Etawah News : देवर के इश्क में सुहाग की बलि

Etawah News : 2 बच्चों की मां बनने के बावजूद मधु के अवैध संबंध फुफेरे देवर रोहित के साथ हो गए. अवैध संबंधों की राह पर वह ऐसी फिसली कि संभल नहीं पाई. साथ ही उस ने प्रेमी के साथ मिल कर ऐसे क्राइम को अंजाम दिया, जिस की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी.

उस रोज मधु ने मस्टर्ड कलर की साड़ी और ब्लैक कलर का ब्लाउज पहन रखा था. इन कपड़ों में उस का गोरा रंग खूब खिल रहा था. रोहित कुछ देर उसे एकटक देखता रहा, फिर मुसकराते हुए बोला, ”भाभी, बुरा न मानो तो एक बात कहूं?’’

मधु के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह सवालिया नजरों से रोहित को देखने लगी. रोहित ने उस की झील सी आंखों में झांकते हुए कह दिया, ”तुम बहुत हसीन हो भाभी, हजारों में न सही, लेकिन सैकड़ों में एक जरूर हो.’’

अपनी तारीफ सुन कर मधु के गाल गुलाबी हो गए. बरबस उस के होंठों पर मुसकान तैर गई. वह मन की खुशी को छिपाते हुए बोली, ”चलो हटो, आजकल तुम बातें बनाना सीख गए हो.’’

”मैं सच कहता हूं भाभी, ”रोहित उत्साह में आ कर उस के सामने आ खड़ा हुुआ, ”कहो तो मैं सबूत भी दे सकता हूं कि आज तुम कितनी हसीन लग रही हो.’’

मधु ने गौर से रोहित को देखा फिर थोड़ी अदा से कहा, ”दो सबूत?’’

”मेरी आंखों में देखो, आईना तो झूठ बोल सकता है, पर मेरी आंखें झूठ नहीं बोलेंगी. आंखों में तुम्हारा अक्स जो कैद है, वह दुनिया की सब से हसीन औरत का है.’’ रोहित ने बड़े प्यार से मधु को देखा.

मधु के होंठों पर शरारत तैर गई. उस ने रोहित की आंखों में देखा, फिर निचला होंठ दबाते हुए बोली, ”चल झूठे, तेरी आंखों में तो मुझे कुछ और ही दिखाई दे रहा है.’’

”तुम्हारी तसवीर के सिवाय कुछ और हो ही नहीं सकता. बताओ, तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है?’’

”एक तमन्ना… एक प्यास,’’ मधु ने मादक स्वर में कहा.

”भाभी, जब तुम ने मेरी तमन्ना देख ही ली है तो उसे पूरी कर दो न.’’ रोहित ने हिम्मत जुटा कर मधु का हाथ पकड़ लिया.

”कर दूंगी, वक्त आने दो.’’ मधु ने रोहित के गाल पर प्यार की चपत लगाई.

”कब भाभी, आखिर कितना इंतजार कराओगी?’’

”ज्यादा नहीं, सिर्फ एक दिन का.’’ मधु नशीली नजरों से देवर को देख कर बोली, ”अब हाथ तो छोड़ दो.’’

”पहले वादा करो भाभी, तभी हाथ छोड़ूंगा.’’

”पक्का वादा.’’ मधु ने कहा तो रोहित ने उस का हाथ छोड़ दिया.

उत्तर प्रदेश के इटावा जनपद का एक चर्चित कस्बा है लखुना. यह कस्बा सोनेचांदी के व्यवसाय के लिए दूरदूर तक मशहूर है. ग्रामीण क्षेत्र के ज्यादातर लोग शादीविवाह में इसी कस्बे से आभूषण बनवाते हैं.

इसी लखुना कस्बे में रामबाबू अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी रामबेटी के अलावा 2 बेटे अजय, अमर तथा 2 बेटियां राधा व मधु थीं. रामबाबू पढ़ालिखा तो न था, लेकिन आभूषण बनाने का उम्दा कारीगर था. वह ज्वैलरी की दुकान में काम करता था. उस के परिवार का भरणपोषण उस की सैलरी से होता था.

मधु भाईबहनों में सब से छोटी थी. वह अपने अन्य भाईबहनों से ज्यादा सुंदर थी. पढ़ाईलिखाई में भी तेज थी. हाईस्कूल पास कर के वह आगे की पढ़ाई जारी रखना चाहती थी, लेकिन मम्मीपापा उसे आगे पढ़ाने के पक्ष में नहीं थे. वह पढ़ाई छोड़ कर मम्मी के साथ घरेलू काम में हाथ बंटाने लगी. हालांकि वह मम्मीपापा के इस निर्णय से खुश नहीं थी.

मधु ने सोलहवां वसंत पार किया तो रामबाबू को उस के ब्याह की चिंता सताने लगी. एक कहावत है, ‘जब बेटी हुई सयानी, फिर पेटे नहीं समानी.’ इसी कहावत के चरितार्थ रामबाबू भी अपनी बेटी की शादी के लिए योग्य लड़का ढूंढने लगा. काफी दौड़धूप के बाद उस की नजर मनोज कुमार पर जा कर ठहर गई.

मनोज कुमार के पापा तहसीलदार, इटावा जिले के इकदिल कस्बा में रहते थे. परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी रागिनी तथा बेटा मनोज कुमार था. रागिनी की शादी वह आगरा के बाह कस्बा निवासी श्याम सिंह के साथ कर चुके थे. श्याम सिंह डाक्टर था.

मनोज अभी कुंवारा था. मनोज रंगरूप से तो सांवला था, लेकिन शरीर से मजबूत था. पढ़ालिखा भी था. सरकारी नौकरी की तलाश में उस ने जूते घिसे. लेकिन जब नौकरी नहीं मिली तो वह कस्बे में ही प्राइवेट नौकरी करने लगा. कुछ खेती की जमीन भी थी, उस की भी देखभाल मनोज ही करता था. रामबाबू ने मनोज को अपनी बेटी मधु के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद फरवरी, 2010 में मधु का विवाह मनोज कुमार के साथ धूमधाम से हो गया.

सुहाग के जोड़े में सजीधजी मधु पहली बार ससुराल आई तो मुंह दिखाई रस्म में सभी ने उस के रूपरंग की तारीफ की. मनोज भी मधु जैसी खूबसूरत पत्नी पा कर खुश था. वह अपने भाग्य पर इतरा उठा था. सब खुश थे, लेकिन मधु खुश नहीं थी. उस ने जिस तरह के पति की कल्पना की थी, मनोज वैसा नहीं था.

मधु ने सपना संजो रखा था कि उस का पति हैंडसम, तेजतर्रार और आधुनिक विचारों वाला होगा. जबकि मनोज उस की अपेक्षाओं से बिलकुल विपरीत था. सांवले रंग का मनोज देहाती भाषा बोलता था और रहनसहन भी साधारण था.

लेकिन अब जैसा भी था, मनोज उस का पति था. मन मसोस कर मधु ने जीवन की शुरुआत की. धीरेधीरे कई साल बीत गए. इस बीच मधु 2 बेटों अमित व सुमित की मां बनी. 2 बच्चों के जन्म से घर में खुशियां तो बढ़ गईं, लेकिन आर्थिक बोझ भी बढ़ गया. मनोज अधिक कमाई की सोचने लगा. लेकिन उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह कौन सा काम करे, जिस से उस की आमदनी में इजाफा हो.

काफी सोचविचार के बाद उस ने घरों में ब्रेड, चाय, बिसकुट सप्लाई का काम शुरू कर दिया. इस धंधे से उस की अतिरिक्त कमाई तो होने लगी, लेकिन इस काम से वह बहुत थम जाता था.

मधु की सास की मौत हो चुकी थी. अत: घर की चाबी उसी के हाथ में थी. मनोज नौकरी व व्यवसाय में जो भी कमाई करता था, वह सब मधु के हाथ पर ही रखता था. खेती से होने वाली आमदनी का हिसाब भी मधु ही रखती थी. मधु के ससुर तहसीलदार नाममात्र के घर के मालिक थे. वह तो केवल घर खेत की रखवाली करते थे. खेतों पर उन्होंने झोपड़ी बना रखी थी. उन का ज्यादा समय खेतों पर ही बीतता था. वह केवल खाना खाने घर आते थे.

मनोज कड़ी मेहनत करता था. वह सुबह उठ कर फेरी लगाता, फिर 10 बजे नौकरी पर चला जाता तो फिर रात गए ही लौटता था. थकान के बहाने वह शराब भी पीने लगा था. धीरेधीरे वह शराब का लती हो गया. मधु शराब पीने को मना करती तो वह उस पर नाराज हो जाता था.

मधु 2 बच्चों की मां जरूर बन गई थी, लेकिन उस के रूपरंग में अभी भी कोई कमी नहीं आई थी. वह बनसंवर कर रहती थी. दूसरी तरफ मनोज का मन सैक्स से हट गया था. 2 बच्चे पैदा करने के बाद उस ने पत्नी की भावनाओं को समझना बंद कर दिया था. मधु हर रात पति का साथ चाहती थी, लेकिन शराब का लती मनोज उस का साथ नहीं दे पाता था. नतीजा यह निकला कि मधु पति से किनारा कर के अपने लिए जिस्म का साथी तलाशने लगी.

इन्हीं दिनों मधु की निगाह रोहित पर पड़ी. रोहित थाना एकदिल के गांव बुसा का रहने वाला था. रिश्ते में मनोज रोहित का ममेरा भाई यानी मामा का बेटा था. इस नाते मनोज की पत्नी मधु और रोहित के बीच देवरभाभी का रिश्ता था.

25 वर्षीय रोहित गबरू जवान था. वह एलआईसी व पोस्ट औफिस का एजेंट था. बचत योजनाओं में लोगों का पैसा जमा कराता था और अच्छी कमाई करता था, जिस से वह ठाटबाट से रहता था. मधु भी पोस्ट औफिस में पैसा जमा करने जाती थी, अत: उस का मधु के घर आनाजाना लगा रहता था. रोहित रसभरी लच्छेदार बातें करता था, इसलिए मधु से उस की खूब पटती थी.

उम्र में रोहित मधु से 5 साल छोटा था. दोनों का देवरभाभी का रिश्ता था, सो उन के बीच खूब हंसीमजाक होती थी. मधु भी उस की बातों में खूब रस लेती थी. उस के मन के किसी कोने में जैसे साथी की तसवीर थी, वह रोहित जैसी ही थी.

यही वजह थी कि मधु रोहित को चाहने लगी थी. रोहित तो वैसे ही उस का दीवाना था. वह मधु भाभी से प्रीत जोड़ कर अपनी तन्हाइयों से निजात पाने के सपने देखा करता था.

उस रोज जब रोहित घर आया तो वह मधु के रूपरंग की तारीफ करने लगा और अपनी रसभरी बातों से मधु को रिझाने लगा. इस से मधु का दिल उमंगों से भर गया. उधर रोहित भी भाभी के लिए बेताब था. उस ने वह रात सपने संजोतेसंजोते गुजारी. अगले दिन उस की चाहत पूरी होने वाली थी.

रोहित सुबह देर से जागा. दोपहर हुई तो तैयार हो कर बाइक से मधु के घर की ओर रवाना हो लिया. लगभग 10 किलोमीटर की दूरी तय कर वह मधु के घर पहुंच गया. मधु उसी का इंतजार कर रही थी. उस दिन उस ने अपने आप को कुछ खास तरह से संवारा था. रोहित ने कमरे में पहुंचते ही मधु को अपनी बांहों में समेट लिया, ”भाभी, आज तो हूर की परी लग रही हो. जी चाहता है कि…’’

”थोड़ा सब्र से काम लो देवरजी,’’ मधु ने प्यार से उसे एक चपत लगाई, ”मैं दरवाजा तो बंद कर लूं.’’

 

रोहित ने मधु को बाहुपाश से मुक्त कर दिया. मधु दरवाजे तक गई, बाहर का जायजा लिया. बाहर दोपहर का सन्नाटा था. मधु ने दरवाजा बंद किया और मुसकान बिखेरती हुई रोहित के सामने आ खड़ी हुई. ख्वाबों की तसवीर अब उस के सामने थी. रोहित बावला सा हो गया. उस ने मधु को बाहुपाश में भरा और बिस्तर पर ले गया. इस के बाद तो कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. दोनों के जिस्म तभी जुदा हुए, जब उन्हें तृप्ति मिल गई.

उस दोपहर अनीति की आग में मर्यादा स्वाहा हुई तो फिर यह खेल अकसर खेला जाने लगा. मधु को रोहित पसंद था. उसे उस की बांहों में असीम सुख मिलता था. देवर से अवैध रिश्ता बना तो मधु पति को तनमन से भूल सी गई. उस ने उस की परवाह करनी भी बंद कर दी. यही नहीं, मधु रोहित के साथ बाइक पर बैठ कर बाजार में घूमने भी जाने लगी.

छिप न सके दोनों के अवैध संबंध

जब देवरभाभी की हर दोपहर रंगीन होने लगी तो बातें बाहर भी फैलने लगीं. इसी बीच एक रोज गांव का एक युवक खेतों पर पहुंचा और झोपड़ी में बैठे मनोज के पिता तहसीलदार से बोला, ”दद्ïदा, आप तो यहां खेतों पर पड़े रहते हो. घर में क्या अनर्थ हो रहा है, तुम्हें कुछ पता भी है?’’

”मेरे घर में और अनर्थ? यह तुम कैसी बातें कर रहे हो?’’ तहसीलदार ने प्रश्न किया.

”दद्ïदा, नहीं पता है तो सुनो. बुसा गांव का रिश्तेदार रोहित अकसर तुम्हारे घर दोपहर में आता है. उस के आते ही तुम्हारी बहू मधु दरवाजा बंद कर लेती है. आप तो बुजुर्ग हैं. बंद दरवाजे के भीतर बहू क्या गुल खिलाती होगी, आप को भी समझना चाहिए.’’

युवक तो अपनी बात कह कर बीड़ी फूंकता हुआ चला गया, लेकिन तहसीलदार के मन में शंकाओं के बादल उमडऩेघुमडऩे लगे. वह सोचने लगा, ‘रोहित खास रिश्तेदार है. क्या वह वास्तव में उस की पीठ में इज्जत का छुरा घोंप रहा है. जल्द ही असलियत का पता लगाना होगा. मनोज को भी अलर्ट करना होगा.’

असलियत जानने के लिए तहसीलदार ने घर की निगरानी शुरू कर दी. चंद दिनों में ही उसे पता चल गया कि बहू मधु बदचलन है. उस का रोहित से टांका भिड़ा है. दोनों बंद कमरे में मर्यादा को तारतार करते हैं. उन्होंने इस बाबत मनोज को अलर्ट किया कि वह अपनी पत्नी मधु व घर पर आने वाले रोहित पर नजर रखे. उन के बारे में पूरे मोहल्ले में खुसरफुसर हो रही है.

मनोज ने इस बाबत मधु से बात की तो वह उसे ही आंखें दिखाते हुए बोली, ”लोगों के बहकावे में आ कर मेरे कैरेक्टर पर शक करते हुए तुम्हें शर्म नहीं आई. रोहित रिश्ते में मेरा देवर है. पोस्ट औफिस की किस्त लेने घर आता है. देवरभाभी के रिश्ते से हम दोनों हंसीमजाक कर लेते हैं. कमाल है, पासपड़ोस के लोग देवरभौजाई के रिश्ते को भी शक की नजर से देखते हैं.’’

आधी रात को चूडिय़ों की आवाज ने खोली पोल

मनोज के पास पत्नी की चरित्रहीनता का कोई सबूत तो था नहीं, सो वह चुप रह गया. उस ने सोचा कि जब तक सच अपनी आंखों से नहीं देखेगा, किसी की बात पर विश्वास नहीं करेगा. मनोज चुप हो गया तो मधु ने इसे अपनी जीत मान लिया. एक महीने तक वह रोहित से दूर रही. उस के बाद फिर अनीति की आग में बदन सिंकने लगे.

उस रोज भी मनोज रोजाना की तरह सुबह 10 बजे ड्यूटी गया था. उस के जाने के बाद ही रोहित उस के घर आ गया. उसी समय मनोज वापस आ गया. मधु और रोहित वासना के नशे में चूर थे. जल्दबाजी में दोनों अंदर से दरवाजा बंद करना भी भूल गए. उढ़का हुआ दरवाजा आहिस्ता से खोल कर मनोज सीधा कमरे में पहुंच गया. वहां का नजारा देख कर उस की आंखें गुस्से से लाल हो गईं.

मधु और रोहित रंगेहाथों पकड़े गए तो दोनों अपराधबोध से कांपने लगे. मनोज ने दोनों की खबर ली. मौके की नजाकत समझ कर मधु ने पति से अपनी गलती की माफी मांग ली. इस के साथ ही उस ने कसम खाई कि भविष्य में वह रोहित से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखेगी. रोहित ने भी मनोज के पैर पकड़ते हुए कहा, ”बड़े भैया, मुझ से बड़ी भूल हो गई, इस बार माफ कर दो. आइंदा ऐसी भूल नहीं होगी.’’

मनोज ने देवरभाभी को इसलिए माफ कर दिया था ताकि मोहल्ले में घर की इज्जत नीलाम न हो. लेकिन इस के बाद वे दोनों पर कड़ी नजर रखने लगा. जिस दिन मनोज रोहित को घर में देख लेता तो उसे फटकार लगाता. मधु जवाबसवाल करती तो वह उस की पिटाई कर देता, परंतु पति की मार का मधु पर कोई असर नहीं पड़ता था. वह रोहित के प्यार में इस कदर पागल थी कि एक दिन भी उस से अलग नहीं रहना चाहती थी. रोहित को भी मधु के बिना चैन नहीं था.

रोहित अब अकसर संडे के दिन आता था. उस दिन मनोज की भी छुट्टी रहती थी, इसलिए वह घर पर ही मिलता था. ऐसा वह इसलिए करता था ताकि आने पर मनोज को शक न हो. उस रोज मधु स्वादिष्ट खाना बनाती थी. शाम को दोनों बैठ कर शराब पीते थे, फिर खाना खाते थे. मधु बड़ी चालाकी से मनोज की सब्जी में नींद की गोलियां पीस कर मिला देती थी. नतीजन खाने के बाद मनोज चारपाई पर लेटता तो कुछ देर बाद उसे नींद आ जाती थी. मनोज जब खर्राटे भरने लगता तो रोहित मधु के कमरे में पहुंच जाता. फिर दोनों रंगरलियां मनाते.

लेकिन मधु की यह चाल ज्यादा समय तक न चली और उस का यह भांडा भी फूट गया. दरअसल, उस रोज मनोज की तबियत कुछ नरम थी. इसलिए उस ने लती होने के बावजूद रोहित के साथ बैठ कर शराब नहीं पी. वह कमरे में जा कर लेट गया. उस ने खाना भी कमरे में ही मंगवा लिया. मधु ने खाने में नशीली गोलियां तो मिलाई थीं, लेकिन उस ने खाना आधाअधूरा ही खाया और थाली चारपाई के नीचे रख दी. कुछ देर बाद मधु उस के कमरे में पहुंची तो मनोज करवट लिए लेटा था. मधु ने समझा कि वह गहरी नींद में है. कुछ देर बाद वह रोहित के बिस्तर पर पहुंच गई.

आधी रात के बाद मनोज पेशाब करने के लिए उठा तो उस के बगल में सो रही मधु गायब थी. वह दबे पांव कमरे से निकल कर आंगन में आ गया. आंगन में आते ही मनोज के पांव ठिठक गए. आंगन से सटे कमरे में फुसफुसाहट और चूडिय़ों के खनकने की आवाजें आ रही थीं. मनोज सधे कदमों से कमरे के पास पहुंचा. दरवाजा उढ़का हुआ था, उस ने दरवाजा ढकेला तो खुल गया. कमरे के अंदर रोहित और मधु निर्वस्त्र हो कर एकदूसरे से गुंथे थे.

रिश्ते के भाई रोहित के साथ मधु को रंगरलियां मनाते देख कर मनोज की मर्दानगी जाग उठी. उस ने पहले दोनों को जलील किया और फिर जम कर मधु की पिटाई की. सुबह उस ने रोहित को भी फटकारा और घर आने को साफ मना कर दिया. अपराधबोध के चलते रोहित चला गया. उस ने मनोज के घर आना बंद कर दिया. रोहित का घर आना बंद हुआ तो मनोज ने राहत की सांस ली, लेकिन यह उस की भूल थी. मधु और रोहित कुछ महीनों तक एकदूसरे से दूर रहे और मोबाइल फोन के जरिए अपनी दिल की लगी बुझाते रहे. उस के बाद उन का फिर से मिलन होने लगा.

मधु रोहित की इस कदर दीवानी थी कि उसे उस के बिना कुछ भी नहीं सुहाता था. अब वह सागभाजी या घर का सामान लाने का बहाना बना कर घर से निकलती और पहुंच जाती रोहित के बताए स्थान पर. जिस्मानी मिलन के बाद मधु घर आ जाती थी. एक रोज मनोज दोपहर में घर आ गया. उस समय घर में ताला लगा था. उस ने पड़ोसियों से मधु के बारे में पूछा तो पता चला कि वह अकसर घर में ताला लगा कर कहीं चली जाती है. पड़ोसियों की बात सुन यह सोच कर मनोज का माथा ठनका कि कहीं वह रोहित से मिलने तो नहीं जाती. वह सोच ही रहा था कि हाथ में थैला लिए मधु आती दिखाई दी. पास आते ही वह बोली, ”आज इतनी जल्दी आ गए आप?’’

”हां, मैं तो आ गया. पहले तुम बताओ कहां गई थी?’’ मनोज ने मधु को शक की नजर से देखते हुए पूछा.

”और कहां जाऊंगी, सब्जी लेने गई थी.’’ मधु ने रूखी आवाज में जवाब दिया.

”सब्जी लेने क्या रोज जाती होï?’’ मनोज ने सवाल किया तो मधु बोली, ”नहीं, आज ही गई थी.’’

”पड़ोसी तो कहते हैं कि तुम आए दिन घर से निकल जाती हो?’’

”पड़ोसी जलते हैं. उन्हें हमारे घर में कलह कराने में मजा आता है, इसलिए तुम्हारे कान भरते हैं. तुम्हारा बूढ़ा बाप भी मुझे शक की नजर से देखता है और ताकझांक में लगा रहता है और तुम ऐसे शक्की इंसान हो कि भरोसा कर लेते हो.’’ मधु ने पति को बरगलाने की पूरी कोशिश की, लेकिन मनोज नहीं माना. उस ने लांछन लगाते हुए मधु को पीट दिया.

मधु भी ढीठ थी. उस ने तय कर रखा था कि पति कितना भी पूछे, लांछन लगाए पर वह रोहित का साथ नहीं छोड़ेगी. एक रोज मधु रोहित से मिलने पहुंची. वह उसे होटल में ले गया. वहां कमरे में रोहित के सामने उस के मन का दुख आंखों से छलक पड़ा. मधु रोआंसी आवाज में बोली, ”रोहित, मनोज ने मेरा जीना हराम कर दिया है. जब मन होता है, तुम्हारा नाम ले कर मुझे पीटने लगता है. अब मैं उस के साथ नहीं रह सकती. मुझे उस से निजात दिलाओ, नहीं तो मैं खुदकुशी कर लूंगी.’’

”ऐसा मत कहो भाभी,’’ रोहित ने उसे बांहों में भर लिया, ”तुम नहीं मरोगी, बल्कि वह मरेगा जो हमारी खुशियों का दुश्मन है.’’

”यह ठीक रहेगा. उस के जीते जी हम सुख से नहीं जी पाएंगे. तुम किसी सुपारी किलर के जरिए उसे ठिकाने लगवा दो. इस काम के लिए जो रुपया लगेगा, मैं खर्च कर दूंगी. कुछ रुपया पेशगी भी दे दूंगी.’’

पत्नी ने क्यों दी हत्या की सुपारी

भाभी के प्यार में आकंठ डूबे रोहित ने उसे पूरी तरह हासिल करने के लिए ममेरे भाई मनोज की हत्या का फैसला कर लिया. इस के बाद वह सुपारी किलर की तलाश में जुट गया. लेकिन वह सुपारी किलर हायर करने में सफल नहीं हुआ. रोहित शातिरदिमाग था. उस ने सोचा कि यदि वह स्वयं ही मनोज को ठिकाने लगा दे तो सुपारी किलर को दी जाने वाली रकम उसे ही मिल जाएगी. किसी को कानोकान खबर भी नहीं लगेगी. मन में लालच समाया तो उस ने सावधानी के साथ मधु से मुलाकात की. रोहित ने मधु से कहा कि सुपारी किलर का इंतजाम हो गया है. मोलभाव के बाद साढ़े 3 लाख रुपए में सौदा तय हुआ है. 20 हजार रुपए पेशगी देने होंगे.

रोहित की बात सुन कर मधु बोली, ”रोहित, तुम्हारे प्यार में मैं पागल हूं. तुम्हें पाने के लिए और पति से छुटकारा के लिए मुझे सौदा मंजूर है, लेकिन अभी मेरे पास 15 हजार रुपया है. कल एकदिल रेलवे स्टेशन पर मिलना, वहीं रुपए दे दूंगी. बाकी रकम काम होने के बाद ज्वैलरी बेच कर व एफडी तुड़वा कर दे दूंगी.’’ दूसरे रोज 15 हजार रुपए मिलने के बाद रोहित ने ममेरे भाई मनोज की हत्या का प्लान तैयार किया. इस प्लान में उस ने अपने छोटे भाई राहुल को भी शामिल कर लिया. राहुल बेरोजगार था और पैसेपैसे के लिए परेशान था, इसलिए पैसा मिलने के लालच में भाई का साथ देने को राजी हो गया.

दोनों भाइयों के बीच तय हुआ कि मनोज को इटावा की नुमाइश दिखाने के बहाने इटावा लाया जाए, फिर लौटते समय रास्ते में शराब पिला कर उसे ठिकाने लगा दिया जाए. लेकिन मनोज को नुमाइश दिखाने कैसे लाया जाए. क्योंकि उस के मन में तो रोहित के प्रति गुस्सा भरा था. रोहित ने इस के लिए कोशिश करनी शुरू कर दी. वह उस के घर तो नहीं जाता, लेकिन जब कभी एकदिल कस्बे में मुलाकात हो जाती तो रोहित झुक कर मनोज के पैर छूता, गलती के लिए माफी मांगता, फिर ठेके पर ले जा कर उसे शराब पिलाता. बारबार माफी मांगने और शराब पार्टी करने से कुछ दिनों बाद मनोज के मन में रोहित के प्रति भरा गुस्सा ठंडा पड़ गया.

प्रेमिका के पति की हत्या तो कर दी लेकिन…

3 जनवरी, 2025 की दोपहर रोहित अपनी बाइक से मनोज के एकदिल कस्बा के खेड़ापति मोहल्ला स्थित घर पहुंचा. उस समय मनोज घर पर ही था. रोहित ने उस के पैर छू कर कहा, ”मनोज भैया, इटावा नुमाइश देखने जा रहा हूं. आप भी साथ चलते तो मजा और ही होता. नुमाइश देख कर व खानेपीने के बाद वापस घर आ जाएंगे.’’ चूंकि मनोज शराब का लती था, इसलिए खानेपीने के लालच में रोहित के साथ चलने को राजी हो गया. वह यह भी जानता था कि सारा खर्चा रोहित ही करेगा, इसलिए वह फटाफट तैयार हुआ और रोहित के साथ नुमाइश देखने को बाइक से घर से निकल लिया. अपनी योजना के तहत रोहित ने अपने छोटे भाई राहुल को भी साथ ले लिया.

शाम 5 बजे तीनों इटावा नुमाइश पहुंचे. यहां रात 9 बजे तक वह सब नुमाइश देखते रहे. फिर रोहित मनोज के साथ शराब ठेके पर पहुंचा और दोनों ने शराब पी. राहुल ने शराब नहीं पी. अद्धा बोतल शराब रोहित ने खरीद कर सुरक्षित भी रख ली. इस के बाद तीनों ने एक होटल में खाना खाया. फिर खापी कर तीनों घर वापस जाने को निकल पड़े. योजना के तहत रोहित जब यमुना पुल के करीब सुनवारा बाईपास पर पहुंचा तो उस ने बाइक रोक दी. यहां रोहित ने मनोज को फिर शराब पिलाई. मनोज जब नशे में धुत हो गया, तब रोहित व राहुल ने उसे दबोच लिया और ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी.

हत्या करने के बाद दोनों मनोज के शव को यमुना नदी में फेंकने के इरादे से बाइक पर रखा और चल पड़े. लेकिन यमुना नदी तक पहुंचने के पहले ही उन की बाइक फिसल गई और शव सड़क किनारे गिर पड़ा. पकड़े जाने के डर से रोहित व राहुल शव को वहीं छोड़ कर भाग गए. इस बीच मोबाइल फोन के जरिए मधु रोहित के संपर्क में थी. उसे सारी जानकारी मिल रही थी. अब तक रात के 12 बज चुके थे. रोहित ने घर आ कर कार सवार बदमाशों द्वारा मनोज को मारनेपीटने व उस के किडनैप की झूठी खबर फेमिली वालों को दी. यह बात सुनते ही घर में कोहराम मच गया. बेटे के किडनैप की बात सुन कर तहसीलदार घबरा उठा. उस ने फोन के जरिए दामाद श्याम सिंह को खबर दी. मधु त्रियाचरित्र का नाटक कर रोनेपीटने लगी. उस की रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा होने लगे.

सुबह तहसीलदार अपने दामाद श्याम सिंह व अन्य फेमिली वालों के साथ सुनवारा बाईपास के पास पहुंचा और मनोज की खोज शुरू की. यमुना पुल से एक किलोमीटर पहले जब दोनों मानिकपुर जाने वाली रोड पर पहुंचे तो लोगों की भीड़ देखी. पता चला कि किसी युवक की लाश पड़ी है. उस लाश को तहसीलदार ने देखा तो फफक पड़ा, क्योंकि लाश मनोज की थी. लाश जिस जगह सड़क किनारे पड़ी थी, वह क्षेत्र इटावा के बड़पुरा थाने के तहत था, इसलिए पुलिस को सूचना दी गई. सूचना पाते ही बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी पुलिस बल के साथ वहां आ गए.

उन की सूचना पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा सीओ (भरथना) नागेंद्र चौबे भी आ गए. पुलिस अधिकारियों को तहसीलदार ने बताया कि लाश उन के बेटे मनोज की है. कल दोपहर बाद वह रिश्ते के भाई रोहित के साथ नुमाइश देखने गया था. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. मृतक मनोज की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी. उस का सिर जख्मी था. देखने से ऐसा लग रहा था कि उस की मौत किसी वाहन से टकराने से हुई थी. शव को पोस्टमार्टम के लिए इटावा के जिला अस्पताल भिजवा दिया गया.

ससुर ने बहू पर क्यों जताया शक

घटनास्थल पर पिता तहसीलदार मौजूद था. पुलिस अधिकारियों ने जब उस से पूछताछ की तो उस ने बेटे मनोज की हत्या का शक जाहिर किया. उस ने बताया कि बुसा गांव निवासी रोहित का उस के घर आनाजाना था. रिश्ते में वह मनोज का भाई है. रोहित और उस की बहू मधु के बीच नाजायज रिश्ता बन गया था, जिस का वह और मनोज विरोध करते थे. रोहित ही उसे कल घर से ले गया था. अब मनोज की हत्या की गई या दुर्घटना से मौत हुई, इस का राज तो रोहित और उस की बहू के पेट में ही छिपा है. सुबह बहू भी रोहित के साथ ही चली गई है.

शक के आधार पर एसएसपी संजय कुमार वर्मा ने मनोज की मौत के खुलासे के लिए सीओ नागेंद्र चौबे की देखरेख में एक पुलिस टीम गठित कर दी. इस टीम ने रोहित व मधु की टोह में इकदिल, भरथना, लखुना आदि स्थानों पर छापा मारा, लेकिन उन का पता नहीं चला. पुलिस टीम ने रोहित के बुसा गांव स्थित घर पर भी छापा मारा तो पता चला कि रोहित के साथ उस का भाई राहुल भी घर से गायब है. 5 जनवरी, 2025 की दोपहर एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी जमुना पुल के करीब वाहन चेकिंग कर रहे थे. तभी एक बाइक पर 3 सवारी दिखीं. उन्होंने बाइक रोकने का प्रयास किया तो वे भागने लगे. तब पीछा कर पुलिस ने उन्हें दबोच लिया. इन तीनों में एक महिला थी. तीनों को थाना बड़पुरा लाया गया.

थाने में जब उन से पूछताछ की गई तो पता चला कि महिला का नाम मधु है और वह मृतक मनोज कुमार की पत्नी है. उस के साथ जो अन्य 2 युवक थे, उन में से एक रोहित और दूसरा रोहित का भाई राहुल था.

उन तीनों से जब मनोज की मौत के बारे मे पूछा गया तो उन्होंने मनोज की हत्या ईंट से सिर कूंचकर करने का जुर्म कुबूला. रोहित ने बताया कि मनोज उस का ममेरा भाई था. घर आनेजाने के दौरान मनोज की पत्नी मधु से उस के संबंध बन गए थे. इस रिश्ते का मनोज विरोध करता था. इसलिए उस ने मधु के साथ मिल कर हत्या की योजना बनाई.

फिर उसे नुमाइश दिखाने के बहाने भाई राहुल के साथ इटावा ले गए. वापसी में राहुल के साथ मिल कर ईंट से सिर कूंच कर मनोज की हत्या कर दी और शव छोड़ कर भाग गए. रोहित ने जुर्म कुबूलने के बाद हत्या में प्रयुक्त ईंट भी बरामद करा दी, जो उस ने झाडिय़ों में फेंक दी थी. एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मनोज की हत्या का खुलासा करने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो एसएसपी संजय वर्मा ने पुलिस लाइन सभागार में प्रैसवार्ता की और मीडिया के सामने मनोज की हत्या का खुलासा किया. उन्होंने 24 घंटे के अंदर खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 10 हजार रुपए पुरस्कार देने की भी घोषणा की.

चूंकि हत्यारोपियों ने जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल खून से सनी ईंटभी बरामद करा दी थी, इसलिए बड़पुरा थाने के एसएचओ गणेश शंकर द्विवेदी ने मृतक के पिता तहसीलदार को वादी बना कर बीएनएस की धारा 103(1), 238/61(2) तथा 3(5) के तहत मधु, रोहित व राहुल के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

6 जनवरी, 2025 को पुलिस ने मधु, रोहित राहुल को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन तीनों को जिला जेल भेज दिया गया.

 

 

Love Crime : कांस्टबेल के इश्क में ट्रेनी एयर होस्टेस गई जान से

Love Crime : हिमाचल प्रदेश के मंडी जिले की रहने वाली निशा सोनी चंडीगढ़ में रह कर एयर होस्टेस का कोर्स कर रही थी, उसी दौरान पंजाब पुलिस के कांस्टेबल युवराज से उसे प्यार हो गया. युवराज का यही प्यार इतना खूंखार हो गया कि…

युवराज सिंह उस दिन घर पर आया तो उस ने एक रेस्टोरेंट से खाना पैक करा लिया और जब वह घर पर पहुंचा तो उस ने सब से पहले घर का दरवाजा भीतर से बंद कर लिया फिर तसल्ली से अपने साथ में लाई व्हिस्की की बोतल खोल ली. वह पैग पीता रहा साथ में स्नैक्स के रूप में मछली के पकोड़े खाता रहा. जब उस ने देखा कि बोतल की व्हिस्की लगभग खाली हो चुकी थी तो उस ने फिर खाना खाने का विचार भी छोड़ दिया. बाथरूम में जा कर उस ने अपने हाथपैर धोए और सीधे बिस्तर में घुस गया. उस ने रजाई अपने चारों ओर लपेट ली. उसे कब नींद आई, उसे पता ही नहीं चला.

तभी अचानक रात को लगभग एक बजे युवराज की नींद टूट गई, उस ने एक बड़ा ही अजीब सपना देखा था, जिस से वह पसीनापसीना हो गया था. उस ने सपने में देखा था कि उस का घर पूरी तरह से टूट कर विखर चुका था. उस की पत्नी रेखा उसे बुरी तरह से गालियां दे रही थी और सभी लोगों के सामने उसे जलील कर रही थी.

सपने में युवराज ने साफसाफ देखा था कि इन सब का कारण उस की प्रेमिका निशा सोनी थी, जिस ने उस की पत्नी रेखा को सारा सच बता दिया था. उस ने रेखा को यह बता दिया था कि युवराज ने उस से प्रेम संबंध बनाए. अपने को अविवाहित बता कर उस का यौनशोषण करने के साथसाथ उसे ब्लैकमेकिंग की धमकी भी दी. यह सपना देखने के बाद युवराज का व्हिस्की का सारा नशा काफूर हो चुका था. वह सोचने लगा कि यदि मेरा यह सपना सच हो गया तो बीवी तो मुझे लात मारेगी ही, जब उस के पुलिस महकमे में यह बात फैलेगी तो वह अपनी नौकरी से तो हाथ धोएगा, साथ ही साथ किसी को भी मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेगा.

पंजाब पुलिस के कांस्टेबल युवराज सिंह का दिमाग अब एक नई प्लानिंग बनाने लगा था. वह कई दिनों से अपनी प्रेमिका निशा सोनी को फोन लगा रहा था, मगर वह उस का फोन रिसीव ही नहीं कर रही थी. युवराज ने अब अपनी प्रेमिका निशा सोनी को अपने रास्ते से हटाने की प्लानिंग बना ली थी. बस वह केवल निशा द्वारा उस की काल रिसीव करने के इंतजार में था कि वह कब उस का फोन उठाए और फिर वह उस को कैसे अपने राह में आए कांटे की तरह निकाल फेंके.

युवराज सिंह की तैनाती उस समय मोहाली की काउंटर इंटेलीजेंस (सीआई विंग) में थी. वह रोज शाम के समय अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद अपने गांव मानपुर फतेहगढ़ साहिब में अपनी क्रेटा कार से चला जाया करता था और सुबह वहां से अपनी कार से ही नियत समय पर अपनी ड्यूटी पहुंच जाता था.

उस दिन सोमवार था और तारीख थी 20 जनवरी, 2025. उस दिन 7 बजे शाम को युवराज मोहाली से अपनी ड्यूटी खत्म कर के वापस अपनी कार नंबर पीबी-23जेड 0086 में बैठ कर अपने घर फतेहगढ़ साहिब की ओर जा रहा था. कुछ दूर गाड़ी चलाने के बाद उस ने अपनी प्रेमिका निशा को फोन किया तो उस ने फोन रिसीव कर लिया. वह उस से बोला, ”क्या बात है जानेमन, आजकल तो तुम ने मेरा फोन उठाना ही बंद कर दिया है? क्या गलती हो गई हम से?’’

”देखो युवराज, अब मैं तुम से न तो कभी मिलना चाहती हूं और न ही अब बात करना चाहती हूं, क्योंकि तुम बड़े धोखेबाज हो.’’ निशा ने गुस्से से कहा.

”देखो निशा, मैं तुम से बस एक बार यानी कि आखिरी बार मिलना चाहता हूं. तुम अभी कहां पर हो?’’ युवराज ने पूछा.

”मैं अपनी बहन के साथ अपने घर जोगिंदर नगर से अपने पीजी जा रही हूं. अभी मैं रास्ते में हूं. वैसे मैं अब कभी नहीं मिलना चाहती, तुम फोन रखो,’’ निशा ने साफसाफ कह दिया.

”यह बात अच्छी तरह से समझ लो निशा सोनी कि तुम्हारी वह सीडी मैं ने अभी तक संभाल कर रखी हुई है. यदि तुम मुझ से नहीं मिली तो मैं सीडी तो वायरल करूंगा ही, तुम को भी जान से मार दूंगा.’’ युवराज ने पुलिस वाली धमकी देते हुए कहा.

युवराज का यह पैंतरा तुरंत काम कर गया था. निशा तुरंत बोली, ”ठीक है युवराज, मैं तुम से जरूर मिलूंगी और वह भी आखिरी बार तुम आ जाना.’’

”ठीक है, तुम घर पहुंचो, मैं भी अभी तुम्हारे घर पर आ रहा हूं.’’ कहते हुए युवराज ने काल डिसकनेक्ट कर दी. निशा अपनी बड़ी बहन रितु सोनी के साथ शाम को लगभग साढ़े 7 बजे अपने घर खरड़ पहुंच गई. घर पहुंचते ही दोनों बहनें घर के लाए हुए सामान को व्यवस्थित करने में जुट गईं. तभी रात को लगभग साढ़े 8 बजे युवराज ने एक बार फिर निशा को फोन कर दिया. काल रिसीव करते ही निशा बोली, ”हां बोलो, अब क्या काम है? मैं ने कहा था न कि एक बार तुम से मिल लूंगी. अब इस समय क्यों फोन किया तुम ने?’’

”जानेमन, तुम्हारे ही घर के नीचे खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं. बस, अब नीचे आ जाओ. आखिरी बार तुम से बात करनी है.’’ युवराज ने कहा.

”दीदी, मैं जरा बाहर जा रही हूं, नीचे युवराज आया है. बस आधे घंटे में वापस आ जाऊंगी.’’ निशा ने अपनी बड़ी बहन रितू से कहा और अपना मोबाइल ले कर घर से निकल गई.

निशा जब अपने फ्लैट से बाहर आई तो युवराज अपनी सफेद रंग की क्रेटा कार में उस का ही इंतजार कर रहा था. निशा गाड़ी में बैठ गई तो युवराज गाड़ी को काफी दूर रोपड़ के पास पथरेड़ी जट्टा गांव के पास तक ले आया. तब तक काफी समय भी हो चुका था. सड़क के किनारे भाखड़ा नहर भी बह रही थी. यह युवराज सिंह का अपनी ओर से पहले से ही सोचासमझा एक प्लान था. लेकिन इतनी रात की इतनी दूर युवराज गाड़ी को क्यों ले कर आया है, यह बात निशा की समझ में नहीं आ पा रही थी.

”युवराज, तुम मुझ से आखिरी बार मिलना चाहते थे. मैं ने तुम्हारी ये ख्वाहिश भी पूरी कर दी. लेकिन इतनी दूर सुनसान जगह पर मुझे ले कर आने का मकसद मैं समझ नहीं पा रही हूं.’’ निशा ने आखिरकार पूछ ही डाला.

”माई स्वीट हार्ट, अब आज का आखिरी मिलन तो हमारा ग्रैंड होना चाहिए न!’’ युवराज ने गाड़ी रोक दी और निशा को अपने गले से लगा लिया था.

”छोड़ोछोड़ो मुझे तुम. मुझे तुम से अब बहुत नफरत हो चुकी थी. तुम ने एक बार मिलने को कहा तो मैं आ गई. अब मुझे मेरा वीडियो जो तुम्हारे पास है, वह दे दो. आज के बाद मैं अब तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहती,’’ निशा ने अपने आप को युवराज की बांहों से छुड़ाते हुए नफरत भरे स्वर में कहा.

”अच्छा तो अब तुम इतनी बदतमीजी पर भी उतर आई हो. कभी तो मुझ से इतना प्यार करती थी, अब इतनी नफरत क्यों?’’ युवराज बोला.

”युवराज, अपने गिरेबान में झांक कर देखो तुम पहले, फिर मुझ पर इलजाम लगाओ. तुम पहले से ही शादीशुदा थे, तुम्हारी उम्र 33 साल है. तुम ने मुझ से खुद को कुंवारा बताया था और अपनी उम्र 27 साल बताई थी. कुछ तो शरम करो, तुम एक बच्चे के पिता भी हो. अब जल्दी से मुझे मेरी वीडियो दे दो और मुझे मेरे घर पर छोड़ दो, वरना इस का अंजाम काफी बुरा होगा.’’ निशा ने बिफरते हुए कहा.

”अच्छा, एक बात बताओ, अगर मैं तुम्हें वीडियो नहीं दूंगा तो तुम मेरा क्या बिगाड़ लोगी? जाओ, मैं नहीं देता तुम्हें वीडियो.’’ युवराज बोला.

”युवराज, अब मैं क्या करूंगी, यह तुम अच्छी तरह से सुन लो. फरवरी में तुम्हारी बीवी रेखा तुम्हारे बेटे के साथ आस्ट्रेलिया से वापस इंडिया आ रही है न! मैं उस के पास जाऊंगी और उस को तुम्हारी सारी करतूत बताऊंगी कि कैसे तुम ने मुझे फंसाया था, यह कह कर कि मैं कुंवारा हूं, 27 साल का हूं. मैं तुम से जल्द शादी कर के तुम्हें अपनी दुलहन बनाऊंगा. फिर हम दोनों सुखचैन की जिंदगी बिताएंगे. तुम्हारी एकएक करतूत तुम्हारी बीवी को बताऊंगी. तुम ने मेरी जिंदगी बरबाद की है. अब तुम्हारी जिंदगी को नरक न बना दूं तो कहना.’’ निशा ने बिफरते हुए कहा.

यह सुनते ही युवराज सिंह के तनबदन में जैसे आग लग गई थी. उस ने पहले तो कई मुक्के सीधे उस के चेहरे पर जड़ दिए. उस के बाद लातघूंसों से उस की बेदर्दी से पिटाई करने लगा. निशा अपनी जान की भीख मांगती रह गई. रोती रही, गिड़गिड़ाती रही, परंतु फिर भी युवराज का दिल नहीं पसीजा. वह उस को लगातार घूसों और लातों से मारता रहा.

कानून का रखवाला ही कर बैठा क्राइम

थोड़ी देर के बाद जब निशा ने कोई हरकत नहीं की तो युवराज ने उस की नाक के आगे हाथ लगाया तो उस की सांस बंद थी. धड़कन भी बंद हो चुकी थी. युवराज के चेहरे पर अब विजयी मुसकान थी. उस की योजना कामयाब हो चुकी थी. उस ने निशा के गहने और उस का मोबाइल फोन निकाल लिया. तब तक चारों तरफ अंधेरा घिर आया था. उस सुनसान इलाके में दूरदूर तक पङ्क्षरदा भी नजर नहीं आ रहा था. उस ने निशा की डैडबौडी को अपने दोनों हाथों से उठाया और वह भाखड़ा नहर में फेंक दी. उस के बाद उस ने अपने मोबाइल फोन से पुलिस कंट्रोल रूम के 112 नंबर पर फोन कर दिया.

दूसरी ओर पुलिस के एक हैडकांस्टेबल ने फोन उठाया तो युवराज ने उसे बताया, ”मेरा नाम युवराज सिंह है. मैं पंजाब पुलिस में कांस्टेबल हूं और मोहाली की काउंटर इंटेलीजेंस की टीम में तैनात हूं. मैं अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद अपने घर फतेहगढ़ साहिब अपनी कार से जा रहा था तो मैं ने एक युवती को नहर में छलांग लगाते देखा.

”मैं ने उसे रोकने और बचाने की बहुत कोशिश की, लेकिन मैं अकेला होने के कारण उसे बचा नहीं पा रहा हूं. आप तुरंत पुलिस टीम को भेज कर उस युवती की जान बचा लीजिए. मैं अभी यहां मौके पर ही हूं.’’

कुछ देर में ही पुलिस की टीम वहां पहुंच गई. पुलिस टीम ने गोताखोर की टीम को भी घटनास्थल पर बुलवा लिया.

पुलिस के बुलावे पर थोड़ी देर में भोले शंकर डाइवर्स क्लब (गोताखोरों) की टीम भी वहां पर पहुंच गई. गोताखोरों ने कड़ी मशक्कत के बाद नेहा की लाश को भाखड़ा नहर से बाहर निकाला.  कांस्टेबल अपनी योजना में कामयाब हो कर चुपचाप अपनी गाड़ी स्टार्ट कर वहां से फतेहगढ़ साहिब की ओर निकल चुका था. सिंह भगवंतपुर पुलिस स्टेशन के एसएचओ इंसपेक्टर सुनील ने लाश का पंचनामा बनाया और मृतका की डैडबौडी पटियाला के राजिंद्र अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी. पुलिस ने आसपास में लाश की फोटो से मृतका की शिनाख्त कराई, लेकिन उस की शिनाख्त नहीं हो पाई.

तब पुलिस ने लाश की फोटो आसपास के जिलों के थानों में पहचान के लिए भिजवा दी. इस वीभत्स खबर को सुन कर रोपड़ जिले के सभी पुलिस अधिकारी सजग व सचेत हो उठे थे. सभी पुलिस अधिकारियों को यह मामला हत्या का दिखाई दे रहा था. युवराज सिंह और निशा सोनी की मुलाकात केवल 5 महीने पहले ही शुरू हुई थी. उस रोज युवराज सुबहसुबह अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए अपने घर फतेहगढ़ साहिब अपनी कार से निकला था. वह जब चंडीगढ़ के पास पहुंचा, तभी उस ने देखा कि सड़क के किनारे एक सुंदर सी युवती उसे कार रोकने के लिए हाथ से इशारा कर रही थी.

युवराज कार रोकना तो नहीं चाहता था, लेकिन वह उस की सुंदरता से पहली ही नजर में प्रभावित हो गया था, इसलिए उस ने उस के इशारे पर अपनी कार रोक दी थी, ”जी कहिए मैडमजी, क्या काम है?’’ युवराज ने कार का शीशा खोलते हुए पूछा.

”जी, मुझे सेक्टर- 34 चंडीगढ़ में अर्जेंट जाना था. आज मुझे यहां पर आने में थोड़ी देर गई, जिस से मेरी बस छूट गई. वैसे वहां तक पहुंचाने के कितने रुपए लेंगे आप?’’ युवती ने पूछा.

”अच्छा तो मैं आप को कोई प्राइवेट टैक्सी वाला दिखाई दे रहा हूं क्या? कम से कम गाड़ी की नंबर प्लेट देख कर तो बात कीजिए.’’ युवराज ने गुस्सा होते हुए कहा.

”अरे सर, आप तो लगता है कि बुरा मान गए. वैसे मेरा इरादा आप का दिल दुखाना बिलकुल भी नहीं था. मैं ने तो जल्दबाजी में गाड़ी का नंबर भी नहीं देखा और आप को टैक्सीवाला समझने की भूल कर दी. अपनी इस खता के लिए मैं आप से सौरी कहती हूं.’’ युवती ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा.

”देखिए मैडमजी, आप जो भी हैं, मैं न तो आप का नामपता और न ही मैं आप के बारे में जानता हूं, मुझे आप का यूं हाथ जोडऩा बिलकुल भी ठीक नहीं लग रहा है. अब आप बेफिक्र हो कर मेरी गाड़ी में बैठ सकती हैं.’’ युवराज ने गाड़ी से बाहर निकलते हुए कहा.

”जी, आप की दरियादिली के लिए बहुतबहुत शुक्रिया. लेकिन सर, आजकल किसी पर भी इतनी जल्दी विश्वास कर लेना ठीक नहीं होता. आप मुझे अपना समझ कर जब जबरदस्ती कर ही रहे हैं तो आप यदि मुझे अपना परिचय बता दें तो मैं भी निश्चिंत हो कर आप की गाड़ी में बैठ सकती हूं. देखिए, आप इस बात का तो बिलकुल भी बुरा न मानिएगा.’’ युवती ने सहज भाव से कहा.

”आप की यह बात मुझे सच में बहुत अच्छी लगी है. आजकल के जमाने में ऐसा होना भी चाहिए. किसी भी अजनबी पर एकदम से विश्वास कर लेना ठीक नहीं होता. वैसे मैं आप को बता दूं कि मैं पंजाब पुलिस में नौकरी करता हूं, मेरा घर फतेहगढ़ साहिब में है और मैं आजकल मोहाली में पोस्टेड हूं. यदि आप को फिर भी मुझ पर विश्वास नहीं हो पा रहा है तो मैं अपना आइडेंटिटी कार्ड भी दिखा सकता हूं.’’ युवराज ने अपनी जेब से अपना आडेंटिटी कार्ड निकालते हुए कहा.

”अरे सर, आप ये कैसी बात कर रहे हैं. आप ने कहा और मुझे पक्का यहीन भी हो गया.’’ युवती ने कार का गेट खोलते हुए कहा.

”अरे मैडम, गाड़ी में आप और मैं 2 ही तो लोग हैं. आप आइए मेरे साथ बैठिए, बातचीत भी होती रहेगी.’’ युवराज ने गाड़ी का आगे का गेट खोलते हुए कहा. गाड़ी आगे बढ़ी तो दोनों में परिचय की शुरुआत होने लगी थी. युवराज ने कहा, ”मैं ने तो आप को अपना परिचय दे दिया, लेकिन आप ने मुझे अपने बारे में नहीं बताया. क्या मैं आप के बारे में जान सकता हूं?’’

”जी, क्यों नहीं! आप पूछें और मैं न बताऊं. मेरा नाम निशा सोनी है. मैं तहसील जोगिंदर नगर जिला मंडी हिमाचल की रहने वाली हूं. मैं ने चंडीगढ़ के एसडी कालेज से बीएससी की पढ़ाई की है और अभी मैं चंडीगढ़ सेक्टर 34 में फ्रैंकफिन इंस्टीट्यूट से एयर होस्टेस का कोर्स कर रही हूं,’’ निशा ने अपना परिचय देते हुए कहा.

”बहुत दिलचस्प बातें करती हैं आप. आप का करिअर भी बहुत उज्जवल दिखाई दे रहा है. आप के परिवार में और कौनकौन हैं? युवराज ने पूछा.

”सर, मेरे घर में हम 3 बहनें हैं. 2 बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है. मैं घर में सब से छोटी हूं. मेरी उम्र अभी 22 वर्ष है.’’ निशा ने कहा.

”निशाजी, पहले तो आप मुझे सर कहना छोड़ दीजिए, आप मुझे युवराज कह सकती हैं. शादी के बारे में आप की क्या सोच है? फेमिली वाले तो अब आप की शादी के लिए लड़का भी ढूंढ रहे होंगे.’’ युवराज ने कहा.

”जी, कोई केअर करने वाला मिल गया तो सोचेंगे. वैसे मैं ने अपने फेमिली वालों से कह दिया है कि मेरी शादी के बारे में अभी से चिंता करने की जरूरत नहीं है. पहले एयर होस्टेस बनना है, बाद में शादी के बारे में सोचेंगे. युवराजजी, आप भी बताइए अपने बारे में, आप की शादी हुई या नहीं ?’’ निशा ने पूछा.

”अरे निशाजी, अपनी तकदीर में तो अभी तक कोई अच्छी लड़की मिली ही नहीं. वैसे मेरी उम्र 27 साल हो चुकी है और फेमिली वाले और मैं बेसब्री से तलाश में लगे हैं.’’ युवराज ने कहा.

”युवराजजी, आप की बातें भी आप की तरह जिंदादिल लगती हैं,’’ निशा उस की तारीफ करते हुए बोली.

तभी युवराज ने कार में ब्रेक लगाया तो वह झटके में रुक गई, ”निशाजी, देखिए आप की मंजिल आ गई.’’ युवराज बोला.

”युवराजजी, इतनी जल्दी फ्रैंकफिन इंस्टीट्यूट आ भी गया. आप की बातें तो इतनी दिलचस्प थीं कि इतने लंबे रास्ते का पता ही नहीं चला.’’ निशा कार से उतरते हुए बोली.

”निशाजी, आप भी मुझे अच्छी लगीं, अच्छा अब कम से कम अपना मोबाइल नंबर तो दे दीजिए.’’ युवराज ने कहा तो निशा ने युवराज का फोन नंबर पूछ कर उसे मिसकाल कर दी. दोनों ने एकदूसरे का मोबाइल नंबर सेव कर लिया. उस के बाद युवराज वहां से अपनी ड्यूटी पर चला गया.

उस समय युवराज वहां से चला तो गया पर निशा का रूपयौवन उस पर काफी प्रभाव जमा चुका था. दूसरी तरफ निशा भी युवराज से एक ही मुलाकात में काफी प्रभावित हो चुकी थी. उस के बाद दोनों के बीच बातचीत होने लगी. वाट्सऐप पर भी वे दोनों एकदूसरे से अपने दिल की बातें साझा करने लगे.

एक दिन युवराज उसे घुमाने एक गार्डन में ले गया और उस दिन युवराज ने उस से कह ही दिया, ”निशा, मैं तुम्हें दिलोजान से चाहने लगा हूं. देखो, हमारी मुलाकात हुए पूरे 10 दिन हो चुके हैं. इन 10 रातों में मैं ने केवल करवटें बदलेते हुए अपनी रातें गुजारी हैं. इस से पहले कि मैं तुम्हारी याद में, चाह में घुटघुट कर अपनी जान दे डालूं, इस से पहले तुम मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार कर लो न प्लीज.’’ युवराज ने घुटने के बल झुकते हुए निशा से अपने प्रेम का इजहार कर डाला.

”युवराजजी, मेरे दिल में भी उसी तरह से आप के लिए प्यार उमड़ रहा है. मेरी भी यही फीलिंग है. मैं भी अब तुम्हारे बिना अधूरी हूं.’’ यह कहते हुए निशा ने युवराज का हाथ पकड़ कर ऊपर उठाया और उस की छाती से लग गई.

प्रेमिका को किस बात से लगा शौक

उस के बाद उन दोनों का प्रेम परवान चढ़ता चला गया. कब वे दोनों एकदूसरे के जिस्म में भी समाते चल गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इस बीच अपने और निशा के अंतरंग क्षणों के वीडियो भी युवराज ने अपने मोबाइल फोन में कैद कर लिए थे. एक बार युवराज ने 2 दिनों की छुट्टी ली और निशा के साथ एक पिकनिक स्पौट पर चला गया. वहां पर वे दोनों एक होटल में रुके, रात भर युवराज निशा के साथ मौजमस्ती करता रहा. सुबह निशा नहाधो कर तैयार हो कर कमरे में आ गई तो युवराज नहाने के लिए चल दिया. तभी युवराज का मोबाइल बजने लगा.

”आप कौन बोल रहे हैं?’’ निशा ने युवराज का फोन उठाते हुए पूछा.

”मैं आस्ट्रेलिया से रेखा बोल रही हूं. आप मोहाली थाने से बोल रही हैं न. प्लीज मेरी युवराज से बात करा दीजिए,’’ दूसरी ओर से एक युवती ने कहा.

”जी, आप युवराजजी की कोई रिश्तेदार हैं क्या?’’ निशा ने पूछा.

”अरे मैडम, आप पुलिस वाले भी वहुत जांचपड़ताल करते हैं. मैं तो हफ्ते में 2-3 बार युवराज से बात कर लेती हूं. इस बार ज्यादा व्यस्त हो गई तो 10 दिनों बाद फोन कर रही हूं. वैसे मैं युवराज सिंह की पत्नी रेखा बोल रही हूं. आप युवराज से जल्दी बात करा दीजिए.’’ रेखा ने कहा तो निशा के तो होश ही उड़ गए थे.

”जी रेखाजी, युवराजजी तो एकाएक एक विशेष ड्यूटी में यहां एकदम बाहर निकल गए. एक गोपनीय औपरेशन था. अपना फोन शायद वह जल्दबाजी में यहां पर भूल गए थे. जब फोन बजा तो मैं ने फोन उठा लिया. वैसे रेखाजी, आप के कितने बच्चे हैं?’’ निशा ने पूछा.

”जी, हमारा एक बेटा है. मैं यहां आस्ट्रेलिया में जौब करती हूं. मगर अब मैं यहां से इस्तीफा दे कर अपने बेटे के साथ हमेशा के लिए इंडिया आ रही हूं. वहां पर आ कर अपना कोई बिजनैस करूंगी. देखिए, मैं अभी अपने औफिस में हूं. मेरे पति युवराज आएं तो उन को जरूर बता दीजिएगा कि मेरा फोन आया था, वह मुझ से जरूर बात कर लें. अच्छा, अब मैं फोन रखती हूं.’’ यह कहते हुए रेखा ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

यह सुन कर तो निशा के तनबदन में आग सी ही लग गई थी और उस ने तुरंत अपना सामान समेटा और जब युवराज बाथरूम से बाहर आया तो निशा उस पर बुरी तरह से भड़क गई थी.

”युवराज, मुझे तुम से ऐसी उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी. तुम 33 साल के हो, तुम्हारी बीवी है, एक बेटा भी है. यह बात मुझ से छिपा कर तुम ने मुझे धोखा दिया. मेरे जज्बातों से खेला. मुझ से अब मिलने व बात करने की तुम कोशिश भी मत करना. मैं जा रही हूं.’’ यह कहते हुए निशा कमरे से निकल गई थी. उस के बाद से निशा ने युवराज से बात करना भी छोड़ दिया था.

निशा की बड़ी बहन रितु ने पुलिस में दर्ज कराई रिपोर्ट

उधर जब 20 जनवरी की रात तक निशा सोनी घर नहीं लौटी तो उस की बड़ी बहन रितु परेशान हो कर रात भर अपने पति हितेश हंस के साथ उसे तलाश करती रही, परंतु निशा का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. उस के बाद सुबह 21 जनवरी को रितु ने अपने पति के साथ रोपड़ जिले के सिंह भगवंतपुर थाने पहुंच कर निशा सोनी की गुमशुदगी की सूचना दर्ज करा दी. निशा ने पुलिस को बताया कि वह अपने बौयफ्रेंड युवराज सिंह के साथ उस की कार में बैठ कर गई थी. उस के बाद वह नहीं लौटी. अब भी निशा का फोन स्विच्ड औफ आ रहा था. थाना सिंह भगवंतपुर पुलिस ने 20 जनवरी, 2025 को एक अज्ञात युवती की लाश भाखड़ा नहर से बरामद की थी.

उन्होंने उस लाश के फोटो रितु को दिखाए तो फोटो देखते ही वह चीख पड़ी और रोते हुए बोली, ”सर, यह लाश तो मेरी बहन निशा की है. उस की यह हालत किस ने की है?’’

लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद पुलिस ने राहत की सांस ली. फिर अगले दिन 22 जनवरी, 2025 की सुबह निशा सोनी के फेमिली वालों ने पटियाला के राजिंद्रा अस्पताल में जा कर शव की पहचान कर ली.

ऐसे पकड़ा गया कांस्टेबल युवराज सिंह

सिंह भगवंतपुर पुलिस ने पोस्टमार्टम कराने के बाद मृतका निशा सोनी का शव उस के फेमिली वालों को सौंप दिया. फेमिली वालों ने जोगिंदर नगर श्मशान घाट में निशा का अंतिम संस्कार कर दिया. अब पुलिस का अगला काम हत्यारे तक पहुंचना था. पुलिस ने जब 20 जनवरी, 2025 की सीसीटीवी फुटेज खंगाली तो उस में निशा युवराज के साथ जाते हुए दिखाई दी. पुलिस ने तेजी से काररवाई करते हुए आरोपी युवराज सिंह को 22 फरवरी, 2025 को बीएनएस की धारा 103बी के तहत गिरफ्तार कर सख्ती से पूछताछ की तो उस ने निशा सोनी की हत्या की पूरी कहानी बयां कर दी.

मृतका निशा सोनी के पिता हंसराज सोनी ने मीडिया और पुलिस को बताया कि उन की बेटी निशा के दांत भी अंदर की ओर पिचके हुए थे. आरोपी कांस्टेबल युवराज सिंह ने उस के सभी गहने और मोबाइल फोन भी निकाल लिया था और मेरी बेटी की नृशंस हत्या करने के बाद उसे नहर में फेंक दिया. हंसराज सोनी ने हत्या आरोपी कांस्टेबल युवराज सिंह के खिलाफ फांसी की मांग की.

उस के बाद मृतका के परिजनों ने जोगिंदर नगर पहुंच कर प्रदेश सरकार और एसपी (मंडी), हिमाचल प्रदेश से बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए हस्तक्षेप करने की मांग भी उठाई तो यह मर्डर केस सिंह भगवंतपुर थाने से हिमाचल प्रदेश के जोगिंदरनगर थाने में ट्रांसफर कर दिया गया.  22 वर्षीय ट्रेनी एयर होस्टेस निशा सोनी की हत्या की यह घटना अत्यंत दुखद व समाज को झकझोरने वाली है. इस घटना ने समाज में महिलाओं की सुरक्षा और रिश्तों में विश्वास पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

यह मामला सिर्फ एक इंसान की जान के नुकसान का नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि हमारे समाज में अब किस प्रकार की मानसिकता पनपती जा रही है, जो प्रेम और विश्वास का गला घोंट कर हिंसा और अपराध को जन्म देती जा रही है. इस मामले में सब से चिंताजनक बात यह है कि आरोपी एक पुलिसकर्मी था, जिस का फर्ज लोगों और समाज की सुरक्षा करना है. लेकिन उसी ने अपने पद व वरदी का गलत इस्तेमाल करते हुए इस जघन्य वारदात को अंजाम दे डाला. इस से यह भी स्पष्ट होता है कि महिलाओं के प्रति हिंसा सिर्फ किसी विशेष वर्ग या समुदाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक समस्या बनती जा रही है.

यह घटना केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज में महिलाओं की सुरक्षा, न्याय व्यवस्था और पुलिस की जिम्मेदारी पर बड़े सवाल पैदा करती है. निशा सोनी एक महत्त्वाकांक्षी युवती थी. मात्र 10 दिनों के बाद ही एयर होस्टेस बनने का सपना देख रही थी. उस मासूम युवती की इस तरह से संदिग्ध परिस्थितियों में मौत न केवल उस के परिवार को गहरे दुख में डालती है, बल्कि हमारे पूरे समाज को भी आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है.

(कथा में रेखा परिवर्तित नाम है)

 

 

Uttarakhand Crime : कर्ज में छिपा कत्ल का राज

Uttarakhand Crime : कर्ज लेनदेन के जाल में रुबीना ऐसी फंसी कि उस का जीना मुहाल हो गया था. किंतु उस से निकलने के लिए उस ने जो तरीका अपनाया, वह कानून के फंदे में फंसने वाला था. उस पर आसमान से गिरे और खजूर पर अटके वाली कहावत पूरी तरह से चरितार्थ हो गई. आखिर उस ने किया क्या था? पढ़ें, इस मर्डर स्टोरी में.

उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में रुड़की के मच्छी मोहल्ले में रहने वाली करीब 40 साल की रुबीना छोटे से घर में अपने शौहर शमशेर और 3 बच्चों के साथ रहती थी. बेटियां स्कूल जाती थीं. पति पत्थर टाइल्स का काम करता था और वह खुद पिछले 6 सालों से जरूरतमंद महिलाओं को लोन दिलवाने के लिए बिचौलिए का काम करती थी.

लेकिन पिछले कई महीने से वह परेशान चल रही थी. उस के घर का गुजारा किसी तरह से बस चल पा रहा था.

”तुम कब से कह रही हो नई ड्रेस दिलवा दूंगी, क्यों नहीं दिलातीं?’’ एक दिन रुबीना की 10 साल की बेटी ठुनकती हुई बोली.

”दिलवा दूंगी…तुम्हें भी दिला दूंगी.’’ रुबीना ने समझाने की कोशिश की.

”नहींनहीं अम्मी, मुझे आज ही चाहिए. तुम दीवाली पर बोली थी, वह भी निकल गई…’’ कहतेकहते बेटी रोने को हो आई.

”अरे चुप हो जा मेरी बच्ची, थोड़े पैसे आ जाने दे.’’

”उतने सारे पैसे थे तो तुम्हारे पास, मैं ने देखा था रात को तुम गिन रही थी…’’

”अरे वो पैसे मेरे नहीं थे, वो तो ब्याज के थे.’’ रुबीना बोली.

”उसी में से दिला देतीं, और पैसे आने पर उस से ब्याज दे देतीं.’’ बेटी का मासूमियत भरा सुझाव था.

”उस में एक पैसा खर्च नहीं कर सकती मेरी बच्ची…समझा कर! ब्याज नहीं चुकाऊंगी, तब कर्ज का बोझ कैसे उतरेगा. लोन वाले किस्त मांगने घर पर आ धमकेंगे.’’ रुबीना बोली.

”कर्ज लिया क्यों?’’ बेटी बोली.

”अब तुम्हें कैसे सब कुछ समझाऊं? यही तो हमारा कामधंधा है…बाप की कमाई से कहां गुजारा होता है.’’ रुबीना बोली.

”अरे इधर आ, तुझे मैं समझाती हूं.’’ रुबीना की बड़ी बेटी अपनी बहन का हाथ खींचती हुई कमरे से बाहर चली गई.

”अरे, क्या हुआ, फिर छुटकी ने किसी फरमाइश की जिद कर दी?’’ शौहर शमशेर कमरे में घुसते ही बोला.

”उस कमीनी के चलते आज यह दिन देखने पड़ रहे हैं…न वह मरती और न मुझे उस का लोन चुकाना पड़ता…’’ रुबीना बिफरती हुई बोली.

”किंतु रुबीना, तुम ने भी कुछ कम लोगों से लोन नहीं ले रखे हैं. ऊपर से दूसरों की गारंटर भी बनी हो.’’ शमशेर बोला.

”ऐसा नहीं करूं तो भला जो भी कमीशन के पैसे आ रहे हैं वह भी नहीं आएंगे और तुम्हारे काम की कमाई का तो मुझे कुछ पता ही नहीं चलता है.’’ रुबीना ने कहा.

”तुम्हारे लोन लेनेदिलवाने के चक्कर में मैं भी फंसता जा रहा हूं. क्या जरूरत थी सगीरन को लोन दिलवाने की, जब वह बीमारी के दौर से गुजर रही थी.’’ शौहर बोला.

”मैं उस की देह के भीतर घुस कर देखने गई थी कि कैसी बीमारी है उसे. अब भला किसी की बीमारी में नहीं मदद होगी, तब कब होगी?’’

लोन कैसे बना जी का जंजाल

रुबीना कई स्थानीय लोगों के अलावा 4 बैंकों की कर्जदार थी. उन की किस्तें और ब्याज के पैसे चुकाने के चलते बच्चे अच्छा खानेपहनने को तरस रहे थे. परिवार का गुजारा मुश्किल से हो पा रहा था. शौहर की कमाई से जो कुछ आता, उस में से आधे से अधिक कर्ज चुकाने में ही चले थे. दरअसल, वह खुद लोन लेने और दिलवाने का धंधा करती थी. उस ने बीते 2 साल से महिलाओं का एक ग्रुप बना रखा था, जिन्हें जरूरत के अनुसार अपनी जिम्मेदारी पर लोन दिलवाती थी. इस के बदले में रुबीना को हर एक महिला से 500 रुपए कमीशन मिल जाता था.

उस ने 2 साल पहले ही अपनी आईडी से सगीरन नामक महिला को एक लाख रुपए का लोन रेखा नाम की महिला से दिलवाया था. रेखा उस के घर के पास में ही सिविल लाइंस कोतवाली क्षेत्र के सत्ती मोहल्ले में मसजिद के पीछे पति घनश्याम के साथ रहती थी. घनश्याम रुड़की की पुरानी सब्जी मंडी में सब्जी की दुकान चलाता है. घर में घनश्याम और उस की पत्नी रेखा (50 वर्ष) के अलावा और कोई नहीं रहता था. उन के 3 बच्चे अंबाला, हरियाणा ही रहते थे.

रेखा भी घर से लोन का धंधा कई सालों से कर रही थी. रुबीना की उस से जानपहचान बीते 5 सालों से थी. रेखा के पास लोन देने के लिए अच्छीखासी रकम थी. उस की समस्या थी कि वह बीमारी के चलते अधिक चलफिर नहीं सकती थी, इस वजह से वह घर पर ही रहती थी. कर्ज लेने वाले उस के घर आते थे और लोन की किस्त आदि चुका कर चले जाते थे. इन में ज्यादातर महिलाएं ही थीं. रुबीना भी उन्हीं में से एक थी, जो लोन के लिए ग्राहक लाती थी. बदले में उसे रेखा कमीशन देती थी.

रुबीना कर्ज से परेशान रहते हुए हमेशा इस चिंता में रहती थी कि कैसे उस के पास मोटी रकम आए कि कर्ज का कुछ बोझ हलका हो पाए. जब भी वह रेखा के पास जाती, तब उसे अकेली देखती थी. उस की नजर बरबस उस के पहनावे और गहनों पर चली जाती थी. उस ने महंगा मंगलसूत्र पहन रखा था. कान में भारी कुंडल थे. पति घनश्याम दिन में अपनी सब्जी की दुकान पर चला जाता था. रुबीना समझती थी कि उस के पास काफी पैसा है. वह रेखा की भी कर्जदार थी. उसे सगीरन के साथसाथ अपने भी पैसे रेखा को चुकाने थे. इस वजह से वह उस से और अधिक कर्ज नहीं ले सकती थी.

रुबीना कई दिनों से यह महसूस करने लगी थी कि रेखा के गहने उस की आंखों को चुभने लगे हैं. मन ही मन वह उस की कीमत का भी हिसाब लगाने लगी थी. एक दिन नहीं रहा गया तब उस ने पूछ लिया, ”दीदी, आप का मंगलसूत्र कितने भर सोने का है?’’

”क्यों तुम्हें बनवाना है, जो पूछ रही है?’’ रेखा ने कमेंट के मूड में बोल दिया.

”नहीं दीदी, यूं ही पूछ रही थी…और वो कान का कुंडल दीदी!’’ रुबीना फिर बोली.

”बड़ी मुश्किल से धनश्याम से लड़झगड़ कर इसे बनवाया है. अरे चलचल, अपने काम पर ध्यान दे. अपनी और दूसरों के लोन की किस्तें समय पर चुकाने का इंतजाम कर…’’ रेखा बोली.

रुबीना को उस रोज रेखा की बात थोड़ी कड़वी लगी. रेखा ने एक तरह से उसे लोन चुकाने को ले कर धमकी दे डाली थी. रुबीना भी क्या करती, उस ने अपनी आईडी उस के पास जमा करवा रखी थी.

सोमवार के दिन 25 नवंबर, 2024 को पौने 11 बज चुके थे. घर का कामकाज निपटा कर रुबीना रेखा के घर जाने के लिए निकली थी. उस रोज भी उस के पास ब्याज चुकाने तक के पूरे पैसे नहीं थे, किस्त की तो बात ही दूर थी. ऊपर से बेटी की फरमाइश थी. उस के दिमाग में खलबली हो रही थी. सब कुछ एकसाथ कौंध रहा था. चल कहीं और रही थी, ध्यान कहीं और ही था. 2 बार ऊबडख़ाबड़ सड़क पर गिरतेगिरते बची और एक बार तो स्कूटी से टकरातेटकराते! हाथ में बैग मजबूती से थामे थी. उसी में उस का साधारण मोबाइल फोन भी था. उस वक्त उस के दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था…! कुछ अच्छा, तो कुछ बुरा! कुल मिला कर उस का इरादा कुछ नेक नहीं लग रहा था.

लालच की नाव ने कैसे पहुंचाया जेल

कर्ज से मुक्ति की कुछ योजना उस ने बना रखी थी और और कुछ के बारे में सोचती हुई रेखा के घर की तरफ कदम बढ़ाती जा रही थी. उसे यह भी ध्यान में था कि रेखा का पति अभी सब्जी की दुकान से नहीं आया होगा. वह दोपहर को ही घर पर रहता था. वह 11 बजे रेखा के घर पहुंच गई थी. जैसे ही वह रेखा के कमरे में गई, शिकायती लहजे में बोली, ”देख, आज बहाना मत बनाना…सगीरन का पैसा भी देना…और अपना बेशक सिर्फ ब्याज चुका दो…आज तुम्हारे मोहल्ले की ही सबीना आने वाली है…उसे 2 लाख चाहिए…तुम्हारा नाम ले कर कल आई थी…’’

रुबीना चुपचाप सुनती रही. कोई जवाब नहीं दिया.

”क्यों कुछ बोल क्यों नहीं रही…उस के लोन का कमीशन तुम्हारे ब्याज में कम कर दूंगी.’’

”लेकिन दीदी…मेरे पास तो अपने ही ब्याज के पूरे पैसे नहीं हैं…वो 2 दिन बाद कर दूंगी…’’

”देख, फिर तूने कर दी न…छिछोरीछिनारों वाली बात!…हराम…’’

रेखा के मुंह से गालियां निकलनी शुरू ही हुईं कि रुबीना गुस्से में आ गई, ”दीदी, मैं तुम्हारी कर्जदार हूं… लिहाज करती हूं, इस का मतलब यह नहीं कि मुझे गालियां दो. दोबारा ऐसी गलती मत करना वरना बहुत बुरा हो जाएगा…’’

”क्या बुरा हो जाएगा…क्या कर लेगी तू…मैं अपना पैसा मांगती हूं…गालियां बुरी लगती हैं तो मेरा पैसा चुकाओ, वरना भुगतने के लिए तैयार हो जाओ…’’ रेखा चीखती हुई बोली.

”मैं भी देखती हूं कौन किसे दबाता है?’’ यह कहती हुई रुबीना ने वहीं कोने में रखा लोहे का पाइप रिंच उठा लिया. रेखा सहम गई, फिर भी तनी हुई आवाज में बोली, ”तो तू मुझे मारेगी, एक फोन मिलाऊंगी कि तुम्हारी बोलती बंद हो जाएगी…’’

रेखा अपना फोन निकालने के लिए तकिए को हटाने लगी, तभी रुबीना ने रेखा के सिर पर पाइप रिंच से जोरदार वार कर दिया. जिस से रेखा एक ओर चीखती हुए लुढ़क गई. चोट सिर पर लगी थी. वह अर्धबेहोशी की हालत में आ गई थी. उस की उठने की हिम्मत नहीं हो रही थी. रुबीना ने तुरंत रेखा के गले में लिपटी चुन्नी को कस दिया. इस के बाद फटाफट रुबीना ने रेखा के घर की अलमारी में रखे सोनेचांदी के जेवर, 10 हजार रुपए की नगदी और रेखा का मोबाइल फोन अपने एक छोटे बैग में ठूंस कर रखा फिर चुपचाप अपने घर आ गई.

उधर घनश्याम अपनी सब्जी की दुकान पर व्यस्त था. जब वह सब्जी बेच कर दुकान से निकला तो उसे कुछ भूख लगने लगी. उस ने सोचा कि पहले घर पर जा कर खाना खाया जाए. तेज कदमों से घनश्याम घर पहुंचा. घर में सन्नाटा पसरा हुआ था. उस ने रेखा को आवाज लगाई. पीछे वाले कमरे से रेखा की दबी हुई आवाज आई, ”मैं यहां हूं.’’ घनश्याम दौड़ कर वहां पहुंचा. वहां देखा तो रेखा कराह रही थी. उस के सिर से खून रिस रहा था. गले में चुन्नी लिपटी हुई थी. घनश्याम ने उस की हालत देख कर तुरंत पड़ोसियों को बुलाया. उसे ईरिक्शा में बैठा कर सरकारी अस्पताल की इमरजेंसी में ले गया. जैसे ही डाक्टरों ने रेखा का इलाज शुरू किया, उस ने दम तोड़ दिया. रेखा को पहले से ही शुगर की बीमारी थी. मरने से पहले वह घटना के बारे में कुछ भी नहीं बता पाई.

डाक्टरों ने प्राथमिक उपचार में पाया कि रेखा के सिर पर किसी भारी चीज से हमला किया गया था. उस के गले में भी किसी रस्सी आदि के कसने के निशान थे. उस की मौत डाक्टरों को सामान्य नहीं, बल्कि हत्या लगी, इसलिए तुरंत पुलिस को सूचना दे दी गई. मामला रुड़की कोतवाली सिविल लाइंस का था. वहां से ऐश्वर्य पाल सूचना पा कर अस्पताल पहुंच गए. सूचना मिलने पर कोतवाल नरेंद्र सिंह बिष्ट भी अस्पताल पहुंच गए. इस मामले की तत्काल काररवाई करते हुए नरेंद्र बिष्ट ने घनश्याम से पूछताछ की. उसे जितनी जानकारी थी, वह कोतवाल को दे दी. महिला की संदिग्ध हत्या की गई थी. वह भी दिन में ही. कोतवाल ने सीओ नरेंद्र पंत और एसपी (देहात) स्वप्न किशोर सिंह को भी घटना से अवगत करा दिया.

दूसरी तरफ डाक्टरों ने रेखा के शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी में भिजवा दिया. मामले की छानबीन के लिए नरेंद्र बिष्ट अपने साथ एसएसआई धर्मेंद्र राठी, एसआई मंसूर अली, हैडकांस्टेबल मनमोहन भंडारी और नूर आलम को ले कर घनश्याम के घर पर गए. रेखा की संदिग्ध मौत की सूचना पा कर उन के बच्चे अंबाला से रुड़की के लिए निकल पड़े. कोतवाल नरेंद्र सिंह बिष्ट ने रेखा के मकान का बारीकी से निरीक्षण किया. रेखा के पति घनश्याम ने पुलिस को बताया कि जब वह घर आया तो उसे लगा कि शायद रेखा बैड से नीचे गिर कर घायल हो गई होगी. मगर जब अस्पताल से लौट कर देखा तो घर के काफी जेवर गायब थी.

घर में अकसर ब्याज पर कर्ज लेने और ब्याज की रकम लौटाने के लिए महिलाएं आती रहती थीं. इन में वे महिलाएं भी थीं, जो कर्ज दिलवाने का काम करती थीं. उन में घनश्याम ने अंजुम, गजाला  और रुबीना का नाम बताया, जिन का अकसर आनाजाना होता था. घर पर आनेजाने वाली महिलाओं के अलावा पुलिस ने रेखा की दिनचर्या की जानकारी जुटाई. इस के बाद पुलिस टीम ने पड़ोसियों से भी पूछताछ की. साथ ही मोहल्ले में आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक करने की योजना बनाई गई.

पुलिस टीम ने वहां लगे लगभग 50 सीसीटीवी कैमरे चैक किए. इन कैमरों की लगभग 200 फुटेजों में घटना वाले रोज 15-16 लोगों का रेखा के घर में आनाजाना दिखा. पुलिस ने सब से पहले उन लोगों की शिनाख्त की और उन के बारे में जानकारी जुटा कर उन से पूछताछ की. उन्हीं फुटेज में एक महिला घटना वाले दिन रेखा के घर से एक छोटा बैग ले कर जाती दिखाई दी थी, जो बाकी महिलाओं से थोड़ी अलग दिखी थी. वह महिला उस दिन 2 बार रेखा के घर जाती हुई दिखाई दी थी. फोरैंसिक टीम द्वारा घटनास्थल की जांच पूरी करने के बाद जब पुलिस ने रेखा की हत्या का मुकदमा उस के बेटे दीपक कुमार की तरफ से धारा 103, 309 (6) बीएनएस के तहत दर्ज कर लिया.

सीसीटीवी फुटेज में नजर आए लोगों से पूतछाछ के सिलसिले में कोतवाल नरेंद्र बिष्ट को बैग ले कर 2 बार रेखा के घर जाने वाली मुसलिम पहनावे वाली महिला संदिग्ध लगी. वह रुबीना थी, जो मृतका रेखा के घर से एक छोटा बैग ले कर वापस जाते हुए दिखाई दी थी. इसलिए पुलिस ने रुबीना से दोबारा पूछताछ के लिए महिला थानेदार अंशु चौधरी के माध्यम से थाने बुलवाया. वह 28 नवंबर, 2024 की शाम थी, जब रुबीना कोतवाली में आ गई थी. थानेदार अंशु चौधरी, कोतवाल नरेंद्र बिष्ट तथा सीओ नरेंद्र पंत ने रेखा की मौत के बारे में उस से पूछताछ करनी शुरू की.

श्री बिष्ट ने जब रुबीना को सीसीटीवी कैमरों की फुटेज दिखाई तो उस के चेहरे पर घबराहट दिखाई दी. उन्होंने घटना से संबंधित कुछ सवाल पूछे तो वह पुलिस के प्रश्नों के सही उत्तर नहीं दे सकी और जल्द ही टूट गई थी. जेल जाने के डर से रुबीना ने पुलिस के सामने रेखा की हत्या करना स्वीकार कर लिया. अपनी मजबूरियों की खातिर रेखा की हत्या करने की सिलसिलेवार जानकारी  रख दी.

रेखा से अपने पुराने संबंधों और उस की हत्या के बारे में रुबीना ने जो खुलासा किया, वह बहुत ही शर्मनाक था, क्योंकि अपनी समस्या का समाधान निकालने का उस ने जो तरीका अपनाया था, वह सोचीसमझी साजिश थी. हालांकि इस के पीछे की वजह उस ने सगीरन के कर्ज चुकाने की अपनी मजबूरी भी बताई. उस ने बताया कि उस ने अपना कर्ज उतारने के लिए रेखा की हत्या कर के उसे लूटने की योजना बनाई थी.

कोतवाल नरेंद्र बिष्ट ने रुबीना की निशानदेही पर उस के घर से रेखा की हत्या करने में इस्तेमाल किया गया पाइप रिंच, रेखा का मोबाइल फोन तथा गहने मंगलसूत्र, सोने की अंगूठियां, कानों के झुमके, कानों के टौप्स, नाक की लौंग, गले की चेन, पाजेब, बिछवे, बच्चों के कड़े व नकद 10 हजार रुपए बरामद कर लिए.

रुबीना से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

 

Love Crime Stories : साली की वजह से दोस्त का कत्ल

Love Crime Stories : लालची स्वभाव की काजल ने अपने जीजा आशुतोष राजपूत उर्फ प्रिंस के दोस्त आयुष गुप्ता से दोस्ती कर नजदीकियां तो बढ़ा लीं, लेकिन उसे इस के अंजाम की तनिक भी आशंका नहीं थी. फिर एक दिन इस का ऐसा खौफनाक नतीजा सामने आया कि…

सर्दी बहुत ज्यादा थी. हो भी क्यों न, जनवरी का सर्द महीना जो था. इस मौसम में धूप बहुत अच्छी लगती है, लेकिन सूरज के भी खुल कर दीदार नहीं हो पा रहे थे. गलियां ऐसे मौसम में बेरौनक हो जाती हैं क्योंकि ज्यादातर लोग घरों के दरवाजे बंद कर के रोजमर्रा का काम करते हैं. शाहजहांपुर के गदियाना मोहल्ले में रहने वाले आशुतोष राजपूत उर्फ प्रिंस उर्फ बबुआ की साली काजल इस सर्द मौसम में उस के यहां आई हुई थी, किंतु ठंड ने उसे रजाई में दुबका कर बिठा दिया था. दिन के 11 बज रहे थे. काजल नित्य कर्म से फारिग होने के बाद रजाई में आ कर बैठ गई थी. वह मोबाइल में यूट्यूब देखने में खोई हुई थी.

 

कमरे में उस की बहन पलक चाय की ट्रे ले कर आई तो काजल को रजाई में दुबकी देख कर मुसकरा पड़ी, ”तुम तो घूमने के इरादे से आई थी काजल .’’

”सर्दी बहुत है दीदी, बिस्तर से पांव नीचे रखने की हिम्मत नहीं हो रही है, तुम घूमने की बात कह रही हो.’’ काजल ठिठुरन भरे लहजे में बोली.

”चाय लो, शरीर में स्फूर्ति और गरमी आ जाएगी.’’ चाय का प्याला काजल की ओर बढ़ाते हुए पलक बोली.

”चाय भी कुछ ही देर के लिए गरमी देती है दीदी.’’

”तो किसी पुरुष से दिल लगाओ न, शरीर से ठंडी उडऩछू हो जाएगी.’’ काजल की बात काट कर पलक ने हंसते हुए कहा.

काजल और पलक दोनों बहनें जरूर थीं, लेकिन एक साथ रहते हुए दोनों हर तरह की बातें दिल खोल कर करती थीं.

”ओह!’’ काजल ने पलकें झपकाईं, ”यह मंत्र तुम ने शादी के बाद सीखा है क्या दीदी?’’

”अरी नहीं.’’ पलक झेंप गई, ”मैं ने सुना है. वैसे इस दिल लगाने का मेरी नजर में यह मतलब निकलता है कि दिल लगाने से नारी का मन पुरुष के खयालों में ही उलझा रहता है. उस से कहां मिलना है, कब मिलना है, इसी में उलझी नारी अपने अंदर ठंड का अहसास नहीं करती या यूं समझ लो ठंड उस के पास नहीं फटकती.’’

”यह तो मैं मान सकती हूं दीदी, ठंड को महसूस किया जाए या याद किया जाएगा तो वह हमें आ कर चिपकेगी. मन इधरउधर लगा रहेगा तो ठंड का अहसास ही नहीं होगा. किंतु ठंड का अहसास न हो इस के लिए पुरुष से ही दिल क्यों लगाया जाए, कुछ और भी तो किया जा सकता है.’’

”पुरुष की कंपनी मिलेगी तो हम लंबे समय के लिए बिजी हो सकते हैं. दूसरा काम तो शुरू किया और घंटे 2 घंटे में खत्म.’’

”यह बात तो है दीदी.’’

”तो फिर निकलो रजाई से और किसी सुंदर, सजीले पुरुष की तलाश करो, जिस से तुम दिल लगा सको.’’

”तुम मुझे यह सलाह दे रही हो दीदी?’’ काजल से पलकें झपकाईं.

”क्या हुआ, आज का मौडर्न जमाना है, तुम अपने लिए बौयफ्रैंड चुन लोगी तो मम्मीपापा और हमारी टेंशन भी दूर हो जाएगी. हम तुम्हारी उस लड़के से शादी कर देंगे.’’

”शादी न कर के मैं उस के साथ फुर्र हो गई तो..?’’ काजल ने आंखें नचा कर कहा.

”तो और भी अच्छा होगा. हमारा शादी का खर्चा बच जाएगा.’’ पलक ने कहा और हंस पड़ी, ”मैं जानती हूं तुझे, तू ऐसा कदम नहीं उठाएगी.’’

”क्यों नहीं उठाऊंगी?’’

”क्योंकि तू हम लोगों से प्यार करती है.’’ पलक ने मुसकरा कर कहा.

काजल थोड़ी देर खामोश रही फिर बोली, ”दीदी, तुम सचमुच कह रही हो न कि मुझे कोई बौयफ्रैंड ढूंढना चाहिए?’’

”हां.’’ पलक ने सिर हिलाया, ”इस में गलत क्या है, तू जवान हो गई है, तुझे अपने लिए हैंडसम लड़का ढूंढ लेना चाहिए. हां, यह याद रखना, लड़का हैंडसम ही न हो, उस की जेब मे माल भी होना चाहिए. यानी दौलतमंद लड़का हो.’’ काजल ने होंठों को गोल दायरे में सिकोड़ कर सीटी बजाई.

”ऐसा एक लड़का मैं ने यहीं गौटिया मंदिर में कल ही देखा था. शाम को जब मैं माथा टेकने मंदिर गई थी तो वह वहां मुझे नजर आया था.’’

”तूने कैसे भांप लिया वह दौलतमंद है?’’

”उस के पास बढिय़ा बाइक थी. उस ने मंदिर के बाहर बैठे गरीबों को 50-50 रुपए का दान भी दिया.’’

”शक्लसूरत से कैसा है तेरा वह दौलतमंद?’’ पलक ने मुसकरा कर पूछा.

”दुबलापतला है, खूबसूरत भी है. कहो तो मैं उस का आज नामपता मालूम कर आऊं!’’

”कर ले.’’ पलक ने हरी झंडी दे दी, ”लड़का अच्छा हुआ तो तेरे लिए हम रिश्ते की बात कर लेंगे.’’

”ठीक है, मैं आज शाम को मंदिर हो कर आऊंगी. अब तुम मुझे बढिय़ा खाना बना कर खिलाओ दीदी. पेट में चूहे दौडऩे लगे हैं.’’

”बनाती हूं, सब्जी पक रही है. बस वह तैयार होते ही रोटियां बना कर परोस दूंगी.’’ पलक ने कहा और कप ट्रे में रख कर वह कमरे से बाहर निकल गई.

आयुष गुप्ता को फांसने के लिए काजल ने चुना अनोखा तरीका

काजल ने जिस लड़के को गौटिया मंदिर में देखा था, उस का नाम आयुष गुप्ता था. उस के पापा दिलीप कुमार गुप्ता काफी पैसे वाले थे. उन का टेंट का बड़ा कारोबार था, जिस की देखभाल की जिम्मेदारी उन्होंने बेटे आयुष के कंधे पर डाल दी थी. अब आयुष ही टेंट के कारोबार को देखता था. आयुष बहुत सीधा और धार्मिक प्रवृत्ति वाला इंसान था. वह रोज मंदिर जाता था और गरीबों को खाना खिलाने के लिए रुपयों का दान करता था. काजल ने अपनी बहन पलक के कहने पर उसी शाम मंदिर में जा कर आयुष के बारे में वहां के गरीब लोगों से मालूम कर लिया था. गरीब लोग आयुष को काफी समय से पहचानते थे. उन्होंने ही बताया था कि आयुष गुप्ता बगैर नागा किए इस मंदिर में शाम को जरूर आता है.

काजल ने दूसरी शाम आयुष की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए बहुत खूबसूरत नाटक किया था. वह शाम को शाल ओढ़ कर उन गरीब लोगों की पंगत में जा कर बैठ गई थी, जो आयुष से कुछ पाने की आस में रोज कतार लगा कर मंदिर की सीढिय़ों पर बैठ जाते थे. आयुष अपने समय पर मंदिर में आया तो उस के हाथ में पूजा की टोकरी थी, जिस में फूल और पूजा करने के लिए धूपबत्ती, माचिस, चंदन आदि था. आयुष ने मंदिर में जा कर पहले पूजा की, फिर खाली टोकरी ले कर वह बाहर सीढिय़ों की ओर आ गया.

सीढिय़ों पर गरीब लोग कतार में उसी का इंतजार करते बैठे रहते थे. आयुष ने जेब से रुपए निकाल कर सभी को 50-50 रुपए देने शुरू किए और कतार की अंतिम छोर तक आ गया. यहां बैठी काजल ने हथेली ऊपर उठा कर आयुष की तरफ देखा. आयुष उस की खूबसूरती देख कर क्षण भर को चौंका, फिर सिर झटक कर उस ने 50 रुपए का नोट काजल की तरफ बढ़ाया, ”लो, इस से अपने लिए खाना खरीद लेना.’’

”मुझे यह रुपए नहीं चाहिए,’’ काजल ने गंभीर स्वर में कहा.

”तो क्या चाहिए?’’ आयुष ने हैरानी से पूछा.

”मुझे आप चाहिए. संपूर्ण रूप से.’’ बेझिझक काजल ने कह दिया.

”क्या कह रही हैं आप?’’ आयुष चौंकता हुआ बोला.

”जो आप ने सुना है. मैं चाहती हूं आप मुझे 50 रुपए का दान न दें, बल्कि पूर्णरूप से मुझे मिल जाएं.’’

”आप को मालूम है आप क्या मांग रही है?’’

”हां. यही पाने के लिए तो मैं भी आप की तरह रोज इस मंदिर में आ कर माथा टेकती हूं. मैं आप को पाना चाहती हूं, आयुष बाबू.’’

”खड़ी हो जाइए,’’ आयुष ने गंभीर हो कर कहा.

काजल खड़ी हो गई. आयुष ने उस की सुंदरता को ऊपर से नीचे तक निहारा, फिर बोला, ”आप को विश्वास है, आप जो मांग रही हैं, वह आप को मिल जाएगा?’’

”मैं दान पाने वालों की लाइन में बैठी हूं. यह दान देने वाले की इच्छा पर डिपेंड करता है कि वह मुझे दान दे सकेगा या नहीं.’’

”आप बहुत होशियार हैं, आप की मंशा पूरी कर के कोई भी धन्य हो जाएगा. मैं तो बहुत तुच्छ हूं.’’

”आप समर्थ हैं आयुषजी.’’ काजल गंभीर हो गई, ”आप मेरी मनोकामना पूरी कर सकते हैं.’’

”लेकिन मैं आप के बारे में कुछ नहीं जानता हूं.’’ आयुष गंभीर स्वर में बोला, ”आइए, वहां सामने चाय का स्टाल है, वहीं बैठ कर एकदूसरे को करीब से जान लेते हैं.’’

आयुष से दोस्ती कर गदगद क्यों हुई काजल

काजल आयुष के साथ चाय के स्टाल पर आ गई. दोनों वहां कोने की मेज के सामने की कुरसियों पर आ कर बैठे. आयुष ने चाय बिसकुट का और्डर दिया.

”क्या नाम है आप का?’’ आयुष ने पूछा.

”मेरा नाम काजल है.’’

”कहां रहती हो?’’

”मैं यहां अपने जीजा के पास रहती हूं. वह मोहल्ला गदियाना, सदर बाजार थाना क्षेत्र में रहते हैं.’’

”गदियाना में..?’’ आयुष चौंका, ”क्या नाम है आप के जीजा का?’’

”आशुतोष राजपूत उर्फ प्रिंस उर्फ बबुआ.’’

”क्याऽऽ’’ आयुष हैरानी से बोला, ”आप प्रिंस की साली हैं? अरे! वह तो मेरा फ्रेंड है. वाह! क्या अजीब संयोग है, प्रिंस से दोस्ती थी, अब उस की साली साहिबा मेरी जिंदगी में एंट्री कर रही हैं.’’

”ओह! आप मेरे जीजा के फ्रेंड हैं. यह तो और अच्छी बात हो गई.’’ काजल हंस पड़ी, ”अब तो आप मुझे अपना बनाने का मेरा प्रस्ताव मंजूर कर लेंगे न?’’

”बेशक!’’ आयुष हंस कर बोला, ”आप सुंदर हैं, हसीन हैं, आप का प्रस्ताव मैं कैसे ठुकरा दूं.’’ आयुष ने हाथ आगे बढ़ाया. काजल ने मुसकरा कर अपना हाथ आयुष के हाथ में दे दिया.

आयुष से दोस्ती हो जाने के बाद काजल बहुत खुश हुई.

यह बात जब उस ने अपनी बहन पलक को बताई तो उस ने भी काजल की पसंद की सराहना की क्योंकि आयुष एक अमीर बिजनैसमैन का बेटा था.

धीरेधीरे काजल और आयुष के बीच दोस्ती का दायरा बढ़ता गया. हालांकि आयुष शादीशुदा था, इस के बावजूद उस का काजल के साथ चक्कर चल गया. वह उसे अपनी गाड़ी से इधरउधर घुमाता और शौपिंग कराता था. काजल और पलक दोनों बहनें लालची स्वभाव की थीं, इसलिए कभीकभी काजल Love Crime Stories अपनी बहन पलक को भी आयुष के साथ घूमने के लिए बुला कर ले जाती थी. आयुष दोनों बहनों को शौपिंग कराता और महंगे रेस्टोरेंट में खाना खिलाता था.

दिनदहाड़े आयुष को किस ने मारी गोली

उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के थाना सदर बाजार में 2 दिसंबर, 2024 की दोपहर बाद कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि ओसीएफ रामलीला मैदान में 2 गुटों में जम कर मारपिटाई हुई है, जिस में एक पक्ष के युवक को गोली मार दी है. मौका मुआयना किया जाए. एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह ने इस सूचना को रोजनामचे में दर्ज कर के अपनी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर कूच कर दिया. पुलिस जब ओसीएफ रामलीला मैदान पहुंची तो वहां कुछ लोगों की भीड़ नजर आ रही थी. इन्हीं में उस युवक के घर वाले भी थे, जिस को गोली मार देने की सूचना कंट्रोल रूम से दी गई थी.

एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह ने पास जा कर देखा तो जमीन पर एक 24-25 साल का युवक खून से लथपथ औंधा पड़ा हुआ था. उस की खोपड़ी के पीछे वाले भाग पर एक छोटा सा सुराख नजर आ रहा था, जिस में से गाढ़ा खून बह कर उस के कपड़ों को रंग रहा था. चूंकि खून गाढ़ा हो चुका था, इस से अनुमान लगाया गया कि युवक के सिर में जो गोली मारी गई है, उसे बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. युवक के शरीर में प्राण नहीं रह गए थे. वह इस दुनिया को छोड़ चुका था. युवक के पास 2-3 युवक, एक बुजुर्ग दंपति और कुछ महिलाएं थीं. बुजुर्ग और एक महिला दहाड़ें मार कर रो रहे थे. शायद ये दोनों इस मृत युवक के मम्मीपापा हो सकते थे.

”आप लोग इस के पास से हट जाइए. हमें अपनी काररवाई करने दीजिए.’’ एसएचओ ने गंभीर स्वर में कहा.

यह सुनने के बाद फैमिली वाले उठ कर युवक के शव के पास से दूर खड़े हो गए. एसएचओ सुरेंद्र पाल अपनी जांच में जुट गए. उन्होंने युवक की नब्ज टटोली तो वह थम चुकी थी. युवक के शरीर पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे, लग रहा था उसे पहले जम कर पीटा गया है. मृतक का अच्छी तरह मुआयना कर लेने के बाद एसएचओ ने सब से पहले एसपी राजेश एस. को इस घटना की सूचना दे दी.

इस के बाद एसएचओ मृतक के फैमिली वालों के पास आए. वह अभी भी जारजार रो रहे थे.

”यह युवक आप का क्या लगता था?’’ एसएचओ ने सहानुभूति से पूछा.

”यह मेरा बेटा है साहब.’’ बुर्जुग व्यक्ति रोते हुए बोला, ”इस का मैं अभागा बाप हूं. मेरा नाम दिलीप कुमार गुप्ता है और यह मेरी पत्नी रानी गुप्ता है. आयुष मेरा एकलौता बेटा था, जिसे उन लोगों ने मार डाला.’’

”आप बताएंगे, आप के बेटे का किन लोगों से झगड़ा हुआ था और इस झगड़े का कारण क्या रहा था.’’

”साहब, मेरा बेटा बहुत सीधासादा था. उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. इस को जिस व्यक्ति ने मारा है, उस का नाम प्रिंस है. नामालूम उस ने मेरे बेटे की जान क्यों ली है.’’

”यह हम मालूम कर लेंगे, आप यहां की काररवाई पूरी हो जाने के बाद रिपोर्ट दर्ज करवा देना. हम आरोपियों के खिलाफ सख्त ऐक्शन लेंगे.’’

”जी साहब, मैं चाहता हूं कि मेरे बेटे के कातिल को फांसी की सजा मिले.’’ दिलीप कुमार रोते हुए बोला.

”ऐसा ही होगा.’’ एसएचओ गंभीर हो गए.

चूंकि एसपी राजेश एस फिंगरप्रिंट्स एक्सपर्ट और फोटोग्राफर्स की टीम के साथ वहां आ गए थे, इसलिए एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह मृतक के फैमिली वालों के पास से हट गए और एसपी साहब के पास आ गए. उन्होंने एसपी साहब को सैल्यूट किया और युवक के शव को दिखा कर बोले, ”सर, इस युवक के सिर में गोली मारी गई है. इस के फादर दिलीप कुमार गुप्ता का कहना है कि इसे प्रिंस नाम के व्यक्ति ने गोली मारी है.’’

एसपी साहब युवक के शव के पास आए और उस का मुआयना करने लगे. थोड़ी देर बाद उन्होंने फिंगरप्रिंट एक्सपर्ट और फोटोग्राफर्स को अपनी काररवाई करने का इशारा कर दिया.

”इस युवक के सिर में गोली मारी गई है सिंह साहब, आप मालूम कीजिए ये कौन हैं और उन्होंने यह कदम क्यों उठाया है. मुझे आप जांच कर कल तक रिपोर्ट देंगे.’’ एसपी साहब बोले.

”ठीक है सर.’’ एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह ने सिर हिला कर कहा.

सीसीटीवी में कैद हुए हत्यारे

एसपी राजेश एस. एसएचओ को कुछ हिदायतें दे कर घटनास्थल से चले गए. उन्होंने वहां मौजूद कुछ चश्मदीदों से घटना के बारे में पूछा तो उन्हें बताया गया कि यहां 2 गुटों का आपस में झगड़ा हुआ था. एक पक्ष के लोग कुछ ज्यादा थे. सभी लाठीडंडों से लैस थे. वही इस युवक के गुट पर भारी पड़ गए थे. उन्होंने भगदड़ मचने पर इस युवक को पीछे से गोली मारी. गोली लगते ही यह नीचे गिर कर तड़पने लगा तो सब भाग गए. उन सभी के नाम वह नहीं बता पाए. जब युवक के पास से सबूत एकत्र करने का काम पूरा कर लिया गया तो शव को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया गया.

वहां पुलिस की ड्यूटी लगा दी गई ताकि सबूत नष्ट करने की कोई कोशिश न हो. एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह वापस थाने लौट आए. उन के साथ युवक के पापा दिलीप कुमार गुप्ता भी थे. मृतक आयुष के पापा दिलीप कुमार गुप्ता शाहजहांपुर के ही रहने वाले आशुतोष राजपूत उर्फ प्रिंस उर्फ बबुआ, उस की पत्नी पलक, साली काजल के अलावा स्वप्निल शर्मा, निशांत मिश्रा, अरविंद वर्मा, अनमोल सक्सेना, शेखर मौर्य, अनुज सिंह, आर्यन सिंह, पीयूष राठौर, कमल, मोहम्मद आदिल के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. पुलिस ने इन के खिलाफ बीएनएस की धारा 191 (2), 191 (3), 190/61 (2), 103 (1) के तहत मामला दर्ज कर लिया.

मुख्य अभियुक्त आशुतोष राजपूत को बनाया गया था, जो सत्यपाल का बेटा था. यह मोहल्ला गदियाना में रहता था. शेष अभियुक्तों के बारे में विवेचना कर के ही मालूम किया जाना था. एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह ने एसपी राजेश एस को दूसरे ही दिन यह जानकारी दे दी. उन्होंने एएसपी (सिटी) के निर्देशन में एक पुलिस टीम गठित कर दी, जिस में सीओ (सिटी) पंकज पंत, एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह, एसआई दिलशाद खां, प्रदीप शर्मा, अहसान अली, दिनेश कुमार, जगेंद्र प्रताप सिंह, कांस्टेबल मोनू चौधरी, आकिब सैफी, अंकित धाना और विनीत कुमार को शामिल किया गया.

इस टीम को सब से पहले प्रिंस के खिलाफ ठोस सबूत एकत्र करने थे. 2 दिसंबर, 2024 को दिनदहाड़े ओसीएफ रामलीला मैदान में यह घटना घटी थी. इस घटना में कौनकौन लोग शामिल थे, यह जांच कर के ही मालूम किया जाना था. पुलिस टीम ने इस की जांच रामलीला Love Crime Stories ग्राउंड से ही शुरू की. रामलीला ग्राउंड में कई सीसीटीवी लगे हुए थे. जाहिर था यह घटना उन सीसीटीवी में रिकौर्ड हुई होगी. यही बात ध्यान में रख कर पुलिस टीम रामलीला ग्राउंड में पहुंच गई.

वहां लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक करने का काम शुरू हुआ तो बहुत कुछ स्पष्ट होता गया. सीसीटीवी कैमरों ने यह रिकौर्ड कर लिया था कि 2 दिसंबर की दोपहरी में वहां क्या कुछ घटित हुआ था. उन फुटेज में 2 गुट वहां दिखाई दिए थे. पहले से एक गुट के लोग वहां मोर्चा संभाले नजर आ रहे थे. मृतक युवक आयुष गुप्ता बाद में अपने साथ 5-7 युवकों के साथ पार्क में पहुंचता दिखाई दिया. पहले से वहां मौजूद युवकों के पास लाठीडंडे थे.

आयुष जब वहां पहुंचा तो एक 25-26 साल का युवक उस के पास आया था. उस के साथ 3-4 अन्य युवक थे. पास आ कर उस ने आयुष से कुछ कहा था. फिर आयुष के साथ धक्कामुक्की शुरू कर दी थी. वह युवक बहुत गुस्से में था. आयुष के साथ आए युवकों ने बीचबचाव करना चाहा था, तब उन में मारपिटाई शुरू हो गई थी. लाठीडंडे चलते दिखाई दे रहे थे. सभी एकदूसरे से गुत्थमगुत्था हो रहे थे. फिर आयुष का दल भागता दिखाई दिया. आयुष एक बाइक पर बैठने की कोशिश में उस के पीछे दौड़ रहा था, तभी उसे किसी व्यक्ति ने गोली मार दी थी. आयुष को वहां बुलाने वाला दूसरे दल का लीडर कौन था, यह अनुमान लगाया जा रहा था. उस की पहचान के लिए दिलीप कुमार गुप्ता को वहां पर बुलवाया गया.

उन्हें जब सीसीटीवी की फुटेज दिखाई गई तो उन्होंने पहचान कर बताया, ”साहब, यह पतला सा युवक प्रिंस राजपूत है. दूसरा युवक अरविंद वर्मा, तीसरा पीयूष राठौर है. यह मोहल्ला जलाल नगर बजरिया, थाना सदर बाजार में रहता है. मैं अन्य को नहीं पहचानता.’’

”हमारे हाथ प्रिंस आ गया तो सभी के नाम सामने आते जाएंगे.’’ सीओ (सिटी) पंकज पंत बोले, ”फिलहाल हमें अपना ध्यान प्रिंस के ऊपर केंद्रित करना है. उसे गिरफ्तार करना जरूरी है.’’

सीसीटीवी कैमरों की फुटेज ले कर पुलिस टीम थाने लौट आई. प्रिंस को गिरफ्तार करने के लिए उस के घर दबिश दी गई तो वह घर से फरार मिला. पुलिस ने उस के घर पर गुप्तरूप से निगरानी के लिए एक पुलिसकर्मी को लगा दिया.

डैडबौडी रख कर ढाई घंटे तक क्यों किया हाइवे जाम

4 दिसंबर, 2024 को फैमिली वालों को जिला अस्पताल से आयुष गुप्ता का शव पोस्टमार्टम के बाद मिल गया. चूंकि अभी तक पुलिस उस की हत्या में शामिल नामजद अभियुक्तों को गिरफ्तार नहीं कर पाई थी, इसलिए आयुष के फैमिली वालों में काफी गुस्सा था. उन्होंने आयुष की डैडबौडी शाहजहांपुर-पीलीभीत हाइवे पर रख कर जाम लगा दिया. पुलिस ने उन्हें समझाया और सड़क को सुचारू रूप चलने देने के लिए शव हटा कर उस का अंतिम संस्कार करने को कहा तो वे लोग नहीं माने. उन की एक ही मांग थी कि पुलिस पहले हत्यारों को गिरफ्तार करे, तभी आयुष का अंतिम संस्कार होगा.

मौके पर डीएम प्रवेंद्र सिंह और सीओ (सिटी) पंकज पंत भी वहां आ गए, लेकिन आयुष के फैमिली वाले नहीं माने. जाम बढऩे लगा, तब पुलिस ने आलाधिकारियों को फोन किया तो एसपी राजेश एस स्वयं घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने फैमिली वालों को आश्वासन दिया कि 24 घंटे में वह मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार करके जेल पहुंचा देंगे. उन के समझाने पर ढाई घंटे बाद वह आयुष की डैडबौडी को राजमार्ग से हटाने पर राजी हुए. फिर आयुष के शव का विधिविधान से अंतिम संस्कार कर दिया गया.

उसी शाम को आशुतोष राजपूत उर्फ प्रिंस उर्फ बबुआ, आर्यन उर्फ शुभांकर व काजल को गिरफ्तार कर लिया गया. इन से पूछताछ करने पर 11 अन्य लोगों के नाम सामने आए. पुलिस ने प्रिंस से वह तमंचा और 2 कारतूस भी हासिल कर लिया, जिस से आयुष की खोपड़ी में गोली मारी गई थी. आयुष को उस की प्रेमिका काजल, जो प्रिंस की साली लगती थी, उस के द्वारा झूठ बोल कर ओसीएफ रामलीला ग्राउंड में बुलवाया गया था. काजल ने आयुष से कहा था कि वह वहां पर उस का इंतजार कर रही है. लेकिन आयुष को दाल में कुछ काला लगा था, क्योंकि एक दिन पहले ही उस की प्रिंस से झड़प हो गई थी.

दरअसल, प्रिंस और आयुष गुप्ता दोस्त थे, लेकिन प्रिंस ने उसे पहली दिसंबर, 2024 को अपनी पत्नी पलक और साली काजल के साथ आयुष को नैशनल हाइवे पर एक ढाबे से एक साथ बाहर निकलते देख लिया था. यह देख कर वह आयुष पर आगबबूला हो कर बोला था, ”तेरी हिम्मत कैसे हो गई मेरी पत्नी और साली को इस ढाबे में लाने की. मैं तुझे जिंदा नहीं छोड़ूंगा. तू कल ओसीएफ ग्राउंड में आना, वहां देखूंगा तुझे.’’

इसी धमकी की वजह से 5-7 लड़के ले कर दोपहरी में ओसीएफ रामलीला ग्राउंड में आयुष गया था, लेकिन वहां प्रिंस ने पहले से 12-13 लड़के इकट्टे कर रखे थे, जिन्होंने आयुष को घेर कर मारना शुरू कर दिया था. आयुष घबरा कर अपने साथियों के साथ भागने लगा था, तब पीछे से उस की खोपड़ी में गोली मार दी गई थी. जिस से आयुष की मौके पर ही मौत हो गई थी. पुलिस टीम के सामने 14 लोगों के नाम सामने आए तो एसपी राजेश एस. ने 4 पुलिस टीमें बना कर शेष अभियुक्तों को पकडऩे का आदेश दे दिया.

कथा लिखे जाने तक पुलिस ने मोहित, अमन खां, पीयूष राठौर को पकड़ कर जेल भेज दिया था.

अन्य फरार अभियुक्तों में हिंदू युवा वाहिनी का पूर्व जिलाध्यक्ष स्वप्निल शर्मा, शेखर मौर्या, अनमोल सक्सेना और अनुज भी हैं. पुलिस टीमें इन्हें पकडऩे के लिए पूरा जोर लगाए हुए थीं. इन की गिरफ्तारी पर एसपी ने 25-25 हजार रुपए का इनाम घोषित कर दिया. उम्मीद है कि ये लोग भी शीघ्र पुलिस के हत्थे चढ़ जाएंगे.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

 

 

Family dispute : छोटे भाई की सुहागरात पर बड़े भाई ने ली परिवार में 5 की जान

Family dispute : पुलिस अधिकारियों को बरामदे में ही 2 महिलाएं घायल पड़ी दिखाई दीं. पूछने पर सुभाष ने बताया कि एक महिला उस की बहू डौली है तथा दूसरी रिश्तेदार सुषमा है. पुलिस अधिकारियों ने इन दोनों को इलाज हेतु सैफई अस्पताल भिजवा दिया. इस के बाद पुलिस अधिकारी आंगन में पहुंचे तो वहां 3 लाशें पड़ी थीं. इन की हत्या गला काट कर बड़ी बेरहमी से की गई थी. आंगन में खून ही खून फैला था.

पूछने पर सुभाष ने बताया कि एक लाश उस के छोटे बेटे अभिषेक उर्फ भुल्लन (20 वर्ष) की है, जबकि दूसरी लाश दामाद सौरभ (26 वर्ष) की है. तीसरी लाश बेटे के दोस्त दीपक (21 वर्ष) की है.

Bhullan (Mratak)               Sonu (Mratak)

     अभिषेक उर्फ भुल्लन                                 मृतक सोनू

लाश के पास ही खून सना फरसा पड़ा था. शायद उसी फरसे से उन का कत्ल किया गया था, इसलिए फरसे को पुलिस ने सुरक्षित कर लिया. एसपी विनोद कुमार सहयोगियों के साथ आंगन से जीने के रास्ते छत पर पहुंचे तो वहां का दृश्य देख कर वह चौंक गए. कमरे के अंदर सुभाष के बेटे सोनू व उस की नई नवेली दुलहन सोनी की लाश पड़ी थी. उन दोनों के हाथ की मेहंदी व पैरों की महावर अभी छूटी भी न थी कि उन्हें मौत की नींद सुला दिया गया था. उन दोनों की हत्या भी गला काट कर ही की गई थी. सोनू की उम्र 23 साल के आसपास थी, जबकि सोनी की उम्र 20 वर्ष थी.

निरीक्षण करते हुए एसपी विनोद कुमार जब मकान के पिछवाड़े पहुंचे तो वहां एक और युवक की लाश पड़ी थी. पूछताछ से पता चला कि वह लाश सुभाष के बड़े बेटे शिववीर (Shivvir) की है. पता चला कि शिववीर ने ही पूरे परिवार का कत्ल किया था, फिर पकड़े जाने के डर से खुदकुशी कर ली थी. शिववीर की उम्र 28 साल के आसपास थी. शिववीर के शव के पास ही एक तमंचा पड़ा था. इसी तमंचे से गोली मार कर उस ने खुदकुशी की थी. पुलिस ने तमंचे को सुरक्षित कर लिया. पुलिस ने शिववीर की तलाशी ली तो उस की जेब से मिर्च स्प्रे तथा नींद की गोलियों के 2 खाली पत्ते मिले. पुलिस ने इसे भी सुरक्षित कर लिया.

इस के अलावा पुलिस ने कमरे से कुल्हाड़ी व फावड़ा भी कब्जे में लिया, जिस से शिववीर ने पत्नी, भाभी व पिता पर हमला किया था.  यह बात 24 जून, 2023 की है.

शिववीर ने घर के 5 जनों को क्यों काटा

यह वीभत्स घटना उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) के मैनपुरी (Mainpuri) जिले के किशनी थाने के गांव गोकुलपुरा अरसारा में बीती रात घटित हुई थी. सामूहिक नरसंहार (Mainpuri Mass Murder Case) की खबर थाना किशनी पुलिस को मिली तो पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया. पुलिस अधिकारी भी घटनास्थल की तरफ रवाना हो लिए. कुछ ही देर में एसएचओ अनिल कुमार, एसपी विनोद कुमार, एएसपी राजेश कुमार तथा सीओ चंद्रशेखर सिंह घटनास्थल पर आ गए. सुभाष के दरवाजे पर अब तक भारी भीड़ जुट चुकी थी. ग्रामीणों की इतनी भीड़ देख कर पुलिस अधिकारी भी हैरान रह गए. उन्हें लगा कि असामाजिक तत्त्व भीड़ को गुमराह कर कहीं कोई बवाल खड़ा न कर दें. इसलिए उन्होंने अतिरिक्त फोर्स मंगा कर गोकुलपुरा गांव में तैनात करा दी.

सामूहिक हत्याकांड (Mainpuri Mass Murder) की खबर सुन कर अब तक सुभाष यादव के घर पर रिश्तेदारों का जमावड़ा शुरू हो गया था. जब भी कोई खास रिश्तेदार आता, महिलाओं का करुण रुदन कलेजा चीरने लगता. माहौल उस समय तो बेहद गमगीन हो उठा, जब नईनवेली दुलहन मृतका सोनी के मम्मीपापा के साथ सैकड़ों लोग आ गए.

वेदराम व उन की पत्नी सुषमा बेटी दामाद का शव देख कर बिलख पड़े. उन का करुण रुदन इतना द्रवित कर देने वाला था कि वहां मौजूद शायद ही कोई ऐसा हो, जिस की आंखों में आंसू न आए हों. पुलिसकर्मी तक अपने आंसू न रोक सके.

Deepak (Mratak)                  Saurabh (Mratak)

मृतक दीपक                                              मृतक सौरभ

मृतक दीपक के मम्मीपापा भी फिरोजाबाद से आ गए थे. वह भी बेटे की लाश के पास सुबक रहे थे. प्रियंका भी पति सौरभ की लाश के पास बिलख रही थी. उस की मम्मी शारदा देवी उसे ढांढस बंधा रही थी. यह बात दीगर थी कि उन की आंखों से भी लगातार आंसू बह रहे थे. क्योंकि उन की आंखों के सामने ही बेटे, बहू और दामाद की लाश पड़ी थी.

पुलिस अधिकारियों ने संवेदना व्यक्त करते हुए किसी तरह समझाबुझा कर मृतकों के घर वालों को शवों से अलग किया, फिर पंचनामा भरवा कर मृतक सोनू, भुल्लन, दीपक, सौरभ, शिववीर तथा सोनी के शवों को पोस्टमार्टम के लिए मैनपुरी के जिला अस्पताल भिजवा दिया. शवों को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाने के बाद एसपी विनोद कुमार ने घर के मुखिया सुभाष यादव से घटना के बारे में जानकारी जुटाई. सुभाष यादव ने बताया कि यह खूनी खेल उस के बड़े बेटे शिववीर ने ही खेला है. 22 जून को उस के मंझले बेटे सोनू की शादी थी. बारात गंगापुरा (इटावा) गई थी. 23 जून को दोपहर बाद बारात वापस आई. घर में बहू की मुंहदिखाई व अन्य रस्में पूरी हुईं. खूब गाना बजाना हुआ.

रात 12 बजे तक डीजे पर सब नाचतेझूमते रहे. शिववीर भी जश्न में शामिल रहा. लेकिन उस के मन में क्या चल रहा है, हम लोग भांप नहीं पाए. रात के अंतिम पहर में इस क्रूर हत्यारे ने हमला कर 5 जनों को काट कर मौत की नींद सुला दिया. शायद उस का इरादा सभी को खत्म करने का था, लेकिन पत्नी बेटी सहित वह बच गए.

Ghar Ke Mukhiya Se Puch-Tach Karte S.P. Vinod Kumar

घर के मुखिया सुभाषचंद यादव से बातचीत करते हुए एसपी विनोद कुमार

एसपी विनोद कुमार ने गोकुलपुरा अरसारा गांव में डेरा जमा लिया था. शवों के अंतिम संस्कार तक वह कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे. देर शाम एडीजी राजीव कृष्ण व आईजी दीपक कुमार गोकुलपुरा पहुंचे और उन्होंने घटनास्थल का निरीक्षण कर घर के मुखिया सुभाषचंद यादव से बातचीत की. उन्होंने एसपी विनोद कुमार से भी घटना से संबंधित जानकारी हासिल की तथा कुछ आवश्यक निर्देश दिए.

मृतकों के शवों का पोस्टमार्टम वीडियोग्राफी के साथ 3 डाक्टरों के पैनल ने किया. वहां क्षेत्रीय विधायक बृजेश कठेरिया मृतकों के परिजनों के साथ रहे और उन्हे धैर्य बंधाते रहे. पोस्टमार्टम के बाद शव उन के परिजनों को सौंप दिए गए. पुलिस व्यवस्था के साथ दीपक का शव फिरोजाबाद तथा सौरभ का शव उस के गांव चांद हविलिया (किशनी) भेज दिया गया. 3 बेटों सोनू, भुल्लन व शिववीर का दाह संस्कार सुभाष ने किया.

इधर वेदराम यादव अपनी बेटी सोनी का शव ले कर अपने गांव गंगापुरा पहुंचे तो माहौल बेहद गमगीन हो गया. लाडली बेटी का शव देखने के लिए पूरा गांव उमड़ पड़ा. हर आंख में आंसू थे. दर्द इस बात का था कि जिस बेटी को पूरे गांव ने हंसी खुशी से ससुराल भेजा था, उस का कफन में लिपटा शव गांव आया था. पूर्व दर्जाप्राप्त राज्यमंत्री रामसेवक यादव भी बेहद दुखी थे. क्योंकि लाडली बेटी सोनी उन के गांव व परिवार की थी. वेदराम को ढांढस बंधाते वह स्वयं भी रो रहे थे.

Ghatna Sthal Par Pahuchi Sansad Dimple Yadav

घटनास्थल पर पहुंची डिंपल यादव

सामूहिक नरसंहार से राजनीतिक गलियारों में भी हलचल शुरू हो गई थी. चूंकि मामला यादव परिवार से जुड़ा था और डिंपल यादव भी मैनपुरी से सांसद हैं, इसलिए वह दूसरे रोज ही गोकुलपुरा गांव जा पहुंचीं. पर्यटन राज्यमंत्री जयवीर सिंह ने भी सामूहिक नरसंहार (Mainpuri Mass Killing) पर गहरा दुख व्यक्त किया. शिववीर ने अपने सगे भाइयों की हत्या क्यों की? परिवार के प्रति उस के मन में ईष्र्या, द्वेष और नफरत की भावना क्यों पनपी? वह क्या हासिल करना चाहता था? यह सब जानने के लिए हमें उस की पारिवारिक (Family dispute) पृष्ठभूमि को समझना होगा.

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले के किशनी थाना अंतर्गत एक गांव है-गोकुलपुरा अरसारा. यादव बाहुल्य इसी गांव में सुभाषचंद्र यादव सपरिवार रहते थे. उन के परिवार में पत्नी शारदा देवी के अलावा 3 बेटे शिववीर, सोनू, अभिषेक उर्फ भुल्लन तथा एक बेटी प्रियंका थी. सड़क किनारे उन का पक्का मकान था. वह किसान थे. खेती से ही वह परिवार का भरणपोषण करते थे.

सुभाषचंद्र यादव खुद तो पढ़े लिखे नहीं थे, लेकिन बेटों को पढ़ालिखा कर योग्य बनाना चाहते थे. इसलिए वह उन की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देते थे. अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा वह बेटों की पढ़ाई पर खर्च करते थे. 2 बेटे सोनू व भुल्लन तो पढऩे में तेज थे, लेकिन बड़ा बेटा शिववीर पढऩे में कमजोर था. इंटरमीडिएट की परीक्षा जैसेतैसे पास कर उस ने पढऩा बंद कर दिया और पिता के साथ खेती में हाथ बंटाने लगा.

Shiv veer (Hatyara)

हत्यारा शिववीर

लेकिन शिववीर का मन खेती किसानी में भी नहीं लगा. इस के बाद वह नौकरी की तलाश में जुट गया. काफी प्रयास के बाद उसे मैनपुरी में स्थित एक फर्म में सेल्समैन की नौकरी मिल गई. चूंकि कृषि यंत्र बेचने में उसे कमीशन भी मिलता था, इसलिए उस की अच्छी कमाई होने लगी. अब वह ठाठबाट से रहने लगा. शिववीर कमाने लगा तो सुभाषचंद्र उस के ब्याह की सोचने लगे. वह ऐसी लड़की चाहते थे, जो उन का घर संभाल सके, भले ही वह ज्यादा पढ़ीलिखी न हो. उन्हीं दिनों करहल (मैनपुरी) निवासी हरीसिंह यादव अपनी बेटी डौली का रिश्ता ले कर सुभाष के पास आए.

सुभाष यादव तो शिववीर के रिश्ते के लिए लालायित ही थे, सो उन्होंने रिश्ता मंजूर कर लिया. फिर दोनों तरफ से बात तय होने के बाद 8 फरवरी, 2019 को हरीसिंह ने डौली का विवाह शिववीर के साथ कर दिया. डौली शिववीर की दुलहन बन कर ससुराल आई तो उस के जीवन में बहार आ गई. डौली सुंदर तो थी ही, साथ ही सुशील व सदाचारी भी थी. उस ने ससुराल आते ही घर संभाल लिया था. वह पति की सेवा तो करती ही थी, सासससुर की सेवा में भी कोई कसर न छोड़ती थी.

शादी के एक साल बाद डौली ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उस ने पीहू रखा. पीहू के जन्म से घर की खुशियां और बढ़ गई. शिववीर डौली से बहुत प्यार करता था. वह उस के प्यार में ऐसा खोया कि कामधंधा ही भूल गया. लापरवाही बरतने व काम पर न जाने के कारण उस की नौकरी भी छूट गई. शिववीर बेरोजगार हुआ तो वह आवारा घूमने लगा. उस की संगत कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोगों से हो गई, जिन के साथ वह नशापत्ती करने लगा. डौली मना करती तो वह उसे झिड़क देता. कभीकभी उस पर हाथ भी उठा देता था.

बेटे को गलत रास्ते पर जाते देख कर सुभाष की चिंता बढ़ गई. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि वह शिववीर को कैसे सुधारें. काफी विचारविमर्श के बाद उन्होंने किशनी कस्बे में शिववीर को फ्लैक्स की दुकान खुलवा दी. बैनर, पोस्टर बनाने के इस धंधे में शिववीर को शुरू में तो आमदनी हुई, लेकिन उधारी के कारण बाद में नुकसान होने लगा. यहां तक कि दुकान का किराया तथा कारीगरों की मजदूरी भी निकालनी मुश्किल हो गई. धंधे में नुकसान हुआ तो उस ने दुकान बंद कर दी. इस धंधे में वह कमाने के बजाय कर्जदार हो गया.

घर वालों ने शिववीर की क्यों नहीं की मदद

सुभाषचंद्र की बेटी प्रियंका अब तक जवान हो गई थी. वह उस के हाथ जल्द ही पीले कर देना चाहते थे. प्रियंका खूबसूरत तो थी, लेकिन ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी. आठवीं कक्षा पास करते ही मां शारदा ने उस की पढ़ाई बंद करा दी थी और अपने साथ घरेलू काम में लगा लिया था. उन का मानना था कि ज्यादा पढ़ीलिखी लड़की के लिए योग्य लड़का खोजना मुश्किल होता है. जबकि सुभाष यादव पत्नी की बात से सहमत नहीं थे. सुभाष यादव ने प्रियंका के लिए योग्य वर की खोज शुरू की तो उन्हें एक लड़का सौरभ पसंद आ गया. सौरभ के पिता रामकिशन यादव मैनपुरी जिले के गांव चांद हविलिया के रहने वाले थे. 24 वर्षीय सौरभ दूध का व्यवसाय करता था और पिता के साथ खेती में भी हाथ बंटाता था.

सुभाष को सौरभ पसंद आया तो उन्होंने 6 जून, 2021 को प्रियंका का विवाह सौरभ के साथ कर दिया. प्रियंका को ससुराल में किसी चीज की कमी न थी, सो वह सुखपूर्वक ससुराल में पति के साथ जीवन बिताने लगी. सुभाष जहां अपने बड़े बेटे शिववीर से दुखी था तो वहीं अन्य 2 बेटों से संतुष्ट भी था. मंझला बेटा सोनू पढ़लिख कर अकाउंटेंट की नौकरी पा गया था. वह राजस्थान की खुशखेरा स्थित एक फैक्ट्री में काम करता था. उसे अच्छी सैलरी मिलती थी.

सब से छोटे अभिषेक उर्फ भुल्लन को नौकरी तो नहीं मिली थी, लेकिन उस ने किशनी तहसील के पास फोटोकापी की दुकान खोल ली थी. दुकान से उसे अच्छी आमदनी होने लगी थी. अभिषेक व सोनू पिता की मरजी से हर काम करते थे, इसलिए वे दोनों उन की आंखों के तारे बन गए थे. इधर शिववीर ने फ्लैक्स के काम में पैसा गंवाने के बाद कर्ज ले कर गल्ले का धंधा किया, लेकिन इस में भी वह मात खा गया. अब वह पहले से ज्यादा कर्जदार हो गया. उस ने पिता व भाइयों से कर्ज (Family dispute) उतारने के लिए पैसा मांगा, लेकिन उन्होंने पैसा नहीं दिया. कर्जदार होने से घर वाले उस की उपेक्षा करने लगे.

कर्जदारों से परेशान शिववीर घर छोड़ कर पुणे चला गया. वहां वह किसी फैक्ट्री में काम करने लगा. एक साल तक शिववीर घर से गायब रहा. उस के बाद फिर घर वापस आ गया. वापस आते ही कर्ज वाले उस के घर के चक्कर लगाने लगे. शिववीर ने फिर घर वालों से पैसे मांगे, लेकिन सभी ने उसे दुत्कार दिया. एक पैसा भी नहीं दिया.

पत्नी भी क्यों हुई शिववीर के खिलाफ

शिववीर ने तब लड़झगड़ कर डौली के जेवर छीन लिए और बेच दिए. एकदो लोगों का उस ने मामूली कर्ज अदा किया. फिर घर छोड़ कर खोड़ा (नोएडा) आ गया. यहां वह किसी प्रिंटिंग प्रेस में काम करने लगा. कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी डौली को भी ले आया. डौली एकदो माह तो उस के साथ खुश रही, फिर दोनों में झगड़ा होने लगा. झगड़ा जेवर बेचने को ले कर होता था. एक रोज तो झगड़े ने बड़ा रूप ले लिया. शिववीर ने पहले तो पत्नी को पीटा, फिर दीवार में उस का सिर पटक दिया, जिस से डौली का सिर फट गया. गुस्से में डौली ने अपनी मासूम बच्ची को साथ लिया और आनंद विहार बसअड्डे आ गई.

यहां से बस पर सवार हो कर करहल आ गई, फिर वहां से अपने मायके आ गई. मम्मीपापा को उस ने पति की करतूत बताई तो उन्होंने बेटी को गले लगा लिया और बेटी को शिववीर के साथ न भेजने का फैसला लिया. कुछ दिनों बाद शिववीर डौली को लेने ससुराल आया तो डौली के मम्मीपापा का गुस्सा फूट पड़ा. उन्होंने शिववीर को खूब खरीखोटी सुनाई और बेटी को साथ भेजने से साफ मना कर दिया. शिववीर ने डौली को लाख मनाने की कोशिश की. माफी भी मांगी, लेकिन डौली नरम नहीं हुई. उस ने भी पति के साथ जाने को साफ मना कर दिया. अपमानित हो कर शिववीर घर आ गया. उस ने सारी बात अपने मम्मीपापा को बताई, फिर वह नोएडा चला गया.

इधर जब डौली कई माह तक ससुराल वापस नहीं आई तो डौली को ले कर गांव में कानाफूसी होने लगी. इज्जत बचाने के लिए सुभाष बहू के मायके गए और उसे किसी तरह मना कर विदा करा लाए. डौली के मम्मीपापा ने कई शर्तों के साथ डौली को उस समय ससुराल भेजा था. कुछ दिन बाद डौली के वापस आने की जानकारी शिववीर को हुई तो वह उसे लेने आ पहुंचा. लेकिन सुभाष ने डौली को यह कह कर उस के साथ नोएडा नहीं भेजा कि बहू के जाने से घर में रोटीपानी की परेशानी होगी. क्योंकि डौली की सास शारदा की तबियत खराब चल रही थी.

शिववीर अब 15 दिन में घर आता. 2-3 दिन रहता, उस के बाद फिर नौकरी पर नोएडा चला जाता. लेकिन जब भी आता, पापा से पैसों की डिमांड करता. न देने पर लड़ाईझगड़ा करता. मां शारदा से भी उलझ जाता. एक दिन तो हद ही हो गई. शिववीर ने पापा सुभाष (Family dispute) पर हाथ छोड़ दिया. पति पर हाथ छोडऩा शारदा को नागवार लगा, इसलिए वह उस से भिड़ गई और कई तमाचे शिववीर के गाल पर जड़ दिए.

घर आतेजाते एक रोज शिववीर को पता चला कि पापा व दोनों भाइयों ने मिल कर सड़क किनारे एक प्लौट तथा 5 बीघा उपजाऊ भूमि खरीदी है. लेकिन प्लौट व जमीन में उस का नाम दर्ज नहीं कराया गया है. वह मन ही मन जलभुन उठा. उस के मन में घर वालों के प्रति नफरत की आग सुलगने लगी. शिववीर ने इस बाबत पापा से पूछा तो उन्होंने कहा कि सोनूू और भुल्लन ने अपनी कमाई से खेत खरीदे हैं. यह सुन कर शिववीर गुस्से से बोला, ”खेत, प्लौट खरीदने को तुम लोगों के पास पैसा है, लेकिन हमारा कर्ज चुकाने को तुम्हारे पास पैसा नहीं है. यह नाइंसाफी है.’’

शिववीर ने इस नाइंसाफी के बारे में बहनोई सौरभ तथा मामा विनोद से भी बात की, लेकिन उन लोगों ने भी उस की एक न सुनी. शिववीर अब मामा व बहनोई से भी नफरत करने लगा. सुभाष का मंझला बेटा सोनू राजस्थान की खुशखेरा स्थित जिस फैक्ट्री में काम करता था, उसी में वेदराम यादव भी नौकरी करता था. वेदराम यादव इटावा जिले के गंगापुरा गांव का रहने वाला था. चूंकि सोनू और वेदराम एक ही क्षेत्र के रहने वाले थे, इसलिए परिचय होने के बाद दोनों के बीच घनिष्ठता बढ़ गई थी. जब भी दोनों को फुरसत मिलती तो साथ बैठ कर घरगांव की बातें करते थे. चूंकि दोनों यादव जाति के थे, सो दिन पर दिन उन की दोस्ती बढ़ती गई.

वेदराम यादव के परिवार में पत्नी सुषमा के अलावा 4 बेटियां सोनी (18 वर्ष), अंजलि (16 वर्ष), खुशबू (14 वर्ष), खुशी (13 वर्ष) तथा एक बेटा यश (7 वर्ष) था. वेदराम स्वयं तो नौकरी करता था, लेकिन उस की पत्नी सुषमा घरखेत की जिम्मेदारी संभाले थी. पांचों बच्चों की देखरेख व पालनपोषण की जिम्मेदारी सुषमा की ही थी.

वेदराम की बेटी सोनी भाईबहनों में सब से बड़ी थी. वह खूबसूरत तो बचपन से ही थी, लेकिन 16 बसंत पार कर जब उस ने जवानी की डगर पर कदम रखा तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ गया था. असित इंटर कालेज, गंगापुरा से उस ने हाईस्कूल की परीक्षा पास कर ली थी. वह आगे पढऩा चाहती थी, लेकिन मम्मी ने उस की पढ़ाई बंद करा दी थी और घरेलू काम में लगा दिया था. वेदराम अपनी जवान बेटी के ब्याह के लिए चिंतित रहता था. वह फैक्ट्री में जब भी सोनू से मिलता तो उसे अपनी बेटी सोनी की याद आ जाती. उसे लगता कि सोनू ही उस की बेटी के योग्य है. वह उसे सदा खुश रखेगा.

रिश्ता हो गया तो दोनों की जोड़ी खूब फबेगी. इशारेइशारे में वेदराम ने कई बार सोनू का मन टटोला तो वह हंस कर टाल गया और बोला, ”शादी विवाह मम्मीपापा की मरजी से होते हैं. पहले उन की हां फिर मेरी हां.’’

वेदराम सोनू का इशारा समझ गया. इस बार मार्च, 2023 में होली त्यौहार की छुट्टी में जब वेदराम घर आया तो वह बेटी का रिश्ता ले कर सोनू के गांव गोकुलपुरा अरसारा पहुंच गया. उस ने बिना कोई भूमिका बांधे सोनू के पापा सुभाष यादव से कहा कि वह अपनी बेटी सोनी का रिश्ता ले कर उन के पास आए हैं. उन का बेटा सोनू उन्हें पसंद है.

Soni (Mratika)

मृतका सोनी

आपस की बातचीत के बाद सोनी का रिश्ता सोनू के साथ तय हो गया. शादी की तारीख 22 जून, 2023 तय हुई. इस के बाद दोनों परिवार शादी की तैयारी में जुट गए.

भाई की शादी पर क्यों चिढ़ा शिववीर

शिववीर को सोनू का ब्याह तय होने की बात पता चली तो वह मन ही मन जल उठा. वह नोएडा से घर आया तो मम्मीपापा से झगडऩे लगा और बोला, ”तुम्हारे पास शादी रचाने को रकम है, लेकिन मेरा कर्ज चुकाने को नहीं. क्या मैं सौतेला बेटा हूं या फिर किसी की नाजायज औलाद. आखिर घर में मेरी अनदेखी क्यों की जा रही है?’’

शिववीर ने शादी की तैयारी के बहाने सुभाष से 20 हजार रुपया मांगा, लेकिन उन्होंने पैसा देने से साफ इंकार कर दिया. इस इंकार से शिववीर की नफरत चरम पर पहुंच गई. वह सोचने लगा कि उसे इस तरह तो कुछ भी हासिल न होगा. उसे सब कुछ छीनना ही पड़ेगा. उस ने मन ही मन तय कर लिया कि वह पूरे परिवार का सफाया कर देगा. उस के बाद आराम की जिंदगी बिताएगा. जमीनजायदाद, घर, प्लौट का वही मालिक होगा.

अपने खतरनाक मंसूबों को सफल बनाने के लिए वह तैयारी में जुट गया. सब से पहले उस ने चारा काटने वाली मशीन के ब्लेड से तेज धार वाला फरसा तैयार कराया. इस के बाद उस ने एक स्थानीय अपराधी की मदद से तमंचा व कारतूस खरीदा. फरसे व तमंचे को उस ने अपने कमरे में सुरक्षित रख दिया. यही नहीं, उस ने हर खतरे से निपटने के लिए अन्य तैयारियां भी पूरी कर लीं. मिर्च का स्प्रे व नींद की गोलियों का इंतजाम भी उस ने कर लिया.

शिववीर ने अपने खतरनाक मंसूबों की किसी को भनक तक न लगने दी. वह सामान्य तरीके से रहने लगा. सुभाष यादव व उस के दोनों बेटे शादी की तैयारियों में जुटे थे. निमंत्रण कार्ड आदि बांटे जा चुके थे. गांव में शादी की रस्में एक सप्ताह पहले ही शुरू हो जाती हैं. रिश्तेदारों व महिलाओं का आनाजाना भी शुरू हो गया था. सोनू की बहन प्रियंका, मौसी, मामी भी आ चुकी थीं. 20 जून को मंडप गाड़ा गया. उस के बाद से मंडप के नीचे ढोलक की थाप पर मंगल गीत गाए जाने लगे.

सुभाष यादव ने बड़े बेटे शिववीर को शादी में नहीं बुलाया था, फिर भी वह 3 दिन पहले ही नोएडा से घर आ गया. वह हर काम हंसीखुशी से करने लगा. उस ने भाइयों को तनिक भी आभास नहीं होने दिया कि उस के मन में क्या चल रहा है. 22 जून, 2023 को गाजेबाजे के साथ निकासी हुई और शाम 4 बजे बारात गंगापुरा के लिए रवाना हुई. रात 8 बजे वेदराम व उस के परिजनों ने बारात का स्वागत किया. बारात में शिववीर ने जम कर डांस किया. डीजे की धुन पर दूल्हा दुलहन भी खूब थिरके.

शिववीर वैसे तो खुश था, लेकिन छोटीछोटी बातों को ले कर वह लड़की पक्ष के लोगों से भिड़ जा रहा था. कभी लाइट को ले कर तो कभी पानी को ले कर वह नाराज हो रहा था. घर वालों के समझाने पर वह चुप हो जाता. डीजे बंद होने पर तो वह इतना नाराज हुआ कि वह रात में ही मोटरसाइकिल से घर वापस आ गया. 23 जून की सुबह वेदराम व उस की पत्नी सुषमा ने अपनी लाडो को लाल जोड़े में आंसुओं के बीच विदा किया. दोपहर बाद बारात गोकुलपुरा गांव वापस आ गई. उस के बाद ज्यादातर रिश्तेदार तो चले गए, लेकिन सोनू की बहन प्रियंका, जीजा सौरभ, मामी सुषमा तथा दोस्त दीपक उपाध्याय रुक गए. शाम तक मुंहदिखाई व अन्य रस्मेें होती रहीं.

ढोलक की थाप पर नाचगाना भी हुआ. फिर देर रात तक डीजे पर डांस होता रहा. सोनू, सोनी भी खूब थिरके. दीपक, सौरभ व शिववीर ने भी खूब डांस किया.

क्या हुआ था नशीली कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद

रात 12 बजे कर्ज से परेशान शिववीर कोल्ड ड्रिंक लाया. बस यहीं से उस ने अपने मंसूबों को अंजाम देना शुरू कर दिया. उस ने चालाकी से कोल्ड ड्रिंक में नशीली गोलियों का पाउडर मिला दिया. फिर एकएक गिलास सभी को थमा दिया. सभी कोल्ड ड्रिंक पीने लगे. कोल्ड ड्रिंक पीने के दौरान ही सोनी की मां सुषमा की काल आई. सोनी ने काल रिसीव की और बताया कि ससुराल में सब ठीक है. अभी चंद मिनट पहले ही डांस बंद हुआ है. जेठजी (शिववीर) कोल्ड ड्रिंक ले कर आए हैं, हम सभी पी रहे हैं.

इधर कोल्ड ड्रिंक पीने के बाद सौरभ, भुल्लन व दोस्त दीपक उपाध्याय आंगन में जा कर लेट गए तथा सोनू की मामी सुषमा, भाभी डौली, बहन प्रियंका तथा मां शारदा देवी बरामदे में सो गईं. बरामदे के पास ही सुभाषचंद्र खटिया पर लेट गए. सोनू व उस की पत्नी सोनी सुहागरात मनाने छत पर बने कमरे में जा कर लेट गए. उन्होंने जीने का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

नशीली कोल्ड ड्रिंक पी कर कुछ देर बाद सभी सो गए. लेकिन शिववीर की आंखों से नींद कोसों दूर थी. रात 3 बजे के बाद वह कमरे में आया. उस ने छिपा कर रखा तमंचा निकाला, फिर लोड कर कमर में खोंस लिया. इस के बाद फरसा ले कर कमरे से बाहर आया. चूंकि जीने का दरवाजा बंद था, अत: वह दीवार के सहारे सीढ़ी लगा कर छत पर पहुंचा. कमरे के अंदर सोनू व सोनी अस्तव्यस्त हालत में लेटे थे. शायद वे सुहागरात मनाने के बाद सुख की नींद सो रहे थे. शिववीर ने एक घृणाभरी नजर दोनों पर डाली फिर फरसे से गले पर वार कर दोनों को मार डाला.

Ghatna Sthan Par Pada Nav-Dampati Ke Shav

घटनास्थल पर पड़े नव दंपति के शव

नवदंपति की हत्या करने के बाद शिववीर जीने का दरवाजा खोल कर आंगन में आया. यहां भाई भुल्लन, बहनोई सौरभ व भाई का दोस्त दीपक सो रहा था. शिववीर ने फरसे से गरदन व चेहरे पर बारीबारी से वार कर तीनों को मौत की नींद सुला दिया. 5 हत्याएं करने के बाद शिववीर आंगन से बरामदे में आया. यहां उस ने फावड़े से अपनी पत्नी डौली व मामी सुषमा पर वार किया. डौली का पैर तथा सुषमा का हाथ जख्मी हो गया. वे दोनों चीखीं तो सुभाष, उस की पत्नी शारदा तथा बेटी प्रियंका जाग गईं.

उन तीनों ने शिववीर का रौद्र रूप देखा तो वे कांप उठीं. फिर भी वह उसे पकडऩे दौड़ीं. इसी बीच शिववीर ने फरसे से पिता पर वार कर दिया. लेकिन फरसा घूम जाने से उस की जान बच गई. केवल हाथ में ही मामूली चोट आई. हिम्मत जुटा कर सुभाष, शारदा व प्रियंका ने शिववीर को पकडऩे का प्रयास किया तो वह मकान के पीछे की ओर भागा. परिवार का कत्ल करने के बाद शिववीर ने कमर में खोंसा तमंचा निकाला और कनपटी से सटा कर फायर कर दिया. फायर की आवाज सुन कर प्रियंका व शारदा वहां पहुंचीं तो शिववीर की मौत हो चुकी थी. मांबेटी तब चीखनेचिल्लाने लगीं.

शारदा व प्रियंका की चीखपुकार सुन कर आसपड़ोस के लोग आ गए. उन्होंने घर के अंदर का खौफनाक मंजर देखा तो सभी की रूह कांप उठी. उस के बाद तो गांव में सनसनी फैल गई. गोकुलपुरा ही नहीं, बल्कि आसपास के गांव के (Family dispute) लोग उमड़ पड़े.

पुलिस को सूचना मिली तो आला अधिकारी भी मौके पर आ गए और जांच में जुट गए. प्रिंट और इलैक्ट्रौनिक मीडिया के पत्रकारों का जमावड़ा भी शुरू हो गया.

Deepak Kumar (I.G.)

आईजी दीपक कुमार

पुलिस अधिकारियों ने सब से पहले घायलों को अस्पताल भेजा, फिर जरूरी काररवाई पूरी कर शवों को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाया. उस के बाद घटना के संबंध में घर के मुखिया सुभाष से जानकारी हासिल की.

Rajesh Kumar (A.S.P.)

एएसपी राजेश कुमार

पूछताछ के बाद किशनी थाने के एसएचओ अनिल कुमार ने घर के मुखिया सुभाषचंद्र यादव की तहरीर पर बड़े शिववीर के खिलाफ हत्या का मुकदमा तो दर्ज किया, लेकिन आरोपी द्वारा भी आत्महत्या कर लेने से उन्होंने फाइल बंद कर दी. कथा संकलन तक डौली और सुषमा का इलाज सैफई के अस्पताल में चल रहा था. उन की जान तो बच गई, लेकिन दिल के जख्म शायद ही जीवन में भर सकें.

प्रियंका का सुहाग भाई ने ही उजाड़ दिया. उस के जीवन में अब शायद ही कभी बहार आए. सुभाष यादव व उन की पत्नी शारदा भी पश्चाताप के आंसू बहा रहे थे. उन का कहना था कि जब परिवार ही नष्ट हो गया तो वह जिंदा रह कर क्या करेंगे?

-कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime stories : शादी का झांसा देता फरजी सीबीआई अधिकारी

Crime stories : 12 दिसंबर, 2017 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के थाना अशोका गार्डन में काफी भीड़भाड़ थी. धीरेधीरे यह भीड़ बढ़ती जा रही थी. लोग यह जानने के लिए उस भीड़ का हिस्सा बनते जा रहे थे कि आखिर यहां हो क्या रहा है? लोग उत्सुकता से एकदूसरे का मुंह भी ताक रहे थे कि यहां हो क्या रहा है? उधर से गुजरने वाला हर आदमी बिना ठिठके आगे नहीं बढ़ रहा था.

इस की वजह यह थी कि शायद माजरा उस की समझ में आ जाए. जब उन्हें सच्चाई का पता चला तो सभी के सभी हक्केबक्के रह गए. एक लड़की, जिस की उम्र 23-24 साल रही होगी, वह एक लड़के का गिरेबान पकड़ कर कह रही थी, ‘‘सर, इस ने मेरी जिंदगी बरबाद कर दी. इस ने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है.’’

इस के बाद उस लड़की ने थाना पुलिस को जो बताया, उस के अनुसार उस लड़के ने फरजी आईपीएस अधिकारी बन कर उसे शादी का झांसा दिया था. काफी समय तक वह उस की इज्जत को तारतार करते हुए उस के भरोसे से खेलता रहा. यही नहीं, शादी करने के नाम पर उस ने उस से लाखों रुपए भी लिए थे.

लड़की को जब लड़के की सच्चाई का पता चला तो उस ने फरार होने की कोशिश की, लेकिन लड़की ने घर वालों की मदद से उसे पकड़ लिया और थाने ले आई. हर मांबाप की यही ख्वाहिश होती है कि वह अपनी औलाद को पढ़ालिखा कर इस काबिल बना दे कि वह खूब तरक्की करे.

ऐसी ही ख्वाहिश याकूब मंसूरी की भी थी. वह अपनी बेटी जेबा को गेट की तैयारी करवा रहे थे. जबकि मुसलमानों में आमतौर पर यही माना जाता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ालिखा कर उन से नौकरी थोड़ी ही करानी है. लेकिन याकूब मंसूरी की सोच इस के विपरीत थी. वह जेबा को पढ़ालिखा कर कुछ करने के लिए प्रेरित करने के साथसाथ हर तरह से उस की मदद भी कर रहे थे.

जेबा मंसूरी भी अपने वालिद के सपनों को साकार करने में पूरी ईमानदारी से जुटी थी. वह परीक्षा की तैयारी मेहनत से कर रही थी. वह पढ़ने में भी काफी होशियार थी. उसे पूरी उम्मीद थी कि इस साल वह गेट की परीक्षा पास कर लेगी. इस के लिए वह रातदिन मेहनत कर रही थी. लेकिन जो सपने उस ने बुने थे, उस पर समीर खान की नजर लग गई.

मैट्रीमोनियल साइट से हुई दोस्ती

जवान होती लड़की के लिए हर मांबाप की यही ख्वाहिश होती है कि उन की बेटी के लिए किसी भी तरह एक अच्छा सा लड़का मिल जाए. इस के लिए मांबाप लड़के वालों की तमाम तरह की मांगों को पूरी करने की कोशिश भी करते हैं. अच्छे रिश्ते के लिए ही याकूब मंसूरी ने शादी डाटकौम पर बेटी जेबा की प्रोफाइल बनाई थी.

उन्होंने ऐसा बेटी के सुखद भविष्य के लिए किया था. लेकिन हो गया उल्टा. शायद इसीलिए जहां शादी की शहनाई बजनी थी, वहां अब मातम पसरा था. समाज में आज इतना बदलाव आ गया है कि लड़केलड़कियां अपनी पसंद से शादी करने लगे हैं. इस में कोई बुराई भी नहीं है. क्योंकि जब लड़के और लड़की को जीवन भर साथ रहना है तो पसंद भी उन्हीं की होनी चाहिए.

society

इसीलिए अब परिचय सम्मेलन आयोजित किए जाने लगे हैं. इस से सब से बड़ा फायदा यह हुआ है कि लड़के के साथ लड़की को भी अपनी पसंद का जीवनसाथी मिल जाता है. चूंकि जमाना हाइटेक हो चुका है, इसलिए अब विवाह के लिए जीवनसाथी तलाशने का काम औनलाइन भी होने लगा है. कई प्लेटफार्म लोगों की शादी के लिए अच्छा जरिया बन गए हैं.

जेबा मंसूरी ने थाना अशोका गार्डन पुलिस को जो तहरीर दी थी, उस के अनुसार शादी के नाम पर उस के साथ धोखा हुआ था. जेबा ने नए साल में अपने लिए तरहतरह के जो अरमान पाले थे, नए साल के कुछ दिनों पहले ही उस के साथ जो हुआ, उस से उस के सारे अरमान एक ही झटके में चकनाचूर हो गए.

उस ने क्या सोचा था और उस के साथ क्या हो गया. शादी के नाम पर उस लड़के ने उस के साथ बहुत भयानक खेल खेला था, जिसे वह चाह कर भी इस जनम में नहीं भुला पाएगी. जेबा ने जो शिकायत दर्ज कराई है, उस के अनुसार उस के शादी के नाम पर धोखा खाने की कहानी कुछ इस प्रकार है—

जेबा प्रतियोगी परीक्षा गेट की तैयारी कर रही थी. जवान होती बेटी की शादी के लिए पिता याकूब मंसूरी ने शादी डाटकौम पर प्रोफाइल बना दी थी. शादी डाटकौम के जरिए शादी के लिए उस की प्रोफाइल पर एक रिक्वेस्ट आई. रिक्वेस्ट में दिए मोबाइल नंबर पर याकूब मंसूरी ने बात की.

इस बातचीत में उस ने अपना नाम समीर खान बताया था. उस ने बताया कि वह चेन्नई में सीबीआई में बतौर अंडरकवर डीएसपी नौकरी करता है. याकूब ने उस के घर वालों से बात करने की इच्छा जाहिर की तो उस ने अपने पिता अनवर खान का नंबर दे दिया. अनवर खान से समीर खान के बारे में जानकारी ली गई तो पता चला कि उन का बेटा समीर सीबीआई में अंडरकवर डीएसपी है. फिलहाल उस की पोस्टिंग चेन्नई में है.

बातचीत के लिए जेबा को ले गया होटल में

इस के बाद समीर ने याकूब मंसूरी से जेबा का मोबाइल नंबर यह कह कर मांग लिया कि वह उस से बात करेगा. अगर वह उसे पसंद आ गई तो वह इस जानपहचान को जल्दी ही शादी जैसे खूबसूरत रिश्ते में बदल देगा. याकूब मंसूरी ने समीर की बातों पर विश्वास कर के उसे जेबा का नंबर दे दिया.

अक्तूबर महीने में एक दिन जेबा के मोबाइल पर समीर ने फोन किया. दोनों में काफी देर तक बातें हुईं. दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने घर परिवार और विचारों के बारे में बताया. समीर ने ऐसी लच्छेदार बातें कीं कि जेबा उस के दिखाए सब्जबाग में फंस गई. इस के बाद अकसर उन की बातें होने लगीं. वाट्सऐप पर भी संदेशों का आदानप्रदान होने लगा.

ऐसे में ही एक दिन समीर ने भोपाल आ कर जेबा से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की, जिसे वह मना नहीं कर सकी. समीर के भोपाल आने की बात पर एक ओर जहां जेबा खुश हो रही थी, वहीं दूसरी ओर अंजाना सा डर भी सता रहा था. क्योंकि किसी से फोन पर बात करना अलग बात होती है और आमनेसामने मिलना अलग.

लेकिन शादी का मामला था, इसलिए जेबा ने मिलना मुनासिब समझा. आखिर वह समीर को लेने भोपाल रेलवे स्टेशन पर पहुंच गई.  यह 22 नवंबर, 2017 की बात है. दोनों ने एकदूसरे को देखा तो पहली नजर में ही पसंद कर लिया.

समीर ने जेबा के घर जाने के बजाय उस के साथ स्टेशन से सीधे नूरउससबा पैलेस होटल पहुंचा. जबकि जेबा उसे घर ले जाना चाहती थी. लेकिन समीर की मरजी के आगे उस की एक न चली.

होटल में उस ने डबलबैड कमरा लिया था, जिस में दोनों 2 दिनों तक रुके. इस बीच समीर ने अपने परिवार के बारे में जेबा को खूब बढ़ाचढ़ा कर बताया. उस के बताए अनुसार, उस के परिवार के ज्यादातर लोग सरकारी नौकरियों में हैं. कोई जज है तो कोई इसी तरह की अन्य सरकारी नौकरी में. अपने पिता के बारे में उस ने बताया कि उन का मुंबई में कपड़ों का बहुत बड़ा बिजनैस है, इसलिए वह वहीं रहते हैं. वह बनारस का रहने वाला है, जहां उस की काफी जमीनजायदाद है.

समीर ने पसंद किया जेबा को

अपने घरपरिवार के बारे में बता कर समीर ने जेबा से कहा कि वह उसे पसंद है और उस से शादी के लिए तैयार है. समीर अच्छे घर का लड़का था और  (CBI )सीबीआई में अफसर था, इसलिए जेबा ने भी हामी भर दी. जेबा के हां करते ही समीर उस से छेड़छाड़ करने लगा. इस के बाद सारी मर्यादाएं लांघते हुए उस ने उस के साथ शारीरिक संबंध बना लिए.

जेबा भी उस के बहकावे में आ कर गुनाहों के ऐसे दलदल में जा फंसी, जहां से निकलना किसी भी लड़की के लिए बहुत मुश्किल होता है. भोपाल में 2 दिन रुकने के बाद समीर ने कहा कि औफिशियल काम से उसे दिल्ली जाना है. इस से जेबा को लगा कि वाकई उसे वहां जरूरी काम होगा.

लेकिन बाद में पता चला कि वह सब झूठ था. यह सब जेबा काफी बाद में जान पाई. दिल्ली जाने के बाद समीर ने उसे फोन किया. डरते हुए उस ने बताया कि उन के होटल में रुकने का पता उस के घर वालों को चल गया है, जिस से वे काफी नाराज हैं. उस की बातें सुन कर जेबा शौक्ड रह गई. वह यह क्या कह रहा है, अब क्या होगा, उस की कितनी बदनामी होगी?

समीर ने जेबा को समझाते हुए कहा कि वह बिलकुल परेशान न हो. यह बात भोपाल में किसी को पता नहीं है, सिर्फ उस के घर वालों को ही पता है. इस बात से वे काफी नाराज हैं. लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है. कुछ दिनों में वह सब संभाल लेगा. वह बिलकुल परेशान न हो. वह उन्हें मना लेगा. वह फिर भोपाल आ रहा है. 2 दिन बाद समीर फिर भोपाल आया और नूरउससबा होटल के उसी कमरे में ही रुका. लेकिन इस बार जेबा होटल में उस के साथ नहीं रुकी, लेकिन उस से मिलने रोज आती रही.

अंत में जब समीर ने दबाव डाला तो वह 8 नवंबर से 23 नवंबर तक होटल में रुकी. समीर से उस के शारीरिक संबंध बन ही चुके थे, इसलिए इस बार भी वह उस से शारीरिक संबंध बनाता रहा.

जेबा ने ऐतराज जताया तो उस ने होटल में ही काजी को बुला लिया और उन के सामने कहा कि वह उस से निकाह कर के उसे अपनी बीवी मान रहा है. इस तरह से जेबा का निकाह समीर से हो गया. वह समीर की बीवी बन कर रहने लगी, जबकि उन के इस निकाह का कोई लिखित सबूत नहीं था.

इतने दिनों तक होटल में साथ रुकने के बाद जेबा समीर को अपने मम्मीपापा से मिलवाने के लिए सागर ले गई, जहां मकरोनिया सागर में उस का पुश्तैनी मकान था. वहां भी वह अपनी लच्छेदार बातों के जाल में फंसा कर जेबा के घर वालों के सामने एक अच्छा लड़का बना रहा. याकूब मंसूरी और उन की पत्नी को भी समीर पसंद आ गया था. अब इस रिश्ते में कोई अड़चन नहीं थी. कुछ समय तक सागर में रुक कर दोनों भोपाल लौट आए. समीर भोपाल स्थित जेबा के घर पर भी कई दिनों तक रुका. वहां भी दोनों ने जिस्मानी रिश्ते बनाए.

ट्रेनिंग के लिए जाने की बात कह कर ठगे लाखों रुपए

समीर ने जेबा के साथसाथ उस के घर वालों को भी इस बात का पक्का यकीन दिला दिया था कि वह सीबीआई में अंडरकवर डीएसपी है और उस का सिलेक्शन आईपीएस के रूप में हो गया है, जिस की ट्रेनिंग हैदराबाद में होनी है. आईपीएस की ट्रेनिंग पर वह इसलिए नहीं जा पा रहा था, क्योंकि किसी वजह से स्टे लगा था. लेकिन अब स्टे हट गया है, इसलिए उसे ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद जाना है.

ऐसे में ही जेबा ने उस से पूछ लिया कि वह वरदी क्यों नहीं पहनता तो उस ने कहा कि वह सीबीआई अफसर है, इसलिए उसे पहचान छिपा कर रखनी पड़ती है. जब कभी औफिस जाना होता है तो वह वरदी पहनता है.

जेबा के कहने पर एक दिन समीर ने उसे आईपीएस की वरदी पहन कर दिखाते हुए कहा कि जब कभी औफिशियल मीटिंग होती है, तब वह यह वरदी पहन कर जाता है. जेबा को उस वरदी पर संदेह हुआ, क्योंकि उस पर सीनियर अफसरों के बैज लगे थे. इस के बाद समीर ने उसे सील लगे हुए कई दस्तावेज दिखाए.

एक दिन समीर परेशान सा सोफे पर चुपचाप बैठा था. जेबा ने परेशानी की वजह पूछी तो उस ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘क्या बताऊं, मुझे ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद जाना है, जिस के लिए काफी पैसों की जरूरत है. होटल में मिलने को ले कर पापा अभी तक नाराज हैं, इसलिए उन से किसी तरह की मदद की उम्मीद नहीं है. अब परेशानी यह है कि ट्रेनिंग का खर्च कहां से आएगा.’’

समीर की बातों में आ कर जेबा ने कहा, ‘‘आप परेशान मत होइए, मैं आप के लिए पैसों का इंतजाम कर दूंगी.’’

समीर मना करता रहा, इस के बावजूद कई बार में जेबा ने तकरीबन 2 लाख रुपए उसे दे दिए. क्योंकि उसे कभी उस पर संदेह नहीं हुआ था.

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परिवार से मिलवाने की बात को टाल जाता था

जब भी जेबा समीर से घर वालों के बारे में पूछती या मिलवाने की बात कहती, वह कोई न कोई बहाना बना कर टाल जाता. जेबा को उस से मिले करीब 2 महीने हो गए थे, लेकिन उस ने अपने मम्मीपापा से मिलवाने की कौन कहे, फोन पर बात तक नहीं करवाई थी.

इन्हीं बातों से जेबा को उस पर शक होने लगा. संदेह गहराया तो उस ने अपने पापा से समीर के बारे में पता करने को कहा. उस ने और उस के मम्मीपापा ने समीर से उस की नौकरी और पढ़ाई के कागजात मांगे तो वह टालमटोल करने लगा. याकूब मंसूरी ने अपने कई परिचितों को समीर के बारे में पता करने के लिए लगा दिया. नतीजा यह निकला कि उस की असलियत का पता चल गया.

समीर को पता नहीं कैसे भनक लग गई कि उस की पोल खुल गई है. वह अपना बैग ले कर घर से भागने की फिराक में था, तभी जेबा ने कहा, ‘‘समीर, हमें तुम्हारी असलियत का पता चल गया है. अब मैं तुम्हें पुलिस के हवाले करूंगी, जिस से तुम्हारी जिंदगी जेल में कटेगी.’’

समीर डर गया. उस ने कहा, ‘‘अगर तुम लोगों ने मेरी शिकायत पुलिस में की तो मैं तुम सभी को जान से मार दूंगा.’’

लेकिन उस की इस धमकी से न जेबा डरी और न उस के मम्मीपापा. याकूब मंसूरी ने अपने दोस्तों की मदद से समीर को पकड़ लिया और थाना अशोका गार्डन ले गए, जहां वह खुद को पुलिस अधिकारी होने का भरोसा दिलाता रहा और वादा करता रहा कि जेबा से ही शादी करेगा.

लेकिन शादी का झांसा दे कर शारीरिक शोषण करने के साथ लाखों रुपए ऐंठने वाले समीर की असलियत जेबा को पता चल गई थी, इसलिए उस ने उस की किसी बात पर भरोसा नहीं किया. मामले की नजाकत को भांपते हुए अशोका गार्डन पुलिस ने समीर को तुरंत हिरासत में ले लिया.

समीर को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने याकूब मंसूरी के घर में रखे उस के बैग को कब्जे में ले कर तलाशी ली तो उस में से राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, सीबीआई सहित कई संस्थानों की फरजी मोहरें मिलीं. यही नहीं, उस के पास से डीआईजी रैंक के पुलिस अधिकारी की वरदी भी मिली. समीर ने एक गलती यह की थी कि उस ने जो वरदी खरीदी थी, वह डीआईजी रैंक के पुलिस अधिकारी की थी. 3 स्टार और अशोक चक्र लगी वरदी को पुलिस ने कब्जे में ले लिया था. पूछताछ में उस ने बताया कि यह वरदी उस ने बिहार के भागलपुर से खरीदी थी.

शातिर दिमाग है ठग समीर खान

एएसपी हितेश चौहान के अनुसार, समीर अनवर खान बहुत ही शातिर दिमाग था. उस ने बड़ी चालाकी से शादी डाटकौम पर अपनी प्रोफाइल बना कर जेबा मंसूरी जैसी पढ़ीलिखी लड़की को अपने जाल में फांस लिया था. बाद में पता चला कि उस ने ऐसा ही कारनामा पंजाब में किया था. मध्य प्रदेश पुलिस ने पंजाब पुलिस से जानकारी हासिल की तो पता चला कि ऐसे ही मामले में वह वहां भी गिरफ्तार किया गया था. जमानत पर रिहा होने के बाद वह फरार हो गया था.

पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के अनुसार, समीर मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला वाराणसी का रहने वाला था. उस ने दिखावे के लिए एमटेक में अप्लाई कर रखा था. उस के पिता मुंबई में झुग्गीझोपड़ी में रहते थे और फेरी में कपड़े बेच कर गुजरबसर करते थे. उस ने जेबा से बताया था कि वाराणसी में उस की तमाम जमीनजायदाद है, लेकिन यह सब झूठ था.

मजे की बात यह थी कि उस ने पंजाब में जो धोखाधड़ी की थी, उस में उस ने 40-50 लाख रुपए की चपत लगाई थी. लेकिन कहीं से भी नहीं लगता था कि इतना पैसा उस के पास होगा.

थाना अशोका गार्डन पुलिस ने समीर के खिलाफ भादंवि की धारा 170, 419, 420, 471, 472, 473, 376 और 506 के तहत मुकदमा दर्ज किया था. कथा लिखे जाने तक समीर पुलिस रिमांड पर था. पुलिस उस से कई पहलुओं पर पूछताछ कर रही थी. पुलिस द्वारा की गई पूछताछ में समीर ने जो बताया है, उस से जाहिर होता है कि वह छोटामोटा अपराधी नहीं है.

होटल प्रबंधन को भी लगाया लाखों का चूना

समीर कितना शातिरदिमाग है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह भोपाल के सब से मशहूर होटल नूरउससबा में 2 नवंबर, 2017  से 23 नवंबर, 2017 तक लड़की के साथ रुका रहा, लेकिन होटल प्रबंधन को उस की कारगुजारियों की तनिक भी भनक नहीं लगी. वह इतने बड़े होटल को लाखों का चूना लगा कर रफूचक्कर हो गया था.

अच्छा हुआ कि वक्त रहते जेबा मंसूरी को उस पर शक हो गया, वरना हाथ से निकलने के बाद फिर शायद ही कभी वह चंगुल में फंसता. नूरउससबा पैलेस होटल में 20 दिनों से ज्यादा रहने के बाद भी वह पैसे दिए बिना  वहां से फरार हो गया था. होटल प्रबंधन के बताए अनुसार, 2 नवंबर से 23 नवंबर, 2017 तक होटल में रहने और खानेपीने का बिल 2 लाख 15 हजार 311 रुपए बना था.

समीर ने चालाकी से काम लेते हुए होटल प्रबंधन को भरोसे में लेने के लिए 20 हजार रुपए एडवांस जमा करा दिए थे. उसे वहां 24 नवंबर तक रुकना था, लेकिन एक दिन पहले ही वह अपना बोरियाबिस्तर समेट कर वहां से चलता बना.

पंजाब में आईएएस बन कर कर चुका है फरजीवाड़ा

समीर के बताए अनुसार, उस ने पंजाब के कपूरथला में भी एक बीएससी की छात्रा के साथ जालसाजी की थी. वहां भी उस ने कुछ ऐसी ही कहानी गढ़ी थी. उस ने वहां बताया था कि उस का सिलेक्शन ( Crime stories ) आईएएस में हो गया है. इस तरह उस के बहकावे में आ कर उस लड़की ने समीर से सन 2016 में निकाह कर लिया था. वहां उस ने अपना नाम शमशेर बताया था.

जब फरजी आईएएस का झूठ सामने आया तो कपूरथला के थाना फगवाड़ा पुलिस ने जनवरी, 2016 में शमशेर के खिलाफ धोखाधड़ी, दहेज अधिनियम और धमकाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया था. शमशेर उर्फ समीर वहां 2 महीने तक जेल में बंद रहा. उस की दादी ने जमानत कराई तो जेल से बाहर आते ही वह फरार हो गया.

अब देखना यह है कि मध्य प्रदेश के साथसाथ पंजाब पुलिस समीर उर्फ शमशेर को धोखाधड़ी, पैसे ऐंठने, शारीरिक शोषण और फरजी पदों का गलत इस्तेमाल करने के अपराध में कितनी सजा दिलवा सकती है. पुलिस यह भी पता कर रही है कि यह काम समीर अकेला ही करता था या उस के साथ और कोई भी था.

काजल का असली रंग : बेटे को पढ़ाने वाले Teacher से बनाए संबंध

Tuition Teacher : वासना की आग ऐसी भड़की कि पतिपत्नी के उस रिश्ते को भी भूल गई, जिस के लिए 12 साल पहले उस ने सात जन्मों का बंधन निभाने का वादा किया था. उस ने प्रेमी संग मिल कर पति की हत्या कर डाली. प्रेमी ने योजना तो ऐसी बनाई थी कि पति की हत्या में मायके वाले ही फंस जाएं और वह प्रेमिका संग मौज मनाता रहे. लेकिन उन के मंसूबों पर तब पानी फिर गया, जब उन की काल डिटेल्स में 13 सौ बार बातचीत करने का पता चला.

35 वर्षीय दिलीप कुमार पाठक बिहार के बेगूसराय जिले के थाना तेघरा के गांव रानीटोल में अपनी ससुराल आया था. उस की पत्नी काजल उर्फ कंचन एकलौते बेटे अंश को ले कर सालों से मायके में रह रही थी. अंश मामा के घर रह कर ही पढ़ता था. काजल भी वहीं रहते हुए एक नर्सरी स्कूल में पढ़ाती थी.

वैसे भी दिलीप की माली हालत ठीक नहीं थी. वह प्रौपर्टी डीलिंग का काम करता था. प्रौपर्टी डीलिंग के इस धंधे में उस ने अपनी सारी जमापूंजी लगा दी थी. इस धंधे में उसे इतना घाटा हुआ था कि वह पैसेपैसे के लिए मोहताज हो गया था. अपनी स्थिति सुधारने के लिए ही उस ने पत्नी और बेटे को ससुराल भेजा था.

उस ने सोचा था कि जब तक हाथ खाली है, तब तक पत्नी और बच्चे को मायके में रहने दे. पैसों का थोड़ा इंतजाम हो जाने के बाद उन्हें वापस बुला लेगा. इसीलिए उस ने काजल और बेटे अंश को रहने के लिए ससुराल भेज दिया था.

उस दिन 25 नवंबर, 2017 की तारीख थी. शाम साढ़े 6 बजे के करीब दिलीप घर से अकेला ही बेटे की कौपी खरीदने चौर बाजार के लिए निकला. उस ने पत्नी से कहा कि कौपी खरीद कर थोड़ी देर में लौट आएगा. उसे घर से निकले काफी देर हो चुकी थी. देखतेदेखते रात के 10 बज गए, लेकिन दिलीप लौट कर घर नहीं आया. इस से काजल और अंश दोनों परेशान हो गए. दोनों की समझ में नहीं आ रहा था कि वे क्या करें. इतनी रात गए उसे कहां ढूंढें.

परेशान काजल को जब कुछ नहीं सूझा तो उस ने देवर विनीत के पास ससुराल फोन कर के पूछा कि दिलीप वहां तो नहीं गए हैं? शाम 5 बजे के करीब बाजार जाने के लिए कह कर घर से पैदल ही निकले थे, लेकिन अभी तक लौट कर नहीं आए. मेरा तो सोचसोच कर दिल बैठा जा रहा है.

भाभी के मुंह से भाई के बारे में ऐसी बात सुन कर विनीत भी परेशान हो गया कि आखिर बिना कुछ बताए भाई कहां चला गया. फिर उस ने बड़े भाई दिलीप के फोन पर काल की तो उस का फोन स्विच्ड औफ था. उस ने कई बार उस से बात करने की कोशिश की लेकिन हर बार फोन बंद मिला. आखिर उस ने यह बात घर वालों को भी बता दी.

दिलीप के घर वाले जिला समस्तीपुर में रहते थे. वहां से बेगूसराय थोड़ी दूरी पर था. विनीत ने सोचा अब तो सुबह ही कुछ हो सकता है. उस ने रात तो जैसेतैसे काट ली. सुबह होते ही वह भाई का पता लगाने रानीटोल पहुंच गया.

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वहां पहुंच कर उसे पता चला कि रानीटोल से सटी बूढ़ी गंडक नदी के किनारे हृष्टपुष्ट गोरे रंग और औसत कदकाठी के एक युवक की लाश पाई गई है. लाश का जो हुलिया बताया जा रहा था, वह काफी कुछ उस के भाई दिलीप से मेल खा रहा था. यह सुन कर विनीत थोड़ा विचलित हो गया कि कहीं लाश भाई की तो नहीं है. हो सकता है, उस के साथ कोई घटना घट गई हो.

जितनी भी जल्दी हो सकता था, वह मौके पर पहुंच गया. वहां काफी भीड़ जमा थी. भीड़ को चीरता हुआ वह लाश तक पहुंच गया. लाश दाईं करवट पड़ी थी. हत्यारों ने उस की गरदन पर किसी तेज धारदार हथियार से पीछे से वार किया था. पास ही पूजा की सामग्री पड़ी थी और लाश के ऊपर अधखुली पीली मखमली चादर पड़ी थी.

ऐसा लग रहा था, जैसे मृतक जब पूजा कर रहा था, तभी हत्यारे ने मौका देख कर उस पर पीछे से वार कर दिया हो. विनीत लाश देख कर पहचान गया कि लाश उस के भाई की है. वह भाई की लाश से लिपट कर बिलखबिलख कर रोने लगा.

गांव वाले भी लाश को देखते ही पहचान गए थे कि काजल के पति दिलीप की लाश है. जैसे ही काजल को पति की हत्या की सूचना मिली तो वह गश खा कर गिर गई. घर में रोनापीटना शुरू हो गया. घर वाले वहां पहुंच गए, जहां दामाद का शव पड़ा था.

जहां से दिलीप का शव बरामद हुआ था, वह इलाका समस्तीपुर जिले के थाना मुफस्सिल में पड़ता था. थाना मुफस्सिल को घटना की सूचना मिल चुकी थी. थानाप्रभारी पवन सिंह पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे. पवन सिंह ने इस बात की सूचना पुलिस अधीक्षक दीपक रंजन और डीएसपी मोहम्मद तनवीर अहमद को दे दी थी. वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी वहां पहुंच गए. घटनास्थल और लाश का निरीक्षण करने के बाद थानाप्रभारी पवन सिंह ने मृतक के भाई से पूछताछ की तो उस ने बताया कि दिलीप के पास उस का एक सेलफोन था, जो गायब है.

घटनास्थल पर पूजा की सामग्री के अलावा दूसरी कोई चीज नहीं मिली थी. पुलिस ने पूजा सामग्री और चादर अपने कब्जे में ले ली. कागजी काररवाई करने के बाद लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई. फिर पुलिस थाने लौट आई.

विनीत ने अपने भाई दिलीप की हत्या की तहरीर थाने में दे दी, जिस के आधार पर पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 34 के तहत अज्ञात हत्यारों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

दिलीप पाठक हत्याकांड का खुलासा करने के लिए एसपी दीपक रंजन ने डीएसपी तनवीर अहमद के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. डीएसपी तनवीर अहमद ने घटनास्थल का दौरा कर के स्थिति को समझने की कोशिश की. परिस्थितियां बता रही थीं कि हत्या के इस मामले में मृतक का कोई अपना ही शामिल था. वह कौन था, इस का पता लगाना जरूरी था.

पुलिस ने मृतक के भाई विनीत पाठक से दिलीप की किसी से दुश्मनी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि उस की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी. काजल ने भी यही कहा. इसी दौरान एक मुखबिर ने चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि दिलीप और उस की पत्नी काजल के बीच काफी मनमुटाव चल रहा था. प्रारंभिक जांच के दौरान तनवीर अहमद को काजल की हरकतें खटकी भी थीं, लेकिन उस के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं थे, इसलिए उन्होंने उस से सीधे बात करना ठीक नहीं समझा था.

डीएसपी मोहम्मद तनवीर अहमद ने दिलीप और काजल के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई. काजल के फोन की डिटेल्स देख कर उन के होश उड़ गए. उस के फोन पर डेढ़ महीने में एक ही नंबर से 13 सौ फोन आए थे. कई काल तो ऐसी थीं, जिन में उसी नंबर से 2 से 3 घंटे तक बातचीत की गई थी.

यह नंबर पुलिस के शक के दायरे में आ गया. पुलिस ने उस नंबर की काल डिटेल्स निकलवाई तो वह नंबर लक्ष्मण कुमार पासवान, निवासी रातगांव करारी, थाना-तेघरा, जिला बेगूसराय का निकला. पुलिस ने बिना समय गंवाए उसी दिन लक्ष्मण के घर पर दबिश दी और उसे पूछताछ के लिए थाने ले आई. पूछताछ में लक्ष्मण टूट गया. उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उस ने काजल के कहने पर उस के पति दिलीप की हत्या की थी. काजल उस की प्रेमिका थी. यह सुन कर सभी अधिकारी स्तब्ध रह गए. क्योंकि देखने में भोलीभाली लगने वाली औरत नागिन से भी जहरीली निकली, जिस ने इश्क के नशे में अपने पति को ही डंस लिया.

काजल को यह समझते देर नहीं लगी कि उस के गुनाहों की पोल खुल चुकी है. ऐसे में भलाई सच बताने में ही है. काजल ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया कि उसी के कहने पर लक्ष्मण ने दिलीप की हत्या की थी. काजल ने हत्या की पूरी कहानी कुछ ऐसे बयां की—

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35 वर्षीय दिलीप कुमार पाठक मूलत: बिहार के समस्तीपुर जिले के थाना भगवानपुर के गांव बुढ़ीवन तैयर का रहने वाला था. पिता अनिल पाठक की 4 संतानों में वह सब से बड़ा था. हंसमुख स्वभाव का दिलीप मेहनतकश था. उस ने प्रौपर्टी डीलिंग का काम शुरू किया था, उस का यह धंधा सही चल निकला था.

दिलीप अपने पैरों पर खड़ा हो चुका था और ईमानदारी से पैसा कमा रहा था. पिता ने 12 साल पहले उस की शादी बेगूसराय के तेघरा, रानीटोल की रहने वाली काजल के साथ कर दी थी. शादी के कई साल बाद उस के घर में एक बेटा पैदा हुआ, जिस का नाम अंश रखा गया. समय के साथ प्रौपर्टी के धंधे में दिलीप को काफी नुकसान हुआ. इस के बाद उस का धंधा धीरेधीरे और भी मंदा होता गया. स्थिति यह आई कि प्रौपर्टी के बिजनैस में उस ने जितनी पूंजी लगाई थी, सब डूब गई. यह करीब 3 साल पहले की बात है.

पति की माली हालत खराब देख काजल बेटे को ले कर अपने मायके रानीटोल चली गई और वहीं मांबाप के साथ रहने लगी. पत्नी का यह रवैया दिलीप को काफी खला, क्योंकि मुसीबत के वक्त साथ देने के बजाय वह उसे अकेला छोड़ कर चली गई. वह मन मसोस कर रह गया और सब कुछ वक्त पर छोड़ दिया.

उधर काजल ने बेटे को वहीं के एक कौन्वेंट स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया. दिलीप बीचबीच में पत्नी और बेटे से मिलने ससुराल जाता रहता था. ससुराल में 1-2 दिन रह कर वह अपने घर लौट आता था. अंश जिस कौन्वेंट स्कूल में पढ़ता था, वहां की किताबें भाषा में काफी मुश्किल होती थीं. कभीकभी अंगरेजी के कुछ शब्दों के अर्थ काजल को भी पता नहीं होते थे, जबकि वह अच्छीभली पढ़ीलिखी थी. बेटे की पढ़ाई में कोई परेशानी न आए, इसलिए उस ने अंश के लिए घर पर ही एक ट्यूटर लगा दिया. यह पिछले साल जुलाईअगस्त की बात है.

ट्यूटर ( Tuition Teacher ) का नाम लक्ष्मण कुमार पासवान था. रातगांव करारी का रहने वाला 21 वर्षीय लक्ष्मण कुमार एकदम साधारण शक्लसूरत और सांवले रंग का युवक था. लक्ष्मण की वाकपटुता से काजल काफी प्रभावित थी. अंश को भी वह खूब मन लगा कर पढ़ाता था. थोड़े ही दिनों में लक्ष्मण उस परिवार का हिस्सा बन गया. बेटे को पढ़ाते समय काजल लक्ष्मण के पास ही बैठी रहती थी. लक्ष्मण जवान था. ऊपर से कुंवारा भी. जब काजल उस कमरे में आ कर बैठती थी, जिस में वह अंश को पढ़ाता था तो लक्ष्मण उसे कनखियों से निहारता रहता था. काजल भी लक्ष्मण के पास बैठने के लिए बेकरार रहती थी.

एक दिन लक्ष्मण अंश को (Tuition Teacher) ट्यूशन पढ़ाने उस के घर पहुंचा. उस समय शाम का वक्त था. उस रोज काजल काफी परेशान थी. उस ने अपने दुखों का पिटारा उस के सामने खोल कर रख दिया. लक्ष्मण काजल की दुखभरी व्यथा सुन कर भावनाओं में बह गया.

काजल ने उस से कहा कि वह उस के लिए कोई छोटीमोटी नौकरी ढूंढने में मदद करे. लक्ष्मण मना नहीं कर सका. बाद में लक्ष्मण ने अपने एक परिचित के माध्यम से एक नर्सरी स्कूल में उसे अध्यापिका की नौकरी दिलवा दी. काजल लक्ष्मण के अहसानों की कायल थी. धीरेधीरे वह उस की ओर झुकती गई. लक्ष्मण भी उस की ओर आकर्षित होता गया. धीरेधीरे दोनों में प्यार हो गया. प्यार भी ऐसा कि एकदूसरे को देखे बिना रह न सके. यह बात भी जुलाई अगस्त 2016 की है. 2 महीने के प्यार के बाद लक्ष्मण और काजल ने चुपके से मंदिर में विवाह कर लिया. काजल ने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी, पति तक को नहीं.

9 वर्ष का अंश भले ही छोटा था, लेकिन उस में इतनी अक्ल थी कि वह अच्छे और बुरे में फर्क महसूस कर सके. उस ने अपनी मम्मी और ट्यूटर के बीच के रिश्तों को महसूस कर लिया था. उसे लगता था कि कहीं कुछ गलत हो रहा है, जो घरपरिवार के लिए अच्छा नहीं है. अंश ने यह बात अपने पापा दिलीप को बता दी. बेटे की बात सुन कर उस के तनबदन में आग लग गई. बहरहाल, सूचना मिलने के अगले दिन दिलीप ससुराल रानीटोल पहुंच गया. उस दिन (Tuition Teacher) ट्यूटर लक्ष्मण को ले कर पतिपत्नी के बीच काफी झगड़ा हुआ. काजल पति को समझाने के लिए झूठ पर झूठ बोले जा रही थी. उस ने सफाई देते हुए कहा कि उस के और लक्ष्मण के बीच कोई संबंध नहीं है.

लक्ष्मण को उस ने बेटे को ट्यूशन पढ़ाने के लिए रखा है. ट्यूटर आता है और बच्चे को ट्यूशन पढ़ा कर चला जाता है. उस रोज काजल अपने त्रियाचरित्र के दम पर पति को काबू करने में कामयाब हो गई थी. जैसेतैसे मामला शांत तो हो गया, लेकिन दिलीप पत्नी पर नजर रखने लगा.

पति को उस पर शक हो गया है, काजल ने यह बात लक्ष्मण को फोन कर के बता दी थी. उस ने लक्ष्मण को यह कहते हुए सावधान कर दिया था कि पति जब तक घर पर रहे, तब तक वह बच्चे को(Tuition Teacher) ट्यूशन पढ़ाने भी न आए. लक्ष्मण उस की बात मान गया और वैसा ही किया, जैसा उस ने करने को कहा था. काजल लक्ष्मण से मिलने के लिए बेचैन रहती थी. पति के रहते उन के मिलन में बाधा पड़ रही थी. काजल से लक्ष्मण की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस ने पति को रास्ते से हटाने के लिए लक्ष्मण पर दबाव बनाया कि वह उस की हत्या कर दे. उस के बाद रास्ते में रुकावट पैदा करने वाला कोई नहीं रहेगा. काजल को पाने के लिए लक्ष्मण उस की बात मानने के लिए तैयार हो गया.

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लक्ष्मण जानता था कि दिलीप की माली हालत अच्छी नहीं है, इसलिए कुछ ऐसा चक्कर चलाया जाए, जिस से वह उस के काबू में आ जाए. इस के लिए उस ने काजल को धोखे में रखते हुए एक और खेल खेलने की सोची.

उस ने सोचा कि दिलीप की हत्या का ऐसा तानाबाना बुना जाए, जिस से पूरा शक काजल और काजल के मायके वालों पर ही जाए. कभी मामले का खुलासा हो भी तो वह शक के दायरे से बचा रहे. दिलीप ने लक्ष्मण को कभी नहीं देखा था, इसलिए वह उसे जानतापहचानता नहीं था. लक्ष्मण और काजल ने इसी बात का फायदा उठाते हुए योजना बनाई कि दिलीप को भरोसा दिलाया जाए कि एक ऐसी पूजा है, जिसे ध्यानमग्न हो कर करने पर पूजा की जगह पर ही 25 हजार रुपए मिल जाते हैं.

योजना बनाने के बाद काजल ने पति को इस पूजा के लिए मना लिया. दिलीप इसलिए तैयार हुआ था क्योंकि उस की आर्थिक स्थिति एकदम जर्जर हो चुकी थी. वह पैसेपैसे के लिए मोहताज था. उस ने सोचा कि संभव है ऐसा करने पर उसे आर्थिक लाभ मिल जाए. बहरहाल, सब कुछ योजना के मुताबिक चल रहा था. काजल ने 25 नवंबर, 2017 को दिन में एक तेज धार वाला गंडासा दिलीप की मोटरसाइकिल की डिक्की में छिपा कर रख दिया. उस ने यह बात फोन कर के लक्ष्मण को बता दी. अब केवल योजना को अमलीजामा पहनाना बाकी था. लक्ष्मण ने काजल को भरोसा दिलाया कि आज काम तमाम हो जाएगा.

25 नवंबर की शाम साढ़े 6 बजे के करीब दिलीप बेटे के लिए कौपी खरीदने के लिए घर से अकेला निकला. घर से निकल कर जब वह चौर बाजार पहुंचा तो पीछे से लक्ष्मण पंडित बन कर उस की मोटरसाइकिल के पास पहुंच गया.

दरअसल, दिलीप के घर से निकलते ही काजल ने लक्ष्मण को फोन कर के बता दिया था कि शिकार घर से निकल चुका है. चौर में उस से मुलाकात हो जाएगी. आगे क्या करना है, यह उसे पता था ही. चौर बाजार में उस की मुलाकात दिलीप से हुई तो उस ने काजल का परिचय देते हुए उसे पूजा वाली बात बताई. दिलीप समझ गया कि यह वही पंडित है, जिस से पूजा करानी है. लक्ष्मण उसे बाइक पर बैठा कर चौर (तेघरा) से समस्तीपुर ले आया, जहां उस ने पूजा की सामग्री खरीदी. सामग्री खरीदने के बाद वह दिलीप को ले कर मोटरसाइकिल से रानीटोल स्थित माधोपुर बूढ़ी गंडक नदी के किनारे पहुंच गया. यह इलाका जिला समस्तीपुर में आता था.

योजना के अनुसार, लक्ष्मण ने पहले दिलीप से पूजा करवाई. पूजा की प्रारंभिक विधि समाप्त होने के बाद उस ने पैसे पाने के लिए दिलीप से 15 मिनट तक आंखें बंद कर ध्यानमग्न होने को कहा. साथ यह भी कहा कि आंखें बंद करने के बाद ही पैसे मिलेंगे.

दिलीप ध्यानमग्न हो गया. तभी लक्ष्मण बाइक की डिक्की में रखा धारदार गंडासा ले आया. उस ने पीछे से दिलीप की गरदन पर जोरदार वार किया. गरदन कटने से दिलीप की मौके पर ही मौत हो गई. दिलीप की हत्या करने के बाद लक्ष्मण वहां से बाइक से वापस बेगूसराय लौट गया. बेगूसराय जाते वक्त लक्ष्मण ने दिलीप का मोबाइल फोन गरुआरा चौर की झाडि़यों में फेंक दिया. वहां से आगे जा कर उस ने गंडासा दलसिंहसराय के पास एनएच-28 के किनारे एक झाड़ी में फेंक दिया, ताकि पुलिस उस तक कभी न पहुंच सके.

इत्मीनान होने के बाद वह मोटरसाइकिल ले कर प्रेमिका काजल के घर रानीटोल पहुंचा. काजल उस के आने का बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी. लक्ष्मण को देखते ही उस का चेहरा खुशी से खिल उठा. घर में सभी सो गए थे. उस ने दबे पांव मोटरसाइकिल बरामदे में चढ़ा दी. उस वक्त रात के करीब 10 बज रहे थे.

मोटरसाइकिल खड़ी करवाने के बाद काजल ऊपर खाली पड़े कमरे में गई तो पीछेपीछे लक्ष्मण भी हो लिया. वहां दोनों एकदूसरे की बांहों में समा गए. बाद में लक्ष्मण अपने घर चला गया.

दोनों के रास्ते का रोड़ा साफ हो चुका था. दोनों यह सोच कर खुश थे कि पुलिस उन तक कभी नहीं पहुंच पाएगी. लेकिन कानून के लंबे हाथों ने उन के मंसूबों पर पानी फेर दिया और दोनों वहां पहुंच गए, जहां उन का असली ठिकाना था यानी जेल की सलाखों के पीछे. अंश अपने दादा अनिल के साथ अपने पैतृक गांव बूढ़ीवन आ गया और दादादादी के साथ रह रहा है.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

जंगल में जोड़ियों की अश्लील वीडियो बनाकर करता था Blackmail

Blackmail अपनी प्रेमिका के साथ जो युवक नेवरी पहाड़ी के जंगल में मौजमस्ती करते, अरुण त्रिपाठी पेड़ की आड़ में छिप कर उन की वीडियो बना लेता था. फिर उन युवकों को ब्लैकमेल कर उन से मोटी रकम वसूलता था. संजू और ऋतिक के भी उस ने उन की प्रेमिकाओं के साथ अश्लील फोटो खींच लिए. ये फोटो उस की जान पर ऐसी मुसीबत बन कर आए कि...

3 अक्तूबर, 2024 को शरद नवरात्र का पहला दिन था. रीवा जिले के नारसाखुर्द गांव में दुर्गा पंडाल में संजू

और ऋतिक की मुलाकात कृष्णा लखेरा व अन्य दोस्तों से हुई. वहीं पर संजू और ऋतिक ने उन्हें बताया, ”यार, इस समय हम दोनों बड़ी मुसीबत में फंसे हुए हैं. समझ नहीं आ रहा कि क्या किया जाए?’’

”कैसी मुसीबत बताओ?’’ कृष्णा लखेरा ने पूछा.

”बात दरअसल यह है कि हम दोनों जंगल में अपनीअपनी गर्लफ्रैंड के साथ मौजमस्ती कर रहे थे, तभी अरुण त्रिपाठी ने छिप कर हमारी वीडियो बना ली. वो हम से अब 10 हजार रुपए मांग रहा था. हम ने 2 हजार तो उसे दे दिए, लेकिन 8 हजार और मांग रहा है. इस के बाद ही वो वीडियो डिलीट करेगा. हमारी समझ में नहीं आ रहा कि क्या करें?’’

”बस, इतनी सी बात पर तुम लोग परेशान हो रहे हो. ऐसा करो, तुम लोग पैसे देने के बहाने उसे उसी जंगल में बुला लेना. हम अपने दोस्तों को ले कर वहां पहुंच जाएंगे, फिर उस से जबरदस्ती उस का फोन छीन कर वीडियो डिलीट कर उस का फोन लौटा देंगे.’’ कृष्णा ने कहा.

”हां, यह ठीक रहेगा.’’ संजू और ऋतिक एक साथ बोले.

उसी समय साजन उर्फ संजू साकेत, ऋतिक साकेत, अमित साकेत, कृष्णा लखेरा आदि 9 दोस्त 3 बाइकों पर सवार हो कर अरुण के खेत पर पहुंचे. वहीं से संजू और ऋतिक ने अरुण को पैसे देने के बहाने फोन कर बुला लिया. अरुण को फोन करते ही बाकी सभी दोस्त इधरउधर छिप गए थे. अरुण के वहां पर पहुंचते ही सारे दोस्त उस के सामने आ खड़े हुए. अपने सामने 9 युवकों को खड़ा देख अरुण की थोड़ी हिम्मत टूटी भी, लेकिन उस ने हार नहीं मानी. जैसे ही सभी ने उस से उस का मोबाइल छीनने की कोशिश की, अरुण अपने डंडे से गुप्ती निकालने लगा.

तभी संजू और ऋतिक ने उस के हाथ से वह गुप्ती छीन ली. फिर भी अरुण उस डंडे से उन पर वार करने लगा. तभी संजू ने गुप्ती से उसे डराने की कोशिश की. उसी विवाद के बढ़ते गुप्ती अरुण के सीने में घुस गई, जिस के कुछ समय बाद ही अरुण ने दम तोड़ दिया. अरुण के खत्म होते ही संजू ने उस का मोबाइल और उस की गुप्ती अपने पास रखी और सभी दोस्तों के साथ अपने गांव आ गया था.

इस घटना से एक दिन पहले 2 अक्तूबर, 2024 को अरुण त्रिपाठी अपने घर में काफी खुश था. उस दिन उस का ध्यान पूरी तरह से मोबाइल पर ही टिका हुआ था. कई बार वह अपने परिवार की नजरों से बच कर मोबाइल खोलता, फिर वह उस में पड़ी वीडियो को देखने लगता था. जिस को देख कर उस के चेहरे की आभा और भी बढ़ जाती थी. उस के हावभाव को देख कर उस की पत्नी सुमन समझ चुकी थी कि आज अरुण ने फिर से किसी नए जोड़े को अपने चंगुल में फंसा लिया है, जिस के कारण वह काफी खुश नजर आ रहा था.

उस शाम अरुण की पत्नी सुमन ने जल्दी खाना तैयार कर लिया था. फिर सभी को खाना खिला कर अपना काम भी खत्म कर लिया था. रात होते ही उस के बच्चे खाना खापी कर अपनेअपने कमरों में आराम करने चले गए थे. अपने काम से छुटकारा पाने के बाद सुमन जिस वक्त अपने कमरे में पहुंची, अरुण अपने मोबाइल में किसी वीडियो को देखने में मस्त था.

”लगता है, आज फिर कोई नई पोर्न वीडियो लौंच हो गई,’’ सुमन ने हंसते हुए पति की तरफ देखते हुए कहा.

”हां, आओ मेरी रानी, मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था. वीडियो लौंच भी हो गई और 10 हजार रुपए में बिक भी गई. यह लो उस के 2 हजार एडवांस.’’ कहते ही अरुण ने खुशी से पत्नी को अपनी बाहों में भर लिया. उस के बाद अरुण ने अपने मोबाइल में पड़ी फोटो और वीडियो एकएक कर पत्नी को दिखानी शुरू की, जो उस ने उसी दिन बनाई थीं. उस दिन अरुण ने एक साथ 2 प्रेमी जोड़ों के कुछ फोटो और वीडियो बनाई थीं, जिस में दोनों ही जोड़े अलगअलग जगहों पर निर्वस्त्र हो कर दुनियादारी से बेखबर हो कर काम वासना में लिप्त थे.

अरुण ने बहुत ही चालाकी से छिपतेछिपाते दोनों की अश्लील फोटो Blackmail और वीडियो अपने मोबाइल में कैद कर ली थीं, जिन के माध्यम से दोनों जोड़ों को ब्लैकमेल किया जा सके. अरुण का यह कोई पहला काम नहीं था. इस से पहले भी वह न जाने कितने प्रेमी जोड़ों की वीडियो व फोटोग्राफी कर चुका था. उन्हीं फोटो व वीडियो के सहारे वह कितने लोगों को ब्लैकमेल कर उन से मोटी रकम ऐंठ चुका था. अरुण हर रोज नेवरी पहाड़ी के जंगलों में मौजमस्ती करने वालों की चोरी से फोटो खींचता, फिर उन्हें दिखा कर उन को वायरल करने की धमकी दे कर उन से काफी मोटी कमाई करता आ रहा था.

अरुण लोगों से मोटी रकम वसूल कर उन्हें विश्वास दिलाने के लिए कुछ फोटो व वीडियो अपने मोबाइल से डिलीट भी कर देता, लेकिन उस से पहले ही उन को किसी दूसरे ऐप में सेव कर लेता था. ताकि वह आगे भी उन को दिखा कर उन से फिर से मोटी रकम ऐंठ सके. यह सिलसिला काफी समय से चला आ रहा था. अरुण त्रिपाठी हमेशा ही अपनी बाइक में एक ठोस बांस का मोटा डंडा बांध कर रखता था, जिस के एक छोर पर उस ने गुप्ती (दोनों तरफ तेज धार वाला लंबा चाकू) फिट करा रखी थी. इसी को दिखा कर वह उस से उलझने वालों को डराधमका लेता था. वह मजबूत कदकाठी का व्यक्ति था, जिस के कारण कोई भी ऐसावैसा व्यक्ति उस से भिडऩे की हिम्मत नहीं कर पाता था.

ब्लैकमेल करना अरुण को क्यों पड़ा भारी

Blackmail 3 अक्तूबर, 2024 को सुबह से ही अरुण का ध्यान पूरी तरह से मोबाइल पर ही लगा हुआ था. उस के मन में एक उल्लास भरी खुशी थी कि कब वे लोग उसे फोन करें और वह 8 हजार रुपए ले कर घर वापस आए. तब तक दोपहर हो चली थी. लेकिन उन लोगों का कोई फोन नहीं आया. फोन काल का इंतजार करतेकरते अरुण खाना खाने बैठ गया. वह अभी पूरी तरह से खाना खा भी नहीं पाया था, तभी उस के मोबाइल पर किसी का फोन आया.

फोन सुनते ही उस के चेहरे पर मुसकान उभर आई. उस ने तुरंत ही खाना खाना बीच में ही छोड़ दिया. उस के तुरंत बाद ही उस ने अपनी बाइक स्टार्ट की और पीछे अपने बड़े बेटे को बिठा कर अपने खेतों की तरफ निकल गया. अपने बेटे को खेतों पर छोड़ कर वह बाइक से जंगल की तरफ चला गया. जाते समय बेटे से वह कह गया था कि थोड़ी देर में लौट कर आता है. जंगल में उसे संजू और उस के साथी मिले. संजू और उस के दोस्तों ने उस से मोबाइल से वीडियो डिलीट करने को कहा तो इसी बात पर दोनों में गरमागरमी हो गई. इसी बीच अरुण की गुप्ती से ही अरुण की मौत हो गई.

उधर काफी देर तक अरुण नहीं लौटा तो उस के बेटे ने फोन किया, जो बंद आ रहा था. फिर बेटा भी घर लौट आया. मध्य प्रदेश के जिला सतना के सभापुर थानांतर्गत एक गांव पड़ता है मचखेड़ा. 40 वर्षीय अरुण त्रिपाठी इसी गांव का रहने वाला था. गांव से कुछ ही दूरी पर नेवरी मचखेड़ा की पहाडिय़ों पर फैले घने जंगलों के किनारे अरुण त्रिपाठी का खेत था. वह खेती करने के साथ ही इसी इलाके में बंद पड़ी एक फैक्ट्री में चौकीदारी का काम भी करता था. फिर भी इन दोनों कामों से उस की आय सीमित ही थी. लेकिन जिस तरह से वह खुले हाथों से खर्च करता था, लोग उस से जलते थे. आखिर वह इतना पैसा लाता कहां से है.

उस वक्त दिन के कोई ढाई बजे का समय था. थाना सभापुर के टीआई रविंद्र द्विवेदी को स्थानीय लोगों ने मोबाइल पर सूचना दी कि सतीक्षण आश्रम के पास नेवरी में सड़क के किनारे एक युवक का शव पड़ा हुआ है. सूचना पाते ही टीआई रविंद्र द्विवेदी तुरंत ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. मृतक युवक औंधे मुंह पड़ा हुआ था. उस के आसपास काफी खून पड़ा हुआ था. घटनास्थल से कोई 50 मीटर दूर एक बाइक पड़ी हुई थी. पुलिस टीम ने उस युवक की जांचपड़ताल की तो उस के चेहरे पर काफी घाव होने के साथसाथ उस के सीने पर गोली मारे जाने जैसा घाव बना हुआ था.

मोबाइल में छिपा मिला अरुण की हत्या का राज

यह सब जानकारी जुटाने के बाद रविंद्र द्विवेदी ने इस घटना की जानकारी एएसपी विक्रम सिंह कुशवाह और एसपी (सतना) आशुतोष गुप्ता को दी. तब तक मौके पर जमा लोगों ने उस युवक की पहचान मचखेड़ा निवासी अरुण त्रिपाठी के रूप में कर दी थी. उसी समय घटनास्थल के पास कुछ चरवाहे मवेशी चरा रहे थे. पुलिस ने उन से भी इस मामले में पूछताछ की, लेकिन उन से भी हत्या से जुड़ा कोई सुराग नहीं मिला.

जिस के तुरंत बाद ही पुलिस ने उस के परिवार को भी सूचित कर दिया था. सूचना पाते ही उस के परिवार वाले रोतेबिलखते घटनास्थल पर पहुंच गए थे. पुलिस ने इस मामले में उस के घर वालों के साथसाथ गांव वालों से भी गहन पूछताछ की, जिस से पता चला कि इन के परिवार में जमीन को ले कर विवाद चल रहा था. अरुण त्रिपाठी की जमीन के बीचोबीच उस की भाभी की जमीन थी, जो कुछ समय पहले उस ने वह जमीन किसी रिटायर फौजी को बेच दी थी. जिस पर जाने के लिए उस की फौजी से आए दिन तकरार होती रहती थी.

गांव वालों को शक था कि शायद उसी फौजी ने अरुण की हत्या करा थी. लेकिन पुलिस इस मामले में कोई भी कदम जल्दबाजी में नहीं उठाना चाहती थी. मृतक के घर वालों ने पुलिस को बताया कि किसी का फोन आने पर अरुण बाइक से घर से निकला था, जिस का राज उस के मोबाइल में ही कैद था. जो इस वक्त बंद आ रहा था. उस के बाद पुलिस ने अपनी काररवाई को आगे बढ़ाते हुए अरुण की लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि अरुण के सीने पर गोली मारे जाने का निशान नहीं, बल्कि गुप्ती जैसे हथियार का गहरा घाव था. जिस के लगने से ही उस की मौत हुई थी. तभी उस के घर वालों ने पुलिस को जानकारी दी कि वह एक गुप्ती हमेशा ही अपने साथ रखता था, जो घटना के बाद से गायब थी. पुलिस ने अनुमान लगाया कि उस की गुप्ती ही उस की मौत का कारण बन गई थी. उस के बाद पुलिस को यह भी लगा कि उस की हत्या में एक से अधिक लोग शामिल रहे होंगे.

अरुण की हत्या खेतों पर की गई थी, जहां पर आसपास कोई सीसीटीवी कैमरा भी नहीं लगा था. जिस के कारण यह केस पुलिस के लिए एक चुनौती बन गया था. इस हत्याकांड के खुलासे के लिए एसपी आशुतोष गुप्ता ने कई थानों के स्टाफ की टीमें बनाईं, जिस में एडिशनल एसपी (देहात) विक्रम सिंह कुशवाह, एसडीओपी (चित्रकूट) रोहित राठौर, वैज्ञानिक अधिकारी डा. महेंद्र सिंह, सभापुर के टीआई रविंद्र द्विवेदी, इंसपेक्टर उमेश प्रताप सिंह, विजय सिंह, एसआई अजीत सिंह व अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे.

इतना ही नहीं, एसपी (सतना) आशुतोष गुप्ता ने इस केस के शीघ्र खुलासे के लिए 10 हजार का इनाम भी घोषित कर दिया था. पुलिस ने अपनी जांचपड़ताल शुरू करते ही उस जंगल से घिरे ग्रामीण इलाके में लगे सीसीटीवी कैमरे खंगाले. जिस में घटना के समय 3 बाइकें दौड़ती नजर आईं. तीनों बाइकों पर 9 लोग सवार थे. लेकिन उन कैमरों से न तो उन लोगों की पहचान ही हो पा रही थी और न ही गाडिय़ों के नंबर साफ नजर आ रहे थे.

उस के बाद पुलिस टीम आगे बढ़ी तो बीरसिंहपुर चौराहे पर लगे कैमरे चैक किए. जहां पर उन तीनों बाइकों के नंबर भी ट्रेस हो गए. साथ ही उन 9 लोगों में से 3 की पहचान भी हो गई. इन में से 2 युवक ऋतिक साकेत और साजन उर्फ संजू साकेत रीवा जिले के सुरसाखुर्द गांव के रहने वाले थे. पुलिस ने अगले ही दिन सुबहसुबह उन के घरों की घेराबंदी करते हुए दोनों को उठा लिया. दोनों युवकों से कड़ी पूछताछ की तो उन्होंने अरुण की हत्या वाली बात स्वीकार भी कर ली. उस के साथ ही अपने अन्य 7 साथियों के नाम भी बता दिए थे.

पुलिस ने तुरंत ही थाना कर्चुलियान जिला रीवा से अमित साकेत, कृष्णा लखेरा के अलावा 4 माइनर्स को भी गिरफ्तार कर लिया. उन की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त मृतक की गुप्ती, मृतक का टूटा हुआ मोबाइल फोन व हत्या में प्रयुक्त बाइकें भी बरामद कर ली थीं. हालांकि जिस तरह से सुनसान पहाड़ी इलाके में इस हत्या को अंजाम दिया गया था, इस केस की तह तक जाना पुलिस के लिए बहुत ही सिरदर्दी भरा काम था. लेकिन सीसीटीवी कैमरों से मिले सुराग से पुलिस ने 24 घंटे में आरोपियों तक पहुंचने में सफलता हासिल कर ली थी.

हालांकि इस हत्याकांड को अंजाम देने में 9 व्यक्ति शामिल थे. लेकिन इस हत्याकांड की मुख्य भूमिका में संजू सब से बड़ा सूत्रधार था. संजू से पुलिस पूछताछ में जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी.

अय्याशी के गर्त में कैसे पहुंचा संजू

मध्य प्रदेश के रीवा जिले के कर्चुलियान थाना इलाके के सरसाखुर्द गांव निवासी साजन उर्फ संजू किशोर उम्र से ही गलत संगत में पड़ गया था. संजू के पापा कामता प्रसाद के पास गांव में ही कुछ जुतासे की जमीन थी. कामता प्रसाद ने संजू के भविष्य को देखते ही उसे गांव के स्कूल में पढऩे भेज दिया था. संजू जन्म से कामचोर किस्म का था. पढ़ाई में उस का बिलकुल भी मन नहीं लगता था. वह स्कूल में लड़कियों से दोस्ती करने का ज्यादा शौकीन था. यही कारण था कि हर वक्त वह पढ़ाई पर ध्यान न दे कर सुंदर लड़कियों के पीछे पड़ा रहता था.

जब उस की हरकतों का उस के पापा को पता चला तो उन्होंने उस की पढ़ाई बंद कर उसे अपने साथ खेतीबाड़ी के काम में लगा लिया था. लेकिन उस का खेतीबाड़ी में पहले से ही मन नहीं लगता था. पढ़ाई छोडऩे के बाद खेतों पर जाना उस की मजबूरी बन गई थी. संजू ने जैसे ही खेतों पर जाना शुरू किया तो उसे पता चला कि उस के खेतों पर कई महिलाएं काम करने आती थीं. उसी दौरान एक दिन उस की नजर एक खूबसूरत लड़की पर पड़ी जिस का नाम अंजलि था. वह अपनी मां के साथ खेतों पर काम करने आती थी.

अंजलि को देखते ही उस का मन उसे पाने के लिए मचल उठा. फिर वह उस का सान्निध्य पाने के लिए नएनए प्लान बनाने लगा. जब तक अंजलि उस के खेतों पर काम करती, उस की निगाहें उसी पर जमी रहती थीं. अंजलि भी उस की निगाहों से उस के मन की बात भांप चुकी थी. वह उस वक्त कोई 12-13 साल की रही होगी, तभी उसी बाली उम्र में उस के एक नजदीकी रिश्तेदार ने उस का यौनशोषण कर डाला था. जिस के बाद उस के परिवार में काफी हलचल पैदा हो गई थी. तभी से उस की मां उसे हर वक्त अपने साथ ही रखती थी.

यही कारण रहा कि अंजलि को अपने जाल में फंसाने के लिए संजू को कोई ज्यादा हाथपांव नहीं मारने पड़े. अंजलि जल्दी की उस के संपर्क में आ गई और फिर दोनों ने एक दिन हसरतें भी पूरी कर लीं. संजू अंजलि पर आए दिन पैसा लुटाने लगा. उस से संपर्क बनाए रखने के लिए उस ने उसे एक मोबाइल भी खरीद कर दे दिया था, जिस के माध्यम से दोनों के बीच हर वक्त संपर्क बना रहता था.

लगभग एक साल पहले की बात है. संजू और अंजलि गांव के बाहर एक सुनसान जगह पर निर्वस्त्र हो कर कामवासना में लिप्त थे. उसी वक्त ऋतिक की नजर उन दोनों पर पड़ी. ऋतिक संजू के गांव का उस का जिगरी दोस्त था. अंजलि ने उसे देख लिया था. ऋतिक को देखते ही संजू को हटा कर अंजलि ने फटाफट अपने कपड़े पहन लिए. लेकिन संजू की हवस नहीं मिटी. वह फिर भी उस के साथ जोरजबरदस्ती करने लगा. सामने ऋतिक को देख कर संजू सब माजरा समझ गया. उस के बाद अंजलि वहां से चली गई.

उसी शाम संजू की मुलाकात ऋतिक से हुई तो वह भी अंजलि के साथ संबंध बनाने के लिए उस पर दबाव बनाने लगा. संजू जानता था कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो वह पूरे गांव में हल्ला मचा देगा. संजू ने अंजलि से ऋतिक के बारे में उस से बात की तो उस ने उस के साथ संबंध बनाने से पूरी तरह से इंकार कर दिया था. लेकिन अंजलि ने संजू को एक रास्ता सुझाया. अंजलि ने बताया कि उस की गांव की एक सहेली सोनिया है. अगर वह चाहे तो वह उस की दोस्ती उस से करा सकती है. संजू ने ऋतिक से इस बारे में बात की तो वह आसानी से मान गया. अगले ही दिन अंजलि अपने साथ अपनी सहेली सोनिया को ले कर संजू और ऋतिक से मिली. उस दिन के बाद दोनों दोस्त अपनीअपनी प्रेमिकाओं के साथ मौजमस्ती करने लगे थे.

फोन में किस ने कैद कर ली संजू की अय्याशी

2 अक्तूबर, 2024 को दोनों दोस्त अपनी प्रेमिकाओं को बाइक पर बिठा कर मौजमस्ती के मकसद से मचखेड़ा गांव के पास नेवरी की पहाड़ी पर स्थित घने जंगलों में जा पहुंचे. वहां पहुंचते ही दोनों ने सड़क के किनारे अपनी बाइकें खड़ी कर दीं. उस के बाद दोनों जोड़े घने जंगल में मौजमस्ती करने के लिए चले गए. तभी अरुण की नजर उन चारों पर पड़ी तो वह उन्हें अपना शिकार बनाने के लिए उन के पीछे लग गया. फिर वह पेड़ों के पीछे छिप कर उन की हरकतों पर नजर रखने लगा. कुछ ही देर बाद दोनों प्रेमी जोड़े निर्वस्त्र हो कर काम वासना में लिप्त हो गए. तभी मौका पाते ही अरुण ने उन दोनों जोड़ों की अश्लील फोटो खीचने के साथसाथ उन की वीडियो Blackmail भी बना ली थी.

अपना काम पूरा करने के बाद अरुण उन के सामने जा खड़ा हुआ. इस तरह अचानक अरुण को अपने सामने देख कर चारों बुरी तरह से घबरा गए. उस के बाद संजू और ऋतिक ने अरुण से माफी मांगी और उस के पैर तक पकड़े. फिर इन चारों ने वहां से जाने की कोशिश की तो अरुण ने कहा, ”जाना चाहते हो तो शौक से जाओ, मैं आप को क्यों रोकूंगा. लेकिन जाने से पहले अपनी यह फोटो और वीडियो देखते जाओ. शायद यह भविष्य में किसी के देखने के काम आए. ये सब वायरल करने के बाद न जाने कहांकहां तक देखी जाएंगी. हो सकता है कि ये सब आप के परिवार वालों के सामने भी जा पहुंचे.’’

अपनी अश्लील फोटो और वीडियो देखते ही चारों बुरी तरह से डर गए. उसी दौरान अरुण ने अपने मोबाइल में रीवा और सतना के कुछ जोड़ों की और वीडियो दिखाते हुए कहा, ”इन सब ने भी पहले पैसा देने से आनाकानी की थी. लेकिन बाद में वे मुझे मेरी फीस चुकता कर के चले गए. उस के बाद भी ये लोग जब कभी भी आते हैं तो मैं इन सब की पूरी सुरक्षा करता हूं. तुम भी मुझे मेरी 10 हजार रुपए फीस दे कर चले जाओ. उस के बाद कभी भी मौजमस्ती करने आओ, मैं तुम लोगों की पूरी सुरक्षा करूंगा.’’

ऋतिक थोड़ा गर्म स्वभाव का था. अरुण की बात सुनते ही वह आगबबूला हो उठा. उस ने एक पैसा भी देने से मना किया तो अरुण ने तुरंत ही अपने डंडे से गुप्ती निकाल कर धमकाने की कोशिश की. चूंकि दोनों के साथ 2 युवतियां भी थीं, इसीलिए विवाद से बचने के लिए संजू और रितिक ने अपने पास से 2 हजार रुपए अरुण को देते हुए मोबाइल से वीडियो और फोटो डिलीट करने को कहा. उस के बाद अरुण ने कहा कि ठीक है यह आप के 2 हजार रुपए मेरे पास एडवांस जमा हैं. कल बाकी 8 हजार रुपए ले कर आ जाना. आप की वीडियो कल ही आप के सामने डिलीट कर दूंगा. फिर चारों अपनी बाइक से अपने घर चले गए. अरुण भी अपने घर चला गया.

संजू और उस के दोस्तों को विश्वास था कि अरुण की हत्या करने के बाद उस का मोबाइल साथ लाने से हत्या का राज खुल ही नहीं पाएगा. लेकिन सीसीटीवी से मिले सुरागों से पुलिस ने 24 घंटे में सभी को गिरफ्तार कर इस मामले का खुलासा कर दिया था. पुलिस ने सभी बालिग आरोपियों से पूछताछ कर उन्हें जेल और चारों नाबालिगों को बाल सुधार गृह भेज दिया. एसपी आशुतोष गुप्ता ने इस केस का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को 10 हजार रुपए दे कर सम्मानित किया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में अंजलि और सोनिया परिवर्तित नाम हैं.

 

तांत्रिक ने भभूत खिलाकर परिवार के तीन लोगों की ली बली

35साल का योगेश उर्फ पप्पू नामदेव अपनी 32 वर्षीय पत्नी सुनीता व 12 साल के बेटे दिव्यांश के साथ मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के बानापुरा के वार्ड नंबर 3 दुर्गा कालोनी में रहता था. योगेश पान की दुकान चलाता था, जबकि पत्नी सुनीता घर पर ही आटा चक्की और किराना दुकान चलाती थी.

4 नवंबर की सुबह को कालोनी के लोग अपनी जरूरत का सामान लेने किराना दुकान पर आ रहे थे, लेकिन अभी तक योगेश की दुकान का दरवाजा नहीं खुला था. पड़ोसी और कालोनी के लोग इस बात को ले कर आश्चर्य भी व्यक्त कर रहे थे कि आज योगेश की दुकान क्यों नहीं खुली. क्योंकि अकसर योगेश सुबह जल्दी उठ कर किराना दुकान खोल लेता था. आसपास रहने वाले लोग अपने घरों में दीवाली की तैयारियों में जुटे थे. योगेश के घर के सामने किसी तरह की हलचल न देख कर लोगों ने यह अनुमान लगाया कि आज अमावस्या है और योगेश शायद अपने परिवार के साथ नर्मदा नदी में स्नान करने आंवली घाट गया होगा.

कालोनी के लोगों को पता था कि योगेश के मातापिता आंवली घाट में पूजन सामग्री की दुकान चलाते हैं. अकसर ही पूर्णिमा और अमावस्या पर योगेश अपने परिवार के साथ वहां जाता रहता था. पिछले पखवाड़े ही वह अपने 8 साल के बेटे को भी वहां छोड़ आया था. दीवाली की शाम करीब 4 बजे थे. तभी योगेश के घर के सामने एक बाइक आ कर रुकी. उन्होंने दरवाजे पर दस्तक दी. दरअसल, योगेश के घर के सामने उस की दुकान की शटर लगा हुआ था. वहीं से हो कर उस के घर के अंदर जाने का रास्ता था.

काफी देर तक योगेश के घर का दरवाजा (शटर) खटखटाया, मगर किसी ने शटर नहीं खोला. आवाज सुन कर पड़ोसी भी आ गए. बाइक पर सवार लोगों ने उन्हें बताया कि वे बनापुरा के ही रहने वाले हैं, आज आंवली घाट नर्मदा स्नान करने गए थे. वहां पर नारियल प्रसाद खरीदते समय योगेश के पिता से परिचय हुआ तो उन्होंने कहा, ‘‘आज दीपावली का दिन है योगेश और बच्चों के लिए देवी मां का प्रसाद ले जाना.’’ योगेश के पिता के भेजे प्रसाद को देने के लिए वे काफी देर से शटर खटखटा रहे हैं, मगर कोई अंदर से उन की बात सुन ही नहीं रहा.

उन दोनों युवकों की बात सुन कर आसपास रहने वाले लोग आ गए और उन्होंने शटर को जोरजोर से पीटना शुरू कर दिया. अंदर से कोई जवाब न मिलने पर एक युवक ने खिड़की से झांक कर देखा तो उस की आंखें फटी रह गईं. अंदर का मंजर खौफनाक था. कमरे के अंदर योगेश, उस की पत्नी और बेटे के रक्तरंजित हालत में पलंग पर पड़े हुए थे. जैसे ही कालोनी में यह खबर फैली तो योगेश के घर के सामने कालोनी के लोग जमा होने लगे. इसी बीच किसी ने सिवनी मालवा पुलिस थाने में फोन कर के मामले की जानकारी दे दी.

सिवनी मालवा पुलिस थाने के टीआई जितेंद्र सिंह यादव को जैसे ही इस घटना की सूचना मिली, उन्होंने जिले के आला अधिकारियों को सूचना दी और पुलिस बल के साथ बनापुरा की दुर्गा कालोनी पहुंच गए. योगेश के मकान में सामने की तरफ 2 शटर लगे हुए थे. एक शटर में किराना दुकान, जबकि दूसरी में आटा चक्की लगी हुई थी. आटा चक्की वाले तरफ से ही योगेश के मकान में अंदर जाने का रास्ता था.

पुलिस के वहां पहुंचते ही जब आटा चक्की दुकान का शटर खोल कर देखा तो वह अंदर से बंद नहीं था. जैसे ही पुलिस टीम ने शटर को उठाया, वह आसानी से खुल गया. उसी रास्ते से पुलिस टीम ने योगेश के घर के अंदर प्रवेश किया. अंदर बैडरूम में एक पलंग पर योगेश नामदेव उर्फ पप्पू, पत्नी सुनीता नामदेव और दूसरे पलंग पर उस के 12 साल के बेटे दिव्यांश के शव पड़े हुए थे. तीनों के सिर पर चोट के साथ गले पर किसी धारदार हथियार के निशान साफ दिख रहे थे.

पलंग समेत आसपास दीवार पर खून के छींटे साफ दिखाई दे रहे थे. घर के कमरे में सामान बिखरा हुआ था. एक कमरे में जलता हुआ दीपक और पूजा की सामग्री रखी हुई थी. इस दिल दहला देने वाली घटना की खबर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो चुकी थी. खबर मिलते ही होशंगाबाद जिले के एसपी डा. गुरुकरन सिंह, एएसपी अवधेश प्रताप सिंह, एसडीपीओ सौम्या अग्रवाल, फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड मौके पर आ चुकी थी. घटना की खबर आंवली घाट में रहने वाले योगेश के पिता को दी गई. योगेश का एक बेटा अपने दादादादी के पास रहता था. खबर मिलते ही आंवली घाट से योगेश के मातापिता उस के बेटे को ले कर आ चुके थे. अपने बेटे, बहू और पोते की मौत के सदमे से उन का रोरो कर बुरा हाल था.

पुलिस ने तीनों शवों को बरामद कर दूसरे दिन सुबह सिवनी मालवा के सरकारी अस्पताल में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया, जिस के बाद तीनों शवों को योगेश के 70 साल के बूढ़े पिता विनोद कुमार नामदेव को सौंप दिया गया. घर से तीनों की अर्थियां एक साथ निकलीं तो दुर्गा कालोनी के रहवासियों की आंखें नम हो गईं. दीवाली पर रोशनी की जगह कालोनी में चारों तरफ सन्नाटा पसरा रहा. एसपी गुरुकरण सिंह, एएसपी अवधेश प्रताप सिंह ने मौके पर जा कर जांचपड़ताल कर घटनास्थल के कमरे को पूरी तरह सील करने का आदेश दिया. और हत्यारों की तलाश के लिए एसडीपीओ सौम्या अग्रवाल, टीआई जितेंद्र सिंह यादव, जिला पुलिस लाइन से इंसपेक्टर उमाशंकर यादव, गौरव सिंह बुंदेला के नेतृत्व में 4 अलगअलग टीमें गठित कीं.

खोजी कुत्ते के द्वारा घटनास्थल का निरीक्षण कराया गया. खोजी कुत्ते के बानापुरा रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म-1 तक जा कर रुकने से यह अनुमान लगाया गया कि शायद हत्या के आरोपी वारदात को अंजाम देने के बाद किसी ट्रेन से या प्लेटफार्म से गुजरे होंगे. दुर्गा कालोनी में दीपावली का त्यौहार मातम में बदल चुका था. एक साथ हुए 3 मर्डर की वजह से कालोनी के लोग दहशत में थे. पुलिस ने दुर्गा कालोनी के लगभग दरजन भर महिला पुरुषों के बयान दर्ज कर हत्या के कारणों को जानने की कोशिश की.

नामदेव परिवार के 3 सदस्यों की हत्या की वजह जानने के लिए पुलिस ने मृतक योगेश के पिता विनोद नामदेव, माता रुकमणी एवं 8 साल के बेटे से आंवली घाट में जा कर गहन पूछताछ की.

‘‘आप के बेटे की किसी से कोई रंजिश थी क्या?’’ टीआई जितेंद्र सिंह ने विनोद नामदेव से पूछा.

‘‘नहीं साहब, पप्पू की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, वह तो दिन भर अपनी दुकान पर ही रहता था.’’ विनोद ने कहा.

‘‘तो फिर किसी पर शक है तुम्हें?’’

‘‘नहीं साहब, कुछ समझ नहीं आ रहा. हां, इतना जरूर है कि पिछले 2 महीने से पप्पू के घर पर अजीब तरीके से चोरी हो रही थी.’’

‘‘तो फिर चोरी की रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं कराई.’’

‘‘साहब, पप्पू बताता था कि घर की अलमारी से बहू सुनीता के गहने और रुपए चोरी हो रहे थे, जिस का पता लगाने के लिए योगेश ने घर पर एक तांत्रिक से तांत्रिक क्रियाएं जरूर कराई थीं.’’

विनोद नामदेव के मुंह से तांत्रिक क्रियाएं कराने की बात सुन कर पुलिस टीम के कान खड़े हो गए. पुलिस ने घटनास्थल पर जलते हुए दीपक और पूजन सामग्री को देखा था, इस से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि दीपावली के एक दिन पहले तंत्रमंत्र का खेल हुआ था.

‘‘तांत्रिक क्रियाएं करने वाला तांत्रिक कौन था?’’ पुलिस ने विनोद से पूछा.

‘‘साहब, हरदा जिले का गणेश काशिव अकसर योगेश के घर पर आ कर तंत्रमंत्र करता रहता था. वह चोरी गई वस्तुओं को वापस दिलाने के लिए तंत्रमंत्र का सहारा लेता था. घटना वाले दिन भी गणेश मुझ से बाइक में पैट्रोल भरवाने के लिए पैसे ले कर आया था.’’ विनोद नामदेव ने साफसाफ बता दिया.

पुलिस ने योगेश के घर सहित दुर्गा कालोनी में सुरक्षा बढ़ा कर आरोपियों की तलाश शुरू की तो कालोनी के लोगों से पता चला कि योगेश के घर तांत्रिक क्रियाओं को हरदा जिले के आदमपुर गांव का तांत्रिक गणेश काशिव अंजाम देता था. तांत्रिक पिछले कुछ दिनों से मृतक के घर बारबार आ रहा था. दीपावली के एक दिन पहले भी लोगों ने उसे योगेश के घर पर देखा था. पुलिस को तीनों मृतकों योगेश नामदेव, पत्नी सुनीता बाई व बच्चे दिव्यांश के शवों पर चोटों के निशान मिले थे. मृतकों के पास पूजा का स्थान एवं उस के पास पड़े खून के छींटे, जलता हुआ दीपक ये सभी साक्ष्य पुलिस के लिए तांत्रिक क्रियाओं की तरफ इशारा कर रहे थे.

योगेश के मौसेरे भाई से भी तांत्रिक गणेश के पूजा करने की बात पुलिस को पता चली. पुलिस की एक टीम हरदा जिले के हंडिया थाना क्षेत्र के गांव आदमपुर पहुंची और शक के आधार पर तांत्रिक गणेश काशिव को ले कर सिवनी मालवा आ गई. गणेश ने तांत्रिक क्रियाएं करने की बात तो स्वीकार कर ली, मगर हत्या की बात से अंजान बनने की कोशिश करता रहा. पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो वह जल्दी ही टूट गया. पुलिस पूछताछ में तांत्रिक गणेश काशिव ने अपने साथी मोनू उर्फ मोहन बामने के साथ मिल कर 3-4 नवंबर, 2021 की रात 12 बजे अमावस्या को मृतक के घर पूजा करने और उन की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया.

आरोपी गणेश ने बताया कि उस ने इंद्रजाल नामक पुस्तक से तंत्र विद्या सीखी थी. उस ने पुलिस के सामने दावा किया कि वह गायब पैसा और गायब सामग्री को वापस दिलाने की तंत्र विद्या अच्छी तरह जानता है. वैज्ञानिक अविष्कारों के बावजूद भी पढ़ेलिखे परिवार द्वारा रुपए और गहने वापस पाने के लिए अंधविश्वास के चक्कर में पड़ कर तांत्रिक से तंत्रमंत्र कराने की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार निकली—

70 साल के विनोद नामदेव मूलत: होशंगाबाद जिले के आंवली घाट के निवासी हैं. नर्मदा नदी के तट पर पूजन सामग्री की दुकान से उन के परिवार की रोजीरोटी चलती है. विनोद का एकलौता बेटा योगेश पढ़लिख कर जवान हुआ तो वह काम की तलाश में गांव से 30 किलोमीटर दूर बनापुरा आ गया. बनापुरा में योगेश ने पान की दुकान खोल ली. योगेश के बनाए पान के लोग दीवाने हो गए. योगेश की पान की दुकान चल पड़ी तो रोजाना हजारों रुपए की कमाई होने लगी. सन 2008 में योगेश की शादी सुनीता से हो गई. शादी के कुछ समय बाद ही बनापुरा की दुर्गा कालोनी में योगेश और सुनीता ने प्लौट ले कर मकान बना लिया.

2 बेटे दिव्यांश और अक्षांश के जन्म के बाद सुनीता के कहने पर योगेश ने घर पर आटा चक्की और छोटी सी किराना दुकान खोल ली. योगेश घर के बाहर पान की दुकान चलाता और सुनीता घर पर रह कर आटा चक्की और किराना दुकान चलाने लगी. सुबह बच्चों को स्कूल भेज कर वह दिन भर दुकान चलाने में व्यस्त रहती. 2021 के सितंबर महीने की बात है. सुनीता अपनी अलमारी में रखे गहने देख रही थी, मगर उसे उस की सोने की बालियां और अंगूठी नहीं मिल रही थी. परेशान हो कर उस ने अपने पति योगेश को यह बात बताई तो योगेश ने कहा, ‘‘अच्छे से देख लो सुनीता, तुम ने ये चीजें कहीं दूसरी जगह रख दी होंगी.’’

सुनीता ने अलमारी का कोनाकोना छान कर देख लिया, मगर उसे अंगूठी और कान की बालियां नहीं मिलीं. इस के हफ्ते भर बाद जब सुनीता ने अपना पर्स खोल कर देखा तो उस के करीब 5 हजार रुपए पर्स से गायब थे. सुनीता इस बात को ले कर परेशान रहने लगी. उस ने योगेश से कहा, ‘‘देखो, घर से रुपए और अंगूठी, कान की बालियां गायब हो गई हैं, जरूर कोई हमारे ऊपर जादूटोना कर रहा है.’’

‘‘तुम कैसी दकियानूसी बातें कर रही हो, घर से कैसे कोई चीज गायब हो सकती है, तुम्हें कुछ याद रहता नहीं. कहीं रख दी होगी.’’ योगेश ने उसे झिड़कते हुए कहा.

सुनीता के दिमाग में शक का कीड़ा घुस गया था, उसे लग रहा था कि किसी ने उस के रुपए और गहने गायब कर दिए हैं. इसी दौरान जब योगेश की मौसी का लड़का मनीष उस के घर आया तो सुनीता ने उसे रुपए और गहने गायब होने की बात बताई तो मनीष बोला, ‘‘भाभी, मैं एक तांत्रिक बंजारा बाबा को जानता हूं, वह लोगों के गुम हो गए सामान को वापस दिला देता है.’’

‘‘भैया, तुम बंजारा बाबा से बात कर लो न, मुझे भी मेरे रुपए और गहने वापस चाहिए.’’ सुनीता के तो जैसे मन की मुराद पूरी हो गई, उस ने चहकते हुए मनीष से कहा.

मनीष 2-3 दिन बाद बंजारा बाबा को ले कर योगेश के घर आ गया. बंजारा बाबा का असली नाम गणेश काशिव था. 25 साल का गणेश काशिव हरदा जिले के हंडिया थाना क्षेत्र के गांव आदमपुर का रहने वाला था. गणेश को जिस उम्र में स्कूल की किताबें पढ़नी चाहिए थीं, उस उम्र में वह तंत्रमंत्र की किताबें पढ़ने लगा था. तंत्रमंत्र और झाड़फूंक में उस का नाम आसपास के इलाकों में प्रसिद्ध हो गया था. गणेश झाड़फूंक और तांत्रिक साधना के लिए बनापुरा आता रहता था. वह लोगों को बताता था कि उस के पास इंद्रजाल नाम की पुस्तक है, जिस में जमीन में गड़े धन का पता लगाने और चोरी किया धन वापस करने के लिए तंत्रमंत्र करने के उपाय बताए गए हैं.

बंजारा बाबा अकसर अमावस्या की रात को सुनसान जगह पर तंत्र साधना करता था. उस के इस काम में मोहन बामने उर्फ मोनू उस की मदद करता था. 30 साल का मोनू भी उस के गांव के पास रीझगांव का रहने वाला था. हमारे समाज में अंधविश्वास की जड़ें भी अमरबेल की तरह इस तरह फैली हुई हैं कि पढ़ेलिखे लोग भी इसे छोड़ने को तैयार नहीं हैं. सुनीता और योगेश भी तांत्रिक के बिछाए इंद्रजाल में फंस ही गए. गणेश अकसर योगेश के घर आ कर कहता कि उस के घर में किसी प्रेत का साया है, इसी वजह से घर का सामान गायब हो रहा है. गणेश ने योगेश को 6 ताबीज बना कर देते हुए कहा था कि इन्हें घर के सभी लोग अपने गले में हमेशा पहन कर रखें तो प्रेत का साया उन का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.

दीपावली के सप्ताह भर पहले गणेश ने सुनीता को बताया कि दीपावली के एक दिन पहले की रात में वह उस के घर आ कर तांत्रिक साधना करेगा, इस से उस के घर से गायब सभी सामान घर में आ जाएगा. उस ने तांत्रिक साधना के लिए कुछ सामान की लिस्ट बना कर उसे दी थी. योगेश काफी मशक्कत के बाद तांत्रिक क्रिया में उपयोग होने वाले सामान जुटा पाया था. तांत्रिक गणेश के बनाए प्लान के मुताबिक वह अपने सहयोगी मोनू को ले कर योगेश के घर रूप चौदस की शाम ही पहुंच गया.

गणेश ने इंद्रजाल नाम की तंत्रमंत्र से संबंधित पुस्तक में पढ़ा था कि अमावस्या की मध्यरात्रि में किसी की बलि चढ़ाने से उसे तांत्रिक शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं. इन शक्तियों के द्वारा वह जमीन में गड़े धन का पता लगाने के साथ खोए हुए रुपए, जेवरात वापस ला सकते हैं. गणेश तंत्रमंत्र के जरिए उन शक्तियों को हासिल करना चाहता था. इसलिए उस ने अपने साथी मोनू की मदद से दीपावली के एक दिन पहले की मध्यरात्रि में तांत्रिक अनुष्ठान कर के बलि चढ़ाने का प्लान बनाया था.

योजना के मुताबिक, वे रात 9 बजे ही पूजापाठ की तैयारियों में लग गए थे. योगेश के घर में बने एक कमरे में दीपक जला कर पूजा में उपयोग होने वाले सामान को सजा कर रख लिया गया था. सुनीता पूजा की तैयारियों के साथ खाना बनाने की तैयारी भी कर रही थी, क्योंकि गणेश ने सुनीता से बोल दिया था कि खाना तैयार कर परिवार के लोग खा लें, तांत्रिक अनुष्ठान के बाद वह खाना खा कर ही घर जाएगा.

गणेश ने एक कागज की पुडि़या सुनीता को देते हुए कहा था कि इसे सब्जी में डाल देना, इस में अभिमंत्रित भभूत (भस्म) है, जो हर बला से सब को बचा कर रहेगी. सुनीता बहुत खुश थी, उसे भरोसा था कि बंजारा बाबा के द्वारा किए जाने वाले तांत्रिक अनुष्ठान से उस के गहने वापस मिल जाएंगे. बाबा द्वारा दी गई भभूत उस ने सब्जी में डाल दी. रात के 11 बजने वाले थे तभी बाबा ने सुनीता को बुला कर कहा, ‘‘आप तीनों खाना खा कर थोड़ा आराम कर लें, तांत्रिक अनुष्ठान में 2 घंटे से भी ज्यादा का समय लगेगा.’’

तांत्रिक अनुष्ठान देखने को बाबा ने पहले ही मना कर दिया था, इसलिए सुनीता, योगेश और दिव्यांश ने एक साथ बैठ कर खाना खाया और अपनेअपने पलंग पर लेट गए. बिस्तर पर पहुंचते ही वे कब बेहोश हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला. इधर जैसे ही तांत्रिक अनुष्ठान खत्म हुआ तो बाबा ने मोनू को अंदर जा कर देखने को कहा. मोनू ने घर के अंदर जा कर देखा तो तीनों सो चुके थे. उस ने तसल्ली के लिए आवाज दे कर पुकारा, मगर योगेश का परिवार सब्जी में मिलाई गई जहरीली भभूत के असर से बेहोश हो चुका था.

मौके का फायदा उठा कर दोनों ने तांत्रिक क्रिया में इस्तेमाल की गई धारदार कुल्हाड़ी निकाल ली. देखते ही देखते तीनों के सिर पर जोरदार प्रहार कर उन का गला भी रेत दिया. कुल्हाड़ी के वार से खून के छींटे दोनों के कपड़ों पर पड़ चुके थे. तीनों का काम तमाम कर गणेश और मोनू ने अलमारी में रखे गहने और रुपए निकाले और सारा सामान समेट कर वे बाइक से भाग गए.

जिस ढंग से दोनों ने घटना को अंजाम दिया था, उन्हें पकड़े जाने का जरा भी खौफ नहीं था. इसलिए वे रात को ही अपनी बाइक से हरदा जिले के अपनेअपने गांव पहुंच गए थे. पुलिस की सघन पूछताछ में जब इस बात का खुलासा हुआ कि गणेश और मोनू तंत्रमंत्र के लिए बनापुरा आते थे, वे पुलिस की नजरों से ज्यादा दिन छिप नहीं सके. सिवनी मालवा पुलिस ने तांत्रिक गणेश और मोनू को उन के गांव से गिरफ्तार कर लिया. आरोपियों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 460, 380 के तहत अपराध दर्ज कर 8 नवंबर, 2021 को दोनों को कोर्ट में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर ले कर पूछताछ में सारे मामले का खुलासा हुआ.

तांत्रिक की निशानदेही पर घटना में प्रयुक्त कुल्हाड़ी, खून से सने हुए कपड़े और योगेश के घर से चुराए हुए रुपए, सोने का मंगलसूत्र बरामद कर लिया. 10 नवंबर को दोनों को कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें होशंगाबाद जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट पर आधारित

Bihar का एक खतरनाक गैंग वार

संतोष को लगा कि जिन के पास पैसा अधिक है, उन से आसानी से पैसा लिया जा सकता है. उस ने परशु सेना के नाम से अपनी गैंग बनाई, जिस में ब्राह्मण लड़कों को शामिल किया. मुकेश पाठक शुरू से उस के साथ जुड़ गया था. बिहार में संतोष झा का अपहरण और वसूली का बहुत बड़ा कारोबार था, पर नैशनल लेवल पर उसे कोई नहीं जानता था. 27 दिसंबर, 2015 को जब संतोष ने दरभंगा हत्याकांड किया. तब उसे सब जानने लगे.

स्टेट हाईवे नंबर 88 का काम चल रहा था, तभी हाईवे बनाने वाली कंस्ट्रक्शन कंपनी से संतोष झा ने हफ्ता मांगा. उस समय यानी 2015 में संतोष ने उस कंपनी से 75 करोड़ रुपए का गुंडा टैक्स मांगा था. मालिकों ने उस से रकम कम करने की विनती की तो भरी दोपहर को संतोष झा और मुकेश पाठक एके 47 ले कर साइट पर पहुंच गए और कंपनी के 2 मुख्य इंजीनियरों मुकेश कुमार और बृजेश कुमार को मार दिया. इस मामले में इन्हें जेल भी जाना पड़ा.

अपराध की दुनिया में आने के बाद मुकेश के दिल में मर चुकी पत्नी सलोनी की यादें कुछ धुंधली होने लगी थीं. यहां जेल में आने के बाद एक बार फिर उस के दिल में प्यार का अंकुर फूटा. जेल में उस की मुलाकात पूजा नाम की एक सुंदर युवती से हुई. वह किडनैपिंग क्वीन के नाम से जानी जाती थी. जेल की ऊंचीऊंची दीवारों के बीच मुकेश और पूजा की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और दोनों में प्यार हो गया. बिहार के इस जेल में ढोल और शहनाई बजी. 14 अक्तूबर, 2013 को दोनों का विवाह हो गया. सभी कैदियों और पुलिस के आशीर्वाद के बीच जिले के एसपी ने पूजा का कन्यादान किया.

जेल में मुकेश और संतोष साथ ही थे, एक थाली में एक साथ खाने का संबंध था, फिर इन दोनों के बीच खटास कैसे पैदा हुई? दोनों के बीच दुश्मनी कैसे हुई, इस की सही वजह आज तक सामने नहीं आई. नेपाल के बौर्डर से जुड़े बिहार के चंपारण जिला को बहुत बड़ा होने की वजह से इसे 2 हिस्सों में बांट दिया गया है. पश्चिम चंपारण और पूर्वी चंपारण. जिले का मुख्यालय मोतिहारी है. 6 मई, 2023 शनिवार की सुबह पूर्वी चंपारण ऐसी ही एक घटना से हिल उठा था. क्योंकि शिवनगर के पास लक्ष्मीनिया गांव के रहने वाला ओमप्रकाश सिंह उर्फ बाबूसाहब की बड़ी ही क्रूरता से हत्या कर दी गई थी.

ओमप्रकाश की मां को घुटने में तकलीफ थी, इसलिए मुजफ्फरपुर में उन के घुटने का औपरेशन कराया गया था. उस दिन ओमप्रकाश सिंह अपनी मां का हालचाल लेने के लिए बोलेरो जीप से मुजफ्फरपुर जा रहा था. उस के साथ उस के 2 रिश्तेदार भी थे और उस का वर्षों पुराना भरोसेमंद ड्राइवर मुकेश जीप चला रहा था. ओमप्रकाश सिंह जीप की आगे वाली सीट पर ड्राइवर के बगल में बैठा था. फेनहारा थाने के अंतर्गत आने वाले गांव इजोबारा को पार कर के जीप जैसे ही आगे बढ़ी, एक टाटा सूमो इतनी तेजी से आ कर सामने खड़ी हुई कि मुकेश को अपनी बोलेरो रोकनी पड़ी. जरा भी समय गंवाए बगैर टाटा सूमो से 3 लोग फुरती से नीचे उतरे और आटोमैटिक रायफलों से धड़ाधड़ फायरिंग शुरू कर दी. गिनती के 3 मिनट में अपना खेल खत्म कर के तीनों सूमो में सवार हो कर भाग निकले.

इस अंधाधुंध फायरिंग में ड्राइवर मुकेश और पीछे बैठे दोनों रिश्तेदारों को खरोंच तक नहीं आई, इस चालाकी से शिकारियों ने अपने शिकार ओमप्रकाश सिंह की देह को छलनी कर दिया था. जीप पर 28 गोलियों के निशान थे. गोलियों की आवाज सुन कर गांव वाले भाग कर आ गए थे. मुकेश ने फोन कर के कांपती आवाज में यह जानकारी ओमप्रकाश सिंह के परिवार को दी. सूचना पा कर घर वाले दौड़े आए और लाश कब्जे में ले ली. किसी की सूचना पर पुलिस भी आ गई थी. पुलिस अपनी जांच में आगे बढ़ती, उस के पहले ही हत्यारों ने खुद ही ओमप्रकाश सिंह की हत्या का अपराध स्वीकार कर के अपना नाम जाहिर करते हुए बिहार के लगभग सभी मीडिया संस्थानों को पत्र भेजा.

हत्यारों ने जो पत्र मीडिया को भेजा था, वह कुछ इस प्रकार था, ‘मैं राज झा, संतोष झा गैंग का मुख्य प्रवक्ता. तमाम मीडिया को बताना चाहता हूं कि 6 मई, 2023 की सुबह बाबूसाहब उर्फ ओमप्रकाश सिंह की हत्या करने की जिम्मेदारी मेरी है. मैं ने ही उसे खत्म किया है. ओमप्रकाश सिंह ठेकेदार नहीं, एक नामचीन गुंडा था. गुंडागिरी और दादागिरी से सरकारी ठेके लेता था. बिहार के कुख्यात गुंडा मुकेश पाठक का वह दाहिना हाथ था. मुकेश पाठक के हर अपराध में वह सहभागी था.

’28 अगस्त, 2018 को जब सीतामढ़ी कोर्ट में संतोष झा की हत्या हुई थी तो वह उस में शामिल था. संतोष झा को मारने वाले सभी शूटर ओमप्रकाश सिंह के घर पर ही रुके थे और उन्हें हथियार भी ओमप्रकाश सिंह ने ही मुहैया कराए थे. उसे खत्म कर के हम ने संतोष झा की हत्या का बदला लिया है. मुकेश पाठक तो अभी जेल में है, पर हम उस की भी यही हालत करने वाले हैं.

-राज झा.’

इस पत्र के बाद जेल में बंद मुकेश पाठक की सुरक्षा बढ़ा दी गई थी. अब अगर मुकेश पाठक की बात करते हैं तो पहले संतोष झा के बारे में बताना जरूरी है.

सामान्य परिवार का युवक था संतोष झा

गुंडागिरी के इतिहास में बिहार के सब से बड़े गैंगस्टर के रूप में संतोष झा का नाम लिया जा सकता है. उत्तर बिहार में इस का बेरोकटोक शासन चलता था. प्राइवेट कंपनियों की तरह हिसाबकिताब रखने वाले संतोष झा के पास 40 से भी अधिक वेतनभोगी गुंडों की फौज थी. हर किसी को हर महीने वेतन के अलावा अन्य सुविधाएं वह देता था. बिहार का जिला चंपारण और नेपाल के बौर्डर से लगा जिला शिवहर है. इसी जिले के दोस्तियां गांव के एक सामान्य परिवार में संतोष का जन्म हुआ था. संतोष के पिता गांव के ही संपन्न किसान नवलकिशोर राय के यहां ड्राइवर की नौकरी करते थे.

संतोष को पढ़ाई में बिलकुल रुचि नहीं थी. परिवार की आर्थिक स्थिति उसे पता ही थी, इसलिए 15 साल की उम्र में ही वह कामधंधे की तलाश में हरियाणा चला गया. वह वहां गया कि 8 महीने बाद गांव में एक ऐसी घटना घटी जिस से उस का जीवन ही बदल गया. नवलकिशोर राय से संतोष के पिता की कुछ बकझक हो गई तो पैसे के घमंड में उन्होंने संतोष के पिता को गालियां देते हुए धमकाने के साथसाथ एक थप्पड़ भी जड़ दिया. इसी के साथ नौकरी से भी निकाल दिया. यह समाचार मिलने के बाद संतोष गांव लौट आया. साल 2001 में 16 साल की उम्र में वह क्या कर सकता था? धनी लोगों के प्रति मन में नफरत तो थी ही. उस समय उस इलाके में नक्सली कमांडर गौरीशंकर झा का रुतबा था. संतोष उस के पास पहुंच गया और उस की टीम में शामिल हो गया.

संतोष ने परशु सेना के नाम से अपनी गैंग बनाई, जिस में ब्राह्मण लड़कों को शामिल किया. मुकेश पाठक शुरू से उस के साथ जुड़ गया था. उस की गैंग ने धूमधड़ाके के साथ रंगदारी वसूली का कारोबार शुरू कर दिया. इस से आने वाली आमदनी को देख कर संतोष ने अपने गैंग को बढ़ाया और अपनी धाक जमा ली. उस के इस कारनामे को देख कर नक्सली कमांडर गौरीशंकर काफी नाराज हुआ. अब तक संतोष के पास एक बड़े गैंग की ताकत थी और अपहरण और वसूली से मोटी कमाई हो रही थी. इसलिए उस ने गुरु की सलाह नहीं मानी और दलील की, जिस से दोनों में झगड़ा बढ़ गया. आवाज सुन कर गौरीशंकर की पत्नी भी बाहर आ गई. उस ने भी संतोष को ताना मारा.

चिढ़ कर संतोष ने जेब से रिवौल्वर निकाला और गोली चला दी. गौरीशंकर और उस की पत्नी की हत्या कर संतोष चुपचाप उन के घर से चला गया. पुलिस को भले ही इस दोहरे हत्याकांड में कोई गवाह या साक्ष्य नहीं मिला, पर लोगों को तो पता चल ही गया था कि ये हत्याएं किस ने की हैं. इस से इलाके में संतोष की धाक के साथ दबदबा भी बढ़ गया. पिता को थप्पड़ मारने वाले नवलकिशोर राय के प्रति उस के दिल में नफरत अभी भी भरी थी. 15 जनवरी, 2010 को उस ने पिता के अपमान का बदला ले लिया. नवलकिशोर राय की खोपड़ी के परखच्चे उड़ाने के साथ उस के हवेली जैसे मकान को डायनामाइट से उड़ा दिया. उसे पकडऩे के लिए बिहार पुलिस की टास्क फोर्स रातदिन लगी थी, पर पकड़ नहीं पा रही थी.

आखिर साल 2014 में स्पैशल टास्क फोर्स ने कोलकाता से संतोष झा को गिरफ्तार कर लिया. वह जेल चला गया, पर वसूली का उस का कारोबार जेल से ही चलता रहा.

मई, 2015 में वह जेल से बाहर आ गया. उस की गैरहाजिरी में मुकेश पाठक जेल में रह कर मुखिया की तरह गैंग संभालता रहा.

गुंडा टैक्स में मांगे थे 75 करोड़ रुपए

स्टेट हाईवे नंबर 88 का काम चल रहा था, तभी कंस्ट्रक्शन कंपनी से संतोष झा ने हफ्ता मांगा. उस समय यानी 2015 में संतोष ने कंपनी से 75 करोड़ रुपए गुंडा टैक्स मांगा था. पैसे न देने पर उस ने कंपनी के 2 मुख्य इंजीनियरों मुकेश कुमार और बृजेश कुमार को मार दिया. दिनदहाड़े इस घटना को अंजाम दिया गया था, इसलिए चश्मदीद भी थे और कंपनी पर सरकार का हाथ भी था. इसलिए इस घटना की चार्जशीट तैयार करने में पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. 75 करोड़ की रंगदारी मांगने वाले संतोष झा का नाम पूरे भारत में चमक उठा. संतोष झा और मुकेश पाठक पकड़े गए. मुकदमा चला और गुरुचेला और इन के अन्य 7 साथियों को आजीवन कारावास की सजा हुई. सभी को जेल में डाल दिया गया.

मुकेश पाठक इस गैंग में कैसे शामिल हुआ, आइए अब यह जानते हैं. मुकेश अपनी पत्नी सलोनी से बहुत प्यार करता था. 3 साल की बेटी श्वेता और पतिपत्नी तीनों शांति से रह रहे थे. पारिवारिक जमीन का विवाद चल रहा था. जब यह विवाद बढ़ा तो उस के चाचा के बेटे प्रेमनाथ पाठक और बुआ के बेटे सुशील तिवारी ने मिल कर मुकेश नाम के इस कांटे को निकाल फेंकने की योजना बनाई. एक दिन दोनों रात को उस के घर आए और गोलियां चलाने लगे. इस में मुकेश तो बच गया, पर गर्भवती सलोनी की गोली लगने से मौत हो गई. प्रेमनाथ और सुशील ने पुलिस और मायके वालों के साथ मिल कर ऐसी साजिश रची कि दहेज उत्पीडऩ में पत्नी की हत्या के आरोप में मुकेश को ही फंसा दिया.

मुकदमा चला तो 3 साल की बेटी श्वेता ने प्रेमनाथ और सुशील की ओर इशारा करते हुए कोर्ट में बयान दिया कि उस की मम्मी को पापा ने नहीं, इन दोनों अंकल ने मारा है. बेटी के बयान के बाद मुकेश निर्दोष छूट गया. श्वेता के बयान पर प्रेमनाथ और सुशील फंस गए. कुछ दिनों बाद प्रेमनाथ जमानत पर बाहर आया तो बदले की आग में जल रहे मुकेश ने 8 मई, 2003 को प्रेमनाथ की हत्या कर के जुर्म की दुनिया में कदम रख दिया. 2004 में पुलिस ने उसे पकड़ा. जमानत पर बाहर आने के बाद वह संतोष झा से जा मिला. अपने गैंग को मजबूत करने के लिए संतोष को ऐसे ही साथियों की जरूरत थी. उस ने संतोष की गैंग में दूसरे नंबर की जगह पा ली.

पुलिस को उस की दरजनों मामलों में तलाश थी. 17 जनवरी, 2012 को स्पैशल टास्क फोर्स ने उसे रांची से पकड़ कर मोतिहारी जेल भेज दिया. इस के बाद उसे शिवहर की जेल भेज दिया गया. इस से वह काफी नाराज था. पर तब उसे शायद यह पता नहीं था कि वहां उसे एक सुखद सरप्राइज मिलने वाला है.

अपराध की दुनिया में आने के बाद मुकेश के दिल में दिवंगत पत्नी सलोनी की यादें कुछ धुंधली होने लगी थीं. यहां जेल में आने के बाद एक बार फिर उस के दिल में प्यार का अंकुर फूटा.

पूजा और मुकेश की जेल में हुई थी शादी

बिहार में किडनैपिंग के कारोबार में केवल पुरुष ही नहीं जुड़े थे, यह साबित करने के लिए पूजा नाम की एक सुंदर युवती भी अपनी हिम्मत से इस धंधे में आ कर बहुत कम समय में किडनैपिंग क्वीन के रूप में नाम कमा चुकी थी. पौलिटेक्निक की पढ़ाई के साथ उस ने अपना यह कारोबार शुरू किया था. पर 4 सफल औपरेशन के बाद वह पुलिस के हत्थे चढ़ गई थी. वह भी इसी जेल में थी. जेल की ऊंचीऊंची दीवारों के बीच मुकेश और पूजा की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा और दोनों में प्यार हो गया. बिहार की इस जेल में ढोल और शहनाई बजी. 14 अक्तूबर, 2013 को दोनों का विवाह हो गया. सभी कैदियों और पुलिस के आशीर्वाद के बीच जिले के एसपी ने पूजा का कन्यादान किया.

20 जुलाई, 2015 को तबीयत खराब होने का बहाना बना कर मुकेश अस्पताल में भरती हुआ. वहां पुलिस को प्रसाद के रूप में नशे वाली मिठाई खिला कर सुला दिया और खुद अस्पताल से फरार हो गया. उस ने पुलिस को सांसत में डाल दिया. एक तो खुद फरार हो गया, दूसरी ओर पता चला कि पूजा गर्भवती है. जेल में कोई प्रेगनेंट महिला कैदी कैसे रह सकती है? जेल में मुकेश और पूजा की प्रेमलीला के चक्कर में 4 पुलिस अधिकारी भी सस्पेंड हुए. संतोष झा के गैंग में मुकेश का दूसरे नंबर पर स्थान था. रंगदारी की जो मोटी रकम आ रही थी, उस से बिहार और नेपाल में रिश्तेदारों के नाम जमीनें और मकान खरीदे जा रहे थे. उस समय मुकेश के मन में एक बात खटकती थी कि उस की चालाकी और मेहनत का जो लाभ उसे मिलना चाहिए, वह उसे नहीं मिल रहा है.

दोनों के बीच दुश्मनी कैसे हुई, इस की सही वजह आज तक सामने नहीं आई. पर एक पत्रकार द्वारा जो एक कारण सामने आया, संतोष के स्वभाव के बारे में जानने वाले उसे सच मानते हैं. संतोष की गैंग की एक शरणस्थली नेपाल में भी थी. नेपाल का कारोबार राजा उर्फ सौरभ कुमार संभालता था.

जेल में आने के बाद मुकेश पाठक को पता चला कि गैंग के किसी भी सदस्य को बताए बगैर संतोष ने कंस्ट्रक्शन कंपनी से 35 करोड़ रुपए ले लिए थे. दगाबाजी के इस मुद्दे पर मुकेश का अपने गुरु संतोष से झगड़ा हुआ और उसी समय मुकेश ने तय कर लिया कि अब ऐसे गुरु को रास्ते से हटाना ही पड़ेगा.

जेल से चल रहा था रंगदारी का धंधा

रंगदारी वसूलने का काम तो सालों से जेल में बैठेबैठे चल रहा था. गैंग के 40 से अधिक खूंखार वेतनभोगी साथी बाहर ही थे. इसलिए गैंग का रुतबा अभी भी वैसा ही था. संतोष झा की हत्या के बारे में विचार करने के बाद मुकेश सोचने लगा कि यह काम किसे सौंपा जाए? तभी उसे ओमप्रकाश सिंह उर्फ बाबूसाहब की याद आई. जेल में ओमप्रकाश सिंह की मुकेश पाठक और संतोष झा से दोस्ती हो गई. इस में मुकेश पाठक से उस की कुछ ज्यादा ही करीबी हो गई थी. उस समय वह बाहर था, इसलिए मुकेश ने अपनी तरह से योजना बनाई और वह पूरा करने की जिम्मेदारी डेविड उर्फ आशीष रंजन और ओमप्रकाश सिंह को सौंपी.

संतोष का एक भरोसेमंद साथी अभिषेक झा भी जेल में था. 16 जुलाई को उस की कोर्ट में पेशी थी. तभी मोतिहारी-ढाका कोर्ट कंपाउंड में मुकेश ने उस की हत्या करा दी. इस सफलता के बाद मुकेश ने संतोष के लिए उसी तरह की योजना बनाई. 28 अगस्त, 2018 को सीतामढ़ी की अदालत में मुकेश पाठक और संतोष झा को हाजिर करना था. इस के 15 दिन पहले से सीतामढ़ी के एक मकान में तैयारी चल रही थी. मुकेश को पता था कि संतोष और विकास को जब अदालत में ले जाया जाएगा तो उन के चारों ओर सशस्त्र पुलिस की सुरक्षा रहेगी. इसलिए उस की हत्या के लिए सियार और नेवले जैसी फुरती रखने वाले शूटर चाहिए.

इस तरह का एक हीरो मुकेश की नजर में था. नौवीं कक्षा में पढऩे वाला विकास महतो मात्र 15 साल का था, फिर भी उस में हिम्मत और जुनून था. फेसबुक पर एके 47 के साथ फोटो डालने वाला यमराज सिंह शूटर- मोतिहारी का यमराज इस तरह की पहचान बताने वाला विकास झा उर्फ कालिया संतोष का वफादार था.

विकास और शकील को दी संतोष की हत्या की सुपारी

विकास महतो बाल सुधार गृह से कुछ दिनों पहले ही बाहर आया था. उसी ने एक और नाम बताया. वह था शकील अख्तर. साल 2015 में थाना चकिया के एसएचओ ने उसे रिवौल्वर के साथ पकड़ा था. उसे बच्चा समझ कर पुलिस ने उस के प्रति लापरवाही बरती और वह थाने से भाग गया था. 20 अगस्त, 2018 में पुलिस ने उसे खोज निकाला और जुवेनाइल कोर्ट ने उसे बाल सुधार गृह रिमांड होम में भेज दिया. मुकेश के खास साथी डेविल उर्फ सौरभ कुमार ने यह मोर्चा संभाल रखा था. उस की देखभाल में 5 दिनों तक रिमांड होम में रहने के बाद 26 अगस्त, 2018 को शकील अख्तर ने प्रार्थना पत्र दिया कि पटना के अस्पताल में उस का भाई सीरियस है, इसलिए उसे छुट्टी दी जाए. बाल सुधार गृह के अधिकारियों ने उसे 27 से 30 अगस्त यानी 4 दिन की छुट्टी दी. इस के बाद वह सीधे सीतामढ़ी आ गया.

विकास महतो और शकील अख्तर को अगले दिन काम समझा कर कहा गया कि संतोष झा जीवित नहीं बचना चाहिए. इस के लिए वह जितनी रकम मांगेंगे, उस से 10 हजार रुपए उन्हें अधिक मिलेंगे. मानव चौबे और संजीत इस पूरी टीम को संभाल रहे थे. इस औपरेशन की सफलता के लिए आसपास के 5 जिलों के तमाम सरकारी ठेकेदारों को मुकेश ने व्यक्तिगत रूप से खबर भिजवा दी थी कि उन्हें लूटने वाले संतोष का सफाया करवाना है. जेल अधिकारियों को पता था कि एक समय जिगरी दोस्त रहे दोनों अब एकदूसरे के खून के प्यासे हैं. इसलिए दोनों को एक वैन में ले जाने का उन्होंने खतरा नहीं उठाया. पहली वैन में मुकेश को सीतामढ़ी लाया गया तो उस के बाद 11 पुलिस वालों के काफिले के साथ संतोष झा को लाया गया.

संतोष झा की हत्या के लिए पूरी व्यवस्था हो चुकी थी. विकास महतो और शकील अख्तर को हथियारों के साथ बाइक पर पीछे बैठना था. कुछ उल्टासीधा हो जाए तो उस परिस्थिति को संभालने के लिए राजा उर्फ सौरभ कुमार कार्बाइन ले कर कोर्ट परिसर में कोने में जम गया. लेकिन विकास और शकील ने कोई गलती नहीं की. 11 पुलिस वालों के साथ जैसे ही संतोष कोर्ट से बाहर आया, चीते की गति से दौड़ कर उन्होंने संतोष के सिर और छाती को गोलियों से छलनी कर दिया. पुलिस वाले कुछ समझ पाते, उस के पहले ही संतोष गिर पड़ा.

हत्यारे अपना काम कर के भागे. उन में बाइक पर चढ़ते समय विकास लडख़ड़ाया और हथियार सहित पुलिस की पकड़ में आ गया. जबकि शकील भाग निकला. संतोष की घटनास्थल पर ही मौत हो गई. इस घटना के लिए लापरवाही के आरोप में 25 पुलिस वालों को सस्पेंड कर दिया गया.

संतोष की हत्या के बाद मुकेश ने संभाली गैंग

मुकेश का नाम हत्या के इस मामले में सामने न आए, इस के लिए 15 साल के विकास महतो ने पूछताछ में पुलिस को बताया कि संतोष झा ने उस के पिता की हत्या की थी, उसी का बदला लेने के लिए उस ने उस की हत्या की है. बाद में पुलिस जांच में उस का यह झूठ पकड़ा गया था. अपने गुरु गौरीशंकर झा की हत्या संतोष ने की थी, उसी तरह संतोष के चेले मुकेश ने उसे खत्म कर दिया था. साल 2020 में पुलिस ने शकील अख्तर को भी पकड़ लिया था. विकास महतो भी जेल में है.

संतोष की हत्या के बाद कुछ दिनों के लिए उस की गैंग बिखर गई थी, लेकिन फिर से मैदान में आ कर विकास झा उर्फ कालिया ने गैंग को फिर से संभाल लिया और रंगदारी वसूलने का कारोबार शुरू कर दिया. अपने गुरु संतोष झा की बेटी के साथ उस ने विवाह कर लिया. वह गजब का हिम्मती था. उसी के इशारे पर मुकेश के साथी राजा उर्फ सौरभ कुमार की हत्या नेपाल में कर दी गई. इस के बाद 6 मई, 2023 को ओमप्रकाश सिंह उर्फ बाबूसाहब को 19 गोलियों से छलनी कर के खुलेआम धमकी दे दी गई कि मुकेश पाठक का भी ऐसा ही हाल किया जाएगा.

मुकेश पाठक इस समय कड़ी सुरक्षा के बीच भागलपुर की जेल में सजा काट रहा है. सूत्रों से पता चला है कि मुकेश ने अवैध कमाई से करीब 7 सौ करोड़ की संपत्ति बनाई है. गैंगवार की इस परंपरा को देखते हुए सवाल यह है कि जेल से आने के बाद इस 7 सौ करोड़ की संपत्ति का सुख कितने दिन भोग सकेगा.