Mathura Crime Story: प्यार की दुश्मन बनी आशिकी

Mathura Crime Story: प्यार के नाम पर लड़केलड़कियां घर वालों की मरजी के खिलाफ शादी तो कर लेते हैं, लेकिन जब यथार्थ की जमीन पर उन के पांव पड़ते हैं तो उन्हें अपने प्रेमिल संबंध दरकते से नजर आने लगते हैं. बस यहीं से कभीकभी उन के बीच अपराध की भूमिका बनने लगती है. ममता और मुकेश के बीच भी कुछ ऐसा ही हुआ…

कस्बा नौहफील, मथुरा जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर है. कन्हैयालाल शर्मा उत्तर प्रदेश जलनिगम में यहीं पर नौकरी करते थे. कुछ साल पहले उन की मृत्यु हो गई तो मृतक आश्रिता के रूप में उन की पत्नी राजकुमारी को नौकरी मिल गई. राजकुमारी के 3 बेटे थे, मुकेश, सोनू और सुभाष. पति की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी राजकुमारी पर आ गई. बड़े बेटे मुकेश का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो राजकुमारी ने एक दुकान पर उस की नौकरी लगवा दी.

मंझला बेटा सोनू पढ़ाई में तेज था. सौफ्टवेयर इंजीनियर बन कर वह दिल्ली में हिंदुस्तान सिरिंज कंपनी में काम करने लगा, जबकि छोटा सुभाष अभी पढ़ रहा था. राजकुमारी के दोनों बेटे अपने पैरों पर खड़े हो चुके थे, अब उन का पूरा ध्यान छोटे बेटे मुकेश पर था. लेकिन वह महसूस कर रही थीं कि मुकेश का लगाव पढ़ाई से हटता जा रहा है. मुकेश कोई छोटा बच्चा तो था नहीं, जो उसे डांटडपट कर पढ़ाई कराई जा सकती. एक दिन उन्होंने उस से बात की.

इस पर मुकेश ने कहा कि उस के कई दोस्त जागरण मंडली के साथ जाते हैं. वहां से उन्हें अच्छी कमाई होती है, अगर वह अपनी जागरण मंडली बना ले तो अच्छीभली कमाई कर सकता है. दरअसल मुकेश उन लोगों में था, जो रातोंरात अमीर होना चाहते हैं. मां ने भी सोचा कि जब बेटे की इच्छा यही है तो उसे एक मौका दे ही देना चाहिए. जागरण मंडली बनाने के लिए मुकेश को काफी सामान जुटाना था. जबकि सामान खरीदने के लिए उस के पास पैसे नहीं थे. ऐसे में उस की मां ने ही उसे सामान खरीदने के लिए पैसे दिए. सामान आदि जुटाने के बाद मुकेश ने कुछ जानने वाले कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल कर लिया. जब पूरी तैयारी हो गई तो उस ने अपनी जागरण मंडली का प्रचार करना शुरू कर दिया.

प्रचार के बाद मुकेश की जागरण मंडली की बुकिंग होने लगी और उस के पास पैसा आने लगा. इस से राजकुमारी की चिंता थोड़ी कम हुई. उसे लगा कि मुकेश की जिंदगी अब सफल हो जाएगी. इसी बीच मुकेश की मुलाकात ममता से हुई. ममता गायिका थी और जागरण मंडलियों में भजन गाती थी. ममता की सुरीली आवाज मुकेश को अच्छी लगी. उस ने सोचा कि यदि ममता उस की मंडली में आ जाएगी तो मंडली को एक नई पहचान मिलेगी. इसलिए उस ने ममता को अपनी मंडली के साथ जुड़ कर काम करने का औफर दिया. ममता ने उस के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

मुकेश की मंडली में एक दो लड़कियां और भी थीं. लेकिन ममता की आवाज उन सब से अच्छी थी. मंडली में ममता के आने के बाद वास्तव में मुकेश की मंडली की डिमांड बढ़ गई. ममता उत्तर प्रदेश के जिला मैनपुरी के गांव सिमरई के रहने वाले अनिल की बेटी थी. बेटी के अलावा अनिल के 2 बेटे थे. उन दोनों की शादी हो चुकी थी. वे पिता से अलग रहते थे. मुकेश के ग्रुप में काम करने की वजह से ममता का उस के घर भी आनाजाना था. ममता खूबसूरत थी, इसलिए मुकेश भी उसे चाहने लगा था. धीरेधीरे ममता का झुकाव भी उस की तरफ हो गया था. वे एकदूसरे के करीब आने लगे. ये बात मुकेश की मां राजकुमारी से छिपी नहीं रही. वह नहीं चाहती थीं कि बेटे की शादी ममता से हो, इसलिए एक दिन उस ने मुकेश से साफ कह दिया कि वह जागरण में जाने वाली लड़कियों को पसंद नहीं करती.

मुकेश मां की बात का मतलब समझ गया था. जबकि ममता ने अपने पिता अनिल को यह बात बताई तो उन्होंने बेटी के फैसले पर सहमति दे दी. कुछ ही दिनों में मुकेश और ममता का प्यार इस मुकाम पर पहुंच गया कि उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया. अपने प्यार की खातिर मुकेश ने मां की बात को नजरअंदाज कर दिया. आखिर घर वालों से छिपा कर सन 2009 में उस ने ममता के साथ कोर्टमैरिज कर ली. बेटी की शादी के समय अनिल भी कोर्ट में मौजूद था. दूसरी ओर मुकेश के घर वालों को इस शादी की भनक तक नहीं लगी. मुकेश से शादी करने के बाद ममता अपने पिता के साथ मथुरा में किराए का मकान ले कर रहने लगी. शादी के बाद मुकेश भला उस से अलग कैसे रह सकता था. पत्नी के साथ रहने के चक्कर में एक दिन वह घर में यह कह कर चला आया कि वह कहीं बाहर जा कर काम करेगा.

मथुरा आ कर वह ममता के कमरे पर ही रहने लगा. किराए पर रहने की वजह से मुकेश को घर का सारा सामान जुटाना पड़ा. उस का खर्चा तो बढ़ गया था, लेकिन उस के हिसाब से कमाई नहीं हो पा रही थी. घरगृहस्थी में फंस जाने की वजह से उन्हें काम पर जाने का भी ज्यादा मौका नहीं मिल पाता था. शादी से पहले ममता ने सोचा था कि मुकेश के साथ वह खूब कमाई करेगी, पर ऐसा हुआ नहीं. शादी से पहले मुकेश उसे हर तरह के सुख उपलब्ध कराने की जो बातें कही थीं, वे सब झूठी साबित हो रही थीं. 2011 को ममता ने एक बेटे को जन्म दिया, जिस के बाद उस के खर्चे और भी बढ़ गए.

ऐसे में ममता मुकेश पर जोर डालती थी कि वह अपने घर से पैसा लाए. लेकिन मुकेश ने शादी के बाद से अपने घर जाना बंद कर दिया था. वह जानता था कि उसे घर से अब कुछ नहीं मिलने वाला. पर ममता ने उसे उस के हिस्से की डेढ़ बीघा जमीन बेचने के लिए मजबूर कर दिया. जमीन बेच कर जो पैसे मिले, ममता ने उन्हें बहुत जल्द खत्म कर दिए. अभी तक मुकेश के घर वालों को यह पता नहीं लगा था कि मुकेश ने शादी कर ली है और वह एक बच्चे का बाप भी बन चुका है, लेकिन यह बात और ज्यादा दिनों तक नहीं छिपी रह सकी. मुकेश की हकीकत पता लगी तो उन्हें गहरा धक्का लगा.

जमीन की बिक्री से मिला पैसा खत्म हो जाने के बाद मुकेश की स्थिति पहले जैसी हो गई. इसी बीच उस के छोटे भाई सोनू ने दिल्ली के मयूर विहार फेस-3 में सिलाई की नई मशीनें लगा कर एक्सपोर्ट होने वाले रेडीमेड कपड़ों की सिलाई का काम शुरू कर दिया. उसे पता चला कि मुकेश पैसेपैसे के लिए मोहताज है तो उस ने उसे भी अपने पास दिल्ली बुला लिया. मुकेश कारीगरों से सिलाई का काम कराने लगा. इस की एवज में सोनू उसे 10 हजार रुपए महीने देता था. कुछ दिनों बाद मुकेश अपने परिवार को भी दिल्ली ले आया. लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में 10 हजार रुपए में क्या होने वाला था. यानी आर्थिक तंगी को ले कर ममता और उस के बीच असंतोष अब भी बरकरार था. इस की वजह से मुकेश को अपना दांपत्यजीवन डगमगाता नजर आ रहा था.

रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर आखिर एक दिन ममता अपने पिता के साथ मथुरा आ गई और मंडी चौराहे पर किराए का कमरा ले कर रहने लगी. मुकेश भी भाई के पास से काम छोड़ कर ममता के पास मथुरा चला आया. अब ममता को लगने लगा कि उस ने मुकेश से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. वह अब फिर से अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. इसलिए उस ने बेटे को मुकेश के हवाले किया और जागरण में काम करने वाले अपने जानकारों से संपर्क करने लगी. जल्दी ही उसे काम भी मिलने लगा. अपनी कमाई से वह अपना काम चलाने लगी, जबकि मुकेश घर में ही पड़ा रहता था. उसे लगने लगा था कि वह एक हारा हुआ इंसान है. वह ममता से प्यार तो बहुत करता था, लेकिन वह उसे खुश नहीं रख पा रहा था.

उन्हीं दिनों ममता की मुलाकात जागरण पार्टी के दौरान गायक पंकज से हो गई. पंकज राजस्थान के भरतपुर जिले का रहने वाला था. वह अपने इलाके का मशहूर कलाकार था. पंकज की अपनी जागरण मंडली थी. उस के पिता गोविंदप्रसाद की अपनी मोटर स्पेयर पार्ट्स की दुकान थी. कुल मिला कर पंकज एक खातेपीते परिवार से था. ममता अच्छी कलाकार थी, इसलिए पंकज ने उस के सामने अपनी मंडली में शामिल होने का प्रस्ताव रखा तो ममता ने उस का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. ममता अपने पति से परेशान थी ही, इसलिए उस का झुकाव पंकज की तरफ हो गया. पंकज भी उसे चाहने लगा. इसी चक्कर में वह किसी न किसी बहाने मथुरा में ममता के कमरे पर आता रहता था.

जब दोनों को लंबे समय तक एकांत में रहने का मौका मिला तो वे अपनी मर्यादाएं भी भूल गए. यानी उन के बीच की दूरियां खत्म हो गईं. ममता के सामने एक ओर उस का पति मुकेश था, जो एक हारा हुआ इंसान था तो दूसरी तरफ पंकज था, जो एक पैसे वाला आदमी था. उसे उन दोनों में से किसी एक को चुनना था. वह सोचने लगी कि उसे यदि पंकज का साथ मिल जाए तो जीवन में वह सब मिल सकता है, जिसे वह हासिल करना चाहती थी. जागरण के बहाने ममता और पंकज की मुलाकातें होती रहती थीं. मुकेश को पता ही नहीं चला कि उस के दांपत्य संबंधों में पंकज ने कब सेंध लगा दी है. जिस ममता की खातिर उस ने अपने घर वालों को छोड़ दिया था, वही उस के साथ बेवफाई पर उतर आई थी.

एक दिन मुकेश ने अपनी आंखों से पत्नी को पंकज से बातें करते देखा तो वह हैरान रह गया. मुकेश ने इस का विरोध किया और पंकज को चेतावनी दी कि वह उस की पत्नी से दूर ही रहे तो अच्छा होगा. इस पर पंकज ने झूठ बोलते हुए कहा कि वह तो ममता के साथ यूं ही मजाक कर रहा था. लेकिन इस के बाद मुकेश को शक हो गया कि पंकज और ममता के बीच कुछ तो है. पंकज को ले कर अब घर में कलह होने लगी. ममता भी अब चुप नहीं रहती थी. वह उसे बातबात पर ताने देती रहती थी. बात जब बढ़ जाती तो मुकेश ममता को पीट देता था.

ममता अब मुकेश से उकता गई थी. वह किसी भी तरह से उस से अपनी जान छुड़ाना चाहती थी. ममता ने अपने पिता को भी पंकज के साथ अपने संबंधों की बात बता दी थी. उस ने कह दिया था कि वह पंकज के साथ बेहतर जिंदगी बिताना चाहती है, लेकिन मुकेश उस के रास्ते का रोड़ा बना हुआ है. अनिल बेटी की कमाई खा रहा था. इसलिए उस ने ममता से कह दिया कि वह उस की भलाई के लिए कुछ भी करने को तैयार है. ममता ने इस बारे में पंकज से बात की तो उसे पाने के लिए वह कुछ भी करने को तैयार हो गया. तब पंकज, ममता और उस के पिता अनिल ने मुकेश को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. पंकज ने अपने दोस्त जीतू को भी इस योजना में शामिल कर लिया.

इस के बाद पंकज मुकेश का विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा. उस ने एक दिन मुकेश से कह भी दिया कि उस के और ममता के बीच कुछ नहीं है. वह तो बस उस की मदद कर देता है. मुकेश भी उस की बातों पर विश्वास करने लगा. पंकज को इसी का इंतजार था. इसी का फायदा उठाने के लिए 16 जुलाई, 2015 को पंकज ने फोन कर के मुकेश से कहा कि उसे ममता के साथ एक जागरण पार्टी में चलना है. आने वाली मुसीबत से बेखबर मुकेश ममता के साथ चल दिया. रास्ते में पंकज और जीतू भी मिल गए. ये लोग पार्टी के बहाने एक जगह शराब पीने बैठ गए, जिस में इन लोगों ने मुकेश को खूब शराब पिलाई. जब वह नशे में होश खोने लगा तो इन लोगों ने उस की गला दबा कर हत्या कर दी.

अब लाश उन के सामने थी और सवाल यह था कि लाश को कहां फेंका जाए. व लाश को कहीं दूर फेंकना चाहते थे, इसलिए वे भरतपुर से खदौली होते हुए आगरा जाना चाहते थे, पर खदौली में सुनसान जगह देख कर उन्होंने एक जगह लाश फेंक दी. रास्ते का कांटा निकल जाने के बाद ममता और पंकज बहुत खुश थे. फिर अपनी योजना के तहत ममता 8 अगस्त, 2015 को मथुरा के थाना हाईवे पहुंची और थानाप्रभारी सुबोध यादव को बताया कि उस का पति मुकेश 17 जुलाई, 2015 से घर से गायब है. उस का फोन भी स्विच्ड औफ आ रहा है. उस की शिकायत पर पुलिस ने मुकेश की गुमशुदगी दर्ज कर ली.

उस दिन के बाद ममता पति के बारे में पूछताछ के लिए कभी थाने नहीं गई. ममता मथुरा के जिस मकान में किराए पर रहती थी, 20 जुलाई को उस ने वह भी खाली कर दिया. टुंडला में एक टैंपो चालक का मकान किराए पर ले कर वह पंकज, अपने पिता व बच्चे के साथ रहने लगी. इसी बीच एक दिन ममता ने मुकेश के भाई सोनू को फोन कर के बताया कि उस का भाई मुकेश पिछले 7 जुलाई से गायब है और उस का कोई अतापता नहीं है. यह सुन कर मुकेश के घर वाले परेशान हो गए. सोनू ने ममता से कहा कि इस मामले में हमें रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए. लेकिन ममता टालमटोल करने लगी.

सोनू और उस के घर वालों को शक हुआ कि कहीं ममता ने ही तो मुकेश को ठिकाने नहीं लगवा दिया. यह तो पता लग ही गया था कि ममता इस समय पंकज नाम के युवक के साथ रह रही है. इसलिए उन्हें शक हुआ कि कहीं ममता और पंकज ने ही मिल कर मुकेश को ठिकाने लगा दिया हो. इस पर सोनू अपने घर वालों के साथ मथुरा में उस जगह पहुंचा, जहां ममता किराए पर रहती थी. लेकिन वहां  पता लगा कि वह तो 20 जुलाई को ही यहां से मकान खाली कर के कहीं चली गई है. इस से मुकेश के घर वालों को पक्का शक हुआ. वह अपने परिचितों के साथ थाना हारे पहुंच गए. सोनू ने थानाप्रभारी से अपने भाई की हत्या होने की आशंका जताई. थानाप्रभारी सुबोध यादव ने ममता का फोन सर्विलांस पर लगा दिया.

इधर ममता को इस बात की भनक लग गई थी कि सोनू अपने भाई की खोज में लग गया है. इसलिए उसे पुलिस का डर सताने लगा. सर्विलांस से पुलिस को पता चल गया कि ममता इस समय टुंडला में है. ममता और पंकज टुंडला से अलवर शिफ्ट होना चाहते थे. उन्होंने अलवर में किराए का मकान भी ले लिया था और अनिल के साथ बेटे कान्हा को पहले ही अलवर भेज दिया था. पुलिस जब टुंडला में उस के मकान पर पहुंची तो वहां ताला लगा मिला. मकान मालिक से पुलिस ने कह दिया कि जब भी ममता वहां से अपना सामान लेने आए, तुरंत खबर कर दे.

15 सितंबर, 2015 को ममता पंकज के साथ टैंपो ले कर आई. टैंपो में अपना सामान भर कर उन्हें अलवर जाना था. जब पंकज और ममता टैंपो में अपना सामान भर रहे थे, तभी मकान मालिक ने पुलिस को फोन कर दिया. पुलिस जल्दी से टुंडला पहुंच गई और पंकज व ममता को दबोच लिया. दोनों को मथुरा के थाना हाईवे ले जा कर पूछताछ की गई तो दोनों ने कहा कि उन्हें मुकेश के बारे में कुछ भी पता नहीं है. लेकिन सख्ती करने पर दोनों ने कुबूल कर लिया कि उन्होंने उस की हत्या कर के लाश खदौली, जिला आगरा में फेंक दी थी. उन्होंने स्वीकारा कि इस गुनाह में जीतू निवासी भरतपुर और अनिल शामिल थे.

पुलिस ने 2 दिनों बाद भरतपुर से जीतू को और अलवर से अनिल को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने मुकेश की गुमशुदगी की सूचना को हत्या में परिवर्तित कर दिया. अभियुक्तों को मुकेश के कत्ल के इल्जाम में जेल भेज दिया गया है.

इस तरह एक नाकाम प्रेम कहानी का भयानक अंत हो गया.

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

 

Crime Story: हत्या जिन के लिए खेल है

Crime Story: किसी का भी खून करना इतना आसान नहीं है, क्योंकि ज्यादातर लोग खून देख कर ही घबरा जाते हैं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें किसी को भी मार देना खेल लगता है. यह कहानी ऐसे ही लोगों की है.

लुधियाना न्यू कोर्ट का माहौल उस दिन बड़ा रहस्यमयी लग रहा था. गेट से ले कर अंदर तक चप्पेचप्पे पर पुलिस तैनात थी. इस की वजह यह थी कि उस दिन अदालत लुधियाना के बहुचर्चित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला हत्याकांड का फैसला सुनाने वाली थी. हत्यारे कितने खतरनाक और खूंखार थे, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें जेल से अदालत तक लाने के लिए 60 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई गई थी. अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रिया सूद की अदालत को सुरक्षा की दृष्टि से पुलिसकर्मियों ने पूरी तरह से घेर रखा था. क्योंकि उन्हीं की अदालत में फैसला सुनाया जाने वाला था.

राष्ट्रपति पदक से सम्मानित डीएसपी बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका कपिला की 1 फरवरी, 2012 की रात बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. इस दोहरे हत्याकांड को 6 लोगों, उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ पिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू, हसनजीत सिंह उर्फ जीता, दविंदरपाल सिंह उर्फ लाडी और रविंदर सिंह उर्फ रिंकू ने मिल कर अंजाम दिया था. पंजाब पुलिस ने इन लोगों को बड़ी मेहनत से पकाड़ा था. डीएसपी बलराज गिल की तैनाती उन दिनों जिला मोगा में डीएसपी हैडक्वार्टर के रूप में थी. चुनाव की वजह से पिछले एक महीने से वह काफी व्यस्त थे. ठीकठाक चुनाव संपन्न हो गए तो उन्होंने चैन की सांस ली थी और 1 फरवरी को छुट्टी ले कर लुधियाना स्थित अपने घर आ गए थे.

बलराज गिल सरदार कश्मीरा सिंह की एकलौती संतान थे. कश्मीरा सिंह बीएसएफ में कमांडेट थे और रिटायर्ड होने के बाद घर पर ही रह रहे थे. घर पहुंच कर बलराज गिल ने कुछ देर आराम किया, उस के बाद शाम को सत्संग सुनने चले गए. चुनाव की वजह से वह कई दिनों से सत्संग सुनने नहीं जा सके थे. सत्संग सुनने के बाद बलराज गिल कुछ देर अपने सत्संगी मित्रों के पास बैठ कर बातें करते रहे, उस के बाद घर चले गए. 7 बजे के करीब उन के फोन पर किसी का फोन आया तो पत्नी से 10 मिनट में आने की बात कह कर वह अपनी सफेद रंग की ओपट्रा कार से मौडल टाउन स्थित इश्मीत चौक के पास प्रिंटिंग प्रैस चलाने वाले अपने दोस्त मनिंदरपाल सिंह के पास जा पहुंचे.

वहीं पर बलराज और मनिंदर के क्लासमेट अनमोल सिंह मिल गए. तीनों दोस्त चाय पीते हुए बातें कर रहे थे कि तभी बलराज के फोन पर किसी का फोन आया, जिसे सुनने के बाद वह अपनी कार छोड़ कर मनिंदर की कार ले कर चले गए. जाते समय वह दोस्तों से कह गए कि थोड़ी देर में वापस आ जाएंगे. लेकिन वह गए तो लौट कर ही नहीं आए. जब काफी देर हो गई तो दोस्तों को चिंता हुई. उन्होंने बलराज को फोन किए, पर उन के दोनों फोन बंद मिले. रात 10 बजे उन्होंने बलराज के घर फोन किया तो उन के पिता कश्मीरा सिंह ने बताया कि बलराज अभी तक घर भी नहीं पहुंचे हैं.

इस के बाद मनिंदरपाल और अनमोल ने कई जगह फोन कर के बलराज के बारे में पूछा, लेकिन कहीं से उन के बारे में कुछ पता नहीं चला. रात 12 बजे तक स्पष्ट हो गया कि बलराज गिल के साथ या तो कोई हादसा हो गया है या फिर उन का अपहरण आदि कर लिया गया है. चिंता की बात यह थी कि बलराज अपना सर्विस रिवौल्वर और सुरक्षा गार्डों को साथ नहीं ले गए थे. वह निहत्थे और अकेले ही गए थे. वैसे तो बलराज गिल जांबाज पुलिस अफसर थे, बड़ेबड़े खूंखार अपराधियों को काबू कर के उन्होंने सलाखों के पीछे पहुंचाया था. लेकिन निहत्थे और अकेले होने की वजह से सभी चिंतित थे.

बहरहाल, जब स्पष्ट हो गया कि बलराज लापता हो गए हैं तो क्षेत्रीय पुलिस और उन की सुरक्षा में लगे पुलिसकर्मी उन की तलाश में लग गए. शहर का चप्पाचप्पा छान मारा गया, लेकिन बलराज गिल का कहीं कोई सुराग नहीं मिला. अगले दिन हंबड़ा रोड स्थित गोल्फ लिंक क्षेत्र में बने एक फार्महाउस से बलराज गिल और उन की महिला मित्र मोनिका की लाश मिली. उन की कारें कई दिनों बाद शहर से दूर सुनसान जगह से पुलिस ने बरामद की थीं. दोनों कारों की नंबर प्लेटें बदली हुई थीं. बलराज और मोनिका की हत्या की बात सुन कर पूरे शहर में भय का माहौल बन गया था. जब यह खबर बलराल के घर पर पहुंची थी तो वहां कोहराम मच गया.

पिता कश्मीरा सिंह ने तो जैसेतैसे खुद को संभाल लिया था, लेकिन मां गुरदीप कौर का बुरा हाल था. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उन का शेर जैसा बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा. बलराज गिल सचमुच सुंदरस्वस्थ और लंबेचौड़े जवान थे. उन का ऐसा शरीर था कि वह 4-5 लोगों पर भारी पड़ सकते थे. उन की पत्नी हरिंदर कौर गिल कुंदनपुरी के सरकारी स्कूल में वाइस प्रिंसिपल थीं. पति की हत्या की बात सुन कर वह बेहोश हो गई थीं. बेटे गुरमन सिंह और बहन गुरशरण कौर का भी रोरो कर बुरा हाल था. लुधियाना के अलावा अन्य जिलों जालंधर, पटियाला, मोगा के भी पुलिस अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. आईजी, डीआईजी एवं एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया.

शिनाख्त के बाद बलराज और मोनिका की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था. इस के बाद कश्मीरा सिंह की तहरीर पर थाना हैबोवाल में 2 फरवरी, 2012 को भादंवि की धारा 302, 404, 201, 465, 468, 471 व 120बी के तहत अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के युद्ध स्तर पर हत्यारों की तलाश शुरू कर दी गई थी. फार्महाउस के हालात बता रहे थे कि इस हत्याकांड को लगभग आधा दर्जन लोगों ने अंजाम दिया था. फार्महाउस के कई गमले टूटे हुए थे. कमरों के अंदर और बाहर खून ही खून फैला था. क्राईम टीम और फिंगर प्रिंट विशेषज्ञों की टीम ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल से हाथोंपैरों के निशान उठाए थे. मृतक बलराज गिल की मुट्ठी में कुछ बाल मिले थे.

मोनिका की लाश बाथरूम के पास मिली थी. बाथरूम की दीवार पर खून और उन के सिर के बाल चिपके हुए थे. पुलिस ने सबूत जुटाने के लिए घटनास्थल के 33 फोटो खींचे थे और 2 वीडियो बनाई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार बलराज गिल के सिर और गरदन पर तेज धार हथियार से वार किए गए थे. मोनिका के सिर, बाजू और पीठ के अलावा शरीर के अन्य अंगों पर भी तेज धार हथियार के घाव पाए गए थे. बलराज के सिर और गरदन पर किए गए वार उन की मौत का कारण बने थे. पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों के अनुसार मरने से पहले बलराज गिल ने हत्यारों से जम कर संघर्ष किया था.

बहरहाल, इस हाईप्रोफाइल दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए डीजीपी के निर्देश पर लुधियाना पुलिस कमिश्नर ईश्वर सिंह और एडीजीपी क्राइम एच.एस. ढिल्लो की देखरेख में एक स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम बनाई गई थी, जिस में एसीपी परमजीत सिंह पन्नू, एसीपी साहनेवाल जसविंदर सिंह, एसीपी क्राईम और सीआईए स्टौफ के तेजतर्रार प्रभारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह गिल, एडीशनल थानाप्रभारी, एसआई अजायब सिंह के अलावा अन्य एसीपी और इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सुरेंद्र मोहन को शामिल किया गया था. इस मामले की जांच में अन्य एजेंसियों को भी टीम की मदद के लिए लगा दिया गया था.

स्पैशल इन्वैस्टीगेशन टीम और एसआईटी ने हंबड़ा रोड और आसपास के गांवों से लगभग 2 हजार संदिग्ध युवकों को पूछताछ के लिए उठा लिया था. पुलिस की इस काररवाई से लोगों में रोष पैदा हो गया था. गांवों के प्रधानों और हिरासत में लिए लोगों के घर वालों ने डीजीपी और मुख्यमंत्री से शिकायत की थी कि पुलिस हत्यारों को पकड़ने के बजाय उन लोगों को परेशान कर रही है, जो बरसों पहले गलत राह छोड़ कर शराफत की जिंदगी जी रहे हैं. हत्याएं सुनसान इलाके में हुई थीं और हत्यारे ऐसा कोई सबूत नहीं छोड़ गए थे, जिस से जांच आगे बढ़ पाती. जांच आगे न बढ़ते देख डीजीपी पंजाब के आदेश पर दिल्ली की स्पैशल टैक्निकल टीम के विशेषज्ञों को बुलाया गया था. साइबर क्राइम यूनिट और टैक्निकल सपोर्ट इंचार्ज इंसपेक्टर भूपेंद्र सिंह की देखरेख में वैज्ञानिक तरीके से जांच शुरू की गई.

घटनास्थल के आसपास ज्यादा सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे, फिर भी दिल्ली से आई साइबर टीम ने 5 किलोमीटर के क्षेत्र में लगे सभी सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चेक की. इन में एक कैमरे से इनोवा और ओपट्रा कार की फुटेज मिली, जिस में इनोवा आगे जा रही थी और ओपट्रा उस के पीछे चल रही थी. लेकिन उन कारों में सवार लोगों के चेहरे नहीं दिखाई दे रहे थे. तब दिल्ली पुलिस ने लेटेस्ट टैक्नोलौजी का सहारा लिया. एक स्पैशल पीसी असैंबल कर इस हत्याकांड से पहले से ले कर हत्याकांड के बाद का सारा डाटा इकट्ठा कर सर्च किया तो पता चला कि हत्यारों में से एक हत्यारा मृतक बलराज का मोबाइल फोन इस्तेमाल कर रहा है.

उस की अंतिम लोकेशन नरपुर बेर के टावर की मिली थी. उस के बाद फोन बंद हो गया था. उस फोन में चलने वाले नंबर की काल डिटेल्स से मिले नंबरों में एक नंबर गोल्फ लिंक वाले क्षेत्र में चल रहा था. उस के साथ 2 अन्य लोगों की भी लोकेशन मिल रही थी. अब तक की जांच से एसआईटी टीम, साइबर टीम और सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह को हत्यारों से जुड़े कुछ अहम सुराग मिल चुके थे. 2 फरवरी से 5 अप्रैल, 2012 तक पुलिस और हत्यारों के बीच आंखमिचौली का खेल चलता रहा. पुलिस को हत्यारों की लोकेशन तो मिल रही थी, लेकिन वे उन के हाथ नहीं लग रहे थे. जबकि पुलिस को यहां तक पता चल चुका था कि इस हत्या में 6 लोग शामिल थे. हत्या के बाद 3-3 लोग अलगअलग जगहों पर घूम रहे थे.

3 आरोपियों ने मोनिका की इनोवा कार पर फर्जी नंबर प्लेट लगा कर जगराओ और गुरदासपुर में बेचने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह बिकी नहीं. तब उन्होंने उसे लुधियाना के लोधी क्लब के पीछे खड़ी कर दी थी. 3 आरोपी हिमाचल प्रदेश में घूम रहे थे, जहां वे नयना देवी मंदिर भी गए थे. बहरहाल, पुलिस ने अपना घेरा तंग कर के इस हाईप्रोफाइल डबल मर्डर मामले के 3 आरोपियों हरविंदर उर्फ बिंदर, प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू तथा उमेश कारड़ा को गिरफ्तार कर लिया. यह गिरफ्तारी इंसपेक्टर हरपाल सिंह ने की थी. इस के बाद बाकी 3 अभियुक्तों को गिरफ्ताल करने के लिए इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने उन के घर छापा मारा तो वे घर से फरार मिले.

लेकिन 7 अप्रैल को वार्ड नंबर 31 के प्रधान जसपाल सिंह ने उन तीनों आरोपियों रविंदर सिंह, दविंदरपाल सिंह और हसनजीत सिंह को सीआईए इंचार्ज हरपाल सिंह के समक्ष पेश कर दिया था. इस तरह सभी अभियुक्तों के पकड़े जाने के बाद पुलिस उच्चाधिकारियों ने जब सब से पूछताछ की गई तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इस हत्याकांड के सभी अभियुक्त डकैती और लूटपाट करते थे. इन का निशाना अधिकतर सुनसान इलाके के फार्महाउस या वे कोठियां होती थीं, जिन में 2-4 लोग रहते थे. 1 फरवरी की रात लगभग 8 बजे ये सभी हंबड़ा रोड पर स्थित संजय अग्निहोत्री के फार्महाउस के पास लूटमार करने के इरादे से इकट्ठा हुए थे. सभी बैठे योजना बना रहे थे कि कहां धावा बोला जाए? उस समय उन्हें यह पता नहीं था कि सामने वाला फार्महाउस किस का है और यहां कौन आने वाला है?

वे शराब पीते हुए लूटपाट की बातें कर रहे थे कि तभी वहां डीएसपी बलराज गिल अपने मित्र मनिंदरपाल सिंह की ओपट्रा कार से पहुंचे. उन के पहुंचने के थोड़ी देर बाद उन की महिला मित्र मोनिका कपिला अपनी इनोवा कार से पहुंचीं. बाहर बैठे लूट की योजना बना रहे लुटेरों ने उन्हें आते देखा तो उन्हें लगा कि फार्महाउस पर इस समय ये दोनों ही हैं. उन्हें लगा कि दोनों के पास कुछ न कुछ माल तो होगा ही और अगर कुछ भी न हुआ तो 2 लग्जरी कारें तो हैं ही. यहीं हाथ मारा जाए. इस तरह आननफानन में लूट की योजना बन गई. लुटेरों के हिसाब से फार्महाऊस में 2 लोग यानी एक औरत और एक मर्द है, जबकि वे 6 थे. 2 लोगों को वे आसानी से काबू कर सकते थे.

यही सोच कर 2 लुटेरे फार्महाऊस की दीवार फांद कर अंदर आए और अंदर से लीवर घुमा कर मुख्य गेट खोल दिया. इस के बाद बाकी 4 लुटेरे भी अंदर आ गए. फार्महाऊस के कमरे में बैठे बलराज और मोनिका बातें कर रहे थे कि तभी बलराज ने पदचाप की आवाज सुनी. बाहर कौन है, यह देखने के लिए वह बाहर लौन में आए तो लुटेरों ने उन्हें दबोच लिया. अचानक हुए इस हमले से वह विचलित तो हुए, लेकिन जल्दी ही खुद को संभाल कर लुटेरों से भिड़ गए. काफी देर तक लुटेरों और बलराज के बीच हाथापाई होती रही. अंत में लुटेरों ने तेजधार हथियारों से उन पर हमला कर के उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया.

वह जमीन पर गिर पड़े तो लुटेरे उन्हें घसीट कर कमरे के अंदर ले गए और सोफे पर पटक दिया. मोनिका ने जब बलराज की हालत देखी तो अपनी जान बचाने के लिए वह कमरे से लगे बाथरूम की ओर भागीं. 2 लुटेरे मोनिका के पीछे भागे. लुटेरों को मोनिका का पीछा करते देख बलराज एक बार फिर उठे. लेकिन बाकी के 4 लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर हथियारों से उन पर फिर से वार कर दिए, जिस से उन की मौत हो गई. मोनिका का पीछा कर लुटेरों ने उन्हें पकड़ कर उन का सिर बाथरूम की दीवार से टकरा दिया, जिस से उन का सिर फट गया और दीवार पर खून और सिर के बाल चिपक गए. इस के बाद मोनिका की भी उन्होंने हथियारों से वार कर के हत्या कर दी.

दोनों को मार कर लुटेरे उन के पास से नकदी, गहने, मोबाइल तथा दोनों कारें लूट कर फार्महाऊस से चले गए. जाते हुए उन्होंने फार्महाऊस का गेट बाहर से बंद कर दिया था.  इंसपेक्टर हरपाल सिंह और एसआई अजायब सिंह ने सभी छहों अभियुक्तों की निशानदेही पर अभियुक्त हरविंदर से बलराज गिल का सैमसंग का मोबाइल फोन, पर्स और ओपट्रा कार की चाबी बरामद की, प्रितपाल के कब्जे से एप्पल का फोन और बलराज की कलाई घड़ी बरामद की, उमेश के कब्जे से नोकिया फोन तथा इनोवा कार की चाबी बरामद की. पूछताछ एवं बरामदगी के बाद 2 मई, 2012 को सभी छहों अभियुक्तों को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पुलिस ने समय से अदालत में चालान पेश कर दिया. पुलिस द्वारा तैयार किए गए आरोपपत्र में 65 गवाहों को शामिल किया गया था, लेकिन अदालत में केवल 44 गवाहों के ही बयान हो सके. अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में घटनास्थल की वीडियो की 4 सीडीज और 85 फोटोग्राफ्स पेश किए गए थे. इसी बीच 4 नवंबर को अभियुक्त उमेश कारड़ा ने साथियों सहित जेल से भागने की कोशिश भी की. इस के बाद इन पर जेल से भागने का भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया था. 1 जनवरी, 2013 को यह मुकदमा लोअर कोर्ट से एडिशनल सैशन जज प्रिया सूद की अदालत में भेज दिया गया. उसी दिन सभी आरोपियों पर चार्ज फ्रेम किया गया.

2 फरवरी, 2013 को रविंदर और हसनजीत ने अदालत में जमानत याचिका दायर की, जिसे 11 फरवरी को खाजिर कर दिया गया. अदालत की काररवाई के दौरान 20 अगस्त, 2013 को आरोपी हरविंदर सिंह पर एक गवाह को धमकाने का मामला दर्ज हुआ. हरविंदर सिंह ने गवाह जसपाल सिंह को गवाही देने के लिए अदालत में जान से मारने की धमकी दी थी. अभियुक्त दविंदरपाल ने जमानत के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की, जो जनवरी, 2014 में मंजूर कर ली गई. अब अदालत में गवाहियां शुरू हो गई थीं.

अभियोजन पक्ष की ओर से चीफ पब्लिक प्रौसीक्यूटर सुखचैन सिंह गिल पैरवी कर रहे थे. मृतक बलराज गिल के पिता कश्मीरा सिंह की ओर से एडवोकेट हरप्रीत संधु मुकदमा लड़ रहे थे. बचाव पक्ष की ओर से एडवोकेट अशोक लखनपाल और नगेंद्र सिंह गोरा पेश हुए थे. 41 गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने इस केस को किसी और अदालत में चलाने की याचिका दायर की, जिसे सैशन जज ने यह कह खारिज कर दिया कि अदालत बदले जाने से केस की सुनवाई में देर होगी और सुनवाई प्रभावित होगी.

गवाहियां समाप्त होने के बाद दोनों पक्षों की बहस और दलीले सुनने के बाद अतिरिक्त सैशन जज प्रिया सूद ने फैसला सुनाने की तारीख 9 सितंबर तय कर दी, लेकिन उस दिन वह फैसला नहीं सुना सकीं. जबकि उन्होंने सभी छहों आरोपियों को हत्याओं का दोषी करार दे दिया था. फैसला सुनाने के लिए उन्होंने 11 सितंबर की तारीख दी. दोषी करार देने के बाद जमानत पर चल रहे दोषी दविंदरपाल सिंह को तत्काल पुलिस ने हिरासत में ले लिया था. माननीय जज प्रिया सूद ने 11 सितंबर 2015 को इस दोहरे हाईप्रोफाइल हत्याकांड में अभियुक्त उमेश कारड़ा उर्फ सोनू, हरविंदर सिंह उर्फ बिंदर तथा प्रितपाल सिंह उर्फ लड्डू को हत्याएं करने, सामान चोरी करने, जाली दस्तावेज तैयार करने, सबूत खुर्दबुर्द करने तथा साजिश रचने के अपराध में दोषी करार देते हुए दोहरी उम्रकैद यानी 42 साल की कैद तथा 1-1 लाख रुपए जुरमाने की सजा सुनाई.

जुरमाना अदा न करने पर सजा 1-1 साल और बढ़ा दी जाएगी. रविंदर सिंह उर्फ रिंकू तथा दविंदरपाल सिंह को सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने और जाली दस्तावेज तैयार करने का दोषी करार देते हुए 3-3 साल की सजा और 5-5 हजार रुपए जुरमाने की तथा हसनजीत सिंह उर्फ हसन को साजिश रचने, सामान चोरी करने, सबूत खुर्दबुर्द करने का दोषी करार देते हुए 7 वर्ष की सजा और 20 हजार रुपए जुरमाने की सजा सुनाई. सजा सुनाने से पहले अभियोजन पक्ष के वकीलों ने अभियुक्तों को फांसी की सजा की मांग की थी. लेकिन अदालत ने उन की यह मांग नहीं स्वीकार की थी.

मजे की बाज यह थी कि सजा सुनने के बाद भी दोषियों के चेहरों पर कोई शिकन नहीं थी. 9 सितंबर को अदालत द्वारा दोषी करार देने के बाद अभियुक्त जब जेल पहुंचे थे तो उन्होंने झगड़ा कर के 3 विचाराधीन कैदियों को गंभीर रूप से घायल कर दिया था. हत्यारों की मानसिकता का इसी बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्हें सजा होने पर जब घर वाले रोने लगे तो उन्होंने कहा, ‘‘आप लोग क्यों परेशान होते हैं, सजा तो शेरों को होती है.’’ Crime Story

 

Rajasthan Crime Story: हत्यारा निकला प्रशासनिक अधिकारी

Rajasthan Crime Story: 2 बच्चों के पिता आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच ने गर्लफ्रैंड के चक्कर में अपनी पत्नी नेहा की सुनियोजित तरीके से हत्या कर के उसे दुर्घटना का रूप देने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन…

नेहा को जब पता चला कि उस का रिश्ता एक आरएएस अधिकारी प्रदीप बालाच से पक्का हो गया है तो वह फूली नहीं समा रही थी. उस के मांबाप व घर के अन्य लोग भी खुश थे कि एक प्रशासनिक अधिकारी प्रदीप के साथ शादी के बाद नेहा राज करेगी. लड़का नेहा को हर वह खुशी देगा, जो उसे चाहिए. प्रदीप बालाच राजस्थान के बाड़मेर जिले के गांव गडरा रोड के रहने वाले प्रेम प्रकाश बालाच का बेटा था. प्रेम प्रकाश कोई बड़े आदमी नहीं थे, वह एक साधारण आदमी थे.

खेतीकिसानी से होने वाली आमदनी से उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ायालिखाया था. प्रदीप शुरू से ही पढ़ाई में होशियार था. स्कूली पढ़ाई पूरी कर के कालेज की पढ़ाई भी पूरी कर ली थी. बाद इस के वह राजस्थान प्रशासनिक सेवा (आरएएस) की तैयारी करने लगा. उस की मेहनत रंग लाई और आरएएस में उस का चयन हो गया. राजस्थान इंस्टीट्यूट औफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन (रीपा), जोधपुर में ट्रेनिंग करने के बाद 13 नवंबर, 2006 को प्रदीप की पहली नियुक्ति जैसलमेर में उपजिलाधिकारी के पद पर हुई. इस के बाद वह जैसलमेर में करीब 2 सालों तक विभिन्न पदों पर प्रशिक्षु के रूप में कार्य करते रहे.

जैसलमेर में तैनाती के दौरान ही 31 जनवरी, 2007 को प्रदीप की शादी बाड़मेर के रहने वाले भीमाराम की बेटी निर्मला उर्फ नेहा के साथ हुई थी. यह शादी बड़ी धूमधाम से हिंदू रीतिरिवाज से हुई थी. शादी में जैसलमेर के तत्कालीन जिलाधिकारी सहित तमाम प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा इलाके के अनेक प्रतिष्ठित लोग भी शामिल हुए थे. गोरे रंग और शर्मीले स्वभाव की नेहा जब अपनी ससुराल पहुंची तो अपने मृदु  व्यवहार से उस ने सब का मन मोह लिया. ससुराल में नेहा की सभी तारीफ कर रहे थे. इस से नेहा भी खुश हो रही थी. नेहा ने अपने दिल में ढेरों सपने संजोए थे. वह दुनिया की वे सब खुशियां पाना चाहती थी, जो एक लड़की चाहती है.

शादी के बाद प्रदीप और नेहा के नवजीवन की शुरुआत हुई. दोनों ही बेहद खुश थे. प्रदीप की छुट्टियां कब बीत गईं, पता ही नहीं चला. छुट्टियां समाप्त होने पर प्रदीप जैसलमेर में अपनी ड्यूटी पर चले गए. एक बार मायके जाने के बाद नेहा भी प्रदीप के साथ जैसलमेर में रहने लगीं. हंसीखुशी के साथ उन का समय गुजर रहा था. इसी बीच नेहा एक बेटे की मां बन गईं. बेटा पैदा होने के बाद घर में खुशी और बढ़ गई. नेहा का समय बच्चे के लालनपालन में व्यतीत होने लगा.

जैसलमेर में लगभग 2 साल रहने के बाद प्रदीप का ट्रांसफर भरतपुर हो गया. भरतपुर के बाद जहांजहां भी प्रदीप का ट्रांसफर हुआ, नेहा उन के साथ ही रही. लेकिन जब प्रदीप को जोधपुर का जिला आबकारी अधिकारी बना कर भेजा गया तो नेहा के पारिवारिक जीवन में अचानक बदलाव आ गया. वह एक और बेटे की मां बन गई. नेहा के साथ उस के सासससुर भी रह रहे थे. जोधपुर आने के बाद नेहा महसूस कर रही थी कि उस का पति उस से कुछ ज्यादा ही चिड़ाचिड़ा सा रहने लगा है. उस ने इस पर कुछ खास ध्यान नहीं दिया. वह सोचती थी कि ड्यूटी की भागादौड़ी की वजह से यह सब हो रहा है, सब ठीक हो जाएगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. ठीक होने के बजाय घर में हर समय कलह रहने लगी.

बातबात पर प्रदीप व उस की मां उसे डांटतेफटकारते थे. नेहा को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि ये लोग उस के साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में आखिर वह क्या करे. रोजरोज की किचकिच से परेशान हो कर नेहा ने एक दिन अपनी मां पार्वती देवी व सहेलियों को यह बात बता दी. मां ने नेहा को ही समझाया कि पारिवारिक विवाद हर घर में होता है. आज नहीं तो कल सब ठीक हो जाएगा. लेकिन घर का माहौल ठीक नहीं हुआ. दिनप्रतिदिन घर में कलह बढ़ती ही गई. नेहा जैसे ही प्रदीप के सामने पड़ती, वह उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहता, ‘‘मैं ने तुम से शादी कर के बहुत बड़ी गलती की है. काश, मैं अपनी मनमरजी से शादी करता तो मेरा जीवन आज नरक नहीं बनता.’’

पति के मुंह से यह बात सुन कर नेहा समझ गई कि प्रदीप ने अपने घर वालों के दबाव में शादी की है. तभी तो वह इस तरह की बातें कह रहा है. नेहा कुछ कहती तो प्रदीप उस पर चिल्लाने लगता. सास तो उसे चैन से बैठने तक नहीं देती. नेहा कहां तो प्रदीप से शादी करने के बाद खुद को किस्मत वाली समझ रही थी. लेकिन अब उस के व्यवहार को देख कर सोचती थी कि इस से तो भला था वह किसी गरीब लड़के से ब्याही होती. एक रोज तो हद ही हो गई. प्रदीप ने अपने मोबाइल में एक लड़की का फोटो दिखाते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी जिंदगी में नहीं आई होती तो मैं इस से ब्याह रचाता. क्योंकि मैं इस से प्यार करता हूं और यह मुझ से. हम दोनों अच्छे मित्र हैं.’’

यह बात सुन कर नेहा के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. अब पति की बेरुखी का कारण उस की समझ में आ गया था. नेहा ने एक दिन मौका मिलते ही प्रदीप के मोबाइल से उस की गर्लफ्रैंड की फोटो अपने मोबाइल में ट्रांसफर कर ली. नेहा जब मायके गई तो वह फोटो उस ने मां को दिखाते हुए अपना दुखड़ा रोया. दामाद की हकीकत जान कर पार्वती भी हक्कीबक्की रह गई. पार्वती ने बेटी की समस्या के बारे में पति और बेटे को भी अवगत कराया. तब भीमाराम अपने कुछ रिश्तेदारों को ले कर प्रदीप के यहां गए और बेटी को तंग करने के मुद्दे पर बात की. उस समय प्रदीप ने उन से वादा किया कि वह आईंदा नेहा को तंग नहीं करेगा.

बात आईगई हो गई. नेहा भी मायके से जोधपुर लौट आई. उस के लौटने पर प्रदीप आंखें तरेर कर बोला, ‘‘अपने मांबाप से मेरी शिकायत कर के तुम ने अच्छा नहीं किया. मैं आबकारी अधिकारी हूं. इसलिए पुलिस के बड़ेबड़े अधिकारियों से मेरे अच्छे संबंध हैं. तुम पुलिस के पास जाओगी, तब भी मेरा कुछ नहीं बिगड़ेगा.’’

पति की बात सुन कर नेहा अवाक सी रह गई. कहां तो वह समझ रही थी कि प्रदीप अब उस से कुछ नहीं कहेगा, लेकिन उस ने तो पहले जैसे ही तेवर दिखाने शुरू कर दिए. नेहा की आंखें भर आईं. पति से बहस करने के बजाय वह चुप हो गई, ताकि बात न बिगड़े. लेकिन उस की यह सोच गलत साबित हुई. सास और प्रदीप ने उस का जीना हराम कर दिया था. प्रदीप अकसर देर रात को घर लौटने लगा. नेहा जब उस से देर से आने की वजह पूछती तो वह कहता कि वह अपनी महिलामित्रों के साथ ऐश कर रहा था. यह सब वह नेहा को चिढ़ाने के लिए कहता था या फिर वह जो कह रहा था सच था, इस बात को वह ही जानता था.

कोई भी महिला सब कुछ सहन कर सकती है, पर यह हरगिज बरदाश्त नहीं कर सकती कि उस का पति किसी दूसरी महिला से नजदीकी बनाए. उसी बीच नेहा ने एक दिन पति को घर में ही एक महिला से हंसहंस कर बातें करते देख लिया. वह वही महिला थी, जिस का फोटो उस ने पति के मोबाइल में देखा था. बात गंभीर थी, इसलिए नेहा ने यह बात अपनी मां को फोन पर बता दी. बेटी की बात सुन कर मायके वाले भी बहुत आहत हुए. नेहा की समस्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी.

वह भी चाहते थे कि किसी तरह प्रदीप पर दबाव बना कर उसे लाइन पर लाया जाए. इसलिए वह अपने गांव के कुछ संभ्रांत लोगों को ले कर प्रदीप के गांव गडरा रोड चले गए. जोधपुर से प्रदीप और उस के घर वाले भी अपने गांव चले गए. गांव में पंचायत हुई. पंचायत में प्रदीप ने फिर से वादा किया कि वह नेहा को अब तंग नहीं करेगा. मगर यह उस का मात्र दिखावा था. वह मन से नेहा को निकाल चुका था. उस के दिल में नेहा की जगह कोई और बस गई थी. यही कारण था कि नेहा के सामने वह इस तरह के हालात खड़े कर रहा था कि नेहा परेशान हो कर खुदबखुद मायके जा कर रहने लगे.

लेकिन वह उस से दूर नहीं होना चाहती थी.  प्रदीप को जब लगा कि नेहा उस का पीछा छोड़ने वाली नहीं है तो वह उस से छुटकारा पाने के उपाय खोजने लगा. इस के लिए उस के दिमाग में यही उपाय आया कि किसी भी तरह नेहा को ठिकाने लगा दिया जाए. इस से उस का नेहा से हमेशा के लिए पीछा छूट जाएगा और कुछ समय बाद वह अपनी उस प्रेमिका से शादी भी कर लेगा, जिस का फोटो नेहा को दिखाया था. भोलीभाली नेहा अपने फरेबी पति के शौतानी दिमाग में मच रही खलबली से नावाकिफ थी. उस के लिए पति और दोनों बेटे ही संसार की सारी खुशियां थीं. नेहा का सोचना था कि हर काली रात के बाद उजाला जरूर होता है. आज नहीं तो कल उस के जीवन से भी अंधकार के बादल छंट जाएंगे और जीवन में उजियारा आएगा. मगर यह उस की सोच भर साबित हुई.

योजना को अंजाम देने के लिए प्रदीप नेहा को ले कर कई बार अपने गांव भी गया, लेकिन मौका न मिलने पर योजना सफल नहीं हो सकी. फिर एक दिन प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘यदि तुम मेरी बीवी बनी रहना चाहती हो तो अपने बाप से 10 लाख रुपए और एक बंगला दिलवा दो. अगर यह नहीं हुआ तो तुम्हें ठिकाने लगा कर मैं अपनी गर्लफ्रैंड से शादी कर लूंगा. मैं अधिकारी हूं, इसलिए पुलिस भी मेरा कुछ नहीं कर पाएगी.’’

यह बात नेहा के दिल पर हथौड़े की तरह लगी. उस ने इस की चर्चा अपने मायके में की. मगर मायके वालों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वे प्रदीप की यह मांग पूरी करते. नेहा ने मांबाप की असमर्थता प्रदीप से बता दी. अब प्रदीप ने अपनी चाल चली. 15 अप्रैल, 2015 को प्रदीप नेहा को जोधपुर से ले कर बाड़मेर गया. प्रदीप अपने साथ छोटे भाई हितेश को भी ले गया था. बाड़मेर में एक रात रुक कर अगले दिन वह अपने गांव गडरा रोड गया. पति के बदले मिजाज को देख कर नेहा को शक हो गया. उस ने फोन से अपनी मां पार्वती से बात करते हुए कहा कि मुझे प्रदीप और उस के छोटे भाई हितेष पर शक हो रहा है. ये मेरे साथ कोई अनहोनी कर सकते हैं.

मां ने समझाते हुए कहा कि यह तेरा वहम है. भला वे ऐसा क्यों करेंगे?

‘‘मम्मी, वहम नहीं, न जाने मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि अब मैं आप से कभी नहीं मिल सकूंगी.’’ इतना कह कर नेहा रोने लगी. मां ने धैर्य रखने को कहा.

3-4 दिन गांव में रुकने के बाद 19 अप्रैल, 2015 की रात प्रदीप ने नेहा से कहा, ‘‘चलो, कोई पूजा करनी है, जिस से घर की सुखशांति लौट आए और रोजरोज के क्लेश से मुक्ति मिल जाए.’’

नेहा भी घर में शांति चाहती थी, इसलिए पति के साथ चली गई. पति के साथ वह चली तो गई, लेकिन उस समय कार में बैठने पर उसे डर लग रहा था. बहरहाल वह कार में बैठ कर चली तो गई, लेकिन वापस जीवित नहीं लौटी. दो-ढाई घंटे बाद प्रदीप उस की लाश ले कर वापस अपने घर लौटा. उस समय उस के साथ उस का छोटा भाई हितेष और भाजपा नेता दशरथ मेघवाल भी थे. पड़ोसियों और मोहल्ले वालों के पूछने पर प्रदीप ने विस्तार से बताया, ‘‘चलती गाड़ी का दरवाजा अचानक खुल जाने से नेहा सड़क पर गिर गई. घायल अवस्था में इसे गडरा रोड अस्पताल ले जाया गया, जहां डा. अशोक मीणा ने हालत नाजुक बताई और ऐंबुलैंस से इसे बाड़मेर ले जाने की सलाह दी. तब मैं बाड़मेर अस्पताल ले गया. लेकिन वहां के डाक्टर ने मृत घोषित कर दिया.

‘‘चूंकि मामला दुर्घटना का था, इसलिए डाक्टर ने पुलिस को सूचना दे दी. उस समय आधी रात का समय था. एक कांस्टेबल अस्पताल आया. उस ने कहा कि शव मोर्चरी में रखवा देते हैं, सुबह पोस्टमार्टम के बाद ले जाना. मैं ने सिपाही को अपना परिचय देते हुए कहा कि इन की मौत कार का गेट खुलने पर गिरने से हुई है. मैं इन का पोस्टमार्टम नहीं कराना चाहता. सिपाही को मेरी बात समझ आ गई और मैं लाश को घर ले आया.’’

प्रदीप ने नेहा की मौत की खबर उस के मायके वालों को देने के बजाय सुबह नेहा का अंतिम संस्कार कर दिया. शव के ऊपर उस ने नमक डाल दिया था. नेहा मेघवाल जाति की थी और राजस्थान में मेघवाल जाति के लोगों का अंतिम संस्कार जमीन में दफना कर ही किया जाता है. मेघवाल जाति हिंदू धर्म में ही आती है, इस के बावजूद भी इस जाति के लोग चिता जलाने के बजाय अंतिम संस्कार लाश को दफना कर करते हैं. नेहा एक जिला आबकारी अधिकारी की पत्नी थी, इसलिए मीडिया वालों को जब घटना की जानकारी हुई तो प्रिंट और इलेक्ट्रौनिक मीडिया में नेहा की मौत की खबर प्रसारित हुई तो प्रदीप को जानने वाले अनेक लोग उस के गांव पहुंचने लगे.

नेहा के मायके वालों को जब नेहा की ऐक्सीडैंट में मौत होने की खबर मिली तो उस के मायके में चीखपुकार मच गई. मायके वाले प्रदीप के गांव पहुंचे. उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि चलती कार का गेट अचानक कैसे खुल जाएगा. अगर मान भी लिया जाए कि नेहा की मौत ऐक्सीडैंट में हुई थी तो प्रदीप ने उन्हें सूचना क्यों नहीं दी. सूचना दिए बगैर और बिना पोस्टमार्टम कराए ही, उस ने जल्दबाजी में उस का अंतिम संस्कार क्यों कर दिया. ऐसे कई सुलगते सवाल थे, जो नेहा के पिता भीमाराम एवं माता पार्वती के साथ उस के भाइयों के दिमाग में घूम रहे थे.

उन्हें ऐसा लग रहा था कि प्रदीप ने नेहा को मार कर ऐक्सीडैंट का रूप दिया है. पार्वती और भीमराम ने 22 अप्रैल, 2015 को बाड़मेर के पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख अनिल से मुलाकात कर के बेटी की शादी होने के बाद से उसे प्रताडि़त करने, दहेज मांगने की पूरी बात बताई. उन्होंने बताया कि यह दुर्घटना नहीं, बल्कि हत्या का मामला है. उन्होंने नेहा के पति प्रदीप बालाच, देवर हितेष और सास के ऊपर शक जताते हुए उन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी काररवाई करने की मांग की. नेहा की लाश का पोस्टमार्टम नहीं करवाने और मायके वालों को मौत की सूचना दिए बगैर आननफानन में लाश का अंतिम संस्कार कराने पर एसपी को भी शक हो गया.

उन्होंने गडरा रोड के थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि प्रदीप बालाच और उस के भाई को थाने बुला कर पूछताछ की जाए, ताकि नेहा की मौत की सच्चाई सामने आ सके. उधर मीडियाकर्मी अपने स्तर पर नेहा की मौत के राज से परदा उठाने के लिए मैदान में कूद पड़े. प्रदीप बालाच ने जहां नेहा की दुर्घटना होने की बात बताई थी, उस जगह रात 10 बजे रियाज खां नाम का एक शख्स अपनी गाड़ी ले कर गुजर रहा था. रियाज ने सड़क किनारे बोलेरो देख कर अपनी गाड़ी रोक दी थी. उसे बोलेरो में लाल शर्ट पहने ड्राइवर व एक बच्चा बैठा दिखा. सड़क से दूर एक व्यक्ति टौर्च लिए खड़ा था.

रियाज ने जब ड्राइवर से पूछा कि कहां से आए हो तो उसने जवाब देने के बजाय जीप के गेट का शीशा ऊपर चढ़ा दिया. इस के बाद रियाज वहां से गाड़ी ले कर चला गया. रियाज को पत्रकारों ने ढूंढ़ निकाला था और उस से बात कर के यह साबित कर दिया था कि जरूर नेहा को मारा गया था. प्रदीप आबकारी विभाग, जोधपुर की बोलेरो जीप नंबर आरजे19यू आर1069 ले कर जोधुपर से गडरा रोड आया था. उस समय नेहा का 4 वर्षीय बेटा रजत भी था. पत्रकारों ने आबकारी विभाग, जोधपुर के ड्राइवर सुगनलाल से बात की तो उस ने बताया कि उस दिन जीप प्रदीप बालाच के पास थी. नेहा की मौत की खबर मिलने पर वह 20 अप्रैल को प्रदीप बालाच की इनोवा गाड़ी में प्रदीप के मातापिता को ले कर गडरा रोड गया था. इनोवा को गडरा में छोड़ कर वह सरकारी बोलेरो गाड़ी ले कर जोधपुर लौट आया था.

मीडिया द्वारा पुलिस को यह खबरें मिलीं तो एसपी के निर्देश पर चोहटन के सीओ नीरज पाठक ने भाजपा के पदाधिकारी दशरथ मेघवाल से पूछताछ की. दशरथ ने बताया, ‘‘मुझे फोन पर प्रदीप बालाच ने बताया था कि कार का गेट खुलने से नेहा का ऐक्सीडैंट हो गया है और मैं गाड़ी ले कर पहुंचूं. चूंकि उन से मेरे घनिष्ठ संबंध थे, इसलिए मैं गाड़ी ले कर घटनास्थल पर गया और नेहा को ले कर गडरा रोड अस्पताल गया. नेहा की हालत गंभीर थी, इसलिए वहां के डाक्टर ने उसे बाड़मेर रैफर कर दिया. बाड़मेर के डाक्टर ने नेहा को मृत घोषित कर दिया था.’’

इस के बाद सीओ नीरज पाठक ने गडरा रोड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के डा. अशोक मीणा के बयान भी नोट किए. इन बयानों के बाद सीओ को जो चौंकाने वाले तथ्य मिले, उस से लगा कि प्रदीप की ससुराल वालों द्वारा लगाए आरोप सही हैं. पुलिस प्रदीप के खिलाफ पहले सबूत जुटाना चाहती थी. इसलिए 24 अप्रैल, 2015 को मैडिकल बोर्ड और मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में नेहा का शव जमीन से निकाल कर पोस्टमार्टम कराया. नमक डालने की वजह से शव सड़गल चुका था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि नेहा की मौत सड़क हादसे में नहीं हुई थी. उस के शरीर पर ऐसी कोई गंभीर चोट नहीं थी, जिस से लगे कि उस की मौत हो गई. नेहा की मौत के कारणों को जानने के लिए विसरा को मैडिकल कालेज, जोधपुर भेज दिया गया.

पुलिस को पूछताछ में पता चला कि प्रदीप बालाच की सरकारी बोलेरो गाड़ी घटनास्थल पर मौजूद थी. इस के बाद उसे बाड़मेर रैफर करने तक प्रदीप ने 3 बार गाडि़यां बदलीं. अपनी सरकारी गाड़ी से नेहा को वह अस्पताल क्यों नहीं ले गया? उस ने अस्पताल ले जाने के लिए भाजपा नेता को क्यों बुलाया? ये सारे सबूत मिल जाने के बाद प्रदीप बालाच और उस के छोटे भाई से पूछताछ करनी जरूरी थी. पुलिस जब उस के घर पहुंची तो हितेष घर से गायब मिला और प्रदीप ने थाने आने से मना कर दिया. सीओ ने इस बात से एसपी को अवगत कराया. एसपी को प्रदीप की यह बात नागवार लगी. उन का मानना था कि सरकारी अधिकारी होने के नाते आबकारी अधिकारी प्रदीप को पुलिस जांच में सहयोग करना चाहिए.

उन्होंने सीओ नीरज पाठक के नेतृत्व में भारी पुलिस बल प्रदीप के घर 25 अप्रैल, 2015 को भेज दिया. पुलिस प्रदीप को पूछताछ के लिए गडरा रोड थाने ले आई. पुलिस अधीक्षक पारिस देशमुख, सीओ चोहटन नीरज पाठक, गडरा रोड थानाप्रभारी बाबूलाल विश्नोई ने प्रदीप से नेहा की हत्या से संबंधित मनोवैज्ञानिक तरीके से रातभर पूछताछ की. लेकिन वह पुलिस को गुमराह करने के लिए बारबार रोने का नाटक करता रहा. पूरी रात ऐसे ही बीत गई. सुबह को अधिकारियों ने उस से फिर पूछताछ की. इस बार वह पुलिस अधिकारियों के सवालों के चक्रव्यूह में फंस गया. आखिर उस ने पत्नी नेहा की हत्या का राज उगल दिया. वह फफकफफक कर रोते हुए बोला, ‘‘हां, मैं ने नेहा की हत्या की है. लंबे समय से कलह के कारण मैं परेशान हो गया था और बस इसी कारण मैं ने उस की जान ले ली.’’

प्रदीप ने बताया कि वह नेहा को टोनेटोटके के बहाने हेलीपैड पर ले गया. वहां टोटका करने के लिए अगरबत्ती जलाई, गेहूं, ज्वार के दाने रखे. जब नेहा पूजा कर रही थी, उस समय गाड़ी में रखे डंडे से नेहा के सिर पर वार किया, जिस से वह घायल हो गई. उसी समय उस ने अपने छोटे भाई हितेष को वहां बुला लिया. फिर वे दोनों नेहा को गाड़ी में डाल कर जैसिंधर गांव से दूर सुनसान सड़क पर ले गए. वहां उन्होंने गाड़ी रोकी और नेहा को धक्का दे कर गिरा दिया ताकि हत्या को हादसे का रूप दे सकें. बाद में उस का गला घोंट दिया.

पुलिस टीम ने जोधुपर से आबकारी विभाग की बोलेरो गाड़ी भी जब्त कर ली. इस के अलावा घटनास्थल से माचिस, लकड़ी के टुकड़े व अन्य सामग्री जब्त की. भीमाराम की तहरीर के आधार पर नेहा की हत्या का मुकदमा गडरा रोड थाना में भादंवि की धारा 302, 498ए, 201 के तहत प्रदीप बालाच, उस के छोटे भाई हितेष बालाच व मां के खिलाफ दर्ज कर लिया गया. जांच एसआई बाबूलाल बिश्नोई को सौंप दी गई. पुलिस ने हितेष की गिरफ्तारी के लिए अलगअलग टीमें गठित कर उस की तलाश शुरू कर दी. प्रदीप बालाच को 27 अप्रैल को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, वहां से उसे 3 दिन के रिमांड पर ले कर उस से विस्तार से पूछताछ की और घटनास्थल की तफ्तीश कराने के साथ कई सबूत भी जुटाए.

प्रदीप ने पुलिस अधिकारियों से कहा कि पत्नी की हत्या कर के उस ने बड़ा अपराध किया है. उधर 27 अप्रैल, मंगलवार को हितेष बालाच ने पुलिस के सामने सरेंडर कर दिया. पुलिस टीम उसे भी घटनास्थल पर ले गई और मौका मुआयना कर नेहा की हत्या से जुड़े विभिन्न पहलुओं की जानकारी हासिल की. हितेष को 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के रिमांड पर ले लिया. 30 अप्रैल को पुलिस ने रिमांड अवधि समाप्त होने पर प्रदीप व हितेष को बाड़मेर कोर्ट में पेश कर और रिमांड मांगा. प्रदीप को 2 दिनों के रिमांड पर दिया, वहीं हितेष को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

2 दिनों के रिमांड अविध पूर्ण होने पर गडरा पुलिस द्वारा प्रदीप बालाच को 2 मई, 2015 को बाड़मेर कोर्ट में पेश किया, जहां न्यायाधीश द्वारा प्रदीप बालाच को भी न्यायिक अभिरक्षा में भेजने के आदेश दिए. दोनों भाई न्यायिक अभिरक्षा में बाड़मेर जेल में बंद अपने किए की भूल पर पछताते हुए आंसू बहा रहे हैं. नेहा के दोनों मासूम बेटे मां की ममता की छांव से हमेशा के लिए दूर हो गए. 5 मई को पुलिस ने नेहा की सास को भी गिरफ्तार कर लिया. उसे धारा 498ए (दहेज के लिए प्रताडि़त करना) के तहत गिरफ्तार किया था. गिरफ्तारी के बाद उसे बाड़मेर की अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

5 मई, 2015 को राज्य सरकार ने पत्नी की हत्या के आरोपी प्रदीप को निलंबित कर दिया है. 48 घंटे से अधिक पुलिस अभिरक्षा में रहने के कारण राज्य सरकार ने निलंबन आदेश जारी किए. कथा लिखने तक प्रदीप व हितेष बाड़मेर जेल में बंद थे. Rajasthan Crime Story

(कथा पुलिस सूत्रों/समाचार पत्रों/नेहा के मायके पक्ष द्वारा दी जानकारी पर आधारित)

 

Crime Story: शैतानी दिमाग की साजिश

Crime Story: 10 सितंबर, 2018 को लुधियाना के जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ की अदालत में अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा भीड़ थी. वजह यह थी कि उस दिन लुधियाना शहर के एक ऐसे दोहरे मर्डर केस का फैसला सुनाया जाना था, जिस ने पूरे शहर में सनसनी फैला दी थी. इस में हतप्रभ कर देने वाली बात यह थी कि आरोपी रिशु ग्रोवर मृतकों के परिवार का ही सदस्य था और उस परिवार की हर तरह से देखरेख करता था.

इस के बावजूद उस ने मां और बेटी की इतनी वीभत्स तरीके से हत्या की थी कि उन की लाशें देख कर पुलिस तक का कलेजा कांप उठा था. यह केस लगभग 5 सालों तक न्यायालय में चला, जिस में 23 गवाहों ने अपने बयान दर्ज कराए. इन गवाहों में एक गवाह ऐसा भी था, जिस ने आरोपी को घटनास्थल से फरार होते देखा था. अभियोजन पक्ष ने इस केस में पुलिस वालों, फोटोग्राफर, फिंगरप्रिंट एक्सर्ट्स, पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों आदि के बयान भी अदालत में दर्ज कराए थे.

निर्धारित समय पर जिला एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ के अदालत में बैठने के बाद जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल ने कहा कि आरोपी रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और उन की बेटी की खंजर से बेहद क्रूरतम तरीके से हत्या की थी. लिहाजा ऐसे आरोपी को फांसी की सजा मिलनी चाहिए. वहीं बचाव पक्ष के वकील ने कहा कि ये दोनों मर्डर किसी और ने किए हैं. हत्याएं करने के बाद हत्यारा खून से दीवार पर एक नाम भी लिख कर गया था.

खून से दीवार पर जिस का नाम लिखा गया था, पुलिस को उस शख्स से सख्ती से पूछताछ करनी चाहिए थी. लेकिन पुलिस ने उस शख्स को बचा कर सीधेसादे रिशु ग्रोवर को फंसा कर जेल में डाल दिया. रिशु पर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं. लिहाजा उसे इस केस से बाइज्जत बरी किया जाना चाहिए. जिला एडिशनल सेशन जज ने तमाम गवाहों के बयान, सबूतों और वकीलों की जिरह के बाद आरोपी रिशु ग्रोवर को दोषी करार दिया और सजा सुनाने के लिए 13 सितंबर, 2018 का दिन नियत कर दिया.

आखिर ऐसा क्या हुआ था कि इस हत्याकांड के फैसले पर लुधियाना के लोगों के अलावा वकीलों और मीडिया तक की निगाहें जमी थीं. सनसनी फैला देने वाले इस केस को समझने के लिए हमें घटना की पृष्ठभूमि में जाना होगा. लुधियाना के बाबा थानसिंह चौक के निकट मोहल्ला फतेहगंज में बलदेव राज अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी ऊषा के अलावा 2 बेटियां आशना व हिना एक बेटा राहुल था. बड़ी बेटी आशना की वह शादी कर चुके थे. शादी के लिए 2 बच्चे और बचे थे. वह उन की शादी की भी तैयारी कर रहे थे, लेकिन इस से पहले ही उन की मृत्यु हो गई.

बलदेव राज की मृत्यु के बाद घर की जिम्मेदारी ऊषा के ऊपर आ गई थी. खेती की जमीन से वह परिवार की गुजरबसर करने लगीं. पंजाब के तमाम लोग विदेशों में काम कर के अच्छा पैसा कमा रहे हैं. ज्यादा पैसे कमाने की चाह में राहुल भी अपने एक जानकार की मदद से आस्ट्रेलिया चला गया. वहां उसे अच्छा काम मिल गया था. राहुल के आस्ट्रेलिया जाने के बाद लुधियाना में उस के घर में 55 वर्षीय मां ऊषा और 21 वर्षीय बहन हिना ही रह गई थीं. राहुल ने अपनी बहन आशना और बहनोई विकास मल्होत्रा का खयाल रखने को कह दिया था. इस के अलावा उस ने अपने चाचा के बेटे रिशु ग्रोवर से भी मांबहन का ध्यान रखने को कहा था.

रिशु टिब्बा रोड के इकबाल नगर में रहता था. वैसे भी ऊषा का घर बाबा थानसिंह चौक पर ऐसी जगह रास्ते में था कि रिशु आतेजाते अपनी ताई ऊषा का हालचाल जान लिया करता था. जब रिशु ऊषा के यहां आनेजाने लगा तो ऊषा उस से घर के छोटेमोटे काम कराने लगीं. इस में रिशु के मातापिता को भी कोई ऐतराज नहीं था. कुछ समय और बीता तो ताई के कहने पर रिशु कभीकभी रात को भी उन के घर रुकने लगा.

इसी बीच एक यह परेशानी सामने आई कि बाबू नाम का एक लड़का हिना के पीछे पड़ गया. बाबू का सेनेटरी का काम था. हिना जब भी घर से बाहर निकलती, बाबू उस का रास्ता रोक कर उस से छेड़छाड़ करता था. इस से परेशान हो कर हिना ने इस की शिकायत पहले रिशु से की और बाद में यह बात अपनी बहन और जीजा को भी बता दी. रिशु ने अपने तरीके से बाबू को समझाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना. कोई हल न निकलता देख हिना के बहनोई विकास ने इस की शिकायत थाना डिवीजन नंबर-3 में कर दी. पुलिस ने बाबू को थाने बुला कर धमका दिया. इस के बावजूद वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. यह सन 2012 की बात है.

इस बीच राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना लौटा तो यह बात उसे भी पता चली. लगभग 2 महीने लुधियाना में रहने के बाद जब वह वापस आस्ट्रेलिया लौटा तो अपनी मां ऊषा और बहन हिना की जिम्मेदारी फिर से रिशु को सौंप गया. आगे चल कर यही राहुल की सब से बड़ी भूल साबित हुई. रिशु एक आवारा, बदचलन और बेहद गिरा हुआ इंसान था. सिगरेट, शराब, जुए से ले कर कोई ऐसा गलत ऐब नहीं बचा था, जो रिशु में नहीं था. ऊषा और हिना का ध्यान रखने की आड़ में वह ऊषा के घर पर ही अपना डेरा जमा कर बैठ गया. दरअसल, रिशु के खुराफाती दिमाग में एक भयानक षड्यंत्र ने जन्म ले लिया था. उस का सीधा निशाना हिना थी जो इस बात से बिलकुल अनजान थी.

नाजायज रिश्ते, नाजायज तरीके. कब किसी इंसान को गुनाह के रास्ते पर ला कर खड़ा कर दें, कोई अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. जिस भाई को राहुल मां और बहन की देखभाल की जिम्मेदारी सौंप गया था, उसी भाई के मन में एक अपराध ने जन्म ले लिया था. अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए रिशु ने अपनी ताई की बेटी हिना को अपने जाल में फंसाना शुरू कर दिया. जल्दी ही वह अपने मकसद में कामयाब भी हो गया. उस ने हिना के साथ नाजायज रिश्ता कायम कर लिया. बाद में वह इसी नाजायज रिश्ते की आड़ ले कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने लगा. उस से मिले पैसों का इस्तेमाल वह अपने सपने पूरे करने में खर्च करता था.

ताज्जुब की बात यह थी कि उसी घर में रहते हुए भी ऊषा को इस सब की भनक तक नहीं लग पाई थी. इस की वजह यह थी कि रिशु अपनी ताई को खाने में नींद की गोलियां दे देता था. गोलियों के नशे को ऊषा अपनी उम्र का रोग समझती थीं. शुरूशुरू में तो हिना रिशु के आकर्षण में फंस गई थी पर जब तक उसे उस की नीयत का पता चला, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. लेकिन अब पछताने से कोई फायदा नहीं था. क्योंकि वह सिर से ले कर पांव तक रिशु के चंगुल में फंसी हुई थी, जहां से अकेले बाहर निकलना उस के बूते की बात नहीं थी.

अंत में हार कर हिना ने अपने भाई राहुल को आस्ट्रेलिया फोन कर के यह बात बता दी. यहां हिना ने एक बार फिर बड़ी गलती की. वह राहुल से अपने और रिशु के शारीरिक संबंधों और रिशु द्वारा ब्लैकमेल करने की बात छिपा गई थी. यह बात फरवरी 2013 की है. अपनी बहन की बात सुन राहुल आस्ट्रेलिया से लुधियाना आया और उस ने रिशु को आड़े हाथों लिया. रिशु के मातापिता ने भी उस की अच्छी खबर ली. आखिर अपनी करनी से शर्मिंदा हो कर रिशु ने राहुल के अलावा अन्य सभी रिश्तेदारों से माफी मांग ली.

बात तो यहीं खत्म हो गई थी पर राहुल कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था. उस ने हिना की शादी करने के लिए लड़के की तलाश शुरू कर दी. लड़का मिल भी गया. राहुल ने लुधियाना के पखोवाल रोड निवासी सौरव के साथ हिना की मंगनी कर के शादी पक्की कर दी. शादी की तारीख 20 नवंबर, 2013 तय हुई. इस बार राहुल ने बहन की शादी की जिम्मेदारी अपनी बहन आशमाऔर जीजा विकास मल्होत्रा को सौंपी. यह सब कर के वह 24 अप्रैल, 2013 को आस्ट्रेलिया लौट गया. आस्ट्रेलिया जा कर उस ने वहां से 4 लाख रुपए और करीब 100 डौलर अपनी मां को भेजे. मां ने शादी की तैयारियां शुरू कर दी थीं. राहुल समयसमय पर अपनी मां को फोन कर के बात करता रहता था.

21 मई, 2013 को राहुल ने आस्ट्रेलिया से अपनी मां को फोन कर के हालचाल पूछना चाहा तो मां का फोन बंद मिला. उस ने 2-3 बार मां को फोन मिलाया, पर हर बार फोन बंद ही मिला. उस ने 22 मई को फिर से मां को फोन किया. उस दिन भी उन का फोन स्विच्ड औफ था. बहन हिना का फोन भी बंद था. राहुल परेशान था कि दोनों के फोन क्यों नहीं मिल रहे. फिर उस ने अपने जीजा विकास मल्होत्रा को फोन कर कहा, ‘‘जीजाजी, पता नहीं क्यों मां और हिना का फोन नहीं मिल रहा है. मैं कल से कोशिश कर रहा हूं. आप वहां जा कर पता तो करें, क्या बात है?’’

‘‘ऐसी तो कोई बात नहीं है. मैं और आशमा कल रात को वहीं थे. हो सकता है वे लोग सो रहे हों या कोई सामान खरीदने बाजार गए हों. फिर भी मैं जा कर देखता हूं.’’ विकास ने कहा. उस के बाद विकास अपनी पत्नी आशमा को ले कर ससुराल गया.

दोनों ने वहां जा कर देखा तो मकान का मुख्य दरवाजा बंद जरूर था पर उस में कुंडी नहीं लगी थी. असमंजस की हालत में विकास ने अंदर जा कर देखा तो नीचे वाले कमरे में बैड पर सास ऊषा की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. मां की लाश देख कर आशमा की चीख निकल गई. विकास भी घबरा गया और सोचने लगा कि हिना कहां है. इस के बाद उस ने ऊपर के फ्लोर पर जा कर देखा तो बाथरूम के बाहर हिना की भी खून सनी लाश पड़ी थी. उस की लाश के पास दीवार पर खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था. बाब यानी बाबू.

विकास को यह समझते देर नहीं लगी थी कि ये दोनों हत्याएं बाबू सेनेटरी वाले ने ही की है. क्योंकि वह हिना को अकसर परेशान करता था. विकास ने इस की सूचना थाना डिवीजन-3 को दे दी. साथ ही उस ने फोन द्वारा राहुल को भी बता दिया. सूचना मिलते ही इंसपेक्टर बृजमोहन, एसआई प्रीतपाल सिंह, एएसआई राजवंत पाल, हवलदार वरिंदर पाल सिंह, सरजीत सिंह और सिपाही राजिंदर सिंह के साथ बताए गए पते की तरफ रवाना हो गए.

घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने लाशों का मुआयना किया तो पता चला कि उन की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी. मौके पर उन्होंने क्राइम टीम को बुलवाया. कई जगह से फिंगरप्रिंट और खून के सैंपल लिए और दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भेज दिया. प्राथमिक पूछताछ में विकास मल्होत्रा से यह बात भी पता चली थी कि वारदात को अंजाम देने के बाद हत्यारे घर में रखे 4 लाख रुपए, 100 डौलर और सोने की एक चेन भी ले गए थे. विकास के बयानों के आधार पर पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड का मुकदमा आईपीसी की धारा 302, 460 के तहत दर्ज कर के तफ्तीश शुरू कर दी.

विकास ने इस हत्याकांड का शक बाबू पर जाहिर किया था और दीवार पर भी खून से ‘बाब’ लिखा हुआ था, इसलिए इंसपेक्टर बृजमोहन ने बाबू को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी.सख्ती से पूछताछ करने पर भी बाबू इस हत्याकांड के बारे में कुछ नहीं बता पाया था. उस का कहना था कि वह हिना का पीछा जरूर करता था पर इन हत्याओं में दूरदूर तक भी उस का कोई हाथ नहीं है. अचानक पुलिस को शक हुआ कि कहीं पैसों के लालच में विकास ने ही तो इस घटना को अंजाम नहीं दिया क्योंकि उसे भी पता था कि घर में इतना कैश रखा है. फोरेंसिक रिपोर्ट में यह बताया गया था कि घटनास्थल से मिले खून के सैंपल के साथ एक किसी तीसरे आदमी का भी खून था, जो शायद हत्यारे का था.

इन्हीं आशंकाओं को देखते हुए पुलिस ने विकास से पूछताछ की. विकास ने भी खुद को बेकसूर बताया. उस से की गई पूछताछ के बाद भी पुलिस को हत्यारों से संबंधित कोई सुराग नहीं मिला. संभावनाओं का पिटारा पुलिस के सामने खुला हुआ था. लेकिन अभी तक कोई ठोस लीड नहीं मिल रही थी. तफ्तीश के दौरान पुलिस को एक ऐसा शख्स मिला, जिस ने हत्यारे को घर से निकलते देखा था और वह उसे अच्छी तरह से पहचानता भी था.

इस के बाद पुलिस ने अन्य सबूत जुटाने के लिए हिना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवा कर खंगाली. उस में कई संदिग्ध नंबर थे. उन सभी नंबरों में एक नंबर ऐसा भी था जिस पर हिना की सब से ज्यादा बातें होती थीं. वह नंबर हिना के चचेरे भाई रिशु ग्रोवर का था. इस हत्याकांड के 2 दिन बाद राहुल भी आस्ट्रेलिया से आ गया. 25 मई को ही वह इंसपेक्टर बृजमोहन से मिला. राहुल ने बताया कि रिशु ने उस की बहन हिना से नाजायज संबंध बना लिए थे. इतना ही नहीं वह हिना को ब्लैकमेल कर उस से पैसे भी ऐंठता रहता था.

राहुल के बयानों ने इस केस का पासा पलट दिया और कातिल सामने आ गया. पता चला कि हिना और ऊषा का हत्यारा कोई और नहीं बल्कि रिशु ग्रोवर था. पुलिस ने रिशु को हिरासत में ले लिया. रिशु के खून की जांच कराई गई तो वह उसी खून से मैच कर गया जो घटनास्थल पर मृतकों के अलावा मिला था. रिशु से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर बृजमोहन ने नाले से हत्या में इस्तेमाल खंजर, प्लास्टिक के दस्ताने और एक रूमाल बरामद किया. पुलिस ने हत्या के बाद लूटे हुए पैसों में से 2 लाख 11 हजार रुपए और 100 डौलर भी बरामद कर लिए. काररवाई पूरी करने के बाद रिशु को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था.

तफ्तीश पूरी करने के बाद इंसपेक्टर बृजमोहन ने एक महीने बाद इस केस की चार्जशीट अदालत में दाखिल कर दी थी. पुलिस ने अदालत में तमाम गवाह पेश किए. उन में एक ऐसी महिला गवाह थी जिस ने इस हत्याकांड को अंजाम देने के बाद रिशु को घटनास्थल से फरार होते देखा था. दरअसल वह महिला रोज तड़के ढाई बजे सेवा करने के लिए गुरुद्वारा साहिब जाती थी. उसी समय उस ने रिशु को ऊषा के घर से निकलते देखा था. अदालत ने उस महिला की गवाही को अहम माना. तमाम गवाहों और सबूतों के आधार पर एडिशनल सेशन जज अरुणवीर वशिष्ठ ने रिशु ग्रोवर को दोषी ठहराया.

रिशु को दोषी ठहराने के बाद लोगों के जेहन में एक ही सवाल घूम रहा था कि पता नहीं 13 सितंबर को जज साहब उसे कौन सी सजा सुनाएंगे. लोगों के 3 दिन इसी ऊहापोह की स्थिति में गुजरे. आखिर वो दिन भी आ गया जो माननीय जज ने सजा सुनाने के लिए मुकर्रर किया था. 13 सितंबर को तमाम लोग बड़ी बेताबी के साथ कोर्टरूम में पहुंच गए थे. सुबह ठीक 10 बजे माननीय जज अदालत में बैठे. उन्होंने केस फाइल पर नजर डालते हुए कहा कि जिला अटौर्नी रविंदर कुमार अबरोल की दलीलों, गवाहों के बयानों और मौके पर मिले अन्य साक्ष्यों से यह बात पूरी तरह साबित हो जाती है कि रिशु ग्रोवर ने अपनी ताई और हिना को खंजर से ताबड़तोड़ वार कर के बेरहमी से मार डाला था.

रिशु चचेरी बहन से अवैध संबंध बना कर उसे ब्लैकमेल कर पैसे वसूलता था, जबकि 6 महीने बाद उस की शादी होनी थी. लिहाजा ब्लैकमेलिंग का धंधा व पैसा मिलना बंद होने की रंजिश में उस ने ही दोहरे हत्याकांड को अंजाम दिया था और हिना की शादी के लिए घर में रखा सारा पैसा लूट लिया था. रिशु इतना शातिरदिमाग था कि दोहरे हत्याकांड को अंजाम देने के बाद उस ने पुलिस को गुमराह करने के लिए घर में रखे गहने व कैश भी गायब कर दिए थे. साथ ही दीवार पर खून से ‘बाब’ लिख दिया था, जिस से पुलिस उस तक न पहुंच सके.

दोषी की घृणित मानसिकता से यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि उस ने जघन्यतम अपराध किया है. ऐसे आदमी को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है. अभियोजन पक्ष ने अपनी चार्जशीट में आरोपी पर जो आरोप लगाए हैं, वह उन्हें पूरी तरह से साबित करने में सक्षम रहा है. आरोपी का दोष पूरी तरह से साबित होता है, लिहाजा भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत दोषी रिशु ग्रोवर को अदालत मृत्युदंड की सजा सुनाती है. अपना फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश अरुणवीर वशिष्ठ ने अपनी कलम की निब तोड़ दी और उठ कर अपने चैंबर में चले गए. रिशु ग्रोवर को फांसी की सजा सुनाए जाने पर आशमा और उस के पति विकास ने संतोष व्यक्त किया. Crime Story

Suspense Story: प्यार की खातिर दोस्त को दगा

Suspense Story: सुबह के साढ़े 6 बजे थे. बिहार के मुंगेर शहर में रहने वाला प्रेमनारायण सिंह ड्यूटी पर जाने के लिए घर से बाहर निकलने लगा तो पास में खड़ी पत्नी शिवानी की तरफ देख कर मुसकराया. पत्नी भी पति की तरफ देख कर मंदमंद मुसकराई. उधर प्रेमनारायण सिंह की बाइक घर से मुश्किल से डेढ़ सौ मीटर आगे ब्रह्मï चौक पहुंची थी कि अचानक किसी ने पीछे से उस पर लगातार 2 फायर कर दिए. गोली लगते ही वह सडक़ पर गिर कर बुरी तरह तड़पनेे लगा.

सुबह की फिजा में गोली चलने की आवाज दूरदूर तक गूंज उठी. गोली की आवाज सुन आसपास के घरों से कुछ लोग निकल कर लहूलुहान प्रेमनारायण सिंह के समीप पहुंचे. किसी ने उस के घर जा कर प्रेमनारायण को गोली लगने की बात कही तो प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी और अन्य लोग रोतेबिलखते घायल प्रेमनारायण सिंह के पास पहुंचे और उसे तुरंत एक निजी क्लिनिक ले गए, लेकिन वहां के डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

शिवानी ने फोन कर के मुंगेर के पूरब सराय पुलिस चौकी में अपने पति की हत्या की सूचना दी तो चौकी इंचार्ज राजीव कुमार कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर क्लिनिक पहुंच गए और प्रेमनारायण सिंह की लाश अपने कब्जे ले कर घटना की सूचना एसएचओ को दे दी. हत्या की खबरसुन कर एसएचओ भी क्लिनिक पहुंच गए. लाश का प्रारंभिक निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई.

लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद पुलिस वारदात वाली जगह ब्रह्मï चौक के निकट पहुंची और वहां का बारीकी से मुआयना करने लगी. सडक़ पर जहां प्रेमनारायण गोली लगने के बाद गिरा था, वहां पर काफी खून था. उस की बाइक भी वहीं पड़ी थी. वहां उपस्थित लोगों से पूछताछ करने पर बस इतना पता चला कि कोई बाइक सवार प्रेमनारायण को गोली मार कर फरार हो गया था.

सीसीटीवी फुटेज से मिला सुराग

कई लोगों से पूछताछ के बाद भी कोई भी बाइक का नंबर या उसेे चलाने वाले बदमाशों का हुलिया नहीं बता पाया. चौकी इंचार्ज राजीव कुमार ने प्रेमनारायण सिंह की पत्नी शिवानी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति की इलाके में किसी से दुश्मनी नहीं है. घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ करने के बाद पुलिस वापस लौट आई. शिवानी की शिकायत पर प्रेमनारायण सिंह की हत्या का मुकदमा अज्ञात अपराधियों के खिलाफ दर्ज कर लिया गया.

एसएचओ ने इस घटना के बारे में मुंगेर के एसपी जगुनाथ रेड्डी जला रेड्डी को विस्तार से जानकारी दी तो उन्होंने इस सनसनीखेज हत्याकांड के रहस्य से परदा हटाने के लिए एक एसआईटी का गठन किया. इस टीम में एसडीपीओ (सदर) राजीव कुमार, ओपी प्रभारी राजीव कुमार, कासिम बाजार एसएचओ मिंटू कुमार, जमालपुर एसएचओ सर्वजीत कुमार, पूरब सराय चौकी इंचार्ज राजीव कुमार तथा अन्य कई सिपाही शामिल थे.

टीम ने इस मर्डर केस को सुलझाने के लिए घटनास्थल और उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवा कर बारीकी से उस की जांच शुरू की तो उन्होंने फुटेज में 2 बाइक सवारों के अलावा कुछ संदिग्ध चेहरों की पहचान की. इस के अलावा मृतक प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी के मोबाइल की काल डिटेल्स की जांच में एक संदिग्ध नंबर मिला, जिस पर घटना के पहले और उस के बाद शिवानी धड़ल्ले से बातें कर रही थी. जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली गई तो वह नंबर गौरव कुमार नाम के युवक का निकला.

हत्या के पीछे निकली लव क्राइम की कहानी

जब गौरव कुमार को थाने में बुला कर उस के और शिवानी के बीच मोबाइल पर चल रही लंबी बातचीत के बारे में पूछताछ की गई तो गौरव ने बताया कि वह प्रेमनारायण का दोस्त है, इसलिए उस का उन के घर आनाजाना है. इसी वजह से वह शिवानी से बातें करता है. लेकिन हैरत की बात थी कि जितनी वह शिवानी से बातें करता था, उतनी बातें शिवानी अपने पति से भी नहीं करती थी.

मामला संदेहास्पद लगा, इसलिए जब गौरव को थाने में बुला कर पूछताछ की गई तो थोड़ी देर के बाद उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में अपना जुर्म स्वीकार करते हुए पुलिस टीम को जो बातें बताईं, उस में पति पत्नी और वो के रिश्तों में उलझी लव क्राइम की एक दिलचस्प कहानी निकल कर सामने आई. उस ने प्रेमनारायण सिंह की हत्या में शामिल सभी लोगों के नामपते बताए, जिस में प्रेमनारायण की पत्नी शिवानी तथा शूटर अभिषेक कुमार, इंद्रजीत कुमार, मोहम्मद इरशाद, राजीव, दीपक कुमार उर्फ दीपू थे. गौरव कुमार को हिरासत में लेने के बाद पुलिस टीम मृतक प्रेमनारायण के घर पहुंची और पति की मौत का नाटक कर रही शिवानी को हिरासत में ले लिया गया.

10 और 11 अगस्त को 2 आरोपी और 12 अगस्त को 3 आरोपियों को उन के ठिकानों पर दबिश डाल कर गिरफ्तार कर लिया. सभी आरोपियों से पूछताछ के बाद इस हत्याकांड के पीछे जो खौफनाक कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार है. 32 वर्षीय प्रेमनारायण सिंह मुंगेर के वार्ड नंबर 14 में अपनी पत्नी शिवानी और 4 साल की बेटी के साथ रहता था. करीब 5 साल पहले दोनों की शादी हुई थी. प्रेमनारायण मुंगेर में ही स्थित आईटीसी कंपनी में नौकरी करता था.

नौकरीपेशा होने की वजह से प्रेमनारायण सिंह के जीवन में हर प्रकार का सुखवैभव मौजूद था, लेकिन इस घर में उन के बड़े भाई का परिवार भी रहता था. शिवानी को जौइंट फैमिली में रहना पसंद नहीं था. इस के अलावा शिवानी की सास भी रहती थी. शिवानी के ससुर की कुछ साल पहले मृत्यु हो चुकी थी. परिवार के अन्य सदस्यों के साथ होने से शिवानी घर में अपनी मनमरजी से नहीं रह पाती थी. जबकि वह बिना किसी रोकटोक के आजाद रहना पसंद करती थी. ऐसा तभी संभव था, जब वह बाकी लोगों से अलग हो कर कहीं दूसरा घर खरीद लेते या किराए के मकान में रहने चले जाते.

प्रेमनारायण इस घर को छोड़ कर कहीं भी जाना नहीं चाहता था. यहां से जाने पर एक तो उसे घर के लिए ज्यादा रुपए खर्च करने पड़ते, दूसरे उसे अपनी मां और भाईभाभी से अलग होना पड़ जाता, जोकि वह चाहता नहीं था. रोजरोज की इस घरेलू कलह से बचने के लिए प्रेमनारायण ने अपने एक दोस्त गौरव कुमार की मदद ली.

दोस्ती की आड़ में प्रेम संबंध का खेल

गौरव कुमार मुंगेर के नजदीक नंदलालपुर का रहने वाला था और उसी के साथ सिगरेट फैक्ट्री में काम करता था. दोनों के बीच खूब जमती थी. वे रोज अपने घरों का हाल अकसर एकदूसरे को बताते रहते थे. कहते हैं कि अपनी परेशानी बांटने से मन का बोझ कुछ हल्का हो जाता है. इसी कारण प्रेमनारायण अपनी परेशानी गौरव के साथ शेयर कर लेता था. प्रेमनारायण के घर का हाल जानने के बाद गौरव भी उस के घर की समस्या हल करने में मदद करने की कोशिश करता.

2023 के जनवरी महीने में गौरव ने प्रेमनारायण के घर आनाजाना शुरू कर दिया. उस ने अपने दोस्त का पक्ष ले कर शिवानी को मनाने का प्रयास करना शुरू किया, लेकिन कुछ ही मुलाकातों के बाद शिवानी की बातों का गौरव के दिलोदिमाग पर कुछ ऐसा जादू हुआ कि वह जिस दिन शिवानी से नहीं मिलता, उस के दिल को सुकून नहीं मिलता था. शिवानी जानती थी कि गौरव कुंआरा है. वह गौरव को पसंद करने लगी. गौरव को जब भी वक्त मिलता, वह शिवानी को समझाने के बहाने उस से मिलने आ जाता. कुछ ही दिनों में उन के बीच जिस्मानी ताल्लुकात हो गए. उधर गौरव और शिवानी दोनों ने प्रेमनारायण को सदा अंधरे में रखा.

गौरव और शिवानी बड़ी खामोशी से प्यार की पींगें बढ़ाते रहे. प्रेमनाराण को कभी गौरव और शिवानी के अवैध संबंधों की भनक तक नहीं लगी. जब उन के अंतरंग संबंध प्रगाढ़ हो गए तो उन्होंने प्रेमनारायण को अपने रास्ते से सदा के लिए हटाने का फैसला कर लिया. गौरव ने शिवानी को समझाया कि प्रेमनारायण की हत्या के बाद उस की जगह पर तुम्हारी नौकरी लग जाएगी.

कुछ समय के बाद जब मामला ठंडा पड़ जाएगा, तब हम दोनों आपस में शादी कर लेंगे. इस बीच हम दुनिया वालों की आखों में धूल झोंक कर मिलते रहेंगे. शिवानी इस बात के लिए तैयार हो गई. तब गौरव कुमार अपने कुछ जानकारों की मदद से कुछ शातिर बदमाशों से मिला, जो सुपारी ले कर हत्या की वारदात को अंजाम देते थे. बदमाशों से प्रेमनारायण की हत्या की बात 7 लाख रुपए में तय हो गई. शिवानी ने बदमाशों को देने के लिए 7 लाख रुपए गौरव को सौंप दिए.

सुपारी दे कर शूटरों से कराई हत्या

4 अगस्त, 2023 को बेगूसराय का शूटर अभिषेक कुमार और समस्तीपुर का शूटर इंद्रजीत तथा मोहम्मद इरशाद मुंगेर स्थित गौरव कुमार के ठिकाने पर पहुंचे. गौरव कुमार मुंगेर के मंगल बाजार स्थित माधोपुर में किराए का कमरा ले कर रहता था. मुस्सफिल थाना क्षेत्र के नंदलालपुर से 2 बदमाश राजीव कुमार तथा दीपक कुमार उर्फ दीपू भी वहां पहुंचे. इन दोनों ने 5 अगस्त को प्रेमनारायण के घर के बाहर मौजूद रह कर उस की रेकी की. 6 अगस्त, 2023 की सुबह प्रेमनारायण सिंह जैसे ही अपनी बाइक से ड्यूटी जाने के लिए घर से निकला. पीछे से अभिषेक कुमार भी बाइक चलाते हुए उस के निकट पहुंचा और पीछे बैठे इंद्रजीत ने प्रेमनारायण की गोली मार कर हत्या कर दी.

घटना को अंजाम देने के बाद अभिषेक कुमार और शूटर इंद्रजीत मुख्य आरोपी गौरव कुमार के मंगल बाजार स्थित कमरे पर पहुंचे. वहां अपने हथियारों को छोड़ कर सभी मुंगेर से फरार हो गए. पुलिस एसआईटी की टीम ने गौरव के कमरे से 2 देशी पिस्तौल, 4 जिंदा कारतूस और 2 चले हुए कारतूस के खोखे बरामद कर लिए. कथा लिखे जाने तक मुंगेर पुलिस ने इस घटना में शामिल आरोपी गौरव समेत कुल 7 बदमाशों को गिरफ्तार कर मुंगेर की जिला अदालत में पेश कर दिया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Film: सलमान खान का नया रूप – बजरंगी भाईजान

Film: बड़े फिल्म स्टार तो कई हैं, लेकिन सलमान खान की बात ही अलग है, जब भी उन की कोई नई फिल्म आती है तो दर्शक उत्साह से भर उठते हैं. ईद पर आई उन की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर वह खुद भी उत्साहित हैं और उन के चाहने वाले भी…

शाहरुख खान, आमिर खान, रितिक रोशन, अजय देवगन, अक्षय कुमार और रणबीर कपूर सभी बड़े फिल्मी सितारे हैं. इन सभी की फिल्मों ने 100-100 करोड़ से ज्यादा कमाए हैं लेकिन लोगों में जो क्रेज सलमान खान का है, वह किसी का नहीं. इस मामले में बौलीवुड के बादशाह कहे जाने वाले शाहरुख खान भी कहीं पीछे छूट जाते हैं. इस की वजह शायद यह है कि जो इंसानियत, सहृदयता, संस्कार, मासूमियत, दूसरों की मदद करने का जज्बा, सुगठित बदन, जबरदस्त अभिनय क्षमता और खूबसूरती सलमान में है, वैसा पूरा पैकेज किसी दूसरे हीरो में नजर नहीं आता. इस से भी बड़ी बात है उन की स्क्रिप्ट की समझ, जो शायद उन्होंने अपने पिता सलीम खान से सीखी, जो फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज लेखक रहे हैं.

शायद इन्हीं खूबियों की वजह से सलमान खान की फिल्म ‘वांटेड’ के बाद लगभग सभी फिल्मों ने सौ करोड़ से ज्यादा कमाए. उन की 2009 में आई ‘वांटेड’, 2010 में आई ‘दबंग’ 2011 में आई ‘रेडी’ और ‘बौडीगार्ड’ ने बहुत मोटी कमाई की. ये सभी उन की सुपरहिट फिल्में थीं.

आजकल बड़े सितारों की फिल्मों का 100-200 और 300 करोड़ क्लब में शामिल होने का क्रेज सा बन गया है. सलमान की लगातार हिट हुई फिल्मों की बात करें तो उन की ‘एक था टाइगर’ ने 198 करोड़, ‘दबंग’ ने 145 करोड़, ‘दबंग-2’ ने 158 करोड़, ‘बौडीगार्ड’ ने 142 करोड़, ‘रेडी’ ने 120 करोड़, ‘जय हो’ ने 111 करोड़ और ‘किक’ ने 233 करोड़ रुपए कमाए. ‘किक’ उन की सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्म थी. इस मामले में शाहरुख खान की ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ 226 करोड़ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ भी 203 करोड़ पर सिमट कर रह गई थीं. हां, आमिर खान की ‘धूम-3’ ने 280 करोड़ और ‘पीके’ ने 339 करोड़ की कमाई कर के जरूर सलमान खान से बाजी मारी.

अब जब सलमान की ‘बजरंगी भाईजान’ रिलीज हो गई है तो उन की चाहत है कि उन की यह फिल्म ‘पीके’ की तरह 300 करोड़ क्लब में शामिल हो. दर्शकों ने जिस तरह फिल्म को हाथोंहाथ लिया है, उस से यह असंभव भी नहीं लगता. निस्संदेह ‘बजरंगी भाईजान’ बहुत अच्छी फिल्म है. इस फिल्म के डाइरैक्टर कबीर खान और सलमान खान इस से पहले भी फिल्म ‘एक था टाइगर’ में साथसाथ काम करचुके हैं, जो इन दोनों की सुपरहिट फिल्म थी. वहीं से दोनों की कैमिस्ट्री भी बनी.

कबीर खान की बात करें तो डाक्युमेंट्री फिल्मों की दुनिया से व्यावसायिक सिनेमा में आए कबीर खान ‘एक था टाइगर’ के अलावा ‘काबुल एक्सप्रेस’ और ‘न्यूयार्क’ फिल्में बना चुके हैं जो हिट फिल्में थीं. कबीर खान पहले यशराज फिल्म्स के लिए काम कर रहे थे. स्वतंत्र रूप से यह उन की पहली फिल्म है, जिस के निर्माता खुद सलमान खान हैं. फिल्म का टाइटल भी कबीर खान ने ही फाइनल किया है. इस फिल्म के लेखक हैं दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध पटकथा लेखक बी. विजेंद्र प्रसाद.

बी. विजेंद्र प्रसाद दक्षिण भारतीय फिल्मों के सुप्रसिद्ध निर्देशक राजमौली के पिता हैं, जिन की फिल्म ‘बाहुबली’ ने पिछले दिनों उत्तर और दक्षिण भारत में ही नहीं, विदेशों तक में खूब धूम मचाई. यह शायद पहली ऐसी भारतीय फिल्म थी जिस का पहले दिन का ही कलेक्शन 60 करोड़ रहा. उम्मीद है यह फिल्म 500 करोड़ तक कमाएगी. यहां यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब फिल्म की कहानी इतनी अच्छी थी तो बी. विजेंद्र प्रसाद ने इसे अपने बेटे राजमौली को क्यों नहीं दिया? दरअसल इस के पीछे भी एक कहानी है.

असल में ‘बजरंगी भाईजान’ की कहानी कुछ इस तरह की थी कि विजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि यह फिल्म पहले हिंदी में बने, इस के बाद तमिल या तेलुगू में. विजेंद्र प्रसाद को लग रहा था कि इस फिल्म में हीरो की भूमिका सलमान खान ज्यादा बेहतर ढंग से निभा सकते हैं, इसलिए वह पहले सलमान खान से ही मिले. सलमान को कहानी बहुत पसंद आई क्योंकि इस में हीरो की भूमिका रियल करेक्टर जैसी थी. वह इस कहानी को मुंहमांगी कीमत पर खरीदने को तैयार हो गए, लेकिन विजेंद्र प्रसाद ने शर्त रखी कि वह इस फिल्म में सहनिर्माता बनना चाहते हैं.

यह बात सलमान को मंजूर नहीं थी, सो बात नहीं बनी. इस के बाद विजेंद्र प्रसाद राकेश रोशन से मिले. कहानी उन्हें भी पसंद आई पर बात सहनिर्माता बनने पर अटक गई. अलबत्ता राकेश रोशन कहानी की पूरी कीमत चुकाने को तैयार थे. दोनों जगह बात न बनती देख अंतत: विजेंद्र प्रसाद ने फैसला किया कि जब कहानी ही देनी है तो क्यों न सलमान खान को दी जाए जो कहानी के नायक के किरदार के हिसाब से एकदम फिट हैं. और इस तरह विजेंद्र प्रसाद की कहानी सलमान के हाथों में आ गई. चूंकि स्क्रिप्ट दमदार थी इसलिए सलमान ने इसे खुद ही बनाने का फैसला किया. इस के लिए उन्होंने बतौर डाइरैक्टर चुनाव किया कबीर खान का, जो ‘एक था टाइगर’ के समय से उन के अच्छे दोस्त बन गए थे.

फिल्म की स्टार कास्ट में उन्होंने करीना कपूर, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, 6 वर्षीय बच्ची हर्षाली मल्होत्रा, नजीम खान, अलीकुली मिर्जा, दीप्ति नवल, ओम पुरी और शरत सक्सेना का चुनाव किया. फिल्म में अदनान सामी की एक कव्वाली के अलावा उन्होंने उन का स्पैशल अपीयरेंस भी रखा. वैसे फिल्म की बात करें तो इस की पूरी कहानी सलमान खान यानी (फिल्म में) पवन कुमार  चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी और हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी के ही इर्दगिर्द घूमती है. यह एक ऐसे साधारण युवक की कहानी है जो अजीब हालात में फंस कर असाधारण काम कर गुजरता है. हर्षाली मल्होत्रा यानी मुन्नी इस फिल्म का अहम किरदार है. फिल्म में यह ऐसी अनपढ़ पाकिस्तानी गूंगी बच्ची है जो भारत में अपनी मां से बिछुड़ गई है. उस के पास कोई पहचान भी नहीं है.

सलमान खान यानी पवन कुमार चतुर्वेदी मुन्नी को कैसे उस के घर वालों तक पहुंचाते हैं, यही फिल्म की कहानी है. मानवीय  रिश्तों वाली इस कहानी को इतनी खूबसूरती से गढ़ा गया है कि ज्यादातर बातें हास्यरस की चाशनी में लपेट कर कही गई हैं ताकि दर्शक बोर न हो और बात सीधे उस के दिल तक जाए. भारत-पाकिस्तान के रिश्ते राजनैतिक स्तर पर भले ही कैसे भी हों, आतंकवाद के समर्थक भले ही भारत में तबाही मचाने के मंसूबे बांधते हों, लेकिन हकीकत यह है कि आम हिंदुस्तानी या आम पाकिस्तानी के मन में किसी तरह का वैरभाव नहीं है.

वैसे भी मेहनत से रोजीरोटी का जुगाड़ करने वालों के पास बिना वजह की दुश्मनी का समय नहीं होता. न ही वे एकदूसरे का बुरा सोचते हैं. उन के बीच इंसानियत का रिश्ता हमेशा कायम रहता है. ‘बजरंगी भाईजान’ में भी इस हकीकत को समझाने का प्रयास किया गया है. इस फिल्म के टाइटल ‘बजरंगी भाईजान’ को ले कर भी खूब होहल्ला मचा. कई शहरों में इस फिल्म का प्रदर्शन रोकने के लिए अदालतों में अर्जियां दी गईं. कई जगह सुनवाई भी हुई. यह सोचेसमझे या देखे बिना ही कि फिल्म में क्या है? बात सिर्फ इतनी सी कि बजरंगी के साथ भाईजान क्यों जोड़ा गया.

जैसे बजरंगी के सारे कौपीराइट हिंदुओं के पास हों और भाईजान मुस्लिमों की प्रौपर्टी. मसलन जैसे मुट्ठी भर कुछ लोग भाईजान जैसे मीठे शब्द, जो शब्द नहीं बल्कि एक भावनात्मक रिश्ता है, को भी मजहबी रंग में रंग देना चाहते हों तो कुछ बजरंगी (हनुमानजी) नाम रखने पर भी पाबंदी लगा देना चाहते हों. यह अलग बात है कि 2-4 बजरंगी हर गांव, कस्बे और शहर में मिल जाएंगे. और भाईजान तो हिंदू और मुस्लिम दोनों में चलता है. वैसे यह सब इसलिए बेकार की बातें हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने पहले ही निर्देश दे रखा है कि सेंसर द्वारा पास की गई फिल्म का प्रदर्शन रोकने की अपीलों पर ध्यान न दिया जाए.

बहरहाल, तमाम तरह की अफवाहों और विवादों के बावजूद बजरंगी भाईजान पूरी भव्यता से प्रदर्शित हुई और सफल भी रही. लेकिन इस फिल्म का एक भावनात्मक पहलू और भी है, जिसे शायद ही कोई जानता हो. दरअसल, सलमान खान अपने पिता का न केवल बहुत ज्यादा सम्मान करते हैं, बल्कि उन से घबराते भी हैं. उन से पूछे बिना वह कोई भी बड़ा काम नहीं करते. सर्वविदित है कि सलमान के पिता सलीम खान विख्यात पटकथा लेखक रहे हैं, जिन्होंने ‘शोले’ जैसी कालजयी फिल्म लिखी. ऐसे में पटकथा पर उन की गहरी पैठ होना स्वाभाविक ही है. इसी के मद्देनजर सलमान उन से अपनी फिल्म की पटकथाओं पर उन की राय जरूर लेते हैं. इतना ही नहीं, फिल्म बन जाने के बाद प्रीमियर से पहले उन्हें दिखाते भी हैं ताकि उन की राय जानी जा सके.

जब ‘बजरंगी भाईजान’ बन गई तो कबीर खान और सलमान ने घर पर यह फिल्म सलीम साहब को दिखाई. फिल्म देखने के बाद कबीर खान ने सलीम साहब से उन की राय पूछी तो वह बोले, ‘‘यह फिल्म सलमान के 25 साल के कैरियर की सब से बेहतरीन फिल्म है. लेकिन फिल्म के अंत में सलमान और करीना पर जो गाना फिल्माया गया है, वह अनावश्यक है. इस गाने से फिल्म का प्रभाव खत्म हो रहा है.’’ बहरहाल, सलीम साहब की राय मान कर कबीर खान और सलमान ने वह गाना हटा दिया. अब यह फिल्म 2 घंटे 40 मिनट की रह गई है.

‘बजरंगी भाईजान’ भले ही दिल्ली बेस्ड है, लेकिन इसे पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और कश्मीर में फिल्माया गया है. भारत-पाक का बौर्डर होने की वजह से सब से ज्यादा शूटिंग राजस्थान में हुई. फिल्म में सब से खूबसूरत लोकेशन कश्मीर की हैं. यहां गुलमर्ग में ऐसी जगह शूटिंग की गई है, जहां आज तक कोई फिल्मकार नहीं गया था. साथ ही पहलगाम और सोनमर्ग में भी कई सीन फिल्माए गए हैं. फिल्म के लिए अलगअलग जगह शूटिंग इसलिए की गई क्योंकि फिल्म में सलमान बच्ची को उस के घर पहुंचाने के लिए उसे ले कर जगहजगह घूमते हैं.

सलमान खान को दर्शक एक्शन हीरो के रूप में देखना चाहते हैं, लेकिन बजरंगी भाईजान की कहानी एकदम अलग तरह की है, दिल को छू जाने वाली. करीब 2 घंटे 40 मिनट की इस फिल्म में दर्शक आखिर तक बंधा रहता है तो इस की वजह सलमान का रियल कैरेक्टर जैसा अभिनय है. फिल्म के निर्देशक कबीर खान ने भी अपने निर्देशन से कहानी पर कुछ ऐसी पकड़ बनाए रखी है कि पूरी फिल्म में हर वर्ग के दर्शक कहानी के किरदारों से बखूबी बंधे रहते हैं. दरअसल, पाकिस्तान के छोटे से गांव की रहने वाली सईदा (हर्षाली मल्होत्रा) जन्म से गूंगी है. उस के पिता पाकिस्तानी आर्मी में हैं और मां घरेलू महिला. सईदा बोल तो कुछ नहीं सकती लेकिन समझती सब कुछ है.

गांव के कुछ लोग सईदा के अब्बूअम्मी को बताते हैं कि अगर वह दिल्ली जा कर निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करे तो उन की बच्ची की जुबान लौट सकती है. परेशानी यह है कि सईदा के अब्बू को पाक आर्मी में होने की वजह से भारत का वीजा नहीं मिल सकता. ऐसी स्थिति में सईदा की अम्मी बेटी को ले कर समझौता एक्सप्रेस से दिल्ली आती है. दरगाह पर सजदा करने के बाद जब वह समझौता एक्सप्रेस से वापस लौटती है तो जरा सी देर के लिए एक सुनसान जगह पर ट्रेन रुकती है. इसी दौरान सईदा मां को छोड़ कर ट्रेन से उतर जाती है. तभी टे्रन चल पड़ती है और सईदा वहीं खड़ी रह जाती है.

सईदा की मां सीमा पार जा कर अपनी बेटी को ढूंढने के लिए भारत आना चाहती है, पर दो देशों की सीमा आड़े आ जाती है जिस की वजह से वह भारत नहीं आ पाती. दूसरी ओर सईदा एक मालगाड़ी में सवार हो कर कुरुक्षेत्र जा पहुंचती है. कुरुक्षेत्र में हनुमान जयंती पर विशाल जुलूस निकल रहा है. इस जुलूस में बजरंगबली के पक्के भक्त पवन कुमार चतुर्वेदी उर्फ बजरंगी (सलमान खान) भी शामिल हैं. इसी जुलूस के दौरान सईदा की मुलाकात बजरंगी से होती है लेकिन गूंगी और अनपढ़ होने की वजह से वह अपने बारे में कुछ भी नहीं बता पाती.

बजरंगी सईदा को ले कर स्थानीय पुलिस स्टेशन में जाता है, लेकिन यह जान कर कि बच्ची गूंगी और अनपढ़ है, पुलिस बजरंगी को हिदायत दे कर वापस भेज देती है. बजरंगी अजीबोगरीब स्थिति में फंस जाता है. उसे न बच्ची का नाम पता होता है, न धर्म और न यह कि वह कहां की रहने वाली है. वह कई तरह के इशारों से उस की हकीकत जानने की कोशिश करता है, लेकिन बच्ची न कुछ समझ पाती है न बता पाती है. बजरंगी दिल्ली में अपने पिता के दोस्त त्रिपाठीजी (शरत सक्सेना) के घर रहता है. त्रिपाठीजी की बेटी रसिका (करीना कपूर) स्कूल टीचर है और बजरंगी से प्यार करती है.

बजरंगी त्रिपाठी और रसिका को बताता है कि वह बच्ची उसे कुरुक्षेत्र में मिली है और हिंदू है. रसिका भी इशारोंइशारों में बच्ची से उस की हकीकत पता लगाने की कोशिश करती है, पर नाकाम रहती है. इस के बाद बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के मिशन में जुट जाता है. अपनी सुविधा के लिए बजरंगी और रसिका बच्ची को मुन्नी कह कर बुलाने लगते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब बजरंगी और रसिका को पता चलता है कि वह बच्ची पाकिस्तानी है. बजरंगी बच्ची को उस के मांबाप तक पहुंचाने के लिए वीजा लेने की कोशिश करता है लेकिन उसे वीजा नहीं मिलता. इस के बाद वह बच्ची को बिना पासपोर्ट वीजा के ही पाकिस्तान पहुंचाने का फैसला करता है.

बजरंगी बच्ची को ले कर बौर्डर पार भी कर जाता है पर पकड़ा जाता है. यहीं पर उस की मुलाकात पाकिस्तान के लोकल टीवी चैनल के खोजी पत्रकार चांद नवाज (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) से होती है. चांद नवाज को बजरंगी में सच्चाई और इंसानियत का जज्बा नजर आता है. वह हर तरह से बजरंगी की मदद करने का फैसला करता है. अंतत: चांद नवाज की मदद से बजरंगी छिपतेछिपाते सईदा के घर तक पहुंचता है और बच्ची को उस के मांबाप को सौंप देता है. बजरंगी जब सईदा को उस के मातापिता के पास छोड़ कर जाने लगता है और वह उसे माता कह कर पुकारती है तो हर दर्शक भावुक हो जाता है. यानि अंतिम दृश्य में बच्ची बोलने लगती है.

बजरंगी की भूमिका में सलमान खान ने जबरदस्त अभिनय किया है. उन के लिए वाकई यह चैलेंजिंग कैरेक्टर था, जिसे उन्होंने अपने अभिनय से जीवंत बना दिया. एक्टिंग के मामले में नवाजुद्ीन सिद्दीकी भी पीछे नहीं हैं. कई जगह तो वह सलमान पर भी हावी रहे. वह चूंकि फिल्म में सलमान को भाईजान बोलते हैं, इसलिए फिल्म का नाम ‘बजरंगी भाईजान’ रखा गया. हर्षाली मल्होत्रा भले ही 6 साल की बच्ची रही हों पर एक्टिंग के मामले में उस ने कमाल किया है. देखा जाए तो यह पूरी फिल्म सलमान खान, हर्षाली मल्होत्रा और नवाजुद्दीन सिद्दीकी के ही कंधों पर टिकी है. भारतपाक के रिश्ते भले ही चाहे जैसे भी हों लेकिन इस फिल्म के माध्यम से इंसानियत का जो मैसेज दिया गया है, वह दिल को छू लेने वाला है. Film

 

 

 

Crime Story: पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या

Crime Story: इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना ने अपने भांजे राजीव सक्सेना की पढ़ाईलिखाई से ले कर हर तरह से मदद की थी. एक दिन इसी भांजे ने आस्तीन का सांप बन कर उन्हें ऐसा डंसा कि उन की दुनिया ही उजड़ गई…

मुरादाबाद के एसएसपी कार्यालय में तैनात इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना 11 अगस्त को अपनी ड्यूटी खत्म कर के शाम करीब साढ़े 4 बजे घर पहुंचे तो उन्हें मेन गेट खुला मिला. इस तरह गेट खुला देख कर वह थोड़े चौंके, क्योंकि उन की पत्नी सरोज अकसर ही गेट बंद रखती थी. उन का घर सिविल लाइंस क्षेत्र के चंद्रनगर कालोनी में था. जैसे ही वह घर में घुसे, उन्हें रूम का दरवाजा भी खुला दिखा. अंदर से टीवी चलने की तेज आवाज भी आ रही थी.

उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई. 4 साल पहले उन्हें पैरालाइसिस हुआ था, जिस की वजह से वह ठीक से चल नहीं पाते थे. इसलिए घर के अंदर से जब कोई जवाब नहीं आया तो वह ड्राइंगरूम में जा कर कुरसी पर बैठ गए और अपने जूते उतारे. उन्होंने सोचा कि सरोज शायद पास की दुकान से कोई सामान वगैरह लेने गई होगी, तभी तो टीवी भी चालू छोड़ गई है. वह कुरसी पर बैठे हुए पत्नी के लौटने का इंतजार करने लगे. कुछ देर इंतजार करने के बावजूद भी जब पत्नी नहीं आई तो वह धीरेधीरे बेड की तरफ बढ़े तो उन्हें पत्नी फर्श पर अस्तव्यस्त हालात में औंधे मुंह पड़ी दिखी.

वह इस हालत में क्यों पड़ी है, सोचते हुए उन्होंने आवाज देते हुए उसे हिलायाडुलाया. उस का बेजान शरीर देख कर उन की चीख निकल गई. वह मृत अवस्था में थीं. रामबाबू सक्सेना रोतेचीखते हएु बाहर सड़क पर आ गए और लोगों को पत्नी की हत्या हो जाने की खबर दी. उन के चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास के लोग उन के घर में आ गए. उन की पत्नी की हत्या की बात सुन कर लोग चौंके. उन्हें इस बात का ताज्जुब हो रहा था कि एक पुलिस अधिकारी के यहां यह वारदात करने की हिम्मत किस ने की? उन में से किसी ने पुलिस को फोन कर के इंसपेक्टर रामबाबू की पत्नी की हत्या की खबर दे दी. थाना सिविल लाइंस वहां से कुछ ही दूरी पर था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी ब्रह्मपाल व चौकीइंचार्ज धीरज सिंह मौके पर पहुंच गए.

मामला एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. मामला विभाग के ही एक पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था और वह इंसपेक्टर भी एसएसपी कार्यालय में तैनात थे, इसलिए 15-20 मिनट के अंदर ही डीआईजी ओमकार सिंह, एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, सीओ सिविल लाइंस महेश कुमार भी मौके पर पहुंच गए. मौके पर खोजी कुत्ता और विधि विज्ञान प्रयोगशाला के डा. अरुण कुमार को भी घटनास्थल पर बुला लिया गया, ताकि वहां से कुछ सबूत जुटाए जा सकें.

खोजी कुत्ता सरोज के शव को सूंघने के बाद घर के बाहर सड़क पर पहुंच कर भौंकने लगा. इस से पुलिस को कोई खास मदद नहीं मिली. डा. अरुण कुमार ने भी मौके का बारीकी से निरीक्षण किया. उन का काम निपट जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका सरोज के बाएं हाथ की मुट्ठी में बालों का गुच्छा मिला. लाश के पास बैंगनी रंग का एक बटन भी पड़ा था. इस से साफ पता चल रहा था कि मृतका की हत्यारे से हाथापाई हुई थी. सरोज ने अपना बचाव करते हुए हत्यारे के बाल पकड़ लिए होंगे. उसी दौरान उस की शर्ट का भी बटन टूट गया होगा.

डबल बैड के गद्दे भी इस तरह से उलटेपलटे पड़े थे, जैसे किसी ने उन के नीचे कुछ ढूंढने की कोशिश की थी. बेडरूम में जो सेफ रखी थी, उस के हैंडल भी मुड़े हुए थे. उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें तोड़ने के लिए उन पर किसी भारी चीज से वार किया गया था, लेकिन हैंडल टूटे नहीं थे. हैंडल न टूटने की वजह से अलमारी में रखा कीमती सामान सुरक्षित था. इस से लग रहा था कि हत्या केवल लूटपाट के लिए ही की गई थी. ड्राइंगरूम में जो मेज रखी थी, उस पर 2 गिलास रखे थे. उन से एक गिलास में कुछ पानी भी था. किचन में गैस चूल्हे पर सौस पैन में 2 कप पानी चढ़ा हुआ था. वहीं स्लैब पर 2 खाली कप, अदरक, चायपत्ती भी रखी थी. लेकिन गैस बंद थी. वह शायद 2 कप चाय बनाने की तैयारी कर रही थी.

चाय के पानी की मात्रा और ड्राइंगरूम में रखे पानी के गिलासों से यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारों की संख्या एक या 2 रही होगी और वह इन के परिचित होंगे, क्योंकि मृतका ने उन्हें पानी पिलाया था और उन्हीं के लिए चाय बनाने के लिए किचन में गई थी. मृतका के गले पर मिले निशानों से लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी.

मौके की छानबीन करने के बाद एसएसपी ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से ही पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह तो नहीं है.

‘‘सर मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मैं सुबह पत्नी को घर पर ठीकठाक छोड़ कर गया था. चूंकि पैरालाइसिस की वजह से मैं अपने काम ठीक से नहीं कर पाता, इसलिए उन्होंने ही मुझे खाना खिलाया, अपने हाथ से कपड़े और जूते पहनाए. फिर मुझे सहारा दे कर औफिस के लिए एक रिक्शे पर बैठाया. मेन गेट को वह हमेशा बंद रखती थीं, जब कोई कालबेल बजाता था तो गेट खोलने से पहले वह देख लेती थीं. अपरिचित के लिए वह गेट नहीं खोलती थीं.’’ कहतेकते इंसपेक्टर रामबाबू सुबकने लगे. एसएसपी ने उन्हें ढांढस बंधाया और भरोसा दिया कि वह केस का खुलासा करने में दिनरात एक कर देंगे. जल्द ही हत्यारे भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने सरोज सक्सेना की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

एसएसपी लव कुमार ने तुरंत शहर के तेजतर्रार अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. मामला उन के ही औफिस के इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था, इसलिए केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए उन्होंने 4 पुलिस टीमों का गठन किया. कई बिंदुओं को ध्यान में रख कर पुलिस टीमें जांच में लग गईं. मौके की जांच करने के बाद यही लग रहा था कि सरोज सक्सेना की हत्या या तो चोरी के इरादे से की गई होगी या फिर किसी दुश्मनी से. लूट की वजह इसलिए लग रही थी कि हत्यारे ने सेफ को खोलने की कोशिश की थी. किंतु इसी बात पर यहीं एक सवाल यह भी उठ रहा था कि मृतका के शरीर पर सोने की ज्वैलरी थी तो हत्यारे वह ज्वैलरी क्यों नहीं ले गए.

चंद्रनगर से सटी हुई भांतू कालोनी है. इस जाति के अनेक लोग लूट की वारदातें करते हैं. यह वारदात कहीं इन्हीं लोगों ने तो नहीं की. यह पता लगाने के लिए इंसपेक्टर ब्रह्मपाल अपनी टीम को ले कर भांतू कालोनी गए और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को उठा कर थाने ले आए. उन से सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. आसपास रहने वाले लोगों से मृतका के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकसर अपना गेट बंद कर के रखती थी. किसी से वह फालतू बात तक नहीं करती थी. पड़ोसियों ने बताया कि घटना वाले दिन उन्हें दोपहर के समय उस समय देखा गया था, जब वह दूधिए से दूध लेने आई थी.

उन के यहां जो दूधिया आता था, वह छजलैट के पास बदावली गांव का रहने वाला था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुखबिरों से खबर के बाद पुलिस चंद्रनगर के ही 2 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की इस काररवाई का मोहल्ले के लोगों ने विरोध किया और सैकड़ों लोग उन दोनों युवकों को छोड़ने की मांग करने लगे. लोगों के विरोध को देखते हुए पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के अलावा पुलिस ने इलाके के अनेक आपराधिक लोगों से भी पूछताछ की, परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात. नतीजा निकलता न देख नगर पुलिस अधीक्षक डा. रामसुरेश यादव ने सीओ महेश कुमार के साथ विचारविमर्श किया. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा शक है कि इस हत्या का कारण पारिवारिक विवाद ही हो सकता है.

एक पुलिस इंसपेक्टर की बीवी का कत्ल बाहरी व्यक्ति भला क्यों करेगा. कोई भी बदमाश यह काम करने से पहले 10 बार सोचेगा. उन्होंने कहा कि हो न हो, इस मामले में इन का कोई न कोई परिचित ही शामिल रहा होगा. पुलिस ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर जांच की. लेकिन उस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. फिर पुलिस ने 11 अगस्त के उन फोन नंबरों को जांच के दायरे में लिया, जो उस दिन दोपहर ढाई बजे से शाम 4 बजे तक चंद्रनगर इलाके में सक्रिय रहे थे. पता चला कि ढाई सौ फोन उस दौरान उस इलाके में सक्रिय रहे. उन सभी नंबरों की जांच की. लेकिन कोई फायदा नहीं निकला.

पुलिस जिस बिंदु पर जांच कर रही थी, निराशा ही हाथ लग रही थी. इस तरह यह केस पुलिस टीम के लिए एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि यह भी मर्डर का केस था, लेकिन यह केस और केसों की तरह सामान्य नहीं था. क्योंकि यह विभाग के ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी का मामला था. अगले दिन पोस्टमार्टम कराने के बाद लाश रामबाबू को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि सरोज के गले, कोहनी, होंठ, बाएं हाथ की अंगुली, सीने और गाल पर जख्मों के निशान थे. मौत की वजह सांस नली का दबाव के कारण अवरुद्ध होना बताया गया. नाखूनों में स्किन के टुकड़े भी मिले, जिन्हें डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

सरोज सक्सेना की हत्या के बाद से अंतिम संस्कार तक उन के यहां आनेजाने वाले नजदीकियों पर सीओ महेश कुमार नजर रखे हुए थे. उन का अंतिम संस्कार होने के बाद सीओ महेश कुमार ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से बात कर के यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसा उन का कौन सा रिश्तेदार या नजदीकी है, जो इस दुखद घटना की जानकारी मिलने के बावजूद उन के यहां नहीं आया. तब उन्होंने बताया कि शाहबाद (रामपुर) में रहने वाली उन की बहन का बेटा राजीव सक्सेना उन के पास नहीं आया. वह केवल पोस्टमार्टम हाउस पर कुछ देर के लिए आया था. यहां तक कि वह अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ. जबकि वह शहर के ही मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) में रहता है.

मोहल्ले वालों से भी पुलिस को पता चला कि राजीव सक्सेना अकसर अपने मामा रामबाबू सक्सेना के घर पर ही रहता था. यह जानकारी पुलिस के लिए खास थी कि जब राजीव सक्सेना अपने मामा के यहां रहता था तो मामी की हत्या की खबर मिलने के बाद भी वह और रिश्तेदारों की तरह उन के यहां क्यों नहीं आया. तीजे की रस्म खत्म होने के बाद पुलिस टीम 14 अगस्त, 2015 की शाम को शहर के मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) पहुंच गई. वह वहां पर मिल गया. अपने घर पर पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस उसे थाने ले आई. थाने में वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उस से सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपनी मामी सरोज की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

रामबाबू सक्सेना मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के सहसवान थाने के अंतर्गत आने वाले छोटे से गांव अकौराबाद के रहने वाले थे. गांव में रहने के बाद भी उन का परिवार सुशिक्षित था. उन के 2 भाई और थे. उन में से एक दिनेश सक्सेना उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर हैं, जो आजकल बरेली जिले में तैनात हैं, जबकि दूसरे भाई श्यामबाबू सक्सेना बदायूं के एक ला कालेज में प्रोफेसर हैं. रामबाबू शर्मा भी उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती हो गए थे. बाद में प्रमोशन से वह इंसपेक्टर हो गए. इन के परिवार में पत्नी सरोज सक्सेना के अलावा 2 बेटे थे. दोनों बेटों की वह शादी कर चुके हैं. बड़ा बेटा राजीव सक्सेना छत्तीसगढ़ पावर कार्पोरेशन में इंजीनियर है.

वह पत्नी और 2 बच्चों के साथ वहीं रहता है. जबकि छोटा बेटा संदीप सक्सेना बरेली के पास मीरगंज स्थित एक शुगर मिल में इंजीनियर है. वह भी पत्नी व 2 बच्चों के साथ बरेली में रहता है.  पैरालाइसिस हो जाने के बाद से इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना के हाथपैर ठीक से काम नहीं करते थे, इसलिए उन की पत्नी सरोज उन्हें खाना खिलाने, कपड़े पहनाने, नहाने आदि में उन का सहयोग करती थीं. उन्होंने घर के काम करने के लिए नौकरानी रखने की बात कई बार पत्नी से कही, लेकिन सरोज ने मना कर दिया. रामबाबू सक्सेना ने मुरादाबाद के चंद्रनगर कालोनी में एक आलीशान मकान बना रखा था, जहां वह पत्नी के साथ रहते थे. शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उन की तैनाती एसएसपी कार्यालय में कर दी गई थी.

वैसे वह शहर की ही कांशीराम कालोनी में स्थित एक डाक्टर के पास फिजियोथेरैपी के लिए जाते थे, जिस से उन्हें कुछ फायदा भी हो रहा था. राजीव सक्सेना इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना का सगा भांजा था. वैसे वह शाहबाद (रामपुर) का रहने वाला था, लेकिन बचपन से ही वह मुरादाबाद में ही रहा है. यहीं से उस ने अपनी पढ़ाई की थी. उस का रामबाबू सक्सेना से ज्यादा लगाव था. इस की वजह यह थी कि उन्होंने उस की पढ़ाईलिखाई में काफी सहयोग किया था. वह अकसर उन के यहां आताजाता था. सक्षम होने की वजह से रामबाबू कभीकभी राजीव की पैसों से मदद कर दिया करते थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद राजीव सक्सेना एक दवा कंपनी में मैडिकल रिप्रिजेंटेटिव बन गया था. लेकिन करीब 4 साल पहले उस की यह नौकरी छूट गई. जिस से वह परेशान रहने लगा. बेरोजगार होने के बाद राजीव सक्सेना पर करीब 80 हजार रुपए कर्ज हो गया था. कहते हैं कि खाली समय में परेशान इंसान के दिमाग में ऊलजुलूल विचार आते हैं. कुछ लोग उन विचारों को अनुसरण कर लेते हैं, जिस से वही विचार उन के लिए दुखदाई बन जाते हैं. घटना के कुछ दिनों पहले राजीव ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना को अपनी परेशानी और कर्ज से लदे होने की पीड़ा बताई थी. उस ने कहा था कि जिन लोगों का कर्ज है, वह उसे परेशान और बेइज्जत करते हैं. उस ने मामा से 50 हजार रुपए मांगे और कहा कि जब नौकरी लग जाएगी तो वह उन के पैसे लौटा देगा.

तब रामबाबू सक्सेना ने उस से कहा, ‘‘राजीव मैं इस बारे में तुम्हारी मामी से बात करूंगा. अगर उस के पास पैसे होंगे तो मैं तुम्हारी मदद कर दूंगा.’’

10 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना पैसे के लिए अपने मामा के घर पहुंचा. उस समय घर पर मामी सरोज ही थी. राजीव ने उन से कहा, ‘‘मामी मेरी मामा से बात हो गई है, आप मुझे 50 हजार रुपए दे दोगी तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘तेरे मामा ने मुझ से इस बारे में कोई बात नहीं बताई है. मैं उन से पूछ लूं, वह कह देंगे तो मैं पैसे दे दूंगी.’’ सरोज ने कहा.

मामी का जवाब सुन कर राजीव निराश हो कर घर लौट गया. अगले दिन 11 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना फिर से अपनी मामी के घर यह सोच कर चला गया कि रात को मामी ने मामा से इस बारे में बात कर ली होगी. इस बार भी घर पर सरोज ही मिली. उस ने फिर से अपनी समस्या बताते हुए मामी से 50 हजार रुपए की डिमांड की तो सरोज ने साफ मना करते हुए कहा, ‘‘देखो राजीव, इस समय घर में पैसे नहीं हैं. तेरे मामा के इलाज पर काफी पैसे खर्च हो रहे हैं. सारी तनख्वाह ऐसे ही खर्च हो जाती है. अब उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भी ले जाना है. वहां भी पता नहीं कितना खर्च आएगा. अब हमें अपना खर्च चलाना ही मुश्किल हो रहा है.

तुझे मालूम ही है कि तेरे मामा ने बच्चों की पढ़ाईलिखाई और उन की शादी में कितना पैसा खर्च किया था. अपाहिज हो कर भी वह अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. जब वह ड्यूटी से वापस आएंगे तो मैं उन से बात करूंगी. जैसा वे कहेंगे कर दूंगी.’’

इस पर राजीव ने कहा कि देखो मामी तुम अलमारी खोल कर मुझे 50 हजार रुपए दे दो. मेरी मामा से बात हो गई है.

बात करतेकरते ही सरोज ने फ्रिज से बोतल निकाल कर राजीव को एक गिलास पानी पीने को दे दिया.

बाद में वह चाय बनाने के लिए किचन में चली गई. उन्होंने सौस पैन में 2 कप पानी भी रख दिया तभी राजीव पीछेपीछे किचन में पहुंच गया. उस ने बिना किसी संकोच के मामी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मामी, अगर तुम ने आज मुझे पैसे नहीं दिए तो अनर्थ हो जाएगा.’’

राजीव की इस हरकत पर सरोज गुस्से में बोलीं, ‘‘यह क्या बदतमीजी है? क्या अनर्थ हो जाएगा, तू हट्टाकट्टा है. कोई काम क्यों नहीं करता. और तेरी मजाल मेरा हाथ पकड़ने की कैसे हुई? चल पीछे हट. बड़ा आया पैसे लेने वाला.’’

उस समय राजीव के सिर पर खून सवार था. सरोज चाय छोड़ कर ड्राइंगरूम में आ गई. राजीव सरोज पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. वह लातघूसों से मामी पर प्रहार करने लगा. अपना बचाव करते हुए वह राजीव को धक्का दे कर अपनी जान बचाने के लिए बैडरूम की तरफ भागी कि वहां जा कर वह बैडरूम बंद कर लेगी. राजीव नीचे गिर चुका था. वह खुद को संभालते हुए उठ खड़ा हुआ. तब सरोज ने घर में रखी टौर्च से उस पर किया था. इस के बाद सरोज तुरंत बैडरूम का दरवाजा बंद करने लगी, लेकिन बैडरूम के दरवाजे में रस्सी बंधी हुई थी, जिस से दरवाजा बंद नहीं हो सका.

इतनी देर में राजीव भी बैडरूम में पहुंच गया. वह फिर से मामी से गुत्थमगुत्था हो गया. सरोज ने अपना बचाव करते हुए राजीव के बाल पकड़ लिए और नाखूनों से उस का मुंह नोच लिया, जिस से उस के नाखूनों में स्किन के टुकड़े फंस गए थे. 53 साल की सरोज भला एक जवान युवक का सामना कैसे कर सकती थीं. अंत में राजीव उन्हें बैड पर लिटा कर उन के सीने पर बैठ गया. तब सरोज ने उस के सामने हाथ जोड़ते हुए जीवन की भीख मांगी और कहा, ‘‘राजीव मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हें पैसे दिलवा दूंगी.’’

मगर राजीव पर खून सवार था. बोला कि मामी अब बहुत देर हो चुकी है. तुझे छोड़ने का मतलब है खुद को फांसी के फंदे तक पहुंचाना. इस के बाद उस ने उन का गला दबोच लिया. वह सरोज का गला तब तक दबाए रखा जब तक उन के प्राण निकल नहीं गए. जब राजीव ने देख लिया कि वह मर चुकी है तो वह पलंग के गद्दों को उलटपलट कर सेफ की चाबियां ढूंढने लगा. जब उसे सेफ की चाबियां नहीं मिलीं तो उस ने घर में रखा टीवी चालू कर के उस की आवाज बढ़ा दी और सेफ के कुंडों को तोड़ने लगा, ताकि उस में रखी नगदी, ज्वैलरी आदि को वह ले जा सके. ऐसा करने से कुंडे मुड़ जरूर गए, लेकिन खुले नहीं.

सेफ नहीं खुली तो वह दबे पांव वहां से बाहर आ गया. फिर औटो पकड़ कर वह कटघर में अपने कमरे पर आ गया. राजीव सक्सेना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. लोगों को जब पता चला कि राजीव ही मामी का हत्यारा है तो लोग दांतों तले अंगुली दबा गए. Crime Story

 

Hindi Crime Story: पति की मौत का फरमान

Hindi Crime Story: कामिनी गांव के ही रहने वाले मार्तंड यादव से शादी करना चाहती थी. लेकिन घर वालों ने उस की शादी पवन से कर दी. इस का परिणाम यह निकला कि निर्दोष पवन मारा गया.

गांव में भागवत कथा होने की वजह से काफी चहलपहल थी. कथा में जाने के लिए हर कोई उत्साहित था, क्योंकि वहां बहुत ही सुंदर कथा होती थी. उस के बाद हवन होता था. कामिनी भी वहां रोजाना अपनी सहेली मीना के साथ कथा सुनने जाती थी. उस दिन वह मीना के साथ कथा सुनने पहुंची तो वहां का नजारा ही कुछ और था. गांव के कई लोग पंडितों द्वारा किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के साथ हवन कर रहे थे. उस से जो धुआं उठ रहा था, वातावरण सुगंधित हो रहा था. कामिनी और मीना ने हाथ जोड़ कर सिर झुकाया और वहां बिछी दरी पर बैठ गईं. अचानक कामिनी की नजर दूसरी ओर बैठे एक युवक पर पड़ी, जो एकटक उसी को ताक रहा था. वह कोई और नहीं, उसी के गांव का मार्तंड यादव उर्फ पिंकू था.

कामिनी उम्र के उस दौर में पहुंच गई थी, जब लड़कों का इस तरह ताकना लड़कियों को अच्छा लगता है. यही वजह थी कि कामिनी ने भी उस की ओर उसी तरह ताका. नजरें मिलीं तो मार्तंड मुसकराया, लेकिन कामिनी ने नजरें झुका लीं. लेकिन यह भी सच है कि इस स्थिति में लड़की पहली बार भले ही नजरें झुका ले, लेकिन पलट कर जरूर देखती है. और कहते हैं कि अगर पलट कर देख लिया तो समझो मामला फिट है यानी वह भी चाहती है. कामिनी से रहा नहीं गया, उस ने नजरें उठाईं तो मार्तंड को अपनी ओर ताकते पाया. उसे उस तरह ताकते देख कामिनी को हंसी आ गई.

बस, फिर क्या था, कामिनी की इस हंसी पर मार्तंड मर मिटा. एक तो कामिनी ने पलट कर देखा था, दूसरे हंसी थी, इसलिए मार्तंड को लगा, अब मामला फिट है. अब वह सबकुछ भूल कर सिर्फ कामिनी को ही देख रहा था. कामिनी का भी कुछ ऐसा ही हाल था. उसे इस तरह बारबार उधर देखते देख कर मीना ने पूछा, ‘‘क्या बात है, जो तू बारबार उधर लड़कों की ओर देख रही है?’’

कामिनी इस तरह सिटपिटा गई, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. उसे जवाब तो देना ही था, इसलिए उस ने मीना को प्यार से झिड़कते हुए कहा, ‘‘यार, तुम भी न जाने क्याक्या सोचती रहती हो? इस तरह की जगहों पर कोई क्या देखेगा? तुम्हारे दिमाग में हमेशा खुराफात ही चलता रहता है.’’

अब तक हवन खत्म हो गया था. प्रसाद ले कर कामिनी मंडप से बाहर आई तो मार्तंड भी उस के पीछेपीछे बाहर आ गया. वह उस से थोड़ी दूरी बना कर चल रहा था. उसे अपने पीछे आते देख कामिनी का दिल तेजी से धड़कने लगा कि मीना के सामने ही वह उसे कुछ कह न दे. अब वह उसे अपना सा लग रहा था. कुछ ऐसा ही मार्तंड को भी महसूस हो रहा था. वह उस से अपने दिल की बेचैनी कहना तो चाहता था, लेकिन मीना की उपस्थिति उसे ऐसा करने से रोक रही थी. कुछ भी रहा हो, मार्तंड की नजरें उसी पर टिकी थीं. कामिनी भी बारबार पलट कर उसे देख रही थी. आखिर मीना ने उस की चोरी पकड़ ही ली. उस ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अच्छा तो यह बात है, अब समझ में आया, यह महाशय हमारे पीछेपीछे क्यों चले आ रहे हैं?’’

‘‘क्या बकवास कर रही है? कोई पीछेपीछे आ रहा है तो इस का मतलब यह तो नहीं हुआ कि मैं उस पर मर मिटी हूं. चलो, घर चलो, नहीं तो तुम इसी तरह बकवास करती रहोगी.’’ कामिनी ने कहा.

‘‘मैं कहां कह रही हूं कि तुम यहीं रुको. चलो न घर.’’ मीना ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा और तेजी से घर की ओर चल पड़ी.

मार्तंड कामिनी को तब तक देखता रहा, जब तक वह उस की आंखों से ओझल नहीं हो गई. घर पहुंच कर कामिनी मार्तंड के खयालों में डूब गई. पता नहीं क्यों वह उस के दिल में बस गया था, जबकि वह बहुत खूबसूरत भी नहीं था. गांव में उस से भी खूबसूरत लड़के थे, जो उस पर मरते थे. लेकिन उस ने कभी किसी को भाव नहीं दिया था. दूसरी ओर मार्तंड भी कामिनी के खयालों में डूबा था. उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि कामिनी जैसी खूबसूरत लड़की का दिल उस के लिए धड़क सकता है. इसलिए अगले दिन के इंतजार में उसे नींद नहीं आई. वह जानता था कि कामिनी रोज कथा सुनने आती है. इसलिए उस ने तय कर लिया था कि अगर अगले दिन कामिनी मिल गई तो कैसे भी वह उस से अपने दिल की बात जरूर कह देगा.

संयोग से अगले दिन कामिनी अकेली ही वहां आई. शायद उसे विश्वास था कि उस के सपनों का राजकुमार मार्तंड अवश्य वहां आएगा और उस से बात करने की कोशिश भी करेगा. उसे बात करने में कोई संकोच न हो, यही सोच कर वह मीना को साथ नहीं लाई थी. जब वह वहां पहुंची तो उसे यह देख कर हैरानी हुई कि मार्तंड वहीं बैठा था, जहां कामिनी एक दिन पहले बैठी थी. शायद वह उसी का इंतजार कर रहा था. मार्तंड की नजरें उस से मिलीं तो दोनों के होठों पर मुसकान तैर उठी. कामिनी आ कर उस से थोड़ी दूरी पर महिलाओं के झुंड में बैठ गई. दोनों बैठे तो भागवत कथा सुनने थे, लेकिन दोनों के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.

आखिर  नहीं रहा गया तो मार्तंड ने कुछ इशरा किया. उस के बाद कामिनी उठ कर चल पड़ी. लोगों की नजरें बचा कर मार्तंड भी उस के पीछेपीछे चल पड़ा. सुरक्षित स्थान पर आ कर जरा भी संकोच किए मार्तंड ने कामिनी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘कामिनी, अब मुझे यह कहने की जरूरत नहीं है कि मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हारे हावभाव से ही मुझे पता चल गया है कि तुम भी मुझे प्यार करती हो, इसलिए चलो एकांत में कहीं बैठ कर बातें करते हैं.’’

गांवों में एकांत कहां होता है, बागों या खेतों के बीच. दोनों गेहूं के खेतों के बीच बैठ कर बातें करने लगे. मार्तंड ने उस एकांत में कामिनी के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘कामिनी, यह जिंदगी हमारी है, इसलिए इस के बारे में सिर्फ हमें ही निर्णय लेने का हक है. तुम मुझ से मिलने के लिए रोज यहीं आना. यहां लोगों की नजर हम पर नहीं पड़ेगी. बोलो, आओगी न?’’

‘‘मैं जरूर आऊंगी मार्तंड. तुम मेरा इंतजार करना.’’ कामिनी ने कहा और अपने घर चली गई.

मनचाहा प्रेमी मिल जाने से कामिनी खुश थी. वह मार्तंड की यादों में खोई रहने लगी. अब उसे हमेशा उस समय का बेसब्री से इंतजार रहता, जब उसे मार्तंड से मिलने जाना होता. मार्तंड उस से जब भी रोमांटिक बातें करता, वह शरमा जाती. वह उस की सुंदरता की तारीफें करते हुए कहता, ‘‘तुम्हारी इसी सुंदरता ने मेरा दिल चुरा लिया है. अब मेरे इस दिल को तुम संभाल कर रखना, इसे कभी तोड़ना मत.’’

कामिनी कहती, ‘‘तुम भी कैसी बातें करते हो, मैं भला तुमरे दिल को क्यों तोड़ूंगी, अब तो वह हमारा हो चुका है.’’

‘‘मैं कितना भाग्यशाली हूं, जो तुम जैसी प्यार करने वाली मिल गई. शायद तुम मेरे भाग्य में लिखी थी.’’

ऐसी ही बातें कर के मार्तंड ने कामिनी को लुभा कर उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. दोनों मन से तो एक थे ही, तन से भी एक हो गए. उत्तर प्रदेश के जिला रायबरेली के थाना शिवगढ़ के निमडवल गांव में रहते थे रामेश्वर प्रसाद. वह खेती कर के अपना गुजरबसर करते थे. उन के परिवार में पत्नी रमा और 2 बेटियां तथा 2 बेटे थे. कामिनी उन के बच्चों में सब से छोटी थी. उन के बाकी बच्चों का विवाह हो चुका था. कामिनी ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसे मार्तंड से प्यार हो गया.

कामिनी ने गांव के ही सरकारी स्कूल से आठवीं तक पढ़ाई की थी. वह खूबसूरत थी, इसलिए जवान होते ही गांव के मनचले लड़के उसे अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करने लगे थे. उन्हीं में मार्तंड भी था. आखिर में उसी ने बाजी मार ली थी. वह प्रभाकर यादव का बेटा था. वह नल वगैरह ठीक करने का काम करता था. गांवों में इस तरह की बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रह पातीं, इसलिए मार्तंड और कामिनी के संबंध भी उजागर हो गए. जब बेटी की करतूत का पता रामेश्वर प्रसाद को चला तो उन्होंने कामिनी की खूब पिटाई की और सख्त हिदायत दी कि अब वह मार्तंड से बिलकुल नहीं मिलेगी. उस के घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी गई.

इस हालत में रामेश्वर जल्द से जल्द कामिनी की शादी के बारे में सोचने लगा. क्योंकि उस की वजह से उन की गांव में बदनामी हो रही थी. रामेश्वर का एक रिश्तेदार हरभजन लखनऊ के थाना नगराम के गांव सेंधूमऊ में रहता था. सेंधूमऊ के बगल में ही एक गांव है बघौली. उसी गांव में ललई प्रसाद अपने परिवार के साथ रहता था. वह भी खेती करता था. उस के परिवार में पत्नी रामकली के अलावा 2 बेटियां और एकलौता बेटा पवन था. उस ने दोनों बेटियों की शादी कर दी थी. बेटे की अभी शादी नहीं हुई थी. वह गोसाईगंज के दयाल इंस्टीट्यूट से बीबीए कर रहा था.

हरभजन पवन से परिचित था. वह जानता था कि पवन बहुत ही नेक और पढ़ालिखा लड़का है. इसलिए उस ने उस से कामिनी से रिश्ते की बात चलाई तो वह बात आगे बढ़ाने को राजी हो गया. उस ने अपने पिता से बात की तो उन की सहमति मिलने के बाद सभी कामिनी को देखने गए. कामिनी के घर वालों को भी पवन और उस का घरपरिवार पसंद था, इसलिए बातचीत के बाद शादी तय हो गई. कामिनी ने पवन के सामने ही विवाह से मना कर दिया था, लेकिन रामेश्वर प्रसाद ने किसी तरह बात संभाल ली थी. 20 मई, 2015 को कामिनी और पवन का विवाह धूमधाम से हो गया. कामिनी को न चाहते हुए भी पवन से विवाह करना पड़ा. जबकि वह मार्तंड से शादी करना चाहती थी.

शादी के बाद भी वह उसे एक पल के लिए नहीं भूल पा रही थी. क्योंकि उस ने उसी के साथ जिंदगी गुजारने का सपना जो देखा था. लेकिन घर वालों ने उस के सपनों को तोड़ दिया था. पग फेरा में कामिनी मायके आई तो मार्तंड से मिली. तब वह उस से गले मिल कर बिलखबिलख कर रोई. मार्तंड की भी आंखें नम हो गईं. कामिनी की हालत देख कर वह बेचैन हो उठा. उस ने कामिनी को ढांढ़स बंधा कर कहा, ‘‘कामिनी हम कभी अलग नहीं होंगे, कोई भी हमें जुदा नहीं कर सकता. हम हमेशा इसी तरह मिलते रहेंगे.’’

इस के बाद मार्तंड ने एक सस्ता सा मोबाइल फोन खरीद कर कामिनी को दे दिया, जिस से उन में बराबर बातें हो सकें. कामिनी जब तक मायके में रही, मार्तंड से बराबर मिलती रही. ससुराल आने पर मिलना तो बंद हो गया, लेकिन मोबाइल से सब की चोरी वह उस से बातें कर लेती थी. 12 अगस्त, 2015 की शाम साढ़े 6 बजे पवन घर लौटा और कपड़े बदल कर आराम करने लगा. रात 8 बजे कामिनी ने उसे सौ रुपए का नोट देते हुए कहा कि उसे कोल्ड ड्रिंक पीनी है, जा कर ला दे. पवन उन्हीं कपड़ों में दहेज में मिली हीरो पैशन प्रो बाइक से कोल्ड ड्रिंक लेने चला गया.

कोल्ड ड्रिंक की दुकान उस के घर से लगभग 3 सौ मीटर की दूरी पर थी. थोड़ी देर बाद पवन का फोन आया कि गांव के बाहर उस की बाइक खड़ी है, किसी से मंगवा लें. वह किसी जरूरी काम से जा रहा है. इस के बाद पवन के पिता वहां गए और गांव के एक लड़के से कह कर बाइक ले आए. सुबह गांव के कुछ बच्चे गांव के बाहर तालाब पर शौच के लिए गए तो उन्होंने वहां झाडि़यों में पवन की लाश पड़ी देखी. बच्चों ने यह बात तुरंत पवन के घर वालों को बताई तो घर वाले रोतेबिलखते वहां पहुंचे. पवन के पिता ललई प्रसाद ने इस घटना की सूचना थाना नगराम पुलिस को दे दी.

सूचना मिलने के थोड़ी देर बाद थाना नगराम के थानाप्रभारी सुधीर कुमार सिंह पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक पवन ने नीले रंग पर सफेद धारी वाली कैपरी और सफेद शर्ट पहन रखी थी. उस के गले और मुंह पर किसी तेज धारदार हथियरा के घाव थे. सुधीर कुमार सिंह घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ राकेश नायक भी आ गए. पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए लखनऊ मैडिकल कालेज भिजवा कर पूछताछ शुरू की. इस के बाद थाने आ कर सुधीर कुमार सिंह ने मृतक के पिता ललई प्रसाद की ओर से अज्ञात के खिलाफ पवन की हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. थानाप्रभारी मामले की जांच के लिए बघौली गांव जाने की तैयारी कर रहे थे कि किसी ने फोन कर के उन्हें बताया कि मृतक पवन की पत्नी कामिनी अपना सामान बांध कर कहीं जाने की तैयारी कर रही है.

यह सुन कर सुधीर कुमार सिंह को हैरानी हुई. जिस औरत के पति की हत्या हुई हो, अभी उस की लाश भी न दफनाई गई हो, इस दुख की घड़ी में ससुराल वालों का साथ देने के बजाय वह घर से जाने की तैयारी कर रही है. उन्हें लगा, कहीं ऐसा तो नहीं कि इस घटना के पीछे उसी का हाथ हो. सीओ राकेश नायक भी थाने में मौजूद थे. कामिनी के बारे में सीओ साहब को बताया तो उन्होंने भी कामिनी पर शक जाहिर किया. फिर क्या था, थानाप्रभारी ललई प्रसाद के घर जा पहुंचे. उन्हें जो सूचना मिली थी, वह सही थी. कामिनी अपना बैग तैयार कर के बैठी थी. शक के आधार पर सुधीर कुमार सिंह ने बैग की तलाशी ली तो उस में से कपड़ों और व्यक्तिगत सामान के अलावा 1 हजार रुपए, एक सिम और एक युवक की फोटो बरामद हुई. उन्होंने बैग में नीचे लगे पैड के अंदर हाथ डाला तो उस में से एक मोबाइल फोन बरामद हुआ.

घर वालों से उस मोबाइल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है. इस के पास जो मोबाइल था, उसे तो पवन ने पहले ही ले लिया था.

सुधीर कुमार सिंह ने जब कामिनी से उस के पास मिले फोटो के बारे में पूछा तो वह काफी देर तक उस फोटो को देखती रही, उस के बाद बोली, ‘‘यह युवक उस के गांव का रहने वाला है.’’

पुलिस कामिनी को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में महिला कांस्टेबल के जरिए उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने कई नाम बताए. उन सभी को पुलिस ने थाने ला कर पूछताछ की तो पता चला कि वे निर्दोष थे. कामिनी ने जो नाम बताए थे, वे उस के पुराने आशिक थे, जिन्हें वह फंसाना चाहती थी. सुधीर कुमार सिंह ने कामिनी का मोबाइल खंगाला तो उस में सिर्फ एक ही नंबर मिला, जिस से उस में लगभग रोज ही फोन आए थे. घटना वाले दिन भी उस नंबर से अंतिम बार रात 11 बजे फोन आया था. जब उस नंबर के बारे में कामिनी से सख्ती से पूछा गया तो उस ने बताया कि उस नंबर से फोन करने वाला और फोटो वाला युवक एक ही है. उस का नाम मार्तंड यादव उर्फ पिंकू है, जो उस के मायके निमडवल में रहता है.

सुधीर कुमार सिंह ने उसी मोबाइल से उस नंबर पर स्पीकर औन कर  के कामिनी से बात करने को कहा. कामिनी ने उस नंबर पर फोन किया तो दूसरी ओर से फोन रिसीव करने वाले ने कहा, ‘‘सब ठीक कर दिया मैं ने, किसी को शक भी नहीं हुआ.’’

‘‘क्या कह…’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि सुधीर कुमार सिंह ने उसे कुछ भी बताने से मना कर दिया.

‘‘मैं ने अपने दोस्तों के साथ सब कुछ बहुत सही ढंग से कर दिया है. अब हम एक साथ रह सकेंगे.’’ दूसरी ओर से कहा गया.

‘‘लेकिन यह सब कर के तुम ने मुझे फंसा दिया. पुलिस मुझ पर शक कर रही है. तुम आ कर मुझे बचाओ. तुम कहां हो?’’ कामिनी इतना ही कह पाई थी कि मार्तंड को शायद शक हो गया. उस ने तुरंत फोन काट दिया. दोबारा फोन किया गया तो फोन बंद हो चुका था. इस के बाद मार्तंड के घर छापा मारा गया, लेकिन वह घर पर नहीं मिला. तब उस के पिता को हिरासत में ले कर थाने लाया गया. लेकिन वह भी मार्तंड के बारे में कुछ नहीं बता सका. उसी दिन यानी 14 अगस्त को एक मुखबिर की सूचना पर दोपहर साढे़ 12 बजे सुधीर कुमार सिंह ने मार्तंड यादव और उस के दोस्त विक्रम यादव को समेसी के पास एक नहर के किनारे से गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ के बाद 15 अगस्त को पुलिस ने मार्तंड के एक अन्य दोस्त सूरजलाल को छतौनी से गिरफ्तार कर लिया. मार्तंड से की गई पूछताछ में पवन की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

मार्तंड द्वारा दिए गए मोबाइल से कामिनी चोरीछिपे उस से बात कर लिया करती थी, लेकिन किसी दिन पवन ने कामिनी को मोबाइल पर बात करते देख लिया. फिर तो उसे समझते देर नहीं लगी कि कामिनी का किसी के साथ चक्कर चल रहा है. उसी ने यह मोबाइल कामिनी को दिया है. पवन ने कामिनी को मारापीटा ही नहीं, उस का मोबाइल भी छीन लिया. कामिनी वैसे ही मार्तंड से दूर हो कर तड़प रही थी. ऐसे में बात करने का जरिया मोबाइल भी छिन गया तो वह गुस्से से भर उठी. आग में घी का काम किया पवन की पिटाई ने. कामिनी ने किसी तरह मार्तंड तक मोबाइल छिन जाने की बात पहुंचा दी.

इसी के साथ यह भी कहा कि अगर वह किसी तरह पवन को ठिकाने लगा दे तो वह हमेशाहमेशा के लिए उस की हो जाएगी. उस के बाद उन्हें मिलने से कोई नहीं रोक पाएगा. मार्तंड तो हर हाल में कामिनी को अपनी बनाना चाहता था. उस ने कामिनी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो, मैं जल्द ही उसे ठिकाने लगा दूंगा.’’

मार्तंड ने अपने 2 दोस्तों, विक्रम और सूरजलाल को दोस्ती का वास्ता दे कर पवन की हत्या में साथ देने को कहा तो वे तैयार हो गए. इस के बाद योजना भी बन गई. अपनी उसी योजना के अनुसार, मार्तंड अपने दोस्तों के साथ 2 मोटरसाइकिलों से कामिनी की ससुराल उस समय पहुंचा, जब पवन घर पर नहीं था. यह बात कामिनी ने मार्तंड को पहले ही बता दी थी. जब तीनों वहां पहुंचे तो कामिनी ने अपनी सास रामकली को बताया कि तीनों उस की सगी मौसी के बेटे हैं. रामकली के हटते ही मार्तंड ने एक मोबाइल फोन कामिनी को दे दिया और पूरी योजना बता दी. इस के बाद वह दोस्तों के साथ चला आया.

13 अगस्त की शाम मार्तंड ने कामिनी को फोन किया कि वह रात 8 बजे तक दोस्तों के साथ उस के गांव के बाहर पहुंच जाएगा. शाम साढ़े 6 बजे तक पवन घर आ जाता था. रात 8 बजे जब मार्तंड गांव के बाहर आ गया तो उस ने कामिनी को फोन कर के पवन को भेजने को कहा. इस के बाद कामिनी ने पवन को कोल्डड्रिंक लाने के बहाने बाहर भेज दिया. पवन मोटरसाइकिल से कोल्डड्रिंक ले कर लौट रहा था तो रास्ते मे दोस्तों के साथ मार्तंड ने उसे हाथ दे कर रोक कर कहा, ‘‘भाई मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई है. जरा देख लीजिए.’’

पवन ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी कर के जेब में पड़ी टौर्च निकाली. उस ने टौर्च जलाई तो मार्तंड के चेहरे पर पड़ी. उस का चेहरा देख कर पवन ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें पहचानता हूं, तुम तो मेरी ससुराल के हो, यहां कैसे, कामिनी से मिलने आए थे क्या?’’

‘‘नहीं, यहीं पास में मेरी एक रिश्तेदारी है, वहीं आया था. लेकिन यहां पहुंचते ही मेरी मोटरसाइकिल खराब हो गई.’’

इस के बाद उन में बातें होने लगीं. उसी बीच मार्तंड ने शौच जाने की बात कही तो पवन उसे तालाब की तरफ टौर्च की रोशनी में ले जाने लगा. इस के पहले उस ने फोन कर के अपनी मोटरसाइकिल मंगवा लेने के लिए घर वालों को कह दिया था. मार्तंड पवन से बातें करते हुए तालाब की ओर जा रहा था, तभी पीछेपीछे चल रहे विक्रम ने कपड़ों में छिपा हंसिया निकाल कर पवन की गरदन पर पूरी ताकत से प्रहार कर दिया. अचानक हुए इस हमले से पवन लड़खड़ा कर गिर पड़ा. वह संभल पाता, उस के पहले ही मार्तंड ने विक्रम से हंसिया ले कर पवन पर ताबड़तोड़ कई वार कर दिए.

पवन तड़पने लगा. और फिर बिना चीखेचिल्लाए मौत के मुंह में समा गया. इस के बाद तीनों उसे घसीट कर झाडि़यों में ले गए. वहां उस की जेब से दोनों मोबाइल निकाल कर तालाब में फेंक दिए. हत्या में प्रयुक्त हंसिया भी वहीं झाडि़यों में फेंक दिया. इस के बाद वे मोटरसाइकिल से चले गए. उन्होंने सोचा था कि वे पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पकड़ ही लिया. सुधीर कुमार सिंह ने उन की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त हंसिया, तीनों मोबाइल, दोनों मोटरसाइकिलें बरामद कर ली थीं. इस के बाद पुलिस ने मुकदमे में धारा 120बी तथा 34 के अलावा एससी/एसटी की धारा 3(2)5 भी बढ़ा दी थी.

पुलिस ने पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi crime story: नीली फिल्मों का बूढ़ा नायक

Hindi crime story: अय्याश कुंदन कुमार को कमउम्र की लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का शौक तो लग ही गया था, दुर्भाग्य से उसे उन के साथ अपने संबंधों की फिल्म बना कर देखने का भी चस्का लग गया था. उस के इसी शौक ने उसे उस की असली जगह तक पहुंचा दिया. पहाड़ों की रानी कहलाने वाले पर्यटनस्थल शिमला के रहने वाले थे सेठ दसौंधामल. मूलरूप से जिला कांगड़ा के गांव काशनी के रहने वाले दसौंधामल ने बरसों पहले शिमला में हार्डवेयर का व्यापार शुरू किया था. उन का यह धंधा इतना बढि़या चला कि उन्होंने शिमला में अपार ख्याति और संपत्ति अर्जित की.

दसौंधामल के परिवार में पत्नी कंचनबाला के अलावा एक बेटा और 6 बेटियां थीं. बेटियों को पढ़ालिखा कर उच्च घरानों में उन की शादियां कर दी गईं, जिन में से 3 तो आज विदेशों में रह रही हैं. 6 बेटियों के बाद एकलौता बेटा था कुंदन कुमार. पढ़लिख कर वह इंडियन एयरफोर्स में पायलट औफिसर बन गया था. साल भर बाद ही मैडिकल ग्राउंड पर नौकरी छोड़ दी और अपने पुश्तैनी धंधे में पिता का हाथ बंटाने के साथसाथ शिमला स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीए करने लगा. दौरान दिल्ली निवासी मधुपलाल की उच्चशिक्षित बेटी मालारानी से कुंदन कुमार की शादी हो गई, जिस से उसे 3 बेटियां और एक बेटा हुआ.

कहते हैं, जब तक दसौंधामल जिंदा थे, तब तक तो उस पर अंकुश रहा. पिता के मरते ही उस के पंख निकल आए. पैसों का लेनदेन और पूरा कारोबार अब उस के हाथों में था. उस के पास इतना पैसा था कि दोनों हाथों से लुटाता तो भी खत्म होने वाला नहीं था. जमेजमाए कारोबार के अलावा दसौंधामल इतनी प्रौपर्टी छोड़ गए थे कि उस का किराया ही हर महीने लाखों में आता था. इस सब के अलावा कुंदन कुमार की पत्नी मालारानी ऊंचे ओहदे पर सरकारी नौकरी में थीं. उन्हें भी वेतन में मोटी रकम मिलती थी. इसलिए पैसों के लिए उन्हें कभी पति की ओर देखने की जरूरत नहीं थी. 4 बच्चे होने के बाद वह उन का भविष्य संवारने में व्यस्त हो गई थीं.

पिता का अंकुश हटते ही कुंदन क्लबों की रंगीनियों में खोया रहने लगा था. इस के बाद उस की अय्याशी के तार देहधंधा करने वाली औरतों से जुड़ गए. इसी के साथा उस ने कमउम्र की लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाने का शौक पाल लिया. बढ़ती उम्र में यौन क्षमता बढ़ाने के लिए वह दवाओं का सहारा ले रहा था. कामवासना से कभी उस का जी नहीं भरता था, इसलिए बिजनैस को नौकरों के सहारे छोड़ कर वह सिर्फ लड़कियां पटाने के तरीके सोचा करता था. धंधेबाज औरतों से मौजमस्ती से जी भर गया तो नौकरी का लालच दे कर कुंदन ने न जाने कितनी लड़कियों को बरबाद किया.

ऐसे में उसे न जाने क्या सूझी कि 4 लड़कियों के साथ के शारीरिक संबंध की उस ने फिल्में बना लीं. इन में एक लड़की अनु थी, जिस के साथ बनाई गई ब्लूफिल्म ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस समय यह मामला अखबारों में खूब उछला था. शहर का हर अखबार इस मामले से जुड़ी खबरों से भरे होते थे. उन दिनों शिमला के एडीशनल एसपी थे कुंवर वीरेंद्र सिंह. कुंदन के इस मामले की विवेचना का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था. यह मामला पुलिस से पहले मीडिया के पास पहुंच गया था. स्थानीय अखबारों में एक समाचार जोरोंशोरों से छप रहा था कि शिमला के बाजारों में एक अश्लील सीडी धड़ल्ले से बिक रही है, जिस में शहर के एक प्रतिष्ठित घराने के बूढ़े को एक नवयौवना से यौनाचार करते दिखाया गया है.

समाचारों में नीचे यह भी लिखा होता था कि वह बूढ़ा काफी प्रभावशाली है, इसलिए पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. पुलिस के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. बिना शिकायत के पुलिस किसी के खिलाफ क्या और कैसे काररवाई कर सकती थी. फिर भी सीआईडी के तत्कालीन आईजी आई.डी. भंडारी ने उन खबरों को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहराई में जाने की जिम्मेदारी सीआईडी स्पैशल ब्रांच के इंसपेक्टर कुशल कुमार को सौंप दी. कुशल कुमार ने अखबार वालों से संपर्क कर खूब दौड़भाग की. मामले की गहराई में जाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया. जांच के लिए वह सीडी जरूरी थी. बाजार में सीडी होने की चर्चा तो खूब थी, लेकिन वह सीडी कुशल कुमार के हाथ नहीं लगी. 3 दिन इसी तरह निकल गए.

चौथे दिन संयोग से किसी अनजान आदमी ने उन्हें फोन कर के बताया, ‘‘सर, आप जिस सीडी के लिए दिनरात परेशान हो रहे हैं, उस की एक कौपी रिज के पास टका बैंच पर रखी है. आप उसे देख कर छानबीन करें तो सारी असलियत सामने आ जाएगी. आप से आग्रह है कि मेरे बारे में पता लगाने की कोशिश मत कीजिएगा.’’

अंधा क्या चाहे, 2 आंखें. कुशल कुमार तुरंत रिज मैदान पहुंच गए. टका बैंच पर उन्हें दीवार के पास कागज का पुराना सा लिफाफा दिखाई दिया. उठा कर देखा तो उस में सीडी थी. अपने औफिस आ कर कंप्यूटर पर उन्होंने उस सीडी को चलाया. सीडी में 15 मिनट की अश्लील फिल्म थी, जिस में एक बूढ़ा एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था. सीडी देखने के बाद कुशल कुमार उसे ले कर आईजी श्री भंडारी के पास गए. सीडी देख कर उन्होंने शिमला के पुलिस अधीक्षक जोगराज ठाकुर को एफआईआर दर्ज कर के तत्काल काररवाई करने के आदेश दे दिए.

जोगराज ठाकुर ने कुशल कुमार की ओर से एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति कर के मामले की फाइल थाना सदर भेज दी. इसी के साथ एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह को इस मामले की विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी. थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बृजेश सूद ने भादंसं की धारा 292 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गोबिंदराम को सौंप दी थी. गोबिंदराम ने सब से पहले शहर के कुछ गणमान्य लोगों को बुला कर उन के सामने उस सीडी को चला कर दिखाया. इस का उद्देश्य ब्लूफिल्म के नायक की पहचान करना था. आखिर उस आदमी की पहचान हो गई. वह कोई और नहीं, कुंदन कुमार था.

उन लोगों ने बताया कि इस की गिनती शहर के प्रमुख कारोबारियों में होती है. इस की पत्नी सरकारी अधिकारी है और इस के बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका में पढ़ रहे हैं. सीडी की अश्लील फिल्म के नायक की पहचान हो जाने के बाद पुलिस टीम ने कुंदन कुमार के भव्य निवास पर छापा मारा. उस समय घर पर नौकर मोतीलाल के अलावा और कोई नहीं था. पुलिस ने उसे थाने ला कर गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में मोतीलाल ने बताया कि उस का मालिक शराब और शबाब का शौकीन है. पैसे की उसे कोई कमी नहीं है. शिमला में प्रौपर्टी से ही उसे लाखों रुपए महीने किराया आता है. उस की उम्र काफी हो गई है, लेकिन बिना मेहनत के आने वाले पैसों की वजह से इस उम्र में भी उस की आदतें खराब हैं.

मोतीलाल को जब सीडी की फिल्म दिखाई गई तो उस ने उस फिल्म के बूढ़े नायक की पहचान अपने मालिक कुंदन कुमार के रूप में कर दी. लड़की के बारे में उस ने कहा, ‘‘अरे यह तो अनु है. यह साहब के औफिस में नौकरी करती थी.’’

‘‘इस समय यह कहां है?’’ मोतीलाल से पूछा गया.

‘‘अब कहां है, यह मुझे पता नहीं. क्योंकि इस ने साहब के यहां से नौकरी छोड़ दी है.’’ मोतीलाल ने कहा.

इस के बाद मोतीलाल को यह संदेश दे कर छोड़ दिया गया कि वह अपने साहब से कह देगा कि वह खुद थाने आ कर पुलिस जांच में शामिल हो जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा, वरना उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इस का असर यह हुआ कि पुलिस का संदेश मिलते ही कुंदन कुमार अपने वकील के साथ थाना सदर आ पहुंचा. पुलिस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखाते हुए उस के बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उस ने कहा, ‘‘अनु मेरे औफिस में नौकरी करती थी. अपनी खूबसूरती के जाल में फंसा कर वह मुझ से पैसे ऐंठती थी. उस के फरेब में आ कर मैं उस के हुस्न के जाल में फंस गया था. जब भी मौका मिलता था, हम संबंध बना लेते थे.

कभीकभी औफिस में भी यह सब हो जाता था. एक दिन मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं ने वैब कैमरे से यह फिल्म बना ली.’’

‘‘फिल्म की सीडी मार्केट में कैसे आई?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में कुंदन ने कहा, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरा कंप्यूटर खराब हो गया था. मिडिल बाजार में मुकेश की कंप्यूटर रिपेयर की दुकान है. अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मैं ने उसे अपने घर बुलवाया. लेकिन घर में कंप्यूटर ठीक नहीं हुआ तो वह सीपीयू अपने साथ ले गया.’’

इतना कह कर कुंदन ने पानी मांगा. 2 गिलास पानी पीने के बाद उस ने आगे कहा, ‘‘अगले दिन मैं मुकेश की दुकान पर गया तो उस ने कहा कि हार्डडिस्क क्रैश हो गई है, इसलिए बदलनी पड़ेगी. मेरे कहने पर उस ने हार्डडिस्क बदल दी. पुरानी हार्डडिस्क उस के पास ही रह गई. मुझे लगता है कि पुरानी हार्डडिस्क को नई में लोड करते समय उस ने मेरी इस फिल्म को देख लिया. उस के बाद पैसा कमाने के लिए उस की सीडी बना कर बाजार में पहुंचा दिया.’’

बृजेश सूद ने कुंदन को अपनी बातों में उलझा लिया और गोबिंदराम 2 सिपाहियों को साथ ले कर कुंदन कुमार की पुरानी हार्डडिस्क बरामद करने मुकेश की दुकान पर जा पहुंचे. कुछ देर बाद आ कर उन्होंने बताया कि दुकान बंद है. लेकिन उन्होंने दुकान सील कर के अपने दोनों सिपाही वहां बैठा दिए हैं. इस के बाद एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह के आदेश पर पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस और घर को सील कर दिया. अगले दिन 2 पार्षदों की उपस्थिति में मुकेश की दुकान खुलवाई गई. कुंदन कुमार भी पुलिस के साथ वहां मौजूद था. उस से दुकान में मिली हार्डडिस्कों से अपनी हार्डडिस्क पहचानने को कहा गया. उस ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘मेरी हार्डडिस्क दुकान में नहीं है.’’

मुकेश भी वहां मौजूद था. जब उस से कहा गया तो उस ने दुकान से 3 हार्डडिस्कें निकाल कर पुलिस के हवाले करते हुए कहा कि ये तीनों हार्डडिस्कें कुंदन कुमार की हैं. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि इन सब में क्या था. उस ने इन के अंदर ताकझांक करने की कोई कोशिश नहीं की थी. पुलिस ने तीनों हार्डडिस्कें कब्जे में ले कर मुकेश की दुकान की गहन तलाशी ली. दुकान में कोई भी आपत्तिजनक चीज नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस की तलाशी ली, जहां पुलिस को पुरानी हार्डडिस्कें तो मिली हीं, 87 सीडीज और 25 फ्लौपीज भी मिलीं. जब उन सब को देखा गया तो उन सभी में अश्लील फिल्में थीं. यही नहीं, 4 ब्लूफिल्मों का हीरो खुद कुंदन कुमार था.

अनु के अलावा 3 अन्य लड़कियों के साथ भी उस ने अश्लील फिल्में बना रखी थीं. जिन फिल्मों में कुंदन कुमार खुद हीरो था, उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें औफिस में ही बनाया गया था. इसलिए फिल्म में दिखाई देने वाला सामान यानी चादर, कुशन, गिलाफ, तकिए और गिलासों के अलावा लकड़ी का वह छोटा सा दीवान भी कब्जे में ले लिया गया, जिस पर शारीरिक संबंध बनाया गया था. इसी के साथ कुंदन कुमार की निशानदेही पर उस के घर से वे कपड़े भी बरामद कर लिए गए थे, जिन्हें उस ने शारीरिक संबंध बनाने से पहले पहन रखे थे. बाद में तो उस ने कपड़े उतार दिए थे. कुंदन चूंकि गंजा था, जवान लड़की को शायद यह बात खल जाती, इसलिए पूरे कपड़े उतारने के बाद भी उस ने सिर पर आकर्षक कैप पहन रखी थी. वह कैप भी पुलिस ने जब्त कर ली थी.

सारी चीजों को कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार को थाने ला कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने यह तो खुलासा कर दिया कि वह शराब और शबाब का शौकीन था, खासकर कमउम्र की लड़कियों के साथ उसे बहुत मजा आता था. इसी के साथ उस की एक कमजोरी भी सामने आई कि अकसर वह कमउम्र लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय वैब कैमरे से उन की फिल्में बना लिया करता था. इस के लिए उस ने अपने औफिस के निजी कमरे में एक वैबकैम लगवा रखा था. बाद में वह अपनी उन फिल्मों को देख कर रोमांचित होता था.

कुंदन कुमार ने अपनी सारी कमजोरियों को बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, लेकिन किसी भी लड़की के बारे में उस ने कुछ नहीं बताया था. शायद बताना नहीं चाहता था. उस ने पुलिस से कहा, ‘‘ये पेशेवर लड़कियां थीं, जो पैसे के लिए मेरे पास आती थीं. खायापिया, मुझे खुश करने का पैसा लिया और चलती बनीं.’’

‘‘लेकिन अनु तो तुम्हारे यहां नौकरी करती थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मैं ने उसे नौकरी पर रखा था, लेकिन वह भी अन्य लड़कियों की तरह पैसे ऐंठने के लिए खुशीखुशी मेरे साथ संबंध बनाने को राजी हो गई थी.’’ कुंदन कुमार ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, फिलहाल यह बताओ कि अनु जब नौकरी करने आई थी तो उस का बायोडाटा तो तुम ने लिया ही होगा?’’ पुलिस ने थोड़ा सख्त लहजे में पूछा.

कुंदन कुमार ने घबरा कर कहा, ‘‘जी हां, लिया था.’’

इस के बाद पुलिस कुंदन कुमार को उस के औफिस ले गई और अनु का बायोडाटा बरामद कर लिया. उस पर उस का फोटो लगा था. फोटो में वह वाकई निहायत खूबसूरत लग रही थी. वह कस्बा रहेड़ू की रहने वाली थी. बायोडाटा से उस का पता ही नहीं, फोन नंबर भी मिल गया था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो फोन अनु के पिता ने रिसीव किया. उन्होंने बताया कि अनु पिछले कई दिनों से कहीं गई हुई है. कहां गई है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाए. पुलिस ने अनु की तलाश में अपना पूरा जाल बिछा दिया. इसी के साथ उस के घर वालों के अलावा कुंदन कुमार पर पुलिसिया शिकंजा कसा गया तो 2 दिनों में सोलन जिले के कनलख कस्बा के एक घर में अनु मिल गई. पिछले कुछ दिनों से वह वहां छिप कर रह रही थी.

शिमला ला कर पुलिस ने अनु से पूछताछ की तो अनु ने बताया कि एक भाई और 3 बहनों में वह सब से बड़ी थी. 12वीं पास करने के बाद वह पुलिस में भरती हो गई. लेकिन वहां दिल नहीं लगा तो जल्दी ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी. इस के बाद वह किसी औफिस में नौकरी तलाश करने लगी. इस के लिए उस ने कंप्यूटर कोर्स भी कर लिया था. एक दिन उसे उस की एक सहेली ने कुंदन कुमार के बारे में बता कर कहा कि उसे औफिस में काम करने के लिए एक लड़की की जरूरत है. कुंदन कुमार के औफिस जा कर अनु उस से मिली तो उस ने उस का बायोडाटा और फोटो लेने के अलावा उस का इंटरव्यू भी लिया. इस के बाद उस से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आ कर मिले. हफ्ते भर बाद अनु गई तो उसे अगले हफ्ते आने को कहा.

महीना भर इसी तरह टरकाने के बाद एक दिन कुंदन कुमार ने कहा, ‘‘ऐसा है बेटा, तुम्हारी परफौरमेंस तो अच्छी नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ अनु ने चहकते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे यह नौकरी दे दी न सर तो देखिएगा, आप को मेरी तरफ से शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. मुझे नौकरी की जरूरत तो है ही, इस के अलावा मैं अपनी मेहनत से जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं.’’

कुंदन कुमार उठे और अनु की पीठ थपथपा कर बोले, ‘‘मैं तुम्हारी भावना से बहुत खुश हूं बेटी. लेकिन पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अभी मैं तुम्हें रैग्युलर नौकरी पर न रख कर ट्रेनी के रूप में रखूंगा. 3 महीने तुम्हें औफिस के कामों की, कंप्यूटर की, सेल्स टैक्स व इनकम टैक्स संबंधी रिटर्न भरने और चुस्तदुरुस्त बनी रहने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इस बीच तुम्हें 12 सौ रुपए महीने मिलेंगे. इस बीच तुम ने बढि़या काम किया तो तुम्हारी नौकरी रैग्युलर कर के तुम्हें 5 हजार रुपए महीने तनख्वाह दी जाएगी. हर साल 5 सौ रुपए का इन्क्रीमेंट के अलावा हर साल दीवाली पर 1 महीने की तनख्वाह बोनस में मिला करेगी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है सर.’’

‘‘नहीं, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई. पहले पूरी बात सुन लो.’’

‘‘देखो, तुम्हारा जो ट्रेनिंग पीरियड है, अगर यह संतोषजनक नहीं रहा तो तुम्हें नौकरी से हटा दिया जाएगा या फिर 3 महीने के लिए तुम्हारा ट्रेनिंग पीरियड और बढ़ा दिया जाएगा. अब फैसला तुम्हें करना है.’’

अनु कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘ठीक है सर, मुझे मंजूर है.’’

इस के बाद अनु मालरोड स्थित कुंदन कुमार के औफिस में नियमित ड्यूटी पर जाने लगी. औफिस में जहां कुंदन कुमार बैठता था, वहीं बगल में कंप्यूटर टेबल रखी थी. उसी पर अनु को बैठना था. वहीं बगल में दीवार से सटा कर छोटा सा दीवान रखा था, जिस पर लेट कर कुंदन कुमार आराम किया करता था. औफिस में कोई खास काम तो था नहीं, लिहाजा कुंदन कुमार बैठा अनु से गप्पें हांकता रहता था. कभीकभी उसे औफिस के कामों के बारे में समझाने बैठ जाता. वह जब भी बैंक में पैसा जमा करने अथवा निकलवाने के लिए जाता, अनु को भी साथ ले जाता. रुपए भी वह उसी से गिनवाता.

औफिस में छोटा सा किचन था. उस में रखे फ्रिज में कई तरह के जूस मौजूद रहते थे. चाय बनाने की भी व्यवस्था थी. कुंदन का जब भी मन होता, अनु से चाय बनवा कर अथवा फ्रिज से जूस मंगवा कर पीता. उस ने अनु से भी कह रखा था कि जब भी उस का मन हो, वह चाय या जूस पी लिया करे. इसी तरह 2 महीने बीत गए. एक दिन कुंदन कुमार बाहर से आया. उस समय अनु कंप्यूटर पर गेम खेल रही थी. कुंदन ने आते ही उस के गाल को गर्मजोशी से चूम कर कहा, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं अनु.’’

अनु ने उस की बात पर ध्यान न देते हुए कुंदन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से यह उम्मीद नहीं थी सर. आप ने मुझे किस कर के बहुत गलत किया. आप को ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

कुंदन कुमार ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा गाल चूम लिया तो कौन सा गजब कर दिया. मुझे एक खुशखबरी मिली थी. इसी वजह से खुश हो कर मैं ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह किस कर लिया. इस का तुम्हें बुरा लगा तो आगे से मैं ध्यान रखूंगा.’’

अनु के बताए अनुसार, यह बात आईगई हो गई. उसे भी लगा कि शायद कुंदन अपनी जगह ठीक था. वैसे भी उम्र में वह उस के पिता से भी कहीं ज्यादा का था. इसलिए अनु ने उस की ओर से अपना मन साफ कर लिया. मगर इस के लगभग 10 दिनों बाद कुंदन ने अचानक अनु को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया. इस बार अनु ने पहले से भी कहीं ज्यादा सख्त लहजे में ऐतराज जताया. यहां तक कि नौकरी छोड़ देने की धमकी भी दी. कुंदन ने इस बार भी उसे यह कह कर मना लिया कि उस की शक्ल हूबहू उस की बेटी जैसी है. जिस तरह ज्यादा खुश होने पर वह अपनी बेटी को बांहों में ले कर प्यार करता था, उसी तरह उस से भी कर बैठा.

इसी के साथ कुंदन कुमार ने कान पकड़ कर अनु से माफी भी मांगी. हालांकि जिस तरह कुंदन कुमार ने अनु को अपनी बांहों में भर कर भींचा था, हर तरह से ऐतराज वाली बात थी. इस के बाद भी कुंदन की बात पर भरोसा कर के अनु ने इस बार भी उस की गलती माफ कर दी थी. कुछ दिनों बाद तो हद ही हो गई. कुंदन कुमार अनु को ले कर बैंक गया था. वहां से कोई फाइल लेने का बहाना कर के उसे अपने घर ले गया. उस समय घर में कोई नहीं था. ताला खोलने के बाद कुंदन कुमार ने उसे ले जा कर एक ऐसे कमरे में बैठा दिया, जहां कंप्यूटर लगा था. उस पर सीडी लगा कर वह बोला, ‘‘मैं अभी आया, तब तक तुम यह फिल्म देखो.’’

इस के बाद वह कमरे से चला गया. अनु ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें जमा दीं. कुछ देर में फिल्म चलने लगी. कंप्यूटर स्क्रीन पर जो दृश्य उभरे, उन्होंने अनु के होश उड़ा दिए. वह एक ब्लूफिल्म थी. फिल्म के अश्लील दृश्यों को देख कर अनु घबरा गई, उस का हलक सूख गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह दरवाजा खोल कर भागी. इस के बाद अनु ने कुंदन कुमार के यहां नौकरी पर जाना बंद कर दिया. वह अपनी तनख्वाह भी लेने नहीं गई. कुंदन कुमार ने भी उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. इसी तरह करीब 2, ढाई महीने बीत गए. इस बीच अनु कहीं और नौकरी तलाश करती रही, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

संयोग से एक दिन लोअर बाजार में कुंदन कुमार से अनु की मुलाकात हो गई. कुंदन कुमार उस की बांह पकड़ कर एक किनारे ले गया और वात्सल्य भरे लहजे में उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘मुझे गलत न समझ बेटी, उस दिन मैं ने तुम्हारे लिए अपनी ओर से वह हिंदी फिल्म लगाई थी, जो उस सुबह ही मैं ने देखी थी. मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि उस सीडी में ब्लूफिल्म है. मेरा यकीन करो बेटी, इस में मेरा जरा भी कुसूर नहीं है.’’

‘‘कुसूर नहीं है तो इस तरह की गंदी फिल्म घर पर ला कर रखी ही क्यों?’’ अनु ने तल्खी से कहा, ‘‘ऐसी फिल्में देखने के बाद, वह भी इस उम्र में, आप क्या समझते हैं कि आप अच्छे कैरेक्टर के मालिक होंगे, कतई नहीं.’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं बेटी. दरअसल हम जैसे हाईसोसायटी वालों के घरों में यह सब आम बात है. हमारे यहां बच्चे, औरतें सब इस तरह की फिल्में देख कर मनोरंजन करते हैं. तुम मिडिल क्लास की हो, इसलिए तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है. उस दिन गलती से ब्लूफिल्म लग गई थी तो कंप्यूटर बंद कर देती या आवाज दे कर मुझे बुला लेती. तुम तो सिर पर पांव रख कर ऐसे भागी, जैसे कोई बम फट गया हो.’’

अनु कुंदन कुमार को बीचबीच में टोकने का प्रयास करती रही, लेकिन कुंदन उसे नजरअंदाज कर के अपनी बात कहता रहा. अंत में उस ने कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी बेटी भी नहीं कहूंगा. जब तुम्हें मेरे दिमाग में, मेरे काम में और मेरी हर हरकत में गंदगी ही दिखाई दे रही है तो फिर इस रिश्ते को बदनाम क्यों किया जाए. बस मेरी एक बात ध्यान से सुन लो अनु कि मैं आज भी तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही मानता हूं.

‘‘मैं ने जानबूझ कर कोई गलती नहीं की. बेकसूर होते हुए भी मैं तुम्हारी नफरत का शिकार हो गया. अब इस की सजा मैं अपने आप को यह देना चाहता हूं कि तुम्हारे ट्रेनिंग पीरियड का वेतन 2 हजार रुपए महीने कर दूंगा. 3 महीने के बाद नौकरी रैग्युलर कर के तनख्वाह 8 हजार रुपए महीने और हर साल बोनस भी इतना ही दूंगा. ठीक लगे तो कल से औफिस आना शुरू कर दो. तुम्हारी सीट आज भी खाली है.’’

अपनी बात पूरी कर के कुंदन कुमार क्षण भर के लिए भी वहां नहीं रुका. तेज कदमों से चलता हुआ वह पलभर में अनु की नजरों से ओझल हो गया. अनु उस के झांसे में आ कर अगले दिन से उस के औफिस में काम करने लगी. कुछ दिन तो ठीकठाक बीते. एक दिन दोपहर को कुंदन कुमार ने फ्रिज से फ्रूटजूस के 2 टेट्रापैक निकाल कर एक उसे पीने को दिया और एक खुद पीने लगा. जूस पीते ही अनु पर नशा सा छाने लगा. जल्दी ही वह अर्धबेहोशी की हालत में पहुंच गई. कुंदन कुमार ने उसे उठा कर दीवान पर लिटा दिया. इस के बाद कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाने लगा.

अनु के साथ कुछ हो रहा है, इस बात की जानकारी तो उसे थी, लेकिन वह विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. शाम 6 बजे वह होश में लौटी तो उसे उस सब का कुछकुछ याद आने लगा. उस ने इस बारे में कुंदन कुमार से पूछा तो उस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखा दी. साथ ही धमकी दी कि इस सब के बारे में किसी को कुछ बताया तो वह उस की ब्लूफिल्म की सीडी बाजार में उतार देगा.  इस से अनु बुरी तरह डर गई. इस के बाद जब भी कुंदन कुमार का मन होता, उस से अपने मन की कर लेता. इस के एवज में वह उस की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखने लगा. वह सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस बारे में कुंदन कुमार और अनु ने कुछ भी मालूम होने से मना कर दिया. जैसे ही यह सब अखबारों में छपना शुरू हुआ, उस ने काफी पैसे दे कर अनु को छिपा दिया था.

अनु से पूछताछ के बाद कुंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उस हवालात में बंद कर दिया गया. इस के बाद वह पुलिस को धमकियां देने लगा कि वह सभी पुलिस वालों को देख लेगा. लेकिन पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे. इस पर भी वह खुद को बेकसूर बता रहा था, साथ ही कह रहा था कि उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. उस ने थाने की मैस का खाना खाने से इनकार कर दिया था. कह रहा था कि उस का खाना किसी बढि़या होटल से मंगवाया जाए. एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जब तक वह यहां है, उसे यहीं का खाना मिलेगा. जैसेतैसे उस ने थोड़ा सा खाना खा लिया तो आधी रात में दिल का दौरा पड़ने का शोर मचाने लगा. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायिक दंडाधिकारी के सम्मुख पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. रिमांड अवधि में भी वह कभी सीने में दर्द का तो कभी किसी और तरह की परेशानी का ढोंग कर के पुलिस वालों को अस्पतालों के चक्कर लगवाता रहा. आखिर उस की सारी नौटंकियां फ्लौप साबित हुईं. जैसेतैसे पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त हुई और पुलिस ने उसे फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से उसे सजा सुनाए जाने तक जमानत नहीं मिली.

चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस केस की सुनवाई 2 सालों तक चली. इस मामले में उसे 10 सालों की कैद की सजा हुई. सजा सुनाए जाने के समय विद्वान जज महोदय ने टिप्पणी करते हुए उसे लताड़ा था कि जिस लड़की से दुष्कर्म के आरोप में उसे यह सजा दी जा रही है, वह उस की बेटी से भी कम उम्र की थी. ऐसे में उस के इस घिनौने अपराध के प्रति देश की कोई भी अदालत नरम रवैया अपनाने के बारे में शायद ही सोच सके. खैर, पुलिस ने तो कुंदन को उस के अपराध की सजा दिला दी, लेकिन वह अश्लील सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस रहस्य की तह तक अंत तक नहीं पहुंच सकी और न ही उन 3 अन्य लड़कियों का पता लगा सकी, जिन के साथ कुंदन कुमार की अश्लील फिल्मों की कई सीडी बरामद हुई थीं.

इस मामले से मिडिल क्लास की उन बेरोजगार लड़कियों को सावधान हो जाना चाहिए, जिन्हें नौकरी देने के नाम पर नोचने के लिए इस तरह के कामुक भेडि़ए घात लगाए बैठे रहते हैं. Hindi crime story

—कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

Suspense Story: शराब के नशे में शबाब की चाहत

Suspense Story: जय सिंह की नीयत के बारे में जान कर अमरजीत और मीना का खून खौल उठा. इस के बाद जहां जय सिंह अपनी जिद पूरी करने पर अड़ गया वहीं दोनों बहनें भी पीछे नहीं हटीं और…  पि  छले 2 दिनों से हो रही बारिश के थमने के बाद अमेंद्र सिंह 2 मजदूरों को अपने ट्रैक्टर पर बैठा कर खेतों की ओर चल पड़े थे. उन के पास 20 बीघा जमीन थी, जिस में उन्हें गवार की बोआई करनी थी. जैसे ही वह खेतों पर पहुंचे, उन्हें किसी जीव के सड़ने की दुर्गंध महसूस हुई.

अमेंद्र ने इधरउधर नजरें घुमा कर यह जानने की कोशिश की कि यह बदबू आखिर आ कहां से रही है. तभी उन्हें खेतों के नीचे वाले हिस्से में 5-7 कुत्तों का झुंड दिखाई दिया. कुत्ते जमीन के अंदर से कुछ खींच रहे थे. उन्हें लगा कि कोई जानवर मरा पड़ा है, जिसे कुत्ते खा रहे हैं.

उन्होंने गांव के कोटवाल भजनलाल को बुलाने के लिए अपने एक मजदूर को भेज दिया. गांवों में आज भी मृत जानवरों को दफनाने का काम कोटवाल करते हैं. भजनलाल आया तो उस ने हड़बड़ा कर कहा, ‘‘भैयाजी, यह जानवर की नहीं, किसी आदमी की लाश है.’’

आदमी की लाश होने की बात सुन कर खेतों में बुआई कर रहे अमेंद्र चौंके. वह भाग कर लाश के पास पहुंचे. वहां गड्ढा खोद कर दफनाई गई आदमी की लाश को कुत्तों ने पंजों से खोदखोद कर बाहर निकाल लिया था. लाश बाहर आ गई थी, इसलिए बदबू फैल रही थी. मजदूरों को लाश के पास छोड़ कर अमेंद्र सिंह कोटवाल भजनलाल को साथ ले कर तुरंत हनुमानगढ़ जंक्शन के थाना सदर पहुंचे. थानाप्रभारी राजेश कुमार सिहाग से मिल कर उन्होंने खेत के पास लाश पड़ी होने की बात बताई तो थानाप्रभारी ने इस बात की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दे कर खुद सहयोगियों के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

राजेश कुमार सिहाग ने घटनास्थल पर पहुंच कर देखा कि खेतों के नीचे वाले हिस्से में एक लाश पड़ी है. उस के शरीर की चमड़ी गायब थी. दोनों पैरों की हड्डियां दिखाई दे रही थीं. देखने से ही लग रहा था कि लाश 8-10 दिन पुरानी थी. थानाप्रभारी लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रहे थे कि सीओ अतर सिंह भी घटनास्थल पर आ पहुंचे. अब तक वहां काफी भीड़ लग गई थी. पूछने पर भीड़ ने बताया कि मृतक यहां का नहीं लगता. इस से पुलिस को लगा कि हत्या कहीं और कर के सबूत मिटाने के लिए लाश को यहां ला कर गाड़ दिया गया है.

अतर सिंह के निर्देश पर डौग स्क्वायड को लाया गया, लेकिन इस से भी पुलिस को कोई लाभ नहीं मिला. इस के बाद घटनास्थल की काररवाई निपटा कर पुलिस ने थाने आ कर अमेंद्र की तहरीर पर अज्ञात की हत्या का मुकदमा अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कर लिया. सीओ ने इस मामले की जांच सबइंसपेक्टर राजेश कुमार सिहाग को सौंप दी. मृतक की पहचान के बिना हत्यारे तक पहुंचना बहुत मुश्किल था. लेकिन राजेश कुमार सिहाग का मानना था कि मृतक भले ही यहां का रहने वाला नहीं है, लेकिन हत्यारे यहीं कहीं आसपास के होंगे. मृतक या हत्यारे तक पहुंचना चुनौती था, लेकिन राजेश कुमार ने इस चुनौती को स्वीकार कर आगे की जांच शुरू कर दी.

घटनास्थल पर लाश के अलावा ऐसा कोई सबूत नहीं मिला था, जिस से कुछ मदद मिल सकती. अधिकतर हत्या जैसे मामलों में जरजोरू या जमीन का विवाद सामने आता है. इसी के साथ अधिकतर यह भी देखा गया है कि अपराधी कितना ही शातिर क्यों न रहा हो, वारदात की जगह पर अनजाने में ही सही, कोई न कोई सबूत अवश्य छोड़ जाता है. राजेश कुमार सिहाग इन्हीं दोनों तथ्यों के आधार पर मामले का खुलासा करने में लग गए. राजेश कुमार सिहाग ने जिले के ही नहीं, नजदीक के अन्य प्रदेशों के पुलिस थानों से भी पता किया कि कहीं कोई गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है. लेकिन उन्हें कहीं से भी किसी की गुमशुदगी की कोई सूचना नहीं मिली. मृतक की पहचान न होने की वजह से मामले की जांच आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

थानाप्रभारी को उम्मीद थी कि घटनास्थल से कोई न कोई ऐसा सूत्र अवश्य मिल जाएगा, जिस से वह हत्यारे को ढूंढ निकालेंगे. इसी उम्मीद पर वह अपने रीडर बृजमोहन मीणा और किसान अमेंद्र सिंह को साथ ले कर एक बार फिर घटनास्थल पर पहुंचे. अमेंद्र के ही नहीं, आसपास के लगभग सभी खेत अभी खाली पडे़ थे. खेतों के चारों ओर एक निर्माणाधीन मकान के अलावा दूरदूर तक कोई मकान या झोपड़ी नहीं थी. राजेश कुमार सिहाग ने सूत्र की तलाश में पूरी ताकत झोंक दी. घटनास्थल के 20-25 मीटर के दायरे को उन्होंने जांच केंद्र बनाया. बरसात हो जाने की वजह से कोई सूत्र मिलने की उम्मीद कम ही थी, इस के बावजूद उन की कोशिश रंग लाई.

उन्होंने गौर से देखा तो लाश जिस गड्ढे में दफनाई गई थी, वहां खेत में गड्ढे से 7-8 फुट की दूरी पर पश्चिम की ओर लग रहा था कि लाश इधर से घसीट कर लाई गई थी. पानी बरस जाने से घसीटे जाने का वह निशान धूमिल तो पड़ गया था, लेकिन अगलबगल की मिट्टी का जो उभार था, वह किसी भारी चीज के घसीटने की चुगली कर रहा था. घसीटे जाने का वह निशान वहां से थोड़ी दूरी पर स्थित उस निर्माणाधीन मकान की ओर जा रहा था. राकेश कुमार को सूत्र मिल गया था. वह मन ही मन प्रफुल्लित हो उठे, क्योंकि जांच को दिशा मिल गई थी. उन्होंने अमेंद्र सिंह से पूछा, ‘‘यह सामने वाला घर किस का है, कौन रहता है यहां?’’

‘‘साहब, यह मकान शृंगारा सिंह बाजीगर का है. 7-8 साल पहले बीकानेर क्षेत्र से आ कर यहां 12 बीघा जमीन खरीद कर बस गया था. 2 साल पहले वह मर चुका है. अब उस की पत्नी और छोटा बेटा यहां रह रहे हैं. लेकिन इस समय उस की 2 बेटियां, जिन की शादी हो चुकी हैं और एक दोहती यहीं हैं.’’

राजेश कुमार सिहाग थाने लौट आए और सारी जानकारी सीओ अतर सिंह को दी. इस जानकारी से संतुष्ट हो कर उन्होंने थानाप्रभारी को अपने विवेक के अनुसार काररवाई करने का आदेश दिया. राजेश कुमार सिंह को शृंगारा सिंह के घर में रहने वालों पर संदेह था, इसलिए उन्होंने काररवाई करने का मन बना लिया. 2 महिला सिपाही साथ ले कर राजेश कुमार शृंगारा सिंह के घर पहुंचे. घर में 4 महिलाएं और एक बच्चा था. उन्होंने घर की मालकिन से पूछा, ‘‘मांजी, पुलिस ने अमेंद्र सिंह के खेत में एक लाश बरामद की थी. आप ने बीते 10-12 दिनों में उन के खेत की ओर किसी आदमी को आतेजाते देखा तो नहीं?’’

‘‘नहीं साहब, मैं ने तो इधर किसी को आतेजाते नहीं देखा.’’ शृंगारा की विधवा ने बताया.

उन्होंने शृंगारा की पत्नी से ही नहीं, बेटियों से भी पूछताछ की. सब ने लगभग एक जैसा जवाब दिया. वह पूछताछ कर रहे थे कि  तभी शृंगारा सिंह की दोहती (बेटी की बेटी) गुलबदन (बदला हुआ नाम) उन के लिए चाय ले कर आई. उन की नजर उस पर गई तो वह उन्हें सहमी हुई सी लगी. उन्होंने बाकी लोगों को बाहर भेज कर उसे रोक लिया. जवानी की दहलीज पर कदज रख रही गुलबदन शृंगारा की बड़ी बेटी की बेटी थी, जो मिडिल स्कूल में पढ़ रही थी और छुट्टियां होने की वजह से नानी के पास आई हुई थी. गेहुंआ रंग की आभा के साथ गुल की सुघड़ शारीरिक बनावट गजब का आकर्षण पैदा कर रही थी. धवल दंत पंक्ति और नितंबों तक लहराते काले बालों की चुटिया 14-15 साल की कमसिन गुल को और ज्यादा आकर्षक बनाती थी.

राजेश कुमार सिहाग के सामने आते ही गुल की रुलाई फूट पड़ी. सुबकते हुए उस ने कहा, ‘‘साहब, मैं ने कुछ नहीं किया. मेरी दोनों मासियां ही कुछ बता सकती हैं.’’

गुल का यह जवाब और चेहरे पर उभरा अपराधबोध का भाव सब कुछ कह गया. राजेश कुमार ने दोनों महिला कांस्टेबलों को इशारा कर के गुल की दोनों मासियां यानी अमरजीत कौर और मीना कौर को पूछताछ के लिए एक बार फिर बुला लिया. सीओ अतर सिंह की मौजूदगी में राजेश कुमार सिहाग ने दोनों बहनों से कहा, ‘‘गुल तो बच्ची थी, लेकिन तुम दोनों समझदार हो. उस ने मुझे सब कुछ साफसाफ बता दिया है. अब अगर तुम झूठ बोलती हो तो वह तुमहारे लिए ही नुकसानदायक साबित होगा. अगर तुम सबकुछ सचसच बता देती हो तो पुलिस तुम्हारी मदद कर सकती है.’’

अंधेरे में फेंका गया उन का यह तीर सही निशाने पर लगा. दोनों बहनों ने बिना किसी हीलहवाली के 5 दिनों पहले कुल्हाड़ी और कस्सी से की गई जय सिंह की निर्मम हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उन का कहना था कि जय सिंह अव्वल दर्जे का शराबी और अय्याश था. उसे अपनी ओछी हरकतों की वजह से जान से हाथ धोना पड़ा. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में जय सिंह की हत्या की जो कथा उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. राजस्थान के जिला बीकानेर की तहसील जामनगर का एक गांव है भरूपावा. इसी गांव में रहता था शृंगारा सिंह बाजीगर. परिवार में पत्नी, 4 बेटियां और एक बेटा था. बेटा सब से छोटा था. बड़ी 2 बेटियों की शादी हो चुकी थी.

मामूली खेतीबाड़ी होने की वजह से शृंगारा सब्जी की दुकान भी लगाता था. उस के कहीं चले जाने पर दुकान का जिम्मा दोनों छोटी बेटियां अमरजीत कौर और मीना कौर संभालती थीं. उस बीच जय सिंह उन का पक्का और नियमित ग्राहक बन गया था. वह ठीकठाक कपड़ों में किसी हीरो से कम नहीं लगता था. जय सिंह मूलरूप से जिला झुंझुनू के बजावा गांव का रहने वाला था और उन दिनों खनन विभाग की रायल्टी वसूलने वाली टीम में नौकरी कर रहा था. उस का पिता बालू सिंह बीकानेर के एक होटल में वाचमैनी करता था. जय सिंह को जो वेतन मिलता था, वह तो मिलता ही था, ऊपरी कमाई भी कर लेता था. उस का ज्यादातर समय दोनों बहनों की सब्जी की दुकान पर ही बीतता था.

उसी बीच उस ने छोटी बहन मीना का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया तो उसी से नहीं, अमरजीत से भी फोन से बातें करने लगा. वह दोनों बहनों को उपहार भी देता था. धीरेधीरे उस ने दोनों बहनों से दोस्ती गांठ ली थी. सन 2010 के आसपास शृंगारा सिंह भरूपावा के अपने खेत और मकान बेच कर डबली राठान गांव में 12 बीघा जमीन खरीद ली और वहीं पक्का मकान बना कर रहने लगा. यहीं से उस ने बाकी बची दोनों बेटियों, अमरजीत कौर और मीना कौर की शादियां कर दीं. इस के बाद सन 2014 की शुरुआत में उस की मौत हो गई.

शृंगारा के परिवार में बूढ़ी पत्नी और 8-10 साल का बेटा बचा था. चारों बेटियों ने स्वयं को बेटा समझते हुए मां को संभालने का जिम्मा सा ले लिया. हर बेटी 1-2 महीने के लिए मां के पास आ जाती. जय सिंह के पास मीना का मोबाइल नंबर था ही, इसलिए उस से उस की बातें होती रहती थी. ज्यादातर मीना और अमरजीत एक साथ मायके आती थीं. दोनों बहनों के मायके आने का पता चलते ही जय सिंह उन से मिलने आ जाता. अव्वल दर्जे का शराबी जय सिंह 1-2 दिन रुक कर अपने काम पर लौट जाता. 20 मई को जय सिंह शृंगारा सिंह के घर आ कर 2 दिनों बाद लौट गया था. उसे जब भी आना होता, वह मोबाइल पर बता देता था.

इस बार कुछ दिनों पहले जय सिंह के जाने के बाद गुलबदन गुमसुम सी आंगन में बैठी थी. उस के दाएं गाल पर बड़ा सा चकता उभरा था. उसे इस तरह उदास देख कर अमरजीत ने पूछा, ‘‘क्या बात है गुल, उदास क्यों है? तेरे गाल को क्या हुआ?’’

जवाब देने के बजाए गुल रोने लगी. अमरजीत ने गुल को सीने से लगा कर ढांढ़स बंधाया. आंसू पोंछ कर पूछा, ‘‘सचसच बता क्या बात है?’’

गुल ने सिसकते हुए कहा, ‘‘मौसी कल रात जय मामा रात में मेरी चारपाई पर आ कर बैठ गए. उन्होंने दांतों से यहां काट लिया,’’ चकत्ते पर अंगुली रख कर गुल ने कहा, ‘‘उस के बाद उस ने मेरी सलवार खोलने की कोशिश की. तभी मीना मौसी जाग गईं. अंधेरा होने की वजह से वह मामा को देख नहीं पाईं और वह चुपके से अपनी चारपाई पर चला गया. सुबह उन्होंने कहा कि अगर मैं ने यह बात किसी को बताई तो वह मेरा गला दबा कर मुझे मार देंगे.’’

जय सिंह की इस घिनौनी हरकत के बारे में सुन कर अमरजीत का खून खौल उठा. मीना भी आंगन में आ गई थी. वह तो गुस्से में कांपने लगी थी. अमरजीत ने तुरंत जय सिंह को फोन किया. उस के फोन रिसीव करते ही वह उसे धमकाते हुए बोली, ‘‘तेरी इतनी हिम्मत कि तू ने गुल को हाथ लगा दिया. आइंदा गुल को हाथ लगाना तो दूर, उस की तरफ गंदी नजरों से देखा भी तो तेरी आंखें फोड़ दूंगी. तेरी बोटीबोटी कर के चीलकौवों को खिला दूंगी. मेरी ढाणी की तरफ रुख भी किया तो मेरी जैसी कोई बुरी नहीं होगी.’’

जो मुंह में आया जय सिंह को कह कर अमरजीत ने फोन काट दिया. उस के मुंह बोले भाई जय सिंह ने सफाई देनी चाही, पर मीना और अमरजीत ने फोन रिसीव नहीं किया.  पिछले 4-5 दिनों से जय सिंह फोन कर रहा था, पर उस का फोन रिसीव नहीं किया गया. 2 जून, 2015 को अमरजीत मां के साथ खेतों की ओर गई थी. घर पर मीना और गुल थीं. तभी मोबाइल की घंटी बजी. मीना ने देखा कि जय सिंह का फोन है. उस ने फोन रिसीव कर लिया तो दूसरी ओर से जय सिंह ने कहा, ‘‘देख मीना, तुम दोनों बहनें बेकार ही मुझ पर नाराज हो. मैं ने कोई गलती नहीं की थी. आरोप लगाने और सच्चाई को आंखों से देखने में रातदिन का फर्क होता है. सच्चाई यह है कि उस रात मैं नहीं, गुल मेरी चारपाई पर आ कर लेट गई थी.

वह तो मैं था जो गुल को दुत्कार कर भगा दिया. मेरी जगह कोई और होता तो निश्चय ही अनर्थ हो जाता. और अब आगे सुन, आज रात मैं तेरे घर आ रहा हूं. गुल ने मेरे ऊपर जो झूठा आरोप लगाया था, आज रात मैं उस झूठे आरोप को सच कर दूंगा. तुम दोनों बहनों से जो बन पड़े कर लेना.’’

इस तरह की धमकी दे कर जय सिंह ने फोन काट दिया. लगभग 2 घंटे बाद अमरजीत मां के साथ घर लौटी तो मीना और गुल को डरी देख कर चौंकी. अमरजीत कुछ पूछती, उस के पहले ही मीना ने कहा, ‘‘दीदी, अभी जय सिंह का फोन आया था. वह आज रात आ रहा है. उस का कहना है कि गुल ने उस पर झूठा आरोप लगाया है.’’

‘‘मीना गुल ने झूठा आरोप नहीं लगाया, बल्कि सच्चाई वही है. गुल झूठा आरोप क्यों लगाएगी.’’ अमरजीत ने कहा.

‘‘दीदी, जय सिंह ने धमकी दी है कि वह आज रात गुल के साथ हमारी मौजूदगी में ही मनमानी करेगा.’’ मीना ने कहा.

‘‘अरे, तुम दोनों इस बात को ले कर इतना डरी हुई क्यों हो? मेरे जीतेजी वह मनमानी तो दूर, गुल को छू भी नहीं पाएगा.’’ अमरजीत ने दृढ़ता से कहा.

अमरजीत जय सिंह के जिद्दी स्वभाव को जानती थी. उसे यह भी पता था कि ट्रक चालकों से जानपहचान होने की वजह से वह फोकट में कहीं भी आजा सकता है. अमरजीत भी जय सिंह की इस धमकी से डर गई, इसलिए खलिहान में पड़ी कुल्हाड़ी और कस्सी को ला कर उस ने आंगन में छिपा कर रख दिया. दोनों बहनें अभी जाग रही थीं. रात 12-1 बजे के बीच जय सिंह उन के घर पहुंचा. शराब के नशे में वह लड़खड़ा रहा था. वह सीधे गुल की चारपाई के पास पहुंचा और उसे बांहों में भर कर उठाने की कोशिश करने लगा. लेकिन नशे में होने की वजह से वह खुद ही गिर गया. इस के बाद नींद में गाफिल गुल के बाल पकड़ कर घसीटा तो वह जाग गई. उस के इस रूप को देख कर मासूम गुल ‘बचाओबचाओ’ कह कर रोने लगी.

गुल की करुणामयी पुकार ने अमरजीत और मीना को चंडी बना दिया. अगले ही पल एक ने कुल्हाड़ी तो दूसरी ने कस्सी उठा ली और जय सिंह पर हमला बोल दिया. एक ही वार में वह लुढ़क गया. कुछ देर छटपटा कर उस ने दम तोड़ दिया. लाश ठिकाने लगाने के लिए दोनों बहनें उसे उठा कर खेतों की ओर ले गईं. अमेंद्र के खेत के पास पहुंचतेपहुंचते वे थक गईं. मीना कस्सी लेने घर लौट गईं तो अमरजीत अकेली ही लाश को कई फुट तक घसीट कर ले आई. इसी घसीटने के निशान के आधार पर राजेश कुमार सिहाग उन के घर तक पहुंच गए थे.  कस्सी से दोनों बहनों ने गड्ढा खोदना शुरू किया. मानसिकशारीरिक थकावट की वजह से वे एकडेढ़ फुट से ज्यादा गहरा गड्ढा नहीं खोद पाईं. उसी गड्ढे में लाश दफना कर दोनों बहनें घर आ कर सो गईं.

पुलिस ने दोनों बहनों को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से पूछताछ एवं साक्ष्य जुटाने के लिए पुलिस ने 3 दिनों के पुलिस रिमांड पर ले लिया. रिमांड अवधि के दौरान जांच अधिकारी ने वारदात में प्रयुक्त कस्सी और कुल्हाड़ी बरामद कर ली. रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद दोनों बहनों को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Suspense Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित