UP Crime Story. फेसबुक पर मयंक और सोनू की एक ही लड़की से फै्रंडशिप चल रही थी. सोनू चाहता था कि मयंक उस की फेसबुक फ्रैंड से दूर रहे. इसी बात को ले कर दोनों में तनातनी हुई और बात हत्या तक जा पहुंची.
उत्तर प्रदेश का एक नया जिला है प्रबुद्धनगर. शामली के नाम से जाना जाने वाला यह जिला नया नाम मिलने से पहले मुजफ्फरनगर का एक हिस्सा हुआ करता था. 11 जनवरी, 2014 की सर्द शाम के लगभग 5 बजे थे. शामली की रेलवे रोड पर लोगों की खूब आवाजाही जारी थी. उसी बीच मंडी गेट के सामने कुछ छात्र जमा हो गए. छात्रों का इस तरह जमा होना कोई नई बात नहीं थी. वह समय बच्चों के ट्यूशन आनेजाने का था और छूटने पर वे रास्ते में कहीं भी जमा हो जाते थे.
लेकिन किशोर उम्र के उन छात्रों के चेहरों को देख कर ऐसा लग रहा था, जैसे उन्हें किसी का इंतजार हो. वे चौकन्नी नजरों से इधरउधर देखते हुए आपस में बातें कर रहे थे. उसी बीच लंबे कद का एक किशोर भी अपने कुछ साथियों के साथ वहां आ पहुंचा. पहले से खड़े छात्रों में से एक किशोर ने उसे खूंखार नजरों से घूरते हुए कहा, ‘‘आखिर तू आ ही गया.’’
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अभीअभी आए छात्र ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘सोनू, मैं डरपोक नहीं हूं, जो आने से डरता.’’
बातचीत कर रहे दोनों छात्रों में से एक का नाम सोनू था और दूसरे का मयंक. मयंक के आते ही दोनों के बीच वादविवाद शुरू हो गया. सोनू ने धमकी भरे अंदाज में कहा, ‘‘होश में रहा कर वरना अच्छा नहीं होगा.’’
‘‘होश में तो तू नहीं है, जो अकड़ रहा है. और हां, मुझे ज्यादा कुछ सुनने की आदत नहीं है.’’ ‘‘इस का मतलब तू मानेगा नहीं.’’ सोनू ने भी उसी अंदाज में जवाब दिया. ‘‘मैं क्या तेरा गुलाम हूं, जो तेरी बात मानूं?’’ मयंक ने कहा तो सोनू गुस्से में बोला, ‘‘पिटेगा तो मान जाएगा.’’ ‘‘तूने क्या सोचा है, मैं ने चूडि़यां पहन रखी हैं. बदमाशी किस को दिखाता है.’’ मयंक बांहें चढ़ा लीं.
दोनों तूतू मैंमैं पर उतर आए थे. थोड़ी देर तक दोनों एकदूसरे को धमकाते रहे. फिर यह कहासुनी मारपीट में तब्दील हो गई. दोनों के साथी भी अपनेअपने साथी का पक्ष ले कर उलझ गए. उन की मारपीट देखने के लिए भीड़ लगनी शुरू हो गई.
लड़ने वाले किशोर थे, लोग चाहते तो उन्हें समझा कर शांत कर सकते थे. लेकिन कोई बीच में नहीं आया. लातघूंसों के बाद किशोरों ने अपनीअपनी पैंट से बेल्ट निकाल कर एकदूसरे पर वार करने शुरू कर दिए.
वहां खड़े दर्जनों लोग तमाशा देख रहे थे, पर न तो किसी ने इस की सूचना पुलिस को देनी जरूरी समझी और न ही दखल दे कर झगड़े को सुलझाने की कोशिश की. छात्रों के दोनों गुटों के बीच मारपीट बढ़ गई. कई बार क्रोधावेश में छोटी घटनाएं बड़ा रूप धारण कर लेती हैं. यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ. मारपीट के बीच एक युवक ने चिल्लाते हुए अपनी अंटी में खोंसा हुआ तमंचा निकाला तो लोगों की आंखें फटी की फटी रह गईं. उस ने पलक झपकते ही तमंचे की नाल मयंक की तरफ कर के गुस्से में कहा, ‘‘अब बहुत हो गया, आज मैं तेरा खेल ही खत्म कर देता हूं.’’
लड़के के हाथ में तमंचा देख कर वहां मौजूद लोगों की सांसें अटक गईं. कोई कुछ कर पाता, इस से पहले ही उस ने ट्रिगर दबा दिया. अचानक तेज धमाका हुआ और गोली मयंक की गरदन में जा लगी. गोली लगते ही वह कटे पेड़ की तरह धड़ाम से जमीन पर गिर पड़ा. इसी के साथ भगदड़ मच गई. हमलावर किशोर वहां से भाग निकले. मयंक की गरदन से खून तेजी से बह रहा था. कुछ ही देर में उस ने तड़प कर दम तोड़ दिया.
हत्या होते ही किसी ने इस की सूचना पुलिस को दे दी थी. सरेआम एक किशोर की हत्या की सूचना से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया. सूचना मिलते ही थानाप्रभारी आर.एन. सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर आ पहुंचे. घटनास्थल पर लोगों की भीड़ लगी थी. पुलिस ने अस्पताल पहुंचाने की नीयत से किशोर की नब्ज टटोली. लेकिन उस की नब्ज टूट चुकी थी. वहां पर तमाशबीन तो बहुत थे, लेकिन ऐसा कोई नहीं था, जो सामने आ कर घटना के बारे में बताता.
मृतक के एकदो साथी वहीं खड़े रो रहे थे. उन्हीं से पुलिस को पता चला कि मरने वाला 16 वर्षीय किशोर मयंक था. पुलिस ने उस के घर वालों को सूचना दे कर लाश का मुआयना किया तो मृतक की जेब से एक मोबाइल फोन मिला. प्राथमिक काररवाई के बाद पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. हत्या की इस वारदात से क्षेत्र में सनसनी फैल गई थी. सूचना पा कर पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार राय व पुलिस उपाधीक्षक प्रकाश कुमार भी थाने पहुंच गए. नाबालिगों की सनसनीखेज करतूत से सभी हैरान थे.
मृतक मयंक शामली के गांव कुड़ाना निवासी किसान कौशेंद्र का बेटा था और आरसी पब्लिक स्कूल में 11वीं में पढ़ता था. शाम को वह ट्यूशन के लिए घर से निकला था कि तभी उस के साथ यह घटना घट गई थी.
मयंक की हत्या की खबर से उस के परिवार में कोहराम मच गया था. आननफानन उस के पिता कौशेंद्र अपने कुछ नातेरिश्तेदारों के साथ शामली आ गए. मयंक का हाल देख कर सभी गुस्से में थे. मृतक के साथियों से हुई पूछताछ में हत्या करने वालों में शामली के ही 3 किशोरों के नाम प्रकाश में आए. वे तीनों न सिर्फ नाबालिग थे, बल्कि उसी के स्कूल में पढ़ते थे. पुलिस ने मयंक की जेब से मिले मोबाइल की जांच की तो उस में जो आखिरी नंबर मिला वह सोनू का था.
सोनू आरोपियों में शामिल था. उस के मोबाइल में सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का प्रोफाइल भी खुला था. पुलिस ने उस के चैटिंग बौक्स को जांचा, तो उस में भी सोनू द्वारा देख लेने की धमकी दी गई थी. चैटिंग की पुरानी हिस्ट्री खंगालने पर पता चला कि फेसबुक पर दोनों के बीच यह तनातनी काफी वक्त से चली आ रही थी. इस की प्रमुख वजह थी सोनू की एक सहपाठी छात्रा. एसएसपी अनिल कुमार ने थानाप्रभारी आर.एन. सिंह को नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए.
मामला अजीब और हैरान करने वाला था. पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद मयंक का शव उस के पजिनों के हवाले कर दिया.
पुलिस ने मयंक के पिता की तहरीर के आधार पर 3 किशोरों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया. आरोपियों की तलाश में पुलिस ने दबिश डाली तो सोनू शिकंजे में आ गया. अगले दिन पुलिस ने उस से विस्तारपूर्वक पूछताछ की तो बेहद चौंकाने वाली कहानी सामने आई.
किशोर उम्र में फेसबुक के इस्तेमाल की वजह से सोनू की एक सहपाठी छात्रा को ले कर हुआ छोटा सा विवाद हत्या तक पहुंच गया था. नतीजतन पढ़नेलिखने की उम्र में एक किशोर की जान चली गई, जबकि बाकी कातिल बन गए.
शामली निवासी सोनू मयंक के स्कूल में ही 8वीं का छात्र था. स्कूलों में लड़केलड़कियों के बीच दोस्ती और कभीकभी उस से आगे के किस्से अब कोई नई बात नहीं है. सोनू की उम्र महज 14 साल थी, लेकिन उस के सपनों को आधुनिकता के पंख लगे हुए थे. इस के साथ ही वह अपने सहपाठियों में दबंगई के लिए भी जाना जाता था. किसी का झगड़ा हो या अन्य कोई मामला, वह उस में दखल दे कर अपनी वाहवाही कराने का आदी था.
सोनू की कक्षा में एक लड़की थी सोनिया. उम्र के नाजुक पायदान पर खड़ी सोनिया की दोस्ती एक ही कक्षा में होने के कारण सोनू से हो गई थी. दोनों ने फेसबुक पर भी अपनाअपना एकाउंट बनाया हुआ था. स्कूल के अलावा दोनों फेसबुक पर भी वार्तालाप किया करते थे. सोनू खुद को क्लास का दादा समझता था. एक दिन वह सोनिया से बोला, ‘‘तुम क्लास में किसी से दब कर मत रहना.’’
‘‘मतलब?’’ सोनिया ने हैरानी से पूछा. ‘‘मतलब यह कि तुम्हें कोई कुछ कहे तो मुझे बताना. मैं उसे ठीक कर दूंगा.’’
‘‘तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो. मेरे बारे में ज्यादा मत सोचो, समझे.’’ सेनिया ने उपेक्षा से जवाब दिया तो सोनू ने झटके से कहा, ‘‘वह तो ठीक है, लेकिन…’’
सोनू अपनी बात पूरी करता, उस से पहले ही सोनिया ने उसे टोक दिया, ‘‘मैं ने कहा न कि मेरे बारे में ज्यादा मत सोचो, बस.’’
सोनू बेवजह सोनिया पर अपना हक जताने लगा था. उसी स्कूल में पढ़ने वाला मयंक भी आधुनिकता की बयार का एक झोंका था. एक ही स्कूल के छात्र होने के कारण मयंक व सोनू एकदूसरे को अच्छी तरह जानते थे. फेसबुक की दोस्तों की सूची में लड़कियों को रखना, उन के पोस्ट पर कमेंटस करना, युवा पीढ़ी में नए फैशन की तरह है.
मयंक ने एक दिन सोनू की फेसबुक पर दोस्तों की सूची में सोनिया को देखा तो उस ने भी उसे अपने साथ जोड़ लिया.
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इस तरह दोनों फेसबुक दोस्त बन गए. एक दिन सोनू ने मयंक का नाम सोनिया के दोस्तों की सूची में देखा तो उसे यह अच्छा नहीं लगा. हालांकि इस की कोई वजह नहीं थी. कुछ दिनों तक वह दोनों के प्रोफाइल चेक करता रहा. उस का माथा तब ठनका, जब एक दिन मयंक और सोनू ने फेसबुक पर चैटिंग शुरू की. सोनू ने उस से पूछा, ‘‘तुम सोनिया को जानते हो?’’
‘‘हां, वह हमारे ही स्कूल में तो है, लेकिन क्यों?’’ ‘‘मैं ने यूं ही पूछ लिया था.’’
‘‘बिना बात क्यों पूछ रहा है, कोई तो वजह होगी?’’ मयंक ने पूछा तो सोनू ने टालने वाले अंदाज में कहा, ‘‘ऐसे ही पूछ लिया.’’
‘‘अच्छा एक बात बता, कैसी लड़की है सोनिया?’’ ‘‘क्यों?’’ ‘‘ऐसे ही पूछ रहा हूं.’’
‘‘अब पूछा तो पूछा, आगे से पूछने की हिम्मत मत करना.’’ सोनू ने नाराजगी प्रकट करते हुए जवाब दिया. मयंक को उस से ऐसी उम्मीद नहीं थी. वैसे यह मानवीय स्वभाव है कि जब कोई किसी पर जबरन अपना हक समझता है और कोई उस के बारे में ऐसीवैसी बात करता है तो उसे बुरा लगता है.
‘‘इस में नाराज होने की क्या बात है, तू इतना बिगड़ क्यों रहा है?’’ ‘‘वह मेरी क्लास की है.’’ ‘‘तो मैं क्या करूं?’’ ‘‘बस इतना कर कि सोनिया की फ्रैंडलिस्ट से अलग हो जा.’’ सोनू ने जवाब में लिखा.
मयंक सोनू से सीनियर था और उम्र में बड़ा भी. इसलिए उसे थोड़ा गुस्सा आ गया, ‘‘अच्छा इतनी हिम्मत.’’ ‘‘हिम्मत देखी ही कहां है तूने मेरी.’’ ‘‘दिखा देना कभी हा..हा…हा…’’ मयंक ने उस की बात को हंसी में उड़ा दिया और चैटिंग बंद कर दी.
उस दिन बात आईगई हो गई. उन दोनों की ऐसी बातों से सोनिया बिलकुल अंजान थी. इस बातचीत के बाद सोनू सोनिया के प्रोफाइल पर पैनी नजर रखने लगा. मयंक जो भी टिप्पणी करता था, उस पर भी उस की नजर होती थी. सोनू हालांकि यदाकदा ही बात करता था, लेकिन इस के बाद उस ने मयंक से बात करना छोड़ दिया था. मयंक ने सोचा कि वह उस की और सोनिया की दोस्ती से चिढ़ रहा होगा. एक दिन मयंक को औनलाइन देख कर सोनू ने उस से बातचीत शुरू की, ‘‘मुझे तुझ से बात करनी है.’’
‘‘क्या बात है, बता?’’ ‘‘तू सोनिया की फ्रेंडलिस्ट से बाहर हो जा.’’ ‘‘तुझे क्या परेशानी है? मैं ऐसा नहीं करूंगा, तू कोई दादा है क्या?’’ ‘‘ऐसा ही समझ ले. मैं तुझे देख लूंगा.’’
‘‘ठीक है, देख लेना.’’ मयंक ने भी उसे उसी अंदाज में टाल दिया. दोनों के बीच छोटी सी बात पर तनातनी हुई तो मयंक ने भी इसे प्रतिष्ष्ठा का प्रश्न बना लिया. एक तो वह उम्र में बड़ा था, दूसरे सोनू उस पर गलत दबाव बनाने की कोशिश कर रहा था. उन के बीच चल रही इस तनातनी की जानकारी उन के यारदोस्तों को भी हो गई थी. यह दिसंबर 2013 की बात है.
इस के बाद आए दिन दोनों के बीच इसी मुद्दे पर तकरार होने लगी. सोनू का स्कूल में भी मयंक से सामना होता तो वह उसे दुश्मन की नजर देखता. सोनू के स्कूल के 2 दोस्त थे. उस ने एक दिन उन्हें अपने पक्ष में तैयार कर के कहा, ‘‘मयंक बहुत बनता है, मुझे उसे सबक सिखाना है. तुम लोगों को मेरा साथ देना होगा.’’
‘‘जब हम दोस्त हैं तो साथ तो देंगे ही.’’ साथियों ने उसे आश्वासन दिया.
फेसबुक पर सोनू व मयंक के बीच एकदूसरे को देख लेने की बात करना आम बात हो चुकी थी. 11 जनवरी की दोपहर को मयंक जब अपने घर पर था तो सोनू ने फेसबुक पर उसे काफी बुराभला कहा. यह सब उस ने देखा तो उस ने सोनू को अपने मोबाइल फोन से फोन कर के कहा, ‘‘लगता है, तू बहुत बड़ा दादा है, जो इतनी बड़ीबड़ी बातें करता है.’’
‘‘हां हूं, तुझे मेरी दादागिरी देखनी है तो आज शाम मंडी गेट पर आ जाना, देख लूंगा तुझे.’’ ‘‘और अगर तू नहीं आया तो..?’’
‘‘मैं तो आऊंगा, मां का दूध पिया है तो तू जरूर आना.’’ मयंक ने भी उस से मिलने की ठान ली. उधर सोनू आरपार की लड़ाई की खतरनाक सोच बना चुका था. उस ने अपने 2 खास दोस्तों को भी इस के लिए तैयार कर लिया था.
तय समय पर सोनू अपने दोस्तों के साथ मयंक को सबक सिखाने की नीयत से रेलवे रोड पर पहुंच कर उस का इंतजार करने लगा. मयंक का 4 से 5 बजे तक ट्यूशन होता था. वह अपने घर से ट्यूशन पढ़ने के लिए निकला था. उस ने भी अपने दोस्तों को सोनू वाली बातें बता रखी थीं.
लिहाजा उस के दोस्त भी उस के साथ चलने को तैयार हो गए थे. 5 बजे मयंक के ट्यूशन की छुट्टी हुई तो वह बाहर निकल कर अपने दोस्तों के साथ सड़क पर आया. उस ने आगे चल कर देखा तो सोनू अपने दोस्तों के साथ पहले से ही वहां खड़ा था. मयंक ने सोचा था कि वह उस का जम कर सामना करेगा.
वह नहीं जानता था कि उस के साथ क्या होने वाला है. दोनों के बीच झगड़ा होने लगा. जब मारपीट होने लगी तो मयंक ने अपनी पैंट से बेल्ट निकाल कर उन्हें पीटना शुरू कर दिया. इसी बीच सोनू के साथी ने तमंचा निकाल कर उसे गोली मार दी. उसे गोली लगते ही वे सब वहां से भाग खड़े हुए.
सोनू से पूछताछ के बाद पुलिस ने गोली चलाने वाले छात्र की तलाश शुरू कर दी और उसे भी गिरफ्तार कर लिया. पुलिस के लिए अपनी तरह का यह अलग मामला था. मरने और मारने वाले, दोनों ही नाबालिग थे. कमउम्र में उन्होंने खतरनाक अपराध को अंजाम दिया था.
पुलिस ने पूछताछ के बाद दोनों छात्रों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में बाल सुधार गृह भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक उन की जमानत नहीं हो सकी थी, जबकि तीसरे आरोपी की पुलिस तलाश कर रही थी. इस तरह फेसबुक के चक्कर में न सिर्फ मयंक की जान चली गई, बल्कि आरोपियों के भविष्य पर भी सवालिया निशान लग गए.
इसके बाद अदालती कार्रवाई में क्या हुआ यह ज्ञात नहीं है.
– मनोहर कहानियां, 2014 में प्रकाशित






