रूपम के बहके कदमों का नतीजा

9 मई की रात तकरीबन साढ़े 8 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के जिला गाजियाबाद के थाना इंदिरापुरम  में किसी ने फोन कर के सूचना दी कि न्याय खंड-3 में एक महिला को किसी ने गोली मार दी है.

इस संवदेनशील सूचना के मिलते ही थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह मय पुलिस बल के सूचना में बताए स्थान पर पहुंच गए. उस इलाके में सैकड़ों की तादाद में जनता फ्लैट बने हुए हैं. जिस जगह यह वारदात हुई, वह गली एकदम सुनसान थी. गली फ्लैटों के पीछे की साइड में होने की वजह से लोग उस का इस्तेमाल कम ही किया करते थे.

थानाप्रभारी ने मौका मुआयना किया तो वहां करीब 28-30 साल की महिला खून से लथपथ पड़ी थी. गोली उस की कनपटी पर मारी गई थी. मौके पर मोबाइल फोन और एक थैला भी पड़ा था, जिस में सब्जियां थीं. महिला शायद जिंदा बच जाए इसलिए आननफानन में पुलिस उसे नजदीक के एक निजी अस्पताल ले गई. लेकिन डाक्टरों ने उस महिला को देख कर मृत घोषित कर दिया.

महिला के पास से ऐसी कोई चीज नहीं मिली थी जिस से तुरंत उस की शिनाख्त हो सके. लिहाजा घटनास्थल के आसपास के फ्लैटों में रहने वाले लोगों से पुलिस उस महिला के बारे में पूछताछ करने लगी.

उसी समय अजय झा नाम का एक युवक पुलिस के पास पहुंचा. उस ने बताया कि उस की पत्नी रूपम काफी देर पहले सब्जी लेने गई थी, वह अभी तक नहीं लौटी है. पुलिस ने अजय को लाश दिखाई तो उस ने तुरंत लाश को पहचान लिया और उस की पुष्टि अपनी पत्नी रूपम के रूप में कर दी.

मामला हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना आला अधिकारियों को भी दे दी. सूचना मिलने पर एसपी सिटी शिवहरि मीणा और सीओ सिटी रणविजय सिंह भी अस्पताल पहुंच गए.  मृतका का पति बुरी तरह बिलख रहा था. पुलिस ने उसे ढांढस बंधा कर शुरुआती पूछताछ की. उस ने बताया कि शाम करीब 7 बजे रूपम बाजार से सब्जी लेने के लिए घर से निकली थी.

पुलिस ने उस समय उस से ज्यादा पूछताछ करना जरूरी नहीं समझा और पंचनामा भर कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

अजय झा की तहरीर पर पुलिस ने अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. थानाप्रभारी ने केस की छानबीन शुरू कर दी. वह इतना तो समझ गए थे कि हमलावर का मकसद केवल रूपम की हत्या करना था और उस के सिर में गोली इसलिए मारी गई थी ताकि वह जिंदा न बच सके.

चूंकि रूपम का पर्स, पहने हुए आभूषण और मोबाइल फोन सलामत था, इसलिए लूट की वजह से हत्या करने की संभावना बिलकुल नहीं थी. एसएसपी शुचि घिल्डियाल ने अगले दिन मृतका के पति को अपने औफिस में बुला कर पूछताछ की. उस ने बताया कि वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता है. किसी के साथ अपनी रंजिश या झगड़ा होने से भी उस ने इनकार कर दिया.

उस से पूछताछ में यह पता जरूर चला कि कुछ समय पहले उस ने अंतरिक्ष सोसायटी के पास एक प्रौपर्टी खरीदी थी. सीओ रणविजय सिंह ने एसएसपी के आदेश पर जब प्रौपर्टी वाले बिंदु पर जांच की तो आशंका खारिज हो गई.

आगे बढ़ने का कोई और रास्ता न देख पुलिस ने रूपम के मोबाइल फोन की जांच की. उस में अंतिम काल उस के पति की थी. इस बारे में पुलिस ने अजय से पूछा तो उस ने बताया, ‘‘मेरे पास रूपम का फोन करीब 8 बजे आया था. उस ने बताया था कि उस की सहेली मिल गई है इसलिए थोड़ा लेट हो जाएगी.’’

जांच के दौरान यह भी पता लगा कि रूपम एक दूसरा मोबाइल भी इस्तेमाल करती थी. पुलिस ने उस का दूसरा नंबर भी हासिल कर लिया.  उस के नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई गई.

काल डिटेल्स की जांच में एक ऐसा नंबर पुलिस को मिल गया, जिस पर रूपम अकसर बातें किया करती थी. हत्या वाली शाम भी उस की उस नंबर पर बात हुई थी, लेकिन बात करने के बाद उस ने वह नंबर डिलीट कर दिया था. फोन की डायल सूची से रूपम ने वह नंबर डिलीट क्यों किया, इस बात को पुलिस नहीं समझ पा रही थी.

पुलिस ने उस नंबर की पड़ताल की तो वह न्याय खंड-3 के ही फ्लैट नंबर-553जी निवासी रोहित राणा का निकला. एक और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि रूपम का जो दूसरा नंबर था, उस का सिम भी रोहित के नाम पर खरीदा गया था.

इन दोनों बातों से रोहित अब पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने उस के घर दबिश दी लेकिन वह लापता था. इस से उस पर पुलिस का शक और भी पुख्ता हो गया.

सीओ रणविजय सिंह ने यह पूरी जानकारी एसएसपी को दी तो एसएसपी ने रोहित राणा की तलाश करने के लिए एक पुलिस टीम बनाई जिस में थानाप्रभारी वीरेंद्र सिंह, एसएसआई विशाल, एसआई सुभाष गौतम, अंजनी कुमार, कांस्टेबल विपिन चावला आदि को शामिल किया गया.

सीओ रणविजय सिंह के निर्देशन में पुलिस रोहित की तलाश में संभावित जगहों पर दबिश डालने लगी. इस की भनक शायद रोहित को लग चुकी थी जिस से वह पुलिस से बचने के लिए इधरउधर भागता रहा. अंतत: एक मुखबिर की सूचना पर उसे रात 8 बजे के करीब एक शौपिंग मौल के पास से गिरफ्तार कर लिया गया.

तलाशी में उस के पास से एक .32 बोर की पिस्टल और एक कारतूस भी बरामद हुआ. थाने ला कर उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने रूपम की हत्या से परदा उठा दिया. वही उस का हत्यारा था. हत्या की जो वजह उस ने बताई. उसे सुन कर सभी चौंक गए.

30 वर्षीया रूपम का पति अजय झा मूलरूप से बिहार के दरभंगा जिले के न्यू बलभद्रपुर, भदेरिया सराय के रहने वाले श्यामधर का बेटा था. सालों पहले अजय भी अन्य युवकों की तरह कामधंधे की तलाश में दिल्ली चला आया था. उस ने कई छोटेमोटे काम कर के किसी तरह अपने पैर जमाए. 8 साल पहले उस का विवाह रूपम झा से हुआ.

रूपम खूबसूरत युवती थी. चूंकि अजय भी दिल्ली में काम करता था इसलिए शादी के बाद वह पत्नी को भी अपने साथ दिल्ली ले आया. रूपम वक्त के साथ 2 बच्चों की मां बन गई थी. वह बनसंवर कर रहती थी.

3 साल पहले अजय ने गाजियाबाद में प्रौपर्टी डीलिंग का मामूली सा काम शुरू किया. बाद में वह दिल्ली से गाजियाबाद शिफ्ट हो गया. अपने काम की उलझनों में अजय पत्नी पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाता था.

इस के विपरीत रूपम की हसरतें जवान थीं. उसे देख कर नहीं लगता था कि वह 2 बच्चों की मां है. पति सुबह ही घर से निकल जाता था इसलिए घरेलू कामों के लिए रूपम को ही बाजार जाना पड़ता था. इसी दौरान उस की नजरें रोहित से चार हो गईं.

रोहित मूलत: उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के अग्रवाल मंडी, टटीरी कस्बे का रहने वाला था. फिलहाल वह न्याय खंड-3 में ही रहता था. वहीं वह ज्वैलरी की छोटी सी दुकान चलाता था. रोहित नवयुवक था.

एक बार रूपम उस के यहां से बिछुए खरीद कर लाई थी. उस छोटी सी मुलाकात में ही वह रोहित को भा गई. यह करीब 5 महीने पहले की बात है.

रोहित थोड़ा बातूनी स्वभाव का था. उस ने उस समय रूपम की सुंदरता की थोड़ी तारीफ क्या कर दी कि वह गदगद हो गई. इस के कुछ दिनों बाद रूपम की एक सहेली को भी अपने गले की चेन के लिए एक लौकेट खरीदना था, तब रूपम सहेली को रोहित की दुकान पर ले गई. रूपम को अपनी दुकान पर फिर आया देख रोहित बहुत खुश हुआ. उस के हावभाव और आंखों की भाषा से रूपम उस के मन की बात समझ गई थी.

शादी के कई साल बाद भी अजय उस की महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सका था. रोहित की चाहत को देख कर रूपम के दिल की घंटी सी बज उठी. उसे लगा कि रोहित उस के ख्वाबों को हकीकत में बदल सकता है इसलिए मुसकरा कर उस ने रोहित के प्यार को हरी झंडी दे दी. उस दिन रोहित ने रूपम का फोन नंबर ले लिया.

बातों ही बातों में रूपम ने उसे बता दिया कि उस का पति प्रौपर्टी डीलर है जो देर रात को ही घर लौटता है. इसलिए रूपम उस की दुकान से जाने के थोड़ी देर बाद ही रोहित ने उसे फोन कर दिया. इधरउधर की बातें करने के बाद रोहित ने उस से अपने मन की बात खुल कर कह दी. रूपम ने भी बिना कोई देर किए उस के प्यार को स्वीकार कर लिया. प्यार का इजहार कर के दोनों ही खुश थे.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से मोबाइल पर अकसर बातें करने लगे. रूपम अपने घर से किसी न किसी बहाने निकलती और रोहित के साथ रेस्टोरेंट व पार्कों में चली जाती. एकांत में होने वाली बातों के जरिए दोनों एकदूसरे के बेहद करीब आ गए.

दिल तो कब के मिल चुके थे. फिर एक दिन एक होटल में उन्होंने अपनी हसरतें भी पूरी कर लीं. जब पति अपने काम पर निकल जाता और बच्चे स्कूल, तभी रूपम रोहित को फोन कर देती. मौका देख कर रोहित उस के घर आ जाता था. इस तरह वे दोनों खूब मौजमस्ती करते रहे.

पति को शक न हो, इस से बचने के लिए रूपम मोबाइल पर बातें कर के प्रेमी रोहित का नंबर डिलीट कर देती थी. बाद में रोहित ने उसे एक मोबाइल और सिमकार्ड भी खरीद कर दे दिया. रोहित से बात करने के लिए वह ज्यादातर उसी नए नंबर का उपयोग करती थी.

प्यार की दीवानगी हदों को लांघने लगी थी. वह पति और बच्चों को छोड़ कर प्रेमी के साथ ही घर बसाने की सोचने लगी. एक दिन उस ने रोहित से अपने मन की बात कह भी दी, ‘‘रोहित, क्यों न हम कहीं जा कर शादी कर लें और फिर एक हो कर रहें.’’

रूपम की बात सुन कर रोहित सकते में आ गया. एकाएक उस से कोई जवाब नहीं बना क्योंकि उस ने कभी सोचा ही नहीं था कि ऐसी नौबत भी आ सकती है. वह रूपम को प्यार तो करता था लेकिन उस से शादी जैसी बात कभी नहीं सोची थी. उसे खामोश देख कर रूपम ने टोका, ‘‘क्या सोच रहे हो, क्या मैं तुम्हें पसंद नहीं?’’

‘‘ऐसी बात नहीं है रूपम. तुम ने जो बात कही है उस पर मुझे सोचने का मौका दो.’’

उस रात रोहित को ठीक से नींद नहीं आई. रूपम उस से उम्र में बड़ी थी. वह उसे इस्तेमाल तो करना चाहता था लेकिन उस के साथ बंध कर रहना नहीं चाहता था. काफी सोचने समझने के बाद उस ने रूपम से पीछा छुड़ाने का फैसला ले लिया और उस से पीछा छुड़ाने की सोचने लगा.

इस के बाद रोहित ने रूपम से दूरियां बनानी शुरू कर दीं. रूपम को जब लगा कि प्रेमी ने उस से मिलना कम कर दिया है तो एक दिन वह बोली, ‘‘रोहित, तुम आजकल कुछ बदलेबदले लगते हो. कहीं तुम मुझे धोखा तो नहीं दे रहे?’’

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है रूपम.’’ रोहित ने कहा.

‘‘तो फिर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम मुझ से दूर होते जा रहे हो. वैसे शादी के बारे में तुम ने क्या सोचा?’’

‘‘मैं हर पल तुम्हारे साथ हूं रूपम. मैं तुम से प्यार भी बहुत करता हूं. मेरा कहना यह है कि शादी के लिए अभी रुक जाओ. वैसे भी शादी की तुम इतनी जल्दी क्यों कर रही हो? हम मिलते तो रहते हैं.’’

‘‘रोहित, तुम्हारी बातों से मुझे यह लग रहा है कि तुम मुझे शादी के लिए टाल रहे हो. लेकिन मैं भी तुम्हें एक बात बताना चाहती हूं.’’

‘‘क्या?’’

‘‘अगर तुम ने मुझ से शादी नहीं की और धोखा दिया तो मैं आत्महत्या कर लूंगी और सुसाइड नोट में तुम्हारा नाम लिख दूंगी.’’

रूपम की इस धमकी से रोहित के पसीने छूट गए. वह बोला, ‘‘मुझे थोड़ा समय तो दो.’’

‘‘बस अब और नहीं. मुझे जल्दी जवाब चाहिए.’’ रूपम के तेवर देख कर रोहित डर गया. उस ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ी रही.

रोहित समझ गया था कि रूपम किसी भी सूरत में उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है.  उस से पीछा छुड़ाने के लिए उस ने एक खतरनाक योजना बना ली.

रोहित का एक दोस्त था गौरव त्यागी. गौरव को रोहित ने अपनी परेशानी बताई और उस से किसी हथियार का इंतजाम करने को कहा. गौरव ने बहुत जल्द एक पिस्टल का इंतजाम कर के उसे दे दिया.

रोहित ने सोच लिया था कि वह आखिरी बार रूपम को समझाने की कोशिश करेगा. अगर वह फिर भी नहीं मानी तो उसे रास्ते से हटा देगा. योजना बना कर उस ने  शाम को रूपम को फोन किया, ‘‘रूपम, मुझे आज तुम से मिलना है. एक जरूरी बात करनी है.’’

रूपम खुश हुई कि रोहित ने शायद उस की बात मान ली है. वह बोली, ‘‘ठीक है, मैं तुम से 8 बजे के बाद घर के पीछे वाली उसी गली में मिलूंगी, जहां हम पहले मिलते थे.’’

उस गली का चुनाव रूपम ने इसलिए किया था क्योंकि वह सुनसान रहती थी.

उस शाम रूपम बाजार के लिए घर से निकली. उस ने घर के लिए सब्जियां खरीदीं. इसी बीच उस ने अपने पति को फोन भी कर दिया कि वह सहेली के पास जाएगी इसलिए घर थोड़ी देरी से आएगी. वह तय समय पर रोहित से मिलने गली में पहुंच गई. रोहित भी वहां पहुंच गया था. वह रोहित के खतरनाक इरादों से पूरी तरह अनजान थी.

उसे देखते ही रूपम ने पूछा, ‘‘क्या सोचा तुम ने?’’

‘‘रूपम, तुम मेरी मजबूरी समझो. मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ यह सुनते ही रूपम के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे उम्मीद नहीं थी कि रोहित उसे ऐसा जवाब देगा.

‘‘मैं अब तुम्हें छोड़ूंगी नहीं. तुम ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया.’’ कहने के साथ ही रूपम ने गुस्से में रोहित के साथ हाथापाई शुरू कर दी. उसे नहीं पता था कि रोहित उस की मौत बनने जा रहा है.

‘‘पीछा तो तुम्हें छोड़ना ही पड़ेगा रूपम.’’ रोहित गुस्से में बोला और पलक झपकते ही पिस्टल निकाल ली. यह देख कर रूपम के होश उड़ गए. वह कुछ कर पाती, उस से पहले ही रोहित ने उस के सिर से पिस्टल सटा कर गोली चला दी. गोली लगते ही रूपम गिर पड़ी. उसे तड़पता छोड़ रोहित वहां से भाग गया.

पुलिस उस तक न पहुंच सके, इसलिए वह घर से भी फरार हो गया. लेकिन पुलिस के जाल में वह फंस ही गया. उस से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या के समय पहनी गई टीशर्ट जिस पर खून के छींटे लगे थे, बरामद कर ली. उस का मोबाइल भी पुलिस ने जब्त कर लिया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया जहां से उसे 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हो सकी थी. पुलिस उसे पिस्टल मुहैया कराने वाले उस के दोस्त गौरव त्यागी की तलाश कर रही थी.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

आखिरी गुनाह करने की ख्वाहिश – भाग 1

नियाज अली से ज्यादा सीधासादा आदमी मैं ने अपनी जिंदगी में इस से पहले नहीं देखा था. उस की उम्र 50 से ऊपर रही होगी, मगर  स्वास्थ्य ऐसा था कि जवान भी देख कर लजा जाए. उसे इस गांव में आए 5-6 साल ही हुए थे. लेकिन अपने स्वभाव और सेवाभाव की वजह से गांव के सभी लोग उसे बहुत पसंद करते थे.

गुजारे के लिए उस ने अपने घर के एक कोने में किराने की छोटी सी दुकान खोल रखी थी. हफ्ते में एक दिन शहर जा कर वह दुकान के लिए सामान ले आता था, बाकी 6 दिन वह गांव में ही रहता था.

अपनी ईमानदारी और सेवाभाव की वजह से वह गांव में ही नहीं, आसपास के गांवों में भी लोकप्रिय हो गया था. इसी वजह से उस की दुकान भी बढि़या चल रही थी. उस का अपना कोई नहीं था. पूछने पर भी उस ने कभी किसी को अपने घर परिवार के बारे में कुछ नहीं बताया था. बाद में लोगों ने इस बारे में पूछना ही छोड़ दिया था.

एक दिन नियाज अली शहर गया तो पूरे एक हफ्ते बाद लौटा. गांव वालों ने पूछा तो उस ने बताया कि वह एक मेले में चला गया था. जिस दिन वह गांव लौटा था, उस के अगले दिन गांव में एक ट्रक, पुलिस एक जीप के साथ आ पहुंची.

इस से पहले गांव में इस तरह पुलिस कभी नहीं आई थी. अगर कोई जरूरत पड़ती थी तो थानेदार 2 सिपाहियों से नंबरदार को खबर भिजवा कर जिस आदमी की जरूरत होती थी, उसे थाने बुलवा लेता था.

इतनी अधिक पुलिस देख कर गांव वाले डर गए. जीप सीधे नंबरदार के दरवाजे पर आ कर रुकी तो ट्रक से आए सिपाहियों ने फुर्ती से पूरे गांव को घेर लिया. नंबरदार दरवाजे पर ही खड़ा था. उस ने हिम्मत कर के पूछा, ‘‘क्या बात है इंसपेक्टर साहब, यह सब क्या है?’’

‘‘नबी खान, मुझे अफसोस है कि आज इस गांव की रीति टूट गई है. लेकिन मैं मजबूर हूं. हमें एक खतरनाक फरार हत्यारे को गिरफ्तार करना है.’’

‘‘कौन है वह?’’ नंबरदार ने पूछा.

‘‘नियाज अली.’’ इंसेक्टर ने जैसे ही यह नाम लिया, नंबरदार हैरान रह गया. उस ने कहा, ‘‘साहब, आप का दिमाग तो ठीक है?’’

‘‘मैं सच कह रहा हूं. मैं नियाज अली को ही गिरफ्तार करने आया हूं.’’

‘‘आइए मेरे साथ. साहब, आप जरूर किसी भ्रम में हैं.’’ नंबरदार ने कहा.

नंबरदार के साथ इंसपेक्टर को अपने घर की ओर आते देख नियाज अली दुकान से निकल कर बाहर आ गया. करीब आने पर उस ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘इतनी बड़ी फौज ले कर आने की क्या जरूरत थी थानेदार साहब. शाम को तो मैं खुद ही आ कर हाजिर होने वाला था. क्योंकि अब मेरा काम खत्म हो गया है.’’

नियाज अली के सामने इंसपेक्टर इस तरह सिर झुकाए खड़ा था, जैसे वह खुद अपराधी हो. नियाज अली नंबरदार से मुखातिब हुआ, ‘‘नंबरदार साहब, इस गांव में इस तरह पुलिस के आने का मुझे दुख है. इस के लिए मैं माफी मांगता हूं. आप लोगों को पता ही है, मैं यहां किस तरह रहा. मैं आज शाम को इस खेल को खत्म कर देता, लेकिन थानेदार साहब सरकार को दिखाने के लिए सुबह ही चले आए.’’

‘‘नियाज अली, तुम…’’ नंबरदार ने उसे हैरानी से देखते हुए कहा.

नंबरदार की बात बीच में ही काट कर नियाज अली बोला, ‘‘नहीं नंबरदार साहब, यह मेरा आखिरी रूप था. मेरा नाम नियाज अली नहीं, भावल खान है, बाकी आप को यह थानेदार साहब बता देंगे.’’

नियाज अली नंबरदार से अपनी बातें कह रहा था, तभी गांव की मसजिद के मौलवी साहब भी आ गए. नियाज अली उन से मुखातिब हुआ, ‘‘मियांजी, आज से मेरे मकान और दुकान के मालिक आप हैं. अगर जिंदा रहा तो आऊंगा अन्यथा यह सब आप का.’’

‘‘हम तुम्हारे घर की तलाशी लेना चाहते हैं.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

‘‘शौक से लीजिए.’’ नियाज अली ने कहा.

मौलवी साहब और नंबरदार हैरानी से नियाज अली का मुंह ताक रहे थे. इंसपेक्टर के इशारे पर नियाज अली को हिरासत में ले लिया गया. मकान और दुकान की तलाशी में कोई भी ऐसी चीज नहीं मिली, जिसे गैरकानूनी कहा जाता.

इंसपेक्टर ने बताया था कि यह नियाज अली नहीं, बल्कि फरार अपराधी भावल खान है. इसे पीर चुनन शाह की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया जा रहा है. पुलिस नियाज अली को साथ ले कर चली गई थी.

मैं अगले दिन उस गांव पहुंचा तो मुझे नियाज अली की गिरफ्तारी के बारे में पता चला. मैं उस गांव का रहने वाला नहीं था. लेकिन उस गांव में हमारी कुछ जमीन थी, जिस की देखभाल के लिए मैं वहां अकसर जाता रहता था. इसी आनेजाने में नियाज अली से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी. एक बार वह हमारे शहर वाले घर पर भी आया था. मेरे पिताजी उस से मिल कर बहुत खुश हुए थे.

गांव वालों ने जब बताया कि नियाज अली एक फरार अपराधी था, जिसे पुलिस ने पीर चुनन शाह की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था. यह जान कर मुझे धक्का सा लगा. हैरानी की बात यह थी कि वहां कोई भी उसे हत्यारा मानने को तैयार नहीं था. उन लोगों में मैं भी शामिल था.

मैं जब भी गांव आता था, 2-4 दिन रुक कर जाता था. लेकिन इस बार मैं एक रात भी वहां नहीं रुक सका. मैं यह जानना चाहता था कि क्या सचमुच नियाज अली फरार अपराधी था. गांव वालों ने भी मुझ से सच्चाई के बारे में पता करने को कहा था.

यह सब मैं ने पिताजी को बताया तो उन्होंने दिमाग पर जोर दे कर कहा कि भावल खान नाम का एक फरार अपराधी था. उस का नाम उन्होंने किसी थाने में सुना था. लेकिन पुलिस रिकौर्ड में उस का कोई फोटो नहीं था, इसलिए वह उसे पहचानते नहीं थे.

जेलर पिताजी के मित्र थे, इसलिए नियाज अली यानी भावल खान से मिलने में मुझे कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं जेल की कोठरी में उस से मिलने पहुंचा तो वहां मुझे देख कर वह हैरान रह गया. उस ने कहा, ‘‘बेटा, तुम यहां कहां? यह जगह तुम जैसे पढ़े लिखे लोगों के लिए नहीं है. तुम्हें यहां नहीं आना चाहिए था.’’

‘‘ऐसा न कहो चचा. तुम जहां भी होते, मैं तुम से मिलने जरूर आता.’’

इधर उधर की बातें करने के बाद मैं ने पूछा, ‘‘क्या, आप सचमुच फरार अपराधी भावल खान हैं, जिस के कारनामों से पुलिस फाइलें भरी पड़ी हैं?’’

‘‘हां बेटा, मैं वही भावल खान हूं. लेकिन पुलिस फाइलों में मेरे बारे में जो लिखा है, वह हकीकत नहीं है.’’ इतना कह कर वह चुप हो गया.

इस के बाद नियाज अली उर्फ भावल खान ने अपने बारे में जो बताया था, वह कुछ इस तरह था.

भावल खान का संबंध एक पिछड़े इलाके से था. उस के पिता बहराम खान अपने जमाने के नामी डाकू थे. बंटवारे से पहले वह भारत के एक सरहदी इलाके में रहते थे. बंटवारे के बाद वह पाकिस्तान आ गए. लेकिन वह सरहदी इलाके मे ही रहते रहे. उन दिनों भावल की उम्र 12-13 थी. होश संभालने तक उस के बाप ने उसे अपनी कला में निपुण कर दिया था.

जानलेवा शर्त ने ली एक बेगुनाह की जान

शहर के आउटस्कर्ट पर लगा यह पुलिस थाना है. यहां पर हलचल शहर के और थानों की अपेक्षा कम ही रहती है. कारण स्पष्ट है कि आसपास ग्रामीण इलाका है, कुछ इलाका घना जंगली भी है. इस शांत जंगली इलाके में अकसर शराबी लोग पार्टियां करने के लिए आया करते हैं.

जनवरी की शुरुआत है और मौसम की ठंडक अपने शबाब पर. थाने के पूरे स्टाफ की नए वर्ष के सेलिब्रेशन की खुमारी अभी तक टूटी नहीं थी. शाम के लगभग 4 बजे थे.

”साहब पास के जंगल में एक लाश पड़ी है,’’ थाने के अंदर घुसता हुआ 20-21 साल का एक युवक बोला.

”तो मैं क्या करूं?’’ स्वागत डेस्क पर बैठा जवान, जो रिपोर्ट लिखने का भी काम करता था, अधखुली आंखों से बोला.

”साहब, आप मेरा यकीन कीजिए. चाहे तो आप उस जगह पर चल कर देख लो,’’ वह युवक बोला.

”तू कौन है? तुझे पता चला कि वह लाश ही है? हो सकता है कोई आदमी दारू पी कर बेसुध पड़ा हो.’’ जवान उसी अवस्था में बोला.

”साहब, मेरा नाम राधेश्याम है और मैं मवेशी चराता हूं. मवेशियों को वापस गांव में लाते समय मुझे वह लाश दिखाई दी थी. वह कोई शराबी या कोई सोया हुआ आदमी नहीं था. उस के शरीर पर कुछ अजीब तरह से जलने के निशान थे,’’ उस युवक ने बताया.

”जा… जा कर जंगल के चौकीदार को यह बात बता. नियमों के अनुसार चौकीदार की रिपोर्ट पर ही पुलिस तस्दीक करने जाएगी.’’ वह पुलिस वाला उस युवक को टरकाने के मकसद से बोला.

”साहब, मुझे मवेशियों को उन के मालिकों को सौंपना है. इसी वजह से मैं ने चौकीदार को नहीं खोजा.’’ युवक ने साफसाफ बता दिया.

”तो जा, जा कर मवेशियों को उन के मालिकों को वापस कर दे. जब चौकीदार की तरफ से सूचना आएगी, तब काररवाई हो जाएगी.’’ पुलिसकर्मी उस युवक को टालते हुए बोला.

”क्या कर रहे हो रामसिंह? एक मर्डर की इन्फर्मेशन को इतने हलके में ले रहे हो.’’ अंदर की तरफ के औफिस से निकलते हुए इंसपेक्टर आलोक कुमार बोले, ”मैं ने अपने औफिस में बैठे हुए पूरी बात सुन ली है.’’

”अरे साहब, इस जंगल में लोग नए साल की पार्टी करने के लिए आते हैं और जब कोई नशे में धुत हो जाता है तो उस के साथी उसे ऐसे ही छोड़ कर निकल जाते हैं. यह भी कोई इसी तरह का आदमी होगा, जो होश में आने पर उठ कर चला जायगा. और अगर लाश होगी तो चौकीदार हमें सूचित करेगा ही.’’ रामसिंह ने जवाब दिया.

”नहीं नहीं साहब, वह लाश ही है.’’ राधेश्याम बीच में ही बोल पड़ा.

”तुझे कैसे पता कि वह लाश ही है.’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”क्योंकि साहब उस के हाथ और पैर बंधे हुए हैं. शरीर पर कपड़े भी नहीं हैं और बदन पर कुछ अजीब तरह के निशान हैं.’’ राधेश्याम ने बताया.

”किस तरह के अजीब निशान हैं?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”जैसे चमड़ी के जलने के बाद आते हैं, उस तरह के.’’ राधेश्याम ने बताया.

”रामसिंह फोटोग्राफर और बाकी स्टाफ को तैयार करो, मामला गंभीर लग रहा है. हम इस लड़के की बताई हुई जगह पर चलेंगे.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

कुछ ही देर में इंसपेक्टर पुलिस टीम और  राधेश्याम को साथ ले कर जंगल में पहुंच गए.

किस की थी जंगल में मिली लाश

वहां 50-55 साल के किसी आदमी की लाश थी. उस के हाथ पैर बंधे हुए थे. कपड़े कुछ दूरी पर पड़े हुए थे. ऐसा लग रहा था कि हाथ पैर बांधने के बाद उस के कपड़े फाड़ कर उतार दिए गए हों.

जिस तरह चीता या जेब्रा के शरीर पर धारियां होती हैं, कुछ उसी तरह की पतली पतली धारियां सी उस के शरीर पर दिखाई दे रही थीं. ऐसा लग रहा था जैसे निशान वाले स्थान पर किसी चीज से जलाया गया हो. पास ही शराब की एक तीन चौथाई खाली बोतल व प्लास्टिक का एक खाली गिलास भी रखा था.

”देखिए साहब, मैं कह रहा था न कि लोग इस जंगल में शराब पार्टी करने के लिए ही आते हैं. यह शराब पार्टी के लिए ही यहां आया था.’’ रामसिंह बोला.

”अगर पार्टी के मकसद से यहां आए होते तो कुछ और गिलास भी होने चाहिए थे, पर यहां सिर्फ एक ही गिलास है. दूसरा इस के पहनावे और चेहरे मोहरे से भी यह उस स्तर का व्यक्ति नहीं लग रहा कि पार्टी कर सके. बल्कि मुझे तो यह खुद एक भिखारी जैसा लग रहा है.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

”सर, हो सकता है कि पार्टी करने के लिए ही आए हों और कुछ विवाद हुआ हो और वह सब इस का मर्डर कर के भाग गए हों. हमें फिंगरप्रिंट न मिल पाएं, यही सोच कर खाली गिलास अपने साथ ले गए हों. शरीर पर कपड़े नहीं हैं इस से ऐसा भी लगता है कि कहीं अवैध संबंधों का मामला न हो.’’ एसआई शफीक अहमद ने कहा.

”पार्टी जैसा कोई माहौल तो लग नहीं रहा है. ऊपर से शरीर पर यह धारीनुमा निशान इस बात की तरफ इशारा कर रहे हैं कि इन स्थानों पर इसे जलाया गया है.’’ इंसपेक्टर आलोक ने अपना शक जाहिर किया.

”मगर इतनी बारीकी से कौन जला सकता है. अगर ऐसा हुआ है तो यह एक बड़ी शानदार कलाकारी है.’’ एसआई शफीक ने कहा.

”ऐसे निशान तो सिर्फ करंट के जलने से आते हैं. यहां पर आसपास दूर तक कोई बिजली की लाइन नहीं है. ऐसे में यहां करंट दे कर जलना कुछ तर्कसंगत नहीं लगता,’’ इंसपेक्टर ने बताया.

”यह भी तो हो सकता है कि इसे कहीं और करंट दे कर मारा गया हो और जांच की दिशा भटकाने के लिए यह बोतल और गिलास यहां रख दिए हों.’’ रामसिंह बोला.

”मेरे विचार से ऐसा नहीं हुआ होगा. क्योंकि उस के कपड़े किसी ब्लेड या चाकू की मदद से काट कर अलग किए गए हैं. मतलब करंट उसे कपड़े उतारने के बाद लगाया गया है. वरना कपड़ों पर जले हुए मांस के कुछ अंश कपड़ों पर जरूर चिपकते.’’ इंसपेक्टर आलोक ने अपने विचार जाहिर किए.

”फिर?’’ एसआई ने पूछा.

”फोटोग्राफर को बोल कर सभी एंगल से फोटो ले लो और डेड बौडी को पोस्टमार्टम के लिए भेज दो.’’ इंसपेक्टर ने निर्देश दिए, ‘ï’पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने पर मुझे दिखलाना.’’

”यस सर,’’ कह कर सब अपने कामों में लग गए.

”सर, उस अंधे कत्ल की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई है.’’ लगभग 2 दिनों के बाद एसआई ने सूचित किया.

”मौत का कारण लो इंटेंसिटी करंट का बौडी से प्रवाहित होना लिखा गया है.’’ इंसपेक्टर आलोक रिपोर्ट पढ़ते हुए बोले.

”वहां पर बिजली कैसे पहुंची होगी?’’ एसआई शफीक ने पूछा.

”यही तो देखने वाली बात है. ऐसा करो इस आदमी का फोटो ले जा कर सभी भिखारियों को दिखाओ. शायद कोई क्लू मिल जाए.’’ इंसपेक्टर ने कहा.

”जी, अभी टीमें भिजवाता हूं.’’ एसआई शफीक कहते हुए औफिस से निकल गए.

किस ने किया भिखारी मोहन का मर्डर

2 दिन बाद एसआई ने सूचना दी, ”सर, हम लोगों का अनुमान सही निकला. वह लाश एक भिखारी की ही है जो यहां से करीब 7 किलोमीटर दूर शंकर मंदिर के पास बैठ कर भीख मांगा करता था.’’

”और क्या इन्फर्मेशन है उस भिखारी के बारे में?’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”सर, उस का नाम मोहन है और वह उसी इलाके में मंदिर से कुछ दूर एक ब्रिज के नीचे झोपड़ी बना कर रहता है. उस के परिवार के बारे में कुछ अतापता नहीं है. अकेले ही रहता था. बहुत ही शांत प्रवृत्ति का इंसान था, लेकिन शराब पीने का बहुत शौकीन था. लेकिन पीने के बाद कोई हंगामा नहीं करता था.’’ एसआई ने मृतक मोहन के बारे में बताया.

”उस की झोपड़ी की तलाशी ली क्या?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”जी सर, झोपड़ी की तलाशी के दौरान करीब एक हजार रुपए नकद मिले. कोई भी ऐसी चीज नहीं मिली, जिसे देख कर कोई संदेह पैदा होता हो.’’ एसआई शफीक ने बताया.

”आसपास के शराबी, अफीमचियों और नशे का धंधा करने वालों पर नजर रखो. शायद उस ने किसी को देख लिया हो और अपने पकड़े जाने के डर से उसे मार डाला गया हो.’’ इंसपेक्टर ने शक जाहिर किया.

”सर, हम ने नजर रखी हुई है और मुखबिर भी अलर्ट कर दिए है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई सुराग नहीं मिला.’’ एसआई ने सूचना दी.

”ठीक है, आप लोग उस की झोपड़ी पर फिर से पहुंचो और सभी पास पड़ोसियों को इकट्ठा कर लो. मैं खुद पूछताछ करूंगा.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने कहा.

लगभग 2 घंटे बाद इंसपेक्टर आलोक कुमार उस बस्ती में थे, जिस में मोहन रहता था.

”साहब, मोहन एक सीधासादा इंसान था, जो सिर्फ अपने पीने और खाने से मतलब रखता था. वह एक नियम का पक्का था कि चाहे कितना भी बड़ा त्यौहार हो, मंदिर में कितनी भी भीड़ हो, लेकिन शाम को 8 बजे के बाद कभी भीख नहीं मांगता था. उस के बाद उस का पीने का ही काम रहता था. कभी हम लोगों में से किसी के साथ भी उस का कभी कोई विवाद नहीं हुआ.’’ भीड़ में मौजूद एक बुजुर्ग भिखारी ने बताया.

”उस का कोई दोस्त? कोई दुश्मन?’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”नहीं साहब, वह किसी से ज्यादा बात नहीं करता था. हां, पिछले 15-20 दिनों से वह सामने के चौराहे पर आटो मैकेनिक नदीम की दुकान पर जरूर 5-7 मिनट रुका करता था. शायद वह कुछ बता सके.’’ वहां मौजूद लोगों में से एक ने बताया.

”नदीम? कैसा आदमी है? मेरा मतलब वह शराब, अफीम या कोई और नशा करता है क्या?’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”यह तो पता नहीं. हम तो जाते नहीं उस की दुकान पर क्योंकि हमारे पास तो कोई गाड़ी है नहीं.’’ वह व्यक्ति बोला.

”तो मोहन से क्यों बातें करता था वह.’’ इंसपेक्टर आलोक ने पूछा.

”पता नहीं. शायद मोहन के मंदिर जाने का रास्ता भी वही था इसी कारण दुआ सलाम हो जाती हो.’’ वह व्यक्ति बोला.

”साहब, नदीम को यहां बुलवाऊं क्या?’’ एसआई शफीक ने पूछा.

”नहीं, तुम ऐसा करो नदीम को उठा कर थाने में ही ले आओ. शायद उस से अच्छी तरह से पूछताछ करनी पड़े.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने निर्देश दिया.

”ठीक है सर.’’ एसआई ने कहा.

कौन सी शर्त ने ली मोहन की जान

कुछ ही देर में एसआई शफीक अहमद नदीम को उस की दुकान से थाने ले आए. थाने में आते ही इंसपेक्टर ने नदीम से पूछा, ”तुम मोहन को कैसे पहचानते हो नदीम?’’

”सर, उसे बीड़ी पीने का शौक था और मैं उसे बीड़ी दिया करता था. बस इतनी पहचान थी उस से,’’ नदीम ने जवाब दिया.

”तुम ने उसे क्यों मारा?’’ इंसपेक्टर आलोक ने तुरंत मुद्दे पर आते हुए पूछा.

”नहीं साहब, मैं ने उसे नहीं मारा.’’ नदीम सहमते हुए बोला.

”लेकिन मेरा अनुभव कहता है कि तुम ने ही उसे मारा है और मेरे पास इस के गवाह और सबूत मौजूद हैं.’’ इंसपेक्टर आलोक अंधेरे में तीर चलाते हुए बोले.

”साहब, मेरी उस से कोई दुश्मनी नहीं थी तो भला मैं उसे क्यों मारूंगा?’’ नदीम ने इंसपेक्टर से उल्टा प्रश्न किया.

”यही तो मैं जानना चाहता हूं. हमें तुम सीधे सीधे बताते हो या फिर मैं अपनी तरह से उगलवाऊं?’’ इंसपेक्टर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा.

”नहीं साहब, मुझे कुछ नहीं मालूम. मां कसम.’’ नदीम ने फिर कहा.

”हवलदार, इस की बत्तीसी निकाल कर मेरे हाथों में रख दो और याद रहे एक भी दांत बचा तो तुम्हारी बत्तीसी मैं निकाल लूंगा.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने पास खड़े एक सिपाही से कहा.

”साहब, मत मारिए मैं सब कुछ बताता हूं.’’ 2-3 करारे थप्पड़ों के बाद ही नदीम टूट गया.

”हां, तो बताओ क्यों मारा मोहन को? सुन, झूठ बोलने की और पुलिस को बहकाने की गलती कतई मत करना वरना शरीर की 208 हड्डयों का चूरमा बनवा दूंगा.’’ इंसपेक्टर ने धमकाते हुए कहा.

”सर, एक शर्त की वजह से मोहन को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा.’’ नदीम ने बताया

”शर्त? कैसी शर्त?’’ इंसपेक्टर ने हैरान होते हुए पूछा.

नदीम ने कैसे पूरी की शर्त

नदीम ने बताया, ”सर, मैं एक साइंस का स्टूडेंट रहा हूं और मैं ने ट्वेल्थ तक साइंस सब्जेक्ट ही लिया है. फिजिक्स मेरा प्रिय विषय था. मगर मैं ट्वेल्थ पास नहीं हो पाया. इसी कारण मैं ने आटो मैकेनिक की ट्रेनिंग ले कर यह दुकान खोल ली.

”कुछ दिनों पहले अखबार में मैं ने एक खबर पढ़ी कि एक स्कूल की फिजिक्स लैब में एक प्रयोगशाला सहायक 12 वोल्ट की बैटरी पर गिर गया और उस के भीगे हुए होने के कारण इलेक्ट्रिक का सर्किट पूरा हो गया और करंट लगने से उस की मौत हो गई.’’

”यह तो एक खबर हो गई. इस में शर्त कहां से आ गई?’’ इंसपेक्टर आलोक उतावलेपन से बोले.

”मेरा एक दोस्त है जुनैद. वह इलेक्ट्रीशियन है. उसे मैं ने जब यह खबर बताई तो वह मानने को तैयार नहीं हुआ. उस के अनुसार 12 वोल्ट का करंट बहुत कम होता है और उस से कोई बड़ा आदमी नहीं मर सकता. बस इसी बात को ले कर हम दोनों में 5-5 हजार रुपए की शर्त लग गई.

”अब समस्या यह थी कि यह प्रयोग किस पर किया जाए और कैसे किया जाए. हम ने आसपास देखा तो हमें मोहन इस प्रयोग के लिए सही लगा. बिना परिवार का आदमी था, गायब हो जाने पर कोई शिकायत करेगा, इस की संभावनाएं बहुत कम थीं.’’ नदीम ने बताया.

”फिर तुम ने अपनी योजना को अंजाम किस तरह दिया?’’ इंसपेक्टर आलोक ने उत्सुकता से पूछा.

”हमें यह तो पता था कि मोहन शराब का बहुत शौकीन है. बस, उस की यह कमजोरी ही उस की मौत का कारण बनी. रोज दुकान के सामने से गुजरते समय हम ने उस से आगे बढ़ कर दुआसलाम करना चालू कर दिया. धीरे धीरे जाते समय हम ने योजना के अनुसार उसे बीड़ी पिलानी चालू कर दी. इस से उस का विश्वास हम पर और बढ़ गया.

”एक दिन हम ने उसे हमारे साथ शराब पीने का औफर दिया तो उस ने यह कह कर मना कर दिया कि इस बस्ती के सभी लोग उसे पहचानते हैं, इसी कारण वह बाहर शराब न पी कर सिर्फ अपनी झोपड़ी में ही पीता है. और वह भी सिर्फ रात को.

”तब हम ने उसे नए साल की खुशी में पास के जंगल में दारू व मुरगे की पार्टी रखने की बात कही तो वह लालच में आ गया और पार्टी की बात मान गया. मेरे पास 2002 मौडल का एक पुराना स्कूटर था. हम तीनों उसी पर बैठ कर जंगल में गए.’’

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साइंस के प्रयोग से कैसे पहुंचे जेल

इंसपेक्टर ने पूछा, ”लेकिन तुम ने उसे मारा कैसे? करंट का इंतजाम कैसे किया?’’

”वही तो बता रहा हंू साहब. मैं और जुनैद दोनों शराब नहीं पीते. मगर अपने प्रयोग का परिणाम देखने के लिए हम ने मोहन की पसंद की पूरी बोतल ली.’’

”अरे मुरगे का क्या हुआ. पार्टी तो दारू और मुरगे दोनों की थी न?’’ मोहन शराब पीते हुए बोला, ”आज बहुत दिनों के बाद जी भर कर पीऊंगा.’’

”पास ढाबे वाले को बोल दिया है, कुछ ही देर में मुरगा ले कर आता होगा,’’ जुनैद ने जवाब दिया.

”लगभग आधी बोतल पीने के बाद मोहन बेसुध होने लगा. मैं ने उस के कपड़े उतारना चाहा लेकिन यह संभव नहीं था. इसलिए आननफानन में एक ब्लेड से उस के कपड़े काट कर उतार दिए.’’ नदीम बोला.

”मारने के लिए करंट का इंतजाम कहां से किया? क्योंकि मुझे मालूम है स्कूटर के उस मौडल या उस समय के किसी भी स्कूटर के मौडल में बैटरी लगती ही नहीं थी और साथ में तुम ने कोई बैटरी रखी नहीं थी.’’ इंसपेक्टर ने पूछा.

”यहां पर मेरा मैकेनिक और फिजिक्स का स्टूडेंट होना काम आया. स्कूटर के टेक्निकल स्पेसिफिकेशन के अनुसार जब उसे साढ़े 5 हजार आरपीएम पर चलाते हैं तो डायनमो के द्वारा 12 वोल्ट का करंट जेनरेट करता है.

”मोहन के कपड़े उतारने के बाद हम ने उस के पैर और हाथ ऊपर कर के बांध दिए. यह सब करने से यह स्पष्ट हो गया था कि मोहन कोई विरोध नहीं कर सकता.

”अब मैं ने अपनी शौप से लाए 5 क्लच वायर से मोहन के शरीर पर एक कांपैक्ट क्वाइल की रचना बना दी. इस क्वाइल को मैं ने स्पार्क प्लग से जोड़ कर पावर सर्किट को पूरा कर दिया.

”अब स्कूटर को न्यूट्रल गियर में डाल कर फुल एक्सीलेटर दे कर चालू कर दिया. बेसुध मोहन विरोध करने की स्थिति में तो था नहीं. कुछ समय करंट से जूझने के बाद मोहन शांत हो गया. और मैं शर्त जीत गया.’’ नदीम ने बताया.

”तो यह बात है, एक शर्त जीतने के लिए एक गरीब की मुफ्त में जान ले ली. वैसे कुल मिला कर करंट कितनी देर देना पड़ा?’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने नदीम से पूछा.

”साहब, कुल 20 मिनट के करंट के बाद मोहन शांत हो चुका था. मुझे उम्मीद थी कि इस सूने जंगल में लाश 2-3 दिन तो पड़ी ही रहेगी और उस की खाल जल जाने की वजह से कीड़े मकोड़े और जानवर जल्दी ही मांस नोच लेंगे फिर मोहन को पहचानना मुश्किल हो जायगा.’’ नदीम बोला.

”क्या खूब कहानी रची तुम ने, मगर एक चरवाहे के समय पर पहुंचने के कारण सारा प्लान फेल हो गया.’’ इंसपेक्टर ने बात पूरी की.

”हां सर, हम से यह बड़ी गलती हुई है. हमें ऐसा नहीं करना चाहिए था. यह मुझे अब अहसास हुआ है.’’ नदीम ने हाथ जोड़ते हुए कहा. तभी जुनैद भी इंसपेक्टर आलोक कुमार के सामने हाथ जोड़ कर माफ करने के लिए गिड़गिड़ाने लगा.

”तुम लोगों ने एक बेगुनाह का मर्डर किया है, इसलिए तुम्हें इस की सजा तो मिलनी ही चाहिए. वो तो भला हो उस चरवाहे का, जिस ने लाश की जानकारी पुलिस को दी, वरना लाश डैमेज हो जाने के बाद केस भी आसानी से नहीं खुल पाता.’’ इंसपेक्टर आलोक कुमार ने कहा.

इस के बाद उन्होंने एसआई शफीक अहमद से कहा कि इन दोनों को मोहन की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजने की काररवाई करें. एक मामूली शर्त की वजह से नदीम और जुनैद को जेल जाना पड़ा.

वैलेंटाइन डे पर मिली अनोखी सौगात – भाग 3

किरण और रामबाबू के बीच एक बार जिस्मानी संबंध बनने के बाद उन का सिलसिला चलता रहा. लेकिन ज्यादा दिनों तक सिलसिला कायम न रह सका. करतार सिंह को पत्नी के हावभाव से उस पर शक होने लगा. उसे रामबाबू का उस के यहां ज्यादा आना अच्छा नहीं लगता था. इस बात का ऐतराज उस ने पत्नी से भी जताया और कहा कि वह रामबाबू को यहां आने से मना कर दे. लेकिन किरण ने ऐसा नहीं किया.

इसी बात को ले कर पत्नी से करतार की नोकझोंक होती रहती थी. उसी दौरान किरण की छोटी बहन सलीना भी उस के पास रहने के लिए आ गई. 22 साल की सलीना खूबसूरत थी. जवान साली को देख कर करतार की भी नीयत डोल गई. वह उस पर डोरे डालने लगा लेकिन घर में अकसर पत्नी के रहने की वजह से उस की दाल नहीं गल पाई.

उधर किरण और रामबाबू के अवैध संबंध का खेल कायम रहा और 7 फरवरी को वह रामबाबू के साथ भाग गई. बदनामी की वजह से करतार ने इस की रिपोर्ट थाने में भी नहीं लिखवाई. करीब एक हफ्ते तक दोनों इधरउधर घूम कर मौजमस्ती कर के घर लौट आए. करतार ने किरण को आडे़ हाथों लिया तो किरण ने पति के पैरों में गिर कर माफी मांग ली. पत्नी के घडि़याली आंसू देख कर करतार का दिल पसीज गया और उस ने पत्नी को माफ कर दिया.

13 फरवरी की शाम को रामबाबू करतार के यहां आया. करतार को पता था कि उस की पत्नी को रामबाबू ही भगा कर ले गया था इसलिए उस के घर आने पर वह मन ही मन कुढ़ रहा था. फिर भी उस ने उस से कुछ कहना जरूरी नहीं समझा.

उस ने उस की खातिरदारी की और उस के साथ शराब भी पी. शराब पीने के दौरान ही बातोंबातों में उन का झगड़ा हो गया. झगड़ा बढ़ने पर रामबाबू वहां से चला गया. किरण ने इसे अपने प्रेमी रामबाबू की बेइज्जती समझा और उलटे वह भी पति से झगड़ने लगी.

अगले दिन 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे था. प्यार का इजहार करने के इस दिन का तमाम लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता है. 40 साल का करतार भी अपनी 22 साल की साली सलीना को मन ही मन चाहता था. उस दिन सलीना किरण के साथ महिपालपुर में रामबाबू के घर चली गई थी. इस बात की जानकारी करतार सिंह को थी.

करतार सिंह ने भी वैलेंटाइन डे के दिन ही सलीना को अपने प्यार का इजहार करने का फैसला कर लिया. वह दुकान पर अपने बेटे को बिठा कर रामबाबू के कमरे पर पहुंच गया. उस समय वहां रामबाबू नहीं था. वह किरण और सलीना को कमरे पर छोड़ कर किसी काम से घर से बाहर चला गया था और उस की पत्नी प्रभा मायके गई हुई थी.

करतार सलीना के लिए बेचैन हुआ जा रहा था. जिस समय किरण किचन में कोई काम कर रही थी, सलीना कमरे में थी, तभी मौका देख कर करतार ने सलीना का हाथ पकड़ लिया.

सलीना घबरा गई. जब उस ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की तो करतार ने उस के सामने प्यार का इजहार करते हुए उसे किस कर दी और वह उस के साथ अश्लील हरकतें करने लगा. सलीना चीखी तो किचन से किरण आ गई. पति की हरकतों को देख कर उसे भी गुस्सा आ गया. तब सलीना ने किसी तरह खुद को उस के चंगुल से छुड़ा लिया और किचन की ओर भाग गई.

उधर किरण पति को डांट ही रही थी तभी सलीना किचन से चाकू ले आई. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाता, सलीना ने करतार के पेट में चाकू घोंप दिया.

चाकू लगते ही करतार के पेट से खून का फव्वारा फूट पड़ा. सलीना ने उसी चाकू से एक वार उस के पेट की दूसरी साइड में कर दिया. इस के बाद करतार सिंह फर्श पर गिर गया और बेहोश हो गया.

बहन के इस कदम पर किरण भी हैरान रह गई. जो हो चुका था, उस में अब वह कुछ नहीं कर सकती थी. उस ने छोटी बहन से कुछ नहीं कहा. बल्कि वह यह सोच कर खुश हुई कि करतार के मरने के बाद वह रामबाबू के साथ बिना किसी डर के रहेगी. करतार कहीं जिंदा न रह जाए, इसलिए किरण ने उसी चाकू से उस का गला काट दिया. इस के बाद किरण ने फोन कर के रामबाबू को करतार की हत्या करने की खबर दे दी. उस ने उसे बुला लिया.

दोनों बहनों द्वारा करतार की हत्या करने पर वह भी हैरान रह गया. अब उन तीनों ने उस की लाश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. सब से पहले उन्होंने उस की बौडी के खून को साफ किया फिर लाश को प्लास्टिक के कट्टे में रख लिया.

अंधेरा होने के बाद रामबाबू ने उस की लाश अपने आटोरिक्शा में रख ली. किरण और सलीना भी आटो में बैठ गईं. रामबाबू आटो को वसंत कुंज इलाके की तरफ ले गया. वसंत वाटिका पार्क के पास उन्हें बिना ढक्कन का एक मेनहोल दिखा तो उसी मेनहोल में उन्होंने लाश गिराने का फैसला ले लिया.

आटो से कट्टा उतार कर उस मेनहोल के पास ले गए और कट्टे का मुंह खोल कर लाश उस मेनहोल में गिरा दी और कट्टा वहीं फेंक कर वे उसी कमरे पर चले गए जहां करतार की हत्या की गई थी.

तीनों ने फर्श धो कर खून के धब्बे साफ किए फिर किरण और सलीना वहां से करतार के कमरे पर आ गईं. उन्हें देख कर घर का कोई भी सदस्य यह अनुमान तक नहीं लगा पाया कि वे कोई जघन्य अपराध कर के आई हैं.

जब देर रात तक करतार घर नहीं पहुंचा तो उस के घर वालों ने किरण से उस के बारे में पूछा. तब किरण ने यही जवाब दिया कि उसे करतार के बारे में कुछ नहीं पता. घर वालों के साथ वह भी करतार को इधरउधर ढूंढती रही.

10-12 दिनों तक घर वाले परेशान होते रहे, लेकिन करतार का कहीं पता नहीं चला. करतार के घर वाले जब उस के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज कराने की बात करते तो किरण उन्हें यह कह कर मना करती कि वह कहीं गए होंगे. अपने आप लौट आएंगे. घर वालों के दबाव देने पर किरण ने 25 फरवरी को थाना वसंत कुंज (नार्थ) जा कर पति की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा दी.

उधर करतार सिंह के मातापिता का कहना है कि सलीना ने उन के बेटे पर छेड़खानी का जो आरोप लगाया है वह सरासर गलत है. हकीकत यह है कि सलीना करतार के साथ पहले से ही उस के कमरे में सोती थी. जब किरण रामबाबू के साथ भाग गई थी तब सलीना करतार के साथ ही सोती थी.

हफ्ता भर तक जब जीजासाली बंद कमरे में सोए थे तो उन्होंने भजनकीर्तन तो किया नहीं होगा. जाहिर है उन्होंने सीमाएं भी लांघी होंगी. ऐसे में उस के द्वारा छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाली बात एकदम गलत है.

उन्होंने आरोप लगाया कि करतार की हत्या रामबाबू, किरण और सलीना ने साजिश के तहत की है. तीनों के खिलाफ सख्त काररवाई की जानी चाहिए.

बहरहाल अब यह बात अदालत ही तय करेगी कि करतार सिंह का हत्यारा कौन है. किरण और सलीना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने एक बार फिर रामबाबू के यहां दबिश दी, लेकिन वह नहीं मिला.

पुलिस को पता चला कि करतार की लाश ठिकाने लगाने में रामबाबू ने अपने जिस आटोरिक्शा का प्रयोग किया था, वह किसी के यहां खड़ा है. पुलिस उस जगह पर पहुंच गई जहां उस का आटोरिक्शा खड़ा था. उस आटोरिक्शा को ले कर पुलिस थाने लौट आई.

पुलिस ने किरण और सलीना को भादंवि की धारा 302 (हत्या करना), 201 (हत्या कर के लाश छिपाने की कोशिश) और 120बी (अपराध की साजिश रचने) के तहत गिरफ्तार कर के उन्हें न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया.

कथा संकलन तक दोनों अभियुक्त जेल में बंद थीं जबकि रामबाबू की तलाश में पुलिस अनेक स्थानों पर दबिश डाल चुकी थी.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

वैलेंटाइन डे पर मिली अनोखी सौगात – भाग 2

करतार रंगपुरी पहाड़ी पर रहता था. महिपालपुर से लौटने के बाद पुलिस ने रंगपुरी पहाड़ी पर पहुंच कर वहां के लोगों से करतार के बारे में जानकारी जुटानी शुरू कर दी. इस से पुलिस को कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिलीं, जिस के बाद किरण और उस की छोटी बहन सलीना भी शक के दायरे में आ गईं.

दोनों बहनों को पुलिस ने उसी दिन पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया. किरण और सलीना को जब अलगअलग कर के पूछताछ की तो करतार के मर्डर की कहानी खुल गई. दोनों बहनों ने स्वीकार कर लिया कि उस की हत्या उन दोनों ने ही की थी और लाश रामबाबू के आटो में रख कर वसंत वाटिका पार्क में लाए और उसे वहां के गटर में डाल कर अपनेअपने घर चले गए थे. पति की हत्या की जो कहानी किरण ने बताई, वह प्रेम से सराबोर निकली.

पिल्लूराम मूलरूप से हरियाणा के गुड़गांव जिले के मेवात क्षेत्र स्थित नूनेरा गांव के रहने वाले थे. अब से तकरीबन 40 साल पहले अपनी पत्नी रतनी और 2 बेटों के साथ वे दिल्ली आए थे और दक्षिणी दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में स्थित रंगपुरी पहाड़ी पर रहने लगे. उन से पहले अनेक लोगों ने इसी पहाड़ी पर तमाम झुग्गियां डाल रखी थीं.

दिल्ली की चकाचौंध ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वह यहीं पर बस गए. छोटेमोटे काम कर के वह परिवार को पालने लगे. दिल्ली आने के बाद रतनी 4 और बेटों की मां बनी. अब उन के पास 6 बेटे हो गए थे जिन में करतार सिंह तीसरे नंबर का था.

पिल्लूराम की हैसियत उस समय ऐसी नहीं थी कि वे बच्चों को पढ़ा सकें. फिर भी उन्होंने सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराया लेकिन सभी ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी. कोई भी बच्चा उच्चशिक्षा हासिल नहीं कर सका, तब पिल्लूराम ने उन्हें अलगअलग कामों में लगा दिया.

सभी बच्चे कमाने लगे तो घर के हालात सुधरने लगे. पैसा जमा करने के बाद करतार सिंह ने रंगपुरी पहाड़ी पर ही किराना स्टोर और चाय की दुकान खोल ली. कुछ ही दिनों में करतार सिंह का काम चल निकला तो उसे अच्छी आमदनी होने लगी. तब पिल्लूराम ने उस की शादी सीमा नाम की एक लड़की से कर दी.

शादी के बाद हर किसी के जीवन की एक नई शुरुआत होती है. यहीं से एक नए परिवार की जिम्मेदारी उठाने की कोशिश शुरू हो जाती है. सीमा से शादी करने के बाद करतार ने भी गृहस्थ जीवन की शुरुआत की. वह सीमा से बहुत खुश था. सीमा सपनों के जिस राजकुमार से शादी करना चाहती थी, करतार वैसा ही था. इसलिए उस ने बहुत जल्द ही करतार के दिल को काबू में कर लिया था.

इस दौरान सीमा एक बेटी और एक बेटे की मां बनी. उस का परिवार हंसीखुशी से चल रहा था. इसी बीच परिवार में ऐसा भूचाल आया जिस का दुख उसे सालता रहा.

करीब 4-5 साल पहले सीमा की कैंसर से मौत हो गई. करतार ने उस का काफी इलाज कराया था. लाख कोशिश करने के बाद भी वह ठीक नहीं हो सकी और परिवार को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर चली गई.

सीमा की मौत पर वैसे तो पूरे परिवार को दुख हुआ था लेकिन सब से ज्यादा दुख करतार ही महसूस कर रहा था. होता भी क्यों न, वह उस की अर्द्धांगिनी जो थी. जीवन के जितने दिन उस ने पत्नी के साथ गुजारे थे, उन्हीं दिनों को याद करकर के उस की आंखों में आंसू भर आते थे.

36 साल का करतार दुकान पर बैठेबैठे खाली समय में अपने वैवाहिक जीवन की यादों में खोया रहता था. उस के मांबाप भी उसे काफी समझाते रहते थे. खैर, जैसेजैसे समय गुजरता गया, करतार सिंह भी सामान्य हो गया.

उसी दौरान उस की मुलाकात किरण नाम की एक युवती से हुई जो झारखंड के केरल गांव की थी. वह भी रंगपुरी पहाड़ी पर रहती थी. किरण वसंत कुंज इलाके में कोठियों में बरतन साफ करने का काम करती थी. करतार एकाकी जीवन गुजार रहा था. किरण को देख कर उस का झुकाव उस की ओर हो गया. किरण भी अकसर उस के पास आने लगी. उसे भी करतार से बातचीत करने में दिलचस्पी होने लगी. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए थे.

फिर तो करतार जब भी फुरसत में होता, किरण को फोन मिला देता. दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू हो जाता और काफी देर तक बातें होती रहतीं. बातों ही बातों में वे एकदूसरे से खुलते गए. यह नजदीकी उन्हें प्यार के मुकाम तक ले गई.

चूंकि किरण भी अकेली ही थी और करतार उस की नजरों में सही था. उस की किराने की दुकान अच्छी चल रही थी इसलिए उस ने काफी सोचनेसमझने के बाद ही उस की तरफ प्यार का हाथ बढ़ाया था. करतार ने उस के सामने पूरी जिंदगी साथ रहने की पेशकश की तो किरण ने सहमति जता दी. इस के बाद किरण करतार के साथ पत्नी की तरह रहने लगी. यह करीब 4 साल पहले की बात है.

करतार की जिंदगी फिर से हरीभरी हो गई थी. किरण के प्यार ने उस के बीते दुखों को भुला दिया था. दोनों की उम्र में करीब 8 साल का अंतर था इस के बाद भी किरण उस से खुश थी.

इन 4 सालों में किरण मां नहीं बन सकी थी. करतार सिंह की पहली पत्नी से 2 बच्चे थे. इसलिए किरण के बच्चा पैदा न होने पर करतार को कोई मलाल नहीं था. लेकिन किरण इस चिंता में घुलती जा रही थी. वह चाहती थी कि उस के भी बच्चा हो. उस की गोद भी भर जाए.

किरण के कहने पर करतार ने उस का इलाज भी कराया. इस के बावजूद भी उस की इच्छा पूरी नहीं हुई तो करतार ने अपने एक संबंधी की एक साल की बेटी गोद ले ली जिस से किरण का मन लगा रहे. किरण उस गोद ली हुई बेटी की परवरिश में लग गई.

किरण के गांव की ही प्रभा नाम की एक लड़की की शादी महिपालपुर में रहने वाले रामबाबू के साथ हुई थी. रामबाबू आटोरिक्शा चलाता था. एक ही गांव की होने की वजह से किरण प्रभा से फोन पर बात भी करती रहती थी. कभी प्रभा उस के यहां तो कभी वह प्रभा के घर जाती रहती थी. एकदूसरे के यहां आनेजाने से करतार और रामबाबू के बीच भी दोस्ती हो गई थी. दोनों साथसाथ खातेपीते थे.

इसी बीच किरण का झुकाव रामबाबू की ओर हो गया. वह उस से हंसीमजाक करती रहती थी. किरण की ओर से मिले खुले औफर को भला रामबाबू कैसे ठुकरा सकता था. शादीशुदा होने के बावजूद भी उस ने अपने कदम किरण की ओर बढ़ा दिए. दोनों ही अनुभवी थे इसलिए उन्हें एकदूसरे के नजदीक आने में झिझक महसूस नहीं हुई.

वैलेंटाइन डे पर मिली अनोखी सौगात – भाग 1

दक्षिणी दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में एमसीडी के कर्मचारी गटर की सफाई कर रहे थे. सफाई करते हुए वे सी-2 ब्लौक में वसंत  वाटिका पार्क पहुंचे तो गटर के एक मेनहोल के पास तीक्ष्ण गंध महसूस हुई. वह गंध सीवर की गंध से कुछ अलग थी. जिस मेनहोल से बदबू आ रही थी, उस पर ढक्कन नहीं था. सफाई कर्मचारी उस मेनहोल के पास पहुंचे तो बदबू और ज्यादा आने लगी. अपनी नाक पर कपड़ा रख कर उन्होंने जब मेनहोल में झांक कर देखा तो उन की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस में एक आदमी की लाश पड़ी थी.

लाश मिलने की खबर उन्होंने अपने सुपरवाइजर को दी. उधर से गुजरने वालों को जब गटर में लाश पड़ी होने की जानकारी मिली तो वे भी उस लाश को देखने लगे. थोड़ी ही देर में खबर आसपास के तमाम लोगों को मिली तो वे भी वसंत वाटिका पार्क में पहुंचने लगे. थोड़ी ही देर में वहां लोगों का हुजूम लग गया. इसी बीच किसी ने खबर पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी. यह 25 फरवरी, 2014 दोपहर 1 बजे की बात है.

यह इलाका दक्षिणी दिल्ली के थाना वसंत कुंज (नार्थ) के अंतर्गत आता है, इसलिए गटर में लाश मिलने की खबर मिलते ही थानाप्रभारी मनमोहन सिंह, एसआई नीरज कुमार यादव, कांस्टेबल संदीप, बलबीर को ले कर वसंत वाटिका पार्क पहुंच गए. थानाप्रभारी ने जब गटर के मेनहोल से झांक कर देखा तो वास्तव में उस में एक आदमी की लाश पड़ी थी. वह सड़ गई थी जिस से वहां तेज बदबू फैली हुई थी.

पुलिस ने लाश बाहर निकाल कर जब उस का निरीक्षण किया तो उस का गला कटा हुआ था और पेट पर दोनों साइडों में गहरे घाव थे. लाश की हालत देख कर लग रहा था कि उस की हत्या कई दिनों पहले की गई होगी. जहां लाश मिली थी, उस से कुछ दूर ही रंगपुरी पहाड़ी थी, जहां झुग्गी बस्ती है.

लाश मिलने की खबर जब इस झुग्गी बस्ती के लोगों को मिली तो वहां से तमाम लोग लाश देखने के लिए वसंत वाटिका पार्क पहुंच गए. उन्हीं में प्रताप सिंह भी था.

प्रताप सिंह का छोटा भाई करतार सिंह भी 14 फरवरी, 2014 से लापता था. जैसे ही उस ने वह लाश देखी, उस की चीख निकल गई. क्योंकि वह लाश उस के भाई करतार सिंह की लग रही थी. अपनी संतुष्टि के लिए उस ने उस लाश का दायां हाथ देखा. उस पर हिंदी में करतार-सीमा गुदा हुआ था. यह देख कर उसे पक्का यकीन हो गया कि लाश उस के भाई की ही है. सीमा करतार की पहली बीवी थी.

करतार सिंह के घर के अन्य लोगों को भी पता चला कि उस की लाश गटर में मिली है तो वे घर से वसंत वाटिका पार्क पहुंच गए. वे भी करतार की लाश देख कर रोने लगे.

कुछ देर बाद पुलिस ने मृतक करतार के पिता पिल्लूराम से पूछा तो उन्होंने बताया, ‘‘यह 14 फरवरी से लापता था. इस की पत्नी किरण ने आज ही इस की गुमशुदगी थाने में लिखवाई थी. इस का यह हाल न जाने किस ने कर दिया?’’

‘‘जब यह 14 फरवरी से गायब था तो गुमशुदगी 12 दिन बाद क्यों कराई?’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘पता नहीं साहब, हम ने तो इसे सब जगह ढूंढा था. इस का मोबाइल फोन भी बंद था.’’ पिल्लूराम ने रोते हुए बताया.

‘‘तुम चिंता मत करो, हम इस बात का जल्दी पता लगा लेंगे कि इस की हत्या किस ने की है.’’

‘‘साहब, हमारा तो बेटा चला गया. हम बरबाद हो गए.’’

थानाप्रभारी ने किसी तरह पिल्लूराम को समझाया और उन्हें भरोसा दिया कि वह हत्यारे के खिलाफ कठोर काररवाई करेंगे.

कोई भी लाश मिलने पर पुलिस का पहला काम उस की शिनाख्त कराना होता है. शिनाख्त के बाद ही पुलिस हत्यारों का पता लगा कर उन तक पहुंचने की काररवाई करती है. गटर में मिली इस लाश की शिनाख्त उस के घर वाले कर चुके थे. इसलिए पुलिस ने लाश का पंचनामा कर के उसे पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

मामला मर्डर का था इसलिए दक्षिणी दिल्ली के डीसीपी भोलाशंकर जायसवाल ने थानाप्रभारी मनमोहन सिंह के निर्देशन में एक पुलिस टीम बनाई जिस में सबइंसपेक्टर नीरज कुमार यादव, संदीप शर्मा, कांस्टेबल बलबीर सिंह, संदीप, विनय आदि को शामिल किया गया.

मृतक करतार सिंह की पत्नी किरण ने 25 फरवरी, 2014 को उस की गुमशुदगी की सूचना थाने में लिखाई थी. जिस में उस ने कहा था कि उस का पति 14 फरवरी से लापता है. पुलिस ने उस से मालूम भी किया था कि सूचना इतनी देर से देने की वजह क्या है.

तब किरण ने बताया था कि पति के गायब होने के बाद से ही वह उसे हर संभावित जगह पर तलाशती रही. उस के जानकारों से भी पूछताछ की थी, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. उस ने सुबह के समय गुमशुदगी लिखाई थी और दोपहर में लाश मिल गई. इसलिए पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या कर लाश छिपाने का मामला दर्ज कर लिया.

पुलिस टीम ने सब से पहले मृतक के घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि करतार अपनी किराने की दुकान पर बैठता था. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी इसलिए कहा नहीं जा सकता कि उस की हत्या किस ने की है. पिता पिल्लूराम ने बताया कि करतार के गायब होने के 2 दिन पहले उस का झगड़ा रामबाबू से हुआ था.

‘‘यह रामबाबू कौन है?’’ थानाप्रभारी मनमोहन सिंह ने पिल्लूराम से पूछा.

‘‘साहब, रामबाबू की बीवी और किरण एक ही गांव की हैं. उसी की वजह से रामबाबू करतार के पास आता था. करतार के गायब होने के 2 दिन पहले ही उस की रामबाबू से किसी बात पर कहासुनी हो गई थी.’’ पिल्लूराम ने बताया.

‘‘…और रामबाबू रहता कहां है?’’

‘‘साहब, ये तो मुझे पता नहीं. लेकिन किरण को जरूर पता होगा. क्योंकि वह उस के यहां जाती थी.’’

थानाप्रभारी ने किरण को थाने बुलवाया. पति की लाश मिलने के बाद उस का रोरो कर बुरा हाल था. थानाप्रभारी ने उस से पूछा, ‘‘तुम रामबाबू को जानती हो? वह कहां रहता है और करतार से उस का जो झगड़ा हुआ था, उस की वजह क्या थी?’’

‘‘रामबाबू की बीवी और हम एक ही गांव के हैं, इसलिए वह कभीकभी हमारे यहां आता रहता था. वह महिपालपुर में रहता है. करतार और रामबाबू 12 फरवरी को साथसाथ शराब पी रहे थे, उसी समय किसी बात पर दोनों के बीच झगड़ा हो गया था.’’ किरण ने बताया.

चूंकि करतार का झगड़ा रामबाबू से हुआ था इसलिए पुलिस सब से पहले रामबाबू से ही पूछताछ करना चाहती थी. पुलिस किरण को ले कर महिपालपुर स्थित रामबाबू के कमरे पर पहुंची. लेकिन उस का कमरा बंद मिला. पड़ोसियों से जब उस के बारे में पूछा तो उन्होंने भी उस के बारे में अनभिज्ञता जताई. इस से पुलिस के शक की सुई रामबाबू की तरफ घूम गई.

कहानी कुछ और थी : प्रेमिका का किया अपहरण

दीवार पर लगी घड़ी की ओर देखते हुए संजय गुप्ता ने बेटी को आवाज दी, ‘‘बेटी चेतना जल्दी करो, ट्यूशन के लिए देर हो रही  है.’’ चेतना ने कोई जवाब नहीं दिया तो संजय गुप्ता ने पुन: आवाज लगाई, ‘‘जल्दी करो बेटा, देर हो रही है.’’

पिता के दोबारा आवाज लगाने पर चेतना टोस्ट का टुकड़ा मुंह में ठूंसते हुए बोली, ‘‘बस आई पापा, दो मिनट.’’

कह कर चेतना ने किताबें और नोटबुक समेटीं और जल्दी से संजय गुप्ता के पास आ कर बोली, ‘‘चलिए पापा.’’

‘‘चलो.’’ कह कर संजय गुप्ता बाहर आ गए. उन्होंने स्कूटी निकाल कर स्टार्ट की तो चेतना फुर्ती से उन के पीछे बैठ गई. इस के बाद उन्होंने स्कूटी आगे बढ़ा दी. संजय गुप्ता और चेतना का यह रोज का काम था. चेतना गुप्ता जगराओं के डीएवी कालेज से बीकौम कर रही थी. वह कालेज दोपहर के बाद जाती थी, इसीलिए सुबह साढ़े 8 बजे से साढ़े 11 बजे तक ट्यूशन पढ़ने जाती थी. यही वजह थी कि दुकान पर जाते समय संजय गुप्ता चेतना को साथ लेते जाते थे. उसे ट्यूशन वाले मास्टर की गली के मोड़ पर छोड़ कर वह अपनी दुकान पर चले जाते थे.

संजय गुप्ता शरीफ और नेकदिल इंसान तो थे ही, शहर के जानेमाने व्यवसाई भी थे. जगराओं रामनगर में ‘एस.के. टेक्सटाइल्स’ नाम से उन का कपड़ों का भव्य शोरूम था. उन के परिवार में पत्नी सीमा गुप्ता के अलावा बेटा साहिल गुप्ता और बेटी चेतना गुप्ता थी. साहिल पिता के साथ शोरूम संभालता था, जबकि चेतना अभी पढ़ रही थी. चेतना छोटी थी, इसलिए संजय गुप्ता बेटे से अधिक बेटी को प्यार करते थे.

उस दिन सुबह 8 बजे के आसपास चेतना को वह गली के मोड़ पर ले कर पहुंचे तो वहां उन्हें सफेद रंग की एक मारुति स्विफ्ट कार खड़ी दिखाई दी. ड्राइविंग सीट पर एक लड़का बैठा था, जो अपना चेहरा दूसरी ओर किए था. कार की पिछली सीट पर 2 लड़के बैठे थे और 2 लड़के कार के बाहर दरवाजे के पास खड़े थे. कार के दोनों पिछले दरवाजे खुले थे.

चेतना स्कूटी से उतर कर जैसे ही कार के पास पहुंची, बाहर खड़े दोनों लड़कों ने अचानक उसे पकड़ कर कार के अंदर झोंक दिया. चेतना के कार के अंदर गिरते ही कार में बैठे लड़कों ने उसे खींच कर दबोच लिया. इस के बाद बाहर खड़े लड़के भी फुर्ती से कार में बैठ गए तो कार तेजी से चल पड़ी. यह 29 जनवरी, 2014 की बात है.

यह सब इतनी तेजी से और अचानक हुआ था कि जल्दी न संजय गुप्ता ही समझ पाए और न चेतना ही कि यह क्या हो रहा है. जब दोनों की समझ में आया कि अपहरण हो गया तो कार के अंदर से जहां चेतना चिल्लाई, ‘पापा बचाओ,’ वहीं स्कूटी संभालते हुए संजय गुप्ता भी चिल्लाए, ‘‘अरे कार रुकवाओ भई, मेरी बेटी को बदमाश उठा ले गए.’’

संजय गुप्ता चिल्लाए ही नहीं, बेटी को इस तरह आंखों के सामने उठा कर ले जाते देख चिल्लाते हुए कार के पीछे स्कूटी लगा दी. आगे उन के भाई की दुकान थी. भाई दुकान पर आ गए थे. शोरशराबा सुन कर वह भी बाहर आ गए. भाई को चिल्लाते हुए स्कूटी से कार का पीछा करते देख वह भी अपना एक्टिवा स्कूटर उठा कर कार का पीछा करने लगे. उन्हीं के साथ कुछ अन्य लोगा भी माजरा समझ कर अपने अपने वाहनों को ले कार के पीछे लपके. लेकिन लाख प्रयास के बाद भी कार पकड़ में नहीं आई और देखते देखते आंखों से ओझल हो गई.

जो भी इस तरह सरेआम अपहरण की बात सुनता, वही दौड़ पड़ता. धीरेधीरे पूरा बाजार जमा हो गया. संजय गुप्ता तो बदहवास हो कर सड़क पर ही बैठ गए थे. व्यापारी साथियों ने उन्हें सांत्वना देने के साथ ही इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम के साथसाथ थाना जगराओं और सिटी पुलिस को भी दे दी थी.

सूचना मिलते ही थाना सिटी के थानाप्रभारी मोहम्मद जमील पुलिस दल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए और संजय गुप्ता द्वारा की गई शिकायत के आधार पर काररवाई करते हुए उन्होंने वायरलैस द्वारा संदेश दे कर जगराओं शहर से बाहर जाने वाली सभी सीमाओं को सील करवाने के साथ चेतना गुप्ता के अपहरण की रिपोर्ट मनीष मल्होत्रा और उस के 4 अज्ञात दोस्तों के खिलाफ दर्ज करा दी.

संजय गुप्ता ने रिपोर्ट दर्ज कराते समय पुलिस को बताया था कि कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे युवक को वह पहचानते थे. उस का नाम मनीष मल्होत्रा था, जबकि उस के साथियों को वह नहीं जानते थे, लेकिन सामने आने पर वह उन्हें पहचान सकते थे. मनीष को वह इसलिए पहचानते थे, क्योंकि वह पहले भी कई बार चेतना से छेड़छाड़ कर चुका था, जिस की उन्होंने पुलिस से शिकायत भी की थी.

संजय गुप्ता ने रिपोर्ट में मनीष और उस के दोस्तों के अलावा इस अपहरण की साजिश में मनीष के पिता जोगिंदर पाल, चाचा राज मल्होत्रा, मां ऊषा रानी, चाची, बुआ के बेटे आकाश धवन उर्फ अभी के नाम भी लिखाए थे. उन का कहना था कि इन सभी लोगों ने साजिश रच कर चेतना का अपहरण करवाया है.

चूंकि अपहरण शहर के एक प्रसिद्ध व्यवसाई के बेटी, जो छात्रा भी थी, का हुआ था, इसलिए इस मामले में छात्र भी हंगामा कर सकते थे. इस बात को ध्यान में रख कर थानाप्रभारी मोहम्मद जमील ने घटना की सूचना एसपी सिटी, डीएसपी सुरेंद्र कुमार, क्राइम टीम और स्पेशल फोर्स को भी दे दी थी.

संजय गुप्ता ने चेतना के अपहर्त्ताओं में से मुख्य अभियुक्त का नाम बता दिया था, इसलिए थानाप्रभारी मोहम्मद जमील ने तुरंत मनीष मल्होत्रा के बारे में पता किया. प्राप्त जानकारी के अनुसार, मनीष मल्होत्रा जगराआें के रायकोटा रोड पर भट्ठा गुरु के नजदीक मकान नंबर 2982 में रहने वाले शहर के प्रसिद्ध व्यवसाई जोगिंदर पाल मल्होत्रा का बेटा था. उन का जगराओं में मल्होत्रा फिल स्टेशन के नाम से पेट्रेल पंप तो था ही, उन के पास कोकपेप्सी की ऐजेंसी भी थी.

जोगिंदर पाल का संयुक्त परिवार था. भाई राज मल्होत्रा भी उन्हीं के साथ रहते थे. उन के 2 बेटे थे. बड़ा बेटा विशाल शादीशुदा था. वह चाचा राज मल्होत्रा के साथ पैट्रोल पंप का कामकाज देखता था. छोटा बेटा मनीष पढ़ाई पूरी करने के बाद मटरगश्ती करता था.

थानाप्रभारी मोहम्मद जमील ने एएसआई जरनैल सिंह के साथ मनीष के घर छापा मारा तो वह घर से फरार मिला. उस के बारे में पता करने के लिए वह जोगिंदर पाल के पेट्रोल पंप और कोकपेप्सी ऐजेंसी के औफिस गए तो पुलिस के डर से वह भी भूमिगत हो गए थे. पुलिस अपनी काररवाई कर रही थी, लेकिन जनता उस से संतुष्ट नहीं थी. इसलिए आम लोगों में पुलिस के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा था. शहर के व्यवसाई ही नहीं, आम लोग भी एकत्र होने लगे थे.

जब अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई तो उन्होंने हाईवे और शहर की प्रमुख सड़कों पर धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया. शहर के बाजार और व्यापारिक गतिविधियां बंद करा दी गईं. लोग सड़कों पर ही धरने पर बैठ गए. धरने पर बैठे लोग पुलिसप्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर रहे थे. इस तरह पुलिस के लिए परेशानी खड़ी हो गई. प्रदर्शनकारियों को भी संभालना था और अपहर्त्ताओं की तलाश कर चेतना को सकुशल बरामद भी करना था.

जांच में परेशानी हो रही थी, क्योंकि कहींकहीं पुलिस और जनता के बीच झड़पें हो रही थीं. एक एएसआई जोगा सिंह से जनता काफी नाराज थी, क्योंकि सूचना देने के बावजूद वह घटनास्थल पर काफी देर से पहुंचे थे. धरने पर बैठे लोग अपहर्त्ताओं को जल्द से जल्द गिरफ्तार कर के चेतना को बरामद करने की मांग कर रहे थे.

जनता को धरनाप्रदर्शन करते देख नेता भी अपनी रोटियां सेंकने पहुंच गए. इनकलाबी क्लब पंजाब के नेता कमलजीत खन्ना ने धरना पर बैठे लोगों को संबोधित करते हुए यहां तक कह डाला कि यह घटना भी पंजाब के चर्चित श्रुति अपहरण कांड की ही तरह है. अपहर्त्ताओं ने पुलिस और सत्ता पार्टी में बैठे नेताओं के साथ मिल कर इस घटना को अंजाम दिया है.

विधायक एस.आर. कलेर ने हाथ जोड़ कर प्रदर्शनकारियों और धरना पर बैठे लोगों से शांत रहने की अपील की. लेकिन उन की बातों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. डीएसपी सुरेंद्र कुमार जब धरना पर बैठे लोगों को समझाने पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने उन के विरोध में नारे तो लगाए ही, उलझने की भी कोशिश की.

शाम होतेहोते यह आक्रोश इस कदर बढ़ गया कि लोगों ने थाने का घेराव करने के साथ थानाप्रभारी मोहम्मद जमील के औफिस के बाहर चादर बिछा कर भीख मांगते हुए जोरजोर से चिल्ला कर कहने लगे, ‘‘हम जानते हैं, पुलिस बिना पैसा लिए कोई काम नहीं करती, इसलिए हमें भिक्षा में पैसे दो, जिसे दे कर हम चेतना बिटिया को वापस ला सकें.’’

लोग उस चादर में 10, 20, 50 और सौ रुपए डालते हुए कह रहे थे कि ‘चाहे जितने पैसे ले लो, लेकिन चेतना को अपहर्त्ताओं के चंगुल से मुक्त करा दो.’ जनता की इस हरकत से परेशान हो कर एसपी और डीएसपी ने आ कर धरना पर बैठे लोगों से माफी मांगी और अपहर्त्ताओं को शीघ्र गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. इस के बाद भीड़ थोड़ा शांत हुई.

पुलिस ने उस रात अपहर्त्ताओं की तलाश में कई जगह छापे मारे, लेकिन अपहर्त्ता पुलिस के हाथ नहीं लगे. उन के परिजनों और निकट संबंधियों पर शिकंजा कसा गया. मनीष के परिजनों और मित्रों को थाने ला कर पूछताछ की गई. इस तरह मनीष और पुलिस के बीच पूरी रात चूहे बिल्ली का खेल चलता रहा. अंत में 30 जनवरी की सुबह एएसआई जरनैल सिंह से मनीष के ताऊ विजय मल्होत्रा ने फोन कर के कहा कि मनीष पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करना चाहता है. इस के लिए वह कचहरी चौक पर आ जाएं. मनीष के आत्मसमर्पण की सिफारिश एक अकाली नेता ने भी की थी.

बहरहाल, पुलिस अधिक झमेले में नहीं पड़ना चाहती थी, क्योंकि वैसे ही इस मामले में अब तक पुलिस की काफी किरकिरी हो चुकी थी. इसलिए थानाप्रभारी मोहम्मद जमील के आदेश पर एएसआई जरनैल सिंह पुलिस टीम के साथ कचहरी चौक पर पहुंच गए. मनीष के कुछ रिश्तेदार वहां पहले से ही मौजूद थे.

पुलिस किसी से कुछ पूछताछ करती, उस के पहले ही वहां मौजूद लोगों में भगदड़ सी मच गई. पुलिस उन्हें संभालती, भगदड़ का फायदा उठा कर एकएक कर के सभी रिश्तेदार खिसक गए. लेकिन मनीष और चेतना पुलिस के हाथ लग गए. इस तरह चेतना सकुशल बरामद हो गई. एएसआई जरनैल सिंह दोनों को ले कर थाने आ गए.

थानाप्रभारी मोहम्मद जमील ने दोनों का सिविल अस्पताल में मैडिकल चेकअप कराया. रिपोर्ट के अनुसार मनीष और चेतना के बीच किसी प्रकार के सैक्स संबंध की पुष्टि नहीं हुई. मैडिकल चैकअप के बाद उसी दिन दोनों को इलाका मजिस्ट्रेट श्री गुरमीत सिंह की अदालत में पेश किया गया. पूछताछ के लिए पुलिस ने मनीष को 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. जबकि चेतना गुप्ता को धारा 164 के अंतर्गत बयान दिला कर उसे उस के पिता संजय गुप्ता को सौंप दिया गया. रिमांड के दौरान मनीष से की गई पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, वह अपहरण की न हो कर आपसी प्रेमसंबंधों में आई खटास की थी.

दरअसल, चेतना गुप्ता और मनीष मल्होत्रा के बीच पिछले काफी समय से प्रेमसंबंध थे. पुलिस के अनुसार, मनीष ने चेतना गुप्ता को बड़ेबड़े सपने दिखाए थे. कहने को तो उस के पिता जोगिंदर पाल के पास पेट्रोल पंप ही नहीं, कोकपेप्सी की ऐजेंसी भी थी, लेकिन सच्चाई यह थी कि उन पर काफी कर्ज था.

चूंकि मनीष चेतना को पसंद करता था और उस से शादी करना चाहता था, इसलिए लगातार उस से झूठ बोलता आ रहा था. जबकि हकीकत यह थी कि चेतना को घुमानेफिराने के लिए वह अपने यारोंदोस्तों की गाडि़यां तो मांग कर लाता ही था, उसे गिफ्ट देने के लिए भी उन्हीं से उधार पैसे ले कर खरीद कर लाता था.

चेतना को बिलकुल पता नहीं था कि मनीष और उस के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी डांवाडोल हो चुकी है. हां, अगर मनीष सच्चाई बता कर अपनी स्थिति स्पष्ट कर देता तो शायद बात कुछ और होती. लेकिन वह उस के झूठ के मकड़जाल में फंसती चली गई और उसे दिल से चाहने लगी. जबकि मनीष उसे लगातार धोखा देता आ रहा था.

मनीष और चेतना आपस में शादी करना चाहते थे. लेकिन इस शादी में सब से बड़ी अड़चन चेतना के मातापिता की ओर से थी. क्योंकि दोनों की जाति अलग थी. चेतना गुप्ता जहां बनियों की बेटी थी, वहीं मनीष पंजाबी झांगी जाति से था. चेतना अच्छी तरह जानती थी कि उस के मातापिता इस शादी के लिए हरगिज तैयार नहीं होंगे.

अंत में काफी सोचविचार कर दोनों ने फैसला लिया कि वे चोरी से कोर्टमैरिज कर लेंगे. इस बात का जिक्र वे घर में नहीं करेंगे. अगर उन के मातापिता शादी के लिए राजी हो जाएंगे, तब तो ठीक है, अन्यथा वे मैरिज प्रमाण पत्र दिखा कर बता देंगे कि उन्होंने पहले ही शादी कर ली है. तब मजबूरन उन्हें झुकना होगा.

इस के बाद चेतना और मनीष ने वकील से बात की. वकील ने उन्हें सलाह दी कि अगर वे किसी मंदिर या गुरुद्वारे में शादी कर के वहां से शादी का प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेते हैं तो उन्हें कोर्टमैरिज में आसानी होगी. दोनों किसी ऐसे मंदिरगुरुद्वारे की तलाश में लग गए, जहां से विवाह का प्रमाण पत्र मिल जाए. आखिर उन्हें एक ऐसा गुरुद्वारा मिल गया, जो उन के मातापिता की गैरमौजूदगी में उन की शादी करा सकता था. वह जगराओं के शेरपुरा रोड पर डीएवी कालेज के पास स्थिति गुरुद्वारा साहिब बाल खेतारामजी था.

12 सितंबर, 2013 को मनीष चेतना को ले कर गुरुद्वारा साहिब बाल खेतारामजी पहुंचा और शादी कर के कुछ फोटो खिंचवाने के बाद विवाह का प्रमाणपत्र हासिल कर लिया. इस के बाद दोनों ने चंडीगढ़ हाईकोर्ट जा कर किसी वकील के माध्यम से गुरुद्वारा द्वारा दिए गए शादी के प्रमाणपत्र के आधार पर नोटरी से शादी रजिस्टर्ड करवा ली.

अपनेअपने मातापिता से जान का खतरा बता कर उन्होंने सुरक्षा के लिए उच्च न्यायालय में आवेदन भी कर दिया. लेकिन इस के बाद जब चेतना को मनीष की आर्थिक स्थिति का पता चला तो उसे उस से नफरत हो गई. क्योंकि मनीष ने उसे प्रेमजाल में फंसाने के लिए झूठ बोला था. उसे यह भी पता चल गया था कि उसे तोहफे देने के लिए वह दोस्तों से पैसे उधार लेता रहता था.

चेतना ने जब इस बारे में मनीष से पूछा तो वह साफ मुकर गया. उस ने कहा कि यह सब झूठ है. उस के लगातार झूठ पर झूठ बोलने से चेतना को उस से इतनी घृणा हो गई कि उस ने उस से मिलना तक बंद कर दिया. यही नहीं, उस ने अपने पिता से भी कह दिया कि वह उस के लिए कोई अच्छा सा लड़का देख कर उस की शादी कर दें.

दूसरी तरफ मनीष के वे दोस्त, जो उस की शादी में गवाह थे, उसे ताना देने लगे, ‘‘यार! तू कैसा पति है. तू यहां अकेला पड़ा सड़ रहा है और पत्नी मायके में ऐश कर रही है.’’

मनीष चेतना को लाना चाहता था, जबकि वह आने को तैयार नहीं थी. क्षुब्ध हो कर उस ने दोस्तों के साथ मिल कर चेतना के अपहरण की योजना बना डाली. इस में उस ने लुधियाना के शिमला पुरी के रहने वाले अपनी बुआ के बेटे अभी की मदद लेने के साथ अपने 3 दोस्तों कालू, सीता और आकाश को शामिल किया. जिस स्विफ्ट कार से चेतना का अपहरण किया गया था, वह उस की बुआ के बेटे आकाश उर्फ अभी की ही थी. घटना के समय आकाश उर्फ अभी भी साथ था.

चेतना का अपहरण कर के वे उसे ले कर जगराओं से रायकोट पहुंचे. वहां कालू और सीता को उतार कर वे मुल्लापुर होते हुए लुधियाना के शिमलापुरी स्थित अभी के घर पहुंचे. वहां सभी ने चायनाश्ता किया. वहीं से फोन कर के मनीष ने जगराओं के मित्रों से वहां होने वाली गतिविधियों की जानकारी ली.

शाम को जब मनीष को पता चला कि पुलिस को उस के लुधियाना के शिमलापुरी में होने की जानकारी मिल गई है तो उस ने अभी से बात की. अभी ने जालंधर के रहने वाले अपने जीजा ललित मेहता को सारी बात बता कर सहायता मांगी. ललित ने उन्हें फौरन जालंधर आने को कहा.

मनीष और अभी तुरंत चेतना को ले कर जालंधर के लिए निकल पड़े. लेकिन लाडोवाल टोल ब्रिज पर पहुंच कर चेतना शोर मचाने लगी. उस के शोर मचाने पर कई लोगों का ध्यान उस की ओर चला गया. टोलनाका पर लगे कैमरों में भी चेतना का फोटो आ गया था. इसलिए डर के मारे मनीष ने वह कार वहीं छोड़ दी और ललित को फोन से स्थिति बताई तो उन्होंने अपनी टवेरा कार भेज कर उन्हें वापस जगराओं जा कर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण करने की सलाह दी. इस के बाद मनीष ने जगराओं आ कर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने ललित की टवेरा भी बरामद कर ली है.

मनीष ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा था कि अगर चेतना ने उस के साथ बेवफाई न की होती तो शायद आज उसे यह अपराध न करना पड़ता. भला कौन अपनी पत्नीप्रेमिका का अपहरण करना चाहेगा. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद पुलिस ने मनीष को पुन: अदालत में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक हिरासम में भेज दिया गया. फरार अभियुक्तों की पुलिस तलाश कर रही थी.

— कथा पुलिस सूत्रों व जन चर्चा पर आधारित

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