Hindi Crime Story: मालकिन की इज्जत के साथ खेलता नौकर

Hindi Crime Story: शराब को भले ही सामाजिक बुराई माना जाता हो, लेकिन देश में शराब का अरबों का कारोबार चलता है. शाम ढलते ही शहरों के मयखानों, बार और नाइट क्लब आबाद होने लगते हैं.  शाम के तकरीबन साढ़े 7 बजे का वक्त था. उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में नौचंदी थाना क्षेत्र के सूरजकुंड स्थित एक कैंटीननुमा मयखाने में शराब पीने वालों की भीड़ लगनी शुरू हो चुकी थी.

लोग मेजों पर खानेपीने का सामान सजाए बैठे थे. किनारे की एक मेज पर आमनेसामने 2 युवक बैठे शराब की चुस्कियां ले रहे थे. तभी अचानक 2 युवक उन के पास आ कर खड़े हो गए. उन के हाथों में पिस्तौलें थीं. उन में से एक युवक हवाई फायर करते हुए चिल्लाया, ‘‘अगर किसी ने भी शोरशराबा किया या भागा तो जिंदा नहीं बचेगा.’’

युवक की इस हरकत से वहां का माहौल दहशतजदा हो गया. लोग सकते में आ गए. कोई कुछ समझ पाता उस से पहले ही दोनों युवकों में से एक ने आमनेसामने बैठे युवकों में से एक ने उस के सिर, सीने और पेट को निशाना बना कर गोलियां चला दीं. गोलियां लगते ही युवक कुरसी पर लुढ़क गया.

इस के बाद दोनों युवक चले गए. टेबल पर रखा उस युवक का मोबाइल भी वे अपने साथ ले गए थे. गोलियां चलने से वहां अफरातफरी मच गई थी. किसी ने छिप कर जान बचाई तो किसी ने भाग कर. मृत युवक के साथ बैठा युवक भी भाग खड़ा हुआ था.

इसी बीच किसी व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दे दी थी. वारदात की सूचना पा कर पुलिस भी वहां पहुंच गई. निरीक्षण में पता चला युवक मर चुका है. पूछताछ में जानकारी मिली कि दोनों हमलावर मोटरसाइकिल से आए थे. उन्होंने मृतक पर करीब 25 राउंड गोलियां चलाई थीं. मारा गया युवक अपने साथी के साथ पल्सर मोटरसाइकिल नंबर यूपी-15 बीए-4351 से आया था, जो बाहर खड़ी थी.

घटनास्थल से पुलिस को कारतूस के कई खोखे मिले. मृतक की शिनाख्त तुरंत नहीं हो सकी. उस के सीने, पेट और सिर पर 10 से ज्यादा गोलियों के निशान थे, लेकिन वहां किसी अन्य व्यक्ति को खरोंच तक नहीं आई थी. इस का मतलब हमलावर सिर्फ उसे ही मारने आए थे. जिस तरह उस पर गोलियां चलाई गई थीं, इस का मतलब था कि हत्यारे उसे किसी भी कीमत पर जिंदा नहीं छोड़ना चाहते थे.

पुलिस को मृतक की जेबों की तलाशी में एक पर्स मिला, जिस में मिलें कागजों के आधार पर उस की शिनाख्त जुहेब आलम उर्फ साहिल खान के रूप में हुई. पुलिस ने पर्स में मिले पते पर उस की हत्या की सूचना दी तो थोड़ी देर में उस के घर वाले रोतेबिलखते हुए वहां आ पहुंचे.

पुलिस ने घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. मृतक जुहेब शहर के ही थाना लालकुर्ती क्षेत्र के मैदा मोहल्ला स्थित जफर बिल्डिंग में रहने वाले सुलतान का बेटा था. उस के 2 भाई और थे, जुहेब एमबीए था और करीब 5 सालों से हापुड़ रोड स्थित कीर्तिका पब्लिकेशन में बतौर एकाउंटैंट नौकरी करता था. वह सुबह घर से निकलता था तो रात 10 बजे तक ही घर लौट पाता था.

जिस तरह उस की हत्या की गई थी, उस से यही लगता था कि उस की किसी से गहरी रंजिश थी. पुलिस ने उस के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी जुहेब या परिवार की रंजिश होने से साफ मना कर दिया. लेकिन यह बात पुलिस के गले नहीं उतरी, क्योंकि कोई तो वजह थी, जिस के चलते उस का कत्ल किया गया था.

पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल से भी पूछताछ की. उन्होंने भी अपनी जानकारी में जुहेब की किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. उन्होंने बताया था कि उस दिन जुहेब शाम करीब साढ़े 6 बजे उन के यहां से निकला था. कैंटीन में उस के साथ गया दूसरा युवक कौन था, इस की जानकारी पुलिस को नहीं मिल सकी. कत्ल का राज उस युवक के सीने में दफन हो सकता था.

यह 20 फरवरी, 2017 की घटना थी. इस मामले में पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. एसएसपी जे. रविंद्र गौड़ और एसपी (सिटी) आलोक प्रियदर्शी ने घटना के खुलासे के लिए डीएसपी विकास जायसवाल के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया. जिस में थानाप्रभारी मोहन सिंह, सबइंसपेक्टर अफसर अली, हैडकांस्टेबल धर्मराज, कांस्टेबल सतीश और राकेश को शामिल किया गया.

पुलिस के हाथ ऐसा कोई सबूत नहीं लगा, जिस से कत्ल का राज खुल पाता. सभी पहलुओं पर गौर किया गया तो सुई मृतक के मोबाइल पर जा कर अटक गई. हत्यारे जुहेब का मोबाइल फोन अपने साथ ले गए थे. मतलब उस के मोबाइल में कोई गहरा राज छिपा था. यह मामला प्रेमप्रसंग का लग रहा था, अगले दिन पुलिस ने उस के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स की छानबीन से पता चला कि जुहेब का नोएडा की रहने वाली किसी युवती से संबंध था. दोनों की अकसर बातें होती रहती थीं. युवती दूसरे संप्रदाय की थी. पुलिस की एक कड़ी मिली तो उस ने जांच आगे बढ़ाई. हत्या की वजह यह प्रेमप्रसंग भी हो सकता था. संभवत: मोबाइल फोन में युवती के फोटोग्राफ रहे होंगे, इसीलिए हत्यारे उसे अपने साथ ले गए थे. एक पुलिस टीम नोएडा गई और उस ने युवती को खोज निकाला.

पूछताछ में पता चला कि युवती और जुहेब का संपर्क सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक के जरिए हुआ था. बाद में दोनों में बातें होने लगी थीं. जुहेब उस से मिलने नोएडा भी जाया करता था. इस बात की जानकारी घर वालों को हुई तो युवती का अलग संप्रदाय की होने की वजह से खासा हंगामा हुआ.

फरवरी के पहले सप्ताह में जुहेब नोएडा गया तो युवती के घर वालों ने उसे काफी डांटाफटकारा. जुहेब ने उस वक्त भविष्य में उस से किसी तरह का संबंध न रखने का वादा किया. लेकिन वह उस से संबंध तोड़ नहीं सका. इन सब बातों से पुलिस को युवती के घर वालों पर शक हुआ. बेटी के संबंधों से नाराज हो कर वे हत्या करा सकते थे.

पुलिस ने उन से गहराई से पूछताछ की, लेकिन उम्मीदों पर तब पानी फिर गया, जब उन्होंने जुहेब को डांटने फटकारने की बात तो स्वीकारी, लेकिन हत्या में किसी भी तरह का हाथ होने से मना कर दिया. तथ्यों की कसौटी पर उन के बयान खरे पाए गए तो पुलिस खाली हाथ लौट आई.

पुलिस ने अपना ध्यान जुहेब के मोबाइल फोन पर केंद्रित किया. पुलिस यह जान कर हैरान रह गई कि वह अपने मोबाइल में 3 सिमकार्ड का इस्तेमाल करता था. पुलिस ने उस के सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि उस की दोस्ती कई लड़कियों और महिलाओं से थी. एक चौंकाने वाली बात यह पता चली कि उस की जिस नंबर पर सब से अधिक बातें होती थीं, वह पब्लिकेशन हाउस की मालकिन का था. पुलिस ने पब्लिकेशन के मालिक अमित अग्रवाल की पत्नी नेहा (परिवर्तित नाम) से पूछताछ की.

नेहा ने बताया कि चूंकि उन का ज्यादातर काम जुहेब ही संभालता था इसीलिए उस की जुहेब से अकसर बातें होती थीं. पुलिस उस के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हुई, क्योंकि दोनों के बीच देर रात तक लंबीलंबी बातें होती थीं. इस का राज नेहा ही बता सकती थी. इस का मतलब कुछ ऐसा जरूर था, जिसे नेहा छिपा रही थी. पुलिस ने 3 अन्य महिलाओं से भी पूछताछ की,  जिन से जुहेब की बातचीत होती थी.

इस के बाद पुलिस को शक हुआ कि जुहेब की हत्या के तार अग्रवाल परिवार से ही जुड़े हैं. पुलिस अभी तक जुहेब के उस साथी तक नहीं पहुंच सकी थी, जिस के साथ वह उस दिन शराब पी रहा था. वह कातिलों से मिला हुआ भी हो सकता था. संभव था कि उसे योजना बना कर वहां लाया गया हो और हत्यारों को इस की सूचना दे दी गई हो.

पुलिस ने रास्तों में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई तो एक फुटेज में जो युवक उस के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा नजर आया, उस की पहचान असब उर्फ बिट्टू के रूप में हुई. वह पब्लिकेशन हाउस में बतौर ड्राइवर नौकरी करता था. खास बात यह थी कि घटना के बाद उस का मोबाइल फोन स्विच्ड औफ था.

अब तक अग्रवाल परिवार पूरी तहर शक के घेरे में आ गया था. अपनी मालकिन से नजदीकियां जुहेब की हत्या की वजह हो सकती हैं, यह सोच कर पुलिस ने अमित अग्रवाल से पूछताछ की. लेकिन उस से काम की कोई बात पता नहीं चली. पुलिस ने नेहा के युवा बेटे मयंक अग्रवाल की काल डिटेल्स निकलवाई. घटना के समय उस का मोबाइल फोन बंद था, जबकि सीसीटीवी फुटेज के हिसाब से वह पब्लिकेशन के औफिस में ही था.

घटना के समय मोबाइल का बंद होना संदेह पैदा करता था. पुलिस ने जुहेब के कई दोस्तों से पूछताछ की. उन्होंने बताया कि जुहेब की नेहा से न केवल खासी नजदीकियां थीं, बल्कि वह उस पर काफी मेहरबान रहती थी.

आखिर 24 फरवरी को पुलिस ड्राइवर असब तक पहुंच ही गई. उसे कस्टडी में ले लिया गया, साथ ही पुलिस ने पूछताछ के लिए मयंक अग्रवाल को भी कस्टडी में ले लिया. दोनों से पुलिस ने गहराई से पूछताछ की तो ऐसा सच समने आया, जिसे जान कर पुलिस हैरान रह गई. महत्वाकांक्षी जुहेब जल्दी से जल्दी आगे बढ़ने की चाहत में बड़ी भूल कर बैठा था. वह घर की इज्जत और दौलत, दोनों से खेल रहा था. उस का यही खेल उस की जान पर भारी पड़ा.

अगले दिन पुलिस ने प्रैसवार्ता कर के पूरे मामले का खुलासा कर दिया. दरअसल, पब्लिकेशन हाउस में नौकरी के दौरान जुहेब की नेहा से नजदीकियां बढ़ गई थीं. इस की भी एक वजह थी. अमित अग्रवाल काम के सिलसिले में अकसर शहर से बाहर आतेजाते रहते थे. बेटा बाहर रह कर पढ़ रहा था. ऐसे में औफिस की जिम्मेदारी नेहा संभालती थी. यही नहीं, पब्लिकेशन के कागजों के अनुसार, मालकिन भी वही थी. वह आजादखयाल महिला थीं, जबकि जुहेब महत्त्वाकांक्षी और लच्छेदार बातों का बाजीगर था.

उस का यही अंदाज नेहा को भा गया. दोनों की उम्र में करीब 20 साल का फासला था. लेकिन आगे बढ़ने की ललक में जुहेब ने उम्र का फासला नजरअंदाज कर दिया था. वह जानता था कि कंपनी की असली मालकिन नेहा है, इसलिए मजे से नौकरी करने और आगे बढ़ने के लिए नेहा को अपने पक्ष में करना जरूरी है.

नेहा जितनी ज्यादा मेहरबान होगी, उस की जिंदगी में उतनी ही खुशियां आएंगी. यही सब सोच कर वह नेहा पर डोरे डालने लगा. उस की बातों में नेहा को भी रस आने लगा था. नतीजा यह हुआ कि कुछ ही दिनों में जुहेब नेहा का दिल जीतने में कामयाब हो गया.

जुहेब ने चालाकी दिखाई थी, लेकिन नेहा को तो समझदारी दिखाते हुए सतर्क हो जाना चाहिए था. पर वह खुद भी अंजाम की परवाह किए बिना उस के रंग में रंगने लगी थी. दोनों की बातें और मुलाकात रोज होती ही होती थी. इस के अलावा वे फोन पर भी बातें और चैटिंग करने लगे. भूल कुछ पलों के निर्णय पर निर्भर होती है. गलत निर्णयों के नतीजे बाद में कितने अच्छे और बुरे निकलेंगे, इस बात को पहले कोई नहीं सोचता. एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूट गई. इस के बाद यह आए दिन का सिलसिला बन गया.

समय अपनी गति से चलता रहा. अमित को दोनों की नजदीकियों पर शक हुआ. जुहेब का आचरण उन्हें अच्छा नहीं लगा तो उन्होंने उसे नौकरी से निकालने का प्रयास किया. लेकिन हर बार नेहा ढाल बन कर खड़ी हो गई.

कहते हैं कि अनैतिक संबंध छिपाए नहीं छिपते. इस मामले में भी ऐसा ही हुआ. जब सब को यकीन हो गया कि दोनों के बीच अनैतिक संबंध हैं तो परिवार कलह का अखाड़ा बन गया. बात बढ़ती देख नेहा ने वादा किया कि वह अपनी गलती को सुधारने का प्रयास करेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कुछ दिनों की खामोशी के बाद दोनों फिर से मिलनेजुलने लगे, उन की राह गलत है, दोनों ही जानते थे, लेकिन अपने संबंधों को वे प्यार का नाम दे कर खुश थे. जुहेब की वजह से एक हंसतेखेलते परिवार में तूफान उठ खड़ा हुआ था. उसे ले कर घर में हमेशा तनाव रहने लगा था. अमित ने कई बार जम कर विरोध किया लेकिन जब स्थितियों में परिवर्तन नहीं आया तो एक दिन उन्होंने आत्महत्या के इरादे से अपने हाथ की नसें काट लीं. लेकिन समय से मिले उपचार की वजह से उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा.

जुहेब और नेहा, दोनों ही बदलने को तैयार नहीं थे. नेहा की मेहरबानियों का असर यह हुआ कि जुहेब की न सिर्फ तनख्वाह बढ़ती गई, बल्कि उस का ओहदा भी बढ़ता गया. एक साल पहले की बात है.

नेहा का बेटा मयंक एमबीए की पढ़ाई कर के घर लौट आया और उस ने बिजनैस संभालना शुरू कर दिया. वह दूर था तो उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन घर आ कर उसे वे बातें भी पता चलने लगीं जो नहीं पता चलनी चाहिए थीं. सब कुछ जान कर उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई, वह जुहेब से नफरत करने लगा.

मयंक ने जुहेब की कई गलतियां पकड़ीं. जुहेब एकाउंटैंट था. हिसाबकिताब की सभी बारीकियां उस के हाथों में थीं. उस की नजर में जुहेब कंपनी को चूना लगा रहा था. उस ने नेहा से उस की शिकायतें कीं, लेकिन वह एक कान से सुन कर दूसरे कान से निकाल देती थी. एक दिन मयंक ने अपनी मां से इस मुद्दे पर स्पष्ट कहा, ‘‘जब आप को पता है कि जुहेब गलत है और वह कंपनी को चूना लगा रहा है तो उसे हटाने में क्या बुराई है? मैं उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता.’’

‘‘चाहती तो मैं भी यही हूं, लेकिन…’’ नेहा ने अपनी बात अधूरी छोड़ी तो मयंक ने पूछा, ‘‘लेकिन क्या?’’

‘‘तुम जानते हो कि कंपनी का सारा काम उसे पता है. लेनदारियां भी उसे मालूम हैं. उसे हटाया गया तो कंपनी को काफी नुकसान हो सकता है. तुम पूरी तरह काम संभाल लो, उस के बाद उसे बाहर कर देंगे.’’

मां की बात सुन कर मयंक सोच में पड़ गया. एक हद तक उन की बात ठीक भी थी. कई सालों में जुहेब कंपनी के हिसाबकिताब की सभी बारीकियां जान गया था. नेहा की तरफ से उसे मिली छूट का ही नतीजा था कि वह बड़े हिसाब अपने हाथों में रखता था.

पूछने या कहने पर भी वह मयंक या उस के पिता को हिसाब नहीं देता था. बात भी उतनी ही बताता था, जितनी वह जरूरी समझता था. जोर देने पर वह मयंक के साथ मारपीट करने तक पर उतारू हो जाता था.

मयंक को शक था कि उस ने कंपनी में लाखों का घोटाला किया है. ऐसे में मयंक की तिलमिलाहट और बढ़ गई. जुहेब शानदार लाइफ स्टाइल में जीता था. एक दिन नेहा के मोबाइल में मयंक ने जुहेब की चैटिंग देख ली. दोनों की बातें शर्मसार करने वाली थीं. मयंक खून का घूंट पी कर रह गया. सब कुछ जान कर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था.

घर में आए दिन झगड़ा होता रहता था. जुहेब के प्रति मयंक के मन में नफरत तो थी ही, यह नफरत तब और बढ़ गई जब नेहा ने उसे गिफ्ट में स्कूटी दी. मयंक को लगा कि अगर वक्त रहते उस ने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं, जब जुहेब उस के परिवार को न सिर्फ बर्बाद कर देगा, बल्कि बिजनैस पर भी कब्जा कर लेगा.

इज्जत और दौलत की बर्बादी वह अपनी आंखों से देख रहा था. उसे लगा कि जब तक जुहेब का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया जाएगा तब तक मां सुधरने वाली नहीं है. आखिर उस ने मन ही मन एक खतरनाक निर्णय ले लिया.

मयंक का एक मौसा था राजू उर्फ किशनपाल. वह मुजफ्फरनगर जिले के थाना रामराज क्षेत्र के गांव देवल का रहने वाला था. वह आपराधिक और दबंग प्रवृति का था. मयंक ने सारी बातें उसे बता कर जुहेब को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने को कहा तो वह बोला, ‘‘झगड़े की जड़ जुहेब को हटाने के लिए पेशेवर लोगों का इंतजाम करना होगा.’’

‘‘जो उचित लगे, आप करें जितना भी खर्चा होगा, मैं देने को तैयार हूं.’’ मयंक ने कहा.

राजू की पहचान ऐसे कई लोगों से थी, जो पैसे ले कर हत्या करते थे. उस ने मेरठ के शास्त्रीनगर के रहने वाले सारिक और नदीम से बात कर के उन्हें जुहेब की हत्या के लिए तैयार कर लिया. इस के बाद सभी ने मिल कर हत्या की योजना बना डाली.

योजना के तहत 20 फरवरी की सुबह राजू मेरठ आ कर मयंक से मिला. मयंक जानता था कि जुहेब और असब के बीच दोस्ती है, इसलिए उस ने असब को भी योजना में शामिल करने का फैसला किया. उस ने असब को औफिस से बाहर बुलवाया और उसे रुपयों का लालच दे कर अपने साथ शामिल कर लिया. तय हुआ कि असब जुहेब को सही ठिकाने पर ले कर जाएगा और फोन कर के राजू को इस बारे में बताएगा.

योजनानुसार राजू शूटरों के पास चला गया. सारिक और उस के साथी के पास पहले से ही हथियार थे. दिन में असब ने जुहेब से शाम को पीनेपिलाने की बात कही तो वह खुशीखुशी तैयार हो गया.

शाम को दोनों मोटरसाइकिल से शराब के ठेके पर पहुंचे तो असब ने फोन कर के राजू को सटीक जानकारी दे दी. इस के बाद राजू शूटर सारिक और नदीम के साथ वहां पहुंचा और चालाकी से जुहेब की पहचान करा दी. इस के बाद उन्होंने वारदात को अंजाम दे दिया.

असब वहां से निकला और बाहर आ कर राजू तथा शूटरों से मिला. शूटरों ने उसे एक पिस्टल छिपा कर रखने के लिए दी और खुद चले गए. असब भी अपने मोबाइल का स्विच औफ कर के घर चला गया.

मयंक ने सोचा था कि योजनाबद्ध तरीके से काम करने की वजह से पुलिस इस मामले में उलझ कर रह जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जुहेब और नेहा की नासमझी से 2 परिवारों पर मुसीबत आ गई. जुहेब को अपनी जान गंवानी पड़ी तो नेहा के बेटे मयंक को जेल जाना पड़ा. समय रहते अगर दोनों सुधर गए होते तो यह नौबत नहीं आती.

असब की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त 32 बोर का पिस्टल और कारतूस बरामद कर लिए. पुलिस ने दोनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक दोनों में से किसी की जमानत नहीं हो सकी थी. फरार आरोपियों की सरगर्मी से तलाश जारी थी. Hindi Crime Story

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: आशिकी का अंजाम

Hindi Crime Story: तुलसीराम से शादी हो जाने के बाद भी कीर्तिबाला ने पुराने प्रेमियों से मिलना जारी रखा. 3 बच्चों की मां बनने के बावजूद भी उस ने आशिकी का ऐसा खेल खेला कि उसे जेल जाना पड़ा.

23 सितंबर, 2015 की सुबह इंदौर के थाना ऐरोड्रम के थानाप्रभारी बलजीत सिंह अपने औफिस में पहुंचे ही थे कि लक्ष्मीबाई अपनी 9 साल की भतीजी चांदनी को ले कर उन के पास पहुंची. वह इलाके के ही अखंडनगर में रहती थी. उस का भाई तुलसीराम पिछले कई दिनों से लापता था. तुलसीराम शादीविवाह के कार्यक्रमों में खाना बनाने का ठेका लेता था. लक्ष्मीबाई के अनुसार, उस की भाभी कीर्तिबाला ने उसे बताया था कि तुलसीराम किसी शादी में खाना बनाने की बात कह कर गए हैं. जबकि यह बात सही नहीं है. हकीकत में कीर्तिबाला ने कुछ युवकों के साथ मिल कर तुलसीराम को मार डाला है और लाश को औटो में रख कर कहीं फेंक दिया है. मामला बेहद गंभीर था. थानाप्रभारी ने लक्ष्मीबाई से पूछा, ‘‘तुलसीराम की हत्या होने की बात तुम इतने दावे के साथ कैसे कह रही हो?’’

‘‘मैं यह सब इस आधार पर कह रही हूं कि मुझे इस बच्ची ने बताया है. यह तुलसीराम की बेटी है. इस ने अपनी आंखों के सामने पिता का कत्ल होते देखा है. आप इस से खुद मालूम कर सकते हैं.’’ लक्ष्मीबाई ने थानाप्रभारी को बताया.

बलजीत सिंह ने 9 साल की बच्ची चांदनी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछा तो उस ने पिता की हत्या किए जाने की सच्चाई उन्हें बता दी. इस के बाद बलजीत सिंह ने पूरे मामले से एसपी (सिटी) आर.एस. घुरैया को अवगत करा दिया. उन के निर्देश पर उन्होंने एक पुलिस टीम बनाई. इस पुलिस टीम ने सब से पहले तुलसीराम की पत्नी कीर्तिबाला को हिरासत में ले कर उस से पूछताछ की. पहले तो वह पुलिस को गुमराह करती रही, लेकिन सख्ती करने पर उस ने पति की हत्या का राज उगल दिया. उस से की गई पूछताछ के आधार पर पुलिस ने उसी दिन उस के प्रेमी विशाल जगताप, संजय सिंघल उर्फ चिंटू, संदीप जाधव और औटोचालक विशाल चालसे को गिरफ्तार कर लिया.

थाने में जब पांचों अभियुक्तों का एकदूसरे से सामना हुआ तो उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन की कहानी अब खत्म हो चुकी है. पुलिस ने उन सभी से तुलसीराम की हत्या के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने अपना अपराध स्वीकार करते हुए तुलसीराम की हत्या की जो कहानी बयां की, वह इस प्रकार थी. कीर्तिबाला मध्य प्रदेश के शहर इंदौर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी. उस के मातापिता दोनों ही काम पर जाते थे. घर की बड़ी बेटी होने की वजह से कीर्ति ही अपने अन्य भाईबहनों की देखभाल करती थी. कीर्ति जब जवानी में पहुंची तो मोहल्ले के आवारा किस्म के कई युवक उस पर डोरे डालने लगे. उन में से एक युवक कीर्ति का दूर का रिश्तेदार भी था. उस युवक का कीर्ति के घर काफी आनाजाना था.

कीर्ति उस पर विश्वास करती थी. वह मौका मिलने पर कीर्ति के साथ छेड़छाड़ करता था. लेकिन रिश्तेदार होने की वजह से कीर्ति ने न तो उस का विरोध किया और न ही इस की शिकायत अपने मांबाप से की. इस से उस युवक की हिम्मत बढ़ती गई. कीर्ति उम्र के जिस पड़ाव से गुजर रही थी, वह बड़ा ही फिसलनभरा होता है. उस रिश्तेदार की बातों में फंस कर कीर्ति फिसल गई. इस के बाद तो वह अपने मोबाइल पर उसे अश्लील फिल्में दिखाने लगा. उसी दौरान उन दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद यह सिलसिला बन गया.

फिर तो कीर्ति ऐसी बहकी कि उस के मोहल्ले के कई लड़कों से नाजायज संबंध हो गए. लेकिन जब बेटी के बहके कदमों की जानकारी मातापिता को हुई तो उन्होंने बिना देरी किए कीर्ति की शादी तुलसीराम के साथ कर दी. यह 10 साल पहले की बात है. तुलसीराम इंदौर के अखंडनगर में रहता था. वह शादीविवाह में ठेके पर खाना आदि बनवाने का काम करता था. उस के साथ इस काम में और भी लोग जुड़े थे. इसलिए उस के पास साल भर काम रहता था. इस से उसे अच्छीखासी कमाई हो जाती थी. चूंकि अपने काम की वजह से वह रातों को घर से बाहर रहता था, इसलिए कीर्ति को उस का यह काम पसंद नहीं था. वह चाहती थी कि पति ऐसा कोई काम करे, जिस से शाम को वह घर लौट आया करे.

इस बारे में कीर्ति ने बात की तो तुलसीराम कोई दूसरा काम करने के लिए राजी नहीं हुआ. वह अपना वही काम करता रहा. रातरात भर जागने के बाद तुलसी सुबह थकाहारा घर लौटता और गहरी नींद सो जाता. कीर्ति इसे पति की बेरुखी समझती. उसे तो कमउम्र में ही शारीरिक संबंध की लत लग गई थी. पति की बेरुखी पर उस ने जल्द ही अपने मायके के पुराने प्रेमियों से मिलनाजुलना शुरू कर दिया. यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा. देखतेदेखते कीर्ति एक बेटी और 2 बेटों की मां बन गई. तुलसीराम के साथ कृष्णबाग कालोनी में रहने वाला संजय उर्फ चिंटू भी काम करता था. काम के सिलसिले में वह अकसर तुलसी के घर आताजाता रहता था. चिंटू अविवाहित था. कीर्ति के सौंदर्य ने उसे पहली ही नजर में अपना दीवाना बना दिया था. इसलिए वह जब भी उस के घर आता, उस से अधिक से अधिक बातें करने के फेर में रहता.

कीर्ति तो इस खेल की पुरानी खिलाड़ी थी. इसलिए वह जल्द ही उस की नजरों को भांप गई. ॐस ने भी उसे आमंत्रण देते हुए उस के मन की आग को हवा देनी शुरू कर दी. चिंटू जब कभी कीर्ति के घर आता, उस से हंसीमजाक करता. उस की हंसीमजाक का वह उसी के अंदाज में जवाब देती थी. इस से वे एकदूसरे के करीब आते चले गए और फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों की इच्छाएं पूरी हो गईं. उस दिन के बाद चिंटू और कीर्ति दुनिया से नजरें बचा कर इस अनैतिक रास्ते पर चल पड़े. चिंटू का एक दोस्त था विशाल जगताप. चिंटू ने कीर्ति के साथ अपने संबंधों की कहानी विशाल को सुनाई तो उस ने भी चिंटू के साथ कीर्ति के घर आनाजाना शुरू कर दिया. क्योंकि कीर्ति के किस्से वह भी अन्य लोगों से सुन चुका था.

इसलिए उस से संबंध बनाने की उस की भी लालसा जाग उठी थी. नएनए लड़कों से संबंध बनाने की कीर्ति की लत लग चुकी थी. उस ने जल्द ही विशाल को भी अपने सांचे में उतार लिया. फिर एक समय ऐसा आया कि चिंटू और विशाल अकसर कीर्ति के पास आने लगे. कीर्ति की बेटी चांदनी 9 साल की हो चुकी थी. इतनी बड़ी बेटी से कीर्ति को न कोई शरम थी और न कोई डर. वह बेटी को बाहर के कमरे में बैठा कर अपने प्रेमियों के साथ दरवाजा बंद कर के मौजमस्ती करती थी. लेकिन कहते हैं कि पाप ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता.

आखिर कीर्ति के अवैध संबंधों की जानकारी तुलसीराम को किसी तरह हो ही गई. पत्नी की सच्चाई जान कर तुलसीराम को बड़ा दुख हुआ. उस ने कीर्ति को समझाया. लेकिन वह कहां मानने वाली थी. तुलसीराम को इस बात की चिंता थी कि मां की गलत आदतों का असर बेटी चांदनी पर न पड़े. इसलिए वह बेटी को अकसर समझाता रहता था. चांदनी भी मां की हरकतों की जानकारी तुलसी को देती रहती थी, जिस से वह परेशान रहने लगा. तब उस ने न केवल कीर्ति पर सख्ती बरतनी शुरू की, बल्कि चेतावनी दी कि यदि उस ने अपना रवैया नहीं बदला तो वह आत्महत्या कर लेगा.

इन बातों का कीर्ति पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं था. उस का अपने प्रेमियों से पहले की ही तरह मिलनाजुलना जारी रहा. रोज नए युवकों के साथ वक्त बिताना उस की जैसे आदत बन चुकी थी. पति की रोजरोज की किचकिच से वह उकता गई. एक तरह से उसे अब पति में कोई दिलचस्पी नहीं रही थी. वह उस से निजात पाना चाहती थी, ताकि उस से कोई टोकाटाकी न कर सके. कीर्ति ने पति की लाखों रुपए की संपत्ति पहले ही अपने नाम करा ली थी. इस के बाद उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए अपने प्रेमी विशाल से बात की. विशाल ने उस से वादा किया कि तुलसीराम की हत्या के बाद वह उस से शादी कर लेगा.

यह काम विशाल अकेले नहीं कर सकता था, लिहाजा उस ने इस काम को अंजाम देने के लिए अपने 2 दोस्तों, चिंटू और संदीप को भी राजी कर लिया. फिर योजना बना कर कीर्ति ने एक दिन विशाल, चिंटू और संदीप को अपने यहां बुला कर एक कमरे में छिपा दिया. रात को तुलसीराम घर लौटा तो खाना खाने के बाद वह बिस्तर पर जा कर लेट गया. थोड़ी देर में उसे नींद आ गई. तभी कीर्ति भी उस के पास जा कर लेट गई. कीर्ति ने पहले तो पति को हिलाडुला कर देखा कि वह सो रहा है या जाग रहा है? जब तुलसीराम ने कोई हरकत नहीं की तो उस ने फटाफट अपना दुपट्टा उतार कर पति के गले में लपेट दिया और उस के दोनों सिरे पलंग के दोनों ओर लटका दिए.

इस के बाद उस के आवाज देने पर उस के दोनों प्रेमी विशाल और चिंटू कमरे में आ गए. आते ही उन्होंने दुपट्टे के दोनों सिरे खींचने शुरू कर दिए तो संदीप तुलसीराम के पैरों पर बैठ गया. उसी समय तुलसीराम की बेटी चांदनी की आंखें खुल गईं. वह उन तीनों को पहचानती थी. पिता को तड़पता देख कर वह चीखी तो कीर्ति ने झट से उस का मुंह बंद कर लिया और 2 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

इस के बाद वह उसे किचन में ले गई. वह उसे डराते हुए बोली, ‘‘खबरदार, किसी को बताया तो तुझे भी मार डालूंगी.’’

मां की धमकी से बच्ची डर गई. तुलसीराम की हत्या करने के बाद उन्हें लाश ठिकाने लगानी थी. इस के लिए उन्होंने लाश को बांध कर विशाल के औटो में रख दिया. लाश को ये नैनोद के पास ले गए और वहीं पर बने एक ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर लाश उस में डाल दी. इन का सोचना था कि लाश वहां से काफी दूर बह जाएगी और पुलिस उन तक नहीं पहुंच पाएगी.

बेटी कहीं मुंह न खोल दे, इसलिए कीर्ति अगले दिन भी उसे डराती रही. उसी दिन दोपहर के समय तुलसीराम का भाई शिवकुमार और बहनोई घर आए तो उन्होंने कीर्ति से तुलसीराम के बारे में पूछा. तब कीर्ति ने उन्हें बताया कि वह किसी शादी में खाना बनाने गए हैं. वहां मौजूद चांदनी उन्हें सचाई बताना चाहती थी, लेकिन जब उस ने कीर्ति की तरफ देखा तो मां ने आंखें तरेरी तो वह डर गई. कीर्ति ने पति को ठिकाने लगाने वाली बात अपनी मां वंदना को भी बता दी थी. नानी वंदना ने भी चांदनी को पीटा और कहा कि अगर उस ने किसी से कुछ बोला तो उसे भी मार कर कहीं फेंक देंगे. शाम को तुलसीराम की बहन लक्ष्मीबाई घर आई तो वह चांदनी को अपने घर ले गई. तब चांदनी ने बुआ को सारी बात बता दी.

अगले दिन सुबहसुबह लक्ष्मीबाई चांदनी को ले कर थाना ऐरोड्रम पहुंची और थानाप्रभारी बलजीत सिंह को पूरी कहानी बता दी. हत्या का खुलासा होने पर डीआईजी संतोष कुमार सिंह और एसपी (पश्चिमी) डी. कल्याण चक्रवर्ती भी थाने पहुंच गए. उन्होंने भी अभियुक्तों से पूछताछ की. अभियुक्तों की निशानदेही पर पुलिस ने ड्रेनेज का ढक्कन हटा कर तुलसीराम की लाश बरामद कर ली. पूछताछ के बाद पुलिस ने सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा संकलन तक तुलसीराम के तीनों बच्चे अपनी बुआ के पास थे. पति की हत्या करने का कीर्ति को तनिक भी अफसोस नहीं था.

जेल जाते समय उस ने कहा कि उसे अब बच्चों से कोई मतलब नहीं है. जेल से छूटने के बाद वह विशाल के साथ शादी कर अपनी गृहस्थी नए सिरे से बसाएगी.

Family Crime: प्यार में छली गई कांस्टेबल

Family Crime: पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी की एक्सीडेंट में मृत्यु के बाद ओडिशा के कांस्टेबल दीपक राउत (39 वर्ष) ने बीमा कंपनी से डेढ़ करोड़ रुपए का क्लेम लिया. इस के बाद उस ने कांस्टेबल शुभमित्रा साहू (25 वर्ष) को प्रेम जाल में फांस कर उस से कोर्टमैरिज कर ली. फिर एक दिन उस ने शुभमित्रा को भी ठिकाने लगा दिया. पुलिस ने जब जांच कर गड़े मुर्दे खोदे तो ऐसी सच्चाई जगजाहिर हुई कि…

महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू अपने दोस्त कांस्टेबल दीपक राउत के साथ गुपचुप तरीके से की गई कोर्ट मैरिज को जल्द से जल्द सार्वजनिक करना चाहती थी, जबकि 39 वर्षीय दीपक राउत अब शुभमित्रा साहू (25 वर्ष) को अपनी जिंदगी से हमेशाहमेशा के लिए निकालने का प्लान बना चुका था.

अपने इसी प्लान को आखिरी मंजिल तक पहुंचाने के लिए उस ने 6 सितंबर, 2025 की तारीख को चुना. शुभमित्रा साहू की ड्यूटी डीसीपी ट्रैफिक कार्यालय में थी. शाम 7 बजे उस की ड्यूटी खत्म हुई तो दीपक राउत ने फोन कर के उसे एक अनजान जगह मिलने के लिए बुलाया. जब शुभमित्रा 7 बज कर 10 मिनट पर उस की बताई गई जगह पर पहुंची तो दीपक राउत अपनी होंडा सिटी कार से उस का इंतजार कर रहा था.

दीपक उसे कार में बिठा कर भीड़भाड़ से दूर एक सुनसान जगह पर ले गया और फिर जंगल के सुनसान इलाके में उस ने कार रोक दी. इस दौरान शुभमित्रा ने दीपक से अपने उधार के 20 लाख रुपयों की मांग की, क्योंकि वह अपनी शादी को सार्वजनिक कर एक ग्रांड पार्टी देना चाहती थी. जबकि दीपक शुभमित्रा को एक पाई तक देने के मूड में नहीं था. वह तो केवल कोर्ट मैरिज की आड़ में उस के शरीर और भावनाओं से खेल रहा था.

पैसे मांगने पर दोनों के बीच विवाद हो गया. कांस्टेबल दीपक ने उसे गालियां देनी शुरू कर दीं तो शुभमित्रा भी जवाब में उसे गालियां देने लगी. इस पर दीपक ने उस के साथ मारपीट करनी शुरू कर दी. इस दौरान शुभमित्रा ने दीपक को जोर से एक लात मार दी. गुस्से में आ कर दीपक ने शुभमित्रा का गला पकड़ लिया और तब तक दबाता रहा, जब तक वह बेसुध हो कर नीचे नहीं गिर गई. कुछ ही पलों में शुभमित्रा की मौत हो गई.

शुभमित्रा की हत्या करने के बाद दीपक ने उस का शव अपनी कार की डिक्की में रखा. पूरे एक दिन तक वह शुभमित्रा का शव अपनी कार की डिक्की में रख कर सामान्य तरीके से ही घूमता रहा. यहां तक कि वह अपनी ड्यूटी करने थाने भी गया. इस के बाद उस ने अपने चचेरे भाई को पैसे देने का लालच दे कर उसे और उस के ड्राइवर को जेसीबी ले कर शव को 170 किलोमीटर दूर क्योंझर जिले के घाटगांव क्षेत्र के पास जंगल में भेज दिया. वहां उन्होंने सुनसान जगह पर जेसीबी से गहरा गड्ढा खोद कर शुभमित्रा साहू को दफना दिया.

25 वर्षीय शुभमित्रा साहू उस समय कोरडा टाउन, पिचकुली, सूर्यनगर, भुवनेश्वर में किराए के मकान में रहती थी. उस के औफिस से उस के कमरे का रास्ता बमुश्किल आधे घंटे का था. शुभमित्रा की मम्मी सुकीर्ति साहू उस के साथ में रहती थीं. जब शाम को 8 बजे तक भी शुभमित्रा साहू अपने घर नहीं पहुंची तो उस की मम्मी एकदम से घबरा गईं. उन्होंने तुरंत अपने पति और बेटी को इस बारे में सूचना दी और अपने पड़ोस की एक महिला के साथ शुभमित्रा का पता लगाने उस के औफिस में चली गईं.

औफिस से पता चला कि शुभमित्रा साहू तो रोजाना की तरह आज शाम को 7 बजे अपनी ड्यूटी खत्म कर के अपने घर की ओर निकल गई थी. अब तक पुलिस महकमे में भी इस खबर को सुन कर हड़बड़ी मच गई थी. शुभमित्रा साहू की मम्मी सुकीर्ति साहू ने तुरंत कैपिटल थाने में अपनी बेटी शुभमित्रा साहू के लापता होने की सूचना दर्ज करा दी.

पुलिस अब तुरंत हरकत में आ गई थी. दूसरे दिन लापता शुभमित्रा साहू की मम्मी सुकीर्ति साहू और पापा धुरयदान साहू ने पुलिस कमिश्नर (भुवनेश्वर) सुरेश देव दत्ता सिंह से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात कर बेटी को तलाशने में त्वरित जांच की मांग की. पुलिस कमिश्नर ने संबंधित अधिकारियों को लापता ट्रैफिक कांस्टेबल शुभमित्रा साहू की खोज के लिए आवश्यक दिशानिर्देश जारी कर दिए.

पुलिस टीमें लगातार शुभमित्रा साहू की तलाश में जुटी हुई थीं. इस के लिए पुलिस ने अपनी कई टीमें बना रखी थीं, लेकिन हफ्ता गुजरने के बाद भी पुलिस के पास कोई भी सुराग हाथ नहीं आ पाया था. पुलिस टीम को शुभमित्रा के किराए के घर पर उस का खुद का मोबाइल भी सुरक्षित हालत में बरामद हुआ था.

अब पुलिस टीम को यह बात साफ नहीं हो पा रही थी कि लापता महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू अपना मोबाइल अपने ही घर में जल्दबाजी में भूल गई थी या जानबूझ कर छोड़ गई थी. एक महिला कांस्टेबल रहस्यमय तरीके से ड्यूटी के स्थान से ले कर अपने किराए के मकान के बीच भला कैसे गायब हो सकती थी. यह प्रश्न अब ओडिशा पुलिस के लिए खुद एक प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका था.

अपनी इसी प्रतिष्ठा को बरकरार रखने के लिए आखिरकार डीसीपी भुवनेश्वर ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘एक्स’ पर शुभमित्रा की फोटो और उस की पूरी डिटेल्स को शेयर करते हुए एक पोस्ट में लिखना पड़ा था कि क्या आप ने हमारी महिला कांस्टेबल शुभमित्रा साहू, जिस की उम्र 25 वर्ष और लंबाई लगभग 5 फुट है, जिस ने ड्यूटी से अपने घर को निकलते समय बैंगनी रंग का टौप और सफेद सलवार पहनी हुई थी, उसे कहीं पर देखा है?

यदि किसी ने इन महिला कांस्टेबल को कहीं पर भी आतेजाते या टहलते हुए कहीं पर देखा है तो कृपया हमें हमारे मोबाइल नंबर 7008264419 और 8280338022 पर सूचित करें. सूचना देने वाले की पहचान गोपनीय रखी जाएगी. इस के अतिरिक्त भुवनेश्वर पुलिस ने लापता शुभमित्रा की सूचना देने वाले व्यक्ति को 25 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा भी कर दी थी.

भुवनेश्वर पुलिस पूरे जोरशोर से शुभमित्रा की तलाश कर रही थी. इस के लिए पुलिस सीसीटीवी कैमरे और शुभमित्रा के घर से बरामद उस के मोबाइल फोन को भी अनलौक करने में जुटी जुटी हुई थी, लेकिन पुलिस को अभी तक कोई भी सूत्र हाथ नहीं लग पाया था. शुभमित्रा अपने औफिस से शाम को 7 बजे के बाद अपने घर आने के रास्ते में अचानक कहां लापता हो गई थी, यह प्रश्न बारबार पुलिस को परेशान कर रहा था.

जांच के दौरान पुलिस के सामने यह बात साफ हो चुकी थी कि शुभमित्रा के गायब होने में उस के किसी खास परिचित, प्रेमी आदि का हाथ हो सकता है, इसलिए अब पुलिस इस केस की जांच ‘लव एंगल’ से भी करने लगी. आखिरकार, भुवनेश्वर पुलिस के कैपिटल पुलिस स्टेशन के जांच अधिकारियों को अपनी विस्तृत जांच करने के दौरान यह पता चला कि भुवनेश्वर में शुभमित्रा साहू के साथ आखिरी बार पुलिस कमिश्नरेट में तैनात पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत को देखा गया था.

पुलिस टीम ने तत्काल दीपक राउत को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी. इसी दौरान पुलिस को यह भी पता चला कि पिछले साल दीपक और शुभमित्रा ने गुपचुप कोर्ट मैरिज कर ली थी, जिस के बारे में दोनों के फेमिली वालों को पता तक नहीं था. अब पुलिस का शक दीपक पर पूरी तरह से बढ़ गया था. पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर संदिग्ध दीपक राउत शुभमित्रा के गायब होने के बाद दुखी होने का दिखावा करता रहा. यहां तक कि वह शुरू में परिवार और पुलिस के साथ उसे ढूंढने में मदद करने का झूठा दिखावा करता रहा.

पुलिस पूछताछ में दीपक राउत ने सामान्य स्थिति का दिखावा करते हुए यह बात स्वीकार की कि उस के और शुभमित्रा के बीच में प्रेम प्रसंग था और उस ने शुभमित्रा के साथ 23 जुलाई, 2024 को कोर्ट मैरिज भी छिप कर कर ली थी. दीपक राउत ने पुलिस पूछताछ में आगे बताया कि वह 6 सितंबर, 2025 को जब शुभमित्रा एकाएक लापता हो गई थी तो वह अपने एक रिश्तेदार से मिलने क्योंझर गया था और उस ने अपनी प्रेयसी और पत्नी शुभमित्रा साहू की सकुशल व सुरक्षित वापसी के लिए वहां के तारिणी मंदिर में प्रार्थना भी की थी.

इस बात की पुष्टि करते हुए उस ने पुलिस टीम को अपने मोबाइल में खींची गई तसवीरें और पूजापाठ करते हुए ली गई सेल्फी भी दिखाई. इस के साथ ही उस ने सोशल मीडिया पर किया गया अपना पोस्ट भी दिखाया, जिस में उस ने शुभमित्रा के लापता होने की जानकारी पोस्ट की थी और लोगों से अपील भी की थी कि उस के बारे में किसी भी किस्म की जानकारी होने पर तुरंत पुलिस को दिए गए मोबाइल फोन पर सूचना दें.

शुभमित्रा साहू की जांच में एक अहम मोड़ तब आया, जब पुलिस ने लापता शुभमित्रा का फोन अनलौक करने के बाद उस के वाट्सऐप चैट्स को एक्सेस किया. इस में इस बात का पता चला कि शुभमित्रा ने 10 लाख रुपए कोर्ट मैरिज से पहले दीपक राउत को उधार दिए थे. उस के बाद शुभमित्रा दीपक से अपने 10 लाख रुपए लौटाने के साथसाथ 10 लाख रुपए अतिरिक्त देने की डिमांड कर रही थी, ताकि वह धूमधाम के साथ अपनी शादी की पार्टी अपने फेमिली वालों व परिचितों के बीच कर सके.

लेकिन दीपक इस विवाह को सार्वजनिक किए जाने के खिलाफ था. वह शुभमित्रा से बारबार यही कहता था कि वह अभी तक अपनी पहली पत्नी अपर्णा की मृत्यु से ठीक तरह से उबर नहीं पाया है. इस के अलावा दीपक बारबार इस बात का उलाहना भी शुभमित्रा को देता रहता था कि उस ने शुभमित्रा का एक करोड़ रुपए का बीमा करा रखा है, जिस की किश्त देना उसे भारी पड़ता जा रहा है, इसलिए दीपक उस के 10 लाख रुपए लौटाने के एकदम खिलाफ हो गया था.

इन सभी बातों से शुभमित्रा काफी तनाव में आ गई थी, जिस के कारण उस के वाट्सऐप मैसेज में पुरी, मथुरा और वाराणसी जाने की इच्छा जताई थी. शुरू में दीपक राउत ने पुलिस को यह कह कर गुमराह करने की कोशिश की थी कि शुभमित्रा की अपने मम्मीपापा के साथ अनबन रहती थी, जिस के कारण वह अपना घर छोड़ कर चली गई होगी. उस के बाद पुलिस टीम ने पुरी, वाराणसी और मथुरा में जा कर भी शुभमित्रा की तलाश की, लेकिन पुलिस टीम को शुभमित्रा का कोई सुराग नहीं मिल पाया था.

फिर पुलिस ने आरोपी दीपक राउत का पौलीग्राफ टेस्ट कराया. पौलीग्राफ टेस्ट के दौरान दीपक राउत के जवाब भ्रामक पाए गए. उस के बाद पुलिस ने जब उस के साथ सख्ती की तो फिर उस ने शुभमित्रा साहू की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. शुभमित्रा साहू और दीपक राउत की पहली मुलाकात किसी फिल्मी सीन की तरह घटित हुई थी. उस दिन शुभमित्रा को औफिस में ज्यादा काम हो गया था, जिस की वजह से वह शाम को 7 बजे अपने घर लौटने के बजाय रात लगभग 9 बजे अपने औफिस से स्कूटी से घर के लिए निकली थी.

जैसे ही शुभमित्रा एक अंधेरी सी सड़क से गुजरी तो उसे एक लड़की की चीख सुनाई पड़ी. चीख सुनते ही शुभमित्रा ने अपनी स्कूटी तत्काल उस तरफ मोड़ दी, जिधर से चीखने की आवाज आई थी. तभी उस की नजर एक अंधेरे कोने पर पड़ी तो उस ने देखा कि एक युवती को 4 युवकों ने चारों ओर से घेर रखा था और वे सब उस युवती को पकड़ कर उस के साथ छेड़छाड़ कर रहे थे. शुभमित्रा खुद एक पुलिस वाली थी, इसलिए उस ने अपनी स्कूटी साइड में खड़ी की और तुरंत उस युवती को बचाने चली गई. पहले तो उन चारों युवकों ने शुभमित्रा को धमकाया, लेकिन जब शुभमित्रा ने उन में से 2 युवकों के चेहरों पर थप्पड़ जड़े तो उन के होश ठिकाने आ गए.

अब चारों युवक उस युवती को छोड़ कर शुभमित्रा से मारपीट करने लगे. पहले तो कुछ देर तक शुभमित्रा चारों से मुकाबला करती रही, लेकिन एक युवती अकेली उन चारों का मुकाबला भला कैसे कर सकती थी. इसलिए धीरेधीरे वे चारों युवक उस पर अब भारी पड़ते जा रहे थे. तभी उन में से एक युवक बोल पड़ा, ”इस के कारण हमारा शिकार देखो भाग गया. इतने दिन से हम उस के पीछे पड़े थे, उस की एकएक गतिविधि को देख रहे थे, आज हमें मौका मिला तो यह समाज सुधारक न जाने कहां से बीच में टपक पड़ी. चलो, कोई बात नहीं, अब इसी से मजे ले लेते हैं.’’

यह सुन कर सुमित्रा की रूह भी एकबारगी कांप सी उठी थी. वह अब सोचने लगी थी कि उस ने तो एक असहाय युवती को बचाने की कोशिश की थी, लेकिन अब तो यहां पर दांव उलटा ही पड़ गया. वह अपनी ओर से उन चारों दरिंदों से फिर भी भिड़ रही थी और बीचबीच में वह मदद के लिए चीखपुकार भी रही थी. तभी उस सड़क से अपनी बाइक पर दीपक गुजर रहा था, उस ने जब अपने सामने एक युवती को अकेले 4 युवकों से मुकाबला करते देखा तो वह दंग रह गया. दीपक ने तुरंत अपनी बाइक रोकी और युवकों को ललकारने लगा. युवकों ने जब देखा कि अब मुकाबले में एक और आदमी शामिल हो गया है तो उन में से 2 युवकों ने चाकू निकाल लिए थे.

लेकिन जब दीपक कयामत बन कर उन सड़कछाप शोहदों पर एकाएक कर टूट पड़ा तो वे चारों शोहदे उस के ताइक्वांडो और जूडो कराटे का सामना चाह कर भी नहीं कर सके. दोनों चाकू वाले गुंडे तो दीपक के हाथों में पड़ गए, जिन की उस ने दिल से कुटाई की, लेकिन 2 शोहदे वहां से भागने में कामयाब हो गए. वहां पर ऐसा भी नहीं था कि अन्य लोग नहीं थे. दूर से तमाशा देखने वाले और उस घटना का वीडियो बनाने वाले भी उस भीड़ में शामिल थे, लेकिन उन लोगों ने न तो उस युवती की मदद की और न ही दीपक की सहायता करने के लिए आगे आए.

शुभमित्रा इस युवक के समय पर किए गए इस साहसिक कार्य को देख कर एकदम कायल हो गई थी. वह उस अनजान युवक को धन्यवाद देने के लिए जब उस के पास गई तो वह युवक किसी को फोन कर रहा था. उस के फोन कटते ही वहां पर पुलिस भी आ गई थी, जो उन दोनों शोहदों को पुलिस की गाड़ी में बिठा कर वहां से चली गई थी.

शुभमित्रा यह समझ चुकी थी कि यह युवक अवश्य कोई पुलिस वाला हो सकता है. जब उस ने अपनी नजरें उठा कर युवक की ओर देखा और दोनों की आंखें मिलीं तो पहला खयाल शुभमित्रा के दिल में यही आया था कि काश! ऐसा निडर पति मुझे भी मिल जाता तो पूरी जिंदगी कितनी आसानी से और बेफिक्री से गुजर जाती.

अपने मन की भावनाओं को किसी तरह शुभमित्रा ने काबू किया और उस अनजान व्यक्ति का धन्यवाद करते हुए बोली, ”सर, आज रात यदि आप यहां पर समय से नहीं आते तो ये चारों शोहदे मेरी जान अवश्य ले लेते. पता नहीं मेरी क्या हालत कर डालते. कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह पाती मैं. आप का मैं किन शब्दों में धन्यवाद करूं, यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है सर! क्या मैं जान सकती हूं कि आप किस विभाग में काम करते हैं?’’

”जी, इस में धन्यवाद वाली भला क्या बात है. एक पुलिसकर्मी होने के नाते तो यह मेरा फर्ज बनता भी है. वैसे मुझे यह लग रहा है कि मैं ने आप को कहीं देखा जरूर है. क्या मैं आप का परिचय जान सकता हूं.’’ उस युवक ने कहा.

”जी सर, मेरा नाम शुभमित्रा साहू है, मैं ट्रैफिक पुलिस में कांस्टेबल हूं और डीसीपी (ट्रैफिक) में आजकल कंप्यूटर का काम देखती हूं. आप ने मुझे अवश्य देखा होगा, आप कहां पर हैं सर!’’ शुभमित्रा ने पूछा.

”शुभमित्राजी, मैं कमिश्नर औफिस में लेखा विभाग में पोस्टेड हूं. देखिए, आप भी हमारे डिपार्टमेंट से ही हैं, इसलिए यदि आप मुझे सर कह कर न पुकारें तो मुझे अच्छा लगेगा. मेरा नाम दीपक राउत है, आप मुझे यदि दीपक नाम से संबोधित करेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा,’’ दीपक ने मुसकराते हुए कहा.

”वैसे आप काफी बहादुर हैं. आप ने उन चारों को ऐसी मार लगाई, जिस से मेरा तो दिल खुश हो गया दीपकजी.’’ शुभमित्रा ने मुसकराते हुए कहा.

दीपक भी पहली नजर में शुभमित्रा का दीवाना सा हो गया था. उस का मन कर रहा था कि वह इस शुभमित्रा जैसी हसीन युवती को जी भर कर देखता रहे और उस के साथ ढेर सारी बातें करता रहे.

तभी शुभमित्रा ने कहा, ”दीपकजी, देखिए अब यहां पर भीड़ काफी अधिक हो चुकी है. लोग तो केवल तमाशबीन बन कर वीडियो बनाते फिरते हैं. किसी ने हम दोनों का ही वीडियो बना लिया तो हम दोनों के लिए यह ठीक नहीं हो सकता. ये तमाशबीन लोग अपने आप कुछ करते नहीं हैं, लेकिन बात का बतंगड़ बनाने में हमेशा आगे रहते हैं.’’

”आप वाकई बहुत समझदार हैं, लेकिन मैं तो आप की बहादुरी और खूबसूरती का पहली नजर में ही कायल हो गया हूं. आप से दोबारा कब मुलाकात होगी? क्या आप का मोबाइल नंबर ले सकता हूं?’’ दीपक ने सीधेसीधे कह दिया था.

”दीपकजी, आप से मिल कर मुझे आज सचमुच बहुत खुशी हो रही है, आप मेरा मोबाइल नंबर नोट कर लीजिए. आप कौल कीजिए, मैं भी आप का मोबाइल नंबर सेव कर लूंगी.’’ शुभमित्रा ने मुसकराते हुए कहा.

दीपक ने तुरंत ही उस मोबाइल नंबर पर फोन किया तो दूसरी तरफ से शुभमित्रा के मोबाइल पर घंटी बजने लगी थी. शुभमित्रा ने भी दीपक का नंबर सेव कर लिया. 25 वर्षीय शुभमित्रा साहू उड़ीसा के जगतपुर जिले के पारादीप की रहने वाली थी. उस के पापा का नाम धुरयदान साहू और मम्मी का नाम सुकीर्ति साहू था. शुभमित्रा अपने परिवार में सब से बड़ी थी. उस के 2 छोटे भाई और एक बहन थी. बचपन से ही शुभमित्रा का सपना पुलिस की नौकरी करने का था, इसलिए वह पढ़ाई के साथसाथ खेलकूद में भी स्कूल और कालेज में सब से आगे रहती थी.

उस के पापा एक किसान थे, इसलिए शुभमित्रा नौकरी कर अपने मम्मीपापा और दोनों छोटे भाइयों को एक सुखद भविष्य देना चाहती थी. सुभमित्रा की कोशिशें रंग लाईं और उस ने इधर बीए में प्रवेश प्रवेश लिया तो दूसरी तरफ उस की नियुक्ति ओडिशा पुलिस में हो गई. यह साल 2018 की बात है.

उस के बाद शुभमित्रा की पोस्टिंग जनवरी 2024 में भुवनेश्वर के कैपिटल थाने में ट्रैफिक पुलिस कांस्टेबल के रूप में हो गई. शुभमित्रा की उम्र भी तब 24 साल की हो गई थी, इसलिए उस के पेरेंट्स उस से शादी करने के लिए दबाव बनाते रहते थे, लेकिन शुभमित्रा का अपना यह मानना था कि अभी उस की शादी की उम्र भी नहीं है. दूसरा वह अपनी पसंद से ही शादी करना चाहती थी. शुभमित्रा साहू के दिल में दीपक राउत ने एक बौलीवुड हीरो की तरह एंट्री कर के ऐसी छाप छोड़ दी थी, जिसे वह भूल नहीं पा रही थी. एक ही दिन और एक ही पल में वह अपना दिल दीपक को न्यौछावर कर चुकी थी.

इस घटना को 2 दिन हो चुके थे, लेकिन शुभमित्रा सोच रही थी कि 2 दिन हो चुके हैं, दीपक ने अभी तक भी उसे फोन नहीं किया.

उस समय रात के लगभग 10 बजे थे. शुभमित्रा खाना खा कर अपने कमरे में बैठी एक किताब पढ़ रही थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने स्क्रीन देखी तो पता चला कि वह कौल दीपक की ही है. शुभमित्रा के चेहरे पर मुसकान तैर गई. दोनों के बीच थोड़ी देर बातचीत हुई. उस के बाद दीपक ने उसे सीधासीधा कह दिया कि वह उस से दोस्ती कर उसे सदा के लिए अपनाना चाहता है.

शुभमित्रा भी यही चाहती थी. लिहाजा उस ने भी दीपक के प्रस्ताव पर अपनी सहमति जता दी. इस के बाद तो दोनों के बीच मुलाकातें भी होने लगी थीं. दीपक ने शुभमित्रा को यह भी बता दिया था कि 2018 में उस की शादी अपर्णा से हुई थी, लेकिन एक सड़क दुर्घटना में उस की जुलाई 2024 में मौत हो गई थी. दीपक की इस ईमानदारी पर शुभमित्रा बहुत प्रभावित हुई.

शुभमित्रा अब जल्द से जल्द धूमधाम से दीपक से शादी करना चाहती थी, लेकिन दूसरी तरफ दीपक ने उस से कहा कि अभी हम लोग कोर्ट मैरिज कर लेते हैं, क्योंकि अभी वह अपनी पहली पत्नी के दुख से पूरी तरह से उबर नहीं पाया है. कुछ समय बाद जब सब नारमल हो जाएगा तो धूमधाम से सब के सामने सामाजिक रीतिरिवाज से विवाह कर लेंगे.

उस के बाद शुभमित्रा और दीपक राउत ने अपने फेमिली वालों, परिचितों से छिप कर 23 जुलाई, 2024 को कोर्ट मैरिज कर ली. कोर्ट मैरिज के बाद शुभमित्रा अपने पेरेंट्स के पास ही रह रही थी और दीपक भी अकेले अपने घर में रह रहा था. कभीकभार वह घूमने का प्लान बना कर दूसरे शहर में साथ रह लेते थे. एक कहावत भी है कि आज की मतलब की दुनिया में कौन किसी का होता है, आज तो धोखा वही देता है, जिस पर भरोसा होता है.

उन के आपसी संबंध अब भले ही चाहे दुनिया से दूर थे, पर अब बद से बदतर होते जा रहे थे. दीपक राउत के मन में लालच की बेल पूरी तरह फैल चुकी थी, इसलिए उस ने एक फुलप्रूफ प्लान बना कर शुभमित्रा साहू की हत्या कर उस का शव ठिकाने लगा दिया. पुलिस ने दीपक से पूछताछ के बाद उस की निशानदेही पर 17 सितंबर, 2025 बुधवार को मजिस्ट्रैट की निगरानी में जेसीबी की मदद से उस जगह की खुदाई कराई, जहां पर शुभमित्रा साहू का शव सीमेंट के एक बैरल में बंद और लगभग 10 फीट नीचे जमीन में दबा हुआ था. जरूरी काररवाई कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

इस के बाद पुलिस ने आरोपी दीपक राउत की होंडा सिटी कार नंबर ओडी02आर 8494 को भी जब्त कर लिया. दीपक राउत के कुबूलनामे और साक्ष्यों के आधार पर भुवनेश्वर के कैपिटल थाने में उस के खिलाफ बीएनएस की धारा 103(1) और 238 के तहत मामला दर्ज कर लिया गया. साथ ही पुलिस ने शव को छिपाने के लिए आरोपी दीपक रावत के चचेरे भाई विनोद बिहारी भुइयां (38 वर्ष) और जेसीबी चालक शंभूनाथ महंत (23 वर्ष) को भी गिरफ्तार कर लिया.

महिला पुलिस कांस्टेबल शुभमित्रा मर्डर केस जब ओडिशा के लोगों के सामने जगजाहिर हुआ तो आरोपी दीपक राउत की मुश्किलें अब और भी बढ़ गई हैं. दीपक की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी के पेरेंट्स ने भी अब पुलिस के समक्ष अपर्णा की हत्या किए जाने की शिकायत दर्ज कराई है. मृतका अपर्णा प्रियदर्शिनी की छोटी बहन रोजलिन ने मीडिया को बताया है कि शुरुआत में हमें यह लगा था कि हमारी बहन की मौत महज एक दुर्घटना थी. अब दीपक राउत की दूसरी पत्नी शुभमित्रा साहू की हत्या के बाद हमें यह पूरा यकीन है कि दीपक ने मेरी बहन की भी हत्या की होगी और हत्या को दुर्घटना का रूप दे दिया. अपर्णा की मौत की दोबारा जांच की मांग को ले कर ढेंकनाल पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है.

रोजलिन ने यह आरोप भी लगाया है कि अपने पति दीपक के साथ अपर्णा का वैवाहिक जीवन शुरू से ही समस्याओं, परेशानियों और अथाह दुखों से भरा था. शादी के कुछ महीनों बाद ही दीपक ने अपर्णा को परेशान और प्रताडि़त करना शुरू कर दिया था. इस संबंध में अपर्णा ने पुलिस कमिश्नरेट में औनलाइन शिकायत भी दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस ने दीपक के खिलाफ कोई भी काररवाई नहीं की.

रोजलिन ने यह राज भी खोला कि दीपक ने उस की बहन का एक करोड़ रुपए का बीमा कराया था, जोकि बहन की मृत्यु के बाद उसे मिल भी चुका है. अब हमें उस के ऊपर यह शक है कि दीपक ने इंश्योरेंस क्लेम पाने के लिए अपर्णा की हत्या की थी. शुभमित्रा साहू के हत्यारे कांस्टेबल दीपक राउत की पहली शादी अपर्णा प्रियदर्शिनी के साथ 25 अप्रैल, 2018 को हुई थी. दीपक राउत की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी एक राजस्व निरीक्षक (कानूनगो) थी और ढेंकनाल जिले में तैनात थी.

19 मार्च, 2022 को दीपक राउत ने खुंटुनी थाने में शिकायत दर्ज कराई कि उस की पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी (31 वर्ष) की 2 दिन पहले ट्रक नंबर ओडी02 एस 3486 की चपेट में आने से मौत हो गई थी. कथित दुर्घटना एनएच-55 पर राधा किशोरपुर चौक के पास हुई थी. घटना के बारे में दीपक राउत ने तब पुलिस को बयान दिया था कि घटना के दिन अपर्णा उस (दीपक) के साथ अपनी गाड़ी से अपने गृहनगर लौट रही थी, तब एक जगह गाड़ी को रुकवा कर अपर्णा ने दीपक से कहा कि उसे टायलट जाना है.

जब वह सड़क पार टायलेट में जाने के लिए सड़क पार कर रही थी तो कथित तौर पर रात को 9 से साढ़े 9 बजे के बीच एक ट्रक ने अपर्णा को टक्कर मार दी, जिस से उस के सिर में गंभीर चोटें आ गई थीं. उस के बाद दीपक उसे ले कर अस्पताल गया, जहां पर इलाज के दौरान उस की मौत हो गई. उस समय खुंटुनी पुलिस ने इस केस की जांच की थी. जांच के दौरान पुलिस ने उक्त पंजीकरण वाले ट्रक का पता लगा लिया और चालक को हिरासत में ले लिया था. लेकिन पुलिस जांच में यह पाया गया कि दुर्घटना वाले दिन वह ट्रक उस इलाके में नहीं था.

उस के बाद दीपक राउत ने दावा किया कि शायद अंधेरा होने के कारण उस ने ट्रक का गलत नंबर नोट कर लिया होगा. वह शायद कोई दूसरे नंबर का वाहन हो सकता है. रिपोर्ट लिखाने वाला एक पुलिसकर्मी था, इसलिए उस की बातों पर यकीन कर के जांच अधिकारी ने यह निष्कर्ष निकाला कि उस दुर्घटना के लिए एक अज्ञात वाहन ही जिम्मेदार था. उस के बाद कोई अन्य सुराग न मिल पाने के कारण जांच अधिकारी द्वारा अदालत में एक अंतिम सत्य रिपोर्ट (एफटीआर) प्रस्तुत की गई, जिस में यह संकेत दिया गया कि यह घटना वास्तविक थी, लेकिन उस विशेष ट्रक को दोषी ठहराने के लिए पुलिस के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे.

अदालत द्वारा यह पूछे जाने पर कि क्या फिर शिकायतकर्ता पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत झूठ बोल रहे थे और क्या पुलिस को उस समय अपर्णा प्रियदर्शिनी की मौत में किसी गड़बड़ी का संदेह था. जांच अधिकारी ने तब अदालत में बताया था कि इन सभी सवालों के जवाब विस्तृत जांच के बाद ही मिल पाएंगे. इस मामले में मृतका अपर्णा की बहन रोजलिन ने मीडिया और पुलिस को दिए अपने शिकायती पत्र में यह भी आरोप लगाया है कि अपर्णा के पति दीपक राउत ने उन्हें फोन पर बताया था कि खुंटुनी के राधा दामोदरपुर के पास अपर्णा का एक्सीडेंट हुआ था.

पहले तो दीपक राउत ने मृतका अपर्णा के परिजनों को यह बताया था कि अभी हम दोनों दुर्घटनास्थल पर ही हैं. उस के बाद में उन के द्वारा यह बताया गया था कि दीपक अपर्णा को एससीबी मैडिकल कालेज और अस्पताल ले कर गया है. बाद में हमें दीपक राउत का एक और कौल आया, जिस में बताया गया कि अपर्णा को वह कटक के एक निजी अस्पताल ले कर गया है. इस मामले में कटक (ग्रामीण) के एसपी विनीत अग्रवाल ने मीडिया को बताया कि हम ने अपर्णा प्रियदर्शिनी की हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और इस की जांच के लिए एक डीएसपी स्तर के अधिकारी को नियुक्त कर दिया है.

भुवनेश्वर पुलिस द्वारा 19 सितंबर, 2025 को बताया गया कि 25 वर्षीय महिला ट्रैफिक कांस्टेबल शुभमित्रा साहू की हत्या को रैड फ्लैग घोषित कर दिया गया है. अब यह जांच क्राइम ब्रांच (सीबी) के डीजीपी की निगरानी में होगी. भुवनेश्वर के कमिश्नरेट पुलिस के समन्वित सहयोग के साथ, एजेंसी कैपिटल थाना पुलिस और खुंटुनी पुलिस द्वारा पहले एकत्र किए गए सभी साक्ष्यों और आंकड़ों की जांच करेगी. इस के साथ ही सीएडब्लू (महिलाओं के विरुद्ध अपराध) और सीडब्लू (साइबर विंग) दोनों ही इकाइयां इस मामले की बारीकी से जांच और छानबीन करेंगी.

ओडिशा पुलिस ने वर्ष 2014 में जांच की रेड फ्लैग श्रेणी शुरू की थी, जिस के तहत मामलों की जांच सर्वोच्च प्राथमिकता के आधार पर की जाती है. इस रेड फ्लैग जांच में महिला कांस्टेबल शुभमित्रा की हत्या के साथसाथ 17 मार्च, 2022 को ओडिशा के कटक के आधागढ़ के पास एक सड़क दुर्घटना में आरोपी कांस्टेबल दीपक राउत की पहली पत्नी अपर्णा प्रियदर्शिनी की मृत्यु के बीच संभावित संबंध का भी पता लगाया जाएगा, जिस के लिए दीपक राउत की जीवन बीमा पौलिसी से डेढ़ करोड़ रुपए का भुगतान मिला था.

18 सितंबर, 2025 को भुवनेश्वर के डीसीपी जगमोहन मीणा ने आरोपी हत्यारे पुलिस कांस्टेबल दीपक राउत को उस की नौकरी से निलंबित कर दिया. उस के एक रिश्तेदार और एक अन्य सहयोगी को भी शुभमित्रा साहू के शव को ठिकाने लगाने में आरोपी दीपक राउत की मदद करने में गिरफ्तार कर लिया गया है. इसी बीच मृतका शुभमित्रा के पोस्टमार्टम के नमूने भुवनेश्वर स्थित राज्य फोरैंसिक विज्ञान प्रयोगशाला में भेज दिए गए हैं, क्योंकि क्योंझर जिला मुख्यालय अस्पताल में सड़ीगली लाशों की विस्तृत और सटीक रिपोर्ट देने के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं.

मृतका कांस्टेबल शुभमित्रा साहू का पोस्टमार्टम उस के भाइयों का मौजूदगी में करा लिया गया है. पुलिस इस मामले की तफ्तीश गंभीरता से कर रही थी. Family Crime

 

Love Crime: प्रेम प्रसंग में टुकड़े – टुकड़े किया पति

Love Crime: चंदौसी शहर के जूता कारोबारी राहुल ने रूबी से लव मैरिज करने के बाद उसे हर तरह की सुखसुविधाएं दीं. लेकिन 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद रूबी पति की आंखों में धूल झोंक कर 2-2 प्रेमियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रही थी. प्यार में अंधी हो चुकी रूबी के इरादे एक दिन इतने खौफनाक हो गए कि….

रूबी की जिंदगी एक त्रिकोणीय प्रेम प्रसंग में फंस गई थी. वह प्रेमी अभिषेक व दूसरे प्रेमी गौरव और पति राहुल के बीच फंसी हुई थी. रूबी के लिए यह त्रिकोण नहीं, बल्कि 3 दिशाओं में बिखरा हुआ मन था. पति राहुल स्थिरता और परिवार में समन्वय  बनाए रखने के भ्रम के साथ परिवार को खुशहाल बनाए रखने की कोशिश में लगा हुआ था. इसी तरह उस की शादी के 15 साल बीत चुके थे. दूसरी तरफ अभिषेक, जो उस के पति और समाज में रूबी को बहन बता कर दिन में भैया रात में सैंया की कहावत को चरितार्थ कर रहा था. अपनी धनदौलत के सहारे रूबी की मस्त जवानी का इस्तेमाल कर रहा था. अभिषेक के साथ रूबी 15 साल पहले जैसे यौन आनंद लिए जाने में मस्त थी. अभिषेक बहुत समझदार था.

तीसरा आशिक गौरव ने कुछ महीने पहले इस कहानी में एंट्री की थी. वह जवानी के जुनून में इस तरह अंधा हो गया था, जैसे कि सांप केंचुली आने पर हो जाता है. रूबी से उस का संपर्क हुआ. इसी दौरान अभिषेक से भी मुलाकात हुई. दोनों में दोस्ती हो गई. अभिषेक की तरह गौरव भी रूबी को बहन कहने लगा था और उस के बच्चे भी अभिषेक की तरह गौरव को भी मामा कहते थे. यह मामला उत्तर प्रदेश के जिला संभल की सब से उन्नतशील तहसील चंदौसी का है. संभल के जिला बनने से पहले चंदौसी को ही जिला बनाने की मांग उठती रही थी. जिला होने के सभी मानक भी चंदौसी पूरे करती थी, लेकिन राजनीतिक खेल की वजह से संभल को जिला घोषित कर दिया गया था, लेकिन मुख्यालय काफी दूर बहजोई में बनाया गया.

चंदौसी की घनी आबादी के चुन्नी मोहल्ला में राहुल नाम का जूते का व्यापारी रहता था. वैसे यह इलाका जूतों के निर्माण के लिए काफी प्रसिद्ध है. इसी चुन्नी मोहल्ले में 40 वर्षीय राहुल कुमार अपनी पत्नी रूबी (39 साल) 12 साल की बेटी और 10 साल के बेटे के साथ रह रहा था. राहुल एक मेहनती जूता व्यापारी था, सुबह से शाम तक कारीगरों से जूते बनवाता था. जूतों को राहुल थोक दुकानदारों को सप्लाई करता था. भागतेदौड़ते हुए भी वह जब भी घर लौटता, रूबी और दोनों बच्चों का चेहरा देख कर सारे दिन की थकान भूल जाता था. उस के चेहरे पर हमेशा संतोष की मुसकान रहती. रूबी, उस की पत्नी, घर की सारी जिम्मेदारियां संभालती थी. कभीकभी वह राहुल के बिजनैस में भी मदद कर दिया करती थी.

प्रेमिका के साथ मिलकर उसके पति की जान लेने वाला आरोपी

रूबी की आंखों में एक खालीपन था, एक ऐसी तन्हाई जो शादी के बंधन में भी उसे घेर लेती थी. राहुल का प्यार सच्चा था, लेकिन उस का जीवन बिजनैस की भागदौड़ में इतना व्यस्त था कि रूबी की भावनाओं को छूने का समय ही नहीं मिलता.

रूबी से हुआ प्यार

राहुल मूलरूप से संभल जिले के ही रजपुरा थाना क्षेत्र के गंवा कस्बे के रहने वाले जसवंत का इकलौता बेटा था. जसवंत के 4 बच्चे हुए, जिस में एक बेटा राहुल और 3 बेटियां हैं. राहुल के चाचा, ताऊ और बाकी रिश्तेदार वहीं रहते हैं. गवां कस्बे में रहने वाले राहुल के चाचा नेकराम बताते हैं कि राहुल जब केवल 15 साल का था, तभी उस के मम्मीपापा का बीमारी के चलते कुछ ही अंतराल में निधन हो गया.

घर संभालने के लिए राहुल ने राजमिस्त्री का काम शुरू कर दिया. पहले राजमिस्त्री के साथ मजदूरी करता था. फिर धीरेधीरे काम सीख कर राजमस्त्री बन गया. बाद में इस ने टाइल्स लगाने का भी काम सीखा. राहुल ने मेहनत कर के परिवार को आगे बढ़ाया. बहनों की शादी की. काम के चलते इसे अलगअलग जगहों पर जाना पड़ता था. उसी बीच इस की मुलाकात चुन्नी मोहल्ले की रहने वाली रूबी से हुई.

चंदौसी के चुन्नी मोहल्ले में उस सुबह धूप कुछ ज्यादा ही सुनहरी थी. गली के कोने पर बन रहे नए मकान में राजमिस्त्री राहुल अपने औजार संभालते हुए काम पर लग चुका था. सिर पर गमछा बंधा था. हाथों में सीमेंट की महक आ रही थी. आंखों में अपने भविष्य के छोटेछोटे सपने थे. राहुल रोज की तरह ईमानदारी से काम कर रहा था. एक दिन मकान के आंगन से अचानक चूडिय़ों की हलकी सी खनक सुनाई दी. राहुल ने नजर उठाई. सामने खड़ी थी मकान मालिक की बेटी. सादे सूट में, खुले बालों और शांत आंखों वाली रूबी किसी सुबह की तरह ताजा लग रही थी. वह पानी का गिलास ले कर आई थी और संकोच से बोली, ”मिस्त्री साहब, पानी पी लीजिए.’’

राहुल ने पहली बार उसे देखा. जवान रूबी की सुंदरता ऐसी थी, जैसे किसी हलकी सुबह की पहली किरण जो धीरेधीरे पूरे आकाश को रंग दे देती हो. उस का चमकदार लाल कुरता, भरे गांव की पृष्ठभूमि में खिला कोई ताजा फूल सा सुंदर लग रहा था. गले के पास की खूबसूरत कढ़ाई उस के व्यक्तित्त्व की कोमलता को और उभार दे रही थी.

उस के कंधों तक बिखरे हलके घुंघराले बाल हवा के हर झोंके के साथ नाच उठते, जैसे बचपन की शरारतें अब भी उस के साथ खेल रही हों. उस की चाल में न तो शहर की बनावट थी, न ही किसी संकोच की दीवार. बस, आत्मविश्वास और सहजता की हलकी सी मुसकान थी, जो अनजाने में देखने वालों के मन में जगह बना लेती.

देखने में वह किसी फिल्मी दृश्य की हीरोइन लग रही थी. जवान रूबी के सपने उस की आंखों से झलक रहे थे, जैसे हर कदम के साथ वह भविष्य की नई कहानी बुन रही हो. रूबी ने फिर कहा, ”लो मिस्त्री साहब, पानी पी लो.’’

उस पल सब कुछ ठहर सा गया. उस ने मुसकरा कर पानी लिया. बस उसी एक पल में दोनों के दिल में जैसे कोई हलकी सी 2 दिलों को जोडऩे वाली प्रेम रेखा खिंच गई. दिन बीतते गए. राहुल ईंटों की दीवारें खड़ी करता और रूबी  कभीकभी उसे काम करते देखती. कभी चाय ले कर आ जाती, कभी घर के किसी काम का बहाना बन जाता. बातों का सिलसिला छोटा होता, पर आंखों में कहानियां लंबी होने लगीं.

धीरेधीरे रोज की मुलाकात छोटी बातों में बदलने लगी. पानी देना, चाय लाना या बस मुसकराना. राहुल को महसूस हुआ कि उस के भीतर का दिल रूबी पर आ गया है. राहुल को अपनी हैसियत का पूरा एहसास था. वह एक राजमिस्त्री था, रोज की मजदूरी पर जीने वाला. वहीं रूबी एक अच्छे घर की पढ़ीलिखी लड़की थी. फिर भी दिल ने बारबार दिमाग को चुप करा दिया. रूबी को राहुल की सादगी, उस का सम्मानपूर्ण व्यवहार और मेहनत भरी ईमानदारी अच्छी लगने लगी. उसे लगा कि यह आदमी दीवारें ही नहीं, भरोसा भी मजबूती से खड़ा करता है.

एक शाम जब काम खत्म हो चुका था और आसमान हलका गुलाबी हो चला था, रूबी ने हिम्मत कर के कहा, ”राहुल, आप बहुत अच्छे इंसान हैं.’’

राहुल कुछ पल चुप रहा. फिर बोला, ”रूबी, मैं बहुत साधारण हूं, पर दिल सच्चा है.’’

बस वही सच था, जिस ने दोनों को और करीब ला दिया.

यह प्यार चुपचाप पनपा. बिना शोर, बिना दिखावे के ईंट, सीमेंट और धूल के बीच 2 दिलों ने एकदूसरे के लिए जगह बना ली. मकान बन कर तैयार हो गया, लेकिन राहुल और रूबी के दिलों में जो निर्माण हुआ था, वह कहीं ज्यादा मजबूत था. चुन्नी मोहल्ले की उस गली में आज भी लोग उस मकान को देखते हैं, पर बहुत कम लोग जानते हैं कि उस की नींव में कहीं न कहीं रूबी की प्रेम कहानी भी गड़ी हुई है. दोनों का इश्क परवान चढ़ा. 2025 के हिसाब से देखें तो 15 साल पहले यानी कि 2010 में दोनों ने प्रेम विवाह कर लिया.

इस चुन्नी मोहल्ले में रूबी का जहां मायका है, इसी गली में थोड़ा आगे कुछ घर छोड़ कर रूबी के राहुल ने भी यहां एक प्लौट खरीद कर मकान बना लिया. राहुल के घर और रूबी के मायके के बीच की गली मात्र 4 फीट चौड़ी है. गांव छोड़ कर कुछ सालों बाद ये लोग इस संकरी गली में बने मकान में रहने लगे.

दिल में बसा गौरव

एक दिन बारिश की झमाझम में रूबी बाजार से सब्जियां ले कर लौट रही थी. उस की साड़ी हलकी सी भीग चुकी थी और वह जल्दीजल्दी घर की ओर बढ़ रही थी, तभी मोहल्ले का युवक गौरव उसे देख कर रुक गया. उस ने अपनी छतरी रूबी की ओर बढ़ाई और मुसकराते हुए कहा, ”भाभीजी, भीग जाएंगी. लीजिए, मेरी छतरी ले लीजिए. मैं तो घर के पास ही हूं.’’

रूबी ने हिचकिचाते हुए छतरी ली, लेकिन उस की आंखों में गौरव की उस छोटी सी मदद ने एक अनजानी चिंगारी जला दी. अगले दिन रूबी ने छतरी लौटाने के बहाने गौरव के घर पर जाना तय किया. छतरी ले कर जा ही रही थी कि रास्ते में उसे गौरव मिल गया. वह बोला, ”अरे भाभीजी, आप ने क्यों कष्ट किया. छतरी लेने मैं ही घर आ जाता. इस बहाने से एक कप चाय भी मिल जाती.’’

रूबी ने कहा, ”अब तो यह अपनी छतरी संभालो. चाय के लिए फिर किसी दिन आ जाना, मेरा दरवाजा आप के लिए हमेशा खुला मिलेगा.’’

यह बस 2-3 मिनट की औपचारिक बातचीत थी, मगर रूबी को चलतेचलते लगा जैसे किसी ने लंबे सूखे दिन के बाद जरा सा पानी छिड़क दिया हो. एक दिन गौरव उस के घर पहुंच गया. रूबी घर में बिलकुल अकेली थी, उसी समय अचानक अभिषेक भी वहां आ गया. दोनों उस समय चाय पी रहे थे. रूबी ने गौरव से परिचय कराते हुए कहा कि यह मेरा मुंह बोला भाई अभिषेक है. फिर गौरव की तरफ इशारा करते हुए रूबी ने कहा कि यह गौरव है. ये मोहल्ले में ही रहता है. मुझे बहन मानता है.

दोनों की यह पहली मुलाकात थी. उस के बाद अकसर रूबी के घर या बाहर भी कभीकभी कहींकहीं दोनों मिल जाया करते थे. औपचारिक बातचीत के साथसाथ उन दोनों में दोस्ती भी हो गई. रूबी की कोशिश रहती कि एक बार में उस के घर एक ही व्यक्ति से मुलाकात हो. दोनों एकदूसरे पर भरोसा भी करते थे. दिलचस्प बात यह कि इन दोनों के मन में कहीं न कहीं शक भी पनप रहा था कि भाई है या मेरी तरह आशिक. कुछ ही मुलाकातों में गौरव और रूबी एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

राहुल को गौरव के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. एक दिन राहुल बाजार से घर पर आया. उस समय रूबी के साथ गौरव बैठा चाय पी रहा था. स्थिति बहुत आपत्तिजनक  तो नहीं थी, लेकिन शक पनप जाने के लायक काफी थी.

यह नजारा देख कर राहुल का पारा चौथे आसमान पर पहुंच गया. इस से पहले कि वह कोई सवाल करता, गौरव ही बोल पड़ा, ”दीदी, चाय में तो मजा आ गया.’’

यह सुन कर राहुल सामान्य हो गया. 2-4 बातें गौरव से भी हुईं. फिर गौरव रुबी दीदी राहुल जीजा को नमस्ते कर के चला गया. चाय की इस मुलाकात के बाद अगली मुलाकात में रूबी ने गौरव से कहा कि उस दिन तुम्हारा स्टेप शानदार रहा, जिस से राहुल का गुस्सा शांत हो गया. नहीं तो यह हमारे बीच का प्यार परवान नहीं चढ़ पाता.

धीरेधीरे गौरव उस की दिनचर्या का हिस्सा बनने लगा, वह पूछता, ”भैया की दुकानदारी कैसी चल रही है? सीजन में तो जूते की अच्छी मांग होगी?’’

रूबी को यह अच्छा लगता कि कोई तो है जो उस के पति के बिजनैस के बारे में इतनी तल्लीनता से पूछ रहा है. बस धीरेधीरे दोनों की बातें, दोनों की आदतें और दोनों की बेचैनियां एकदूसरे में घुलने लगीं. राहुल मेहनती था, पर बिजनैस की चिंता, कर्ज की किस्तें और बढ़ता हुआ खर्च उस के स्वभाव को चिड़चिड़ा बना रहे थे. घर पर उस की बातचीत ज्यादातर पैसों, बिलों और थके हुए तानों के बीच उलझ जातीं. रूबी के दिल में कहीं यह बात बैठ गई कि उस की मुसकराहट अब पति के लिए जरूरी नहीं रही.

रूबी और गौरव दोनों को समझ में आ गया कि जो रिश्ता उन के बीच बन चुका है, वह नाम के बंधन से परे, दिल की गहराई में जड़ें जमा चुका है. एक दिन मौका पाते ही 2 जिस्म एक जान हो गए. फिर तो यह सिलसिला चलता ही रहा.

दोनों पकड़े गए रंगेहाथ

जब कभी राहुल बिजनैस के काम से बाजार चला जाता, गौरव घर आ जाता. बच्चे स्कूल में होते. दोनों मौजमस्ती करते. अभिषेक से भी ज्यादा आनंद वह गौरव के साथ महसूस कर रही थी. शाम का वक्त था. राहुल ने अपना ब्रीफकेस उठा कर जल्दबाजी में कहा, ‘मैं बाजार जा रहा हूं, कल शाम तक लौटूंगा’, इतना कह कर वह निकल गया. बच्चे सो चुके थे. घर में अब सिर्फ रूबी थी. उस ने तुरंत फोन कर के गौरव से घर आने को कहा.

मौके का फायदा उठाने के लिए गौरव रूबी के घर पहुंच गया.

”कितनी देर लगाई आज?’’ रूबी ने हलके से ठहाका लगाते हुए कहा.

पति की हत्यारोपी रूबी को पुलिस में ले जाते हुए 

”बाजार गया था, वहां ट्रैफिक में फंस गया था,’’ गौरव ने आतेआते अपनी शर्ट का एक बटन खोल दिया और उस के पास पहुंच कर उस की कमर में हाथ डाल दिया.

”अब सजा सुनाओ, कितना इंतजार करवाया?’’ रूबी ने भी उस के गले में बांहें डाल दीं.

”सजा तो बहुत कुछ बाकी है. पहले तो यह सजा पूरी करो.’’ गौरव ने उसे दीवार से सटा दिया.

रूबी की सांसें तेज हो गईं. उस ने गौरव के होंठों को अपने होंठों से ढंक लिया. एक ऐसी भूख के साथ, जो सालों से दबी हुई थी. 15 साल पहले राहुल के साथ भी ऐसे ही पल आते थे, पर वो जल्दी खत्म हो जाते. अब कमरे में सिर्फ सांसों की आवाज थी. दोनों एकदूसरे में खोए हुए थे. ऐसे जैसे दुनिया में सिर्फ यही 2 लोग बचे हों. जल्दबाजी में वे दरवाजा बंद करना भी भूल गए थे. तभी अचानक राहुल आ गया.

राहुल हुआ लापता

दरअसल, राहुल को पूरा शक हो गया था कि उस की पत्नी गौरव के साथ रंगरलियां मनाती है, इसलिए वह जाने का बहाना कर के घर में ही अपने गोदाम में छिप गया था. यही घटना राहुल की हत्या का सबब बन गई. रूबी ने अपने प्रेमी गौरव के साथ मिल कर अपने पति राहुल की हत्या की ऐसी योजना बनाई कि एक महीने तक पता ही नहीं चल सका कि राहुल कहां चला गया. उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया.

शायद कभी पता चलता भी नहीं, लेकिन कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक हो, कोई न कोई ऐसा क्लू पुलिस के हाथ लग ही जाता है. फिर जमीन की तह से भी पुलिस अपराधी को खोज लेती है. राहुल ने राजमिस्त्री के काम से हट कर जूतों के कारोबार में कदम रखा था. घर से ही यह काम शुरू किया. वह अलगअलग जगहों पर जूते सप्लाई करता था. उस ने देहरादून में भी एक किराए की जगह ले रखी है. वहां भी बिजनैस को बढ़ा रहा था. देहरादून एक पर्यटक स्थल है.

कभीकभी वहां सैलानी बहुत बड़ी संख्या में आ जाते हैं, जिस के कारण होटल में ठहरने को जगह भी नहीं मिल पाती थी. इसलिए राहुल ने किराए पर एक कमरा ले लिया था. बिजनैस के सिलसिले में उस का हमेशा घर से बाहर आनाजाना लगा रहता. अभी कुछ दिन पहले राहुल की बुआ की बेटी की शादी थी. राहुल को शादी की तैयारी के लिए जाना था. इस के अलावा उसे कुछ खरीदारी भी करनी थी. 18 नवंबर, 2025 को उस ने अपनी पत्नी रूबी से कहा, ”मैं किसी काम से बाहर जा रहा हूं, कल तक लौट आऊंगा.’’

18 नवंबर का पूरा दिन बीत गया. 19 नवंबर आया, पर राहुल घर नहीं लौटा. पत्नी और बच्चे इंतजार कर रहे थे. हालांकि वो काम की वजह से कईकई दिनों तक घर नहीं आता था. यह नौरमल बात थी, इसलिए बच्चों को उतनी चिंता नहीं थी. 20 नवंबर आया. बेटा और बेटी भी मम्मी से पापा के बारे में पूछ रहे थे. बेटी के अनुसार पापाजी का मोबाइल फोन कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा था. कभी औन रहता तो कभी स्विच्ड औफ हो जाता.

शायद बैटरी खराब हो गई होगी. बच्चों के जिद करने पर रूबी ने जब पति को कौल किया तो उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. कुछकुछ देर बाद और ट्राई किया, लेकिन हर बार मोबाइल स्विच्ड औफ ही मिला. बेटी ने बताया कि पापा अपने फूफा के घर भी जाने वाले थे. हो सकता है कि काम पूरा करने के बाद वहीं चले गए हों. शादी के सामान की खरीदारी करवानी थी.

अब फूफा को कौल किया गया. उन्होंने कहा कि राहुल तो यहां पर आया ही नहीं. बारीबारी से पत्नी कभी बच्चे बाकी रिश्तेदारियों में कौल करते रहे, लेकिन राहुल का कहीं कुछ पता नहीं चला. इसी तरह एक दिन और बीत जाता है. अब रूबी ने फैसला किया कि राहुल जहां भी काम के सिलसिले में जाते थे, वहां जा कर पता करेगी. इस के बाद रूबी बच्चों के खुद पति की खोज में निकल गई. 22 नवंबर, 2025 को यह देहरादून के उस किराए वाले मकान में भी पहुंच गई, जहां राहुल का अकसर आनाजाना होता था.

रूबी ने मकान मालिक से बात की. अभी तक 4 दिन बीत चुके थे. मकान मालिक ने कहा कि राहुल तो यहां पर कई दिनों से नहीं आए. समझ नहीं आ रहा था कि राहुल कहां चला गया. अंत में थकहार कर रूबी ने 24 नवंबर, 2025 को कोतवाली चंदौसी में पति के लापता होने की सूचना दर्ज कराई. पुलिस ने उस की हर एक डिटेल ली. राहुल की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस की जानकारी आसपास के दूसरे थानों में भी भिजवा दी.

ऐसे ही इस का भाई जुगनू है. उस के खिलाफ चंदौसी कोतवाली में कई मामले दर्ज हैं. जो चोरीचकारी, लूटपाट और छिनैती के मामले बताए गए हैं. वह वर्तमान में मुरादाबाद जेल में बंद है. भाई के कारनामों में बहन रूबी का भी दखल रहता था. बताते हैं कि जब पुलिस जुगनू को पकडऩे के लिए जाती तो रूबी पुलिस से उलझ जाती थी. आसपास के लोग भी रूबी से दूरी बना कर रखते, इस डर से कि कब किस पर झूठा केस कर दे. रूबी कोई आम सुंदरी नहीं थी.

रूबी एक हेकड़ और दबंग महिला थी. बताते हैं कि साल 2016 में राहुल का अपने गांव में जमीन को ले कर विवाद हो गया था. उस समय रूबी अपने पति के साथ गांव के ही मकान में रहती थी. तब रूबी ने मोर्चा संभाला और विरोधियों को धूल चटाई थी. रूबी ने गांव के 3 लोगों पर गंभीर आरोप लगाते हुए रजपुरा थाने में केस दर्ज करवाया था. इस में एक पिता, बेटा और भतीजे को नामजद कराया गया था. वह झगड़ा तो शांत हुआ. गांव के लोगों ने फैसला करा दिया था. नामजद लोगों को इस के लिए भरी पंचायत में माफी मांगनी पड़ी थी. ऊपर से रूबी ने उन तीनों से केस वापस लेने के लिए भारीभरकम रकम भी वसूल की थी.

घटना से करीब डेढ़ महीने पहले चंदौसी के सैनिक चौराहे के पास एक जमीन खाली कराने के लिए रूबी अपने प्रेमी अभिषेक के लिए मैदानेजंग में उतर आई थी. रूबी की हिम्मत, हौसला और तेवर देख कर विरोधी घबरा गए और उन्हें जमीन छोड़ कर भागना पड़ा था. रूबी के कारण ही प्रेमी अभिषेक को मोटी रकम का फायदा हुआ था.

बदले में रूबी को खुश करने के लिए अभिषेक ने भी अच्छीखासी रकम रूबी को दी थी. ऐसे ही विवाद का एक और मामला चर्चा का विषय बना हुआ है, जिस में रूबी ने अभिषेक और गौरव के साथ मिल कर हंगामा किया था. उस समय उस का पति राहुल भी साथ था. इस की एक तसवीर भी वायरल हो रही है, जिस में रूबी को अपने दोनों प्रेमी और  पति के साथ कहीं पर हंगामा करते हुए देखा जा सकता है.

इसी तरह के कई अन्य विवादों में रूबी चंदौसी, रजपुरा, बनियाठेर थानों में लगभग 6-7 केस दर्ज करवा चुकी है. कुछ महीने पहले अभिषेक, रूबी और गौरव नैनीताल घूमने गए थे. वहां एक होटल में इन्होंने रात्रि विश्राम किया था. दोनों का टारगेट यह था कि इन में से कोई एक भी किसी काम से बाहर चला जाए तो दूसरा रूबी के साथ अपने प्रेम का टारगेट पूरा कर ले. शक तो दोनों को एकदूसरे पर हो ही गया था. यह सब आजमाने के लिए अभिषेक होटल से कोई बहाना कर के बाहर गया.

गौरव समझा 1-2 घंटे में तो घूम कर वापस आएगा, लेकिन अभिषेक कुछ ही मिनट बाद जैसे ही होटल के कमरे में घुसा, उस ने रूबी और गौरव को आपत्तिजनक हालत में देख लिया. उस समय उस ने गौरव से तो कुछ नहीं कहा, ऐसा बन गया जैसे उस ने कुछ देखा ही न हो. उस दिन के बाद से वह धीरेधीरे उन दोनों से किनारा करने लगा.

लाश के मिले टुकड़े

रूबी अब गौरव पर पूरी तरह से फिदा थी. इसलिए अभिषेक रूबी की प्रेम कहानी से बाहर हो गया और उस का संपर्क रूबी और गौरव दोनों से ही टूट गया. धीरेधीरे समय बीत रहा था. लेकिन राहुल का कुछ अतापता नहीं था. सभी लोग काफी चिंतित थे. अब दिन हफ्तों में बदलने लगे. 3 हफ्ते गुजर गए. सब की उम्मीद भी अब दम तोड़ चुकी थी. 27 दिन बाद यानी 15 दिसंबर, 2025 को राहुल के घर से करीब 800 मीटर दूर पतरौआ रोड है. यहीं पर एक ईदगाह स्थित है. इसी के पास रोड के साइड से एक नाला गुजरता है.

यह इलाका काफी सुनसान रहता है. आसपास खेतखलिहान है. कोई सीसीटीवी कैमरा भी दूरदूर तक नहीं है. सुबह के करीब 9 बजे के आसपास कुछ लोग इसी रास्ते से गुजर रहे थे. उन्होंने देखा कि नाले के पास काफी सारे कुत्ते इकट्ठे हैं और आपस में लड़ रहे हैं. एकदूसरे पर भौंक रहे हैं और किसी चीज को ले कर छीनाझपटी भी कर रहे हैं. उन के पास एक बड़ा सा पौलीथिन बैग पड़ा था, जिस में कुछ भारीभरकम चीज रखी हो.

उस में से काफी तेज गंध भी आ रही थी. मामला संदिग्ध लगा तो एक व्यक्ति ने पुलिस कंट्रोल रूम का 112 नंबर डायल कर दिया. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना चंदौसी कोतवाली में दे दी गई. सूचना मिलते ही कोतवाल अनुज तोमर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. यह 15 दिसंबर, 2025 की बात है. पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां 2 टूरिस्ट बैग नाले में पड़े थे. एक को कुत्तों ने फाड़ दिया था, जिस में से मानव बौडी के टुकड़े दिखाई दे रहे थे. जब खोला गया तो उस में से किसी आदमी का धड़ वाला भाग निकला. इस का हाथ, पैर, सिर सब कुछ गायब था.

पुलिस को दूसरे बैग के अंदर कुछ और भी सामान और एक पौलीथिन मिली. सामानों में ब्लैक और ग्रीन कलर की एक टीशर्ट थी. इस पर खून के धब्बे भी थे. एक अंडरवियर भी मिला और पौलीथिन में बायां हाथ अच्छे से सील पैक था, जिस वजह से नाले में पड़े रहने के बावजूद भी उस में पानी प्रवेश नहीं कर सका. शायद इस की बदबू बाहर न आ जाए, इस वजह से पैक किया हो. दिखने में लाश के ये अंग कई हफ्ते पुराने लग रहे थे. फोरैंसिक टीम को सूचित कर दिया गया.

फोरैंसिक टीम ने मौके से साक्ष्य इकट्ठा करने शुरू कर दिए. इतनी देर में आसपास के गांवों के सैकड़ों लोग भी जुटने लगे. पुलिस ने यहीं आसपास और भी छानबीन की. शायद और भी शरीर का हिस्सा भी मिल जाए. काफी तलाश के बाद भी सिर और शरीर के बाकी अंग कहीं नहीं मिले. घटनास्थल के फोटोग्राफ लिए गए और वीडियो भी बनाई गई. पुलिस द्वारा बरामद शरीर और बरामद कपड़ों को दिखा कर पहचान कराने की कोशिश की गई.

कटर से काटी लाश

फोरैंसिक जांच के दौरान पुलिस को बहुत सारी चीजें पता चलीं. ऐसा लगा जैसे आराम से घटना अंजाम दी गई है. पूरी सफाई के साथ शरीर के टुकड़े किए गए. शरीर को काटने में तेजधार हथियार नहीं, बल्कि किसी मशीन का इस्तेमाल किया गया. 16 और 17 दिसंबर, 2025 तक यानी 2 दिन लगातार पुलिस की टीमें बौडी के विभिन्न अंगों को तलाश करती रहीं. पुलिस की कोशिश थी कि किसी तरह से सिर बरामद हो जाए तो मृतक की पहचान हो सके.

कोतवाल अनुज कुमार तोमर लगातार केस की जांच कर रहे थे. घटनास्थल पर बैग में जो हाथ मिला था, पुलिस द्वारा उस का ध्यान से निरीक्षण किया तो उस पर एक टैटू नजर आया. हाथ के बीच में ‘राहुल’ नाम लिखा हुआ था. अब राहुल कौन हो सकता है? राहुल या तो इस का ही नाम होगा या फिर इस के किसी करीबी का. उधर पुलिस की टीमें थाने में ऐसी पुरानी फाइल्स खंगाल रही थीं, जिन की गुमशुदगी लिखाई गई हो. चंदौसी थाने में ही एक केस फाइल मिला जूता कारोबारी राहुल कुमार का. 18 नवंबर, 2025 से गायब था. उस की गुमशुदगी उस की पत्नी रूबी द्वारा लिखाई गई थी.

पुलिस ने रूबी को बुला कर बरामद कपड़े व लाश के टुकड़े दिखाए. रूबी ने सब कुछ देख कर अपने पति के अवशेष होना स्वीकार नहीं किया. साफ इनकार कर दिया. थकहार कर पुलिस ने 18 दिसंबर, 2025 को लाश के टुकड़ों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पुलिस का सब से पहला काम था मृतक की पहचान पता करना. पुलिस के पास तो कोई ऐसी निशानी भी नहीं थी. अब पुलिस को शक हो चला था कि यह लाश राहुल की ही हो सकती है. क्योंकि एक तरफ तो राहुल गुमशुदा था और दूसरी तरफ लाश की बांह पर भी ‘राहुल’ के नाम का टैटू बना हुआ था.

जनपद संभल के थाना चंदौसी क्षेत्र में 24 नवंबर, 2025 को रूबी नाम की एक महिला ने गुमशुदगी दर्ज कराई थी. गुमशुदगी दर्ज कराने के बाद रूबी ने कभी पुलिस से कोई कौंटेक्ट नहीं किया, न ही उच्च अधिकारियों से शिकायत की कि पुलिस उस के पति को ढूंढने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है, इसलिए पुलिस का शक अब यकीन में बदलता जा रहा था, लेकिन कोई सबूत हाथ में आने से पहले वह रूबी पर हाथ डालना नहीं चाहती थी.

पुलिस ने लापता राहुल के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स और लोकेशन निकलवाई. पता चला कि राहुल का मोबाइल फोन घर पर ही 18 नवंबर, 2025 से ही स्विच औफ दिख रहा था. 19 दिसंबर, 2025 को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी आ चुकी थी. पुलिस को राहुल की पत्नी रूबी पर शक हो रहा था. 20 दिसंबर, 2025 को पुलिस ने रूबी से फिर पूछताछ की. उस के बात करने का तरीका अजीब था. जैसे कि वह जानबूझ कर दुखी होने का नाटक कर रही हो. जांच के दौरान पुलिस ने रूबी से उस का मोबाइल फोन मांगा, लेकिन वह मोबाइल  देने से इंकार कर रही थी.

पुलिस को मना करने की वजह भी नहीं बता रही थी. डांटडपट कर पुलिस ने मोबाइल लिया और इस की जांच की. सारे फोटोज, कौल डिटेल्स, चैटिंग सब कुछ चैक किया गया. इसी में ही रूबी के पति राहुल के साथ अलगअलग समय में लिए गए अनेक फोटो मिले. उसी दौरान पुलिस को 2 फोटो ऐसे मिले, जिन्होंने इस केस की परतें प्याज के छिलकों की तरह खोल कर रख दी. एक फोटो में राहुल वही टीशर्ट पहने दिखा, जो नाले के पास बैग में मिली थी.

जब पुलिस ने बरामद टीशर्ट रूबी को दिखाई थी तो उस ने उसे पहचानने से क्यों इंकार किया? मान लें कि वह कोई दूसरा टीशर्ट हो, किसी और का हो, फिर भी यह बोल सकती थी कि राहुल के पास ऐसा ही टीशर्ट है. पर उस ने बिलकुल ही पहचानने से मना कर दिया था.

पत्नी निकली कातिल

पुलिस ने थोड़ा ध्यान से देखा तो फोटो में राहुल के हाथ पर उस के नाम का टैटू गुदा था. इस से पुलिस को विश्वास कि नाले से बरामद लाश के टुकड़े राहुल के ही थे. इस से साफ हो गया कि रूबी अपने पति राहुल की गुमशुदगी और मौत को ले कर झूठ बोल रही है. अब पुलिस ने रूबी से अपने अंदाज में पूछताछ शुरू कर दी. इस पूछताछ में रूबी सच बोलने के लिए मजबूर हो गई. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने पति राहुल की हत्या कराई थी. उस ने इस हत्याकांड की एक हृदयविदारक स्टोरी सुनाई.

18 नवंबर की रात को जब राहुल घर पर नहीं था. रूबी ने गौरव को अपने घर बुला लिया. रूबी को पता नहीं था कि वह कहीं गया नहीं है, घर में ही छिपा है. राहुल को मौके का इंतजार था. प्यार के नाम पर वासना का खेल शुरू होते ही राहुल अंदर आया. दरवाजा खुला था. क्योंकि दोनों इतने खोए हुए थे कि चिटकनी लगाना भी भूल गए थे. राहुल को देखते ही कमरे में सन्नाटा छा गया.

एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई

उस की आंखें पहले रूबी पर टिकीं, जो अब तक चादर से जिस्म ढकने की कोशिश में सीने से लगाए बैठी थी. बाल बिखरे, होंठ कांपते हुए. फिर गौरव पर, जो बिस्तर के किनारे खड़ा था, हाथ में चादर का कोना पकड़े, लेकिन शरीर अभी भी नंगा था. राहुल का चेहरा पहले सफेद पड़ गया, फिर लाल. उस की आंखों में कुछ ऐसा था नफरत, सदमा, धोखा और शायद एक पल के लिए दया भी. वह कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला सूख गया था.

सन्नाटा तोड़ते हुए आवाज आई, ”राहुल…’’ यह कांपती आवाज रूबी की थी, ”तुम… तुम इतनी जल्दी?’’

राहुल ने जवाब नहीं दिया. उस ने बस एक बार फिर दोनों को देखा, जैसे कोई तसवीर देख रहा हो, जो कभी भूलना नहीं चाहता. फिर बिना एक शब्द बोले, वह मुड़ा. उस के कदम भारी थे. दरवाजे तक पहुंच कर वह रुका. पीठ फेर कर बोला, कपड़े पहन ले. वह आक्रोश से बुरी तरह तमतमा रहा था. फिर उस ने रूबी को बुरी तरह पीटा और सरेबाजार उस का जुलूस निकालने की धमकी दी.

कोतवाल अनुज तोमर

बस इसी से पगलाई रूबी ने गौरव को इशारा किया. गौरव ने लोहे की रौड उठा कर राहुल के सिर में मार दिया. वह वहीं गिर गया. उस के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. रूबी भी पति पर हमला करने की पोजीशन ले चुकी थी. उस ने हथौड़ा ले कर उस के सिर पर मारमार कर सिर कुचल दिया. इस तरह दोनों ने मिल कर राहुल का  कत्ल कर दिया और अगले दिन बाजार से इलैक्ट्रिक कटर मशीन ला कर घर में ही अपने पति की लाश के टुकड़ेटुकड़े कर डाले.

पुलिस ने रूबी और गौरव की निशानदेही पर कत्ल और सबूत मिटाने में इस्तेमाल किए गए कटर मशीन, हथौड़ा, मोबाइल फोन और लोहे की रौड जैसी चीजों को भी अपने कब्जे में ले लिया. पुलिस ने धड़ का हिस्सा और एक बांह तो बरामद कर ली थी, लेकिन राहुल का सिर और उस के बाकी के हाथपांव बरामद नहीं हुए. रूबी और गौरव ने उस की लाश के अन्य हिस्सों को एक कार में ले कर बहजोई बबराला होते हुए राजघाट पहुंचे. वहां से गुजर रही गंगा नदी में राहुल के शरीर के बाकी टुकड़ों को फेंक दिया, जो अब बह कर दूर जा चुके हैं. शायद नष्ट भी हो चुके हों.

इस पूरे हत्याकांड की भनक उन्होंने बच्चों तक को नहीं लगने दी. राहुल की बेटी पापा के मर्डर में मम्मी और गौरव के अलावा अभिषेक को भी आरोपी मान रही है. पुलिस की जांच में सामने आया है कि अभिषेक के रूबी से संबंध विच्छेद हो चुके थे. वह इस कहानी से अलग था. इस का इस घटना में कोई रोल नहीं है. चंदौसी शहर के लिए इतनी निर्मम हत्या का यह पहला मामला बताया जा रहा है.

गौरव ने जिस दुकान से बैग खरीदे थे, उस दुकानदार का नाम विनोद अरोड़ा है. उसे भी यह जान कर बहुत दुख हुआ कि उस के बैग का इस्तेमाल एक निर्मम हत्या के बाद लाश के टुकड़े कर के फेंकने के लिए किया गया. गौरव को कटर देने वाला व्यक्ति जितेंद्र उर्फ जीतू तो उस समय बिलखबिलख कर रोने लगा, जब पत्रकारों ने उस से कहा कि तुम ने कटर गौरव को क्यों दिया था. उसे इस बात का बहुत दुख हुआ कि लोहे का सरिया काटने वाला कटर मानव शरीर को काटने में इस्तेमाल किया गया.

एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने 22 दिसंबर, 2025 को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में घटनाक्रम का खुलासा किया. पुलिस ने दोनों आरोपियों गौरव व रूबी को न्यायालय के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Love Crime

 

 

Bareilly Murder Case: 9 साल का प्यार, 2 महीने की शादी और मर्डर का काला राज

Bareilly Murder Case: प्रेम प्रसंग का एक ऐसा मामला सामने आया है, जिस ने प्यार शब्द को ही सवालों के घेरे में डाल दिया है. 9 साल तक एक दूसरे के साथ रहने वाले जोड़े की कहानी इस कदर दर्दनाक मोड़ पर पहुंची कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था. 9 साल के रिश्ते में बंधे प्रेमी युगल ने फेमिली वालों की राजी से शादी की, लेकिन शादी के महज 2 महीने बाद ही प्रेमिका ने अपने पति की हत्या कर दी. आइए जानते हैं क्या कारण बना कि इतना लंबा प्यार अचानक खून की वारदात में बदल गया.

यह घटना उत्तर प्रदेश के बरेली शहर से सामने आई. 33 साल के  जितेंद्र कुमार यादव की शादी 2 महीने पहले 9 साल पुरानी प्रेमिका ज्योति से हुई थी. इस के बाद जितेंद्र का शव शहर के इज्जतनगर इलाके में किराए के मकान में फंदे पर लटका मिला. शुरुआत में हत्या को आत्महत्या माना गया, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने चौंकाने वाला सच उजागर किया. रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटना बताया गया.

पुलिस के अनुसार, पूछताछ में ज्योति ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया है. ज्योति ने बताया कि शादी के बाद पैसों को ले कर अकसर दोनों में झगड़ा होता रहता था. जिस की वजह से दोनों के रिश्तों के बीच कड़वाहट बढ़ गई थी. उस दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि उस ने अपने परिवार को बुला लिया.  उस ने मम्मीपापा और भाई के साथ मिलकर जितेंद्र की हत्या कर दी. इन सभी ने जितेंद्र को दबोच लिया फिर ज्योति ने पति का गला गला घोंट दिया. इसके बाद इस हत्या को आत्महत्या दिखाने के लिए शव को खिड़की की ग्रिल में मफलर के सहारे लटकाया.

आपको बता दें कि जितेंद्र और ज्योति स्कूल के दिनों से ही एक दूसरे के संपर्क में थे. 25 नवंबर, 2025 को दोनों ने परिवार की सहमति से शादी की थी. विवाद तब शुरू हुआ, जब जितेंद्र ने कथित तौर पर ज्योति के बैंक खाते से 20,000 रुपए निकाल लिए और औनलाइन जुए में हार गया.

26 जनवरी, 2026 को इसी मुद्दे पर उन की बहस इतनी बढ़ गई कि ज्योति ने अपने मायके वालों को बुला लिया और मिलकर इस हत्या की योजना बनाई. पुलिस ने पत्नी और उस के पेरेंट्स को गिरफ्तार कर लिया है, जबकि उस के भाई की तलाश अभी जारी है. Bareilly Murder Case

UP Crime: जब पति की उम्र में हो ज्यादा अंतर

UP Crime: बच्चे की डिलीवरी के समय मनीष बाजपेई की पत्नी रीति की मृत्यु हो जाने के बाद उस की छोटी बहन काजल मिश्रा मनीष से ब्याह दी गई. 18 वर्षीय काजल 33 वर्षीय जीजा मनीष की पत्नी जरूर बन गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. दोनों की उम्र के बीच 15 साल के अंतर ने एक दिन उन की गृहस्थी में ऐसा भूचाल खड़ा कर दिया कि…

लखीमपुर खीरी रेलवे स्टेशन से सटी मनीष बाजपेई की चाय की दुकान पर भीड़ काफी कम हो गई थी. इक्कादुक्का ग्राहक चाय पी रहे थे. वह थोड़ा सुस्ताने के लिए बेंच पर बैठ गया था. बीड़ी निकाल ली थी. बीड़ी अभी सुलगाई ही थी कि जेब में रखे मोबाइल की घंटी बज उठी. सुलगी हुई बीड़ी को होंठों से दबाते हुए मनीष ने जेब से मोबाइल निकाल लिया. स्क्रीन पर उभरे नाम को पढ़ते ही उस के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान फैल गई.

कौल उस की पत्नी काजल ने की थी. उस ने तुरंत कौल रिसीव करते हुए कहा, ”हलो! बड़ी लंबी उम्र है तुम्हारी…मैं तुम्हें कौल करने ही वाला था.’’

”चलो, अच्छी बात है, कम से कम मेरी याद तो आई. कई दिन हो गए घर आए, क्यों नहीं आए.’’ पत्नी काजल नाराजगी जताते हुए बोली.

”इधर काम कुछ ज्यादा था. इस वजह से आ नहीं पाया,’’ मनीष ने सरलता से जवाब दिया.

”देखो, आज आप घर जरूर आ जाना.’’ काजल दबाव बनाती हुई बोली.

”ठीक है, आज मैं जरूर आऊंगा,’’ इतना कह कर मनीष ने कौल डिसकनेक्ट कर दी. यह बात 25 नवंबर, 2025 की सुबह की है. उस रोज मनीष ने अपने होटल का काम निपटाया और कुछ देर बाद बस पकड़ कर सीधा जलालपुर पुल के निकट पहुंच गया. वहां पहुंचने की खबर मनीष ने काजल को फोन से दे दी थी. थोड़े समय में ही काजल स्कूटी से जलालपुर पुल के पास आ गई. उस वक्त रात के 8 बज रहे थे. काजल और मनीष स्कूटी से सीतापुर जिले के गांव निजामाबाद में स्थित अपने घर आ गए.

दोनों ने रात का खाना इकट्ठे खाया और बातें करने लगे. थोड़ी देर बाद दोनों सो गए. अगले दिन 26 नवंबर की सुबह 6 बजे के करीब काजल अपने पति को स्कूटी पर बिठा कर जलालपुर पुल के पास छोडऩे के लिए निकल पड़ी.

बरईखेड़ा तिराहे के पास काजल ने अचानक स्कूटी रोक दी तो मनीष ने पूछा, ”क्यों रोकी स्कूटी?’’

”अरे कुछ नहीं, स्कूटी में किसी चीज के फंसने की आवाज आ रही थी, इसलिए… तुम बैठे रहो.’’

उसी समय अचानक एक मोटे बरगद के पेड़ की आड़ से 2 लोग निकले. एक के हाथ में धारदार गंडासा था. दूसरा लोहे की रौड लिए था. इस से पहले कि मनीष कुछ समझ पाता, दोनों ने उस पर हमला कर दिया. मनीष इस के लिए पहले से तैयार नहीं था. वह अपना बचाव नहीं कर पाया. लहूलुहान हो कर वह स्कूटी से नीचे गिर पड़ा. काजल अपनी जान बचाने के लिए स्कूटी छोड़ कर भागी. मनीष गिर कर तड़पने लगा, जबकि काजल हमलावरों की नजर से बच कर रोड के किनारे नीचे की ओर ओट में छिप गई.

दोनों हमलावर घटना को अंजाम दे कर फरार हो गए. ओट ले कर छिपी काजल डरीसहमी बाहर निकली. लहूलुहान पति को बीच सड़क पर गिरे देख कर घबरा गई. पसीने से नहा गई. उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या करे, क्या नहीं? इसी बीच एक राहगीर चीखा, ”अरे इसे अस्पताल ले जाओ. एंबुलेंस बुलाओ!’’ काजल ने एंबुलेंस के लिए मोबाइल से इमरजेंसी नंबर 108 पर कौल कर दिया. फिर अपने फेमिली वालों को कौल किया. उन्हें घटना की सूचना दे दी. कुछ मिनटों में ही घटनास्थल पर एंबुलेंस आ गई. लहूलुहान मनीष को जिला अस्पताल सीतापुर पहुंचाया गया. वहां मौजूद डौक्टरों ने मनीष की गंभीर हालत देख कर तुरंत लखनऊ ले जाने को कह दिया.

लखनऊ के मैडिकल कालेज में जैसे ही मनीष को इमरजेंसी में ले जाया गया, वहां के डौक्टरों ने शुरुआती जांच में ही उसे मृत घोषित कर दिया. इस वारदात की जानकारी से आसपास के इलाके में कोहराम मच गया. मौके पर पहुंची थाना कमलापुर पुलिस ने इस घटना की सूचना पुलिस के आलाधिकारियों को दे दी. कुछ समय में ही एडिशनल एसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार भी घटनास्थल पर पहुंच गए. हर कोण से पुलिस ने मौकामुआयना किया. पुलिस के आलाधिकारियों ने एसएचओ इतुल चौधरी को जांच संबंधी जरूरी निर्देश दिए.

एसएचओ चौधरी ने अपनी जांच शुरू की. मुखबिरों को सचेत किया. पुलिस हत्या की वजह और हत्यारों की तलाश में जुट गई. मरने वाले व्यक्ति की पहचान मनीष बाजपेई कमलापुर थाना निवासी के तौर पर हुई. इस बाबत मृतक के पिता दयाशंकर बाजपेई ने पुलिस को तहरीर दी. अपनी तहरीर में उन्होंने लिखा कि उन का बेटा मनीष बाजपेई अपनी ससुराल निजामाबाद में अपनी पत्नी काजल बाजपेई के साथ रहता था. उस की जनपद लखीमपुर खीरी में रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की गुमटी है.

26 नवंबर की सुबहसुबह मनीष को गांव के समीप ही हत्या कर दी गई. उन्होंने हत्या का संदेह उस की पत्नी काजल समेत उस के पिता कपिल मिश्रा व कुछ अज्ञात लोगों पर जताया. उन्होंने अपने बेटे की हत्या के लिए काजल पर शंका जाहिर की. काजल का चालचलन ठीक नहीं होने की बात बताई, जो मनीष ने बताई थी. दयाशंकर बाजपेई की तहरीर पर 27 नवंबर की दोपहर ढाई बजे काजल बाजपेई और उस के पिता कपिल मिश्रा समेत अन्य अज्ञात हत्यारों के खिलाफ पुलिस ने बीएनएस की धारा 103(1) के तहत एसपी अंकुर अग्रवाल ने जांच का जिम्मा क्राइम ब्रांच प्रभारी इतुल चौधरी को सौंप कर सहयोग के लिए एसओजी टीम को भी लगा दिया.

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जांच की प्रक्रिया जैसे ही आगे बढ़ी, पुलिस को मुखबिर द्वारा हत्यारे के बरईखेड़ा मोड़ तिराहे के पास मौजूद होने की सूचना मिली. कमलापुर पुलिस ने क्राइम ब्रांच टीम के साथ मिल कर 3 लोगों को गिरफ्तार कर लिया. पकड़े गए लोगों में मृतक मनीष बाजपेई की पत्नी काजल बाजपेई और उस के पापा कपिल मिश्रा के साथसाथ 28 साल का युवक अजीत कुमार भी था. हालांकि काजल अपनी गिरफ्तारी को ले कर पुलिस से उलझ गई. पति से बेहद प्रेम करने का हवाला देती हुई खुद को उस की भरोसेमंद पत्नी बताया, लेकिन जब बताया गया घटना की जांच के लिए उस से भी पूछताछ की जानी जरूरी है, तब वह शांत हुई और पुलिस की जांच में साथ देने लिए तैयार हो गई.

थाने में पूछताछ की शुरुआत काजल से हुई. उस से पति के साथ मधुर संबंधों, कामधंधे और घरेलू बातों को ले कर कई सवाल पूछे गए. उस की और पति की उम्र में 15 साल से अधिक का अंतर था. मनीष बाजपेई करीब 35 वर्ष का था. 20 वर्षीय काजल ने इस पर अफसोस जताते हुए बताया कि मनीष से उस की शादी अचानक हो गई थी. इस में काजल की मरजी की एक नहीं चली थी. मनीष उस का जीजा था. उस की बड़ी बहन रीति उस से ब्याही गई थी. वर्ष 2018 में प्रसव के दौरान रीति की आकस्मिक मौत हो गई थी. फिर फेमिली वालों ने 2021 में उस की जीजा मनीष के साथ शादी कर दी. मनीष के पसंद नहीं होने का एक बड़ा कारण उस का एक पैर से विकलांग होना भी था.

मनीष एक साधारण कारोबार करता था. उस की लखीमपुर रेलवे स्टेशन गेट के पास चाय की छोटी सी दुकान थी. उस की इतनी आमदनी हो जाती थी, जिस से वह अपना घरपरिवार किसी तरह चला लेता था. मनीष काजल का पूरा खर्च उठाता था. उसे किसी भी तरह की कमी नहीं होने देता था. वह दुकान में ही रहता था और बीचबीच में काजल के पास घर आ जाया करता था. कभीकभी काजल के मायके में ही ठहर जाता था. काजल ने मनीष के साथ अपने दांपत्य संबंधों के बारे में बताया कि मनीष से एक बेटी पैदा हुई. वह ढाई साल की है. पति की शारीरिक कमजोरी की वजह से काजल का झुकाव अजीत कुमार की तरफ हो गया था. वह लखीमपुर खीरी जनपद के गांव मूड़ाधामू टिकरा का रहने वाला है.

पति के कभीकभार घर आने से काजल का लगाव अजीत से हो गया था. बाद में दोनों के बीच अवैध संबंध भी स्थापित हो गए. दोनों के ये संबंध छिपे रहे. पति की गैरमौजूदगी में काजल और अजीत का मनमानापन बढ़ता चला गया. जब इस बारे में मनीष को संदेह हुआ, तब उस ने इस पर आपत्ति जताई. काजल और मनीष के बीच आए दिन इस बात को ले कर तकरार होने लगी. रोजरोज की किचकिच से छुटकारा पाने के लिए अजीत ने मनीष को ही रास्ते से हटाने का उपाय सोचा. उस बारे में काजल को बताया. उपाय सुनते ही काजल की आंखों में चमक आ गई. वह इस के लिए तुरंत तैयार हो गई.

उपाय के लिए योजना बनाना जरूरी था. काजल और अजीत योजना बनाने लगे. आपसी रायमशविरा करने के बाद दोनों ने योजना बना डाली. काजल ने उसी योजना के तहत मनीष को घर बुलवाया. उस के बाद अगले दिन 26 नवंबर को वापस लौटते हुए मनीष को मौत के घाट उतार दिया. काजल के बाद पुलिस ने अजीत से भी पूछताछ की. उस ने भी काजल की तरह मनीष की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल किया गया गंड़ासा, एक स्कूटी, खून सने कपड़े, 3 अदद मोबाइल फोन बरईखेड़ा तिराहे के पास मौजूद बरगद के पेड़ के निकट से बरामद कर लिए गए.

मौके से पुलिस द्वारा खून आलूदा एवं सादी मिट्टी का भी नमूना इकट्ठा कर लिया गया. गिरफ्तार दोनों अभियुक्तों से फरार तीसरे अभियुक्त के बारे में पूछताछ की गई. उस के बारे में उन्होंने बताया कि मौके से वह अकेला ही फरार हो गया था. कमलापुर पुलिस व क्राइम ब्रांच फरार तीसरे अभियुक्त की तलाश में जुट गई. कथा लिखे जाने तक तीसरे अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी. उत्तर प्रदेश के जनपद सीतापुर जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर स्थित गांव निजामाबाद थाना कमलापुर क्षेत्र में आता है. काजल के पापा कपिल मिश्रा इसी गांव के निवासी हैं. वह खेतीकिसानी कर अपने परिवार का भरणपोषण करते हैं.

कपिल मिश्रा का भरापूरा परिवार है. परिवार में 5 बेटियों के अलावा एक बेटा है. उन्होंने अपनी तीसरी बेटी रीति की शादी मनीष के साथ की थी, जिस की प्रसव के दौरान मौत हो गई थी. काजल उन की 5वीं बेटी है, जिस की मनीष के साथ शादी की गई गई थी. वह मनीष के साथ अवस्थी टोला गंज बाजार महोली में रहने लगी थी. काजल हाईस्कूल पास है. वह शुरू से ही काफी चंचल, हंसमुख और तीखे नैननक्श वाली थी. वह किसी से भी बेझिझक बातें कर लेती थी. उस की अदाओं से हर कोई उस का दीवाना बन जाता था.

यौवन की उम्र आतेआते वह और भी दिलकश बन गई थी. काजल के कजरारे नैन, गुलाबी गाल, लंबे खूबसूरत बाल, गोल खूबसूरत चेहरा एक झलक में ही किसी को भी आकर्षित कर लेता था. वह सभी बहनों से सुंदर जरूर थी, लेकिन शादी का योग नहीं बन पा रहा था. एक तरफ उस की सुंदरता और बिंदास हरकतों से चौतरफा बदनामी हो रही थी, दूसरी तरफ उस के पेरेंट्स को शादी की चिंता सता रही थी. इसी बीच रीति की अचानक मौत के बाद कुछ ऐसी परिस्थिति बनी कि वह विकलांग मनीष बाजपेई से ब्याह दी गई.

काजल जब ब्याह कर ससुराल आई, तब आसपास की औरतों ने उस की खूबसूरती की खूब चर्चा की. ससुराल में ससुर दयाशंकर बाजपेई के अलावा उस की सौतेली सास, पति मनीष, सौतेला देवर सुमित बाजपेई और देवरानी रहते थे. ननद प्रीति उर्फ जुगनू और नेहा थीं. प्रीति की लखीमपुर खीरी में शादी कर दी गई थी. देवर सुमित बाजपेई का भी ब्याह कर दिया गया था. ससुराल में केवल काजल, सौतेली सास, ससुर, देवर व देवरानी ही रह गए थे.

काजल कहने को तो ससुराल में रहती थी, लेकिन उस का रहनसहन और गांव और बाजारहाट में घुमानाफिरना मायके की तरह ही होता था. वह अकसर सजधज कर कभी बाजार तो कभी आसपास के घरों में आतीजाती रहती थी. काजल की इन आदतों को देख कर उस की सौतेली सास रोकटोक करती रहती थी. यहां तक कि उसे डांट भी देती थी. सास जब भी उसे मर्यादा का पाठ पढ़ाती थी, वह तुनक जाती थी और उसी के साथ झगड़ पड़ती थी. काजल अपनी मनमानी पर उतारू थी. धीरेधीरे सासबहू में लड़ाईझगड़ा बढऩे लगा. तब काजल पति पर दबाव बना कर मायके में रहने लगी. मायके में ही उस ने बेटी को जन्म दिया.

काजल के मायके में रहते हुए मनीष कभीकभार ससुराल में आ कर रुकने लगा. मायके में काजल पर टीकाटिप्पणी करने वाला कोई नहीं था. इसलिए वह और भी स्वच्छंद हो गई थी. हंसीमजाक तक करने लगी थी. इसी बीच उस ने अजीत को अपना दिल दे दिया था. काजल की जिद पर मनीष ने उसे स्कूटी खरीद दी थी. स्कूटी मिलते ही मानो उस के पंख लग गए थे. वह अपनी मरजी की मालिक बन गई थी. यहां तक कि अपने मम्मीपापा तक से जुबान लड़ाने लगी थी. कहते हैं न हर गलत और मनमानी करने का नतीजा गलत ही निकलता है, जो कुछ सालों में ही काजल के सामने आ चुका था.

काजल एवं अजीत से एएसपी (दक्षिणी) दुर्गेश कुमार सिंह, सीओ (सिधौली) कपूर कुमार ने भी पूछताछ की. इस के बाद दोनों आरोपियों को धारा 103(1) बीएनएस व 4/25 शस्त्र अधिनियम के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. UP Crime

लेखक – शरीफ अहमद

 

 

True Crime Story: अधेड़ उम्र का इश्क – पति की कातिल दुलारी

True Crime Story: बांदा जिले के बुधेड़ा गांव के रहने वाले शिवनारायण निषाद 18 जून, 2021 की रात को गांव में रामसेवक के घर एक शादी के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे. जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटे तो घर पर मौजूद पत्नी दुलारी की चिंता बढ़ने लगी. उस समय दुलारी घर पर अकेली थी. उस का 20 वर्षीय बेटा और 17 वर्षीय बेटी राधा गांव अलमोर में स्थित एक रिश्तेदारी में गए हुए थे. दुलारी ने पति की चिंता में जैसेतैसे कर के रात काटी.

सुबह होने पर दुलारी ने अपने बेटे को फोन कर के रोते हुए कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारे पिताजी गांव में ही रामसेवक चाचा के घर मंडप पूजन के कार्यक्रम में शामिल होने गए थे, लेकिन अभी तक वह घर वापस नहीं लौटे हैं.’’

बेटे दीपक ने जब अपने पिता के गायब होने ही बात सुनी तो वह भी घबरा गया. फिर वह मां को समझाते हुए बोला, ‘‘घबराओ मत मां, मैं घर आ रहा हूं. हो सकता है पिताजी रात होने पर वहीं रुक गए हों. फिर भी आप उन के घर जा कर पूछ आओ.’’

‘‘ठीक है बेटा, मैं रामसेवक चाचा के घर पता करने जा रही हूं.’’ दुलारी ने दीपक से कहा.

दुलारी जब रामसेवक के घर पहुंची तो रामसेवक ने बताया कि शिवनारायण गांव के ही 2 लोगों सूबेदार और चौथैया के साथ रात 10 बजे ही वहां से लौट गए थे.

यह बात दुलारी ने दीपक को फोन कर के बताई तो दीपक के मन में तमाम तरह की आशंकाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया. उसी दिन दीपक अपनी बहन के साथ गांव अलमोर से घर वापस  लौट आया. दुलारी और घर के लोग सोचने लगे कि जब रामसेवक चाचा के यहां से वह लौट आए तो कहां चले गए. अभी तक वह घर क्यों नहीं आए? उस दिन दीपक अपने ताऊ पिता रामआसरे, मां दुलारी और परिजनों के साथ पिता को आसपास खोजने में लगा रहा.

इस के बाद परिजनों ने सूबेदार और चौथैया से शिवनारायण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि हम लोग रात में 10 बजे साथ ही लौटे थे और गांव के शिवलाखन की पान परचून की दुकान पर गए, लेकिन उस समय उस की दुकान बंद थी. तब हम लोग अलगअलग हो कर अपनेअपने घरों को वापस लौट गए थे. इस के बाद शिवनारायण कहां गया, हमें नहीं पता. शिवनारायण की 2 बेटियां, जो अपनी ससुराल में थीं, वह भी पिता के लापता होने की सूचना मिलने पर मायके आ चुकी थीं.

अब शिवनारायण के घर वालों के मन में तमाम तरह की आशंकाएं जन्म लेने लगी थीं. बेटे दीपक और बेटियों का रोरो कर बुरा हाल था. इस दौरान बेटे ने अपने सभी रिश्तेदारियों में फोन कर उन के बारे में जानना चाहा. लेकिन सभी जगह निराशा ही हाथ लग रही थी.

शिवनारायण को गायब हुए 2 दिन होने वाले थे, फिर भी घर वाले पुलिस के पास न जा कर इधरउधर खोजने में ही लगे हुए थे. इसी दौरान 20 जून, 2021 की सुबह गांव के सूबेदार और अन्य लोग जब यमुना नदी किनारे से जा रहे थे. तो उन्होंने हाथपैर बंधे घुटनों के बीच डंडा फंसे एक लाश पड़ी देखी. यह बात उन्होंने गांव के अन्य लोगों को बताई. इस के बाद वह लाश देखने के लिए यमुना किनारे गए. वहां ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी.

गांव वालों ने वह लाश पहचान ली. मृतक और कोई नहीं 2 दिन से गायब हुआ शिवनारायण ही था. इधर ग्रामीणों ने नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना स्थानीय थाने जसपुरा के थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को भी दे दी. थानाप्रभारी सुनील इस घटना की सूचना अपने उच्चाधिकारियों को देने के बाद अपने मातहतों के साथ घटनास्थल पर रवाना हो गए. नदी के किनारे लाश मिलने की सूचना पा कर शिवनारायण निषाद के परिजन भी रोतेबिलखते वहां पहुंच चुके थे. पति की लाश देख कर दुलारी दहाड़ें मार कर रोने लगी.

सूचना पा कर बांदा के एसपी अभिनंदन के अलावा एएसपी महेंद्र प्रताप सिंह चौहान, सीओ (सदर) सत्यप्रकाश शर्मा के साथ मौके पर पहुंच गए. पुलिस नें अपनी जांच में पाया कि लाश पानी में फूल कर उतरा कर नदी के किनारे आई है. ऐसे में अनुमान लगाया कि शिवनारायण की हत्या 18 जून की रात में कर दी गई थी. क्योंकि पानी में पड़ा शव करीब 24 घंटे बाद ही उतरा कर ऊपर आता है. थानाप्रभारी ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने वहां से कुछ सबूत भी जुटाए.

पुलिस ने लाश को देख कर यह कयास लगाया कि हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल रहे होंगे. क्योंकि पुलिस को घटनास्थल पर ऐसा कोई निशान और न ही दोपहिया व चार पहिया वाहनों के टायरों के निशान मिले, जिस से यह कहा जा सके कि हत्या इसी जगह पर की गई थी. इसी को आधार बना कर पुलिस यह मान रही थी कि हत्या कहीं और की गई है. लाश को नदी में ठिकाने लगाने के उद्देश्य से यहां ला कर फेंका गया था.

जिस समय बुधेड़ा गांव में पुलिस अधिकारी व थाने की पुलिस घटनास्थल का मौकामुआयना कर रही थी, पुलिस को वहां जमीन पर खून पड़ा भी दिखा. साथ ही कुछ दूरी पर चूडि़यों के टुकड़े भी बरामद हुए थे. जिन्हें फोरैंसिक टीम ने अपने कब्जे में ले लिया. मौके पर मौजूद गांव वालों ने बताया कि टूटी चूडि़यां मृतक की पत्नी दुलारी की हैं. उन का कहना था कि मामले की जानकारी होने पर दुलारी वहां बैठ कर रो रही थी. हो सकता है उस दौरान चूडि़यां टूट कर बिखर गई हों.

लेकिन पुलिस किसी भी साक्ष्य को हलके में नहीं ले रही थी, इसलिए वहां मौजूद हर संदिग्ध वस्तु को अपने कब्जे में ले रही थी. इस दौरान हत्या से जुड़े साक्ष्यों को इकट्ठा करने के लिए पुलिस ने शव मिलने वाले स्थान से पैदल ही नदी किनारे करीब डेढ़ किलोमीटर तक छानबीन की, लेकिन वहां से पुलिस को कोई अन्य और खास सबूत नहीं मिला.

पुलिस ने जरूरी साक्ष्यों को इकट्ठा करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. इस दौरान पुलिस ने परिजनों से शिवनारायण के घर वालों से किसी से रंजिश होने की बात पूछी तो उन्होंने बताया कि उन की किसी से कोई रंजिश नहीं थी. दोपहर तक पुलिस को पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी मिल गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में गला घोंट कर हत्या करने और फेफड़ों में पानी न होने की पुष्टि हुई. इस के बाद पुलिस ने शिवनारायण के बेटे दीपक की तहरीर पर हत्या का मुकदमा भादंवि की धारा 302 व 201 के तहत दर्ज कर लिया.

रिपोर्ट दर्ज करने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने एसपी के निर्देश पर जांच के लिए एक टीम गठित की, जिस में कांस्टेबल शुभम सिंह, सौरभ यादव, अमित त्रिपाठी, महिला कांस्टेबल अमरावती व संगीता वर्मा को शामिल कर जांच शुरू की. थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह को शुरुआती पूछताछ में मृतक शिवनारायण के बड़े भाई रामआसरे और बेटे दीपक ने बताया कि 6 महीने पहले गांव के ही एक दुकानदार ने शिवनारायण से विवाद किया था और धमकी दी थी.

इस के बाद पुलिस दुकानदार और रात में दावत में साथ रहे व लाश मिलने की सूचना देने वाले सूबेदार सहित 4 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले गई. लेकिन पुलिस को उन लोगों से पूछताछ में ऐसी कोई बात नहीं मिली, जिस से उन पर हत्या का शक किया जा सके. जसपुरा थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह शिवनारायण निषाद के हत्या की हर एंगल से जांच कर रहे थे. इस दौरान उन्होंने मृतक के घर के हर सदस्य का बयान दर्ज किया था.

उन्हें जांच में पता चला कि शिवनारायण रात के 9 बजे ही दावत से अपने घर के लिए वापस लौट लिए थे. चूंकि उस समय हलकी बारिश हो रही थी, ऐसे में 45 साल की उम्र में उन के कहीं जाने का सवाल ही नहीं उठता था. ऐसे में पुलिस यह मान कर चल रही थी कि शिवनारायण घर लौटे थे और उन के साथ घर पर ही कोई घटना हुई थी. उस दिन घर पर मृतक शिवनारायण की पत्नी ही मौजूद थी. क्योंकि उस के बच्चे रिश्तेदारी में पैलानी थानांतर्गत अमलोर गांव गए हुए थे. मौके पर मिली चूडि़यों के टुकड़ों के आधार पर पुलिस का शक पत्नी दुलारी पर और भी पुख्ता होता जा रहा था.

उधर पुलिस को मृतक के हाथपांव के बांधने और घुटनों के बीच डंडा बांधने की बात समझ आ चुकी थी. यह हत्या के बाद लाश को उठा कर ले जाने में उपयोग किया गया होगा. इसी दौरान पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि उसी गांव के रहने वाले जगभान सिंह उर्फ पुतुवा का अकसर शिवनारायण निषाद के घर आनाजाना था. चूंकि शिवनारायण जगभान के खेतों में बंटाई पर खेती करता था. इसी दौरान जगभान का  शिवनारायण की पत्नी दुलारी से अवैध संबंध हो गए थे. जिस की जानकारी होने पर शिवनारायण और जगभान के बीच खटास पैदा हो गई थी.

अब पुलिस शिवनारायण की पत्नी दुलारी और जगभान पर अपनी जांच केंद्रित कर आगे बढ़ रही थी. इसी सिलसिले में थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जगभान के घर जा कर पता करना चाहा तो वह घर पर नहीं मिला. लेकिन उस की पत्नी दुलारी ने पुलिस को बताया कि वह शाम को 6 बजे पास के एक गांव में शादी में गए थे. वहां से वह साढ़े 11 बजे रात में लौट कर आए थे. दुलारी ने यह भी बताया कि उन के साथ ही गांव के भोला निषाद की 4 बेटियां भी शादी में गई थीं. जहां भोला की 3 लड़कियां वहीं रुक गई थीं, जबकि एक उन के साथ वापस आई थी.

इस के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार सिंह ने जहां शादी थी, वहां पता किया तो लोगों ने बताया कि जगभान वहां से साढ़े 8 बजे ही निकल  गया था. फिर पुलिस ने भोला निषाद के घर जा कर पूछताछ की तो  लड़कियों ने बताया कि जगभान उन के घर 9 बजे आए थे, उस के बाद तुरंत वह वापस चले गए. अब पुलिस के सामने सवाल यह था कि जगभान जब भोला के घर से साढ़े 8 बजे चला आया तो वह अपने घर साढ़े 11 बजे रात में पहुंचा था. तो इन ढाई घंटों के दौरान वह कहां रहा.

इस आशंका के आधार पर पुलिस ने जगभान सिंह से ढाई घंटे गायब रहने का कारण पूछा तो वह उस का सही जबाब नहीं दे पाया. पुलिस ने जब कड़ाई से मृतक की पत्नी दुलारी और जगभान सिंह से पूछताछ की गई तो उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या किए जाने की बात स्वीकारते हुए हत्या का राज उगल दिया. उन दोनों ने शिवनारायण की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी. उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के जसपुरा थाना क्षेत्र के बुधेड़ा गांव के निवासी शिवनारायण गांव में रह कर खेती करता था. वह दूसरों के खेत बंटाई पर ले कर भी खेती करता था.

शिवनारायण ने गांव के ही जगभान सिंह का खेत भी बंटाई पर ले रखा था. खेत बंटाई में लेने के कारण खेत मालिक जगभान शिवनारायण के घर आनेजाने लगा था. इस बीच जगभान और शिवनारायण की पत्नी दुलारी के बीच नजदीकियां बढ़ाने लगी थीं. दोनों की ये नजदीकियां कब शारीरिक संबंधों में बदल गईं, उन्हें पता ही नहीं चला. लेकिन एक दिन शिवनारायण ने जगभान और दुलारी को साथ में देख लिया तो वह आगबबूला हो गया और जगभान सिंह को घर न आने कि कड़ी हिदायत दे डाली. इस के बावजूद भी जगभान सिंह शिवनारायण के घर आता रहा.

लेकिन बारबार शिवनारायण द्वारा जगभान को घर आने से मना करने की वजह से बीते साल जगभान ने शिवनाराण को अपना खेत बंटाई पर नहीं दिया, तभी से दोनों के बीच मनमुटाव हो गया था. इसी बात से जगभान और दुलारी शिवनारायण से खार खाए बैठे थे. वह इसी उधेड़बुन में थे कि किसी तरह शिवनारायण को ठिकाने लगाया जाए. हत्यारोपी दुलारी ने बताया कि घटना वाले दिन उन के अविवाहित बेटाबेटी गांव अलमोर में अपने एक दिश्तेदार के घर गए हुए थे. उस दिन घर में कोई नहीं था. उसी दिन दोनों ने शिवनरायण को ठिकाने लगाने के लिए तानाबाना बुन लिया था.

जगभान दावत से लौटने के बाद  रात के 9 बजे दुलारी के घर पहुंच गया. इधर मंडप कार्यक्रम से घर लौटे शिवनरायण ने दुलारी को जगभान के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देखा तो गुस्से में उस का खून खौल गया और वह पत्नी को मारनेपीटने लगा और जगभान से गालीगलौज करने लगा. तभी दुलारी ने प्रेमी जगभान के साथ मिल कर अपने पति को चारपाई पर पटक दिया और गला दबा कर उस की हत्या कर दी. उसी दौरान उन लोगों नें लाश को ठिकाने लगाने का प्रयास किया, लेकिन गांव के लोग उस समय जाग रहे थे. ऐसे में उन्होंने शिवनारायण की लाश चारपाई के नीचे छिपा दी. इस के बाद जगभान रात के 11 बजे अपने घर चला आया.

जगभान ने बताया कि रात करीब 2 बजे जब मोहल्ले के लोग गहरी नींद में सो रहे थे, तब वह रात के सन्नाटे में फिर से शिवनारायण के घर पहुंचा. जहां उस ने और दुलारी ने शिवनारायण की लाश के हाथपांव बांध कर दोनों पैरों के बीच डंडा डाल कर लाश को यमुना नदी में फेंक आए. इतना सब करने के बाद दुलारी और जगभान अपनेअपने घर चले गए. घर आने के बाद दुलारी ने पति के गायब होने की खबर पूरे गांव में फैला दी और जानबूझ कर पति को खोजने का नाटक करती रही. लेकिन पुलिसिया जांच में उन का जुर्म छिप नहीं सका.

पुलिस ने शिवनारायण की पत्नी दुलारी और उस के आशिक जगभान से पूछताछ करने के बाद दोनों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया. वहीं एसपी अभिनंदन ने इस सनसनीखेज हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को ईनाम देने की घोषणा की है. True Crime Story

 

Social Story: बहू भी कराती है हत्या

Social Story: आमतौर पर यह माना जाता है कि ससुराल में बहू पर ही अत्याचार होता है. यह अत्याचार कभी ससुर करता है कभी सास. लखनऊ के माल थाना क्षेत्र के नबीपनाह गांव की रहने वाली बहू पर उसकी ससुराल वालों ने कोई अत्याचार नहीं किया बल्कि खुद उसने ही करोडों की जायदाद के लालच में अपने ससुर की हत्या चचेरे देवर और उसके दोस्त के साथ मिलकर कर दी और हत्या के आरोप में अपने पति और सगे देवर को फंसाने की कोशिश की, पर अपराध छिपाये नही छिपता और बहू को अपने डेढ साल के बच्चे के साथ जेल जाना पड़ा.

नबी पनाह गांव में मुन्ना सिंह अपने दो बेटो संजय और रणविजय सिंह के साथ रहते थे. 60 साल के मुन्ना सिंह की आम कह बाग और दूसरी जायदाद थी. जिसकी कीमत करोडो में थी. मुन्ना के बडे बेटे संजय की शादी रायबरेली जिले की रहने वाली सुशीला के साथ 5 साल पहले हुई थी.

सुशीला के 2 बच्चे 4 साल की बडी लडकी और डेढ साल का बेटा था. सुशीला पूरे घर पर कब्जा जमाना चाहती थी. इस कारण उसने अपने सगे देवर रणविजय से संबंध बना लिये. जिससे वह अपनी शादी न करे. सुशील को डर था कि देवर की शादी के बाद उसकी पत्नी और बच्चों का भी जायदाद में हक लगेगा. यह बात जब मुन्ना सिह को पता चली तो वह अपने छोटे बेटे की शादी कराने का प्रयास करने लगे. सुशीला को जायदाद की चिन्ता थी. वह जानती थी कि देवर रणविजय ससुर को राह से हटाने में उसकी मदद नहीं करेगा.

तब उसने अपने चचेरे देवर शिवम को भी अपने संबंधों से जाल में फंसा लिया. जब शिवम पूरी तरह से उसके काबू में आ गया तो उसने ससुर मुन्ना सिंह की हत्या की योजना पर काम करने के लिये कहा. शिवम जब इसके लिये तैयार नहीं हुआ तो सुशीला ने शिवम को बदनाम करने का डर दिखाया और बात मान लेने पर 20 हजार रूपये देने का लालच भी दिया. डर और लालच में शिवम सुशीला का साथ देने को तैयार हो गया.

12 जून की रात सुशीला के सुसर बुजुर्ग किसान मुन्ना सिंह चैहान आम की फसल बेचकर अपने घर आये. इसके बाद खाना खाकर आम की बाग में सोने के लिये चले गये. वह अपने पैसे भी हमेशा अपने साथ ही रखते थे. सुशीला ने शिवम को फोन गांव के बाहर बुला लिया. शिवम अपने साथ राघवेन्द्र को भी ले आया था.

तीनों एक जगह मिले और फिर मुन्ना सिंह को मारने की योजना बना ली. मुन्ना सिंह उस समय बाग में सो रहे थे. दबे पांव पहुंच कर तीनो ने उनको दबोचने के पहले चेहरे पर कंबल ड़ाल दिया. सुशीला ने उनके पांव पकड लिया और शिवम,राघवेन्द्र ने उनको काबू में किया. जान बचाने के संघर्ष में मुन्ना सिंह चारपाई से नीचे गिर गये. वही पर दोनो ने गमझे से गला दबा कर उनकी हत्या कर दी.

मुन्ना सिंह की जेब में 9 हजार 2 सौ रूपये मिले. शिवम ने 45 सौ रूपये राघवेन्द्र को दे दिये. सुशीला ने आलमारी और बक्से की चाबी ले ली. सबलोग अपने घर चले आये. सुबह पूरे गांव मे मुन्ना सिह की हत्या की खबर फैल गई. मुन्ना सिंह के बेटे संजय और रणविजय ने हत्या का मुकदमा माल थाने में दर्ज कराया.

एसओ माल विनय कुमार सिंह ने मामले की जांच शुरू की. पुलिस ने हत्या में जायदाद को वजह मान कर अपनी खोजबीन शुरू की. मुन्ना सिंह की बहु सुशीला बारबार पुलिस को यह समझाने की कोशिश में थी कि ससुर मुन्ना के संबंध अपने बेटो से अच्छे नहीं थे. पुलिस ने जब मुन्ना सिंह के दोनो बेटो संजय और रणविजय से पूछताछ शुरू की तो दोनो बेकसूर नजर आये.

इस बीच गांव में यह पता चला कि मुन्ना सिंह की बहू सुशीला के देवर से संबंध है. इस बात पर पुलिस ने सुशीला से पूछताछ शुरू की तो उसकी कुछ हरकते संदेह प्रकट करने लगी.

पुलिस ने सुशीला के मोबाइल की काल डिटेल देखनी शुरू की तो उनको पता चला कि सुशीला ने शिवम से देर रात तक उस दिन बात की थी. पुलिस ने शिवम के फोन को देखा तो उसमें राघवेन्द्र का फोन मिला. इसके बाद पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला से सबसे पहले अलग अलग बातचीत शुरू की.

सुशीला अपने देवर रणविजय को हत्या के मामले में फंसाना चाहती थी. वह पुलिस को बता रही थी कि शिवम का फोन उसके देवर रणविजय के मोबाइल पर आ रहा था. सुशीला सोच रही थी कि पुलिस हत्या के मामले में देवर रणविजय को जेल भेज दे तो वह अकेली पूरे जायदाद की मालकिन बन जायेगी. पर पुलिस को सच का पता चल चुका था. पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला तीनो को आमने सामने बैठाया.तो सबने अपना जुर्म कबूल कर लिया.

14 जून को माल पुलिस ने राघवेन्द्र, शिवम और सुशीला को मजिस्ट्रेट के समाने पेश किया. वहां से तीनो को जेल भेज दिया गया. सुशीला अपने साथ डेढ साल के बेटे को भी जेल ले गई. उसकी 4 साल की बेटी को पिता संजय और चाचा रणविजय ने अपने पास रख लिया. जेल जाते वक्त भी सुशीला के चेहरे पर कोई शिकन नहीं था. वह बारबार शिवम और राघवेंद्र पर इस बात से नाराज हो रही थी कि उन लोगों ने यह क्यों बताया कि मारने के समय उसने ससुर मुन्ना सिंह के पैर पकड रखे थे.

Hindi Stories: एक औरत की खता

Hindi Stories: रिजवाना खूबसूरत महिला थी. उस की खूबसूरती के जाल में उलझ कर नूर हसन ने मर्यादाओं को तोड़ दिया. लेकिन तलाक के डर से उस ने प्रेमी नहीं पति का साथ दिया. घर तो बचा लिया, लेकिन जेल जाने से नहीं बच सकी. एक रात नूर हसन जब अचानक लापता हो गया तो उस के घर वालों की परेशानी बढ़ गई. वह घर वालों के साथ ही सोया था,

सुबह देखा तो वह बिस्तर से गायब था. वह कहां चला गया? कोई नहीं जानता था. घर वालों को भी उस ने कुछ नहीं बताया था. हैरानी की बात यह थी कि उस का मोबाइल भी स्विच औफ आ रहा था. घर वालों ने अपने हिसाब से उस की खूब खोजबीन की. लेकिन जब उस का कुछ पता नहीं चला तो उस के चाचा अब्दुल हमीद ने थाना डोईवाला में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

38 वर्षीय नूर हसन उत्तराखंड के डोईवाला कस्बे के गांव कुडकावाला निवासी दिवंगत सकी जान का बेटा था. वह घर के पास ही परचून की दुकान चलाता था. उस के परिवार में पत्नी शबनम के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में एक 2 साल की बेटी और दूसरा 6 माह का दुधमुंहा बेटा था.

नूर हसन 6 अगस्त की देर रात लापता हुआ था. उस की गुमशुदगी दर्ज कर के थानाप्रभारी संदीप नेगी ने इस मामले की जांच में  एसएसआई प्रदीप चौहान व अन्य को लगा दिया था. पुलिस को लग रहा था कि नूर हसन शायद पत्नी से नाराज हो कर कहीं चला गया होगा, इसलिए पुलिस ने शबनम से पूछताछ की. पुलिस को उस ने बताया था कि वे दोनों हंसीखुशी से रहते थे. नाराजगी जैसी उन के बीच बिलकुल बात नहीं थी. वह लगभग 9 बजे बच्चों के साथ सो गई थी. सुबह नूर हसन गायब था और घर का दरवाजा खुला हुआ था. सुबह उस ने सोचा कि वह टहलने गए होंगे.

लेकिन जब 11 बजे तक वह नहीं आए, तो उस ने उन का मोबाइल नंबर मिलाया. मोबाइल स्विच औफ होने से उसे फिक्र हुई और उस ने अपने घर वालों को यह बात बताई. पूछताछ में एक बात बिलकुल साफ हो गई थी कि नूर हसन घर से अपनी मरजी से गया था. आखिर ऐसी क्या वजह थी, जो उस ने पत्नी को भी नहीं बताई. पुलिस ने जांच के लिए उस का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. मोबाइल की काल डिटेल्स के लिए कंपनी को लिख दिया गया.

पुलिस नूर हसन का कुछ पता लगा पाती, उस से पहले ही 3 दिनों बाद यानी 11 अगस्त, 2015 को लोगों ने इस्तेमाल में न आने वाले कुएं में एक शव देखा. कुएं से बदबू फैलने के बाद लोगों ने उस में देखा था. इस की सूचना पुलिस को दी गई. सूचना पा कर थानाप्रभारी संदीप नेगी मय पुलिस बल के मौके पर पहुंच गए थे. कुआं गहरा था और उस में पानी के साथ गंदगी भी अटी पड़ी थी. ऐसे कुएं में जहरीली गैसें होती हैं, यह पुलिस जानती थी, इसलिए आक्सीजन सिलेंडर किट के जरिए अग्निशमन दल के कांस्टेबल दीपक थपलियाल को उस में उतारा गया.

अंतत: कड़ी मशक्कत के बाद शव को बाहर निकाल लिया गया. शव सड़ने लगा था. कुएं से शव मिलने की सूचना से गांव में सनसनी फैल गई थी. थोड़ी देर में वहां लोगों की भीड़ जमा हो गई. कुएं से जो शव बरागद हुआ था, उस की शिनाख्त नूर हसन के रूप में हो गई. नूर हसन की कनपटी और सिर में पीछे की तरफ चोट के निशान थे. मामला सीधेसीधे हत्या का था. पुलिस का अनुमान था, किसी बहाने से उसे कुएं तक बुलाया गया था और वहीं उस की हत्या कर के शव कुएं में फेंक दिया गया था. सूचना पा कर एसपी (देहात) जी.सी. ध्यानी व पुलिस उपाधीक्षक अरुण पांडे ने भी मौका मुआयना किया था.

पुलिस ने लिखापढ़ी कर के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. इस के साथ ही अज्ञात हत्यारों के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस की विवेचना एसएसआई प्रदीप चौहान को सौंप दी गई. एसएसपी पुष्पक ज्योति ने इस मामलें में अधीनस्थों को त्वरित काररवाई कर के केस का खुलासा करने के निर्देश दिए. नूरहसन की हत्या के खुलासे के लिए थानाप्रभारी संदीप नेगी के नेतृत्व में एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में एसएसआई प्रदीप चौहान, एसआई संजीत कुमार, कांस्टेबल मनोज कुमार, विपिन सैनी, सुरेश रमोलसा , नवनीत, धन सिंह व महिला कांस्टेबल सुलेखा को शामिल किया गया.

इस बीच मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट आ गई, जिस में मृत्यु की वजह सिर में किसी भारी वस्तु से लगी चोट से हुआ ब्रेन हैमरेज व पानी में डूबना बताया गया था. एक दिन बाद मृतक की काल डिटेल्स भी पुलिस को मिल गई थी. पुलिस ने काल डिटेल्स की जांच की तो पाया कि लापता होने वाली रात नूर हसन की 1:33 और 1:38 बजे एक नंबर पर बात हुई थी. पुलिस समझ गई कि हत्या का राज उसी नंबर में छिपा है, जिस ने फोन किया था. पुलिस को लगा कि संदिग्ध नंबर के मालिक तक पहुंचते ही केस का खुलासा हो जाएगा.

पुलिस ने उस नंबर का कंपनी से पता हासिल किया तो वह चौंकी, क्योंकि वह नंबर भी नूर हसन के नाम पर ही था. उस नंबर से केवल नूर हसन से ही बात की जाती थी. लापता होने वाली रात से दोनों ही नंबर बंद थे. दूसरा नंबर या तो नूर हसन  के परिवार में होना चाहिए था या किसी ऐसे खास शख्स के पास, जो उस के बेहद नजदीक था. ऐसा भी संभव था कि उस ने दूसरा नंबर अपनी पत्नी को दिया हो. पुलिस ने उस की पत्नी से पूछताछ की तो उस ने उस नंबर के बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया. उस ने यह भी बताया कि नंबर कौन इस्तेमाल कर रहा था, वह यह भी नहीं जानती. इस से हत्या की गुत्थी सुलझाने के बजाय और उलझ गई. देखतेदेखते कई दिन बीत गए.

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि जिस मोबाइल में वह संदिग्ध नंबर इस्तेमाल किया गया था, उस में 2 सिमकार्ड इस्तेमाल होते थे. पुलिस ने दूसरे सिमकार्ड का नंबर हासिल कर के उस के मालिक का पता लगाया तो वह कुडकावाला के ही फिरोज के नाम निकला. इस से हत्या का मामला सुलझता नजर आया. 19 अगस्त को पुलिस उस के पास पहुंची तो पता चला कि वह मोबाइल उस की पत्नी रिजवाना इस्तेमाल करती थी. रिजवाना खूबसूरत महिला थी. पुलिस को सामने देख पतिपत्नी, दोनों बुरी तरह घबरा गए. पुलिस दोनों को हिरासत में ले कर थाने आ गई. थाने में दोनों से पूछताछ की गई तो उन्होंने ऐसा सनसनीखेज खुलासा किया कि पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई.

नूर हसन रिजवाना के हुस्न में उलझा हुआ था. यही हुस्न उसे बड़ी खामोशी और चालाकी से मौत की दहलीज तक ले गया. विस्तृत पूछताछ में चौंकाने वाली जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी. रिजवाना देहरादून के महूवाला क्षेत्र की रहने वाली थी. करीब 10 साल पहले उस का निकाह फिरोज के साथ हुआ था. रिजवाना तेजतर्रार खूबसूरत युवती थी. उसे पा कर फिरोज खुशी से फूला नहीं समाया था. समय के साथ रिजवाना 2 बच्चों की मां बनी. फिरोज गांव में ही छोटा सा हेयरकटिंग सैलून चलाता था. उस का छोटा सा परिवार हर तरह की खुशिया समेटे हुए था. रिजवाना उन युवतियां में थी, जो अपनी खूबसूरती पर नाज करती हैं.

रिजवाना के पड़ोस में ही नूर हसन रहता था. वह पहले शहर में वेल्डिंग का काम करता था, लेकिन यह काम उसे रास नहीं आया तो एक साल पहले उस ने गांव आ कर परचून की दुकान खोल ली. एक दिन रिजवाना नूर हसन की दुकान पर आई तो वह उसे देखता रह गया. एक ही मोहल्ले का होने के कारण दोनों एकदूसरे को पहले से ही जानते थे, लेकिन उस दिन नूर हसन की नजरें उस पर अटक गई थीं. उस का मन किया कि रिजवाना के हुस्न की तारीफ करे, लेकिन वह यह सोच कर खामोश रहा कि कहीं वह बुरा न मान जाए. जिन हसरत भरी निगाहों से उस ने रिजवाना को देखा था, उस से रिजवाना को अपनी खूबसूरती पर और भी नाज हो गया था.

कहते हैं कि मर्द की नजरों को पहचानने में औरत का कोई सानी नहीं होता. दूसरे शब्दों में यह कुदरती हुनर होता है. अगले कुछ दिनों में रिजवाना की समझ में आ गया कि कुछ तो है, जो नूर हसन के दिल में चल रहा है. तभी वह उसे ऐसी नजरों से देखता है. यूं तो नूर हसन खुद भी 2 बच्चों का पिता था, परंतु रिजवाना की खूबसूरती उसे लुभा रही थी. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह कभी मौका मिलने पर उस की खूबसूरती की तारीफ जरूर करेगा. एक दिन रिजवाना फिर उस की दुकान पर आई तो वह तारीफ करते हुए बोला,‘‘आप बुरा न माने तो एक बात कहूं भाभीजान?’’

‘‘हां कहो?’’ रिजवाना बोली.

‘‘पहले वादा कीजिए कि आप नाराज नहीं होंगी. इस से मुझे जो दर्द होगा, मैं खुद को कभी माफ नहीं कर सकूंगा.’’ यह बात उस ने इतने गंभीर लहजे में कही कि रिजवाना के मन में जिज्ञासा जाग गई और वह भी गंभीर हो गई, ‘‘ऐसी क्या बात है, जो तुम कहना चाहते हो?’’

‘‘बस यही कहना था कि आप बहुत खूबसूरत हैं. जो हुस्न आप ने पाया है, वह सब को नहीं मिलता. फिरोज खुशनसीब है, जो उसे आप जैसी शरीकेहयात मिली है.’’

तारीफ के अल्फाज हर किसी को खुश कर देते हैं. रिजवाना के साथ भी ऐसा ही हुआ. अपनी तारीफ सुन कर वह अंदर ही अंदर बहुत खुश हुई. वेसे भी नूर हसन की हसरतपूर्ण निगाहों ने उस के दिल में पहले ही जगह बना ली थी. इस के बाद जब दोनों मिलते, बातें कर लिया करते. एकाध बार ऐसा भी हुआ, जब नूर हसन फिरोज की अनुपस्थिति में किसी काम के बहाने उस के घर गया. रिजवाना कोई नादान नहीं थी. वह समझ गई कि नूर हसन उसे चाहता है. अब तक नूर हसन उसे भी अच्छा लगने लगा था. दोनों के दिलों में जो पनप रहा था, उसे एक दिन प्यार का नाम दे कर दोनों ने इजहार कर दिया.

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर ले लिया और अकसर बातें करने लगे. कुछ समय ऐसे ही चलता रहा. इस के बाद दोनों एकदूसरे से मिलने का बहाना तलाशने लगे. रिजवाना सामान लेने के बहाने उस की दुकान पर आती तो वह भी किसी न किसी बहाने उस के घर पहुंच जाता. जमाने से उन्होंने अपने दिलों में पनपते प्यार को छिपाया हुआ था. रिजवाना ऐसी गलती कर चुकी थी, जो उसे नहीं करनी चाहिए थी. रिजवाना के मोबाइल में अकसर बैलेंस कम होने लगा तो फिरोज उस से सवालजवाब करने लगा. इस से उसे शक हो सकता था.

रिजवाना सतर्क हो गई. उस ने यह बात नूर हसन को बताई तो उस ने अपने नामपते से एक नया सिम कार्ड खरीदा और उसे रिजवाना को दे दिया, साथ ही ताकीद भी कर दी कि इस नंबर से वह सिर्फ उस से ही बात करेगी. रिजवाना के पास ड्यूल सिमकार्ड वाला मोबाइल था. उस के बाद वह नूर हसन से सिर्फ उसी नंबर से बात करने लगी. वह भी उसी नंबर पर बात करता था. दूसरी ओर फिरोज को पता भी नहीं था कि उस की बीवी क्या गुल खिला रही है. खुफिया मुलाकातों के दौर में एक दिन रिजवाना व नूर हसन ने मर्यादाओं की दीवार को गिरा दिया. दोनों शादीशुदा थे, नैतिक व सामाजिक नजरिए से यह गलत था, लेकिन दिल के हाथों की मजबूरी बहाना बन गई.

पतन की दलदल ऐसी होती है, जो इस में एक बार गिरता है, वह गिरता ही जाता है. उन दोनों के साथ भी ऐसा ही हुआ. उन के रिश्ते अकसर बनने लगे. वह पकड़े जा सकते थे. इस का रास्ता भी दोनों ने खोज निकाला. रिजवाना को जिस रात नूर हसन के आगोश में समाना होता था, उस रात वह॒॒फिरोज को खाने में नींद की गोलियां दे दिया करती थी. जब वह गहरी नींद में हो जाता था तो वह नूर हसन को फोन कर के बुला लेती थी. दोनों के बीच यह आए दिन का सिलसिला बन गया था. ऐसे रिश्ते छिपाए नहीं छिपते. दोनों को ले कर लोगों में चर्चाएं होने लगीं. फिरोज को पता चल गया कि दिन में नूर हसन उस के घर जाता है. उस ने रिजवाना को डांटाफटकारा.

कुछ दिन तो रिजवाना सही रास्ते पर रही, लेकिन बहुत जल्द उस ने पुराना ढर्रा अपना लिया. फिरोज को किसी ने बताया था कि नूर हसन रात में भी उस की पत्नी से चोरीछिपे मिलता है. रिजवाना की गतिविधियों पर उसे शक तो हो ही गया था, इस तरह की बातों ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया. एक दिन उस ने नूर हसन को अपने घर से निकलते हुए देख लिया. वह घर के अंदर दाखिल हुआ तो रिजवाना चौंक गई. फिरोज उस की हालत देख कर समझ गया कि वह गलत डगर पर है. फिरोज गुस्से वाला युवक था. उस का खून खौल उठा. उस ने रिजवाना की जम कर पिटाई की और तलाक की धमकी दे डाली.

रिजवाना को अपना घर टूटता नजर आया तो वह त्रियाचरित्र पर उतर आई. उस ने रोरो कर बताया कि नूर हसन ने उसे अपने जाल में उलझा लिया था और उसे बदनाम करने की धमकी देता था, इसलिए वह खामोशी से अपने साथ होने वाले जुल्मों को सहती रही. फिरोज को उस के नाटक और आंसुओं पर भरोसा हो गया. उस ने रिजवाना को तो माफ कर दिया, लेकिन उसी दिन मन में ठान लिया कि वह नूर हसन को सबक सिखा कर रहेगा.

रिजवाना समझ गई थी कि घर टूटने से बेहतर अपने कदम संभालने में ही भलाई है. उस ने नूर हसन से बातें करनी बंद कर दीं. फिरोज अपमान की आग में झुलस रहा था. उस ने रिजवाना से कह दिया कि वह नूर हसन को जिंदा नहीं छोड़ेगा. वह जानता था कि रिजवाना के माध्यम से ही वह नूर हसन को उलझा सकता है. दोनों ने उसे मारने की योजना बना डाली.

योजना के अनुसार, 6 अगस्त की शाम रिजवाना ने उसे फोन कर के कहा, ‘‘मुझे तुम से कुछ बात करनी है.’’

‘‘कह दो इस में सोचने की क्या बात है?’’ नूर हसन ने कहा.

रिजवाना राजदराना अंदाज में बोली, ‘‘मैं फोन पर नहीं कह सकती.’’

‘‘तो आज रात आ जाता हूं.’’ नूर हसन ने कहा तो वह उसे समझाते हुए बोली, ‘‘नहीं, तुम्हारा घर आना ठीक नहीं है. एक गड़बड़ हो गई है. मैं रात को मौका देख कर फोन करूंगी. तुम कुएं पर आ जाना, हम वहीं मिल लेंगे.’’

‘‘ठीक है.’’ नूर हसन ने कहा.

कई दिनों से दोनों के बीच रिश्ते नहीं बने थे. नूर हसन के मन में मिलने की तड़प थी. वह उस पर पूरा भरोसा करता था. रात में वह उस के फोन का बेसब्री से इंतजार करने लगा. उस की पत्नी व बच्चे सो चुके थे. देर रात एक बजे के बाद रिजवाना का फोन आया और उस ने उसे कुएं पर आने के लिए कहा. नूर हसन को ख्वाब में भी उम्मीद नहीं थी कि रिजवाना आज उसे मौत का पैगाम दे रही है. वह चुपके से घर से निकल गया.

उधर नूर हसन को फोन कर के फिरोज व रिजवाना कुएं पर पहुंच गए. रात के गहरे सन्नाटे में वहां कोई नहीं था. फिरोज छिप कर खड़ा हो गया, जबकि रिजवाना उस का इंतजार करने लगी. कुछ ही मिनटों में नूर हसन वहां आ गया. रिजवाना को अकेली पा कर उसे सुकून मिला. रिजवाना ने उसे बातों में  उलझा लिया, तभी फिरोज ने एक पत्थर उठाया और तेजी से उस के सिर व कनपटी पर वार कर दिए. अचानक हुए वार को नूर हसन सह नहीं पाया. वह बेहोश हो कर नीचे गिर गया. फिरोज ने रिजवाना की मदद से उसे उठाया और कुएं में डाल कर घर चले आए. बाद में नूर हसन का शव मिलने पर फिरोज न सिर्फ कुएं पर गया, बल्कि उस के परिवार के गम में भी शरीक हुआ. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि पुलिस कभी उन तक पहुंच पाएगी, लेकिन उन की यह सोच गलत साबित हुई और वह गिरफ्त में आ गए.

पूछताछ के बाद पुलिस ने अगले दिन दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी पुष्पक ज्योति ने ढाई हजार रुपए का इनाम देने की घोषण भी की.

नूर हसन ने दूसरे की बीवी से रिश्ते बना कर विश्वास न किया होता और रिजवाना ने गलती कर के त्रियाचरित्र न दिखाया होता तो ऐसी नौबत कभी नहीं आती. अब उन के बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया है. कथा लिखे जाने दोनों हत्यारोपियों की जमानत नहीं हो सकी थी और पुलिस उन के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल करने की तैयारी कर रही थी. Hindi Stories

Gujrat News: फारेस्ट औफिसर ने किया परिवार दफन

Gujrat News: भावनगर के फारेस्ट औफिसर शैलेष खांभला का परिवार ऊपर से देखने में भले ही खुशहाल लगता था, लेकिन घर में ऐसी खामोश आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस की कोई कल्पना तक नहीं कर सकता था. इसी बीच शैलेष ने एक ऐसी खूनी साजिश तैयार कर ली, जिस से उस ने न सिर्फ पत्नी बल्कि दोनों बच्चों की हत्या कर उन्हें दफन कर दिया. एक फारेस्ट अधिकारी ने आखिर ऐसा क्यों किया?

गुजरात के जिला भावनगर की फारेस्ट कालोनी की वह सुबह हर दिन से कुछ अलग सी थी. सूरज से निकलने वाली किरणें घरों की छतों पर इस तरह फैल रही थीं, मानो धीरेधीरे कोई राज खोल रही हों. जबकि इस कालोनी का वह घर, जिस में शैलेष खांभला अपनी पत्नी नयनाबेन, बेटे भव्य और बेटी पृथा के साथ रहता था. उस सुबह जैसे किसी अदृश्य परदे में लिपटा हुआ था. दूर से देखने में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अंदर ऐसा कुछ था, जिसे हवा भी छूने से डर रही थी. शैलेष खांभला वन विभाग में एसीएफ यानी असिस्टेंट कंजर्वेटर औफ फारेस्ट था. साल भर पहले ही उस का इस पद पर प्रमोशन हुआ था. उस के बाद ही ट्रांसफर हो कर भावनगर आया था.

जयपुरिया शर्ट पहन कर औफिस जाने वाला, नियमों में विश्वास रखने वाला, दिखने में शांत, लोगों से कम बोलने वाला व्यक्ति था शैलेष. लोग कहते थे कि साहब बहुत सीधे हैं, गुस्सा बिलकुल नहीं करते. परिवार से बहुत प्यार करते हैं. और उस की पत्नी नयना एक ऐसी महिला थी, जो अपनी छोटी सी दुनिया को संभालने में ही दिनरात खोई रहती थी. बेटी पृथा 13 साल की थी तो बेटा भव्य 9 साल का. दोनों पढऩे में तो अच्छे थे ही, सभ्य और खुशमिजाज भी थे.

एक अफसर का परिवार होने के बावजूद यह परिवार बिलकुल साधारण दिखाई देता था. नौकरी की वजह से पति बाहर रहता था तो नयना बच्चों को ले कर सूरत के कापोद्रा में सासससुर के साथ रहती थी. बाहर से देखने में सब कुछ सामान्य लगता था. लेकिन कुछ बातें ऐसी भी होती हैं, जो घर की दीवारों के अंदर ही चुपचाप सांसें लेती हैं. उन का किसी को पता तक नहीं चलता कि अंदर ही अंदर क्या हो रहा है, क्या मर रहा है और क्या जन्म ले रहा है?

शैलेष साल भर पहले ही प्रमोशन ले कर भावनगर आया था. यहां रहते हुए उस की दुनिया बदल गई थी, लेकिन यह बदलाव उस के घर में नहीं आया था, उस के औफिस में आया था. वन विभाग में ही नौकरी करने वाली एक युवती शैलजा (बदला हुआ नाम), जिस की उम्र शैलेष से भले कम थी, लेकिन उस का रूप अधिक था. आकर्षण ऐसा था कि देखने वाले की नजर उस पर ठहर जाए. वह विभाग की अपनी जिम्मेदारी अच्छे से निभाती थी. मुसकरा कर बातें करती तो जैसे फूल झड़ते हों. बिलकुल अलग दुनिया से आई हुई लगती थी शैलजा.

प्यार की हुई शुरुआत

मिलने की शुरुआत काम की बातचीत से हुई. शैलजा को काम के सिलसिले में बारबार शैलेष के पास आना पड़ता था. बारबार पास यानी नजदीक आने से शैलेष उस की ओर आकर्षित होने लगा, क्योंकि शैलजा जितनी खूबसूरत थी, उस से कहीं अधिक खूबसूरत उस का बातचीत करने का ढंग था. शैलजा अच्छी लगने लगी तो शैलेष उस के नजदीक जाने की कोशिश करने लगे. शुरुआत हुई वाट्सऐप मैसेज से. आजकल सरकारी आदेश, सूचनाएं, नोटिस आदि वाट्सऐप से ही भेजे जाने लगे हैं. इसलिए औफिस के हर कर्मचारी का नंबर हर किसी के पास होता ही है. इसलिए शैलजा का नंबर भी शैलेष के पास था. शैलेष शैलजा को सरकारी संदेशों के साथसाथ गुडमार्निंग का संदेश भी भेजने लगा था.

गुडमार्निंग का संदेश भेजतेभेजते शैलेष उसे प्यार के द्विअर्थी संदेश भेजने लगा. शैलजा उस के इन संदेशों को अवाइड करने या विरोध करने के बजाय जवाब देने लगी तो शैलेष समझ गया कि शैलजा को वह पसंद हैं. उस के संदेशों से स्पष्ट हो रहा था कि उस ने शैलेष के प्यार के प्रपोजल को स्वीकार कर लिया था. शैलजा को पता था कि शैलेष शादीशुदा ही नहीं, 2 बच्चों का बाप भी है, फिर भी वह शैलेष के प्यार के झांसे में आ गई थी.

जब दोनों को एकदूसरे से प्यार हो गया तो उन की फोन पर बातें होने लगी थीं, जो घंटोंघंटों चलती थीं. फिर तो दोनों के दिलों ने एकदूसरे को इस तरह जकड़ लिया, जैसे जंगल की बेल किसी पेड़ को धीरेधीरे जकड़ लेती है. कहते हैं कि प्यार कभी अचानक नहीं होता. वह धीरेधीरे बढ़ता है, जैसे दीमक किसी लकड़ी में बढ़ता है. शैलेष के मन में भी शैलजा के प्यार का दीमक लग चुका था.

किस ने चुराईं खुशियां

किसी और की मुसकान ने उस के घर की खुशियां चुरा ली थीं. अब घर लौटने में उस का मन शांत नहीं रहता था. वह फोन को सीने से लगा कर सोने लगा था. पत्नी कभी कोई सवाल करती थी तो जवाब देने के बजाय चुप रह जाता था. अपने ही बच्चों से अब उसे कोई मतलब नहीं रह गया था. एक पिता अपने ही बच्चों से दूर होता गया था. एक हंसतेखेलते, सुखीसंपन्न परिवार में एक पुरुष की लंपटता की वजह से काफी कुछ बदल चुका था.

शैलजा शैलेष के जीवन में भावना बन कर नहीं आई थी, बल्कि जुनून बन कर आई थी. एक आग की तरह कि जिसे बुझाना भी चाहो तो वह और भड़क उठे. शैलेष का दिमाग पूरी तरह बदल चुका था. वह सोचने लगा था कि अगर शैलजा के प्यार को पाना है तो उस के लिए कुछ बड़ा करना होगा. कुछ ऐसा करना होगा कि उस के बाद उसे कोई रोकटोक न सके. दुनिया उसे एक अधिकारी, एक भरेपूरे परिवार वाला और एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देखती थी. हर किसी को लगता था कि शैलेष बहुत सुखी है.

उस की सुंदरसुघड़ पत्नी और 2 प्यारेप्यारे बच्चे हैं. अच्छीखासी कमाई है. संपन्न परिवार से भी है. लेकिन इतना सब कुछ होने के बावजूद उस के अंदर अब एक और आदमी पैदा हो चुका था, जो प्यार नहीं, कब्जा चाहता था. किसी और की देह पर कब्जा. और कब्जा अकसर हिंसा से ही मिलता है. 26 अक्तूबर, 2025 को नयना बच्चों को ले कर सूरत से भावनगर पति के पास आ गई थी. उसे पति के स्वभाव और बातचीत से उस की हरकतों पर संदेह हो गया था, जिस की वजह से वह उस से लडऩेझगडऩे लगी थी. साथ रहने की जिद करने लगी थी.

एक पति पत्नी के साथ जैसा व्यवहार करता है, शैलेष नयना के साथ बिलकुल नहीं कर रहा था. इसलिए यह झगड़ा बढ़ता ही जा रहा था. शैलेष के बदले व्यवहार से नयना को यकीन हो गया था कि शैलेष पूरी तरह बदल गया है. इसलिए नयना अब उस के साथ ही रहना चाहती थी, जबकि शैलेष उसे खुद से दूर ही रखना चाहता था. नयना ने पति की हरकतों को भांप कर तय कर लिया था कि अब वह उस के साथ ही रहेगी. जबकि शैलेष किसी भी हालत में साथ रखने को तैयार नहीं था. इसलिए नयना की जिद से वह परेशान हो उठा था. जब नयना किसी भी हालत में नहीं मानी तो शैलेष उस से छुटकारा पाने के उपाय ही नहीं सोचने लगा था, बल्कि योजना बनाने लगा था.

उसी योजना के तहत 2 नवंबर को शैलेष ने रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से कहा कि कूड़ा फेंकने और पानी भरने के लिए उसे घर के पीछे वाले खेत में एक बड़ा गड्ïढा खुदवाना है. खेत में गड्ïढा खुदवाना सामान्य बात थी. लेकिन वह गड्ïढा सामान्य नहीं था. वह गड्ïढा भविष्य का श्मशान था.

उसी दिन रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया ने शैलेष के सरकारी क्वार्टर से 20 फीट की दूरी पर जेसीबी से मिट्टी हटवा कर गहरा गड्ïढा खुदवा दिया. गड्ïढा छोटामोटा नहीं खुदवाया था, शैलेष ने पूरे साढ़े 6 फुट गहरा गड्ïढा खुदवाया था. गिरीश ने सोचा था कि शैलेष ने किसी खास काम यानी कूड़ा डालने और पानी भरने के लिए गड्ïढा खुदवाया होगा. तब किसे पता था कि वह गड्ïढा 3 जिंदगियों का अंतिम ठिकाना बनने वाला है.

4 नवंबर, 2025 से शैलेष का व्यवहार एकदम से बदल गया था. घर में कुछ बेचैनी सी फैल गई थी. उस का बदला व्यवहार देख कर पत्नी ने पूछा भी था कि सब ठीक तो है न? जवाब में उस ने कहा था, ”हां, सब ठीक ही है. कुछ तो नहीं है.’’ लेकिन उस के इस ‘कुछ तो नहीं है’ में एक ऐसा तूफान छिपा था, जिस में सब उड़ जाना था. जो बच्चे रोज उस के साथ खेलते थे, वे उस से दूर हो गए थे. वे अपने मन से नहीं दूर हुए थे, बल्कि शैलेष ने खुद उन्हें दूर कर दिया था. पिता के बातव्यववहार से उन्हें भी हवा से कुछ गड़बड़ होने का अहसास हो रहा था.

4 नवंबर की सुबह साढ़े 8 बजे के करीब रेंज फारेस्ट औफिसर ने शैलेष को फोन किया कि सर खेत में जो गड्ïढा खोदा था, उस में एक मोर गिर कर मर गया है. इसलिए गड्ïढा पटवाना जरूरी है. शैलेष भाग कर आया. उस ने कहा कि यहां तो कोई मोर नहीं है. आरएफओ हैरान रह गया था, क्योंकि उस ने अपनी आंखों से गड्ढे क में मरा हुआ मोर देखा था. वह खड़ा यही सोच रहा था कि शैलेष झूठ क्यों बोल रहा है? आखिर यह आदमी गड्ïढा भरवाने से मना क्यों कर रहा है?

जो भी राज था, वह शैलेष के मन में ही था. गड्ढे क का वह क्या करेगा, यह किसी को पता नहीं था. इसलिए लोगों को शक होने लगा था. उस रात भावनगर में हवा कुछ अलग ही चल रही थी. वह ऐसी हवा थी, जो शांत तो थी, पर डरावनी भी थी. घर में बच्चों की आवाजें धीमी पड़ गई थीं. नयना को कुछ बेचैनी सी हो रही थी. शैलेष का चेहरा ऐसा हो गया था, जैसे कोई आदमी अपनी परछाई से भी डर रहा हो.

औफिसर ने किए 3 मर्डर

4 नवंबर, 2025 की रात से ही शैलेष और नयना में साथ रहने को ले कर झगड़ा शुरू हो गया था, जो पूरी रात चलता रहा. बच्चे खापी कर सो गए थे, लेकिन न शैलेष की आंखों में नींद थी और न नयना की आंखों में, क्योंकि कमरे की चौखट पर खड़ा शैलेष अपने ही परिवार की मौत लिखने वाला था. उस ने सोचा कि सब से पहले पत्नी को ठिकाने लगाया जाए. क्योंकि पत्नी ही उस के प्यार की, उस के नए जीवन की सब से बड़ी बाधा थी. सब से बड़ा सवाल थी. सब से बड़ा सच थी. वही सवाल कर सकती थी कि वह यह क्या करने जा रहा है.

शैलेष और नयना की लड़ाई सुबह और बढ़ गई थी. नयना अपना अधिकार मांग रही थी. उसे क्या पता था कि थोड़ी देर में उसे अधिकार नहीं, मौत मिलने वाली है. यह काम कोई और नहीं, वही आदमी करेगा, जिस ने अग्नि के 7 फेरे लेते हुए उस की जानमाल और इज्जत की सुरक्षा करने की कसम खाई थी. वही अब उस की जान लेने वाला है, एक ऐसी औरत के लिए जो अभी उस की कोई नहीं थी. अभी सब कुछ वादों में था.

लड़तेझगड़ते अचानक शैलेष को गुस्सा आ गया. उस ने बैड पर पड़ा दूसरा तकिया उठाया और नयना के मुंह पर पूरी ताकत से इतनी मजबूती से दबाया कि उस की आवाज तक बाहर नहीं आ सकी. नयना ने जान बचाने के लिए संघर्ष तो बहुत किया, लेकिन शैलेष की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उस ने हाथपैर पटक कर, थोड़ी देर छटपटा कर दम तोड़ दिया. जिस आदमी ने कभी बच्चों तक से ऊंची आवाज में बात नहीं की थी, उस आदमी ने अपनी ही पत्नी की सांसें रोक दीं. जिस से पूरे जीवन साथ निभाने का वादा किया था, बीच में उस की जान ले कर उस का साथ छोड़ दिया.

कमरा फिर खामोश हो गया. एक ऐसी खामोशी, जिस में कोई रो तो सकता था, लेकिन कोई सुन नहीं सकता था. शायद मम्मी के कमरे से आने वाली छटपटाहट की आवाज सुन कर दोनों बच्चे, 13 साल की पृथा और 9 साल का भव्य जाग गए थे. कमरे से आने वाली धीमी आवाजों ने उन्हें डरा दिया था. बेटी थोड़ी बड़ी थी. उस ने पूछा, ”पापा, मम्मी को क्या हुआ?’’

शैलेष ने मुसकराने की कोशिश तो की, लेकिन उस की आंखों में पागलपन उतर चुका था. उस ने बेटी को समझाने या सांत्वना देने के बजाय दबोच लिया और उस के मुंह पर भी तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाना शुरू कर दिया. 13 साल की मासूम बच्ची कितना संघर्ष करती, एक वयस्क पुरुष के सामने कितनी देर टिक सकती थी? आखिर वही हुआ, जो शैलेष चाहता था. कुछ पलों में पृथा की भी सांसें रुक गईं. उस के बाद 9 साल के बेटे को भी उसी तरह खत्म कर दिया.

जिन हाथों ने पकड़ कर उसे चलना सिखाया था, उन्हीं हाथों ने बेटी और बेटे का जीवन लील लिया था. उन का मुंह दबाते समय पिता के हाथ भी नहीं कांपे थे. जब पत्नी और बच्चों की सांसें थम गईं तो शैलेष के अंदर का शैतान शांत हो गया. वही नहीं, घर भी शांत हो गया था. यह शांति मौत की थी. शैलेष खड़ा तीनों लाशों को ताक रहा था. उस की आंखों में उस समय एक ऐसा खालीपन था, जो अब कभी भरने वाला नहीं था. लगता था कि भीतर का सब कुछ मर चुका हो. लेकिन मन में कोई पछतावा नहीं था. अब उसे तीनों लाशों को ठिकाने लगाना था. इस की योजना उस ने पहले से बना रखी थी.

लाशों को ठिकाने लगाने के लिए शैलेष ने पहले से घर के पीछे 20 फीट की दूरी पर गड्ïढा खुदवा रखा था. अब उसे उन लाशों को उस गड्ढे क में डाल कर ऊपर से मिट्ठी डालनी थी. शैलेष ने तीनों लाशें उस गड्ढे क तक पहुंचाई, जिसे उस ने लाशों के हिसाब से ही खुदवाया था. लाशों में पत्थर बांध कर गड्ढे क में डाल दिया. इस के बाद घड़ी की ओर देखा तो साढ़े 8 बज रहे थे. उस ने लाशों के ऊपर गद्ïदा डाल कर ऊपर से एक दरवाजा डाल दिया, जिस से गद्ïदा इधरउधर न खिसके. अब ऊपर से मिट्टी डालनी थी.

शैतान बन चुके शैलेष ने खुद ही अपने उस परिवार के ऊपर मिट्टी डाल कर दफना दिया, जिस के लिए अब तक जिया था. इस के बाद उस ने अमित को फोन कर के 2 डंपर बजरी मंगवाई कि गड्ढे क को भरवाना है. रेंज फारेस्ट अफसर ने कहा कि गड्ढे क से निकली मिट्टी तो है, उसी को जेसीबी से भरवा देते हैं. पर शैलेष ने बजरी मंगवा कर गड्ढे क में डलवा दी. इस तरह उस गड्ढे क में अपराध का एक इतिहास दफन हो गया था. ऊपर से सूखी घास और पुरानी बोरियां डाल कर गड्ढे को खेत का एक हिस्सा बना दिया था.

5 नवंबर, 2025 को हत्या हुई थी. इतना कुछ करने के बाद शैलेष घर से निकल गया. 7 नवंबर, 2025 की शाम को वह भावनगर के थाना भरतनगर पहुंचा और पत्नी, बेटे और बेटी की गुमशुदगी दर्ज कराई. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने अपना काम शुरू कर दिया. नयना, पृथा और भव्य के फोटो, आधार कार्ड आदि सारी जानकारी भावनगर जिले के तमाम थानों को भेज कर तलाश शुरू कर दी. 12 नवंबर, 2025 तक शैलेष नौकरी पर जाता रहा. उस के बाद छुट्टी ले कर सूरत चला गया. वह इस तरह रह रहा था, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है.

दूसरी ओर 8 नवंबर को पुलिस ने नयना के मोबाइल नंबर की कौल डिटेल्स निकलवाई थी. उसी दिन शैलेष ने थाना भरतनगर जा कर पुलिस को बताया था कि सिक्योरिटी गार्ड ने बताया है कि उस ने नयना और दोनों बच्चों को एक औटोरिक्शा से जाते देखा था. इस के बाद पुलिस ने सिक्योरिटी गार्ड से पूछताछ की तो उस ने उन तीनों को देखने से साफ मना कर दिया. तब पुलिस ने फारेस्ट कालोनी तथा उस के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालने के साथ नयना के मोबाइल की वह स्क्रीनशौट मंगाई, जिस में उस ने वह मैसेज छोड़ा था कि वह घर छोड़ कर बच्चों के साथ जा रही है.

सीसीटीवी फुटेज में ऐसा कोई औटो नजर नहीं आया, जिस में नयना और बच्चे जा रहे हों. तीनों पैदल भी जाते नहीं दिखाई दिए थे.

फोन से मिला सुराग

जांच में पता चला कि शैलेश ने खुद ही पत्नी के मोबाइल से एक मैसेज किया था, जिस में उस ने लिखा था कि वह किसी दूसरे के साथ रहने जा रही है. लेकिन फोन फ्लाइट मोड पर था, इसलिए वह मैसेज सेंड नहीं हो सका था. पुलिस को इस से थोड़ा शक हुआ और उसे आगे बढऩे की रोशनी मिल गई. तब पुलिस ने नयना के पुराने मैसेज से उस की भाषा का मिलान किया तो उस की भाषा अलग लगी. पुलिस को यहीं शक हुआ कि जो इंसान घर छोड़ कर भाग रहा हो, वह संदेश छोड़ कर क्यों जाएगा.

शैलेष शक के दायरे में आया तो पुलिस ने उस के मोबाइल की कौल डिटेल्स निकलवाने के साथसाथ लोकेशन भी निकलवाई. कौल डिटेल्स से पता चला कि इस बीच शैलेष की रेंज फारेस्ट अफसर गिरीशभाई बनिया से अधिक बात हुई थी. 11 नवंबर को पुलिस ने शैलेष के घर की तलाशी ली, जिस में घर से एक छोटा कपड़ा कुरसी के नीचे से मिला था, जो किसी बच्चे का लगता था. उस का एक बटन टूटा हुआ था. कोने में पड़े 2 स्कूल बैग और घर बता रहा था कि बच्चे कई दिनों से गायब थे. 15 नवंबर को रेंज फारेस्ट अफसर गिरीश बनिया से मिलने पुलिस पहुंच गई.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ मे गिरीश बनिया ने बताया कि 2 नवंबर को शैलेष ने उस से कहा था कि उसे घर के पीछे खेत में पानी जमा करने और कूड़ा डालने के लिए एक गड्ïढा खुदवाना है. उस ने शैलेष के कहने पर गड्ïढा खुदवा दिया था. 6 नवंबर को फिर आदेश आया कि अब इस गड्ढे क में मिट्टी भरवा दो. बनिया की इस बात से पुलिस को लगा कि यह महज संयोग नहीं हो सकता. यह किसी योजना के तहत था.

शैलेष के कहने पर गड्ïढा भरवाने के लिए गए वनरक्षक विशाल पनोत ने बताया कि जब वह गड्ïढा भरवाने के लिए डंपर से मिट्टी गिरवाने लगा तो गड्ïढा देखने की गरज से उस ओर गया. तब शैलेष ने घबराई आवाज में कहा था कि इधर मत आओ, उस का पैर किसी सांप पर पड़ गया था. वह उसे काट सकता है. घर का रहा न घाट का एक जंगल के अधिकारी की इस तरह की बचकानी हरकत पुलिस को हजम नहीं हुई. डंपर के साथ आए विशाल से बात की गई तो उस ने बताया कि जब उस ने गड्ढे क में पड़े गद्ïदे के बारे में पूछा तो शैलेष ने बताया था कि गड्ढे क में एक नीलगाय गिर गई थी, उसे बाहर निकालने के लिए गद्ïदा डालना पड़ा था. जबकि गड्ढे क में डाली गई मिट्टी एक अलग ही कहानी कह रही थी.

नई, ताजी, जल्दबाजी में भरी गई मिट्टी साफ कह रही थी कि इस के नीचे कोई रहस्य छिपा है. मिट्टी डाल कर भले जमीन समतल कर दी गई थी, लेकिन जल्दबाजी में किया गया यह कारनामा पुलिस की आंखों में धूल नहीं झोंक सका. हर क्लू एक ही बात की ओर इशारा कर रहा था कि गड्ïढा हत्या से जुड़ा है और हत्या के रहस्य को इसी गड्ढे में जल्द से जल्द मिटाने की कोशिश की गई थी. सिक्योरिटी गार्ड, सीसीटीवी फुटेज, रेंज फारेस्ट अफसर, वनरक्षक और डंपर के साथ आए सहायक की बातों से पुलिस का शक अब यकीन में बदलने लगा था. तब पुलिस टीम फिर फारेस्ट कालोनी पहुंची. इस बार उन के साथ फोरैंसिक टीम भी थीं.

गड्ढे में जहां मिट्टी और बजरी डाली गई थी, जेसीबी से मिट्टी हटाई जाने लगी. सभी टकटकी लगाए गड्ढे क को ताक रहे थे. जब मिट्टी के नीचे कपड़े का एक टुकड़ा दिखाई दिया तो वहां खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो गए. कुछ ही देर में तीनों लाशें दिखाई दे गईं. ये लाशें नयनाबेन, पृथा और भव्य की थीं, जिन्हें तकिए से दम घोंट कर मारा गया था. इस घटना की खबर आग की तरह फैल गई. पूरे भावनगर में मातम था. पुलिस ने लाशें निकलवा कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी थीं.

लाशें मिलने के बाद स्पष्ट हो गया था कि ये हत्याएं शैलेष ने ही की हैं. पर लोगों की समझ में यह नहीं आ रहा था कि एक पढ़ेलिखे, सभ्य, सरकारी मुलाजिम ने यह जघन्य अपराध क्यों किया? वह इतना क्रूर कैसे हो गया? अब पुलिस शैलेष को गिरफ्तार करना चाहती थी. पर वह घर में ताला बंद कर के गायब था. चूंकि मामला एक अधिकारी से जुड़ा था, इसलिए एसपी नितेश पांडे ने तुरंत थाना भरतनगर के इंसपेक्टर को भावनगर तथा सूरत में छापा मार कर शैलेष खांभला को गिरफ्तार करने का आदेश दिया.

पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए चंद घंटों में शैलेष खांभला को सूरत से गिरफ्तार कर लिया. लेकिन उस समय उस के चेहरे पर कोई पछतावा नहीं था. बस, एक अजीब सा खालीपन था, जैसे वह खुद भी समझ नहीं पा रहा था कि उस ने क्या खोया और क्या पाया है. शैलेष की गिरफ्तारी की सूचना पा कर एसपी नितेश पांडे, रेंज आईजी गौतम परमार भी आ गए थे. सभी की मौजूदगी में शैलेष से पूछताछ की गई तो उस ने अपना हर अपराध स्वीकार कर लिया था.

इस पूछताछ में उस ने यही बताया कि पत्नी नयनाबेन साथ रहने की जिद कर रही थी, इसलिए आवेश में आ कर उस ने उस की हत्या कर दी थी. बच्चों की हत्या उस ने क्यों की, इस सवाल का उस ने कोई जवाब नहीं दिया. पुलिस ने शैलजा से भी पूछताछ की. उस का कहना था कि शैलेष के मन में क्या था, उसे पता नहीं. रही बात प्यार करने की तो वह अलग बात है. पर उस ने शैलेष से न कभी साथ रहने की बात की है और न ही उस से कभी अपने परिवार की हत्या करने की बात की थी.

पूछताछ के बाद पुलिस ने शैलजा को जाने दिया, क्योंकि पुलिस के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था कि वह भी इस हत्या में शामिल थी. पुलिस ने शैलेष को 7 दिनों तक रिमांड पर भी रखा. इस बीच उस के खिलाफ जितने सबूत मिल सकते थे, जुटाए. यह भी पता किया कि इन हत्याओं में कोई और तो उस के साथ नहीं था. पता चला कि यह जघन्य अपराध उस ने अकेले ही किया था. रिमांड अवधि पूरी होने पर उसे कोर्ट में दोबारा पेश कर के जेल भेज दिया गया था. शैलेष के इस कारनामे से उस की पूरी बिरादरी ही नहीं, घर वाले भी इस कदर नाराज हैं कि सभी यही चाहते हैं कि उसे सख्त से सख्त सजा मिले. Gujrat News