Superstition : लालच अधविश्वास और ठगी

Superstition : आढ़ती सुनील कुमार सूद की लाखों की कमाई थी. इस के बाद भी उस ने लालच में आ कर ऐसा कौन सा गुनाह कर डाला कि लाखों रुपए तो गंवाए ही, जेल भी पहुंच गया. लुधियाना पुलिस कंट्रोल रूम को 20 नवंबर, 2014 की शाम साढ़े सात बजे के करीब फोन द्वारा सुनील कुमार सूद ने सूचना दी. कि 3 लोगों ने धांधरा रोड पर उस से 12 लाख रुपए लूट लिए हैं, तुरंत उस की मदद की जाए. पुलिस कंट्रोल रूम ने तुरंत इस घटना की सूचना थाना सदर पुलिस को दी, क्योंकि घटनास्थल उसी थाना के अंतर्गत था.

थाना सदर पुलिस ने घटना की जानकारी उच्चाधिकारियों को देने के साथ पुलिस चौकी बसंत एवेन्यू को दी, क्योंकि घटनास्थल वहां से करीब था. सरेआम हुई इस लूट की सूचना मिलते ही थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह, पुलिस चौकी बसंत एवेन्यू के चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह, हेडकांस्टेबल जसबीर सिंह, दलबीर सिंह, सुखविंदर सिंह के साथ धांधरा रोड स्थित घटनास्थल पर पहुंच गए.

लूट का शिकार हुए सुनील कुमार सूद अपने बेटों अंकुश और अंकुर के साथ वहां मौजूद थे. थानाप्रभारी जतेंद्रजीत सिंह ने उन से घटना के बारे में पूछा तो सुनील कुमार ने बताया, ‘‘मैं धंधरा गांव का रहने वाला हूं और गांव में ही मेरी आढ़त है. आज पूरे दिन लुधियाना से उगाही कर के मैं घर लौट रहा था तो एक व्यापारी ने पेमेंट देने के लिए फोन किया. उस समय मेरे पास पूरे दिन की उगाही के लगभग 12 लाख रुपए थे. इतनी बड़ी रकम ले कर मैं वापस नहीं जाना चाहता था.

‘‘इसलिए मैं ने गाड़ी रोक कर अपने बेटे अंकुश को फोन किया कि वह आ कर मुझ से रुपए ले जाए, क्योंकि मुझे कुछ और पेमेंट लेने जाना है. फोन कर के मैं गाड़ी से उतर कर बेटे का इंतजार करने लगा. उसी बीच 2 लड़कों ने मुझ से लुधियाना का एक पता पूछा. मैं ने पता बता दिया तो उन लड़कों ने कहा कि मैं उन्हें गाड़ी से लुधियाना तक छोड़ दूं.

‘‘मैं बेटे का इंतजार कर रहा था, इसलिए मैं ने मना कर दिया. मेरी उन लड़कों से बात हो रही थी कि तभी अंकुश आ गया. नोटों वाला बैग निकाल कर मैं ने बेटे को देने के लिए उस की ओर बढ़ाया. बेटा बैग पकड़ पाता, उस के पहले ही उन दोनों लड़कों ने झपट्टा मार कर नोटों वाला बैग मेरे हाथ से छीन लिया. मैं कुछ समझ पाता या उन का विरोध करता, तेजी से एक गोल्डन रंग की वरना कार आई, जिस में दोनों युवक सवार हो कर भाग गए. लेकिन उन के जातेजाते मैं ने कार का नंबर नोट कर लिया था.

इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह और सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह सुनील कुमार सूद से पूछताछ कर ही रहे थे कि एडीसीपी (क्राइम) हरिमोहन सिंह एडीसीपी-3 परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी (देहात) गुरप्रीत सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे थे. इन अधिकारियों के वहां आने की वजह यह थी कि चंद रोज पहले ही बदमाशों ने शहर के एक नामी मिष्ठान व्यापारी के घर फिल्म स्पैशल 26 की तरह फर्जी इन्कमटैक्स अधिकारी बन कर चालीस लाख रुपए की लूट की थी.

आढ़ती सुनील कुमार सूद ने लूट की जो कहानी इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह को सुनाई थी, उन्हें वह काफी संदिग्ध लगी, क्योंकि उस की कहानी में काफी पेंच थे. मसलन वह आबादी से दूर सुनसान जगह पर खड़े हो कर अपने बेटे का इंतजार क्यों कर रहा था? अंधेरे में लुटेरों की कार का नंबर नोट कर लेना. उस ने जिस जगह पर लूट होने की बात बताई थी, वह जगह थोड़ा वीरान जरूर थी, लेकिन उस से कुछ ही दूरी पर मकान और दुकानें थीं, जिस की वजह से वहां चहलपहल थी. कोई भी आदमी, वह भी व्यापारी, चहलपहल वाली जगह छोड़ कर सुनसान में क्यों खड़ा होगा?

बहरहाल, इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह के आदेश पर चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने इस मामले को अपराध संख्या-178 पर भादंवि. की धारा 382-34 के तहत अज्ञात लुटेरों के खिलाफ दर्ज करा कर जांच शुरू कर दी. थानाप्रभारी ने इस मामले की जांच में मदद के लिए लालतो के चौकीप्रभारी सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह को भी लगा दिया था. पुलिस अधिकारियों ने तमाम नाकों और चंडीगढ़हरियाणा की सीमाओं पर कार का नंबर दे कर अलर्ट घोषित करा दिया. इसी के साथ अपने मुखबिरों को भी यह पता लगाने के लिए लगा दिया कि मामले की सच्चाई क्या है?

अगले दिन सुबह सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह ने आढ़ती सुनील कुमार सूद का दुगड़ी के इंडियन बैंक की जिस शाखा में खाता था, वहां सीसीटीवी फुटेज चैक की तो पता चला कि 20 नवंबर को उस का बेटा अंकुश 2 बार बैंक आयागया था. पहली बार वह 1 बज कर 42 मिनट पर बैंक में गया था और 1 बज कर 51 मिनट पर बाहर निकला था. दूसरी बार वह 3 बज कर 8 मिनट पर बैंक गया था तो 3 बज कर 28 मिनट पर बाहर निकला था. बैंक से जब उस के आनेजाने के बारे में पता किया गया तो पता चला कि उस दिन अंकुश ने इंडियन बैंक की उस शाखा से 10 लाख रुपए निकलवाए थे. इस बात ने सुनील कुमार सूद की उस बात को झूठा साबित कर दिया कि उस ने पूरे दिन घूमघूम कर व्यापारियों से उगाही की थी.

पुलिस को शुरू से ही यह मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने हेडकांस्टेबल जसबीर सिंह और सुखविंदर सिंह को सुनील के बारे में पता लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी. दोनों ने अपने सूत्रों से जो जानकारी जुटाई, उस के अनुसार सुनील कुमार का उठनाबैठना गुरविंदर, राजवीर, कुलदीप और शिवपाल के साथ था. ये चारों युवक आपराधिक प्रवृत्ति के थे और पिछले लगभग 2 महीने से सुनील के संपर्क में थे. इन चारों के अलावा एक राजमिस्त्री बलबीर इधर कुछ दिनों से सुनील के पास कुछ ज्यादा ही आताजाता था.

दूसरी ओर सबइंसपेक्टर गुरबख्शीश सिंह ने लूट में प्रयुक्त कार का पता लगा लिया था. वह कार फजिल्का के रहने वाले जतिंद्र सिंह की थी. जतिंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह कार उस ने दिल्ली से खरीदी थी और कुछ दिनों पहले गुरविंदर उस से मांग कर ले गया था. अब तक हुई जांच से काफी हद तक यह साफ हो गया था कि लूट नहीं हुई थी, बल्कि लूट का ड्रामा रचा गया था. अब सवाल यह उठा कि क्यों? इसी क्यों का पता लगाने के लिए चौकीप्रभारी पवित्र सिंह राजमिस्त्री बलबीर को पूछताछ के लिए पुलिस चौकी ले आए.

पूछताछ में पहले तो उस ने इस मामले में अनभिज्ञाता प्रकट की. उस ने कहा कि वह किसी सुनील कुमार सूद को नहीं जानता. चूंकि पवित्र सिंह को सच्चाई का पता चल गया था, इसलिए उन्होंने उस से स्वीकार करा लिया कि वह सुनील कुमार सूद को ही नहीं, गुरविंदर, राजवीर, कुलदीप और शिवपाल को भी जानता है. इस के बाद उस ने लूट के नाटक की जो कहानी सुनाई, वह अंधविश्वास, लालच और ठगी के तानेबाने में बुनी थी. लुधियाना के धंधरा गांव का रहने वाला बलबीर राजमिस्त्री का काम कर के अपने परिवार का गुजरबसर करता था. उस के लिए परेशानी यह थी कि काफी मेहनत करने के बाद भी उस की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था.

राजमिस्त्री का काम करने के साथसाथ उस ने मकान बनाने के छोटेमोटे ठेके भी लिए, लेकिन इस में भी उसे कोई खास लाभ नहीं हुआ. परेशान बलबीर पीरबाबाओं के यहां चक्कर लगाने लगा. उसे पूरा विश्वास था कि इन पीरबाबाओं की कृपा से एक न एक दिन उस के दिन जरूर बदल जाएंगे. किसी पीर की मजार पर एक दिन उसे किसी ने बताया कि वह एक ऐसे तांत्रिक को जानता है, जो तंत्रमंत्र से नोटों को दोगुना कर देता है. अगर किसी के पास सोनाचांदी है तो उसे भी वह अपने मंत्रों की ताकत से दोगुना कर देता है.

यह जानकारी मिलने के बाद बलबीर के मन में उथलपुथल मच उठी. उस ने उस आदमी से तांत्रिक से मिलवाने का आग्रह किया. काफी टालमटोल के बाद आखिर उस आदमी ने बलबीर को गिद्दड़बाहा के रहने वाले सुरजीत सिंह के बेटे गुरविंदर सिंह से मिलवा दिया. गुरविंदर सिंह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का काम करता था. बलबीर ने उस के कहने पर कुछ रकम अपने घर से तो कुछ ब्याज पर ले कर कुल 80 हजार रुपए दोगुना करने के लिए उसे दे दिए. वैसे तो गुरविंदर सिंह एक तांत्रिक के रूप में काफी प्रसिद्ध था, लेकिन उसे तंत्रमंत्र का कखग भी नहीं आता था. वह तंत्रमंत्र के नाम पर ठगी करता था.

वह अपने साथियों राजवीर सिंह उर्फ राजा, शिवाल सिंह उर्फ काला तथा कुलदीप सिंह उर्फ कीपा की मदद से अकल के अंधे, अंधविश्वास में जकड़े लालची लोगों को नोट दोगुने करने का झांसा दे कर उन के रुपए ठग लेता था. बहरहाल, घर बैठे जब 80 हजार का बलबीर नामक बकरा उस के पास आया तो उस ने उसे हलाल कर दिया. नोट ले कर एक लिफाफा बलबीर को थमा कर उस ने कहा, ‘‘इसे ले जा कर घर में पूजास्थल पर रख देना और 3 दिनों बाद खोलना. तुम्हारे रुपए दोगुने हो जाएंगे.’’

बलबीर लिफाफा ले कर घर आ गया और उसे पूजास्थल पर रख दिया. लेकिन जैसा तांत्रिक गुरविंदर सिंह ने कहा था, वैसा नहीं हुआ. लिफाफे में रुपयों की जगह राख निकली. बलबीर को समझते देर नहीं लगी कि उस के साथ ठगी हुई है. लेकिन यह ऐसा मामला था कि वह पुलिस के पास भी नहीं जा सकता था. इसलिए उस ने गुरविंदर के पास जा कर अपने रुपए मांगे. तब गुरविंदर ने कहा कि उस ने उस के द्वारा बताए समय पर लिफाफा नहीं खोला, इसीलिए सारे रुपए राख हो गए. लेकिन जब बलबीर ने उसे धमकी दी कि वह उसे जगहजगह बदनाम कर देगा और पुलिस के पास भी जाएगा, तब जा कर गुरविंदर ने उस से रुपए लौटाने का वादा कर लिया. लेकिन जब काफी समय तक उस ने बलबीर के रुपए नहीं लौटाए तो बलबीर को चिढ़ होने लगी, क्योंकि उस पर ब्याज चढ़ रहा था.

बलबीर ने गुरविंदर पर रुपए लौटाने के लिए दबाव बनाया तो एक दिन गुरविंदर ने साफसाफ कह दिया. ‘‘भाई साफ बात तो यह है कि जब तक हमारे पास कोई नया शिकार नहीं आता, तब तक हम तुम्हारे रुपए नहीं लौटा सकते. अगर तुम्हें रुपयों की ज्यादा जल्दी है तो तुम्हीं कोई शिकार हमारे पास ले आओ.’’

इस के बाद बलबीर किसी शिकार की तलाश में लग गया. अचानक उसे आढती सुनील कुमार सूद की याद आई. सुनील उन दिनों संत समुंद्र सिंह नगर में नई कोठी बनवा रहा था. बलबीर उसे अच्छी तरह जानता था, क्योंकि कई दिनों तक उस ने उस की नई कोठी पर काम किया था. बलबीर जानता था कि सुनील लालची किस्म का आदमी है और नई कोठी बनवाने की वजह से उसे रुपयों की जरूरत भी है.

बलबीर सिंह नोट दोगुने करने की कहानी सुना कर सुनील पर चारा डालने लगा. जब सुनील उस के झांसे में नहीं आया तो गुरविंदर ने विश्वास जमाने के लिए अपने सहयोगियों शिवपाल और कुलदीप को भेजा. शिवपाल और कुलदीप ने सुनील को झूठी कहानियां गढ़ कर सुनाई कि वे किस तरह व्यापार में घाटा होने पर कंगाल हो गए थे और किस तरह तांत्रिक गुरविंदर ने उन का धन दोगुना कर के उन्हें बचाया था. इस तरह कुछ दिनों की मेहनत के बाद सुनील उन के जाल में फंस कर अपना धन दोगुना करवाने के लिए राजी हो गया.

योजना के अनुसार, 20 नवंबर, 2014 को सुनील ने गुरविंदर को परवोवाल रोड जी.के. एस्टेट स्थित अपने घर बुलाया. तय समय पर गुरविंदर अपने साथियों शिवपाल, कुलदीप और राजवीर के साथ सुनील के घर पहुंच गया. सभी ने एक खाली कमरे में आसन जमा कर तंत्रमंत्र का ड्रामा शुरू कर दिया. पूजा सामग्री के साथ कमरे में एक खाली कनस्तर भी रखा गया था. कुछ देर पूजापाठ करने के बाद गुरविंदर ने अभिमंत्रित जल खाली कनस्तर पर छिड़क कर उसे शुद्ध किया और सुनील द्वारा दिए गए 10 लाख रुपए उस में रख कर उस में ताला लगा चाबी सुनील को देते हुए कहा, ‘‘लो बच्चा, हम ने अपनी तंत्र शक्ति के माध्यम से तुम्हारा काम कर दिया है. कुछ देर में ये 10 लाख रुपए 20 लाख हो जाएंगे. लेकिन बच्चा हमें भूलना मत. कभीकभार सेवा कर दिया करना.’’

‘‘बिलकुल महाराज, मैं आप को आजीवन याद रखूंगा.’’ सुनील ने गुरविंदर के चरणों में माथा टेकते हुए कहा.

‘‘उठो बच्चा, ध्यान से सुनो. अब से ठीक 15 मिनट बाद यह ताला खोल रुपए निकाल लेना. इस में न एक सैकेंड की जल्दी होनी चाहिए और न देर.’’

सुनील को सारी बातें समझा कर गुरविंदर, शिवपाल, कुलदीप और राजवीर अपनी गाड़ी से चले गए. 15 मिनट बाद जब सुनील ने कनस्तर का ताला खोल कर देखा तो उस में रुपए की जगह एक थैले में राख भरी रखी थी. यह देख कर सुनील के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह समझ गया कि नोट दोगुने करने का लालच दे कर गुरविंदर उसे लूट ले गया है. वह इतना घबरा गया कि उस की समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करे? जब उसे कुछ नहीं सूझा तो आननफानन में उस ने लूट की झूठी कहानी गढ़ कर ठगों को गिरफ्तार कराने के लिए गाड़ी का नंबर दे कर पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा दिया.

लेकिन उस की कहानी में इतने पेंच थे कि इंसपेक्टर जतेंद्रजीत सिंह को ताड़ते देर नहीं लगी कि यह ड्रामा कर रहा है. बलबीर की निशानदेही पर पुलिस ने सुनील कुमार सूद, गुरविंदर, कुलदीप, राजवीर और शिवपाल को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में सुनील कुमार ने बताया कि रुपए उस ने अपने हाथों से कनस्तर में रख कर ताला लगाया था और वहीं बैठा भी रहा. गुरविंदर ने रुपए कनस्तर से कब निकाल कर राख वाला झोला रख दिया, उसे पता ही नहीं चला.

सभी अभियुक्तों से पूछताछ के बाद इंसपेक्टर जतेंद्रजीत के आदेश पर चौकीप्रभारी पवित्र सिंह ने लूट के लिए दर्ज मुकदमे को खारिज कर नया मुकदमा पुलिस को गुमराह करने और झूठ बोलने की धाराओं के तहत दर्ज कराया. इस के बाद सभी अभियुक्तों को ड्यूटी मजिस्ट्रेट मिस शगुन की अदालत में पेश कर के 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में अभियुक्तों की निशानदेही पर सबइंसपेक्टर पवित्र सिंह ने कार, 7 लाख 15 हजार रुपए नगद और खाली कनस्तर बरामद कर लिया. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद 2 दिसंबर, 2014 को पुन: सभी अभियुक्तों को जिला मजिस्ट्रेट मनी अरोड़ा की अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. Superstition

— कथा पुलिस सूत्रों प

Crime Story : घिनौना खेल एक अपराधी का

Crime Story : गांव में दबंगई दिखाने के चक्कर में रामउजागर ऐसा हिस्ट्रीशीटर बदमाश बन गया कि उस के खिलाफ 45 मामले दर्ज हो गए. फिर उस ने पुलिस से बचने के लिए ऐसी फूलप्रूफ योजना बनाई कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के बक्शा थाना क्षेत्र में एक गांव पड़ता है चुरावनपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जातियों की मिलीजुली आबादी है, लेकिन चौहानों की संख्या यहां दूसरी जातियों से ज्यादा है. इसी गांव के रामकिशोर चौहान ने अपने सभी बच्चों को ठीक से पढ़ायालिखाया.

वे चाहते थे कि उन के सभी बच्चे पढ़लिख कर किसी काबिल बनें. लेकिन उन के बेटे रामउजागर उर्फ कल्लू ने तो कुछ और ही सोच रखा था. घरपरिवार के दबाव के बावजूद वह ज्यादा नहीं पढ़लिख सका. जैसेजैसे उस की उम्र बढ़ती गई, उस की सोच भी बदलती गई. वह खापी कर घर से निकलता और दिनभर मौजमस्ती कर के देर शाम घर लौट आता. धीरेधीरे गांव के कई आवारा लड़के उस की सोहबत में आ गए. इन लोगों के लिए गुंडागर्दी और लोगों से मारपीट करना आम बात हो गई. उस की इन हरकतों को देख कर रामकिशोर ने उस की नौकरी एक ईंट भट्टे पर लगवा दी, ताकि वह बुरी सोहबत से बचा रहे.

रामउजागर ने नौकरी तो कर ली, लेकिन इस काम में उस का मन नहीं लगता था. उसे आवारागर्दी में जो आनंद आता था, वह बंद हो गया. इसी बीच उसे शराब पीने की लत लग गई. अपनी इस लत को पूरी करने के लिए वह चोरी भी करने लगा. मारपीट करना तो उस की आदत में शामिल था ही. चोरीचकारी की शिकायतें भले ही रामकिशोर के पास नहीं आ पाती थीं, लेकिन बेटे द्वारा की गई मारपीट की बातें उन्हें अकसर पता चलती रहती थीं. इस से परिवार को भी कई तरह की मुशकिलों का सामना करना पड़ता था.  जब रामउजागर का आतंक बढ़ने लगा तो उस की शिकायतें थाने तक पहुंचने लगीं. एक बार उस की शिकायत पुलिस के पास पहुंची तो बक्शा थाने की पुलिस ने उसे उठा लिया.

उस के पास से पुलिस ने चाकू बरामद किया. पुलिस ने उस के खिलाफ 25 आर्म्स एक्ट का केस दर्ज किया. यह 1983 की बात है. यह छोटा सा मामला था, इसलिए जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जेल से आने के बाद सुधरने के बजाय वह और बिगड़ गया. वह बेखौफ हो कर वारदातें करने लगा, जिस से कुछ ही दिनों में उस पर बक्शा थाने में 9 केस दर्ज हुए और 1998 में वह थाने का हिस्ट्रीशीटर बदमाश घोषित हो गया. हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद जब पुलिस का दबाव बढ़ने लगा तो रामउजागर जौनपुर से मध्य प्रदेश के शहर जबलपुर चला गया. 22 अक्तूबर, 2014 को जौनपुर के पुलिस अधीक्षक बबलू कुमार अपने औफिस में बैठे दैनिक फाइलें निपटा रहे थे.

तभी पहरे पर तैनात सिपाही ने आ कर बताया कि उन से मध्य प्रदेश पुलिस के 2 पुलिसकर्मी मिलने आए हैं. साहब के हां करने पर उस ने उन दोनों को अंदर भेज दिया. पुलिस अधीक्षक ने उन दोनों को बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘कहिए, क्या कहना चाहते हैं?’’

‘‘सर, हम लोग मध्य प्रदेश, जबलपुर के थाना जीआरपी से आए हैं. रामउजागर चौहान जिस की उम्र करीब 50-55 वर्ष होगी, ने हमारे क्षेत्र में जहरखुरानी की कई वारदातों को अंजाम दिया है. पकड़े जाने पर वह कई बार जेल भी जा चुका है, लेकिन जमानत मिलने के बाद वह फिर से जहरखुरानी की घटनाओं को अंजाम दे रहा है. हमारे पास उस की कुर्की का आदेश है. हमें पता चला है कि इन दिनों वह जनपद जौनपुर के बक्शा थाना क्षेत्र के अपने गांव चुरावनपुर में छिपा हुआ है.’’

उन दोनों की बात सुन कर एसपी बबलू कुमार ने बक्शा थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को फोन मिलवा कर कहा कि रामउजागर चौहान के बारे में पता लगाएं और जबलपुर जीआरपी से आए सबइंस्पेक्टर आर.पी. सिंह की पूरी मदद करें. साथ ही अपनी काररवाई से भी अवगत कराएं. एसपी से बात होने के बाद थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने चुरावनपुर गांव का आपराधिक रजिस्टर मंगा कर उस पर नजर डाली तो उन्हें पहली ही नजर में पता चल गया कि रामउजागर बक्शा थाने का हिस्ट्रीशीटर है.

जबलपुर जीआरपी से आए सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह से बातचीत के बाद पता चला कि रामउजागर के खिलाफ 45 मुकदमे दर्ज हैं. प्रशांत कुमार तब आश्चर्य में रह गए, जब उन्हें पता चला कि रामउजागर तो 3 साल पहले ही मर चुका है. फाइल देखने के बाद प्रशांत कुमार ने गांव चुरावनपुर के प्रधान राजबहादुर पाल को फोन कर के थाने आने को कहा. ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ पाता, इस से पहले ही जबलपुर जीआरपी के सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह अपने सहयोगी के साथ थाना बक्शा पहुंच गए. उन्होंने एसपी बबलू कुमार का रेफरेंस दे कर थानाप्रभारी प्रशांत कुमार को अपने आने का मकसद बता दिया.

थानाप्रभारी बक्शा और जबलपुर जीआरपी से आए आर.पी. सिंह रामउजागर के बारे में बातें कर ही रहे थे कि ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल आ गए. जब प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उन्हें बताया कि जबलपुर जीआरपी को उन के गांव के रामउजागर की तलाश है और वे उस के घर की कुर्की का आदेश ले कर आए हैं तो वह आश्चर्य से बोले, ‘‘साहब, वह तो 3 साल पहले मर चुका है, उस के घर की कुर्की कर के क्या होगा?’’

ग्रामप्रधान ने यह बात बड़े विश्वास से कही थी. उन का कहना था कि रामउजागर का अंतिम संस्कार उन के सामने किया गया था. ग्रामप्रधान की बात पर विश्वास कर के थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने उन से लिखित में रामउजागर का मृत्यु प्रमाणपत्र ले लिया. ग्रामप्रधान वापस लौट गया. ग्रामप्रधान द्वारा रामउजागर की मृत्यु के बारे में लिखित पत्र दिए जाने के बाद भी सबइंसपेक्टर आर.पी. सिंह यह मानने को तैयार नहीं थे कि वह मर चुका है. उन्होंने जातेजाते अपनी यह शंका थानाप्रभारी प्रशांत कुमार श्रीवास्तव को भी बता दी.

उन के जाने के बाद प्रशांत कुमार ने इस मुद्दे पर गहराई से सोचा तो उन्हें यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लगी कि जब रामउजागर 3 साल पहले मर चुका है तो 1998 में खोली गई उस की चार्जशीट क्यों नहीं बंद की गई. मन में संदेह उठा तो उन्होंने पुराना रिकौर्ड चेक किया. उन्हें यह देख कर आश्चर्य हुआ कि रामउजागर के मरने के बाद भी थाने में उस के खिलाफ 7 मुकदमें दर्ज हुए थे. सोचविचार के बाद प्रशांत कुमार ने अपने एक मुखबिर को सच्चाई पता लगाने का काम सौंपा. 2 दिन बाद मुखबिर ने थाने आ कर बताया कि रामउजागर मरा नहीं है, बल्कि उस ने पुलिस से बचने के लिए मरने का नाटक किया था. उस ने यह भी बताया कि वह अब भी अपराधों में लिप्त है. इतना ही नहीं, उस ने थानाप्रभारी को रामउजागर का मोबाइल नंबर भी दे दिया.

प्रशांत कुमार श्रीवास्तव ने उस नंबर पर फोन लगाया. दूसरी ओर फोन की घंटी भी बजी और रिसीव भी किया गया. लेकिन थानाप्रभारी ने कोई बात करने के बजाय 2 बार ‘हैलो हैलो’ कह कर फोन काट दिया. इस से उन्हें यकीन हो गया कि रामउजागर वाकई जिंदा है. विश्वास होने के बाद उन्होंने यह बात एसपी बबलू कुमार को बता दी. यह जान कर उन्हें भी आश्चर्य हुआ कि 45 अपराधों का आरोपी लोगों की नजरों में खुद को मरा हुआ साबित कर के अब भी अपराध कर रहा है. निस्संदेह मामला गंभीर था. उन्होंने  रामउजागर को पकड़ने के लिए क्राइम ब्रांच और थाना पुलिस की एक संयुक्त टीम बनाई, साथ ही आदेश दिया कि जैसे भी हो जल्दी से जल्दी रामउजागर को गिरफ्तार करें.

एसपी बबलू कुमार के निर्देश पर संयुक्त टीम ने रामउजागर को अपने जाल में फांसने की योजना बना ली. जब सारी तैयारी हो गई तो 9 नवंबर, 2014 को थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर उस से बात की. बातचीत के दौरान उन्होंने ठेठ गंवई अंदाज में कहा, ‘‘रामउजागर, मैं तुम्हारा भाई बोल रहा हूं. भाई बहुत बीमार है, चुपचाप आ कर मिल जाओ.’’

यह सुन कर रामउजागर ने कहा, ‘‘ठीक है, मैं कल शाम को आता हूं. ध्यान रखना किसी को कानोंकान खबर न हो. मैं भाई से मिल कर भोर में निकल जाऊंगा.’’

‘‘चिंता करने की जरूरत नहीं है, किसी को पता नहीं चलेगा.’’ कह कर प्रशांत कुमार ने फोन काट दिया.

बात होने के बाद पुलिस ने सारी तैयारी कर ली. दूसरे दिन यानी 10 नवंबर को पुलिस टीम ने थाना क्षेत्र के सरायहरखू रेलवे स्टेशन पर अपना जाल बिछा दिया. रामउजागर को पहचानने वाला एक मुखबिर पुलिस के साथ था. सभी लोग सादे कपड़ों में थे. ट्रेन आने से थोड़ी देर पहले थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने रामउजागर के नंबर पर फोन मिला कर कहा, ‘‘कहां पहुंचे भैया, मैं स्टेशन पर तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘बस, थोड़ी देर में पहुंचने वाला हूं, मुझे गेट के पास मिलना.’’

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘और हां, मैं ने मुंह पर कपड़ा बांध रखा है, ताकि कोई पहचान न सके. इस बात का ध्यान रखना.’’

शाम को 5 बज कर 20 मिनट पर सुलतानपुर की ओर से आने वाली गाड़ी जब प्लेटफार्म नंबर 1 पर आ कर रुकी और यात्री उतरनेचढ़ने लगे तो प्रशांत कुमार के नंबर पर फोन आया. फोन रामउजागर का ही था. वह बोला, ‘‘भैया, मैं ट्रेन से उतर गया हूं, तुम गेट के पास ही हो न?’’

‘‘हां, गेट पर ही खड़ा इंतजार कर रहा हूं.’’ कह कर थानाप्रभारी ने फोन काट दिया. थोड़ी देर बाद पुलिस की नजर एक अधेड़ उम्र के आदमी पर पड़ी, जो मुंह पर कपड़ा लपेटे, एक बैग और एक ब्रीफकेस उठाए गेट की ओर आ रहा था. मुखबिर ने उसे पहचान कर बताया कि वही रामउजागर है. पुलिस ने उसे दबोच लिया. अचानक हुई इस काररवाई से रामउजागर हतप्रभ रह गया. हिरासत में ले कर रामउजागर के बैग और ब्रीफकेस की तलाशी ली गई तो उस के पास से 1 चाकू, 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात, एक फरजी पहचान पत्र और 205 ग्राम नशीला पाउडर बरामद हुआ. पुलिस उसे गिरफ्तार कर के थाने ले आई.

बक्शा बाजार से किसी तरह यह खबर रामउजागर के गांव चुरावनपुर पहुंच गई. सुन कर लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि वे लोग जिस रामउजागर के मृत्युभोज में शामिल हुए थे, वह जिंदा है और उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है. इस बात की पुष्टि के लिए गांव के कुछ लोग रात 9 बजे ही थाना बक्शा पहुंचे, लेकिन पुलिस ने उन्हें थाने में नहीं घुसने दिया. इस की जगह थानाप्रभारी ने उस इलाके के सिपाही को निर्देश दिया कि अगले दिन 9 बजे वह चुरावनपुर के ग्रामप्रधान और रामउजागर के पिता और भाई को थाने ले आए.

दूसरे दिन यानी 11 नवंबर, 2014 को रामउजागर के पिता रामकिशोर चौहान और ग्रामप्रधान राजबहादुर पाल गांव के कुछ लोगों के साथ थाने पहुंच गए. थानाप्रभारी प्रशांत कुमार ने एक सिपाही को बुला कर लौकअप से रामउजागर को लाने को कहा. उसे लाया गया तो उसे जीवित देख कर गांव के लोग आश्चर्यचकित रह गए. रामउजागर शरम के मारे सिर झुकाए खड़ा था. पूछताछ में रामउजागर ने अपनी जो कहानी बताई, वह कुछ इस तरह थी. रामउजागर की हिस्ट्रीशीट खुलने के बाद इलाके में कोई अपराध होने पर पुलिस पूछताछ के लिए उसे ही उठा कर लाती. पुलिस प्रताड़ना से तंग आ कर रामउजागर अपना गांव छोड़ कर जबलपुर चला गया.

वहीं पर उस की मुलाकात किशन नाम के एक युवक से हुई. किशन जबलपुर की गुप्तेश्वर रोड का रहने वाला था. रामउजागर ने उस से रोजी रोजगार की बात की तो वह बोला, ‘‘चिंता मत करो, ऐसा रोजगार बताऊंगा कि पैसे की कोई कमी न रहे. बस थोड़ी सी मेहनत और चालाकी की जरूरत है.’’

‘‘बताइए, क्या करना है.’’ रामउजागर ने विनती की, ‘‘बताओ दोस्त, मैं कुछ भी करने को तैयार हूं. कभी भी तुम्हारा उपकार नहीं भूलूंगा.’’

इस पर किशन रामउजागर को पाउडर का एक पैकेट पकड़ाते हुए बोला, ‘‘यह लो और रेलवे स्टेशन की ओर निकल जाओ. वहां तुम्हें ट्रेनों में काम करना है. वहां जो भी ठीकठाक पैसे वाला आदमी दिखाई दे, उस से दोस्ती करो और चाय वगैरह में इस पाउडर में से थोड़ा सा मिला कर उसे चुपके से पिला देना. थोड़ी देर में वह बेहोश हो जाएगा. इस के बाद उस का माल ले कर चलते बनना.’’

‘‘और मान लो, अगर मैं पकड़ा गया तो?’’ रामउजागर ने कहा तो किशन बोला, ‘‘अरे भाई, पैसा कमाना है तो डर तो रहेगा ही, लेकिन सावधानी बरतेंगे तो पकड़े जाने का खतरा नहीं रहेगा. मैं ने रास्ता बता दिया है, आगे तुम्हारी मरजी.’’

कुछ देर शांत रहने के बाद रामउजागर उठा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया. स्टेशन पर पहुंच कर उस ने आसपास सरसरी नजर डाली तो एक व्यक्ति एक भारीभरकम बैग लिए बैठा दिखाई दिया. वह उसी की बगल में जा कर बैठ गया. कुछ देर खामोश बैठे रहने के बाद रामउजागर उस से गाडि़यों के बारे में बात करने लगा. बातों का सिलसिला जुड़ा तो वह अपना बैग उस के बैग के पास रखते हुए बोला, ‘‘खयाल रखना जरा, मैं कैंटीन से चाय ले कर आता हूं.’’

थोड़ी देर बाद वह वापस लौटा तो उस के हाथों में चाय के 2 प्याले थे. उस ने एक प्याला उस आदमी को थमा दिया और दूसरा खुद ले कर उस के साथ बैठ गया. दोनों ने साथसाथ चाय पी. चाय पीने के बाद वह व्यक्ति एक ओर लुढ़कने लगा. यह देख रामउजागर ने इधरउधर नजर दौड़ाई. फिर उस आदमी को हिलाडुला कर देखा. चाय में नशीला पाउडर होने की वजह से उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस पर कोई प्रतिक्रिया न होती देख वह धीरे से अपना और उस का बैग ले कर वहां से चलता बना. जहर खुरानी का यह उस का पहला दिन था, इसलिए अपनी सफलता पर वह फूला नहीं समा रहा था. अपने ठिकाने पर आ कर जब उस ने बैग खोला तो उस में काफी मात्रा में नकदी और कपड़ों सहित कई कीमती सामान निकले.

बस फिर क्या था, उस दिन के बाद उस का जहरखुरानी का यह सिलसिला चल निकला. कभी इस शहर तो कभी उस शहर में वह वारदात पर वारदात को अंजाम देने लगा. इस तरह धीरेधीरे उस ने किशन से अलग हो कर अपना गिरोह बना लिया. उस के दोस्तों की संख्या भी अच्छीखासी हो गई. इसी बीच अचानक वह एक दिन वह पुलिस के हत्थे चढ़ गया. लेकिन जल्दी ही उसे जमानत मिल गई. जमानत मिलने के बाद वह फिर जौनपुर आ गया. लेकिन उस का अपराधी दिमाग उसे कहां शांत बैठने देने वाला था. बक्शा पुलिस ने उसे आर्म्स एक्ट में गिरफ्तार कर लिया. लेकिन इस मामले में भी उसे जमानत मिल गई.

जेल से बाहर आने के बाद वह मानिकपुर, बांदा आ गया और जहरखुरानी की वारदातों को अंजाम देने लगा. जौनपुर के अलावा वह बांदा, कानपुर, सुलतानपुर, सीतापुर, इलाहाबाद, वाराणसी में भी वारदातें करने लगा. धीरेधीरे उस का आतंक उत्तर प्रदेश से बाहर निकल कर मध्य प्रदेश और मुंबई तक फैल गया. पुलिस उस की कारगुजारियों से परेशान थी. रामउजागर इन प्रदेशों में ट्रेन और बस में सफर करने वाले सहयात्रियों के साथ मधुर संबंध बना कर उन्हें खानेपीने की चीजों में नशीला पदार्थ मिला कर उन के सामान पार कर देता था. उस के अपराधों का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा था. कई बार वह पकड़ा भी गया, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद वह केस की तारीखों पर नहीं जाता था. इस के लिए उस के खिलाफ कई वारंट भी निकाले गए.

अदालतों में न जाने से रामउजागर पर कानून का शिकंजा कसता जा रहा था. आए दिन उस के घर पुलिस आने से उस के घर वाले भी परेशान थे. तभी अचानक एक दिन उस ने एक व्यक्ति की हत्या की खबर पढ़ी. हत्या सुलतानपुर के एक व्यक्ति की हुई थी, जिस की शिनाख्त नहीं हुई थी. इस खबर को पढ़ कर उस के दिमाग में साजिश का तानाबाना बुनने लगा. उन दिनों रामउजागर जौनपुर के ही कुल्हनामउ गांव में स्थित अपनी बहन की ससुराल आताजाता रहता था और लोगों से चोरीछिपे वह 2-4 दिन वहीं ठहर जाता था. घरपरिवार के लोग भी उस से वहीं आ कर मिल लिया करते थे. बहन के घर से उस ने चुपके से अपने घर संदेशा भिजवाया कि उस से कानपुर आ कर मिलें. वे लोग उस से मिलने आए तो उस ने उन्हें अखबार में छपी वह खबर दिखाई.

फिर कहा कि वे लोग सुलतानपुर जाएं और अज्ञात लाश की शिनाख्त उस की लाश के रूप में कर दें. इस से पुलिस के आए दिन घर आने का झंझट खत्म हो जाएगा. रामउजागर की राय पर उस के घर वालों ने ऐसा ही किया. लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर पुलिस ने उस व्यक्ति की लाश की शिनाख्त रामउजागर के रूप में कर दी. साथ ही बता भी दिया कि वह अपराधी प्रवृत्ति का था. पुलिस मामले में खानापूर्ति करना चाहती थी, इसलिए उस ने उन की बात सच मान ली. इस के बाद रामउजागर के घर वालों ने बाकायदा उस की तेरहवीं वगैरह की. कोर्ट में हाजिर न होने की वजह से रामउजागर के वारंट भी कटे हुए थे.

रामउजागर की तलाश में पुलिस उस के घर आती या फिर कुर्की वारंट का चक्कर होता तो घर वाले और ग्रामप्रधान उस के मरने की बात बता कर पल्ला झाड़ लेते. उधर रामउजागर अपना जहरखुरानी का काम बाकायदा करता रहा. पूछताछ में रामउजागर ने बताया कि उस से चांदी के जो जेवरात बरामद हुए हैं वे उस ने लखनऊ में चारबाग स्टेशन से वाराणसी जा रहे एक सेठ को नशीला पदार्थ खिला कर लूटे थे और उस का बैग ले कर सुलतानपुर स्टेशन पर उतर गया था. इस बैग में उसे 3.2 किलोग्राम चांदी के जेवरात और 88 हजार रुपए नकद मिले थे.

पकड़े जाने के बाद रामउजागर को पत्रकारों के सामने पेश किया गया, जहां उस ने अपना जुर्म स्वीकारते हुए बताया कि वह लोगों को लूटने के लिए नशीले पदार्थों के अलावा बिस्किट आदि का भी प्रयोग करता था. बिस्किट और पैकेट के पेय पदार्थों में वह सिरिंज के जरिए नशीला पदार्थ डाल देता था. इस से लोगों को उस पर शक भी नहीं होता था. रामउजागर की कहानी उसी की जुबानी सुन पत्रकार भी दंग रह गए. 45 मामलों में वांछित शातिर अपराधी और बक्शा थाने के हिस्ट्रीशीटर व जौनपुर जिले के टापटेन अपराधियों की सूची में 5वें नंबर के इस अपराधी के पकड़े जाने से पुलिस खुश थी. जुर्म स्वीकारने के बाद पुलिस ने रामउजागर को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. Crime Story

Crime in Society : क्रिकेट खिलाड़ी ने बनाया चोरी का अर्द्धशतक

Crime in Society : एकांत बंसल क्रिकेट का उभरता हुआ खिलाड़ी था. उचित मार्गदर्शन मिलने पर उस की प्रतिभा निखर सकती थी लेकिन उस के सामने एक ऐसी समस्या आन पड़ी कि उस ने अपने कदम पिच के बजाय चोरी की तरफ बढ़ा दिए और…

रात के करीब ढाई बजे थे. दिल्ली के मध्य जिला के थाने पहाड़गंज को पुलिस नियंत्रण कक्ष से सूचना मिली कि क्षेत्र के नेहरू बाजार में एक दुकान का ताला तोड़ने वाले चोरों ने 2 चौकीदारों की पिटाई की है. यह सूचना मिलते ही थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एएसआई हरपाल सिंह नेहरू बाजार की ओर रवाना हो गए. नेहरू बाजार थाने से दक्षिणपूर्वी दिशा में करीब 2 किलोमीटर दूर महावीर मंदिर के पास है. पुलिस वहां पहुंची तो मंदिर के आसपास 2-3 लोग मिले. मंदिर के पास ही सड़क पर एक जगह खून पड़ा मिला. उन लोगों ने बताया कि एक दुकान का ताला तोड़ रहे कुछ चोरों ने 2 चौकीदारों को पीट कर घायल कर दिया.

जिन्हें पुलिस नियंत्रण कक्ष की वैन लेडी हार्डिंग अस्पताल ले गई है. जिस दुकान का चोर ताला तोड़ रहे थे पुलिस वहां भी गई. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. उस दुकान के शटर का एक ताला टूटा पड़ा था. यह बात 12-13 नवंबर, 2014 की रात की है. थानाप्रभारी एएसआई हरपाल सिंह को घटनास्थल पर छोड़ कर लेडी हार्डिंग अस्पताल पहुंच गए. वहां डाक्टरों ने बताया कि एक चौकीदार भगत शाह की अस्पताल में ही मौत हो गई है जबकि दूसरे घायल चौकीदार करन बहादुर शाह का इलाज चल रहा है. थानाप्रभारी करन बहादुर शाह के पास गए. वह बयान देने की हालत में था.

करन बहादुर ने पुलिस को बताया कि वह पहाड़गंज के 6 टूटी चौक पर चौकीदारी करता है. रात करीब 2 बजे उसे प्यास लगी तो वह नेहरू मार्केट में महावीर मंदिर के प्याऊ पर पानी पीने गया. उसे देख कर उस का चाचा भगत शाह भी उस के पास आ गया था. भगत शाह पास में ही स्थित रतन मार्केट सब्जीमंडी में चौकीदारी करता था. पानी पीने के बाद दोनों बातें कर रहे थे, तभी उन की नजर नेहरू बाजार में खड़ी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार पर गई. उस कार के पास ही 2 लड़के हाथ में लोहे की रौड लिए खड़े थे. एक उस सैंट्रो कार में था जबकि एक अन्य युवक एक दुकान के ताले तोड़ रहा था. यह देख कर वे चौंके. उन्होंने उन युवकों को टोका तो वे तीनों उन पर टूट पड़े और रौड से पिटाई करने लगे.

करन ने बताया कि एक हमलावर ने रौड से भगत शाह के सिर पर वार किया तो उन का सिर फट गया और वह नीचे गिर गए. दूसरे हमलावर ने उस के ऊपर वार किया तो उस ने हाथ से उस की रौड रोकने की कोशिश की जिस से उस के दाहिने हाथ के अंगूठे में चोट आ गई. अपनी जान बचाने के लिए वह रतन मार्केट सब्जीमंडी की तरफ भाग गया. फिर एक गली से निकल कर घटनास्थल की तरफ देखा तो वे हमलावर वहां नहीं दिखे. वे कार ले कर वहां से जा चुके थे. तब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो वहां उस के चाचा भगत शाह खून में सने पड़े थे. किसी का फोन ले कर उस ने पुलिस के 100 नंबर पर काल की. थोड़ी देर में ही पीसीआर की गाड़ी वहां आ गई और उन्हें अस्पताल ले लाई.

करन बहादुर के बयान से पुलिस को इतना पता चल गया था कि बदमाश सिल्वर कलर की सैंट्रो कार में आए थे और दुकान में चोरी करने के लिए दुकान का एक ताला तोड़ भी चुके थे. उन्होंने यह मैसेज वायरलैस से पूरी दिल्ली में प्रसारित करा दिया कि 4 लड़के वारदात करने के बाद सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से भागे हैं. जहां भी वे दिखें, उन्हें ट्रेस किया जाए. इस के बाद उन्होंने अज्ञात लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर के एसीपी ओमप्रकाश और डीसीपी परमादित्य को घटना की जानकारी दे दी. अगले दिन थानाप्रभारी को खबर मिली कि दिल्ली के नजफगढ़ की मेन मार्केट में जवाहर चौक पर स्थित एक ज्वैलरी शौप में 4 चोर ताले तोड़ कर उस में से 7 किलोग्राम से ज्यादा चांदी और सोने की ज्वैलरी तथा 35 हजार रुपए नकद ले गए.

चोरी करने से पहले उन्होंने वहां के चौकीदार को डराधमका दिया था. नजफगढ़ थाने में इस घटना की रिपोर्ट दर्ज हुई थी. उस चौकीदार ने पुलिस को बताया था कि वे चारों लुटेरे सिल्वर कलर की सैंट्रो कार से आए थे. नजफगढ़ वाली घटना डीसीपी परमादित्य की जानकारी में आई तो उन्हें लगा कि कहीं नजफगढ़ में वारदात करने वाले वही तो नहीं हैं जो पहाड़गंज क्षेत्र में चौकीदार का मर्डर कर के भागे थे. क्योंकि दोनों ही वारदातों में एक बात समान थी कि बदमाशों की संख्या 4 थी और उन के पास सिल्वर कलर की सैंट्रो कार थी. उन बदमाशों के पास पहुंचने का एक ही रास्ता था कि किसी भी तरह उन की सैंट्रो कार का रजिस्ट्रेशन नंबर पता चल जाए. लेकिन दोनों ही जगहों के चौकीदारों को कार का नंबर पता नहीं था इसलिए यह केस खोलना किसी चुनौती से कम नहीं था.

डीसीपी परमादित्य ने इस केस को सुलझाने के लिए पहाड़गंज क्षेत्र के एसीपी ओमप्रकाश के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में थानाप्रभारी राजकुमार, इंसपेक्टर (इनवैस्टीगेशन) सुखदेव मीणा, एसआई ओ.पी. मंडल, विनोद जैन, एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद कुमार, जितेंद्र राकेश, कांस्टेबल कुलदीप, समय सिंह को शामिल किया गया. इस के अलावा उन्होंने स्पैशल स्टाफ के इंचार्ज इंसपेक्टर सतेंद्र मोहन की टीम को भी इस केस को सुलझाने में लगा दिया. दोनों पुलिस टीमें इस केस को खोलने में जुट गईं. पहाड़गंज के नेहरू बाजार में जिस जगह वारदात हुई थी, पुलिस ने उस जगह का एक बार फिर मुआयना कर के यह देखा कि उधर कहीं कोई सीसीटीवी कैमरे तो नहीं लगे हैं, जिस से उस सैंट्रो कार का नंबर मिल सके.

पुलिस को कुछ दुकानों के आगे सीसीटीवी कैमरे तो लगे मिले लेकिन उन में से कई कैमरे बंद थे. और जो कैमरे चालू थे, उन की रिकौर्डिंग की जांच की तो वे इस एंगल से थे कि कार का केवल ऊपर का भाग ही उन की जद में आ सका. कार का नंबर उन कैमरों में नहीं मिल सका. इस के बाद पुलिस ने नजफगढ़ मार्केट में जवाहर चौक पर लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकौर्डिंग देखी तो वहां भी सिल्वर कलर की सैंट्रो कार दिखी. एक कैमरे की रिकौर्डिंग में उस कार का नंबर दिखा, लेकिन वह स्पष्ट नहीं हो रहा था. उस नंबर को देखने की कोशिश की तो अधूरा नंबर 3409 ही पढ़ने में आया. इस अधूरे नंबर के माध्यम से उन बदमाशों तक पहुंचना आसान नहीं था. एसीपी ओमप्रकाश ने इस नंबर को भी दिल्ली के समस्त थानों में वायरलैस से फ्लैश करा दिया.

दोनों ही पुलिस टीमें अपनेअपने स्रोतों से उन बदमाशों तक पहुंचने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. इलाके के अनेक संदिग्ध लोगों से भी पूछताछ की गई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल सका. इसी तरह करीब 2 महीने निकल गए. 15 जनवरी, 2015 को हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त को अपने एक मुखबिर द्वारा बदमाशों के बारे में एक महत्त्वपूर्ण जानकारी मिली. विष्णुदत्त ने उस सूचना से थानाप्रभारी राजकुमार को अवगत करा दिया. थानाप्रभारी ने आगे की काररवाई करने के लिए तुरंत 2 टीमें बनाईं. पहली टीम इंसपेक्टर सुखदेव मीणा के नेतृत्व में बनी, जिस में एएसआई हरपाल सिंह, हेडकांस्टेबल विष्णुदत्त, अरविंद को शामिल किया. जबकि दूसरी टीम एसआई विनोद नैन की देखरेख में बनाई जिस में हेडकांस्टेबल जितेंद्र, राकेश आदि सम्मिलित थे.

पहली टीम वीडियोकौन टावर के पास पचकुइयां रोड पर बैरीकेड्स लगा कर वाहनों की चैकिंग करने लगी तो दूसरी टीम को समयपुर बादली क्षेत्र में जीवन पार्क के नजदीक भेज दिया. पचकुइयां रोड पर जो टीम वाहनों की चैकिंग कर रही थी, उसे डीएल3सीए क्यू3409 नंबर की सैंट्रो कार आती दिखी. वह कार सिल्वर कलर की थी. पुलिस ने उसे रोका. उस कार में ड्राइवर के अलावा अगली सीट पर एक युवक और बैठा था. पूछने पर ड्राइवर ने अपना नाम राकेश कुमार और दूसरे युवक ने अपना नाम एकांत बंसल बताया. मुखबिर ने पुलिस को इन्हीं दोनों युवकों के बारे में सूचना दी थी. पुलिस ने दोनों को हिरासत में ले लिया.

कार की तलाशी लेने पर पीछे वाली सीटों के नीचे से 2 रौड, गैस कटर, शटर खोलने का हैंडल, हथौड़ा, छेनी आदि औजार मिले. जिस सैंट्रो कार में वे बैठे थे, वह उन्होंने 16 अक्तूबर, 2014 को दिल्ली के पटेलनगर क्षेत्र से चुराई थी, जिस की वहां रिपोर्ट भी दर्ज है. उन्होंने बताया कि पहाड़गंज के नेहरू बाजार में चौकीदारों पर हमला और नजफगढ़ में ज्वैलरी की दुकान में चोरी की वारदात को उन्होंने ही अपने साथियों के साथ अंजाम दिया था. दोनों अभियुक्तों को पुलिस पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की दूसरी टीम जो जीवन पार्क गई थी, वहां से उस ने मनोज नाम के एक व्यक्ति को हिरासत में ले लिया. वह भी एकांत बंसल का साथी था.

वह जिस सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 से जीवन पार्क में स्थित अपने घर लौट रहा था. वह उस ने दिल्ली के राजेंद्रनगर से 15 जनवरी, 2015 यानी उसी दिन चुराई थी. तलाशी लेने पर उस की कार से एक गैस कटर, छोटा सिलेंडर, एक गदाड़ा, शटर खोलने का हैंडल आदि बरामद हुआ. उस ने भी बताया कि नजफगढ़ और पहाड़गंज की वारदातों में वह शामिल रहा. उसे भी हिरासत में ले कर पुलिस थाने लौट आई. चौकीदार भगत शाह की हत्या के मामले का खुलासा हो चुका था. 3 अभियुक्त पुलिस के हत्थे चढ़ चुके थे. मास्टरमाइंड एकांत बंसल था जो एक क्लब लेवल का क्रिकेट खिलाड़ी था. जबकि मनोज दिल्ली विधानसभा का चुनाव भी लड़ चुका था. तीनों अभियुक्तों से सख्ती से पूछताछ की तो उन से लूट और चोरी की 55 वारदातों का खुलासा हुआ.

एक क्रिकेट खिलाड़ी और राजनेता ने मिल कर चोरी की इतनी सारी वारदातों को कैसे अंजाम दिया और ये इस जरायम में कैसे आए, इस की एक रोचक कहानी सामने आई. 34 वर्षीय एकांत बंसल दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित संग तराशान इलाके में रहने वाले गुरुचरण बंसल का बेटा था. बचपन से ही उसे क्रिकेट खेलने का शौक था. क्रिकेट खेल में ज्यादा ध्यान देने की वजह से वह जूनियर कक्षा से आगे नहीं पढ़ सका. दिल्ली में वह कई क्लबों की तरफ से मैच खेलता था. उस ने बताया कि वह इशांत शर्मा जैसे कई बड़े खिलाडि़यों के साथ भी मैच खेल चुका है.

राष्ट्रीय खिलाडि़यों की तरह वह भी इस खेल में अपना नाम चमकाना चाहता था. लेकिन उस के हौसले उस समय पस्त हो गए जब पिता ने उस की शादी कर दी. पिता बूढ़े हो चुके थे, उन की इतनी कूवत नहीं थी कि वह अपने शादीशुदा बच्चों का भी खर्च उठा सकें. एकांत के सिर पर बीवी का खर्च भी आन पड़ा था. अब उस के सामने परेशानी यह थी कि वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था जिस से उसे कोई नौकरी मिल सके और उस के पास कोई तकनीकी ज्ञान भी नहीं था जिस के सहारे उस की रोजीरोटी चल सके. क्रिकेट खिलाड़ी होने की वजह से लोगों की नजरों में उस की अच्छी इमेज थी. इस की वजह से वह कोई ऐसा काम भी नहीं करना चाहता था जिस से उस की इज्जत धूमिल हो. इसी बीच उस के मातापिता की मौत हो गई. उन की मौत के बाद वह और परेशान रहने लगा.

उस के दूसरे भाई अलगअलग रह रहे थे. उस के सामने एक ही समस्या बनी हुई थी कि वह अपने घर का खर्च कैसे चलाए. काफी सोचनेसमझने के बाद एकांत चोरियां करने लगा. इस काम में जुट जाने के बाद उस ने क्रिकेट खेल की तरफ ध्यान नहीं दिया. इस के बाद वह इसी जरायम से पैसा कमाने लगा. चोर चाहे कितनी चालाकी से चोरी क्यों न करे, एक न एक दिन वह पकड़ में आ ही जाता है. एकांत भी एक दिन पुलिस की पकड़ में आ ही गया, जिस की वजह से उसे जेल जाना पड़ा.

रोहिणी स्थित जेल में ही सन 2008-09 में उस की मुलाकात राकेश कुमार नाम के व्यक्ति से हुई. वह दिल्ली के वजीरपुर क्षेत्र में रहता था. राकेश भी चोरी के आरोप में जेल गया था. साथसाथ जेल में रहने पर दोनों के बीच दोस्ती हो गई और जमानत पर रिहा होने के बाद दोनों ही मिल कर चोरियां करने लगे. वह बंद दुकानों के ताले तोड़ कर बड़ीबड़ी चोरियां करने लगे. चोरियों में मोटा माल हाथ लगने लगा तो उन के हौसले बढ़ने लगे. दोनों जने साथसाथ जेल भी गए. अब एकांत को जेल जाने से डर नहीं लगता.

जेल में ही इन की मनोज नाम के एक अन्य शख्स से मुलाकात हुई. समयपुर बादली के जीवन पार्क में रहने वाला 45 वर्षीय मनोज भी चोरी के मामले में जेल गया था. तीनों का पेशा एक ही था इसलिए जेल से बाहर आने पर तीनों ने मिल कर वारदात को अंजाम देने का फैसला कर लिया. मनोज ने अपने दोस्त अजय को भी अपनी टीम में शामिल कर लिया. फिर तो इस चौकड़ी ने दिल्ली में एक के बाद एक वारदातें करनी शुरू कर दीं. ये लोग किसी वाहन से रात में निकलते और वाहन को दुकान के आगे खड़ा कर के अपने साथ लाए औजारों से ताले तोड़ कर उस में रखा सामान, नकदी साफ कर देते थे.

इन के टारगेट पर मैडिकल स्टोर, ज्वैलरी शौप, सिगरेट शौप, जनरल स्टोर्स, साडि़यों की दुकान आदि रहते थे. चोरी किए सामान को यह आपस में बांट लेते थे. ज्वैलरी को मेरठ के एक ज्वैलर को बेचते थे. एक ही इलाके के बजाय ये दिल्ली के अलगअलग इलाकों में वारदात को अंजाम देते थे. कभीकभी तो ये एक ही रात में  3-4 वारदातें कर देते थे. मनोज के पास जब पैसा जमा हो गया तो उस ने राजनीति में पैर जमाने का निश्चय किया. सन 2003 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में उस ने कई राजनीतिक पार्टियों के नेताओं से संपर्क कर टिकट लेने की कोशिश की लेकिन जब उसे किसी भी पार्टी से टिकट नहीं मिला तो उस ने निर्दलीय रूप से विधानसभा का चुनाव लड़ा, जिस में उसे 1500 वोट मिले. राजनीति में पैर न जमने पर वह फिर से अपने साथियों के साथ पुराने धंधे में उतर आया.

16 अक्तूबर, 2014 को इन्होंने पटेलनगर क्षेत्र से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल3सीए क्यू 3409 चुराई. इस कार का नंबर बदले बिना ही ये दिल्ली में इसे चलाते रहे लेकिन पुलिस की पकड़ में नहीं आ सके. 12-13 नवंबर, 2014 की रात को ये इसी कार में बैठ कर वारदात के लिए निकले. इस बार वे पहाड़गंज क्षेत्र में स्थित नेहरू बाजार में गए. वहां पर उन्होंने एक दुकान के आगे अपनी कार लगा दी. वह रामकिशन वार्ष्णेय की कौस्मेटिक सामान की होलसेल की दुकान थी. राकेश कार में ड्राइविंग सीट पर बैठा रहा तो मनोज और अजय हाथों में लोहे की रौड ले कर कार के पास खड़े हो कर निगरानी करने लगे. जबकि एकांत औजारों से उस दुकान के ताले तोड़ने लगा. उस ने दुकान का एक ताला तोड़ भी लिया था.

वह और ताले तोड़ रहा था तभी अचानक चौकीदार करन बहादुर और भगत शाह उधर आए. करन बहादुर और भगत शाह मूलरूप से नेपाल के रहने वाले थे. वे इस बाजार में पिछले 10-15 सालों से चौकीदारी कर रहे थे. फिलहाल वे संग तराशान इलाके में रह रहे थे. उन्होंने कार के पास 2 लोगों को खड़े देखा तो उन्हें शक हुआ कि रात 2 बजे ये हाथों में रौड लिए क्यों खड़े हैं. तभी उन की नजर एक दुकान की तरफ गई वहां भी एक आदमी तालों को तोड़ने में लगा था. वे समझ गए कि ये सेंधमार हैं. दोनों चौकीदारों ने आवाज दे कर उन से पूछा कि वे वहां क्या कर रहे हैं.

बदमाशों को डर हो गया कि ये चौकीदार उन की योजना को नाकाम कर सकते हैं, इसलिए वे तीनों रौड ले कर उन के पास आ गए और चौकीदारों पर रौड से हमला कर दिया. एक हमलावर ने भगत शाह के सिर पर वार किया जिस से वह वहीं गिर गया तथा दूसरा चौकीदार करन बहादुर जान बचा कर वहां से भाग गया. चौकीदार का सिर फटने के बाद बदमाशों ने सोचा कि शायद वह मर गया है, इसलिए चोरी करने के बजाय वे वहां से भाग खड़े हुए. पहाड़गंज से वे चारों नजफगढ़ मेनबाजार पहुंचे. रास्ते में उन की गाड़ी को पुलिस ने भी नहीं रोका. मेनमार्केट में पहुंच कर वे दुकानों के ऊपर लगे साइनबोर्डों को पढ़ कर सोचने लगे कि किस दुकान को निशाना बनाना सही रहेगा. तभी उन्हें जवाहर चौक पर एक ज्वैलरी शौप दिखी.

उस ज्वैलरी शौप के पास एक चौकीदार था. उन्होंने सब से पहले उस चौकीदार को काबू में कर के डराधमका दिया. इस के बाद उन्होंने दुकान के ताले तोड़ कर वहां से सोनेचांदी की करीब 7 किलोग्राम ज्वैलरी और 35 हजार रुपए कैश चुरा लिया. अपना काम करने के बाद वे पहाड़गंज लौट आए. रात में वे सभी एकांत के घर रुके और सुबह होने पर सभी अपनेअपने घर चले गए. बाद में उन्होंने चोरी के सामान का बंटवारा भी कर लिया था. 2 महीने बाद मनोज ने राजेंद्रनगर से एक सैंट्रो कार नंबर डीएल-6सी जे3828 चुराई.

दोनों जगहों की वारदातों में पुलिस को ऐसा सुबूत नहीं मिला था, जिस से पुलिस उन तक पहुंच पाती. इसलिए 13 नवंबर के बाद भी उन्होंने दिल्ली के अलगअलग क्षेत्रों में कई वारदातों को अंजाम दिया. आखिर मुखबिर की सूचना पर 15 जनवरी, 2015 को वे पुलिस के हत्थे चढ़ ही गए. पुलिस ने 16 जनवरी को अभियुक्त एकांत बंसल, राकेश कुमार और मनोज को तीसहजारी कोर्ट में महानगर दंडाधिकारी अंबिका सिंह की कोर्ट में पेश कर के उन का 3 दिनों का रिमांड लिया.

रिमांड अवधि में पुलिस ने उन की निशानदेही पर 20 किलोग्राम चांदी और सोने की ज्वैलरी, 1 लाख 70 हजार रुपए नकद, चोरी की 2 सैंट्रो कारें, 2 मोटरसाइकिलें, 52 इंच के 2 एलईडी टीवी, 6 लैपटोप, 20 मोबाइल फोन, 30 किलोग्राम 5 व 10 रुपए के सिक्के, 4 गैस कटर, 5 म्यूजिक सिस्टम, भारी मात्रा में रेडीमेड कपड़े, ब्रांडेड कंपनियों के सिगरेट के पैकेट, चौकलेट आदि सामान बरामद किए. उन्होंने बताया कि वे दिल्ली के 20 से अधिक थानाक्षेत्रों में चोरी, डकैती, सेंधमारी की 55 वारदातों को अंजाम दे चुके हैं.

18 जनवरी को पुलिस ने चोरी का माल खरीदने वाले एक ज्वैलर को भी दिल्ली के मंगोलपुरी बसस्टाप से गिरफ्तार कर लिया. वह इन लोगों से मिलने दिल्ली आया था. उसे इन के गिरफ्तार होने की जानकारी नहीं थी. उस की निशानदेही पर पुलिस ने 2 किलोग्राम चांदी एवं चांदी को मोल्डिंग करने वाली मशीन बरामद कर ली. 37 वर्षीय वह ज्वैलर चोरी का सामान खरीदने के आरोप में पहले भी जेल जा चुका है. उस के खिलाफ 6 केस पहले से दर्ज थे. पांचवें अभियुक्त अजय को पुलिस गिरफ्तार नहीं कर सकी. चारों अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद उन्हें जेल भेज दिया गया. मामले की जांच इंसपेक्टर सुखदेव मीणा कर रहे हैं. Crime in Society

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Delhi News : भोली सूरत वाली कातिल प्रेमिका

Delhi News : उत्तरी दिल्ली से एक ऐसी हैरान कर देने वाली वारदात सामने आई है, जिसे सुनकर लोग सन्न रह गए. यहां एक युवती ने अपने पूर्व प्रेमी के साथ मिलकर अपने लिवइन पार्टनर की बेरहमी से न सिर्फ हत्या कर दी, उसे आग के हवाले कर दिया. सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह थी, जिस ने एक प्रेमिका को इतना क्रूर कदम उठाने पर मजबूर कर दिया? चलिए जानते हैं पूरी स्टोरी को विस्तार से

यह दर्दनाक घटना 5-6 अक्टूबर, 2025 की रात उत्तरी दिल्ली के तिमारपुर थाना क्षेत्र के गांधी विहार इलाके की है. पुलिस के अनुसार, 21 वर्षीय अमृता चौहान नाम की युवती ने अपने पूर्व बौयफ़्रेंड सुमित कश्यप (27 वर्ष) के साथ मिलकर लिवइन पार्टनर रामकेश मीणा (32 वर्ष) की हत्या की और फिर उसे आग की घटना जैसा दिखाने की कोशिश की.

मृतक रामकेश मीणा उत्तरी दिल्ली के गांधी विहार में रह कर यूपीएससी परिक्षा की तैयारी कर रहा था. वह अपनी गर्ल फ्रेंड अमृता चौहान के साथ मई 2025 से लिवइन रिलेशन में रह रहा था. इसी दौरान रामकेश ने प्रेमिका के कुछ आपत्तिजनक वीडियो बनाए और उन्हें एक हार्ड डिस्क में सेव कर लिया.
जब अमृता को इस बात का पता चला तो उस ने रामकेश से वीडियो डिलीट करने की मांग की, लेकिन वह ऐसा करने से इनकार कर रहा था. इतना ही नहीं, उस ने प्रेमिका की बदनामी के लिए झूठी कहानियां भी फैलानी शुरू कर दीं.

डीसीपी राजा बांठिया के मुताबिक, बदनामी और ब्लैकमेलिंग से परेशान हो कर अमृता चौहान ने अपने पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप (27 वर्ष) से संपर्क किया और दोनों ने बदला लेने की योजना बनाई. जांच में खुलासा हुआ कि युवती, उस का पूर्व बौयफ्रेंड और उस का एक दोस्त संदीप कुमार (29 वर्ष) ने मिलकर रामकेश की हत्या की साजिश रची.
अमृता को क्राइम शो देखने का बेहद शौक था और उस ने उन शोज़ से मिले फोरैंसिक नालेज का इस्तेमाल रामकेश मीणा के प्रदर की परफेक्ट प्लानिंग की.

5-6 अक्टूबर, 2025 की रात तीनों रामकेश के फ्लैट पर पहुंचे. वहां पहले उन्होंने रामकेश के साथ झगड़ा किया फिर उसी दौरान गला घोंटकर और बेरहमी से पीटपीट कर उसे मार डाला.

हत्या के बाद शव को जलाने की साजिश रची गई ताकि यह घटना दुर्घटना लगे. अमृता के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप, जो मुरादाबाद में एलपीजी गैस वितरक का काम करता था ने आग लगाने की पूरी योजना बनाई. उस ने गैस सिलेंडर का रेगुलेटर खोल दिया, मृतक के शरीर पर तेल और शराब डालकर लाइटर से आग लगा दी और सिलेंडर को उस के सिर के पास रख दिया.

पुलिस के अनुसार, करीब एक घंटे बाद सिलेंडर में विस्फोट हुआ और शव पूरी तरह जल गया. शुरुआत में यह मामला हादसे का लगा, लेकिन जांच के दौरान पोस्टमार्टम रिपोर्ट और कौल डिटेल्स से सच्चाई सामने आ गई. पुलिस ने प्रेमिका अमृता चौहान, उस के पूर्व प्रेमी सुमित कश्यप और तीसरे आरोपी संदीप कुमार को गिरफ्तार कर लिया है. Delhi News

Kanpur Crime News : अपना अपराध दूसरे के सिर

Kanpur Crime News : परशुराम का पत्नी और बेटी के साथ गांव वापस आना उस के भाई जयराम को जरा भी अच्छा नहीं लगा, क्योंकि उस ने अपने हिस्से की जमीन और घर बंटा लिया था. जमीन और घर पर कब्जा पाने के लिए उस ने जो किया, क्या उसे उचित कहा जा सकता है…

घर के अंदर का दृश्य बड़ा ही वीभत्स था. खून से लथपथ 3 लाशें पड़ी थीं. मृतकों में परशुराम यादव, उस की कथित पत्नी विमला देवी और मासूम बेटी हिमांशी थी. तीनों की हत्या गोली मार कर की गई थी. परशुराम और विमला की लाशें कमरे के अंदर खून में डूबी पड़ी थीं, जबकि मासूम हिमांशी की लाश बरामदे में पड़े तखत पर पड़ी थी.लकमरे से ले कर बरामदे तक खून ही खून फैला था. कमरे के अंदर का सामान अस्तव्यस्त था और फर्श पर चूडि़यों के टुकड़े बिखरे थे. वहां की हालत देख कर साफ लग रहा था कि मरने से पहले परशुराम और विमला का हत्यारों से जम कर संघर्ष हुआ था. दिल दहलाने वाली यह घटना उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा में 13 दिसंबर, 2014 की रात घटी थी.

चूंकि हत्याएं गोली मार कर की गई थीं, इसलिए गांव वालों को तुरंत हत्याओं की जानकारी हो गई थी. मृतक के भाई जयराम सिंह ने हत्यारों को भागते देखा भी था, इसलिए गांव वालों की सलाह पर उस ने तुरंत घटना की सूचना थाना उसराहार पुलिस को दे दी थी. मामला 3-3 हत्याओं का था, इसलिए घटना की जानकारी होते ही रात को ही एसएसपी राकेश सिंह, सीओ अनिल यादव के साथ थाना ऊसराहार के थानाप्रभारी संजय यादव भी भारी पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. डौग स्क्वायड और फिंगर प्रिंट एक्सपर्ट टीम भी एसएसपी राकेश सिंह साथ लाए थे. पहले पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. उस के बाद मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह से पूछताछ की गई.

जयराम सिंह ने बताया कि 2 मंजिला बने मकान में भूतल पर वह अपने परिवार के साथ रहता था, जबकि पहली मंजिल पर उस का बड़ा भाई परशुराम अपनी पत्नी विमला और 3 वर्षीया बेटी हिमांशी के साथ रहता था. रात में गोलियां चलने की आवाज सुन कर जब वह घर से बाहर निकला तो देखा रामकिशन और धर्मेंद्र तमंचा लिए 2 अन्य लोगों के साथ भागे जा रहे थे. मैं ने उन्हें अच्छी तरह पहचान लिया था. शोर भी मचाया था, लेकिन अन्य लोगों के आतेआते वे अंधेरे का फायदा उठा कर निकल गए.

‘‘ये रामकिशन और धर्मेंद्र कौन हैं, मृतक की उन से क्या दुश्मनी थी?’’ एसएसपी राकेश सिंह ने पूछा.

‘‘साहब, मेरे बड़े भाई परशुराम के रामकिशन की पत्नी विमला से नाजायज संबंध बन गए थे. रामकिशन ने विरोध किया तो परशुराम विमला को दिल्ली भगा ले गया और पत्नी बना कर रहने लगा. पिछली होली पर परशुराम गांव लौट आया तो रामकिशन आ धमका. उस ने गांव में पंचायत बुलाई और विमला को अपने साथ भेजने के लिए पंचायत से गुहार लगाई. लेकिन विमला ने रामकिशन के साथ जाने से साफ मना कर दिया. उस के बाद पंचायत क्या करती, बेइज्जत हो कर रामकिशन चला तो गया, लेकिन जातेजाते अंजाम भुगतने की धमकी देता गया. उसी बेइज्जती का बदला लेने के लिए उस ने ये तीनों हत्याएं की हैं.’’

फिंगर एक्सपर्ट टीम ने घटनास्थल से फिंगर प्रिंट उठा लिए तो खोजी कुत्ता टीम ने कुत्ते को छोड़ा. खोजी कुत्ता घटनास्थल और लाशों को सूंघ कर भौंकता हुआ नीचे आया. जयराम सिंह के घर के सामने आ कर कुछ देर वह भौंकता रहा, उस के बाद जयराम सिंह को पकड़ लिया. इस से पुलिस अधिकारियों को लगा कि कहीं भाई और उस के परिवार की हत्या भाई ने ही तो नहीं की. क्योंकि अक्सर जर, जोरू जमीन के लिए इस तरह हत्याएं होती रही हैं. इन हत्याओं में जोरू भी थी और जरजमीन भी. हत्याओं की सही वजह क्या हो सकती थी, यह जांच के बाद ही पता चल सकता था.

इस पूछताछ के बाद एसएसपी राकेश सिंह के आदेश पर थानाप्रभारी संजय यादव ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर तीनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और जरूरी सुबूत जुटा कर थाने वापस आ गए, जहां उन्होंने मृतक परशुराम के भाई जयराम सिंह की तहरीर पर रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा कर खुद ही जांच शुरू कर दी. चूंकि जयराम सिंह ने तीनों हत्याओं का आरोप मृतका विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाया था, इसलिए थानाप्रभारी संजय यादव ने रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र को गिरफ्तार करने के लिए गांव चौबिया स्थित उस के घर छापा मारा.

रामकिशन और उस का बेटा धर्मेंद्र घर पर ही मिल गया था. पुलिस दोनों को गिरफ्तार कर के थाना ऊसराहार ले आई. थाने पर जब रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र से परशुराम, उस की पत्नी और बेटी की हत्या के बारे में पूछा गया तो रामकिशन ने कहा कि यह सच है कि परशुराम से उस की दुश्मनी थी, क्योंकि वह उस की पत्नी विमला को भगा ले गया था और उस के साथ शादी कर ली थी. लेकिन जहां तक हत्याओं की बात है तो उस ने ये हत्याएं नहीं कीं. कोई अपने फायदे के लिए उस की दुश्मनी का फायदा उठा कर उसे फंसाना चाहता है.

‘‘ऐसा कौन हो सकता है, जो अपने फायदे के लिए तुम्हें फंसाएगा?’’ थानाप्रभारी संजय यादव ने पूछा.

‘‘साहब, पूरे यकीन के साथ तो मैं नहीं कह सकता, लेकिन मुझे परशुराम के भाई जयराम सिंह पर शक है. उसी ने मकान और जमीन हथियाने के लिए यह खूनी खेल खेला है.’’ रामकिशन ने कहा.

थानाप्रभारी संजय यादव असमंजस में पड़ गए. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच्चा है और कौन झूठा? दोनों हत्याओं की वजह ऐसी बता रहे थे कि अविश्वास करने का सवाल ही नहीं उठता था. सचझूठ का पता लगाने के लिए थानाप्रभारी संजय यादव ने अपने खास मुखबिर को रामकिशन और जयराम सिंह के पीछे लगा दिया. यही नहीं, वह खुद भी सुरागरसी करते रहे. थानाप्रभारी संजय यादव के उस खास मुखबिर ने जयराम सिंह और रामकिशन से दोस्त गांठ ली और वह उन के साथ खानेपीने लगे. एक दिन जयराम सिंह के साथ महफिल जमी तो मुखबिर ने अंधेरे में तीर चलाया, ‘‘यार जयराम! तू ने खेल तो बहुत अच्छा खेला भाई. सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी.’’

‘‘कौन सा खेल?’’ जयराम शराब का घूंट गले से नीचे उतारते हुए बोला.

‘‘अरे वही, जमीनजायदाद भी मिल गई और पुलिस से भी बच गए. बड़ी सफाई से हत्याओं का इल्जाम दूसरे के सिर मढ़ दिया?’’

‘‘तुम्हें यह सब किस ने बताया?’’ जयराम ने शराब का गिलास नीचे रख कर हैरानी से पूछा.

‘‘दोस्त हूं तुम्हारा, दिल की बात जान लेना मेरे लिए मुश्किल नहीं है.’’ मुखबिर ने टकराने के लिए अपना गिलास ऊपर उठा कर कहा.

‘‘तुम जान गए हो तो कोई बात नहीं, क्योंकि तुम तो अपने हो. लेकिन किसी दूसरे के सामने जुबान मत खोलना.’’ जयराम ने गिलास से गिलास टकराते हुए कहा.

महफिल खत्म कर के मुखबिर सीधे थाना ऊसराहार पहुंचा. थानाप्रभारी संजय यादव थाने में ही मौजूद थे. मुखबिर के चेहरे की चमक देख कर ही संजय यादव समझ गए कि यह जरूरी संदेश लाया है. उन्होंने उसे सामने पड़ी कुर्सी पर बिठा कर पूछा, ‘‘कोई खुशखबरी?’’

‘‘जी सर, खुशखबरी ही है.’’

‘‘तो जल्दी बताओ, ताकि तुरंत काररवाई की जा सके.’’

‘‘साहब, परशुराम, उस की पत्नी विमला और बेटी हिमांशी का कत्ल उस के भाई जयराम सिंह ने ही किया है. मकान और जमीन हथियाने के लिए उसी ने तीनों को गोली मार कर मारा है और इल्जाम विमला के पूर्व पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगा दिया है.’’

‘‘तुम यह बात इतने यकीन के साथ कैसे कह रहे हो?’’ संजय यादव ने पूछा.

‘‘सर, अभी थोड़ी देर पहले हम दोनों की महफिल जमी थी. उसी में मुझे जुबान न खोलने की नसीहत देते हुए जयराम ने तीनों की हत्या की बात स्वीकार की है.’’

थानाप्रभारी संजय यादव को भी जयराम सिंह पर ही शक था. क्योंकि खोजी कुत्ते ने उसी को पकड़ा था. लेकिन जयराम सिंह ने हत्या की जो वजह बताई थी, उस से वह गुमराह हो गए थे. मुखबिर ने सच्चाई पता लगा ली तो उन्होंने देर करना उचित नहीं समझ. पुलिस बल के साथ वह गांव इकघरा पहुंचे और जयराम सिंह को उस के घर से गिरफ्तार कर के थाने ले आए. थाने में उस से पूछताछ शुरू हुई तो पहले तो वह उन्हें गुमराह करता रहा. लेकिन जब उन्होंने अपना अंदाज दिखाया तो उस ने तीनों हत्याओं का अपराध स्वीकार कर लिया.

इस के बाद जयराम सिंह ने खून से सने कपडे़ और वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिसे उस ने भूसे वाली कोठरी में छिपा रखा था. जयराम सिंह ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया तो पुलिस ने मुकदमे से रामकिशन और धर्मेंद्र का नाम हटा कर उस का नाम दर्ज कर दिया. इस के बाद पूछताछ एवं पुलिस जांच में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के थाना चौबिया के गांव गंगापुरा में कुल्फ सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटे बालकिशन और रामकिशन थे. कुल्फ सिंह के पास ज्यादा जमीन नहीं थी, इसलिए उस की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी.

गुजरबसर के लिए वह अपने खेतों पर काम करने के बाद दूसरे के यहां मेहनतमजदूरी कर लेता था. दोनों बेटे बड़े हुए तो वे भी मेहनतमजदूरी कर के पिता की मदद करने लगे. बड़ा बेटा बालकिशन जवान हुआ तो कुल्फ सिंह ने उस का विवाह इटावा के ही थाना ऊसराहार के गांव इकघरा के रहने वाले हुकुम सिंह यादव की बेटी अमृता के साथ कर दिया. अमृता फैशन परस्त व खुले विचारों की लड़की थी. वह सासससुर के आगे परदा नहीं करती थी, जिस से नाराज हो कर सासससुर ने घरजमीन का बंटवारा कर के उसे अलग कर दिया.

बालकिशन से छोटे रामकिशन की शादी विमला के साथ हुई. गोरीचिट्टी आकर्षक कदकाठी की विमला थाना इकदिल के गांव तीरवा के रहने वाले राम सिंह की 3 संतानों में सब से छोटी थी. राम सिंह के पास अपनी इतनी जमीन थी कि उस में खेती कर के वह अपना गुजारा आसानी से कर रहा था. रामकिशन विमला को पा कर बेहद खुश था, क्योंकि उस ने जैसी पत्नी की कल्पना की थी, विमला वैसी ही थी. उस की मोहक मुसकान, कजरारी आंखे एवं गठीले बदन ने उसे दीवाना बना दिया था. लेकिन विमला अपनी इस शादी से खुश नहीं थी, क्योंकि उस का पति रामकिशन उम्र में उस से 10 साल बड़ा था. उस ने भी अपनी उम्र के युवक की कल्पना की थी, लेकिन रामकिशन वैसा नहीं था.

समय के साथ विमला एक बेटे की मां बनीं, नाम रखा धर्मेंद्र सिंह. बेटे के पैदा होने के बाद रामकिशन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं तो उस ने गांव से बाहर जा कर पैसा कमाने का विचार किया. मातापिता से बात की तो वे भी राजी हो गए. उस ने कुछ जरूरी सामान लिया और आगरा चला गया. वहां उसे एक बिल्डिंग बनवाने वाले ठेकेदार के यहां नियमित काम मिल गया. रामकिशन सुबह 9 बजे ड्यूटी पर जाता तो शाम को ही लौटता. वह अपनी तरह के अन्य मजदूरों के साथ कच्ची बस्ती में रहता था. सब मिलजुल कर खाना बनाते और एक साथ बैठ कर खाते. कभीकभी उन के बीच पीनेपिलाने का भी दौर चलता. धीरेधीरे रामकिशन को आगरा शहर पसंद आ गया. अब उस का एक ही लक्ष्य था, ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाना.

2-3 महीने में वह घर आता और जो कमा कर लाता, पिता के हाथों पर रख देता. विमला को खर्च के लिए अलग से पैसे देता. हफ्तादस दिन घर में रह कर वह नौकरी पर वापस चला जाता. गांव में विमला पति की यादों को दिल में संजोए बच्चे का मुंह देख कर दिन काट रही थी. समय बिताने के लिए कभीकभार वह जेठानी अमृता के घर चली जाती थी. वहीं पर उस की मुलाकात अमृता के भाई परशुराम से हुई. परशुराम जिला इटावा के थाना ऊसराहार के गांव इकघरा का रहने वाला था. उस के पिता का नाम हुकुम सिंह यादव था. हुकुम सिंह के 2 बेटे, परशुराम, जयराम और एक बेटी अमृता थी. हुकुम सिंह ने दोनों बेटों की शादी कर के घरजमीन का बंटवारा कर दिया था.

छोटा भाई जयराम तो परिवार के साथ सुखमय जीवन बिता रहा था, जबकि परशुराम की जिंदगी में भूचाल आ गया था. बीमारी से उस की पत्नी सूर्यमुखी की मौत हो गई थी. वह तनहा जिंदगी काट रहा था. अकेला होने की वजह से अक्सर वह अपनी बहन अमृता के यहां चला जाता था. वहीं उस की मुलाकात बहन की देवरानी विमला से हुई. अमृता के घर विमला और परशुराम का आमनासामना हुआ तो इसी पहली मुलाकात में दोनों ही एकदूसरे को देख कर कुछ इस तरह मोहित हुए कि पलकें झपकाना भूल गए. विमला की आकर्षक देहयष्टि परशुराम की आंखों में बस गई. वहीं परशुराम का गठीला बदन देख कर विमला मंत्रमुग्ध सी हो गई.

बातचीत के दौरान परशुराम की नजरें विमला पर ही जमी रहीं. वह बारबार कनखियों से उसे ही ताकता रहा. विमला की नजरें जब भी उस की नजरों से टकरातीं, वह कुछ इस तरह मुसकराता कि विमला का दिल मचल उठता. उस की इस मुसकराहट से विमला के दिलोदिमाग में हलचल मचने लगी. उस दिन विमला अपने घर आई तो उसे लगा जैसे वह अपना कुछ खो आई है. परशुराम का अक्स उस के दिमाग में बस गया था. दूसरी ओर परशुराम का भी वही हाल था. उसे साफ महसूस हो रहा था कि विमला की आंखों में उस के लिए चाहत थी.

पति के दूर रहने से विमला को जब भी परशुराम की मुसकान याद आती, उस का मन विचलित होने लगता. रामकिशन ने उस की ओर ध्यान देना बंद कर दिया था. महीनों हो गए थे, वह गांव नहीं आया था. पति की उपेक्षा से विमला व्याकुल रहने लगी थी. यही वजह थी कि उस ने परशुराम को खयालों में बसा लिया था. परशुराम से मिलने और उस से बातें करने का विमला का जब भी मन होता, वह जेठानी के यहां आ जाती. बहाना जेठानी से मिलने का होता था, जबकि नजरें परशुराम को खोजा करती थीं. जल्दी ही परशुराम और विमला के बीच अंतरंगता बढ़ गई और आंखों ही आंखों में इशारे भी होने लगे. एक दिन विमला ने कहा, ‘‘मैं रोज यहां आती हूं, जबकि तुम कभी हमारे घर नहीं आते. अब मैं तभी यहां आऊंगी, जब तुम मेरे घर आओगे…’’

‘‘अगर तुम्हारे सासससुर ने ऐतराज किया तो..?’’ परशुराम ने कहा.

‘‘मेरे सासससुर एक सप्ताह के लिए रिश्तेदारी में भागवत कथा सुनने गए हैं. मैं घर में बिलकुल अकेली हूं. इसलिए घबराने की कोई बात नहीं है. तुम मेरे घर आओगे तो मुझे बहुत अच्छा लगेगा.’’ शरारत से आंखें नचाते हुए विमला ने कहा.

परशुराम समझ गया कि विमला क्या अच्छा लगने की बात कर रही है. आग दोनों ओर लगी थी. इसलिए अगले दिन परशुराम विमला के घर जा पहुंचा. विमला घर में सचमुच अकेली थी. इस का परिणाम यह निकला कि मर्यादा टूट गई. एक बार मर्यादा क्या टूटी, परशुराम अब महीने में पंद्रह दिन बहन के घर ही पड़ा रहने लगा. परशुराम बहन के घर क्यों पड़ा रहता है, इस बात की गांव में चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ाते बात रामकिशन के कानों तक पहुंची. रामकिशन ने परशुराम और विमला को अलग करने की बहुत कोशिश की, लेकिन प्रेम दीवानी विमला ने परशुराम का साथ नहीं छोड़ा. तंग आ कर रामकिशन गांव में ही रहने लगा, जिस से दोनों को मिलने में परेशानी होने लगी.

तब किसी तरह एक दिन विमला ने परशुराम से मिल कर कहा, ‘‘परशुराम, अब मैं तुम्हारे लिए और मार नहीं खा सकती. तुम मजा ले कर दीदी के घर जा कर चैन से सो जाते हो, जबकि मेरा पति मुझे जानवरों की तरह पीटता है. अगर तुम मुझे सचमुच चाहते हो तो मुझे इस मारपीट से मुक्ति दिला दो. मुझे यहां से कहीं और ले चलो.’’

‘‘सच विमला.’’ परशुराम ने हैरानी से पूछा.

‘‘हां, मैं तुम्हारे लिए पति और बेटे, दोनों को छोड़ने को तैयार हूं.’’

और फिर सचमुच एक दिन विमला ने अपना सामान समेटा और परशुराम के साथ भाग गई. परशुराम विमला को ले कर दिल्ली चला गया. वहां उस ने लक्ष्मीनगर में मदर डेयरी के पास झोपड़पट्टी में एक कमरा किराए पर लिया और विमला के साथ आराम से रहने लगा. रोजीरोटी के लिए वह सब्जी बेचने लगा. दूसरी ओर विमला के भाग जाने से रामकिशन की बड़ी बदनामी हुई. उस ने विमला को खोजने की खुद तो कोशिश की ही, थाने में भी परशुराम के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई, लेकिन विमला और परशुराम का कुछ पता नहीं चला. हार कर वह शांत हो कर बैठ गया.

लगभग 8 सालों बाद परशुराम मार्च, 2014 में अचानक अपने गांव इकघरा लौटा. साथ में उस की कथित पत्नी विमला और 3 साल की बेटी हिमांशी भी थी. गांव आ कर वह पत्नी और बेटी के साथ मकान की पहली मंजिल पर रहने लगा. जमीन का अपना आधा हिस्सा भी उस ने बंटा लिया. परशुराम का घर लौटना उस के छोटे भाई जयराम सिंह को अच्छा नहीं लगा. इस की वजह यह थी कि अभी तक घर और जमीन पर उसी का कब्जा था. उसे लगता था कि डर की वजह से परशुराम कभी लौट कर नहीं आएगा. विमला के आने की जानकारी रामकिशन को हुई तो वह इकघरा आया और गांव में पंचायत बैठा कर विमला को अपने साथ भिजवाने की गुहार लगाई. लेकिन विमला ने भरी पंचायत में उस के साथ जाने से मना कर दिया. बेटे धर्मेंद्र को देख कर भी उस का दिल नहीं पसीजा.

जब वह उसे छोड़ कर गई थी, तब वह 8 साल का था. अब वह 16 साल का हो गया था.  धर्मेंद्र ने भी मां से वापस चलने को कहा. समाज में हो रही बदनामी का भी वास्ता दिया, उस के बाद भी विमला राजी नहीं हुई. उस के बाद रामकिशन विमला और परशुराम को अंजाम भुगतने की धमकी दे कर वापस चला गया. भाई के आने से जयराम सिंह परेशान रहता था. उस का दिन का चैन और रातों की नींद छिन गई थीं. उस का सोचना था कि अगर परशुराम लौट कर न आता तो मकान और जमीन उसी की होती. लेकिन अब यह नामुमकिन था. इसी सोचविचार में जयराम सिंह ने एक रात एक तीर से 2 निशाने साधने की तरकीब निकाली.

उस ने बड़े भाई परशुराम, उस की कथित पत्नी विमला और बेटी हिमांशी की हत्या कर के इल्जाम विमला के पति रामकिशन और उस के बेटे धर्मेंद्र पर लगाने की योजना बना डाली. योजना बना कर जयराम सिंह ने एक बदमाश से 4 हजार रुपए में एक तमंचा और 5 कारतूस खरीदे. 13 दिसंबर, 2014 की रात जब गांव में सन्नाटा पसर गया तो जयराम तमंचा लोड कर के पहली मंजिल पर पहुंचा और बरामदे में सो रही मासूम हिमांशी के सीने से सटा कर गोली चला दी. गोली चलने की आवाज सुन कर परशुराम और विमला ने समझा कि बदमाश आ गए हैं. वे कमरे में दुबक गए.

इस के बाद जयराम सिंह कमरे में आया तो परशुराम ने भाई को पहचान लिया. वह उस से भिड़ गया. दोनों गुत्थमगुत्था हो गए. लेकिन मौका मिलते ही जयराम ने परशुराम के सीने में गोली मार दी. वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर पड़ा. विमला ने भी जयराम को पहचान लिया था. वह भी उसे से भिड़ गई. लपटाझपटी में विमला की चूडि़यां टूट कर बिखर गईं. वह चीख पाती, उस के पहले ही जयराम ने विमला के सीने में गोली मार दी. विमला भी खून से लथपथ हो कर गिर पड़ी.

तीनों को मौत के घाट उतार कर जयराम ने तमंचा तथा खून से सने कपड़े भूसे की कोठरी में छिपा दिए और घर के बाहर आ कर जोरजोर से शोर मचाने लगा. उस की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन सभी को जयराम ने बताया कि विमला के पति रामकिशन, उस के बेटे धर्मेंद्र तथा 2 अन्य लोगों ने ये हत्याएं की हैं. भागते समय उस ने रामकिशन तथा धर्मेंद्र को पहचान लिया था. कुछ देर बाद ग्रामप्रधान अंगद सिंह यादव ने इन तीनों हत्याओं की सूचना थाना ऊसराहार पुलिस को दी.

पूछताछ के बाद 21 दिसंबर, 2014 को थाना ऊसराहार पुलिस ने अभियुक्त जयराम सिंह को इटावा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उस की जमानत नहीं हुई थी. Kanpur Crime News

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारि

Rajasthan News : नीले ड्रम की मर्डर मिस्ट्री

Rajasthan News : शादी हो जाने के बाद हर पत्नी चाहती है कि वह अपने घर को अच्छे से संभाले और अपने पति व बालबच्चों की ठीक से देखभाल करे. 3 बच्चों की मां सुनीता भी ये सारी जिम्मेदारियां बखूबी निभा रही थी. फिर एक दिन ऐसा क्या हुआ कि सुनीता ने अपने पति हंसराम उर्फ सूरज की न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उस की लाश को नीले ड्रम में डाल कर ऊपर से नमक भी डाल दी. आखिर सुनीता ने क्यों की पति की हत्या?

बरसात आते ही ईंटभट्ठे के मुनीम जितेंद्र शर्मा के कहने पर हंसराम उर्फ सूरज 3 महीने के लिए शाहजहांपुर में स्थित अपने घर लौटने के बजाए बीवीबच्चों के साथ उसी के साथ राजस्थान के अलवर जिले के किशनगढ़ वास कस्बा चला आया. उसे भट्ठे पर लोग सूरज के नाम से जानते थे. वह अपनी पत्नी सुनीता और 3 बच्चों के साथ वहां की आदर्श नगर कालोनी में जितेंद्र शर्मा की मां मिथिलेश शर्मा के मकान में किराए पर रहने लगा.

जितेंद्र ने सूरज को एक दुकान पर काम भी दिलवा दिया. इस तरह से सूरज की आमदनी का जरिया बन गया और उस की दिनचर्या शुरू हो गई. वह सुबह काम पर जाता और शाम तक घर वापस लौटता था. घर में उस के पीछे पत्नी सुनीता और 3 बच्चे होते थे. बड़ा बेटा 8 साल का, जबकि 2 अन्य बच्चे 4 साल और डेढ़ साल के थे.

सूरज और सुनीता एक तरह से जितेंद्र के एहसान तले आ गए थे. जितेंद्र जबतब छत पर बने घर में सुनीता के पास आनेजाने लगा था. वह सूरज के नहीं रहने पर भी सुनीता के पास चला जाता था. बच्चों से प्यारदुलार करता था. जल्द ही सुनीता जितेंद्र से भावनात्मक लगाव महसूस करने लगी थी. यह लगाव कब सैक्स अपील की भावना में बदल गया, उन्हें पता ही नहीं चला. यानी उन के बीच अवैध संबंध बन गए. दोनों को जब एकांत की चाहत होती, तब जितेंद्र बच्चों को गेम खेलने के लिए अपना मोबाइल फोन दे कर कमरे से बाहर भेज दिया करता था.

सुनीता और जितेंद्र के बीच एक अनैतिक रिश्ता कायम हो चुका था. जबकि सूरज इस से बेखबर था.  सुनीता शुरू से ही अपने पति से संतुष्ट नहीं थी. वह भले ही 3 बच्चों का बाप बन गया था, लेकिन सुनीता की शारीरिक भूख को नहीं मिटा पाता था.

सूरज उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर का रहने वाला था, लेकिन रोजीरोटी की तलाश में राजस्थान के खैरथल तिजारा जिलांतर्गत सूर्या ईंटभट्ठे पर काम करने आ गया था. वहीं उस की भट्ठे के मुनीम जितेंद्र से अच्छी जानपहचान हो गई थी. उन्हीं दिनों रंगीनमिजाज जितेंद्र की निगाह सुनीता पर पड़ी थी. उस के खिलते यौवन और सौंदर्य को देख कर मन ही मन उसे पाने की लालसा से भर गया था.

शायद यही कारण था कि जितेंद्र ने सूरज को परिवार समेत अपने गांव वापसी से रोक दिया था. यही नहीं, उस ने सूरज को शराब की ऐसी लत लगा दी कि वह जितेंद्र का पक्का यार बन गया. यह सब जितेंद्र ने सुनीता को हासिल करने के लिए किया था.

जितेंद्र एक तरह से अपनी योजना में सफल हो गया था और उस ने सुनीता के साथ जैसा रिश्ता कायम करना चाहता था, उस में उसे सफलता मिल गई थी. उस की जब इच्छा होती तो मौका निकाल कर सुनीता को अपनी बाहों में दबोच लेता था.

हालांकि जितेंद्र भी शादीशुदा था. वह एक 8 साल के बेटे आदित्य का पिता भी था. उस की पत्नी की करीब 12 साल पहले करंट लगने से मौत हो गई थी. बेटे की देखभाल उस की मां करती थी और जितेंद्र विधुर की जिंदगी गुजार रहा था.

यही कारण था कि वह स्त्रीसुख की आग में बेचैन रहता था. जब से उस ने सुनीता को देखा था, तभी से उसे पाने के लिए तड़प उठा था. इस के प्रयास में लग गया था और उस ने सुनीता को भट्ठे पर कम काम करवाने और शराबी सूरज को मुफ्त शराब पिला कर संतुष्ट कर दिया था.

वैसे जितेंद्र और सुनीता के बीच अवैध संबंध किशनगढ़ आने के पहले से बने हुए थे. जुलाई में बारिश के दिनों में जब सूरज ने सुनीता से वापस गांव चलने की बात कही, तब उस ने जितेंद्र के प्रस्ताव के साथ हां में हां मिला कर सूरज को राजी कर लिया था.

जितेंद्र ने जानबूझ कर सूरज को अपने घर के छत पर बना कमरा मां से कह कर किराए पर दिलवा दिया था. वहां उस की मां कभीकभार जाती थी. वह जगह सुनीता और जितेंद्र दोनों के लिए महफूज थी. सूरज और सुनीता के वहां रहने पर एक तरह से जितेंद्र की मौज आ गई थी.

बदले में वह उस की मदद करने लगा. एक बार जितेंद्र ने किराया ही अपनी जेब से दे दिया था. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह पत्नी से झगड़ पड़ा. उसे पहले से ही पत्नी के चालचलन और जितेंद्र से अधिक घुलनेमिलने से उस पर संदेह होने लगा था. किराए की बात पर उस का संदेह और गहरा हो गया. शराब के नशे में वह सुनीता पर सच उगलवाने का दबाव बनाने लगा था.

तब उलटे सुनीता पति सूरज से ही उलझ गई, गुस्से में बोली, ”तुम्हारे पास किराए का पैसा नहीं था और जब उस ने किराया चुका दिया है, तब उस का एहसान मानने के बजाए उसी पर लांछन लगा रहे हो.’’

”किराए में दोचार रोज देरी हो जाती तो इस से क्या हो जाता,’’ सूरज बोला.

”तुम्हें नहीं मालूम जितेंद्र की मां किराए के मामले में बहुत कड़क बुढिय़ा है. किराया नहीं मिलने पर तुरंत कमरा खाली करवा देती.’’ सुनीता बोली.

पत्नी के इस तर्क पर सूरज चुप लगा गया, किंतु कुछ दिनों बाद ही बेटे के एडमिशन को ले कर सुनीता पति से झगड़ पड़ी. दरअसल, उस के एडमिशन के लिए जितेंद्र ने पहल की थी. जब इस की जानकारी सूरज को हुई, तब वह गुस्से में आ गया और बोला, ”जितेंद्र कौन होता है मेरे बेटे का एडमिशन करवाने वाला?’’

इस पर फिर सुनीता पहले की तरह पति को ताना देती हुई बोली, ”अगर कोई तुम्हें मदद कर रहा है तो इस में बुराई क्या है?’’

”बुराई उस की मदद में नहीं, उस की नीयत में है. उस ने तुम्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है…तुम मेरे कहने का मतलब अच्छी तरह से समझती हो,’’ सूरज नाराजगी के साथ बोला.

तभी जितेंद्र वहां आ गया. उस ने जब सुनीता और सूरज को तूतूमैंमैं करते देखा, तब माहौल को हलका बनाते हुए बोल पड़ा, ”तुम दोनों फिजूल में लड़ते रहते हो. इतना अच्छा मौसम है. चलो बाजार, आज दारू की बोतल और मछली लाते हैं. यहीं दारू पार्टी करेंगे. सुनीता मछली पकाएगी.’’

दारू और मछली का नाम सुनते ही सूरज के मुंह से लार टपकने लगी. वह तुरंत तैयार हो गया और उस के साथ दारू लाने के लिए बाजार चला गया. थोड़ी देर में जितेंद्र और सूरज दारू और मछली ले कर आ गए. दोनों वहीं दारू पार्टी करने लगे. मछली पका कर सुनीता लाई, तब जितेंद्र ने उसे भी एक पैग पीने को दे दिया. उस ने भी खुश हो कर 2-3 पैग दारू का आनंद लिया. शराब के नशे में जितेंद्र ने कहा कि उसे उस की माली हालत पर पर दया आती है, इसलिए वह उस की मदद करता है. अपनी बातों से उस ने सूरज को आश्वस्त किया कि सुनीता और उस के संबंधों को ले कर बेकार में संदेह करता है.

हालांकि यह कहना उस का एक झूठ ही था. हकीकत तो यह थी कि जितेंद्र अकसर सूरज को शराब पिलाता था. उस में सुनीता भी साथ देती थी और जब सूरज नशे में धुत हो जाता था, तब जितेंद्र उस की बीवी के साथ मौजमस्ती करता था. यह सब चलता रहा. सुनीता अपने अनैतिक संबंधों के बचाव में लोगों से पति को शराब की लत लग जाने का दुखड़ा सुनाने लगी थी. जब भी जितेंद्र की मां से मिलती, एक दुखड़ा सुनाती कि वह अपने शराबी पति से परेशान हो गई है. जितेंद्र की मां उसे नसीहत देती. समझाती थी कि वह पति से झगड़ा नहीं करे, बल्कि प्रेम से उसे समझाएबुझाए.

बात 15 अगस्त, 2025 की है. सूरज दुकान से घर लौट आया था. वह गुस्से से भरा हुआ कमरे में बैठा था. जैसे ही पत्नी आई, उस से झगड़ पड़ा. तभी मकान के नीचे बैठा जितेंद्र उस के कमरे में आ गया. वह बोला, ”क्यों झगड़ रहे हो?’’

”क्या करूं? मेरी जिंदगी नरक बन गई है. दारू पिलाओगे, तब बोलूंगा?’’ सूरज निराश भाव से बोला.

”हां, क्यों नहीं, लो अभी गया और ले कर आया.’’ जितेंद्र बोला.

”कहां से लाओगे, आज तो ड्राई डे है.’’

”तो क्या हुआ, मैं ने इंतजाम कर रखा है.’’ जितेंद्र बोला और वहां से चला गया. थोड़ी देर में लौटा, तब उस के हाथ में एक शराब की बोतल थी.

सूरज और जितेंद्र वहीं दारू पीने लगे. सुनीता गुमसुम उन्हें देखती रही. जितेंद्र ने इशारा किया, तब वह भी अपने लिए एक गिलास ले आई. सूरज उस रोज गुस्से में लगातार पैग पर पैग पिए जा रहा था. हर पैग के साथ सुनीता को गालियां बके जा रहा था. उस पर बदलचलनी का आरोप लगाए जा रहा था. हद तो तब हो गई, जब सूरज उस पर गिलास फेंक कर मार दिया. इस पर जितेंद्र बोला, ”क्यों उसे मारते हो? गलत बात है.’’

नशे में सूरज बोला, ”मैं उसे मारूं या प्यार करूं, तुम कौन होते हो इसे बचाने वाले?’’

”तुम्हें जो कुछ करना है वह मेरे सामने मत करो,’’ जितेंद्र डांटता हुआ बोला.

”मैं मारूंगा इसे, आज इस की सारी हेकड़ी निकाल दूंगा.’’ बोलते हुए उस ने सुनीता की गरदन पकड़ ली थी. सुनीता चीख पड़ी थी. चीख सुन कर जब उस का बेटा उसे बचाने आया था, तब सूरज ने बेटे की भी पिटाई शुरू कर दी. वह गुस्से में बावला हो गया था. बचाव करते हुए जितेंद्र बोल पड़ा, ”अरे बच्चे को मार डालेगा क्या? इतना क्यों पीट रहा है उसे?’’

तभी सूरज की नजर लोहे के एक औजार पर गई. उस ने झट से उसे उठा लिया. तब तक सुनीता और उस का बेटा बचाव में भागने लगे. वे सूरज के आक्रामक तेवर को देख कर समझ गए थे कि वह काफी गुस्से में है. कुछ भी कर सकता है. ऐसा ही जितेंद्र ने भी महसूस किया तो वह भी वहां से जाने को उठा. तब सूरज ने तीनों पर लोहे का औजार फेंक मारा.

उस ने अनापशनाप बकना शुरू कर दिया था. उस रोज नशे में उस ने यहां तक कह दिया कि उन के बीच नाजायज संबंध है. उसे अब खत्म कर के ही चैन लेगा. वह शराब के नशे में बकता हुआ इधरउधर चक्कर लगा रहा था. इसी बीच सुनीता ने जितेंद्र को इशारा किया. हाथों के इशारे से धीमी आवाज में बोली, ”अब क्या किया जाए? इस पर तो भूत सवार है.’’

”जो तुम को सही लगे.’’

फिर क्या था. जितेंद्र ने चक्कर काटते सूरज को दबोच लिया. सुनीता ने उस के पैर पकड़ लिए. सूरज के गरदन पर जितेंद्र की पकड़ मजबूत होती चली गई. सुनीता ने उस को छटपटाने का मौका तक नहीं दिया. जितेंद्र ने एक हाथ से गरदन और दूसरे हाथ से सूरज का मुंह नाक ऐसे दबाई कि वह कुछ मिनट में ही बेजान हो गया. उस वक्त रात हो चुकी थी. सुनीता और जितेंद्र आपस में विचार करने लगे कि अब आगे क्या किया जाए? शव को कैसे ठिकाने लगाया जाए?

तभी जितेंद्र को कमरे के बाहर छत पर रखे नीले ड्रम को देख कर एक आइडिया आया. क्यों न शव को ड्रम में डाल कर उस पर नमक डाल दिया जाए, ताकि शव जल्दी सडग़ल जाए. उसे यह आइडिया अचानक कुछ महीने पहले मेरठ के सौरभ हत्याकांड से आया. उस ने वही किया. फर्क इतना था कि सीमेंट का गाढ़ा घोल डालने के बजाय सूरज के शव को ड्रम में डाल कर उस में नमक का घोल डाल दिया. उस के मुंह को चादर से ढंक दिया.

संयोग से जब यह सब किया जा रहा था, तब सूरज का बेटा पेशाब के लिए उठा था. वह अर्धनिद्रा में था, उसे कुछ समझ में नहीं आया कि उस की मम्मी और जितेंद्र अंकल ड्रम के साथ क्या कर रहे हैं? जब उस ने पूछा कि वे क्या कर रहे हैं? तब अचानक जितेंद्र बोल पड़ा, ”तुम्हारे पापा को ठिकाने लगा रहे हैं. वह तुम्हें और मम्मी को मार रहा था न!’’

17 अगस्त, 2025 को जितेंद्र की मां मिथिलेश ने महसूस किया कि छत पर रहने वाले किराएदार सूरज के यहां सन्नाटा है, वहां से किसी की आवाज नहीं आ रही है. जबकि सुबह होते ही सुनीता और सूरज के बीच होने वाली बहस की आवाजें आने लगती थीं. कई बार बच्चों के रोने की भी आवाज सुनाई देती थी.

वह छत पर चली गई. कमरे में कोई नजर नहीं आ रहा था. वहां न तो सुनीता थी और न ही सूरज और उस के बच्चे. उस ने महसूस किया कि जितेंद्र भी बीती रात से अपने कमरे में नजर नहीं आया था. तभी वहां उसे अजीब सी दुर्गंध महसूस हुई. जो पास रखे नीले ड्रम से आ रही थी. उस ने तुरंत अपने पति राजेश शर्मा को यह बात बताई. पति ने पुलिस कंट्रोल रूम में फोन कर छत पर रखे ड्रम से दुर्गंध आने की सूचना पुलिस को दी.

पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना पा कर किशनगढ़ वास के एसएचओ जितेंद्र सिंह शेखावत, एसआई दिनेश कुमार मीणा, एएसआई ज्ञानचंद पुलिस दलबल के साथ आदर्शनगर कालोनी स्थित राजेश शर्मा के घर पहुंच गए. पुलिस टीम छत पर रखे नीले ड्रम के पास गई, जहां से दुर्गंध आ रही थी. एक पुलिसकर्मी ने उस का ढक्कन हटाया तो दुर्गंध और तेज हो गई. उस के भीतर चादर ठूंसी हुई थी. जब चादर बाहर निकली, तब दुर्गंध का तेज भभका निकला और अंदर लाश नजर आई.

लाश की पहचान सूरज के रूप में हुई, जो वहीं किराए पर रहता था. एसएचओ ने इस की सूचना किशनगढ़ वास के डीएसपी राजेंद्र सिंह निर्वाण को दे दी. वह थोड़ी देर में ही मौके पर पहुंच गए. उन्होंने उस के कमरे की तलाशी ली. वहां उन्हें सूरज का आधार कार्ड मिला, जिस पर उस का नाम हंसराज दर्ज था. उस पर उस के पिता का नाम खेमकरण और पता नवादिन नवाजपुर, शाहजहांपुर, उत्तर प्रदेश लिखा था. मकान मालकिन को भी यह जान कर हैरानी हुई कि मृतक ने अपना असली नाम उसे नहीं बताया था.

उस वक्त सडऩे की स्थिति में आ चुके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. पुलिस के सामने सवाल यह था कि मृतक की पत्नी सुनीता और बच्चे कहां गए? जांच और पूछताछ में यह भी मालूम हुआ कि मकान मालकिन का विधुर बेटा जितेंद्र शर्मा भी 16 सितंबर, 2025 से ही लापता है. उन का पता लगाने के लिए जांच टीमें गठित कर दी गईं. उन्हें पकडऩे के लिए टीमें पड़ोसी राज्य हरियाणा और उत्तर प्रदेश भेजी गईं. साथ ही सीसीटीवी के फुटेज निकलवाए गए.

दूसरी तरफ फरार जितेंद्र शर्मा 18 अगस्त को सुनीता और उस के तीनों बच्चों को ले कर अलवर जिले के रामगढ़ इलाके के आलावड़ा गांव जा पहुंचा. वहां लोगों ने एक ईंट भट्ठे पर काम मांगा. भट्ठे के मालिक को उन पर संदेह हो गया था. कारण उसे बीते दिनों किशनगढ़ वास में हत्या संबंधी जानकारी न्यूजपेपर और सोशल मीडिया के जरिए मिल चुकी थी, जिस में फरार लोगों के बारे में भी जिक्र किया गया था.

इस संदेह के आधार पर उस ने तुरंत स्थानीय पुलिस थाने को इस की सूचना दे दी. पुलिस वहां पहुंच गई और उन्हें वही हिरासत में ले लिया. इस के बाद उन्हें किशनगढ़ वास लाया गया. थाने में पहले से ही सूरज के परिजन मौजूद थे. उन्होंने सूरज की लाश की पहचान कर ली थी. सूरज के पेरैंट्स और भाईबहनों का रोरो कर बुरा हाल था. थाना किशनगढ़ वास की पुलिस ने हंसराज उर्फ सूरज की हत्या का मामला उस के परिजनों की शिकायत पर दर्ज कर लिया गया. हत्याकांड में जितेंद्र शर्मा और सुनीता मुख्य आरोपी बनाए गए.

दोनों ने गहन पूछताछ में हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. उन्होंने हत्या किस तरह से की, पुलिस इस की जांच के लिए उन्हें घटनास्थल पर ले गई. वहां आरोपियों द्वारा क्राइम सीन क्रिएट किया गया. उन के बयान लिए गए. अपने बयान में जितेंद्र ने बताया कि सूरज की पत्नी सुनीता के प्रेम में वह अंधा हो गया था. सुनीता भी उसे पसंद करने लगी थी. सूरज उन के प्रेम संबंधों में बाधक था, इसलिए उस की हत्या कर दी थी.

पुलिस ने जितेंद्र शर्मा और सुनीता से गहन पूछताछ के बाद उन्हें मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर दिया. वहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Rajasthan News

 

 

MP News : साधना पटेल नहीं बन पाई बैंडिट क्वीन

MP News : पिछड़े तबके के बुद्धिविलास पटेल मध्य प्रदेश के विंघ्य इलाके के चित्रकूट के गांव बगहिया पुरवा के बाशिंदे थे. उन की 3 औलादों में साधना सब से बड़ी थी. हालांकि साधना पढ़ाईलिखाई में होशियार थी, लेकिन उस की ख्वाहिश जिंदगी में कुछ ऐसा करने की थी, जिस से लोग उसे याद रखें.

जिस उम्र में लड़कियां कौपीकिताबें सीने से लगाए शोहदों से बचती जमीन में आंखें धंसाए स्कूल जा रही होती थीं, उस उम्र में साधना अपने किसी बौयफ्रैंड के साथ जंगल में कहीं मौजमस्ती कर रही होती थी. जाहिर है कि बहुत कम उम्र में ही वह रास्ता भटक बैठी थी तो इस के जिम्मेदार पिता बुद्धिविलास भी थे, जिन के घर आएदिन डाकुओं का आनाजाना लगा रहता था. नामी और इनामी डाकू चुन्नी पटेल का तो उन से इतना याराना था कि जिस दिन वह घर आता था, तो तबीयत से दारू, मुरगा की पार्टी होती थी.

चुन्नी पटेल को साधना चाचा कह कर बुलाती थी और अकसर उस की उंगलियां बंदूक से खेला करती थीं. साधना की हरकतें देख चुन्नी पटेल अकसर कहा करता था कि एक दिन यह लड़की पुतलीबाई से भी बड़ी डाकू बनेगी. ऐसा हुआ भी और उजागर 18 नवंबर, 2019 को हुआ, जब सतना पुलिस ने 50,000 इनामी की इस दस्यु सुंदरी, जिसे ‘जंगल की शेरनी’ भी कहा जाता था, को कडियन मोड़ के जंगल से गिरफ्तार कर लिया.

ऐसे बनी डाकू

एक मामूली से घर की बला की खूबसूरत दिखने व लगने वाली साधना पटेल के डाकू बनने की कहानी भी उस की जिंदगी की तरह कम दिलचस्प नहीं. कम उम्र में ही साधना पटेल को सैक्स का चसका लग गया था, जिस से पिता बुद्धिविलास परेशान रहने लगे थे. बेटी को रास्ते पर लाने के लिए उन्होंने उसे अपनी बहन के घर भागड़ा गांव भेज दिया, लेकिन इस से कोई फायदा नहीं हुआ. उलटे, वह यह जान कर हैरान हो उठी कि चुन्नी चाचा का आनाजाना यहां भी है और उन के उस की बूआ से नाजायज संबंध हैं. तब साधना को पहली बार सैक्स को ले कर मर्दों की कमजोरी सम झ आई थी.

लेकिन सैक्स की अपनी लत और कमजोरी से वह कोई सम झौता नहीं कर पाई. बूआ के यहां कोई रोकटोक नहीं थी, इसलिए उस के जिस्मानी ताल्लुकात एक ऐसे नौजवान से बन गए, जो उस का मुंहबोला भाई था. एक दिन बूआ ने हमबिस्तरी करते दोनों को रंगेहाथ पकड़ लिया, तो साधना घबरा उठी. साधना को डर था कि बूआ के कहने पर चुन्नीलाल उसे और उस के आशिक को मार डालेगा, इसलिए वह जान बचाने के लिए बीहड़ों में कूद पड़ी.

यह साल 2015 की बात है, जब उस की मुलाकात नामी डकैत नवल धोबी से हुई. नवल धोबी औरतों के मामले में बड़ा सख्त था. उस का मानना था कि औरतें डाकू गिरोहों की बरबादी की बड़ी वजह होती हैं, इसलिए वह गिरोह में उन्हें शामिल नहीं करता था. कमसिन साधना पटेल को देखते ही नवल धोबी का मन डोल उठा और अपने उसूल छोड़ते हुए उस ने साधना को न केवल गिरोह में, बल्कि जिंदगी में भी शामिल कर लिया. अब तक साधना कपड़ों की तरह आशिक बदलती रही थी, लेकिन नवल की हो जाने के बाद उस ने इसी बात में बेहतरी और भलाई सम झी कि अब कहीं और मुंह न मारा जाए. कुछ दिन बड़े इतमीनान और सुकून से कटे.

इसी दौरान साधना ने डकैती के कई गुर और सलीके से हथियार चलाना सीखा. नवल के साथ मिल कर उस ने कई वारदातों को अंजाम भी दिया. नवल के साथ साधना का नाम भी चल निकला, लेकिन एक दिन पुलिस ने नवल को कई साथियों समेत गिरफ्तार कर लिया, जिस से उस का गिरोह तितरबितर हो उठा. नवल की गिरफ्तारी साधना की बैंडिट क्वीन बन जाने की ख्वाहिश पूरी करने वाली साबित हुई.

साधना ने गिरोह के बाकी सदस्यों को ले कर अपना खुद का गिरोह बना डाला और बेखौफ हो कर वारदातों को अंजाम देने लगी. गिरोह के सभी सदस्य हालांकि उसे ‘साधना जीजी’ कहते थे, लेकिन कई मर्दों से वह सैक्स संबंध बनाती रही.

फिर आया एक मोड़

अपना खुद का गिरोह बनाने के शुरुआती दौर में साधना रंगदारी वसूलती थी, लेकिन यह भी उसे सम झ आ रहा था कि अगर नामी डाकू बनना है और खौफ बनाए रखना है तो जरूरी है कि किसी ऐसी वारदात को अंजाम दिया जाए जिस की चर्चा दूरदूर तक हो. इसी गरज से साल 2018 में साधना ने नयागांव थाने के तहत आने वाले पालदेव गांव के छोटकू सेन को अगवा कर लिया. छोटकू सेन से वह गड़े खजाने के बारे में पूछती रहती थी. लेकिन वह कुछ नहीं बता पाया तो साधना ने बेरहमी से उस की उंगलियां काट दीं.

साधना की गिरफ्त से छूट कर छोटकू ने उस के खिलाफ मामला दर्ज कराया तो इस कांड की चर्चा वाकई वैसी ही हुई जैसा कि वह चाहती थी. इस कांड के बाद साधना के नाम का सिक्का बीहड़ों में चल निकला और इसी दौरान उस की जिंदगी में पालदेव गांव का ही नौजवान छोटू पटेल आया. छोटू के पिता ने बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में लिखाते समय उस के अगवा हो जाने का अंदेशा जताया था.

कुछ दिनों बाद पुलिस को पता चला कि छोटू साधना का नया आशिक है और उसे अगवा नहीं किया गया है, बल्कि वह अपनी मरजी से साधना के साथ रह रहा है, तो पुलिस ने उसे भी डकैत घोषित कर उस के सिर 10,000 रुपए का इनाम रख दिया. छोटू 6 अगस्त, 2019 को गायब हुआ था, लेकिन हकीकत में इस के पहले भी वह साधना से मिला करता था और दोनों जंगल में रंगरलियां मनाते थे. बाद में छोटू गांव वापस लौट आता था.

सच जो भी हो, लेकिन यह तय है कि साधना वाकई छोटू से दिल लगा बैठी थी और उस की ख्वाहिश पूरी करने के लिए कभीकभी जींसशर्ट उतार कर साड़ी भी पहन लेती थी. छोटू भी उस पर जान देने लगा था, इसलिए उस के साथ रहने लगा था. सितंबर, 2019 में पुलिस ने नामी और 7 लाख रुपए के इनामी डाकू बबली कोल को उस के साथ व साले लवकेश को ऐनकाउंटर में मार गिराया तो राज्य में खासी हलचल मची थी. बबली कोल गिरोह के दबदबे और चर्चों के चलते साधना को कोई भाव नहीं देता था. अब तक हालांकि उस के खिलाफ आधा दर्जन मामले दर्ज हो चुके थे, लेकिन बबली के कारनामों के सामने वे कुछ भी नहीं थे.

बहरहाल, बबली कोल की मौत के बाद विंध्य के बीहड़ों में 21 साला साधना का एकछत्र राज हो गया, लेकिन जिस फुरती से पुलिस डाकुओं का सफाया कर रही थी, उस से घबराई साधना पटेल को अंडरग्राउंड हो जाना ही बेहतर लगा. छोटू के साथ वह  झांसी और दिल्ली में रही और पूरी तरह घरेलू औरत बन कर रही. हालांकि यह जिंदगी वह 4 महीने ही जी पाई. बड़े शहरों के खर्चे भी ज्यादा होते हैं, लिहाजा जब पैसों की तंगी होने लगी, तो उस ने फिर वारदात की योजना बनाई और बीहड़ लौट आई.

पुलिस को मुखबिरों के जरीए जब यह बात मालूम हुई तो उस ने जाल बिछा कर 17 नवंबर, 2019 को उसे गिरफ्तार कर लिया. उत्तर प्रदेश में भी साधना पटेल कई वारदातों को अंजाम दे चुकी थी, लेकिन वहां किसी थाने में उस के खिलाफ किसी ने मामला दर्ज नहीं कराया था. इस के बाद भी पुलिस ने उस पर 30,000 रुपए के इनाम का ऐलान किया था.

अब साधना पटेल जेल में बैठी मुकदमोें की सुनवाई और सजा के इंतजार में काट रही है, लेकिन उस की कहानी बताती है कि उस के डाकू बनने में सब से बड़ी गलती तो उस के पिता की ही है, जिन की मौत के बाद साधना बेलगाम हो गई थी.

Love Stories in Hindi : प्रेमिका के चक्कर में शिकारी बन गया शिकार

Love Stories in Hindi : यह कहानी है पतिपत्नी और ‘वो’ के बीच एक लव ट्रायंगल की, जिस में सुनंदा नाम की महिला अपने प्रेमी सिद्धप्पा कटकरे के साथ मिल कर अपने पति बीरप्पा पुजारी की हत्या की कोशिश करती है. इस वारदात के बाद अचानक सिद्धप्पा गायब हो जाता है, लेकिन जब पुलिस उस की खोज करती है, तब पुलिस को सिद्धप्पा की लाश मिलती है. एक शिकारी खुद कैसे शिकार बन गया, यह हैरतअंगेज कहानी किसी फिल्म की नहीं, बल्कि एक ऐसी हकीकत है कि…

इस कहानी की शुरुआत होती है कर्नाटक के विजयपुरा जिले के इंडी टाउन के अक्क महादेवी नगर से. यहीं पर अपने बच्चों के साथ किराए के मकान में रहता था बीरप्पा पुजारी. बीरप्पा किसान था. उस का छोटा सा परिवार था. परिवार में पत्नी सुनंदा के अलावा २ बच्चे थे. बीरप्पा को कई बार अपनी पत्नी पर शक हुआ कि उस की पत्नी का किसी दूसरे मर्द के साथ चक्कर चल रहा है, लेकिन वह बिना किसी सबूत के उस पर इलजाम लगा कर अपनी गृहस्थी में आग नहीं लगाना चाहता था. उस ने कई बार पत्नी को रंगेहाथों पकडऩे की कोशिश की, लेकिन वह किसी भी सूरत में सफल नहीं हो सका.

सुनंदा बहुत ही तेज किस्म की थी. उसे भी आभास हो गया था कि उस का पति उस की जासूसी करने पर लगा हुआ है, लेकिन वह हर वक्त पूरी तरह से अलर्ट रहती थी. फिर भी बीरप्पा के मन में पत्नी के प्रति शक पैदा हुआ तो वह छोटीछोटी बातों को ले कर उस के साथ लड़ाईझगड़े पर उतारू हो उठता था, जिस के कारण दोनों के संबधों में जहर घुलना शुरू हो गया यानी एक बसीबसाई गृहस्थी में कलह शुरू हो गई. सुनंदा काफी दिनों बाद अपने खेतों पर गई थी, तभी उस का इंतजार कर रहा प्रेमी सिद्धप्पा कटकरे उस के पास आया और बोला, ”क्या बात है भाभी, आज बहुत दिनों बाद खेतों पर आना हुआ.’’

”आज तो आ भी गई, लेकिन आगे मेरा खेतों पर आने का रास्ता पूरी तरह से बंद होने वाला है. बीरप्पा ने मेरे खेतों पर आने पर पाबंदी लगा दी है. किसी गांव वाले ने उस के कान भर दिए कि तुम्हारी बीवी तुम्हारे पीछे खेतों पर जा कर सिद्धप्पा के साथ मौजमस्ती करती है.’’ सुनंदा ने बताया.

”अरे, भाभी, तुम बीरप्पा की धमकी से डर गई?’’ सिद्धप्पा बोला.

”’डरूं नहीं तो हर रोज उस की मार खाती रहंंू? सिद्धप्पा अब तुम मेरे खेतों पर मत आया करो, तुम्हारे कारण मेरे घर में कलह पैदा हो गई है.’’

”लेकिन भाभी, मैं तो तुम्हें बेइंतहा प्यार करता हंू. तुम से मिले बिना मुझे सब कुछ सूनासूना लगता है. तुम्हारे बिना मेरी जिंदगी अधूरी है.’’

”प्यार तो मैं भी तुम्हें बहुत करती हूं, लेकिन क्या करूं, बीरप्पा ने मेरा जीना हराम कर रखा है.’’ कहतेकहते सुनंदा की आंखें भर आईं.

तब सुनंदा गंभीर हो कर बोली, ”देखो सिद्धप्पा, अगर तुम चाहते हो कि मैं तुम से पहले की तरह ही मिलतीजुलती रहूं तो तुम्हें मेरा एक काम करना होगा. तुम्हें किसी भी तरह से हम दोनों के मिलन में बाधा बन रहे मेरे पति को हटाना होगा. तुम किसी भी तरह से बीरप्पा को खत्म कर दो. उस के बाद हम दोनों पतिपत्नी के रूप में गृहस्थ जीवन बिताएंगे.’’

”तुम ठीक कहती हो भाभी, मैं भी काफी समय से यही सोच रहा था, लेकिन तुम्हारे डर से अपना मुंह बंद किए हुए था. अगर तुम्हारी ऐसी ही मरजी है तो यह काम आप मुझ पर छोड़ दो. आप तो केवल मौका देख कर मुझे फोन कर देना. बाकी काम मैं अपने आप निपटा दूंगा.’’

उस दिन के बाद सुनंदा मौके की तलाश में जुट गई. फिर उसी दौरान ३१ अगस्त, २०२५ को उस योजना को अंजाम देने का प्लान तैयार कर लिया. उसी रात को कोई १२ बजे का वक्त था. बीरप्पा खापी कर गहरी नींद में सोया हुआ था. उसी दौरान उसे लगा कि उस के शरीर पर कोई बैठा हुआ है. अपने शरीर पर वजन महसूस होते ही बीरप्पा ने उठने की कोशिश की. लेकिन तब तक दूसरा आदमी उस के पैरों पर बैठ गया.

इस से पहले कि बीरप्पा कुछ माजरा समझ पाता, एक व्यक्ति ने उस का मुंह दबाते हुए उस का गला घोंटना शुरू कर दिया. वह बुरी तरह से छटपटाने लगा.

और सीने पर सवार हो गई पत्नी

तभी उस के पेट पर बैठे आदमी ने उस के गुप्तांगों को बुरी तरह से दबाना चालू किया. उस की सांसें बंद होती जा रही थीं. देखते ही देखते बीरप्पा बेहोशी की हालत में पहुंच गया.

जब उसे होश आया तो वह एक अस्पताल में भरती था. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि उस के साथ क्या हुआ और किस ने उसे अस्पताल में कब भरती कराया. उस के होश में आते ही पास में खड़ी नर्स ने उसे आश्वासन दिया कि अब आप पूरी तरह से सही हो, चिंता की कोई बात नहीं. इस बात को सुन कर बीरप्पा की आंखें आंसुओं से सराबोर हो आई थीं. अपने को ठीक हालत में देख बीरप्पा ने अपनी पत्नी के बारे में पूछा तो पता चला कि उस की पत्नी ३१ अगस्त, २०२५ से ही गायब है.

बीरप्पा के होश में आते ही पुलिस ने उस से पूछताछ की. तब बीरप्पा ने पुलिस को जानकारी देते हुए बताया कि ३१ अगस्त की रात को वह खाना खा कर सो गया था. उस के सोने के बाद कुछ आदमी उस के घर में घुसे और उन्होंने उस का गला व गुप्तांग दबा कर मारने की कोशिश की. उस दौरान उस की पत्नी सुनंदा भी घर पर ही मौजूद थी. अपने पति को इस हालत में देखते हुए न तो उस ने कोई शोरशराबा किया और न ही उस ने उन लोगों से उसे बचाने की कोशिश की. उस ने बताया कि उसी दौरान उस की पत्नी ने कहा, ”इसे छोडऩा मत सिद्धू, इस की गरदन जोर से दबाओ. यह किसी भी सूरत में बचना नहीं चाहिए.’’

सुनंदा की बात सुनते ही उस व्यक्ति ने मेरे गले पर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर दी थी. बुरी तरह से गला दबते ही वह बेहोशी की हालत में चला गया था. बीरप्पा की बात सुनते ही पुलिस समझ चुकी थी कि उस के साथ घटित इस घटना में उस की पत्नी सुनंदा का ही हाथ था. इसी कारण वह घर से गायब हो गई थी. इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने सुनंदा को हर जगह तलाशने की कोशिश की, लेकिन उस का कहीं भी अतापता न चल सका. पुलिस निरंतर सुनंदा की तलाश में जुटी थी. उसी दौरान पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

सुनंदा को गिरफ्तार करते ही पुलिस ने उस से कड़ी पूछताछ की तो उस ने सहज ही अपना जुर्म कुबूलते हुए पुलिस को बताया कि काफी समय से उस की सिद्धप्पा से गहरी दोस्ती थी. जिस के कारण उस का पति उस पर शक करते हुए उस के साथ मारपीट करता था. उस की मारपीट से तंग आ कर ही उस ने प्रेमी सिद्धप्पा के साथ मिल कर पति को मारने की योजना बनाई थी.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस ने उस के प्रेमी सिद्धप्पा को गिरफ्तार करने के लिए कई जगह पर दबिश दी, लेकिन वह पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. उस के बाद पुलिस ने उस की खोज में अपने मुखबिर लगा दिए, लेकिन इस से पहले कि पुलिस सिद्धप्पा तक पहुंच पाती, उस ने एक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दी. उस ने उस वीडियो में जो कहा था, वह काफी हैरान कर देने वाला था. उस ने उस वीडियो के जरिए खुद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश की थी.

सिद्धप्पा ने कहा कि इस वारदात में मेरी कोई खास गलती नहीं. मैं ने जो भी किया, सुनंदा के कहने पर ही किया है. सुनंदा मुझे दिलोजान से चाहती थी. वह मेरे साथ श्रीशैलम मंदिर भी गई थी. वहां पर उस ने मेरे लिए मन्नत भी मांगी थी. वहां पर उस ने प्रार्थना की कि ३ महीने के भीतर हम पतिपत्नी की तरह साथ रहें. लेकिन इस वक्त वह उसे फंसाना चाहती है.

सिद्धप्पा ने वीडियो में कहा कि बीरप्पा को मौत की साजिश रचने में उस की पत्नी सुनंदा का हाथ था. जबकि वह इस मामले में खुद को निर्दोष साबित करना चाह रही है. वह जानता है कि उस के पास खुद को निर्दोष साबित करने का कोई सबूत नहीं है. फिर पुलिस प्रशासन भी महिलाओं का ही साथ देता है. अगर वह पुलिस के सामने हाजिर हो कर सब कुछ साफसाफ भी बता दे तो पुलिस सुनंदा का ही पक्ष लेगी. इसी कारण मेरे पास सिवाय अपनी जान देने के कोई दूसरा रास्ता नहीं.

सिद्धप्पा ने कहा कि सुनंदा कोई ढाई साल से उस के साथ रिलेशनशिप में थी. उस ने ही बीरप्पा को मौत की नींद सुलाने की साजिश रची थी. उस के दबाव में आ कर ही उस ने उस की पति को मौत की नींद सुलाने की कोशिश की थी. जब तक यह वीडियो पुलिस के हाथों तक पहुंचेगी, शायद तब तक मैं स्वयं भी मौत को गले लगा चुका होऊंगा. मेरी आत्महत्या की जिम्मेदारी भी सुनंदा की ही होगी. इस वीडियो ने सब को चौंका दिया था, क्योंकि वीडियो में सिद्धप्पा ने न सिर्फ खतरनाक साजिश का खुलासा किया था, बल्कि अपनी खुदकुशी का इशारा भी दे दिया था. इस वीडियो के जारी होते ही विजयपुरा के एसपी लक्ष्मण निंबर्गी की देखरेख में उस की तलाश शुरू की गई. फौरन ही सिद्धप्पा की तलाश में पुलिस की सक्रियता बढ़ गई थी.

वीडियो के जारी होते ही पुलिस प्रशासन में हड़कंप मच गया. उसे तलाशने में पुलिस बल को लगा दिया था. पुलिस और उस के मुखबिर अभी उस की तलाश में जुटे थे. उसी दौरान इस घटना के लगभग १० दिन बाद पुलिस को जानकारी मिली कि सुनंदा के प्रेमी सिद्धप्पा की लाश एक पेड़ से लटकी हुई है. पुलिस के हत्थे चढऩे से पहले ही उस ने यह खौफनाक कदम उठा लिया था.

शिकारी कैसे हो गया शिकार

सिद्धप्पा की लाश उस के गांव के बाहर जंगल में एक पेड़ से लटकी हुई थी. उस वक्त तक उस की लाश की हालत बहुत ही खराब हो चुकी थी. जिस से साफ जाहिर था कि सिद्धप्पा ने यह कदम कई दिन पहले ही उठा लिया था. जबकि पुलिस उसे किसी भी कीमत पर जिंदा गिरफ्तार करना चाहती थी. इस की जानकारी मिलते ही लोकल पुलिस मौके पर पहुंची. पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. जांचपड़ताल से पता चला कि सिद्धप्पा ने खुद ही पुलिस के डर की वजह से खुदकुशी कर ली थी. फिलहाल सिद्धप्पा की मौत के साथ ही इस लव ट्रायंगल की कहानी के सारे सबूत ही दफन हो गए थे, जिस के सबूत पुलिस जुटाना चाह रही थी.

पुलिस ने मृतक सिद्धप्पा का शव पेड़ से उतार कर अपनी काररवाई पूरी करते हुए उस की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. मृतक ने अपने गले में रस्सी का फंदा डाल कर सुसाइड की वारदात को अंजाम दिया था, जिसे देख कर यह आशंका भी नहीं की जा सकती थी कि उसे मार कर लटकाया गया हो. इस मामले में बीरप्पा की तरफ से अपनी पत्नी सुनंदा और उस के प्रेमी सिद्धप्पा को अपनी मौत की साजिश रचने का आरोप लगा कर पुलिस को लिखित तहरीर दी थी. जिस के बाद पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कई लोगों को इस मामले से जोड़ते हुए शक के आधार पर काररवाई करने की योजना बनाई थी.

इस जानकारी के मिलते ही पुलिस पूछताछ के दौरान सिद्धप्पा के फेमिली वालों के साथ ही सुनंदा के बयानों के आधार पर इस केस की जो हकीकत सामने आई, वह इस प्रकार थी. बीरप्पा मयप्पा पुजारी कर्नाटक के जिला विजयपुरा के अंजूतागी गांव का रहने वाला था. सिद्धप्पा कटकरे भी बीरप्पा का ही पड़ोसी था. बीरप्पा पुजारी को इतनी खास जानकारी मिल चुकी थी कि उस की पत्नी का उस के पड़ोसी सिद्धप्पा कटकरे के साथ चक्कर चल रहा है.

बीरप्पा और सिद्धप्पा के खेत पासपास में ही थे. बीरप्पा अपने खेतों पर कम ही जाता था. उस की पत्नी सुनंदा ही ज्यादातर खेतों पर काम करने जाती थी. खेतों पर काम करने के दौरान ही उस की दोस्ती सिद्धप्पा से हो गई. सुनंदा की दोस्ती सिद्धप्पा के साथ हो जाने के बाद वह हर वक्त ही अपने खेतों पर पड़ा रहता था. गांव में अधिकांश लोग दोपहर में अपने घरों पर चले आते हैं, लेकिन सिद्धप्पा फिर भी सुनंदा के साथ दोस्ती होने के कारण उस के मिलने की चाहत में वहीं पर पड़ा रहता था. उसी दोस्ती के सहारे जल्दी ही दोनों के बीच अवैध संबंध भी बन गए थे. सिद्धप्पा के साथ संबंध बनते ही सुनंदा उस के प्यार में पागल हो गई. फिर दोनों फोन पर बातें करने लगे थे. सिद्धप्पा जब कभी भी मौका पाता, फोन कर के सुनंदा को खेतों पर बुला लेता और उस के साथ मौजमस्ती करने लगा था.

लेकिन दोनों के बीच लुकाछिपी का यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. जैसे ही दोनों गांव वालों की नजरों में चढ़े, उन की गांव में चर्चा होने लगी थी. यह बात धीरेधीरे बीरप्पा के सामने भी पहुंच गई. यह बात सुनते ही बीरप्पा को बहुत दुख हुआ. बीरप्पा ने सुनंदा के साथसाथ सिद्धप्पा को भी हड़काया, लेकिन सिद्धप्पा फिर भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा था.

बीरप्पा ने कई बार अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन दोनों के बीच बातचीत का सिलसिला खत्म नहीं हुआ. यह बात बीरप्पा को नागवार गुजरती थी. कई बार दोनों के बीच इस मामले को ले कर मनमुटाव भी हुआ, लेकिन उस के पास कोई ऐसा ठोस सबूत नहीं था, जिस के आधार पर वह उस पर किसी प्रकार का लांछन लगा सके. पूरे गांव में सिद्धप्पा सुनंदा को ले कर चर्चे हो रहे थे. जिस के कारण गांव में बीरप्पा का रहना मुश्किल हो गया था.

जब गांव में उस की पत्नी के चरित्र को ले कर काफी चर्चा होने लगी तो पत्नी की हरकतों से तंग आ कर एक दिन बीरप्पा ने बहुत बड़ा कदम उठाया. उस ने अपनी बीवी की हरकतों से तंग आ कर अपनी जुतासे की जमीन बेचने का निर्णय लिया. गांव छोडऩे का पूरा मन बना कर उस ने अपने गांव की जमीन बेच दी. जमीन बेचते ही बीरप्पा ने अपना कुछ कर्ज भी चुकाया. फिर उस ने शहर की तरफ कदम बढ़ाया. वह अपनी गांव की जमीन बेच कर इंडी टाउन के अक्क महादेवी नगर में किराए के मकान में शिफ्ट हो गया.

प्रेमी के प्यार में पागल हो गई थी सुनंदा

अक्कमहादेवी नगर में आने के बाद बीरप्पा को उम्मीद थी कि वहां पर आ कर सब कुछ सही हो जाएगा. यही सोच कर उस ने वहां पर अपना काम भी लगा लिया था. लेकिन उसी दौरान उसे लगा कि सुनंदा गांव छोडऩे के बाद भी अपने पुराने रास्ते पर ही चल रही है. उस ने कई बार उसे फोन पर किसी से बात करते देखा तो उसे फिर से चिंता सताने लगी. उस ने सुनंदा का मोबाइल चैक किया तो पता चला कि वह फिर से सिद्धप्पा से संपर्क साधे हुए है. इसी बात पर दोनों के बीच जोरदार लड़ाई हुई. यह बात सुनंदा ने सिद्धप्पा से कही तो गुस्से में उस का पारा चढ़ गया. वह अपनी प्रेमिका के दर्द को सुन कर बौखला उठा. फिर उस दिन दोनों के बीच जो बात हुई, उस ने एक खतरनाक योजना को जन्म दिया.

सिद्धप्पा ने अपनी प्रेमिका के पति से छुटकारा पाने के लिए अपने साथ अपने एक दोस्त को भी शामिल कर लिया था. सिद्धप्पा ने सुनंदा के कमरे पर पहुंचने से पहले ही उसे सारी जानकारी दे दी थी. उसी जानकारी के बाद बीरप्पा के सोते ही सुनंदा ने अपने मकान का दरवाजा खुला छोड़ दिया था, ताकि बिना किसी शोरशराबे के प्रेमी सिद्धप्पा उस के घर में प्रवेश कर योजना को अंजाम दे सके. सिद्धप्पा अपने एक साथी के साथ प्रेमिका के घर पहुंच गया.

बीरप्पा को सोते देख सुनंदा ने सिद्धप्पा और उस के साथी को इशारा कर दिया. उस का इशारा पाते ही दोनों गहरी नींद में सो रहे बीरप्पा पर टूट पड़े, लेकिन बीरप्पा ने हिम्मत से काम लिया. उस ने दोनों के साथ डट कर मुकाबला किया.

बीरप्पा के सिर के पास ही दीवार से सटा हुआ फ्रिज रखा हुआ था. उस ने फुरती से अपने पैर बैड से सटा कर जोरदार धक्का मारा, जिस से वह सिरहाने रखे फ्रिज से टकराया. उस के टकराने से कमरे में एक जोरदार आवाज गूंजी, जिसे सुनते ही उस का मकान मालिक कमरे की तरफ आया. उसे देखते ही सिद्धप्पा अपने साथी के साथ घर से फरार हो गया, लेकिन उस के बाद भी वह जोरजोर से चीख रहा था. उस की चीख सुन कर सुनंदा ने उसी से सवाल किया कि आप चीख क्यों रहे हो.

तब तक शोरशराबा सुन कर आसपड़ोस के लोग उस के पास आ गए थे. उस के कुछ समय बाद बीरप्पा बेहोशी की हालत में चला गया. तब उस के किराएदार व पड़ोसियों ने उसे अस्पताल में भरती कराया. घटना के वक्त बीरप्पा की पत्नी उस की बगल में ही मौजूद थी, लेकिन उस ने एक बार भी हमलावरों से कुछ नहीं बोला.

बीरप्पा के बेहोश होते ही उस की पत्नी सुनंदा ने लोगों को बताया कि कुछ बदमाश घर में घुस आए थे. जिन्होंने घर में लूटमार करने के बाद बीरप्पा के साथ बुरी तरह से मारपीट भी की थी, लेकिन अस्पताल में बीरप्पा के होश में आते ही सब भेद खुल गया. बीरप्पा ने पुलिस को बताया कि घटना के वक्त उस की पत्नी ही उस के सीने पर चढ़ी बैठी थी. जबकि उस का प्रेमी सिद्धप्पा और उस का एक साथी उस का गला दबाने व उस के गुप्तांगों को दबा रहे थे.

सुनंदा ने प्लान बनाया था कि वह पति की हत्या कराने के बाद सिद्धप्पा के साथ मौजमस्ती मारेगी, लेकिन उस का फेंका पांसा उलटा पड़ गया. उस का पति तो किसी तरह से मौत के मुंह से वापस आ गया और उस का प्रेमी उसे छोड़ कर दुनिया से चला गया. स्टोरी लिखे जाने तक बीरप्पा एक निजी अस्पताल में भरती था. उस की हालत स्थिर बनी हुई थी. पुलिस की एक विशेष टीम ने बीरप्पा की पत्नी सुनंदा को गिरफ्तार कर लिया था. उस के बाद पुलिस ने उस से विस्तार से जानकारी जुटाने के बाद जेल भेज दिया था.

यह दुखद घटना टूटे हुए विश्वास और घरेलू अनसुलझे झगड़ों के गहरे परिणामों को उजागर करती है, जिस के कारण उन के २ बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया. Love Stories in Hindi

 

 

True Crime Stories : पछतावा

True Crime Stories : कबड्डी खेलते समय नासिर ने चौधरी आफताब की जो बेइज्जती की थी, उस का बदला लेने के लिए उस ने हैदर अली के साथ मिल कर नासिर के साथ ऐसा क्या किया कि उसे और हैदर अली को पछताना पड़ा. उन दिनों मैं जिला छंग के एक देहाती थाने में तैनात था. वह जगह दरिया के करीब थी. मई का महीना होने की वजह से अच्छीभली गरमी पड़ रही थी. अचानक एक दिन पास के गांव से एक वारदात की खबर आई.

कांस्टेबल सिकंदर अली ने बताया कि गुलाबपुर में एक गबरू जवान का बड़ी बेदर्दी से कत्ल कर दिया गया है, जिस की लाश खेतों में पड़ी है. गुलाबपुर मेरे थाने से करीब एक मील दूर था. वहां से फैय्याज और यूनुस खबर ले कर आए थे. वे दोनों खबर दे कर वापस जा चुके थे.

मैं ने पूछा, ‘‘मरने वाला कौन है?’’

‘‘उस का नाम नासिर है, वह कबड्डी का बहुत अच्छा और माहिर खिलाड़ी था.’’ सिकंदर अली ने बताया. मैं 2 सिपाहियों के साथ गुलाबपुर रवाना हो गया. हमारे घोड़े खेतों के बीच आड़ीतिरछी पगडंडी पर चल रहे थे. जिस खेत में लाश पड़ी थी, वह गांव से एक फर्लांग के फासले पर था. कुछ लोग हमें वहां तक ले गए. वहां एक अधूरा बना कमरा था, न दीवारें न छत. जरूर कभी वहां कोई इमारत रही होगी. नासिर की लाश कमरे के सामने पड़ी थी. लाश के पास 8-9 लोग खड़े थे, जो हमें देख कर पीछे हट गए थे.

मैं उकड़ूं बैठ कर बारीकी से लाश की जांच करने लगा. बेशक वह एक खूबसूरत गबरू जवान था. उस की उम्र 23-24 साल रही होगी. वह मजबूत और पहलवानी बदन का मालिक था, रंग गोरा था और बाल घुंघराले. लाश देख कर मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि उस पर तेजधार हथियार या छुरे से हमला हुआ होगा. मारने वाले एक से ज्यादा लोग रहे होंगे. उस के हाथों के जख्म देख कर लगता था कि उस ने अपने बचाव की भरपूर कोशिश की थी. नासिर कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था, इसलिए गुलाबपुर के लोग उसे गांव की शान समझते थे. लाश पर चादर डाल कर मैं लोगों से पूछताछ करने लगा.

नासिर का 60 साल का बाप वहीं था, उस की हालत बड़ी खराब थी, आंखें आंसुओं से भरी थीं. उस का नाम बशीर था. मैं ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे तसल्ली दी, ‘‘चाचा, आप फिकर न करो, आप के बेटे का कातिल पकड़ा जाएगा.’’

उस ने रोते हुए कहा, ‘‘साहब, मेरा बेटा तो चला गया. कातिल के पकड़े जाने से मेरा बेटा लौट कर तो नहीं आएगा.’’

बेटे के गम ने उस की सोचनेसमझने की ताकत खत्म कर दी थी. उसे बस एक ही बात याद थी कि उस का जवान बेटा कत्ल हो चुका है. मुझे उस पर बड़ा तरस आया. मैं ने उसे एक जगह बिठा दिया और अपनी काररवाई करने लगा. सब से पहले मैं ने घटनास्थल का नक्शा तैयार किया. इस कत्ल का मुझे कोई सुराग नहीं मिला था. यहां तक कि वह हथियार भी नहीं, जिस से उस का कत्ल किया गया था.  मैं ने वारदात की जगह पर मौजूद लोगों के बयान लिए. लेकिन सिवाय नासिर की तारीफ सुनने के कोई जानकारी नहीं मिली. मैं ने नासिर की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया.

मेरे दिमाग में एक सवाल घूम रहा था कि इतनी रात को नासिर इस सुनसान जगह पर क्या कर रहा था. मेरे अंदाज से कत्ल रात को हुआ था. मैं ने मौजूद लोगों से घुमाफिरा कर कई सवाल किए, पर काम की कोई बात पता नहीं चली. मैं ने यूनुस और फैयाज से भी पूछताछ की. पर कुछ खास पता नहीं चला. इलियास जिस ने सब से पहले लाश देखी थी, उस से भी पूछा, ‘‘इलियास, तुम सुबहसुबह कहां जा रहे थे?’’

‘‘साहबजी, मैं कुम्हार हूं. मैं मिट्टी के बरतन बनाता हूं. मैं रोजाना सुबह मिट्टी के लिए घर से निकलता हूं. मेरा कुत्ता मोती भी मेरे साथ होता है. वह मुझे इस तरफ ले आया, तभी लाश पर मेरी नजर पड़ी. लाश देख कर मैं ने ऊंची आवाज में चीखना शुरू कर दिया. उस वक्त खेतों में लोगों का आनाजाना शुरू हो गया था. कुछ लोग जमा हो गए. मौजूद लोगों से पता चला कि बशीर लोहार के बेटे नासिर का किसी ने कत्ल कर दिया है.’’

बशीर लोहार का घर गांव के बीच में था. उस का छोटा सा परिवार था. घर में नासिर के मांबाप के अलावा एक बहन थी. बशीर ने अपने घर के बरामदे में भट्ठी लगा रखी थी. वहीं पर वह लोहे का काम करता था. जब मैं उस के घर पहुंचा तो वह मुझे घर के अंदर ले गया. मैं ने उस से कहा, ‘‘चाचा बशीर, जो कुछ तुम्हारे साथ हुआ, बहुत अफसोसनाक है. मैं तुम्हारे गम में बराबर का शरीक हूं. मेरी पूरी कोशिश होगी कि जैसे भी हो, कातिल को कानून के हवाले करूं. लेकिन तुम्हें मेरी मदद करनी होगी. हर बात साफसाफ और खुल कर बतानी होगी.’’

उस की बीवी जुबैदा बोल उठी, ‘‘साहब, आप से कुछ भी नहीं छिपाएंगे. हमारी दुनिया तो अंधेरी हो ही गई है, लेकिन जिस जालिम ने मेरे बच्चे को मारा है, उसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’’

‘‘आप दोनों को किसी पर शक है?’’

‘‘साहब, हमें किसी पर शक नहीं है. मेरा बेटा तो पूरे गांव की आंख का तारा था. अभी पिछले महीने ही उस ने कबड्डी का टूर्नामेंट जीता था. इस मुकाबले में 4 गांवों की टीमों ने हिस्सा लिया था. गुलाबपुर की टीम में अगर नासिर न होता तो यह जीत नजीराबाद के हिस्से में जाती. सुल्तानपुर और चकब्यासी पहले दौर में आउट हो गए थे. असल मुकाबला गुलाबपुर ओर नजीराबाद में था. जीतने पर गांव वाले उसे कंधे पर उठाए घूमते रहे. बताइए, मैं किस पर शक करूं?’’ बशीर ने तफ्सील से बताया.

‘‘नासिर कबड्डी का इतना अच्छा खिलाड़ी था, जहां 10 दोस्त थे, वहां एकाध दुश्मन भी हो सकता है.’’ मैं ने कहा.

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं साहब, पर मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं है.’’ बशीर ने बेबसी जाहिर की.

‘‘मुझे उस दसवें आदमी की तलाश है, जिस ने नासिर का बेदर्दी से कत्ल किया है. जरूर यह किसी दुश्मन का काम है. हो सकता है, गांव के बाहर का कोई दुश्मन हो?’’ मैं ने कहा.

‘‘बाहर का भी कोई दुश्मन नहीं है साहब.’’ उस की बीवी जुबैदा ने कहा तो मैं सोच में पड़ गया. अचानक बशीर बोल उठा, ‘‘वह तो सारा दिन मेरे साथ काम में लगा रहता था. शाम को अखाड़े में कसरत वगैरह करता था.’’

‘‘यह अखाड़ा कहां है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘अखाड़ा ट्यूबवेल के पास है. उस टूटीफूटी इमारत के करीब, जहां यह वारदात हुई.’’ उस ने जवाब दिया.

‘‘मेरे अंदाज से कत्ल देर रात को हुआ है, इतनी रात को वह अखाड़े में क्या कर रहा था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘यह बात हमारी भी समझ में नहीं आ रही है.’’ जुबैदा बोली.

‘‘रात को क्या वह रोजाना की तरह समय पर सोया था?’’

‘‘सोया तो रोजाना की तरह ही था.’’ कहतेकहते जुबैदा रुक गई.

‘‘मुझे खुल कर बताओ, क्या बात है?’’ मैं ने कहा तो वह बोली, ‘‘आप हमारे साथ ऊपर छत पर चलिए. आप खुद समझ जाएंगे.’’

हम छत पर पहुंचे तो जुबैदा कहने लगी, ‘‘मैं रोजाना नासिर को उठाने छत पर आती थी और वह 2 पुकार में उठ जाता था. लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. मैं ने आगे बढ़ कर चादर उठाई तो उस के नीचे एक तकिया रखा हुआ था, जिस पर चादर ओढ़ाई हुई थी. ऐसा लग रहा था, जैसे कोई सो रहा है.’’

मैं खामोश खड़ा रहा तो जुबैदा ने कहा, ‘‘इस का मतलब है कि पिछली रात नासिर अपनी मरजी से घर से निकला था. वह नहीं चाहता था कि किसी को उस के जाने के बारे में पता चले.’’ जुबैदा बोली.

‘‘नहीं जुबैदा, ऐसा नहीं है. वह पहले भी जाता रहा होगा, पर सुबह होने से पहले आ जाता रहा होगा. इसलिए तुम्हें पता नहीं चला. तुम्हारा बेटा रात के अंधेरे में कहीं जाता था और जल्द लौट आता रहा होगा, इसलिए तुम्हें खबर नहीं मिल सकी. मुझे तो किसी लड़की का चक्कर लगता है.’’ मैं ने कहा तो वे दोनों बेयकीनी से मुझे देखने लगे, ‘‘लड़की का चक्कर…’’

बशीर ने कहा, ‘‘साहब, नासिर ऐसा लड़का नहीं था. वह तो गुलाबपुर की लड़कियों और औरतों को बहनें समझता था. वह कभी किसी की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.’’

‘‘मैं मान नहीं सकता कि लड़की का चक्कर नहीं था. पिछली रात वह लड़की से मुलाकात करने ही खेत में पहुंचा था. अगर आप लोग लड़की का नाम बता दो तो केस जल्द हल हो जाएगा. मैं कातिलों तक पहुंच जाऊंगा, क्योंकि वही लड़की बता सकती है कि खेत में क्या हुआ था?’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

‘‘जनाब, हम बड़ी से बड़ी कसम खा कर कह रहे हैं कि हम ऐसी किसी लड़की को नहीं जानते.’’ दोनों ने एक साथ कहा.

‘‘मैं आप की बात का यकीन करता हूं, पर इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते. मैं कहीं न कहीं से इस का सुराग लगा ही लूंगा. आप यह बताएं कि गुलाबपुर में नासिर का सब से करीबी दोस्त कौन है?’’

‘‘जमील से उस की गहरी दोस्ती थी.’’ बशीर ने कहा.

‘‘ठीक है, अब मैं पता कर लूंगा. दोस्त दोस्त का राज जानते हैं. मुझे जमील से मिलना है. तुम उसे यहां बुला लो?’’ मैं ने कहा.

‘‘उस का घर पड़ोस में है, मैं अभी बुलाता हूं.’’ बशीर ने कहा. उस ने वापस लौट कर बताया कि जमील 2 दिनों से टोबा टेक सिंह गया हुआ है.

‘‘ठीक है, कल वह वापस आएगा तो उस से पूछ लूंगा. अभी उस के घर वालों से बात कर लेता हूं.’’ मैं ने कहा.

सामने ही उस की परचून की दुकान थी. उस का बाप वहीं मिल गया. मैं ने करीब 15 मिनट तक उस से बात की, पर कोई काम की बात पता नहीं चल सकी. वह भी कबड्डी की वजह से नासिर का बड़ा फैन था. उसे उस की मौत का बहुत गम था. मेरा दिमाग गहरी सोच में था. मुझे पक्का यकीन था कि जरूर लड़की का चक्कर है. जहां लाश मिली थी, वहां एक अधूरा कमरा था. रात में मुलाकात के लिए वह बेहतरीन जगह थी. मुझे ऐसी लड़की की तलाश थी, जो नासिर से मोहब्बत करती थी और नासिर उस के इश्क में पागल था.  वह जगह गुलाबपुर के करीब ही थी, इसलिए लड़की भी वहीं की होनी चाहिए थी.

मेरी सोच के हिसाब से कातिल इस राज से वाकिफ था कि लड़की और नासिर वहां छिपछिप कर मिलते हैं. उसे इस बात का भी यकीन रहा होगा कि नासिर वहां जरूर आएगा. निस्संदेह कातिल उन दोनों की मोहब्बत और मिलन से सख्त नाराज रहा होगा. उस ने वक्त और मौका देख कर नासिर को मौत के घाट उतार दिया होगा. मुझे उस लड़की को तलाश करना था. दोपहर के बाद मैं ने हमीदा को थाने बुलाया. वह कस्बे में घरघर जा कर क्रीमपाउडर और परांदे वगैरह बेचा करती थी. हर घर की लड़कियों को वह खूब जानती थी और कई की राजदार भी थी. पहले भी वह मेरे कई काम करा चुकी थी.

मैं उसे कुछ पैसे दे देता था तो वह खुश हो जाती थी. मैं ने उस से पूछा, ‘‘हमीदा, तुम गुलाबपुर के हर घर से वाकिफ हो. मुझे नासिर के बारे में जानकारी चाहिए. तुम जो जानती हो, बताओ.’’

‘‘साहब, वह तो गुलाबपुर का हीरो था. बच्चाबच्चा उस पर जान देता था.’’ उस ने दुखी हो कर कहा.

‘‘मुझे गुलाबपुर की उस हसीना का नाम बताओ, जो उस पर जान देती थी और नासिर भी उस का आशिक रहा हो.’’ मैं ने उस की आंखों में झांकते हुए पूछा.

‘‘ओह, तो कत्ल की इस वारदात का ताल्लुक नासिर की मोहब्बत की कहानी से जुड़ा हुआ है.’’ उस ने गहरी सांस ले कर कहा.

‘‘सौ फीसदी, उस के इश्क में ही कत्ल का राज छिपा है.’’ मैं ने पूरे यकीन से कहा.

हमीदा कुछ सोचती रही, फिर धीरे से बोली, ‘‘सच क्या है, यह तो नहीं कह सकती. पर मैं ने उड़तीउड़ती खबर सुनी थी कि रेशमा से उस का कुछ चक्कर चल रहा था. रेशमा शकूर जुलाहे की बेटी है.’’

मैं ने हमीदा को इनाम दे कर विदा किया. मैं पहले भी उस से मुखबिरी का काम ले चुका था. उस की खबरें पक्की हुआ करती थीं. अगले दिन गरमी कुछ कम थी. मैं खाने और नमाज से फारिग हो कर बैठा था कि जमील अपने बाप के साथ आ गया. मैं ने उस के बाप को वापस भेज कर जमील को सामने बिठा लिया. वह गोराचिट्टा, मजबूत जिस्म का जवान था. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जमील, तुम्हें नासिर के साथ हुए हादसे का पता चल गया होगा?’’

मेरी बात सुन कर उस की आंखें भीग गईं. वह दुखी लहजे में बोला, ‘‘साहब, मैं ने अपना सब से प्यारा दोस्त खो दिया है. पता नहीं किस जालिम ने उसे कत्ल कर दिया.’’

‘‘तुम उस जालिम को सजा दिलवाना चाहते हो?’’

‘‘जरूर, साहब मैं दिल से यही चाहता हूं.’’

‘‘तुम्हारी मदद मुझे कातिल तक पहुंचा सकती है. जमील मुझे यकीन है कि बिस्तर पर तकिया रख कर वह पहली बार रात को घर से बाहर नहीं गया होगा. जरूर वह पहले भी जाता रहा होगा. यह खेल काफी दिनों से चल रहा था. तुम उस के दोस्त हो, राजदार हो, तुम्हें सब पता होगा. मैं सारी हकीकत समझ चुका हूं, पर तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

कुछ देर सोचने के बाद वह बोला, ‘‘आप का अंदाजा सही है, इस में एक लड़की है.’’

‘‘रेशमा नाम है न उस का?’’ मैं ने बात पूरी की तो वह हैरानी से मुझे देखने लगा. फिर बोला, ‘‘साहब, उस का नाम रेशमा ही है. दोनों एकदूसरे से मोहब्बत करते थे. धीरेधीरे उन की मुलाकातों का सिलसिला शुरू हो गया था. मैं उन का राजदार था या यूं कहिए मेरी वजह से ही ये मुलाकातें मुमकिन थीं. रेशमा हमारी दुकान पर सामान लेने आती थी. उसे पता था कि मैं कब दुकान पर रहता हूं. मैं ही रेशमा को बताया करता था कि उसे कब खेतों में पहुंचना है. नासिर उस की राह देखेगा, अगर वह आने को हां कह देती थी तो मैं नासिर को बता देता था. फिर वह उस जगह पहुंच जाता था. इस तरह उन दोनों की मुलाकात हो जाती थी.’’

‘‘क्या मुलाकात के वक्त तुम भी आसपास होते थे?’’

‘‘नहीं साहब, मैं कभी उस तरफ नहीं गया. हां, दूसरे दिन नासिर मुझे सब बता दिया करता था.’’

‘‘दोनों के बीच बात किस हद तक आगे बढ़ चुकी थी?’’

‘‘दोनों की मोहब्बत शादी तक पहुंच गई थी. रेशमा जल्दी शादी करने का इसरार कर रही थी. नासिर भी शादी करना चाहता था, लेकिन उसे इतनी जल्दी नहीं थी. जबकि रेशमा जल्दी रिश्ता तय करने की बात कर रही थी.’’

‘‘रेशमा की जल्दी के पीछे भी कोई वजह रही होगी?’’

‘‘हां, दरअसल रेशमा की मां सरदारा बी उस का रिश्ता अपनी बहन के लड़के से करना चाहती थी और उस का बाप उस का रिश्ता अपने भाई के लड़के से करना चाहता था. पर बात सरदारा बी की ही चलनी थी, क्योंकि वह काफी तेज है. वही सब फैसले करती है. रिश्ता खाला के बेटे से न तय हो जाए, इस डर से रेशमा नासिर को जल्दी रिश्ता लाने को कह रही थी.’’ जमील ने तफ्सील से बताया.

‘‘एक बात समझ में नहीं आई जमील, तुम्हारे मुताबिक उन की मुलाकातों के तुम अकेले राजदार थे. जबकि कत्ल वाले दिन के पहले से तुम गांव से बाहर थे. फिर उस दिन दोनों की मुलाकात किस ने तय कराई थी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘साहब, जिस दिन मैं टोबा टेक सिंह गया था, उसी दिन मैं ने उन की दूसरे दिन की मुलाकात तय करा दी थी. नासिर ने दूसरे दिन मिलने को कहा था. मैं ने यह बात रेशमा को बता दी थी. उस के हां कहने पर मैं ने नासिर को भी प्रोग्राम पक्का होने के बारे में बता दिया था.’’

‘‘इस का मतलब प्रोग्राम के मुताबिक ही नासिर अगली रात रेशमा से मिलने खेतों में पहुंचा था. यकीनन वादे के मुताबिक रेशमा भी वहां आई होगी और उस रात नासिर के साथ जो खौफनाक हादसा हुआ, वह उस ने भी देखा होगा. उस का बयान कातिल तक पहुंचने में मदद कर सकता है. मुझे रेशमा का बयान लेना होगा.’’ मैं ने कहा.

‘‘साहब, मामला बहुत नाजुक है. नासिर तो अब मर चुका है, आप रेशमा से इस तरह मिलें कि बात फैले नहीं. नहीं तो बेवजह वह मासूम बदनाम हो जाएगी.’’

‘‘तुम इस की चिंता न करो, मैं उस से बहुत सोचसमझ कर इस तरह मिलूंगा कि किसी को पता भी नहीं चलेगा.’’ मैं ने उसे समझाया.

‘‘बहुतबहुत शुक्रिया जनाब, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

‘‘जमील, तुम एक बात का खयाल रखना, जो बातें हमारे बीच हुई हैं, उन का किसी से जिक्र मत करना.’’

जब मैं नासिर की लाश ले कर गुलाबपुर पहुंचा तो बशीर लोहार के घर तमाम लोग जमा थे. लाश देख कर एक बार फिर रोनापीटना शुरू हो गया. मौका देख कर मैं ने शकूर को एक तरफ ले जा कर कहा, ‘‘शकूर, मुझे नासिर के कत्ल के सिलसिले में तुम से कुछ पूछना है. यहां खड़े हो कर बात करने से बेहतर है तुम्हारे घर बैठ कर बात की जाए.’’

उस ने कोई आपत्ति नहीं की. मैं उस के साथ उस के घर चला आया. उस की बैठक में बैठा. उस की एक बेटी थी रेशमा और एक बेटा शमशाद. बेटा 12-13 साल का रहा होगा, जो उस वक्त बाहर खेल रहा था. थोड़ी बातचीत हुई थी कि सरदारा बी चाय की ट्रे ले कर आ गई. शकूर ने कहा, ‘‘थानेदार साहब, चाय पीएं और सवाल भी पूछते रहें. ये मेरी बीवी सरदारा बी है, इस से भी जो पूछना है पूछ लें.’’

उन की बातचीत से मैं ने अंदाजा लगाया कि उन्हें रेशमा के इश्क के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मैं ने उन से नासिर के बारे में कुछ सवाल पूछे, उन दोनों ने उस की बहुत तारीफें कीं. बातचीत के बाद मैं ने उन से पूछा, ‘‘आप की बेटी रेशमा कहां है?’’

‘‘वह घर में ही है जनाब, कल से उसे तेज बुखार है. हकीमजी से दवा ला कर दी, पर उस का कुछ असर नहीं हुआ.’’ सरदारा बी ने कहा.

‘‘रेखमा का बुखार हकीमजी की दवा से कम नहीं होगा. यह दूसरी तरह का बुखार है.’’ मैं ने कहा तो शकूर ने चौंक कर मेरी ओर देखा. मैं ने आगे कहा, ‘‘मैं सच कह रहा हूं, यह इश्क का बुखार है. नासिर की मौत ने रेशमा के दिलोदिमाग को झिंझोड़ कर रख दिया है.’’

दोनों उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगे, ‘‘हमारी तो कुछ समझ में नहीं आ रहा. यह सब क्या है?’’

‘‘मैं समझाता हूं. यही सच्चाई है. रेशमा और नासिर एकदूसरे से बहुत मोहब्बत करते थे. दोनों रातों को मिलते भी थे. रेशमा को उस की मौत से बहुत दुख पहुंचा है.’’ मैं ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘मुझे बिलकुल यकीन नहीं आ रहा है.’’ सरदारा बी बोली.

हकीकत जान कर वे दोनों परेशान थे. मैं ने कहा, ‘‘परेशान न हों, आप के घर की बात इस चारदीवारी से बाहर नहीं जाएगी. रेशमा मेरी बेटी की तरह है और बिलकुल बेगुनाह है. मुझे उस की इज्जत का पूरा खयाल है. आप मुझे उस के पास ले चलो, मैं उस से कुछ बातें करूंगा. इस बात की कानोंकान किसी को खबर नहीं हो पाएगी. आप को घबराने की जरूरत नहीं है.’’

उन्होंने मुझे रेशमा के पास पहुंचा दिया. मैं ने उन दोनों को बाहर भेज दिया. वे दरवाजे के पीछे जा कर खड़े हो गए. मैं ने रेशमा से नरम लहजे में कहा, ‘‘रेशमा, मैं तुम से कुछ सवाल पूछना चाहता हूं. दरअसल मैं तुम से नासिर के बारे में कुछ बातें जानना चाहता हूं. वैसे मैं सब जानता हूं, फिर भी तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं.’’

‘‘मैं जो जानती हूं, सब बताऊंगी.’’ उस ने बेबसी से कहा.

‘‘कत्ल की रात तुम खेतों में नासिर से मिलने गई थीं, मुझे यह बताओ कि उस पर हमला किस ने किया था?’’ मैं ने पूछा.

‘‘मैं उस रात नासिर से मिलने नहीं गई थी.’’ वह मजबूती से बोली. उस के लहजे में विश्वास और यकीन साफ झलक रहा था.

‘‘जमील ने मुझे बताया है कि तुम्हारी और नासिर की मुलाकात पहले से तय थी. यह बात इस से भी साबित होती है, क्योंकि नासिर तुम से मिलने खेतों में गया था.’’

‘‘यही बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है कि नासिर वहां क्यों गया था? जबकि उस ने खुद ही प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था.’’ उस ने उलझन भरे लहजे में कहा.

‘‘प्रोग्राम कैंसिल कर दिया था, यह तुम क्या कह रही हो?’’ उस की बात सुन कर मैं बुरी तरह चौंका.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रही हूं थानेदार साहब, मुझे नहीं पता प्रोग्राम कैंसिल करने के बाद नासिर वहां क्यों गया था. कल से मैं यही बात सोच रही हूं.’’ रेशमा ने सोचते हुए कहा.

‘‘एक मिनट, तुम दोनों के बीच खबर का आदानप्रदान जमील ही करता था न, पर जमील पिछले 2 दिनों से गुलाबपुर में नहीं था. फिर प्रोग्राम कैंसिल होने की खबर तुम्हें किस ने दी?’’ मैं ने उसे देखते हुए पूछा.

‘‘इम्तियाज ने.’’ उस ने एकदम से कहा.

‘‘इम्तियाज कौन है?’’

‘‘माजिद चाचा का बेटा.’’

‘‘क्या इम्तियाज को भी तुम दोनों के मोहब्बत की खबर थी?’’

‘‘नहीं जी, वह तो 8 साल का बच्चा है. हमारे पड़ोस में ही रहता है.’’

‘‘इम्तियाज ने तुम से क्या कहा था?’’

‘‘मुझे तो यह जान कर ही बड़ी हैरानी हुई थी कि नासिर ने इम्तियाज के हाथ यह पैगाम क्यों भिजवाया था कि मुझे वहां नहीं जाना है. मैं ने चेक करने के लिए उस से पूछा, कहां नहीं जाना है. इस पर उस ने कहा था कि वह इस से ज्यादा कुछ नहीं जानता. नासिर भाई ने कहा है कि रेशमा को कह दो कि आज नहीं आना है. कुछ जरूरी काम है.’’ उस ने रुकरुक कर आगे कहा, ‘‘मैं जमील की दुकान पर जा कर पता कर लेती, पर वह टोबा टेक सिंह चला गया था. इम्तियाज से कुछ पूछना बेकार था. बहरहाल मैं ने फैसला कर लिया था कि मैं नासिर से मिलने नहीं जाऊंगी.’’

‘‘इस का मतलब है कि नासिर को पूरी मंसूबाबंदी से साजिश के तहत कत्ल किया गया है. मुझे यकीन है कि इम्तियाज उस आदमी को पहचानता होगा, जिस ने नासिर के हवाले से तुम्हारे लिए संदेश भेजा था.’’ मैं ने सोचते हुए कहा.

‘‘आप यह बात इम्तियाज से पूछें. मेरी तबीयत बहुत बिगड़ रही है. चक्कर आ रहे हैं.’’ वह कमजोर लहजे में बोली.

‘‘तुम आराम करो रेशमा, पर इन बातों का किसी से जिक्र मत करना और परेशान मत होना.’’ मैं ने उसे समझाया. जब मैं कमरे से निकला तो उस के मांबाप ने मुझे घेर कर पूछा, ‘‘थानेदार साहब, कुछ पता चला?’’

‘‘कुछ नहीं, बल्कि सब कुछ पता चल गया है.’’

‘‘हमें भी तो कुछ बताइए न?’’ शकूर ने कहा.

‘‘पहले आप पड़ोस से इम्तियाज को बुलाएं.’’

थोड़ी देर में सरदारा बी इम्तियाज को बैठक में ले आई. वह 8 साल का मासूम सा बच्चा था. मैं ने उसे प्यार से अपने पास बिठा कर पूछा, ‘‘बेटा इम्तियाज, तुम जानते हो कि मैं कौन हूं?’’

‘‘हां, आप पुलिस हैं.’’ वह मुझे गौर से देखते हुए बोला.

इधरउधर की एकदो बातें करने के बाद मैं ने उस से कहा, ‘‘तुम स्कूल जाते हो, एक अच्छे बच्चे हो, सच बोलने वाले. यह बताओ, परसों शाम को तुम ने रेशमा बाजी से कहा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैं ने उसे गौर से देखते हुए कहा, ‘‘ऐसा हुआ था न?’’

‘‘हां, ऐसा हुआ था साहब.’’ इम्तियाज बोला.

‘‘तुम बहुत अच्छे बच्चे हो. मैं तुम्हें टाफियां दूंगा. अब यह भी बता दो कि तुम ने रेशमा बाजी को कहां जाने से मना किया था?’’

‘‘यह मुझे नहीं पता.’’ वह मासूमियत से बोला, ‘‘आप को यकीन नहीं आ रहा है तो रब की कसम खाता हूं.’’

‘‘नहीं बेटा, कसम खाने की जरूरत नहीं है. मुझे तुम पर भरोसा है. तुम ने तो रेशमा बाजी से वही कहा था, जो नासिर भाई ने तुम से कहलवाया था, है न?’’

‘‘नहीं जी.’’ वह उलझन भरी नजरों से मुझे देखने लगा.

‘‘क्या नहीं?’’

‘‘यह बात मुझे नासिर भाई ने नहीं कही थी.’’

उस ने कहा तो मैं ने तपाक से सवाल किया, ‘‘फिर किस ने कही थी?’’

‘‘हैदर भाई ने.’’

‘‘तुम्हारा मतलब है हैदर अली? सरदारा बी का भांजा हैदर अली जुलेखा का बेटा.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, जी वही हैदर भाई.’’ उस ने जल्दी से कहा.

सरदारा बी की बहन जुलेखा का घर भी गुलाबपुर में ही था. हैदर अली उसी का बेटा था और वह इसी हैदर से रेशमा की शादी करना चाहती थी. यह भी सुनने में आया था कि हैदर का दावा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. मैं सोचने लगा कि जब उसे रेशमा और नासिर की मोहब्बत का पता चला होगा तो उस ने अपने प्रतिद्वंदी को रास्ते से हटाने की कोशिश की होगी. मुझे लगा कि अब केस हल हो जाएगा. जैसे ही वह मेरे हत्थे चढ़ेगा, उसे डराधमका कर मैं उस की जुबान खुलवाने में कामयाब हो जाऊंगा. पर ऐसा नहीं हुआ.

जब मैं जुलेखा के घर पहुंचा तो हैदर अली घर पर नहीं था. मैं ने जुलेखा से पूछा, ‘‘हैदर अली कहां गया है?’’

‘‘मुझे तो पता नहीं, बता कर नहीं गया है जी. वैसे आप हैदर को क्यों ढूंढ रहे हैं?’’ वह परेशान हो कर बोली.

उस की परेशानी स्वाभाविक थी. अगर पुलिस किसी के दरवाजे पर आए तो घर के लोग चिंता में पड़ जाते हैं. मैं जुलेखा को अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. मैं ने ठहरे हुए लहजे में कहा, ‘‘तुम्हें यह पता है न कि गुलाबपुर में एक लड़के का कत्ल हो गया है?’’

‘‘जी…जी मालूम है, बशीर लोहार के जवान बेटे का कत्ल हो गया है. किसी जालिम ने उसे बड़ी बेरहमी से मारा है.’’ उस ने कहा.

‘‘किसी ने नहीं, एक खास बंदे ने जिस की तलाश में मैं यहां आया हूं. तुम्हारा लाडला हैदर अली.’’

‘‘नहींऽऽ.’’ उस ने एक चीख सी मारी, ‘‘मेरा बेटा कातिल नहीं हो सकता. आप को कोई गलतफहमी हुई है थानेदार साहब.’’ वह रोनी आवाज में बोली.

‘‘हर मां का यही खयाल होता है कि उस का बेटा मासूम है. पर मैं तफ्तीश कर के पक्के सुबूत के साथ यहां आया हूं.’’

‘‘कैसा सुबूत साहब?’’ वह परेशान हो कर बोली.

‘‘हैदर अली को मेरे हाथ लगने दो, उसी के मुंह से सुबूत भी जान लेना.’’ मैं ने तीखे लहजे में कहा.

काफी देर राह देखने के बाद मैं ने गांव में अपने 2 लोग उस की तलाश में भेजे. पर वह कहीं नहीं मिला. इस का मतलब था, वह गांव छोड़ कर कहीं भाग गया था. गुलाबपुर में भी किसी को उस के बारे में कुछ पता नहीं था. हैदर अली के गांव से गायब होने से पक्का यकीन हो गया कि वारदात में उसी का हाथ था. मैं काफी देर तक गुलाबपुर में रुका रहा. फिर जुलेखा से कहा, ‘‘जैसे ही हैदर घर आए, उसे थाने भेज देना.’’

एक बंदे को उस की टोह में लगा कर मैं थाने लौट आया. अगले रोज मैं सुबह की नमाज पढ़ कर उठा ही था कि किसी ने दरवाजा खटखटाया. दरवाजा खोला तो सामने कांस्टेबल न्याजू खड़ा था. पूछने पर बोला, ‘‘साहब, जिस सिपाही को हैदर के लिए गांव में छोड़ कर आए थे, उस ने खबर भेजी है कि वह देर रात घर लौट आया है.’’

‘‘न्याजू, तुम और हवलदार समद फौरन गुलाबपुर रवाना हो जाओ और हैदर अली को साथ ले कर आओ.’’ मैं ने उसे आदेश दिया.

तैयार हो कर मैं थाने पहुंचा तो थोड़ी देर बाद हवलदार समद हैदर को गिरफ्तार कर के ले आया. उस के साथ रोती, फरियाद करती जुलेखा भी थी. मैं ने कहा, ‘‘देखो जुलेखा, रोनेधोने की जरूरत नहीं है. यह थाना है शोर मत करो.’’

‘‘साहब, आप मेरे जवान बेटे को पकड़ कर ले आए हैं, मैं फरियाद भी न करूं.’’ वह रोते हुए बोली.

‘‘मैं ने तुम्हारे बेटे को पूछताछ के लिए थाने बुलाया है, फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं. अगर वह बेकुसूर है तो अभी थोड़ी देर में छूट जाएगा. यह मेरा वादा है तुम से.’’

‘‘अल्लाह करे, मेरा बेटा बेगुनाह निकले.’’

‘‘मेरी सलाह है, तुम घर चली जाओ. अगर हैदर बेकुसूर है तो शाम तक घर आ जाएगा.’’

हैदर को मैं ने अपने कमरे में बुलाया. हवलदार समद भी साथ था. मैं ने उसे गहरी नजर से देखा और तीखे लहजे में कहा, ‘‘हैदर, इसी कमरे में तुम्हारी जुबान खुल जाएगी या तुम्हें ड्राइंगरूम की सैर कराई जाए.’’

मेरी बात सुन कर उस के चेहरे का रंग उतर गया. वह गिड़गिड़ाया, ‘‘साहब, मैं ने ऐसा क्या किया है?’’

‘‘क्या के बच्चे, मैं बताता हूं तेरी काली करतूत. तूने नासिर का कत्ल किया है.’’

‘‘नहीं जी, मैं ने किसी का कत्ल नहीं किया.’’ वह घबरा उठा.

‘‘फिर नासिर का कातिल कौन है?’’ मैं ने उस की आंखों में देखते हुए कहा.

‘‘मुझे कुछ पता नहीं थानेदार साहब.’’ वह हकलाया.

‘‘तुम्हें यह तो पता है न कि रेशमा तुम्हारी बचपन की मंगेतर है.’’ मैं ने टटोलने वाले अंदाज में कहा.

‘‘जी, जी हां, यह सही है.’’ उस ने कहा.

‘‘और यह भी तुम्हें मालूम होगा कि मकतूल नासिर और तुम्हारी मंगेतर रेशमा में पिछले कुछ अरसे से इश्क का चक्कर चल रहा था?’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं थानेदार साहब?’’ उस ने नकली हैरत दिखाते हुए कहा.

‘‘मैं जो कह रहा हूं, तुम अच्छी तरह समझ चुके हो. सीधी तरह से सच्चाई बता दो, वरना मुझे दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ मैं ने सख्त लहजे में कहा.

‘‘मैं बिलकुल सच कह रहा हूं, मैं ने नासिर का कत्ल नहीं किया.’’ वह नजरें चुराते हुए बोला.

‘‘नासिर के कत्ल वाली बात पहले हो चुकी है. अभी मेरे इस सवाल का जवाब दो कि तुम्हें रेशमा और नसिर के इश्क की खबर थी या नहीं? सच बोलो.’’ मैं ने पूछा.

‘‘नहीं साहब, मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था.’’

‘‘तो क्या तुम इम्तियाज को भी नहीं जानते?’’

‘‘कौन इम्तियाज?’’ वह टूटी हुई आवाज में बोला.

‘‘माजिल का बेटा, रेशमा का पड़ोसी बच्चा. याद आया कि नहीं?’’ मैं ने दांत पीसते हुए कहा.

‘‘अच्छाअच्छा, आप उस बच्चे की बात कर रहे हैं.’’

‘‘हां…हां, वही बच्चा, जिस के हाथ तुम ने रेशमा के लिए संदेह भेजा था कि नासिर भाई ने कहा है कि आज नहीं आना है.’’ मैंने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा तो वह हैरानी से बोला, ‘‘मैं ने? मैं ने तो ऐसी कोई बात नहीं की…’’

‘‘तुम्हारे इस कारनामे के 2 गवाह मौजूद हैं. एक तो इम्तियाज, जिस के हाथ तुम ने संदेश भेजा था, दूसरी रेशमा, जिस के लिए तुम ने यह पैगाम भेजा था. अब बताओ, क्या कहते हो?’’

मेरी बात सुन कर वह हड़बड़ा गया. हवलदार समद ने कहा, ‘‘आप इस नालायक को मेरे हवाले कर दें, एक घंटे में फटाफट बोलने लगेगा.’’

मैं ने हैदर अली को हवलदार के हवाले कर दिया. थोड़ी देर में उस की चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. एक घंटे के पहले ही हवलदार ने खुशखबरी सुनाई.

‘‘हैदर अली ने जुर्म कुबूल लिया है. आप इस का बयान ले लें.’’

‘‘मतलब यह कि उस ने नासिर के कत्ल की बात मान ली है?’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी नहीं, बात कुछ और ही है, आप उसी से सुनिए.’’

हैदर अली ने नासिर का कत्ल सीधेसीधे नहीं किया था. अलबत्ता वह एक अलग तरह से इस कत्ल से जुड़ा था. यह भी सच था कि नन्हे इम्तियाज से रेशमा को पैगाम उसी ने भिजवाया था. यह पैगाम उस ने चौधरी आफताब के कहने पर रेशमा को भिजवाया था, ताकि रेशमा वारदात की रात मुलाकात की जगह न पहुंच सके और नासिर को ठिकाने लगाने में किसी मुश्किल का सामना न करना पड़े. चौधरी आफताब नजीराबाद के चौधरी का बेटा था. वह भी कबड्डी का अच्छा खिलाड़ी था. हाल ही में खेले गए टूर्नामेंट में वह नजीराबाद से खेल रहा था. फाइनल मैच में नजीराबाद की बुरी तरह से हार हुई थी. कप और इनाम गुलाबपुर के हिस्से में आए. ढेरों तारीफ व जीत की खुशी भी नासिर के नाम लिखी गई.

एक कबड्डी का दांव नासिर और आफताब के बीच पड़ा था, जिस में नासिर ने चौधरी आफताब को इतनी बुरी तरह से रगड़ा था कि उस की नाक और मुंह से खून बहने लगा था. एक तो गांव की हार, ऊपर से अपनी दुर्गति पर उस का दिल गुस्से और बदले की आग से जलने लगा था. उस का वश चलता तो वह वहीं नासिर का सिर फोड़ देता. उस ने मन ही मन इरादा कर लिया कि नासिर से बदला जरूर लेगा. इस तरह उस का अपने सब से बड़े प्रतिद्वंदी से भी पीछा छूट जाएगा. आफताब से हैदर ने कह रखा था कि रेशमा उस की बचपन की मंगेतर है. किसी तरह उसे यह भी पता चल गया था कि नासिर और रेशमा के बीच मोहब्बत और मुलाकात का सिलसिला चल रहा है. इसलिए उस ने एक तीर से दो शिकार करने का खतरनाक मंसूबा बना लिया.

हैदर अली को रेशमा और नासिर के संबंध का शक तो था ही, पर जब आफताब ने इस बारे में उसे शर्मसार किया तो वह आपे से बाहर हो गया. चौधरी आफताब ने उसे समझाया कि जोश के बजाय होश और तरीके से काम लिया जाए तो सांप भी मर जाएगा और लाठी भी सलामत रहेगी. हैदर अली ने चौधरी आफताब का साथ देने का फैसला कर लिया. हैदर अली ने अपने हाथों से नासिर का कत्ल नहीं किया था, पर वह इस साजिश का एक हिस्सा था. जिस में चौधरी के भेजे हुए दो लोगों ने तेजधार चाकू की मदद से नासिर का बेदर्दी से कत्ल कर दिया था. जब कातिल उसे मौत के घाट उतार रहे थे तो हैदर अली थोड़ी दूर अंधेरे में खड़ा यह खूनी तमाशा देख रहा था.

हैदर अली के इकबालेजुर्म और गवाही पर मैं ने उसी रोज खुद नजीराबाद जा कर नासिर के कत्ल के सिलसिले में चौधरी आफताब को भी गिरफ्तार कर लिया था. आफताब गांव के चौधरी का बेटा था, इसलिए उस की गिरफ्तारी को रोकने के लिए मुझ पर काफी दबाव डाला गया था, पर मैं ने उस के असर व पैसे की परवाह न करते हुए चौधरी आफताब और उस की निशानदेही पर उन दोनों कातिलों को भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दिया था. अपनी हर कोशिश नाकाम होते देख चौधरी ने मुझे धमकी दी थी, ‘‘मलिक साहब, आप को मेरी ताकत का अंदाजा नहीं है. मैं अपने बेटे को अदालत से छुड़वा लूंगा.’’

मैं ने विश्वास से कहा, ‘‘चौधरी साहब, मैं सिर्फ खुदा की ताकत और कानून से डरता हूं. आप को जितना जोर लगाना है, लगा लो. आप का होनहार बेटा अदालत से सीधा जेल जाएगा.’’

मैं ने हैदर अली, चौधरी आफताब और नासिर के दोनों कातिलों के खिलाफ बहुत सख्त रिपोर्ट बनाई और उन्हें अदालत के हवाले कर दिया. दोनों कातिल अपने जुर्म का इकबाल कर चुके थे, इसलिए उन की बाकी जिंदगी जेल में ही गुजरनी थी. True Crime Stories

 

Crime News : 2 रूपए के लिए हैवान बना नौकर

Crime News : होटल मालकिन सुशीला ने अगर अपने नौकर नंदू को 2 रुपए दे दिए होते तो शायद हत्या जैसा यह जघन्य अपराध न होता. नौकरों पर इलजाम लगा देना बड़ा आसान होता है, पर उन के दबेकुचले मन के आक्रोश को समझना बहुत मुश्किल. नंदू के मामले में भी शायद ऐसा ही था. तारीख थी 5 नवंबर, 2014. सुबह के 8 बज रहे थे. उत्तराखंड के हरिद्वार की वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक स्वीटी अग्रवाल उस समय हर की पौड़ी पुलिस चौकी पर अपने अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को ड्यूटी के बारे में निर्देशित कर रही थीं, क्योंकि अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा को होने वाले महास्नान के कारण वहां जिलेभर की पुलिस की तमाम टीमें मौजूद थीं.

उसी बीच वहां मौजूद हर की पौड़ी पुलिस चौकी के प्रभारी मोहन सिंह के मोबाइल की घंटी बजी. उन्होंने मोबाइल स्क्रीन पर नजर डाली और मोबाइल का स्विच औन कर के ‘हैलो’ कहा तो दूसरी ओर से पूछा गया, ‘‘क्या पौड़ी पुलिस चौकी इंचार्ज से बात हो सकती है?’’

‘‘हां, बोल रहा हूं. बताइए क्या बात है?’’ मोहन सिंह ने कहा.

‘‘सर, आप को एक मर्डर की खबर देनी थी.’’ फोनकर्ता बोला.

‘‘भई मर्डर कहां और किस का हुआ है?’’ मोहन सिंह ने चौंक कर पूछा तो उस ने बताया, ‘‘सर, मर्डर जाह्नवी मार्केट के निकट होटल शेरेपंजाब की मालकिन सुशीला शर्मा का हुआ है. सुशीला रात को प्रतिदिन की तरह होटल में सोई थीं. आज सुबह उन की बर्फ तोड़ने वाले सुए से गोदी हुई लाश बेड पर पड़ी मिली है.’’

‘‘सुशीला शर्मा के घर वाले क्या वहां मौजूद हैं?’’ मोहन सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं सर, वहां पर सुशीला शर्मा का कोई घर वाला नहीं है. दरअसल वह पिछले कई महीने होटल में ही रात को सोती थीं. उन का होटल मैनेजर राहुल भी अक्सर होटल में ही सोता था.’’ फोन करने वाले ने बताया.

‘‘क्या राहुल वहां मौजूद है.’’ मोहन सिंह ने पूछा.

‘‘नहीं सर, अभी मौके पर न तो राहुल है और न ही सुशीला का कोई घर वाला,’’ फोन करने वाले ने आगे बताया, ‘‘रोजाना की तरह आधे घंटे पहले होटल के नौकर दिलवर सिंह और संतराम भट्ट होटल पहुंचे थे. वहां उन्हें होटल का आधा शटर खुला मिला. वे दोनों अपने साथ होटल के बाहर सोने वाले नौकर सहदेव के साथ अंदर गए तो उन्होंने वहां का जो नजारा देखा, उसे देख कर तीनों के होश उड़ गए.’’

‘‘क्या सुशीला की हत्या की जानकारी उस के घर वालों को दे दी गई है?’’ मोहन सिंह ने पूछा तो फोन करने वाले ने बताया, ‘‘हां सर, होटल के पड़ोसी दुकानदारों ने फोन कर के सुशीला की हत्या की जानकारी गुरदासपुर में रहने वाले उन के पति सुरेश शर्मा और दिल्ली में रह रही उन की बेटी को दे दी है. प्लीज आप जल्दी आ जाइए.’’

‘‘आप कौन साहब बोल रहे हैं?’’ मोहन सिंह ने पूछा तो फोनकर्त्ता ने कहा, ‘‘देखिए सर, मैं ने आप को इस मर्डर की खबर दे कर एक जिम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभया है. आप मेरे बारे में जानकारी करने के बजाय घटनास्थल पर पहुंचे और अपनी जिम्मेदारी निभाएं.’’

इतना कह कर उस ने फोन काट दिया. मामला चूंकि चौकी क्षेत्र की होटल संचालिका की हत्या का था, इसलिए मोहन सिंह ने इस मामले की सूचना कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर पी.सी. मठपाल, सीओ चंद्रमोहन नेगी, एसपी सिटी सुरजीत सिंह पंवार और एसएसपी स्वीटी अग्रवाल को दे दी. थोड़ी देर में सभी अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. तब तक शेरेपंजाब होटल के बाहर स्थानीय दुकानदारों, नेताओं और हर की पौड़ी पर आए श्रद्धालुओं की काफी भीड़ जमा हो चुकी थी.

पुलिस ने सब से पहले वहां खड़ी भीड़ को हटाया और उस के बाद मौके का गहनता से निरीक्षण करने लगी. एसएसपी स्वीटी अग्रवाल और सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने अंदर जा कर सब से पहले लहूलुहान पड़े सुशीला के शव को देखा. शव के चेहरे, गरदन व शरीर के अन्य भागों पर सुए से निर्ममता से गोदे जाने के दरजनों घाव थे. मृतका की सलवार उतरी हुई थी. जिसे देख कर पुलिस को कुछ संदेह हुआ. इसी के मद्देनजर हर की पौड़ी पुलिस चौकी से एक महिला कांस्टेबल को बुला कर सुशीला के सारे शरीर का निरीक्षण कराया गया. पता चला कि मृतका के शरीर के सभी जेवर गायब थे. लाश को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे उस का गला भी दबाया गया हो.

घटनास्थल से बर्फ तोड़ने वाला वह सुआ मिल गया था, जिस से सुशीला की हत्या की गई थी. पुलिस ने उसे जब्त कर लिया. घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद सबइंसपेक्टर मोहन सिंह मृतका सुशीला की लाश का पंचनाम बनाने लगे और एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने होटल मैनेजर राहुल तथा नौकरों दिलवर, संतराम व सहदेव से पूछताछ करनी शुरू कर दी. हालांकि घटनाक्रम के हिसाब से शक की सुई लापता नौकर नंदकिशोर उर्फ नंदू पर जा रही थी, लेकिन इस केस में बड़ा पेंच यह फंस गया था कि किसी को यह मालूम नहीं था कि नंदू कहां का रहने वाला था और वह कहां से यहां आया था? हत्या के बाद नंदू के गायब होने से सुशीला की हत्या की गुत्थी और उलझ गई थी. घटनास्थल से मृतका के 2 मोबाइल फोन भी गायब थे.

बहरहाल, सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने सुशीला की लाश को पोस्टमार्टम के लिए राजकीय हरमिलाप अस्पताल भिजवा दिया और राहुल, संतराम, दिलवर व सहदेव को ले कर कोतवाली हरिद्वार लौट आए. कोतवाली में सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने उन चारों से हत्या की तह में जाने के लिए गहन पूछताछ की. तत्पश्चात पुलिस ने नौकर संतराम, निवासी गांव भटवाडा, जिला टिहरी गढ़वाल की ओर से धारा 302 के तहत हत्या का केस दर्ज कर लिया. इस के साथ ही गवाहों सहदेव, दिलवर और राहुल के बयानों के आधार पर जांच शुरू कर दी. जांच की जिम्मेदारी मोहन सिंह को सौंपी गई थी. पुलिस पूछताछ में सुशीला की हत्या की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी.

सुशीला शर्मा के पति सुरेश शर्मा मूलत: हापुड़, गाजियाबाद के रहने वाले थे. उन के फूफा देवीराम का हरिद्वार में होटल था. उन की कोई संतान नहीं थी. उन्होंने सुरेश को गोद ले लिया था. बाद में सुरेश हरिद्वार आ कर होटल चलाने लगे थे. सुरेश ने काफी मेहनत की और पैसा कमा कर किराए के होटल की इमारत अपनी पत्नी सुशीला के नाम से खरीद ली. इस बीच उन के 2 बेटियां और एक बेटा हुआ. बच्चों के बड़े होने के बाद सुशीला ने कांगे्रस पार्टी ज्वाइन कर ली और कांगे्रस के कार्यक्रमों में भाग लेने लगी. सन 2000 में सुशीला महिला कांगे्रस की प्रदेश सचिव बन गईं. सुशीला का दिन भर घर से बाहर रहना सुरेश को पसंद नहीं था, इसलिए दोनों में आपसी तनाव रहने लगा.

जब तनाव बढ़ता गया तो सन 2006 में सुरेश अपनी पत्नी सुशीला, दोनों बेटियों और बेटे को छोड़ कर गुरदासपुर, पंजाब चला गया और एक होटल में काम करने लगा. इस के बाद सुशीला ने अपनी दोनों बेटियों और बेटे की शादियां कर दीं. 3 साल पहले सुशीला के बेटे अंकुर की छत से गिर कर मौत हो गई. उस वक्त अंकुर की मौत को आत्महत्या माना गया था. पिछले 7 महीने से सुशीला घर छोड़ कर होटल में ही रहने लगी थी. होटल का मैनेजर राहुल निवासी हाथीखाना, हरिद्वार भी रात को अकसर होटल में ही सोता था. लेकिन पिछले 7 दिनों से वह होटल में नहीं सो रहा था. यह भी पता चला कि सुशीला का अपने नौकरों के प्रति व्यवहार अच्छा नहीं था. वह नौकरों को अक्सर डांटतीफटकारती रहती थी. इतना ही नहीं, उन्हें वेतन देने में भी परेशान करती रही थी.

इसी वजह से उस के होटल में नौकर बदलते रहते थे. जब पुलिस सुशीला से अपने नौकरों के सत्यापन के लिए कहती तो वह उन के फोटो देने और उन के सत्यापन कराने में आनाकानी करती. उस की इस आनाकानी की वजह से एक बार हरिद्वार पुलिस उस पर उत्तराखंड पुलिस अधिनियम-2007 के तहत जुर्माना भी कर चुकी थी. पता चला सुशीला फरार नौकर नंदू पर अपने मैनेजर राहुल से ज्यादा भरोसा करती थी. जांचअधिकारी मोहन सिंह के सामने परेशानी यह थी कि उस के पास न तो सुशीला के नौकर नंदू का कोई फोटो था और न ही उस के बारे में किसी को कोई जानकारी थी. नंदू के बारे में पुलिस को केवल इतनी ही जानकारी मिल सकी थी कि वह खुद को राजस्थान का रहने वाला और लावारिस बताता था.

सुशीला उसे 2 महीने पहले गंगाघाट से पकड़ कर अपने होटल में काम करवाने के लिए लाई थी. इस से पहले भी वह उस के होटल में काम कर चुका था. अभी 2 माह पहले ही नंदू दोबारा उस के होटल में काम करने आया था. इस के अलावा पुलिस के लिए सुशील की हत्या की वजह पता लगाना भी किसी चुनौती से कम नहीं था. सुशीला की हत्या उस के नौकर नंदू ने ही की थी या हत्यारा कोई और था, क्योंकि प्रौपर्टी विवाद या किसी राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के चलते भी ऐसा हो सकता था. सुशीला की लाश आपत्तिजनक हालत में मिली थी, उस के शरीर के निचले हिस्से पर कपड़े नहीं थे, इस से संभावना दुष्कर्म की भी थी. यह बात मृतका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही पता चल सकती थी. पुलिस को उसी का इंतजार था.

सबइंसपेक्टर मोहन सिंह ने सुशीला के नौकर नंदू को पकड़ने के लिए अपने कुछ खास मुखबिरों को उस का हुलिया बता कर उस का पता लगाने की जिम्मेदारी सौंपी. इस के अलावा उन्होंने सुशीला के दोनों मोबाइल नंबरों को भी सर्विलांस पर लगवा दिया, जिस से उन की लोकेशन पता चल सके. अगले दिन मोहन सिंह को मृतका सुशीला की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस की मौत का कारण सुए से हुए प्रहारों के कारण अधिक रक्त बह जाना और गला दबाना बताया गया. इसी तरह 3 दिन बीत गए, लेकिन पुलिस को नौकर नंदू के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. 9 नवंबर को मोहन सिंह को सर्विलांस के माध्यम से जानकारी मिली कि सुशीला शर्मा के एक मोबाइल से एक नंबर पर काल की गई थी.

जिस नंबर पर काल की गई थी, उस नंबर के बारे में जानकारी एकत्र की गई तो पता चला कि वह नंबर दुकानदार अंकुर अग्रवाल, निवासी निंबाड़ा, जिला चित्तौड़गढ़, राजस्थान का था. मोहन सिंह तुरंत सिपाहियों गुलशन, दिनेश चौधरी और आशीष बिष्ट को साथ ले कर निंबाड़ा जा पहुंचे और अंकुर से नंदू के बारे में पूछताछ की. उत्तराखंड पुलिस को देख कर अंकुर घबरा गया. अंकुर ने मोहन सिंह को बताया कि 2 वर्ष पूर्व नंदकिशोर उर्फ नंदू उस की दुकान पर नौकरी करता था. वह गांव रानीखेड़ा, थाना निंबाड़ा निवासी गोपाल लोहार का बेटा था.

अंकुर से पूछताछ करने के बाद पुलिस टीम नंदू के घर पहुंची. वहां नंदू के पिता गोपाल लोहार ने पुलिस टीम को निंबाड़ा थाने में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट दिखाते हुए बताया कि नंदू घर से 2 वर्ष से लापता है. उसे नहीं मालूम कि इस वक्त वह कहां है. मोहन सिंह ने नंदू के घर से उस की फोटो ली और लोगों को अजमेर, निंबाडा, चित्तौड़गढ़ तथा श्रीगंगानगर के बसस्टैंडों व रेलवे स्टेशनों पर दिखा कर नंदू का पता लगाने की कोशिश की. जब उस का कोई पता नहीं चला तो वह अपनी टीम के साथ हरिद्वार लौट आए.

13 नवंबर, 2014 को मोहन सिंह को पता चला कि सुशीला के मोबाइल के हिसाब से नंदू की लोकेशन चित्तौड़गढ़ की आ रही है. यह महत्त्वपूर्ण जानकारी थी. मोहन सिंह तुरंत अपनी टीम को ले कर चित्तौड़गढ़ के लिए निकल गए. नंदू को पहचानने वाला एक नौकर उन के साथ था. उस की निशानदेही पर नंदू को रेलवे स्टेशन पर घूमते हुए पकड़ लिया गया. उसे गिरफ्तार कर के पुलिस हरिद्वार ले आई. पूछताछ में नंदू ने सुशीला की हत्या करने की बात कुबूलते हुए जो कुछ बताया, वह कुछ इस तरह था.

नंदू के अनुसार, उस का बाप गोपाल लोहार नशे में बचपन से ही उसे खूब पीटता आया था. बाप की पिटाई से वह काफी परेशान रहता था. इसी चक्कर में उस ने घर छोड़ दिया और 2 साल तक निंबाड़ा के दुकानदार अंकुर अग्रवाल की दुकान पर नौकरी की. जब वहां से उस का मन उचट गया तो वह भाग कर ट्रेन से हरिद्वार आ गया और भिखारियों के साथ रह कर भीख मांग कर अपना पेट भरने लगा. तभी एक दिन उस पर सुशीला की नजर पड़ी. उसे वह भिखारी नहीं लगा. नंदू से बातचीत के बाद सुशीला शर्मा उसे अपने होटल शेरेपंजाब ले गई और काम पर रख लिया. कई महीने काम करने के बाद भी जब सुशीला ने उसे वेतन नहीं दिया तो वह वहां से काम छोड़ कर चला गया. इस के बाद उस ने अन्य 2-3 दुकानों पर काम किया.

2 महीने पहले हरिद्वार में ही सुशीला और नंदू का आमनासामना हो गया. सुशीला ने नंदू को समझायाबुझाया और 3 हजार रुपए महीना नियमित वेतन देने की बात तय कर के उसे अपने होटल ले आई. नंदू ठीक से अपना काम करने लगा. लेकिन जब वेतन देने की बात आई तो सुशीला पहले की ही तरह उसे वेतन देने में आनाकानी करने लगी. यहां तक कि वह सुलभ शौचालय में जाने के लिए उसे 2 रुपए तक नहीं देती थी. इस सब से वह बहुत परेशान था. घटना वाले दिन यानी 4 नवंबर को चाकू लगने से नंदू का हाथ कट गया. जब उस ने घाव पर बैंडैड लगाने के लिए सुशीला से 2 रुपए मांगे तो उस ने 2 रुपए भी देने से मना कर दिया. इस बात को ले कर उस ने 2-4 बातें कहीं तो सुशीला चिढ़ गई.

शाम को सुशीला और होटल मैनेजर राहुल ने उसे चिढ़ाते हुए उस का खाना भी फेंक दिया. इस से नंदू रात को बहुत गुस्से में था. जब उस ने सुशीला से छुट्टी मांगी तो उस ने छुट्टी देने से भी मना कर दिया. रात को डेढ़ बजे जब सुशीला होटल के अंदर सो रही थी तो नंदू ने वहीं रखी अलमारी से बर्फ तोड़ने वाला सुआ निकाला और गुस्से में उस के चेहरे, गले व शरीर पर कई ताबड़तोड़ वार कर दिए. जब सुशीला ने चिल्लाने का प्रयास किया तो नंदू ने उस का गला दबा कर उस की हत्या कर दी. इस के बाद उस ने मृत सुशीला के कपड़े उतारे और उस के साथ दुराचार किया. इस के बाद उस ने सुशीला की चेन, अंगूठी, 2 मोबाइल व 6 हजार रुपए उठाए और हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर आ गया. वहां वह दिल्ली जा रही एक ट्रेन में बैठ गया.

दिल्ली होता हुआ नंदू चित्तौड़गढ़ पहुंचा. चित्तौड़गढ़ के बाद वह अजमेर और निंबाड़ा आदि जगहों पर घूमता रहा. यह सब वह पुलिस से छिपने के लिए कर रहा था. इसी के चलते जब वह चित्तौड़गढ़ रेलवे स्टेशन पर घूम रहा था, तभी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था. जांच अधिकारी मोहन सिंह ने नंदू के बयान दर्ज कर लिए और उस की निशानदेही पर सुशीला के गहने, मोबाइल और कुछ नगदी बरामद कर ली. 14 नवंबर को एसएसपी स्वीटी अग्रवाल ने आरोपी नंदू को प्रैसवार्ता के दौरान मीडिया के सामने पेश किया. इस के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक नंदू जेल में था और मोहन सिंह इस मामले की चार्जशीट बनाने में जुटे थे.

हो सकता है नंदू के बयानों में सच्चाई न हो. यह बात अदालत में ही साबित होगी. लेकिन छोटी सी यह अपराध कथा उन लोगों के लिए प्रेरणा साबित हो सकती है, जो अपने नौकरों को इंसान नहीं समझते. यह बात हमें कभी नहीं भूलनी चाहिए कि सालों से मन में दबा आक्रोश जब फूट कर निकलता है तो उस का अंजाम अच्छा नहीं होता. आक्रोश न चाहते हुए भी इंसान को अपराधी बना दे. Crime News