Rajasthan News: पुलिस वाले ने पुलिस से परेशान हो कर खुदकुशी की

Rajasthan News: राजस्थान के नागौर जिले के सुरपालिया थाने के तहत आने वाले एक गांव बाघरासर में रविवार, 21 जनवरी, 2018 की सुबह डीडवाना एएसपी दफ्तर के ड्राइवर कांस्टेबल गेनाराम मेघवाल ने अपनी पत्नी संतोष और बेटे गणपत व बेटी सुमित्रा के साथ फांसी के फंदे पर झूल कर जान दे दी.

21 जनवरी, 2018 को सुबह के 4 बजे गेनाराम के लिखे गए सुसाइड नोट को सोशल मीडिया पर पोस्ट किया गया. उस सुसाइड नोट पर गेनाराम समेत परिवार के सभी सदस्यों के दस्तखत थे. 5 पन्नों के उस सुसाइड नोट में एक पुलिस एएसआई राधाकिशन समेत 3 पुलिस वालों पर चोरी के आरोप में फंसाने, सताने व धमकाने को ले कर यह कदम उठाने का आरोप लगाया गया था.

सुसाइड नोट में लिखा था कि मार्च, 2012 में नागौर पुलिस लाइन में रहने वाले एएसआई राधाकिशन सैनी के घर में चोरी हुई थी. राधाकिशन ने गेनाराम, उस के बेटे गणपत और बेटे के दोस्तों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. उन दिनों गेनाराम नागौर में तैनात था. इस मामले में 2 बार एफआईआर हो चुकी थी. लेकिन तीसरी बार यह मामला फिर खुलवा लिया गया. इस के बाद गेनाराम ने कोर्ट में एफआईआर रद्द करने की याचिका लगाई, मगर वह कोर्ट से खारिज हो गई थी.

गेनाराम अपने आखिरी समय में एएसपी दफ्तर, डीडवाना में तैनात था. वहां वह दफ्तर के पास बने सरकारी क्वार्टर में परिवार के साथ रहता था. जांचपड़ताल में यह भी सामने आया  कि गेनाराम और राधाकिशन के बीच गांव ताऊसर में 18 बीघा जमीन को ले कर भी झगड़ा चल रहा था. इस मामले में भी अजमेर पुलिस के अफसरों ने जांच की थी. गेनाराम और उस के परिवार के तनाव की एक खास वजह यह भी थी.

गेनाराम का पिछले कुछ सालों में कई बार तबादला हुआ था. इस के चलते भी वह परेशान था. अपने सुसाइड नोट में उस ने एएसआई राधाकिशन सैनी पर बेवजह परेशान करने का आरोप लगाया था. गेनाराम के खिलाफ चोरी के मामले की जांच कर रहे नागौर सीओ ओमप्रकाश गौतम का कहना है कि मार्च, 2012 के इस मामले की जांच पहले भी सीओ लैवल के कई अफसर कर चुके थे. 2 बार एफआईआर भी कराई गई थी, लेकिन पिछले दिनों यह मामला फिर से खुलवाया गया था.

गेनाराम ने हाईकोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को खारिज कराने के लिए भी याचिका लगाई थी, लेकिन 8 जनवरी, 2018 को कोर्ट ने उस की यह याचिका खारिज कर दी थी. अपने सुसाइड नोट में गेनाराम ने परेशान करने के लिए जिस भंवरू खां का जिक्र किया है, वह रिटायर हो चुका है. गेनाराम के परिवार वालों ने राधाकिशन, उस की पत्नी, भंवरू खां और रतनाराम समेत 3-4 दूसरे लोगों के खिलाफ खुदकुशी करने के लिए उकसाने और दलित उत्पीड़न अधिनियम की धाराओं में मामला दर्ज कराया था.

लोगों ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराने और ताऊसर की 18 बीघा जमीन को सीज करने की मांग की है. यहां यह भी बताना जरूरी है कि राधाकिशन के घर में मार्च, 2012 में जब पुलिस लाइन, नागौर में चोरी हुई थी. तब राधाकिशन को गेनाराम की पत्नी संतोष ने ही चोरी होने की खबर दी थी. पर राधाकिशन और उस के परिवार ने गेनाराम और उस के बेटे गणपत व उस के साथियों पर ही चोरी करने का आरोप लगा दिया और मुकदमा दर्ज करा दिया.

जुर्म साबित नहीं होने के बाद भी दुराचरण रिपोर्ट भेजी गई. गेनाराम ने सुसाइड नोट में लिखा था, ‘हमारी किसी ने नहीं सुनी.’

इस मामले में तब सीओ द्वारा तलबी लैटर जारी किया गया था. दफ्तर पहुंचने पर राधाकिशन ने गेनाराम को फिर धमकाया. राधाकिशन कई सालों से एक ही दफ्तर में तैनात है. गेनाराम एएसपी दफ्तर में ड्राइवर था. नागौर जिला एसपी दफ्तर में मीटिंग होती थी, तो वही एएसपी को ले कर जाता था. एसपी दफ्तर में ही एएसआई राधाकिशन का दफ्तर था. वह गेनाराम को देखते ही धमकाता था. गेनाराम इस वजह से परेशान हो गया था.

गेनाराम और उस के बीवीबच्चे पढ़ेलिखे थे. उन्होंने क्यों नहीं कानूनी लड़ाई लड़ी? शायद उन की उम्मीद जवाब दे गई थी, तभी उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म करने में ही भलाई समझी और जहर पीने के बाद फांसी के फंदे पर झूल कर मौत के मुंह में जा पहुंचे. सुसाइड नोट में लिखी बातें पढ़ कर लोग हैरान रह गए कि पुलिस वाला भी पुलिस के कहर से नहीं बच सका. ऐसे पुलिस वालों पर सख्त कार्यवाही होनी चाहिए, ताकि भविष्य में कोई इस तरह पूरा परिवार खत्म न हो.

गेनाराम के बेटे गणपत और बेटी सुमित्रा ने सीकर से पौलीटैक्निक का कोर्स किया था. इस के बाद से वे दोनों मातापिता के साथ डीडवाना में ही रह रहे थे. इस परिवार के बाकी सदस्यों का कहना है कि सुमित्रा की सगाई गांव धीरजदेसर में हुई थी, जबकि बेटे गणपत की सगाई गांव सोमणा में की गई थी.

कांस्टेबल गेनाराम के 10 सवाल, जो उस ने अपने सुसाइड नोट में लिखे थे, अब जवाब मांग रहे हैं :

* चोरी का सारा सामान मिल जाना और एफएसएल भी नहीं उठाना घटना का बनावटी होना जाहिर करता है.

* तांत्रिक के कहने, कांच में चेहरा देखने की बात के आधार पर अनुसंधान करना क्या सही है?

* जांच अधिकारी के सामने राधाकिशन द्वारा गणपत के साथ मारपीट की गई. गवाह होने के बाद भी एफआईआर दर्ज करा देना.

* एसपी दफ्तर में नियम विरुद्ध नौकरी करना.

* पुत्र के साथ मारपीट और बिना वारंट 2 दिन थाने में रखना सचाई पर कुठाराघात है.

* पुत्र गणपत अपराधी था तो उसे थाने में रख कर छोड़ा क्यों गया?

* अनुसंधान अधिकारी राजीनामे का दबाव बनाने में जुटे थे. मामला इसी के चलते पैंडिंग रखा गया.

* जांच में पहले पुत्र और फिर पूरे परिवार पर आरोप लगाना शक पैदा करता है.

* चोरी के सामान में मंगलसूत्र गायब बताया जो महिला हमेशा पहने रहती है.

* महिला ने मंगलसूत्र पहन रखा था तो उसे चोरी हो जाना क्यों बताया?

गेनाराम के पूरे परिवार समेत खुदकुशी करने का पता चला तो राधाकिशन, भंवरू खां और रतनाराम फरार हो गए.

कांग्रेस के संसदीय सचिव रह चुके गोविंद मेघवाल ने बताया, ‘‘दलितों पर जोरजुल्म बढ़ रहे हैं. समाज को एकजुट होना पड़ेगा. यह पुलिस और वसुंधरा सरकार की नाकामी है. हमारा समाज इस पर विचार कर रहा है.’’ Rajasthan News

Hindi Crime Stories: पप्पू बन गया डौन

Hindi Crime Stories: अपने परिवार के साथ खुशहाल जीवन बिताने वाले आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू को कुछ मौकापरस्त नेताओं ने बंदूक उठाने को मजबूर किया था, आज वही नेता उस से खौफ खा रहे हैं और सरकार से उसे गिरफ्तार करने की मांग कर रहे हैं.

3 सितंबर, 2015 को राजस्थान के जिला नागौर की डीडवाना कोर्ट में कुख्यात अपराधी आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू के खिलाफ चल रहे नानूराम हत्याकांड का फैसला सुनाया जाना था. उसे 15 सदस्यीय पुलिस टीम अजमेर जेल से डीडवाना ले कर आई थी. उस के 2 साथी श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड भी उस के साथ थे. कोर्ट में वैसे भी भारी संख्या में पुलिस तैनात रहती थी, लेकिन उस दिन रोज की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही पुलिस तैनात की गई थी.

फैसले की घड़ी आई तो कोर्ट में सन्नाटा छा गया. लेकिन माननीय जज ने सबूतों के अभाव में आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को इस केस से बरी कर दिया था. इस के बाद कोर्ट में मौजूद आनंदपाल सिंह के समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. वे इतने खुश हुए कि मिठाई मंगा कर न्यायालय परिसर में ही बांटने लगे. वे जो मिठाई बांट रहे थे, उस में से कुछ में उन्होंने नींद की दवा मिला दी थी, जिसे उन्होंने कमांडो सहित वैन में सवार उन 15 पुलिसकर्मियों को खिला दी, जो आनंदपाल सिंह को अजमेर जेल से लाए थे. लेकिन वैन के ड्राइवर को उन्होंने वह नींद की दवा वाली मिठाई नहीं दी थी.

मिठाई खाने के बाद पुलिस वालों ने आनंदपाल सिंह और उस के साथियों को पुलिस वैन में बिठाया और अजमेर की ओर चल दिए. थोड़ी दूर जाने के बाद पुलिस वालों को नींद आने लगी. पुलिस वालों को ऊंघते देख आनंदपाल सिंह मंदमंद मुसकराया. उसे लगा कि अब उस की योजना सफल होने वाली है. पुलिस वैन जब डीडवाना और परवतसर के बीच गांगवा गांव के पास पहुंची तो सामने से सफेद रंग की एक जीप पुलिस की गाड़ी के सामने इस तरह आ कर रुकी कि पुलिस की गाड़ी आगे न निकल सके.

उस जीप से कुछ लोग उतर कर पुलिस वैन की तरफ लपके. पुलिस टीम जब तक कुछ समझ पाती, जीप में आए लोगों ने गोलियां दागनी शुरू कर दीं. नशीली दवा मिली मिठाई खाने से पुलिसकर्मी अर्धबेहोशी की हालत में थे, इसलिए वे उन का विरोध नहीं कर सके. उन लोगों ने पुलिस पर एके47 जैसे आधुनिक हथियारों से हमला किया था, जिस से 2 कमांडो और ड्राइवर शंभू सिंह घायल हो गए. पुलिस पर हमला कर के वे लोग आनंदपाल सिंह, श्रीबल्लभ और सुभाष मुंड को पुलिस कस्टडी से छुड़ा ले गए. नशे की हालत में भी परवतसर थानाप्रभारी अनिल पांडे ने जवाबी फायरिंग की थी. एक गोली आनंदपाल सिंह के पैर में लगी थी. घायल आनंदपाल के साथी उसे गाड़ी में बिठा कर ले गए थे.

आनंदपाल सिंह कोई छोटामोटा बदमाश नहीं था. उस पर हत्या, फिरौती, गैंगवार जैसे संगीन मामलों के 28 मुकदमे दर्ज थे. दहशत के पर्याय बने इस बदमाश के अपने 2 साथियों के साथ फिल्मी स्टाइल में पुलिस कस्टडी से फरार होने पर पुलिस अधिकारियों के हाथपैर फूल गए. प्रदेश स्तर के पुलिस अधिकारियों तक जब इस कुख्यात बदमाश के फरार होने की खबर पहुंची तो तुरंत पूरे प्रदेश में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया. नागौर और आसपास के जिलों में नाकाबंदी कर दी गई. हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश से लगती राजस्थान की सीमाओं को भी सील कर दिया गया. मगर आनंदपाल और उस के दोनों साथी पुलिस के हाथ नहीं लगे.

न्यूज चैनलों पर आनंदपाल सिंह के फरार होने बहस होने लगी, पुलिस की निष्क्रियता से संबंधित खबरें चलने लगीं. जो राजनीतिज्ञ आनंदपाल के निशाने पर थे, खौफ खाने लगे. अपनी हिफाजत के लिए वे पुलिस की शरण में जा पहुंचे. उन्हें इस बात का डर सता रहा था कि कहीं आनंदपाल सिंह उन्हें मार न दे. बदमाशों की गोली से घायल और नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश पुलिसकर्मियों को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल में भरती करा दिया गया था. मीडिया इसे पुलिस की मिलीभगत बता रही थी. उस का कहना था कि 3 सितंबर, 2015 को पुलिस जब आनंदपाल को अजमेर जेल से डीडवाना लाई थी तो कई बदलाव किए गए थे. उस की सुरक्षा में केवल 15 पुलिसकर्मी ही तैनात थे, जिस में केवल 2 ही कमांडो थे.

जबकि इस के पहले जब भी आनंदपाल को पेशी पर लाया जाता था, 30 पुलिसकर्मियों के साथ एक दरजन कमांडो तैनात होते थे. आखिर इस बार उस की सुरक्षा में कमी क्यों की गई? इस पर सवाल उठ रहे थे. पुलिस की जो टीमें आनंदपाल की तलाश में लगी थीं, वे इस बात की भी जांच कर रही थीं कि पिछले दिनों आनंदपाल से जेल में मिलने कौनकौन आया था. लेकिन पुलिस ने यह पता लगाने की कोशिश नहीं की कि इतना खूंखार अपराधी जेल में मोबाइल और फेसबुक कैसे चला रहा था? और तो और पेशी के दौरान अदालत में भी आनंदपाल से संदिग्ध लोग मिलते रहते थे.

वह जेल से ही अपना गिरोह चला रहा था. सब कुछ जानते हुए भी पुलिस उस से कुछ नहीं कहती थी. वह बीकानेर जेल में था, तब उस के पास बंदूक तक पहुंच गई थी. यह जेल प्रशासन की मिलीभगत के बिना कैसे संभव हो सकता था. इस से साफ लगता है कि आनंदपाल को जेल में खुली छूट मिली थी. कुछ महीने पहले आनंदपाल का छोटा भाई रूपेंद्र सिंह चुरू जेल से पैरोल पर बाहर आया तो ऐसा गायब हुआ कि पुलिस उसे आज तक नहीं खोज पाई है. आनंदपाल या उस की गैंग के सदस्यों को पेशी पर लाने और वापस जेल तक ले जाने के दौरान पुलिस की गाडि़यां एस्कौर्ट करती थीं, इस के अलावा संबंधित थानों की पुलिस भी रास्ते की पहले से मौनिटरिंग करती थी. उन रास्तों पर नाकाबंदी भी रहती थी. अगर 3 सितंबर को भी इसी तरह की सुरक्षा व्यवस्था होती तो आनंदपाल को छुड़ाने आए बदमाश पहले ही कहीं न कहीं पकड़ लिए जाते.

आनंदपाल का इलाके में कितना प्रभाव था, इस का पता इसी बात से चलता है कि सन 2012 में जब वह गिरफ्तार किया गया था, तब उसे जब भी जेल से डीडवाना, चुरू, बीकानेर या नागौर की अदालतों में लाया जाता था, उस की गैंग के सदस्य निजी वाहनों से पुलिस वैन के आगेपीछे चलते थे. मीडिया द्वारा जब इस बात की जानकारी तत्कालीन एसपी लक्ष्मण गौड़ को हुई तो उन्होंने 2 वाहनों को पकड़ा. तब उन लोगों ने सफाई में कहा था कि उन्हें किसी पर भरोसा नहीं है, इसलिए वे खुद आनंदपाल की सुरक्षा करते हैं.

जांच के बाद पुलिस अधिकारियों को पता चला है कि पुलिस जब भी आनंदपाल को जेल से कोर्ट लाती थी, पुलिसकर्मियों के लिए चायपानी और खानेपीने की व्यवस्था वही करता था. आखिर पुलिस उस पर आंख मूंद कर इस तरह विश्वास क्यों करती थी. मीडिया ने पुलिस पर यह भी आरोप लगाया है कि आनंदपाल के फरार होने के बाद भी पुलिस ने ढिलाई बरती. पुलिस के पास अत्याधुनिक हथियार थे, फिर भी आनंदपाल के साथी उसे ले उड़े. उस के फरार होने के करीब एक घंटे बाद पुलिस के बड़े अधिकारी सक्रिय हुए. आखिर ऐसा क्यों हुआ.

कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी बड़े राजनेता ने अपने किसी दुश्मन को ठिकाने लगवाने के लिए पूरी योजना के तहत आनंदपाल सिंह को फरार कराया हो. बहरहाल आनंदपाल के फरार होने की कहानी किसी हिंदी फिल्म की कहानी जैसी है. जुर्म की दुनिया में कदम रखने के बाद आनंदपाल चंद सालों में दहशत का पर्याय बन गया था. जब उस ने अपराध की राह पर कदम रखा था, उस के पीछेपीछे उस के 2 छोटे भाई रूपेंद्र सिंह और मंजीत सिंह भी उसी राह पर चल पड़े थे. धीरेधीरे उस के पीछे करीब 300 गुंडों की फौज खड़ी हो गई थी. इस के बाद इन लोगों के कारनामों से आमजनों में खौफ पैदा हो गया तो दूसरे अपराधियों में जलन.

एकएक कर आनंदपाल के ऊपर हत्याएं, लूट, अपहरण और धमकाने के 28 मामले दर्ज हो गए. इस के अलावा तमाम मामले ऐसे थे, जिन की लोगों ने डर की वजह से रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई. आसपास के 5 जिलों में उस का एकछत्र राज स्थापित हो गया. उस के पास अत्याधुनिक हथियारों की खेप जमा हो गई. सन 2012 में जब आनंदपाल गिरफ्तार हुआ था तो उस के पास से एके 47 समेत 6 राइफलों के अलावा एक अमेरिकन कारबाइन और बुलेट प्रूफ जैकेट भी बरामद हुई थी. इस के गुर्गों बिजेंद्र ने भावता में हैडकांस्टेबल फैज मोहम्मद को जब गोली मारी थी, तब पुलिस ने उस के पास से एसएलआर बरामद की थी.

एसएलआर भारतीय सेना के पास होती है. कुचामन, डीडवाना, सीकर और चुरू जिलों में आनंदपाल का ऐसा खौफ था कि व्यापारी उस के नाम से ही फिरौती दे देते थे. इलाके में उस के गैंग का प्रभाव जमने से दूसरे बदमाश उस से दुश्मनी रखने लगे थे. राजू ठेहठ गैंग उस का सब से बड़ा विरोधी गैंग था. पिछले साल बीकानेर जेल में ठेहठ गैंग के लोगों ने आनंदपाल और उस के साथियों पर हमला कर दिया था. इस गैंगवार में आनंदपाल तो बच गया, लेकिन उस का दोस्त बलवीर बानूड़ा मारा गया. ठेहठ गैंग के भी 2 लोगों को गोली लगी थी. बाद में हमला करने वाले ठेहठ गैंग के 2 लोगों की आनंदपाल सिंह ने बीकानेर जेल में उन की ही पिस्तौल से हत्या कर दी थी.

हत्या के बाद आनंदपाल ने उन का सिर बड़े पत्थर से कुचल दिया था. इस घटना के बाद जेल में इतना खौफ पैदा हो गया था कि एक घंटे तक बीकानेर पुलिस भी जेल के अंदर नहीं गई थी. बाद में पुलिस ने काररवाई की थी. 3 साल जेल में रहने के बाद आनंदपाल जमानत पर बाहर आया तो उस ने 12 मार्च, 2015 को गैंगवार, धमकियों और आशंकाओं के बीच मीडिया के सामने बेबाक कह कर सब को चौंका दिया था कि राजनेता अपने फायदे के लिए गैंगवार कराते हैं. जेल में अपने दुश्मनों को मारने के बाद उस के बाहर के दुश्मनों में भी खौफ छा गया था. उन की सांसें हलक में अटक गईं. कौन जाने किस घड़ी आनंदपाल उन का काम तमाम कर दे.

नागौर के तत्कालीन एसपी राघवेंद्र सुहासा ने मई, 2015 में गृह मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा था कि आनंदपाल व राजू ठेहठ खूंखार अपराधी हैं और दोनों में गैंगवार भी है. इसलिए इन के मामलों की सुनवाई वीडियो कौन्फे्रंसिंग के जरिए जेलों से ही करवाई जाए. मगर राजस्थान सरकार के गृह मंत्रालय ने एसपी राघवेंद्र सुहासा के पत्र को गंभीरता से नहीं लिया. आनंदपाल और उस के साथियों की ओर से दी गई नींद की दवा मिली मिठाई खाने से बेहोश हुए 7 पुलिसकर्मियों को 7 सितंबर, 2015 को अजमेर के जवाहरलाल नेहरू अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया. जबकि कमांडो शक्ति सिंह और ड्राइवर शंभू सिंह उपचाररत थे. जो पुलिसकर्मी अस्पताल से डिस्चार्ज हुए थे, उन्हें पूछताछ के लिए नागौर पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.

हिरासत में लिए गए पुलिसकर्मियों से जांच अधिकारी ने अलगअलग पूछताछ की. उन्हें घटनास्थल पर भी ले जाया गया. अपने बचाव के लिए उन्होंने मनगढ़ंत कहानी गढ़ते हुए विरोधाभासी बयान दिए. जांच अधिकारी ने अपनी रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को सौंप दी. इस में सभी को दोषी माना गया है. आईजी मालिनी अग्रवाल ने चालानी गार्ड के तौर पर तैनात ड्राइवर शंभू सिंह, एसआई फूलचंद, कमांडो शक्ति सिंह, राजेंद्र सिंह, जगदीश शर्मा, अर्जुन राम, हरदीप, सुनील, गोपाल, सांवरमल, मुकेश, फोटोग्राफर राजेंद्र को सस्पेंड कर दिया है. इन में ड्राइवर शंभू सिंह के पैरों में और कमांडो शक्ति सिंह की जांघ में गोली लगी थी.

आईजी का कहना है कि प्रारंभिक तौर पर अपराधी की फरारी में इन्हें जिम्मेदार मानते हुए निलंबन की काररवाई की गई है. जांच के बाद इन्हें चार्जशीट दी जाएगी. इन की गिरफ्तारी भी हो सकती है. अगर इन का दोष साबित हो गया तो इन्हें नौकरी से भी बर्खास्त किया जा सकता है.

इस घटना को गंभीरता से लेते हुए 7 सितंबर को मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने गृह विभाग एवं पुलिस अधिकारियों की एक उच्च स्तरीय बैठक बुलाई, जिस में आनंदपाल सिंह की फरारी का मामला छाया रहा. मुख्यमंत्री ने पुलिस की लापरवाही पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि पुलिस आनंदपाल की गिरफ्तारी के लिए तेजी दिखाए. इस बैठक में गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव एवं मुखोपाध्याय, डीजीपी मनोज भट्ट सहित इंटैलीजेंस, जेल, कानून व्यवस्था और सुरक्षा से जुड़े अफसर मौजूद थे.

उधर विधायक हनुमान बेनीवाल ने सार्वजनिक निर्माण एवं परिवहन मंत्री यूनुस खान पर आरोप लगाया है कि उन के और आनंदपाल सिंह के बीच गहरे संबंध हैं. वही आनंदपाल का सहयोग करते रहे हैं. इस आरोप पर मंत्री यूनुस खान ने तुनक कर कहा कि उन के आनंदपाल से कोई संबंध नहीं हैं. वह सिर्फ उन के विधानसभा क्षेत्र डीडवाना का रहने वाला है. उन्होंने यहां तक कह दिया कि अगर हनुमान बेनीवाल इस का कोई सबूत ला दें तो वह राजनीति छोड़ देंगे. मंत्री यूनुस खान ने उलटा आरोप लगाया कि कुख्यात अपराधी आनंदपाल और विधायक हनुमान बेनीवाल में कोई अंतर नहीं है. बेनीवाल पर आनंदपाल सिंह की ही तरह हत्या, डकैती और लूटपाट के आरोप हैं. आनंदपाल की तरह बेनीवाल भी कई बार जेल जा चुके हैं.

बताया जाता है कि आनंदपाल की हिट लिस्ट में हनुमान बेनीवाल का भी नाम है. साथ ही श्रीगंगानगर के कई नेता भी उस के निशाने पर हैं. पुलिस कस्टडी से उस के फरार होने के बाद से ये सभी नेता परेशान हैं. यह इनपुट नागौर पुलिस ने जयपुर मुख्यालय को भेज दी है. इस के बाद मुख्यालय से सभी जिलों में अलर्ट जारी कर दिया गया है. सभी जिलों में सतर्कता बढ़ाने की सख्त हिदायत दी गई है.

सूत्रों के अनुसार, नागौर पुलिस को जेल स्टाफ तथा दूसरे कैदियों से जानकारी मिली थी कि आनंदपाल जेल में अकसर सीकर, नागौर व श्रीगंगानगर के कुछ लोगों का नाम लेता था. वह इन लोगों को अपना बड़ा दुश्मन बताता था और उन्हें खत्म करने के दावे करता था. इस के अलावा सीकर के कुछ व्यापारी व नागौर के कुछ नेता भी उस के निशाने पर बताए जा रहे हैं.

हालांकि पुलिस अधिकारी उस के पुराने रिकौर्ड के आधार पर यह भी कह रहे हैं कि आनंदपाल अमूमन जाटों व पूंजीपतियों को ही अपने टारगेट पर रखता है. आम लोगों को कभी नुकसान पहुंचाने की जानकारी नहीं मिली है. पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अभी तो पूरे प्रदेश में हाईअलर्ट के चलते आनंदपाल कोई ऐसा कदम नहीं उठाएगा, लेकिन उस के जो 300 गुर्गे हैं, वे अपने बौस के इशारे पर खून की होली खेलने से नहीं चूकेंगे.

आखिर यह आनंदपाल सिंह उर्फ पप्पू कौन है और वह खून की होली क्यों खेलना पसंद करता है? यह जानने के लिए हमें उस के अतीत में जाना होगा. राजस्थान के नागौर जिले में लाडनूं-डीडवाना रोड पर एक छोटा सा गांव है सांवराद, जहां ठाकुर हुकम सिंह चौहान रहते थे. आनंदपाल सिंह इन्हीं का बड़ा बेटा है. घर में सभी उसे पप्पू कहते थे. सीधासादा सरल स्वभाव का पप्पू मांबाप की आंखों का तारा था. गांव के स्कूल से प्रारंभिक शिक्षा पाने के बाद उस ने लाडनूं से 12वीं पास किया. इस के बाद वह डीडवाना चला गया, जहां उस ने बीए और बीएड किया. इस के बाद

वह सरकारी नौकरी पाने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट गया. पढ़ाई के साथ ही वह लाडनूं के गौशाला मार्केट में सीमेंट की दुकान भी चलाता था. इसी बीच चुरू जिला के सुजानगढ़ की राजकंवर से उस की शादी हो गई. वह एक बेटा व 2 बेटियों का बाप भी बन गया. उसी दौरान उस का झुकाव राजनीति की तरफ हो गया.

उस ने सन 1999-2000 में पंचायती राज चुनाव में सांवराद से पंचायत समिति का निर्दलीय चुनाव लड़ा. वह चुनाव जीत गया. इस के बाद उस ने भाजपा से प्रधान का चुनाव लड़ा. इस चुनाव में उस का मुकाबला कांग्रेस से पूर्व केबिनेट मंत्री हरजीराम बुरड़क के बेटे जगन्नाथ बुरड़क से था. दोनों के बीच कांटे की टक्कर थी. तमाम कोशिशों के बावजूद आनंदपाल जगन्नाथ बुरड़क से 2 वोटों से चुनाव हार गया. चुनाव जीतने के बाद जगन्नाथ प्रधान बन गया तो आनंदपाल लाडनूं पंचायत समिति का नेता प्रतिपक्ष बन गया.

नवंबर, 2000 में लाडनूं पंचायत समिति की स्थाई समितियों का चुनाव हुआ. इस चुनाव में विधायक हरजीराम बुरड़क और आनंदपाल के बीच तकरार हुई. तकरार की वजह लादु सिंह घुड़ीला का आवेदन पत्र जमा नहीं करना था. आनंदपाल खंड विकास अधिकारी से आवेदनपत्र जमा करने की जिद कर रहा था. तब विधायक ने खंड विकास अधिकारी रमेशचंद्र द्वारा आनंदपाल, जिला परिषद सदस्य खींवाराम घिंटाला और सुरजन सिंह घिरड़ौदा के खिलाफ सरकारी काम में बांधा डालने का मुकदमा लाडनूं थाने में दर्ज करा दिया. इस मुकदमे की तफ्तीश एएसआई चंद्राराम को सौंपी गई.

फिर अशोक सैनी नाम के व्यक्ति की ओर से आनंदपाल और उस के दोनों छोटे भाइयों के खिलाफ भादंवि की धारा 482 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया गया. यह मुकदमा संभवतया आनंदपाल को परेशान करने के लिए दर्ज कराया गया था, ताकि वह मुकदमे से डर कर अपने पैर पीछे खींच ले. मामला चूंकि गलत लग रहा था, इसलिए किसान नेता भागीरथ यादव और पूर्व विधायक दीपंकर शर्मा के नाती संजय शर्मा अशोक सैनी को एसपी नागौर गोविंद गुप्ता के पास ले गए.

अशोक सैनी ने एसपी को सारी सच्चाई बता दी. तब एसपी ने एसएचओ लाडनूं को इस मुकदमे में फाइनल रिपोर्ट लगाने के निर्देश दिए. लेकिन दूसरे ही दिन एक और मुकदमा उसी अशोक सैनी के हस्ताक्षर से आनंदपाल वगैरह के खिलाफ दर्ज हो गया. जिस एसपी ने अशोक सैनी वाले मामले में एसएचओ से फाइनल रिपोर्ट लगाने की बात कही थी. इस के बाद आनंदपाल और उस का सहयोग करने वालों पर मुकदमों की झड़ी लग गई.

9 जनवरी, 2001 को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सभा में पत्थर फेंकने, 16 जनवरी, 2001 को कोलिया गांव में हुई लूट तथा 11 फरवरी, 2001 को लाडनूं में हुई खेराज की हत्या के मामले में आनंदपाल के खिलाफ रिपोर्टें दर्ज हुईं. धीरेधीरे पप्पू खूंखार डौन आनंदपाल सिंह सांवराद बन गया. आनंदपाल और उस के सहयोगियों के खिलाफ हत्या का जो मामला दर्ज हुआ था, उस के गवाह ने तो यहां तक कहा था कि उसे हत्या के मुकदमे में फंसाने की धमकी दे कर विधायक ने झूठा बयान दिलवा कर आनंदपाल वगैरह को फंसाया था, जबकि वह किसी को नहीं पहचाना था.

इस सब से पप्पू इतना व्यथित हुआ था कि वह खूंखार अपराधों की राह पर चल पड़ा. बस आनंदपाल ने उस के बाद अपने दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए बुलेटप्रूफ जैकेट पहन कर हाथ में बंदूक थाम ली थी. वह अपराध के दलदल में दिनबदिन धंसता चला गया था. आनंदपाल ने गरीबों को कभी परेशान नहीं किया. वह शोषितों, मजलूमों की सेवा को अपना परम धर्म समझता है. उसे आम आदमी से कोई शिकवा नहीं है. न ही वह उस वर्ग को परेशान करता है. लूट, डकैती, हत्या सहित दरजन भर से भी ज्यादा मामलों में उत्तर प्रदेश पुलिस को भी आनंदपाल की तलाश है.

आनंदपाल ने जब बंदूक उठाई थी तो धड़ाधड़ उस के खिलाफ मुकदमे दर्ज होने लगे थे. पुलिस आनंदपाल को तलाश रही थी, मगर वह कहां हाथ आने वाला था. वह आंधी की तरह आता था और हत्या, लूट या डकैती को अंजाम दे कर तूफान की तरह चला जाता था. सांप के जाने के बाद पुलिस उस की लकीर पीटती रहती थी. पुलिस की नाक में आनंदपाल ने दम कर रखा था. आखिर आनंदपाल सिंह को पकड़ने का जिम्मा दबंग पुलिस अधिकारियों को सौंपा गया.

जयपुर पुलिस, एसओजी और एटीएस की संयुक्त टीमों ने फागी कस्बे के पास मोहब्बतपुरा गांव से आनंदपाल को गिरफ्तार कर लिया था. इस के कब्जे से एके 47 राइफल सरीखे खतरनाक हथियार, आटोमैटिक मशीन गन, बम और बुलेटप्रूफ जैकेट बरामद की गई. बता दें कि सरकारी सुरक्षा बलों के पास ही एके 47 राइफलें पाई जाती हैं.

अपराध जगत में आनंदपाल का जन्म वर्ष 2006 में हुआ था. उस ने डीडवाना में जीवनराम गोदारा नाम के छात्र नेता की गोलियों से भून कर हत्या कर दी थी. जीवनराम कालेज आतीजाती लड़कियों से छेड़छाड़ करता था. उस की इन हरकतों से छात्राएं परेशान थीं. वह बदमाश था, इसलिए उस से पंगा लेने की किसी में हिम्मत नहीं थी. जीवनराम की हरकतें बढ़ीं तो उसे समझाया गया कि वह अपनी हरकतों से बाज आए, मगर वह बाज नहीं आया. मदन सिंह राठौड़ नाम के एक शख्स ने उस की हरकतों पर अंकुश लगाने की हिम्मत की तो जीवन ने पत्थरों से कुचल कर सरेआम उस की हत्या कर दी थी.

आनंदपाल को यह बात बड़ी नागवार गुजरी. उस ने जीवनराम गोदारा की गोलियों से भून कर हत्या कर दी. जीवनराम गोदारा की हत्या के अलावा आनंदपाल के नाम डीडवाना में ही 13 मामले दर्ज हैं, जहां 8 मामलों में कोर्ट ने उसे भगोड़ा घोषित किया हुआ था. सीकर के गोपाल फोगावट हत्याकांड को भी आनंदपाल ने ही अंजाम दिया था.

गोदारा और फोगावट की हत्या करने का मामला समयसमय पर विधानसभा में गूंजता रहा था. आनंदपाल के जुर्म की फेहरिस्त का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब भी उस ने किसी को मौत के घाट उतारा, वह मुद्दा सरकार के लिए जवाब का विषय बन गया. सरकार किसी भी पार्टी की रही हो, विपक्ष लचर कानून व्यवस्था और पनपते शराब माफियाओं के नाम पर सरकार को निशाने पर लेता रहा.

बीकानेर जेल में हुई गैंगवार को ले कर विधानसभा में खूब हंगामा हुआ था. आनंदपाल को ले कर सरकार विपक्ष के निशाने पर रही. 29 जून, 2011 को आनंदपाल ने सुजानगढ़ में भोजलाई चौराहे पर गोलियां चला कर 3 लोगों को घायल किया था. उसी दिन गनौड़ा में शराब ठेके पर सेल्समैन के भाई की हत्या के आरोप में भी आनंदपाल का हाथ होने की बात सामने आई थी.

शेखावटी में अपराध के कभी 3 चेहरे हुआ करते थे. ये चेहरे थे— आनंदपाल सिंह, राजू ठेहठ और बलवीर बानूड़ा. अब 2 ही चेहरे बचे हैं. बलवीर बानूड़ा की हत्या के बाद आनंदपाल और राजू ठेहठ. अब इन दोनों में तनातनी चल रही है. राजू की गैंग में करीब 200 लोग हैं. उस पर भी 25 से ज्यादा केस दर्ज हैं. 8 अगस्त, 2013 को एटीएस ने उसे असम से पकड़ा था. वह अलवर जेल में बंद है.

राजू ठेहठ की अपराध की कहानी शुरू होती है 1997 से. तब बलवीर बानूड़ा और राजू ठेहठ दोस्त हुआ करते थे. दोनों शराब के धंधे से जुड़े थे. लेकिन सन 2005 में हुई एक हत्या ने दोनों दोस्तों के बीच दुश्मनी की दीवार खड़ी कर दी. शराब के ठेके पर बैठने वाले सेल्समैन विजयपाल की राजू ठेहठ से किसी बात पर कहासुनी हो गई. विवाद इतना बढ़ा कि राजू ने अपने साथियों के साथ मिल कर विजयपाल की हत्या कर दी. विजयपाल रिश्ते में बलवीर का साला लगता था. विजयपाल की हत्या से दोनों दोस्तों में दुश्मनी शुरू हो गई. बलवीर ने राजू के गैंग से निकल कर अपना अलग गिरोह बना लिया. बाद में वह आनंदपाल की गैंग में जा मिला. आनंदपाल का वह घनिष्ठ दोस्त बन गया. 15 फरवरी, 2012 को बलवीर गिरफ्तार हुआ था.

पिछले साल राजू ठेहठ के आदमियों ने बीकानेर जेल में बंद आनंदपाल व बलवीर बानूड़ा पर हमला किया. जेल में हुए इस हमले से आनंदपाल को बचाने के चक्कर में बलबीर मारा गया. पुलिस का कहना है कि राजू ठेहठ पर गोलियां बरसाने वाला सुभाष मुंड वही है, जो हाल ही में आनंदपाल के साथ पुलिस कस्टडी से फरार हुआ है. बलबीर पर 16 केस दर्ज थे. पुलिस सूत्रों के अनुसार, आनंदपाल के गैंग में अनुराधा नाम की एक युवती भी शामिल थी. अनुराधा बड़े व्यापारियों के अपहरण का प्लान बना कर उन से फिरौती वसूलती थी. आरोप है कि इसी साल 9 अप्रैल, 2015 को अनुराधा ने सीकर के व्यापारी विनोद सर्राफ का अपहरण करवाया था. 22 अप्रैल, 2015 को पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

कंप्यूटर ग्रैजुएट अनुराधा उर्फ अनुराग महला सीकर में कमोडिटी मार्केट का काम करती थी. उस की पढ़ाई दिल्ली और पिलानी में हुई थी. कहा जाता है कि कमोडिटी मार्केट में घाटा होने पर उस ने अपराध की दुनिया में कदम रखा. पहले वह जेल में राजू ठेहठ से मिली, लेकिन राजू ने अनुराधा को अपनी गैंग में शामिल करने से मना कर दिया. इस के बाद वह जेल में ही आनंदपाल से मिली और बताया कि वह उस के गैंग में काम करना चाहती है. आनंदपाल उसे इनकार नहीं कर सका. आनंदपाल और बलबीर बानूड़ा ने सब से पहले राजू ठेहठ के करीबी गोपाल फोगावट की हत्या की थी. दुश्मनी का खेल ऐसा चला कि पिछले 10 सालों में शेखावटी में 15 से ज्यादा हत्याएं हुईं. जेल तक में दोनों गैंगों के बीच गोलियां चलीं.

आनंदपाल की फरारी के बाद एक बार फिर से गैंगवार की आशंका पैदा हो गई है. पुलिस एड़ीचोटी  का जोर लगा रही है, मगर आनंदपाल उस की गिरफ्त से कोसों दूर है. आनंदपाल को मौकापरस्त राजनेताओं ने बंदूक उठाने पर मजबूर कर दिया, नहीं तो आज वह ऐसा खूंखार अपराधी नहीं होता. वह भी अपने बीवीबच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहा होता. आनंदपाल सिंह और उस के साथियों श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड की फरारी के बाद पुलिस ने थाना परवतसर में उन पर एक केस और दर्ज कर लिया है. पुलिस ने शुरुआत में आनंदपाल सिंह का सुराग देने वाले को 1 लाख रुपए और श्रीबल्लभ शर्मा व सुभाष मुंड का सुराग देने वाले को 50-50 हजार रुपए इनाम देने की घोषणा के पैंफ्लेट चिपका दिए हैं.

इस के बावजूद अब तक राजस्थान पुलिस को आनंदपाल और उस के साथियों के बारे में कोई सुराग नहीं मिला है. राजस्थान के पुलिस महानिदेशक ने आनंदपाल के ऊपर घोषित इनाम की धनराशि एक लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दी है. अब देखना यह है कि यह घोषणा कोई रंग लाती है या नहीं? बहरहाल, उस के निशाने पर रहने वाले राजनेताओं व अन्य विरोधियों की नींद उड़ी हुई है. लोगों में अब यही चर्चा है कि पता नहीं आनंदपाल का अगला निशाना कौन होगा? Hindi Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Mumbai News: मुन्ना भाई के चेले

Mumbai News: मुंबई में बैग छीनने और जेब काटने की ट्रेनिंग देने वाले मुन्नाभाई ने अपने चेलों के साथ जयपुर के जौहरी बाजार से 2 बार में लाखों का माल लूट तो लिया लेकिन उस ने ऐसी कौन सी गलती की कि पकड़ा गया. नवंबर का आधा महीना बीत चुका था. गुलाबी सर्दी ने दस्तक दे दी थी. देवउठनी एकादशी के बाद सावे शुरू हो चुके थे, इसलिए राजस्थान के गुलाबी नगर जयपुर की बाजारों में काफी भीड़भाड़ थी. यहां का जौहरी बाजार दुनिया भर में मशहूर है. इस बाजार को हीरेजवाहरातों और रत्नों की मंडी भी कहा जाता है. यहां रोजाना करोड़ों रुपए का कारोबार होता है.

राजाओंमहाराजाओं के जमाने में बसे जौहरी बाजार में छोटीछोटी तमाम गलियां हैं, अलगअलग नामों से रास्ते हैं, जिन में सैकड़ों दुकानें हैं. जवाहरात व्यवसाय से हजारों लोग जुड़े हैं. खरड़ बेचने वालों से ले कर उन्हें तराशने और बेचने वाले हजारों लोगों की रोजीरोटी जवाहरातों की इस मंडी से जुड़ी है. यहां से पूरी दुनिया में हीरेजवाहरात निर्यात होते हैं, इसलिए तमाम लोग यहां दलाली भी करते हैं. राकेश पारिख भी जवाहरातों की दलाली करते थे. जयपुर की तख्तेशाही रोड पर स्थित कानोता बाग में देवी पथ पर रहने वाले राकेश पारिख छोटे से बैग में लाखों रुपए के हीरेजवाहरात ले कर घूमा करते थे. 15 नवंबर की शाम 7 बजे वह बदहवास हालत में थाना माणक चौक पहुंचे.

वह काफी घबराए हुए थे. गेट पर राइफल ले कर खड़े संतरी से उन्होंने थानाप्रभारी के बारे में पूछा तो संतरी ने एक कमरे की ओर इशारा कर के कहा, ‘‘साहब अंदर बैठे हैं, चले जाइए.’’

राकेश तेज कदमों से चलते हुए सीधे थानाप्रभारी के कमरे में पहुंचे. थानाप्रभारी राम सिंह अपने 2-3 मातहतों के साथ किसी मसले पर चर्चा कर रहे थे. अनजान आदमी को कमरे में देख कर उन्होंने पूछा, ‘‘कहिए, क्या काम है?’’

घबराए राकेश ने कहा, ‘‘साहब, मैं लुट गया. मुझे इंचार्ज साहब से बात करनी है.’’

थानाप्रभारी राम सिंह ने राकेश पारिख को कुर्सी पर बैठने का इशारा करते हुए कहा, ‘‘मैं ही थानाप्रभारी हूं, आप आराम से बैठ कर पूरी बात बताइए. आप के साथ क्या हुआ?’’

थानाप्रभारी के कहने पर राकेश पारिख कुर्सी पर बैठ गए. लेकिन उन के मुंह से आवाज नहीं निकल रही थी. उन की जुबान सूख गई थी. उन की हालत देख कर थानाप्रभारी ने उन्हें पानी पिलवाया तो उन्होंने कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम राकेश पारिख है. मैं जवाहरातों की दलाली करता हूं. आज बाजार में लुटेरों ने मुझे लूट लिया.’’

राकेश को सांत्वना देते हुए थानाप्रभारी ने कहा, ‘‘आप के साथ क्या और कैसे हुआ, विस्तार से बताइए? मैं यकीन दिलाता हूं कि पुलिस आप की हरसंभव मदद करेगी.’’

थानाप्रभारी के सांत्वना देने पर राकेश के अंदर थोड़ा साहस आया. उन्होंने कहा, ‘‘शाम साढ़े पांच बजे के करीब मैं मोती सिंह भौमियो के रास्ते बैग ले कर एक व्यापारी के पास जा रहा था. बैग में कीमती हीरेजवाहरात और नकद रुपए थे. चंद्रमहल कौंप्लैक्स के बाहर 7-8 लोगों ने मुझे घेर लिया. मैं कुछ समझ पाता, तभी किसी ने पीछे से मेरे हाथ से बैग छीन लिया. उन लोगों ने मुझे इस तरह गुमराह कर दिया कि मैं कुछ नहीं कर सका. जब वे लोग निकल गए तो मैं चिल्लाया ‘पकड़ो-पकड़ो’, लेकिन तब तक वे सभी अपना काम कर के निकल चुके थे.’’

इतना कहतेकहते राकेश रुआंसे हो गए. उन्होंने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘उन लोगों ने मुझे बरबाद कर दिया साहब.’’

ध्यानपूर्वक राकेश पारिख की बातें सुन रहे थानाप्रभारी ने पूछा, ‘‘आप बरबाद कैसे हो गए?’’

‘‘साहब, मेरे उस बैग में 50 लाख रुपए के हीरेजवाहरात और 20 लाख रुपए नकद थे.’’ राकेश ने सिर पकड़ कर कहा.

राकेश पारिख की बात सुन कर थानाप्रभारी राम सिंह सन्न रह गए. जौहरी बाजार में दिनदहाड़े 70 लाख रुपए की इस तरह की लूट होना हैरानी की बात थी. दिन भर जगहजगह पुलिस की गश्त होने की वजह से जौहरी बाजार में आमतौर पर इस तरह की वारदातें नहीं होतीं. इसलिए थानाप्रभारी सहित वहां मौजूद अन्य पुलिसकर्मियों को राकेश पारिख की बात पर एकबारगी विश्वास नहीं हुआ. लेकिन एकदम से अविश्वास भी नहीं किया जा सकता था. थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों एडीशनल डीसीपी (उत्तर) ज्ञानचंद यादव एवं माणक चौक सर्किल के एसीपी आलोक शर्मा को घटना की सूचना देने के साथ इस घटना की असलियत का पता लगाने के लिए सबइंसपेक्टर राजेश कुमार और तेजतर्रार हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह को राकेश पारिख के साथ घटनास्थल पर भेज दिया.

सबइंसपेक्टर राजेश कुमार ने राकेश पारिख के साथ घटनास्थल पर पहुंच कर चंद्रमहल कौंप्लैक्स के आसपास के व्यापारियों से पूछताछ की तो वहां इस तरह की कोई लूट होने की किसी ने पुष्टि नहीं की. हां राकेश पारिख की ‘पकड़ो-पकड़ो’ की आवाज सुनने की बातें 2-4 व्यापारियों ने जरूर स्वीकार की. इस के बाद सबइंसपेक्टर राजेश कुमार और हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह ने थाने वापस आ कर थानाप्रभारी राम सिंह को सारी बातें बताईं. सबइंसपेक्टर की बातें सुन कर थानाप्रभारी के सामने पसोपेश की स्थिति पैदा हो गई. राकेश पारिख 70 लाख रुपए की लूट की बात कह रहे थे. जबकि घटनास्थल पर घटना की पुष्टि नहीं हो रही थी. उन्होंने मामले की तह तक पहुंचने के लिए राकेश पारिख से विस्तार से सारी बातें बताने को कहा.

राकेश पारिख ने उस दिन की अपनी दिनचर्या के बारे में बताते हुए कहा, ‘‘साहब, घर से भोजन करने के बाद मैं स्कूटर से पहले गणेशजी के मंदिर गया. इस के बाद मोतीडूंगरी के जैन मंदिर दर्शन कर के अन्य काम करता हुआ दोपहर करीब 3 बजे पीतलिया का चौक पहुंचा. वहां हीरावतजी से 6 लाख रुपए लिए. इस के बाद शाम करीब साढ़े 4 बजे पैदल ही नेशनल हैंडलूम के सामने से होते हुए मोती सिंह भौमियों का रास्ता पहुंचा.

‘‘वहां से रत्ना सागर होते हुए राजीव सौगानी के औफिस गया. निखिलजी को एक दिन पहले दिए हीरे के 10 सेट उन से वापस लिए. उन के यहां चाय पी और करीब आधा घंटे तक गपशप करने के बाद दूसरे व्यापारी के पास जा रहा था कि तभी चंद्रमहल के पास यह घटना घट गई.’’

राकेश ने थोड़ा रुक कर आगे कहा, ‘‘लुटेरे मेरा जो बैग छीन कर ले गए हैं, वह हरे रंग का था. उस बैग में हीरे के 10 सेट, कुंदन के 3 पेंडेंट सेट, 20 लाख रुपए नकद के अलावा चैकबुक, पिता गंगाराम पारिख के नाम का यूटीआई का एक चैक और मेरे परिचय पत्र की फोटोकौपी आदि रखी थी.’’

राकेश पारिख से मिली जानकारी के आधार पर थानाप्रभारी राम सिंह ने हीरावतजी और निखिलजी को फोन कर के इस बात की पुष्टि की कि उन्होंने राकेश को 6 लाख रुपए नकद एवं हीरे के 10 सेट दिए थे या नहीं? दोनों से राकेश पारिख के बयान की पुष्टि होने पर थानाप्रभारी को विश्वास हो गया कि राकेश सच बोल रहे हैं. थानाप्रभारी राम सिंह गंभीर हो गए और तुरंत एक्शन लेते हुए जयपुर से बाहर जाने वाले रास्तों पर नाकेबंदी का आदेश दे दिया. इसी के साथ अलगअलग पुलिस टीमें गठित कर रेलवे स्टेशन. बसस्टैंडों के अलावा होटलों में पता लगाने के लिए भेज दिया. राकेश पारिख की रिपेर्ट थाना माणक चौक में अपराध संख्या 404/2014 पर भादंवि की धारा 392 के तहत दर्ज कर ली गई थी.

शुरुआती जांच से तय हो गया था कि राकेश पारिख के साथ हुई लूट की घटना झूठी नहीं थी. थानाप्रभारी ने उच्चाधिकारियों के निर्देशन में अलगअलग पुलिस टीमें गठित कर उन्हें अलगअलग जिम्मेदारियां सौंप दी थीं. जांच दल में सबइंसपेक्टर राजेश कुमार, एएसआई कृष्ण कुमार, हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह, कांस्टेबल विनीत कुमार, महावीर सिंह, संजय डांगी व रामनिवास को शामिल किया गया था. पुलिस टीमों ने घटनास्थल के आसपास की सीसीटीवी फुटेज व मोबाइल फोनों की लोकेशन के अलावा बड़े शहरों में इस तरह की लूट को अंजाम देने वाले गिरोहों के बारे में जानकारियां जुटाईं. पुलिस इस मामले की जांच में जुटी ही थी कि उसी बीच 15 जनवरी, 2015 को वैसी ही एक और घटना घट गई.

जयपुर के थाना कानोता के मीणा पालड़ी के रहने वाले अशोक पटवा ने थाना माणक चौक में रिपोर्ट दर्ज कराई कि पटवागिरी का काम करने वाले ह ज्वैलरी के शोरूम से माल ले कर उन की धागा पुआई कर के लौटा देते थे. 15 जनवरी को उन्होंने एमआई रोड स्थित चमेली मार्केट से राहुल जैन से 50 चांदी के पेंडेंट पुआई हेतु लिए. शाम करीब सवा 5 बजे वह राहुल की दुकान से माल ले कर पैदल ही चले जा रहे थे. सवा छह बजे के करीब वह जौहरी बाजार स्थित बौंबे बूट हाउस के पास बरामदे में पहुंचे तो पीछे से 7-8 लोगों ने उन्हें घेर लिया और उन के हाथ से बैग छीन कर भाग गए. उन्होंने शोर मचाया, लेकिन तब तक लुटेरे भाग चुके थे.

जौहरी बाजार में 2 महीने में एक जैसी लूट की 2 घटनाएं घट जाने से पुलिस अधिकारी चिंतित हो उठे. हीराजवाहरात व्यवसायियों में भी असुरक्षा की बात उठने लगी. क्योंकि लुटेरों ने भीड़ाभाड़ वाले स्थानों पर शाम के समय जिस तरह से लूट की थी, वह जिगरा वालों का ही काम हो सकता था. दोनों वारदातों में ज्वैलरी व जवाहरात के व्यवसाय से जुड़े लोगों को निशाना बनाया गया था और दोनों ही बार लुटेरों की संख्या 7-8 होने की बात सामने आई थी, जिन्होंने व्यापारी को घेर कर बैग छीन लिया था. इस घटना के बाद पुलिस ने नए सिरे से रणनीति बनाई. दोनों मामलों की नए सिरे से जांच शुरू हुई. राकेश पारिख से लूट के मामले में सीसीटीवी फुटेज एक बार फिर से खंगाली गई. जांच टीम में शामिल हैडकांस्टेबल हरिओम सिंह को एक फुटेज में राकेश पारिख के आसपास 4-5 युवकों का घेरा नजर आया. इन में एक युवक मोबाइल फोन पर बातें करता दिखाई दिया.

इस से हरिओम सिंह को एक क्लू मिल गया. उन्होंने अपने संपर्क सूत्रों से सूचनाएं जुटा कर जांच आगे बढ़ाई. हरिओम सिंह ने उच्चाधिकारियों को सूचनाएं दे कर उन के निर्देशन में अपराध और अपराधियों की कडि़यां जोड़ीं. इन कडि़यों के आधार पर थाना माणक चौक पुलिस ने मुंबई में डेरा डाल दिया. जयपुर पुलिस की मेहनत रंग लाई और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की अंधी गलियों में चलने वाले लूट के एक ट्रेनिंग स्कूल का खुलासा हो गया. इसी के साथ मुंबई के ऐसे लुटेरे गिरोह का पता चला, जिस की कई राज्यों की पुलिस को तलाश थी. मुंबई में बदमाशों को लूट की ट्रेनिंग देने वाले कुख्यात सरगना मुन्नाभाई को भी गिरफ्तार करने में जयपुर पुलिस को सफलता मिली. मुन्नाभाई के अलावा 6 अन्य कुख्यात अपराधी भी पकड़े गए. ये अपराधी लूट की रकम को नशा और अय्याशी में उड़ाते थे.

रोजाना डांस बार में जाना और रुपए लुटाना इन के शौक थे. इन अपराधियों की बार डांसरों के अलावा कई अन्य लड़कियों से दोस्ती थी. उन्हीं लड़कियों पर ये लूट का पैसा खर्च करते थे. एकएक बदमाश का रोजाना का खर्च 10 से 15 हजार रुपए तक था. मुन्नाभाई के ये शागिर्द आपस में एकदूसरे के बारे में कुछ नहीं जानते थे. उन्हें एकदूसरे का न तो असली नाम पता था और न ही पता ठिकाना. इस के बावजूद ये लोग गिरोह के रूप में वारदात करते थे. लूट की वारदात ये कोडवर्ड में करते थे. इन का कोडवर्ड होता था, जादू की मशीन. बैग छीनने को ये लोग कोडवर्ड में जादू करना कहते थे. शिकार को बाबू एवं धुर कहते थे. ये सिर्फ महानगरों में ही वारदातें करते थे. ये जिस शहर में वारदात करते थे, उस के बजाय आसपास के शहर में ठहरते थे. वहीं से वारदात करने वाले शहर में बस, ट्रेन या टैक्सी से जाते थे.

पहले ये ज्वैलरी, कीमती सामान और नकदी ले जाने वाले लोगों की रैकी करते थे. शिकार मिल जाने पर ये गिरोह बना कर उसे घेर लेते थे. इसी बीच एक बदमाश बैग छीन कर भाग जाता था तो उस के बाद बाकी के साथी पीडि़त को अपनी बातों में लगा लेते थे. जब उन का साथी निकल जाता था तो उसे तलाशने के बहाने वे भी रफूचक्कर हो जाते थे. काम हो जाने के बाद वे उस शहर को छोड़ कर सीधे मुंबई के लिए रवाना हो जाते थे. इस गिरोह की मुंबई के अलावा दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों की पुलिस को तलाश थी. इस गिरोह में मुंबई के छोटेबड़े सैकड़ों अपराधी हैं.

जयपुर पुलिस ने हीरेजवाहरातों की लूट के मामले में मुंबई के कापड़ बाजार माहिम के रहने वाले मुन्नाभाई उर्फ यूसुफ खान उर्फ मुन्ना सरकार के अलावा मुंबई में नाला सोपारा, ठाणे के रहने वाले नुमान अजीम शेख उर्फ इब्बू उर्फ बाबू उर्फ गब्बू, मुंबई में सुंदरनगर कालोनी शाही दर्शन बिल्डिंग अंधेरी ईस्ट के रहने वाले साजिद रियासत खान उर्फ इमरान उर्फ चिकना. मुंबई की बिस्मिल्ला चाल कमेटी साइन धारावी डिपो के रहने वाले राजू बाबू तांबे उर्फ रज्जाक, मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और आजकल मुंबई के माहिम दरगाह रेती बंदर के रहने वाले मोहम्मद नासिर, मूलरूप से कोलकाता और आजकल मुंबई ईस्ट में अंधेरी बस स्टौप मां महाकाली गुफा के पास रहने वाले सरफराज आलम उर्फ मोहन, मुंबई में जोगेश्वरी ईस्ट अंधेरी के रहने वाले अलताफ खान उर्फ सुजात को गिरफ्तार किया था.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में पता चला कि मुन्नाभाई मुंबई में लूट गिरोह से जुड़े बदमाशों को लूट के लिए हत्थी मार कर बैग छीनने और बचने के तरीके बताने की ट्रेनिंग देता था. वह अपने स्कूल में टे्रनिंग देने के साथ संगठित गिरोह भी चलाता था. इस के अलावा वह अन्य गिरोह के बदमाशों के साथ भी वारदात करता था. वह वारदात के समय अन्य बदमाशों के साथ ठहरता तो था, लेकिन वारदात में खुद शामिल नहीं होता.

59 वर्षीय मुन्नाभाई ने देश के विभिन्न शहरों में सैकड़ों वारदातें की थीं. वह 14 नवंबर को गिरोह के संचालक इब्बू उर्फ गब्बू और साजिद रियासत उर्फ चिकना समेत करीब 10 बदमाशों के साथ जयपुर आया था. ये सभी जयपुर में सिंधी कैंप, विधायकपुरी व हसनपुरा इलाके के 4 अलगअलग होटलों में ठहरे थे. होटलों में ठहरने के लिए मुन्नाभाई ने खुद का पहचान पत्र दिया था. इस से पहले 13 नवंबर को ये अजमेर गए थे, जहां एक रात रुक कर दरगाह में जियारत की थी. उस के बाद अगले दिन जयपुर आए थे.

नुमान अजीम शेख उर्फ इब्बू उर्फ बाबू उर्फ गब्बू का पिता अजीम शेख फिल्म यूनिट में स्पौट ब्वौय का काम करता था. इब्बू दसवीं फेल है. उस ने मुंबई के नेशनल उर्दू हाईस्कूल जोगेश्वरी से 2008 में पढ़ाई छोड़ दी थी. इस के बाद उस ने एयर कंडीशनर रिपेयरिंग का डिप्लोमा किया था, लेकिन मेहनत का काम उस से हो नहीं सका और वह अपराध की दुनिया में उतर गया. इब्बू के खिलाफ मुंबई के विभिन्न थानों में कई मामले दर्ज हैं. वह कई बार जेल जा चुका है. वह चरस, गांजा, स्मैक, कोकीन से ले कर तमाम नशे करता था. सन् 2010 में नशे के अपने साथियों से इब्बू को पता चला कि मुन्नाभाई मुंबई का सब से बड़ा बैग लिफ्टर है और अपना गिरोह चलाता है. इस के बाद वह माहिम की दरगाह पर मुन्नाभाई से मिला. इस के बाद मुन्नाभाई के साथ वारदात करने लगा.

सन 2010 में इब्बू ने अपने गिरोह के साथ दिल्ली के चांदनी चौक से करोड़ों रुपए का माल लूटा था. मुन्नाभाई को इब्बू चाचू कहता है, जबकि मुन्नाभाई की बीवी जरीना उसे भाई कहती थी. पत्नी नीलोफर इब्बू पर जान छिड़कती थी, लेकिन इब्बू के मोबाइल में कई लड़कियों के नंबर मिले हैं. साजिद रियासत खान उर्फ इमरान उर्फ चिकना दसवीं तक पढ़ा है. पिता रियासत खान कारपेंटरी का काम करते थे. साजिद ने शुरू में आइस क्यूब फैक्ट्री में काम किया, उस के बाद कैटरिंग, बैंक की रिकवरी, मोबाइल की दुकान से ले कर ज्वैलरी की दुकान तक पर काम किया. सन 2008 में वह अपराध के दलदल में आ धंसा.

उस के खिलाफ मुंबई के कई थानों में लूट के मुकदमे दर्ज हैं. 4 बार पकड़ा जा चुका है. कई बार जेल जा चुका है. उस की मुन्नाभाई से जब से जानपहचान हुई है, तब से गिरफ्तार होने पर वही उस की और उस के साथियों की जमानत कराता था. राजू बाबू तांबे उर्फ रज्जाक 18 साल से जेब काटने व बैग छीनने का काम कर रहा था. अपराध करतेकरते वह इतना शाहिर हो चुका था कि उसे अपनी छठी इंद्रिय से पता चल जाता था कि किस के बैग में कितना माल हो सकता है. बैग में रकम है या कोई कीमती चीज, वह बैग देख कर ही जान लेता था.

इन्हीं बदमाशों ने 15 नवंबर को जयपुर के जौहरी बाजार में राकेश पारिख का हीरे जवाहरातों व नकदी से भरा बैग लूटा था. इस के बाद ये तुरंत अजमेर चले गए थे और वहां से मुंबई. वहीं उन्होंने माल का बंटवारा किया. जनवरी में ये फिर जयपुर आए और इस बार अशोक पटवा को अपना शिकार बनाया. इब्बू और चिकना इतने शातिर हैं कि इन्होंने अपने गुरु मुन्नाभाई को भी चूना लगा दिया था. राकेश पारिख का बैग लूटने के बाद दोनों ने औटो से होटल जाने तक अपने साथियों की नजर बचा कर बैग से डायमंड के 6 नैकलेस एवं एक बगड़ी निकाल ली थी. इन में एक नैकलेस इब्बू ने अपने पास रख लिया था और एक नैकलेस चिकना को दे दिया था. बाकी के 4 नैकलेस और एक बगड़ी मुंबई पहुंच कर मकसूद उर्फ इमाम की मार्फत एक मारवाड़ी को बेच दिए थे.

नैकलेस और बगड़ी बेच कर मिले साढ़े 6 लाख रुपए दोनों ने आपस में बांट लिए थे. दूसरी ओर मुंबई पहुंच कर मुन्नाभाई ने राकेश पारिख के बैग से मिले माल का बंटवारा किया. उस में से 12 लोगों को उन के काम के हिसाब से रुपयों का बंटवारा किया गया. जयपुर पुलिस ने भले ही इस गिरोह के सरगना समेत 7 सदस्यों को पकड़ लिया है, लेकिन जब तक मुन्नाभाई जैसे लोग अपराधों की ट्रेनिंग देते रहेंगे, तब तक अपराध की विषबेल फलतीफूलती रहेगी. Mumbai News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Rajasthan Crime News : दगाबाज प्रेमी और 2 हत्याएं

Rajasthan Crime News : शादीशुदा मोनू का अपनी जवानी पर कंट्रोल नहीं था. फैक्ट्री में साथ काम करने वाली विवाहिता आशा पर वह इस कदर लट्टू हो गया था कि उसे हासिल करने के लिए उस ने परिवार, समाज और देश के कायदेकानून तक ताक पर रख दिए. फिर जो हुआ, वह किसी अनहोनी से कम नहीं था…

जयपुर के सांगानेर सदर इलाके में स्थित कई फैक्ट्रियों में कुरती बनाने की भी एक फैक्ट्री थी. वहीं मोनू पंडित और आशा मीणा काम करते थे. उस का पति राजाराम मीणा भी उसी फैक्ट्री में काम करता था. मोनू और आशा हमउम्र थे. विवाहित थे. जब कभी फुरसत में होते, तब इधरउधर की बातें करते थे. उन के बीच होने वाली कुछ मिनटों की बातों में उन्हें अच्छा सुकून मिलता था. कई बार घरेलू समस्याओं से बेखबर एकदूसरे की तारीफ भी कर दिया करते थे.

आशा की तारीफ करते हुए जब मोनू कह देता कि तुम आज बहुत सुंदर दिख रही हो, तब वह शरमा जाती थी. मुसकराती हुई उस के कसरती बदन को बनाए रखने के लिए खानेपीने पर ध्यान देने की सलाह दे डालती थी. एक दिन जब आशा ने बातोंबातों में अपने 4 साल के बच्चे के बारे में जिक्र किया, तब मोनू चौंंक गया. उस ने तुरंत टिप्पणी कर दी, ”तुम्हें देख कर कोई नहीं कहेगा कि तुम 4 साल के बच्चे की मां हो! आखिर तुम्हारी इस खूबसूरती का राज क्या है…जरा मुझे भी बताओ!’’

इस तरह की मीठीमीठी बातों का असर आशा के मन में गहराई से होने लगा था, जबकि मोनू उस के रूपरंग और अदाओं पर मर मिटा था. वह उस की खूबसूरती, चालढाल और बोलचाल की शैली को ले कर जबतब छेडऩे भी लगा था. सच तो यह था कि मोनू का उस के साथ खुल कर बात करना आशा को भी अच्छा लगने लगा था. वे फैक्ट्री में लंच साथसाथ करने लगे थे, जबकि अधिकतर लड़कियां अपने साथ काम करने वाली महिलाओं के साथ ही लंच करती थीं. मोनू उसे अपनी तरफ से कुछ बाहरी खानेपीने की चीजें, आइसक्रीम, चौकलेट, बिसकुट, चाय वगैरह भी देने लगा था.

आशा और मोनू के बीच नजदीकियां बढ़ चुकी थीं. मोनू की मीठी बातें और उस का खयाल रखने को ले कर आशा को बहुत कुछ समझने में देर नहीं लगी कि वह उस का दीवाना बन चुका है… और उस की चाहत क्या है? कई बार उस ने उस की निगाहों को उस की देह पर टिके होने का भी एहसास किया. एक दिन मोनू ने जब अपने प्यार का इजहार किया, तब वह झेंप गई. उस ने कहा कि वह एक बेटे की मां है. तब मोनू भी बोला, ”तो क्या हुआ? मैं भी एक बेटे का पिता हूं. हमारा दिल तुम पर आ गया है…तो इस में बुराई क्या है?’’

इस के बाद धीरेधीरे आशा और मोनू एकदूसरे के करीब आते चले गए. मोनू ने उसे एक नया एंड्रायड फोन गिफ्ट दिया तो आशा बहुत खुश हुई. आशा अपने कुंवारेपन को याद करती हुई मोनू की ओर एक कदम आगे बढ़ाती तो मोनू उस की ओर 2 कदम आगे बढ़ा देता था. कई महीने तक उन के बीच यह सब चलता रहा. एक रोज इस की भनक आशा के पति राजाराम मीणा को हो गई. पत्नी के प्रेम संबंधों और उसे प्रेमी द्वारा फोन गिफ्ट में देने की जानकारी एक परिचित ने उसे दी. जबकि आशा ने पति को बताया था कि उस के साथ काम करने वाली एक लड़की ने किस्त पर मोबाइल दिलवाया है.

आशा ने अपने फोन में मोनू का नंबर पंडित के नाम से सेव कर रखा था. मोनू का पूरा नाम मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित था. उस नंबर पर आशा के दिन में कई बार कौल करने के रिकौर्ड दर्ज थे. इस पर राजाराम चुप नहीं बैठा. उस ने फोन में सबूत दिखाते हुए नाराजगी दिखाई. साफ लहजे में समझाया कि उस का किसी गैरमर्द के साथ प्रेम संबंध रखना इज्जत नीलाम करने जैसा है. इस का असर उस के बच्चों और परिवार पर होगा. इसलिए यह सब छोड़ कर अपनी नौकरी और परिवार पर ध्यान दे. इस का असर आशा पर हुआ. उस ने पति से माफी मांगी. गलती सुधारने का मौका मांगा. कसम खाई कि वह अब मोनू से बात तक नहीं करेगी.

राजाराम ने अगला कदम उठाते हुए आशा की फैक्ट्री से नौकरी छुड़वा दी. उन दिनों वह भी उसी फैक्ट्री में काम करता था. उस ने भी वहां से नौकरी छोड़ कर आदित्य सोलर कंपनी में नौकरी जौइन कर ली. आशा का मोबाइल भी उस ने अपने कब्जे में ले लिया. इस की जानकारी जब मोनू को हुई, तब वह आगबबूला हो गया. वह आशा से बात करने के लिए तड़पने लगा. उस ने राजाराम को आशा के प्यार का रोड़ा मान लिया. उसे राजाराम पर बहुत गुस्सा आ रहा था, लेकिन वह उस के खिलाफ कुछ करने में विवश था.

अचानक उसे आशाराम मीणा उर्फ गोलू का खयाल आया. वह आशा का देवर था. गोलू को अपनी भाभी आशा और मोनू के बीच प्रेम संबंध के बारे में जानकारी हो चुकी थी. यही कारण था कि मोनू ने जब आशा से बात करवाने को कहा, तब उस ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. गुस्से में मोनू ने गोलू को धमकी दी. कहा कि इस का अंजाम पूरे परिवार को भुगतना होगा, किंतु मोनू का यह प्रयास भी विफल हो गया. फिर तो वह और भी तड़प उठा. उस के बाद वह 26 वर्षीय राजाराम मीणा को ही रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा. दूसरी तरफ जब से मोनू ने गोलू को धमकी दी थी, तब से आशाराम और राजाराम दोनों भाई सतर्क हो गए थे. खासकर आशा के घर से निकलने पर परिवार का कोई न कोई सदस्य उस के साथ हमेशा रहने लगा था.

24 वर्षीय आशा मीणा अपने पति, 4 साल के बेटे, भाई आशाराम मीणा और बहन मीनाक्षी के साथ जोतवाड़ा के शांति विहार में रहती थी. वैसे वे मूलरूप से जयपुर जिले के चाकसू तहसील में कोटखावदा के रहने वाले थे. आशा राजाराम और गोलू जिस कुरती फैक्ट्री में काम करते थे, वहीं यूपी के आगरा जिले के बंडपुरा गांव का रहने वाला मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित भी काम करता था. सांगानेर में मोनू और आशा के घर के बीच की दूरी करीब आधे किलोमीटर की थी. मोनू किराए के मकान में अपनी पत्नी और 3 बच्चों के साथ रहता था. वह कई साल पहले आगरा से आ कर जयपुर काम करने लगा था.

मोनू के दिलोदिमाग पर आशा छाई हुई थी. वह रातदिन उस की याद में तड़पता रहता था. किंतु जनवरी, 2025 के पहले सप्ताह में जब से आशा का मोबाइल फोन पति ने अपने कब्जे में लिया था, तब से मोनू उस से बात करने तक को तरस गया था. आशा की जुदाई और ऊपर से उस पर लगी पहरेदारी से उस की स्थिति पागलों जैसी हो गई थी. उस की रातों की नींद गायब हो चुकी थी. दिन में बावलों की तरह घूमता रहता था. आशा पर भले ही कई पाबंदियां लगी थीं, लेकिन कई बार उसे अकेले में घर से निकलना ही होता था. इसी सिलसिले में 22 जनवरी, 2025 को वह अपने बेटे को स्कूल से लेने के लिए घर से अकेली निकली जरूर थी, लेकिन गोलू काफी पीछे से उस पर नजर रखे हुए था. अचानक मोनू की नजर आशा पर पड़ी. आशा से बात करने की चाहत में वह उस के पीछेपीछे हो लिया.

किंतु जैसे ही उस की निगाह गोलू पर पड़ी वह सहम गया, तुरंत खुद को संभालते हुए गोलू को धमका कर अपनी राह चल दिया. इस घटना की आशा को भनक तक नहीं लगी, लेकिन जब वह बच्चे को ले कर घर आई, तब गोलू ने उसे और पति को मिली धमकी के बारे में बताते हुए और अधिक सतर्क रहने की हिदायत दी. मोनू अब इस उधेड़बुन में रहने लगा था कि राजाराम को रास्ते से कैसे हटाया जाए, ताकि वह आशा को हासिल कर सके. अंतिम निर्णय लिया, क्यों न उसे गोली मार दी जाए? इसी के साथ अगला सवाल उठा कि गोली दागने का इंतजाम कैसे होगा? उस ने इस का भी हल निकाल लिया.

दिमाग में विचार आया, ‘क्यों न पिस्तौल ही खरीद ली जाए…देसी कट्टा ही सही!’ फिर क्या था, इस बारे में प्रयास तेज कर दिया. पता चला कि धौलपुर में उसे पिस्तौल मिल सकती है. अगले दिन 23 जनवरी, 2025 को ही मोनू धौलपुर के बसेड़ी गांव गया और 50 हजार रुपए में एक देसी पिस्तौल और कारतूस खरीद लाया. तब तक शाम हो चुकी थी. उस ने फैक्ट्री में साथ काम करने वाले अपने दोस्त प्रदीप को वीडियो कौल के जरिए पिस्तौल दिखाई. उस से कहा, ”आशा मुझ से बात नहीं करेगी, तब मैं उस के पति राजाराम मीणा को इसी पिस्तौल से मार दूंगा.’’

प्रदीप को वीडियो कौल से पिस्तौल दिखाने का मकसद उस की धमकी को राजाराम तक पहुंचाने का था. हालांकि प्रदीप ने इसे गंभीरता से नहीं लिया था. 24 जनवरी, 2025 की सुबहसुबह मोनू ने राजाराम के मोबाइल पर कई कौल कीं, लेकिन उस का मोबाइल साइलेंट मोड पर होने के कारण कौल का पता नहीं चला. उस के बाद मोनू ने गोलू को कौल कर उसे राजाराम को कई कौल करने की बात बताई. उस ने मोनू को कौलबैक की और बताया कि वह घर पर है. थोड़ी देर बाद उस का भाई गोलू ड्यूटी पर चला गया.

उसी रोज 24 जनवरी, 2025 को मोनू पिस्तौल ले कर दोपहर करीब साढ़े 12 बजे राजाराम के घर के बाहर जा पहुंचा. काफी समय तक घर के बाहर मंडराता रहा. कभी कमर मेें खोंस कर रखे पिस्तौल को टटोलने लगता तो कभी मोबाइल पर नंबर सरकाने लगता. उस की स्थिति एक विक्षिप्त जैसी थी. उस ने राजाराम मीणा को कौल की. उस की कौल का जवाब राजाराम ने चिढ़ते हुए दिया, ”बोलो, क्या बात है? क्यों सुबह से मुझे कौल कर के तंग कर रहे हो?’’

जवाब में मोनू बोला, ”घर आओ, तुम से जरूरी बात करनी है. मैं तुम्हारे साथ दुश्मनी रख कर एक ही मोहल्ले में भला कैसे रह पाऊंगा?’’

राजाराम को भी न जाने क्या सूझी, वह मोनू के कहने पर घर आ गया. पीछे से ताक लगाए मोनू भी राजाराम के घर में घुस आया. उस वक्त घर पर आशा और उस की विवाहित बहन मीनाक्षी मौजूद थी. वह अपने मायके आई हुई थी. मोनू ने उस से कहा कि बाहर उस की सहेली बुला रही है. उस के कहे पर मीनाक्षी बाहर चली गई, किंतु वहां सहेली को नहीं पा कर सामने उस के घर ही चली गई. राजाराम मोनू को ले कर घर के पिछले हिस्से में बने कमरे में ले कर चला गया. वहीं आशा भी आ गई. राजाराम के कुछ भी बोलने से पहले मोनू ही कड़े तेवर के साथ बोला, ”राजाराम, तूने आशा को मुझ से बात करने से क्यों मना किया?’’

उस के कड़े रुख को देखते हुए राजाराम नरमी के साथ बोला, ”देख मोनू, तू बालबच्चे वाला है, मैं भी बालबच्चेदार हूं…ऐसे में तू जो चाहता है वह कैसे हो सकता है? समाजपरिवार भी कुछ होता है या नहीं?’’

”मुझे अच्छेबुरे की तुझ से ज्यादा समझ है… प्यारमोहब्बत भी तो कुछ होता है कि नहीं…इस पर दुनियाजहान टिकी हुई है.’’ मोनू ने तर्क दिया.

”लेकिन तुम जो चाहते हो, वह सरासर गलत है…और जब आशा ही तुम से बात नहीं करना चाहती, तब तुम क्यों उस के पीछे पड़े हो?’’ अब राजाराम भी उस की तरह गर्म लहजे में बोला.

आशा ने बीचबचाव करने की कोशिश की, लेकिन कुछ सेकेंड में ही बात बिगड़ती चली गई. उन तीनों के बीच गरमागरम बहस छिड़ गई. यहां तक कि मोनू और राजाराम एकदूसरे को धमकाने लगे…और उन के बीच हाथापाई तक की नौबत आ गई. आशा बीचबचाव करने लगी. मोनू उसे परे धकेलता हुआ बोला, ”तुम हट जाओ…आज में इसे हमेशा के लिए हटा कर रहूंगा.’’

आशा को जोर का धक्का लगा था, जिस से वह थोड़ी दूर जा कर गिर पड़ी. इस बीच मोनू ने कमर में खोंस कर रखी पिस्तौल राजाराम मीणा की कनपटी पर सटा दी. आशा चीखी, बचाने की गुहार लगाई…किंतु तब तक तो मोनू के सिर पर आक्रामकता का भूत सवार हो चुका था. सेकेंड भर में ही उस ने गोली दाग दी, राजाराम मीणा धड़ाम से वहीं गिर गया. आशा अवाक रह गई!

किंतु जल्द ही वह चीखती हुई मोनू को मारने के लिए उस की तरफ दौड़ पड़ी. मोनू आशा के विरोधी तेवर को देख कर डर गया. उस ने महसूस किया कि आशा को पति की मौत का जबरदस्त सदमा लगा है, इसलिए उस की विरोधी बन चुकी है. उसे पुलिस में पकड़वा सकती है. आशा जैसे ही पास आई, उस ने तुरंत उस की कनपटी पर भी पिस्तौल रख कर गोली दाग दी. आशा भी राजाराम की तरह जमीन पर गिर पड़ी. उस के बाद मोनू फरार हो गया.

इस तरह एक घर में डबल मर्डर की घटना हो गई थी. दोनों रक्तरंजित लाशें जमीन पर पड़ी थीं. जब मीनाक्षी घर आई, तब वह भाई और भाभी की लाश देख कर घबरा गई. उस वक्त राजाराम का बेटा स्कूल में था. मीनाक्षी ने सब से पहले अपने भाई गोलू को इस की सूचना दी. वह भागाभागा घर आया. इस घटना की खबर आग की तरह पूरे मोहल्ले में फैल गई. गोलू पड़ोसियों की मदद से राजाराम और आशा को नारायण अस्पताल ले गया. वहां डौक्टर ने दोनों को मृत घोषित कर दिया.

दोपहर ढाई बजे सदर थाना सांगाने को इस वारदात की सूचना मिल गई. इंसपेक्टर  नंदलाल चौधरी दलबल के साथ अस्पताल पहुंचे. घटना की तहकीकात डौक्टरी जांच के आधार पर की, उस के बाद पुलिस घटनास्थल पर गई. इस बीच दोहरे हत्याकांड में मोनू पंडित का हाथ होने की जानकारी मिली. उस के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया. इस घटना की जानकारी एसएचओ नंदलाल चौधरी ने अपने आला अधिकारियों को भी दी. मौके पर डीसीपी (साउथ) दिगंत आनंद अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों के साथ घटनास्थल पर पहुंचे.

एफएसएल टीम को भी मौके पर बुलाया गया. जांच टीम ने वहां से साक्ष्य एकत्रित किए. कमरे में बिखरे खून के नमूने लिए. वहीं से खाली कारतूस भी मिले. घटना के बारे में मृतकों के परिजनों में आशाराम मीणा उर्फ गोलू और मीनाक्षी से तमाम तरह की जानकारियां जुटाई गईं. गोलू ने साफतौर पर कहा कि मोनू ने उसे राजाराम को मारने की धमकी दी थी. वह आशा से प्रेम करता था, जिस का राजाराम ने विरोध जताया था.

इस दोहरे हत्याकांड में मुख्य आरोपी मोनू उपाध्याय उर्फ मोनू पंडित फरार हो गया था. उस के घर में तलाशी ली गई, लेकिन वह दूसरे शहर के लिए निकल चुका था. उस के फेमिली वालों को न तो किसी तरह के प्रेमप्रसंग की जानकारी थी और न ही इस तरह की घटना को ले कर कभी संदेह हुआ था. एडिशनल डीसीपी ललित शर्मा के नेतृत्व में पुलिस की टीमें हत्यारे का पता लगाने में जुट गई थीं. घटनाक्रम से पहले वही व्यक्ति था, जो आशा और राजाराम से घर पर बातचीत के लिए आया था.

तीनों के बीच क्या बातें हुईं और पूर्व में किस तरह का कैसा विवाद था? इस बारे में मृतक के परिजनों और फैक्ट्री में काम करने वाले कारीगरों से पूछताछ की गई. उस के पकड़े जाने पर ही वारदात का पूरी तरह से खुलासा हो पाएगा. मोनू की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम ने पहले उस के मोबाइल नंबर से लोकेशन का पता लगाई. इसी के साथ पूरे इलाके के सीसीटीवी कैमरों की फुटेज की जांच की गई. एक फुटेज में मोनू आगरा जाने वाली बस में सवार होता हुआ दिख गया. उस आधार पर पुलिस टीम ने दौसा आगरा की तरफ रुख किया. उस का मोबाइल फोन भी सर्विलांस पर था.

उस ने जैसे ही फोन को औन किया, उस की लोकेशन दौसा की मिल गई. उस आधार पर 25 जनवरी, 2025 की रात को उसे दौसा से महुवा जाने के क्रम में उसे गिरफ्तार कर लिया गया. अगले दिन 26 जनवरी को उसे सांगनेर सदर थाने लाया गया. उस से सख्ती से पूछताछ की गई. उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. उस से पुलिस ने दोनों हत्याओं में प्रयुक्त हुई देसी पिस्तौल भी बरामद कर ली. मोनू को उसी रोज कोर्ट में पेश किया गया, वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Rajasthan Crime News

 

 

Rajasthan Crime News : पति की हत्या कर लाश नीले ड्रम में डाली लाश गलाने को डाला नमक

Rajasthan Crime News : एक ऐसी सनसनीखेज घटना सामने आई है, जिस ने हर किसी को हैरान कर रख दिया है.एक पत्नी ने पति की हत्या कर शव छत पर रखे ड्रम छिपा दी. इतना ही नहीं लैश को जल्द गलाने के लिए ड्रम में नमक भी दाल दिया. सूचना के बाद पुलिस मौके पर पहुंची तो शव को देख हैरान रह गई. आखिर मृतक कौन था? पत्नी ने ऐसा क्यों किया? चलिए जानते हैं इस क्राइम से जुड़ी खबर को विस्तार से जो खोलेगी इस खौफनाक मर्डर मिस्ट्री का राज.

यह दर्दनाक घटना 7 अगस्त, 2025 को राजस्थान के खैरथल तिजारा जिले के किशनगढ़बास की आदर्श कालोनी की है, जहां एक मकान मालकिन को छत से तेज बदबू आई तो वह हैरान थी, फिर मालकिन ने सोचा कि कोई जानवर मर गया होगा, बदबू उस की होगी. लेकिन जब बदबू तेज आने लगी तो उस ने आसपास यह देखना शुरू कर दिया कि ये बदबू आखिर आ कहां से रही है? यही खोजतेखोजते वह छत पर जा पहुंची.

जब देखा कि बदबू छत पर रखे नीले रंग के प्लास्टिक ड्रम से आ रही है तो वह उस के नजदीक गई. उस ड्रम के ढक्कन पर भारी पत्थर रखा हुआ था.

शक होने पर मकान मालकिन ने पुलिस को सूचना दी तो मौके पर पहुंची. पुलिस ने पत्थर हटाकर जब ड्रम का ढक्कन खोला तो उस में हंसराम उर्फ सूरज का शव पड़ा हुआ था. जिसे नष्ट करने के लिए ड्रम में नमक भरा गया था. हंसराम उर्फ सूरज वहां किराए पर पत्नी और बच्चों के साथ रह रहा था और ईंट भट्टे पर मजदूरी का करता था. उस के गले पर धारदार हथियार का निशान था. वारदात के बाद उस की पत्नी सुनीता और तीनों बच्चे अचानक गायब हो गए.

पुलिस के अनुसार, इस की सूचना से आसपास के इलाके में हड़कप मच गया. डीएसपी राजेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. जब ड्रम खोला गया तो वहां मौजूद सभी लोगों के होश उड़ गए. ड्रम के अंदर नमक में दबा हुआ हंसराज का शव पड़ा था. इस के बाद एफएसएल टीम को बुलाकर मौके से जरूरी साक्ष्य इकट्ठा किए गए.

हंसराज किशनगढ़ बास के ईंट भट्ठे पर मजदूरी करता था और डेढ़ महीने पहले पत्नी व 3 बच्चों संग आदर्श कालोनी में किराए पर रहने लगा था. पड़ोसियों से पता चला कि दोनों मियांबीवी में अकसर झगड़ा होता रहता था. हत्या के बाद पत्नी, बच्चे और मकान मालिक का बेटा लापता है, जिस से उन पर संदेह गहरा गया है. अब सवाल यह है कि हंसराज की हत्या कब की गई और शव कितने दिनों से ड्रम में था. पुलिस संदिग्धों की तलाश कर रही है. Rajasthan Crime News

Hindi Stories love : अवैध संबंध का खौफनाक अंत – भतीजे ने चाची के प्यार में घोंटा चाचा का गला

Hindi Stories love : चाचीभतीजे का रिश्ता मांबेटे जैसा होता है. लेकिन जमना देवी ने 18 वर्षीय भतीजे मदनमोहन को अपने मोहपाश में ऐसा फांसा कि वह निकल न सका. फिर एक दिन…

राजस्थान के अलवर जिले के भिवाड़ी शहर के थाना यूआईटी के थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार को 15 फरवरी, 2021 की सुबह फोन पर सूचना मिली कि सेक्टर 4 व 5 के बीच सड़क पर एक व्यक्ति का शव पड़ा है. सूचना पा कर थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. मौके पर उन्हें वास्तव में एक युवक का शव पड़ा मिला. उन्होंने जब शव की जांच की तो उस के दोनों पैरों के अंगूठों से चमड़ी उधड़ी हुई दिखी. प्रथमदृष्टया ऐसा लग रहा था मानो मृतक की हत्या कहीं और कर के शव यहां ला कर डाला गया हो. पुलिस ने इस नजर से भी जांच की कि मृतक कहीं दुर्घटना का शिकार तो नहीं हो गया. मगर मौकाएवारदात और शव को देखने से ऐसा नहीं लग रहा था.

शव पर और किसी जगह चोट या रगड़ के निशान या खून निकला हुआ नहीं था. मामला सीधे हत्या का लग रहा था. मामला संदिग्ध लगा तो थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार ने मामले की जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. भिवाड़ी एसपी राममूर्ति जोशी के संज्ञान में मामला आया तो उन्होंने एएसपी अरुण मच्या को घटनास्थल पर जा कर मामला देखने के निर्देश दिए. एएसपी अरुण मच्या और फूलबाग थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने एफएसएल टीम को भी वहां बुला कर साक्ष्य इकट्ठा करवाए. पुलिस अधिकारियों ने जांचपड़ताल के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया. शव की शिनाख्त नहीं हुई थी. लेकिन जब तक शिनाख्त नहीं हो जाती.

तब तक पुलिस हाथ पर हाथ धर कर बैठने वाली नहीं थी. पुलिस ने अज्ञात शव मिलने का मामला दर्ज कर लिया. इस केस को सुलझाने के लिए एएसपी अरुण मच्या के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित की गई. इस टीम में यूआईटी थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार के साथ फूलबाग थानाप्रभारी जितेंद्र सिंह सोलंकी, एसआई अखिलेश, हैडकांस्टेबल मुकेश कुमार, राकेश कुमार, मोहनलाल, कर्मवीर, रामप्रकाश, राजेंद्र, संतराम, सुरेश, ओमप्रकाश व ऊषा को शामिल किया गया. मृतक की हुई शिनाख्त इस पुलिस टीम ने मृतक के फोटो एवं पैंफ्लेट बना कर भिवाड़ी में सार्वजनिक स्थानों पर लगवा कर लोगों से शव की शिनाख्त की अपील की. साथ ही पुलिस टीम ने 2 दिन में लगभग 800 घरों में संपर्क कर शव की शिनाख्त कराने की कोशिश की. वहीं पुलिस टीम ने सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले.

सीसीटीवी फुटेज में एक बाइक पर एक युवक और महिला किसी व्यक्ति को बीच में बैठा कर ले जाते दिखे. पुलिस ने मृतक की शिनाख्त कर ली. मृतक का नाम कमल सिंह उर्फ कमल कुमार था. मृतक कमल निवासी उमराया, छाता, जिला मथुरा का रहने वाला था और इन दिनों भिवाड़ी की प्रधान कालोनी, सेक्टर-2 में रह रहा था. पुलिस ने मृतक कमल के घर जा कर पूछताछ की तो मृतक की बीवी जमना देवी अपने पति की हत्या की बात सुन कर रोने लगी. पुलिस ने उसे ढांढस बंधाया और पूछताछ की. जमना देवी ने बताया कि उस का पति कमल एटीएम से रुपए निकलवाने गया था. जबकि मृतक के बड़े भाई भीम सिंह ने पुलिस को बताया कि 14 फरवरी, 2021 की रात कमल सिंह की पत्नी जमना देवी उन के घर आई थी. वह उस से बाइक की चाबी यह कह कर मांग कर लाई थी कि कमल को बल्लभगढ़ जाना है.

भीम सिंह ने तब बाइक की चाबी जमना को दे दी थी. पुलिस को लगा कि मृतक की बीवी गुमराह कर रही है. तब पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ करने के साथ ही सीसीटीवी फुटेज जमना देवी को दिखाई. सीसीटीवी फुटेज में बाइक पर बैठी महिला के कपड़े एवं जमना के पहने कपड़े एक ही थे. पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि कमल की हत्या में उस की पत्नी जमना का हाथ है. तब पुलिस ने जमना से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में जमना टूट गई. उस ने कबूल कर लिया कि अपने प्रेमी और भतीजे मदनमोहन के साथ मिल कर पति की हत्या की थी. तब पुलिस ने मृतक कमल सिंह की बुआ के पोते 19 वर्षीय मदनमोहन को फरीदाबाद, हरियाणा से गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने मदनमोहन को मोबाइल की लोकेशन के आधार पर साइबर सेल एक्सपर्ट की मदद से धर दबोचा था.

पुलिस गिरफ्त में आते ही मदनमोहन समझ गया कि उस का भांडा फूट गया है. इसलिए उस ने भी कमल सिंह की हत्या का जुर्म कबूल कर लिया. इस तरह 19 फरवरी, 2021 को पुलिस ने हत्या के इस मामले से परदा हटा दिया. मदनमोहन को यूआईटी थाना पुलिस थाने ले आई. शव की शिनाख्त होने के बाद कमल सिंह के शव का मैडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम कराया गया. मृतक के भाई भीम सिंह की तरफ से जमना देवी उर्फ लक्ष्मी जादौन और मदनमोहन जादौन के खिलाफ भादंसं की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. आरोपियों जमना देवी उर्फ लक्ष्मी और उस के प्रेमी भतीजे मदनमोहन से की गई पूछताछ में जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार निकली—

कमल सिंह और भीम सिंह जादौन सगे भाई थे. कई साल पहले वह अपने गांव उमराया, थाना छाता, जिला मथुरा, उत्तरप्रदेश से राजस्थान के अलवर के भिवाड़ी शहर में आ बसे थे. दोनों भाई भिवाड़ी में किराए के मकान में रहते थे. दोनों भाई माश मेटल कंपनी चौक भिवाड़ी में नौकरी करते थे. शादी के बाद दोनों भाई अलग हो गए थे. कमल सिंह अपनी पत्नी जमना देवी उर्फ लक्ष्मी के साथ प्रधान कालोनी, सेक्टर-2 में किराए के मकान में रहता था. वहीं भीम सिंह अपने बीवीबच्चों के साथ रामनिवास कालोनी, भिवाड़ी में रहता था. दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे. दोनों की तनख्वाह भी अच्छीखासी थी. जिस से घरपरिवार का खर्च आराम से चल रहा था.

शादी में दे बैठे दिल जमना करीब एक साल पहले कमल की बुआ के पोते की शादी में गांव सांखी, मथुरा गई थी. शादी में वैसे भी सब लोग अच्छे कपड़े और शृंगार कर के शामिल होते हैं. महिलाएं और युवतियां तो ऐसे मौके पर सजनेसंवरने में कोई कसर नहीं छोड़तीं. जमना ने भी मेकअप करा कर अच्छे कपड़े पहने. वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. शादी श्रीचंद जादौन के बड़े बेटे की थी. दूल्हे का छोटा भाई मदनमोहन भी उस समय खूब सजाधजा हुआ था. वह शक्लसूरत से भी ठीक ही था. दूल्हे के आसपास घूमते मदनमोहन और जमना की नजरें एकदूसरे से मिलीं तो दोनों एकदूसरे से नजरें नहीं हटा सके. मदन को जहां जमना प्यारी लगी थी, वहीं जमना को भी मदन भा गया था. मदन उस समय 18 साल का गबरू जवान था. दोनों का रिश्ता वैसे तो चाचीभतीजे का था मगर उन की आंखों में एकदूजे के लिए अलग ही चाहत थी.

दोनों एकदूसरे को ऐसे देख रहे थे, मानो उन के अलावा उन के लिए वहां कोई और था ही नहीं. मदन ने जब भी इधरउधर देख कर जमना की तरफ देखा, वह उसे ही देखती मिली. मदनमोहन ने तब मौका पा कर जमना चाची से कहा, ‘‘चाची, क्या खूबसूरत लग रही हो. नयनों के तीर चुभो कर मेरा दिन घायल कर दिया.’’

सुन कर जमना हंस कर बोली, ‘‘तुम्हारे नयनों ने मेरा भी दिल घायल कर दिया. अब इस की मरहमपट्टी तुम्हें ही करनी पड़ेगी.’’

‘‘बंदा अभी हाजिर है. आप हुक्म करें. मैं दिल का नया डाक्टर हूं.’’ वह बोला.

‘‘अच्छा, तो डाक्टर साहब से दिल घायल हुआ उस का इलाज आज जरूर कराएंगे.’’ जमना ने हंस कर कहा.

ये बातें हो तो मजाक में रही थीं मगर दोनों के मन में एकदूजे के लिए चाहत जाग उठी थी. दोनों शादी के दौरान एकदूसरे से मिलते रहे. एकदूसरे की खूबसूरती की तारीफों के पुल बांधते रहे. मौका रात में मिला तो दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. उन का चाचीभतीजे का रिश्ता वासना की आग में जल कर खाक हो गया. दोनों में एक नया रिश्ता कायम हो गया, जिस का अंत बहुत बुरा होने वाला था. अगले दिन जमना जब गांव सांखी बुआ सास के घर से भिवानी आने की तैयारी कर रही थी तो मदनमोहन ने कहा, ‘‘चाची, मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हारे जाने के बाद मुझे तुम्हारी बहुत याद आएगी.’’

‘‘आज के बाद चाची नहीं जमना कहोगे.’’ जमना बोली.

तब मदनमोहन बोला, ‘‘जैसा आप का हुकम मेरी प्यारी डार्लिंग जमना. मुझे हर रोज फोन करना. मिलने भी बुलाना. क्योंकि मैं तुम्हारी जुदाई बरदाश्त नहीं कर पाऊंगा.’’

‘‘जरूर मेरे राजा, मुझे भी तुम्हारी बहुत याद सताएगी. याद करूं तब दौड़े आना.’’ वह बोली.

‘‘जरूर आऊंगा.’’ मदन ने जमना की ओर देखते हुए रुआंसे स्वर में कहा.

इस के बाद दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर लिया. जमना भिवाड़ी आ गई. वह भिवाड़ी आ जरूर गई थी, लेकिन अपना दिल तो भतीजे मदनमोहन के पास छोड़ आई थी. यही हाल मदनमोहन का भी था. उसे जमना के बगैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता था. मगर करते भी तो क्या. दोनों फोन पर बातें कर के दिल को तसल्ली देते रहते. एकदो बार मदनमोहन भिवाड़ी भी आया और हसरतें पूरी कर वापस गांव मथुरा लौट आया. उन के बीच अवैध संबंध बने तो दोनों को दुनिया फीकी लगने लगी. मौका मिलने पर मदन भिवाड़ी आ कर जमना देवी से मिल जाता. दोनों कमल सिंह की गैरमौजूदगी में रास रचाते थे.

दोनों एकदूसरे से कोसों दूर रहते थे. एक भिवाड़ी में तो दूसरा मथुरा में. ऐसे में हर रोज मिलना संभव नहीं था. ऐसे में वे दोनों फोन पर बातें कर जी हलका करते थे. घटना से 6 महीने पहले एक दिन कमल ने अपनी पत्नी जमना को किसी से हंसहंस कर अश्लील बातें करते पकड़ लिया. तब कमल ने उस से पूछा कि किस से बातें कर रही थी. जमना ने बताया कि वह मदनमोहन से ही बात कर रही थी. तब उस ने कहा, ‘‘अरे शर्म नहीं आई तुझे उस से ऐसी बातें करते. अगर आज के बाद किसी से भी इस तरह की बात की तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

तब जमना ने कसम खा कर पति से कहा कि वह भविष्य में कभी भी मदनमोहन से बात नहीं करेगी. जमना ने पति से यह वादा कर तो लिया लेकिन मदन से बात किए बिना उस का मन नहीं लग रहा था. तब उस ने एक नई सिम ले ली. फिर वह उस नए नंबर से चोरीछिपे मदन से बतिया लेती. कमल ने सोचा कि बीवी ने मदनमोहन से बात करनी छोड़ दी है. 2 महीने बाद जमना को पुन: मदनमोहन से फोन पर बातें करते समय कमल ने पकड़ लिया. तब कमल ने जमना को जम कर पीटा और मदनमोहन को भी फोन कर के धमकाया, ‘‘हरामजादे, तेरे खिलाफ अपनी बीवी से बलात्कार करने का मुकदमा दर्ज कराऊंगा. तब तू सुधरेगा.’’

इतनी पिटाई के बाद भी जमना नहीं सुधरी. उसे अपने प्रेमी से बात करनी नहीं छोड़ी. इस के बाद कमल सिंह ने एक बार फिर बीवी को मदनमोहन से बात करते पकड़ा. तब बीवी को पीटा और मदनमोहन को धमकी दी कि उस ने अगर 2 लाख रुपए नहीं दिए तो वह बलात्कार का मामला दर्ज करा कर सारे परिवार व रिश्तेदारों से तुम दोनों के अवैध संबंधों की पोल खोल देगा. मदनमोहन डर गया. उस ने कहा कि उस के पास इतने रुपए नहीं हैं. वह रुपए किस्तों में दे देगा. वह बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज न कराएं. इस के बाद कमल ने 14 फरवरी, 2021 को फोन कर मदनमोहन को भिवाड़ी बुलाया. शाम 5 बजे मदनमोहन भिवाड़ी स्थित कमल के घर आया. इस के बाद कमल और मदनमोहन ने साथ बैठ कर शराब पी.

जब शराब का नशा चढ़ा तो कमल ने मदनमोहन से पूछा कि 2 लाख रुपए देगा तो बलात्कार का मामला दर्ज नहीं कराऊंगा. तब मदनमोहन ने कहा कि वह किस्तों में रुपए जरूर दे देगा. इस के बाद कमल, जमना व मदनमोहन कमरे में एक ही बैड पर सो गए. कमल के दिमाग में तो उस समय कुछ और ही चल रहा था. वह चुपके से उठा और पास में सो रही अपनी बीवी और मदनमोहन के इस तरह फोटो खींचने लगा जैसे वे दोनों एक साथ सो रहे हैं. फोटो खींच कर कमल ने मदनमोहन और जमना को जगा कर कहा, ‘‘अब मैं रिश्तेदारों को फोन कर के बुलाता हूं और पूरी कालोनी के लोगों को बुला कर बताता हूं कि मैं ने तुम दोनों को शारीरिक संबंध बनाते रंगेहाथों पकड़ा है.’’

तब कमल की पत्नी जमना बोली कि ऐसा मत करो. लेकिन कमल नहीं माना और जिद करने लगा कि वह लोगों को तुम्हारे अवैध संबंधों के बारे में बता कर ही रहेगा. अपनी पोल खुलने के डर से मदनमोहन ने कमल सिंह को पकड़ लिया और जमना ने अपनी चुन्नी पति के गले में डाल कर जोर से कस दी, जिस से कमल की मृत्यु हो गई. तब मदन और जमना के हाथपांव फूल गए. मगर कमल तो मर चुका था. तब दोनों ने कमल की लाश ठिकाने लगाने की योजना बनाई, जिस के तहत जमना उसी समय अपने जेठ भीम सिंह के घर गई और उन की बाइक की चाबी यह कह कर ले आई कि कमल को अभी एटीएम से पैसे निकालने बल्लभगढ़ जाना है.

जमना और मदन ने कमल की बाइक पर रात करीब एक बजे कमल के शव को इस तरह दोनों के बीच बिठा कर रखा जैसे किसी बीमार को अस्पताल ले जा रहे हैं. दोनों बाइक पर शव को बाबा मोहनराम के जंगलों में डालने के लिए रवाना हुए लेकिन सड़क पर आने पर बाइक के पीछे पुलिस गश्त की मोटरसाइकिल देख कर मदनमोहन ने बाइक हेतराम चौक से सेक्टर-5 की तरफ मोड़ दी. सेक्टर-5 व 6 वाली रोड पर बस की लाइट दिखाई देने पर दोनों ने शव को सेक्टर-5 में खाली प्लौट के सामने सड़क किनारे पटक दिया और वापस घर आ गए. मोटरसाइकिल पर मृतक कमल के पैर जमीन पर लटक रहे थे, जिस के कारण दोनों पैरों के अंगूठे आगे से रगड़ कर छिल गए थे. लाश ठिकाने लगाने के बाद आरोपी मदनमोहन फरीदाबाद चला गया.

अगली सुबह यानी 15 फरवरी, 2021 सड़क पर शव देख कर साढ़े 7 बजे थाना यूआईटी भिवाड़ी फेज-3 के थानाप्रभारी सुरेंद्र कुमार को किसी राहगीर ने शव पड़े होने की सूचना दी. इस के बाद थानाप्रभारी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. पुलिस ने मृतक की बाइक और जमना देवी व मदनमोहन के मोबाइल जब्त कर के पूछताछ के बाद दोनों को भिवाड़ी कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Hindi Stories love

Family Story Hindi : पति का गला दबाया फिर साड़ी से शव पंखे पर लटका दिया

Family Story Hindi : कभीकभी कुछ महिलाएं मौजमस्ती के चक्कर में अपनी बसीबसाई घरगृहस्थी खुद ही उजाड़ लेती हैं. काश! मंजू इस बात को समझ पाती तो शायद…

21 अप्रैल, 2021 को सुबह के यही कोई 6 बजे थे. तभी गांव सबरामपुरा के रहने वाले राकेश ओझा के घर से रोने की आवाज आने लगी. घर में एक महिला जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘अरे मेरे भाग फूट गए रे…मेरे पति ने फांसी लगा ली रे…कोई आओ रे…बचाओ रे…’’

रुदन सुन कर आसपड़ोस के लोग दौड़ कर राकेश ओझा के घर पहुंचे. तब तक मृतक की पत्नी मंजू ओझा ने कमरे में पंखे के हुक से साड़ी का फंदा बना कर झूलते मृत पति को फंदे से नीचे उतार लिया था. मृतक की लाश के पास उस की पत्नी मंजू सुबकसुबक कर रो रही थी. मृतक का बड़ा भाई राजकुमार ओझा भी खबर सुन कर वहां पहुंच गया था. वह भी भाई की मौत पर आश्चर्यचकित रह गया. राजकुमार ओझा ने यह सूचना थाना कालवाड़ में दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. घटनास्थल की जांच कर वीडियोग्राफी व फोटोग्राफी कराई गई. मृतक की पत्नी मंजू ओझा से भी पूछताछ की गई. मंजू ने बताया कि रात में राकेश ने किसी समय साड़ी का फंदा गले में डाल कर फांसी लगा ली.

आज सुबह जब मैं उठ कर कमरे में आई तो इन्हें फांसी पर लटका देख कर नीचे उतारा कि शायद जिंदा हों. मगर यह तो चल बसे थे. इतना कह कर वह फिर रोने लगी. पुलिस ने वहां मौजूद मृतक के भाइयों और अन्य परिजनों से भी पूछताछ की. पूछताछ के बाद पुलिस को मामला संदिग्ध लग रहा था. आसपास के लोगों ने थानाप्रभारी को बताया कि राकेश आत्महत्या नहीं कर सकता. उसी समय मंजू रोने का नाटक करते हुए पुलिस की बातों को गौर से सुन रही थी. पुलिस वाले जब चुप होते तो वह रोने लगती. पुलिस वाले आपस में बोलते तो मृतक की पत्नी चुप हो कर सुनने लगती. थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी ने संदिग्ध घटना की खबर उच्चाधिकारियों को दे कर दिशानिर्देश मांगे.

जयपुर (पश्चिम) डीसीपी प्रदीप मोहन शर्मा के निर्देश पर एडिशनल डीसीपी राम सिंह शेखावत, झोटवाड़ी एसीपी हरिशंकर शर्मा ने कालवाड़ थानाप्रभारी से राकेश ओझा की संदिग्ध मौत मामले की पूरी जानकारी ले कर उन्हें कुछ दिशानिर्देश दिए. थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया. मृतक राकेश का शव ले कर उस की पत्नी मंजू ओझा अपने देवर, जेठ वगैरह एवं तीनों बच्चों के साथ अपने पति के पुश्तैनी गांव रुआरिया, मुरैना लौट गई. पुलिस को मामला लगा संदिग्ध गांव रुआरिया में राकेश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. राकेश ओझा बेहद जिंदादिल इंसान था.

ऐसे में उस के इस तरह आत्महत्या करने की बात किसी के भी गले नहीं उतर रही थी. राकेश ओझा की मौत पुलिस को संदिग्ध लगी थी. पुलिस को जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो शक पुख्ता हो गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक राकेश को गला घोंट कर मारा गया था. तब डीसीपी प्रदीप मोहन शर्मा ने एक टीम गठित कर निर्देश दिए कि जल्द से जल्द राकेश ओझा हत्याकांड का परदाफाश कर हत्यारोपियों को गिरफ्तार किया जाए. टीम में एसीपी हरिशंकर शर्मा थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी आदि को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन एडिशनल डीसीपी रामसिंह शेखावत के हाथों सौंपा गया. पुलिस टीम ने साइबर सेल की मदद लेने के साथ मृतक के पड़ोस के लोगों से भी जानकारी ली. पुलिस टीम को जानकारी मिली कि मृतक की बीवी मंजू के पड़ोस में रहने वाले बीरेश उर्फ सोनी ओझा से अवैध संबंध थे.

राकेश और बीरेश ओझा दोस्त थे और दोनों पीओपी का काम करते थे. बीरेश अकसर राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर आयाजाया करता था. लोगों ने यहां तक कहा कि बीरेश जैसे ही राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर जाता, मंजू और बीरेश कमरे में बंद हो जाते थे. यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने मंजू और बीरेश उर्फ सोनी ओझा के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि जिस रात को राकेश की हत्या हुई थी, उस रात 10 बजे मंजू और बीरेश के बीच बात हुई थी. उस के बाद भी हर रोज दिन में कईकई बार बात होती रही. राकेश की हत्या से पहले भी मंजू और बीरेश के बीच दिन में कई बार बात होने का पता चला.

आरोपी चढ़े पुलिस के हत्थे पुलिस को पुख्ता प्रमाण मिल गए थे कि राकेश की हत्या कर के उसे आत्महत्या दिखाने की साजिश रची गई थी. इस के बाद पुलिस ने बीरेश ओझा की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू किए. मगर वह कहीं चला गया था. कुछ दिन बाद वह जैसे ही अपने घर आया, कांस्टेबल सुनील कुमार को इस की खबर मिल गई. तब पुलिस ने 27 अप्रैल, 2021 को उसे हिरासत में ले लिया. बीरेश को थाना कालवाड़ ला कर पूछताछ की गई. पूछताछ में वह ज्यादा देर तक पुलिस के सवालों के आगे टिक नहीं पाया और राकेश ओझा की हत्या अपनी प्रेमिका मंजू ओझा के कहने पर राकेश ओझा की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. इस के बाद पुलिस ने मृतक की पत्नी मंजू को भी गिरफ्तार कर लिया.

मंजू ओझा और बीरेश ओझा उर्फ सोनी ओझा से पूछताछ के बाद जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार से है—

राकेश ओझा मूलरूप से मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गांव रुआरिया का रहने वाला था. वह काफी पहले गांव से जयपुर आ कर पीओपी का कामधंधा करने लगा था. राकेश की शादी मंजू से हुई थी. मंजू गोरे रंग की अच्छे नैननक्श की खूबसूरत युवती थी. शादी के कुछ महीने बाद राकेश पत्नी मंजू को भी अपने साथ जयपुर ले आया था. राकेश तीजानगर इलाके के सबरामपुरा में किराए का घर ले कर बीवी के साथ रहता था. वक्त के साथ मंजू 3 बच्चों की मां बन गई. इन में एक बेटी और 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 7 साल, 4 साल और 2 साल है.

राकेश पीओपी का अच्छा कारीगर था. इस कारण उस की मजदूरी भी अच्छी थी. वह महीने में 20-25 हजार रुपए आसानी से कमा लेता था. इस कारण उस के परिवार कागुजरबसर अच्छे से हो जाता था. राकेश दिन भर काम कर के राकेश का छोटा भाई घनश्याम और बड़ा भाई राजकुमार भी जयपुर में काम करते थे. ये भी अपने परिवारों के साथ अलगअलग किराए पर रहते थे. राकेश के पड़ोस में बीरेश उर्फ सोनी ओझा भी रहता था. बीरेश भी पीओपी का काम करता था. इसलिए दोनों दोस्त बन गए. बीरेश कुंवारा था और देखने में हैंडसम था. दोस्ती के नाते वह राकेश के घर आनेजाने लगा. बीरेश की नजर राकेश की बीवी मंजू पर पड़ी तो वह उस के रूपयौवन पर मर मिटा.

मंजू की उम्र उस समय 33 साल थी और वह उस समय 2 बच्चों की मां थी. इस के बावजूद उस की उम्र 20-22 से ज्यादा नहीं लगती थी. मंजू का गोरा रंग व मादक बदन बीरेश की निगाहों में चढ़ा तो वह मंजू के इर्दगिर्द मंडराने लगा. बीरेश अकसर मौका पा कर राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर आता और मंजू की खूबसूरती की तारीफें करता. मंजू समझ गई कि बीरेश उस से क्या चाहता है. पति के दोस्त से बने संबंध राकेश ज्यादातर समय अपने काम पर बिताता और रात को घर लौटता तो खाना खा कर सो जाता. पत्नी की इच्छा पर वह ध्यान नहीं देता था. ऐसे में मंजू ने अपने से उम्र में 6 साल छोटे बीरेश से पहले नजदीकियां बढ़ाईं और फिर अपनी हसरतें पूरी कीं. इस के बाद यह सिलसिला चलता रहा.

बीरेश नई उम्र का जवान लड़का था. ऊपर से वह कुंवारा भी था. ऐसे में मंजू उसे पति से ज्यादा चाहने लगी. काफी समय तक दोनों लुपछिप कर गुलछर्रे उड़ाते रहे. किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई. मगर जब अकसर राकेश की गैरमौजूदगी में बीरेश उस के घर आ कर दरवाजा बंद करने लगा तो आसपास के लोगों में कानाफूसी होने लगी. इसी दौरान मंजू तीसरे बच्चे की मां बन गई. मंजू और बीरेश की बातें और आपस में व्यवहार देख कर राकेश को उन के संबंधों पर शक होने लगा था. ऐसे में राकेश को एक पड़ोसी ने इशारों में कह दिया कि बीरेश से दोस्ती खत्म करो. उस का घर आना बंद कराओ. यही ठीक रहेगा.

इस के बाद राकेश ने मंजू से सख्ती करनी शुरू कर दी तो मंजू बौखला गई. उस की आंखों में पति खटकने लगा. मौका मिलने पर मंजू अपने प्रेमी बीरेश से मिली. दोनों काफी दिनों बाद मिले थे. मंजू ने बीरेश से कहा, ‘‘राकेश को हमारे संबंधों पर शक हो गया है. वह तुम से बात करने की मनाही करता है. लेकिन मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगी. राकेश हम दोनों को जीने नहीं देगा. ऐसा कुछ करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

‘‘मंजू, मैं भी तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. राकेश को रास्ते से हटा कर हम दोनों शादी कर लेंगे. इस के बाद हम अपने हिसाब से मौजमजे से जिंदगी जिएंगे.’’ बीरेश बोला.

‘‘मैं भी तुम से शादी करना चाहती हूं, मगर यह राकेश की मौत के बाद ही संभव है. हमें ऐसी योजना बनानी है कि राकेश की हत्या को आत्महत्या साबित करें. बाद में जब मामला ठंडा पड़ जाएगा तब हम शादी कर लेंगे.’’ मंजू ने कहा. गला दबा कर की हत्या इस के बाद दोनों ने योजना बना ली. 20 अप्रैल, 2021 की रात मंजू ने तीनों बच्चों को खाना खिला कर कमरे में सुला दिया और उन के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. मंजू ने राकेश को खाने में नींद की गोलियां दे दी थीं, जिस से वह कुछ ही देर में गहरी नींद में चला गया. फिर रात 10 बजे मंजू ने बीरेश को फोन कर घर बुला लिया.

बीरेश और मंजू राकेश के कमरे में पहुंचे. बीरेश ने राकेश के गले में कपड़ा लपेट कर कस दिया. थोड़ा छटपटाने के बाद वह मौत की आगोश में चला गया. राकेश मर गया. तब बीरेश और मंजू ने साड़ी राकेश के गले में लपेट कर उस के शव को पंखे के हुक से लटका दिया ताकि लोगों को लगे कि राकेश ने आत्महत्या की है. इस के बाद बीरेश अपने घर चला गया और मंजू सो गई. अगली सुबह 6 बजे उठ कर मंजू ने योजनानुसार राकेश के कमरे में जा कर रोनाचिल्लाना शुरू कर दिया. तब रोने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग और मृतक के भाई वगैरह घटनास्थल पर आए. तब तक मंजू ने राकेश का शव फंदे से उतार कर फर्श पर रख लिटा दिया था. इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई और पुलिस ने काररवाई कर राकेश ओझा हत्याकांड का परदाफाश किया.

पुलिस ने राजकुमार ओझा की तरफ से मंजू ओझा और उस के प्रेमी बीरेश ओझा उर्फ सोनी के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली. आरोपियों से मोबाइल और गला घोंटने का कपड़ा व साड़ी जिस का फंदा बनाया गया था, पुलिस ने बरामद कर ली. पूछताछ के बाद मंजू और बीरेश को 28 अप्रैल, 2021 को कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिराससत में भेज दिया गया.

Real Crime Story : प्रेमी संग साजिश रच कर पत्नी ने रस्सी से गला घोंटकर पति को मार डाला

Real Crime Story : 3 बच्चों की मां बनने के बाद भी प्रियंका की हसरतें उफान पर थीं. उसी दौरान उस के संपर्क में महावीर मीणा नाम का युवक आया. इस के संपर्क में आते ही प्रियंका की गृहस्थी में ऐसा जहर घुला कि…

तकरीबन 26-27 साल की उस युवती ने अपना नाम प्रियंका बताया था. हलका सा घूंघट होने के बावजूद उस का आंसुओं से भीगा चेहरा साफ नजर आ रहा था. उस का रंग गेहुंआ था. बड़ीबड़ी आंखें और सुतवां नाक घूंघट की ओट से साफ नजर आ रही थी. थानाप्रभारी बदन सिंह के सामने आते ही वह फफक पड़ी, ‘‘साब मेरा तो सुहाग ही उजड़ गया. बच्चों को भी अनाथ कर गया.’’

फिर चेहरा हाथों में छिपा कर रोने लगी, ‘‘साहब, एक तो मेरा मरद खुदकुशी कर मुझे बेसहारा छोड़ गया. अब घरपरिवार वाले कह रहे हैं कि उस की हत्या हो गई. कोई क्यों करेगा उन की हत्या? हमारा तो किसी से बैर भी नहीं था.’’

इतना कहतेकहते उस ने हिचकियां लेनी शुरू कर दीं. थानाप्रभारी बदन सिंह  ने उसे शांत रहने का संकेत करते हुए कहा, ‘‘आप रोएं नहीं. हम हकीकत का खुलासा कर के रहेंगे. आप पूरी बात को सिलसिलेवार बताइए ताकि हमें अपराधी को गिरफ्तार करने में मदद मिल सके.’’

कुछ पलों के लिए गला भर आने के कारण प्रियंका चुप हो गई. फिर उस ने कहना शुरू किया, ‘‘सच्ची बात तो यह है साब कि हमारा मर्द कुछ दिनों से पैसों की देनदारी और तगादों से परेशान था. उधारी चुकाने की कोई सूरत कहीं से नजर नहीं आ रही थी. दिनरात शराब में डूबा रहता था. कल तो सुबह से ही शराब पी रहा था. शायद दारू के नशे की झोंक में ही जान दे बैठा…’’ प्रियंका की रुलाई फिर फूट पड़ी, ‘‘तगादों से परेशान हो कर जान देने की क्या जरूरत थी?’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने उसे ढाढस बंधाते हुए कहा, ‘‘आप को किसी पर शक है? मेरा मतलब है जिस के तगादे से परेशान हो कर आप के पति ने आत्महत्या की या उस की हत्या हो गई?’’

‘‘हत्या की बात कौन कह रहा है साब!’’ प्रियंका ने प्रतिवाद करते हुए कहा.

तभी वहां खड़े कुछ लोगों में से एक युवक बोल पड़ा, ‘‘हम कहते हैं साब.’’

इस के साथ ही वह शख्स बुरी तरह उबल पड़ा, ‘‘हमें तो इस कुलच्छिनी पर ही शक है. साहब, इस ने ही मरवाया है अपने पति को… यह आत्महत्या का नहीं बल्कि हत्या का मामला है.’’

इस से पहले कि थानाप्रभारी बदन सिंह उस युवक को तवज्जो देते, प्रियंका चिल्ला पड़ी, ‘‘नहीं… यह झूठ है, हम से दुश्मनी निकालने के लिए यह झूठे इल्जाम लगा रहा है.’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने युवक की तरफ देखा, ‘‘कौन हो तुम? तुम कैसे कह सकते हो कि इस की हत्या हुई है और इस के पीछे प्रियंका का हाथ है?’’

‘‘मेरा नाम रामदीन है साहब, रिश्ते में मृतक बुद्धि प्रकाश मेरा चचेरा भाई था.’’ उस के चेहरे की तमतमाहट कम नहीं हुई थी. वह बुरी तरह फट पड़ा, ‘‘साहब बुद्धि प्रकाश का किसी से कोई लेनदेन था ही नहीं. फिर तगादे की बात कहां से आ गई? मेरा भाई मजबूत दिल गुर्दे वाला आदमी था, कायर नहीं था कि आत्महत्या कर लेता. जरूर उस की हत्या हुई है.’’

‘‘तो इस में प्रियंका कहां से आ गई?’’ थानाप्रभारी बदन सिंह ने सवाल दागा.

‘‘आप पूरी जांच कर लो साहब. दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा.’’ वहीं मौजूद परिजनों और बस्ती के लोगों ने एक स्वर में कहा, ‘‘साहब, घर में प्रियंका के अलावा और कौन रहता है? बुद्धि प्रकाश ने जिंदगी में कभी शराब नहीं पी, लेकिन पिछले 2 सालों से तो जैसे दारू में डुबकी मार रहा था. अगर उस ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है तो हमारी समझ से बाहर है.’’

इस बीच पड़ोस के कुछ लोग भी बोल पड़े, ‘‘पतिपत्नी के संबंध भी अच्छे नहीं थे. दिनरात झगड़े की आवाज सुनाई देती थी. पड़ोस के नाते हम ने प्रियंका से पूछा भी, लेकिन इस ने मुंह बिचका दिया. कहती थी, नशेड़ी को न घर की चिंता होती है और न ही घरवाली की. दारू पी कर खेतखलिहान में पड़ा रहेगा तो घर में झगड़े ही होंगे.’’

थानाप्रभारी बदन सिंह ने गहरी नजरों से मृतक के परिजनों और पड़ोसियों की तरफ देखा फिर कहा, ‘‘दिनरात दारू में डुबकी मारने की नौबत तो तब आती है जब कोई गहरे तनाव में हो? पतिपत्नी के बीच रोज की खटपट भी इस की वजह हो सकती है? लेकिन आत्महत्या तो बहुत बड़ा कदम होता है.’’

लेकिन इस सवाल पर परिजनों की खामोशी ने रहस्य का कुहासा और गहरा कर दिया. थानाप्रभारी बदन सिंह के दिमाग में एक सवाल हथौड़े की तरह टकरा रहा था, आखिर मृतक की पत्नी प्रियंका क्यों इस बात पर अड़ी हुई है कि यह आत्महत्या का मामला है.

उन्होंने थोड़े सख्त स्वर मे प्रियंका से पूछा, ‘‘तुम्हें कब और कैसे पता चला कि तुम्हारे पति ने आत्महत्या कर ली है?’’

प्रियंका की रुलाई फिर फूट पड़ी, ‘‘साहब हम तो रोज की तरह तड़के दिशामैदान के लिए चले गए थे. तब भी हमारा मरद ऐसे ही सो रहा था. लौट कर आए तब भी ऐसे ही सोता मिला. हमें बड़ा अटपटा लगा. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ. हम ने हिलायाडुलाया, कोई हरकत नहीं हुई. दिल की धड़कन भी गायब थी. हमारा दिल धक से रह गया. लगा जरूर कुछ गड़बड़ है… हम ने फौरन पड़ोसियों को पुकार लगाई.’’

बुद्धि प्रकाश घर के बाहर बरामदे में तख्त पर मृत पड़ा था. थानाप्रभारी बदन सिंह शव का निरीक्षण करने लगे. वह कुछ अनुमान लगा पाते तब तक सीओ विजय शंकर शर्मा वहां पहुंच गए. उन्होंने शव का निरीक्षण किया तो उन के चेहरे पर हैरानी के भाव आए बिना नहीं रहे. गले पर पड़े निशानों ने कौतूहल जगा दिया था. सीओ शर्मा ने झुक कर गौर किया तो वह चौंक पड़े. चेहरे पर ऐंठन और गले के निशान बहुत कुछ कह रहे थे. चेहरे पर ऐसी ऐंठन तो बेरहमी से गला दबाए जाने पर ही होती है.  स्वाभाविक प्रश्न था कि क्या किसी ने बुद्धि प्रकाश का गला दबाने की कोशिश की थी?

मामला पूरी तरह संदिग्ध लग रहा था. काले निशान भी रस्सी से गला दबाए जाने पर होते हैं. उन्होंने आसपास नजर दौड़ाई. ऐसी कोई रस्सी नजर नहीं आई. फोरैंसिक टीम को बुलाना अब जरूरी हो गया था. छानबीन और मौके से सबूत जुटाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम के साथ फोरैंसिक टीम भी पहुंच गई थी. फोरैंसिक टीम की जांच में चौंकाने वाले रहस्य उजागर हुए. बुद्धि प्रकाश के गले के दोनों ओर तथा पीछे की तरफ काले निशान बने हुए थे. लगता था कि रस्सी से गले को पूरी ताकत से कसा गया था. इस के अलावा चोट का कोई और निशान शरीर पर कहीं नहीं पाया गया.

लेकिन स्थितियां पूरी तरह संदेहास्पद थीं. घटनास्थल पर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे होने के कारण किसी के वहां आनेजाने का साक्ष्य मिलना भी संभव नहीं था. सीओ विजय शंकर शर्मा ने घटनास्थल का बड़ी बारीकी से निरीक्षण किया. उन्होंने प्रियंका से दरजनों सवाल किए. लेकिन अपने मतलब की कोई बात नहीं उगलवा सके. बिना किसी सबूत के प्रियंका पर हाथ डालने का कोई मतलब भी नहीं था. हालांकि पूछताछ के दौरान प्रियंका पूरी तरह सामान्य लग रही थी. उस के चेहरे पर भय या घबराहट की कोई रेखा तक नहीं थी. लेकिन उस के जवाब अटपटे थे.

मृतक करवट की स्थिति में था, जबकि प्रियंका का कहना था कि उस ने दिशामैदान से लौट कर उसे हिलायाडुलाया था. दिल की धड़कन टटोलने के लिए शरीर को पीठ के बल कर दिया था. लेकिन प्रियंका और पड़ोसियों के बयानों में कोई तालमेल नहीं था. उन का कहना था हम ने बुद्धिप्रकाश को करवट स्थिति में देखा था. पुलिस के सामने अच्छेअच्छे के हौंसले पस्त पड़ जाते हैं. लेकिन प्रियंका चाहे अटकअटक कर ही सही, पूरे हौसले से हर सवाल का जवाब दे रही थी. बेशक बुद्धि प्रकाश शराब में धुत रहा होगा. लेकिन आखिर था तो हट्टाकट्टा मर्द. उसे अकेली प्रियंका के द्वारा काबू करना आसान नहीं था.

सीओ हत्या के हर संभावित कोण को समझ रहे थे. इसलिए एक बात पर तो उन्हें यकीन हो चला था कि अगर हत्या में प्रियंका शामिल थी तो उस का कोई मजबूत साथी जरूर रहा होगा. हत्या सुनियोजित ढंग से की गई थी. लेकिन सवाल यह था कि योजना किस ने बनाई और उसे कैसे अंजाम दिया? पोस्टमार्टम के बाद पुलिस ने शव परिजनों को सौंप दिया. पोस्टमार्टम में प्रथमदृष्टया मौत का कारण दम घुटना माना गया. थाने लौट कर थानाप्रभारी बदन सिंह ने अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

एसपी शरद चौधरी ने इस मामले का खुलासा करने के लिए एडिशनल एसपी पारस जैन की निगरानी में सीओ विजय शंकर शर्मा, थानाप्रभारी बदन सिंह, हैडकांस्टेबल भरत, कांस्टेबल सतपाल, रामराज और महिला कांस्टेबल भारती बाना को शामिल किया. प्रियंका के थाने आने से पहले की गई पूछताछ में पुलिस को कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई थी. लेकिन थाने लाए जाने के बाद हुई पूछताछ में महावीर मीणा का जिक्र आने के साथ ही घटना की गिरह खुलने लगी. पुलिस का हवा में पूछा गया सवाल ही घटना का तानाबाना खोलता चला गया कि बुद्धि प्रकाश की शराबनोशी में उस का साथी कौन था? प्रियंका जिस भेद को छिपाए थी, वह खुल गया. प्रियंका को बताना पड़ा कि बुद्धि प्रकाश शनिवार 13 मार्च को दिन भर पड़ोसी महावीर मीणा के साथ शराब पी रहा था.

लेकिन पुलिस के इस सवाल पर प्रियंका बिफर पड़ी कि महावीर मीणा के साथ उस के अवैध रिश्ते हैं. उस का कहना था, ‘‘आप सुनीसुनाई बातों को ले कर मेरे चरित्र पर लांछन लगा रहे हैं.’’

लेकिन प्रियंका की काल डिटेल्स खंगाल चुके पुलिस अधिकारी पूरी तरह आश्वस्त थे. उन का एक ही सवाल प्रियंका के होश फाख्ता कर गया, ‘‘क्या तुम्हारे और महावीर के बीच देर रात को 2-2 घंटे तक बातें नहीं होती थीं?’’

प्रियंका के पास अब कोई जवाब नहीं बचा था. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस का कहना था कि बुद्धि प्रकाश उस के चालचलन पर शक करता था और रोज उस के साथ मारपीट करता था. इसलिए उस ने पति की हत्या कर दी. यह आधा सच था. प्रियंका अपने आप को एक बेबस औरत के रूप में पेश कर रही थी. लेकिन पुलिस को उस की पूरी दास्तान सुनने का इंतजार था कि कैसे उस ने प्रेमी के साथ मिल कर पति को मौत के घाट उतारा? राजस्थान के कोटा जिले में इटावा कस्बे के बूढादीत गांव में रहने वाले बुद्धि प्रकाश मीणा का कोई 12 साल पहले वहीं के निवासी सीताराम की बेटी प्रियंका से विवाह हुआ था. बुद्धि प्रकाश खेतिहर किसान था. प्रियंका का दांपत्य जीवन 10 साल ही ठीकठाक रह पाया. इस के बाद दोनों में खटपट रहने लगी.

इस बीच प्रियंका ने एकएक कर के एक बेटा और 2 बेटियों समेत 3 बच्चों को जन्म दिया. दांपत्य जीवन के 12 साल गुजर जाने और 3 बच्चों की पैदाइश के बाद बुद्धि प्रकाश और प्रियंका के बीच खटास कैसे पैदा हुई? उस की वजह था पड़ोस में आ कर बसने वाला युवक महावीर मीणा. दरअसल कदकाठी की दृष्टि से आकर्षक लगने वाला महावीर मीणा प्रियंका की नजरों में चढ़ गया था. प्रियंका की हर बात महावीर पर जा कर खत्म होती थी कि क्यों तुम अपने आप को महावीर की तरह नहीं ढाल लेते? जबकि बुद्धि प्रकाश का जवाब मुसकराहट में डूबा होता था कि महावीर की अभी शादी नहीं हुई है. इसलिए उसे अभी किसी की फिक्र नहीं है.

प्रियंका जवान थी, खूबसूरत भी. बेशक वह 3 बच्चों की मां बन गई थी, लेकिन उस की देह के कसाव में कोई कमी नहीं आई थी. उस की अपनी भावनाएं थीं. इसलिए मन करता था कि बुद्धि प्रकाश भी सजीले नौजवान की तरह बनठन कर रहे. फिल्मी हीरो की तरह उस से प्यार करे. लेकिन बुद्धि प्रकाश 35 की उम्र पार कर चुका था. मेहनतकश खेतीकिसानी में खटने के कारण उस पर उम्र हावी हो चली थी. इसलिए पत्नी की इच्छाओं की गहराई भांपने का उसे कभी खयाल तक नहीं आया. प्रियंका को अपने मेहनतकश पति के पसीने की गंध सड़ांध मारती लगती थी.

चढ़ती उम्र और बढ़ती आकांक्षाओं के साथ प्रियंका में पति के प्रति नफरत में इजाफा होता चला गया. संयोग ही रहा कि उस के बाजू वाले मकान में रहने के लिए महावीर बैरवा आ गया. महावीर छैलछबीला था और प्रियंका के सपनों के मर्द की तासीर पर खरा उतरता था. प्रियंका अकसर अपने पति बुद्धि प्रकाश को उस का उदाहरण देते हुए कहती थी, तुम भी ऐसे सजधज कर क्यों नहीं रहते. बुद्धि प्रकाश सीधासादा गृहस्थ इंसान था, इसलिए पत्नी की उड़ान को पहचानने की बजाय बात को टालते हुए कह देता, ‘‘अभी महावीर पर गृहस्थी की जिम्मेदारी नहीं पड़ी. जब पड़ेगी तो वह भी सजनासंवरना भूल जाएगा.’’

पड़ोसी के नाते महावीर भी बुद्धि प्रकाश से मेलमुलाकात बढ़ी तो गाहेबगाहे महावीर के यहां उस का आनाजाना भी बढ़ गया. अकसर प्रियंका के आग्रह पर वह वहीं खाना भी खा लेता था. असल में महावीर की नजरें प्रियंका पर थी. उस की पारखी नजरों से यह बात छिपी नहीं रही कि असल में प्रियंका को क्या चाहिए? लेकिन सवाल यह था कि पहल कौन करे. महावीर दोपहर में अकसर वक्त गुजारने के लिए अपने दोस्त की फलसब्जी की दुकान पर बैठ जाता था. दोस्त को सहूलियत थी कि अपने जरूरी काम निपटाने के लिए महावीर के भरोसे दुकान छोड़ जाता था. एक दिन दुकान पर अकेला बैठा था तो प्रियंका सब्जी खरीदने पहुंची. लेकिन महावीर ने फलसब्जी के पैसे नहीं लिए.

प्रियंका ने पैसे देने चाहे तो महावीर मुसकरा कर बोला, ‘‘तुम्हारी मुसकराहट में दाम वसूल हो गए. सारी दुकान ही अपनी समझो…’’

प्रियंका को शायद ऐसे ही मौके की तलाश थी. मुसकरा कर कहा, ‘‘ऐसी दोपहरी में दुकान पर बैठने की बजाय घर आओ.’’ प्रियंका ने मुसकरा कर निमंत्रण दिया तो महावीर बोला, ‘‘खातिरदारी का वादा करो तो आऊं.’’

‘‘मेरी तरफ से मेहमाननवाजी में कोई कमी नहीं रहेगी, तुम अकेले में आ कर देखो तो…’’ प्रियंका ने हंस कर कहा.

इस के बाद एक दिन महावीर प्रियंका के घर दोपहर के समय चला गया. प्रियंका तो जैसे उस का इंतजार कर रही थी. मौके का फायदा उठाते हुए उस दिन दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. इस के बाद तो प्रियंका महावीर की मुरीद हो गई. मौका मिलने पर दोपहर के समय वह प्रियंका के घर चला जाता. इस तरह कुछ दिनों तक उन का यह खेल बिना किसी रुकावट के चलता रहा. कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते.  एक दिन बुद्धि प्रकाश खेत से जल्दी ही लौट आया और उस ने प्रियंका को महावीर के साथ रंगरलियां मनाते देख लिया. फिर तो बुद्धि प्रकाश का खून खौल उठा.

महावीर तो भाग गया, लेकिन उस ने प्रियंका की जम कर धुनाई शुरू कर दी. प्रियंका ने गलती मानी तो बुद्धि प्रकाश ने यह चेतावनी देते हुए उसे छोड़ दिया कि अगली बार ऐसा हुआ तो तुम दोनों जिंदगी से हाथ धो बैठोगे. जिसे पराया घी चाटने की आदत पड़ जाए वह कहां बाज आता है. एक बार कीबात है. पति के सो जाने के बाद प्रियंका अपने प्रेमी से फोन पर बातें कर रही थी. उसी दौरान बुद्धि प्रकाश की नींद खुल गई. उस ने पत्नी की बातें सुनली थीं. फिर क्या था, उसी समय बुद्धि प्रकाश ने प्रियंका पर जम कर लातघूंसों की बरसात कर दी.

प्रियंका किसी भी हालत में महावीर का साथ नहीं छोड़ना चाहती थी. इस की वजह से अकसर ही उसे पति से पिटाई खानी पड़ती थी. रोजरोज की कलह और पिटाई से अधमरी होती जा रही प्रियंका का पोरपोर दुखने लगा था. प्रियंका का सब से ज्यादा आक्रोश तो इस बात को ले कर था कि बुद्धि प्रकाश जम कर शराब पीने लगा था और नशे में धुत हो कर उसे गंदीगंदी गालियों से जलील करता था. प्रियंका ने महावीर पर औरत का आखिरी अस्त्र चला दिया कि तुम्हारे कारण मैं हर रोज रूई की तरह धुनी जाती हूं और तुम कुछ भी नहीं करते. प्रियंका ने महावीर के सामने शर्त रख दी, ‘‘फूल चाहिए तो कांटे को जड़ से खत्म करना पड़ेगा.’’

प्रियंका की खातिर महावीर बुद्धि प्रकाश का कत्ल करने को तैयार हो गया. फिर योजना के तहत अगले दिन महावीर यह कहते हुए बुद्धि प्रकाश के पावोंं में गिर पड़ा, ‘‘दादा, मैं कल गांव छोड़ कर जा रहा हूं ताकि तुम्हारा कलह खत्म हो सके.’’

बुद्धि प्रकाश ने भी महावीर पर यह सोच कर भरोसा जताया कि संकट अपने आप ही जा रहा है. महावीर ने बुद्धि प्रकाश को यह कहते हुए शराब की दावत दे डाली कि भैया आखिरी मुलाकात का जश्न हो जाए. बुद्धि प्रकाश के मन में तो कोई खोट नहीं थी. उस ने सहज भाव से कह दिया, ‘‘ठीक है भैया, अंत भला सो सब भला.’’

महावीर ने तो थोड़ी ही शराब पी, लेकिन बुद्धि प्रकाश को जम कर पिलाई. नशे में बेहोश हो चुके बुद्धि प्रकाश को महावीर ने घर के बरामदे में रखे तख्त पर ला कर पटक दिया. फिर प्रियंका की मदद से रस्सी से उस का गला घोंट दिया. पुलिस द्वारा निकाली गई काल डिटेल्स के मुताबिक महावीर ने रात करीब 12 बजे बुद्धि प्रकाश की हत्या करने के बाद प्रियंका से 20 से 25 मिनट बात की. इस के बाद प्रियंका सो गई थी. प्रियंका से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के प्रेमी महावीर मीणा को भी गिरफ्तार कर लिया. फिर दोनों को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित

 

 

 

 

 

Rajasthan Crime News : पत्नी ने नौकर संग मिलकर रची साजिश फिर कर दिया पति का कत्ल

Rajasthan Crime News : रुक्मिणी पढ़ीलिखी ही नहीं बल्कि एक सरकारी टीचर प्रेमनारायण मीणा की पत्नी थी. वह एक बेटी की शादी भी कर चुकी थी. 40 साल की उम्र में उस ने घरेलू नौकर जितेंद्र से नजदीकी संबंध बना लिए. यह संबंध उस के लिए इतने घातक सिद्ध हुए कि…

बात 26 मार्च, 2021 की सुबह 7 बजे की है. राजस्थान के बारां जिले के गांव आखाखेड़ी के रहने वाले मास्टर प्रेमनारायण मीणा के यहां उन का भतीजा राजू दूध लेने पहुंचा तो उन के घर का मुख्य गेट भिड़ा हुआ था. दरवाजा धक्का देने पर खुला तो भतीजा घर में चला गया. उस की नजर जैसे ही आंगन में चारपाई पर पड़ी तो वहां का मंजर देख कर वह कांप गया. बिस्तर पर चाचा प्रेमनारायण की खून सनी लाश पड़ी थी. यह देख कर भतीजा चीखनेचिल्लाने लगा. आवाज सुन कर प्रेमनारायण की पत्नी रुक्मिणी (40 वर्ष) अपने कमरे से बाहर आई. बाहर आते समय वह बोली, ‘‘क्यों रो रहे हो राजू, क्या हुआ?’’

मगर जैसे ही रुक्मिणी की नजर चारपाई पर खून से लथपथ पड़े पति पर पड़ी तो वह जोरजोर से रोनेचिल्लाने लगी. रोने की आवाज मृतक के बच्चों वैभव मीणा और ऋचा मीणा ने भी कमरे में सुनी. वह दरवाजा पीटने लगे कि क्या हुआ. क्यों रो रही हो. दरवाजा खोलो. उन भाईबहनों के दरवाजे के बाहर कुंडी लगी थी. कुंडी खोली तो भाईबहन बाहर आ कर पिता की लाश देख कर रोने लगे. मास्टर प्रेमनारायण के घर से सुबहसवेरे रोने की आवाज सुन कर आसपास के लोग भी वहां आ गए. थोड़ी देर में पूरे आखाखेड़ी गांव में मास्टर की हत्या की खबर फैल गई. थाना छीपा बड़ौद में किसी ने हत्या के इस मामले की खबर दे दी.

थानाप्रभारी रामस्वरूप मीणा खबर मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. थानाप्रभारी मीणा ने घटनास्थल का मुआयना किया. रात में अज्ञात लोगों ने घर में सो रहे सरकारी टीचर प्रेमनारायण की धारदार हथियार से गला, मुंह और सिर पर वार कर के हत्या कर दी थी, जिस से काफी मात्रा में खून निकल चुका था. पूछताछ में मृतक की पत्नी रुक्मिणी ने बताया कि वह कमरे में सो रही थी. उस के दोनों बच्चे वैभव और ऋचा अलग कमरे में सो रहे थे. बड़ी बेटी ससुराल में थी. वह (प्रेमनारायण) आंगन में अकेले सो रहे थे, तभी नामालूम किस ने उन्हें मार डाला.

थानाप्रभारी रामस्वरूप मीणा ने घटना की खबर उच्चाधिकारियों को दे दी. एसपी (बारां) विनीत कुमार बंसल ने सीओ (छबड़ा) ओमेंद्र सिंह शेखावत व जयप्रकाश अटल आरपीएस (प्रोबेशनरी) को निर्देश दिए कि वे घटनास्थल पर जा कर मौकामुआयना कर जल्द से हत्याकांड का खुलासा करें. एसपी के निर्देश पर दोनों सीओ ओमेंद्र सिंह और जयप्रकाश अटल घटनास्थल पर पहुंचे और घटना से संबंधित जानकारी ली. पुलिस अधिकारियों ने एफएसएल एवं डौग स्क्वायड टीम को भी बुला कर साक्ष्य जुटाने के निर्देश दिए. पुलिस अधिकारियों को पता चला कि मृतक प्रेमनारायण मीणा सरकारी स्कूल में टीचर थे.

उन की पोस्टिंग इस समय मध्य प्रदेश के गुना जिले के फतेहगढ़ के सरकारी स्कूल में थी. वह छुट्टी पर घर आए हुए थे. वह 15-20 दिन बाद छुट्टी पर गांव आते थे. पुलिस को पता चला कि मृतक प्रेमनारायण घर के आंगन में सोए थे. उन की बीवी कमरे में अलग सोई थी. उन के 3 बच्चे हैं, जिन में से बड़ी बेटी की शादी हो चुकी थी. वह अपनी ससुराल में थी. जबकि छोटे दोनों बच्चे वैभव व ऋचा अलग कमरे में सो रहे थे. घर के आंगन में हत्यारों ने आ कर हत्या की थी, मगर बीवी व बच्चों ने कुछ नहीं सुना था. बीवी सुबह 7 बजे तब जागी, जब भतीजा राजू दूध लेने आया.

यह बात पुलिस को पच नहीं रही थी. मृतक के मुंह, सिर और गरदन पर लगे गहरे घावों से रिसा खून सूख चुका था. इस का मतलब था कि मृतक की हत्या हुए 6-7 घंटे का समय हो चुका था. एफएसएल टीम ने साक्ष्य एकत्रित किए. तब पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया. पुलिस अधिकारियों ने अपने मुखबिरों को सुरागसी के लिए लगा दिया. वहीं मृतक के बच्चों वैभव व ऋचा से एकांत में पूछताछ की. बच्चों ने बताया कि कल रात मम्मी ने हमें धमका कर अलग कमरे में सुला दिया था. मम्मी ने हमें कमरे में बंद कर के बाहर से कुंडी लगा दी थी. मम्मी अलग कमरे में सोई थी. बच्चों ने यह भी बताया कि वह हमेशा मम्मी के कमरे में सोते थे, लेकिन उन्होंने कल हमें दूसरे कमरे में सुला दिया था.

वैभव को पुचकार कर पुलिस अधिकारियों ने कुछ और जानकारी पूछी तो उस ने एक पत्र ला कर पुलिस अधिकारियों को दिया. वैभव ने कहा, ‘‘यह चिट्ठी मेरी बड़ी बहन, जो शादीशुदा है, ने पापा को लिखी थी. यह पत्र हम भाईबहनों को मिला तो हम ने छिपा दिया था.’’

उस पत्र में मृतक की बड़ी बेटी ने पापा प्रेमनारायण को लिखा था कि वह मम्मी को बदनाम नहीं करना चाहती है. नौकर जितेंद्र को अब अपने यहां नहीं रखना चाहिए. पुलिस ने चिट्ठी के आधार पर तथा वारदात से जुड़े अन्य पहलुओं पर जांच करते हुए जांच आगे बढ़ाई. पुलिस ने साइबर एक्सपर्ट सत्येंद्र सिंह की भी मदद ली. बच्चों ने पुलिस अधिकारियों से यहां तक कहा कि पापा की हत्या किसी और ने नहीं बल्कि मम्मी ने ही नौकर जितेंद्र उर्फ जीतू बैरवा (मेघवाल) के साथ मिल कर रात में की है. रात में वैभव कमरे से बाहर आना चाहता था मगर कमरा बाहर से लौक था. इस कारण वह वापस जा कर सो गया था.

इसी दौरान मुखबिरों ने भी पुलिस को जानकारी दी. इन सब तथ्यों पर गौर किया गया तो मृतक की पत्नी का किरदार संदिग्ध नजर आया. पुलिस अधिकारियों ने तब उसे पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. पुलिस ने रुक्मिणी से कड़ी पूछताछ की. पूछताछ में वह टूट गई. उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. उस ने अपने प्रेमी व नौकर जितेंद्र उर्फ जीतू बैरवा और एक अन्य हंसराज भील के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. बस, फिर क्या था, पुलिस ने उसी दिन जितेंद्र और हंसराज भील को भी दबोच लिया. थाने ला कर उन से पूछताछ की.

पूछताछ में उन्होंने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया.  जितेंद्र ने बताया कि वह पिछले 2 साल से टीचर प्रेमनारायण के घर नौकर था. वह खेतों की रखवाली और खेतीबाड़ी करता था. जितेंद्र को 65 हजार रुपए सालाना तनख्वाह पर रखा हुआ था. प्रेमनारायण ज्यादातर समय अपनी ड्यूटी पर फतेहगढ़, मध्य प्रदेश में रहते थे. वह 15-20 दिन बाद ही अपने गांव आखाखेड़ी आते थे. प्रेमनारायण की अपनी बीवी से नहीं बनती थी. दोनों में मनमुटाव रहता था. इस कारण रुक्मिणी ने पति की गैरमौजूदगी में अपने नौकर से अवैध संबंध बना लिए थे. प्रेमनारायण की बड़ी बेटी ने एक दिन अपनी मम्मी और नौकर जितेंद्र को रंगरलियां मनाते देख लिया था.

इस कारण वह चिट्ठी लिख कर पापा को अपनी मम्मी की करतूत बताना चाहती थी. मगर यह चिट्ठी उस के छोटे भाईबहनों के हाथ लग गई थी. तब उन्होंने चिट्ठी पढ़ कर छिपा ली. 26 मार्च, 2021 को यह चिट्ठी बच्चों ने पुलिस अधिकारियों को सौंपी. तब जा कर इस घटना की परतें खुलनी शुरू हुईं. प्रेमनारायण को किसी तरह बीवी और नौकर के अवैध संबंधों की खबर लग गई थी. इस कारण वह इन दोनों के बीच राह का रोड़ा बन चुके थे. इस रोड़े को हमेशा के लिए रास्ते से हटाने के लिए रुक्मिणी ने एक योजना बना ली. फिर जितेंद्र ने 31 वर्षीय हंसराज भील को 20 हजार रुपए दे कर योजना में शामिल कर लिया. हंसराज जितेंद्र का दोस्त था. पुलिस ने मात्र 3 घंटे में ही मास्टर प्रेमनारायण मीणा की हत्या का राजफाश कर दिया.

मृतक के शव का मैडिकल बोर्ड से पोस्टमार्टम करा कर शव परिजनों को सौंप दिया गया. परिजनों ने उसी रोज दोपहर बाद अंतिम संस्कार क र दिया. आखाखेड़ी में मास्टर की मौत से सनसनी फैल गई थी. जिस ने भी बीवी और उस के प्रेमी नौकर की करतूत के बारे में सुना, सन्न रह गया. आरोपी पुलिस हिरासत में थे, जिन से पुलिस अधिकारियों ने पूछताछ की. पूछताछ में जो घटना प्रकाश में आई, वह इस प्रकार थी. प्रेमनारायण मीणा अपनी पत्नी रुक्मिणी और 3 बच्चों के साथ जिला बारां के गांव आखाखेड़ी में रहते थे. वह सरकारी अध्यापक थे. प्रेमनारायण की ड्यूटी इन दिनों मध्य प्रदेश के जिला गुना के फतेहगढ़ में थी. वह महीने में एकाध बार अपने गांव बीवीबच्चों से मिलने आते रहते थे.

प्रेमनारायण जहां शांत स्वभाव के थे तो वहीं उन की बीवी कर्कश स्वभाव की थी. उन की शादी को 20 साल से ज्यादा हो गए थे मगर इतना समय साथ गुजारने के बाद भी मियांबीवी में अकसर झड़प हो जाया करती थी. उन के बच्चे बड़े हो गए थे. मगर दोनों का मनमुटाव कम नहीं हुआ. रुक्मिणी दिनरात काम कर के थक जाने का रोना रोती रहती थी. तब प्रेमनारायण ने वार्षिक तनख्वाह पर जितेंद्र उर्फ जीतू बैरवा  को 2 साल पहले घर का नौकर रख लिया. जितेंद्र जहां खेतों पर काम करता, वहीं घर पर भी काम करता था. रुक्मिणी और जितेंद्र का रिश्ता मालकिन और नौकर का था. मगर पति के दूर रहने और मनमुटाव के चलते रुक्मिणी शारीरिक सुख से वंचित थी.

जब उसे जितेंद्र नौकर के रूप में मिला तो वह उसे बिस्तर तक ले आई. रुक्मिणी की उम्र 40 साल थी. इस के बावजूद वह अपने से 8 साल छोटे नौकर के साथ सेज सजाने लगी. उस ने नौकर को प्रेमी बना लिया और उस की बांहों में झूला झूलने लगी. रुक्मिणी की बड़ी बेटी शादी लायक हो गई थी. इस के बावजूद अधेड़ उम्र में उस पर वासना का ऐसा भूत सवार हुआ कि वह जबतब मौका पा कर नौकर जितेंद्र बैरवा के साथ शारीरिक संबंध बनाने लगी. एक रोज बेटी ने अपनी मां को नौकर के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. अपनी मां का यह रूप देख कर बेटी को उस से नफरत सी हो गई. मां का यह रूप देख कर उसे कई दिन तक कुछ भी अच्छा नहीं लगा.

वह सोचने लगी कि क्या किया जाए. इसी बीच एक दिन फिर उस ने अपनी मां को नौकर जितेंद्र के साथ देख लिया. तब उस ने अपने पापा को लिखे एक पत्र में मम्मी की करतूत और नौकर को हटाने के बारे में लिखा. पत्र पापा के पास पहुंचने से पहले ही वह छोटे भाई वैभव व बहन ऋचा के हाथ लग गया. दोनों बहनभाइयों ने वह पत्र छिपा दिया. उन्हें पता था कि पापा ने यह पत्र देख लिया तो मम्मी की खैर नहीं होगी. बस, उन मासूमों को क्या पता था कि मम्मी को बचाने के चक्कर में वह पापा को एक दिन खो देंगे. पत्र गायब हुआ तो बड़ी बेटी भी चुप्पी लगा गई. एक साल पहले प्रेमनारायण ने बेटी की शादी कर दी. वह अपनी ससुराल चली गई.

कोरोना काल में प्रेमनारायण काफी समय तक घर पर रहे. तब रुक्मिणी को अपने प्रेमी से एकांत में मिलने का मौका नहीं मिला. जब स्कूल खुल गए तब प्रेमनारायण फतेहगढ़ चले गए. पति के जाने के बाद रुक्मिणी और जितेंद्र का खेल फिर से शुरू हो गया. लेकिन छुट्टी पर प्रेमनारायण गांव आते तो बीवी को वह फूटी आंख नहीं सुहाते थे. वह उन से बिना किसी बात के लड़तीझगड़ती रहती. तब वह ड्यूटी पर चले जाते. रुक्मिणी यही तो चाहती थी. इस के बाद वह नौकर के साथ रंगरलियां मनाती. प्रेमनारायण को अपनी बीवी और नौकर जितेंद्र के व्यवहार से ऐसा लगा कि कुछ गड़बड़ है. एकदो बार प्रेमनारायण ने बीवी से इस बारे में पूछा तो वह उलटा उस पर चढ़ दौड़ी.

रुक्मिणी को अंदेशा हो गया कि उस के पति को नौकर के साथ संबंधों का शक हो गया है. तब उस ने नौकर जितेंद्र के साथ साजिश रची कि अब वह प्रेमनारायण को रास्ते से हटा कर अपने हिसाब से जीवन जिएंगे. रुक्मिणी के कहने पर जितेंद्र यह काम करने को राजी हो गया. घटना से 10 दिन पहले प्रेमनारायण छुट्टी पर घर आए थे. होली के बाद उन्हें वापस फतेहगढ़ जाना था. इन 10 दिनों में रुक्मिणी और जितेंद्र को एकांत में मिलने का मौका नहीं मिला. ऐसे में रुक्मिणी और उस के प्रेमी ने तय कर लिया कि अब जल्द ही योजना को अंजाम दिया जाएगा, तभी वह चैन की जिंदगी जी सकेंगे. जितेंद्र ने अपने दोस्त हंसराज को 20 हजार का लालच दे कर योजना में शामिल कर लिया.

25 मार्च, 2021 की आधी रात को योजना के तहत जितेंद्र और हंसराज तलवार और कुल्हाड़ी ले कर रुक्मिणी के घर के पीछे पहुंचे. रुक्मिणी ने पहली मंजिल पर जा कर मकान के पीछे वाली खिड़की से रस्सा नीचे फेंका. रस्से के सहारे जितेंद्र और हंसराज मकान की पहली मंजिल पर खिड़की से आ गए. इस के बाद घर के आंगन में बरामदे में सो रहे मास्टर प्रेमनारायण पर नींद में ही तलवार और कुल्हाड़ी से हमला कर मार डाला. इस के बाद जिस रास्ते से आए थे, उसी रास्ते से अपने हथियार ले कर चले गए. रुक्मिणी निश्चिंत हो कर कमरे में जा कर सो गई. सुबह जब मृतक का भतीजा राजू दूध लेने आया तो उस की चीखपुकार सुन कर रुक्मिणी आंखें मलती हुई कमरे से बाहर आई. वह नाटक कर के रोनेपीटने लगी. मगर उस की करतूत बच्चों ने चिट्ठी से खोल दी.

पुलिस ने पूछताछ पूरी होने पर तीनों आरोपियों को कोर्ट में पेश किया, जहां से रुक्मिणी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया. जितेंद्र व हंसराज को 3 दिन के पुलिस रिमांड पर भेजा गया. रिमांड के दौरान आरोपियों से तलवार, कुल्हाड़ी, खून सने कपड़े और मोबाइल बरामद किए गए. रिमांड अवधि खत्म होने पर 30 मार्च, 2021 को फिर से जितेंद्र और हंसराज भील को कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. Rajasthan Crime News

Rajasthan News : 9 साल का बेटा बना पिता की हत्या का गवाह, मां और प्रेमी ने कराई हत्या

Rajasthan News : एक ऐसी दिल दहला देने वाली वारदात सामने आई है जहां महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी. वो भी अपने 9 साल के बेटे के सामने. इस घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है. इस घटना ने पतिपत्नी वफादारी के रिश्ते को तारतार कर दिया है. जानते हैं इस स्टोरी को विस्तार से

यह घटना राजस्थान जिले के अलवर के खेड़ली कस्बे में 7 जून को हुई. जहां एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने ही बेटे के सामने अपने पति का कत्ल करवा डाला. पुलिस ने महिला अनीता और काशीराब और ब्रजेश जाटव को अरेस्ट कर लिया गया है और बाकी के तीन आरोपी विष्णु, नवीन और चेतन फरार हैं. मृतक का नाम वीरु है और वह एक टेंट से जुड़ा व्यवसाय करता था. वीरुर की उम्र 32 साल है. वीरु को उसके मोहल्ले के लोग मान सिंह जाटव के नाम से भी जानते है.

देवर को शक हुआ भाभी पर

पति की मौत के बारे में पूछे जाने पर पत्नी अनीता ने कहा कि उसकी मौत बीमारी के कारण हुई है. उसने अपनी भाभी को फोन कर बताया की वीरू को साइलेंट अटैक हुआ है जिससे उसकी तबीयत खराब होने लगी और मौत हो गई है. लेकिन मृतक का भाई गब्बर जाटव को भाई के गले पर निशान देख कर उसकी मौत के कारण पर शक होने लगा, उसे यह लगने लगा कि उसकी भाई की हत्या गला घोंट कर की गई है. इसी शक के आधार पर गब्बर जाटव ने पुलिस को सूचना दी.

पुलिस ने मामला संदिग्ध मानकर जांच शुरू की और आस पास के 100 से अधिक सीसीटीवी फुटेज खंगाले. साथ ही कौल डिटेल्स की जांच भी की. जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए. इसी आधार पर वीरु की हत्या का पता चल सका. पुलिस ने इस वारदात मे मृतक की पत्नी अनीता, उसका प्रेमी काशीराम और उसके साथी को अरेस्ट कर लिया. जबकि बाकी अपराधी अभी फरार है. उनकी भी तलाश जारी है.

मुख्य गवाह बना बेटा

बेटे ने पुलिस को बताया कि पिता जी रात को देर से घर लौटे थे और फोन चार्ज करने के लिए कहा था. मां ने मुझे जल्दी सोने के लिए कहा था. लेकिन खाट हिलने की आवाज आ रही थी तो मेरी आंखे खुल गई. मैंने देखा, मां ने घर का दरवाजा खोल दिया था और काशीराम अंकल अंदर आए. बच्चे ने कहा कि मैं डर गया था इसलिए मैं चुप रहा. वे सभी कमरे में अंदर गए और मां खाट पर खड़ी थी. उन सभी ने पापा को मुक्का मारा और पैर पकड़ लिए थे. वहीं काशीराम अंकल ने पापा का गला तकिए से दबाकर मार डाला. फिर पापा ने हिलना बंद कर दिया बाद में सभी चले गए. मम्मी ने कुछ भी नही कहा था वह देखती रही.

2 लाख में दी थी सुपारी

एसएचओ धीरेंद्र शास्त्री ने बताया की अनीता ने अपने प्रेमी काशीराम के साथ मिलकर चार किराए के हत्यारों को 2 लाख रुपए में सुपारी देकर पति वीरु का कत्ल कराया. अनीता ने साजिश के तहत रात को अपना घर का दरवाजा जानबूझकर खुला छोड़ दिया ताकि अपराधी आसानी से घर के अंदर आकर घटना का अंजाम दे सके. इसके बाद काशीराम अपने चार साथियों चेतन, विष्णु, नवीन और बृजेश जाटव के साथ मिलकर में घर में दाखिल हुआ और सोते हुए वीरु पर हमला कर दिया. पहले चोरों ने मिलकर उसे मुक्का मार कर पीटा फिर तकिए से गला दबा कर मार डाला. यह पूरी वारदात एक सुनियोजित साजिश के तहत अंजाम दी गई थी. Rajasthan News