UP Crime: मेरठ कांड – किडनेप के बाद का कहर

UP Crime: खेत पर जाते समय दिनदहाड़े कुछ युवकों ने सुनीता के सामने उस की बेटी मनीषा को किडनैप करने की कोशिश की तो सुनीता के विरोध करने पर युवकों ने सुनीता की हत्या कर दी और मनीषा को किडनैप कर ले गए. इस कांड के बाद गांव में तनाव व्याप्त हो गया और प्रदेश सरकार की भी नींद उड़ गई. कौन थे किडनैपर और क्यों किया गया मनीषा का किडनैप?

कहते हैं कि बालक उम्र का प्यार न तो जातपात व ऊंचनीच देखता है और न अमीरीगरीबी. इस आयुवर्ग के प्यार में एक ऐसा आकर्षण होता है, जिस के पाश में फंसे किशोर न तो समाज की बंदिशों को मानते हैं, न ही समाज की वर्जनाओं को. जाहिर है ऐसे प्यार का अंजाम भी खतरनाक होता है. पारस सोम और मनीषा का प्यार भी शायद समाज में ऊंचनीच के भेदभाव के बीच पनपा एक ऐसा ही प्यार था, जिस ने दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में सरधना थाना क्षेत्र के कपसाड़ गांव को जातीय भेदभाव की आग में झुलसने पर मजबूर कर दिया.

सुनीता की आंखों के सामने ही उस की बेटी को कुछ युवकों द्वारा ले जाने की कोशिश हुई तो उस ने विरोध किया फलस्वरूप उस पर जानलेवा हमला हुआ, जिस में उसकी जान चली गई

हालात ऐसे बने कि कपसाड़ गांव बवाल की आग में जलतेजलते बचा. गांव की गली से ले कर चट्टीचौराहे तक पुलिस छावनी बन गए. इस गांव में न कोई आ सकता था, न जा सकता था. किसी को अगर आनाजाना भी होता तो उसे पुलिस को पहले संतुष्ट करना पड़ता कि वह किसी गलत इरादे से गांव में नहीं जा रहा है. कपसाड़ गांव मेरठ महानगर की सीमा से सटा होने के कारण संपन्न और घनी आबादी वाला है. राजपूत और जाटव बिरादरी बहुल इस गांव में कुछ वैश्य, ब्राह्मण और अन्य जातियों के लोग भी रहते हैं. राजूपत जाति के लोग संपन्न और बड़े खेतिहर किसान हैं.

जबकि जाटव जाति के लोग या तो छोटे किसान हैं या राजूपतों के खेतों में मजदूरी कर गुजरबसर करते हैं अथवा शहर जा कर फैक्ट्री और दुकानों में नौकरी करते हैं.  इसी गांव में रहता है सतेंद्र कुमार जाटव का परिवार. उस के परिवार में पत्नी सुनीता के अलावा 5 बच्चे थे. परिवार में सब से बड़ा बेटा है नरसी, उस से छोटे 2 बेटे मनदीप और शुभम हैं. जबकि 2 बेटियों में मनीषा बड़ी है.

परिवार में नरसी सब से बड़ा है, जबकि मनीषा दूसरे नंबर की है. पढ़ाई के नाम पर वैसे तो सभी बच्चे पढ़ेलिखे हैं, लेकिन मनीषा समेत सभी ने इंटरमीडिएट से ज्यादा की पढ़ाई नहीं की है. मनीषा ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई की थी. गुजरबसर के लिए सतेंद्र व उन का परिवार या तो गांव के तरुण राजपूत के खेतों में मजदूरी का काम करते या शहर सरधना कस्बे व मेरठ शहर में नौकरी कर गुजरबसर करते थे.

इन दिनों गन्ने की पैदावार तैयार थी, इसलिए सतेंद्र की पत्नी सुनीता व बेटी मनीषा तरुण राजपूत के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए सुबह ही खेतों में काम करने चली जाती थीं. मनीषा की सहारनपुर में शादी तय हो चुकी थी. फरवरी महीने में उस की शादी थी, इसलिए सतेंद्र का पूरा परिवार इस समय उस की शादी को ले कर पैसे जुटाने व दूसरी तैयारियां करने में व्यस्त था.

अचानक 8 जनवरी, 2026 की सुबह सतेंद्र जाटव के परिवार पर कयामत बन कर टूट पड़ी. सुबह करीब 8 बजे सुनीता बेटी मनीषा के साथ तरुण के खेत में गन्ने की छिलाई के लिए जा रही थी. जब ये दोनों रजवाहे के नए पुल के पास पहुंचीं, तभी गांव के एक राजूपत योगेश सोम का बेटा पारस सोम व उस का हमजाति दोस्त सुनील तथा उन के कुछ अज्ञात साथियों ने सुनीता व मनीषा का रास्ता रोक लिया.

पारस व उस के साथी मनीषा को पकड़ कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे. जब सुनीता ने इन लोगों का विरोध किया तो उन लोगों ने सुनीता के साथ गालीगलौज शुरू कर दी. उन्हें जातिसूचक शब्द कहते हुए हाथापाई शुरू कर दी. लेकिन सुनीता बेटी को उन के चंगुल से बचाने के लिए मां दुर्गा का रूप धारण कर चुकी थी. इसी दौरान पारस व उस के साथियों ने सुनीता के सिर पर फरसे का प्रहार किया, जिस से वह जमीन पर गिर कर वहीं बेहोश हो गई.

पारस व उस के साथियों का उद्देश्य शायद मनीषा को वहां से ले कर जाने का था, इसीलिए सुनीता के खून से लथपथ होने के बाद जमीन पर गिरते ही वे सभी मनीषा को वहां से ले कर नौ दो ग्यारह हो गए. चूंकि उस वक्त बहुत सारे लोग उस रजवाहे पर खेतों में काम करने के लिए आजा रहे थे. सुनीता की बिरादरी की 2 लड़कियां भी उस वक्त वहीं से गुजर रही थीं, जिन्होंने इस मंजर को अपनी आंखों से देखा था. उन्होंने तुरंत शोर मचा कर लोगों की भीड़ इकट्ठी कर ली और सब को वह माजरा बता दिया, जो कुछ देर पहले घटित हुआ था.

लोगों की भीड़ में से किसी ने गांव में जा कर सतेंद्र व उस के परिवार को इस घटना की खबर कर दी तो सतेंद्र का परिवार और बिरादरी के दूसरे लोग भी वहां पहुंच गए, जहां सुनीता खून से लथपथ बेहोश पड़ी थी. सुनीता को उपचार देना पहली प्राथमिकता थी, इसलिए फेमिली वालों ने सब से पहले सुनीता को बेहोशी की हालत में एसडीएस ग्लोबल हौस्पिटल, मोदीपुरम, मेरठ में भरती कराया, जहां डौक्टरों ने उस का इलाज तो शुरू कर दिया, लेकिन इस बात से भी आगाह कर दिया कि सुनीता के सिर में काफी गंभीर चोट है तथा खून भी काफी बह चुका था, इसलिए उस के बचने की उम्मीद कम ही है.

बहरहाल, डौक्टर अपना प्रयास कर रहे थे, लेकिन उन के परिवार ने अपना दूसरा काम यह किया कि मनीषा को तलाशने के लिए पुलिस की शरण ली. सतेंद्र के बेटे नरसी ने कुछ रिश्तेदारों के साथ जा कर सरधना थाने में इस बात की शिकायत दर्ज करा दी. उस ने पुलिस को बताया कि 2 किशोरियां इस बात की गवाह हैं कि पारस सोम अपने दोस्त सुनील व अन्य अज्ञात लोगों के साथ सुनीता पर फरसे से हमला कर के मनीषा का अपहरण कर के ले गया है.

सरधना थाने के एसएचओ इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने नरसी जाटव की शिकायत पर तत्काल एक टीम ग्लोबल अस्पताल व कपसाड़ गांव भेज दी, ताकि शिकायत की सच्चाई का पता लगाया जा सके. गांव में इस बात की पुष्टि हो गई कि यह घटना सच है, जबकि अस्पताल के डौक्टरों ने भी सुनीता के मरणासन्न हालत में होने की बात बता दी.

गांव में हुआ तनाव

लिहाजा अपने सीओ आशुतोष कुमार व एसएसपी विपिन ताड़ा को सारे हालात बता कर इंसपेक्टर प्रताप सिंह ने मुकदमा दर्ज कर लिया. गलत तरीके से रोकने के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2), शांति भंग करने के इरादे से जानबूझ कर अपमान करने व हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज कर लिया, क्योंकि तब तक सुनीता जिंदा थी.

चूंकि जिस लड़की मनीषा का अपहरण हुआ था और उस की घायल मां दोनों जाटव बिरादरी के थे और जिन लोगों पर आरोप था, वे सभी राजपूत बिरादरी के थे, इसलिए मामला बड़ा जातीय रूप न ले ले, इसीलिए आशंका को समझते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में अतिरिक्त पुलिस बन तैनात करवा दिया. साथ ही पुलिस की एक टीम कपसाड़ गांव में ही रहने वाले योगेश व उस के परिजनों को पूछताछ के लिए सरधना थाने ले आई. पुलिस को पारस सोम व उस के दूसरे साथी अपने घर पर नहीं मिले.

लेकिन इसी बीच 8 जनवरी की देर शाम तक अस्पताल में गंभीर रूप से इलाज करा रही सुनीता ने दम तोड़ दिया. बस, सुनीता की मौत के बाद ही हालात एकदम गंभीर हो गए. कपसाड़ गांव में जाटव बिरादरी के लोगों का एक होना शुरू हो गया. इस हत्या का आरोप व मनीषा के किडनैप का आरोप चूंकि एक राजपूत युवक और उस के हमबिरादरी साथियों पर लगा था, इसलिए मामला पूरी तरह जातीय हो गया. बढ़ते तनाव को देखते हुए एसएसपी विपिन ताड़ा ने गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया.

मनीषा का भाई नरसी

सुनीता की मौत के बाद रात को ही उस का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. अगली सुबह शव का पोस्टमार्टम होने के बाद शव को अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को सौंप दिया गया. चूंकि सुनीता की मौत होने के बाद मामला अब हत्या में तब्दील हो चुका था और फेमिली वालों के आरोप के बाद इस में एससी/एसटी एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी गई थीं. लिहाजा एसएसपी के आदेश पर इस की जांच सरधना के सीओ आशुतोष कुमार को सौंप दी गई.

सुनीता की मौत से गुस्साए फेमिली वालों और गांव वालों ने शव के गांव में आते ही उस एंबुलेंस में तोडफ़ोड़ कर दी, जिस में शव को लाया गया था. शव को ले कर फेमिली वाले धरने पर बैठ गए. डीएम के साथ मौके पर पहुंचे एसएसपी विपिन ताड़ा ने परिजनों को समझाने का प्रयास किया, लेकिन परिजन और ग्रामीण मनीषा की बरामदगी और आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग पर अड़े रहे. उन का साफ कहना था कि जब तक अपहृत मनीषा बरामद नहीं होती और आरोपी पकड़े नहीं जाते, तब तक अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा.

मनीषा के किडनेप और उस की मम्मी की मौत के गम में डूबी घर की महिलाएं

शुरुआत में पीडि़त परिवार मृतका सुनीता का अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं था, लेकिन सरधना से भाजपा के पूर्व विधायक संगीत सोम की मध्यस्थता के बाद सरकार की ओर से 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता की घोषणा के बाद परिवार मान गया और 9 जनवरी की रात को सुनीता का अंतिम संस्कार कर दिया गया. हालांकि फेमिली वालों की तरफ से 50 लाख रुपए की आर्थिक सहायता व परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी की मांग की गई थी, लेकिन बाकी मांगें कुछ समय में पूरी करने के वादे पर फिलहाल 10 लाख का चैक मिलने से मामला थोड़ा शांत हो गया था.

होटल में मिले दोनों

उस रात को अंतिम संस्कार होने के बाद पुलिस के ऊपर आरोपी की गिरफ्तारी और मनीषा की बरामदगी का दबाव आ गया. पुलिस पारस के फेमिली वालों के साथ सख्ती से पूछताछ करने के अलावा अपने इंटैलीजेंस सिस्टम से यह पता लगाने में जुट गई कि पारस मनीषा को ले कर कहां छिपा है? जहां से भी जानकारी मिल रही थी, पुलिस की टीमें वहां दबिशें डाल रही थीं, लेकिन पुलिस को सफलता मिली अगले दिन यानी 10 जनवरी की शाम को. रुड़की के एक होटल में आरोपी पारस सोम व पीडि़ता मनीषा के ठहरने की सूचना मिली थी.

इंसपेक्टर प्रताप सिंह व स्पैशल स्टाफ की एक टीम तत्काल रुड़की के उस होटल में पहुंची और पुलिस ने वहां मनीषा को आरोपी पारस सोम के साथ बरामद कर लिया. दोनों को ले कर पुलिस टीम पहले रात को मेरठ पहुंची. मनीषा के बरामद होने के बाद एसएसपी व महिला पुलिस ने उस से काफी लंबी पूछताछ की, जिस के बाद उसे आशा ज्योति केंद्र भेज दिया गया.

मनीषा के किडनेप का आरोपी पारस सोम

अगले दिन पहले प्यारे लाल अस्पताल में मनीषा का मैडिकल चैकअप कराया गया. उस के बाद पुलिस ने एसीजेएम नम्रता सिंह की अदालत में मनीषा के दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के इकबालिया बयान दर्ज कराए. बाद में अदालत के आदेश पर मनीषा को पुलिस की अभिरक्षा में उस के फेमिली वालों के साथ भेज दिया गया. दूसरी तरफ पारस से खुद एसएसपी विपिन ताड़ा ने कई घंटे तक गहन पूछताछ की, जिस के बाद पारस सोम को स्पैशल सीजेएम न्यायालय में पेश कर 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया.

पुलिस को दिए बयान में पारस सोम ने बताया कि गांव से मनीषा को ले कर निकलने के बाद वह उसे ले कर अपनी रिश्तेदारी खतौली गया था. शाम को सुनीता की मौत की खबर मिलने पर दोनों दिल्ली चले गए, वहां एक होटल में रात गुजारी. उस के बाद वहां से अपने दोस्त के पास गुरुग्राम चले गए. मीडिया के जरिए गांव के माहौल पर पारस सोम नजर रखे हुए था.

गांव का माहौल बिगडऩे पर मनीषा को गुरुग्राम से साथ ले कर ट्रेन से सहारनपुर पहुंच गया. सहारनपुर के टपरी गांव में पारस की बहन रहती है. उन के घर पर शुक्रवार की रात बिताई. शनिवार को रुड़की के लिए ट्रेन में सवार हो गया. पारस सोम ने अपने परिवार के बारे में गांव के ही झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र, जो उस का दोस्त भी था, उस से लगातार गांव की जानकारी ले रहा था. राजेंद्र ने उसे बताया कि मनीषा की मम्मी की मौत के बाद मामला काफी तूल पकड़ चुका है और पुलिस उसे चारों तरफ तलाश कर रही है तो वह समझ नहीं पाया कि क्या करे. चूंकि मनीषा और पारस के मोबाइल को पुलिस लगातार ट्रैक कर रही थी, जिस से उस की रियल टाइम लोकेशन का पता चल गया.

उस वक्त वह रुड़की रेलवे स्टेशन के पास एक होटल में ठहरा था और मनीषा उस के साथ ही थी. पुलिस की टीम वहीं पहुंच गई और 10 जनवरी, 2026 की शाम को पारस को हिरासत में ले कर मनीषा को पुलिस ने अपने संरक्षण में ले लिया और मेरठ ले आई.

हालांकि प्रेम संबंध के इस तरह के मामलों में यूं तो मामला लड़की के बरामद होने और आरोपी की गिरफ्तारी के बाद खत्म हो जाता है, लेकिन यहां यह सब होने के बाद पूरा मामला कानूनी दांवपेंच में फंस गया. हालांकि मनीषा के फेमिली वाले तो पहले से ही उस की उम्र 17 साल बता रहे थे, लेकिन पारस के जेल जाने के बाद पारस के अधिवक्ता बलराम राणा व संजीव उर्फ संजू राणा ने अदालत में हाईस्कूल की मार्कशीट पेश कर उस के नाबालिग होने का दावा कर दिया. जबकि उन्होंने कोर्ट को बताया कि जिस मनीषा को उस का परिवार नाबालिग यानी 17 साल की बता रहा है, उस की उम्र 21 साल है.

उम्र बनी सिरदर्द

पुलिस के सामने सब से बड़ी चुनौती पारस और मनीषा की सही उम्र का पता लगाना था. मामला कानूनी दांवपेंच में फंसने के बाद पुलिस के सामने चुनौती आ गई कि पीडि़ता व आरोपी दोनों की सही उम्र का पता करें ताकि सच्चाई सामने आ सके. पारस और मनीषा दोनों ने गांव के ही आदर्श जनता इंटर कालेज में पढ़ाई की थी. लिहाजा पुलिस ने कालेज की प्रधानाचार्य मंजू देवी से संपर्क किया और दोनों की हाईस्कूल व इंटरमीडिएट की मार्कशीट हासिल कर ली.

जिस के बाद पता चला कि मनीषा ने 2023 में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी. उस का जन्म का साल 2005 था यानी वह 21वें साल में चल रही थी. पारस के अधिवक्ता ने मनीषा को बालिग और पारस को नाबालिग साबित करने के लिए सबूत पेश किए, लेकिन यह कैसे तय हो कि कौन बालिग है और कौन नाबालिग. उम्र के इन दावों की जटिलता को देखते हुए पुलिस अधिकारी कानून विशेषज्ञों से विधिक राय ले रहे हैं. एसएसपी डा. विपिन ताड़ा ने एक मैडिकल बोर्ड से दोनों के बोन टेस्ट कराने पर भी विचार कर रही है.

वैसे इस तरह के मामले बाल किशोर बोर्ड के अधीन आयु निर्धारण केंद्रों में मामले भेजे जाते हैं. आयु का निर्धारण करने के लिए मैडिकल बोर्ड का गठन भी किया जा सकता है. हालांकि मनीषा की हाईस्कूल की मार्कशीट के मुताबिक वह बालिग है, लेकिन कई बार गफलत में गांव के स्कूल में जन्मतिथि गलत भी लिखवा दी जाती है. इसी तरह पीडि़त की उम्र भी नाबालिग या बालिग हो सकती है, इसीलिए पुलिस अब कानूनी दांवपेंच में फंसे उम्र के दांवपेंच को बाल किशोर बोर्ड की मदद से सुलझाने का काम करेगी.

सुनीता की हत्या व मनीषा के किडनैप केस की जांच करने वाले सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार को शक है कि पारस ने पकड़े जाने से पहले अपने झोलाछाप दोस्त को फोन कर गांव के माहौल की जानकारी ली थी. इसी जानकारी के आधार पर पुलिस ने पारस को सर्विलांस पर ले कर गिरफ्तार भी किया था. जांच अधिकारी अब इस बात का पता लगा रहे हैं कि गांव का झोलाछाप डौक्टर राजेंद्र इस पूरी साजिश का हिस्सा तो नहीं था.

अपने बयान में मनीषा ने स्पष्ट कहा है कि पारस ने अपने साथियों के साथ उस का किडनैप किया और फरसे का वार कर उस की मम्मी सुनीता की हत्या की. मनीषा ने अपने बयान में यह भी कहा कि पारस के पास एक तमंचा था, जिसे दिखा कर उसे डराया गया, जिस से वह उस का विरोध नहीं कर सकी और वह मनमानी करता रहा. हालांकि उस के बयानों का विरोधाभास इसी बात से साबित होता है कि पुलिस ने उन्हें रुड़की के जिस होटल से पकड़ा, वहां मनीषा आरोपी पारस के साथ आराम से रह रही थी. साथ ही जांच में यह बात भी सामने आई कि उस ने कहीं भी आरोपी के साथ जाते हुए उस का विरोध नहीं किया.

अब चूंकि पीडि़त परिवार अनुसूचित जाति से है. इस कारण वारदात ने इलाके में तनाव फैला दिया था. चूंकि सभी राजनीतिक दल अनुसूचित जाति के लोगों की हमदर्दी बटोरना चाह रहे थे, इसलिए विपक्षी दलों ने मामले को पूरी तरह गरमा दिया. हर सियासी दल का नेता खुद को पीडि़त परिवार का हमदर्द साबित करना चाहता था, इसलिए सब की दौड़ कपसाड़ गांव की तरफ शुरू हो गई.

पुलिस को पहले से ही इस बात की आशंका थी कि इस मामले में सियासत होगी. लिहाजा आसपास के कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी व रैपिड ऐक्शन फोर्स की टीमें गांव में तैनात कर दी गईं. कोई भी बाहरी व्यक्ति गांव में घुस न सके, इसलिए गांव के बाहर टोल प्लाजा के पास मेनरोड पर बैरिकेड लगा कर रास्तों को बंद कर दिया. जिस राजनीतिक दल के नेता ने कपसाड़ गांव में जाने की कोशिश की, उसे या तो वहीं से वापस लौटा दिया गया अथवा हिरासत में ले लिया गया. एक तरह से मामला पूरी तरह राजपूत बनाम अनुसूचित जाति का हो गया था.

मनीषा और पारस की इस उलझी हुई प्रेम कहानी में एक पक्ष गांव के लोगों का भी है. एक तरफ जहां पीडि़त परिवार जो आरोप लगा रहा है, उसे गांव के लोग गलत बता रहे हैं. गांव के लोगों का कहना है कि लड़की का लड़के के साथ पिछले ढाई 3 साल से अफेयर था. लड़की ने ही लड़के को फोन कर के बुलाया था. लड़की ने ही अपनी मम्मी के ऊपर हमला करवाने में लड़के का साथ दिया और उस के साथ भाग गई.

गांव वालों का कहना है कि करीब 3 साल पहले जब मनीषा के सब से बड़े भाई नरसी की शादी हुई थी, तब पारस व मनीषा पहली बार एकदूसरे से मिले थे. वहीं से दोनों में एकदूसरे के प्रति प्यार व आकर्षण हुआ. चूंकि दोनों एक ही कालेज में पढते भी थे, इसलिए गांव से बाहर दोनों की एकदूसरे से मुलाकातों का सिलसिला भी शुरू हो गया. दोनों ही इस बात से अंजान थे कि उन का वास्ता ऐसी जातियों से था, जहां उन के प्रेम संबंधों को स्वीकार नहीं किया जाएगा.

छिप सकी आशिकी

किशोर उम्र के प्यार में ऐसा जुनून और मस्तीभरी होती है, जो किसी से छिपती नहीं है. पारस व मनीषा का प्यार भी किसी से छिपा नहीं रह सका. दोनों के इश्क की कहानियां गांव के लोगों के बीच जब किस्से बन कर तैरने लगी तो जल्द ही दोनों के फेमिली वालों को भी इस की भनक लग गई. ऐसे मामलों में जो होता है, वैसा ही पारस और मनीषा के साथ भी हुआ. दोनों के ऊपर पहले परिवार की बंदिशें लगीं, लेकिन आशिकी का जुनून दोनों को जब मिलने से नहीं रोक सका तो एक दिन ऐसा भी आया कि मनीषा के परिवार वालों ने पारस के परिवार पर मनीषा को बरगलाने का आरोप लगाते हुए झगड़ा किया.

बात बढ़ती, इस से पहले ही राजपूत व जाटव बिरादरी के कुछ समझदार लोगों ने बीचबचाव किया और इस के बाद गांव में दोनों पक्षों की एक पंचायत बुलाई गई. ये अप्रैल, 2024 की बात है. इस पंचायत में फैसला लिया गया कि मनीषा और पारस उस दिन के बाद एकदूसरे से नहीं मिलेंगे. गांव के कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि मनीषा के पिता ने अनुसूचित जाति का होने के कारण पारस के परिवार के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट का मुकदमा दर्ज कराने का मन बनाया था, इसलिए पारस के फेमिली वालों ने खुद इस समझौते के तहत मनीषा के पापा को एक बड़ी रकम दी थी और कहा था कि वे जल्द से जल्द अपनी बिरादरी में एक लड़का ढूंढ कर उस की शादी करा दें, ताकि यह समस्या हमेशा के लिए दूर हो जाए.

गांव वालों का कहना है कि इसी के बाद मनीषा के फेमिली वालों ने भागदौड़ शुरू की और उस के लिए सहारनपुर में अपनी बिरादरी का एक अच्छा लड़का देख कर उस की शादी तय कर दी. यह शादी 10 फरवरी, 2026 को होनी थी. गांव वालों का यह भी कहना है कि मनीषा पारस को भुला नहीं पा रही थी, इसीलिए गुपचुप तरीके से उस का पारस से मिलनाजुलना जारी रहा और उस ने अपनी शादी से कुछ दिन पहले पारस के साथ मिल कर खुद को भगाने की यह साजिश रची.

हालांकि मनीषा के फेमिली वाले कहते हैं कि पारस मनीषा पर अपने साथ भागने का दबाव बना रहा था, लेकिन मनीषा ने जब साफ मना कर दिया तो 8 जनवरी की सुबह उस ने इस वारदात को अंजाम दिया. यह तो अदालत के फैसले के बाद ही पता चलेगा कि दोनों का प्यार कितना सच्चा या झूठा था. प्यार की इस नासमझी में न सिर्फ पारस की जिंदगी अंधेरे में पड़ गई, वहीं मनीषा के दामन पर भी बदनामी का दाग लग गया और उस की मम्मी की जान गई सो अलग.

इस घटना के बाद सियासी रंग ले कर बवाल को टालने के लिए फिलहाल यूपी सरकार ने परिवार को 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता दे कर और व स्थानीय पूर्व विधायक और बीजेपी नेता संगीत सोम ने 2 लाख नकद आर्थिक मदद दे कर पीडि़त परिवार की मदद से मामले को ठंडा करने की कोशिशें तो की हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी ने 5 लाख व सपा के सरधना विधायक अतुल प्रधान ने एक लाख के चैक से परिवार को आर्थिक मदद दे कर इस घटना को सियासी रंग में रंगने का काम कर दिया है.

मुख्य आरोपी पारस सोम को कोर्ट में पेश करने ले जाती पुलिस

अब इस प्रकरण में जांच अधिकारी सीओ (सरधना) आशुतोष कुमार ने सुनीता की हत्या और बेटी मनीषा के किडनैप के मामले में पुलिस की जांच तेज कर दी है. आरोपी पारस सोम को अदालत के आदेश से रिमांड पर ले कर सुनीता की हत्या में प्रयुक्त फरसा (आलाएकत्ल) बरामद कर लिया गया है, जो केस के लिए अहम सबूत है. साथ ही पुलिस ने इस मामले में 2 नाबालिग चश्मदीद लड़कियों के बयान कोर्ट के दर्ज कराए, जिस से पारस सोम के खिलाफ केस और मजबूत होगा.

जांच अधिकारी आशुतोष कुमार ने मनीषा के परिजनों में उस के पापा सतेंद्र कुमार और भाइयों नरसी, मनदीप व शुभम से भी पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए.

(कथा पुलिस की जांच, पीडि़त व आरोपी पक्ष के बयान और ग्रामीणों द्वारा बताए गए तथ्यों पर आधारित है. कथा में मनीषा परिवर्तित नाम है)

 

UP News: तमाशा इंजीनियर की लाइव मौत का

UP News: खुद को उत्तर प्रदेश का ‘शो-विंडो’ कहने वाला गौतमबुद्धनगर (नोएडा) आपदा के समय कितना असहाय है, युवराज मेहता की मौत ने ये साबित कर दिया. करीब 2 घंटे तक रेस्क्यू मिशन के नाम पर चले ड्रामे के दौरान तो जिला प्रशासन का कोई बड़ा अधिकारी मौके पर पहुंचा और ही नोएडा प्राधिकरण का. पुलिस, एनडीआरएफ और दमकल विभाग के जो कर्मचारी मौके पर पहुंचे भी, वे सिर्फ तमाशबीन बने रहे और बल्कि उन की लापरवाही ने इंजीनियर की मौत को ऐसा लाइव शो बना दिया कि…

गलगोटिया कालेज से 2022 में बीटेक की पढ़ाई करने वाले 27 साल के युवराज मेहता मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले के रहने वाले थे. वह पढ़ाई में शुरू से ही अच्छे थे. पढ़ाई के बाद युवराज मेहता गुरुग्राम स्थित डनहमबी कंपनी में सौफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर कार्यरत थे. डनहमबी एक जानीमानी डेटा साइंस और कस्टमर एनालिटिक्स कंपनी है, जो दुनिया भर में रिटेल और टेक्नोलौजी सेक्टर में काम करती है.

युवराज की मम्मी का 2 साल पहले देहांत हो गया था. युवराज की बहन ब्रिटेन में रहती हैं. वह भी शादी के बाद ब्रिटेन में ही जा कर बसने की योजना बना रहे थे. उन के पिता राजकुमार मेहता भी एक कंपनी में नौकरी करते थे. नौकरी लगने के बाद युवराज पहले वह गाजियाबाद में रहते थे. वहां से वह रोजाना मेट्रो के जरिए गुरुग्राम स्थित अपने औफिस आतेजाते थे. मेट्रो कनेक्टिविटी होने की वजह से उन का सफर आसान था, लेकिन नवंबर 2024 में वह ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आ कर रहने लगे.

ग्रेटर नोएडा शिफ्ट होने के बाद चूंकि वहां से सीधे कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट या मेट्रो जैसा साधन नहीं था, इसलिए वह अपनी नई ब्रिजा कार से ही गुरुग्राम आनेजाने लगे. 16 जनवरी, 2026 की रात के करीब 12 बज रहे थे. युवराज अपनी कंपनी से शिफ्ट खत्म होने के बाद कुछ देर दोस्तों से गप्पें लड़ाने के बाद अपनी कार द्वारा गुरुग्राम से ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 स्थित अपने घर की तरफ निकले.

उस वक्त रात के करीब 12 बज रहे थे, जब युवराज की कार नोएडा के सेक्टर 150 में 90 डिग्री कोण वाली मोड़ पर पहुंची. उस समय दिल्ली एनसीआर में सुबह और शाम के समय घने कोहरे का प्रकोप चल रहा था. युवराज भी इसी घने कोहरे की वजह से उस बाउंड्री वाल को नहीं देख पाए, जो सड़क के मोड़ पर बनी थी. कार की स्पीड भी थोड़ी ज्यादा थी, जिस से उन की कार उस मामूली से सीमेंटिंड रेलिंग को तोड़ती हुई पानी से भरे गहरे गड्ढे में जा गिरी.

एक ही क्षण में युवराज को अहसास हो गया कि वह कार समेत सड़क के किनारे बने पानी से भरे बेसमेंट के लिए बनाए गए गड्ढे में जा गिरे हैं. दरअसल, यह सब कुछ ही सेकेंडों में हो गया था. कार के भीतर पानी तेजी से भरने लगा. युवराज ने दरवाजा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं खुला. शीशा तोडऩे की कोशिश की, लेकिन उस पल जान जाने के डर से उस के हाथ कांप गए. ताकत होते हुए भी हिम्मत जवाब दे रही थी.

युवराज पूरी ताकत से चीखेचिल्लाए, लेकिन उन की आवाज कार के भीतर ही दबी रह गई. किसी तरह हिम्मत जुटा कर सनरूफ खोला और कार की छत पर आ गए. मौत के उस पल में उन्हें अपने पापा की याद आई. कांपते हाथों से पापा को फोन किया. बस इतना कहा, ‘मैं गड्ढे में फंस गया हूं, जल्दी आइए. कार धीरेधीरे डूब रही है.’

पानी तेजी से युवराज को अपनी चपेट में ले रहा था. आंखों के सामने फेमिली वालों और दोस्तों के चेहरे तैरने लगे. लगा कि अब जिंदगी नहीं बचेगी. कुछ ही देर में पापा राजकुमार मेहता सड़क के पास पहुंच गए. उन्हें करीब 20 मिनट लगे. वह जोरजोर से चीखने लगे. पानी में डूबते युवराज को लगा कि अब मदद आ जाएगी. युवराज ने मोबाइल की टौर्च जलाई ताकि पापा को उन की लोकेशन दिख जाए. लेकिन मदद सिर्फ सड़क तक आई थी, गड्ढे के अंदर नहीं उतरी. युवराज बेबस और असहाय सा मौत को करीब आते हुए मदद का इंतजार करता रहा. कार और नीचे धंसती जा रही थी. जैसेतैसे युवराज कार की छत पर इधर से उधर पहलू बदलता रहा. कार की छत से ही वो ‘हेल्प…हेल्प’ चीखते हुए मदद की गुहार लगाने लगा.

चूंकि राजकुमार मेहता ने डायल 112 पर फोन कर दिया था, इसलिए थोड़ी ही देर में पुलिस और दमकलकर्मी व उस के बाद एसडीआरफ के कर्मचारी भी पहुंच गए. युवराज की उम्मीद फिर जागी, सोचा अब तो बच ही जाऊंगा. लेकिन यही उन की सब से बड़ी भूल थी. उन्हें पानी में डूबते हुए कुछ आकृतियां दिखीं. वे सब लोग ऊपर खड़े थे. लेकिन नीचे उतरने को कोई तैयार नहीं था. पानी करीब 70 फुट गहरा था. ‘जोखिम है,’ कह कर सरकारी एजेंसियों के अधिकारी व कर्मचारी संसाधन आने का इंतजार करते रहे. रस्सी आई… मगर इस में काफी देर हो गई. उपकरण देर से पहुंचे और वक्त हाथ से निकलता चला गया.

वह सड़क, जिस पर न बैरिकेड था, न चेतावनी बोर्ड, न लाल झंडी, वहां युवराज की मौत इस की गवाह बन रही थी. पूरा सिस्टम मौके पर था, लेकिन संवेदना नहीं थी. तिलतिल कर के मौत युवराज के करीब आ रही थी और लंबे इंतजार के बाद उन की उम्मीद भी डूबने लगी थी. क्योंकि पानी उन की छाती तक आ चुका था, सांसें टूटने लगीं और आवाज गले में अटकने लगी थी. जब तक वह पूरी तरह पानी में डूब नहीं गया, तब तक सड़क पर वह उम्मीद और हसरतभरी नजरों से देखते रहे. नाकारों की भीड़ के बीच युवराज के पापा खुद को असहाय महसूस कर रहे थे और हृदयविदारक चीखों के साथ वहां खड़े सिस्टम से जुड़े लोगों से हाथ जोड़ कर कहते रहे, ‘सर, कुछ तो कीजिए.’

वरदीधारी लोग, सरकारी गाडिय़ां और एक ऐसा सिस्टम जो फाइलों में तो तेज है, लेकिन इंसान को बचाने के लिए पानी में उतरने से डरता है, वह सिर्फ यही कहता रहा, ‘सर, पानी बहुत गहरा और ठंडा है. भीतर बहुत से सरिए भी हैं.’ राजकुमार मेहता को उस वक्त लगा कि काश! उस सड़क पर पहले ही बैरिकेड लगा होता. काश! उस गड्ढे को ढक दिया गया होता. काश! सिस्टम हादसे से पहले जागा होता तो उन का बेटा जिंदा पानी भरे गड्ढे में न होता. मदद सामने थी, लेकिन सिस्टम के नकारेपन, अधिकारियों और कर्मचारियों की संवेदनहीनता के आगे उन के बेटे की जिंदगी हार गई.

कुछ देर बाद जब पानी भरे बेसमेंट से चीखनेचिल्लाने और मदद की पुकार करने वाली आवाजें आनी बंद हो गईं तो राजकुमार मेहता को अहसास हो गया कि अब बेटा उन से दूर जा चुका है.

तमाशबीन सिस्टम

युवराज करीब 2 घंटे तक संषर्ष करते रहे, सिस्टम वहां खड़ा हो कर देखता भी रहा, इस के बाद बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका. जब ये सारी कवायद चल रही थी, उस वक्त एक फूड कंपनी का डिलीवरी बौय मुनेंद्र जरूर गाडिय़ों व लोगों की भीड़ देख कर वहां रुका था. जब मुनेंद्र को पता चला कि एक युवक गाड़ी समेत उस पानी भरे बेसमेंट में डूब गया है तो उस ने एसडीआरएफ वालों से लाइफ सेविंग जैकेट ले कर उस पानी भरे गड्ढे में छलांग लगाई थी. उस ने करीब आधा घंटा प्रयास भी किया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी.

राजकुमार मेहता ने तब तक अपने कुछ रिश्तेदारों और पहचान वालों को फोन कर दिया तो वे भी मौके पर आ गए, लेकिन वहां खड़ा सिस्टम का कोई भी इंसान दिन निकलने से पहले उन की मदद नहीं कर सका. सुबह करीब 6 बजे सुबह रेस्क्यू औपरेशन शुरू हुआ. तब करीब एक घंटे बाद युवराज की डैडबौडी को बाहर निकाला जा सका. चूंकि दिन का उजाला हो चुका था. युवराज की मौत का मामला इस दौरान सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. सुबह जब लोग वहां पहुंचे तो उन्हें पूरे घटनाक्रम की जानकारी मिली और उन्होंने घटना की वीडियो क्लिप बना कर उसे सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर दिया.

चूंकि ये मामला नालेज पार्क थाने के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस ने दुर्घटना का मामला दर्ज कर लिया और शव को पेास्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन राजकुमार मेहता व उन के साथ जुटे लोग तब तक समझ चुके थे कि युवराज की मौत सिर्फ हादसा नहीं है, बल्कि सिस्टम की लापरवाही से हुई हत्या है. लिहाजा उन्होंने पुलिस को नोएडा प्राधिकरण के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कराने की तहरीर दे कर मुकदमा दर्ज करने जिद पकड़ ली.

संयोग से दिन चढ़तेचढ़ते युवराज की मौत का मामला तूल पकडऩे लगा था. मुनेंद्र नाम के उस डिलीवरी बौय का बयान भी सोशल मीडिया की सुर्खी बन चुका था, जिस ने पूरे सरकारी तंत्र की मौजूदगी के बावजूद खुद जान पर खेल कर युवराज को बचाने का असफल प्रयास किया था. पुलिस महकमा समझ गया कि उन से भूल हुई है, लिहाजा उच्चाधिकारियों का निर्देश मिलने पर नालेज पार्क पुलिस ने आननफानन में बीएनएस की धारा में गैरइरादतन हत्या की धारा 105, लापरवाही से मौत 106(1) और जीवन को खतरे में डालने वाले कार्य की धारा 125 को जोड़ कर उन 2 बिल्डरों को नामजद कर दिया, जिन की जमीन पर बेसमेंट की खुदाई के बाद ये पानी भरा था.

दूसरी तरफ युवराज के शव को पोस्टमार्टम के बाद परिजनों को सौंप दिया गया. उसी दिन कुछ फेमिली वालों, सोसाइटी के लोगों व युवराज के मित्रों की मौजूदगी में अंतिम संस्कार कर दिया गया. लेकिन 17 जनवरी, 2026 की शाम होतेहोते युवराज की मौत का मामला नोएडा शहर से निकल कर देशव्यापी स्तर पर मीडिया की सुर्खी बन चुका था. चारों तरफ हाइटेक कहे जाने वाले नोएडा के प्रशासन, शहर के सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और मामले पर उस की चुप्पी को ले कर लताड़ लगाई जाने लगी.

यह घटना जरूर साधारण थी, लेकिन इस ने पूरे सरकारी तंत्र पर इतने सवाल खड़े कर दिए थे कि उन का जवाब देने के लिए सरकार को ही डैमेज कंट्रोल के लिए सामने आना पड़ा.

एसआईटी जुटी जांच में

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उसी शाम को इस दुघर्टना पर स्वत:संज्ञान लेते हुए एक 3 सदस्यीय एसआईटी का गठन कर दिया, जिस की कमान मेरठ जोन के एडीजी (पुलिस) भानु भास्कर को सौंपी गई. एसआईटी में मेरठ मंडल के आयुक्त भानु गोस्वामी को भी शामिल किया गया. सीएम ने एसआईटी को निर्देश दिया कि 5 दिनों में जांच कर यह पता लगाया जाए कि इस में किन सरकारी विभागों की लापरवाही रही, किन अधिकारियों की संवेदनहीनता के कारण युवराज की जान गई.

हालांकि पुलिस ने विशटाउन और लोटस ग्रीन नाम के जिन 2 बिल्डरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज की थी, उस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार को उसी रात गिरफ्तार कर अपनी पारदर्शिता को स्पष्ट करने की कोशिश की. अगले दिन फरीदाबाद के लोटस ग्रीन बिल्डर से जुड़े डाइरेक्टर रवि बंसल व सचिन कर्णवाल को भी गिरफ्तार कर लिया गया. हादसे के दूसरे ही दिन नोएडा अथौरिटी के सीईओ एम. लोकेश को उन के पद से हटा दिया गया और उन की जगह करुणेश कुमार को नया सीईओ बना दिया गया.

इतना ही नहीं, अथौरिटी के एक जूनियर इंजीनियर गौरव को बरखास्त कर शासन ने डैमेज कंट्रोल करने की भी कोशिश की, लेकिन तब तक इतने सवाल खड़े हो चुके थे कि प्रशासन का कोई भी अंग आरोपों की जद में आए बिना बच नहीं सका. सरकार की तरफ से एसआईटी गठन के बाद मीडिया ने भी युवराज की मौत के मामले में समानांतर जांच शुरू कर दी और आए दिन नए तरह के सवाल उठाए जाने लगे थे.

सब से पहला सवाल तो नोएडा की डीएम मेधा रूपम को ले कर ही खड़ा होने लगा था, जो एसडीआरफ या एनडीआरएफ के काम काज को नियंत्रित करने वाले आपदा प्रबंधन ग्रुप की चेयरमैन होती है. उत्तर प्रदेश के महत्त्वपूर्ण जिले गौतमबुद्ध नगर की कमान संभालने वाली आईएएस अधिकारी मेधा रूपम के बारे में चर्चा होने लगी कि उन्होंने हादसे के बाद न तो कोई संवेदनशीलता दिखाई, न ही किसी की जिम्मेदारी तय की.

चूंकि डीएम मेधा रूपम के फादर ज्ञानेश कुमार वर्तमान में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर तैनात हैं, इसलिए उन्हें बचाने की कवायद होने लगी. सोशल मीडिया पर डीएम मेधा रूपम के प्रति नाराजगी जाहिर की जाने लगी. एसआईटी की जांच शुरू होते ही युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले ने पूरे प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया. एसआईटी ने अपनी जांच का दायरा बढ़ाते हुए नोएडा अथौरिटी के अधिकारियों से ले कर पुलिस और फायर ब्रिगेड तक को लपेटे में ले लिया. फोरैंसिक टीम ने मौके से अहम सबूत जुटाने शुरू कर दिए. नोएडा पुलिस के साथ नोएडा अथौरिटी के अधिकारी भी एसआईटी के साथ कोऔर्डिनेशन करने लगे.

लोग युवराज मेहता की मौत के मामले में गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे. उन का कहना था कि अगर उस ने पुलिस को काल न कर के अपने दोस्तों को बुलाया होता तो शायद युवराज की जान बच सकती थी. घटना के कुछ प्रत्यक्षदर्शियों का दावा है कि रात 12:20 बजे पहली पीसीआर मौके पर पहुंची, कुछ देर बाद दूसरी पीसीआर भी आ गई. इस बीच युवराज के पापा भी मौके पर पहुंच गए थे. दोनों पीसीआर में 10 से 12 पुलिसकर्मी मौजूद थे, लेकिन उन के पास न तो रस्सा था और न ही कोई जरूरी रेस्क्यू उपकरण.

युवराज मेहता की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी टीम ने कई बार घटनास्थल का मुआयना किया और दरजनों लोगों के साथ संबंधित विभागों के अधिकारियों व कर्मचारियों से पूछताछ कर उन के बयान दर्ज किए. जिस के बाद संबंधित प्लौट के दोनों बिल्डर अभय कुमार और निर्मल सिंह के कारपोरेट औफिस को पुलिस ने सील कर दिया. एसआईटी को यह भी पता चला कि जिस प्लौट पर इस बेसमेंट की खुदाई कर पानी भरा छोड़ दिया गया था, वह स्पोट्र्स सिटी घोटाले का हिस्सा है. इसी प्लौट को विशटाउन बिल्डर ने खरीदा था और सीबीआई स्पोट्र्स सिटी घोटाले की पहले से जांच कर रही है.

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पिछले साल नोएडा स्पोट्र्स सिटी घोटाले की जांच सीबीआई और ईडी को सौंपने का आदेश दिया था. इस केस में सीबीआई ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की थी, जिस की जांच सीबीआई कर रही है. इसी प्रकार कंपनी के निदेशक निर्मल सिंह, विदुर भारद्वाज, सुरप्रीत सिंह सूरी, नोएडा प्राधिकरण के अज्ञात अधिकारी और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था. इस में लोटस ग्रीन के साथसाथ इस की लगभग 24 सब लीज वाली कंपनियों को भी जोड़ा गया है.

जिस निर्माणाधीन साइट पर भरे पानी में डूब कर युवराज की मौत हुई, वह स्पोट्र्स सिटी के प्लौट नंबर-2 (ए-3) का हिस्सा है. वह भूखंड लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड ने नोएडा प्राधिकरण से प्राप्त किया था. वर्ष 2020 में विशटाउन प्लानर्स ने इसे लोटस ग्रीन से खरीदा, जिस में लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन की भी शेयर होल्डिंग है. इस में विशटाउन के बिल्डर अभय कुमार की 32.20 फीसदी, संजय कुमार की 27.30 फीसदी, मनीष कुमार, आंचल बोहरा की 3.5 फीसदी और निर्मल कुमार (लोटस ग्रीन) की 30 फीसदी है.

वास्तव में, यह प्लौट एक कंसोर्टियम का हिस्सा है. सेक्टर 150 का प्लौट नंबर 2 (ए 3) कुल 27,185 वर्गमीटर क्षेत्र का है, जिस का भू उपयोग स्पोट्र्स सिटी लेआउट में व्यावसायिक निर्धारित है. हिस्सेदारी के हिसाब से सभी लोग इस मामले के आरोपी हैं.

इस प्लौट को लीड डेवलपर लोटस ग्रीन ने विज टाउन प्लानर्स नामक बिल्डर कंपनी को सबडिवीजन करा कर सौंपा था. वर्ष 2017 में इस के लिए एक नक्शा भी प्राधिकरण से स्वीकृत करवाया गया था. बिल्डर ने इसे मौल जैसा शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की योजना बनाई और फिर बेसमेंट के लिए खुदाई भी शुरू कर दी. बाद में संशोधित नक्शे का आवेदन दिया गया, लेकिन प्राधिकरण ने मई 2022 में इसे खारिज कर दिया. कारण बताया कि भूमि पर प्रो शौप्स (खेल सामग्री दुकानें) और फूड बेवरेज की दुकानों की अनुमति है, न कि पूर्ण शौपिंग कौंप्लेक्स की. इस के बाद बिल्डर ने साइट पर कोई आगे काम नहीं किया.

नोएडा प्राधिकरण ने एसआईटी को बताया कि बिल्डर अपने लेआउट के मुताबिक एक मौल जैसी संरचना बनाना चाहता था. एसआईटी के सामने सब से बड़ा सवाल यह था कि अखिर किस वजह से बेसमेंट के लिए गहरा गड्ढा खोद कर उसे भरा नहीं गया? जांचपड़ताल में इस का भी जवाब मिल गया.

करोड़ों का हुआ खनन

दरअसल, नोएडा सेक्टर 150 के इस बेसमेंट से अरबों रुपए का अवैध खनन कर रोजाना 200 डंपर रेत निकाली गई थी. अवैध खनन पर निगरानी की सीधी जिम्मेदारी खनन विभाग की है, जबकि नोएडा अथौरिटी की यह जिम्मेदारी बनती है कि उस के आवंटित प्लौट पर निर्माण कार्य बिल्डिंग बायलौज के अनुसार हो. प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को भी देखना होता है कि पर्यावरण नियमों के तहत काम हो रहा हो. अवैध जलदोहन को भी रोकना होता है.

बेसमेंट के लिए जमीन के अंदर से करीब 2 साल तक पानी निकाल कर सीवर में बहाया गया. लिहाजा इस प्रोजेक्ट के एक तरफ यमुना और दूसरी तरफ हिंडन नदी होने के बावजूद जमीन का जलस्तर नीचे चला गया और आसपास मौत के कुएं बना कर छोड़ दिए गए. इस के बावजूद किसी ने समय रहते काररवाई नहीं की. बेसमेंट के नाम पर जमीन को इतना खोखला कर दिया गया कि बाद में वहां निर्माण कार्य भी नहीं हुआ. न तो सुरक्षा घेरा लगाया गया, न चेतावनी बोर्ड.

यही गड्ढा 16 जनवरी, 2026 की रात युवराज मेहता की मौत का कारण बना, जब उन की कार पानी से भरे गहरे गड्ïढे में गिर गई. हादसे के बाद अब अधिकारियों की लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. सेक्टर 150 ही नहीं, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई इलाकों में सैकड़ों ऐसे प्लौट हैं, जहां इसी तरह बेसमेंट के नाम पर खनन कर गड्ïढे छोड़ दिए गए हैं. इन में से कई गड्ïढे आबादी और सड़कों के बेहद करीब हैं, जहां कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है. यह प्लौट नोएडा अथौरिटी ने लोटस ग्रीन कंस्ट्रक्शन को आवंटित किया था, जिसे बाद में अन्य डेवलपर्स को बेच दिया गया.

हालांकि नियमों के तहत यहां सीमित खुदाई की अनुमति होती है, लेकिन इस से कहीं अधिक गहराई तक खनन किया गया. यहां बेहतरीन गुणवत्ता की बालू निकली, जिसे खुलेआम बेचा गया. लोगों का कहना है कि रोजाना करीब 200 डंपर रेत इस प्रोजेक्ट से बाहर भेजी जाती थी. उस समय एक डंपर की कीमत करीब 15 हजार रुपए थी, जिसे बाजार में लगभग दोगुने दाम पर बेचा जाता था. यह सिलसिला एक से डेढ़ साल तक चला और करीब 70 फीट तक जमीन खोद दी गई.

युवराज की मौत के मामले की जांच कर रही एसआईटी को 5 दिन की जांच के दौरान नोएडा अथौरिटी और पुलिस ने अपने जवाब सौंप दिए. अथौरिटी ने करीब 150 और पुलिस ने 450 पेज की रिपोर्ट में सारे फैक्ट शामिल किए. इस जवाब में घटनाक्रम, काररवाई, ड्यूटी रोस्टर, कंट्रोल रूम रिकौर्ड, काल डिटेल, रेस्पांस टाइम को रखा गया है. चश्मदीद मुनेंद्र व उस के परिवार के बयान भी लिए गए.

युवराज की गड्ढे में डूबने से हुई मौत के मामले में कई पेंचीदे पहलू हैं. एसआइटी ने जांच पूरी करने के बाद अपनी रिपोर्ट शासन को सौंप दी है, जिस में एसडीआरएफ, नोएडा अथौरिटी, नोएडा पुलिस, दमकल विभाग, जलकल विभाग, प्रदूषण विभाग और परियोजना विभाग जैसे कई महकमे निशाने पर आए, जिन की लापरवाही से मौत का ये गड्ढा खुदा था. लेकिन देखना होगा कि शासन इस रिपोर्ट पर संज्ञान ले कर क्या काररवाई करता है.

डेथ जोन हैं खुले नाले

सेक्टर 150 में हाल ही में एक इंजीनियर की खुले तालाब में डूबने से हुई मौत ने न केवल सुरक्षा दावों की पोल खोली है, बल्कि स्पोट्र्स सिटी परियोजना के नाम पर चल रहे अरबों के खेल को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. यह हादसा उस स्थान पर हुआ है, जिसे कागजों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्पोट्र्स हब बनना था, लेकिन असलियत में वह प्रशासनिक लापरवाही और बिल्डर की धोखाधड़ी का खूनी दलदल बन चुका है. 300 एकड़ में फैली इस स्पोट्र्स सिटी की कहानी 3सी ग्रुप के मुखिया निर्मल सिंह से शुरू होती है. आरोप है कि निर्मल सिंह ने कौडिय़ों के भाव जमीन आवंटित कराई और फिर उसे 24 अन्य बिल्डरों (सबलेसी) को बेच कर गायब हो गया.

जमीन गिरवी रख कर करोड़ों का कर्ज लिया गया, जिसे चुकाने के बजाय डकार लिया गया. हालत यह है कि बैंक का कर्ज, फ्लैट खरीदारों का पैसा और प्राधिकरण का बकाया सब कुछ मुकदमों के जाल में फंसा है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बिल्डरों ने एक बार फिर स्पोट्र्स सिटी का संशोधित मास्टर प्लान नोएडा अथौरिटी को सौंपा है. अब इसे बोर्ड बैठक में निर्णय के लिए रखा जाएगा. हालांकि, इस हादसे के बाद इस योजना को मंजूरी मिलना कई गंभीर सवाल खड़े करता है. स्पोट्र्स सिटी में व्यावसायिक लाभ को प्राथमिकता देने की कोशिशें नई नहीं है. साल 2022 में नोएडा अथौरिटी ने विशटाउन प्लानर्स के संशोधित लेआउट को सिरे से खारिज कर दिया था.

कंपनी ने खेल सुविधाओं के बजाय दुकानें और फूड आउटलेट्स के लिए भारीभरकम एफएआर का प्रस्ताव रखा था, जो स्वीकृत सीमा से कहीं अधिक था. स्पोट्र्स सिटी के मूल ब्रोशर के अनुसार, व्यावसायिक गतिविधियों के लिए केवल 0.5 प्रतिशत क्षेत्र ही आवंटित था, लेकिन बिल्डरों ने खेल को दरकिनार कर इस प्रोजेक्ट को शौपिंग कौंप्लेक्स बनाने की हर मुमकिन कोशिश की. इतना ही नहीं, शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के बड़ेबड़े दावों के बीच एक ऐसी डरावनी हकीकत सामने आई है, जो किसी के भी रोंगटे खड़े कर सकती है.

जनपद में खुले नाले और असुरक्षित तालाब भी अब लोगों के लिए डेथ जोन साबित हो रहे हैं. पुलिस रेकौर्ड के चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि पिछले 2 सालों में 11 मौतें सीधे तौर पर खुले नालों में गिरने और डूबने की वजह से हुई है. हैरानी की बात यह है कि सड़कों के किनारे बहते ये नाले खुलेआम मौत को दावत दे रहे है, लेकिन संबंधित विभाग गहरी नींद में सोए हुए हैं. न तो इन नालों को ढका गया है और न ही इन के किनारों पर सुरक्षा के लिए रेलिंग लगाई गई है.

जांच में सामने आया है कि कई हादसों में लोग बाइक चलाते समय संतुलन बिगडऩे या मोबाइल पर बात करते वक्त पैर फिसलने से इन गहरे नालों में जा गिरे हैं. नोएडा के सेक्टर-150 में युवराज मेहता की मौत के बाद नोएडा प्राधिकरण ने सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए जब जांच शुरू की तो 65 ब्लैक स्पाट्स की पहचान की गई. इन में 50 ब्लैक स्पाट्स बिल्डरों को 5 दिनों के अंदर सुधारने होंगे, वरना उन पर भारी जुरमाना किया जाएगा. बाकी 15 ब्लैक स्पाट्स प्राधिकरण खुद 15 दिनों में ठीक करेगा. अब इन पर कितना अमल होगा, ये देखने वाली बात है या फिर किसी नए हादसे का इंतजार होगा.

इस के अलावा जलभराव की समस्या रोकने को 20 गांवों में ड्रेनेज व्यवस्था बेहतर की जाएगी और पूरे नोएडा का विस्तृत सर्वेक्षण होगा. इस का आदेश नोएडा प्राधिकरण के नए सीईओ कृष्णा करुणेश ने जारी किया है.  बता दें कि कि युवराज की मौत से पहले भी गड्ढों व नालों में गिरने से कई लोगों की मौत हो चुकी है. 18 दिसंबर, 2024 को सेक्टर 73 सर्फाबाद गांव में एक व्यक्ति बाइक सहित नाले में जा गिरा, जहां नाले में भरे पानी में डूबने की वजह से उस की मौत हो गई थी.

इस से पहले पहली अक्तूबर, 2024 को सेक्टर 126 के पास एक्सप्रैसवे सर्विस रोड पर एक तेज रफ्तार बुलेट नाली में जा गिरी, जिस से बाइक पर सवार 3 युवकों में से एक की मौत हो गई. 28 सितंबर, 2024 को भी सेक्टर 52 स्थित खुले नाले में टहलने निकले एक युवक की अचानक गिर कर डूबने से मौत हो गई थी.

मेरे बेटे को बेबस छोड़ दिया गया पिता राजकुमार मेहता

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर-150 में बेसमेंट के लिए खोदे गए पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद मेरा बेटा दो घंटे तक संघर्ष करता रहा. उसे बचाने का पर्याप्त समय था लेकिन बचाव दल ने लापरवाही दिखाई. मेरे बेटे को भगवान भरोसे छोड़ दिया. अगर ठीक से प्रयास किया जाता तो उसे आसानी से बचाया जा सकता था. सेक्टर-150 के टाटा यूरेका पार्क सोसाइटी में आयोजित हुई शोक सभा में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता के पिता राज कुमार मेहता ने भीगी आंखों और टूटे दिल से मनोहर कहानियां के समक्ष अपनी ये व्यथा व्यक्त की. उनकी आवाज में दर्द और आक्रोश दोनों थे.

उन्होंने कहा कि हम युवराज को न्याय नहीं दिला सकते क्योंकि वह अब वापस नहीं आ सकता. अब वे यह चाहते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम में लापरवाही बतरने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए. यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में कोई दूसरा युवराज इस तरह की त्रासदी का शिकार न हो. राज कुमार बोले, ‘प्रशासनिक लापरवाही ने मेरे बेटे की जान ले ली. मैं उन सभी का आभारी हूं जिन्होंने हमारी आवाज बुलंद की, हमें ताकत दी और इस विषय को सही दिशा दी. बेटे की मौत ने मुझे तोड़ दिया, लेकिन समाज, मीडिया और जनता ने मुझे संभाला. सभी ने मिलकर इस लापरवाही को देश और सरकार तक पहुंचाया.’

उन्होंने डिलीवरी बॉय मोनिंदर का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए कहा कि उसने किसी की परवाह किए बगैर नाले में छलांग लगाई. मेरे बेटे को बचाने की कोशिश की. उन्होंने घटना का संज्ञान लेते हुए एसआईटी गठित करने पर यूपी सरकार का भी आभार जताया. इस शोकसभा के दौरान सांसद डॉ. महेश शर्मा, दादरी विधायक तेजपाल नागर, भाजपा जिलाध्यक्ष अभिषेक शर्मा और एडीसीपी ग्रेनो सुधीर कुमार समेत बड़ी संख्या में सोसाइटी निवासी मौजूद थे. ग्रेटर नोएडा में सोसाइटी के क्लब हाउस में आयोजित सभा की युवराज की शोक सभा के दौरान परिजन, युवराज के दोस्त, पड़ोसी भी पहुंचे. इस दौरान सभी की आंखें नम दिखी.

शोक सभा के दौरान लोगों ने सवाल किया कि जिले में पुलिस के अधीन ही डायल-112, पीसीआर, दमकल, ट्रैफिक पुलिस आदि की टीम आती है. इसी तरह प्राधिकरण के वर्क सर्किल प्रबंधक, ट्रैफिक सेल के जिम्मेदारों और जिला प्रशासन के अधीन आने वाले खनन विभाग, आपदा प्रबंधन, स्वास्थ्य विभाग, परिवहन विभाग आदि के जिम्मेदार भी युवराज की मौत पर खामोश है.

जिला प्रशासन भी ये स्पष्ट नहीं कर पाया कि एनडीआरएफ और एसडीआरएफ से संपर्क करने में देरी क्यों हुई. शोक सभा में गुस्से में भरे लोगों के सवाल थे कि अगर सभी विभाग मिलकर काम करते तो शायद युवराज जिंदा होगा. शोक सभा में आए लोगों ने प्रशासन के रेस्क्यू औपरेशन और समय-समय पर आपदा प्रबंधन के लिए होने वाली मॉकड्रिल को भी दिखावटी और नाटक बताया.

सिस्टम से ज्यादा जांबाज तो गरीब मुनेंद्र निकला

नोएडा के सेक्टर 150 में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत के मामले में एक तरफ पूरा सिस्टम था, जो एक बेगुनाह की मौत का तमाशा मूकदर्शक बन कर देखता रहा तो वहीं एक गरीब परिवार में जन्मा डिलवरी बौय मुनेंद्र है, जिस ने अपनी जान की बाजी लगा कर युवराज को बचाने का प्रयास किया. मुनेंद्र इस हादसे में चश्मदीद गवाह भी है. सेक्टर 150 स्थित गढ़ी में रहने वाले बिहार के समस्तीपुर निवासी मुनेंद्र ने बताया कि वह डिलीवरी बौय का काम करता है. 16 जनवरी की रात वह करीब पौने 2 बजे घटनास्थल पर पहुंचा. 2 मिनट के अंदर ही उस ने फैसला कर लिया कि वह पानी के अंदर जाएगा. वहां मौजूद टीम से पानी में जाने की बात कही तो वे लोग घबरा गए.

मुनेंद्र बचपन से तैरना जानता है. मौके पर मौजूद टीम ने उसे सेफ्टी जैकेट दी, जिसे पहन कर वह पानी में उतरा. करीब 40 मिनट तक पानी में रहने के दौरान भी वह युवराज को नहीं खोज सका. जबकि बाहर खड़े लोगों और युवराज के पिता को उम्मीद थी कि शायद मुनेंद्र का प्रयास सफल होगा. युवराज को बचाने के लिए वह अपनी जान की बाजी लगा कर पानी में उतरा था. अफसोस कि वह उन की जान नहीं बचा सका. युवराज का कहना है कि अगर वह 5 मिनट पहले आ गया होता या प्रशासन की मौजूद टीम ने लापरवाही न बरती होती तो युवराज हम सब के बीच होते.

युवराज चिल्ला रहे थे और बारबार यही कह रहे थे कि मुझे बचा लो. मुनेंद्र ने बताया कि वह एक बेहद गरीब परिवार से है, लेकिन बावजूद इस के वह अपनी जान की परवाह किए बगैर करीब 40 मिनट तक ठंडे और गहरे पानी में युवराज को खोजने की कोशिश करते रहे. पानी बेहद ठंडा था, वहां पर कोई रोशनी नहीं थी. इस के बावजूद उस ने हिम्मत नहीं हारी. लगातार पुलिस के सामने बारबार युवराज को बचाने की कोशिश कर रहा था.

मुनेंद्र के मुताबिक घटना के अगले दिन पुलिस उसे अपने साथ ले गई. उस के साथ करीब 5 घंटे तक पूछताछ की. फिर उसे यह कह कर छोड़ दिया कि किसी के सामने कोई भी सच बात मत बताना, लेकिन मुनेंद्र ने इंसानियत दिखाते हुए उस रात जो देखा, सब कुछ मीडिया के सामने बता दिया. जब उस ने शासनप्रशासन और पुलिस की पोल खोली तो पुलिस ने उस से कहा कि अपना बयान बदल दो, लेकिन वह लगातार सच बोलता रहा.

इस पूरी घटना में बिल्डर की गिरफ्तारी के बाद मुनेंद्र को इस बात का डर लगने लगा कि कहीं बिल्डर उस के खिलाफ कोई गलत कदम न उठा ले. उसे लगने लगा कि ऐसे लोग जो पहले से ही लापरवाह हैं, अपने को बचाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं. इसीलिए उस ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए पुलिस से गुहार लगाई.

वह अपने घर को छोड़ कर कुछ शुभचिंतकों के पास रहने लगा. उस ने नौकरी तक छोड़ दी. उसे देर रात घर से बाहर निकलने में डर लगने लगा. लेकिन मुनेंद्र की बहादुरी और सच का साथ देने के संकल्प से ही शायद युवराज को इंसाफ मिलने का दरवाजा खुल रहा है, क्योंकि एसआईटी के समक्ष उसी की गवाही से जांच दल व्यवस्था की लापरवाही के ठोस नतीजे तक पहुंच सका.

व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है शासन को सौंपी गई एसआईटी जांच रिपोर्ट

नोएडा के सेक्टर 150 में बिल्डर के निर्माणाधीन इमारत के कई फुट गहरे गड्ïढे में सौफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार डूबने से हुई मौत के मामले में गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी अंतिम रिपोर्ट शासन को सौंप दी है. यह गहन जांच 7 दिन तक चली है, जिस में सैकड़ों दस्तावेजों की पड़ताल और लगभग 30 अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछताछ की गई. इस के बाद यह अंतिम रिपोर्ट तैयार की गई.

यह रिपोर्ट प्रशासनिक सिस्टम की गंभीर चूक की तरफ इशारा करती है. रिपोर्ट में बचाव दल की चूक को स्वीकार करते हुए प्राधिकरण, एसडीआरएफ, दमकल, पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया गया है. अब प्रदेश सरकार के निर्णय का इंतजार है. अगर सब कुछ ईमानदारी से हुआ तो रिपोर्ट के आधार पर बड़े स्तर पर सख्त काररवाई हो सकती है.

योगी सरकार द्वारा युवराज की मौत के बाद स्वत:संज्ञान लेते हुए गठित की गई 3 सदस्यीय एसआईटी का नेतृत्व मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) भानु भास्कर को सौंपा था. टीम में मेरठ मंडल के मंडलायुक्त भानुचंद्र गोस्वामी और लोक निर्माण विभाग के चीफ इंजीनियर अशोक कुमार द्विवेदी बतौर सदस्य एसआईटी में शामिल रहे.

नोएडा प्राधिकरण, पुलिस और जिला प्रशासन ने एसआईटी को करीब 550 पन्नों का विस्तृत लिखित बयान सौंपा था. इस में जलभराव की पहले से मिली सूचना, स्टार्म वाटर ड्रेनेज की योजना, कंट्रोल रूम का संचालन, ड्यूटी चार्ट, कौल रिकौर्डिंग्स, बचाव कार्यों का प्रतिक्रिया समय और घटनास्थल पर तैनात अधिकारियों की भूमिकाओं का पूरा ब्यौरा दर्ज है. टीम ने सभी दस्तावेजों की जांचपड़ताल कर उन्हें अपनी रिपोर्ट में शामिल किया. जांच के दौरान सब से बड़ा सवाल यह उठा कि युवराज को बाहर निकालने में करीब 4 घंटे क्यों लगे.

एसआईटी को पता चला कि हादसे के तुरंत बाद शुरुआत के समय में बचाव तंत्र पूरी तरह से सक्रिय नहीं हुआ. एसडीआरएफ, पुलिस और स्थानीय प्रशासन के बीच तालमेल की गंभीर कमी बनी रही. कंट्रोल रूम से समय रहते निर्देश जारी नहीं हुए और घटनास्थल पर मौजूद टीमें स्थिति की गंभीरता न समझ सकीं. रिपोर्ट में यह भी खुलासा हुआ कि हादसे वाले प्लौट पर जल निकासी की स्थाई व्यवस्था पहले ही प्रस्तावित थी, मगर वह केवल कागजों पर रह गई.

प्लौट आवंटन से ले कर हादसे तक ड्रेनेज सिस्टम पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. एसआईटी ने उस दौरान तैनात वरिष्ठ अधिकारियों, जूनियर इंजीनियरों और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी को जांच के केंद्र में रखा है. एसआईटी रिपोर्ट में लापरवाही करने वाले करीब 20 अधिकारियों व कर्मचारियों के नाम साफतौर पर दर्ज हैं. रिपोर्ट मिलते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद इस का गहन अध्ययन करेंगे. अनुमान है कि दोषियों के खिलाफ निलंबन, विभागीय जांच के अलावा आपराधिक केस दर्ज करने के आदेश जारी हो सकते हैं. युवराज मेहता की मौत अब केवल हादसा नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक बन गई है.

एसआईटी रिपोर्ट से स्पष्ट हो गया कि सही समय पर योजना, निगरानी और रेस्क्यू सिस्टम सक्रिय होता तो यह मौत टाली जा सकती थी. फिलहाल सभी की नजर अब प्रदेश सरकार के निर्णय पर टिकी है. UP News

 

UP News: फर्स्ट लेडी ड्राइवर मर्डर – प्यार में छलावा

UP News: झांसी की 40 वर्षीय अनीता चौधरी ने जब औटोरिक्शा चलाना शुरू किया तो लोगों ने उस की हिम्मत की दाद देते हुए बहुत सम्मान दिया. जिले की इस पहली लेडी औटो ड्राइवर को सिर्फ सामाजिक संगठनों बल्कि पुलिस के सीनियर अधिकारियों ने भी सम्मानित किया, लेकिन एक दिन उस की हत्या हो जाने पर पुलिस अधिकारी भी भौचक्के रह गए. कौन था अनीता चौधरी का हत्यारा और क्यों की गई उस की हत्या? पढ़ें, लव क्राइम की यह खास स्टोरी.

अनीता चौधरी की उपेक्षा से मुकेश झा बहुत परेशान रहने लगा था. वह समझ नहीं पा रही था कि जिस अनीता ने शादीशुदा होते हुए भी उस के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी, उस ने अचानक उस से मुंह क्यों मोड़ लिया. मुकेश ने अनीता को लाख मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह उस की बात सुनने को राजी ही नहीं थी. क्योंकि अनीता का झुकाव अरुण नाम के युवक की तरफ हो गया था. 4 जनवरी, 2026 का दिन मुकेश झा के लिए खास दिन था. खास इसलिए कि इसी दिन मुकेश ने अनीता के साथ मंदिर में लव मैरिज की थी. शादी की सालगिरह की खुशी में मुकेश बीते दिनों की कड़वाहट भुला कर अनीता से मिलने गया.

उस ने अनीता को शादी की सालगिरह की याद दिला कर साथ रहने को मनाने की कोशिश की, लेकिन अनीता राजी नहीं हुई. उस ने घूमनेफिरने को साथ चलने को कहा तो इस के लिए भी अनीता ने मना कर दिया. इतना ही नहीं, अनीता ने मुकेश को खरीखोटी सुना कर अपमानित भी किया.

अपमान और बेवफाई का घूंट पी कर मुकेश वापस घर आ गया. उसे अनीता की बेवफाई पसंद नहीं आई. वह सोचने लगा कि जिस के लिए उस ने तन मन धन सब न्योछावर कर दिया, अपनी पत्नी व बच्चों से छल किया, जिस को उस ने प्रेमिका की जगह पत्नी का दरजा दिया, उसी ने उस के साथ इतना बड़ा धोखा किया. ऐसी बेवफा को वह कभी माफ नहीं करेगा. उसे उस की बेवफाई की सजा जरूर देगा. वह उस की न हुई तो वह उसे किसी और की भी नहीं होने देगा.

इस के बाद मुकेश झा ने शादी की सालगिरह की रात ही अनीता व उस के प्रेमी अरुण की हत्या का प्लान बनाया. मुकेश अपनी सुरक्षा के लिए अपने साथ तमंचा रखता था. अपने प्लान के मुताबिक उस ने तमंचा लोड किया, फिर रात 9 बजे अपनी कार से अनीता की खोज में घर से निकल गया. अनीता झांसी जिले की पहली औटोरिक्शा महिला ड्राइवर थी. वह अकसर रात में ही औटो चलाती थी. एक दिन मुकेश ने मौका पा कर उस के औटोरिक्शा में ट्रैकर लगा दिया था. अपने फोन से ट्रैकर को कनेक्ट कर वह अनीता पर नजर रखता था.

अनीता 4 जनवरी, 2026 की रात लगभग साढ़े 9 बजे औटो ले कर घर से निकली और रेलवे स्टेशन पहुंची. वहां उस का प्रेमी अरुण मौजूद था. अनीता ने अरुण को औटो में बैठा लिया फिर दोनों बातचीत में लीन हो गए. इधर मुकेश झा तमंचा लोड कर अपनी कार से अनीता का पीछा करने निकला. ट्रैकर के सहारे वह पीछा करते हुए अनीता तक जा पहुंचा. औटो में अरुण भी था. उस समय रात का डेढ़ बज रहा था.

सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास मुकेश ने चलती कार से अनीता पर फायर कर दिया. गोली उस की कनपटी पर लगी. अनीता लहूलुहान हो कर सड़क पर जा गिरी. औटो कुछ दूरी पर जा कर पलट गया. औटो पलटने से मुकेश अनीता के दूसरे प्रेमी अरुण को नहीं मार सका. अरुण छिप कर वहां से भाग गया. मुकेश भी कार ले कर फरार हो गया. 4-5 जनवरी, 2026 की दरम्यानी रात डेढ़ बजे किसी युवक ने झांसी के थाना नवाबाद पुलिस को सूचना दी कि स्टेशन रोड पर सुकुवां ढुकुवां कालोनी के पास सड़क पर एक्सीडेंट हुआ है, औटो पलटा पड़ा है और एक महिला सड़क पर खून से लथपथ पड़ी है. वह जिंदा है या नहीं, यह बताना मुश्किल है.

पहली थी लेडी ड्राइवर

एक्सीडेंट की सूचना पर एसएचओ रवि श्रीवास्तव कुछ पुलिसकर्मियों के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. सर्दी की रात थी, इसलिए वहां सन्नाटा पसरा था. एक महिला सड़क पर मरणासन्न पड़ी थी और चंद कदमों की दूरी पर एक औटो पलटा पड़ा था. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब घायल पड़ी महिला को गौर से देखा तो उन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा. उसे वह जानते थे. वह कोई और नहीं, बल्कि झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर अनीता चौधरी थी. वह झांसी की चर्चित महिला थी. उसे पूरा शहर जानता था.

इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने एक्सीडेंट की सूचना पुलिस अधिकारियों व अनीता के फेमिली वालों को दी और अनीता को इलाज के लिए मैडिकल कालेज अस्पताल भेजा. वहां डौक्टरों ने परीक्षण के बाद उसे मृत घोषित कर दिया. सुबह एसएसपी बी.बी.जी.टी. एस. मूर्ति, एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम घटनास्थल पर पहुंचे और घटनास्थल का निरीक्षण किया. पहली नजर में अधिकारियों को लगा कि अनीता चौधरी की मौत एक्सीडेंट में हुई है.

सूचना पा कर मृतका की बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका चौधरी व देवर दिलदार सिंह पहले घटनास्थल फिर मोर्चरी पहुंचे. वहां अनीता का शव देख कर सभी परिजन बिलख पड़े. मृतका का बेटा विक्की उस समय पुणे में था. उसे भी सूचना दे दी गई. पुलिस मान रही थी कि अनीता चौधरी की मौत दुर्घटना है, लेकिन अनीता के फेमिली वाले पुलिस की बात से सहमत नहीं थे. उन का कहना था कि अनीता की हत्या की गई है. दुर्घटना में मौत दर्शाने के लिए औटो को पलटा गया है. अनीता के शरीर से ज्वैलरी भी गायब थीं. वह मंगलसूत्र, झुमके, पायल आदि पहने थी. उस का मोबाइल फोन भी गायब था.

इधर सुबह होते ही फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर अनीता चौधरी की मौत की खबर झांसी शहर में जंगल की आग की तरह फैली. जिस ने भी सुना, वही दंग रह गया. अधिकारियों से जानकारी जुटाने मीडियाकर्मी भी उमड़ पड़े. अनीता के फेमिली वालों से भी उन्होंने बातचीत की. उन्होंने मीडियाकर्मियों से साफ कहा कि अनीता की हत्या हुई है. फेमिली वाले पुलिस अधिकारियों से भी मिले और हत्या की आशंका जताई.

अनीता चौधरी की हत्या हुई या फिर एक्सीडेंट में मौत हुई, इस के लिए पुलिस ने शव का पंचनामा कर पोस्टमार्टम हेतु मैडिकल कालेज भेजा. 2 डाक्टरों के पैनल ने वीडियोग्राफी के बीच अनीता चौधरी के शव का पोस्टमार्टम किया और रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी. रिपोर्ट की एक प्रति एसपी कार्यालय भी भिजवा दी. एसएचओ रवि श्रीवास्तव ने जब अनीता चौधरी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंक पड़े. क्योंकि उस की मौत एक्सीडेंट में नहीं हुई थी, बल्कि उस की गोली मार कर हत्या की गई थी. उस की कनपटी (कान के नीचे) पर गोली मारी गई थी. गोली उस के गले में फंस गई थी. रवि श्रीवास्तव ने यह जानकारी आला अधिकारियों को दी तो वे भी सकते में आ गए.

अनीता की मौत के मामले में पुलिस से भारी चूक हुई थी, अत: पुलिस अधिकारियों ने मृतका अनीता चौधरी के फेमिली वालों को बुलवाया और उस की हत्या के संबंध में उन से पूछताछ की.

प्रेमी पर हुआ शक

मृतका की छोटी बहन विनीता चौधरी, पति द्वारका तथा देवर दिलदार ने बताया कि अनीता की हत्या मुकेश झा ने की है, जो प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में रहता है. दोनों के बीच पैसों के लेनदेन का झगड़ा था. मुकेश अनीता के चरित्र पर भी शक करता था. अनीता की हत्या में उस का बेटा शिवम झा व उस का बहनोई मनोज झा भी शामिल हो सकता है. पूछताछ के बाद पुलिस अधिकारियों के आदेश पर इंसपेक्टर रवि श्रीवास्तव ने मृतका अनीता के पति द्वारका चौधरी की तहरीर पर बीएनएस की धारा 103(1) के तहत मुकेश झा, उस के बेटे शिवम झा तथा बहनोई मनोज झा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. तुरंत काररवाई करते हुए पुलिस ने शिवम झा व मनोज झा को हिरासत में ले लिया, लेकिन मुकेश झा घर से फरार हो गया.

मुकेश झा की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति ने 3 टीमों का गठन एसपी (सिटी) प्रीति सिंह तथा सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत की अगुवाई में किया. ये टीमें मुहिम में जुट गईं. उस की तलाश में कई संभावित ठिकानों पर दबिश दी गई, लेकिन सफलता हाथ नहीं लगी. तब एसएसपी ने उस की गिरफ्तारी के लिए 25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया.

कार में मिला तमंचा

6 जनवरी, 2026 की देर रात एसएचओ रवि श्रीवास्तव को खबर मिली कि बरुआ सागर थाना क्षेत्र के बेतवा नदी के नोटघाट पुल पर एक लावारिस कार खड़ी है. खबर पाते ही वह अपनी टीम के साथ पहुंचे और कार की तलाशी ली. कार के अंदर से एक तमंचा तथा एक मोबाइल फोन बरामद हुआ. मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. जांचपड़ताल से पता चला कि लावारिस खड़ी इग्निस कार हत्यारोपी मुकेश झा की है. एसएचओ ने मुकेश झा की कार बरामद होने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी. साथ ही आशंका जताई कि गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी मुकेश ने नदी में छलांग लगा दी है.

इस पर एसपी (सिटी) प्रीति सिंह व सीओ (सिटी) लक्ष्मीकांत गौतम नोटघाट पुल पहुंचे और नदी में जाल डलवा कर गोताखोरों की मदद से मुकेश की खोज कराई. लेकिन घंटों की मशक्कत के बाद भी मुकेश का कुछ भी पता न चला. तब पुलिस अधिकारियों को शक हुआ कि शायद मुकेश पुलिस को गुमराह कर भाग गया होगा. अब पुलिस ने मुकेश की तलाश और तेज कर दी. जंगलों में भी उस की तलाश शुरू कर दी. इस के अलावा पुलिस अधिकारियों ने अपने खास खबरियों को भी लगा दिया. लेकिन इस के बावजूद मुकेश हाथ नहीं आया.

9 जनवरी, 2026 की रात 10 बजे एसएचओ रवि श्रीवास्तव अपनी टीम के साथ भगवंतपुरा के पास चैकिंग कर रहे थे, तभी उन्हें खास मुखबिर से जानकारी मिली कि मुकेश झा को भगवंतपुरा से करगुआं वाले कच्चे रास्ते पर देखा गया है. इस पर नवाबाद थाने के एसएचओ रवि प्रकाश श्रीवास्तव ने पुलिस टीम के साथ घेराबंदी की. पुलिस को देख कर मुकेश कच्चे रास्ते पर भागा. रोकने पर उस ने पुलिस टीम पर फायर किया. पुलिस की जवाबी फायरिंग में उस के दाएं पैर में गोली लगी. गोली लगते ही वह लडख़ड़ा कर गिर पड़ा. पुलिस ने उसे तब गिरफ्तार कर लिया. घायल मुकेश को इलाज हेतु अस्पताल में भरती कराया गया.

एसएसपी बी.बी.जी.टी.एस. मूर्ति तथा एसपी (सिटी) प्रीति सिंह ने मुकेश झा से अनीता चौधरी की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया, ”मैं अनीता से बेहद प्यार करता था. हम दोनों पिछले 7 सालों से रिलेशनशिप में थे. मंदिर में शादी भी कर चुके थे, लेकिन अनीता अब दूसरे युवक को चाहने लगी थी. इसलिए उस ने 3 महीने पहले ब्रेकअप कर लिया था.’’

उस ने आगे बताया, ”प्यार में धोखा मिला तो मुझे बरदाश्त नहीं हुआ. मैं ने मैरिज एनिवर्सरी की रात 4 जनवरी को कनपटी पर गोली मार कर उस की हत्या कर दी थी. फिर अपनी कार नोटघाट पुल पर खड़ी कर भाग गया था, ताकि पुलिस को लगे कि मैं ने बेतवा नदी में कूद कर जान दे दी है. मैं अनीता के प्रेमी अरुण को भी मारना चाहता था, लेकिन औटो पलटने से वह बच गया.’’

पुलिस अधिकारियों की पूछताछ के बाद उन के आदेश पर एसएचओ रवि प्रकाश ने मुकेश झा को अनीता चौधरी की हत्या के आरोप में विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. लेकिन हिरासत में लिए गए मुकेश के बेटे शिवम झा तथा बहनाई मनोज झा को साक्ष्य के अभाव में गिरफ्तार नहीं किया गया. दोनों ने खुद को अनीता की हत्या में निर्दोष बताया. अनीता चौधरी कौन थी? वह झांसी की प्रथम महिला औटो चालक कैसे बनी? मुकेश झा के संपर्क में कैसे आई? लिवइन रिलेशन में रहने के बावजूद उस का मुकेश से ब्रेकअप क्यों हुआ? मुकेश ने उस की हत्या क्यों की? यह सब जानने के लिए अनीता का अतीत झांकना होगा.

मैनेजर से हुआ प्यार

उत्तर प्रदेश का झांसी शहर वीरांगना लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि के रूप में जाना जाता है. इसी शहर के नवाबाद थाना अंतर्गत एक मोहल्ला है तालपुरा. इसी तालपुरा मोहल्ले की अंबेडकर नगर कालोनी में द्वारका चौधरी सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी अनीता के अलावा एक बेटा विक्की तथा 2 बेटियां थीं. द्वारका झांसी बस स्टौप के पास चाय का ठेला लगाता था. इसी की आमदनी से परिवार का भरणपोषण करता था.

अनीता पढ़ीलिखी खूबसूरत युवती थी, जबकि उस का पति द्वारका चौधरी साधारण रंगरूप का कम पढ़ालिखा इंसान था. अनीता की छोटी बहन विनीता भी द्वारका के छोटे भाई दिलदार के साथ ब्याही थी. वह भी झांसी में ही रहता था. अनीता 3 बच्चों की मां थी. वह चाहती थी कि उस के बच्चे पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़े हों, लेकिन पति द्वारका की कमाई इतनी नहीं थी कि वह बच्चों का पालनपोषण ठीक से कर सके, उन की पढ़ाई का बोझ उठा सके. उस के लिए तो परिवार की दोजून की रोटी जुटाना ही मुश्किल था. अनीता सदैव चिंता में डूबी रहती थी.

अनीता को जब बच्चों की देखभाल की चिंता ज्यादा सताने लगी तो उस ने घर की दहलीज लांघ कर नौकरी करने का मन बनाया. इस बाबत उस ने पति से बात की तो उस ने साफ मना कर दिया. द्वारका ने कहा, ”वह चौहान वंश का है. वह गरीब जरूर है, लेकिन उस के वंश की महिलाएं घर की देहरी नहीं लांघतीं.’’

लेकिन अनीता ने पति की बात अनसुनी कर दी और नौकरी के लिए प्रयास करने लगी. अनीता के मोहल्ले की कुछ महिलाएं ओरछा स्थित एक ग्लास फैक्ट्री में काम करती थीं. अनीता ने उन महिलाओं से बात की, फिर उन के सहयोग से अनीता को भी वहां नौकरी मिल गई. अनीता कांच फैक्ट्री में काम करने लगी तो उस की माली हालत सुधरने लगी. बच्चों का पालनपोषण व पढ़ाई ठीक से होने लगी.

वह जिस ग्लास फैक्ट्री में काम करती थी, उसी में मुकेश झा भी काम करता था. वह मैनेजर था. फैक्ट्री के कर्मचारियों पर निगाह रखना तथा उन का वेतन आदि वितरण करना उस का काम था. फैक्ट्री के अन्य काम भी वही देखता था. कर्मचारी को काम पर रखना या फिर निकालना उसी के हाथ में था. फैक्ट्री पर उस की मजबूत पकड़ थी. मुकेश झा प्रेमनगर थाने के ईसाई टोला मोहल्ले में परिवार सहित रहता था. उस के परिवार में पत्नी अंजना के अलावा बेटा शुभम व एक बेटी थी. मुकेश फैक्ट्री में मैनेजर तो था ही, इस के अलावा वह एक होटल का संचालन भी करता था. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. उस के पास एक कार तथा बाइक भी थी. वह ठाठबाट से रहता था. रंगीनमिजाज भी था.

एक रोज मुकेश झा की नजर फैक्ट्री में काम कर रही अनीता पर पड़ी. खूबसूरत अनीता को देख कर उस की धड़कनें बढ़ गईं. कुछ देर तक वह उसे अपलक निहारता रहा, फिर चला गया. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अनीता को रिझाने के लिए वह उस से नजदीकियां बढ़ाने लगा. अनीता की पारखी नजरें भांप गईं कि मैनेजर बाबू की नजरें उस पर गड़ी हैं, इसलिए वह उस से नजरें चुराने लगी, लेकिन मुकेश झा कहां मानने वाला था. एक रोज मौका पा कर उस ने अनीता को रोक लिया और बोला, ”अनीता, तुम बहुत खूबसूरत हो. तुम्हारी खूबसूरती पर मैं फिदा हूं. तुम से दोस्ती करना चाहता हूं.’’

अनीता झिझकते व शरमाते हुए बोली, ”मुकेश बाबू, आप यह क्या कह रहे हैं. मैं 3 बच्चों की मां हूं. भला मुझ से दोस्ती कर के आप को क्या हासिल होगा?’’

”अनीता तुम 3 बच्चों की मां जरूर हो, लेकिन खूबसूरती में किसी नवयौवना से कम नहीं हो. मेरे लिए तो तुम अप्सरा जैसी हो.’’

अपनी खूबसूरती की तारीफ सुन कर अनीता मन ही मन खुश हुई, लेकिन दिखावे के तौर पर बोली, ”आप मेरी झूठी तारीफ कर रहे हो. भला मैं इतनी खूबसूरत कहां हूं.’’

इस के बाद मुकेश अनीता के पीछे पड़ गया. वह उसे हर तरह से रिझाने की कोशिश करने लगा. उस की आर्थिक मदद भी करने लगा. धीरेधीरे अनीता भी उस की ओर आकर्षित होने लगी. यही आकर्षण कब प्यार में तब्दील हो गया, अनीता नहीं जान पाई. अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो उन के बीच की दूरियां भी कम होने लगीं. अब दोनों साथसाथ घूमनेफिरने लगे. होटल रेस्त्रां में गुलछर्रे उड़ाने लगे. अनीता को अब मुकेश का साथ अच्छा लगने लगा था. मुकेश भी ज्यादा समय अनीता के साथ बिताने लगा. उसे अनीता हूर की परी लगने लगी थी.

मुकेश झा आर्थिक रूप से संपन्न था. शहर में उस का मकान तथा आवागमन के लिए घर में कार व बाइक थी. अनीता की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी. उस का पति द्वारका चौधरी ठेले पर चाय बेचता था. वह बीमार भी रहता था. अनीता जितनी खूबसूरत थी, उस का पति साधारण शक्लसूरत का था. अत: अनीता को जब मुकेश का साथ मिला तो वह उस की तरफ खिंचती चली गई. मुकेश के सामने उसे अब अपना पति फीका लगने लगा था. यही हाल मुकेश का भी था. अनीता के मुकाबले अपनी पत्नी फीकी लगने लगी थी.

मंदिर में लव मैरिज

अनीता और मुकेश का प्यार परवान चढ़ा तो दोनों एक रोज मंदिर में पहुंचे और मुकेश ने उस की मांग में सिंदूर भर कर उसे पत्नी का दरजा दे दिया. इस के बाद दोनों अलग मकान ले कर लिवइन रिलेशन में रहने लगे. मुकेश अनीता की हर सुखसुविधा का ध्यान रखता था. अनीता गहने, कपड़े, पैसों जिस किसी की भी डिमांड करती थी, मुकेश झा उसे पूरा करता था. अनीता की मांग में सिंदूर भले ही पति द्वारका का सजा था, लेकिन वह पतिधर्म प्रेमी मुकेश के साथ निभाती थी. हंसीखुशी से उन का समय बीत रहा था.

अनीता ने मुकेश को दिल मेें बसाया तो उसे अपना बीमार पति द्वारका फीका लगने लगा. वह उस की उपेक्षा करने लगी. उस ने उस की परवाह करना छोड़ दी. अनीता और मुकेश अब साथसाथ रहना चाहते थे. अत: 4 जनवरी, 2019 को मुकेश ने मंदिर में जा कर अनीता की मांग में सिंदूर भर कर उस के साथ लव मैरिज कर ली.

इस के बाद अनीता और मुकेश ने अपनेअपने घरों से दूरियां बना लीं और अलग मकान में लिवइन रिलेशन में रहने लगे. दोनों के फेमिली वालों को विवाह रचाने की जानकारी हुई तो उन्होंने विरोध जताया, लेकिन विरोध का उन पर असर नहीं हुआ. 19 फरवरी, 2020 को अनीता और मुकेश के बीच फैक्ट्री में किसी बात को ले कर बहस हो गई. गुस्से में मुकेश ने अनीता से कह दिया कि कल से फैक्ट्री मत आना. मुकेश की यह बात अनीता के दिल में कांटे की तरह चुभ गई, अत: उस ने फैक्ट्री जाना बंद कर दिया.

हालांकि मुकेश ने अनीता को मनाने की कोशिश की, लेकिन बात दिल को चुभ गई थी, इसलिए अनीता फैक्ट्री नहीं गई. मार्च 2020 के पहले हफ्ते में अनीता नौकरी की तलाश में मुंबई चली गई. वहां गए उसे 10 दिन ही बीते थे कि कोरोना की वजह से लौकडाउन की चर्चा होने लगी. वहां उसे नौकरी भी नहीं मिली थी, इसलिए वह घर लौट आई. मुंबई से लौटने के बाद अनीता के घर की आर्थिक स्थिति और बिगड़ गई.

अनीता कर्मठ, लगनशील और खुद्ïदार महिला थी. काफी सोचविचार कर उस ने फाइनैंस पर औटो ले कर चलाने का प्लान बनाया, लेकिन उस के सामने पहला प्रश्न यह था कि पैसा कौन देगा? इस के लिए उस ने कई बैंकों से संपर्क साधा, लेकिन कोई बैंक बिना गारंटी उसे लोन देने को तैयार न था. काफी प्रयास के बाद एक निजी बैंक ने लोन देने की हामी भरी. जब बैंक अधिकारी जांचपड़ताल करने घर आए तो अनीता के पति द्वारका ने अपना आधार और बैंक पासबुक की कौपी देने से इंकार कर दिया. क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अनीता महिला हो कर औटो चलाए.

वैसे भी झांसी में कोई महिला औटो चालक नहीं थी, लेकिन विरोध के बावजूद अनीता ने हिम्मत नहीं हारी. इस बुरे वक्त में अनीता ने मुकेश झा से मदद मांगी. मुकेश की मदद से उस ने बैंक के कागज पूरे किए और लोन ले लिया. 18 फरवरी, 2021 को अनीता ने फाइनैंस करा कर नई औटो खरीदी और झांसी की सड़कों पर उसे चलाने लगी. इस तरह अनीता चौधरी झांसी की फस्र्ट लेडी औटो ड्राइवर बन गई. उस के जज्बे की हर तरफ तारीफ होने लगी. वह अखबारों की सुर्खियों में भी छा गई. कई सामाजिक संगठनों ने उस के जज्बे को सलाम करते हुए उसे सम्मानित भी किया.

पुलिस विभाग में भी वह चर्चा का विषय बन गई. उस ने अपने औटो के आगेपीछे पोस्टर चस्पा किए थे, जिन पर लिखा था— जनपद झांसी पुलिस, झांसी की पहली महिला औटो ड्राइवर. पुरुष और महिला एक समान, जनजन का हो यही आह्वान. पुलिस अफसरों के फोन नंबर भी लिखे थे. अनीता का हौसला बढ़ाने के लिए तत्कालीन डीआईजी (झांसी रेंज) जोगेंद्र सिंह ने भी उस के औटो पर सफर किया था और 13 दिसंबर, 2021 को उस के कार्य की सराहना करते हुए उसे प्रशस्ति पत्र दिया था.

इस तरह समय बीतता रहा और अनीता औटो चला कर पैसे कमाती रही. साथ ही सुर्खियों में भी छाई रही. अनीता और मुकेश साथ रहते थे. मुकेश अनीता को प्यार करता था, इसलिए वह उस की हर डिमांड पूरी करता था. उस ने अनीता को गहनों से लाद दिया था. अनीता अकसर औटो ले कर झांसी रेलवे स्टेशन के पास खड़ी होती थी. यहां जुलाई 2025 में उस की दोस्ती अरुण नाम के युवक से हुई. अरुण स्टेशन के पास ही एक ट्रेवल एजेंसी में काम करता था. अनीता और अरुण एकदूसरे को पसंद करने लगे. दोनों घंटों मोबाइल पर रसभरी बातें करते और हंसीठिठोली करते.

प्यार में आया ट्विस्ट

अनीता की अरुण से नजदीकियां बढ़ीं तो वह मुकेश की उपेक्षा करने लगी. उस का फोन रिसीव करना भी बंद कर दिया. लेकिन इधर कुछ समय से अनीता के व्यवहार में रूखापन आ गया था. वह उस की उपेक्षा भी करने लगी थी. उस की जुबान में कड़वाहट भी आ गई थी. वह पहले जैसा न तो बरताव करती थी और न ही हंसतीबोलती थी. वह साथ घूमने को चलने के लिए कहता तो साफ मना कर देती. कोई उपहार लाता तो उसे लेने से इंकार कर देती. मुकेश की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर अनीता के स्वभाव मेें यह परिवर्तन कैसे और क्यों आया.

अनीता के स्वभाव को ले कर मुकेश की उलझन बढ़ी तो उस ने अनीता की जासूसी की. तब उसे पता चला कि अनीता अब किसी अरुण नाम के युवक से प्यार करने लगी है. इसी कारण वह उस की उपेक्षा करती है.

एक रोज मुकेश ने अनीता के चेहरे पर नजरें गड़ा कर पूछा, ”अनीता, यह अरुण कौन है? इस से तुम्हारा क्या रिश्ता है?’’

अरुण का नाम सुनते ही अनीता घबरा गई. वह जान गई कि मुकेश को उस के और अरुण की दोस्ती का पता चल गया है. फिर भी वह संभलते हुए बोली, ”अरुण एक अच्छा इंसान है. हम दोनों के बीच दोस्ती है. कभीकभी उस से बतिया लेती हूं.’’

”तुम दोनों के बीच सिर्फ दोस्ती है या फिर नाजायज रिश्ता भी है?’’ मुकेश ने कटाक्ष किया.

मुकेश के इस कटाक्ष से अनीता भड़क गई और बोली, ”तुम मुझ पर लांछन लगा कर अपनी हदें पार कर रहे हो. मैं यह सब कतई बरदाश्त नहीं करूंगी.’’

उस रोज अरुण को ले कर अनीता और मुकेश के बीच खूब कहासुनी हुई. इस के बाद तो आए दिन विवाद होने लगा. उन दोनों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि मामला पुलिस के सामने जा पहुंचा. अरुण को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा होने लगा. अक्तूबर, 2025 में एक रोज मुकेश ने अनीता के साथ रेलवे स्टेशन के बाहर अभद्रता व मारपीट की तो औटो चालकों का गुस्सा फूट पड़ा. चालकों ने मुकेश की पिटाई कर दी. अनीता ने भी थाना नवाबाद में मुकेश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस के बाद मुकेश को थाने लाया गया. थाने में पंचायत शुरू हुई. दोनों के फेमिली वाले भी थाने पहुंचे.

थाने में मुकेश पुलिस व अपने फेमिली वालों के सामने बोला कि वह अनीता के साथ ही रहेगा, लेकिन जब अनीता से पूछा गया तो उस ने कहा कि वह मुकेश के साथ नहीं रहना चाहती. यह सुनते ही मुकेश बौखला गया और कहने लगा कि अब या तो तुम रहोगी या हम. धमकी देने पर पुलिस ने उसे काफी फटकार लगाई. इस घटना के बाद अनीता ने मुकेश से ब्रेकअप कर लिया और उसे छोड़ कर पति के साथ रहने लगी. अनीता अब दिन में घर संभालती और रात को औटो चलाती. रात में अकसर अरुण भी उस के साथ रहता. सुरक्षा की दृष्टि से वह अरुण को साथ रखती थी.

मुकेश किसी भी कीमत पर अनीता को खोना नहीं चाहता था, अत: अनीता चौधरी की जिंदगी में जब अरुण आया तो वह बौखला गया. वह दोनों पर नजर रखने लगा. मुकेश ने गुपचुप तरीके से अनीता के औटो में ट्रैकर लगा दिया. मोबाइल के जरिए वह निगाह रखता था. ट्रैकर औन होने पर उस से होने वाली बात सुनता था. अनीता व अरुण में क्या बातचीत होती, उसे सब पता चल जाता था. मुकेश अब जान गया था कि अनीता और अरुण के बीच गहरे प्रेम संबंध हैं.

4 जनवरी, 2026 की शाम मुकेश अनीता के पास गया. उस ने उसे शादी की सालगिरह की याद दिलाई और घर वापस चलने को कहा, लेकिन अनीता ने साफ मना करते हुए मुकेश की बेइज्जती की. तब उस ने उसी रात अनीता की गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन उस का दूसरा प्रेमी अरुण बच गया. आरोपी मुकेश झा से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने 10 जनवरी, 2026 को उसे झांसी की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया. UP News

 

 

UP Crime: पत्नी को बनाया वेश्या

UP Crime: अधिकांश लोगों के लिए अपने घरपरिवार की इज्जतआबरू सर्वोपरि होती है. इसे बचाने के लिए वह अपनी जान तक की परवाह नहीं करते, लेकिन सलमान ऐसा शख्स था, जो अपनी पत्नी नरगिस से देह व्यापार कराता था, उस के लिए वह खुद ग्राहक लाता था. इस घुटनभरी जिंदगी से निकलने के लिए एक दिन नरगिस ने ऐसा काम किया कि…

इंदौर के राजा रघुवंशी की हत्या उस की पत्नी सोनम ने कराई थी, उस के भांतिभांति के समाचार अभी भी आ रहे हैं. इधर कुछ महीनों में पत्नियों द्वारा पति की हत्या के अनेक मामले सामने आए हैं. औरैया की प्रगति ने विवाह के 15 दिनों बाद ही पति दिलीप की हत्या करा दी थी. कर्नाटक में अधेड़ पल्लवी ने अपने पति रिटायर्ड डीजीपी ओमप्रकाश को छुरी मार कर मार डाला. मेरठ की मुसकान ने अपने पति सौरभ की हत्या करवा दी. मुंबई की रूपाली ने अपने पति की हत्या करा दी.

ये बड़ी घटनाएं थीं, इसलिए सभी की नजरों में आ गईं. इस के अलावा भी अन्य तमाम घटनाएं हैं, जिन में पता चलता है कि पतिपत्नी एकदूसरे के लिए जान देने के बजाय जैसे जान लेने की प्रतियोगिता चला रहे हैं. इस में लिवइन में रहने वाली लड़कियों की हत्या के समाचार तो रोज ही अखबारों में आते हैं. यह कहानी भी इसी तरह की हत्या की है. लेकिन यह कहानी उन सभी कहानियों से अलग है. उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर की इस कहानी में पत्नी ने अपने हाथों से पति की हत्या कर दी. लेकिन इस कहानी में ऐसे अनेक सवाल हैं, जो समाज की आंखें खोलने वाले हैं.

दिल्ली से हरिद्वार जाने वाले नैशनल हाईवे पर बीच में पड़ता है उत्तर प्रदेश का जिला मुजफ्फरनगर. 21 जून, 2025 की आधी रात को मुजफ्फरनगर के खाईखेड़ा इलाके के मदीना चौक के पास चमन कालोनी में शोर मचने से कालोनी वालों की आंखें खुल गईं. 24 साल की नरगिस घर से निकल कर चिल्ला रही थी कि ‘कोई मेरे शौहर को बचा लो, उस ने गले में फांसी लगा ली है. वह फडफ़ड़ा रहा है.’

पड़ोसी तुरंत भाग कर आ गए. नरगिस और सलमान की शादी के अभी साढ़े 5 साल ही हुए थे. उन का 4 साल का एक बेटा भी था. ये तीनों चमन कालोनी के उस मकान में किराए पर रहते थे. पड़ोसियों ने देखा कि ऊपरी मंजिल के कमरे में सलमान चित पड़ा था. पड़ोसियों ने उसे उठा कर रिक्शे में डाला और सरकारी अस्पताल ले गए. वहां नरगिस ने डौक्टर से कहा कि गले में दुपट्टा बांध कर सलमान पंखे से लटक गया था. किसी तरह उस ने पति को पंखे से उतारा. वह कैसे भी उस के पति को बचा लें.

सलमान की प्राथमिक जांच कर के डौक्टर ने सिर हिलाते हुए कहा कि यह मर चुका है, लेकिन यह आत्महत्या का मामला है, इसलिए पुलिस को सूचना देनी पड़ेगी. अस्पताल प्रशासन ने इस की सूचना पुलिस को दी तो थोड़ी ही देर में थाना कोतवाली पुलिस आ पहुंची. कोतवाली प्रभारी ने नरगिस से पूछा, ”रात को पति से तुम्हारा झगड़ा हुआ था क्या? इस ने मर जाने की धमकी देते हुए तुम से अपना इरादा व्यक्त किया था क्या?’’

जवाब में नरगिस ने कहा, ”साहब, छोटामोटा, खट्टामीठा झगड़ा तो सभी घरों में होता है. इस तरह का झगड़ा तो हमेशा होता रहता था. पर बात इस हद तक पहुंच जाए, इस तरह का झगड़ा तो कभी नहीं हुआ था. हां, इन की कोई नौकरी नहीं थी, सो बेरोजगार होने की वजह से इन के दिमाग पर बहुत टेंशन रहती थी. शायद उसी वजह से इन्होंने यह कदम उठाया होगा. बाकी आप सारे पड़ोसियों से पूछ लीजिए, कभी हमारा कोई बड़ा झगड़ा नहीं हुआ था.’’

इस के बाद पुलिस ने लाश कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. मदीना चौराहे और मोहल्ले में रहने वाले सभी लोगों को नरगिस पर दया आ रही थी. सभी यही कह रहे थे कि सलमान तो आत्महत्या कर के छुट्टी पा गया, अब यह बेचारी अकेली 4 साल के बच्चे को कैसे पाल कर बड़ा करेगी? सलमान के अम्मीअब्बू फर्रुखाबाद में रहते थे. सलमान का छोटा भाई फैजल मुजफ्फरनगर में ही दूसरे इलाके में अलग रहता था.

सलमान के आत्महत्या का समाचार पा कर सभी मदीना चौक के पास स्थित चमन कालोनी में नरगिस के घर आ गए थे. पोस्टमार्टम के बाद लाश सलमान के फेमिली वालों को सौंप दी गई थी. लाश मिलने के बाद पिता और भाई ने मिल कर उस की लाश को दफना दिया था. पुलिस और फेमिली वालों ने मान लिया था कि सलमान ने आत्महत्या ही की है. अगले दिन थाना कोतवाली में पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो उसे देख कर कोतवाल चौंके. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, सलमान ने आत्महत्या नहीं की थी, बल्कि गला दबा कर उस की हत्या की गई थी. कोतवाल पूरी टीम के साथ चमन कालोनी के सलमान के घर पहुंचे.

पुलिस ने जब सलमान के फेमिली वालों को बताया कि उस ने आत्महत्या नहीं की, बल्कि उस की गला दबा कर हत्या की गई है तो पूरा परिवार सन्न रह गया. सलमान के भाई फैजल ने तो जरा भी शरम संकोच किए बगैर तुरंत खड़े हो कर कहा, ”साहब, आप मेरी शिकायत दर्ज कर लीजिए. मेरे भाई सलमान की हत्या मेरी भाभी नरगिस ने ही की है.’’

वैसे भी जब सलमान की मौत हुई थी, उस समय घर में केवल नरगिस और उस का छोटा सा बच्चा ही था. इसलिए नरगिस पर ही सलमान की हत्या का पूरा शक जाता था. आत्महत्या के बजाय अब मामला हत्या का हो गया था, इसलिए इस घटना की सूचना कोतवाली पुलिस ने सीओ (सिटी) राजू कुमार साव और एसएसपी संजय वर्मा को भी दे दी थी. इस के बाद पुलिस अधिकारियों के डायरेक्शन में नरगिस से पूछताछ शुरू की गई.

शुरुआती पूछताछ में नरगिस ने कहा, ”भला कौन औरत विधवा बनना चाहेगी? किसी भी औरत को विधवा बनने का शौक नहीं होता. मैं अपने पति को क्यों मारूंगी? मैं तो अपने बेटे को गोद में ले कर सोई थी. उस के सो जाने के बाद घर में क्या हुआ, मुझे पता नहीं है.’’

पति को खोने वाली नरगिस के प्रति सहानुभूति रखते हुए पुलिस ने 3 दिनों तक साधारण पूछताछ की, परंतु नरगिस का एक ही जवाब था कि यह जो कुछ भी हुआ है, उस की उसे बिलकुल खबर नहीं है. इस के बाद 24 जून, 2025 को पुलिस ने अपने तरीके से नरगिस से सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. नरगिस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने पति सलमान को मौत के घाट उतारा था. उस ने बताया कि उस ने उस दिन सुबह ही सलमान से कहा था कि उसे रात में नींद नहीं आती, जिस की वजह से पूरे दिन बेचैनी रहती है. किसी डौक्टर से लिखवा कर वह उस के लिए नींद की दवा ला दे.

दोपहर को सलमान बाहर गया और नींद की दवा ला कर नरगिस को दे दी. रात को खाने में नरगिस ने रोटी और कीमा बनाया था. उस ने नींद की 7 गोलियां अच्छी तरह पीस कर सलमान के कीमा में मिला दी. रात को खाना खाने के बाद सलमान की कोल्डड्रिंक पीने की आदत थी. बची 3 गोलियां नरगिस ने कोल्डड्रिंक में मिला दीं. पेट भर कीमा खाने के बाद सलमान ने कोल्डड्रिंक भी पी ली थी, जिस से उसे गहरी नींद आ गई. रात 2 बजे नरगिस ने सलमान को झकझोर कर देखा. उस समय सलमान जरा भी होश में नहीं था. इस के बाद उस ने सलमान के गले में दुपट्टा लपेट कर पूरी ताकत से कस दिया. 5 मिनट छटपटाने के बाद सलमान की सांसें थम गईं.

वह मर गया है, यह विश्वास होने के बाद नरगिस ने चीखतेचिल्लाते हुए पड़ोसियों से कहा कि सलमान ने पंखे से लटक कर आत्महत्या करने की कोशिश की है. उसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा. इस के बाद मोहल्ले के 2 लोग उसे अस्पताल ले गए थे. नरगिस द्वारा अपराध स्वीकार करने के बाद सीओ (सिटी) ने पूछा, ”तुम दोनों के बीच ऐसी क्या लड़ाई थी कि तुम्हें इस तरह का खतरनाक कदम उठाना पड़ा. पति से तुम्हारी ऐसी क्या दुश्मनी थी?’’

सहज संकोच के साथ नरगिस नीचे ताकने लगी. उस के बाद मन मजबूत कर के उस ने जो बताया, उसे सुन कर पुलिस वालों को जबरदस्त झटका लगा. उस ने एक भी शब्द छिपाए बगैर पति की हत्या की सही वजह बता दी. उस ने जो वजह बताई, वह इस तरह थी. मुजफ्फरनगर के मोरना ब्लौक के गांव ककराला का रहने वाला सलमान 3 भाइयों में सब से बड़ा था. उस की 4 बहनें हैं. अभी एक भाई और 2 बहनों की शादी नहीं हुई है. साल 2020 में इसी जिले ककरौली के खाईखेड़ा की रहने वाली नरगिस से उस का विवाह हुआ था. दोनों का इस समय 4 साल का एक बेटा है.

नरगिस को गांव में रहना अच्छा नहीं लगता था, इसलिए शहर चल कर रहने के लिए वह अकसर सलमान से झगड़ती रहती थी. रोजरोज की किचकिच से तंग आ कर नरगिस के कहने पर सलमान 3 साल पहले नरगिस और बच्चे को ले कर मुजफ्फरनगर आ गया था. शहर के कई मोहल्लों में रहते हुए इस समय वह मदीना चौक के पास चमन कालोनी में किराए के मकान में पत्नी और बेटे के साथ रह रहा था.

उस की कोई नौकरी नहीं थी. वह इधरउधर मजदूरी करता था. खर्च ज्यादा था, जबकि कमाई कम थी. घर वाले चाहते थे कि वह गांव आ जाए, पर नरगिस गांव नहीं जाना चाहती थी. इसी बात को ले कर नरगिस नाराज हो कर डेढ़ साल तक मायके में रही थी. नरगिस ने बताया कि कामधंधा न होने की वजह से पैसों की तंगी रहती थी. उस का बेटा ढाई साल का हो गया था, उस के बाद यानी डेढ़ साल पहले सलमान ने उसे वेश्या बना दिया था. नएनए ग्राहक खोज कर वह नरगिस को उन के आगे परोसने लगा था. पति हो कर वह अपनी ही पत्नी की दलाली का धंधा करने लगा था.

पहली बार जब सलमान ने यह काम करने के लिए कहा था तो नरगिस ने जम कर विरोध किया था. पर सलमान ने मारपीट कर के उस से वही करवा लिया था, जो वह चाहता था. नरगिस के मायके में भी ऐसा कोई नहीं था, जो उस की मदद करता. इसलिए मार खा कर, बेबस हो कर नरगिस को सलमान का साथ देना पड़ रहा था, जिस से अंजान लोग उस की देह को नोच रहे थे.

सलमान ने दिल्ली, नोएडा से ले कर मणिपुर के इंफाल तक उस के लिए ग्राहक खोज रखे थे. वह नरगिस को ग्राहकों के पास ले जाता और बंद कमरे में जो प्रेमलीला होती, उस की वीडियो बनाता. अपनी ही पत्नी के उन वीडियो को बेच कर भी वह रुपए कमाता था. नरगिस की व्यथा सुन कर पुलिस वाले स्तब्ध थे. उस का कहना था कि इस तरह की घुटघुट कर जीने वाली जिंदगी जीने से तो मर जाना ही अच्छा था. लेकिन उसे अपने बेटे की चिंता थी कि उस के बाद उसे कौन संभालेगा?

उस का मुंह देख कर वह जलालतभरी जिंदगी जी रही थी, लेकिन धीरेधीरे उस की परेशानी बढ़ती ही जा रही थी और सहनशीलता घटती जा रही थी. फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब उस की सहनशीलता खत्म हो गई. इस की वजह यह थी कि पैसा देने वाले ग्राहक नरगिस को औरत नहीं, खिलौना मान कर उस के साथ तरहतरह की चित्रविचित्र हरकतें करते थे, जो उस के लिए असहनीय हो गई थीं. नरगिस को लगने लगा था कि वह इस यातना भरी जिंदगी से तभी छुटकारा पा सकती है, जब वह पति सलमान के शिकंजे से निकल पाए.

नरगिस ने इस के लिए बहुत सोचा. काफी सोचनेविचारने के बाद उसे लगा कि सलमान के शिकंजे से निकलने के लिए उस की मौत के अलावा दूसरा कोई उपाय नहीं है. उस ने सोचा कि सलमान की हत्या तो उसे बहुत पहले ही कर देनी चाहिए थी. पर उस समय उस की मार के आगे उस की हिम्मत नहीं पड़ रही थी. नरगिस मानसिक और शारीरिक यातनाओं से तंग आ चुकी थी. शायद इसीलिए उस के अंदर पति सलमान की हत्या करने की हिम्मत आ गई थी. फिर उस ने सलमान से ही नींद की गोलियां मंगा कर उन्हें कीमा में मिला कर खिला दीं. उसे मौत के घाट उतार कर अपनी बेइज्जती का बदला ले लिया.

इस के बाद उस ने रोते हुए कहा था कि जेल की जिंदगी इस नरक भरी जिंदगी से सौ गुना अच्छी है. अपनी दुख भरी कहानी सुना कर नरगिस रो रही थी. पुलिस वाले मौन थे. 25 जून, 2025 को प्रेस कौंफ्रेंस में एसएसपी संजय वर्मा ने नरगिस द्वारा अपराध स्वीकार करने की बात कह कर हत्या करने की वजह बताई तो मीडिया वाले भी हैरान रह गए थे. सभी एकटक नरगिस को ताकते रह गए थे.

पुलिस ने बचा हुआ कीमा, वह गिलास, जिस में सलमान ने कोल्डड्रिंक पी थी, नींद की गोलियों का पत्ता, वह दुपट्टा, जिस से गला घोंटा गया था, कब्जे में ले लिया था. नरगिस को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया था. उस के बेटे को सलमान के पेरेंट्स अपने साथ फर्रुखाबाद ले गए थे. UP Crime

(कथा में नरगिस परिवर्तित नाम है)

 

 

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

pix

जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद

 

 

Crime News: Gen-Z इंजीनियर ने किए पेरेंट्स के टुकड़े

Crime News: बुजुर्ग मांबाप के सिर को लोहे के बट्टे से फोड़ा, आरी से दोनों की लाशों के टुकड़े किए, फिर उन्हें नदी में बहा दिया. सवाल यह है कि हैवानियत की सारी हदें पार करने वाले इकलौते इंजीनियर बेटे ने ऐसा क्यों किया? उस से भी बड़ा सवाल तो यह है कि आज के टूटतेबिखरते परिवार और बंटतेकटते समाज पर यह दोहरा हत्याकांड कितना भारी पड़ेगा, जिस ने मानवता के माथे पर कलंक लगा दिया है?

उत्तर प्रदेश के जौनपुर का रहने वाला इंजीनियर बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था. दशहरे से ठीक पहले वह अपने घर चला आया था, जबकि उस की पत्नीबच्चे कोलकाता में ही रह गए थे. बच्चों को साथ नहीं लाने पर उस के मम्मीपापा ने शिकायत भी की थी और उसे तीखे ताने भी मारे थे, ”गैर जातिधर्म वाली औरत क्या समझेगी घरपरिवार क्या होता है?’’

इस पर अंबेश तिलमिला गया था. चुप रहने के बजाय उस ने भी मम्मीपापा के तानों का जवाब ताने से ही दिया, ”आप लोग मेरी बीवी को बहू मानते ही नहीं हो तो वह कैसे यहां आएगी…’’

इस बात को ले कर अंबेश की अपने ही मम्मीपापा के साथ काफी समय तक नोकझोंक होती रही.   दिसंबर की 8 तारीख को सर्द भरी रात थी. जौनपुर के ग्रामीण इलाके में कोहरा घना होने लगा था. चारों तरफ शांति थी. हालांकि उसे भंग करने करने के लिए बीचबीच में कुत्तों के भौंकने या फिर पास के हाइवे से वाहनों के हार्न की आवाजें सुनाई दे जाती थी. अंबेश अपने कमरे में लेटा था. उसे नींद नहीं आ रही थी. रजाई में था. घर में कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था, जो उस के कहने पर कुछ दिन पहले रोक दिया गया था. असल में उस ने एक तरह से घर में होने वाले निर्माण के काम को जबरन रुकवा दिया था.

अचानक वह बैड से उठा. हवाई चप्पलें पहनीं और बेसमेंट में चला गया. अंधेरे में टटोलते हुए बिजली का स्विच औन किया. एक नजर उस ने कमजोर रोशनी वाले बल्ब की ओर तो दूसरी नजर बेसमेंट के चारों तरफ घुमाई. सीमेंट की खुली बोरी का मुंह बंद कर दिया. इधरउधर बिखरी लोहे की छड़ें, तख्ते, लकडिय़ां, कुदाल, आरी, तसले, बाल्टी, कड़ाही आदि को सहेजने लगा. यह सब करते हुए उस की नजर लोहे के एक बट्टे पर पड़ी. जाने उसे क्या सूझी कि भारी बट्टे को वहां से उठा लाया और अपने कमरे में बैड के नीचे रख दिया.

बेसमेंट में खटपट की आवाज सुन कर अंबेश की मम्मी बबीता देवी की नींद खुल गई थी. वह सीधे बेटे के कमरे में चली आईं.

”क्या बात है अंबेश, नींद नहीं आ रही?’’

”नींद कैसे आएगी मम्मी, एक तरफ तुम्हारी बहू जिद कर रही है और दूसरी तरफ तुम और बाबूजी एक ही बात पर अड़े हो.’’

”तो हम क्या करें… हमें तो इसी परिवार और समाज में रहना है. तुम्हारे बाबूजी की गांव में इज्जत है. हमारे खानदान में आज तक किसी ने दूसरी बिरादरी में शादी नहीं की…तो फिर हम कैसे तुम्हारी पत्नी को बहू मान लें. उस से भी बड़ी बात ये कि वह दूसरे धर्म की है.’’

”दूसरे धर्म की है तो क्या हुआ मम्मी, अब जमाना बदल गया है. जातिधर्म के चलते क्या मैं अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ दूं?’’

”…तो हम उसे स्वीकार कर लें? हम से भी यह कभी नहीं होगा,’’ नाराज होती हुई अंबेश की मम्मी बोलीं.

”जो आप से हो सकता है, वह तो कर दो.’’ अंबेश ने भी नाराजगी के साथ तेज आवाज में कहा.

”क्या करूं मैं?’’ मम्मी बोली.

”मुझे पैसे दे दो, उस से मैं कोलकाता में अपने घर की मरम्मत करवाऊंगा.’’ अंबेश बोला.

”कहां से पैसे दूं…और किसलिए दूं, जब मैं उसे बहू ही नहीं मानती.’’ मां बोली.

”गांव की जमीन बेच दो, वो तो आज नहीं कल मेरी ही है.’’ अंबेश बोला.

”जमीन बेच दें और उस के बाद हम भीख मांगें!’’ मां बोली.

”मुझे पैसा निकालना अच्छे से आता है,’’ अंबेश गुस्से में आंखें लाल करता हुआ बोला.

”लगता है उस हरामजादी के चलते पागल हो गया है तू,’’ मां भी गुस्से में बोली और कमरे से बाहर जाने के लिए मुड़ी.

मांबाप की कर दी हत्या

पत्नी को मम्मी द्वारा दी गई गाली सुन कर अंबेश का चेहरा तमतमा गया. वह बैड के नीचे झुका और लोहे के बट्टे से मम्मी पर पीछे से हमला कर दिया. अचानक हुए इस हमले से मम्मी बबीता की चीख निकल गई और वह वहीं गिर पड़ीं. उन के सिर से खून बहने लगा था. अंबेश ने उन्हें उठाने के बजाय बट्टे से उन पर और 3-4 वार कर दिए. इस दौरान हुए शोरगुल को सुन कर दूसरे कमरे से उस के पापा श्याम बहादुर भी आ गए. उन्होंने वहां का दृश्य देखा तो सन्न रह गए. मानो उन्हें काठ मार गया हो. उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी.

अगले पल हाथ में पकड़े मोबाइल से वह कहीं कौल करने लगे. अंबेश अपने पापा को कौल करता देख घबरा गया. उन के हाथ से उस ने मोबाइल झपट लिया, जिस से श्याम बहादुर लडख़ड़ा गए और वापस अपने कमरे की ओर लौटने लगे. किंतु पलक झपकते ही अंबेश ने उन के गले में एक रस्सी फंसा कर खींच लिया और उन्हें वहीं गिरा दिया. उस वक्त उस के दिमाग में हिंसा की सनक सवार थी. वह आक्रामक बना हुआ था. उस ने तुरंत लोहे के खून सने बट्टे को उठाया और दनादन अपने पापा के सिर पर कई वार कर दिए.

श्याम बहादुर भी अपनी पत्नी की तरह कुछ पल में ही लहूलुहान जमीन पर धराशाई पड़े थे. उन्हें कुछ पल तक अंबेश निहारता रहा. उस के बाद बाथरूम में गया और खून से सने अपने हाथपैर धोए. अगले रोज अंबेश की बहन वंदना ने हर रोज की तरह अपनी मम्मी बबीता को कौल किया, लेकिन उन का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था. उस के बाद वंदना ने अपने पापा के नंबर पर कौल की. वह भी नौट रिचेबल मिला. उसे चिंता तो हुई, लेकिन उस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया और अपने दैनिक घरेलू काम में लग गई.

बेटी ने शुरू की तलाश

दोपहर बाद उस ने फिर से मम्मी और पापा को कौल की. उस वक्त भी दोनों में से किसी से बात नहीं हो पाई. उस की चिंता बढ़ गई थी. उस ने न चाहते हुए भी भाई अंबेश को कौल कर दी. उसे अपने भाई की मम्मीपापा से आए दिन होने वाले झगड़े के बारे में मालूम था. इस कारण वह उस से कम ही बात करती थी. भाई का फोन भी स्विच्ड औफ मिला. रेलवे से रिटायर होने के बाद श्याम बहादुर (65 वर्ष) अपनी पत्नी बबीता (63 वर्ष) के साथ अहमदपुर गांव के 3 मंजिला मकान में रहते थे. श्याम बहादुर की 3 बेटियां और एक बेटा था. बेटा अंबेश अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ कोलकाता में रहता था.

 

उस ने बीटैक की पढ़ाई की थी और पिछले 3 महीने से वह अकेला ही घर चला आया था. घर में मम्मीपापा और बेटा ही थे. उस की पत्नी मुसलिम समाज की है, जो कोलकाता की रहने वाली है. उसे ले कर अंबेश की अपनी मम्मी से हमेशा नोकझोंक हो जाती थी. मम्मी उसे किसी भी सूरत में बहू स्वीकारने को राजी नहीं थी. उस का नाम आते ही वह भद्दीभद्दी गालियां बकने लगती थीं. बेटे पर बहू को छोडऩे का दबाव बनाए हुए थीं. जबकि अंबेश उस के लिए मम्मीपापा से पैसे मांगता रहता था.

उस रात इसी बात को ले कर मम्मी के साथ ज्यादा बहस हो गई थी. इसे से पहले वह दिन में जमीन और पैसे के लिए पापा से भी उलझ पड़ा था. इस कारण अंबेश गुस्से से भरा हुआ था, जिस का अंजाम यह हुआ कि उस ने पैसे और जमीन के विवाद में अपने मम्मीपापा की नृशंस हत्या कर दी थी. उस के बाद वह फरार हो गया था. वंदना द्वारा मम्मीपापा को फोन मिलाते हुए पूरा दिन निकल गया था. वह जौनपुर में रहती थी. अगले रोज मायके जाने की सोच कर किसी तरह से रात गुजारी. गांव जाने से पहले उस की बात भाई अंबेश से हो गई.

उस से मालूम हुआ कि मम्मीपापा गुस्से में कहीं चले गए हैं. वह उन्हें तलाशने के लिए बनारस चला आया है. इस से वंदना को थोड़ी राहत मिली, लेकिन मम्मीपापा के कहीं गुम हो जाने की अलग चिंता सताने लगी. वह बेचैन हो गई. भाई से न तो मम्मीपापा की सही जानकारी मिल पा रही थी और न ही उन से फोन पर बात हो रही थी. भाई का फोन भी कभी स्विच्ड औफ मिलता तो कभी नौट रिचेबल आता. मम्मीपापा से तो बात किए हुए 4 दिन बीत गए थे. आखिरकार उस ने 13 दिसंबर, 2025 को जाफराबाद थाने जा कर मम्मीपापा और भाई की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करवा दी.

इस शिकायत पर जाफराबाद थाने की पुलिस पहले श्यामलाल के घर के पते पर गई. वहां कोई नहीं मिला. घर का मेन गेट बाहर से लौक था. पड़ोसियों से मालूम हुआ कि यह गेट तो 9 दिसंबर से ही बंद है.

पकड़ में आया अंबेश

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के सिंधौरा थाना क्षेत्र की कटौना गांव निवासी वंदना द्वारा थाने में दर्ज करवाई गई शिकायत में अनहोनी की आशंका जाहिर की गई थी. जाफराबाद थाने की पुलिस ने पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से लेते हुए 3 टीमें गठित कीं, जिस के बाद जांच शुरू हुई. अंबेश समेत  श्याम बहादुर और बबीता के फोन नंबरों को सर्विलांस पर लगाया गया और उन के पिछले कौल की डिटेल्स निकलवाई गई. जल्द ही पुलिस को सफलता मिल गई और पुलिस ने 15 दिसंबर, 2025 को अंबेश को तलाश कर लिया. वह अपने घर के पास ही मिल गया.

लापता मम्मीपापा के बारे में पूछने पर उस ने सीधे तौर पर कुछ बताने से इनकार कर दिया. उस की बातों से पुलिस समझ गई कि वह अपने मम्मीपापा के बारे में बताने से बच रहा है. पुलिस को उस की बातें संदिग्ध लगीं. फिर उस से सख्ती से पूछताछ की गई. इस के बाद उस ने चौंकाने वाला खुलासा किया, जिस का किसी को अंदेशा नहीं था. जब उस ने कहा कि उस के मम्मीपापा अब इस दुनिया में नहीं हैं, उन की उस ने हत्या कर दी है, तब पुलिस समेत फेमिली वाले भी सन्न रह गए. बहन वंदना की स्थिति विक्षिप्तावस्था की हो गई. वह अपने पेरेंट्स की बड़ी बेटी थी और अंबेश दूसरे नंबर का.

पुलिस ने पूछताछ की तो उस ने मम्मीपापा की हत्या की बात स्वीकार की. हत्या का कारण बताया कि 8 दिसंबर, 2025 की रात करीब 8 बजे पैसों के लिए उस का पेरेंट्स से झगड़ा हुआ था. वह आपा खो बैठा और उन पर बट्टे से हमला कर दिया. उन के शवों को ठिकाने लगाने के बारे में उस ने आगे जो बताया, उस से उस की हैवानियत का पता चला. उस ने अपने पेरेंट्स की न केवल नृशंस हत्या कर डाली थी, बल्कि उन के शवों को ठिकाने लगाने के लिए उन को कई टुकड़ों में काट डाला था.

दोनों शवों के कटे टुकड़ों को बेसमेंट में रखे सीमेंट के बोरे में भर दिया था. यह सब करने में उसे कोई रुकावट नहीं आई, क्योंकि उस वक्त घर में वह अकेला था. फिर उन्हें ठिकाने लगाने के लिए बोरे को कार में रखा. यह वही कार थी, जो उस के पेरेंट्स ने उसे खरीद कर दी थी. कार अपने घर से 8 किलोमीटर दूर गोमती नदी के बेलाव घाट ले कर गया था. वहां उस ने लाश के सभी बोरे नदी में फेंक दिए थे. किसी को शक न हो, इसलिए वह घर वापस आ गया था.

इस के बाद खुद को बचाने के लिए अगले दिन 9 दिसंबर को पेरेंट्स को खोजने का नाटक करने लगा. उस ने उन के लापता होने की खबर अपने परिचितों, रिश्तेदारों को भी दी. खोजबीन में जुटा अंबेश 12 दिसंबर को खुद लापता हो गया. इधरउधर घूमतेघूमते वह वाराणसी चला गया, जहां उस ने गंगा स्नान किया और कुछ समय घाट पर गुजारने के बाद घर चला आया. इस बीच खोजबीन में जुटी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पुलिस के सवालों में वह इस कदर उलझ गया कि पेरेंट्स की हत्या की पूरी कहानी बता दी.

मृतक श्याम बहादुर रेलवे में लोको पायलट थे. वह मूलरूप से थाना गद्दी के खरसेनपुर गांव के रहने वाले थे, लेकिन वह अपनी ससुराल में आ कर बस गए थे. वह रामनारायण के 3 दामादों में से एक थे. अंबेश के बयान के बाद पुलिस शवों की गोमती नदी में तलाश करवाने में जुट गई थी. इस के लिए 15 गोताखोर लगाए गए. इस खुलासे के बाद पुलिस ने हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कर ली. मुख्य और एकमात्र आरोपी अंबेश कुमार की निशानदेही पर शवों की बरामदगी का प्रयास किया गया. उस ने अपने बारे में बताया कि उस ने 5 साल पहले कोलकाता की एक महिला से कोविड काल के दौरान प्रेम विवाह किया था, जो वहीं पर ब्यूटीपार्लर चलाती थी.

इकलौते बेटे के इस तरह लव मैरिज करने से उस के मम्मीपापा दुखी रहते थे. यह भी बताया जाता है कि पेरेंट्स का अपनी तीनों बेटियों के प्रति झुकाव अधिक रहता था. इसी वजह से अंंबेश का उन से कई बार विवाद हो चुका था. गांव के लोग दबी जुबान से यह भी कहते पाए गए कि अंबेश अपनी पत्नी के साथ ही पिता के रुपए ले कर शिफ्ट होना चाहता था.

वह 4 भाईबहनों में दूसरे नंबर पर था. सभी बहनों की शादी हो चुकी है. ननिहाल में अंबेश कुमार की अच्छी जिंदगी गुजरती थी. उस ने पिता के पैसों से एक कार भी खरीदी थी.  कार से चलने का शौकीन था. पुलिस के मुताबिक इसी कार में रख कर उस ने अपने पेरेंट्स के शव को ठिकाने लगाया था. अंबेश के अनुसार वह पत्नी द्वारा पैसे की मांग और मम्मीपापा द्वारा दूसरे धर्म की पत्नी को स्वीकार न किए जाने से मानसिक तनाव में था. पैसे के लिए ही बीते 3 माह से घर आया हुआ था. पैसों को ले कर घर पर बात की. पेरेंट्स ने उसे पैसे देने से इंकार कर दिया. इसी बात से 8 दिसंबर की रात वह उग्र हो गया. उग्र हो कर उस ने लोहे के बट्टे से दोनों के सिर पर हमला कर डाला.

घर में कंस्ट्रक्शन के काम के लिए बेसमेंट में आरी और अन्य औजार रखे हुए थे. आरी से दोनों शवों को 3-3 टुकड़ों में काट दिया. फिर उन टुकड़ों को 6 सीमेंट की बोरियों में भरा. इस के बाद उस ने अपने पेरेंट्स के ही कपड़ों से ही फर्श को साफ किया.

कथा लिखे जाने तक अंबेश कुमार न्यायिक हिरासत में था और बरामद शव के टुकड़ों से उस की डीएनए जांच की तैयारी की जा रही थी. Crime News

 

 

True Crime Story: साक्षी की साजिश में समर

 True Crime Story: प्रेमी समर खान के कहने पर साक्षी ने राहुल अग्रवाल से शादी तो कर ली, लेकिन ससुराल में उस का मन नहीं लगा. इसी बीच ऐसा क्या हुआ कि वह लुटेरी दुलहन बन कर प्रेमी समर के साथ जेल पहुंच गई.

उत्तर प्रदेश का एक जिला है संभल, जो अपने आप में अनेक गाथाओं को समेटे हुए है. इस के अलावा इस शहर में सींग के सामान बनाने का बहुत बड़ा उद्योग भी फैला हुआ है. जिस की वजह से इस की विश्व भर में पहचान है. इसी ऐतिहासिक शहर के गवां मोहल्ले के गिरीश चौक पर दीपक अग्रवाल अपने परिवार के साथ रहते थे. उन की गिनती पुराने रईसों में होती है. उन की रासायनिक खाद की दुकान है और गवां में एक पैट्रोल पंप भी है.

दुकान पर उन का बेटा राहुल बैठता था, जबकि वह खुद पैट्रोल पंप को देखते थे. दोनों ही सुबह घर से निकलने के बाद देर रात को ही घर लौटते थे. रोजाना की तरह 23 मई, 2015 को भी वे अपनेअपने काम पर निकल गए. उस के बाद घर पर राहुल की भतीजी प्रियंका और बीवी साक्षी थीं. दोपहर करीब 12 बजे किसी ने उन के घर का दरवाजा खटखटाया. साक्षी ने दरवाजा खोला तो सामने 4 युवक खड़े थे. इस से पहले कि साक्षी उन से कुछ पूछती, वे चारों अंदर घुस आए और अंटी से तमंचे निकाल कर साक्षी को चुप रहने की हिदायत दी. हथियार देख कर साक्षी डर गई. भतीजी प्रियंका उस समय कमरे में बैठी टीवी देख रही थी. बदमाशों ने प्रियंका को भी चुप रहने की धमकी दी और उस के हाथपैर बांध दिए.

इस के बाद बदमाशों ने साक्षी से अलमारियों की चाबी मांगी. साक्षी ने बताया कि चाबियां ऊपर के कमरे में हैं तो 2 बदमाश साक्षी को खींच कर ऊपर ले गए और 2 प्रियंका के पास ही खड़े रहे. डर की वजह से साक्षी ने चाबियां बदमाशों के हवाले कर दीं. चाबियां पाने के बाद उन्होंने साक्षी के भी हाथपैर बांध कर डबलबैड पर डाल दिया, साथ ही धमकी दी कि शोर मचाया तो गोली से उड़ा दिया जाएगा. चाबियां मिलते ही बदमाशों ने अलमारियों से नकदी, फोन, लैपटौप, ज्वैलरी आदि लूट ली. कुछ ही देर में लाखों रुपए का सामान समेट कर बदमाश वहां से चले गए. जाते समय वे प्रियंका का कमरा बाहर से बंद करते गए.

करीब एक घंटा बाद साक्षी ने किसी तरह खुद को खोला और डरते हुए नीचे आईं. नीचे के कमरे में बाहर से कुंडी लगी थी. कुंडी खोल कर साक्षी ने भतीजी प्रियंका को भी खोला. साक्षी ने लूट की सूचना सब से पहले अपने पति राहुल और ससुर दीपक अग्रवाल को फोन द्वारा दी. उस समय दीपक अग्रवाल अपने पैट्रोल पंप पर थे और राहुल अग्रवाल अपनी खाद की दुकान पर. घर पर लूट होने की सूचना मिलते ही दीपक अग्रवाल और राहुल के होश उड़ गए. दोनों तुरंत अपने घर की ओर चल दिए. पति और ससुर को खबर करने के बाद साक्षी प्रियंका को ले कर घर के बाहर आ गई और अपने यहां लूट होने का शोर मचा दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए.

तब तक दीपक अग्रवाल बेटे राहुल के साथ घर पहुंच गए. दोनों ने सब से पहले यह देखा कि बदमाश घर व अलमारियों से क्याक्या सामान ले गए हैं? जांच करने पर पता चला कि घर से सोनाचांदी की ज्वैलरी, नकदी, चांदी के सिक्के, फोन, लैपटौप आदि गायब थे. उन के यहां से बदमाश करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए थे. दिनदहाड़े लाखों रुपए की लूट होने की बात सुन कर हर कोई हैरान था. उसी दौरान किसी ने इस लूट की खबर फोन द्वारा थाना रजपुरा को दे दी. थाना वहां से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव मय फोर्स के दीपक अग्रवाल के घर पहुंच गए. उन्होंने कमरों का निरीक्षण किया तो अलमारियां खुली हुई थीं और उन का सामान आदि फैला हुआ था.

थानाप्रभारी ने इस की सूचना अपने उच्च अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलते ही एसपी अतुल सक्सेना, एएसपी कमलेश दीक्षित भी वहां पहुंच गए. उधर शहर के व्यवसाइयों को जब पता चला कि दीपक अग्रवाल के यहां दिनदहाड़े लूट हो गई है तो तमाम व्यवसाई भी उन के घर पहुंचने लगे. व्यापारियों का जमावड़ा होने से एसपी अतुल सक्सेना को चिंता होने लगी कि कोई हंगामा न खड़ा हो जाए, इसलिए उन्होंने बहजोई, धनारी, हयातनगर थानों की फोर्स के अलावा क्राइम ब्रांच को भी बुला लिया. दीपक अग्रवाल ने पुलिस को बताया कि बदमाश नकदी सहित करीब 30 लाख रुपए का सामान ले गए हैं. देखा जाए तो यह बहुत बड़ी लूट थी.

पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ डराधमका कर लूट करने की रिपोर्ट दर्ज कर ली और बदमाशों की तलाश के लिए पुलिस अधीक्षक के आदेश पर शहर के मुख्य मार्गों पर बैरिकेड्स लगा कर चैकिंग शुरू कर दी. लेकिन पुलिस को सफलता नहीं मिली. लूट के इस मामले को सुलझाने के लिए एसपी अतुल सक्सेना ने थाना रजपुरा के थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव, धनारी के थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह यादव के अलावा क्राइम ब्रांच और साइबर सेल की टीम को भी लगा दिया. टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों ने गहनता के साथ केस की छानबीन शुरू कर दी.

दीपक अग्रवाल का घर गली के अंतिम छोर पर था. ऐसी सुरक्षित जगह पर कोई अनजान आदमी आसानी से नहीं पहुंच सकता था. विचारविमर्श के बाद पुलिस टीम इस नतीजे पर पहुंची कि इस वारदात को किसी जानकार ने ही अंजाम दिया होगा. दीपक अग्रवाल के पैट्रोल पंप और खाद की दुकान पर काम करने वाले सभी लोगों और नौकरों से पुलिस ने पूछताछ की. उन के घर पर काम करने वाली आया से भी पूछताछ की गई, परंतु पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला.

उधर संभल शहर के अलावा सीमावर्ती कस्बे बहजोई के व्यापारियों के मन में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था. व्यापारियों के एक प्रतिनिधि मंडल ने एसपी से मुलाकात कर चेतावनी दी कि जल्द केस न खुला तो वे आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे. एसपी अतुल सक्सेना ने उन्हें भरोसा दिलाया कि जिले के तेजतर्रार पुलिस अधिकारी केस को सुलझाने में लगे हैं और जल्द ही केस खुलने की संभावना है. व्यापारियों को आश्वासन दे कर उन्होंने उन्हें संतुष्ट तो कर दिया, लेकिन उन के ऊपर भी केस जल्द खुलने का दबाव बढ़ गया. उन्होंने टीम में शामिल सभी पुलिस अधिकारियों की मीटिंग बुलाई और कुछ दिशानिर्देश देते हुए केस को जल्द से जल्द खोलने को कहा.

इस के बाद सभी पुलिस अधिकारी अलगअलग दृष्टिकोण से मामले की जांच करने लगे. क्राइमब्रांच के इंसपेक्टर रूप सिंह बघेल, साइबर सेल के प्रभारी संतोष कुमार त्यागी ने परिवार के सभी सदस्यों के मोबाइल फोन नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाईं. उन्होंने काल डिटेल्स का अध्ययन किया तो दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी के फोन से एक नंबर पर ज्यादा बातचीत करने की बात सामने आई. जिस नंबर पर साक्षी अकसर बात करती थी, वह नंबर बरेली के कस्बा आंवला के रहने वाले समर खान का निकला.

पुलिस ने दीपक अग्रवाल से पूछा कि आंवला में क्या उन के कोई रिश्तेदार वगैरह रहते हैं?

‘‘हां, आंवला में हमारे बेटे राहुल की ससुराल है. लेकिन आप यह क्यों पूछ रहे हैं? इस घटना से उन का क्या मतलब?’’ दीपक अग्रवाल बोले.

थानाप्रभारी योगेंद्र कृष्ण यादव ने एक फोन नंबर उन्हें देते हुए कहा, ‘‘आप की बहू साक्षी की इस फोन नंबर पर वक्तबेवक्त बहुत बातें होती थीं. हम यह जानना चाहते हैं कि यह नंबर किस का है.’’

दीपक अग्रवाल और उन के बेटे के पास साक्षी के मायके के सभी लोगों के नंबर उन के फोन में सेव थे. थानाप्रभारी ने जो नंबर उन्हें दिया था, उस के बारे में वह अनजान थे. इसलिए राहुल ने साक्षी को बुला कर उस फोन नंबर के बारे में पूछा तो वह बोली, ‘‘यह नंबर आंवला के ही हमारे पापा के जानकार समर खान का है. यह हमारे घर के सदस्य की तरह हैं. मैं ने लूट की खबर देने के लिए इन्हें फोन किया था.’’

यह बात मान भी ली जाए कि घटना वाले दिन साक्षी ने उसे घटना की जानकारी देने के लिए फोन किया होगा, लेकिन इस से पहले वक्तबेवक्त यह उस से क्या बातें करती थी. यह बात थानाप्रभारी की समझ में नहीं आ रही थी. उस समय उन्होंने दीपक अग्रवाल और उन की बहू साक्षी से और ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा, बल्कि उन्होंने उसी शख्स की जांच करना जरूरी समझा, जिस से साक्षी ज्यादा बातें करती थी.

आंवला के किला मोहल्ला के जिस समर खान से साक्षी बात करती थी, सादा वेश में पुलिस टीम वहां पहुंच गई. 2 पुलिस वाले किला मोहल्ले के लोगों से समर खान के बारे में जानकारी जुटाने लग गए तो टीम के बाकी सदस्य समर खान के घर चले गए. साक्षी ने जिस तरह समर को अपने पिता का जानकार बताया था, उस से पुलिस यही समझ रही थी कि समर खान अधेड़ उम्र का होगा. लेकिन वह तो 25-26 साल का युवक निकला. स्थानीय लोगों से उन दोनों पुलिसकर्मियों को चौंकाने वाली बात पता चली. लोगों ने बताया कि समर खान एक शातिर इंसान है, उस का आंवला की ही साक्षी नाम की एक लड़की से कई सालों से चक्कर चल रहा है. दोनों शादी करने वाले थे.

साक्षी के घर वालों को इस प्रेमप्रसंग का जब पता चला तो उन्होंने संभल के राहुल अग्रवाल के साथ आननफानन में उस की शादी कर दी. उधर पुलिस टीम को समर खान घर पर नहीं मिला. लेकिन उस के बारे में पुलिस को जो जानकारी मिली थी, वह बहुत महत्त्वपूर्ण थी. समर खान के न मिलने पर पुलिस टीम वापस संभल लौट आई. उस का फोन नंबर पुलिस के पास था ही. उस फोन नंबर को सर्विलांस पर लगाने पर उस की लोकेशन अनूप शहर रोड की आ रही थी. पुलिस टीम फटाफट अनूप शहर रोड पर पहुंच कर नाकेबंदी लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी. उसी समय एक होंडा सिटी कार आती दिखी. पुलिस को देखते ही ड्राइवर ने कार की गति बढ़ा दी. कुछ दूर पीछा करने के बाद पुलिस ने उस कार को रोक लिया.

उस कार में ड्राइवर के अलावा एक आदमी और बैठा था. पूछताछ करने में उन दोनों ने अपने नाम क्रमश: समर खान और विकास नारंग उर्फ विक्की बताए. समर खान नाम सुनते ही पुलिस समझ गई कि यह वही है, जिस की उन्हें तलाश थी, लिहाजा उन दोनों को पूछताछ के लिए पुलिस बहजोई थाने ले आई. समर खान ने अपना जो मोबाइल नंबर बताया था, वह वही निकला, जिस पर साक्षी की बातें होती थीं. पुलिस टीम ने समर खान को हिरासत में लेने वाली बात एसपी अतुल सक्सेना और एएसपी कमलेश दीक्षित को बताई तो दोनों पुलिस अधिकारी थाना बहजोई पहुंच गए. उन की मौजूदगी में समर खान से पूछताछ की गई तो उस ने व्यवसाई दीपक अग्रवाल के घर लूट करने की बात स्वीकार ली.

इस के अलावा उस ने चौंकाने वाली बात यह बताई कि यह वारदात उस ने अपनी प्रेमिका साक्षी के कहने पर की थी. लूट की साजिश में व्यवसाई दीपक अग्रवाल की बहू साक्षी का नाम सामने आने पर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए, क्योंकि संभ्रांत परिवार में इस तरह की यह पहली वारदात थी. पुलिस ने दीपक अग्रवाल, उन के बेटे राहुल और बहू साक्षी को भी थाने बुला लिया. थाने में समर खान को देख कर साक्षी घबरा गई. सब के सामने पुलिस ने समर खान से पूछताछ की तो समर खान ने वारदात को अंजाम देने के पीछे की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

साक्षी उत्तर प्रदेश के जिला बरेली के कस्बा आंवला में पक्का कटरा मोहल्ले के रहने वाले प्रदीप कुमार की बेटी थी. पेशे से वह भी बिजनेसमैन थे. बात करीब 6 साल पुरानी है. उस समय 13 साल की साक्षी आंवला के ही एक स्कूल में पढ़ रही थी. उसी स्कूल में पढ़ने वाली रुकैया नाम की एक लड़की से उस की गहरी दोस्ती थी. रुकैया भी पक्का कटरा मोहल्ले में रहती थी.

रुकैया का एक दोस्त था समर खान, जो आंवला के ही किला मोहल्ले में रहता था. एक दिन रुकैया ने साक्षी की मुलाकात समर से कराई तो साक्षी भी उस की दोस्त बन गई. समर खान कक्षा 8 में पढ़ता था. साक्षी को देख कर वह बहुत प्रभावित हुआ. उस पर अपना प्रभाव जमाने के लिए शातिर दिमाग समर ने खुद को एक बड़े घर का बताया. वह बताता था कि उस के पिता का हार्डवेयर का बहुत बड़ा बिजनैस है. उस ने साक्षी को अपनी बातों के जाल में फांस कर अपना दोस्त बना लिया था.

जैसेजैसे समर खान और साक्षी की उम्र बढ़ती गई, उन की सोच में बदलाव आता गया. धीरेधीरे उन की दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए थे. इतना ही नहीं, दोनों ने शादी करने का फैसला भी कर लिया. इसी बीच साक्षी के घर वालों को बेटी के संबंधों की जानकारी हो गई. उन्हें बदनामी का डर सताने लगा. बीएससी करने के बाद साक्षी उस समय एयरहोस्टेस का कोर्स कर रही थी. उन्हें उस की शादी की इतनी जल्दी होने लगी कि उन्होंने उस का एयरहोस्टेस का कोर्स पूरा होना जरूरी नहीं समझा. वह उस के लिए लड़का तलाशने लगे. किसी ने उन्हें संभल के गवां मोहल्ले में रहने वाले बिजनेसमैन दीपक अग्रवाल के बेटे राहुल अग्रवाल के बारे में बताया.

दीपक अग्रवाल का गवां में एक पैट्रोल पंप था. जबकि राहुल रासायनिक खाद की दुकान संभालता था. प्रदीप अग्रवाल ने राहुल के बारे में छानबीन की तो वह उन्हें पसंद आ गया. इस बारे में उन्होंने दीपक अग्रवाल से बात की. दोनों तरफ से बातचीत होने के बाद 17 अप्रैल, 2015 को साक्षी और राहुल की शादी होने का दिन भी मुकर्रर कर दिया गया. आननफानन में तय हुई शादी के बात साक्षी को पता लगी तो वह परेशान हो गई. वह तो समर से शादी करना चाहती थी. उस ने समर खान को यह जानकारी दे कर जल्द से जल्द कोर्टमैरिज करने के लिए कहा.

लेकिन समर खान ने पैसों का हवाला देते हुए कहा, ‘‘साक्षी इस समय मैं मजबूर हूं. व्यापार में काफी घाटा हो गया है, इसलिए पैसे न होने की वजह से मैं कोर्टमैरिज नहीं कर सकता. ऐसा करो फिलहाल जिस लड़के से तुम्हारी शादी हो रही है, कर लो. जैसे ही पैसों का इंतजाम हो जाएगा, तुम्हें मुंबई ले कर चला जाऊंगा.’’

न चाहते हुए भी साक्षी ने समर खान की बात मान ली. निर्धारित 17 अप्रैल, 2015 को धूमधाम के साथ साक्षी की राहुल के साथ शादी हो गई. इस तरह बेमन से वह पिया के घर चली गई. लेकिन पति राहुल अग्रवाल ने प्यार के बूते साक्षी का दिल जीत लिया था. कुछ दिनों तक तो वह राहुल के साथ खुश रही, लेकिन बाद उसे ससुराल में बोरियत महसूस होने लगी. राहुल सुबह 11 बजे खाना खा कर अपनी दुकान पर चला जाता था और रात 8-9 बजे घर लौटता था. साक्षी का अकेले मन नहीं लगता था. वह खुले विचारों वाली युवती थी. घूमनाफिरना, बड़ेबड़े होटलों में खाना खाना, उस की आदत थी.

शादी से पहले उस के मातापिता आंवला के बजाय शौपिंग कराने के लिए उसे बरेली ले जाते थे. तब उसे अच्छे होटल में खाना भी खिलाते थे. जबकि राहुल उसे बाहर घुमाने तक नहीं ले जाता था. वह घर में खाली पड़ी बोर होती रहती थी. उधर साक्षी की शादी के बाद समर खान पैसे कमाने के लिए मुंबई चला गया था. वह साक्षी को भूला नहीं था. इस बीच उस की अपनी प्रेमिका से फोन पर बात होती रहती थी. वह साक्षी को सुनहरे सपने दिखाता था. एक महीने बाद ही वह मुंबई से आंवला आ गया. साक्षी अपने पति राहुल से नाराज थी. वह उस से कहीं घूमनेफिरने को कहती तो वह दुकान पर बिजी होने की बात कह कर उस की बात को टाल देता था.

ऐसे में साक्षी को प्रेमी समर खान की याद आती. वह समर से कहती थी कि तुम मुझे इस नरक से निकालो. मेरे पिता ने मुझे गांव में डाल दिया है. मैं गाय के खूंटे की तरह बंध कर नहीं रहना चाहती. समर बारबार पैसे न होने की बात कहता. तब एक दिन साक्षी ने उस की समस्या का समाधान करते हुए कहा, ‘‘समर, मेरी ससुराल में बहुत माल है. मेरी ससुराल के लोग अपनेअपने कारोबार में व्यस्त हैं. सुबह निकल जाते हैं और देर शाम को ही वापस आते हैं. अलमारियों की सारी चाबियां मेरे पास ही रहती हैं. तुम किसी दिन पूर्वांह्न 11 बजे के बाद यहां आ कर सारा माल ले जाओ. मैं कह दूंगी लुटेरे ले गए हैं.’’

साक्षी की यह योजना समर को पसंद आ गई.  समर जानता था कि साक्षी की शादी एक खातेपीते परिवार में हुई है. उस के यहां माल भी काफी होगा. उस के यहां लूट की वारदात को अंजाम देना उस के अकेले के बस का नहीं था. उस ने इस बारे में अपने अपराधी किस्म के दोस्तों विकास उर्फ विक्की, सोनू और नीरज से बात की. पैसे के लालच में वे सब उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. फिर योजना के मुताबिक 15 मई, 2015 को समर खान और उस के दोस्तों ने राहुल के घर की रेकी की.

योजना को अंजाम देने के लिए एक हफ्ते बाद 23 मई, 2015 को दिन के 12 बजे के करीब वे चारों राहुल के घर पहुंच गए. दरवाजे पर दस्तक देने पर साक्षी ने दरवाजा खोला. उन्होंने दिखावे के लिए उसे तमंचे से डरा दिया. राहुल की भतीजी प्रियंका उस समय टीवी देख रही थी. साक्षी ने इशारे से बता दिया था कि वह अंदर है. तब उन चारों लोगों ने प्रियंका को पकड़ कर उस के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया. 2 लोग उस के पास ही खड़े रहे.

मारनेपीटने का नाटक कर 2 बजे साक्षी को ऊपर के कमरे में ले गए. तभी साक्षी ने अलमारियों की चाबियां समर को दे दीं. अलमारियों से उन्होंने ज्वैलरी, चांदी के सिक्कों के अलावा नकदी भी निकाल ली. एक अलमारी का ताला उन से नहीं खुल रहा था तो साक्षी ने अपने हाथों से वह ताला खोल कर सोनेचांदी के जेवर निकाल कर उन्हें दे दिए थे. दिखावे के लिए समर ने साक्षी के हाथपैर बांध कर बैड पर डाल दिया था. कुछ ही देर में वे ज्वैलरी, नकदी, लैपटौप, मोबाइल आदि सहित करीब 30 लाख रुपए का माल ले गए.

कुछ देर बाद साक्षी ने अपने पति राहुल, ससुर आदि को घटना की जानकारी दी व मोहल्ले में शोर मचा दिया कि बदमाश लूटपाट कर के सारा सामान ले गए. दीपक अग्रवाल और राहुल को इस बात का विश्वास ही नहीं हो रहा था कि साक्षी अपने ही घर में ऐसा कर सकती है. लेकिन अभियुक्त समर खान के स्वीकारने के बाद वे कुछ कर भी नहीं सकते थे. पुलिस ने समर की निशानदेही पर उस की होंडा सिटी कार से दीपक के यहां से लूटा गया लैपटौप, 38 चांदी के सिक्के, 80 हजार रुपए नकद, मोबाइल फोन, 2 तमंचे और कारतूस बरामद किए. पुलिस ने वह होंडा सिटी कार भी बरामद कर ली. साक्षी को भी उन्होंने उसी समय गिरफ्तार कर लिया.

पुलिस ने दिनांक 3 जून, 2015 को तीनों अभियुक्तों समर खान, साक्षी व विकास नारंग उर्फ विक्की को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. अन्य आरोपी सोनू और नीरज कथा लिखे जाने तक गिरफ्तार नहीं हो सके थे. True Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, रुकैया परिवर्तित नाम है

 

UP Crime: मामूली बात पर

UP Crime: अरविंद और उन का परिवार मिलनसार स्वभाव का था. उन्होंने पड़ोस में रहने वाले एक युवक विपुल को इसलिए अपनी दुकान किराए पर देने से मना कर दिया कि किराए के लेनदेन से संबंध खराब हो सकते हैं. लेकिन विपुल ने इसे गलत तरीके से लेते हुए मन में रंजिश पाल ली. इस का नतीजा भी बहुत भयानक निकला.

6 सितंबर 2015 की शाम को अरविंद शर्मा बाहर से घर लौटे तो उन की पत्नी पूनम के चेहरे पर

परेशानी के भाव और आंखों में चिंता झलक रही थी. यह देख कर अरविंद ने पूछा, ‘‘क्या हुआ पूनम, कुछ परेशान लग रही हो?’’

‘‘परेशानी की ही बात है. लक्ष्य को बहुत देर हो गई. साइकिल ले कर गया था, अभी तक वापस नहीं आया.’’

‘‘इधर उधर घूम रहा होगा आ जाएगा.’’ वह हंसते हुए बोले.

‘‘पता नहीं क्यों मेरा दिल घबरा रहा है.’’ इस पर अरविंद पत्नी को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘घबराओ नहीं, थोड़ा इंतजार कर लो, वह आ जाएगा.’’

पूनम चिंतामग्न हो कर बैठ गई.

अरविंद मूलरूप से उत्तर प्रदेश के शामली जनपद के रहने वाले थे. उन के पिता श्यामलाल शर्मा सेवानिवृत्त शिक्षक थे. कई साल पहले अरविंद का परिवार शामली से लगे मुजफ्फरनगर के थाना सिविल लाइन क्षेत्र की इंदिरा कालोनी में आ कर बस गया था. अरविंद खुद भी बेसिक शिक्षा विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे. उन के परिवार में पत्नी पूनम के अलावा 3 बच्चे थे. 2 बेटियां वर्णिका, वैष्णवी और 11 साल का बेटा लक्ष्य. लक्ष्य शहर के डीएवी पब्लिक स्कूल में कक्षा 6 में पढ़ता था. परिवार में इकलौता बेटा होने की वजह से वह सब का लाडला था. श्यामलाल शर्मा परिवार को एकसूत्र में बांधे हुए थे. संस्कारी और मिलनसार परिवार था. व्यवहारकुशल श्यामलाल व उन के बेटे अरविंद को मोहल्ले में इज्जत की नजरों से देखा जाता था.

अरविंद सुबह औफिस जाते थे और शाम को घर आ जाते थे. 6 सितंबर को रविवार की वजह से घर पर ही थे, लेकिन दोपहर बाद किसी काम से बाहर चले गए थे. जब वह लौटे तो उन का एकलौता बेटा लक्ष्य घर पर नहीं था. लक्ष्य जिद कर के साइकिल ले कर बाहर चला जाता था, यह कोई नई बात नहीं थी. उस दिन भी वह साइकिल ले कर बाहर गया था. शाम का धुंधलका फैला, तो परिवार की चिंता बढ़ गई. अरविंद बेटे को ढूंढने के लिए बाहर सड़क की तरफ निकल गए, जबकि पूनम व उन की बेटियों ने आसपास के घरों में लक्ष्य को ढूंढा, लेकिन उस का कहीं कुछ पता नहीं चला.

लक्ष्य के लापता होने की खबर मोहल्ले में फैली तो लोग भी उसे ढूंढने में लग गए. वह कहां चला गया, इस बात को कोई नहीं जानता था. अरविंद का परिवार बेहद परेशान था. पूनम का बेटे के इंतजार में रोरो कर बुरा हाल था. हर आहट पर वह दरवाजे की तरफ देखतीं, उन्हें लगता कि बेटा आ गया है. लोगों ने हर तरफ लक्ष्य के बारे में पूछताछ भी की, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. वह पूरी रात परेशानी में बीती. अगले दिन लक्ष्य के लापता होने की सूचना थाना सिविल लाइन में दे दी गई. थाना प्रभारी चंद्र किरण यादव ने उस की गुमशुदगी दर्ज कर ली. पुलिस ने अगले दिन का इंतजार किया, परंतु उस दिन भी वह वापस नहीं आया. इस से इस आशंका को बल मिला कि लक्ष्य का अपहरण कर लिया गया है.

हालांकि शर्मा परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि फिरौती के लिए कोई उन के बेटे का अपहरण करे, लेकिन इस के और भी कई कारण हो सकते थे. पुलिस इस इंतजार में थी कि यदि लक्ष्य का अपहरण किया गया होगा, तो फिरौती के लिए फोन या पत्र जरूर आएगा. लेकिन पुलिस का यह अनुमान गलत साबित हुआ. इस तरह का कोई फोन परिवार के पास नहीं आया, तो यह मामला रंजिश का लगा. पुलिस ने अरविंद व उन के पिता से पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि वह सीधेसादे लोग हैं. किसी से रंजिश तो दूर उन का कभी किसी से झगड़ा तक नहीं हुआ था.

इस से पुलिस उलझन में पड़ गई. बहरहाल पुलिस ने लक्ष्य के फोटो लगे इश्तहार बनवाए और सभी थानों में भिजवा दिए, पर इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. अगले कई दिनों तक भी जब लक्ष्य नहीं मिला, तो लोगों में गुस्सा पनपने लगा. लक्ष्य के घरवालों और शुभचिंतकों ने एकत्र हो कर एसएसपी के.बी. सिंह से मुलाकात की. एसएसपी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों को शीघ्र काररवाई के निर्देश दिए. एसपी (सिटी) प्रबल कुमार सिंह व एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने थाना पुलिस को सुरागसी में लगा दिया.

एसपी (क्राइम) राकेश जौली ने अभी तक के जांच बिंदुओं पर विचारविमर्श भी किया. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि हो न हो लक्ष्य को रंजिशन उठा कर मार दिया गया हो. वह साइिकल समेत लापता हुआ था, इस से जाहिर होता था कि वह विश्वास कर के किसी जानकार के साथ ही गया होगा. शर्मा परिवार रंजिश से इंकार कर रहा था, इसलिए इस थ्यौरी पर अविश्वास भी हो रहा था, फिर भी पुलिस अपने इस शक पर कायम रही.

चूंकि कुछ रंजिशें एक पक्षीय होती हैं, इसलिए पुलिस को लगा कि हो न हो मोहल्ले का ही कोई आदमी अरविंद या उन के परिवार से रंजिश रखता हो, इसलिए पुलिस ने आसपास के लोगों की फेहरिश्त तैयार की. इस फेहरिश्त में एक नाम विपुल सैनी का भी सामने आया. विपुल अरविंद के ही पड़ोसी जगलाल का बेटा था और डीजे (डिस्क जौकी) का काम करता था. पुलिस को पता चला कि उस की सोहबत अच्छी नहीं थी और वह आवारा व दबंग प्रवृत्ति का युवक था.

पुलिस अरविंद के घर पहुंची और उन से विपुल के बारे में पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वह भले ही बिगडै़ल प्रवृत्ति का युवक है, लेकिन उन के लिए अच्छा है. उन्होंने यह भी बताया कि लक्ष्य के लापता होने के बाद से विपुल लगातार उन के साथ उसे ढुंढवाने में साथ रहा है. आनेजाने वाले शुभचिंतकों को चाय पानी देने का जिम्मा भी उस ने ही संभाल रखा था. अगले दिन पुलिस को पता चला कि विपुल अपने घर से अचानक लापता हो गया है. पुलिस ने जब अरविंद से एक बार फिर से इस बारे में पूछताछ की, तो उन्होंने बताया कि विपुल को यह बात पता चल गई थी कि पुलिस उस के बारे में पूछताछ कर रही है. इस के तुरंत बाद अचानक लापता हो जाने से विपुल पूरी तरह शक के दायरे में आ गया.

पुलिस ने उस का मोबाइल नंबर हासिल किया और उस की कालडिटेल्स के साथ पिछले कई दिनों की लोकेशन भी निकलवाई. नंबरों की जांच से पता चला कि लक्ष्य के लापता होने वाले दिन व रात 3 नंबरों पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस जांच में यह भी पता चल गया कि वह नंबर पंकज प्रजापति, कपिल और विक्की के नाम पर थे. इन में पंकज उसी कालोनी में रहता था, जबकि कपिल गांव अलमासपुर का और विक्की गांव गजावली का रहने वाला था.

लोगों से पूछताछ में पता चला कि ये तीनों कपिल के जिगरी दोस्त थे और उसी की तरह आवारा थे. चौंकाने वाली बात यह थी कि 6 सितंबर को विपुल व उस के दोस्तों की लोकेशन एक साथ थी. रात 12 बजे उन सभी की लोकेशन बागोवाली क्षेत्र में पाई गई. बागोवाली शहर की सीमा से सटा हुआ क्षेत्र था. पुलिस समझ गई कि लक्ष्य का राज इन्हीं चारों के बीच छिपा था. 15 सितंबर को पुलिस ने एकएक कर के विपुल, कपिल व पंकज को उठा लिया. जबकि विक्की पुलिस के हाथ नहीं लग सका पुलिस उन से कई घंटे तक घुमाफिरा कर पूछताछ करती रही, लेकिन उन्होंने लक्ष्य के अपहरण में अपना हाथ होने से इनकार कर दिया.

अलबत्ता पुलिस इतना जरूर समझ गई कि तीनों बेहद शातिर युवक थे. अंतत: जब पुलिस ने अपना परपंरागत तरीका अपनाया, तो तीनों टूट गए. उन लोगों ने न केवल मासूम लक्ष्य का अपहरण किया था, बल्कि उस की हत्या कर के शव भी गन्ने के खेत में फेंक दिया था. पुलिस तीनों को ले कर उन के बताए स्थान पर पहुंची और उन की निशानदेही पर गन्ने के एक खेत से बोरे में बंद लक्ष्य का शव बरामद कर लिया, जो बुरी तरह सड़ चुका था. पुलिस ने उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद उसी शाम लक्ष्य के शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उस के घर वालों का रोरो कर बुरा हाल था.

लक्ष्य की हत्या से लोगों में जबर्दस्त आक्रोश था, इसलिए विपुल के घर पर पुलिस बल तैनात कर दिया गया. इस बीच उस के घर वाले लोगों के आक्रोश से डर का घर में ताला डाल कर फरार हो गए. पुलिस ने हत्यारोपियों से विस्तृत पूछताछ की. लक्ष्य की हत्या इतनी मामूली बात पर की गई थी कि पुलिस भी हतप्रभ रह गई. अरविंद के परिवार से विपुल के अच्छे रिश्ते थे. वह उन के पास अकसर आताजाता रहता था. इस नाते श्यामलाल से ले कर लक्ष्य तक सभी उसे अच्छी तरह जानते थे. विपुल बिगड़ैल और आवारा था, लेकिन चूंकि अरविंद से वह अच्छा व्यवहार करता था, इसलिए वह उसे अच्छा मानते थे.

अरविंद की एक खाली दुकान थी. उसे वह किराए पर देना चाहते थे. यह बात जब विपुल को पता चली, तो उस ने दुकान किराए पर देने के लिए कहा. अरविंद सुलझे हुए व्यक्ति थे. पड़ोस का मामला था, इसलिए वह कतई नहीं चाहते थे कि दुकान की किराएदारी को ले कर उन के बीच कोई मनमुटाव हो, इसलिए उन्होंने प्यार से दुकान देने से मना कर दिया. विपुल को उन से ऐसी उम्मीद नहीं थी. यह बात उसे बेहद नागवार गुजरी और वह अंदर ही अंदर अरविंद से चिढ़ने लगा. उठतेबैठते, सोतेजागते उस के दिमाग में अरविंद के इनकार के शब्द गूंजते रहते. प्रवृत्ति अच्छी न हो और सोच फितरती हो, तो जलन की अग्नि और तेज हो जाती है. विपुल के साथ बिलकुल ऐसा ही हो रहा था.

उस की जलन की यह आग तब और भी बढ़ गई, जब उसे पता चला कि अरविंद ने अपनी दुकान एक अन्य युवक मोंटी को किराए पर दे दी है. विपुल को पता चला कि मोंटी अपनी दुकान का मुहूर्त 7 सितंबर को करेगा. विपुल ने मन ही मन में सोच लिया था कि चाहे जो भी हो वह दुकान का मुहूर्त नहीं होने देगा. अरविंद को वह ऐसा दर्द देगा कि जिंदगी भर नहीं भूल पाएगा. उस ने अपनी इस रंजिश को जाहिर नहीं होने दिया और उन से मेलभाव बनाए रखा. विपुल व उस के दोस्त कपिल की साझेदारी में कालोनी से थोड़ी दूरी पर डीजे की दुकान थी.

विपुल वहां अपने दोस्तों कपिल, पंकज व विक्की के साथ बैठ कर शराब पीता था. एक दिन ऐसी ही महफिल के दौरान उस ने अपने दोस्तों से सारी बात बता कर कहा, ‘‘मुझे मेरे पड़ोसी ने दुकान नहीं दी. मुझे उसे सबक सिखाना है.’’

‘‘यह तो कोई बात नहीं हुई.’’ उस के एक दोस्त ने कहा.

‘‘नहीं, मैं जीते जी आग में जल रहा हूं. तुम लोग मेरा साथ दो, मैं उस के इकलौते बेटे को खत्म कर दूंगा.’’ विपुल ने गुस्से से दांत पीसते हुए कहा. कभीकभी शराबियों की दोस्ती बहुत गहरी होती है. उन सब का बहुत गहरा याराना था. वे सब विपुल  का साथ देने को तैयार हो गए.

अंतत: उन्होंने 6 सितंबर को लक्ष्य को मारने की योजना बना ली. अगले दिन विपुल ने अपने दोस्तों को फोन कर दिया कि वे शाम को दुकान पर पहुंचकर इंतजार करें. वह बहाने से अरविंद के बेटे को ले आएगा. उधर विपुल घर आया और लक्ष्य के घर से बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. 6 सितंबर को रविवार था. लक्ष्य पूरे दिन घर पर ही रहा. शाम को वह जिद कर के साइकिल ले कर निकल गया. विपुल बाहर नजरें गड़ाए हुए था. उसे पूरी उम्मीद थी कि लक्ष्य साइकिल से बाहर जरूर आएगा.

लक्ष्य पर नजर पड़ते ही विपुल की आंखों में चमक आ गई. वह पैदल चल कर कालोनी के बाहर वाले रास्ते पर चला गया, तब तक लक्ष्य राउंड पूरा कर के वापस आ रहा था. विपुल को देखते ही लक्ष्य ने नमस्ते की, तो उस ने उसे रोक कर पूछा, ‘‘कहां घूम रहा है लक्ष्य?’’

‘‘कुछ नहीं भैया जी. साइकिल चलाने आया था.’’

‘‘चल आ मैं तुझे नया वीडियो गेम खिलाता हूं. मैं ने अपनी दुकान पर लगाया है.’’ वीडियो गेम की बात पर लक्ष्य खुश हो गया. वह मासूम उस की चालाकी को समझ नहीं पाया और उस के साथ चल दिया. विपुल उसे ले कर सीधे कपिल की दुकान पर पहुंचा. वहां कपिल, पंकज व विक्की पहले से ही मौजूद थे. वहां पहुंचते ही लक्ष्य ने जिज्ञासा से कहा. ‘‘भैया अब तो मैं आप की दुकान पर खेलने आया करूंगा, मम्मी पापा भी नहीं रोकेंगे. कहां है नया वीडियो गेम?’’

‘‘अभी दिखाता हूं.’’ कहने के साथ ही उस ने अपने दोस्तों को इशारा कर दिया. उन्होंने लक्ष्य का मुंह दबा कर उसे जकड़ लिया. मामूली बात पर अंधे हुए विपुल ने दुकान में पड़ी प्लास्टिक की रस्सी उठाई और लक्ष्य के गले में डाल कर कसनी शुरू कर दी. दम घ़ुटा तो लक्ष्य मौत के भय से छटपटा कर रह गया. उस ने उन के चंगुल से छूटने के लिए हाथ पैर चलाए, लेकिन किसी को उस पर दया नहीं आई.

विपुल ने रस्सी तब तक उस के गले में कसी, जब तक उस की सांसों की डोर नहीं टूट गई. हत्या के तुरंत बाद इन लोगों ने लक्ष्य के शव को एक बोरे में बंद कर के कोने में सामान के पीछे छिपा दिया. इस के बाद उन्होंने रात होने का इंतजार किया. तकरीबन 12 बजे इन लोगों ने बोरे को उठाया और मोटरसाइकिल से बागोवाली क्षेत्र में गन्ने के खेत में फेंक आए. विक्की ने लक्ष्य की साइकिल भी एक स्थान पर छिपा दी. विपुल ने घर आ कर उस दिन के बाद अरविंद के साथ लक्ष्य को ढुंढवाने का सफल नाटक किया. इतना ही नहीं वह परिवार व पुलिस जांच की टोह लेने के लिए अधिकांश उन के घर पर ही रहता था. अरविंद के जो भी मिलने वाले आते थे, उन्हें चाय आदि पिलाने का जिम्मा भी उस ने ही उठा लिया था.

किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि विपुल ऐसा बेहरम हो सकता है. बेटे के विछोह में पूनम व अरविंद की तड़प उसे सुकून दे रही थी. विपुल को जब एक दिन पता चला कि पुलिस उस के बारे में भी पूछताछ कर रही है, तो डर की वजह से वह लापता हो गया. यहीं से वह शक के दायरे में आया और पकड़ा गया. अगले दिन पुलिस ने चौथे हत्यारे विक्की को भी धर दबोचा. उस ने भी हत्या में शामिल होने की बात कुबूल ली. पुलिस को उस की निशानदेही पर लक्ष्य की साइकिल भी मिल गई. पुलिस ने कागजी औपचारिकताएं पूरी कर के चारों आरोपियों को लोगों के गुस्से और हमले की आशंका के मद्देनजर भारी सुरक्षा के बीच न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

मामूली सी बात पर विपुल की बिगड़ैल प्रवृति और मन में उपजी रंजिश ने एक परिवार का चिराग बुझा दिया. उस ने यह रंजिश न रखी होती, तो लक्ष्य भी जीवित होता और उस का व उस के दोस्तों का भविष्य भी चौपट होने से बच जाता. लक्ष्य के परिजनों का कहना था कि यदि विपुल ने अपनी नाराजगी बताई होती, तो वह उसे दुकान दे देते. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. UP Crime

Suspense Crime Story: परदेसी पति की बेवफा पत्नी

Suspense Crime Story: उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के थाना कैंपियरगंज के थानाप्रभारी चौथीराम यादव रात की गश्त से लौट कर लेटे ही थे कि उन के फोन की घंटी बजी. बेमन से उन्होंने फोन उठा कर कहा, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘‘सर मैं टैक्सी ड्राइवर किशोर बोल रहा हूं.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘जो भी कहना है, सुबह थाने में आ कर कहना. अभी मैं सोने जा रहा हूं.’’

‘‘सर, जरूरी बात है… मोहम्मदपुर नवापार सीवान के पास सड़क के किनारे एक औरत की लाश पड़ी है. उस के सीने से एक छोटा बच्चा चिपका है. अभी बच्चा जीवित है.’’ किशोर ने कहा.

लाश की बात सुन कर थानाप्रभारी की नींद गायब हो गई. उन्होंने कहा, ‘‘ठीक है, मैं पहुंच रहा हूं. मेरे आने तक तुम वहीं रहना. बच्चे का खयाल रखना.’’

‘‘ठीक है सर, आप आइए. आप के आने तक मैं यहीं रहूंगा.’’

कह कर किशोर ने फोन काट दिया.

सूचना गंभीर थी, इसलिए थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने तुरंत इस घटना की सूचना अधिकारियों को दी और खुद जल्दीजल्दी तैयार हो कर सबइंसपेक्टर विनोद कुमार सिंह, कांस्टेबल रामउजागर राय, अवधेश यादव और जगरनाथ यादव के साथ घटनास्थल की ओर चल पड़े. अब तक उजाला फैल चुका था. घटनास्थल पर काफी लोग जमा हो चुके थे. घटनास्थल पर पहुंचते ही थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने सब से पहले उस बच्चे को उठाया, जो मरी हुई मां के सीने से चिपका सो रहा था. स्थिति यही बता रही थी कि वह मृतका का बेटा था. उठाते ही बच्चा जाग गया. वह बिलखबिलख कर रोने लगा. चौथीराम ने उसे एक सिपाही को पकड़ाया तो वह उसे चुप कराने की कोशिश करने लगा.

पहनावे से मृतका मध्यमवर्गीय परिवार की लग रही थी. उस की उम्र यही कोई 25 साल के आसपास थी. उस के मुंह और सीने में एकदम करीब से गोलियां मारी गई थीं. मुंह में गोली मारी जाने की वजह से चेहरा खून से सना था. घावों से निकल कर बहा खून सूख चुका था. मृतका की कदकाठी ठीकठाक थी. इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे कम से कम 2 तो रहे ही होंगे. पुलिस ने घटनास्थल से 315 बोर के 2 खोखे बरामद किए थे. खोखे वही रहे होंगे, जो 2 गोलियां मृतका को मारी गई थीं. घटनास्थल पर मौजूद लोग लाश की शिनाख्त नहीं कर सके थे. इस का मतलब मृतका वहां की रहने वाली नहीं थी.

पुलिस लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की काररवाई कर रही थी कि अचानक वहां एक युवक आया और लाश देख कर जोरजोर से रोने लगा. उस के रोने का मतलब था, वह मृतका का कोई अपना रहा होगा.

पुलिस ने उसे चुप करा कर पूछताछ की तो पता चला कि वह मृतका का भाई दीपचंद था. मृतका का नाम शीला था. कल सुबह वह ससुराल से अपने बेटे को ले कर मायके जाने के लिए निकली थी. शाम तक वह घर नहीं पहुंची तो उसे चिंता हुई. सुबह वह उसी की तलाश में निकला था. यहां भीड़ देख कर वह रुक गया. पूछने पर पता चला कि यहां एक महिला की लाश पड़ी है. वह लाश देखने आया तो पता चला वह लाश उस की बहन की है. उस के साथ उस का बेटा कृष्णा भी था.

पुलिस ने कृष्णा को उसे सौंप दिया. दीपचंद ने फोन द्वारा घटना की सूचना पिता वृजवंशी को दी तो घर में कोहराम मच गया. गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर वृजवंशी भी वहां पहुंच गया, जहां लाश पड़ी थी. बेटी की लाश और मासूम नाती कृष्णा को रोते देख वृजवंशी भी बिलखबिलख कर रोने लगा. उस से रहा नहीं गया और उस ने नाती को दीपचंद से ले कर सीने से चिपका लिया. घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर पुलिस दीपचंद के साथ थाने आ गई. थाने में उस की ओर से शीला की हत्या का मुकदमा अज्ञात के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. यह 23 जनवरी, 2014 की बात है.

मुकदमा दर्ज होने के बाद थानाप्रभारी चौथीराम यादव ने जांच शुरू की. हत्यारों ने सिर्फ शीला की हत्या की थी, उस के बच्चे को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया था. इस का मतलब उस का जो कुछ था, वह शीला से ही था. उसे सिर्फ उसी से परेशानी थी. ऐसे में उस का कोई प्रेमी भी हो सकता था, जो उस से पीछा छुड़ाना चाहता रहा हो.

शीला की ससुराल गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा सरहरी में थी. थानाप्रभारी चौथीराम दीपचंद को ले कर शीला की ससुराल जा पहुंचे. बनरहा पहुंचने में उन्हें करीब 2 घंटे का समय लगा. शीला की ससुराल में उस की सास और ससुर थे. पूछताछ में उन्होंने बताया कि 22 जनवरी, 2014 को शीला अपने मुंहबोले भाई पप्पू और उस के दोस्त के साथ मोटरसाइकिल से मायके के लिए निकली थी. कृष्णा को भी वह अपने साथ ले गई थी. इस के अलावा वे और कुछ नहीं बता सके थे. पूछताछ में सासससुर ने यह भी बताया था कि पप्पू अकसर उन के यहां आता रहता था. चौथीराम यादव ने दीपचंद से पप्पू के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि पप्पू उसी के गांव का रहने वाला था. वह आवारा किस्म का लड़का था.

थानाप्रभारी बनरहा से सीधे दीपचंद के गांव अहिरौली जा पहुंचे. पप्पू के बारे में पता किया गया तो घर वालों ने बताया कि वह 22 जनवरी, 2014 को नौतनवा जाने की बात कह कर घर से निकला था. तब से लौट कर नहीं आया है. दीपचंद की मदद से पप्पू और शीला का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि 22 जनवरी की सुबह शीला ने पप्पू को फोन किया था. उस के बाद पप्पू का मोबाइल फोन बंद हो गया था. काल डिटेल्स से यह भी पता चला कि दोनों में रोजाना घंटों बातें होती थीं. इस से साफ हो गया कि दोनों में संबंध थे. पप्पू ने ही किसी बात से नाराज हो कर दोस्त की मदद से शीला की हत्या की थी.

जांच कहां तक पहुंची है, थानाप्रभारी चौथीराम इस की जानकारी क्षेत्राधिकारी अजय कुमार पांडेय और पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) डा. यस चेन्नपा को भी दे रहे थे. पप्पू के बारे में जब घर वालों से कोई जानकारी नहीं मिली तो थानाप्रभारी ने उस के बारे में पता करने के लिए उस के मोबाइल को सर्विलांस पर लगवा दिया. आखिर 2 फरवरी, 2014 को घटना के 10 दिनों बाद पुलिस ने मुखबिर के जरिए पप्पू और उस के दोस्त को मोटरसाइकिल सहित लोरपुरवा के पास से उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब दोनों नेपाल की ओर जा रहे थे.

पुलिस पप्पू और उस के दोस्त अवधेश को थाने ले आई. तलाशी में पुलिस को अवधेश के पास से 315 बोर का देशी तमंचा और कारतूस भी मिले. पुलिस ने दोनों चीजों को अपने कब्जे में ले लिया. जबकि पप्पू उर्फ दुर्गेश के पास से सिर्फ 2 सिम वाला मोबाइल फोन मिला था. पुलिस दोनों से अलगअलग पूछताछ करने लगी. दोनों ने पहले तो शीला की हत्या से इनकार किया, लेकिन पुलिस के पास उन के खिलाफ इतने सुबूत थे कि ज्यादा देर तक वे अपनी बात पर टिके नहीं रह सके और सच्चाई कुबूल कर के शीला की हत्या की पूरी कहानी उगल दी. इस पूछताछ में पप्पू और अवधेश ने शीला की हत्या की जो कहानी सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी.

जिला महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव अहिरौली में रहता था वृजवंशी. उस के परिवार में पत्नी फूलवासी के अलावा कुल 7 बच्चे थे. शीला उन में पांचवें नंबर पर थी. वृजवंशी के पास इतनी खेती थी कि उसी से उन के इतने बड़े परिवार का गुजरबसर हो रहा था. लेकिन बेटे बड़े हुए, उन्होंने काफी जिम्मेदारियां अपने कंधों पर ले ली थीं. बेटों की शादियां हो गईं तो बेटों की मदद से वृजवंशी बेटियों की शादियां करने लगा. शीला जवान हुई तो वृजवंशी को उस की शादी की चिंता हुई. बाप और भाई उस के लिए लड़का ढूंढ पाते उस के पहले ही वह गांव में ही बचपन के साथी दुर्गेश उर्फ पप्पू से आंखें लड़ा बैठी. दोनों साथसाथ खेलेकूदे ही नहीं थे, बल्कि एक ही स्कूल में पढ़े भी थे.

दुर्गेश उर्फ पप्पू के पिता दूधनाथ भी खेती किसानी करते थे. उस के परिवार में पत्नी के अलावा एकलौता बेटा पप्पू और 3 बेटियां थीं. एकलौता होने की वजह से पप्पू को घर से कुछ ज्यादा ही लाडप्यार मिला, जिस की वजह से वह बिगड़ गया. जैसेतैसे उस ने इंटरमीडिएट कर के पढ़ाई छोड़ दी. इस के बाद गांव में घूमघूम कर आवारागर्दी करने लगा. शीला और पप्पू के संबंधों की जानकारी गांव वालों को हुई तो इस से वृजवंशी की बदनामी होने लगी. तब उसे चिंता हुई कि बात ज्यादा फैल गई  तो बेटी की शादी होना मुश्किल हो जाएगा. अब इस से बचने का एक ही उपाय था, शीला की शादी. वह उस के लिए लड़का ढूंढने लगा. क्योंकि अब देर करना ठीक नहीं था.

उस ने कोशिश की तो गोरखपुर के थाना गुलरिहा के गांव बनरहा का रहने वाला दिनेश उसे पसंद आ गया. उस ने जल्दी से शीला की शादी उस के साथ कर दी. शीला विदा हो कर ससुराल आ गई. दिनेश मुंबई में रहता था. कुछ दिन पत्नी के साथ रह कर वह मुंबई चला गया. शीला को उस ने बूढ़े मांबाप के पास उन की सेवा के लिए छोड़ दिया, ताकि किसी को कुछ कहने का मौका न मिले. क्योंकि उन्हें तो पूरी जिंदगी साथ रहना है.

शीला भले ही 2 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन पति के परदेस में रहने की वजह से वह अपने पहले प्यार दुर्गेश उर्फ पप्पू को कभी नहीं भूल पाई. शादी के बाद भी वह प्रेमी से मिलती रही. शीला का मुंहबोला भाई बन कर वह उस की ससुराल भी आता रहा. उस के सासससुर पप्पू को उस का भाई समझते थे, इसलिए उस के आनेजाने पर कभी रोक नहीं लगाई. जबकि भाईबहन के रिश्ते की आड़ में दोनों कुछ और ही गुल खिला रहे थे.

पप्पू ने बातचीत के लिए शीला को मोबाइल फोन खरीद कर दे दिया था. सासससुर रात में सो जाते तो शीला मिस्डकाल कर देती. इस के बाद पप्पू फोन करता तो दोनों के बीच घंटों बातें होतीं. शीला को कई बार पप्पू से गर्भ भी ठहरा, लेकिन पप्पू ने हर बार उस का गर्भपात करा दिया. बारबार गर्भपात कराने से तंग आ कर शीला उस के साथ रहने की जिद करने लगी. जबकि पप्पू को शीला से नहीं, सिर्फ उस की देह से प्रेम था. शीला जब भी उस से साथ रखने के लिए कहती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. शीला जब उस पर जोर डालने लगी तो वह दूर भागने लगा. उस का कहना था कि घर वाले उसे रहने नहीं देंगे. अपना अलग घर है नहीं. तब शीला ने पप्पू को 1 लाख रुपए जमीन खरीद कर घर बनाने के लिए दिए. इस की जानकारी न तो शीला के पति को थी, न सासससुर को.

पप्पू ने पैसे तो लिए, लेकिन उस ने जमीन नहीं खरीदी. जब भी शीला जमीन और घर के बारे में पूछती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. जब शीला को लगने लगा कि पप्पू उसे बेवकूफ बना रहा है तो वह बेचैन हो उठी. वह समझ गई कि उस से बहुत बड़ी भूल हो गई है. जिस के लिए उस ने घरपरिवार के साथ विश्वासघात किया, वह उस के साथ विश्वासघात कर रहा है. उस ने ठान लिया कि वह ऐसे आदमी को किसी कीमत पर नहीं बख्शेगी. वह पप्पू से अपने रुपए मांगने लगी.

शीला ने जब पैसे के लिए पप्पू पर दबाव बनाया तो वह विचलित हो उठा. उस की समझ में आ गया कि शीला उस की नीयत जान गई है. अब उस की दाल गलने वाली नहीं है. शीला के पैसे उस ने खर्च कर दिए थे.  लाख रुपए की व्यवस्था वह कर नहीं सकता था. इसलिए शीला से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना डाली. शीला की हत्या करना उस के अकेले के वश का नहीं था, इसलिए उस ने एक पेशेवर बदमाश अवधेश से बात की.

अवधेश महाराजगंज के थाना पनियरा के गांव खजुही का रहने वाला था. पप्पू से उस की दोस्ती भी थी. पनियरा थाने में उस के खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म, लूट और राहजनी के कई मुकदमे दर्ज थे. योजना के मुताबिक, अवधेश ने 315 बोर के देशी कट्टे का इंतजाम किया. इस के बाद दोनों को मौके की तलाश थी. 22 जनवरी, 2014 की सुबह 7 बजे शीला ने पप्पू को फोन कर के पूछा कि इस समय वह कहां है, तो उस ने कहा कि इस समय वह शहर में है. कुछ देर में उस के पास पहुंच जाएगा.

इस के बाद शीला ने फोन काट दिया. जबकि सही बात यह थी कि पप्पू उस समय नौतनवा में मौजूद था. उस ने शीला से झूठ बोला था. शीला से बात करने के बाद उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया. दुर्गेश उर्फ पप्पू को वह मौका मिल गया, जिस की तलाश में वह था. उस ने अवधेश को तैयार किया और मोटरसाइकिल से शीला की ससुराल बनरहा 11 बजे के आसपास पहुंच गया. शीला उसी का इंतजार कर रही थी. चायनाश्ता करा कर शीला मायके जाने की बात कह कर उन के साथ निकल पड़ी. उस ने सास से कहा था कि 2-1 दिन में वह लौट आएगी.

दिन में कुछ हो नहीं सकता था. इसलिए पप्पू को किसी तरह रात करनी थी. इस के लिए वह कुसुम्ही के जंगल स्थित बुढि़या माई के मंदिर दर्शन करने गया. वहां से निकल कर वह सब के साथ शहर में घूमता रहा. अचानक रात साढ़े 8 बजे पप्पू को कुछ याद आया तो उस ने मोबाइल औन कर के फोन किया. उस समय वह चिलुयाताल के मोहरीपुर में था. इस के बाद वे कैंपियरगंज पहुंचे.

रात साढ़े 10 बजे के करीब पप्पू सब के साथ मोहम्मदपुर नवापार पहुंचा तो ठंड का मौसम होने की वजह से चारों ओर सुनसान हो चुका था. पप्पू ने अचानक मोटरसाइकिल सड़क के किनारे रोक दी. शीला ने रुकने की वजह पूछी तो पप्पू ने कहा कि पेशाब करना है. पेशाब करने के बहाने वह थोड़ा आगे बढ़ गया तो अवधेश शीला के पास पहुंचा और कमर में खोंसा तमंचा निकाला और उस के सीने से सटा कर ट्रिगर दबा दिया.

गोली लगते ही शीला के मुंह से एक भयानक चीख निकली. तभी उस ने कट्टे की नाल उस के मुंह में घुसेड़ कर दूसरी गोली चला दी. इसी के साथ बच्चे को गोद में लिए हुए शीला जमीन पर गिरी और मौत के आगोश में समा गई. उस का मासूम बेटा सीने से चिपका सोता ही रहा. अपना काम कर के पप्पू और अवधेश चले गए. टैक्सी ड्राइवर किशोर सुबह उधर से गुजरा तो उस ने सड़क किनारे पड़ी शीला की लाश देख कर थानाप्रभारी चौथीराम यादव को सूचना दी.

पुलिस ने हत्या में इस्तेमाल की गई मोटरसाइकिल, 315 बोर का तमंचा और मोबाइल फोन बरामद कर लिया था. थाने की सारी काररवाई निबटा कर थानाप्रभारी चौथीराम ने पप्पू और अवधेश को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Suspense Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Crime Story Hindi: नाबालिग मोहब्बत का तीखा जहर

Crime Story Hindi: रोमिला अपनी बेटी सलोनी के साथ लखनऊ के इंदिरा नगर मोहल्ले में रहती थी. उस का 3 मंजिल का मकान था. पहली दोनों मंजिलों पर रहने के लिए कमरे थे और तीसरी मंजिल पर गोदाम बना था, जहां कबाड़ और पुरानी चीजें रखी रहती थीं.

ईसाई समुदाय की रोमिला मूलत: सुल्तानपुर जिले की रहने वाली थी. उस ने जौन स्विंग से प्रेम विवाह किया था. सलोनी के जन्म के बाद रोमिला और जौन स्विंग के संबंध खराब हो गए. रोमिला ने घुटघुट कर जीने के बजाय अपने पति जौन स्विंग से तलाक ले लिया. इसी बीच रोमिला को लखनऊ के सरकारी अस्पताल में टैक्नीशियन की नौकरी मिल गई. वेतन ठीकठाक था. इसलिए वह अपनी आगे की जिंदगी अपने खुद के बूते पर गुजारना चाहती थी.

स्विंग से प्यार, शादी और फिर तलाक ने रोमिला की जिंदगी को बहुत बोझिल बना दिया था. कम उम्र की तलाकशुदा महिला का समाज में अकेले रहना सरल नहीं होता, इस बात को ध्यान में रखते हुए रोमिला ने अपने को धर्मकर्म की बंदिशों में उलझा लिया. समय गुजर रहा था, बेटी बड़ी हो रही थी. रोमिला अपनी बेटी को पढ़ालिखा कर बड़ा बनाना चाहती थी. क्योंकि अब उस का भविष्य वही थी. सलोनी कावेंट स्कूल में पढ़ती थी, पढ़ने में होशियार. रोमिला ने लाड़प्यार से उस की परवरिश लड़कों की तरह की थी.

सलोनी भी खुद को लड़कों की तरह समझने लगी थी. वह जिद्दी स्वभाव की तो थी ही गुस्सा भी खूब करती थी. जन्म के समय ही कुछ परेशानियों के कारण सलोनी के शरीर के दाएं हिस्से में पैरालिसिस का अटैक पड़ा था, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उस का असर करीब करीब खत्म हो गया था. सलोनी बौबकट बाल रखती थी. उस की उम्र हालांकि 15 साल थी पर वह अपनी उम्र से बड़ी दिखाई देती थी. वह लड़कों की तरह टीशर्ट पैंट पहनती थी. सलोनी के साथ पढ़ने वाले लड़के लड़कियां स्मार्टफोन इस्तेमाल करते थे. सलोनी ने भी मां से जिद कर के स्मार्टफोन खरीदवा लिया.

रोमिला जानती थी कि आजकल के बच्चे मोबाइल पर इंटरनेट लगा कर फेसबुक और वाट्सएप जैसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं जो सलोनी जैसी कम उम्र लड़की के लिए ठीक नहीं है. लेकिन एकलौती बेटी की जिद के सामने उसे झुकना पड़ा. रोमिला सुबह 8 बजे अस्पताल जाती थी और शाम को 4 बजे लौटती थी. सलोनी भी सुबह 8 बजे स्कूल चली जाती थी और 2 बजे वापस आती थी. कठिन जीवन जीने के लिए रोमिला ने बेड की जगह घर में सीमेंट के चबूतरे बनवा रखे थे. मांबेटी बिस्तर डाल कर इन्हीं चबूतरों पर सोती थीं.

रोमिला को अस्पताल से 45 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन मिलता था. इस के बावजूद मांबेटी का खर्च बहुत कम था. रोमिला जो खाना बनाती थी वह कई दिन तक चलता था. मोबाइल फोन लेने के बाद सलोनी ने इंटरनेट के जरीए अपना फेसबुक पेज बना लिया था. वह अकसर अपने दोस्तों से चैटिंग करती रहती थी. इसी के चलते उस के कई नए दोस्त बन गए थे. उस के इन्हीं दोस्तों में से एक था पश्चिम बंगाल के मालदा का रहने वाला सुदीप दास. 19 साल का सुदीप एक प्राइवेट फैक्ट्री में काम करता था.

उस के घर की हालत ठीक नहीं थी. उस का पिता सुधीरदास मालदा में मिठाई की एक दुकान पर काम करता था. जबकि मां कावेरी घरेलू महिला थी. उस का छोटा भाई राजदीप कोई काम नहीं करता था. सुदीप और उस के पिता की कमाई से ही घर का खर्च चलता था. सुदीप और सलोनी के बीच चैटिंग के माध्यम से जो दोस्ती हुई धीरेधीरे प्यार तक जा पहुंची. नासमझी भरी कम उम्र का तकाजा था. चैटिंग करतेकरते सुदीप और सलोनी एकदूसरे के प्यार में पागल से हो गए. स्थिति यह आ गई कि सुदीप सलोनी से मिलने के लिए बेचैन रहने लगा.

दोनों के पास एकदूसरे के मोबाइल नंबर थे. सो दोनों खूब बातें करते थे. मोबाइल पर ही दोनों की मिलने की बात तय हुई. सितंबर 2013 में सुदीप सलोनी से मिलने लखनऊ आ गया. सलोनी ने सुदीप को अपनी मां से मिलवाया. रोमिला बेटी को इतना प्यार करती थी कि उस की हर बात मानने को तैयार रहती थी. 2 दिन लखनऊ में रोमिला के घर पर रह कर सुदीप वापस चला गया. अक्तूबर में सलोनी का बर्थडे था. उस के बर्थडे पर सुदीप फिर लखनऊ आया. अब तक सलोनी ने सुदीप से अपने प्यार की बात मां से छिपा कर रखी थी. लेकिन इस बार उस ने अपने और सुदीप के प्यार की बात रोमिला को बता दी.

सलोनी और सुदीप दोनों की ही उम्र ऐसी नहीं थी कि शादी जैसे फैसले कर सकें. इसलिए रोमिला ने दोनों को समझाने की कोशिश की. ऊंचनीच दुनियादारी के बारे में बताया. लेकिन सुदीप और सलोनी पर तो प्यार का भूत चढ़ा था. रोमिला को इनकार करते देख सुदीप बड़े आत्मविश्वास से बोला, ‘‘आंटी, आप चिंता न करें. मैं सलोनी का खयाल रख सकता हूं. मैं खुद भी नौकरी करता हूं और मेरे पिताजी भी. हमारे घर में भी कोई कुछ नहीं कहेगा.’’

बातचीत के दौरान रोमिला सुदीप के बारे में सब कुछ जान गई थी. इसलिए सोचविचार कर बोली, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी सारी बातें अपनी जगह सही हैं. मुझे इस रिश्ते से भी कोई ऐतराज नहीं है. पर मैं यह रिश्ता तभी स्वीकार करूंगी जब तुम कोई अच्छी नौकरी करने लगोगे. आजकल 10-5 हजार की नौकरी में घरपरिवार नहीं चलते. अभी तुम दोनों में बचपना है.’’

‘‘ठीक है आंटी, मैं आप की बात मान लेता हूं. लेकिन आप वादा करिए कि आप उसे मुझ से दूर नहीं करेंगी. जब मैं कुछ बन जाऊंगा तो सलोनी को अपनी बनाने आऊंगा.’’ सुदीप ने फिल्मी हीरो वाले अंदाज में रोमिला से अपनी बात कही.

इस बार सुदीप सलोनी के घर पर एक सप्ताह तक रहा. इसी बीच रोमिला ने सुदीप से स्टांप पेपर पर लिखवा लिया कि वह किसी लायक बन जाने के बाद ही सलोनी से शादी करेगा. इस के बाद सुदीप अपने घर मालदा चला गया. लेकिन लखनऊ से लौटने के बाद उस का मन नहीं लग रहा था. जवानी में, खास कर चढ़ती उम्र में महबूबा से बड़ा दूसरा कोई दिखाई नहीं देता. कामधाम, भूखप्यास, घरपरिवार सब बेकार लगने लगते हैं. सुदीप का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उस की आंखों के सामने सलोनी का गोलगोल सुंदर चेहरा और बोलती हुई आंखें घूमती रहती थीं. वह किसी भी सूरत में उसे खोने के लिए तैयार नहीं था.

जब नहीं रहा गया तो 10 दिसंबर, 2013 को सुदीप वापस लखनऊ आया और रोमिला को बहका फुसला कर सलोनी को मालदा घुमाने के लिए साथ ले गया. हालांकि सलोनी की मां रोमिला इस के लिए कतई तैयार नहीं थी. लेकिन सलोनी ने उसे मजबूर कर दिया. दरअसल मां के प्यार ने उसे इतना जिद्दी बना दिया था कि वह कोई बात सुनने को तैयार नहीं होती थी. रोमिला के लिए बेटी ही जीने का सहारा थी. वह उसे किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी. इस लिए वह सलोनी की जिद के आगे झुक गई. करीब ढाई माह तक सलोनी सुदीप के साथ मालदा में रही.

मार्च, 2014 में सलोनी वापस आ गई. सुदीप भी उस के साथ आया था. बेटी का बदला हुआ स्वभाव देख कर रोमिला को झटका लगा. सलोनी उस की कोई बात सुनने को तैयार नहीं थी. पति से अलग होने के बाद रोमिला ने सोचा था कि वह बेटी के सहारे अपना पूरा जीवन काट लेगी. अब वह बेटी के दूर जाने की कल्पना मात्र से बुरी तरह घबरा गई थी.

लेकिन हकीकत वह नहीं थी जो रोमिला देख या समझ रही थी. सच यह था कि सलोनी का मन सुदीप से उचट गया था. उस का झुकाव यश नाम के एक अन्य लड़के की ओर होने लगा था. जबकि सुदीप हर हाल में सलोनी को पाना चाहता था. वह कई बार उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर चुका था. यह बात मांबेटी दोनों को नागवार गुजरने लगी थी. रोमिला ने अस्पताल से 1 मार्च, 2014 से 31 मार्च तक की छुट्टी ले रखी थी. उस ने अस्पताल में छुट्टी लेने की वजह बेटी की परीक्षाएं बताई थीं.

7 अप्रैल, 2014 की सुबह रोमिला के मकान के पड़ोस में रहने वाले रणजीत सिंह ने थाना गाजीपुर आ कर सूचना दी कि बगल के मकान में बहुत तेज बदबू आ रही है. उन्होंने यह भी बताया कि मकान मालकिन रोमिला काफी दिनों से घर पर नहीं है. सूचना पा कर एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही, सीनियर इंसपेक्टर रामराज कुशवाहा और सिपाही अरूण कुमार सिंह रोमिला के मकान पर पहुंच गए.

देखने पर पता चला कि मकान के ऊपर के हिस्से में बदबू आ रही थी. पुलिस ने फोन कर के मकान मालकिन रोमिला को बुला लिया. वहां उस के सामने ही मकान खोल कर देखा गया तो पूरा मकान गंदा और रहस्यमय सा नजर आया. सिपाही अरूण कुमार और एसएसआई रामराज कुशवाहा तलाशी लेने ऊपर वाले कमरे में पहुंचे तो कबाड़ रखने वाले कमरे में एक युवक की सड़ीगली लाश मिली.

पुलिस ने रोमिला से पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह लाश मालदा, पश्चिम बंगाल के रहने वाले सुदीप दास की है. वह उस की बेटी सलोनी का प्रेमी था और उस से शादी करना चाहता था. जब सलोनी ने इनकार कर दिया तो सुदीप ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. रोमिला ने आगे बताया कि इस घटना से वह बुरी तरह डर गई थी. उसे लग रहा था कि हत्या के इल्जाम में फंस जाएगी. इसलिए वह घर को बंद कर के फरार हो गई थी.

पुलिस ने रोमिला से नंबर ले कर फोन से सुदीप के घर संपर्क किया और इस मामले की पूरी जानकारी उस के पिता को दे दी. लेकिन उस के घर वाले लखनऊ आ कर मुकदमा कराने को तैयार नहीं थे. कारण यह कि वे लोग इतने गरीब थे कि उन के पास लखनऊ आने के लिए पैसा नहीं था. इस पर एसओ गाजीपुर ने अपनी ओर से मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच शुरू कर दी. प्राथमिक काररवाई के बाद सुदीप की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया.

8 अप्रैल 2014 को सुदीप की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद जो सच सामने आया, वह चौंका देने वाला था. इस बीच सलोनी भी आ गई थी. रोमिला और उस की बेटी सलोनी ने अपने बयानों में कई बातें छिपाने की कोशिश की थी. लेकिन उन के अलगअलग बयानों ने उन की पोल खोल दी. एसपी ट्रांस गोमती हबीबुल हसन और सीओ गाजीपुर विशाल पांडेय पुलिस विवेचना पर नजर रख रहे थे जिस से इस पूरे मामले का बहुत जल्दी पर्दाफाश हो गया. मांबेटी से पूछताछ के बाद जो कहानी सामने आई वह कुछ इस तरह थी.

13 मार्च, 2014 की रात को सलोनी अपने कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. इसी बीच सुदीप उस से झगड़ने लगा. वह गुस्से में बोला, ‘‘मैं ने मांबेटी दोनों को कितनी बार समझाया है कि मुझे खीर में इलायची डाल कर खाना पसंद नहीं है. लेकिन तुम लोगों पर मेरी बात का कोई असर नहीं होता.’’

उस की इस बात पर सलोनी को गुस्सा आ गया. उस ने सुदीप को लताड़ा, ‘‘तुम मां से झगड़ने के बहाने तलाश करते रहते हो. बेहतर होगा, तुम यहां से चले जाओ. मैं तुम से किसी तरह की दोस्ती नहीं रखना चाहती.’’

‘‘ऐसे कैसे चला जाऊं? मैं ने स्टांपपेपर पर लिख कर दिया है, तुम्हें मेरे साथ ही शादी करनी होगी. बस तुम 18 साल की हो जाओ. तब तक मैं कोई अच्छी नौकरी कर लूंगा और फिर तुम से शादी कर के तुम्हें साथ ले जाऊंगा. अब तुम्हारी मां चाहे भी तो तुम्हारी शादी किसी और से नहीं करा सकती.’’ सुदीप ने भी गुस्से में जवाब दिया.

‘‘मेरी ही मति मारी गई थी जो तुम्हें इतना मुंह लगा लिया.’’ कह कर सलोनी ऊपर चली गई. वहां उस की मां पहले से दोनों का लड़ाईझगड़ा देख रही थी.

‘‘सुदीप, तुम मेरे घर से चले जाओ.’’ रोमिला ने बेटी का पक्ष लेते हुए चेतावनी भरे शब्दों में कहा तो सुदीप उस से भी लड़नेझगड़ने लगा. यह देख मांबेटी को गुस्सा आ गया. सुदीप भी गुस्से में था. उस ने मांबेटी के साथ मारपीट शुरू कर दी. जल्दी ही वह दोनों पर भरी पड़ने लगा. तभी रोमिला की निगाह वहां रखी हौकी स्टिक पर पड़ी.

रोमिला ने हौकी उठा कर पूरी ताकत से सुदीप के सिर पर वार किया. एक दो नहीं कई वार. एक साथ कई वार होने से सुदीप की वहीं गिर कर मौत हो गई. सुदीप की मृत्यु के बाद मांबेटी दोनों ने मिल कर उस की लाश को बोरे में भर कर कबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद अगली सुबह दोनों घर पर ताला लगा कर गायब हो गईं. पुलिस को उलझाने के लिए रोमिला ने बताया कि वह यह सोच कर डर गई थी कि सुदीप का भूत उसे परेशान कर सकता है. इसलिए, वे दोनों हवन कराने के लिए हरिद्वार चली गई थीं.

सलोनी ने भी 14 मार्च को अपनी डायरी में लिखा था, ‘आत्माओं ने सुदीप को मार डाला. हम फेसबुक पर एकदूसरे से मिले थे. आत्माओं के पास लेजर जैसी किरणें हैं. वह हमें नष्ट कर देंगी. आत्माएं हमें फंसा देंगी.’ सलोनी ने इस तरह की और भी तमाम अनापशनाप बातें डायरी में लिखी थीं. रोमिला भी इसी तरह की बातें कर रही थी. पुलिस ने अपनी जांच में पाया कि मांबेटी हरिद्वार वगैरह कहीं नहीं गई थी बल्कि दोनों लखनऊ में इधरउधर भटक कर अपना समय गुजारती रही थीं. वे समझ नहीं पा रही थीं कि इस मामले को कैसे सुलझाएं, क्योंकि सुदीप की लाश घर में पड़ी थी.

बहरहाल, उस की लाश की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद इस बात का खुलासा हो गया था कि मामला आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का था. गाजीपुर पुलिस ने महिला दारोगा नीतू सिंह, सिपाही मंजू द्विवेदी और उषा वर्मा को इन मांबेटी से राज कबूलवाने पर लगाया. जब उन्हें बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सुदीप की मौत का का कारण सिर पर लगी चोट को बताया गया है, तो वे टूट गईं. दोनों ने अपना गुनाह कबूल कर लिया. रोमिला की निशानदेही पर हौकी स्टिक भी बरामद हो गई.

8 अप्रैल, 2014 को पुलिस ने मां रोमिला को जेल और उस की नाबालिग बेटी सलोनी को बालसुधार गृह भेज दिया. जो भी जैसे भी हुआ हो, लेकिन सच यह है कि फेसबुक की दोस्ती की वजह से सुदीप का परिवार बेसहारा हो गया है.

पुलिस उस के परिवार को बारबार फोन कर के लखनऊ आ कर बेटे का दाह संस्कार कराने के लिए कह रही थी. लेकिन वे लोग आने को तैयार नहीं थे. सुदीप की लाश लखनऊ मेडिकल कालेज के शवगृह में रखी थी. एसओ गाजीपुर नोवेंद्र सिंह सिरोही ने सुदीप के पिता सुधीर दास को समझाया और भरोसा दिलाया कि वह लखनऊ आएं, वे उन की पूरी मदद करेंगे. पुलिस का भरोसा पा कर सुदीप का पिता सुधीर दास लखनऊ आया. बेटे की असमय मौत ने उस का कलेजा चीर दिया था.

सुधीर दास पूरे परिवार के साथ लखनऊ आना चाहता था लेकिन उस के पास पैसा नहीं था. इसलिए परिवार का कोई सदस्य उस के साथ नहीं आ सका. वह खुद भी पैसा उधार ले कर आया था. सुधीर दास की हालत यह थी कि बेटे के दाह संस्कार के लिए भी उस के पास पैसा नहीं था. जवान बेटे की मौत से टूट चुका सुधीर दास पूरी तरह से बेबस और लाचार नजर आ रहा था. उन की हालत देख कर गाजीपुर पुलिस ने अपने स्तर पर पैसों का इंतजाम किया और सुदीप का क्रियाकर्म भैंसाकुंड के इलेक्ट्रिक शवदाह गृह पर किया. सुदीप की अभागी मां कावेरी और भाई राजदीप तो उसे अंतिम बार देख भी नहीं सके.

क्रियाकर्म के बाद पुलिस ने ही सुधीर के वापस मालदा जाने का इंतजाम कराया. गरीबी से लाचार यह पिता बेटे की हत्या करने वाली मांबेटी को सजा दिलाने के लिए मुकदमा भी नहीं लड़ना चाहता. अनजान से मोहब्बत और उस से शादी की जिद ने सुदीप की जान ले ली. सुदीप अपने परिवार का एकलौता कमाऊ बेटा था. उस के जाने से पूरा परिवार पूरी तरह से टूट गया है. सलोनी और सुदीप की एक गलती ने 2 परिवारों को तबाह कर दिया है. Crime Story Hindi

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में आरोपी सलोनी का नाम परिवर्तित है.