Gujrat News: पैसों की चकाचौंध में बह गई भावना

Gujrat News: 30 जून, 2023 को गुजरात के जिला भरूच के थाना जंबुसर पुलिस को सूचना मिली कि पगरनाला में एक लाश पड़ी है. सूचना मिलते ही थाना पुलिस घटनास्थल पर पहुंच गई. लाश किसी पुरुष की थी, जिस की उम्र 36 साल के आसपास थी.

मरने वाले के शरीर पर कपड़े के नाम पर सिर्फ पैंट थी. पुलिस ने पैंट की तलाशी ली कि शायद उस की जेब से ऐसा कुछ मिल जाए, जिस से उस की पहचान हो जाए. पर उस की जेब से कुछ भी नहीं मिला. आसपास भी ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी, जिस से उस की पहचान हो पाती. तब पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

इस के बाद थाने आ कर यह पता करने की कोशिश की जाने लगी कि जिले में कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. पर जिले के किसी थाने में उस हुलिए के किसी व्यक्ति की कोई गुमशुदगी दर्ज नहीं थी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने लाश को बड़ौदा की मोर्चरी में रखवा दी. इस के बाद पुलिस यह पता करने की कोशिश करती रही कि मरने वाला कौन है?

10 दिन बाद हुई लाश की शिनाख्त

लाश मिलने के 10 दिनों बाद थाना जंबुसर से करीब 400 किलोमीटर दूर जिला बनासकांठा के थाना थराद के एसएचओ इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी ने फोन कर के जंबुसर पुलिस से पूछा, “पता चला है कि आप के थानांतर्गत एक पुरुष की लाश मिली है. मरने वाले की उम्र 36 साल के आसपास है.”

“जी, आज से 10 दिन पहले नाले में एक लाश मिली थी. मरने वाले की यही उम्र होगी, जितनी आप बता रहे हैं. मैं उस के फोटो भेज रहा हूं. लाश अभी मोर्चरी में रखी है.” थाना जंबुसर पुलिस ने कहा.

जंबुसर पुलिस ने लाश के फोटो भेजे तो पता चला कि वह लाश गुजरात के जिला बनासकांठा की तहसील थराद के गांव चोटपा के रहने वाले मारवाड़ी चौधरी पटेल शंकरभाई की थी. वह गांव में रह कर खेती करने के साथसाथ मकान बनाने के ठेके लेता था. उस के परिवार में पत्नी भावना पटेल के अलावा 3 बच्चे और बूढ़े मांबाप थे. पिता को लकवा मार दिया था, इसलिए वह चलफिर नहीं सकते थे.

29 जून, 2023 को साइट से आने के बाद शाम का खाना खा कर शंकर यह कह कर घर से निकला था कि वह पड़ोस में रहने वाले ऊदाजी के पास जा रहा है. वह घर से गया तो फिर लौट कर नहीं आया. घर वालों ने थोड़ी देर इंतजार किया. पर जब समय ज्यादा होने लगा तो उस के बारे में पता करने लगे. फोन किया गया तो पता चला फोन बंद है.

अगले दिन यानी 30 जून को थाना थराद पुलिस को सूचना दी गई, लेकिन थाना थराद पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेने के बजाय एकदो दिन और इंतजार करने के लिए कह कर सूचना देने गई शंकर की मां मीरादेवी को वापस भेज दिया था.

गुमशुदगी दर्ज कर पुलिस ने की कार्यवाही

जब 2 जुलाई तक शंकर नहीं आया तो मीरादेवी दोबारा थाने जा पहुंची. इस बार इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी से उन की मुलाकात हो गई. उन्होंने तुरंत शंकर की गुमशुदगी दर्ज कराई और शंकर के बारे में पता कराने का आश्वासन दे कर मीरादेवी को घर भेज दिया.

इस के बाद एसएचओ ने शंकर की तलाश शुरू की. गांव वालों से पूछताछ में पता चला कि शंकर की पत्नी भावनाबेन का चरित्र ठीक नहीं है. इस के बाद उन्होंने भावना का फोन सर्विलांस पर लगवा दिया. इस से उन्हें पता चला कि भावना लगातार पड़ोसी गांव कलश के रहने वाले शिवा पटेल के संपर्क में है.

जब उन्होंने शिवा पटेल के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह 29 जून को अंकलेश्वर से गांव आया तो था, पर अपने घर नहीं गया था. इस के अलावा 29 जून को उस ने शंकर को फोन भी किया था. 29 जून की शंकर और शिवा के फोन की लोकेशन निकलवाई गई तो पता चला कि दोनों के फोन की लोकेशन एक साथ थी.

इस से पुलिस को उस पर शक हुआ तो पुलिस ने उस की लोकेशन निकलवाई. उस की लोकेशन अंकलेश्वर की मिली. इंसपेक्टर सी.पी. चौधरी की टीम अंकलेश्वर पहुंची और शिवा को गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

थाने ला कर शिवा से पूछताछ शुरू हुई. शिवा पुलिस को गोलगोल घुमाता रहा. उस का कहना था कि वह 29 जून को गांव गया ही नहीं था. इधर शंकर से उस की मुलाकात ही नहीं हुई, लेकिन जब पुलिस ने उस के मोबाइल फोन की लोकेशन उस के सामने रखी तो उस ने शंकर के मर्डर में अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि भावना के साथ रहने के लिए उस ने शंकर की हत्या की है. इस के बाद उस ने भावना से प्यार होने से ले कर शंकर की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

मेले में मिल गए दोनों के दिल

शंकरभाई पटेल और भावनाबेन का विवाह करीब 14 साल पहले हुआ था. शंकर अपने परिवार के साथ चोटपा गांव में खेतों के बीच मकान बना कर रहता था. उस की दोस्ती कलश गांव के शिवाभाई पटेल से थी. वह भी मारवाड़ी चौधरी पटेल था. वह भी खेतों के बीच घर बना कर रहता था, शायद इसीलिए दोनों में कुछ ज्यादा पटती थी.

शिवा शंकर के घर भी खूब आताजाता था. शिवा अंकलेश्वर में मेटल का धंधा करता था. वह जब भी अंकलेश्वर से गांव आता, शंकर को अपनी क्रेटा गाड़ी में बैठा कर घुमाता था.

एक बार वह राजस्थान के बौर्डर पर लगने वाले लवाड़ा के मेले में घूमने जा रहा था तो शंकर के साथ उस की पत्नी भावना भी मेला देखने गई थी. उसी मेले में शिवा और भावना ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया था. बाद में दोनों के बीच फोन पर बातें होने लगीं. फोन पर बातें करतेकरते दोनों के बीच प्रेम संबंध बना तो फिर शारीरिक संबंध भी बन गए.

शिवा कुंवारा था, जवान था, अच्छा पैसा कमाता था, उसे एक महिला शरीर की जरूरत भी थी, जो भावना ने पूरी कर दी थी. शिवा के पास पैसों की कमी नहीं थी, वह दिल खोल कर भावना पर पैसे खर्च करता था तो भावना भी प्यार से उस की शारीरिक जरूरतें पूरी करती थी. यह अवैध संबंध इसी तरह चलते रहे.

यह लगाव जब गहराया तो भावना अकसर शिवा से शिकायत करने लगी, “मेरा पति शंकर मुझे बहुत परेशान करता है. जराजरा सी बात पर मुझे मारता है.”

शिवा के प्यार में डूब गई भावना

जब कभी भावना और शंकर में झगड़ा होता तो भावना शिवा को फोन कर के पति और अपना झगड़ा शिवा को सुनाती भी थी. शंकर भावना के साथ जो बरताव कर रहा था, वह शिवा को अच्छा नहीं लगता था. पर वह शंकर से कुछ कह भी नहीं सकता था.

शिवा भावना से बहुत प्यार करता था, इसलिए एक दिन उस ने कहा, “तुम शंकर को छोड़ कर मेरे साथ क्यों नहीं रहने आ जाती? मैं तुम्हें रानी की तरह रखूंगा.”

इस पर भावना ने कहा, “घर में बूढ़े मांबाप हैं, उन्हें छोड़ कर आऊंगी तो समाज मुझ पर थूकेगा. मेरी बहुत बदनामी होगी.”

“तब तुम्हीं बताओ मैं क्या करूं?” शिवा ने कहा.

“कुछ तो करना ही होगा, मैं इस आदमी के साथ अब नहीं रह सकती.” भावना बोली.

28 जून, 2023 को किसी बात पर शंकर और भावना में झगड़ा हुआ. तब भावना ने शिवा को फोन कर के कहा, “शिवा, तुम किसी भी तरह मुझे इस आदमी से छुड़ाओ. अब मैं इस आदमी के साथ बिलकुल नहीं रह सकती.”

शिवा भावना से प्यार तो करता ही था. पर उस के लिए परेशानी यह थी कि उस की बिरादरी में पति या पत्नी को छोडऩा आसान नहीं है. इसलिए जब उस ने भावना से एक बार फिर शंकर को छोड़ कर आने को कहा तो भावना बोली, “अगर मैं शंकर को छोड़ कर आती हूं तो समाज में मेरी बहुत बदनामी होगी. इसलिए शंकर से छुटकारा पाने के लिए उस का कुछ करना होगा.”

“वही तो मैं पूछ रहा हूं कि शंकर का किया जाए?” शिवा ने पूछा.

“ऐसा है, अगर तुम मेरे साथ रहना चाहते हो तो उसे खत्म कर दो. वह नहीं रहेगा तो हम दोनों आराम से रह सकेंगे.” भावना ने कहा.

“ठीक है, जैसा तुम कह रही हो, वैसा ही करते हैं. आराम से बैठ कर योजना बनाते हैं, उस के बाद शंकर को खत्म कर देते हैं.” शिवा ने कहा.

शंकर की हत्या की हुई प्लानिंग

28 जून को यह बात हुई थी. इस के पहले भी दोनों में शंकर नाम के कांटे को निकालने की कई बार बात हो चुकी थी, लेकिन इस के पहले फाइनल योजना नहीं बनी थी. पर इस बार दोनों ने फोन पर ही शंकर को खत्म करने की फाइनल योजना बना डाली.

योजना बनाने के बाद किसी को शक न हो, इसलिए भावना 28 जून को ही मायके चली गई. 29 जून को शिवा ने एक दूसरे नंबर से अपने दोस्त शंकर को फोन कर के अच्छीअच्छी बातें करने के बाद विश्वास में ले कर कहा, “यार शंकर, तुम से एक जरूरी काम है. मैं गाड़ी ले कर आ रहा हूं. तुम ऐसा करो, सडक़ पर आ कर मुझ से मिलो.”

इस बीच भावना से भी शिवा की बातचीत होती रही. 2 महीने पहले भावना और शिवा के बीच शंकर को मारने की बात हुई थी, तब भावना ने कहा था कि शंकर को नींद की गोली खिला कर खत्म कर दो. इसलिए 2 महीने पहले ही उस ने भरूच सिटी से नींद की गोलियां खरीद कर रख ली थीं, जो उस की गाड़ी में ही रखी थीं. 2 महीने पहले हुई बातचीत के अनुसार शिवा अपनी योजना में आगे बढ़ रहा था.

कार में गला घोंट कर की थी हत्या

29 जून, 2023 की दोपहर को अपनी क्रेटा कार नंबर जीजे16डी के1389 ले कर शिवा अंकलेश्वर से निकला. उस ने अपने निकलने की बात शंकर को बता दी थी. चलने के पहले उस ने नींद की गोलियां पीस कर पानी की बोतल में मिला दी थीं.

रात करीब 9 बजे वह गांव चोटपा पहुंचा. उस ने शंकर से बता ही दिया था कि एक जरूरी काम से उसे साथ चलना है, इसलिए वह खाना खा कर तैयार था. गांव पहुंचते ही शिवा ने फोन किया तो शंकर आ कर उस की कार में बैठ गया. शिवा इधरउधर गाड़ी घुमाने लगा.

शिवा समय गुजार रहा था कि शंकर उस से पानी पीने के लिए मांगे. इसलिए वह शंकर को चोटपा से खोडा चरकपोस्ट, साचोर, ननेवा से घानेरा ले गया. जब वह काफी दूर निकल गया तो शंकर ने पानी पीने के लिए मांगा. शिवा ने तुरंत पानी की वही बोतल पकड़ा दी, जिस में उस ने नींद की गोलियां पीस कर मिलाई थीं.

वह पानी पीने के थोड़ी देर बाद शंकर को नींद आ गई. इस के बाद शिवा घानेरा से सीधे डीसा रोड पर गया. सडक़ पर सुनसान जगह देख कर शिवा ने कार रोकी और शंकर के मोबाइल को स्विच्ड औफ कर दिया कि किसी को पता न चल सके.

इस के बाद वह गाड़ी ले कर चल पड़ा. काफी दूर जाने के बाद सुनसान जगह देख कर उस ने सडक़ के किनारे गाड़ी रोक दी. शंकर गहरी नींद में था. शिवा ने कार में रखी रस्सी निकाली और शंकर के गले में लपेट कर कस दी. गला घोंटने से शंकर की सांस हमेशा हमेशा के लिए रुक गई.

बच्चों के अनाथ होने पर समाज ने की मदद

अब उसे शंकर की लाश को ठिकाने लगाना था. वह लाश को ऐसी जगह फेंकना चाहता था, जहां कोई उस की पहचान न कर सके. उस ने शंकर को आगे की सीट पर इस तरह बैठा दिया, जिस से लगे कि वह बैठेबैठे सो रहा हो.

शंकर की लाश को ले कर वह डीसा, पालनपुर, मेहसाणा, अहमदाबाद, बड़ौदा होते हुए वह जंबुसर गया. जंबुसर चौराहे से थोड़ी दूर आगे से सिंगल रोड गई थी. उसे वह रोड सुनसान दिखाई दी तो उस ने कार उसी रोड पर उतार दी. लगभग एक किलोमीटर जा कर शिवा को एक पगरनाला दिखाई दिया तो उस ने शंकर की लाश उसी पगरनाले में फेंक दी. उस समय सुबह के 6 बज रहे थे.

लाश को ठिकाने लगाने के बाद शिवा ने फोन कर के यह बात भावना को बताई और वहां से सीधे अंकलेश्वर चला गया. 2 दिन बाद भावना भी ससुराल आ गई, जिस से किसी को उस पर शक न हो.

हत्याकांड का खुलासा हो जाने के बाद थाना थराद पुलिस ने भावना को भी गिरफ्तार कर लिया. शिवा को थाने में देख कर उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. इस के बाद थाना थराद पुलिस ने शिवा और भावना को बनासकांठा की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों का 6 दिन का रिमांड लिया गया.

रिमांड के दौरान बनासकांठा के एसपी अक्षयराज मकवाना ने प्रैस कौन्फ्रैंस की. पत्रकारों के सामने भी प्रेमिका प्रेमी भावना और शिवा ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद सारे सबूत जुटा कर पुलिस ने दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

शंकर, जिस की हत्या हुई है, उस के पिता लकवाग्रस्त हैं, मां बूढ़ी है. 3 बच्चे हैं, जिस में सब से बड़ी बेटी 7 साल, उस से छोटा बेटा 4 साल और सब से छोटा बेटा 2 साल का है. पिता की हत्या हो गई है. पिता की हत्या के आरोप में मां जेल में है. बच्चों की हालत पर दया खा कर आजणा चौधरी समाज के बुजुर्गों ने बच्चों की मदद के लिए 15 लाख रुपए इकट्ठा कर के दिए हैं. Gujrat News

Hindi Crime Story: प्रेम में डूबी जब प्रेमलता

Hindi Crime Story: प्रेमलता की अच्छीभली गृहस्थी थी, सरकारी नौकरी वाला पति था. लेकिन बबलू के प्यार और महत्त्वाकांक्षा में वह कुछ इस तरह उलझी कि अपने ही हाथों सुहाग उजाड़ कर गृहस्थी बरबाद कर दी.

अभी सुबह का उजाला भी ठीक से फैला नहीं था कि मैनपुरी कोतवाली के गेट से एक महिला अंदर घुसी. वह काफी अस्तव्यस्त और घबराई हुई लग रही थी,

इसलिए ड्यूटी पर तैनात संतरी ने आगे बढ़ कर पूछा, ‘‘कहो, कैसे आई?’’

‘‘साहब से मिलना है.’’

‘‘क्यों, क्या परेशानी है?’’ संतरी ने पूछा.

संतरी का इतना कहना था कि महिला रोने लगी. संतरी ने उसे चुप कराते हुए कहा, ‘‘साहब तो अभी आए नहीं हैं. तुम अपनी परेशानी बताओ. अगर कोई ज्यादा परेशानी वाली बात होगी तो मैं साहब से जा कर बता दूंगा.’’

‘‘मेरे पति ने रात में आत्महत्या कर ली है. उन की लाश घर में पड़ी है.’’ महिला ने सिसकते हुए कहा.

इस के बाद संतरी महिला को ड्यूटी पर तैनात मुंशी के पास ले गया और उसे पूरी बात बताई. मामला गंभीर था, इसलिए मुंशी ने संतरी से कोतवाली प्रभारी को सूचना देने के लिए कहा.

सूचना पा कर कुछ ही देर में कोतवाली प्रभारी मनोहर सिंह यादव आ गए. उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बुला कर पूछा, ‘‘क्या नाम है तुम्हारा?’’

‘‘जी प्रेमलता, घर में सब पिंकी कहते हैं.’’

‘‘कहां से आई हो?’’

‘‘नगला कीरत से. वहीं अपने पति और बच्चों के साथ रहती थी.’’

‘‘पति का क्या नाम था?’’

‘‘गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू.’’

‘‘बच्चे कितने हैं?’’

‘‘2, बेटा 8 साल का और बेटी 5 साल की है.’’

प्रेमलता जिस तरह टकरटकर मनोहर सिंह के सवालों का जवाब दे रही थी, उस से उन्हें उस पर संदेह हुआ. जिस औरत का पति मरा हो, वह इस तरह कतई बातें नहीं कर सकती. उन्होंने पूछा, ‘‘यह सब हुआ कैसे?’’

‘‘साहब, हम क्या बताएं. रात को हम सब खाना खा कर सोए और सवेरे उठे तो उन की लाश मिली. आप चलिए और लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम करा दीजिए. हम उन का जल्दी से अंतिम संस्कार करना चाहते हैं.’’

आगे कुछ पूछने के बजाय कोतवाली प्रभारी कुछ सिपाहियों और प्रेमलता को साथ ले कर कीरतपुर नगला जा पहुंचे. प्रेमलता के घर के सामने भीड़ लगी थी. भीड़ को हटा कर मनोहर सिंह अंदर पहुंचे तो कमरे में पड़ी चारपाई अस्तव्यस्त हालत में पड़ी थी.

मनोहर सिंह ने लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर चोट का कहीं कोई निशान नहीं था. गले पर जरूर कुछ इस तरह का निशान था, जो गला दबाने पर पड़ जाते हैं. उन्हें जो आशंका थी, लाश देख कर वह सच नजर आ रही थी. घर में एक ही दरवाजा था, उसी से अंदर आया या बाहर जाया जा सकता था. प्रेमलता का कहना था कि रात में उस ने खुद कुंडी लगाई थी.

मनोहर सिंह ने औपचारिक काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद उन्होंने एक बार फिर प्रेमलता से पूछताछ की. उस का कहना था कि वह रहते भले तनाव में थे, लेकिन ऐसी कोई बात नहीं कि उन्हें आत्महत्या करनी पड़े. शाम को सब ठीकठाक था. बात भी अच्छी तरह कर रहे थे. कहीं से नहीं लगता था कि वह रात में आत्महत्या कर लेंगे.

पूछताछ में पता चला कि मृतक गवेंद्र सिंह की सरकारी नौकरी थी. वह सरकारी स्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. वह बहुत खुशदिल था. हर किसी से हमेशा हंस कर मिलता था. मनोहर सिंह को गवेंद्र सिंह की आत्महत्या का यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध लग रहा था, लेकिन जब तक पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आ जाती, वह कुछ नहीं कर सकते थे.

प्रेमलता ने 6 बजे ही अपने ससुर रामसेवक को फोन कर के गवेंद्र की मौत की सूचना दे दी थी. उसी सूचना पर रामसेवक 9 बजे घर वालों के साथ नगला कीरतपुर पहुंचे तो पुलिस वहां मौजूद थी. बेटे की लाश देख कर रामसेवक ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरे बेटे ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की हत्या की गई है. आखिर वह आत्महत्या क्यों करेगा, उसे किसी चीज की कमी थोड़े ही थी.’’

‘‘कोई बात नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट से सब पता चल जाएगा. उस के पहले हम कुछ नहीं कह सकते.’’ मनोहर सिंह ने उसे आश्वासन दिया.

मनोहर सिंह ने मृतक के पिता रामसेवक की ओर से अपराध संख्या 1341/2015 पर अज्ञात लोगों के खिलाफ गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया था. मनोहर सिंह ने मुखबिरों से प्रेमलता के बारे में पता लगाने को कहा, क्योंकि उन्हें उस का चरित्र संदिग्ध लग रहा था. आखिर जब उन्हें पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो सारा मामला साफ हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक की मौत दम घुटने से हुई थी. उस की गला दबा कर हत्या की गई थी. ऐसे में संदेह प्रेमलता पर ही था, क्योंकि घर में मृतक के साथ वही थी और थाने आ कर उस ने झूठ भी बोला था.

मनोहर सिंह ने पूरे परिवार को इकट्ठा किया तो उन की नजरें मृतक के बच्चों पर जम गईं. हत्या वाली रात वे भी साथ थे. बच्चे डरे हुए लग रहे थे. बेटी तो छोटी थी, लेकिन बेटा उमंग 8 साल का था. वह कुछ बता सकता है, यह सोच कर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया और प्यार से पुचकार कर पूछा तो उस ने कहा, ‘‘मम्मी ने बबलू अंकल और 2 लोगों के साथ मिल कर पापा को मारा है.’’

अब क्या था, पुलिस ने तुरंत प्रेमलता उर्फ पिंकी को हिरासत में ले लिया. लेकिन जब उस से हत्या में शामिल बबलू तथा 2 अन्य लोगों के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि न वह बबलू को जानती है और न 2 अन्य लोगों को. उमंग ने बबलू का नाम तो बता दिया था, लेकिन वह कौन था, कहां का रहने वाला था, यह सब वह नहीं बता सका था.

पुलिस बबलू के बारे में पता करने लगी. उसी बीच उसे पता चला कि प्रेमलता इन दिनों आगरा की लायर्स कालोनी स्थित आईआईएमटी से नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी और वहीं कमरा ले कर रहती थी. इस से पुलिस को लगा कि कहीं बबलू आगरा का ही रहने वाला तो नहीं है. पुलिस वहां जा कर बबलू के बारे में पता लगाने की सोच ही रही थी कि प्रेमलता से मिलने एक लड़का आया. उस ने थानाप्रभारी से प्रेमलता को अपनी बहन बता कर मिलने की गुजारिश की तो मनोहर सिंह ने उसे प्रेमलता से मिलने की इजाजत दे दी.

उन्होंने उस लड़के को प्रेमलता से मिलने की इजाजत तो दे दी, लेकिन महिला सिपाही रेनू सारस्वत को उस के पीछे लगा दिया कि वह किसी भी तरह उन की बातें सुनने की कोशिश करे. रेनू उधर से गुजरी तो लड़का कह रहा था, ‘‘तुम ने ताजमहल वाले फोटो जला दिए हैं न?’’

‘‘हां, जला दिए हैं. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है?’’

यह सुन कर रेनू चौंकी. वह तुरंत मुंशी मंसूर अहमद के पास पहुंची और उन से बता दिया कि प्रेमलता से जो लड़का मिलने आया है, वही बबलू है.

मंसूर अहमद तेजी से बाहर आए. बबलू को शायद शक हो गया था, इसलिए वह तेजी से बाहर की ओर चला जा रहा था. मंसूर अहमद ने संतरी को आवाज देते हुए तेजी से उस की ओर दौड़े. आखिर उन्होंने उसे दबोच ही लिया.

इस के बाद उसे अंदर ला कर पूछताछ की गई तो एक ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस में प्रेम की राह में रोड़ा बनने वाले गवेंद्र सिंह उर्फ नीलू की हत्या कर दी गई थी. यह पूरी कहानी इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी का एक गांव है भरथरा, जहां महेशचंद फौजी परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी, 2 बेटे और 4 बेटियां थीं. प्रेमलता उन में सब से बड़ी थी. उस ने बीए करने के बाद बीएड किया और नौकरी की तलाश में लग गई. इसी के साथ महेशचंद उस की शादी के लिए लड़का ढूंढ़ने लगे.

महेशचंद की आर्थिक स्थिति ठीकठाक थी, बेटी भी पढ़ीलिखी थी. इसलिए वह उस के लिए खातेपीते परिवार का पढ़ालिखा लड़का तलाश रहे थे. इसी तलाश में उन्हें किसी से जिला एटा के थाना बागवाला के गांव लोहाखार के रहने वाले रामसेवक के बेटे गवेंद्र के बारे में पता चला तो वह उस के घर जा पहुंचे. रामसेवक का खातापीता परिवार था. उस के पास ठीकठाक जमीन थी. गांव में पक्का मकान था, एक मकान मैनपुरी के नगला कीरतपुर में भी था. गवेंद्र ने पौलिटैक्निक करने के साथ बीए भी कर रखा था. वह नौकरी की तलाश में था.

महेशचंद को गवेंद्र प्रेमलता के लिए पसंद आ गया. उसे लगा कि गवेंद्र को जल्दी ही कहीं न कहीं नौकरी मिल ही जाएगी. उस के बाद उन की बेटी की जिंदगी संवर जाएगी. उस ने गवेंद्र को प्रेमलता के लिए पसंद कर लिया और उस के साथ प्रेमलता की शादी कर दी. प्रेमलता ससुराल आ गई. रामसेवक का छोटा सा परिवार था. पतिपत्नी के अलावा एक बेटा और एक बेटी नीरज थी, जिस की वह शादी कर चुके थे. इसलिए घर में सिर्फ 4 ही लोग बचे थे. प्रेमलता को पूरा विश्वास था कि उस के पति को जल्दी ही कहीं न कहीं अच्छी नौकरी मिल जाएगी. वैसे घर में किसी तरह की कोई कमी नहीं थी, लेकिन पति की कमाई की बात अलग ही होती है.

गवेंद्र नौकरी की कोशिश में लगा था, लेकिन नौकरी मिल नहीं रही थी. इस बीच वह 2 बच्चों उमंग और तमन्ना का पिता बन गया. प्रेमलता खुद भी बीए, बीएड थी. लेकिन बच्चे छोटे थे, दूसरे गवेंद्र नहीं चाहता था कि वह नौकरी करे, इसलिए प्रेमलता ने अपने लिए कोशिश नहीं की. सन 2012 में गवेंद्र को मैनपुरी के कीरतपुर स्थित सेवाराम जूनियर हाईस्कूल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी मिल गई. नौकरी भले ही चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की थी, लेकिन सरकारी थी, इसलिए उस ने इसे जौइन कर लिया.

लेकिन प्रेमलता को यह नौकरी पसंद नहीं थी, वह शायद किसी अधिकारी की बीवी बनना चाहती थी. चपरासी की बीवी कहलवाना उसे बिलकुल भी पसंद नहीं था. इसलिए उस ने सोचा कि अब उसे ही कुछ करना होगा. वह अपने कैरियर के बारे में सोचने लगी. उस के बच्चे भी बड़े हो गए थे, इसलिए वह खुद कुछ कर के समाज में नाम और पैसा कमाना चाहती थी.

उसी बीच ससुराल जाते समय बस में उस की मुलाकात बबलू से हुई. बबलू भी उसी सीट पर बैठा था. रास्ते में बबलू उस के बच्चों से बातें करतेकरते उस से भी बातें करने लगा. उस ने बताया कि वह आगरा के आईआईएमटी कालेज से जीएनएम (जनरल नर्सिंग मिडवाइफरी) का कोर्स कर के आगरा के पुष्पांजलि अस्पताल में नौकरी करता है.

जब प्रेमलता ने कहा कि उस ने भी बीए, बीएड किया है, लेकिन लगता नहीं कि उसे नौकरी मिलेगी तो उस ने कहा, ‘‘अगर तुम जीएनएम का कोर्स कर लो तो जल्दी ही तुम्हें कहीं न कहीं नौकरी मिल जाएगी. रही बात दाखिले की तो वह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए. 2-4 दिन ससुराल में रह कर प्रेमलता पति के पास आई तो उस ने गवेंद्र से कहा, ‘‘भई अब इस तरह काम नहीं चलेगा. बच्चों के भविष्य के लिए मुझे भी कुछ करना होगा. बीए, बीएड से तो नौकरी मिल नहीं सकती, इसलिए मैं जीएनएम का कोर्स करना चाहती हूं. इस से किसी न किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाएगी.’’

गवेंद्र को लगा कि अब बच्चे समझदार हो गए हैं. ऐसे में प्रेमलता कुछ करना चाहती है तो इस में बुराई क्या है. वह प्रेमलता को जीएनएम का कोर्स कराने के लिए राजी हो गया. गवेंद्र के पिता रामसेवक रिटायर हो चुके थे. इसलिए अब वह भी उसी के साथ रहने लगे थे.

प्रेमलता ने बबलू की मदद से आईआईएमटी में अपना दाखिला करा लिया.  बबलू उसे सुनहरे भविष्य का सपना दिखाने लगा. प्रेमलता की पढ़ाई शुरू हो गई. बबलू लायर्स कालोनी में कमरा किराए पर ले कर रहता था. प्रेमलता को भी उस ने उसी कालोनी में कमरा दिला दिया. अब दोनों की रोज मुलाकात होने लगी. बबलू प्रेमलता के कमरे पर भी आनेजाने लगा.

लगातार मिलने और कमरे पर आनेजाने से प्रेमलता और बबलू में प्यार ही नहीं हो गया, प्रेमलता ने उस से शारीरिक संबंध बना कर उस ने रिश्तों की मर्यादा भंग कर दी. सपनों को ख्वाहिश बनाया तो तन और मन से पति से ही नहीं, बच्चों से भी दूर हो गई.

बबलू को जब लगा कि प्रेमलता पूरी तरह से उस की हो गई है तो उस ने उस से विवाह करने की इच्छा व्यक्त की. तब प्रेमलता ने कहा, ‘‘बबलू यह सब इतना आसान नहीं है. क्योंकि गवेंद्र मुझे आसानी से छोड़ने वाला नहीं है.’’

‘‘तो ठीक है, मैं उसे रास्ते से हटाए देता हूं.’’ बबलू ने कहा तो प्रेमलता गंभीर हो कर बोली, ‘‘यह तो और भी आसान नहीं है.’’

प्रेमलता भी अब गवेंद्र से छुटकारा पा कर बाकी की जिंदगी बबलू के साथ बिताना चाहती थी, लेकिन वह उसे छोड़ कर बबलू से शादी नहीं कर सकती थी. क्योंकि ऐसा करने पर मायके वाले उस का साथ न देते. इसलिए वह बड़ी उलझन में फंसी थी. वह इस बारे में कुछ करती, उस के पहले ही उस की पोल खुल गई. स्कूल में छुट्टी होने की वजह से गवेंद्र पत्नी से मिलने आगरा पहुंच गया. उस का वहां आना प्रेमलता को अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन वह उसे भगा भी नहीं सकती थी. रात का खाना खा कर वह सो गया.

अचानक उस की आंख खुली तो उस ने प्रेमलता को मोबाइल पर किसी से हंसहंस कर बात करते पाया. उस की बातचीत सुन कर पता चला कि वह किसी बबलू से बातें कर रही थी. उस ने फोन काटा तो गवेंद्र ने पूछा, ‘‘यह बबलू कौन है, जिस से तुम इतनी रात को बातें कर रही थी?’’

‘‘यहीं पड़ोस में रहता है. उस से किसी काम के लिए कहा था, उसी के बारे में बात कर रही थी.’’

‘‘उस के बारे में तुम सुबह भी तो पूछ सकती थी.’’

‘‘अभी पूछ लिया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा.’’ प्रेमलता ने तमक कर कहा.

इस के बाद गवेंद्र को नींद नहीं आई. सुबह दोनों में बबलू को ले कर खूब झगड़ा हुआ. बबलू को पता नहीं था कि गवेंद्र अभी गया नहीं है, इसलिए जब दोनों में झगड़ा हो रहा था तो वह प्रेमलता के कमरे पर आ पहुंचा. उसे देख कर गवेंद्र ने पूछा, ‘‘तो तुम्हीं बबलू हो?’’

गवेंद्र के इस सवाल पर बबलू सिटपिटा गया. घबराहट में बोला, ‘‘जी, हम ही बबलू हैं. पिंकी दीदी से कुछ काम था, इसलिए आ गया. जरूरत पड़ने पर कुछ मदद कर देता हूं.’’

‘‘कोई अपनी दीदी से देर रात को बातें नहीं करता. बबलू यह सब ठीक नहीं है. मेरे खयाल से तुम्हारा यहां आनाजाना ठीक नहीं है. इन की मदद के लिए मैं हूं न.’’

गवेंद्र ने बबलू को दरवाजे से वापस कर दिया. प्रेमलता को यह बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. इसलिए उस ने तय कर लिया कि अब उसे किसी भी तरह गवेंद्र से छुटकारा पाना है.

दूसरी ओर गवेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि वह प्रेमलता के बारे में पिता को बताए या न बताए. उसे लगा कि यह पतिपत्नी के बीच मामला है, इस में पिता को बता कर परेशान करना ठीक नहीं है. इस तरह रामसेवक को कुछ पता नहीं चला. बच्चों की छुट्टियां पड़ गईं तो गवेंद्र ने बच्चों को आगरा पहुंचा दिया. इस बीच बबलू के साथसाथ उस के दोस्तों विनयकांत और सर्वेंद्र का भी प्रेमलता के यहां आनाजाना हो गया. सर्वेंद्र और विनयकांत भी उसी कालेज से बीएमएस कर रहे थे. वहां रहते हुए उमंग और तमन्ना भी बबलू से हिलमिल गए थे.

एक दिन सभी ताजमहल देखने गए, जहां बबलू ने प्रेमलता के साथ फोटो खिंचवाए. इस तरह उन के प्यार का एक प्रमाण भी हो गया. इस के बाद तय हुआ कि गवेंद्र को रास्ते से हटा कर दोनों शादी कर लेंगे. यही नहीं, उस ने पूरी तैयारी भी कर ली. अब उसे मौके की तलाश थी. 30 नवंबर को प्रेमलता ने गवेंद्र को फोन किया तो पता चला कि रामसेवक वोट डालने गांव गए हैं. खेतों की बुवाई भी करानी है, इसलिए वह खेतों की बुवाई कराने तक गांव में ही रहेंगे. प्रेमलता ने बबलू से कहा कि गवेंद्र को निबटाने का यह अच्छा मौका है. बबलू ने अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत को दोस्ती के नाम पर साथ देने के लिए राजी कर लिया. इस तरह गवेंद्र की हत्या की पूरी तैयारी हो गई.

31 दिसंबर, 2015 को प्रेमलता बच्चों के साथ कीरतपुर आ गई. उसे देख कर गवेंद्र ने कहा, ‘‘फोन कर देती तो मैं बच्चों को लेने आ जाता.’’

‘‘मैं ने फोन इसलिए नहीं किया कि यहां आ कर घर भी देख लूंगी और तुम से भी मिल लूंगी.’’ प्रेमलता ने कहा.

योजना के अनुसार, 4 दिसंबर, 2015 को बबलू अपने दोनों दोस्तों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ मैनपुरी आ गया. कीरतपुर में ही उस का एक दोस्त रहता था, वे उसी के घर ठहर गए. उन का खाना प्रेमलता ने ही उमंग के हाथों भिजवाया था. 5 दिसंबर को गवेंद्र अपनी स्कूल की ड्यूटी कर के घर आया तो प्रेमलता उसे काफी बेचैन लगी. गवेंद्र ने पूछा तो प्रेमलता ने कहा, ‘‘मैं आगरा में रहती हूं तो तुम्हारी और बच्चों की चिंता लगी रहती है.’’

गवेंद्र ने कहा, ‘‘कुछ दिनों की ही तो बात है. पढ़ाई पूरी होने पर मैनपुरी के आसपास नौकरी की कोशिश की जाएगी.’’

प्रेमलता की इन बातों से गवेंद्र का मन साफ हो गया. उसे क्या पता था कि अब उस की जिंदगी कुछ ही घंटों की बची है. रात का खाना बना कर प्रेमलता ने सब को खिलाया. गवेंद्र को खाना खातेखाते ही नींद आने लगी. वह बिस्तर पर जा कर सो गया. प्रेमलता ने बच्चों को भी सुला दिया. जब मोहल्ले में सन्नाटा पसर गया तो उस ने बबलू को फोन कर के आने को कहा. बबलू तो तैयार ही बैठा था. वह अपने दोनों साथियों, सर्वेंद्र और विनयकांत के साथ आ पहुंचा. प्रेमलता उन्हें उस कमरे में ले गई, जहां गवेंद्र सो रहा था. प्रेमलता ने गवेंद्र को खाने में नींद की गोलियां दे कर सुला दिया था, इसलिए सभी उस की ओर से निश्चिंत थे.

बबलू गवेंद्र का गला दबाने लगा तो वह जाग गया. उस के विरोध में हुए शोर से दूसरे कमरे में सो रहे उमंग की नींद टूट गई. शोर क्यों हो रहा है, यह जानने के लिए वह उस कमरे में आया तो देखा 4 लोग उस के पापा को दबोचे हुए थे. लेकिन तब तक गवेंद्र मर चुका था. उमंग को देख कर सभी के होश उड़ गए. जो जहां था, वहीं खड़ा रह गया. अब सब की नजरें उमंग पर टिकी थीं. बबलू एकदम से बोला, ‘‘यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई, इस ने जो देखा है, किसी से भी बता सकता है. अब इसे भी खत्म करना होगा.’’

‘‘नहीं, इसे कोई हाथ नहीं लगा सकता. तुम लोग लाश को इसी तरह पड़ी रहने दो. मैं इसे भी संभाल लूंगी और लाश को भी संभाल लूंगी. आगे क्या करना है, यह तुम मुझ पर छोड़ दो.’’ प्रेमलता ने कहा.

इस के बाद बबलू, सर्वेंद्र और विनयकांत चले गए. उन के जाने के बाद प्रेमलता बेटे को डराती रही कि वह किसी से कुछ नहीं बताएगा. अगर उस ने किसी को कुछ बताया तो वह उसे भी मार देगी. सवेरा होने पर प्रेमलता ने रोरो कर मोहल्ले वालों को इकट्ठा कर के बताया कि गवेंद्र ने आत्महत्या कर ली है. इस के बाद खुद ही थाने जा कर पति की आत्महत्या की सूचना दे दी. बबलू को उमंग से तो खतरा था ही, ताजमहल में उस ने प्रेमलता के साथ जो फोटो खिंचवाए थे, उन से भी वह पकड़ा जा सकता था. इसीलिए वह उन के बारे में पता करने थाने आ गया और पकड़ा गया.

सर्वेंद्र और विनयकांत भी उमंग से डर रहे थे, इसलिए उन्होंने उस का अपहरण करना चाहा, लेकिन रामसेवक को इस की भनक लग गई तो उन्होंने इस बात की जानकारी थाना विछवां के थानाप्रभारी जी.पी. गौतम को दे दी. जी.पी. गौतम ने उसे पुलिस सुरक्षा मुहैया करा दी. पूछताछ के बाद बबलू और प्रेमलता को जेल भेज दिया गया है. फरार सर्वेंद्र और विनयकांत की पुलिस तलाश कर रही है.

मनोहर सिंह यादव ने इस मामले का खुलासा मात्र 9 दिनों में कर दिया. इस से खुश हो कर एसएसपी ने उन्हें 5 हजार रुपए ईनाम दिया है. रेनू और मंसूर अहमद ने जिस तरह सूझबूझ से पकड़वाया, इस के लिए उन्हें भी ढाईढाई हजार रुपए ईनाम दिया गया है. Hindi Crime Story

 

Love Crime: सलहज को प्यार – साले को मौत का उपहार

Love Crime: रामवीर की नजर अपनी सलहज कुसुमा पर पहले से ही जमी थी. पत्नी की मौत के बाद तो वह उस के पीछे ही पड़ गया. उस ने उसे पा तो लिया, लेकिन इस का परिणाम सुखद नहीं रहा.

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना यमुनापार के गांव ढहरुआ में रहता था भागचंद. उस की गिनती गांव के खुशहाल लोगों में होती थी. उस के 7 बेटे और 3 बेटियां थीं. उस ने सभी बच्चों को खूब पढ़ाना चाहा था, लेकिन उस का कोई भी बेटा ज्यादा नहीं पढ़ सका, तब उस ने सभी को उन की मरजी के मुताबिक काम सिखवा दिए. उस के 3 बेटे शटर बनाने का काम करने लगे. बच्चे कमाने लगे तो भागचंद की मौज हो गई. बच्चे जो भी कमाते थे, वह उसी को देते थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए, वह उन की शादियां करता गया.

भागचंद ने अपने बेटे भूरा की शादी मथुरा से और उस से छोटे खन्ना की शादी जिला आगरा के गांव मितावली इंकारपुर की कुसुमा से की थी. कुसुमा के पिता की मौत हो चुकी थी. इस के बाद घर में मां मनिया के अलावा 3 बहनें और एक भाई था. खन्ना अपनी कमाई से जो पैसे पिता को देता था, शादी के बाद देने बंद कर दिए थे. उन पैसों से अब वह अपनी गृहस्थी चलाने लगा था. कुसुमा खन्ना के साथ बहुत खुश थी. उन्हीं दिनों भागचंद ने अपनी बेटी पिंकी की शादी राजस्थान के कस्बा कुम्हेरपुर के रामवीर के साथ कर दी. रामवीर भी खातेपीते परिवार का था. पिंकी को ससुराल में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी.

रामवीर का छोटा भाई श्यामवीर भी शादी लायक था. भागचंद को श्यामवीर छोटी बेटी किन्ना के लिए ठीक लगा तो उस के पिता देवी सिंह से बात की. देवी सिंह का परिवार पिंकी से काफी खुश था, इसलिए उन्हें इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं था. इस के बाद किन्ना की शादी श्यामवीर के साथ हो गई. इस तरह भागचंद की दोनों बेटियों की शादी एक ही घर में हो गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. समय के साथ कुसुमा 2 बच्चों की मां बन गई. खन्ना का शटर बनाने का काम बढि़या चल रहा था. पिंकी अपने पति रामवीर के साथ जल्दीजल्दी मायके आती रहती थी. रामवीर मजाकिया स्वभाव का था, इसलिए अपनी सलहज कुसुमा से वह खूब मजाक करता था.

यह बात उस के साले खन्ना को अच्छी नहीं लगती थी. कभीकभी खन्ना अपने बहनोई रामवीर के मजाक करने पर ऐतराज कर दिया करता था. तब रामवीर कहता, ‘‘साले साहब, सलहज से हमारा मजाक करने का हक है, इस में आप को क्यों बुरा लगता है. भाभी को तो कोई ऐतराज नहीं है.’’

खन्ना कहता, ‘‘मजाक का भी कोई समय होता है. हर समय हंसीमजाक अच्छा नहीं लगता. उस की भी एक सीमा होती है, लेकिन आप हैं कि मानते ही नहीं.’’

मगर खन्ना की बातों का रामवीर पर कोई असर नहीं पड़ा. वह जब तक ससुराल में रहता, खन्ना परेशान रहता. खन्ना ने कई बार अपने पिता से भी कहा, ‘‘आप जीजाजी को समझाते क्यों नहीं, वह इतने फूहड़ मजाक करते हैं.’’

भागचंद दामाद के बजाय उसे ही समझाता, ‘‘बेटा, दामाद से इस तरह की बात करना ठीक नहीं है. फिर वह मजाक ही तो करता है. वह यहां महीनों तो रहता नहीं, एकदो दिन रह कर चला जाता है. इस बात को ले कर उसे नाराज नहीं करना चाहिए, हम ने उसे बेटी दी है, बेटी की वजह से हमें चुप रहना चाहिए.’’

रामवीर को किसी की कोई परवाह नहीं थी. वह जब भी ससुराल आता, कुसुमा के आगेपीछे मंडराता रहता और हंसीमजाक करता रहता. जब वह चला जाता तो खन्ना इस बात को ले कर कुसुमा से खूब झगड़ता. एक दिन भागचंद को खबर मिली कि उस की बेटी बीमार है. यह खबर सुन कर वह परेशान हो उठा. उसे देखने के लिए वह बेटे खन्ना के साथ उस की ससुराल कुम्हेरपुर पहुंचा. वहां जा कर पता चला कि पिंकी की हालत बहुत नाजुक है. बेहतर इलाज के लिए वह बेटी को एक बड़े अस्पताल ले गया, लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. लाख कोशिशों के बाद भी डाक्टर पिंकी को नहीं बचा पाए.

पिंकी की मौत उस के मायके वालों के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस के बच्चों को पालने की जिम्मेदारी पिंकी की छोटी बहन किन्ना ने ले ली. पत्नी की मौत के बाद भी रामवीर जबतब अपनी ससुराल आता रहता था. ससुराल में अब भी उस की पहले की ही तरह इज्जत होती थी. कुसुमा उस की पहले की ही तरह खातिरदारी करती थी. खन्ना को अब रामवीर का आना बिलकुल भी नहीं अच्छा लगता था. उसी की वजह से अब उस के और कुसुमा के बीच तनाव रहने लगा था. खन्ना की बात पर घर में कोई ध्यान नहीं देता था और न ही कोई उस के मानसिक तनाव को समझने की कोशिश करता था.

जबकि सच्चाई यह थी कि कुसुमा रामवीर की तरफ आकर्षित होती जा रही थी, जिस की वजह से उस के दांपत्य में दरार पड़ने लगी थी. रामवीर और कुसुमा के बीच वे बातें भी होने लगीं, जो दोनों को एकदूसरे के करीब लाने वाली थीं. एक दिन रामवीर ने कुसुमा को मथुरा में मिलने को कहा, लेकिन कुसुमा ने कहा कि घर के सभी लोग शादी में जा रहे हैं, इसलिए घर में अकेली होने की वजह से वह वहां नहीं आ सकती. उस ने रामवीर को अपने यहां आने को कहा. तब रामवीर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि ऐसे में वह उस के घर आ सकता था.

मौके का फायदा उठाने के लिए रामवीर अपनी ससुराल पहुंच गया और एकांत का फायदा उठा कर दोनों ने उस दिन मर्यादाएं लांघ कर इच्छा पूरी कर ली. रामवीर ने साले के दांपत्य में सेंध लगा दी. खन्ना को बीवी की बेवफाई का पता नहीं चला. कुसुमा को भी अपनी बेवफाई पर कोई ग्लानि नहीं हुई. उस दिन के बाद से कुसुमा का पति के प्रति व्यवहार बदलने लगा. खन्ना जब कभी उस से झगड़ता, वह मायके जाने की धमकी देने लगती. खन्ना समझ नहीं पा रहा था कि कुसुमा अब इस तरह की बातें क्यों करती है. वह अंदर ही अंदर तनाव में घुटने लगा. दूसरी ओर कुसुमा को किसी बात की परवाह नहीं थी.

उसी बीच मथुरा में रामवीर और कुसुमा की मुलाकात हुई तो कुसुमा ने उस से कहा कि खन्ना को अब उस पर शक हो गया है. वह छोटीछोटी बात पर उस की पिटाई करने लगा है. तब रामवीर ने कहा, ‘‘मैं खन्ना से बात करूंगा.’’

‘‘नहीं, तुम उस से कुछ मत कहना. अब मेरे घर भी मत आना. जब कभी मिलना होगा, हम बाहर ही मिल लिया करेंगे. लेकिन इस समस्या का कोई हल तो ढूंढ़ना ही होगा. आखिर मैं कब तक उस से पिटती रहूंगी.’’ कुसुमा ने कहा.

कुसुमा की बात पर रामवीर गंभीर हो गया. उसे लगा कि कुछ तो करना ही होगा. कुसुमा ने कहा, ‘‘चलो, हम कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘नहीं, इस से बड़ी गड़बड़ हो जाएगी. तुम्हें यह तो पता ही है कि मेरा छोटा भाई श्यामवीर भी उस घर का दामाद है. जब मैं घर में नहीं रहूंगा तो खन्ना को पूरा विश्वास हो जाएगा कि मैं ही तुम्हें भगा कर ले गया हूं. तब ससुराल वालों से श्यामवीर के संबंध खराब हो जाएंगे. मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से श्यामवीर की गृहस्थी बिगड़े.’’

रामवीर ने कुसुमा को भरोसा दिया कि वह इस बारे में कुछ न कुछ जरूर करेगा. अगर जरूरत पड़ी तो खन्ना को रास्ते से हटा कर हमेशा की टेंशन खत्म कर देगा. होली पर रामवीर बिना बुलाए मेहमान की तरह भागचंद के घर पहुंच गया. खन्ना को उस का आना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन वह खामोश रहा. होली के बहाने रामवीर ने कुसुमा को अपनी बाहों में भर लिया. रामवीर की इस हरकत से नाराज हो कर खन्ना ने रामवीर की पिटाई कर दी. रामवीर अपनी सफाई में यही कहता  रहा कि वह तो सलहज के साथ होली खेल रहा था. लेकिन खन्ना का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. आखिर में घर वालों ने बीचबचाव कर के रामवीर को छुड़ाया.

इस घटना से रंग में भंग पड़ चुका था. खन्ना ने तय किर लिया था कि अब वह रामवीर को किसी भी कीमत पर अपने घर नहीं आने देगा. रामवीर की पिटाई से कुसुमा भी डर गई थी. उस ने पहली बार पति का ऐसा गुस्सा देखा था. खन्ना ने उसे भी चेतावनी दी थी कि वह संभल जाए वरना बहुत पछताएगी. उस दिन कुसुमा को लगा कि अब वह रामवीर से कभी नहीं मिल पाएगी. लेकिन रामवीर ने तो कुछ और ही सोच लिया था. वह खन्ना से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था. वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाए, जिस से वह खन्ना से बदला भी ले ले और कुसुमा भी हासिल हो जाए.

खन्ना को लगा कि रामवीर इतने अपमान के बाद अब उस के घर नहीं आएगा. वह अपने काम में मन लगाने लगा. कुसुमा का व्यवहार भी उसे सामान्य लगने लगा था. इस तरह वह बेफिक्र हो गया. लेकिन उस की यही लापरवाही आगे चल कर उस की मुसीबत बनने वाली थी. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी की आशिकी उसे कभी मौत की सौगात दे जाएगी. रामवीर और खन्ना के बीच हुए झगड़े के बाद कुसुमा भी सतर्क हो गई थी. उस का रामवीर से भले ही मिलना नहीं हो रहा था, पर वह उस से फोन पर बातें करती रहती थी. जब कभी उसे मौका मिलता, वह फोन पर बात कर के निश्चित जगह पर उस से मिल भी लेती थी.

27 अगस्त, 2015 को सवेरे शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी ने खन्ना के घर का दरवाजा खटखटाया. खन्ना ने दरवाजा खोला तो अजीत ने कहा कि उसे अभी उस के साथ चलना होगा, क्योंकि पार्टी को अभी काम पूरा कर के देना है. अगर समय पर उस के शटर बना कर नहीं दिए तो परेशानी हो जाएगी.  खन्ना ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम 2 मिनट ठहरो, मैं अभी तैयार हो कर आता हूं.’’

इस के बाद खन्ना ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ चला गया. उस दिन अजीत चौधरी के साथ गया खन्ना फिर कभी वापस नहीं लौटा. खन्ना देर रात तक वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने अजीत को फोन किया, क्योंकि वह उसी के साथ गया था. अजीत ने बताया कि खन्ना तो शाम को ही काम खत्म कर के घर चला गया था. जब काम खत्म कर के घर के लिए चला था तो रास्ते से कहां गायब हो गया? घर वालों ने रात में ही खन्ना की खोजबीन शुरू कर दी. लेकिन वह नहीं मिला. घर वाले रात भर उस की चिंता में परेशान रहे. जैसेतैसे उन की रात बीती. सवेरा होते ही वे सब फिर खन्ना को तलाशने लगे.

किसी ने चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में खन्ना की लाश देखी तो उस के घर वालों को बता दिया. वे वहां पहुंच गए. भागचंद ने जब बेटे की लाश देखी तो फूटफूट कर रोने लगा. खबर मिलने पर थाना यमुनापार के थानाप्रभारी संतोष कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला. गले में बनियान बंधा था. इस से अंदाजा लगाया गया कि इसी बनियान से उस का गला घोंटा गया था.

भागचंद का शक शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी पर था, क्योंकि वही उसे अपने साथ घर से लिवा कर ले गया था. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने खन्ना के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने भागचंद की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्होंने अपना शक अजीत चौधरी पर जताया था. अजीत चौधरी थाना मांट के कुढ़वारा गांव का रहने वाला था. दबिश दे कर पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने अजीत से पूछताछ की तो उस ने खुद को बेकसूर बताया. उस ने कहा कि खन्ना लंबे समय से उस के साथ काम कर रहा था. उस के साथ उस के काफी अच्छे संबंध थे. कोई ऐसी वजह नहीं थी, जिस से वह उस की हत्या करता. पुलिस ने उस से कई तरह से पूछताछ की. लेकिन कोई हल नहीं निकला. इस पूछताछ में अनुभवी थानाप्रभारी को वह वास्तव में बेकसूर लगा. उन्होंने उसे छोड़ दिया. मृतक खन्ना के परिवार वालों को जब इस बात का पता चला तो वे हंगामा करते हुए थाने पहुंच गए और अजीत को जेल भेजने की मांग करने लगे.

इस हंगामे में रामवीर बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहा था. थानाप्रभारी ने मृतक के परिजनों को समझाया कि वह खन्ना के हत्यारे को पकड़ कर जेल जरूर भेजेंगे. इस के बाद पुलिस ने खन्ना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस के मोबाइल पर आने वाली आखिरी काल खन्ना के बहनोई रामवीर की थी. पुलिस ने रामवीर के बारे में छानबीन शुरू की तो गांव वालों से पता चला कि होली वाले दिन रामवीर ने खन्ना की बीवी को छेड़ा था, तब खन्ना ने उस की पिटाई कर दी थी.

इस बात की पुष्टि के लिए पुलिस ने खन्ना के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि रामवीर के साथ खन्ना का झगड़ा तो हुआ था, लेकिन वह झगड़ा ऐसा नहीं था कि रामवीर खन्ना की हत्या कर देता. फिर होली के बाद रामवीर उन के यहां आया भी नहीं था. पुलिस को अब तक पता चल चुका था कि खन्ना की बीवी कुसुमा से रामवीर का कोई चक्कर था. इस के बाद पुलिस के सामने तसवीर साफ हो गई.

दूसरी ओर रामवीर को किसी तरह पता चल गया कि पुलिस को उस पर शक हो गया है तो वह फरार हो गया. उस के फरार होने की जानकारी पुलिस को मिल गई. लिहाजा 2 सिपाहियों को उस के घर पर लगा दिया गया. जैसे ही वह घर लौटा, पुलिस ने उसे दबोच लिया. पुलिस रामवीर को पकड़ कर थाने ले आई और पूछताछ शुरू कर दी. रामवीर ने पहले तो पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने साले खन्ना की हत्या की थी और उस की लाश को चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में फेंक दिया था.

रामवीर ने यह भी स्वीकार किया कि उस की सलहज कुसुमा से उस के नाजायज संबंध थे. कुछ समय तक तो सब कुछ ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों बाद खन्ना को उस पर शक होने लगा और उसे उस का आनाजाना अखरने लगा. वह किसी भी कीमत पर कुसुमा से संबंध तोड़ना नहीं चाहता था. कुसुमा भी अपने पति की पिटाई से तंग आ गई थी. वह हमेशा के लिए पति से छुटकारा चाहती थी. इस के बाद दोनों ने खन्ना को ठिकाने लगाने की योजना बना ली.

उस के बाद रामवीर खन्ना का विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा. जब उसे उस पर विश्वास हो गया तो रामवीर ने घटना वाले दिन खन्ना को फोन कर के शाम का खाना किसी होटल में खाने की बात कही. खन्ना रामवीर को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता था. उस ने सोचा कि अगर रामवीर सुधर रहा है तो उसे एक मौका अवश्य देना चाहिए. उस ने सोचा कि खाना खाते समय वह रामवीर को समझाएगा. उस दिन सुबह ही वह ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ काम पर निकला था. काम खत्म करने के बाद वह शाम को रामवीर की बताई जगह पर पहुंच गया. रामवीर उसे एक ढाबे पर ले गया, जहां दोनों ने खाना खाया और शराब पी.

रामवीर ने खन्ना को खूब शराब पिलाई. जब खन्ना नशे में धुत हो गया तो वह उसे एक टैंपो में डाल कर सुनसान जगह पर ले गया और अपनी बनियान से उस का गला घोंट दिया. चूंकि उस दिन अजीत चौधरी खन्ना को घर से बुला कर ले गया था, इसलिए घर वालों का शक अजीत पर ही गया. पर पुलिस ने असली अपराधी को खोज निकाला. रामवीर से पूछताछ के बाद पुलिस ने कुसुमा को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. कुसुमा के घर वालों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुसुमा ने ही अपने पति को मरवाया है. कुसुमा यही कहती रही कि न उस के रामवीर से संबंध हैं और न ही उस ने पति को मरवाया है.

बहरहाल, पुलिस ने रामवीर और कुसुमा को गिरफ्तार कर के कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक दोनों जेल में थे. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: मालकिन की इज्जत के साथ खेलता नौकर

Hindi Crime Story: शराब को भले ही सामाजिक बुराई माना जाता हो, लेकिन देश में शराब का अरबों का कारोबार चलता है. शाम ढलते ही शहरों के मयखानों, बार और नाइट क्लब आबाद होने लगते हैं.  शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में नौचंदी थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित एक कैंटीननुमा मयखाने में शराब पीने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी.

लोग मेजों पर खानेपीने का सामान सजाए बैठे थे. किनारे की एक मेज पर आमनेसामने 2 युवक बैठे शराब की चुस्कियां ले रहे थे. तभी अचानक 2 युवक उन के पास आ कर खड़े हो गए. उन के हाथों में पिस्तौलें थीं. उन में से एक युवक हवाई फायर करते हुए चिल्लाया, ‘‘अगर किसी ने भी शोरशराबा किया या भागा तो जिंदा नहीं बचेगा.’’

युवक की इस हरकत से वहां का माहौल दहशतजदा हो गया. लोग सकते में आ गए. कोई कुछ समझ पाता उस से पहले ही दोनों युवकों में से एक ने आमनेसामने बैठे युवकों में से एक ने उस के सिर, सीने और पेट को निशाना बना कर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही युवक कुरसी पर लुढ़क गया.

इस के बाद दोनों युवक चले गए. टेबल पर रखा उस युवक का मोबाइल भी वे अपने साथ ले गए थे. गोलियां चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. किसी ने छिप कर जान बचाई तो किसी ने भाग कर. मृत युवक के साथ बैठा युवक भी भाग खड़ा हुआ था.

इसी बीच किसी व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दे दी थी. वारदात की सूचना पा कर पुलिस भी वहां पहुंच गई. निरीक्षण में पता चला युवक मर चुका है. पूछताछ में जानकारी मिली कि दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से आए थे. उन्होंने मृतक पर करीब 25 राउंड गोलियां चलाई थीं. मारा गया युवक अपने साथी के साथ पल्सर मोटरसाइकिल नंबर यूपी-15 बीए-4351 से आया था, जो बाहर खड़ी थी.

घटनास्थल से पुलिस को कारतूस के कई खोखे मिले. मृतक की शिनाख्त तुरंत नहीं हो सकी. उस के सीने, पेट और सिर पर 10 से ज्यादा गोलियों के निशान थे, लेकिन वहां किसी अन्य व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई थी. इस का मतलब हमलावर सिर्फ उसे ही मारने आए थे. जिस तरह उस पर गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब था कि हत्यारे उसे किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

पुलिस को मृतक की जेबों की तलाशी में एक पर्स मिला, जिस में मिलें कागजों के आधार पर उस की शिनाख्त जुहेब आलम उर्फ साहिल खान के रूप में हुई. पुलिस ने पर्स में मिले पते पर उस की हत्या की सूचना दी तो थोड़ी देर में उस के घर वाले रोतेबिलखते हुए वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक जुहेब शहर के ही थाना लालकुर्ती क्षेत्र के मैदा मोहल्ला स्थित जफर बिल्डिंग में रहने वाले सुलतान का बेटा था. उस के 2 भाई और थे, जुहेब एमबीए था और करीब 5 सालों से हापुड़ रोड स्थित कीर्तिका पब्लिकेशन में बतौर एकाउंटैंट नौकरी करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे तक ही घर लौट पाता था.

जिस तरह उस की हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि उस की किसी से गहरी रंजिश थी. पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी जुहेब या परिवार की रंजिश होने से साफ मना कर दिया. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, क्योंकि कोई तो वजह थी, जिस के चलते उस का कत्ल किया गया था.

पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल से भी पूछताछ की. उन्होंने भी अपनी जानकारी में जुहेब की किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया था कि उस दिन जुहेब शाम करीब साढ़े 6 बजे उन के यहां से निकला था. कैंटीन में उस के साथ गया दूसरा युवक कौन था, इस की जानकारी पुलिस को नहीं मिल सकी. कत्ल का राज उस युवक के सीने में दफन हो सकता था.

यह 20 फरवरी, 2017 की घटना थी. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ और एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने घटना के खुलासे के लिए डीएसपी विकास जायसवाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. जिस में थानाप्रभारी मोहन सिंह, सबइंसपेक्टर अफसर अली, हैडकांस्टेबल धर्मराज, कांस्टेबल सतीश और राकेश को शामिल किया गया.

पुलिस के हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा, जिस से कत्ल का राज खुल पाता. सभी पहलुओं पर गौर किया गया तो सुई मृतक के मोबाइल पर जा कर अटक गई. हत्यारे जुहेब का मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे. मतलब उस के मोबाइल में कोई गहरा राज छिपा था. यह मामला प्रेमप्रसंग का लग रहा था, अगले दिन पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की छानबीन से पता चला कि जुहेब का नोएडा की रहने वाली किसी युवती से संबंध था. दोनों की अकसर बातें होती रहती थीं. युवती दूसरे संप्रदाय की थी. पुलिस की एक कड़ी मिली तो उस ने जांच आगे बढ़ाई. हत्या की वजह यह प्रेमप्रसंग भी हो सकता था. संभवत: मोबाइल फोन में युवती के फोटोग्राफ रहे होंगे, इसीलिए हत्यारे उसे अपने साथ ले गए थे. एक पुलिस टीम नोएडा गई और उस ने युवती को खोज निकाला.

पूछताछ में पता चला कि युवती और जुहेब का संपर्क सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए हुआ था. बाद में दोनों में बातें होने लगी थीं. जुहेब उस से मिलने नोएडा भी जाया करता था. इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो युवती का अलग संप्रदाय की होने की वजह से खासा हंगामा हुआ.

फरवरी के पहले सप्ताह में जुहेब नोएडा गया तो युवती के घर वालों ने उसे काफी डांटाफटकारा. जुहेब ने उस वक्त भविष्य में उस से किसी तरह का संबंध न रखने का वादा किया. लेकिन वह उस से संबंध तोड़ नहीं सका. इन सब बातों से पुलिस को युवती के घर वालों पर शक हुआ. बेटी के संबंधों से नाराज हो कर वे हत्या करा सकते थे.

पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब उन्होंने जुहेब को डांटने फटकारने की बात तो स्वीकारी, लेकिन हत्या में किसी भी तरह का हाथ होने से मना कर दिया. तथ्यों की कसौटी पर उन के बयान खरे पाए गए तो पुलिस खाली हाथ लौट आई.

पुलिस ने अपना ध्यान जुहेब के मोबाइल फोन पर केंद्रित किया. पुलिस यह जान कर हैरान रह गई कि वह अपने मोबाइल में 3 सिमकार्ड का इस्तेमाल करता था. पुलिस ने उस के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की दोस्ती कई लड़कियों और महिलाओं से थी. एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उस की जिस नंबर पर सब से अधिक बातें होती थीं, वह पब्लिकेशन हाउस की मालकिन का था. पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल की पत्नी नेहा (परिवर्तित नाम) से पूछताछ की.

नेहा ने बताया कि चूंकि उन का ज्यादातर काम जुहेब ही संभालता था इसीलिए उस की जुहेब से अकसर बातें होती थीं. पुलिस उस के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, क्योंकि दोनों के बीच देर रात तक लंबीलंबी बातें होती थीं. इस का राज नेहा ही बता सकती थी. इस का मतलब कुछ ऐसा जरूर था, जिसे नेहा छिपा रही थी. पुलिस ने 3 अन्य महिलाओं से भी पूछताछ की,  जिन से जुहेब की बातचीत होती थी.

इस के बाद पुलिस को शक हुआ कि जुहेब की हत्या के तार अग्रवाल परिवार से ही जुड़े हैं. पुलिस अभी तक जुहेब के उस साथी तक नहीं पहुंच सकी थी, जिस के साथ वह उस दिन शराब पी रहा था. वह कातिलों से मिला हुआ भी हो सकता था. संभव था कि उसे योजना बना कर वहां लाया गया हो और हत्यारों को इस की सूचना दे दी गई हो.

पुलिस ने रास्तों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई तो एक फुटेज में जो युवक उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा नजर आया, उस की पहचान असब उर्फ बिट्टू के रूप में हुई. वह पब्लिकेशन हाउस में बतौर ड्राइवर नौकरी करता था. खास बात यह थी कि घटना के बाद उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था.

अब तक अग्रवाल परिवार पूरी तहर शक के घेरे में आ गया था. अपनी मालकिन से नजदीकियां जुहेब की हत्या की वजह हो सकती हैं, यह सोच कर पुलिस ने अमित अग्रवाल से पूछताछ की. लेकिन उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस ने नेहा के युवा बेटे मयंक अग्रवाल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय उस का मोबाइल फोन बंद था, जबकि सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से वह पब्लिकेशन के औफिस में ही था.

घटना के समय मोबाइल का बंद होना संदेह पैदा करता था. पुलिस ने जुहेब के कई दोस्तों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि जुहेब की नेहा से न केवल खासी नजदीकियां थीं, बल्कि वह उस पर काफी मेहरबान रहती थी.

आखिर 24 फरवरी को पुलिस ड्राइवर असब तक पहुंच ही गई. उसे कस्टडी में ले लिया गया, साथ ही पुलिस ने पूछताछ के लिए मयंक अग्रवाल को भी कस्टडी में ले लिया. दोनों से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो ऐसा सच समने आया, जिसे जान कर पुलिस हैरान रह गई. महत्वाकांक्षी जुहेब जल्दी से जल्दी आगे बढ़ने की चाहत में बड़ी भूल कर बैठा था. वह घर की इज्जत और दौलत, दोनों से खेल रहा था. उस का यही खेल उस की जान पर भारी पड़ा.

अगले दिन पुलिस ने प्रैसवार्ता कर के पूरे मामले का खुलासा कर दिया. दरअसल, पब्लिकेशन हाउस में नौकरी के दौरान जुहेब की नेहा से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस की भी एक वजह थी. अमित अग्रवाल काम के सिलसिले में अकसर शहर से बाहर आतेजाते रहते थे. बेटा बाहर रह कर पढ़ रहा था. ऐसे में औफिस की जिम्मेदारी नेहा संभालती थी. यही नहीं, पब्लिकेशन के कागजों के अनुसार, मालकिन भी वही थी. वह आजादखयाल महिला थीं, जबकि जुहेब महत्त्वाकांक्षी और लच्छेदार बातों का बाजीगर था.

उस का यही अंदाज नेहा को भा गया. दोनों की उम्र में करीब 20 साल का फासला था. लेकिन आगे बढ़ने की ललक में जुहेब ने उम्र का फासला नजरअंदाज कर दिया था. वह जानता था कि कंपनी की असली मालकिन नेहा है, इसलिए मजे से नौकरी करने और आगे बढ़ने के लिए नेहा को अपने पक्ष में करना जरूरी है.

नेहा जितनी ज्यादा मेहरबान होगी, उस की जिंदगी में उतनी ही खुशियां आएंगी. यही सब सोच कर वह नेहा पर डोरे डालने लगा. उस की बातों में नेहा को भी रस आने लगा था. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में जुहेब नेहा का दिल जीतने में कामयाब हो गया.

जुहेब ने चालाकी दिखाई थी, लेकिन नेहा को तो समझदारी दिखाते हुए सतर्क हो जाना चाहिए था. पर वह खुद भी अंजाम की परवाह किए बिना उस के रंग में रंगने लगी थी. दोनों की बातें और मुलाकात रोज होती ही होती थी. इस के अलावा वे फोन पर भी बातें और चैटिंग करने लगे. भूल कुछ पलों के निर्णय पर निर्भर होती है. गलत निर्णयों के नतीजे बाद में कितने अच्छे और बुरे निकलेंगे, इस बात को पहले कोई नहीं सोचता. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. इस के बाद यह आए दिन का सिलसिला बन गया.

समय अपनी गति से चलता रहा. अमित को दोनों की नजदीकियों पर शक हुआ. जुहेब का आचरण उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने उसे नौकरी से निकालने का प्रयास किया. लेकिन हर बार नेहा ढाल बन कर खड़ी हो गई.

कहते हैं कि अनैतिक संबंध छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब सब को यकीन हो गया कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध हैं तो परिवार कलह का अखाड़ा बन गया. बात बढ़ती देख नेहा ने वादा किया कि वह अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कुछ दिनों की खामोशी के बाद दोनों फिर से मिलनेजुलने लगे, उन की राह गलत है, दोनों ही जानते थे, लेकिन अपने संबंधों को वे प्यार का नाम दे कर खुश थे. जुहेब की वजह से एक हंसतेखेलते परिवार में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उसे ले कर घर में हमेशा तनाव रहने लगा था. अमित ने कई बार जम कर विरोध किया लेकिन जब स्थितियों में परिवर्तन नहीं आया तो एक दिन उन्होंने आत्महत्या के इरादे से अपने हाथ की नसें काट लीं. लेकिन समय से मिले उपचार की वजह से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

जुहेब और नेहा, दोनों ही बदलने को तैयार नहीं थे. नेहा की मेहरबानियों का असर यह हुआ कि जुहेब की न सिर्फ तनख्वाह बढ़ती गई, बल्कि उस का ओहदा भी बढ़ता गया. एक साल पहले की बात है.

नेहा का बेटा मयंक एमबीए की पढ़ाई कर के घर लौट आया और उस ने बिजनैस संभालना शुरू कर दिया. वह दूर था तो उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन घर आ कर उसे वे बातें भी पता चलने लगीं जो नहीं पता चलनी चाहिए थीं. सब कुछ जान कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई, वह जुहेब से नफरत करने लगा.

मयंक ने जुहेब की कई गलतियां पकड़ीं. जुहेब एकाउंटैंट था. हिसाबकिताब की सभी बारीकियां उस के हाथों में थीं. उस की नजर में जुहेब कंपनी को चूना लगा रहा था. उस ने नेहा से उस की शिकायतें कीं, लेकिन वह एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती थी. एक दिन मयंक ने अपनी मां से इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा, ‘‘जब आप को पता है कि जुहेब गलत है और वह कंपनी को चूना लगा रहा है तो उसे हटाने में क्या बुराई है? मैं उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता.’’

‘‘चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन…’’ नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मयंक ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘तुम जानते हो कि कंपनी का सारा काम उसे पता है. लेनदारियां भी उसे मालूम हैं. उसे हटाया गया तो कंपनी को काफी नुकसान हो सकता है. तुम पूरी तरह काम संभाल लो, उस के बाद उसे बाहर कर देंगे.’’

मां की बात सुन कर मयंक सोच में पड़ गया. एक हद तक उन की बात ठीक भी थी. कई सालों में जुहेब कंपनी के हिसाबकिताब की सभी बारीकियां जान गया था. नेहा की तरफ से उसे मिली छूट का ही नतीजा था कि वह बड़े हिसाब अपने हाथों में रखता था.

पूछने या कहने पर भी वह मयंक या उस के पिता को हिसाब नहीं देता था. बात भी उतनी ही बताता था, जितनी वह जरूरी समझता था. जोर देने पर वह मयंक के साथ मारपीट करने तक पर उतारू हो जाता था.

मयंक को शक था कि उस ने कंपनी में लाखों का घोटाला किया है. ऐसे में मयंक की तिलमिलाहट और बढ़ गई. जुहेब शानदार लाइफ स्टाइल में जीता था. एक दिन नेहा के मोबाइल में मयंक ने जुहेब की चैटिंग देख ली. दोनों की बातें शर्मसार करने वाली थीं. मयंक खून का घूंट पी कर रह गया. सब कुछ जान कर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

घर में आए दिन झगड़ा होता रहता था. जुहेब के प्रति मयंक के मन में नफरत तो थी ही, यह नफरत तब और बढ़ गई जब नेहा ने उसे गिफ्ट में स्कूटी दी. मयंक को लगा कि अगर वक्त रहते उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब जुहेब उस के परिवार को न सिर्फ बर्बाद कर देगा, बल्कि बिजनैस पर भी कब्जा कर लेगा.

इज्जत और दौलत की बर्बादी वह अपनी आंखों से देख रहा था. उसे लगा कि जब तक जुहेब का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जाएगा तब तक मां सुधरने वाली नहीं है. आखिर उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

मयंक का एक मौसा था राजू उर्फ किशनपाल. वह मुजफ्फरनगर जिले के थाना रामराज क्षेत्र के गांव देवल का रहने वाला था. वह आपराधिक और दबंग प्रवृति का था. मयंक ने सारी बातें उसे बता कर जुहेब को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने को कहा तो वह बोला, ‘‘झगड़े की जड़ जुहेब को हटाने के लिए पेशेवर लोगों का इंतजाम करना होगा.’’

‘‘जो उचित लगे, आप करें जितना भी खर्चा होगा, मैं देने को तैयार हूं.’’ मयंक ने कहा.

राजू की पहचान ऐसे कई लोगों से थी, जो पैसे ले कर हत्या करते थे. उस ने मेरठ के शास्त्रीनगर के रहने वाले सारिक और नदीम से बात कर के उन्हें जुहेब की हत्या के लिए तैयार कर लिया. इस के बाद सभी ने मिल कर हत्या की योजना बना डाली.

योजना के तहत 20 फरवरी की सुबह राजू मेरठ आ कर मयंक से मिला. मयंक जानता था कि जुहेब और असब के बीच दोस्ती है, इसलिए उस ने असब को भी योजना में शामिल करने का फैसला किया. उस ने असब को औफिस से बाहर बुलवाया और उसे रुपयों का लालच दे कर अपने साथ शामिल कर लिया. तय हुआ कि असब जुहेब को सही ठिकाने पर ले कर जाएगा और फोन कर के राजू को इस बारे में बताएगा.

योजनानुसार राजू शूटरों के पास चला गया. सारिक और उस के साथी के पास पहले से ही हथियार थे. दिन में असब ने जुहेब से शाम को पीनेपिलाने की बात कही तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

शाम को दोनों मोटरसाइकिल से शराब के ठेके पर पहुंचे तो असब ने फोन कर के राजू को सटीक जानकारी दे दी. इस के बाद राजू शूटर सारिक और नदीम के साथ वहां पहुंचा और चालाकी से जुहेब की पहचान करा दी. इस के बाद उन्होंने वारदात को अंजाम दे दिया.

असब वहां से निकला और बाहर आ कर राजू तथा शूटरों से मिला. शूटरों ने उसे एक पिस्टल छिपा कर रखने के लिए दी और खुद चले गए. असब भी अपने मोबाइल का स्विच औफ कर के घर चला गया.

मयंक ने सोचा था कि योजनाबद्ध तरीके से काम करने की वजह से पुलिस इस मामले में उलझ कर रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जुहेब और नेहा की नासमझी से 2 परिवारों पर मुसीबत आ गई. जुहेब को अपनी जान गंवानी पड़ी तो नेहा के बेटे मयंक को जेल जाना पड़ा. समय रहते अगर दोनों सुधर गए होते तो यह नौबत नहीं आती.

असब की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त 32 बोर का पिस्टल और कारतूस बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. फरार आरोपियों की सरगर्मी से तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime: इश्क का खूनी अंजाम

Love Crime: 25 वर्षीय जिकरा परवीन का पति कामधंधा करने दूसरे प्रदेश क्या गया, वह देवर दिलदार कुरैशी के लंगोटिया यार  27 वर्षीय मोहम्मद फैजान को प्यार करने लगी. फैजान ने न सिर्फ जिकरा बल्कि दिलदार की बहन को भी प्यार के जाल में फांस लिया था. फिर एक दिन इन के इश्क का ऐसा खूनी अंजाम हुआ कि…

जनवरी 2026 के पहले सप्ताह में एक रोज दोपहर में दिलदार ने भाभी व दोस्त को हमबिस्तर होते देख लिया. यह देखने के बावजूद उस ने अपने गुस्से पर काबू रखा और दबे पांव घर से चला गया. चूंकि उस समय घर पर उस की बहन भी मौजूद थी, अत: दिलदार को यह भी शक हुआ कि बहन भी भाभी से मिली हुई है. उस के मन में भी फैजान के प्रति चाहत है. उस का भी नाजायज रिश्ता फैजान से हो सकता है.

सच्चाई जानने के बावजूद दिलदार ने एक बार फिर भाभी जिकरा परवीन व फैजान को समझाने का प्रयास किया, लेकिन वे दोनों नहीं माने और मनमानी करते रहे. बहन को समझाया तो वह अपनी भाभी का ही पक्ष लेने लगी. इतना ही नहीं, उस ने दोनों के नाजायज रिश्तों को भी नकार दिया. अपने आप को भी पाकीजा बताया. दिलदार तब समझ गया कि बहन मन्नू भी फैजान के प्रेमजाल में फंस चुकी है. भाभी जिकरा परवीन ने खानदान की इज्जत को खाक में मिलाया था और दोस्त मोहम्मद फैजान ने दोस्ती का छुरा उस की पीठ में घोंपा था, इसलिए दिलदार ने उन दोनों को सबक सिखाने की ठान ली. बहन के प्रेम संबंधों पर भी उसे शक था, अत: उसे भी सबक सिखाने का निश्चय किया.

16 जनवरी, 2026 की दोपहर दिलदार अपनी योजना के तहत हसवा कस्बे के बाजार पहुंचा. वहां उस ने एक दुकान से तेज धार वाला चापडऩुमा चाकू 500 रुपए में खरीदा और उसे कमर में खोंस कर रख लिया. इस के बाद शराब ठेके पर जा कर उस ने शराब पी, साथ ही शराब का एक क्वार्टर और खानेपीने का सामान सुरक्षित कर लिया.

दोपहर बाद लगभग 3 बजे दिलदार अपने दोस्त मोहम्मद फैजान के घर पहुंचा. उस समय वह घर पर ही था. दिलदार उसे क्रिकेट खेलने के बहाने करबला के पास बगीचे में ले गया. कुछ दूरी पर बगीचे में लड़के क्रिकेट खेल रहे थे. दिलदार ने फैजान से कहा कि पहले शराब पी कर मूड बना लेते हैं, फिर क्रिकेट खेलने चलेंगे. इस के बाद दोनों ने बगीचे में बैठ कर शराब पी.

नशा हावी होने पर दिलदार ने उस से पूछा, ”दोस्त, सचसच बताना कि भाभीजान से तुम्हारा नाजायज रिश्ता है या नहीं? क्या मेरी बहन से भी तुम्हारे ताल्लुकात हैं?’’

”तुम्हारी भाभी और मेरे बीच वही रिश्ता है जो एक बीवीशौहर के बीच होता है. तुम्हारी बहन से भी मेरे प्रेम संबंध हैं. वह भी मुझ पर जान छिड़कती है.’’ फैजान ने नशे में सच्चाई बयां कर दी.

जिकरा परवीन के अवैध संबंध से बेहद खफा था देवर दिलदार

फैजान की बात सुन कर दिलदार के तनबदन में आग लग गई. उस पर खून का भूत सवार हो गया. उस ने कमर में खोंसा चाकू निकाला और फैजान के गले पर वार कर दिया. फैजान जान बचा कर भागा, लेकिन चंद कदम की दूरी पर लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. उस के बाद दिलदार ने फैजान के गले पर 2 और वार कर उस का गला रेत दिया.

फैजान कुछ देर तड़पा, फिर उस ने दम तोड़ दिया. हत्या किए जाने की भनक न क्रिकेट खेल रहे लड़कों को लगी और न ही किसी अन्य को. फैजान की हत्या करने के बाद दिलदार हाथ में खून सना चाकू लहराते हुए अपने घर पहुंचा. उस के सिर पर खून का भूत सवार था.

घर में उस समय उस की भाभी जिकरा परवीन व बहन मौजूद थी. अम्मी व छोटी बहन किसी काम से पड़ोस में गई थीं. घर में घुसते ही वह चीखा, ”भाभी… ओ भाभी…’’

2 खून के बाद…

दिलदार के चीखने की आवाज सुन कर जिकरा परवीन कमरे से बाहर आ गई. उसे देख कर दिलदार बोला, ”भाभी, मैं ने तुम्हारे यार फैजान को तो उस की सही जगह में पहुंचा ही दिया है. अब तुम्हारी बारी है.’’

देवर के रूप में साक्षात मौत को सामने देख कर जिकरा परवीन सिर से पांव तक कांप उठी. वह जान बचा कर छत की तरफ भागी, लेकिन दिलदार ने उसे आंगन में ही पकड़ लिया. फिर उस ने उस की पीठ व गरदन पर चाकू से कई प्रहार किए. जिकरा परवीन खून से सराबोर हो कर जमीन पर गिर पड़ी. कुछ पल बाद ही उस ने दम तोड़ दिया. इसी बीच भाभी की चीख सुन कर मन्नू उसे बचाने आई तो दिलदार उस पर भी टूट पड़ा और चाकू से हाथ, सिर व गरदन पर वार कर उसे घायल कर दिया.

मन्नू भी खून से लथपथ हो कर आंगन में धराशाई हो गई. कुछ देर बाद मांबेटी वापस आईं तो घर में खूनी खेल देख कर उन की रूह कांप गई. इस के बाद तो घरमोहल्ले में कोहराम मच गया. इसी बीच फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी होने की खबर लगी तो मोहल्ले के लोग वहां पहुंच गए.

फेमिली वालों ने फैजान का शव देखा तो उन की चीखें गूंजने लगीं. उन की चीखों से लोगों का कलेजा कांप उठा. मृतका जिकरा परवीन के पेरेंट्स को मौत की खबर लगी तो वे भी आ गए और बेटी का शव देख कर बिलख पड़े.

इधर डबल मर्डर करने के बाद दिलदार कुरैशी हसवा कस्बा चौकी पहुंचा. उस समय चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह वहां मौजूद थे. दिलदार उन के पास पहुंचा और बोला, ”सर, मैं ने उन दोनों को मार डाला है.’’

दिलदार की बात सुन कर वी.के. सिंह चौंक पड़े, ”तूने किसे मार दिया? कहीं नशे में तो बकबक नहीं कर रहा है?’’

”सर, मैं नशे में जरूर हूं. लेकिन जो कह रहा हूं, वह सच है. मैं ने सचमुच अपनी भाभी जिकरा परवीन व उस के आशिक फैजान को मार डाला है. भाभी की लाश हमारे घर में तथा फैजान की लाश आम के बाग में पड़ी है. यकीन न हो तो जा कर देख लो. भाभी को बचाने आई अपनी बहन पर भी हमला किया. पता नहीं वह जिंदा है या वह भी मर गई?’’

रूह कपा देने वाली दिलदार की बात सुन कर चौकी इंचार्ज वी.के. सिंह ने उसे तुरंत हिरासत में ले लिया. इस के बाद डबल मर्डर की सूचना असोथर थाने के एसएचओ राजेंद्र सिंह को दी. सूचना पाते ही राजेंद्र सिंह पुलिस बल के साथ हसवा कस्बा आ गए और चौधराना मोहल्ला स्थित घटना वाले मकान पर जा पहुंचे. उस समय वहां भीड़ जुटी थी.

जिकरा परवीन के घर के बाहर जमा भीड़

मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने डबल मर्डर की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी और निरीक्षण में जुट गए. घर के अंदर आंगन में एक महिला की लाश पड़ी थी, जबकि दूसरी युवती घायल अवस्था में पड़ी थी. राजेंद्र सिंह ने घायल युवती को इलाज के लिए जिला अस्पताल भिजवाया, लेकिन हालत गंभीर होने के कारण उसे हैलट अस्पताल कानपुर रेफर किया गया.

बाग में मिली लाश

एसएचओ राजेंद्र सिंह अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अनूप कुमार सिंह, एएसपी महेंद्र पाल सिंह तथा सीओ (थरियांव) वीर सिंह पहुंच गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया.

बाग में मिली मोहम्मद फैजान की लाश 

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. घर के अंदर आंगन में मृतका जिकरा परवीन खून से लथपथ पड़ी थी. उस की पीठ पर 3 घाव तथा गले पर 5 घाव थे. बदन के सारे कपड़े खून से सने थे. फर्श पर भी खून फैला था. मृतका की उम्र 25 वर्ष के आसपास थी. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल से सबूत जुटाए. मृतका जिकरा परवीन के ससुरालीजन मौके से फरार हो गए थे, लेकिन उस की अम्मी तहरून निशा व अब्बू फकीरे वहां मौजूद थे. वे दोनों बेटी के शव के पास बिलख रहे थे.

पुलिस अधिकारियों ने उन दोनों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि बेटी का शाम 4 बजे फोन आया था. तब उस ने कहा था कि उसे आ कर ले जाओ. लेकिन देर शाम खबर लगी कि बेटी के देवर दिलदार ने उस की हत्या कर दी और बहन को घायल कर दिया है. पता नहीं मेरी बेटी ने ऐसा कौन सा गुनाह किया था, जो उसे मार डाला. गुनहगार को सख्त सजा मिलनी चाहिए.

इस के बाद पुलिस अधिकारी आम के बगीचे में पहुंचे, जहां मोहम्मद फैजान की लाश पड़ी थी. लाश के पास मृतक के फेमिली वाले बिलख रहे थे. पुलिस अधिकारियों ने उन्हें सांत्वना दी, फिर बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक की उम्र 27 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या बेरहमी से की गई थी. उस के गले में 3 बड़े घाव थे. चाकू से गला रेता गया था. कपड़ेे खून से तरबतर थे. जमीन पर भी खून था.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के अब्बू रुआब व चाचा मोहम्मद शमीम से घटना के बारे में पूछताछ की. इस पर उन्होंने बताया कि फैजान और दिलदार दोस्त थे. उन की दोस्ती नफरत में क्यों बदल गई, उन्हें पता नहीं. लेकिन हत्या के बाद पता चला कि दिलदार को शक था कि उस की भाभी और फैजान के बीच नाजायज रिश्ता था. शायद इसी शक में उस ने डबल मर्डर कर दिया. मृतक व मृतका के फेमिली वालों से पूछताछ के बाद एसपी अनूप कुमार सिंह ने एसएचओ राजेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद आरोपी दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार करें.

एसपी के आदेश पर एसएचओ राजेेंद्र सिंह ने जिकरा परवीन व मोहम्मद फैजान के शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल फतेहपुर भेज दिए. इस के बाद फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत दिलदार कुरैशी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस की जांच, आरोपी के बयानों एवं मृतकों के परिजनों से की गई पूछताछ के आधार पर इश्क के खूनी खेल की जो सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई, इस प्रकार है.

दोनों भाई थे अपराधी

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर शहर का एक मुसलिम बाहुल्य मोहल्ला है— पीरनपुर. इसी मोहल्ले में फकीरे अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी तहरून निशा के अलावा 3 बेटियां थीं, जिस में जिकरा परवीन सब से छोटी थी. दोनों बड़ी बेटियों का निकाह हो चुका था. फकीरे छोटामोटा कामधंधा कर अपने परिवार का भरणपोषण करता था.

मृतका जिकरा परवीन की अम्मी तहरून

फकीरे की बेटी जिकरा परवीन अपनी बहनों में सब से खूबसूरत और होशियार थी. उस ने मोहल्ले के मदरसे से हाईस्कूल तक तालीम हासिल की थी. जिकरा परवीन 18 साल की हो गई थी. पेरेंट्स की अब एक ही ख्वाहिश थी कि जल्दी से कोई अच्छा लड़का देख कर उस का निकाह कर दिया जाए. इस के लिए फकीरे ने खोजबीन शुरू की तथा नातेरिश्तेदारों से भी कहा. काफी प्रयास के बाद एक रिश्तेदार ने मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू का नाम सुझाया.

आमिर उर्फ बल्लू के वालिद वाजिद कुरैशी, फतेहपुर जनपद के थरियांव थाने के हसवा कस्बे के चौधराना मोहल्ले में रहते थे. उन के परिवार में बीवी शकीला के अलावा 6 बेटे व 3 बेटियां थीं. उन का एक बेटा विदेश में था. वाजिद के 2 बेटे आमिर उर्फ बल्लू व दिलदार उस के साथ रहते थे. दोनों पशुओं की खरीदफरोख्त का व्यापार करते थे. आमिर व दिलदार दोनों अविवाहित थे.

अस्पताल में उपचाराधीन दिलदार की छोटी बहन मन्नू और मृतक फैजान के रोतेबिखलते फैमिली वाले

फकीरे ने जब आमिर उर्फ बल्लू को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी जिकरा परवीन के लिए पसंद कर लिया. इस के बाद 13 जून, 2019 को फकीरे ने जिकरा परवीन का निकाह आमिर उर्फ बल्लू के साथ कर दिया. जिकरा परवीन बेहद खूबसूरत थी. ससुराल में उस का चांद सा मुखड़ा जिस ने भी देखा, उसी ने उस के रूपयौवन की तारीफ की. आमिर उर्फ बल्लू भी खूबसूरत बीवी पा कर खुश था. उस ने कभी सोचा नहीं था कि उसे इतनी खूबसूरत बीवी मिलेगी.

निकाह के बाद जिकरा परवीन और आमिर ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. इसी चाहत में 3 साल कब बीत गए, पता ही न चला. इन 3 सालों में जिकरा परवीन 3 बेटियों की मां बन गई.

भाभी जिकरा परवीन और उस के प्रेमी मौहम्मद फैजान की हत्या का आरोपी दिलदार कुरैशी 

मोहम्मद आमिर उर्फ बल्लू अपने भाई दिलदार के साथ पशुओं के खरीदनेबेचने का व्यापार करता था. दोनों भाई अपराधी प्रवृत्ति के थे. उन का अकसर किसी न किसी से झगड़ा होता रहता था. थाना थरियांव में दोनों के खिलाफ मारपीट, हत्या का प्रयास, आम्र्स ऐक्ट व गोवध निवारण अधिनियम के तहत कई मुकदमे दर्ज थे. थरियांव थाने में दोनों भाइयों की हिस्ट्रीशीट खुली थी. पुलिस ने जब दोनों भाइयों पर शिकंजा कसा तो वह उत्तर प्रदेश के बजाय मध्य प्रदेश जा कर पशु तसकरी करने लगे. आमिर उर्फ बल्लू अब 2-4 माह में एक बार घर आता और कुछ दिन रह कर वापस चला जाता.

इसी तरह दिलदार भी घर आता और फिर कुछ माह रह कर भाई आमिर के पास चला जाता. दोनों भाइयों को सदैव पुलिस का डर बना रहता था. दिलदार कुरैशी का एक दोस्त था मोहम्मद फैजान. वह भी हसवा कस्बा के चौधराना मोहल्ले में रहता था. उन के घरों के बीच मात्र 200 मीटर का फासला था. फैजान के अब्बू रुआब उर्फ राजू टेलर थे.

रुआब के परिवार में पत्नी रोशन बानो के अलावा 2 बेटे मोहम्मद फैजान, मोहम्मद अरमान तथा 2 बेटियां थीं. रुआब खुद तो रायबरेली में रहते थे और वहीं टेलङ्क्षरग का काम करते थे, जबकि उन का परिवार हसवा कस्बे में ही रहता था. दिलदार और फैजान एक ही गली में खेलकूद कर बड़े हुए थे. दोनों बचपन के दोस्त थे. हाईस्कूल तक उन्होंने साथ ही पढ़ाई की थी. लेकिन दिलदार जब हाईस्कूल में फेल हो गया तो उस ने पढ़ाई बंद कर दी. इस के बाद वह अपराधिक गतिविधियों में लग गया.

लेकिन फैजान होनहार युवक था. उस ने इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ठाकुर युगराज सिंह महाविद्यालय में बीएससी में प्रवेश ले लिया था. वह पढ़ाई पूरी कर विदेश (सऊदी अरब) जाना चाहता था. दिलदार और फैजान के बीच गहरी दोस्ती थी. दोनों साथ खातेपीते व उठतेबैठते थे. उन को क्रिकेट खेलने का भी शौक था. दिलदार शराब का लती था. उस ने फैजान को भी इस की लत लगा दी थी. दिलदार तो इतना लती हो गया था कि जब उसे शराब नहीं मिलती तो वह नशे का इंजेक्शन लगा लेता था.

दोस्ती के नाते फैजान का दिलदार के घर आनाजाना लगा रहता था. घर आतेजाते ही एक रोज फैजान की नजर दिलदार की खूबसूरत भाभी जिकरा परवीन पर पड़ी. वह उसे चाहत भरी नजरों से देखता रहा और उस से रसभरी बातें करता रहा. जिकरा परवीन अब उस के दिल में रचबस गई थी और वह उस से प्यार करने लगा था.

खूबसूरती पर फिदा

जिकरा परवीन की खूबसूरती ने फैजान के दिल में हलचल मचा दी थी. अत: वह खिंचा हुआ उस के घर आ जाता था. जिकरा परवीन भी हंसतीबोलती थी. चूंकि दोनों ने आपस में देवरभाभी का रिश्ता बना रखा था, इसलिए उन में हंसीमजाक भी हो जाता था. एक रोज ऐसे ही हंसीमजाक के दौर में फैजान बोला, ”भाभी, तुम बहुत खूबसूरत हो. जी चाहता है कि…’’

फैजान के इतना कहने पर जिकरा परवीन ने मादक आंखों से उसे देखा और मुसकरा कर बोली, ”तुम्हारा क्या जी चाहता है फैजान?’’

”यही कि तुम्हारा चांद जैसा चेहरा हमेशा मेरी आंखों के सामने रहे.’’ फैजान ने दिल की बात जुबां पर ला दी.

”अच्छा,’’ जिकरा परवीन हंसने लगी, ”मैं तुम्हें इतनी हसीन लगती हूं.’’

”हां भाभी,’’ फैजान जिकरा परवीन का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला.

जिकरा परवीन का शौहर आमिर मध्य प्रदेश में पड़ा रहता था, अत: वह पुरुष सुख से वंचित थी. ऐसे में जवान फैजान का घर आना उस को अच्छा लगता था. उस की रसीली बातें उस के दिल में गुदगुदी पैदा करती थीं. अब उस की उमंगें भी छलांग मारने लगी थीं. वह भी फैजान की ओर आकर्षित होने लगी थी.

मौहम्मद फैजान और दिलदार के बीज जबरदस्त याराना था, लेकिन भाभी के साथ अवैध संबंधो ने जानी दुश्मन बना दिया

धीरेधीरे जिकरा परवीन और फैजान के दिल नजदीक आते गए. उन के बीच की दूरियां सिमटती गईं. एक रोज फैजान ने मुसकरा कर जिकरा परवीन की आंखों में देखा तो उन में उसे अजीब सी प्यास मचलती नजर आई. उस से रहा नहीं गया तो उस ने उसे बांहों में भर लिया. फिर तो तूफान तभी थमा, जब दोनों की हसरतें पूरी हुईं.

इस के बाद अकसर दोनों का मिलन होने लगा. दिलदार की बहन को भी फैजान का घर आना और बतियाना अच्छा लगता था. अत: वह भाभी की वफादार बन गई. वह भी फैजान को पसंद करती थी. वह फैजान के घर आनेजाने की जानकारी परिवार के किसी अन्य सदस्य को नहीं देती थी. जुलाई 2025 में दिलदार मध्य प्रदेश से आ कर घर में रहने लगा. आते ही दोनों के बीच दोस्ती फिर से कायम हो गई. दोनों की महफिल भी सजने लगी. कभीकभी फैजान और दिलदार की महफिल दिलदार के घर पर ही जम जाती. 2 महीने तक सब कुछ सामान्य रहा.

एक दिन दिलदार कुरैशी शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे मोहम्मद फैजान पर पड़ी. वह उस की भाभी जिकरा परवीन से हंसीठिठोली कर रहा था. जिकरा परवीन भी उस की बातों में सराबोर थी.

यह देख कर दिलदार का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. वह दांत पीसते हुए बोला, ”भाभीजान, अपने यार से ही बतियाती रहोगी या फिर अपने देवर को भी चायपानी को पूछोगी.’’

दिलदार का कटाक्ष जिकरा परवीन के मन में कांटे की तरह चुभ गया. अत: वह गुस्से से बोली, ”कैसी बातें करते हो दिलदार? थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. मोहम्मद फैजान मेरा यार नहीं, गलीटोले के नाते देवर लगता है. वैसे भी फैजान तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो. गपशप लड़ाते हो और महफिल भी जमाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का यहां आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो बेइज्जत कर के भगा दो, ताकि दोबारा इधर न आए.’’

”भाभीजान, तुम्हारी लोमड़ी वाली चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तुम चाहती हो कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तुम उस की भली बनी रहो. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तुम्हारे दिल में फैजान के लिए जो मोहब्बत है, उसे मैं अच्छी तरह जानता हूं. तुम्हारी ही वजह से यह बेशर्मों की तरह चला आता है. मुझ से मिलने का तो बहाना होता है.’’

दिलदार और जिकरा परवीन की बहस की भनक फैजान के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर आंगन में आ गया और बोला, ”दिलदार भाई, लगता है तुम किसी से लड़ कर आए हो. इसलिए तुम्हारा मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भाभीजान पर उतार रहे हो. लेकिन दोस्त, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लालपरी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

दिलदार कुरैशी शराब का लती था. फैजान ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा.

वह खुशी का इजहार करते हुए बोला, ”फैजान भाई, मैं भाभी से बहस नहीं कर रहा था, खानेपीने का सामान लाने की बात हो रही थी.’’ उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”भाभीजान, कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम दोनों महफिल सजाएंगे.’’

देवर की हांक सुन कर जिकरा परवीन मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा देवर है. कुछ देर पहले चरित्र पर लांछन लगा रहा था, अपने दोस्त को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है.’’

जिकरा परवीन ने कमरे में पानी, गिलास, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद दिलदार और फैजान शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त फैजान की निगाहें जिकरा परवीन पर ही टिकी रहीं. जिकरा परवीन भी मंदमंद मुसकरा कर फैजान का नशा बढ़ाती रही. दिलदार को मोहम्मद फैजान का घर आनाजाना नागवार लगता था, लेकिन गहरी दोस्ती के चलते वह फैजान से कुछ कह नहीं पाता था. हालांकि उस ने कई बार इस बाबत फैजान से टोकाटाकी की थी, लेकिन फैजान उस की बात अनसुनी कर जाता था.

दिलदार ने भाभी जिकरा परवीन को भी समझाया था और खानदान की इज्जत की दुहाई दी थी, लेकिन उस पर भी कोई असर नहीं पड़ रहा था. दिलदार कुरैशी को अब शक होने लगा था कि भाभी और दोस्त फैजान के बीच नाजायज रिश्ता है. दोनों मौका पा कर रंगरलियां मनाते हैं. शक का बीज दिलदार के मन में पड़ा तो उसे पनपते देर न लगी.

लेकिन शक के आधार पर वह कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था. वह दोनों को रंगेहाथ पकडऩा चाहता था, अत: वह चोरीछिपे दोनों पर नजर रखने लगा. उस ने अपना शक किसी को भी जाहिर नहीं होने दिया. अपनी योजना के तहत दिलदार कुरैशी ने 16 जनवरी, 2026 को बारीबारी से दोनों की हत्या कर दी और बहन को भी जख्मी कर दिया. इस के बाद पुलिस के समक्ष समर्पण कर दिया.

17 जनवरी, 2026 को पुलिस ने आरोपी दिलदार कुरैशी को फतेहपुर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक आरोपी की बहन कानपुर के हैलट अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रही थी. Love Crime

 

 

UP News: मोहब्बत में क्राइम हरगिज नहीं

UP News: 35 साल की सुनीता भले ही 5 बच्चों की मां बन चुकी थी, लेकिन उस के गठीले बदन की कसावट पर गांव के अनेक युवा आहें भरते थे. गांव का 22 वर्षीय आशीष कुमार उर्फ अंशु तो उसे अपना दिल दे चुका था. अमरबेल की तरह दोनों की मोहब्बत बढ़ती गई. मोहब्बत के इसी समंदर में डूब कर एक दिन दोनों ऐसा खतरनाक क्राइम कर बैठे कि…

आशीष उर्फ अंशु और उस की प्रेमिका सुनीता ने वीरपाल की हत्या करने की ठान ली, क्योंकि वह उन दोनों की मोहब्बत में रोड़ा बन रहा था. वीरपाल सुनीता का पति था. वे दोनों यही सोच रहे थे कि उस की हत्या कब और कैसे की जाए? तय किया कि आधी रात के बाद वीरपाल की गोली मार कर हत्या घर में ही कर दी जाए. फिर शोर मचा दिया जाएगा कि बदमाश आए थे. घर का सामान भी बिखेर दिया जाएगा और लूट की घटना बनाने के लिए जेवर और नकदी लूट कर ले जाने का नाटक किया जाएगा.

तभी अंशु बोला, ”तमंचा और कारतूस का इंतजाम कहां से होगा?’’

सुनीता ने कहा, ”यह इंतजाम तुम्हें ही करना पड़ेगा. इस के लिए रुपयों की जरूरत भी पड़ेगी.’’

”रुपए का तो मैं इंतजाम कर लूंगा, लेकिन तमंचा और कारतूस मिलना इतना आसान नहीं है. चलो, मान लिया जाए कि ये चीजें मिल भी गईं तो वीरपाल को गोली कौन मारेगा?’’ अंशु बोला.

”तुम ठीक कह रहे हो. यदि उस समय बच्चे उठ गए, उन्होंने देख लिया तो हम दोनों पकड़े जाएंगे. फिर बिना सजा के नहीं बचेंगे. इस तरह हमारी प्रेम कहानी तो अधूरी रह जाएगी.’’ सुनीता ने आशंका जताई.

इस के बाद उन्होंने दूसरी योजना तैयार की. गेहूं को सुरक्षित रखने के लिए सल्फास की गोलियों का प्रयोग होता है. अकसर यह सुनने में आता है कि लोग आत्महत्या के लिए इन गोलियों का सेवन करते हैं. उन्होंने सोचा कि क्यों न ये गोलियां किसी तरह वीरपाल को खिला दी जाएं.

यह तरीका दोनों को अच्छा लगा. फिर एक दिन सल्फास की गोलियों का पैकेट अंशु ने सुनीता को ला कर दे दिया. दोनों ने तय किया कि जब भी शराब के नशे में वीरपाल आएगा, खाने में मिला कर सल्फास की गोलियां उसे दे दी जाएंगी. इस से पहले कि योजना को अंजाम दिया जाता, सल्फास की गोलियों का पैकेट बच्चों के हाथ लग गया. बच्चे समझे कि पैकेट पापा लाए हैं. वीरपाल के सामने ले जा कर बच्चे पूछने लगे, ”पापा, ये गोलियां काहे की हैं?’’

वीरपाल गोलियों का पैकेट देख कर सन्न रह गया. वीरपाल ने पैकेट उलटपलट कर देखा तो उसे पता चला कि यह तो गेहूं को सुरक्षित रखने वाली सल्फास की गोलियां हैं.

गुस्से से आगबबूला होते हुए वीरपाल ने सुनीता से पूछा, ”सल्फास का पैकेट कौन लाया है?’’

सुनीता ने झूठ बोलते हुए कहा, ”गेहूं में घुन लगने लगे थे. इसलिए मैं ने ही यह पैकेट मंगाया है.’’

वीरपाल की हत्या करने का यह प्लान भी फेल हो गया. बात आईगई हो गई. कुछ समय बाद धान की फसल तैयार होने लगी. उस की रखवाली के लिए वीरपाल अकसर खेत पर जाया करता था. ग्रामीण क्षेत्र में कई तरह के जंगली जानवर फसलों को क्षति पहुंचाते हैं. उन से फसल को बचाने के लिए रात को भी अनेक किसान खेतों पर डेरा डाले रहते हैं.

वीरपाल भी धान की फसल की रखवाली के लिए खेत पर जाता था. नींद आने पर वह वहीं सो जाया करता था. शातिर दिमाग अंशु ने सुनीता से कहा, ”अब मौका आ गया है, वीरपाल को ठिकाने लगाया जा सकता है. जिस वक्त वीरपाल रात को खेत पर सोया हो, तभी उसे हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया जाएगा.’’ सुनीता को योजना सही लगी और वह राजी हो गई. उत्तर प्रदेश के जनपद संभल में थाना हयात नगर क्षेत्र में एक गांव स्थित है सहजना. इस गांव में दलवीर सिंह का परिवार निवास करता है. दलवीर सिंह के 5 बेटे और 5 बेटियां थीं. चौथे नंबर की बेटी सुनीता थी.

सुनीता का विवाह साल 2008 में जनपद मुरादाबाद के थाना बिलारी क्षेत्र के गांव अलेहदादपुर देवा नगला निवासी वीरपाल था. वीरपाल खेतीकिसानी के साथसाथ मजदूरी भी करता था. कभीकभी हरिद्वार में स्थित फैक्ट्री में मजदूरी करने भी चला जाता था. वीरपाल का एक बड़ा भाई है कुंवरपाल. वीरपाल की मां ज्ञानवती है, जो एक गृहिणी हैं. वीरपाल और सुनीता का वैवाहिक जीवन ठीकठाक गुजर रहा था. इस दौरान उन के 5 बच्चे हुए, जिन में 4 बेटियां और एक बेटा था.

5 बच्चों की मां होने के बावजूद सुनीता के हंसीमजाक में एक बेकाबू आग छिपी थी. उस के चेहरे पर जवानी की नैचुरल चमक थी. गालों की मुलायम लकीरों में मासूमियत और आत्मविश्वास दोनों एक साथ झलकते थे. उस की आंखें बड़ी साफ और गहरी थीं, मानो किसी के बोलने से पहले ही उस का मन पढ़ लेती हों. उस का शरीर किसी कठोर मेहनत से तराशा हुआ नहीं, बल्कि स्वाभाविक रूप से सधे हुए अनुपातों वाला था. कंधे हलके चौड़े, कमर में नजाकत और चाल में लयबद्ध कोमलता, जिसे देख कर कोई भी तुरंत समझ जाए कि यह महिला तन से ही नहीं, मन से भी मजबूत है.

वह मध्यम कद की थी. उस का रंग गेहुंआ और चेहरा गोल था. उस की आंखें बड़ी और ध्यान खींचने वाली थीं, जिन में आत्मविश्वास का भाव दिखता था. बाल पूरी तरह से सिर को ढकने वाले दुपट्टे के नीचे छिपे रहते थे, जो पारंपरिकता और शालीनता दर्शाते थे. उस की नाक में एक छोटा नथ उस की पहचान को और उभारता था. होंठ थोड़े मोटे जरूर थे, लेकिन उन पर हलकी मुसकान दिखाई देती, जो उस में छिपी ममता और दृढ़ इच्छाशक्ति की झलक देती थी. उस की आंखों की चमक देखने वालों को भटकाने वाली पहेली सी लगती थी.

गांव की गलियों में जब भी सुनीता का नाम लिया जाता, लोग धीरे से मुसकरा देते. कोई जलन से, कोई तजुर्बे से. 5 बच्चों की मां होते हुए भी उस में कुछ ऐसा था, जो जवान दिलों को बेचैन कर देता था. उस की चाल, उस की बातों की मिठास और उस की आंखों में छिपी कामुक शरारत की वजह से 35 वर्षीय सुनीता गांव की अन्य महिलाओं से अलग पहचानी जाती थी. सब जानते थे कि वह साधारण महिला नहीं.

गांव में कुंवरपाल का परिवार भी निवास करता था. कुंवरपाल अलेहदादपुर गांव का दामाद था. करीब 2 दशक पहले इसी गांव में घरजमाई बन कर आया था. फिर गांव में ही बस गया था. उस के 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. एक बेटे और एक बेटी की शादी हो चुकी है. कुंवरपाल का बेटा आशीष कुमार उर्फ अंशु करीब 22 साल का एक कुंवारा नौजवान था. अंशु अपनी जवानी के चरम पर पहुंच चुका था. 22 साल की उम्र उस के चेहरे पर एक अलग ही चमक ले कर आई थी. वह चमक जो मेहनत, आत्मविश्वास और युवापन के मिलन से पैदा होती है.

उस के नैननक्श साधारण होते हुए भी बेहद आकर्षक थे. माथे पर गिरती हलकी बिखरी लटें और आंखों में मौजूद सहज चमक उसे अलग पहचान देती थी. उस का शरीर एकदम सधा हुआ था. न बहुत भारी, न बहुत पतला. छाती में कसावट और बांहों में हलकी उभरी नसें, उस के मेहनत भरे जीवन की गवाही देती थीं. चलते समय उस का आत्मविश्वास साफ दिखता था. कदमों में सधी हुई लय और शख्सियत में एक ऐसी गरिमा जो बिना बोले ही लोगों को उस की तरफ देखने पर मजबूर कर देती थी. अंशु की मुसकान उस के पूरे चेहरे को रोशन कर देती थी. उस की जवानी में एक तरह की साफगोई थी, वही मासूम पर दृढ़ ऊर्जा जो केवल 21-22 की उम्र में ही दिखाई देती है.

कुंवरपाल के साले का नाम भूप सिंह था. वह इस समय गांव के मौजूदा प्रधान है. असरदार व्यक्ति है. गांव में उस का काफी मानसम्मान भी है. अंशु का दिल किसी रिश्ते की बंदिश नहीं मानता था.

अंशु अपनी नानी के घर रहता था. उस की पैदाइश भी यहीं पर हुई थी, जहां उस की जवानी बेलगाम घोड़े सी दौड़ रही थी. उस के अय्याशी के किस्से भी कम न थे. मामला पकड़े जाने पर पंचायतें भी हुईं. उस के मामा को मामला लेदे कर निपटाना पड़ा. कई बार उस के मामा को काफी रकम मुआवजे के रूप में गांव की गरीब लड़कियों को देनी पड़ी. अकसर लड़की वाले बदनामी के डर से प्रधान के रुतबे और प्रभाव के कारण कानूनी काररवाई के लिए आगे नहीं बढ़े. इस का फायदा अंशु उठाता रहा और कई घटनाएं गांव में अंजाम दे दीं.

जब सुनीता और अंशु की राहें टकराईं, तो जैसे दो चिंगारियां एक ही पल में भड़क उठीं. फिर रिश्ता रिश्ता नहीं, एक अंधी ललक बन गया, जहां उम्र, रिश्तेदारी और समाज सब पीछे छूट गया. कहानी यहीं से मोड़ लेती है. प्यार और पागलपन के इस खेल में वह सुनीता अपने पति से तंग आ चुकी थी, और अंशु उस की चाहत में अंधा हो गया था. शाम का वक्त था. खेतों से किसानों की वापसी हो रही थी, ढलती धूप में चलती बकरियों की आवाजें, ऐसा लग रहा था कि उन्हें भी घर वापस ले जाया जा रहा है.

बीच में एक महिला जो अपने आंगन में पानी भर रही थी. उस के बच्चे पास ही खेल रहे थे, गांव की गलियों में सन्नाटा पसरा था, लेकिन इस शांति के पीछे एक तूफान पनप रहा था. अंशु गांव का मनचला, दुबलापतला मगर तेज नजर वाला जवान था. सब जानते थे कि अंशु की नजरें मासूम नहीं हैं और सुनीता भी यह बात समझती थी, मगर न जाने क्यों, उसे अब फर्क नहीं पड़ता था.

अंशु ने पहली बार बिना झिझक के उस से कहा, ”नानी, इतना पानी रोज क्यों भरती हो? कोई समंदर बनाना है क्या?’’

सुनीता मुसकराई, ”तेरे काम का समंदर नहीं है, डूब जाएगा तू इस में.’’

अंशु हंसा, ”डूबने का तो मन है ही, बस कोई मौका डूबने का मिल जाए.’’

उन के बीच का यह मजाक गांव के माहौल से ज्यादा गर्म था. दोनों जानते थे कि वो किस ओर बढ़ रहे हैं, मगर किसी को रोकने की हिम्मत न थी. धीरेधीरे ये मुलाकातें बढ़ीं. कभी खेत के किनारे, कभी सूनी पगडंडी पर तो कभी मकानों के पीछे के बाग में, जहां हवस और हंसी एक साथ घुलमिल जाती.

सुनीता अब अपने पति वीरपाल से ऊब चुकी थी. बच्चों और घर के झगड़ों ने उन के रिश्ते की जान निकाल दी थी. एक रात वीरपाल ने उसे रोकते हुए कहा, ”तू अब पहले जैसी नहीं रही, सुनीता.’’

तो उस ने ठंडे लहजे में जवाब दिया, ”हां, और तू भी मर्द जैसा नहीं रहा.’’

वीरपाल ने गुस्से में थप्पड़ मारा, मगर उस थप्पड़ की गूंज ने सुनीता के भीतर का सब कुछ तोड़ दिया. उसी रात वो चुपके से घर के पीछे वाले दरवाजे से बाहर निकली. अंशु उस का इंतजार कर रहा था.

”अंशु, मुझ से अब और नहीं सहा जाता,’’ सुनीता ने उस से कहा.

अंशु ने उस की आंखों में झांकते हुए फुसफुसाया, ”तो फिर खत्म कर देते हैं उसे, हमेशा के लिए.’’

सुनीता चौंकती हुई बोली, ”क्या मतलब?’’

”मतलब साफ है. तुम्हारे रास्ते में बस वो वीरपाल ही तो दीवार है. गिरा देंगे, उस दीवार को.’’

सुनीता चुप रही, मगर उस के दिल में डर और चाहत दोनों एक साथ पनपने लगे. बड़ी हिम्मत करने के बाद सुनीता सीधेसीधे प्रेमी को चुनौती देती हुई बोली, ”अगर तुम को मेरे साथ रहना है तो कुछ तो करना ही होगा, मगर उस के बाद क्या तुम मुझे पत्नी के रूप में स्वीकार करोगे?’’

”सुनीता, मैं ने तुम से प्यार किया है. पत्नी मान भी लिया है. अब तुम बताओ उस के बाद तुम्हारी क्या भूमिका होगी?’’

”मैं जिंदगी भर तुम्हारा साथ दूंगी, तुम्हारा खयाल रखूंगी.’’

”अगर तुम मुझे पाना चाहते हो तो अब अपने नाना का काम तमाम कर ही दो.’’

अंशु का मामा प्रधान भूप सिंह जाति से जाटव है. एक ही बिरादरी के होने के नाते से प्रधान भूप सिंह, वीरपाल को गांव के रिश्ते में चाचा कहता था. इसी रिश्ते से अंशु वीरपाल को नाना और सुनीता को नानी कह कर संबोधित करता था. दोनों के संबंध जगजाहिर हो चुके थे. फिर भी गांव के लोगों को यकीन नहीं होता था कि दोनों की उम्र में इतना अंतर होने के बाद इन के बीच अवैध संबंध होंगे. वीरपाल 12 अक्तूबर, 2025 की रात को अपने धान के खेत पर सोने के लिए गए थे. अगले दिन जब गांव के लोग खेतों पर सुबहसुबह अपने काम के लिए निकले, तब उन्होंने देखा कि वीरपाल खेत में अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था.

वीरपाल अकसर सुबहसुबह 5 बजे उठ कर घर आ जाता था. फ्रैश हो कर फिर से काम के लिए खेत पर आ जाता था, लेकिन उस दिन वह इतनी देर तक खेत में क्यों सो रहा है, लोग समझ नहीं पाए. पास जा कर लोगों ने देखा तो वह एकदम बेसुध सा लेटा हुआ था. उन्हें वीरपाल के शरीर पर कोई हरकत नहीं दिखी.  इस दौरान हड़कंप मच गया तो यह बात गांव तक पहुंची. काफी संख्या में ग्रामीण लोग उस के खेत पर पहुंच गए. गांव के एक डौक्टर को भी बुला लिया. उस ने नब्ज टटोलते ही वीरपाल को मृत घोषित कर दिया.

वीरपाल की पत्नी सुनीता भी खूब रोते हुए दहाड़े मारते हुए खेत पर पहुंच गई. पूरा चेहरा ढके हुए खूब रोए जा रही. उस को रोता देख कर लोगों का दिल पसीज गया कि अब इस बेचारी के बच्चों का क्या होगा? यह बात 13 अक्तूबर, 2025 की है. वहां मौजूद लोगों ने पुलिस को खबर देने की बात कही तो सुनीता कहने लगी कि मैं अपने पति की मिट्टी को खराब नहीं होने दूंगी. पुलिस हमारे पति का शरीर ले कर जाएगी. पोस्टमार्टम को भेजेगी. वहां चीरफाड़ होगी. पूरे शरीर को बरबाद कर देगी.

मैं अपने पति के साथ यह नहीं होने दूंगी. लेकिन कोई व्यक्ति पहले ही कोतवाली बिलारी में फोन कर के यह सूचना पुलिस को दे चुका था. सूचना पाते ही कोतवाल उदय प्रताप मलिक मय फोर्स के घटना स्तर पर पहुंच गए. शुरुआती जांच में मामला हत्या का प्रतीत हुआ, क्योंकि मृतक के गले पर दबाने के निशान थे. थोड़ीबहुत हलकीफुलकी छीनाझपटी जैसे निशान भी थे. इस से प्रतीत हो रहा था कि मृतक ने हत्यारों से थोड़ा बहुत संघर्ष भी किया है. फोरैंसिक टीम भी वहां पहुंच गई. घटनास्थल के आसपास का बड़ी बारीकी से मुआयना किया गया. आवश्यक सबूत इकट्ठे किए गए. मौके की काररवाई पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला मुख्यालय मुरादाबाद भेज दिया.

कोतवाल उदय प्रताप मलिक ने मामले की जानकारी सीओ अशोक कुमार और एसपी (ग्रामीण) कुंवर आकाश सिंह को दे दी. अधिकारियों ने जांच के लिए पुलिस की दो टीमें गठित कर दीं. पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. गांव के लोगों ने पोस्टमार्टम से लाश आने के बाद वीरपाल का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस अपनी जांच कर ही रही थी. उसी दिन सुनने में आया कि वीरपाल की पत्नी सुनीता ग्रामीणों से लाश का पोस्टमार्टम कराने को मना कर रही थी. उस का कहना था कि ज्यादा शराब पी लेने से इस की स्वाभाविक मौत हुई होगी.

यह बात सुन कर पुलिस को वीरपाल की हत्या करने का शक उस की पत्नी सुनीता पर हो गया. सुनीता ने अपने पति की हत्या क्यों कराई? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए पुलिस ने जब छानबीन की तब पता चला कि गांव का ही एक युवक अंशु है, जिस से सुनीता का प्रेम प्रसंग चल रहा है. इतनी जानकारी मिलने पर अंशु भी पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन से जब पूछताछ की गई तो उन्होंने पहले तो बातें गोलमोल करने की कोशिश की, लेकिन जब सख्ती की गई तब दोनों ने ही सच उगल दिया.

दोनों की उम्र में 13 से 14 साल का अंतर था. लोगों को जब इस बात का पता चला कि वास्तव में इन दोनों के बीच में प्रेम प्रसंग चल रहा था तो कोई इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन जब सच सामने आया तो सब हैरान रह गए. इस दौरान सुनीता ने अपने आप को बचाने के लिए खूब प्लानिंग की थी. पहली प्लानिंग तो उस ने पुलिस को बुलाने से मना किया. लेकिन जब उसे लगा कि पुलिस आ गई है तो पोस्टमार्टम न हो पाए, इस के लिए उस ने पूरी कोशिश की.

पुलिस ने लाश को जब पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. तब सुनीता ने भागने का भी प्लान बना रखा था. जब उस के रिश्तेदार आए. दोनों पक्षों के बीच नोकझोंक व झगड़ा चल रहा था तो एक रिश्तेदार सुनीता को अपनी बाइक पर बिठा कर वहां से निकलने वाला था, लेकिन जैसे ही सुनीता बाइक पर बैठी, गांव के लोगों ने देख लिया और उसे दौड़ कर पकड़ लिया. उस के बाद ग्रामीणों ने कहा कि जब तक पुलिस नहीं आएगी, तब तक कोई नहीं जाएगा. पुलिस को आने दो. उस के बाद जिस को जहां जाना हो, वो चला जाए.

पुलिस ने सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु से पूछताछ की तो वीरपाल की हत्या के पीछे की ऐसी प्रेम कहानी सामने आई, जिस ने सभी को चौंका कर रख दिया. सुनीता गांव के रिश्ते में अंशु की नानी लगती थी. दोनों के खेत आसपास ही थे, इसलिए उन के बीच बातचीत होना आम बात थी. उसी दौरान दोनों के बीच प्यार हो गया. और जल्द ही उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. सुनीता अंशु के प्यार की कायल हो गई थी. उस के सामने अपना पति वीरपाल फीका लगने लगा था. इसलिए जब भी उन का शारीरिक संबंध बनाने का मन होता था, तो सुनीता वीरपाल को शराब पिला कर धान की रखवाली करने के लिए रात को खेत पर भेज देती थी.

फिर अंशु को फोन कर के रात को अपने घर पर बुला लेती थी. फिर रात भर दोनों मौजमस्ती करते थे. इस तरह सुनीता अविवाहित अंशु के प्यार में डूब चुकी थी, लेकिन यह खेल ज्यादा दिनों तक छिप न सका. एक दिन इसी बीच रात में एक बार वीरपाल धान के खेत से घर वापस आया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. यह देख कर वीरपाल का खून खौल गया. अंशु तो फटाफट वहां से भाग गया, लेकिन सुनीता कहां जाती. तब वीरपाल ने उस दिन सुनीता की खूब पिटाई की. सुनीता ने उसी दिन सोच लिया था कि वीरपाल हमारे प्यार के बीच में रोड़ा बन रहा है. इसे तो निपटवाना ही पड़ेगा.

सुनीता ने उस समय तो पति से हाथ जोड़ कर माफी मांग ली थी. वीरपाल ने यह बात किसी को बदनामी की वजह से नहीं बताई. 2-4 दिन बाद सुनीता और अंशु का चोरीछिपे मिलनाजुलना जारी रहा. एक दिन सुनीता ने अशु को बताया कि वीरपाल हम दोनों के प्यार में रोड़ा बन रहा है. इसे ठिकाने लगाना है. इतना ही नहीं, उस ने धमकी भी दी कि अगर तूने इसे ठिकाने नहीं लगाया तो मैं जहर खा कर अपनी जान दे दूंगी, लेकिन तेरे बिना नहीं जी सकती.

यह सुन कर अंशु के जवान खून में उबाल आ गया. उसे लगा कि उस की प्रेमिका उस के लिए जान देने के लिए तैयार है. उस की जुदाई बरदाश्त नहीं कर पा रही. लिहाजा अंशु ने कहा, ”तुम ऐसा मत करो. हम वीरपाल को ठिकाने लगा देंगे.’’

12 अक्तूबर को सुबह करीब 8 बजे सुनीता अपने खेत पर धान झाड़ रही थी. वहां पर उस की फेमिली के कुछ लोग भी मौजूद थे. उस समय अंशु भी अपने खेत पर था. सुनीता ने अंशु को अपने पास बुलाया. उस के साथ वह बात कर रही थी, तभी वीरपाल वहां पर आ गया. उस ने दोनों को बात करते देखा तो वीरपाल दोनों पर आगबबूला हो गया गालीगलौज करने लगा. अंशु उसी समय वहां से अपने घर चला गया. उस के कुछ देर बात वीरपाल भी चला गया तो सुनीता ने अंशु को फिर से बुला लिया.

फिर दोनों ने मिल कर वीरपाल की हत्या करने की योजना बनाई. वारदात की अन्य योजना पर सहमति नहीं बनी तो सुनीता ने अंशु को बताया कि वीरपाल रात में धान की रखवाली करने के लिए खेत पर जा कर सोता है. वहीं पर उस की हत्या करना आसान रहेगा. अंशु उस की इस बात पर राजी हो गया. 13 अक्तूबर को रात में करीब साढ़े 12 बजे वीरपाल खेत पर सोने गया. तभी सुनीता ने यह जानकारी प्रेमी अंशु को दे दी.

इस के बाद जब अंशु रात में वीरपाल के खेत पर पहुंचा तो उस समय वीरपाल शराब के नशे में चारपाई पर सो रहा था. अंशु ने उस का गला दबाना शुरू कर दिया. तभी वीरपाल का एक हाथ अचानक अंशु के मुंह पर लगा तो वह घबरा गया. अंशु को लगा कि अब यदि वह जिंदा बच गया तो मामला बहुत गड़बड़ हो जाएगा. वीरपाल ने उठने की कोशिश की, लेकिन नशा अधिक होने के कारण वह उठ नहीं सका. अंशु ने फिर से वीरपाल को अपने काबू में किया और गला दबाने लगा. उस के गले को वह तब तक दबाए रखा, जब तक कि वीरपाल की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट नहीं गई.

जब वीरपाल निढाल हो गया, उस का छटपटाना बंद हो गया, उस के शरीर में कोई हरकत नहीं हुई, तब कहीं अंशु को तसल्ली हुई. फिर भी अंशु ने उस की नाक पर हाथ रख कर एक बार चैककिया कि वह मर चुका है कि नहीं.

जब उसे विश्वास हो गया कि अब इस का काम तमाम हो गया है तो अंशु वहां से सीधे अपनी प्रेमिका सुनीता के घर पहुंचा. उस ने प्रेमिका को खुशखबरी देते हुए कहा कि तुम्हारे पति का मैं ने काम तमाम कर दिया है. अब वो तुम्हें कभी परेशान नहीं करेगा. इस मर्डर की खुशी में दोनों ने रात भर मौजमस्ती की. इस के बाद उन्होंने पुलिस से बचने का प्लान बनाया. फिर रात में ही अंशू अपने घर चला गया. दूसरे दिन अंशु भीड़ के साथ घटना स्थल पर पहुंचा और परिवार के लोगों के साथ रहा. पोस्टमार्टम से ले कर अंतिम संस्कार तक हर कार्यक्रम में वह वीरपाल के फेमिली वालों के साथ ही रहा, ताकि किसी को उस पर कोई शक न हो, लेकिन इस के बावजूद वह पुलिस के शक के दायरे में आ गया.

मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला दबाकर हत्या कर देना आया. जिस के बाद मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल की तहरीर के आधार पर धारा 103 (1)/61(2) (क) बीएनएस के तहत आशीष कुमार उर्फ अंशु और सुनीता को नामजद किया गया. 24 घंटे के भीतर पुलिस ने हत्या की गुत्थी सुलझा दी. पूछताछ के बाद सुनीता और उस के प्रेमी आशीष कुमार उर्फ अंशु को जेल भेज दिया गया. बच्चों की परवरिश मृतक के बड़े भाई कुंवरपाल कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक अंशु और उस की प्रेमिका दोनों ही जेल में थे. UP News

 

 

Maharashtra News: भट्ठी में भस्म की बीवी

Maharashtra News: गैरमर्द से संबंध रखने वाली पत्नी जब रिश्ते की मानमर्यादा को भूल जाए, तब पति का खून खौलना लाजिमी है. जैसा पुणे के समीर के साथ हुआ. टीचर पत्नी को लाख समझाया, लेकिन वह नाजायज रिश्ते के सुख में खोई रही. फिर रोंगटे खड़े कर देने वाला जो क्राइम हुआ, उस की तुलना ‘दृश्यम’ फिल्म से होने लगी. आखिर क्यों और कैसे हुआ यह सब? पढ़ें, इस क्राइम स्टोरी में…

महाराष्ट्र में पुणे के शिवने इलाके में रहने वाला एक गैराज व्यवसायी समीर पंजाबराव जाधव अपनी टीचर पत्नी अंजलि को पा कर बेहद खुश था. उस की खूबसूरती और लुभावनी अदाओं पर मानो वह मर मिटने को हमेशा तैयार रहता था. एक खुशहाल दंपति की तरह वह अपनी गुजरबसर कर रहे थे. दोनों अपनीअपनी कमाई से घर में सुखसंपति से खुशहाल थे. सब कुछ सही चल रहा था. श्री स्वामी संकुल अपार्टमेंट के बगल में 304 नंबर के प्लौट पर उन का ठिकाना था.

दोनों का एकदूसरे पर भरोसा भी गजब का था. उन के बीच किसी भी तरह की शिकवाशिकायत नहीं थी. किसी से कोई भूल हो जाने पर वे तुरंत सौरी बोल देते थे. रात के वक्त अंजलि बाथरूम में थी, तब उस के मोबाइल पर एक वाट्सऐप मैसेज को पढ़ कर समीर चौंक पड़ा था. लिखा था, ‘हाय! हैलो सैक्सी डार्लिंग! कैसी हो?’’

उस के बाद लगातर 3-4 इमोजी के मैसेज भी आए. वे दिल बने हुए थे. मैसेज करने वाले का टाइटल नाम ‘पाटिल’ था. इस मैसेज ने समीर के दिमाग में खलबली मचा दी थी. वह इसे ले कर तरहतरह की बातें सोचने लगा था. उस का दिमाग जितना गलत और बेबुनियादी बातें सोच सकता था, सोच चुका था.

अंजलि के बाथरूम से आते ही उस ने पूछा, ”ये पाटिल कौन है?’’

अचानक पाटिल का नाम सुनते ही अंजलि चौंक पड़ी. डाइनिंग टेबल पर रखे पानी का गिलास उठाती हुई बोली, ”कौन पाटिल? मैं किसी पाटिलवाटिल को नहीं जानती हूं.’’

”तो यह मैसेज भेजने वाला कौन बदतमीज है? अश्लील इमोजी भेज रहा है, प्यार की बातें लिख रहा है, तुम्हें सैक्सी बुला रहा है…’’ समीर मोबाइल का स्क्रीन दिखाते हुए तीखेपन के साथ बोला.

अंजलि ने उस के सवाल का जवाब देने से पहले अपना सवाल दाग दिया, ”तुम ने मेरा मोबाइल खोला कैसे? तुम्हें इस का पासवर्ड पता है? बहुत गलत बात है.’’ इसी के साथ उस ने अपना मोबाइल समीर के हाथ से एक झटके में छीन लिया.

वह दूसरे कमरे में जाने लगी तो समीर ने फिर पूछा, ”तुम ने जवाब नहीं दिया, मैं जानना चाहता हूं कि कौन है ये पाटिल?’’

अंजलि ने कोई जवाब नहीं दिया और उस की बात अनसुनी कर दूसरे कमरे में चली गई, जो उस का स्टडीरूम था. वहां जा कर उस मोबाइल को चार्ज करने के लिए लगा दिया और वहीं बैठ कर उस का पासवर्ड बदलते हुए भुनभुनाने लगी. उस की भुनभुनाहट से साफ जाहिर हो रहा था कि वह समीर से नाराज थी. वह वहीं बैठी रही. जबकि समीर उसे पुकारता रहा. अंत में उस ने मोबाइल देखने के लिए सौरी बोल कर बात को खत्म करने की कोशिश की.

थोड़ी देर में अंजलि उस के पास आई. धीमी आवाज में बोली, ”सौरी समीर, मैं ने तुम से तेज आवाज में बात की. मैं ने तुम पर शक किया. मेरे मोबाइल का मैसेज पढऩे पर नाराज हुई, जबकि तुम तो मेरे अपने हो, तुम्हारा तो मुझ पर पूरा हक है…मुझे माफ कर दो, प्लीज!’’ इसी के साथ वह समीर से लिपट गई. समीर ने भी अनमनेपन के साथ उसे अपनी बाहों में समेट लिया. दोबारा कोई सवाल नहीं किया और सीधा बैड पर सोने चला गया. अंजलि ने गहरी सांस ली. कमरे की लाइट बुझाई और समीर की बगल में आ कर लेट गई.

अगले दिन दोनों सुबह होते ही सामान्य दिनचर्या में लग गए. समीर अपने कामकाज में व्यस्त हो गया, जबकि अंजलि अपनी ड्यूटी पर चली गई. हालांकि समीर का काम में जरा भी मन नहीं लग रहा था. बारबार पाटिल का मैसेज उस के दिमाग में कौंध जाता था.

उस बारे में अंजलि से कोई जवाब नहीं मिल पाया था. जबकि वह जानना चाहता था कि पाटिल कौन हो सकता है, जिस ने उसे प्यार के इजहार के साथ अश्लील मैसेज भेजा था. समीर का मन अशांत था. पूरे दिन उधेड़बुन में लगा रहा कि अगर मैसेज अंजलि को परेशान करने के लिए किया गया था तो वह मैसेज करने वाले पर नाराज होने के बजाय उस के साथ क्यों उलझ गई? उस ने बात क्यों बदल दी?

उस रोज जब वे घर पर साथ थे, तब उन के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही थी. वे अपनेअपने काम में लगे हुए थे. अंजलि ने चुपचाप समीर के लिए खाना परोस दिया था. समीर भी खाना खाने के बाद सीधा बैडरूम में चला गया था. ऐसा लग रहा था, मानो वे एकदूसरे से कुछ बोलना चाह रहे हों, लेकिन बीते रात की पाटिल के मैसेज वाली बातों से दोनों के मन में अशांति बनी हुई थी. किसी तरह अंजलि ने ही चुप्पी तोड़ी, ”समीर, मुझे गलत मत समझना. मैं तुम्हारी हूं और सिर्फ तुम्हारी! वो पाटिल मेरे कालेज के जमाने का बौयफ्रेंड था. उसे न जाने कहां से मेरा नंबर मालूम हो गया.’’

”कोई बात नहीं, जो बीत गई सो बीत गई. भूल जाओ कल रात की बातें, तुम पर मुझे पूरा भरोसा है!’’ समीर ने यह कहते हुए एक तरह से अंजलि के बोझिल मन को हलका कर दिया था. जबकि सच तो यह था कि समीर का भारी मन भी हलका हो गया था. समीर जाधव और अंजलि जाधव की शादी 2017 में हुई थी. उन्होंने कोरोना के दौर में एकदूसरे का साथ दिया था और उन के बीच प्रेम और भी गहरा हो चुका था. पिछले दिनों समीर 44 और अंजलि 38 साल के हो चुके थे. उन के 2 बच्चे हैं. एक बच्चा तीसरी और दूसरा पांचवीं क्लास में पढ़ता है. औटोमोबाइल डिप्लोमा करने के बाद समीर ने एक गैराज खोल लिया था. जबकि अंजलि एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थी.

समीर जाधव

अंजलि द्वारा पाटिल के बारे में बताने पर समीर संतुष्ट तो हो गया था, लेकिन उस के दिमाग में वही बात घूमती रहती थी कि उस का पुराना प्रेमी फिर से हाजिर हो चुका है. इस का अंजाम एक न एक दिन उस के लिए नुकसानदायक हो सकता है. हालांकि दोनों के बीच पहले जैसी सहजता बन गई थी. उन की दिनचर्या सामान्य हो चुकी थी. किंतु जब कभी समीर अंजलि को अकेले में मोबाइल पर बातें करते हुए या फिर मैसेज देखते हुए पाता था, तब उस के दिमाग में शक का कीड़ा कुलबुलाने लगता था.

एक सच तो यह भी था कि शादी के बाद समीर का भी किसी अन्य महिला से अफेयर चल रहा था, जिस से वह शादी करना चाहता था. इस कारण उस ने अंजलि के अफेयर के बहाने से एक योजना बनाई. उस ने अपनी पत्नी को ही रास्ते से हटाने का फैसला ले लिया. दीवाली की छुट्टी होने वाली थी. उस ने बच्चों को पैतृक गांव भेज दिया था. योजना के मुताबिक 26 अक्तूबर, 2025 को दोपहर के सवा 2 बजे के करीब समीर अंजलि को अपनी कार नंबर एमएच12 एफयू 0864 में बैठा कर घर से नांदेड सिटी के नवले पुल पर से मुंबई बेंगलुरु हाइवे से पहले खेड़ शिवापुर के घाट पर गया था. वहां पर दोनों ने कुछ देर बातें कीं. चहलकदमी करते हुए कुछ समय बिताया. उस के बाद समीर शाम के करीब 5 बजे ब्राउनस्टोन एयरडाइन रेस्टोरेंट, खेड शिवापुर के पास वाशरूम के लिए रुका.

उस के बाद पुणे के गोगल, शिंदेवाडी के एक होटल से समीर ने भेल खरीदी. फिर शाम के करीब साढ़े 7 बजे के आसपास वह अंजलि को ले कर गोगलवाड़ी वाले किराए पर लिए गए सूरज इंडस्ट्रीज के गोदाम में पहुंचा. अंदर जाते ही अंजलि ने पहले गोदाम देखा. वहीं एक साफ जगह पर समीर ने चटाई बिछाई. चटाई पर बैठ कर वे दोनों भेल खाने लगे. भेल खातेखाते उन के बीच बहस होने लगी. दरअसल, समीर ने अचानक पाटिल की चर्चा छेड़ दी थी. उस ने अंजलि को हिदायत दी कि वह उस से अपना संबंध तोड़ दे, वरना अंजाम बुरा होगा.

इस पर अंजलि ने कोई जवाब नहीं दिया. वह शांत बनी रही. लेकिन जब उस ने जुबान खोली, तब फिल्मी अंदाज में बोली, ”क्या करूं दिल है कि मानता ही नहीं.’’

यह सुनते ही समीर को गुस्सा आ गया. गुस्से में वह पत्नी अंजलि के साथ गालीगलौज करने लगा. उन के बीच बातों का जब सिलसिला शुरू हुआ, तब उन के प्रेम संबंध को ले कर तूतूमैंमैं होने लगी. उस वक्त गोदाम में उन दोनों के अलावा कोई और नहीं था. उन के बीच हाथापाई तक की नौबत आ गई. इसी दौरान समीर ने अंजलि का गला दबा दिया. समीर आक्रामक हो चुका था. उस ने तब तक गला दबाए रखा रखा, जब तक कि अंजलि की सांसें बंद नहीं हो गईं.

अंजलि के बेजान होने पर समीर थोड़ा सहम गया. थोड़ी दूर बैठ कर सोच में पड़ गया कि अब वह क्या करे? उस के हाथों पत्नी का खून हो चुका था. उस की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था. जेल, उम्रकैद और फांसी का फंदा तक उस के खयाल में आने लगे थे. इसी के साथ बच्चों का चेहरा भी उस के दिमाग में घूमने लगा था. वह इस आरोप से बचने के उपाय सोचने लगा. उस के द्वारा कत्ल के बारे में किसी को भी पता नहीं था. वहां कोई चश्मदीद नहीं था. इस कारण वह कत्ल के सबूत मिटाने की तैयारी में लग गया.

हालांकि इस की कुछ तैयारी उस ने पहले से ही कर रखी थी. गोदाम में लोहे की एक भट्ठी बनवा रखी थी. उस ने भट्ठी में अंजलि की लाश को रख कर उसे सुलगा दिया था. भट्ठी में लकडिय़ां और पेट्रोल डाल कर लाश को राख होने तक जलाता रहा, ताकि कोई सबूत न बचे. बची राख को उस ने पास की नदी में बहा दिया. हत्या के बाद उस ने एक और चालाकी की. अंजलि के फोन से अपने ही एक दोस्त को ‘आई लव यू’ का मैसेज भेज दिया. फिर उसी फोन से खुद ही जवाब भी लिख दिया.

ऐसा कर उस ने यह दिखाने की कोशिश की कि अंजलि किसी और के साथ प्रेम संबंध में थी और हत्या की वजह उस का अफेयर है. वारदात को अंजाम देने के बाद उस ने अंजलि की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई. वह 28 अक्तूबर, 2025 को अचानक वारजे पुलिस थाने पहुंच गया. पुलिस से अपनी पत्नी अंजलि जाधव के गुम हो जाने की बात कही. इधर पुलिस अंजलि को ढूंढने में लग गई. एसआई नितिन गायकवाड़ ने अपनी टीम के साथ अंजलि को खोजना शुरू किया. अंजलि को आखिरी बार श्रीराम मिसल हाउस, गोगलवाड़ी फाटा, शिंदेवाड़ी के आसपास देखा गया था. इसलिए मामला राजगढ़ पुलिस थाने में ट्रांसफर कर दिया. इधर समीर बारबार वारजे पुलिस स्टेशन जाने लगा.

वहां वह पत्नी के बारे में बारबार पूछने लगा. पुलिस को इस तरह बारबार पूछना संदिग्ध लगने लगा. डिप्टी कमिश्नर संभाजी कदम की देखरेख में पूछताछ और गुमशुदा की जांच शुरू हो चुकी थी. इस सिलसिले में जब पुलिस ने इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली तो अंजलि आखिरी बार पति समीर के साथ ही नजर आई. कई राउंड की पूछताछ में समीर के बयान भी उलटेपुलटे थे. जब पुलिस ने सख्ती की तो समीर टूट गया और अपना अपराध कुबूल कर लिया. उस ने बताया कि पत्नी की हत्या कर उस की लाश भी वह ठिकाने लगा चुका है. उसे इस का आइडिया ‘दृश्यम’ फिल्म से मिला था.

इस के लिए उस ने अजय देवगन की ‘दृश्यम’ 4 बार देखी थी. समीर ने यह भी कुबूल कर लिया कि उस ने जानबूझ कर गोगलवाड़ी इलाके में 18 हजार रुपए महीने पर किराए पर एक गोदाम लिया था. इस में एक लोहे का बौक्स ले जा कर रखा था, जिसे भट्ठी के रूप में इस्तेमाल किया गया. वहां उस ने पहले से ही पेट्रोल और लकडिय़ां इकट्ठा कर रखी थीं. नितिन शिवाजी गायकवाड़ ने सरकार की ओर से पुलिस थाने में बीएनएस की धारा 103, 238 के तहत फरियाद दर्ज कर कानूनी रूप से समीर पंजाबराव जाधव को हिरासत में लिया.

समीर जाधव ने जिस जगह पत्नी का कत्ल करने का अपराध किया था, दरअसल वह क्षेत्र राजगढ़ पुलिस थाने का था. इसलिए वारजे मालवाडी थाना पुलिस के सीनियर पुलिस इंसपेक्टर विश्वजीत कायंगड़े ने पुणे में दर्ज कर लिया था. फिर इसे राजगढ़ (ग्रामीण) पुलिस थाने को कानूनन सौंप दिया. इस मामले में पुणे के पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार, एडिशनल कमिश्नर रंजन कुमार शर्मा, डीसीपी संभाजी कदम, एसीपी (कोथरूड) भाऊसाहेब पठारे के मार्गदर्शन में केस का खुलासा हुआ. Maharashtra News

 

 

ExtraMarital Affair: अवैध संबंधों ने उजाड़ दिया परिवार

ExtraMarital Affair: विश्वप्रसिद्ध पर्यटनस्थल मांडू के नजदीक के एक गांव तारापुर में पैदा हुई पिंकी को देख कर कोई सहसा विश्वास नहीं कर सकता था कि वह एक आदिवासी युवती है. इस की वजह यह थी कि पिंकी के नैननक्श और रहनसहन सब कुछ शहरियों जैसे थे. इतना ही नहीं, उस की इच्छाएं और महत्वाकांक्षाए भी शहरियों जैसी ही थीं, जिन्हें पूरा करने के लिए वह कोई भी जोखिम उठाने से कतराती नहीं थी.

बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमगाथा कहने वाले मांडू के आसपास सैकड़ों छोटेछोटे गांव हैं, जहां की खूबसूरत छटा और ऐतिहासिक इमारतें देखने के लिए दुनिया भर से प्रकृतिप्रेमी और शांतिप्रिय लोग वहां आते हैं. वहां आने वाले महसूस भी करते हैं कि यहां वाकई प्रकृति और प्रेम का आपस में गहरा संबंध है.

यहां की युवतियों की अल्हड़ता, परंपरागत और आनुवांशिक खूबसूरती देख कर यह धारणा और प्रबल होती है कि प्रेम वाकई प्रेम है, इस का कोई विकल्प नहीं सिवाय प्रेम के. नन्ही पिंकी जब मांडू आने वाले पर्यटकों को देखती और उन की बातें सुनती तो उसे लगता कि जैसी जिंदगी उसे चाहिए, वैसी उस की किस्मत में नहीं है, क्योंकि दुनिया में काफी कुछ पैसों से मिलता है, जो उस के पास नहीं थे.

मामूली खातेपीते परिवार की पिंकी जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे यौवन के साथसाथ उस की इच्छाएं भी परवान चढ़ती गईं. जवान होतेहोते पिंकी को इतना तो समझ में आने लगा था कि यह सब कुछ यानी बड़ा बंगला, मोटरगाड़ी, गहने और फैशन की सभी चीजें उस की किस्मत में नहीं हैं. लिहाजा जो है, उसे उसी में संतोष कर लेना चाहिए.

लेकिन इस के बाद भी पिंकी अपने शौक नहीं दबा सकी. घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने के उस के सपने दिल में दफन हो कर रह गए थे. घर वालों ने समय पर उस की शादी धरमपुरी कस्बे के नजदीक के गांव रामपुर के विजय चौहान से कर दी थी. शादी के बाद वह पति के साथ धार के जुलानिया में जा कर रहने लगी थी.

पेशे से ड्राइवर विजय अपनी पत्नी की इस कमजोरी को जल्दी ही समझ गया था कि पिंकी के सपने बहुत बड़े हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए बहुत दौलत चाहिए. उन्हें कमा कर पूरे कर पाना कम से कम इस जन्म में तो उस के वश की बात नहीं है. इस के बाद भी उस की हर मुमकिन कोशिश यही रहती थी कि वह हर खुशी ला कर पत्नी के कदमों में डाल दे.

इस के लिए वह हाड़तोड़ मेहनत करता भी था, लेकिन ड्राइवरी से इतनी आमदनी नहीं हो पाती थी कि वह सब कुछ खरीदा और हासिल किया जा सके, जो पिंकी चाहती थी. इच्छा है, पर जरूरत नहीं, यह बात विजय पिंकी को तरहतरह से समयसमय पर समझाता भी रहता था.

लेकिन अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की आदी होती जा रही पिंकी को पति की मजबूरी तो समझ में आती थी, लेकिन उस की बातों का असर उस पर से बहुत जल्द खत्म हो जाता था. शादी के बाद कुछ दिन तो प्यारमोहब्बत और अभिसार में ठीकठाक गुजरे. इस बीच पिंकी ने 2 बेटों को जन्म दिया, जिन के नाम हिमांशु और अनुज रखे गए.

विजय को जिंदगी में सब कुछ मिल चुका था, इसलिए वह संतुष्ट था. लेकिन पिंकी की बेचैनी और छटपटाहट बरकरार थी. बेटों के कुछ बड़ा होते ही उस की हसरतें फिर सिर उठाने लगीं. बच्चों के हो जाने के बाद घर के खर्चे बढ़ गए थे, लेकिन विजय की आमदनी में कोई खास इजाफा नहीं हुआ था.

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अकसर अपनी नौकरी के सिलसिले में विजय को लंबेलंबे टूर करने पड़ते थे. इस बीच पिंकी की हालत और भी खस्ता हो जाती थी. पति इस से ज्यादा न कुछ कर सकता है और न कर पाएगा, यह बात अच्छी तरह उस की समझ में आ गई थी. अब तक शादी हुए 17 साल हो गए थे, इसलिए अब उसे विजय से ऐसी कोई उम्मीद अपनी ख्वाहिशों के पूरी होने की नहीं दिखाई दे रही थी.

लेकिन जल्दी ही पिंकी की जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आ गया, जो अंधा भी था और खतरनाक भी. यह एक ऐसा मोड़ था, जिस का सफर तो सुहाना था, परंतु मंजिल मिलने की कोई गारंटी नहीं थी. इस के बाद भी पिंकी उस रास्ते पर चल पड़ी. उस ने न अंजाम की परवाह की न ही पति और बच्चों की. इस से सहज ही समझा जा सकता है कि इच्छाओं और गैरजरूरी जरूरतों के सामने जिम्मेदारियों ने दम तोड़ दिया था. पिंकी को संभल कर चलने के बजाय फिसलने में ज्यादा फायदा नजर आया.

विजय का एक दोस्त था दिलीप चौहान. वह बेरोजगार था और काम की तलाश में इधरउधर भटक रहा था. काफी दिनों बाद दोनों मिले तो विजय को उस की हालत पर तरस आ गया. उस ने धीरेधीरे दिलीप को ड्राइविंग सिखा दी. धार, मांडू और इंदौर में ड्राइवरों की काफी मांग है, इसलिए ड्राइविंग सीखने के बाद वह गाड़ी चलाने लगा. दोस्त होने के साथसाथ विजय अब उस का उस्ताद भी हो गया था.

ड्राइविंग सीखने के दौरान दिलीप का विजय के घर आनाजाना काफी बढ़ गया था. एक तरह से वह घर के सदस्य जैसा हो गया था. जब विजय दिलीप को ड्राइविंग सिखा रहा था, तभी पिंकी दिलीप को जिस्म की जुबान समझाने लगी थी. उस के हुस्न और अदाओं का दीवाना हो कर दिलीप दोस्तीयारी ही नहीं, गुरुशिष्य परंपरा को भी भूल कर पिंकी के प्यार में कुछ इस तरह डूबा कि उसे भी अच्छेबुरे का होश नहीं रहा.

ऐसे मामलों में अकसर औरत ही पहल करती है, जिस से मर्द को फिसलते देर नहीं लगती. दिलीप अकेला था, उस के खर्चे कम थे, इसलिए वह अपनी कमाई पिंकी के शौक और ख्वाहिशों को पूरे करने में खर्च करने लगा. इस के बदले पिंकी उस की जिस्मानी जरूरतें पूरी करने लगी. जब भी विजय घर पर नहीं होता या गाड़ी ले कर बाहर गया होता, तब दिलीप उस के घर पर होता.

पति की गैरहाजिरी में पिंकी उस के साथ आनंद के सागर में गोते लगा रही होती. विजय इस रिश्ते से अनजान था, क्योंकि उसे पत्नी और दोस्त दोनों पर भरोसा था. यह भरोसा तब टूटा, जब उसे पत्नी और दोस्त के संबंधों का अहसास हुआ.

शक होते ही वह दोनों की चोरीछिपे निगरानी करने लगा. फिर जल्दी ही उस के सामने स्पष्ट हो गया कि बीवी बेवफा और यार दगाबाज निकला. शक के यकीन में बदलने पर विजय तिलमिला उठा. पर यह पिंकी के प्रति उस की दीवानगी ही थी कि उस ने कोई सख्त कदम न उठाते हुए उसे समझाया. लेकिन अब तक पानी सिर के ऊपर से गुजर चुका था.

चूंकि पति का लिहाज और डर था, इसलिए पिंकी खुलेआम अपने आशिक देवर के साथ रंगरलियां नहीं मना रही थी. फिर एक दिन पिंकी कोई परवाह किए बगैर दिलीप के साथ चली गई. चली जाने का मतलब यह नहीं था कि वह आधी रात को कुछ जरूरी सामान ले कर प्रेमी के साथ चली गई थी, बल्कि उस ने विजय को बाकायदा तलाक दे दिया था और उस की गृहस्थी के बंधन से खुद को मुक्त कर लिया था.

कोई रुकावट या अड़ंगा पेश न आए, इस के लिए वह और दिलीप धार आ कर रहने लगे थे. पहले प्रेमिका और अब पत्नी बन गई पिंकी के लिए दिलीप ने धार की सिल्वर हिल कालोनी में मकान ले लिया था. मकान और कालोनी का माहौल ठीक वैसा ही था, जैसा पिंकी सोचा करती थी.

यह पिंकी के दूसरे दांपत्य की शुरुआत थी, जिस में दिलीप उस का उसी तरह दीवाना था, जैसा पहली शादी के बाद विजय हुआ करता था. पति इर्दगिर्द मंडराता रहे, घुमाताफिराता रहे, होटलों में खाना खिलाए और सिनेमा भी ले जाए, यही पिंकी चाहती थी, जो दिलीप कर रहा था. खरीदारी कराने में भी वह विजय जैसी कंजूसी नहीं करता था.

यहां भी कुछ दिन तो मजे से गुजरे, लेकिन जल्दी ही दिलीप की जेब जवाब देने लगी. पिंकी के हुस्न को वह अब तक जी भर कर भोग चुका था, इसलिए उस की खुमारी उतरने लगी थी. लेकिन पत्नी बना कर लाया था, इसलिए पिंकी से वह कुछ कह भी नहीं सकता था. प्यार के दिनों के दौरान किए गए वादों का उस का हलफनामा पिंकी खोल कर बैठ जाती तो उसे कोई जवाब या सफाई नहीं सूझती थी.

जल्दी ही पिंकी की समझ में आ गया कि दिलीप भी अब उस की इच्छाएं पूरी नहीं कर सकता तो वह उस से भी उकताने लगी. पर अब वह सिवाय किलपने के कुछ कर नहीं सकती थी. दिलीप की चादर में भी अब पिंकी के पांव नहीं समा रहे थे. गृहस्थी के खर्चे बढ़ रहे थे, इसलिए पिंकी ने भी पीथमपुर की एक फैक्ट्री में नौकरी कर ली. क्योंकि अपनी स्थिति से न तो वह खुश थी और न ही संतुष्ट.

इस उम्र और हालात में तीसरी शादी वह कर नहीं सकती थी, लेकिन विजय को वह भूल नहीं पाई थी, जो अभी भी जुलानिया में रह रहा था. पिंकी को लगा कि क्यों न पहले पति को टटोल कर दोबारा उसे निचोड़ा जाए. यही सोच कर उस ने एक दिन विजय को फोन किया तो शुरुआती शिकवेशिकायतों के बाद बात बनती नजर आई.

ऐसा अपने देश में अपवादस्वरूप ही होता है कि तलाक के बाद पतिपत्नी में दोबारा प्यार जाग उठे. हां, यूरोप जहां शादीविवाह मतलब से किए जाते हैं, यह आम बात है. विजय ने दोबारा उस में दिलचस्पी दिखाई तो पिंकी की बांछें खिलने लगीं. पहला पति अब भी उसे चाहता है और उस की याद में उस ने दोबारा शादी नहीं की, यह पिंकी जैसी औरत के लिए कम इतराने वाली बात नहीं थी.

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वह 28 जुलाई की रात थी, जब दिलीप रोजाना की तरह अपनी ड्यूटी कर के घर लौटा. उसे यह देख हैरानी हुई कि उस के घर में धुआं निकल रहा है यानी घर जल रहा है. उस ने शोर मचाना शुरू किया तो देखते ही देखते सारे पड़ोसी इकट्ठा हो गए और घर का दरवाजा तोड़ दिया, जो अंदर से बंद था.

अंदर का नजारा देख कर दिलीप और पड़ोसी सकते में आ गए. पिंकी किचन में मृत पड़ी थी, जबकि विजय बैडरूम में. जाहिर है, कुछ गड़बड़ हुई थी. हुआ क्या था, यह जानने के लिए सभी पुलिस के आने का इंतजार करने लगे. मौजूद लोगों का यह अंदाजा गलत नहीं था कि दोनों अब इस दुनिया में नहीं हैं.

हैरानी की एक बात यह थी कि आखिर दोनों मरे कैसे थे? पुलिस आई तो छानबीन और पूछताछ शुरू हुई. दिलीप के यह बताने पर कि मृतक विजय उस की पत्नी पिंकी का पहला पति और उस का दोस्त है, पहले तो कहानी उलझती नजर आई, लेकिन जल्दी ही सुलझ भी गई.

दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस वालों ने दिलीप से पूछताछ की तो उस की बातों से लगा कि वह झूठ नहीं बोल रहा है. उस ने पुलिस को बताया था कि वह काम से लौटा तो घर के अंदर से धुआं निकलते देख घबरा गया. उस ने मदद के लिए गुहार लगाई. इस के बाद जो हुआ, उस की पुष्टि के लिए वहां दरजनों लोग मौजूद थे.

दरवाजा सचमुच अंदर से बंद था, जिसे उन लोगों ने मिल कर तोड़ा था. सभी ने बताया कि पिंकी की लाश जली हालत में किचन में पड़ी थी और विजय की ड्राइंगरूम में. उस के गले में साड़ी का फंदा लिपटा था. पिंकी के चेहरे पर चोट के निशान साफ दिखाई दे रहे थे.

जल्दी ही इस दोहरे हत्याकांड या खुदकुशी की खबर आग की तरह धार से होते हुए समूचे निमाड़ और मालवांचल में फैल गई, जिस के बारे में सभी के अपनेअपने अनुमान थे. लेकिन सभी को इस बात का इंतजार था कि आखिर पुलिस कहती क्या है.

धार के एसपी वीरेंद्र सिंह भी सूचना पा कर घटनास्थल पर आ गए थे. उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से जायजा लिया. पुलिस को दिए गए बयान में पिंकी की मां मुन्नीबाई ने बताया था कि पिंकी और विजय का वैवाहिक जीवन ठीकठाक चल रहा था, लेकिन दिलीप ने आ कर न जाने कैसे पिंकी को फंसा लिया.

जबकि दिलीप का कहना था कि उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उस की गैरमौजूदगी में पिंकी पहले पति विजय से मिलतीजुलती थी या फोन पर बातें करती थी. पिंकी के भाई कान्हा सुवे ने जरूर यह माना कि उस ने पिंकी को बहुत समझाया था, पर वह नहीं मानी. पिंकी कब विजय को तलाक दे कर दिलीप के साथ रहने लगी थी, यह उसे नहीं मालूम था.

तलाक के बाद दोनों बेटे विजय के पास ही रह रहे थे. विजय के भाई अजय के मुताबिक हादसे के दिन विजय राजस्थान के प्रसिद्ध धार्मिकस्थल सांवरिया सेठ जाने को कह कर घर से निकला था.

वह छोटे बेटे अनुज को अपने साथ ले गया था. अनुज को उस ने एक परिचित की कार में बिठा कर अपनी साली के पास छोड़ दिया था, जो शिक्षिका है.

अब पुलिस के पास सिवाय अनुमान के कुछ नहीं बचा था. इस से आखिरी अंदाजा यह लगाया गया कि विजय पिंकी के बुलाने पर उस के घर आया था और किसी बात पर विवाद हो जाने की वजह से उस ने पिंकी की हत्या कर के घर में आग लगा दी थी. उस के बाद खुद भी साड़ी का फंदा बना कर लटक गया. फंदा उस का वजन सह नहीं पाया, इसलिए वह गिर कर बेहोश हो गया. उसी हालत में दम घुटने से उस की भी मौत हो गई होगी.

बाद में यह बात भी निकल कर आई कि विजय पिंकी से दोबारा प्यार नहीं करने लगा था, बल्कि उस की बेवफाई से वह खार खाए बैठा था. उस दिन मौका मिलते ही उस ने पिंकी को उस की बेवफाई की सजा दे दी. लेकिन बदकिस्मती से खुद भी मारा गया.

सच क्या था, यह बताने के लिए न पिंकी है और न विजय. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक दोनों की मौत दम घुटने से हुई थी, लेकिन पिंकी के पेट पर एक धारदार हथियार का निशान भी था, जो संभवत: तवे का था. विजय के सिर पर लगी चोट से अंदाजा लगाया गया कि खुद को फांसी लगाते वक्त वह गिर गया था, इसलिए उस के सिर में चोट लग गई थी.

यही बात सच के ज्यादा नजदीक लगती है कि विजय ने पहले पिंकी को मारा, उस के बाद खुद भी फांसी लगा ली. लेकिन क्यों? इस का जवाब किसी के पास नहीं है. क्योंकि वह वाकई में पत्नी को बहुत चाहता था, पर उस की बेवफाई की सजा भी देना चाहता था. जबकि पिंकी की मंशा उस से दोबारा पैसे ऐंठने की थी. शायद इसी से वह और तिलमिला उठा था.

पिंकी समझदारी से काम लेती तो विजय की कम आमदनी में करोड़ों पत्नियों की तरह अपना घर चला सकती थी. पर अपनी शर्तों पर जिंदगी जीने की जिद और ख्वाहिशें उसे महंगी पड़ीं, जिस से उस के बच्चे अनाथ हो गए. अब उन की चिंता करने वाला कोई नहीं रहा.

दिलीप कहीं से शक के दायरे में नहीं था. उस का हादसे के समय पहुंचना भी एक इत्तफाक था. परेशान तो वह भी पिंकी की बढ़ती मांगों से था, जिन से इस तरह छुटकारा मिलेगा, इस की उम्मीद उसे बिलकुल नहीं रही होगी. ExtraMarital Affair

UP Crime News: अवैध संबंधों के चलते पति की कुल्हाड़ी से हत्या

UP Crime News: एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिस ने पारिवारिक रिश्तों को झकझोर कर रख दिया. आरोप है कि पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी. आखिर ऐसी क्या वजह बनी थी कि मामला हत्या तक पहुंच गया? इस सनसनीखेज वारदात के पीछे की पूरी कहानी क्या है? आइए जानते हैं विस्तार से, ताकि रिश्तों में पनपते अविश्वास और गलत फैसलों के खतरनाक परिणाम समझे जा सकें.

यह घटना उत्तर प्रदेश के इटावा जिले से सामने आई है. जहां रात के समय पूजा ने अपने प्रेमी अर्पित के साथ मिलकर पति रनवीर सिंह यादव पर कुल्हाड़ी से हमला कर हत्या कर दी. बताया जाता है कि करीब 8 साल पहले रनवीर की शादी मथुरा निवासी पूजा से हुई थी. वैवाहिक जीवन की शुरुआत से ही दोनों के संबंध तनावपूर्ण रहे. कुछ समय बाद पूजा मायके चली गई थी. करीब 3 साल बाद रनवीर उसे समझाकर वापस अपने साथ ले आया था.

गांव में रहने वाले अर्पित, जो सर्वेश का बेटा है, का उस के घर पर आनाजाना था. इसी दौरान पूजा और अर्पित के बीच नजदीकियां बढ़ीं. पति की गैरमौजूदगी में मुलाकातें बढ़ती गईं और दोनों के संबंधों की चर्चा धीरेधीरे गांव में फैलने लगी. जब रनवीर को इन संबंधों की जानकारी हुई तो उस ने इस का विरोध किया.

एएसपी (ग्रामीण) श्रीशचंद्र के अनुसार, रविवार को कथित तौर पर पूजा ने अर्पित को घर बुलाया. पहले रनवीर को शराब पिलाई गई और फिर रात करीब 8 बजे उस पर घर के भीतर कुल्हाड़ी से कई वार किए गए. हमले की गंभीरता के चलते रनवीर की मौके पर ही मौत हो गई.

सोमवार सुबह जब उस के पिता लाखन सिंह घर पहुंचे तो उन्होंने चबूतरे पर बेटे का खून से लथपथ शव पड़ा देखा. पास ही खून से सनी कुल्हाड़ी भी पड़ी थी.  घटना के बाद पूजा और अर्पित फरार हो गए थे.

मृतक के भाई प्रदीप उर्फ लालू की शिकायत पर पुलिस ने पूजा, उस के प्रेमी अर्पित और अर्पित के पिता सर्वेश के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है. आरोपियों की तलाश में 3 पुलिस टीमें गठित की गईं. मंगलवार सुबह करीब सवा 10 बजे भरथनाबिधूना रोड स्थित अहनैया नदी के पास से पूजा और अर्पित को गिरफ्तार कर लिया गया.

पूछताछ के दौरान पूजा ने स्वीकार किया कि अवैध संबंधों का पति द्वारा विरोध किए जाने के कारण उस ने साजिश रचकर यह कदम उठाया. फिलहाल पुलिस मामले की विस्तार से जांच कर रही है. UP Crime News

Love Crime: प्रेम प्रसंग में टुकड़े – टुकड़े किया पति

Love Crime: चंदौसी शहर के जूता कारोबारी राहुल ने रूबी से लव मैरिज करने के बाद उसे हर तरह की सुखसुविधाएं दीं. लेकिन 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रूबी पति की आंखों में धूल झोंक कर 2-2 प्रेमियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी. प्यार में अंधी हो चुकी रूबी के इरादे एक दिन इतने खौफनाक हो गए कि….

रूबी की जिंदगी एक त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में फंस गई थी. वह प्रेमी अभिषेक व दूसरे प्रेमी गौरव और पति राहुल के बीच फंसी हुई थी. रूबी के लिए यह त्रिकोण नहीं, बल्कि 3 दिशाओं में बिखरा हुआ मन था. पति राहुल स्थिरता और परिवार में समन्वय  बनाए रखने के भ्रम के साथ परिवार को खुशहाल बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ था. इसी तरह उस की शादी के 15 साल बीत चुके थे. दूसरी तरफ अभिषेक, जो उस के पति और समाज में रूबी को बहन बता कर दिन में भैया रात में सैंया की कहावत को चरितार्थ कर रहा था. अपनी धनदौलत के सहारे रूबी की मस्त जवानी का इस्तेमाल कर रहा था. अभिषेक के साथ रूबी 15 साल पहले जैसे यौन आनंद लिए जाने में मस्त थी. अभिषेक बहुत समझदार था.

तीसरा आशिक गौरव ने कुछ महीने पहले इस कहानी में एंट्री की थी. वह जवानी के जुनून में इस तरह अंधा हो गया था, जैसे कि सांप केंचुली आने पर हो जाता है. रूबी से उस का संपर्क हुआ. इसी दौरान अभिषेक से भी मुलाकात हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. अभिषेक की तरह गौरव भी रूबी को बहन कहने लगा था और उस के बच्चे भी अभिषेक की तरह गौरव को भी मामा कहते थे. यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला संभल की सब से उन्नतशील तहसील चंदौसी का है. संभल के जिला बनने से पहले चंदौसी को ही जिला बनाने की मांग उठती रही थी. जिला होने के सभी मानक भी चंदौसी पूरे करती थी, लेकिन राजनीतिक खेल की वजह से संभल को जिला घोषित कर दिया गया था, लेकिन मुख्यालय काफी दूर बहजोई में बनाया गया.

चंदौसी की घनी आबादी के चुन्नी मोहल्ला में राहुल नाम का जूते का व्यापारी रहता था. वैसे यह इलाका जूतों के निर्माण के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसी चुन्नी मोहल्ले में 40 वर्षीय राहुल कुमार अपनी पत्नी रूबी (39 साल) 12 साल की बेटी और 10 साल के बेटे के साथ रह रहा था. राहुल एक मेहनती जूता व्यापारी था, सुबह से शाम तक कारीगरों से जूते बनवाता था. जूतों को राहुल थोक दुकानदारों को सप्लाई करता था. भागतेदौड़ते हुए भी वह जब भी घर लौटता, रूबी और दोनों बच्चों का चेहरा देख कर सारे दिन की थकान भूल जाता था. उस के चेहरे पर हमेशा संतोष की मुसकान रहती. रूबी, उस की पत्नी, घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. कभीकभी वह राहुल के बिजनैस में भी मदद कर दिया करती थी.

प्रेमिका के साथ मिलकर उसके पति की जान लेने वाला आरोपी

रूबी की आंखों में एक खालीपन था, एक ऐसी तन्हाई जो शादी के बंधन में भी उसे घेर लेती थी. राहुल का प्यार सच्चा था, लेकिन उस का जीवन बिजनैस की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि रूबी की भावनाओं को छूने का समय ही नहीं मिलता.

रूबी से हुआ प्यार

राहुल मूलरूप से संभल जिले के ही रजपुरा थाना क्षेत्र के गंवा कस्बे के रहने वाले जसवंत का इकलौता बेटा था. जसवंत के 4 बच्चे हुए, जिस में एक बेटा राहुल और 3 बेटियां हैं. राहुल के चाचा, ताऊ और बाकी रिश्तेदार वहीं रहते हैं. गवां कस्बे में रहने वाले राहुल के चाचा नेकराम बताते हैं कि राहुल जब केवल 15 साल का था, तभी उस के मम्मीपापा का बीमारी के चलते कुछ ही अंतराल में निधन हो गया.

घर संभालने के लिए राहुल ने राजमिस्त्री का काम शुरू कर दिया. पहले राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था. फिर धीरेधीरे काम सीख कर राजमस्त्री बन गया. बाद में इस ने टाइल्स लगाने का भी काम सीखा. राहुल ने मेहनत कर के परिवार को आगे बढ़ाया. बहनों की शादी की. काम के चलते इसे अलगअलग जगहों पर जाना पड़ता था. उसी बीच इस की मुलाकात चुन्नी मोहल्ले की रहने वाली रूबी से हुई.

चंदौसी के चुन्नी मोहल्ले में उस सुबह धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी थी. गली के कोने पर बन रहे नए मकान में राजमिस्त्री राहुल अपने औजार संभालते हुए काम पर लग चुका था. सिर पर गमछा बंधा था. हाथों में सीमेंट की महक आ रही थी. आंखों में अपने भविष्य के छोटेछोटे सपने थे. राहुल रोज की तरह ईमानदारी से काम कर रहा था. एक दिन मकान के आंगन से अचानक चूडिय़ों की हलकी सी खनक सुनाई दी. राहुल ने नजर उठाई. सामने खड़ी थी मकान मालिक की बेटी. सादे सूट में, खुले बालों और शांत आंखों वाली रूबी किसी सुबह की तरह ताजा लग रही थी. वह पानी का गिलास ले कर आई थी और संकोच से बोली, ”मिस्त्री साहब, पानी पी लीजिए.’’

राहुल ने पहली बार उसे देखा. जवान रूबी की सुंदरता ऐसी थी, जैसे किसी हलकी सुबह की पहली किरण जो धीरेधीरे पूरे आकाश को रंग दे देती हो. उस का चमकदार लाल कुरता, भरे गांव की पृष्ठभूमि में खिला कोई ताजा फूल सा सुंदर लग रहा था. गले के पास की खूबसूरत कढ़ाई उस के व्यक्तित्त्व की कोमलता को और उभार दे रही थी.

उस के कंधों तक बिखरे हलके घुंघराले बाल हवा के हर झोंके के साथ नाच उठते, जैसे बचपन की शरारतें अब भी उस के साथ खेल रही हों. उस की चाल में न तो शहर की बनावट थी, न ही किसी संकोच की दीवार. बस, आत्मविश्वास और सहजता की हलकी सी मुसकान थी, जो अनजाने में देखने वालों के मन में जगह बना लेती.

देखने में वह किसी फिल्मी दृश्य की हीरोइन लग रही थी. जवान रूबी के सपने उस की आंखों से झलक रहे थे, जैसे हर कदम के साथ वह भविष्य की नई कहानी बुन रही हो. रूबी ने फिर कहा, ”लो मिस्त्री साहब, पानी पी लो.’’

उस पल सब कुछ ठहर सा गया. उस ने मुसकरा कर पानी लिया. बस उसी एक पल में दोनों के दिल में जैसे कोई हलकी सी 2 दिलों को जोडऩे वाली प्रेम रेखा खिंच गई. दिन बीतते गए. राहुल ईंटों की दीवारें खड़ी करता और रूबी  कभीकभी उसे काम करते देखती. कभी चाय ले कर आ जाती, कभी घर के किसी काम का बहाना बन जाता. बातों का सिलसिला छोटा होता, पर आंखों में कहानियां लंबी होने लगीं.

धीरेधीरे रोज की मुलाकात छोटी बातों में बदलने लगी. पानी देना, चाय लाना या बस मुसकराना. राहुल को महसूस हुआ कि उस के भीतर का दिल रूबी पर आ गया है. राहुल को अपनी हैसियत का पूरा एहसास था. वह एक राजमिस्त्री था, रोज की मजदूरी पर जीने वाला. वहीं रूबी एक अच्छे घर की पढ़ीलिखी लड़की थी. फिर भी दिल ने बारबार दिमाग को चुप करा दिया. रूबी को राहुल की सादगी, उस का सम्मानपूर्ण व्यवहार और मेहनत भरी ईमानदारी अच्छी लगने लगी. उसे लगा कि यह आदमी दीवारें ही नहीं, भरोसा भी मजबूती से खड़ा करता है.

एक शाम जब काम खत्म हो चुका था और आसमान हलका गुलाबी हो चला था, रूबी ने हिम्मत कर के कहा, ”राहुल, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

राहुल कुछ पल चुप रहा. फिर बोला, ”रूबी, मैं बहुत साधारण हूं, पर दिल सच्चा है.’’

बस वही सच था, जिस ने दोनों को और करीब ला दिया.

यह प्यार चुपचाप पनपा. बिना शोर, बिना दिखावे के ईंट, सीमेंट और धूल के बीच 2 दिलों ने एकदूसरे के लिए जगह बना ली. मकान बन कर तैयार हो गया, लेकिन राहुल और रूबी के दिलों में जो निर्माण हुआ था, वह कहीं ज्यादा मजबूत था. चुन्नी मोहल्ले की उस गली में आज भी लोग उस मकान को देखते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उस की नींव में कहीं न कहीं रूबी की प्रेम कहानी भी गड़ी हुई है. दोनों का इश्क परवान चढ़ा. 2025 के हिसाब से देखें तो 15 साल पहले यानी कि 2010 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया.

इस चुन्नी मोहल्ले में रूबी का जहां मायका है, इसी गली में थोड़ा आगे कुछ घर छोड़ कर रूबी के राहुल ने भी यहां एक प्लौट खरीद कर मकान बना लिया. राहुल के घर और रूबी के मायके के बीच की गली मात्र 4 फीट चौड़ी है. गांव छोड़ कर कुछ सालों बाद ये लोग इस संकरी गली में बने मकान में रहने लगे.

दिल में बसा गौरव

एक दिन बारिश की झमाझम में रूबी बाजार से सब्जियां ले कर लौट रही थी. उस की साड़ी हलकी सी भीग चुकी थी और वह जल्दीजल्दी घर की ओर बढ़ रही थी, तभी मोहल्ले का युवक गौरव उसे देख कर रुक गया. उस ने अपनी छतरी रूबी की ओर बढ़ाई और मुसकराते हुए कहा, ”भाभीजी, भीग जाएंगी. लीजिए, मेरी छतरी ले लीजिए. मैं तो घर के पास ही हूं.’’

रूबी ने हिचकिचाते हुए छतरी ली, लेकिन उस की आंखों में गौरव की उस छोटी सी मदद ने एक अनजानी चिंगारी जला दी. अगले दिन रूबी ने छतरी लौटाने के बहाने गौरव के घर पर जाना तय किया. छतरी ले कर जा ही रही थी कि रास्ते में उसे गौरव मिल गया. वह बोला, ”अरे भाभीजी, आप ने क्यों कष्ट किया. छतरी लेने मैं ही घर आ जाता. इस बहाने से एक कप चाय भी मिल जाती.’’

रूबी ने कहा, ”अब तो यह अपनी छतरी संभालो. चाय के लिए फिर किसी दिन आ जाना, मेरा दरवाजा आप के लिए हमेशा खुला मिलेगा.’’

यह बस 2-3 मिनट की औपचारिक बातचीत थी, मगर रूबी को चलतेचलते लगा जैसे किसी ने लंबे सूखे दिन के बाद जरा सा पानी छिड़क दिया हो. एक दिन गौरव उस के घर पहुंच गया. रूबी घर में बिलकुल अकेली थी, उसी समय अचानक अभिषेक भी वहां आ गया. दोनों उस समय चाय पी रहे थे. रूबी ने गौरव से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा मुंह बोला भाई अभिषेक है. फिर गौरव की तरफ इशारा करते हुए रूबी ने कहा कि यह गौरव है. ये मोहल्ले में ही रहता है. मुझे बहन मानता है.

दोनों की यह पहली मुलाकात थी. उस के बाद अकसर रूबी के घर या बाहर भी कभीकभी कहींकहीं दोनों मिल जाया करते थे. औपचारिक बातचीत के साथसाथ उन दोनों में दोस्ती भी हो गई. रूबी की कोशिश रहती कि एक बार में उस के घर एक ही व्यक्ति से मुलाकात हो. दोनों एकदूसरे पर भरोसा भी करते थे. दिलचस्प बात यह कि इन दोनों के मन में कहीं न कहीं शक भी पनप रहा था कि भाई है या मेरी तरह आशिक. कुछ ही मुलाकातों में गौरव और रूबी एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

राहुल को गौरव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक दिन राहुल बाजार से घर पर आया. उस समय रूबी के साथ गौरव बैठा चाय पी रहा था. स्थिति बहुत आपत्तिजनक  तो नहीं थी, लेकिन शक पनप जाने के लायक काफी थी.

यह नजारा देख कर राहुल का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. इस से पहले कि वह कोई सवाल करता, गौरव ही बोल पड़ा, ”दीदी, चाय में तो मजा आ गया.’’

यह सुन कर राहुल सामान्य हो गया. 2-4 बातें गौरव से भी हुईं. फिर गौरव रुबी दीदी राहुल जीजा को नमस्ते कर के चला गया. चाय की इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात में रूबी ने गौरव से कहा कि उस दिन तुम्हारा स्टेप शानदार रहा, जिस से राहुल का गुस्सा शांत हो गया. नहीं तो यह हमारे बीच का प्यार परवान नहीं चढ़ पाता.

धीरेधीरे गौरव उस की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा, वह पूछता, ”भैया की दुकानदारी कैसी चल रही है? सीजन में तो जूते की अच्छी मांग होगी?’’

रूबी को यह अच्छा लगता कि कोई तो है जो उस के पति के बिजनैस के बारे में इतनी तल्लीनता से पूछ रहा है. बस धीरेधीरे दोनों की बातें, दोनों की आदतें और दोनों की बेचैनियां एकदूसरे में घुलने लगीं. राहुल मेहनती था, पर बिजनैस की चिंता, कर्ज की किस्तें और बढ़ता हुआ खर्च उस के स्वभाव को चिड़चिड़ा बना रहे थे. घर पर उस की बातचीत ज्यादातर पैसों, बिलों और थके हुए तानों के बीच उलझ जातीं. रूबी के दिल में कहीं यह बात बैठ गई कि उस की मुसकराहट अब पति के लिए जरूरी नहीं रही.

रूबी और गौरव दोनों को समझ में आ गया कि जो रिश्ता उन के बीच बन चुका है, वह नाम के बंधन से परे, दिल की गहराई में जड़ें जमा चुका है. एक दिन मौका पाते ही 2 जिस्म एक जान हो गए. फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा.

दोनों पकड़े गए रंगेहाथ

जब कभी राहुल बिजनैस के काम से बाजार चला जाता, गौरव घर आ जाता. बच्चे स्कूल में होते. दोनों मौजमस्ती करते. अभिषेक से भी ज्यादा आनंद वह गौरव के साथ महसूस कर रही थी. शाम का वक्त था. राहुल ने अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दबाजी में कहा, ‘मैं बाजार जा रहा हूं, कल शाम तक लौटूंगा’, इतना कह कर वह निकल गया. बच्चे सो चुके थे. घर में अब सिर्फ रूबी थी. उस ने तुरंत फोन कर के गौरव से घर आने को कहा.

मौके का फायदा उठाने के लिए गौरव रूबी के घर पहुंच गया.

”कितनी देर लगाई आज?’’ रूबी ने हलके से ठहाका लगाते हुए कहा.

पति की हत्यारोपी रूबी को पुलिस में ले जाते हुए 

”बाजार गया था, वहां ट्रैफिक में फंस गया था,’’ गौरव ने आतेआते अपनी शर्ट का एक बटन खोल दिया और उस के पास पहुंच कर उस की कमर में हाथ डाल दिया.

”अब सजा सुनाओ, कितना इंतजार करवाया?’’ रूबी ने भी उस के गले में बांहें डाल दीं.

”सजा तो बहुत कुछ बाकी है. पहले तो यह सजा पूरी करो.’’ गौरव ने उसे दीवार से सटा दिया.

रूबी की सांसें तेज हो गईं. उस ने गौरव के होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया. एक ऐसी भूख के साथ, जो सालों से दबी हुई थी. 15 साल पहले राहुल के साथ भी ऐसे ही पल आते थे, पर वो जल्दी खत्म हो जाते. अब कमरे में सिर्फ सांसों की आवाज थी. दोनों एकदूसरे में खोए हुए थे. ऐसे जैसे दुनिया में सिर्फ यही 2 लोग बचे हों. जल्दबाजी में वे दरवाजा बंद करना भी भूल गए थे. तभी अचानक राहुल आ गया.

राहुल हुआ लापता

दरअसल, राहुल को पूरा शक हो गया था कि उस की पत्नी गौरव के साथ रंगरलियां मनाती है, इसलिए वह जाने का बहाना कर के घर में ही अपने गोदाम में छिप गया था. यही घटना राहुल की हत्या का सबब बन गई. रूबी ने अपने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर अपने पति राहुल की हत्या की ऐसी योजना बनाई कि एक महीने तक पता ही नहीं चल सका कि राहुल कहां चला गया. उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

शायद कभी पता चलता भी नहीं, लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक हो, कोई न कोई ऐसा क्लू पुलिस के हाथ लग ही जाता है. फिर जमीन की तह से भी पुलिस अपराधी को खोज लेती है. राहुल ने राजमिस्त्री के काम से हट कर जूतों के कारोबार में कदम रखा था. घर से ही यह काम शुरू किया. वह अलगअलग जगहों पर जूते सप्लाई करता था. उस ने देहरादून में भी एक किराए की जगह ले रखी है. वहां भी बिजनैस को बढ़ा रहा था. देहरादून एक पर्यटक स्थल है.

कभीकभी वहां सैलानी बहुत बड़ी संख्या में आ जाते हैं, जिस के कारण होटल में ठहरने को जगह भी नहीं मिल पाती थी. इसलिए राहुल ने किराए पर एक कमरा ले लिया था. बिजनैस के सिलसिले में उस का हमेशा घर से बाहर आनाजाना लगा रहता. अभी कुछ दिन पहले राहुल की बुआ की बेटी की शादी थी. राहुल को शादी की तैयारी के लिए जाना था. इस के अलावा उसे कुछ खरीदारी भी करनी थी. 18 नवंबर, 2025 को उस ने अपनी पत्नी रूबी से कहा, ”मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं, कल तक लौट आऊंगा.’’

18 नवंबर का पूरा दिन बीत गया. 19 नवंबर आया, पर राहुल घर नहीं लौटा. पत्नी और बच्चे इंतजार कर रहे थे. हालांकि वो काम की वजह से कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. यह नौरमल बात थी, इसलिए बच्चों को उतनी चिंता नहीं थी. 20 नवंबर आया. बेटा और बेटी भी मम्मी से पापा के बारे में पूछ रहे थे. बेटी के अनुसार पापाजी का मोबाइल फोन कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था. कभी औन रहता तो कभी स्विच्ड औफ हो जाता.

शायद बैटरी खराब हो गई होगी. बच्चों के जिद करने पर रूबी ने जब पति को कौल किया तो उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कुछकुछ देर बाद और ट्राई किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ ही मिला. बेटी ने बताया कि पापा अपने फूफा के घर भी जाने वाले थे. हो सकता है कि काम पूरा करने के बाद वहीं चले गए हों. शादी के सामान की खरीदारी करवानी थी.

अब फूफा को कौल किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल तो यहां पर आया ही नहीं. बारीबारी से पत्नी कभी बच्चे बाकी रिश्तेदारियों में कौल करते रहे, लेकिन राहुल का कहीं कुछ पता नहीं चला. इसी तरह एक दिन और बीत जाता है. अब रूबी ने फैसला किया कि राहुल जहां भी काम के सिलसिले में जाते थे, वहां जा कर पता करेगी. इस के बाद रूबी बच्चों के खुद पति की खोज में निकल गई. 22 नवंबर, 2025 को यह देहरादून के उस किराए वाले मकान में भी पहुंच गई, जहां राहुल का अकसर आनाजाना होता था.

रूबी ने मकान मालिक से बात की. अभी तक 4 दिन बीत चुके थे. मकान मालिक ने कहा कि राहुल तो यहां पर कई दिनों से नहीं आए. समझ नहीं आ रहा था कि राहुल कहां चला गया. अंत में थकहार कर रूबी ने 24 नवंबर, 2025 को कोतवाली चंदौसी में पति के लापता होने की सूचना दर्ज कराई. पुलिस ने उस की हर एक डिटेल ली. राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस की जानकारी आसपास के दूसरे थानों में भी भिजवा दी.

ऐसे ही इस का भाई जुगनू है. उस के खिलाफ चंदौसी कोतवाली में कई मामले दर्ज हैं. जो चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के मामले बताए गए हैं. वह वर्तमान में मुरादाबाद जेल में बंद है. भाई के कारनामों में बहन रूबी का भी दखल रहता था. बताते हैं कि जब पुलिस जुगनू को पकडऩे के लिए जाती तो रूबी पुलिस से उलझ जाती थी. आसपास के लोग भी रूबी से दूरी बना कर रखते, इस डर से कि कब किस पर झूठा केस कर दे. रूबी कोई आम सुंदरी नहीं थी.

रूबी एक हेकड़ और दबंग महिला थी. बताते हैं कि साल 2016 में राहुल का अपने गांव में जमीन को ले कर विवाद हो गया था. उस समय रूबी अपने पति के साथ गांव के ही मकान में रहती थी. तब रूबी ने मोर्चा संभाला और विरोधियों को धूल चटाई थी. रूबी ने गांव के 3 लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए रजपुरा थाने में केस दर्ज करवाया था. इस में एक पिता, बेटा और भतीजे को नामजद कराया गया था. वह झगड़ा तो शांत हुआ. गांव के लोगों ने फैसला करा दिया था. नामजद लोगों को इस के लिए भरी पंचायत में माफी मांगनी पड़ी थी. ऊपर से रूबी ने उन तीनों से केस वापस लेने के लिए भारीभरकम रकम भी वसूल की थी.

घटना से करीब डेढ़ महीने पहले चंदौसी के सैनिक चौराहे के पास एक जमीन खाली कराने के लिए रूबी अपने प्रेमी अभिषेक के लिए मैदानेजंग में उतर आई थी. रूबी की हिम्मत, हौसला और तेवर देख कर विरोधी घबरा गए और उन्हें जमीन छोड़ कर भागना पड़ा था. रूबी के कारण ही प्रेमी अभिषेक को मोटी रकम का फायदा हुआ था.

बदले में रूबी को खुश करने के लिए अभिषेक ने भी अच्छीखासी रकम रूबी को दी थी. ऐसे ही विवाद का एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस में रूबी ने अभिषेक और गौरव के साथ मिल कर हंगामा किया था. उस समय उस का पति राहुल भी साथ था. इस की एक तसवीर भी वायरल हो रही है, जिस में रूबी को अपने दोनों प्रेमी और  पति के साथ कहीं पर हंगामा करते हुए देखा जा सकता है.

इसी तरह के कई अन्य विवादों में रूबी चंदौसी, रजपुरा, बनियाठेर थानों में लगभग 6-7 केस दर्ज करवा चुकी है. कुछ महीने पहले अभिषेक, रूबी और गौरव नैनीताल घूमने गए थे. वहां एक होटल में इन्होंने रात्रि विश्राम किया था. दोनों का टारगेट यह था कि इन में से कोई एक भी किसी काम से बाहर चला जाए तो दूसरा रूबी के साथ अपने प्रेम का टारगेट पूरा कर ले. शक तो दोनों को एकदूसरे पर हो ही गया था. यह सब आजमाने के लिए अभिषेक होटल से कोई बहाना कर के बाहर गया.

गौरव समझा 1-2 घंटे में तो घूम कर वापस आएगा, लेकिन अभिषेक कुछ ही मिनट बाद जैसे ही होटल के कमरे में घुसा, उस ने रूबी और गौरव को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उस समय उस ने गौरव से तो कुछ नहीं कहा, ऐसा बन गया जैसे उस ने कुछ देखा ही न हो. उस दिन के बाद से वह धीरेधीरे उन दोनों से किनारा करने लगा.

लाश के मिले टुकड़े

रूबी अब गौरव पर पूरी तरह से फिदा थी. इसलिए अभिषेक रूबी की प्रेम कहानी से बाहर हो गया और उस का संपर्क रूबी और गौरव दोनों से ही टूट गया. धीरेधीरे समय बीत रहा था. लेकिन राहुल का कुछ अतापता नहीं था. सभी लोग काफी चिंतित थे. अब दिन हफ्तों में बदलने लगे. 3 हफ्ते गुजर गए. सब की उम्मीद भी अब दम तोड़ चुकी थी. 27 दिन बाद यानी 15 दिसंबर, 2025 को राहुल के घर से करीब 800 मीटर दूर पतरौआ रोड है. यहीं पर एक ईदगाह स्थित है. इसी के पास रोड के साइड से एक नाला गुजरता है.

यह इलाका काफी सुनसान रहता है. आसपास खेतखलिहान है. कोई सीसीटीवी कैमरा भी दूरदूर तक नहीं है. सुबह के करीब 9 बजे के आसपास कुछ लोग इसी रास्ते से गुजर रहे थे. उन्होंने देखा कि नाले के पास काफी सारे कुत्ते इकट्ठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं. एकदूसरे पर भौंक रहे हैं और किसी चीज को ले कर छीनाझपटी भी कर रहे हैं. उन के पास एक बड़ा सा पौलीथिन बैग पड़ा था, जिस में कुछ भारीभरकम चीज रखी हो.

उस में से काफी तेज गंध भी आ रही थी. मामला संदिग्ध लगा तो एक व्यक्ति ने पुलिस कंट्रोल रूम का 112 नंबर डायल कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना चंदौसी कोतवाली में दे दी गई. सूचना मिलते ही कोतवाल अनुज तोमर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह 15 दिसंबर, 2025 की बात है. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां 2 टूरिस्ट बैग नाले में पड़े थे. एक को कुत्तों ने फाड़ दिया था, जिस में से मानव बौडी के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. जब खोला गया तो उस में से किसी आदमी का धड़ वाला भाग निकला. इस का हाथ, पैर, सिर सब कुछ गायब था.

पुलिस को दूसरे बैग के अंदर कुछ और भी सामान और एक पौलीथिन मिली. सामानों में ब्लैक और ग्रीन कलर की एक टीशर्ट थी. इस पर खून के धब्बे भी थे. एक अंडरवियर भी मिला और पौलीथिन में बायां हाथ अच्छे से सील पैक था, जिस वजह से नाले में पड़े रहने के बावजूद भी उस में पानी प्रवेश नहीं कर सका. शायद इस की बदबू बाहर न आ जाए, इस वजह से पैक किया हो. दिखने में लाश के ये अंग कई हफ्ते पुराने लग रहे थे. फोरैंसिक टीम को सूचित कर दिया गया.

फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य इकट्ठा करने शुरू कर दिए. इतनी देर में आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी जुटने लगे. पुलिस ने यहीं आसपास और भी छानबीन की. शायद और भी शरीर का हिस्सा भी मिल जाए. काफी तलाश के बाद भी सिर और शरीर के बाकी अंग कहीं नहीं मिले. घटनास्थल के फोटोग्राफ लिए गए और वीडियो भी बनाई गई. पुलिस द्वारा बरामद शरीर और बरामद कपड़ों को दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की गई.

कटर से काटी लाश

फोरैंसिक जांच के दौरान पुलिस को बहुत सारी चीजें पता चलीं. ऐसा लगा जैसे आराम से घटना अंजाम दी गई है. पूरी सफाई के साथ शरीर के टुकड़े किए गए. शरीर को काटने में तेजधार हथियार नहीं, बल्कि किसी मशीन का इस्तेमाल किया गया. 16 और 17 दिसंबर, 2025 तक यानी 2 दिन लगातार पुलिस की टीमें बौडी के विभिन्न अंगों को तलाश करती रहीं. पुलिस की कोशिश थी कि किसी तरह से सिर बरामद हो जाए तो मृतक की पहचान हो सके.

कोतवाल अनुज कुमार तोमर लगातार केस की जांच कर रहे थे. घटनास्थल पर बैग में जो हाथ मिला था, पुलिस द्वारा उस का ध्यान से निरीक्षण किया तो उस पर एक टैटू नजर आया. हाथ के बीच में ‘राहुल’ नाम लिखा हुआ था. अब राहुल कौन हो सकता है? राहुल या तो इस का ही नाम होगा या फिर इस के किसी करीबी का. उधर पुलिस की टीमें थाने में ऐसी पुरानी फाइल्स खंगाल रही थीं, जिन की गुमशुदगी लिखाई गई हो. चंदौसी थाने में ही एक केस फाइल मिला जूता कारोबारी राहुल कुमार का. 18 नवंबर, 2025 से गायब था. उस की गुमशुदगी उस की पत्नी रूबी द्वारा लिखाई गई थी.

पुलिस ने रूबी को बुला कर बरामद कपड़े व लाश के टुकड़े दिखाए. रूबी ने सब कुछ देख कर अपने पति के अवशेष होना स्वीकार नहीं किया. साफ इनकार कर दिया. थकहार कर पुलिस ने 18 दिसंबर, 2025 को लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस का सब से पहला काम था मृतक की पहचान पता करना. पुलिस के पास तो कोई ऐसी निशानी भी नहीं थी. अब पुलिस को शक हो चला था कि यह लाश राहुल की ही हो सकती है. क्योंकि एक तरफ तो राहुल गुमशुदा था और दूसरी तरफ लाश की बांह पर भी ‘राहुल’ के नाम का टैटू बना हुआ था.

जनपद संभल के थाना चंदौसी क्षेत्र में 24 नवंबर, 2025 को रूबी नाम की एक महिला ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद रूबी ने कभी पुलिस से कोई कौंटेक्ट नहीं किया, न ही उच्च अधिकारियों से शिकायत की कि पुलिस उस के पति को ढूंढने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए पुलिस का शक अब यकीन में बदलता जा रहा था, लेकिन कोई सबूत हाथ में आने से पहले वह रूबी पर हाथ डालना नहीं चाहती थी.

पुलिस ने लापता राहुल के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. पता चला कि राहुल का मोबाइल फोन घर पर ही 18 नवंबर, 2025 से ही स्विच औफ दिख रहा था. 19 दिसंबर, 2025 को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. पुलिस को राहुल की पत्नी रूबी पर शक हो रहा था. 20 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने रूबी से फिर पूछताछ की. उस के बात करने का तरीका अजीब था. जैसे कि वह जानबूझ कर दुखी होने का नाटक कर रही हो. जांच के दौरान पुलिस ने रूबी से उस का मोबाइल फोन मांगा, लेकिन वह मोबाइल  देने से इंकार कर रही थी.

पुलिस को मना करने की वजह भी नहीं बता रही थी. डांटडपट कर पुलिस ने मोबाइल लिया और इस की जांच की. सारे फोटोज, कौल डिटेल्स, चैटिंग सब कुछ चैक किया गया. इसी में ही रूबी के पति राहुल के साथ अलगअलग समय में लिए गए अनेक फोटो मिले. उसी दौरान पुलिस को 2 फोटो ऐसे मिले, जिन्होंने इस केस की परतें प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी. एक फोटो में राहुल वही टीशर्ट पहने दिखा, जो नाले के पास बैग में मिली थी.

जब पुलिस ने बरामद टीशर्ट रूबी को दिखाई थी तो उस ने उसे पहचानने से क्यों इंकार किया? मान लें कि वह कोई दूसरा टीशर्ट हो, किसी और का हो, फिर भी यह बोल सकती थी कि राहुल के पास ऐसा ही टीशर्ट है. पर उस ने बिलकुल ही पहचानने से मना कर दिया था.

पत्नी निकली कातिल

पुलिस ने थोड़ा ध्यान से देखा तो फोटो में राहुल के हाथ पर उस के नाम का टैटू गुदा था. इस से पुलिस को विश्वास कि नाले से बरामद लाश के टुकड़े राहुल के ही थे. इस से साफ हो गया कि रूबी अपने पति राहुल की गुमशुदगी और मौत को ले कर झूठ बोल रही है. अब पुलिस ने रूबी से अपने अंदाज में पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में रूबी सच बोलने के लिए मजबूर हो गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने पति राहुल की हत्या कराई थी. उस ने इस हत्याकांड की एक हृदयविदारक स्टोरी सुनाई.

18 नवंबर की रात को जब राहुल घर पर नहीं था. रूबी ने गौरव को अपने घर बुला लिया. रूबी को पता नहीं था कि वह कहीं गया नहीं है, घर में ही छिपा है. राहुल को मौके का इंतजार था. प्यार के नाम पर वासना का खेल शुरू होते ही राहुल अंदर आया. दरवाजा खुला था. क्योंकि दोनों इतने खोए हुए थे कि चिटकनी लगाना भी भूल गए थे. राहुल को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया.

एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई

उस की आंखें पहले रूबी पर टिकीं, जो अब तक चादर से जिस्म ढकने की कोशिश में सीने से लगाए बैठी थी. बाल बिखरे, होंठ कांपते हुए. फिर गौरव पर, जो बिस्तर के किनारे खड़ा था, हाथ में चादर का कोना पकड़े, लेकिन शरीर अभी भी नंगा था. राहुल का चेहरा पहले सफेद पड़ गया, फिर लाल. उस की आंखों में कुछ ऐसा था नफरत, सदमा, धोखा और शायद एक पल के लिए दया भी. वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था.

सन्नाटा तोड़ते हुए आवाज आई, ”राहुल…’’ यह कांपती आवाज रूबी की थी, ”तुम… तुम इतनी जल्दी?’’

राहुल ने जवाब नहीं दिया. उस ने बस एक बार फिर दोनों को देखा, जैसे कोई तसवीर देख रहा हो, जो कभी भूलना नहीं चाहता. फिर बिना एक शब्द बोले, वह मुड़ा. उस के कदम भारी थे. दरवाजे तक पहुंच कर वह रुका. पीठ फेर कर बोला, कपड़े पहन ले. वह आक्रोश से बुरी तरह तमतमा रहा था. फिर उस ने रूबी को बुरी तरह पीटा और सरेबाजार उस का जुलूस निकालने की धमकी दी.

कोतवाल अनुज तोमर

बस इसी से पगलाई रूबी ने गौरव को इशारा किया. गौरव ने लोहे की रौड उठा कर राहुल के सिर में मार दिया. वह वहीं गिर गया. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. रूबी भी पति पर हमला करने की पोजीशन ले चुकी थी. उस ने हथौड़ा ले कर उस के सिर पर मारमार कर सिर कुचल दिया. इस तरह दोनों ने मिल कर राहुल का  कत्ल कर दिया और अगले दिन बाजार से इलैक्ट्रिक कटर मशीन ला कर घर में ही अपने पति की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर डाले.

पुलिस ने रूबी और गौरव की निशानदेही पर कत्ल और सबूत मिटाने में इस्तेमाल किए गए कटर मशीन, हथौड़ा, मोबाइल फोन और लोहे की रौड जैसी चीजों को भी अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने धड़ का हिस्सा और एक बांह तो बरामद कर ली थी, लेकिन राहुल का सिर और उस के बाकी के हाथपांव बरामद नहीं हुए. रूबी और गौरव ने उस की लाश के अन्य हिस्सों को एक कार में ले कर बहजोई बबराला होते हुए राजघाट पहुंचे. वहां से गुजर रही गंगा नदी में राहुल के शरीर के बाकी टुकड़ों को फेंक दिया, जो अब बह कर दूर जा चुके हैं. शायद नष्ट भी हो चुके हों.

इस पूरे हत्याकांड की भनक उन्होंने बच्चों तक को नहीं लगने दी. राहुल की बेटी पापा के मर्डर में मम्मी और गौरव के अलावा अभिषेक को भी आरोपी मान रही है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि अभिषेक के रूबी से संबंध विच्छेद हो चुके थे. वह इस कहानी से अलग था. इस का इस घटना में कोई रोल नहीं है. चंदौसी शहर के लिए इतनी निर्मम हत्या का यह पहला मामला बताया जा रहा है.

गौरव ने जिस दुकान से बैग खरीदे थे, उस दुकानदार का नाम विनोद अरोड़ा है. उसे भी यह जान कर बहुत दुख हुआ कि उस के बैग का इस्तेमाल एक निर्मम हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर के फेंकने के लिए किया गया. गौरव को कटर देने वाला व्यक्ति जितेंद्र उर्फ जीतू तो उस समय बिलखबिलख कर रोने लगा, जब पत्रकारों ने उस से कहा कि तुम ने कटर गौरव को क्यों दिया था. उसे इस बात का बहुत दुख हुआ कि लोहे का सरिया काटने वाला कटर मानव शरीर को काटने में इस्तेमाल किया गया.

एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने 22 दिसंबर, 2025 को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में घटनाक्रम का खुलासा किया. पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव व रूबी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Love Crime