Shocking Murder Case: पत्नी की हत्या कर शव सेप्टिक टैंक में छिपाया

Shocking Murder Case: ओडिशा के नबरंगपुर जिले से एक बेहद दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिस ने पूरे इलाके को हिला कर रख दिया है. रायघर थाना क्षेत्र के जोड़िंगा पंचायत के बोरगांव  में सुबास गोंड नामक व्यक्ति ने अपनी पत्नी मनई गंड की बेरहमी से हत्या कर दी और फिर सबूत छिपाने के लिए उस के शव को घर के शौचालय के सेप्टिक टैंक में डाल दिया.

जानकारी के अनुसार, सुबास अपनी पत्नी और बच्चों के साथ एक शादी समारोह में शामिल होने गया था. वहां से लौटने के बाद पतिपत्नी के बीच किसी बात को ले कर विवाद शुरू हो गया. बताया जा रहा है कि सुबास को अपनी पत्नी के चरित्र पर शक था, जिस वजह से दोनों के बीच झगड़ा बढ़ गया और गुस्से में उस ने पत्नी पर हमला कर दिया, जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

हत्या के बाद आरोपी ने सबूत छिपाने के लिए शव को सेप्टिक टैंक में डाल दिया ताकि किसी को शक न हो. लेकिन इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ, जब उन के 4 साल के मासूम बेटे ने घटना देख ली और डर के कारण पड़ोसियों को सारी बात बता दी. बच्चे की बात सुनकर ग्रामीणों ने सुबास से पूछताछ की, जहां पहले तो वह इनकार करता रहा, लेकिन बाद में उस ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया.

सूचना मिलने पर रायघर थाना पुलिस मौके पर पहुंची और सेप्टिक टैंक से शव को बरामद किया. पुलिस ने आरोपी को हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी है. वहीं, यह घटना पूरे क्षेत्र में सनसनी का कारण बन गई है, जहां एक तरफ पति की दरिंदगी ने लोगों को झकझोर दिया है, वहीं एक मासूम बच्चे द्वारा सच उजागर करने ने सभी को भावुक कर दिया है. Shocking Murder Case

Child Murder Case: पिता ने ली 6 साल के बेटे की जान

Child Murder Case: एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जहां एक पिता ने अपने ही 6 साल के मासूम बेटे की बेरहमी से हत्या कर दी. वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने सबूत मिटाने के इरादे से बच्चे को नदी में फेंक दिया. आखिर ऐसी क्या वजह थी, जिस ने एक पिता को ही अपने बेटे का कातिल बना दिया? इस दर्दनाक और चौंकाने वाली घटना की पूरी सच्चाई जानने के लिए पढ़िए यह विस्तृत कहानी, जो आप को सोचने पर मजबूर कर देगी और सतर्क रहने का संदेश भी देगी.

कर्नाटक के विजयपुरा से एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जिस ने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया. विजयपुरा ग्रामीण पुलिस ने मल्लिकार्जुन हरिकेरी नामक व्यक्ति को अपने 6 साल के बेटे सिद्धार्थ की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है. आरोप है कि उस ने मासूम को कृष्णा नदी में फेंक दिया, जिस से उस की मौत हो गई.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आरोपी को शक था कि बच्चा उस की संतान नहीं है. इसी संदेह ने उसे इतना क्रूर बना दिया कि उस ने अपने ही बेटे की जान ले ली. वह बच्चे को स्कूल में दाखिला कराने का बहाना बनाकर घर से बाहर ले गया और उसे नदी में धकेल दिया. घटना के बाद वह घर लौट आया और जब फेमिली वालों ने बच्चे के बारे में पूछा तो वह गुस्सा करने लगा.

मामला दर्ज होते ही उस ने भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.
विजयपुरा के एसपी लक्ष्मण निंबर्गी के अनुसार, यह घटना 15 मार्च, 2026 को हुई थी.

मल्लिकार्जुन अपने बेटे सिद्धार्थ को नए स्कूल में दाखिला दिलाने के बहाने घर से ले गया था, लेकिन कुछ दिनों बाद वह अकेला लौट आया. उस के विरोधाभासी बयानों से परिवार को शक हुआ. पहली अप्रैल, 2026 को सिद्धार्थ के जन्मदिन पर मां ने उस से मिलने की जिद की, जिस के बाद परिजनों ने गुमशुदगी की सूचना दर्ज कराई. पूछताछ में आरोपी ने स्वीकार किया कि वह बच्चे को महाराष्ट्र के कराड ले गया और कृष्णा नदी में धकेल दिया.

आरोपी के कुबूलनामे के बाद विजयपुरा पुलिस ने महाराष्ट्र पुलिस से संपर्क किया. जांच में पता चला कि कराड में पहले से एक अज्ञात बालक की ‘अप्राकृतिक मौत’ का मामला दर्ज था. कराड पुलिस द्वारा उपलब्ध कराए गए सबूतों से पुष्टि हुई कि बरामद शव सिद्धार्थ का ही था.
इस के बाद गुमशुदगी के मामले को हत्या में तरमीम कर दिया गया और आरोपी मल्लिकार्जुन हरिकेरी को गिरफ्तार कर लिया गया. Child Murder Case

Firozabad Crime News: इश्क में गवाई जान

Firozabad Crime News: मंजू के प्यार में गौतम इस कदर पागल था कि उस के घर वालों के लगातार मना करने पर भी वह पीछे नहीं हटा. अंतत: मंजू के घर वालों ने अपनी इज्जत की खातिर उसे ठिकाने लगा दिया.

उत्तर प्रदेश के जिला फिरोजाबाद के कस्बा एका के रहने वाले राम सिंह के बड़े बेटे गौतम का मन गांव में नहीं लगा तो कुछ करने की सोच कर वह दिल्ली चला गया, जबकि मां नहीं चाहती थी कि वह दिल्ली जाए. क्योंकि उस के पिता की मौत हो चुकी थी और पिता के बाद वही घर में सब से बड़ा था. गौतम ने कुछ दिन तो मन लगा कर नौकरी की, लेकिन अचानक उसे लगने लगा कि वह दिल्ली की तेज रफ्तार जिंदगी से तालमेल नहीं बैठा पा रहा है.  मां कहती ही थी कि घर में बहुत काम है, वह बेकार वहां पड़ा है. आखिर एक दिन वह नौकरी छोड़ कर गांव आ गया. बेटे के आने पर शीला ने कहा, ‘‘अब तुझे दिल्ली जाने की जरूरत नहीं है, जो कुछ भी करना है, गांव में रह कर कर.’’

गौतम घर में ही रह कर कुछ करना चाहता था. इस बारे में उस ने अपने बहनोई से बात की तो उस ने कहा, ‘‘आम के बागों को ठेके पर ले लो. 3-4 महीने में इतनी आमदनी हो जाएगी कि पूरे साल आराम से खर्च चलता रहेगा.’’

गौतम ने बाग मालिकों से बात करनी शुरू की. इसी चक्कर में उस की मुलाकात थाना सहावर के गांव नगलां विभाई के रहने वाले नरेश के बेटे आदेश से हुई. वह पहले से ही आम के बागों को ठेके पर लेता रहता था. दोनों हमउम्र थे, इसलिए पहली मुलाकात में ही उन की दोस्ती हो गई. आदेश को आम के बागों को ठेके पर लेने का अनुभव था, इसलिए गौतम ने उसी के साथ आम के बागों को ठेके पर ले लिया. दोनों का एक साथ काम हो गया तो वे एकदूसरे के घर भी आनेजाने लगे.

आदेश की एक बहन थी मंजू, जो बारहवीं में पढ़ती थी. गौतम जब भी आदेश के घर जाता, उस की मुलाकात मंजू से भी होती थी. कभीकभार बातचीत भी हो जाती थी. बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा तो उन के मनों में प्यार पनपने लगा. लेकिन दिल की बात कहने की न गौतम की हिम्मत हो रही थी, न मंजू की. उसी दौरान गौतम थाना सहावर के गांव खेड़ा कल्याणपुर के रहने वाले अपने मामा भूमिराज के यहां गया. उस की मामा की बेटी पूनम से बातचीत हुई तो पता चला कि पूनम और मंजू एक साथ पढ़ती थीं. उन की आपस में दोस्ती भी थी.

गौतम ने सोचा कि क्यों न वह पूनम के जरिए मंजू से मिले. लेकिन यह कहना भी आसान नहीं था. वह ममेरी बहन से दिल की बात कैसे कहता. गौतम घर जाने के लिए तैयार हुआ तो पूनम ने कहा, ‘‘भैया, गांव में भागवत है. मंजू भी अपने परिवार के साथ आ रही है. तुम भी रुक जाओ, कल चले जाना.’’

मंजू के आने की बात सुन कर गौतम खुश हो गया. सोचा, भागवत के बहाने उस की मंजू से भी मुलाकात हो जाएगी. वह रुक गया. मंजू अपने परिवार के साथ आई तो गौतम को देख कर हैरान रह गई. जब पूनम ने बताया कि गौतम उस की बूआ का बेटा है तो उसे भी खुशी हुई. मंजू तक अपनी बात पहुंचाने के लिए गौतम ने पूनम का सहारा लिया. उस ने पूनम को बता दिया कि वह मंजू से प्यार करता है और वह उस से अपने दिल की बात कहना चाहता है. पूनम ने यह बात मंजू तक पहुंचा दी. मौका देख कर मंजू भागवतस्थल से उठ कर उस जगह पहुंच गई, जहां गौतम उस का इंतजार कर रहा था.

एकांत में गौतम ने अपने दिल की बात मंजू से कही तो उस ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘गौतम, तुम जानते हो कि मैं बघेल हूं और तुम लोधी. इस वजह से यह रिश्ता कभी नहीं हो सकता. अगर हम ने कोशिश की तो पूरा समाज हमारे खिलाफ हो जाएगा.’’

गौतम ने मंजू का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मंजू, मैं तुम्हारे प्यार में पागल हूं. तुम्हारे लिए मैं किसी से भी टकराने को तैयार हूं.’’

गौतम का हौसला देख कर मंजू की हिम्मत बढ़ गई. उस ने मुसकराते हुए प्यार के इस रिश्ते पर अपनी मोहर लगा दी. उसी बीच आम पकने लगे, आदेश और गौतम ने आम बेच दिए, यानी उन का साझेदारी का धंधा खत्म हो गया. इस के बाद भी गौतम का आदेश के घर आनाजाना बना रहा. वह मंजू से फोन पर भी बातें किया करता था. काम न होने के बावजूद गौतम के आनेजाने से मंजू की मां को शक होने लगा. एक दिन गौतम ने मंजू के दरवाजे पर दस्तक दी तो उस की मां ने दरवाजा खोला. सामने गौतम को देख कर उस ने कहा, ‘‘गौतम, तुम्हारा हमारे यहां बेमतलब आनाजाना ठीक नहीं है. हमारे घर सयानी बेटी है, लोग तरहतरह की बातें करते हैं.’’

गौतम समझ गया कि इन लोगों को शक हो गया है. इसलिए वह वापस चला गया. मंजू को मां का यह व्यवहार पसंद नहीं आया. इसलिए उस ने कहा, ‘‘मम्मी, गौतम के साथ तुम्हें इस तरह का व्यवहार नहीं करना चाहिए था.’’

‘‘क्यों, तुझे क्यों बुरा लगा? जब देखो, तब मुंह उठाए चला आता है. यह लड़का मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है.’’ मां ने कहा तो मंजू कुछ नहीं बोली. वह अपने कमरे में जा कर सोचने लगी कि अब क्या होगा.

रात में मंजू ने गौतम को फोन किया कि मां ने उस के साथ जो किया, वह उसे अच्छा नहीं लगा. अब वह काफी परेशान है. गौतम ने उसे समझाया कि वह मिलने का कोई न कोई रास्ता निकाल लेगा, इसलिए परेशान होने की जरूरत नहीं है. वे देर रात को फोन पर प्यार भरी बातें करते रहते थे. लेकिन एक दिन आदेश ने रात में मंजू को मोबाइल पर बातें करते सुन लिया तो उस का माथा ठनका. आदेश ने उस के हाथ से मोबाइल छीन कर देखा तो वह जिस नंबर पर बात कर रही थी, वह गौतम का नंबर था. पहले तो उसे केवल शक था, पर अब विश्वास हो गया कि दोस्त ने उस के साथ दगा किया है.

गौतम के प्रति उस के मन में नफरत पैदा होने लगी. सुबह को उस ने यह बात अपनी मां को बताई तो घर वालों की नजरें चौकस हो गईं. सभी मंजू पर निगाह रखने लगे. लेकिन शायद उन्हें यह बात पता नहीं थी कि प्यार पर जितना पहरा बिठाया जाता है, वह उतना ही ज्यादा बढ़ता जाता है. मंजू के घर का रास्ता बंद होने पर गौतम ने पूनम से संदेश भिजवा कर मंजू को गांव के बाहर प्राइमरी स्कूल के पीछे मिलने को कहा. मां की नजरें बचा कर किसी तरह मंजू प्रेमी से मिलने प्राइमरी स्कूल के पीछे पहुंच गई. मंजू के पिता नरेश दोपहर में घर आया तो बेटी को घर में न पा कर पत्नी से उस के बारे में पूछा था. पत्नी ने कह दिया कि वह पड़ोस में गई होगी. नरेश ने उसे बुलाने भेजा तो वह पड़ोस में भी नहीं मिली.

नरेश परेशान हो उठा. वह बेटी के बारे में सोच रहा था, तभी आदेश आ गया. उसे जब पता चला कि बहन घर पर नहीं है तो वह उसे ढूंढ़ने निकल गया. ढूंढतेढूंढते वह प्राइमरी स्कूल के पीछे पहुंचा. वहां उस ने को गौतम से बातें करते देखा. उस का खून खौल उठा. उस ने लपक कर गौतम का गिरेबान पकड़ लिया. गौतम ने कहा, ‘‘आदेश, मैं मंजू से प्यार करता हूं और इस से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘दोस्त है इसलिए आखिरी चेतावनी दे कर छोड़ रहा हूं. आइंदा फिर कभी इस से मिला तो जमीन में गाड़ दूंगा. तुझे पता है कि हमारी जाति अलग है, इसलिए तू यह ख्वाब देखना छोड़ दे.’’ आदेश ने कहा.

इस के बाद वह मंजू को घसीटता हुआ घर ले आया और मां से बोला, ‘‘संभालो इसे, वरना यह जान से जाएगी.’’

भाई के इस व्यवहार से मंजू का मन बागी हो उठा. उस ने तय कर लिया कि वह गौतम के साथ ही ब्याह करेगी. उस की वजह से घर में तनाव रहने लगा. आदेश को लगा कि कहीं मंजू परिवार की बदनामी का कारण न बन जाए, इसलिए वह उस की शादी करने की सोचने लगा. मंजू को जब पता चला कि उस के लिए रिश्ता तलाशा जा रहा है तो वह बागी हो गई. उस ने मां से कहा कि गौतम एक अच्छा लड़का है, वह उसी से शादी करेगी. उस के साथ वह सुखी रहेगी. उस के अलावा वह किसी और से शादी नहीं करेगी.

मां ने भी साफसाफ कह दिया कि घर वाले जहां चाहेंगे, वहीं उस की शादी होगी, इसलिए वह गौतम के बारे में सोचना छोड़ दे. अब मंजू की जिंदगी एकदम नीरस हो गई. मंजू की शादी के बारे में गौतम को पता चला तो वह भी परेशान हो गया. उस ने आदेश को फोन कर के कहा कि वह दोस्ती को रिश्ते में बदलना चाहता है. आदेश ने उसे डांटते हुए कहा कि ऐसा हरगिज नहीं हो सकता. इस बारे में वह उन के यहां आइंदा फोन न करे, वरना अच्छा नहीं होगा.

गौतम ने तय कर लिया था कि कुछ भी हो, वह मंजू को किसी भी कीमत पर नहीं भूल सकता. वह उसे भगा कर कहीं दूर ले जाएगा और अपनी दुनिया बसा लेगा. इधर मंजू ने भी अपने घर वालों से साफ कह दिया था कि घर वालों ने जहां उस की शादी तय की है, वह वहां बता देगी कि वह किसी और से प्यार करती थी. बहन के तेवर देख कर आदेश स्तब्ध रह गया. उसे लगा कि इस से पहले उस की बहन परिवार की इज्जत को धूमिल करे, उस से पहले गौतम का खून कर के जेल चला जाना ज्यादा ठीक है. गौतम पर आदेश का गुस्सा फूटने लगा. आखिर उस ने गौतम को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली.

इस के लिए उस ने मंजू को विश्वास में ले कर कहा, ‘‘हम तेरी शादी अपनी बिरादरी में करना चाहते थे, पर तू इस के लिए तैयार नहीं है. तू गौतम से शादी करना चाहती है न, हम तेरी खुशी के लिए तैयार हैं. लेकिन हम उस से एक बार बात करना चाहते हैं. ऐसा कर, तू फोन कर के उसे यहां बुला ले.’’

भाई की बात पर मंजू बहुत हैरान हुई. क्योंकि वह भाई के इरादे को समझ नहीं पाई. उस ने गौतम को फोन कर के भाई की बात कह कर अपने घर आने को कह दिया. गौतम को पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ, लेकिन जवानी के जोश में उस ने कुछ सोचने की जरूरत नहीं समझी. गौतम के घर वालों को कुछ भी पता नहीं था. बस उस के दोस्त रिंकू को उस की मोहब्बत के बारे में जानकारी थी. जब उस ने रिंकू को सारी बात बताई तो उस ने कहा कि दाल में कुछ काला मालूम पड़ता है. जल्दबाजी के बजाय सोचसमझ कर कदम उठाने की जरूरत है.

गौतम ने उस की बात को गंभीरता से नहीं लिया. वह हंस कर बोला, ‘‘हो सकता है, मंजू की जिद की वजह से वे मान गए हों. आदेश डर गया होगा, जबकि हमें डरने की क्या जरूरत है.’’

गौतम रिंकू की हीरो होंडा बाइक ले कर घर से निकलने लगा तो शीला ने टोका, ‘‘बेटा, कहां जा रहा है?’’

‘‘मम्मी, तुम्हारे लिए बहू लेने जा रहा हूं.’’ उस ने हंसते हुए कहा.

आने वाली मुसीबत से बेखबर शीला ने कहा, ‘‘बहू तो हम जा कर लाएंगे तेरे लिए.’’

गौतम मां की बात सुने बगैर चला गया. यह बात 6 अक्तूबर, 2015 की है.

अगले 2 दिनों तक जब गौतम घर नहीं लौटा तो शीला ने रिंकू को बुला कर पूछा कि क्या उसे गौतम के बारे में कुछ पता है, वह कहां गया है?

रिंकू ने बताया कि जिस दिन से गौतम गया है, उस का फोन स्विच्ड औफ आ रहा है. वह उस की बाइक ले कर गया है. इस के बाद उस ने गौतम की मां शीला और चाचा पदम सिंह को उस के प्यार के बारे में बता दिया. इस के बाद उन्हें लगा कि गौतम की जान को खतरा है. शीला ने तुरंत अपनी बेटी भगवान देवी और दामाद सिंकी को फोन कर के सारी बात बता कर बुला लिया. इस के बाद अपने घर वालों को ले कर वह थाना सहावर पहुंची और थानाप्रभारी रफत मजीद को बेटे गौतम के लापता होने की बात बताई.

रफत मजीद ने गौतम की गुमशुदगी दर्ज कर आदेश को थाने बुला कर पूछताछ की. उस ने गौतम के बारे में किसी भी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया. अगले दिन 12 अक्तूबर को थानाप्रभारी को सूचना मिली कि कटरी में किसी युवक की लाश पड़ी है. खबर मिलते ही वह मय फोर्स के घटनास्थल पर पहुंच गए. उन के साथ पदम सिंह भी था. लाश 23-24 साल के युवक की थी. वह 5-6 दिन पुरानी लग रही थी. जगहजगह से मांस को जंगली जानवरों ने खा लिया था, इसलिए वह क्षतविक्षत हो चुकी थी. कपड़ों से पदम सिंह ने उस की पहचान गौतम के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने पर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और शक के आधार पर आदेश, मनवीर, जगदीश और सतीश के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने उसी दिन आदेश के घर दबिश दी और उसे पकड़ कर थाने ले आई. पुलिस को अब तक गौतम और मंजू से प्यार की जानकारी मिल चुकी थी. इसलिए मंजू को भी पूछताछ के लिए थाने लाया गया. मंजू को जब पता चला कि उस के प्रेमी गौतम की हत्या कर दी गई है तो वह हैरान रह गई. वह थाने में ही रोने लगी.

आदेश कुछ भी बताने को तैयार नहीं था. पुलिस ने उस पर सख्ती की तो उस ने कहा, ‘‘सर, गौतम को तो मरना ही था. उस ने खुद अपनी मौत को न्यौता दिया था. हम ने उसे इज्जत की दुहाई दे कर समझाया था, लेकिन वह हमें ही धमकी दे रहा था कि वह मेरे गांव में घुस कर मंजू को ले जाएगा. वह हमारी इज्जत पर पलीता लगाने पर तुला था, इसलिए मजबूरन हमें गौतम को ठिकाने लगाना पड़ा.’’

आदेश ने बताया कि उस ने मंजू द्वारा फोन करा कर गौतम को समझाने के लिए बुलाया था. उस समय उस के साथ मनवीर, जगदीश और सतीश मौजूद थे. सभी ने पहले तो गौतम को समझाने की कोशिश की, पर गौतम मंजू से शादी की जिद पर अड़ा रहा. जब वह नहीं माना तो फिर कटरी में ले जा कर उस को मार डाला गया. उस की हीरोहोंडा मोटरसाइकिल नंबर यूपी 83 एई 9868 गोरहा नहर में फेंक दी गई. आदेश से पूछताछ के बाद पुलिस ने उस के साथियों को भी गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर नहर से मोटरसाइकिल बरामद कर ली गई. पूछताछ के बाद सभी अभियुक्तों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया गया.

औनर किलिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रवैया बहुत सख्त है, फिर भी आए दिन युवाओं की हत्याएं होती रहती हैं. अपने प्यार को खो कर मंजू अब क्या करेगी, पता नहीं. लेकिन घर वालों के लिए उस के मन में बहुत गुस्सा है. आदेश जेल चला गया है. मंजू को इस बात का दुख है कि गौतम की हत्या उसी की वजह से हुई है. मंजू जानती है कि जीवन काटने के लिए उसे शादी तो करनी ही होगी, पर क्या दिल से प्रेमी की यादों को वह निकाल पाएगी? Firozabad Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Delhi Crime News: काम आई महिला सिपाहियों की जांबाजी

Delhi Crime News: दिल्ली पुलिस पर लोग भ्रष्टाचार और न जाने कैसेकैसे आरोप लगाते हैं, लेकिन 2 महिला सिपाहियों ने जिस तरह हथियारबंद बदमाश के चंगुल से एक लड़की को छुड़ाया, उस से दिल्ली पुलिस की साख बढ़ी है.

आज महिलाओं के साथ कोई भी वारदात हो जाना आम बात हो गई है. आपराधिक तत्त्वों से महिलाएं कैसे बचें और संकट की उस घड़ी में वे क्या करें, इस बात की जानकारी कहीं और भले ही न दी जाती हो, लेकिन दिल्ली में दिल्ली पुलिस समयसमय पर इस की ट्रेनिंग के लिए कैंप लगा कर महिलाओं को ट्रेनिंग देती रहती है. दिल्ली के रैनबसेरों में भी तमाम महिलाएं रहती हैं, दिल्ली पुलिस रैनबसेरों में भी जा कर महिलाओं को जागरूक करती है.

उत्तरपश्चिमी दिल्ली के थाना आदर्शनगर की हैडकांस्टेबल जसबिनी और कांस्टेबल पूजा 28 जनवरी, 2016 को अपने रूटीन कार्यक्रम के तहत लालबाग स्थित रैनबसेरे में गई थीं. वहां की महिलाओं को जागरूकता का पाठ पढ़ा कर वे दोपहर को थाने लौट रही थीं, तभी 2 लड़के दौड़ते हुए उन के पास आए. दोनों ही बुरी तरह हांफ रहे थे. जसबिनी ने पूछा, ‘‘क्या बात है, कोई परेशानी है क्या?’’

एक लड़के ने सांसों पर काबू पाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘मैडम, फुटपाथ पर नीली कैप लगाए जो लड़का लड़की के साथ जा रहा है, उस ने उस लड़की का अपहरण कर लिया है.’’

जसबिनी ने उस ओर देखा तो सिर पर नीली कैप लगाए एक लड़का आराम से एक लड़की के साथ चला जा रहा था. उसे देख कर कहीं से भी नहीं लग रहा था कि उस के साथ जो लड़की जा रही है, उस का अपहरण किया गया है. लड़की उस के साथ चुपचाप चली जा रही थी. यही लग रहा था कि वह अपनी मरजी से उस के साथ जा रही है.

जसबिनी ने कहा, ‘‘पागल हो क्या? दिनदहाड़े भीड़ भरी सड़क पर कोई इस तरह अपहरण कर के आराम से चलेगा. अगर उस का अपहरण हुआ होता तो वह चीखतीचिल्लाती?’’

‘‘मैडम, वह शोर इसलिए नहीं मचा रही है, क्योंकि लड़के ने उस की पसलियों से तमंचा सटा रखा है.’’ लड़के ने कहा.

उस की इस बात पर जसबिनी चौंकी. उन्होंने साथ खड़ी कांस्टेबल पूजा की ओर देखा. इस के बाद दोनों सड़क पार उस नीली कैप वाले लड़के का पीछा करने लगीं. जब दोनों उस लड़के के नजदीक पहुंचीं तो उन्होंने देखा सचमुच वह अपने साथ चल रही लड़की की कमर से तमंचे की नाल सटा चल रहा था. उस लड़के को इस बात का पता नहीं था कि दिल्ली पुलिस की 2 महिला कांस्टेबल उस का पीछा कर रही हैं. वह लापरवाही से चला जा रहा था. जसबिनी ने एकाएक फुरती से लड़के के हाथ से तमंचा छीन लिया. उस ने पलट कर देखा तो पुलिस को देख कर डर गया और तेजी से भागा. जसबिनी और पूजा ने भी उस के पीछे दौड़ लगा दी.

उस युवक ने भागते हुए ही अपनी पैंट की जेब से एक डिबिया निकाली और उस में रखी गोलियां हथेली पर रख कर मुंह में डाल लीं. इसी के साथ वह ठोकर खा कर गिर गया. तब तक जसबिनी और पूजा उस के पास पहुंच गईं. उन्होंने लड़के को पकड़ लिया. जसबिनी ने उस का मुंह खोल कर अंगुलियों से कुछ गोलियां बाहर निकाल लीं, लेकिन तब तक कुछ गोलियां उस ने निगल ली थीं, जिस से उस की आंखें मुंदने लगीं थीं.

कांस्टेबल पूजा ने मोबाइल फोन द्वारा इस बात की जानकारी थानाप्रभारी संजय कुमार को दे दी थी. चूंकि थाना लालबाग कुछ ही दूरी पर था, इसलिए थानाप्रभारी कुछ पुलिसकर्मियों को ले कर कुछ ही देर में वहां पहुंच गए. तब तक वह लड़का बेहोश हो गया था और उस के साथ जो लड़की थी, वह रो रही थी. इस बीच वहां तमाम तमाशबीन इकट्ठा हो गए थे. संजय कुमार लड़के को तुरंत अपनी गाड़ी से जहांगीरपुरी स्थित बाबू जगजीवनराम मेमोरियल अस्पताल ले गए. डाक्टरों ने उस का उपचार शुरू कर दिया. डाक्टरों ने बताया कि लड़के ने सल्फास की गोलियां खाई थीं. डाक्टरों ने किसी तरह लड़के की जान बचा ली.

पुलिस ने लड़के की तलाशी ली तो उस की पैंट की जेब से एक ड्राइविंग लाइसेंस, जिंदा कारतूस और एक सुसाइड नोट मिला. ड्राइविंग लाइसेंस पर नाम सुनील लिखा था. वह लाइसेंस उसी लड़के का था. सुसाइड नोट में लड़की की हत्या करने के बाद खुद के सुसाइड करने की बात लिखी थी. सुनील कौन था, वह जिस लड़की को अपहरण कर के ले जा रहा था, वह कौन थी और उस ने उस का अपहरण क्यों किया था? सुनील के होश में आने पर पुलिस ने उस से पूछताछ की तो उस लड़की के अपहरण की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी.

24 वर्षीय सुनील थाना आदर्शनगर के अंतर्गत आजादपुर का रहने वाला था. वह औटो चलाता था. करीब 8 साल पहले उस का पत्नी से तलाक हो गया था, जिस के बाद वह शराब पीने लगा था. वह जिस लड़की का अपहरण कर के ले जा रहा था, उस का नाम अनीता था. 22 वर्षीया अनीता अपने परिवार के साथ सुनील के पड़ोस में रहती थी. वह वजीरपुर स्थित एक फैशन डिजाइन संस्थान में प्रशिक्षण ले रही थी. आसपास रहने की वजह से सुनील और अनीता का एकदूसरे के यहां आनाजाना था. इसी वजह से अनीता सुनील को भइया और उस की पत्नी को भाभी कहती थी. सुनील भी उसे बहन जैसा स्नेह देता था. यही नहीं, रक्षाबंधन पर वह उस से राखी भी बंधवाता था.

सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. समस्या तब पैदा हुई, जब सुनील के घर में कलह होने लगी. कलह की ही वजह से उस की पत्नी उसे छोड़ कर मायके चली गई. उस ने उस के साथ रहने से साफ मना कर दिया. बाद में उन का तलाक हो गया. सुनील शराब तो पहले से ही पीता था, पत्नी से तलाक होने के बाद वह और ज्यादा शराब पीने लगा. पत्नी से तलाक के बाद वह महिला का साथ पाने के लिए तरसने लगा. उसी बीच उसे अनीता का ध्यान आया. वह उस की कोई सगी बहन तो थी नहीं, मुंहबोली थी. इसलिए बहनभाई के रिश्ते को दरकिनार कर वह उस के बारे में उलटीसीधी बातें सोचने लगा. एकतरफा प्यार करते हुए वह उसे पाने के तिकड़म भिड़ाने लगा.

एक दिन सुनील ने शर्मोहया त्याग कर अपने मन की बात अनीता से कह दी. वह उसे भाई मानती थी, इसलिए उस के मुंह से प्यार की बात सुन कर हक्कीबक्की रह गई. उस ने सुनील से कह दिया कि वह उसे भाई समझती है, इसलिए वह अपने मन से यह फालतू की बात निकाल दे. पर सुनील की समझ में उस की बात नहीं आई. वह उलटा अनीता को ही समझाने की कोशिश् करने लगा. तब हार कर अनीता ने उस की शिकायत अपने मातापिता से कर दी. उन्होंने सुनील को काफी लताड़ा.

मगर सुनील अपने मन से अनीता के अक्स को निकाल नहीं सका. वह लगातार उस से प्रेमनिवेदन करता रहा. अनीता के घर वालों को जब लगा कि सुनील इस तरह से नहीं मानेगा तो 22 जुलाई, 2015 को अनीता अपने मांबाप के साथ थाना आदर्शनगर पहुंची और सुनील की शिकायत कर दी. पुलिस ने भादंवि की धारा 354 के तहत सुनील को गिरफ्तार कर के जेल भेज दिया. लेकिन 3 महीने बाद सुनील जमानत पर जेल से छूट गया.

जेल जाने के बाद भी सुनील के सिर से प्यार का भूत नहीं उतरा. अब वह अनीता को धमकी भी देने लगा. उस ने उस से साफसाफ कह दिया कि अगर वह उस की न हुई तो वह उसे मार कर खुद भी मर जाएगा. अनीता उसे शराबी समझती थी. इसलिए उस ने उस की धमकियों को कभी गंभीरता से नहीं लिया. 28 जनवरी, 2016 की दोपहर 1 बजे के आसपास अनीता वजीरपुर स्थित फैशन डिजाइन संस्थान से बाहर आई तो उस ने सुनील को सामने सड़क पर खड़े देखा. वह चुपचाप बसस्टाप की ओर चलने लगी. सुनील भी उस के पीछेपीछे चलने लगा. अनीता ने जब पीछे मुड़ कर देखा तो सुनील उस के पीछे आ रहा था. उस ने रुक कर गुस्से में कहा, ‘‘मेरे पीछे क्यों पड़े हो, फिर जेल जाने का इरादा है क्या?’’

‘‘मैं तुम से आखिरी बार पूछ रहा हूं कि मुझ से शादी करोगी या नहीं?’’ सुनील ने पूछा.

‘‘लगता है, तुम ऐसे नहीं मानोगे. तुम्हारी शिकायत फिर पुलिस से करनी पड़ेगी,’’ अनीता ने कहा.

इतना कह कर अनीता आगे बढ़ी थी कि सुनील ने झपट कर उसे पकड़ लिया और तमंचा लहराते हुए कहा, ‘‘तुझे मेरे साथ अभी चलना होगा. ध्यान रहे, रास्ते में शोर मचाया तो तुझे मार कर खुद को भी गोली मार लूंगा.’’

तमंचा देख कर अनीता बुरी तरह से डर गई. सुनील ने तमंचे की नाल अनीता की कमर से सटा दी. डर के मारे अनीता उस के साथसाथ चलने लगी. तमंचा किसी को दिखाई न दे, इस के लिए उस ने उस के ऊपर अनीता के गले में पड़ी चुन्नी डाल ली. वह उसे वजीरपुर स्थित झुग्गी बस्ती में ले गया. वहां उस का एक परिचित रहता था, जो उस समय वहां नहीं मिला. वहीं पर अनीता ने 2 लड़कों से इशारों ही इशारों में मदद की गुहार लगाई.

तमंचा देख कर उन लड़कों की सुनील से कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई. सुनील तमंचे की नाल अनीता की कमर पर सटा कर फिर चलने लगा. दोनों लड़के उस का पीछा करने लगे. जब वह उसे ले कर लालबाग के पास पहुंचा तो उन लड़कों की नजर 2 महिला कांस्टेबलों पर पड़ गई. वे दोनों दौड़ कर उन के पास पहुंचे और उन्हें पूरा वाकया बता दिया. हैडकांस्टेबल जसबिनी और कांस्टेबल पूजा ने साहस का परिचय दे कर सुनील के हाथ से तमंचा छीन लिया था. उन के इन अदम्य साहस ने अनीता की जान तो बचाई ही, साथ ही एक सनकी प्रेमी को जेल पहुंचा दिया.

पुलिस ने सुनील को भादंवि की धारा 364/365/307 और 25/54/27 के तहत गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. जसबिनी को बहादुरी विरासत में ही मिली थी. उन के पिता भारतीय सेना में थे. पूजा के पिता सुरेंद्र कुमार भी विदेश मंत्रालय में नौकरी करते थे. डीसीपी विजय सिंह और एसीपी रविंद्र कुमार त्यागी को जब इन दोनों महिला सिपाहियों की बहादुरी की जानकारी हुई तो दोनों पुलिस अधिकारी थाना आदर्शनगर पहुंच गए. उन्होंने उन के साहसपूर्ण कार्य की सराहना की. इस के बाद तो ये बहादुर महिला सिपाही मीडिया की सुर्खियां बन गईं.

तत्कालीन पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी ने भी हैडकांस्टेबल जसबिनी और कांस्टेबल पूजा को अपने औफिस बुला कर उन के इस साहस के लिए उन्हें सम्मानित किया. यही नहीं, उन्होंने दोनों को आउट औफ टर्न प्रमोशन देने की भी घोषणा की. काश जसबिनी और पूजा की तरह दिल्ली पुलिस के अन्य लोग इसी तरह मुस्तैदी से काम करें तो यकीनन दिल्ली में अपराधियों के मन में पुलिस के प्रति भय पैदा हो जाएगा. Delhi Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, अनीता बदला हुआ नाम है

Hindi Crime Story: गुनाह जो छिप न सका

Hindi Crime Story: पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा ने दूसरी पत्नी पार्वती की भी हत्या कर आत्महत्या का रूप देना चाहा. पर लाख छिपाने पर भी उस का गुनाह छिप न सका.

24 मार्च, 2016 को शाम करीब 6 बजे 2 युवक एक युवती को एम्स के ट्रामा सेंटर ले कर पहुंचे. उन में से एक का नाम रामबीर और दूसरे का कपिल शर्मा था. जिस युवती को वे ट्रामा सेंटर ले कर आए थे, वह कपिल शर्मा की 27 वर्षीया पत्नी पार्वती थी. कपिल ने डाक्टरों को बताया कि पार्वती आत्महत्या के लिए गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से झूल गई थी.

आपातकालीन सेवा में तैनात डाक्टर पार्वती का परीक्षण करने लगे तो उन्हें वह मृत दिखाई दी. उस की सांसें काफी देर पहले ही बंद हो चुकी थीं और शरीर ठंडा हो चुका था. उस के गले में चारों तरफ रस्सी के बांधने का निशान था. इस के अलावा उस के हाथपैर, ठोड़ी, चेहरे, होंठ आदि पर चोट के निशान थे. उस का होंठ कटा हुआ था, जिस से खून भी निकला था. उस के पति कपिल शर्मा के भी चेहरे व अन्य जगहों पर चोट के निशान थे, जिन से खून छलक आया था. वह भी अपना इलाज करने को कह रहा था.

चोटों के बारे में कपिल ने बताया कि जब वह पत्नी को इलाज के लिए बाइक से अस्पताल ला रहा था तो महारानीबाग टी पौइंट पर एक आटोरिक्शा से एक्सीडेंट हो गया था, जिस से उसे और पत्नी को चोटें आई थीं. इस बात की पुष्टि उस के साथ आए युवक रामबीर ने भी की. पार्वती के गले के चारों तरफ जो निशान था, उस से डाक्टरों को शक हुआ, क्योंकि गले में फंदा लगा कर आत्महत्या के अधिकांश मामलों में फंदे का निशान पूरे गले पर नहीं आता. निशान करीब आधे गले तक ही आता है, इसलिए डाक्टरों ट्रामा सेंटर में मौजूद पुलिस चौकी में इस संदिग्ध केस की सूचना दे दी.

डाक्टरों की सूचना पर कांस्टेबल जगबीर पुलिस चौकी में मौजूद इमरजेंसी वार्ड में पहुंच गए. उन्होंने डाक्टरों से बात की. मृतका के गले का निशान देख कर उसे भी शक हुआ. कपिल शर्मा दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूर नगर में रहता था, इसलिए मामले की एमएलसी तैयार कर जगबीर ने सूचना न्यू फ्रैंड्स कालोनी थाने को दे दी. सूचना मिलने पर थाने से एसआई संतोष पाबरी, लोकेंद्र त्यागी, कांस्टेबल संदीप और कांस्टेबल कमलेश ट्रामा सेंटर के लिए निकल पड़े.

पुलिस ने सब से पहले मृतका पार्वती की लाश का मुआयना किया. इमरजेंसी वार्ड में भरती उस के पति कपिल शर्मा का इलाज चल रहा था. उस से पूछताछ की तो उस ने उन्हें वही बताया, जो पहले बताया था. पुलिस को कपिल की बातों पर शक हो रहा था. उसी बीच थानाप्रभारी कुलदीप सिंह भी ट्रामा सेंटर पहुंच गए. उन्होंने भी लाश का मुआयना कर कपिल से पूछताछ की.

कपिल शर्मा के साथ अस्पताल में मौजूद रामबीर से थानाप्रभारी ने बात की तो उस ने बताया कि कपिल के शोर मचाने पर जब वह मोहल्ले के दूसरे लोगों के साथ उस के कमरे में गया तो पार्वती बैड पर पड़ी थी और कपिल उस के पास बैठा रो रहा था. पूछने पर कपिल ने बताया था कि पार्वती गले में दुपट्टा बांध कर पंखे से लटकी हुई थी. चाकू से दुपट्टा काट कर उस ने उसे उतारा था. उस समय कपिल शर्मा गहरे दुख में था, इसलिए अस्पताल से छुट्टी हो जाने के बाद ही पुलिस ने उस से पूछताछ करना जरूरी समझा. मामला आत्महत्या का है या हत्या का, यह बात पोस्टमार्टम के बाद ही साफ होनी थी. इसलिए लाश को पोस्टमार्टम के लिए एम्स की मार्च्युरी भेज दिया गया.

कुलदीप सिंह कपिल शर्मा के तैमूरनगर स्थित कमरे का मुआयना करने पहुंचे. उस का कमरा पहली मंजिल पर था. वह एक छोटा सा कमरा था, जिस में दरवाजे के दाहिनी ओर एक बैड डला था. कोने में प्लास्टिक का छोटा कूलर रखा था. पुलिस को कमरे में सामान बिखरा हुआ मिला. वहीं पर दुपट्टे के 2 टुकड़े मिले और उन टुकड़ों के पास ही चाकू पड़ा मिला. कोने में बिजली का करीब एक 2 मीटर तार का टुकड़ा भी मिला. बिजली का स्विच बोर्ड भी टूटा हुआ मिला. कमरे के जिस पंखे से लटक कर फांसी लगाने की बात कही गई, उन्होंने उस पंखे का भी निरीक्षण किया. वह पंखा एकदम सहीसलामत था. उस पंखे पर धूल जमी थी.

थानाप्रभारी ने जांच के लिए फोरैंसिक विभाग के फिजिकल डिवीजन की एक्सपर्ट टीम और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया.  दोनों टीमों ने घटनास्थल पर पहुंच कर जांच की और सबूत जुटाए. जिस दुपट्टे से कपिल ने फांसी लगाने की बात की थी, फोरैंसिक टीम ने दुपट्टे के उन दोनों टुकड़ों की जांच की. पता चला कि वह दुपट्टा इतना छोटा था कि उस से गले और पंखे में गांठें नहीं बंध सकती थीं. अब तक जो भी जांच हुई, उस से पार्वती के आत्महत्या करने की कहानी झूठी लग रही थी. कुल मिला कर शक की सूई उस के पति कपिल शर्मा पर ही जा रही थी. अगले दिन पुलिस को पार्वती की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में बताया गया था कि उस की मौत फांसी लगा कर नहीं, बल्कि मुंह व नाक दबा कर की गई थी.

इतना ही नहीं, उस के शरीर पर चोटों के 26 निशान भी पाए गए थे. पुलिस का शक सही निकला. कपिल भी ट्रामा सेंटर से डिस्चार्ज हो चुका था. वह कहीं भाग न जाए, इसलिए पार्वती के अंतिम संस्कार के समय पुलिस मौजूद रही. पत्नी का क्रियाकर्म करने के बाद पुलिस ने 26 मार्च को थाने बुला कर कपिल शर्मा से पूछताछ की. अपना वही पुराना राग अलापता रहा कि पार्वती ने खुदकुशी की है. लेकिन पुलिस के पास इतने सबूत थे कि उन के आगे वह टिक नहीं सका.

कपिल शर्मा को लगा कि वह अपने बुने जाल में फंस चुका है तो उस ने सच बोलना ही उचित समझा. वह बोला, ‘‘सर, मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मैं ने ही गुस्से में पार्वती की हत्या की थी. लेकिन यह सब अचानक हो गया था.’’

इस के बाद उस ने पार्वती की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार निकली—

32 वर्षीय कपिल शर्मा मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर का रहने वाला था. हाईस्कूल पास करने के बाद वह आगे की पढ़ाई नहीं कर सका तो पिता के साथ खेती के काम में लग गया. कपिल दबंग किस्म का था. छोटीछोटी बातों पर वह मोहल्ले में लोगों से झगड़ बैठता था. उस की इस आदत से घर वाले भी परेशान थे. वह उसे समझासमझा कर हार चुके थे, पर उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता था. तब पिता ने यह सोच कर उस की शादी कर दी कि शायद घरगृहस्थी में बंधने के बाद वह सुधर जाए. लेकिन शादी के बाद भी कपिल के स्वभाव में कोई फर्क नहीं आया बल्कि शादी के कुछ दिनों बाद ही उस का अपनी पत्नी से भी झगड़ा रहने लगा. दोनों के बीच की दूरियां बढ़ने लगीं. हालात यहां तक पहुंच गए कि उस ने शादी के डेढ़-दो साल बाद ही पत्नी को जला कर मार दिया. यह सन 2004 की बात है.

कपिल ने इस मामले को भी आत्महत्या का रूप देने की कोशिश की थी, पर ससुराल वालों के रिपोर्ट करने के बाद कपिल को जेल जाना पड़ा. कोर्ट में केस चला, जिस में उस का दोष सिद्ध हो गया और उसे 7 साल की सजा हुई. जेल के नियम और कानूनों का सही से पालन करने की वजह से उसे साढ़े 4 साल बाद ही रिहाई मिल गई. जेल से छूटने के बाद कपिल अपने एक दोस्त के साथ काम की तलाश में दिल्ली चला आया. उस का दोस्त दिल्ली के एक निजी अस्पताल में नौकरी करता था. दोस्त कपिल के लिए भी नौकरी ढूंढने लगा, लेकिन उस समय उसे नौकरी नहीं मिली.

उसी दौरान हजरत निजामुद्दीन क्षेत्र के एक पुरुष मरीज की देखभाल के लिए एक नर्सिंग अटेंडेंट की जरूरत थी. कपिल को कोई काम नहीं मिल रहा था तो वह यह काम करने को तैयार हो गया. कपिल अस्पताल की ओर से उस मरीज की देखभाल करने के लिए हजरत निजामुद्दीन चला गया. रहने के लिए उसे उसी कोठी में एक कमरा भी मिल गया था. उसी कोठी में पार्वती नाम की एक युवती खाना बनाने आती थी. 21 साल की पार्वती मूलरूप से नेपाल की थी. वह शादीशुदा थी. उस के 2 बच्चे भी थे.

पार्वती भी तेजतर्रार थी, पति से उस की नहीं बनती थी. कुछ दिनों पहले ही वह गुस्से में पति को छोड़ कर दिल्ली चली आई थी. दोनों बच्चों को भी वह पति के पास ही छोड़ आई थी. दिल्ली आ कर वह कोठियों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. कपिल और पार्वती एक ही जगह काम करते थे, इसलिए उन की दोस्ती हो गई थी. चूंकि कोठी में दोनों साथसाथ रहते थे, इसलिए उन की नजदीकियां बढ़ती गईं. फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब उन के बीच शारीरिक संबंध बन गए.

इस के बाद उन्होंने एक मंदिर में शादी कर ली. शादी के बाद वे दक्षिणपूर्वी दिल्ली के थाना न्यू फ्रैंड्स कालोनी के तहत तैमूरनगर में किराए का कमरा ले कर रहने लगे. यह बात सन 2011 की है. कपिल और पार्वती दोनों ही कमा रहे थे, इसलिए उन के सामने कोई आर्थिक परेशानी नहीं थी, पर एक चिंता उन्हें सताए जा रही थी कि कई साल बाद भी उन के कोई बच्चा नहीं हुआ. पार्वती को कई बार गर्भ ठहरा भी, लेकिन 1-2 महीने बाद ही किसी वजह से गर्भपात हो जाता था.

बारबार गर्भ गिरने से पार्वती को तो दुख होता ही था, कपिल भी परेशान रहने लगा. इस के लिए वह हर बार पत्नी पार्वती को ही दोषी मानता था. कपिल ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी. नशे में धुत हो कर घर लौटना जैसे उस की आदत हो चुकी थी. पार्वती उसे ज्यादा शराब पीने को मना करती तो वह उस से झगड़ा करने लगता. कभीकभार बात बढ़ने पर वह उस की पिटाई भी कर देता. इसी दौरान हजरत निजामुद्दीन के बाद कपिल को पीतमपुरा में किसी मरीज की देखभाल करने का काम मिल गया. वह वहां अपनी मोटरसाइकिल से आताजाता था. जब कपिल पिता नहीं बन सका तो सोचने लगा कि पार्वती के अंदर ही कोई कमी है, जिस की वजह से उस के गर्भ में बच्चा नहीं रुक रहा.

कपिल ने पार्वती को छोड़ने की धमकी दी तो वह उस के सामने गिड़गिड़ाई, ‘‘मैं ने तुम्हारे लिए अपने पति और बच्चों तक को छोड़ दिया और तुम इस तरह की बात कर रहे हो. बताओ, ऐसे में मैं कहां जाऊंगी.’’

‘‘तुम भाड़ में जाओ. ऐसी औरत का क्या फायदा, जो बच्चा तक न दे सके.’’ कपिल ने गुस्से में कहा.

‘‘यह कोई मेरे हाथ में तो है नहीं, जब इलाज के बाद भी बच्चा नहीं रुक रहा तो मैं क्या करूं.’’ वह बोली.

‘‘अब तू एक ही शर्त पर यहां रहेगी. मैं चाहे कुछ भी करूं, तू मेरे काम में दखल नहीं देगी.’’ कपिल ने फरमान सुनाया.

पार्वती की मजबूरी थी. उस ने भी कह दिया कि वह अब उस से कुछ नहीं कहेगी. इस के बाद कपिल घर कितने बजे लौटता, वह कहां जाता, पार्वती इस बारे में उस से कुछ नहीं पूछती. बस वह उसे समय पर खाना बना कर दे देती थी. लेकिन इसी साल मार्च के महीने में कपिल को जब पता चला कि पत्नी को फिर से गर्भ ठहर गया है तो वह खुश हुआ. उस के मन में फिर से उम्मीद की किरण जाग उठी. उस ने पत्नी के प्रति अपना व्यवहार बदल दिया. वह उस के साथ प्यार से पेश आने लगा. इतना ही नहीं, वह उस के खानपान का भी ध्यान रखने लगा.

लेकिन होली से 2-3 दिन पहले अचानक फिर से गर्भपात हो गया. यह उन दोनों के लिए बड़े दुख की बात थी. इस के बाद कपिल की तो जैसे उम्मीद ही टूट गई. होली के अगले दिन धुलेंदी थी. उस दिन बहुत से लोग रंग में सराबोर और नशे में चूर होते हैं. कपिल उस दिन अपने काम से दोपहर बाद ढाई बजे घर लौट आया था. उस समय भी वह शराब पीए हुए था और शराब की एक बोतल अपने साथ लाया था. कमरे में आते ही वह पत्नी के साथ गालीगलौज करने लगा. पार्वती पहले तो सब बरदाश्त करती रही, जब बातें बरदाश्त से बाहर हुईं तो उस ने जवाब देने शुरू कर दिए.

पार्वती का बोलना ही था कि कपिल का गुस्सा उस पर फूट पड़ा. उस ने उस की लातघूंसों से पिटाई शुरू कर दी. इतना ही नहीं, गुस्से में तमतमाए कपिल ने अपने हाथों से उस की नाक और मुंह दबा कर हत्या कर दी. पत्नी के मर जाने के बाद कपिल का नशा उतर गया. अब उसे पुलिस द्वारा पकड़े जाने का डर था. पुलिस से बचने का वह उपाय सोचने लगा. तभी उस के दिमाग में आया कि यदि वह इस हत्या को आत्महत्या का रूप दे देगा तो वह आसानी से बच सकता है.

आत्महत्या का केस दिखाने के लिए उस ने कमरे में पड़े बिजली के तार को पत्नी की गरदन में डाल कर दोनों हाथों से कस दिया, जिस से उस के गले पर निशान पड़ जाएं. फिर पत्नी के एक दुपट्टे को चाकू से काट कर उसे लाश के पास ही डाल दिया. यह काम करने के बाद वह कमरे का दरवाजा भिड़ा कर हाथ में शराब की बोतल लिए पहली मंजिल से नीचे उतर आया. नीचे कुछ दोस्त मिले तो उन के साथ बैठ कर उस ने शराब पी. 2 पैग पी कर वह दोस्तों के बीच से उठ कर पास में स्थित पान की दुकान पर गया. वहां से पान खाते हुए वह सीधे अपने कमरे पर चला गया.

कमरे में घुसते ही उस ने योजनानुसार शोर मचाना शुरू कर दिया. शोर सुन कर आसपड़ोस के लोग उस के यहां इकट्ठा हुए तो उस ने उन्हें बताया कि पत्नी गले में दुपट्टे का फंदा बना कर पंखे से झूल गई. बड़ी मुश्किल से उस ने चाकू से दुपट्टा काट कर उसे उतारा है. उस समय पार्वती के शरीर में गरमाहट थी. लोगों के कहने पर वह अपने दोस्त रामबीर के साथ पत्नी को एम्स के ट्रामा सेंटर ले गया.

मोटरसाइकिल रामबीर चला रहा था. महारानी बाग के पास उस की बाइक एक औटोरिक्शा से भिड़ गई. रामबीर तो किसी तरह संभल गया, लेकिन कपिल और उस की मृत पत्नी को चोटें आईं. उसी दौरान औटोरिक्शा वाला वहां से भाग गया. जैसे ही वह ट्रामा सेंटर में पार्वती को ले कर पहुंचे, डाक्टरों ने उस के गले पर लगे निशान से ही पहचान लिया कि यह केस आत्महत्या का नहीं हो सकता. कपिल शर्मा से पूछताछ के बाद पुलिस ने 26 मार्च को उसे कोर्ट में पेश कर 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि में जरूर सबूत जुटा कर उन्होंने उसे फिर से न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. मामले की विवेचना थानाप्रभारी कुलदीप सिंह कर रहे हैं.

पहली पत्नी की हत्या के आरोप में सजा काट चुके कपिल शर्मा को एहसास होना चाहिए था कि जुर्म चाहे कितने भी शातिराना तरीके से किया जाए, वह उजागर हो ही जाता है. पार्वती से शादी करने के बाद उसे फिर से अपनी बाकी की जिंदगी हंसीखुशी से बिताने का मौका मिला था, लेकिन उस की जिद और नासमझी ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा. यदि पार्वती के गर्भ में बच्चा नहीं ठहर रहा था तो उसे किसी अच्छे डाक्टर से इलाज कराना चाहिए था. बहरहाल, कपिल शर्मा के असंयमित काम की वजह से पार्वती को तो अपनी जान से हाथ धोना ही पड़ा, वह खुद भी सलाखों के पीछे पहुंच गया. Hindi Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Mumbai Crime: गले की फांस

Mumbai Crime: सबीना से संबंध बनाते समय नसीम ने कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन वह उस के गले की फांस बन जाएगी. जिस डर से उस ने उस फांस को निकालना चाहा, आखिर में वही हुआ.

शब्बीर खान के परिवार में पत्नी जन्नतुनिशां के अलावा 26 साल की विवाहिता बेटी सबीना कौसर और 2 साल की नातिन जिया थी. पति से तलाक होने के बाद सबीना बेटी के साथ मांबाप के साथ ही रह रही थी. शब्बीर खान अपने इस छोटे से परिवार के साथ मुंबई के उपनगर कुर्ला वेस्ट, संजय नगर, चांदतारा पुलिस चौकी के पास स्थित चाल नंबर डी-6 के रूम नंबर 6 में रहते थे. उन का अपना खुद का छोटा सा व्यवसाय था.

14 जनवरी, 2016 की शाम के यही कोई 6 बजे जब जन्नतुनिशां घर के कामों में व्यस्त थीं, तभी सबीना मजार पर जाने की बात कह कर घर से निकली तो लौट कर नहीं आई. वह लगभग रोजाना शाम को मजार पर जाती थी, इसलिए उस दिन भी जब उस ने मजार पर जाने की बात कही तो जन्नतुनिशां ने इजाजत दे दी थी. रोजाना सबीना मजार से जल्दी ही लौट आती थी, लेकिन उस दिन जब उसे लौटने में देर होने लगी तो जन्नतुनिशां को थोड़ा चिंता हुई. सबीना की बेटी जिया भी बारबार मम्मी को पूछ रही थी. थोड़ी देर तक तो जन्नतुनिशां को लगा कि सबीना किसी परिचित के यहां चली गई होगी, लेकिन जब समय ज्यादा होने लगा तो उन्हें चिंता होने लगी.

शब्बीर खान के आने पर सबीना की खोज शुरू हुई. पहले आसपड़ोस वालों से, उस के बाद जानपहचान तथा नातेरिश्तेदारों से पता किया गया. जब सबीना के बारे मे कहीं से कोई जानकारी नहीं मिली तो पतिपत्नी घबरा गए. सबीना की बेटी ऊपर से परेशान किए थी. शब्बीर खान और जन्नतुनिशां को जब कोई राह नहीं सूझी तो सवेरा होते ही उन्होंने थाने का रुख किया. थाना घाटकोपर में उन्होंने सबीना की गुमशुदगी दर्ज करा दी. गुमशुदगी दर्ज होते ही पुलिस ने काररवाई शुरू कर दी. लेकिन कोई सूत्र हाथ न लगने से पुलिस भी उस के बारे में कुछ पता नहीं कर सकी. बेटी के बारे में पता न चलने से शब्बीर खान और जन्नतुनिशां की चिंता और परेशानी बढ़ती जा रही थी.

शब्बीर खान लगभग रोज ही थाने जाते थे, लेकिन वहां उन्हें निराशा के अलावा कुछ नहीं मिलता. इसी तरह 15 दिन बीत गए, लेकिन सबीना के बारे में कुछ पता नहीं चला. अब शब्बीर खान और जन्नतुनिशां के मन में किसी अनहोनी की आशंका होने लगी थी. उसी बीच मुंबई सायन अटौप हिल क्राइम ब्रांच यूनिट-4 के हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे को उन के किसी मुखबिर ने बताया कि एक आदमी किसी महिला की हत्या कर के उस के सारे गहने मुंबई में बेचने की कोशिश कर रहा है.

गंगाधर पिलवटे ने यह बात सीनियर इंसपेक्टर अशोक जाधव को बताई तो उन्होंने इंसपेक्टर सुनील जाधव के नेतृत्व में एसआई प्रदीप गायकवाड, अरुण जाधव, हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे, सुभाष बागुल, दीपक मांढरे, संभाजी सांलुके, प्रताप चौहाण की एक टीम बना कर उस आदमी पर नजर रखने के लिए लगा दिया, साथ ही इस  बात की जानकारी अधिकारियों को भी दे दी. जहांजहां मुखबिर द्वारा बताए आदमी के मिलने की संभावना थी, गंगाधर पिलवटे अपने साथियों के साथ वहांवहां नजर रखने लगे. कुर्ला, विद्याविहार, माटुंगा रेलवे स्टेशनों के साथसाथ धारावी बस्ती पर उन की खास नजर थी. लेकिन कई दिनों की अथक मेहनत के बाद भी मुखबिर द्वारा बताया गया वह आदमी उन की नजर में नहीं आया.

हैडकांस्टेबल गंगाधर पिलवटे निराश होने लगे थे कि 2 फरवरी, 2016 की दोपहर को मुखबिर के इशारे पर उन्होंने क्रीम रंग की शर्ट और खाकी रंग की पैंट पहने एक आदमी को सायन धारावी की बस्ती की ओर जाते हुए पकड़ लिया. पूछने पर उस ने अपना नाम नसीम खान बताया. उस समय वह भोपाल से आ रहा था. पुलिस टीम ने कुछ लोगों की उपस्थिति में नसीम खान की तलाशी ली तो उस के बैग से ट्रेन की 2 टिकटों के अलावा मैरून रंग के 2 डिब्बे मिले, जिन में से एक डिब्बे में प्लास्टिक की एक थैली में चांदी के कुछ गहने थे तो दूसरे डिब्बे में सोने के 2 हार, कर्णफूल, एक अंगूठी, कान की बालियां, नाक की लौंग थी, जिन की कीमत करीब 3 लाख रुपए थी. पुलिस ने औपचारिक काररवाई कर के सारा सामान अपने कब्जे में ले लिया.

इस के बाद नसीम को क्राइम ब्रांच के औफिस लाया गया, जहां पुलिस अधिकारियों की उपस्थिति में उस से पूछताछ शुरू हुई. इस पूछताछ में उस ने बताया कि ये सारे गहने उस की पत्नी के हैं, जिन्हें बेच कर वह गांव में अपना एक दवाखाना खोलना चाहता है. लेकिन जब पुलिस ने पूछा कि वह इन गहनों को गांव में भी तो बेच सकता था, मुंबई आने की क्या जरूरत थी? पुलिस के इस सवाल का वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका.

इस के बाद पुलिस ने जब उस से इसी तरह के कई और सवाल किए तो घबरा कर उस ने सच्चाई उगल दी. उस ने कहा, ‘‘साहब, ये गहने जिस औरत के हैं, उस की मैं ने हत्या कर दी है.’’

‘‘कहां की है हत्या?’’

‘‘साहब, गांव में.’’

‘‘हत्या गांव में की है और गहने यहां बेचने चला आया?’’ अशोक जाधव ने हैरानी से पूछा.

‘‘साहब, वह औरत यहीं मुंबई में रहती थी. मैं भी यहीं रहता था.’’ नसीम ने कहा.

‘‘क्या नाम था उस का, मुंबई में वह कहां रहती थी?’’

‘‘उस का नाम सबीना कौसर था. मुंबई में वह कुर्ला वेस्ट में रहती थी.’’

‘‘चलो, अच्छा पूरी कहानी विस्तार से बताओ?’’ अशोक जाधव ने कहा.

इस के बाद नसीम खान ने सबीना से प्रेम, उस की हत्या और मुंबई आ कर गहने बेचने की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी.

38 वर्षीय नसीम खान उर्फ वैद्यराज मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला फतेहपुर की थानातहसील ललौली का रहने वाला था. उस के पिता सुलेमान खान मुंबई के सायन धारावी की बस्ती पुट्टागली में रहते थे. वह खटाऊ मिल्स का कबाड़ खरीद कर बाहर बेचते थे. उन की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं थी, लेकिन खराब भी नहीं थी. नसीम का एक भाई था शरीफ खान, जो पिता के साथ रह कर उन के व्यवसाय में हाथ बंटाता था.

नसीम खान की शादी हो चुकी थी. उस की 3 बेटियां और एक बेटा था. सुलेमान की गांव में खेती की कुछ जमीन थी, जिसे नसीम खान ही संभालता था. जब दोनों भाइयों में बंटवारा हुआ तो मुंबई की सारी प्रौपर्टी और कारोबार उस के छोटे भाई शरीफ खान को मिला तो गांव की सारी प्रौपर्टी नसीम खान के हिस्से में आई. नसीम खान ज्यादा पढ़ालिखा तो नहीं था, लेकिन दिमाग का काफी तेज था. वह गांव की जमीन पर खेती तो करवाता ही था, इस के अलावा आयुर्वेदिक दवाओं से इलाज भी करता था. अपनी दवाओं से वह गुप्तरोगों को पूरी तरह से ठीक करने का दावा करता था. इसीलिए गांव में वह वैद्यराज के नाम से मशहूर था.

उस के यहां सैक्स रोग, बवासीर, शुगर और लैंगिक कमजोरी के मरीज आते थे. इन मरीजों को उस की दवा से कितना फायदा होता था, यह तो नहीं मालूम, लेकिन नसीम खान को इन मरीजों से अच्छाखासा फायदा हो रहा था. गांव में तो नसीम खान का यह आयुर्वेदिक दवाखाना चल ही रहा था, खाली समय में वह मुंबई, दिल्ली, इंदौर, कोलकाता और भोपाल जैसे महानगरों के भी चक्कर लगा लेता था. कुछ दिनों में ही वह इन शहरों से अच्छी कमाई कर के लौट आता था. लेकिन इन शहरों में से वह सब से ठीक मुंबई को समझता था. इस की वजह यह थी कि यह महानगर उस का जानासमझा था. यहां उस का एक भाई भी रहता था, इसलिए वहां उसे किसी तरह की परेशानी नहीं होती थी. यहां उस के ग्राहकों की भी संख्या बहुत थी.

सबीना के पिता शब्बीर खान भी उसी गांव के रहने वाले थे, जिस गांव का नसीम था. शब्बीर खान के बड़े भाई गांव में ही रहते थे, इसलिए वह गांव आतेजाते रहते थे. यही वजह थी कि जब उन की बेटी सबीना शादी लायक हुई तो उन्होंने उस का निकाह गांव में ही अपने एक रिश्तेदार के बेटे से कर दिया था. लेकिन सबीना उस के साथ अधिक दिनों तक रह नहीं सकी. ससुराल वालों के अत्याचारों से तंग आ कर उस ने पति से तलाक ले लिया और मुंबई आ कर मातापिता के साथ रहने लगी. कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा, लेकिन समय के साथ शब्बीर खान और उन की पत्नी जन्नतुनिशां को बेटी की चिंता सताने लगी.

आखिर जवान बेटी को वह कब तक घर में बैठाए रखते. फिर अभी उस की उम्र ही क्या थी. पूरी जिंदगी तो वे बैठे नहीं रहते, यही सोच कर उन्होंने कौशर खान के साथ उस का दूसरा निकाह कर दिया. लेकिन दुर्भाग्य ने यहां भी सबीना का साथ नहीं छोड़ा. बेटी जिया के पैदा होने के बाद कौसर खान का व्यवहार उस के प्रति बदल गया. वह सबीना से मायके से रुपए मांग कर लाने को कहता. मांबाप की आर्थिक स्थिति को देखते हुए सबीना पैसे मांग कर लाने से मना करती तो वह मारतापीटता. कईकई दिनों तक खानापानी न देता. परेशान और दुखी हो कर सबीना बेटी को ले कर मांबाप के घर आ गई और ससुराल जाने से साफ मना कर दिया. तब से वह मांबाप के साथ ही रह रही थी.

नसीम खान और शब्बीर खान एक ही गांव के रहने वाले थे, इसलिए कभीकभार जब नसीम खान उधर से गुरजता तो शब्बीर खान से मिलने उस के घर चला जाता था. पति का घर छोड़ कर आने के बाद सबीना मर्द सुख से वंचित थी, इसलिए घर आनेजाने में नसीम खान उसे भा गया. स्वस्थ, सुंदर, हट्टेकट्टे नसीम को देख कर सबीना की कोमल भावनाएं जाग उठीं. उस का मन नसीम की नजदीकी के लिए मचल उठा. इस के बाद नसीम खान जब भी शब्बीर के घर आता, सबीना की नजरें उसी पर जमी रहतीं.

शुरूशुरू में तो नसीम ने सबीना की ओर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब उस ने सबीना की नजरों के भाव को समझा तो उस के नजदीक जाने से खुद को रोक नहीं सका. सबीना भी सुंदर और आकर्षक थी. 2 शादियों और एक बच्चे की मां होने के बाद भी उस में किसी भी पुरुष को आकर्षित करने की क्षमता थी. नसीम खान को सबीना की उतनी जरूरत नहीं थी, जितनी सबीना को उस की थी. इस की वजह यह थी कि नसीम खान महीने, 2 महीने में गांव जाता रहता था, जहां उस की पत्नी रहती थी. जबकि सबीना जब से पति से अलग हुई थी, उसे पुरुष का साथ नहीं मिला था. शायद यही वजह थी कि नसीम खान के आते ही वह उस के आगेपीछे घूमने लगती थी.

सबीना की इस मूक चाहत के आगे आखिर नसीम खान का ईमान डिग गया. वह भी सबीना की नजदीकियां पाने के लिए बेचैन हो उठा. नतीजा यह निकला कि जल्दी ही दोनों करीब आ गए. एक बार मर्यादा टूटी तो सिलसिला बन गया. कुछ दिनों तक तो नसीम और सबीना के ये संबंध छिपो रहे, लेकिन कुछ दिनों बाद पहले आसपड़ोस वालों को, उस के बाद मातापिता को बेटी के इस संबंध की जानकारी हो गई. कोई कुछ कह न सके, इस के लिए सबीना ने मातापिता और पड़ोसियों को यह कह कर चुप करा दिया कि नसीम से वह अपने किसी गुप्त रोग का इलाज करा रही है.

नसीम खान के संपर्क में आने के बाद जहां सबीना का उदास चेहरा खिल उठा था, वहीं नसीम खान का खिला चेहरा उदास रहने लगा था. इस की वजह यह थी कि नसीम खान अब इस अनैतिक संबंध को ढोना नहीं चाहता था. क्योंकि उसे लगता था कि जिस दिन सबीना और उस के संबंधों की जानकारी गांव में रह रही उस की पत्नी और बच्चों को हुई, वह कहीं का नहीं रहेगा. इस से सबीना का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, लेकिन उस की गृहस्थी में जरूर आग लग सकती है.

इसी बात से डर कर वह सबीना से दूरी बनाने लगा. घरपरिवार और समाज के डर से नसीम खान ने खुद पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया, लेकिन सबीना उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी. नसीम खान को आने में ज्यादा दिन होने लगता तो वह कहीं भी होता, सबीना उसे फोन करकर के परेशान कर देती. मजबूरन उसे सबीना से मिलने आना पड़ता. वह उसे समझाता भी, लेकिन उस के समझाने का सबीना पर कोई असर नहीं पड़ता. अब तो वह उस के साथ  रहने की जिद करने लगी थी. जबकि नसीम खान के लिए यह संभव नहीं था.

जब सबीना हाथ धो कर नसीम खान के पीछे पड़ गई तो मजबूरन वह उसे गांव ले जा कर उस से किसी भी तरह पीछा छुड़ाने के बारे में सोचने लगा, क्योंकि अब वह उस के गले की फांस बन गई थी. 14 जनवरी, 2016 को नसीम खान को गांव जाना था. जब इस बात की जानकारी सबीना को हुई तो वह भी उस के साथ जाने को तैयार हो गई. उस ने बेटी जिया को मां के पास छोड़ा और मसजिद जाने के बहाने घर से निकल कर नसीम खान के पास पहुंच गई. नसीम उसे जीप से नासिक रेलवे स्टेशन पर ले आया और वहां से कानपुर जाने वाली ट्रेन पकड़ कर कानपुर पहुंच गया. कानपुर से उस ने बस पकड़ी और रात 10 बजे ललौली स्थित अपने घर पहुंच गया.

सर्दी के दिन थे, इसलिए रात 10 बजे गांव में सन्नाटा पसरा था. इस स्थिति में नसीम खान सबीना को अपने घर ले जाने के बजाय उसे उस के चाचा के घर ले गया. वहां नसीम खान ने ही नहीं, उस के चाचाचाची ने भी सबीना को समझाया कि वह उस का पीछा छोड़ दे और मुंबई जा कर अपनी बेटी की देखभाल करे. लेकिन नसीम खान के प्यार में पागल सबीना ने किसी की कोई बात नहीं मानी. इस पर उस की अपने चाचाचाची से भी कहासुनी हो गई. कहासुनी में ही बात हाथापाई तक पहुंच गई तो सबीना का सिर दीवार से कुछ इस तरह टकराया कि वह बेहोश हो कर जमीन पर गिरी तो उसे होश नहीं आया.

इस से सभी घबरा गए. अब क्या किया जाए, इस बारे में सोचा जाने लगा. जब किसी की समझ में कुछ नहीं आया तो उन्होंने सबीना के प्रति एक क्रूर फैसला ले लिया. नसीम खान रसोई से छुरी उठा लाया और बेहोश पड़ी सबीना की गला काट कर हत्या कर दी. उस ने सिर को एक प्लास्टिक की थैली में भर कर उसे पत्थरों के साथ गांव के बाहर स्थित तालाब में फेंक दिया, जबकि धड़ को एक बोरी में भर कर दूसरे मोहल्ले में फेंक आया. उसे लगता था कि बिना सिर के कोई उस की पहचान नहीं कर सकेगा.

सबीना मुंबई से अपने साथ जो गहने, कपड़े ले गई थी, नसीम खान ने उन्हें अपने पास रख लिया. इस तरह सबीना से पीछा छुड़ा कर नसीम खान अपने घर चला गया.mसुबह जब वह सो कर उठा तो गांव में हड़कंप मचा था. गांव के चौकीदार ने धड़ मिलने की सूचना थाना पुलिस को दी तो इंसपेक्टर मनोज कुमार तुरंत घटनास्थल पर पहुंच गए. घटनास्थल की काररवाई कर के उन्होंने धड़ को पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. चूंकि धड़ की शिनाख्त नहीं हो सकी थी, इसलिए मनोज कुमार की जांच आगे नहीं बढ़ रही थी. फिर भी वह मामले की जांच में लगे थे. मामले में पुलिस की सक्रियता देख कर नसीम खान ने गांव में रुकना उचित नहीं समझा और सबीना के गहने ले कर भोपाल चला गया.

भोपाल में एक सप्ताह रह कर वह गहने बेचने के लिए मुंबई चला गया. वह अपने मकसद में कामयाब हो पाता, उस के पहले ही क्राइमब्रांच यूनिट-4 के एक मुखबिर को उस के इरादे की भनक लग गई और उस ने उसे गिरफ्तार करा लिया. पूछताछ के बार जांच अधिकारी सुनील जाधव ने नसीम खान के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर फतेहपुर के थाना ललौली पुलिस को उस के पकड़े जाने की सूचना दे दी. थाना ललौली पुलिस उसे पूछताछ के लिए ट्रांजिट रिमांड पर अपने साथ फतेहपुर ले गई. कथा लिखे जाने तक वह ललौली पुलिस की हिरासत में था. आगे की जांच इंसपेक्टर मनोज कुमार कर रहे थे. Mumbai Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

Love Crime Story: बीवी का तोहफा

Love Crime Story: शाहिद से प्यार करने वाली तरन्नुम की शादी भले ही अलाउद्दीन से हो गई थी, लेकिन उस ने उसे मन से शौहर नहीं माना था. तभी तो जब प्रेमी ने उस से पूछा कि वह वैलेंटाइन डे पर क्या तोहफा लेगी तो उस ने शौहर का सिर मांग लिया…

17 जनवरी, 2016 को रविवार था. हनीफ खां के लिए यह दिन बहुत ही महत्त्वपूर्ण था. क्योंकि उस दिन उन की जिंदगी की ख्वाहिश पूरी होने जा रही थी. उन का एक ही सपना था कि उन के जीवित रहते उन के बेटे अलाउद्दीन की शादी हो जाए. अलाउद्दीन से बड़े उन के तीनों बेटों शफरुद्दीन, जाकिर व भूरे खां की शादियां हो चुकी थीं और वे बालबच्चेदार भी थे. जिला अलीगढ़, थाना कोतवाली क्षेत्र के मोहल्ला भुजपुरा के नए बसे इब्राहिमनगर में हनीफ खां का पूरा परिवार संयुक्त रूप से एक ही मकान में रहता था.

अलाउद्दीन 20 साल का हो चुका था. हनीफ खां ने उस का रिश्ता अलीगढ़ के ही थाना सिविललाइंस के मोहल्ला हमदर्दनगर, जमालपुर निवासी अलाउद्दीन उर्फ पप्पू की बेटी तरन्नुम से तय कर दिया था. शादी की तारीख भी निश्चित हो गई थी 17 जनवरी 2016. अंतत: हनीफ खां का सपना पूरा हो गया था. 17 जनवरी, 2016 को उन का बेटा तरन्नुम से निकाह कर के उसे घर ले आया था. अलाउद्दीन खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था.

तरन्नुम 3 दिनों तक ससुराल में रही. चौथे दिन उसे मायके वाले विदा करा कर ले गए. 10 दिनों बाद अलाउद्दीन ससुराल जा कर अपनी पत्नी को ले आया. लेलिन इस के चौथे दिन ही तरन्नुम की जिद पर अलाउद्दीन को उसे उस के मायके छोड़ कर आना पड़ा. अलाउद्दीन कोई बच्चा तो था नहीं, पति के पास रहने के बजाय तरन्नुम के इस तरह मांबाप के घर जाने की जिद ने उस के मन में शक का बीज बो दिया था. जब शक की सुई घूमी तो उस की आंखों के सामने पहली रात से ले कर अब तक का सारा घटनाक्रम घूम गया.

तरन्नुम ने उसे अपने बदन को छूने तक नहीं दिया था. कभी सिर दर्द का बहना तो कभी कुछ और. उसे अपनी भाभी की बात भी याद आई. भाभी ने उसे बताया था कि तरन्नुम उस की गैरमौजूदगी में मोबाइल पर किसी से लंबीलंबी बातें करती है. जब दिमाग में इधरउधर की बातें आईं तो अलाउद्दीन मोटरसाइकिल से ससुराल जा पहुंचा और अम्मी की तबीयत खराब होने का बहाना बना कर बीवी को घर ले आया. ससुराल आने के दूसरे दिन जब तरन्नुम नहाने के लिए बाथरूम जाने लगी तो अलाउद्दीन ने उस से कहा कि वह एक जरूरी काम से बाहर जा रहा है. तरन्नुम जब बाथरूम में घुसी तो अलाउद्दीन धीरे से पलंग के नीचे घुस गया.

तरन्नुम नहा कर बाहर आई तो कमरा खाली था. मौका अच्छा था, वह बालों को तौलिए में लपेट कर बैठ गई और मोबाइल पर बातें करने लगी. अलाउद्दीन सारी बातें सुन रहा था. जब बात बरदाश्त के बाहर हो गई तो वह पलंग के नीचे से बाहर निकला और मोबाइल छीन कर बोला, ‘‘किस से बातें कर रही थी? क्या नाम है तेरे आशिक का?’’

‘‘जब सब कुछ सुन ही लिया है तो फिर पूछ क्यों रहे हो? यह पूछो कि मेरा उस से संबंध क्या है?’’ तरन्नुम ने बेशर्मी से कहा.

‘‘अगर तुम्हारे किसी और से संबंध थे तो उसी से शादी कर लेती. मेरी जिंदगी को नरक बनाने की क्या जरूरत थी?’’ अलाउद्दीन ने गुस्से में कहा.

तरन्नुम ने पलटवार करते हुए कहा, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ, आप ने हमारी बातें सुन लीं. अगर थोड़ी देर और नीचे लेटे रहते तो आप को यह भी पता चल जाता कि मैं ने उसे यह कहने के लिए फोन किया था कि अब वह मुझे भूल जाए, क्योंकि मैं किसी और की बीवी बन चुकी हूं.’’

‘‘बीवी बनने की बात तो कहने वाली थीं, लेकिन आज तक तुम ने बीवी का कौन सा संबंध निभाया है?’’ अलाउद्दीन ने तीखे स्वर में पूछा.

‘‘जब तबीयत ही ठीक नहीं थी तो कैसे संबंध निभाती.’’ कहते हुए तरन्नुम ने अलाउद्दीन को पकड़ कर पलंग पर लिटा दिया और उस के सीने पर सिर रख कर बोली, ‘‘मुझ से अनजाने में जो भी गलती हुई, वह मेरी भूल थी. लेकिन अब मैं नादान नहीं हूं. मैं जानती हूं कि मैं आप की बीवी हूं. आप के खानदान की इज्जत हूं, माफ कर दो मुझे.’’

एक तो नईनई शादी थी, दूसरे पत्नी का पहला सान्निध्य. फलस्वरूप अलाउद्दीन तरन्नुम के त्रियाचरित्र को समझ नहीं पाया. इसे पत्नी की नादानी समझ कर उसे माफ कर दिया और सीने से लगा लिया. 2 दिनों तक तरन्नुम रातदिन अलाउद्दीन से बेल की तरह लिपटीचिपटी रही. उस ने अलाउद्दीन को वह सब भूलने को मजबूर कर दिया, जो वह उस के बारे में सोचता था. तरन्नुम उसे पूरी तरह समर्पित हो गई. तीसरे दिन तरन्नुम की मां का फोन आया तो अलाउद्दीन ने ही बातें कीं. बात करने के बाद उस ने तरन्नुम से कहा, ‘‘तैयार हो जाओ, तुम्हारी अम्मी ने हमें दावत पर बुलाया है.’’

‘‘मेरा मन नहीं है, अब वहां जाने का. तुम साथ हो तो मेरे लिए दावत कोई अहमियत नहीं रखती.’’ तरन्नुम उस के गले में बाहें डाल कर बोली.

‘‘मैं ने अम्मी से कह दिया है, जाओ जल्दी तैयार हो जाओ.’’

तरन्नुम ने दिखाने के लिए भले ही कुछ भी कहा हो, पर वह मन ही मन खुश थी. अलाउद्दीन के कहने पर वह तैयार हो गई. थोड़ी देर बाद दोनों बाइक से जमालपुर के लिए रवाना हो गए. मायके जा कर तरन्नुम ने अपनी मां से कह दिया कि उसे 2-4 दिन के लिए रोक ले. उस की तबीयत ठीक नहीं है. दावत खाने के बाद जब अलाउद्दीन चलने को हुआ तो सास ने उस से मनुहार कर के कहा कि तरन्नुम को 4-5 दिनों के लिए वहीं छोड़ दे. फलस्वरूप अलाउद्दीन को बात माननी पड़ी. वह अकेला ही घर लौट आया.

दूसरे दिन सुबह जब तरन्नुम चाय बना रही थी तो उस के मोबाइल की घंटी बजी. मां ने किचन में आ कर बताया तो तरन्नुम किचन से बाहर जाते हुए बोली, ‘‘मां चाय देखना, पता नहीं कौन बद्तमीज है, चाय भी नहीं पीने देता.’’

‘‘कौन क्या, तेरा शौहर होगा. शौहर को क्या ऐसे बोलते हैं. कुछ सलीका सीख ले.’’

मां को किचन में छोड़ कर तरन्नुम मोबाइल ले कर छत पर चली गई. ऊपर जा कर वह बनावटी गुस्से में बोली, ‘‘क्या बात है शाहिद, हम ने तो रात में ही फोन पर कह दिया था कि हम तुम्हारी खातिर घर रुक गई है. फिर सुबहसुबह क्या जरूरत आन पड़ी, जो घंटी बजा दी?’’

‘‘तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया है. 3 बजे फूफी के घर आ जाना.’’ दूसरी ओर से यह कहने वाला उस का आशिक शाहिद था.

‘‘आ जाएंगे, हम वादा खिलाफी नहीं करते.’’ कह कर तरन्नुम नीचे आ गई. तब तक चाय बन गई थी. मां ने उसे चाय का प्याला देते हुए पूछा, ‘‘क्या कह रहे थे अलाउद्दीन?’’

‘‘3 बजे अमींनिशा बाजार बुलाया है.’’

‘‘तो चली जाना. शौहर ही तो है, कोई गैर तो नहीं.’’ मां ने कह दिया. उसे क्या पता था कि फोन पर दूसरी ओर अलाउद्दीन नहीं शाहिद था.

शाहिद 3 बजे से पहले ही फूफी के घर पहुंच कर तरन्नुम का इंतजार करने लगा. यह वह घर था, जहां दोनों की मोहब्बत जवान हुई थी. इसी घर की एकांत जगहों पर दोनों के बीच की दूरियां मिटी थीं. फूफी उन दोनों के संबंधों की राजदार थी. शाहिद बैठक में अकेला बैठा था. फूफी ने चाय का प्याला मेज पर रखते हुए उसे सलाह दी, ‘‘अब तुझे भी कोई लड़की ढूंढ़ कर निकाह कर लेना चाहिए. तरन्नुम अब किसी और की बीवी बन चुकी है. अगर भूल से भी कभी उस के शौहर को तुम दोनों की कहानी पता चल गई तो तरन्नुम की जिंदगी में तूफान आ जाएगा.’’

जब फूफी और शाहिद बात कर रहे थे, तभी तरन्नुम आ गई. बड़े अदब से फूफी को सलाम कर के वह सोफे पर बैठ गई. फूफी चुपचाप बाहर निकल गई.

‘‘क्या बात है शाहिद, तुम्हें इतनी बेसब्री क्यों हो जाती है?’’ तरन्नुम ने सोफे से उठ कर शाहिद की गोद में बैठते हुए पूछा.

‘‘मैं ने तो तुम्हें याद दिलाने के लिए फोन किया था.’’ शाहिद ने तरन्नुम के बालों से खेलते हुए कहा.

‘‘मैं ने तो यहां आते ही बता दिया था कि मैं तुम्हारे लिए आ गई हूं, फिर टाइम को कैसे भूल जाती? पर तुम्हें चैन कहां, जब मन आता है, मिला दिया फोन.’’

‘‘मैं तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं जी सकता. वैसे भी परसों ‘वैलेंटाइन डे’ है, बोलो इस बार क्या तोहफा लोगी?’’ शाहिद ने पूछा.

‘‘मैं जो मागूंगी, तुम दे नहीं पाओगे शाहिद.’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों में मचलते हुए कहा.

‘‘तुम मांगो तो. हम न दें तो लानत है हम पर.’’

‘‘और अगर मुकर गए तो…?’’ तरन्नुम ने शाहिद की बांहों से फिसल कर सामने खड़े होते हुए पूछा.

‘‘मैं भी पहलवान की औलाद नहीं, जो मुंह मांगा तोहफा न दूं. बताओ क्या चाहिए?’’ शाहिद ने उत्तेजना में कहा.

तरन्नुम यही चाहती थी. उस ने तुरंत कह दिया, ‘‘अलाउद्दीन का सिर.’’

‘‘शौहर का सिर?’’ ठगे से रह गए शाहिद ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘जी हां, शौहर का सिर.’’ कहते हुए तरन्नुम ने शाहिद को सारी बातें बता कर कहा कि उसे सब कुछ पता लग चुका है.

तरन्नुम पूरी चालाकी से ख्ेल ख्ेल रही थी. शाहिद कुछ सोचता, इस से पहले ही वह बोली, ‘‘मैं तुम्हारी अमानत को पहली रात से ही बचाती आ रही थी, लेकिन मजबूरी में उसे भी लुटाना पड़ा.’’

14 फरवरी, 2016 को वैलेंटाइन डे के दिन दोपहर को तरन्नुम को मोबाइल पर उस के शौहर अलाउद्दीन का फोन आया कि ‘आज हमारा पहला ‘वैलेंटाइन डे’ है, मैं शाम को तुम्हें लेने आ रहा हूं, तैयार रहना.’ तरन्नुम ने फोन कर के यह बात शाहिद को बता दी. अलाउद्दीन ससुराल आया और खापी कर तरन्नुम के साथ बाइक से घर के लिए निकला. उस वक्त पौने 8 बजे थे. शाहिद अपने एक दोस्त के साथ बाइक से उस का पीछा कर रहा था. रात साढ़े 8 बजे अलाउद्दीन की बाइक टावर वाले रास्ते से भुजपुरा में घुसी तो पीछे आ रहे शाहिद ने सुनसान जगह टक्कर मार कर अलाउद्दीन को गिरा दिया.

तरन्नुम भी गिर पड़ी. जब तक अलाउद्दीन संभल पाता, तब तक शाहिद ने बाइक से उतर कर उस के सिर में गोली मार दी. एक चीख के साथ ही अलाउद्दीन जमीन पर पड़ा रह गया. शाहिद तरन्नुम को उठाते हुए बोला, ‘‘जो तोहफा मांगा था, वही दिए जा रहा हूं.’’

‘‘भाग जाओ शाहिद, कोई पहचान लेगा. जल्दी भागो यहां से.’’ तरन्नुम ने कहा और सड़क पर पड़े तड़पते शौहर को देख कर रोनेचीखने लगी.

इत्तफाक से यह सारा नजारा वहां से गुजर रहे एक आदमी ने देख लिया था. हमलावरों के भागते ही वहां लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. किसी ने खबर दी तो अलाउद्दीन के घर वाले भी दौड़े चले आए. तब तक घटना की सूचना पुलिस को भी मिल चुकी थी. पुलिस के पहुंचने से पहले ही चश्मदीद ने पूरी हकीकत अलाउद्दीन के घर वालों को बता दी थी. दूसरी ओर सूचना मिलते ही थाना कोतवाली के इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी बिना देर किए पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे.

खून से लथपथ अलाउद्दीन को तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां से उसे जे.एन मेडिकल भेजा गया. उसे बचाने के लिए डाक्टरों की टीम जुट गई. उसी रात अलाउद्दीन के भाई भूरे खां की तहरीर पर तरन्नुम, शाहिद उर्फ लड्डन व एक अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ भादंवि की धारा 307 व 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया. हकीकत सुननेसमझने के बाद इंसपेक्टर जैदी ने अलाउद्दीन के घर वालों को सचेत करते हुए कहा कि अलाउद्दीन के होश में आने तक तरन्नुम को घर से बाहर न जाने दें, साथ ही उस की हर गतिविधि पर नजर रखने के अलावा यह भी ध्यान रखें कि वह कुछ खा न ले.

2 दिनों तक अलाउद्दीन जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा. उस की स्थिति कोमा जैसी थी. 16 फरवरी की रात उस ने दम तोड़ दिया. अलाउद्दीन की मौत की सूचना मिलते ही हैदर रजा जैदी ने तरन्नुम को उस की ससुराल पहुंच कर गिरफ्तार कर लिया और उसे कोतवाली ले आए. उस से पूछताछ की गई तो उस ने सब कुछ सचसच बता दिया. इसी के साथ इस मामले में दर्ज मुकदमा धारा 302 में तरमीम कर दिया गया. शाहिद की गिरफ्तारी के लिए कई जगह दबिश दी गई. पुलिस की काररवाई से परेशान हो कर शाहिद ने 19 फरवरी को अदालत में आत्मसमर्पण कर दिया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

कोतवाली इंसपेक्टर हैदर रजा जैदी ने अदालत में प्रार्थनापत्र दे कर शाहिद को 3 मार्च, 2016 को पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. कोतवाली ला कर उस से पूछताछ की गई तो उस ने अपने साथी का नाम मुस्तकीम निवासी हमदर्दनगर, जमालपुर बताया. साथ ही उस ने वह तमंचा भी बरामद करा दिया, जिस से अलाउद्दीन की हत्या की गई थी. शाहिद को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मुस्तकीम की गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए. 8 मार्च, 2016 को इंसपेक्टर जैदी को सूचना मिली कि मुस्तकीम जमालपुर गंदा नाले के पास खड़ा है. पुलिस ने वहां जा कर उसे भी गिरफ्तार कर लिया. वह कहीं बाहर जाने के लिए अपने घर से आया था.

कोतवाली में मुस्तकीम ने बताया कि वह सिर्फ दोस्ती के नाते यह काम करने के लिए तैयार हो गया था. घटना के वक्त वह बाइक चला रहा था, जबकि शाहिद पीछे बैठा था. पूछताछ के बाद मुस्तकीम को भी अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक तीनों जेल में थे. तरन्नुम को वैलेंटाइन का तोहफा तो मिल गया, लेकिन बाकी की उस की जिंदगी जेल में जो बीतेगी, वह भी उस के लिए तोहफे जैसी ही होगी. Love Crime Story

Uttar Pradesh Crime: ज्योति जो बुझ गई

Uttar Pradesh Crime: ज्योति का कमाने वाला पति था, 3 बच्चे थे, घर में किसी चीज की कमी नहीं थी लेकिन स्वार्थी राजेश के कहने में आ कर उस ने जो किया, उस से उस की खुद की जान तो गई ही, अपना और राजेश का घर भी बरबाद कर दिया.

आदमी में महत्त्वाकांक्षाएं कभीकभी ऐसा जुनून पैदा करती हैं कि कुछ पाने की चाह में उस के पास जो होता है, वह भी गंवा बैठता है. ज्योति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. वह उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के पंचवटी रोड स्थित यशोदानगर के रहने वाले कालका सिंह चौहान के बड़े बेटे जितेंद्र की पत्नी थी. उन का दूध का कारोबार था, जिसे अब उन का बड़ा बेटा जितेंद्र संभालता था.

ज्योति तहसील करहल के गांव तिलियानी के रहने वाले रिटायर्ड फौजी महेंद्र सिंह की बेटी थी. ससुराल में किसी चीज की कमी नहीं थी. वह बीए पास थी. शादी से पहले वह नौकरी करके अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी. अच्छी ससुराल मिल जाने की वजह से उस ने नौकरी वाली बात भुला भले दी थी, लेकिन मन से निकाल नहीं पाई थी, जिस की वजह से कभीकभी उसे लगता था कि वह जो करना चाहती थी, कर नहीं पाई.

ज्योति जितेंद्र के 2 बेटों और 1 बेटी की मां बन चुकी थी. घर के कामों को करते हुए कभीकभी उसे लगता कि जिंदगी इसी तरह खाना बनाते, बरतन धोते और घर वालों की चाकरी करते बीत जाएगी. कभी वह मन की बात पति से कहना चाहती तो उस के पास समय ही नहीं होता था कि वह पत्नी के मन की बात को सुनता. लेकिन समय को किस ने देखा है. कभी भी कुछ भी हो सकता है. वह कभी भी करवट ले सकता है और आदमी को कुछ भी करने का मौका दे सकता है.

करीब 4 साल पहले जितेंद्र ने अपने मकान का एक हिस्सा अपने दोस्त राजेश को किराए पर दे दिया. वह आगरा के फतेहाबाद के श्रीकृष्णपुरा के रहने वाले बीरी सिंह का बेटा था. दोस्त होने के नाते जितेंद्र ने उसे दूध के अपने कारोबार में पार्टनर बना लिया था. राजेश ने कारोबार में काफी मेहनत की, जिस से जल्दी ही उस की हैसियत जितेंद्र के घर में सदस्य जैसी हो गई. उस का खानापीना, उठनाबैठना, सब जितेंद्र के घर होने लगा. इस का नतीजा यह निकला कि उसे जितेंद्र के घर के अंदर की बातें पता चल गईं.

कुछ ही दिनों में राजेश को लगा कि जितेंद्र और उस की पत्नी ज्योति के बीच कुछ ऐसा है, जो पतिपत्नी के बीच नहीं होना चाहिए. वह शादीशुदा था और जब भी मौका मिलता था, पत्नी से मिलने घर जाता रहता था. लेकिन घर से दूर रह कर उसे पत्नी की कमी तो खलती ही थी. उस ने महसूस किया कि ज्योति उदास रहती है. उस ने उस से उदासी का कारण पूछा तो वह टाल गई. राजेश को पता था कि ज्योति पढ़ीलिखी और स्मार्ट महिला है. उस के घर वालों की कुछ मजबूरियां रही होंगी, तभी उस की शादी एक कम पढ़ेलिखे लड़के से कर दी थी है.

दरअसल, ज्योति अब तक घर के कामों से ऊब गई थी. वह कुछ करना चाहती थी, लेकिन जितेंद्र का कहना था कि उसे किस चीज की कमी है, जो वह नौकरी करना चाहती है. इस से ज्योति को लगता था कि पति उस की भावनाओं की कद्र नहीं करता. राजेश का घर के अंदर तक आनाजाना था. पत्नी से दूर रहने की वजह से वह ज्योति के प्रति सहानुभूति दिखा कर उस से कुछ हासिल करना चाहता था. इसलिए एक दिन उस ने ज्योति से कहा, ‘‘भाभी, मैं देखता हूं, जितेंद्र भाई को तुम्हारी जो कद्र करनी चाहिए, वह नहीं करते. जबकि तुम सुंदर और स्मार्ट तो हो ही, उन से ज्यादा पढ़ीलिखी भी हो. आखिर तुम कुछ करना चाहती हो तो इस में बुरा क्या है? वैसे मुझे यह सब कहना तो नहीं चाहिए था, लेकिन तुम्हें परेशान देख कर कह दिया.’’

ज्योति को लगा, राजेश ठीक ही कह रहा है. वह सुंदर और स्मार्ट है, पढ़ीलिखी भी है. अगर वह चाहे तो कुछ कर सकती है. लेकिन जितेंद्र करने नहीं देता. शायद वह उसे इसी तरह नौकरानी बना कर रखना चाहता है. उस दिन दोपहर का खाना ले कर वह राजेश के कमरे में पहुंची तो राजेश ने कहा, ‘‘अरे भाभी, तुम ने क्यों तकलीफ की? मैं खाना लेने आ ही रहा था.’’

‘‘मैं ही ले कर आ गई तो क्या हो गया?’’ राजेश के कमरे में पड़ी कुरसी पर बैठते हुए ज्योति ने कहा, ‘‘अच्छा यह बताओ कि क्या मैं कुछ कर सकती हूं? घर का काम खत्म होने के बाद समय काटे नहीं कटता है.’’

‘‘भाभीजी, तुम पढ़ीलिखी हो, टीचर बन सकती हो, ब्यूटीपार्लर खोल सकती हो, जो भी चाहो, कर सकती हो.’’

‘‘तुम्हें मेरे ऊपर इतना विश्वास है?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘क्यों नहीं, मैंने कहा न कि तुम सुंदर और पढ़ीलिखी हो, कुछ भी कर सकती हो. जितेंद्र तुम्हें परख नहीं पाया.’’

‘‘लेकिन तुम ने परख लिया?’’ ज्योति ने हंसते हुए कहा.

ज्योति का मन राजेश के इर्दगिर्द भटकने लगा तो पति से नफरत सी होने लगी. जल्दी ही वह राजेश के प्रति आकर्षित हो उठी. इस के बाद उस की नजरें बदल गईं तो राजेश को भांपते देर नहीं लगी. आखिर एक दिन उस ने ज्योति से मन की बात कह ही दी, ‘‘भाभी, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं.’’

‘‘प्यार, वह भी मुझ से? अरे मैं तुम्हारे दोस्त की पत्नी हूं और उन के 3 बच्चों की मां भी.’’

‘‘अब भाभी, तुम पर दिल आ गया तो मैं क्या करूं. मैं उस के हाथों मजबूर हूं. मैं तुम्हें ले कर परेशान रहता हूं. काम में भी मन नहीं लगता. अगर तुम ने ना कर दिया तो शायद मैं यहां न रह पाऊं.’’ राजेश ने कहा.

राजेश ने जाने की बात की तो ज्योति का दिल धड़क उठा. उस ने कहा, ‘‘मुझे कुछ सोचने का समय दो.’’

‘‘सोचना क्या है? मेरा दिलोदिमाग सब बेचैन है. मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुटा हुआ है. अगर यही हाल रहा तो मैं पागल हो जाऊंगा.’’

ज्योति ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘‘ठीक है, आज रात जितेंद्र बाहर जा रहे हैं.’’

‘‘जितेंद्र बाहर जाए या घर में रहे, इस से मुझे क्या मिलेगा?’’ राजेश ने उत्सुकता से पूछा.

ज्योति ने उस के पास आ कर कहा, ‘‘लगता है, तुम बुद्धू ही हो. इसीलिए मेरी बात तुम्हारी समझ में नहीं आई. आज रात में मिलूंगी.’’

राजेश की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. इतनी आसानी से काम बन जाएगा, उस ने सोचा भी नहीं था. फिर उस रात राजेश ने दोस्त के दांपत्य में सेंध लगा दी. जितेंद्र को पता ही नहीं चला कि दोस्त आस्तीन का सांप बन गया है. पत्नी और दोस्त दोनों ही बेवफा हो गए थे. वह 2 दिनों के लिए बाहर गया था. लौट कर आया तो सब बदल गया था. रात को पलंग पर ज्योति रहती तो उस के पास थी, लेकिन साथ नहीं रहती थी.

कुछ ही दिनों में जितेंद्र को लगने लगा कि उस के घर में कुछ गड़बड़ है. क्योंकि ज्योति उस की उपेक्षा करने लगी थी. लेकिन वह यह नहीं समझ पा रहा था कि इस की वजह क्या है. पर ऐसी बातें ज्यादा दिनों तक छिपी कहां रहती हैं. पत्नी और दोस्त के हावभाव से उसे शक होने लगा. पिछले कुछ दिनों से वह देख रहा था कि राजेश को वह काम से बाहर भेजना चाहता तो वह कोई न कोई बहाना कर के घर में ही रहना चाहता था. लेकिन बिना सबूत के कुछ कहना ठीक नहीं था.

अब तक ज्योति को लगने लगा था कि आखिर उस के और राजेश के इस संबंध का भविष्य क्या है? इस की वजह यह थी कि अब वह राजेश को दिल से चाहने लगी थी और आगे की जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहती थी. इसलिए एक दिन उस ने राजेश से पूछ लिया, ‘‘राजेश, हम इस तरह कब तक चोरीछिपे मिलते रहेंगे.’’

‘‘जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने दो, इस में बुरा क्या है.’’ राजेश ने कहा.

‘‘अब मैं तुम्हारी पत्नी बन कर तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. यह लुकाछिपी मुझे अच्छी नहीं लगती.’’

‘‘लेकिन ज्योति मैं पत्नीबच्चों वाला हूं, उन का क्या होगा?’’

‘‘मैं उन के बारे में क्यों सोचूं? मैं ने पति को दिल से निकाल दिया है, इसलिए अब तुम्हारे साथ रहना चाहती हूं. इस के लिए तुम्हें कुछ तो करना ही होगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कुछ सोचता हूं.’’ राजेश ने कह तो दिया, लेकिन वह जानता था कि पत्नी के रहते वह ज्योति के लिए कुछ नहीं कर सकता. वैसे भी वह ज्योति को ले कर जरा भी गंभीर नहीं था. उस ने तो मौजमस्ती के लिए उस से संबंध बनाए थे.

इस मामले में बात आगे बढ़ती, संयोग से एक दिन जितेंद्र ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. राजेश को तो उस ने खरीखोटी सुना कर भगा दिया, जबकि ज्योति की जम कर पिटाई कर दी. राजेश के जाने के बाद से ज्योति परेशान रहने लगी थी. आखिर एक दिन राजेश का फोन आया तो उस ने अपने दिल की बात उस से कही. तब राजेश ने कहा, ‘‘ज्योति, मुझे भले ही तुम्हारे घर से निकाल दिया गया है, लेकिन मैं तुम्हें दिल से नहीं निकाल पाया हूं.’’

राजेश के लिए परेशानी तब खड़ी हो गई, जब उस की पत्नी विमला को उस के  और ज्योति के संबंधों का पता चल गया. उसे शक तो पहले से ही था, लेकिन जब पति के मोबाइल में उस ने ज्योति का फोटो देखा तो विश्वास हो गया. वह समझ गई कि पति धोखा दे रहा है. उस ने राजेश से साफ कह दिया, ‘‘अगर तुम ने ज्योति से संबंध खत्म नहीं किए तो मैं जान दे दूंगी. उस के बाद तुम जेल की हवा खाते रहना.’’

एक ओर पत्नी थी, दूसरी ओर प्रेमिका. दोनों के बीच फंसा राजेश बेचैन हो उठा. उधर राजेश के जाने के बाद से जितेंद्र को लगता था कि सब ठीक हो चुका है, लेकिन ज्योति तो पहले से ज्यादा उग्र हो उठी थी. राजेश से मिलने के लिए ही उस ने घर में कहा कि वह बीएड करना चाहती है. जितेंद्र ने सोचा कि अगर ज्योति का मन पढ़ाई में लग जाता है तो वह राजेश को भूल जाएगी. इसलिए उस ने बीएड करने के लिए ज्योति का दाखिला शमसाबाद स्थित एनडी कालेज में करा दिया.

बीएड तो एक बहाना था, ज्योति ने राजेश से मिलने और उस पर शादी का दबाव डालने के लिए यह सब किया था. जबकि राजेश ने सिर्फ मजा लेने के लिए उस से संबंध बनाए थे. ज्योति अब उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई. एक दिन उस ने फोन कर के कहा, ‘‘राजेश अगर तुम्हें लगता है कि मैं मजाक कर रही हूं तो यह तुम्हारी भूल है. मैं सचमुच तुम से शादी करना चाहती हूं. अगर तुम ने धोखा दिया तो मैं तुम्हें जेल भी भिजवा सकती हूं.’’

ज्योति के तेवर देख कर राजेश डर गया. अब वह सोचने लगा कि ज्योति से कैसे छुटकारा पाए, क्योंकि अब उस की वजह से उस की गृहस्थी बरबाद होने वाली थी. दूसरी ओर उस की वजह से जितेंद्र भी उस की जान का दुश्मन बन सकता था. इसलिए उस ने सोचा कि अगर ज्योति को ठिकाने लगा दिया जाए तो सारा झंझट खत्म हो जाएगा. इस के बाद उस ने ज्योति को फोन कर के कहा, ‘‘ज्योति, तुम ऐसा करो, फतेहाबाद आ जाओ, यहीं बैठ कर आपस में बात करते हैं कि कैसे क्या किया जाए.’’

20 अक्तूबर, 2016 को कालेज जाने के बहाने ज्योति घर से निकली. दोपहर बाद उस ने जितेंद्र को फोन किया कि बैंक बंद होने की वजह से वह पैसा नहीं निकाल पाई, इसलिए रात में किसी सहेली के पास हौस्टल में रुक जाएगी. कल सुबह घर आ जाएगी. इस के बाद ज्योति का मोबाइल बंद हो गया. अगले दिन वह न घर आई और न फोन पर बात हो सकी तो घर वालों को चिंता हुई. जितेंद्र ने कालेज और हौस्टल जा कर पता किया, लेकिन कुछ पता नहीं चला.

इस के बाद ज्योति की तलाश शुरू हुई. राजेश से भी पूछा गया, लेकिन उस ने जानने से साफ मना कर दिया. काफी तलाश के बाद भी जब ज्योति का कुछ पता नहीं चला तो इटावा कोतवाली में जितेंद्र ने उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. जितेंद्र की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर ज्योति कहां चली गई. अब पुलिस वाले भी उस की तलाश में लग गए थे. लेकिन उस का कुछ पता नहीं चल रहा था. कभीकभी गुनाह सिर चढ़ कर बोलता है. ऐसा ही इस मामले में भी हुआ. 6 नवंबर, 2016 को राजेश जितेंद्र के घर पहुंचा और मुंह लटका कर बोला, ‘‘जितेंद्र भाई, भाभी का कुछ पता चला?’’

‘‘नहीं, लेकिन कभी न कभी तो पता चल ही जाएगा.’’

‘‘वह कुछ तो कह कर गई होंगी?’’ राजेश ने पूछा.

‘‘अब इस का क्या फायदा? जब लौट कर आएंगी, तभी पता चलेगा कि वह कहां गई थीं.’’ जितेंद्र ने कहा.

‘‘देखो जितेंद्र, तुम मेरे दोस्त हो, मुझे तुम से पूरी सहानुभूति है. कुछ गलतियां जरूर मुझ से हुई हैं, पर मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूं. मैं यहां तुम को कुछ बताने आया हूं. फोन पर बताता तो तुम पता नहीं क्या सोचते. ज्योति भाभी को फतेहाबाद में देखा गया है, पर यकीन मानो वह मेरे पास नहीं आई थीं. तुम्हें तो पता ही है कि आजकल मैं चौकीदारी की नौकरी कर रहा हूं. छुट्टी मुश्किल से मिलती है, वरना मैं तुम्हारी मदद जरूर करता.’’

राजेश की बातों से जितेंद्र को उस पर शक हुआ. उस ने तुरंत कोतवाली पुलिस को फोन कर के बुला लिया. पुलिस राजेश को हिरासत में ले कर कोतवाली ले आई और जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने ज्योति की हत्या का अपना अपराध स्वीकार कर लिया. इस के बाद कोतवाली पुलिस राजेश को ले कर फतेहाबाद पहुंची और सीओ ए.के. सिंह से मिली. उन की उपस्थिति में राजेश की निशानदेही पर वह जहां चौकीदारी करता था, वहां खुदाई कराई गई तो ज्योति की सड़ीगली लाश बरामद हो गई. पत्नी की लाश देख कर जितेंद्र फूटफूट कर रोने लगा.

थाना फतेहाबाद में अपराध संख्या 334/15 पर राजेश के खिलाफ ज्योति की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इस के बाद उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस तरह ज्योति की महत्वाकांक्षा उसे तो ले डूबी ही, 2 घर भी बरबाद हो गए. Uttar Pradesh Crime

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Family Crime: बदचलन बहू

Family Crime: न जाने कितनों को हवालात की हवा खिलाने वाले मोहन सक्सेना बहू की बदचलनी से इस कद्र आजिज आ गए कि यह जानते हुए भी कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं, उन्होंने कानून हाथ में ले ही लिया. नतीजतन अब वह बेटे के साथ जेल में है.

मध्य प्रदेश पुलिस में असिस्टैंट सबइंसपेक्टर मोहन सक्सेना के दिन का चैन और रातों की नींद गायब थी. सोतेजागते, उठतेबैठते उन्हें एक ही शख्स नजर आता था, वह था उन का पुराना ड्राइवर अंकित चौरसिया. अंकित बिना किसी डर और लिहाज के उन के घर की इज्जत से खिलवाड़ कर रहा था. गुस्से, खीझ और बेबसी में मोहन सक्सेना दांत पीस कर रह जाते थे. उन्हें कभीकभी इस बात का डर सताने लगता कि कहीं उन्हें इस तनाव में फिर से लकवा न मार जाए या  हार्टअटैक न आ जाए.

59 वर्षीय मोहन सक्सेना की तैनाती शाजापुर की पुलिस लाइन में थी. वह अगले ही साल रिटायर होने वाले थे. एक उम्र पुलिस की नौकरी करने वाले मोहन सक्सेना की जिंदगी में कई तरह के उतारचढ़ाव आए. लेकिन जिंदगी की ढलती शाम में वह जो कुछ देख रहे थे, वह उन की आंखों में कांटे की तरह चुभ रहा था. इस की वजह थी उन की बहू नेहा. शाजापुर में उन का अपना अलग रुतबा था, जिस की वजह वरदी या पुलिस की नौकरी ही नहीं, बल्कि एक इज्जतदार कायस्थ परिवार का मुखिया होना भी था. बहू द्वारा किए जा रहे कृत्य से उन्हें अपनी इज्जत मिट्टी में मिलती नजर आ रही थी. लेकिन वह करें क्या उन की समझ में नहीं आ रहा था.

क्योंकि लाख समझानेबुझाने और चेतावनी देने पर भी न नेहा मान रही थी और न ही अंकित रास्ते पर आ रहा था. उन के सुनने में तो यहां तक आया कि अंकित ने अपने मोबाइल फोन में नेहा के साथ बिताए अंतरंग दृश्यों की कुछ फोटो तक खींच रखी हैं जिन्हें वह अपने दोस्तों को दिखाता रहता है. ऐसी बेबसी में अकसर वह उस घड़ी को कोसते थे, जब उन्होंने अंकित को शरीफ मानते हुए अपने यहां ड्राईवरी की नौकरी पर रखा था. दरअसल मोहन सक्सेना का बेटा नितिन दिमागी तौर पर कुछ कमजोर है. यह बात सारा शाजापुर जानता था.

अपने रिटायर होने से पहले उन्होंने उस की शादी अपने बराबर वाले घर में कर दी थी. बेटा कुछ करता है, यह दिखाने के लिए उन्होंने एक कार खरीद ली थी, जो बतौर टैक्सी चलती थी. अंकित को यही गाड़ी चलाने के लिए रखा गया था. शुरूशुरू में तो सबकुछ ठीकठाक चला. सवारियां मिल जातीं तो अंकित गाड़ी ले कर चला जाता और न मिलती तो शहर में इधरउधर घूम कर वक्त काटता. उधर नितिन को अपने लिए जमाए जा रहे इस ट्रैवलिंग के कारोबार से कोई खास लेनादेना नहीं था. इतना ही नहीं, उस की दिलचस्पी तो अपनी पत्नी में भी नहीं थी, जो खासी खूबसूरत, आकर्षक और चंचल थी. उस की पति से बिलकुल पटरी नहीं बैठती थी.

अंकित ने इसी बात का फायदा उठाया. वह नेहा को चाहने लगा और उस से करीबी संबंध बनाने की जुगत में लग गया. अपने बातूनी स्वभाव से उस ने उसे प्रभावित करना शुरू कर दिया. बातों का दायरा बढ़तेबढ़ते प्यार के मुकाम तक पहुंच गया और फिर एक दिन ऐसा भी आ गया, जब दोनों के संबंध बन गए. इस के बाद सिलसिला बन गया. दोनों ने ही बूढ़े मोहन सक्सेना का किसी भी स्तर पर कोई लिहाज नहीं किया.

पिछले साल एकाएक मोहन सक्सेना को लकवा मार गया तो अंकित को उन के घर आनेजाने के ज्यादा मौके मिल गए. सक्सेना परिवार के सारे काम वह वक्त पर ईमानदारी से कर देता था. लेकिन नेहा के आकर्षण से खुद को नहीं बचा सका. नेहा भी खूबसूरत और मजाकिया स्वभाव के अंकित के प्रेमजाल में फंसने से खुद को नहीं रोक पाई थी. उस के संस्कार इस कथित प्यार या व्यभिचार के आगे ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाए.

लकवाग्रस्त मोहन सक्सेना का लंबा इलाज चला तो उस बुरे वक्त में कई मामलों में नितिन की भूमिका अंकित निभा रहा था, इसलिए मोहन उस के एहसान तले दबते जा रहे थे. इलाज के अलावा वह झाड़फूंक और तंत्रमंत्र का भी सहारा ले रहे थे. यानी वह हर हालत में ठीक हो जाना चाहते थे. और इस सब से जल्द ही वह ठीक भी हो गए.

शाजापुर एक छोटा सा कस्बा है, इसलिए मोहन सक्सेना की बहू के प्रेमसंबंधों की चर्चा लोग चटकारे लेले कर करने लगे. यह बात जब मोहन सक्सेना के कानों में पड़ी तो वह बौखला उठे. एक बार तो उन्हें कान सुनी बातों पर विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने सोचा कि ऐसा नहीं हो सकता. क्योंकि नेहा शरीफ घर की थी. उस के मांबाप ने उसे बेहतर संस्कार दिए थे. रही बात अंकित की तो कल के इस छोकरे की क्या मजाल जो उन की बहू की तरफ आंख उठा कर भी देखे. लेकिन पुलिस की नौकरी के दौरान उन्होंने कई संस्कारवान बहूबेटियों का त्रियाचरित्र देखा था और अंकित जैसे रंगीले मजनूं भी देखे थे.

लिहाजा दिमाग में आया शक दूर करने के लिए उन्होंने खुद चोरीछिपे दोनों की निगरानी शुरू कर दी. नितिन से तो उन्हें कोई उम्मीद करना बेकार लग रहा था. दिमागी कमजोरी के चलते वह गुस्से और जल्दबाजी में बगैर सोचेसमझे कोई ऐसा कदम उठा सकता था, जो काफी महंगा पड़ता. इसलिए उन्होंने इस बारे में नितिन को कुछ नहीं बताया. आखिर एक दिन उन्होंने खुद अपनी आंखों से अंकित और बहू नेहा को अपने ही घर में आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया तो मारे गुस्से के उन का शरीर जल उठा. उन्हें विश्वास हो गया कि बाहर उन के बहू और अंकित के बारे में जो बातें की जा रही हैं, निराधार नहीं थीं. उन का मन कर रहा था कि वह अंकित को ऐसी सजा दें कि कोई भी उन के घर की तरफ नजर उठाने की हिम्मत न करे.

लेकिन वह कानून को अपने हाथ में लेना नहीं चाहते थे और अदालत या बाहर की दुनिया तक खुद बात ले जाएं तो जगहंसाई के साथ उन की जिंदगी भर की कमाई इज्जत मिट्टी में मिला देने वाली बात होती. किसी तरह जहरीला घूंट पी कर वह चुप रहे. लेकिन अगले दिन उन्होंने दोनों को खूब लताड़ा. अंकित को उन्होंने नौकरी से हटा दिया, साथ ही नेहा को भी सख्त लहजे में समझा दिया कि आइंदा वह उस लड़के से मिलेगी तो अच्छा नहीं होगा.

ससुर के गुस्से को देख कर नेहा उस समय सहम जरूर गई थी, लेकिन अंकित की यादों को वह दिल से निकाल नहीं पाई. वह ससुर से नजरें बचा कर उस से घर से बाहर मिलने लगी. यानी आशिक का लगाव ससुर की वरदी पर भारी पड़ा. आशिक से बाहर मिलने की बात भी मोहन सक्सेना से ज्यादा दिनों तक छिप नहीं सकी. वह परेशान थे कि बहू का क्या करें, जो यह उस लड़के का पीछा छोड़ दे. उसी समय अचानक मोहन सक्सेना के दिमाग में तांत्रिक बाबा उर्फ संजय व्यास का खयाल आया. उन्हें उम्मीद की एक किरण दिखाई पड़ी. वह खुद भी मानते थे कि उन का लकवा तांत्रिक बाबा ने ही ठीक किया था.

कुछ साल पहले तक संजय व्यास शाजापुर के ही एक सरकारी बैंक में चपरासी था. बाद में वह नौकरी छोड़ कर कस्बे में छोटे किले के पास स्थित बरगद के पेड़ के नीचे बैठ कर तंत्रक्रियाओं द्वारा लोगों का इलाज करने लगा था. इस तरह तथाकथित तांत्रिक बन कर वह लोगों की जेबें ढीली करने लगा था. इस से उसे अच्छी कमाई होने लगी थी. देखते ही देखते वह शहर में इतना मशहूर हो गया कि हर गुरुवार को उस के पास हैरानपरेशान लोगों की भीड़ लगने लगी थी. संजय का यह कारोबार चल निकला तो उस ने हुलिया भी बदल लिया. वह हरे रंग के कपड़े पहनने लगा. उस के गले में तरहतरह की मालाएं और अंगुलियों में हरे, काले, लाल आदि रंगों वाले  नगों की अंगूठियां चमकने लगीं.

अपनी परेशानी से छुटकारा पाने के लिए मोहन उस तथाकथित तांत्रिक उस की शरण में आने लगे. उन्होंने बहू के देहरी लांघने वाली बात तांत्रिक को बता कर कहा कि किसी भी तरह वह कुछ ऐसा कर दें कि बहू का प्रेमी अंकित की तरफ से मन उचट जाए. तांत्रिक संजय ने उन्हें भरोसा दिया कि वह अपनी सिद्धियों के बल पर ऐसा कर देगा कि नेहा उस लड़के का नाम तक नहीं लेगी. इस काम के लिए उस ने मोहन सक्सेना से मोटी रकम भी ली.

इसी तांत्रिक के पास अंकित भी पहुंच गया. अंकित ने उस से कहा कि उस की प्रेमिका नेहा अब उस से दूरियां बना रही है. वह ऐसा कुछ कर दे कि वह पति को छोड़ कर उस के पास आ जाए. बातचीत से तांत्रिक को पता लग गया कि इस का चक्कर मोहन सक्सेना की बहू से चल रहा है. वह उस के पास इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए आए थे. तांत्रिक के लिए मोहन सक्सेना या अंकित में से कोई भी उस का सगा नहीं था. उस का मकसद तो दोनों से पैसे कमाना था. इसलिए उस ने अंकित से भी मोटे पैसे ले लिए. इस तरह तांत्रिक संजय दोनों से ही पैसे ऐंठता रहा.

बाद में मोहन को पता चला कि अंकित भी संजय बाबा के पास आता है तो उन का माथा ठनका. वह भागेभागे संजय बाबा के पास पहुंचे. उन्होंने पैसों का लालच दे कर बाबा से अंकित के बारे में पूछा तो उस ने मनुहार के बाद बता दिया कि अंकित नेहा को अपने वश में करवाने के लिए आता है. मोहन सक्सेना अब अंकित से तुरंत छुटकारा पाना चाहते थे. इस बारे में उन्होंने तांत्रिक संजय से बात की. बातचीत के बाद उन्होंने फैसला किया कि अब तंत्रमंत्र से तो बात संभलने वाली नहीं, लिहाजा अंकित की हत्या कर दी जाए.

वैसे कई बार यह बात मोहन सक्सेना के मन में आई थी, लेकिन अपने पुलिसिया तजुर्बे से वह जानते थे कि किसी का कत्ल कर कानून से बच पाना आसान काम नहीं होता. इसलिए वह यह अपराध नहीं करना चाहते थे. पर अब उन्हें तांत्रिक संजय का साथ मिल रहा था, इसलिए वह तैयार हो गए. तांत्रिक संजय व्यास अंकित की हत्या के लिए तैयार हो गया. इस के लिए उस ने मोहन सक्सेना से 15 हजार रुपए की मांग की तो उन्होंने झट से पैसे दे दिए. क्योंकि जिस काम के लिए वह अपनी अब तक की सारी कमाई खर्च करने को तैयार थे, वह काम काफी सस्ते में हो रहा था.

दूसरी ओर अंकित को इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि संजय और मोहन के बीच क्या खिचड़ी पक चुकी है. वह तो यह सोच कर खुश हो रहा था कि तांत्रिक की वशीकरण क्रिया के बाद नेहा हमेशा के लिए उस के पास चली आएगी. इसलिए तांत्रिक उस से जोजो काम करने के लिए कहता था, वह वैसा ही कर रहा था. एक दिन संजय बाबा ने उस से कहा कि एक विशेष तांत्रिक क्रिया करनी जरूरी है, जो शाजापुर में नहीं, बल्कि दूसरी किसी जगह पर करनी होगी. अंकित तुरंत तैयार हो गया. उसे लगा कि इस क्रिया के बाद नेहा उस के साथ भागने को तैयार हो जाएगी. फिर दोनों कहीं दूर जा कर शादी कर लेंगे.

संजय ने उसे बताया था कि यह काम 16 जनवरी शनिवार को करना ठीक रहेगा. अंकित तैयार हो गया. उस ने संजय को बताया कि वह ठीक वक्त पर गाड़ी ले कर आ जाएगा. इस के बाद पूजा के लिए चले चलेंगे. अंकित उस समय शाजापुर की ही एक संभ्रांत महिला निर्मला गौर के यहां ड्राइवर की नौकरी कर रहा था. उस दिन उस ने निर्मला से यह कह कर उन की कार मांग ली कि वह कुछ दोस्तों के साथ उज्जैन जाना चाहता है. निर्मला को इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. उन्होंने कार की चाबियां अंकित को दे दीं.

16 जनवरी की सुबह अंकित तांत्रिक बाबा के पास पहुंच गया. तांत्रिक उसे बैरसिया होते हुए विदिशा रोड पर स्थित भोजापुरा के जंगल में ले गया. यह जंगल आमतौर पर सुनसान रहता है. इस जंगल में हत्या करने की सलाह दरअसल में मोहन सक्सेना ने ही दी थी, ताकि इतनी दूर लाश मिलने पर उस की शिनाख्त न हो सके. जंगल में एक जगह पर बैठ कर संजय व्यास अंकित से पूजा करवाने लगा. कुछ देर बाद तांत्रिक संजय ने कहा, ‘‘इस सिद्धि के लिए तुम्हें अपने सारे कपड़े उतारने पड़ेंगे.’’

पहले तो अंकित तांत्रिक की इस बात पर चौंका, पर यह क्रिया प्रेमिका को पाने के लिए की जा रही थी, इसलिए वह तैयार हो गया. पूजा वाली जगह से कुछ दूरी पर मोहन सक्सेना अपने बेटे नितिन के साथ छिपे बैठे थे. अंकित जब पूरी तरह पूजा में डूब गया तो तांत्रिक संजय का इशारा पा कर दोनों आहिस्ते से अंकित के पीछे आ गए. मोहन ने मौके का फायदा उठाते हुए लोहे की रौड का एक भरपूर वार उस के सिर पर कर दिया, इस के बाद नितिन और तांत्रिक भी उस पर टूट पड़े. तीनों को जब उस के मरने की तसल्ली हो गई तो योजना के मुताबिक उन्होंने एक बड़े पत्थर से उस का चेहरा कुचल दिया, जिस से लाश की पहचान न हो पाए.

अंकित की हत्या करने के बाद तांत्रिक संजय और नितिन बैरसिया होते हुए वापस आए तो मोहन पहले इंदौर गए, फिर शाजापुर आए. इस दौरान तीनों ने अपने मोबाइल बंद रखे. क्योंकि मोहन सक्सेना जानते थे कि जांचपड़ताल में मोबाइल की लोकेशन पता चल जाती है. इसलिए उन्होंने यह अहतियात बरती थी. 17 जनवरी, 2016 की सुबह गांव वाले जंगल की तरफ गए तो उन्होंने वहां लाश देखी. इस की खबर उन्होंने बैरसिया थाने को दी तो एसडीओपी बीना सिंह के निर्देश पर पुलिस टीम घटनास्थल के लिए रवाना हो गई. मौके पर जितने लोग खड़े थे, पुलिस ने उन से उस निर्वस्त्र लाश की शिनाख्त करानी चाही, पर चेहरा कुचला हुआ होने की वजह से कोई भी उसे पहचान नहीं पाया. वहां कोई ऐसा सामान भी नहीं मिला, जिस से लाश की शिनाख्त हो सकती.

पुलिस को लाश से कुछ दूरी एक आई-20 कार लावारिस हालत में खड़ी मिली. पर उस की नंबर प्लेट्स गायब थीं. कार खोल कर तलाशी ली गई तो उस के दस्तावेज मिल गए. कागजों से पता चला कि वह कार शाजापुर की निर्मला गौर नाम की महिला के नाम है. कार की नंबर प्लेट गायब होने पर पुलिस को शक हुआ कि हो न हो, कार का इस हत्या के मामले से जरूर कोई संबंध है.

पुलिस जब शाजापुर में निर्मला गौर के पास पहुंची तो उन्होंने बता दिया कि कार उन का ड्राइवर अंकित ले गया था. उन्होंने ड्राइवर अंकित का हुलिया पुलिस को बताया तो कदकाठी से वह लाश के हुलिए जैसा ही था. उन्होंने पुलिस को अंकित का पता बताया तो पुलिस अंकित के घर पहुंच गई और लाश की शिनाख्त के लिए उस के घर वालों को पोस्टमार्टम स्थल पर ले गई. घर वालों ने लाश की शिनाख्त अंकित के रूप में कर दी.

लाश की शिनाख्त होने के बाद पुलिस हत्यारों का पता लगाने में जुट गई. जांच में पुलिस को मृतक जानकारी मिली. उन के ही महकमे के एएसआई मोहन सक्सेना के यहां नौकरी करता था और उस का उन की बहू नेहा के साथ चक्कर चल रहा था. पुलिस को मुखबिर से यह भी जानकारी मिली थी कि 16 जनवरी, 2016 की रात तांत्रिक बाबा संजय व्यास को कार में अंकित के साथ देखा गया था.

तांत्रिक संजय को पुलिस ने थाने बुलवा लिया. उस से अंकित के बारे में पूछताछ की गई तो वह किसी तरह की जानकारी होने से इंकार करता रहा. पर जैसे ही उसे यह बताया गया कि पिछली रात उस के मोबाइल की लोकेशन बैरसिया के आसपास थी तो वह घबरा गया. इस के बाद उस ने अंकित की हत्या की सच्चाई बता दी. तांत्रिक के बयान पर पुलिस ने मोहन और नितिन को भी गिरफ्तार कर लिया. तीनों अभियुक्तों को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

अंकित नेहा से शादी करने की हसरत दिल में लिए दुनिया से चला गया और नेहा अब मायके में है. शाजापुर में किसी को उस से सहानुभूति नहीं है, उलटे लोग उसे ही इस कांड की वजह मान रहे हैं. अपनी सेवा अवधि में कइयों को हवालात पहुंचा चुके मोहन सक्सेना अब खुद अपने बेटे नितिन के साथ जेल की हवा खा रहे हैं, साथ में तथाकथित तांत्रिक संजय व्यास भी है, जिस की कलई खुलने पर लोग उसे भी कोस रहे हैं. Family Crime

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित, नेहा परिवर्तित नाम है)

 

Real Crime Story: मुंबई की सायरा मनीमाजरा में दफन

Real Crime Story: पैसे कमाने के लिए मनोहरलाल गुप्ता जो कर रहा था, वह वैसे ही गलत था, लेकिन सायरा बानो के साथ उस ने जो किया वह उस से भी ज्यादा गलत हुआ. परंतु ऐसे लोगों के लिए तो पैसा ही सब कुछ होता है. पैसे के लिए किसी की जान भी लेनी पड़े तो वे पीछे नहीं हटते.

उस काली लांसर का नंबर था एचआर 20 एफ 4529. रफ्तार ज्यादा नहीं थी, इसलिए पीसीआर की गाड़ी पर सवार एएसआई दर्शन सिंह की निगाह अचानक उस के भीतर चली गई. गाड़ी की पिछली सीट पर पड़ा कंबल उन्हें संदिग्ध लगा. ऐसा लग रहा था, जैसे कंबल के नीचे कुछ छिपाया गया है. उस वक्त सुबह के साढ़े 5 बजे थे. तारीख थी 13 जनवरी, 2016. दर्शन सिंह नाइट ड्यूटी खत्म कर के लौट रहे थे.

काली लांसर उन की पुलिस वैन के एकदम पास से निकल कर आगे बढ़ गई थी. एक तो लांसर ने पीसीआर की गाड़ी को बाईं तरफ से ओवरटेक किया था, जो यातायात नियम के विरुद्ध था, दूसरे बगल से निकलते ही लांसर के ड्राइवर ने रफ्तार बढ़ा दी थी. इस से वह संदेह के दायरे में आ गया था.  उस समय दर्शन सिंह की वैन पंचकूला के सैक्टर-19 स्थित अमरटैक्स चौक के पास थी. दर्शन सिंह ने अपने साथी एएसआई अनिल कुमार, जो गाड़ी ड्राइव कर रहे थे, से लांसर को रुकवाने को कहा.

लांसर रिहाइशी एरिया की तरफ से निकल कर चौक से वीरान जगहों की ओर जाने वाली सड़क पर मुड़ गई थी. अनिल कुमार ने वैन की रफ्तार बढ़ा कर लांसर से आगे निकाली और लांसर के ड्राइवर को रुकने का इशारा किया. ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति ने रफ्तार कम कर के सड़क के बाएं किनारे पर कार रोक दी. ड्राइविंग सीट पर जो व्यक्ति बैठा था, वह मजबूत कदकाठी वाला था. कड़ाके की ठंड के बावजूद उस ने आधे बाजू वाली शर्ट के साथ हाफ स्वेटर पहन रखा था. भीतर बैठेबैठे ही वह नरमी से बोला, ‘‘जी सर, कोई गलती हो गई हो तो हुक्म करें.’’

लांसर के रुकते ही एएसआई दर्शन सिंह वैन से उतर कर उस के पास आ गए थे. उन्होंने ड्राइविंग सीट पर बैठे व्यक्ति से पूछा, ‘‘पुलिस को देख कर तुम ने अपनी गाड़ी की रफ्तार क्यों बढ़ाई और इस कंबल के नीचे क्या छिपा रखा है?’’

वह आदमी भी अपनी कार से बाहर आ गया था. आगे बढ़ कर दर्शन सिंह के पैर छूते हुए वह दोनों हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘नहीं सर, आप लोगों को देख कर रफ्तार नहीं बढ़ाई. पहुंचने की जल्दी में खाली सड़क देख कर यूं ही एक्सेलेटर दबा दिया था. कंबल ठंड की वजह से रख रखा है. इस के नीचे कुछ नहीं है, अभी दिखाए देता हूं.’’

कहने के साथ ही उस आदमी ने गाड़ी का पिछला दरवाजा खोल कर कंबल बाहर निकाल लिया. उस के नीचे कुछ नहीं था, न ही उस में कुछ लिपटा था. इस के बाद एएसआई अनिल कुमार ने गाड़ी के अंदर की पूरी तलाशी ले ली. गाड़ी में कोई संदिग्ध चीज नहीं मिली.

‘‘ठीक है सर, अब मैं जाऊं? अगर चायनाश्ते की कोई सेवा हो तो बता दीजिए.’’ लांसर ड्राइवर ने कहा और बिना पुलिस वालों की ओर देखे, कंबल को मोड़ कर गाड़ी में रख दिया और ड्राइविंग सीट पर बैठने लगा.

तभी दर्शन सिंह ने उस के कंधे पर हाथ रख कर उसे गाड़ी में बैठने से रोकते हुए कहा, ‘‘ठहरो, ऐसी भी क्या जल्दी है. जरा अपना नाम, पता वगैरह तो नोट करवा दो. यह भी बताओ कि इतनी सुबह तुम कहां से आ रहे हो और कहां जा रहे हो?’’

‘‘जी सर,’’ उस ने पीछे मुड़ते हुए कहा, ‘‘मेरा नाम मनोहरलाल गुप्ता है और पिता का नाम अच्छेलाल गुप्ता. मैं चंडीगढ़ के सैक्टर 56 के फ्लैट नंबर 6308 में रहता हूं. यह मेरा अपना फ्लैट है.’’

‘‘तो इधर पंचकूला में क्या करने आए थे?’’ दर्शन सिंह ने पूछा.

‘‘पंचकूला में सैक्टर 10 में मेरा एक दोस्त रहता है.’’

‘‘क्या नाम है उस का और सैक्टर 10 के किस नंबर के मकान में रहता है तुम्हारा दोस्त?’’

‘‘उस का नाम राजन है और वह कोठी नंबर 1081 में किराए पर रहता है. वह कोठी चंडीगढ़ के किसी पुलिस अफसर की है. कल मैं अपने दोस्त से मिलने आया था तो उस ने जिद कर के अपने पास रोक लिया था. अब मैं वहीं से आ रहा हूं और घर जा रहा हूं.’’

‘‘लेकिन तुम तो चंडीगढ़ के बजाय उलटी दिशा में जा रहे हो?’’

‘‘सर, मैं ने शिमलाअंबाला हाईवे से जीरकपुर के रास्ते चंडीगढ़ जाने की सोची थी. दूसरी तरफ से जाने पर घर दूर पड़ता है.’’

‘‘चलो ठीक है, गाड़ी के कागजात चैक करवाओ, फिर चले जाना.’’

‘‘सर, गाड़ी के कागज तो इस वक्त मेरे पास नहीं हैं.’’

‘‘क्यों, यह गाड़ी तुम्हारी नहीं है क्या?’’

‘‘नहीं सर, यह मेरे एक दोस्त निशांत की गाड़ी है. उस का चंडीगढ़ के सैक्टर 45 में अपना होटल था, कुछ दिनों पहले वह होटल बेच कर कहीं चला गया. जाते वक्त यह कह कर अपनी यह कार मेरे पास छोड़ गया कि कुछ दिनों बाद आ कर गाड़ी ले जाएगा.’’

‘‘गाड़ी के कागजात नहीं दे गया?’’

‘‘नहीं सर, गाड़ी के सारे कागजात उसी के पास हैं.’’

‘‘निशांत का फोन नंबर होगा तुम्हारे पास, उस से बात करवाओ.’’ दर्शन सिंह ने कथित मनोहरलाल को गौर से देखते हुए कहा.

‘‘सर, निशांत ने अपना पुराना नंबर बदल दिया है, नया नंबर मुझे अभी तक नहीं दिया.’’

‘‘तो पुराना नंबर ही बता दो. क्या था पुराना नंबर?’’

‘‘सर, वह तो मैं ने डिलीट कर दिया है.’’

दर्शन सिंह को उस की इन बातों पर यकीन नहीं हुआ. उन का संबंध कंट्रोल रूम से था, जबकि संदिग्ध व्यक्ति से वांछित पूछताछ करना थाना या चौकी पुलिस के अधिकार में होता है. इसलिए उन्होंने मनोहरलाल से ज्यादा पूछताछ न कर के उस के बारे में सैक्टर 19 की पुलिस चौकी को बता दिया. थोड़ी देर में पुलिस चौकी के इंचार्ज एसआई राजेंद्र सिंह और थाना सैक्टर 20 के थानाप्रभारी इंसपेक्टर अजीत सिंह पुलिस टीम के साथ वहां आ पहुंचे. उन्हें संदेह था कि पकड़े गए व्यक्ति के पास चोरी की कार है और इस का संबंध किसी बड़े कार चोर गिरोह से है. उन्हें लगा कि पूछताछ में किसी बड़े कार चोर गिरोह का खुलासा हो सकता है.

मनोहरलाल से हल्कीफुल्की पूछताछ के बाद अजीत सिंह ने बरामद कार की तलाशी के लिए डिक्की खुलवाई. डिक्की में एक बोरी रखी थी, जिस का मुंह सिला हुआ था. बोरी में पालक, धनिया और मेथी भरी होने की बात कह कर मनोहरलाल ने बताया कि उस के परिवार में एक पारिवारिक फंक्शन है, उसी के लिए उस ने बीते दिन चंडीगढ़ की सदर सब्जी मंडी से ये सब्जियां खरीदी थीं. इस में संदेह जैसा कुछ नजर नहीं आया. फिर भी पुलिसिया स्वभाव के चलते अजीत सिंह ने पूछ लिया कि बोरी में कुल कितने वजन का सामान है. इस सवाल का जवाब देने में मनोहरलाल की जुबान लड़खड़ा गई. इस पर अजीत सिंह ने अपने 2 सिपाहियों से बोरी उठा कर उस के वजन का अनुमान लगाने को कहा.

पालक और धनिया वगैरह का वजन ज्यादा नहीं होता, लेकिन पुलिस के 2 जवान भी उस बोरी को आसानी से नहीं उठा सके. उन्होंने बताया कि बोरी का वजन एक क्विंटल के आसपास है. निस्संदेह बोरी में अन्य कोई भारी चीज थी. इस से संदेह का दायरा और बढ़ गया. बोरी की सिलाई उधेड़ कर उस के भीतर भरे सामान को देखने का प्रयास किया गया तो एक ऐसा अप्रत्याशित दृश्य पुलिस के सामने आया, जिसे देख सब की आंखें फटी की फटी रह गईं. बोरी में पालक व धनिया के बीच एक युवती की लाश को मोड़ कर रखा गया था. उस के हाथ और पैर पीछे की ओर बंधे हुए थे. उस की नाक से कुछ खून भी निकला था, जो जम गया था.

कार और उस के ड्राइवर की हकीकत सामने आने के बाद अजीत सिंह ने मोबाइल द्वारा घटना की सूचना जिला पंचकूला के डीसीपी अनिल धवन को दे कर उन से दिशानिर्देशन हासिल किए. इस के बाद उन्होंने पीसीआर 19 के इंचार्ज एएसआई दर्शन सिंह से तहरीर ले कर धारा 302/201/34 के तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए थाने भिजवा दी. इसी के साथ उन्होंने मनोहरलाल गुप्ता को विधिवत हिरासत में ले कर मौके पर ही उस से पूछताछ शुरू कर दी. उस ने जल्दी ही अपना अपराध स्वीकार कर लिया. मनोहरलाल ने बताया कि मृतका का नाम सायरा बानो था और वह मुंबई की रहने वाली थी.

मनोहरलाल ने आगे बताया, ‘‘इसे मैं ने अपने दोस्त राजन गुप्ता और उस की पत्नी पायल गुप्ता के साथ मिल कर मारा है. इस की हत्या के पीछे एक लंबी कहानी है. मैं आप को हर बात विस्तारपूर्वक बताऊंगा, कोर्ट में भी वही बयान दूंगा. मैं आप लोगों का पूरा सहयोग करूंगा. बस आप लोग मेरा टौर्चर मत कीजिएगा. मैं पहले भी कुछ केसों में गिरफ्तार हो कर पुलिस की मार झेल चुका हूं.’’  कुछ देर बाद डीसीपी

अनिल धवन के अलावा सीआईए इंसपेक्टर नरेंद्र कादियान भी वहां आ पहुंचे. इन पुलिस अधिकारियों ने भी मनोहरलाल से पूछताछ की. उस के बाद अनिल धवन के निर्देश पर अजीत सिंह ने मौके की बाकी काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए पंचकूला के सिविल अस्पताल भिजवा दिया. जरूरी काररवाई निपटा कर पुलिस मनोहरलाल को थाने के बजाय पहले पंचकूला के सेक्टर-10 स्थित राजन गुप्ता की कोठी 1081 ले गई. वह पहले ही बता चुका था कि जिस चादर में सायरा की लाश लपेट कर रखी गई थी और जिस तौलिए पर उस के खून के छीटें पड़े थे, वे राजन के घर पर ही रह गए थे.

इस समय इन चीजों को वे दोनों कहीं छिपाने गए होंगे. मनोहरलाल ही उन दोनों को पहचानता था. लिहाजा उसे साथ ले कर पुलिस गुप्ता दंपति की तलाश में लग गई. आखिर पुलिस की मेहनत रंग लाई और उसी दिन दोपहर बाद 3 बजे दोनों पंचकूला के माजरी चौक पर पुलिस को मिल गए. पुलिस ने तीनों को ले जा कर थाने में अलगअलग लौकअप में बंद कर दिया. रात में उन से कोई खास पूछताछ नहीं की गई. अगले दिन पुलिस ने तीनों को इलाका मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के एक सप्ताह के कस्टडी रिमांड पर ले लिया.

दालत से निपटने के बाद पूछताछ के लिए तीनों को सीआईए के पूछताछ केंद्र ले जाया गया, जहां तीनों से विस्तृत पूछताछ की गई. इस पूछताछ में तीनों ने पुलिस को जो बताया, उस से सायरा बानो हत्याकांड की सारी कहानी खुल कर सामने आ गई : चंडीगढ़ का रहने वाला मनोहरलाल गुप्ता खूब पैसा कमा कर बड़ा आदमी बनने के सपने देखता था. उस के पिता सब्जी बेचने का काम करते थे. इस काम में उसे इतनी कमाई नहीं थी कि बच्चों को साफसुथरे माहौल में रख कर सलीके से पढ़ायालिखाया जा सकता. मनोहरलाल का बड़ा भाई अशोक भी रेहड़ी पर सब्जियां लाद कर गलीमोहल्लों में बेचने जाता था. गुजारे लायक पढ़ाई कर लेने के बाद मनोहरलाल भी भाई के साथ वही काम करने लगा.

सन 2000 में जब वह 20 साल का हुआ तो सब्जी बेचने के साथसाथ वह स्थानीय सिनेमाघरों में जा कर टिकटें ब्लैक करने लगा. बाद में उसे जुए की लत लग गई तो उस का उठनाबैठना गलत लोगों के साथ हो गया. इस का नतीजा यह निकला कि वह 2 बार दुष्कर्म के केस में और एक बार ब्लाइंड मर्डर केस में जेल गया. हालांकि इन सभी आरोपों से वह बरी हो गया. लेकिन पुलिस की मार खाने के अलावा उस ने अपनी जिंदगी का काफी समय जेल में गुजारा था.

जेल से निकलने के बाद उस ने इन कामों से तौबा कर के सेक्टर-45, चंडीगढ़ के एक होटल में नौकरी कर ली. इस होटल का मालिक निशांत कुछ रहस्यमय सा व्यक्ति था. उस के बारे में मनोहरलाल बस इतना ही जान पाया था कि वह मूलरूप से हिमाचल प्रदेश का रहने वाला था. मनोहरलाल को वह समझाया करता था कि इस दुनिया में सीधे रास्ते से इतना ही कमाया जा सकता है कि गुजर होता रहे. मजे की जिंदगी जीने के लिए मोटा पैसा कमाना हो तो किसी भी उलटेसीधे काम से गुरेज नहीं करना चाहिए. दरअसल वह अपने होटल में आने वाले अपने ग्राहकों को कालगर्ल्स उपलब्ध करा कर उन से अच्छा पैसा वसूलता था. उस ने इस काम के गुर मनोहरलाल को भी सिखा दिए थे.

इस का नतीजा यह निकला कि थोड़े ही दिनों में वह भी इस काम से पैसों में खेलने लगा. इस बीच उस ने शादी कर ली और 2 बेटियों तथा एक बेटे का पिता बन गया. रहने को उस ने चंडीगढ़ के सैक्टर-56 में एक बढि़या फ्लैट खरीद लिया. निशांत के संपर्क में कई कालगर्ल्स थीं. इन्हीं में एक थी सायरा बानो. वह खुद को मुंबई की रहने वाली बताया करती थी. निशांत इस तरह की लड़कियों के बारे में जानने के लिए ज्यादा गहराई में नहीं जाता था. वह इन के जिस्म व हुस्न के हिसाब से कीमत लगा कर उन्हें ग्राहक के पास भेज देता था, जिस का 2 तिहाई हिस्सा वह अपने पास रखता था.

लड़कियों को नए नाम दे कर वह नसीहत दे दिया करता था कि वे किसी भी ग्राहक को न तो अपना असली नाम बताए और न ही कभी अपने मूल पते व परिवार वगैरह की जानकारी दें. सायरा बानो को उस ने पूनम नाम दे रखा था. निशांत बिना मेहनत के खूब पैसे बटोर रहा था. फिर भी एक दिन कई लड़कियों की कमाई समेट कर वह चंडीगढ़ छोड़ कर चला गया. होटल उस ने किसी को बेच दिया था. उस के जाने के बाद लड़कियों ने दूसरे ठिकाने ढूंढ़ लिए.

मनोहरलाल इस धंधे के गुर सीख गया था. लेकिन होटल बिक जाने की वजह से उसे आगे यह धंधा चलतेफिरते ही करना था. इसी सिलसिले में उस ने मोटी रकम का लालच दे कर सायरा को अपने साथ रख लिया. निशांत की लांसर कार उस के पास रह गई थी, जिसे वह अपने इसी काम के लिए इस्तेमाल करने लगा था. मनोहरलाल का एक जानकार था राजन गुप्ता. वह शिवमंदिर वाली गली, कीर्तिनगर, सिरसा हरियाणा का रहने वाला था. उस ने नेपाली लड़की पायल से शादी कर रखी थी और इसी तरह के धंधे के लिए पंचकूला में रह रहा था.

एक दिन अचानक उस की मुलाकात पुराने जानकार मनोहरलाल से हुई तो उस ने उसे व उस की पत्नी को पार्टनर बना कर इस काम को बड़े स्तर पर करने का मन बना लिया. धंधा करने वाली लड़कियां अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा या तो अपने घर भेज देती थीं या फिर किसी विश्वसनीय व्यक्ति पर भरोसा कर के उस के पास जमा करवाती रहती थीं.जब उन्हें जरूरत होती थी, वे अपना पैसा वापस ले लेती थीं. निशांत पर तमाम लड़कियों ने भरोसा किया था, लेकिन वह उन्हें धोखा दे कर उन का पैसा ले उड़ा था. इन में सायरा भी थी. इस स्थिति में उसे आगे किसी पर विश्वास नहीं करना चाहिए था. लेकिन उसे मनोहरलाल के अलावा राजन और पायल भी भले लोग लगे थे.

एक बार सायरा बीमार हुई तो इन लोगों ने एक प्राइवेट क्लीनिक में उस का इलाज कराया. वहां पता चला कि उसे एड्स है. यह जानते हुए भी कि उस के संपर्क में आने वाले लोगों की जान जोखिम में पड़ सकती है, इन्होंने उस से धंधा करवाना बंद नहीं किया. सायरा ने एक बार इन लोगों को बताया भी था कि उस की मां बीमार रहती है, मां के इलाज के लिए वह पैसा इकट्ठा कर रही है ताकि मुंबई जा कर ठीक से मां का इलाज करा सके. 11 जनवरी, 2016 को सायरा इन लोगों को बिना बताए सीधे एक ग्राहक के पास चली गई. रात में उस ने मनोहरलाल को पंचकूला की एक जगह के बारे में बता कर वहां से पिकअप करने को कहा. मनोहरलाल बताई गई जगह पर पहुंचा तो वह शराब के नशे में धुत्त थी. वह उसे राजन के यहां ले गया.

वहां पहुंच कर सायरा ने झगड़ा करते हुए कहा, ‘‘आप लोगों के पास मेरे जो ढाई लाख रुपए जमा हैं, वे मुझे दे दो. मुझे अपनी मां का इलाज कराने मुंबई जाना है.’’

‘‘देखो,’’ मनोहरलाल ने उसे समझाना चाहा, ‘‘तुम्हारे इलाज पर काफी पैसा खर्च हो रहा है. फिर भी तुम चिंता मत करो, एक हफ्ते के अंदर हम तुम्हें तुम्हारा सारा पैसा लौटा देंगे.’’

‘‘अपना इलाज भी मैं खुद करवाऊंगी. बस तुम लोग अभी के अभी मेरा ढाई लाख रुपया वापस कर दो.’’

इस के बाद वह चिल्लाने लगी. समझाने पर भी वह नहीं मानी तो पायल ने आगे बढ़ कर उसे 5-6 थप्पड़ जड़ दिए. इस पर चुप होने के बजाय वह और जोरों से चिल्लाने लगी. राजन को गुस्सा आया तो उस ने रसोई से बेलन ला कर उस के सिर व कंधे पर कई वार कर दिए.

सायरा को निढाल होते देख मनोहरलाल ने उसे धक्का दे कर बैड पर गिरा दिया. पायल ने तुरंत उस के मुंह में रूमाल ठूंस कर उस के हाथपैर पीछे ले जा कर बांध दिए. मुंह में रूमाल ठूंसते वक्त उस के मुंह से खून निकलने लगा था. इस पर मनोहरलाल ने उस की नाक व मुंह को दबा दिया, जिस से उस की मौत हो गई. तीनों ने मिल कर उस की लाश को मखमल की चादर में लपेट कर एक जगह छिपा कर रख दिया. उस रात और अगले पूरे दिन लाश उसी तरह पड़ी रही. अब तक उस में से हलकी बदबू आने लगी थी. ऐसे में लाश को जल्दी ठिकाने लगाना जरूरी था.

3 जनवरी की सुबह मनोहरलाल अकेला जा कर बड़ी सी बोरी में पालक, धनिया और गोभी वगैरह ले आया. उसी में लाश को रख कर बोरी को सिल दिया और अकेला ही सायरा की लाश को ठिकाने लगाने के लिए घर से निकल पड़ा. संयोग से रास्ते में ही पुलिस द्वारा पकड़ लिया गया. इस बीच राजन व पायल वारदात में इस्तेमाल चादर व तौलिया किसी वीरान जगह पर फेंकने चले गए थे, बाद में उन्हें भी उसी दिन पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था. पूछताछ के बाद उन की निशानदेही पर पुलिस ने चादर, तौलिया और बेलन बरामद कर लिए. कार पहले ही कब्जे में ली जा चुकी थी.

सायरा के फोन में उस की बड़ी बहन शबाना बानो का फोन नंबर था. उस से संपर्क कर के पुलिस ने उन लोगों से पंचकूला आ कर शव की पहचान करने के लिए कहा, ताकि पोस्टमार्टम करवाया जा सके. लेकिन शबाना व उस की मां फातिमा ने कहा कि वह तो उन के लिए 10 साल पहले तब ही मर चुकी थी, जब वह 16 साल की उम्र में घर से भाग गई थी. उन लोगों ने अपनी बदतर माली हालत का हवाला दे कर पंचकूला आने में असमर्थता जाहिर की. उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि सायरा का अंतिम संस्कार वही करवा दें.

इस के बाद पुलिस के सामने दूसरा कोई चारा नहीं बचा था. 72 घंटों तक शव को मार्च्युरी में रखने के बाद उस का पोस्टमार्टम करवा कर 7 जनवरी, 2016 की शाम पुलिस की देखरेख में मनीमाजरा के कब्रिस्तान में दफना दिया गया. रिमांड अवधि समाप्त होने पर पुलिस ने मनोहरलाल गुप्ता, राजन गुप्ता व पायल गुप्ता को फिर से न्यायालय में पेश कर के न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया. Real Crime Story

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित