Uttar Pradesh Crime: राजनीतिक अवतार में डाकू ददुआ

Uttar Pradesh Crime: अनिमेष की पत्नी की मौत बेटे के पैदा होते समय हुई थी, इसलिए वह बेटे को अपशकुनी मानता था. यही वजह थी कि उस ने बेटे को तो गला दबा कर मार दिया, उस के साथ ढाई साल की बेटी को भी खत्म कर दिया.

3 मार्च, 2016 को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के थाना नाका में रोज की ही तरह काम हो रहा था कि दोपहर के 2 बज कर 40 मिनट पर खड़ी लाइन की चेकदार शर्ट पहने सामान्य घर का दिखने वाला 32 साल का एक युवक इंसपेक्टर अनिल कुमार सिंह के कमरे में जा कर उन के सामने हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. उस के बाल छोटेछोटे थे, चेहरा गोल और उस पर बेतरतीब दाढ़ी उगी हुई थी. वहां बैठे लोगों को लगा कि यह कोई शिकायत करने आया होगा. लेकिन जब उस से थाने आने का सबब पूछा गया तो उस ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर सब सन्न रह गए.

युवक ने चेहरे पर बिना किसी तरह का भाव लाए सीधा और सपाट सा जवाब दिया था, ‘‘साहब, मैं ने अपने 2 बच्चों, 10 महीने के बेटे और ढाई साल की बेटी की गला दबा कर हत्या कर दी है.’’

युवक की बात सुन कर वहां बैठे लोगों में कोई भी सवाल करने की हालत में नहीं रह गया था. इस की वजह यह थी कि यह विश्वास करने लायक बात नहीं थी. इसीलिए तो युवक के पीछे खड़े सिपाही ने उसे डांट कर कहा था, ‘‘क्या बक रहा है, पागल हो गया है क्या?’’

लेकिन इंसपेक्टर अनिल कुमार को लगा कि युवक जो भी कह रहा है, सही कह रहा है. अब तक वह पूरी बात समझ चुके थे. युवक कोई गलत कदम न उठा ले, वह अपनी कुरसी से उठे और युवक के पास पहुंच गए. उस के कंधे पर हाथ रख कर उन्होंने कहा, ‘‘तुम आराम से पूरी बात बताओ, हम से जो हो सकेगा, तुम्हारी मदद करेंगे.’’

‘‘साहब, मेरा नाम अनिमेष वाजपेयी है. मैं स्वास्थ्य विभाग में काम करता हूं और यहीं पास में तिलकनगर कालोनी में किराए के मकान में रहता हूं. करीब 10 महीने पहले मेरी पत्नी सुषमा की मौत उस समय हो गई थी, जब वह अपने दूसरे बच्चे को जन्म दे रही थी. इस समय मेरी बेटी दिवांशी ढाई साल की थी और बेटा 10 महीने का था. मुझे लगता था कि मेरी पत्नी की मौत की वजह मेरा बेटा था. अगर वह न पैदा होता तो मेरी पत्नी की मौत न होती. इसीलिए मैं ने दोनों बच्चों को मार दिया.’’

अनिमेष की पूरी बात सुन कर अनिल कुमार सिंह ने उसे हिरासत में ले लिया. 2 बच्चों की हत्या की बात थी, इसलिए उन्होंने इस बात की जानकारी एसपी (पश्चिमी) सर्वेश मिश्रा और सीओ (बाजारखाला) अभयनाथ त्रिपाठी को दे दी. अनिमेष जिस मोहल्ले में रहता था, वह कोतवाली बाजारखाला के अंतर्गत आता था, इसलिए इस घटना की सूचना थाना बाजारखाला पुलिस को दे दी गई. पुलिस अनिमेष को साथ ले कर उस के घर पहुंची तो देखा दोनों बच्चों की लाशें पहली मंजिल के एक ही कमरे में बैड पर पड़ी थीं.

बच्चों की लाशें देख कर किसी का भी कलेजा फट सकता था. वहां खड़े सभी लोगों का लगभग यही हाल था. मोहल्ले वाले भी दिल दहलाने वाले इस दृश्य को देखने के लिए जुट गए थे. अनिमेष मूलरूप से लखनऊ के ही थाना इटौंजा के गांव कुम्हरावां का रहने वाला था. उस की ससुराल इटौंजा के ही पांडेय टोला में थी. 5 साल पहले उस की शादी सुषमा से हुई थी. अनिमेष लखनऊ के सिल्वर जुबली अस्पताल में औपरेशन थिएटर सहायक के रूप में काम करता था. वह पत्नीबच्चों, पिता अनूप कुमार वाजपेयी, भाई अभिषेक और भाभी श्वेता के साथ रहता था. तिलकनगर के जिस मकान में यह परिवार किराए पर रहता था, वह रिटायर अफसर सरोज तिवारी का था.

ग्राउंड फ्लोर पर सत्यनारायण चौरसिया रहते थे, जबकि पहली मंजिल पर अनिमेष अपने घर वालों के साथ रहता था. मकान मालिक सरोज तिवारी मुंबई में रहते थे. अनिमेष का बड़ा भाई अभिषेक इलाहाबाद में रह कर पीएचडी की तैयारी कर रहा था. समयसमय पर वह घर आता रहता था. अभिषेक और श्वेता को अभी कोई बच्चा नहीं था. वे अनिमेष के ही बच्चों को अपने बच्चों की तरह मानते थे. सुषमा की मौत के बाद अनिमेष के बच्चों की देखभाल उस की भाभी श्वेता ही कर रही थीं. दुधमुंहे बेटे को पालपोस कर 10 महीने का करने में श्वेता की अहम भूमिका थी, क्योंकि अनिमेष शुरू से ही बेटे को पत्नी की मौत का कारण मानता था, इसलिए वह उसे फूटी आंखों नहीं देखना चाहता था.

वह घर में रहता और बच्चे रोने लगते तो पत्नी की मौत का जिम्मेदार मानते हुए वह उन की पिटाई करने लगता था. पत्नी की मौत के बाद बच्चों का खयाल रखने या देखभाल करने के बजाय वह उन की पिटाई करता था. अगर घर का कोई आदमी बच्चों की पिटाई करने से उसे रोकता तो वह उस से झगड़ा करता. इस मामले में वह पिता की भी नहीं सुनता था.

गुरुवार की सुबह बच्चे रोने लगे तो अनिमेष बेरहमी से उन की पिटाई करने लगा. श्वेता ने उसे मना किया तो उस ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम्हें क्या पता, इन बच्चों की वजह से मैं कितने तनाव में रहता हूं. इन्होंने अपनी मां को तो मार ही डाला, इसी तरह रोरो कर मुझे भी मार डालेंगे. ये मेरे बच्चे हैं, इसलिए तुम लोगों को इन की चिंता करने की जरूरत नहीं है. इन्हें कैसे रखना है, इन का क्या करना है, यह मेरी जिम्मेदारी है, मैं इन से निपट लूंगा.’’

‘‘मुझे भी पता है कि ये बच्चे तुम्हारे हैं, लेकिन जब तुम इन मासूमों को इस तरह बेरहमी से पीटते हो तो मुझे बड़ी तकलीफ होती है. तुम्हारे बच्चे हैं, तुम इन के साथ कुछ भी कर सकते हो, पर मैं इन्हें इस तरह पिटते नहीं देख सकती.’’ कह कर श्वेता चली गई.

इस के बाद बच्चों को ले कर अनिमेष और श्वेता का आपस में काफी झगड़ा हुआ. श्वेता से जब सहन नहीं हुआ तो वह मायके चली गई. बेटी और बेटा रोधो कर सो गए. अनिमेष उन्हीं के पास बैठा सोचता रहा. उसे लगता था कि इन्हीं बच्चों की वजह से पत्नी मर गई, घर वाले भी अकसर उसे उलटासीधा कहते रहते हैं. इन की वजह से न दिन में चैन मिलता है, न रात में. उस का सुखचैन इन्होंने छीन लिया है. जब तक ये रहेंगे, वह कभी सुखचैन से नहीं रह पाएगा. अगर इन्हें खत्म कर दिया जाए तो सारा झंझट ही खत्म हो जाएगा.

अनिमेष ने वहीं रखा तकिया उठाया और सोते हुए बच्चों के मुंह पर रख कर दबा दिया. मुंह पर तकिया रखा होने की वजह से बच्चे चीख भी नहीं पाए और मर गए. इस तरह 2-2 हत्याएं हो गईं और किसी को पता नहीं चला. इस के बाद उसे लगा, उस ने जो किया है, वह ठीक नहीं है. वह उठा और सीधा थाने चला गया. पुलिस अनिमेष को ले कर घर आई तो मोहल्ले वालों को दोनों बच्चों की हत्या का पता चला. बैड पर दोनों बच्चों की लाशें पड़ी थीं. जिस तकिया से मुंह दबा कर बच्चों की हत्या की गई थी, वह भी वहीं पड़ा था. पुलिस ने अपनी काररवाई कर के दोनों बच्चों की लाशों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और अनिमेष को ला कर थाने में बंद कर दिया.

पोस्टमार्टम के बाद बच्चों की लाशों को लेने के लिए ननिहाल और ददिहाल पक्ष में तनाव हो गया. अंतत लाशों को बच्चों के मामा भानु मिश्रा, अनुराग और शिवम ने अपने कब्जे में ले लिया. वे उन्हें अपने गांव ले गए, जहां उन का अंतिम संस्कार कर दिया गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने अनिमेष को बच्चों की हत्या के आरोप में जेल भेज दिया था. पुलिस का मानना है कि पत्नी की मौत के बाद अनिमेष डिप्रैशन में था. इसी वजह से उस ने बच्चों की हत्या कर दी थी. जबकि अनिमेष की ससुराल वालों का कहना है कि अनिमेष दूसरी करना चाहता था. दोनों बच्चे उसे इस में बाधा लग रहे थे, इसलिए उन की हत्या कर के उस ने इस बाधा को दूर कर दिया है.

जबकि अनिमेष का कहना था कि उस के ये बच्चे अपशकुनी थे, इसलिए उस ने उन्हें मार दिया. लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि अगर बेटा अपशकुनी था तो बेटी को मारने की क्या जरूरत थी. जांच में अनिमेष के खिलाफ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है कि उसे पागल मान लिया जाए. इस से साफ लगता है कि पत्नी की मौत के बाद अनिमेष अपने बच्चों की परवरिश नहीं करना चाहता था, इसलिए उस ने उन की हत्या कर दी.

शायद वे उसे ऐशोआराम में बाधक लग रहे थे. इसलिए अनिमेष ने उन्हें मार दिया. अब अदालत उसे क्या सजा देगी, यह तो बाद की बात है, लेकिन उस ने अपने जीवन में कांटे तो बो ही लिए हैं. इस की सजा अब उसे इस जीवन में भुगतनी ही होगी. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: जिसे अपनाना चाहा उसी ने मरवाया

Hindi Crime Story: अबरार अपने चचेरे भाई उम्मीद खां की हत्या कर के एक तीर से दो निशाने साधना चाहता था. उस ने भाई को तो मार दिया, लेकिन क्या उस की इच्छा पूरी हुई?

उत्तर प्रदेश का एक जिला है संभल. इस जिले के थाना नखासा के अंतर्गत आने वाले चंदावली गैलुआ रोड पर स्थित चंदावली इंटर कालेज के पास कच्ची सड़क पर नीले रंग की एक टेरेनो कार खड़ी थी. जब काफी देर तक वह कार वहीं खड़ी रही तो कुछ लोग उस के पास पहुंचे. उन्होंने शीशे से अंदर झांका तो उन्हें कार की पिछली सीट पर एक आदमी पड़ा दिखाई दिया, जिस के सीने पर एक तकिया रखा था. उस आदमी में कोई हलचल दिखाई नहीं दी तो लोगों को शक हुआ. इस के बाद तो एकदूसरे से होते हुए यह खबर चंदावली और गैलुआ गांव के अधिकांश लोगों तक पहुंच गई. धीरेधीरे वहां भीड़ लगने लगी. उन्हीं लोगों में से किसी ने यह सूचना थाना नखासा पुलिस को दे दी. यह 22 अक्तूबर, 2015 की बात है.

सूचना मिलने पर शाम साढ़े 7 बजे के करीब थानाप्रभारी के.के. तिवारी पुलिस टीम के साथ वहां पहुंच गए. उन्होंने लोगों की मदद से कार को काफी हिलायाडुलाया, लेकिन सीट पर पड़े आदमी में कोई हरकत नहीं हुई. इस से लगा कि या तो वह बेहोश हैं या फिर किसी ने उस की हत्या कर दी है. के.के. तिवारी ने इस बात की जानकारी जिले के सभी पुलिस अधिकारियों को दे दी. मामला हत्या का लग रहा था, इसलिए एसपी अतुल कुमार, एएसपी कमलेश दीक्षित भी वहां पहुंच गए. चूंकि कार के दरवाजे लौक थे, इसलिए लौक खुलवाने से पहले पुलिस ने फोन कर के नजदीकी जिला मुरादाबाद से फौरेंसिक एक्सपर्ट्स की टीम को बुलवा लिया.

रात साढ़े 10 बजे फोरैंसिक एक्सपर्ट्स की टीम मौके पर पहुंची तो कार का शीश तोड़ कर उस के दरवाजे खोले गए. पुलिस ने कार के अंदर पड़े आदमी की जांच की तो पता चला कि वह मर चुका था. फोरैंसिक टीम ने कार की स्टीयरिंग, विंडो और हैंडिल लीवर से फिंगरप्रिंट उठाए. कार की जांच में पिछली सीट पर 2 मोबाइल, मिर्च पाउडर और एक लेटरहेड रखा मिला. लेटरहैड पर एक मोबाइल नंबर लिखा था. जब फोरैंसिक टीम जांच कर रही थी, तभी के.के. तिवारी ने अपने मोबाइल से वह नंबर मिलाया तो दूसरी ओर से फोन किसी महिला ने उठाया. उन्होंने उस महिला से पूछा कि क्या वह किसी ऐसे आदमी को जानती है, जिस के पास नीले रंग की टेरेनो कार है?

उस महिला ने कहा, ‘‘यह कार तो मेरे पति की है. कहां हैं वह?’’ महिला ने पूछा. महिला ने अपना नाम गुलिस्तां बताया था. के.के. तिवारी ने कहा, ‘‘उन का ऐक्सीडेंट हो गया है. उन्हें गंभीर चोटें आई हैं. आप जल्दी संभल के थाना नखासा आ जाइए.’’

पति के ऐक्सीडेंट की बात सुन कर महिला रोने लगी. उस ने यह बात अपने ससुर शमीउल्ला खां को बताई तो वह भी परेशान हो गए. उन्हें लगा था कि ऐक्सीडेंट में घायल होने की वजह से वह किसी अस्पताल में भरती होगा.

फोरैंसिक टीम का काम निपट गया तो पुलिस ने जांच शुरू की. लाश के गले पर मिर्च पाउडर पड़ा था, जिस से अंदाजा लगाया गया कि उस की आंखों में मिर्च पाउडर डाला गया था. जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. देर रात शमीउल्ला खां गुलिस्तां और अन्य घर वालों के साथ थाना नखासा पहुंचे तो उन्हें पता चला कि उन का बेटा अब इस दुनिया में नहीं है. थानाप्रभारी ने उन्हें अपने मोबाइल में उस की लाश के फोटो दिखाए तो फोटो देखते ही शमीउल्ला खां की आंखें भर आईं, क्योंकि वह फोटो उन के बेटे उम्मीद खां के थे. के.के. तिवारी ने सांत्वना दे कर उन्हें बताया कि उन के बेटे का एक्सीडेंट नहीं हुआ बल्कि किसी ने उस की हत्या की है.

इस के बाद पुलिस उन्हें मोर्चरी ले गई. शमीउल्ला को लाश दिखाई गई तो उन्होंने उस की शिनाख्त अपने बेटे उम्मीद खां के रूप में कर दी. पोस्टमार्टम कराने के बाद अगले दिन पुलिस ने उम्मीद खां की लाश उस के घर वालों को सौंप दी. 30 वर्षीय उम्मीद खां की हत्या के मामले को सुलझाने के लिए एसपी अतुल कुमार सक्सेना ने एएसपी कमलेश दीक्षित के नेतृत्व में एक टीम गठित की, जिस में थानाप्रभारी के.के. तिवारी, स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) के प्रभारी संतोष त्यागी जैसे कई तेजतर्रार पुलिस वालों को शामिल किया गया. मृतक जिला अमरोहा के कस्बा गजरौला के निकटवर्ती गांव लिसड़ई बुजुर्ग का रहने वाला था. इस से पुलिस यह सोचने पर मजबूर हो गई कि उस की हत्या संभल के इलाके में क्यों की गई?

अगर किसी को उस की हत्या करनी ही थी तो वह गजरौला से हसनपुर के बीच कहीं भी कर सकता था. आखिर उसे वहां क्यों लाया गया? इस का मतलब हत्यारों या मृतक में से किसी न किसी का संबंध संभल से जरूर रहा होगा. इस बारे में पुलिस ने शमीउल्ला खां से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि संभल के कस्बा हसनपुर के पास गांव बावनखेड़ी में उन की ससुराल है. उम्मीद खां अकसर अपनी ननिहाल आताजाता रहता था.

के.के. तिवारी ने उम्मीद खां की ननिहाल जा कर पूछताछ की तो पता चला कि 22 अक्तूबर को उम्मीद खां वहां नहीं पहुंचा था. उसी बीच उम्मीद के एक दोस्त शाहनवाज ने पुलिस को बताया कि 22 अक्तूबर को वह उम्मीद के साथ था. वह अपनी टेरेनो कार से उसे मुरादाबाद ले गया था. वहां उन दोनों ने कुछ खरीदारी की थी. दोपहर 2 बजे वे लोग गजरौला पहुंचे तो उम्मीद के फोन पर किसी का फोन आया. फोन पर उम्मीद जिस तरह बात कर रहा था, उस से साफ पता चल रहा था कि वह किसी महिला से बात कर रहा है. महिला ने शायद उसे बुलाया था इसीलिए उस ने महिला से कहा कि मैं अभी आ रहा हूं. फोन पर बात होने के बाद उम्मीद ने शाहनवाज से कहा कि वह किसी जरूरी काम से कहीं जा रहा है.

शाहनवाज ने उस से मालूम भी करना चाहा पर उस ने यह नहीं बताया कि वह कहां जा रहा है. उस ने सिर्फ इतना ही बताया कि वह बिजनेस के सिलसिले में किसी से बात करने जा रहा है. उसे गजरौला में उतार कर वह चला गया था. अब पुलिस को यह पता लगाना था कि 22 अक्तूबर की दोपहर को उम्मीद की किस से बात हुई थी, जिस के बाद वह गजरौला से चला गया था. वह फोन नंबर किस का था, यह जानने के लिए पुलिस ने उम्मीद के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि वह फोन नंबर बावनखेड़ी के रहने वाले मोहम्मद अमीर की बेटी नगमा का था.

पुलिस टीम बावनखेड़ी स्थित मोहम्मद अमीर के घर पहुंची तो घर पर पुलिस को देख कर नगमा घबरा गई. पुलिस ने जब उस से पूछा कि क्या वह गजरौला के गांव लिसड़ई बुजुर्ग के रहने वाले उम्मीद खां को जानती है तो उस ने साफ मना कर दिया. जिस समय पुलिस नगमा से बात कर रही थी, उस की बड़ी बहन सायमा भी वहां मौजूद थी. पुलिस पूछताछ के समय दोनों बहनें बारबार एकदूसरे की ओर देख रही थीं. काल डिटेल्स में नगमा का फोन नंबर आया था. इस के बावजूद वह पुलिस से झूठ बोल रही थी. दूसरे दोनों बहनों के घबरा कर एकदूसरे की ओर देखने से भी पुलिस को शक हो गया. उन के व्यवहार से पुलिस को लगा कि दोनों बहनें उम्मीद की हत्या के बारे में कुछ न कुछ जरूर जानती हैं.

एएसपी कमलेश दीक्षित ने टीम में शामिल महिला सिपाहियों से कहा कि दोनों लड़कियों को गाड़ी में बैठा कर थाने ले चलो, इन से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. नगमा और सायमा को ले कर पुलिस टीम थाने लौट आई. थाने में दोनों बहनों से उम्मीद खां की हत्या के बारे में पूछताछ की जाने लगी. पहले तो दोनों बहनें झूठ बोलती रहीं, लेकिन जब उन से मनोवैज्ञानिक तरीके से पूछताछ की गई तो वे अपने ही जाल में उलझती चली गईं. आखिर उन्होंने स्वीकार कर लिया कि उम्मीद की हत्या उन्होंने ही कराई थी. इस के बाद उन्होंने उम्मीद की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी.

उम्मीद खां उत्तर प्रदेश के जिला अमरोहा के थाना गजरौला के गांव लिसड़ई बुजुर्ग का निवासी था. उस के पिता किसान थे. उम्मीद खां 6 भाइयों में दूसरे नंबर पर था. गजरौला और हसनपुर के बीच एक गांव है सिंघली जागीर. वैसे तो यहां तमाम नर्सरियां हैं, जिन में अनेक किस्म के फूलों के पौधे मिलते हैं. लेकिन यहां की 2 नर्सरियां काफी बड़ी हैं, जिन का सालाना करोड़ों का टर्नओवर है.

उम्मीद खां जब बड़ा हुआ तो उस ने अपनी खेती का काम करने के बजाय नर्सरी का काम सीखना चाहा. घर वालों से पूछ कर वह गांव की एक बड़ी नर्सरी में काम करने लगा. 2-3 साल वहां काम करने के बाद जब उसे नर्सरी के सारे कामों की जानकारी हो गई और यह भी पता चल गया कि इस काम में कितनी आमदनी है तो उस ने नर्सरी की नौकरी छोड़ दी.

उम्मीद खां अपनी नर्सरी खोलना चाहता था, लेकिन उस के पास जमीन नहीं थी. उस ने अपने गांव के पास ही जमीन किराए पर ले कर नर्सरी का काम शुरू कर दिया. फूल आदि के पौधे कहां से मंगाए जाते हैं, कौनकौन से पौधे नर्सरी में ही तैयार किए जाते हैं, इस की उसे अच्छी जानकारी थी. अपनी मेहनत से कम पूंजी में ही उस का काम अच्छा चल निकला.

गजरौला औद्योगिक क्षेत्र है, जहां पर बिरला समूह की वाम आर्गेनिक जैसी कई बड़ी फैक्ट्रियां हैं. इस के अलावा यहां तमाम औद्योगिक प्रतिष्ठान, होटल और कोठियां हैं. उम्मीद खां इन सभी जगहों पर जा कर पौधे सप्लाई करने लगा, जिस से उसे मोटी कमाई होने लगी. पैसा आने के बाद उस के रहनसहन का अंदाज बदल गया. उस ने नर्सरी की आमदनी से आलीशान घर बनवाया और सन 2013 में निशान कंपनी की नीले रंग की टेरेनो कार खरीद ली.

आदमी के पास पैसा आता है तो साथ में कई बुराइयां भी साथ ले कर आता है. उम्मीद खां के साथ भी यही हुआ. नई कार लेते ही उस के जैसे पर लग गए. वह अपनी व्यावसायिक पार्टियों के पास कार से जाने लगा. इस से उस का धंधा और बढ़ गया. अब उसे सारा काम अकेले संभालना मुश्किल लगने लगा था. उम्मीद को अपने साथ काम करने के लिए एक ईमानदार लड़के की जरूरत महसूस होने लगी थी. उम्मीद खां के एक चाचा थे सरदार खां, जो गांव में ही रहते थे. उन का एक बेटा अबरार खां खाली था. वह दिन भर गांव में आवारागर्दी करता रहता था. उम्मीद ने उस से कहा, ‘‘अबरार, तुम दिन भर खाली घूमते रहते हो. गांव के जिन लड़कों के साथ तुम रहते हो, वे अच्छे नहीं हैं. अगर तुम मेरे साथ काम करो तो कुछ बन सकते हो.’’

अबरार जानता था कि उम्मीद ने जब से नर्सरी का काम शुरू किया है, उस की किस्मत बदल गई है. इसलिए उस ने उम्मीद की बात मान ली. अगले दिन से ही वह उम्मीद के साथ काम करने लगा. धीरेधीरे उम्मीद काम की जिम्मेदारी अबरार पर डालने लगा. जबकि वह खुद गजरौला से बाहर जा कर ठेके लेने लगा था. अबरार जितनी मेहनत से काम कर रहा था, उम्मीद उसी के हिसाब से उसे तनख्वाह भी दे रहा था. उम्मीद खां ने अबरार को कार चलाना भी सिखा दिया था. उम्मीद की गैरमौजूदगी में अबरार ही पार्टियों के पास जाता था और नर्सरी में नौकरों से काम भी कराता था. अबरार मालिक की तरह वहां रह रहा था. अब वह भी अच्छे और महंगे कपड़े पहनने लगा था.

हसनपुर तहसील के गांव बावनखेड़ी में उम्मीद की ननिहाल थी. वह बच्चों के साथ अकसर अपनी ननिहाल आताजाता रहता था. कभीकभी वह अबरार को भी साथ ले जाता था. उस की ननिहाल के पास ही मोहम्मद अमीर का घर था. उस के 2 बेटे और 5 बेटियां थीं. करीब 10 साल पहले उस की पत्नी का इंतकाल हो गया था. वह एक बेटे और 3 बेटियों की शादी कर चुका था. अब उसे एक बेटे और 2 बेटियां सायमा व नगमा की शादी करनी थी. दोनों ही बेटियां शादी योग्य थीं. वह उन के लिए लड़के देख रहा था.

अबरार एक बार उम्मीद के साथ बावनखेड़ी गया तो उस की नजरें सायमा से चार हो गईं. एकदूसरे को देख कर दोनों ही मुसकरा पड़े. अबरार उस का मतलब समझ गया. मौका मिलते ही उस ने सायमा का मोबाइल नंबर ले लिया. एकदूसरे से अपनी बात कहने और उस की सुनने का मोबाइल फोन बढि़या जरिया है. सायमा और अबरार को नजदीक लाने में मोबाइल ने अपनी अहम भूमिका निभाई.

अबरार ने सायमा से फोन पर बात की तो उसे भी उस से बात करना अच्छा लगा. इस के बाद उन की मोबाइल पर लंबीलंबी बातें होने लगीं, जिस से वे एकदूसरे के नजदीक आते गए. कभीकभी अबरार अकेला ही उम्मीद की कार ले कर बावनखेड़ी चला जाता था, जिस से सायमा पर उस का अच्छाखासा प्रभाव जम गया. बाद में सायमा के पिता से भी उस की जानपहचान हो गई, जिस से वह उस के घर भी जाने लगा.

अबरार और सायमा की प्रेमकहानी के बारे में उम्मीद को पता चला तो उसे ताज्जुब हुआ कि अबरार ने उस के ननिहाल की लड़की सायमा को कैसे पटा लिया? सायमा की एक छोटी बहन नगमा थी. उम्मीद ने सोचा कि वह नगमा पर अपना प्रभाव डाल कर उसे पटाने की कोशिश करेगा. लेकिन काफी कोशिश के बाद भी वह सफल नहीं हुआ.

एक दिन उस ने अबरार से कहा, ‘‘तुम्हारा और सायमा का यह खेल इस तरह कब तक चलता रहेगा. क्यों न तुम किसी दिन सायमा को मुरादाबाद ले आओ. उसे यहां घुमा देंगे.’’

उम्मीद की इस बात पर अबरार पहले तो चौंका कि उस की प्रेम वाली बात उम्मीदभाई को कैसे पता चल गई. अब चूंकि वह उस से झूठ भी नहीं बोल सकता था, इसलिए उस ने उम्मीद की बात मान ली. इस के बाद उस ने सायमा के सामने मुरादाबाद घूमने का प्रस्ताव रखा.

सायमा ने कहा कि उस के अब्बू उसे अकेली बाहर जाने की इजाजत नहीं देंगे. शायद छोटी बहन को साथ ले जाने को कहूं तो वह इजाजत दे दें. अबरार ने कहा कि वह अपने अब्बू से बात करे. जो भी बात हो, वह उसे बता दे. वह कार ले कर बावनखेड़ी आ जाएगा. इस के बाद सायमा ने अपने अब्बू से कहा, ‘‘अब्बू हमें गजरौला से कुछ खरीदारी करनी है. अबरार अपनी कार ले कर आया है. हम उस के साथ चले जाएं तो जल्दी लौट आएंगे.’’

अमीर ने दोनों बेटियों को गजरौला जाने की इजाजत दे दी. सायमा ने अबरार को यह खबर दी तो वह उम्मीद के साथ बावनखेड़ी पहुंच गया और सायमा व नगमा को गाड़ी में बैठा कर गजरौला लौट आया. उम्मीद भी वहीं मिल गया. पहले चारों ने एक रेस्टोरैंट में नाश्ता वगैरह किया. इस के बाद उम्मीद ने दोनों बहनों को बाजार से खरीदारी कराई. दोनों बहनें उम्मीद खां से बहुत खुश थीं. इस के बाद उम्मीद खां उन्हें ले कर गजरौला के एक होटल में पहुंचा. वह होटल उस के परिचित का था. वहां उस ने किराए पर 2 कमरे लिए. एक कमरे में अबरार और सायमा चले गए. दूसरे कमरे में उम्मीद खां नगमा को साथ ले कर चला गया.

अबरार और सायमा ने तो हंसीखुशी से संबंध बनाए जबकि उम्मीद खां ने नगमा के साथ जबरन संबंध बनाए. बाद में उस ने नगमा को कुछ पैसे दे कर खुश करने की कोशिश की. इस के बाद यह सिलसिला सा चल निकला. उम्मीद खां नगमा पर पानी की तरह पैसा बहाने लगा. यही नहीं, वह उस पर शादी करने का दबाव भी डालने लगा. नगमा को जब पता चला कि उम्मीद खां शादीशुदा ही नहीं, 3 बच्चों का बाप है तो उसे अपनी गलती का अहसास हुआ. उस ने उम्मीद खां से दूरी बनानी शुरू कर दी. जबकि उम्मीद खां उस पर निकाह करने का दबाव बना रहा था. नगमा ने निकाह करने से साफ मना कर दिया तो उम्मीद खां बौखला उठा.

उस ने नगमा को धमकी दी कि अगर उस ने उस के साथ निकाह नहीं किया तो वह उस के होने वाले जीजा अबरार को नौकरी से हटा देगा. यही नहीं, वह उसे गांव में भी बदनाम कर देगा. उस की इस धमकी से नगमा डर गई. उस ने यह बात अपने होने वाले जीजा अबरार को बताई तो वह भी परेशान हो उठा. क्योंकि अबरार भी नहीं चाहता था कि उस की होने वाली साली नगमा 3 बच्चों के पिता उम्मीद खां से शादी करे. दरअसल उसे लगा कि अगर किसी तरह उम्मीद खां और नगमा की शादी हो गई तो सायमा के घर वालों के सामने उस की इज्जत कम हो जाएगी.

इस के बाद नगमा और अबरार उम्मीद खां से छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगे. एक दिन इन दोनों ने मिल कर एक भयानक योजना बना डाली. अपनी उस योजना में अबरार ने अपने एक दोस्त गौरव को भी शामिल कर लिया. गौरव अमरोहा के ही जोया कस्बे का रहने वाला था. योजना के मुताबिक 22 अक्तूबर, 2015 की दोपहर को नगमा ने उम्मीद खां को फोन कर के कुछ देर इधरउधर की बातें करने के बाद कहा, ‘‘उम्मीद, आज तुम से मिलने का मन कर रहा है. तुम हसनपुर आ जाओ. मैं वहीं पर तुम्हारा इंतजार कर रही हूं. और हां, आज तुम्हारे मन की मुराद भी पूरी हो जाएगी. मैं तुम से आज ही निकाह कर लूंगी. इस का सारा इंतजाम मैं ने कर लिया है.’’

नगमा की इन बातों से उम्मीद खां बहुत खुश हुआ. उस समय वह अपने दोस्त शाहनवाज के साथ था. वह उसे उस के घर छोड़ कर अपनी निशान टेरेनो कार से हसनपुर के लिए रवाना हो गया. हसनपुर में तय जगह पर उसे नगमा अपनी बहन सायमा और अबरार के साथ खड़ी मिल गई. तीनों कार में बैठ कर संभल की ओर चल पड़े. नगमा ने उम्मीद खां को बताया कि उन दोनों का निकाह संभल के डेरा सराय में मौलवी द्वारा पढ़ाया जाएगा. कार हसनपुर से आगे रहरा मार्ग पर चितावली गांव के नजदीक पहुंची तो अबरार ने गाड़ी रुकवा ली. दरअसल योजना के अनुसार वहां अबरार का दोस्त गौरव खड़ा था. वहीं पर उस की मोटरसाइकिल भी खड़ी थी.

मोटरसाइकिल किसी जानकार के यहां खड़ी कर के गौरव भी उन की कार में बैठ गया. कार थोड़ी ही दूर चली थी कि दोनों बहनें लघुशंका के बहाने कार से उतर कर खेत में चली गईं. उम्मीद, अबरार और गौरव इधरउधर की बातें करने लगे. तब तक अंधेरा हो चुका था. वापस आ कर नगमा और सायमा फिर से गाड़ी में बैठ गईं. नगमा और सायमा अपने साथ मिर्ची का पाउडर लाई थीं. कार में बैठने के बाद उन्होंने वह पाउडर उम्मीद की आंखों में डाल दिया. उम्मीद खां अपनी आंखें मसलने लगा तो उन लोगों ने दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

उम्मीद खां की मौत हो गई. इस के बाद अबरार ने लाश को पिछली सीट पर लिटा कर उस के मुंह पर तकिया रख दिया. उम्मीद की हत्या के बाद अबरार ने नगमा और सायमा को कार से हसनपुर छोड़ा. फिर वह गौरव को वहां ले गया, जहां उस ने अपनी मोटरसाइकिल खड़ी की थी. गौरव वहां से मोटरसाइकिल से कार के पीछेपीछे चलने लगा. अबरार कार ले कर संभल जिले के थाना नखासा के पास गैलुआ गांव पहुंचा. खेत के रास्ते पर कार खड़ी कर के उस ने कार में रखे लेटरहेड पर उम्मीद खां के घर का मोबाइल नंबर लिखा और कार को लौक कर के वहीं छोड़ दिया. इस के बाद वह गौरव की मोटरसाइकिल से गजरौला लौट आया.

पूरी बात पता चलने पर पुलिस ने अबरार और गौरव को भी गिरफ्तार कर लिया. उम्मीद को मार कर अबरार ने एक तीर से दो निशाने साधने चाहे थे. एक तो उस की होने वाली साली का पीछा छूट जाता, दूसरे उस की नर्सरी पर उस का कब्जा हो जाता. इस के बाद वह दोनों बहनों को अपने घर में रखना चाहता था, जो उस के काम में हाथ बंटातीं. पूछताछ के बाद पुलिस ने चारों अभियुक्तों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. Hindi Crime Story

Mumbai Crime: दिल लगा कर मिटाया सुहाग

Mumbai Crime: पत्नी के प्रेमसंबंधों के बारे में पता चलने पर बाबू उसे रोकने ही नहीं लगा, बल्कि उस से मारपीट भी करने लगा. पति नाम के इस कांटे को निकालने के लिए रीवा ने मोनू को शरीर का चारा डाल कर जो दांव चला, वह उसे जेल तक ले गया.

दिन के लगभग 2 बजे महानगर मुंबई के उपनगर अंधेरी के थाना साकीनाका पुलिस को घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल से एक महत्त्वपूर्ण सूचना मिली. ड्यूटी पर मौजूद इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे ने चार्जरूम में ड्यूटी पर तैनात सबइंसपेक्टर बड़रे को बुला कर तुरंत सूचना दर्ज कराई. साथ ही उन्होंने इस सूचना की जानकारी कंट्रोल रूम और वरिष्ठ अधिकारियों को भी दे दी. सूचना दर्ज कराने के बाद आबूराव सोनवणे, इंसपेक्टर बाबूलाल शिंदे, चंद्रशेखर नलावणे, असिस्टैंट इंसपेक्टर दत्तात्रेय देशमुख, अनिल जयकर, सबइंसपेक्टर बाबूराव शिंदे, बड़रे, कांस्टेबल रतन गायकवाड़, कोलेकर और पाटिल को साथ ले कर घाटकोपर स्थित राजावाड़ी अस्पताल जा पहुंचे.

जिस समय वे अपनी टीम के साथ वहां पहुंचे, डाक्टरों की टीम एक लाश का निरीक्षण कर रही थी. उस लाश के साथ आए लोग भी वहां मौजूद थे. पूछताछ में मृतक का नाम बाबू राजरत्नम बताया गया. डाक्टरों के अनुसार, उस की मौत लगभग 10-11 घंटे पहले हुई थी. उसे गला घोंट कर मारा गया था. क्योंकि उस के गले पर गहरा निशान स्पष्ट नजर आ रहा था, जबकि घर वालों का कुछ और ही कहना था.  मृतक की पत्नी रीवा और बेटे जीतू का कहना था कि उन्हें पता ही नहीं चला कि बाबू की मौत कब और कैसे हुई, पत्नी रीवा के बताए अनुसार, वह रात को काफी देर से घर आए थे और आते ही अपनी चारपाई पर सो गए थे. सुबह 4 बजे पानी आया तो उन्होंने हमेशा की तरह उठ कर पानी भरा, उस के बाद फिर अपनी चारपाई पर जा कर सो गए थे.

सुबह 6 बजे के करीब बेटा जीतू रात की ड्यूटी कर के आया तो वह भी उन्हीं की चारपाई पर उन के पास लेट कर सो गया. वह चूंकि एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाती थी, इसलिए सुबह उठ कर घर का सारा काम निपटाया और नाश्ता बना कर साढ़े 6 बजे स्कूल चली गई. इस बीच क्या हुआ, उसे कुछ पता नहीं. सवा 1 बजे जीतू ने उसे फोन कर के बताया कि एक बजे जब वह सो कर उठा तो देखा उस के पापा अभी भी सो रहे थे. उस ने पापा को उठाना चाहा तो उन में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. इस के बाद जीतू ने घबरा कर उसे फोन किया.

रीवा ने स्कूल से ही इस बात की जानकारी पति के बड़े भाई यशु को दे दी.  इस के बाद उस के पड़ोस में रहने वाले अपने पिता रतन तथा मां शांती को बताया. जल्दी से भाग कर वह घर आई और घर वालों तथा पड़ोसियों की मदद से पति को अस्पताल ले गई. रीवा ने पुलिस को जो बताया, वह काफी संदिग्ध था. बहरहाल, पुलिस ने प्राथमिक काररवाई निपटाई और लाश को पोस्मार्टम के लिए भिजवा दिया.

अस्पताल से यह पुलिस टीम सीधे अंधेरीकुर्ला रोड स्थित जरीमरी बस्ती की राधाकृष्ण चाल पहुंची, जहां रीवा पति और बच्चों के साथ रहती थी. चाल के जिस मकान में मृतक बाबू रहता था, वह 2 कमरों का छोटा सा मकान था. पीछे वाले कमरे में ही छोटा सा किचन, टौयलेट और बाथरूम भी था, जबकि दूसरे कमरे में एक चारपाई पड़ी थी, उसी पर बाबू सोता था. वहीं उस की हत्या हुई थी. निरीक्षण में पुलिस ने कमरे का सारा समान अपनीअपनी जगह व्यवस्थित पाया. आनेजाने का एक ही दरवाजा था, जो अंदर से बंद था. इसलिए कोई बाहरी आदमी अंदर नहीं आ सकता था.

इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे अपनी टीम के साथ कमरे का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सीनियर इंसपेक्टर अभिनाश धर्माधिकारी और एसीपी समद शेख भी आ गए. दोनों अधिकारियों ने भी घटनास्थल का निरीक्षण किया और आपस में सलाह कर के इस मामले की जांच इंसपेक्टर आबूराव सोनवणे और चंद्रशेखर नलावणे को सौंप दी. समद शेख और अभिनाश धर्माधिकारी काफी दिनों तक क्राइम ब्रांच में रह चुके थे, जहां उन्होंने चंदन तस्करी से ले कर अपहरण जैसे कई बड़े पेचीदा मामले सुलझाए थे. उस हिसाब से यह मामला उन के लिए कुछ भी नहीं था.

इस के बावजूद इस मामले को ले कर उन के ऊपर काफी दबाव था. इस की वजह यह थी कि मृतक राजनीतिक पार्टी आरपीआई (रिपब्लिकन पार्टी औफ इंडिया) से जुड़ा था. इस के अलावा बौद्ध विहार मंदिर का अध्यक्ष भी था. घटनास्थल की जांच और अब तक की पूछताछ से यह साफ हो गया था कि हत्यारा कोई बाहरी नहीं था. इस से साफ था कि हत्या का राज घर में ही छिपा था. इसलिए पुलिस ने इस मामले की जांच मृतक बाबू के घर से ही शुरू की. यही वजह थी कि घर वालों के सामान्य होते ही पुलिस ने उन्हें थाने बुला लिया.

थाने में की गई पूछताछ में परिवार के किसी सदस्य से कोई खास जानकारी नहीं मिली, लेकिन मृतक के 5 साल के बेटे फैंडली ने पुलिस को जो बताया, उस से मृतक की पत्नी रीवा संदेह के दायरे में आ गई. उस ने पुलिस को बताया कि जिस रात उस के पापा की हत्या हुई थी, उस रात उस के घर मोनू अंकल आए थे और वह कई बार मम्मी के साथ पापा की चारपाई के पास गए थे. इस के अलावा पूछताछ में पुलिस ने एक चीज यह भी देखी थी कि पति की मौत पर पत्नी को जिस तरह दुखी होना चाहिए, रीवा उस तरह दुखी नहीं लग रही थी. इन बातों से पुलिस को लगा कि बाबू की हत्या में किसी न किसी रूप से रीवा का हाथ अवश्य है.

पुलिस ने रीवा से मोनू के बारे में पूछा तो उस ने जिस मोनू के बारे में बताया, वह उस के बड़े बेटे जीतू का दोस्त था. वह उसी के साथ नौकरी करता था. वह अकसर उस के घर आयाजाया करता था. जब फैंडली से उस की शिनाख्त कराई गई तो उस ने कहा, ‘‘यह वह मोनू नहीं है, जो उस रात आया था.’’

रीवा से दोबारा मोनू के बारे में पूछा गया तो उस ने कहा कि वह इस के अलावा किसी और मोनू को नहीं जानती. पुलिस जानती थी कि रीवा झूठ बोल रही है. इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस ने उस के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला उस की एक नंबर पर बहुत ज्यादा बातें होती थीं.

संदेह होने पर पुलिस ने उस नंबर के बारे में पता किया तो जो जानकारी मिली, वह चौंकाने वाली थी. वह नंबर भी उसी के नाम था, लेकिन उस का उपयोग कोई और कर रहा था. पुलिस ने तुरंत उस नंबर की काल डिटेल्स और लोकेशन पता करवाई तो पता चला कि जिस रात बाबू की हत्या हुई थी, उस नंबर की भी लोकेशन रीवा के घर की थी. जबकि वह रहता मुंबई के उपनगर जोगेश्वरी के प्रेमनगर में हनुमान मंदिर के पीछे था.

पुलिस ने रीवा के मोबाइल का इनबौक्स, काल लौग और उस से खींचें गए फोटो देखे तो इनबौक्स और काल लौग में तो कुछ नहीं मिला, लेकिन गलती से उस के मोबाइल में मोनू के साथ एक सेल्फी रह गई थी. उस फोटो को मृतक के बेटे फैंडली को दिखाया गया तो उस ने बताया कि यही वह मोनू है, जो उस रात उस के घर आया था.

पुलिस को अब मोनू को पकड़ना था. पुलिस को उस की लोकेशन मिल गई थी, इसलिए छापा मार कर तुरंत उसे गिरफ्तार कर लिया गया. वही असली मोनू था. रीवा के बेटे फैंडली ने उस की शिनाख्त भी कर दी. पूछताछ में उस ने अपना अपराध भी स्वीकार कर लिया. उस का नाम अजय उर्फ अभिमन्यु उर्फ मोनू चौधरी था.

बाबू की हत्या अवैध संबंधों की वजह से हुई थी. मोनू के अपराध स्वीकार कर लेने के बाद पुलिस ने रीवा को भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने जब उस से बाबू की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उस ने खुद को निर्दोष बताया. लेकिन जब उस का सामना मोनू से कराया गया तो उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने बाबू की हत्या की जो कहानी बताई, वह अवैध संबंधों की घिनौनी कहानी थी.

रीवा के पिता रतन बहुत पहले तमिलनाडु से मुंबई आ गए थे. मुंबई के उपनगर अंधेरी कुर्ला रोड पर स्थित जरीमरी बस्ती में उन के गांव के तमाम लोग रहते थे, इसलिए वह भी वहीं रहने लगे. उन्हें यहां कोई ढंग का काम नहीं मिला तो उन्होंने बस्ती के नाके पर पानबीड़ी का स्टाल लगा लिया. इसी की कमाई से उन के परिवार की गुजरबसर हो रही थी. उन के परिवार में पत्नी शांति के अलावा 2 बेटे और एक बेटी रीवा थी.

रीवा जब कालेज में पढ़ रही थी, तभी उसे प्राइमरी स्कूल से कालेज तक साथ पढ़ने वाले रमन से प्यार हो गया था. रीवा ने जहां ग्रेजुएशन कर के बीटीसी की, वहीं रमन की नौकरी दूसरे शहर में लग गई. इस के बावजूद वह रीवा से मिलता रहता था. रीवा रमन से शादी करना चाहती थी, लेकिन जब उस ने पिता से बात की तो उन्होंने रमन से उस की शादी करने से मना ही नहीं किया, बल्कि आननफानन में पड़ोस में रहने वाले अपनी ही जाति के बाबू से उस की शादी कर दी. मजबूरन रीवा को यह रिश्ता स्वीकार करना पड़ा.

बाबू कपड़ों की सिलाई का काम करता था और अपने बड़े भाई यशु के साथ रहता था. वह समाजसेवा के कामों में भी रुचि लेता था, इसलिए समाजसेवा करतेकरते एक समय ऐसा भी आया, जब वह रामदास अठावले की भारतीय रिपब्लिकन पार्टी से जुड़ गया. सामाजिक कार्यकर्ता होने की वजह से उसे जरीमरी बौद्ध विहार मंदिर का अध्यक्ष बना दिया गया था. शादी के कुछ दिनों तक तो बाबू अपने भाई के साथ रहा, लेकिन जल्दी ही उस ने उसी चाल में अपना खुद का मकान खरीद लिया और पत्नी के साथ रहने लगा. आगे चल कर संतान के रूप में उस के यहां 2 बेटे हुए, जिन में जीतू अब 17 साल का है और फैंडली 5 साल का.

बाबू की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए रीवा भी साकीनाका सफेद पुल के पास एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने लगी. इस से भी घर की हालत में सुधार नहीं आया तो बेटा जीतू भी किसी कंपनी में रात की ड्यूटी पर जाने लगा. वह शाम को जाता था तो सुबह ही आता था. रीवा की शादी भले ही बाबू से हो गई थी, लेकिन वह अपने पहले प्रेम को भुला नहीं पाई थी. शादी के बाद भी वह अपने प्रेमी रमन से मिलती रही, जबकि रमन की भी शादी हो गई थी. उस के भी बच्चे हो गए थे. शादी के कुछ दिनों बाद बाबू को इस की जानकारी हुई तो इस बात को ले कर अकसर दोनों में लड़ाईझगड़ा होने लगा.

किसी भी चीज की एक हद होती है. हद खत्म होते ही आदमी बगावत पर उतर आता है. रीवा की भी सहनशक्ति की हद खत्म हो चुकी थी. वह रोजरोज के लड़ाईझगड़े और मारपीट से तंग आ चुकी थी, इसलिए वह पति से छुटकारा पाना चाहती थी. लेकिन सवाल यह था कि यह काम करवाया किस से जाए. जिस से वह सुकून की जिंदगी जी सके. इसी चक्कर में रीवा की जिंदगी में मोनू आया. 22 वर्षीय मोनू उर्फ अजय उर्फ अभिमन्यू चौधरी उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज का रहने वाला था. काम की तलाश में वह मुंबई आया तो यहां गांव वालों के साथ कारपेंटर का काम करने लगा. मोनू की रीवा से मुलाकात उसी के स्कूल में हुई थी. मोनू स्कूल में फर्नीचर का काम करने आया था.

काम के दौरान ही रीवा उस से मिली तो न जाने क्यों उसे लगा कि यह आदमी उस का काम कर सकता है. फिर वह उस के आगेपीछे घूमने लगी. मोनू भी बच्चा नहीं था. उस के हावभाव से समझ गया कि वह क्या चाहती है. फिर दोनों जल्दी ही करीब आ गए. रीवा को मोनू से अपना काम निकलवाना था, इसीलिए वह उस के करीब आई थी. यही नहीं, अपने मकसद के लिए उस ने मोनू को अपना तन भी सौंप दिया. इस के बाद तो मोनू पूरी तरह उस के वश में हो गया. मोनू से बातचीत के लिए उस ने अपने नाम से एक सिमकार्ड भी ला कर उसे दे दिया था.

उस ने ऐसा इसलिए किया था कि एक तो कोई उस के इस रिश्ते पर शक न कर सके, दूसरे वह आसानी से उस के पति की हत्या के आरोप में फंस जाए. उस ने सोचा था कि पुलिस उसे गिरफ्तार कर के जेल भेज देगी, उस के बाद वह आसानी से अपने प्रेमी रमन से मिल सकेगी. इधर एक महीने से उस ने मोनू से मिलनाजुलना कम कर दिया था. जबकि मोनू उस से मिले बगैर रह नहीं सकता था. जब उस ने यह बात रीवा से कही तो उस ने कहा कि उस के संबंधों की जानकारी पति को हो गई है, जिस की वजह से वह उसे मारतापीटता है. अगर उसे उस से मिलनाजुलना है तो उस के पति नाम के इस कांटे को निकाल फेंके.

रीवा के प्रेम में मोनू कुछ इस तरह पागल था कि वह उस के लिए कुछ भी करने को तैयार था. भले ही वह उस के पति की हत्या ही क्यों न हो. रीवा यही तो चाहती थी. मोनू ने हामी भर दी तो उस ने उस के साथ मिल कर बाबू की हत्या की योजना बना डाली. 16 जुलाई की रात का समय भी तय हो गया. उस रात रीवा ने मकान का दरवाजा खुला छोड़ दिया. बड़ा बेटा अपनी ड्यूटी पर था. रीवा घर में छोटे बेटे के साथ थी. रात एक बजे के करीब मोनू दबे पांव उस के यहां पहुंचा. रीवा धीरे से फैंडली के पास से उठी और उस के साथ बाबू की चारपाई के पास आ गई. गहरी नींद में सो रहे बाबू के गले में उस ने अपना दुपट्टा डाल दिया तो दोनों ने उसे पूरी ताकत से कस दिया. पलभर छटपटा कर बाबू ने दम तोड़ दिया.

बाबू को मौत के घाट उतार कर दोनों कई बार उस के पास आएगए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि वह मर चुका है तो मोनू जोगेश्वरी स्थित अपने घर चला गया. रीवा सुबह उठी और स्कूल चली गई. सभी सामान्य रूप से अपनेअपने काम में लग गए. उन्हें पता नहीं था कि रात में फैंडली जाग गया था और उस ने मां और मोनू की हरकतों को देख लिया था. पूछताछ के बाद पुलिस ने मोनू उर्फ अजय उर्फ अभिमन्यु और रीवा के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर अंधेरी की अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में आर्थर रोड जेल भेज दिया गया. Mumbai Crime

UP Crime: उजड़ गया आशियाना – बाप बना कातिल

UP Crime: गांवों में आज भी ज्यादातर घरों में दिन ढलते ही रात का खाना बन जाता है. शाम के यही कोई साढ़े 6 बजे खाना खा कर सुरेंद्र सोने के लिए जानवरों के बाड़े में चला गया था. उस के जाने के बाद सुरेंद्र की पत्नी ममता, बेटा कुलदीप, दीपक, रतन और बहू प्रभा खाना खाने की तैयारी करने लगी थी. सभी खाने के लिए बैठने जा रहे थे कि तभी प्रभा के पिता फूल सिंह पाल, चाचा रामप्रसाद, भाई लाल सिंह उस के मौसेरे भाई टुंडा के साथ उन के यहां आ पहुंचे.

किसी के हाथ में कुल्हाड़ी थी तो कोई चापड़ लिए था तो कोई डंडा. उन्हें इस तरह आया देख कर घर के सभी लोग समझ गए कि इन के इरादे नेक नहीं हैं. वे कुछ कर पाते, उस से पहले ही उन्होंने प्रभा को पकड़ा और कुल्हाड़ी से उस की हत्या कर दी. प्रभा की सास ममता बहू को बचाने के लिए दौड़ी तो हमलावरों ने उसे भी कुल्हाड़ी से काट डाला.

ममता प्रभा की 9 महीने की बेटी को लिए थी, हत्यारों ने उसे छीन कर एक ओर फेंक दिया था. 2 लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद हमलावरों ने कुलदीप को पकड़ कर जमीन पर गिरा दिया. कुलदीप जान की भीख मांगने लगा तो फूल सिंह ने कहा, ‘‘कुलदीप, तुझे हम जान से नहीं मारेंगे, तुझे तो अपाहिज बना कर छोड़ देंगे, ताकि तू उम्र भर चलने को तरसे और अपनी बरबादी पर रोता रहे.’’

इतना कह कर फूल सिंह ने कुलदीप के दोनों पैर कुल्हाड़ी से काट दिए. सुरेंद्र की बुआ श्यामा और छोटेछोटे बच्चे चीखतेचिल्लाते रहे और गांव वालों से मदद की गुहार लगाते रहे, लेकिन गांव का कोई भी उन की मदद को नहीं आया. लोग अपनीअपनी छतों पर खड़े हो कर इस वीभत्स नजारे को देखते रहे.

कुछ ही देर में इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दे कर जिस तरह हमलावर आए थे, उसी तरह फरार हो गए. सुरेंद्र का घर खून से डूब गया था. 2 महिलाओं की खून से लथपथ लाशें पड़ी थीं, जबकि कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. हमलावरों के जाने के बाद गांव वाले जुटने शुरू हुए. खबर सुन कर सुरेंद्र और उस के मातापिता, भाई, चाचा आदि आ गए. लोमहर्षक नजारा देख कर वे सन्न रह गए.

सुरेंद्र ने पुलिस चौकी साढ़ को फोन कर के इस घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव घटना की सूचना कोतवाली घाटमपुर को दे कर हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, भीम प्रकाश, प्रवेश मिश्रा, संजय कुमार के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए.

घटना की सूचना पा कर कोतवाली घाटमपुर के प्रभारी गोपाल यादव और सीओ जे.पी. सिंह गांव ढुकुआपुर के लिए चल पड़े थे. ढुकुआपुर से पुलिस चौकी 8 किलोमीटर दूर थी इसलिए पुलिस टीम को वहां पहुंचने में पौन घंटा लग गया. 3 लोगों को खून में लथपथ देख कर पुलिस हैरान रह गई. देख कर ही लग रहा था कि कि यह सब दुश्मनी की वजह से हुआ है.

2 महिलाओं की मौत हो चुकी थी. कुलदीप दर्द से तड़प रहा था. पुलिस ने कुलदीप को स्वरूपनगर के एसएनआर अस्पताल भिजवाया. सूचना मिलने पर एसपी (देहात) अनिल मिश्रा भी वहां आ गए थे. पुलिस अधिकारियों ने आसपास के लोगों से घटना के बारे में जानना चाहा, लेकिन पुलिस के सामने किसी ने मुंह नहीं खोला. लोग अलगअलग बहाने बना कर वहां से खिसकने लगे. पुलिस समझ गई कि डर या किसी अन्य वजह से लोग कुछ भी बताने से कतरा रहे हैं.

हमलावरों ने सुरेंद्र की पत्नी ममता और बहू प्रभा की हत्या कर दी थी, जबकि बेटे कुलदीप के दोनों पैर काट दिए थे. पुलिस ने जब सुरेंद्र से पूछताछ की तो उस ने बताया कि यह सब कुलदीप की ससुराल वालों ने किया है. पुलिस ने सुरेंद्र पाल की ओर से फूल सिंह, उस के बेटे, भाई रामप्रसाद पाल, लाल सिंह, टुंडा उर्फ मामा और रामप्रसाद उर्फ छोटे के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 307, 452, 34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस ने दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए कानपुर भिजवा दिया था.

इस लोमहर्षक कांड के बाद गांव में दहशत फैल गई थी. गांव वाले दबी जुबान से तरहतरह की बातें कर रहे थे. एसएसपी यशस्वी यादव ने सीओ जे.पी. सिंह को निर्देश दिए कि वह जल्द से जल्द हमलावरों को गिरफ्तार करें. सीओ ने तुरंत ही प्रभारी निरीक्षक गोपाल यादव और चौकीप्रभारी वीरेंद्र प्रताप यादव के नेतृत्व में 2 टीमें गठित कीं.

पहली टीम में एसआई अखिलेश मिश्रा, कांस्टेबल धर्मेंद्र सिंह, प्रवेश बाबू और इरशाद अहमद को शामिल किया गया, जबकि दूसरी टीम में हेडकांस्टेबल अरविंद तिवारी, कांस्टेबल रईस अहमद, अजय कुमार यादव और भीम प्रकाश को भी शामिल किया गया. चूंकि आरोपी अपने घरों से फरार थे, इसलिए पुलिस टीमें उन की तलाश में संभावित जगहों पर छापे मारने लगीं. आखिर सुबह होतेहोते पुलिस को सफलता मिल ही गई. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह और रामप्रसाद उर्फ छोटे को गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की गई तो इस खूनी तांडव की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की प्रस्तावना पर लिखी हुई थी.

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर की एक तहसील है घाटमपुर. यहां से लगभग 50 किलोमीटर दूर बसा है एक गांव ढुकुआपुर. इस गांव में वैसे तो सभी जाति के लोग रहते हैं, लेकिन गड़रियों की संख्या कुछ ज्यादा है. इसी गांव में सुरेंद्र सिंह पाल भी अपने परिवार के साथ रहता था. वैसे सुरेंद्र पाल का पुश्तैनी मकान गांव के बीचोंबीच था, लेकिन भाइयों में जब बंटवारा हुआ तो वह गांव के बाहर खाली पड़ी जमीन पर मकान बना कर रहने लगा.

सुरेंद्र के परिवार में पत्नी ममता के अलावा 3 बेटे, कुलदीप, दीपक और करण थे. कुलदीप पढ़ाई के साथ पिता के काम में भी हाथ बंटाता था.  सुरेंद्र के पड़ोस में ही फूल सिंह पाल का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 3 बेटे और 1 बेटी प्रभा थी. प्रभा और कुलदीप एक ही स्कूल में पढ़ते थे. दोनों आसपास ही रहते थे, इसलिए स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे. दोनों साथसाथ खेलते और पढ़ते हुए जवान हुए तो उन की दोस्ती प्यार में कब बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला.

कुलदीप और प्रभा का प्यार कुछ दिनों तक तो चोरीछिपे चलता रहा, लेकिन वह इसे ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिपा न सके. वैसे भी प्यार कहां छिप पाता है. दोनों के प्रेमसंबंधों की बात गांव के लोगों तक पहुंची तो लोग उन के बारे में चटखारे ले ले कर बातें करने लगे.

गांव वालों से होते हुए यह बात किसी तरह प्रभा और कुलदीप के घर वालों के कानों तक पहुंची तो फूल सिंह ने पत्नी रानी से बात कर के प्रभा पर पाबंदी लगा दी कि वह घर के बाहर अकेली नहीं जाएगी. कहते हैं, बंदिशें लगाने से मोहब्बत और बढ़ती है. प्रभा की कुलदीप से मुलाकात भले ही नहीं हो पा रही थी, लेकिन फोन के जरिए बात होती रहती थी.

चूंकि उन्होंने पहले से ही तय कर लिया था कि वे प्यार में आने वाली हर रुकावट का विरोध करेंगे, इसलिए वे बगावत पर उतर आए. जमाने की परवाह किए बगैर अपने प्यार को मंजिल तक पहुंचाने के लिए वे जनवरी, 2012 में अपनेअपने घरों को छोड़ कर हरियाणा के गुड़गांव शहर चले गए. गुड़गांव में कुलदीप का एक दोस्त रहता था. कुलदीप ने उसी की मदद से आर्यसमाज रीति से प्रभा के साथ विवाह भी कर लिया. दोस्त की मदद से उसे दिल्ली की एक फैक्ट्री में नौकरी भी मिल गई. इस के बाद कुलदीप दिल्ली में किराए पर कमरा ले कर प्रभा के साथ रहने लगा.

प्रभा के इस तरह भाग जाने से फूल सिंह की बहुत बदनामी हुई. उस ने 16 जनवरी, 2012 को थाना घाटमपुर में कुलदीप के खिलाफ प्रभा को बरगला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी. रिपोर्ट में उस ने प्रभा को नाबालिग बताया था. मामला नाबालिग लड़की का था, इसलिए पुलिस ने सुरेंद्र पाल और उस के परिवार वालों पर शिकंजा कसा. मजबूरन कुलदीप को वापस जाना पड़ा.

चूंकि कुलदीप के खिलाफ पहले से रिपोर्ट दर्ज थी, इसलिए पुलिस ने कुलदीप को गिरफ्तार कर के पूछताछ की. प्रभा का मैडिकल परीक्षण कराया. मैडिकल में प्रभा की उम्र 18 साल से ऊपर निकली. वह संभोग की अभ्यस्त पाई गई.  प्रभा ने कुलदीप की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए कहा था कि उस ने कुलदीप के साथ अपनी मरजी से जा कर शादी की थी. प्रभा ने सुबूत के तौर पर अपने और कुलदीप के शादी के फोटो भी दिखाए. लेकिन पुलिस ने उस की एक न सुनी और कुलदीप को अदालत में पेश कर जेल भेज दिया.

मजिस्ट्रेट के सामने प्रभा के बयान कराए गए तो प्रभा ने वही सब कहा जो उस ने पुलिस के सामने चीखचीख कर कहा था. प्रभा के बयान और उस के बालिग होने की रिपोर्ट के मद्देनजर मजिस्ट्रेट ने प्रभा को उस की मरजी के अनुसार जहां और जिस के साथ जाने व रहने की इजाजत दे दी.

अदालत के फैसले के बाद प्रभा ने अपने घर के बजाय सासससुर के साथ जाने की इच्छा जताई तो पुलिस ने उसे कुलदीप के घर पहुंचा दिया. बेटी के इस फैसले से फूल सिंह और उस के धर वालों ने बड़ी बेइज्जती महसूस की. कुछ दिनों बाद कुलदीप भी छूट कर घर आ गया. माहौल खराब न हो, इसलिए कुलदीप प्रभा को ले कर फिर से दिल्ली चला गया. जनवरी, 2013 में प्रभा ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने शिवानी रखा.

समय का पहिया अपनी गति से चलता रहा. शिवानी भी 9 महीने की हो गई. अपने मातापिता से भी कुलदीप के संबंध ठीक हो गए थे. वह अकसर घर वालों से फोन पर बातचीत करता रहता था. लेकिन फूल सिंह ने बेटी से हमेशा के लिए संबंध खत्म कर लिए थे. कुलदीप बेटी का मुंडन संस्कार कराना चाहता था, इसलिए घर वालों से बात कर के वह पत्नी और बेटी को ले कर 9 अक्तूबर, 2013 को अपने गांव ढुकुआपुर आ गया.

सुरेंद्र पाल ने मुंडन संस्कार की सारी तैयारियां पहले से ही कर रखी थीं. 10 अक्तूबर को बड़ी धूमधाम से शिवानी का मुंडन संस्कार हुआ. प्रभा के मातापिता ने कुलदीप को अपना दामाद स्वीकार नहीं किया था. वह कुलदीप से खुंदक खाए बैठा था. इसलिए सुरेंद्र ने मुंडन कार्यक्रम में फूल सिंह और उस के परिवार वालों को नहीं बुलाया था.

गांव वाले मुंडन की दावत खा कर जब लौट रहे थे तो तरहतरह की बातें कर रहे थे. वे बातें फूल सिंह ने सुनीं तो उस का खून खौल उठा. उस ने उसी समय कुलदीप और उस के घर वालों को सबक सिखाने का निश्चय कर लिया. इस बारे में उस ने मोहद्दीपुर थाना बकेवर में रहने वाले अपने भाई रामप्रसाद से सलाह- मशविरा कर के उसे भी शामिल कर लिया. अब इंतजार था, सुरेंद्र के मेहमानों के चले जाने का. 13 अक्तूबर को उस के यहां से सभी मेहमान चले गए. केवल सुरेंद्र की बुआ श्यामा रह गई थीं.

14 अक्तूबर, 2013 की शाम सुरेंद्र खाना खा कर घर से करीब 50 मीटर दूर जानवरों के बाड़े में सोने चला गया. उस की पत्नी ममता बच्चों को खाना खिलाने की तैयारी कर रही थी तभी फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद आदि कुल्हाड़ी, चापड़ और डंडे ले कर सुरेंद्र के घर में दाखिल हुए.

घर वाले कुछ समझ पाते उस से पहले उन्होंने प्रभा की हत्या की, क्योंकि उसी की वजह से समाज में उन की नाक कटी थी. ममता बहू को बचाने आई तो उन्होंने उसे भी काट डाला. उस के बाद कुलदीप के दोनों पैर काट दिए. इतना सब कर के वे फरार हो गए. पुलिस ने फूल सिंह, लाल सिंह, रामप्रसाद उर्फ छोटे पाल से पूछताछ कर के सभी को जेल भेज दिया.

पुलिस ने टुंडा उर्फ मामा से पूछताछ करने के बाद उसे छोड़ दिया. पुलिस का कहना था कि उस का एक हाथ कटा था. एक हाथ से वह किसी पर हमला नहीं कर सकता. दूसरे पुलिस जब उस के घर फरीदपुर पहुंची तो वह घर पर ही सोता मिला था. अगर वह हत्या जैसे जघन्य अपराध में शामिल होता तो अन्य हमलावरों की तरह वह भी घर से फरार होता. वह आराम से अपने घर में नहीं सो रहा होता.

उधर सुरेंद्र का कहना है कि टुंडा घटना में शामिल था. पुलिस ने जानबूझ कर उसे छोड़ दिया. सच्चाई जो भी हो, इस लोमहर्षक कांड ने यह तो साबित कर दिया है कि लोग खुद को कितना भी आधुनिक कहें, लेकिन अभी उन की सोच नहीं बदली है. अगर फूल सिंह बेटी की पसंद को स्वीकार कर लेता तो उसे इस जघन्य अपराध के आरोप में जेल न जाना पड़ता. कथा लिखे जाने तक कुलदीप अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहा था. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्र और जनचर्चा पर आधारित

UP Crime: बेटी के प्यार में विलेन बने पापा

UP Crime: उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का एक थाना है नौहझील. इस थाना क्षेत्र के गांव अड्डा मीना फिरोजपुर निवासी बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह ने 25 जनवरी, 2023 को अपनी 17 वर्षीय बेटी अनन्या को गांव के ही युवक रामगोपाल उर्फ गोपाल द्वारा भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. रिपोर्ट में बदन सिंह ने आरोप लगाया था कि 22 जनवरी को उन की बेटी अनन्या पशुओं के लिए चारा लेने खेत पर गई थी. उन के गांव का ही रहने वाला रामगोपाल उर्फ गोपाल उन की बेटी को वहां से बहलाफुसला कर अपने साथ भगा ले गया.

पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बाद आरोपी गोपाल को 27 जनवरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. लेकिन अनन्या का कोई पता नहीं चल सका. इस के बाद भी पुलिस उस की तलाश में जुटी रही. अनन्या की तलाश में पुलिस ने हर उस जगह दबिश दी, जहां उस के होने की संभावना थी.

मुखबिर ने दी पुलिस को जानकारी

अनन्या की तलाश में जुटी नौहझील पुलिस को मुखबिर ने सूचना दी कि उस की हत्या की जा चुकी है. अब पुलिस के सामने प्रश्न यह था कि अनन्या 22 जनवरी को अपने प्रेमी के साथ गई थी. 25 जनवरी को रिपोर्ट दर्ज होने के बाद 27 जनवरी को रामगोपाल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया तो उस के जेल जाने के बाद अनन्या की हत्या किस ने, कब और कहां की? पुलिस को यह भी शक हो रहा था कि प्रेमी गोपाल के जेल चले जाने से दुखी अनन्या ने कहीं आत्महत्या तो नहीं कर ली?

लेकिन बाद में मुखबिर ने पुलिस को यह भी सूचना दी कि अनन्या की हत्या उस के पापा बदन सिंह और चाचा ने षडयंत्र के तहत मिल कर की है. वे लोग अब अपने घर पर बेफिक्र हो कर बैठे हुए हैं. मुखबिर से मिली सूचना के बाद पुलिस ने अनन्या के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर व चाचा तेजपाल को थाने बुलाया. उन से पूछताछ की गई.

दोनों ने बताया कि वे पलवल में अनन्या के होने की सूचना पर उस की तलाश में गए थे. लेकिन वहां काफी तलाश करने के बाद भी वह नहीं मिली. इस के बाद वह वापस गांव आ गए. अनन्या के बारे में सही जानकारी रामगोपाल ही दे सकता है. पलवल से वापस आने के बाद गांव वालों को भी दोनों भाइयों ने यही बात बताई कि अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला.

पलवल जाने के बाद बंद कर दी तलाश

पुलिस को जांच में पता चला कि अनन्या की तलाश में घर वाले पलवल गए जरूर थे, लेकिन इस के बाद उन्होंने उस की तलाश बंद कर दी है. इस जानकारी के मिलने के बाद एसएचओ धर्मेंद्र भाटी ने बलवीर व तेजपाल दोनों की कल डिटेल्स निकलवाई, जिस से हत्या का राज खुल गया. सबूत मिलने के बाद दोनों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया. जब पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो वे अपने गुनाह को ज्यादा देर तक छिपा नहीं सके. दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

दोनों ने बताया कि उन्होंने अनन्या की हत्या कर लाश अलीगढ़ की शिवाला नहर में फेंक दिया था. इस संबंध में पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा पुलिस ने 31 जनवरी, 2023 को एक लडक़ी का शव बरामद किया था. पुलिस दोनों को थाना गोंडा ले गई. वहां लाश के फोटो और कपड़ों के आधार पर अनन्या के रूप में कर ली. इस के बाद उन्होंने अनन्या की हत्या किए जाने की बेहद चौंकाने वाली कहानी बताई—

अनन्या ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि उसी दौरान उस की मुलाकात रामगोपाल से हुई. उसी के गांव का रहने वाला 22 वर्षीय रामगोपाल उर्फ गोपाल एक निजी टेलीकाम कंपनी में काम करता है. गांव में आतेजाते समय अनन्या और रामगोपाल की नजरें अकसर मिल जातीं. अनन्या मुसकरा कर नजरें झुका लेती. गोपाल को अनन्या की यह अदा भा गई. उस दिन के बाद से दोनों जब तक एकदूसरे को देख नहीं लेते, उन के दिलों को चैन नहीं मिलता था.

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दोनों के बीच हुई दोस्ती

दोनों के बीच मौन प्यार चल रहा था. रामगोपाल को अनन्या ने अपने मौन प्यार के बंधन में पूरी तरह बांध लिया था. आखिर एक दिन जब रास्ते में जाते हुए अनन्या मिली तो मौका देख कर रामगोपाल ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘अनन्या, तुम मुझ से बात क्यों नहीं करती?’’

“तुम ही कौन सा मुझ से बात करते हो.’’ अनन्या ने जवाब दिया. यह सुन कर गोपाल निरुत्तर हो गया. कुछ पल बाद वह बोला, ‘‘अनन्या, तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. क्या मुझ से दोस्ती करोगी?’’

“करूंगी, जरूर करूंगी,’’ कहते हुए वह तेजी से कदम बढ़ाते हुए अपने घर की ओर चली गई. उस दिन के बाद से दोनों चोरीचोरी मिल लेते थे. धीरेधीरे दोनों का प्यार परवान चढऩे लगा. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. अब दोनों घंटों तक एकदूसरे से बतियाते, अपने भविष्य के सुखद सपने संजोते हैं. रामगोपाल और अनन्या जमाने की सोच की परवाह किए बिना अपने प्यार की पींगें बढ़ाने में लगे हुए थे.

कहते हैं प्यार को चाहे लाख छिपाने की कोशिश की जाए, लेकिन वह उजागर हो ही जाता है. गांव के लोगों ने दोनों को एक साथ देख लिया. इस के बाद तो दोनों के घर वालोयं को उन के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चल गया. अनन्या के घर वालों ने इस का विरोध किया. लेकिन अनन्या ने अपने घर वालों से साफ कह दिया कि रामगोपाल और वह एकदूसरे को प्यार करतेे हैं. वह उस के साथ शादी करेगी. बेटी की इस बेबाकी पर घर वाले सन्न रह गए. उन्होंने उसे बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी.

तब घर वालों ने उस के रामगोपाल से मिलने पर सख्त पाबंदी लगा दी. पर अनन्या इस के बाद भी प्रेमी से फोन पर बातें करती रहती थी. अनन्या दिन और रात में अपने प्रेमी रामगोपाल उर्फ गोपाल से बात करती थी. इस की भनक अनन्या की दादी को लग गई. इस पर घटना से 2 महीने पहले दादी ने अनन्या से उस का फोन छीन लिया था. अनन्या तभी से फोन के लिए घर में झगड़ा करती रहती थी. उस के तेवर बगावती हो गए थे. उस ने अपने मम्मीपापा से साफ कह दिया था कि वह रामगोपाल के साथ ही शादी करेगी अन्यथा अपनी जान दे देगी.

प्रेमी के साथ भाग गई

22 जनवरी, 2023 को जब घर वाले गहरी नींद में सोए हुए थे, अनन्या सुबह के समय घर से अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ भाग गई. दोनों ने एक दिन पहले ही भागने की योजना बना ली थी. इस बात का दोनों के घरवालों को पता नहीं चल सका था. अनन्या के घरवालों को बेटी के इस तरह घर से भाग जाना बेहद नागवार गुजरा. अनन्या के चले जाने पर घर वाले परेशान हो गए. अनन्या के प्रेमी के साथ भाग जाने की खबर पूरे गांव में जंगल की आग की तरह फैल गई. समाज में उन का सिर शर्म से झुक गया. उन्होंने अनन्या को काफी तलाशा, इस बीच उन्हें जानकारी मिली कि अनन्या अपने प्रेमी रामगोपाल के साथ पलवल चली गई है.

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एसएचओ धर्मेंद्र भाटी व एसआई मनोज चौधरी ने बताया कि अनन्या गोपाल के साथ ही शादी करने की जिद पर अड़ी थी. जबकि इस के लिए उस के घरवाले राजी नहीं थे. अनन्या के घर से भाग जाने की घटना ने आग में घी का काम किया. उस के पापा बदन सिंह उर्फ बलवीर सिंह का खून खौल उठा, क्योंकि उन का गांव में निकलना मुश्किल हो गया.

अनन्या के गायब होने के बाद जहां पुलिस उसे तलाश रही थी, वहीं घर वाले भी उस की तलाश में जुटे थे. पिता बदन सिंह को जानकारी मिली कि अनन्या हरियाणा के पलवल में मौजूद है. इस जानकारी पर बदन सिंह अपने छोटे भाई तेजपाल सिंह के साथ पलवल जा पहुंचा. दोनों ने अनन्या को ढूंढ लिया. लेकिन वह उन के साथ आने को तैयार नहीं हुई. आखिर गोपाल से शादी कराने की बात पर वह उन के साथ घर आने को तैयार हो गई.

झूठी आन की खातिर पिता बना हत्यारा

अनन्या को उस के पापा व चाचा बाइक पर बैठा कर टप्पल-जट्ïटारी मार्ग से होते हुए अलीगढ़ जिले के थाना खैर क्षेत्र में स्थित शिवाला नहर के पास पहुंचे. यहां दोनों भाइयों ने बाइक रोक ली. सुस्ताने के बहाने वे सब नहर किनारे बैठ गए. वहां पर पिता व चाचा ने अनन्या को एक बार फिर समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह रामगोपाल से शादी की बात पर अड़ी रही.

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फिर लोकलाज और समाज में अपनी इज्जत के डर से बदन सिंह ने अपने भाई तेजपाल की मदद से अनन्या का गला घोंट कर हत्या कर दी और शव नहर में फेंक दिया. नहर के गहरे पानी में वह डूब गई. यानी एक पिता ने ही बेटी की हत्या कर दी. दोनों भाई अनन्या को नहर में फेंक कर अपने गांव लौट आए. गांव में पूछने पर दोनों ने बताया कि उन्हें अनन्या का कोई सुराग नहीं मिला. इसलिए वे वापस आ गए. जबकि हकीकत यह थी कि दोनों ने उस की हत्या कर दी थी.

एसएचओ धर्मेंद्र भाटी के अनुसार, घर वालों ने अनन्या को 22 जनवरी को ही पलवल (हरियाणा) से बरामद कर लिया था. उसी दिन उन्होंने उस की हत्या कर लाश नहर में फेंक दी थी. इस घटना के 3 दिन बाद बदन सिंह ने प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ बेटी को भगा ले जाने की रिपोर्ट दर्ज करा उसे जेल भिजवा दिया था.

शव 15 किलोमीटर बह कर पहुंचा गोंडा क्षेत्र में

उधर अनन्या की लाश नहर में बहते हुए 15 किलोमीटर दूर अलीगढ़ जिले के थाना गोंडा क्षेत्र में पहुंच गई. नहर में एक युवती का शव मिलने की सूचना पर वहां की पुलिस ने गोताखोरों की मदद से शव को नहर से बाहर निकाला.

चूँकि शव नहर में कहीं से बह कर आया था, इस के चलते उस की पहचान नहीं हो सकी. पुलिस यह पता लगाने में जुट गई कि युवती ने आत्महत्या की है या यह औनर किलिंग का मामला तो नहीं है? थाना गोंडा पुलिस ने शव को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था.

पुलिस ने 72 घंटे इंतजार किया. लेकिन युवती की शिनाख्त नहीं हो सकी. इस पर उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस ने युवती के फोटो कराने के साथ ही उस के कपड़ों को सुरक्षित रख लिया था. इस के साथ ही आसपास के थानों से संपर्क किया. तब अनन्या की लाश मिलने की बात पुलिस के संज्ञान में आई.

बेटी के प्रेमप्रसंग में विलेन बना बाप

मोहब्बत के दुश्मन बने बलवीर सिंह ने अपनी बेटी अनन्या को बहलाफुसला कर भगा ले जाने की रिपोर्ट अनन्या के प्रेमी रामगोपाल के खिलाफ दर्ज कराई थी, वह अब भी इस आरोप में जेल में बंद है. अभी उस की जमानत नहीं हुई है.बेटी के प्रेम प्रसंग में हत्या कर के विलेन बने उस के पापा व चाचा यही सोच रहे थे कि उन की इस साजिश का किसी को पता ही नहीं चलेगा, लेकिन यह उस की भूल थी.

पुलिस ने अनन्या की हत्या की गुत्थी को सुलझा कर पिता बलवीर सिंह व चाचा तेजपाल सिंह को अनन्या की हत्या करने व सबूतों को छिपाने के आरोप में 21 फरवरी, 2023 को गिरफ्तार कर हत्या में प्रयोग की गई बाइक को भी बरामद कर ली. दोनों को न्यायालय के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया.

अपराध करने वाला अपने आप को अपराध करते समय चाहे कितना भी होशियार समझे, लेकिन अंत में वह पकड़ा जरूर जाता है. झूठी आन की खातिर एक पिता ही अपनी बेटी का कातिल बन गया और एक प्रेमकहानी का दर्दनांक अंत हो गया. UP Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अनन्या नाम परिवर्तित है.

Love Story: बहन का प्यार – यार बना गद्दार

Love Story: निश्चित जगह पर पहुंच कर अखिलेश उर्फ चंचल को प्रियंका दिखाई नहीं दी तो वह बेचैन हो उठा. उस बेचैनी में वह इधरउधर  टहलने लगा. काफी देर हो गई और प्रियंका नहीं आई तो वह निराश होने लगा. वह घर जाने के बारे में सोच रहा था कि प्रियंका उसे आती दिखाई दे गई. उसे देख कर उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. प्रियंका के पास आते ही वह नाराजगी से बोला, ‘‘इतनी देर क्यों कर दी प्रियंका. मैं कब से तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. अच्छा हुआ तुम आ गईं, वरना मैं तो निराश हो कर घर जाने वाला था.

‘‘जब प्यार किया है तो इंतजार करना ही पड़ेगा. मैं तुम्हारी तरह नहीं हूं कि जब मन हुआ, आ गई. लड़कियों को घर से बाहर निकलने के लिए 50 बहाने बनाने पड़ते हैं.’’ प्रियंका ने तुनक कर कहा.

‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारे लिए तो मैं कईकई दिनों तक इंतजार करते हुए बैठा रह सकता हूं. क्योंकि मैं दिल के हाथों मजबूर हूं,’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘प्रियंका, मैं चाहता हूं कि तुम आज कालेज की छुट्टी करो. चलो, हम सिनेमा देखने चलते हैं.’’

प्रियंका तैयार हो गई तो अखिलेश पहले उसे एक रेस्टोरेंट में ले गया. नाश्ता करने के बाद दोनों सिनेमा देखने चले गए.

सिनेमा देखते हुए अखिलेश छेड़छाड़ करने लगा तो प्रियंका ने कहा, ‘‘दिनोंदिन तुम्हारी शरारतें बढ़ती ही जा रही हैं. शादी हो जाने दो, तब देखती हूं तुम कितनी शरारत करते हो.’’

‘‘शादी नहीं हुई, तब तो इस तरह धमका रही हो. शादी के बाद न जाने क्या करोगी. अब तो मैं तुम से शादी नहीं कर सकता.’’ अखिलेश ने कान पकड़ते हुए कहा.

‘‘अब मुझ से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है. शादी तो मैं तुम्हीं से करूंगी.’’ प्रियंका ने कहा.

‘‘फिर तो मुझे यही गाना पड़ेगा कि ‘शादी कर के फंस गया यार.’’’ अखिलेश ने कहा तो प्रियंका हंसने लगी.

प्रियंका उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार के मोहल्ला बाड़ूजई प्रथम के रहने वाले चंद्रप्रकाश सक्सेना की बेटी थी. वह ओसीएफ में दरजी थे. उन के परिवार में प्रियंका के अलावा पत्नी सुखदेवी, 2 बेटे संतोष, विपिन तथा एक अन्य बेटी कीर्ति थी. बड़े बेटे संतेष की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी प्रीति के साथ दिल्ली में रहता था.

कीर्ति की भी शादी शाहजहांपुर के ही मोहल्ला तारोवाला बाग के रहने वाले राजीव से हुई थी. वह अपनी ससुराल में आराम से रह रही थी. गै्रजएुशन कर के विपिन ने मोबाइल एसेसरीज की दुकान खोल ली थी. जबकि प्रियंका अभी पढ़ रही थी. प्रियंका घर में सब से छोटी थी, इसलिए पूरे घर की लाडली थी. विपिन तो उसे जान से चाहता था.

प्रियंका बहुत सुंदर तो नहीं थी, लेकिन इतना खराब भी नहीं थी कि कोई उसे देख कर मुंह मोड़ ले. फिर जवानी में तो वैसे भी हर लड़की सुंदर लगने लगती है. इसलिए जवान होने पर साधारण रूपरंग वाली प्रियंका को भी आतेजाते उस के हमउम्र लड़के चाहत भरी नजरों से ताकने लगे थे. उन्हीं में एक था उसी के भाई के साथ मोबाइल एसेसरीज का धंधा करने वाला अखिलेश यादव उर्फ चंचल.

अखिलेश उर्फ चंचल शाहजहांपुर के ही मोहल्ला लालातेली बजरिया के रहने वाले भगवानदीन यादव का बेटा था. भगवानदीन के परिवार में पत्नी सुशीला देवी के अतिरिक्त 3 बेटे मुनीश्वर उर्फ रवि, अखिलेश उर्फ चंचल, नीलू और 2 बेटियां नीलम और कल्पना थीं. अखिलेश उस का दूसरे नंबर का बेटा था. भगवानदीन यादव कभी जिले का काफी चर्चित बदमाश था. उस की और उस के साथी रामकुमार की शहर में तूती बोलती थी.

रामकुमार की हत्या कर दी गई तो अकेला पड़ जाने की वजह से भगवानदीन ने बदमाशी से तौबा कर लिया और अपने परिवार के साथ शांति से रहने लगा. लेकिन सन 2002 में उस के सब से छोटे बेटे नीलू की बीमारी से मौत हुई तो वह इस सदमे को बरदाश्त नहीं कर सका और कुछ दिनों बाद उस की भी हार्टअटैक से मौत हो गई.

बड़ी बेटी नीलम का विवाह हो चुका था. पिता की मौत के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी बड़े बेटे रवि ने संभाल ली थी. वह ठेकेदारी करने लगा था. हाईस्कूल पास कर के अखिलेश ने भी पढ़ाई छोड़ दी और मोबाइल एसेसरीज का धंधा कर लिया. एक ही व्यवसाय से जुड़े होने की वजह से कभी विपिन और अखिलेश की बाजार में मुलाकात हुई तो दोनों में दोस्ती हो गई थी.

दोस्ती होने के बाद कभी अखिलेश विपिन के घर आया तो उस की बहन प्रियंका को देख कर उस पर उस का दिल आ गया. फिर तो वह प्रियंका को देखने के चक्कर में अकसर उस के घर आने लगा. कहने को वह आता तो था विपिन से मिलने, लेकिन वह तभी उस के घर आता था, जब वह घर में नहीं होता था. ऐसे में भाई का दोस्त होने की वजह से उस की सेवासत्कार प्रियंका को करनी पड़ती थी. उसी बीच वह प्रियंका के नजदीक आने की कोशिश करता.

उस के लगातार आने की वजह से विपिन से उस की दोस्ती गहरी हो ही गई, प्रियंका से भी उस की नजदीकी बढ़ गई. इस के बाद विपिन और अखिलेश ने मिल कर मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली एक नामी कंपनी की एजेंसी ले ली तो उन का कारोबार भी बढ़ गया और याराना भी. इस से उन का एकदूसरे के घर आनाजान ही नहीं हो गया, बल्कि अब साथसाथ खानापीना भी होने लगा था.

अब अखिलेश को प्रियंका के साथ समय बिताने का समय ज्यादा से ज्यादा मिलने लगा था. उस ने इस का फायदा उठाया. उसे अपने आकर्षण में ही नहीं बांध लिया, बल्कि उस से शारीरिक संबंध भी बना लिए. वह विपिन की अनुपस्थिति का पूरा फायदा उठाने लगा. विपिन के चले जाने के बाद केवल मां ही घर पर रहती थी. वह घर के कामों में व्यस्त रहती थी. फिर उसे बेटी पर ही नहीं, बेटे के दोस्त पर भी विश्वास था, इसलिए उस ने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वे दोनों क्या कर रहे हैं.

प्रियंका अपने भाई और परिवार को धोखा दे रही थी तो अखिलेश अपने दोस्त के साथ विश्वासघात कर रहा था. वह भी ऐसा दोस्त, जो उस पर आंख मूंद कर विश्वास करता था. उसे भाई से बढ़ कर मानता था. प्रियंका और अखिलेश क्या कर रहे हैं, किसी को कानोकान खबर नहीं थी. जबकि जो कुछ भी हो रहा था, वह सब घर में ही सब की नाक के नीचे हो रहा था.

संतोष की पत्नी प्रीति को बच्चा होने वाला था, इसलिए संतोष ने प्रीति को शाहजहांपुर भेज दिया. डिलीवरी की तारीख नजदीक आ गई तो उसे जिला अस्पताल में भरती करा दिया गया. प्रीति के अस्पताल में भरती होने की वजह से विपिन और उस की मां का ज्यादा समय अस्पताल में बीतता था.

छुट्टी न मिल पाने की वजह से संतोष नहीं आ सका था. उस स्थिति में प्रियंका को घर में अकेली रहना पड़ रहा था. विपिन को अखिलेश पर पूरा विश्वास था, इसलिए प्रियंका और घर की जिम्मेदारी उस ने उस पर सौंप दी थी. अखिलेश और प्रियंका को इस से मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. जब तक प्रीति अस्पताल में रही, दोनों दिनरात एकदूसरे की बांहों में डूबे रहे.

26 फरवरी, 2014 को प्रीति को जिला अस्पताल में बेटा पैदा हुआ था. खुशी के इस मौके पर अखिलेश ने 315 बोर के 2 तमंचे और 10 कारतूस ला कर विपिन को दिए थे. भतीजा पैदा होने पर दोनों ने उन तमंचों से एकएक फायर भी किए थे. बाकी 8 कारतूस और दोनों तमंचे अखिलेश ने विपिन से यह कह कर उस के घर रखवा दिए थे कि भतीजे के नामकरण संस्कार पर काम आएंगे. विपिन ने दोनों तमंचे और कारतूस अपने कमरे में बैड पर गद्दे के नीचे छिपा कर रख दिए थे.

विपिन पुलिस में भरती होना चाहता था, इसलिए रोजाना सुबह 5 बजे उठ कर जिम जाता था. वहां से वह 9 बजे के आसपास लौटता था. कभीकभी उसे देर भी हो जाती थी. 23 मार्च को विपिन 9 बजे के आसपास घर लौटा तो मां नीचे बरामदे में बैठी आराम कर रही थीं. भाभी प्रीति बच्चे के साथ सामने वाले कमरे में लेटी थी. उस ने कपड़े बदले और ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में सोने के लिए चला गया.

विपिन ने दरवाजे को धक्का दिया तो पता चला वह अंदर से बंद है. इस का मतलब अंदर कोई था. उस ने आवाज दी, लेकिन अंदर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. उस ने पूरी ताकत से दरवाजे पर लात मारी तो अंदर लगी सिटकनी उखड़ गई और दरवाजा खुल गया. अंदर अखिलेश और प्रियंका खड़े थे. दोनों की हालत देख कर विपिन को समझते देर नहीं लगी कि अंदर क्या कर रहे थे. उन के कपड़े अस्तव्यस्त थे और वे काफी घबराए हुए थे.

विपिन के कमरे में घुसते ही प्रियंका निकल कर नीचे की ओर भागी. विपिन का खून खौल उठा था. उस ने गुस्से में अखिलेश को एक जोरदार थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘तुझे मैं दोस्त नहीं, भाई मानता था. मैं तुझ पर कितना विश्वास करता था और तूने क्या किया? जिस थाली में खाया, उसी में छेद किया.’’

‘‘भाई, मैं प्रियंका से सच्चा प्यार करता हूं और उसी से शादी करूंगा.’’ अखिलेश ने कहा, ‘‘वह मुझ से शादी को तैयार है.’’

‘‘तुम दोनों को पता था कि हमारी जाति एक नहीं है तो यह कैसे सोच लिया कि तुम्हारी शादी हो जाएगी?’’ विपिन गुस्से से बोला, ‘‘तुम ने जो किया, ठीक नहीं किया. मेरी इज्जत पर तुम ने जो हाथ डाला है, उस की सजा तो तुम्हें भोगनी ही होगी.’’

अखिलेश को लगा कि उसे जान का खतरा है तो उस ने जेब से 315 बोर का तमंचा निकाल लिया. वह गोली चलाता, उस के पहले ही विपिन ने उस के हाथ पर इतने जोर से झटका मारा कि तमंचा छूट कर जमीन पर गिर गया. अखिलेश ने तमंचा उठाना चाहा, लेकिन विपिन ने फर्श पर पड़े तमंचे को अपने पैर से दबा लिया.

अखिलेश कुछ कर पाता, विपिन ने बैड पर गद्दे के नीचे रखे दोनों तमंचे और आठों कारतूस निकाल कर उस में से एक तमंचा जेब में डाल लिया और दूसरे में गोली भर कर अखिलेश पर चला दिया. गोली अखिलेश के सीने में लगी. वह जमीन पर गिर गया तो विपिन ने एक गोली उस के बाएं हाथ और एक पेट में मारी. 3 गोलियां लगने से अखिलेश की तुरंत मौत हो गई.

अखिलेश का खेल खत्म कर विपिन नीचे आ गया. प्रियंका बरामदे में दुबकी खड़ी थी. उस के पास जा कर उस ने पूछा, ‘‘मैं ने सही किया या गलत?’’

प्रियंका ने जैसे ही कहा, ‘‘गलत किया.’’ विपिन ने उस की कनपटी पर तमंचे की नाल रख कर ट्रिगर दबा दिया. प्रियंका कटे पेड़ की तरह फर्श पर गिर पड़ी. इस के बाद उस ने एक गोली और चलाई, जो प्रियंका के सीने में बाईं ओर लगी. प्रियंका की भी मौत हो गई. प्रियंका को खून से लथपथ देख कर उस की मां और भाभी बेहोश हो गईं.

अखिलेश और प्रियंका की हत्या कर विपिन घर से बाहर निकला तो सामने पड़ोसी सचिन पड़ गया. सचिन से उस की पुरानी खुन्नस थी. उस ने उस की ओर तमंचा तान दिया. विपिन का इरादा भांप कर सचिन अपने घर के अंदर भागा. विपिन भी पीछेपीछे उस के घर में घुस गया. सचिन कहीं छिपता, विपिन ने उस पर भी गोली चला दी. गोली उस की कमर में लगी, जिस से वह भी फर्श पर गिर पड़ा.

सचिन के घर से निकल कर विपिन अपने एक अन्य दुश्मन सतीश के घर में घुस कर 2 गोलियां चलाईं. लेकिन ये गोलियां किसी को लगी नहीं. अब तक शोर और गोलियों के चलने की आवाज सुन कर आसपड़ोस वाले इकट्ठा हो गए थे. लेकिन विपिन के हाथ में तमंचा देख कर कोई उसे पकड़ने की हिम्मत नहीं कर सका. इसलिए विपिन एआरटीओ वाली गली में घुस कर आराम से फरार हो गया.

किसी ने कोतवाली सदर बाजार पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी थी. चंद मिनटों में ही कोतवाली इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए थे. इस के बाद उन की सूचना पर पुलिस अधीक्षक राकेशचंद्र साहू, अपर पुलिस अधीक्षक (नगर) ए.पी. सिंह, फोरेंसिक टीम और डाग स्क्वायड की टीम भी वहां आ गई थी.

पुलिस तो आ गई, लेकिन अपनी नौकरी पर गए चंद्रप्रकाश को किसी ने इस बात की सूचना नहीं दी. काफी देर बाद सूचना पा कर वह घर आए तो बेटी की लाश देख कर बेहोश हो गए. एक ओर बेटी की लाश पड़ी थी तो दूसरी ओर उस की और उस के प्रेमी की हत्या के आरोप में बेटा फरार था.

सचिन की हालत गंभीर थी. इसलिए पुलिस ने उसे तुरंत सरकारी अस्पताल भिजवाया. उस की हालत को देखते हुए सरकारी अस्पताल के डाक्टरों ने उसे कनौजिया ट्रामा सेंटर ले जाने को कहा. लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. तब उसे वसीम अस्पताल ले जाया गया. डा. वसीम ने उस का औपरेशन कर के फेफड़े के पार झिल्ली में फंसी गोली निकाली. इस के बाद उस की हालत में कुछ सुधार हुआ.

फोरेंसिक टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य उठा लिए. डाग स्क्वायड टीम ने खोजी कुतिया लूसी को छोड़ा. वह विपिन के घर से निकल कर सतीश के घर तक गई, जहां विपिन ने 2 गोलियां चलाई थीं. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारियों को समझते देर नहीं लगी कि मामला अवैध संबंधों में हत्या का यानी औनर किलिंग का है.

पुलिस ने घटनास्थल की सारी काररवाई निपटा कर दोनों लाशों को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद थाने आ कर इंसपेक्टर यतेंद्र भारद्वाज ने अखिलेश के बड़े भाई मुनीश्वर यादव की ओर से विपिन सक्सेना के खिलाफ अखिलेश और प्रियंका की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. इस के बाद विपिन की तलाश शुरू हुई.

26 मार्च की सुबह पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर विपिन को पुवायां रोड पर चिनौर से पहले हाइड्रिल पुलिया के पास से गिरफ्तार कर लिया. उस समय वह अपने चचेरे भइयों सुशील और लल्ला के पास चिनौर जा रहा था. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने बिना किसी हीलाहवाली के अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

पूछताछ में विपिन ने पुलिस को बताया कि जिस यार को मैं भाई की तरह मानता था, उस ने मेरी इज्जत पर हाथ डाला तो मुझे इतना गुस्सा आया कि मैं ने उस का खून कर दिया. घटना को अंजाम देने के बाद वह एआरटीओ वाली गली के पास से निकल रहे नाले में अखिलेश से छीना तमंचा और अपनी खून से सनी टीशर्ट निकाल कर फेंक दी थी.

खाली बनियान और जींस पहने हुए वह एआरटीओ गली से रोडवेड बसस्टैंड पहुंचा. यहां से उस ने निगोही जाने के लिए सौ रुपए में एक आटो किया. निगोही जाते समय रास्ते में उस ने दूसरा तमंचा फेंक दिया. निगोही से वह प्राइवेट बस से बरेली पहुंचा. बरेली में उस ने नई टीशर्ट खरीद कर पहनी. पूरे दिन वह इधरउधर घूमता रहा. रात को उस ने बरेली रेलवे स्टेशन से दिल्ली जाने के लिए टे्रन पकड़ ली.

दिल्ली में विपिन बड़े भाई संतोष के यहां गया. उसे उस ने पूरी बात बताई. संतोष को पता चल गया कि प्रियंका मर चुकी है, फिर भी वह उस के अंतिम संस्कार में शाहजहांपुर नहीं गया. संतोष को जब पता चला कि पुलिस विपिन की गिरफ्तारी के लिए घर वालों तथा रिश्तेदारों को परेशान कर रही है तो उस ने उसे घर भेज दिया.

26 मार्च को विपिन अपने चचेरे भाइयों के पास चिनौर जा रहा था, तभी पुलिस ने मुखबिरों से मिली सूचना पर गिरफ्तार कर लिया था. उस समय भी उस के पास एक तमंचा था.

पूछताछ में विपिन ने बताया था कि उस के पास कारतूस नहीं बचे थे. अगर कारतूस बचा होता तो वह खुद को भी गोली मार लेता. कानूनी औपचारिकताएं पूरी कर के पुलिस ने विपिन को सीजेएम की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Social Crime: अधेड़ पति संग कैसे चले गृहस्थी

Social Crime: यह कहानी सिर्फ लक्ष्मी की नहीं है, बल्कि हर उस औरत की है, जो पति से डरती है. लेकिन समाज से और ज्यादा अपमान सहती रहती है. वह इसलिए क्योंकि उसे अपना घर बचाना होता है. वह सब कुछ सहते हुए भी चुप रहती है, क्योंकि उसे अपने बच्चों का भविष्य देखना होता है. और अंत में वही चुप्पी उस की कब्र की मिट्टी बन जाती है. पढ़ें, दिल को झकझोर देने वाली यह कहानी. 

लक्ष्मी जब उस घर में ब्याह कर आई थी, तब उस घर की लक्ष्मी बन कर आई थी. साल 2017 में जब वाराणसी के मार्कंडेय महादेव मंदिर में उस का विवाह 38 साल के प्रदीप मिश्रा के साथ हुआ था, तब वह मात्र 18 साल की थी. उस का पति प्रदीप उस से 20 साल बड़ा था. अपनी उम्र से 20 साल बड़े आदमी से विवाह करने का मतलब था कि उस के फेमिली वालों ने मजबूरी में उस का विवाह प्रदीप के साथ किया था. क्योंकि 20 साल का अंतर कम नहीं होता.

लक्ष्मी के पेरेंट्स की मजबूरी यह थी कि वे इतने गरीब थे कि बेटी का विवाह नहीं कर सकते थे. इसीलिए उन्होंने लक्ष्मी का विवाह मंदिर में किया था.

प्रदीप मिश्रा उम्र में ही लक्ष्मी से बड़ा नहीं था, बल्कि अपराधी भी था. वह 10 साल की सजा भी काट चुका था. थाना चौबेपुर में उस के खिलाफ कई आपराधिक मुकदमे दर्ज थे. इसीलिए इतनी उम्र तक वह कुंवारा ही रहा था.

कुछ भी रहा हो, लक्ष्मी प्रदीप से मंदिर में ब्याह कर के उस के घर की लक्ष्मी बन कर आ गई थी. इस तरह के आदमी से विवाह कर के लक्ष्मी जिस घर में आई थी, वहां संशय, डर और अपमान ने पहले से ही डेरा डाल रखा था. ऐसे घर में लक्ष्मी कहां से लक्ष्मी रहती. इस तरह लक्ष्मी नाम की यह महिला ‘लक्ष्मी’ नहीं, विडंबना बन कर रह गई थी.

प्रदीप मिश्रा: पत्नी द्वारा अपमानित करने पर उसे ठिकाने लगाने की ठान ली

वाराणसी के सोनबरसा गांव की उस गली में, जहां सुबह गंगा की आरती की ध्वनि गूंजती थी और शाम को दीपों की रोशनी उतरती थी, वहां प्रदीप से विवाह के बाद लक्ष्मी की जिंदगी बिना किसी शोर के धीरेधीरे बुझने लगी थी.

प्रदीप के साथ रहते हुए दिन गुजरने लगे. उसे अपने सुख की नहीं, पति के सुख की ज्यादा चिंता रहती. धीरेधीरे उसकी उम्र 26 साल हो गई तो पति की उम्र 46 साल. लक्ष्मी जवान हुई तो पति अधेड़ यानी बूढ़ा हो गया था. अब तक वह 2 बच्चों, एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी.

मृतका लक्ष्मी: गरीब पेरेंट्स ने उस का विवाह 20 साल बड़े प्रदीप से कर दिया था

सपने देखने और और उन्हें संवारने की उम्र थी लक्ष्मी की, हाथों में बच्चों की गरमाहट और मन में शायद एक ऐसी जिंदगी की चाह थी, जिस में उसे हर पल सफाई न देनी पड़े, लेकिन उस के सामने था उस का पति 46 साल का प्रदीप मिश्रा, जो औटो चलाता था. वह एक कातिल भी था, जिस की वह सजा भी काट चुका था.

20 साल की उम्र का फासला कोई छोटी बात नहीं होती. इस तरह देखा जाए तो लक्ष्मी ने प्रदीप से विवाह नहीं किया था, बल्कि अपनी जिंदगी से, खुशियों से, सपनों से समझौता किया था. जैसा आज तक होता आया है कि लड़की के हिस्से में आता है समझना, झुकना, निभाना, वैसा ही लक्ष्मी के हिस्से में भी आया था. इस का उलटा पुरुष के हिस्से में आता है अधिकार, शक और असुरक्षा.

शादी के शुरुआती दिनों में शायद सब कुछ ठीकठाक रहा होगा. तभी तो लक्ष्मी प्रदीप के 2 बच्चों की मां बन गई थी. तब प्रदीप भी जवान रहा होगा. इसलिए लक्ष्मी को हर तरह से खुश रखता रहा होगा. इसी का परिणाम था उन के 2 बच्चे. बच्चे रिश्तों को जोड़ते हैं, परिवार को टूटने से बचाते हैं, लेकिन कभीकभी वे फंस गए होते हैं.

धीरेधीरे लक्ष्मी में बदलाव आने लगा था. इस की वजह यह थी कि अब वह जवान हुई तो उस का पति यानी प्रदीप मिश्रा बूढ़ा हो गया था. वह उस की हसरतें जगा तो देता था, पर उन्हें शांत करना उस के वश का नहीं रह गया था. जवान लक्ष्मी की चाल में वह काफी पीछे रह जाता था. औटो चलाने वाला प्रदीप पत्नी और बच्चों की खुशी के लिए पैसे कमाने के चक्कर में देर रात को आता था और खाना खा कर सो जाता था. कभीकभार लक्ष्मी उस से प्यार करने की बात करती तो वह उस की भावनाओं को नहीं समझता था. ऐसे में लक्ष्मी जलभुन जाती और बूढ़ा कह कर उसे धिक्कारती.

अपमान और शरम से प्रदीप करवट बदल कर सो जाता था. धीरेधीरे यह क्रम बढ़ता ही गया. पति का प्यार न पाने और देह की आग शांत न होने से लक्ष्मी का स्वभाव बदलने लगा था. वह चिड़चिड़ी हो गई थी, जिस से अपना ज्यादातर समय वह मोबाइल पर बिताने लगी थी. उसी बीच उस की मोबाइल द्वारा ही किसी से मुलाकात हो गई थी, जो उसे अपने पति और बच्चों से ज्यादा अच्छा लगने लगा था.

फिर तो जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर बात करती रहती. कभी मुसकराती तो खिलखिला कर हंसती. कभी अचानक चुप हो जाती. फिर यही चुप्पी प्रदीप को चुभने लगती. लक्ष्मी में आए इस बदलाव से उसे लगता था कि लक्ष्मी उस से दूर जा रही है. वह उसे बूढ़ा समझती है, जिस की वजह से वह किसी और की हो चुकी है. प्रदीप को अभी इस बात का शक था, क्योंकि उस के पास इस बात का कोई सबूत नहीं था. शक दीमक की तरह रिश्तों को भीतर से खोखला कर देता है, लेकिन यह शक नहीं था. लक्ष्मी सचमुच किसी और की हो गई थी.

क्योंकि एक बार नहीं, 3 बार घर, पति और बच्चों को छोड़ कर भाग चुकी थी. वह जब भी घर छोड़ कर जाती थी, कभी एक सप्ताह तो कभी 10 दिन बाद लौट आती थी. पहली बात तो प्रदीप उस से कुछ पूछने की हिम्मत ही नहीं कर पाता था और अगर पूछ भी लेता तो उसे बूढ़ा कह कर अपमानित करती थी. वह अपना घर बचाने के लिए चुप रह जाता था. यही वजह थी कि दिनोंदिन लक्ष्मी मनबढ़ होती गई और वह वह करने लगी, जो उस का मन होता था. इस से प्रदीप परेशान रहने लगा था.

लक्ष्मी ने कभी खुल कर कुछ कहा या नहीं, यह अब कोई नहीं जानता. लेकिन प्रदीप ने लोगों को जो बताया, उस के हिसाब से लक्ष्मी ही हमेशा दोषी रही. प्रदीप का कहना था कि वह उसे ‘बुड्ïढा’ कह कर अपमानित करती थी. अब वह उस के साथ नहीं रहना चाहती थी. लक्ष्मी 3 बार घर छोड़ कर जा चुकी थी. पर उसने ही नही, किसी ने भी उस से यह नहीं पूछा कि वह कहां और क्यों गई थी?

इस की वजह यह थी कि प्रदीप को अपने बच्चों की चिंता थी. पत्नी नहीं रहेगी तो वह छोटेछोटे बच्चों को कैसे संभालेगा. बच्चों को पालने के लिए पैसों की जरूरत थी और पैसे कमाने के लिए उस का घर से बाहर जाना जरूरी था. अगर लक्ष्मी घर में नहीं रहेगी तो वह बच्चों को अकेला छोड़ कर घर से बाहर कैसे जा पाता? यही सोच कर प्रदीप लक्ष्मी की यह गलती भी स्वीकार करता रहा और उस के ताने भी सुनता रहा. लक्ष्मी जब भी घर छोड़ कर जाती थी, सप्ताह या 10 दिनों बाद खुद ही वापस आ जाती थी. वह भाग कर कहां जाती थी, किस के पास जाती थी, यह प्रदीप को ही नहीं, किसी को भी नहीं पता था. उस के मायके वालों को भी नहीं.

क्या घर छोड़ कर जाना अपराध है? क्या अपनी खुशी के लिए इतना करना अपराध है? कभीकभी यह घुटन भरे वातावरण से निकल कर सांस लेने की कोशिश भी तो हो सकती है? एक औरत की मानसिक थकान दूर करने की इच्छा भी तो हो सकती है. लक्ष्मी के दिन अब बोझिल होने लगे थे. प्रदीप के घर में उस के साथ रहने में उसे घुटन सी होने लगी थी. वह मां थी, लेकिन उस से पहले एक औरत भी थी. किसी भी औरत के लिए घर एक सुरक्षित जगह मानी जाती है. उस की सारी दुनिया वही घर होता है, जहां उसे सुरक्षा के साथसाथ सारे सुख मिलते हैं. पर लक्ष्मी के लिए अब उस का ही घर सुरक्षित जगह नहीं रहा था.

जिस सुख के लिए वह उस घर में आई थी, अब वही सुख उसे वहां नहीं मिल रहा था. अब उस के हर सवाल में इलजाम थे, हर चुप्पी में शक था और हर हंसी में अपराध था. जब देखो, तब लक्ष्मी मोबाइल पर व्यस्त रहने लगी थी. शायद इसलिए नहीं कि दूसरी ओर कोई और था, बल्कि इसलिए कि कोई तो हो, जिस से वह बिना डरे, बिना संकोच बात कर सके. मन की घुटन को दूर कर सके. मन को हलका कर सके.

लेकिन पुरुष समाज में औरत का अकेलापन भी उसे ही दोषी ठहराता है. अपराधी बनाता है या अपराध को जन्म देता है. अकेलेपन पर पति की उपेक्षा से परेशान लक्ष्मी एक बार फिर घर छोड़ कर भागी तो 18 दिसंबर, 2025 की सुबह लौटी थी. उस दिन गुरुवार था. लक्ष्मी घर तो वापस आ गई थी, लेकिन उस का मूड ठीक नहीं था. घर आने के बाद जब प्रदीप ने उसे टोका तो वह उस से लडऩे लगी थी. इस बार उस ने प्रदीप से स्पष्ट कह दिया था कि अब वह उस के साथ नहीं रहेगी. वह बूढ़ा हो चुका है. वह बूढ़े के साथ रहने के बजाय अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी.

इस के पहले भी वह 2 बार भागी थी. तब प्रदीप और लक्ष्मी का एक बार थाने में तो दूसरी बार पंचायत में समझौता हुआ था. प्रदीप उसे तलाक देने को भी राजी था, लेकिन तब लक्ष्मी ने कहा था कि अब वह नहीं भागेगी. इस के बावजूद यह तीसरी बार भाग गई थी. अकेलेपन और पति की टोकाटाकी से परेशान लक्ष्मी बारबार प्रदीप से झगड़ा कर रही थी. हल्की ठंड थी, लेकिन अकेलेपन से बेचैन लक्ष्मी का मूड गरम था.

पतिपत्नी के इस झगड़े से बच्चे परेशान हो रहे थे. इसलिए सभी का मूड ठीक करने के लिए प्रदीप ने 19 दिसंबर, 2025 की शाम को लक्ष्मी से अपनी बहन के यहां चलने को कहा. उस की बहन जौनपुर के चंदवक के अहिरौली गांव में रहती थी. लक्ष्मी प्रदीप की बहन यानी अपनी ननद के यहां जाने के लिए राजी हो गई. महिलाएं अकसर मान जाती हैं. लक्ष्मी भी मान गई थी, शायद वह आखिरी कोशिश करना चाहती थी.

सभी को अपने औटो से ले कर प्रदीप बहन के यहां पहुंचा. रात करीब 10 बजे सभी ने साथ बैठ कर खाना खाया. खाने के बाद एक बार फिर प्रदीप ने उस लड़के का जिक्र किया, जिस से लक्ष्मी बातें करती थी. प्रदीप का कहना था कि लक्ष्मी उसे छोड़ कर उस लड़के से शादी करना चाहती है. प्रदीप ने उस लड़के की बात की तो लक्ष्मी उसे भलाबुरा कहने लगी. जबकि प्रदीप का कहना था कि वह उसे समझा रहा था. लड़के का जिक्र करने से लक्ष्मी को गुस्सा आ गया था और वह उस से जोरजोर लडऩे लगी थी.

रिश्तेदारों के सामने ही प्रदीप को अपमानित करने लगी थी. वहां भी उस ने वही बात कही कि अब वह उस जैसे बूढ़े के साथ नहीं रहेगी. वह अपने बौयफ्रेंड के साथ रहेगी. यह बात प्रदीप को बुरी लगी और उस ने मन ही मन उस की हत्या करने का निर्णय ले लिया. प्रदीप के अनुसार, रोजरोज के इन झगड़ों से अपमानित होने से वह परेशान हो चुका था. रिश्तेदारों के सामने लक्ष्मी ने प्रदीप को अपमानित किया तो उस ने तय कर लिया कि अब उसे लक्ष्मी को ठिकाने लगाना ही होगा. तभी वह शांति से रह पाएगा.

थोड़ा शांत होने के बाद लक्ष्मी ने चाय पिलाने के लिए कहा. बहन ने चाय बनाने के लिए कहा तो लक्ष्मी ने कहा, ”नहीं, मैं घर में नहीं, बाहर चल कर चाय पीना चाहती हूं.’’

बच्चों को बहन के घर में ही छोड़ कर प्रदीप लक्ष्मी को औटो से ले कर चल पड़ा. चलते समय बच्चों ने नहीं सोचा था कि वह मम्मी को अंतिम बार देख रहे हैं. यही कोई 11 बजे का टाइम था. लक्ष्मी ने एक बार फिर चाय पीने की बात की. उस की यह एक मामूली इच्छा थी. साधारण सी बात थी. बस, उस की इसी इच्छा ने अपराध को जन्म दे दिया था. लक्ष्मी औटो की पिछली सीट पर बैठी थी. वह सोच रही थी कि शायद सब ठीक हो जाएगा. उसे क्या पता था कि जिस आदमी के साथ उस ने इतने साल गुजारे थे, आज वही आदमी उस की सांसों का हिसाब करने वाला है.

सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ था. प्रदीप कथौर गांव के पास (चोलापुर) की ओर मुड़ गया. थोड़ा आगे बढऩे पर सड़क को सुनसान देख कर प्रदीप को लगा कि यही सही जगह और मौका है. उस के दिमाग में लक्ष्मी की हत्या की योजना बनने लगी. फिर उस ने औटो रोक दिया. उस के औटो रोकने पर लक्ष्मी ने पूछा, ”यहां सुनसान में औटो क्यों रोक दिया?’’

प्रदीप ने बहाना बनाते हुए कहा, ”कुछ गड़बड़ी हो गई है. रुको देखता हूं, क्या खराबी आई है?’’

औटो से बाहर आ कर प्रदीप ने गले में लिपटा मफलर निकाला और उस का फंदा बना कर तैयार हो गया. इस के बाद लक्ष्मी से कहा कि उस की मदद के लिए वह भी जरा बाहर आ जाए. लक्ष्मी जैसे ही औटो से उतर कर बाहर आई, प्रदीप ने फुरती से मफलर का फंदा उस के गले में डाल कर कस दिया. 2 मिनट तक तड़प कर लक्ष्मी हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गई. लक्ष्मी की हत्या करने के बाद उस सर्द रात में प्रदीप 10 मिनट तक चुपचाप बैठा सोचता रहा कि अब क्या किया जाए. काफी सोचने के बाद उस के मन में आया कि अगर वह लाश को इसी तरह छोड़ कर चला गया तो वह पकड़ा जा सकता है, क्योंकि उस का घर वहां से ज्यादा दूर नहीं था. कोई न कोई लाश को पहचान लेगा.

लाश की पहचान न हो सके, इस के लिए वह लाश को सड़क से घसीट कर पास के एक बाग में ले गया और उस की पहचान मिटाने के लिए औटो में रखी एक सीमेंट की ईंट से उस के चेहरे पर कई वार किए, जिस से उस का चेहरा इस तरह बिगड़ गया कि अब उसे कोई पहचान नहीं सकता था. वहीं करीब ही बाजरे के लट्ठे का ढेर था. चेहरा बिगाडऩे के बाद प्रदीप ने लाश को उसी में छिपा दिया. उस के बाद वह न घर गया और न बहन के यहां. वह फरार हो गया था. बच्चों को उस ने बहन के घर ही रहने दिया था.

21 दिसंबर, 2025 को कथौर गांव का रहने वाला मूकबधिर सोनू यादव बाग में लगे बाजरे के लट्ठे के ढेर को उठाने पहुंचा तो उसे उस ढेर में एक महिला की लाश दिखाई दी. वह भाग कर गांव पहुंचा और इशारे से लोगों को बुला कर लट्ठे के ढेर के पास ले आया. इस के बाद लोगों ने ग्राम प्रधान दयाराम यादव को बाजरे के ढेर में लाश होने की सूचना दी तो दयाराम ने यह जानकारी वाराणसी के थाना चोलापुर पुलिस को दे दी.

लाश मिलने की सूचना मिलते ही एसएचओ दीपक कुमार पुलिस बल, फोरैंसिक टीम एवं डौग स्क्वायड के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थाने से निकलने से पहले उन्होंने यह सूचना पुलिस अधिकारियों को भी दे दी थी. लाश बाहर निकाली गई. चेहरा बुरी तरह कुचला हुआ था. इसलिए उस की पहचान मुश्किल लग रही थी. प्रदीप ने यही सोचा था कि चेहरा बिगाड़ देने से कोई पहचान नहीं पाएगा, लेकिन वह यह भूल गया था कि औरतें सिर्फ चेहरे से ही नहीं पहचानी जातीं, उन की पहचान एक निशान से भी हो जाती है. उस के हाथों पर पहचान लिखी थी.

लाश के दोनों हाथों पर टैटू थे. एक हाथ पर अंगरेजी में ‘पीएल’ लिखा था तो दूसरे हाथ में दिल का निशान तो बना ही था, साथ ही कुछ लिखा भी था. ये प्रेम के निशान थे. पुलिस के लिए यही सब से बड़ा सुराग साबित हुआ. पूछताछ में मरने वाली का नाम आया लक्ष्मी. ‘एल’ से लक्ष्मी था तो ‘पी’ से प्रदीप. यानी उस ने हाथ पर लक्ष्मी और प्रदीप लिखवा रखा था. इस का मतलब था कि वह प्रदीप से बहुत प्यार करती थी. तभी तो अपने नाम के साथ उस का नाम लिखवाया था, लेकिन समय के साथ वह प्यार खत्म हो गया था और बात हत्या तक पहुंच गई थी.

प्रैस क्रौन्फ्रैंस करते एसीपी विदुष सक्सैना और एडीसीपी वरूणा नीतू कात्यायन

उसी टैटू से लाश की शिनाख्त हो गई तो पुलिस हत्यारे का पता लगाने के साथ सबूत जुटाने में लग गई. पुलिस को अब लक्ष्मी के पति प्रदीप मिश्रा की तलाश थी. लेकिन वह घर में नहीं था. पुलिस को उस का मोबाइल नंबर मिल गया था, जिसे पुलिस ने सर्विलांस पर लगा दिया था. इस के अलावा पुलिस सीसीटीवी कैमरों की भी मदद ले रही थी. परिणामस्वरूप पुलिस और क्राइम ब्रांच ने सीसीटीवी कैमरों और सर्विलांस की मदद से प्रदीप मिश्रा उर्फ गुड्ïडू को औटो के साथ 22 दिसंबर को महमूदपुर मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया.

उसे थाना चोलापुर ला कर एडिशनल डीसीपी वरुणा नीतू कत्यायन और एसीपी सारनाथ विदुष सक्सेना की उपस्थिति में पूछताछ की गई तो प्रदीप थोड़ेबहुत बहाने बनाने के बाद टूट गया और पत्नी लक्ष्मी की हत्या करने का अपराध स्वीकार कर लिया. शुरुआत में उस ने भी बाकी अपराधियों की तरह अंजान बनने की कोशिश की थी, लेकिन सच भारी होता है. ज्यादा देर छिपता नहीं है. वह जल्दी ही मुंह से निकल ही आता है. जब उस ने कहा कि उस ने ही लक्ष्मी को मारा है तो पुलिस ने राहत की सांस ली, क्योंकि मामले का खुलासा हो गया था और आरोपी पकड़ा गया था.

और फिर जैसे किसी को अपना गुनाह हल्का करना होता है तो वह गुनाह की वजहें गिनाने लगता है, उसी तरह प्रदीप भी लक्ष्मी की हत्या की वजहें गिनाने लगा कि वह उसे ताने मारती थी, उस से दूर हो गई थी, उस का किसी और से अफेयर था. लेकिन प्रदीप ने यह नहीं कहा कि उस ने उसे समझने या समझाने की कोशिश की.

प्रदीप का कहना था कि उस ने उस की हर बात सुनी, उसे हर तरह की आजादी दी, शायद उसी का नतीजा था कि वह आजाद हो गई थी. अपना धर्म और संस्कार भूल गई थी. उस ने यह नहीं कहा कि किसी जवान महिला को सिर्फ रोटीकपड़ा ही नहीं चाहिए, उसे प्यार और स्नेह भी चाहिए, जो उसे परिवार के लिए बांधे रखता है.

उसके 2 बच्चे हैं, जो अभी कुछ नहीं जानते. सब से ज्यादा चुप्पी अब उन्हीं के हिस्से में है. वे अपनी बुआ के पास हैं. उन्हें बताया गया है कि मम्मी कहीं गई है. पापा काम से बाहर गए हैं. किसी ने उन्हें नहीं बताया कि उन की मम्मी अब कभी कहानी नहीं सुनाएगी, उन्हें अब कभी नहीं मिलेगी और उन के पिता जेल में हैं. पूछताछ के बाद प्रदीप को जेल भेज दिया गया है. पुलिस ने उसे हत्यारा साबित करने के लिए सबूत भी जुटा लिए हैं, जिस में सीसीटीवी फुटेज के अलावा घटनास्थल पर उस की उपस्थिति के भी सबूत थे. Social Crime

 

 

Superstition: अल्लाह के नाम पर बेटी की कुर्बानी

Superstition: रमजान का पवित्र महीना चल रहा था. मसजिद से सुबह की अजान हुई तो शबाना की आंखें खुल गईं. वह फटाफट सेहरी के लिए उठी तो देखा कि उस की 4 साल की बेटी रिजवाना बिस्तर पर नहीं थी. वहां केवल छोटी बेटी ही दिखी. शबाना ने सोचा कि रिजवाना को शायद टौयलेट आया होगा तो वह नीचे चली गई होगी. उस ने रिजवाना को आवाज दी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. इस पर शबाना सोचने लगी कि रिजवाना कहां गई होगी. मेरे पास ही तो सो रही थी. शबाना अपनी बेटी को तलाश करने लगी. यह 8 जून, 2018 के तड़के की बात है.

राजस्थान में जोधपुर जिले के पीपाड़ शहर में सिलावटों का मोहल्ला है. इस मोहल्ले में नवाब अली अपने मामा मोहम्मद साजिद के घर में उन के साथ ही ऊपरी मंजिल पर रहता था. नवाब अली और मोहम्मद साजिद मिल कर मीट की दुकान चलाते थे. नवाब अली मूलरूप से पिचियाक गांव का रहने वाला था. वह अपनी बीवी शबाना और 4 साल की बेटी रिजवाना तथा एक छोटी बेटी के साथ मामा के मकान में रहता था.

जून महीने में राजस्थान में भीषण गरमी पड़ती है इसलिए नवाब अली अपनी बीवी और दोनों बेटियों के साथ छत पर सोया हुआ था. शबाना को जब बेटी रिजवाना नहीं मिली तो वह उसे देखने नीचे की मंजिल पर बने कमरे में गई. कमरे का दृश्य देख कर शबाना की आंखें फटी रह गईं. वहां उस की मासूम रिजवाना खून में सनी पड़ी थी. उस के गले से खून बह रहा था. बेटी को रक्तरंजित हालत में देख कर शबाना रोने लगी. उस ने नब्ज देख कर बेटी के जिंदा होने का अनुमान लगाने की कोशिश की लेकिन उसे कुछ पता नहीं चला.

वह रोती हुई तेजी से सीढि़यां चढ़ कर छत पर पहुंची और वहां सो रहे पति नवाब अली को जगा कर नीचे वाले कमरे में खून से लथपथ पड़ी बेटी रिजवाना के बारे में बताया. इस पर नवाब अपनी बीवी के साथ नीचे वाले कमरे में आया और वहां खून फैला देख कर बीवी से कहा कि लगता है इस पर बिल्ली ने हमला किया है, इस से उस का गला कट गया है.

शबाना की चीखपुकार सुन कर नवाब अली के मामा मोहम्मद साजिद के परिवार वाले भी जाग गए. शबाना पति के साथ खून से लथपथ बेटी को अस्पताल ले गई. अस्पताल में डाक्टरों ने चैकअप के बाद बच्ची को मृत घोषित कर दिया. नवाब अली ने बच्ची पर बिल्ली के हमले की बात कह कर अस्पताल में डाक्टरों को संतुष्ट कर दिया और बेटी का शव घर ले आया.

तब तक सूरज का उजाला नजर आने लगा था. नवाब की मासूम बेटी की मौत होने का पता चलने पर मोहल्ले के लोग भी एकत्र हो गए. नवाब ने मोहल्ले वालों को भी बेटी पर बिल्ली के हमले की बात बताई, लेकिन यह बात लोगों के गले नहीं उतरी. इस बीच किसी आदमी ने पुलिस को सूचना दे दी. पुलिस मौके पर पहुंच गई.

पुलिस ने जब बच्ची की लाश का निरीक्षण किया तो उस के शरीर पर कहीं भी बिल्ली के पंजों के निशान नहीं दिखे. गला भी किसी धारदार हथियार से काटा हुआ दिख रहा था, इसलिए पुलिस को शक हो गया कि यह हत्या का मामला है. पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए सरकारी अस्पताल भिजवा दी.

पुलिस ने बच्ची की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए जोधपुर से विधिविज्ञान प्रयोगशाला की टीम को मौके पर बुलाया, लेकिन इन से भी पुलिस को कोई ऐसे सबूत नहीं मिले, जिस से हत्यारे तक पहुंचा जा सके. पुलिस ने डाक्टरों के पैनल से बच्ची के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया.

पुलिस इस बात से भी आश्चर्यचकित थी कि जब कमरे में बच्ची के मातापिता सो रहे थे तो फिर गला रेतने के समय उन्हें रिजवाना के चीखनेचिल्लाने की आवाज सुनाई क्यों नहीं पड़ी. मां के पास सो रही रिजवाना नीचे वाले कमरे में कैसे पहुंची. पुलिस को इस बात के भी कोई सबूत नहीं मिले कि हत्यारा बाहर से आया था, क्योंकि घर के दरवाजे बंद थे.

मासूम बच्ची की हत्या से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई. शबाना की तरफ से पुलिस ने अज्ञात आदमी के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. जोधपुर एसपी (ग्रामीण) राजन दुष्यंत राजन, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) खींवसिंह भाटी और पुलिस उपाधीक्षक सेठाराम बंजारा ने भी मौके पर पहुंच कर जांचपड़ताल की.

एसपी राजन दुष्यंत ने मौकामुआयने के बाद थाने में पुलिस अधिकारियों के साथ इस मामले पर चर्चा की. उन्हें लगा कि रिजवाना की हत्या में परिवार के ही किसी सदस्य का हाथ रहा होगा. परिवार वालों ने जब रिजवाना का शव दफना दिया तो पुलिस नवाब अली और उस के मामा मोहम्मद साजिद को पूछताछ के लिए थाने ले आई. दोनों से अलगअलग पूछताछ की गई. पूछताछ में नवाब अली ने अपनी बेटी रिजवाना की हत्या की जो लोमहर्षक कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस अफसर भी स्तब्ध रह गए.

नवाब अली कुरैशी ने पुलिस को बताया कि रमजान के महीने में अल्लाह को खुश करने के लिए वह अपनी सब से प्यारी चीज की कुरबानी देना चाहता था. वह बेटी रिजवाना को बहुत प्यार करता था, इसलिए उसे ही कुरबान कर दिया. नवाब जिस छुरी से बकरे काटता था, उसी से उस ने अपनी बेटी को हलाल कर दिया.

26 साल के नवाब ने पुलिस को बताया कि मैं नमाजी हूं. बेटी को कुरबान कर के अल्लाह को खुश करना चाहता था. वह कई दिनों से अपने ननिहाल में थी. मैं ने रिजवाना को ननिहाल से बुलवा लिया. 7 जून को उसे बाजार ले गया और शहर में घुमायाफिराया. उसे मिठाई, फ्रूट, चौकलेट आदि खिलाए और उस की पसंद की चीजें दिलवाईं. उस के बाद मैं घर आ गया. रात को रिजवाना अपनी मां शबाना के साथ छत पर सोई थी, मैं भी पास में ही सोया था.

आधी रात बाद मैं रिजवाना को चुपके से उठा कर नीचे के कमरे में ले गया. वहां उसे कलमा सुनाया. फिर अपनी गोद में बिठा कर बकरा काटने वाली छुरी से धीरेधीरे उस का गला रेत दिया. बेटी को हलाल करने से मेरी पैंट खून से सन गई तो मैं ने कपड़े बदले. फिर छुरी और खून से सने कपड़े छिपा कर रख दिए और वापस छत पर आ कर सो गया. मुझे नींद नहीं आ रही थी, पर मैं सोने का नाटक कर रहा था. बाद में जब शबाना मुझे बेटी की लाश के पास ले गई तो मैं ने बेटी पर बिल्ली के हमले की बात कह कर मामले को दूसरा रूप देने की कोशिश की लेकिन बाद में पुलिस आ गई और मेरी मंशा पूरी नहीं हो सकी.

पुलिस ने बेटी की हत्या के आरोप में नवाब अली कुरैशी को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया और वहां से उसे जेल भेज दिया गया. दूसरी ओर इसलाम से जुड़े लोगों ने आरोपी के बयान और कृत्य को धर्मविरोधी बताया. इन का कहना था कि इसलाम में इंसान का कत्ल हराम है. यह कृत्य सरासर धर्म के खिलाफ है. Superstition

Heart Touching Story: मां को बनाया आया

Heart Touching Story: बच्चे का जन्म उस बच्चे के मांबाप के लिए एक सुंदर सपना सच होने जैसा होता है. बच्चे के जन्म लेते ही मां की ढेरों आशाएं उस से जुड़ जाती हैं. बच्चे में मां को अपना भविष्य सुरक्षित नजर आने लगता है. मां की उम्मीद बंध जाती है कि बच्चा जब बड़ा होगा तो उस के जीने का सहारा बनेगा. उसे अच्छी जिंदगी देगा. अपने इस सपने को साकार करने के लिए मांबाप जब अपने छोटे से फूल जैसे बच्चे को पढ़ालिखा कर बड़ा करते हैं और समाज में सम्मान से जीने की राह दिखाते हैं. खासतौर पर अगर जन्म लड़के का हो तो मांबाप कुछ ज्यादा ही आशान्वित हो जाते हैं.

बच्चा बड़ा हो कर जब कमाने लगता है और उस का मांबाप को संभालने का वक्त आता है, उस वक्त वह अपने स्वार्थ और बढ़ती इच्छाओं के चलते शादी कर के अपनी दुनिया अलग बसा लेता है. उसे अपनी मां फांस की तरह चुभने लगती है. लेकिन जब उस का खुद का परिवार बनना शुरू होता है और उस के अपने बच्चे को संभालने की बारी आती है तो वही अपनी मां उस को याद आने लगती है. उस के हिसाब से मां से अच्छा बच्चे को भला कौन संभाल सकता है और आया को भारी रकम देने का खर्चा भी बच जाएगा. इस तरह बच्चे अपने स्वार्थ के लिए अपनी ही मां को घर की आया बनाने से नहीं चूकते.

बच्चे संभालने के लिए साथ रखा

खासतौर पर उन मांओं को यह तकलीफ ज्यादा सहन करनी पड़ती है जो तलाकशुदा या विधवा का जीवन जी रही हों. वह मां जिस को बुढ़ापे में आराम की जरूरत होती है उस को बच्चे की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है क्योंकि पतिपत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं.

ऐसे ही हालात की मारी 60 वर्षीय प्रेमा कुलकर्णी एक विधवा हैं. प्रेमा के पति की ऐक्सिडैंट में मौत हो गई और चूंकि वे पढ़ीलिखी नहीं थीं इसलिए उन्होंने घरघर काम कर के अपने बच्चे को पढ़ायालिखाया इस उम्मीद से कि उन का बेटा उन को बड़ा हो कर संभालेगा और उन को बुढ़ापे में काम नहीं करना पड़ेगा लेकिन इस के ठीक विपरीत प्रेमा बताती हैं,

‘‘मेरे बेटे ने कमाई शुरू करते ही शराब पीनी शुरू कर दी. और चूंकि हम लोग गरीब हैं, झोंपड़पट्टी में रहते हैं इसलिए वहां पर कुछ गलत लड़कों की संगत में उस ने जुआ खेलना भी शुरू कर दिया. ‘‘उस के बाद उस की एक लड़की से दोस्ती हुई जोकि उस के औफिस में ही काम करती थी, उस से उस ने शादी कर ली. जब मेरे बेटे की शादी हुई तो मुझे लगा घर में बहू आएगी तो शायद मेरा बेटा सुधर जाएगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

‘‘मेरा बेटा और बहू दोनों काम पर चले जाते थे और मुझे घर का पूरा काम करने को बोलते थे जबकि मैं इतनी उम्र में 5 घरों का काम पहले से कर रही थी. जब मैं ने इस बात पर एतराज किया तो वे दोनों मेरा घर छोड़ कर अलग हो गए. 1 साल तक मैं अकेली रही. जब उस को बच्चा हुआ तो वे दोनों मेरे पास आए और अपने साथ ही रहने को कहा.

‘‘मैं भी अकेली घर में रहरह कर तंग हो गई थी इसलिए बेटे के पास चली गई लेकिन बाद में मुझे समझ आया कि उन्होंने मुझे अपना बच्चा संभालने के लिए घर में रखा है. बुढ़ापे में मुझे छोटे से बच्चे को संभालने में तकलीफ होती थी. साथ ही मुझे भरपेट खाना भी नहीं मिलता था. मेरी बहू फ्रिज में ताला लगा कर जाती थी ताकि मैं फ्रिज में से कुछ ले कर खा न सकूं. जब इस बात को ले कर मैं ने बहू से झगड़ा किया तो वह और बेटा दोनों मुझ से झगड़ा करने लगे. आखिर तंग आ कर मैं वापस अपनी झोंपड़ी में चली आई और घरघर काम कर के ही अपना पेट पाल रही हूं.’’

मजबूरी भी कारण

प्रेमा की तरह ही एक और भारतीय नारी हैं जो अपने पति की सेवा और बच्चों का पालनपोषण ही अपना धर्म समझती हैं. उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इसी कार्य में लगा दी. उन का नाम है वीणा मिश्रा.

65 वर्षीय वीणा के 3 बच्चे हैं, 1 लड़का और 2 लड़कियां वीणा अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि बेटियों की तो उन्होंने पढ़ालिखा कर शादी कर दी और बेटे को इंजीनियरिंग करवाई. चूंकि बेटा पढ़ाई में होशियार था इसलिए उस ने पढ़लिख कर अच्छी नौकरी पा ली और उसी नौकरी के तहत उस को अमेरिका में ट्रांसफर मिल गया. हम अपने बेटे की तरक्की से बहुत खुश थे और हमारा बेटा हमारा अच्छे से खयाल भी रख रहा था. वीणा आगे बताती हैं कि वह जब पूरी तरह सैटल हो गया तो हम ने हिंदुस्तान की ही एक लड़की से उस की शादी करवा दी.

सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. उस का इरादा कुछ सालों में इंडिया में ही बसने का था. लेकिन शादी के बाद वह एकदम से बदल गया. वहां पर ही वह रचबस गया. उस के 2 बच्चे भी हो गए. वह हमें लगातार नियमित तौर पर पैसे भी भेजता था. लेकिन क्योंकि उस की पत्नी भी नौकरी करती है इसलिए घर में बच्चों को संभालने वाला कोई नहीं था. वहां पर (अमेरिका में) पहले तो नौकरानी मिलती नहीं है और अगर मिलती भी है तो उस की तनख्वाह ही 60 हजार रुपए से ऊपर होती है.

वीणा कहती हैं कि बेटे ने कहा कि वे वहीं उन के साथ अमेरिका में रहें ताकि उस के बच्चों को कोई संभालने वाला मिल जाए. मेरे पति और मुझे दोनों को इंडिया से बहुत प्यार है, हमारा पूरा जीवन यहीं गुजरा है इसलिए हम ने अमेरिका आने से मना कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उस ने हमें खर्चे के पैसे भेजने बंद कर दिए. आखिर में थकहार कर हमें अमेरिका जाना ही पड़ा.

वीणा और प्रेमा की तरह कितनी ही बेबस बूढ़ी और लाचार मांएं हैं जो अपने बच्चों के घर में ही नौकरानी जैसी बन गई हैं. अगर वे इस के खिलाफ जाती हैं तो उन को अपने बुढ़ापे का सहारा खोना पड़ता है. इसलिए वे नौकरानी बनना कुबूल कर लेती हैं या फिर उन्हीं के साथ रहने का फैसला करती हैं. Heart Touching Story

Love Crime: सलहज को प्यार – साले को मौत का उपहार

Love Crime: रामवीर की नजर अपनी सलहज कुसुमा पर पहले से ही जमी थी. पत्नी की मौत के बाद तो वह उस के पीछे ही पड़ गया. उस ने उसे पा तो लिया, लेकिन इस का परिणाम सुखद नहीं रहा.

उत्तर प्रदेश के जिला मथुरा के थाना यमुनापार के गांव ढहरुआ में रहता था भागचंद. उस की गिनती गांव के खुशहाल लोगों में होती थी. उस के 7 बेटे और 3 बेटियां थीं. उस ने सभी बच्चों को खूब पढ़ाना चाहा था, लेकिन उस का कोई भी बेटा ज्यादा नहीं पढ़ सका, तब उस ने सभी को उन की मरजी के मुताबिक काम सिखवा दिए. उस के 3 बेटे शटर बनाने का काम करने लगे. बच्चे कमाने लगे तो भागचंद की मौज हो गई. बच्चे जो भी कमाते थे, वह उसी को देते थे. जैसेजैसे बच्चे जवान होते गए, वह उन की शादियां करता गया.

भागचंद ने अपने बेटे भूरा की शादी मथुरा से और उस से छोटे खन्ना की शादी जिला आगरा के गांव मितावली इंकारपुर की कुसुमा से की थी. कुसुमा के पिता की मौत हो चुकी थी. इस के बाद घर में मां मनिया के अलावा 3 बहनें और एक भाई था. खन्ना अपनी कमाई से जो पैसे पिता को देता था, शादी के बाद देने बंद कर दिए थे. उन पैसों से अब वह अपनी गृहस्थी चलाने लगा था. कुसुमा खन्ना के साथ बहुत खुश थी. उन्हीं दिनों भागचंद ने अपनी बेटी पिंकी की शादी राजस्थान के कस्बा कुम्हेरपुर के रामवीर के साथ कर दी. रामवीर भी खातेपीते परिवार का था. पिंकी को ससुराल में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी.

रामवीर का छोटा भाई श्यामवीर भी शादी लायक था. भागचंद को श्यामवीर छोटी बेटी किन्ना के लिए ठीक लगा तो उस के पिता देवी सिंह से बात की. देवी सिंह का परिवार पिंकी से काफी खुश था, इसलिए उन्हें इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं था. इस के बाद किन्ना की शादी श्यामवीर के साथ हो गई. इस तरह भागचंद की दोनों बेटियों की शादी एक ही घर में हो गई. सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. समय के साथ कुसुमा 2 बच्चों की मां बन गई. खन्ना का शटर बनाने का काम बढि़या चल रहा था. पिंकी अपने पति रामवीर के साथ जल्दीजल्दी मायके आती रहती थी. रामवीर मजाकिया स्वभाव का था, इसलिए अपनी सलहज कुसुमा से वह खूब मजाक करता था.

यह बात उस के साले खन्ना को अच्छी नहीं लगती थी. कभीकभी खन्ना अपने बहनोई रामवीर के मजाक करने पर ऐतराज कर दिया करता था. तब रामवीर कहता, ‘‘साले साहब, सलहज से हमारा मजाक करने का हक है, इस में आप को क्यों बुरा लगता है. भाभी को तो कोई ऐतराज नहीं है.’’

खन्ना कहता, ‘‘मजाक का भी कोई समय होता है. हर समय हंसीमजाक अच्छा नहीं लगता. उस की भी एक सीमा होती है, लेकिन आप हैं कि मानते ही नहीं.’’

मगर खन्ना की बातों का रामवीर पर कोई असर नहीं पड़ा. वह जब तक ससुराल में रहता, खन्ना परेशान रहता. खन्ना ने कई बार अपने पिता से भी कहा, ‘‘आप जीजाजी को समझाते क्यों नहीं, वह इतने फूहड़ मजाक करते हैं.’’

भागचंद दामाद के बजाय उसे ही समझाता, ‘‘बेटा, दामाद से इस तरह की बात करना ठीक नहीं है. फिर वह मजाक ही तो करता है. वह यहां महीनों तो रहता नहीं, एकदो दिन रह कर चला जाता है. इस बात को ले कर उसे नाराज नहीं करना चाहिए, हम ने उसे बेटी दी है, बेटी की वजह से हमें चुप रहना चाहिए.’’

रामवीर को किसी की कोई परवाह नहीं थी. वह जब भी ससुराल आता, कुसुमा के आगेपीछे मंडराता रहता और हंसीमजाक करता रहता. जब वह चला जाता तो खन्ना इस बात को ले कर कुसुमा से खूब झगड़ता. एक दिन भागचंद को खबर मिली कि उस की बेटी बीमार है. यह खबर सुन कर वह परेशान हो उठा. उसे देखने के लिए वह बेटे खन्ना के साथ उस की ससुराल कुम्हेरपुर पहुंचा. वहां जा कर पता चला कि पिंकी की हालत बहुत नाजुक है. बेहतर इलाज के लिए वह बेटी को एक बड़े अस्पताल ले गया, लेकिन वहां भी उस की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. लाख कोशिशों के बाद भी डाक्टर पिंकी को नहीं बचा पाए.

पिंकी की मौत उस के मायके वालों के लिए एक बड़ा सदमा थी. उस के बच्चों को पालने की जिम्मेदारी पिंकी की छोटी बहन किन्ना ने ले ली. पत्नी की मौत के बाद भी रामवीर जबतब अपनी ससुराल आता रहता था. ससुराल में अब भी उस की पहले की ही तरह इज्जत होती थी. कुसुमा उस की पहले की ही तरह खातिरदारी करती थी. खन्ना को अब रामवीर का आना बिलकुल भी नहीं अच्छा लगता था. उसी की वजह से अब उस के और कुसुमा के बीच तनाव रहने लगा था. खन्ना की बात पर घर में कोई ध्यान नहीं देता था और न ही कोई उस के मानसिक तनाव को समझने की कोशिश करता था.

जबकि सच्चाई यह थी कि कुसुमा रामवीर की तरफ आकर्षित होती जा रही थी, जिस की वजह से उस के दांपत्य में दरार पड़ने लगी थी. रामवीर और कुसुमा के बीच वे बातें भी होने लगीं, जो दोनों को एकदूसरे के करीब लाने वाली थीं. एक दिन रामवीर ने कुसुमा को मथुरा में मिलने को कहा, लेकिन कुसुमा ने कहा कि घर के सभी लोग शादी में जा रहे हैं, इसलिए घर में अकेली होने की वजह से वह वहां नहीं आ सकती. उस ने रामवीर को अपने यहां आने को कहा. तब रामवीर की खुशी का ठिकाना नहीं रहा, क्योंकि ऐसे में वह उस के घर आ सकता था.

मौके का फायदा उठाने के लिए रामवीर अपनी ससुराल पहुंच गया और एकांत का फायदा उठा कर दोनों ने उस दिन मर्यादाएं लांघ कर इच्छा पूरी कर ली. रामवीर ने साले के दांपत्य में सेंध लगा दी. खन्ना को बीवी की बेवफाई का पता नहीं चला. कुसुमा को भी अपनी बेवफाई पर कोई ग्लानि नहीं हुई. उस दिन के बाद से कुसुमा का पति के प्रति व्यवहार बदलने लगा. खन्ना जब कभी उस से झगड़ता, वह मायके जाने की धमकी देने लगती. खन्ना समझ नहीं पा रहा था कि कुसुमा अब इस तरह की बातें क्यों करती है. वह अंदर ही अंदर तनाव में घुटने लगा. दूसरी ओर कुसुमा को किसी बात की परवाह नहीं थी.

उसी बीच मथुरा में रामवीर और कुसुमा की मुलाकात हुई तो कुसुमा ने उस से कहा कि खन्ना को अब उस पर शक हो गया है. वह छोटीछोटी बात पर उस की पिटाई करने लगा है. तब रामवीर ने कहा, ‘‘मैं खन्ना से बात करूंगा.’’

‘‘नहीं, तुम उस से कुछ मत कहना. अब मेरे घर भी मत आना. जब कभी मिलना होगा, हम बाहर ही मिल लिया करेंगे. लेकिन इस समस्या का कोई हल तो ढूंढ़ना ही होगा. आखिर मैं कब तक उस से पिटती रहूंगी.’’ कुसुमा ने कहा.

कुसुमा की बात पर रामवीर गंभीर हो गया. उसे लगा कि कुछ तो करना ही होगा. कुसुमा ने कहा, ‘‘चलो, हम कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘नहीं, इस से बड़ी गड़बड़ हो जाएगी. तुम्हें यह तो पता ही है कि मेरा छोटा भाई श्यामवीर भी उस घर का दामाद है. जब मैं घर में नहीं रहूंगा तो खन्ना को पूरा विश्वास हो जाएगा कि मैं ही तुम्हें भगा कर ले गया हूं. तब ससुराल वालों से श्यामवीर के संबंध खराब हो जाएंगे. मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से श्यामवीर की गृहस्थी बिगड़े.’’

रामवीर ने कुसुमा को भरोसा दिया कि वह इस बारे में कुछ न कुछ जरूर करेगा. अगर जरूरत पड़ी तो खन्ना को रास्ते से हटा कर हमेशा की टेंशन खत्म कर देगा. होली पर रामवीर बिना बुलाए मेहमान की तरह भागचंद के घर पहुंच गया. खन्ना को उस का आना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा. लेकिन वह खामोश रहा. होली के बहाने रामवीर ने कुसुमा को अपनी बाहों में भर लिया. रामवीर की इस हरकत से नाराज हो कर खन्ना ने रामवीर की पिटाई कर दी. रामवीर अपनी सफाई में यही कहता  रहा कि वह तो सलहज के साथ होली खेल रहा था. लेकिन खन्ना का गुस्सा कम होने का नाम नहीं ले रहा था. आखिर में घर वालों ने बीचबचाव कर के रामवीर को छुड़ाया.

इस घटना से रंग में भंग पड़ चुका था. खन्ना ने तय किर लिया था कि अब वह रामवीर को किसी भी कीमत पर अपने घर नहीं आने देगा. रामवीर की पिटाई से कुसुमा भी डर गई थी. उस ने पहली बार पति का ऐसा गुस्सा देखा था. खन्ना ने उसे भी चेतावनी दी थी कि वह संभल जाए वरना बहुत पछताएगी. उस दिन कुसुमा को लगा कि अब वह रामवीर से कभी नहीं मिल पाएगी. लेकिन रामवीर ने तो कुछ और ही सोच लिया था. वह खन्ना से अपने अपमान का बदला लेना चाहता था. वह सोचने लगा कि ऐसा क्या किया जाए, जिस से वह खन्ना से बदला भी ले ले और कुसुमा भी हासिल हो जाए.

खन्ना को लगा कि रामवीर इतने अपमान के बाद अब उस के घर नहीं आएगा. वह अपने काम में मन लगाने लगा. कुसुमा का व्यवहार भी उसे सामान्य लगने लगा था. इस तरह वह बेफिक्र हो गया. लेकिन उस की यही लापरवाही आगे चल कर उस की मुसीबत बनने वाली थी. उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी की आशिकी उसे कभी मौत की सौगात दे जाएगी. रामवीर और खन्ना के बीच हुए झगड़े के बाद कुसुमा भी सतर्क हो गई थी. उस का रामवीर से भले ही मिलना नहीं हो रहा था, पर वह उस से फोन पर बातें करती रहती थी. जब कभी उसे मौका मिलता, वह फोन पर बात कर के निश्चित जगह पर उस से मिल भी लेती थी.

27 अगस्त, 2015 को सवेरे शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी ने खन्ना के घर का दरवाजा खटखटाया. खन्ना ने दरवाजा खोला तो अजीत ने कहा कि उसे अभी उस के साथ चलना होगा, क्योंकि पार्टी को अभी काम पूरा कर के देना है. अगर समय पर उस के शटर बना कर नहीं दिए तो परेशानी हो जाएगी.  खन्ना ने कहा, ‘‘ठीक है, तुम 2 मिनट ठहरो, मैं अभी तैयार हो कर आता हूं.’’

इस के बाद खन्ना ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ चला गया. उस दिन अजीत चौधरी के साथ गया खन्ना फिर कभी वापस नहीं लौटा. खन्ना देर रात तक वापस नहीं लौटा तो घर वालों ने अजीत को फोन किया, क्योंकि वह उसी के साथ गया था. अजीत ने बताया कि खन्ना तो शाम को ही काम खत्म कर के घर चला गया था. जब काम खत्म कर के घर के लिए चला था तो रास्ते से कहां गायब हो गया? घर वालों ने रात में ही खन्ना की खोजबीन शुरू कर दी. लेकिन वह नहीं मिला. घर वाले रात भर उस की चिंता में परेशान रहे. जैसेतैसे उन की रात बीती. सवेरा होते ही वे सब फिर खन्ना को तलाशने लगे.

किसी ने चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में खन्ना की लाश देखी तो उस के घर वालों को बता दिया. वे वहां पहुंच गए. भागचंद ने जब बेटे की लाश देखी तो फूटफूट कर रोने लगा. खबर मिलने पर थाना यमुनापार के थानाप्रभारी संतोष कुमार पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं मिला. गले में बनियान बंधा था. इस से अंदाजा लगाया गया कि इसी बनियान से उस का गला घोंटा गया था.

भागचंद का शक शटरिंग ठेकेदार अजीत चौधरी पर था, क्योंकि वही उसे अपने साथ घर से लिवा कर ले गया था. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने खन्ना के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने भागचंद की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली. उन्होंने अपना शक अजीत चौधरी पर जताया था. अजीत चौधरी थाना मांट के कुढ़वारा गांव का रहने वाला था. दबिश दे कर पुलिस ने उसे उस के घर से हिरासत में ले लिया.

पुलिस ने अजीत से पूछताछ की तो उस ने खुद को बेकसूर बताया. उस ने कहा कि खन्ना लंबे समय से उस के साथ काम कर रहा था. उस के साथ उस के काफी अच्छे संबंध थे. कोई ऐसी वजह नहीं थी, जिस से वह उस की हत्या करता. पुलिस ने उस से कई तरह से पूछताछ की. लेकिन कोई हल नहीं निकला. इस पूछताछ में अनुभवी थानाप्रभारी को वह वास्तव में बेकसूर लगा. उन्होंने उसे छोड़ दिया. मृतक खन्ना के परिवार वालों को जब इस बात का पता चला तो वे हंगामा करते हुए थाने पहुंच गए और अजीत को जेल भेजने की मांग करने लगे.

इस हंगामे में रामवीर बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रहा था. थानाप्रभारी ने मृतक के परिजनों को समझाया कि वह खन्ना के हत्यारे को पकड़ कर जेल जरूर भेजेंगे. इस के बाद पुलिस ने खन्ना के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स का अध्ययन करने पर पता चला कि उस के मोबाइल पर आने वाली आखिरी काल खन्ना के बहनोई रामवीर की थी. पुलिस ने रामवीर के बारे में छानबीन शुरू की तो गांव वालों से पता चला कि होली वाले दिन रामवीर ने खन्ना की बीवी को छेड़ा था, तब खन्ना ने उस की पिटाई कर दी थी.

इस बात की पुष्टि के लिए पुलिस ने खन्ना के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने कहा कि रामवीर के साथ खन्ना का झगड़ा तो हुआ था, लेकिन वह झगड़ा ऐसा नहीं था कि रामवीर खन्ना की हत्या कर देता. फिर होली के बाद रामवीर उन के यहां आया भी नहीं था. पुलिस को अब तक पता चल चुका था कि खन्ना की बीवी कुसुमा से रामवीर का कोई चक्कर था. इस के बाद पुलिस के सामने तसवीर साफ हो गई.

दूसरी ओर रामवीर को किसी तरह पता चल गया कि पुलिस को उस पर शक हो गया है तो वह फरार हो गया. उस के फरार होने की जानकारी पुलिस को मिल गई. लिहाजा 2 सिपाहियों को उस के घर पर लगा दिया गया. जैसे ही वह घर लौटा, पुलिस ने उसे दबोच लिया. पुलिस रामवीर को पकड़ कर थाने ले आई और पूछताछ शुरू कर दी. रामवीर ने पहले तो पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे वह टूट गया. उस ने स्वीकार कर लिया कि उसी ने अपने साले खन्ना की हत्या की थी और उस की लाश को चैतन्य अस्पताल के सामने खाली पड़े प्लौट में फेंक दिया था.

रामवीर ने यह भी स्वीकार किया कि उस की सलहज कुसुमा से उस के नाजायज संबंध थे. कुछ समय तक तो सब कुछ ठीकठाक चला, लेकिन कुछ दिनों बाद खन्ना को उस पर शक होने लगा और उसे उस का आनाजाना अखरने लगा. वह किसी भी कीमत पर कुसुमा से संबंध तोड़ना नहीं चाहता था. कुसुमा भी अपने पति की पिटाई से तंग आ गई थी. वह हमेशा के लिए पति से छुटकारा चाहती थी. इस के बाद दोनों ने खन्ना को ठिकाने लगाने की योजना बना ली.

उस के बाद रामवीर खन्ना का विश्वास जीतने की कोशिश करने लगा. जब उसे उस पर विश्वास हो गया तो रामवीर ने घटना वाले दिन खन्ना को फोन कर के शाम का खाना किसी होटल में खाने की बात कही. खन्ना रामवीर को अपना दुश्मन नहीं बनाना चाहता था. उस ने सोचा कि अगर रामवीर सुधर रहा है तो उसे एक मौका अवश्य देना चाहिए. उस ने सोचा कि खाना खाते समय वह रामवीर को समझाएगा. उस दिन सुबह ही वह ठेकेदार अजीत चौधरी के साथ काम पर निकला था. काम खत्म करने के बाद वह शाम को रामवीर की बताई जगह पर पहुंच गया. रामवीर उसे एक ढाबे पर ले गया, जहां दोनों ने खाना खाया और शराब पी.

रामवीर ने खन्ना को खूब शराब पिलाई. जब खन्ना नशे में धुत हो गया तो वह उसे एक टैंपो में डाल कर सुनसान जगह पर ले गया और अपनी बनियान से उस का गला घोंट दिया. चूंकि उस दिन अजीत चौधरी खन्ना को घर से बुला कर ले गया था, इसलिए घर वालों का शक अजीत पर ही गया. पर पुलिस ने असली अपराधी को खोज निकाला. रामवीर से पूछताछ के बाद पुलिस ने कुसुमा को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. कुसुमा के घर वालों को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुसुमा ने ही अपने पति को मरवाया है. कुसुमा यही कहती रही कि न उस के रामवीर से संबंध हैं और न ही उस ने पति को मरवाया है.

बहरहाल, पुलिस ने रामवीर और कुसुमा को गिरफ्तार कर के कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. कथा लिखने तक दोनों जेल में थे. Love Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित