Crime Story : फिल्म देखकर रची अनूठी साजिश

Crime Story : मुनव्वर ने सहारनपुर की एक हिंदू लड़की सोनिया से शादी की थी, जो धर्म बदल कर इशरत बन गई थी. इशरत और मुनव्वर की 2 बेटियां थीं आरजू और अर्शिता. साथ ही 2 बेटे भी आकिब और शाकिब. सभी बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे. घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी, करोड़ों की प्रौपर्टी अलग से.

यह अलग बात है कि उस पर जमीनों पर जबरन कब्जा करने, अपहरण, हत्या के प्रयास, दुष्कर्म और आर्म्स एक्ट के करीब दरजन भर केस चल रहे थे. 19 जनवरी, 2017 को मुनव्वर को एक रेप केस में जेल जाना पड़ा. मुनव्वर के जेल जाने से इशरत और बच्चे परेशान रहने लगे. ऐसे समय में इस परिवार के काम आया मुनव्वर का दोस्त शाहिद उर्फ बंटी. वह उन लोगों की मदद भी करता था और मुनव्वर के केस की पैरवी भी. इसी बीच बंटी ने सिनेमाघर में फिल्म ‘दृश्यम’ देखी, जिसे देख कर उस दिमाग घूम गया. उस ने अपने औफिस में बैठ कर इस फिल्म को 4-5 बार टीवी पर देखा और मुनव्वर के परिवार को मिटाने की फूलप्रूफ योजना बना डाली, ताकि उस की करोड़ों की संपत्ति का मालिक बन सके.

शाहिद मेरठ का रहने वाला था, वहां उस के पिता का लोहे और स्टील के गेट बनाने का कारखाना था. उस ने मेरठ के ही 5 पेशेवर हत्यारों फिरोज, जुल्फिकार, जावेद, उस के भाई वाहिद और जसवंत को 3 लाख रुपए देने की बात कह कर हत्याएं करने के लिए तैयार किया. उन्हें योजना भी बता दी गई. शाहिद का चूंकि मुनव्वर के घर आनाजाना था और वह इशरत को बहन मानता था, इसलिए उस के लिए यह काम मुश्किल नहीं था. 20 अप्रैल को मुनव्वर के बच्चों की परीक्षाएं खत्म हुईं.

21 अप्रैल, 2017 को बंटी अपनी एसएक्स4 कार से मुनव्वर के घर पहुंचा. उस ने सोनिया उर्फ इशरत से कहा कि वह सहारनपुर जा रहा है, वह चाहे तो उसे उस की मांबहनों से मिलवा लाएगा. शादी के बाद इशरत कभी मायके नहीं गई थी, हां, मां और बहनों से फोन पर बात जरूर कर लेती थी. वह तैयार हो गई, लेकिन जवान बेटियों को वह अकेले छोड़ कर नहीं जाना चाहती थी. उस ने बेटों आकिब और शाकिब को घर पर छोड़ा और दोनों बेटियों आरजू और अर्शिता को साथ ले लिया.

बहन से मिलने के बाद 22 अप्रैल को इशरत बंटी के साथ दिल्ली लौटने लगी. तब तक रात हो गई थी. रास्ते में बंटी को दीपक मिला तो उस ने उसे भी कार में बैठा लिया.  रात साढ़े 11 बजे सभी दौराला के समोली गांव पहुंचे. वहीं से बंटी कार को अख्तियारपुर के जंगल में 3 किलोमीटर अंदर ले गया. इशरत ने वजह पूछी तो उस ने कह दिया कि हाइवे पर जाम मिलता है, यह शौर्टकट है. काली नदी के किनारे पहुंच कर बंटी ने कार रोक दी. जुल्फिकार, फिरोज, जावेद और वाहिद वहां पहले से ही मौजूद थे. उन लोगों ने इशरत और उस की दोनों बेटियों आरजू और अर्शिता को कार से बाहर निकाल कर गोली मार दी. इन लोगों ने वहां पहले ही 10 फुट गहरा गड्ढा खोद रखा था, जिस में तीनों की लाशें दफना दी गईं. गड्ढे के ऊपर घास डाल दी गई.

आकिब और शाकिब मां को फोन मिलामिला कर थक गए थे, लेकिन फोन नहीं मिल रहा था. 23 अप्रैल को मांबहनों का पता करने के लिए मुनव्वर का छोटा बेटा शाकिब कमल विहार स्थित बंटी के औफिस पहुंचा. वहां पर दीपक, जुल्फिकार और फिरोज वगैरह बैठे थे. उन्होंने शाकिब के मुंह में कपड़ा ठूंस दिया और उस के हाथपैर बांध कर उसे औफिस में डाल दिया. इस के बाद बंटी ने फोन कर के आकिब को भी वहीं बुला लिया. उस का भी यही हश्र किया गया. कई घंटे तक इसी तरह से पड़े रहने से दोनों भाई मर गए.

दोनों बच्चों की लाशें ठिकाने लगाने के लिए बंटी ने औफिस का फर्श खुदवा कर 3-4 फुट गहरा गड्ढा खुदवाया और दोनों की लाशों पर नमक डाल कर दफन कर दिया. ऊपर से फिर से फर्श बनवा दिया गया. चूंकि बंटी इस परिवार का करीबी था, इसलिए कई दिनों तक लापता परिवार को ढूंढने का ढोंग करता रहा. बाद में उस ने जेल जा कर यह बात मुनव्वर को बताई. मुनव्वर के कहने पर उस ने परिवार के गायब होने की बात कह कर 17 मई, 2017 को उसे पैरोल पर जेल से बाहर निकलवा लिया. बाहर आ कर मुनव्वर ने बंटी के उसी औफिस में बैठ कर परिवार को ढूंढने की योजना बनाई, जहां उस के बेटे दफन थे.

अगले दिन बंटी मुनव्वर को साथ ले कर थाना बुराड़ी पहुंचा और उस के परिवार के गायब होने की गुमशुदगी दर्ज करा दी. सुपारीकिलर बुराड़ी में ही ठहरे थे. 20 मई की सुबह बंटी मुनव्वर के घर पहुंच गया. बाद में जुल्फिकार, जावेद और फिरोज भी वहां पहुंच गए. मुनव्वर उन्हें जानता था. इन लोगों ने मुनव्वर को 3 गोलियां मार कर उस की हत्या कर दी. शाम को बंटी ने जानबूझ कर मुनव्वर के मोबाइल पर 3-4 काल कीं, लेकिन वह तो मृत पड़ा था. शाहिद उर्फ बंटी ने खेल तो बहुत सोचसमझ खेला, मोबाइल का इस्तेमाल भी नहीं किया लेकिन बदमाशों को किए गए उस के फोन ने पोल खोल दी और पूरे परिवार के हत्यारे पकडे़ गए. सब की लाशें भी बरामद हो गईं. Crime Story

Crime Story : फेसबुक की दोस्ती- जान का जंजाल

Crime Story : सोशल साइटों ने देशविदेश की दूरियां मिटा कर कितने ही दिलों को जोड़ा है. लेकिन सोशल साइटों से बने संबंधों के नतीजे हमेशा अच्छे ही निकलें, यह जरूरी नहीं है. रितेश संघवी और सोशलाइट वेंडी अल्बानो के मामले में भी ऐसा ही कुछ हुआ. सोशल साइटों पर दोस्ताना संबंध बनाते वक्त क्या सावधानी बरतना जरूरी नहीं है?

बैंकाक के जिला वात्ताना के शहर ख्लोंग तोई के सुखुमवित रोड नंबर 11 पर स्थित फाइवस्टार होटल फ्रेजर के मैनेजर 3 बजे के करीब होटल के रिसैप्शन पर खड़े कुछ कस्टमर्स से बातें कर रहे थे, तभी होटल के एक वेटर ने उन के पास आ कर बताया कि 17वीं मंजिल के कमरा नंबर 1701 का दरवाजा सुबह से बंद है. काफी कोशिशों के बाद भी न तो उस कमरे के कस्टमर ने दरवाजा खोला और न ही अंदर कोई प्रतिक्रिया हुई. होटल के उस कमरे के बारे में रिसैप्शन से जानकारी ली गई तो पता चला कि उस कमरे में एक अमेरिकी महिला एक भारतीय युवक के साथ ठहरी है.

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दोनों पिछले 4 दिनों से उस कमरे में ठहरे थे. रिसैप्शनिस्ट ने होटल मैनेजर को यह भी बताया कि दोनों सुबह अकसर घूमनेफिरने के लिए बाहर निकल जाते थे तो शाम को काफी देर से लौटते थे. लेकिन उस दिन वे वापस नहीं लौटे थे. होटल के रजिस्टर में उन के बाहर आनेजाने की कोई एंट्री भी नहीं थी. इस का मतलब दोनों होटल के कमरे में ही थे. होटल के कमरे में होने के बावजूद उन दोनों ने न तो कमरे का दरवाजा खोला था और न ही अभी तक होटल की कोई सेवा ली थी. यह बात होटल के मैनेजर और उन के स्टाफ की समझ में नहीं आई. होटल मैनेजर कुछ कर्मचारियों को साथ ले कर 17वीं मंजिल पर स्थित कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंचे.

कमरा नंबर 1701 के सामने पहुंच कर मैनेजर और रिसैप्शनिस्ट ने भी कमरे की डोरबेल बजाई, दरवाजा खटखटाया. इंटरकौम पर रिंग दी, आवाजें दीं. लेकिन कमरे के अंदर कोई हलचल नहीं हुई. इस से मैनेजर और कर्मचारियों के मन में तरहतरह की आशंकाएं होने लगीं. उन्हें लगा कि कमरे के अंदर कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है. कोई रास्ता न देख मैनेजर ने कमरे की दूसरी चाबी मंगवाई. दरवाजा खोल कर जब वे कमरे में दाखिल हुए तो वहां का दृश्य देख कर स्तब्ध रह गए. कमरे के बाथरूम में महिला कस्टमर का शव औंधे मुंह पड़ा था. शव के आसपास ढेर सारा खून फैला था. उस का साथी कस्टमर कमरे से गायब था.

होटल फ्रेजर बैंकाक का जानामाना होटल है. इस होटल में पहली बार इस तरह की घटना घटी थी, इसलिए होटल का सारा स्टाफ परेशान हो उठा. जाहिर तौर पर यह हत्या का मामला था. होटल मैनेजमेंट ने इस मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस को दे दी. लुंपीग थाने की पुलिस ने इस मामले को बड़ी गंभीरता से लिया. पुलिस चंद मिनटों में ही घटनास्थल पर पहुंच गई. बाथरूम में औंधे मुंह पड़ी अमेरिकी महिला को उठा कर सीधा किया गया तो पता चला कि उस के सीने और पेट पर कई गहरे घाव थे. हत्यारे ने उस की हत्या बड़ी बेरहमी से की थी. घटनास्थल और मृतका के शव का निरीक्षण करने के बाद लुंपीग थाने की पुलिस ने होटल मैनेजमेंट से पूछताछ की तो पता चला कि जिस कमरे में यह घटना घटी थी, उस कमरे की बुकिंग औनलाइन कराई गई थी.

कस्टमर ने 9 फरवरी, 2012 की शाम 5 बजे होटल आ कर कमरे की चाबी ली थी. कमरे की चाबी लेते समय महिला ने होटल के रजिस्टर में अपना नाम वेंडी अल्बानो और साथ आए युवक का नाम रितेश संघवी लिखवाया था. कमरे की तलाशी लेने पर मृतका वेंडी अल्बानो के समान में उस का पासपोर्ट, लैपटौप और मोबाइल फोन तो मिला, लेकिन उस के साथी रितेश संघवी का कोई सामान वहां नहीं मिला. इस से स्पष्ट हो गया कि रितेश संघवी अल्बानो की हत्या कर के फरार हो गया था. इसीलिए उस ने अपना कोई सुबूत भी वहां नहीं छोड़ा था.

होटल के रजिस्टर और मृतका के पासपोर्ट से जानकारी मिली कि वह फ्लोरिडा, अमेरिका की रहने वाली थी. रितेश संघवी कहां का रहने वाला था, इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. लेकिन इस के लिए लुंपीग पुलिस को अधिक माथापच्ची नहीं करनी पड़ी. रितेश संघवी का बायोडाटा वेंडी अल्बानो के मोबाइल फोन और लैपटौप में मिल गया. वेंडी के मोबाइल फोन और लैपटौप पर उस के फेसबुक पर जाने से रितेश संघवी की पूरी प्रोफाइल खुल कर सामने आ गई. यह भी पता चल गया कि वह मुंबई का रहने वाला था. रितेश के प्रोफाइल, होटल के कर्मचारियों के बयानों और सीसीटीवी कैमरे की फुटेज को देख कर उस की शिनाख्त हो गई. मृतका वेंडी अल्बानो के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद लुंपीग पुलिस थाने लौट आई.

घटना की प्राथमिक औपचारिकता पूरी करने के बाद लुंपीग पुलिस ने वेंडी एस. अल्बानो की हत्या की सारी कडि़यां जोड़ीं और इस मामले की जानकारी अमेरिका की एफबीआई और भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई को दे कर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई का दबाव देख कर सीबीआई ने इस मामले को गंभीरता से लिया. सीबीआई ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट से रितेश संघवी का गिरफ्तारी का वारंट जारी करवा कर मामले की तफ्तीश शुरू कर दी.

रितेश संघवी चूंकि मुंबई का रहने वाला था, इसलिए सीबीआई ने उस की गिरफ्तारी का वारंट मुंबई के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह को भेज दिया. सत्यपाल सिंह ने यह वारंट क्राइम ब्रांच (सीआईडी) के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर हिमांशु राय को सौंप दिया. हिमांशु राय ने रितेश संघवी की गिरफ्तारी की जिम्मेदारी क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा को सौंप दी. इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने निर्देश पर रितेश संघवी की तेजी से तलाश शुरू हो गई. उस के हर उस ठिकाने पर छापे मारी की गई, जहांजहां उस के मिलने की संभावना थी. लेकिन यह कवायद साइबर सेल के काम नहीं आई.

इस पर साइबर सेल ने रितेश संघवी के घर वालों से पूछताछ की. उन लोगों ने उस की एक अलग ही कहानी बताई. उन के बताए अनुसार, रितेश संघवी 8 फरवरी 2012 से लापता था. घर से निकलते वक्त वह महाबलेश्वर जाने की बात कह कर गया था, लेकिन वह लौट कर नहीं आया. उस का मोबाइल फोन भी बंद था. जब वे उसे हर जगह तलाश कर के थक गए तो 13 फरवरी 2012 की शाम 6 बजे डीवी मार्ग के पुलिस थाने में उस की गुमशुदगी दर्ज करवा दी थी. सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा ने अपने स्टाफ के साथ बड़े उत्साह से रितेश संघवी की खोज शुरू की थी, लेकिन यह जानने के बाद उन का जोश ठंडा पड़ने लगा. साइबर सेल के भरपूर प्रयासों के बाद भी रितेश संघवी के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी. धीरेधीरे समय निकलता जा रहा था.

मुखबिरों का नेटवर्क भी फेल होता नजर आ रहा था. इस के पहले कि वह रितेश संघवी तक पहुंच पातीं अथवा नए सिरे से मामले की तफ्तीश शुरू करतीं, मुंबई पुलिस में एक बड़ा फेर बदल हो गया. जिस के चलते रितेश संघवी का मामला दब सा गया. दरअसल, मुंबई पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह अपने पद से इस्तीफा दे कर राजनीति में चले गए थे. उन की जगह मुंबई के नए पुलिस कमिश्नर के रूप में राकेश मारिया की नियुक्ति हुई. राकेश मारिया कई सालों तक मुंबई क्राइम ब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर रह चुके थे. उन्होंने तमाम पेचीदा मामलों को सुलझाया था.

इस बीच रितेश संघवी के मामले को 19 महीने बीत चुके थे. इस केस में कोई प्रगति न होते देख बैंकाक की लुंपीग पुलिस और अमेरिका की एफबीआई ने भारत की खुफिया एजेंसी सीबीआई पर दबाव बनाया. चूंकि बात एक अमेरिकन महिला की हत्या की थी, इस लिए अमेरिका के काउंसलर ने सिंघवी की गिरफ्तारी के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री और मुंबई के मुख्यमंत्री को पत्र भेजा. जब मुंबई के पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया पर कई तरफ से दबाव पड़ा तो उन्होंने इस मामले की तफ्तीश की जिम्मेदारी अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को सौंप दी.

के.एम. प्रसन्ना ने इसे गंभीरता से लिया. उन्होंने इस केस से जुड़ी सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की जांच अधिकारी शालिनी शर्मा को अपने औफिस बुला कर पूरे मामले और अब तक की तफ्तीश को समझा. केस की बारीकियों पर विचारविमर्श करने के बाद उन्होंने शालिनी शर्मा को मामले की तफ्तीश नए सिरे से शुरू करने को कहा. इतना ही नहीं, उन्होंने उन की मदद के लिए एक स्पेशल टीम का भी गठन किया. इस स्पेशल टीम में उन्होंने अपने स्टाफ के 4 अनुभवी अफसरों को नियुक्त किया. वे थे क्राइम ब्रांच यूनिट 1 के असिस्टैंट इंसपेक्टर कुंभार, कांस्टेबल जगदाले, यूनिट 2 के इंसपेक्टर प्रकाश कोकणे और कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा. सीआईडी और क्राइम ब्रांच की नई टीम ने इस मामले को अपनी नाक का सवाल बना कर काररवाई शुरू की तो 15 दिनों में रितेश सिंघवी पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

दरअसल, क्राइम ब्रांच की इस टीम ने अपनी तफ्तीश में रितेश के परिवार और उस के दोस्तों को रखा. वजह यह थी कि इस टीम को रितेश संघवी की गुमशुदगी की बात झूठी लग रही थी. कारण यह कि रितेश संघवी को गायब हुए 2 साल के करीब हो गए थे, पर उस के परिवार और उस के दोस्तों के चेहरों पर किसी तरह की शिकन तक नहीं थी. यही सोच कर जांच टीम ने उस के 4-5 करीबी दोस्तों को जांच के दायरे में लिया. जांच टीम उन लोगों के मोबाइल फोन, फेसबुक और बैंक एकाउंट्स पर नजर रखने लगी. जांच अधिकारियों ने जब उन के फेसबुक, वाट्सऐप और बैंक के एकाउंटों की गहराई से जांचपड़ताल की तो पता चला कि रितेश संघवी के गायब होने के कुछ दिनों बाद ही उस के दोस्तों के एकाउंट से उस के एकाउंट में लगभग ढाई लाख रुपए ट्रांसफर हुए थे.

ट्रांसफर हुए रुपए कुछ दिनों के बाद रितेश संघवी के एकाउंट से निकाल लिए गए थे. ये रुपए कहां गए थे, जब इस की जांच की गई तो पता चला कि सारे रुपए गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र की बैंकों से निकाले गए थे. इस से यह बात साफ हो गई कि रितेश संघवी गोवा स्थित परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कहीं छिपा हुआ था. लेकिन वह कहां छिपा था, यह पता लगाना समुद्र में मोती ढूंढ़ने की तरह था. फिर भी जांच टीम ने हिम्मत नहीं हारी. पुलिस टीम गोवा के परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में जा कर वहां के होटलों और दुकानों में उस का फोटो दिखा कर उस के बारे में पूछताछ करने लगी.

पुलिस टीम जब परभणी गंगाखेड़ इलाके की गलियों में रितेश संघवी की तलाश में खाक छान रही थी, तभी कांस्टेबल हृदयनाथ मिश्रा के मोबाइल पर एक मैसेज आया. यह मैसेज उन के एक मुखबिर का था. उस ने मैसेज में बताया कि रितेश संघवी परभणी गंगाखेड़ क्षेत्र में कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान चला रहा है. मैसेज में इस बात का भी जिक्र था कि रितेश ने अपना नाम और हुलिया बदल कर उसी इलाके में रंजीत के नाम से किराए का मकान ले रखा है. इस सूचना से जांच टीम के सदस्यों के चेहरों पर चमक आ गई. टीम ने कावेरी नाम की उस मोबाइल शौप को खोज निकाला. वहां रितेश संघवी उर्फ रंजीत मिल गया तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

उस के गिरफ्तार होते ही जांच टीम ने इस बात की जानकारी सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना को दे दी. 28 सितंबर, 2014 को जांच टीम ने गिरफ्तार अभियुक्त रितेश संघवी को मुंबई ला कर वरिष्ठ अधिकारियों के सामने पेश कर दिया. एडीशनल पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना ने उस से खुद विस्तृत पूछताछ की. 25 वर्षीय रितेश नरपतराज संघवी स्वस्थ, सुंदर और स्मार्ट युवक था. वह महानगर मुंबई के ग्रांट रोड पर अपने मातापिता और भाईबहनों के साथ रहता था. उच्चशिक्षित और मिलनसार स्वभाव के रितेश संघवी का स्टेनलैस स्टील का कारोबार था, जिसे वह अपने पिता के साथ चलाता था. खुले विचारों का रितेश नए जमाने के साथ चलने में यकीन रखता था.

उस ने अपना प्रोफाइल फेसबुक और वाट्सऐप पर डाल रखा था. वह फेसबुक और वाट्सऐप पर नएनए दोस्त बना कर उन के साथ चैटिंग किया करता था. करीब 4 साल पहले 2010 के अंत में एक दिन उस ने अपना एकाउंट खोला तो उस में कई लोगों की फ्रैंड रिक्वेस्ट आई हुई थी. रितेश संघवी ने उन की रिक्वेस्ट पढ़ कर उन्हें स्वीकार कर लिया. इस के बाद वह उन लोगों द्वारा पोस्ट किए गए कमेंट्स को पढ़ने लगा. तभी उस के पास एक विदेशी महिला का औनलाइन मैसेज आया. उस महिला ने अपना नाम वेंडी एस. अल्बानो बता कर लिखा था कि उस ने उस का प्रोफाइल देखा, जो उसे बहुत अच्छा लगा. वह उस से फ्रैंडशिप करना चाहती है.

रितेश संघवी को उस विदेशी महिला का मैसेज पढ़ कर खुशी हुई. लेकिन कोई जवाब देने से पहले उस ने उस का प्रोफाइल चैक कर लेना ठीक समझा. उस ने जब अल्बानो का प्रोफाइल देखा तो चौंका. वह अमेरिका के फ्लोरिडा की रहने वाली थी. उस की उम्र 50 साल के आसपास थी और उस की 2 शादियां हो चुकी थीं. साथ ही उस की 2 बेटियां भी थीं, जिन की शादी हो चुकी थी. बेटियां अपने पति के साथ रहती थीं. अल्बानो के पहले पति की एक रोड ऐक्सीडेंट में मौत हो गई थी तो दूसरे पति से उस ने तलाक ले लिया था. वह अपने घर में अकेली ही रहती थी. अपने से दोगुनी उम्र की वेंडी अल्बानो की यह रिक्वेस्ट रितेश संघवी को कुछ अजीब सी लगी. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

पहले तो उस के दिमाग में वेंडी अल्बानो की इस रिक्वेस्ट को रिजेक्ट कर देने की बात आई. लेकिन फिर उस ने यह सोच कर उस की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली कि उम्र के जिस मुकाम पर वह तनहा खड़ी है, वहां उसे एक ऐसे दोस्त की जरूरत है, जिस से बातें कर के वह अपना मन बहला सके. अगर उसे दोस्त बना कर वेंडी के मन को सुकून मिलता है तो इस में बुराई क्या है? काफी सोचविचार कर रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो की रिक्वेस्ट स्वीकार कर ली. इस के बाद रितेश संघवी और वेंडी अल्बानो की औनलाइन चैटिंग शुरू हो गई. पहले दिन वेंडी अल्बानो ने खुद को पेशे से इंटीरियर डिजाइनर बताया था. वह सोशलाइट महिला थी और उस की स्वयं की एक इंटीरियर डिजाइनिंग कंपनी थी, जिस में कई लोग काम करते थे. रितेश संघवी वेंडी अल्बानो से काफी प्रभावित हुआ.

बदले में उस ने भी अपना बायोडाटा उसे बता दिया. इस के बाद दोनों नियमित रूप से एकदूसरे के साथ चैटिंग करने लगे. चैटिंग के जरिए दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए. दोनों ने अपनेअपने मोबाइल नंबर भी एकदूसरे को दे दिए थे, जिस से दोनों की नजदीकियां और बढ़ गई थीं. जब भी मौका मिलता था, दोनों फोन पर बातें कर लिया करते थे. इस तरह दोनों को मोबाइल पर बातें करते और फेसबुक पर चैटिंग करते लगभग 6 महीने का समय बीत गया. अब तक दोनों एकदूसरे के गहरे दोस्त बन गए थे. शुरूशुरू में रितेश संघवी का वेंडी अल्बानो से कुछ खास लगाव नहीं था. लेकिन जैसेजैसे समय बीतता गया, वैसेवैसे दोनों एकदूसरे से करीब आने के साथ खुलते गए. दोनों के बीच उम्र और मर्यादा जैसी कोई बात नहीं रह गई. दोनों एकदूसरे से खूब खुल कर हंसीमजाक करने लगे.

मार्च, 2011 में वेंडी अल्बानो रितेश संघवी को सरप्राइज देते हुए अचानक मुंबई आ गई. वह होटल ताज में ठहरी थी. उस ने रितेश संघवी को बुला कर पहली बार उस से मुलाकात की. मुंबई घूमने के बाद वह अमेरिका चली गई. इस बीच दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. रितेश संघवी को वेंडी अल्बानो का मुंबई आना, उस के साथ घूमनाफिरना और उस का व्यवहार काफी अच्छा लगा. यही हाल वेंडी अल्बानो का भी था. इस के बाद अक्टूबर, 2011 में वेंडी अल्बानो ने रितेश संघवी को फोन कर के बताया कि वह फिर से भारत आना चाहती है. इस बार उस का इरादा पूरा भारत घूमने का था. इस में रितेश को क्या ऐतराज हो सकता था. वह आई तो रितेश संघवी ने एयरपोर्ट पर जा कर उस का स्वागत किया.

घर वालों को यह बता कर कि कुछ दिनों के लिए वह एक बिजनैस पार्टी के साथ बाहर जा रहा है, रितेश वेंडी अल्बानो के साथ भारत की सैर पर निकल पड़ा. कुछ दिन भारत में गुजार कर अल्बानो अमेरिका लौट गई. वेंडी अपने घर तो पहुंच गई, पर रितेश संघवी के साथ बिताए क्षणों को वह भुला नहीं पा रही थी. वह पहली ही मुलाकात से उस से दिल लगा बैठी थी. इसी वजह से वह साल भर में 2 बार भारत आई थी और रितेश संघवी के साथ मिल कर मौजमस्ती में अपना समय बिताया था. लेकिन 9 फरवरी, 2012 का आगमन वेंडी अल्बानो के लिए उस की जिंदगी का आखिरी सफर साबित हुआ. क्योंकि अगली बार वेंडी अल्बानो ने भारत न आ कर बैंकाक घूमने की योजना बनाई.

इस के लिए उस ने बैंकाक के जानेमाने होटल फ्रेजर में अपने और रितेश संघवी के ठहरने के लिए औनलाइन डबलबेड वाला कमरा बुक करवाया. इस की जानकारी उस ने रितेश संघवी को भी दे दी. यह जान कर रितेश इसलिए काफी खुश हुआ, क्योंकि बैंकाक जाने की योजना सीधे न जा कर मुंबई हो कर जाने की थी. इसीलिए उस ने रितेश संघवी को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर बुला लिया था. वहां से दोनों बैंकाक चले गए. वहां होटल फ्रेजर में दोनों की पहले ही बुकिंग थी. पहले की ही तरह इस बार भी रितेश संघवी अपने परिवार वालों से झूठ बोल कर वेंडी अल्बानो के साथ बैंकाक चला गया. वह घर पर कह कर गया था कि वह एक पार्टी के साथ बिजनैस के सिलसिले में महाबलेश्वर जा रहा है, जल्दी ही आ जाएगा.

12 फरवरी, 2012 की रात वेंडी अल्बानो और रितेश संघवी के लिए काफी हसीन और रंगीन थी. उस दिन बैंकाक में घूमनेफिरने के बाद, दोनों जब अपने कमरे आए तो बहुत खुश थे. रात 10 बजे वेंडी अल्बानो ने पहले शराब पी, फिर खाना खाया. खाना खाने के बाद उस ने रितेश संघवी से सैक्स की इच्छा जाहिर की. सैक्स की इच्छा पूरी होने के बाद उस ने रितेश संघवी के सामने जो प्रस्ताव रखा, उसे सुन कर उस के होश उड़ गए. उस का गला सूख गया. वह अपनी जगह से उठा और थोड़ा सा पानी पीने के बाद बोला, ‘‘यह क्या कह रही हैं आप? मेरी और आप की शादी? यह कैसे मुमकिन है. हम दोनों की उम्र में जमीनआसमान का फर्क है.

आप की 2-2 जवान बेटियां और उन के परिवार हैं. अपनी इज्जत की नहीं तो मेरे परिवार की तो सोचो, लोग क्या कहेंगे? हम दोनों की जितनी दोस्ती है, बहुत है. इस से आगे जाना ठीक नहीं है. न मेरे लिए और न आप के लिए.’’

रितेश संघवी ने वेंडी अल्बानो को काफी समझाया. लेकिन वह उस की एक भी बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. अब वह शादी के लिए धमकियों पर उतर आई थी. उस का कहना था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह इंडिया जा कर उस के परिवार वालों को अपने और उस के संबंधों के बारे में बता देगी. इस के साथ ही वह अपने और उस के सैक्स संबंधों को दुष्कर्म बता कर उस के खिलाफ बैंकाक पुलिस में शिकायत दर्ज करवा देगी और उसे जेल भिजवा देगी. वेंडी अल्बानो की इस धमकी से रितेश संघवी के होश उड़ गए. वह बुरी तरह डर गया. उस ने सोचा कि अगर उस के परिवार वालों को यह बात पता चल गई कि फेसबुक वाली अमेरिकन दोस्त से उस का अवैधसंबंध था और उसी चक्कर में वह बैंकाक पुलिस की हिरासत में है तो उन के दिलों पर क्या बीतेगी. उन की समाज में क्या इज्जत रह जाएगी. वह खुद भी किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा.

यह सब सोच कर रितेश मन ही मन काफी डर गया. उस ने सोचा भी नहीं था कि फेसबुक और वाट्सऐप की दोस्ती इंसान को कितनी महंगी पड़ सकती है. बहरहाल अब उसे वेंडी अल्बानो नाम की उस मुसीबत से किसी भी तरह पीछा छुड़ाना था. लेकिन कैसे, यह उस की समझ में नहीं आ रहा था. आखिर काफी सोचनेविचारने के बाद उस ने वेंडी अल्बानो से छुटकारा पाने के लिए एक खतरनाक योजना तैयार कर ली. 12/13 फरवरी, 2012 की रात को जब उस ने घड़ी देखी तो सुबह के 2 बजे रहे थे. नशे में धुत वेंडी अल्बानो गहरी नींद में सो रही थी. रितेश संघवी अपने बिस्तर से उठा और रूम के किचन में जा कर फल काटने वाला चाकू उठा लाया. इस के बाद वह नशे में धुत वेंडी को उठा कर कमरे के बाथरूम में ले गया और चाकू से गोद कर उस की हत्या कर दी.

वेंडी अल्बानो को मारने के बाद उस ने अपने कपड़े वगैरह ठीक किए और अपना सामान ले कर सुबह के 4 बजे चुपचाप होटल से निकल गया. होटल से निकल कर वह सीधा बैंकाक एयरपोर्ट पहुंचा और बिजनैस क्लास का टिकट ले कर हवाई जहाज से कोलकाता आ गया. कोलकाता से घरेलू उड़ान पकड़ कर वह मुंबई स्थित अपने घर आया. घर आ कर उस ने अपने साथ घटी घटना की सारी जानकारी अपने घर वालों को दे दी. घर वालों ने उसे बचाने के लिए भागदौड़ कर के हाईकोर्ट के एक वकील से संपर्क किया. हकीकत जान कर उस वकील ने रितेश को फरार होने की सलाह दी. इस पर रितेश संघवी गोवा चला गया. रितेश के जाने के बाद उस के घर वालों ने उसी शाम 6 बजे डीवी पुलिस थाने में रितेश की गुमशुदगी दर्ज करवा दी.

रितेश संघवी गोवा के परभणी, गंगाखेड़ इलाके में रहने लगा. अपने परिवार और दोस्तों की मदद से उस ने अपने रहने के लिए किराए का एक मकान और बिजनैस के लिए कावेरी नाम से मोबाइल फोन की दुकान खोल ली. उस ने अपना नाम और अपना हुलिया भी बदल लिया था. काफी समय निकल जाने के बाद रितेश को यकीन हो गया था कि पुलिस अब कभी भी उस तक नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन उस के इस यकीन की दीवारें कुछ महीनों बाद ही ढह गईं. आखिर वह मुंबई क्राइम ब्रांच (सीआईडी) की इंटरपोल साइबर सेल की गिरफ्त में आ गया. रितेश संघवी की गिरफ्तारी और उस से पूछताछ करने के बाद इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा की टीम ने उसे अपनी कस्टडी में दिल्ली ला कर सीबीआई को सौंप दिया. सीबीआई ने उसे बैंकाक की लुंपीग पुलिस थाने की पुलिस के हवाले कर दिया.

मुंबई क्राइम ब्रांच सीआईडी की इंटरपोल साइबर सेल की सीनियर इंसपेक्टर शालिनी शर्मा और उन की स्पैशल टीम ने इस मामले को जिस सूझबूझ से सुलझाया, उस के लिए अमेरिकन कांउसलर ने उन्हें प्रशस्तिपत्र दिया. साथ ही मुंबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने भी अपनी तरफ से इस टीम को 30 हजार रुपए का इनाम घोषित किया. Crime Story

कथा लिखे जाने तक अभियुक्त रितेश संघवी बैंकाक की जेल में बंद था.

Uttarakhand Crime : अपहरण में कैसे हुई इतनी बड़ी भूल

Uttarakhand Crime : संजय बालियान ने हर्षित के अपहरण और फिरौती की जो योजना बनाई थी, उस में वह कामयाब भी रहा. लेकिन इस पूरे मामले में भूल कहां हुई कि अपराध की सफलता का जश्न मनाने के पहले ही वह साथियों समेत पकड़ा गया. भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) में सहायक निदेशक के पद पर तैनात गिरीश तायल का परिवार उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के पौश इलाके इंजीनियर्स एनक्लेव स्थित आलीशान कोठी में रहता था. उन के परिवार में पत्नी लक्ष्मी तायल के अलावा 2 बड़ी बेटियां और एक बेटा हर्षित था. गिरीश तायल की तैनाती उत्तर प्रदेश के जिला मुजफ्फरनगर में थी, इसलिए वह कभीकभी ही घर आ पाते थे.

आर्थिक रूप से समृद्ध तायल का बेटा हर्षित शहर के ही एक प्रतिष्ठित स्कूल में कक्षा 12 में पढ़ता था. व्यक्ति कितना भी अमीर व गरीब क्यों न हो, समय उस के साथ अपने हिसाब से ही चाल चलता है. 29 नवंबर की ठंडक भरी शाम के करीबन सवा 7 बजे का वक्त था. 18 वर्षीय हर्षित तायल स्कूटी से अपने मोबाइल को रिचार्ज कराने के लिए जीएमएस रोड की तरफ घर से निकला. गिरीश तायल उस दिन घर पर ही थे. हर्षित को घर से निकले लगभग एक घंटा हो गया. इतनी देर तक वह वापस नहीं आया तो गिरीश को उस की चिंता हुई. उन के दिमाग में यह भी  खयाल आया कि कहीं वह अपने दोस्तों के साथ बातचीत में तो नहीं लग गया.

कुछ समय और बीता तो फिक्र की डगर पर चलना उन की मजबूरी हो गई. उन्होंने उस का मोबाइल मिलाया, लेकिन पूरी घंटी जाने के बाद भी उस ने फोन नहीं उठाया. उन्होंने दोबारा फोन किया तो उस का फोन बंद मिला. इस के बाद उन्होंने जितनी बार फोन किया, हर बार उस का फोन स्विच औफ ही बताया. गिरीश तायल परेशान हो गए कि हर्षित का फोन स्विच औफ क्यों हो गया है? लड़का हो या लड़की, जब तक बाहर जाने के बाद घर न आ जाए, तब तक मातापिता को चिंता सताती है. अगले आधे घंटे तक भी हर्षित घर नहीं आया तो गिरीश ने अपने परीचितों को यह बात बताई. परिचित उन के घर आ गए और हर्षित की खोज में निकल पड़े.

घर से निकलते समय हर्षित ने जीएमएस रोड की तरफ जाने की बात कही थी, इसलिए सभी जीएमएस रोड पर स्थित बाजार पहुंचे. परंतु वह वहां कहीं दिखाई नहीं दिया. बीचबीच में सभी उस के मोबाइल पर फोन भी कर रहे थे. जब वे वापस आने लगे तो एनक्लेव के सामने सड़क किनारे खड़ी हर्षित की स्कूटी देख कर चौंके. आश्चर्य की बात यह थी कि स्कूटी का लौक खुला था. गिरीश तायल ने इधरउधर देखा. हर्षित का कुछ पता नहीं था. चौंकाने वाली एक और बात यह थी कि हर्षित की चप्पलें भी वहीं पड़ी थीं. यह देख कर गिरीश व उन के परिचितों का दिल अनहोनी की आशंका से धड़कने लगा.

गिरीश हताशपरेशान थे. करीब आधा घंटे बाद उन्होंने फिर से बेटे का मोबाइल नंबर मिलाया. घंटी गई तो गिरीश की परेशानी थोड़ा कम हुई. उन्हें लगा कि अब बेटे से बात हो कर वास्तविक स्थिति पता चल जाएगी. लेकिन इस बार भी घंटी बजने के बावजूद फोन रिसीव नहीं किया गया. बुरे खयालों का तूफान गिरीश को परेशान करने लगा. घर में विचारविमर्श के बाद गिरीश थाना बसंत विहार पहुंचे और थानाप्रभारी प्रदीप चौहान से बेटे के लापता होने की बात बताई. उन की शिकायत पर पुलिस ने गुमशुदगी का मामला दर्ज कर लिया. मामला एक अधिकारी के बेटे के लापता होने का था. थानाप्रभारी ने एसएसपी अजय रौतेला व एसपी (सिटी) अजय सिंह को भी बच्चे के गायब होने की बात बता दी.

एसएसपी ने थानाप्रभारी को जरूरी काररवाई के निर्देश दे कर उन के साथ स्पेशल औपरेशन गु्रप (एसओजी) की टीम को भी लगा दिया. एसओजी प्रभारी रवि कुमार व सबइंस्पेक्टर मुकेश त्यागी मामले की जांच में जुट गए. गिरीश तायल थाने से घर लौटे ही थे कि उन के मोबाइल की घंटी बजी. फोन हर्षित का था. उन्होंने जल्दी से रिसीव किया, ‘‘हैलो बेटा हर्षित, तुम कहां हो, क्या हुआ?’’

दूसरे ही पल तायल को झटका लगा. उधर से आवाज हर्षित की नहीं, बल्कि किसी और की थी, उस ने भारीभरकम आवाज में कहा, ‘‘आप का प्यारा बेटा नहीं, हम बोल रहे हैं.’’

‘‘कौन हो तुम और मेरा बेटा कहां है? वह ठीक तो है न?’’ गिरीश ने घबरा कर पूछा.

‘‘इतने सवालों का जवाब तो हम एकसाथ नहीं दे सकते.’’ कुछ पल रुक कर फोनकर्ता बोला, ‘‘आप इतना समझ लो कि अभी तक आप का बेटा बिलकुल सेफ है. उसे आगे भी सेफ रखना है या नहीं, यह आप मुझे बता देना. हम क्या चाहते हैं, यह बाद में फोन कर के बता देंगे. फिलहाल तुम इतना जान लो कि पुलिस के चक्कर में ज्यादा मत पड़ना, वरना…’’ इस के बाद उस ने फोन काट दिया. अब गिरीश व उन के घर वालों को यह समझते देर नहीं लगी कि उन के बेटे का अपहरण हो चुका है. घर वाले इस बात को ले कर परेशान हो रहे थे कि पता नहीं हर्षित किस हाल में होगा.

हर्षित रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हुआ था. मामले की जांच के लिए पुलिस टीम भी उन के यहां पहुंच गई थी. गिरीश की अपहर्ता से जो बात हुई थी, पुलिस को नहीं बताई. इसी बीच हर्षित के मोबाइल से दोबारा फोन आया. गिरीश फोन ले कर पुलिस से हट कर दूसरे कमरे में चला गया. उस ने पूछा, ‘‘कैसा है मेरा बेटा?’’

‘‘वह बिलकुल ठीक है. अगर उसे ठीक देखना है तो हमें 5 करोड़ रुपए दे दो.’’

‘‘क…क…क्या..?’’ तायल के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह बोले, ‘‘मेरे पास इतने रुपए पूरे जन्म में भी नहीं होंगे.’’

‘‘कैसी बात करते हो इंजीनियर साहब, माल तो बहुत कमाया है तुम ने.’’

‘‘तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है. मैं कोई इंजीनियर नहीं हूं. मैं तो बीएसएनएल में हूं.’’

‘‘क्या मतलब?’’ फोनकर्ता चौंका.

‘‘हां, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं. इतनी रकम मैं भला कहां से लाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, तुम्हें दोबारा फोन करता हूं.’’ फोन कट गया. गिरीश को लग रहा था कि गलतफहमी के चलते उन के बेटे का अपहरण हुआ है. उन की आशंका सही साबित हुई. जब फोन दोबारा आया तो उस ने कहा, ‘‘हम ने पता किया है कि आप इंजीनियर नहीं हैं, लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ता. इतना जान लो कि रकम मोटी चाहिए. पुलिस के चक्कर में मत पड़ना, वरना उस की जान हमारे हाथ में है. पैसा कब और कहां पहुंचाना है, बाद में वाट्सऐप पर बता देंगे.’’

इतना कह कर अपहर्त्ता ने फिर फोन काट दिया. इस दौरान एसएसपी अजय रौतेला व एसपी भी तायल के घर पहुंच गए थे. तब तायल ने दबी जुबान से पुलिस को बता दिया कि हर्षित का अपहरण कर लिया गया है और करोड़ों रुपए की फिरौती मांगी जा रही है. पुलिस के लिए मामला बेहद गंभीर था. एसएसपी ने आला अधिकारियों को सनसनीखेज घटना की जानकारी दे दी. सूचना मिलते ही अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) राम सिंह मीणा व डीआईजी संजय गुंज्याल ने एसएसपी से मंत्रणा की. अधिकारियों ने हर्षित के घर वालों से भी बात की, लेकिन उन के रवैये ने पुलिस को निराश कर दिया. वह पुलिस को सहयोग करने को तैयार नहीं थे.

इस के बावजूद भी पुलिस ने अपने हिसाब से काररवाई करने का फैसला किया. पुलिस ने गुमशुदगी के मामले को अपहरण में बदल दिया. हर्षित के अपहरण की बात धीरेधीरे दबी जबान से खुली तो अगले दिन अखबारों की सुर्खियां बन गई. उत्तराखंड में फिरौती के लिए बड़ी वारदात थी. कानूनव्यवस्था को ले कर भी सवाल उठ रहे थे. प्रदेश की राजधानी से मामला जुड़ा होने के चलते मुख्यमंत्री हरीश रावत के संज्ञान में भी मामला आ गया. उन्होंने पुलिस महानिदेशक बी.एस. सिद्धू को अविलंब कार्रवाई करने के साथ ही हर्षित की सकुशल रिहाई के निर्देश दिए.

एडीजी राम सिंह मीणा के निर्देश पर हर्षित की बरामदगी के लिए पुलिस दलों का गठन का निर्णय लिया गया. पुलिस, एसटीएफ व एसओजी की टीमें जांच में जुट गईं. एसटीएफ टीम की कमान उस के एसएसपी डा. सदाकांत दाते ने संभाली. पुलिस टीम में सीओ (सिटी) मनोज कत्याल व कई थानाप्रभारियों के अलावा दरजन भर से भी ज्यादा पुलिसकर्मियों को शामिल किया गया. पुलिस अपने काम में लग चुकी थी. पुलिस ने गिरीश को भी किसी तरह सहयोग करने के लिए तैयार कर लिया. पुलिस ने हर्षित के मोबाइल की लोकेशन हासिल की तो वह हरिद्वार की निकली. उस का मोबाइल स्विच्ड औफ था. इस से साफ था कि अपहर्त्ता उसे हरिद्वार ले गए हैं.

एक पुलिस टीम हरिद्वार के लिए रवाना कर दी गई. इस बीच अपहर्ता अलगअलग नंबरों से गिरीश तायल से बात करते रहे. अपहर्ताओं ने हर्षित का एक विडियो भी तायल को भेजा. वीडियो में वह बेहद डरा हुआ था और खुद को बचाने की गुहार कर रहा था. पुलिस को अपहर्त्ताओं की लोकेशन कभी देहरादून, कभी हरिद्वार, कभी सहारनपुर तो कभी मुजफ्फरनगर जिले की मिल रही थी. सभी जगह पुलिस टीमें भेज दी गई थीं. पुलिस के सामने परेशानी यह थी कि अपहर्त्ता बेहद चालाक थे और वह हर काल के बाद सिम कार्ड बदल देते थे. मोबाइल नंबरों के जो पते मिल रहे थे, वे सब फरजी निकल रहे थे.

फिरौती को ले कर अपहर्त्ता गिरीश तायल से सौदेबाजी करने लगे. तायल के गिड़गिड़ाने के बाद किसी तरह बात 34 लाख रुपए पर तय हो गई. डील पक्की हो जाने के बाद अपहर्त्ता ने कहा, ‘‘सारी रकम हजार के नोटों में होनी चाहिए और उसे लाल रंग के सूटकेस में लाना. पैसे कहां पहुंचाने हैं, हम बाद में बता देंगे.’’

इस के बाद तायल ने इधरउधर से उधार ले कर व आभूषण बेच कर फिरौती की रकम का इंतजाम कर लिया और वे पैसे लाल रंग के एक सूटकेस में रख लिए. शाम के समय फिर अपहर्त्ताओं का फोन आया, ‘‘इंतजाम हुआ?’’

‘‘हो गया.’’

‘‘ठीक है, तुम रात को रेलवे स्टेशन से लाहौरी एक्सप्रैस से हरिद्वार की तरफ चलना. रास्ते में हम तुम्हें बता देंगे कि सूटकेस कहां फेंकना है. तुम अकेले ही आओगे. तुम्हारे साथ कोई दूसरा नहीं होना चाहिए.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगा.’’

अपहर्त्ता बेहद चालाकी बरत रहे थे और कई फोन का इस्तेमाल अलगअलग इलाकों से कर रहे थे. इस से पुलिस अधिकारी सकते में आ गए थे. पुलिस की योजना थी कि फिरौती लेते समय अपहर्ताओं को दबोच लेंगे, लेकिन वह फिरौती लेने का अलग ही तरीका अपना रहे थे. पुलिस महानिदेशक राम सिंह मीणा भी पुलिस औपरेशन पर बराबर नजर रख रहे थे. डीआईजी संजय गुंज्याल की नजर सर्विलांस पर थी, जबकि एसएसपी अजय रौतेला व एसटीएफ के एसएसपी डा. सदाकांत के निर्देशन में पुलिस टीमें काम कर रही थीं.

पुलिस किसी भी तरह हर्षित की सकुशल बरामदगी के साथ अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. पुलिस टीमों ने वाट्सऐप पर अपना एक ग्रुप बना लिया, ताकि एकदूसरे को सूचना आदि शेयर की जा सके. सादी वरदी में पुलिसकर्मियों को रेलवे स्टेशन के अलावा लाहौरी एक्सपे्रस के कोच में तैनात करने का निर्णय लिया गया. ऐसा भी हो सकता था कि अपहर्त्ता स्टेशन पर ही फिरौती वसूल कर लेते. शाम के समय तायल स्टेशन पहुंच गए. रात्रि 1 बजे वह लाहौरी एक्सप्रैस में सवार हो गए. उसी डिब्बे में तायल से दूरी बना कर सादी वरदी में पुलिस टीम सीओ मनोज कात्याल के नेतृत्व में सवार हो गई. रेल ने रफ्तार पकड़ी तो अपहर्त्ता ने तायल को फोन किया,

‘‘मोतीचूर रेलवे स्टेशन के पास एक रेलवे पुल आएगा. वहां हम टौर्च की रोशनी दिखाएंगे. तुम्हें सूटकेस बाईं तरफ नीचे फेंकना है.’’

‘‘ठीक है, मैं ऐसा ही करूंगा, लेकिन मेरा बेटा…’’

‘‘वह कल सुबह सकुशल तुम्हें मिल जाएगा. कोई भी चालाकी नहीं, समझे.’’ अपहर्त्ता ने गुर्रा कर कहा.

‘‘कुछ देर में रेलवे पुल आया. गिरीश तायल ने डिब्बे के गेट पर जा कर बाहर की तरफ देखा. उन्हें हाथ से हिलती हुई टौर्च की रौशनी का संकेत नजर आया तो उन्होंने सूटकेस नीचे फेंक दिया. यह इलाका सुनसान था. अंधेरा इतना था कि कोई दिखाई नहीं दिया. सूटकेस फेंकने के बाद सूटकेस फेंकने की बात उन्होंने अपहर्त्ता को बता दी.

उधर टे्रन में बैठे सीओ ने यह बात एसएसपी को बताई. चूंकि पुलिस टीम वाट्सऐप पर एकदूसरे से संपर्क में थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर आननफानन में पुलिसकर्मी वहां पहुंचे, लेकिन तब तक सूटकेस कोई ले जा चुका था. तायल हरिद्वार जा कर रेल से उतर गए और वापस घर आ गए. पुलिस की सर्विलांस टीम अपहर्त्ताओं के फोन नंबरों के सहारे उन के पास तक पहुंचने की कोशिश में लगी थी.

अगली सुबह यानी पहली दिसंबर को तड़के तायल के पास एक अंजान नंबर से फोन आया. उन्होंने रिसीव किया तो दूसरी तरफ से हर्षित की आवाज आई. उस की आवाज सुनते ही तायल खुश हो गए. तायल ने उस से बात की तो उस ने बताया कि उसे अपहर्त्ताओं ने 5 बजे हरिद्वार सब्जी मंडी के पास छोड़ दिया था. वहां से पैदल चल कर वह एक चाय वाले के पास पहुंचा और उस से मोबाइल मांग कर उस ने उन्हें फोन किया. बेटे से बात करने के बाद वह पुलिस व घर वालों के साथ उस के पास पहुंच गए. बेटे को सकुशल पा कर तायल खुश थे. हर्षित की रिहाई सकुशल हो गई थी. अब पुलिस को अपहर्त्ताओं तक पहुंचना था. अपहर्त्ताओं ने जितने भी नंबरों का इस्तेमाल किया था, वे सभी नंबर सर्विलांस पर थे.

सभी नंबर बंद हो गए, लेकिन उन्होंने उन मोबाइलों में जो नए सिम डाले, वे पकड़ में आ गए. पुलिस को उन की लोकेशन हरिद्वार के जगजीतपुर की मिल रही थी. एसएसपी अजय रौतेला ने हरिद्वार की एसएसपी स्वीटी अग्रवाल से संपर्क कर सहयोग मांगा तो स्वीटी अग्रवाल ने जिला पुलिस की एक टीम को देहरादून पुलिस के साथ लगा दिया. लोकेशन के सहारे पुलिस टीमें एक घर तक पहुंच गईं. पुलिस के दस्तक देने पर एक व्यक्ति ने दरवाजा खोला. पुलिस को अपने सामने देख कर उस व्यक्ति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

‘‘रकम का बंटवारा हो गया या अभी बाकी है.’’ उस व्यक्ति को घूरते हुए पुलिस ने पूछा और अंदर दाखिल हो गई. घर के अंदर अन्य लोग भी थे. अपने सामने पुलिस को देख कर सभी की हालत हारे हुए जुआरी जैसी हो गई थी. उन से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस ने सभी 5 अपहर्त्ताओं को गिरफ्तार कर लिया. उन में एक युवती भी थी. अपहर्त्ताओं में हरिद्वार के जगजीतपुर निवासी संजय बालियान, उस का बेटा आशीष, बेटी मीनाक्षी, गुरदासपुर, पंजाब का आशी डेनियल व अमृतसर निवासी सरनजीत सिंह शामिल थे.

आशीष देहरादून में ही एक अस्पताल में फार्मासिस्ट था, जबकि सरनजीत सिंह देहरादून में ठेकेदरी के काम में मुंशी था. प्राथमिक पूछताछ के बाद अपहर्त्ताओं के पास से पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल की गईं 2 कारें, 6 मोबाइल फोन व फिरौती की रकम भी बरामद कर ली. एक और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि संजय बालियान ने वारदात में अपनी बेटी मीनाक्षी व बेटे आशीष को भी शामिल किया था. पुलिस सभी को गिरफ्तार कर के देहरादून ले आई. देहरादून पुलिस के लिए निस्संदेह यह बड़ी सफलता थी. अधिकारियों ने अपहर्त्ताओं से विस्तृत पूछताछ की तो हर्षित के अपहरण की बड़ी ही दिलचस्प कहानी सामने आई.

दरअसल, मुख्य आरोपी संजय बालियान सरकारी विभागों में ठेकेदारी करता था. वह मूलरूप से जनपद मुजफ्फरनगर के गांव किचौरी शाहपुर का रहने वाला था, लेकिन कई सालों से हरिद्वार में रहने लगा था. उस ने देहरादून व हरिद्वार के कई विभागों में सड़क, शौचालय व छोटेमोटे कामों की ठेकेदारी करने के साथ ही प्रौपर्टी का काम भी शुरू कर दिया. इन कामों में उस ने काफी पैसा कमाया. पैसा आने पर उस की लाइफस्टाइल बदल गई. वह शानोशौकत की जिंदगी जीने लगा. अपने बच्चों को भी उस ने ऐसी ही आदत डाल दी. जिस से उस के खर्चे बढ़ गए. इसी दौरान उसे ठेकेदारी में घाटा हो गया.

धंधा सही चल रहा था तो उस ने करोड़पति बनने का जो सपना देखा था, वह उसे धूमिल होता नजर आ रहा था. वक्त ने उसे ऐसे आर्थिक झटके दे दिए कि वह उन से उबर नहीं पाया. वह दिनरात इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि आखिर मोटी रकम कैसे कमाई जाए. उस का व्यवहार अपने बच्चों से दोस्ताना था. उस ने उन्हें अपने तरीके से जीने की पूरी आजादी दे रखी थी. इस का नतीजा यह निकला था कि बेटा आशीष अपने अंदाज में जिंदगी जीता था और बेटी मीनाक्षी अपने अंदाज में. आशीष के कदम बहक चुके थे. उस के अपने आवारा दोस्तों की मंडली थी. संजय के दिमाग में हर वक्त कोई लंबा हाथ मार कर रातोंरात करोड़पति बनने की ख्वाहिश हिलोरें लेती रहती थीं.

एक बार उस के दिमाग में विचार आया कि क्यों न किसी अमीर बाप के बेटे का अपहरण कर लिया जाए. इस काम में उस ने अपने बेटाबेटी को भी लालच दे कर शामिल कर लिया.

‘‘वह सब तो ठीक है, लेकिन हम अपहरण करेंगे किस का?’’ आशीष बोला.

‘‘मैं एक ऐसे आदमी को जानता हूं, जिस ने मोटा माल कमा रखा है. उसी के बेटे का हम अपहरण कर लेंगे.’’ संजय बालियान ने मुसकरा कर कहा.

‘‘कौन है वह?’’

‘‘देहरादून में एक इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा. हमें उस से करोड़ों रुपए मिल सकते हैं.’’

‘‘लेकिन पापा क्या वह इस लायक होगा कि करोड़ों दे सके, क्योंकि लाखों के लिए तो काम करना बेकार है.’’‘‘वह मजबूत हैसियत वाला है. मैं ने भी उस का रसूख देखा है. देहरादून के इंजीनियर एनक्लेव में आलीशान कोठी है उस की.’’

‘‘तो क्या हम वहां से..?’’ आशीष ने जिज्ञासु बन कर पूछा तो संजय ने बताया, ‘‘हां हम यह काम देहरादून से ही करेंगे.’’

अपहरण की पृष्ठभूमि तैयार करने के बाद उन्होंने तय किया कि इस में देहरादून के भी किसी व्यक्ति को शामिल किया जाए. संजय पहले से ही अस्पताल में नौकरी करने वाले डेनियल व मुंशी सरनजीत को जानता था. डेनियल से संजय की मुलाकात अस्पताल आनेजाने के दौरान हुई थी. बाद में वह मीनाक्षी का भी दोस्त बन गया था. सरनजीत को संजय इसलिए जानता था, क्योंकि ठेकेदारी के दौरान वह मुंशी था. संजय ने बेटा, डेनियल व सरनजीत को करोड़पति बनने का सपना दिखा कर अपने साथ शामिल कर लिया. वे खुशीखुशी तैयार हो गए.

फिर सभी ने अपहरण की फूलप्रूफ योजना बना ली. योजना को सफलता के अंजाम तक पहुंचाने के लिए कई बार बौलीवुड की फिल्में किडनैप और अपहरण देखीं. बीएससी कर रही मीनाक्षी को कंप्यूटर की अच्छी जानकारी थी. उस ने हाईटैक ढंग से पुलिस को चकराने की सोची और पुलिस के सर्विलांस सिस्टम को अच्छे से समझा. फिरौती की रकम मांगने के लिए उन्होंने कई कंपनियों के सिमकार्ड भी खरीद लिए. सभी सिम फरजी आईडी पू्रफों पर अलगअलग जिलों से लिए गए थे. पुलिस को चकमा देने के लिए हरिद्वार के अलावा देहरादून, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर व छुटमलपुर जा कर फोन करने का प्लान बनाया.

इंजीनियर आर.के. राजा के बारे में संजय को ठेकेदारी करने के दौरान देहरादून में पता चल गया था कि वह बहुत अमीर है और उस का एक ही बेटा है. उस ने यह भी सुना था कि वह इंजीनियर्स एनक्लेव की किसी आलीशान कोठी में रहता है. अपहरण के लिए मीनाक्षी खुद मोहरा बनने को तैयार थी. वह कई बार देहरादून गई, लेकिन उन्होंने इंजीनियर राजा की कोठी समझ कर जिस कोठी को टारगेट किया, वह कोठी गिरीश तायल की थी. सभी रास्तों का नक्शा भी उस ने दिमाग में बैठा लिया. राजा के बेटे के रूप में उन्होंने हर्षित तायल की पहचान कर ली.

योजना को अंजाम देने के लिए सभी अकसर हरिद्वार से देहरादून जा कर सुबह दोपहर व शाम को एनक्लेव के बाहर ऐसी जगह खड़े हो जाते थे, जहां से तायल की कोठी दिखाई दे. उन की नजर में वह कोठी इंजीनियर राजा की थी. उन्होंने देखा कि हर्षित शाम को अकसर घर से बाहर निकलता है. ऐसे ही मौके पर उन्होंने उस का अपहरण करने की ठान ली. इस के लिए उन्होंने 21 नवंबर, 2014 की तारीख तय कर दी. अपहरण के लिए कार का इंतजाम जरूरी था. उन्होंने 2 कारों का इंतजाम करने की सोची. यह इसलिए सोचा कि अगर किसी एक पर शक हो जाए तो दूसरी का इस्तेमाल किया जाए.

21 नवंबर को संजय ने अपने एक परिचित से उस की सैंट्रो कार विवाह में जाने के बहाने मांग ली और देहरादून आ गया. मीनाक्षी का देहरादून में एक फेसबुक दोस्त था एहतेशाम. एहतेशाम ने दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर के देहरादून में अपना फाइनेंस व प्रौपर्टी का काम शुरू कर दिया था. उस के पास हुंडई वरना कार थी. मीनाक्षी अपने भाई के साथ उस से मिली और एक दिन के लिए उस से कार देने को कहा. एहतेशाम ने उसे इनकार नहीं किया और अपनी कार उसे खुशीखुशी दे दी. सभी लोग कारों में सवार हो कर इंजीनियर्स एनक्लेव के बाहर पहुंच गए.

शाम के वक्त हर्षित स्कूटी ले कर निकला. मीनाक्षी बाहर निकल कर खड़ी हो गई, बाकी लोग उस के वापस आने का इंतजार करने लगे. लगभग आधे घंटे बाद हर्षित फोन रिचार्ज करा कर वापस आ रहा था. जैसे ही वह एनक्लेव के बाहर पहुंचा, वहां पहले से खड़ी मीनाक्षी ने उसे हाथ दे कर रोका. हर्षित ने स्कूटी रोकी. मीनाक्षी ने दिलकश अंदाज में अपनी बात कह कर एक कागज का टुकड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘‘क्या आप मुझे यह पता बता देंगे?’’

हर्षित ने पता पढ़ कर कहा, ‘‘यह थोड़ा आगे पड़ेगा.’’

‘‘प्लीज, आप मुझे वहां तक छोड़ दीजिए, नहीं तो मैं अकेली भटक जाऊंगी.’’

मीनाक्षी के अंदाज पर हर्षित इंकार नहीं कर सका. उस की मूक सहमति पा कर मीनाक्षी उस की स्कूटी पर बैठ गई. हर्षित उस के बताए पते पर उसे छोड़ने के लिए चल दिया. तब बाकी लोगों ने कारों से उस का पीछा करना शुरू कर दिया. थोड़ा आगे जाने पर मीनाक्षी ने मोबाइल पर बात करने का नाटक किया. उस ने इस तरह बातें कीं, जैसे सिग्नल न आने की वजह से बात करने में दिक्कत पेश आ रही हो. सुनसान जगह मिलते ही उस ने हर्षित से कहा, ‘‘प्लीज, 2 मिनट के लिए स्कूटी रोकिए, सिग्नल नहीं आ रहे. मुझे जरूरी बात करनी है.’’

हर्षित को जरा भी अंदाजा नहीं था कि वह जाल में उलझ चुका है. उस ने स्कूटी रोक दी. तभी एक कार में सवार अन्य लोग वहां आ कर रुके और उन्होंने बिना समय गंवाए हर्षित को खींच कर कार में डाल लिया. इस दौरान हर्षित की चप्पलें भी पैरों से निकल गईं. कार में आते ही डेनियल ने उस की पीठ में बेहोशी का इंजेक्शन लगा दिया. अस्पताल में नौकरी करने के चलते उसे बेहोशी के इंजेक्शन की जानकारी थी. इस बीच हर्षित के मोबाइल पर कई बार उस के पापा का फोन आया. फोन में नंबर पापा के नाम से फीड था. लगातार फोन आने पर अपहर्त्ताओं ने उस का मोबाइल बंद कर दिया. वह उसे ले कर हरिद्वार में जगजीतपुर स्थित संजय के घर पहुंच गए. सभी को विश्वास था कि उठाया गया शिकार राजकीय निर्माण निगम के इंजीनियर आर.के. राजा का बेटा है.

लेकिन जब उन्होंने 5 करोड़ की फिरौती मांगी तो पता चला कि उन्होंने आर.के. राजा के बेटे के धोखे में गिरीश तायल के बेटे हर्षित तायल का अपहरण कर लिया है. तब उन्होंने तायल से 5 के बजाए 2 करोड़ रुपए मांगे. बाद में डील 34 लाख रुपए में तय हो गई. योजना के अनुसार संजय मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, छुटमलपुर, देहरादून आदि जगहों से हर्षित के पिता को फोन किए. फिरौती की रकम मिलने पर अगले दिन अल सुबह वह हर्षित की आंखों पर पट्टी बांध कर कार से ले कर निकले. उसे किराए के लिए 200 रुपए दिए और सब्जी मंडी के पास छोड़ कर वापस आ गए.

अपना काम पूरा हो जाने के बाद उन्होंने अपहरण की बातचीत में इस्तेमाल किए गए मोबाइल सिमकार्ड तोड़ दिए. वाट्सऐप से हुई बातचीत का डाटा भी डिलीट कर दिया. अपनी सफलता से वे खुश थे, लेकिन अपराध की सफलता का जश्न बनाने से पहले ही पुलिस के शिकंजे में आ गए. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया. उत्तराखंड पुलिस की यह बड़ी सफलता थी. मुख्यमंत्री हरीश रावत ने खुलासा करने वाली टीम को एक लाख रुपए का इनाम देने की घोषणा की.

कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी. चार दिनों बाद पुलिस ने 2 अभियुक्तों संजय व डेनियल को 12 घंटे की पुलिस रिमांड पर लिया. उन की निशानदेही पर हर्षित का हेलमेट व अन्य साक्ष्य एकत्र किए. बाद में संजय व डेनियल को न्यायालय में पेश कर के जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है. Uttarakhand Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आ

Crime Story : दरिंदगी की पराकाष्ठा

Crime Story : समाज में ऐसे दरिंदों की कोई कमी नहीं है जो मौका मिलने पर छोटीछोटी बच्चियों को भी हवस का शिकार बनाने से नहीं चूकते. ऐसे ज्यादातर मामलों में दरिंदगी की शिकार हुई बच्ची को मौत के घाट उतार दिया जाता है. नीरजा के साथ भी यही हुआ था.

पिथौरागढ़ निवासी विशंभरलाल अपने परिवार के साथ जब हल्द्वानी आए थे तो बहुत खुश थे. खुशी स्वभाविक ही थी. 18 नवंबर, 2014 को उन के साले विष्णु की शादी थी. विशंभरलाल भी बड़े व्यवसाई थे और विष्णु भी. खुशीखुशी शादी संपन्न भी हो गई. 20 नवंबर की रात विष्णु ने हल्द्वानी के शीशमहल इलाके के रामलीला मैदान में अपनी शादी की रिसैप्शन पार्टी रखी थी. शानदार पार्टी थी, जिस में कई सौ लोग आए हुए थे. जब पार्टी चल रही थी, तभी साढ़े 7 बजे विशंभरलाल की बेटी नीरजा अचानक लापता हो गई. 7 वर्षीया नीरजा दूल्हे की सगी भांजी थी और विशंभरलाल के परिवार की आंख का तारा. तुरंत उस की खोजबीन शुरू हो गई.

जब वह कहीं नहीं मिली तो रिसैप्शन पार्टी के रंग में भंग पड़ गया. दोनों परिवार, रिश्तेदार और उन के परिचित पार्टी भूल कर नीरजा की खोज में लग गए. जब घंटों तक नीरजा का कोई पता न चला तो उस के लापता होने की सूचना कोतवाली पुलिस को दी गई. पुलिस ने भी अपने स्तर पर बच्ची को हर जगह खोजा, लेकिन उस का कहीं पता न चला. ऐसे में संभावना व्यक्त की गई कि किसी ने नीरजा का अपहरण कर लिया है. इसी संभावना के चलते पुलिस ने थाना कोतवाली में अज्ञात लोगों के खिलाफ अपहरण का केस दर्ज कर लिया. 21 नवंबर की सुबह से ही नीरजा की खोजबीन शुरू हो गई. बडे़ लोगों का मामला था, इसलिए पुलिस एसओजी टीम और एलआईयू की टीमें नीरजा को ढूंढने में लगी थीं.

बच्ची के पिता और मामा के परिवार और रिश्तेदार तो जीजान से उस की खोज में जुटे थे. लेकिन किसी का कोई भी प्रयास सार्थक नहीं रहा. अपहरण की संभावना इसलिए निर्मूल लग रही थी, क्योंकि फिरौती के लिए कोई फोन नहीं आया था. नीरजा के इस तरह रिसैप्शन पार्टी से गायब हो जाने से सभी आश्चर्य में थे. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि यह दुश्मनी का मामला भी हो सकता है और फिरौती के लिए अपहरण का भी. दुश्मनी की बात से विशंभरलाल और विष्णु दोनों ही इनकार कर रहे थे. दूसरी और फिरौती के लिए तीसरे दिन भी कोई फोन नहीं आया तो पुलिस की परेशानी और भी बढ़ गई. स्थानीय मीडिया इसे पुलिस की नाकामी बता कर सुर्खियों पर सुर्खियां बना रहा था.

ऐसी स्थिति में पुलिस ने दुश्मनी और अपहरण की ओर से ध्यान हटा कर अपनी जांच का केंद्रबिंदु शहर के नशेडि़यों, जुआरियों, भिखारियों और पाखंडी बाबाओं को बनाया. क्योंकि ऐसे लोग बच्चों को उठा कर बच्चा चोर गिरोहों को बेच देते हैं और इन गिरोहों के सदस्य उन्हें दूरदराज के प्रदेशों में बेच आते हैं. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. जब कई दिन बीत जाने पर भी नीरजा का कोई पता नहीं चला तो स्थानीय लोगों के सब्र का बांध टूट गया. पुलिस की लचर काररवाई से नाराज हल्द्वानी के लोग सड़कों पर उतर आए. धरनाप्रदर्शन शुरू हो गया. लोग पुलिस के खिलाफ नारेबाजी करने लगे. नरीमन तिराहे पर नैनीताल-काठगोदाम मार्ग जाम कर दिया. जिस से सारे शहर की रफ्तार थम गई.

जब नैनीताल काठगोदाम मार्ग पर 2 किलोमीटर लंबा जाम लग गया तो स्थानीय प्रशासन परेशान हो उठा. इस स्थिति से निपटने के लिए उच्चाधिकारियों ने लोगों को आश्वासन दे कर नीरजा का पता लगाने के लिए एक दिन का समय मांगा. प्रशासनिक आश्वासन के बाद लोगों ने धरना खत्म कर दिया. वादा किया था तो निभाना भी जरूरी हो गया था. मंगलवार 25 नवंबर को क्षेत्राधिकारी जी.सी. टम्टा के नेतृत्व में कई टीमें बना कर पुलिस फोर्स नीरजा की तलाश में जुट गई. लेकिन इस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. घबराई हुई पुलिस अभी आगे की योजना बना रही थी कि एक घोड़ेतांगे वाले ने कोतवाली आकर पुलिस को बताया कि उस का घोड़ा छूट कर गोला नदी के जंगल की ओर भाग गया था.

वह उस के पीछे जंगल में गया तो वहां उस ने एक बच्ची की लाश पड़ी देखी. यह खबर सुन कर पुलिस के हाथपांव फूल गए. उसे विश्वास हो गया कि वह लाश नीरजा की ही होगी. पुलिस नीरजा के घर वालों और उस घोड़े वाले बुजुर्ग को साथ ले कर गोला नदी पार कर के जंगल में गई. घोड़े वाले ने जो जगह बताई थी, वहां एक बच्ची की लाश पड़ी थी. वह लाश नीरजा की ही थी. उस का मुंह खून से सना था. उस के अंडरगारमेंट के अलावा उस की टांगों पर भी खून के छींटे थे. जाहिरा तौर पर कहा जा सकता था कि बच्ची के साथ दुष्कर्म हुआ था और बाद में उस की हत्या कर दी गई थी. नीरजा के घर वाले यह देख कर गहरे सदमे में आ गए.

यह खबर मिलते ही एसएसपी सेंथल अबुदई, एएसपी श्वेता चौबे सहित तमाम बड़े पुलिस अफसर घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरेंसिक एक्सपर्ट डा. दयाल शरण को भी बुलवा लिया गया. जिस ने भी मासूम नीरजा की लाश देखी, उसी का कलेजा मुंह को आ गया. बच्ची के साथ हुई दरिंदगी वाकई हैरान कर देने वाली थी. बहरहाल पुलिस ने घटना स्थल से साक्ष्य एकत्र करने की कवायद शुरू की तो वहां बीड़ी और टौफी के रैपर पड़े मिले, जिन्हें जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लिया गया. फोरेंसिक विशेषज्ञ डा. दयाल शरण ने वहां से कुछ फिंगरप्रिंट भी लिए.

करीब 2 घंटे तक घटनास्थल की सूक्ष्म जांच के बाद पुलिस ने पंचनामा बना कर नीरजा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. उधर नीरजा की हत्या की खबर मिलते ही शहर भर में आक्रोश फैल गया. उस के परिवार वालों का तो बहुत बुरा हाल था. इस बीच पुलिस ने इस केस में अपहरण के साथसाथ दुष्कर्म और हत्या की धाराएं भी जोड़ दी थीं. नीरजा की लाश का पोस्टमार्टम डाक्टरों के एक पैनल ने किया, जिस की वीडियोग्राफी भी कराई गई. डाक्टरी रिपोर्ट में जो बताया गया था, उस ने सभी के होश उड़ा दिए.

रिपोर्ट के अनुसार, नीरजा की हत्या दुष्कर्म के बाद हुई थी. उस की मौत अत्यधिक खून रिसाव के कारण हुई थी. यहां तक कि दरिंदे ने हैवानियत की सभी हदें पार करते हुए मासूम बच्ची के हाथपैर तक तोड़ दिए थे. नाखूनों से उस का चेहरा बिगाड़ने की भी कोशिश की थी. उस के अंगों पर भी गहरे घाव थे. पोस्टमार्टम के बाद बच्ची की लाश उस के परिजनों को सौंप दी गई. बेटी की मौत और उस के साथ हुई हैवानियत से आहत नीरजा के घर वालों ने कहा कि वे तब तक लाश को नहीं उठाएंगे, जब तक पुलिस कातिल को नहीं पकड़ लेती. उधर नीरजा की मौत की खबर सुन कर उस की दादी और मां की हालत बिगड़ गई थी.

उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. एक नन्ही बच्ची के साथ हुए इस दर्दनाक हादसे से पूरा कुमांऊ शोक में डूब गया. कातिलों के प्रति मन में गुस्सा लिए हल्द्वानी के लोग फिर सड़कों पर उतर आए. ये लोग जल्दी से जल्दी कातिलों को गिरफ्तार कर के फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे थे. 26 नवंबर को पूरा हल्द्वानी दिन भर गुस्से की आग से सुलगता रहा. शहर के सभी सरकारी दफ्तर, शिक्षण संस्थान, बैंक और टेंपोटैक्सी सर्विस पूरी तरह बंद रहे. नीरजा की हत्या से उस के घर वाले इतने आहत थे कि पोस्टमार्टम हो जाने के बावजूद वे बच्ची की लाश तक ले जाने को तैयार नहीं थे. उत्तराखंड के एडीजी राम सिंह मीणा ने नीरजा के घर वालों को लाख मनाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कातिलों की गिरफ्तारी होने तक बच्ची की लाश उठाने से इनकार कर दिया.

मजबूरी में पुलिस को बच्ची की लाश को मोर्चरी में रखवाना पड़ा. उधर नीरजा के साथ हुए दुष्कर्म और हत्या से नाराज लोगों ने हल्द्वानी के निकटवर्ती शहर काठगोदाम को भी पूरी तरह से बंद रखा. लोगों ने अपनी दुकानें बंद कर के पूरे शहर में पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया. हालात इतने बिगड़ गए कि मासूम नीरजा के साथ हुए कुकृत्य और उस की हत्या का मामला विधानसभा तक भी पहुंचा. बुधवार 26 नवंबर को इस मामले को ले कर विपक्ष ने जम कर हंगामा किया. इस दौरान नियम 310 के तहत सदन में इस की चर्चा कराने की मांग पर अड़ा विपक्ष वेल में उतर कर धरने पर बैठ गया. विपक्षी नेताओं का कहना था कि इस घटना से यह बात स्पष्ट हो गई है कि प्रदेश में कानूनव्यवस्था चौपट हो चुकी है.

उन्होंने नियम-310 के तहत सदन की काररवाई स्थगित कर इस मुद्दे पर चर्चा कराने की मांग की, जिसे पीठ ने स्वीकार नहीं किया. इस से खफा भाजपा विधायक अपनी बैंच पर खड़े हो गए. विधायक मदन कौशिक, बंधीधर भगत, हरबंस कपूर, संजय गुप्ता, यतीश्वरानंद, आदेश चौहान, सुरेंद्र सिंह जीना समेत तमाम सदस्यों ने इस मामले पर तुरंत चर्चा कराने की मांग की. इस पर संसदीय एवं विधायी कार्य मंत्री इंदिरा हृदयेश ने कहा कि तुरंत चर्चा कराने की स्थिति में सरकार के पास तुरंत जवाब उपलब्ध नहीं होगा. इस मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के विधायकों के बीच हल्की नोकझोंक भी हुई. बाद में मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार इस मार्मिक घटना की चर्चा के लिए तैयार है.

उन्होंने बताया कि अपराधियों को पकड़ने के लिए सरकार पूरी ताकत लगाएगी. हत्यारों को जल्द पकड़ने हेतु स्थानीय पुलिस की मदद के लिए एसटीएफ की टीम को हल्द्वानी भेजा गया है. दूसरी ओर मासूम बच्ची के साथ हुए दुष्कर्म और उस की हत्या को ले कर पूरे कुंमाऊ में आक्रोश का लावा फूट पड़ा. उत्तराखंड के सभी शहरों में विरोध प्रदर्शन और जाम की स्थिति बनी रही. जिले के कई संगठनों ने बच्ची की आत्मा की शांति के लिए कैंडिल मार्च निकाला. सभी स्कूल संस्थान बंद रहे, स्कूली बच्चों ने भी कैंडिल मार्च निकाल कर नीरजा को श्रद्धांजलि दी.

इस मामले ने पूरे शासन को हिला कर रख दिया था. जब पुलिस हत्यारों की खोज में हर तरह की खाक छान चुकी और कहीं कुछ पता नहीं चला तो उस का ध्यान घटनास्थल से मिले बीड़ी के बंडल और टौफी के रेपर पर जम गया. इस की तहकीकात के लिए पुलिस ने क्षेत्र के मजदूरों और डंपर चालकों का सत्यापन किया. इसी दौरान पुलिस की नजर 3 ऐसे संदिग्ध लोगों पर पड़ी, जो इस कांड के बाद देर रात घर आते थे और सवेरे ही घर से निकल जाते थे. जबकि इन तीनों में से एक शख्स ऐसा भी था, जो घटना वाले दिन के बाद अपने कमरे पर आया ही नहीं था. इस के साथ ही पुलिस को एक अहम जानकारी यह भी मिली कि घटनास्थल से जिस ब्रांड की बीड़ी के रैपर मिले थे, वे तीनों उसी ब्रांड की बीड़ी पीते थे. उन के साथ रहने वाले अन्य मजदूरों ने पुलिस को बताया कि वे तीनों ही नशेड़ी हैं और अफीम वगैरह खाते हैं.

इस जानकारी के बाद पुलिस उन तीनों की तलाश में लग गई. पुलिस ने देर रात उन के आवास पर छापा मारा तो उन में से 2 पुलिस के हत्थे चढ़ गए. इन में एक का नाम प्रेमपाल और दूसरे का जूनियर मसीह था. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई. कोतवाली में उन से कड़ी पूछताछ की गई. पुलिस पूछताछ में दोनों ने बताया कि इस अपराध को अंजाम देने वाला अख्तर अली है. पुलिस ने प्रेमपाल और मसीह से उस के बारे में पूछा तो दोनों ने बताया कि अख्तर अली उसी रात से गायब है, जिस रात घटना घटी थी.

पुलिस ने उन दोनों से अख्तर के किसी फोटो के बारे में पूछा. लेकिन उन के पास अख्तर अली का कोई फोटो नहीं था. उस का फोटो नहीं मिला तो पुलिस ने उन दोनों की मदद ले कर उस का स्केच बनवाया. स्केच की मदद से पुलिस ने उस की खोजबीन शुरू कर दी. साथ ही उस के पैंफ्लेट छपवा कर दीवारों पर भी लगवा दिए गए. अख्तर के साथियों से उस का मोबाइल नंबर मिल गया था. पुलिस ने उस के मोबाइल की लोकेशन पता की तो वह दिल्ली की पाई गई. अख्तर की लोकेशन मिलते ही एसटीएफ के एसपी डा. सदानंद दाते पुलिस टीम के साथ बुधवार शाम को ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए. लेकिन पुलिस दिल्ली पहुंची तो उस की लोकेशन लुधियाना आने लगी.

फलस्वरूप पुलिस टीम को लुधियाना जाना पड़ा. आखिरकार लोकेशन के आधार पर खोजबीन कर के उसे लुधियाना से गिरफ्तार कर लिया गया. आरोपी के गिरफ्तार होने की सूचना उसी समय नीरजा के घर वालों को दे दी गई. पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों के समझाने के बाद नीरजा के घर वाले उस की लाश उठाने के लिए तैयार हुए. गुरुवार को फूलों से सजे वाहन में बच्ची के शव को पोस्टमार्टम हाउस से बरेली मार्ग होते हुए रानीबाग स्थित चित्रशिला घाट ले जाया गया. यह हल्द्वानी में पहला ऐसा मामला था, जिस में हल्द्वानी ही नहीं, पूरे राज्य के वीआईपी, नेता, पत्रकार, वकील और अन्य गणमान्य लोगों के साथ बच्चेबूढ़े व महिला भी शामिल हुईं.

अगले दिन उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत, राजस्व मंत्री यशपाल आर्य और आपदा प्रबंधन समिति के अध्यक्ष प्रयाग भट्ट सांत्वना देने के लिए हल्द्वानी पहुंचे तो गुस्साए लोगों ने उन की कारों के शीशे तोड़ दिए. यशपाल आर्य और प्रयाग भट्ट को तो चोटें भी आईं. पुलिस ने जैसेतैसे स्थिति को संभाला. मासूम नीरजा की अंतिम विदाई को अभी कुछ ही समय बीता था कि एसटीएफ की टीम आरोपी अख्तर को लेकर हल्द्वानी पहुंच गई. हल्द्वानी लाते ही अख्तर से कड़ी पूछताछ की गई. पूछताछ में उस ने बताया कि इस घिनौने अपराध में प्रेमपाल और जूनियर मसीह भी ने सहयोग किया था. लेकिन बच्ची जिस हालत में मिली थी, उस से पुलिस को उस की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था.

उन दोनों को पुलिस ने पहले ही हिरासत में ले रखा था. उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया. डंपर चालक अख्तर अली उर्फ शमीम मूलरूप से बिहार के चंपारण जिले के बेतिया थाना के गांव महानाजनी का रहने वाला था, जो हल्द्वानी में रह कर डंपर चलाता था. 20 नवंबर को देर रात शादी के रिसैप्शन के दौरान अख्तर अली शराब के नशे में समारोह में घुस आया. उस ने वहीं खाना भी खाया. खाना खाते समय नीरजा उस की नजरों में चढ़ गई. नीरजा को देखते ही उस के मन में पाप घर कर गया और वह उस के अकेले होने का इंतजार करने लगा.

नीरजा जैसे ही अपने मांबाप से अलग हुई, उस ने उसे अपने विश्वास में ले कर टौफी दिलाने का लालच दिया. वह बच्ची को चुपचाप वहां मौजूद लोगों की नजरों से दूर ले गया. बाहर जा कर एक दुकान से उस ने टौफी खरीदी. इस के बाद वह उस मासूम को बहलाफुसला कर जंगल की तरफ ले गया. उसी जंगल के पास उसे प्रेमपाल और जूनियर मसीह मिल गए. उस वक्त वे दोनों भी नशे में थे. वे समझ गए कि अख्तर बच्ची को क्यों लाया है. वे उस के साथ चल दिए. तब तक मासूम नीरजा रोने लगी थी. उन शैतानों ने उस का मुंह बंद कर दिया और उसे उठा कर जंगल में ले गए. वहां अख्तर ने हैवानियत दिखाते हुए मासूम बच्ची का मुंह बंद कर के उस के साथ दुराचार किया और उसे वैसे ही छोड़ कर साथियों के साथ चला आया. घटना को अंजाम देने के बाद तीनों अपने कमरे पर लौट आए.

अगले दिन बच्ची की खोजबीन को देख कर अख्तर डर की वजह से पहले दिल्ली, फिर गुड़गांव और बाद में लुधियाना चला गया. अख्तर के दिल्ली चले जाने की बात प्रेमपाल और मसीह को मालूम थी. लेकिन फंसने के डर से दोनों ने अपना मुंह बंद रखा और अपनेअपने कमरे से गायब रहे, ताकि पुलिस उन से किसी तरह की पूछताछ न कर सके. बाद में प्रेमपाल और जूनियर मसीह पुलिस के हत्थे चढ़ गए थे. इस केस में पुलिस ने साक्ष्य छिपाने व आरोपी को बचाने के जुर्म में प्रेमपाल व जूनियर मसीह को भी गिरफ्तार कर लिया. मूलरूप से पीलीभीत का रहने वाला प्रेमपाल घटना के समय काठगोदाम में रह रहा था. जबकि जूनियर मसीह कंटोपा, रुद्रपुर का निवासी था.

केस के खुलने के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को बी.डी. पांडे अस्पताल ले जा कर उन का मेडिकल कराया. उन की मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि तीनों ही चरस और शराब पीने के आदी थे. इस घटना को अंजाम देते समय तीनों नशे में थे. मासूम नीरजा के साथ ददिंरगी की हदें पार करने के बाद उसे तड़पता छोड़ कर तीनों वापस चले आए थे. अगले दिन सारे शहर में पुलिस की खोजबीन को देखते हुए मुख्य आरोपी अख्तर दिल्ली भाग गया था और उस ने अपना मोबाइल बंद कर लिया था, ताकि पुलिस उस का पीछा न कर सके.

कड़ी सुरक्षा के बीच अभियुक्तों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें गुप्त रूप से जिला एवं सत्र न्यायाधीश एन.एस. धानिक की अदालत में पेश किया. उसी वक्त महिला संगठन ‘आशा’ की कुछ महिलाएं अदालत में पहुंच गईं. बी.डी. पांडे अस्पताल में जुटीं आशा संगठन की महिलाओं में आरोपियों के प्रति इतना गुस्सा था कि वे उन्हें एक बार जूता मारना चाहती थीं. वे मांग कर रही थीं कि आरोपियों को एक बार जूता मारने दिया जाए तो उन्हें तसल्ली मिल जाएगी. महिलाओं के आक्रोश को देखते हुए पुलिस ने किसी तरह उन्हें झांसा दिया और आरोपियों को अस्पताल के पीछे के रास्ते से निकाल कर अदालत में पेश किया.

तीनों आरोपियों पर भादंवि की धारा 376, 302, 363, 201 और पोक्सो एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे के अवलोकन के बाद जिला जज ने उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के आदेश दिए. इस मामले की विवेचना कर रहे एसआई दिनेश पंत ने बताया कि अदालत से आरोपियों की डीएनए जांच के लिए आवेदन किया गया है. आदेश मिलने के बाद डीएनए जांच कराई गई. जांच से साबित हो गया है कि दुराचार सिर्फ अख्तर ने ही किया था. प्रेमपाल और जूनियर मसीह ने मदद की थी. इस बीच पुलिस ने वारदात के दौरान पहने गए आरोपियों के कपड़े भी बरामद कर लिए थे. जिन्हें जिला जज के अवलोकन के बाद सील कर दिया गया.

पिछले कुछ समय से समाज में यौन अपराधों में दरिंदगी बढ़ती जा रही है. मासूम बच्चियों के मामले में तो अपराधी हैवानियत की सारी हदों को पार कर जाते हैं. ऐसे दरिंदो को जब तक त्वरित रूप से सख्त से सख्त सजा नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना संभव नहीं है. कानून को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए और पुलिस को भी. Crime Story

—कहानी में नीरजा, उस के पिता और मामा के नाम बदल दिए गए हैं.

 

Delhi News : स्टिंग औपरेशन के जरिए ब्लैकमेलिंग

Delhi News : रामशरण और उससके साथियों ने स्टिंग औपरेशन के जरिए एक पैथलैब संचालक से 40 लाख रुपए ऐंठने में तो सफलता पा ली लेकिन डील के बाकी 60 लाख रुपए पाने के लिए उन्होंने दबाव डाला तो वे पुलिस के शिकंजे में ऐसे फंसे कि…

पश्चिमी दिल्ली के शकूरबस्ती इलाके के रहने वाले डी.के. रोहिल्ला के दोनों बेटे डाक्टर बन गए तो उन की खुशी का ठिकाना न रहा. एक बेटा डा. अतुल रोहिल्ला ने डेंटल सर्जन बनने के बाद शकूरपुर में अपना क्लीनिक खोल लिया. जबकि दूसरा बेटा डा. पंकज रोहिल्ला बालरोग विशेषज्ञ हो गया. दोनों के ही क्लीनिक अच्छे चल रहे थे. इस के अलावा इन्होंने वेस्ट पंजाबीबाग के लाल क्वार्टर्स में हेल्थकेयर मंत्र के नाम से एक पैथोलौजी लैब भी खोल ली. दोनों भाई अपने क्लीनिक के अलावा लैब पर भी समय देते हैं. इन की गैरमौजूदगी में पिता डी.के. रोहिल्ला भी पैथोलौजी लैब पर बैठते थे.

3 अक्तूबर, 2014 को डा. अतुल रोहिल्ला अपने भाई डा. पंकज रोहिल्ला के साथ दिल्ली से बाहर गए हुए थे. उन की गैरमौजूदगी में पैथोलौजी लैब पर डी.के. रोहिल्ला बैठे थे. तभी उन के पास एक महिला एक युवक के साथ आई. उस महिला की उम्र करीब 30-35 साल थी. महिला ने बताया कि उस के 5 बेटियां हैं और अब फिर से गर्भवती है. उस ने बताया कि वह अपने गर्भ में पल रहे शिशु के बारे में जानना चाहती है कि उस का सही विकास हो रहा है या नहीं. उन की लैब में अल्ट्रासाउंड और एक्सरे करने की सुविधा नहीं थी इसलिए डी.के. रोहिल्ला ने उस महिला से कहा,

‘‘मैडम, यहां पर केवल खून की जांच होती है. बेहतर यही होगा कि आप किसी योग्य गायनेकोलौजिस्ट को दिखा कर कहीं अल्ट्रासाउंड कराएं. उस के बाद ही बच्चे के बारे में सही जानकारी मिल सकेगी.’’

‘‘कौन सी लैब सही है, कौन सी गलत, यह हमें तो पता नहीं है. आप किसी सही लैब के बारे में बता दें तो मेहरबानी होगी जिस से मैं गर्भ में पल रहे शिशु की जांच करा सकूं.’’ वह महिला बोली. डी.के. रोहिल्ला को उस महिला पर दया आ गई. उन्होंने उसे कीर्तिनगर स्थित एक अल्ट्रासाउंड क्लीनिक का पता बताते हुए वहां भेज दिया. डी.के. रोहिल्ला की पैथोलौजी लैब पर अकसर इस तरह के लोग आते रहते थे, जिस टेस्ट की सुविधा उन के यहां उपलब्ध नहीं होती थी, उसे वह कहीं और से कराने को कह देते थे.

अगले दिन भी डी.के. रोहिल्ला ही अपनी पैथोलौजी लैब पर बैठे थे. शाम साढ़े 5 बजे के करीब उन की लैब में 5-6 युवक आए. उन के गले में एक टीवी न्यूज चैनल के आईडी कार्ड लटके हुए थे. उन युवकों के साथ वह महिला भी थी, जो एक दिन पहले उन के यहां अपने गर्भस्थ शिशु की जांच कराने आई थी. उन युवकों के हावभाव देख कर डी.के. रोहिल्ला चौंक गए. लैब में घुसते ही उन युवकों ने सब से पहले वहां काम करने वाले स्टाफ को यह कहते हुए जबरदस्ती बाहर कर दिया कि उन्हें रोहिल्लाजी से कोई जरूरी बात करनी है. डी.के. रोहिल्ला ने उन युवकों से कहा भी कि उन्हें जो भी बात करनी है, स्टाफ के सामने भी कर सकते हैं. लेकिन उन युवकों ने उन की एक नहीं सुनी. कह दिया कि वे उन से अकेले में ही बात करेंगे.

स्टाफ को बाहर निकालने के बाद उन युवकों में से एक ने डी.के. रोहिल्ला से कहा, ‘‘आप को पता है कि सरकार ने गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग परीक्षण करने पर बैन लगा रखा है, इस के बावजूद भी आप यह काम कर रहे हैं.’’

‘‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं. हमारे यहां तो अल्ट्रासाउंड मशीन तक नहीं है तो हम यह बात कैसे बता सकते हैं. जरूर ही आप को भूल हुई है.’’ 59 वर्षीय डी.के. रोहिल्ला घबरा कर बोले.

‘‘देखिए, आप हमें बेवकूफ नहीं बना सकते. यह लेडी कल आप के ही पास आई थी न?’’ दूसरा युवक बोला.

‘‘हां.’’

‘‘इस लेडी से आप ने गर्भस्थ शिशु के लिंग परीक्षण के बारे में जो बातें कही थीं, वह हमारे पास रिकौर्ड हैं. हम ने आप का स्टिंग औपरेशन कर लिया है. उन बातों से पता चलता है कि आप लंबे समय से इस गैरकानूनी धंधे में लगे हुए हैं.’’

‘‘जब मैं ने इस तरह की कोई बात कही नहीं है तो रिकौर्ड कैसे कर लिया?’’

‘‘यदि आप अपनी गलती नहीं मान रहे तो कोई बात नहीं, हम इसे अपने चैनल पर चलाएंगे. तभी तुम्हारे गोरखधंधे को लोग जानेंगे. पता तब चलेगा जब लैब चलाने वाले तुम सभी लोग जेल जाओगे और यह लैब भी सील होगी.’’

इतना सुनते ही डी.के. रोहिल्ला घबरा गए. कहीं इन लोगों ने उन की आवाज से मिलतीजुलती किसी और की आवाज तो रिकौर्ड नहीं कर ली. वह इस बात को अच्छी तरह से समझ रहे थे कि टीवी चैनल पर न्यूज चलते ही उन की लैब सील हो जाएगी. भले ही वह कितनी सफाई देते रहें, पुलिस उन की एक नहीं सुनेगी. जब तक रिकौर्डिड आवाज की जांच रिपोर्ट कोर्ट में आएगी, तब तक उन का काफी नुकसान हो जाएगा और बदनामी होगी अलग से. रोहिल्ला अब यही सोच रहे थे कि वह ऐसी हालत में क्या करें. तभी एक युवक आहिस्ता से बोला, ‘‘ये टेप चैनल पर न चले, इस का एक ही रास्ता है कि आप को एक करोड़ रुपए खर्च करने पड़ेंगे.’’

‘‘एक करोड़ऽऽ’’ रोहिल्ला चौंकते हुए बोले.

‘‘हां, यह कोई ज्यादा नहीं हैं. जानते हो, हमें भी इस में से अपने सीनियर्स को देना होगा, तभी यह न्यूज रुक सकती है. इसलिए गनीमत इसी में है कि तुम जल्द से जल्द पैसों का इंतजाम कर दो, वरना…’’

मामला बड़ा ही पेचीदा होता जा रहा था. रोहिल्ला के दोनों बेटे दिल्ली से बाहर थे. उन की गैरमौजूदगी में वह कोई बड़ा फैसला नहीं लेना चाहते थे. उन्होंने उन युवकों को बताया भी कि बेटे बाहर हैं. जब वे दिल्ली लौट आएं तो उन की मौजूदगी में ही बात करना सही रहेगा. इस पर तीसरे युवक ने कहा, ‘‘हम इस खबर को कल से रोके हुए हैं. इसे अब और ज्यादा रोकना संभव नहीं है. अब आप हमें सीधे बता दें कि आप को हमारी डील मंजूर है या नहीं.’’

‘‘आप लोग 5 मिनट रुकिए. मैं इस बारे में अपने बेटे से बात कर लूं.’’ कह कर रोहिल्ला ने जेब से मोबाइल फोन निकाला और उस पर कोई नंबर मिलाते हुए एक कमरे में चले गए. उन्होंने बेटे डा. अतुल रोहिल्ला को फोन मिलाया था. उन्होंने अतुल को पूरे मामले से अवगत करा दिया. स्टिंग औपरेशन की बात सुन कर डा. अतुल भी परेशान हो गए. उन के पिता इस लफड़े में कैसे फंस गए, यह जानने से पहले उन्हें यह जरूरी हो गया कि इस मुसीबत से बाहर कैसे निकला जाए. डा. अतुल किसी भी तरह के पुलिस के लफड़े से बचना चाहते थे. काफी सोचनेसमझने के बाद उन्होंने अपने पिता से कह दिया कि किसी भी तरह वह इस मामले को निपटा लें.

डी.के. रोहिल्ला ने उन युवकों से मामले को रफादफा करने को कहा लेकिन वे एक करोड़ रुपए से कम पर तैयार नहीं हुए. तब रोहिल्ला ने कहा कि इतनी बड़ी रकम अभी उन के पास नहीं है. जैसेतैसे कर के वह उन्हें 40 लाख रुपए दे सकते हैं. बाकी पैसे बाद में दे देंगे. 40 लाख रुपए भी रोहिल्ला के घर में थोड़े ही रखे थे, जो निकाल कर उन्हें दे दें. उन्होंने अपने परिचितों, रिश्तेदारों को फोन कर के जैसेतैसे कर के इतने रुपए इकट्ठे कर के उन युवकों को दे दिए. 40 लाख रुपए ले कर वे रिपोर्टर वहां से चले गए. जाते समय उन्होंने रोहिल्ला से कह दिया कि बाकी के पैसों का इंतजाम भी वे जल्दी से कर लें.

उन युवकों के जाने के बाद डी.के. रोहिल्ला को इस बात की तसल्ली हुई कि फिलहाल स्टिंग औपरेशन की न्यूज वे लोग चैनल पर तो नहीं दिखाएंगे, लेकिन दूसरी ओर इस बात की फिक्र भी हो रही थी कि बाकी के 60 लाख रुपए का इंतजाम कहां से होगा. 5 अक्तूबर, 2014 की सुबह उन के दोनों बेटे डा. अतुल रोहिल्ला और डा. पंकज रोहिल्ला घर लौटे तो उन्होंने पूरी बात विस्तार से बताई. जो हो चुका था उस पर अफसोस करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था. अब उन्होंने यह तय कर लिया कि उन की लैब पर जिन टेस्टों की सुविधा नहीं है, पेशेंट से उस के लिए स्पष्ट मना कर देंगे. उन टेस्टों को वह पेशेंट कहां से कराता है, यह उस की जिम्मेदारी है. वे उसे इस बारे में कोई सलाह भी नहीं देंगे. इस घटना से सीख ले कर डाक्टर बंधुओं ने क्लीनिकों पर बैठना शुरू कर दिया.

उधर जो तथाकथित पत्रकार डी.के. रोहिल्ला से 40 लाख रुपए ले गए थे, उन्होंने बाकी के 60 लाख रुपए लेने के लिए रोहिल्ला को फोन करना शुरू कर दिया. 60 लाख रुपए कोई मामूली रकम तो होती नहीं. उन्होंने जैसेतैसे कर के 40 लाख रुपए इकट्ठा कर उन्हें दिए थे. बकाया के 60 लाख रुपए देने के लिए उन के पास बारबार फोन आने लगे. पहले तो रोहिल्ला उन्हें टालते रहे, लेकिन जब वे लोग ज्यादा ही परेशान करने लगे तो रोहिल्ला ने इतने रुपए देने में असमर्थता जता दी. तब उन तथाकथित पत्रकारों ने उन्हें धमकाया कि अगर बाकी के पैसे नहीं दिए तो स्टिंग वाली टेप को न्यूज चैनल पर चलवा देंगे.

इस तरह के धमकी भरे फोन उन के पास अकसर आने लगे, जिस से परिवार के लोग परेशान रहने लगे. 40 लाख रुपए देने के बावजूद भी उन का उन तथाकथित पत्रकारों से पीछा नहीं छूट रहा था. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसी हालत में वे क्या करें. तभी उन के एक दोस्त ने उन्हें इस की शिकायत पुलिस से करने की सलाह दी. तब 21 अक्तूबर, 2014 को डा. अतुल रोहिल्ला अपने पिता को ले कर मादीपुर पुलिस चौकी चले गए. वहां मौजूद एसआई अनूप को उन्होंने पूरी कहानी बता दी. जिन फोन नंबरों से रोहिल्ला के पास पैसे मांगने की काल आई थीं, वह फोन नंबर भी उन्होंने पुलिस को दे दिए.

मादीपुर पुलिस चौकी थाना पंजाबीबाग के तहत आती है, इसलिए डा. अतुल रोहिल्ला की तहरीर पर पंजाबीबाग में पैसे मांगने वालों के खिलाफ भादंवि की धारा 342, 384, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली गई. इस के बाद पंजाबीबाग थाना पुलिस अभियुक्तों की तलाश में जुट गई. अभियुक्तों ने अपने फोन नंबर बंद कर लिए थे इसलिए पुलिस को उन के ठिकानों की जानकारी नहीं मिल पा रही थी. उधर दिल्ली पुलिस की दक्षिणपूर्वी रेंज की क्राइम ब्रांच यूनिट को खास मुखबिर से सूचना मिली कि दिल्ली और इस से सटे शहरों में एक ऐसा गिरोह सक्रिय है, जो स्टिंग औपरेशन के जरिए लोगों से मोटी रकम की उगाही कर रहा है. उस गिरोह में कुछ पत्रकार भी शामिल हैं.

सूचना महत्त्वपूर्ण थी, इसलिए डीसीपी भीष्म सिंह ने एसीपी के.पी.एस. मल्होत्रा के निर्देशन में एक टीम बनाई. टीम में इंसपेक्टर सुनील कुमार, सबइंसपेक्टर रविंद्र तेवतिया, मनदीप, हेडकांस्टेबल राकेश रावत, विजय प्रताप, असलूप खान, कांस्टेबल मोहित, अशोक, उदय, सुनील पांडे, मनोज आदि को शामिल किया गया. पुलिस टीम को ब्लैकमेल करने वाले उन कथित पत्रकारों के फोन नंबर भी मिल गए थे. उन नंबरों को पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था, लेकिन वह फोन नंबर बंद थे. टीम उन नंबरों की काल डिटेल्स को खंगालने लगी.

काल डिटेल्स के जरिए पुलिस टीम को कुछ सुराग हाथ लग गए. उन सुरागों के जरिए 28 अक्तूबर को धनसिंह और रामशरण नाम के 2 युवकों को दिल्ली के राजेंद्रनगर स्थित सर गंगाराम अस्पताल के पास से हिरासत में ले लिया. क्राइम ब्रांच औफिस में जब इन दोनों युवकों से पूछताछ की तो उन्होंने पंजाबीबाग क्षेत्र के डी.के. रोहिल्ला से 40 लाख रुपए ऐंठने की बात कुबूल कर ली. उन से पूछताछ के बाद पुलिस को पता चला कि उन के गैंग में और लोग भी शामिल हैं. उन के साथियों के नामपते मालूम करने के बाद एक पुलिस टीम उन के ठिकानों पर भेज दी. तत्परता दिखाते हुए पुलिस ने उन के साथी जय कोचर और पुष्पा को भी गिरफ्तार कर लिया.

पता चला कि रामशरण और धनसिंह एक टीवी न्यूज चैनल से जुडे़ थे. एक राष्ट्रीय न्यूज चैनल से जुड़े होने के बावजूद भी वे ब्लैकमेलिंग जैसे धंधे से कैसे जुड़े, इस की एक रोचक कहानी सामने आई. 32 वर्षीय रामशरण मूलरूप से बिहार के सीतामढ़ी जिले का रहने वाला था. वह 12 साल की उम्र में किसी परिचित के साथ दिल्ली आया था. परिचित ने एक दुकान पर उस की नौकरी लगवा दी. बाद में उस ने करोलबाग के एक ब्यूटीपार्लर में नौकरी कर ली. फिर वह करोलबाग में गऊशाला रोड पर किराए पर रहने लगा. पिछले दशक से जिस तरह टीवी न्यूज चैनलों की बाढ़ सी आई है, उसी तरह युवाओं का रुझान भी टीवी पत्रकारिता की तरफ बढ़ा है.

रामशरण भी टीवी पत्रकार बनना चाहता था, लेकिन उस के सामने समस्या यह थी कि वह ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था. वह बनठन कर रहता था. इसलिए उस के बातचीत और पहनावे से नहीं लगता था कि वह कम पढ़ालिखा है. कम पढ़ालिखा होने के बावजूद भी उस के ऊपर पत्रकार बनने की सनक सवार थी. इस बारे में उस ने अपने एक परिचित से बात की. परिचित की एकदो टीवी पत्रकारों से बातचीत थी.परिचित के साथ रामशरण नोएडा के फिल्म सिटी में स्थित एक टीवी न्यूज चैनल पहुंच गया. वहां उस ने खुद को दिल्ली के मध्य जिला से संवाददाता बनाने की गुजारिश की. बताया जाता है कि वहां उस की बात बन गई. उसे स्ट्रिंगर के रूप में काम मिल गया.

स्टिंगर वह होता है, जो अपने साधनों से न्यूज आदि कवरेज कर के न्यूज चैनल के औफिस भेजता है. न्यूज के हिसाब से उस स्ट्रिंगर को चैनल की तरफ से पेमेंट किया जाता है यानी वह न्यूज चैनल का स्थाई कर्मचारी नहीं होता. न्यूज चैनल से जुड़ कर रामशरण बहुत खुश हुआ. बताया जाता है कि उस ने कई लोगों के स्टिंग औपरेशन भी किए. रामशरण का एक दोस्त था धनसिंह, जो उत्तराखंड के गढ़वाल का रहने वाला था. 1999 में वह दिल्ली आया था. बाद में वह भी उस के साथ सहायक के रूप में काम करने लगा. दोनों लोग कम समय में ज्यादा पैसे कमाना चाहते थे. उन के दिमाग में स्टिंग औपरेशन के जरिए लोगों से पैसे ऐंठने की बात आई.

उन के पास स्टिंग औपरेशन करने के लिए कैमरे तो थे ही, इसलिए अब वह ऐसे लोगों को तलाशने लगे, जिन से रकम हासिल की जा सके. बताया जाता है कि दोनों ने मिल कर कई छोटेमोटे स्टिंग औपरेशन किए, जिस से उन की हिम्मत बढ़ी. करीब 3-4 महीने पहले इन दोनों के संपर्क में जय कोचर नाम का युवक आया. जय कोचर दिल्ली के रोहिणी क्षेत्र में रहता था. उसे भी अपने साथ मिला कर वह अपने काम को अंजाम देते रहे. छोटेमोटे स्टिंग औपरेशन से उन्हें मोटी कमाई नहीं हो पाती थी. लिहाजा अब वह ऐसी आसामी तलाशने लगे, जहां से मोटी रकम मिल सके.

अब उन्होंने क्लीनिक और पैथोलौजी लैब को निशाना बनाने का प्लान बनाया. इस काम में उन्होंने दिल्ली के किशनगंज में रहने वाले छोटेलाल की पत्नी पुष्पा को मिला लिया. 3 बच्चों की मां पुष्पा का पेट किसी वजह से बढ़ गया. फूला हुआ पेट देख कर लगता कि जैसे वह गर्भवती हो. पुष्पा किसी नर्सिंगहोम, पैथलैब में जाती और खुद को गर्भवती बताते हुए भ्रूण के लिंग परीक्षण की बात करती थी. उस के साथ रामशरण भी जाता था, वह खुद को पुष्पा का पति बताता था. लिंग परीक्षण से संबंधित होने वाली बात को रामशरण अपने खुफिया कैमरे में रिकौर्ड कर लेता था. बाद में उसी रिकौर्डिंग के जरिए वे लोग नर्सिंगहोम, पैथलैब संचालक से मोटी रकम वसूलते. उस रकम में से 2 हजार रुपए वे पुष्पा को दे देते थे.

छोटे से काम के बदले 2 हजार रुपए पा कर पुष्पा भी खुश रहती थी. मगर उसे यह पता नहीं था कि इस मामूली रकम के बदले वह क्या अपराध कर रही है. रिसर्च के दौरान उन्हें पता लगा कि पंजाबीबाग के लाल क्वार्टर्स में डा. रोहिल्ला की हेल्थकेयर मंत्र के नाम से पैथोलौजी लैब है. अगर वहां स्टिंग औपरेशन किया जाए तो मोटी रकम हासिल हो सकती है. पूरी योजना बना कर 3 अक्तूबर, 2014 को पुष्पा उक्त पैथोलौजी लैब पहुंची. उस समय वहां डा. पंकज रोहिल्ला के पिता डी.के. रोहिल्ला बैठे थे. पुष्पा ने उन्हें बताया कि उस के 5 बेटियां हैं. वह फिर से गर्भवती है. अब वह गर्भ में पल रहे शिशु की जांच कराना चाहती है. रोहिल्ला की लैब में अल्ट्रासाउंड करने की सुविधा नहीं थी.

उन्होंने उसे योग्य गायनेकोलौजिस्ट के पास जाने की सलाह दी. इस दौरान वह उन से शिशु के लिंग परीक्षण के संबंध में बात करती रही. रामशरण उस के पास खड़ा पूरी बात को रिकौर्ड करता रहा. उसी रिकौर्डिड बातचीत के जरिए उन लोगों ने डी.के. रोहिल्ला से एक करोड़ रुपए की मांग की. उन युवकों के गले में पड़े आईडी कार्ड देख कर डी.के. रोहिल्ला समझ गए थे कि वे लोग उस स्टिंग औपरेशन को न्यूज चैनल पर चलवा देंगे तो उन के खिलाफ पुलिस काररवाई तो होगी ही साथ ही लैब भी सील हो जाएगी इसलिए अपने बेटों से बात कर के उन्होंने उन युवकों को 40 लाख रुपए दे दिए थे.

रामशरण और उस के साथियों को विश्वास था कि जिस तरह से रोहिल्ला ने 40 लाख रुपए दिए हैं, उसी तरह वह बाकी 60 लाख भी दे देंगे. 60 लाख वसूलने के लिए ही वे लोग डी.के. रोहिल्ला और उन के बेटों को बारबार धमकी भरे फोन कर रहे थे. लेकिन इस से पहले कि वह उन से 60 लाख रुपए वसूल पाते, पुलिस के हत्थे चढ़ गए. रोहिल्ला से वसूली गई रकम में से जय कोचर को जो हिस्सा मिला था, उसी से उस ने नई स्विफ्ट कार खरीदी थी. पुलिस ने उस से वह कार भी बरामद कर ली. इस के अलावा पुलिस ने उन के कब्जे से 70 हजार रुपए नकद, स्टिंग औपरेशन में प्रयोग होने वाले कैमरे, 7 मोबाइल फोन आदि बरामद किए.

चूंकि इन के खिलाफ थाना पंजाबीबाग में रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए एसआई रविंद्र तेवतिया ने 29 अक्तूबर को चारों अभियुक्तों को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया. उसी समय पंजाबीबाग थाना पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. अभियुक्तों ने पुलिस को बताया कि वे अब तक लगभग 50 स्टिंग औपरेशन कर चुके हैं. पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें तीसहजारी कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है. Delhi News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा का नाटकीय रूपांतरण किया गया है.

 

Crime Story : खून से सनी नशे की लकीर

Crime Story : मनमोहन गली नंबर-24, बस्ती टोकावली, फिरोजपुर निवासी सुभाष ठाकुर का पुत्र था. मनमोहन की शादी 4 साल पहले बी1-5/6, गली नंबर-3, जनता कालोनी, जालंधर में रहने वाले चानन सिंह राजपूत की बेटी पूजा के साथ हुई थी. दोनों राजपूत परिवारों से थे, दोनों के बीच आपसी प्रेमप्यार था.

पूजा के पिता चानन सिंह आर्मी में थे. उन की 2 ही संतानें थीं, बेटा विनोद और बेटी पूजा. दोनों ही शादीशुदा थे और अपनेअपने परिवारों के साथ खुश थे. पूजा की शादी चानन सिंह ने 4 साल पहले मनमोहन के साथ की थी. पूजा बीए पास और अच्छे संस्कारों वाली समझदार लड़की थी. ससुराल आ कर उस ने पति ही नहीं, बल्कि सब का मन मोह लिया था. मनमोहन ने एमबीए कर रखा था. कोई अच्छी सरकारी नौकरी न मिलने के कारण वह हिंदुस्तान हाइड्रोलिक कंपनी में नौकरी कर रहा था.

मनमोहन की मां के निधन के बाद वह और उस के पिता जब काम पर चले जाते थे, तो पूजा दिन भर घर में अकेली रहती थी. घर का मुख्यद्वार पूरे दिन बंद रहता था, क्योंकि उन के यहां किसी का आनाजाना नहीं था. शाम को मनमोहन या उस के पिता के घर लौटने पर ही मुख्यद्वार खोला जाता था. लेकिन उस दिन मनमोहन घर लौटा तो ऐसा नहीं हुआ. मनमोहन के 2-3 बार डोरबैल बजाने के बाद भीतर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने दरवाजा थपथपाया तो दरवाजा हाथ रखते ही खुल गया.

यह देख कर मनमोहन को और अधिक आश्चर्य हुआ. असमंजस की स्थिति में  अपनी पत्नी पूजा को आवाज देते हुए उस ने घर के भीतर जा कर देखा तो कमरे का दृश्य देख उस के होश उड़ गए. भीतर पूरा सामान बिखरा पड़ा था. देख कर ऐसा लग रहा था जैसे कमरे में 2 लोगों का आपस में जबरदस्त संघर्ष हुआ हो.b घर के सभी कमरे खुले हुए थे और उन का सामान बिखरा पड़ा था. घर में ऐसा क्या हुआ, यह जानने के लिए वह पूजा को लगातार आवाज देता रहा, पर पूजा कहीं नहीं दिखी. पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था. उस के काम से लौटने पर पूजा होंठों पर मुसकान लिए दरवाजा खोलती थी.

मनमोहन किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठा. पागलों की तरह पूजा को आवाज देते हुए वह घर से बाहर निकल आया. उस की पड़ोसन ने बताया कि दोपहर को उन के घर कोई रिश्तेदार आया था और पूजा ने उस के लिए दरवाजा खोला था. आने वाला कौन था, यह वह नहीं बता सकी. हां, उस ने इतना जरूर बताया कि शाम को उसी ने दरवाजा अंदर की ओर धकेला था, क्योंकि कुत्ते घर के अंदर जाने की कोशिश कर रहे थे. पड़ोसन की बात सुन कर मनमोहन को चिंता हुई. उस की समझ में यह बात नहीं आ रही थी कि आखिर ऐसा कौन रिश्तेदार था, जिस के घर आने के बाद यह हालत हुई. इस से भी बड़ा सवाल यह था कि पूजा कहां गई?

उस की समझ में यह भी नहीं आ रहा था कि घर बैठ कर पूजा का इंतजार करे या उस की तलाश में कहीं जाए. लेकिन जाए तो कहां जाए. फिर भी मनमोहन ने पड़ोसियों के साथ पूजा की तलाश की, उसे अस्पतालों में भी देखा. पर पूजा का पता नहीं चला. मनमोहन बदहवासी में कुछ सोचने का प्रयास कर रहा था कि तभी उस के पिता सुभाष भी घर पहुंच गए. वह पिछले एक सप्ताह से संगत के लिए हिमाचल स्थित बाबा बालक नाथ के डेरे पर गए हुए थे.

बेटे को यूं बदहवास देख और पूजा के गायब होने की बात सुन कर उन्हें भी चिंता होने लगी. इस के बाद पूरे मोहल्ले में पूजा के घर से लापता होने की बात फैल गई. सांत्वना और सहयोग के लिए पूरा मोहल्ला उन के घर आ जुटा था. अचानक एक पड़ोसी की नजर मनमोहन के कमरे में पड़े पर बैड पर गई तो वह चौंका. बंद बैड पर गद्दे के नीचे से किसी औरत की चोटी के बाल बाहर झांक रहे थे. उस के बताने पर वहां मौजूद सभी लोगों ने बैड को देखा.

गद्दे को उठा कर बैड का बौक्स खोला गया तो बौक्स के भीतर का दृश्य देख सभी लोगों के मुंह से चीख निकल गई. बैड के भीतर पूजा की लाश पड़ी थी. एकाएक किसी को भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. उस समय मनमोहन की जो हालत थी, उस का अनुमान लगाना मुश्किल था. वह बैड पकड़ कर वहीं फर्श पर बैठ गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि पूजा की हत्या कर के लाश बैड में किस ने छिपाई. काफी देर बाद लोगों के सांत्वना देने पर जब वह सामान्य हुआ. घर के अंदर के किसी भी सामान को छुए बिना सब से पहले उस ने इस घटना की सूचना थाना कैंट, फिरोजपुर पुलिस को दी. साथ ही उस ने पूजा की हत्या की खबर अपने ससुर चानन सिंह को भी दे दी. यह घटना 27 नवंबर, 2018 की है.

पूजा की हत्या की खबर मिलते ही उस के मातापिता वहां पहुंच गए. पुलिस ने क्राइम टीम सहित वहां पहुंच कर अपनी काररवाई शुरू कर दी. पूरे घर को सील कर दिया गया. फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट ने जगहजगह से अंगुलियों के निशान उठाए. सबूतों की तलाश में घर की बारीकी से तलाशी ली गई. थाना कैंट एसएचओ इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने बड़ी बारीकी से लाश का मुआयना किया. पूजा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. उस के गले पर दबाव के निशान स्पष्ट नजर आ रहे थे.

इस घटना की सूचना मिलते ही एसपी (डी) बलजीत सिंह सिद्धू, डीएसपी जसपाल सिंह ढिल्लों, सीआईए प्रभारी तरलोचन सिंह ने भी घटनास्थल पर पहुंच कर मुआयना किया. क्राइम टीम का काम खत्म हो गया तो इंसपेक्टर जसबीर सिंह पूजा के पिता चानन सिंह को थाने ले गए. वहां उन के बयान पर अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 के तहत पूजा की हत्या का मुकदमा दर्ज किया गया. इस के बाद पूजा की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया.

शुरुआती जांच में इंसपेक्टर जसबीर सिंह को मनमोहन के बयानों से पता चला कि उस के घर में किसी बाहरी व्यक्ति का आनाजाना बिलकुल नहीं था. रिश्तेदारों का आनाजाना भी न के बराबर था. इस परिवार की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. बापबेटा अपने काम से काम रखने वाले थे. ऐसे में शहर के व्यस्ततम इलाके में दिनदहाड़े किसी के घर में घुस कर उस की हत्या करने जैसी बात न तो पुलिस को हजम हो रही थी और न ही मोहल्ले वालों को.

इंसपेक्टर जसबीर को एक बात शुरू से ही खटक रही थी कि यह काम घर के ही किसी आदमी का हो सकता है. किसी बाहरी व्यक्ति की संभावना कम नजर आ रही थी. बहरहाल, पुलिस ने मनमोहन को शक के दायरे में रख कर जांच शुरू कर दी. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, घटना के समय मनमोहन और उस के पिता सुभाष भले ही अपने घर के आसपास नहीं थे, पर यह काम पैसे दे कर किसी किराए के हत्यारे से भी करवा सकते थे.

घटना वाले दिन मनमोहन और सुभाष घटनास्थल से दूर थे. उन के फोन रिकौर्ड से भी पुलिस को कुछ हाथ नहीं लगा. मृतका पूजा के फोन रिकौर्ड भी चैक किए गए, सब बेदाग थे. पोस्टमार्टम के अनुसार पूजा की हत्या गला घोंट कर की गई थी. पोस्टमार्टम के बाद उस की लाश घर वालों के हवाले कर दी गई. उसी शाम उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

पूजा की हत्या की खबर शहर भर में चर्चा का विषय बन गई थी. एसपी साहब खुद पलपल की रिपोर्ट ले रहे थे. लेकिन अभी तक पुलिस के हाथ खाली थे. पूजा का पति मनमोहन शुरू से ही शक के दायरे में था, इसलिए पुलिस ने मनमोहन और उस के पिता से कई बार अलगअलग घुमाफिरा कर पूछताछ की, लेकिन वे लोग निर्दोष लग रहे थे. पूजा के पति पर शक करने की वजह यह थी कि पूजा संतानहीन थी. शादी के 4 साल बाद भी उस की गोद नहीं भरी थी. पुलिस सोच रही थी कि कहीं संतानहीन पत्नी से पीछा छुड़ाने के लिए मनमोहन ने ही तो पूजा की हत्या नहीं कर दी.

पुलिस ने मनमोहन के अलावा उस के खास दोस्तों और करीबी रिश्तेदारों से भी पूछताछ की. लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इस केस पर जिले के स्पैशल स्टाफ के अलावा और भी कई टीमें काम कर रही थीं. पुलिस के मुखबिर इस मामले में कोई खास जानकारी नहीं जुटा पाए थे. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने इस मामले को लूटपाट के नजरिए से भी देखा और इलाके के छोटेबड़े सभी हिस्ट्रीशीटरों से ले कर चोरों, जेबतराशों और उठाईगीरों को भी राउंडअप किया. लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला. पूजा की हत्या हुए एक महीने से ऊपर का वक्त गुजर चुका था. धीरेधीरे यह केस ठंडे बस्ते की ओर बढ़ने लगा था.

हालांकि इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने अभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा था. यह अलग बात है कि उन के तमाम प्रयासों के बाद भी कोई ऐसा सूत्र हाथ नहीं लगा था, जिस से इस मामले की कोई भी कड़ी जुड़ती नजर आती. लोग भी धीरेधीरे इस घटना को भूलने लगे थे. 2 महीने से भी ज्यादा गुजर चुके थे, तभी एक दिन एक ऐसा सूत्र खुद सामने से चल कर आया कि जसबीर सिंह की बांछें खिल गईं. इस सूत्र ने इस केस को एक नई दिशा दे दी थी. इस घटना के लगभग 2 महीने बाद मनमोहन घर की अलमारी के लौकर में कोई जरूरी कागजात ढूंढ रहा था, तभी अचानक उसे झटका सा लगा. अलमारी के लौकर में रखे कीमती जेवरात गायब थे.

मनमोहन ने इस बात की खबर इंसपेक्टर जसबीर सिंह को दी. जेवरात कैसे गायब हुए, यह तो वह ठीक से नहीं बता पाया, पर यह बात उस ने दावे के साथ कही कि जेवरात पूजा की हत्या से पहले ही गायब हुए थे. क्योंकि उस के और पूजा के अतिरिक्त जेवरातों की जानकारी किसी को नहीं थी. पूजा मरने के बाद जेवरात अपने साथ नहीं ले जा सकती थी. जाहिर है उस के सामने या उस की हत्या के बाद ही जेवरात गायब हुए होंगे.

यह भी संभव थी कि इन्हीं जेवरातों की वजह से पूजा की हत्या की गई हो. यह जबरदस्त पौइंट इंसपेक्टर जसबीर के सामने था. उन्होंने अपनी जांच का दायरा बदलते हुए शहर के सुनारों, खासकर उन सुनारों की तरफ मोड़ दिया जो चोरी का माल खरीदते थे. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने उन्हें मनमोहन के घर से गायब सामान की लिस्ट देते हुए सख्त चेतावनी दी कि अगर कोई चोर चोरी का सामान बेचने आए तो उन्हें खबर दें. और फिर एक दिन पुलिस की मेहनत रंग लाई.

20 फरवरी, 2019 को शहर के एक सुनार ने फोन द्वारा इंसपेक्टर जसबीर सिंह को सूचना दी कि अजय पटियाल नाम का एक व्यक्ति उस की दुकान पर मनमोहन के घर से चोरी हुए गहनों से मिलतेजुलते गहने बेचने आया है. इस सूचना पर इंसपेक्टर जसबीर सिंह एएसआई जसपाल सिंह, बलविंदर सिंह, हवलदार गुरतेज सिंह और जसवीर सिंह के साथ सुनार की दुकान पर पहुंचे. अजय को देख कर सभी चौंके. अजय मनमोहन का ही रिश्तेदार था. वह वीर नगर गली नंबर-1 निवासी उस के मामा का बेटा था. मजे की बात यह कि इंसपेक्टर जसबीर सिंह शक के आधार पर उसे 3 बार पूछताछ के लिए थाने बुला चुके थे, लेकिन ठोस सबूतों के अभाव में उसे छोड़ना पड़ा था. बहरहाल, वे गहनों सहित अजय को गिरफ्तार कर थाने ले आए.

पूछने पर अजय ने बताया कि गहने उस के अपने हैं. फिर बताया कि गहने उस के किसी दोस्त के हैं और उस ने अपनी बीमार मां का इलाज करवाने के लिए उसे बेचने के लिए दिए थे. किस दोस्त ने गहने दिए थे, यह बात वह नहीं बता पाया. इंसपेक्टर जसबीर सिंह ने मनमोहन और उस के पिता सहित मृतक पूजा के मातापिता को भी थाने बुलवा कर जब गहनों की शिनाख्त करवाई तो उन्होंने तुरंत गहने पहचान लिए.

अजय से बरामद गहने पूरे नहीं थे, इसलिए इंसपेक्टर जसबीर ने अजय को अदालत में पेश कर उस का 2 दिन का रिमांड ले लिया. रिमांड के दौरान अजय से बाकी गहने भी बरामद कर लिए गए जो उस ने अपने घर में छिपा कर रखे थे. दरअसल, अजय नशे का आदी था. पूजा की हत्या उस ने नशे की पूर्ति के लिए की थी. इसे इत्तफाक समझा जाए या कुछ और कि घटना वाले दिन वह पूजा की हत्या के इरादे से मनमोहन के घर नहीं गया था. अजय के नशेड़ी होने की वजह से कोई रिश्तेदार उसे पसंद नहीं करता था. न ही कोई उसे अपने घर में घुसने देता था.

पूछताछ के दौरान अजय ने बताया कि उस दिन वह मनमोहन से कुछ रुपए उधार लेने उस के घर गया था. लेकिन मनमोहन अपने काम पर जा चुका था. पूजा घर में अकेली थी. पूजा ने अजय को इज्जत से बिठाया और उस के लिए चाय बनाने रसोईघर में चली गई. क्योंकि अजय रिश्ते में मनमोहन के मामा का बेटा था, चायपानी के लिए पूछना उस का फर्ज था. जिस समय अजय मनमोहन के घर आया था, उस समय पूजा अलमारी खोल कर उस में कुछ सामान रख रही थी. अजय के आ जाने की वजह से वह अलमारी खुली छोड़ कर चाय बनाने चली गई.

अचानक अजय की नजर खुली अलमारी पर पड़ी तो वह यह सोच कर अलमारी की ओर चला गया कि संभव है उस में रखे कुछ रुपए उस के हाथ लग जाएं. लेकिन अलमारी में रखे जेवर देख कर उस की आंखें चमक उठीं. गहने देख कर उसे लगा जैसे उस की कई दिन की नशापूर्ति का इंतजाम हो गया हो. उस ने अलमारी में रखे सारे गहने उठा लिए. तभी पूजा ने चाय ले कर कमरे में प्रवेश किया. अजय को गहने चोरी करते देख वह भौचक्की रह गई. हैरान हो कर उस ने अजय के हाथों से गहने छीनने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘भैयाजी, यह आप क्या कर रहे हैं?’’

अजय के सिर पर तो नशे का भूत सवार था, सो उस ने पूजा को एक ओर धकेलते हुए घर से भाग जाने की कोशिश की. पर पूजा ने उस का रास्ता रोक लिया. वह किसी भी कीमत पर अजय को वहां से गहने ले कर नहीं जाने देना चाहती थी. पूजा द्वारा विरोध करने पर अजय को ऐसा लगा जैसे वह उस की दुनिया छीन लेना चाहती हो. इसी छीनाझपटी में अजय ने पूजा का गला दबा कर उसे मौत के घाट उतार दिया. पूजा की हत्या करने के बाद अजय घबरा गया. उस ने पूजा की लाश को एक सूटकेस में भरा और सूटकेस बैड में रख कर वहां से चुपचाप निकल आया.

काररवाई और पूछताछ के बाद पुलिस ने 22 फरवरी, 2019 को अजय को अदालत में पेश किया, जहां से अदालत के आदेश पर उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Story

—पुलिस सूत्रों पर आधारित

Swami Chaitanyananda : छात्राओं से यौन शोषण करने वाला पाखंडी

Swami Chaitanyananda : दिल्ली से एक ऐसा हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है, जिस ने पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया है, जहां पाखंडी स्वामी चैतन्यानंद ने गरीब लड़कियों के साथ यौन शोषण किया. उस की हैवानियत का यह खेल दिल्ली से ले कर उड़ीसा तक चल रहा था. आखिर किस तरह से वारदात को अंजाम देता था स्वामी. चलिए जानते हैं इस क्राइम से जुड़ी पूरी स्टोरी विस्तार से.

अकसर ऐसे बाबाओं की करतूतें सामने आती रही हैं, जिन पर लोग आंखें मूंदकर भरोसा करते हैं. ऐसा ही आस्था के नाम पर लोगों के साथ खिलवाड़ करने वाले स्वामी चैतन्यानंद का परदाफाश हुआ. यह करीब 16 सालों तक अनेक लड़कियों के साथ यौन शोषण करता रहा. यह स्वामी माथे पर त्रिपुंड, बदन पर भगवा वस्त्र, केश विहीन सिर और बिलकुल धर्मगुरु सा हुलिया बनाकर रहता था, लेकिन इस के कारगुज़रियों ने सभी को हैरान कर दिया.

यह घटना दिल्ली से सामने आई है, जहां यह पाखंडी पिछले 16 सालों से दक्षिण पश्चिमी दिल्ली के वसंतकुंज में मौजूद नामी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट श्रीश्री जगदगुरु शंकराचार्य महास्थानाम दक्षिणामान्य श्री शारदा पीठम का चांसलर बना बैठा था. इसी इंस्टीट्यूट में पढ़ने वाली लड़कियों के साथ यह ढोंगी यौन शोषण और ब्लैकमेलिंग करता था. ईडब्ल्यूएस कोटे की लड़कियों को टार्गेट कर उन का यौन उत्पीड़न करता रहा और लड़कियां सालोंसाल बदनामी और करिअर चौपट होने के डर से चुप रहीं.

एयरफोर्स हैडक्वार्टर की शिकायत मिलने पर पीठम ने अपने ही चांसलर यानी बाबा चैतन्यानंद के खिलाफ दिल्ली पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाई, जिस से उस की असलियत सामने आई.

फिलहाल बाबा फरार है, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उस की तलाश के लिए ‘औपरेशन इच्छाधारी’ शुरू कर दिया है. पुलिस उस के सुराग और करतूतों के सबूत जुटाने में लगी है. Swami Chaitanyananda

Superstition : 2 महिलाओं की बलि देकर संतान पाने का अनुष्ठान

Superstition : आईवीएफ तकनीक और गोद लेने जैसी सुविधाओं के होते हुए भी तांत्रिकों का मायाजाल कम नहीं हुआ है. निस्संतान दंपति द्वारा गोद भरने के लिए अपनाया जाने वाला तांत्रिक अनुष्ठान अंधविश्वास जनित अपराध को ही बढ़ावा देता है. सचेत करने वाली इस अपराध कहानी में संतान की खातिर ग्वालियर में 2 महिलाओं को बलि चढ़ाने की घटना इस का ताजा उदाहरण है.

ग्वालियर पुलिस एक औरत की लाश की पहचान को ले कर उलझी हुई थी. लाश 21अक्तूबर, 2021 की सुबह साढ़े 5 बजे के करीब ग्वालियर से आगरा की ओर जाने वाले हाईवे पर स्थित ट्रिपल आईटीएम कालेज के निकट सड़क किनारे मिली थी. हजीरा थाना पुलिस को इस की सूचना एक राहगीर ने दी थी. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी आलोक सिंह परिहार एसआई अभिलाख सिंह तोमर, त्रिवेणी राजावत, आनंद कुमार, नरेंद्र छिकारा, हैडकांस्टेबल जयसिंह और मनोज शर्मा को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए थे. तब तक वहां लोगों की अच्छीखासी भीड़ जमा हो गई थी. सभी लाश को ले कर तरहतरह की बातें कर रहे थे.

थानाप्रभारी ने लाश के चेहरे से दुपट्टे को हटवाया. मृतका के गले पर निशान नजर आए. लाश के किसी वाहन से दुर्घटनाग्रस्त होने के कोई ठोस सबूत नजर नहीं आए. कहीं भी खून का एक कतरा नहीं नजर आया और न ही उसे घसीटे जाने का कोई निशान ही दिखा. इस आधार पर अनुमान लगाया गया कि मृतक की हत्या गला घोंट कर की गई होगी और दुर्घटना दिखाने के लिए उसे सड़क के किनारे फेंक दिया. पहली जरूरत मृतका की शिनाख्त करने की थी. मृतका चौकलेटी कलर की लैगी और पिंक कुरती पहने हुए थी. उस के पैरों में कोई चप्पल या जूती नहीं थी. शरीर पर कहीं भी खरोंच के कोई निशान नहीं थे.

मामला गंभीर था, इसलिए थानाप्रभारी ने यह सूचना अपने आला अधिकारियों के अलावा क्राइम इन्वैस्टीगेशन और फोरैंसिक टीम को भी दे दी थी. कुछ समय में ही एसपी अमित सांघी, एडिशनल एसपी हितिका वासल और एसपी (सिटी) रवि भदौरिया भी घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने क्राइम सीन को समझने के साथसाथ वहां मौजूद लोगों से लाश की शिनाख्त करवाई. इस में उन्हें सफलता मिल गई. लाश की पहचान लक्ष्मी उर्फ आरती मिश्रा के रूप में हुई. यह भी मालूम हुआ कि वह चारशहर के नाका की निवासी थी, लेकिन नरसिंह नगर हजीरा में मंशाराम कुशवाह के मकान में किराए पर रह रही थी.

मृतका की इस संक्षिप्त शिनाख्त के बाद सामान्य औपचारिकताएं पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. हजीरा थाने की पुलिस उसी दिन मृतका के उस निवास पर गई, जहां वह किराए पर रहती थी. वहां उस के बारे में कुछ अन्य जानकारी मालूम हुई. पता चला कि 2 साल पहले उस का पति सुनील दुबे से तलाक हो चुका था और वह अकेली किराए पर घरपरिवार से अलग रहती थी. उस के बारे में अन्य जानकारियां जुटाने के लिए पुलिस ने अपने तमाम तंत्र फैला दिए. जल्द ही पुलिस को उस के बारे में चौंकाने वाली कुछ जानकारियां मिलीं. उस में एक जानकारी आरती के चालचरित्र के बारे में थी, जबकि एक अन्य जानकारी उस जैसी चालचरित्र वाली मीरा राजावत नाम की औरत के बारे में थी.

दोनों के बारे में कई तरह की बातें सुनने को मिलीं. जैसे वे छिपे तौर पर सैक्स वर्कर का काम करती थीं. उन के लिवइन रिलेशन के पार्टनर थे. उन के संबंध कई अनैतिक काम करने वाले लोगों के साथ थे, आदिआदि…

इसी के साथ एक और जानकारी इलाके में सक्रिय कुछ वैसे ढोंगी बाबाओं के बारे में भी मिली, जो अकेली रहने वाली औरतों को बेवकूफ बना कर ठगी किया करते थे. हालांकि उन के खिलाफ कोई ठोस सबूत पुलिस को हाथ नहीं लग पाया था. आरती के बारे में पुलिस को यह भी मालूम हुआ कि उस के कई लोगों के साथ अवैध संबंध थे. यहां तक कि उस की जानपहचान संदिग्ध चरित्र वाली महिलाओं से भी थी. दरअसल, वह एक कालगर्ल ही थी, जो किसी के बुलावे पर ही आतीजाती थी. पुलिस ने सब से पहले महिला के पास अकसर आनेजाने वाले घासमंडी निवासी एक आटो चालक राहुल को दबोचा. उस ने आरती से जानपहचान की बात तो स्वीकार कर ली, लेकिन उस की हत्या में खुद को निर्दोष बताया.

हालांकि राहुल ने बताया कि उस की मौत के एक सप्ताह पहले ही आटो समय पर नहीं लाने को ले कर आरती से उस की तकरार हो गई थी. उस के बाद वह उस से नहीं मिला था. रोशनी से पुलिस को मिली अहम जानकारी आरती के साथ उस का कोई गलत संबंध नहीं था. वह केवल उसे कहीं लाने ले जाने के लिए बुलाती थी. किंतु राहुल ने इतना जरूर बताया कि उस की गतिविधियां संदेह भरी थीं. कहां जाती थी, क्या करती थी, नहीं मालूम, लेकिन कई बार काफी सजसंवर कर जाती थी. राहुल के बयान के मुताबिक वह उस से मिलनाजुलना बंद कर चुका था. इस का एक कारण उस ने यह बताया कि पैसे को ले कर वह बहुत चिकचिक करती थी.

पुलिस को राहुल से भी आरती की हत्या से संबंधित कोई ठोस सबूत नहीं मिले, सिवाय उस के मोबाइल नंबर के. जांच में वह भी पुलिस संदेह के घेरे से बाहर हो गया. उस के बाद एएसपी हितिका वासन और सीएसपी रवि भदौरिया व आलोक परिहार ने राहुल से मिले आरती के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई. उस की मौत के कुछ दिन पहले की काल डिटेल्स का एनालिसिस किया गया. लिस्ट में अधिकांश महिलाओं के नाम थे. उन्हीं में से एक नाम रोशनी का भी था, जिस की पिछले 2 दिनों में आरती से कुछ ज्यादा ही बातें हुई थीं. रोशनी ने उसे कई बार काल की थी और बातचीत के कुछ काल 4-5 मिनट से भी अधिक के थे.

पुलिस ने रोशनी को पूछताछ के लिए थाने बुलवाया. उस ने भी राहुल की तरह सिरे से इनकार कर दिया कि लक्ष्मी उर्फ आरती की मौत से उस का कोई संबंध है. हालांकि वह दुखी हो कर बोली कि उस के मरने से उस का 2 हजार रुपया भी डूब गया. उस ने बताया कि उस ने उसे एक काम के लिए 10 हजार रुपए दिलवाए थे. उस में से मुझे भी 2 हजार मिलने वाले थे. वह अकसर उसे काम दिलवाया करती थी. उस के बदले में उसे भी कुछ कमीशन मिल जाता था. काम के बारे में पूछने पर उस ने ‘छोडि़ए न साहब’ कहते हुए टाल दिया था. बहुत कुरेदने पर बताया कि अमीरों की पर्टियों में उन्हें मेहमानों की खतिरदारी आदि के लिए बुलाया जाता था. यही उन का काम था.

रोशनी पर पुलिस ने अतिरिक्त दबाव बनाया. उन्हें लगा कि वह आरती के बारे में कुछ जानकारी दे सकती है. बातोंबातों में रोशनी ने स्वीकार कर लिया कि वह भी अपने परिवार से अलग रहती है. उस का परिवार में कोई नहीं है. रोशनी आरती की तरह तलाकशुदा तो नहीं थी, लेकिन पति द्वारा दूसरी शादी करने के बाद से ही वह अलग रह रही थी. बदले में खर्च के लिए पति से महीने के 8000 रुपए  वसूलती है. पति उस का बच्चा अपने साथ रखता है. रोशनी ने यह भी बताया कि उस की जानपहचान मीरा राजावत के प्रेमी नीरज परमार से भी है.

रोशनी के मुंह से मीरा राजावत का नाम निकलते ही पुलिस के कान खडे़ हो गए, कारण मीरा के बारे में पुलिस को पहले भी काफी विरोधाभासी जानकारी मिल चुकी थी. उस में नई जानकारी उस के प्रेमी की जुड़ गई थी. रोशनी ने बताया कि मीरा और नीरज दोनों लिवइन रिलेशनशिप में हैं. उन की शादी नहीं हुई है, लेकिन साथसाथ रहते हैं. नीरज के फोन से पुलिस को मिलीं खास तसवीरें नीरज ने ही आरती को एक रात के लिए 10 हजार रुपए देने की पेशकश की थी. काम कुछ खास बताया था. रोशनी के कहने पर आरती के साथ सौदा तय हुआ था. जिस में से आरती ने रोशनी को पैसे मिलने के बाद 21 अक्तूबर को कमीशन के 2 हजार रुपए देने का वादा किया था.

यह तारीख भी पुलिस के लिए महत्त्वपूर्ण थी, क्योंकि उसी दिन आरती की लाश बरामद हुई थी और पहली जांच के अनुसार उस की मौत होने का अनुमान भी 20 अक्तूबर की आधी रात का लगाया गया था. उस के बाद पुलिस को धीरेधीरे लगने लगा था कि उस की जांच सही दिशा में जा रही है. पूछताछ की अगली कड़ी में 2 नाम मीरा राजावत और नीरज परमार के भी जुड़ गए थे. पुलिस ने बगैर देरी के मीरा और उस के प्रेमी नीरज परमार को थाने बुलवा लिया था. रोशनी को अलग कमरे में बिठा कर उन से दूसरे कमरे में पूछताछ की जाने लगी. पहले तो दोनों ने रोशनी और आरती से संपर्क होने से इनकार कर दिया. किंतु पुलिसिया तेवर और मनोवैज्ञानिक तरीके के आगे उस की एक नहीं चली.

पुलिस ने जैसे ही रोशनी को उन दोनों के सामने खड़ा किया, वे उसे देख अवाक रह गए. नीरज समझ गया कि उस की पोल खुल चुकी है. और फिर दोनों ने आरती को बुलाने की बात कुबूल कर ली. पूछताछ के सिलसिले में ही पुलिस ने नीरज और मीरा के मोबाइल ले लिए. उन के वाट्सऐप मैसेजिंग को स्क्राल करने लगे. अंगुलियां सरकातेसरकाते अचानक नीरज के मोबाइल स्क्रीन पर आरती की सजीसंवरी तसवीर दिख गई. जांच अधिकारी ने पूछा, ‘‘बता तूने आरती की हत्या क्यों की?’’

अचानक यह सवाल सुन कर नीरज सकपकाता हुआ बोला, ‘‘ऐं…ये क्या कह रहे हैं साब… मैं ने कुछ नहीं किया है…’’

‘‘तो फिर उस की तसवीर तुम्हारे पास कैसे आई?’’ जांच अधिकारी बोले.

‘‘साबजी, आरती की ऐसी फोटो तो और भी मेरे मोबाइल में हैं. हमारी उस की जानपहचान है, इसलिए वह हमें अपनी फोटो भेजती रहती थी.’’ नीरज ने बताया.

‘‘और ये तसवीर भी आरती ने भेजी है?’’ इस बार जांच अधिकारी ने मीरा का मोबाइल नीरज के सामने कर दिया.

कुछ पल में वही तसवीर नीरज के मोबाइल स्क्रीन पर भी दिखा दी. अब जांच अधिकारी ने आक्रोश के साथ डपटते हुए पूछा, ‘‘यह तसवीर आरती की लाश ने तुम्हें भेजी है?’’

दरअसल, पुलिस को मीरा और नीरज के मोबाइल से आरती के शव की तसवीर मिल गई थी, जो नीरज ने मीरा को भेजी थी. वही तसवीर एक अन्य व्यक्ति गिरवर यादव को भी भेजी गई थी.  ऐसे खुला इस रहस्यमय केस का राज फिर क्या था, जांच अधिकारी का पारा काफी गरम हो गया. उन्होंने दोनों को हिरासत में ले लिया और आरती की हत्या के बारे में उन से गहन पूछताछ होने लगी. मीरा और नीरज का कहना था कि आरती की हत्या के बारे उन्हें कोई जानकारी नहीं है. जबकि रोशनी से पुलिस को मालूम हुआ कि नीरज ने ही आरती को बेटू भदौरिया के घर 20 अक्तूबर की रात को भेजा था. नीरज ने बताया था कि बेटू के घर पर पूरी रात चलने वाला कोई धार्मिक आयोजन होना है, उस में ही उसे हाथ बंटाना था.

‘‘तुम दोनों झूठ बोल रहे हो. सचसच बताओ कि आरती बेटू भदौरिया के घर रात के वक्त क्यों गई थी?’’ थानाप्रभारी परिहार ने नीरज को एक थप्पड़ जड़ते हुए पूछा.

इस पर नीरज तिलमिला उठा. परिहार का हाथ दोबारा मीरा को थप्पड़ मारने के लिए उठा ही था कि वह बोल पड़ी, ‘‘बताती हूं साब, सब बताती हूं.’’

‘‘सचसच बताना, कुछ भी छिपा कर नहीं रखना. मुझे सच पहचानना और उगलवाना अच्छी तरह से आता है.’’ जांच कर रहे थाना प्रभारी बोले.

दोनों पर इस कदर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया गया कि उन्होंने सब कुछ बताना मान लिया. मीरा ने जब बताया कि बेटू भदौरिया कोई और नहीं, बल्कि उस का भाई है, तब जांच अधिकारी को और भी आश्चर्य हुआ. साथ ही उन का संदेह पुख्ता होने लगा कि सभी ने मिल कर ताकतवर दिखने वाली युवती आरती की हत्या की है. मीरा ने बताया कि उन की मंशा आरती को मारने की नहीं थी, उन्होंने उस वक्त की परिस्थियों के अनुसार ऐसा करने पर मजबूर हो कर किया. आरती हत्याकांड का पूरा मामला जो सामने आया, उस में एक और ट्विस्ट तंत्रमंत्र, साधना और नरबलि से संतान की पूर्ति के घोर अंधविश्वास का था. पुलिस उन की कहानी सुन कर दंग रह गई. उन्होंने सिर पर हाथ रख लिया कि टेस्ट ट्यूब से बच्चा पैदा होने के जमाने में भी ऐसा अंधविश्वास लोगों के जेहन में भरा हुआ है.

इस अंधविश्वास के कारण हुए अपराध की कहानी की जड़ में संतान की चाहत निकली. जिस का फायदा उठाने वाले ढोंगी बाबा की भी भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी, जिस की वजह से एक नहीं बल्कि 2-2 महिलाओं की बलि दी गई थी. भाभी ममता की गोद भरना चाहती थी मीरा भावनात्मक दावपेंच और तांत्रिक अनुष्ठान के लिए अपनाए गए भयभीत करने वाले तरीके के प्रवाह में 5 लोग बह गए. उन में मीरा राजावत, उस का भाई बेटू भदौरिया, भाभी ममता, प्रेमी नीरज परिहार और तांत्रिक गिरवर था. इस में शिकार बनने वाली अनजान महिला आरती और नीरू थीं. इस का पूरा तानाबाना मीरा द्वारा ही बुना गया था. उसी ने अपने निस्संतान भाईभौजाई को इस के लिए उकसाया था.

हत्या का जुर्म स्वीकारने के बाद पछतावे में रोती हुई मीरा बोली, ‘‘साहब, भाई का घर आबाद करने की चाहत में तांत्रिक के कहने पर ही आरती और नीरू की बलि देनी पड़ी थी.’’

यह सब कैसे हुआ, उस की दिलचस्प मगर सवाल खड़ा करने के साथसाथ सावधान करने वाली कहानी इस प्रकार है—

ग्वालियर के मोतीझील इलाके में रहने वाले मीरा के बड़े भाई बेटू भदौरिया की शादी 18 साल पहले ममता भदौरिया के साथ हुई थी. बेटू ट्रक ड्राइवर था. अभी तक वे निस्संतान थे. काफी डाक्टरी इलाज और मन्नतों के बावजूद ममता की गोद सूनी थी. एक दिन ममता ने अपनी संतानहीनता की पीड़ा मीरा को सुनाई. किसी भी तरह कहीं से कोई बच्चा गोद लेने या दूसरा उपाय करने के लिए कहा. मीरा खुद तो अविवाहित थी, लेकिन वह संतानहीनता की पीड़ा को समझती थी. उस की जानपहचान कई तरह के लोगों से थी. ममता को उस के प्रेमी नीरज की अच्छी जानपहचान होने के बारे में भी मालूम था. इस कारण ममता ने मीरा को नीरज या किसी और के जरिए उपाय करने की गुजारिश की.

ममता के काफी अनुरोध के बाद मीरा ने इस बारे में नीरज से बात की. नीरज ने छूटते ही बताया कि वह एक ऐसे तांत्रिक को जानता है, जो कइयों की मनमानी संतान की चाहत को पूरा करवा चुका है, लेकिन इस पर वह मोटी फीस वसूलता है. नीरज की विश्वास भरी बातें सुन कर मीरा को लगा जैसे उस के भाईभाभी की मुराद बस पूरी होने ही वाली है. उस ने तुरंत तांत्रिक से बात करने के लिए कहा. अगले रोज ही नीरज ने मीरा को जानकारी दी कि हमें इस के लिए भैयाभाभी को तांत्रिक गिरवर यादव नाम के तांत्रिक के यहां ले कर जाना होगा. वहीं उन की जन्म कुंडलियों को देखने के बाद उपाय के बारे में सब कुछ तय किया जाएगा.

मीरा ने तुरंत यह जानकारी अपनी भाभी ममता को दी, ममता ने अपने पति बेटू को इस के लिए राजी कर लिया. इस पर आने वाले खर्च के बारे में बेटू ने जानना चाहा. मीरा कोई निश्चित राशि तो नहीं बता पाई, लेकिन इतना जरूर कहा कि नीरज के मुताबिक लाख, सवा लाख में उपाय हो जाना चाहिए. इसी के साथ मीरा ने बेटू को 10-15 हजार रुपए साथ ले कर चलने को भी कहा, ताकि तांत्रिक की पैरपुजाई के तौर पर कुछ पेशगी दी जा सके. तांत्रिक ने बताया संतान प्राप्ति का तरीका चारों लोग तांत्रिक के पास गए. तांत्रिक ने बेटू और ममता की जन्मकुंडलियां देखने के बाद ध्यान लगा कर बताया कि ममता की किस्मत में औलाद सुख बहुत ही कमजोर है. थोड़ीबहुत उम्मीद की किरण बेटू में दिखती है. उसे ममता के करीब लाने के लिए एक तांत्रिक अनुष्ठान करना होगा.

तांत्रिक ने अनुष्ठान का समय भी निर्धारित कर दिया. बताया कि दोनों को औलाद सिर्फ उसी सूरत में हो सकती है, जब वे शरद पूर्णिमा की आधी रात में किसी निस्संतान महिला की बलि बगैर रक्त बहे दे दें. अनुष्ठान तक की बात सभी के लिए किसी उम्मीद की किरण से कम नहीं थी, लेकिन बलि की बात सुन कर सभी हैरानी में पड़ गए. जबकि तांत्रिक ने स्पष्ट कहा कि इस के बगैर वे संतान की उम्मीद छोड़ दें. मीरा और नीरज ने इस के लिए तुरंत हामी भर दी. उस के बाद ममता और बेटू ने भी अपनी स्वीकृति दे दी. उन्होंने इस पर आने वाले खर्च और आगे की तैयारी के बारे में पूछा.

तांत्रिक गिरवर यादव ने बताया कि पूरे आयोजन पर कुल डेढ़ लाख रुपए का खर्च आएगा. बलि के लिए किसी को तैयार करने का खर्च और इंतजाम उन का होगा. इस काम के लिए वह श्मशान में लगातार 3 घंटे तक मंत्रजाप  अकेले करेंगे. तांत्रिक की शर्त पर ममता, बेटू, मीरा और नीरज ने एक साथ हामी कर दी. अनुष्ठान के लिए समय मात्र एक हफ्ते का बचा था. महत्त्वपूर्ण तैयारी किसी वैसी निस्संतान औरत के तलाश की थी, जो उन की बिरादरी की न हो. इस के लिए नीरज को लगा दिया गया. उस ने अपने जानने वालों से गुप्त तरीके से इस पर काम करना शुरू कर दिया. उसी क्रम में उसे पहचान वाली रोशनी से मदद मिल गई. उस ने आरती के बारे में बताया.

संयोग से आरती को नीरज पहले से जानता था. जल्द ही उन के बीच बात बन गई और नीरज ने आरती को 10 हजार रुपए में धार्मिक आयोजन में सहयोग करने के लिए तैयार कर लिया. नीरज आरती को एडवांस पैसा देने के बाद 20 अक्तूबर, 2021 की शाम 8 बजे के करीब आटो में बिठा कर बेटू की पुरानी छावनी स्थित आवास पर ले गया. वहां गिनेचुने लोग ही थे. उसे मिला कर कुल 5 लोग. एक कमरे में अनुष्ठान की तैयारी की गई थी. आरती की खातिरदारी के साथसाथ उस के लिए खरीदे गए उपहार के कपड़े और सामान दिखाए गए, जो उसे आयोजन के बाद दिए जाने थे. आरती यह सब देख कर खुश हो गई.

औनलाइन अनुष्ठान में दी गई महिला की बलि मीरा ने आरती को आयोजन के उद्देश्य और तरीके के बारे में समझाया. उस ने कहा कि उस के सहयोग से उस के भाईभाभी के घर में किलकारी गूंज उठेगी. इस का लाभ भविष्य में हम सभी को मिलेगा, ऐसा पुजारी ने कहा है. उसे एक धार्मिक अनुष्ठान में बेटू और ममता के साथ एक अनुष्ठान करने वाले महत्त्वपूर्ण सदस्य के तौर पर बैठना है. अनुष्ठान का सारा काम औनलाइन होगा. पुजारी दूर रह कर हवन आदि के साथ मंत्रजाप करेंगे. यहां से हमें मोबाइल पर उन की आवाज के साथ सहयोग का जयकारा लगाना होगा.

इन तैयारियों के साथ अनुष्ठान का आयोजन रात के 11 बजे शुरू हो गया. तांत्रिक ने बलि देने का समय रात के एक बजे का तय किया था. आरती को इस का जरा भी आभास नहीं हुआ कि उस की बलि दी जानी है. रात एक बजे बलि देने से पहले तांत्रिक के बताए अनुसार पूजा करने के बाद सभी को दूधदही मिश्रित प्रसाद खिलाया गया, जिसे पहले से ही तैयार कर सब के सामने रख दिया गया था. आरती के सामने रखे प्रसाद में नशीला पदार्थ मिला दिया गया था. प्रसाद का सेवन पहले ममता और बेटू ने किया था, उस के कुछ समय बाद आरती ने प्रसाद खाया. पूजा का आयोजन करीबकरीब खत्म होने को था. मीरा और नीरज सभी के लिए खाना परोसने की तैयारी करने लगे.

आरती बाथरूम के लिए उठने लगी, लेकिन उस ने सिर चकराने की शिकायत की. मीरा तुरंत बोली, ‘‘अधिक समय तक भूखे बैठने से ऐसा हुआ होगा. अभी ठीक हो जाएगा.’’

उस के बाद आरती खड़ी होते ही धड़ाम से गिर गई. सभी पहले से उस के बेहोश होने के इंतजार में थे. उन्होंने समय गंवाए बगैर उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट डाला. उधर तांत्रिक का मंत्रजाप मोबाइल पर जारी था, इधर आरती के प्राण निकल रहे थे. उस की छटपटाने की आवाज मंत्रजाप के साथ मिल गई थी.   तांत्रिक ने मोबाइल पर विधिवत मंत्र पढ़ने के बाद भरोसा दिलाया कि बलि देने से हत्या के जुर्म में नहीं पकडे़ जाएंगे. क्योंकि उस के मंत्र की शक्तियां बलि देने के बाद जागृत हो जाएंगी. उन से ही उन की रक्षा मिलेगी. बाइक से सड़क पर गिर गई लाश आरती की बलि का कार्य संपन्न होने के बाद अब उस के शव को ठिकाने लगाने की थी.

इस के लिए बेटू और नीरज आरती की लाश को बीच में बिठा कर तांत्रिक के पास ले जाने के लिए घर से निकले. दुर्भाग्य से ट्रिपल आईटीएम कालेज के निकट बाइक फिसल गई और आरती की लाश सड़क किनारे गिर गई. सड़क पर वाहनों की आवाजाही होने के कारण वे दोबारा आरती को बाइक पर नहीं लाद पाए. उन्होंने उसे वहीं छोड़ कर जाना ही सही समझा. उन्होंने तांत्रिक को इस नई समस्या के बारे में बताया. तांत्रिक ने उपाय के तौर पर लाश की तसवीर मंगवाई, ताकि बाकी का अनुष्ठान पूरा किया जा सके. नीरज ने वैसा ही किया और आरती की लाश की फोटो मोबाइल से खींच कर तांत्रिक को वाट्सऐप पर भेज दी. लाश को छोड़ कर वे लोग घर आ गए.

हजीरा पुलिस की पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि उन्होंने ‘मर्डर 2’ फिल्म देखी. उसी आधार पर अकेली रहने वाली कालगर्ल आरती को बलि के लिए चुना. इस की बलि देने के बाद उन को पकड़े जाने का जोखिम नहीं होने का भरोसा था. एडिशनल एसपी हितिका वासल की मौजूदगी में थानाप्रभारी आलोक सिंह परिहार  ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए नीरज और बेटू भदौरिया से विस्तार से पूछताछ की तो नीरज ने बताया कि उन्होंने एक नहीं  बल्कि 2 महिलाओं की बलि दी थी. यह सुन कर पुलिस अधिकारी भी चौंक गए. तब नीरज ने बताया कि उन्होंने पहले बलि चढ़ाने के लिए कालगर्ल नीरू को चुना था. नीरू की बलि देने के लिए उसे 5000 रुपए का लालच दे कर बुलवाया था.

फिर योजना के अनुसार उसी दिन 14 अक्तूबर, 2021 को अष्टमी के दिन उसे मुरैना जिले के थाना सरायछोला के अंतर्गत आने वाली पीपलखाड़ी की बड़ी नहर के निकट सुनसान स्थान पर ले जा कर उसे जम कर शराब पिलाई. जब नीरू पर कुछ ज्यादा ही नशा हो गया तब तांत्रिक गिरवर यादव के बताए अनुसार नीरज ने पूजापाठ करने के बाद उस के साथ शारीरिक संबंध बनाए फिर उसी के दुपट्टे से उस का गला घोंट कर हत्या कर दी थी और उस की लाश को वहीं पड़ा छोड़ कर ग्वालियर लौट आया था. उस के बाद तांत्रिक को नीरू की बलि देने का फोटो उस के मोबाइल पर भेजने के साथ ही उसे शराब पिला कर उस की जान लेने की बात भी बताई थी.

इस पर तांत्रिक ने  कहा, ‘‘तुम ने नीरू की बलि उसे शराब पिला कर दी है, इसलिए पूजा विधि पूरी नहीं हुई है. यदि तुम्हें पूजा पूरी करनी है तो शरद पूर्णिमा के दिन एक और महिला की बलि देनी पड़ेगी.’’

नीरज ने बताया कि दूसरी महिला को तलाश करना आसान नहीं था. तांत्रिक द्वारा बताई पूजा विधि को सुरक्षित ढंग से अंजाम देने के लिए वह और मीरा ऐसी दूसरी महिला की तलाश में लग गए और जल्दी ही उन की मेहनत रंग लाई. फिर रोशनी नाम की महिला ने उन्हें कालगर्ल आरती से मिलवा दिया. इस के बाद नीरज ने आरती को भी मोटी रकम देने का प्रलोभन दे कर पूजा में बैठने के लिए राजी कर लिया. अपने जाल में फंसा कर उस ने आरती को भी मौत के घाट उतार दिया. संतान की चाहत में तांत्रिक के कहने पर 2 महिलाओं की बलि देने के मामले का 36 घंटे के भीतर पुलिस ने खुलासा कर दिया.

नीरज ने कालगर्ल नीरू की हत्या मुरैना जिले के थाना सराय छोला क्षेत्र में की थी, इसलिए पुलिस ने सराय छोला थाना पुलिस से संपर्क किया तो पता चला कि उन्होंने एक अज्ञात महिला की लाश बरामद की थी. पुलिस नीरज और गांव के कुछ लोगों को ले कर मुरैना पहुंची तो उन लोगों ने कपड़े आदि देख कर बताया कि ये नीरू के ही हैं. जरूरी काररवाई कर के ग्वालियर पुलिस मुरैना से लौट आई. चूंकि उन्होंने नीरू की लाश बरामद करने के साथ आरोपी ननद, भाभी, भाई प्रेमी सहित तांत्रिक को धर दबोचा था, इसलिए हजीरा थाना पुलिस की टीम को ग्वालियर के एसपी अमित सांघी ने इनाम देने की घोषणा की.

इस पूरे मामले को सुनने के बाद पुलिस ने आरती और नीरू की बलि देने के जुर्म में मीरा राजावत, नीरज कुमार, ममता भदौरिया, बेटू भदौरिया के अलावा तांत्रिक गिरवर यादव को गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों को अदालत में पेश करने के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story : बीवी और मंगेतर को मारने वाला नाइट्रोजन गैस किलर

Crime Story : बठिंडा की रहने वाली सोनू के जीवन में खुशियों की सौगात आने वाली थी, क्योंकि एक लंबे इंतजार के बाद उस की शादी उस के प्रेमी और मंगेतर नवनिंदर से होने वाली थी. पटियाला में मंगेतर नवनिंदर के साथ दिल खोल शौपिंग के बाद वह एक दिन अचानक से गायब हो गई. बाद में इस का राज खुला तो…

11 अक्तूबर 2021 का दिन था. बठिंडा, पंजाब की रहने वाली छपिंदरपाल कौर उर्फ सोनू (28) पटियाला में अपने होने वाले पति से मिलने के लिए जा रही थी. वह बेहद खुश थी क्योंकि एक लंब े अरसे के इंतजार के बाद उस की शादी नवनिंदर प्रीतपाल सिंह उर्फ सिद्धू (39) से होने वाली थी. लंबा इंतजार इसलिए क्योंकि छपिंदरपाल और नवनिंदर दोनों की सगाई पिछले साल मार्च 2020 में ही हो गई थी. लेकिन उन की शादी उन दिनों देश में फैले कोविड की वजह से नहीं हो पाई. जब कोविड का असर धीरेधीरे कम होने लगा और देश में अनलौक की प्रक्रिया को चालू किया गया, उस के बाद नवनिंदर अपने निजी कारणों से शादी की डेट लगातार टाल दिया करता था.

इस शादी के लिए छपिंदर ने लंबा इंतजार किया था, जोकि आने वाले 20 अक्तूबर को खत्म होने वाला था. नवनिंदर पटियाला के अर्बन एस्टेट इलाके में रहता था जोकि पौश इलाकों में माना जाता है. वह अपने मातापिता का एकलौता बेटा था. उस के 80 साल के पिता इंडियन आर्मी के रिटायर्ड कर्नल थे, जिन की आखिरी इच्छा अपने बेटे की खुशहाल जिंदगी देना था. दरअसल, नवनिंदर और छपिंदरपाल उर्फ सोनू दोनों ने एक साथ पंजाबराजस्थान के बौर्डर पर स्थित श्रीगंगानगर में श्री गुरुनानक खालसा ला कालेज से एलएलबी यानी कानून में बैचलर की पढ़ाई की थी. उसी दौरान बठिंडा और पटियाला 2 अलगअलग इलाकों के रहने वाले इन दोनों में दोस्ती गहराई और प्यार हो गया. इस के अलावा नवनिंदर ने समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रैजुएशन की पढ़ाई भी की थी और वह अमेरिका के एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट में पढ़ाई करने वाले बच्चों को औनलाइन पढ़ाता था.

11 अक्तूबर को जब नवनिंदर ने छपिंदर को शादी की शौपिंग और तैयारियां करने के लिए बुलाया तो छपिंदर उर्फ सोनू की खुशी का ठिकाना नहीं था. छपिंदर के घर वालों ने भी इस के लिए टोकाटाकी नहीं की. उन्होंने खुशी से अपनी बेटी को पटियाला उस के होने वाले पति से मिलने की इजाजत दे दी. 11 अक्तूबर की दोपहर को सोनू पटियाला पहुंच कर नवनिंदर से मिली. सब से पहले नवनिंदर सोनू को अपने साथ एक होटल में ले गया. जहां वह फ्रैश हुई और कपड़े बदल कर वे दोनों पटियाला में लगने वाली बड़ी मार्किट में शौपिंग के लिए निकल गए.

11 अक्तूबर से 13 अक्तूबर तक नवनिंदर ने सोनू को अपने साथ खूब घुमायाफिराया. सोनू ने नवनिंदर से जिस किसी चीज की मांग की, नवनिंदर ने उन सभी मांगों की पूर्ति की. वे दोनों कभी महंगे 5 स्टार होटल में खाना खाने जाते, कभी बड़ेबड़े शौपिंग कौंप्लेक्स में घूमते और खरीदारी करते. इस बीच मौका मिलते ही सोनू अपने घर वालों से और अपने दोस्तों से फोन कर उन से बात किया करती. अपने घर वालों से उस की लगभग हर दिन ही बातचीत होती थी. सोनू से बातें कर उस के घर वालों के दिल को सुकून मिल जाता था. सोनू के पिता सुखचैन सिंह अपनी बेटी से बहुत प्यार करते थे. घर पर सोनू के नहीं होने से उन्हें घर बेहद सूना लग रहा था. लेकिन 14 अक्तूबर से सोनू ने फोन उठाना बंद कर दिया. उस के घर वाले उस के नंबर पर फोन करते रहे, लेकिन किसी ने जवाब नहीं दिया.

पहले तो सोनू के घर वालों को लगा कि शायद वह कहीं व्यस्त होगी या फिर शौपिंग करने में मशगूल होगी. लेकिन जब सोनू की तरफ से अपने पिता को या घर में किसी को भी कालबैक नहीं की गई तो उन की चिंता बढ़ने लगी. जब उन को महसूस हुआ कि सोनू फोन नहीं उठा रही तो उन्होंने नवनिंदर के नंबर पर फोन किया. बेटी की खबर से सुखचैन की बढ़ी चिंता सोनू के पिता सुखचैन सिंह की काल देख नवनिंदर ने फोन उठाया और बात की. सुखचैन हड़बड़ाते हुए बोले, ‘‘बेटा, ये सोनू फोन क्यों नहीं उठा रही है? हम काफी देर से उसे फोन कर रहे हैं. न तो वह फोन उठा रही है और न ही कालबैक कर रही है. आखिर वह है कहां पर?’’

पिता की चिंता महसूस कर नवनिंदर हकपका गया. जवाब में उस ने कहा, ‘‘सतश्रीअकाल पापाजी. दरअसल, आज सुबह सोनू के साथ मार्किट शौपिंग के लिए जाना था लेकिन छोटी सी एक बात पर वह रूठ गई. गुस्सा हो कर वह घर से निकल गई, वह भी बिना अपना फोन लिए. मैं ने उस का फोन देखा भी नहीं था. मैं भी उसे तब से फोन मिला रहा हूं, लेकिन अभी देखा कि वह अपना फोन ले जाना भूल गई है. आप चिंता न करें. वह जल्द ही घर लौट आएगी. तब मैं आप की बात उस से करवा दूंगा.’’

अपनी बेटी और होने वाले दामाद के बीच झगड़े की इस बात को सुन कर सुखचैन सिंह के मन का सुख और चैन मानो कहीं गायब सा हो गया. उन के दिल में अपनी बेटी को ले कर बेचैनी पैदा हो गई. वह हर पल सोनू के बारे में ही सोचे जा रहे थे कि आखिर एक बड़े से शहर में उन की बेटी बिना फोन लिए कहां भटक रही होगी या उस के साथ कुछ अनहोनी न हो जाए. 14 अक्तूबर, 2021 को जब सोनू के घर वालों को यह बात पता चली, उस के बाद से नवनिंदर को हर घंटे फोन आता. लेकिन सोनू के वापस आने की उन्हें कोई खबर नहीं मिली.

सोनू के लापता होने को 24 घंटे हो गए तो घर वालों को अपनी बेटी की चिंता होने लगी कि सोनू का भाई दविंदर सिंह और पिता सुखचैन सिंह अगले दिन 15 अक्तूबर की सुबहसुबह करीब 5 बजे बठिंडा से पटियाला नवनिंदर से मिलने के लिए पहुंच गए. नवनिंदर ने उन्हें अपने और सोनू के बीच होने वाले झगड़े के बारे में बताया लेकिन नवनिंदर की बात सुन कर उन के मन को शांति नहीं हुई. मामले को गंभीर होता देख, दविंदर, सुखचैन सिंह और नवनिंदर, तीनों पटियाला के अर्बन एस्टेट पुलिस स्टेशन जा पहुंचे. अर्बन एस्टेट थाने के थानाप्रभारी रौनी सिंह ने सुखचैन सिंह की शिकायत पर सोनू की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर जल्द ही काररवाई शुरू कर दी. ऐसे में सोनू को ढूंढने के लिए सब से पहले जिस शख्स से पूछताछ होनी थी, वह नवनिंदर ही था.

पुलिस ने नवनिंदर से उन के बीच होने वाले झगड़े की वजह पूछी. जब नवनिंदर ने झगड़े का कारण बताया तो उसे सुन कर पुलिस के मन में पहली नजर में ही उस के ऊपर शक होने लगा. नवनिंदर ने बताया कि मार्किट में एक चीज को खरीदने के लिए उस ने सोनू को मना कर दिया था, जिस के बाद वह रूठ गई थी. होटल में उन के बीच इसी बात को ले कर हलकी नोकझोंक भी हुई थी. नवनिंदर की ये बातें सुन कर थानाप्रभारी के मन में सवाल उठने शुरू हो गए थे. वह सोचने लगे कि जिस जोड़ी की भला कुछ दिनों के बाद शादी होने वाली हो, उन के बीच इस बात पर झगड़ा होना और घर से निकल जाना, कैसे संभव हो सकता है.

ये वजह उन्हें कुछ हजम नहीं हुई. तो ऐसे में नवनिंदर से पुलिस की पूछताछ करने वाली टीम ने कुछ और जरूरी सवालजवाब किए. पुलिस वालों ने नोटिस किया कि नवनिंदर ने उन के जितने सवालों का जवाब दिया, उन से उन्हें नवनिंदर पर शक गहराता जा रहा था. ऐसी स्थिति में थानाप्रभारी ने सोनू के पिता और भाई को तसल्ली दी और जल्द ही सोनू के बारे में पता लगाने का आश्वासन भी दिया. और इस मामले को ले कर पुलिस ने तुरंत काररवाई करनी शुरू कर दी.

पुलिस टीमें जुटीं जांच में 

पुलिस की कई टीमें इस काम में जुट गईं. एक टीम पटियाला में सोनू को ढूंढने में लगी थी तो दूसरी टैक्निकल टीम उस की लास्ट लोकेशन और उस से पहले वह कहांकहां गई, उस के बारे में पता करने में व्यस्त थी. ऐसे में थानाप्रभारी के नेतृत्व में एक टीम ऐसी बनाई गई जोकि सोनू के मंगेतर नवनिंदर की हिस्ट्री का पता लगाने के लिए थी. इस टीम में खुद थानाप्रभारी शामिल थे. एक तरफ पुलिस की सभी टीमें सोनू का पता लगाने का काम कर रही थीं तो दूसरी तरफ समय बीतने के साथसाथ सोनू के घर वालों के सब्र का बांध टूटता जा रहा था. घर वालों के मन में सोनू को ले कर बेचैनी और चिंता ने इस कदर घर कर लिया था कि जिसे निकाल बाहर फंकना बेहद मुश्किल था.

अगले 4-5 दिनों तक पुलिस से सोनू के परिवार वालों को कोई जवाब नहीं मिला, लेकिन अंदर ही अंदर पुलिस की टीमें अपना काम कर रही थीं. 20 अक्तूबर, 2021 के दिन थानाप्रभारी ने बठिंडा से सोनू के घर वालों को पटियाला अर्बन एस्टेट पुलिस थाने में बुलाया. पुलिस ने नवनिंदर के बारे में कुछ ऐसी चीजों का पता लगा लिया था, जिस का सोनू के घर वालों को पता होना जरूरी था. खबर मिलते ही सुखचैन सिंह, दविंदर और साथ में कुछ और लोग अर्बन एस्टेट पुलिस थाने जल्द से जल्द पहुंच गए. उन के पहुंचते ही थानाप्रभारी ने उन्हें अपने औफिस में बुलाया और उन के होने वाले दामाद नवनिंदर के बारे में कुछ ऐसे खुलासे किए, जिसे सुन कर सोनू के घर वालों के होश उड़ गए थे.

पता चला कि नवनिंदर की पहली शादी 12 फरवरी, 2018 को गांव बिशनपुरा, जिला संगरूर, पंजाब की रहने वाली सुखदीप कौर से हो चुकी थी. सुखदीप उच्चशिक्षित परिवार से ताल्लुक रखती थी और वह खुद भी ट्रिपल एमए थी. लेकिन 19 सितंबर 2021 को उस की रहस्यमयी हालत में मौत हो गई. रहस्यमयी इसलिए क्योंकि उस की मौत कैसे हुई, इस का किसी के पास कोई प्रूफ नहीं था. पुलिस की टीम ने जब संगरूर में सुखदीप के घर पर जा कर उस की मृत्यु का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि सुखदीप की मौत हार्ट अटैक से हुई थी. जब उन से पूछा गया कि उन्हें इस बात पर कैसे यकीन है कि सुखदीप की मौत हार्ट अटैक से हुई तो उन्होंने बताया कि उस के पूरे शरीर पर किसी चीज का निशान नहीं था, जिस से उन्हें किसी और बात पर शक हो.

मंगेतर ही निकला कातिल परिवार ने यह भी बताया कि सुखदीप 5 महीने की प्रेग्नेंट भी थी. सिर्फ यही नहीं, पुलिस टीम ने नवनिंदर के बारे में कुछ और भी पता लगाया जोकि हैरान करने वाला था. फरवरी 2018 में सुखदीप से पहली शादी के बाद उस ने पहली अक्तूबर, 2018 को भवानीगढ़ संगरूर की रहने वाली लखविंदर कौर से भी शादी की थी. इस की जानकारी सुखदीप के घर वालों को नहीं हुई. लखविंदर के साथ नवनिंदर अर्बन एस्टेट अपने पिता के घर से कुछ दूरी पर किराए के कमरे में रहता था. उन्होंने सुखदीप के घरवालों से नवनिंदर की लखविंदर से शादी के बारे में जब पूछा तो उन्हें इस बात का पता ही नहीं था कि नवनिंदर ने कहीं और भी शादी की थी.

इस का मतलब यह था कि नवनिंदर ने सुखदीप को धोखे में रख कर 6 महीने बाद एक और शादी की थी. इस बीच सब से ज्यादा हैरानी की बात यह थी कि इन सभी बातों के बारे में सोनू के घर वालों को पता ही नहीं था. उन्होंने थानाप्रभारी को बताया कि नवनिंदर और सोनू के बीच पिछले 2 सालों से संबंध था. इस बीच नवनिंदर उन के घर आता था, परिवार वालों से बातचीत करता था, बच्चों के लिए खिलौने लाया करता था लेकिन उस ने कभी भी अपने पुराने रिश्तों के बारे में किसी को नहीं बताया. उन्होंने इस बात को भी माना कि अगर नवनिंदर ने सोनू को भी इस बारे में कुछ भी बताया होता तो सोनू जरूर अपने घर वालों को इस के बारे में बताती.

इस का मतलब यह था कि नवनिंदर सोनू समेत सभी को धोखे में रख कर यह शादी करने वाला था. यह सब जानने और सुनने के बाद अब पुलिस के शक की सुई सिर्फ एक ही शख्स पर आ कर रुक गई, वह था नवनिंदर. सब जानने के बाद सोनू के पिता सुखचैन सिंह ने अगले दिन 21 अक्तूबर को नवनिंदर के खिलाफ अपनी बेटी की किडनैपिंग की रिपोर्ट दर्ज करा दी और पुलिस ने सुखचैन सिंह की तहरीर पर नवनिंदर को हिरासत में ले लिया. इस बार नवनिंदर को हिरासत में लेने के बाद पुलिस की पूछताछ करने वाली टीम ने शुरुआत से ही उसे सवालों के ऐसे घेरे में ले लिया कि वह कोई जवाब नहीं दे पाया.

उस ने पुलिस के सवालों पर ऐसी चुप्पी साध ली कि उस से कुबूलवाने के लिए पुलिस को सख्ती दिखानी पड़ी. सख्ती से पूछताछ करने के बाद नवनिंदर ने पुलिस के सामने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. उस ने पुलिस के सामने अपने रिश्ते छपिंदरपाल कौर उर्फ सोनू, सुखदीप कौर और लखविंदर कौर के साथ होने की बात को स्वीकार कर लिया. उस ने बताया कि वह इन तीनों के रिश्तों के बीच खुद को काफी उलझा हुआ महसूस करने लगा था, जिस से निकलने के लिए उसे सिर्फ एक ही रास्ता दिखाई देने लगा. वह तीनों में से किन्हीं 2 की मौत ही था.

उस ने अपनी पहली पत्नी सुखदीप को इसलिए जान से मार दिया क्योंकि एक तो वह लखविंदर से उस के रिश्ते के बारे में जान चुकी थी और दूसरी बात यह कि वह उस के बच्चे की मां बनने वाली थी. जबकि नवनिंदर पिता बनने के लिए तैयार नहीं था, वह भी उस स्थिति में जब वह पहले से ही 2 महिलाओं के साथ रिश्ते में बंधा हुआ था. उस ने इस उलझन को खत्म करने के लिए सब से पहले सुखदीप को ठिकाने लगाने के बारे में प्लान किया. चूंकि नवनिंदर ने कानून की पढ़ाई की थी और वह क्रिमिनल लौ के बारे में अच्छे से समझता था, इसलिए वह सुखदीप को मारने के बाद कोई भी सबूत पीछे नहीं छोड़ना चाहता था.

उसे पता था कि हत्या किसी भी तरीके से की जाए, आखिर में कोई न कोई सबूत पीछे छूट ही जाता है. ऐसे में हत्या करने के तरीकों के बारे में वह पिछले 6 महीनों से रिसर्च करने लगा. वह दिनरात इंटरनेट पर तरहतरह के आर्टिकल पढ़ता, क्राइम स्टोरीज पढ़ता और हत्या के तरीके ढूंढता. उस ने पिछले 6 महीनों में हत्या का तरीका ढूंढने के लिए 200 से ज्यादा बौलीवुड, साउथ बौलीवुड और हौलीवुड की फिल्में देख डालीं. वह हर दिन क्राइम पैट्रोल शो भी देखने लगा. अंत में इसी तरह की फिल्में देखने के बाद उसे एक तरकीब सूझी नाइट्रोजन गैस.

उस ने इस बारे में खूब पढ़ा और अंत में इस नतीजे पर पहुंचा कि नाइट्रोजन गैस के इस्तेमाल से शरीर पर किसी तरह के कोई निशान नहीं छूटते और बिना किसी शोरशराबे के पीडि़त पहले बेहोश हो जाता है और उस के बाद उस की मृत्यु तय है. नाइट्रोजन गैस को बनाया मौत का हथियार आखिर उस ने सुखदीप से अपना पीछा छुड़ाने के लिए नाइट्रोजन गैस को अपना हथियार बना लिया. 19 सितंबर, 2021 की रात को नवनिंदर सुखदीप के लिए औक्सीजन गैस के सिलिंडर में नाइट्रोजन भर कर लाया.

रात को सोते समय उस ने सुखदीप से कहा कि अगर वह औक्सीजन गैस इन्हेल (श्वास) करेगी तो यह उस के लिए और उन के बच्चे के लिए अच्छा साबित होगा. सुखदीप पढ़ीलिखी महिला थी और वह भी इस बात को अच्छे से जानती थी. इसलिए नवनिंदर पर किसी तरह का शक होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. नवनिंदर ने इस हत्या को अंजाम देने के लिए खास तरह का मास्क भी बनवाया था, जिस में छेद नहीं थे. सुखदीप ने नवनिंदर की बात मानते हुए मास्क लगाया और नवनिंदर ने सिलिंडर से धीरेधीरे गैस छोड़नी शुरू कर दी. सुखदीप को क्या मालूम था कि उस का पति औक्सीजन सिलिंडर में नाइट्रोजन गैस भर कर लाया है. नाइट्रोजन गैस उस की नाक से होते हुए उस के फेफड़ों में फैल गई.

धीरेधीरे कुछ ही मिनटों में नाइट्रोजन खून से होते हुए पूरे शरीर में फैल गई, जिस से पहले तो सुखदीप बेहोश हुई और उस के चंद सैकंड बाद उस की मौत हो गई. सुखदीप की हत्या के बाद उस ने सुखदीप के घर वालों को उस की मौत हार्टअटैक से बताई, जिसे सुखदीप के घर वालों ने मान लिया. इसी तरह उस ने सोनू की मौत को भी अंजाम दिया. 11 अक्तूबर को जब सोनू उस से मिलने के लिए बठिंडा से पटियाला आई थी तो उस ने उसी दिन से ही अपने घर, अपने कमरे में सोनू को दफनाने के लिए गड्ढा खोदना शुरू कर दिया था.

गड्ढा खोदने के लिए उस ने बाकायदा टीवी पर तेज वौल्यूम में गाने चला दिए और हाथों में दस्ताने, आंखों पर चश्मा लगा कर फावड़े से गहरा गड्ढा खोद दिया. 11-13 अक्तूबर के बीच उस ने हर दिन थोड़ाथोड़ा कर सोनू की कब्र खोदी. 13 अक्तूबर की शाम को वह शौपिंग कर के घर लौटे तो उस ने अपने वही पुराने नाइट्रोजन गैस सिलिंडर को निकाल लिया. उस ने सोनू से कहा कि अगर वह शुद्ध औक्सीजन इन्हेल करेगी तो उस की मदद से चेहरे पर ग्लो आएगा. नादान सोनू भी सुखदीप की ही तरह नवनिंदर के जाल में फंस गई. उस ने उस की बात मान ली और जैसे ही नाइट्रोजन गैस उस ने कुछ मिनटों के लिए सूंघी, उस के कुछ देर बाद वह बेहोश हुई और ज्यादा गैस इन्हेल करने की वजह से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

नवनिंदर ने सोनू की हत्या करने के बाद तुरंत उसे खोदे हुए गड्ढे में डाल दिया. ऊपर से मिट्टी डाल कर जमीन को बराबर किया. फिर टाइल्स का इस्तेमाल कर के उस जगह को एकदम चकाचक बना दिया. उस ने सबूत के कोई निशान नहीं छोड़े. अपना गुनाह कुबूल करने के बाद नवनिंदर की निशानदेही पर पुलिस ने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रैट की मौजूदगी में 368 अर्बन एस्टेट पटियाला, पंजाब (नवनिंदर के घर) पर उस के कमरे में बैड के नीचे के फर्श को उखाड़ा और खुदाई कर के सोनू की लाश बरामद कर ली.

हत्या का परदाफाश करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर 6 दिनों का रिमांड माननीय न्यायाधीश से लिया. रिमांड पर लेने के बाद पुलिस ने उस से विस्तार से पूछताछ की. फिर उसे छपिंदरपाल कौर उर्फ सोनू और पहली पत्नी सुखदीप कौर की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. भोलाभाला दिखने वाला शातिर अपराधी नवनिंदर प्रीतपाल सिंह उर्फ सिद्धू अब सलाखों के पीछे है.  Crime Story

 

Kerala Crime News : पत्नी की हत्या करने के बाद चलाया फेसबुक लाइव

Kerala Crime News : एक ऐसी दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई है, जहां एक पति ने अपनी पत्नी की बेरहमी से हत्या कर डाली. हैरानी की बात यह रही कि वारदात के बाद वह खुद थाने पहुंचा और गुनाह कुबूल कर लिया. आखिर ऐसा क्या हुआ था कि उस ने अपनी ही पत्नी की जान ले ली. इस खौफनाक मर्डर मिस्ट्री के पीछे का रहस्य क्या है? चलिए जानते हैं इस पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह सनसनीखेज घटना केरल के कोल्लम जिले के कूथानाडी गांव से सामने आई है, जहां सोमवार को 42 साल के इशहाक ने अपनी पत्नी शालिनी की चाकू से बेरहमी से हत्या कर डाली. पत्नी जब नहाने गई थी, तब उस ने इस घटना को अंजाम दिया. उस ने पत्नी शालिनी  के छाती और पीठ पर जोरदार हमला किया जिस से उस की मौत हो गई.

हत्या के बाद हुआ फेसबुक लाइव

इशहाक ने हत्या के 2 मिनट बाद फेसबुक लाइव किया और कहा कि पत्नी उस पर कभी भरोसा नहीं करती थी. और उस की बातों पर हमेशा अनदेखी किया करती थी. जब कभी पतिपत्नी के बीच विवाद हो जाता तो वह मायके में अपनी मम्मी के पास जा कर रहने लग जाती. वापस आती तो घर को छोड़ने की धमकी भी दिया करती.

पुलिस के अनुसार, आरोपी का नाम इशहाक का उस की पत्नी लंबे समय से विवाद चल रहा था. मृतका हमेशा आरोपी पति के चरित्र पर शक किया करती थी. आरोपी ने बताया कि गहने गिरवी रख कर गाड़ी खरीदी थी. इस के अलावा आरोपी अपनी पत्नी की राजनीतिक बैठकों और नौकरी करने से नाराज था.

हत्या करने के बाद आरोपी पुलिस स्टेशन पहुंचा और पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. इस के बाद पुलिस तुंरत घटना स्थल पर पहुंची तो शव को देख हैरान थी. देखा कि शालिनी खून से लथपथ पड़ी हुई थी. उस के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है. पुलिस के द्वारा अब विस्तार से जांच करने के लिए एक टीम गठित कर दी गई है. Kerala Crime News