Love Story in Hindi: दूसरे की प्रेमिका

Love Story in Hindi: प्राची खूबसूरत भी थी और अल्हड़ भी. वह लंच बौक्स सप्लाई का काम करती थी. इसी बीच उस की मुलाकात समीर रोहितकर से हुई और वह अपने पति से तलाक ले कर उस की हो गई. लेकिन बाद में जब प्राची की जिंदगी में प्रसाद मांडवकर आया तो…

25 वर्षीय प्रसाद प्रकाश मांडवकर मराठी दैनिक अखबारों का फ्रीलांस रिपोर्टर और फोटोग्राफर था. काम की वजह से उस के घर आनेजाने का कोई निश्चित समय नहीं था. लेकिन जब कभी लौटने में देरी होती थी, तो वह फोन कर के अपनी मां राधा को घर लौटने का समय बता देता था. रोजाना की तरह उस दिन सुबह भी वह काम पर जाने के लिए घर से तो निकला लेकिन वापस नहीं लौटा. जब वह न खुद आया और न उस का कोई फोन आया तो उस की मां राधा ने उसे फोन किया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ था. प्रसाद प्रकाश जिस पेशे में था, उस में देरसवेर होना या फोन बंद मिलना आम बात थी. इसलिए उस की मां राधा ने उसे दोबारा फोन नहीं किया.

लेकिन जब रात के 12 बज गए तो राधा को चिंता हुई. उस ने दोबारा बेटे का फोन ट्राई किया, लेकिन उस का फोन अब भी बंद था. देरसवेर भले ही हो जाती थी लेकिन ऐसा कभी नहीं होता था कि लगातार फोन बंद रहे. ऐसी स्थिति में राधा की परेशानी स्वाभाविक ही थी. राधा का मन नहीं माना तो वह बेटे की तलाश में घर से निकल पड़ी. उस ने अपनी चाल और बस्ती के रहने वाले प्रसाद प्रकाश के सारे दोस्तों से उस के बारे में पता किया. उस के एक दोस्त समीर ने उसे बताया कि प्रसाद रात 8 बजे के करीब उसे मिला था. लेकिन उस के बाद वह कहां गया, इस की उसे कोई जानकारी नहीं है.

राधा ने अपनी जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों से भी फोन पर संपर्क कर के बेटे के बारे में पूछताछ की. जब प्रसाद मांडवकर के बारे में कहीं से कोई खबर नहीं मिली तो उस की मां राधा बुरी तरह घबरा गई. उस की चिंता बढ़ गई और भूखप्यास मर गई. किसी अनहोनी की आशंका से राधा के दिमाग में तरहतरह के विचार आने लगे. उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी, निगाहें घर के दरवाजे पर टिकी हुई थीं. बाहर जरा सी भी आहट होती तो वह लपक कर घर के दरवाजे पर आ जाती. लेकिन जब कोई दिखाई नहीं देता तो मायूस हो कर अंदर चली जाती.

बेटे के लौटने की आशा लिए प्रसाद की मां राधा ने जैसेतैसे रात बिताई. सुबह होते ही वह अपने घर वालों के साथ थाना ताड़देव पहुंची और वहां मौजूद पुलिस अफसर से सारी बात बता कर प्रसाद मांडवकर की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. यह 7 जनवरी, 2015 की बात है. शिकायत दर्ज करने के बाद पुलिस ने वायरलेस से यह सूचना अन्य थानों को दे दी. 8 जनवरी, 2015 को सुबह लगभग 10 बजे मुंबई के उपनगर घाटकोपर स्थित तिलक नगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले को किसी राहगीर ने फोन पर जानकारी दी कि घाटकोपर-मानखुर्द रोड स्थित पी.डब्ल्यू.डी. कंपाउंड, तिलक ब्रिज के पास एक अज्ञात युवक की लाश पड़ी है.

सूचना मिलते ही तिलक नगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित किया और यह खबर कंट्रोल रूम को देने के बाद पुलिस टीम के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से महज एक किलोमीटर दूर था इसलिए पुलिस को वहां पहुंचने में ज्यादा देर नहीं लगी. इस बीच इस घटना की खबर पूरे इलाके में फैल गई थी और घटनास्थल पर काफी लोगों की भीड़ एकत्र हो चुकी थी. पुलिस ने भीड़ को वहां से हटा कर घटनास्थल का निरीक्षण किया. लाश को ठीक से देखने के बाद पुलिस ने वहां मौजूद लोगों से उस की शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका.

इस से यह बात स्पष्ट हो गई थी कि मृतक उस इलाके का रहने वाला नहीं था. निस्संदेह हत्यारों ने कहीं दूसरी जगह से ला कर वहां उस की हत्या की थी. मृतक के सिर और गले पर किसी तेजधार वाले हथियार के गहरे घाव थे. सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले अभी घटना का निरीक्षण और वहां मौजूद लोगों से पूछताछ कर ही रहे थे कि सूचना पा कर क्राइमब्रांच के ज्वाइंट पुलिस कमिश्नर सदानंद दाते, अपर पुलिस कमिश्नर के.एम. प्रसन्ना, एडिशनल पुलिस कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी, असिस्टैंट कमिश्नर प्रफुल्ल भोसले और क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर वांकट पाटील, इंसपेक्टर संजय सुर्वे, असिस्टेंट इंसपेक्टर अनिल ढोले अपने सहायकों के साथ घटना पर पहुंच गए. सभी ने तिलकनगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर के साथ घटनास्थल का निरीक्षण किया.

इंसपेक्टर भगवत सोनावले ने घटनास्थल की जांच पड़ताल और औपचारिक काररवाई पूरी कर के मृतक के शव को पोस्टमार्टम के लिए घाटकोपर के राजावाड़ी अस्पताल भेज दिया. शव के कपड़ों की तलाशी ले कर उन्होंने सील कर के अपने कब्जे में ले लिया. तत्पश्चात वे थाने लौट आए. थाने लौट कर वह मृतक की शिनाख्त में जुट गए. क्योंकि बिना उस की शिनाख्त के तफ्तीश की दिशा तय करना संभव नहीं था. इधर क्राइम ब्रांच यूनिट-7 के सीनियर इंसपेक्टर व्यंकट पाटील अपने सहायकों के साथ मामले की तफ्तीश और उस के विषय में विचारविमर्श कर रहे थे तो उधर क्राइम ब्रांच के उच्चाधिकारी भी चुप नहीं बैठे थे. एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी को जब लगा कि मृतक की शिनाख्त जल्दी होना संभव नहीं है तो उन्होंने उस की लाश की फोटो सोशल मीडिया पर डाल दी.

इस का जल्दी ही नतीजा निकला. मृतक का फोटो सोशल मीडिया पर आते ही दैनिक मराठी सामना के एक रिपोर्टर ने मृतक को पहचान कर क्राइम ब्रांच यूनिट-3 के सीनियर इंसपेक्टर अरविंद सावंत को बताया कि मृतक का नाम प्रसाद प्रकाश मांडवकर है और वह मुंबई सेंट्रल (पश्चिम) का रहने वाला है. रिपोर्टर ने यह भी बताया था कि उस की गुमशुदगी की रिपोर्ट ताड़देव पुलिस थाने में दर्ज कराई गई है. उस रिपोर्टर की सूचना पर क्राइम ब्रांच यूनिट-3 के सीनियर इंसपेक्टर अरविंद सावंत ने मामले को तफ्तीश के लिए इंसपेक्टर अविनाश धर्माधिकारी, इंसपेक्टर दीपक चव्हाण, इंसपेक्टर संजय तिकुंव, सिपाही हसन मुजावर, नंद कुमार आड़ावकर, प्रकाश कोठालकर आदि को नियुक्त कर के इस की जानकारी एडिशनल कमिश्नर धनंजय कुलकर्णी और असिस्टेंट कमिश्नर प्रफुल्ल भोसले को दे दी.

इंसपेक्टर अविनाश धर्माधिकारी ने तुरंत अपने सहायकों को साथ लिया और ताड़देव पुलिस थाने से जानकारी ले कर मृतक प्रसाद मांडवकर के घर पहुंच गए. जब मृतक प्रसाद मांडवकर की फोटो उस की मां राधा को दिखाई गई तो वह सन्न रह गई और छाती पीटपीट कर रोने लगी. जांच अधिकारियों ने उसे सांत्वना दे कर समझाया और प्रसाद मांडवकर का शव लेने के लिए राजाबाड़ी अस्पताल भेज दिया. मृतक की शिनाख्त हो गई तो जांच अधिकारियों का आधा सिरदर्द खत्म हो गया. लेकिन अब जो समस्या सामने थी, वह मृतक प्रसाद मांडवकर के हत्यारों को ले कर थी. लेकिन यह समस्या भी शीघ्र ही हल हो गई. क्राइम ब्रांच ने इस रहस्य को सुलझाने के लिए मृतक की मां राधा से पूछताछ करने का फैसला किया.

इस बारे में राधा से पूछा गया तो उस ने बताया कि प्रसाद प्रकाश का न तो किसी से कोई लड़ाईझगड़ा था और किसी की देनदारी. यहां तक कि उस का कोई दुश्मन भी नहीं था. इस पर क्राइम ब्रांच के अफसरों ने राधा से प्रसाद के दोस्तों और रिश्तेदारों के पते और फोन नंबर लिए. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. क्राइम ब्रांच के पास अब सिर्फ एक ही रास्ता बचा था कि प्रसाद मांडवकर के मोबाइल की सीडीआर (कौल डिटेल्स रिकौर्ड) चेक करे. जब उस के नंबर की सीडीआर निकलवाई गई तो उस के कई दोस्तों के नंबर सामने आए. जब उन नंबरों की गहराई से जांच की गई तो उन की नजर एक नंबर पर ठहर गई. वह नंबर प्रसाद के पड़ोस में रहने वाले उस के दोस्त समीर का था, जिस से वह गायब होने के कुछ घंटों पहले मिला था. उस ने प्रसाद माडंवकर की मां राधा को भी यही बताया था.

समीर ब्रीच कैंडी अस्पताल के सामने वाली इमारत में कार ड्राइवर की नौकरी करता था. समीर की पूरी कुंडली निकालने के बाद क्राइम ब्रांच ने उसे 10 जनवरी, 2015 को हिरासत में ले लिया. क्राइम ब्रांच के औफिस में ला कर उस से प्रसाद मांडवकर की हत्या के बारे में पूछताछ की गई तो पहले तो वह खुद को प्रसाद की हत्या से अनभिज्ञ बताता रहा. लेकिन वह जांच अधिकारियों के सवालों के आगे ज्यादा देर तक नहीं ठहर सका. अंतत: उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए प्रसाद मांडवकर की हत्या में सामिल अपने सभी साथियों के नाम पते बता दिए. समीर ने प्रसाद मांडवकर हत्याकांड की जो कहानी बताई, वह काफी चौंकाने वाली थी.

31 वर्षीय समीर रोहितकर मुंबई सेंट्रल (पश्चिम) के जरीवाला चाल में अपने परिवार के साथ रहता था. उस के पिता का नाम वसंत रोहितकर था. परिवार में उस के मातापिता के अलावा 2 बहने थीं. उस के पिता भी कार ड्राइवर थे. परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी. इसलिए समीर रोहितकर कुछ खास पढ़लिख नहीं पाया था. जब समीर जवान हुआ तो पिता वसंत रोहितकर ने उसे भी कार ड्राइवरी का लाइसेंस बनवा कर ब्रीच कैंडी अस्पताल के पास रहने वाले एक व्यापारी के यहां नौकरी पर रखवा दिया.

वह व्यापारी समीर रोहितकर को अपने बेटे की तरह मानता था. जब कभी वह मुंबई के बाहर जाता था, तो अपनी कार समीर रोहितकर की हिफाजत में छोड़ जाता था. समीर रोहितकर जिस चाल में रहता था, उसी चाल में प्रसाद मांडवकर और प्राची के परिवार भी रहते थे. प्राची का परिवार काफी गरीब था. उस के पति की कोई खास आमदनी नहीं थी. विवाह के बाद प्राची जब उस घर में आई थी तो घर की आर्थिक स्थिति काफी खराब थी. लेकिन शादी के बाद प्राची ने अपनी मेहनत और परिश्रम से घर की स्थिति को काफी हद तक संभाल लिया था. अपने परिवार की आर्थिक स्थिति को पटरी पर लाने के लिए वह हाउस कैटरिंग का काम करने लगी थी. वह अपने घर में अच्छा और स्वादिष्ट खाना बनवा कर काम धंधे वालों को पहुंचाने लगी थी.

प्राची जितनी सुंदर थी, उस से कहीं अधिक चंचल थी. उस ने महानगर पालिका के स्कूल से 8वीं पास की थी. उस की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह बहुत मिलनसार थी. वह जिस से भी बातचीत करती खुल कर करती थी और अपनी बातों से किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर लेती थी. शादी के बाद जब प्राची अपनी ससुराल आई थी, उस के कुछ दिनों बाद ही समीर का दिल उस पर आ गया था. सोतेजागते वह प्राची को ही सपने में देखने लगा था. वह जब भी कमसिन अल्हड़ प्राची को देखता तो उस के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. वह उस की नजदीकी पाने के लिए छटपटा उठता था.

कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है. समीर रोहितकर के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. प्राची एक कर्मठ महिला थी. वह अपने परिवार और घर की स्थिति को सुधारने के लिए हाउस कैटरिंग का काम करती थी, उसी हाउस कैटरिंग के सहारे समीर प्राची के करीब पहुंच गया. दरअसल समीर ने अपने घर का लंचबौक्स लाना बंद कर के प्राची का लंच बौक्स मंगवाना शुरू कर दिया. फिर इसी बहाने वह कभीकभी प्राची के घर भी खाना खाने जाने लगा. जल्दी ही वह उस के परिवार वालों से घुलमिल गया. जरूरत पड़ने पर वह उस के परिवार की आर्थिक मदद भी करने लगा था.

प्राची भी कोई बच्ची नहीं थी. वह समीर रोहितकर के मन की बातों को अच्छी तरह समझने लगी थी. समीर रोहितकर को अपनी तरफ आकर्षित होते देख कर धीरेधीरे वह भी उस की तरफ खिंचती चली गई. दोनों के दिलों में जब एकदूसरे के लिए प्रेम के अंकुर फूटे तो जल्दी ही वह समय भी आ गया, जब दोनों का एकदूसरे के बिना रहना मुश्किल हो गया. यह स्थित आई तो दोनों अपने आप को रोक नहीं पाए और मौका पाते ही एकदूसरे की बांहों में समा गए. दोनों ने एक ही झटके में सारी मर्यादाएं तोड़ डालीं. एक बार जब सीमाएं टूटीं तो फिर दोनों की नजदीकियां बढ़ती ही गईं. अब जब भी प्राची और समीर को मौका मिलता तो दोनों अपने तनमन की प्यास बुझा लेते. दोनों के बीच यह सिलसिला 2 साल तक चुपचाप चलता रहा. इस बीच उन के संबंधों के बारे में कोई नहीं जान सका.

इश्क और मुश्क अधिक दिनों तक छिपाए नहीं छिपता. धीरेधीरे पड़ोसियों में जब इस बात की चर्चा होने लगी तो उड़तेउड़ते यह खबर प्राची के परिवार और उस के पति के कानों तक भी जा पहुंची. हकीकत जान कर उस के पति के होश उड़ गए. प्राची के पति को यह बात तो मालूम थी कि समीर रोहितकर उस की पत्नी के हाथों के बने लंच बौक्स का खाना खाता है और उस के घर भी आताजाता है. लेकिन खाना खाने के बहाने समीर का उस की पत्नी के साथ शारीरिक संबंध हो जाएगा, यह उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था. मामला नाजुक था. शोरशराबे से बदनामी हो सकती थी. इसलिए उस ने प्राची को शांति से समझाना चाहा. लेकिन प्राची ने पति की बातों को न समझ कर पूरा घर सिर पर उठा लिया. वह उलटा अपने पति पर ही बरस पड़ी और उसे काफी खरीखोटी सुनाई. प्राची पर जब पति के समझाने का कोई असर नहीं हुआ तो उस के पति ने उसे तलाक दे दिया. यह बात 2005 की थी.

पति से तलाक होने के बाद प्राची भायखाला आ कर रहने लगी. यहां वह समीर रोहितकर से खुल कर मिलती थी. हालांकि समीर प्राची से शादी नहीं की थी, लेकिन दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे थे. समीर प्राची की सभी जरूरतों को पूरी करता था. उस के अलावा प्राची ने अपना कैटरिंग का काम भी चालू रखा था. समय पंख लगा कर उड़ता रहा. धीरेधीरे प्राची और समीर को साथसाथ रहते और मौजमस्ती करते हुए 8 साल गुजर गए. लेकिन 2013 में इस हवा का रुख बदला और प्राची समीर की बांहों को छोड़ कर प्रसाद मांडवकर की बांहों में आ गई. यह बात जब समीर रोहितकर को पता चली तो उस का खून खौल उठा. वह प्रसाद मांडवकर के खून का प्यासा हो गया.

प्रसाद मांडवकर भी उसी चाल में रहता था, जिस चाल में समीर रोहितकर रहता था. दोनों बचपन के दोस्त थे. दोनों एक साथ खेलेकूदे और जवान हुए थे. प्रसाद मांडवकर के पिता प्रकाश मांडवकर की मृत्यु हो चुकी थी. मां राधा ने उसे मेहनतमशक्कत करके पालापोसा और उसे पढ़ायालिखाया था. प्रसाद मांडवकर महत्त्वाकांक्षी युवक था. वह पढ़लिख कर जवान हुआ तो उस का झुकाव नौकरी या किसी व्यवसाय की तरफ नहीं था. इस की जगह उस ने पत्रकारिता को अपना पेशा बनाया और मराठी दैनिक अखबारों में फ्रीलांस फोटोग्राफी और न्यूज रिपोर्टिंग करने लगा. धीरेधीरे उस की कई मराठी न्यूज रिपोर्टरों और फोटोग्राफरों से जानपहचान हो गई.

प्रसाद मांडवकर ने जब कई बार प्राची और समीर रोहितकर को एकदूसरे से मिलतेजुलते मौजमस्ती करते देखा, तो उस का दिल भी प्राची के लिए धड़कने लगा. न चाहते हुए भी वह धीरेधीरे प्राची की तरफ झुकने लगा. प्राची की सुंदरता और उस के व्यवहार से प्रसाद मांडवकर की भी वही हालत हुई जो कभी समीर रोहितकर की हुई थी. फलस्वरूप प्रसाद मांडवकर का दिल भी प्राची की नजदीकियां पाने के लिए तड़प उठा. उस ने भी प्राची को पाने के लिए वही रास्ता अपनाया जो कभी समीर रोहितकर ने अपनाया था.

उस ने समीर रोहितकर से प्राची का मोबाइल नंबर ले लिया और अगले दिन ही अपने लिए प्राची का लंच बौक्स मंगवाने के बहाने उस से बातचीत शुरू कर दी. शुरूशुरू में प्राची ने प्रसाद मांडवकर को लंच बौक्स भेजने के अलावा उस की और कोई ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब प्रसाद उस के लंच बौक्स और उस के रूप सौंदर्य की खुल कर तारीफ करने लगा तो प्राची को भी उस की बातें अच्छी लगने लगीं. नतीजतन वह भी प्रसाद की बातों का जवाब उसी की तरह देने लगी.

औरत हमेशा अपने रूप सौंदर्य और अपनी तारीफों की भूखी होती है. प्रसाद मांडवकर ने इस का लाभ उठाया. प्राची का प्रोत्साहन मिलते ही वह उस के करीब आने की कोशिश करने लगा. धीरेधीरे दोनों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. नजदीकियां बढ़ीं तो दोनों फोन पर खूब बातें करने लगे. इतना ही नहीं प्रसाद अब लंच बौक्स मंगाने के बजाए उसी के घर जा कर लंच करने लगा. कभीकभी वह उसे अपने साथ घुमाने भी ले जाने लगा. प्राची जब सुंदर स्वस्थ और मजबूत कदकाठी वाले प्रसाद मांडवकर की तरफ आकर्षित हुई तो समीर रोहितकर को वह नजरअंदाज करने लगी. प्राची को अब समीर रोहितकर की बांहों में वह आनंद नहीं मिलता था, जो प्रसाद मांडवकर की बांहों में मिलता था.

उसे अब समीर रोहितकर की बांहों से मजबूत बांहें प्रसाद मांडवकर की लगने लगी थीं. कुछ दिनों बाद जब समीर रोहितकर को प्रसाद मांडवकर और प्राची के मधुर संबंधों की जानकारी हुई तो वह बौखला उठा. इस बात को ले कर उस ने जब प्राची को आड़े हाथों लिया तो वह उस पर बरस पड़ी. उस ने समीर को बताया कि प्रसाद से उस का रिश्ता भाईबहन जैसा है. लेकिन समीर को प्राची की बातों पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ. वह यह बात अच्छी तरह जान चुका था कि प्रसाद मांडवकर और प्राची के बीच कुछ अलग ही तरह के संबंध हैं.

आखिरकार उन दोनों के रिश्तों की सच्चाई जानने के लिए समीर प्रसाद मांडवकर से मिला और उस के व प्राची के संबंधों के बारे में पूछा. साथ ही उस ने उसे अपने और प्राची के बीच से निकल जाने के लिए भी कहा. लेकिन प्रसाद ने उस की बात मानने से इनकार करते हुए कहा कि प्राची अब उस की प्रेमिका है. प्रमाण के लिए प्रसाद ने उसे अपने नजदीकी संबंधों के कुछ फोटोग्राफ्स भी दिखाए जिनमें वे दोनें साथसाथ थे. यह देखकर समीर ने गुस्से में कहा, ‘‘प्रसाद, यह तुम ने ठीक नहीं किया. दोस्त हो कर दोस्त की पीठ में छुरा घोंपना ठीक नहीं है.’’

इस बात पर प्रसाद को भी गुस्सा आ गया. वह बोला, ‘‘यह सब कहने से पहले अपने गिरेबान में झांको. तुम ने कौन अच्छा किया था? एक सीधेसादे आदमी का घरबार बरबाद करने वाले तुम ही थे न? वह कौन सी तुम्हारी पत्नी है जो तुम उस के लिए मरे जा रहे हो. जो तुम कर रहे हो वही मैं भी कर रहा हूं. इस में बुरा मानने वाली बात क्या है?’’

अपने घर लौट कर प्रसाद मांडवकर तो रिलेक्श हो गया लेकिन समीर रोहितकर को रातभर नींद नहीं आई. उसे प्रसाद मांडवकर की कही बातें कांटों की तरह चुभ रही थीं. रातभर सोचने के बाद उस ने प्रसाद को अपने और प्राची के बीच से निकाल फेंकने का खतरनाक फैसला कर लिया. लेकिन यह काम उस के अकेले के बस की बात नहीं थी. इसलिए उस ने इस काम में अपने 2 दोस्तों की मदद लेने की सोची. इस काम के लिए उस ने अपने दोस्त रोहित वंगर और जार्ज फर्नांडीस से बात की. दोनों उस के खास दोस्त थे. उस की बात सुन कर वह खुशीखुशी उस का साथ देने के लिए तैयार हो गए. जार्ज फर्नांडीस मुंबई स्थित ब्रीच कैंडी अस्पताल के पास एक सैंडविच और जूस सेंटर पर नौकरी करता था, जहां समीर अकसर अपने मालिकों के लिए सैंडविच और जूस लेने आताजाता था.

यहीं पर रोहितकर से उस की दोस्ती हुई थी. जार्ज फर्नांडीस के पिता वहीं की एक इमारत में कार ड्राइवरी करते थे. वह अपने पिता के लिए उसी दुकान पर उन का लंच बौक्स ले कर आता था. सैंडविच और जूस सेंटर पर ही तीनों की मुलाकातें होती थीं. तीनों गहरे दोस्त बन गए थे. अब समीर रोहितकर को इंतजार था एक ऐसे मौके का जब वह अपना काम आसानी से कर सके. उसे यह मौका घटना वाले दिन मिल गया. संयोग से उस दिन समीर रोहितकर के मालिक किसी काम से मुंबई से बाहर चले गए थे. उन की कार 24 घंटों के लिए समीर के हाथों मे ंआ गई थी. निस्संदेह उस के लिए यह एक अच्छा मौका था. समीर रोहितकर ने जार्ज फर्नांडीस और रोहित वंगर से फोन पर बात की और प्रसाद मांडवकर को सारे गिले शिकवे भुला कर सैंडविच सेंटर पर आने के लिए कहा.

जिस वक्त प्रसाद मांडवकर सैंडविच सेंटर पर पहुंचा, उस समय समीर रोहितकर अपने मालिक की कार लिए खड़ा था. उस ने प्रसाद मांडवकर को बड़े प्यार से अपनी कार में बैठा लिया और इधरउधर की बातें करने लगा. इसी बीच समीर ने अपने दोस्त जार्ज फर्नांडीस को इशारा किया. जार्ज फर्नांडीस ने प्रसाद मांडवकर को पीने के लिए जूस का गिलास ला कर दिया जिस में योजनानुसार नींद की गोलियां मिली हुई थीं. जूस पीने के थोड़ी देर बाद जब उस पर खुमारी छाने लगी तो अपनी योजना के अनुसार समीर ने कपड़ा धोने वाले डिटर्जेंट के पाउडर और बोरिक ऐसिड से बनाया गया इंजेक्शन अपने दोस्तों की मदद से प्रसाद मांडवकर के गले में लगा दिया. उन का मानना था कि इस इंजेक्शन से प्रसाद मांडवकर की मौत हो जाएगी और किसी को उस की मौत के कारणों का पता भी नहीं चलेगा.

लेकिन जब उन की यह योजना फेल हो गई तो समीर बेहोश प्रसाद को देर रात गए अपने दोस्तों के साथ कार में ले कर चेंबूर, घाटकोपर, तिलक नगर इलाके की तरफ निकल गया. इन लोगों ने तिलक नगर पीडब्ल्यूडी कंपाउंड की सुनसान जगह पर जा कर प्रसाद मांडवकर को कार से बाहर निकाला और कंपाउंड की दीवार के सहारे सीधा खड़ा कर के उस के गले पर चापर से वार कर दिया. इस के बाद उन्होंने प्रसाद के कपड़ों की तलाशी ली. उन्होंने उस की जेब से शिनाख्त के सारे कागजात और उस का मोबाइल निकाल लिया और वहां से लौट आए.

समीर रोहितकर और उस के दोनों दोस्त यह मान कर चल रहे थे कि पहले तो प्रसाद मांडवकर की लाश किसी को मिलेगी ही नहीं और अगर मिल भी गई तो उस की शिनाख्त होनी असंभव थी. मगर यह उन की भूल थी. कुछ ही घंटों बाद किसी राहगीर ने लाश की सूचना तिलकनगर पुलिस थाने को दे दी थी. फलस्वरूप पुलिस ने उस की लाश बरामद कर ली थी. क्राइम ब्रांच ने समीर रोहितकर के साथसाथ उस के दोस्त रोहित वंगर ओर जार्ज फर्नांडीस को अपनी गिरफ्त में ले लिया. यह खबर जब प्राची को मिली तो वह सन्न रह गई. समीर बंसत रोहितकर, रोहित विश्वनाथ और जार्ज अरुण फर्नांडीस से विस्तृत पूछताछ करने के बाद क्राइम ब्रांच ने उन्हें महानगर मेटोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. इस केस की जांच तिलकनगर पुलिस थाने के सीनियर इंसपेक्टर भगवत सोनावले कर रहे हैं. तीनों अभियुक्त जेल में हैं. Love Story in Hindi

कथा में प्राची का नाम काल्पनिक है और कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है.

 

Love Story: दिल लगाने का अपराध

Love Story: मारपीट, चोरीडकैती, अपहरण और फिरौती वसूलने जैसे अपराध करने वाले वैभव को शादीशुदा ज्योत्सना से दिल लगा कर जिंदगी से हाथ क्यों धोना पड़ा. 23 अगस्त की रात के यही कोई 8 बजे महानगर मुंबई के व्यस्ततम थाना डोंगरी के चार्जरूम में ड्यूटी पर मौजूद महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के के सामने रोनी सूरत लिए एक चेहरा अपने पूरे परिवार के साथ आ कर खड़ा हो गया. गिरिजा मस्के उस चेहरे और उस के परिवार वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. वह विशाल आचरेकर था, जो आपराधिक प्रवृत्ति के वैभव आचरेकर का बड़ा भाई था.

भाई के मामलों में वह अकसर थाना डोंगरी आता रहता था, इसलिए सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के उसे और उस के घर वालों को अच्छी तरह से पहचानती थीं. इसी वजह से उन्होंने सीधे पूछा, ‘‘कहिए, क्या बात है, वैभव ने फिर कोई कांड कर दिया क्या?’’

‘‘नहीं मैडम, इस बार उस ने कोई कांड नहीं किया, बल्कि लगता है वह खुद ही किसी कांड का शिकार हो गया है.’’ विशाल आचरेकर ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैडम, 20 अगस्त की सुबह वह घर से निकला था, तब से उस का कुछ अतापता नहीं है. उस का मोबाइल फोन भी बंद है.’’

‘‘चिंता करने की कोई बात नहीं है. अपराध कर के कहीं छिपा होगा. 2-4 दिनों में अपने आप ही आ जाएगा.’’ सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने उस की शिकायत को हल्के में लेते हुए कहा, ‘‘हो सकता है, यारोंदोस्तों के साथ कहीं चला गया हो. ऐसे लोगों का क्या भरोसा.’’

‘‘नहीं मैडम, हम लोगों ने उसे हर जगह ढूंढ लिया है. पूरी तरह निराश हो कर ही आप के पास आए हैं. वह कहीं छिपा नहीं, उस के साथ जरूर कोई अनहोनी हो गई है. अब आप ही हमारी कुछ मदद कर सकती हैं.’’

विशाल और उस के घर वालों की विनती पर सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के ने वैभव की गुमशुदगी दर्ज करा कर इस बात की जानकारी अपने सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल को दे दी. इस के बाद उन्होंने विशाल और उस के घर वालों को आश्वासन दे कर घर भेज दिया. थाना डोंगरी के सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने तत्काल इस मामले की जानकारी अधिकारियों को देने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी थी. इस के बाद अधिकारियों के दिशानिर्देश पर सीनियर इंसपेक्टर संदीप डाल ने सहायक इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर के साथ जांच की रूपरेखा तैयार की और फिर उन्हीं को इस मामले की जांच सौंप दी.

जांच की जिम्मेदारी मिलने के बाद इंसपेक्टर महादेव कदम और अंकुश काटकर ने एक टीम बनाई, जिस में असिस्टेंट इंसपेक्टर शशिकांत यादव, सबइंसपेक्टर संतोष कांबले, महिला सबइंसपेक्टर गिरिजा मस्के, पुलिस नायक सैयद सांलुके, कांबले, धार्गे, कनकुटे और वोडरे को शामिल किया. इस टीम ने जांच तो तेजी से शुरू की, लेकिन कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई. 31 वर्षीय वैभव आचरेकर अपने मातापिता, भाईभाभी और बहनों के साथ मुंबई के डोंगरी इलाके में स्थित पोद्दार इमारत की दूसरी मंजिल पर रहता था. पिता का नाम देवीदास आचरेकर था. वैभव डोंगरी के जिस इलाके में रहता था, वह इलाका किसी जमाने में जानेमाने कुख्यात तस्कर करीम लाला और हाजी मस्तान का माना जाता था.

उस समय पठान भाइयों की इजाजत के बगैर इस इलाके का एक पत्ता भी नहीं हिलता था. शायद वैभव पर भी इलाके का असर पड़ गया था और वह भी अपराधी प्रवृत्ति का हो गया था. इलाके के सभी छोटेबड़े अपराधियों के बीच उस की अच्छी पैठ थी. उस के खिलाफ मारपीट, चोरीडकैती और अपहरणफिरौती जैसे कई अपराधों के मामले दर्ज थे, इसलिए थाना डोंगरी पुलिस उसे ही नहीं, उस के घर के हर सदस्य को पहचानती थी. शुरू में वैभव की अपराधी प्रवृत्ति को ध्यान में रख कर पुलिस टीम ने उस के बारे में पता लगाना शुरू किया. पुलिस को लगता था, कि अपने कारनामों की वजह से कहीं उसे मार न दिया गया हो. लेकिन इस बारे में कोई सुराग नहीं मिला.

धीरेधीरे दिन बीतते गए. वैभव को गायब हुए 4 महीने बीत गए और उस का कुछ पता नहीं चला. उस की लाश भी नहीं मिली कि मान लिया जाता कि उसे मार दिया गया है. अगर वह कोई अपराध कर के भी छिपा होता तो इतने दिनों तक न उस का अपराध छिपा रह सकता था और न वह खुद. जांच टीम वैभव के बारे में जो सोच कर जांच कर रही थी, उस से कोई फायदा नहीं हुआ, इसलिए जांच अधिकारी इंसपेक्टर महादेव कदम ने जांच की दिशा बदल दी. माना जाता है कि लड़ाईझगड़े या हत्या जैसे अपराधों की वजह जर, जमीन और जोरू होती है. यहां जर, जमीन का कोई कारण नहीं दिख रहा था, इसलिए उन का ध्यान जोरू की तरफ गया. वैभव जवान, सुंदर और अविवाहित युवक था, इसलिए उन्हें लगा कि कहीं वह किसी जोरू की वजह से तो नहीं गायब कर दिया गया.

इस की एक वजह यह भी थी कि जिस दिन वैभव गायब हुआ था, उस दिन की उस के मोबाइल फोन की लोकेशन मुंबई के उपनगर दहिसर की लाभदर्शन इमारत के आसपास की पाई गई थी. वहां उस के जाने की क्या वजह हो सकती थी? जांच टीम यह जानने के लिए उस के घर गई तो घर वाले इस बारे में कुछ खास नहीं बता सके. लेकिन जब इस टीम ने किसी महिला से संबंध के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि इसी इमारत में रहने वाली ज्योत्सना मोरे से वैभव के मधुर संबंध थे. उस के घर भी उस का खूब आनाजाना था.

पुलिस ने जब ज्योत्सना मोरे से पूछताछ की तो उस ने यह तो स्वीकार कर लिया कि पड़ोसी होने के नाते वैभव का उस के घर आनाजाना था. लेकिन न तो उस के उस से कोई गलत संबंध थे, न उसे उस की गुमशुदगी के बारे में कुछ पता है. इमारत में ईर्ष्या करने वाले लोगों ने उसे बदनाम करने के लिए उस का नाम वैभव के साथ जोड़ दिया होगा. पुलिस ने ज्योत्सना मोरे को गिरफ्तार तो नहीं किया, लेकिन वह संदेह के घेरे में आ गई थी, इसलिए उस का मोबाइल अपने पास रखने के साथ इस हिदायत के साथ घर जाने दिया कि वह पुलिस को बताए बिना मुंबई छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. इस के बाद पुलिस ने ज्योत्सना के बारे में पता लगाना शुरू किया.

जुटाई गई जानकारियों के आधार पर पुलिस को ज्योत्सना मोरे के बारे में जो पता चला, वह चौंकाने वाला था. पुलिस को उस के नंबर की काल डिटेल्स में एक ऐसा नंबर मिला, जिस पर उस ने वैभव के गायब होने वाले दिन कई बार बात की थी. उस नंबर वाले फोन की लोकेशन भी उसी जगह की पाई गई थी, जहां की वैभव के मोबाइल फोन की मिली थी. ज्योत्सना के भी मोबाइल फोन की लोकेशन वहां की थी. तीनों मोबाइल फोनों की लोकेशन एक जगह की मिलने की वजह से ज्योत्सना मोरे संदेह के घेरे में आ गई. यह संदेह तब और गहरा गया, जब पुलिस ने उस से उस नंबर के बारे में पूछा तो उस ने साफ कहा कि वह उस नंबर के बारे में बिलकुल नहीं जानती.

जबकि उस नंबर पर उस की लगातार बातें हो रही थीं. पुलिस को अब तक यह भी पता चल चुका था कि दहिसर की लाभदर्शन इमारत में उस का मायका था. साफ था, ज्योत्सना ने ही वैभव को वहां बुलाया होगा. इस के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. 20 दिसंबर, 2014 को इंसपेक्टर महादेव कदम ने सीनियर अधिकारियों की उपस्थिति में जब ज्योत्सना से सुबूतों के आधार पर सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गई. उस ने वैभव की हत्या का अपना अपराध तो स्वीकार कर ही लिया, उस मोबाइल नंबर के बारे में भी बता दिया, जिस के बारे में वह अनभिज्ञता प्रकट कर रही थी.

वह मोबाइल नंबर ज्योत्सना के पुराने प्रेमी प्रकाश पाटिल का था. उसी के साथ मिल कर उस ने वैभव आचरेकर को ठिकाने लगा दिया था. इस के बाद उस की निशानदेही पर इंसपेक्टर महादेव कदम ने उसी रात उस के साथी प्रकाश पाटिल को भी गिरफ्तार कर लिया था. थाने में दोनों से की गई पूछताछ में वैभव आचरेकर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह प्रेम त्रिकोण में की गई हत्या की थी. 34 वर्षीय प्रकाश पाटिल महाराष्ट्र के जनपद पालघर की तहसील वसई के गांव ज्यूचंद्र का रहने वाला था. उस के पिता रामचंद्र  पाटिल गांव के सुखीसंपन्न किसान थे. बीए करने के बाद प्रकाश नगर महापालिका में ठेकेदारी करने लगा था, जिस से उसे ठीकठाक आमदनी हो रही थी.

जिन दिनों वह बीए कर रहा था, उन्हीं दिनों साथ पढ़ने वाली ज्योत्सना से उसे प्यार हो गया था. ज्योत्सना भी उसे प्यार करती थी, इसलिए दोनों शादी करना चाहते थे. लेकिन किन्हीं कारणों से यह शादी नहीं हो पाई. प्रकाश के घर वालों ने उस की शादी कहीं और कर दी थी तो ज्योत्सना के घर वालों ने भी उस उस की शादी मुंबई के रहने वाले अमित मोरे से कर दी थी. दोनों ही अपनेअपने घरसंसार में सुखी थे. प्रकाश जहां 2 बेटियों का बाप बन गया था, वहीं ज्योत्सना भी एक बेटे की मां बन चुकी थी. लेकिन जब कई सालों बाद बिछड़े हुए प्रेमी एक विवाह समारोह में मिले तो इन का प्यार एक बार फिर उमड़ पड़ा.

गिलेशिकवे दूर करने के बाद प्रकाश और ज्योत्सना ने एकदूसरे के मोबाइल नंबर ले लिए थे. फोन पर बातचीत करतेकरते धीरेधीरे दोनों एक बार फिर पुराने रंग में रंग गए. ज्योत्सना पति अमित मोरे और बेटे के साथ मुंबई के डोंगरी में रहती थी. दरअसल वह अपने पति अमित मोरे से खुश नहीं थी. अमित मोरे एक बीमा कंपनी का एजेंट था. वह ज्योत्सना जैसी सुंदर और पढ़ीलिखी पत्नी पा कर खुद को धन्य समझ रहा था. इसीलिए वह उसे खुश रखने और उस की सुखसुविधाओं का पूरा खयाल रखता था. पत्नी और बेटे को किसी तरह की कोई तकलीफ न हो, इस के लिए वह दिनरात मेहनत करता था.

इसी चक्कर में वह यह भूल भी गया था कि सुखसुविधा के अलावा पत्नी को पति का प्यार भी चाहिए. देर रात वह घर लौटता तो बुरी तरह थका होता. खापी कर वह बिस्तर पर पड़ते ही सो जाता. सुबह उठता और चायनाश्ता कर के काम पर निकल जाता. उस के पास ज्योत्सना के लिए समय ही नहीं होता था. पति की इसी उपेक्षा से ज्योत्सना अंदर ही अंदर सुलग रही थी, जिस का फायदा उसी इमारत में रहने वाले वैभव आचरेकर ने उठाया. वैभव आचरेकर और अमित मोरे के बीच अच्छी दोस्ती थी. दोनों बचपन के दोस्त थे. यह अलग बात थी कि अमित मोरे ईमानदारी और मेहनत की कमाई खाता था, जबकि वैभव आचरेकर अपराध की कमाई से मौज कर रहा था. दोनों की दिशाएं अलग थीं, इस के बावजूद उन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं पड़ा था.

वैभव कभी अमित मोरे के साथ उस के घर आया तो खूबसूरत ज्योत्सना को देख कर उस पर मर मिटा. कुंवारा होने की वजह से स्त्रीसुख से वंचित वैभव ज्योत्सना को पाने की कोशिश करने लगा. उस के हावभाव से जब उस के मन की बात ज्योत्सना को पता चली तो वह भी उस की ओर आकर्षित हो उठी. क्योंकि वह यही तो चाहती थी. धीरेधीरे ज्योत्सना वैभव की ओर खिंचने लगी. फिर तो वह स्वयं को संभाल नहीं सकी और वैभव की बांहों में समा गई. ज्योत्सना को वैभव की सशक्त बांहों का सुख मिला तो वह अमित मोरे को भूल कर उसी की हो गई. उसे जब भी मौका मिलता, वैभव को अपने फ्लैट पर बुला लेती. पहले तो वैभव ज्योत्सना के बुलाने का इंतजार करता था, लेकिन कुछ दिनों बाद जब भी उस का मन होता, वह खुद ही ज्योत्सना के फ्लैट पर पहुंच जाता.

धीरेधीरे वह ज्योत्सना को प्रेमिका कम, पत्नी ज्यादा समझने लगा. लेकिन जब ज्योत्सना की मुलाकात उस के पुराने प्रेमी प्रकाश से हुई तो वह वैभव से किनारे करने लगी. अपराधी प्रवृत्ति के वैभव को ज्योत्सना का यह व्यवहार पसंद नहीं आया. क्योंकि वह उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था. उसे जब जैसी जरूरत पड़ती थी, वह ज्योत्सना को उसी हिसाब से इस्तेमाल कर लेता था. यह बात ज्योत्सना को पसंद नहीं थी. प्रकाश से मिलने के बाद वह वैभव से संबंध नहीं रखना चाहती थी. ज्योत्सना जब वैभव की मनमानियों से तंग आ गई तो उस से मुक्ति पाने के लिए परेशान रहने लगी. जब उस की परेशानी के बारे में प्रकाश पाटिल को पता चला तो उस ने ज्योत्सना के साथ मिल कर वैभव को अपने बीच से निकाल फेंकने की खतरनाक योजना बना डाली.

लेकिन वैभव मजबूत कदकाठी और अपराधी प्रवृत्ति का युवक था, इसलिए उस से सीधे निपटना ज्योत्सना और प्रकाश के वश की बात नहीं थी. इसलिए प्रकाश ने अपनी योजना में अपने एक दोस्त माइकल को भी शामिल कर लिया. योजना के अनुसार, ज्योत्सना 19 अगस्त, 2014 को अपने मायके दहिसर आ गई. वहीं से उस ने वैभव को फोन कर के मिलने के लिए वसई के रेलवे स्टेशन नायगांव बुलाया. 20 अगस्त, 2014 की सुबह वैभव अपने घर वालों को बताए बगैर ज्योत्सना से मिलने नायगांव पहुंच गया. साढ़े 10 बजे वैभव नायगांव रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो पहले से ही इंतजार कर रहे प्रकाश और माइकल ने उसे पकड़ लिया. दोनों खुद को पालिका इंसपेक्टर बता कर वैभव को पूछताछ के बहाने नायगांव पूर्व मित्तल क्लब हाउस के पास ले गए.

वहां पहुंच कर प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की यह कर पिटाई शुरू कर दी कि वह डोंगरी में रहने वाली ज्योत्सना मोरे को परेशान करता है और उसे धमकी दे कर बिना उस की मरजी के उस के साथ शारीरिक संबंध बनाता है. प्रकाश पाटिल और माइकल ने वैभव की इस तरह पिटाई की कि थोड़ी देर में वह बेहोश हो गया. उस के बेहोश होने के बाद प्रकाश पाटिल ने वैभव के गले में रस्सी डाल कर कस दी, जिस से उस की मौत हो गई.

वैभव को मौत के घाट उतार कर उस की लाश एक चादर में लपेटी और रात में ही माइकल की मारुति कार में रख कर उसे ठिकाने लगाने के लिए मुंबई-अहमदाबाद एक्सप्रेस हाइवे पर चल पड़े. रात 12 बजे के आसपास वे मनोर के पास बह रही नदी के पुल पर पहुंचे. उन्होंने लाश कार से निकाली और तलाशी में उस का सारा सामान निकाल कर लाश को नदी में फेंक दिया. लाश ठिकाने लगाने के बाद प्रकाश ने फोन कर के ज्योत्सना को वैभव की हत्या के बारे में बता दिया. अगले दिन वैभव की लाश किसी मछुआरे के जाल में फंस गई तो उस ने इस बात की जानकारी थाना मनोर पुलिस को दी. पुलिस ने शव बरामद कर के शिनाख्त कराने की कोशिश की. शिनाख्त न होने पर पोस्टमार्टम के बाद थाना मनोर पुलिस ने उस का अंतिम संस्कार करा दिया.

वैभव की हत्या से ज्योत्सना तो खुश थी ही, प्रेमिका को खुश कर के प्रकाश भी खुश था. जिस तरह प्रकाश ने वैभव को अपने रास्ते से हटाया था, उस का सोचना था कि पुलिस उस तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. 4 महीने बीत गए तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि अब वह बच गया. लेकिन पुलिस खोजतेखोजते ज्योत्सना तक पहुंच गई तो वैभव आचरेकर की हत्या का रहस्य खुल गया और वह भी पकड़ा गया. पूछताछ के बाद पुलिस ने प्रकाश के दोस्त माइकल को भी गिरफ्तार कर लिया. इस के बाद वैभव की हत्या का मुकदमा प्रकाश पाटिल, ज्योत्सना और माइकल के खिलाफ दर्ज कर के महानगर मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों अभियुक्त जेल में ही थे. Love Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Love Crime : जिस्म की खातिर किया इश्क

Love Crime : मीना अपने 3 भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं, खूबसूरत भी थी. उस का परिवार औरैया जिले के कस्बा दिबियापुर में रहता था. उस के पिता अमर सिंह रेलवे में पथ निरीक्षक थे. उस ने इंटर पास कर लिया तो मांबाप उस के विवाह के बारे में सोचने लगे. उन्होंने उस के लिए घरवर की तलाश शुरू की तो उन्हें कंचौसी कस्बा के रहने वाले राम सिंह का बेटा अनिल पसंद आ गया.

जून, 2008 में मीना की शादी अनिल से हो गई. मीना सुंदर तो थी ही, दुल्हन बनने पर उस की सुंदरता में और ज्यादा निखार आ गया था. ससुराल में जिस ने भी उसे देखा, उस की खूबसूरती की खूब तारीफ की. अपनी प्रशंसा पर मीना भी खुश थी. मीना जैसी सुंदर पत्नी पा कर अनिल भी खुश था.

दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चल पड़ी थी. लेकिन कुछ समय बाद आर्थिक परेशानियों ने उन की खुशी को ग्रहण लगा दिया. शादी के पहले अनिल छोटेमोटे काम कर के गुजारा कर लेता था. लेकिन शादी के बाद मीना के आने से जहां अन्य खर्चे बढ़ ही गए थे, वहीं मीना की महत्त्वाकांक्षी ख्वाहिशों ने उस के इस खर्च को और बढ़ा दिया था. आर्थिक परेशानियों को दूर करने के लिए वह कस्बे की एक आढ़त पर काम करने लगा था.

आढ़त पर काम करने की वजह से अनिल को कईकई दिनों घर से बाहर रहना पड़ता था, जबकि मीना को यह कतई पसंद नहीं था. पति की गैरमौजूदगी में वह आसपड़ोस के लड़कों से बातें ही नहीं करने लगी थी, बल्कि हंसीमजाक भी करने लगी थी. शुरूशुरू में तो किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. लेकिन जब उस की हरकतें हद पार करने लगीं तो अनिल के मातापिता से यह देखा नहीं गया और वे यह कह कर गांव चले गए कि अब वे गांव में रह कर खेती कराएंगे.

सासससुर के जाने के बाद मीना को पूरी आजादी मिल गई थी. अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए उस ने इधरउधर नजरें दौड़ाईं तो उसे राजेंद्र जंच गया. फिर तो वह उसे मन का मीत बनाने की कोशिश में लग गई. राजेंद्र मूलरूप से औरैया का रहने वाला था. उस के पिता गांव में खेती कराते थे. वह 3 भाईबहनों में सब से छोटा था. बीकौम करने के बाद वह कंचौसी कस्बे में रामबाबू की अनाज की आढ़त पर मुनीम की नौकरी करने लगा था.

राजेंद्र और अनिल एक ही आढ़त पर काम करते थे, इसलिए दोनों में गहरी दोस्ती थी. अनिल ने ही राजेंद्र को अपने घर के सामने किराए पर कमरा दिलाया था. दोस्त होने की वजह से राजेंद्र अनिल के घर आताजाता रहता था. जब कभी आढ़त बंद रहती, राजेंद्र अनिल के घर आ जाता और फिर वहीं पार्टी होती. पार्टी का खर्चा राजेंद्र ही उठाता था.

राजेंद्र पर दिल आया तो मीना उसे फंसाने के लिए अपने रूप का जलवा बिखेरने लगी. मीना के मन में क्या है, यह राजेंद्र की समझ में जल्दी ही आ गया. क्योंकि उस की निगाहों में जो प्यास झलक रही थी, उसे उस ने ताड़ लिया था. इस के बाद तो मीना उसे हूर की परी नजर आने लगी थी. वह उस के मोहपाश में बंधता चला गया था.

एक दिन जब राजेंद्र को पता चला कि अनिल 2 दिनों के लिए बाहर गया है तो उस दिन उस का मन काम में नहीं लगा. पूरे दिन उसे मीना की ही याद आती रही. घर आने पर वह मीना की एक झलक पाने को बेचैन था. उस की यह ख्वाहिश पूरी हुई शाम को. मीना सजधज कर दरवाजे पर आई तो उस समय वह उसे आसमान से उतरी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी. उसे देख कर उस का दिल बेकाबू हो उठा.

राजेंद्र को पता ही था कि अनिल घर पर नहीं है, इसलिए वह उस के घर जा पहुंचा. राजेंद्र को देख कर मीना ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘आज तुम आढ़त से बड़ी जल्दी आ गए, वहां कोई काम नहीं था क्या?’’

‘‘काम तो था भाभी, लेकिन मन नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ मीना ने पूछा.

‘‘सच बता दूं भाभी.’’

‘‘हां, बताओ.’’

‘‘भाभी, तुम्हारी सुंदरता ने मुझे विचलित कर दिया है, तुम सचमुच बहुत सुंदर हो.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कद्र न हो.’’ मीना ने लंबी सांस ले कर कहा.

‘‘क्या अनिल भाई, तुम्हारी कद्र नहीं करते?’’

‘‘जानबूझ कर अनजान मत बनो. तुम जानते हो कि तुम्हारे भाई साहब महीने में 10 दिन तो बाहर ही रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें करवटों में बीतती हैं.’’

‘‘भाभी जो दुख तुम्हारा है, वही मेरा भी है. मैं भी तुम्हारी यादों में रातरात भर करवट बदलता रहता हूं. अगर तुम मेरा साथ दो तो हमारी समस्या खत्म हो सकती है.’’ कह कर राजेंद्र ने मीना को अपनी बांहों में भर लिया.

मीना चाहती तो यही थी, लेकिन उस ने मुखमुद्रा बदल कर बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे.’’

‘‘प्लीज भाभी शोर मत मचाओ, तुम ने मेरा सुखचैन सब छीन लिया है.’’ राजेंद्र ने कहा.

‘‘नहीं राजेंद्र, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’

‘‘नहीं भाभी, अब यह मुमकिन नहीं है. कोई पागल ही होगा, जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने करीब पहुंच कर पीछे हटेगा.’’ कह कर राजेंद्र ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखावे के लिए मीना न…न…न… करती रही, जबकि वह खुद राजेंद्र के शरीर से लिपटी जा रही थी. राजेंद्र कोई नासमझ बच्चा नहीं था, जो मीना की हरकतों को न समझ पाता. इस के बाद वह क्षण भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी.

एक बार मर्यादा भंग हुई तो राजेंद्र को हरी झंडी मिल गई. उसे जब भी मौका मिलता, वह मीना के घर पहुंच जाता और इच्छा पूरी कर के वापस आ जाता. मीना अब खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस की शारीरिक भूख मिटने लगी थी, साथ ही आर्थिक समस्या का भी हल हो गया था. मीना जब भी राजेंद्र से रुपए मांगती थी, वह चुपचाप निकाल कर दे देता था.

काम कोई भी हो, ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता. ठीक वैसा ही मीना और राजेंद्र के संबंधों में भी हुआ. उन के नाजायज संबंधों को ले कर अड़ोसपड़ोस में बातें होने लगीं. ये बातें अनिल के कानों तक पहुंची तो वह सन्न रह गया. उसे बात में सच्चाई नजर आई. क्योंकि उस ने मीना और राजेंद्र को खुल कर हंसीमजाक करते हुए कई बार देखा था. तब उस ने इसे सामान्य रूप से लिया था. अब पडोसियों की बातें सुन कर उसे दाल में काला नजर आने लगा था.

अनिल ने इस बारे में मीना से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘पड़ोसी हम से जलते हैं. राजेंद्र का आनाजाना और मदद करना उन्हें अच्छा नहीं लगता, इसलिए वे इस तरह की ऊलजुलूल बातें कर के तुम्हारे कान भर रहे हैं. अगर तुम्हें मुझ पर शक है तो राजेंद्र का घर आनाजाना बंद करा दो. लेकिन उस के बाद तुम दोनों की दोस्ती में दरार पड़ जाएगी. वह हमारी आर्थिक मदद करना बंद कर देगा.’’

अनिल ने राजेंद्र और मीना को रंगेहाथों तो पकड़ा नहीं था, इसलिए उस ने मीना की बात पर यकीन कर लिया. लेकिन मन का शक फिर भी नहीं गया. इसलिए वह राजेंद्र और मीना पर नजर रखने लगा. एक दिन राजेंद्र आढ़त पर नहीं आया तो अनिल को शक हुआ. दोपहर को वह घर पहुंचा तो उस के मकान का दरवाजा बंद था और अंदर से मीना और राजेंद्र के हंसने की आवाजें आ रही थीं. अनिल ने खिड़की के छेद से अंदर झांक कर देखा तो मीना और राजेंद्र एकदूसरे में समाए हुए थे.

अनिल सीधे शराब के ठेके पर पहुंचा और जम कर शराब पी. इस के बाद घर लौटा और दरवाजा पीटने लगा. कुछ देर बाद मीना ने दरवाजा खोला तो राजेंद्र कमरे में बैठा था. उस ने राजेंद्र को 2 तमाचे मार कर बेइज्जत कर के घर से भगा दिया. इस के बाद मीना की जम कर पिटाई की. मीना ने अपनी गलती मानते हुए अनिल के पैर पकड़ कर माफी मांग ली और आइंदा इस तरह की गलती न करने की कसम खाई.

अनिल उसे माफ करने को तैयार नहीं था, लेकिन मासूम बेटे की वजह से अनिल ने मीना को माफ कर दिया. इस के बाद कुछ दिनों तक अनिल, मीना से नाराज रहा, लेकिन धीरेधीरे मीना ने प्यार से उस की नाराजगी दूर कर दी. अनिल को लगा कि मीना राजेंद्र को भूल चुकी है. लेकिन यह उस का भ्रम था. मीना ने मन ही मन कुछ दिनों के लिए समझौता कर लिया था.

अनिल के प्रति यह उस का प्यार नाटक था, जबकि उस के दिलोदिमाग में राजेंद्र ही बसता था. उधर अनिल द्वारा अपमानित कर घर से निकाल दिए जाने पर राजेंद्र के मन में नफरत की आग सुलग रही थी. उन की दोस्ती में भी दरार पड़ चुकी थी. आमनासामना होने पर दोनों एकदूसरे से मुंह फेर लेते थे. मीना से जुदा होना राजेंद्र के लिए किसी सजा से कम नहीं था.

मीना के बगैर उसे चैन नहीं मिल रहा था. अनिल ने मीना का मोबाइल तोड़ दिया था, इसलिए उस की बात भी नहीं हो पाती थी. दिन बीतने के साथ मीना से न मिल पाने से उस की तड़प बढ़ती जा रही थी. आखिर एक दिन जब उसे पता चला कि अनिल बाहर गया है तो वह मीना के घर जा पहुंचा. मीना उसे देख कर उस के गले लग गई. उस दिन दोनों ने जम कर मौज की.

लेकिन राजेंद्र घर के बाहर निकलने लगा तो पड़ोसी राजे ने उसे देख लिया. अगले दिन अनिल वापस आया तो राजे ने उसे राजेंद्र के आने की बात बता दी. अनिल को गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन वह चुप रहा. उसे लगा कि जब तक राजेंद्र जिंदा है, तब तक वह उस की इज्जत से खेलता रहेगा. इसलिए इज्जत बचाने के लिए उस ने अपने दोस्त की हत्या की योजना बना डाली.

उस ने मीना को उस के मायके दिबियापुर भेज दिया. उस ने उसे भनक तक नहीं लगने दी थी कि उस के मन में क्या चल रहा है. मीना को मायके पहुंचा कर उस ने राजेंद्र से पुन: दोस्ती गांठ ली. राजेंद्र तो यही चाहता था, क्योंकि दोस्ती की आड़ में ही उस ने मीना को अपनी बनाया था. एक बार फिर दोनों की महफिल जमने लगी.

एक दिन शराब पीते हुए राजेंद्र ने कहा, ‘‘अनिलभाई, तुम ने मीना भाभी को मायके क्यों पहुंचा दिया? उस के बिना अच्छा नहीं लगता. मुझे आश्चर्य इस बात का है कि उस के बिना तुम्हारी रातें कैसे कटती हैं?’’

अनिल पहले तो खिलखिला कर हंसा, उस के बाद गंभीर हो कर बोला, ‘‘दोस्त मेरी रातें तो किसी तरह कट जाती हैं, पर लगता है तुम मीना के बिना बेचैन हो. खैर तुम कहते हो तो मीना को 2-4 दिनों में ले आता हूं.’’

अनिल को लगा कि राजेंद्र को उस की दोस्ती पर पूरा भरोसा हो गया है. इसलिए उस ने राजेंद्र को ठिकाने लगाने की तैयारी कर ली. उस ने राजेंद्र से कहा कि वह भी उस के साथ मीना को लाने चले. वह उसे देख कर खुश हो जाएगी. मीना की झलक पाने के लिए राजेंद्र बेचैन था, इसलिए वह उस के साथ चलने को तैयार हो गया.

5 जुलाई, 2016 की शाम अनिल और राजेंद्र कंचौसी रेलवे स्टेशन पहुंचे. वहां पता चला कि इटावा जाने वाली इंटर सिटी ट्रेन 2 घंटे से अधिक लेट है. इसलिए दोनों ने दिबियापुर (मीना के मायके) जाने का विचार त्याग दिया. इस के बाद दोनों शराब के ठेके पर पहुंचे और शराब की बोतल, पानी के पाउच और गिलास ले कर कस्बे से बाहर पक्के तालाब के पास जा पहुंचे.

वहीं दोनों ने जम कर शराब पी. अनिल ने जानबूझ कर राजेंद्र को कुछ ज्यादा शराब पिला दी, जिस से वह काफी नशे में हो गया. वह वहीं तालाब के किनारे लुढ़क गया तो अनिल ने ईंट से उस का सिर कुचल कर उस की हत्या कर दी. राजेंद्र की हत्या कर के अनिल ने उस के सारे कपडे़ उतार लिए और खून सनी ईंट के साथ उन्हें तालाब से कुछ दूर झाडि़यों में छिपा दिया. इस के बाद वह ट्रेन से अपनी ससुराल दिबियापुर चला गया.

इधर सुबह कुछ लोगों ने तालाब के किनारे लाश देखी तो इस की सूचना थाना सहावल पुलिस को दे दी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी धर्मपाल सिंह यादव फोर्स ले कर घटनास्थल पहुंच गए. तालाब के किनारे नग्न पड़े शव को देख कर धर्मपाल सिंह समझ गए कि हत्या अवैध संबंधों के चलते हुई है.

लाश की शिनाख्त में पुलिस को कोई परेशानी नहीं हुई. मृतक का नाम राजेंद्र था और वह रामबाबू की आढ़त पर मुनीम था. आढ़तिया रामबाबू को बुला कर राजेंद्र के शव की पहचान कराई गई. उस के पास राजेंद्र के पिता रामकिशन का मोबाइल नंबर था. धर्मपाल सिंह ने उसी नंबर पर राजेंद्र की हत्या की सूचना दे दी.

घटनास्थल पर बेटे की लाश देख कर रामकिशन फफक कर रो पड़ा. लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. धर्मपाल सिंह ने जांच शुरू की तो पता चला कि मृतक राजेंद्र कंचौसी कस्बा के कंचननगर में किराए के कमरे में रहता था. उस की दोस्ती सामने रहने वाले अनिल से थी, जो उसी के साथ काम करता था.

राजेंद्र का आनाजाना अनिल के घर भी था. उस के और अनिल की पत्नी मीना के बीच मधुर संबंध भी थे. अनिल जांच के घेरे में आया तो धर्मपाल सिंह ने उस पर शिकंजा कसा. उस से राजेंद्र की हत्या के संबंध में पूछताछ की गई तो पहले वह साफ मुकर गया. लेकिन जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की तो वह टूट गया.

उस ने बताया कि राजेंद्र ने उस की पत्नी मीना से नाजायज संबंध बना लिए थे, जिस से उस की बदनामी हो रही थी. इसीलिए उस ने उसे ईंट से कुचल कर मार डाला है. अनिल ने हत्या में प्रयुक्त ईंट तथा खून सने कपड़े बरामद करा दिए, जिसे उस ने तालाब के पास झाडि़यों में छिपा रखे थे.

अनिल ने हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया था. इसलिए धर्मपाल सिंह ने मृतक ने पिता रामकिशन को वादी बना कर राजेंद्र की हत्या का मुकदमा दर्ज कर अनिल को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. Love Crime

Crime Story : प्रेमिका की हत्या कर पिता को फंसाने की रची चाल

Crime Story : कृष्णा कुमारी की हत्या के बाद पुलिस को जांच में जो सबूत मिल रहे थे, उस से मामला औनर किलिंग का लग रहा था, लेकिन कृष्णा कुमारी के पिता और भाई खुद को बेकसूर ही बताते रहे. इसी दौरान कृष्णा कुमारी के प्रेमी संजय चौहान से पूछताछ की तो न सिर्फ केस का खुलासा हो गया बल्कि इस की कहानी भी प्यार के इर्दगिर्द की निकली…

30 मई, 2021 की सुबह छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के गांव तुमान में दिगपाल सिंह वैष्णव जब अपनी कोरा बाड़ी की ओर हमेशा की तरह दातून कर के चहलकदमी करते हुए पहुंचा था तो उस ने देखा कि उस की बेटी कृष्णा बेसुध पड़ी हुई है. गले में साड़ी का फंदा फंसा हुआ है. दिगपाल यह देखते ही घबरा गया. उस ने दातून एक तरफ फेंकी और तेजी से बेटी कृष्णा के पास पहुंच गया. उस ने सब से पहले उस के गले में पड़ी साड़ी की गांठ खोल दी. उस ने अपनी बेटी को खूब हिलायाडुलाया. लेकिन उस में कोई हरकत नहीं हुई तो वह घबरा गया. उस के आंसू टपकने लगे. उसे लगा कि कहीं कृष्णा ने आत्महत्या तो नहीं कर ली है या फिर उस की यह हालत किस ने की है.

वह समझ गया कि कृष्णा की सांसें थम चुकी हैं. दिगपाल चिल्लाता हुआ अपने घर की ओर भागा, ‘‘कृष्णा की मां… कृष्णा की मां, देखो यह कैसा अनर्थ हो गया है. किसी ने हमारी बेटी को मार कर घर के पिछवाड़े बाड़ी में फेंक दिया है.’’

यह सुन कर दिगपाल की पत्नी भी रोने लगी. कहने लगी कि किस ने मार दिया बेटी को. थोड़ी ही देर में यह खबर तुमान गांव में फैल गई. इस के बाद तो दिगपाल के घर के बाहर लोगों की भीड़ जुटने लगी. उसी समय गांव के सरपंच सचिन मिंज ने कटघोरा थाने फोन कर के घटना की जानकारी थानाप्रभारी अविनाश सिंह को दे दी. थानाप्रभारी अविनाश सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हुए और सुबह लगभग 8 बजे तुमान गांव पहुंच कर घटनास्थल का मुआयना करने में जुट गए. थानाप्रभारी ने घटनास्थल से ही अनुविभागीय अधिकारी (पुलिस) रामगोपाल कारियारे, एसपी अभिषेक सिंह मीणा को घटना की जानकारी दे दी.

कुछ ही देर में कोरबा से डौग स्क्वायड टीम वहां पहुंच गई. जांच के लिए खोजी कुत्ता बाघा को मृत शरीर के पास ले जा कर अपराधी को पकड़ने के लिए छोड़ दिया गया. यह अजूबा पहली बार गांव वालों ने देखा. जब खोजी कुत्ता अपराधी को पकड़ने के लिए शव को सूंघ रहा था तो लोग यह मान रहे थे कि अब जल्द ही वह आरोपी को पकड़ लेगा. मगर लोगों ने आश्चर्य से देखा कुत्ता इधरउधर घूमते हुए मृतका कृष्णा कुमारी के पिता दिगपाल वैष्णव और भाई राजेश के आसपास मंडराने लगा. यह देखते ही थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने कृष्णा के पिता दिगपाल और राजेश को हिरासत में लेने का निर्देश दिए.

दिगपाल वैष्णव स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में कंपाउंडर था. क्षेत्र में उस की अच्छी इज्जत थी. इसलिए वह थानाप्रभारी से गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब, मैं भला क्यों अपनी ही बेटी को मारूंगा. आप यकीन मानिए, मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है.’’

वह बारबार कह रहा था, मगर 2 सिपाहियों ने उसे हिरासत में ले लिया और एक कमरे में ले जा कर के उस से इकबालिया बयान देने को कहा. तब वह आंसू बहाते हुए हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘साहब, मैं बिलकुल सच कह रहा हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है, कृष्णा मुझे जान से भी ज्यादा प्यारी थी, मैं उसे नहीं मार सकता.’’

इस पर अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘देखो, पुलिस के सामने सचसच बता दो, जितना हो सकेगा हम तुम्हारे साथ रियायत करेंगे. खोजी डौग गलत नहीं हो सकता, यह जान लो.’’

इस पर आंसू बहाते हुए दिगपाल वैष्णव ने कहा, ‘‘साहब, मेरा यकीन मानिए मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. मैं तो  सुबह जब गया तो उसे मृत अवस्था में देखा था और उसे अपनी गोद में ले कर के रोता रहा था.’’

दिगपाल को याद आया कि यही कारण हो सकता है कि कुत्ते ने उसे आरोपी माना है. जब यह बात उस ने जांच अधिकारी अविनाश सिंह को बताई तो उन्हें समझ में आया. उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, ‘‘तुम्हारी बात सही हो सकती है, मगर यह जान लो कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं. हमारी जांच में और भी बहुत सारे ऐसे सबूत हमें आखिर मिल ही जाएंगे, जिस से यह सिद्ध हो जाएगा कि आरोपी कौन है. अच्छा है कि अभी भी अपना अपराध कबूल कर लो.’’

‘‘नहींनहीं साहब, मैं ने यह कर्म नहीं किया है.’’ दिगपाल ने कहा.

विवेचना अधिकारी और अन्य पुलिस जो जांच कार्य में लगी हुई थी, ने यह निष्कर्ष निकाला कि हो सकता है सुबह जब कृष्णा की लाश दिगपाल ने देखी तो उसे स्पर्श किया होगा. शायद यही कारण है कि खोजी कुत्ता उसे आरोपी मान रहा है. इस तरह जांच आगे एक नई दिशा में आगे बढ़ने लगी. जांच में पता चला कि पिछले लंबे समय से कृष्णा कुमारी का प्रेमसंबंध पास के गांव पुटुंवा निवासी संजय चौहान (23 साल) नामक युवक से था और उन के संबंध इतने मजबूत थे कि कृष्णा कुमारी ने संजय चौहान को एक बाइक और मोबाइल भी गिफ्ट किया था. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने गौर किया. जब संजय चौहान घटनास्थल पर पहुंचा था तो उस समय उस का चेहरा उतरा हुआ था और आंखें लाल थीं, ऐसा लग रहा था कि वह बहुत रोया हो.

अविनाश सिंह ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने उन के सामने अपना मोबाइल रख दिया, जिसे देख कर थानाप्रभारी चौंक गए. उस मैसेज से यह बात स्पष्ट थी कि हत्यारा दिगपाल वैष्णव ही है. संजय चौहान के मोबाइल में कृष्णा कुमारी का  मैसेज था, जिस में लिखा था, ‘आज की रात मैं नहीं बच पाऊंगी, मेरे पिता मुझे मार डालेंगे, मुझे बचा लो…’

यह मैसेज यह बता रहा था कि हत्या दिगपाल ने ही की है. इस सबूत के बाद अविनाश सिंह ने दिगपाल को फिर तलब किया और उसे मैसेज दिखाते हुए कठोर शब्दों में कहा, ‘‘दिगपाल, अब तुम सचसच बता दो, अब हमारे हाथ में सबूत आ गया है. यह देखो, तुम्हारी बेटी ने कल रात संजय को यह मैसेज किया था. बताओ, रात को क्याक्या हुआ था.’’

यह सुन कर दिगपाल भयभीत होते हुए बोला, ‘‘साहब, क्या मैसेज लिखा है मुझे बताया जाए.’’

इस पर थानाप्रभारी ने संजय के मोबाइल में लिखा हुआ मैसेज उसे पढ़ कर सुना दिया. उसे सुन कर वह आंसू बहाने लगा और सिर पकड़ कर बैठ गया. थानाप्रभारी ने थोड़ी देर बाद उस से कहा, ‘‘अब बताओ, तुम स्वीकार करते हो कि कृष्णा की हत्या तुम्हीं ने की है. हमें यह जानकारी भी मिली है कि तुम उस का विवाह दूसरी जगह करने वाले थे, जिस से वह बारबार मना भी कर रही थी. मगर इस बात पर घर में विवाद भी चल रहा था. इन सब बातों को देखते हुए स्पष्ट है कि हत्या कर के तुम्हीं लोगों ने की है.’’

दिगपालरोआंसा हो गया. उस ने कहा, ‘‘साहबजी, मैं फिर हाथ जोड़ कर बोल रहा हूं कि कृष्णा मेरी जान से भी प्यारी थी. मैं ने उसे नहीं मारा है.’’

यह सुन कर जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘तुम चाहे जितना भी कहो, सारे सबूत चीखचीख कर तुम्हें हत्यारा बता रहे हैं. साक्ष्य तुम्हारे खिलाफ हो चुके हैं. तुम बताओ, तुम्हारे पास ऐसा क्या सबूत है, जिस से यह सिद्ध हो सके कि तुम ने बेटी की हत्या नहीं की.’’

यह सुन कर दिगपाल बोला, ‘‘मैं क्या बताऊं मेरे पास कहने के लिए कुछ भी नहीं है. मगर मैं यही कहूंगा कि मैं ने अपनी बेटी को नहीं मारा है.’’

इस पर अविनाश सिंह ने गुस्से में कहा, ‘‘तुम पुलिस को चाहे कितना ही चक्कर पर चक्कर लगवाओ, मैं यह जान चुका हूं कि कृष्णा का मर्डर तुम्हारे ही हाथों से हुआ है. तुम बड़े ही शातिर और चालाक हत्यारे हो.’’

थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने वहां मौजूद अपने स्टाफ से कहा, ‘‘इसे हिरासत में ले कर  थाने ले चलो, बापबेटे से आगे की पूछताछ वहीं पुलिसिया अंदाज में करेंगे.’’

छत्तीसगढ़ का औद्योगिक जिला कोरबा ऊर्जा राजधानी के रूप में जाना जाता है. इस के अलावा यह कोयला खदानों के कारण एशिया भर में विख्यात है. कोरबा जिला मुख्यालय से लगभग 60 किलोमीटर दूर तुमान गांव स्थित है. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि तुमान छत्तीसगढ़ यानी दक्षिण कौशल की प्रथम राजधानी हुआ करती थी. यहां का एक रोमांचक इतिहास अभी भी लोगों को पर्यटनस्थल के रूप में तुमान की ओर आकर्षित करता है. इतिहास के अनुसार, सन 850-1015 के मध्य कलचुरी राजाओं का शासन था. वर्तमान जिला बिलासपुर की रतनपुर नगरी  राजा रत्नसेन प्रथम का प्राचीन काल में यहां शासन था और हैहय वंश ने यहां अपनी राजधानी बनाई थी. यहीं से पूरे छत्तीसगढ़ का राजकाज संभाला जाता था.

थाना कटघोरा में जब दिगपाल और उन के बेटे राजेश से पूछताछ की गई तो वह एक ही बात कहते रहे कि उन्होंने कृष्णा को नहीं मारा है… नहीं मारा है. मगर विवेचना के बाद सारे सबूत यही कह रहे थे कि मामला सीधेसीधे औनर किलिंग का है. पुलिस यह मान कर चल रही थी कि कृष्णा कुमारी की हत्या पिता दिगपाल और भाई राजेश ने ही की है. जांच अधिकारी अविनाश सिंह यही सब सोचते हुए अपने कक्ष में बैठे कुछ दस्तावेजों को देख रहे थे कि थोड़ी देर में एक एसआई ने उन के सामने मृतका कृष्णा के एक दूसरे प्रेमी नेवेंद्र देवांगन को सामने ला कर खड़ा कर दिया.

कटघोरा निवासी नेवेंद्र देवांगन जोकि रायपुर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुका था. कृष्णा उस से भी कुछ समय से वाट्सऐप पर चैट यानी बातचीत करती थी. नेवेंद घबराया हुआ सामने खड़ा था. अविनाश सिंह ने उस की आंखों में देखते हुए  कहा, ‘‘कृष्णा कुमारी को तुम कब से जानते हो? सब कुछ सचसच बताओ, कोई भी बात छिपाना नहीं. देखो तुम पढ़ेलिखे नौजवान हो और मामला हत्या का है.’’

यह सुन कर उस ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, लगभग एक महीने से एक लूडो गेम में खेलते हुए कृष्णा से मेरा परिचय हुआ था. इस के बाद हमारी अकसर मोबाइल पर ही बात होती थी. मैं कभी उस से आमनेसामने नहीं मिला हूं. मगर हां, बीती रात उस का यह मैसेज आया था.’’ कह कर उस ने अपना मोबाइल अविनाश सिंह के समक्ष रख दिया. थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने देखा, मैसेज जैसा संजय चौहान के मोबाइल में था, ठीक वैसा ही नेवेंद्र के मोबाइल में भी आया था. सब कुछ साफ था. अब तो अविनाश सिंह के सामने पूरा चित्र स्पष्ट था कि हत्या औनर किलिंग में दिगपाल और उस के बेटे ने ही की है.

उन्होंने नेवेंद्र का पूरा बयान रिकौर्ड किया. उच्च अधिकारियों को सारी जानकारी से अवगत कराते हुए बताया कि मामला लगभग स्पष्ट हो चुका है हत्या बाप और बेटे ने ही की है. दिगपाल और राजेश को कृष्णा कुमारी के हत्या के आरोप में पुलिस न्यायालय में पेश करने की तैयारी कर रही थी कि इस बीच अविनाश सिंह के दिमाग में एक आइडिया कौंध गया. उन्होंने दिगपाल और राजेश को फिर से अपने कक्ष में बुलाया और सामने बैठा कर के पानी और चाय पिलवाई और फिर धीरे से कहा, ‘‘देखो दिगपाल, तुम जिन परिस्थितियों में थे, वैसे में कोई भी बेटी की करतूत को बरदाश्त नहीं कर सकता. मैं जानता हूं, गलती तुम से हो गई है.

यह मैं भलीभांति समझ रहा हूं. अच्छा है कि पुलिस को सहयोग करो और सारी परिस्थितियों को हमारे सामने साझा करो, ताकि मैं तुम्हारी ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकूं.’’

यह एक पुलिसिया पासा था. मगर इस के बाद भी दिगपाल ने भीगी पलकों से कहा, ‘‘साहब, मैं अपनी बेटियों की कसम खा कर कहता हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. अगर यह काम मुझ से हुआ होता तो मैं अवश्य आप को बता देता.’’

कृष्णा कुमारी के भाई राजेश से भी अलग से पूछताछ की गई. उस ने भी साफसाफ यही कहा कि उस ने कृष्णा को नहीं मारा है. अब अविनाश सिंह के सामने एक ऐसा मोड़ था, जहां से रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था. उन्हें बापबेटे की बातों में सच्चाई का एहसास हो रहा था. मगर लाख टके का सवाल यह था कि आखिर जब इन लोगों ने हत्या नहीं की तो फिर हत्यारा कौन है? कृष्णा की हत्या में सारे साक्ष्य साफ कह रहे थे कि हत्या पिता और पुत्र ने ही की है. वह कुछ समय तक अपने कक्ष में सिर पर हाथ रख कर आंख मूंद कर बैठ गए और सोचते रहे कि आखिर क्या हो सकता है, आखिर कृष्णा की हत्या कौन कर सकता है?

जांच अधिकारी के दिमाग में अब एक ही संदिग्ध सामने था और वह था कृष्णा का प्रेमी संजय चौहान. अगर कोई हत्या कर सकता था तो वह संजय हो सकता था. मगर उस के खिलाफ कोई भी सबूत पुलिस के पास नहीं था. इस के बावजूद संजय चौहान को उन्होंने तलब किया और उस से एक बार फिर पूछताछ शुरू की गई. 23 वर्षीय संजय चौहान ने बताया कि लगभग 8 साल से उस के कृष्णा के साथ शारीरिक संबंध हैं. लेकिन अलगअलग जाति के होने के कारण उन का विवाह नहीं हो पाया था. मगर जल्द ही वे आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में विवाह भी करने वाले थे. उस ने जोर दे कर यह भी कहा कि हमारे विवाह में सब से बड़ी बाधा कृष्णा के पिता दिगपाल वैष्णव थे, जो उस का विवाह कहीं दूसरी जगह करने के लिए अकसर कृष्णा पर दबाव डालते थे, उस से झगड़ा करते थे.

पुलिस के सामने एक बार फिर यह तथ्य भी सामने आ गए कि हत्या दिगपाल और उस के भाई राजेश ने ही की है. अविनाश सिंह के समक्ष दिगपाल का मासूम चेहरा घूम रहा था, जो बड़े ही दुख के साथ यह कह रहा था कि उस ने हत्या नहीं की है. अविनाश सिंह ने अंतिम जांच प्रक्रिया के तहत मनोवैज्ञानिक तरीके से संजय चौहान से पूछताछ करने का निर्णय किया और 3 अलगअलग अधीनस्थ अधिकारियों को कहा कि इस से थोड़ीथोड़ी देर में मिलना है और इस के बयान लेना है. हमें देखना है यह बयान में क्या कहता है. संजय चौहान ने एक एसआई से जांच के दौरान कहा, ‘‘कृष्णा और उस का बहुत पुराना प्रेम संबंध है.’’

एसआई ने जब उस से पूछा कि उस ने घटना के दिन अपना फोन बंद क्यों रखा था. इस के जवाब में उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी उस रात तबीयत ठीक नहीं थी.’’

एक एएसआई से जब संजय का अलग से सामना हुआ तो बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘साहब, उस दिन मोबाइल की बैटरी लो हो गई थी. इसलिए मोबाइल बंद हो गया था.’’

जबकि तीसरे अधिकारी को उस ने अपने बयान में कहा, ‘‘सर, मोहल्ले में झगड़ा होने के कारण मैं ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.’’

तीनों अधिकारियों ने संजय के तीनों अलगअलग बयानों के बारे में बताया तो वह खुशी से उछल पड़े और बोले कि अब बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है. कृष्णा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि संजय ने ही की है. उन्होंने संजय को बुला कर बातचीत की तो उन्होंने यह नोट किया कि बात करते समय वह उन से आंखें चुरा लेता. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने उस से पूछा, ‘‘मैं ने गौर किया कि जब तुम सुबह घटनास्थल पर आए थे तो तुम्हारी आंखें लाल थीं. इस का क्या कारण है?’’

इस पर संजय ने कहा, ‘‘साहब मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. रात को मैं सो भी नहीं पाया था.’’

अविनाश सिंह ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारे मोबाइल फोन की जांच करवाई है और यह जानकारी सामने आई है कि तुम कभी भी अपना मोबाइल रात को बंद नहीं करते थे. फिर उस रात आखिर मोबाइल क्यों बंद किया.

‘‘अगर मोबाइल बंद भी कर दिया तो फिर सुबह उस में सारे मैसेज को तुम ने डिलीट क्यों किया था? हमें अब विश्वास है कि हत्या तुम ने ही की है. सबूत हमें मिल चुका है, तुम सचसच बताओ. इसी में तुम्हारी भलाई है.’’

इस पर संजय चौहान गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘साहब, कृष्णा की हत्या की बात सुन कर मैं घबरा गया था, इसलिए अपने मोबाइल का सारा मैसेज डिलीट कर दिया था.’’

संजय चौहान को घूरते हुए उन्होंने कहा, ‘‘जब तुम घर में थे तो तुम्हें कैसे पता चल गया कि कृष्णा की हत्या हुई है, बिना देखे जाने?’’

संजय चौहान ने घबरा कर आंखें चुराते हुए कहा, ‘‘मैं ने सुना तो मुझे लगा कि जरूर परिवार वालों ने उसे मार कर फेंक दिया है.’’

‘‘देखो, तुम पुलिस को धोखा नहीं दे सकते, तुम ने बारबार अपना बयान बदला है और तीनों बातें सही नहीं हो सकतीं. अब साफसाफ बता दो, हम ने तुम्हारे मोबाइल की काल डिटेल्स भी चैक करवाई है.’’ थानाप्रभारी ने कहा. अब संजय चौहान टूट गया और बोला, ‘‘सर…गलती मुझ से हुई है. मैं बताता हूं उस रात क्या हुआ था.’’

और उस ने जो कहानी बताई, उस के अनुसार कृष्णा कुमारी और वह दोनों आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में जल्द ही शादी करने वाले थे कि नेवेंद्र की उन के बीच एंट्री हुई. अकसर कृष्णा नेवेंद्र से मोबाइल पर बात करती थी, एक दिन जब वह रात को कृष्णा से मिलने गया तो मोबाइल मैं उस ने नेवेंद्र का चैट पढ़ लिया. चैट पढ़ कर उस का दिमाग घूमने लगा. उस ने उसी समय स्वयं कृष्णा के रूम में रात को जब वाट्सऐप पर नेवेंद्र से बातें की तो उस के सामने खुलासा हो गया कि कृष्णा का उस से कुछ ज्यादा ही गहरा संबंध हो चुका है. दोनों आपस में अश्लील बातें भी किया करते थे.

इस पर एक दिन कृष्णा से झगड़ा कर के संजय चौहान ने कहा, ‘‘सारी सच्चाई मैं जान गया हूं. तुम अगर अब आगे उस के साथ बात करोगी तो ठीक नहीं होगा.’’

इस पर कृष्णा कुमारी ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं किसी की जायजाद नहीं हूं. ऐसा है तो अभी से संबंध खत्म समझो.’’

संजय को भी गुस्सा आ गया. उस ने गुस्से में कहा, ‘‘कृष्णा, अगर तुम मेरी नहीं होगी तो मैं किसी की तुम्हें नहीं होने दूंगा, मैं तुम्हें मार दूंगा.’’

संजय ने बताया कि एक टीवी सीरियल में उस ने ऐसी ही कहानी देखी थी, वही सीरियल देख कर उस ने प्रेमिका कृष्णा की हत्या कर उस के पिता को फंसाने की योजना बनाई. योजनानुसार, 29 मई 2021 की रात को जब संजय चौहान कृष्णा से  मिलने गया तो अपनी बाइक को दूर झाडि़यों के पास खड़ी कर गया था और पैदल बिना चप्पल के धीरेधीरे उस के घर की ओर गया. रात को लगभग 12 बजे उस ने एक पत्थर इशारे के रूप में कृष्णा की छत पर फेंका. बाद में थोड़ी देर में कृष्णा आई और दोनों एक कमरे में बैठ कर के आपस में बातचीत कर रहे थे. इसी तरह से वह पहले भी कृष्णा से मिलता था.

संजय ने उसे फुसला कर कहा, ‘‘कृष्णा, तुम एक मैसेज लिखो कि मुझे मेरे पिता मार डालेंगे, मुझे बचा लो. और यह मैसेज मुझे और नेवेंद्र को भेज दो.’’

कृष्णा ने विश्वास में आ कर ऐसा ही किया. बाद में कृष्णा ने वह मैसेज अपने फोन से डिलीट कर दिया. आगे बातों ही बातों में जब उसे यह समझ में आया कि कृष्णा अब उस के हाथ से पूरी तरह निकल चुकी है तो उस ने वहीं पास में रखी हुई एक साड़ी उस के गले में डाल कर उस का गला घोंट दिया फिर लाश उठा कर के बाड़ी में फेंक कर अपने घर चला गया. पुलिस ने संजय चौहान के इकबालिया बयान के बाद उसे कृष्णा कुमारी वैष्णव की हत्या के आरोप में 31 मई, 2021 को भादंवि की धारा 302, 120बी के तहत गिरफ्तार कर लिया. फिर उसे प्रथम न्यायिक दंडाधिकारी, कटघोरा की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. Crime Story

 

 

Crime Story Real : देवर संग मिलकर पत्नी ने रची साजिश फिर पति का गला दबाकर मार डाला

Crime Story Real :  दिव्यांग सिकंदर शरीर से कमजोर था पर मेहनतकश था. लेकिन काम के चक्कर में वह पत्नी ललिता की खुशियों का गला घोंटता रहा. सिकंदर की यह लापरवाही ललिता पर भारी पड़ने लगी. इसी दौरान ललिता ने अपने कदम देवर जितेंद्र की तरफ बढ़ा दिए. यहीं से ललिता की ऐसी खतरनाक लीला शुरू हुई कि… दे

32 वर्षीया ललिता झारखंड के कोडरमा जिले के गांव दौंलिया की रहने वाली थी. उस की मां का नाम राजवती और पिता का नाम दुल्ली था. वह 4 भाइयों की इकलौती बहन थी. इसलिए घर में सभी की लाडली थी. 16 साल की होते ही उस पर यौवन की बहारें मेहरबान हो गई थीं. बाद में समय ऐसा भी आया कि वह किसी प्रेमी की मजबूत बांहों का सहारा लेने की कल्पना करने लगी. गांव के कई नवयुवक ललिता पर फिदा थे. ललिता भी अपनी पसंद के लड़के से नैन लड़ाने लगी. इस के बाद तो दिन प्रतिदिन उस की आकांक्षाएं बढ़ने लगीं तो अनेक लड़कों के साथ उस के नजदीकी संबंध हो गए.

Ghar ki Kahaniyan

दुल्ली के कुछ शुभचिंतक उसे आईना दिखाने लगे, ‘‘तुम्हारी बेटी ने तो यारबाजी की हद कर दी. वह खुद तो खराब है, गांव के लड़कों को भी खराब कर रही है. लड़की जब दरदर भटकने की शौकीन हो जाए तो उसे किसी मजबूत खूंटे से बांध देना चाहिए. जितनी जल्दी हो सके, ललिता का विवाह कर दो, वरना तुम बहुत पछताओगे.’’

अपमान का घूंट पीने के बाद दुल्ली ने एक दिन ललिता को समझाया. उसी दौरान मां राजवती ने ललिता की पिटाई करते हुए चेतावनी दी, ‘‘आज के बाद तेरी कोई ऐसीवैसी बात सुनने को मिली तो मैं तुझे जिंदा जमीन में दफना दूंगी.’’

उस समय ललिता ने कसम खा कर किसी तरह अपनी मां को यकीन दिला दिया कि वह किसी लड़के से बात नहीं करेगी. ललिता बात की पक्की नहीं, बल्कि ख्वाहिशों की गुलाम थी. कुछ समय तक ललिता ने अपनी जवानी के अरमानों को कैद रखा, लेकिन अरमान बेलगाम हो कर उस के जिस्म को बेचैन करते तो वह अंकुश खो बैठी और फिर से लड़कों के साथ मटरगश्ती करने लगी. लेकिन यह मटरगश्ती अधिक दिनोें तक नहीं चल सकी. इस की वजह थी कि उस के पिता दुल्ली ने उस का रिश्ता तय कर दिया था. ललिता का विवाह कोडरमा जनपद के ही गांव करौंजिया निवासी काली रविदास के बेटे सिकंदर रविदास से तय हुआ था.

सिकंदर किसान था और एकदम सीधासादा इंसान था. लेकिन एक पैर से दिव्यांग था. उस का एक छोटा भाई जितेंद्र रविदास था. सिकंदर की उम्र विवाह योग्य हो चुकी थी, इसलिए ललिता का रिश्ता सिकंदर के लिए आया तो काली रविदास मना नहीं कर सके.  12 साल पहले दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से हो गया. कालांतर में ललिता 3 बेटों की मां बन गई. विवाह के बाद से ही सिकंदर ललिता के साथ अलग मकान में रहने लगा था. सिकंदर का छोटा भाई जितेंद्र अपने मातापिता के साथ रहता था. सिकंदर दिव्यांग होने पर भी खेतों में दिनरात मेहनत करता रहता था. इसलिए जब वह घर पर आता तो थकान से चूर हो कर सो जाता था, जिस से ललिता की ख्वाहिशें अधूरी रह जाती थीं.

पति के विमुख होने से ललिता बेचैन रहने लगी. इस स्थिति में कुछ औरतों के कदम गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं, ऐसा ही ललिता के साथ भी हुआ. अब उसे ऐसे शख्स की तलाश थी, जो उसे भरपूर प्यार दे और उस की भावनाओं की इज्जत करे. उस शख्स की तलाश में उस की नजरों को अधिक भटकना नहीं पड़ा. घर में ही वह शख्स उसे मिल गया, वह था जितेंद्र. सिकंदर जहां अपने भविष्य के प्रति गंभीर तथा अपनी जिम्मेदारियों को समझने वाला था, वहीं जितेंद्र गैरजिम्मेदार था. जितेंद्र का किसी काम में मन नहीं लगता था.

जितेंद्र की निगाहें ललिता पर शुरू से थीं. वह देवरभाभी के रिश्ते का फायदा उठा कर ललिता से हंसीमजाक भी करता रहता था.  जितेंद्र की नजरें अपनी ललिता भाभी का पीछा करती रहती थीं. दरअसल जितेंद्र ने ललिता को विवाह मंडप में जब पहली बार देखा था, तब से ही वह उस के हवास पर छाई हुई थी. अपने बड़े भाई सिकंदर के भाग्य से उसे ईर्ष्या होने लगी थी. वह सोचता था कि ललिता जैसी सुंदरी के साथ उस का विवाह होना चाहिए था. काश! ललिता उसे पहले मिली होती तो वह उसे अपनी जीवनसंगिनी बनाता और उस की जिंदगी इस तरह वीरान न होती, उस की जिंदगी में भी खुशियां होतीं.

ललिता के रूप की आंच से आंखें सेंकने के लिए ही वह ललिता के घर के चक्कर लगाता. चूंकि वह घर का ही सदस्य था, इसलिए उस के आनेजाने और वहां हर समय बने रहने पर कोई शक नहीं करता था. जितेंद्र की नीयत साफ नहीं थी, इसलिए वह ललिता से आंखें लड़ा कर और हंसमुसकरा कर उस पर डोरे डाला करता था. सिकंदर सुबह खेत पर जाता तो दीया बाती के समय ही लौट कर आता. जितेंद्र के दिमाग में अब तक ललिता के रूप का नशा पूरी तरह हावी हो गया था. इसलिए ललिता को पाने की चाह में उस के सिकंदर के घर के फेरे जरूरत से ज्यादा लगने लगे.

ललिता घर पर अकेली होती थी, इसलिए जितेंद्र के पास मौके ही मौके थे. एक दिन जितेंद्र दोपहर के समय आया तो ललिता दोपहर के खाने में तहरी बनाने की तैयारी कर रही थी, जिस के लिए आलू व टमाटर काट रही थी. जितेंद्र ने खुशी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘लगता है, आज अपने हाथों से स्वादिष्ट तहरी बनाने जा रही हो.’’

‘‘हां, खाने का इरादा है क्या?’’

‘‘मेरा ऐसा नसीब कहां, जो तुम्हारे हाथों का बना स्वादिष्ट खाना खा सकूं. नसीब तो सिकंदर भैया का है, जो आप जैसी रूपसी उन को पत्नी के रूप में मिलीं.’’

यह सुन कर ललिता मुसकान बिखेरती हुई बोली, ‘‘ठीक है, मुझ से विवाह कर के तुम्हारे भैया ने अपनी किस्मत चमका ली तो तुम भी किसी लड़की की मांग में सिंदूर भर कर अपनी किस्मत चमका लो.’’

‘‘मुझे कोई दूसरी नहीं, तुम पसंद हो. भाभी, अगर तुम तैयार हो तो मैं तुम्हारे साथ अपना घर बसाने को तैयार हूं.’’

ललिता जितेंद्र के रोज हावभाव पढ़ती रहती थी. इसलिए जान गई थी कि जितेंद्र के दिल में उस के लिए नाजुक एहसास है. लेकिन वह इस तरह चाहत जाहिर कर के उस से प्यार की सौगात मांगेगा, ललिता ने सोचा तक न था. अचानक सामने आई ऐसी असहज स्थिति से निपटने के लिए वह उस से आंखें चुराने लगी और कटी हुई सब्जी उठा कर रसोई की तरफ चल दी. तभी उस के बच्चे भी घर आ गए. प्यार में विघ्न पड़ता देख कर जितेंद्र भी वहां से उठ गया. उस दिन के बाद जब भी मौका मिलता, वह ललिता के पास पहुंच जाता और अपने प्यार का विश्वास दिलाता. धीरेधीरे ललिता को उस के प्यार पर यकीन होने लगा. उसे भी अपने प्रति जितेंद्र की दीवानगी लुभाने लगी थी.

उस की दीवानगी को देख कर ललिता के दिल में उस के लिए प्यार उमड़ पड़ा. कल तक जो ललिता जितेंद्र के हवास पर छाई थी, अब जितेंद्र ललिता के हवास पर छा गया. एक दिन जितेंद्र ने फिर से ललिता के सामने अपने प्यार का तराना सुनाया तो वह बोली, ‘‘जितेंद्र, मेरे प्यार की चाहत में पागल होने से तुम्हें क्या मिलेगा. मैं विवाहित होने के साथसाथ 3 बच्चों की मां भी हूं. इसलिए मुझे पाने की चाहत अपने दिल से निकाल दो.’’

‘‘यही तो मैं नहीं कर पा रहा, क्योंकि यह दिल पूरी तरह से तुम्हारे प्यार में गिरफ्तार है.’’

ललिता कुछ नहीं बोल सकी. जैसे उस के जेहन से शब्द ही मिट गए थे. जितेंद्र ने अपने हाथ उस के कंधे पर रख दिए, ‘‘भाभी, कब तक तुम अपने और मेरे दिल को जलाओगी. कुबूल कर लो, तुम्हें भी मुझ से प्यार है.’’

ललिता ने सिर झुका कर जितेंद्र की आंखों में देखा और फिर नजरें नीची कर लीं. प्रेम प्रदर्शन के लिए शब्द ही काफी नहीं होते, शारीरिक भाषा भी मायने रखती है. जितेंद्र समझ गया कि मुद्दत बाद सही, ललिता ने उस का प्यार कुबूल कर लिया है. उस ने ललिता के चेहरे पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. ललिता भी सुधबुध खो कर जितेंद्र से लिपट गई. उस समय मन के मिलन के साथ तन की तासीर ऐसी थी कि ललिता का जिस्म पिघलने लगा.  इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कर लीं. यह बात करीब 6 साल पहले की है. बाद में यह मौका मिलने पर चलता रहा.

13 मई, 2021 को दोपहर करीब 12 बजे सिकंदर दास लोचनपुर गांव के निजी कार चालक विजय दास के साथ चरवाडीह के संजय दास के यहां शादी समारोह में गया. सिकंदर और विजय दोनों कार से गए थे. कार विजय की थी. साढ़े 3 बजे शादी से दोनों निकल आए. लेकिन सिकंदर दास घर नहीं लौटा. उस के नंबर पर सिकंदर के चाचा ने फोन किया गया तो विजय ने उठाया. उस से पूछा गया कि सिकंदर कहां है तो विजय द्वारा अलगअलग ठिकाने का पता बताते हुए फोन काट दिया. इस के बाद सिकंदर की काफी तलाश की गई, वह नहीं मिला. 16 मई को ललिता ने कोडरमा के थानाप्रभारी और एसपी को एक पत्र दिया, जिस में उस ने अपने पति सिकंदर दास के लापता होने की बात लिखी. सिकंदर के गायब होने का आरोप उस ने कार चालक विजय दास पर लगाया था.

चूंकि मामला चांदवारा थाना क्षेत्र के करौंजिया गांव का था. इसलिए एसपी पुलिस ने मामला चांदवारा थाने में ट्रांसफर कर दिया. चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह ने पूरा मामला जान कर थाने में सिकंदर की गुमशुदगी दर्ज करा दी. थानाप्रभारी सोनी प्रताप ने 20 मई को जामू खाड़ी से विजय दास को गिरफ्तार कर लिया. सख्ती से पुलिस ने पूछताछ की तो विजय ने सिकंदर की हत्या करने की बात स्वीकारी. उस ने इस हत्या में सिकंदर की पत्नी ललिता और भाई जितेंद्र का भी हाथ होने की बात बताई. 20 मई को विजय के बाद ललिता और जितेंद्र को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर रात में कोटवारडीह के बंद पड़े मकान से सिकंदर की लाश बरामद कर ली.

वह अर्द्धनिर्मित मकान सिकंदर का था. लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद चांदवारा थाने के थानाप्रभारी सोनी प्रताप सिंह अभियुक्तों को ले कर थाने आ गए. थाने में सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने हत्या के पीछे की पूरी कहानी बयां कर दी. एक दोपहर को जितेंद्र और ललिता घर में बेधड़क रंगरलियां मना रहे थे कि अचानक किसी काम से सिकंदर खेतों से घर लौटा तो उस ने उन दोनों को रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. यह देख कर उसे एक बार तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि उस की पत्नी ऐसा भी कर सकती है. वह ललिता पर खुद से भी ज्यादा विश्वास करता था. लेकिन हकीकत तो सामने उस की दगाबाजी की तरफ इशारा कर रही थी.

दूसरी ओर सगा छोटा भाई जितेंद्र था, जिसे वह बहुत प्यार करता था, उस का खूब खयाल रखता था. वही उस की गृहस्थी में आग लगा रहा था. अपनों की इस दगाबाजी से सिकंदर इतना आहत हुआ कि उस ने पूरे घर को सिर पर उठा लिया. ललिता और जितेंद्र ने भी उस से अपनी गलती की माफी मांग ली और भविष्य में ऐसा कुछ न करने का वादा किया तो सिकंदर शांत हुआ. जितेंद्र और ललिता ने उस समय तो अपनी जान छुड़ाने के लिए वादा कर दिया था, लेकिन वे इस पर अमल करने को कतई तैयार नहीं थे. लेकिन उन का भेद खुल चुका था, इसलिए मिलन में उन को बहुत ऐहतियात बरतनी पड़ती थी. वे चोरीछिपे फिर से मिल लेते थे.

सिकंदर ने देखा तो उस ने विरोध किया. मामला घर की चारदीवारी से निकल कर गांव के लोगों तक पहुंच गया. पंचायत तक बैठ गई. भरी पंचायत में ललिता ने जितेंद्र के साथ रहने की बात कही. लेकिन फैसला न हो सका. इस के बाद सिकंदर उन दोनों के बीच की एक बड़ी दीवार था, जिसे गिराए बिना वे हमेशा के लिए एक नहीं हो सकते थे. इसलिए ललिता और जितेंद्र ने सिकंदर की हत्या करने की ठान ली. सिकंदर दास ने विजय दास से लोन दिलाने के नाम पर डेढ़ लाख रुपए लिए थे. सिकंदर ने जब लोन नहीं दिलाया तो विजय उस से अपने दिए रुपए वापस मांगने लगा. सिकंदर रुपए देने में टालमटोल कर रहा था. ऐसे में ललिता ने जितेंद्र से बात कर के विजय को अपने प्लान में शामिल करने की बात कही.

उस ने यह भी कहा कि सिकंदर का काम तमाम होने के बाद वह अकेले विजय को उस की हत्या में फंसवा देगी, जिस से वे दोनों बच जाएंगे. जितेंद्र को उस की बात सही लगी. दोनों ने विजय से बात की तो वह सिकंदर की हत्या में उन दोनों का साथ देने को तैयार हो गया. 13 मई, 2021 को एक शादी समारोह से लौटने के बाद विजय सिकंदर को ले कर कोटवारडीह में उस के अर्धनिर्मित मकान पर ले गया. वहां ललिता और जितेंद्र पहले से मौजूद थे. तीनों ने मिल कर सिकंदर की गला दबा कर हत्या कर दी और लाश एक कमरे में डाल कर कमरा बंद कर दिया.

लेकिन सिकंदर की हत्या में विजय को फंसाने की योजना ही ललिता और जितेंद्र को भारी पड़ गई. ललिता ने उस पर शक जताया तो पुलिस विजय को पकड़ कर उन तक पहुंच गई. तीनों अभियुक्तों के खिलाफ हत्या व साक्ष्य छिपाने का मुकदमा दर्ज कर के चांदवारा पुलिस ने तीनों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया. Crime Story Real

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Kahani : बूढ़े आशिक संग रहने की खातिर मां ने बेटी का मुंह दबाकर मार डाला

Crime Kahani : वासना की आग में सुलगने वाली औरत बड़े से बड़ा गुनाह कर जाती है. नंदिनी हत्याकांड इस का उदाहरण है. टीना अपने बूढ़े आशिक प्रह्लाद सहाय के प्यार में ऐसी अंधी हुई कि उस ने पति और उस का घर तो छोड़ा ही, अपनी बेटी के खून से भी हाथ रंग दिए.

राजस्थान के कोटा जिले के थाना बुढ़ादीव के गांव बोरखेड़ा में सुमित पुत्र हरदेव यादव अपनी पत्नी पुष्पा यादव उर्फ टीना (25 वर्ष) और इकलौती बेटी नंदिनी (4 साल) के साथ रहता था. सुमित सीधासादा इंसान था. वहीं उस की पत्नी टीना उर्फ पुष्पा रंगीनमिजाज युवती थी. सुमित का दिन जहां मेहनतमजदूरी करने में बीतता था, वहीं टीना का दिन मोबाइल देख कर गुजरता था. सुमित और टीना की शादी को करीब 6 साल हो चुके थे. इन 6 सालों में टीना एक बेटी नंदिनी की मां बन गई थी. उस का बदन कसा था और हसरतें उफान पर थीं. वह चाहती थी कि सुमित उसे सारी रात बांहों में भर कर जन्नत की सैर कराए.

मगर इस के उलट सुमित दिन भर कामधंधे में खपने के कारण इतना थक जाता था कि शाम को घर लौट कर खाना खा कर बिस्तर पर जा पड़ता था. टीना जब रसोई का काम निपटा कर पति के पास आती तो वह नींद में खर्राटे भरता मिलता था. यह देख कर टीना का मन कसैला हो जाता था. वह दिन भर इसी सोच में रहती कि आज पति उसे शारीरिक सुख देगा. मगर रात में थकामांदा पति उसे सोता मिलता. वह कभीकभी सोचा करती कि कैसे मर्द से ब्याह किया जो घोड़े बेच कर हर रात सो जाता है. उसे तनिक भी बीवी को प्यार करने की इच्छा नहीं होती. औरत भूखी रह सकती है मगर वह बिना शारीरिक प्यार के नहीं रह सकती.

सुमित कभीकभार ही टीना से शारीरिक संबंध बनाता था. मगर टीना चाहती थी कि उसे पति हर रात प्यार करे. वह पति से शर्म के मारे कह नहीं पाती थी. समय का पहिया घूमता रहा. एक दिन टीना किसी रिश्तेदार को मोबाइल पर फोन लगा रही थी. 3-4 बार घंटी बजने के बाद फोन उठा कर कोई शख्स बोला, ‘‘हैलो.’’

‘‘हां जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ टीना ने कहा तो फोन उठाने वाला बोला, ‘‘आप कौन हैं?’’

‘‘मैं तो टीना बोल रही हूं बोरखेड़ा, कोटा से.’’

‘‘टीना जी, मैं प्रह्लाद सहाय जयपुर से बोल रहा हूं. कहिए मैं आप की क्या सेवा करूं. फोन कैसे किया?’’ उस शख्स ने कहा.

सुन कर टीना बोली, ‘‘सौरी, आप को रौंग नंबर लग गया. मैं कहीं और फोन लगा रही थी.’’

‘‘रौंग नंबर लगा तो कोई बात नहीं. हम दोस्त तो बन ही सकते हैं. फोन पर बात कर के अच्छा लगा. वैसे आप की आवाज बड़ी मीठी और प्यारी है.’’ प्रह्लाद बोला.

‘‘तारीफ के लिए शुक्रिया. वैसे बातें आप भी बड़ी प्यारी करते हैं. मैं नंबर सेव कर लेती हूं. फुरसत में बात करते हैं.’’

‘‘ओके, मैं भी आप का नंबर सेव कर लेता हूं.’’ प्रह्लाद सहाय बोला. टीना ने काल डिसकनेक्ट कर दी. दोनों ने एकदूसरे के नंबर सेव कर लिए. रौंग नंबर से शुरू हुई इस बातचीत के बाद वह दोनों अकसर फोन पर करने लगे. बात नहीं करने पर उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. एक दिन दोनों ने फोन पर बातों ही बातों में प्यार का इजहार कर दिया और टीना ने प्रेम आमंत्रण स्वीकार भी कर लिया. प्रह्लाद को टीना ने बता दिया था कि वह एक 6 साल की बेटी नंदिनी की मां है. प्रह्लाद ने टीना से कहा कि वह नंदिनी को अपनी बेटी बना लेगा और पालनपोषण करेगा. टीना यादव यह जान कर बहुत खुश हुई कि उस का प्रेमी उस की बेटी को अपना रहा है. वह उस की प्यार भरी बातों के जाल में उलझती चली गई. वह भूल गई कि वह शादीशुदा और एक बेटी की मां है.

टीना भूल गई कि उस के मातापिता ने उसे डोली में बिठा कर विदा करते हुए कहा था, ‘‘बेटी, सुखदुख, अमीरीगरीबी आतेजाते रहेंगे. मगर ससुराल के घर से तेरी अर्थी ही उठनी चाहिए. इस के अलावा ससुराल के घर से कभी कदम बाहर नहीं रखना.’’

टीना प्रह्लाद पर इतना विश्वास करने लगी कि वह पति का घर छोड़ कर उस के पास जाने को तैयार हो गई थी. पति के साथ अग्नि के समक्ष सात फेरे ले कर जन्मों तक साथ निभाने की कसमें खाने वाली टीना शादी के मात्र 6 साल बाद ही पति की पीठ में खंजर घोंप कर प्रेमी का घर आबाद करने को उतावली हो रही थी.  सुमित को तो अपने कामधंधे से ही फुरसत नहीं थी. उसे पता नहीं था कि जिस की खुशी के लिए वह मेहनतमजदूरी करता है कि उसे किसी तरह की परेशानी नहीं हो. लेकिन वही बीवी किसी गैरमर्द को अपना बना चुकी है और वह घर से फुर्र होने वाली है. सुमित तो सोचता था कि टीना उस के साथ खुश है. वह उस की खुशी के लिए क्या कुछ नहीं करता था.

11 नवंबर, 2020 को भी हर रोज की तरह सुमित काम पर निकल गया. शाम को घर लौटा तो उस की बीवी टीना और बेटी नंदिनी घर पर नहीं थी. आसपड़ोस में सुमित ने बीवी और बेटी की खोजबीन की मगर वे नहीं मिलीं. सुमित ने टीना के मोबाइल पर भी फोन किया. मगर मोबाइल स्विच्ड औफ था. सुमित कई दिन तक अपने स्तर पर बीवी और बेटी की खोजबीन करता रहा. जब उन की कोई खोजखबर नहीं मिली तो थकहार कर वह 16 दिसंबर, 2020 को बुढ़ादीत थाने पहुंचा. सुमित ने थानाप्रभारी अविनाश कुमार को सारी बात बता कर पत्नी और बेटी नंदिनी की गुमशुदगी लिखा दी. गुमशुदगी दर्ज होने के बाद पुलिस की बहुत दिन तक नींद नहीं खुली.

जब सुमित थाने के चक्कर पर चक्कर काटने लगा तो पुलिस हरकत में आई. इस के बाद इटावा डीएसपी विजयशंकर शर्मा के निर्देशन व थाना बुढ़ादीत थानाप्रभारी  अविनाश कुमार के नेतृत्व में एक पुलिस टीम गठित की गई. इस पुलिस टीम में थानाप्रभारी अविनाश कुमार के अलावा हैडकांस्टेबल सुरेशचंद्र वर्मा, सतपाल, प्रह्लाद, पूरन सिंह, महिला कांस्टेबल माली को शामिल किया गया. पुलिस टीम ने मामले की जांच शुरू की. तकनीकी जांच और मुखबिर से पता चला कि सुमित की पत्नी टीना उर्फ पुष्पा जयपुर जिले के थाना मनोहरपुर के गांव उदावाला में प्रेमी प्रह्लाद सहाय के साथ रह रही है.

पुलिस टीम ने 13 मई, 2021 को सुमित की पत्नी टीना और उस के प्रेमी प्रह्लाद सहाय को हिरासत में ले लिया. लेकिन टीना के साथ उस की बेटी नंदिनी नहीं थी. टीना और प्रह्लाद से पुलिस टीम ने नंदिनी के बारे में पूछताछ की. टीना ने बताया कि नंदिनी अपने दादादादी के पास है. पुलिस ने पता किया. दादादादी के पास नंदिनी नहीं थी. तब पुलिस ने प्रह्लाद सहाय से और टीना से अलगअलग पूछताछ की. टीना ने बताया कि नंदिनी को बसस्टैंड पर अकेली छोड़ दिया था. पुलिस को उस की बातों पर यकीन नहीं था. इस कारण पुलिस ने गुमराह कर रहे प्रह्लाद व टीना से कड़ी पूछताछ की तो दोनों ने नंदिनी की हत्या की बात कबूल ली.

टीना को जब पता चला कि उस के प्रेमी ने नंदिनी की हत्या की स्वीकारोक्ति कर ली है, तब टीना भी टूट गई. उस ने भी बेटी की हत्या का गुनाह कबूल कर लिया. प्यार की खातिर मासूम बेटी की हत्या की बात सुन कर पुलिस भी आश्चर्यचकित रह गई. पूछताछ करने पर टीना की एक ऐसी कुमाता वाली छवि उभर कर सामने आई, जिस ने अपने से 20 बरस बड़े प्रेमी प्रह्लाद की खातिर इकलौती बेटी की हत्या कर उस का शव सरिस्का जंगल में फेंक दिया. दोनों आरोपियों से की गई पूछताछ के बाद प्यार में अंधी एक औरत की जो कहानी प्रकाश में आई, इस प्रकार है—

राजस्थान के कोटा जिले के बुढ़ादीत थानांतर्गत बोरखेड़ा गांव निवासी सुमित यादव से टीना उर्फ पुष्पा की शादी हो जरूर गई थी, लेकिन वह उस से खुश नहीं थी. क्योंकि वह उस की शारीरिक जरूरत को नहीं समझता था. इसीलिए वह अपने पति को पसंद नहीं करती थी. मगर लोकलाज के कारण वह उसे ढो रही थी. टीना की हसरतें उफान मारती थीं. मगर सुमित को इस की परवाह नहीं थी. टीना 4 साल की बेटी की मां हो गई थी, लेकिन वह इतनी खूबसूरत थी कि उस का गदराया बदन देख कर कोई भी मर्द उसे पाने को बेताब हो उठता था.

ऐसे में जयपुर के गांव उदावाला, निवासी प्रह्लाद सहाय से रौंग काल के जरिए उस की बात हुई तो उसे लगा कि प्रह्लाद उस के लिए ही बना है. इसलिए उस ने उस से नजदीकी बढ़ा ली. बातोंबातों में दोनों इतने खुल गए कि फोन पर प्यार का इजहार हो गया. इतना ही नहीं, दोनों ने जीवन भर साथ निभाने का फैसला भी ले लिया. एक दिन उस से प्रह्लाद ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारी बेटी को अपनी बेटी के रूप में स्वीकार कर लूंगा. तुम उसे ले कर जयपुर के लिए निकल जाओ. मैं तुम दोनों को घर ले आऊंगा.’’

यह सुन कर टीना खुश हो गई. फिर वह 11 नवंबर, 2020 को पति सुमित के काम पर जाने के बाद अपनी बेटी नंदिनी को ले कर बोरखेड़ा से जयपुर आ गई, जहां से प्रह्लाद टीना और नंदिनी को ले कर अपने गांव उदावाला आ गया. टीना और प्रह्लाद पतिपत्नी की तरह रहने लगे. प्रह्लाद ने आसपड़ोस में कहा कि उस ने टीना से लव मैरिज की है. प्रह्लाद अधेड़ उम्र का था वहीं टीना जवान थी. टीना जैसी सुंदर प्रेमिका पा कर प्रह्लाद निहाल हो गया था. प्रह्लाद ने टीना को तनमनधन से सुख दिया. टीना अपने प्रेमी की दीवानी हो गई. प्रह्लाद भी स्त्री सुख से वंचित था. अधेड़ उम्र में जब जवान प्रेमिका मिली तो वह रोजाना अपनी हसरतें पूरी करता.

दोनों मौजमस्ती से दिन गुजार रहे थे. 9 जनवरी, 2021 की शाम नंदिनी सीढि़यों से गिर कर घायल हो गई. अगले दिन 10 जनवरी को नंदिनी को प्रह्लाद और टीना शाहपुरा अस्पताल ले गए. डाक्टर ने नंदिनी को देख कर कहा कि उसे जयपुर ले जाओ. इस पर प्रह्लाद व टीना नंदिनी को उदावाला घर ले आए. प्रह्लाद ने टीना से कहा, ‘‘टीना, अगर नंदिनी को जयपुर ले जाएंगे तो लाखों रुपए इलाज में खर्च होंगे. इस के बाद भी क्या पता नंदिनी बचे कि नहीं. ऐसा करते हैं कि पैसा बचाने के लिए नंदिनी को ही मार डालते हैं.’’

सुन कर मां की ममता पसीजने के बजाय बोली, ‘‘सही कह रहे हैं, आप. वैसे सुमित के खून को हमतुम क्यों पालेंपोसें.’’

उसी रात नंदिनी को सोते हुए शाल मुंह पर दबा कर टीना और प्रह्लाद ने मार डाला. रात भर लाश वहीं पड़ी रही. अगले दिन 11 जनवरी, 2021 को नंदिनी का शव ले कर प्रह्लाद और टीना अलवर जिले के सरिस्का जंगल में पहुंचे और सुनसान जगह पर डाल कर वापस उदावला लौट आए. शाम को उदावला आने पर प्रह्लाद के आसपड़ोस के लोगों ने जब नंदिनी के बारे में पूछा. तब उन से कहा कि नंदिनी को दादादादी के पास छोड़ आए हैं. टीना ने अपनी 4 बरस की बेटी को मारने के बावजूद टीना सामान्य बनी रही. उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी. उलटे वह तो अपने को आजाद महसूस कर रही थी. उधर टीना और नंदिनी के 11 नवंबर, 2020 को घर से गायब होने पर टीना का पति सुमित यादव दोनों की रिश्तेदारी में एक महीने से ज्यादा समय तक खोजबीन करता रहा.

जब कहीं भी बीवी और बेटी का पता नहीं चला तब वह थकहार कर 16 दिसंबर, 2020 को थाना बुढ़ादीत पहुंच कर बीवी टीना उर्फ पुष्पा और बेटी नंदिनी की गुमशुदगी दर्ज कराई. यानी गुमशुदगी दर्ज कराने से पहले ही नंदिनी की हत्या कर दी गई थी. गुमशुदगी के बाद भी पुलिस की नींद देर से खुली. टीना और नंदिनी के गायब होने के तुरंत बाद अगर सुमित पुलिस थाने में गुमशुदगी की प्राथमिकी दर्ज करा देता और पुलिस समय पर काररवाई करती तो नंदिनी जिंदा होती. प्रह्लाद सहाय और टीना उर्फ पुष्पा से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Crime Kahani

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Crime Story Real : प्रेमिका के इशारे पर बच्चे का किडनैप करके मार डाला

Crime Story Real : कभीकभी कुछ लोग मामूली खुन्नस में एक बड़ा अपराध कर बैठते हैं. पार्वती और उस के प्रेमी संदीप चौहान ने अगर संयम से काम लिया होता तो शायद उन्हें…

मई महीने की 15 तारीख की सुबह करीब 10 बजे प्रेमा का ढाई साल का बड़ा बेटा रितेश चौहान अपने घर के बाहर खेल रहा था. प्रेमा जब घर से बाहर निकली तो उसे रितेश दिखाई न दिया. तब उस ने बेटे को आवाज लगाई, ‘‘रितेश, बेटा कहां हो?’’

लेकिन रितेश घर के आसपास कहीं न मिला. प्रेमा रितेश को घर के बाहर न पा कर घबरा गई. वह उसी समय अपने ससुर जगराम के पास गई, क्योंकि प्रेमा का पति जवाहर लाल एक दिन पहले ही गांव से दिल्ली गया था. प्रेमा रोते हुए ससुर जगराम से बोली, ‘‘बाबूजी, रितेश अभी कुछ देर पहले घर से बाहर खेल रहा था. लेकिन अब वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है.’’

बहू प्रेमा की बात सुन कर जगराम भी घबरा गए और उन्होंने घर के आसपास अपने ढाई वर्षीय पोते रितेश को आवाज देनी शुरू कर दी, लेकिन रितेश का कहीं पता नहीं चला. इस के बाद प्रेमा देवी, ससुर जगराम और प्रेमा देवी के 2 देवर सहित परिवार के सभी सदस्य बदहवासी की अवस्था में उसे इधरउधर ढूंढने लगे. लेकिन रितेश का कहीं नहीं मिला. परिवार वालों ने उसे आसपास के खेतों, बागबगीचों में हर जगह ढूंढा, पर उस के बारे में कहीं कोई जानकारी नहीं मिली. रितेश के गायब होने की खबर एक दिन पहले दिल्ली गए उस के पिता जवाहरलाल को भी फोन द्वारा दे दी गई. बेटे के गायब होने की खबर पा कर जवाहर भी घबरा गया और वह उसी दिन दिल्ली से अपने घर के लिए चल पड़ा. इधर प्रेमा का रोरो कर बुरा हाल हो गया था.

रितेश के गायब होने की सूचना जंगल में आग की तरह आसपास के गांवों में भी फैल चुकी थी. लोग जी जान से रितेश को खोजने में लगे थे. तभी किसी ने रितेश के दादा जगराम को बताया कि चचेरा भाई संदीप चौहान रितेश को साइकिल पर बैठा कर कहीं ले जा रहा था. रितेश के परिजनों ने संदीप को पकड़ कर उस से कड़ाई से पूछा कि रितेश के साथ उस ने क्या किया है तो संदीप बोला, ‘‘मुझे नहीं पता और न ही मैं ने रितेश को देखा है.’’

लोग बारबार संदीप से रितेश के बारे में पूछते रहे लेकिन संदीप रितेश के बारे में अनभिज्ञता ही जाहिर करता रहा. इस के बाद लोगों के कहने पर जगराम ने स्थानीय थाने सोनहा पहुंच कर पोते के गायब होने की जानकारी देते हुए संदीप पर उसे गायब करने का आरोप लगाया. जगराम की शिकायत को थानाप्रभारी अशोक कुमार सिंह ने गंभीरता से लिया. उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों को भी घटना की सूचना दे दी. सूचना पा कर एसपी आशीष श्रीवास्तव, सीओ (रुधौली) धनंजय सिंह कुशवाहा, स्वाट, एसओजी और सर्विलांस और डौग स्क्वायड टीम के साथ पहुंच गए. इस के अलावा रुधौली सर्किल के सभी थानों को भी रितेश की खोज में लगा दिया गया.

पुलिस स्वाट और डौग स्क्वायड टीम के साथ रितेश को खोजने में लगी हुई थी, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चल रहा था और उधर पुलिस जगराम की शिकायत पर आरोपी संदीप के घर पहुंची तो वह भी घर पर नहीं मिला. अगले दिन 16 मई की सुबह पुलिस ने संदीप को गांव के पास से धर दबोचा. जब पुलिस ने उस से रितेश के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि वह रितेश को बिसकुट टौफी दिलाने ले गया था. जिस के बाद उस ने रितेश को उस के घर पर छोड़ दिया था. पुलिस को संदीप के बातचीत के लहजे से कुछ शक हुआ, फिर पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ शुरू कर दी, जिस से संदीप टूट गया. इस के बाद उस ने अपने रिश्ते के भतीजे ढाई वर्षीय रितेश की हत्या किए जाने की बात कबूल कर ली.

उस ने बताया कि रितेश की हत्या उस ने गांव की ही महिला पार्वती के कहने पर की थी. पार्वती उस की प्रेमिका है. उस ने पुलिस को बताया कि हत्या करने के बाद रितेश की लाश खाजेपुर के जंगल में छिपा दी थी. पुलिस ने हत्यारोपी महिला पार्वती को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया. उस के घर से पुलिस को रितेश की चप्पलें और वारदात में प्रयुक्त साइकिल भी बरामद हो गई. रितेश की लाश बरामद करने के लिए पुलिस दोनों आरोपियों को खाजेपुर के जंगल में ले गई. वहां एक गड्ढे से रितेश की लाश बरामद कर ली गई. रितेश की हत्या और उस की लाश मिलने की जानकारी जैसे ही उस की मां प्रेमा को मिली तो वह बेसुध हो कर गिर पड़ी, उधर बाकी परिजनों का भी रोरो कर बुरा हाल था.

रितेश की लाश की बरामदगी के बाद पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. संदीप और पार्वती से विस्तार से पूछताछ की गई तो उन्होंने ढाई वर्षीय रितेश की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती के सोनहा थाना क्षेत्र के दरियापुर जंगल टोला उकड़हवा की रहने वाली पार्वती देवी का पति अहमदाबाद में रह कर नौकरी करता था. पार्वती कुछ दिनों गांव में रहती तो कुछ दिनों अहमदाबाद में अपने पति के साथ गुजारती थी. शादी के बाद पार्वती 4 बेटियों और एक बेटे की मां बन चुकी थी. इस के बावजूद भी वह अपने पति से संतुष्ट नहीं थी. इसलिए वह किसी ऐसे साथी की तलाश में थी, जो उस की ख्वाहिशें पूरी कर सके. पार्वती अहमदाबाद से जब अपने गांव आती तो हरिराम का लड़का संदीप चौहान कभीकभार उस के घर आ जाता था. पार्वती जब हृष्टपुष्ट संदीप को देखती तो उस के दिल में चाहत की हिलारें उठ जाती थीं. उसे अपने जाल में फांसने के लिए वह उस से अश्लील मजाक करने लगती.

संदीप बच्चा तो था नहीं, इसलिए वह पार्वती के इशारों को समझने लगा था. आखिर एक दिन पार्वती ने मौका पा कर संदीप से अपने दिल की बात कह दी, ‘‘संदीप, तुम मुझे बहुत अच्छे लगते हो. तुम्हें देख कर मुझे कुछकुछ होने लगता है.’’

पार्वती की तरफ से खुला आमंत्रण पा कर संदीप भी खुद पर काबू नहीं रख सका. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. फिर तो उन्हें जब भी मौका मिलता, अपनी हसरतें पूरी कर लेते. इधर जब पार्वती गांव से अपने पति के पास अहमदाबाद चली जाती तो फिर उसे संदीप की याद सताती थी. इसलिए वह फिर से गांव भाग आती थी. कहा जाता है कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता है, उसी तरह से पार्वती और संदीप के अवैध संबंध की बात धीरेधीरे आसपड़ोस में भी फैलने लगी थी. लोग जब भी दोनों को देखते तो कानाफूसी करने लगते थे. यह बात धीरेधीरे संदीप के घर वालों को भी पता चल चुकी थी. जिस के बाद संदीप के घर वालों ने उसे समझाया भी, लेकिन पार्वती पर कोई असर नहीं पड़ा.

रितेश की हत्या के लगभग 2 महीने पहले एक दिन संदीप चौहान के रिश्ते की भाभी प्रेमा की पार्वती के साथ किसी बात को ले कर कहासुनी हो गई. इसी दौरान तूतूमैंमैं के दौरान प्रेमा ने पार्वती और संदीप के संबंधों को ले कर कटाक्ष कर दिया. बात बढ़ी तो प्रेमा ने इस की शिकायत सोनहा थाने में कर दी, जहां पुलिस ने दोनों को बुला कर समझायाबुझाया. पार्वती को प्रेमा द्वारा थाने में बुलाया जाना नागवार लगा. उसे लगा कि उस ने कोई गलती नहीं की, उस के बावजूद भी उसे थाने बुला कर नीचा दिखाया गया. यह बात पार्वती के मन में गांठ कर गई और वह प्रेमा से बदला लेने की फिराक में लग गई.

थाने से आने के बाद पार्वती प्रेमा से बदले की फिराक में लगी रही. बदले की आग में झुलस रही पार्वती ने एक छोटी सी वजह से एक खौफनाक फैसला ले लिया था. उस ने इस के लिए अपने प्रेमी संदीप चौहान को मोहरा बनाने की चाल चली और संदीप के साथ मिल कर मासूम रितेश की हत्या की खौफनाक साजिश तैयार कर डाली. संदीप चौहान पार्वती के साथ मिल कर पूरी प्लानिंग के साथ इस घटना को अंजाम देना चाहता था. इस के लिए उस ने प्रेमा के घर आनाजाना शुरू कर दिया और वह रोज रितेश के साथ खेलता और साइकिल पर बैठा कर अकसर उसे टौफी, बिसकुट दिलाने दुकान तक ले जाता था. जब उसे लगा कि कोई उस पर शक नहीं करेगा तो पार्वती के साथ मिल कर रितेश की हत्या की साजिश को अंजाम तक पहुंचाने का फैसला कर लिया.

संदीप ने पुलिस पूछताछ में बताया कि वह हर रोज की तरह 15 मई, 2021 की सुबह करीब 10 बजे प्रेमा के घर पहुंचा, जहां रितेश को बाहर अकेले खेलते देख मौका पा कर उसे टौफी और बिसकुट दिलाने के बहाने  साइकिल पर बैठा कर ले गया. अपनी प्रेमिका पार्वती के कहने पर वह उसे गांव से दूर खाजेपुर के जंगल में ले गया और वहीं उस की गला दबा कर हत्या कर दी. उस के शव को उस ने वहीं पर एक छोटे से गड्ढे में डाल कर पत्तियों से छिपा दिया. ढाई वर्षीय रितेश के गायब होने के बाद खोजबीन में लगे परिजनों को जब यह पता चला कि आखिरी बार रितेश को संदीप के साथ साइकिल पर बैठे देखा गया था तो लोगों के शक की सुई संदीप पर टिक गई. जिस के बाद पुलिस के हिरासत में आने के बाद संदीप ने सब कुछ सचसच बता दिया.

जब लोगों को यह बात पता चली कि पार्वती और उस के प्रेमी संदीप ने जघन्य तरीके से मासूम रितेश की हत्या की है तो लोगों का गुस्सा बढ़ने लगा. पुलिस के उच्चाधिकारियों ने स्थिति को बिगड़ने से बचाने के लिए कुछ दिनों के लिए गांव में पीएसी की प्लाटून के साथ पुलिस बल तैनात कर दिया था. पुलिस ने 24 घंटे के भीतर घटना का परदाफाश कर हत्यारोपी पार्वती और संदीप चौहान के खिलाफ आईपीसी की धारा 364 (अपहरण), 302 (हत्या), 201 (हत्या के बाद शव छिपाना), 120बी (वारदात की साजिश में सम्मिलित होने) का मुकदमा दर्ज कर आरोपियों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. आरोपी पार्वती के गुनाहों के चलते जब उस की डेढ़ साल की बेटी को भी अपना समय जेल में बिताना होगा. Crime Story Real

Family Story in Hindi : स्मार्ट मदर जवान प्रेमी और मर्डर

Family Story in Hindi : रेखा 2 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन अपनी खूबसूरती और शारीरिक कसावट की वजह से वह वास्तविक उम्र से कम की दिखती थी. तभी तो गांव का ही रहने वाला 18 वर्षीय मंजीत उस पर फिदा हो गया था. वह अपनी कार से रोजाना रेखा को उस के औफिस छोडऩे जाने लगा. इसी दौरान इस एकतरफा प्यार ने रेखा पर ऐसा खूनी वार किया कि… 

दिन के 9 बजने को आए थे. झज्जर जिले के गांव बहू में रहने वाले रवि की पत्नी रेखा ने जल्दीजल्दी घर के काम निपटा लिए थे और काम पर जाने के लिए तैयार होने लगी थी. उस की एक नजर दीवार पर टंगी घड़ी पर थी. जैसे ही घड़ी ने सवा 9 बजाए, रेखा अपना बैग कंधे पर टांग कर घर से बाहर हो गई. वह लंबेलंबे कदम बढ़ाते हुए घर से कुछ दूर बने बस स्टाप पर आ गई और बस का इंतजार करने लगी. समय धीरेधीरे आगे बढ़ रहा था. बस उसे दूरदूर तक आती हुई नजर नहीं आ रही थी.

रेखा के माथे पर पसीने की बूंदें चमकने लगीं, क्योंकि 10 से ज्यादा का समय हो गया, किंतु बस नदारद थी. ‘इस मुई बस के चक्कर में मुझे रोज ही काम पर पहुंचने में लेट होना पड़ता है.’ वह झल्लाते हुए बड़बड़ाई. अभी तक उस बस स्टाप पर रेखा अकेली ही खड़ी थी, कोई दूसरा व्यक्ति वहां नहीं आया था. रेखा की झल्लाहट बढऩे लगी. आज उस बस का दूर तक कोई अतापता नहीं था, जो रोज 10 बजे तक बस स्टाप पर आ जाती थी. ‘लगता है आज बस खराब हो गई है, मुझे अब पैदल ही झाड़ली के एनटीपीसी पावर प्लांट तक जाना पड़ेगा. क्योंकि वह उसी प्लांट में नौकरी करती थी. मौसम बड़ा ठंडा है.

लेकिन घबराहट में मुझे पसीने छूटने लगे हैं, लगता है किसी दिन मुझे इस बस के चक्कर में काम से हाथ धोना पड़ेगा.’ सोचते हुए रेखा ने दूरदूर तक सुनसान नजर आ रही उस डामर की सड़क पर कदम बढ़ा दिए. सफर लंबा था. अभी वह थोड़ी ही दूरी पार कर पाई थी कि पीछे से उसे किसी गाड़ी का हार्न सुनाई दिया. रेखा ने पीछे मुड़ कर देखा. यह एक कार थी, जो उसी की साइड पर आ रही थी. रेखा जल्दी से सड़क से नीचे कच्चे राह पर उतर गई. कार तेजी से आ कर उस के बराबर में रुक गई. ब्रेक लगने से कार के टायर सड़क पर रगड़ खा गए थे और उस में से अजीब सी आवाज आई थी. रेखा की ओर की खिड़की खुली और उस में से एक युवक का सिर बाहर निकला. यह युवक 18-19 साल का युवा ही नजर आता था.

”आज बस नहीं आई है क्या, जो तुम पैदल ही सफर करने के लिए निकल गई हो?’’ उस युवक ने पूछा.

रेखा उसे देख कर उपेक्षा से कंधे झटक कर बोली, ”बस खराब हो गई होगी. मैं काम पर जाने के लिए लेट हो रही हूं, इसलिए पैदल जाना पड़ रहा है.’’

”आओ, मेरी कार में बैठ जाओ, मैं तुम्हें तुम्हारे काम पर पहुंचा देता हूं.’’ युवक ने कहा.

”नहीं, मैं पैदल ही चली जाऊंगी.’’ रेखा ने गंभीरता से कहा और आगे बढ़ गई.

”मैं तुम्हारे लिए अजनबी हो सकता हूं रेखा, लेकिन मैं तुम्हें अच्छे से जानता हूं. आओ कार में बैठ जाओ.’’

युवक की बात पर रेखा चौंकी, ”तुम मुझे कैसे जानते हो, मेरा नाम भी तुम्हें मालूम है.’’

युवक ने बताया, ”मैं बहू गांव में ही रहता हूं, तुम्हारा घर मेरे घर से ज्यादा दूर नहीं है.’’ युवक ने बताया, ”मैं ने तुम्हें कई बार हाटबाजार में देखा है. एक ही गांव का हूं, इसलिए नाम भी जानता हूं. संकोच मत करो, मैं गांव के नाते से तुम्हारी मदद करना चाहता हूं, ज्यादा सोचोगी तो लेट हो जाओगी काम से.’’

रेखा को युवक की बात पर विश्वास करना पड़ा. वैसे भी उसे काम पर पहुंचने में देर हो रही थी. वह कार में बैठ गई. युवक ने उसे अपनी बाईं ओर बिठा लिया था. कार को युवक ने तेजी से आगे बढ़ा दिया. थोड़ी देर तक दोनों मौन रहे, फिर रेखा ने ही मुंह खोला, ”तुम मेरा नाम जानते हो, लेकिन तुम ने अपना नाम नहीं बताया मुझे.’’

”मेरा नाम मंजीत है.’’ युवक बोला.

”क्या करते हो मंजीत?’’

”फिलहाल कुछ नहीं. अभी मैं ने 12वीं पास की है. सोच रहा हूं कालेज में दाखिला ले लूं.’’

”अच्छा विचार है, आजकल पढऩेलिखने से ही अच्छी नौकरी मिलती है. तुम किसी कालेज में एडमिशन ले लो.’’

”हां.’’ मंजीत ने धीरे से कहा और कार की विंडस्क्रीन से बाहर देखने लगा. कुछ ही दूरी पर झाड़ली पावर प्लांट नजर आ रहा था. कार जब वहां पहुंची तो रेखा ने जल्दी से कहा, ”मंजीत, यहीं कार रोक दो. मैं यहीं पर काम करती हूं.’’

मंजीत ने कार एक साइड कर के रोक दी. रेखा दरवाजा खोल कर नीचे उतरी और उस ने शिष्टाचार दिखाते हुए मंजीत का मुसकरा कर शुक्रिया किया, फिर अपने काम पर झाड़ली पावर प्लांट की तरफ बढ़ गई. मंजीत कुछ देर तक रेखा को देखता रहा, जब वह आंखों से ओझल हो गई तो उस ने कार को घुमा लिया और वापस गांव की ओर लौटने लगा. उस के जेहन में रेखा को ले कर तरहतरह के विचार आने लगे थे. रेखा बला की हसीन और भरेपूरे बदन की युवती थी. वह उस के मन को भा गई थी. मंजीत उसे अपने दिल में जगह देने का सपना संजोने लगा.

इस के बाद वह अकसर रोजाना ही अपनी कार से रेखा को बस स्टाप से एनटीपीसी पावर प्लांट तक छोडऩे जाने लगा. इस तरह दोनों के बीच गहरी दोस्ती हो गई. शाम ढलने को थी. भैंसें चराने वाला चरवाहा अपनी भैंसों को ले कर अब गांव के लिए लौट जाने की तैयारी करने लगा था. उस ने पेड़ के सहारे रखा लट्ठ उठाया और उठ कर खड़ा हो गया. भैंसें अभी भी खेतों में चर रही थीं. उस ने उन्हें इकट्ठा करना शुरू किया और पानी पिलाने के विचार से उन्हें पास में ही स्थित तालाब की तरफ हांक कर ले आया. जैसे ही वह तालाब पर पहुंचा, उस के मुंह से चीख निकल गई.

तालाब की सतह पर एक युवती की लाश तैर रही थी. चरवाहा बुरी तरह घबरा गया. वह कुछ क्षण बुत बना वहां खड़ा लाश को देखता रहा. फिर गांव की तरफ दौड़ पड़ा. यह झज्जर जिले का ही रुडिय़ावास गांव था, जो हरियाणा के झज्जर जिले के अंतर्गत आता है. चरवाहा यहां अकसर भैंसें चराने आता रहता था, इसलिए वह गांव के चौकीदार को अच्छी तरह जानता था. चरवाहे को चौकीदार गांव की चौपाल पर हुक्का पीता हुआ मिल गया. वहां गांव के कुछ बड़ेबूढ़े भी बैठे हुए थे. बदहवास हालत में चरवाहे को वहां भागता हुआ आया देख कर चौकीदार उठ कर खड़ा हो गया. उस ने उसे देख कर हैरानी से पूछा, ”क्या हुआ, तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?’’

”चाचा…म..मैं ने तालाब में एक युवती की लाश देखी है.’’ चरवाहे ने हांफते हुए बताया.

”लाश!’’ चौकीदार घबरा कर बोला, ”सुबह तो तालाब में कुछ नहीं था.’’

”मैं ने अपनी आंखों से देखी है.’’ चरवाहे ने कहा, ”तुम चल कर देख लो.’’

लाश की बात सुन कर वहां बैठे गांव वाले भी घबरा कर खड़े हो गए. चौकीदार के साथ वह लोग भी तालाब की तरफ चल पड़े. चरवाहा भी उन के पीछे था.

कुछ ही देर में वह सब तालाब पर पहुंच गए. वास्तव में तालाब में एक युवती की लाश तैर रही थी.

रुडिय़ावास गांव के चौकीदार और गांव वाले बुजुर्गों ने उस युवती की लाश को ध्यान से देखा.

वह जवान और सुंदर थी. पेट में पानी चले जाने की वजह से लाश फूल कर पानी के ऊपर तैरने लगी थी.

”यह गांव की तो नहीं है चौधरी.’’ एक बुर्जुग बोला, ”मुझे तो लग रहा है किसी ने इसे मार कर यहां ला कर डाल दिया है.’’

”ऐसा ही लग रहा है ताऊ.’’ दूसरा व्यक्ति जो उम्र में इन से कम लग रहा था, अपनी बात कहता हुआ चौकीदार की तरफ घूमा, ”भाई, तुम पुलिस थाना साल्हावास में इस लाश की खबर दे दो. पुलिस तहकीकात कर लेगी कि यहां यह लाश कैसे आई.’’

चौकीदार ने सिर हिलाया और जेब से मोबाइल निकाल कर उस ने थाना साल्हावास से संपर्क कर लिया. कुछ देर घंटी बजती रही फिर किसी ने काल अटेंड की, ”हैलो! मैं थाना साल्हावास से एसएचओ हरीश कुमार बोल रहा हूं. आप को किस से बात करनी है?’’

”मैं साल्हावास गांव का चौकीदार बोल रहा हूं साहब. यहां तालाब में एक युवती की लाश तैर रही है.’’

”लाश!’’ दूसरी ओर एसएचओ चौंके, ”लाश तुम ने देखी है क्या?’’

”हां साहब, मैं इस समय तालाब के किनारे पर ही खड़ा हूं. लाश अभी भी तालाब में तैर रही है.’’ चौकीदार ने बताया.

”तुम वहीं रहो. मैं आधा घंटा में वहां पहुंच रहा हूं.’’ एसएचओ हरीश कुमार बोले. चौकीदार ने मोबाइल स्विच्ड औफ किया और मोबाइल को जेब में डाल लिया.

अब तक इस लाश की खबर गांव रुडिय़ावास में फैल गई थी. गांव के तमाम लोग वहां लाश देखने के लिए आ कर इकट्ठा हो गए. चौकीदार ने सभी को तालाब से दूर खड़े रहने की हिदायत दे दी. सभी लाश को बड़ी हैरानी से देख रहे थे. अभी तक एक भी ऐसा व्यक्ति सामने नहीं आया, जो मृतका को पहचानने का दावा करता हो. पुलिस वहां पौना घंटा में पहुंची. सूरज इस बीच पश्चिम दिशा में आ चुका था और अस्त होने जा रहा था. रोशनी घटने लगी थी, लेकिन अभी लाश दूर से भी देखी जा सकती थी. एसएचओ ने उस युवती की लाश को पानी से निकलवाने के बाद उस का बारीकी से निरीक्षण किया.

वह युवती गोरे रंग की बेहद खूबसूरत थी. नाकनक्श सांचे में ढले प्रतीत हो रहे थे. मृतका के शरीर पर कहीं भी चोट का निशान नजर नहीं आ रहा था. कपड़े भी सहीसलामत दिखाई दे रहे थे. ऐसा नहीं लग रहा था कि किसी ने इस के साथ जोरजबरदस्ती की हो और फिर मार कर फेंक दिया हो. डैडबौडी पर कहीं भी खरोंच के निशान नहीं थे. एसएचओ ने अनुमान लगाया कि इस का गला दबा कर मारा गया है. यह आपसी रंजिश का मामला नजर आता था. जांच पूरी कर लेने के बाद एसएचओ ने कागजों की खानापूर्ति की और फिर ऊंची आवाज में वहां मौजूद लोगों से पूछा, ”क्या आप में से कोई इस युवती को पहचानता है?’’

”नहीं साहब.’’ कई स्वर एक साथ उभरे.

लाश की जामातलाशी में भी कुछ हाथ नहीं आया था. एक प्रकार से उस मृतका की शिनाख्त नहीं हो पाई थी. एसएचओ हरीश कुमार ने मौके की काररवाई पूरी कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए झज्जर के सरकारी अस्पताल में भिजवा दिया.

यहां के काम को पूरा कर के उन्होंने चौकीदार से पूछा, ”तुम्हें इस लाश की जानकारी कैसे मिली थी?’’

”यह चरवाहा यहां भैंसें चराने आया हुआ था साहब, इस ने ही तालाब में इस की लाश देखी और मुझे इत्तला देने दौड़ता हुआ गांव रुडिय़ावास पहुंच गया.’’ चौकीदार ने बताते हुए चरवाहे के कंधे पर हाथ रख दिया.

”तुम यहां भैंसें चराने कब से आते हो?’’

”मैं सर्दी में यहां आता हूं साब, गरमी में मैं गांव बहू के खेतों में जानवर चरा लेता हूं. मैं ने आज शाम को घर जाने से पहले भैंसें इकट्ठी कीं और इन्हें पानी पिलाने के लिए तालाब पर आया तो उस लाश तैरती देखी थी.’’

”दिन भर तुम यहीं थे आज?’’ एसएचओ ने पूछा.

”जी हां.’’ चरवाहे ने बताया, ”लेकिन मैं ने दिन में इधर किसी को भी नहीं देखा है.’’

”तुम यहां कितने बजे आ गए थे?’’

”मैं दोपहर में एक बजे यहां भैंसें ले कर आया था. तब से कोई इधर आया ही नहीं.’’

”शायद हत्या कहीं और कर के कोई यहां लाश फेंकने आया होगा तो वह एक बजे से पहले आया होगा.’’ एसएचओ हरीश कुमार ने गंभीर स्वर में कहा, ”अब तुम अपना नामपता दरोगाजी को लिखवा दो और चले जाओ. जरूरत पडऩे पर तुम्हें याद कर लिया जाएगा.’’

”ठीक है साहब.’’ चरवाहे ने धीरे से कहा और भैंसें ले कर वह गांव बहू की ओर रवाना हो गया. रुडिय़ावास गांव के लोग भी गांव में लौट गए. एसएचओ जीप में सवार हुए और थाने की तरफ रवाना हो गई.

हरियाणा के झज्जर जिले के अंतिम छोर पर बसे गांव बहू का रहने वाला रवि 4 मई, 2025 को बारबार घड़ी देख रहा था. घड़ी शाम के 7 बजा रही थी. उस की पत्नी रेखा 6 बजे तक रोज ड्ïयूटी से लौट कर घर आ जाती थी, लेकिन उस दिन एक घंटा ऊपर हो गया था, वह काम से घर नहीं लौटी थी. रवि के माथे पर अब चिंता की रेखाएं उभरने लगी थीं. घड़ी ने जब साढ़े 7 बजाए तो वह पत्नी रेखा की तलाश में पैदल ही बस स्टाप की तरफ बढ़ गया.

बस स्टैंड दूर था और अंधेरा भी घिर आया था. रवि जब बस स्टैंड पर पहुंचा तो वहां गहरा सन्नाटा फैला हुआ था. दूरदूर तक कोई इंसान वहां नजर नहीं आ रहा था. रवि परेशान हालत में घर लौट कर आया तो रेखा अभी तक घर नहीं पहुंची थी.

‘कहां रह गई यह… साढ़े 8 से ऊपर का समय हो गया. पहले तो वह कभी इतनी देर घर से बाहर नहीं रही.’ रवि बड़बड़ाया और उस ने अपने छोटे भाई को बताया कि रेखा घर नहीं आई है आज.

”कहीं वह अपने मायके में तो नहीं चली गई है भैया!’’ नवीन (काल्पनिक नाम) ने कहा, ”आप उन के घर फोन कर के पूछो. हो सकता है वहीं गई हों.’’

रवि ने मोबाइल निकाल कर झज्जर जिले के ही कड़ौधा गांव में रहने वाले रेखा के पापा अजमेर को काल लगा दी. रेखा से उस की शादी 8 साल पहले हुई थी, जिस के 2 बच्चे भी हैं. दूसरी ओर घंटी बजी और फिर काल उठा ली गई, ”हां दामादजी, कैसे फोन कर रहे हो? घर में सब ठीकठाक है न?’’ अजमेर ने पूछा.

”सब ठीक है पापा.’’ रवि जल्दी से बोला, ”क्या रेखा वहां पहुंची है? अभी तक वह काम से नहीं लौटी है.’’

”नहीं दामादजी, रेखा तो यहां नहीं आई.’’ अजमेर के स्वर में परेशानी के भाव थे, ”रेखा से तुम्हारी कहासुनी हुई थी क्या?’’

”नहीं पापाजी, वह सुबह अच्छे मूड में काम पर निकली थी.’’ कहने के बाद रवि ने फोन काट दिया.

”नवीन, रेखा कडौधा में नहीं गई है. उस के पापा ने बताया है.’’ रवि चिंतित स्वर में बोला, ”तुम अपनी भाभी के काम पर झाड़ली जा कर पता लगाओ, यारदोस्तों से भी कहो, वह रेखा को ढूंढें. मुझे तो बहुत घबराहट हो रही है.’’

”आप बैठ जाइए, आप की तबियत वैसे भी ठीक नहीं रहती है. मैं झाड़ली में पावर प्लांट पर जा कर मालूम करता हूं. 1-2 दोस्तों को भी साथ ले जाऊंगा. हो सकता है भाभी का ओवरटाइम चल रहा हो.’’ नवीन ने कहा और घर से साइकिल ले कर निकल गया.

नवीन ने झाड़ली जा कर पावर प्लांट में भाभी रेखा के बारे में मालूम किया तो उसे बताया गया कि रेखा आज तो काम पर आई ही नहीं थी. नवीन हैरान रह गया. उस ने सुबह भाभी रेखा को बैग कंधे पर टांग कर काम के लिए घर से निकलते देखा था. अगर वह काम पर नहीं पहुंची तो फिर कहां चली गई. नवीन अपने एक दोस्त श्याम को साथ ले कर आया था. वह उस के साथ भाभी को तलाश करने लगा. झाड़ली की तरफ आने वाले रास्ते के दोनों ओर उन्होंने अच्छी तरह देखा कि कहीं रेखा भाभी का सुबह रास्ते में एक्सीडेंट वगैरह न हुआ हो. वह रेखा को तलाश करते हुए गांव बहुलौर आए. गांव में भी रेखा की ढूंढाढांढी चलती रही, लेकिन उस का कहीं पर भी पता नहीं चला.

रेखा की तलाश करते हुए सुबह हो गई. पूरा घर और पड़ोसी पूरी रात रेखा को ढूंढते रहे, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. किसी पड़ोसी ने अपने वाट्सऐप पर सुबह एक युवती के शव का फोटो देखा. वह रेखा लग रही थी. उस ने यह बात नवीन और रवि को बताई तो उन्होंने वाट्सऐप पर पुलिस की ओर से शेयर की गई उस युवती की तसवीर को देख कर पहचान लिया कि वह रेखा ही है. तसवीर एक मृत युवती की थी और पुलिस की ओर से इस मृत युवती की पहचान करने की अपील की गई थी. रेखा की यह तसवीर देखते ही घर में कोहराम मच गया. सभी रोने लगे. थोड़ी देर बाद नवीन, रवि और 2-3 पड़ोस के लोग साल्हावास थाने के लिए एक ट्रैक्टर से निकल गए. रेखा की यह तसवीर वाट्सऐप पर यहीं के थाने से शेयर की गई थी.

उधर जब पुलिस को मृत युवती की पहचान कराने में सफलता नहींमिली तो उस का फोटो गांव वालों के वाट्सऐप पर शेयर कर दिया. इस के अलावा किसी सूत्र की तलाश में 2 कांस्टेबल रुडिय़ावास भेजे गए. उन्हें वहां तालाब के किनारे घास में एक महिला का पर्स मिला था. उस पर्स में एक आईकार्ड मिला, जो एनटीपीसी पावर प्लांट झाड़ली का था. इस से अनुमान लगाया गया कि मृत मिली वह युवती इस पावर प्लांट में नौकरी करती थी. एसएचओ झाड़ली जा कर इस आईकार्ड के बारे में मालूम करना चाहते थे कि उस से पहले एक कांस्टेबल ने अंदर कक्ष में आ कर बताया, ”सर, एक ट्रैक्टर में कुछ ग्रामीण लोग थाने आए ओर वह आप से मिलना चाहते हैं.’’

एसएचओ उठ कर बाहर आ गए. ट्रैक्टर से आए लोग उतर कर उन के पास आ गए. उन्हें ‘रामराम’ करने के बाद नवीन ने आगे आ कर बताया, ”साहब, हम गांव बहू से आए हैं. वाट्सऐप पर जिस युवती की लाश का फोटो शेयर किया गया है, पहचान के लिए वह मेरी भाभी रेखा से मिलतीजुलती है. मेरी भाभी रेखा कल शाम को काम से घर नहीं लौटी है.’’

”क्या? तुम्हारी भाभी रेखा झाड़ली में एनटीपीसी पावर प्लांट में नौकरी करती थी?’’ एसएचओ हरीश कुमार ने पूछा.

”हां साहब,’’ नवीन ने कहा.

”तो हमें जो लाश रुडिय़ावास तालाब में मिली है, वह रेखा की है. हमें एक पर्स तालाब के पास से मिला है. उसे पहचान कर बताओ क्या वह पर्स तुम्हारी भाभी रेखा का ही है.’’ कहने के बाद एसएचओ ने कांस्टेबल को कक्ष में रखा पर्स ले कर आने को कहा.

कांस्टेबल वह पर्स उठा लाया तो नवीन ने देखते ही बता दिया, ”यह पर्स मेरी भाभी रेखा का ही है साहब.’’

”लाश पोस्टमार्टम के लिए झज्जर भेजी गई है.’’ एसएचओ ने बताया, ”तुम यह बताओ कि तुम्हें किसी पर शक है? ऐसा व्यक्ति जो तुम्हारी भाभी से खुंदक रखता हो.’’

नवीन कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया फिर बोला, ”ऐसा तो कोई व्यक्ति नहीं था साहब, मेरी भाभी लड़ाकू टाइप की नहीं थी. वह किसी से ज्यादा वास्ता भी नहीं रखती थी.’’

”लेकिन कोई ऐसा व्यक्ति तुम्हारी भाभी की जिंदगी में जरूर रहा है नवीन, जिस ने किसी बात पर उस की हत्या कर दी और लाश को रुडिय़ावास में ले जा कर तालाब में फेंक दिया.’’ एसएचओ ने बहुत गंभीर स्वर में कहा, ”तुम्हारी भाभी अकेली तो रुडिय़ावास नहीं जा सकती.’’

”ऐसा कौन हो सकता है साहब!’’ नवीन ने दिमाग पर जोर डाला फिर जैसे कोई तसवीर उस की आंखों के सामने उभरी. नवीन ने राजदाराना अंदाज में कहा, ”साहब, आजकल भाभी किसी की कार में बैठ कर झाड़ली पावर प्लांट पर जाने लगी थी. मैं ने खुद भाभी को उस कार में बस स्टैंड से बैठते हुए कई बार देखा था. शुरू मे मुझे लगा कि गाड़ी पावर प्लांट वालों की ओर से लगाई गई है, उस में पावर प्लांट में काम करने वाले और भी वर्कर आते होंगे, लेकिन बाद में मुझे संदेह हुआ कि कार में सिर्फ भाभी ही बैठती है, दूसरा कोई और नहीं.’’

”कार किस रंग की है?’’

”रंग को छोडि़ए साहब, मैं ने उस कार का नंबर दिमाग में बिठा रखा है. मैं इस के विषय में मौका देख कर भाभी से पूछताछ करने वाला था कि यह हादसा हो गया.’’

”मुझे कार का नंबर बताओ.’’ एसएचओ ने उत्सुकता से पूछा.

नवीन ने कार का नंबर बता दिया, जिसे एसएचओ हरीश कुमार ने डायरी में नोट कर लिया. फिर उन्होंने एक कांस्टेबल के साथ इन लोगों को झज्जर के सरकारी हौस्पिटल जाने के लिए भेज दिया और केस डायरी में अज्ञात के खिलाफ रेखा की हत्या का मामला दफा दर्ज कर लिया.

एसएचओ ने एसआई को बुला कर उसे नवीन द्वारा नोट कराए कार का नंबर दे कर कहा कि वह मालूम करें कि यह कार किस के नाम से रजिस्टर्ड है. एसआई ने एक घंटे में ही उस कार के नंबर से उस के मालिक का नामपता मालूम कर लिया और एसएचओ को जानकारी दे दी. यह कार गांव बहू के एक व्यक्ति के नाम रजिस्टर थी, जिस का नाम जयपाल (काल्पनिक) था. गांव बहू का नाम सुन कर एसएचओ हरीश कुमार बुरी तरह से चौंके. रेखा भी तो गांव बहू की ही थी. एसएचओ तुरंत 4 कांस्टेबल साथ ले कर उस व्यक्ति से मिलने गांव बहू के लिए चल पड़े, जिस के नाम से कार का रजिस्ट्रैशन था. वह व्यक्ति गांव बहू में अपने घर पर ही मिल गया.

पूछताछ करने पर उस ने कहा, ”साहब, यह कार मेरे ही नाम से है, लेकिन मैं ने यह अपने भांजे मंजीत को दे रखी है. मेरी बहन आजकल बीमार रहती है. मेरे जीजा का 2021 में रोड एक्सीडेंट हो गया था. उन के बाद अपनी बहन के घर की मैं ही देखभाल करता हूं. कार मैं ने इसलिए दी कि मंजीत अपनी मम्मी को इलाज के लिए अस्पताल ले जाए और ले कर आए. क्या कुछ एक्सीडेंट कर दिया मंजीत ने?’’

”नहीं. बात कुछ और है, तुम हमें अपनी बहन के घर ले चलो. हमें मंजीत से कुछ पूछताछ करनी है.’’ एसएचओ ने कहा.

जयपाल एसएचओ को अपनी बहन के घर ले गया. यहां मंजीत के बारे में पूछने पर मालूम हुआ कि वह कल से कहीं गया हुआ है. कार घर पर खड़ी कर गया है.

एसएचओ का शक मंजीत पर गहरा हो गया. उन्होंने मंजीत का फोटो मंजीत की मम्मी से मांगा और उसे ले कर थाने लौट आए. उन्होंने मंजीत का फोटो मुखबिरों को दिखा कर उन्हें मंजीत की टोह लेने के काम पर लगा दिया. मुखबिर अपने काम में लग गए. एसएचओ खुद मंजीत के मिलने वाली संभावित स्थानों पर दबिश देने लगे.

काफी भागदौड़ करने के बाद मंजीत 10 मई, 2025 को एक मुखबिर की काल आने के बाद पकड़ लिया गया. उसे थाना साल्हावास लाया गया. वह अभी 18 वर्ष का युवा था. वह काफी डरा हुआ था. उस से कड़ी पूछताछ शुरू की गई तो उस ने रेखा की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली.

”तुम ने रेखा की हत्या क्यों की?’’ एसएचओ हरीश कुमार ने पूछा.

”सर, यह सुनने से पहले आप मेरे प्रेम की दास्तां सुन ले, आप को मालूम हो जाएगा, मुझे रेखा की हत्या क्यों करनी पड़ी.’’ मंजीत ने गंभीर स्वर में कहा और बगैर इजाजत मिले वह अपनी प्रेम कहानी के पन्ने खोलने लगा.

”सर, मैं गांव बहू का रहने वाला हूं, रेखा भी इसी गांव की थी. मैं ने उसे कई बार देखा था. उस का पति शराबी और कामचोर था, इसलिए रेखा ने घर चलाने के लिए झाड़ली पावर प्लांट में साफसफाई का काम पकड़ लिया था. वह रोज बस से झाड़ली जाती थी. एक दिन वह मुझे गांव के बाहर बस स्टाप पर परेशान हालत में मिली थी. उस दिन बस खराब थी, आई नहीं थी.’’

मंजीत ने आगे बताया, ”मैं ने रेखा को कार में लिफ्ट देनी चाही. काफी नानुकुर के बाद वह मेरी कार में बैठी. मैं उसे झाड़ली छोड़ कर आया. उस दिन के बाद से मैं हर रोज रेखा को उस के काम पर छोडऩे जाने लगा. साथ मिला तो मेरे दिल में रेखा के लिए प्यार का अंकुर फूट गया. मैं रेखा को चाहने लगा. उस का खयाल रखने लगा.

”मुझे अपने पापा रामपाल के एक्सीडेंट क्लेम का रुपया मिलता था. मेरे मामा हरपाल भी मदद करते थे. मैं उन पैसों में से रेखा को गिफ्ट वगैरह देने लगा तो धीरेधीरे रेखा भी मेरी तरफ झुक गई. हम दोनों प्यार करने लगे.’’

मंजीत कुछ देर के लिए रुका, फिर सांसें दुरुस्त कर के आगे बताने लगा.

”सर, रेखा को मैं सच्चा प्यार करने लगा था. वह 2 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन लगती नहीं थी. मैं रेखा को अपनी बनाने का ख्वाब सजाने लगा था कि एक दिन यानी 4 मई, 2025 को मैं ने रेखा को अपनी कार में बस स्टाप से बिठाया तो वह काफी खुश थी.

”मैं ने उस से खुशी का कारण पूछा तो उस ने कुछ नहीं बताया. कार चलाते हुए मैं ने यूं ही रेखा का मोबाइल हाथ में ले लिया और उसे औन किया तो उस में किसी के साथ रेखा की चैटिंग देख कर चौंक पड़ा. मैं ने रेखा से पूछा कि वह किस के साथ चैटिंग कर रही थी?

”रेखा ने मुझे जवाब नहीं दिया. मैं ने कहा तुम मेरे सामने उस युवक को काल लगा कर बात करो, लेकिन रेखा ने यह कह कर बात समाप्त करनी चाही कि वह उस युवक से मिल कर काल आदि करने के लिए मना कर देगी. चूंकि मेरे मन में शक घर कर गया था, इसलिए मैं रेखा पर दबाव बनाने लगा कि वह उस युवक से मेरे सामने बात करे.’’

मंजीत ने गहरी सांस ली, ”रेखा नहीं मानी सर. मैं ने गुस्से में उस का फोन छीन कर तोड़ डाला. इस बात पर रेखा को गुस्सा आ गया. उस ने मुझे थप्पड़ मार दिया. कोई लड़की लड़के को थप्पड़ मारेगी तो कहां बरदाश्त होगा. मैं ने क्रोध में रेखा की चुन्नी से उस का गला घोंटना शुरू कर दिया.

 

”कार मैं ने सड़क के किनारे खड़ी कर दी थी. यहां गहरा सन्नाटा था. मैं ने क्रोध में रेखा का गला इतनी जोर से दबाया कि उस की सांसें थम गईं. वह मर गई तो मैं बुरी तरह घबरा गया. मेरी समझ में नहीं आया कि मैं क्या करूं.

”मैं काफी देर तक बेमतलब कार को सड़क पर दौड़ाता रहा, फिर मैं रुडिय़ावास की ओर चला गया. वहां एक तालाब मुझे दिखाई दिया. यहां सन्नाटा था. मैं ने रेखा की लाश उस तालाब में फेंक दी और उस का बैग झाडिय़ों में डाल कर वापस गांव बहू आ गया.

”यहां घर पर मैं ने कार खड़ी की और राजस्थान भाग गया. एक हफ्ते बाद मैं गांव की तरफ लौटते वक्त मुखबिर द्वारा पहचान लिया गया और मुझे पकड़ लिया गया. मैं रेखा की हत्या का गुनाह कुबूल करता हूं.’’

चूंकि मंजीत ने गुनाह कुबूल कर लिया था और रेखा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी यह स्पष्ट हो गया था कि उस की मौत गला घुटने से हुई है. एसएचओ हरीश कुमार ने दोबारा मंजीत को न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस ने मंजीत की कार, रेखा का बैग और मोबाइल जो टूटी दशा में था, जब्त कर लिया. रेखा की लाश उस के फेमिली वालों को सौंप दी. वह लोग रेखा का अंतिम क्रियाकर्म करने में व्यस्त हो गए. अपने से कम उम्र के लड़के की ओर रेखा ने झुक कर अपना विवेक, पति और बच्चे खोए और भरी जवानी में ही वह प्रेमी के हाथों अपना जीवन गंवा बैठी. Family Story in Hindi