Family Crime: मौज मजे में पति की हत्या

Family Crime: मानने वाले प्रेमीप्रेमिका और पतिपत्नी का रिश्ता सब से अजीम मानते हैं. लेकिन  जबजब ये रिश्ते आंतरिक संबंधों की महीन रेखा को पार करते हैं, तबतब कोई न कोई संगीन जुर्म सामने आता है.

हरिओम तोमर मेहनतकश इंसान था. उस की शादी थाना सैंया के शाहपुरा निवासी निहाल सिंह की बेटी बबली से हुई थी. हरिओम के परिवार में उस की पत्नी बबली के अलावा 4 बच्चे थे. हरिओम अपनी पत्नी बबली और बच्चों से बेपनाह मोहब्बत करता था. बेटी ज्योति और बेटा नमन बाबा राजवीर के पास एत्मादपुर थानांतर्गत गांव अगवार में रहते थे, जबकि 2 बेटियां राशि और गुड्डो हरिओम के पास थीं. राजवीर के 2 बेटों में बड़ा बेटा राजू बीमारी की वजह से काम नहीं कर पाता था. बस हरिओम ही घर का सहारा था, वह चांदी का कारीगर था.

हरिओम और बबली की शादी को 15 साल हो चुके थे. हंसताखेलता परिवार था, घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी. दिन हंसीखुशी से बीत रहे थे. लेकिन अचानक एक ऐसी घटना घटी, जिस से पूरे परिवार में मातम छा गया. 3 नवंबर, 2019 की रात में हरिओम अपनी पत्नी और 2 बच्चों के साथ घर से लापता हो गया. पिछले 12 साल से वह आगरा में रह रहा था. 36 वर्षीय हरिओम आगरा स्थित चांदी के एक कारखाने में चेन का कारीगर था.

पहले वह बोदला में किराए पर रहता था. लापता होने से 20 दिन पहले ही वह पत्नी बबली व दोनों बच्चियों राशि व गुड्डो के साथ आगरा के थानांतर्गत सिकंदरा के राधानगर इलाके में किराए के मकान में रहने लगा था. आगरा में ही रहने वाली हरिओम की साली चित्रा सिंह 5 नवंबर को अपनी बहन बबली से मिलने उस के घर गई. वहां ताला लगा देख उस ने फोन से संपर्क किया, लेकिन दोनों के फोन स्विच्ड औफ थे.

चित्रा ने पता करने के लिए जीजा हरिओम के पिता राजबीर को फोन कर पूछा, ‘‘दीदी और जीजाजी गांव में हैं क्या?’’

इस पर हरिओम के पिता ने कहा कि कई दिन से हरिओम का फोन नहीं मिल रहा है. उस की कोई खबर भी नहीं मिल पा रही. चित्रा ने बताया कि मकान पर ताला लगा है. आसपास के लोगों को भी नहीं पता कि वे लोग कहां गए हैं. किसी अनहोनी की आशंका की सोच कर राजबीर गांव से राधानगर आ गए. उन्होंने बेटे और बहू की तलाश की, लेकिन उन की कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर पिता राजबीर ने 6 नवंबर, 2019 को थाना सिकंदरा में हरिओम, उस की पत्नी और बच्चों की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

जांच के दौरान हरिओम के पिता राजबीर ने थाना सिकंदरा के इंसपेक्टर अरविंद कुमार को बताया कि उस की बहू बबली का चालचलन ठीक नहीं था. उस के संबंध कमल नाम के एक व्यक्ति के साथ थे, जिस के चलते हरिओम और बबली के बीच आए दिन विवाद होता था. पुलिस ने कमल की तलाश की तो पता चला कि वह भी उसी दिन से लापता है, जब से हरिओम का परिवार लापता है. पुलिस सरगरमी से तीनों की तलाश में लग गई. इस कवायद में पुलिस को पता चला कि बबली सिकंदरा थानांतर्गत दहतोरा निवासी कमल के साथ दिल्ली गई है. उन्हें ढूंढने के लिए पुलिस की एक टीम दिल्ली के लिए रवाना हो गई.

शनिवार 16 नवंबर, 2019 को बबली और उस के प्रेमी कमल को पुलिस ने दिल्ली में पकड़ लिया. दोनों बच्चियां भी उन के साथ थीं, पुलिस सब को ले कर आगरा आ गई. आगरा ला कर दोनों से पूछताछ की गई तो मामला खुलता चला गया. पता चला कि 3 नवंबर की रात हरिओम रहस्यमय ढंग से लापता हो गया था. पत्नी और दोनों बच्चे भी गायब थे. कमल उर्फ करन के साथ बबली के अवैध संबंध थे. वह प्रेमी कमल के साथ रहना चाहती थी. इस की जानकारी हरिओम को भी थी. वह उन दोनों के प्रेम संबंधों का विरोध करता था. इसी के चलते दोनों ने हरिओम का गला दबा कर हत्या कर दी थी.

बबली की बेहयाई यहीं खत्म नहीं हुई. उस ने कमल के साथ मिल कर पति की गला दबा कर हत्या दी थी. बाद में दोनों ने शव एक संदूक में बंद कर यमुना नदी में फेंक दिया था.

  पूछताछ और जांच के बाद जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—

फरवरी, 2019 में बबली के संबंध दहतोरा निवासी कमल उर्फ करन से हो गए थे. कमल बोदला के एक साड़ी शोरूम में सेल्समैन का काम करता था. बबली वहां साड़ी खरीदने जाया करती थी. सेल्समैन कमल बबली को बड़े प्यार से तरहतरह के डिजाइन और रंगों की साडि़यां दिखाता था. वह उस की सुंदरता की तारीफ किया करता था. उसे बताता था कि उस पर कौन सा रंग अच्छा लगेगा. कमल बबली की चंचलता पर रीझ गया. बबली भी उस से इतनी प्रभावित हुई कि उस की कोई बात नहीं टालती थी. इसी के चलते दोनों ने एकदूसरे को अपने मोबाइल नंबर दे दिए थे.

अब जब भी बबली उस दुकान पर जाती, तो कमल अन्य ग्राहकों को छोड़ कर बबली के पास आ जाता. वह मुसकराते हुए उस का स्वागत करता फिर इधरउधर की बातें करते हुए उसे साड़ी दिखाता. कमल आशिकमिजाज था, उस ने पहली मुलाकात में ही बबली को अपने दिल में बसा लिया था. नजदीकियां बढ़ाने के लिए उस ने बबली से फोन पर बात करनी शुरू कर दी. जब दोनों तरफ से बातों का सिलसिला शुरू हुआ तो नजदीकियां बढ़ती गईं. फोन पर दोनों हंसीमजाक भी करने लगे. फिर उन की चाहत एकदूसरे से गले मिलने लगी. बातोंबातों में बबली ने कमल को बताया कि वह बोदला में ही रहती है.

इस के बाद कमल बबली के घर आनेजाने लगा. जब एक बार दोनों के बीच मर्यादा की दीवार टूटी तो फिर यह सिलसिला सा बन गया. जब भी मौका मिलता, दोनों एकांत में मिल लेते थे. हरिओम की अनुपस्थिति में बबली और कमल के बीच यह खेल काफी दिनों तक चलता रहा. लेकिन ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रहतीं, एक दिन हरिओम को भी भनक लग गई. उस ने बबली को कमल से दूर रहने और फोन पर बात न करने की चेतावनी दे दी.

दूसरी ओर बबली कमल के साथ रहना चाहती थी. उस के न मानने पर वह घटना से 20 दिन पहले बोदला वाला घर छोड़ कर सपरिवार सिकंदरा के राधानगर में रहने लगा. 3 नवंबर, 2019 को हरिओम शराब पी कर घर आया. उस समय बबली मोबाइल पर कमल से बातें कर रही थी. यह देख कर हरिओम के तनबदन में आग लग गई. इसी को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ तो हरिओम ने बबली की पिटाई कर दी. बबली ने इस की जानकारी कमल को दे दी. कमल ने यह बात 100 नंबर पर पुलिस को बता दी. पुलिस आई और रात में ही पतिपत्नी को समझाबुझा कर चली गई. पुलिस के जाने के बाद भी दोनों का गुस्सा शांत नहीं हुआ, दोनों झगड़ा करते रहे.

रात साढे़ 11 बजे बबली ने कमल को दोबारा फोन कर के घर आने को कहा. जब वह उस के घर पहुंचा तो हरिओम उस से भिड़ गया. इसी दौरान कमल ने गुस्से में हरिओम का सिर दीवार पर दे मारा. नशे के चलते वह कमल का विरोध नहीं कर सका. उस के गिरते ही बबली उस के पैरों पर बैठ गई और कमल ने उस का गला दबा दिया. कुछ देर छटपटाने के बाद हरिओम की मौत हो गई. उस समय दोनों बच्चियां सो रही थीं. कमल और बबली ने शव को ठिकाने लगाने के लिए योजना तैयार कर ली. दोनों ने शव को एक संदूक में बंद कर उसे फेंकने का फैसला कर लिया, ताकि हत्या के सारे सबूत नष्ट हो जाएं.

योजना के तहत दोनों ने हरिओम की लाश एक संदूक में बंद कर दी. रात ढाई बजे कमल टूंडला स्टेशन जाने की बात कह कर आटो ले आया. आटो से दोनों यमुना के जवाहर पुल पर पहुंचे. लाश वाला संदूक उन के साथ था. इन लोगों ने आटो को वहीं छोड़ दिया. सड़क पर सन्नाटा था, कमल और बबली यू टर्न ले कर कानपुर से आगरा की तरफ आने वाले पुल पर पहुंचे और संदूक उठा कर यमुना में फेंक दिया. इस के बाद दोनों अपनेअपने घर चले गए. दूसरे दिन 4 नवंबर को सुबह कमल बबली और उस की दोनों बच्चियों को साथ ले कर दिल्ली भाग गया.

बबली की बेवफाई ने हंसतेखेलते घर को उजाड़ दिया था. उस ने पति के रहते गैरमर्द के साथ रिश्ते बनाए. यह नाजायज रिश्ता उस के लिए इतना अजीज हो गया कि उस ने अपने पति की मौत की साजिश रच डाली. पुलिस 16 नवंबर को ही कमल व बबली को ले कर यमुना किनारे पहुंची. उन की निशानदेही पर पीएसी के गोताखोरों को बुला कर कई घंटे तक यमुना में लाश की तलाश कराई गई, लेकिन लाश नहीं मिली. अंधेरा होने के कारण लाश ढूंढने का कार्य रोकना पड़ा.

रविवार की सुबह पुलिस ने गोताखोरों और स्टीमर की मदद से लाश को तलाशने की कोशिश की. लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला. बहरहाल, पुलिस हरिओम का शव बरामद नहीं कर सकी. शायद बह कर आगे निकल गया होगा. पुलिस ने बबली और उस के प्रेमी कमल को न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. Family Crime

Hindi Stories: अंजानों पर विश्वास का नतीजा

Hindi Stories: संजय गुप्ता सोनू की फितरत समझ नहीं पाए और उस पर विश्वास कर के उस का पुलिस वेरीफिकेशन भी नहीं कराया. शातिर सोनू ने इसी का फायदा उठा कर ऐसा क्या कर डाला कि अब संजय गुप्ता को पछतावा हो रहा है.

उत्तर प्रदेश का नोएडा शहर देश की राजधानी दिल्ली की सीमा से सटे तेजी से विकसित व्यावसायिक नगर के रूप में जाना जाता है. यह शहर एशिया के बड़े औद्योगिक उपनगरों में से एक है. यहां की अधिकांश जमीनों पर बड़ीबड़ी इमारतें बन गईं हैं. विकास की पगडंडियों के बीच यहां रहने वालों की अपनीअपनी जिंदगियां हैं. सेक्टर-41 की कोठी नंबर बी-169 में रहने वाले संजय गुप्ता की पत्नी श्रीमती राखी गुप्ता अच्छी चित्रकार थीं. उन्होंने सैंकड़ों पेंटिंगें बनाई थीं. यह उन का पेशा नहीं, बल्कि शौक था, जिसे पूरा करने के लिए वह कैनवास पर जिंदगी के रंगों को अक्सर उकेरा करती थीं. अभिव्यक्ति के अपने मायने होते हैं, उसे प्रदर्शित करने का सभी का अपना अलगअलग अंदाज होता है.

उस दिन भी सफेद कैनवास पर अपनी अंगुलियों से ब्रश के जरिए जो चित्र उन्होंने उकेरा था, वह एक खुशहाल परिवार का था, जिस में पतिपत्नी और उन के 2 बच्चे प्रसन्न मुद्रा में नजर आ रहे थे. सभी की बांहें एकदूसरे के गले में थीं. ब्रश को किनारे रख कर राखी पेंटिंग को निहारने लगीं. काफी देर तक अपलक निहारने के बाद उन की आंखों में अचानक आंसू छलक आए. आंसुओं ने लुढ़क कर अपना सफर शुरू किया तो राखी ने साड़ी के पल्लू से उन के वजूद को मिटाने की कोशिश की. सोफे पर बैठे संजय की नजर पत्नी पर गई तो नजदीक जा कर उन के कंधे पर हाथ रख कर बोले, ‘‘तुम बारबार परेशान क्यों हो जाती हो?’’

‘‘मेरा दुख तुम जानते हो, फिर भी…’’

‘‘हम कोशिश तो कर रहे हैं. इस तरह हिम्मत नहीं हारते, एक दिन हमारा बेटा अवश्य ठीक हो जाएगा.’’

‘‘पता नहीं कैसा संयोग है. मेरा फूल सा बेटा बिस्तर पर पड़ा है. इंजीनियर बनना था, कितने सपने थे हमारे. काश, इस की जगह मेरी यह हालत हो जाती.’’

‘‘मैं तुम्हारा दर्द समझता हूं राखी. लेकिन इस तरह परेशान होने से भी तो काम नहीं चलेगा.’’ संजय ने कहा.

‘‘फिर भी मैं ने कभी नहीं सोचा था कि हमारा होनहार बेटा इस हाल में होगा. मैं मां हूं, इस का दर्द महसूस करती हूं. वह सब जानतासमझता है, लेकिन अपनी वेदना व्यक्त करने में नाकाम है. जब उस की आंखों में छटपटाती बेबसी देखती हूं तो तड़प कर रह जाती हूं. हर पल इसी के बारे में सोचती रहती हूं. मुझे जिंदगी में कुछ नहीं चाहिए, बस मेरा बेटा ठीक हो जाए.’’ कहने के साथ ही राखी फफक कर रो पड़ीं.

‘‘भरोसा रखो, एक दिन सब ठीक हो जाएगा.’’ संजय ने प्यार से समझाया तो राखी ने हर बार की तरह उस दिन भी सुखद उम्मीदों के साथ अपने दिल को समझाने की नाकाम कोशिश की.

यह एक कड़वी हकीकत है कि जिंदगी कई बार इंसान के साथ बहुत सख्ती से पेश आती है. बेबसी तब तूफान की तरह और भी बढ़ जाती है, जब उसे संभालने की सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं. इस दर्द को वह शख्स बखूबी महसूस कर सकता है, जो इस से रूबरू हुआ हो. संजय गुप्ता और उन की पत्नी भी पलपल ऐसी पीड़ा से गुजर रहे थे, जहां उन की कोशिशों को ग्रहण सा लग गया था. संजय गुप्ता रियल एस्टेट कारोबार से जुड़े थे. वह मूलरूप से उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के रहने वाले थे, लेकिन वर्षों पहले वह वहां से चले आए थे. वह अहमदाबाद में इंडियन स्पेस रिसर्च और्गेनाइजेशन (इसरो) में वैज्ञानिक थे, परंतु कई सालों पहले नौकरी छोड़ कर वह नोएडा में प्रौपर्टी का काम करने लगे थे.

बच्चों को उन्होंने शुरू से ही साथ रखा था. उन के परिवार में पत्नी राखी के अलावा 2 बच्चे थे, जिन में बड़ा बेटा जितार्थ और उस से छोटी बेटी स्मिति. दोनों ही बच्चे पढ़ने में होनहार थे. स्मिति दिल्ली के एक फैशन इंस्टीट्यूट में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही थी, जबकि जितार्थ मणिपाल यूनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था. संजय के पास किसी चीज की कमी नहीं थी. एक साल पहले तक उन की जिंदगी बहुत खुशहाल थी. किसी की हंसतीखेलती जिंदगी में कब गमों का दरिया बहने लगे, इस बात को कोई नहीं जानता.

3 मार्च, 2013 को गुप्ता परिवार में भी ऐसा ही एक दरिया बह निकला. संजय को सूचना मिली कि उन का बेटा गोवा में एक रोड ऐक्सीडेंट का शिकार हो गया है. संजय वहां पहुंचे. जितार्थ को बे्रन हेमरेज हुआ था. लंबे उपचार के बाद वह हेमरेज से उबरा जरूर, लेकिन उस के चलनेफिरने, बोलने की शक्ति जाती रही.  जितार्थ स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया. वह कब तक ऐसा ही रहेगा, इस का जवाब किसी के पास नहीं था. संजय और उन की पत्नी पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. संजय बेटे को नोएडा ले आए और बेहतर से बेहतर इलाज कराया. लेकिन उस की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

लिहाजा डाक्टरों की सलाह पर वह उसे घर ले आए. घर के एक कमरे में उस के लिए बैड लगवा दिया गया. वह कोमा जैसी स्थिति में था. सभी दैनिक क्रियाएं वह बिस्तर पर ही करता था. बेटे को ले कर संजय भी परेशान थे और राखी भी. बेटा स्थाई रूप से बिस्तर पर पड़ गया था. उस की देखभाल जरूरी थी, इसलिए संजय ने अक्टूबर, 2014 में उस के लिए नर्सिंग का काम जानने वाले 2 अटेंडैंट रख लिए, क्योंकि 24 घंटे किसी एक अटेंडैंट को घर पर रखा नहीं जा सकता था. दोनों अटेंडैंट की ड्यूटी 12-12 घंटे की हुआ करती थी. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक अटेंडैंट सोनू जितार्थ की देखभाल करता था तो रात 9 बजे से सुबह 9 बजे तक रहता दूसरा लड़का था. सोनू ने खुद को बदायूं का रहने वाला बताया था. नोएडा में वह मोरना में कहीं किराए पर रहता था.

संजय के पास दौलतशोहरत सब कुछ था, लेकिन बेटे के लिए वह कुछ नहीं कर पा रहे थे. बेटे को ले कर राखी अक्सर परेशान हो जाती थीं. उस दिन भी वह चित्रकारी करतेकरते बेटे के बारे में सोच कर रोने लगी थीं. संजय ने किसी तरह समझा कर उन्हें चुप कराया था. उन का परिवार जिस कोठी में रह रहा था, वह सीमा खन्ना की थी. सीमा खन्ना ग्राउंड फ्लोर पर रहती थीं, जबकि संजय का परिवार पहली मंजिल पर किराए पर रहता था.

बेटे की वजह से राखी पूरे वक्त घर पर ही रहती थीं. वह संवेदनशील महिला थीं. खाली वक्त में वह ऐसे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दिया करती थीं, जो पैसे दे कर ट्यूशन नहीं पढ़ सकते थे. ये बच्चे 3 से साढ़े 3 बजे के बीच राखी के यहां आते थे. राखी का सोचना था कि शिक्षा जीवन का प्राथमिक आधार है, इसलिए सभी को शिक्षित होना चाहिए. राखी गरीबों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं. मेल नर्स सोनू के आने के बाद संजय सुबह अपने औफिस चले जाते थे. बेटी स्मिति कालेज चली जाती थी. सुबह घर में एक नौकरानी सुनीता काम करने आती थी. 12 बजे तक वह भी चली जाती थी.

इस के बाद घर में राखी गुप्ता, मेल अटेंडैंट सोनू और बेटा जितार्थ ही रह जाते थे. रोज की लगभग यही दिनचर्या थी. किसी शहर के विकास के बीच अपराध की भी अपनी एक चाल होती है. आम दिनों की भांति 6 अप्रैल, 2015 को भी सेक्टर-41 शांत था. लोगों की आवाजाही और उन के काम जारी थे. राजेंद्र प्रसाद के 2 बच्चे राखी के यहां ट्यूशन पढ़ने आते थे. लगभग 3 बजे बच्चे कोठी की पहली मंजिल पर पहुंचे तो दरवाजा खुला हुआ था. वे रोज आते थे, इसलिए उन्हें लगा कि राखी मैडम दरवाजा बंद करना भूल गई होंगी.

वे अंदर दाखिल हुए तो वहां का नजारा देख कर बुरी तरह डर गए. वे उलटे पांव सीधे अपने घर पहुंचे और उन्होंने वहां जो देखा था, पिता राजेंद्र प्रसाद को बताया. बच्चों की बात से वह हैरान रह गए. राजेंद्र तुरंत संजय के घर पहुंचे और पूरी बात मकान मालकिन सीमा खन्ना और आसपास के लोगों को बताई. आपस में विचारविमर्श कर के कुछ लोग हिम्मत कर के पहली मंजिल पर पहुंचे तो वहां की हालत देख कर उन के पैरों तले से जमीन खिसक गई. 45 वर्षीया राखी गुप्ता खून से लथपथ फर्श पर पड़ी थीं. उन के आसपास खून ही खून फैला था. किसी ने उन की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. उन का बीमार बेटा जितार्थ भी नीचे पड़ा था. लेकिन वह ठीक था.

सीमा खन्ना ने तुरंत इस मामले की खबर संजय गुप्ता को दी तो वह कुछ ही देर में घर आ गए. राखी की मौत हो चुकी थी. किसी ने उन की गर्दन और शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीली चीज से प्रहार किए थे. जितार्थ चूंकि बिस्तर से गिर गया था, इसलिए वह दर्द से छटपटा रहा था. उस के सिर में चोट लगी थी. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. इस बीच पुलिस को भी घटना की सूचना दे दी गई थी. सूचना पा कर कोतवाली सेक्टर-39 के थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान तुरंत पुलिस बल के साथ मौके पर आ पहुंचे. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने इस की सूचना अपने आला अधिकारियों को दे दी. सूचना पा कर एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह और एएसपी विजय ढुल भी मौके पर आ पहुंचे थे.

पुलिस ने मौकामुआयना किया तो हत्या की वजह समझ में नहीं आई. लेकिन यह जरूर लगा कि कातिल का मकसद सिर्फ राखी की हत्या करना नहीं था. क्योंकि थोड़ी नकदी और राखी का मोबाइल गायब था लेकिन घर में रखे अन्य लाखों रुपए बच गए थे. हालांकि जिस लौकर में नकदी रखी थी, उसे तोड़ने की कोशिश जरूर की गई थी. राखी पर किसी नुकीली चीज से प्रहार किए गए थे, लेकिन हत्या में प्रयुक्त वह नुकीली चीज मौके से बरामद नहीं हुई थी. पुलिस ने डौग स्क्वायड और फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट की टीम को मौके पर बुलवा लिया था. चौंकाने वाली बात यह थी कि मेल अटेंडैंट सोनू लापता था, जबकि उस समय उसे ड्यूटी पर होना चाहिए था.

पुलिस ने निरीक्षण के बाद पूछताछ शुरू की, ‘‘सब से पहले इस घटना की जानकारी किसे हुई?’’

‘‘मुझे साहब.’’ राजेंद्र प्रसाद ने आगे बढ़ कर कहा.

‘‘कैसे?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में राजेंद्र प्रसाद ने अपने बच्चों के वहां ट्यूशन पढ़ने आने की बात बता दी.

पुलिस ने संजय गुप्ता से भी पूछताछ की. इस पूछताछ में उन्होंने किसी से भी अपनी दुश्मनी होने से इनकार कर दिया. जितार्थ घटना का चश्मदीद तो था, लेकिन वह कुछ भी बताने लायक नहीं था. हैरानी की बात यह थी कि पड़ोस में भी किसी को घटना के बारे में कुछ पता नहीं चला था. वैसे भी आजकल शहरी जीवनशैली में लोगों की दुनिया अपने तक ही सिमट गई है. संजय गुप्ता के सेक्टर-2 स्थित अपने औफिस चले जाने के बाद घर में कुल 3 लोग ही रह जाते थे. एक राखी गुप्ता, दूसरा उन का 22 वर्षीया बेटा जितार्थ और तीसरा 25 वर्षीय अटेंडैंट सोनू. मकान के जिस हिस्से में संजय गुप्ता का परिवार रहता था, उस में मुख्य दरवाजे पर जाली वाला दरवाजा भी लगा हुआ था.

जाहिर है, अंजान आदमी के लिए दरवाजा नहीं खोला जा सकता था. पुलिस ने सोनू के मोबाइल पर फोन किया तो वह बंद था. इस से उस पर शक हुआ. जबकि संजय यह मानने को तैयार नहीं थे कि सोनू इस तरह हत्या कर सकता है. हत्या के बाद जिस तरह वह गायब था, उसी से संदेह हो रहा था. मकान मालकिन सीमा खन्ना ने पुलिस को बताया कि उन्होंने सोनू को चुपचाप जाते देखा था. उस की तलाश में एक पुलिस टीम मोरना भेजी गई तो उस के मकान मालिक ने बताया कि 1 अप्रैल को वह उन का घर छोड़ कर चला गया था. सवाल यह था कि अगर सोनू ने राखी की हत्या की थी तो इस की वजह क्या थी?

इस बीच पुलिस ने राखी गुप्ता के शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया और संजय गुप्ता की तहरीर पर सोनू के खिलाफ राखी की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दिनदहाड़े हुई हत्या की इस घटना से समूचे इलाके में हड़कंप मच गया था. लोग पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाने लगे थे. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में राखी के शरीर पर नुकीली चीज के 8 घाव पाए गए थे. ये घाव उन के गले, हाथ और कंधे पर थे. ये संभवत: किसी सर्जिकल चीज के थे. मैडिकल ट्रीटमेंट के कुछ सामान जितार्थ के कमरे में रहते थे. हाथों पर घाव पाए जाने से एक बात साफ थी कि राखी ने मरने से पहले संघर्ष किया था. दूसरी ओर गिरने की वजह से जितार्थ के सिर में चोट आई थी. डाक्टरों ने उस का सीटी स्कैन कराया. वह नौर्मल था.

पुलिस का सोनू तक पहुंचना जरूरी था. हैरानी की बात यह थी कि सोनू का कोई स्थाई पता या फोटो गुप्ता परिवार के पास नहीं था. संजय ने पुलिस को बताया कि सोनू का फोटो राखी के मोबाइल में था, जबकि उन के मोबाइल को वह साथ ले गया था. घटना क्यों और कैसे घटी, सोनू ही इस से परदा उठा सकता था. एसएसपी ने एएसपी विजय ढुल के निर्देशन में मामले के खुलासे के लिए 3 पुलिस टीमों को गठन किया. पुलिस ने सोनू के मोबाइल की काल डिटेल्स व लोकेशन निकलवाई. उस की आखिरी लोकेशन सेक्टर-39 की मिली थी. इस के बाद उस का मोबाइल बंद हो गया था.

पुलिस ने सोनू के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटानी शुरू की. पता चला कि संजय ने सोनू को अपने यहां इस के पहले काम करने वाले राजकुमार के माध्यम से नौकरी पर रखा था. पुलिस राजकुमार तक पहुंच गई. राजकुमार से पता चला कि सोनू पहले नोएडा के सेक्टर-40 स्थित एक अस्पताल में 2 साल और एक डाक्टर दंपत्ति के घर करीब एक साल तक काम कर चुका था. उसी बीच उस की उस से मुलाकात हुई थी. इस से ज्यादा उस के बारे में वह भी कुछ नहीं जानता था.

पुलिस ने उस की बताई दोनों जगहों पर जा कर पूछताछ की तो पता चला कि सोनू झगड़ालू स्वभाव का था. एक बार उस ने एक नर्स को जान से मारने की धमकी भी दी थी. हैरानी की बात यह थी कि दोनों ही जगहों पर सोनू का फोटो और पता नहीं मिल सका. इन सभी जगहों पर उसे सोनू शेख या सोनू राघव के नाम से जाना जाता था. यही उस का असली नाम था, यह भी किसी को पता नहीं था. घटना को घटे 2 दिन बीत गए, लेकिन संदिग्ध हत्यारे का कोई सुराग नहीं लग सका. पुलिस ने सोनू के फोटो की तलाश के लिए सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का भी सहारा लिया. जिस मोबाइल नंबर का इस्तेमाल सोनू करता था, वह फर्जी आईडी पर लिया गया था. इस से उस का पता मिलने की संभावना भी खत्म हो चुकी थी.

सोनू की जो काल डिटेल्स मिली थी, उस में एक नंबर पर उस की सब से ज्यादा बातें हुई थीं. पुलिस ने उस नंबर पर बात की तो वह नंबर कर्नाटक की एक युवती रीतू (परिवर्तित नाम) का था. उस युवती ने बताया कि 2 महीने पहले मिसकाल के जरिए सोनू उस के संपर्क में आया था, तभी से उस से बातें होने लगी थीं. उस के बारे में वह ज्यादा कुछ नहीं जानती. युवती को उस ने अपना नाम सोनू शर्मा बताया था. इलेक्ट्रौनिक सर्विलांस से पुलिस को पता चला कि सोनू ने अपने मोबाइल में नए नंबर का सिम डाल लिया है. उस नंबर की लोकेशन के अनुसार, सोनू नोएडा से दिल्ली होते हुए पश्चिमी बंगाल चला गया था. उस की लोकेशन पुलिस को वहां के मुर्शिदाबाद जिले की मिल रही थी.

उस नंबर से उस ने दिल्ली के एक नंबर पर बात की थी. पुलिस उस नंबर तक पहुंची तो वह नंबर उस की मौसी का निकला. उस से पता चला कि सोनू की मां दिल्ली में ही रहती थी, लेकिन उस ने दूसरा विवाह कर लिया था, इसलिए उस का अपने परिवार से अब कोई ताल्लुक नहीं था. वह लोगों के घरों में साफसफाई का काम करती थी. उस से पुलिस को सोनू के घर का पता मिल गया. वह पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद का रहने वाला था. डीआईजी रमित शर्मा पूरे मामले पर नजर रखे हुए थे. एसएसपी डा. प्रीतिंदर सिंह से उन्होंने केस की प्रगति की पूरी जानकारी ली और एक पुलिस टीम पश्चिम बंगाल रवाना करने के आदेश दिए.

एसएसपी ने थानाप्रभारी धर्मेंद्र चौहान के नेतृत्व में 9 अप्रैल को एक पुलिस टीम वहां के लिए रवाना कर दी. इस पुलिस टीम में सबइंसपेक्टर पतनीश यादव, आलोक सिंह और कांस्टेबल अशोक यादव आदि शामिल थे. अगले दिन पुलिस मुर्शिदाबाद स्थित सोनू के घर पहुंची तो वह घर पर ही मिल गया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया और अपने साथ नोएडा ले आई. पुलिस के लिए यकीनन यह बड़ी सफलता थी. नोएडा ला कर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो राखी की हत्या की जो कहानी निकल कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

सोनू मूलरूप से पश्चिम बंगाल के जिला मुर्शिदाबाद निवासी जिल्ले का बेटा था. जिल्ले मेहनतमजदूरी किया करता था. कई सालों पहले सोनू नौकरी की तलाश में दिल्ली चला आया. कुछ दिन दिल्ली में रहने के बाद वह नोएडा आ गया और छोटेमोटे काम करने लगा. इस के बाद वह एक अस्पताल में वार्डबौय का काम करने लगा. समय के साथ वह काम सीख गया. कुछ अस्पतालों में नौकरी करने के बाद उस ने एक डाक्टर दंपत्ति के यहां भी नौकरी की. सोनू शातिर दिमाग युवक था. वह मुसलमान था, लेकिन किसी को वह अपना नाम सोनू शर्मा तो किसी को सोनू शेख तो किसी को सोनू राघव बताता था.

अपना असली नामपता वह किसी को नहीं बताता था. इस के पीछे वजह यह थी कि वह रातोरात अमीर बनने के सपने देखा करता था और किसी अच्छे मौके की तलाश में था. वह नोएडा में ही किराए का कमरा ले कर रहता था. सन 2015 में गुप्ता परिवार को जितार्थ के लिए मेल अटेंडैंट की जरूरत पड़ी तो राजकुमार ने सोनू के बारे में बताया. उन्होंने बेटे की देखभाल के लिए सोनू से बात की तो वह तैयार हो गया. इस के बाद वह उन के घर आने लगा. गुप्ता परिवार सोनू को परिवार के सदस्य की तरह मानता था. उसे 9 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन पर रखा गया था, लेकिन 2 महीने में ही संजय ने उस की तनख्वाह बढ़ा कर 11 हजार रुपए कर दी थी.

सोनू होशियार तो था ही. वह जानता था कि सब से पहले हर किसी का विश्वास जीतना चाहिए. इसलिए उस ने बातों और काम से पूरे परिवार का विश्वास जीत लिया. वह ड्यूटी के समय जितार्थ के पास ही रहता था. इस बीच या तो टीवी वह देखता था या राखी से बातें कर लिया करता था. शुरू में तो सोनू मन लगा कर काम करता रहा. लेकिन झूठ और दिखावे की चमक बहुत लंबे समय तक बरकरार नहीं रहती. समय के साथ राखी की समझ में आने लगा कि वह दिखावा ज्यादा करता है, काम कम. संजय सोनू को 11 हजार रुपए अपने बेटे की पूरी तरह से देखभाल के लिए दे रहे थे. धीरेधीरे सोनू देखभाल में लापरवाही करने लगा. इस की भी एक वजह थी. दरअसल सोनू इस काम से परेशान हो गया था. वह अमीर बनने के सपने देखता था, लेकिन सपने पूरे होने की उसे कोई राह नहीं दिख रही थी.

3 महीने पहले सोनू का संपर्क मोबाइल के जरिए गलत नंबर लग जाने से कोलकाता की रहने वाली रीतू से हो गया, जो कर्नाटक में रहती थी. वह उस से बातें करने लगा. वह उस से आधाआधा घंटे मोबाइल पर बातें करता रहता. राखी को उस की यह लापरवाही बहुत अखरती थी. शुरूशुरू में तो उन्होंने उसे कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरेधीरे उन्होंने सोनू को टोकना शुरू कर दिया. उस का किसी ने पुलिस वेरीफिकेशन नहीं कराया था. संजय गुप्ता ने भी यही गलती की. इस बात से सोनू खुश था.

सोनू की लापरवाही से बेटे की जान भी जा सकती थी. एक दिन राखी ने लापरवाही पर सोनू को न सिर्फ जम कर फटकरा, बल्कि उसे थप्पड़ भी मार दिया. सोनू ने आगे से लापरवाही न करने का वादा किया. वह कभी धोखा दे कर भाग न जाए, इस के लिए राखी ने अपने मोबाइल में उस का फोटो खींच लिया. कुछ समय बाद राखी ने महसूस किया कि सोनू लापरवाही के मामले में बदला नहीं है. जब देखो तब वह मोबाइल पर बातें करने में लगा रहता है. जितार्थ को प्रतिदिन दवाइयां व इंजेक्शन देने होते थे. सोनू इस में भी लापरवाही करने लगा था. सोनू की इस लापरवाही पर राखी उसे खरीखोटी सुना कर थप्पड़ जड़ दिया करती थीं. इस पर सोनू खून का घूंट पी कर रह जाता था.

वक्त के साथ सोनू को राखी का डांटना अखरने लगा. थप्पड़ को ले कर उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सोनू शातिर तो था ही, वह राखी को सबक सिखाने के बारे में सोचने लगा. मन ही मन उस ने सोच लिया कि एक दिन वह राखी के घर को लूट लेगा. इस से उस के थप्पड़ का बदला भी पूरा हो जाएगा और वह मालामाल भी हो जाएगा. सोनू को इस बात का डर नहीं था कि वह पकड़ा जाएगा, क्योंकि उस का रिकौर्ड किसी के पास नहीं था. उस ने अपने मन के गुस्से को जाहिर नहीं होने दिया और आराम से रहता रहा. सोनू का जितार्थ की देखभाल से मन उचट गया था.

वह काम में लापरवाही करने के साथ ही रीतू से मोबाइल पर बातें भी किया करता था. इस पर राखी की सोनू से अकसर नोंकझोंक हो जाया करती थी. सोनू ने लूटने की योजना मन ही मन बना ली थी. इसलिए 1 अप्रैल को उस ने किराए का मकान भी खाली कर दिया. इस के बाद वह उचित मौके की तलाश में रहने लगा. 6 अप्रैल को भी सोनू ने लापरवाही की और मोबाइल पर बातें करने के चक्कर में जितार्थ के गले में कफ निकालने के लिए लगने वाली नली ठीक से नहीं लगाई. इसी बीच राखी कमरे में आ गईं. यह देख कर वह भड़क गईं, ‘‘तुम से कोई भी काम ठीक से नहीं किया जाता?’’

‘‘सौरी मैडम वह…’’ सोनू अपनी बात कह पाता, उस से पहले ही राखी ने उस के गाल पर तमाचा रसीद कर दिया. सोनू पहले ही खार खाए बैठा था. उस दिन वह आगबबूला हो उठा. उस का खून खौल गया. उस ने गालियां देते हुए राखी का हाथ झटक दिया, ‘‘तुम्हारे हाथ बहुत चलते हैं, आज मैं सब से पहले इन का चलना बंद किए देता हूं.’’

कह कर सोनू ने जितार्थ की दवाइयों की ट्रे में रखा सर्जिकल चाकू उठा लिया और राखी की गर्दन पर वार कर दिया. इस अप्रत्याशित हमले से राखी तड़प उठीं. उन्होंने विरोध किया, लेकिन सोनू नौजवान था. उस ने एक के बाद एक राखी पर कई वार कर दिए. राखी नीचे गिर कर तड़पने लगीं. जितार्थ यह सब देख रहा था. वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता था, लेकिन अंदर ही अंदर घुट रहा था. मां को बचाने के लिए उस ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी तो हिलने डुलने से बिस्तर से नीचे गिर गया. सोनू ने इस की परवाह नहीं की. राखी के बचने की कोई गुंजाइश न रहे, उस ने और कई वार कर दिए. राखी की मौत हो गई.

इस के बाद सोनू ने राखी का मोबाइल, घड़ी, डीवीडी व सेफ में रखे करीब 10 हजार रुपए उठा कर एक बैग में रख लिए. सोनू जानता था कि राखी के मोबाइल में उस का फोटो है, इसलिए उस ने उसे भी ले लिया था. उस ने हत्या में प्रयुक्त चाकू भी अपने पास रख लिया. हत्या के दौरान उस की कमीज पर थोड़ा खून लग गया था. लगभग साढ़े 12 बजे वह वहां से चला गया. उस ने अपना मोबाइल बंद कर दिया और चालू किया तो नया सिमकार्ड उस में डाल लिया. उस रात वह अपने दोस्त के घर रुका. इस से पहले उस ने सर्जिकल चाकू और कमीज को सेक्टर-41 में एक स्थान पर छिपा दिया था.

अगले दिन वह दिल्ली पहुंचा और कालका मेल से कोलकाता होते हुए मुर्शिदाबाद स्थित अपने घर चला गया. सोनू ने सोचा था कि उस का असली नामपता चूंकि किसी के पास नहीं है, इसलिए पुलिस पश्चिम बंगाल तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. वह आराम से रह रहा था कि इसी बीच वह पुलिस की गिरफ्त में आ गया. पुलिस ने उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू और खून से सनी कमीज बरामद कर ली थी. पूछताछ और जरूरी कागजी काररवाई कर के पुलिस ने उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गुप्ता परिवार ने सोनू की फितरत को समझने की भूल कर दी. उस का पुलिस वैरीफिकेशन न करा कर भी उन्होंने भूल की. सोनू जैसे लोगों पर विश्वास और गुस्सा दोनों ही खतरनाक साबित हुए. कथा लिखे जाने तक सोनू जेल में था. 28 मई को पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया था. Hindi Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story: पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या

Crime Story: इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना ने अपने भांजे राजीव सक्सेना की पढ़ाईलिखाई से ले कर हर तरह से मदद की थी. एक दिन इसी भांजे ने आस्तीन का सांप बन कर उन्हें ऐसा डंसा कि उन की दुनिया ही उजड़ गई…

मुरादाबाद के एसएसपी कार्यालय में तैनात इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना 11 अगस्त को अपनी ड्यूटी खत्म कर के शाम करीब साढ़े 4 बजे घर पहुंचे तो उन्हें मेन गेट खुला मिला. इस तरह गेट खुला देख कर वह थोड़े चौंके, क्योंकि उन की पत्नी सरोज अकसर ही गेट बंद रखती थी. उन का घर सिविल लाइंस क्षेत्र के चंद्रनगर कालोनी में था. जैसे ही वह घर में घुसे, उन्हें रूम का दरवाजा भी खुला दिखा. अंदर से टीवी चलने की तेज आवाज भी आ रही थी.

उन्होंने पत्नी को आवाज लगाई. 4 साल पहले उन्हें पैरालाइसिस हुआ था, जिस की वजह से वह ठीक से चल नहीं पाते थे. इसलिए घर के अंदर से जब कोई जवाब नहीं आया तो वह ड्राइंगरूम में जा कर कुरसी पर बैठ गए और अपने जूते उतारे. उन्होंने सोचा कि सरोज शायद पास की दुकान से कोई सामान वगैरह लेने गई होगी, तभी तो टीवी भी चालू छोड़ गई है. वह कुरसी पर बैठे हुए पत्नी के लौटने का इंतजार करने लगे. कुछ देर इंतजार करने के बावजूद भी जब पत्नी नहीं आई तो वह धीरेधीरे बेड की तरफ बढ़े तो उन्हें पत्नी फर्श पर अस्तव्यस्त हालात में औंधे मुंह पड़ी दिखी.

वह इस हालत में क्यों पड़ी है, सोचते हुए उन्होंने आवाज देते हुए उसे हिलायाडुलाया. उस का बेजान शरीर देख कर उन की चीख निकल गई. वह मृत अवस्था में थीं. रामबाबू सक्सेना रोतेचीखते हएु बाहर सड़क पर आ गए और लोगों को पत्नी की हत्या हो जाने की खबर दी. उन के चिल्लाने की आवाज सुन कर आसपास के लोग उन के घर में आ गए. उन की पत्नी की हत्या की बात सुन कर लोग चौंके. उन्हें इस बात का ताज्जुब हो रहा था कि एक पुलिस अधिकारी के यहां यह वारदात करने की हिम्मत किस ने की? उन में से किसी ने पुलिस को फोन कर के इंसपेक्टर रामबाबू की पत्नी की हत्या की खबर दे दी. थाना सिविल लाइंस वहां से कुछ ही दूरी पर था, इसलिए कुछ ही देर में थानाप्रभारी ब्रह्मपाल व चौकीइंचार्ज धीरज सिंह मौके पर पहुंच गए.

मामला एक पुलिस अधिकारी की पत्नी की हत्या का था, इसलिए थानाप्रभारी ने इस की सूचना विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी. मामला विभाग के ही एक पुलिस इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था और वह इंसपेक्टर भी एसएसपी कार्यालय में तैनात थे, इसलिए 15-20 मिनट के अंदर ही डीआईजी ओमकार सिंह, एसएसपी लव कुमार, एसपी सिटी डा. रामसुरेश यादव, सीओ सिविल लाइंस महेश कुमार भी मौके पर पहुंच गए. मौके पर खोजी कुत्ता और विधि विज्ञान प्रयोगशाला के डा. अरुण कुमार को भी घटनास्थल पर बुला लिया गया, ताकि वहां से कुछ सबूत जुटाए जा सकें.

खोजी कुत्ता सरोज के शव को सूंघने के बाद घर के बाहर सड़क पर पहुंच कर भौंकने लगा. इस से पुलिस को कोई खास मदद नहीं मिली. डा. अरुण कुमार ने भी मौके का बारीकी से निरीक्षण किया. उन का काम निपट जाने के बाद पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतका सरोज के बाएं हाथ की मुट्ठी में बालों का गुच्छा मिला. लाश के पास बैंगनी रंग का एक बटन भी पड़ा था. इस से साफ पता चल रहा था कि मृतका की हत्यारे से हाथापाई हुई थी. सरोज ने अपना बचाव करते हुए हत्यारे के बाल पकड़ लिए होंगे. उसी दौरान उस की शर्ट का भी बटन टूट गया होगा.

डबल बैड के गद्दे भी इस तरह से उलटेपलटे पड़े थे, जैसे किसी ने उन के नीचे कुछ ढूंढने की कोशिश की थी. बेडरूम में जो सेफ रखी थी, उस के हैंडल भी मुड़े हुए थे. उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें तोड़ने के लिए उन पर किसी भारी चीज से वार किया गया था, लेकिन हैंडल टूटे नहीं थे. हैंडल न टूटने की वजह से अलमारी में रखा कीमती सामान सुरक्षित था. इस से लग रहा था कि हत्या केवल लूटपाट के लिए ही की गई थी. ड्राइंगरूम में जो मेज रखी थी, उस पर 2 गिलास रखे थे. उन से एक गिलास में कुछ पानी भी था. किचन में गैस चूल्हे पर सौस पैन में 2 कप पानी चढ़ा हुआ था. वहीं स्लैब पर 2 खाली कप, अदरक, चायपत्ती भी रखी थी. लेकिन गैस बंद थी. वह शायद 2 कप चाय बनाने की तैयारी कर रही थी.

चाय के पानी की मात्रा और ड्राइंगरूम में रखे पानी के गिलासों से यही अनुमान लगाया गया कि हत्यारों की संख्या एक या 2 रही होगी और वह इन के परिचित होंगे, क्योंकि मृतका ने उन्हें पानी पिलाया था और उन्हीं के लिए चाय बनाने के लिए किचन में गई थी. मृतका के गले पर मिले निशानों से लग रहा था कि उस की हत्या गला घोंट कर की गई थी.

मौके की छानबीन करने के बाद एसएसपी ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से ही पूछा कि उन की किसी से कोई रंजिश वगैरह तो नहीं है.

‘‘सर मेरी किसी से कोई दुश्मनी नहीं है. मैं सुबह पत्नी को घर पर ठीकठाक छोड़ कर गया था. चूंकि पैरालाइसिस की वजह से मैं अपने काम ठीक से नहीं कर पाता, इसलिए उन्होंने ही मुझे खाना खिलाया, अपने हाथ से कपड़े और जूते पहनाए. फिर मुझे सहारा दे कर औफिस के लिए एक रिक्शे पर बैठाया. मेन गेट को वह हमेशा बंद रखती थीं, जब कोई कालबेल बजाता था तो गेट खोलने से पहले वह देख लेती थीं. अपरिचित के लिए वह गेट नहीं खोलती थीं.’’ कहतेकते इंसपेक्टर रामबाबू सुबकने लगे. एसएसपी ने उन्हें ढांढस बंधाया और भरोसा दिया कि वह केस का खुलासा करने में दिनरात एक कर देंगे. जल्द ही हत्यारे भी गिरफ्तार कर लिए जाएंगे. मौके की काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने सरोज सक्सेना की लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

एसएसपी लव कुमार ने तुरंत शहर के तेजतर्रार अधिकारियों की एक मीटिंग बुलाई. मामला उन के ही औफिस के इंसपेक्टर की पत्नी की हत्या का था, इसलिए केस का जल्द से जल्द खुलासा करने के लिए उन्होंने 4 पुलिस टीमों का गठन किया. कई बिंदुओं को ध्यान में रख कर पुलिस टीमें जांच में लग गईं. मौके की जांच करने के बाद यही लग रहा था कि सरोज सक्सेना की हत्या या तो चोरी के इरादे से की गई होगी या फिर किसी दुश्मनी से. लूट की वजह इसलिए लग रही थी कि हत्यारे ने सेफ को खोलने की कोशिश की थी. किंतु इसी बात पर यहीं एक सवाल यह भी उठ रहा था कि मृतका के शरीर पर सोने की ज्वैलरी थी तो हत्यारे वह ज्वैलरी क्यों नहीं ले गए.

चंद्रनगर से सटी हुई भांतू कालोनी है. इस जाति के अनेक लोग लूट की वारदातें करते हैं. यह वारदात कहीं इन्हीं लोगों ने तो नहीं की. यह पता लगाने के लिए इंसपेक्टर ब्रह्मपाल अपनी टीम को ले कर भांतू कालोनी गए और आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को उठा कर थाने ले आए. उन से सख्ती से पूछताछ की, लेकिन सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल सकी. आसपास रहने वाले लोगों से मृतका के बारे में पता किया तो पता चला कि वह अकसर अपना गेट बंद कर के रखती थी. किसी से वह फालतू बात तक नहीं करती थी. पड़ोसियों ने बताया कि घटना वाले दिन उन्हें दोपहर के समय उस समय देखा गया था, जब वह दूधिए से दूध लेने आई थी.

उन के यहां जो दूधिया आता था, वह छजलैट के पास बदावली गांव का रहने वाला था. पुलिस ने उस से भी पूछताछ की, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. मुखबिरों से खबर के बाद पुलिस चंद्रनगर के ही 2 लोगों को पूछताछ के लिए थाने ले आई. पुलिस की इस काररवाई का मोहल्ले के लोगों ने विरोध किया और सैकड़ों लोग उन दोनों युवकों को छोड़ने की मांग करने लगे. लोगों के विरोध को देखते हुए पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया. इस के अलावा पुलिस ने इलाके के अनेक आपराधिक लोगों से भी पूछताछ की, परंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात. नतीजा निकलता न देख नगर पुलिस अधीक्षक डा. रामसुरेश यादव ने सीओ महेश कुमार के साथ विचारविमर्श किया. उन्होंने कहा कि मुझे पूरा शक है कि इस हत्या का कारण पारिवारिक विवाद ही हो सकता है.

एक पुलिस इंसपेक्टर की बीवी का कत्ल बाहरी व्यक्ति भला क्यों करेगा. कोई भी बदमाश यह काम करने से पहले 10 बार सोचेगा. उन्होंने कहा कि हो न हो, इस मामले में इन का कोई न कोई परिचित ही शामिल रहा होगा. पुलिस ने मृतका के फोन की काल डिटेल्स निकाल कर जांच की. लेकिन उस का भी कोई नतीजा नहीं निकला. फिर पुलिस ने 11 अगस्त के उन फोन नंबरों को जांच के दायरे में लिया, जो उस दिन दोपहर ढाई बजे से शाम 4 बजे तक चंद्रनगर इलाके में सक्रिय रहे थे. पता चला कि ढाई सौ फोन उस दौरान उस इलाके में सक्रिय रहे. उन सभी नंबरों की जांच की. लेकिन कोई फायदा नहीं निकला.

पुलिस जिस बिंदु पर जांच कर रही थी, निराशा ही हाथ लग रही थी. इस तरह यह केस पुलिस टीम के लिए एक चुनौती से कम नहीं था. हालांकि यह भी मर्डर का केस था, लेकिन यह केस और केसों की तरह सामान्य नहीं था. क्योंकि यह विभाग के ही एक पुलिस अधिकारी की पत्नी का मामला था. अगले दिन पोस्टमार्टम कराने के बाद लाश रामबाबू को सौंप दी गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि सरोज के गले, कोहनी, होंठ, बाएं हाथ की अंगुली, सीने और गाल पर जख्मों के निशान थे. मौत की वजह सांस नली का दबाव के कारण अवरुद्ध होना बताया गया. नाखूनों में स्किन के टुकड़े भी मिले, जिन्हें डीएनए जांच के लिए भेज दिया.

सरोज सक्सेना की हत्या के बाद से अंतिम संस्कार तक उन के यहां आनेजाने वाले नजदीकियों पर सीओ महेश कुमार नजर रखे हुए थे. उन का अंतिम संस्कार होने के बाद सीओ महेश कुमार ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना से बात कर के यह पता लगाने की कोशिश की कि ऐसा उन का कौन सा रिश्तेदार या नजदीकी है, जो इस दुखद घटना की जानकारी मिलने के बावजूद उन के यहां नहीं आया. तब उन्होंने बताया कि शाहबाद (रामपुर) में रहने वाली उन की बहन का बेटा राजीव सक्सेना उन के पास नहीं आया. वह केवल पोस्टमार्टम हाउस पर कुछ देर के लिए आया था. यहां तक कि वह अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ. जबकि वह शहर के ही मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) में रहता है.

मोहल्ले वालों से भी पुलिस को पता चला कि राजीव सक्सेना अकसर अपने मामा रामबाबू सक्सेना के घर पर ही रहता था. यह जानकारी पुलिस के लिए खास थी कि जब राजीव सक्सेना अपने मामा के यहां रहता था तो मामी की हत्या की खबर मिलने के बाद भी वह और रिश्तेदारों की तरह उन के यहां क्यों नहीं आया. तीजे की रस्म खत्म होने के बाद पुलिस टीम 14 अगस्त, 2015 की शाम को शहर के मोहल्ला कटघर (मेहबुल्लागंज) पहुंच गई. वह वहां पर मिल गया. अपने घर पर पुलिस को देखते ही वह घबरा गया. पुलिस उसे थाने ले आई. थाने में वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष उस से सरोज सक्सेना की हत्या के बारे में सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना अपराध स्वीकार कर लिया. फिर उस ने अपनी मामी सरोज की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

रामबाबू सक्सेना मूलरूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले के सहसवान थाने के अंतर्गत आने वाले छोटे से गांव अकौराबाद के रहने वाले थे. गांव में रहने के बाद भी उन का परिवार सुशिक्षित था. उन के 2 भाई और थे. उन में से एक दिनेश सक्सेना उत्तर प्रदेश पुलिस में इंसपेक्टर हैं, जो आजकल बरेली जिले में तैनात हैं, जबकि दूसरे भाई श्यामबाबू सक्सेना बदायूं के एक ला कालेज में प्रोफेसर हैं. रामबाबू शर्मा भी उत्तर प्रदेश पुलिस में भरती हो गए थे. बाद में प्रमोशन से वह इंसपेक्टर हो गए. इन के परिवार में पत्नी सरोज सक्सेना के अलावा 2 बेटे थे. दोनों बेटों की वह शादी कर चुके हैं. बड़ा बेटा राजीव सक्सेना छत्तीसगढ़ पावर कार्पोरेशन में इंजीनियर है.

वह पत्नी और 2 बच्चों के साथ वहीं रहता है. जबकि छोटा बेटा संदीप सक्सेना बरेली के पास मीरगंज स्थित एक शुगर मिल में इंजीनियर है. वह भी पत्नी व 2 बच्चों के साथ बरेली में रहता है.  पैरालाइसिस हो जाने के बाद से इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना के हाथपैर ठीक से काम नहीं करते थे, इसलिए उन की पत्नी सरोज उन्हें खाना खिलाने, कपड़े पहनाने, नहाने आदि में उन का सहयोग करती थीं. उन्होंने घर के काम करने के लिए नौकरानी रखने की बात कई बार पत्नी से कही, लेकिन सरोज ने मना कर दिया. रामबाबू सक्सेना ने मुरादाबाद के चंद्रनगर कालोनी में एक आलीशान मकान बना रखा था, जहां वह पत्नी के साथ रहते थे. शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने की वजह से उन की तैनाती एसएसपी कार्यालय में कर दी गई थी.

वैसे वह शहर की ही कांशीराम कालोनी में स्थित एक डाक्टर के पास फिजियोथेरैपी के लिए जाते थे, जिस से उन्हें कुछ फायदा भी हो रहा था. राजीव सक्सेना इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना का सगा भांजा था. वैसे वह शाहबाद (रामपुर) का रहने वाला था, लेकिन बचपन से ही वह मुरादाबाद में ही रहा है. यहीं से उस ने अपनी पढ़ाई की थी. उस का रामबाबू सक्सेना से ज्यादा लगाव था. इस की वजह यह थी कि उन्होंने उस की पढ़ाईलिखाई में काफी सहयोग किया था. वह अकसर उन के यहां आताजाता था. सक्षम होने की वजह से रामबाबू कभीकभी राजीव की पैसों से मदद कर दिया करते थे.

पढ़ाई पूरी करने के बाद राजीव सक्सेना एक दवा कंपनी में मैडिकल रिप्रिजेंटेटिव बन गया था. लेकिन करीब 4 साल पहले उस की यह नौकरी छूट गई. जिस से वह परेशान रहने लगा. बेरोजगार होने के बाद राजीव सक्सेना पर करीब 80 हजार रुपए कर्ज हो गया था. कहते हैं कि खाली समय में परेशान इंसान के दिमाग में ऊलजुलूल विचार आते हैं. कुछ लोग उन विचारों को अनुसरण कर लेते हैं, जिस से वही विचार उन के लिए दुखदाई बन जाते हैं. घटना के कुछ दिनों पहले राजीव ने इंसपेक्टर रामबाबू सक्सेना को अपनी परेशानी और कर्ज से लदे होने की पीड़ा बताई थी. उस ने कहा था कि जिन लोगों का कर्ज है, वह उसे परेशान और बेइज्जत करते हैं. उस ने मामा से 50 हजार रुपए मांगे और कहा कि जब नौकरी लग जाएगी तो वह उन के पैसे लौटा देगा.

तब रामबाबू सक्सेना ने उस से कहा, ‘‘राजीव मैं इस बारे में तुम्हारी मामी से बात करूंगा. अगर उस के पास पैसे होंगे तो मैं तुम्हारी मदद कर दूंगा.’’

10 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना पैसे के लिए अपने मामा के घर पहुंचा. उस समय घर पर मामी सरोज ही थी. राजीव ने उन से कहा, ‘‘मामी मेरी मामा से बात हो गई है, आप मुझे 50 हजार रुपए दे दोगी तो बड़ी मेहरबानी होगी.’’

‘‘तेरे मामा ने मुझ से इस बारे में कोई बात नहीं बताई है. मैं उन से पूछ लूं, वह कह देंगे तो मैं पैसे दे दूंगी.’’ सरोज ने कहा.

मामी का जवाब सुन कर राजीव निराश हो कर घर लौट गया. अगले दिन 11 अगस्त, 2015 को राजीव सक्सेना फिर से अपनी मामी के घर यह सोच कर चला गया कि रात को मामी ने मामा से इस बारे में बात कर ली होगी. इस बार भी घर पर सरोज ही मिली. उस ने फिर से अपनी समस्या बताते हुए मामी से 50 हजार रुपए की डिमांड की तो सरोज ने साफ मना करते हुए कहा, ‘‘देखो राजीव, इस समय घर में पैसे नहीं हैं. तेरे मामा के इलाज पर काफी पैसे खर्च हो रहे हैं. सारी तनख्वाह ऐसे ही खर्च हो जाती है. अब उन्हें इलाज के लिए दिल्ली भी ले जाना है. वहां भी पता नहीं कितना खर्च आएगा. अब हमें अपना खर्च चलाना ही मुश्किल हो रहा है.

तुझे मालूम ही है कि तेरे मामा ने बच्चों की पढ़ाईलिखाई और उन की शादी में कितना पैसा खर्च किया था. अपाहिज हो कर भी वह अपनी ड्यूटी कर रहे हैं. जब वह ड्यूटी से वापस आएंगे तो मैं उन से बात करूंगी. जैसा वे कहेंगे कर दूंगी.’’

इस पर राजीव ने कहा कि देखो मामी तुम अलमारी खोल कर मुझे 50 हजार रुपए दे दो. मेरी मामा से बात हो गई है.

बात करतेकरते ही सरोज ने फ्रिज से बोतल निकाल कर राजीव को एक गिलास पानी पीने को दे दिया.

बाद में वह चाय बनाने के लिए किचन में चली गई. उन्होंने सौस पैन में 2 कप पानी भी रख दिया तभी राजीव पीछेपीछे किचन में पहुंच गया. उस ने बिना किसी संकोच के मामी का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मामी, अगर तुम ने आज मुझे पैसे नहीं दिए तो अनर्थ हो जाएगा.’’

राजीव की इस हरकत पर सरोज गुस्से में बोलीं, ‘‘यह क्या बदतमीजी है? क्या अनर्थ हो जाएगा, तू हट्टाकट्टा है. कोई काम क्यों नहीं करता. और तेरी मजाल मेरा हाथ पकड़ने की कैसे हुई? चल पीछे हट. बड़ा आया पैसे लेने वाला.’’

उस समय राजीव के सिर पर खून सवार था. सरोज चाय छोड़ कर ड्राइंगरूम में आ गई. राजीव सरोज पर भूखे भेडि़ए की तरह टूट पड़ा. वह लातघूसों से मामी पर प्रहार करने लगा. अपना बचाव करते हुए वह राजीव को धक्का दे कर अपनी जान बचाने के लिए बैडरूम की तरफ भागी कि वहां जा कर वह बैडरूम बंद कर लेगी. राजीव नीचे गिर चुका था. वह खुद को संभालते हुए उठ खड़ा हुआ. तब सरोज ने घर में रखी टौर्च से उस पर किया था. इस के बाद सरोज तुरंत बैडरूम का दरवाजा बंद करने लगी, लेकिन बैडरूम के दरवाजे में रस्सी बंधी हुई थी, जिस से दरवाजा बंद नहीं हो सका.

इतनी देर में राजीव भी बैडरूम में पहुंच गया. वह फिर से मामी से गुत्थमगुत्था हो गया. सरोज ने अपना बचाव करते हुए राजीव के बाल पकड़ लिए और नाखूनों से उस का मुंह नोच लिया, जिस से उस के नाखूनों में स्किन के टुकड़े फंस गए थे. 53 साल की सरोज भला एक जवान युवक का सामना कैसे कर सकती थीं. अंत में राजीव उन्हें बैड पर लिटा कर उन के सीने पर बैठ गया. तब सरोज ने उस के सामने हाथ जोड़ते हुए जीवन की भीख मांगी और कहा, ‘‘राजीव मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हें पैसे दिलवा दूंगी.’’

मगर राजीव पर खून सवार था. बोला कि मामी अब बहुत देर हो चुकी है. तुझे छोड़ने का मतलब है खुद को फांसी के फंदे तक पहुंचाना. इस के बाद उस ने उन का गला दबोच लिया. वह सरोज का गला तब तक दबाए रखा जब तक उन के प्राण निकल नहीं गए. जब राजीव ने देख लिया कि वह मर चुकी है तो वह पलंग के गद्दों को उलटपलट कर सेफ की चाबियां ढूंढने लगा. जब उसे सेफ की चाबियां नहीं मिलीं तो उस ने घर में रखा टीवी चालू कर के उस की आवाज बढ़ा दी और सेफ के कुंडों को तोड़ने लगा, ताकि उस में रखी नगदी, ज्वैलरी आदि को वह ले जा सके. ऐसा करने से कुंडे मुड़ जरूर गए, लेकिन खुले नहीं.

सेफ नहीं खुली तो वह दबे पांव वहां से बाहर आ गया. फिर औटो पकड़ कर वह कटघर में अपने कमरे पर आ गया. राजीव सक्सेना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. लोगों को जब पता चला कि राजीव ही मामी का हत्यारा है तो लोग दांतों तले अंगुली दबा गए. Crime Story

 

Hindi crime story: नीली फिल्मों का बूढ़ा नायक

Hindi crime story: अय्याश कुंदन कुमार को कमउम्र की लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाने का शौक तो लग ही गया था, दुर्भाग्य से उसे उन के साथ अपने संबंधों की फिल्म बना कर देखने का भी चस्का लग गया था. उस के इसी शौक ने उसे उस की असली जगह तक पहुंचा दिया. पहाड़ों की रानी कहलाने वाले पर्यटनस्थल शिमला के रहने वाले थे सेठ दसौंधामल. मूलरूप से जिला कांगड़ा के गांव काशनी के रहने वाले दसौंधामल ने बरसों पहले शिमला में हार्डवेयर का व्यापार शुरू किया था. उन का यह धंधा इतना बढि़या चला कि उन्होंने शिमला में अपार ख्याति और संपत्ति अर्जित की.

दसौंधामल के परिवार में पत्नी कंचनबाला के अलावा एक बेटा और 6 बेटियां थीं. बेटियों को पढ़ालिखा कर उच्च घरानों में उन की शादियां कर दी गईं, जिन में से 3 तो आज विदेशों में रह रही हैं. 6 बेटियों के बाद एकलौता बेटा था कुंदन कुमार. पढ़लिख कर वह इंडियन एयरफोर्स में पायलट औफिसर बन गया था. साल भर बाद ही मैडिकल ग्राउंड पर नौकरी छोड़ दी और अपने पुश्तैनी धंधे में पिता का हाथ बंटाने के साथसाथ शिमला स्थित पंजाब विश्वविद्यालय से बीए करने लगा. दौरान दिल्ली निवासी मधुपलाल की उच्चशिक्षित बेटी मालारानी से कुंदन कुमार की शादी हो गई, जिस से उसे 3 बेटियां और एक बेटा हुआ.

कहते हैं, जब तक दसौंधामल जिंदा थे, तब तक तो उस पर अंकुश रहा. पिता के मरते ही उस के पंख निकल आए. पैसों का लेनदेन और पूरा कारोबार अब उस के हाथों में था. उस के पास इतना पैसा था कि दोनों हाथों से लुटाता तो भी खत्म होने वाला नहीं था. जमेजमाए कारोबार के अलावा दसौंधामल इतनी प्रौपर्टी छोड़ गए थे कि उस का किराया ही हर महीने लाखों में आता था. इस सब के अलावा कुंदन कुमार की पत्नी मालारानी ऊंचे ओहदे पर सरकारी नौकरी में थीं. उन्हें भी वेतन में मोटी रकम मिलती थी. इसलिए पैसों के लिए उन्हें कभी पति की ओर देखने की जरूरत नहीं थी. 4 बच्चे होने के बाद वह उन का भविष्य संवारने में व्यस्त हो गई थीं.

पिता का अंकुश हटते ही कुंदन क्लबों की रंगीनियों में खोया रहने लगा था. इस के बाद उस की अय्याशी के तार देहधंधा करने वाली औरतों से जुड़ गए. इसी के साथा उस ने कमउम्र की लड़कियों से शारीरिक संबंध बनाने का शौक पाल लिया. बढ़ती उम्र में यौन क्षमता बढ़ाने के लिए वह दवाओं का सहारा ले रहा था. कामवासना से कभी उस का जी नहीं भरता था, इसलिए बिजनैस को नौकरों के सहारे छोड़ कर वह सिर्फ लड़कियां पटाने के तरीके सोचा करता था. धंधेबाज औरतों से मौजमस्ती से जी भर गया तो नौकरी का लालच दे कर कुंदन ने न जाने कितनी लड़कियों को बरबाद किया.

ऐसे में उसे न जाने क्या सूझी कि 4 लड़कियों के साथ के शारीरिक संबंध की उस ने फिल्में बना लीं. इन में एक लड़की अनु थी, जिस के साथ बनाई गई ब्लूफिल्म ने उसे सलाखों के पीछे पहुंचा दिया. उस समय यह मामला अखबारों में खूब उछला था. शहर का हर अखबार इस मामले से जुड़ी खबरों से भरे होते थे. उन दिनों शिमला के एडीशनल एसपी थे कुंवर वीरेंद्र सिंह. कुंदन के इस मामले की विवेचना का जिम्मा उन्हें ही सौंपा गया था. यह मामला पुलिस से पहले मीडिया के पास पहुंच गया था. स्थानीय अखबारों में एक समाचार जोरोंशोरों से छप रहा था कि शिमला के बाजारों में एक अश्लील सीडी धड़ल्ले से बिक रही है, जिस में शहर के एक प्रतिष्ठित घराने के बूढ़े को एक नवयौवना से यौनाचार करते दिखाया गया है.

समाचारों में नीचे यह भी लिखा होता था कि वह बूढ़ा काफी प्रभावशाली है, इसलिए पुलिस इस मामले में कुछ नहीं कर रही है. पुलिस के लिए परेशानी की बात यह थी कि इस मामले में किसी ने कोई शिकायत नहीं दर्ज कराई थी. बिना शिकायत के पुलिस किसी के खिलाफ क्या और कैसे काररवाई कर सकती थी. फिर भी सीआईडी के तत्कालीन आईजी आई.डी. भंडारी ने उन खबरों को गंभीरता से लेते हुए मामले की गहराई में जाने की जिम्मेदारी सीआईडी स्पैशल ब्रांच के इंसपेक्टर कुशल कुमार को सौंप दी. कुशल कुमार ने अखबार वालों से संपर्क कर खूब दौड़भाग की. मामले की गहराई में जाने के लिए उन्होंने दिनरात एक कर दिया. जांच के लिए वह सीडी जरूरी थी. बाजार में सीडी होने की चर्चा तो खूब थी, लेकिन वह सीडी कुशल कुमार के हाथ नहीं लगी. 3 दिन इसी तरह निकल गए.

चौथे दिन संयोग से किसी अनजान आदमी ने उन्हें फोन कर के बताया, ‘‘सर, आप जिस सीडी के लिए दिनरात परेशान हो रहे हैं, उस की एक कौपी रिज के पास टका बैंच पर रखी है. आप उसे देख कर छानबीन करें तो सारी असलियत सामने आ जाएगी. आप से आग्रह है कि मेरे बारे में पता लगाने की कोशिश मत कीजिएगा.’’

अंधा क्या चाहे, 2 आंखें. कुशल कुमार तुरंत रिज मैदान पहुंच गए. टका बैंच पर उन्हें दीवार के पास कागज का पुराना सा लिफाफा दिखाई दिया. उठा कर देखा तो उस में सीडी थी. अपने औफिस आ कर कंप्यूटर पर उन्होंने उस सीडी को चलाया. सीडी में 15 मिनट की अश्लील फिल्म थी, जिस में एक बूढ़ा एक लड़की के साथ शारीरिक संबंध बना रहा था. सीडी देखने के बाद कुशल कुमार उसे ले कर आईजी श्री भंडारी के पास गए. सीडी देख कर उन्होंने शिमला के पुलिस अधीक्षक जोगराज ठाकुर को एफआईआर दर्ज कर के तत्काल काररवाई करने के आदेश दे दिए.

जोगराज ठाकुर ने कुशल कुमार की ओर से एफआईआर दर्ज करने की संस्तुति कर के मामले की फाइल थाना सदर भेज दी. इसी के साथ एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह को इस मामले की विवेचना की जिम्मेदारी सौंप दी गई थी. थाना सदर के थानाप्रभारी इंसपेक्टर बृजेश सूद ने भादंसं की धारा 292 के तहत मुकदमा दर्ज कर के इस मामले की जांच अतिरिक्त थानाप्रभारी गोबिंदराम को सौंप दी थी. गोबिंदराम ने सब से पहले शहर के कुछ गणमान्य लोगों को बुला कर उन के सामने उस सीडी को चला कर दिखाया. इस का उद्देश्य ब्लूफिल्म के नायक की पहचान करना था. आखिर उस आदमी की पहचान हो गई. वह कोई और नहीं, कुंदन कुमार था.

उन लोगों ने बताया कि इस की गिनती शहर के प्रमुख कारोबारियों में होती है. इस की पत्नी सरकारी अधिकारी है और इस के बच्चे इंग्लैंड, अमेरिका में पढ़ रहे हैं. सीडी की अश्लील फिल्म के नायक की पहचान हो जाने के बाद पुलिस टीम ने कुंदन कुमार के भव्य निवास पर छापा मारा. उस समय घर पर नौकर मोतीलाल के अलावा और कोई नहीं था. पुलिस ने उसे थाने ला कर गहन पूछताछ की. इस पूछताछ में मोतीलाल ने बताया कि उस का मालिक शराब और शबाब का शौकीन है. पैसे की उसे कोई कमी नहीं है. शिमला में प्रौपर्टी से ही उसे लाखों रुपए महीने किराया आता है. उस की उम्र काफी हो गई है, लेकिन बिना मेहनत के आने वाले पैसों की वजह से इस उम्र में भी उस की आदतें खराब हैं.

मोतीलाल को जब सीडी की फिल्म दिखाई गई तो उस ने उस फिल्म के बूढ़े नायक की पहचान अपने मालिक कुंदन कुमार के रूप में कर दी. लड़की के बारे में उस ने कहा, ‘‘अरे यह तो अनु है. यह साहब के औफिस में नौकरी करती थी.’’

‘‘इस समय यह कहां है?’’ मोतीलाल से पूछा गया.

‘‘अब कहां है, यह मुझे पता नहीं. क्योंकि इस ने साहब के यहां से नौकरी छोड़ दी है.’’ मोतीलाल ने कहा.

इस के बाद मोतीलाल को यह संदेश दे कर छोड़ दिया गया कि वह अपने साहब से कह देगा कि वह खुद थाने आ कर पुलिस जांच में शामिल हो जाए तो ज्यादा ठीक रहेगा, वरना उन्हें भारी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इस का असर यह हुआ कि पुलिस का संदेश मिलते ही कुंदन कुमार अपने वकील के साथ थाना सदर आ पहुंचा. पुलिस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखाते हुए उस के बारे में स्पष्टीकरण मांगा तो उस ने कहा, ‘‘अनु मेरे औफिस में नौकरी करती थी. अपनी खूबसूरती के जाल में फंसा कर वह मुझ से पैसे ऐंठती थी. उस के फरेब में आ कर मैं उस के हुस्न के जाल में फंस गया था. जब भी मौका मिलता था, हम संबंध बना लेते थे.

कभीकभी औफिस में भी यह सब हो जाता था. एक दिन मेरे मन में न जाने क्या आया कि मैं ने वैब कैमरे से यह फिल्म बना ली.’’

‘‘फिल्म की सीडी मार्केट में कैसे आई?’’ पुलिस ने पूछा तो जवाब में कुंदन ने कहा, ‘‘कुछ दिनों पहले मेरा कंप्यूटर खराब हो गया था. मिडिल बाजार में मुकेश की कंप्यूटर रिपेयर की दुकान है. अपना कंप्यूटर ठीक करवाने के लिए मैं ने उसे अपने घर बुलवाया. लेकिन घर में कंप्यूटर ठीक नहीं हुआ तो वह सीपीयू अपने साथ ले गया.’’

इतना कह कर कुंदन ने पानी मांगा. 2 गिलास पानी पीने के बाद उस ने आगे कहा, ‘‘अगले दिन मैं मुकेश की दुकान पर गया तो उस ने कहा कि हार्डडिस्क क्रैश हो गई है, इसलिए बदलनी पड़ेगी. मेरे कहने पर उस ने हार्डडिस्क बदल दी. पुरानी हार्डडिस्क उस के पास ही रह गई. मुझे लगता है कि पुरानी हार्डडिस्क को नई में लोड करते समय उस ने मेरी इस फिल्म को देख लिया. उस के बाद पैसा कमाने के लिए उस की सीडी बना कर बाजार में पहुंचा दिया.’’

बृजेश सूद ने कुंदन को अपनी बातों में उलझा लिया और गोबिंदराम 2 सिपाहियों को साथ ले कर कुंदन कुमार की पुरानी हार्डडिस्क बरामद करने मुकेश की दुकान पर जा पहुंचे. कुछ देर बाद आ कर उन्होंने बताया कि दुकान बंद है. लेकिन उन्होंने दुकान सील कर के अपने दोनों सिपाही वहां बैठा दिए हैं. इस के बाद एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह के आदेश पर पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस और घर को सील कर दिया. अगले दिन 2 पार्षदों की उपस्थिति में मुकेश की दुकान खुलवाई गई. कुंदन कुमार भी पुलिस के साथ वहां मौजूद था. उस से दुकान में मिली हार्डडिस्कों से अपनी हार्डडिस्क पहचानने को कहा गया. उस ने इधरउधर देख कर कहा, ‘‘मेरी हार्डडिस्क दुकान में नहीं है.’’

मुकेश भी वहां मौजूद था. जब उस से कहा गया तो उस ने दुकान से 3 हार्डडिस्कें निकाल कर पुलिस के हवाले करते हुए कहा कि ये तीनों हार्डडिस्कें कुंदन कुमार की हैं. साथ ही उस ने यह भी कहा कि उसे नहीं पता कि इन सब में क्या था. उस ने इन के अंदर ताकझांक करने की कोई कोशिश नहीं की थी. पुलिस ने तीनों हार्डडिस्कें कब्जे में ले कर मुकेश की दुकान की गहन तलाशी ली. दुकान में कोई भी आपत्तिजनक चीज नहीं मिली. इस के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार के औफिस की तलाशी ली, जहां पुलिस को पुरानी हार्डडिस्कें तो मिली हीं, 87 सीडीज और 25 फ्लौपीज भी मिलीं. जब उन सब को देखा गया तो उन सभी में अश्लील फिल्में थीं. यही नहीं, 4 ब्लूफिल्मों का हीरो खुद कुंदन कुमार था.

अनु के अलावा 3 अन्य लड़कियों के साथ भी उस ने अश्लील फिल्में बना रखी थीं. जिन फिल्मों में कुंदन कुमार खुद हीरो था, उन्हें देख कर साफ लग रहा था कि उन्हें औफिस में ही बनाया गया था. इसलिए फिल्म में दिखाई देने वाला सामान यानी चादर, कुशन, गिलाफ, तकिए और गिलासों के अलावा लकड़ी का वह छोटा सा दीवान भी कब्जे में ले लिया गया, जिस पर शारीरिक संबंध बनाया गया था. इसी के साथ कुंदन कुमार की निशानदेही पर उस के घर से वे कपड़े भी बरामद कर लिए गए थे, जिन्हें उस ने शारीरिक संबंध बनाने से पहले पहन रखे थे. बाद में तो उस ने कपड़े उतार दिए थे. कुंदन चूंकि गंजा था, जवान लड़की को शायद यह बात खल जाती, इसलिए पूरे कपड़े उतारने के बाद भी उस ने सिर पर आकर्षक कैप पहन रखी थी. वह कैप भी पुलिस ने जब्त कर ली थी.

सारी चीजों को कब्जे में लेने के बाद पुलिस ने कुंदन कुमार को थाने ला कर पूछताछ शुरू की. इस पूछताछ में उस ने यह तो खुलासा कर दिया कि वह शराब और शबाब का शौकीन था, खासकर कमउम्र की लड़कियों के साथ उसे बहुत मजा आता था. इसी के साथ उस की एक कमजोरी भी सामने आई कि अकसर वह कमउम्र लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाते समय वैब कैमरे से उन की फिल्में बना लिया करता था. इस के लिए उस ने अपने औफिस के निजी कमरे में एक वैबकैम लगवा रखा था. बाद में वह अपनी उन फिल्मों को देख कर रोमांचित होता था.

कुंदन कुमार ने अपनी सारी कमजोरियों को बता कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया था, लेकिन किसी भी लड़की के बारे में उस ने कुछ नहीं बताया था. शायद बताना नहीं चाहता था. उस ने पुलिस से कहा, ‘‘ये पेशेवर लड़कियां थीं, जो पैसे के लिए मेरे पास आती थीं. खायापिया, मुझे खुश करने का पैसा लिया और चलती बनीं.’’

‘‘लेकिन अनु तो तुम्हारे यहां नौकरी करती थी?’’ पुलिस ने पूछा.

‘‘जी, मैं ने उसे नौकरी पर रखा था, लेकिन वह भी अन्य लड़कियों की तरह पैसे ऐंठने के लिए खुशीखुशी मेरे साथ संबंध बनाने को राजी हो गई थी.’’ कुंदन कुमार ने कहा.

‘‘वह सब छोड़ो, फिलहाल यह बताओ कि अनु जब नौकरी करने आई थी तो उस का बायोडाटा तो तुम ने लिया ही होगा?’’ पुलिस ने थोड़ा सख्त लहजे में पूछा.

कुंदन कुमार ने घबरा कर कहा, ‘‘जी हां, लिया था.’’

इस के बाद पुलिस कुंदन कुमार को उस के औफिस ले गई और अनु का बायोडाटा बरामद कर लिया. उस पर उस का फोटो लगा था. फोटो में वह वाकई निहायत खूबसूरत लग रही थी. वह कस्बा रहेड़ू की रहने वाली थी. बायोडाटा से उस का पता ही नहीं, फोन नंबर भी मिल गया था. पुलिस ने उस नंबर पर फोन किया तो फोन अनु के पिता ने रिसीव किया. उन्होंने बताया कि अनु पिछले कई दिनों से कहीं गई हुई है. कहां गई है, इस बारे में वह कुछ नहीं बता पाए. पुलिस ने अनु की तलाश में अपना पूरा जाल बिछा दिया. इसी के साथ उस के घर वालों के अलावा कुंदन कुमार पर पुलिसिया शिकंजा कसा गया तो 2 दिनों में सोलन जिले के कनलख कस्बा के एक घर में अनु मिल गई. पिछले कुछ दिनों से वह वहां छिप कर रह रही थी.

शिमला ला कर पुलिस ने अनु से पूछताछ की तो अनु ने बताया कि एक भाई और 3 बहनों में वह सब से बड़ी थी. 12वीं पास करने के बाद वह पुलिस में भरती हो गई. लेकिन वहां दिल नहीं लगा तो जल्दी ही उस ने वह नौकरी छोड़ दी. इस के बाद वह किसी औफिस में नौकरी तलाश करने लगी. इस के लिए उस ने कंप्यूटर कोर्स भी कर लिया था. एक दिन उसे उस की एक सहेली ने कुंदन कुमार के बारे में बता कर कहा कि उसे औफिस में काम करने के लिए एक लड़की की जरूरत है. कुंदन कुमार के औफिस जा कर अनु उस से मिली तो उस ने उस का बायोडाटा और फोटो लेने के अलावा उस का इंटरव्यू भी लिया. इस के बाद उस से कहा कि वह एक हफ्ते बाद आ कर मिले. हफ्ते भर बाद अनु गई तो उसे अगले हफ्ते आने को कहा.

महीना भर इसी तरह टरकाने के बाद एक दिन कुंदन कुमार ने कहा, ‘‘ऐसा है बेटा, तुम्हारी परफौरमेंस तो अच्छी नहीं है, फिर भी मैं तुम्हें नौकरी पर रखने के बारे में सोच रहा हूं.’’

‘‘थैंक्यू सर,’’ अनु ने चहकते हुए कहा, ‘‘आप ने मुझे यह नौकरी दे दी न सर तो देखिएगा, आप को मेरी तरफ से शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा. मुझे नौकरी की जरूरत तो है ही, इस के अलावा मैं अपनी मेहनत से जिंदगी में कुछ बनना चाहती हूं.’’

कुंदन कुमार उठे और अनु की पीठ थपथपा कर बोले, ‘‘मैं तुम्हारी भावना से बहुत खुश हूं बेटी. लेकिन पहले मेरी एक बात ध्यान से सुन लो. अभी मैं तुम्हें रैग्युलर नौकरी पर न रख कर ट्रेनी के रूप में रखूंगा. 3 महीने तुम्हें औफिस के कामों की, कंप्यूटर की, सेल्स टैक्स व इनकम टैक्स संबंधी रिटर्न भरने और चुस्तदुरुस्त बनी रहने की ट्रेनिंग दी जाएगी. इस बीच तुम्हें 12 सौ रुपए महीने मिलेंगे. इस बीच तुम ने बढि़या काम किया तो तुम्हारी नौकरी रैग्युलर कर के तुम्हें 5 हजार रुपए महीने तनख्वाह दी जाएगी. हर साल 5 सौ रुपए का इन्क्रीमेंट के अलावा हर साल दीवाली पर 1 महीने की तनख्वाह बोनस में मिला करेगी.’’

‘‘यह तो बहुत अच्छा है सर.’’

‘‘नहीं, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई. पहले पूरी बात सुन लो.’’

‘‘देखो, तुम्हारा जो ट्रेनिंग पीरियड है, अगर यह संतोषजनक नहीं रहा तो तुम्हें नौकरी से हटा दिया जाएगा या फिर 3 महीने के लिए तुम्हारा ट्रेनिंग पीरियड और बढ़ा दिया जाएगा. अब फैसला तुम्हें करना है.’’

अनु कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, ‘‘ठीक है सर, मुझे मंजूर है.’’

इस के बाद अनु मालरोड स्थित कुंदन कुमार के औफिस में नियमित ड्यूटी पर जाने लगी. औफिस में जहां कुंदन कुमार बैठता था, वहीं बगल में कंप्यूटर टेबल रखी थी. उसी पर अनु को बैठना था. वहीं बगल में दीवार से सटा कर छोटा सा दीवान रखा था, जिस पर लेट कर कुंदन कुमार आराम किया करता था. औफिस में कोई खास काम तो था नहीं, लिहाजा कुंदन कुमार बैठा अनु से गप्पें हांकता रहता था. कभीकभी उसे औफिस के कामों के बारे में समझाने बैठ जाता. वह जब भी बैंक में पैसा जमा करने अथवा निकलवाने के लिए जाता, अनु को भी साथ ले जाता. रुपए भी वह उसी से गिनवाता.

औफिस में छोटा सा किचन था. उस में रखे फ्रिज में कई तरह के जूस मौजूद रहते थे. चाय बनाने की भी व्यवस्था थी. कुंदन का जब भी मन होता, अनु से चाय बनवा कर अथवा फ्रिज से जूस मंगवा कर पीता. उस ने अनु से भी कह रखा था कि जब भी उस का मन हो, वह चाय या जूस पी लिया करे. इसी तरह 2 महीने बीत गए. एक दिन कुंदन कुमार बाहर से आया. उस समय अनु कंप्यूटर पर गेम खेल रही थी. कुंदन ने आते ही उस के गाल को गर्मजोशी से चूम कर कहा, ‘‘आज मैं बहुत खुश हूं अनु.’’

अनु ने उस की बात पर ध्यान न देते हुए कुंदन पर सख्त ऐतराज जताते हुए कहा, ‘‘मुझे आप से यह उम्मीद नहीं थी सर. आप ने मुझे किस कर के बहुत गलत किया. आप को ऐसा हरगिज नहीं करना चाहिए था.’’

कुंदन कुमार ने भी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारा गाल चूम लिया तो कौन सा गजब कर दिया. मुझे एक खुशखबरी मिली थी. इसी वजह से खुश हो कर मैं ने तुम्हें अपनी बेटी की तरह किस कर लिया. इस का तुम्हें बुरा लगा तो आगे से मैं ध्यान रखूंगा.’’

अनु के बताए अनुसार, यह बात आईगई हो गई. उसे भी लगा कि शायद कुंदन अपनी जगह ठीक था. वैसे भी उम्र में वह उस के पिता से भी कहीं ज्यादा का था. इसलिए अनु ने उस की ओर से अपना मन साफ कर लिया. मगर इस के लगभग 10 दिनों बाद कुंदन ने अचानक अनु को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया. इस बार अनु ने पहले से भी कहीं ज्यादा सख्त लहजे में ऐतराज जताया. यहां तक कि नौकरी छोड़ देने की धमकी भी दी. कुंदन ने इस बार भी उसे यह कह कर मना लिया कि उस की शक्ल हूबहू उस की बेटी जैसी है. जिस तरह ज्यादा खुश होने पर वह अपनी बेटी को बांहों में ले कर प्यार करता था, उसी तरह उस से भी कर बैठा.

इसी के साथ कुंदन कुमार ने कान पकड़ कर अनु से माफी भी मांगी. हालांकि जिस तरह कुंदन कुमार ने अनु को अपनी बांहों में भर कर भींचा था, हर तरह से ऐतराज वाली बात थी. इस के बाद भी कुंदन की बात पर भरोसा कर के अनु ने इस बार भी उस की गलती माफ कर दी थी. कुछ दिनों बाद तो हद ही हो गई. कुंदन कुमार अनु को ले कर बैंक गया था. वहां से कोई फाइल लेने का बहाना कर के उसे अपने घर ले गया. उस समय घर में कोई नहीं था. ताला खोलने के बाद कुंदन कुमार ने उसे ले जा कर एक ऐसे कमरे में बैठा दिया, जहां कंप्यूटर लगा था. उस पर सीडी लगा कर वह बोला, ‘‘मैं अभी आया, तब तक तुम यह फिल्म देखो.’’

इस के बाद वह कमरे से चला गया. अनु ने कंप्यूटर स्क्रीन पर नजरें जमा दीं. कुछ देर में फिल्म चलने लगी. कंप्यूटर स्क्रीन पर जो दृश्य उभरे, उन्होंने अनु के होश उड़ा दिए. वह एक ब्लूफिल्म थी. फिल्म के अश्लील दृश्यों को देख कर अनु घबरा गई, उस का हलक सूख गया. उसे कुछ नहीं सूझा तो वह दरवाजा खोल कर भागी. इस के बाद अनु ने कुंदन कुमार के यहां नौकरी पर जाना बंद कर दिया. वह अपनी तनख्वाह भी लेने नहीं गई. कुंदन कुमार ने भी उस से संपर्क करने की कोशिश नहीं की. इसी तरह करीब 2, ढाई महीने बीत गए. इस बीच अनु कहीं और नौकरी तलाश करती रही, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली.

संयोग से एक दिन लोअर बाजार में कुंदन कुमार से अनु की मुलाकात हो गई. कुंदन कुमार उस की बांह पकड़ कर एक किनारे ले गया और वात्सल्य भरे लहजे में उस के सिर पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘मुझे गलत न समझ बेटी, उस दिन मैं ने तुम्हारे लिए अपनी ओर से वह हिंदी फिल्म लगाई थी, जो उस सुबह ही मैं ने देखी थी. मुझे इस बात की जरा भी जानकारी नहीं थी कि उस सीडी में ब्लूफिल्म है. मेरा यकीन करो बेटी, इस में मेरा जरा भी कुसूर नहीं है.’’

‘‘कुसूर नहीं है तो इस तरह की गंदी फिल्म घर पर ला कर रखी ही क्यों?’’ अनु ने तल्खी से कहा, ‘‘ऐसी फिल्में देखने के बाद, वह भी इस उम्र में, आप क्या समझते हैं कि आप अच्छे कैरेक्टर के मालिक होंगे, कतई नहीं.’’

‘‘अब तुम्हें कैसे समझाऊं बेटी. दरअसल हम जैसे हाईसोसायटी वालों के घरों में यह सब आम बात है. हमारे यहां बच्चे, औरतें सब इस तरह की फिल्में देख कर मनोरंजन करते हैं. तुम मिडिल क्लास की हो, इसलिए तुम्हें यह सब अजीब लग रहा है. उस दिन गलती से ब्लूफिल्म लग गई थी तो कंप्यूटर बंद कर देती या आवाज दे कर मुझे बुला लेती. तुम तो सिर पर पांव रख कर ऐसे भागी, जैसे कोई बम फट गया हो.’’

अनु कुंदन कुमार को बीचबीच में टोकने का प्रयास करती रही, लेकिन कुंदन उसे नजरअंदाज कर के अपनी बात कहता रहा. अंत में उस ने कहा, ‘‘अब मैं तुम्हें कभी बेटी भी नहीं कहूंगा. जब तुम्हें मेरे दिमाग में, मेरे काम में और मेरी हर हरकत में गंदगी ही दिखाई दे रही है तो फिर इस रिश्ते को बदनाम क्यों किया जाए. बस मेरी एक बात ध्यान से सुन लो अनु कि मैं आज भी तुम्हें अपनी बेटी की तरह ही मानता हूं.

‘‘मैं ने जानबूझ कर कोई गलती नहीं की. बेकसूर होते हुए भी मैं तुम्हारी नफरत का शिकार हो गया. अब इस की सजा मैं अपने आप को यह देना चाहता हूं कि तुम्हारे ट्रेनिंग पीरियड का वेतन 2 हजार रुपए महीने कर दूंगा. 3 महीने के बाद नौकरी रैग्युलर कर के तनख्वाह 8 हजार रुपए महीने और हर साल बोनस भी इतना ही दूंगा. ठीक लगे तो कल से औफिस आना शुरू कर दो. तुम्हारी सीट आज भी खाली है.’’

अपनी बात पूरी कर के कुंदन कुमार क्षण भर के लिए भी वहां नहीं रुका. तेज कदमों से चलता हुआ वह पलभर में अनु की नजरों से ओझल हो गया. अनु उस के झांसे में आ कर अगले दिन से उस के औफिस में काम करने लगी. कुछ दिन तो ठीकठाक बीते. एक दिन दोपहर को कुंदन कुमार ने फ्रिज से फ्रूटजूस के 2 टेट्रापैक निकाल कर एक उसे पीने को दिया और एक खुद पीने लगा. जूस पीते ही अनु पर नशा सा छाने लगा. जल्दी ही वह अर्धबेहोशी की हालत में पहुंच गई. कुंदन कुमार ने उसे उठा कर दीवान पर लिटा दिया. इस के बाद कपड़े उतार कर शारीरिक संबंध बनाने लगा.

अनु के साथ कुछ हो रहा है, इस बात की जानकारी तो उसे थी, लेकिन वह विरोध करने की स्थिति में नहीं थी. शाम 6 बजे वह होश में लौटी तो उसे उस सब का कुछकुछ याद आने लगा. उस ने इस बारे में कुंदन कुमार से पूछा तो उस ने उसे उस की ब्लूफिल्म दिखा दी. साथ ही धमकी दी कि इस सब के बारे में किसी को कुछ बताया तो वह उस की ब्लूफिल्म की सीडी बाजार में उतार देगा.  इस से अनु बुरी तरह डर गई. इस के बाद जब भी कुंदन कुमार का मन होता, उस से अपने मन की कर लेता. इस के एवज में वह उस की हर छोटीबड़ी जरूरत का ध्यान रखने लगा. वह सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस बारे में कुंदन कुमार और अनु ने कुछ भी मालूम होने से मना कर दिया. जैसे ही यह सब अखबारों में छपना शुरू हुआ, उस ने काफी पैसे दे कर अनु को छिपा दिया था.

अनु से पूछताछ के बाद कुंदन के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उस हवालात में बंद कर दिया गया. इस के बाद वह पुलिस को धमकियां देने लगा कि वह सभी पुलिस वालों को देख लेगा. लेकिन पुलिस के पास पुख्ता सबूत थे. इस पर भी वह खुद को बेकसूर बता रहा था, साथ ही कह रहा था कि उसे किसी साजिश के तहत फंसाया जा रहा है. उस ने थाने की मैस का खाना खाने से इनकार कर दिया था. कह रहा था कि उस का खाना किसी बढि़या होटल से मंगवाया जाए. एडीशनल एसपी कुंवर वीरेंद्र सिंह ने कहा कि जब तक वह यहां है, उसे यहीं का खाना मिलेगा. जैसेतैसे उस ने थोड़ा सा खाना खा लिया तो आधी रात में दिल का दौरा पड़ने का शोर मचाने लगा. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां चैकअप के बाद डाक्टरों ने उसे पूरी तरह स्वस्थ बताया.

अगले दिन पुलिस ने उसे न्यायिक दंडाधिकारी के सम्मुख पेश कर के 5 दिनों के कस्टडी रिमांड पर ले कर विस्तारपूर्वक पूछताछ की. रिमांड अवधि में भी वह कभी सीने में दर्द का तो कभी किसी और तरह की परेशानी का ढोंग कर के पुलिस वालों को अस्पतालों के चक्कर लगवाता रहा. आखिर उस की सारी नौटंकियां फ्लौप साबित हुईं. जैसेतैसे पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त हुई और पुलिस ने उसे फिर से अदालत में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भिजवा दिया, जहां से उसे सजा सुनाए जाने तक जमानत नहीं मिली.

चार्जशीट दाखिल होने के बाद इस केस की सुनवाई 2 सालों तक चली. इस मामले में उसे 10 सालों की कैद की सजा हुई. सजा सुनाए जाने के समय विद्वान जज महोदय ने टिप्पणी करते हुए उसे लताड़ा था कि जिस लड़की से दुष्कर्म के आरोप में उसे यह सजा दी जा रही है, वह उस की बेटी से भी कम उम्र की थी. ऐसे में उस के इस घिनौने अपराध के प्रति देश की कोई भी अदालत नरम रवैया अपनाने के बारे में शायद ही सोच सके. खैर, पुलिस ने तो कुंदन को उस के अपराध की सजा दिला दी, लेकिन वह अश्लील सीडी बाजार में कैसे पहुंची, इस रहस्य की तह तक अंत तक नहीं पहुंच सकी और न ही उन 3 अन्य लड़कियों का पता लगा सकी, जिन के साथ कुंदन कुमार की अश्लील फिल्मों की कई सीडी बरामद हुई थीं.

इस मामले से मिडिल क्लास की उन बेरोजगार लड़कियों को सावधान हो जाना चाहिए, जिन्हें नौकरी देने के नाम पर नोचने के लिए इस तरह के कामुक भेडि़ए घात लगाए बैठे रहते हैं. Hindi crime story

—कथा में पात्रों के नाम बदले हुए हैं.

 

Haryana Crime News: एमए बीएड टौपर बनी सीरियल किलर

Haryana Crime News: पानीपत में 4 बच्चों की हत्या के आरोप में पकड़ी गई पूनम के निशाने पर वे बच्चे होते थे, जो उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर दिखते थे. एमए बीएड पास किलर मौम द्वारा की गईं 3 हत्याओं का किसी को शक नहीं हुआ, लेकिन चौथे बच्चे की हत्या के बाद वह इस तरह शक के दायरे में आई कि…

पानीपत के एक गांव में शादी का माहौल था, दिसंबर 2025 महीने की पहली तारीख थी. सभी शादी के जश्न में डूबे हुए थे. यह शादी पूनम के मायके में थी, इसलिए वह भी इस शादी में आई हुई थी. फेमिली में लोगों के बीच वह काफी चर्चा में थी. कारण, वह अपनी सुंदरता, चपलता और चंचलता से सब का बरबस ध्यान खींच रही थी. वैसे भी फेमिली के लोगों से वह कई सालों बाद मिली थी.

घर में चहलपहल का माहौल था. विवाह की रस्में निभाई जा रही थीं. रात होने को आई थी. घर के लोगों को रात के भोजन के लिए बुलाया जाने लगा था. इसी बीच उस की भाभी राखी ने पूछा, ”पूनम, तुम ने विधि को देखा है क्या?’’ विधि 6 साल की बच्ची थी.

”नहीं तो भाभी! क्यों, क्या हुआ?’’ पूनम अनजान बनती हुई बोली.

”कुछ नहीं, काफी देर से दिखाई नहीं पड़ रही है. सुबह का खाना खाया है, भूखी होगी!’’ राखी चिंता से बोली.

”आ जाएगी. इधर ही कहीं खेल रही होगी बच्चों के साथ.’’ पूनम बोली.

”अरे नहीं पूनम, बहुत टाइम हो गया है. इतनी देर तक मेरे बगैर नहीं रहती है, उसे ढूंढना होगा!’’ चिंता जताती हुई राखी भाभी बोली.

”जी भाभी, मैं तलाशती हूं उसे.’’

थोड़ी देर में ही यह बात पूरे घर में फैल गई कि विधि नहीं मिल रही है. पहले घर के सभी बच्चों से पूछताछ की गई, सभी ने एक ही बात कही कि उन्होंने उसे बहुत देर से नहीं देखा है.

विधि के लापता हुए कई घंटे हो गए. परिवार के सभी सदस्य उसे तलाशने में जुट गए. घर के कमरे का कोनाकोना छान मारा गया. यहां तक कि पासपड़ोस के घरों में भी उस की तलाश की गई. कई लोगों से उस के बारे में पूछताछ की गई, किंतु उस का कोई पता नहीं चल पाया था.

हर किसी के लिए शादी के काम के दिन एक नई समस्या खड़ी हो गई थी. क्या बच्चे और और क्या बड़ेबुजुर्ग, विधि की एक झलक पाने के प्रयास में थे. सभी के सामने एक ही सवाल था, ‘आखिर कहां गई होगी विधि?’

कई घंटे बीत चुके थे. विधि की मम्मी राखी का बुरा हाल हो रहा था. परेशान थी. घर के सभी कमरों में कई बार झांक चुकी थी. छत पर कई बार सीढिय़ां चढ़ चुकी थी. थक कर बरामदे में चावल की एक बोरी पर बैठ गई. उस की सांसें तेजतेज चल रही थीं. सुस्ताने के लिए आंखें मूंद ली थीं. कुछ पल में उस ने एक आवाज सुनी, ”मिल गई विधि… मिल गई.’’

”कहां? कहां है मेरी विधि?’’ राखी चौंकती हुई बोली.

”स्टोररूम में मिली…’’ किसी ने कहा.

”स्टोररूम में क्या करने चली गई थी.’’ विधि की मम्मी तेजी से उठी और स्टोररूम की ओर भागी. उसे विधि के मिलने की जानकारी जरूर मिल गई थी, लेकिन बुरी खबर भी सुनने को मिली.

विधि सोनीपत में रहती थी और अपने परिवार के साथ एक रिश्तेदार की शादी में शामिल होने पानीपत के नौल्था गांव आई थी. उस के साथ उस के दादा पाल सिंह, दादी ओमवती, पिता संदीप, मम्मी और 10 महीने का छोटा भाई भी था. दादी ओमवती और विधि की मम्मी राखी घर और आसपास की गलियों में काफी तलाश कर चुके थे. रात करीब 2 बजे जब ओमवती पहली मंजिल पर गईं, तब उन्होंने स्टोररूम का दरवाजा बाहर से बंद देखा. जब उन्होंने दरवाजा खोला तो देखा कि विधि पानी से भरे टब में मुंह के बल पड़ी थी. उसे कोई होश नहीं था.

यह देखते ही उन की चीख निकल गई. फेमिली वाले तुरंत उसे इसराना मैडिकल कालेज ले गए, जहां डौक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. विधि नाम की जो बच्ची शादी के लिए काफी उत्साह के साथ तैयार हुई थी, पूरे दिन काफी उमंग से भरी हुई थी, वह अचानक गायब हो गई थी. उस की तलाश में सभी घंटों तक परेशान रहे. खोजबीन शुरू हुई और तब वह आधी रात को स्टोररूम में प्लास्टिक के टब में बेहोशी की हालत में मिली.

यह मामला सोनीपत के नौल्था गांव की है. सोनीपत पुलिस को इस की सूचना मिली. गहन जांचपड़ताल होने लगी. 2 दिनों तक तहकीकात होती रही. घरपरिवार के सभी सदस्यों से विधि के लापता होने से ले कर उस की मौत के बारे में पूछताछ की जाने लगी. पुलिस ने शादी में आए सभी लोगों से पूछताछ की. पुलिस अधिकारियों को जल्द ही पूनम के बयानों में अंतर दिखा और उन का शक गहरा गया. लगातार पूछताछ के दौरान वह टूट गई और उस ने न केवल विधि की हत्या करना, बल्कि इसी तरीके से पहले भी 3 हत्याएं करना कुबूल कर लिया. उसे 3 दिसंबर को पुलिस ने हिरासत में ले लिया.

उस ने पुलिस को हत्या का जो कारण बताया, वह बेहद हैरान करने वाली थी. यह भी बताया कि वह विधि से पहले और 3 बच्चों की हत्या कर चुकी है. विधि समेत वह 4 बच्चों की हत्या की आरोपी थी. इस डरावने मामले का कारण तो और भी चौंकाने वाला था. उस ने बताया कि उस ने जिन बच्चों की हत्याएं की थीं, वे बच्चे उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर थे. इस कारण उस ने उन्हें मार डाला. चौंकाने वाली बात यह है कि मरने वालों में एक उस का अपना बेटा भी था.

उस ने पुलिस को बताया कि परिवार में कोई भी उस के बच्चों से ज्यादा सुंदर दिखा नहीं कि वह उन बच्चों को नुकसान पहुंचाने के मनोविज्ञान से ग्रसित हो जाती थी. जब भी उस के सामने सुंदर बच्चा आता था, तब वह जलन से भर जाती थी. इस कारण ही सजीसंवरी विधि पूनम की आंख की किरकिरी बन गई थी और उस ने पहली दिसंबर की रात को अपनी 6 साल की भतीजी विधि को बाथटब में डुबो कर तब मार डाला था, जब पूरा परिवार  शादी के फंक्शन में मशगूल था.

उस ने विधि को बाथटब में पानी भरने का लालच दिया था. उसे स्टोररूम में ले जाने के लिए कहा था. वहां जाते ही उस ने बच्ची को डुबो दिया था. बाहर से दरवाजा बंद कर शादी के जश्न में ऐसे वापस आ गई, जैसे कुछ हुआ ही न हो. पुलिस ने पूनम से पूछताछ में पाया कि वह एक साइको किलर है. उस ने पिछले जुर्म के बारे में भी बताया. पूनम ने सब से पहले 2023 में अपनी ननद की बेटी इशिका को टैंक में डुबो कर मार डाला था. बेटे को मारने का कारण उस के मन में छिपा भय था. उसे आशंका हो गई थी कि उस ने जो अपराध किया है, वह उस का बेटा शुभम जान गया है. वह इस बारे में सब को बता न दे. इसलिए अपने बेटे को भी मार दिया.

उस के बाद अगस्त, 2025 में पूनम अपने चचेरे भाई की 6 साल की बेटी जिया को भी इसी तरह मार डाला था. इन सभी मौतों को परिवार ने दुखद हादसा मान कर टाल दिया था. इस तरह से पूनम शुभम, इशिका, जिया और विधि की कातिल बन गई. उस की कहानी किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं है. उस ने प्यार, सनक और दरिदंगी का जो काम किया, उसे सुन कर किसी का भी कलेजा कांप जाए. बात जनवरी, 2023 की है. पूनम की ननद पिंकी 11 जनवरी को अपनी 7 साल की बेटी इशिता के साथ मायके आई थी. सोनीपत के गोहाना के भावड़ गांव में अचानक 12 जनवरी, 2023 को हड़कंप मच गया था.

घर के बाहर बने पानी के 5 फीट गहरे स्टोरेज टैंक में पूनम के 3 साल के बेटे शुभम और उस की ननद पिंकी की 7 वर्षीय बेटी इशिता का शव मिलता है. तब परिवार के लोगों ने इसे हादसा मान लिया था. किसी ने जरा भी हत्या किए जाने की आशंका नहीं जताई. कोई पूनम के इरादे नहीं भांप नहीं पाया. जबकि हैरान करने वाली बात यह थी कि साइको पूनम ने इशिता के साथ अपने बेटे को भी टैंक में डुबो कर मार दिया था. 2 हत्याओं को अंजाम देने के बाद पूनम ने फिर अपनी सनक मिटाने के लिए करीब डेढ़ साल का वक्त लिया. इस अंतराल की वजह पूनम ने फिर से गर्भवती होना बताया. उस ने एक और बेटे को जन्म दिया, जिस का नाम अपने पहले बेटे शुभम के नाम पर ही रख लिया.

पूनम द्वारा दोहराई गई वारदात 18 अगस्त, 2025 की है. वह रात को अपने चचेरे भाई दीपक के घर रुकी थी. रात में उस ने 10 साल की जिया को अपने पास सोने के लिए मना लिया. बच्ची को प्यार और दुलार का झांसा दिया और रात के अंधेरे में उस ने जिया को घर के पीछे बने पानी के हौद में डुबो दिया. इस घटना के बाद अगले रोज जिया की मम्मी ने बताया कि 19 अगस्त की सुबह उस ने उठ कर परिवार के लोगों के साथ बच्ची की काफी तलाश की. उसे स्कूल जाने के लिए तैयार करना था, लेकिन बच्ची घर के पीछे बनी पानी की छोटी सी टंकी में मिली.

इस दौरान फेमिली वालों को लगा कि पुलिस को शिकायत दी जाए. तब पूनम ने भी कानूनी काररवाई के नाम पर सभी को डरा दिया. वह सब से ज्यादा रोती नजर आई. जिया की मम्मी ने बताया कि पानी की टंकी इतनी गहरी भी नहीं थी कि बच्ची उस में डूब जाती, लेकिन परिवार के लोग यह मान कर चुप हो गए कि शायद सोते समय उस के साथ हादसा हो गया हो और उस की मौत हो गई. हालांकि तब जिया के ताऊ सुरेंद्र ने पूनम पर ही शक किया था, लेकिन पूनम काफी रोने लगी. कहने लगी कि मैं इशिता की मौत की जिम्मेदार हूं तो अपनी जान दे दूंगी. परिवार के लोग उस की भावनात्मक धमकी से घबरा गए और लोकलाज के चलते इस मामले को शांत कर दिया और पुलिस में इस की शिकायत तक नहीं की गई.

इस तरह पूनम 2 साल के अंतराल में 3 हत्याएं कर चुकी थी, लेकिन इस की भनक  किसी को नहीं लगी. उस पर शक जरूर हो गया था, लेकिन इस की पुलिस में शिकायत किसी ने नहीं की. पूनम ने यह कुबूल किया कि वह अपने खौफनाक इरादों के साथ ही पानीपत में इसराना के नौल्था गांव गई थी. पूनम की रिश्तेदारी में जेठ लगने वाले सतीश अपने परिवार के साथ शादी में आए थे. उस ने मौका पा कर पहली दिसंबर को 6 साल की बच्ची विधि की हत्या कर दी थी. इन चारों हत्याओं में पूनम का तरीका एक जैसा था. पूनम ने विधि को भी पानी में डुबो कर मारा था और हत्या के लिए शादी वाला दिन चुना.

जब पुलिस ने इस की गहन छानबीन की, तब एक और बात का पता चला. वह अहम बात यह थी कि तीनों हत्याएं पूनम ने एकादशी के दिन की थी. एक दिसंबर को भी एकादशी थी. ऐसे में अब तंत्रमंत्र के एंगल से भी जांच की जाने लगी. मृतक बच्ची जिया के ताऊ सुरेंद्र ने बताया कि पूनम उस की चचेरी बहन थी. उन्होंने बारबार सभी पहलुओं पर विचार किया तो एक बात सामने निकल कर आई कि तीनों वारदात के दिन एकादशी थी और तीनों की हत्या करने का तरीका एक ही था तो कहीं न कहीं यह तांत्रिक क्रिया से जुड़ा होने की शंका जताई गई.

पूनम का व्यवहार भी अजीब रहता था और वह गोहाना में अपने घर के आसपास के लोगों से कहती थी कि उस में पड़ोस के युवक की आत्मा आ गई है. इसे ले कर ही पूनम के चचेरे भाई सुरेंद्र ने पुलिस प्रशासन से मांग की है कि उस की बहन को कड़ी से कड़ी सजा दी जाए. क्योंकि उम्रकैद होने के बाद वह जेल से बाहर आएगी और फिर से बच्चों की हत्या कर सकती है. परिवारजनों का कहना है कि पूनम को तांत्रिक के पास भी ले गए थे. पूनम की मम्मी सुनीता ने यह अंदेशा जताया कि उस की मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी. हालांकि, पति ने इंकार किया है.

वैसे यह भी कुछ कम अजीब बात नहीं है कि पूनम ने जिस विधि को मौत के घाट उतारा, उस की मम्मी राखी पूनम के बेटे शुभम की देखभाल कर चुकी थी. राखी पूनम के 2 साल के बेटे शुभम को सीने से लगा कर दूध पिलाती थी. तब सोनीपत के वेस्ट रामनगर की रहने वाली विधि की मम्मी राखी पूनम के 10 माह के बच्चे को अपने साथ ले गई थी. कारण, पूनम अपने बच्चे की भी परवाह नहीं करती थी और वह ज्यादातर मायके में ही रहती थी. पानीपत के इसराना की रहने वाली पूनम की शादी सोनीपत के गोहाना में नवीन से 2019 में हुई थी. 2021 में पूनम ने पहले बेटे को जन्म दिया था. ऐसा भी नहीं है कि पूनम कोई अनपढ़ थी. वह उच्चशिक्षित थी. उस ने एमए पौलिटिकल साइंस से किया था और फिर बीएड में वह टौपर थी. पूनम का पति नवीन गाडिय़ों को धोने का वाशिंग सेंटर चलाता था.

पूनम ने गांव के देवीलाल कन्या कालेज से बीए तक की पढ़ाई की थी. उस के बाद राजकीय कालेज से राजनीति शास्त्र से एमए किया था और वह टीचर बनना चाहती थी. उस के 2 छोटे भाई हैं और वह सब से बड़ी थी. 3 बच्चों की हत्या करने के बाद तक पूनम कानून के फंदे से बच गई थी, लेकिन चौथी बच्ची की हत्या के दौरान पूनम कुछ गलतियां कर बैठी. पूनम ने जिस बाथटब में विधि को डुबो कर मारा था, वह उस की ऊंचाई से कम था. ऐसे में पुलिस को शक हुआ कि बच्ची की हत्या की गई है. इस दौरान जब पूनम ने बच्ची की हत्या की और फिर पहली मंजिल से नीचे आई तो उस के कपड़े भीगे हुए थे.

यानी उसे बच्ची को मारने के लिए संघर्ष करना पड़ा. लोगों ने पूनम को भीगी हुई हालत में देखा था. पुलिस को मामले की शिकायत दी गई और फिर जब पूछताछ हुई तो सारा मामला खुल गया. पानीपत के एसपी भूपेंद्र सिंह के अनुसार पूनम ने पूछताछ में बताया कि वह अपने मायके सिवाह में आई थी और गांव नौल्था में पति नवीन के मामा सतपाल के बेटे अमन और बेटी की शादी थी. वह 30 नवंबर को शादी में गई थी. फिर पहली दिसंबर को दोपहर बाद अमन की बारात निकली तो घर से सभी मेहमान बाहर थे. इसी दौरान उसे विधि घर पर सीढिय़ों से चढ़ते हुए दिखी.

बाद में वह उस के पीछेपीछे छत पर गई और विधि से बातचीत करने लगी, फिर इसी दौरान स्टोररूम के बाहर पानी से भरे प्लास्टिक टब को अंदर ले गई और इस में विधि की गरदन डुबो कर हत्या कर दी. हत्या करने के बाद बाहर से दरवाजे की कुंडी लगा कर नीचे आ गई थी. कथा लिखे जाने तक पूनम पर अब अपने बेटे शुभम और भतीजी इशिका की हत्या के मामले में सोनीपत के गोहाना के बरोदा पुलिस थाने में भी हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है. Haryana Crime News

 

Family Dispute: नाकाम साजिश : बहू ने बनाई सास की हत्या की योजना

Family Dispute: कुलदीप कौर पिछले कई महीनों से परेशान थी, लेकिन परेशानी की वजह उस की समझ में नहीं आ रही थी. उस का मन हर समय बेचैन रहता था. अजीबोगरीब विचार मन को उलझाए रखते थे. वह कितना भी अच्छा सोचने की कोशिश करती, मन सकारात्मक सोच की ओर न जा कर नकारात्मक सोच में ही डेरा जमाए रहता था.

बुरे विचारों से जैसे कुलदीप का नाता जुड़ गया था. मन को समझाने और बुरे विचारों से दूर रहने के लिए वह अपना अधिकांश समय गुरुद्वारे में व्यतीत करने लगी थी. कुलदीप कौर की चिंता का विषय सात समंदर पार पंजाब में बैठी अपनी मां राजविंदर कौर थीं. हालांकि 57 वर्षीय राजविंदर कौर की देखभाल के लिए गांव के घर में उस की भाभी शगुनप्रीत कौर थी, लेकिन भाभी पर उसे भरोसा नहीं था.

कुलदीप के पति मनमोहन सिंह ने उसे कई बार समझाया भी था कि बेकार में चिंता करने से कोई फायदा नहीं है. अगर मन इतना ही परेशान है तो इंडिया का चक्कर लगा आओ. वहां अपनी मां से मिल लेना. लेकिन समस्या यह थी कि उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी. डाक्टरों ने ऐसी हालत में हवाई यात्रा करने से मना कर रखा था. बहरहाल, इसी उधेड़बुन में कुलदीप कौर के दिन गुजर रहे थे.

भरापूरा परिवार था बलदेव सिंह का

कुलदीप कौर मूलत: गांव बुट्टर सिविया, थाना मेहता, जिला अमृतसर, पंजाब की रहने वाली थी. उस के जीवन के 16 बसंत भी अपने गांव बुट्टर में ही गुजरे थे. गांव में रहते ही उस ने जवानी की दहलीज पर पांव रखे थे. कुलदीप का छोटा सा परिवार था. पिता बलदेव सिंह और मां राजविंदर कौर के अलावा उस के 2 भाई थे गगनदीप सिंह और सरबजीत सिंह. तीनों भाईबहनों का आपस में बहुत प्यार था. वे तीनों बहनभाई कम दोस्त ज्यादा लगते थे. आपस में इन की कोई बात एकदूसरे से छिपी नहीं रहती थी.

बलदेव सिंह जाट सिख किसान थे. उन के पास खेती की ज्यादा जमीन तो नहीं थी, पर जितनी थी वह परिवार की हर जरूरत पूरी करने के लिए काफी थी. इसीलिए बलदेव सिंह ने अपने तीनों बच्चों को सिर उठा कर आजादी से जीना सिखाया था. उन्होंने तीनों बच्चों को अपनी हैसियत के हिसाब से पढ़ाया था. बच्चों के लिए अभी वह और भी बहुत कुछ करना चाहते थे, पर साल 2002 में उन की मौत हो गई. बलदेव सिंह की मौत के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारियां राजविंदर कौर के कंधे पर आ गई थीं. उस वक्त उन का बड़ा बेटा गगनदीप जवानी की दहलीज पर कदम रख चुका था. वह मां का हाथ बंटा कर उस का सहारा बन गया. घर की गाड़ी फिर से अपनी स्पीड से दौड़ने लगी थी.

साल 2008 इस परिवार के लिए अच्छा साबित हुआ. इसी साल कुलदीप कौर के लिए एक अच्छे परिवार का रिश्ता आया, लड़के का नाम मनमोहन सिंह था. वह अच्छे घर का पढ़ालिखा गबरू जाट था और आस्ट्रेलिया में अपना कारोबार करता था. राजविंदर कौर को मनमोहन और उस का परिवार कुलदीप के लिए पसंद आया. कुलदीप को भी मनमोहन सिंह पसंद था. दोनों परिवारों की रजामंदी के बाद सन 2008 में कुलदीप कौर और मनमोहन सिंह की शादी धूमधाम से संपन्न हो गई. इस शादी से सभी लोग खुश थे.

अचानक हो गई गगनदीप की मौत

खुशी का माहौल था, पर कहीं अनहोनी मुंह पसारे इस परिवार की खुशियों को लीलने के लिए घात लगाए बैठी थी. कुलदीप की शादी के कुछ दिनों बाद ही इस परिवार को तब बड़ा झटका लगा, जब अचानक गगनदीप की मौत हो गई.

गगनदीप की मौत का सदमा उस की मां राजविंदर कौर और उस के छोटे भाईबहन को भीतर तक तोड़ गया. कुलदीप की समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसे नाजुक मौके पर वह अपनी मां और छोटे भाई सरबजीत को अकेला छोड़ कर पति के साथ आस्ट्रेलिया जाए या यहीं रह कर उन का साथ दे.
संसार का नियम है, यहां लोग आतेजाते हैं, सब कुछ समय की गति से चलता रहता है. जबकि समय का चक्र और संसार के कामकाज कभी नहीं रुकते. वक्त का मरहम बड़े से बड़ा घाव भर देता है. बहरहाल, अपनी मां और भाई को दिलासा दे कर कुलदीप कौर अपने पति मनमोहन सिंह के साथ आस्ट्रेलिया चली गई. कुलदीप को आस्ट्रेलिया गए 10 साल बीत गए थे.

इस बीच वह सरताज सिंह और सम्राट सिंह 2 बच्चों की मां बन गई थी. उस के पीछे मायके में छोटे भाई सरबजीत सिंह की भी शगुनप्रीत कौर के साथ शादी हो गई थी. सरबजीत भी 2 बच्चों बेटी मनतलब कौर और बेटे वारिसदीप सिंह का बाप बन गया था. कुलदीप की अपनी मां और भाई से हर हफ्ते फोन पर बातें होती रहती थीं. सभी अपनीअपनी जिंदगी में मशगूल थे कि साल 2015 की एक मनहूस खबर ने कुलदीप को अंदर तक तोड़ कर रख दिया. इस घटना से राजविंदर कौर की तो जैसे दुनिया ही उजड़ गई थी. उसे अपने पति और बड़े बेटे गगनदीप की मौत का इतना दुख नहीं हुआ था, जितना दुख सरबजीत की मौत का हुआ.

सरबजीत की मौत बड़े रहस्यमय तरीके से हुई थी. वह रात को खाना खा कर ऐसा सोया कि सोता ही रह गया. सरबजीत अपने परिवार का एकमात्र सहारा था. उस की मौत से परिवार की गाड़ी पूरी तरह लड़खड़ा गई. वक्त ने ताजा जख्मों पर एक बार फिर से मरहम लगाया. राजविंदर कौर ने अपने आप को पूरी तरह से अकेला मान कर जीना सीख लिया था. समय का चक्र फिर से अपनी रफ्तार से चलने लगा. कुलदीप मां को फोन करकर के सांत्वना देती रहती थी. सैकड़ों मील दूर बैठी कुलदीप और कर भी क्या सकती थी. इसी तरह दिन गुजरते गए थे और साल 2016 आ गया.
दूसरे बेटे की मौत से टूट गई मां

कुलदीप कौर ने महसूस किया कि सरबजीत सिंह की मौत के बाद गांव से उस की मां के जो फोन आते थे, वह काफी मायूसी भरे होते थे. सुन कर कुलदीप को ऐसा लगता था, जैसे उस की मां बहुत परेशान और दुखी हैं. उस ने बहुत बार मां से इस बारे में पूछा भी था, पर मां ने उसे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया था. वह बहुत दुखी लग रही थीं. ज्यादा कुरेद कर पूछने पर राजविंदर ने सिर्फ इतना ही बताया कि पिछले कुछ समय से शगुन का चालचलन ठीक नहीं है.

कुलदीप कौर ने जब शगुन से इस बारे में बात की तो उस ने बताया, ‘‘दीदी, ऐसी कोई बात नहीं है. बीजी को एक तो बेटे की मौत का सदमा है, ऊपर से अकेलापन परेशान करता है. कभीकभी शुगर की बीमारी की वजह से भी उन्हें घबराहट होने लगती है. आप चिंता न करें, मैं सब संभाल लूंगी.’’

शगुन की गोलमोल बातें कुलदीप की समझ से बाहर थीं. वह अच्छी तरह जानती थी कि शगुन बहुत चालाक है. वह सच्ची बात कभी नहीं बताएगी. इसीलिए कुलदीप ने अपने गांव के कुछ खास लोगों को फोन कर के विनती की कि वे उस के घर हो रहे क्रियाकलापों पर नजर रखें. गांव के जानकार लोगों ने कुलदीप कौर की बात मान कर राजविंदर के घर पर नजर रखनी शुरू कर दी.

बाद में उन्होंने कुलदीप को बताया कि उस की मां के घर में सामने से तो सब कुछ ठीक नजर आता है. शगुन लोगों के सामने तो राजविंदर कौर का बहुत खयाल रखती है. बाकी उन की पीठ पीछे घर में सासबहू का आपस में कैसा बर्ताव है, कुछ कहा नहीं जा सकता. बहरहाल, ऐसा जवाब सुन कर कुलदीप कौर मन मसोस कर रह जाती थी और अपनी मां की सलामती की दुआ करती थी.

29 अक्तूबर, 2016 को शगुन ने कुलदीप कौर को आस्ट्रेलिया फोन कर के खबर दी कि बीजी का देहांत हो गया है. शगुन ने मौत की वजह राजविंदर का शुगर लेवल कम हो जाना बताया था. उन दिनों कुलदीप गर्भवती थी, डाक्टरों ने उसे यात्रा के लिए मना कर रखा था सो अपने घर के एकांत में कुलदीप ने छाती पीट कर मां की मौत का मातम मना लिया. अब उस के मायके के परिवार में सिवाय उस के कोई और नहीं बचा था. राजविंदर की मौत के बाद 2-4 बार शगुन के फोन उसे आए थे, पर वह बिना सिरपैर की बातें ही किया करती थी. एक बात थी जो हर समय कुलदीप को परेशान कर रही थी. उसे हर समय ऐसा लगता था जैसे उस की मां की मौत स्वाभाविक नहीं थी. जरूर उस के साथ कोई अनहोनी घटी थी, पर क्या हुआ और कैसे यह बात उस की समझ में नहीं आती थी.

मां सरबजीत की मौत के बाद शगुन गांव की कोठी और सारी जमीन की मालकिन बन गई थी. कुलदीप अकसर यह भी सोचा करती थी कि कहीं उस की मां की मौत किसी षडयंत्र की वजह से तो नहीं हुई.
बहरहाल, कुलदीप ने एक बार फिर से अपने गांव के भरोसेमंद लोगों से अपनी मां की मौत से परदा उठाने के लिए विनती की. इस बात का पता लगाने में गांव के कुछ खास लोगों को पौने 2 साल का समय लग गया.

जुलाई 2018 में कुलदीप कौर को सूचना मिली थी कि उस की मां राजविंदर कौर की मौत में उस की भाभी शगुन का हाथ था. यह सुन कर वह ज्यादा हैरान नहीं हुई, क्योंकि उसे शगुन पर शुरू से ही शक था. यह तो दूर का मामला था, अगर वह कहीं पास होती तो कब की अपनी मां की मौत से परदा उठा देती.
खैर, अब भी देर नहीं हुई थी और अब वह पूरी तरह से यात्रा करने लायक थी. बीती जुलाई के दूसरे सप्ताह में वह आस्ट्रेलिया से भारत अपने गांव पंजाब पहुंच गई. जब अपने मायके के घर पहुंच कर उस ने वहां का नजारा देखा तो हैरान रह गई. उस की मां के घर 2 अनजान आदमी बैठे शगुन के साथ हंसीमजाक कर रहे थे.

गुस्से से बिफरते हुए जब कुलदीप कौर ने पूछा, ‘‘भाभी, ये लोग कौन हैं?’’ तो शगुन ने मिमियाते हुए जवाब दिया, ‘‘दीदी, तुम्हारे भाई की मौत के बाद ये दोनों खेतों में काम करने में मदद करते हैं.’’

कुलदीप को शक हुआ भाभी पर

कुलदीप अच्छी तरह जानती थी कि शगुन जो बता रही है, बात वह नहीं है. पर उस वक्त उस ने चुप रहना ही बेहतर समझा. कुलदीप के आने की वजह से वे दोनों व्यक्ति वहां से चले गए. अगले दिन सुबह उठ कर कुलदीप नहाईधोई और गुरुद्वारे चली गई. अरदास के बाद वह अपने मौसा हरदयाल सिंह को साथ ले कर सीधे एसएसपी (देहात) अमृतसर परमपाल सिंह के पास जा पहुंची. कुलदीप ने अपनी मां की हत्या का शक जताते हुए उन्हें बताया कि मां की मौत में उस की भाभी और कुछ अन्य लोगों का हाथ है.

एसएसपी परमपाल सिंह ने कुलदीप द्वारा दिए प्रार्थनापत्र पर नोट लिख कर उसे संबंधित थाना मेहता भेज दिया. साथ ही उन्होंने थानाप्रभारी अमनदीप सिंह को फोन कर आदेश दिया कि इस मामले की गुत्थी जल्द से जल्द सुलझाएं. कुलदीप कौर ने उसी दिन थानाप्रभारी अमनदीप से मिल कर आस्ट्रेलिया जाने से ले कर अपनी गैरहाजिरी में अपने भाई और मां की मौत का सारा हाल विस्तार से कह सुनाया. कुलदीप कौर की पूरी बात सुनने के बाद अमनदीप सिंह ने तत्काल अपने खास मुखबिरों को शगुन और उस के साथियों की कुंडली खंगालने के काम पर लगा दिया. जल्दी ही उन्हें रिपोर्ट भी मिल गई.

एसएसपी के आदेश पर उन्होंने कुलदीप कौर की शिकायत को आधार बना कर उसी दिन यानी 30 जुलाई, 2018 को राजविंदर कौर की हत्या का मुकदमा भादंसं की धारा 302, 201, 120बी और 34 पर दर्ज कर के काररवाई शुरू कर दी. अमनदीप सिंह ने उसी दिन एएसआई कमलबीर सिंह, हवलदार जतिंदर सिंह, महिंदरपाल सिंह, कांस्टेबल महकप्रीत सिंह और लेडी हवलदार हरजिंदर कौर को साथ ले कर बुट्टर गांव पहुंचे और देर शाम शगुनप्रीत कौर और उस के आशिक सतनाम सिंह को हिरासत में ले लिया.

हत्या के इस मामले का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह भाग निकला था. संभवत: उसे पुलिस काररवाई की भनक लग गई थी. जसबीर की गिरफ्तारी के लिए पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी, पर वह पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस ने की काररवाई

थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने जब शगुनप्रीत और सतनाम सिंह से पूछताछ की तो दोनों आरोपियों ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. इस के बाद उसी दिन राजविंदर कौर की हत्या के आरोप में शगुन और सतनाम सिंह को अदालत में पेश कर आगामी पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में राजविंदर की मौत की जो कहानी पता चली, वह कुछ इस तरह थी—
शगुनप्रीत कौर बचपन से ही दिलफेंक और महत्त्वाकांक्षी थी. शादी से पहले अपने गांव में उस के कई युवकों के साथ नाजायज संबंध थे.

अपने पति सरबजीत की मौत से पहले भी उस का गांव के कई युवकों के साथ नैनमटक्का चल रहा था, पर परदे के पीछे. क्योंकि तब उसे अपने पति का डर था.
लेकिन पति की मौत के बाद उस ने सरेआम यारियां जोड़नी शुरू कर दी थीं. अब उसे रोकनेटोकने वाला नहीं था. शगुन के अपने गांव के ही एक युवक सतनाम सिंह के साथ नाजायज संबंध बन गए थे. सतनाम आवारा आदमी था और नशीली वस्तुएं बेचता था.

शगुन ने प्रेमी के साथ बनाई योजना

जसबीर सिंह सतनाम के नशे के धंधे में उस का भागीदार था. उसे जब शगुन और सतनाम के संबंधों का पता चला तो बहती गंगा में हाथ धोने के लिए वह भी मचलने लगा. शगुन को इस बात से कोई ऐतराज नहीं था, बल्कि वह खुश थी कि उस के 2-2 चाहने वाले हैं. सरबजीत की मौत के बाद सतनाम सिंह शगुन के ही घर पर रहने लगा था.

यह बात राजविंदर को मंजूर नहीं थी. सतनाम के वहां रहने का वह विरोध करती थी. शगुन अपनी मनमानी पर उतर आई थी. उसे न तो सास का कोई डर था और न शरम. वह तो बस हवा में उड़ी चली जा रही थी.
जब राजविंदर कौर का विरोध बढ़ गया तो शगुन ने उसे रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. इस के 2 फायदे थे, एक तो राजविंदर की मौत के बाद उसे कोई रोकनेटोकने वाला नहीं रहता और दूसरे सारी जमीनजायदाद उस के नाम हो जाती.

यह अलग बात थी कि राजविंदर की मौत के बाद सब कुछ उसे ही मिलने वाला था, पर उसे सब्र नहीं था. दूसरे उसे यह भी डर था कि मरने से पहले राजविंदर जायदाद किसी और के नाम न कर जाएं.
शगुनप्रीत और उस के आशिक सतनाम सिंह ने मिल कर राजविंदर कौर की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उन्होंने गांव के ही जसबीर सिंह को चुना और उसे ढाई लाख रुपए देने का वादा कर के तैयार कर लिया.

अपनी योजना के अनुसार, 28 अक्तूबर 2016 की आधी रात को तीनों ने मिल कर सोते समय राजविंदर कौर को गला दबा कर मार डाला. अगली सुबह योजना के तहत शगुन ने कुछ देर गांव वालों के सामने राजविंदर की बीमारी का नाटक रचा और बाद में शोर मचा कर यह खबर फैला दी कि शुगर लेवल कम होने की वजह से राजविंदर की मौत हो गई है. इतना ही नहीं, वह इतनी शातिर निकली कि रिश्तेदारों को बताए बिना ही जल्दबाजी में गांव के कुछ लोगों को साथ ले कर सास का अंतिम संस्कार भी करा दिया. बाद में उस ने कुलदीप कौर को भी फोन कर के इस की खबर दे दी थी.

राजविंदर कौर की हत्या की योजना में शगुन और सतनाम सिंह ने ढाई लाख रुपए की सुपारी दे कर जसबीर को अपने साथ शामिल तो कर लिया था, पर हत्या के बाद उन्होंने उसे पैसे देने से इनकार कर दिया था. जसबीर काफी समय तक उन से पैसे मांगता रहा, जब उन्होंने पैसे देने से बिलकुल इनकार कर दिया तो गुस्से में आ कर उस ने गांव के कुछ लोगों के सामने इस बात का खुलासा कर दिया. गांव वाले पहले से ही तीनों पर नजर रखे हुए थे, सो उन्होंने यह खबर फोन द्वारा कुलदीप को दे दी.

रिमांड की अवधि समाप्त होने पर थानाप्रभारी अमनदीप सिंह ने शगुनप्रीत कौर और उस के प्रेमी सतनाम सिंह को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जिला जेल भेज दिया गया. इस अपराध का तीसरा आरोपी जसबीर सिंह फरार था. Family Dispute

पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Stories: आखिरी फैसला – साधना बनी अपनों की कातिल

Crime Stories: उस दिन सितंबर, 2020 की 10 तारीख थी. साधना ने फैसला कर रखा था कि मां का बताया व्रत जरूर रखेगी. मां के अनुसार, इस व्रत से सुंदर स्वस्थ पुत्र की प्राप्ति होती है. लेकिन व्रत रखने से पहले ही लेबर पेन शुरू हो गया.

इस में उस के अपने वश में कुछ नहीं था, क्योंकि उसे 2 दिन बाद की तारीख बताई गई थी. निश्चित समय पर वह मां बनी, लेकिन पुत्र नहीं पुत्री की. तीसरी बार भी बेटी आई है, सुन कर सास विमला का गुस्से से सिर भन्ना गया. वह सिर झटक कर वहां से चली गई. बच्ची के जन्म पर मां बिटोली आ गई थी. उस ने साधना को समझाया, ‘‘जी छोटा मत कर. बेटी लक्ष्मी का रूप होती है. क्या पता इस की किस्मत से मिल कर तेरी किस्मत बदल जाए.’’बेटी के मन पर छाई उदासी पर पलटवार करने के लिए मां बिटोली बोली, ‘‘आजकल बेटेबेटी में कोई फर्क नहीं होता. तेरी सास के दिमाग में पता नहीं कैसा गोबर भरा है जो समझती ही नहीं या जानबूझ कर समझना नहीं चाहती.’’

साधना क्या कर सकती थी. 2 की तरह तीसरी को भी किस्मत मान लिया. उसे भी बाकी 2 की तरह पालने लगी. वह भी बहनों की तरह बड़ी होने लगी.उस दिन अक्तूबर 2020 की पहली तारीख थी. सेहुद गांव निवासी कुलदीप खेतों से घर लौटा, तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था. उस ने दरवाजा खुलवाने के लिए कुंडी खटखटाई, पर पत्नी ने दरवाजा नहीं खोला. घर के अंदर से टीवी चलने की आवाज आ रही थी. उस ने सोचा शायद टीवी की तेज आवाज में उसे कुंडी खटकने की आवाज सुनाई न दी हो. उस ने एक बार फिर कुंडी खटखटाने के साथ आवाज भी लगाई. पर अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई. कुलदीप का माथा ठनका. मन में घबराहट भी होने लगी.

उस के घर के पास ही भाई राहुल का घर था तथा दूसरी ओर पड़ोसी सुदामा का घर. भाई घर पर नहीं था. वह सुदामा के पास पहुंचा और बोला, ‘‘चाचा, साधना न तो दरवाजा खोल रही है और न ही कोई हलचल हो रही है. मेरी मदद करो.’’

कुलदीप पड़ोसी सुदामा को साथ ले कर भाई राहुल के घर की छत से हो कर अपने घर में घुसा. दोनों कमरे के पास पहुंचे तो मुंह से चीख निकल गई. कमरे के अंदर छत की धन्नी से लोहे के कुंडे के सहारे चार लाशें फांसी के फंदे पर झूल रही थीं. लाशें कुलदीप की पत्नी साधना और उस की बेटियों की थीं. कुलदीप और सुदामा घर का दरवाजा खोल कर बाहर आए और इस हृदयविदारक घटना की जानकारी पासपड़ोस के लोगों को दी. उस के बाद तो पूरे गांव में सनसनी फैल गई और लोग कुलदीप के घर की ओर दौड़ पड़े. देखते ही देखते घर के बाहर भीड़ उमड़ पड़ी. जिस ने भी इस मंजर को देखा, उसी का कलेजा कांप उठा.

कुलदीप बदहवास था, लेकिन सुदामा का दिलोदिमाग काम कर रहा था. उस ने सब से पहले यह सूचना साधना के मायके वालों को दी, फिर थाना दिबियापुर पुलिस को.पुलिस आने के पहले ही साधना के मातापिता, भाई व अन्य घर वाले टै्रक्टर पर लद कर आ गए. उन्होंने साधना व उस की मासूम बेटियोें को फांसी के फंदे पर झूलते देखा तो उन का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने कुलदीप व उस के पिता कैलाश बाबू के घर जम कर उत्पात मचाया. घर में टीवी, अलमारी के अलावा जो भी सामान मिला तोड़ डाला. साधना के सासससुर, पति व देवर के साथ हाथापाई की.

साधना के मायके के लोग अभी उत्पात मचा ही रहे थे कि सूचना पा कर थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा पुलिस टीम के साथ आ गए. उन्होंने किसी तरह समझाबुझा कर उन्हें शांत किया. चूंकि घटनास्थल पर भीड़ बढ़ती जा रही थी, अत: थानाप्रभारी मिश्रा ने इस घटना की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी और घटनास्थल पर अतिरिक्त पुलिस बल भेजने की सिफारिश की. इस के बाद वह भीड़ को हटाते हुए घर में दाखिल हुए. घर के अंदर आंगन से सटा एक बड़ा कमरा था. इस कमरे के अंदर का दृश्य बड़ा ही डरावना था. कमरे की छत की धन्नी में लोहे का एक कुंडा था. इस कुंडे से 4 लाशें फांसी के फंदे से झूल रही थीं.

मरने वालो में कुलदीप की पत्नी साधना तथा उस की 3 मासूम बेटियां थीं. साधना की उम्र 30 साल के आसपास थी, जबकि उस की बड़ी बेटी गुंजन की उम्र 7 साल, उस से छोेटी अंजुम थी. उस की उम्र 5 वर्ष थी. सब से छोेटी पूनम की उम्र 2 माह से भी कम लग रही थी. साड़ी के 4 टुकड़े कर हर टुकड़े का एक छोर कुंडे में बांध कर फांसी लगाई गई थी. कमरे के अंदर लकड़ी की एक छोटी मेज पड़ी थी. संभवत: उसी मेज पर चढ़ कर फांसी का फंदा लगाया गया था.

थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा अभी निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी सुनीति तथा एएसपी कमलेश कुमार दीक्षित कई थानों की पुलिस ले कर घटनास्थल आ गए.उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. पुलिस अधिकारियों ने तनाव को देखते हुए सेहुद गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया. उस के बाद घटनास्थल का निरीक्षण किया. मां सहित मासूमों की लाश फांसी के फंदे पर झूलती देख कर एसपी सुनीति दहल उठीं. उन्होंने तत्काल लाशों को फंदे से नीचे उतरवाया. उस समय माहौल बेहद गमगीन हो उठा.मृतका साधना के मायके की महिलाएं लाशों से लिपट कर रोने लगीं. सुनीति ने महिला पुलिस की मदद से उन्हें समझाबुझा कर शवों से दूर किया.

फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. घटनास्थल पर मृतका का भाई बृजबिहारी तथा पिता सिपाही लाल मौजूद थे. पुलिस अधिकारियों ने उन से पूछताछ की तो बृजबिहारी ने बताया कि उस की बहन साधना तथा मासूम भांजियों की हत्या उस के बहनोई कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू, भाई राहुल तथा मां विमला देवी ने मिल कर की है.जुर्म छिपाने के लिए शवों को फांसी पर लटका दिया है. अत: जब तक उन को गिरफ्तार नहीं किया जाता, तब तक वे शवों को नहीं उठने देंगे. सिपाही लाल ने भी बेटे की बात का समर्थन किया.

बृजबिहारी की इस धमकी से पुलिस के माथे पर बल पड़ गए. लेकिन माहौल खराब न हो, इसलिए पुलिस ने मृतका के पति कुलदीप, ससुर कैलाश बाबू, सास विमला देवी तथा देवर राहुल को हिरासत में ले लिया तथा सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें थाना दिबियापुर भिजवा दिया. सच्चाई का पता लगाने के लिए पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप के पड़ोसी सुदामा से पूछताछ की. सुदामा ने बताया कि कुलदीप जब खेत से घर आया था, तो घर का दरवाजा बंद था. दरवाजा पीटने और आवाज देने पर भी जब उस की पत्नी साधना ने दरवाजा नहीं खोला, तब वह मदद मांगने उस के पास आया. उस के बाद वे दोनों छत के रास्ते घर के अंदर कमरे में गए, जहां साधना बेटियों सहित फांसी पर लटक रही थी.

सुदामा ने कहा कि कुलदीप ने पत्नी व बेटियों को नहीं मारा बल्कि साधना ने ही बेटियों को फांसी पर लटकाया और फिर स्वयं भी फांसी लगा ली. निरीक्षण और पूछताछ के बाद एसपी सुनीति ने मृतका साधना व उस की मासूम बेटियों के शवों को पोस्टमार्टम के लिए औरैया जिला अस्पताल भिजवा दिया. डाक्टरों की टीम ने कड़ी सुरक्षा के बीच चारों शवों का पोस्टमार्टम किया, वीडियोग्राफी भी कराई गई. इस के बाद रिपोर्ट पुलिस को सौंप दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मासूम गुंजन, अंजुम व पूनम की हत्या गला दबा कर की गई थी, जबकि साधना ने आत्महत्या की थी. रिपोर्ट से स्पष्ट था कि साधना ने पहले अपनी तीनों मासूम बेटियों की हत्या की फिर बारीबारी से उन्हें फांसी के फंदे पर लटकाया. उस के बाद स्वयं भी उस ने फांसी के फंदे पर लटक कर आत्महत्या कर ली. उस ने ऐसा शायद इसलिए किया कि वह मरतेमरते भी जिगर के टुकड़ों को अपने से दूर नहीं करना चाहती थी.

थाने पर पुलिस अधिकारियों ने कुलदीप तथा उस के मातापिता व भाई से पूछताछ की. कुलदीप के पिता कैलाश बाबू ने बताया कि कुलदीप व साधना के बीच अकसर झगड़ा होता था, जिस से आजिज आ कर उन्होंने कुलदीप का घर जमीन का बंटवारा कर कर दिया था. वह छोटे बेटे राहुल के साथ अलग रहता है. उस का कुलदीप से कोई वास्ता नहीं था. पूछताछ के बाद पुलिस ने कैलाश बाबू उस की पत्नी विमला तथा बेटे राहुल को थाने से घर जाने दिया, लेकिन मृतका साधना के भाई बृजबिहारी की तहरीर पर कुलदीप के खिलाफ भादंवि की धारा 309 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली और उसे विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में घर कलह की सनसनीखेज घटना सामने आई.

गांव अमानपुर, जिला औरेया का सिपाही लाल दिबियापुर में रेलवे ठेकेदार के अधीन काम करता था. कुछ उपजाऊ जमीन भी थी, जिस से उस के परिवार का खर्च आसानी से चलता था. सिपाही लाल की बेटी साधना जवान हुई तो उस ने 12 फरवरी, 2012 को उस की शादी सेहुद गांव निवासी कैलाश बाबू के बेटे कुलदीप के साथ कर दी. लेकिन कुलदीप की मां विमला न बहू से खुश थी, न उस के परिवार से.

साधना और कुलदीप ने जैसेतैसे जीवन का सफर शुरू किया. शादी के 2 साल बाद साधना ने एक बेटी गुंजन को जन्म दिया. गुंजन के जन्म से साधना व कुलदीप तो खुश थे, लेकिन साधना की सास विमला खुश नहीं थी, क्योंकि वह पोते की आस लगाए बैठी थी. बेटी जन्मने को ले कर वह साधना को ताने कसने लगी थी. घर की मालकिन विमला थी. बापबेटे जो कमाते थे, विमला के हाथ पर रखते थे. वही घर का खर्च चलाती थी. साधना को भी अपने खर्च के लिए सास के आगे ही हाथ फैलाना पड़ता था. कभी तो वह पैसे दे देती थी, तो कभी झिड़क देती थी. तब साधना तिलमिला उठती थी. साधना पति से शिकवाशिकायत करती, तो वह उसे ही प्रताडि़त करता.

गुंजन के जन्म के 2 साल बाद साधना ने जब दूसरी बेटी अंजुम को जन्म दिया तो लगा जैसे उस ने कोई गुनाह कर दिया हो. घर वालों का उस के प्रति रवैया ही बदल गया. सासससुर, पति किसी न किसी बहाने साधना को प्रताडि़त करने लगे. सास विमला आए दिन कोई न कोई ड्रामा रचती और झूठी शिकायत कर कुलदीप से साधना को पिटवाती. विमला को साधना की दोनों बेटियां फूटी आंख नहीं सुहाती थीं. वह उन्हें दुत्कारती रहती थी.

बेटियों के साथसाथ वह साधना को भी कोसती, ‘‘हे भगवान, मेरे तो भाग्य ही फूट गए जो इस जैसी बहू मिली. पता नहीं मैं पोते का मुंह देखूंगी भी या नहीं.’’

धीरेधीरे बेटियों को ले कर घर में कलह बढ़ने लगी. कुलदीप और साधना के बीच भी झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साधना मायके चली गई. जब कई माह तक वह ससुराल नहीं आई, तो विमला की गांव में थूथू होने लगी. बदनामी से बचने के लिए उस ने पति कैलाश बाबू को बहू को मना कर लाने को कहा. कैलाश बाबू साधना को मनाने उस के मायके गए. वहां उन्होंने साधना के मातापिता से बातचीत की और साधना को ससुराल भेजने का अनुरोध किया, लेकिन साधना के घर वालों ने प्रताड़ना का आरोप लगा कर उसे भेजने से साफ मना कर दिया.

मुंह की खा कर कैलाश बाबू लौट आए. उन्होंने वकील से कानूनी सलाह ली और फिर साधना को विदाई का नोटिस भिजवा दिया. इस नोटिस से साधना के घर वाले तिलमिला उठे और उन्होंने साधना के मार्फत थाना सहायल में कुलदीप तथा उस के घर वालों के खिलाफ घरेलू हिंसा का मुकदमा दर्ज करा दिया. इस के अलावा औरैया कोर्ट में कुलदीप के खिलाफ भरणपोषण का मुकदमा भी दाखिल कर दिया. जब कुलदीप तथा उस के पिता कैलाश बाबू को घरेलू हिंसा और भरणपोषण के मुकदमे की जानकारी हुई तो वह घबरा उठे. गिरफ्तारी से बचने के लिए कैलाश बाबू समझौते के लिए प्रयास करने लगे. काफी मानमनौव्वल के बाद साधना राजी हुई. कोर्ट से लिखापढ़ी के बाद साधना ससुराल आ कर रहने लगी.

कुछ माह बाद कैलाश बाबू ने घर, जमीन का बंटवारा कर दिया. उस के बाद साधना पति कुलदीप के साथ अलग रहने लगी. साधना पति के साथ अलग जरूर रहने लगी थी, लेकिन उस का लड़नाझगड़ना बंद नहीं हुआ था. सास के ताने भी कम नहीं हुए थे. वह बेटियों को ले कर अकसर ताने मारती रहती थी. कभीकभी साधना इतना परेशान हो जाती कि उस का मन करता कि वह आत्महत्या कर ले. लेकिन बेटियों का खयाल आता तो वह इरादा बदल देती.

10 सितंबर, 2020 को साधना ने तीसरी संतान के रूप में भी बेटी को ही जन्म दिया, नाम रखा पूनम. पूनम के जन्म से घर में उदासी छा गई. सब से ज्यादा दुख विमला को हुआ. उस ने फिर से साधना को ताने देने शुरू कर दिए. छठी वाले दिन साधना की मां विटोली भी आई. उस रोज विमला और विटोली के बीच खूब नोंकझोंक हुई. सास के ताने सुनसुन कर साधना रोती रही. विटोली बेटी को समझा कर चली गई. उस के बाद साधना उदास रहने लगी. वह सोचने लगी क्या बेटी पैदा होना अभिशाप है? अब तक साधना सास के तानों और पति की प्रताड़ना से तंग आ चुकी थी.

अत: वह आत्महत्या करने की सोचने लगी. लेकिन खयाल आया कि अगर उस ने आत्महत्या कर ली तो उस की मासूम बेटियों का क्या होगा. उस का पति शराबी है, वह उन की परवरिश कैसे करेगा. वह या तो बेटियों को बेच देगा या फिर भूखे भेडि़यों के हवाले कर देगा. सोचविचार कर साधना ने आखिरी फैसला लिया कि वह मासूम बेटियों को मार कर बाद में आत्महत्या करेगी.1 अक्तूबर, 2020 की सुबह 7 बजे कुलदीप खेत पर काम करने चला गया. उस के जाने के बाद साधना ने मुख्य दरवाजा बंद किया और टीवी की आवाज तेज कर दी. फिर उस ने साड़ी के 4 टुकड़े किए और इन के एकएक सिरे को मेज पर चढ़ कर छत की धन्नी में लगे लोहे के कुंडे में बांध दिया.

साड़ी के टुकड़ों के दूसरे सिरे को उस ने फंदा बनाया. उस समय गुंजन और अंजुम चारपाई पर सो रही थीं. साधना ने कलेजे पर पत्थर रख कर बारीबारी से गला दबा कर उन दोनों को मार डाला फिर उन के शवों को फांसी के फंदे पर लटका दिया. 21 दिन की मासूम पूनम का गला दबाते समय साधना के हाथ कांपने लगे आंखों से आंसू टपकने लगे. लेकिन जुनून के आगे ममता हार गई और उस ने उस मासूम को भी गला दबा कर मार डाला और फांसी के फंदे पर लटका दिया. इस के बाद वह स्वयं भी गले में फंदा डाल कर झूल गई.

घटना की जानकारी तब हुई जब कुलदीप घर वापस आया. पड़ोसी सुदामा ने घटना की सूचना मोबाइल फोन द्वारा थाना दिबियापुर पुलिस को दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी सुधीर कुमार मिश्रा आ गए. उन्होंने शवों को कब्जे में ले कर जांच शुरू की तो घर कलह की घटना प्रकाश में आई. 2 अक्टूबर, 2020 को थाना दिबियापुर पुलिस ने अभियुक्त कुलदीप को औरैया कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Crime Stories

Family Crime: काली नजर का प्यार – वर्षा ने क्यों किया पति पर वार

Family Crime: जिला हमीरपुर का एक बड़ा कस्बा है राठ. मूलत: मध्य प्रदेश के गांव सरमेड़ के रहने वाले मूलचंद्र अनुरागी का परिवार राठ के मोहल्ला भटियानी में रहता था. परिवार में पत्नी सरस्वती के अलावा 2 बेटे वीरेंद्र व अनिल थे. गांव में मूलचंद्र का पुश्तैनी मकान व जमीन थी. वह खुद गांव में रह कर घरजमीन की देखरेख करता था.

पत्नीबच्चों से मिलने वह राठ आताजाता रहता था. मूलचंद्र की पत्नी सरस्वती, राठ स्थित नवोदय विद्यालय में रसोइया थी. वह छात्रावास में रहने वाले छात्रों के लिए खाना बनाती थी. सरस्वती का बड़ा बेटा वीरेंद्र मिठाई की एक दुकान में काम करता था. वीरेंद्र बताशा बनाने का उम्दा कारीगर था, जबकि छोटा बेटा अनिल राठ की ही एक जूता बनाने वाली फैक्ट्री में नौकरी कर रहा था. चूंकि सरस्वती और उस के दोनों बेटे कमाते थे, सो घर की आर्थिक स्थिति ठीक थी.

सरस्वती बेटों के साथ खुशहाल तो थी, लेकिन घर में बहू की कमी थी. वह वीरेंद्र की शादी को लालायित रहती थी. वीरेंद्र अनुरागी जिस दुकान में काम करता था, उसी में अशोक नाम का एक युवक काम करता था. अशोक राठ कस्बे से आधा किलोमीटर दूर स्थित सैदपुर गांव का रहने वाला था. अशोक की छोटी बहन वर्षा अकसर उसे लंच देने आया करती थी. जयराम की 2 ही संतानें थीं अशोक और वर्षा. कुछ साल पहले जयराम की मृत्यु हो चुकी थी. मां चंदा देवी ने उन दोनों को तकलीफें सह कर बड़ा किया था. आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण अशोक और वर्षा ज्यादा पढ़लिख नहीं सके थे.

अशोक 10वीं कक्षा छोड़ कर नौकरी करने लगा था, जबकि वर्षा 10वीं कक्षा पास करने के बाद मां के घरेलू कामों में हाथ बंटाने लगी थी. 20 वर्षीय वर्षा गोरीचिट्टी, छरहरी काया की युवती थी. नैननक्श भी तीखे थे. सब से खूबसूरत थी उस की आंखें. खुमार भरी गहरी आंखें. उस की आंखों में ऐसी कशिश थी कि जो उन में देखे, खो सा जाए.

एक दिन वर्षा अपने भाई अशोक को लंच देने दुकान पर आई. वीरेंद्र की नजरें वर्षा की नजरों से मिलीं, तो वह उन में मानो डूब सा गया. जी में आया, उन्हीं खुमार भरी आंखों की अथाह गहराइयों में पूरी उम्र डूबा रहे. खुद भी उबरना चाहे तो उबर न सके. कुछ पल के लिए आंखों से आंखें मिली थीं, लेकिन उन्हीं लम्हों में वीरेंद्र वर्षा की आंखों पर फिदा हो गया. इस के बाद वर्षा की आंखें उस की सोच की धुरी बन गईं. उस दिन के बाद वीरेंद्र को वर्षा के आने का इंतजार रहने लगा. हालांकि अशोक से बोलचाल पहले से थी, लेकिन वर्षा तक पहुंच बनाने के लिए उस ने उस से संबंध प्रगाढ़ बना लिए. इन्हीं संबंधों की आड़ में उस ने वर्षा से परिचय भी कर लिया.

वर्षा से परिचय हुआ तो बेइमान कर देने वाली उस की नजरें वीरेंद्र का दिल और तड़पाने लगीं. अब वीरेंद्र को इंतजार था उस पल का, जब वर्षा अकेले में मिले और वह उस से अपने दिल की बात कह सके.
किस्मत ने एक रोज उसे यह मौका भी मुहैया करा दिया. उस रोज वर्षा भाई को खाना खिला कर जाने लगी, तो ताक में बैठा वीरेंद्र उस के पीछेपीछे चल पड़ा. तेज कदमों से वह वर्षा के बराबर में पहुंचा. वर्षा ने सिर घुमा कर वीरेंद्र को देखा और मुसकराने लगी.

वीरेंद्र बोला, ‘‘मुझे तुम से एक जरूरी बात कहनी है.’’

वर्षा के कदम पहले की तरह बढ़ते रहे, ‘‘बोलो.’’

‘‘मुझे जो कहना है, सड़क चलते नहीं कह सकता.’’

सहसा वीरेंद्र की नजर कुछ दूर स्थित पार्क पर पड़ी, ‘‘चलो, वहां पार्क में बैठते हैं. सुकून से बात हो जाएगी.’’
‘‘चलो,’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘तुम्हारी बात सुन लेती हूं.’’

वे दोनों पार्क में जा कर बैठ गए. उस के बाद वर्षा वीरेंद्र से मुखातिब हुई, ‘‘अब बोलो, क्या कहना है?’’
वीरेंद्र के पास भूमिका बनाने का समय नहीं था. अत: उस ने सीधे तौर पर अपनी बात कह दी, ‘‘तुम्हारी आंखें बहुत हसीन हैं.’’

वर्षा की मुसकराहट गाढ़ी हो गई, ‘‘और मैं?’’
‘‘जिस की आंखें इतनी हसीन हैं, कहने की जरूरत नहीं कि वह कितनी हसीन होगी.’’
वर्षा ने उसे गहरी नजरों से देखा, ‘‘तुम मेरे हुस्न की तारीफ करने के लिए यहां ले कर आए हो या कुछ और कहना है?’’

वीरेंद्र ने महसूस किया कि वर्षा प्यार का सिलसिला शुरू करने के लिए उकसा रही है. अत: उस के दिल की बात जुबान से बयां हो गई, ‘‘तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. मुझे तुम से प्यार हो गया है.’’

कुछ देर तक वर्षा उस की आंखों में देखती रही, फिर आहिस्ता से बोली, ‘‘प्यार ही तो ऐसी चीज है, जिस पर न दुनिया का कोई कानून लागू नहीं होता, न इसे दबाया या छिपाया जा सकता है. लेकिन प्यार के कुछ तकाजे भी होते हैं.’’

वीरेंद्र ने धड़कते दिल से पूछा, ‘‘कैसे तकाजे?’’

‘‘वफा, ईमानदारी और जिंदगी भर साथ निभाने का जज्बा.’’

वीरेंद्र समझ गया कि वर्षा कहना चाहती है कि वह उस का प्यार कबूल तो कर सकती है, मगर शर्त यह है कि उसे शादी करनी होगी. उस वक्त वीरेंद्र के सिर पर वर्षा को पाने का जुनून था, सो उस ने कह दिया, ‘‘मैं टाइमपास करने के लिए तुम्हारी तरफ प्यार का हाथ नहीं बढ़ा रहा हूं, बल्कि संजीदा हूं. मैं तुम से शादी कर के वफा और ईमानदारी से साथ निभाऊंगा.’’

दरअसल वर्षा अपनी मां की मजबूरियां जानती थी. चंदा देवी ने बहुत तकलीफें उठा कर पति का इलाज कराया था. इलाज में उस पर जो कर्ज चढ़ा था, उस की भरपाई होने में बरसों लग जाने थे. परिवार में कोई ऐसा न था जो युवा हो चुकी वर्षा के भविष्य के बारे में सोचता. मां बेटी को दुलहन बना कर विदा कर पाने की हैसियत में नहीं थी. छोटा भाई अशोक खुद अपनी जिम्मेदारियों से जूझ रहा था. अत: वर्षा को अपने भविष्य का निर्णय स्वयं करना था.

वर्षा 20 साल की भरीपूरी युवती थी. उस के मन में किसी का प्यार पाने और स्वयं भी उसे टूट कर चाहने की हसरत थी. मन में इच्छा थी कि कोई उसे चाहने वाला मिल जाए, तो वह जीवन भर के लिए उस का हाथ थाम ले. इस तरह उस का भी जीवन संवर जाएगा और वह भी अपनी गृहस्थी, पति व बच्चों में रमी रहेगी. लोग गलत नहीं कहते, इश्क पहली नजर में होता है. वर्षा के दिल में भी तब से हलचल मचनी शुरू हो गई थी, जब वीरेंद्र से पहली बार उस की नजरें मिली थीं.

वर्षा की आंखें खूबसूरत थीं, तो वीरेंद्र की आंखों में भी प्यार ही प्यार था. उस पल से ही वीरेंद्र वर्षा की सोच का केंद्र बन गया था. वर्षा ने जितना सोचा, उतना ही उस की ओर आकर्षित होती गई. वर्षा का मानना था कि वीरेंद्र अच्छा और सच्चा आशिक साबित हो सकता है. उस के साथ जिंदगी मजे से गुजर जाएगी. वर्षा ने यह भी निर्णय लिया कि जब कभी भी वीरेंद्र प्यार का इजहार करेगा, तो वह मुहब्बत का इकरार कर लेगी. उम्मीद के मुताबिक उस दिन वीरेंद्र ने अपनी चाहत जाहिर की, तो वर्षा ने उस का प्यार कबूल कर लिया. उस दिन से वर्षा और वीरेंद्र का रोमांस शुरू हो गया.

वर्षा के प्रेम की जानकारी उस की मां चंदा देवी और भाई अशोक को भी हो गई थी. चूंकि वर्षा और वीरेंद्र शादी करना चाहते थे, सो उन दोनों ने उन के प्यार पर ऐतराज नहीं किया. एक प्रकार से वर्षा को मां और भाई का मूक समर्थन मिल गया था. दूसरी ओर वर्षा वीरेंद्र के जितना करीब आ रही थी, उतना ही उसे लग रहा था कि अभी वह वीरेंद्र को ठीक से समझ नहीं पाई, अभी उसे और समझना बाकी है. अत: वीरेंद्र को समझने के लिए वर्षा ने उस के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने का मन बना लिया. सोचा वीरेंद्र उस की अपेक्षाओं के अनुरूप साबित हुआ, तो उस से शादी कर लेगी. कसौटी पर खरा न उतरा, तो दोनों अपने रास्ते अलग कर लेंगे.

वर्षा को लिवइन रिलेशनशिप में भी दोहरा लाभ नजर आ रहा था. पहला लाभ यह है कि वीरेंद्र को ठीक से समझ लेगी. दूसरा लाभ यह कि अपनी जवानी को घुन नहीं लगाना पड़ेगा. वीरेंद्र उस की देह का सुख भोगेगा, तो वह भी वीरेंद्र के जिस्म से आनंद पाएगी.

एक रोज जब वर्षा और वीरेंद्र का आमनासामना हुआ और बातचीत का सिलसिला जुड़ा तो वीरेंद्र ने जल्द शादी करने का प्रस्ताव रखा. इस पर वर्षा बोली, ‘‘मुझे शादी की जल्दी नहीं है बल्कि हमें अभी एकदूसरे को समझने की जरूरत है.’’

‘‘6 महीने से हमारा रोमांस चल रहा है,’’ वीरेंद्र के शब्दों में हैरानी थी, ‘‘और अब तक तुम मुझे समझ नहीं पाई.’’

‘‘समझी तो हूं, लेकिन उतना नहीं जितना जीवन भर साथ रहने के लिए समझना चाहिए.’’

‘‘पूरी तरह समझने में कितना वक्त लगेगा?’’ वीरेंद्र ने उदास मन से पूछा.

कुछ देर गहरी सोच में डूबे रहने के बाद वर्षा ने जवाब दिया, ‘‘शायद 6 महीने और.’’

‘‘और इस दौरान मेरा क्या होगा?’’ वीरेंद्र ने पूछा.

वर्षा के होंठों पर मुसकान आई, ‘‘तुम्हारे साथ मैं भी रहूंगी.’’

वीरेंद्र के सिर पर हैरत का पहाड़ टूट पड़ा, ‘‘बिन ब्याहे मेरे साथ रहोगी.’’

‘‘इस में बुरा क्या है?’’ वर्षा मुसकराई, ‘‘नए जमाने के साथ लोगों की सोच और जिंदगी के तरीके भी बदलते रहते हैं. शहरों कस्बों में बहुत सारे लोग लिवइन रिलेशनशिप में रह रहे हैं, हम भी रह लेंगे.’’
‘‘यानी कि शादी किए बिना ही तुम घर रहोगी.’’

वर्षा ने वीरेंद्र की ही टोन में जवाब दिया, ‘‘बेशक.’’

चूंकि वीरेंद्र वर्षा का दीवाना था. अत: जब वर्षा ने वीरेंद्र के सामने लिवइन रिलेशनशिप का प्रस्ताव रखा तो वह फौरन राजी हो गया. इधर वीरेंद्र ने अपने व वर्षा के प्रेम संबंधों की जानकारी मां को दी तो सरस्वती भड़क उठी. उस ने वीरेंद्र से साफ कह दिया कि वह बिनब्याही लड़की को घर में नहीं रख सकती. उस ने कोई बवाल कर दिया तो हम सब फंस जाएंगे. बदनामी भी होगी.

इस पर वीरेंद्र ने मां को समझाया कि वे दोनों एकदूसरे से प्रेम करते हैं. 6 महीने बीतते ही शादी कर लेंगे. वर्षा के घर वालों को भी साथ रहने में कोई ऐतराज नहीं है. इस बीच हम लोग वर्षा को परख भी लेंगे कि वह घर की बहू बनने लायक है भी या नहीं. सरस्वती देवी का मन तो नहीं था, लेकिन बेटे के समझाने पर वह राजी हो गई. इस के बाद वीरेंद्र ने 5 जून, 2020 को वर्षा को राठ स्थित शीतला माता मंदिर बुला लिया. यहां उस ने उस की मांग में सिंदूर लगाया. फिर उसे अपने घर ले आया. सरस्वती ने आधेअधूरे मन से बिनब्याही दुलहन का स्वागत किया और घर में पनाह दे दी.

वर्षा महीने भर तो मर्यादा में रही, उस के बाद रंग दिखाने लगी. वह न तो घर का काम करती और न ही खाना बनाती. सरस्वती देवी उस से कुछ कहती तो वह उसे खरीखोटी सुना देती. देवर अनिल के साथ भी वह दुर्व्यवहार करती. पति वीरेंद्र को भी उस ने अंगुलियों पर नचाना शुरू कर दिया. वर्षा मनमानी करने लगी तो घर में कलह होने लगी. कलह का पहला कारण यह था कि वर्षा को संयुक्त परिवार पसंद नहीं था. वह सास देवर के साथ नहीं रहना चाहती थी. कलह का दूसरा कारण उस की स्वच्छंदता थी. जबकि सरस्वती देवी चाहती थी कि वर्षा मर्यादा में रहे.

उधर वर्षा को घर की चारदीवारी कतई पसंद न थी. वह स्वच्छंद विचरण चाहती थी. तीसरा अहम कारण पति का वेतन था. वर्षा चाहती थी कि वीरेंद्र जो कमाए, वह उस के हाथ पर रखे. जबकि वीरेंद्र अपना आधा वेतन मां को दे देता था. इस बात पर वह झगड़ा करती थी. 10 नवंबर, 2020 की शाम 4 बजे सरस्वती देवी खाना तैयार करने नवोदय विद्यालय छात्रावास चली गई. अनिल व वीरेंद्र भी काम पर गए थे. घर में वर्षा ही थी. शाम 5 बजे वीरेंद्र घर आ गया. आते ही वर्षा ने वीरेंद्र से वेतन के संबंध में पूछा. वीरेंद्र ने बताया कि उसे वेतन मिल तो गया है. लेकिन उसे पैसा मां को देना है. क्योंकि दीपावली का त्यौहार नजदीक है और मां को घर का सारा सामान लाना है.

यह सुनते ही वर्षा गुस्से से बोली, ‘‘शारीरिक सुख मेरे से उठाते हो और पैसा मां के हाथ में दोगे. यह नहीं चलेगा. आज रात मां के कमरे में ही जा कर सोना, समझे.’’

वर्षा की बात सुन कर वीरेंद्र तिलमिला उठा और उस ने गुस्से में वर्षा के गाल पर एक तमाचा जड़ दिया. वर्षा गम खाने वाली कहां थी, वह वीरेंद्र से भिड़ गई. दोनो में मारपीट होने लगी. इसी बीच वर्षा की निगाह सिलबट्टे पर पड़ी. उस ने सिल का बट्टा उठाया और वीरेंद्र के सिर पर प्रहार कर दिया. बट्टे के प्रहार से वीरेंद्र का सिर फट गया और वह जमीन पर गिर पड़ा. इस के बावजूद वर्षा का हाथ नहीं रुका और उस ने उस के सिर व चेहरे पर कई और वार किए. जिस से वीरेंद्र की मौत हो गई. कथित पति की हत्या करने के बाद वर्षा ने घर पर ताला लगाया और फरार हो गई.

इधर रात 8 बजे सरस्वती देवी नवोदय विद्यालय छात्रावास से खाना बना कर घर आई तो घर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. सरस्वती ने वर्षा के मोबाइल फोन पर काल की तो उस का मोबाइल फोन बंद था.
फिर उस ने अपने छोटे बेटे अनिल को फोन कर घर पर बुला लिया. अनिल ने भी वर्षा को कई बार काल की लेकिन उस से बात नहीं हो पाई. सरस्वती और उस के बेटे अनिल ने पड़ोसियों से पूछताछ की तो उन्होंने बताया कि वर्षा बदहवास हालत में घर के बाहर निकली थी. ताला लगाने के बाद वह बड़बड़ा रही थी कि सास और पति उसे प्रताडि़त करते हैं. वह रिपार्ट लिखाने पुलिस चौकी जा रही है. पड़ोसियों की बात सुन कर सरस्वती का माथा ठनका. किसी अनिष्ट की आशंका से उस ने राठ कोतवाली को सूचना दी.

सूचना पाते ही कोतवाल के.के. पांडेय पुलिस टीम के साथ आ गए. पांडेय ने दरवाजे का ताला तुड़वा कर घर के अंदर प्रवेश किया. उन के साथ सरस्वती व अनिल भी थे. कमरे में पहुंचते ही सरस्वती व अनिल दहाड़ मार कर रो पड़े. कमरे के फर्श पर 22 वर्षीय वीरेंद्र की खून से लथपथ लाश पड़ी थी. सरस्वती ने पांडेय को बताया कि यह उन के बड़े बेटे की लाश है. चूंकि हत्या का मामला था. अत: के.के. पांडेय ने सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी. कुछ ही देर में एसपी नरेंद्र कुमार सिंह, एएसपी संतोष कुमार सिंह, तथा डीएसपी अखिलेश राजन घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

वीरेंद्र की हत्या सिल के बट्टे से सिर पर प्रहार कर के की गई थी. उस की उम्र 22-23 वर्ष के बीच थी. खून से सना आलाकत्ल बट्टा शव के पास ही पड़ा था, जिसे अधिकारियों ने सुरक्षित करा लिया. निरीक्षण के बाद अधिकारियों ने शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल हमीरपुर भिजवा दिया. उस के बाद मृतक की मां व भाई से घटना के बारे में पूछताछ की. सरस्वती देवी ने बताया कि वर्षा उस के बेटे वीरेंद्र के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही थी. उसी ने वीरेंद्र की हत्या की है. उस का मायका राठ कोतवाली के गांव सैदपुर में है. सरस्वती देवी की तहरीर पर थानाप्रभारी के.के. पांडेय ने भादंवि की धारा 302 के तहत वर्षा के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली और उस की तलाश शुरू कर दी.

रात 11 बजे थानाप्रभारी ने पुलिस टीम के साथ सैदपुर गांव में चंदा देवी के घर छापा मारा. घर पर उस की बेटी वर्षा मौजूद थी. पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. उसे थाना राठ कोतवाली लाया गया.
थाने पर जब उस से वीरेंद्र की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. उस ने बताया कि वीरेंद्र से रुपए मांगने पर उस का झगड़ा हुआ था. गुस्से में उस ने वीरेंद्र पर सिल के बट्टे से प्रहार किया. जिस से उस का सिर फट गया और उस की मौत हो गई. पुलिस से बचने के लिए वह घर में ताला लगा कर मायके चली गई थी, जहां से वह पकड़ी गई.

11 नवंबर, 2020 को पुलिस ने अभियुक्ता वर्षा को हमीरपुर की कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया. Family Crime

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Shocking Crime Story: 7 फेरों पर हावी मोहब्बत

Shocking Crime Story: विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति का खून किया, क्या अब जेल जाने के बाद वह उसे मिल सकेगा? दुख की बात तो यह है कि अपने इस स्वार्थ में उस ने मासूम बेटे को भी कातिल बना दिया.

लंच में राजनलाल खाना खाने घर आया तो उस की नजर पलंग पर रखी घड़ी पर पड़ी तो वह चौंका.

उस ने कहा, ‘‘यह घड़ी तो सुमन की है, यहां कैसे आई है?’’

विमला हड़बड़ा उठी. उस ने झपट कर घड़ी उठाते हुए कहा, ‘‘लगता है, सोनी यहां रख गई है.’’

‘‘तो इस में इतना हड़बड़ाने की क्या जरूरत है?’’ राजनलाल ने कहा और खाने बैठ गया. लेकिन लंच कर के जब वह नौकरी पर वापस जाने लगा तो रास्ते में जब उस ने इस बात पर गहराई से विचार किया तो उसे पत्नी की हड़बड़ाहट पर संदेह हो गया. राजनलाल उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस के थाना शादाबाद के गांव बिसावर का रहने वाला था. इंटर पास करने के बाद वह पिता भगवान सिंह के साथ खेती करने लगा था. लेकिन जल्दी ही उस का मन खेती के काम से ऊब गया तो वह कहीं बाहर जा कर नौकरी करने के बारे में सोचने लगा. उसने पिता से बात की तो उन्होंने इजाजत दे दी.

गांव के तमाम लड़के मथुरा, आगरा और दिल्ली में नौकरी करते थे. राजनलाल ने उन लड़कों से बात की तो मथुरा में रहने वाला उस का एक दोस्त अपने साथ लिवा ले गया. वहां उस ने साड़ी की छपाई के कारखाने में उस की नौकरी लगवा दी. राजनलाल की नौकरी लग गई तो उस के लिए रिश्ते आने लगे. घर वालों ने उस के लिए राजस्थान के हिंडोन के रहने वाले मथुराप्रसाद की बेटी विमला को पसंद कर लिया. उसे भी लड़की दिखाई गई. उसे भी लड़की पसंद आ गई तो दोनों का ब्याह हो गया.

विमला के रूप में भगवान सिंह के घर खुशियों ने कदम रख दिया. विमला के पायलों की रुनझुन से उस का आंगन गुलजार हो गया. राजनलाल को जब भी मौका मिलता, घर आ जाता, क्योंकि मथुरा और बिसावर के बीच ज्यादा दूरी नहीं है. समय के साथ राजनलाल 3 बेटों का बाप बन गया. बच्चों को पढ़ानेलिखाने की बात आई तो राजनलाल ने पत्नी और बच्चों को मथुरा में साथ रखने का विचार किया. उस ने परिवार के साथ रहने लायक किराए का मकान लिया और पत्नी तथा बेटों को ले आया.

घर में सब ठीकठाक था. विमला एक अच्छी पत्नी की तरह घर संभाल रही थी. धीरेधीरे बच्चे बड़े हो रहे थे. उसी बीच राजनलाल के पिता की मौत हो गई और घर में जमीन का बंटवारा हो गया तो राजनलाल ने बड़े बेटे विकास को गांव भेज दिया, जिस से वह उस के हिस्से की खेती करा सके. विकास दादी के साथ रह कर अपने हिस्से की खेती कराने लगा. राजनलाल पुष्पविहार कालोनी में किराए पर रहता था. इसी मकान में 2 किराएदार और रहते थे. उन में एक उस के साढ़ू की बेटी पूजा थी और दूसरा था ऋषिपाल, जो अलीगढ़ का रहने वाला था और यहां वह भी किसी साड़ी के छपाई के कारखाने में नौकरी करता था. उस की पत्नी सोनी और 2 बच्चे भी साथ ही रहते थे.

पूजा विधवा थी. उस के 3 बच्चे थे, जिन के पालनपोषण के लिए वह यहां मथुरा में रहती थी. वह सूरी सुपारी की फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी. पूजा भले ही विमला की सगी बहन की बेटी थी, लेकिन उस की पूजा की अपेक्षा पड़ोसन किराएदार सोनी से ज्यादा पटती थी. इस की वजह यह थी कि एक तो दोनों घरेलू महिलाएं थीं, दूसरे विमला पूजा से कुछ जलती थी. इस के अलावा पूजा सुबह चली जाती थी तो शाम को ही लौटती थी. आने पर वह घर के कामों और बच्चों की देखभाल में लग जाती थी. उस के पास किसी से मिलनेजुलने का समय ही नहीं रहता था.

सोनी का भाई सुमन भी उस के साथ रहता था. वह फिरोजाबाद के थाना टुंडला के गांव मोरेला का रहने वाला था. अभी उस की शादी नहीं हुई थी. वह काफी खुशमिजाज था. बहन की वजह से उस की भी जानपहचान विमला से हो गई थी. वह कुछ करताधरता नहीं था, इसलिए विमला से घंटों बातें करता रहता था. कभीकभी विमला के साथ खरीदारी करने भी चला जाता था. विमला की बातचीत से सुमन को लगा कि विमला पति से खुश नहीं है. राजनलाल शाम को नौकरी से लौट कर आता तो पत्नी और बच्चों से चिढ़ा सा रहता. दरअसल उसे बगल में एक घाव हो गया था, जो ठीक नहीं हो रहा था. इस शारीरिक तकलीफ की वजह से वह चिड़चिड़ा हो गया था.

इसी वजह से पतिपत्नी के बीच कहासुनी होती रहती थी, जिस से उन की आपस में दूरी बढ़ती जा रही थी. राजनलाल अकसर पूजा से हालचाल पूछने उस के कमरे में चला जाता था. वहां वह घंटों बैठा रहता, उस के बच्चों को खिलातापिलाता भी था. पूजा विमला की सगी बहन कृष्णा की बेटी थी. पति की मौत के बाद वह मथुरा में नौकरी कर के किसी तरह बच्चों को पाल रही थी. राजनलाल का पूजा के यहां इस तरह उठनाबैठना विमला को जरा भी नहीं सुहाता था. उसे लगता था कि राजनलाल पूजा की रुपयोंपैसों से मदद करता है. इस से उसे पति पर संदेह होने लगा. इन बातों को ले कर घर में अकसर क्लेश होता रहता.

घर में रोजरोज के क्लेश से तंग आ कर राजनलाल शराब पीने लगा. पतिपत्नी के इस क्लेश के बारे में जान कर सुमन को लगा कि अगर वह चाहे तो इस मौके का फायदा उठा सकता है. इस के बाद उस ने कोशिश भी शुरू कर दी. एक दिन उस ने विमला से कहा, ‘‘भाभी, आप खूबसूरत भी हैं और घर का इतना काम भी करती हैं, इस के बावजूद भाई साहब न आप की इज्जत करते हैं और न आप से खुश रहते हैं.’’

विमला ने सुमन की आंखों में झांक कर हंसते हुए कहा, ‘‘इसी खूबसूरती की वजह से तो तुम्हारे भाई साहब ने मुझे पसंद किया था. लेकिन लगता है अब उन का मन मुझ से भर गया है.’’

‘‘लेकिन हैं तो आप अभी भी उतनी ही सुंदर. कोई भी देखे तो देखता ही रह जाए. उन्हीं में एक मैं भी हूं. मेरा तो मन करता है कि मैं बैठा सिर्फ आप को ही देखता रहूं.’’ सुमन ने विमला के चेहरे को एकटक ताकते हुए कहा.

‘‘देखने का मन होता है तो देखो न, कौन मना करता है.’’ विमला ने शरारती लहजे में कहा.

‘‘भाभी, देखने से मन खराब होता है. फिर और किसी चीज का मन होने लगा तो…?’’‘‘अच्छा,’’ विमला ने मुसकरा कर उस के गाल में चिकोटी काटते हुए कहा, ‘‘लगता है, जवानी उबाल मार रही है. चलो, अब मुझे खाना बनाना है.’’

सुमन उठ कर अपनी बहन के कमरे में चला आया. लेकिन उस की समझ में आ गया कि अगर उस ने विमला पर हाथ डाला तो वह मना नहीं करेगी. उस के स्पर्श ने उसे उत्तेजित कर दिया था. दूसरी ओर उस की बातों ने विमला के मन में भी हलचल मचा दी थी. सुमन विमला से एकांत में मिलने का मौका तलाश रहा था कि उसी बीच उस की नौकरी लग गई. इस के बाद उस के बहनोई ऋषिपाल ने उसे अलग कमरा दिला दिया. लेकिन विमला की वजह से वह बहन के कमरे में अड्डा जमाए रहता और जब देखो तब विमला के कमरे में घुसा रहता.

सुमन का जब विमला के कमरे में कुछ ज्यादा ही आनाजाना हो गया तो एक दिन राजनलाल ने विमला को टोका, ‘‘सोनी से कहो कि वह अपने भाई को संभाले, वरना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ, क्या किया है उस ने?’’ विमला ने हैरानी से पूछा.

‘‘देखो विमला, वह लड़का मुझे जरा भी पसंद नहीं, फिर उस से हमारा लेनादेना ही क्या है. जब देखो तब वह हमारे कमरे में पड़ा रहता है.’’

‘‘बस, इतनी सी बात को ले कर इतना गुस्सा, ठीक है मैं मना कर दूंगी.’’ विमला ने पति को शांत किया.

विमला ने पति से कह तो दिया कि वह सुमन को कमरे में आने से मना कर देगी, लेकिन उस ने कहा कुछ नहीं. वह खुद ही चाहती थी कि सुमन उस के आगेपीछे घूमता रहे. संयोग से उसी दिन सुमन दोपहर को बहन के घर आया तो वह बाजार गई थी. बच्चे स्कूल गए थे, इसलिए घर पर विमला अकेली थी. सुमन के लिए यह अच्छा मौका था. वह विमला के कमरे में पहुंचा तो विमला ने उसे बैठा कर कहा, ‘‘तुम बैठो, मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

सुमन ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘भाभी, मैं चाय पीने नहीं, दिल में लगी आग बुझाने आया हूं.’’

विमला का दिल धड़क उठा. मन में तो उस के भी लड्डू फूट रहे थे. जबकि वह कुछ कह नहीं पा रही थी. लेकिन उस की आंखों में जो भाव आए, उसे देख कर सुमन ने आगे बढ़ कर उसे बांहों में भर लिया. बाहर के दरवाजे में वह कुंडी लगा ही आया था, इसलिए उसे किसी तरह का डर नहीं था. इस के बाद तो उस दिन उस ने विमला के कपोलों पर ही नहीं, पूरे जिस्म पर अपने प्यार की मुहर लगा दी. उस दिन सुमन ने विमला को अनैतिकता के जिस दलदल में डाल दिया, दिनोंदिन वह उस में धंसती चली गई. जिस्म की भूख ने उसे अनैतिकता की राह पर चलने को मजबूर कर दिया. सुमन से संबंध बनने के बाद राजनलाल से उसे वितृष्णा होती गई. कभी राजनलाल उस के करीब आने की कोशिश करता तो वह उसे झटक देती.

राजनलाल की समझ में नहीं आ रहा था कि विमला हो क्या गया है? विमला का बेटा आकाश 13 साल का हो गया था. वह सुमन और मां के संबंधों को समझ रहा था. सुमन को उस से डर भी लगता था, इसलिए उसे खुश रखने के लिए वह उसे पैसे तो देता ही था, उस की अन्य जरूरतें भी पूरी करता था. इस से आकाश को लगने लगा कि राजनलाल बाप हो कर भी उस की जो जरूरतें नहीं पूरी करता, सुमन उस का कोई नहीं है, फिर भी उस की हर जरूरत का खयाल रखता है. इसलिए उसे भी पिता से नफरत हो गई. मां तो उसे झिड़क ही रही थी.

इस का नतीजा यह निकला कि आकाश भी बाप को हर बात में जवाब देने लगा. इस पर नाराज हो कर राजनलाल उस की पिटाई कर देता, जिस से बापबेटे के बीच खाई चौड़ी होती गई, जो सुमन के लिए फायदेमंद साबित हो रही थी. सुमन विमला के साथ खुल कर मजे ले रहा था. सोनी को सब पता था, लेकिन पति के डर की वजह से वह चुप थी, क्योंकि बात खुल जाती तो सालेबहनोई में खटक जाती. विमला भले ही पति की चोरी से सुमन के साथ मजे ले रही थी, लेकिन एक दिन राजनलाल को सच्चाई का पता चल ही गया. उस ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया था.

सुमन तो भाग गया था, लेकिन राजनलाल ने विमला की जम कर पिटाई कर दी थी. इस के बाद उस ने विमला को धमकाते हुए कहा, ‘‘अब अगर सुमन कमरे में दिखाई दे गया तो उस का खून कर दूंगा.’’

शाम को राजनलाल ने यह बात ऋषिपाल को बताई तो उस ने राजनलाल को आश्वासन दिया कि वह सुमन को समझाएगा. लेकिन इस के बाद भी विमला और सुमन का मिलना बंद नहीं हुआ. विमला अब राजनलाल के साथ रहना नहीं चाहती थी. दोनों की जाति अलग थी, लेकिन ऐसे संबंधों में जाति की चिंता कौन करता है. सुमन ने उसे विश्वास भी दिला रखा था कि कुछ भी हो, वह उसे अपनी बना कर रहेगा. विमला किसी भी तरह राजनलाल से छुटकारा पाना चाहती थी. पितापुत्र के बीच भी उस ने दरार पैदा कर दी थी. 25 मई, 2015 को किसी बात पर विमला और राजनलाल में झगड़ा हुआ तो राजनलाल ने उस की पिटाई कर दी.

एक तो राजनलाल की वजह से विमला प्रेमी से नहीं मिल पा रही थी, दूसरी ओर जब देखो तब वह उस की पिटाई कर देता था. इन बातों से तंग आ कर उस ने पति नाम के इस कांटे को निकालने का इरादा बना लिया.

राजनलाल के ड्यूटी पर जाने के बाद उस ने सुमन को फोन किया. सुमन मिलने आया तो उस ने कहा, ‘‘अब मैं राजनलाल की मार सहन नहीं कर सकती, चलो कहीं भाग चलते हैं.’’

‘‘तुम पागल हो गई हो क्या? गांव में तुम्हारी इतनी जमीन है. अगर हम भाग जाएंगे तो हमारे हाथ क्या लगेगा? ऊपर से पुलिस मेरी बहन और बहनोई को परेशान करेगी. फिर मेरे पास पैसे कहां हैं, जो मैं तुम्हें भगा ले चलूं. मेरा मन तो कहता है कि मैं राजनलाल को ठिकाने लगा दूं. उस के बाद तुम ही नहीं, उस का सब कुछ मेरा हो जाएगा.’’

विमला को भी लगता था कि राजनलाल के न रहने पर वह सुकून से रह सकेगी. इसलिए उस ने सुमन के साथ मिल कर राजनलाल को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. विमला यह काम जल्दी से जल्दी कर डालना चाहती थी. उस समय राजनलाल की रात की ड्यूटी चल रही थी, इसलिए उस ने उसे दिन में ही मार देने का मन बना लिया. 28 मई, 2015 को खाना खाने के बाद राजनलाल सो गया. सोनी अपने बच्चों के साथ कहीं गई हुई थी. ऋषिपाल और पूजा अपनीअपनी ड्यूटी पर थे. घर में विमला और उस के दोनों बेटे थे. मोहित को सुमन के कमरे पर भेज कर विमला ने सुमन को फोन किया.

राजनलाल ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि पत्नी उस की जान भी ले सकती है. राजनलाल आराम से सो रहा था कि रात को ड्यूटी पर जाना है. सुमन के आते ही विमला ने उसे गंडासा थमा दिया. इस के बाद एक ही झटके में उस ने राजनलाल का सिर धड़ से अलग कर दिया. आकाश ने अपनी आंखों से अपने बाप का कत्ल होते देखा. राजनलाल मर गया. उस के खून के छीटों से दीवारें रंग गईं. अब सवाल यह उठा कि लाश का क्या किया जाए? तय हुआ कि लाश के टुकड़े कर के बोरे में डाल कर इसी समय कहीं बाहर फेंक दिया जाए. उस समय दिन के ढाई बज रहे थे. सुमन ने लाश के टुकड़ेटुकड़े कर दिए. वे लाश के टुकड़ों को बोरे में भर पाते, किसी ने दरवाजा खटखटा दिया. दरवाजा नहीं खुला तो वह बाहरी दरवाजे की कुंडी हाथ डाल कर खोल कर अंदर आ गया. वह कोई और नहीं, सुमन का बहनोई ऋषिपाल था.

अब तक खून बह कर दरवाजे से बाहर आ गया था. उस ने राजनलाल के दरवाजे पर खून देखा तो डर गया. खटखटाने पर भी विमला ने दरवाजा नहीं खोला तो ऋषिपाल को मामला गड़बड़ लगा. उस ने बाहर आ कर शोर मचा दिया. सारे पड़ोसी इकट्ठा होते, उस के पहले ही विमला प्रेमी सुमन और बेटे आकाश के साथ पीछे के दरवाजे से निकल गई. ऋषिपाल ने थाना गोविंदनगर पुलिस को सूचना दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी हरीशवर्धन एसएसआई सलीम अहमद, एसआई विनोद कुमार, एसआई विजय सिंह और कुछ सिपाहियों के साथ पुष्पविहार कालोनी पहुंच गए. थाना पुलिस ने घटनास्थल पर जो देखा, उस की सूचना पुलिस अधिकारियों को दे दी. इस के बाद एसपी सिटी शैलेश कुमार पांडेय, सीओ (सिटी) चक्रपाणि त्रिपाठी भी घटनास्थल पर आ गए.

कमरा खोला गया तो राजनलाल के शरीर का हर अंग कटा हुआ बिस्तर पर पड़ा था. पुलिस लाश और घटनास्थल का निरीक्षण कर रही थी कि सूचना पा कर राजनलाल का भाई मुकेश आ गया. भाई की लाश देख कर वह फूटफूट कर रोने लगा. शायद लाश के टुकड़ों को बोरी में भरने की कोशिश की गई थी. लेकिन बोरी छोटी थी, इसलिए कोशिश सफल नहीं हुई. राजनलाल के शरीर के टुकड़ों को समेट कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया. इस के बाद मुकेश की ओर से थाना गोविंदनगर में विमला, उस के बेटे आकाश और प्रेमी सुमन के खिलाफ राजनलाल की हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस तीनों आरोपियों की तलाश में जुट गई. तीनों मथुरा से भाग पाते, उस के पहले ही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया. पूछताछ में विमला ने सहज ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. अपना यह अपराध स्वीकार करते समय उस के चेहरे पर न जरा सी शिकन थी और न पति के कत्ल करने का जरा भी पछतावा. उस का कहना था कि वह सुमन से प्यार करती थी, इसलिए प्यार में आड़े आ रहे पति को उस ने मार दिया. सुमन ने भी अपना अपराध स्वीकार करते हुए कहा कि राजनलाल की हत्या उस ने विमला के साथ मिल कर की थी. आकाश ने बताया कि पिता उसे बहुत मारते थे और उन का अपनी एक विधवा रिश्तेदार औरत से संबंध था, जिसे उस ने कई बार अपनी आंखों से देखा था. इसलिए उसे पिता से नफरत हो गई थी. पिता के मरने का उसे कोई अफसोस नहीं है.

पूछताछ के बाद विमला और उस के प्रेमी सुमन को अदालत में मजिस्ट्रेट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया गया. जबकि आकाश को बालसुधार गृह भेज दिया गया. आखिर विमला ने जिस प्रेमी को पाने के लिए पति को मार दिया, अब जेल जाने के बाद क्या वह मिलेगा? शायद अब दोनों की सारी उम्र जेल में ही कटेगी. Shocking Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Crime Story: ऐसी बहन किसी की न हो

Hindi Crime Story: कोई बहन गलतियों का पिटारा बनने के बावजूद इतनी खुदगर्ज हो सकती है कि लालच में अपने ही एकलौते भाई की जान ले ले, सोचा भी नहीं जा सकता. लेकिन रचना तो ऐसी ही निकली. उसे क्या सजा मिलेगी, यह अलग बात है, लेकिन उस ने अपनी मां का आंचल तो सूना कर ही दिया. काले रंग की वह लेंसर कार बड़ी तेजी से लुधियानाअमृतसर मार्ग पर जालंधर बाईपास की ओर भागी चली जा रही थी. कार में करीब 60 साल की एक औरत और 26-27 साल का एक लड़का सवार थे. दोनों बहुत घबराए हुए लग रहे थे. लड़का कार चलाते हुए बारबार पीछे मुड़ कर देख रहा था. इस की वजह यह थी 3 मोटर साइकिलों पर सवार लोग कार का पीछा कर रहे थे और उसे लगातार ललकारते हुए रुकने को कह रहे थे.

जिस तरह कार भाग रही थी, उस से यही लग रहा था कि कार चलाने वाला लड़का काफी होशियार है, लेकिन जीटी रोड पर वाहनों की आवाजाही काफी थी, जिस की वजह से उसे कार भगाने में परेशानी हो रही थी. कई बार उस की कार दुर्घटनाग्रस्त होतेहोते बची थी. लेकिन उस कार चालक लड़के को संभवत: दुर्घटना की उतनी चिंता नहीं थी, जितनी पीछा करने वालों की थी. शायद इसीलिए वह किसी भी तरह उन की पकड़ से दूर निकल जाना चाहता था.

बगल वाली सीट पर बैठी औरत लड़के के कंधे पर अपना हाथ रख कर बारबार उसे सांत्वना दे रही थी. तभी कार अचानक झटका खा कर हिचकौले लेने लगी. इस से लड़के के चेहरे पर घबराहट झलकने लगी. उस ने फ्यूल गेज पर नजर डाली. सुई एकदम नीचे बैठ चुकी थी. उस ने बगल में बैठी औरत से कहा, ‘‘अब क्या होगा? कार का पैट्रोल खत्म हो गया है?’’

यह सुन कर महिला घबरा गई. अचानक चालक लड़के के दिमाग में न जाने क्या आया कि उस ने बड़ा खतरा उठाते हुए बगल में चल रहे ट्रक को एकदम से ओवरटेक किया और कार बाईं ओर वाले पेट्रौल पंप में घुसा दी. इस तरह वह मोटरसाइकिल सवारों को चकमा देने में सफल हो गया, क्योंकि ट्रक की वजह से मोटरसाइकिल सवार यह नहीं देख पाए कि कार किधर गई.

कारचालक लड़के ने जल्दीबाजी में पेट्रौल भरवाया. लेकिन जैसे ही वह पेट्रौल पंप से बाहर निकल कर कुछ दूर आगे सब्जी मंडी के पास पहुंचा, मोटरसाइकिल सवारों ने रास्ता रोक कर कार रुकवा ली. कार रुक गई तो मोटरसाइकिलों से आए लोग उसे घेर कर दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगे. लेकिन लौक होने की वजह से दरवाजे नहीं खुले. तब उन्होंने बाहर से ही कार पर धावा बोल दिया. वे लोग इतने उत्तेजित थे कि राहगीरों की परवाह किए बगैर कार पर अंधाधुंध ईंटपत्थर बरसाने लगे. लड़के और महिला ने मदद के लिए शोर भी मचाया, लेकिन हमलावर जिस तरह उत्तेजित और गुस्से में थे, उसे देख कर किसी की भी बचाव के लिए आगे आने की हिम्मत नहीं हुई.

कार के शीशे टूट गए तो हमलावरों द्वारा फेंके जाने वाली ईंटें चालक और महिला को लगने लगीं. हमलावरों में एक औरत भी थी, जो सब से ज्यादा पत्थर फेंक रही थी. उसे उस तरह पत्थर फेंकते देख कार में बैठी औरत हाथ जोड़ कर चीखचीख कर कहने लगी, ‘‘यह क्या कर रही है बेटी, यह तेरा भाई है.’’

लेकिन इस बात का न तो उस औरत पर कोई असर हुआ, न ही उस के साथी हमलावरों पर. तभी उस औरत द्वारा फेंकी एक ईंट ड्राइविंग सीट पर बैठे लड़के के माथे पर आ लगी. ईंट लगते ही खून का फव्वारा फूट पड़ा. चालक लड़का कार की सीट पर बैठेबैठे ही छटपटाने लगा. इस के बावजूद ईंटपत्थर फेंकने वालों के हाथ नहीं रुके. उन के हाथ तभी रुके, जब उस लड़के की गरदन सीट पर ही एक ओर लुढ़क गई. इस के बाद वे सब मोटरसाइकिलों पर बैठ कर भाग निकले.

इस बीच किसी ने फोन कर के इस घटना की सूचना थाना सलेम टाबरी को दे दी थी. खबर मिलते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी, सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, कमलजीत सिंह, परमजीत सिंह, हेडकांस्टेबल अमरीक सिंह, बलविंदर राम और गुरजीत सिंह घटनास्थल पर पहुंच गए थे. हमलावर चूंकि भाग चुके थे, इसलिए उन के बारे में बाद में भी पता किया जा सकता था. पहले घायलों का इलाज कराना जरूरी था. इसलिए मनिंदर सिंह औरत और लड़के को अविलंब अस्पताल ले गए.

डाक्टरों ने लड़के को तो देखते ही मृत घोषित कर दिया, जबकि महिला को इलाज के लिए भरती कर लिया. यह घटना 9 मई, 2015 दोपहर 2 बजे की थी. मनिंदर सिंह बेदी के आदेश पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने इलाज के दौरान औरत का बयान लिया तो पता चला कि उस का नाम रेनू अरोड़ा है और मृतक उस का एकलौता बेटा हरीश अरोड़ा था. हमलावरों में जो औरत शामिल थी, वह उस की बेटी रचना थी. उसी ने अपने प्रेमी मनोज कुमार और उस के घर वालों के साथ मिल कर मां और भाई पर हमला किया था.

रेनू अरोड़ा ने पुलिस को बताया कि वह विधवा है और अपने बेटे हरीश के साथ लुधियाना  के दुगेड़ी में धांधरा रोड पर मानकपाल गेट के पास जीएसवी में रहती है. उस के 3 बच्चों में 2 बेटियां थीं रचना और ज्योति तथा एक बेटा था हरीश. दोनों बेटियों की शादियां हो चुकी थीं. रेनू की बड़ी बेटी रचना प्रौपर्टी में हिस्सा मांग रही थी. इस के लिए रेनू ने कुछ शर्तें रख दी थीं, जिस की वजह से विवाद हो गया था. उस के बाद रचना ने अपने प्रेमी मनोज कुमार, उस की मां बलराज कौर, ह्यूमन राइट्स संस्था के प्रधान नवनीत सिंह, प्रवीन कुमार, दीपू, राकेश, करन और शमी के साथ उन पर हमल कर दिया था.

रेनू अरोड़ा के इस बयान के आधार पर सबइंसपेक्टर दलबीर सिंह ने उसी दिन यानी 9 मई, 2015 को भादंसं की धारा 302/323, 342, 327, 149, 120बी के तहत 9 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के उसी दिन ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह, करन और शमी को गिरफ्तार कर लिया. प्राथमिक उपचार के बाद रेनू अरोड़ा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई थी. हरीश की लाश का पोस्टमार्टम हो गया तो उसे रिश्तेदारों को सौंप दिया गया. इंसपेक्टर मनिंदर सिंह बेदी ने एसआई दलबीर सिंह, एएसआई सुखपाल सिंह, परमजीत सिंह और कमलजीत सिंह के नेतृत्व में पुलिस की टीमें बना कर नामजद लोगों की तलाश में लगा दिया था.

दिनदहाड़े शहर के बीचोबीच मुख्यमार्ग पर घटी इस घटना से स्थानीय लोगों में दहशत भी थी और पुलिस के प्रति आक्रोश भी. कोई अनहोनी न हो, इस के लिए पुलिस टीमें अभियुक्तों की तलाश में दिनरात एक किए हुए थीं. आखिर उन की मेहनत रंग लाई और 12 मई, 2015 को एसआई दलबीर सिंह ने 3 अभियुक्तों दीपू, राकेश कुमार उर्फ गोगी को गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद 24 मई को रचना और मनोज कुमार को भी बड़े नाटकीय ढंग से गिरफ्तार कर लिया गया. इस पूरे मामले में अहम भूमिका निभाने वाली मनोज कुमार की मां बलराज कौर को एसआई दलबीर सिंह ने बड़ी मुश्किल से काफी दिनों बाद 23 जुलाई को गिरफ्तार किया.

लगभग 2, ढाई महीने चली भागदौड़ और गिरफ्तारियों के बाद अभियुक्तों से सिलसिले वार की गई पूछताछ में जो कानी प्रकाश में आई, वह एक ऐसी खुदगर्ज औरत की कहानी थी, जिस ने अपनी मौजमस्ती के लिए अपने ही सगे भाई को मौत के घाट उतार दिया था. लुधियाना के दुगड़ी में रहते थे अशोक कुमार अरोड़ा. उन के परिवार में पत्नी रेनू अरोड़ा के अलावा 2 बेटियां रचना, ज्योति और एकलौता बेटा हरीश था. अशोक अरोड़ा टैक्सियां चलवाते थे. वह कोई बड़े आदमी तो नहीं थे, लेकिन घर में किसी चीज की कमी नहीं थी.

अशोक कुमार ने अपने तीनों बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाई थी. बड़ी बेटी रचना पढ़लिख तो जरूर गई थी, लेकिन उस में वे संस्कार नहीं आ पाए थे, जिन से घरपरिवार की मानमर्यादा बनती है. वह बचपन से ही हठी और महत्त्वकांक्षी प्रवृत्ति की थी. उम्र के साथसाथ उस का हठ और महत्त्वाकांक्षा बढ़ती गई. समय रहते ही अशोक कुमार ने रचना की शादी हैबोवाल निवासी विनय कुमार से कर दी. शादी के बाद जल्दी ही वह एक बेटी की मां भी बन गई. इसी बीच अशोक कुमार की मौत हो गई. उन की मौत के बाद घरपरिवार की पूरी जिम्मेदारी रेनू और हरीश पर आ गई. पिता की मौत के बाद टैक्सियां चलवाने का काम हरीश करने लगा. उस ने छोटी बहन ज्योति की भी शादी कर दी. अब घर में सिर्फ मांबेटे रह गए. सब ठीकठाक चल रहा था.

हरीश ने ड्राइवर तो रख ही रखे थे, खुद भी टैक्सी चलाता था. उस का एक ड्राइवर था मनोज, जिस से उस की कुछ ज्यादा ही पटती थी. इसी वजह से वह उस के घर भी आताजाता था. हरीश की बड़ी बहन रचना की ससुराल ठीकठाक थी. वहां उसे किसी चीज की कमी नहीं थी. पति भी प्यार करने वाला था. इस के बावजूद उस का मन ससुराल में नहीं लगता था. वह अकसर मायके आ जाया करती थी. वह जब भी मायके आती, महीनों रहती.

मायके में रहते हुए ही उस की मुलाकात ड्राइवर मनोज कुमार से हुई. उस ने उस में न जाने ऐसा क्या देखा कि वह उस पर मर मिटी. एक तरह से वह मनोज की दीवानी सी हो गई. मनोज भी उसे अपनी ओर आकर्षित होते देख उस के गदराए शरीर पर फिदा हो गया. हालांकि वह शादीशुदा और एक बेटी का बाप था. उस की शादी सन 2012 में चंडीगढ़ के रहने वाले रामदेव की बेटी मोनिका से हुई थी. लेकिन वह उतनी सुंदर नहीं थी, जितनी सुंदर रचना थी.

इस बीच रचना की शादी को 12 साल हो गए थे और उस की बेटी भी 11 साल की हो गई थी. इतनी बड़ी बेटी की मां होने के बावजूद उस ने मनोज से नाजायज संबंध बना लिए. कुछ दिनों तक तो यह सब चोरीछिपे चला, लेकिन रचना को चोरीछिपे मिलना अच्छा नहीं लगा तो वह मां और पति का घर छोड़ कर मनोज के साथ रहने लगी. रेनू अरोड़ा को इस बात की भी जानकारी कई दिनों बाद मिली.

दरअसल, उस समय रचना मायके में थी. उस ने मां और भाई से कहा कि वह ससुराल जा रही है लेकिन वह ससुराल जाने के बजाय मनोज के घर चली गई. कई दिनों बाद जब विनय ने आ कर बताया कि रचना उस के घर पहुंची ही नहीं है तो उस की तलाश शुरू हुई. उस समय तो उस का पता नहीं चला, लेकिन इस बात की जानकारी जरूर हो गई है कि जाते समय रचना अपने साथ मां के करीब डेढ़ लाख रुपए, 5 तोला सोने के गहने और कुछ अन्य कीमती सामान ले गई है. यह जानकारी होने पर रेनू अरोड़ा ने थाना दुगड़ी में रचना के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी.

इस के पहले भी हरीश और मनोज के बीच रचना को ले कर झगड़ा हुआ था. हरीश ने इस झगड़े की रिपोर्ट थाना डिवीजन नंबर 4 में दर्ज कराई थी. रचना मनोज के साथ छावनी क्षेत्र में किराए का मकान ले कर रह रही थी. इस बात का पता चलने पर हरीश और रेनू ने वहां जा कर उसे समझाया कि जो हुआ, वह उसे भूल जाए और अपनी ससुराल में जा कर शांति से रहे. लेकिन रचना ने उन की सलाह मानने से साफ मना करते हुए कहा कि अब वह मनोज को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. तब रेनू और हरीश ने उसे उस के हाल पर छोड़ दिया.

इस बीच हरीश ने टैक्सियां चलवाने का काम बंद कर के जालंधर बाईपास पर मोटर गैराज खोल लिया. इस के बाद रेनू ने हरीश की सगाई कर दी थी और उस के विवाह की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं. जब इस बात की जानकारी रचना को हुई तो वह तिलमिला उठी. वह मायके पहुंची और मां तथा भाई से अपना हिस्सा मांगने लगी. वैसे तो उस स्थिति में उस का कोई हिस्सा नहीं बनता था, इस के बावजूद रेनू और हरीश उसे हिस्सा देने को तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने शर्त रख दी कि वे उसे हिस्सा तभी देंगे, जब वह मनोज को छोड़ कर ससुराल चली जाएगी.

रचना मनोज को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थी. इस बात को ले कर उस का मां और भाई से आए दिन झगड़ा होने लगा. मनोज और उस के घर वाले भी रचना का साथ दे रहे थे. एक तरह से उस ने मां और भाई का जीना हराम कर दिया था. 8 मई को 2 लोग रेनू के घर आए और उन्होंने कहा कि रचना और मनोज से उन का जो विवाद चल रहा है, अगर वह उन के औफिस आ जाएं तो वे इस विवाद को खत्म करा देंगे. आने वालों ने अपना नाम करन और शमी बताया था. वे छावनी मोहल्ला स्थिति डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स औफिस से आए थे.

अगले दिन यानी 9 मई की दोपहर को समझौते की गरज से रेनू बेटे हरीश को ले कर छावनी स्थित डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के औफिस पहुंची तो वहां करन और शमी के अलावा उन की मुलाकात डेमोके्रटिव ह्यूमन राइट्स के प्रधान नवनीत सिंह से हुई, उन्होंने जिन शर्तों के तहत रचना और मनोज से उन का समझौता कराना चाहा, वे रेनू और हरीश को मंजूर नहीं थीं. रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना किया तो वे बहस कर के दबाव में समझौता कराने की कोशिश करने लगे. जब रेनू और हरीश ने समझौता करने से मना कर दिया तो वे लड़ाईझगड़े और मारपीट पर उतारू हो गए. किसी तरह वे दोनों बाहर आए तो वहां रचना अपने प्रेमी मनोज कुमार, मनोज की मां बलराज कौर के साथ खड़ी थी.

उन दोनों के साथ और भी कई लोग थे. सभी ने उन्हें घेर लिया और मारपीट करने लगे. रेनू और हरीश किसी तरह अपनी कार तक पहुंचे और जान बचाने के लिए कार में बैठ कर वहां से भाग निकले. बाद में रचना और उस के साथियों ने मोटरसाइकिलों से पीछा कर के उन्हें पकड़ लिया और ईंटपत्थरों से उन पर हमला कर दिया. इस हमले में रेनू जहां घायल हो गई, वहीं उस के बेटे हरीश की मौत हो गई. पुलिस ने जैसेजैसे जिस को पकड़ा था, पूछताछ कर के अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. कथा लिखे जाने तक किसी भी अभियुक्त की जमानत नहीं हुई थी. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित