर दो. अर्चना द्वारा बारबार शिकायत करने से अवनीश के मन में नफरत और बढ़ गई. उसे लगने लगा कि अर्चना जानबूझ कर किराएदारों के सामने उस की बेइज्जती करती है. उस के मन में प्रतिशोध की ज्वाला भड़कने लगी. वह बेइज्जती का बदला लेने की सोचने लगा.

28 फरवरी, 2021 की सुबह अवनीश ने पान की पीक कमरे के बाहर थूक दी. पीक की गंदगी को ले कर अर्चना और अवनीश में जम कर तूतूमैंमैं हुई. ऊषा ने किसी तरह पति को समझा कर शांत किया और गंदगी साफ कर दी. झगड़ा करने के बाद अवनीश दिन भर कमरे में पड़ा रहा और अर्चना को सबक सिखाने की सोचता रहा. आखिर उस ने एक बेहद खतरनाक योजना बना ली. रात 8 बजे अवनीश अपनी पत्नी ऊषा को अकबरपुर कोतवाली छोड़ने गया. वहां से लौटते समय उस ने पैट्रोल पंप से एक बोतल में आधा लीटर पैट्रोल लिया और वापस घर लौट आया.

उस ने ऊपरनीचे घूम कर पूरे मकान का जायजा लिया. ग्राउंड फ्लोर स्थित कार्यालय में सभासद जितेंद्र यादव क्षेत्रीय लोगों के साथ क्षेत्र की समस्यायों के संबंध में बातचीत कर रहे थे, कैलाश नाथ भी अपने कमरे में थे. जायजा लेने के बाद अवनीश पहली मंजिल पर आया. वहां अर्चना यादव रसोई में थी. पास में उन की 5 साल की बेटी अक्षिता तथा 18 माह का बेटा हनू भी बैठा था. अर्चना खाना पका रही थीं, जबकि दोनों बच्चे खेल रहे थे. इस बीच सिपाही अनीता कोई सामान मांगने अर्चना के पास आई. फिर वापस अपने कमरे में चली गई.

सही मौका देख कर अवनीश अपने कमरे में गया और वहां से पैट्रोल भरी बोतल ले आया. फिर वह रसोई में पहुंचा और पीछे से अर्चना यादव व उस के बच्चों पर पैट्रोल उड़ेल दिया. उस समय गैस जल रही थी, अत: पैट्रोल पड़ते ही गैस ने आग पकड़ ली. अर्चना व उस के बच्चे धूधू कर जलने लगे. आग की लपटों से घिरी अर्चना चीखी तो महिला सिपाही अनीता ने दरवाजा खोला. सामने का खौफनाक मंजर देख कर वह सहम गई. वह उसे बचाने को आगे बढ़ी तो अवनीश ने उस पर वार कर दिया. अनीता चीखनेचिल्लाने लगी.

भूतल पर सभासद जितेंद्र यादव साथियों सहित मौजूद थे. उन्होंने चीखपुकार सुनी तो पिता कैलाश नाथ व अन्य लोगों के साथ भूतल पर पहुंचे और आग की लपटों से घिरी पत्नी अर्चना व बच्चों के ऊपर कंबल डाल कर आग बुझाई. इसी बीच पकड़े जाने के डर से अवनीश भागा और केबिल के सहारे नीचे आ गया. घर के बाहर सभासद की स्कौर्पियो कार खड़ी थी. उस ने उसे भी जलाने का प्रयास किया. इसी बीच सभासद के साथियों ने उसे दौड़ाया तो वह भागने लगा. भागते समय सड़क पार करते हुए वह मिनी ट्रक की चपेट में आ गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और उपचार हेतु सरकारी अस्पताल पहुंचा दिया.

इधर सभासद जितेंद्र यादव ने गंभीर रूप से जली पत्नी और दोनों बच्चों को अपनी कार से प्राइवेट अस्पताल राजावत पहुंचाया. लेकिन डाक्टरों ने उन की गंभीर हालत देख कर जिला अस्पताल रेफर कर दिया. सभासद  के पिता कैलाश नाथ यादव ने घटना की सूचना पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को दी तो हड़कंप मच गया. कुछ ही देर में कोतवाल तुलसी राम पांडेय, डीएसपी संदीप सिंह, एसपी केशव कुमार चौधरी, एएसपी घनश्याम चौरसिया तथा डीएम दिनेश चंद्र जिला अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने सभासद जितेंद्र यादव को धैर्य बंधाया और हरसंभव मदद का आश्वासन दिया.

चूंकि अर्चना की हालत नाजुक थी. अत: जिलाधिकारी डा. दिनेश चंद्र ने अर्चना का बयान दर्ज कराने के लिए एसडीएम संजय कुशवाहा को जिला अस्पताल बुलवा लिया. संजय कुशवाहा ने अर्चना का बयान दर्ज किया. अर्चना ने कहा कि किराएदार अवनीश ने पैट्रोल डाल कर उसे और उस के दोनों मासूम बच्चों को जलाया है. जिला अस्पताल में अर्चना व उस के बच्चों की हालत बिगड़ी तो डाक्टरों ने उन्हें कानपुर शहर के उर्सला अस्पताल में रेफर कर दिया. उर्सला अस्पताल में रात 11 बजे जितेंद्र के मासूम बेटे हनू ने दम तोड़ दिया.

रात 1 बजे बेटी अक्षिता की भी सांसें थम गईं. उस के बाद 4 बजे अर्चना ने भी उर्सला अस्पताल में आखिरी सांस ली. इस के बाद तो परिवार में कोहराम मच गया. जितेंद्र पत्नी व मासूम बच्चों का शव देख कर बिलख पड़े. अर्चना की मां व भाई भी आंसू बहाने लगे. पहली मार्च को सभासद जितेंद्र यादव की पत्नी अर्चना यादव व उस के मासूम बच्चों को किराएदार अवनीश द्वारा जिंदा जलाने की खबर अकबरपुर कस्बे में फैली तो सनसनी फैल गई. चूंकि मामला सभासद के परिवार का था, उन के सैकड़ों समर्थक थे. अत: उपद्रव की आशंका से पुलिस अधिकारियों ने अकबरपुर कस्बे में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

इधर अर्चना व उस के बच्चों की मौत की खबर अकबरपुर कोतवाल तुलसीराम पांडेय को मिली तो उन्होंने अवनीश व उस की पत्नी ऊषा की सुरक्षा बढ़ा दी. उन्होंने अवनीश को अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर अपनी कस्टडी में ले लिया. सभासद जितेंद्र यादव की तहरीर पर कोतवाल तुलसीराम पांडेय ने भादंवि की धारा 326/302 के तहत अवनीश प्रजापति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर उसे बंदी बना लिया. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद डीएसपी संदीप सिंह ने अभियुक्त अवनीश से घटना के संबंध में पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज किया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का भी बारीकी से निरीक्षण किया तथा साक्ष्य जुटाए.

2 मार्च, 2021 को नगरवासियों ने मृतकों की आत्माओं की शांति के लिए कैंडल मार्च निकाला और अंडर ब्रिज के नीचे उन की फोटो पर पुष्प अर्पित किए. अनेक युवकों के हाथों में हस्तलिखित तख्तियां थी. उन की मांग थी कि हत्यारे को फांसी की सजा मिले. युवक सीबीआई जांच की भी मांग कर रहे थे. उन को शक था कि इस साजिश में कुछ और लोग भी शामिल हैं, जिन का परदाफाश होना जरूरी है.

3 मार्च, 2021 को पुलिस ने अभियुक्त अवनीश प्रजापति को कानपुर देहात की माती कोर्ट में मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. सभासद जितेंद्र यादव और उन के पिता इस हृदयविदारक घटना से बेहद दुखी हैं. जितेंद्र यादव से दर्द साझा किया गया तो वह फफक पड़े. बोले, ‘किस पर भरोसा करूं. चंद मिनटों में ही हमारा सब कुछ खत्म हो गया. किराएदार ऐसा कर सकता है, कभी सोचा नहीं था. अवनीश ने मेरे परिवार को योजना बना कर जलाया है. बदले की आग में उस ने हमारी दुनिया ही उजाड़ डाली.’ Social Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Mumbai News: राधे मां का मायावी संसार

Mumbai News: राधे मां का मामला सामने आने के बाद यह बात साफ हो गई है कि साधुसंत हो या कोई तथाकथित अध्यात्म का ठेकेदार, सब के लिए मार्केटिंग जरूरी है. जितनी अच्छी मार्केटिंग होगी, उतना ही लाभ मिलेगा. अगर खूबसूरती पर आडंबर का आवरण चढ़ा दिया जाए तो कहना ही क्या…

वहां अनगिनत लोगों का जमावड़ा था. अधिकांश के माथे पर राधे मां के नाम की लाल पट्टी बंधी थी. भीड़ के बावजूद वहां पुलिस नहीं थी, अलबत्ता कैमरों के साथ बड़ी संख्या में मीडियाकर्मी जरूर मौजूद थे. जिन में पलपल की खबर देने की होड़ सी लगी थी. जिस जगह यह जमावड़ा लगा था वह थी मुंबई में बालकेश्वर इलाके के एक बड़े मकान के सामने की खुली जगह. उस दिन तारीख थी इसी साल की 14 अगस्त. सुबह का वक्त. इस जगह को प्रैस वालों ने पिछले रोज तब से ही अपने कैमरों के फोकस पर ले रखा था, जब मुंबई की ढिंडोसी कोर्ट के माननीय सेशन जज वी.ए. राउत ने राधे मां के खिलाफ दर्ज दहेज प्रताड़ना के केस में उन की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी.

यह आपराधिक प्रकरण मुंबई के थाना कांदिवली में 7 लोगों के खिलाफ दर्ज हुआ था. इन में 6 लोगों से पुलिस ने पूछताछ पूरी कर ली थी, जिन्हें अदालत से अग्रिम जमानत भी मिल चुकी थी. सातवीं आरोपी राधे मां थीं, जिन से पूछताछ करने के लिए पुलिस ने सम्मन भेज कर उन्हें 14 अगस्त को दोपहर 12 बजे थाना कांदिवली बुलाया था. शुरू में राधे मां ने शायद इस सब को हल्केपन से लिया था. दरअसल, उन का मानना था कि कोई उन के खिलाफ कुछ भी कहता रहे, न तो पुलिस उन का कुछ बिगाड़ सकती है और न कोई कानून. संभवत: राधे मां को यह भी भरोसा था कि उन की कथित महानता के चलते पुलिस उन के खिलाफ कोई केस दर्ज करने की हिम्मत नहीं कर पाएगी.

उन के इस अति आत्मविश्वास का कारण था, उन के अनुयायियों में महानगर के तमाम बड़ेबड़े प्रभावशाली लोगों का होना, जिन में कई जानीमानी फिल्मी हस्तियां भी थीं. वैसे भी उन के भक्तों का दायरा इतना बड़ा था कि अपनी धर्मगुरु राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की स्थिति में वे जमीनआसमान एक कर सकते थे. यही वजह थी कि राधे मां के खिलाफ आवाजें उठते ही बड़ी संख्या में लोग उन के आश्रम पर एकत्रित होने लगे. कई लोग ऐसे भी थे जो फोन कर के उन्हें हर तरह से आश्वस्त कर रहे थे.

राधे मां का आश्रम बोरीवली स्थित एक विशाल इमारत के 5वें माले पर था. इस बिल्डिंग के छठें माले पर राधे मां ने अपना निजी आवास बना रखा था, जहां उन की अनुमति के बगैर कोई नहीं आजा सकता था. जिस इमारत में आश्रम और राधे मां का निवास है वह मुंबई (मलाड) की मशहूर एम.एम. मिठाईवाला चेन के मालिक मनमोहन गुप्ता की है. पूरा गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त है. परिवार के मुखिया मनमोहन गुप्ता राधे मां के आदेश के बिना न तो कोई व्यापारिक फैसला लेते हैं और न ही पारिवारिक.

मनमोहन गुप्ता का एक भांजा है नकुल. 30 अप्रैल, 2012 को उस की शादी मुंबई के ही कांदिवली इलाके की रहने वाली निक्की अग्रवाल से हुई थी. यह शादी राधे मां की अनुमति से ही संपन्न हुई थी. लेकिन चंद रोज बाद ही यह विवाह टूटने के कगार पर पहुंच गया था. इस की वजह बताई जा रही हैं राधे मां. कम से कम निक्की का तो यही कहना है. 16 जुलाई, 2015 को निक्की ने इस संबंध में थाना कांदिवली में भादंवि की धाराओं 498ए, 406 एवं 506 के तहत गुप्ता परिवार के 6 सदस्यों के अलावा राधे मां को भी नामजद करते हुए अपनी रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. यह प्राथमिकी पुलिस ने अदालती आदेश पर दर्ज की थी.

अपनी इस रिपोर्ट में निक्की ने जिस पर सब से ज्यादा आरोप लगाए थे, वह थीं राधे मां. निक्की के आरोप के अनुसार यह शादी न केवल राधे मां की अनुमति से हुई थी, बल्कि शादी से जुड़े अन्य मामलों में भी उन का पूरा दखल था. दानदहेज की बातें भी उन्होंने ही खुल कर की थीं. बकौल निक्की सब कुछ तय हो जाने के बाद राधे मां ने शादी में शिरकत करने के लिए वायुमार्ग से आने की बात कहते हुए एक विशेष हेलीकौप्टर, लग्जरी गाड़ी व 25 लाख रुपयों की मांग की थी, जो उस के घर वाले उन की इच्छा के मुताबिक पूरी नहीं कर पाए. निक्की के अनुसार दहेज में 25 लाख रुपए दे दिए जाने के बावजूद राधे मां शेष मांगें पूरी न होने की वजह से खफा हो गईं.

शादी हो जाने के बाद इसी की सजा देने के लिए उन्होंने उसे तब अपने यहां हाजिर होने का फरमान सुना दिया, जब वह अपने पति के साथ हनीमून पर विदेश गई हुई थी. अपनी गुरुमां के आदेश की अवहेलना करना उस के पति के बूते की बात नहीं थी. लिहाजा हनीमून बीच में छोड़ नकुल ने वापस लौट कर उसे राधे मां के सामने पेश कर दिया. निक्की द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार इस के बाद राधे मां ने उसे अपनी सेविका बना कर अपने निवास पर रख लिया, जहां उस से साफसफाई करने से ले कर कई ऐसे कार्य भी करवाए जाते थे जिन्हें करने के बारे में उस ने अपने घर में कभी सोचा तक नहीं था.

बकौल निक्की इन कामों में जरा सी भी कोताही होने पर उसे राधे मां के गुस्से का शिकार बनना पड़ता था. राधे मां उस के प्रति न केवल कठोर शब्दों का इस्तेमाल करती थीं बल्कि उस के जिस्म के हिस्सों पर अपने त्रिशूल की नोक चुभो कर उसे बुरी तरह प्रताडि़त भी करती थीं. बाद में वह उस की ससुराल वालों को बुलवा कर उन से उस की पिटाई भी करवाती थीं. उस वक्त राधे मां निक्की को संबोधित कर के कहती थीं, ‘‘आगे से कभी भी मुझे न कहने की जुर्रत मत करना.’’

निक्की ने पुलिस को बताया कि उस के परिवार वालों ने अपनी हैसियत से ज्यादा खर्चा कर के उस की शादी बड़ी धूमधाम से की थी, जिस में अच्छाखासा दहेज भी दिया गया था. लेकिन उस का जीवन नर्क बना दिए जाने के बावजूद उस की ससुराल वाले उस के मातापिता से 65 लाख रुपए नगद मांग कर रहे थे.

बकौल निक्की यह सब राधे मां के कहने पर किया जा रहा था. राधे मां ने उसे एक तरह से अपनी बंधक बना लिया था. तमाम तरह की प्रताड़नाओं की वजह से उस का जीवन नर्क बनता जा रहा था. न कोई उसे बचाने वाला था, न ही उस की बात सुनने वाला. उस के मातापिता व भाई रौनक अग्रवाल उस की दशा देख कर अलग खून के आंसू रो रहे थे. लेकिन राधे मां के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत उन में भी नहीं थी. निक्की की सोच के मुताबिक राधे मां ने शायद उस पर काला जादू कर के उसे अपने वश में कर रखा था. वह जितना भी इस जाल से निकलने का प्रयास करती, उतना ही और ज्यादा फंसती जाती थी. आखिर जैसेतैसे एक दिन वह राधे मां के जाल से निकल कर अपने घर पहुंचने में सफल हो गई.

इस के बाद उस ने वकील सन्नी वास्कर से मिल कर अपनी तहरीर तैयार की और इसे ले कर पुलिस के पास पहुंची. लेकिन जब पुलिस ने कोई काररवाई नहीं की तो उस ने अदालत में अपनी याचिका लगाई. आखिर अदालत ने पुलिस को प्राथमिकी दर्ज कर के काररवाई करने का निर्देश दिया. निक्की की शिकायत पर पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कर के 6 लोगों के बयान लिए और राधे मां को थाने में पेश होने का लिखित आदेश दिया.

राधे मां के पास जब यह आदेश पहुंचा तब वह बोरीवली स्थित अपने आवास पर थीं, जहां से वह अचानक गायब हो गईं. पुलिस को संदेह हुआ कि कहीं वह विदेश भागने की कोशिश न करें, लिहाजा इस संबंध में रेड कौर्नर नोटिस जारी कर के उन की फोटो के साथ सभी हवाईअड्डों को सूचित कर दिया गया. इधर यह सब चल रहा था, उधर मुंबई की एक वकील फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट ने राधे मां पर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाते हुए उन के खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी. इस बारे में फाल्गुनी का कहना था कि राधे मां की कथित महिमा के बारे में सुन कर वह खुद उन के दरबार में गई थीं. वहां का माहौल एकदम अभद्र व अश्लील था, जिस से आहत हो कर उन्होंने राधे मां के खिलाफ बोरीवली थाने में शिकायत दर्ज करवाई.

बकौल फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट राधे मां अपने यहां लोगों को देर रात की पार्टियों में बुलाती हैं, जिस में वह बौलीवुड के गानों पर लोगों के साथ नाचती हैं. इतना ही नहीं, बल्कि वह अपने भक्तों खासकर पुरुषों को उन्हें गोद में उठा कर झूला झुलाने और चूमने को भी कहती हैं. मुंबई में जगहजगह राधे मां के होर्डिंग्स लगे हुए थे. उन्हें दुर्गा मां का अवतार कह कर प्रचारित किया गया था. वह रहती भी अपनी अलग वेशभूषा में थीं. निहायत कीमती लाल सुर्ख जोड़े के साथ महंगे आभूषणों से लदीफदी राधे मां के चेहरे पर फिल्मी तारिकाओं जैसी चमक और सौंदर्य झलकता था. वह गहरे लाल रंग की लिपस्टिक का इस्तेमाल करती थीं. उन के माथे पर गहरे लाल रंग की लंबी रेखा खिंची रहती थी.

केशविन्यास भी फिल्मी तारिकाओं से कम नहीं था, जिस में दाईं तरफ बालों में गुलाब का फूल टंका रहता था. इस कथित दिव्य रूप के साथ राधे मां के दाएं हाथ में गोटे वाली लाल रंग की चुनरी में लिपटा छोटा सा त्रिशूल होता था और बायां हाथ आशीर्वाद देने की मुद्रा में उठा रहता था. संभवत: मार्केटिंग को ध्यान में रखते हुए राधे मां का यही स्वरूप जनमानस को परोसा गया था. अपनी इसी छवि के साथ राधे मां आम लोगों के जेहन में समाई हुई थीं. दरअसल अगर कोई व्यक्ति उन का भक्त नहीं भी था तो भी वह उन के इस रूप को राधे मां के रूप में पहचानता था. इस कथित दिव्य चेहरे के पीछे कोई दूसरा चेहरा भी छिपा हो सकता था, इस बारे में अभी तक शायद किसी ने सोचने की जहमत नहीं उठाई थी.

लेकिन खुद को देवी का अवतार बताने वाली राधे मां के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने का जरा सा धुआं क्या उठा कि छोटे रूप में ही सही आग की चिंगारियां नजर आने लगीं. इन चिंगारियों की चमक तब और बढ़ गई जब सोशल साइट्स पर राधे मां का एक वीडियो वायरल हुआ. इस वीडियो में वह अपने चिरपरिचित परिधान की जगह थोड़े मौडर्न लिबास में फिल्मी गाने की धुन पर हिरणी वाले अंदाज में ठुमके लगाती हुई नजर आईं.

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई, किसी ने उन के कुछ ऐसे अभद्र चित्र भी नेट पर डाल दिए, जिन में वह निहायत आधुनिक लिबास पहने नजर आ रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे उन्होंने आधेअधूरे मौडर्न कपड़ों में मौडलिंग का सेशन करवाया हो. अभी तक यह रहस्य ही था कि आखिर राधे मां के इस तरह के फोटो जुटा कर किस ने सार्वजनिक कर दिए. इसी बीच टीवी कलाकार राहुल महाजन ने एक टीवी चैनल पर आ कर बताया कि ये फोटो उन्होंने अपने एक मित्र से हासिल कर के सार्वजनिक किए थे ताकि ऐसे ढोंगी साधुसंतों की सच्चाई लोगों के सामने आ सके.

इस के साथ ही राधे मां का हर क्रियाकलाप ब्रेकिंग न्यूज बनने लगा. सभी न्यूज चैनलों पर राधे मां पर होने वाली परिचर्चा दिखाई जाने लगी. कोई राधे मां के हक में बोल रहा था तो कोई विरोध में. अखबारों के पन्ने भी इस तरह के समाचारों से रंगने लगे थे. घरघर में राधे मां की चर्चा हो रही थी. दूसरी ओर अपने खिलाफ मामला दर्ज होने और पुलिस द्वारा थाने में पेश होने का सम्मन मिलने पर राधे मां अपने बोरीवली आश्रम कम निवास से गायब हो गईं. इस से पुलिस को संदेह हुआ कि राधे मां विदेश भागने की कोशिश कर सकती हैं. इसी के मद्देनजर उन के खिलाफ रेड कौर्नर नोटिस जारी कर दिया गया.

पुलिस को तो राधे मां की तलाश थी ही, मीडिया भी उन की खोजखबर लेने के लिए दिनरात शिद्दत से जुटा था. आखिर 8 अगस्त की भोर में कुछ मीडियाकर्मियों को पता चला कि राधे मां अपने खास भक्तों के साथ महाराष्ट्र के औरंगाबाद स्थित एक बड़े होटल में ठहरी हैं. उन्हें यह भी पता चला कि वह होटल से सुबहसुबह नांदेड़ के लिए रवाना हो जाएंगी. इस का नतीजा यह हुआ कि जब राधे मां नांदेड़ जाने के लिए तैयार हो कर होटल से बाहर निकलीं तो पत्रकारों ने उन्हें घेर कर सवाल दागने शुरू कर दिए, जिस पर एक बार तो वह बेहोश हो कर जमीन पर गिर गईं. इस पर उन के साथी पत्रकारों को लताड़ते हुए उन्हें गोद में उठा कर उन की कार तक ले गए. इस बीच वह होश में आ गई थीं.

राधे मां के पास काले रंग की चमचमाती विदेशी जगुआर कार थी. भारतीय मुद्रा में इस कार की कीमत करीब एक करोड़ रुपए है. इस कार में ड्राइवर के साथ वाली सीट हटा कर लाल रंग का सिंहासन लगवा दिया गया था. साथ ही इस के नीचे आने वाले कार के पहिए पर भी लाल रंग पोत दिया गया था. अन्य तीनों पहिए जिस तरह के थे, उन्हें वैसा ही रहने दिया गया था. पत्रकार लगातार प्रश्न पूछते हुए राधे मां के पीछे आ गए थे. राधे मां के साथियों ने जब उन्हें ले जा कर गाड़ी में बने सिंहासन पर बैठा दिया तो वह एक बार तो अपना चेहरा हाथों में छिपा कर रोने लगीं. फिर अचानक खिड़की का शीशा नीचे करते हुए पत्रकारों से मुखातिब हो कर बोलीं, ‘‘मैं मीडिया, पुलिस और कानून का सम्मान करती हूं. मेरा न्याय मेरा भगवान करेगा.’’

इस के बाद वह अपने समर्थकों समेत नांदेड़ के लिए रवाना हो गईं. मीडिया भी उन के पीछे लगा रहा. नांदेड़ के एक बड़े गुरुद्वारे में जा कर राधे मां ने मत्था टेका और अरदास की. 9 तारीख को वह मुंबई लौट आईं. इसी दिन किसी ने उन की वेबसाइट को हैक कर लिया. मातामणि श्री राधे गुरु मां चैरिटेबल ट्रस्ट के कार्यकारी ट्रस्टी संजीव गुप्ता ने इस बारे में पत्रकारों को बताया कि किसी शरारती तत्व ने वेबसाइट हैक कर के उस पर लिख दिया था— ‘प्लीज, ढोंग करने वाले किसी तथाकथित संत को मत पूजो. आप लोग मेहनत कीजिए. राधे मां को पूजने से कुछ नहीं होगा.’

बहरहाल जल्दी ही वेबसाइट को ठीक कर दिया गया. बहरहाल, मुंबई लौट कर राधे मां एक मजार पर चादर चढ़ाने भी गईं. इस के साथ ही उन्होंने कांदिवली थाने में एक लिखित प्रार्थनापत्र दे कर इस बात की गुजारिश की कि 14 अगस्त की बजाय थाने में उन की पेशी 26 अगस्त तक के लिए मुल्तवी कर दी जाए. दरअसल राधे मां के एक बेटे को हीरो के रूप में ले कर एक फिल्म निर्माता फिल्म बना रहे थे ‘इश्क डौट कौम’. इस फिल्म की शूटिंग बैंकाक में हो रही थी, जिसे देखने के लिए राधे मां को वहां जाना था. लेकिन पुलिस ने उन का यह अनुरोध अस्वीकार करते हुए अपना सख्त आदेश भिजवा दिया कि वह किसी भी सूरत में 14 अगस्त, 2015 को दिन के ठीक 12 बजे थाने में हाजिर हो जाएं, यही उन के हित में होगा.

नांदेड़ से मुंबई लौटने पर राधे मां बोरीवली न जा कर बालकेश्वर इलाके में स्थित अपने दूसरे आवास पर जा कर ठहर गई थीं. यहीं से उन्हें थाना कांदिवली पहुंचना था. इस जगह से थाने की दूरी करीब 30 किलोमीटर थी. मुंबई के ट्रैफिक को देखते हुए डेढ़-2 घंटे का वक्त लग सकता था. लिहाजा तय हुआ कि वहां से 10 बजे निकला जाए. अपने चिरपरिचित अंदाज में राधे मां सही वक्त पर अपने इस निवास से निकल भी आईं. लेकिन बाहर आते ही उन्हें पत्रकारों ने घेर लिया, जिस पर राधे मां ने इतना ही कहा, ‘‘देखिए, मैं पूरी तरह प्योर और पायस हूं. मैं ने आज तक कभी किसी का दिल नहीं दुखाया. मैं पूरी तरह प्योर हूं.’’

फिर उन्होंने पहले तो आम प्रचलित कवितानुमा बात कही, ‘‘सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से, खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फूलों से.’’

इस के बाद राधे मां ने कबीर के इस दोहे का उल्लेख किया, ‘‘साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप. जाके हृदय साच है ताके हृदय आप.’’

इस के बाद राधे मां ने खुद को बेकसूर कहते हुए फरमाया कि वह पैसे वाली देवी हैं, उन के श्रद्धालु उन्हें इतना चढ़ावा चढ़ाते हैं कि उन्हें पैसों की कोई कमी नहीं है. ऐसे में वह निक्की के परिवार वालों से पैसा क्यों मांगेगी? जबकि वह तो हमेशा दूसरों की मदद करती आई हैं. इसी मौके पर राधे मां ने इलैक्ट्रौनिक मीडिया के एक फोटोग्राफर से कहा, ‘‘बेटा, इस वक्त भी मेरी गाड़ी में 20 लाख रुपया पड़ा है, जिसे मैं जिसे चाहूं दे सकती हूं. तुम्हारा कैमरा अगर टूट जाए तो चिंता नहीं करना. मैं ले कर दूंगी तुम्हें नया कैमरा.’’

खैर, अपने साथियों, छोटी मां व टल्ली बाबा समेत वह अपने 60 समर्थकों सहित दिन के ठीक पौने 11 बजे कांदिवली थाने के लिए रवाना हो गईं. इस बार वह काले रंग की अपनी जगुआर कार पर न जा कर सफेद रंग की फार्चुनर गाड़ी से निकली थीं. बहरहाल, राधे मां ने थाने में क्या कहा, यह जानने से पहले उन का इतिहास खंगालने की कोशिश करते हैं. राधे मां का वास्तविक नाम है सुखविंदर कौर. कुछ लोग उन्हें बब्बो के नाम से भी जानते हैं. उन का जन्म 4 अप्रैल, 1965 को जिला गुरदासपुर (पंजाब) के गांव दोरांगला निवासी अजीत सिंह के यहां हुआ था.

उन की 3 बहनें और 2 भाई थे. अजीत सिंह पंजाब स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में नौकरी करते थे. अपनी पुत्रवधू की हत्या में सजा भुगतने के बाद 2014 में उन की मृत्यु हो गई थी. सुखविंदर ने गांव के सरकारी स्कूल से 10वीं पास की थी. जब वह कुल 17 साल की थी, तभी उस की शादी कर दी गई. उस की ससुराल जिला होशियारपुर के कस्बा मुकेरियां में थी. उस का पति मोहन सिंह अपने पिता करम सिंह हलवाई के साथ दुकान पर काम करता था.

सुखविंदर को धर्मकर्म में बचपन से ही रुचि थी. शादी के बाद भी उस का धर्मकर्म के प्रति लगाव बना रहा. इत्तफाक से उस की कही कई बातें सच हो गई थीं. इसी को ध्यान में रख कर उस ने अपने पति के बारे में भी भविष्यवाणी की कि विदेश में जा कर काम करने से वह अच्छा पैसा कमा सकते हैं. मोहन सिंह पत्नी की बात मानते हुए दोहा कतर चले गए. तब तक सुखविंदर 3 बच्चों की मां बन चुकी थी.

पति के विदेश जाने के बाद घरगृहस्थी चलाने के लिए सुखविंदर ने घर पर ही कपड़े सिलने का काम शुरू कर दिया. लेकिन उस ने अपनी भक्ति में कमी नहीं आने दी. स्थानीय काली मंदिर में जा कर वह घंटों काली मां की पूजाअर्चना किया करती थी. धीरेधीरे वह अध्यात्म की दिशा में मुड़ कर मुकेरियां स्थित डेरा परमहंस बाबा के महंत रामादीन दास की शिष्या बन गई. महंत ने उसे आध्यात्मिक दीक्षा दी. साथ ही नया नाम दिया—राधे मां.

इस के बाद सुखविंदर राधे मां के रूप में सत्संग करने लगीं. वैसे भी लोग अब उन्हें राधे मां के नाम से ही जाननेपुकारने लगे थे. खानपुर में मां भगवती मंदिर राधे मां का आध्यात्मिक केंद्र बन गया. आज भी वहां के लोगों का कहना है कि इस तरह के सत्संग के दौरान वह अपने भक्तों को वरदान देती थीं, जिस से उन के संकट दूर हो जाते थे. उन दिनों खुद को देवी का अवतार कहते हुए राधे मां जागरण भी किया करती थीं. सन 2002 में राधे मां ने फगवाड़ा में ऐसे ही एक भव्य जागरण का आयोजन करवाया, जिस में उन्होंने खुद को मां दुर्गा के अवतार के तौर पर प्रचारित करने का प्रयास किया. फगवाड़ा में रहने वाले विश्व हिंदू परिषद के नेता सुरेंद्र मित्तल ने इस बात का विरोध किया.

30 मार्च 2002 को हुए जागरण के बाद राधे मां एक कारोबारी अरण नंदा के दीवान हाउस में ठहरी हुई थीं. सुरेंद्र मित्तल ने अपने साथियों के साथ वहां पहुंच कर राधे मां का विरोध किया. यह विरोध प्रदर्शन 3 घंटों तक चला. मौके पर स्थानीय पुलिस भी पहुंच गई थी. आखिर राधे मां द्वारा सार्वजनिक रूप से माफी मांगे जाने के बाद यह प्रदर्शन खत्म हो पाया. जो भी था, एक जगह राधे मां का विरोध हुआ तो 10 जगह जयजयकार भी होती रही. राधे मां प्रवचन सुनातीं व जागरण करतीं और अपने भक्तों को आशीर्वाद देतीं. भक्त भी कहते रहे कि राधे मां के आशीर्वाद से उन के कष्ट दूर हो गए हैं.

कहते हैं कि ऐसा ही एक आशीर्वाद राधे मां ने मुंबई के एक भक्त मनमोहन गुप्ता को भी दिया था. काम हो जाने पर वह राधे मां से इस कदर प्रभावित हुए कि उन्हें अपने साथ मुंबई ले गए. इस तरह मुंबई का जानामाना गुप्ता परिवार राधे मां का अनन्य भक्त बन गया. मनमोहन गुप्ता का लड़का संजय गुप्ता अपनी ग्लोबल एडवरटाइजिंग एजेंसी चलाता था. यह एजेंसी बड़ेबड़े होर्डिंग्स लगाने का काम करती थी. संजय गुप्ता ने अपने इस व्यवसाय के माध्यम से राधे मां को उच्च श्रेणी की देवी बना कर लोगों के सामने पेश किया और अपने बोरीवली वाले विशाल बंगले की 2 मंजिलें उन्हें दे दीं. राधे मां को विदेशी जगुआर गाड़ी भी संजय गुप्ता ने ही भेंट की थी.

फलस्वरूप गुप्ता परिवार की बदौलत कुछ ही सालों में राधे मां की प्रसिद्धि इस तरह आसमान छूने लगी कि 2 अगस्त, 2012 को जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि ने गुरु पूर्णिमा पर अनुष्ठानों के साथ राधे मां को महामंडलेश्वर की पदवी से नवाज दिया. इस अलंकरण समारोह को पूरी तरह गुप्त रखा गया था. अखाड़े के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार महामंडलेश्वर पदवी मिलने के अगले ही दिन राधे मां मुंबई चली गई थीं. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी दिए जाने पर कई सवाल उठने लगे.

जांच के लिए राधे मां के आध्यात्मिक गुरु स्वामी पंचनंद के नेतृत्व में 11 सदस्यीय जांच समिति बनी. समिति ने राधे मां के जीवन से जुड़े विभिन्न स्थानों पर जा कर जांच की. इस के बाद उन्हें महामंडलेश्वर की पदवी से निलंबित कर दिया गया था. इस से पहले द्वारिकापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने राधे मां को नासिक कुंभ मेले में औपचारिक शाही स्नान में हिस्सा लेने से रोक दिया था. अखाड़ों में संतों के बीच राधे मां को ले कर भले ही कुछ भी चलता रहा हो, मुंबई में राधे मां का दबदबा तब तक पूरी तरह कायम रहा, जब तक निक्की ने उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं करवाई थी. निक्की की उसी रिपोर्ट ने उन्हें थाने पहुंचने को मजबूर कर दिया था.

बहरहाल, 14 अगस्त 2015 को दिन के ठीक पौने 11 बजे बालकेश्वर से चला राधे मां का काफिला 12 बज कर 20 मिनट पर थाना कांदिवली जा पहुंचा. मामले की नजाकत को देखते हुए थाने में भारी पुलिस बल का प्रबंध किया गया था. राधे मां के अलावा किसी को भी थाने के भीतर नहीं जाने दिया गया. थाने के विशेष रूम में 3 महिला इंसपेक्टरों और एक पुरुष इंसपेक्टर ने राधे मां से 75 सवालों की सूची के साथ 4 घंटे 42 मिनट तक पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान 25 मिनट तक राधे मां रोईं और एक बार बेहोश भी हुईं. तब उन्हें वातानुकूलित कमरे में ले जा कर उन की सहायक छोटी मां को भीतर बुलाया गया जो लगातार उन्हें टेट्रापैक जूस व काजू देती रहीं.

इस बीच राधे मां के वकील अशोक गुप्ते व आबाद कोंडा उन्हें हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत दिलवाने का प्रयास करते रहे जो आखिर स्वीकार कर ली गई. यह जमानत 2 हफ्तों के लिए स्वीकार की गई. साथ ही राधे मां को इस बात का निर्देश भी दिया गया कि उन्हें तय समय पर मामले की जांच के सिलसिले में कांदिवली पुलिस थाने जाना होगा. यह सिलसिला अभी ठंडा भी नहीं हुआ था कि इस दौरान अन्य कई जगहों पर राधे मां के खिलाफ शिकायतें दर्ज हो गईं. जगहजगह आक्रोश भी प्रकट हो रहा था.

इस सिलसिले में मुकेरियां में हिंदू संगठनों ने न केवल उन के विरोध में प्रदर्शन किया, बल्कि उन का पुतला जला कर उन के चित्रों वाले होर्डिंग्स पर कालिख पोत दी गई. तमाम संतों के बीच वह बहस का मुद्दा तो बनी ही रहीं. यहां तक कि राधे मां का मामला लोकसभा में भी गूंजा. सदन में सरकार से फरजी साधूसाध्वियों के खिलाफ कठोर कदम उठाने की मांग की जाती रही. मलोट कस्बे के वकील चूनीलाल भारती ने स्थानीय सिटी पुलिस में राधे मां के खिलाफ अपनी शिकायत दर्ज करवाते हुए आरोप लगाया कि राधे मां उर्फ सुखविंदर कौर खुद को दुर्गा मां का अवतार बता कर चौकी लगाती हैं. इस से जहां वह अंधविश्वास फैला रही हैं, वहीं वह धार्मिक भावनाओं से भी खिलवाड़ कर रही हैं. बकौल वकील भारती राधे मां ने यह पाखंड रच कर 1000 करोड़ की संपत्ति एकत्र की है.

राधे मां पर एक आरोप उन के भाई के ससुराल वालों ने भी लगाया है. आरोप के अनुसार पंजाब के गांव नानोमंगल निवासी बलविंदर कौर की शादी राधे मां के भाई सुखबीर सिंह हुई थी. बलविंदर आंगनवाड़ी में सरकारी नौकरी करती थी. शादी के 6 साल बाद तक उसे बच्चा नहीं हुआ तो 6 जून, 2002 को गला दबा कर उस की हत्या कर दी गई. इस आरोप में राधे मां के पिता अजीत सिंह और भाइयों सुखबीर सिंह व निर्मल सिंह के खिलाफ कत्ल का मुकदमा दर्ज हुआ. 11 अक्तूबर 2004 को इन तीनों को 10-10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी. बलविंदर के भाई जगतार सिंह ने आरोप लगाया है कि उस की बहन की हत्या के षडयंत्र में राधे मां भी शामिल थी, लेकिन उस के खिलाफ कुछ नहीं किया गया. अब इस की विस्तृत जांच की जाए.

हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा-चंबा सीमा पर स्थित हटली राम मंदिर के महंत श्यामसुंदर ने बताया कि वह और राधे मां गुरु रामादीन दास परमहंस के शिष्य थे. गुरुजी ने ही सुखविंदर कौर को राधे मां बनाया था. महंत श्यामसुंदर का आरोप है कि गुरुजी की संपत्ति हथियाने के मकसद से राधे मां एक बार उन्हें अपने साथ विदेश ले गईं, जहां से वापस आने पर गुरुजी इस कदर बीमार हुए कि आखिर मौत की नींद ही सो गए. महंत श्यामसुंदर को आशंका है कि अब राधे मां से उन्हें भी जान का खतरा है.

14 अगस्त को फगवाड़ा निवासी सुरेंद्र मित्तल ने एसएसपी कपूरथला को लिखित शिकायत दे कर राधे मां, उस की बहन राजेंद्र कौर उर्फ रज्जी मौसी, रितु सरीन उर्फ छोटी मां, उस की पुत्रवधू मेघा सिंह व संजीव गुप्ता पर धमकाने, अश्लीलता फैलाने व आडंबर रच कर हिंदू धर्म को ठेस पहुंचाने के आरोप लगाए हैं. लुधियाना में भी इस तरह की एक शिकायत अदालत में दर्ज हुई है. फिल्म अभिनेत्री डौली बिंद्रा पहले राधे मां की मुरीद थीं, अब उन्होंने भी इसी तरह की शिकायत मुंबई पुलिस में की है.

फिल्म अभिनेता ऋषि कपूर खुल कर राधे मां के खिलाफ बोले, तो दिग्गज फिल्म निर्माता सुभाष घई ने उन के हक की बात की. गायक सोनू निगम तो पूरी तरह राधे मां के समर्थन में उतर पड़े. 17 अगस्त 2015 को उन्होंने राधे मां के समर्थन में एक के बाद एक ट्वीट कर के उन का समर्थन करते हुए उन की तुलना काली मां से कर डाली. उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, ‘काली मां को तो राधे मां से भी कम कपड़ों में दर्शाया गया है, यह बहुत रोचक है कि यह देश कपड़ों की वजह से एक महिला पर केस चलाना चाहता है.’ सोनू का दूसरा ट्वीट था, ‘पुरुष साधु नग्न घूम सकते हैं, अजीब तरह के डांस कर सकते हैं, लेकिन रेप का आरोप लगने के बाद ही उन्हें जेल में डाला जा सकता है. क्या यह लैंगिक समानता है?’

सोनू ने तीसरे ट्वीट में लिखा, ‘केस चलाना चाहते हैं तो अनुयायियों पर केस चलाइए. अपने आप पर केस चलाइए. महिलाओं और पुरुषों को धर्मगुरु बनाने के लिए अलगअलग नियम. यह सही नहीं है.’ इसे ले कर सोनू निगम के खिलाफ केस भी दर्ज हुआ है क्योंकि उन्होंने राधे मां की तुलना काली मां से कर दी थी. बहरहाल, इसे रोचक ही कहा जाएगा कि इस वक्त राधे मां की सर्वाधिक चर्चा फिल्मनगरी में है. कोई उन का विरोध कर रहा है तो कोई उन के हक में आवाज बुलंद कर रहा है. राधे मां के एक पूर्व अनुयायी ने अपना नाम न छापने की शर्त पर जो बताया वह भी कम रोचक नहीं है, ‘सब माया का खेल था, जबरदस्त मार्केटिंग थी. प्रचार से लोग, बीड़ी कच्छा बेच कर क्या से क्या बन गए, यहां तो फिर भी…’

इसी सब के चलते 20 अगस्त को राधे को पुन: थाने बुलाया गया. इस बार उन के सामने 23 सवालों की सूची रखी गई. इस सूची में एक नया नाम ‘डैडी’ भी शामिल था. पूछताछ में राधे मां ने बताया कि डैडी उन के पति को कहा जाता है जबकि अपने और डैडी के पासपोर्ट के बारे में राधे मां ने कोई जानकारी नहीं दी. जो भी हो, ज्यादा रोचक तो इस समाचार को माना जाना चाहिए कि ‘ग्लैमरस राधे मां’ नाम से इस प्रकरण पर फिल्म की घोषणा भी हो गई है. Mumbai News

 

Lucknow News: धंधे की तपिश में झुलसी बेटी

Lucknow News: सायरा लखनऊ में देहधंधे की बड़ी धुरी थी. दूसरे की बेटियों को वेश्यावृत्ति की आग में झोंकने वाली सायरा अपनी बेटियों पर इस धंधे की छाया भी नहीं पड़ने देना चाहती थी. लेकिन उस की करतूतों की सजा बेटी को उठानी ही पड़ गई. सायरा जितनी खूबसूरत थी उतनी ही चंचल और शोख हसीन भी. अन्य लड़कियों की तरह शादी को ले कर उस के भी सुनहरे सपने थे. लेकिन उस के सारे सपने उस वक्त चकनाचूर हो गए जब उस की शादी सीतापुर जिले के महमूदाबाद कस्बे के हुसनैन के साथ हुई. उस का मायका भी इसी कस्बे के दूसरे मोहल्ले का था.

हुसनैन मेहनतमजदूरी करता था. वह जो पैसे कमाता था उस से उस के घर का केवल खर्च ही चल पाता था. ऐसे में उस ने अपने सपनों को एक तरफ सरका दिया और अपनी घरगृहस्थी में रम गई. लेकिन जब कभी वह गहने या अच्छे कपड़े पहनी हुई अन्य महिलाओं को देखती तो उस के दिल में टीस सी उठती थी. तब वह सोचती कि उस के सपने भी कभी पूरे होंगे या जिंदगी ऐसे ही अभावों में कटेगी.

जब उसे निश्चित हो गया कि कस्बे में रह कर उस के सपने पूरे नहीं हो सकते तो उस ने लखनऊ जाने की ठान ली और इस के लिए उस ने पति को भी किसी तरह तैयार कर लिया. इस के बाद सायरा और हुसनैन महमूदाबाद से लखनऊ पहुंच गए. पुराने लखनऊ में उन्होंने एक कमरा किराए पर ले लिया. शहर में जाते ही कोई काम मिलना आसान नहीं होता, इसलिए हुसनैन रिक्शा चलाने लगा. इस से उसे पहले से ज्यादा कमाई होने लगी पर शहर में रहने की वजह से उन के खर्च भी बढ़ने लगे थे. इस के बावजूद भी दोनों वहां खुश थे.

सायरा खुद भी अपने लिए कामधंधे की तलाश में लग गई. किसी जानकार के माध्यम से उसे एक ब्यूटीपार्लर में काम मिल गया. उस की शादी को 8 साल हो हो चुके थे और वह 4 बच्चों की मां भी बन गई थी. ब्यूटीपार्लर में काम करने की वजह से वह बनठन कर रहती थी. इस से पता नहीं लग पाता था कि वह 4 बच्चों की मां है. उसी ब्यूटीपार्लर में काम करने वाली परवीन नाम की एक औरत से उस की दोस्ती हो गई. सायरा परवीन से अपने घर के हालात बताती रहती थी.

एक दिन परवीन ने उस से कहा, ‘‘सायरा, तुम्हारी गरीबी देख कर मुझे दया आ रही है. वैसे मेरे पास एक काम है. इस में पैसा खूब है लेकिन यह बात तुम अपने तक ही रखना.’’

‘‘क्या काम है और इस में मुझे करना क्या होगा?’’ सायरा ने अचंभे से पूछा.

‘‘देख, करना कुछ नहीं है. बस यह समझ ले कि जिस काम को तू हुसनैन के साथ मुफ्त में करती है, उसी को तुझे दूसरी जगह करना है. 3 से 4 घंटे में ही तुझे उतने पैसे मिल जाएंगे, जितने ब्यूटीपार्लर में 15 दिन में नहीं कमाती होगी.’’

‘‘अच्छा…’’ सायरा हंसते हुए बोली.

‘‘मैं तो कई सालों से इसे मजे से कर के पैसे कमा रही हूं.’’ परवीन ने बताया.

‘‘फिर तुम ब्यूटीपार्लर में नौकरी क्यों करती हो?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘वह तो सिर्फ दिखावे के लिए है. इस बहाने मैं घर से बाहर आ जाती हूं.’’

‘‘इस में कोई रिस्क तो नहीं है?’’ सायरा ने पूछा.

‘‘रिस्क कैसा. तू मेरे साथ रहेगी तो सब जान जाएगी. हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं.’’ परवीन ने कहा तो सायरा ने हां कर दी. इस के बाद दोनों मिल कर जिस्मफरोशी का धंधा करने लगीं.

सायरा के पति हुसनैन को पता नहीं था कि उस की बीवी क्या काम करती है. जबकि उस की गतिविधियों से मोहल्ले वाले उस के चालचलन को जान चुके थे. मगर इस की उस ने चिंता नहीं की. उस का मकसद पैसे कमाना था, इसलिए लोगों की बातों को अनसुना कर वह अपने मिशन में जुटी रही. परवीन के साथ रह कर सायरा भी इस क्षेत्र की खिलाड़ी बन गई. धंधे की सारी जानकारी हो जाने के बाद सायरा परवीन से अलग रह कर काम करने लगी.

फिर उस ने पुराना मोहल्ला का कमरा छोड़ कर मडियांव इलाके में दूसरा कमरा किराए पर ले लिया. यहां उस ने एक प्लौट भी खरीद लिया. मडियांव इलाके में घनी आबादी नहीं थी. वह एक नई कालोनी बस रही थी. इस कारण वहां पर कौन किस के पास आजा रहा है, इस का किसी को पता भी नहीं चल रहा था. कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रह सकता. यानी उस के पति हुसनैन को भी उस के धंधे की भनक लग गई. उस ने उसे डांटा और उस के काम का विरोध किया पर सायरा को बिना कोई ज्यादा मेहनत किए अच्छी आमदनी हो रही थी इसलिए उस ने पति के विरोध की परवाह नहीं की.

हुसनैन भी गैरतमंद था, अपनी बात पर अड़ते हुए उस ने पत्नी को कई चेतावनियां भी दीं. इस का भी उस पर असर नहीं हुआ तो वह उस से अलग हो कर दूसरी जगह रहने लगा. अब सायरा की लगाम कसने वाला कोई नहीं था. वह अपने घर पर ही ग्राहकों को बुलाने लगी. इसी दौरान उस की मुलाकात हरदोई जिले के लालबहादुर मिश्रा से हुई. सायरा को एक ऐसे आदमी की जरूरत थी जो उस के साथ रहे और कोई मुसीबत आए तो उस का साथ दे. सायरा के काम से वाकिफ होते हुए भी लालबहादुर मिश्रा ने सायरा से शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपना नाम शम्सुद्दीन रख लिया.

लालबहादुर का साथ मिलते ही सायरा की कमाई तेजी से बढ़ने लगी. अब उस ने अपने साथ दूसरी लड़कियां भी रख लीं. इस से उसे और ज्यादा कमाई होने लगी. कुछ दिनों बाद उस ने मडियांव की ही बसंत विहार कालोनी में एकएक कर के 4 प्लौट खरीद लिए. इन में से 2 प्लौट अपने नाम से और 2 लालबहादुर के नाम पर थे. करीब 1 हजार वर्गमीटर के इन प्लौटों पर उन्होंने 28 कमरे बनवाए. सारे कमरों को होटल के कमरों की तरह से तैयार कराया गया था. सभी कमरों में होटल की तरह सभी सुविधाएं मौजूद थीं.

कमरों में एसी, फ्लोर टाइल्स, छतों पर पीओपी की पूरी कारीगरी, दीवारों पर महंगा पेंट और कमरों में आरामदायक बेड डाले गए थे. कमरे इस तरह से बनाए गए थे कि आपातकाल में वहां से सुरक्षित निकला जा सके. मडियांव में हिंदुओं की आबादी ज्यादा थी इस वजह से वह हिंदू औरत की तरह रह रही थी. उस के मोहल्ले में भी किसी को यह पता नहीं था कि उस का पति हिंदू से मुस्लिम बन गया है. सायरा ने अपने घर के सामने एक मंदिर भी बनवा रखा था. वह खुद भी सुबहशाम उस मंदिर में पूजा करने जाती थी. सायरा के इस काम से मोहल्ले वाले भी प्रभावित रहते थे.

दूसरी ओर सायरा अपने धंधे को और बढ़ाने का काम भी कर रही थी. उस के पास दूसरे शहरों से भी लड़कियां आने लगीं. वह लड़कियां उस के मकान में ही ठहरती थीं. मोहल्ले वालों से उन लड़कियों को किराएदार बताती. किसीकिसी को वह अपनी रिश्तेदार तक बता देती थी. वहां जो ग्राहक आते, उन से कमरों का किराया भी वसूलती थी. इस तरह उस की आमदनी दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी. धीरेधीरे सायरा के संबंध दूसरे राज्यों में जिस्मफरोशी का धंधा करने वाले लोगों से भी हो गए. दिल्ली, मुंबई व अन्य शहरों की सी-ग्रेड की मौडल भी उस के यहां आने लगीं. कुछ दलाल उस के यहां नाबालिग लड़कियों को भी छोड़ जाते थे. उन्हें वह अपने घर के तहखाने में ठहराती थी.

तहखाने में भी एसी लगे थे. जब कोई लड़की देहधंधे के लिए तैयार नहीं होती तो उस को डरायाधमकाया जाता था. उसे भूखाप्यासा रखा जाता था. वहां रहने वाले मुस्टंडे उस के साथ बलात्कार करते. ऐसी प्रताड़नाओं को सह कर ज्यादातर नाबालिग लड़कियां सायरा की बात मानने को तैयार हो जाती थीं. तब वह उन्हें ग्राहकों के पास भेज देती थी. सायरा के ग्राहकों में पुलिस, बिल्डर, माफिया और छोटे नेता तक शामिल थे. ये उस के यहां आते थे तो कई अपने पास ही लड़कियां बुलवाते थे. अपने धंधे को चलाने के लिए उस ने लखनऊ में ही अलगअलग जगहों पर कुछ और कमरे भी किराए पर ले रखे थे.

वह दूसरों की लड़कियों को देहधंधे में लगाने का काम करती थी. लेकिन उस ने अपनी लड़कियों को इस से दूर रखा. अपनी बड़ी बेटी सना की वह शादी कर चुकी थी. अपनी छोटी बेटी सोनी और बेटे साजिद को वह अपने साथ रखती थी. उस के यहां बाहरी लोगों का ज्यादा आनाजाना हो गया तो मोहल्ले वाले भी उस की असलियत समझ गए. फिर तो उस के यहां आए दिन छापे पड़ने लगे. सायरा की जिंदगी ऊपर से भले ही सरल दिख रही थी, पर उस की परेशानियां भी कम नहीं थीं. मोहल्ले वालों की शिकायत पर उस के अड्डे पर कई बार पुलिस के छापे भी पड़े, जिस में सायरा और लालबहादुर को जेल भी जाना पड़ा. बाद में वे लोग जमानत पर जेल से बाहर आ गए.

उन के ऊपर कई मुकदमे चल रहे थे. लालबहादुर पर गुंडा एक्ट भी लगा हुआ था. उसे जिला बदर भी किया गया था. इस के बावजूद भी वह पुलिस से चोरीछिपे अपने घर पर रह रहा था. सायरा ग्राहकों की मांग पर अपने घर के कमरों को खास किस्म की थीम से भी सजाती थी. इस के लिए ग्राहक को अलग से पैसा देना पड़ता था. जैसे किसी ग्राहक को सुहागरात जैसा कमरा चाहिए तो वह फूलों से सजा कर कमरे को तैयार करा देती थी.

पहली जून, 2015 की रात करीब साढ़े 8 बजे सायरा कहीं बाहर से घर लौटी थी. लालबहादुर और बेटा साजिद कुछ सामान लेने के लिए बाजार गए थे. घर में अंदर घुसने के बाद सायरा ने अपनी साड़ी उतार कर मैक्सी पहन ली. उस की 16 साल की बेटी सोनी किचन में खाना बना रही थी. उसी समय दरवाजे पर दस्तक हुई. सायरा ने दरवाजा खोला तो सामने 2 लोग थे. सायरा उन में से एक को जानती थी. इसलिए उस ने उन्हें घर में बुला लिया. तभी उन में से एक युवक ने बड़ी फुरती से सायरा की कनपटी और गरदन पर गोली मार दी.

गोलियों की आवाज सुन कर बेटी सोनी किचन से बाहर आई तो बदमाशों को देख कर डर की वजह से वह बाथरूम में घुस गई. लेकिन वह बाथरूम का दरवाजा बंद कर पाती, उस से पहले ही बदमाश उस के पीछेपीछे पहुंच गए. दरवाजा खोल कर उन्होंने सोनी के माथे पर गोली मार कर हत्या कर दी. 2 लोगों की हत्या कर के बदमाश वहां से भाग गए. आधे घंटे बाद सायरा का बेटा साजिद घर लौटा तो घर का गेट खुला देख कर उसे कुछ अजीब लगा. वह अंदर दाखिल हुआ तो मां को खून से लथपथ देख कर उस की चीख निकल गई. फिर वह अपनी बहन सोनी की तलाश करने लगा.

बाथरूम में वह भी मृत अवस्था में मिली. दोनों लाशें देख कर वह जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने की आवाज सुन कर आसपास के कुछ लोग वहां आ गए. उन के सहयोग से वह मां और बहन को मैडिकल कालेज के ट्रामा सेंटर ले गया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल की तरफ से सूचना थाना मडियांव पुलिस को दे दी गई. सूचना मिलने के बाद थानाप्रभारी संतोष सिंह भी अस्पताल पहुंच गए. पुलिस ने घटनास्थल का भी निरीक्षण किया.

मडियांव थाने से महज कुछ दूरी पर हुए दोहरे हत्याकांड से पुलिस भी हैरान रह गई. खबर मिलने पर सीओ राजेश यादव और डीआईजी आर.के. चतुर्वेदी मौके पर पहुंच गए. साजिद ने पुलिस को बताया कि उस की मां हर समय ज्वैलरी पहने रहती थीं. पर उन की लाश पर एक भी ज्वैलरी नहीं थी. हत्यारे उस की मां के सारे गहने भी उतार कर ले गए. घटनास्थल की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के आवश्यक काररवाई शुरू कर दी. इस केस को खोलने के लिए एक पुलिस टीम बनाई गई. टीम में इंसपेक्टर संतोष सिंह, एसएसआई अक्षय कुमार सिंह, हेडकांस्टेबल अमरेश त्रिपाठी, सिपाही अनिल सिंह, हमीदुल्लाह, राजीव पांडेय, लवकुश, रामनरेश कनौजिया आदि को शामिल किया गया.

पुलिस ने सायरा के धंधे और उस से जुड़े हर पहलू की छानबीन शुरू की. दिन पर दिन बीतते रहे लेकिन घटना से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. इस बीच लखनऊ में राजेश पांडेय को एसएसपी के रूप में तैनात किया गया. एसएसपी ने टीम के साथ मिल कर केस की समीक्षा की. सर्विलांस सेल को भी टीम के साथ लगाया गया. फिर सायरा के नजदीकियों से एकएक कर के पूछताछ की. इस का नतीजा यह निकला कि पुलिस टीम हत्यारे तक पहुंच गई. हत्यारा भी और कोई नहीं सायरा की खास सहेली फिरोजा का पति शिवओम निकला. उस ने इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

शिवओम मडियांव थाने के ही नौबस्ता का रहने वाला था. वह आपराधिक किस्म का था. सन 2003 में उस ने अपनी पहली पत्नी पंचमाला उर्फ सुमन की हत्या कर के उस की लाश भी ठिकाने लगा दी थी. पंचमाला के साथ शिवओम की शादी सन 1996 में हुई थी. उस के एक बेटी भी हुई. बेटी के पैदा होने के बाद शिवओम घर से दूर रहने लगा था. पंचमाला ने जब पति की छानबीन की तो पता चला कि उस ने धर्म बदल कर खदरा की रहने वाली फिरोजा से निकाह कर लिया है. तब 2 मई, 2003 को पंचमाला ने शिवओम के खिलाफ विकास नगर थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया. रिपोर्ट दर्ज होते ही शिवओम डर गया. पुलिस के डर से उस ने पत्नी के साथ समझौता कर लिया और उसे अपने घर ले आया.

9 जुलाई, 2003 को पंचमाला अचानक कहीं लापता हो गई. पुलिस ने जब शिवओम से पूछताछ की तो उस ने सारी सच्चाई बयां कर दी. उस ने बताया कि वह पंचमाला की हत्या कर के लाश को ठिकाने लगा चुका है. तब पुलिस ने पत्नी की हत्या के आरोप में उसे जेल भेज दिया. अदालत में केस चलने के बाद उसे 7 साल की सजा हुई, लेकिन बाद में हाईकोर्ट से जमानत मिलने पर वह बाहर आ गया. शिवओम की दूसरी पत्नी फिरोजा की सायरा से अच्छी दोस्ती थी. फिरोजा की 2 बेटियां थीं. कई बार फिरोजा सायरा के पास जाती तो अपनी दोनों बेटियों को भी ले जाती थी.

शिवओम सायरा के धंधे से वाकिफ था, इसलिए फिरोजा का उस के यहां जाना उसे पसंद नहीं था. उसे शक था कि सायरा कहीं उस की पत्नी और दोनों बेटियों को भी देहधंधे में न लगा दे. उस ने पत्नी से कहा कि वह सायरा से नहीं मिला करे लेकिन सायरा फिरोजा की गहरी दोस्त थी, इसलिए उस ने पति की बात नहीं मानी. शिवओम ने कई बार सायरा को भी समझाया था कि वह उस की पत्नी और बेटियों से न मिला करे. लेकिन सायरा ने उस की बात को अनसुना कर दिया. तब उस ने सायरा को ही रास्ते से हटाने की योजना बना ली.

पहली जून, 2015 की देर शाम को योजना के अनुसार शिवओम अपने दोस्त आमिर के साथ सायरा के घर पहुंच गया. दरवाजा बंद था. दस्तक देने पर सायरा ने दरवाजा खोला तो शिवओम ने उसे 2 गोली मारी, जिस से उस का वहीं काम तमाम हो गया. तभी सायरा की बेटी सोनी वहां आ गई. चूंकि वह शिवओम को पहचानती थी, इसलिए न चाहते हुए मजबूरी में उस की हत्या करनी पड़ी. सायरा के शरीर पर सोने के काफी गहने थे. शिवओम ने उस के सारे गहने उतारे और भाग गया. गहने गायब होने से पुलिस को शुरू में यह शक हुआ था कि कहीं हत्या की वजह लूट तो नहीं थी. लेकिन पुलिस ने जब जांच की तो मामला दूसरा ही निकला.

एसएसपी राजेश पांडेय ने केस का खुलासा करने वाली टीम की सराहना की है. जिस देहधंधे ने सायरा को गरीबी से उठा कर ऐशोआराम की जिंदगी मुहैया कराई, वही धंधा उस की मौत का कारण बना. इस तरह की घटनाओं से यही सीख मिलती है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है. बुराई का अंजाम उस व्यक्ति को ही नहीं, उस के पूरे परिवार को उठाना पड़ता है. Lucknow News

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

Crime Stories: जानलेवा

Crime Stories: इन्क्वायरी अफसर ने अपनी जांच में पूरे भरोसे के साथ औफिस बौय रमीज को कत्ल के इल्जाम में फंसा दिया था कि असली मुलजिम यही है, लेकिन एडवोकेट मिर्जा अमजद बेग ने अपने तर्कों से उस की जांच को गलत साबित कर दिया. जो औरत मेरे सामने बैठी थी, वह चेहरे से ही काफी परेशान लग रही थी. वह 28-29 साल की गोरी सी दुबलीपतली औरत थी. शक्लसूरत से वह किसी शरीफ घराने की लग रही थी. मैं ने उस से आने की वजह पूछी तो उस ने दुखी

लहजे में कहा, ‘‘वकील साहब, मेरे शौहर को बचा लीजिए.’’

‘‘आप के शौहर को क्या हुआ, किस से बचाना है उन्हें?’’

‘‘पुलिस उन्हें कत्ल के इल्जाम में पकड़ ले गई है.’’

‘‘आप के शौहर ने किस का कत्ल किया है?’’

‘‘वकील साहब, मेरे शौहर ने कोई कत्ल नहीं किया, फिर भी उन पर पुलिस माजिद निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ ले गई है. उन्हें किसी गहरी साजिश के तहत फंसाया गया है.’’

मेरे सवालों के जवाब में उस औरत ने जो बताया था, उस के अनुसार औरत का पति रमीज और माजिद निजामी एक ही कंपनी में काम करते थे. कंपनी का नाम खान ट्रेडर्स था, जो एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम करती थी. निजामी उस कंपनी में जनरल मैनेजर था, जबकि रमीज औफिस बौय था. उसे चपरासी भी कह सकते हैं. रमीज सीधासादा, लड़ाईझगड़े से दूर रहने वाला ठंडे मिजाज का आदमी था. उस से औफिस का हर आदमी खुश रहता था.

इतना जान लेने के बाद मैं ने उस औरत, जिस का नाम सानिया था, से पूछा, ‘‘जब तुम्हारे शौहर के सब से इतने अच्छे संबंध थे तो फिर उन्हें पुलिस क्यों पकड़ ले गई?’’

उस ने उदासी से कहा, ‘‘यह मुझे नहीं मालूम.’’

‘‘यह कब और कहां की बात है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘माजिद निजामी को कल शाम औफिस के उस के कमरे में कत्ल किया गया था और मेरे शौहर को आज सुबह 9-10 बजे घर से गिरफ्तार किया गया. उस समय वह औफिस जाने की तैयारी कर रहे थे.’’

‘‘गिरफ्तार करते समय पुलिस ने क्या कहा था?’’

‘‘कोई सवाल किए बगैर पुलिस ने सीधे उन पर निजामी के कत्ल का इल्जाम लगा कर पकड़ लिया था. परेशान हो कर मैं भागीभागी थाने पहुंची तो वहां सिर्फ इतना पता चला कि रमीज ने औफिस के मैनेजर निजामी का कत्ल कर दिया है. इस के बाद मैं उन के औफिस गई तो बाकी बातें वहां से पता चलीं.’’

‘‘आप को इस केस से संबंधित छोटीबड़ी जो भी बातें औफिस से पता चली हों, मुझे विस्तार से बताओ. उस के बाद ही मैं आप के शौहर की कुछ मदद कर सकूंगा.’’

सानिया ने मुझे जो कुछ बताया था, वह इस प्रकार था. खान ट्रैडर्स का औफिस एक मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में था, जो बलोच कालोनी के पास थी. उस बिल्डिंग में खान ट्रैडर्स का औफिस तीसरी मंजिल पर था. वहां एक्सपोर्टइंपोर्ट का काम होता था. रमीज को वहां काम करते 6 साल हो गए थे. वह भले ही कम पढ़ालिखा था, लेकिन चपरासी का अपना काम बहुत अच्छे से करता था, जैसे फाइलें इधर से उधर पहुंचाना, चाय बनाना, पिलाना, लंच करवाना और औफिस की सफाई आदि अपनी निगरानी में करवाना. बैंक के काम भी वही करता था.

सईद खान बड़ा बिजनैसमैन था. एक अरसे से वह यह कंपनी चला रहा था. शहर में उस का नाम था. वह डिफैंस इलाके में रहता था. अन्य स्टाफ में महमूद खान, जो एकाउंट देखता था, नादिरा अलवी कंपनी की डायरेक्टर थीं. मकतूल निजामी जनरल मैनेजर था. लुबना अली रिसैप्शनिस्ट थीं, जो फोन औपरेटर का भी काम करती थीं. खान ट्रैडर्स के औफिस का समय 10 बजे से 6 बजे था. एक रमीज को छोड़ कर बाकी सभी लोग 11 बजे तक आते थे. वह जल्दी इसलिए आ जाता था, क्योंकि उसे औफिस खोल कर साफसफाई करवानी होती थी. उस दिन वह औफिस जाने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने उसे उस के घर से गिरफ्तार कर लिया था.

मकतूल निजामी समनाबाद में अपनी बीवीबच्चों के साथ रहता था. वह कर्मठ और ईमानदार आदमी था. औफिस में वह काफी देर तक काम करता था, जिस से रात 9 बजे तक घर पहुंचता था. लेकिन उस दिन जब वह 10 बजे तक भी घर नहीं पहुंचा तो उस की बीवी शाइस्ता ने औफिस फोन किया. औफिस में किसी ने फोन नहीं उठाया तो उसे लगा कि वह औफिस से निकल चुके हैं. उस ने थोड़ी देर और राह देखी. जब काफी देर हो गई तो उस ने असिस्टैंट को फोन किया. उस ने कहा, ‘‘आ जाएंगे, कहीं फंस गए होंगे.’’

लेकिन शाइस्ता की परेशानी बढ़ती जा रही थी, क्योंकि निजामी का कुछ अतापता नहीं चल रहा था. असिस्टैंट ने बताया था कि जब वह औफिस से निकला था तो निजामी काम कर रहे थे. रमीज भी था. उस ने यह भी बताया कि जब एकाउंटैंट महमूद औफिस से निकला था तो उन के पास कोई मिलने वाला बैठा था. जब कहीं से कुछ पता नहीं चला तो रात साढ़े 11 बजे शाइस्ता ने अपने बड़े बेटे इमरान को मोटरसाइकिल से औफिस भेजा. घर से औफिस काफी दूर था, इसलिए वह वहां देर रात पहुंचा. वह मोटरसाइकिल खड़ी करने के लिए पार्किंग में गया तो यह देख कर चौंका कि उस के पापा की कार वहां खड़ी थी. इस का मतलब पापा अभी औफिस में ही थे.

उस ने एक बार फिर औफिस में फोन किया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. वह बड़बड़ाया, ‘अगर पापा अंदर हैं तो फोन क्यों नहीं उठा रहे हैं?’

उस ने चौकीदार के पास जा कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जब मैं ने औफिस बंद किया था तो वहां कोई नहीं था.’’

चौकीदार भी सोच में पड़ गया कि आखिर निजामी साहब कहां चले गए? इमरान ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने उन्हें जाते हुए देखा था?’’

‘‘नहीं, मैं उस समय गेट पर मौजूद नहीं था.’’

‘‘जब उन की गाड़ी यहां खड़ी है तो वह कैसे चले गए?’’

‘‘हो सकता है गाड़ी खराब हो गई हो, इसलिए यहीं छोड़ गए हों.’’

‘‘वह कभी इस तरह गाड़ी छोड़ कर नहीं जा सकते. चलो मान लेते हैं कि उन्होंने गाड़ी छोड़ दी, लेकिन उन्हें घर तो पहुंचना चाहिए. तुम मेरे साथ ऊपर चलो, हम वहां देखते हैं.’’

चौकीदार इमरान के साथ चल पड़ा. ऊपर जाते हुए चौकीदार ने पूछा, ‘‘आप ने औफिस के अन्य लोगों को फोन कर के उन के बारे में पूछा था?’’

‘‘हां, उन के असिस्टैंट और दोस्तों से पूछा था, कहीं से कुछ पता नहीं चला. रिश्तेदारों से भी पूछा था.’’

चौकीदार ने सोचते हुए कहा, ‘‘एक उलझन है. जब कोई औफिस में गाड़ी छोड़ कर जाता है तो मुझे जरूर बताता है, पर निजामी साहब ने कुछ नहीं कहा था.’’

ऊपर पहुंच कर चौकीदार ने निजामी के कमरे के दरवाजे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘देखिए, दरवाजा बंद है.’’

लेकिन जब इमरान ने दरवाजे के हैंडल को घुमा कर हलका सा धक्का दिया तो दरवाजा खुल गया. इस का दरवाजा लौक नहीं था. चौकीदार बड़बड़ाया, ‘‘मैं ने तो सारे दरवाजों के हैंडल घुमा कर देखे थे, पता नहीं यह कैसे खुला रह गया?’’

दोनों कमरे के अंदर घुसे. कमरे में लाइट जल रही थी. पंखा भी चला रहा था. सामने एक दहशतनाक मंजर था, निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था, उस की गरदन और सिर टेबल पर बेढंगे अंदाज में रखा था. चेहरे का बायां हिस्सा बाएं कान के बल पर टेबल पर टिका था और दाईं ओर से उस की गरदन कान से जरा नीचे और आगे से पीछे तक कटी हुई नजर आ रही थी. किसी बहुत तेज धार वाले हथियार से गरदन इस तरह काटी गई थी कि आधी से अधिक कट गई थी. यह खतरनाक काम उस समय किया गया था, जब निजामी अपनी कुरसी पर बैठा था.

गरदन काटने के बाद उस का सिर झटके से टेबल पर आ टिका था. वार इतना घातक था कि उसे मरने में जरा भी देर नहीं लगी. उस की गरदन से निकला खून औफिस में बिछे कालीन को दागदार कर गया था. इमरान बाप की लाश देख कर बुरी तरह घबरा गया. उस ने मां को फोन किया. चौकीदार ने कंपनी के मालिक सईद खान और अन्य लोगों को फोन किया. करीब 4 बजे सुबह तक सईद खान, महमूद, नादिरा और लुबना आदि पहुंच गए. रमीज के घर फोन नहीं था, इसलिए उसे खबर नहीं दी जा सकी. जल्दी ही पुलिस भी पहुंच गई.

इंसपेक्टर कादरबख्श अपने 2 साथियों के साथ आया था. जांचपड़ताल और पूछताछ शुरू हुई. चौकीदार से भी पूछताछ की गई. इस पूछताछ में पुलिस का शक रमीज पर गया. पुलिस को उसी पर क्यों शक हुआ, यह आप को अदालत की काररवाई के दौरान पता चलेगा. सानिया की विपदा सुन कर मैं ने यह केस ले लिया था. अगले दिन पुलिस ने रमीज को अदालत में पेश किया. उस पर निजामी का बेदर्दी से कत्ल करने का इल्जाम था. हालात और मौके की स्थिति भी कुछ यही कह रही थी. अदालत ने थोड़ी काररवाही के बाद मुलजिम रमीज को 7 दिनों के पुलिस रिमांड पर दे दिया.

अदालत के बाहर सानिया 5 साल की बेटी को लिए परेशान खड़ी थी. मैं ने उसे तसल्ली दे कर कहा, ‘‘यह कत्ल का केस है, अभी जमानत का सवाल ही नहीं उठता. चिंता मत करो, अगर तुम्हारा शौहर बेगुनाह है तो वह जरूर छूट जाएगा.’’

रमीज से मुलाकात होने पर कई बातें और पता चलीं. औफिस के हालात, आपस के ताल्लुक और वहां की हर छोटीबड़ी बात मैं ने उस से पूछी. मैं ने उस से कहा, ‘‘सारी सच्चाई सुन कर साफ लगता है कि तुम्हें फंसाया गया है, पर इस का ठोस सबूत ढूंढना जरूरी है. तुम्हारा औफिस में कोई ऐसा हमदर्द है, जो तुम्हारी मदद कर सकता है.’’

‘‘हां, लुबना मैम औफिस की राजनीति में नहीं रहतीं. वह मेरी हमदर्द भी हैं. वह आप को बहुत कुछ बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें काफी कुछ पता है.’’

‘‘मैं लुबना से बात करूंगा. क्या औफिस के बाहर भी तुम्हारा ऐसा कोई दोस्त है, जो मेरे लिए जानकारियां जुटा सकता है?’’

‘‘हां, मेरा एक अच्छा दोस्त है बाबर अली, वह प्रूफ रीडिंग करता है, समझदार और पढ़ालिखा भी है.’’

रमीज ने उस का फोन नंबर मुझे दे दिया था. मैं ने लुबना से फोन पर बात की तो उस ने कहा, ‘‘यहां मैं कुछ नहीं कह सकती. आप के औफिस आ कर बात करूंगी.’’

अगले दिन शाम को वह मेरे औफिस आई. मुझे उस से काफी उपयोगी जानकारियां मिलीं. पर इस शर्त के साथ कि बीच में उस का नाम नहीं आना चाहिए. इस के बाद मैं ने बाबर अली से मुलाकात की. वह बड़े काम का आदमी निकला. मैं ने उसे केस से संबंधित कुछ जानकारियां जुटाने की जिम्मेदारी सौंपी थीं, उस ने बड़ी मेहनत तथा फुरती से काम शुरू कर दिया और कई बातें मालूम कर लीं. वे जानकारियां रमीज को बरी करवाने में बड़ी उपयोगी साबित हुईं.

रिमांड अवधि खत्म होने के बाद भी रमीज की जमानत नहीं हो सकी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक माजिद निजामी की मौत 11 जुलाई की रात 6 से 8 के बीच हुई थी. तेज धार वाले हथियार से उसे मौत के घाट उतार गया था. पुलिस ने वहीं से हथियार को बरामद भी कर लिया था. वह तेज धार की बड़ी छुरी थी. उस के लंबे फल पर लगे खून के नमूने को लेबौरेटरी भेजा गया था, वहां से पता चला कि उसी से कत्ल किया गया था. 2 महीने बाद मुकदमे की बाकायदा सुनवाई शुरू हुई. जज ने मुलजिम के अपराध की रिपोर्ट पढ़ कर सुनाई. मेरे मुवक्किल ने कत्ल से साफ इनकार कर दिया. सरकारी वकील ने रमीज से कुछ सवाल किए. जिस का मतलब कुछ इस तरह निकलता था.

वह 6 सालों से खान ट्रैडर्स में मेहनत, लगन और ईमानदारी से काम कर रहा था. उस से सब खुश थे, घर की माली हालत ठीक न होने की वजह से वह अकसर कंपनी से लोन या एडवांस लेता रहता था. पिछले 6 सालों में वह 9 बार एडवांस ले चुका था. सरकारी वकील ने इसी बात को मुद्दा बना कर उसे उलझाना चाहा, ‘‘रमीज, तुम ने दसवीं बार औफिस से एडवांस मांगा था. इस की क्या वजह थी और इस का क्या नतीजा निकला था?’’

‘‘मैं एक बड़ी मुसीबत में फंस गया था. मेरे एक बड़े ही अजीज दोस्त ने मुझ से 10 हजार रुपए मांगे थे, जो मेरे पास नहीं थे. उसे पैसों की सख्त जरूरत थी. मैं ने जो एडवांस ले रखा था, उस की सिर्फ 2 किश्तें बाकी थीं. इसलिए मैं एडवांस नहीं ले सकता था. मैं ने एक सूदखोर से एक महीने के लिए 10 हजार रुपए उधार ले कर अपने उस दोस्त को दे दिए थे.

‘‘उस ने एक महीने में लौटाने का वादा किया था. मैं ने उसे बता दिया था कि ये रुपए 1 हजार रुपए महीने के ब्याज पर ले कर दे रहा हूं, जिसे हर हाल में अगले महीने लौटाना है. पर मेरी बदनसीबी कि मेरा वह दोस्त मेरे रुपए ले कर दुबई चला गया और मैं फंस गया. 2 महीने ब्याज भरने के बाद औफिस का एडवांस पूरा हो गया तो मैं ने औफिस से एडवांस मांगा, पर कंपनी ने एडवांस देने से साफ मना कर दिया.’’

‘‘एडवांस न मिलने पर तुम्हें जनरल मैनेजर पर सख्त गुस्सा आया होगा. तुम्हें लगा होगा कि उसे किसी ने तुम्हारे खिलाफ भड़का दिया है.’’

‘‘मैं मुश्किल में था, इसलिए गुस्सा आना लाजिमी था. इस से पहले हर बार मुझे एडवांस मिल गया था. इसलिए मुझे यह शक भी हुआ.’’

‘‘इसी बात को ले कर तुम एकाउंटैंट महमूद के पास भी गए थे. उस ने तुम से हमदर्दी तो जताई, पर जनरल मैनेजर के आदेश के बगैर वह तुम्हें एडवांस नहीं दे सकता था. तुम ने महमूद के सामने कहा था, ‘जी चाहता है कि जनरल मैनेजर को चाय में जहर मिला कर पिला दूं.’ क्या यह सच है?’’

‘‘हां, उस दिन मैं बहुत परेशान था. तब गुस्से में मैं ने ऐसा कह दिया था, पर मेरा ऐसा करने का कोई इरादा नहीं था.’’

‘‘और तुम ने बदला लेने के लिए जहर के बजाय निजामी का छुरी से कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठ है, मेरे खिलाफ कोई साजिश रची गई है.’’

‘‘क्या तुम इस बात से इनकार करोगे कि वारदात वाले दिन मृतक का कोई दोस्त उस से मिलने आया था?’’

‘‘जी हां, आए थे. उन का नाम तौसीफ अहमद था.’’

‘‘मृतक ने उस के लिए तुम से चाय लाने को कहा था?’’

‘‘जी हां, चाय लाने के लिए कहा था. लेकिन उस दिन दूध खत्म हो गया था, तब मैं चाय लेने नजदीक के होटल चला गया था.’’

‘‘तुम ने चाय लाने में इतनी देर कर दी कि दोस्त ही नहीं, औफिस के सभी कर्मचारी तक चले गए. आखिर क्यों देर की? देर होने पर उन्होंने तुम्हें डाटा होगा. उस के बाद तुम ने गुस्से में उन का कत्ल कर दिया?’’

‘‘यह एकदम झूठा इल्जाम है. कत्ल से मेरा कोई वास्ता नहीं है. होटल में लड़ाई हो रही थी, इसलिए मुझे आने में देर हो गई थी. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था, मैं ने कत्ल नहीं किया.’’

इस के बाद सरकारी वकील की जिरह खत्म हो गई. मैं ने जज से इन्क्वायरी अफसर से कुछ सवाल पूछने की इजाजत मांगी. इजाजत मिलने पर मैं ने उस से पूछा, ‘‘इंसपेक्टर कादरबख्श साहब, अभी सरकारी वकील से पता चला कि जब मेरा मुवक्किल चाय ले कर आया तो जनरल मैनेजर का दोस्त और दूसरे लोग जा चुके थे. मुलजिम ने अच्छा मौका देख कर उस का कत्ल कर दिया. आप इस बात को साबित कैसे करेंगे? जबकि मेरा मुवक्किल इस इल्जाम से मना कर रहा है. आप के पास इस वारदात का कोई गवाह भी नहीं है.’’

‘‘जिस समय मृतक का दोस्त आया था, मुलजिम के अलावा एकाउंटैंट महमूद भी मौजूद था. जब मुलजिम को चाय लेने भेजा गया था, तब तीनों थे. लेकिन जब वह लौट कर आया तो महमूद और तौसीफ जा चुके थे. इस के बाद यह काम कौन कर सकता है सिवाय रमीज के? यह उसी का काम हो सकता है?’’ इन्क्वायरी अफसर ने कहा.

‘‘वाह जनाब, क्या थ्यौरी है. जरा सी डांट पड़ने पर मुलजिम कत्ल कर के आराम से घर चला गया और उस ने दरवाजा तक बंद नहीं किया. एक बात बताइए, क्या आप ने छुरी से फिंगरप्रिंट्स उठाए थे?’’

‘‘जी हां, फिंगरप्रिंट्स उठाए थे.’’

‘‘क्या छुरी पर मुलजिम की अंगुलियों के निशान मिले थे?’’

‘‘नहीं, उस पर निशान नहीं मिले, साफ कर दिए होंगे.’’

‘‘मैं आप से जो सवाल करने जा रहा हूं, जरा उस का सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा. क्या आप ने मकतूल की लाश और कमरे की ध्यान से जांच कर के कमरे का नक्शा तैयार किया था?’’

‘‘जी हां, सब बहुत ध्यान और सावधानी से किया था.’’

मैं ने भी कमरे और लाश की स्थिति के बारे में पता किया था. इसलिए मैं ने पूछा, ‘‘आप की तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक मृतक को तेज धार वाली छुरी से मारा गया था. उस की आधी से ज्यादा गरदन कट गई थी. जब वार किया गया था, वह अपनी कुरसी पर बैठा था. गरदन कटने के बाद सिर टेबल पर आ टिका था. गरदन का कटा हुआ हिस्सा ऊपर और सुरक्षित हिस्सा नीचे टेबल पर टिका था, मैं गलत तो नहीं कह रहा इंसपेक्टर साहब?’’

‘‘नहीं, आप बिलकुल सही कह रहे हैं.’’

‘‘अब मैं घटनास्थल की बात करता हूं. उस कमरे में 2 दरवाजे हैं, एक अंदर जाने का और दूसरा वौशरूम का. मृतक की टेबल 3 बाई 5 फुट की है, जिस के आगे आने वालों के लिए कुर्सियां रखी हैं. मृतक के बाएं हाथ की ओर एक साइड टेबल रखी है, इसलिए वह दाईं ओर से अपनी कुरसी तक जाता था. फर्श पर ब्लू कालीन बिछा है, सफेद परदे लगे हैं, ठीक है न?’’

मैं ने घटनास्थल का ऐसा नक्शा खींचा कि इन्क्वायरी अफसर हैरान हो कर बोला, ‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं. लेकिन एक बात मेरी समझ में यह नहीं आई कि यह सब बता कर आप साबित क्या करना चाहते हैं?’’

सरकारी वकील ने बीच में बात काट कर कहा, ‘‘मिर्जा साहब को इस तरह की बेमतलब की बातें कर के मुकदमे को उलझाने की आदत है. जनाबेआली इन्हें रोका जाए.’’

जज ने मेरी ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘आप का इस बारे में क्या कहना है बेग साहब?’’

‘‘जनाबेआली, मैं ने यह सारी मेहनत ऐसे ही नहीं की है. इस का इस मुकदमे से गहरा संबंध है, जिस का खुलासा आगे होगा. पहले इस मामले के गवाह मि. महमूद और मि. तौसीफ अहमद के बयान हो जाएं. जो कुछ मैं ने इन्क्वायरी अफसर से पूछा है, उस का ताल्लुक मेरे मुवक्किल की बेगुनाही से है.

‘‘मुझे पूरा यकीन है कि उसे साजिश कर के फंसाया गया है, वह बेकसूर है. कातिल कोई और है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार निजामी की मौत 6 से 8 बजे के बीच हुई थी. 6 बजे औफिस के अन्य लोग जा चुके थे. एकाउंटैंट 6 बजे औफिस से निकला था.

‘‘मुलजिम, मृतक और मृतक का दोस्त औफिस में मौजूद था. अगर पुलिस का यह दावा है कि कत्ल मेरे मुवक्किल ने किया है तो मैं भी दावा कर सकता हूं कि कत्ल तौसीफ अहमद या महमूद ने किया है या इस के अलावा बाहर का भी कोई आदमी हो सकता है. खैर, कातिल जो भी है, जल्दी ही सामने आ जाएगा. यह सारी मेहनत मैं ने इसीलिए की है.’’

‘‘ओके इट्स ओके, क्या अब आप मुलजिम से कुछ सवाल पूछना चाहते हैं?’’

‘‘जनाबेआली, मैं मुलजिम से 2-4 सवाल जरूर पूछूंगा, जिस से अगली सुनवाई में आसानी रहे.’’

जज ने मुझे इजाजत दे दी.

मैं ने रमीज से पूछा, ‘‘तुम बता सकते हो कि वारदात वाले दिन मृतक का दोस्त तौसीफ अहमद उस से मिलने कितने बजे औफिस पहुंचा था?’’

‘‘जी मुझे बिलकुल याद है. वह साढ़े 5 या पौने 6 बजे आए थे.’’

‘‘एक जवाब चाहिए.’’

‘‘करीब 5:40 पर आए थे.’’

‘‘जब तौसीफ अहमद आए थे, तब औफिस में कौनकौन था?’’

‘‘सिर्फ एकाउंटैंट महमूद साहब थे, बाकी सभी लोग जा चुके थे.’’

‘‘फिर क्या हुआ था?’’

‘‘मेहमान से चाय के लिए पूछना मेरी ड्यूटी थी. जब मैं ने निजामी साहब से पूछा तो उन के दोस्त ने कहा, ‘अच्छी सी चाय पिलवाओ.’

‘‘हमारी बिल्डिंग के पास ही एक होटल है. मैं वहीं चाय लेने चला गया था.’’

‘‘तुम चाय लेने होटल क्यों गए, जबकि खान ट्रैडर्स में चाय बनाने और खाना गरम करने के लिए किचन है.’’ मैं ने थोड़ा तेज लहजे में पूछा.

‘‘वकील साहब, आप की बात सही है. पर उस दिन दूध खत्म हो गया था, इसलिए मुझे चाय लाने के लिए बाहर जाना पड़ा. मैं ने निजामी साहब को इंटरकौम पर बता दिया था कि औफिस में दूध खत्म हो गया है, चाय लेने के लिए बाहर जाना पड़ेगा. उन्होंने इजाजत दे दी थी, लेकिन जल्दी आने को कहा था.’’

‘‘पुलिस जांच के अनुसार, जब तुम चाय ले कर लौटे तो मृतक निजामी का दोस्त तौसीफ अहमद जा चुका था. लेट होने पर मृतक ने तुम्हें डांटा और चाय पीने से मना कर दिया तो तुम ने गुस्से में किचन में जा कर चाय की केतली पटकी और डबलरोटी काटने वाली छुरी पीछे छिपा कर मृतक के कमरे में गए. एडवांस न मिलने से तुम उन से पहले से ही नाराज थे. उन की डांट ने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, जिस से तैश में आ कर तुम ने जनरल मैनेजर माजिद निजामी का कत्ल कर दिया. क्या सब कुछ ऐसा ही हुआ था न?’’

‘‘नहीं, वकील साहब, यह सब झूठ है. मैं चाय लेने गया था, सिर्फ यह सच है.’’

‘‘सच क्या है, विस्तार से बताओ?’’

‘‘मैं चाय लेने होटल गया तो वहां होटल के मालिक की एक आदमी से लड़ाई हो रही थी, जिस से चाय बनने में इतनी देर लग गई कि मैं ऊपर औफिस जाने के बजाय नीचे से ही घर चला गया था.’’

‘‘तुम नीचे से ही घर क्यों चले गए थे?’’ मैं ने यह बात जानबूझ कर पूछी, ‘‘तुम्हें तो चाय लेने भेजा गया था.’’

‘‘हां, मुझे चाय लेने भेजा गया था, लेकिन चाय तैयार होती, उस के पहले ही मैनेजर साहब अपने दोस्त के साथ चले गए थे. जिन के लिए मुझे चाय लानी थी, वे चले गए तो मैं ऊपर औफिस में जा कर क्या करता.’’ रमीज ने आत्मविश्वास के साथ बताया.

‘‘तुम्हें कैसे पता चला कि निजामी साहब अपने दोस्त के साथ चले गए हैं? तुम तो उस समय चाय के लिए होटल में खड़े थे?’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘यह बात मुझे महमूद साहब ने बताई थी.’’

‘‘पर महमूद साहब को तो तुम औफिस में बैठा छोड़ कर गए थे?’’

‘‘यह सच है कि जब मैं चाय के लिए जा रहा था तो महमूद साहब औफिस में बैठे थे. मैं ने उन से भी चाय के लिए पूछा था. तब उन्होंने मना कर दिया था. लेकिन जब मैं चाय के लिए होटल में खड़ा था और चाय तैयार होने वाली थी तो मैं ने महमूद साहब को अपनी ओर आते देखा. करीब आ कर उन्होंने मुझ से कहा, ‘माजिद निजामी चाय का इंतजार कर के अपने दोस्त तौसीफ अहमद के साथ निकल गए हैं. अब चाय ले जाने की जरूरत नहीं है. तुम भी अपने घर चले जाओ.’’

मैं ने कहा, ‘‘अगर वह चले गए हैं तो मुझे औफिस बंद करना होगा. मैं ऊपर जा कर औफिस बंद कर देता हूं.’’

‘‘औफिस मैं ने बंद कर दिया है. मुझे एक जगह जाना है, इसलिए तुम्हारा इंतजार किए बिना ही मैं चला आया. औफिस भी मैं ने बंद कर दिया है.’’

‘‘निजामी साहब से जब इंटरकौम पर बात हुई थी, तब उन्होंने जल्दी आने को कहा था, क्योंकि उन का दोस्त ज्यादा देर रुकने वाला नहीं था. लेकिन लड़ाई की वजह से देर हो गई. महमूद साहब ने बताया कि मेहमान चले गए हैं तो मैं ने सोचा कि मैं औफिस जा कर क्या करूंगा. बहुत होगा, अगले दिन निजामी साहब डाटेंगे तो डांट सुन लूंगा. फिलहाल घर जाना ही बेहतर समझा. मुझे सोचते देख कर महमूद साहब बोले, ‘क्या तुम्हें ऊपर औफिस में कोई काम है क्या?’

‘‘मैं ने कहा, ‘नहीं, मुझे कोई काम नहीं है. आप कह रहे हैं तो मैं घर चला जाता हूं.’ कह कर मैं घर चला गया. अगले दिन मैं औफिस आने की तैयारी कर रहा था, तभी पुलिस ने मुझे कत्ल के इल्जाम में गिरफ्तार कर लिया.’’

मैं ने आखिरी सवाल पूछा, ‘‘पुलिस जांच के अनुसार मृतक की कार औफिस की बिल्डिंग के नीचे पार्किंग में खड़ी थी, तुम्हारी नजर उस पर नहीं पड़ी?’’

‘‘जनाब, चाय का होटल बाईं ओर जरा अंदर की तरफ है. मैं वहीं से सीधे घर चला गया था. इसलिए गाड़ी मुझे नहीं दिखाई दी. वैसे भी महमूद साहब के कहने पर मुझे उन के जाने का यकीन हो गया था.’’

इस के बाद अदालत का समय खत्म हो गया. अगली पेशी पर 3 गवाहों को अदालत में लाया गया. 2 गवाहों की गवाही में कोई खास बात नहीं थी, तीसरे गवाह का नाम तौसीफ अहमद था, वह 50 साल का अच्छाभला सेहतमंद आदमी था. वह बड़े सुकून और इत्मीनान से विटनैसबौक्स में खड़ा था. मैं ने जिरह शुरू की, ‘‘तौसीफ साहब, आप की मृतक से काफी गहरी दोस्ती थी, उन की मौत का मुझे भी अफसोस है. आप कितने बजे निजामी साहब के औफिस पहुंचे थे?’’

‘‘मैं करीब पौने 6 बजे उन के औफिस पहुंचा था.’’

‘‘उस वक्त वहां कौनकौन था?’’

‘‘निजामी साहब, उन का एकाउंटैंट महमूद और औफिस बौय रमीज. एकाउंटैंट का जिक्र निजामी साहब ने ही किया था.’’

‘‘क्या निजामी साहब ने आप के सामने मुलजिम रमीज को चाय लाने भेजा था?’’

‘‘जी हां, औफिस में दूध खत्म हो गया था. इस के बाद उन्होंने होटल से जल्दी चाय लाने के लिए कहा था, क्योंकि मुझे जरा जल्दी जाना था.’’

‘‘क्या मुलजिम जल्दी चाय ले कर आ गया था?’’

‘‘जल्दी क्या, वह गया तो लौट कर आया ही नहीं.’’

मैं ने नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि उस दिन आप बिना चाय पिए ही चले गए थे, कितने बजे गए थे आप?’’

‘‘मैं करीब साढ़े 6 बजे वहां से निकला था.’’

‘‘जब आप निकले थे, तब तक मुलजिम नहीं आया था?’’

‘‘जी हां, तब तक नहीं आया था, निजामी साहब को बड़ा गुस्सा आया था. अगर वह आ जाता तो चाय उस के मुंह पर फेंक देते, लेकिन वह आया ही नहीं.’’

‘‘अफसोस कि वह सीधे घर चला गया था. उस के बाद उसे औफिस आने का मौका ही नहीं मिला. तौसीफ साहब जब आप साढे़ 6 बजे जाने के लिए औफिस से निकले थे तो क्या निजामी साहब भी आप के साथ निकले थे? जब आप निकल रहे थे तो एकाउंटैंट महमूद अपने कमरे में मौजूद था?’’

‘‘निजामी साहब मेरे साथ नहीं गए थे. उन्हें कुछ काम निपटाने थे. महमूद का मुझे पता नहीं, क्योंकि मैं निजामी साहब के पास से उठ कर इधरउधर देखे बगैर, सीधे बाहर निकल गया था.’’

‘‘थैंक्यू तौसीफ साहब, आप ने एकदम सटीक जवाब दिए हैं. बस अब आप को एक टेस्ट देना बाकी है. यही टेस्ट निजामी साहब के असली कातिल तक पहुंचाएगा. इस टेस्ट में वही लोग शामिल होंगे, जो 6 बजे से 8 बजे तक औफिस में मौजूद थे.’’

तौसीफ अहमद उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे. सरकारी वकील ने कहा, ‘‘बेग साहब, आप कैसे टेस्ट की बात कर रहे हैं?’’

‘‘यह ऐसा टेस्ट है, जो असली कातिल को सामने ले आएगा.’’ मैं ने जज की ओर सवालिया नजरों से देखते हुए कहा.

जज ने पूछा, ‘‘बेग साहब, अभी आप कितने लोगों का टेस्ट लेंगे और यह कैसा टेस्ट है?’’

‘‘जनाबेआली, यह टेस्ट उन लोगों का लिया जाएगा, जो वारदात के समय वहां मौजूद थे. निजामी साहब तो रहे नहीं, मुलजिम रमीज, गवाह तौसीफ अहमद और कंपनी के एकाउंटैंट महमूद साहब का टेस्ट लेना है. मृतक की गरदन जिस अंदाज में कटी थी, वह खुदकुशी नहीं, यकीनन कत्ल था. फिंगरप्रिंट्स मिले नहीं, इसलिए टेस्ट से ही सच्चाई पता चल सकती है. यह एक साधारण टेस्ट है.’’

मैं ने तौसीफ अहमद से पूछा, ‘‘आप टेस्ट के लिए तैयार हैं?’’

‘‘जी हां, मैं तो तैयार हूं.’’

मैं गवाह तौसीफ अहमद को जज साहब के पास ले गया. एक पैड और कलम देते हुए बोला, ‘‘आप जज साहब के सामने इस पैड पर लिखें कि मैं ने निजामी साहब का कत्ल नहीं किया है.’’

उन्होंने मेरे कहे अनुसार लिख दिया.

‘‘शुक्रिया अहमद साहब, अब आप जा सकते हैं.’’

जज ने सवालिया नजरों से मेरी ओर देखा तो मैं ने कहा, ‘‘जनाबेआली, मुझे इस टेस्ट से यह साबित करना है कि गवाह तौसीफ बहमद राइट हैंड से काम करने का आदी है.’’

जज साहब ओके, कह कर कागज देखने लगे. फिर वही टेस्ट मैं ने मुलजिम रमीज से करवाया, दोनों कागज जज की टेबल पर रख कर कहा, ‘‘जनाब, मैं यह साबित करना चाहता था कि ये दोनों सीधे हाथ से काम करने के आदी हैं.’’

सरकारी वकील बड़ी उलझन में था. उस ने पूछा, ‘‘जनाबेआली, यह क्या हो रहा है?’’

जज ने कागज देखते हुए कहा, ‘‘बेग साहब यह साबित करना चाहते थे कि ये दोनों राइट हैंडेड हैं. नतीजे के बारे में तो यही बताएंगे.’’

अदालत में बैठे लोग सन्न मारे सारी काररवाही देख रहे थे. मैं ने आत्मविश्वास के साथ कहा, ‘‘जैसा कि जज साहब ने बताया है, तौसीफ अहमद और मुलजिम रमीज राइट हैंड से काम करने के आदी हैं. घटनास्थल का नक्शा, कमरे और टेबल की सिचुएशन, लाश की स्थिति इस बात की गवाह है कि माजिद निजामी का कत्ल किसी ऐसे आदमी ने किया है, जो बाएं हाथ से काम करने का आदी है. यानी लैफ्ट हैंडेड है. इसलिए तौसीफ अहमद और रमीज दोनों में से कोई भी कातिल नहीं हो सकता.’’

इन्क्वायरी अफसर जो बड़े ध्यान से सारी काररवाही देख रहा था, एकदम बोल पड़ा, ‘‘यह आप क्या कह रहे हैं बेग साहब?’’

मैं ने जांच अधिकारी की आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘कादरबख्श साहब, आप ने बड़ी बारीकी से लाश की जांच की थी और बड़ी सावधानी से कमरे का नक्शा बनाया था. यह पौइंट आप की समझ में आना चाहिए था.’’

उस के चेहरे पर घबराहट नजर आने लगी. अब मैं ने जज की ओर देख कर कहा, ‘‘जनाबेआली, मैं ने पिछली पेशी में इस से लंबी जिरह जिस मकसद से की थी, उस का मकसद यही था. अब मौका है कि मैं अपने मुवक्किल को बेगुनाह साबित करूं.’’

जज गहरी दिलचस्पी से मेरी बातें सुन रहे थे. अदालत में सन्नाटा छा गया था. सभी का ध्यान मेरी ओर था. मैं अपनी दलीलें आगे बढ़ाते हुए बोला, ‘‘जनाबेआली, मृतक की कुरसी उस के कमरे में इस कोण से ऐसी पोजीशन में रखी थी कि दाएं हाथ से काम करने वाले के लिए उस पर, खास तौर पर उस की गरदन पर ऐसा हमला करना नामुमकिन था.

‘‘कमरे की दीवार और मृतक की गरदन के बीच इतना फासला नहीं था कि लंबे फल वाली छुरी को आजादी से घुमा कर गरदन पर भरपूर वार किया जा सकता. अगर इत्तफाक से ऐसा हो भी जाता तो उस स्थिति में गरदन को बाएं तरफ से कान के नीचे से कटना चाहिए था.

‘‘लेकिन हकीकत में मृतक की गरदन दाईं ओर से कान के नीचे से कटी थी. इस का मतलब यह कि किसी लेफ्ट हैंडेड आदमी ने निजामी पर कातिलाना हमला किया था, जो बहुत घातक साबित हुआ. मृतक पलक झपकते ही मर गया.’’

‘‘मेरा तो इस तरफ ध्यान ही नहीं गया. सचमुच यह तो बहुत खास पौइंट है.’’ इन्क्वायरी अफसर ने शर्मिंदा होने वाले लहजे में कहा.

‘‘आप का इस ओर ध्यान नहीं गया, कोई बात नहीं. मैं आप का ध्यान इस तरफ दिला रहा हूं. आप घटनास्थल के नक्शे को दिमाग में ताजा करें और पूरी ईमानदारी से बताएं कि माजिद निजामी का कातिल कौन हो सकता है. लेफ्ट हैंडेड या राइट हैंडेड? यह आप की समझबूझ का टेस्ट है.’’

इन्क्वायरी अफसर ने फौरन दृढ़ता से जवाब दिया, ‘‘कातिल ने वह खतरनाक वार बाएं हाथ से ही किया था. कातिल लेफ्ट हैंडेड था.’’

‘‘और मेरा मुवक्किल एक सौ एक प्रतिशत राइट हैंडेड है.’’ मैं ने जज की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘जनाबेआली, आप ने खुद अपनी आंखों से देखा है कि मुलजिम दाएं हाथ से काम करने का आदी है. जबकि इन्क्वायरी अफसर भी कह रहे हैं कि कातिल यकीनन लेफ्ट हैंडेड था. इसलिए मेरी आप से दरख्वास्त है कि मेरा मुवक्किल बेगुनाह है, इसलिए उसे बाइज्जत बरी किया जाए.’’

जज ने घूर कर इन्क्वायरी अफसर की ओर देखा और नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब यह हुआ कि पूरी विवेचना ही गलत है.’’

इन्क्वायरी अफसर घबरा कर बोला, ‘‘जनाबेआली, यह लेफ्टराइट की गलती तो मुझ से हो गई है.’’

‘‘आप की यह लेफ्टराइट की गलती एक बेगुनाह इंसान को गुनहगार बना देती. यह अदालत आप को हुक्म देती है कि 7 दिनों के अंदर नया चालान पेश करें और अब लेफ्टराइट की गलती नहीं होनी चाहिए.’’

उसी वक्त सरकारी वकील की हैरतभरी आवाज गूंजी, ‘यह लेफ्ट हैंडेड व्यक्ति कौन हो सकता है, जिस ने निजामी का कत्ल किया है?’

‘‘मेरे दोस्त अब लेफ्ट हैंडेड कातिल को तलाशना जरूरी है, क्योंकि पहले लापरवाही की गई. अगर कमरे और टेबल की सिचुएशन व नक्शे को बारीकी व सावधानी से देखा जाता तो यह बात पहले ही पता चल जाती कि कातिल लेफ्ट हैंडेड है, क्योंकि जिस तरफ से राइट हैंड उपयोग में आ सकता था, वहां इतनी जगह ही नहीं थी कि खुल कर छुरी का वार किया जा सकता. मैं आप को इतनी हिंट दे सकता हूं कि लेफ्ट हैंड कातिल को इस्तगासा के गवाहों में ही ढूंढ़े, जो 6 से 8 बजे के बीच औफिस में मौजूद थे. एक इशारा और कर दूं, मैं ने अभी तक कातिल का अदालती टेस्ट नहीं लिया है.’’ मैं ने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा.

‘‘ऐसा तो सिर्फ एक ही आदमी है, खान ट्रैडर्स का एकाउंटैंट महमूद.’’ उस ने सोचते हुए कहा.

‘‘मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा. इंसपेक्टर साहब, वैसे अक्लमंद को इशारा काफी है.’’ मैं ने मुसकरा कर कहा. इस के साथ ही अदालत का वक्त खत्म हो गया. अगली पेशी पर अदालत ने मेरे मुवक्किल को बाइज्जत बरी कर दिया. इन्क्वायरी अफसर ने खुद को अक्लमंद साबित करते हुए एकाउंटैंट महमूद को अदालत के सामने पेश कर दिया. महमूद ने पुलिस कस्टडी में ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया था.

वह लेफ्ट हैंडेड था. उसी ने कंपनी के जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतारा था. अपने मंसूबे को पूरा करने के लिए वारदात के दिन औफिस बौय रमीज को कुरबानी के बकरे की तरह इस्तेमाल किया था. उस से झूठ बोल कर उसे औफिस आने देने के बजाय उसे घर भेज दिया, ताकि अगले दिन जब वह औफिस आए तो फौरन ही उस के कत्ल के इल्जाम में धर लिया जाए. उस के प्लान के मुताबिक ऐसा ही हुआ. औफिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनरल मैनेजर निजामी एक बेहद ईमानदार और उसूल वाला आदमी था, जब से उस ने यह कंपनी संभाली थी. उन लोगों को बड़ी तकलीफ थी, जो कंपनी को नुकसान कर के खुद का घर भर रहे थे. बेईमानी करने में सब से ऊपर नाम महमूद का था.

वारदात से करीब 3 महीने पहले मृतक ने एकाउंटैंट का एक संगीन फ्रौड पकड़ लिया था, जिस की वजह से महमूद को बौस के सामने बुरी तरह से अपमानित होना पड़ा था और बौस ने अगली बार उसे निकाल बाहर करने की धमकी दी थी. इस से औफिस में उस की बदनामी और थूथू हुई थी. अपनी बदनामी और अपमान का बदला लेने के लिए वह मौके की ताक में था. उस के दिल में बदले की आग दहक रही थी. रमीज को जनरल मैनेजर ने एडवांस देने से मना कर दिया. रमीज अपनी दिल की भड़ास महमूद के सामने निकालता. निजामी को बुराभला कहता और लोगों के सामने भी उस के खिलाफ बकबक करता.

महमूद को रमीज की शक्ल में एक कुरबानी का बकरा मिल गया. उस ने फैसला कर लिया कि वह जनरल मैनेजर निजामी को मौत के घाट उतार देगा और इस कत्ल का इल्जाम रमीज के सिर पर डाल देगा. ऐसी बातें करेगा, जिस से सब का शक रमीज की तरफ चला जाए. जो लोग उसूल परस्त और ईमानदार होते हैं, उन्हें कदमकदम पर मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और कभीकभी ईमानदारी जानलेवा भी साबित होती है, जैसा कि माजिद निजामी के साथ हुआ. पर महमूद भी अपने बदले की आग में खुद जल गया. Crime Stories