Hindi Love Story: प्रीत किए दुख होय

Hindi Love Story: उजली ने ठंड से अकड़े पोरबंदर के राजकुंवर मेहा जेठवा को शरीर की गर्मी दे कर नया जीवन दिया था. बदले में राजकुंवर ने उसे क्या दिया…

आकाश में बिजली चमकी तो उस के उजाले से आंखों की पलकें बंद हो गईं. ऐसा लगा, जैसे पूरे पहाड़ पर आग लग गई हो. बादल इतने जोर से गरजे कि बिछौने में सो रहे बच्चे मांओं के सीने में छिपने की कोशिश करने लगे. बादल ऐसे गरज रहे थे, मानो हजार हाथी एक साथ चिंघाड़ रहे हों. हवा भी इतनी तेज थी कि मानो वह घरों की छतों को उड़ा ले जाएगी. ऐसा लग रहा था, जैसे प्रलय आने वाली है. बाकी बची कसर ओलों ने पूरी कर दी. तड़ातड़…तड़ातड़ मोटेमोटे ओले पत्थर की तरह बरसने लगे थे.

पेड़ों पर बैठे पक्षियों का साथ बिछड़ गया, खुले में बंधे पशु रंभाते हुए रस्सियां तोड़ कर भागने लगे. जिन के खूंटे और रस्सियां मजबूत थीं, वे रंभाते हुए रस्सियां तोड़ने की कोशिश कर रहे थे. बर्फ से पिटते, ठंड से ठिठुरते पशुपक्षी इधरउधर छिपने की कोशिश कर रहे थे. जीवजंतु परेशान हो रहे थे. सपौष की सर्दी में यह बरसात, आंधी और ओलों की मार से ठंड चौगुनी हो गई थी. झोपडि़यों में रहने वाले चारण आग जलाए ताप रहे थे. बच्चे मांओं से चिपटे थे.

अपनी झोपड़ी में बूढ़ा अमरा चारण फटी गुदड़ी से लिपटा ठंड से बचने की कोशिश कर रहा था. लेकिन फटी गुदड़ी से कहीं ठंड जाती है. ठंड से जूझता हुआ अमरा हवा और बरसात को कोस रहा था. सर्दी की वजह से उस की पूरी देह कांप रही थी. ऐसे में भला कहीं नींद आती है. आधी रात को उस भयंकर मौसम में घोड़े के टापों की आवाज सुनाई दी तो अमरा के कान खड़े हो गए. इस समय ऐसे मौसम में घोड़े की टाप कहां से आ रही है? घोड़े की टाप और हिनहिनाने की आवाज धीरेधीरे उस की झोंपड़ी के नजदीक आती जा रही थी. अचानक उस की झोपड़ी के सामने आ कर वह आवाज ठहर गई. वह उठ कर दरवाजे पर पहुंचा तो देखा दरवाजे पर घोड़ा खड़ा था.

‘कौन होगा?’ यह सोच कर वह परेशान हो गया. अमरा ने वहीं से आवाज दी, ‘‘बेटी उजली, उठ कर बाहर तो देख, कौन आया है? अंधेरे में मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है.’’

ठंड से कांपती उजली अपनी गुदड़ी फेंक कर उठी. दीपक जलाया तो उस के उजाले में उस की काया ऐसे चमक उठी, जैसे काले बादलों में चांद. बाहर आ कर दीए के उजाले में देखा तो घोड़ा खड़ा दिखाई दिया. जीन से पानी टपक रहा था. घोड़े के पैरों के पास गठरी सा एक आदमी बेसुध पड़ा था. ठंड की वजह से उस का शरीर अकड़ गया था. अमरा ने उस की छाती पर हाथ रखा तो सांस चल रही थी. इस का मतलब अजनबी अभी जिंदा था. उजली ने पूछा, ‘‘घुड़सवार जिंदा है न काका?’’

‘‘जिंदा तो है बेटी, लेकिन सर्दी की वजह से अकड़ा हुआ है. इसे जल्दी से अंदर ले चल और आग सुलगा. जल्दी से आग की गरमी दे, वरना यह मर जाएगा.’’

उजली उसे अंदर ले आई. लेकिन आग जलाने की बात आई तो घर में एक भी लकड़ी नहीं थी. घर की सारी गुदडि़यां उस ने उसे ओढ़ा दी. अमरा के ललाट पर चिंता की लकीरें उभर आईं. सोचने लगा, घर आया राहगीर मर गया तो लोग क्या कहेंगे? इस की जान बचाना उस की जिम्मेदारी ही नहीं, धर्म है. वह सोच में पड़ गया. मन को कठोर कर के उजली के सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘बेटी, घर आया मेहमान मर गया तो हम कल लोगों को क्या जवाब देंगे. इसे गरमी देनी पड़ेगी. घर में एक भी लकड़ी नहीं है, गुदड़ी भी नहीं है. मैं 80 साल का बूढ़ा मेरे शरीर में इतनी गर्मी नहीं कि इसे गर्मी दे सकूं. बेटा एक उपाय है, तू जवान है, अपने शरीर की गरमी इसे दे तो यह बच सकता है.’’

20 साल की जवान कुंवारी उजली अपने बाप का मुंह ताकने लगी. अमरा ने कहा, ‘‘बेटी, यही धर्म है, यह कोई पाप नहीं है. किसी की जिंदगी बचा लेना बहुत नेक काम है.’’

बाप की बात मानते हुए उजली अचेत पड़े घुड़सवार के 2 फेरे लगा कर उसे अपना पति मान कर उस के पास लेट कर उसे देह की गर्मी देने लगी. होश में आने पर घुड़सवार ने उजली का हाथ थाम कर कहा, ‘‘तुम्हारा यह उपकार मैं जीवन भर नहीं भूलूंगा.’’

कल तक जो अंजान था, आज वह उजली के अंतस का स्वामी बन बैठा. कल की आसमान से ओलों के गोले बरसाती अंधेरी रात, आज प्रेमरस बरसाने वाली रात हो गई थी. आकाश में चांद हंस रहा था. पोरबंदर का राजकुंवर मेहा जेठवा हंसहंस कर उजली के मन में उजाला भर रहा था. कह रहा था, ‘‘हमारा मिलन एक संयोग है. जिस तरह डूंगरों में पारस पत्थर मिला, वन में शंकुतला मिली, उसी तरह तुम मुझे मिल गईं.’’

‘‘राजा दुष्यंत की तरह अपनी इस शकुंतला को भूल कर महलों में जा कर तो नहीं बैठ जाओगे?’’ उजली के मन का वहम होंठों पर आ गया.

‘‘महलों में जा कर तो बैठेगा, लेकिन उजली रानी के साथ.’’

‘‘तो आप मुझे साथ ले चलेंगे?’’

‘‘ऐसे नहीं, मैं ठाठबाट के साथ तुम से शादी करने आऊंगा, पूरी बारात और ढोलमंजीरे के साथ.’’

‘‘वचन दो.’’

‘‘बिना खंभे के आसमान के नीचे खड़ा हो कर मैं सौगंध लेता हूं कि अगर ऐसा न करूं तो मेरी मौत हो जाए. अब मेरे लिए इस जीवन में तुम से बढ़ कर कोई दूसरा नहीं.’’ उजली को बांहों में ले कर जेठवा ने सौगंध खाई.

‘‘मैं भी जन्मोजन्म तक आप की. आप के सिवाय इस संसार के दूसरे सारे मर्द मेरे भाई. आप मुझ से ब्याह करो या न करो, लेकिन मैं ने आप को पति के रूप में मान लिया है. भले सूरजचांद डिगे, पर मैं न डिगूं.’’ उजली ने कहा.

‘‘सुखदुख में मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा प्रिए.’’ जेठवा ने उजली को प्रेम भरी नजरों से देखते हुए कहा.

सुख के दिनरात कितने जल्दी बीतते हैं, पता ही नहीं चलता. बरसात और जंवाई कितने दिनों के मेहमान होते हैं? एक दिन घोड़े की जीन कसते हुए मेहर जेठवा ने विदा मांगी. उजली ने हिचकियां भरते हुए विदा दी. विदा लेते वक्त मेहा जेठवा ने कहा, ‘‘उजली, मैं एक पखवाड़े में वापस आऊंगा.’’ जेठवा राजाजी से शिकार की इजाजत ले कर पहाड़ों की ओर आता और उजली से छिपछिप कर मिलता. उस की गोद में सिर रख कर तनमन की थकान उतारता और ब्याह के मंसूबे बनाता. पहाड़ी फूलों को गहने बना कर उजली का शृंगार करता. फूल कुम्हलाते, उस से पहले ही कलेजे पर पत्थर रख कर महल के लिए चल देता.

जब तक दोनों साथ रहते प्यार की बातें करते. लेकिन वियोग की तलवार सिर पर लटकती रहती थी. इसी तरह दोनों को मिलते महीनों बीत गए. आखिर कितने दिनों तक बात छिपी रहती. राजा भी जान गया और प्रजा भी. राजा गुस्से से लालपीला हो उठा. प्रजा में चर्चा चलने लगी, कि चारण की बेटी तो राजपूत की बहन जैसी होती है, फिर राजकुंवर कैसे दिल लगा बैठा? अनर्थ होने वाला है. राजा का कोप झेलने की मेहा जेठवा की हिम्मत नहीं पड़ी. दुनिया के सामने अपनी प्रतिज्ञा पालन करने की हिम्मत नहीं पड़ी. अपना मन मसोस कर वह महलों में जा बैठा और उजली को मन से निकालने की कोशिश करने लगा.

उधर उजली आशा की बेल में लाखोंलाख घड़े पानी डाल जेठवा की राह देखती रही. दिन पर दिन बीतते गए, मेहा जेठवा का कोई समाचार नहीं मिला. घर का काम और बूढ़े बाप की सेवा छोड़ कर वह राह में बैठी उस की राह देखती रही. एक दिन उसे दूर से घोड़ों का काफिला आता दिखाई दिया तो उसे लगा कि मेहा जेठवा आ रहा है. उस की नसनस में उमंग की लहर दौड़ गई. दौड़ कर पहाड़ी की चोटी पर जा पहुंची और आंखें फाड़ कर मेहा को पहचानने की कोशिश करने लगी. आंखों से आंसुओं का समंदर बह निकला. पास आने पर पता चला कि उस में उस का मेहा जेठवा नहीं था.

मुंह से निकला, ‘‘हाय मेरे मन का मीत तो इन में नहीं है.’’

उजली लंबी सांस छोड़ते हुए प्रियतम की याद में रात को तारों से बातें करती, दिन में डूंगर के पत्थरों से मन की बात कहती. आषाढ़ में बरसात की झड़ी सी लग गई. मेह (राजस्थान-गुजरात में बरसात को कहते हैं) के नाम के साथ मेहौ नाम जोड़ कर वह रोने लगी, ‘‘मोड़ो उपड़यो मेह, आयौ धरती धौवतो. मुझ पांती रो ऐह, छांट बरस्यौ जेठवा.’’

उजली बादलों से कह रही थी कि तुम बहुत बरसे, लेकिन जेठवा तो एक बूंद भी नहीं बरसा. यह बरसात तो बड़ेबड़े बूंद बरस कर धरती को तृप्त कर गई, लेकिन मेरे मेह ने तो एक भी बूंद मेरे ऊपर नहीं बरसाई. बसंत में खिले फूलों को देख कर उजली बेलों से लिपट कर रोती. वह अंत:मन से जेठवा को बुलाती. डूंगर की खोह में पशुपक्षियों की लीला देखती. सारस, चकवे की प्रीत देख कर उजली सोचती, ‘मनुष्य से तो पंछी अच्छे हैं, जो अपनी प्रीत निभाते हैं. दुनिया में प्रीत निभाने वाले चकवे या सारस की जोड़ी मशहूर है. जेठवा मैं राह देखदेख कर थक गई, लेकिन तू कहीं नजर नहीं आया.’

धीरेधीरे उजली मेहा जेठवा के आने की उम्मीद छोड़ बैठी. मेहा जेठवा को उस ने कहलवाया कि हालचाल भेजे, अंतर्मन की वेदना के गीत, दोहे बना कर भेजे. उस का कहना था, ‘‘मेरे अंत:करण पर तुम ने ताला लगा कर तुम न जाने कहां चले गए हो. अब तुम्हीं आ कर ताला खोलोगे, तभी खुलेगा, वरना पूरे जन्म ताला लगा रहेगा. अपनी टोली से, जोड़ी से, बिछुड़ कर पशुओं के मन में भी उदासी छा जाती है, जेठवा तुम से बिछुड़ कर मैं कैसे जी रही हूं, यह शायद तुम नहीं जानते.

‘‘तुम ने मुझ से प्यार कर के आकाश में ले जा कर पाताल में फेंक दिया है. अभी भी आ कर सहारा दे दो तो मैं दोबारा जी सकती हूं. चकवा, सारस और नारी की एक सी वाणी होती है. जोड़ी बिछुड़ने के बाद ये तीनों ही नहीं जीते. जिस के बिना एक घड़ी रहना मुश्किल हो, उस के निबा जिंदगी का लंबा सफर कैसे तय होगा? मैं बिछोह में बिलख रही हूं, तुम मुझे जोगन बना कर चले गए जेठवा.’’

उजली ने रोरो कर जेठवा को भूली याद दिलाई. इस के बाद जेठवा ने जवाब भिजवाया कि वह अपनी पुरानी प्रीति भूल जाए. बहुत से चारण हैं, किसी से ब्याह कर के घर बसा ले. वह चारण की बेटी है और वह राजपूत. उन की जाति अलगअलग है, इसलिए उन के भाईबहन जैसे संबंध हुए.

यह सुन कर उजली के पैरों तले से जमीन खिसक गई. जो सपने में भी नहीं सोचा था, वह बात सुनी. झूठी बात, प्रीति में जातिपांत नहीं मानी जाती. वह बड़बड़ाई, ‘‘जेठवा, तुम ने प्यार की बीन बजाई, प्रीत की राग गाई. मैं उसी प्रीति पर रो रही हूं. गंवार जाति को थोड़े ही झींक रही है.’’

तेज धूप में रेत के टीलों पर चढ़ने की जो गति होती है, वैसी दुर्गति उजली की हो रही थी. उस ने पुन: कहलवाया कि पेड़ बन कर उसे छांव दो. जिस ने मानसरोवर का पानी पी लिया, उस का मन तालाब का पानी कैसे स्वीकार कर सकता है. उस से प्रीत कर के दूसरे मर्द के सामने उस की नजर नहीं उठती. उजली ने बहुत कोशिश की, लेकिन जेठवा का पत्थर दिल नहीं पसीजा. कायर के कलेजे में जमा खून कभी गरम नहीं हुआ. जेठवा ने संदेश भिजवाया, ‘‘तुझे जाति का विचार नहीं, तो मेरी सुन. अगर तुझे राजा से ब्याह करना है तो बहुत बड़ेबड़े राजवी हैं. उन से अरदास कर, वे तेरी मंशा पूरी करेंगे.’’

यह सुन कर उजली पर वज्रपात सा हुआ. रोमरोम में क्रोध की लपटें निकलने लगीं, ‘‘धिक्कार है तुझे जेठवा.’’

अपने साथी चारण खीमरा से उस ने कहा, ‘‘खीमरा खारो देश, मीठा बोल मानवी. नुगरा किसौ स्नेह, जेठो राणा झल्यौ नहीं.’’

कहने का मतलब यह कि खीमरा, यह देश ही खारा निकला. खारे मन के आदमी सिर्फ मुंह से मीठे बोलते हैं, ऐसे नुगरे आदमी से कैसा प्रेम. मैं अनजाने में कुम्हार के घर से कच्चा घड़ा (मटका) उठा लाई. जेठवा राणा मेरी जिंदगी से जाने वाला नहीं. उस ने मुझ परदेशी की प्रीत की पीड़ा को नहीं जाना. उस ने तरकस भरभर कर दुख के बाण जीभ से मेरे ऊपर चलाए.

दुख से व्याकुल उजली आभपरा के पहाड़ों पर भटकतीभटकती पोरबंदर जा पहुंची. जेठवा के महलों के आगे 3 दिनों तक भूखीप्यासी बैठी रही कि एक बार जेठवा अपना मुंह दिखा दे. महल के झरोखे से जेठवा ने मुंह निकाल कर कहा, ‘‘तू अपनी जाति के किसी आदमी से ब्याह कर ले, आधा राज्य तुझे दे कर अपनी बहन बना लूंगा.’’

यह सुन कर उजली के पैरों तले से जमीन खिसक गई. अब वहां रुकने का सवाल ही नहीं था. जेठवा के प्यार में पागल उजली ने पहाड़ों पर भटकते हुए जान दे दी. Hindi Love Story

 

Delhi Crime Story: प्रियंका के आखिरी खत की दर्दनाक कहानी

Delhi Crime Story: इवेंट मैनेजर प्रियंका कपूर चावला अपनी जिंदगी को जिंदादिली के साथ जीना चाहती थीं. वह जिंदगी की ऊंची उड़ान भर कर शोहरत पाना चाहती थीं, लेकिन बिजनेसमैन नितिन चावला की मोहब्बत में फंस कर उस से शादी करना उन की जिंदगी की एक बड़ी भूल साबित हुई.

प्रियंका से शादी करने के बाद नितिन चावला ने दक्षिणी दिल्ली के पौश इलाके डिफेंस कालोनी में रहने लगा था. वह एक बिजनेसमैन था, जबकि प्रियंका इवेंट मैनेजर थी. उन की शादी करीब सवा महीने पहले हुई थी. 25 मार्च को प्रियंका ने अपनी मां रूमा को दोपहर बाद फोन कर के कहा, ‘‘मम्मी आज शाम को मैं घर आऊंगी. आप मेरे पसंद का खाना राजमा चावल बना कर रखना.’’

बेटी के घर आने की बात सुन कर रूमा खुश हो गईं. उन्होंने अपने यहां खाना बनाने वाली नौकरानी को बेटी की पसंद का खाना बनाने के लिए कह दिया. प्रियंका कितने बजे आएगी, यह जानने के लिए उन्होंने शाम 5 बजे फोन किया. घंटी जाती रही, पर उस ने फोन रिसीव नहीं किया. उन्होंने सोचा कि वह किसी काम में व्यस्त होगी, इसलिए दोबारा फोन नहीं किया. आधे घंटे बाद उन्होंने फिर से फोन किया. इस बार भी फोन की घंटी बजती रही, लेकिन उस ने फोन नहीं उठाया. इसी तरह रात 11 बजे तक उन्होंने प्रियंका को कई बार फोन किए, पर उस ने एक बार भी फोन रिसीव नहीं किया.

रूमा को चिंता हुई कि प्रियंका फोन क्यों नहीं उठा रही. उन्होंने प्रियंका के यहां काम करने वाले नेपाली नौकर को फोन किया तो उस ने बताया कि सुबह 9 बजे से मेमसाब अपने कमरे में हैं.

‘‘उस ने सुबह से कुछ खायापीया भी है या नहीं?’’ रूमा ने पूछा.

‘‘मेमसाब जब से कमरे में गई हैं, तब से मुझ से कोई चीज नहीं मंगाई है.’’ नौकर ने कहा.

नौकर से बात करने के बाद रूमा परेशान हो गईं, क्योंकि प्रियंका पिछले 14 घंटों से भूखी अपने कमरे में थी. उसे तो उन के यहां आना था, आखिर वह बंद कमरे में क्या कर रही है? उन्होंने उसी समय नितिन को फोन किया, ‘‘नितिन बेटा, मैं ने प्रियंका को कई बार फोन किया, वह फोन नहीं उठा रही.’’

‘‘आप फ्लैट पर जा कर देख लें.’’ नितिन ने कहा.

‘‘बेटा, तुम्हारे नौकर ने बताया है कि वह सुबह 9 बजे से अपने कमरे में है. तब से उस ने कुछ खायापीया नहीं है.’’ रूमा ने कहा.

‘‘उस ने खाना नहीं खाया तो आप को तकलीफ हो रही है. ऐसी तकलीफ मुझे उस वक्त हुई थी, जब मैं अपने 11 साल के बेटे को घर लाया था और प्रियंका ने उसे भूखा रखा था.’’ नितिन ने ताना देते हुए कहा.

नितिन की पहली पत्नी से एक बेटी और एक बेटा है. पहली पत्नी को वह तलाक दे चुका है. उस के बाद ही उस ने प्रियंका से शादी की थी. कुछ दिनों पहले वह अपने बेटे को फ्लैट पर लाया था. नितिन का आरोप है कि उस वक्त प्रियंका ने उसे खाना नहीं खिलाया था. रूमा को नितिन की पुरानी बातें याद आ गईं. उस ने उन से प्रियंका की शिकायत की थी. रूमा ने इस बारे में जब प्रियंका से पूछा था तो उस ने कहा था कि उस ने उस के बच्चे को बारबार खानेपीने की तमाम चीजें दी थीं, लेकिन उस ने कोई भी चीज नहीं खाई थी.

रूमा समझ गईं कि नितिन के मन में अब भी पुरानी बातें बैठी हुई हैं. उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हारी जो शिकायत है, उस पर हम बाद में बात कर लेंगे, लेकिन तुम इसी समय घर आ जाओ. आखिर देखो तो प्रियंका सुबह से कमरे में क्यों बंद है?’’

‘‘मम्मी, मैं अभी नहीं जा सकता. अभी मुझे द्वारका में समय लगेगा. ऐसा करें, आप ही फ्लैट पर चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

‘‘इतनी रात को मैं अकेली कैसे जा सकती हूं?’’ रूमा ने कहा.

‘‘ऐसा करता हूं, मैं ड्राइवर को गाड़ी ले कर आप के पास भेज देता हूं. उस के साथ आप चली जाइए.’’ नितिन ने कहा.

कुछ देर बाद नितिन का ड्राइवर उन के यहां आया तो वह अपनी ननद की बेटी नेहा को साथ ले कर प्रियंका के यहां पहुंच गईं. फ्लैट पर उन्हें बेटी का नौकर मिला. उन्होंने बेटी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. अंदर से जब कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई तो उन्होंने आवाज दी. उन की आवाज सुन कर आसपास रहने वाले निकल आए, लेकिन प्रियंका के कमरे का दरवाजा नहीं खुला. रूमा को बेटी को ले कर चिंता हुई. उन्होंने दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को फोन कर के सारी जानकारी दे दी. चूंकि पुलिस को दरवाजा अंदर से बंद होने की जानकारी मिली थी, इसलिए थाना डिफेंस कालोनी की पुलिस और दिल्ली फायर ब्रिगेड के जवान फ्लैट पर पहुंच गए.

पुलिस ने पहले दरवाजा खटखटाया. जब दरवाजा नहीं खुला तो कुछ आशंका नजर आई. दरवाजे पर इंटरलौक लगा था. पुलिस ने नौकर से चाबी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि इस की चाबी साब और मेमसाब के पास ही रहती है. दरवाजा नहीं खुला तो फायर ब्रिगेड के जवानों ने अपने साथ लाए औजारों से दरवाजे को उखाड़ दिया. दरवाजा खुलने पर प्रियंका घुटनों के बल पलंग पर बैठी दिखी, गले में दुपट्टा बंधा हुआ था, जिस का दूसरा सिरा पंखे से बंधा था और गरदन एक ओर झुकी थी. बैड पर एक ट्रे रखी थी, जिस में कांच का बड़ा सा कटोरा पानी से भरा रखा था. ट्रे में ही एक रेजर और एक छोटा सा चाकू रखा था.

बेटी के शरीर में जब कोई हरकत नहीं हुई तो रूमा रोते हुए पुलिस वालों से हेल्प करने को कहने लगीं. इस पर एक पुलिस वाले ने ट्रे में रखे चाकू से दुपट्टा काट कर प्रियंका के गले का फंदा खोला. इसी बीच नितिन भी वहां आ गया. पुलिस वालों के कहने पर रूमा ने बेटी को बिस्तर पर लिटा कर उस के सीने पर हाथों से दबाना शुरू किया, ताकि उस के फेफड़े काम करना शुरू कर दें. इस के बाद नितिन ने भी यही प्रक्रिया दोहराई, पर कोई लाभ नहीं हुआ. पुलिस उसे अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ले गई, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया. डाक्टरों ने जांच की तो उस के शरीर पर कई स्थानों पर चोट के निशान मिले. उस के बाएं हाथ की कलाई पर कटे के निशान थे.

बेटी की मौत की खबर पा कर रूमा फूटफूट कर रोने लगीं. उन्होंने यह खबर गुड़गांव में नौकरी कर रहे अपने पति अशोक कपूर, घर पर मौजूद छोटी बेटी डिंपी कपूर और अपने नातेरिश्तेदारों को दी. थोड़ी ही देर सभी एम्स अस्पताल पहुंच गए.

थानाप्रभारी सतीशचंद्र शर्मा ने घटनास्थल की जांच के लिए क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को बुला लिया था. टीम ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. छानबीन में पुलिस को कमरे से 2 पेज का एक सुसाइड नोट मिला, जिस में लिखा था, ‘मेरे पास जानीपहचानी तकलीफ है, खुशी है, दुख है और इमोशंस है. लेकिन पति ने पहली बार बेबस कर दिया. नितिन पर मुंबई में रेप का केस दर्ज है. मालूम नहीं था कि वह मेरे साथ इतना बुरा करेगा. वही एकमात्र ऐसा इंसान है, जिस से मैं डरती हूं.

‘शादी के एक महीने बाद ही उस ने मुझे राक्षस की तरह मारा. मैं ने अपनी फैमिली को बुलाने को कहा तो उस ने और बुरी तरह मारा. मैं ने नितिन से सिर्फ इसलिए शादी की थी, क्योंकि उस ने कहा था कि वह मुझ से बहुत प्यार करता है और हमेशा करता रहेगा. लेकिन अब वही इंसान मुझे घर छोड़ने को कहता है. इस आदमी के साथ रहने के लिए मैं ने अपनी मां से संबंध खत्म कर लिए थे. वह सब से ज्यादा स्वार्थी है.

‘मुझे लगा कि यहां मुझे मोहब्बत मिलेगी, लेकिन दर्द मिला. नितिन की मां के मुताबिक नितिन ने कुछ गलत नहीं किया. पिछली 3 रातों से नितिन घर पर नहीं है. उस ने मुझे वाट्सऐप पर मैसेज किया कि मैं घर खाली कर दूं, अब मेरे पास कोई रास्ता नहीं है.’

पुलिस ने सुसाइड नोट सहित अन्य जरूरी सबूत अपने कब्जे में ले लिए. थानाप्रभारी ने प्रियंका के घर वालों से बात की तो उस की मां रूमा ने बताया कि शादी के बाद नितिन के घर वालों ने प्रियंका की सारी गोल्ड और डायमंड ज्वैलरी अपने पास रख ली थी. यही नहीं, उस ने मायके से उस की महंगी घडि़यां भी मंगा ली थीं. इस के बावजूद वह उस पर दबाव बना रहा था कि वह अपने मायके वालों से कार खरीदवा कर दे. इस के लिए नितिन ने उन पर भी दबाव डाला था. रूमा और उन की बेटी डिंपी कपूर ने आरोप लगाया कि प्रियंका की मौत में उस के पति नितिन चावला, सास हर्ष चावला और देवर जतिन चावला का हाथ है.

चूंकि मामला दहेज एक्ट के तहत दर्ज हुआ था, इसलिए इस में मजिस्ट्रैट के सामने पीडि़त पक्ष के बयान होने जरूरी थे. इसलिए एसआई शिवदेव सिंह डिंपी और उस की मां रूमा को तहसील कालकाजी के तहसीलदार अजीत कुमार चौधरी के पास ले गए. तहसीलदार ने रूमा और डिंपी के बयान दर्ज किए. उन्होंने कमरे से मिले सुसाइड नोट को भी पढ़ा. उन के बयानों के आधार पर ही पुलिस ने नितिन चावला, उस के भाई जतिन चावला और मां हर्ष चावला के खिलाफ भादंवि की धारा 498ए/304बी/34 के तहत रिपोर्ट दर्ज कर ली.

अस्पताल में जरूरी काररवाई करने के बाद पुलिस ने प्रियंका की लाश पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मोर्चरी में भेज दी थी. इस के बाद नितिन को हिरासत में ले लिया गया. जब उस से पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह प्रियंका का बहुत ध्यान रखता था, इस के बावजूद उस ने सुसाइड क्यों कर लिया, इस के बारे में उसे कुछ नहीं पता. प्रियंका मूलरूप से हरियाणा के रोहतक जिले के रहने वाले अशोक कपूर की बड़ी बेटी थी. इस के अलावा अशोक कपूर की एक बेटी और थी डिंपी. अशोक कपूर भारतीय वायु सेना में औफिसर थे.

अशोक कपूर की पोस्टिंग लंबे समय तक चंडीगढ़ में रही. वहीं पर दोनों बच्चों की स्कूली पढ़ाई हुई. उन का दिल्ली ट्रांसफर हुआ तो वह परिवार के साथ दिल्ली आ गए और लाजपत नगर में रहने लगे. वह नौकरी के बजाय अपना कोई बिजनैस करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने वीआरएस (ऐच्छिक सेवानिवृत्ति) ले कर गुड़गांव में टेलीकौम का बिजनैस शुरू किया. लेकिन घाटा होने से उन्हें बिजनैस बंद करना पड़ा. इस के बाद उन्होंने गुड़गांव की एक निजी कंपनी में नौकरी कर ली. दिल्ली विश्वविद्यालय से ग्रैजुएशन करने के बाद प्रियंका ने एक जर्मन कंपनी में नौकरी की. उसे डांसिंग का शौक था. नौकरी से छुट्टी होने के बाद वह डांस सीखने चली जाती थी.

वह चाहती थी कि उस की मधुर आवाज को दुनिया भर में नई पहचान मिले, इसलिए उस ने रेडियो जौकी का कोर्स किया. रेडियो जौकी का कोर्स करने के बाद उसे आस्ट्रेलियन रेडियो में रेडियो जौकी की नौकरी मिल गई. प्रियंका बेहद खूबसूरत थी. अपनी काया को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उस ने योगा में भी डिप्लोमा ले रखा था. इस के अलावा वह मैडिटेशन, हीलिंग और विपश्यना में एक्सपर्ट थी.

प्रियंका एक संपन्न परिवार से थी. नौकरी को वह किसी मजबूरी की वजह से नहीं, बल्कि शौक के तौर पर कर रही थी. कुछ दिनों बाद उस ने रेडियो जौकी की नौकरी छोड़ दी और एक गैरसरकारी सामाजिक संस्था से जुड़ कर काम करने लगी. इस के बाद वह एक कंपनी में अपनी दोस्त तेहरीमा जाकी के साथ इवेंट मैनेजर के रूप में काम करने लगी. प्रियंका की नितिन चावला से पहली मुलाकात ग्रैटर कैलाश पार्ट-2 में उस के ही सिनेमा लाउंज पब में हुई थी. नितिन चावला एक बड़ा बिजनेसमैन था. ग्रेटर कैलाश के आलवा पंजाबी बाग और चंडीगढ़ में उस के सिनेमा लाउंज नाम से 5 पब हैं. इस के अलावा दिल्ली एनसीआर में उस का स्टील का कारोबार है. वह दिल्ली के पंजाबी बाग में अपने परिवार के साथ रहता था.

पहली ही मुलाकात में नितिन चावला प्रियंका का दीवाना हो गया. उस ने प्रियंका की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो खुले विचारों की प्रियंका ने उस से दोस्ती करने में कोई गुरेज नहीं समझा. उन की फोन पर बातचीत होने लगी. इस से उन की दोस्ती और गहरी हो गई. प्रियंका से फोन पर बात कर के वह कार ले कर निश्चित जगह पहुंच जाता, जहां दोनों कार से घूमते और महंगे रेस्टोरेंट में खाना खाते. प्रियंका को प्रभावित करने के लिए वह उसे उस की पसंद के गिफ्ट भी देता. एक दिन उस ने प्रियंका से अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. इस पर प्रियंका चौंकी, ‘‘नितिन, अभी मुझे अपना कैरियर बनाने दो. इस के बाद ही मैं प्यारव्यार के बारे में सोचूंगी.’’

‘‘प्रियंकाजी, प्यार के बारे में सोचा नहीं जाता, बल्कि खुदबखुद हो जाता है. जैसे कि मुझे हो गया.’’ नितिन बोला, ‘‘क्या मुझ में कोई कमी है, जिस की वजह से तुम मुझे पसंद नहीं करतीं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है. अगर तुम पसंद नहीं होते तो मैं दोस्ती ही क्यों करती, लेकिन यह संबंध अभी मैं केवल दोस्ती तक ही सीमित रखना चाहती हूं.’’

‘‘चलो मैं उस वक्त का इंतजार करूंगा, जब तुम्हारे दिल में मेरे प्रति चाहत पैदा होगी. प्रियंका मैं केवल इतना जानता हूं कि मैं तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं.’’ नितिन ने कहा.

प्रियंका मुसकराई, ‘‘हां…हां, यह बात मैं भी महसूस कर रही हूं कि तुम मजनूं हुए जा रहे हो, पर अपना ध्यान रखो.’’

इस के बाद वह कई महीनों तक दोस्त की तरह ही मिलते रहे. वह प्रियंका के घर भी जाने लगा. उस का जब मन करता, वह प्रियंका को फोन कर देता. बारबार फोन करने पर वह भी परेशान हो जाती थी. तब वह उस की काल रिसीव नहीं करती. इस तरह लगातार मिलते रहने का नतीजा यह निकला कि प्रियंका नितिन को प्यार करने लगी.  इतना ही नहीं, नितिन ने उस के सामने शादी का प्रस्ताव रखा तो वह तैयार हो गई.

प्रियंका ने नितिन से शादी करने का प्रस्ताव घर वालों के सामने रखा तो मां रूमा ने नितिन से शादी करने को मना कर दिया. इस की वजह यह थी कि नितिन प्रियंका से 15 साल बड़ा था. पर प्रियंका शादी के लिए अड़ गई. न चाहते हुए भी घर वालों को प्रियंका की बात माननी पड़ी. 6 जनवरी, 2016 को नितिन चावला और प्रियंका की शादी सामाजिक रीतिरिवाज से हो गई. नितिन ने डिफेंस कालोनी में जो फ्लैट किराए पर लिया था, शादी का कार्यक्रम उसी फ्लैट की छत पर आयोजित किया गया. इस शादी में दोनों परिवारों की तरफ से चुनिंदा लोग ही शामिल हुए थे.

शादी के बाद प्रियंका खुश थी, क्योंकि नितिन उसे बहुत प्यार करता था. इस के अलावा दूसरी बात यह थी कि जिस फ्लैट में वह रह रही थी, वहां पर उन दोनों के अलावा घर का कोई और सदस्य नहीं रहता था. केवल एक नौकर ही था. प्रियंका की शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे कि उसे ऐसी खबर मिली, जिस ने उसे झकझोर कर रख दिया. उसे पता चला कि जिस नितिन से उस ने शादी की है, वह पहले से शादीशुदा ही नहीं, बल्कि 2 बच्चों का बाप है. यह उस के साथ एक बड़ा धोखा था. इस बारे में उस ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि उस ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया है और बच्चे भी उसी के साथ हैं. उस से उस का अब कोई मतलब नहीं है.

नितिन ने अपनी बातों से प्रियंका को भले ही समझाने की कोशिश की थी, लेकिन प्रियंका को इस बात का दुख था कि उस ने खुद के शादीशुदा होने वाली बात उसे बताई क्यों नहीं? बात छिपा कर उस ने उस के साथ बहुत बड़ा धोखा किया है. उस ने नितिन से अपनी नाराजगी भी प्रकट की, लेकिन नितिन ने अपनी चिकनीचुपड़ी बातों से उसे मना लिया. प्रियंका ने भी होहल्ला मचाना उचित नहीं समझा, लिहाजा वह चुप हो गई. जो हो चुका, उस पर तनाव में रहने के बजाय वह अपनी लाइफ को खुशमिजाजी के साथ जीने की कोशिश में लग गई.

मूलचंद फ्लाईओवर के पास प्रियंका के एक दोस्त का रेस्टोरेंट है. शादी के बाद वह दोस्त प्रियंका और उस के पति नितिन चावला को अपने रेस्टोरेंट में पार्टी के लिए बुलाना चाहता था. उस ने जनवरी के आखिरी हफ्ते में नितिन और प्रियंका को कई बार फोन कर के बुलाया, पर नितिन को टाइम नहीं मिल रहा था. नितिन से बात करने के बाद प्रियंका ने दोस्त से कह दिया कि वह 29 जनवरी को पति के साथ रेस्टोरेंट पर पहुंच जाएगी. शाम को प्रियंका पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी. नितिन उस समय घर पर नहीं था. उस ने उसे फोन किया तो उस ने कहा कि उसे घर आने में देर हो जाएगी. वह उस का इंतजार न करे और अकेली पार्टी में चली जाए.

उसी समय प्रियंका का दोस्त उस के यहां आ गया. वह उस के साथ जैसे ही उस की कार में बैठने को हुई, तभी नितिन आ गया. प्रियंका नितिन को देख कर खुश हो गई. उस ने नितिन से चलने को कहा तो उस ने पार्टी में जाने से साफ मना कर दिया. तब प्रियंका अकेली ही चली गई और एकडेढ़ घंटे में वहां से लौट आई. प्रियंका घर लौटी तो नितिन वहीं था. वह एकदम सामान्य था. बातचीत कर के दोनों सो गए. उसी रात को अचानक नितिन के दिमाग में न जाने क्या फितूर पैदा हुआ कि रात 3 बजे उठ कर उस ने प्रियंका की पिटाई शुरू कर दी. लातघूसों से उस ने उसे बुरी तरह पीटा.

पिटाई से प्रियंका का चेहरा सूज गया, होंठ फट गए. इस के अलावा उस के शरीर पर भी चोटें आईं. खून से उस की टीशर्ट भी भीग गई. प्रियंका समझ नहीं पाई की आखिर उस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन ने उसे सजा दी. इस पिटाई से वह बुरी तरह डर गई. सुबह 4 बजे के करीब प्रियंका ने अपने सूजे हुए चेहरे की सेल्फी ले कर वाट्सऐप से मां रूमा के पास भेज दी. उस ने उन्हें अपने पिटाई करने की बात भी बता दी.

बेटी की पिटाई की बात सुन कर रूमा का खून खौल उठा. उन्होंने बेटी पर कभी हाथ तक नहीं उठाया था. आखिर उस ने उस की बेटी को इतनी बेदर्दी से क्यों मारा. उन का मन कर रहा था कि वह उसी समय उस के पास जाएं, पर उस समय एक तो अंधेरा था और दूसरे उन के पति घर पर नहीं थे.

बेटी डिंपी भी दोस्त की शादी में पूर्वी दिल्ली गई हुई थी. रूमा ने तुरंत डिंपी को फोन कर के प्रियंका के घर पहुंचने को कहा. उजाला होने पर रूमा बेटी प्रियंका के घर पहुंच गईं. डिंपी भी अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंच चुकी थी. प्रियंका की चोटें देख कर सभी हैरान थे कि आखिर इस से ऐसी क्या गलती हो गई, जो नितिन इतना बेदर्द हो गया. रूमा ने नितिन से बात की तो उस ने बताया कि यह बातबात पर बहसबाजी करती है. उसी बहसबाजी में बात इतनी बढ़ गई कि वह अपना आपा खो बैठा.

रूमा ने उस समय उस से ज्यादा बात करनी जरूरी नहीं समझी. वह प्रियंका को अपने घर ले आईं. जाने से पहले नितिन ने खून से सनी उस की टीशर्ट उतरवा कर दूसरी पहना दी थी. उन्होंने उसे एक क्लिनिक में भरती करा दिया. प्रियंका का अंगअंग दुख रहा था. इतनी पिटाई होने के बाद भी प्रियंका ने पुलिस काररवाई करने से मना कर दिया था. रूमा ने नितिन के पिता दलजीत चावला को फोन कर के जानकारी दी तो उन्होंने कहा कि वह अभी अपने किसी रिश्तेदार के अंतिम संस्कार में आए हुए हैं. नितिन के भाई जतिन को फोन किया तो उस ने भी कोई बहाना बना दिया.

उस के घर वालों ने जब उन की बात को गंभीरता से नहीं लिया तो उन्हें गुस्सा आ गया. उन्होंने जतिन को धमकी दी कि अगर वह नहीं आए तो उस के भाई के खिलाफ थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई जाएगी. इस से जतिन डर गया और प्रियंका के घर पहुंच गया. जतिन ने नितिन को भी वहीं बुला लिया. प्रियंका की चोटें देख कर जतिन भी हैरान था. उस ने नितिन को समझाया. तब नितिन ने अपनी गलती मानी और वादा किया कि भविष्य में वह ऐसा नहीं करेगा.

इस के बाद नितिन प्रियंका को लिवाने ससुराल गया, लेकिन रूमा ने कह दिया कि जिस घर में उन की बेटी के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जाए, वहां वह उसे हरगिज नहीं भेजेंगी. नितिन ने अपनी इस गलती की कई बार माफी मांगी. इस पर प्रियंका के दिल में रहम आ गया और वह उस के साथ जाने के लिए तैयार हो गई. नितिन उसे अपने फ्लैट पर ले आया. नितिन शक्की स्वभाव का था. 2 हफ्ते बाद ही नितिन ने प्रियंका के साथ फिर से सख्ती बरतनी शुरू कर दी. जब प्रियंका पूरी तरह स्वस्थ हो गई तो वह अपने खाली समय में सोशल साइट्स पर दोस्तों आदि से बातें करती रहती थी. नितिन को शक था कि वह अपने किसी बौयफ्रैंड से बात करती है. इसलिए उस ने प्रियंका के फोन से वाट्सऐप और फेसबुक अनस्टाल करा दी.

इस के अलावा नितिन ने प्रियंका के अकेली घर से बाहर निकलने पर भी पाबंदी लगा दी. खुले आसमान में उड़ने वाली प्रियंका अब पिंजड़े में बंद एक चिडि़या बन कर रह गई थी. यही नहीं नितिन के तुगलकी फरमान की वजह से घर का खाना उसे खुद बनाना पड़ता था. जबकि खाना बनाने के लिए रखा नौकर दिन भर खाली रहता था. अब प्रियंका को नितिन  के साथ शादी करने का पछतावा हो रहा था. प्रियंका कभी किसी बात पर बहस करती तो नितिन उस की पिटाई कर देता. इस से उस के अंदर इतना खौफ बैठ गया कि वह उस के सामने अपना मुंह नहीं खोल पाती थी. वह उसी के आदेशानुसार काम करती थी.

एक दिन नितिन अपनी पहली पत्नी से पैदा हुए बेटे को फ्लैट पर लाया. उसे उसी समय बिजनैस के सिलसिले में कहीं जाना था तो वह 8 वर्षीय बेटे को प्रियंका के पास छोड़ कर चला गया. उस के जाने के बाद उस लड़के ने प्रियंका के हाथों खाना तो दूर, कोई दूसरी चीज भी नहीं खाई. ऐसा लग रहा था, जैसे उसे किसी ने सिखा कर भेजा हो कि कोई चीज नहीं खानी है. शाम को जब नितिन को पता चला कि उस का बेटा दिन भर भूखा रहा है तो उसे पत्नी पर बहुत गुस्सा आया. उस ने उसे जम कर डांटा.

प्रियंका मां को फोन कर के अपना दुखड़ा रोती, तब मां को लगता कि उन की आपस की बातों में ज्यादा टांग अड़ाना ठीक नहीं है. छोटेमोटे झगड़े तो होते ही रहते हैं. बेटी की ससुराल के मामलों में ज्यादा दखलंदाजी करने पर कभीकभी रिश्ते बिगड़ जाते हैं. उन्होंने सोचा कुछ दिनों में रिश्ते सामान्य हो जाएंगे तो सब ठीक हो जाएगा. रूमा ने 24 मार्च, 2016 को भी प्रियंका से बात की थी, तब प्रियंका ने कहा था कि वह कल शाम को नितिन के साथ घर आएगी और खाना खाने के बाद लौट आएगी. 25 मार्च को उन्होंने फिर से प्रियंका से बात की. इस के बाद उन की उस से बात नहीं हो सकी.

पूछताछ में नितिन चावला बारबार खुद को बेगुनाह बता रहा था. वह पत्नी की मौत को आत्महत्या ही कह रहा था. नितिन से पूछताछ करने पर पुलिस को कोई खास जानकारी नहीं मिली तो पुलिस ने उसे 27 मार्च, 2016 को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. प्रियंका की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से स्पष्ट नहीं हो सका कि प्रियंका ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या कर आत्महत्या का रूप दिया गया था. इसलिए डाक्टरों ने उस का विसरा सुरक्षित कर जांच के लिए भेज दिया.

प्रियंका के मातापिता का आरोप है कि उन की बेटी इतनी कमजोर नहीं थी कि वह सुसाइड करती. वह हीलिंग, मैडिटेशन और विपश्यना की एक्सपर्ट थी. मार्च के पहले हफ्ते में भी वह 15 दिनों के लिए विपश्यना के लिए पुष्कर गई थी. उन्होंने बताया कि जिस समय फ्लैट का दरवाजा तोड़ा गया था, वह बिस्तर पर घुटनों के बल बैठी थी. उस स्थिति में फांसी लगा कर किसी की भी मौत नहीं हो सकती. पुलिस को उस स्थिति का फोटो खिंचवाना चाहिए था, लेकिन पुलिस ने ऐसा नहीं किया.

फ्लैट पर जो नेपाली नौकर था, उस से भी पुलिस ने पूछताछ नहीं की. सुसाइड नोट में प्रियंका ने लिखा था कि नितिन 3 दिनों से घर नहीं आ रहा. जबकि नौकर ने रूमा को बताया था कि साहब कल भी घर पर थे. इस से तो यही लग रहा है कि वह सुसाइड नोट 25 मार्च से पहले का लिखा है. शायद पहले कभी प्रियंका ने सुसाइड करने की कोशिश की होगी. अगर पुलिस नितिन के मोबाइल फोन की डिटेल्स निकलवाती तो कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती थीं.

प्रियंका को डेली डायरी लिखने का शौक था. रूमा का कहना था कि अगर उस ने सुसाइड किया है तो इस बात को उस ने अपनी डायरी में जरूर लिखा होगा, लेकिन पुलिस डायरी के बारे में कुछ भी नहीं बता रही. जिस कमरे में उन की बेटी मरी मिली, उस कमरे का लौक सिस्टम ऐसा है, जो अंदर और बाहर दोनों तरफ से बंद किया जा सकता है. इसलिए उन का कहना यही है कि प्रियंका की हत्या करने के बाद नितिन कमरे का ताला लगा कर चला गया था.

पिता अशोक कपूर का कहना है कि सन 2014 में नितिन के खिलाफ मुंबई की किसी मौडल ने वर्सोवा थाने में रेप का केस दर्ज कराया था. इस की जानकारी प्रियंका को भी हो गई थी. वह नितिन के जुल्मोसितम से तंग आ कर घर लौटना चाहती थी. यह जानकारी नितिन को लग गई थी, इसलिए उस ने उन की बेटी की हत्या कर दी.

उन्होंने इस केस की निष्पक्ष जांच करा कर दोषियों के खिलाफ सख्त काररवाई करने की मांग की है. बहरहाल मामला चाहे जो भी हो, यह तो जांच के बाद ही स्पष्ट हो पाएगा. मामले की जांच एसआई शिवदेव सिंह कर रहे हैं. कथा लिखे जाने तक नितिन की मां हर्ष चावला और भाई जतिन चावला पुलिस की गिरफ्त में नहीं आ सके थे. Delhi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों और मृतका के घर वालों से की गई बातचीत पर आधारित

 

Social Story: समाज से जुड़ने की चाह में चंबल के डाकू

Social Story: समाज या परिवार के लिए कुछ करने की उम्र में जिन लोगों ने समाज या घर वालों से बगावत कर के बीहड़ में जा कर बंदूक उठाई, अब वही जीवन के अंतिम दौर में समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, लेकिन समाज आज भी उन से दहशत खाता है, जिस से उन्हें अपने साथ जोड़ने से कतरा रहा है.

आज डाकू भले ही किस्सेकहानियों के पात्र बन कर रह गए हों, लेकिन कभी इन का बोलाबाला था. कुछ डाकुओं का तो इतना आतंक था कि लोग उन के नामों से कांपते थे. कुछ महिलाएं भी डाकू बनीं, जिन्हें आज दस्यु सुंदरी कहा जाता है. डाकुओं और उन की दहशत पर तमाम फिल्में भी बनी हैं, जिन में सब से चर्चित फिल्म शोले रही है.

शोले में दिखाए गए गब्बर सिंह को लोग शायद ही कभी भूल पाएंगे. फिल्म में गब्बर सिंह की भूमिका अभिनेता अमजद खान ने निभाई थी. फिल्म के तमाम डायलौग लोगों की जुबान पर चढ़ गए थे. इस के अलावा भी डाकुओं पर तमाम फिल्में बनीं, लेकिन शोले जैसी सफलता किसी दूसरी फिल्म को नहीं मिली. अब समय बदल गया है, अपराध भले ही पहले से ज्यादा हो रहे हैं, लेकिन आज अपराधों और अपराधियों का ट्रेंड बदल गया है. अब बंदूकों की बदौलत डकैती नहीं, अपहरण होने लगे हैं. डकैत बीहड़ों और जंगलों में रहते थे, जहां रहना खाना पेड़ों के नीचे या छोटीमोटी गुफाओं में होता था.

जबकि अब विकास के नाम पर जंगल उजड़ते जा रहे हैं. डकैतों का लगभग सफाया हो चुका है. अपराधों का स्वरूप बदल गया है तो अपराधी भी सुविधाभोगी हो गए हैं. घोड़ों का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है, उन की जगह कारों या जीपों ने ले ली हैं.

राजस्थान से ले कर मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश तक पसरी चंबल की घाटी अवैध खनन की वजह से सिमटती जा रही है. जंगल खत्म होते जा रहे हैं. उन की जगह बहुमंजिली इमारतें बनती जा रही हैं यानी हरेभरे जंगलों की जगह कंकरीट के जंगल खड़े होते जा रहे हैं. बीहड़ों और जंगलों को कुख्यात बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली यहां से बहने वाली चंबल नदी है.nमध्य प्रदेश में इंदौर के पास बसे शहर महू से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित विंध्याचल की पहाडि़यों से निकलने वाली यह नदी राजस्थान के कुछ हिस्से से गुजरते हुए मध्य प्रदेश के भिंडमुरैना के इलाके से निकल कर उत्तर प्रदेश के इटावा जिले की ओर बढ़ जाती है.

पानी के कटाव से चंबल नदी के किनारेकिनारे सैकड़ों मीलों तक ऊंचे घुमावदार बीहड़ों की संरचना हुई है. चंबल के यही बीहड़ डाकुओं के छिपने के अभेद्य ठिकाने रहे हैं. डाकुओं की पहली पीढ़ी में मान सिंह, तहसीलदार सिंह, सूबेदार सिंह, लक्का डाकू, सुल्ताना डाकू, पन्नाबाई, पुतलीबाई, पान सिंह तोमर आदि बड़े नाम रहे हैं. इस के बाद मलखान सिंह, माधो सिंह, मोहर सिंह, माखन चिड्डा, बाबा मुस्तकीम, फूलन देवी, विक्रम मल्लाह, श्रीराम, लालाराम और ददुआ जैसे दुर्दांत डाकुओं का चंबल घाटी पर दबदबा रहा है.

डकैत, जो कभी आतंक का पर्याय माने जाते थे, कुछ लोगों की पहल पर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया. सजा भुगतने के बाद आज वे समाज की मुख्य धारा से जुड़ गए हैं. दस्यु सुंदरी फूलन देवी 2 बार सांसद बनी थीं. दूसरी बार सांसद बनने के बाद सन 2001 में शेर सिंह राणा ने दिल्ली में उन के आवास पर गोली मार कर उन की हत्या दी थी.  सन 1981 में फूलन देवी तब चर्चा में आई थीं, जब उन के गिरोह पर बेहमई गांव में सवर्ण जाति के 22 लोगों की हत्या का आरोप लगा था.

सालों तक चंबल के बीहड़ों में भटकने वाले पूर्व दस्यु अब जीवन के इस पड़ाव पर समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं. इसी उद्देश्य से 20 मार्च को होली आने से 3 दिन पहले गुलाबी नगर जयपुर में देशभर के नामी डाकू इकट्ठा हुए. सिर पर साफा बांधे, ललाट पर रोली का तिलक लगाए, कंधे पर दुनाली लटकाए ये डकैत यहां कोई अपराध करने नहीं, बल्कि अपने दस्यु जीवन की दास्तां सुनाने और बीहड़ बचाने के लिए इकट्ठा हुए थे.

प्रकृति एवं संस्कृति संरक्षण व संवर्धन को समर्पित जयपुर के श्री कल्पतरू संस्थान ने दस्युओं का यह महाकुंभ विश्व वानिकी दिवस की पूर्व संध्या पर पूर्व आयोजित किया था. जयपुर के इंदिरा गांधी पंचायती राज संस्थान औडिटोरियम में आयोजित इस ऐतिहासिक आयोजन का नाम दिया गया था, ‘पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़.’

कभी दस्यु सुंदरी के नाम से मशहूर रही सीमा परिहार भी इस आयोजन में आई थीं. सीमा परिहार अपनी मरजी से डकैत नहीं बनी थीं. उन का अपहरण कर के चंबल में ले जाया गया था. वह पहली दस्यु सुंदरी थीं, जिन्होंने बागी रहते हुए बच्चे को जन्म दिया था. उन के जीवन पर बुंडेड नाम से फिल्म भी बन चुकी है, जल्दी ही उन्होंने एक और फिल्म साइन की है. इस बार वह सलमान खान के साथ फिल्मी परदे पर नजर आएंगी. वह बिग बौस में भी भाग ले चुकी हैं.

सीमा परिहार 13 साल की थीं, तब डाकू उन्हें उठा ले गए थे. डाकुओं के साथ रह कर उन्होंने भी बंदूक उठा ली थी. दस्यु जीवन में उन पर कुल 29 मुकदमे दर्ज हुए, जिन में 4 हत्याओं के थे, बाकी पुलिस मुठभेड़, लूट और अन्य मामलों के थे. 1 दिसंबर, 2000 को उन्होंने अधिकारियों के सामने औरैया जिले में आत्मसमर्पण किया था. कहा जाता है कि उन का इतना खौफ था कि जिस दिन वह जेल गई थीं, वहां सजा काट रहे अन्य कैदी डर के मारे रात को पेशाब करने नहीं निकले थे. उन का बच्चा तब उन की गोद में था. उस समय जेल में 35 अन्य महिला कैदी थीं. वह सन 2004 रिहा हुईं. उन के रिहा होने के बाद सन 2006 में उन के भाई को झूठे एनकाउंटर में मरवा दिया गया था.

सीमा परिहार का कहना था कि चंबल में जो गए थे, वे अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले थे. असली डकैत तो समाज में हैं, वही अपराधी बनाते हैं. दस्यु सुंदरी या डकैत मांबाप के दिए नाम नहीं होते. समाज, पुलिस और सरकार ही उन्हें डकैत बनाती है. सरकार वादे तो बड़ेबड़े करती है, लेकिन वे पूरे नहीं होते. दस्यु सुंदरी सीमा का कहना था कि पेड़पौधों के बारे में जितना दस्यु जानते हैं, उतना कोई और नहीं जान सकता. बीहड़ में डाकुओं को पेड़ की ही छाया मिलती थी, क्योंकि वहां छत नहीं होती. बीहड़ में कभी कोई डकैत सांपबिच्छू के काटने से नहीं मरता. 20 साल पहले जो जंगल थे, अब वे नहीं रहे. जीवन को बचाने के लिए पेड़पौधे लगाना जरूरी है. सरकार इस के लिए मुहिम चला रही है. इस मुहिम में डाकुओं को भी जुड़ना चाहिए. अगर हर कोई चाह ले तो जंगलों को बचाया जा सकता है.

इस आयोजन में आई 28 साल की दस्यु सुंदरी रेणु यादव जब नौवीं क्लास में पढ़ती थीं, तब सन 2003 में 29 नवंबर को बदमाश चंदन यादव ने स्कूल से आते समय उन का अपहरण कर लिया था. उन्हें छोड़ने के लिए उस ने उन के घर वालों से 10 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. उन के पिता किसान थे, 5-6 बीघा जमीन थी. वह 10 लाख रुपए कहां से देते. पैसे नहीं मिले तो बदमाशों ने उन्हें मारापीटा, प्रताडि़त किया और कुछ दिनों बाद उन्हें डाकू बना दिया.

रेणु के पास डाकुओं की बात मानने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था. इस के बाद उन्हीं के नाम पर अपराध किए जाने लगे. धीरेधीरे उन का नाम मशहूर हो गया और लोग उन के नाम से खौफ खाने लगे. इस के बाद चंदन यादव द्वारा की गई हत्या, लूट, डकैती और अपहरण जैसे 17 मामलों में उन का नाम बतौर मुलजिम दर्ज हो गया. इसी तरह 4 जनवरी, 2005 तक चलता रहा. उसी बीच एक दिन रामवीर गुर्जर और चंदन यादव में गैंगवार हुई, जिस में चंदन मारा गया. रामवीर गुर्जर ने रेणु को बंधक बना कर गलत नीयत से उन पर हमला किया. उस समय उन के पास एसएलआर थी, जिस की सारी गोलियां उस ने रामवीर के सीने में उतार दीं. इस के बाद 7-8 दिनों तक जंगल में भटकती रही.

उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें, कहां जाएं? आखिर वह अपने घर आ गईं. खबर पा कर पुलिस आ गई और उन्हें भरोसे में ले कर कोतवाली ले गई, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. उन पर कई आरोप थे. आखिर उन्हें जेल भेज दिया गया. वह 3 अलगअलग जेलों में रहीं. 7 साल 3 महीने 15 दिन तक जेल में रहने के बाद 29 मई, 2012 को लखनऊ के नारी बंधी निकेतन से रेणु रिहा हुईं. जेल से रिहा होने के बाद अब भी कुछ बदमाश उन पर दबाव डाल रहे हैं कि वह वापस आ कर गैंग का मोर्चा संभाल लें, वरना उन्हें मार दिया जाएगा. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से मिलीं और सुरक्षा की गुहार लगाई. इस के बाद उन्हें गनमैन मुहैया करा दिया गया.

रेणु यादव का कहना था कि पुलिस ने उन्हें डाकू माना, लेकिन न्यायपालिका से उन्हें न्याय मिला. उन पर फिल्म बीहड़ बन रही थी, जो अभी विवादों में फंस गई है. वह न टीवी देखती हैं न फिल्में, लेकिन कोई अच्छा डाइरैक्टर मिल जाए तो वह उस के साथ काम करना चाहती हैं. फिलहाल वह गौ सेवा में लगी हैं. वह गायों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाती हैं. अब तक वह हजारों गायों को कटने से बचा चुकी हैं. उन्हें जेल से बाहर आए 2 साल हो गए हैं. वह एनजीओ चलाती हैं, जिस के माध्यम से वह गायों को बचाने के साथ दानदहेज को ले कर महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने की कोशिश कर रही हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान का समर्थन करते हुए रेणु ने कहा कि अगर सरकार सहयोग करे तो बीहड़ ही नहीं, पूरे चंबल में पेड़ों की कटाई को छोड़ो, वह किसी को हरा पत्ता तक न तोड़ने दें, अवैध खनन के नाम पर एक पत्थर न उठाने दें और शिकार के नाम पर एक चिडि़या न मारने दें. इस आयोजन में भाग लेने आए डाकुओं में पंचम सिंह एक बड़ा नाम रहा है. उन के नाम से आम आदमी ही नहीं, पुलिस भी खौफ खाती थी. बरसों तक डकैत के रूप में बीहड़ों की खाक छानने वाले और दहशत का पर्याय रहे पंचम सिंह ने अब संन्यास ले लिया है. पीत वस्त्र धारण करने वाले पंचम सिंह की उम्र इस समय 84 साल है, लेकिन उन की आवाज आज भी बुलंद है.

जयप्रकाश नारायण के प्रयास से साढ़े 5 सौ डाकुओं ने आत्मसमर्पण किया था, उन्हीं में एक पंचम सिंह भी थे. उन्हें दुख इस बात का है कि आज भी डाकुओं को सामाजिक कार्यों से नहीं जोड़ा जाता. वह पूरे 14 साल बीहड़ में रहे. उन्होंने राज सत्ता, डाकू सत्ता और धर्म सत्ता देखी है. पंचम सिंह का कहना था कि डाकुओं के बारे में फिल्मों में जो दिखाया जाता है, वह सब झूठ है. डाकुओं के अपने नियमकानून होते थे. उन में एकता होती थी, जो आज राज सत्ता और धर्म सत्ता में नहीं है. साढ़े 5 सौ डाकुओं ने एकता के दम पर ही भारत सरकार को हिला कर रख दिया था.

पंचम सिंह के गिरोह का सफाया करने के लिए सरकार ने एक करोड़ रुपए का इनाम रखा था. यह तब की बात है, जब सौ रुपए में एक तोला सोना मिलता था. पंचम सिंह ही नहीं, उस समय के लगभग सभी डाकू चरित्रवान थे, किसी की मांबहन को गलत नजर से नहीं देखते थे. पंचम सिंह ने एक बलात्कारी को पेड़ से बांध कर जिंदा जला दिया था. वे अमीरों का धन लूट कर गरीबों में बांटते. यही वजह थी कि किसी डाकू की कोई कोठी नहीं बनी है. पंचम सिंह का 45 जिलों में बोलबाला रहा. उन्हें गाड़ीघोड़ों की कोई कमी नहीं थी. उन का आतंक ऐसा था कि स्टेशन न होने पर भी ट्रेन रुकती थी.

पंचम सिंह चौथी तक पढ़े थे. 14 साल की उम्र में उन की शादी हो गई थी. गांव में हुए एक झगड़े के बाद बदले की भावना से वह चंबल के डाकुओं से जा मिले थे. उस के बाद एक दिन गांव आए और 6 लोगों को मार दिया और डाकू बन गए. वह भले ही पढ़ेलिखे नहीं थे, लेकिन डकैत जीवन में स्कूल बनवाए, हजारों कन्याओं की शादी कराई. जंगल के आदिवासी उन की मदद करते थे. चंबल में उन्होंने जो स्कूल खोला था, उस में 17 मास्टर थे और लगभग 5 सौ बच्चे पढ़ते थे. उन के स्कूल का रिकौर्ड रहा है कि कोई बच्चा फेल नहीं हुआ. मास्टर हो या छात्र, गलती करने पर पंचम सिंह उसे स्कूल में 24 घंटे के लिए बंद कर देते थे.

पंचम सिंह के हथियार हेलीकौप्टर द्वारा बांग्लादेश से आते थे. उन के पास हर तरह के हथियार थे. वह जिस नेता को सपोर्ट करते थे, वही चुनाव जीतता था. वह एक दिन में सरपंच और 3 दिन में एमएलए बनाते थे. आत्मसमर्पण के समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण के माध्यम से उन्होंने 8 शर्तें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने रखी थीं. सन 1972 में सरकार ने उन शर्तों को मान लिया तो उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्हें और मोहर सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में राष्ट्रपति ने फांसी की सजा आजीवन कारावास में बदल दी थी.

पंचम सिंह का कहना था कि सन 1972 में समर्पण करने वाले साढ़े 5 सौ डकैतों में करीब 2 सौ डाकू आज भी जीवित हैं. ये डकैत पहले गोलियों से उस के बाद फांसी से बचे. अब जीवन के आखिरी दिनों में वह उस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प लेंगे, जिस ने उन्हें मां की तरह रखा. अगर समाज साथ दे तो ये डाकू बलिदान देने को तैयार हैं. डाकू गब्बर सिंह पर बनी थी, वह भी इस महाकुंभ में जयपुर आए थे.

उत्तर प्रदेश के ललितपुर के गांव रामपुर के रहने वाले गब्बर सिंह का असली नाम प्रीतम सिंह है. गब्बर सिंह बीड़ी जरूर पीते हैं, लेकिन फिल्म शोले के गब्बर की तरह तंबाकू नहीं खाते. फिल्म शोले का गब्बर सिंह खूंख्वार था, जबकि असली गब्बर सिंह की छवि उस से बिलकुल अलग है. वह अब तक सैकड़ों लड़कियों का विवाह करवा चुके हैं. गब्बर सिंह 10 साल बीहड़ में रहे. सन 1986 में उन्होंने आत्मसमर्पण किया तो 7-8 साल जेल में रहे. उन्होंने डाकू जीवन में गुनहगारों को ही मारा. गलती से एक बार एक बच्चा और एक औरत मर गई थी, जिस का उन्हें आज भी मलाल है. उन का कहना था कि बागी को दर्द नहीं होता है. उन के पास मारने वाला दिल होता है, रहम का दिल नहीं होता.

सरकार ने डेढ़ सौ से अधिक पुलिस वालों को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी सौंप रखी थी, लेकिन वे उन्हें पकड़ नहीं पाए. बाद में धीरज सिंह, राम सिंह और रामपाल के साथ उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था. सरकार ने उन से जो वादे किए थे, उन में से एक भी पूरे नहीं किए. जेल में अलग रहने और खाने की व्यवस्था जरूर हो गई थी. जेल में रह कर गीतारामायण जैसी धार्मिक किताबें पढ़ कर धीरेधीरे उन्होंने खुद को बदला. उन का कहना था कि अब वह गांव और इलाके के लोगों की सेवा कर के अपराध जीवन के दाग धोने की कोशिश कर रहे हैं.

देशभर में महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचारों से वह काफी दुखी हैं. उन का निशाना आज भी अचूक है. अब वह कानून का सम्मान करते हुए खुद को देश की सेवा में लगाए रखना चाहते हैं. चंबल घाटी में आतंक का पर्याय रहे पान सिंह तोमर के भतीजे बलवंत सिंह तोमर का पुलिस रिकौर्ड में नाम बलवंता है. बलवंता इस परिवार के एकमात्र ऐसे सदस्य हैं, जो पुलिस से हुई अंतिम मुठभेड़ में बच गए थे. करीब 13 घंटे तक चली मुठभेड़ में पान सिंह तोमर सहित गैंग के 28 डकैत मारे गए थे. बलवंता पर 70 मुकदमे दर्ज थे, जिन में 30 हत्या के थे.

पान सिंह तोमर भारतीय सेना में थे और अंतर्राष्ट्रीय धावक भी. बाद में वह बागी बन गए. उन के नाम से ही फिल्म भी बनी है. बलवंता का कहना था कि फिल्म में सब कुछ सच दिखाया गया है. अभिनेता इरफान खान ने अच्छा अभिनय किया था, लेकिन फिल्म निर्देशक ने धोखा दिया. फिल्म बनाने की अनुमति के समय उन का इंटरव्यू लिया था. तब जो शर्तें तय हुई थीं, बाद में वह उन से मुकर गया. फिलहाल मामला अदालत में चल रहा है. बलवंता जिन दिनों चंबल में थे, अगर कोई पेड़ काटता था, वह उसे कुल्हाड़ी से मारते थे, क्योंकि बीहड़ में पेड़पौधे ही उन के घर थे.

बलवंता ने जंगलों पर मंडराते खतरे पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि जंगल नहीं रहेगा तो किसान भी नहीं रहेगा. क्योंकि जंगलों के साफ हो जाने से अकाल पड़ेगा. काली मां के अनन्य भक्त बलवंता ने पान सिंह तोमर के समय लूट के पैसों से मंदिर भी बनवाया था. खारिया गांव के रहने वले अध्यापक के बेटे से बागी बने मुन्ना सिंह मिर्धा के लिए एके 47 चलाना खेल था. उन का निशाना अचूक है. बंदूक से उन्हें आज भी मोहब्बत है. वह दद्दा मलखान सिंह गैंग में थे. 18 साल की उम्र में बागी बन कर 12 सालों तक बीहड़ों में राज किया. 1982 से उन्होंने गैंग के साथ आत्मसमर्पण किया था.

उन का कहना था कि जब तक उन के पास बंदूक रही, लोग उन की बात सुनते थे, लेकिन आज हालात बदल गए हैं. अब वह बंदूक साथ नहीं रखते, जिस से उन्हें काम कराने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं. बागी रहते हुए उन से जो हुआ, उस का उन्हें पछतावा नहीं है. लेकिन जो गलती से मर गया, उस का दुख आज भी है. अब उन की इच्छा है कि वह पर्यावरण के लिए काम करें और अपने गांव को आदर्श गांव बनाएं.

सन 1993 में जेल से बाहर आते ही मुन्ना सिंह ने पहला पेड़ अपनी जन्मभूमि पर लगाया था. वह जेल में जो मांगते थे, वह उन्हें मिलता था. उन के लिए जेल में अलग से खीरपूरी बनाई जाती थी. जेल से ही जिस कागज पर दस्तखत कर के भेज देते थे, तुरंत वह काम हो जाता था. जंगल में रहने पर भी उन की नेताओं से सांठगांठ थी. मुन्ना सिंह पर 135 मुकदमे दर्ज थे. उन में हत्या के कितने थे, पता नहीं. उन के हथियार विदेश से आते थे. उन का कहना था कि शासनप्रशासन अगर उन का साथ दे तो वह पर्यावरण को बचा सकते हैं.

चंबल का शेर कहलाने वाले मलखान सिंह को आज भी लोग दद्दा कहते हैं. मंदिर की सौ बीघा जमीन को मंदिर में मिलाने की मांग को ले कर 26 साल की उम्र में पंच रहते हुए बागी बने मलखान सिंह को बागी रहते हुए जो कुछ हुआ, उस का उन्हें जरा भी मलाल नहीं है.  उन्होंने जो कुछ भी किया, वह अन्याय के खिलाफ किया. वह 15 साल बीहड़ में रहे, वहां उन्हें कोई तकलीफ नहीं हुई. जेल में रहते खाने या किसी तरह की कोई परेशानी हुई तो वह जेलर से भिड़ जाते थे. उन का कहना था कि आज भी जेलों में कैदियों की स्थिति दयनीय है. जेलों में आधे लोग बेकसूर बंद हैं.

अन्याय सहन करने के बजाय बीहड़ को अच्छा बताने वाले मलखान सिंह ने बागी रहते गरीब और जरूरतमंदों के अलावा ईमानदार लोगों की भी मदद की, आदर्श गांव बनाए. उन कहना था कि अगर सरकार सहयोग करे तो वह आज भी आदर्श गांव बनाने की इच्छा रखते हैं. अपने समय में वह गाय काटने वाले को छोड़ते नहीं थे.

मलखान सिंह को बीबीसी लंदन ने कई बार दस्यु सम्राट कह कर संबोधित किया था. उन के जीवन पर आर.के. चौकसे दद्दा मलखान सिंह नाम से फिल्म बना रहे हैं. फिल्म में डिंपल कपाडि़या व मुकेश तिवारी भी अभिनय कर रहे हैं. फिल्म की शूटिंग ग्वालियर की जेल में भी हुई है, जहां मलखान सिंह बंद रहे थे.  मलखान सिंह पर 32 पुलिसकर्मियों सहित 185 हत्याओं और डकैती के सैकड़ों मामले दर्ज थे. उन के गिरोह में 17 लोग थे, जो उन के गांव और आसपास के इलाकों के रहने वाले थे. चंबल घाटी में डेढ़ दशक तक बागी रहने के बाद करीब 32 साल पहले अर्जुन सिंह सरकार के समक्ष उन्होंने आत्मसमर्पण किया था.

दद्दा मलखान सिंह के साथी रहे पूर्व दस्यु रामप्रकाश ने सन 1979 में पहली बार बंदूक उठाई थी और दद्दा की गैंग में शामिल हो गए थे. तब से अब तक वह दद्दा के साथ ही बंदूक लिए खड़े नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश के बड़ा कस्ता गांव के रहने वाले रामप्रकाश ने बताया कि बाबू गुर्जर महिलाओं से दुराचार करता था. उन्होंने विरोध किया तो उस ने उन्हें इतना मारा कि वह सिर्फ मरे नही. इस के बाद उन्होंने 3 लोगों की दिनदहाड़े गांव के चौराहे पर गोली मार कर हत्या कर दी और दद्दा की शरण में चले गए. तब से आज तक वह उन्हीं की शरण में हैं. आत्मसमर्पण भी उन्हीं के साथ किया था.

70 के दशक में चंबल घाटी में डाकू सरू सिंह का बड़ा आतंक था. वह 17 साल की उम्र में बागी बने थे. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और 12 सालों तक बीहड़ों पर राज किया. जयप्रकाश नारायण के समझाने पर सन 1972 में आत्मसमर्पण किया था. तब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी मदद की थी. अदालत से उन्हें आजीवन कारावास हुई थी, लेकिन 8 सालों में ही वह जेल से बाहर आ गए थे. बस्तूरी गांव के रहने वाले सरू सिंह पर 540 केस दर्ज थे. इन में हत्या के 65 मामले थे. उन के गिरोह में 60 लोग थे. एक बार पुलिस से हुई मुठभेड़ में 9 पुलिस वाले तो 4 उन के साथी मारे गए थे. इस मुठभेड़ में सरू सिंह की गर्दन में गोली लगी थी, लेकिन 14 दिनों में ही वह घाव भर गया था.

उस समय जंगल में 11 दिनों तक उन्हें अन्न नहीं मिला था. उन का कहना था कि जंगल में जिस किसी ने उन्हें खाना दिया, वह सुरक्षित रहा. वह खुद को डकैत नहीं बागी कहते हैं. उन का कहना था कि डकैतों के समय में महिलाएं सुरक्षित थीं. मोहर सिंह और उन के नाम की आज भी कसमें खाई जाती हैं. आज भी वे एकदूसरे के लिए बंदूक उठा सकते हैं.

पहले बसाया बीहड़, अब बचाएंगे बीहड़ अभियान में 7 राज्यों के करीब 30 पूर्व दस्युओं ने शिरकत की. उन्होंने वीरान और उजाड़ हो कर अपना अस्तित्व खोते जा रहे बीहड़ों को फिर से हराभरा कर पर्यावरण संरक्षण की शपथ ली, साथ ही लोगों को पेड़ लगाने की मुहिम में शामिल होने का आह्वान किया. अब देखना यह है कि इन डाकुओं ने पर्यावरण की रक्षा का सिर्फ संकल्प ही लिया है या पहले की ही तरह अपने दिए वचन को पूरा भी करेंगे. Social Story

Delhi Crime: दरोगा के गले की फांस

Delhi Crime: सबइंसपेक्टर विजेंद्र वर्मा ने शादीशुदा होते हुए भी पत्रकार निकिता चौहान से इसलिए दोस्ती की, ताकि वह उस के साथ मौजमस्ती करता रहे. लेकिन यह दोस्ती उस के गले की ऐसी फांस बनी, जिस ने उस का सब कुछ तबाह कर दिया.

जनवरी का महीना आधा बीत चुका था. हलकीफुलकी बारिश हो जाने की वजह से मौसम में थोड़ी नमी आ गई थी. दिल्ली के द्वारका सेक्टर-4 स्थित डीडीए पार्क में वैसे तो रोजाना तमाम लोग आते थे, लेकिन उस दिन रविवार होने की वजह से पार्क में कुछ ज्यादा ही गहमागहमी थी. पार्क में कुछ लोग धूप सेंक रहे थे तो कुछ लोग व्यायाम कर रहे थे. साढ़े 11 बजे के करीब एक सबइंसपेक्टर एक युवती के साथ पार्क के गेट पर ईरिक्शा से उतरे और पार्क में जा कर एक बेंच पर बैठ गए. उन की तरह पार्क में और भी कई जोड़े बैठे थे. सभी अपनीअपनी बातों में मशगूल थे.

सबइंसपेक्टर और युवती को आए अभी कुछ ही देर हुई थी कि उधर से पटाखे के फूटने जैसी आवाज आई. तेज आवाज आने पर लोगों की निगाहें उधर गईं तो सभी हैरान रह गए. सबइंसपेक्टर ने अपने साथ बैठी युवती पर अपनी सर्विस रिवौल्वर से एक के बाद एक कई फायर कर के खुद को भी गोली मार ली थी.

इस घटना से लोग हैरान रह गए थे. सभी डर के मारे भागने लगे. मिनटों में पार्क खाली हो गया. पार्क के पास ही बैरिस्टर सिंह नाम का आदमी कपड़ों पर इस्तरी करता था. लोगों के इस तरह तेजी से पार्क से भाग निकलने की वजह वह समझ नहीं पाया. पार्क में पटाखों के फूटने जैसी आवाज उस ने भी सुनी थी. जिज्ञासावश वह पार्क में गया. उस ने एक बेंच के पास एक पुलिस औफिसर और एक युवती को पड़ी देखा. दोनों ही खून से लथपथ थे. दोनों को उस ने कुछ देर पहले ही पार्क में जाते देखा था.

बैरिस्टर सिंह उलटे पांव वापस लौटा और यह बात वहां फ्लैटों में रहने वालों को बताई. कुछ लोग अविलंब पार्क में पहुंचे. गोली चलने पर जो लोग पार्क से भाग गए थे, वे भी फिर से पार्क में आ गए. उन्होंने ही बताया कि सबइंसपेक्टर ने पहले युवती पर गोलियां चलाईं, इस के बाद खुद को भी गोली मार ली. इसी दौरान किसी ने 100 नंबर पर फोन कर के पुलिस को इस घटना की सूचना दे दी थी. यह 17 जनवरी, 2016 की बात है.

खबर मिलते ही पुलिस कंट्रोल रूम की गाड़ी घटनास्थल पर पहुंच गई. चूंकि वह इलाका दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली के थाना द्वारका (उत्तरी) के अंतर्गत आता था, इसलिए द्वारका उत्तरी थाने की पुलिस भी वहां पहुंच गई. आननफानन में पुलिस वाले सबइंसपेक्टर और युवती को पास के रौकलैंड अस्पताल ले गए, जहां डाक्टरों ने युवती को मृत घोषित कर दिया.

सबइंसपेक्टर गंभीर रूप से घायल था. उसे भी कई गोलियां लगी थीं. वह धीरेधीरे बोल रहा था. वह अपना नाम विजेंद्र वर्मा बता रहा था, जबकि उस की वर्दी पर संदीप बिश्नोई नाम की नेमप्लेट लगी थी. उस की पोस्टिंग पश्चिमी दिल्ली के रनहोला थाने में थी. नाम और नेमप्लेट की बात बाद की थी. पहली कोशिश उस की जान बचाने की थी. रौकलैंड अस्पताल के डाक्टरों ने सबइंसपेक्टर को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के ट्रामा सेंटर रैफर कर दिया. घटनास्थल पर एक सरकारी रिवौल्वर और मृतक युवती का पर्स पड़ा था, जिन्हें पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया था.

रास्ते भर विजेंद्र वर्मा यही कहता रहा कि ‘मणे मरण दो’. साथ में बैठे पुलिस वाले उसे दिलासा दे रहे थे कि वह बच जाएगा. इसी बीच उस ने कहा कि निक्की ने उसे इस कदर परेशान कर रखा था कि उसे यह कदम उठाना पड़ा. उस की बातों से जानकारी मिली कि उस के साथ पार्क में जो युवती आई थी, उस का नाम निक्की था और वह उस की प्रेमिका थी.

एम्स के ट्रामा सेंटर पहुंचने के बाद डाक्टरों की टीम सबइंसपेक्टर विजेंद्र वर्मा के इलाज में जुट गई. उस के सीने में 3 गोलियां लगी थीं. सूचना मिलने पर दक्षिणीपश्चिमी जिले के डीसीपी आर.ए. संजीव भी ट्रामा सेंटर पहुंच गए थे. उन्होंने विजेंद्र का इलाज कर रहे डाक्टरों से बात की. डाक्टरों ने बताया कि गोलियां लगने से उस के कई अंग क्षतिग्रस्त हो गए हैं, साथ ही काफी मात्रा में खून भी बह चुका है, इसलिए हालत चिंताजनक बनी हुई है. अंतत: डाक्टरों की कोशिश नाकाम रही. शाम करीब साढ़े 4 बजे सबइंसपेक्टर विजेंद्र वर्मा ने दम तोड़ दिया.

विजेंद्र वर्मा की पोस्टिंग पश्चिमी जिले के रनहोला थाने में थी. इस से पहले वह उत्तरनगर में तैनात था. विभाग के तमाम लोग उस के और मृत युवती निक्की के प्रेमसंबंधों से वाकिफ थे. जब उन्हें दोनों की मौत की जानकारी मिली तो सभी को आश्चर्य हुआ. रात करीब साढ़े 9 बजे अस्पताल के डाक्टर ने पुलिस को विजेंद्र के कपड़े और सामान सौंपा. सामान में विजेंद्र का एक पर्स भी था. पुलिस ने जब पर्स खोला तो उस में एक सुसाइड नोट मिला. सुसाइड नोट हिंदी में लिखा था. उस में उस ने निक्की की हत्या और अपनी आत्महत्या की वजह बताई थी. पत्र पढ़ कर लग रहा था कि विजेंद्र ने यह योजना पहले ही बना कर सुसाइड नोट लिखा था.

खबर मिलने पर हरियाणा के झज्जर जिले से उस के मातापिता व अन्य लोग दिल्ली आ गए. 39 साल के एकलौते बेटे की मौत पर उन का रोरो कर बुरा हाल था. उन का कहना था कि उन का बेटा इतना कमजोर नहीं था, जो वह आत्महत्या करता. पत्रकार निकिता चौहान उर्फ निक्की ने ब्लैकमेल करकर के उसे इतना परेशान कर दिया था कि उसे यह कदम उठाना पड़ा.

घर वाले जिस युवती पर आरोप लगा रहे थे, उस की मौत पहले ही हो चुकी थी. मतलब कोई ऐसा आरोपी नहीं था, जो जीवित हो. पुलिस ने मृतका निकिता चौहान (25 वर्ष) के पर्स की तलाशी ली तो उस में एक सीडी और पेनड्राइव के अलावा उस का पहचानपत्र मिला. पता चला कि वह दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली के सागरपुर की गली नंबर-4 निवासी शादीराम चौहान की बेटी थी. पुलिस ने शादीराम चौहान को भी उन की बेटी की मौत की खबर दे दी. बेटी की मौत पर उन्हें भी सदमा लगा.

पुलिस ने दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करा कर लाशें उन के घर वालों को सौंप दीं. पुलिस ने इस केस की जांच की तो इस के पीछे प्रेमप्रसंग की एक हैरतभरी कहानी सामने आई. विजेंद्र वर्मा मूलरूप से हरियाणा के झज्जर जिले के गांव मातनहेल के रहने वाले रामकिशन का बेटा था. वह अपनी 5 बहनों के बीच अकेला भाई था. विजेंद्र सन 2001 में दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भरती हुआ था. उसी साल रेवाड़ी, हरियाणा की निशा से उस की शादी हो गई थी. विजेंद्र की शादी के बाद उस के घर वाले गांव छोड़ कर झज्जर शहर के किला मोहल्ला में आ कर रहने लगे.

उन के शहर में रहने से विजेंद्र को यह सुविधा हो गई थी कि जब भी उसे ड्यूटी से समय मिलता था, वह दिल्ली से झज्जर जा कर अपनी पत्नी और घर वालों से मिल आता था. इस तरह वह अपनी गृहस्थी और ड्यूटी में तालमेल मिला कर चल रहा था. वक्त के साथ वह एक बेटी प्रियंका और बेटे रजत का पिता भी बन गया.

विजेंद्र भी दिल्ली पुलिस में अधिकारी बनना चाहता था. इस के लिए वह पढ़ाई भी कर रहा था. ड्यूटी के  सद जब भी उसे समय मिलता, यारोंदोस्तों के साथ गप्पें लड़ाने के बजाय पढ़ाई करने बैठ जाता. सन 2008 में दिल्ली पुलिस में सबइंसपेक्टरों की भरती हुई तो उस ने भी आवेदन किया. अपनी मेहनत और लगन से वह सबइंसपेक्टर बन गया.

सन 2009 में जब विजेंद्र की पोस्टिंग पश्चिमी दिल्ली के उत्तमनगर थाने में थी, तभी उस की मुलाकात निकिता चौहान उर्फ निक्की से हुई. निकिता दक्षिणीपश्चिमी दिल्ली के सागरपुर इलाके में रहती थी. उसे पत्रकार बनने का शौक था, इस के लिए उस ने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का डिप्लोमा किया था. इस के बाद वह दिल्ली के तिलकनगर से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक समाचारपत्र में नौकरी करने लगी थी.

निकिता खबरों के सिलसिले में उत्तमनगर थाने में भी आती रहती थी. उसी दौरान उस का परिचय सबइंसपेक्टर विजेंद्र वर्मा से हुआ. निकिता खूबसूरत और तेजतर्रार युवती थी. उस की इसी खूबी पर विजेंद्र उस से प्रभावित हो गया. दोनों ने एकदूसरे को अपने फोन नंबर दे दिए. दोनों की फोन पर अकसर बातें होने लगीं. धीरेधीरे दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई. यह दोस्ती बाद में प्यार में बदल गई.

प्यार होने के बाद दोनों की मुलाकातें होने लगीं. विजेंद्र को चूंकि अच्छा वेतन मिलता था, इसलिए वह अपनी प्रेमिका पर खुले हाथों से खर्च करता था. जब निकिता को पता चला कि विजेंद्र शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप है तो उस ने नाराजगी जताई. उस की नाराजगी देख कर विजेंद्र ने उसे उसी नजरिए से समझाया, तब कहीं जा कर वह शांत हुई. निकिता शांत तो हो गई, लेकिन विजेंद्र की हकीकत जान कर उस ने इस का फायदा उठाना शुरू कर दिया. वह जबतब विजेंद्र से मोटी रकम ऐंठने लगी. विजेंद्र भी बदनामी के डर से उसे मुंहमांगी रकम देता रहा.

इसी बीच निकिता की दोस्ती प्रवेश कुमार उर्फ बिट्टू से हो गई. 2011 में दोनों ने चोरीछिपे आर्यसमाज मंदिर में शादी कर ली. यह बात सबइंसपेक्टर विजेंद्र को पता नहीं थी. वह एक प्रेमी से पैसे ऐंठ रही थी तो दूसरे के साथ मौजमस्ती कर रही थी. चूंकि वह प्रवेश से ही शादी करना चाहती थी, इसलिए उस ने यह बात अपने घर वालों से बता दी थी. बेटी की खुशी देखते हुए निकिता के घर वाले तैयार हो गए तो प्रवेश के घर वालों ने भी हामी भर दी. सन 2014 में घर वालों की सहमति से हरिनगर के एक बैंक्वेट हाल में दोनों की सामाजिक रीतिरिवाज से शादी हो गई.

विजेंद्र को जब नकिता की शादी की बात पता चली तो वह नाराज हुआ. इस पर निकिता ने तर्क दिया, ‘‘तुम शादीशुदा हो तो मैं ने भी शादी कर ली. इस में हर्ज ही क्या है? हम दोनों के लिए बेहतर यही होगा कि जिस तरह पहले मिलते रहते थे, उसी तरह मिलते रहें. अगर तुम ने डिस्टर्ब किया तो मैं सब को अपने संबंधों की बात बता दूंगी.’’

उस की इस धमकी पर विजेंद्र चुप हो गया. इस के बाद दोनों अपनेअपने जीवनसाथी को धोखा दे कर मिलते रहे. विजेंद्र की पत्नी चूंकि हरियाणा स्थित उस के घर पर रहती थी, इसलिए उसे कुछ पता नहीं था. लेकिन किसी तरह निकिता के पति को यह बात पता चल गई कि उस की पत्नी दिल्ली पुलिस के एक सबइंसपेक्टर के साथ गुलछर्रे उड़ाती है. सइसे ले कर प्रवेश और निकिता के बीच विवाद शुरू हो गया. बात यहां तक पहुंच गई कि प्रवेश कुमार ने निकिता से तलाक लेने के लिए फैमिली कोर्ट में केस दायर कर दिया.

इस से निकिता को झटका तो लगा, लेकिन वह बहुत ज्यादा परेशान नहीं हुई, क्योंकि विजेंद्र से उसे हर तरह की सुखसुविधाएं मिल रही थीं. विजेंद्र भी उस के प्यार में अंधा था. किसी तरह विजेंद्र की पत्नी निशा को जानकारी मिल गई कि विजेंद्र दिल्ली की एक पत्रकार के साथ रहता है. पत्नी चाहे कितनी भी सीधी क्यों न हो, वह सब कुछ बरदाश्त कर सकती है लेकिन यह हरगिज सहन नहीं कर सकती कि उस का पति किसी दूसरी औरत के साथ रहे. लिहाजा निशा ने भी पति से इस बात पर विरोध जताया. नतीजतन उन के पारिवारिक रिश्ते में दरार आ गई. विजेंद्र पत्नी पर पुलिसिया रौब झाड़ना चाहता था. लेकिन वह यह नहीं जानता था कि घर में वर्दी का रौब नहीं चलता.

विजेंद्र डराधमका कर पत्नी को शांत करना चाहता था, लेकिन हुआ इस का उलटा. निशा खुले रूप से उस का विरोध करने लगी. उस ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों से मिल कर पति की शिकायत की. इतना ही नहीं, उस ने पति के खिलाफ घरेलू हिंसा का केस भी कोर्ट में दायर कर दिया. इस से विजेंद्र तनाव में रहने लगा. एक तरफ उस की विभागीय जांच चल रही थी तो दूसरी ओर कोर्ट केस. ऐसी स्थिति में मानसिक तनाव स्वाभाविक था. तनाव की वजह से वह पूरी जिम्मेदारी से अपनी ड्यूटी नहीं कर पा रहा था. जांच के बाद विजेंद्र का ट्रांसफर उत्तमनगर से थाना रनहोला में कर दिया गया.

उधर विजेंद्र के पिता रामकिशन ने अपने रिश्तेदारों को बुला कर विजेंद्र से बात की. सभी ने उसे समझाया. उस ने भी सब के सामने वादा कर लिया कि अब वह निकिता से संबंध नहीं रखेगा. उस का यह आश्वासन मिलने के बाद निशा मान गई. फलस्वरूप उन दोनों में राजीनामा हो गया. इस मौखिक समझौते के बाद विजेंद्र ने निकिता से दूरियां बढ़ानी शुरू कर दीं. जब निकिता को महसूस हुआ कि विजेंद्र उस से मिलने में आनाकानी कर रहा है तो उस ने भी उसे धमकाना शुरू कर दिया. यह बात विजेंद्र के घर वालों को पता चली तो वे दिल्ली आए. उन्होंने निकिता से बात कर के उसे समझाया. इस पर निकिता 5 लाख रुपए ले कर विजेंद्र का पीछा छोड़ने को तैयार हुई.

कुछ दिनों तक निकिता विजेंद्र से नहीं मिली तो उस ने राहत की सांस ली. लेकिन उस का यह सुकून ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रहा. क्योंकि निकिता उसे सोने का अंडा देने वाली मुरगी समझती थी. उसे आसानी से कैसे छोड़ सकती थी. उस ने फिर से विजेंद्र से संपर्क करने की कोशिश की. विजेंद्र के लिए अब अपना परिवार पहले था. इसलिए उस ने निकिता को लिफ्ट देनी बंद कर दी. यह देख निकिता ने विजेंद्र को धमकी दी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह उस के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज करा देगी.

विजेंद्र उस की धमकी में नहीं आया तो निकिता ने अक्तूबर, 2015 में थाना उत्तमनगर में शिकायती पत्र दे कर सबइंसपेक्टर विजेंद्र वर्मा के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने की मांग की. थानाप्रभारी ने रिपोर्ट दर्ज नहीं की तो उस ने संयुक्त पुलिस आयुक्त से मुलाकात की. उस ने उन्हें बताया कि विजेंद्र वर्मा शादी का झांसा दे कर उस के साथ लिवइन में रह रहा था. लेकिन अब वह शादी करने के लिए मना कर रहा है. उस ने विजेंद्र के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग की. संयुक्त पुलिस आयुक्त ने निकिता को भरोसा दिया कि इस मामले की जांच कर के उचित काररवाई करेंगे.

विजेंद्र की एक बार फिर से विभागीय जांच शुरू हुई तो वह फिर से परेशान रहने लगा. उस ने निकिता को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी. वह अपनी शिकायत वापस लेने के एवज में उस से 10 लाख रुपए मांग रही थी. यह कोई छोटी रकम नहीं थी, जो वह तुरंत दे देता. इस बारे में विजेंद्र ने अपने घर वालों से बात की. चूंकि निकिता से पीछा छुड़ाना जरूरी था, इसलिए किसी तरह पैसों का इंतजाम कर के उन्होंने 10 लाख रुपए निकिता को दिए और उस का मुंह बंद कर दिया. बताया जाता है कि जिस अखबार में वह नौकरी करती थी, उस के मालिक के खिलाफ भी उस ने छेड़छाड़ की रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

पैसे लेने के बाद भी निकिता विजेंद्र को फिर से ब्लैकमेल करने लगी. वह उस से और पैसों की डिमांड कर रही थी. उस ने धमकी दी कि यदि उस ने बात नहीं मानी तो वह कोर्ट चली जाएगी. यानी उस ने फिर से विजेंद्र को टेंशन दे दी. निकिता विजेंद्र से अब तक कई लाख रुपए ऐंठ चुकी थी. उसे लगने लगा कि निकिता किसी गिरोह के चंगुल में है. गिरोह के लोग उसे मोहरा बना कर खेल खेल रहे हैं. उस के लगातार पैसे मांगने पर विजेंद्र अधिक मानसिक दबाव में आ गया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि इस भंवर से कैसे निकले.

मानसिक तनाव की वजह से वह अपने केसों की तफ्तीश भी ढंग से नहीं कर पा रहा था. काम के प्रति लगातार लापरवाही की वजह उसे अधिकारियों की डांट खानी पड़ती थी. बिना बताए वह कईकई दिनों तक ड्यूटी से गायब रहता था. घटना से पहले भी वह 2 सप्ताह के लिए गायब हो गया था. 16 जनवरी, 2016 को विजेंद्र अपनी ड्यूटी पर वापस आया. उस समय भी वह अधिक तनाव में था. इस तनाव की वजह निकिता ही थी. तनाव जब उस की बरदाश्त की सीमा से बाहर हो गया तो इस के लिए उस ने दूसरा ही रास्ता खोजा.

17 जनवरी को वह फिर थाने पहुंचा. उस ने लूटपाट से जुड़ी तफ्तीश में जाने के लिए थाने से रिवौल्वर लिया. इस के बाद वह निकिता के साथ एक ईरिक्शा से द्वारका सेक्टर-4 स्थित डीडीए पार्क पहुंचा. वहां दोनों एक बैंच पर बैठ कर बातें करने लगे. उसी दौरान उन के बीच पता नहीं ऐसी क्या बात हुई कि उस ने अपने सर्विस रिवौल्वर से निकिता को 4 गोलियां मारीं.

आटोमैटिक रिवौल्वर से उस ने खुद को भी 3 गोलियां मारीं. निकिता की घटनास्थल पर ही मौत हो गई और बाद में विजेंद्र ने भी अस्पताल में दम तोड़ दिया. अभी तक यह पता नहीं चल सका है कि जब विजेंद्र थाने से निकला था तो उस की वर्दी पर उस के नाम की ही प्लेट लगी थी. बाद में उस ने सबइंसपेक्टर संदीप बिश्नोई के नाम की नेमप्लेट क्यों लगाई. संदीप बिश्नोई भी दिल्ली पुलिस में एक सबइंसपेक्टर है और वह विजेंद्र वर्मा का दोस्त था.

विजेंद्र वर्मा तेजतर्रार पुलिस अफसर था. निकिता के प्यार में फंस कर उसे अपनी जान से तो हाथ धोना ही पड़ा, साथ ही अपने और निकिता के घर वालों को बिलखते भी छोड़ना पड़ा. उधर निकिता के पिता शादीराम का कहना है कि उन की बेटी की हत्या एक सुनियोजित योजना के तहत कराई गई है, जिस में मृतक सबइंसपेक्टर के अलावा एक अखबार का मालिक व एक अन्य शख्स शामिल था. उस ने उन सब के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराने की मांग की. बहरहाल पुलिस मामले की तफ्तीश कर रही है.

कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

Crime Story: सिपाही ने किया खुद का अपहरण

Crime Story: दिल्ली पुलिस का सिपाही रविंद्र एक समृद्ध परिवार से था. लेकिन अपनी बुरी लतों की वजह से उस पर लाखों रुपए का कर्ज हो गया. इस कर्ज को अदा करने और सुखसुविधाओं वाली जिंदगी जीने के लिए उस ने अपने अपहरण का जो ड्रामा रचा, उस से आखिर उसे क्या मिला…

किसी पुलिस वाले के साथ कोई वारदात पेश आ जाए तो पूरा पुलिस विभाग बिजली की सी गति से सक्रिय हो जाता है. इस की 2 प्रमुख वजहें होती हैं. एक तो यह कि वह विभाग का आदमी होता है, दूसरे प्रतिष्ठा दांव पर लगने के साथ कानूनव्यवस्था पर भी सवालिया निशान लग जाते हैं. सिपाही रविंद्र के मामले में भी ऐसा ही हुआ था. उस के अपहरण की खबर से पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया था.

उत्तर प्रदेश के कृषि प्रधान जनपद बागपत के एसएसपी रविशंकर छवि ने एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय के निर्देशन में आननफानन में पुलिस टीमों का गठन कर उस की तलाश में लगा दिया था. रविंद्र के अपहरण से न सिर्फ उस के परिवार वाले परेशान थे, बल्कि गांव वाले भी हैरान थे. अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ने के बदले 20 लाख रुपए की फिरौती मांगी थी. सिपाही रविंद्र कुमार जिला बागपत के थाना चांदीनगर के गांव ढिकौली का रहने वाला था. वह दिल्ली पुलिस में था और उस समय दिल्ली के थाना नरेला में तैनात था.

उस का परिवार काफी मजबूत हैसियत और रसूख वाला था. उस के पिता राजकुमार दिल्ली पुलिस से सबइंसपेक्टर सेवानिवृत्त हुए थे. गांव में उन के पास काफी खेतीबाड़ी थी. रविंद्र का एक और भाई था सुधीर, जो गांव में ही रहता था. दिल्ली के थाना नरेला में तैनात रविंद्र, बीचबीच में छुट्टी ले कर घर भी आता रहता था. वह छुट्टी पर घर आया था, तभी 22 फरवरी, 2016 की सुबह रहस्यमय स्थितियों में उस का अपहरण हो गया था. अपहरण की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार पुलिस बल के साथ उस के घर पहुंच गए थे. मामला चूंकि सिपाही के अपहरण का था, इसलिए एएसपी विद्यासागर मिश्र और सीओ श्वेताभ पांडेय भी पहुंच गए थे.

रविंद्र के घर वालों ने पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार रविंद्र सुबह 10 बजे के करीब घर से थोड़ी दूरी पर अपने चचेरे भाई सत्यवीर और पड़ोसी सुकरमपाल से बातें कर रहा था. सत्यवीर और सुकरमपाल अपनेअपने घर चले गए. रविंद्र भी अपने घर की ओर आ रहा था, तभी वह रहस्यमय स्थितियों में गायब हो गया था. वह कहां, किस के साथ गया, इस की किसी को खबर नहीं थी. उस के घर वालों ने सोचा कि वह छुट्टी पर आया है, इसलिए गांव में किसी से मिलने चला गया होगा. लेकिन दोपहर 12 बजे के आसपास सुधीर के मोबाइल पर उस के मोबाइल से फोन आया. सुधीर ने फोन उठा कर पूछा, ‘‘हैलो रविंद्र कहां हो तुम?’’

सुधीर को तब झटका लगा, जब पलभर की खामोशी के बाद दूसरी ओर से रविंद्र के बजाय किसी दूसरे आदमी की आवाज आई, ‘‘रविंद्र हमारे कब्जे में है. अगर तुम उसे सहीसलामत पाना चाहते हो तो बहुत जल्द 20 लाख रुपए का इंतजाम कर लो.’’

यह सुन कर सुधीर के पैरों तले से जमीन खिसक गई. वह सन्न रह गया. उस ने हकलाते हुए कहा, ‘‘अ…अ…आप कौन बोल रहे हैं?’’

‘‘इस बात पर ज्यादा ध्यान मत दो. जितना कहा है, उतना करो.’’ कुछ पल रुक कर फोन करने वाले ने कहा, ‘‘और हां, पुलिस को खबर करने की गलती मत करना, वरना हम रविंद्र को जिंदा नहीं छोड़ेंगे.’’

इतना कह कर फोन करने वाले ने फोन काट दिया. उस ने पलट कर फोन किया तो मोबाइल स्विच्ड औफ हो चुका था. इस से घर वाले घबरा गए. रविंद्र की जान खतरे में थी. अपहर्त्ता उस के साथ कुछ भी कर सकते थे. अपहर्त्ताओं ने पुलिस में न जाने की धमकी दे कर उलझन पैदा कर दी थी. घर वालों ने आपस में विचारविमर्श किया. वे किसी नतीजे पर पहुचं पाते, एक घंटे बाद दोबारा दूसरे नंबर से फोन आया. इस बार उस ने कहा, ‘‘पैसे का इंतजाम जल्द से जल्द करो. पैसा कहां पहुंचाना है, इस के लिए हम दोबारा फोन करेंगे.’’

‘‘रविंद्र को कुछ नहीं होना चाहिए.’’ रविंद्र के घर वालों ने कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर पैसे नहीं मिले और तुम ने पुलिस को खबर कर दी तो हम अपना वादा भूल जाएंगे. फिर वह आप को जिंदा नहीं मिलेगा.’’ अपहर्त्ता ने धमकी भरे लहजे में कह कर फोन काट दिया.

राजकुमार बेटे के अपहरण से बुरी तरह परेशान थे. उन्होंने पुलिस की नौकरी की थी. मामले को छिपाना ठीक नहीं था, इसलिए उन्होंने पुलिस को सूचना दे दी. इस के बाद पुलिस उन के घर पहुंच गई. पुलिस को उम्मीद थी कि अपहर्त्ताओं ने रविंद्र को आसपास कहीं खेतों में छिपा दिया होगा, इसलिए पुलिस ने आसपास के खेतों में उस की तलाश शुरू कर दी. लेकिन इस का कोई नतीजा नहीं निकला. पुलिस ने गांव के अन्य लोगों से इस उम्मीद में पूछताछ की कि कोई सुराग या चश्मदीद मिल जाए. लेकिन इस का भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस बीच थाने में रविंद्र के भाई सुधीर की तहरीर पर अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

पुलिस अधिकारी पसोपेश में थे. इस बात का अंदेशा था कि रविंद्र का अपहरण किसी बड़े गिरोह ने किया होगा. अपहर्त्ता उसे नुकसान भी पहुंचा सकते थे. क्राइम ब्रांच की टीम को भी इस मामले में लगा दिया गया. अगले दिन रविंद्र के अपहरण की खबर अखबारों में छपी तो जिले में सनसनी फैल गई. थानाप्रभारी अमर सिंह पंवार अपने सहयोगियों एसआई सतबीर सिंह भाटी और कर्मवीर सिंह के साथ सुरागरसी में लगे थे. जिस नंबर से अपहर्त्ताओं का फोन आया था, पुलिस ने उस नंबर की जांच की. उस की लोकेशन गाजियाबाद जिले के लोनी इलाके की पाई गई.

तुरंत एक पुलिस टीम गाजियाबाद भेजी गई. पुलिस के साथ रविंद्र के घर वाले और नातेरिश्तेदार भी अपने स्तर से उस की खोजबीन में जुटे थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. दिल्ली पुलिस को भी इस की सूचना दे दी गई थी. अपने सिपाही के अपहरण के बारे में जान कर थाना नरेला पुलिस सन्न रह गई थी. अपहर्त्ताओं ने उस दिन के बाद घर वालों से कोई संपर्क नहीं किया था. इस बात ने पुलिस की चिंता और बढ़ा दी थी. पुलिस रविंद्र की खोजबीन में लगी थी कि एक नाटकीय घटना घट गई. अगले दिन रविंद्र ने शाम को अपने घर वालों को फोन किया कि वह खेकड़ा इलाके में रेलवे स्टेशन के पास है, वे उसे लेने आ जाएं. घर वाले वहां पहुंचे तो रविंद्र डरासहमा खड़ा मिल गया. वे उसे घर ले आए.

इस की सूचना पुलिस को दी गई तो पुलिस उस के घर पहुंच गई. उस की सकुशल रिहाई से घर वाले खुश थे. इस बीच चर्चएं भी चलीं कि घर वाले उसे फिरौती दे कर ले आए हैं. रविंद्र बेहद हताश नजर आ रहा था. पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस ने बताया कि सुबह जब वह घर की ओर जा रहा था, तभी एक कार उस के पास आ कर रुकी. कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे शख्स ने उस की तरफ एक विजिटिंग कार्ड बढ़ा कर कहा, ‘‘भाईसाहब, यह पता बता देंगे?’’

रविंद्र विजिटिंग कार्ड चेहरे के नजदीक ला कर पढ़ने लगा, तभी उसे चक्कर आ गया. बस उतने में ही कार सवार बदमाशों ने उसे खींच कर कार में डाल लिया. रविंद्र के अनुसार, विजिटिंग कार्ड में कोई ऐसा नशीला पदार्थ था, जो सांसों के जरिए शरीर में गया और उसे चक्कर आ गया. बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के उस का मोबाइल छीन लिया. एक बदमाश ने कहा, ‘‘हम ने तुम्हारा अपहरण किया है. अब हम तुम्हें तभी छोडेंगे, जब हमें 20 लाख रुपए मिल जाएंगे.’’

रविंद्र ने पूरी ताकत से विरोध किया, छूटने की भी कोशिश की. इस पर बदमाशों ने उस के साथ मारपीट कर के हथियार तान कर कहा, ‘‘जरा भी चालाकी दिखाई तो तुम्हारा काम तमाम कर देंगे.’’

वे कार से उसे कहीं दूर ले गए और खेत में बांध कर बैठा दिया. इस बीच उन्होंने जबरन उसे नशे की गोलियां खिला कर उसे पानी पिला दिया. बीचबीच में उसे होश आता रहा. वह बुरी तरह आतंकित था. अगले दिन बदमाश आपस में बातें कर रहे थे कि मामला पुलिस तक पहुंच गया है. पुलिस एड़ीचोटी का जोर लगा रही है. इसलिए इसे ज्यादा रखा गया तो खतरा बढ़ सकता है. पुलिस एनकाउंटर के डर से शाम के समय वे उसे कार में डाल कर खेखड़ा कस्बे तक लाए और स्टेशन के पास धकेल कर चले गए.

पुलिस ने रविंद्र से बारीकी से पूछताछ करनी चाही तो उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी तबीयत अभी ठीक नहीं है. मेरे साथ जो हुआ है, मैं उसे भूलना चाहता हूं. मैं ने कभी सोचा भी नहीं था कि बदमाश मेरा ही अपहरण कर लेंगे.’’

पुलिस को लगा कि इस की मनोस्थिति अच्छी नहीं है, लेकिन यह साफ हो गया था कि पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अपहर्त्ताओं ने उसे छोड़ दिया था. रविंद्र भले ही अपहर्त्ताओं के चंगुल से छूट कर आ गया था, लेकिन पुलिस अपहर्त्ताओं तक पहुंचना चाहती थी. अपहर्त्ताओं के नंबर के साथ पुलिस ने अगले दिन रविंद्र के मोबाइल की भी लोकेशन हासिल कर ली. उसे देख कर पुलिस को हैरानी हुई, क्योंकि रविंद्र के मोबाइल की लोकेशन उन स्थानों से नहीं मिल रही थी, जहांजहां उस ने अपहर्त्ताओं द्वारा ले जाने की बात बताई थी.

अपहरण के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के नांगलोई की भी थी. यह बड़ी अजीब बात थी. पुलिस ने उस से गहराई से पूछताछ करनी चाही तो वह कन्नी काटते हुए बोला, ‘‘सर, जो होना था, सो हो गया. जांच करने से क्या फायदा. बदमाशों ने मुझे जिंदा छोड़ दिया, यही बहुत बड़ी बात है, वरना वे मेरी जान भी ले सकते थे.’’

यह बात पुलिस अधिकारियों को अजीब लगी. क्योंकि रविंद्र खुद पुलिस वाला था. वह पुलिस जांच में सहयोग देने से न जाने क्यों कतरा रहा था. इस से पुलिस को दाल में काला नजर आने लगा. लेकिन कोई पुख्ता वजह पुलिस के हाथ नहीं लगी. इस बीच पुलिस को पता चला कि अपहर्त्ताओं ने जिस नंबर से फिरौती के लिए फोन किया था, वह सिमकार्ड दिल्ली के नरेला से खरीदा गया था. जांच को दिशा मिली तो पुलिस सिम बेचने वाले तक पहुंच गई. पुलिस ने सिम बेचने वाले अबरार को हिरासत में ले लिया.

अबरार नरेला का ही रहने वाला था और मोबाइल की दुकान चलाता था. पुलिस ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, सुन कर पुलिस चकरा गई. पता चला कि वह सिम सिपाही रविंद्र ने ही खरीदा था. जांच नाटकीय मोड़ पर आ गई. पुलिस ने 25 फरवरी को रविंद्र को हिरासत में ले लिया. पहले तो वह सिम खरीदने वाली बात से इनकार करता रहा, लेकिन जब पुलिस ने मोबाइल लोकेशन दिखा कर अबरार से उस का सामना कराया तो वह टूट गया. पुलिस ने जब उस से विस्तार से पूछताछ की तो उस ने जो बताया, वह बेहद चौंकाने वाला था.

बुरी लतों के शिकार रविंद्र ने खुद ही अपने अपहरण की ऐसी पटकथा लिखी थी, जिस से वह अपने ही घर वालों से फिरौती के रूप में मोटी रकम वसूल करना चाहता था. दरअसल, रविंद्र महत्वकांक्षी युवक था. उस ने पुलिस की नौकरी जरूर कर ली थी, लेकिन वेतन के रूप में मिलने वाली रकम से वह संतुष्ट नहीं था. वह तमाम सुखसुविधाओं के बीच ऐश की जिंदगी जीना चाहता था. जल्द अमीर बनने की चाहत में वह पुलिस होने के बावजूद जुएसट्टे की लत का शिकार हो गया था. इस तरह की लत इंसान को बर्बादी की ही ओर ले जाती है. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ.

धीरेधीरे वह करीब 5 लाख रुपए का कर्जदार हो गया था. बड़ा झटका तब लगा, जब जनवरी, 2016 के पहले सप्ताह में वह 44 हजार 600 रुपए सट्टे में हार गया. इस से उसे बड़ा झटका लगा. इस बीच एएसआई बनने के लिए वह एग्जाम भी दे चुका था. रविंद्र ने सोचा था कि वहां भी शायद उसे रकम खर्च करनी पडे, जबकि उस के पास कोई जमापूंजी नहीं थी. वह चाहता था कि उस के पास स्विफ्ट डिजायर कार हो. वह चाहता तो सब्र व समय के साथ घर वालों की मदद से उस की ये इच्छाएं पूरी हो सकती थीं, लेकिन सोच फितरती हो जाए तो बेलगाम हो जाती हैं. रविंद्र के साथ भी ऐसा ही हुआ. उस ने सोच लिया कि एक ही झटके में वह अपने सारे सपने पूरे कर लेगा.

कई दिनों की उधेड़बुन के बाद उस ने अपने ही अपहरण का नाटक कर के घर वालों से रुपए वसूलने की योजना बनानी शुरू कर दी. योजना के तहत उस ने अबरार की दुकान से फर्जी पते पर 2 सिमकार्ड खरीद कर एक्टिवेट करा लिए. योजना को अंजाम देने के लिए वह छुट्टी पर घर आ गया. 22 फरवरी की सुबह अपने चचेरे भाई और पड़ोसी से बात करने के बाद वह घर की तरफ चला जरूर, लेकिन उन लोगों के ओझल होते ही चुपचाप गांव से बाहर निकल गया. खेतों के रास्ते से होते हुए उस ने रास्ते से ही आवाज बदल कर अपने मोबाइल से फिरौती के लिए अपने  भाई को फोन कर दिया. आवाज बदलने की वह पहले ही कई दिनों से प्रैक्टिस कर रहा था.

वहां से निकल कर पहले वह लोनी पहुंचा, जहां से नए सिमकार्ड से उस ने एक बार फिर आवाज बदल कर फिरौती की रकम मांगी और धमकाया भी. इस के बाद वह दिल्ली पहुंचा और नांगलोई में रुक गया. रविंद्र को पूरी उम्मीद थी कि उस की जान की कीमत पर घर वाले फिरौती की रकम दे देंगे और उस की धमकी से डर कर पुलिस को सूचना नहीं देंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, घर वालों ने पुलिस को सूचना दे दी. उस ने अगले दिन के अखबार देखे तो अपने अपहरण को ले कर पुलिस की सक्रियता की खबर पढ़ कर उस के होश उड़ गए. इस से उसे अपनी योजना धराशाई होती नजर आई.

वह जानता था कि सर्विलांस के जरिए उस की पोल खुल जाएगी. उस ने अपनी योजना बदल दी. वह नहीं चाहता था कि उस के अपहरण की जांच पुलिस आगे बढ़ाए. उस ने सोचा कि अगर वह सकुशल वापस घर पहुंच जाएगा तो मामला अपने आप ठंडे बस्ते में चला जाएगा. पुलिस जांच को आगे नहीं बढाएगी. इसी सोच के तहत वह अगले दिन खेखड़ा पहुंचा और घर वालों को फोन कर के अपने पास बुला लिया. घर आ कर उस ने पुलिस और घर वालों को मनगढंत कहानी सुना दी. पुलिस बारीकियों में न जाए, इस के लिए उस ने पहले तबीयत खराब होने का बहाना और फिर जांच न करने का आग्रह किया. लेकिन वह अपने ही बुने जाल में उलझ गया. पुलिस ने उस के मोबाइल से वह सिमकार्ड बरामद कर लिया.

पूछताछ के बाद एएसपी विद्यासागर मिश्र ने प्रेसवार्ता कर के उसे पत्रकारों के सामने पेश किया. बाद में रविंद्र और अबरार को अदालत में पेश किया. माननीय अदालत ने दोनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. कथा लिखे जाने तक दोनों जेल में थे. उन की जमानतें नहीं हो सकी थीं. योजना में रविंद्र का कोई साथी तो नहीं शामिल था. पुलिस इस की भी जांच कर रही थी. रविंद्र बुरी लत का शिकार न हुआ होता  और अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखा होता तो आज यह नौबत न आती. बागपत पुलिस की रिपोर्ट के आधार पर दिल्ली पुलिस ने भी उसे सस्पैंड कर दिया था. हालांकि जेल जाने से पूर्व रविंद्र का कहना था कि उस का अपहरण हुआ था और बदमाशों ने ही फिरौती मांगी थी. उस पर लगे आरोप गलत हैं. Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Hindi Stories: हौंसले वाली लड़की

Hindi Stories: इंसान की जिंदगी में यादों का खास महत्व होता है. जो यादें मन को सुकून देती हैं, उन्हें कोई भूलना नहीं चाहता. जबकि कड़वी यादों को इंसान भूल से भी याद नहीं करना चाहता. लेकिन यादों की डोर आदमी के अपने वश में नहीं होती. दिमाग के परदे पर गाहेबगाहे हर तरह की यादें दस्तक देती रहती हैं. तकलीफ तब होती है, जब कड़वी यादें वर्तमान को प्रभावित करने लगती हैं.

एक शाम ऐलिशिया कोजाकीविक्ज अपने कमरे में बैठी थी, अनायास ही पुरानी यादें उस के सुकून पर हावी हो गईं. उस ने उन से पीछा छुड़ाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह उन बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ा सकी. जब मन परेशान  होने लगा तो उस ने उन यादों को मन के द्वार से निकाल कर आंखों की ऊपरी सतह पर लाने की सोची, ताकि डरावने दृश्य शब्द बन जाएं.

ऐलिशिया ने उन बुरी यादों की अखबारी कटिंग काट कर एक फाइल बना ली थी. उस फाइल में केवल बुरी यादों की ही खबरें नहीं थीं, बल्कि उस की तारीफ में छपी कुछ खबरें और रिपोर्ताज भी थे. वह उस फाइल को ले कर टेबल पर बैठ गई और एकएक खबर को उचटती नजरों से देखने लगी. सभी ऐसी खबरें थीं, जिन्हें उस ने सैकड़ों बार पढ़ा था, इसलिए जानीपहचानी थीं. मन की दिशा बदलने के लिए उस ने सतही तौर पर खबरें पढ़ीं तो, लेकिन बुरी यादों के किसी भी चित्र को आंखों के द्वार पर दस्तक नहीं देने दी. ऐलिशिया अभी उन खबरों की फाइल को उलटपुलट ही रही थी कि उस ने अपने कंधे पर हाथ का स्पर्श महसूस किया. उस ने पलट कर देखा, पीछे उस की मां मैरी खड़ी थीं.

ऐलिशिया के चेहरे पर नजर पड़ी तो वह उस की उदासी और परेशानी को भांप कर थोड़ी नाराजगी से बोलीं, ‘‘ऐलिशिया बेबी, तुम फिर उन्हीं बुरी यादों में डूबी हो न? इट इज नौट गुड बेबी. अब तुम उस सब से बहुत दूर आ चुकी हो. भूल कर भी तुम्हें उस सब के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए. इस के बजाय तुम्हें यह सोच कर खुश होना चाहिए कि लोग तुम्हें पसंद करते हैं. बच्चों के लिए तुम एक नेक काम कर रही हो.’’

‘‘सौरी मम्मा, बट…’’

मैरी ने उस की बात को बीच में ही काट कर समझाने वाले अंदाज में कहा, ‘‘कम औन ऐलिशिया, जो बीत गया सो बीत गया. तुम सिर्फ अपने फ्यूचर पर फोकस करो. हमें नाज है तुम पर. अब तुम्हें गुजरे जमाने की बातों को ले कर बिलकुल नहीं सोचना चाहिए. बुरी यादों से पीछा नहीं छुड़ाओगी तो वे तुम्हें परेशान करती रहेंगी. हम अपनी बेटी के चेहरे पर जरा सी भी उदासी नहीं देखना चाहते.’’

‘‘ओके मम्मा, अब ऐसा नहीं होगा.’’ ऐलिशिया ने मुसकरा कर कहा और खड़ी हो कर मां के गले लग गई.

ऐलिशिया कई साल पहले जिस भयानक हादसे से रूबरू हुई थी, वह उस के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ गया था. उस हादसे में उस का दिल ही नहीं, आत्मा तक घायल हुई थी. ऐलिशिया के दिमाग में एक अंजाना सा डर घर कर गया था. परिवार की सहानुभूति, मनोचिकित्सकों के उपचार और खुशनुमा माहौल दे कर जैसेतैसे उस डर को ऐलिशिया के दिमाग से निकाला गया था.

ऐलिशिया ने खुद भी उस डर से उबरने की पूरी कोशिश की थी, लेकिन इस सोच के साथ कि वह कुछ ऐसा करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी दूसरे के साथ न हो. इसी सोच के चलते उस ने अपने साथ हुई भयानक घटना को एक उद्देश्य में बदल दिया. यह सब निस्संदेह आसान नहीं था. लेकिन ऐलिशिया ने मजबूत इरादों के साथ जो मुहिम चलाई, वह काफी हद तक कामयाब रही.

उस की यह मुहिम थी, आधुनिकता की चकाचौंध भरे इस साइबर युग में बच्चों को उन के सिर पर मंडराते खतरों से बचाने की. इस का परिणाम अच्छा ही निकला. जल्दी ही वह बच्चों को जागरूक करने वाली रोल मौडल बन गई. न केवल उस के काम को सराहना मिली, बल्कि सरकार ने उस के नाम पर बच्चों को सुरक्षा देने वाला एक कानून भी बना दिया. ऐलिशिया अब वाकई एक बड़ा नाम है.

ऐलिशिया कमउम्र में जिस घटना का शिकार हुई थी, वह वाकई खौफनाक थी. उस का गुनाह सिर्फ इतना था कि वह इंटरनेट चैटिंग की लत का शिकार थी. भावनाओं में बह कर वह अपनी सोचनेसमझने की क्षमता भी खो बैठी थी. इंटरनेट की सोशल साइट पर एक शख्स पर विश्वास करना उस के लिए बहुत खौफनाक साबित हुआ था.

गनीमत बस इतनी थी कि वह उस शख्स के चंगुल में फंसी होने के बाजवूद जिंदा थी और पुलिस ने वक्त पर पहुंच कर उसे छुड़ा लिया था. ऐलिशिया अमेरिका के पेंसिल्वेनिया राज्य के खूबसूरत शहर पीटर्सबर्ग की रहने वाली थी. उस के पिता चार्ल्स एक समृद्ध कारोबारी थे. परिवार में कुल जमा 4 लोग थे, ऐलिशिया, उस की मां मैरी और एक बड़ा भाई.

घटना के समय ऐलिशिया महज 13 साल की थी. पढ़ाई के दौरान कंप्यूटर इंटरनेट का इस्तेमाल उस की आदत में शुमार था. उस का भाई भी यह सब करता था. ऐलिशिया ने अपने हमउम्र दोस्तों और उन के संपर्क के लोगों से औनलाइन चैटिंग शुरू कर दी. पढ़ाई के बाद उस का ज्यादातर वक्त इसी में बीतता था. कह सकते हैं कि वह इस लत का शिकार हो गई थी. उस के कई दोस्त बने, जिन में एक नया दोस्त स्कौट भी था. स्कौट बातें बनाने में माहिर था. उस की बातों का अंदाज ऐलिशिया को गुदगुदाता था. चैटिंग का दायरा बढ़ा तो ऐलिशिया को अपने नए दोस्त के बारे में बहुत सी बातें पता चलीं. उसे भी वही चीजें पसंद थीं, जो ऐलिशिया को पसंद थीं.

कई बार बच्चों को पता नहीं चलता कि वह स्मार्ट और खूबसूरत हैं. उन्हें तब बहुत खुशी मिलती है, जब कोई दूसरा बताता है कि वे स्मार्ट हैं, सुंदर हैं. ऐलिशिया के साथ भी यही हुआ. स्कौट ने ऐसी बातें कर के कुछ ही दिनों में उस का विश्वास जीत लिया. ऐलिशिया दूसरों पर बहुत जल्द विश्वास करने वाली मासूम लड़की थी. उस का परिवार एकदूसरे के बहुत करीब था. पिता व्यस्त रहते थे, फिर भी परिवार की खुशियों के बीच वक्त जरूर निकाल लेते थे. मैरी दोनों बच्चों को बहुत प्यार करती थीं. बेटी को इंटरनेट पर उलझी देख कर वह उसे अंजान लोगों से सावधान रहने के लिए कहती रहती थीं.

ऐलिशिया का दोस्त स्कौट बहुत दिलचस्प था. उसे गुडमौर्निंग कहने से ले कर गुडनाइट कहने तक वह छोटीछोटी बातों तक का खयाल रखता था. वह कभी भी किसी भी बात पर ऐलिशिया से नाराज नहीं होता था. कभी ऐेलिशिया उस से नाराज हो जाती तो वह उसे मना लेता था. दोनों ही एकदूसरे में दिलचस्पी लेते थे और रोजाना घंटोंघंटों तक चैटिंग करते थे. महीनों तक चली चैटिंग ने दोनों को काफी करीब ला दिया था.

स्कौट के कहने पर ऐलिशिया ने उसे अपनी कई फोटो भेजी थीं. उस के हर फोटो की वह दिल खोल कर तारीफ करता था. इस सब से ऐलिशिया को बहुत खुशी मिलती थी. इस के बावजूद दोनों की कभी मुलाकात नहीं हुई थी. ऐलिशिया ने उसे अपने परिवार के बारे में सारी जानकारियां दे रखी थीं. स्कौट उसे समझाता था कि वह अपनी इस दोस्ती के बारे में किसी को न बताए.

दिसंबर, 2001 में स्कौट ने ऐलिशिया के सामने मिलने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उस ने इनकार कर दिया. इस पर स्कौट ने उस से मीठीमीठी बातें कीं, कसमें दीं, अपनी कई महीनों की दोस्ती का वास्ता दिया. अंतत: किसी तरह वह ऐलिशिया को मनाने में कामयाब हो गया. दोनों ने तय कर लिया कि वे 31 दिसंबर की रात न्यू ईयर पर मिलेंगे. स्कौट ने उसे बताया था कि जिस ब्लौक में उस का घर है, वह वहां से कुछ दूर खड़ा मिल जाएगा. ऐलिशिया इस के लिए तैयार हो गई. उस ने सोशल साइट के उस दोस्त पर पूरा विश्वास कर लिया, जिस से वह पहले कभी नहीं मिली थी. चैटिंग से उपजी भावनाओं और विश्वास ने स्कौट को उस के सपनों का राजकुमार बना दिया था.

31 दिसंबर की रात को न्यू ईयर का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाता है. क्रिसमस के बाद आने वाली 31 दिसंबर की रात अमेरिकियों के लिए तो और भी खास होती है. ऐलिशिया के परिवार के लिए भी वह रात खास थी. लोग नए साल के जश्न की तैयारियों में डूबे थे. छोटीबड़ी इमारतें रोशनी से नहाई हुई थीं.

उस दिन शाम से ही मौसम बेहद सर्द था. रुकरुक कर बर्फ गिर रही थी. ऐलिशिया स्कौट से मिलने की कल्पनाओं में डूबी थी. उस के घर में भी सब खुश थे. सभी ने एकसाथ डिनर किया. 9 बजने वाले थे. ऐलिशिया को सब की नजरों से बच कर घर से निकलना था. उस ने अपनी मां मैरी से कहा, ‘‘मम्मा, आई एम गोईंग. मुझे नींद आ रही है.’’

‘‘ओके, हैप्पी न्यू ईयर बेबी.’’ मां ने प्यार से कहा.

इस के बाद नींद के बहाने ऐलिशिया उन लोगों से अलग हो कर अपने कमरे में चली गई. उम्र के बहाव ने उसे जरूरत से ज्याद चालाक बना दिया था. स्कौट को साढ़े 9, 10 बजे आना था. यह सब गलत था, पर दोस्ती की खातिर वह स्कौट से मिलने के लिए तैयार हो गई थी. साढ़े 9 बजने को आए तो उस ने चुपके से घर का जायजा लिया. घर के सभी लोग डाइनिंग हौल में बैठे टीवी देखने में मशगूल थे. ऐलिशिया चुपके से मुख्य दरवाजा खोल कर घर से बाहर निकल गई.

बाहर बहुत ठंड थी. एकदम सन्नाटा पसरा था. सड़कों पर बर्फ की सफेद चादर बिछी थी. मौसम से लड़ती स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी भी धुंधलाई हुई थी. ऐलिशिया ने ठंड से बचने के लिए जींस, टौप, जैकेट और स्टालर पहन रखा था. ठंड से बचने की कोशिश करते हुए वह सड़क पर चलने लगी. सन्नाटे में उसे केवल अपने पैरों के नीचे बर्फ के कुचलने की आवाज सुनाई पड़ रही थी.

मन ही मन वह डर भी रही थी. डरावनी खामोशी के साए में वह अपने ब्लौक को पार कर के कोने पर पहुंची. तभी उस के दिल ने कहा कि वह गलत कर रही है, उसे वापस चले जाना चाहिए. अपने इस खयाल पर अमल करने के लिए वह मुड़ी, लेकिन तभी उस के कानों में आवाज पड़ी, ‘‘हाय ऐलिशिया, प्लीज कम.’’

ऐलिशिया ने आवाज की दिशा में पलट कर देखा. आवाज सड़क किनारे खड़ी एक कार से आई थी. ड्राइविंग सीट पर एक शख्स बैठा नजर आ रहा था. उस ने सोचा कि वह स्कौट ही होगा, जो सर्द मौसम में कार लिए उस का इंतजार कर रहा है. वह कार की ओर लपकते हुए ड्राइविंग सीट के बगल वाले दरवाजे के नजदीक पहुंची. कार में ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने उस के वहां पहुंचते ही दरवाजा खोल दिया. ऐलिशिया ने झुक कर देखा तो बुरी तरह चौंकी. कार में बैठा शख्स अधेड़ उम्र का व्यक्ति था. निस्संदेह वह उस का दोस्त स्कौट कतई नहीं था. क्योंकि उस की फोटो उस ने इंटरनेट पर मंगा कर कितनी ही बार देखी थी.

ऐलिशिया कुछ सोचसमझ पाती, इस के पहले ही उस व्यक्ति ने उस का बाजू पकड़ कर खींचा और कार की सीट पर बैठा दिया. ऐलिशिया बुरी तरह डर गई. दिमाग जैसे शून्य हो गया. इसी दरम्यान उस व्यक्ति ने फुरती दिखाते हुए एक रस्सी से उस के हाथ बांध दिए. साथ ही गुर्राया भी, ‘‘शोर मत मचाना वरना मार कर पीछे कार की डिक्की में डाल दूंगा.’’

डरीसहमी ऐलिशिया को जान का खतरा सताने लगा. वह समझ गई कि वह बड़े खतरे में फंस गई है. उस व्यक्ति ने तेजी से कार चलानी शुरू कर दी. सड़क पर पड़ी बर्फ को कुचलती हुई कार पूरी रफ्तार से आगे बढ़ रही थी. कार से ऐलिशिया सड़कों पर लगे साइनबोर्ड्स ही देख पा रही थी. वे उस के रोज के जानेपहचाने थे. उस सड़क पर आगे टोलबूथ पड़ने वाला था. ऐलिशिया को वहां बचने की उम्मीद नजर आई, क्योंकि बूथ के अंदर बैठे कर्मचारी बच्चों को बहुत प्यार करते थे. वे उन का हालचाल पूछते थे और कभीकभी टाफियां भी देते थे. ऐलिशिया जब मातापिता के साथ जाती थी तो भी ऐसा ही होता था. वह सोच रही थी कि जब बूथकर्मी उसे सीट पर रोते हुए देखेंगे तो पूछेंगे कि क्या हुआ?

इस के बाद उस अंजान खतरनाक शख्स का भेद खुल जाएगा. वह पुलिस बुला कर उसे आजाद करा लेंगे. कार बूथ पर पहुंची. लेकिन उसे किसी ने नहीं देखा. ठंडे मौसम की वजह से कर्मचारी एक छोटी खिड़की के जरिए ही टोलटैक्स का लेनदेन कर रहा था. कार आगे बढ़ गई. इस के साथ ही ऐलिशिया की उम्मीद भी टूट गई. ऐलिशिया बुरी तरह डरी हुई थी. उसे लग रहा था कि वह शख्स अब कहीं कार रोकेगा, उसे मारेगा और सड़क किनारे फेंक देगा. रास्ते में टेलीफोन बूथ भी था. वह सोच रही थी कि काश वह अपने घर एक फोन कर पाती तो उसे खतरे से आजादी मिल जाती. वह कसमसाती तो वह व्यक्ति गुर्रा कर उसे जान से मारने की धमकियां दोहराता.

करीब 4 घंटे के सफर के बाद कार एक घर के पोर्च में जा कर रुकी. वह व्यक्ति नीचे उतरा. उतरने से पहले वह फिर गुर्राया, ‘‘चुप रहना, वरना अच्छा नहीं होगा.’’

उस ने ताला खोल कर घर का दरवाजा खोला. इस के बाद उस ने ऐलिशिया को खींच कर नीचे उतारा और उसे धकेलते हुए घर में बने बेसमेंट में ले गया. वहां एक ताला लगा दरवाजा था. वह बोला, ‘‘तुम्हारे साथ इतना बुरा होने जा रहा है, जिस के बारे में तुम ने सोचा भी नहीं होगा. अब तुम जितना चीखना चाहो, चीखो.’’

‘‘प्लीज मुझे छोड़ दो.’’ ऐलिशिया गिड़गिड़ाई.

लेकिन तब तक उस ने दरवाजा खोल कर उसे अंदर खींच लिया. वह हैवान उस के साथ क्रूर ढंग से पेश आ रहा था. उस ने ऐलिशिया के कपड़े उतार कर उस के गले में कुत्ते का पट्टा डाल कर उसे जमीन पर खींचा और फिर खींचते हुए ही बिस्तर पर गिरा दिया. इस के बाद उस ने ऐलिशिया के साथ जबरदस्ती की. ऐलिशिया डर, दहशत और दर्द से बेहाल रोती और तड़पती रही. उस की बातों, उस के गिड़गिड़ाने या रोने का उस पर कोई असर नहीं पड़ा. अगले 3 दिनों तक वह उसे मारतापीटता और उस के साथ जबरदस्ती करता रहा. वह उसे खानेपीने के लिए भी बहुत कम देता था. ऐलिशिया के आंसू खत्म हो चुके थे. उसे विश्वास हो गया था कि जब उस हैवान का मन भर जाएगा तो वह उसे मार ही देगा.

ऐलिशिया भावनाओं में किए गए विश्वास पर पछता रही थी. उसे अपने परिवार की याद भी सता रही थी. वह सोच रही थी कि घर वाले उसे जिंदा रहते या मरने के बाद ढूंढ़ ही लेंगे. चौथे दिन शाम को उस हैवान ने कहा, ‘‘मैं तुम्हें मारने वाला था, लेकिन मैं तुम्हें पसंद करने लगा हूं, इसलिए जिंदा रखूंगा. तुम अब सब कुछ भूल कर मेरे साथ रहने की आदत डाल लो.’’

उस आदमी की आंखों में हैवानियत, बातों में कठोरता और चेहरे पर क्रूरता थी. यकीनन वह बेहद खतरनाक किस्म का आदमी था. शाम ढले वह खाना लाने की बात कह कर ऐलिशिया को कमरे में बंद कर के चला गया. प्यार जताने की कोशिश में उस ने ऐलिशिया को पूरी तरह नहीं बांधा था. उस ने बिस्तर पर उसे खुला छोड़ कर बैडरूम के बाहर का ताला लगा दिया था. अलबत्ता जाने से पहले वह उस के हाथ बांधना नहीं भूला था. ऐलिशिया के ऊपरी हिस्से को उस ने बेपर्दा ही रहने दिया था. वह टेलीफोन पर अपने दोस्तों से कहा करता था कि वह जिंदगी के मजे ले रहा है और उन्हें भी मजे करा सकता है. ऐलिशिया को यह डर भी सता रहा था कि वह अपने दोस्तों के सामने उसे शिकार की तरह डाल सकता है.

रात हो चुकी थी. तभी ऐलिशिया ने दरवाजे पर एक साथ कई कदमों की आहट सुनी. वह बुरी तरह डर गई. उस ने सोचा कि वह अपने साथ दोस्तों को लाया होगा. ऐलिशिया बिस्तर से उतर कर बैड के नीचे छिप गई. दरवाजा खुला, उसे बैड के नीचे से कई बूट दिखाई दिए. एक व्यक्ति ने उसे बैड के नीचे से ढूंढ़ निकाला. उस ने कहा, ‘‘बाहर निकल आओ, हम तुम्हें बचाने के लिए आए हैं.’’

डरीसहमी ऐलिशिया बाहर निकली. उस के अर्द्धनग्न बदन पर नजर पड़ते ही सशस्त्र लोगों ने पीठ घुमा ली. उन के हाथों में पिस्तौलें और वर्दी देख कर वह समझ गई कि ये पुलिस वाले हैं. उन में एक महिला पुलिसकर्मी भी थी. उस ने ऐलिशिया के हाथ खोले और सोफे पर पड़ी उस की जैकेट उसे पहनने को दी. उन लोगों के कब्जे में वह हैवान आदमी भी था. उस के हाथों को पीछे कर के हथकडि़यां लगा दी गई थीं, वह कसमसा रहा था.

पुलिस ऐलिशिया को गाड़ी से थाने ले गई. उसे सब से ज्यादा खुशी तब मिली जब उस के मातापिता ने दौड़ कर उसे गले लगा लिया. ऐलिशिया के लिए एक तरह से यह दूसरी जिंदगी थी. नरक से निकल कर मां की बांहों में वह खुद को सुरक्षित महसूस कर रही थी. पुलिस ने उस आदमी से पूछताछ की तो पता चला कि वह एक हैवान की घिनौनी मानसिकता का शिकार हुईर् थी.

पुलिस ने जिस व्यक्ति को पकड़ा था, उस का नाम टैरी था. 38 वर्षीय टैरी वर्जीनिया का रहने वाला था. किशोर उम्र की लड़कियों को ले कर वह विकृत मानसिकता का शिकार था. वह अकेला रहता था और उस में कई बुरी आदतें थीं. इंटरनेट चैटिंग से वह लड़कियों को अपने जाल में उलझाता था और उन के साथ गंदी बातें किया करता था. टैरी ने कई नामों से अपनी आईडी बनाई हुई थी. उस का ज्यादातर वक्त चैटिंग में ही बीतता था. ऐलिशिया को भी उस ने अपने जाल में उलझा लिया था. अपनी उम्र व पहचान छिपा कर वह खुद को उस का हमउम्र लड़का बन कर चैटिंग करता था. उस ने इंटरनेट से एक किशोर के कई फोटो चुरा लिए थे, जिन्हें वह ऐलिशिया को भेजता था.

ऐलिशिया किशोर थी. उस में बहुत ज्यादा समझ नहीं है, यह बात टैरी चंद रोज की चैटिंग में ही समझ गया था. उसे वह आसान शिकार लगी. उस की भावात्मक बातों से वह उस पर विश्वास करने लगी थी. ऐलिशिया जब पूरी तरह भावात्मक रूप से उस के साथ जुड़ गई तो टैरी ने उसे मिलने के लिए तैयार कर लिया. जब वह उस के कब्जे में आ गई तो वह हैवान बन गया. उधर ऐलिशिया का परिवार उस के रहस्यमय तरीके से गायब होने से बुरी तरह परेशान था. किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था. अपने स्तर से उन्होंने उस की बहुत खोजबीन की.

परिवार पर नए साल की खुशियों पर गम और परेशानी की धुंध जम गई थी. पूरी रात की परेशानी और उलझन के बाद चार्ल्स ने ऐलिशिया का फोटो दे कर पुलिस में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी थी. पुलिस सक्रिय हो गई और ऐलिशिया के फोटो व पहचानशुदा इश्तहार जारी कर दिए. कोई नहीं जानता था कि ऐलिशिया कहां चली गई. 2 दिनों बाद एक व्यक्ति ने पुलिस को गुप्त सूचना दी कि उस ने इंटरनेट पर औनलाइन एक व्यक्ति को एक बच्ची का यौनशोषण करते देखा है. वह मुसीबत में थी और बचने के लिए छटपटा रही थी. ऐलिशिया लापता थी, पुलिस उसे खोज रही थी. इस बात से उसे लगा कि वह ऐलिशिया भी हो सकती है. ऐलिशिया न भी होती तो भी यह एक बच्ची के शोषण का गंभीर मामला था.

पुलिस ने उस व्यक्ति से पूछताछ कर के पता किया तो उस ने वह इंटरनेट आईडी लिंक पुलिस को दे दी, जिस पर उस ने लाइव वीडियो देखा था. पुलिस सुरागरसी में जुट गई. पुलिस ने उस आईडी का आईपी ऐड्रेस निकलवाया तो वह टैरी का निकला. पुलिस ने टैरी की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की तो वे पूरी तरह संदिग्ध पाई गईं. एक शाम पुलिस टीम उस के घर तक पहुंच गई. इत्तफाक से टैरी तभी खाना पैक करा कर वापस आया था. उसे कब्जे में ले कर ऐलिशिया को बरामद कर लिया गया. ऐलिशिया को उस के परिवार के सपुर्द कर के टैरी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे जेल भेज दिया गया.

इस घटना के बाद ऐलिशिया को लगने लगा था कि उस के लिए दुनिया में कुछ नहीं बचा है. वह डर का शिकार हो गई थी. दिलोदिमाग पर सिर्फ डर छाया था. बेटी को दर्द से निकालने के लिए उस के मातापिता ने मनोचिकित्सकों का सहारा लिया. खुद भी वह उस का बड़ा सहारा बने. अमूमन ऐसे मामलों में लोग बच्चों को भी दोषी मान लेते हैं, लेकिन चार्ल्स और मैरी ने ऐसा कतई नहीं किया. उन्होंने उसे प्यार से संभाला. लंबे समय के बाद वह स्कूल गई. समय अपनी गति से चलता रहा. ऐलिशिया की कड़वी यादों ने साथ नहीं छोड़ा था. उधर एक साल बाद सन 2003 में अदालत ने टैरी को दोषी पा कर उसे 20 साल कैद की सजा सुनाई.

ऐलिशिया ने पढ़ाई में मन लगाया. अब वह काफी समझदार हो गई थी. वह चाहती थी कि वह बच्चों के लिए ऐसा कुछ करे कि जो उस के साथ हुआ, वह किसी और के साथ न हो. इस के लिए उस ने झिझक छोड़ कर बिना यह सोचे कि लोग क्या कहेंगे, बच्चों को जागरूक करना शुरू किया. उस ने इंटरनेट के खतरों पर सार्वजनिक रूप से बोलना शुरू किया. वह स्कूलों में जाती और अपनी आपबीती बता कर बच्चों को आगाह करती. अभिभावकों, शिक्षकों को भी आगाह करती. वह जानती थी कि इंटरनेट को ले कर ऐसी कोई शिक्षा नहीं दी जाती कि बच्चे इंटरनेट के खतरों से सतर्क रह सकें. अगर उसे भी उदाहरणों के साथ ऐसी शिक्षा दी गई होती, तो शायद वह इस खतरे से बच जाती.

अब वह बच्चों को जागरूक कर के खुद उदाहरण बनना चाहती थी. अपने साथ घटी इस भयानक घटना को उस ने उद्देश्य में बदल दिया. लेकिन पहली बार जब उस ने एक स्कूल में बोलना चाहा तो अपने साथ घटी घटना को पूरी तरह बयान नहीं कर पाई. बस माइक पर खड़ी रोती रही. इस के बावजूद ऐलिशिया ने बच्चों को इंटरनेट के उस जाल से बचाना ही अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया, जिस में वह खुद फंस गई थी. वह चाइल्ड वैलफेयर एक्टीविस्ट बन गई. ऐलिशिया खुद जिस हादसे का शिकार हुई थी, उस में पहचान छिपाने की जरूरत थी. लेकिन ऐलिशिया का मनाना था कि अगर वह ऐसा करेगी तो वे बच्चे खतरे में पड़ जाएंगे, जिन्हें जागरूक कर के वह बचा सकती है.

इस चिंता को उस ने अपने पास नहीं फटकने दिया. मीडिया में ऐलिशिया सुर्खिया बनने लगी. उस के काम की सराहना होती थी. बच्चों के अधिकारों के लिए वह आगे बढ़ कर सरकार तक उन की बात पहुंचाती थी. अब वह अलग किस्म की लड़की बन चुकी थी. ऐलिशिया ने पौइंट पार्क यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया तो उस ने ग्रेजुएशन के लिए फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय का चुनाव किया. इस की 2 वजहें थीं. एक तो इस विषय की गहराई में जा कर वह खुद की बुरी यादों को धुंधला कर सकती थी, दूसरे बच्चों को भी वह मनोवैज्ञानिक ढंग से अपनी बात समझा सकती थी. ऐलिशिया के इंटरनेट सिक्योरिटी और बच्चों के मानवाधिकार संरक्षण की पैरोकारी व लापता बच्चों के लिए किए जा रहे उस के काम को बहुत ख्याति मिली.

धीरेधीरे ऐलिशिया एक बड़ा नाम बन गई. सन 2007 में उस ने नेशनल एसोसिएशन प्रोजेक्ट टू चिल्ड्रेन संस्था के साथ मिल कर सरकार के सामने बच्चों को इंटरनेट के खतरों से बचाने, उन्हें शिकार बनाने वालों के खिलाफ सख्त कानून बनाने तथा बच्चों की तस्करी रोकने का मुद्दा उठा कर पुख्ता कानून बनाने की जरूरत के साथ प्रोजैक्ट रखा. अमेरिकी सरकार ने उस पर गंभीरता से विचार कर के ‘इंटरनेट क्राइम्स अगेंस्ट चाइल्ड टास्क फोर्स’ (आईसीएसी) का गठन किया. उस के साथ घटी घटना को उदाहरण बना कर सरकार ने सन 2008 में ‘ऐलिशियाज लौ’ नाम से बच्चों के संरक्षण देने वाला एक कानून भी बना दिया.

इस कानून को वर्जीनिया, टेक्सास, कैलीफोर्निया, टैनिसी व आईदाहो आदि कई राज्यों में लागू कर दिया गया. ऐलिशिया शेष राज्यों में कानून लागू कराने के लिए प्रयासरत है. ऐलिशिया के प्रयासों से न सिर्फ अब तक अनेक बच्चे खतरों से बचे हैं, बल्कि उस की सक्रियता की बदौलत पुलिस भी कई लापता लड़कियों को खोजने में कामयाब रही है.

ऐलिशिया को शहर, राज्य व राष्ट्रीय स्तर के सेमिनारों और सरकार के बड़े आयोजनों में बुलाया जाता है. वह सब जगह अपनी बात रखती है. उस के काम को हर जगह सराहा जाता है. वह जबतब ‘ऐलिशिया प्रोजैक्ट’ नाम से इंटरनेट सिक्योरिटी और जागरूक करने वाला प्रोग्राम करती रहती है. ‘रेडी चिल्ड्रेन’, ‘सेफ कौंफ्रेंस’ नाम से भी ऐलिशिया समयसमय पर प्रोग्राम करती है. इस समय वह फौरेंसिक मनोविज्ञान विषय से मास्टर डिग्री की पढ़ाई कर रही है. ऐलिशिया का कहना है कि वह जिंदगी भर कोशिश करती रहेगी कि कोई भी किशोर उम्र लड़की उस की तरह धोखे और शोषण का शिकार न हो. Hindi Stories

—कथा पात्र से बातचीत पर आधारित

 

ISIS Terrorist Organization: खौंफ का खलीफा आईएसआईएस

ISIS Terrorist Organization: आईएसआईएस एक दुर्दांत और क्रूर आतंकी संगठन है जो पत्रकारों, मानवाधिकार के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधियों को मौत के घाट उतारते हुए जश्न मनाता है और उस की वीडियो बना कर दुनिया को दिखाता है. इस के बावजूद बहुत से देश उसे आतंक फैलाने के लिए फंडिंग तो कर ही रहे हैं, कट्टरपंथी सोच वाले कितने ही युवा और महिलाएं भी इस संगठन से जुड़ने के लिए लालायित हैं.

पहले पेरिस, एक बार फिर पेरिस, उस के बाद बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स. आईएसआईएस ने यूरोप में पिछले 3 सालों में इस तरह की एक दर्जन से ज्यादा खूनखराबे की घटनाओं को अंजाम दिया है, लेकिन इन 3 आत्मघाती हमलों ने यूरोप के समूचे मनोविज्ञान में ही दहशत बैठा दी है. पिछले दिनों यूरोप के कई अखबारों द्वारा अलगअलग देशों में इस खूंखार संगठन को ले कर जाने गए लोगों के मनोविज्ञान का साझा निष्कर्ष यह था कि आज की तारीख में यूरोप के 60 फीसदी से ज्यादा लोग इस वहशी संगठन से बेहद डरे हुए हैं. वे इस से किस कदर भयग्रस्त हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस का डर उन की हड्डियों तक में समा गया है.

सन 2001 में अलकायदा ने अमेरिका के ट्रेड टावर में हवाई जहाजों को मिसाइल की तरह इस्तेमाल करते हुए जो हमला किया था, उस ने अमेरिकियों के दिलोदिमाग में जबरदस्त खौफ पैदा कर दिया था. तकरीबन वैसा ही खौफ और वैसी ही दहशत इन दिनों यूरोपीय लोगों के दिलोदिमाग में घर किए हुए है. यह दहशत कितनी हौलनाक है, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लंदन के 50 फीसदी से ज्यादा लोग मानते हैं कि सुबह जब वे घर से निकलते हैं तो एक बार सीने में कहीं धक सा कुछ होता है कि क्या शाम को वे सहीसलामत वापस आ पाएंगे?

सवाल है, हथियार, तकनीक, धन और वर्चस्व से लबालब यूरोप जैसे भूखंड में एक जिहादी संगठन ने इस कदर अपना आतंक क्यों मचा रखा है? क्या यह महज संयोग है या फिर खौफ और आतंक कि इस समूची दास्तां में तमाम व्यवस्थित षडयंत्रों का भी गुप्त योगदान है? निश्चित रूप से ऐसा ही है. लेकिन यह सब इतना जटिल है कि आईएसआईएस की शुरू से आखिर तक दास्तां को जाने बिना श्यामश्वेत ढंग से कुछ भी कह देना खतरे से खाली नहीं है. आइए, इस खूंखार संगठन के गठन से ले कर इस के इस भयानक आतंक के सौदागर होने तक के सफर में एक संपूर्ण नजर डालें.

आईएसआईएस कब, कैसे और क्यों बना?

संगठित खौफ के इतिहास में आज तक आईएसआईएस जितना दुर्दांत और मनुष्य को पीड़ा पहुंचाने वाला कोई दूसरा संगठन नहीं हुआ. आईएसआईएस यानी ‘इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया’ नाम से इस संगठन के मौजूदा स्वरूप का गठन अप्रैल, 2013 में हुआ था, लेकिन इस की जड़ें इस से भी एक दशक पुरानी हैं. इब्राहिम अव्वद अल बदरी उर्फ अबु बक्र अल बगदादी इस का मौजूदा मुखिया है, जिसे अब तक के दुनिया के इतिहास का सब से दुर्दांत रक्तपिपासु माना जाता है.

दुनिया के मौजूदा कायदेकानूनों के हिसाब से यह संगठन, जो खुद को इराक और सीरिया के भौगोलिक क्षेत्र को मिला कर इस्लामिक राज्य कहना पसंद करता है, एक अमान्य राज्य तथा इराक एवं सीरिया में सक्रिय जिहादी सुन्नी सैन्य समूह है. अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है ‘अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’ जिस का हिंदी में मतलब है, ‘इराक एवं शाम का इस्लामी राज्य’. शाम सीरिया का प्राचीन नाम है.

लेकिन इस के यही 2 नाम भर नहीं हैं. इस दुर्दांत संगठन के और भी कई नाम हैं. मसलन, आईएसआईएल या दाइश इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड लेवांट. पुराने समय में लेवांट उस इलाके को कहा जाता था, जिस में आज सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन आते हैं. कहने का मतलब यह है कि लेवांट एक ऐसे इलाके के रूप में जाना जाता है, जहां दुनिया के लिखित इतिहास में सब से अधिक खूनी संघर्ष हुए हैं. इस संघर्ष के दायरे में दुनिया के जो मौजूदा देश शामिल रहे हैं, वे हैं—जौर्डन, इजरायल, कुवैत, फिलिस्तीन, लेबनान, साइप्रस तथा दक्षिणी तुर्की के कुछ भाग.

खौफ के पर्याय इस संगठन को इराक और सीरिया के लोग इशारों में ‘दौलत’ अर्थात सरकार भी कहते हैं. यह सशस्त्र तकफीरी सलफी और जेहादी संगठन है. इस का घोषित उद्देश्य इस्लामी शासन व्यवस्था और इस्लामी कानून को लागू करना है. इस आतंकी संगठन के गठन, इस के अस्तित्व में आने, इस की गतिविधियों, लक्ष्यों और कौन से देशों से इस के संपर्क हैं, इस बारे में दुनिया के हर देश के पास एकदूसरे से भिन्न यानी विरोधाभासी सूचनाएं हैं, जो खुद एक रणनीति के तहत इस ने और इस संगठन के मददगारों ने फैलाई हैं.

मसलन कुछ लोगों और देशों का मानना है कि यह संगठन सीरिया में अलकायदा की एक शाखा है, जबकि दूसरे लोगों का कहना है कि यह एक स्वतंत्र संगठन है, जो इस्लामी सरकार के गठन का प्रयास कर रहा है. इसी तरह कुछ अन्य सूचना समूहों और देशों का मानना है कि यह सीरिया सरकार के विरोधियों को विभाजित करने के लिए सीरिया की सरकार और पश्चिमी देशों के षडयंत्रों का सांगठनिक विस्तार है. इस की पुष्टि अमेरिका के एक पुराने जासूस एडवर्ड स्नोडेन के इंटरव्यू से होती है, जो उस ने जुलाई, 2014 में ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स को दिया था. गौरतलब है कि एडवर्ड स्नोडेन सन 2013 तक अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) में था.

सन 2013 में जब उस की सीआईए की नौकरी छूट गई तो वह हांगकांग भाग गया और फिर वहां से रूस. आज भी वह रूस में ही किसी अज्ञात स्थान में छिपा है. स्नोडेन ने अमेरिका की करतूत के बहुत सारे काले चिट्ठे पूरी दुनिया की मीडिया के सामने खोले हैं, जिस से पता चलता है कि कैसे अमेरिका ने ही ओसामा बिन लादेन की तरह खौफ के मौजूदा सौदागर अबू बक्र अल बगदादी को पैदा किया. बहरहाल, स्नोडेन द्वारा तेहरान टाइम्स को दिए गए इंटरव्यू के मुताबिक अमेरिका, ब्रिटेन और इजरायल ने मिल कर बगदादी और उस के संगठन आईएसआईएस को खड़ा किया है.

स्नोडेन ने अपनी इस बातचीत में खुलासा किया था कि वह इजरायल ही था, जिस ने बगदादी को हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी थी. वास्तव में इस पूरे खुफिया षडयंत्र को जिस कोड नाम से अंजाम दिया गया था, वह था ‘बीहाइव’ यानी मधुमक्खी का छत्ता. स्नोडेन के मुताबिक बगदादी और उस के संगठन को खड़ा करने के पीछे अमेरिका और उस के साथी देशों का मकसद था कि इजरायल के आसपास वाले देशों में आतंकवाद की एक ऐसी ताकत खड़ी कर दी जाए, जिस से इजरायल के दुश्मन उस ताकत से लड़ने में ही उलझ कर रह जाएं और इस तरह इजरायल सुरक्षित रहे.

स्नोडेन के मुताबिक, जहां साल भर से ज्यादा समय तक इस काम को अंजाम देने के लिए इजरायल ने बगदादी को अत्याधुनिक हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग दी थी, वहीं खुद अमेरिका ने भारीभरकम आर्थिक सहायता दे कर बगदादी से मिडिल ईस्ट के अपने दुश्मन देशों पर हमला कराया था. वास्तव में इस के पीछे मकसद था कि इस आतंक की दहशत से अमेरिका द्वारा मध्यपूर्व के उन तमाम देशों में भी अपनी सेना की तैनाती थी, जहां फिलहाल वह नहीं है या सन 2012-13 में नहीं था.

यह स्नोडेन का शिगूफा भी हो सकता है, लेकिन जहां तक आईएसआईएस के खौफनाक इतिहास की बात है तो उस की जड़ें हाल के इन सालों से भी कहीं पीछे हैं. वास्तव में इस संगठन के गठन का इतिहास सन 2004 से शुरू होता है. जब खूंखार आतंकवादी अबू मुस्सअब जरकावी ने जमातुत्तवहीद और अल जेहाद नामक संगठनों का गठन किया. जरकावी ओसामा बिन लादेन के नेतृत्व में काम कर चुका था. उस ने ओसामा की मदद से अपने संगठन का इराक में काफी हद तक विस्तार कर लिया था. दरअसल इस संगठन ने इराक में अमेरिका के हमले का बदला लेने की कसम खाई थी.

यही वजह थी कि इस ने इराक के कोनेकोने से नौजवानों को अमेरिकी सैनिकों के विरुद्ध लड़ने के लिए तैयार किया. अपनी आक्रामक अमेरिका विरोधी नीतियों के चलते यह संगठन न सिर्फ बहुत कम समय में ही इराकी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो गया, बल्कि मध्यपूर्व और उस के बाहर के अन्य देशों के युवाओं में भी इस संगठन के प्रति तेजी से झुकाव बढ़ा. सन 2006 में अबू मुस्सअब जरकावी ने अपने एक वीडियो संदेश में अब्दुल्लाह रशीद अल बगदादी के नेतृत्व में मुजाहिदीन परिषद का गठन किया. लेकिन दुर्भाग्य से उसी महीने जरकावी मारा गया, जिस से उस की जगह अबू हमजा अल मुहाजिर को इराक में अलकायदा का मुखिया बना दिया गया.

सन 2006 के अंत तक इराक के और भी कई छोटेछोटे संगठन, जो अमेरिकी हमले के विरोध में छिटपुट मोर्चा संभाले हुए थे, वे सब भी इस से आ मिले और इस तरह इस संगठन का नाम हो गया ‘दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम’, जिस का मतलब हम ऊपर ही बता चुके हैं. इस संगठन का मुखिया अबू उमर अल बगदादी था. संगठन का उद्देश्य बिलकुल साफ था, इराक से अमेरिका को उखाड़ फेंकना और इसलाम की पाबंद सरकार का गठन करना.

कौन है अबू बक्र अल बगदादी?

आज पूरी दुनिया जानना चाहती है कि खौफ का सौदागर अबू बक्र अल बगदादी आखिर है कौन और वह आईएसआईएस का मुखिया कब और कैसे बना? पहले यह जानते हैं कि आखिर ईदी अमीन और हिटलर से भी बड़ा खूंखार तानाशाह अबू बक्र अल बगदादी है कौन? बगदादी का जन्म सन 1971 में इराक के सामर्रा शहर में हुआ था. आज की तारीख में इस के कई नाम हैं जैसे, अल बदरी सामर्राई, अबू दुआ, डाक्टर इब्राहिम, अल कर्रार और अबू बक्र अल बगदादी.

बगदादी एक जमाने में दुनिया के आतंकी नंबर एक रहे ओसामा बिन लादेन की ही तरह बेहद पढ़ालिखा शख्स है. सच बात तो यह है कि वह ओसामा से भी ज्यादा पढ़ालिखा है. उस ने इस्लामिक स्टडीज से डाक्टरेट यानी पीएचडी कर रखी है. बगदादी बगदाद के इस्लामी विज्ञान विश्वविद्यालय से इस्लामी विज्ञान में मास्टर की डिग्री हासिल की है और बाद में यहीं से पीएचडी की डिग्री अर्जित की. बगदादी के पिता अल बदरी हैं. वह भी तकफीरी सलफी विचारधारा को मानते हैं. अबू बक्र बगदादी की कट्टरपंथ में आमद धर्म के प्रचार और उस की विधिवत शिक्षा से हुई. बचपन से ही उस में जेहाद के प्रति झुकाव था. इसीलिए वह इराक के दियाला और सामर्रा में जेहादी पृष्ठभूमि के 2 केंद्रों में से एक के रूप में उभरा.

तमाम जेहादी वेबसाइटों के मुताबिक वह अच्छीखासी आर्थिक और प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि से है. सन 2003 में जब इराक में अमेरिकी सेनाओं ने घुसपैठ की थी, तभी वह अल जेहाद, जो बाद में अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम बना, संगठन के साथ जुड़ गया था. वह बहुत दिलेरी के साथ अमेरिकी फौज से लड़ा था. उसी दौरान लड़ते हुए अमेरिकी फौजों द्वारा पकड़ लिया गया था, जिस की वजह से उसे सन 2005-09 तक दक्षिणी इराक में अमेरिकी सेना द्वारा बनाए गए गिरफ्तार आतंकी कैंप उर्फ बक्का जेल में रखा गया. सन 2009 में उसे अमेरिकी सेना ने छोड़ दिया, लेकिन अमेरिका के प्रति उस के गुस्से और नफरत में कमी नहीं आई.

वह सन 2010 में फिर से पुराने संगठन में ही लौट गया और पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर ढंग से अमेरिकी फौजों पर हमले किए. इस के बाद की कहानी पूरी दुनिया जानती है कि कैसे उस ने खुद को दुनिया भर के मुसलमानों का खलीफा घोषित किया और कैसे इराक व सीरिया के तमाम ऐतिहासिक शहरों को खंडहरों में बदल दिया.

कैसे शुरू हुआ आईएसआईएस के खौफ का सफर?

एक लंबी लड़ाई के बाद अमेरिका इराक को सद्दाम हुसैन के चंगुल से आजाद करा चुका था. मगर इस आजादी को हासिल करने के लिए उसे बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी. एक तरफ जहां इराक अमेरिकी फौजों के बूटों तले रौंदे जाने से तहसनहस हो चुका था, वहीं दूसरी तरफ अमेरिकी सेनाएं भी युद्ध लड़तेलड़ते पस्त हो चुकी थीं. जब अमेरिकी सेनाओं ने सन 2011 में इराक छोड़ा, तब वे इतनी जर्जर हो चुकी थीं कि उन के सामने ही धीरेधीरे सिर उठा रही फिदायीन ताकतों की अमेरिकी फौजों ने एक तरह से अनदेखी कर दी थी. अब तक सद्दाम हुसैन मारा जा चुका था. लेकिन इराक में आतंक का इंफ्रास्ट्रक्चर अब भी मौजूद था.

हालांकि यह बात भी थी कि अमेरिकी सेनाओं के जाने के बाद भी संसाधनों की कमी के चलते बगदादी जैसे आतंकी ज्यादा कुछ नहीं कर पा रहे थे. अब तक उस ने अपने संगठन का नाम आईएसआई यानी इस्लामिक स्टेट औफ इराक रख लिया था. बरबाद बगदाद में बड़े पैमाने पर सद्दाम हुसैन की सेना के ऐसे पुराने सैनिक मौजूद थे, जिन के अंदर गहरे तक ग्लानि और अवसाद था कि वे अमेरिकी फौजों को हरा नहीं पाए. अब तक अमेरिकी फौजें जा चुकी थीं, लेकिन उन की नुमाइंदगी कर रहीं मौजूदा इराकी सेनाओं को भी वे पुराने सिपाही देश के गद्दारों में गिनती कर रहे थे. यही कारण थे कि वे उन के खिलाफ लड़ने को बगदादी के आह्वान पर उस के संगठन आईएसआई से जुड़ गए.

बगदादी ने बड़ी ही खुशी और चतुराई से सद्दाम हुसैन की सेना के इन कमांडरों और सिपाहियों को अपने साथ मिला लिया. इस के बाद उस ने शुरुआती निशाना पुलिस, सेना के दफ्तर, चैक पौइंट्स और भरती दफ्तरों को बनाना शुरू किया. धीरेधीरे उसे सफलताएं मिलने लगीं और उस के लड़ाकों की संख्या कई हजार हो गई.

मगर अब भी बगदादी को इराक में वह कामयाबी नहीं मिल रही थी, जो उस के जेहन में थी. उसे लगा, शायद जर्जर इराक में यह कामयाबी उसे मिलेगी भी नहीं, इसलिए वह थोड़ी निराशा और बड़ी ही चतुराई से इराक छोड़ सीरिया पहुंच गया, जो एक तरह से इराक का पड़ोसी है. सीरिया उन दिनों जबरदस्त गृहयुद्ध की चपेट में था. अलकायदा और फ्री सीरियन आर्मी वहां के 2 सब से बड़े गुट थे, जो सीरियाई राष्ट्रपति असद के विरुद्ध मोर्चा बांधे थे. लेकिन सीरिया में भी घुसते ही उसे कामयाबी नहीं मिल गई. कई सालों तक सीरिया में भी बगदादी का कोई नामलेवा नहीं था.

अलबत्ता उस ने अब तक अपने संगठन का नाम एक बार फिर बदल लिया था और अब की बार वह आईएसआईएस हो चुका था, जोकि अभी तक है. बताने की जरूरत नहीं कि आईएसआईएस का मतलब इस्लामिक स्टेट औफ इराक ऐंड सीरिया था. एक  तरफ जहां बगदादी बड़े मंसूबे बांध कर यहां आया था, वहीं दूसरी तरफ असद की सेनाओं से दोदो हाथ कर रही फ्री सीरियन आर्मी जून, 2013 को अपने खस्ता हालत हो चुकने के चलते पहली बार सामने आई और इस के मुखिया ने दुनिया से अपील की कि उसे हथियार दिए जाएं, वरना असद की फौजें उसे नेस्तनाबूद कर देगी और निर्णायक रूप से वे महज एक महीने के अंदर हार जाएंगे.

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इस अपील के हफ्ते भर के अंदर ही अमेरिका, इजरायल, जौर्डन, टर्की, सऊदी अरब और कतर ने फ्री सीरियन आर्मी को हथियार, पैसे और ट्रेनिंग की मदद देनी शुरू कर दी. इन देशों ने बाकायदा सारे आधुनिक हथियार, एंटी टैंक मिसाइलें, गोलाबारूद, सब कुछ सीरिया पहुंचा दिया. बस यहीं से आईएसआईएस के दिन पलट गए.

दरअसल, हुआ यह कि जो हथियार फ्री सीरियन आर्मी के लिए आ रहे थे, बड़े पैमाने पर उन्हें या तो पहले ही रास्ते में आईएसआईएस के लड़ाकों ने लूट लिया या फ्री सीरियन आर्मी के तमाम कमांडर गुपचुप रूप से आईएसआईएस से जा मिले थे और इस तरह दुनिया भर से आए हथियारों का 90 फीसदी सीरियन आर्मी के पास पहुंचने के बजाय आईएसआईएस के पास पहुंच गए. फ्री सीरियन आर्मी में गहरी निराशा थी, इस का मुख्य कमांडर पहले ही हार की आशंका और हताशा का बयान दे चुका था. नतीजतन बचेखुचे फ्री सीरियन आर्मी के सदस्यों ने आईएसआईएस से लड़ने का इरादा त्याग दिया और ज्यादातर उसी से जा मिले.

अगर कहा जाए उन दिनों तमाम आईएस लड़ाके फ्रीडम फाइटर का नकाब ओढ़ कर हथियार लूटे और अमेरिकी कमांडरों से बेहतरीन ट्रेनिंग हासिल की तो भी गलत नहीं होगा, क्योंकि सीरिया में लड़ रहे संगठन फ्री आर्मी के पीछे अमेरिका की ही ताकत, हथियार और रणनीति रही है. एक बार जब बड़े पैमाने पर आईएसआईएस के पास हथियारों का जखीरा हो गया तो फिर उस ने खौफ का ऐसा कहर बरपाया कि हजारों लोगों को मौत के घाट उतारते हुए महज एक साल के भीतर सीरिया और इराक दोनों ही देशों के एक बड़े हिस्से में कब्जा कर लिया.

इन में इन दोनों देशों के तमाम बड़े शहर भी शामिल थे. इराक में तो आईएसआईएस अब लगातार बगदाद की तरफ कूच कर रहा था. दूसरी तरफ इस ने सीरिया के तमाम प्राचीन शहरों को अपने गोलाबारूद से खंडहरों में बदल दिया था. जून, 2014 से आईएसआईएस की लगातार विजयगाथा में हर रोज कोई न कोई नया पन्ना जुड़ रहा है, जो आज भी बदस्तूर जारी है. आईएसआईएस के आतंकी इराक और सीरिया के तकरीबन आधे से ज्यादा बड़े शहरों में आज की तारीख में कब्जा जमाए हुए हैं और अपनी सरकार चला रहे हैं.

आईएसआईएस ने सीरिया के रक्का, पामयेरा, दियर, इजौर, इसाक्का, एलेप्पो, हम्मास और यारमुक इलाके के तमाम शहरों पर कब्जा कर लिया है. इस ने इराक में भी रमादी, अनबार, तिकरित, मोसुल और फालुजा शहरों को तहसनहस कर दिया है और अब यहां इसी का हुक्म चलता है. मगर सवाल है कि क्या इराक की इस दुर्दशा के लिए यहां का शिया समुदाय दोषी है? एक तरह से देखें तो यही सच है, क्योंकि सद्दाम की मौत के बाद अमेरिका की सरपरस्ती में सन 2006 में यहां एक तथाकथित लोकतांत्रिक सरकार बनी, जिस के मुखिया शिया समुदाय के नूर अल मलीकी थे.

कहते हैं कि इस शिया सरकार ने इराक के सुन्नियों के साथ जबरदस्त भेदभाव किया था. जबकि अमेरिका ने न केवल इस ओर से आंखें मूंदे रखीं, बल्कि कहीं न कहीं इस सब को बढ़ावा भी दिया, ताकि इराक में अल्पसंख्यक मलीकी सरकार पर उस का मजबूत कब्जा बना रहे. इस का नतीजा यह निकला कि आईएसआईएस के पक्ष में इराक के ज्यादातर सुन्नी होते चले गए. कोढ़ में खाज की स्थिति यह हुई कि सन 2011 के बाद राष्ट्रपति ओबामा ने इराक से अपनी फौज वापस बुलाने का फैसला कर लिया. अमेरिकी सेनाओं के चले जाने के बाद हर गुजरते दिन के साथ आईएसआईएस इतना मजबूत होता गया कि इराक सरकार कमजोर होती गई.

आईएसआईएस के लड़ाकों की संख्या इसी बीच 10 हजार से बढ़ कर 1 लाख की संख्या भी पार कर गई है. लेकिन जिस समय आईएसआईएस ताबड़तोड़ खौफ की काररवाहियां कर के ज्यादा से ज्यादा इलाकों में कब्जा जमा रहा था, उस समय इराक की सेना उस से कई गुना ज्यादा संख्या में थी और ज्यादा हथियारों से भी लैस थी, फिर भी आईएसआईएस के लड़ाकों ने इराकी सेना से बड़े पैमाने में उस के टैंक, हेलीकौप्टरों और लड़ाकू विमान छीन लिए.

कैसे फंडिंग जुटाता है आईएसआईएस?

अखबार ग्लोबल न्यूज के मुताबिक आईएसआईएस आतंकी संगठन न सिर्फ दुनिया का सब से खूंखार और क्रूर संगठन है, बल्कि यह खर्च के मामले में भी बहुत शाहाना है. यह दुनिया का सब से धनी आतंकी संगठन है. माना जाता है कि इस के पास 1 हजार अरब डौलर से ज्यादा की संपत्ति है, जिस में से 5 सौ अरब डौलर की संपत्ति तो उस ने इराक के विभिन्न शहरों, बैंकों और तेल कुओं को लूट कर हासिल की है. यह आतंकी संगठन तकरीबन 9 हजार बैरल तेल रोज बेचता है और उस से हर दिन 26 करोड़ रुपए से ज्यादा कमाता है.

जब इराक के मोसुल शहर पर इस ने कब्जा किया था, उन दिनों 7 बैंकों को लूट कर कई करोड़ डौलर अपने खजाने में जमा कर लिए थे. कहते हैं, आईएसआईएस के पास इतना पैसा है कि वह अपने 60 हजार से 90 हजार के बीच लड़ाकों को हर महीने 42 हजार से 50 हजार रुपए महीने की तनख्वाह देता है, जबकि इस में खानापीना, रहना और सैक्स शामिल नहीं होता.

द एक्सप्रैस ट्रिब्यून और न्यूयार्क टाइम्स के हालिया रिपोर्टों के मुताबिक पाकिस्तान, इजिप्ट, जौर्डन, बांग्लादेश, अल्जीरिया, फिलिपींस, इंडोनेशिया, गाजा और लेबनान से न केवल इसे अपने 90 फीसदी लड़ाके मिलते हैं, बल्कि इन देशों से बड़े पैमाने पर हवाला के जरिए फंड भी इसे हासिल होता है. अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुताबिक, 22 देशों से भी ज्यादा के 3 सौ बैंक आईएसआईएस के फंड जुटाने के काम में हाथ बंटाते हैं. इस सब के अलावा आईएसआईएस बडे़ पैमाने पर खुद भी फंड जुटाता है, जिस में एक जरिया है अफगानिस्तान में पैदा होने वाले हेरोइन को अमेरिका और यूरोप के बाजारों में बेचना.

माना जाता है कि आईएसआईएस हर साल तकरीबन 70 अरब रुपए की हेरोइन अकेले अमेरिका के बाजारों में बेच देता है. इस सब के अलावा तमाम मुसलिम देश विशेषकर सुन्नी मुसलमानों वाले देश इस खूंखार संगठन को लड़ने के लिए धन देते हैं. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के मुताबिक आईएसआईएस को फंड देने वाली सरकारों में कतर की सरकार भी शामिल है. हालांकि एडवर्ड स्नोडेन जैसे अमेरिका के भगोड़े जासूसों का तो यह भी कहना है कि एक बड़ी मात्रा में आईएसआईएस को अमेरिका भी फंडिंग करता है. हालांकि अमेरिका इस खुलासे को बकवास बताता है.

आईएसआईएस दुनिया का न सिर्फ पहला ऐसा खूंखार संगठन है, जिस ने तमाम देशों की ताकत को खुलेआम चुनौती दी है, बल्कि यह पहला ऐसा संगठन है, जिस के पास इतना धन है कि वह यूरोप के कई छोटे मगर विकसित देशों की अर्थव्यवस्था से टक्कर लेता है.

निस्संदेह इस की इस भारीभरकम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान खुद उन आत्मघाती आतंकियों का है, जो अपनी जान हर समय हथेली पर रख कर दुनिया भर में आईएसआईएस के खौफ का सिक्का जमाते हैं. मसलन जिस आतंकी ने पेरिस में हमले की अगुवाई की थी (जिस हमले में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे) अकेले इस आतंकी ने 30 हजार यूरो या 32 हजार अमेरिकी डौलर का फंड उन आत्मघाती लड़ाकों के लिए इकट्ठा किया था, जिन्होंने इस हमले को अंजाम दिया था. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि दुनिया का यह खूंखार संगठन क्यों कभी पैसे की दिक्कत महसूस नहीं करता.

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आईएसआईएस का खौफनाक चेहरा आखिर आईएसआईएस के युवा इतने दीवाने क्यों हैं?

एक संगठन, जो हजारों लोगों की मौजूदगी में पिंजरे में जानवरों की तरह बंद कर के बेकसूर पत्रकारों, मानवाधिकारों के लिए काम करने वाली युवतियों और विरोधी संगठनों के सैनिकों पर पैट्रोल छिड़क कर आग लगा देता है और उन के धूधू कर के जलने का सामूहिक उत्सव मनाता है. एक ऐसा संगठन, जो किसी मां के बेटे को ही मजबूर करता हो कि वह अपनी मां का सिर धड़ से अलग कर दे. एक ऐसा संगठन, जो बाकायदा 4-4 कैमरों के सामने इस बर्बरता से विदेशी पत्रकारों की गरदन हलाल करता हो, जैसे बकरे की कुरबानी कर रहा हो.

एक ऐसा संगठन, जो ज्ञानविज्ञान की हजारों किताबों को यह कह कर जला देता हो कि ये युवाओं को इसलाम से विमुख कर रही हैं. सवाल है, ऐसे क्रूर और खौफनाक संगठन में शामिल होने के लिए दुनिया भर से युवक और युवतियां भागे क्यों चले आते हैं? ट्यूनीशिया के गृहमंत्री लोफी बेन जेडौअ के मुताबिक तो उन के देश से हजारों युवतियां सीरिया में विद्रोह की कमान संभाले लड़ाकों को सैक्स सुख देने के लिए तथा उन के साथ कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के लिए चोरीछिपे देश से भाग रही हैं. ट्यूनीशिया के गृहमंत्री इसे ‘सैक्स जिहाद’ की संज्ञा देते हैं और उन के मुताबिक इसे चला रही हैं खुद ट्यूनीशिया की युवतियां.

यह बात संसद के भीतर कही गई है, जिस से इस की गंभीरता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. बेन के मुताबिक, ‘ये औरतें 20, 30 या 100 के करीब विद्रोहियों के साथ सैक्सुअल रिलेशनशिप बनाती हैं. वे इसे जिहाद-अल-निकाह (सैसुअल होली वार) की संज्ञा देते हैं और प्रैग्नेंट हो कर घर लौट आती हैं.’ इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस संगठन के प्रति युवाओं में चाहे वे लड़कियां हों या लड़के, एक अजीब किस्म की दीवानगी है. पिछले 3 सालों में हिंदुस्तान से भी कई दर्जन युवक चोरीछिपे इस में हिस्सा लेने के लिए जा चुके हैं, जिन में से कइयों को एयरपोर्ट से वापस किया गया है तो कइयों के शहीद होने की खबरें ही लौट कर आई हैं.

जबकि यह संगठन अपने लड़ाकों से भी क्रूरता बरतने में पीछे नहीं रहता. अगर इसे अंदाजा हो गया कि कोई लड़ाका छोड़ कर भागने की फिराक में है तो यह संगठन बहुत नृशंसता से उस लड़ाके को बाकी तमाम लड़ाकों के सामने मौत के घाट उतार देता है, जिस से कि बाकी लड़ाके खौफ से भर जाएं और कभी वापस जाने का साहस न कर सकें.

यह संगठन लड़कियों के साथ तो और भी ज्यादा क्रूर है. यह संगठन लड़कियों को 7 से 9 साल की उम्र में भी शादी को मंजूरी देता है और 16 साल तक में हर हाल में शादी करने की हिदायत देता है. यह संगठन खुलेआम अपने लड़ाकों को सैक्स के लिए महिलाओं की मांग करता है और साफ चेतावनी देता है कि अगर उस की बात अनसुनी की गई तो खैर नहीं. यह हैरानी की ही बात है कि इस के बावजूद इस अमानवीय और बर्बर संगठन के प्रति लड़कियां और लड़के खिंचे चले आते हैं. सवाल है कि आखिर क्यों? उन में इस के लिए इतनी दीवानगी क्यों है?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जो सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं, पूरी दुनिया के समाजशास्त्रियों और सरकारों को भी परेशान कर रहे हैं. दि इंस्टीट्यूट फौर स्ट्रैटजिक डायलौग की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया या इराक जाने वाले करीब 3 हजार यूरोपीय युवाओं में 5 सौ से ज्यादा युवतियां शामिल हैं. कुछ तो किशोर उम्र की और कुछ भले ही अपवाद के तौर पर हों, मगर 50 साल के पार की प्रौढ़ महिलाएं भी हैं.

‘बिकमिंग मुलान’ नामक इस रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये तमाम महिलाएं फिर चाहे वे जिस उम्र समूह से रिश्ता रखती हों, इस बात से प्रभावित होती हैं कि मुसलमानों के लिए नए इलाके का निर्माण हो रहा है. एक नई दुनिया, जहां किसी और के लिए कोई जगह नहीं होगी. यहां तक कि मुसलमानों में भी गैरसुन्नियों के लिए भी नहीं.

इसीलिए तमाम सुखसुविधाओं में पलीबढ़ी पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और इंग्लैंड की लड़कियां भी रोमांचित हो कर इस सपने वाले देश या भूखंड की तरफ कूच कर रही हैं. जाहिर है, वे उस सपने का हिस्सा होना चाहती हैं. यहां तक कि युद्ध के मोर्चे पर डंट कर भी और लड़ाकों के लिए सेज में बिछ कर भी. सवाल है, क्या ये युवा, खासकर लड़कियां दिमागी रूप से बीमार हैं? समाजशास्त्रियों की मानें तो हां, कुछकुछ ऐसा ही है. इन में से कई युवाओं का व्यक्तित्व कई हिस्सों में बंटा सा लगता है, विशेषकर युवतियों का. ऐसी कुछ महिलाओं, जिन के बारे में माना जाता है कि वे इस वक्त सीरिया या इराक में हैं, के ट्विटर या फेसबुक एकाउंट को देखने पर भी यह बात साफ प्रतीत होती है.

क्योंकि ये महिलाएं जहां एक पल को किसी फिल्म से संबंधित कोई बात कहती हैं या अपने पालतू कुत्ते के बच्चे के साथ अपनी वाल पर तसवीर लगाती हैं, वहीं दूसरे ही पल वे किसी सार्वजनिक जगह पर आईएस के लड़ाकों की किसी का सिर काटते या नृशंसता से पेश आने वाली तसवीरें पोस्ट कर रही होती हैं. सवाल है, आखिर ये महिलाएं ऐसा क्यों कर रही हैं? बहुचर्चित हो रही बिकमिंग मुलान रिपोर्ट के मुताबिक वास्तव में ये महिलाएं भी वही चाहती हैं, जो इन दिनों आईएसआईएस की तरफ आकर्षित दुनिया भर के खासतौर पर पश्चिम के युवा मुसलिम चाहते हैं या कहें जिन बातों से मुसलिम युवक प्रेरित हैं, उन्हीं से महिलाएं भी प्रेरित हैं.

मुसलिम युवाओं की तरह ही ये मुसलिम महिलाएं भी आईएसआईएस की तरफ खलीफा के शासन की स्थापना, पश्चिम से नफरत, पहचान की तलाश जैसे वैचारिक कारणों से प्रेरित हैं. आईएस के आतंकियों के उन के कब्जे वाले इलाके में, ऐसे ही अफगानिस्तान या बाल्कन में सक्रिय कट्टरपंथियों से इसलिए भूमिका बिलकुल अलग है, क्योंकि आईएस के आतंकी यहां एक राष्ट्र का निर्माण करना चाह रहे हैं. इसलिए यहां स्थानीयता के साथ कोई टकराव नहीं है.

इसीलिए ये गतिविधियां आतंक के मनोविज्ञान से ऊपर उठ कर एक ‘राष्ट्र निर्माण’ की प्रक्रिया का हिस्सा हो जाती हैं. इसीलिए इस में भाग लेते हुए महिलाएं भी इतिहास रचने वालों में शामिल होना चाहती हैं. फिर चाहे भले ही लड़ाकों के लिए सैक्स परोस कर या उन के लिए घर की देखरेख कर के ही क्यों न ये संभव हो. सच तो यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपनी भूमिका घर की देखरेख करने वाले के तौर पर ही देख रही हैं. इसीलिए ये महिलाएं जेहादियों को अपने पति के रूप में चुन रही हैं. कुछ महिलाओं के सोशल मीडिया एकाउंट के अनुसार, जिहादी लड़ाके से शादी करने पर उन्हें घर इत्यादि की सुविधाएं मिलती हैं यानी इस उन्माद में आर्थिक असुरक्षा भी एक कारण है.

इन महिलाओं की मंशा को उजागर करने वाली कई वेबसाइटों के मुताबिक सीरिया में होने का दावा करने वाले कुछ लोग ‘खलीफा के राज्य’ में शादी की संभावना से जुड़े सवालों का जवाब देते हैं. हालांकि इन में से कई शादियां ज्यादा समय तक नहीं चलतीं, क्योंकि उन के पति लड़ाई में मारे जाते हैं. ऐसे में ये महिलाएं ट्विटर पर अपने पतियों के शहीद हो जाने की घोषणा करती हैं. आईएस से तेजी से जुड़ रही ये महिलाएं एक मामले में पुरुषों से काफी हद तक अलग हैं. इन में से ज्यादातर ने इस्लाम में धर्मांतरण  किया है यानी ये जन्म से मुसलमान नहीं थीं. इसलिए ये इस्लाम से बहुत गहरे तक वाकिफ भी नहीं हैं. शायद यही इस सवाल का जवाब भी है कि कमउम्र की लड़कियां ऐसा माहौल क्यों स्वीकार करना चाहती हैं?

असली सवाल इन के इस्लाम की ओर झुकाव का है. आईएस की तरफ तीव्रता से आकर्षित हो रही ज्यादातर लड़कियों की उम्र 18 से 25 साल के बीच है. इस्लाम ग्रहण करने वाली इन ज्यादातर लड़कियों को इस्लाम धर्म के बारे में बिलकुल भी पता नहीं होता. वास्तव में उन्होंने इंटरनेट पर इस के बारे में सर्च किया होता है, जैसा आम लोग करते हैं.

उन्होंने यूट्यूब पर ऐसे वीडियो देखे होते हैं, जिन में अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए होते हैं. धर्म के बारे में जानने के लिए उन के पास यही एक आधुनिक और आसान रास्ता होता है. ऐसी लड़कियां न कभी मसजिद गई होती हैं, न किसी लाइब्रेरी. वे सौ प्रतिशत यूट्यूब, गूगल, सोशल मीडिया पर निर्भर होती हैं. इसीलिए ये इस्लाम की संवेदनशीलता से परिचित नहीं होतीं. ऐसे में ये अपना भी नुकसान करती हैं और इस्लाम को भी बदनाम करती हैं. ISIS Terrorist Organization

 

Hindi Stories: खामियों के बावजूद लहराया परचम

Hindi Stories: लक्ष्य को ध्यान में रख कर अगर मजबूत इरादों के साथ काम किया जाए तो विकलांगता भी बौनी साबित होती है, देखने और सुनने में अक्षम मनीराम शर्मा ने आईएएस अफसर और नेत्रहीन ब्रह्मानंद शर्मा ने जज बन कर यही कर दिखाया.

कहते हैं, आदमी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है. अगर वह ठान ले तो कोई भी काम उस के लिए मुश्किल नहीं है. जिन लोगों ने अपनी कमी और कमजोरी को हथियार बना कर मेहनत की, उन्होंने कामयाबी की मंजिल निश्चित रूप से हासिल की. ऐसे अनेक लोगों की कामयाबी के किस्सेकहानियां हमें सुनने को मिलते रहते हैं. जो देख नहीं सकते, सुन नहीं सकते या बोल नहीं सकते थे. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और मन की आवाज को सुनी, जुनून के साथसाथ तब तक पीछे मुड़ कर नहीं देखा, जब तक उन्होंने कामयाबी हासिल नहीं कर ली.

ऐसे दिव्यांग लोगों ने अपनी शारीरिक कमियों को अपनी पढ़ाई या दूसरी विधा पर हावी नहीं होने दिया. अपनी जिद और जज्बे से दुनिया में कामयाबी की कहानी लिखी. शारीरिक रूप से विकलांग ऐसे ही कुछ लोगों की सफलता की कहानी यहां पेश है, जो आज हीरो बन कर समाज को एक नई दिशा दे रहे हैं. सब से पहले हम भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारी मनीराम शर्मा के बारे में बताना चाहेंगे. वह इस समय हरियाणा के मेवात के नूंह जिले में जिला परिषद में मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पद पर तैनात हैं. राजस्थान के जिला अलवर की तहसील कठूमर के बदनगढ़ी गांव के रहने वाले मनीराम शर्मा जन्म से ही न तो पूरी तरह बोल सकते थे और न पूरी तरह सुन सकते थे. उन के पिता मजदूरी करते थे और मां बधिर थीं. पूरा परिवार अनपढ़ था.

घर की आर्थिक स्थिति भी बेहद कमजोर थी. गुजरबसर मुश्किल से होती थी. ऐसे में बच्चे का इलाज कैसे होता? इलाज न होने से 9 साल की उम्र में मनीराम की सुनने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई, लेकिन उन में पढ़ने की ललक थी. पढ़ाई के लिए उन्होंने तमाम पापड़ बेले. बदनगढ़ी गांव काफी पिछड़ा था, वहां कोई स्कूल नहीं था. आज भी इस गांव में कोई सरकारी स्कूल नहीं है. मनीराम पढ़ने के लिए 3 किलोमीटर पैदल चल कर या कभी किसी की साइकिल पर बैठ कर पास के गांव अखैगढ़ जाते थे. बाद में खेड़ली कस्बे में पढ़ने जाने लगे.

स्कूल के कुछ बच्चे उन के गूंगाबहरा होने का मजाक उड़ाते थे. लेकिन उन्होंने उन की बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया. अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाए रहा. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने सन 1990 में दसवीं की परीक्षा न सिर्फ अच्छे अंकों से पास की, बल्कि प्रदेश में उन की पांचवीं रैंक आई. स्कूल में साथी विद्यार्थी और अध्यापक जो उन्हें गूंगाबहरा कहते थे, इस के बाद उन्होंने उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया. अच्छे अंकों से दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद मनीराम के पिता ने सोचा कि बेटे को कहीं चपरासी की नौकरी ही मिल जाए तो अच्छा रहेगा. चार पैसे मिलेंगे तो घर के हालात में कुछ तो सुधार होगा.

यही सोच कर वह मनीराम को अपने परिचित एक खंड विकास अधिकारी (बीडीओ) के पास ले गए. उन्होंने उन से कहा, ‘‘साहब, बेटा बड़े अच्छे नंबरों से पास हुआ है. इसे कहीं चपरासी ही लगवा दो.’’

बीडीओ को जब पता चला कि मनीराम बोल और सुन नहीं सकता तो उन्होंने कहा, ‘‘यह न तो बोल सकता है और न ही सुन सकता है. ऐसे में इसे कैसे नौकरी पर रखा जा सकता है?’’

बीडीओ की बात सुन कर मनीराम के पिता की आंखों में आंसू आ गए. बापबेटे बीडीओ के औफिस से अपना सा मुंह ले कर लौट आए. घर आ कर मनीराम ने पिता को अपने इशारों से भरोसा रखने को कहा. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वह अपनी विकलांगता को सीढ़ी बना कर सफलता का मुकाम हासिल करेंगे. इस के बाद वह जीजान लगा कर पढ़ाई करने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि उन्होंने बारहवीं कक्षा में पूरे प्रदेश में सातवीं रैंक हासिल की. बाद में उन्होंने बीए औनर्स में राजस्थान विश्वविद्यालय में टौप किया और गोल्ड मैडलिस्ट बने. ग्रैजुएट होने के बाद उन्होंने सरकारी नौकरी पाने के प्रयास शुरू किए.

राजस्थान लोक सेवा आयोग (आरपीएससी) की परीक्षा दी. पहली परीक्षा में ही वह पास हो गए. तब उन्हें अलवर जिले के गंडाला गांव के राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में नौकरी मिली. मनीराम के परिवार में इस से पहले कोई सरकारी नौकरी में नहीं रहा था, इसलिए उन के लिए यही सब से बड़ी नौकरी थी. मनीराम भले ही सरकारी नौकरी पा गए थे, लेकिन उन के सपनों की उड़ान अभी थमी नहीं थी. स्कूल की नौकरी करते हुए उन्होंने पढ़ाई जारी रखी और राजनीति विज्ञान से प्राइवेट एमए किया. इस के बाद परीक्षा पास कर के वह राजकीय महाविद्यालय में राजनीति विज्ञान के व्याख्याता बन गए. हालांकि कि उन्हें अब पहले से ज्यादा तनख्वाह मिलने लगी थी, लेकिन वह अभी संतुष्ट नहीं थे.

वह प्रशासनिक सेवा की तैयारी में जुट गए. इस के लिए वह अथक परिश्रम करने लगे, जिस की बदौलत उन्होंने सन 2001 में राजस्थान लोक सेवा आयोग की राजस्थान प्रशासनिक सेवा की एलाइड परीक्षा पास की. इस के बाद देवस्थान विभाग में निरीक्षक के पद पर भरतपुर में उन की नियुक्ति हुई. इस बीच उन्होंने एमफिल, नेट, जेआरएफ करने के साथ पीएचडी भी कर ली थी. बाबू से अफसर बनने के बाद भी मनीराम चैन से नहीं बैठे. उन्हें अपनी मंजिल आगे नजर आ रही थी. हर शिक्षित युवा की तरह मनीराम का सपना भी आईएएस औफिसर बनने का था. नौकरी करते हुए वह संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करने लगे.

उन्होंने सन 2005 में पहली बार यह परीक्षा दी और पहली बार में ही उन्होंने यह परीक्षा पास कर ली. पूरे देश में उन की 27वीं रैंक आई. वह बहुत खुश हुए. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन यह खुशियां ज्यादा दिनों की नहीं रहीं. आईएएस परीक्षा का परिणाम आने के कुछ दिनों बाद सरकार ने उन्हें सौ फीसदी डीफनेस (बहरेपन) की वजह से रिजैक्ट कर दिया. रिजैक्ट होने से मनीराम उदास हो गए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बल्कि दोगुने उत्साह से फिर आईएएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. सन 2006 में उन्होंने फिर आईएएस परीक्षा पास की. अफसरों ने इस बार भी उन्हें डीफनेस के कारण मैडिकल ग्राउंड पर अनफिट घोषित कर दिया.

मनीराम को फिर झटका लगा. उन का बहरापन उन की आईएएस की नौकरी में आड़े आ रहा था. जबकि वह हर हाल में आईएएस की नौकरी करना चाहते थे. यह तभी संभव था, जब उन के कान का इलाज हो यानी कान का औपरेशन. इस औपरेशन में कई लाख रुपए का खर्चा था और उन के पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे. अब तक लोग मीडिया द्वारा इस विलक्षण प्रतिभा के बारे में जान चुके थे. मीडिया में खबरें छपने पर लोगों ने उन के इलाज के लिए पैसे देने शुरू कर दिए.

इस अभियान में 8 लाख रुपए इकट्ठा हुए. इस धनराशि से जून, 2007 में उन के कान का औपरेशन कराया गया. औपरेशन के बाद उन्हें आंशिक रूप से सुनाई देने लगा. डाक्टरों के प्रयास से मनीराम ने बुदबुदा कर थोड़ाबहुत बोलना भी शुरू कर दिया. इस के बाद मनीराम शर्मा ने सन 2009 में तीसरी बार आईएएस की परीक्षा पास की. मैडिकल बोर्ड ने उन की जांच की. उन की विलक्षण लिप रीडिंग देख कर सारे अधिकारी दंग रह गए. मैडिकल जांच की मशीनें उन के सौ फीसदी बहरेपन की पुष्टि कर रही थीं. लेकिन उन की कार्यशैली बता रही थी कि बहरापन आंशिक है.

मैडिकल बोर्ड ने शर्मा को आंशिक डीफनेस का प्रमाणपत्र दे दिया. आंशिक डीफनेस के कारण इस बार भी आईएएस की नौकरी मिलने में तमाम तरह की अड़चनें आईं. काफी भागदौड़ के बाद प्रधानमंत्री औफिस की पहल पर मनीराम को आईएएस की नौकरी के योग्य माना गया. इस तरह बधिर होने वाले वह देश के पहले आईएएस बने. मनीराम को मणिपुर त्रिपुरा कैडर मिला. मणिपुर के तमेंगलोंग तथा चुरा चांदपुर में मनीराम शर्मा ने असिस्टैंट कमिश्नर ऐंड सब डिवीजनल मजिस्ट्रैट के पद पर करीब 5 सालों तक नौकरी की.

उस के बाद जनवरी, 2015 में केंद्रीय कैबिनेट की अपौइंटमेंट कमेटी ने उन के कैडर बदलने को स्वीकृति दे दी. कैडर बदलने पर मनीराम हरियाणा आ गए. हरियाणा सरकार ने उन्हें सब से पहले एडिशनल डिप्टी कमिश्नर एंड डिस्ट्रिक्ट रूरल डैवलपमेंट अथौरिटी का चीफ एक्जीक्यूटिव औफिसर नियुक्त किया. मनीराम शर्मा का कहना है कि बहरापन उन के परिवार में वंशानुगत है. उन की नानी बहरी थीं. नानी के कारण मां और मामा भी बहरे थे. उन के भाईबहन भी बहरे हैं. उन का बेटा भी बहरा था. नानी से चले आ रहे बहरेपन के कारण परिवार में 35 लोग बहरे हैं. लेकिन मनीराम ने अपनी इस कमी को दरकिनार कर हिम्मत और हौसलों के जरिए एक प्रेरणादायक इतिहास रच दिया.

हम आगे बात करते हैं, राजस्थान के पहले दृष्टिहीन जज ब्रह्मानंद शर्मा की. नियति भले ही किसी को कमजोर कर दे, लेकिन मन और हौसला मजबूत हो तो किसी को भी मनचाही ऊंचाई छूने से नहीं रोका जा सकता. अपनी कमजोरी को ताकत बना कर आगे बढ़ने वाले ही सफलता की मंजिल हासिल करते हैं. राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के मोटरास गांव के रहने वाले ब्रह्मानंद शर्मा ऐसी ही शख्सियत हैं. उन्होंने इसी साल 11 जनवरी को चित्तौड़गढ़ में अतिरिक्त सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रैट का पद संभाला है. दृष्टिहीनता को मात दे कर वह अब न्यायिक क्षेत्र जैसी महत्त्वपूर्ण सेवा में चयनित हो कर लोगों के लिए न्याय की ज्योति जला रहे हैं. वह राजस्थान न्यायिक सेवा के पहले दृष्टिहीन मजिस्ट्रैट हैं.

ब्रह्मानंद शर्मा जन्म से दृष्टिहीन नहीं थे. वह पहले भलेचंगे थे. उन की नेत्र ज्योति भी ठीक थी. उन के सामने किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने बचपन से ही न्यायाधीश बनने का सपना देखा था. स्कूल और कालेज की पढ़ाई के दौरान वह विभिन्न अदालतों के फैसलों की कतरनें घर ला कर उन का अध्ययन किया करते थे. पिता के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद घर में कुछ आर्थिक परेशानी हुई तो ब्रह्मानंद ने पढ़ाई पूरी कर के सरकारी नौकरी की कोशिश शुरू कर दी. परिणामस्वरूप सन 1996 में राजस्थान के सार्वजनिक निर्माण विभाग में उन्हें कनिष्ठ लिपिक की नौकरी मिल गई.

उन की पहली पोस्टिंग उन के गृह जनपद भीलवाड़ा में हुई.  लेकिन अपनी इस नौकरी से वह संतुष्ट नहीं थे. उन का सपना मजिस्ट्रैट बनने का था. अपने इसी सपने को पूरा करने के लिए वह दोगुने उत्साह से जुट गए. इसी बीच कुछ कारणों से उन की आंखों का रेटिना कमजोर होता चला गया, जिस से उन की आंखों की रोशनी कम होती चली गई. आंखों से कम दिखाई देने के कारण उन्हें कामकाज के साथ पढ़ाई करने में परेशानी होने लगी. उन्होंने अपना बहुत इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उसी बीच उन्हें तेज बुखार आया. कई दिनों तक बुखार रहने के कारण उन की आंखों की रौशनी पूरी तरह से चली गई. बुखार तो उतर गया, लेकिन उन की आंखों की रौशनी वापस नहीं आ सकी.

आंखों से दिखना बंद होने से ब्रह्मानंद शर्मा की जिंदगी में ही अंधेरा छा गया. उन्हें अपने सपने मिट्टी में मिलते नजर आने लगे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उन्हें न्यायाधीश बनना है तो बनना है. इस के लिए कानून की पढ़ाई करनी जरूरी थी. उन्होंने एक लौ कालेज में दाखिला ले लिया. चूंकि वह देख नहीं सकते थे, इसलिए अपनी पत्नी और भतीजे की आवाज में कोर्स को रिकौर्ड करवा कर उसे रात में सुनते थे. इसी तरह उन्होंने अपनी कानून की पढ़ाई पूरी की. इस के बाद उन्होंने पहली बार सन 2008 में राजस्थान न्यायिक सेवा (आरजेएस) की परीक्षा दी, लेकिन इस परीक्षा में वह सफल नहीं हो सके.

उन्हें भीलवाड़ा में पढ़ाई के पूरे संसाधन नहीं मिल रहे थे, इसलिए वह जयपुर आ गए. जयपुर में आरजेएस परीक्षा की कोचिंग करने के लिए जब वह एक कोचिंग सेंटर में गए तो दृष्टिहीन होने की वजह से संचालक ने कहा कि वह एडमिशन ले कर क्या करेंगे, घर जाएं, अपना पैसा और समय क्यों बर्बाद कर रहे हैं? ब्रह्मानंद शर्मा ने उस से एक मौका देने को कहा. उन का हौसला और जज्बा देख कर कोचिंग संचालक ने कहा, ‘‘एक घंटे में सेक्शन 144 याद कर के आओ, उस के बाद तुम्हारे एडमिशन के बारे में सोचेंगे.’’

ब्रह्मानंद शर्मा ने कोचिंग के बाहर ही भतीजे से सेक्शन 144 सुना और करीब 1 घंटे बाद उन्होंने उसे संचालक को ज्यों का त्यों सुना दिया. उन की बुद्धि को देख कर कोचिंग सेंटर का संचालक हैरान रह गया. इस के बाद उन्हें कोचिंग में दाखिला मिल गया. इस बीच ब्रह्मानंद शर्मा ने राजस्थान न्यायिक सेवा भर्ती परीक्षा 2011 के लिए आवेदन कर दिया और जीजान से परीक्षा की तैयारी में जुट गए. उन की मेहनत रंग लाई और परीक्षा परिणाम घोषित हुआ तो ब्रह्मानंद शर्मा की 83वीं रैंक आई. पूरे परिवार में खुशियां छा गईं. उन्हें अपने सपने पूरे होते नजर आने लगे, लेकिन किस्मत को अभी उन की एक परीक्षा और लेनी थी. राजस्थान में शानदार रैंक आने के बावजूद दृष्टिहीन होने की वजह से उन की ट्रेनिंग पर रोक लगा दी गई.

इस के बाद मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा. हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने ब्रह्मानंद शर्मा की नियुक्ति की सिफारिश की. एक साल की ट्रेनिंग के बाद उन्होंने चित्तौड़गढ़ में न्यायिक मजिस्टै्रट का पदभार संभाला. ब्रेल लिपि कंप्यूटर और सहायक की मदद से उन्होंने पहले ही दिन एक अनुभवी जज की तरह सुनवाई कर फैसले भी किए. ब्रह्मानंद शर्मा कहते हैं कि हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है. किसी को भी विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए. हालात से लड़ कर आगे बढ़ें तो सफलता जरूर आप के कदम चूमेगी.

रंगमंच पर कोई रीटेक नहीं होता. उस समय गलतियां सुधारने का भी मौका नहीं मिलता. मंच पर जो अभिनय किया जाता है, उसे सामने बैठा दर्शक सीधे देखता है. कलाकार के पास या फेल होने का फैसला दर्शक करते हैं. लेकिन जयपुर के दृष्टिहीन बच्चे किस तरह अपने अभिनय की प्रस्तुति करते हैं, उसे देख कर आप चौंके बिना नहीं रह सकते. इन बच्चों को तराशा है मशहूर रंगकर्मी भारतरत्न भार्गव ने. राजस्थान यूनिवर्सिटी जयपुर में हिंदी के प्रोफेसर रह चुके भारतरत्न भार्गव संगीत नाटक एकेडमी नई दिल्ली के उपसचिव रहे हैं. थिएटर के क्षेत्र में भारतरत्न भार्गव देशभर की जानीमानी हस्ती हैं. बीबीसी लंदन और आल इंडिया रेडियो के लिए भी वह सेवाएं दे चुके हैं.

आजकल वह कला और रंगमंच को समर्पित जयपुर के संस्थान नाट्यकुलम में कुलगुरु के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. ढेर सारे अवार्ड और पुरस्कारों से सम्मानित भारतरत्न भार्गव ने अनेक नाटकों में अभिनय और निर्देशन किया है. मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर पर उन्होंने एक किताब लिखी है- रंग हबीब, जिसे नैशनल स्कूल औफ ड्रामा ने प्रकाशित किया है.

भारतरत्न भार्गव बताते हैं, ‘मैं करीब डेढ़ साल पहले कुछ दृष्टिबाधित बच्चों के संपर्क में आया. वे खेलखेल में भावभंगिमाएं बना रहे थे. मैं ने तभी ठान लिया कि इन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाऊंगा. शुरुआत की तो लोगों ने मजाक उड़ाया. लोग कहते रहे कि जिन्हें खुद नहीं दिखता, उन्हें देखने कौन आएगा? लेकिन मैं ने हिम्मत नहीं हारी और ये बच्चे मेरी कल्पना से भी आगे निकले. आम रंगकर्मी जो अहसास व्यक्त नहीं कर पाते, वैसा ये बच्चे कर दिखाते हैं. शायद इन का मन ही वह आंख हैं, जो इन्हें सब कुछ सिखा देता है.

‘शुरुआत में मैं इन बच्चों को भावभंगिमाएं सिखाने के लिए अंगुलियों से इन के चेहरों पर भाव उकेरता था. अभिनय करते समय ये दृष्टिहीन बच्चे स्टेज से गिर न जाएं, इस के लिए संगीत की मदद ली. ढोलक, मंजीरे की ताल आदि सुन कर अब ये बच्चे समझ जाते हैं कि मंच पर कब चलना है, कहां रुकना है. इसलिए अब ये अभिनय करते हुए गिरते नहीं हैं. इन्हीं में से कुछ बच्चों को संगीत का क्लू देने के लिए प्रशिक्षित किया. बेजान आंखों को सपने देने से इन्हें एक नई ऊर्जा मिलती है.’

78 साल के भारतरत्न भार्गव जब इन दृष्टिहीन बच्चों को अभिनय सिखाते हैं तो अच्छाभला अभिनेता भी उन का समर्पण देख कर हैरान रह जाता है. चांदी से चमकते सिर व दाढ़ी के बालों के बीच उन के चेहरे पर वह तेज होता है, जिसे उन के दृष्टिहीन शिष्य भले ही नहीं देख पाते, लेकिन उन की सिखाई बातों को तुरंत ग्रहण कर लेते हैं.

फोटोग्राफी एक ऐसी कला है, जिस में आंखों के द्वारा देखे गए नजारों को कैमरे में कैद किया जाता है. जाहिर है, कोई भी फोटोग्राफर उसी वस्तु के फोटो खींचता है, जो उसे उपयोगी लगती है. लेकिन पश्चिम बंगाल के कुछ फोटोग्राफर ऐसे हैं, जो पूरी तरह दृष्टिहीन हैं. इन दृष्टिहीन बच्चों द्वारा की गई फोटोग्राफी देख कर आप हैरान रह जाएंगे. इन दृष्टिहीन बच्चों को फोटोग्राफी में पारंगत किया है जयपुर की फोटोग्राफर पद्मजा शर्मा उर्फ गुनगुन और चंदन एस. राठौड़ ने. गुनगुन तथा चंदन एस. राठौड़ बताते हैं कि पहले यह प्रयास उन्होंने जयपुर के दृष्टिबाधित बच्चों को ले कर करना चाहा, पर अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सका. बाद में पश्चिम बंगाल के सियराफुली कस्बे की सोसायटी फौर ब्लाइंड के संपर्क में आए. सन 2014 के अप्रैल महीने में गुनगुन व राठौड़ ने मिल कर इस सोसायटी के 5 बच्चों की फोटोग्राफी कार्यशाला की.

यह कार्यशाला 7 दिनों तक चली. इस कार्यशाला का विचार शिप औफ थीसिस फिल्म देख कर आया था. उस फिल्म में एक दृष्टिहीन फोटोग्राफर होती है. इसी विचार को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कई ब्लाइंड सेंटरों पर बात की, लेकिन बात नहीं बनी. कुछ लोगों को लगता था कि उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए. कुछ लोग यह कह कर मना कर देते थे कि इस से कोई फायदा नहीं होगा. कुछ लोग कहते थे कि ऐसा हो ही नहीं सकता. कुछ लोग क्राफ्ट या म्यूजिक की क्लास लगवाने की सलाह देते थे. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी.

पश्चिम बंगाल के सोसायटी फौर ब्लाइंड सेंटर पर ही कार्यशाला की. इस बीच वह ब्लाइंड फोटोग्राफरों के बारे में भी पढ़ते रहे, उन की तसवीरें देखीं, तसवीरों तक पहुंचने की यात्रा को जानने की कोशिश करते रहे. कार्यशाला में पहले दिन उन्होंने सूरदास को पढ़ा. सूरदासजी देख नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने कितने सारे दृश्य लिखे हैं. इसी तरह बच्चों को ध्वनि और अहसास के सहारे फोटो खींचने के बारे में बताया. उन्होंने इन बच्चों के हाथ में औटो मोड डिजिटल कैमरे दे कर उस की सारी तकनीकी प्रक्रिया समझाई. फिर औब्जेक्ट को छू कर उस से एक निश्चित दूरी बना कर फोटो खींचना सिखाया. इस के बाद आवाज सुन कर उस दिशा में क्लिक करना सिखाया. आवाज के आधार पर फोटो खींचने का उन का प्रयास बेहद उत्साहजनक रहा.

ये बच्चे पहले कैमरे को उसी अंदाज में आंख पर लगाते हैं, जैसे आम लोग करते हैं. इस के बाद बटन पर अंगुली सेट करते हैं और उस के बाद आवाज की दिशा में क्लिक कर के दृश्य को कैमरे में कैद कर लेते हैं. अब तो ये बच्चे फोटोग्राफी में इतने पारंगत हो गए हैं कि कभी मैदान, कभी पहाड़, तो कभी पानी के नजारों तक को कैमरे में अपने अंदाज में उतार लेते हैं. सोसायटी फौर ब्लाइंड के 5 बच्चों फणी पाल, मिलन शर्मा, अंजन शेरेन, टिंकू हाजरा और दुलीचंद राय के खींचे गए फोटोग्राफ्स की प्रदर्शनी जयपुर के जवाहर कला केंद्र में इसी साल 12 से 16 फरवरी तक लगाई गई थी.

दृष्टिहीन बच्चों द्वारा अपनी शब्दभेदी ताकत से केवल आवाज सुन कर खींची गई तसवीरों की प्रदर्शनी जयपुर के हजारों लोगों ने देखी. जो भी इस प्रदर्शनी को देखने आया, वह इन बच्चों की अनूठी पहल को देख कर दंग रह गया. दर्शकों के मन में ढेर सारे सवाल और यह जानने की इच्छा थी कि आखिर इन दृष्टिहीन बच्चों ने कैसे इतनी अच्छी तसवीरें खींची? दर्शकों के इन सवालों के जवाब भी वहां मौजूद इन बच्चों ने ही दिए.

कहानी दृष्टिहीन फोटोग्राफरों की चल रही है तो मुंबई में एक ऐसा शख्स भी है, जो नामी फिल्म कलाकारों को उन की महक के सहारे कैमरे में कैद करता है. इस फोटोग्राफर का नाम है भावेश पटेल. हाल ही में बौलीवुड एक्ट्रैस कैटरीना कैफ का एक वीडियो यू ट्यूब पर आया है, जिस में वह एक परफ्यूम के लिए शूट कर रही हैं. इस में कैटरीना की फोटोग्राफी भावेश ने की है. भावेश नेत्रहीन हैं. वह इस वीडियो में कह रहे हैं, ‘मैं जब भी फोटोग्राफ खींचता हूं, वह महक ही होती है, जो उस की तसवीर मेरे मन में बना देती है और उस के बाद मुझे करना होता है बस एक क्लिक.’

वीडियो में दिखाया गया है कि भावेश के खींचे फोटोग्राफ देख कर कैटरीना कैफ मुसकरा कर कहती हैं, ‘दे आर अमेजिंग’. बहरहाल, ये नेत्रहीन, मूकबधिर अपने जज्बे से एक नई कहानी लिख कर लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन रहे हैं. फिर भी यह चिंता की बात है कि भारत में सन 2011 की जनगणना के अनुसार, 50 लाख 32 हजार 463 नेत्रहीन हैं. इन में पुरुषों की संख्या 26 लाख 38 हजार 516 एवं महिलाओं की संख्या 23 लाख 93 हजार 947 है. सरकार को चाहिए कि इन नेत्रहीनों के समुचित विकास के लिए ठोस नीति बनाए. Hindi Stories

 

Bihar Crime News: क्या सचमुच लौट आया बिहार में जंगलराज

Bihar Crime News: 2 दशक पहले बिहार नक्सलियों के जिस कहर से आतंकित था, आतंक के वही पूत अब फिर से अपने पांव पसारने लगे हैं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के 2 इंजीनियरों की हत्या के खौफनाक मंजर से यही लगता है कि बिहार में फिर से जंगलराज लौट आया है.

बिहार के दरभंगा जिले के शिवराम चौक से बरुआर होते हुए रसियारी पुल तक 120 किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग-88 का काम पिछले 2 सालों से बड़ी तेजी से चल रहा है. 750 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली इस सड़क का ठेका बीसिनैया प्राइवेट लिमिटेड एंड चड्ढा एवं चड्ढा कंस्ट्रक्शन कंपनियों को दिया गया है. काम की मौनिटरिंग रोडिया कंसल्टैंट कंपनी कर रही है. इस मार्ग के बन जाने से सहरसा से राजधानी पटना की दूरी काफी कम हो जाएगी. वैसे तो सड़क निर्माण का यह काम अक्तूबर, 2015 तक पूरा हो जाना चाहिए था, लेकिन किसी वजह से यह तय समय में पूरा नहीं हो सका.

सरकार की नाराजगी से कंपनियां काम को जल्द से जल्द पूरा करने में लगी थीं. कंस्ट्रक्शन कंपनी के इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह 26 दिसंबर, 2015 की दोपहर को करीब डेढ़ बजे शिवराम चौक पहुंचे और काम की मौनिटरिंग कर के वहां पड़ी प्लास्टिक की कुरसी पर बैठ गए. रोडिया कंसल्टैंट कंपनी के फील्ड इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह उन्हीं के पास खड़े हो कर काम की निगरानी कर रहे थे. राष्ट्रीय राजमार्ग होने की वजह से छोटेबड़े वाहन आजा रहे थे. उसी समय विपरीत दिशा से 2 मोटरसाइकिलें आईं और इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह के पास रुक गईं. दोनों मोटरसाइकिलों पर 4 लोग सवार थे. सभी की उम्र 20-25 साल के बीच थी. उसी समय एक मर्सिडीज कार भी वहां आ कर रुक गई.

मोटरसाइकिलों से आए लड़कों में से एक ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह से धमकी भरे अंदाज में कुछ कहा तो उन्होंने भी उसे पलट कर जवाब दे दिया. इस के बाद दोनों में कहासुनी होने लगी. उसी बीच उस लड़के ने पिस्तौल निकाल कर उन के ऊपर 3 गोलियां दाग दीं. एक गोली सिर में और 2 गोलियां उन के पेट में लगीं. गोली चलते ही वहां खड़े इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह और बाकी कर्मचारी अपनी जान बचाने के लिए भागे. लेकिन बाकी के तीनों लड़कों ने दौड़ कर इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह को एके 47 से भून दिया.

इस के बाद उन लड़कों ने वहां एक परची फेंक दी और ‘बिहार पीपुल्स लिबरेशन आर्मी जिंदाबाद’, ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ के नारे लगाते हुए चले गए. बदमाशों के जाने के बाद इधरउधर दुबके कर्मचारी बाहर निकले. घायल मुकेश और ब्रजेश बुरी तरह से तड़प रहे थे. किसी कर्मचारी ने पुलिस कंट्रोल रूम के 100 नंबर पर फोन कर के इस लोमहर्षक घटना की सूचना दी. सूचना मिलते ही थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद पुलिस बल ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए. उन्होंने दोनों घायल इंजीनियरों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.

पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करने से जिले के उच्च पुलिस अधिकारियों को भी इस सनसनीखेज घटना की सूचना मिल गई थी. इसलिए एसएसपी ए.के. सत्यार्थी, एसपी (सिटी) हरकिशोर राय, डीएसपी दिलनवाज अहमद, डीएसपी (बेनीपुर) अंजनी कुमार, थाना सदर के थानाप्रभारी हरिमोहन प्रसाद, थाना बेंता के थानाप्रभारी सुरेंद्र पासवान और डौग स्क्वायड तथा फोरेंसिक टीम मौके पर पहुंच गई थीं. दिल दहला देने वाली घटना की सूचना प्रदेश के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डीजीपी पी.के. ठाकुर तक भी पहुंच गई थी. एक महीने के भीतर इंजीनियरों के साथ हुई यह दूसरी बड़ी वारदात थी.

पुलिस ने मौके से 9 एमएम और एके 47 के 20 खोखे बरामद किए थे. सड़क निर्माण में जुटे चश्मदीदों से भी पुलिस ने पूछताछ की. घटनास्थल की जांच करने के बाद पुलिस अधिकारी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे और लाशों का निरीक्षण कर के उन्हें पोस्टमार्टम के लिए दरभंगा के जिला अस्पताल भिजवा दिया. इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह बेगूसराय के थाना सरलाही के गांव सोम्हो के और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह रोहताश जिले के थाना डेयरी के गांव करमनगंज के रहने वाले थे. पुलिस ने दोनों के घर वालों को घटना की सूचना दे दी थी. ए.के. सत्यार्थी ने थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद को तत्काल निलंबित कर दिया और उन की जगह पर रामशंकर सिंह को बहेड़ी का थानाप्रभारी बनाया.

दरअसल, सीताराम प्रसाद ने बगैर सूचना दिए कंपनी के प्लांट से बीएमपी के जवानों को अचानक एक दिन पहले हटा कर नगर पार्षद के चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया था. एसएसपी को इस मामले में उन की भूमिका संदिग्ध लगी, इसलिए उन्होंने उन के खिलाफ तत्काल काररवाई की थी. दिनदहाड़े 2-2 इंजीनियरों की हत्या के इस मामले में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने डीजीपी पी.के. ठाकुर को आड़े हाथों लिया. उन्होंने सख्त हिदायत दी कि अपराधी कितने भी पावरफुल क्यों न हों, उन की गिरफ्तारी हर हाल में होनी चाहिए. इस के बाद दरभंगा जोन के आईजी अमित कुमार जैन ने पुलिस की 8 टीमें गठित कीं और इन का नेतृत्व एसएसपी शिवदीप लांडे को सौंप दिया.

घटनास्थल से हत्यारों की जो परची मिली थी, शिवदीप लांडे ने उसे जांच के लिए भेज दिया. 24 दिनों पहले 2 दिसंबर, 2015 को जिला शिवहर में इंजीनियर राजेंद्र प्रसाद की हत्या के बाद पुलिस ने वहां से भी एक परची बरामद की थी. उस परची में भी ‘मुकेश पाठक जिंदाबाद’ का नारा लिखा था. परची की जांच में पता चला कि दोनों घटनाओं को मुकेश पाठक के गैंग ने ही अंजाम दिया था. कहने को तो पिछले 3 सालों से मुकेश पाठक गैंग का सरगना संतोझ झा गया जिले की जेल में बंद था, लेकिन वह जेल से ही अपना नेटवर्क चला रहा था. पिछले एक दशक से कुख्यात संतोष झा और मुकेश पाठक प्रदेश पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए थे.

शिवदीप लांडे ने पता लगा लिया कि मुकेश पाठक के गैंग में कौनकौन शामिल हैं. उन की तलाश में उन के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे जाने लगे. इस का परिणाम यह निकला कि तीसरे दिन यानी 28 दिसंबर को पुलिस ने एक बदमाश पिंटू लालदेव को उस के गांव से गिरफ्तार कर लिया गया. पिंटू लालदेव बहेड़ी की ब्लाक प्रमुख मुन्नी देवी का देवर था. पुलिस को मुन्नी देवी के पति संजय लालदेव की भी तलाश थी, लेकिन वह फरार हो चुका था. मुन्नी देवी कुख्यात डान संतोष झा की बहन थी. पिंटू लालदेव को गिरफ्तार कर के पुलिस थाना बहेड़ी ले आई. सूचना मिलते ही ए.के. सत्यार्थी पूछताछ करने थाने पहुंच गए.

पुलिस ने उसे मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया का फोटो दिखा कर पूछताछ शुरू की तो थोड़ी सख्ती के बाद उस ने स्वीकार कर लिया कि मुकेश पाठक और विकास झा उर्फ कालिया से उस के संबंध हैं और मुकेश पाठक के ही इशारे पर दोनों इंजीनियरों की हत्या की गई थी. पिंटू लालदेव के अपराध स्वीकार करने के बाद उसी दिन शाम को पुलिस लाइंस में ए.के. सत्यार्थी ने पत्रकारवार्ता आयोजित कर पत्रकारों के सामने आरोपी पिंटू लालदेव को पेश किया. इस के बाद उसे कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया गया.

पिंटू को जेल भेजने के बाद शिवदीप लांडे ने उसी रात 2 बजे सीतामढ़ी के थाना रुन्नीसैदपुर के गांव कमलदह की घेराबंदी कर के चंद्रकेतु झा को गिरफ्तार कर लिया. चंद्रकेतु भी इस दोहरे हत्याकांड में वांछित था. इस के पहले भी वह आर्म्स एक्ट में जेल जा चुका था.

चंद्रकेतु झा से की गई पूछताछ में उस के कई साथियों के नाम पुलिस को पता चले. इस के बाद उस की निशानदेही पर पुलिस ने अलगअलग जगहों से उस के 3 साथियों चंदन झा, अंचल झा और दिलीप झा को गिरफ्तार किया. सख्ती से की गई पूछताछ में उन्होंने घटना में शामिल होने की बात स्वीकार कर ली. अंचल झा ने बताया कि इंजीनियरों की हत्या की योजना उसी के घर बनी थी. योजना को अंतिम रूप मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, टुन्ना झा, सुझोध झा, अभिषेक मिश्र, ऋषि झा, चंद्रकेतु झा, चंदन झा, दिलीप झा, पिंटू लालदेव और उस के बड़े भाई संजय लालदेव ने दी थी.

बदमाशों द्वारा दिए गए बयान के बाद दोहरे इंजीनियर हत्याकांड की तसवीर बिलकुल साफ हो गई. पता चला कि यह खूनी खेल गिरोह के दूसरे नंबर के खतरनाक बदमाश मुकेश पाठक के इशारे पर 75 लाख की रंगदारी न देने के एवज में खेला गया था. गिरोह के शार्प शूटर विकास झा उर्फ कालिया और अभिषेक मिश्र ने इंजीनियर मुकेश कुमार सिंह और इंजीनियर ब्रजेश कुमार सिंह की गोली मार कर हत्या की थी. इस के बाद पुलिस विकास और अभिषेक की तलाश में जुट गई.

पुलिस जांच के अनुसार, कुख्यात बदमाश मुकेश पाठक ने अपने साथियों विकास झा उर्फ कालिया, अभिषेक मिश्र आदि के साथ नेपाल में पनाह ले रखी थी. पुलिस ने इस बारे में नेपाल पुलिस से भी संपर्क किया. ए.के. सत्यार्थी को यह भी पता चला कि बदमाश कंपनी से पिछले 3 महीने से 75 लाख रुपए की रंगदारी की मांग कर रहे थे. घटना से एक सप्ताह पहले कंपनी के मैनेजर देवेश राठौर ने मौखिक रूप से इस की सूचना पुलिस को दी थी. मामले की गंभीरता को समझते हुए उन्होंने उसी दिन 6 बीएमपी के जवानों को सुरक्षा में लगा दिया था.

लेकिन थाना बहेड़ी के थानाप्रभारी सीताराम प्रसाद ने उन जवानों को पंचायत चुनाव की नामांकन ड्यूटी पर लगा दिया. इस के बाद यह घटना घट गई. पुलिस ने गिरफ्तार पांचों बदमाशों को कोर्ट में पेश कर के जेल भेज दिया था. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इस कहानी के असली खलनायक माफिया डौन संतोष झा के बारे में जानना जरूरी है कि आखिर वह कौन है? बेहद कमजोर और डरडर कर जिंदगी जीने वाले संतोष झा के साथ ऐसा क्या हुआ कि गांव का एक सीधासादा नौजवान खतरनाक डौन बन गया? यहां उन पहलुओं पर रौशनी डालना बेहद जरूरी है.

37 वर्षीय संतोष झा बिहार के जिला शिवहर के पुरनहिया शहर के दोस्तियां गांव का रहने वाला था. वह एक मजदूर का बेटा था. बात उन दिनों की है, जब बिहार में नक्सलियों का बोलबाला था. इंसान गाजरमूली की तरह काटे जा रहे थे. जिस की लाठी में दम था, जयजयकार उसी की हो रही थी. जिस दोस्तियां गांव का संतोष झा रहने वाला था, उसी गांव में मुखिया नवल राय की तूती बोलती थी. उन की बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी. गांव में एक जमीन को ले कर संतोष के पिता और मुखिया नवल राय के बीच ठन गई. मुखिया उन की जमीन हथियाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने लगा.

संतोष उस समय किशोरावस्था की दहलीज पर था. मुखिया का जुल्म जब असहनीय हो गया तो नक्सली नेता गौरीशंकर झा ने संतोष के हाथों में लाल झंडा और बंदूक थमा दी. देखतेदेखते संतोष माओवाद का एक मजबूत स्तंभ बन गया. उसी समय वह माओवादी संगठन की नीतियों को भुला कर अपराध की डगर पर चल निकला.

माओवादियों को संतोष का काम नागवार लगा तो उन्होंने उसे संगठन से निकाल दिया. इस के बाद संतोष ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नामक संगठन बना लिया. इस संगठन से उस ने कमउम्र के अतिमहत्त्वाकांक्षी युवकों को जोड़ा. उन में ज्यादातर पढ़ेलिखे युवा थे. संतोष जिस समय माओवादियों के संगठन से जुड़ा था, उसी समय उस ने परशुराम सेना नामक एक और संगठन बनाया था. उस की कमान भी उसी के हाथ में थी. संगठन जब धन और अत्याधुनिक हथियारों से लैस हो गया तो संतोष ने अपने दुश्मन मुखिया नवल राय से बदला लेने की योजना बनाई.

सन 1999 में रामनवमी पर नवल राय के घर के बाहर खाली मैदान में रामलीला हो रही थी. उस समय नक्सली नेता गौरीशंकर झा संतोष के साथ था. मौका मिलते ही उस ने नवल राय के ऊपर हमला बोल दिया. लेकिन इस हमले में नवल राय बालबाल बच गया. इस के बाद वह सतर्क हो गया. मगर संतोष मौके की फिराक में था. उस ने साथियों की मदद से 3 मार्च, 2003 को दोस्तियां स्थित नवल राय के मकान को डायनामाइट से उड़ा दिया. संयोग से इस हमले में भी नवल राय और उस का पूरा परिवार बालबाल बच गया.

9 महीने बाद 12 दिसंबर को संतोष ने दोबारा उस पर हमला करने की रणनीति बनाई. वह उसे मारने निकला तो किसी ने इस की मुखबिरी पुलिस से कर दी. जैसे ही वह रीगा के बराही पहुंचा, पुलिस के साथ उस की मुठभेड़ हो गई. इस मुठभेड़ में उसे कई गोलियां लगीं. इस के बावजूद वह भागने में सफल रहा. आज भी उस समय की लगी एक गोली उस के सीने में फंसी है. संतोष की बदले की आग अभी ठंडी नहीं हुई थी. नवल राय की हत्या की फिराक में वह लगा रहा. उस की हत्या तो वह नहीं कर सका, लेकिन सन 2004 में उस ने शिवहर जिले के थाना रीगा के बराही गांव के रहने वाले पूर्व मुखिया दिनेश सिंह को गोलियों से छलनी कर के मौत के घाट उतार दिया.

बेहद कमजोर और बेबस संतोष झा पूर्व मुखिया की हत्या कर के आतंक के पर्याय के रूप में जाना जाने लगा. लोगों के दिलों में उस के नाम का खौफ बैठ गया. लेकिन ज्यादा दिनों तक वह आजाद नहीं घूम पाया. पुलिस ने दिसंबर, 2004 में उसे पटना से गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. 5 साल जेल में रहने के बाद दिसंबर, 2009 में वह जमानत पर रिहा हो कर बाहर आया. जेल से बाहर आते ही वह मुखिया नवल राय के पीछे हाथ धो कर पड़ गया.

आखिरकार 15 जनवरी, 2010 को उस ने नवल राय को उसी के गांव में गोलियों से भून डाला. उस की हत्या करने के बाद जिले के अन्हारी कस्बा स्थित सेंट्रल बैंक के गार्ड की हत्या कर बैंक से लाखों रुपए लूट लिए. इन घटनाओं को अंजाम देने के बाद संतोष झा अपने गुरु और माओवादी नेता गौरीशंकर झा के पास लौट गया. गौरीशंकर झा ने संतोष को संगठन में यह कह कर लेने से मना कर दिया कि वह अपराध की डगर पर चल निकला है. गुरु की यह बात उसे काफी नागवार लगी और फिर 24 नवंबर, 2011 को उस ने अपने साथियों मुकेश पाठक, विकास झा उर्फ कालिया, ऋषि झा और लंकेश के साथ दोस्तियां पहुंच कर माओवादी नेता गौरीशंकर झा को मार दिया.

इस हमले में गांव के पूर्व मुखिया, उन की पत्नी देवता झा और बेटी भी बुरी तरह से घायल हो गई. संतोष झा के संगठन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की ताकत उस समय दोगुनी हो गई, जब मुकेश पाठक ने उस के गैंग में कदम रखा. 32 वर्षीय मुकेश पाठक उर्फ चुटुल पाठक मूलरूप से मोतिहारी जिले के थाना मेहसी के मोरियाबाद गांव का रहने वाला था. मुकेश पाठक बचपन से ही काफी दबंग था. बातबात पर लड़ जाना उस की आदत थी. पुसाबाद, बरहरवा गांव के मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर उर्फ चुन्नू ठाकुर मुकेश के गुरु थे.

लेकिन एक किसी बात को ले कर मुखिया चंद्रकिशोर से उस की ठन गई थी. जिद्दी स्वभाव के मुकेश ने अपने साथियों ऋषि झा, श्यामसुंदर पाठक, पवन कुमार, गौतम ठाकुर और निकेश दुबे के साथ 11 दिसंबर, 2010 को मेहसी ब्लाक औफिस जा कर दिनदहाड़े मुखिया चंद्रकिशोर ठाकुर को गोलियों से भून डाला. दिनदहाड़े मुखिया की हत्या कर के मुकेश पाठक भी सुर्खियों में छा गया. संतोष झा की नजर मुकेश पर पड़ी तो उस ने उसे अपने गिरोह में शामिल कर लिया. गैंग में संतोष ने उसे सैकेंड बौस बना दिया.

अब संतोष और मुकेश मिल कर काम करने लगे. उन्होंने तय किया कि वे बड़ी कंपनियों को निशाना बनाएंगे, जहां से एक बार में करोड़ों रुपए वसूले जा सकें. उन्होंने उन बड़ीबड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनियों को टारगेट पर लिया, जिन के बजट कम से कम 500-600 करोड़ के होते थे. उन कंपनियों से वे उन के बजट का 10 प्रतिशत लेवी (रंगदारी, गुंडा टैक्स) के रूप में वसूलते थे. जिन कंपनियों ने उन की बात नहीं मानी या लेवी नहीं दी, वे उन के बेकसूर इंजीनियरों की हत्या कर के दहशत फैला देते थे. इस तरह इन के गैंग ने अब तक दरजन भर इंजीनियरों को मौत के घाट उतार दिया है.

स्पैशल औपरेशन ग्रुप (एसओजी) ने आतंक के पर्याय बने संतोष झा और मुकेश पाठक को 17 फरवरी, 2012 को रांची के बूटी मोड़ से गिरफ्तार किया था. दोनों को शिवहर लाया गया था. सरगना संतोष को गया जेल में बंद कर दिया गया, जबकि मुकेश पाठक को शिवहर जेल में. शातिर मुकेश ने जेल में बंद के दौरान बीमारी का बहाना बनाया. जेल अधिकारियों ने इलाज के लिए उसे जिला अस्पताल में दाखिल करा दिया. 15 जुलाई, 2015 को पुलिस को चकमा दे कर वह अस्पताल से भाग गया.

तब से अब तक वह फरार चल रहा है. पुलिस रिकौर्ड में मुकेश पाठक की छवि उत्तर बिहार के शातिर अपराधियों की है. उस ने पूर्वी चंपारण, पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर और मुजफ्फरपुर में तमाम घटनाओं को अंजाम दिया है. 2 इंजीनियरों के हत्याकांड की जांच में बेहद चौंका देने वाली घटना खुल कर सामने यह आई कि इस डबल मर्डर केस के मुख्य अभियुक्त मुकेश पाठक की पत्नी पूजा गर्भवती है. वह भी अपहरण के किसी मामले में जेल में बंद है. पुलिस ने इसे गंभीरता से लिया है.

दरअसल, जेल में रहते हुए मुकेश पाठक ने पूजा से शादी की थी. दोनों की शादी अक्तूबर, 2013 में शिवहर जेल में जेल प्रशासन की निगरानी में हुई थी. पूजा मुकेश पाठक की दूसरी पत्नी थी. उस ने पहली पत्नी की हत्या कर दी थी. शादी के बाद दोनों को अलगअलग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. किसान की बेटी पूजा मुजफ्फरपुर के सकरा गांव की रहने वाली थी. पटना में रह कर वह पौलीटैक्निक कर रही थी. पैसों के लिए उस ने सन 2013 में अपने साथी कैलाश फौजी के साथ मिल कर एक दिन में 2 लोगों का अपहरण किया था. कैलाश फौजी भी मुजफ्फरपुर के सकरा का ही रहने वाला था.

अप्रैल में पूजा की डिलीवरी होने वाली थी. वह पुलिस की कड़ी निगरानी में है. पुलिस को लगता है कि पूजा की डिलीवरी के दौरान मुकेश पत्नी से मिलने जरूर आएगा, तभी उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा. इसी बीच 3 मार्च, 2016 को पुलिस ने माफिया डौन संतोष झा के खास शूटर विकास झा उर्फ कालिया, करण झा, अभिषेक झा, पिंटु झा उर्फ बाबा और निकेश दूबे को अलगअलग जगहों से गिरफ्तार कर लिया है. विकास झा, पिंटू झा उर्फ बाबा और करण झा की गिरफ्तारी पर सरकार ने एकएक लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था.

पुलिस ने शिवहर की ब्लौक प्रमुख मुन्नी देवी और उस के पति संजय लालदेव को भी भादंवि की धारा 120बी के तहत गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया है. अब पुलिस को मुकेश पाठक की सरगर्मी से तलाश है. कथा लिखे जाने तक वह पुलिस की गिरफ्त से बहुत दूर था. Bihar Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Crime: मंगोलपुरी में पीजी के बेड बॉक्स में मिली महिला की लाश

Delhi Crime News: किसी सामान की तरह औरतों को इस्तेमाल कर उसे डस्टबीन में फेंक देने की मानसिकता आज भी कई मर्दों में बरकरार है. रेप, यौन-उत्पीड़न और घरेलू हिंसा इस बात का सबूत है. कहीं प्यार के नाम पर तो कहीं जाती के नाम पर औरतों की हत्याएं होती हैं इस मामले में भारत सबसे आगे है. NCRB के 2023 के आंकड़ों को देखें तो औरतों के खिलाफ अपराध के कुल 4,48,211 केस दर्ज हुए. इसमें रेप, उत्पीड़न, दहेज़ हत्या के अलावा मामूली बात पर औरतों की हत्यायों के तक़रीबन 17 हजार मामले हैं. दिल्ली के मंगोलपूरी में हुई यह वारदात भी इसी कड़ी का मामूली उदाहरण है जहाँ मामूली सी बात पर औरत की हत्या कर दी गई.

दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके के PG में एक 35 साल की औरत की लाश मिली. पुलिस जाँच में पता चला की इस औरत के प्रेमी दीपक ने धारदार हथियार से हमला करके घायल किया फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी और हत्या के बाद दीपक ने औरत की लाश को कंबल में लपेटकर डबल बेड के स्टोरेज बॉक्स में छिपा दिया गया.

पुलिस के अनुसार यह औरत 6 अप्रैल की शाम करीब 4 बजे घर से 2 लाख रुपये लेकर घर से निकली थी. वह अपनी बेटी को ट्यूशन छोड़ने जा रही थी.
दीपक और इस औरत के बीच पिछले ढाई सालों से अफेयर था. औरत के घर के पास ही दीपक की मीट की दुकान थी. दीपक ने इस औरत को फोन कर PG में बुलाया. PG कमरे में दोनों के बीच कहासुनी हो गई. दीपक ने पहले धारदार हथियार से हमला किया, फिर गला घोंटकर हत्या कर दी. हत्या के बाद लाश को कंबल में लपेटकर बेड के बॉक्स में छुपा दिया. दीपक के रिश्तेदार सुरेंद्र और दोस्त जोगिंदर ने लाश छिपाने में दीपक की मदद की.

PG कर्मचारी को शक हुआ तो उसने बेड के बॉक्स को खोलकर लाश देख ली और तुरंत पुलिस को सूचना दी. दिल्ली पुलिस ने लाश बरामद की और पोस्टमार्टम के लिए संजय गांधी अस्पताल भेज दिया. हत्या के आरोप में दीपक, सुरेंद्र और जोगिंदर तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया है.

मृतक महिला के परिवार का आरोप है कि दीपक कई साल से महिला को ब्लैकमेल करता था और जबरन मिलने बुलाता था. औरत शादीशुदा थी और दीपक के पडोस में अपने पति, दो बेटों और एक बेटी के साथ रहती थी. Delhi Crime News