Suspense Story: नहीं था वह कोई करिश्मा

Suspense Story: बच्चे को पूंछ निकली देख कर लोगों ने उसे हनुमानजी का अवतार मान लिया और उस के दर्शन के लिए आने ही नहीं लगे, बल्कि उस पर चढावा भी चढ़ाने लगे. लेकिन जब उस पूंछ की वजह से बच्चे को परेशानी हुई तो उस की असलियत सब के सामने आ गई और सभी ने मान लिया कि वह कोई करिश्मा नहीं था.

सरहिंद से पश्चिम की ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर एक गांव पड़ता है संगतपुर सोढियां. इसी  गांव में रहते थे पंजाब के जानेमाने संगीतकार मास्टर जाने खान. उन की संतानों में 5 बेटियां और 2 बेटे थे, जिन में चौथे नंबर पर था इकबाल कुरैशी. इकबाल बचपन से ही गानेबजाने का शौकीन था. वह गीतगजल लिखता और खुद ही गाता. उस के कुछ गीत काफी लोकप्रिय हुए, जिस से उसे लोग गीतकार और गायक के रूप में जाननेपहचानने लगे. अपनी इस शोहरत से वह कुछ इस तरह उत्साहित हुआ कि गीतसंगीत को ही उस ने अपनी आजीविका का साधन बना लिया.

शादी लायक हुआ तो सन 1970 में सुरैया बेगम से उस का निकाह हो गया. सुरैया से उसे 5 बच्चे हुए. बेटियों में उषा,सलमा, शहनाज और बेटों में साहिब अली तथा अमानत अली. पहले इकबाल कुरैशी दूसरी जगह रहते थे, सन 1978 में वह सपरिवार जिला फतेहगढ़ साहिब के गांव नबीपुर में आ कर रहने लगे थे. बच्चे बड़े हुए तो उषा की शादी मलेरकोटला के एक गांव में कर दी. सन 1997 में सलमा का निकाह साहनेवाल के रहने वाले राज मोहम्मद से कर दिया. राज मोहम्मद एक हलवाई के यहां नौकरी करता था. सलमा को बीवी के रूप में पा कर वह बहुत खुश था.

लेकिन राज मोहम्मद की खुशी तब काफूर हो गई, जब उसे किसी ढोंगी तांत्रिक ने बताया कि उस की शरीकेहयात बच्चा जनते ही अल्लाह को प्यारी हो जाएगी. उस तांत्रिक पर राज मोहम्मद को गहरी आस्था थी, इसलिए उस की बात को उस ने पूरी तरह सच मान लिया. यह बात उस ने घर वालों को बताई तो सभी को जैसे सांप सूंघ गया. तांत्रिक की बात को गंभीरता से ले कर सब आपस में सलाहमशविरा करने लगे. परिवार के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘आजकल बड़ा बुरा समय चल रहा है. बहू अगर ससुराल में मर जाती है तो ससुराल वालों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है.’’

‘‘तुम्हारी यह बात एकदम सही है. औरत भले ही अपनी मौत मरी हो, लेकिन पुलिस आ कर सब को पकड़ ले जाती है. तब लड़की के घर वाले भी कहने लगते हैं कि उन की बेटी को दहेज के लालच में ससुराल वालों ने मार दिया है.’’ किसी दूसरे बुजुर्ग ने उस की हां में हां मिलाते हुए कहा.

इस मुद्दे पर काफी विचारविमर्श करने के बाद नतीजा यह निकाला गया कि जब ऐसी स्थिति आएगी तो सलमा को उस के मायके पहुंचा दिया जाएगा. प्रसव के समय अगर वह मायके में मर भी जाती है तो उन पर कोई जिम्मेदारी नहीं आएगी. इस के बाद वही किया गया. सलमा गर्भवती थी ही, प्रसव का समय नजदीक आया तो राज मोहम्मद ने उसे उस के मायके नबीपुर पहुंचा दिया. समय पर सलमा को बेटा पैदा हुआ. बेटा एकदम स्वस्थ था तो सलमा को भी न प्रसव से पहले कोई परेशानी हुई थी न प्रसव के दौरान और न ही प्रसव के बाद. बच्चे को जन्म देते समय उस के मर जाने की बात तो दूर, उसे कोई ज्यादा तकलीफ भी नहीं हुई थी. कुछ दिनों बाद सलमा पहले की तरह घरबाहर के सभी काम भी करने लगी थी.

सलमा को बेटा हुआ है, इस बात की सूचना देने के बावजूद भी उस की ससुराल से न कोई आया और न किसी तरह की खुशी मनाई. तांत्रिक की बातों पर विश्वास करते हुए ससुराल वाले सलमा की मौत का इंतजार करते रहे. समय अपनी रफ्तार से बढ़ता रहा. सलमा सहीसलामत अपने बच्चे की परवरिश करती रही. उसे तांत्रिक की भविष्यवाणी की जानकारी नहीं थी. हां, यह सोच कर वह जरूर परेशान हो रही थी कि उस की ससुराल वाले उसे और बच्चे को देखने क्यों नहीं आए. उसे क्या पता कि ससुराल वाले उस के मरने का इंतजार कर रहे हैं. उसे तो इस बात की कल्पना तक नहीं थी.

इसी तरह कुछ दिन और बीते. जब सलमा को कुछ नहीं हुआ तो उस की ससुराल वाले बारीबारी से आ कर बच्चे को देख गए. जब उन्हें विश्वास हो गया कि सलमा को कुछ नहीं होने वाला तो एक दिन राज मोहम्मद आ कर सलमा को लिवा ले गया. दरअसल, इस बीच राज मोहम्मद ने तांत्रिक से मिल कर इस बारे में बात कर ली थी. तब उस ढोंगी तांत्रिक ने उस से अच्छेखासे पैसे ले कर कहा था कि इस बार का खतरा उस ने अपनी शक्ति से टाल दिया है. लेकिन दूसरा बच्चा निश्चित ही उस के लिए परेशानी खड़ी करेगा. सलमा का दूसरा बच्चा पैदा होगा तो वह कहीं की न रहेगी. दूसरे बच्चे के जन्म के समय वह मर जाएगी. अगर मरी नहीं तो निश्चित पागल हो जाएगी.

खैर, सलमा ससुराल पहुंच गई. बेटे के साथ वह दिन भर मस्त और व्यस्त रहती. हमेशा खुशी का आलम बना रहता था. पहले उसे इस बात की शिकायत थी कि बेटा पैदा होने पर ससुराल से तुरंत कोई क्यों नहीं आया था, लेकिन धीरेधीरे उस ने इसे भी भुला दिया. किसी दिन सलमा ने घर वालों के बीच हो रही बातचीत सुन ली तो उसे तांत्रिक वाली बात मालूम हो गई. सच्चाई जान कर उसे बहुत दुख हुआ. उस का मन चाहा कि वह इस बारे में सब से चीखचीख कर पूछे, लेकिन उस ने समझदारी से काम लिया. किसी भी तरह का बखेड़ा खड़ा किए बगैर वह शांत रही. यही नहीं, इस बात को मन से निकालने का भी प्रयास किया. आखिर कुछ दिनों बाद इसे भूल भी गई.

वक्त पंख लगा कर उड़ता रहा. सलमा का बेटा साल भर का हो गया. सलमा ने अपनी हैसियत के मुताबिक बच्चे का जन्मदिन खूब धूमधाम से मनाया. उन्होंने उस बच्चे का नाम रखा था मनी मोहम्मद. मनी मोहम्मद अभी कुल सवा साल का हुआ था कि सलमा के पैर फिर से भारी हो गए. समय के साथ वह फिर उस स्थिति में आ गई कि किसी भी समय बच्चा पैदा हो सकता है तो बहाना बना कर राज मोहम्मद उसे एक बार फिर उस के मांबाप के पास नबीपुर छोड़ आया. इस बार सलमा को तांत्रिक की बताई हर बात मालूम थी. उस ने यह बात पिता को ही नहीं, अन्य लोगों को भी बता दी थी. लेकिन किसी ने उस की इस बात पर ध्यान नहीं दिया. तब सब ने यही कहा कि हो सकता है पिछली बार की तरह इस बार भी मायके में प्रसव होने से अनहोनी टल जाए.

सलमा का मन इस तरह की बातों से काफी खिन्न था. लेकिन वह कर भी क्या सकती थी. उस ने अब्बू से बात की तो उन्होंने भी उसे समझाते हुए कहा, ‘‘जैसा लोग सोचते हैं, उन्हें सोचने दो. तुम अपने दिमाग पर किसी तरह का बोझ मत डालो. पिछली बार तुम्हें कोई परेशानी नहीं हुई थी न, देखना इस बार भी कोई परेशानी नहीं होगी.’’

पिता कुछ भी कहते, कितना भी समझाते, लेकिन सलमा के मनमस्तिष्क पर इन बातों का गहरा असर पड़ चुका था. ससुराल वालों का व्यवहार भुला पाना उस के लिए मुश्किल हो रहा था. लिहाजा वह उदास रहने लगी थी. जैसेतैसे दिन गुजरते गए. नबीपुर से एक किलोमीटर की दूरी पर बसे गांव जलवेड़ा की दाई शिब्बो को पहले ही सहेज दिया गया था. शिब्बो दाई 100 साल की उम्र पार कर चुकी थी. अपने फन में माहिर शिब्बो ने यही काम कर के एक तरह से इतिहास रचा था. अपनी पूरी तैयारी कर के उस ने वक्त पर पहुंचने का आश्वासन दिया था. 15 फरवरी, 2001 की शाम को शिब्बो का बुलावा आया तो पहले से ही तैयार बैठी शिब्बो नबीपुर पहुंच गई.

पहले बच्चे की तरह सलमा ने इस बार भी स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया. इस बार भी उस का प्रसव शिब्बो ने करवाया था. शिब्बो बच्चे की सफाई करने लगी तो उस का स्वरूप देख कर चौंकी. अब तक के जीवन में हजारों बच्चों को जन्म दिलवाया था, लेकिन इस तरह का बच्चा उस ने पहले कभी नहीं देखा था. इस बच्चे का स्वरूप उसे चमत्कारिक लगा. शक्लसूरत से बच्चा भले ही इंसानी लग रहा था, लेकिन उस के शरीर में विलक्षण चीजों की कमी नहीं थी.

शिब्बो ने नाल काटने के बाद बच्चे को नहला कर लिटा दिया और उसे एकटक देखने लगी. पल भर बाद अचानक वह जोर से चिल्ला कर बोली, ‘‘अरे कहां है बच्चे का बाप, बुलाओ उसे? हजारों बच्चे पैदा किए हैं, लेकिन ऐसा बच्चा पहले कभी नहीं देखा. कोई कुछ भी कहे, लेकिन मैं कहती हूं कि यह बच्चा बजरंग बली का अवतार है. इस की पूंछ देखो, बाजू और हाथपैर देखो, इस के जिस्म का एकएक अंग कह रहा है कि यह पवनपुत्र का अवतार है.’’

बच्चा देखने में खूबसूरत था और पूरी तरह स्वस्थ भी. इस के बावजूद उस के समूचे जिस्म में अनेक विलक्षणताएं थीं. सब से बड़ी विलक्षणता तो यह थी कि उसे डेढ़दो इंच लंबी पूंछ थी. इस के अलावा बच्चे के शरीर में कुछ अन्य निशान भी अन्य बच्चों से अलग थे. उस समय कमरे में सलमा और नवजात शिशु के अलावा शिब्बो दाई ही थी. अपने काम के लिए शिब्बो को आज तक किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़ी थी. उस की अलाप सुन कर घर की महिलाएं दौड़ कर कमरे में आ गईं. उन्होंने भी बच्चे को देखा तो दांतों तले अंगुली दबा ली. कुछ ही देर में पासपड़ोस के लोग भी पहुंच गए. उन में गांव के एक जानेमाने पुजारी भी थे.

उन्होंने बच्चे के जिस्म की विलक्षणताओं को परखने का प्रयास किया. बच्चा पलक नहीं झपका रहा था. उस के बाएं बाजू पर गोल निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना सीता माता की मोहर से की. बाएं पांव पर तीर का निशान था. पुजारीजी ने इस की तुलना राजा भरत के तीर मारने की घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि यह उसी तीर का निशान है. उसी पांव पर टखने के पास कुंडल का निशान था. पुजारीजी ने कहा कि हनुमानजी जो कुंडल पहनते थे, यह उसी का निशान है. दाएं पैर के नीचे क्रौस का निशान था. इसे पुजारीजी ने पद्म का निशान बताया. उन का कहना था यह निशान उन्हीं लोगों को होता है, जो ईश्वर को बहुत प्यारे होते हैं.

इस के अलावा बच्चे के बाएं कंधे पर रौकेट जैसे तीर का निशान था. कमर में धागा बांधने का भी निशान था. इस के बाद पुजारीजी ने सलमा और बच्चे का पैर छू कर अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कहा, ‘‘यह बच्चा बजरंगबली का अवतार है. सभी लोग सिर झुका कर इस अवतार को प्रणाम करें. इसी के साथ मैं सलमा बेटी से एक बात कहना चाहूंगा. जब तक यह बच्चा सवा साल का न हो जाए, वह पति को अपने पास बिलकुल न आने दें. वह खुद भी पति का मुंह न देखें. साथ ही यह भी कोशिश करें कि उस का पति भी बच्चे का मुंह भी न देखे.’’

इस के बाद तो वहां का माहौल ही बदल गया. बच्चे का नाम रख दिया गया बालाजी. ‘जय बालाजी’ और ‘जय बजरंग बली’ के जयकारे लगने लगे. धीरेधीरे यह समाचार आसपास फैला तो उस के दर्शन के लिए लोग आने लगे. बात मीडिया तक पहुंची तो अगले दिन यह समाचार क्षेत्रीय अखबारों में छप गया. इस के बाद सैंकड़ों लोग बच्चे के दर्शन के लिए पहुंचने लगे. शाम को दर्शनार्थियों की भीड़ कम हुई तो इकबाल कुरैशी ने चढ़ाया गया चढ़ावा समेटा.

इकबाल कुरैशी ने दरजनों गीत लिखे थे. सरदूल सिकंदर और अमर नूरी द्वारा गाए उन के गीत तो इस कदर लोकप्रिय हुए थे कि इकबाल कुरैशी नाम पंजाब के हर शहर, हर मोहल्ले में गूंज गया था. लेकिन इतनी प्रसिद्धि हासिल कर लेने के बाद भी लक्ष्मी कभी उन पर मेहरबान नहीं हुई थी. चूंकि गाने लिखने और गाने के अलावा अन्य कोई धंधा उन के पास नहीं था, इसलिए वह हमेशा ही मुफलिसी से घिरे रहते थे. लेकिन आज उन के यहां जैसे नोटों की बरसात हुई थी. यह सिलसिला केवल एक दिन का नहीं था. जितने लोग पहले दिन आए थे, उस से कहीं ज्यादा लोग अगले दिन आए थे. फिर तो यह संख्या बढ़ती ही गई. आने वाले बढ़ते गए तो चढ़ावे की राशि भी बढ़ती गई.

लोग नन्हे बालाजी के सामने हाथ जोड़ कर मनौती भी मांगने लगे. काम हो जाने के बाद गाजेबाजे के साथ चढ़ावा ले कर आने लगे. कुछ ही दिनों में नबीपुर की अलग ही महिमा हो गई. श्रद्धालुओं ने पैसा इकट्ठा कर के नबीपुर में एक बहुत बड़ा भूखंड खरीद लिया. उस पर धार्मिक स्थल का निर्माण भी शुरू करवा दिया. इधर सलमा के मायके में यह सब चल रहा था, उधर ससुराल में इस मुद्दे पर कई दिनों तक विचारविमर्श किया गया. इस के बाद एक दिन वे सलमा और उस के बच्चों को ले जाने के लिए नबीपुर आ पहुंचे. लेकिन इकबाल कुरैशी ने उन्हें सलमा से मिलने नहीं दिया. इस के बाद बात पंचायत तक पहुंची. पंचायत को जब पुजारी की बात बताई गई तो पंचायत ने फैसला दिया कि जब तक बच्चा सवा साल का नहीं हो जाता, राज मोहम्मद उस का और पत्नी का मुंह नहीं देखेगा.

बच्चे के सवा साल होने के बाद वह इन्हें ले जा सकता है. इस बीच राज मोहम्मद को प्रत्येक सप्ताह चढ़ावे की राशि से 2 हजार रुपए मिलेंगे. इस तरह बच्चे की वजह से उस की महीने में 8 हजार रुपए की कमाई होने लगी. पंचायत का यह फैसला सभी को जंच गया और सलमा की ससुराल वाले खुशीखुशी वापस लौट गए. यह सिलसिला चलते एक साल से अधिक बीत गया. इस बीच बच्चे के जिस्म के निशान जहां मिटने लगे थे, वहीं उस की पूंछ बढ़ कर 6 इंच हो गई थी. धीरेधीरे मामला पंजाब में चर्चा का विषय बन गया. कोई इसे अद्भुत चमत्कार कहता था तो कोई कुदरत का अनूठा करिश्मा कहता था. तमाम लोगों की धार्मिक भावनाएं बच्चे के साथ जुड़ गईं तो कुछ लोगों ने इसे अंधविश्वास कहा.

डाक्टरों ने इसे न चमत्कार माना, न कोई करिश्मा. उन का कहना था कि बच्चे की पूंछ तत्काल कटवा देनी चाहिए, वरना यह पूंछ उस के लिए भारी परेशानी बन जाएगी. उन्होंने इसे चाइल्ड एब्यूज का मामला माना है. तर्कशील सोसायटी वालों ने भी आ कर इकबाल कुरैशी को उन्हें समझाया कि वे अंधविश्वास को बढ़ावा दे रहे हैं. लेकिन उस समय किसी ने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया. तब घर के सभी लोग इस बात पर अड़े रहे कि उन के यहां पवनपुत्र का अवतार हुआ है. कहा जाता है कि अपने देश में आज शिक्षण व चिकित्सा संस्थानों से कई गुना ज्यादा धार्मिकस्थल हैं. कहा तो यह भी जाता है कि इन्हीं की वजह से इस से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने लगी है. क्योंकि अधिकांश लोग धर्म के मामले में संवेदनशील तो हैं ही, धर्मांध की तरह व्यवहार भी करते हैं.

यही वजह है कि कुकुरमुत्तों की तरह कथित धर्मस्थल पनपने लगे हैं. ऐसे में हनुमानजी के इस कथित अवतार वाला यह नया कथित धर्मस्थल भी न केवल अस्तित्व में आ गया, बल्कि धर्मभीरू लोगों के आकर्षण और उन की अंधश्रद्धा का केंद्र भी बन गया. झंडे लहरा उठे, घंटियां बजने लगीं. हनुमानजी के विभिन्न स्वरूपों वाले चित्रों का सहारा लिया जाने लगा. भीड़ जुट रही थी, पैसा बरस रहा था. लेकिन 2 साल बीततेबीतते स्थिति यह बन गई कि बालाजी नामक इस बालक की पूंछ की लंबाई 7 इंच पर पहुंच कर रुक गई. इसी के साथ बच्चे के जिस्म के सारे निशान मिट गए. इसी के साथ तमाम अंगों का विकास रुकने लगा. इस के अलावा उसे अन्य कई तरह की परेशानियां भी होने लगीं. तब उसे डाक्टरों के पास ले जाया गया.

डाक्टरों ने उस की परेशानियों का इलाज करते हुए बताया कि इस सब की वजह बच्चे के जिस्म पर उगी पूंछ है. लेकिन उन्होंने पूंछ काटने में अपनी असमर्थता जाहिर कर दी. बच्चे की पूंछ कटवाने को ले कर परिवार में 2 राय थी. पूंछ के कटते ही सारा खेल खत्म हो जाता, लेकिन कुछ समय बाद इस विकृति ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया. बच्चा देखने में अपनी उम्र से छोटा तो लग ही रहा था, उस के निचले अंगों में खासी परेशानी होने लगी. वह चलनेफिरने में अक्षम होने लगा. हाजत होने के साथ पेशाब तुरंत निकल जाती. फिर भी जैसेतैसे समय आगे सरकता गया और अजीब शारीरिक परेशानियों से ग्रस्त बच्चे को हनुमानजी का अवतार कहते धर्म की दुकानदारी चलती रही.

यहां एक बात बताना जरूरी होगा कि एक ढोंगी तांत्रिक ने इस बच्चे के जन्म के बाद उस की मां की मौत हो जाने की ‘भविष्यवाणी’ की थी. मगर मां को तो कुछ नहीं हुआ, बच्चा 4 साल का हुआ तो उस के पिता की मौत जरूर हो गई. इस के बाद बच्चे की मां ने दूसरा निकाह कर लिया. खैर, बच्चे के भीतर पैदा हुए विकारों में बढ़ोत्तरी होती जा रही थी. धर्मभीरु लोग उस के आगे हाथ जोड़ कर खड़े आशीर्वाद की दरकार कर रहे होते और उस की पेशाब निकल कर उन भक्तों की ओर बढ़ने लगती. धीरेधीरे लोगों के मनों में यह धारणा बैठने लगी कि बच्चे के केवल पूंछ निकल आने से ही उसे भगवान कह कर कहीं उन्हें मूर्ख तो नहीं बनाया जा रहा. उन का विश्वास डगमगाने लगा. बच्चा पहले ही से बीमार लग रहा था, अब अभिभावक भी उसे बीमार कह कर पेशाब निकलने की बात कहने लगे.

जब भगवान ही बीमार पड़ गए तो भक्तों का क्या भला करेंगे, यह सोच कर बच्चे के दर्शन के लिए आने वाले लोग कम होने लगे. भीड़ छंटी तो चढ़ावा भी कम हो गया. आखिर एक स्थिति ऐसी आ गई कि तमाम लोगों का वहां आना बंद हो गया. इसी के साथ आय का अच्छाखासा स्रोत बंद हो गया. बालाजी के परिवार वालों के पास जो जमापूंजी थी, वह धीरेधीरे खत्म होने लगी. बच्चे की हालत अलग से बिगड़ती जा रही थी. बहरहाल, किसी के कहने पर बालाजी को मोहाली स्थित फोर्टिस अस्पताल ले जाया गया. फरवरी, 2015 में न्यूरोसर्जरी विभाग के डायरैक्टर डा. आशीष पाठक ने बालाजी की गहन जांच की तो पाया कि कथित पूंछ की वजह से बच्चे की रीढ़ की हड्डी में बदलाव आने लगा था, जो उस के लिए बहुत खतरनाक हो सकता था.

डा. पाठक के अनुसार, बच्चा क्लबफुट डिफौर्मिटी का शिकार हो गया था. उन्होंने बच्चे को यूरोलौजिस्ट के पास भेजा, जहां डा. मनीष आहूजा ने उसे क्लीन इंटरिमिटैंट केथेराइजेशन सिखाते हुए उस का ब्लैडर पूरी तरह खाली करवाया. 3 महीनें तक बच्चे को दवाएं देते हुए उस के टेस्ट किए गए. इकबाल कुरैशी ने पहले ही अपनी मजबूरी डाक्टरों को बता दी थी कि बच्चे का इलाज कराने के लिए उन के पास पैसे नहीं है. इस के बाद अस्पताल से जुड़ी एक गैरसरकारी संस्था ने उस के इलाज का खर्च अपने ऊपर ले लिया.

डा. आशीष पाठक के बताए अनुसार, यह एक निहायत जटिल एवं कठिन औपरेशन था. मगर उन्होंने अपनी टीम के योग्य सदस्यों की मदद से 7 घंटे तक जटिल सर्जरी कर के बच्चे की पूंछ हटा कर उसे भगवान से आम इंसान बना दिया. महीना भर बालाजी को औब्जर्वेशन में रखने के बाद डा. पारुल व डा. आहूजा ने 1 जुलाई, 2015 को एक संवाददाता सम्मेलन का आयोजन कर पत्रकारों के सामने पेश किया. बच्चे से पत्रकारों ने खूब बातें कीं. डाक्टरों को विश्वास है कि बालाजी पर किया जा रहा उन का उपचार पूरी तरह कामयाब रहेगा. Suspense Story

Hindi Stories: पिता की डायरी

Hindi Stories: पिता के प्यार को समझना उतना आसान नहीं होता, जितनी आसानी से मां के प्यार को समझा जा सकता है. पिता का प्यार क्या होता है, यह मैं ने उस दिन जाना, जब मैं…

वह दिल्ली की दिसंबर की ठंड से कांपती सुबह थी, जब मैं अपना घर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था. उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. मैं तंग आ चुका था अपनी जिंदगी से. खासतौर पर अपने पिता के व्यवहार से तो मैं इतना थक गया था कि अब उन की शक्ल भी नहीं देखना चाहता था. सच तो यह था कि मुझे न सिर्फ अपने पिता से, बल्कि अपने पूरे परिवार से नफरत हो गई थी. घर जाता तो वहां मेरा दम घुटता था. इसलिए मैं ने फैसला कर लिया था कि अब कभी वापस नहीं लौटूंगा.

बचपन से ले कर आज तक मुझे हर कदम पर समझौता करना पड़ा था. और तो और अब मैं अपनी पसंद की लड़की से शादी भी नहीं कर सकता था. यह तो हद ही हो गई थी. शादी न करने की वजह थी, मेरे महान पिता की यह सोच कि लड़की बड़े घर की है, ज्यादा पढ़ीलिखी है, हाईक्लास. बड़ी सोसायटी में उठनेबैठने वाली. वह हमारे घर में एडजस्ट नहीं कर सकेगी. उन का कहने का अंदाज कुछ ऐसा था, जैसे लड़की न हो कर कोई सोफा सेट हो, जिसे घर में फिट करने की बात कर रहे हों. भला यह भी कोई वजह होती है किसी लड़की को रिजैक्ट करने की?

शायद वह चाहते थे कि मैं ऐसी लड़की से शादी करूं, जो अंगूठा छाप हो. छोटे से दो बाई दो के कमरे में रहती हो और दिमाग से पैदल हो. मतलब अगर उसे सोसायटी की समझ आ गई, तो फिर वह घर की बहू बनने लायक नहीं रहेगी. ऐसे महान विचार थे मेरे पिता के.

अरे सोचना तो लड़की वालों को चाहिए था कि वे अपनी मौडर्न, स्मार्ट, एजूकेटिड लड़की को कैसे घर में दे रहे हैं. लेकिन यहां तो मामला ही उलटा था. सच कहूं तो इस मामले में मेरी लाइफ का बैंड बज गया था. उस लड़की का नाम सोनिया था, जिसे मैं प्यार करता था. नाम में ही इतना फर्क था, मतलब कहां सोनिया और कहां हरिलाल यानी मैं. पिता का नाम रामलाल और बेटे का नाम हरिलाल. अपने नाम को भी मैं ने लाइफ में बहुत झेला था. कालेज में सब मजाक उड़ाते थे. फिर मुझे खुद ही अपना नामकरण करना पड़ा. मैं हरिलाल से हैरी बन गया. यह अलग बात है कि इस के लिए मुझे गवर्नमेंट के गजट से ले कर न्यूजपेपर के क्लासीफाइड एडवरटाइजमेंट तक सब जगह अपना नाम प्रिंट कराना पड़ा. तब कहीं मैं हरिलाल से हैरी बना.

हां, तो मैं अपने पिता यानी रामलालजी की बात कर रहा था. मेरे पिता की दिल्ली के नवीन शाहदरा में हार्डवेयर की एक छोटी सी दुकान थी. वह रोजाना अपने पुराने बजाज चेतक स्कूटर से दुकान आतेजाते थे. उस स्कूटर को पुराना बोलना भी ‘पुराने’ शब्द का अपमान था. बाबा आदम के जमाने का स्कूटर था, जिस के हौर्न को छोड़ कर सब कुछ बजता था. मैं अपने पिता को उस स्कूटर पर आतेजाते देखता तो बड़ी शर्म महसूस होती. यारदोस्तों के सामने उन्हें अपना पिता बताने में भी मुझे शर्म आती. लेकिन पिताजी को अपने उस पुराने स्कूटर पर भी गर्व था.

‘‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन.’’ वह गर्व से कहते, ‘‘पुरानी चीजें सोना होती हैं सोना. अब तो ऐसे मजबूत स्कूटर बनने ही बंद हो गए.’’

उन्होंने जीवन में एक ही अच्छा काम किया था कि मेरी ग्रैजुएशन कंपलीट करा दी थी. आगे की पढ़ाई के लिए भी उन्होंने पूरा सहयोग दिया. निस्संदेह उन का सहयोग न होता तो मैं पीएचडी न कर पाता.

अरे हां, मैं अपना इंट्रोडक्शन तो दे ही नहीं पाया. मैं ने इंगलिश लिटरेचर में पीएचडी कर ली थी. खास बात यह कि मेरा फर्स्ट ग्रेड था. अब मुझे आसानी से किसी भी डिग्री कालेज में लेक्चरर का जौब मिल सकता था. इसलिए घर छोड़ते वक्त मैं ने अपने सर्टिफिकेट की फाइल साथ ले ली थी. कहानी की बैकग्राउंड और कैरेक्टर मैं ने आप को अच्छी तरह समझा दिए हैं. अब आप वह बात सुनिए, जिस की वजह से यह कहानी लिख रहा हूं.

सुबहसुबह घर छोड़ कर भागते समय मुझ से एक गड़बड़ हो गई. दरअसल मैं ने घर में अपनी जैकेट ढूंढ़ी, लेकिन मुझे मेरी जैकेट नहीं मिली. ठंड बहुत थी, इसलिए मैं ने जल्दबाजी में पापा का ही कोट पहन लिया और अपने सर्टिफिकेट की फाइल ले कर घर छोड़ दिया. मैं ने आखिरी बार अपनी मां और अपने से 4 साल छोटी बहन को देखा, जो एकदूसरे से चिपटी गहरी नींद सो रही थीं. उन्हें पता ही नहीं था कि थोड़ी देर बाद घर में कितना कोहराम मचने वाला है.

अपने पिता के तो मैं ने आखिरी बार दर्शन करने भी जरूरी नहीं समझे थे. मैं घर से निकल कर पैदल ही जल्दीजल्दी मैट्रो स्टेशन की तरफ बढ़ा. मुझे मैट्रो पकड़ कर सब से पहले नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचना था और फिर वहां से ट्रेन पकड़ कर कुछ दिनों के लिए कहीं दूरदराज के इलाके में निकल जाना था. मैं ने सोच रखा था कि कुछ दिन अकेले रह कर आगे की प्लानिंग करूंगा. तब तक घर में भी सब कुछ शांत हो जाएगा.

उस दिन ठंड कुछ ज्यादा ही थी. कोट में भी मुझे जबरदस्त ठंड लग रही थी. मैं ने देखा कई लोग बाइक पर आजा रहे थे. उन्हें बाइक पर आतेजाते देख कर मुझे अपनी चाहत याद आ गई. दरअसल पिछले कई सालों से मेरी इच्छा थी कि एक बाइक खरीदूं. लेकिन इच्छा पूरी नहीं हो पाई थी. पापा हर साल कहते थे कि मुझे बाइक दिलाएंगे, लेकिन बाइक आज तक नसीब नहीं हुई थी. जबकि तमाम फटीचर बाइक लिए घूमते थे. मुझे अभी भी सर्दी लग रही थी. मेरे लिए मैट्रो स्टेशन तक पहुंचना मुश्किल हो रहा था. मुझे लग रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है. वरना कोट में इतनी ठंड लगने का सवाल ही नहीं था.

मैं एक टीन शेड के नीचे जा कर खड़ा हुआ और जल्दी से कोट उतार कर देखा कि आखिर समस्या क्या है? कोट का अंदर का हाल देख कर मैं हैरान रह गया. उस का अंदर का अस्तर बिलकुल फटा हुआ था, इसीलिए उस में सर्दी नहीं रुक रही थी. मुझे हैरानी हुई, पापा रोजाना वही कोट पहन कर दुकान पर जाते थे. अचानक मुझे याद आया. कई सालों पहले जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था, तब पापा ने वह कोट लाल किले की उस मार्केट से खरीदा था, जहां पुराने कपड़ों की सेल लगती थी. वह कोट भी पुराना था. ताज्जुब की बात यह थी कि उसी दिन उन्होंने चांदनी चौक के कपड़े के एक बड़े शोरूम पर जा कर मेरे लिए ब्लेजर का कपड़ा खरीदा था, जिस की सिलाई ही एक हजार से ज्यादा चली गई थी.

उस के बाद मेरे तो कई कोट बने, लेकिन उन का वही एक कोट आज तक चल रहा था. कोट के फटे हुए स्तर ने मुझे अंदर तक हिला दिया था. कोट उतार कर मैं अभी देख ही रहा था कि तभी एक घटना और घटी. कोट की पौकेट से पापा का पर्स निकल कर नीचे गिर गया. मैं ने जल्दी से पर्स उठाया और उसे खोल कर देखने लगा कि उस में कितने रुपए हैं? रुपए तो उस में सिर्फ 780 ही थे, लेकिन पर्स के अंदर एक पतली सी छोटी डायरी थी. इस डायरी को पापा किसी को हाथ भी नहीं लगाने देते थे. आज वही डायरी मेरे हाथ लग गई थी. मुझे ऐसा लगा, जैसे कोई खजाना मेरे हाथ लग गया हो.

मैं ने जल्दी से डायरी खोल कर पढ़ी. उस पतली सी डायरी के तीसरे पन्ने पर ‘मां के गहनों’ से संबंधित कुछ जानकारी थी, जिस से पता चलता था कि मेरी ग्रैजुएशन के लिए उन्हें वे सारे गहने बेचने पड़े थे, आगे के पन्नों पर तो ऐसी जानकारी थी, जिस ने मुझे बिलकुल ही हिला कर रख दिया. पता चला कि मेरी आगे की पढ़ाई और पीएचडी के लिए तो उन्होंने अपनी दुकान तक गिरवी रखी हुई थी. हकीकत जान कर मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. मुझे पढ़ाने के लिए पापा ने इतना सब कुछ किया और मुझे पता ही नहीं था.

तभी उस डायरी में मुझे एक कागज दिखाई दिया. कागज क्या किसी न्यूज पेपर की कटिंग थी. मैं ने खोल कर देखा. वह एक बाइक कंपनी का विज्ञापन था, जिस में लिखा था कि अपनी पुरानी बाइक या स्कूटर के बदले नई बाइक ले सकते हैं. इस का मतलब पापा कुछ भी नहीं भूले थे. उन के बारे में सोच कर मेरी आंखों में आंसू आ गए. जो पापा इतनी मुश्किलों में भी मेरे लिए इतना सोचते थे, मैं उन्हीं को छोड़ कर भाग रहा था. एकाएक मेरी दिशा बदल गई. मैं मैट्रो स्टेशन की जगह अब वापस अपने घर की तरफ भागा. मैं ने पापा के कोट को कस कर अपने सीने से चिपकाए हुए था. अब मुझे उस में बिलकुल भी सर्दी नहीं लग रही थी. मैं ने जोर से अपने घर का दरवाजा खोल कर अंदर दाखिल हुआ. मैं सब से पहले पापा को देखना चाहता था.

घर का माहौल एकदम सामान्य था. मां और मेरी छोटी बहन जाग गई थीं और अपना रूटीन का काम कर रही थीं. मां किचन में जल्दीजल्दी नाश्ता बना रही थीं, जबकि छोटी बहन घर की सफाई में लगी थी. उन्हें पता ही नहीं चला था कि मैं घर छोड़ कर भागा था.

‘‘पापा कहां हैं?’’ मैं ने घर में घुसते ही मां से पूछा.

‘‘अरे,’’ मां चिल्लाईं, ‘‘तू सुबहसुबह कहां चला गया था? फोन भी नहीं लग रहा था तेरा. इतनी बेखयाली में था कि जातेजाते कोट भी अपने पापा का पहन गया. वह चिल्लाते हुए अपना कोट ढूंढ़ रहे थे. उन की सब से ज्यादा जान तो उस डायरी में अटकी थी, जिसे वह किसी को छूने नहीं देते.’’

‘‘लेकिन पापा हैं कहां?’’

‘‘पता नहीं, आज सुबह से ही पता नहीं उन के दिमाग में क्या चल रहा था?’’ मां गुस्से में ही बोलीं, ‘‘बड़े खुश नजर आ रहे थे. अभी थोड़ी देर पहले घर से निकले हैं. बोल कर गए हैं, मैं जरा कश्मीरी गेट तक जा रहा हूं. आज तो नाश्ता भी नहीं कर के गए.’’

‘‘कश्मीरी गेट?’’ मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई.

मैं वापस उलटे पैर घर से बाहर भागा.

‘‘अरे…अरे.’’ मां चिल्लाईं, ‘‘अब तू कहां जा रहा है? नाश्ता तो करता जा. हद है दोनों बापबेटों से. कोई भी कुछ काम बता कर नहीं करता. इस घर में सब से बड़ी पागल तो बस मैं हूं.’’

जब मां के आखिरी शब्द मेरे कान में पड़े, तब तक मैं घर से बाहर निकल चुका था. मैं ने घर के बाहर देखा, पापा की स्कूटर नहीं थी. मैं कश्मीरी गेट का नाम सुन कर ही समझ गया था कि पापा कहां गए हैं. मैं सीधे कश्मीरी गेट के उस बाइक के शोरूम पर पहुंचा, जहां का विज्ञापन मैं ने पापा की डायरी में देखा था. उम्मीद के मुताबिक पापा वहां मौजूद थे और शोरूम के सेल्स मैनेजर से बहस कर रहे थे. दरअसल सेल्स मैनेजर उन के खटारा स्कूटर को लेने से मना कर रहा था. उस की निगाह में वह स्कूटर नहीं था. जबकि पापा उसे उस स्कूटर की अच्छाई गिनवा रहे थे और कोशिश कर रहे थे कि उस स्कूटर का पैसा लगा कर वह उन से बाकी पैसा ले ले और बाइक दे दे.

मेरी आंखों में आंसू आ गए. मेरी इच्छा हुई कि मैं अपने पापा से लिपट कर फूटफूट कर रो पड़ूं. हमारे पापा हमारे लिए कितनी कुर्बानियां देते हैं और हमें वे सब मामूली बातें लगती हैं. मैं भाग कर पापा के पास पहुंचा और उन्हें अपने सीने से लिपटा लिया.

‘‘अरे बंटी,’’ वह मुझे बंटी ही कहते थे, ‘‘तू कब आया? देख मैं तेरे लिए नई बाइक लेने की कोशिश कर रहा हूं. अच्छा हुआ तू आ गया, तू अपने लिए बाइक पसंद कर ले. मैं पैसा ले कर आया हूं.’’

‘‘नहीं पापा.’’ मैं बड़ी मुश्किल से अपनी रुलाई रोक पाया, ‘‘मुझे अब बाइक नहीं चाहिए. आप शायद भूल गए हैं कि अब आप के बेटे हरिलाल ने पीएचडी कर ली है. मैं हरिलाल से डा. हरिलाल बन गया हूं. जल्द ही मुझे किसी बड़े कालेज में जौब भी मिल जाएगी. आप ही सोचिए डा. हरिलाल बाइक पर कैसे घूम सकता है? उसे तो कार चाहिए. कार भी बड़ी वाली. चिंता मत करिए मैं जल्द ही अपने वेतन से कार खरीदूंगा. फिर आप को उस में सैर कराऊंगा.’’

पापा हंस पड़े. उन की हंसी किसी बच्चे जैसी थी.

‘‘चलो, अब घर वापस चलते हैं.’’

उन्होंने जल्दी से अपना स्कूटर स्टार्ट करना चाहा.

‘‘नहीं.’’ मैं ने उन्हें स्कूटर स्टार्ट करने से रोका, ‘‘आज आप का यह स्कूटर मैं चलाऊंगा. आखिर डा. हरिलाल को भी तो ड्राइविंग अच्छे से आनी चाहिए. आगे चल कर कार भी तो ड्राइव करनी है.’’

पापा हंस पड़े. थोड़ी देर बाद मैं पापा को स्कूटर की पीछे वाली सीट पर बिठा कर घर की तरफ दौड़ा जा रहा था. जिस स्कूटर को देख कर मुझे शर्म आती थी, उसी स्कूटर को आज डा. हरिलाल गर्व से चला रहा था, क्योंकि वह मेरे पापा का स्कूटर था.

‘‘मुझे तुझ से कुछ कहना है बेटा.’’ स्कूटर के पीछे बैठेबैठे पापा ने कहा.

‘‘क्या?’’

‘‘मैं ने सोनिया से तेरी शादी के लिए मना किया, तुझे बुरा तो नहीं लगा?’’

‘‘बिलकुल भी नहीं.’’ मैं ने निस्संकोच भाव से कहा, ‘‘आप की बात बिलकुल सही है. हमारी और उन की फैमिली में बहुत फर्क है. अब कहां डा. हरिलाल और कहां सोनिया?’’

मेरी बात सुन कर वह फिर हंस पड़े.

उन की हंसी में मुझे बारिश की बूंदों की खनक महसूस हो रही थी. सचमुच उस एक सुबह ने मेरी पूरी दुनिया बदल डाली. मेरे और सोनिया के प्यार का जरूर ‘द एंड’ हो गया था, लेकिन मेरे पापा के साथ मेरी एक नए रिश्ते की शुरुआत हुई थी. Hindi Stories

 

Superstition: न खुदा मिला बिसाले सनम

Superstition: खजाने के लिए मासूम जाकिर की बलि देने वाले इमरान को खजाना नहीं मिला तो उसे बड़ा अफसोस हुआ. अपने इसी अपराधबोध की वजह से वह बेचैन रहने लगा. बेचैनी कम करने के लिए वह हज करने गया. उस के बाद भी…

उत्तर प्रदेश के शहर अलीगढ़ की कोतवाली के मोहल्ला पठानान में रहती थी संजीदा बेगम. उन के कुल 11 बच्चे थे. बच्चे बड़े होने लगे तो उन का घर छोटा पड़ने लगा. उन्होंने सोचा कि एक मकान और ले लिया जाए तो परिवार आराम से रह सकेगा. संजीदा बेगम के बड़े बेटे इमरान का फलों का कारोबार था. उन्होंने इमरान से कहा कि उन्हें एक मकान और खरीद लेना चाहिए. इस के बाद वह मकान के लिए जमीन की तलाश में लग गया. तभी उसे बहन से पता चला कि उस के पड़ोस में रहने वाली मुन्नी दरजिन का मकान बिक रहा है. उस की बहन गुलफ्शां बाबरी मंडी में रहती थी. उस ने वह मकान अपनी मां संजीदा बेगम के नाम से खरीद लिया.

वह मकान काफी पुराना था, इसलिए संजीदा बेगम उसे अपने हिसाब से बनवाना चाहती थीं. उन्होंने अपने हिसाब से मकान बनवाना शुरू भी कर दिया. मकान बनाने का ठेका उन्होंने आमिर को दिया, जो अपने साथियों बाबू, इरफान, शहजाद और राजू के साथ मकान तोड़वाने लगा. यह जनवरी, 2014 की बात है. संजीदा बेगम को क्या पता था कि यह मकान ले कर उस ने अपने लिए मुसीबत खड़ी कर ली है. मकान का काम अभी शुरू ही हुआ था कि 11 मार्च, 2014 को इमरान अपने छोटे भाई शाजेब के साथ कोतवाली पहुंचा. उस ने कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी को बताया कि उस के निर्माणाधीन मकान के एक कमरे में एक 11-12 साल के बच्चे की लाश पड़ी है, जिस की गरदन काट कर हत्या की गई है.

इमरान ने बताया था कि सुबह करीब 8 बजे जब वह अपने छोटे भाई शाजेब के साथ मकान का ताला खोल कर अंदर गया तो उस ने पीछे के कमरे में एक लाश देखी, जिस की सूचना देने वह सीधे कोतवाली आ गया. इमरान की बात सुन कर कोतवाली प्रभारी ने मामला दर्ज करा कर मामले की जांच के लिए एसएसआई ओमप्रकाश राणा को सौंप दी. ओमप्रकाश राणा कुछ सिपाहियों के साथ इमरान के निर्माणाधीन मकान पर पहुंच गए. मकान के सामने काफी लोग जमा थे. उस दिन मौसम काफी खराब था. काले घने बादल छाए हुए थे. दिन में भी रात जैसे हालात थे, हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. ओमप्रकाश राणा टार्च ले कर उस कमरे में पहुंचे, जहां लाश पड़ी थी. लाश के पास काफी खून फैला था, वहीं खून से सनी एक छुरी पड़ी थी.

मोहल्ले वालों से लाश की शिनाख्त कराई गई तो कोई पहचान नहीं पाया. इस का मतलब बच्चा किसी दूसरे मोहल्ले का रहने वाला था. उसे कहीं और से ला कर यहां मारा गया था. अब सवाल यह था कि बच्चे को कौन और कैसे मकान के अंदर ले आया, क्योंकि मकान में तो ताला बंद था. पुलिस को आशंका हुई कि कहीं बच्चे को कुकर्म के लिए तो यहां नहीं लाया गया? कुकर्म के बाद मार दिया गया हो. लेकिन जब लाश का बारीकी से निरीक्षण किया गया तो यह आशंका निराधार निकली. हत्या कुकर्म के उद्देश्य से नहीं की गई थी, क्योंकि उस के कपड़े एकदम दुरुस्त थे. चूंकि जिस मकान में लाश मिली थी, वह इमरान का था, इसलिए पुलिस ने उस से पूछताछ शुरू की.

उस ने बताया कि शायद बच्चे को दूसरे कमरे की खिड़की से अंदर लाया गया था, क्योंकि उस में अभी दरवाजे नहीं लगे थे. रोक के लिए पटरे लगा दिए गए थे. शायद किसी ने फंसाने के लिए यह काम किया है. ओमप्रकाश को इमरान की बातचीत और हावभाव से उस पर संदेह हो रहा था. वहां फैले खून से लग रहा था कि हत्या अभी कुछ देर पहले ही की गई है. बहरहाल पुलिस ने जरूरी काररवाई निपटा कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

घटनास्थल की काररवाई निपटा कर ओमप्रकाश राणा पूछताछ कर रहे थे कि एक आदमी ने उन के पास आ कर कहा, ‘‘साहब, मेरा नाम साबिर है. मैं मुल्ला पाड़ा में रहता हूं. मेरा 11 साल का बेटा जाकिर सुबह करीब 6 बजे सो कर उठा, तब से गायब है. मैं उसे खोज रहा था कि मुझे पता चला कि यहां किसी बच्चे की लाश मिली है. मैं उसे देखना चाहता हूं.’’

राणा ने तुरंत पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे ने क्या पहन रखा था?’’

‘‘साहब, वह काले रंग की कमीज पहने था.’’

काले रंग की कमीज तो मृतक बच्चा भी पहने था. उम्र भी वही थी. कहीं वह लाश इसी के बेटे की तो नहीं, यह सोच कर ओमप्रकाश राणा ने कहा, ‘‘तुम पोस्टमार्टम हाउस चले जाओ. जा कर वहां लाश देख लो.’’

लाश देखने की बात से साबिर का कलेजा कांप उठा. पोस्टमार्टम हाउस जा कर उस ने लाश देखी तो वह लाश उस के बेटे जाकिर की ही थी. लाश देख कर वह दहाड़े मार कर रोने लगा. उस ने फोन कर के यह बात पत्नी परवीन को बताई तो घर में कोहराम मच गया. मोहल्ले वालों के साथ परवीन भी वहां पहुंची. बेटे की हत्या हो जाने से वह सीना पीटपीट कर रो रही थी. परवीन चीखचीख कर कह रही थी कि उस के बेटे की हत्या इमरान ने ही की है. लेकिन पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि आखिर इमरान जाकिर की हत्या क्यों करेगा? किसी ने जाकिर को इमरान के साथ आतेजाते भी नहीं देखा था.

पोस्टमार्टम के बाद जाकिर की लाश घर वालों को सौंप दी गई तो उन्होंने उसे दफना दिया. लेकिन परवीन ने प्रतिज्ञा कर ली कि कुछ भी हो, उस का सब कुछ बिक जाए, पर वह अपने बच्चे के कातिल का पता लगा कर रहेगी. मुल्ला पाड़ा जहां परवीन अपने परिवार के साथ रहती थी, बाबरी मंडी जहां जाकिर की लाश मिली थी, दोनों के बीच करीब डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी. पुलिस की समझ में यह नहीं आ रहा था कि बच्चा उतनी सुबह वहां कैसे पहुंच गया? या तो कोई उसे लालच दे कर ले गया या फिर किसी परिचित के साथ वहां गया. काफी सोचविचार के बाद भी हत्या की कोई वजह पुलिस की समझ में नहीं आ रही.

परवीन जिस एल्यूमिनियम की फैक्टरी में काम करती थी, वह हाफिज की थी, हाफिज इमरान के बहनोई रिजवान का भाई था. परवीन का कहना था कि उस के बेटे का कातिल इमरान ही है. पुलिस के पास सिफारिशें आ रही थीं कि इमरान सीधासादा आदमी है. हत्या जैसा घिनौना काम वह बिलकुल नहीं कर सकता. आखिर वह एक रिक्शे वाले के बेटे की हत्या क्यों करेगा? पुलिस को कोई वजह भी नजर नहीं आ रही थी. ओमप्रकाश राणा की समझ में बात नहीं आई तो हत्या के इस मामले की जांच खुद कोतवाली प्रभारी मोहम्मद हनीफ त्यागी करने लगे. मई में उन का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह आए इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी. वह जब भी इमरान को पूछताछ के लिए कोतवाली बुलाते, उस के समर्थन में सैकड़ों लोग कोतवाली आ कर हंगामा करते और जांच को प्रभावित करने की कोशिश करते.

आखिर नवंबर महीने में इस मामले की जांच क्राइम ब्रांच के इंसपेक्टर प्रेमपाल सिंह नागर को सौंप दी गई. तमाम प्रयास के बाद वह भी हत्यारे तक नहीं पहुंच सके. इस के बाद जांच एसआई सुरेशबाबू यादव के हाथ में आ गई. जांच करने वाले बदलते रहे, लेकिन न हत्यारा पकड़ में आ रहा था, न हत्या की वजह पता चल रही थी. परवीन लगातार पुलिस के पीछे पड़ी थी. वह काफी परेशान थी और सीधे कह रही थी कि जाकिर की हत्या इमरान ने ही की है. हालांकि वजह उसे भी पता नहीं थी. परवीन के 7 बच्चे थे, जिन में 5 बेटियां और 2 बेटे. बड़ा बेटा था गुलशन और छोटा जाकिर, जिस की हत्या हो गई थी.

साबिर रिक्शा चलाता था. इस के अलावा शादीब्याह में बैंडबाजा वालों के साथ काम करता था. उस के दोनों बेटे भी बारातों में बाजा बजाने का काम करते थे. इस तरह उस के परिवार का गुजर हो रहा था. किसी से भी उस की कोई दुश्मनी नहीं थी. जिस दिन जाकिर की हत्या हुई थी, साबिर ने ही उसे 6 बजे जगाया था.

जाकिर उन दिनों मोहल्ले के ही बिहारीलाल स्कूल में सातवीं में पढ़ रहा था. सुबह जिस समय जाकिर घर से निकला था, परवीन सो रही थी. उठते ही उस ने पूछा था कि जाकिर कहां है? शायद उस ने कोई बुरा सपना देखा था. जाकिर कहीं नहीं दिखाई दिया तो उस ने साबिर से कहा, ‘‘जाकिर के साथ कुछ बुरा हो गया है.’’

साबिर ने कहा, ‘‘चिंता मत करो, क्रिकेट खेलने गया होगा, आ जाएगा.’’

परवीन 11 बजे तक पागलों की तरह बेटे को ढूंढती रही, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला. इस के बाद उसी ने साबिर को फोन कर के बताया कि जाकिर तो नहीं मिला, लेकिन पता चला है कि बाबरी मंडी में किसी बच्चे की लाश मिली है. जा कर उसे देख लो. पत्नी की इस बात पर साबिर घबरा गया. वह बाबरी मंडी स्थित इमरान के घर पहुंचा तो वहां पुलिस मौजूद थी. उस ने ओमप्रकाश राणा को अपने बेटे के गायब होने के बारे में बताया तो उन्होंने उसे लाश की शिनाख्त के लिए पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया था.

पुलिस मामले की जांच कर रही थी, लेकिन परवीन और साबिर पुलिस की इस जांच से संतुष्ट नहीं थे. संतुष्ट होते भी कैसे, पुलिस उन के बेटे के कातिल को ढूंढ नहीं पा रही थी. उसी बीच सितंबर, 2014 में इमरान अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने चला गया. परवीन ने पुलिस का पीछा नहीं छोड़ा था. वह लगातार कोतवाली के चक्कर लगा रही थी. उस के बेटे को क्यों मार दिया गया, यह बात रहरह कर उसे साल रही थी. यही सोचते हुए अचानक उस के मन में आया कि कहीं जाकिर की बलि तो नहीं दी गई? उस ने यह बात मामले की जांच कर रहे ओमप्रकाश राणा को भी बताई.

इस के बाद वह एक बार फिर से पूछताछ करने पहुंचे. इस बार उन्होंने संजीदा बेगम से पूछताछ की तो उस ने बताया कि मकान की खुदाई करते समय 5 मिट्टी के घड़े मिले थे, जिन में से 2 में कोयला और 3 में मिट्टी भरी थी. शायद किसी ने उन्हें फंसाने के लिए बच्चे को उस के घर ले जा कर मारा है. दूसरी ओर परवीन का कहना था कि उस के बेटे की तांत्रिक क्रिया कर के बलि दी गई थी. पुलिस को भी अब इमरान पर शक होने लगा था, लेकिन बिना किसी ठोस सबूत के उसे गिरफ्तार करना पुलिस के लिए मुश्किल था.

पुलिस ने राजमिस्त्री आमिर से भी पूछताछ की थी. उस ने बताया था कि घटना वाले दिन जब वह मजदूरों के साथ काम करने पहुंचा था तो इमरान और शाजेब वहां मौजूद थे. उन्होंने कहा था कि आज काम नहीं होगा. उस ने खुदाई से घड़े निकलने की बात स्वीकार की थी. कहते हैं कि कुदरत सब कुछ देखती है और अपना करिश्मा दिखा कर रहती है. जून, 2015 की बात है. परवीन का भाई कल्लन आया हुआ था. कल्लन बदायूं में रहता था. अचानक इमरान अपने भाई शाजेब के साथ उस के घर पहुंचा. उन्हें देख कर परवीन के माथे पर बल पड़ गए. साबिर ने उन्हें बैठाया.

इस के बाद इमरान ने कहा, ‘‘मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं. मेरे हाथों बहुत बड़ा गुनाह हो गया है. मैं लालच में आ गया था. एक बाबा ने मुझे बताया था कि मेरे घर में काफी धन गड़ा है. अगर बच्चे की बलि दी जाए तो मुझे वह धन मिल सकता है. इस के बाद मैं ने अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर जाकिर की बलि दे दी थी. उस के बाद भी धन नहीं मिला और एक बच्चे की जान चली गई.’’

इमरान अपने हाथों हुए गुनाह की माफी मांग रहा था और बदले में 10 लाख रुपए देने की बात कर रहा था. सभी उस की बात चुपचाप सुनते रहे. उस के बाद परवीन ने कहा, ‘‘ठीक है, सोचसमझ कर बताऊंगी.’’

इमरान ने कहा, ‘‘इस में सोचनेसमझने की क्या बात है, 10 लाख रुपए कम नहीं होते.’’

परवीन बोली, ‘‘अगर मैं आप को 10 लाख रुपए दूं तो क्या तुम मेरे बेटे को लौटा दोगे.’’

‘‘अगर मैं ऐसा कर सकता तो जरूर करता, पर मुझे अफसोस है कि मैं ऐसा कर नहीं सकता. मेरे हाथों जो गुनाह हुआ है, वह मुझे चैन नहीं लेने दे रहा है. हम हज भी कर आए हैं, पर मन को तसल्ली नहीं मिल रही है. तुम लोग मुझे माफ कर दो. मैं तुम लोगों के जवाब का इंतजार करूंगा.’’

इमरान के जाने के बाद घर में सन्नाटा पसर गया. जाकिर तो अब वापस आ नहीं सकता था. साबिर जैसे गरीब आदमी के लिए 10 लाख रुपए कम नहीं थे. लेकिन परवीन के लिए रुपए से बढ़ कर बच्चा था. उस ने तय कर लिया कि वह बेटे के कातिलों को सजा दिला  कर रहेगी. 5 जून, 2015 को परवीन ने कोतवाली जा कर सारी बात ओमप्रकाश राणा को बता दी. अब पुलिस को गिरफ्तारी का रास्ता मिल गया. हैदर रजा जैदी पुलिस बल के साथ इमरान के घर पहुंचे और उसे गिरफ्तार कर के कोतवाली ले आए. इमरान वैसे ही अपराधबोध से ग्रसित था. उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद पुलिस पूछताछ में जाकिर की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

इमरान फलों का व्यापारी था. उस ने बाबरी मंडी में मुन्नी दरजिन का मकान खरीदा और बनवाने के लिए उस की खुदाई कराने लगा. मकान काफी बड़ा था. उस की दीवारें काफी चौड़ी थीं. अचानक खुदाई में मिट्टी के घड़े निकलने लगे, जिन में कोयला और मिट्टी भरी थी. मिट्टी के घड़ों का निकलना हैरान करने वाला था. इमरान को लगा, मकान में जरूर कहीं खजाना गड़ा है. उस ने तांत्रिकों से पूछताछ शुरू की तो किसी तांत्रिक ने बताया कि घड़ों के मिलने का मतलब है कि उस मकान में खजाना गड़ा है, लेकिन वह खजाना तभी मिलेगा, जब किसी बच्चे की बलि दी जाए.

खजाना पाने के लिए इमरान बच्चे की बलि देने को तैयार हो गया. वह अपने भाई शाजेब के साथ मिल कर किसी ऐसे बच्चे की तलाश में जुट गया, जिस की बलि दी जा सके. 1 फरवरी, 2014 को मुल्ला पाड़ा में सवेरे उन्हें जाकिर दिख गया तो उन्होंने उसे 10-10 के 4 नोट दे कर कहा कि वह उन का एक काम कर दे तो वे उसे और रुपए देंगे. जाकिर राजी हो गया तो वे उसे मोटरसाइकिल पर बैठा कर अपने बन रहे नए मकान पर ले आए. मकान में वे उसे तीसरे कमरे में ले गए, जहां काफी अंधेरा था. शाजेब ने उसे बातों में उलझा लिया तो इमरान ने उस के गले पर छुरी चला दी. बच्चे की मौत हो गई. उसी समय मकान पर काम करने वाले राजमिस्त्री और मजदूर आ गए. इमरान और शाजेब डर गए. उन्होंने बाहर आ कर काम करने वाले मजदूरों से कहा कि मेरी दादी बीमार हैं, इसलिए आज काम नहीं होगा.

राजमिस्त्री और मजदूर चले गए, लेकिन इमरान और शाजेब ने जो अपराध किया था, उस से वे डरे हुए थे कि अगर किसी को पता चल गया तो वे पकड़े जाएंगे. उन्हें पुलिस और जेल का डर सताने लगा था. सुबह का समय था, रात से पहले वे लाश को वहां से निकाल नहीं सकते थे. आखिर इमरान ने तय किया कि वह खुद थाने जा कर पुलिस को बताएगा कि किसी ने उस के मकान में एक बच्चे की हत्या कर दी है. जब उन्होंने सुबह आ कर मकान का दरवाजा खोला तो अंदर उन्हें बच्चे की लाश मिली.

इस के बाद इमरान ने वही किया. वह पैसे वाला और रसूखदार आदमी था. इसलिए शक होने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर सकी. लेकिन बच्चे की बलि देने के बाद भी जब कोई खजाना नहीं मिला तो उसे काफी अफसोस हुआ. अपने गुनाहों की माफी के लिए वह अपनी मां संजीदा बेगम के साथ हज करने गया. उस ने वहां उलेमाओं से बात की तो उन्होंने सलाह दी कि वह मृतक बच्चे के मांबाप से माफी मांगे और उन्हें हरजाने के रूप में धनराशि दे तो उसे चैन मिल सकता है.

उलेमाओं की सलाह पर इमरान भाई के  साथ परवीन के घर गया. दरअसल अपराधबोघ से वह बेचैन था. वह बच्चे के गरीब मांबाप को धन दे कर माफी चाहता था. लेकिन बच्चे के मांबाप को तो अपने निर्दोष बेटे के लिए इंसाफ चाहिए था. उन्होंने उसे माफ नहीं किया और पुलिस को सारी बात बता दी. इमरान को तो पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि शाजेब फरार हो गया. पुलिस ने इमरान को जेल भेज दिया. बाद में शाजेब ने भी आत्मसमर्पण कर दिया. वह नाबालिग था, इसलिए उसे बालसुधार गृह भेज दिया गया. सेशन कोर्ट से इमरान की जमानत खारिज हो चुकी है. अब उस ने हाईकोर्ट में जमानत के लिए अपील की है. Superstition

—कथा पुलिस सूत्रों और जाकिर के घर वालों के बयान पर आधारित

 

Hindi Crime Story: रजनी को भाया प्रेमी का धमाल

Hindi Crime Story: रजनी उर्फ कुंजावती अपने भाईबहनों में सब से बड़ी ही नहीं बल्कि कदकाठी से भी ठीक ठाक थी. इसलिए अपनी उम्र से काफी बड़ी लगती थी. उस का परिवार उत्तर प्रदेश के शहर इटावा में रहता था. उस के पिता किसान थे. जैसे ही वह जवान हुई तो उस के मातापिता उस के लिए योग्य वर की तलाश में लग गए.

उन्हें इस बात का डर था कि कहीं रजनी के कदम बहक गए तो उन की इज्जत पर दाग लग जाएगा. उन्होंने रजनी की शादी के लिए ग्वालियर जिले के महाराजपुरा कस्बे के गांव गुठीना में रहने वाले सुलतान माहौर को पसंद कर लिया. फिर जल्द ही उन्होंने उस की शादी सुलतान के साथ कर दी.

रजनी सुंदर तो थी ही, दुलहन बनने के बाद उस की सुंदरता में पहले से ज्यादा निखार आ गया. रजनी जैसी सुंदर पत्नी पा कर सुलतान बेहद खुश था. दोनों के दांपत्य की गाड़ी खुशहाली के साथ चलने लगी. समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा और रजनी 3 बच्चों की मां बन गई. लेकिन कुछ दिनों बाद आर्थिक परेशानियों ने परिवार की खुशी पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया. शादी से पहले सुलतान छोटामोटा काम कर के गुजरबसर कर लेता था, लेकिन 3 बच्चों का बाप बन जाने से घर के खर्चे भी बढ़ गए थे. वहीं रजनी की बढ़ती ख्वाहिशों ने उस के खर्चों में काफी इजाफा कर दिया था.

आर्थिक परेशानी से उबरने के लिए  वह एक शोरूम में रात के समय चौकीदारी भी करने लग गया था. इस दौरान उसे शराब पीने की भी लत लग गई, जिस की वजह से वह पैसे शराबखोरी में उड़ा देता था. इस के चलते घर की माली हालत डांवाडोल होने लगी थी. यहां तक कि उस ने कई लोगों से कर्ज ले लिया था. उधर जब से कोविड के कारण लौकडाउन लगा, तब से सुलतान की मजदूरी और चौकीदारी का काम भी छूट गया था. इस के बावजूद वह लोगों से पैसा उधार ले कर शराब पी लेता था और हद तो तब हो गई जब अपनी पत्नी रजनी उर्फ कुंजावती को शराब के नशे में जराजरा सी बात पर पीटना शुरू कर देता था.

पति की ये आदतें रजनी को काफी सालती थीं. सुलतान के पड़ोस में अजीत उर्फ छोटू कोरी रहता था. वह रजनी को भाभी कहता था, इसलिए दोनों में हंसीमजाक होता रहता था. रजनी को अजीत से मजाक करने में किसी तरह का संकोच नहीं होता था. एक दिन दोनों हंसीमजाक कर रहे थे तो रजनी ने कहा, ‘‘देवरजी, कब तक इस तरह हंसीमजाक कर के दिन काटोगे? कहीं से घरवाली ले आओ.’’

‘‘भाभी, घरवाली मिलती तो जरूर ले आता. जब तक कोई नहीं मिल रही आप से हंसीमजाक कर संतोष करना पड़ रहा है.’’ अजीत ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘जब तक घरवाली नहीं मिल रही तो इधरउधर से जुगाड़ कर लो.’’ रजनी ने बिना किसी हिचकिचाहट के अजीत की आंखों में आंखें डाल कर कहा.

‘‘कौन फिक्र करता है भाभी भूखे आदमी की. जिस का पेट भरा रहता है, उसे ही हर कोई पूछता है,’’ अजीत ने शरमाते हुए कहा.

‘‘क्या तुम ने कभी किसी से अपनी परेशानी का जिक्र कर के देखा है?’’

‘‘कोई फायदा नहीं भाभी, लोग मेरी हंसी ही उड़ाएंगे.’’ वह बोला.

‘‘अजीत, जब तक तुम किसी से कहोगे नहीं, कोई तुम्हारी मदद कैसे करेगा?’’ रजनी ने कहा.

‘‘भाभी, अगर आप से कहूं तो क्या आप मेरी मदद करना पसंद करेंगी? भलाबुरा कहते हुए गालियां जरूर देंगी,’’ अजीत ने रजनी के चेहरे पर नजरें गड़ा कर कहा.

रजनी ने चेहरे पर मुसकान लाते हुए कहा, ‘‘एक बार कह कर तो देखो. अरे, मैं तुम्हारी मुंहबोली भाभी हूं अजीत, भला पड़ोसी पड़ोसी की मदद नहीं करेगा तो क्या बाहर वाला मदद करने आएगा.’’

अब इस से भी ज्यादा रजनी क्या कहती. अजीत इतना भी नासमझ नहीं था कि वह रजनी की बात का मतलब न समझ पाता.

‘‘जरूर भाभी, मौका मिलने पर कह दूंगा.’’ वह मुसकराते हुए बोला.

संयोग से अगले दिन अजीत को पता चला कि सुलतान किसी काम से बाहर गया है. उस दिन अजीत का मन अपने काम में नहीं लगा रहा था. दिन भर उसे रजनी की याद सताती रही. शाम होने पर घर आने पर वह रजनी की एक झलक देखने को बेचैन हो उठा.

रजनी भी पति की गैरमौजूदगी में अजीत को रिझाने के लिए जैसे ही सजसंवर कर दरवाजे पर आई  तो उस की नजर अजीत पर पड़ी. अजीत भी रजनी को देख कर बिना वक्त जाया किए उस के घर पर जा पहुंचा.

अजीत को अचानक इस तरह आया देख कर रजनी ने हंसते हुए कहा, ‘‘देवरजी, आज आप अपने काम से जल्दी लौट आए?’’

‘‘क्या बताऊं भाभी, आज मेरा मन काम में जरा भी नहीं लगा.’’

‘‘क्यों?’’ रजनी ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘सच बताऊं?’’

‘‘हां, मुझे तो सचसच बताओ.’’

‘‘भाभी, जब से तुम्हें और तुम्हारी सुंदरता  को देखा है, मेरा मन किसी काम में लगता ही नहीं है. आप सच में बेहद खूबसूरत है.’’

‘‘ऐसी सुंदरता किस काम की, जिस की कोई कदर ही न हो,’’ रजनी ने लंबी सांस लेते हुए कहा.

‘‘क्या भैया तुम्हारी कोई कदर नहीं करते भाभी?’’

‘‘सब कुछ जानते हुए भी अनजान मत बनो, तुम तो जानते हो कि मेरे वो रात में चौकीदारी करते हैं, सो रात को घर से बाहर रहते हैं. ऐसे में मेरी रातें कैसे गुजरती हैं, वो तो मुझे ही पता है.’’

‘‘भाभीजी, जिस स्थिति से आप गुजर रही हैं, ठीक वही स्थिति मेरी है. मैं भी रात भर करवटें बदलता रहता हूं. अगर आप मेरा साथ दें तो हम दोनों की समस्या खत्म हो सकती है,’’ यह कहते हुए अजीत ने रजनी को अपनी बांहों में भर लिया.

पुरुष सुख से वंचित रजनी चाहती तो यही थी, मगर उस ने हावभाव बदलते हुए बनावटी गुस्से में कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हो, छोड़ो मुझे. बच्चे देख लेंगे.’’

‘‘बच्चे तो अपनी मौसी के बच्चों के साथ बाहर खेल रहे हैं. भाभी, आप ने तो मेरा सुखचैन सब छीन रखा है,’’ अजीत ने कहा.

‘‘नहीं अजीत, छोड़ो मुझे. मैं बदनाम हो जाऊंगी, कहीं की नहीं रहूंगी मैं.’’ वह बनावटी बोली.

‘‘नहीं भाभी, अब यह संभव नहीं है. कोई बेवकूफ ही होगा जो रूपयौवन के इस प्याले के इतने नजदीक पहुंच कर पीछे हटेगा,’’ इतना कह कर अजीत ने बांहों का कसाव बढ़ा दिया.

दिखाने के लिए रजनी न…न…न करती रही, जबकि वह स्वयं अजीत के जिस्म से बेल की तरह लिपटी जा रही थी. इस के बाद वह पल भी आ गया, जब दोनों ने मर्यादा भंग कर दी. एक बार मर्यादा मिटी तो यह सिलसिला चल निकला. जब भी उन्हें मौका मिलता, इच्छाएं पूरी कर लेते. दोनों पड़ोस में रहते थे, इसलिए उन्हें मिलने में कोई परेशानी भी नहीं होती थी. रजनी अब कुछ ज्यादा ही खुश रहने लगी थी, क्योंकि उस का प्रेमी मौका मिलने पर बिस्तर पर धमाल मचाने आ जाता था.

अब उस की आर्थिक परेशानी भी दूर हो गई थी. रजनी खर्चे के लिए अजीत से जब भी रुपए मांगती, वह बिना नानुकुर के चुपचाप निकाल कर रजनी के हाथ पर रख देता था. रजनी और अजीत के बीच अवैध संबंध बने तो उन की बातचीत और हंसीमजाक का लहजा बदल गया. अब दोनों एकदूसरे का खयाल भी कुछ ज्यादा ही रखने लगे थे, इसलिए आसपड़ोस वालों को शक होने लगा.

लोग इस बात को ले कर चर्चा करने लगे. नतीजा यह निकला कि इस बात की जानकारी सुलतान को भी हो गई. सुलतान ने लोगों की बातों पर विश्वास न कर के खुद सच्चाई का पता लगाने का निश्चय किया. वह जानता था कि यदि इस बारे में पत्नी से पूछताछ करेगा तो वह सच बात बताएगी नहीं, बल्कि होशियार हो जाएगी. सच पता लगाने के लिए वह एक दिन बाहर जाने के बहाने घर से निकला और छिप कर रजनी और अजीत पर नजर रखने लगा.

एक दिन दोपहर के समय उस ने रजनी और अजीत को रंगेहाथों पकड़ लिया. गुस्से में  उस ने रजनी की जम कर पिटाई कर दी. रजनी के पास सफाई देने को कुछ नहीं था, इसलिए वह भविष्य में कभी ऐसा न करने की कसम खाते हुए माफी मांगने लगी. गुस्से में सुलतान ने अजीत को भी कई थप्पड़ जड़ दिए. साथ ही चेतावनी दी कि आज के बाद वह उस के घर के आसपास भी दिखाई दिया तो ठीक नहीं होगा.

रजनी सुलतान की सिर्फ पत्नी ही नहीं, उस के 3 बच्चों की मां भी थी, इसलिए बच्चों के भविष्य की फिक्र करते हुए उस ने दोबारा ऐसी गलती न करने की चेतावनी दे कर उसे माफ कर दिया. यह बात सच है कि जिस महिला का पैर एक बार बहक चुका हो, उसे संभालना मुश्किल होता है. यही हाल रजनी का भी था. कुछ दिनों तक अपनी कामोत्तेजना पर जैसेतैसे काबू रखने के बाद वह फिर चोरीछिपे अजीत से मिलने लगी.

इस का पता सुलतान को चला तो उस ने रजनी को काफी बुराभला कहा. इस के बाद रजनी का अजीत से मेलजोल कुछ कम हो गया, लेकिन बंद नहीं हुआ. जब मिलने में परेशानी होने लगी तो एक दिन रजनी ने अजीत से कहा, ‘‘मुझ से तुम्हारी दूरी बरदाश्त नहीं होती. अब मैं सुलतान के साथ नहीं रहना चाहती.’’

‘‘अगर ऐसा है तो उसे ठिकाने लगा देते हैं. न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी. वह शराब पीता ही है, खाना खा कर बेसुध हो जाता है, इसलिए उस की हत्या करना भी आसान है.’’

इसी के साथ दोनों ने सुलतान की हत्या की योजना बना ली.

5 जून, 2021 की रात सुलतान शराब पी कर बेसुध सो गया. सोने से कुछ समय पहले ही उस ने रजनी के साथ मारपीट की थी. पति के सोने के बाद रजनी ने प्रेमी अजीत को फोन कर के बुला लिया. मगर जैसे ही अजीत आया सुलतान की नींद खुल गई. रजनी और अजीत ने सुलतान को पकड़ा और उस के गले में रस्सी का फंदा बना कर उस का गला घोंट दिया. इस के बाद अजीत काफी डर गया तो वह अपने घर भाग गया, मगर रजनी कशमकश में फंस गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह क्या करे?

आखिर उस का मन नहीं माना तो वह घर के पास में रहने वाली अपनी बहन के घर चली गई. यहां पर रजनी की मां भी आई हुई थी. उस ने हिचकियां लेले कर रोते हुए बहन और मां को बताया कि उस के पति ने आत्महत्या कर ली है. इन लोगों को रजनी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था. शायद इसी वजह से एक बार तो लगा कि वह फूटफूट कर रो पड़ेगी, लेकिन किसी तरह खुद को संभालते हुए आखिर उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्या आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास नहीं हो रहा है?’’  बाद में यह बात पूरे मोहल्ले में फैल गई.

सुबह होते ही गंधर्व सिंह ने महाराजपुरा थानाप्रभारी प्रशांत यादव को फोन कर इस घटना की सूचना दे दी. थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने इस घटना को काफी गंभीरता से लिया. बात सिर्फ आत्महत्या कर लेने भर तक सीमित नहीं थी, बल्कि इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गुठीना जैसे छोटे से गांव में इस तरह की घटना घट गई और किसी को कानोंकान खबर तक नहीं हुई.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी प्रशांत यादव  एसआई जितेंद्र मवाई के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. चलने से पहले उन्होंने इस की सूचना सीएसपी रवि भदौरिया को भी दे दी थी. प्रशांत यादव घटनास्थल का निरीक्षण शुरू करने वाले थे कि सीएसपी भदौरिया भी आ पहुंचे. उन के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो सीएसपी लौट गए. उन के जाने के बाद  थानाप्रभारी प्रशांत यादव ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और घटनास्थल की औपचारिक काररवाई निपटा कर सुलतान की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

रजनी और उस के प्रेमी ने जिस रस्सी से फंदा बना कर सुलतान का गला घोंटा था, वह भी पुलिस ने अपने कब्जे में ले ली. उस के बाद थानाप्रभारी ने गंधर्व सिंह की तरफ से अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर ली. थानाप्रभारी इस केस की जांच में जुट गए. उन्होंने इस बारे में मृतक की पत्नी रजनी से पूछताछ की. थाने पहुंचते ही रजनी डर गई और उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपने प्रेमी अजीत के साथ मिल कर पति को ठिकाने लगाया था.

पुलिस ने 6 जून, 2021 को ही रजनी के प्रेमी अजीत को भी गिरफ्तार कर लिया. दोनों ने ही सुलतान की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. इस के बाद दोनों ने सुलतान की हत्या की जो सनसनीखेज कहानी सुनाई, वह परपुरुष की बांहों में सुख तलाशने वाली औरत के अविवेक का नतीजा थी. पूछताछ  और सारे साक्ष्य जुटाने के बाद  पुलिस ने दोनों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. रजनी के साथ उस का 3 वर्षीय सब से छोटा बेटा भी जेल गया है.

रजनी ने जो सोचा था, वह पूरा नहीं हुआ. वह एक हत्या की अपराधिन बन गई. उस के साथ उस का पे्रमी भी. जो सोच कर उन दोनों ने सुलतान की हत्या की, वह अब शायद ही पूरा हो, क्योंकि यह तय है कि दोनों को सुलतान की हत्या के अपराध में सजा होगी. Hindi Crime Story

True Crime Story: धोखे की नाव पर सवार – अपनों ने ही ली जान

—श्वेता पांडेय

True Crime Story: गंगाराम अपनी मां दुलारीबाई से किसी भटियारिन की तरह हाथ नचाता हुआ गुस्से से बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें कितनी बार बोला है कि मुझे निकासी के लिए रास्ता दो. मुझे लंबा चक्कर काट कर घर तक पहुंचना पड़ता है. उस समय तो और परेशानी बढ़ जाती है जब खेतों से फसल बैलगाड़ी में लाद कर लाते हैं.

‘‘आखिर मेरी बात तुम कब समझोगी. हर साल इसी बात का रोना होता है. सवा महीने बाकी हैं, फसल तैयार हो चुकी है. मुझे निकासी के लिए रास्ता चाहिए. और उस 2 एकड़ खेत में से हिस्सा भी चाहिए. मैं भी परिवार वाला हूं.’’

‘‘अच्छा. अभी तो मांबाप को पूछता नहीं है और जिस दिन जमीन से हिस्सा मिल गया, मांबाप मानने से भी इनकार कर देगा. गंगाराम, मैं ने दुनिया देखी है. बंटवारा हुआ नहीं कि मांबाप के हाथ में कटोरा थमा दोगे. बुढ़ौती में भीख मांगनी पड़ जाएगी.

दोनों मांबेटे में इसी तरह काफी देर तक झगड़ा चलता रहा. उसी समय गंगाराम के पिता बालाराम खेत से घर लौटे. दुलारी ने बेटे की शिकायत अपने पति से की, ‘‘लो, संभालो अपने बेटे को, जो जी में आता है बोलता ही चला जाता है.’’

गंगाराम अपने पिता से बोला, ‘‘बाबूजी, मां को समझाओ और संभालो नहीं तो किसी दिन मेरा मूड खराब हो गया तो इसे गंडासे से काट कर नदी में.’’

बालाराम ने बीच में हस्तक्षेप किया, ‘‘बहुत बोल चुका,’’ उन्होंने अपनी पत्नी दुलारी का पक्ष लिया, ‘‘अब अगर तू अपनी मां को एक भी शब्द बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’

इस झगड़े के बीच गंगाराम की पत्नी निर्मला पति का हाथ पकड़ कर बाहर लाने लगी. गंगाराम ने निर्मला का हाथ झटक दिया, ‘‘आज मैं बुड्ढे बुढि़या को छोड़ूंगा नहीं.’’

कहता हुआ गंगाराम अपने पिता बालाराम से जा भिड़ा. बापबेटे को एकदूसरे से हाथपाई करते देख गांव के लोग जमा हो गए.

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गांव वालों ने बापबेटे को बड़ी मुश्किल से एकदूसरे से अलग किया. गंगाराम लोगों की बांहों में जकड़ा हुआ कसमसा रहा था. साथ ही गुस्से से चीखता रहा.

दोनों एकदूसरे के कट्टर विरोधी हो गए. कोढ़ में खाज यह हुआ कि इसी बीच निर्मला बीमार रहने लगी. इस के लिए निर्मला अपनी सास दुलारीबाई को जिम्मेदार ठहराने लगी. वह सास पर यह आरोप लगाती कि उस ने उस के ऊपर कोई टोनाटोटका करा दिया है. गंगाराम ने कई ओझागुनिया को पत्नी को दिखाया. मर्ज यह था कि निर्मला के सिर में दर्द बना रहता था और शाम को बुखार चढ़ने लगता था.

झाड़फूंक से कोई सुधार न हुआ तो वह डाक्टर के पास गया. टेस्ट करवाने पर पता चला कि निर्मला को टायफायड है. एलोपैथी दवा भी चली और झाड़फूंक भी. पता नहीं किस ने असर दिखाया, निर्मला धीरेधीरे ठीक होने लगी. गंगाराम और उस की पत्नी निर्मला के दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि उस की सास दुलारीबाई किसी तांत्रिक ओझा से मिल कर उन्हें बरबाद करने पर तुली है.

इस बात पर गंगाराम की सोच भी निर्मला की सोच से अलग नहीं थी. निर्मला जब पूरी तरह से ठीक हो गई और उस के शरीर में जान आ गई तब वह अपनी सास पर इलजाम लगाने लगी. एक बार फिर दोनों पक्षों में तकरार और झिकझिक होने लगी. वह एकदूसरे के लिए गलत भावनाएं रखने लगे. फिर वही समय आया, नवंबर दिसंबर का. फसल तैयार हो कर खेत से कोठरी में जाने को तैयार थी.

मुद्दा फिर वही उठा कि बैलगाड़ी में रखे अनाज को दूसरे रास्ते से लाना होगा. बालाराम और दुलारी किसी भी तरह से इस बात के लिए तैयार नहीं थे कि निकासी के लिए बाड़ी से जगह दी जाए. हर साल फसल तैयार होने के बाद यही सवाल खड़ा हो जाया करता था. कई सालों से यह निकासी का मसला न तो सुलझ रहा था और न ही दूरदूर तक कोई समाधान ही दिखाई दे रहा था. आज भी इसी विवाद को ले कर गंगाराम और निर्मला दोनों का मन खिन्न था. खाना खाने के बाद दोनों पतिपत्नी टीवी देखने लगे.

टीवी पर वह क्राइम स्टोरी पर आधारित सीरियल देख रहे थे. उस सीरियल की कहानी उन की जिंदगी से जुड़ी जैसी थी. दोनों ने बड़े ध्यान से खामोशी के साथ वह सीरियल देखा. सीरियल खत्म होने के बाद दोनों ने उस पर चर्चा की. गंगाराम और उस की पत्नी को इस बात की चिंता हो रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि मांबाप पूरी जमीन छोटे भाई रोहित के नाम कर जाएं. वैसे भी छोटा होने के नाते वह मांबाप का चहेता था.

इस सोच ने निर्मला और गंगाराम को परेशान कर डाला. जब इंसान को कोई चीज मिलने की संभावना दिखाई न देती है, तब वह उसे किसी दूसरे ही तरीके से हासिल करने की कोशिश में लग जाता है. इन दोनों ने भी एक योजना बना ली. गंगाराम और निर्मला ने एक योजना के तहत अपने व्यवहार में थोड़ाबहुत बदलाव किया. अपने पिता बालाराम और मां दुलारीबाई से सहजता से पेश आने लगे. बालाराम और दुलारी को आश्चर्य हुआ कि हमेशा कड़वे बोल बोलने वालों की जुबान में शहद कैसे घुल गया.

इस के बाद उन दोनों ने विचारविमर्श किया कि अपनी योजना में किसे शामिल किया जाए, जिस से उन की योजना सफल हो जाए. नजर और दिमाग के घोड़े दौड़ाने के बाद गंगाराम ने धुधवा गांव के ही नरेश सोनकर, योगेश सोनकर और कोपेडीह निवासी रोहित सोनकर से जिक्र किया.

पैसों के लालच में तीनों ही उन की योजना में शामिल हो गए. तीनों ने योजना बना कर वारदात को अंजाम देने के लिए 21 दिसंबर, 2020 का दिन तय किया. योजना के अनुसार, चारों लोग खेत पर पहुंच गए. वहां बालाराम और उस का छोटा बेटा रोहित तड़के में खेतों पर पानी लगा रहे थे. उन्होंने उन दोनों को दबोच लिया और सीमेंट की बनी पानी की हौदी में डुबो कर दोनों को मार दिया.

अगला निशाना अब दुलारीबाई और उस की बहू कीर्तिनबाई रही. चारों दबेपांव वहां पहुंचे, जहां वे सब्जियों का गट्ठर तैयार करने में व्यस्त थीं. शिकारी की तरह दबेपांव वे उन के करीब पहुंचे और कुल्हाड़ी से ताबड़तोड़ वार कर उन दोनों की जिंदगी भी खत्म कर दी. इतना सब कुछ करने के बाद उन लोगों ने चैन की सांस ली. यहां यह बताते चलें कि निर्मला उन चारों को ऐसा करते हुए दरवाजे की ओट से देख रही थी. काम को अंजाम देने के बाद गंगाराम ने तीनों साथियों को वहां से रवाना कर दिया.

निर्मला और गंगाराम दोनों ने मिल कर कुल्हाड़ी को बाड़ी में ही दबा दिया. सुबह के 5 बजतेबजते पूरे खुरमुड़ा गांव में इस दहला देने वाली हत्या की चर्चा होने लगी. अम्लेश्वर थाने में संजू सोनकर निवासी खुरमुड़ा की रिपोर्ट पर अमलेश्वर थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने इस नृशंस हत्याकांड की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दी.

जांचपड़ताल के लिए फोरैंसिक टीम घटनास्थल पर पहुंच गई. आईजी विवेकानंद सिन्हा के सुपरविजन में जांच होती रही. पुलिस को किसी तरह का कोई सूत्र नहीं मिल रहा था जिस से जांच आगे बढ़ती. डौग स्क्वायड टीम घटनास्थल पर पहुंच चुकी थी. मृतकों के शव के समीप ले जा कर कुत्ते को छोड़ दिया गया. खोजी कुत्ता गोलगोल चक्कर लगाता हुआ मृतकों को सूंघ कर खेत की ओर कुछ दूर तक गया.

मौके की जांच से इतना तो स्पष्ट था कि हत्यारे 2-3 से कम नहीं थे. खेत में रासायनिक छिड़काव कर दिया गया था, जिस के कारण खोजी कुत्ते को सही दिशा नहीं मिल पा रही थी. बहरहाल, पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. जब पुलिस को किसी तरह का सूत्र नहीं मिला तो पुलिस ने गंगाराम के साढ़ू नरेश सोनकर को विश्वास में ले कर मुखबिरी का जिम्मा सौंपा.

नरेश मंझा हुआ खिलाड़ी था. उस ने पुलिस को मुखबिरी करने के बहाने उलझाए रखा. जांच के लिए आईजी विवेकानंद सिन्हा ने कुछ बिंदु तय किए. उन बिंदुओं को आधार बना कर पुलिस जांच में जुटी रही. इस सामूहिक हत्याकांड को हुए 3 महीने बीत चुके थे. लेकिन अपराधियों का कोई अतापता नहीं था. थानाप्रभारी वीरेंद्र श्रीवास्तव ने अपने एक मुखबिर को नरेश के पीछे लगा दिया. नरेश की एक्टिविटी पुलिस को शुरू से ही संदेहास्पद लगी थी.

फोरैंसिक विशेषज्ञों की टीम के सहयोग से भौतिक साक्ष्य जुटाया गया. टीम ने वैज्ञानिक एवं तकनीकी साक्ष्य को आधार बना कर बारीकी से पूछताछ कर जानकारी इकट्ठी की. पुलिस ने संदेहियों को हिरासत में ले कर सघन पूछताछ की. इस घटना का मास्टरमाइंड बालाराम का अपना सगा बड़ा बेटा गंगाराम निकला. गंगाराम की स्वीकारोक्ति के बाद योगेश सोनकर, नरेश सोनकर, रोहित सोनकर उर्फ रोहित मौसा को गिरफ्तार कर लिया गया. सभी को घटनास्थल पर ले जा सीन रीक्रिएशन कराया गया.

आरोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त कुल्हाड़ी पुलिस ने बालाराम की बाड़ी से बरामद कर ली. घटना के वक्त पहने गए कपड़ों को इन चारों ने ठिकाने लगा दिया था. 18 मार्च, 2021 को आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जिस में निर्मला भी शामिल थी. इन चारों आरोपियों का नारको टेस्ट भी कराया गया.

आईजी विवेकानंद सिन्हा ने अमलेश्वर थाना स्टाफ की पीठ थपथपाई. पुलिस ने सभी आरोपियों गंगाराम, उस की पत्नी निर्मला, योगेश सोनकर, नरेश सोनकर और रोहित सोनकर को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

Crime Story: चाहत दूसरी शादी की – पति बना रिश्तों में बोझ

Crime Story: 21अप्रैल, 2021 को सुबह के यही कोई 6 बजे थे. तभी गांव सबरामपुरा के रहने वाले राकेश ओझा के घर से रोने की आवाज आने लगी. घर में एक महिला जोरजोर से रोते हुए कह रही थी, ‘‘अरे मेरे भाग फूट गए रे..मेरे पति ने फांसी लगा ली रे..कोई आओ रे. बचाओ रे..’’

रुदन सुन कर आसपड़ोस के लोग दौड़ कर राकेश ओझा के घर पहुंचे. तब तक मृतक की पत्नी मंजू ओझा ने कमरे में पंखे के हुक से साड़ी का फंदा बना कर झूलते मृत पति को फंदे से नीचे उतार लिया था. राकेश ओझा की लाश के पास उस की पत्नी मंजू सुबकसुबक कर रो रही थी. मृतक का बड़ा भाई राजकुमार ओझा भी खबर सुन कर वहां पहुंच गया था. वह भी भाई की मौत पर आश्चर्यचकित रह गया.

राजकुमार ओझा ने यह सूचना थाना कालवाड़ में दे दी. सूचना पा कर थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर जा पहुंचे. घटनास्थल की जांच कर वीडियोग्राफी व फोटोग्राफी कराई गई. मृतक की पत्नी मंजू ओझा से भी पूछताछ की गई. मंजू ने बताया कि रात में राकेश ने किसी समय साड़ी का फंदा गले में डाल कर फांसी लगा ली. आज सुबह जब मैं उठ कर कमरे में आई तो इन्हें फांसी पर लटका देख कर नीचे उतारा कि शायद जिंदा हों. मगर यह तो चल बसे थे. इतना कह कर वह फिर रोने लगी.

पुलिस ने वहां मौजूद मृतक के भाइयों और अन्य परिजनों से भी पूछताछ की. पूछताछ के बाद पुलिस को मामला संदिग्ध लग रहा था. आसपास के लोगों ने थानाप्रभारी को बताया कि राकेश आत्महत्या नहीं कर सकता. उसी समय मंजू रोने का नाटक करते हुए पुलिस की बातों को गौर से सुन रही थी. पुलिस वाले जब चुप होते तो वह रोने लग जाती. पुलिस वाले आपस में बोलते तो मृतक की पत्नी चुप हो कर सुनने लगती.

थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी ने संदिग्ध घटना की खबर उच्चाधिकारियों को दे कर दिशानिर्देश मांगे. जयपुर (पश्चिम) डीसीपी प्रदीप मोहन शर्मा के निर्देश पर एडिशनल डीसीपी राम सिंह शेखावत, एसीपी (झोटवाड़ा) हरिशंकर शर्मा ने कालवाड़ थानाप्रभारी से राकेश ओझा की संदिग्ध मौत मामले की पूरी जानकारी ले कर उन्हें कुछ दिशानिर्देश दिए.

थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी ने घटनास्थल की काररवाई पूरी करने के बाद शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया. मृतक राकेश का शव ले कर उस की पत्नी मंजू ओझा अपने देवर, जेठ वगैरह एवं तीनों बच्चों के साथ अपने पति के पुश्तैनी गांव रुआरिया, मुरैना लौट गई.

गांव रुआरिया में राकेश का अंतिम संस्कार कर दिया गया. राकेश ओझा बेहद जिंदादिल इंसान था. ऐसे में उस के इस तरह आत्महत्या करने की बात किसी के भी गले नहीं उतर रही थी. राकेश ओझा की मौत पुलिस को संदिग्ध लगी थी. पुलिस को जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो शक पुख्ता हो गया.

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पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतक राकेश को गला घोंट कर मारा गया था. तब डीसीपी प्रदीप मोहन शर्मा ने एक टीम गठित कर निर्देश दिए कि जल्द से जल्द राकेश ओझा हत्याकांड का परदाफाश कर हत्यारोपियों को गिरफ्तार किया जाए. टीम में एसीपी हरिशंकर शर्मा, थानाप्रभारी गुरुदत्त सैनी आदि को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन एडिशनल डीसीपी रामसिंह शेखावत के हाथों सौंपा गया.

पुलिस टीम ने साइबर सेल की मदद लेने के साथ मृतक के पड़ोस के लोगों से भी जानकारी ली. पुलिस टीम को जानकारी मिली कि मृतक की बीवी मंजू के पड़ोस में रहने वाले बीरेश उर्फ सोनी ओझा से अवैध संबंध थे. राकेश और बीरेश ओझा दोस्त थे और दोनों पीओपी का काम करते थे. बीरेश अकसर राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर आयाजाया करता था. लोगों ने यहां तक कहा कि बीरेश जैसे ही राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर जाता, मंजू और बीरेश कमरे में बंद हो जाते थे.

यह जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने मंजू और बीरेश उर्फ सोनी ओझा के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काल डिटेल्स से पता चला कि जिस रात को राकेश की हत्या हुई थी, उस रात 10 बजे मंजू और बीरेश के बीच बात हुई थी. उस के बाद भी हर रोज दिन में कईकई बार बात होती रही. राकेश की हत्या से पहले भी मंजू और बीरेश के बीच दिन में कई बार बात होने का पता चला.

पुलिस को पुख्ता प्रमाण मिल गए थे कि राकेश की हत्या कर के उसे आत्महत्या दिखाने की साजिश रची गई थी. इस के बाद पुलिस ने बीरेश ओझा की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू किए. मगर वह कहीं चला गया था. कुछ दिन बाद वह जैसे ही अपने घर आया, कांस्टेबल सुनील कुमार को इस की खबर मिल गई. तब पुलिस ने 27 अप्रैल, 2021 को उसे हिरासत में ले लिया.

बीरेश को थाना कालवाड़ ला कर पूछताछ की गई. पूछताछ में वह ज्यादा देर तक पुलिस के सवालों के आगे टिक नहीं पाया और अपनी प्रेमिका मंजू ओझा के कहने पर राकेश ओझा की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. इस के बाद पुलिस ने मृतक की पत्नी मंजू को भी गिरफ्तार कर लिया.

मंजू ओझा और बीरेश ओझा उर्फ सोनी से पूछताछ के बाद जो कहानी प्रकाश में आई, वह इस प्रकार से है—

राकेश ओझा मूलरूप से मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गांव रुआरिया का रहने वाला था. वह काफी पहले गांव से जयपुर आ कर पीओपी का कामधंधा करने लगा था. राकेश की शादी मंजू से हुई थी. मंजू गोरे रंग की अच्छे नैननक्श की खूबसूरत युवती थी. शादी के कुछ महीने बाद राकेश पत्नी मंजू को भी अपने साथ जयपुर ले आया था. राकेश तीजानगर इलाके के सबरामपुरा में किराए का घर ले कर बीवी के साथ रहता था. वक्त के साथ मंजू 3 बच्चों की मां बन गई. इन में एक बेटी और 2 बेटे हैं, जिन की उम्र 7 साल, 4 साल और 2 साल है.

राकेश पीओपी का अच्छा कारीगर था. इस कारण उस की मजदूरी भी अच्छी थी. वह महीने में 20-25 हजार रुपए आसानी से कमा लेता था. इस कारण उस के परिवार कागुजरबसर अच्छे से हो जाती थी. राकेश का छोटा भाई घनश्याम और बड़ा भाई राजकुमार भी जयपुर में काम करते थे. ये भी अपने परिवारों के साथ अलगअलग किराए पर रहते थे.

राकेश के पड़ोस में बीरेश उर्फ सोनी ओझा भी रहता था. बीरेश भी पीओपी का काम करता था. इसलिए दोनों दोस्त बन गए. बीरेश कुंवारा था और देखने में हैंडसम था. दोस्ती के नाते वह राकेश के घर आनेजाने लगा. बीरेश की नजर राकेश की बीवी मंजू पर पड़ी तो वह उस के रूपयौवन पर मर मिटा. मंजू की उम्र उस समय 33 साल थी और वह उस समय 2 बच्चों की मां थी. इस के बावजूद उस की उम्र 20-22 से ज्यादा नहीं लगती थी.

मंजू का गोरा रंग व मादक बदन बीरेश की निगाहों में चढ़ा तो वह मंजू के इर्दगिर्द मंडराने लगा. बीरेश अकसर मौका पा कर राकेश की गैरमौजूदगी में उस के घर आता और मंजू की खूबसूरती की तारीफें करता. मंजू समझ गई कि आखिर बीरेश उस से क्या चाहता है.

राकेश ज्यादातर समय अपने काम पर बिताता और रात को घर लौटता तो खाना खा कर सो जाता. पत्नी की इच्छा पर वह ध्यान नहीं देता था. ऐसे में मंजू ने अपने से उम्र में 6 साल छोटे बीरेश से पहले नजदीकियां बढ़ाईं और फिर अपनी हसरतें पूरी कीं. इस के बाद यह सिलसिला चलता रहा. बीरेश नई उम्र का जवान लड़का था. ऊपर से वह कुंवारा भी था. ऐसे में मंजू उसे पति से ज्यादा चाहने लगी.

काफी समय तक दोनों लुपछिप कर गुलछर्रे उड़ाते रहे. किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई. मगर जब अकसर राकेश की गैरमौजूदगी में बीरेश उस के घर आ कर दरवाजा बंद करने लगा तो आसपास के लोगों में कानाफूसी होने लगी. इसी दौरान मंजू तीसरे बच्चे की मां बन गई. मंजू और बीरेश की बातें और आपस में व्यवहार देख कर राकेश को उन के संबंधों पर शक होने लगा था. ऐसे में राकेश को एक पड़ोसी ने इशारों में कह दिया कि बीरेश से दोस्ती खत्म करो. उस का घर आना बंद कराओ. यही तुम्हारे लिए ठीक रहेगा.

इस के बाद राकेश ने मंजू से सख्ती करनी शुरू कर दी तो मंजू बौखला गई. उस की आंखों में पति खटकने लगा.

मौका मिलने पर मंजू अपने प्रेमी बीरेश से मिली. दोनों काफी दिनों बाद मिले थे. मंजू ने बीरेश से कहा, ‘‘राकेश को हमारे संबंधों पर शक हो गया है. वह तुम से बात करने की मनाही करता है. लेकिन मैं तुम्हारे बगैर जी नहीं पाऊंगी. राकेश हम दोनों को जीने नहीं देगा. ऐसा कुछ करो कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.’’

‘‘मंजू, मैं भी तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. राकेश को रास्ते से हटा कर हम दोनों शादी कर लेंगे. इस के बाद हम अपने हिसाब से मौजमजे से जिंदगी जिएंगे.’’ बीरेश बोला.

‘‘मैं भी तुम से शादी करना चाहती हूं, मगर यह राकेश की मौत के बाद ही संभव है. हमें ऐसी योजना बनानी है कि राकेश की हत्या को आत्महत्या साबित करें. बाद में जब मामला ठंडा पड़ जाएगा तब हम शादी कर लेंगे.’’ मंजू ने कहा.

इस के बाद दोनों ने योजना बना ली. 20 अप्रैल, 2021 की रात मंजू ने तीनों बच्चों को खाना खिला कर कमरे में सुला दिया और उन के कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया. मंजू ने राकेश को खाने में नींद की गोलियां दे दी थीं, जिस से वह कुछ ही देर में गहरी नींद में चला गया. फिर रात 10 बजे मंजू ने बीरेश को फोन कर घर बुला लिया.

बीरेश और मंजू राकेश के कमरे में पहुंचे. बीरेश ने राकेश के गले में कपड़ा लपेट कर कस दिया. थोड़ा छटपटाने के बाद वह मौत की आगोश में चला गया. राकेश मर गया. तब बीरेश और मंजू ने साड़ी राकेश के गले में लपेट कर उस के शव को पंखे के हुक से लटका दिया ताकि लोगों को लगे कि राकेश ने आत्महत्या की है.

इस के बाद बीरेश अपने घर चला गया और मंजू सो गई. अगली सुबह 6 बजे उठ कर मंजू ने योजनानुसार राकेश के कमरे में जा कर रोनाचिल्लाना शुरू कर दिया. तब रोने की आवाज सुन कर आसपड़ोस के लोग और मृतक के भाई वगैरह घटनास्थल पर आए. तब तक मंजू ने राकेश का शव फंदे से उतार कर फर्श पर रख लिटा दिया था. इस के बाद पुलिस को सूचना दी गई और पुलिस ने काररवाई कर राकेश ओझा हत्याकांड का परदाफाश किया.

पुलिस ने राजकुमार ओझा की तरफ से मंजू ओझा और उस के प्रेमी बीरेश ओझा उर्फ सोनी के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

आरोपियों से मोबाइल और गला घोंटने का कपड़ा व साड़ी जिस का फंदा बनाया गया था, पुलिस ने बरामद कर ली. पूछताछ के बाद मंजू और बीरेश को 28 अप्रैल, 2021 को कोर्ट में  पेश कर न्यायिक हिराससत में भेज दिया गया. Crime Story

Family Crime: कलयुगी बेटा – अधेड़ उम्र का इश्क

Family Crime: रवि को मदन सेन के साथ अपनी मां जसवंती के अवैध संबंधों की पूरी जानकारी थी. वह यह भी जानता था मदन अब उस की मां से तंग आ चुका था. इसलिए रवि ने अपनी मां को मौत के घाट उतारने के लिए मदन से संपर्क किया तो वह भी जसवंती की हत्या में शामिल हो गया.

15 मार्च, 2021 की सुबह 10 बजे का वक्त था. जब बैतूल जिले की मुलताई थाने की सीमा में बसे छोटे से गांव काथम की रहने वाली जसवंती और उस की 11 वर्षीया नातिन लविशा की हत्या की खबर गांव में आग की तरह फैली थी, जिस से घटना की जानकारी लगने पर टीआई मुलताई सुरेश सोलंकी भी कुछ देर में टीम ले कर मौके पर पहुंच गए.

कमरे के अंदर बिछे पलंग पर जसवंती और उस की नातिन के शव खून से लथपथ पडे़ थे. दोनों के सिर पर घातक चोटें थीं. टीआई सोलंकी ने घटना की जानकारी बैतूल एसपी सिमला प्रसाद के अलावा एएसपी श्रद्धा जोशी और एसडीपीओ नम्रता सोधिया को भी दे दी. जिस से कुछ ही देर में उक्त अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए.

शुरुआती पूछताछ में पता चला कि पति की मौत के बाद जसवंती अपने बेटे रवि और बहू के साथ रहती थी. वह स्थानीय कलारी की रसोई में खाना बनाने का काम करती थी. कुछ दिनों में उस की नातिन लविशा भी आ कर उस के साथ रहने लगी. जबकि घटना से 4 दिन पहले ही जसवंती ने लड़झगड़ कर बेटेबहू को उन के ढाई महीने के बच्चे के साथ घर से निकाल दिया था. जिस से रवि अपनी पत्नी को ले कर पास के गांव परसोडी में रहने वाले अपने मामा ससुर के घर जा कर रहने लगा था.

जसवंती का हालिया विवाद बेटे से हुआ था. इस के अलावा गांव में उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. लेकिन छोटी बात पर बेटा मां की हत्या करेगा, इस बात पर आसानी  से भरोसा नहीं किया जा सकता था. इसलिए पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड में दूसरे एंगल से जांच करनी शुरू कर दी, जिस में पता चला कि जसवंती 45 की जरूर थी, लेकिन शारीरिक बनावट और खूबसूरती के चलते वह 35 से अधिक नहीं दिखती थी.

उस के पति की मौत कई साल पहले हो चुकी थी. इसलिए पुलिस जसंवती के अवैध संबंधों की जानकारी जुटाने में लग गई. जांच में पता चला कि जसवंती का प्रेम प्रसंग कई सालों से कलौरी में काम करने वाले मदन सेन के साथ चल रहा था. मदन सेन मूलरूप से सागर जिले के बंडा का रहने वाला था. लेकिन कलारी में नौकरी के चलते यहां जसवंती के घर के पास ही किराए पर रहने लगा था. पूरे गांव को मदन और जसवंती के इश्क की जानकारी थी.

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लेकिन उन के बीच विवाद का कोई वाकया सामने नहीं आया था. पुलिस ने मदन से पूछताछ की, जिस में उस ने कबूल कर लिया कि उस के जसंवती से संबंध थे, किंतु उस की हत्या में उस ने अपना हाथ होने से मना कर दिया. इसलिए एसपी सिमला प्रसाद ने इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए एएसपी श्रद्धा जोशी के निर्देशन में और एसडीपीओ सोधिया के नेतृत्व में थानाप्रभारी मुलताई सुरेश सोलंकी की एक टीम गठित कर दी.

टीम ने जांच शुरू करते हुए चौतरफा प्रयास शुरू कर दिए, लेकिन जब इस में सफलता मिलती नहीं दिखाई दी तो एसपी सिमला प्रसाद ने साइबर सेल के एसआई राजेंद्र राजवंशी को मदन सेन के अलावा मृतक के बेटे रवि के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकालने के निर्देश दिए. काल डिटेल्स में चौंका देने वाली जानकारी निकल कर सामने आई कि घटना के 2 दिन पहले से ही अचानक जसवंती के प्रेमी मदन की उस के बेटे से फोन पर कई बार बात हुई थी.

इतना ही नहीं, घटना की रात को रवि और उस के मामा ससुर दिलीप के मोबाइल की लोकेशन गांव में मदन सेन के मोबाइल के पास मिल रही थी. उस रात भी मदन और रवि के बीच कई बार बात हुई थी. जबकि 15 मार्च के बाद से मदन और रवि के बीच इक्कादुक्का बार बात हुई थी, वह भी बहुत कम समय के लिए.

साइबर सेल को रवि के मोबाइल की लोकेशन 15 मार्च को कामथ में मिली थी. इस का सीधा मतलब था कि वह घटना वाली रात को कामथ आया था. इसलिए रवि पर अपना शक पुख्ता करने के लिए टीआई सोलंकी ने रवि को थाने बुला कर बातोंबातों मे उस से पूछा, ‘‘जिस रात तुम्हारी मां का कत्ल हुआ, उस रात तुम कहां थे?’’

‘‘कहां होता साहब, मां ने घर से धक्का मार कर निकाल दिया था. इसलिए मैं अपने मामा ससुर के यहां जा कर रहने लगा. उस रात भी वहीं था.’’ रवि ने बताया.

‘‘ठीक है. इस मदन सेन के बारे में तुम्हारा क्या खयाल है? लोग बताते हैं कि मदन की तुम्हारी मां के साथ अच्छी दोस्ती थी.’’ टीआई ने कहा.

‘‘आप ने सही सुना है, साहब. मुझे तो अपनी मां कहने में भी शर्म आने लगी थी. मदन हमारे घर के पास ही रहता है. कई बार वही आधी रात में भी मेरी मां से मिलने आया करता था. यह सब मेरी पत्नी ने अपनी आंखों से देखा था. इसलिए वह इस बात को ले कर

मुझे ताने दिया करती थी.’’ रवि बोला.

‘‘तुम ने मदन को रोका नहीं?’’ टीआई ने पूछा.

‘‘रोका था साहब. हमारे बीच काफी झगड़ा भी हो चुका है. लेकिन खुद मेरी मां ही उसे घर बुलाती थी.’’ वह बोला.

‘‘मदन से तुम्हारी बात होती थी कभी?’’

‘‘पहले होती थी, लेकिन जब पता चला कि उस के मेरी मां से अवैध संबंध हैं, तब हमारे बीच झगड़ा हुआ था. फिर उस से बातचीत बंद हो गई थी.’’

‘‘फोन पर तो होती होगी बात तुम्हारी मदन से.’’

‘‘नहीं, कभी नहीं.’’

जैसे ही रवि ने मदन से फोन पर बात होने से इनकार किया. तभी पुलिस ने उस के साथ थोड़ी सख्ती दिखाई तो वह टूट गया. फिर उस ने इस दोहरे हत्याकांड का राज उगल दिया. उस ने बताया कि इस हत्याकांड में मामा ससुर दिलीप के अलावा मां का प्रेमी मदन भी शामिल था. रवि की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मूसल एवं हथौड़ी भी बरामद कर ली. पुलिस ने रवि के मामा ससुर दिलीप व मां के प्रेमी मदन सेन को भी गिरफ्तार कर लिया.

हत्या करने के बाद वह जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल ले गए थे, इसलिए पुलिस ने आरोपियों से ये दोनों जेवर भी बरामद कर लिए. उन से पूछताछ के बाद इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार निकली—

पति की मृत्यु के बाद जसवंती ने न केवल परिवार संभाला, बल्कि बेटे की शादी भी धूमधाम से की. रवि मां का हाथ बंटाने के लिए छोटामोटा काम किया करता था, लेकिन लौकडाउन में काम छूट जाने से वह घर में कुछ महीनों से बैठा था.

जसवंती पिछले 5 सालों से कलारी के औफिस में खाना बनाने का काम करती थी. जसवंती सुंदर तो थी ही, साथ ही आकर्षक भी थी. कलारी में सागर जिले का मदन सेन मैनेजर की हैसियत से पूरा हिसाबकिताब देखता था. मदन यहां अकेला रहता था, इसलिए उसे एक औरत की और जवानी में पति की मौत हो जाने से जसवंती को एक मर्द की आवश्यकता यदाकदा महसूस होती रहती थी.

ऐसे में मदन की नजर जसवंती पर थी. वह जानता था कि जसंवती का पति नहीं है, इसलिए उस तक पहुंचना उस के लिए ज्यादा मुश्किल नहीं था. उस ने काफी सोचसमझ कर ही जसवंती के पड़ोस में किराए का मकान ले कर उस में रहना शुरू किया.

कुछ समय बाद मदन ने धीरेधीरे जसवंती की तरफ बढ़ना शुरू किया तो अपनी खुद की जरूरतों से परेशान जसवंती ने भी अपने मन की लगाम ढीली छोड़ दी और मदन को अपनी मौन स्वीकृति दे दी, जिस से एक रोज आधी रात में मदन शराब पी कर जसवंती के घर पहुंचा तो जसवंती ने भी पहली मुलाकात में उस के सामने समर्पण कर दिया.

कहना नहीं होगा कि दोनों को एकदूसरे की जरूरत थी, इसलिए मदन और जसवंती दोनों ही कुछ दिनों बाद खुल कर अपनी प्रेम लीला करने लगे. जसवंती की बेटी की शादी पहले ही हो चुकी थी. सो वह अपनी ससुराल में थी. बेटा रवि अपनी मां के साथ रहता था, उसे काबू में रखने के लिए मदन ने रवि को शराब पीने की आदत डाल दी और रोज ही उसे कलारी में शराब पीने के लिए पैसे देने लगा.

मदन के साथ मां के संबंध की बात पता होने के बाद भी शराब के लालच में रवि ने उस का कोई विरोध नहीं किया. यहां तक कि 2 साल पहले रवि की शादी हो जाने के बाद बहू के आ जाने पर भी मदन और जसवंती के संबंधों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. लेकिन कहते हैं कि अवैध संबंधों की एक उम्र होती है. क्योंकि वक्त के साथ जहां औरत अपने प्रेमी पर ज्यादा अधिकार जताने लगती है, वहीं पे्रमी का मन उस से ऊबने लगता है. यही इस मामले में होने लगा था.

जसवंती मदन पर पूरा हक जमाने लगी थी. यहां तक कि वह उस पर दबाव बनाने लगी थी कि वह गांव में रहने वाली अपनी पत्नी को छोड़ कर उस के साथ उस के घर में पति की तरह रहे. लेकिन मदन इस के लिए राजी नहीं था. इस से मदन और जसंवती के बीच विवाद होने लगा.

लौकडाउन में काम बंद हो जाने से रवि पूरी तरह मां पर निर्भर हो गया. इसलिए वह जब भी मां से खर्च के पैसे मांगता तो मां उसे खरीखोटी सुना देती थी. ढाई महीने पहले ही रवि की पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया था, जिस से जसवंती रवि पर रोज कोई न कोई काम करने के लिए उस पर दबाव बनाने लगी थी. लेकिन रवि को कोई काम नहीं मिल पा रहा था.

इस दौरान जसवंती की बेटी की बेटी लवीशा भी उस के साथ आ कर रहने लगी, जिस से जसंवती रवि को खर्च के पैसे देने में और आनाकानी करने लगी. इस से रवि अपनी भांजी से भी नफरत करने लगा. घटना के 4 दिन पहले रवि ने अपनी मां से खर्च के लिए पैसे मांगे तो जसवंती ने उसे बुरी तरह झिड़का ही नहीं, बल्कि पत्नी और बच्चे के साथ घर से निकलने का फरमान भी सुना दिया. जिस से गुस्से में आ कर रवि अपनी पत्नी और बच्चे को ले कर अपने मामा ससुर दिलीप के वहां चला गया.

रवि को इस बात का डर था कि कहीं मां पूरी जायदाद भांजी लवीशा के नाम न लिख दे, जो उस के साथ आ कर रहने लगी थी. इसलिए उस ने मामा ससुर के साथ मिल कर मां की हत्या की योजना बना कर मदन को फोन किया. वास्तव में रवि को पता था कि मां का प्रेमी मदन सेन भी अब उस से तंग आ चुका है. इसलिए रवि ने मदन को अपनी योजना बताई तो मदन इस में साथ देने को राजी हो गया. जिस के बाद घटना वाले दिन मामा ससुर दिलीप और रवि गांव पहुंचे तो वहां से मदन भी उन के साथ हो गया.

आधी रात के बाद तीनों ने चुपचाप घर में घुस कर सो रही जसवंती और उस की नातिन के सिर पर मूसल और हथौड़ी से वार कर उन की हत्या कर दी. पुलिस इस घटना को लूट की वारदात समझे, इसलिए रवि हत्या के बाद जसवंती का मंगलसूत्र और लविशा की पायल उतार कर साथ ले गया. तीनों को भरोसा था कि पुलिस उन पर कभी शक नहीं करेगी. लेकिन पुलिस ने 7 दिनों में ही मामले का खुलासा कर दिया. Family Crime

True Crime Story: दौलत के लालच में अपनों का कत्ल

True Crime Story: वर्षा से शादी के बाद से ही खफा चल रहे उस के देवर कृष्णकांत को जब यह पता चला की वर्षा  किसी और के साथ लिवइन में रह रही है तो यह उस से सहा नहीं गया. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद उस का सारा पैसा भी उस की भाभी वर्षा ही ले गई थी. भाई के बदले वह सेना में नौकरी चाह रहा था. यह मामला भी कोर्ट की दहलीज पर पहुंच चुका था.

भाभी के लिवइन में रहने की खबर के बाद कृष्णकांत को लगा कि भाभी उस के भाई की ही संपत्ति और पैसे पर ऐश कर रही है. तब कृष्णकांत ने अपनी भाभी को सदा के लिए मौत की नींद सुला देने का भयानक निर्णय ले लिया. मध्य प्रदेश के जिला बैतूल से करीब 22 किलोमीटर की दूरी पर बसा है आमला कस्बा. आदिवासी बाहुल्य यह कस्बा ज्यादा बड़ा तो नहीं है पर आसपास के गांव वाले यहां खरीदारी करने आया करते हैं.

लिहाजा शाम तक यहां के बाजार भीड़ से भरे होते हैं. ऐसे में पुलिस को भी कानूनव्यवस्था के लिए चुस्त रहना पड़ता है. 6 फरवरी, 2021 को रात करीब 9 बजे का वक्त रहा होगा. आमला के टीआई सुनील लाटा शहर में भ्रमण पर थे. इसी बीच उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि कनौजिया गांव में गोली चली है, इस में एक महिला गंभीर रूप से घायल है.

सूचना मिलते ही टीआई कनौजिया गांव पहुंचे, इस इलाके में गोली चलने की वारदात अमूमन कम ही होती है. बरहाल, टीआई ने इस घटना की जानकारी एसपी सिमाला प्रसाद को दी. साथ ही एसडीपीओ मुलताई नम्रता सोंधिया समेत फोरैंसिक टीम के सदस्यों को दी और वह तत्काल कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

आमला से कनौजिया की दूरी करीब 5 किलोमीटर है, लिहाजा पुलिस को यहां पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा. पुलिस जब घटनास्थल पर पहुंची, तब तक भीड़ काफी जमा हो चुकी थी. कनौजिया गांव के जिस मकान में गोली चलने की घटना हुई थी, वहां करीब 4-5 कमरे थे. पहले कमरे में बैड पर खून से लथपथ एक 27-28 वर्षीय युवती का शव पड़ा था. पास में ही उस का मोबाइल पड़ा था. पुलिस ने अनुमान लगाया कि घटना के समय युवती मोबाइल पर बात कर रही होगी.

टीआई सुनील लाटा अभी मौकामुआयना कर ही रहे थे कि इतने में एसडीपीओ (मुलताई) नम्रता सोंधिया भी मौके पर आ गईं. इस के बाद एसपी सिमाला प्रसाद भी वहां पहुंच गईं. पूछताछ में पता चला कि मृतका का नाम वर्षा नागपुरे है और वह बोखड़ी कस्बे की रहने वाली थी. सुबह ही वह अपनी मां के पास कनोजिया आई थी.

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पुलिस ने यहां लोगों से प्रारंभिक पूछताछ भी की, पर वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं थे. उन का कहना था कि कौन आया, किस ने वर्षा को गोली मारी, पता ही नहीं चला. वे तो गोली चलने की आवाज के बाद अपने घरों से बाहर आए थे. वर्षा की हत्या की वजह पुलिस को भी समझ नहीं आ रही थी. पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि मायके में आने के बाद उस की हत्या किस ने की? एफएसएल टीम द्वारा जांच करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

पुलिस ने इस के बाद वर्षा के मायके वालों से पूछताछ की तो वर्षा के भाई कृष्णा पवार ने बहन वर्षा की हत्या का संदेह उस के देवर कृष्णकांत नागपुरे और महेश नागपुरे निवासी बोडखी पर व्यक्त किया था. इधर पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि वर्षा किसी के साथ लिवइन रिलेशन में रह रही थी.

बहरहाल, सारी जानकारी जुटाने के बाद टीआई सुनील लाटा आमला लौट आए. उन के सामने जिन लोगों के नाम संदेह के तौर पर सामने आए थे, उन पर नजर रखने के लिए उन्होंने कुछ पुलिसकर्मियों को लगा दिया. पुलिस को अपनी जांच में यह भी पता चला कि अपनी ससुराल वालों से वर्षा के रिश्ते ठीक नहीं थे, लिहाजा उन्होंने जांच का रुख ससुराल वालों की तरफ मोड़ लिया.

इस बीच टीआई सुनील लाटा को खबर मिली कि वर्षा का देवर कृष्णकांत घटना से कुछ दिनों से गांव बोडखी में ही देखा गया था. पर घटना के बाद से वह गायब है. पुलिस ने अब अपना ध्यान कृष्णकांत की ओर लगा दिया.

पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो यह भी पता चला कि कृष्णकांत का अपनी भाभी वर्षा से काफी समय से विवाद चल रहा था. जब से उस ने कृष्णकांत के बड़े भाई चंद्रशेखर नागपुरे से लवमैरिज की थी, तभी से ससुराल वाले उस से नाराज चल रहे थे. जिस से वह शादी के बाद से ही ससुराल वालों से अलग पति के साथ रह रही थी. वह भी उस से खुश नहीं थे.

पुलिस ने वर्षा की सास और जेठ से भी पूछताछ की. उन्होंने बताया कि वर्षा उन से अलग रहती थी. लिहाजा उन्होंने भी उस से रिश्ता लगभग खत्म कर रखा था. इस मामले में पता चला कि कीर्ति नाम की युवती से मृतका के देवर की मित्रता थी. पुलिस ने कीर्ति के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि उस का कृष्णकांत से मिलनाजुलना था. पुलिस ने कीर्ति से पूछताछ की और उस की काल डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि घटना के दिन कई बार उस की कृष्णकांत से बात भी हुई थी.

कीर्ति से जब पुलिस ने थोड़ी सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि कृष्णकांत अकसर उस से वर्षा के बारे में पूछता रहता था. तब वह उसे वर्षा की लोकेशन बता देती थी. कीर्ति ने पुलिस को बताया कि अब कृष्णकांत कहां है, इस बारे में उसे कुछ भी पता नहीं है. कृष्णकांत का मोबाइल फोन भी बंद था. पुलिस ने अपने मुखबिरों को लगातार इस मामले में नजर रखने को कहा था. इस का परिणाम यह हुआ की पुलिस को जानकरी मिली कि कृष्णकांत भोपाल में है.

पुलिस को यह भी पता चला कि वह कोर्ट के काम से आमला आने वाला है. लिहाजा पुलिस मुस्तैद हो कर उस के आने का इंतजार करने लगी. अगले दिन जैसे ही वह आमला आया, पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. पुलिस ने थाने ले जा कर जब कृष्णकांत से पूछताछ की तो वह खुद को बेगुनाह बताने लगा. उस ने बताया कि घटना वाली तारीख को वह भोपाल में था.

पुलिस ने जब उसे बताया कि घटना की रात उस का मोबाइल देर रात तक आमला के आसपास ही लोकेशन दिखा रहा था. उसे उस के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स दिखाई तो वह टूट गया. उस ने कबूल कर लिया कि उस ने अपनी दोस्त कीर्ति की मदद से अपनी भाभी वर्षा की हत्या की है. वर्षा ने हालात ही ऐसे बना दिए थे, जिस से उसे उस की हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ा.

कृष्णकांत ने पुलिस को जो बताया उस के अनुसार कहानी कुछ इस प्रकार सामने आई—

बैतूल जिले के आमला गांव के समीप बोडखी में रहने वाले आर.के. नागपुरे के 3 बेटों में सब से बड़ा चंद्रशेखर नागपुरे था. इंटरमीडिएट की पढ़ाई करने के बाद चंद्रशेखर सेना में भरती हो गया.

नौकरी से छुट्टी मिलने पर जब वह घर आता तो कनोजिया में रहने वाले अपने मामा के यहां भी जाता था. उस के मामा की बेटी वर्षा उस समय जवानी की दहलीज पर कदम रख ही रही थी और महज 16 साल की थी. इधर चंद्रशेखर 27 की उम्र छू रहा था. पर सेना में होने के कारण उस का बदन गठीला था और सेना में होने का रौब तो उस पर था ही. उसी दौरान वर्षा से उसे प्यार हो गया. दोनों ही एकदूसरे को दिलोजान से चाहने लगे.

रिश्ते मे वर्षा चंद्रशेखर की ममेरी बहन थी, पर इस के बाद भी दोनों रिश्तों की मर्यादा भूल गए और प्यार की पींगे बढ़ाने लगे. जब इस बात की भनक चंद्रशेखर के घर वालों को लगी तो वे उस पर नाराज हुए. उन को कतई गवारा नहीं था कि उन का बेटा ऐसी युवती से प्रेम करे, जो उस के सगे रिश्ते में आती हो. वे चंद्रशेखर का रिश्ता कहीं दूसरी जगह करने की योजना बना रहे थे. उन्होंने चंद्रशेखर को काफी समझाया पर वह नहीं माना.

चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध की परवाह नहीं की ओर वर्षा से मिलना जारी रखा. वर्षा भी उस के प्यार में दीवानी थी. लिहाजा उस ने नजदीकी रिश्ते से ज्यादा अपने प्यार को अहमियत दी. नतीजा यह हुआ कि घर वालों के विरोध के बावजूद चंद्रशेखर और वर्षा ने शादी का फैसला कर लिया और घर वालों के विरोध के बावजूद उन्होंने शादी कर ली.

शादी चूंकि चंद्रशेखर ने घर वालों के विरोध के बावजूद की थी, लिहाजा शादी के बाद वह घर से अलग हो गया और बोखड़ी में ही अलग मकान ले कर रहने लगा. समय अपनी गति से बीतता रहा. कुछ समय बाद वर्षा एक बेटे की मां भी बन गई. बात 2013 के आसपास की है. चंद्रशेखर की जहर खाने से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई. उस ने जहर कैसे खाया, इस बात का खुलासा तो नहीं हो पाया, पर कहा यह जाता है कि चंद्रशेखर अपने घर वालों के व्यवहार से दुखी था और घर वालों द्वारा उसे स्वीकार नहीं किया तो उस ने यह कदम उठा लिया.

हालांकि उस ने जहर खाया था या उसे दिया गया था, यह भी एक रहस्य था. चंद्रशेखर की मृत्यु के बाद उस की सारी संपत्ति की वारिस उस की पत्नी वर्षा बन गई. चंद्रशेखर के घर वाले वर्षा को पहले ही नापसंद करते थे. उन्होंने इस शादी को भी मान्यता नहीं दी थी, लिहाजा वे इस के खिलाफ हो गए कि वर्षा को उस की संपत्ति में से कुछ मिले. पर उन के चाहने से कुछ नहीं हुआ.

सेना ने वर्षा को उस की पत्नी मानते हुए उस की मौत के बाद उस के सारे देय दे दिए. बताया जाता है कि वर्षा को चंद्रशेखर की मौत के बाद करीब 30 लाख रुपए मिले थे. चंद्रशेखर का भाई कृष्णकांत इसे अपनी संपत्ति मान रहा था और उस का मानना था कि इस से उस के घर वालों को काफी नुकसान उठाना पड़ रहा है. उस ने सेना मुख्यालय में भी पत्र लिख कर इस धनराशि में अपना अधिकार बताया. कृष्णकांत ने कहा कि चंद्रशेखर का वर्षा के साथ कभी विवाह हुआ ही नहीं था. दोनों भाईबहन थे, लिहाजा उस की संपत्ति पर घर वालों का अधिकार है.

उस ने चंद्रशेखर की मौत के बाद खुद को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने की मांग भी सेना से की थी. जब यह बात नहीं बनी तो वह कोर्ट चला गया. कोर्ट में इस मामले की सुनवाई अभी जारी थी. अब बात करते हैं हत्या के कारणों की. बड़े भाई चंद्रशेखर की मौत के बाद कृष्णकांत भोपाल आ गया और यहां एक कंपनी में मोटरसाइकिल राइडर बन गया. वह कंपनी के निर्देश पर लोगों को लाने ओर छोड़ने का काम करने लगा.

इस दौरान वह जब भी गांव जाता तो वर्षा के शानोशौकत भरे खर्चे देख कर उसे बेहद पीड़ा होती थी. उसे लगता था कि उस का परिवार आर्थिक दिक्कत झेल रहा है और वर्षा उस के भाई की मौत के बाद मिले पैसों से ऐश कर रही है. कुछ दिनों बाद कृष्णकांत को पता चला की वर्षा किसी और व्यक्ति के साथ लिवइन में रहने लगी है तो उसे और बुरा लगा. उसे लगा कि अब तो वर्षा की संपत्ति उसे कभी नहीं मिलेगी. लाखों के लालच में उस ने वर्षा को मारने का फैसला कर लिया. इस के लिए उस ने कीर्ति को अपने विश्वास में लिया और उस से दोस्ती कर ली. कीर्ति को उस ने यह जिम्मेदारी दी कि वर्षा की हर गतिविधि पर नजर रखे और उस की हर गतिविधि की उसे फोन द्वारा जानकारी देती रहे.

6 फरवरी, 2021 को वर्षा अपनी मां के यहां आई थी. कीर्ति ने इस की जानकारी फोन पर कृष्णकांत को दी. कृष्णकांत को लगा कि अच्छा मौका है. शाम के समय वैसे भी गांव में अंधेरा छा जाता है और अधिकांश लोग अपने घरों में कैद हो जाते हैं. ऐसे मे वर्षा की हत्या करना कृष्णकांत को आसान लगा. उस ने अपने एक मित्र से एक तमंचे का जुगाड़ किया और शाम को मोटरसाइकिल से सीधा कनौजिया गांव पहुंचा और वर्षा के घर के सामने जा कर खड़ा हो गया. वहां उस समय कुछ लोग उसे दिखे और घर का दरवाजा भी बाहर से बंद था.

लिहाजा वह घर के पीछे गया. वहां वर्षा की दादी बरतन साफ कर रही थीं. बूढ़ी होने के कारण उन्हें कम दिखाई और कम सुनाई देता था. उन्हें चकमा दे कर वह पीछे के दरवाजे से अंदर घुस गया. वर्षा कमरे में किसी से फोन पर बात कर रही थी. कृष्णकांत ने बिना समय गंवाए उस पर गोली चला दी. गोली लगते ही वर्षा ढेर हो गई. उधर अपना काम करने के बाद कृष्णकांत पीछे के दरवाजे से फरार हो गया. उसी रात वह मोटरसाइकिल से भोपाल आ गया. कोर्ट के काम से उसे फिर आमला जाना पड़ा. हालांकि वह 2 दिन में निश्चिंत हो चुका था कि उसे किसी ने नहीं देखा होगा. इस कारण वह पकड़ा नहीं जाएगा.

लेकिन कहते हैं न कि जुर्म कहीं न कहीं अपने निशान छोड़ ही जाता है. कृष्णकांत के साथ भी यही हुआ. पुलिस ने कड़ी से कड़ी जोड़ी तो उस का जुर्म सामने आ गया. पुलिस ने कृष्णकांत और कीर्ति से पूछताछ के बाद उन्हें गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. True Crime Story

Crime Story: प्रेमी के सिंदूर की चाहत – पति बना पत्नी का शिकार

Crime Story: 17 मई की शाम करीब साढ़े 5 बजे थे जब दिल्ली में द्वारका सेक्टर 29 से सटे छावला के थाने के टेलीफोन की घंटी बजी. ड्यूटी औफिसर ने तुरंत फाइल समेटते हुए अपना हाथ टेलीफोन का रिसीवर उठाने के लिए आगे बढ़ाया. जैसे ही ड्यूटी औफिसर ने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से किसी ने घबराते हुए बोला, ‘‘छावला पुलिस स्टेशन?’’

ड्यूटी औफिसर, ‘‘मैं छावला थाने से बोल रहा हूं. बताइए आप क्या कहना चाहते हैं?’’ ड्यूटी औफिसर ने कहा.

‘‘साहब, निर्मलधाम के पास सड़क किनारे एक आदमी की लाश पड़ी है. मैं यहां से गुजर रहा था तो मैं ने देखा. आप यहां आ कर देख लीजिए.’’

ड्यूटी औफिसर ने फोन के रिसीवर को अपने दांए कंधे और कान के सहारे दबाया, अपने दोनों हाथों को आजाद किया और टेबल पर कहीं पड़े नोट्स वाली डायरी ढूंढने लगे. वह लगातार फोन पर उस राहगीर से वारदात की घटना के बारे में पूछ रहे थे और डायरी ढूंढ रहे थे. टेबल पर बिखरे सारे सामान को उलटने पुलटने के बाद जब डायरी नहीं मिली तो एक फाइल के पीछे ही उन्होंने वारदात की जगह समेत बाकी जरूरी जानकारियां लिख डालीं. ड्यूटी औफिसर ने उस राहगीर को वारदात की जगह से कहीं भी हिलने से मना कर दिया और फोन काट दिया.

ये सारी जानकारी ड्यूटी औफिसर ने उस समय थाने में मौजूद थानाप्रभारी राजवीर राणा को दी. राजवीर राणा बिना किसी देरी के थाने में मौजूद स्टाफ को ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

वहां पहुंचते ही पुलिस की टीम ने उस सुनसान सी सड़क के एक किनारे पर एक बाइक खड़ी देखी. बाइक के बिलकुल बगल में खून से लथपथ एक व्यक्ति की लाश पड़ी थी. लाश को देखते ही वहां मौजूद पुलिस टीम चौकन्नी हो गई और सबूत जमा करने के मकसद से घटनास्थल के इर्दगिर्द फैल गई.

थानाप्रभारी राजवीर राणा जब लाश का मुआयना करने के लिए बौडी के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा कि उस के बदन पर किसी धारदार हथियार से कई वार किए गए थे. जो साफ दिखाई दे रहे थे. उन्होंने लाश के अगलबगल नजर घुमाई तो एक मोबाइल फोन वहीं पास में पड़ा था, जो कि संभवत: मरने वाले शख्स का रहा होगा.

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रात होने को थी. मौके पर पहुंची पुलिस टीम ने बिना किसी देरी के बाइक और मोबाइल जब्त कर लिया और लाश की काररवाई आगे बढ़ाने के लिए क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम के आने का इंतजार करने लगे.

उस सड़क से पैदल आने जाने वाले लोगों ने पुलिस और वहां मौजूद लाश को देख कर घटनास्थल पर जमावड़ा लगा दिया. सब टकटकी लगाए पुलिस को अपना काम करते देख आपस में फुसफुसाहट करने लगे.

जब वहां मौजूद पुलिस ने आसपास के मूकदर्शक बने लोगों से लाश की पहचान करने के लिए पूछताछ की तो कुछ लोगों ने लाश की शिनाख्त करते हुए कहा कि इस का नाम अशोक कुमार है और यह पेशे से टैक्सी ड्राईवर है.

तब तक मौके पर क्राइम इनवैस्टीगैशन टीम भी आ पहुंची. टीम ने अपना काम शुरू किया. उन्होंने सब से पहले लाश की फोटोग्राफी की. उन्होंने सबूत के तौर पर घटनास्थल से खून लगी मिट्टी के नमूने इकट्ठा कर लिए. यह सब काम कर लेने के बाद थानाप्रभारी राजवीर राणा ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए मौर्चरी भेज दिया.

सारे काम निपटा लेने के बाद पुलिस की टीम थाने लौट आई तथा इस केस के संबंध में काम आगे बढ़ाने लगी. पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया और जांच की जिम्मेदारी थानाप्रभारी राजवीर राणा ने स्वयं संभाली.

केस की तफ्तीश को आगे बढ़ाने के लिए थानाप्रभारी राणा ने सब से पहले घटनास्थल से बरामद किए गए मोबाइल फोन को निकलवाया. यह फोन टूटा नहीं था. सिर्फ बैटरी चार्जिंग खत्म होने की वजह से बंद हो गया था.

उस की काल डिटेल्स निकलवाई और देखा कि आखिरी बार एक नंबर से अशोक कुमार को कई बार काल की गई थी. इस के कुछ देर बाद ही अशोक कुमार की हत्या हो गई थी.

शक की सूई अब इसी आखिरी नंबर पर आ कर रुक गई थी. राजवीर राणा ने अपने फोन से इस नंबर को डायल किया तो दूसरी तरफ से किसी महिला की आवाज आई. थानाप्रभारी ने पहले अपना परिचय दिया और उस के बाद उस महिला से अशोक कुमार के रिश्ते के बारे में पूछा.

महिला ने अपना नाम शीतल और खुद को अशोक कुमार की बेटी बताया. राजवीर ने फोन पर बड़े दु:ख के साथ शीतल को बताया कि उस के पिता सड़क दुर्घटना में बुरी तरह से घायल हो चुके हैं, यह जानने के बाद शीतल उसी समय ही बिलखने लगी. उन्होंने उस से उस की मां के बारे में पूछा तो शीतल ने अपनी मां राजबाला से उन की बात करा दी.

थानाप्रभारी ने राजबाला को अशोक की मौत की खबर देते हुए उन से शीघ्र ही थाने पहुंचने को कहा 2-3 घंटे बाद जब राजबाला थाने पहुंची तो वह राजवीर राणा को देखते ही फफकफफक कर रोने लगी.

अपने पति की हत्या की खबर सुन कर वह आहत थी. राजवीर राणा ने राजबाला को हौसला रखने को कहा और उस से उस के पति से किसी से साथ दुश्मनी होने के बारे में पूछा. राजबाला ने रोते हुए कहा कि अशोक की किसी के साथ भी कोई दुश्मनी नहीं थी.

राजबाला से बात करते समय थानाप्रभारी राजवीर राणा को उस की बातों से ऐसा नहीं लग रहा था कि उसे पति की मौत का दुख है. बेशक राजबाला राजवीर राणा के सामने रो रही थी और दुखी दिखाई दे रही थी. लेकिन राजवीर को राजबाला पर शक हो चुका था.

राजबाला के आंसू घडि़याली लग रहे थे. दाल में कहीं तो कुछ काला जरुर था, जिस का पता लगाना जल्द से जल्द जरुरी था. आखिर एक व्यक्ति का कत्ल जो हुआ था.

राजबाला से पूछताछ खत्म होने पर वह अपने घर के लिए रवाना हो गई और पीछे कई तरह के शक और सवाल छोड़ गई.

इन सभी शकों को दूर करने के लिए और इस मामले से जुडे़ सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए थानाप्रभारी ने शीतल और राजबाला की काल डिटेल्स मंगवाई. उन्होंने दोनों की काल डिटेल्स को बेहद बारीकी से परखी और उस की जांच की तो वह बेहद हैरान रह गए.

काल डिटेल्स से उन्हें यह पता लगा कि शीतल जिस समय अशोक को लगातार काल कर रही थी उस के ठीक बाद उस ने एक अन्य नंबर पर काफी देर तक बातचीत की थी. यह सब देख कर पुलिस ने यह अनुमान लगाया कि यदि इस मामले में शीतल को थोडा ढंग से कुरेदा जाए तो शायद इस केस में एक और लीड मिल सकती है. राजवीर ने बिना देरी किए फिर से एक बार राजबाला और शीतल को थाने बुला लिया.

उन्होंने इस बार दोनों से अलगअलग पूछताछ की. उन्होंने पहले शीतल से इस घटना के बारे में विस्तार से पूछा. शीतल का बयान लेने के बाद उन्होंने राजबाला से इस मामले में फिर से पूछताछ की. क्रास पूछताछ में दोनों की चोरी पकड़ी गई.

दोनों के बयान एक दूसरे से अलग थे. जब राजवीर राणा ने दोनों को कानून का थोड़ा डर दिखा कर उन पर दबाव बनाया तो शीतल ज्यादा देर टिक नहीं सकी. शीतल ने रोतेबिलखते, अपने हाथ से अपना सिर पीटते हुए अपनी मां राजबाला और उस के प्रेमी वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू के साथ साजिश रच कर अपने पिता की हत्या कराने की बात कबूल कर ली.

यह सब सुनते ही बेटी के सामने राजबाला का चेहरा पीला पड़ गया. उसे जैसे न तो कुछ सुनाई दे रहा था और न ही कुछ दिखाई दे रहा था. थाने में शीतल के सामने राजबाला अपनी बेटी को घूरे जा रही थी. वह उसे ऐसे घूर रही थी जैसे मानो अगर उसे मौका मिलता तो वह वहीं पर शीतल का भी कत्ल कर बैठती.

शीतल द्वारा जुर्म कबूल करते ही पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया. फिर राजबाला की निशानदेही पर उस के प्रेमी वीरेंद्र को भी उस के घर से गिरफ्तार कर लिया.

वीरेंद्र से पूछताछ की गई तो उस ने अशोक की हत्या करने का जुर्म स्वीकार कर लिया. वीरेंद्र के बताए हुए पते पर जा कर पुलिस टीम ने अशोक कुमार की हत्या में इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू और उस की कार बरामद कर ली. तीनों की गिरफ्तारी के बाद पूछताछ में अशोक कुमार की हत्या के पीछे अवैध संबंधों की जो सनसनीखेज दास्तान सामने आई, कुछ इस तरह थी—

अशोक कुमार दिल्ली के नजफगढ़ के नजदीक भरथल गांव में अपने परिवार के साथ रहता था. उस का 3 सदस्यों का छोटा परिवार था जिस में अशोक, उस की पत्नी राजबाला और बेटी शीतल ही थी. अशोक की कमाई का जरिया उस की टैक्सी थी. वह बेटी शीतल की शादी जाफरपुर कला के पास इशापुर गांव के रहने वाले हिमांशु से कर चुका था. शीतल अपने पति के साथ बेहद खुश थी. बेटी की शादी के बाद अशोक के सिर पर अब कोई और जिम्मेदारी नहीं थी.

लेकिन पिछले साल कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में लौकडाउन लगा तो ज्यादातर लोगों की तरह अशोक भी अपने घर में कैद हो कर रह गया. उस का काम न के बराबर रह गया. घर पर रहने पर अशोक बहुत ज्यादा परेशान नहीं था.

अशोक को महसूस हुआ कि वैसे भी अपने काम के दौरान वह अकसर अपने घर से बाहर ही रहता है, ऐसे में न जाने कितने अरसे बाद उसे इतने लंबे समय के लिए घर में रहना नसीब हुआ है. अपने काम से हमेशा बाहर रहने वाले व्यक्ति को जब घर में कैद होना पड़ जाए तो जाहिर सी बात है कि वह घर की हर एक चीज को बारीकी से परखता है, गौर करता है.

ऐसे ही लौकडाउन के एक दिन अशोक घर का सामान लेने के लिए गांव में निकला तो दुकानदार से बातचीत के दौरान उस ने जो सुना उस से उस के होश ही उड़ गए.

दुकानदार ने कहा, ‘‘क्या भई अशोक. मजा आ रहा है घर में कैद हो कर?’’

‘‘कैद होना किस को अच्छा लगता है भला. अब समस्या सिर पर बैठी है तो हम बस उसे झेलने को मजबूर हैं. घर में रहने के अलावा और कुछ कर भी तो नहीं सकते.’’ अशोक बोला.

‘‘अब तो तुम्हारी महरिया भी तुम्हारे साथ कैद हो गई होगी. अब तो लोग आ जा भी नहीं सकते तुम्हारे घर. दुकानदार ने जोर देते हुए कहा.’’

‘‘वो घर में कैद हो गई…? क्या मतलब. और घर में लोगों के आने की क्या बात कह रहे हो.’’ अशोक भौंहें चढ़ाते हुए बोला.

दुकानदार ने धीमी, दबी आवाज में कहा, ‘‘अरे वो तो लौकडाउन लग गया तब जा कर तुम्हारी महरिया घर पर रुकने को मजबूर है. नहीं तो तुम्हारे घर से निकलते ही तुम्हारी महरिया आशिकी करने निकल जाती थी.’’

‘‘यह तुम कैसी बातें कर रहे हो. कौन है उस का आशिक?’’ अशोक ने गुस्से से पूछा.

दुकानदार दबी आवाज में बोला, ‘‘अरे ढिल्लू का नाम सुना है न तुम ने? वीरेंद्र का? वही तो है जो शीतल की मां के साथ आशिकी करता फिरता है. यह बात तो पूरे गांव वालों को पता है. चाहे तो पूछ लो.’’

ये सब सुनते ही अशोक के दाएं हाथ में थामी पौलिथिन थैली छूट गई. थैली फटने से चीनी, आटा, दाल और घर का कुछ और सामान नीचे पथरीली सड़क पर गिर कर फैल गया. अशोक को इस बात पर जितना सदमा लगा था उस से कहीं ज्यादा उसे इस बात को सुन कर गुस्सा आ रहा था. लोग उस की पत्नी राजबाला और गांव के बदमाश वीरेंद्र के बारे में उलटी सीधी बातें कर रहे थे.

दुकानदार से यह सब सुन कर उस ने 2-4 और लोगों से इस बारे में पूछताछ की. हर किसी ने दबी आवाज में अशोक को वही बताया जो कि उस दुकानदार ने बताया था.

दरअसल 43 वर्षीय वीरेंद्र उर्फ ढिल्लू भरथल का ही निवासी था. वीरेंद्र उस इलाके का नामचीन बदमाश था. दिल्ली के कई थानों में उस के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे. एक तरह से जेल उस का दूसरा घर था.

लोगों के अनुसार जब अशोक घर पर नहीं रहता था तब उस के पीठ पीछे वीरेंद्र राजबाला के साथ गुलछर्रे उड़ाता था. अशोक ने बिना किसी हिचकिचाहट के राजबाला से इस बारे में पूछा.

लेकिन राजबाला ने पति की बात से कन्नी काट ली. उस ने उस की बात से साफ इनकार कर दिया. लेकिन उस दिन के बाद राजबाला अशोक की नजरों का ज्यादा देर तक सामना नहीं कर पाई.

राजबाला के मोबाइल पर जब कभी भी वीरेंद्र का फोन आता तो वह पति से दूर जा कर बात करती, जब अशोक उस से पूछता कि किस का फोन आया था तो वह रिश्तेदार होने का बहाना बनाने लगती. यह सब कुछ देख कर अशोक को यह यकीन जरूर हो गया कि दाल में जरूर कुछ काला है.

अकसर पति के घर पर रहने से पत्नी को खुशी होती है लेकिन अशोक के घर पर होने से राजबाला की खुशियों पर मानो बादल छा गए थे.

राजबाला वीरेंद्र से मिलने के लिए तड़पने लगी. उसे अपने पति से ज्यादा वीरेंद्र पसंद था. वीरेंद्र के साथ मां की आशिकी के किस्से बेटी शीतल से भी नहीं छिपे थे. वह भी उन के रिश्ते के बारे में बखूबी जानती थी और वह भी तो वीरेंद्र से पिता का महत्त्व देती थी.

शीतल वीरेंद्र को पिता अशोक से ज्यादा पसंद करती थी. क्योंकि अशोक जब घर पर नहीं रहता था, उस समय वीरेंद्र राजबाला से मिलने आता तो शीतल के लिए महंगे तोहफे साथ लाता था. दरअसल लौकडाउन की वजह से अशोक अपनी पत्नी राजबाला, बेटी शीतल और वीरेंद्र के लिए गले की हड्डी बन गया था.

लौकडाउन के चलते जेल में बंद वीरेंद्र को भी पैरोल पर छोड़ दिया गया था. एक दिन अशोक की नजरों से बचते बचाते वीरेंद्र राजबाला से मिला. उस दिन राजबाला ने वीरेंद्र पर इस कदर प्यार लुटाया जैसे वीरेंद्र के पर लग गए हों.

शारीरिक सुख भोग लेने के बाद जब राजबाला और वीरेंद्र एकदूसरे से अलग हुए तो उस ने वीरेंद्र्र से कहा कि अगर उस ने उस के पति अशोक को जल्द ठिकाने नहीं लगाया तो वह आत्महत्या कर लेगी. तब वीरेंद्र ने प्रेमिका से कहा, ‘‘तुम्हें आत्महत्या करने की जरूरत नहीं है. मैं उसे ही निपटा दूंगा.’’

इस के बाद राजबाला और वीरेंद्र ने योजना बनाई. इस योजना में उन्होंने शीतल को शामिल कर लिया. शीतल इस काम के लिए खुशी से तैयार हो गई.

17 मई, 2021 को शीतल ने अपने पिता अशोक को मिलने के लिए निर्मलधाम बुलाया. अशोक अपनी बाइक से निर्मलधाम के रास्ते में ही था. शीतल पलपल पिता को काल कर उस से खबर लेती रही. जब अशोक निर्मलधाम के नजदीक पहुंचा तो शीतल ने वीरेंद्र को काल कर यह बात बता दी.

वीरेंद्र अपनी हुंडई कार से वहां पहुंच गया और अशोक को सड़क किनारे रोक कर चाकू से गोद दिया. अशोक की लाश को वहीं छोड़ कर वीरेंद्र्र वहां से फरार हो गया. काम हो जाने पर वीरेंद्र्र ने राजबाला और शीतल को इस बात की जानकारी फोन कर के दी.

राजबाला, शीतल और वीरेंद्र्र तीनों अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे थे लेकिन पुलिस ने अपनी सूझबूझ के साथ 12 घंटे के अंदर ही अशोक कुमार हत्याकांड का परदाफाश कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया. तीनों आरोपियों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. मामले की तफ्तीश थानाप्रभारी राजवीर राणा कर रहे थे. Crime Story

Domestic Dispute: गलती गुरतेज की – क्यों बना बीवी का हत्यारा

Domestic Dispute: गुरतेज सिंह के 2 और भाई थे. ये सभी बठिंडा के थाना संगत के गांव मुहाला के आसपास रहते थे. गुरतेज भाइयों से अलग रहता था. उस के पास पैसा भी था और रुतबा भी. शादी के 2 सालों बाद ही वह एक बेटे का बाप बन गया था.

वह सुबह खेती के काम के लिए निकल जाता तो शाम को ही लौटता था. पतिपत्नी एकदूसरे से बहुत खुश थे. लेकिन एक दिन गुरतेज के एक दोस्त ने उसे जो बताया, उस से इस घर की खुशियों में ग्रहण लगना शुरू हो गया. गुरतेज के उस खास दोस्त ने बताया था कि उस ने जसप्रीत भाभी को एक लड़के के साथ शहर के बाजार में घूमते देखा था. लेकिन गुरतेज को उस की बातों पर विश्वास ही नहीं हुआ.

लेकिन यही बात कुछ दिनों बाद किसी दूसरे दोस्त ने बताई तो गुरतेज सोचने को मजबूर हो गया कि दोनों दोस्तों को एक जैसा धोखा नहीं हो सकता.

इसलिए शाम को घर लौट कर उस ने जसप्रीत से इस बारे में पूछा तो उस ने खिलखिला कर हंसते हुए कहा, ‘‘लगता है, आप के दोस्त भांग पी कर घूमते हैं, इसीलिए आप से बहकीबहकी बातें करते हैं. आप खुद ही सोचिए, मैं आप के बगैर शहर क्या करने जाऊंगी?’’

जसप्रीत के इस जवाब से गुरतेज लाजवाब हो गया. लेकिन यह धोखा नहीं था. इस के 10 दिनों बाद की बात है. यही बात एक रिश्तेदार ने गुरतेज से कही तो घर में झगड़ा होना स्वाभाविक था, जबकि जसप्रीत का अब भी वही कहना था, जो उस ने पहले कहा था.

जसप्रीत की बातों से गुरतेज को लगता कि वही गलत है. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सच है और कौन झूठा? लेकिन एक बात तय थी कि कोई न कोई तो झूठ बोल रहा था. काफी सोचनेविचारने के बाद भी गुरतेज को इस समस्या का कोई हल नजर नहीं आया. इसी तरह ऊहापोह में कुछ दिन और बीत गए, इस बार उस के छोटे भाई जगतार ने एक दिन उस से कहा, ‘‘भाई, आप होश में आ जाइए, कहीं ऐसा न हो कि पानी सिर के ऊपर से गुजर जाए और आप को इस की खबर तक न लगे.’’

इस बार भाई जगतार ने जसप्रीत के बारे में खबर दी तो उसे पूरा विश्वास हो गया कि सभी सच थे, झूठ जसप्रीत ही बोल रही थी. इसलिए उस दिन गुरतेज ने सख्ती से काम लिया. उस ने जसप्रीत को खूब डांटाफटकारा.

इस के बाद पतिपत्नी दोनों ही सतर्क हो गए. जसप्रीत जहां घर से बाहर निकलने में सावधानी बरतने लगी, वहीं गुरतेज गुपचुप तरीके से उस पर नजर रखने के साथ पड़ोसियों से उस के बारे में पूछता रहता था. इस से गुरतेज को पता चल गया कि उस के खेतों पर जाने के बाद कोई लड़का उस के घर आता है. उस के आने के बाद जसप्रीत बेटे को किसी पड़ोसी के घर छोड़ कर उस लड़के के साथ चली जाती है.

वह लड़का कौन था, यह कोई नहीं जानता था. इस से साफ हो गया कि जसप्रीत के किसी लड़के से संबंध हैं. इस बारे में गुरतेज ने जसप्रीत से कुछ नहीं पूछा. दरअसल, वह उसे रंगेहाथों पकड़ना चाहता था, इसलिए एक दिन घर से वह खेतों पर जाने की बात कह कर गांव में ही छिप गया.

करीब एक घंटे बाद एक टाटा 407 टैंपो आ कर रुका. उस में से एक लड़का उतर कर गांव की ओर चला गया. गुरतेज ने उस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया, क्योंकि इस तरह लोगों के रिश्तेदार अपनी गाडि़यों से आते रहते थे. लेकिन जब कुछ देर बाद टैंपो स्टार्ट होने लगा तो उस ने झांक कर देखा. लड़के के साथ टैंपो में जसप्रीत बैठी थी.

गुरतेज मोटरसाइकिल से टैंपो के पीछेपीछे चल पड़ा, लेकिन वह टैंपो का पीछा नहीं कर सका. कुछ दूर जा कर टैंपो उस की आंखों से ओझल हो गया. कुछ देर वह सड़क पर खड़ा सोचता रहा, उस के बाद घर लौट आया. घर के अंदर कदम रखते ही उस का दिमाग चकरा गया, क्योंकि जसप्रीत घर में बैठी बेटे को खाना खिला रही थी. उसे देख कर गुरतेज की बोलती बंद हो गई.

उस ने सोचा था कि जसप्रीत यार से मिल कर लौटेगी तो वह पूछेगा कि कहां से आ रही है? पर उस ने अपनी आंखों से जो देखा, वह भी झूठा हो गया था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या कहे, उस ने उसे खुद टैंपो में बैठ कर जाते देखा था. यह धोखा कैसे हो गया? गुरतेज के पास अब कहने को कुछ नहीं बचा था, इसलिए वह खामोश रह गया.

लेकिन उस ने जसप्रीत का पीछा करना नहीं छोड़ा. आखिर एक दिन उस ने जसप्रीत को बाजार में एक लड़के के साथ घूमते देख लिया. दोनों उस से कुछ दूरी पर थे. वहां भीड़ थी. गुरतेज के वहां पहुंचने तक लड़का तो गायब हो गया, पर जसप्रीत खड़ी रह गई. अब जसप्रीत के पास अपनी सफाई में कहने को कुछ नहीं था.

गुरतेज ने घर आ कर जसप्रीत की जम कर पिटाई की, लेकिन उस ने प्रेमी का नाम बताना तो दूर, यह भी नहीं माना कि उस के साथ बाजार में कोई था. लेकिन अब गुरतेज को सच्चाई का पता चल गया था. इसलिए पतिपत्नी में क्लेश रहने लगा. घर में रोजाना लड़ाईझगड़ा और मारपीट आम बात हो गई.

आखिर एक दिन गुरतेज को कुछ बताए बगैर जसप्रीत बेटे को छोड़ कर घर से भाग गई. लेकिन वह अपने किसी प्रेमी के साथ नहीं भागी थी, अपने पिता के घर गई थी. हालांकि जसप्रीत के पिता ने उसे काफी समझाया, पर उस ने उन की एक नहीं सुनी. पिता के घर कुछ दिन रहने के बाद वह अपनी बड़ी बहन के पास बाड़ी गांव चली गई.

दरअसल, जसप्रीत बहन के यहां कुछ दिन रह कर अपने प्रेमी के साथ भाग जाना चाहती थी. लेकिन उस की बहन को न जाने कैसे इस बात का पता चल गया. उस ने यह बात अपने पति को भी बता दी. उन लोगों ने सोचा कि अगर जसप्रीत उन के घर से भागती है तो उन की बदनामी तो होगी ही, साथ ही लोग यही कहेंगे कि जसप्रीत को उन्हीं लोगों ने भगाया है.

यही सोच कर उन्होंने गुरतेज को अपने गांव बुलाया और पतिपत्नी में समझौता करा दिया. गुरतेज जसप्रीत को ले कर गांव आ गया. जसप्रीत ने भी पति से माफी मांगी और वादा किया कि अब वह कभी वैसी गलती नहीं करेगी. पतिपत्नी फिर पहले की ही तरह रहने लगे. जिंदगी की गाड़ी एक बार फिर से पटरी पर दौड़ने लगी.

27 जुलाई, 2017 की रात आम दिनों की तरह गुरतेज और जसप्रीत ने साथसाथ रात का खाना खाया. बेटा पहले ही खाना खा कर सो गया था. खाना खाते ही गुरतेज को बहुत जोर से नींद आ गई तो वह जा कर बैड पर लेट गया. वह पिछले एक सप्ताह से देख रहा था कि खाना खाते ही उसे नींद आ जाती है. लेकिन उस ने इस बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया.

बहरहाल, खाना खा कर वह सो गया. सुबह 4 बजे के करीब उस की आंख खुली तो उसे लगा कि उस का सिर भारीभारी है. वह बिस्तर पर चुपचाप पड़ा रहा. तभी उसे किसी के हंसने और बातें करने की आवाजें सुनाई दीं. उस ने ध्यान लगा कर सुना तो उन की आवाजों के साथ चूडि़यों के खनकने की भी आवाजें आ रही थीं.

अब उस से रहा नहीं गया. वह बैड से उठा. कमरे से बाहर आ कर उस ने जो देखा, उस से उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. गुस्सा और उत्तेजना से उस का पूरा शरीर कांपने लगा. सामने आंगन में बिछी चारपाई पर जसप्रीत एक लड़के के साथ आपत्तिजनक स्थिति में थी. उस दृश्य ने उसे आकाश की ऊंचाइयों से उठा कर पाताल में झोंक दिया था. वही क्या, उस की जगह कोई भी होता, उस का यही हाल होता.

गुरतेज कमरे में गया और दीवार पर टंगी लाइसेंसी बंदूक उतारी और आंगन में पड़ी चारपाई के पास पहुंच कर उस ने बिना कुछ कहे एक गोली जसप्रीत की छाती में तो दूसरी गोली उस के यार को मार कर दोनों को मौत के घाट उतार दिया.

पत्नी और उस के प्रेमी को मौत के घाट उतार कर गुरतेज ने यह बात दोनों भाइयों, गुरप्रीत सिंह और जगतार सिंह को बता दी. इस के बाद इधरउधर भागने के बजाय उस ने थाना पुलिस को फोन कर के कहा कि उस ने अपनी पत्नी और उस के प्रेमी को गोली मार कर मौत के घाट उतार दिया है. पुलिस आ कर उन की लाशें बरामद कर के उसे गिरफ्तार कर ले. वह घर में बैठा पुलिस का इंतजार कर रहा है.

इस के बाद गुरतेज ने अपने छोटे भाई जगतार से नाश्ता बनवाने तथा बेटे को संभालने को कहा. इस के बाद नहाधो कर घर के आंगन में कुरसी डाल कर बैठ कर पुलिस का इंतजार करने लगा.

सचना मिलते ही थाना संगत के थानाप्रभारी इंसपेक्टर परमजीत सिंह एसआई सुरजीत सिंह, हवलदार जसविंदर सिंह, सिपाही राकेश कुमार, तारा सिंह, तेज सिंह, महिला सिपाही चरनजीत कौर और कर्मजीत कौर को साथ ले कर गांव मलीहा पहुंच गए.

गुरतेज आंगन में कुरसी डाले बैठा था. बाहर गांव वालों की भीड़ लगी थी. वहीं चारपाई पर जसप्रीत और उस के प्रेमी की रक्तरंजित निर्वस्त्र लाशें पड़ी थीं. परमजीत सिंह ने लाशों पर चादर डलवा कर सारी काररवाई कर उन्हें पोस्टमार्टम के लिए सिविल अस्पताल भिजवा दिया.

गुरतेज सिंह उर्फ तेजा को हिरासत में ले कर थाने आ गए. उस के बयान के आधार पर अपराध संख्या 174/2017 पर आईपीसी की धारा 302 और 27 आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया. उसी दिन उसे जिला मजिस्ट्रैट की अदालत में पेश कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

इस के बाद परमजीत सिंह ने जसप्रीत के साथ मारे गए उस के प्रेमी के बारे में पता किया तो पता चला कि उस का नाम गुरप्रीत सिंह था. वह गांव मिडू खेड़ा के रहने वाले दिलवीर सिंह का बेटा था. वह टैंपो चलाता था. करीब 2 सालों से जसप्रीत कौर से उस के अवैध संबंध थे.

दोनों शादी करना चाहते थे, वे शादी करते, उस के पहले ही गुरतेज ने उन्हें खत्म कर दिया. लेकिन यहां गलती गुरतेज ने भी की. बेशर्म पत्नी और उस के प्रेमी को मार कर उन्हें क्या मिला, वह तो हत्या के आरोप में जेल चले गए. शायद उन्हें सजा भी हो जाए. ऐसे में उन का घर तो बरबाद हुआ ही, बेटा भी अनाथ हो गया. Domestic Dispute

   —कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित