Stories in Hindi Love : बेलगाम सायरा कई जिंदगियां हुईं बरबाद

Stories in Hindi Love : 20 साल की सायरा परवीन के साथ कुछ बदमाश पार्क में जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे थे. उसे बचाने के चक्कर में उधर से गुजर रहे राहुल को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. इस केस में सायरा चश्मदीद गवाह बनी. इस घटना के 5 महीने बाद ऐसी क्या वजह रही कि मृतक राहुल के चाचा किशन कुमार को सुपारी दे कर सायरा परवीन की ही हत्या करानी पड़ी?

शराब का वो आखिरी पैग भी लंगड़े ने गले से नीचे उतार लिया था, लेकिन उस को अभी नशा नहीं हुआ था. उस ने खाली हो गई बोतल को घूरा, फिर सामने बैठे सलमान और अरबाज से बोला, ”मजा नहीं आया यारो, मेरा तो गला भी तर नहीं हुआ है अभी.’’

”रात के 8 बज गए हैं रहमत मियां, अब टेक भी बंद हो गए हैं. जितनी पी है, उसी से सब्र करो आज.’’ सलमान ने कहा.

”हां, कल 2 बोतल खरीदेंगे, एक तुम अकेले डकार लेना.’’ अरबाज ने अपना डिस्पोजल गिलास रेत पर फेंकते हुए कहा.

”लेकिन कुछ हुआ ही नहीं है अरबाज, तुम्हें मालूम है मैं अधूरा मजा नहीं करता हूं.’’ रहमत उर्फ लंगड़ा ने मुंह बना कर कहा.

”मजे के लिए दूसरा इंतजाम कर लो रहमत मियां,’’ अरबाज ने होंठों पर कुटिल मुसकान लाते हुए कहा, ”तुम्हारे पास तो जुगाड़ है.’’

”जुगाड़ कैसा जुगाड़?’’

”अरे, वो है न तुम्हारी फ्रेंड सायरा, उसे बुला लो.’’ अरबाज ने दाईं आंख दबा कर मुसकराते हुए कहा.

”हीऽऽहीऽऽहीऽऽ’’ रहमत उर्फ लंगड़ा दांत निकाल कर हंसा, ”वो सायरा… माल तो बढिय़ा है, लेकिन वह कंधे पर हाथ नहीं रखने देगी अरबाज.’’

”उसे बुलाओ तो सही, तुम कंधे की बात कर रहे हो, मैं तो उसे बोलने का मौका ही नहीं दूंगा. मेरा नाम अरबाज है.’’

”अरबाज सही बोलता है तू.’’ सलमान ने मुंह खोला, ”जब उस के टेंटुए पर रामपुरी रखेंगे तो खुद ही कपड़े उतार कर साथ में सोने के लिए हां बोल देगी.’’

”ऐसी बात है क्या, फिर तो उसे मैं अभी फोन करता हूं.’’ रहमत ने हंस कर कहा और जेब से फोन निकालने लगा.

उस ने जेब से मोबाइल निकाल कर सायरा परवीन का नंबर निकाल कर मिलाया. दूसरी तरफ कुछ देर घंटी बजी, फिर एक सुरीली आवाज सुनाई दी, ”सलाम रहमत. कैसे फोन कर रहे हो इस टाइम?’’

”तेरे से मिलना है सायरा, एक जरूरी काम आ पड़ा है, तू अभी के अभी आ जा.’’

”अब शाम ढल रही है रहमत, घर में बहुत काम है. मैं नहीं आ पाऊंगी.’’ सायरा ने स्पष्ट इंकार किया.

”समझा कर सायरा, बहुत जरूरी काम है वरना मैं नहीं बुलाता.’’ रहमत ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा.

”काम क्या है?’’

”आएगी तो बताऊंगा. तू 15-20 मिनट में सुंदर नगरी में एच ब्लौक के पार्क के पास आ कर मिल, मैं वहीं तेरा इंतजार कर रहा हूं.’’

”ठीक है, आती हूं.’’ कहने के बाद सायरा ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

रहमत मुसकराया, ”आ रही है वो. अब शराब के साथ शबाब भी मिलेगा. मजा आ जाएगा.’’

”पहला नंबर मेरा होगा रहमत,’’ सलमान रौब से बोला.

”आने दे भाई, पहले तू ही मुहूर्त कर लेना.’’ रहमत धीरे से बोला.

वे सायरा का इंतजार करने लगे. वह आधा घंटे में पार्क के पास पहुंच गई. वहां पर रहमत के साथ 2 और दोस्तों को देख कर उस का माथा ठनका. वह रहमत के पास आ कर बोली, ”क्यों बुलाया है मुझे?’’

”सायरा, यह लंगड़ा क्या बताएगा. मैं बताता हूं.’’ सलमान थोड़ा आगे आ कर बोला, ”हमारी शराब आज कम पड़ गई है, इसलिए नशा नहीं चढ़ा है.’’

”तो मैं क्या तुम्हें शराब ला कर पिलाऊं?’’ आंखें तरेर कर सायरा ने कहा.

”नहीं, शराब तो तुम्हारे जिस्म में भरी हुई है सायरा. उसे पिलाएगी तो नशा शराब से दोगुना चढ़ जाएगा.’’

”सलमान, होश में बात करो मुझ से. मेरा नाम सायरा परवीन है.’’ वह गुस्से से बोली.

”देखो सायरा, तुम्हें हमारी खिदमत तो करनी ही पड़ेगी, राजी या गैर राजी.’’ सलमान ने कहा और सायरा का हाथ पकड़ लिया.

”मेरा हाथ छोड़ो सलमान,’’ सायरा गुर्रा पड़ी, ”छोड़ो मेरा हाथ.’’

सलमान को गुस्सा आ गया, ”बहुत फडफ़ड़ा रही है तू.’’ सलमान ने सायरा के गाल पर थप्पड़ जड़ दिया.

”सीधी तरह पार्क में चलती है या उधेड़ूं तेरी खाल.’’ गुर्राते हुए सलमान ने कहा और सायरा को पार्क में ले जाने के लिए हाथ पकडऩे लगा.

सायरा चीखने लगी, ”रहमत, मुझे छुड़ाओ इस से.’’

”मैं कुछ नहीं बोल सकता सायरा, क्योंकि नशा मैं भी करना चाहता हूं, लेकिन पहला नंबर सलमान का है.’’ रहमत मुसकराते हुए बोला.

सायरा की इज्जत बचाने में राहुल की गई जान

चीखती हुई सायरा को खींचते हुए सलमान पार्क की तरफ ले गया. वह दरवाजे से सायरा को अंदर पार्क में ले जाने वाला था कि सामने से 2 व्यक्ति उधर आ निकले. वह दोनों चाचाभतीजे थे. इन में एक राहुल उर्फ मनीष था. दूसरा उस का चाचा किशन कुमार था. ये केबल औपरेटर का काम करते थे और दोनों सुंदर नगरी की झुग्गियों में रहते थे. सायरा उन्हें देख कर चिल्लाई, ”मेरी मदद करो भाई. यह बदमाश मेरी इज्जत पर हाथ डालना चाहता है.’’

राहुल जोशीला युवक था. उस ने आगे बढ़ कर सलमान का गरीबान पकड़ लिया और गुर्राया, ”छोड़ इस लड़की को.’’

”मेरे मामले में मत बोल राहुल. तू अपने रास्ते जा.’’ सलमान ने ऐंठ कर कहा

”अबे तू ज्यादा धौंस मत दे मुझे. जानता हूं सुंदर नगरी का बदमाश है तू… लेकिन तू इस लड़की पर हाथ डालेगा तो तेरी बदमाशी यहीं निकाल दूंगा.’’ राहुल गुस्से से बोला और उस ने सलमान को जोर से धक्का दे दिया.

सलमान संभल नहीं पाया. सायरा का हाथ उस के हाथ से छूट गया. वह दूर जा कर गिरा. हाथ छूटते ही सायरा जान बचा कर भाग निकली. सलमान उठ कर खड़ा होता, इस से पहले ही राहुल और उस का चाचा अपने रास्ते पर आगे बढ़ गए. सलमान उन्हें घूरता रहा. फिर वह उस तरफ दौड़ा, जिधर रहमत उर्फ लंगड़ा और अरबाज बैठे गप्पें लड़ा रहे थे. उसी रात 15 नवंबर, 2024 की आधी रात को उत्तरपूर्वी दिल्ली के नंदनगरी थाने में पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना दी गई कि सुंदर नगरी के एच ब्लौक पार्क में एक व्यक्ति का कत्ल हो गया है.

सूचना मिलते ही नंदनगरी थाने के एसएचओ संतोष कुमार रावत अपनी टीम के साथ तुरंत घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. वे जब पार्क में पंहुचे, वहां बिजली के पोल के पास एक युवक खून से लथपथ पड़ा दिखाई दिया. संतोष कुमार रावत ने उस युवक की नब्ज देखी. वह हलकीहलकी चल रही थी. युवक के गले पर गहरा घाव देख कर रावत ने अनुमान लगा लिया कि हत्यारे ने चाकू से इस युवक की गरदन रेतने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

उस युवक के पास एक व्यक्ति बैठा रो रहा था.

”यह घायल व्यक्ति तुम्हारा क्या लगता है?’’ श्री रावत ने पूछा.

”यह मेरा भतीजा राहुल उर्फ मनीष है साहब, इसे बदमाशों ने घर से बुला कर चाकू मारा है, इसे बचा लीजिए आप.’’ वह व्यक्ति रोते हुए बोला.

एसएचओ संतोष कुमार रावत ने धीरे से कहा, ”तुम हमारे साथ अस्पताल चलो. पूछताछ तुम्हारे भतीजे के उपचार के बाद कर लेंगे. आओ.’’

श्री रावत ने साथ आए कांस्टेबल को इशारा किया और घायल युवक को पुलिस वैन में रखने को कहा. 2 कांस्टेबलों ने राहुल को पुलिस वैन की बर्थ पर लिटा दिया. श्री रावत वैन में बैठे और ड्राइवर को जीटीबी अस्पताल चलने को कहा. वैन जीटीबी हौस्पिटल के लिए तुरंत चल पड़ी, जो ज्यादा दूर नहीं था. वहां पहुंचते ही युवक को वैन से उतार कर इमरजेंसी की तरफ ले जाया जाने लगा तो उस ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. इमरजेंसी में पहुंचने पर वहां मौजूद डाक्टरों ने भी उस की मौत की पुष्टि कर दी. श्री रावत ने राहुल की लाश को फारमेलिटी पूरी करने के बाद उसे वहीं की मोर्चरी में पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया और उस के चाचा को साथ ले कर थाने में लौट आए.

उन्होंने मृतक के चाचा किशन कुमार को सामने बिठा कर पूछताछ शुरू की तो किशन ने बताया कि आज शाम को वह जब अपना काम निपटा कर भतीजे राहुल के साथ पैदल घर के लिए आ रहा था तो सलमान नामक बदमाश एक 19-20 साल की युवती को जबरदस्ती पार्क में खींच कर ले जाने की कोशिश कर रहा था. वह मदद के लिए चीख रही थी तो मैं और राहुल रुक गए. राहुल ने सलमान से युवती को छुड़ाने के लिए सलमान को धक्का दिया तो वह गिर पड़ा. लड़की भाग गई तो हम भी घर चले आए. घर आ कर खाना वगैरह बना कर खा लेने के बाद हम सोने के लिए तैयारी कर रहे थे कि झुग्गी के दरवाजे पर सलमान अपने 3-4 साथियों को ले कर पहुंच गया. उस ने दरवाजे पर लात मारी और गुस्से में राहुल को बाहर आने को कहा.

राहुल के हत्यारे चढ़े पुलिस के हत्थे

राहुल उठ कर बाहर आया तो वह उसे ले कर पार्क की तरफ चले गए. मैं कपड़े पहन कर पीछे भागा, तब तक उन्होंने मेरे भतीजे राहुल की गरदन काट दी और भाग गए. मैं ने पुलिस कंट्रोल रूम को इस की सूचना दी तो आप आ गए. मेरे भतीजे की हत्या सलमान ने अपने साथियों के साथ की है, आप उन्हें गिरफ्तार करें.

”वह युवती कौन थी, उसे पहचानते हो तुम?’’ श्री रावत ने पूछा.

”नहीं साहब, यह तो सलमान ही बताएगा.’’ किशन कुमार ने कहा.

श्री रावत ने किशन कुमार को वादी बना कर एफआईआर दर्ज की, जो बीएनएस की धारा 103(1), 109(1), 3(5) के अंतर्गत लिखी गई.

श्री रावत ने इस काल की सूचना डीसीपी आशीष मिश्रा तथा एसीपी (नंदनगरी) जशोद सिंह मेहता को दे कर निर्देश मांगा तो उन्होंने तुरंत एक पुलिस टीम गठित कर के राहुल के हत्यारों को पकडऩे का आदेश दे दिया.

जो पुलिस टीम इस केस को सौल्व करने के लिए बनाई गई, उस में एसएचओ संतोष कुमार रावत, इंसपेक्टर गोविंद सिंह, एएसआई प्रमोद कुमार, हैडकांस्टेबल दीपक नागर कांस्टेबल परमजीत सिंह, जितेंद्र कुमार, मुकेश कुमार को शामिल किया गया. सलमान सुंदर नगरी का कुख्यात बदमाश था. उस के ठिकानों पर इस टीम ने दबिश दी तो वह पुलिस के हाथ आ गया. उसे थाने में ला कर सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपने साथियों अरबाज, रहमत और अपने अब्बू सलीम को राहुल की हत्या में शामिल होना बता दिया.

यह पूछे जाने पर कि वह युवती कौन थी, जिसे वह बुरी नीयत से पार्क में ले जा रहा था. सलमान ने बता दिया कि वह कुष्ठ आश्रम के पास वाली झुग्गी में रहने वाली सायरा परवीन थी. सायरा परवीन को पुलिस तलाश कर के थाने ले आई. सायरा परवीन अपनी बहन और जीजा के पास रहती थी. उस के अब्बू की मौत हो चुकी थी और एक महीना पहले ही अम्मी भी कैंसर की बीमारी में इस दुनिया से विदा हो गई थी.

सायरा की हत्या पुलिस के लिए बनी मिस्ट्री

20 वर्षीय सायरा ने पुलिस को सारी बात बता दी, तब एसएचओ श्री रावत ने सायरा को सरकारी गवाह बना लिया. पुलिस शेष अपराधियों की धरपकड़ के लिए लगातार दबिश दे रही थी. 26 नवंबर, 2024 को ये तीनों भी पुलिस के हाथ लग गए. इन्हें मजिस्ट्रैट के सामने पेश कर के जेल भेज दिया गया. इस प्रकार राहुल मर्डर केस एक प्रकार से सुलझा कर पुलिस ने अपनी पीठ थपथपा ली, लेकिन यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. इस में अभी एक कत्ल और शामिल होना था. वह कत्ल हुआ खुद सायरा परवीन का. क्यों? आइए जानते हैं

14 अप्रैल, 2025, दिन सोमवार, रात 10 बजे उत्तरपूर्वी दिल्ली के जीटीबी एनक्लेव थाने को किसी ने सूचना दी कि जीटीबी एनक्लेव के सामने एमआईजी फ्लैट की सर्विस लाइन में किसी ने एक युवती लड़की को गोली मार दी है. उस समय थाना जीटीबी एनक्लेव के एसएचओ ब्रजेश मिश्रा थाने में ही थे. सूचना मिलने पर वह एएसआई अनिल यादव, हैडकांस्टेबल मनोज कुमार, कांस्टेबल अभय कुमार और तनुज को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

पाकेट-ए के पास उन्हें सड़क पर एक युवती पड़ी दिखाई दी. उस का निरीक्षण करने पर उस की कमर और सिर में गोली के 2 निशान मिले. वहां निकला खून गाढ़ा पड़ चुका था. इस से अनुमान लगाया गया कि उस घटना को हुए ज्यादा वक्त नहीं हुआ है. वहां कुछ लोग एकत्र हो गए थे. एसएचओ ब्रजेश कुमार मिश्रा ने उस की नब्ज देखी, वह बंद थी. उस की सांसें भी थम चुकी थीं यानी मौत हो गई थी. उस की तलाशी ली गई तो उस के पास कुछ भी ऐसा नहीं मिला, जिस से उस की पहचान हो सके. वहां मौजूद कुछ लोगों ने बताया कि यह युवती कुष्ठ आश्रम के पास की आनंद आश्रम की झुग्गियों में रहती है और इस का नाम सायरा परवीन है.

युवती कोई 20 साल के आसपास की उम्र की थी. एसएचओ मिश्रा ने मौके की फोरैंसिक जांच के लिए एफएसएल टीम को बुला लिया और क्षेत्र के डीसीपी (शाहदरा) प्रशांत गौतम को इस हत्याकांड की सूचना फोन द्वारा दे दी. वह भी घटनास्थल पर आ गए. सारी काररवाई पूरी कर लेने के बाद सायरा परवीन की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में भिजवा दिया गया. डीसीपी प्रशांत गौतम ने एसएचओ बृजेश मिश्रा को इस हत्या के आरोपियों को पकडऩे की जिम्मेदारी सौंपी.

इस के बाद एसआई अनिल यादव आनंद आश्रम की झुग्गियों में जा कर सायरा परवीन के घर पहुंचे तो एक महिला ने दरवाजा खोला, जिस का नाम शाहिदा था. दरवाजे पर पुलिस को देख कर वह घबरा गई, ”क्या हुआ साहब?’’

”क्या सायरा परवीन आप के ही घर से हैं?’’ यादव ने पूछा.

”जी हां, वह मेरी छोटी बहन है. क्या हुआ उसे वह ठीक तो है न साहब?’’

”उसे किसी ने गोली मार दी है, उस की लाश जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में है.’’ एएसआई यादव ने सूचना देते हुए कहा, ”आप सुबह मोर्चरी आ जाना.’’

सायरा परवीन की हत्या की खबर सुनते ही शाहिदा दहाड़ें मार कर रोने लगी, जिस से घर में सभी जाग गए. एएसआई ने अब वहां रुकना ठीक नहीं समझा. वह थाने के लिए लौट गए.

शाहदरा जोन के डीसीपी प्रशांत गौतम ने एसीपी मुकेश वालिया के सुपरविजन में सायरा परवीन हत्याकांड का केस जीटीबी एनक्लेव थाने के एसएचओ ब्रजेश मिश्रा के सुपुर्द कर के एक टीम उन के नेतृत्व में बना दी. इस टीम में एसआई अनिल कुमार, मनीष कुमार, एएसआई अनिल यादव, सुनील कुमार, हैडकांस्टेबल मनोज कुमार, कांस्टेबल अभय कुमार और तनुज को शामिल किया गया. इंसपेक्टर इनवेस्टीगेशन देवेंद्र कुमार भी इस टीम का हिस्सा बने. थाना पुलिस के अलावा इस केस की जांच में क्राइम ब्रांच की इंटरस्टेट सेल को भी लगा दिया गया था.

सेल के एसीपी रमेश लांबा के नेतृत्व में एक पुलिस टीम जांच में जुट चुकी थी. टीम में इंसपेक्टर पंकज मलिक और रोहित कुमार के अलावा हैडकांस्टेबल गजेंद्र सिंह, नरेंद्र कुमार, कांस्टेबल रविंद्र कुमार शामिल थे. क्राइम ब्रांच की टीम ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों को चैक किया. टीम को 1-2 कैमरों में सायरा किसी युवक के साथ सड़क पर जाती नजर आई. घटनास्थल के पास भी एक सीसीटीवी में सायरा के साथ वही युवक नजर आया.

करनाल में छिपा बैठा था हत्या का आरोपी

इंसपेक्टर पंकज मलिक ने सायरा परवीन की बहन शाहिदा को सीसीटीवी कैमरे की फुटेज दिखाई और उस से पूछा, ”सायरा इस युवक के साथ थी, जानती हो यह कौन है?’’

”इस का नाम रिजवान है साहब. कल शाम को मेरी बहन सायरा को इस ने ही फोन कर के मिलने के लिए बुलाया था. मेरे मना करने पर भी सायरा नहीं रुकी और इस से मिलने के लिए चली गई.’’

”यह रिजवान कहां रहता है?’’

”साहब, यह सुंदर नगरी की झुग्गियों में रहता है. इस की झुग्गी का नंबर ई-57/632 है. मुझे सायरा ने ही यह बताया था.’’

”सायरा रिजवान के संपर्क में कैसे आई, क्या वह रिजवान से प्यार करती थी?’’

”हां साहब. सायरा से रिजवान की दोस्ती हुए ज्यादा समय नहीं हुआ है. पता नहीं रिजवान जैसा गरीब लड़का सायरा को क्यों पसंद आया. वह रिजवान के साथ घूमनेफिरने लगी थी. इसी का ही परिणाम सामने आ गया.’’

इंसपेक्टर पंकज टीम के साथ सुंदर नगरी में रिजवान की तलाश में निकल गए. किंतु रिजवान घर पर नहीं मिला. उस के मोबाइल नंबर को सर्विलांस पर लगा दिया गया. नंबर कुछ समय बंद रहा, फिर ऐक्टिव हो गया. सर्विलांस द्वारा मालूम हुआ रिजवान इस समय हरियाणा के करनाल जिले में है. क्राइम ब्रांच टीम सर्विलांस का सहारा ले कर करनाल जा पहुंची. वहां 19 वर्षीय रिजवान किसी रिश्तेदार के यहां छिपा हुआ मिल गया. उसे वहां से गिरफ्तार कर के दिल्ली लाया गया और क्राइम ब्रांच ने उसे जीटीबी एनक्लेव थाना पुलिस के हवाले कर दिया गया.

थाने में उस से पूछताछ की गई तो उस ने सायरा से हुई मोहब्बत की पूरी दास्तान पुलिस को सुना दी, जो इस प्रकार थी. दोढाई महीने पहले की बात है. रिजवान वैल्डिंग का काम करने आनंद ग्राम गया था, वहीं पर उस ने पहली बार सायरा को देखा था और उस की खूबसूरती पर मर मिटा था. बातचीत के दौरान उस ने सायरा का फोन नंबर ले लिया था. इस के बाद दोनों की फोन पर बातचीत और चैटिंग होने लगी. धीरेधीरे दोनों नजदीक आ गए और प्यार करने लगे. रिजवान ने बताया कि सायरा अच्छी लड़की नहीं थी, होती तो वह उसे क्यों मारता. वह दूसरे लड़कों से बातें करती थी. रिजवान ने यह देखा तो उस ने ऐसा करने से मना किया.

वह नहीं मानी तो रिजवान ने प्लान बना कर उसे मिलने के लिए सुंदर नगरी बुलाया. वह उसे एलआईजी फ्लैट की तरफ ले गया. और सुनसान जगह पर उस ने उसे गोली मार दी. सायरा को मारने के बाद रिजवान ने दोस्त फिरोज खान उर्फ अनिल की मदद ली, वह अपनी बाइक से उसे एक रिश्तेदार के पास करनाल छोड़ आया, जहां से पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस टीम ने फिरोज खान उर्फ अनिल को भी उसी रात सुंदर नगरी से पकड़ लिया.

किशन ने क्यों मरवाया गवाह सायरा को

फिरोज खान से एसएचओ ब्रजेश मिश्रा ने पूछताछ की तो उस ने चौंकाने वाला बयान दिया, ”साहब, मैं रिजवान की हेल्प नहीं करना चाहता था, लेकिन उस ने मुझे 5 हजार रुपए देने का वादा किया. उस ने कहा कि किशन से जब एक लाख रुपया मिल जाएगा, वह उसे खुश कर देगा इसलिए मैं उसे अपनी बाइक नंबर डीएल 96बीएफ 8410 से करनाल ले कर गया था.’’

इंसपेक्टर ब्रजेश मिश्रा ने रिजवान से पूछा, ”रिजवान, तुम्हारे दोस्त फिरोज ने हमें बताया है कि तुम ने सायरा परवीन की हत्या करने की सुपारी एक लाख रुपए किसी किशन से ली है. क्या यह सच है? देखो, सच बोलोगे तो मार से बच जाओगे. वरना…’’

रिजवान मार के नाम से ही थरथर कांपने लगा. उस ने स्वीकार कर लिया कि किशन से सायरा की हत्या करने का सौदा एक लाख में हुआ है, किशन ने मुझे आधा एडवांस दे दिया था.

”यह किशन कौन है? उसे सायरा परवीन की हत्या क्यों करवानी थी?’’

”साहब, पिछले साल नवंबर में नंदनगरी में हुए राहुल मर्डर केस में सायरा परवीन मुख्य गवाह बनाई गई थी. किशन उस निर्दोष राहुल का चाचा है, जिस का कत्ल हुआ था. चूंकि सायरा परवीन उन बदमाशों की मुंहलगी प्रेमिका थी. किशन को डर था कि सायरा मर्डर केस में मुख्य गवाह तो बन गई है, लेकिन बदमाश उसे डराएंगे तो वह कोर्ट में बयान बदल देगी. इसलिए उस ने सायरा को इस केस के रास्ते से ही हटा दिया.’’

”ओह!’’ श्री मिश्रा हैरानी से बोले, ”तुम ने जो खुलासा किया है, वह सायरा मर्डर के तार राहुल मर्डर केस से जोड़ रहा है.’’

श्री मिश्रा ने तुरंत फोन द्वारा यह जानकारी डीसीपी प्रशांत गौतम और एसीपी मुकेश वालिया को दे दी.

इस के बाद इंसपेक्टर ब्रजेश मिश्रा ने किशन को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस टीम सुंदर नगरी भेज दी. किशन अपने घर में इत्मीनान से सो रहा था. उसे खुशी थी कि रिजवान ने सायरा परवीन का कत्ल कर के उस के भतीजे राहुल का केस कमजोर होने से बचा लिया है. पुलिस ने उसे सोते हुए दबोच लिया और थाने में ले आई. सुबह डीसीपी (शाहदरा) प्रशांत गौतम और एसीपी मुकेश वालिया ने प्रैसवार्ता की. उस में तीनों आरोपी किशन कुमार, फिरोज खान उर्फ अनिल और सायरा परवीन के कातिल रिजवान को प्रैस वालों के सामने खड़ा कर के डीसीपी प्रशांत गौतम ने इस केस का खुलासा किया.

सायरा परवीन अपने अब्बू और अम्मी अपनी बहन शाहिदा के पास रहने लगी थी. वह शुरू से ही स्वच्छंद खयालों वाली थी. अम्मी उसे समझाती थी कि जमाना खराब है, गलत लोगों की संगत में मत रहा कर. लेकिन सायरा मानती नहीं थी. अम्मी के बाद बहन शाहिदा के यहां रहने पर भी उस का यही रवैया बना रहा. सायरा का बड़ा भाई जावेद चोरी के इल्जाम में मंडोली जेल में बंद था. सायरा उस से मिलने जेल जाती थी तो उस की पहचान वहां बंद रहमत उर्फ लंगड़ा से हो गई. लंगड़ा बदमाश है, उस का दिल सायरा पर आ गया.

जब वह जमानत पर जेल से बाहर आया तो उस ने मौजमस्ती के इरादे से सायरा को बाजार में रात के वक्त बुलाया. वहां रहमत के संग बदमाशी लाइन में उतरे सलमान, अरबाज भी थे. वह सायरा को जबरदस्ती पार्क में ले जाने लगे तो किशन और भतीजे राहुल ने सायरा को सलमान के पंजे से बचाया. फिर इन लोगों ने राहुल की हत्या कर दी. पुलिस ने सायरा परवीन की हत्या के मामले में गिरफ्तार आरोपियों रिजवान, फिरोज खान उर्फ अनिल और किशन कुमार के खिलाफ बीएनएस की धारा 103/1, 61(2) व 3/25 आम्र्स एक्ट के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Stories in Hindi Love

 

 

Hindi Crime Story : हनीमून में बीवी लाई मौत

Hindi Crime Story : 21 वर्षीय राज कुशवाहा इंदौर में स्थित सोनम रघुवंशी (24 वर्ष) के भाई की प्लाईवुड फैक्ट्री में नौकरी करता था. वहीं पर सोनम को राज कुशवाहा से प्यार हो गया. दोनों ने जीवन भर साथ रहने का वादा कर लिया. इसी दौरान फेमिली वालों ने सोनम की शादी राजा रघुवंशी से कर दी. फिर प्रेमी राज कुशवाहा के साथ मिल कर सोनम ने हनीमून के बहाने पति राजा रघुवंशी को ठिकाने लगाने की ऐसी योजना बनाई, जिस की गूंज पूरे देश में फैल गई.

सोनम रघुवंशी नहीं चाहती थी कि उस की शादी उस के प्रेमी राज कुशवाहा के अलावा किसी और के साथ हो, लेकिन उस के न चाहते हुए भी पेरेंट्स ने उस की शादी राजा रघुवंशी के साथ तय कर दी थी. शादी तय हो जाने के बाद वह बहुत परेशान थी, क्योंकि तनमन से वह प्रेमी राज की थी. इसलिए वह ताउम्र उसी के साथ रहना चाहती थी. उस ने प्रेमी को फोन कर कहा, ”राज, पापा ने मेरी शादी तय कर दी है. और मालूम है शादी की तारीख क्या है, 11 मई 2025.’’

”शादी से क्या होता है सोनम, कागज के एक टुकड़े और कुछ मंत्र पढ़ देने से कोई रिश्ता नहीं बनता.’’ राज ने उसे आश्वस्त करते हुए कहा.

”राज, मैं किसी और की नहीं हो सकती. मैं सिर्फ तुम्हारी हूं और अगर तुम ने मुझे नहीं अपनाया तो मैं सच कह रही हूं, मैं मर जाऊंगी. आज वो जो लड़का मुझे देखने आया था राजा रघुवंशी, वो मुझे देख कर मुसकरा रहा था. जिसे देख कर मेरे अंदर ऐसी आग लग रही थी कि एक घूंसा मार कर उस की वो मुसकान वहीं दबा दूं. पर पापा वहीं थे, इसलिए कुछ कर नहीं पाई. लेकिन मेरी बात ध्यान से सुन लो राज, अगर तुम ने मेरा साथ नहीं दिया तो मैं दुनिया में ऐसा तूफान ला दूंगी कि लोग मेरे नाम से भी डरेंगे. मैं सब कुछ जला दूंगी खुद को, इस दुनिया को और हर रिश्ते को.’’

”तुम मेरी थी, मेरी हो और मेरी ही रहोगी सोनम,’’ राज ने कहा.

”मैं सिर्फ तुम्हारे लिए बनी हूं राज, किसी और के लिए नहीं.’’

”चिंता मत करो और विश्वास रखो सोनम, अगर उस की परछाई भी तुम्हें छुएगी तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगा.’’

”मैं तुम्हें पहले ही बता चुकी हूं, पापा हार्ट के पेशेंट हैं. मैं ऐसा कोई भी कदम नहीं उठा सकती, जिस का उन की सेहत पर असर हो. घर से भाग कर कहीं और जा कर रहने का खयाल तो दिल से निकाल दो.’’

”फिर तुम ही कुछ बताओ कि क्या किया जाए?’’

”मेरा आइडिया यह है कि मेरी कदकाठी की कोई लड़की तलाश की जाए. उस की हत्या कर के जला दिया जाए. मेरी स्कूटी में भी वहीं आग लगा दी जाए. यह काम किसी ऐसी सुनसान जगह पर किया जाए, जिस से कि कोई देख न सके. तब यह साबित हो जाएगा कि सोनम मर गई. फिर हम दोनों किसी और शहर में जा कर अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करेंगे.’’

सोनम ने कहा कि घरों में काम करने वाली किसी लड़की की तलाश आसानी से हो सकती है. लेकिन काफी तलाश के बाद भी घर में साफसफाई चौकाबरतन करने के लिए ऐसी कोई लड़की हाथ नहीं लगी, जिस की कदकाठी सोनम जैसी हो. इस से राज ने राहत की सांस ली. इस की वजह यह थी कि इस से राज और उस के परिवार की जिंदगी ही तबाह हो जाती. घर में आर्थिक साधन जुटाने के लिए वह अकेला ही था. घर का खर्च उस के वेतन में मुश्किल से चल पाता था. सोनम अगर अपने घर वालों के लिए मर गई होती तो नई परेशानी ही खड़ी हो जाती. यदि वह घर से 30 या 40 लाख रुपए ले कर भी आ जाती तो भी कब तक उस से गुजारा होता.

सेफ गेम खेलना चाहता था राज कुशवाहा

दूसरी जगह दोनों को नौकरी मिलना भी आसान नहीं था. कोई बिजनैस करने के लिए बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता. इस तरह राज भी अपने परिवार के लिए एक तरह से मर ही चुका होता. राज कुशवाहा ने सोनम को समझाया कि इस तरह की दुर्घटना से तुम्हारे पापा तुम्हारी मौत का सदमा शायद बरदाश्त नहीं कर पाएंगे. अगर हार्टअटैक से बच भी जाएं तो जीते जी भी उन की मौत हो जाएगी. उस की पहली योजना घर से भागने की भी मेरी समझ से परे थी, क्योंकि उस का अंजाम भी वही होता. आर्थिक संकट से राज का परिवार ही नहीं, बल्कि राज और सोनम भी जूझ रहे होते.

यह सोच कर राज ने उस की दोनों ही योजनाओं को फेल करने में पूरा दिमाग लगा दिया. वह चाहता था कि सोनम से शादी कर के फैक्ट्री का मालिक बन जाएगा, जिस में अब तक नौकरी करता था. वह ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहता था, जिस से कि सोने के अंडे देती मुरगी उस के हाथ से निकल जाए.

सोनम की शादी की तारीख करीब आ चुकी थी. उस की चिंता बढ़ती जा रही थी. सोनम की चिंता दूर करने के लिए राज ने एक ऐसा प्लान तैयार किया, जिसे सुन कर सोनम खुशी से उछल पड़ी. उस ने कहा, ”इस का मतलब यह है कि मैं विधवा हो जाऊंगी और बिरादरी का कोई व्यक्ति विधवा से शादी करने के लिए आसानी से तैयार नहीं होगा. फिर विधवा से शादी किसी और बिरादरी के युवक से करने के लिए मेरे पापा भी राजी हो जाएंगे. यानी हम दोनों पतिपत्नी के रूप में जिंदगी बिता कर अपने सपनों को साकार कर सकेंगे. बहुत बढिय़ा.’’

”लेकिन एक वादा करो,’’ राज ने कहा.

”क्या?’’

”शादी के बाद उस दुष्ट को सुहागरात की रस्म अदा करने नहीं दोगी.’’

”इस का मतलब यह कि मुझे सुहागन बनते ही यानी सुहागरात मनाने से पहले विधवा करना चाहते हो.’’ सोनम ने मुसकराते हुए कहा, ”यह पक्का वादा है, मुझे चाहे जो भी जतन करना पड़े, मैं उसे सुहागरात को हाथ नहीं लगाने दूंगी.’’

इंदौर मध्य प्रदेश का सब से बड़ा और सब से व्यस्त शहर है. यह ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और व्यावसायिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है. यह शहर एक तरफ अपने गौरवशाली अतीत की गवाही देता है तो दूसरी ओर आधुनिकता और प्रगति का प्रतीक भी है. इस शहर का नाम इंद्रेश्वर महादेव मंदिर से लिया गया है, जो अब भी शहर के मध्य में स्थित है.

राजवाड़ा, इंदौर की 7 मंजिला ऐतिहासिक इमारत मराठा, मुगल और फ्रांसीसी वास्तुकला का अद्भुत संगम है. यह शहर के दिल में स्थित है. यह महल होलकर शासकों की विलासिता और कलात्मक रुचि का प्रतीक है. यूरोपीय शैली में बना यह महल अपने भव्य फरनीचर, दीवारों पर सुंदर चित्रों और विशाल गार्डन के लिए प्रसिद्ध है. इंदौर केवल एक शहर नहीं, बल्कि अनुभवों का संगम है, जहां इतिहास बोलता है, स्वाद महकता है, शिक्षा ऊंचाइयां छूती है और स्वच्छता संस्कृति बन जाती है.

इतनी खूबियों वाले इसी शहर में देवी सिंह नाम के एक व्यक्ति निवास करते हैं. उन का एक बेटा गोविंद रघुवंशी और बेटी सोनम रघुवंशी है. उन की पत्नी संगीता रघुवंशी घरेलू काम संभालती हैं. दरअसल, सोनम रघुवंशी का मूल निवास गुना जिला है. सोनम अपने भाई गोविंद से उम्र में छोटी है. गोविंद की शादी करीब 8 साल पहले विदिशा से हुई थी और उस के 2 बच्चे हैं. सोनम का परिवार पिछले कुछ सालों से इंदौर में रह रहा है. बताया जाता है कि उन्होंने गुना से इंदौर आने का फैसला उस वक्त लिया, जब गोविंद ने व्यापार में कदम रखा. शुरुआत में गोविंद एक निजी कंपनी में नौकरी करता था. लेकिन साल 2020 के आसपास उस ने माइका (सनमाइका) के व्यापार में कदम रखा और खुद की कंपनी खड़ी की.

शुरुआत में गोविंद केवल तैयार माल खरीद कर बेचने का काम करता था, लेकिन बाद में उस ने मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाने का फैसला लिया. अब उस की एक माइका मैन्युफैक्चरिंग यूनिट गुजरात में स्थापित है, जहां से वह माल तैयार कर विभिन्न शहरों में सप्लाई करता है. सोनम के परिवार का बिजनैस अग्रणी कारोबार में से एक था. परिवार की इंदौर में एक सनमाइका बनाने की यूनिट है. देवी सिंह को पैरालाइसिस का अटैक हुआ था, जिस के कारण वह फैक्ट्री में सक्रिय भूमिका नहीं निभा पाते. सोनम रघुवंशी और गोविंद रघुवंशी दोनों भाईबहन मिल कर कारोबार संभालते हैं. सोनम अपने ही पिता की कंपनी में बतौर एचआर काम करती थी.

इसी शहर में अशोक रघुवंशी का एक परिवार है. इन के 3 बेटे और एक बेटी है. एक बेटे का नाम सचिन रघुवंशी, दूसरे का विपिन रघुवंशी, तीसरा सब से छोटा 28 वर्षीय बेटा राजा रघुवंशी और बेटी सृष्टि है. उन का ट्रांसपोर्ट का प्रमुख व्यवसाय है. राजा रघुवंशी व 2 बड़े भाई सचिन और विपिन भी संयुक्त परिवार के रूप में रहते हैं.  ‘रघुवंशी ट्रांसपोर्ट’ नामक कंपनी परिवार के सभी लोग 2007 से संयुक्त रूप से चलाते थे. इस कंपनी का मुख्य काम स्कूलों और कोचिंग संस्थानों को किराए पर बसें उपलब्ध कराना है. सोनम रघुवंशी और राजा रघुवंशी दोनों के परिवार का आपस में कोई रिश्ता नहीं था. इन में से कोई एकदूसरे को जानता तक नहीं था. दोनों परिवारों की मुलाकात बहुत ही रोचक तरीके से हुई.

पहली अक्तूबर, 2024 को हर साल की तरह रामनवमी के दिन रघुवंशी समाज का सामूहिक भंडारा आयोजित हुआ था. यह कार्यक्रम इंदौर के रघुवंशी बिरादरी के लिए अपनेअपने बच्चे के लिए अपने ही समाज में लड़का और लड़की के विवाह के लिए रिश्ता तलाशने का एक बेहतरीन माध्यम है.

सामाजिक रीतिरिवाज से हुई शादी

रघुवंशी समाज के लोग रामनवमी के दिन एक स्थान पर एकत्रित होते हैं और यहां पर अपनेअपने बच्चों की जानकारी एक परची में लिख कर रख दिया करते हैं. इस में लड़के या लड़की का नाम, उम्र, पढ़ाई और काम के बारे में जानकारी लिखी होती है. एक तरह से इसे बायोडाटा कहा जा सकता है. रघुवंशी संस्थान बायोडाटा के आधार पर रजिस्ट्रैशन कर लेता है. इस डाटा को व्यवस्थित कर के रघुवंशी समाज की एक पत्रिका जारी की जाती है, जिस में रघुवंशी परिवारों द्वारा रजिस्ट्रैशन में दी गई जानकारी को प्रकाशित किया जाता है. इस पत्रिका में जिसे लड़की की तलाश है तो वो लड़की का बायोडाटा देखता है और जिसे लड़के की तलाश है, वो लड़के का.

यहां सोनम और राजा रघुवंशी के परिवार के लोगों ने भी इन दोनों का रजिस्ट्रैशन कराया था. यहीं से ही इन दोनों का परिवार आपस में मिला. दोनों के परिवार वालों को सब सही लगा. दोनों ही मांगलिक थे. कुंडली भी मिल गई, इसलिए बात शादी तक जा पहुंची. राजा रघुवंशी का एक संपन्न परिवार है. घर में सब से छोटा होने के कारण राजा रघुवंशी की शादी का सब को बहुत अरमान था. शादी समारोह को भव्य बनाने के लिए काफी तैयारी की गई. जम कर पैसा खर्च किया गया.

उधर सोनम का परिवार राजा की टक्कर का परिवार था. सोनम की शादी के भी उस के परिवारजनों को बहुत अरमान थे, लेकिन खर्च करने में काफी कंजूसी की गई और वह उत्साह सोनम की शादी में नजर नहीं आया, जिस की अपेक्षाएं की जा रही थीं. बहरहाल, 11 मई को एक भव्य शादी समारोह हुआ. सात फेरे हुए. सभी सामाजिक और धार्मिक रस्में पूरी की गईं. 12 मई, 2025 को सोनम दुलहन बन कर राजा रघुवंशी के घर आ गई. दोनों परिवार और पतिपत्नी सभी खुश थे. किसी तरह का कोई भी विवाद नहीं था. राजा रघुवंशी की ओर से दहेज की कोई मांग की ही नहीं गई थी.

सोनम 4 दिन ससुराल में रहने के बाद मायके चली गई. मायके से ही सोनम रघुवंशी ने हनीमून का कार्यक्रम भी अचानक बना लिया. सोनम ने अपने पति राजा रघुवंशी को इस बात के लिए राजी किया कि शारीरिक संबंधों के जरिए शादी को परिपूर्ण करने से पहले उन्हें कामाख्या देवी मंदिर में पूजाअर्चना करनी चाहिए. पहले तय हुआ कि दोनों असम के कामाख्या देवी मंदिर जाएंगे. फिर वहीं से कश्मीर के लिए निकल जाएंगे. सोनम अपने मातापिता के घर से सीधे एयरपोर्ट गई, जबकि राजा रघुवंशी अपने घर से 10 लाख रुपए से अधिक के गहने पहन कर निकला था. इस में एक हीरे की अंगूठी, एक चेन और एक ब्रेसलेट शामिल था.

दोनों 20 मई को पहले असम के कामाख्या देवी मंदिर पहुंचे. यह असम के गुवाहाटी शहर में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित है. कामाख्या मंदिर से उन्होंने कश्मीर की जगह मेघालय जाने का प्रोग्राम बनाया. 20 मई, 2025 को ही दोनों मेघालय पहुंचे. 21 मई को राजा और सोनम रघुवंशी शिलांग पहुंचे थे और एक होमस्टे में रुके थे. 22 मई को उन्होंने एक स्कूटी किराए पर ली और सोहरारिम चले गए. शाम तक वे मावलखियात पहुंचे और एक गाइड लिया. गाइड की मदद से वे शिप्रा होमस्टे में रुके. इस के बाद गाइड को उन्होंने छोड़ दिया.

अगले दिन यानी 23 मई को सोनम और राजा रघुवंशी से उन के फेमिली वालों का कांटेक्ट बंद हो गया. दोनों के परिजन चिंतित हो गए और उन के लापता होने की खबरें आम हो गईं. सोनम का भाई गोविंद रघुवंशी और राजा का भाई विपिन रघुवंशी लापता पतिपत्नी की तलाश करने मेघालय पहुंचे. उन्होंने शिलांग की पुलिस से कांटेक्ट किया. उम्मीद के मुताबिक रिस्पौंस न मिलने पर दोनों वापस इंदौर लौट आए. इंदौर के एडिशनल डीसीपी राजेश दंडोतिया से शिकायत की और बात मुख्यमंत्री तक भी पहुंच गई. यहां की सरकार ने मेघालय की सरकार से संपर्क साधा. इस बीच मामला बहुत तूल पड़ चुका था.

मेघालय सरकार की बदनामी होने लगी. यहां की अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत पर्यटकों से है. इस घटना से पर्यटकों में दहशत का माहौल हो गया. पर्यटक देर शाम अपने होटल के कमरों से निकलने में डरने लगे. अफवाह यह थी कि कपल का अपहरण कर के बांग्लादेश ले जाया गया है और उन के सारे पैसे और ज्वैलरी लूट ली गई है. मध्य प्रदेश सरकार ने तो केंद्र सरकार को पत्र लिख कर मामले की सीबीआई जांच करने की सिफारिश भी कर दी. 2 जून, 2025 को फिर राजा रघुवंशी का शव वेईसावडांग झरने के पास गहरी खाई में मिला. शव बुरी तरह सड़ चुका था. राजा के भाई विपिन ने ही शव की पहचान की. वह भी उन के हाथ पर बने ‘राजा’ टैटू से. लेकिन सोनम नहीं मिली.

शुरुआत में लगा कि दोनों का एक्सीडेंट हुआ होगा, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि राजा की हत्या धारदार हथियार से की गई थी. इंदौर शहर के हर घर में इस घटना को ले कर अफसोस जताया जा रहा था, सब लोग सोनम के जिंदा मिल जाने की कामना कर रहे थे. मेघालय पुलिस सोनम को बरामद करने और मामले की गुत्थी सुलझाने के लिए औपरेशन चला रही थी, जिस का नाम ‘औपरेशन हनीमून’ रखा गया. मेघालय सरकार ने एसआईटी गठित कर पुलिस की कई टीमें मामले का राज फाश करने के लिए लगा दीं.

पुलिस को जांच में पता चला कि 22 मई को राजा और सोनम शिलांग के मावलखियात गांव पहुंचे और वहां से नोंग्रियाट गांव में मशहूर ‘लिविंग रूट ब्रिज’ देखने गए. दोनों ने रात एक होमस्टे में बिताई. 23 मई की सुबह 6 बजे दोनों होटल से बाहर निकल आए. किराए की स्कूटी पर सैर के लिए निकले. इस के बाद दोनों रहस्यमय ढंग से लापता हो गए.

टूर गाइडों से मिली खास जानकारी

24 मई की रात को उन की स्कूटी ओसारा हिल्स की पार्किंग में लावारिस हालत में मिली, जो होमस्टे से 25 किलोमीटर दूर थी. 28 मई को जंगल में 2 बैग मिले. मावलाखियात से नोंग्रियात तक की यात्रा पर उन्हें ले जाने वाले गाइड भकुपर वानशाई थे. पुलिस को उन से महत्त्वपूर्ण सुराग हाथ लगे. गाइड ने पुलिस को बताया कि कपल ने 22 मई को फोन किया. उस समय शाम के करीब साढ़े 3 बजे थे, लेकिन मैं ने मना नहीं किया और उन्हें नोंग्रियात तक गाइड करने का फैसला किया. उन्हें शिपारा होमस्टे पर छोडऩे के बाद हम वहां से निकल पड़े.

एक अन्य गाइड अल्बर्ट पीडी भी उन के साथ थे. गाइड ने यह भी बताया कि 3 व्यक्ति इस कपल के साथ और थे. वे तीनों हिंदी में बात कर रहे थे. वह हिंदी कम जानता है, इसलिए समझ नहीं पाया. वानशाई ने कहा कि हम ने अगले दिन (23 मई) के लिए अपनी सेवा की पेशकश की, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया कि उन्हें रास्ता पता है. वानशाई ने अपने पुलिस बयान में कहा कि सोनम ने उन से ज्यादातर बातचीत अंगरेजी में की. केस को खोलने के लिए पुलिस पर बहुत दबाव था, पुलिस की टीमें अपना काम कर रही थीं. वह हत्यारों तक पहुंच गई थी. हत्या के 3 आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया था. इस से पहले 8 मई की रात करीब 11 बजे मेघालय पुलिस पूरे लावलश्कर के साथ कोतवाली महरौनी के ग्राम चौकी पहुंची थी.

यहां राजा रघुवंशी हत्याकांड का आरोपी आकाश कमरे में सोते हुए मिला था. मेघालय पुलिस ने आकाश से पूछा कि सोनम रघुवंशी कहां है? उसे कहां छिपाया है. आकाश ने सोनम के बारे में कोई जानकारी होने से मना कर दिया था. तब परिजनों से सोनम के बारे में पूछताछ की. उन्होंने भी इंकार कर दिया था.  आकाश राजपूत (19 वर्ष) और उस के परिजन के इंकार करने के बाद भी मेघालय और जनपद की पुलिस ने मकान का चप्पाचप्पा छाना. यहां तक कि मकान के टपरे में रखे भूसे के ढेर के अंदर तक सोनम को तलाशा था.

पुलिस की यह काररवाई करीब एक घंटे तक चलती रही. जब पुलिस को यकीन हुआ कि सोनम यहां नहीं है, तब वह आकाश राजपूत और उस के 3 साथियों को अपने साथ ले गई थी. मध्य प्रदेश की पुलिस के सहयोग से मेघालय पुलिस ने इस हत्या में शामिल 3 हमलावरों आकाश राजपूत (19 वर्ष) के बाद विशाल सिंह चौहान (22 वर्ष) और राज सिंह कुशवाह (21 वर्ष) को भी गिरफ्तार कर लिया. इन की गिरफ्तारी के बाद ही नाटकीय ढंग से सोनम ने सरेंडर किया. आधी रात के बाद सोनम उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में स्थित काशी चाय जायका होटल पर पहुंची. यह होटल रात भर खुलता है.

गाजीपुर के नंदगंज थाने के अंतर्गत आता है. होटल संचालक साहिल यादव उस समय मौजूद थे. साहिल यादव से उस ने मोबाइल मांगा. अपने भाई को फोन मिलाया, लेकिन रोती रही बात नहीं कर पाई. साहिल यादव ने सोनम के भाई गोविंद से बात की, उस ने इस होटल का पता बताया. आधे घंटे के भीतर नंदगंज थाना पुलिस वहां पहुंच गई. सोनम को हिरासत में ले लिया गया. मध्य प्रदेश और मेघालय पुलिस को इस की सूचना दी गई. सोनम ने दावा किया कि उसे अगवा करने के बाद उस के साथ क्या हुआ, इस बारे में उसे कुछ याद नहीं है. उस ने कहा कि उसे अंधेरे कमरे में रखा गया था, बाहर की दुनिया से उस का कोई संपर्क नहीं था. वह जैसेतैसे वहां से निकली.

सोनम से पूछताछ के बाद पुलिस ने आनंद कुर्मी को भी पकडऩे में सफलता हासिल की. आरोपी आनंद कुर्मी (23) खिमलासा थाना क्षेत्र के बसाहरी गांव में अपने चाचा भगवानदास कुर्मी के घर में छिपा हुआ था. मेघालय से आई पुलिस टीम ने स्थानीय पुलिस की मदद से आरोपी को पकड़ा. डीएसपी एस.ए. संगमा के नेतृत्व में आई टीम ने आगासौद, खिमलासा और बीना थाना पुलिस के साथ मिल कर घेराबंदी की. आरोपी को पकडऩे के बाद खिमलासा थाने में पूछताछ की गई. एसडीओपी नितेश पटेल ने बताया कि आरोपी का पिता दौलतराम कुर्मी करीब 20-22 साल पहले परिवार के साथ इंदौर चला गया था. आनंद वहां जियोमार्ट में काम करता था. वह मुख्य आरोपी राज कुशवाहा के संपर्क में था. आनंद मूलरूप से भानगढ़ थाना क्षेत्र के मिर्जापुर गांव का रहने वाला है.

पूछताछ में पता चला कि उस के पिता 4 भाई हैं. बड़े भाई हरिशंकर कुर्मी मिर्जापुर में रहते हैं. वहां 5 एकड़ जमीन पर खेती करते हैं. देवाराम और दौलतराम इंदौर चले गए थे. भगवानदास अपनी ससुराल बसाहरी में रह रहे थे. मेघालय पुलिस यहां से कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद पांचों को मेघालय ले गई. शिलांग में ही एफआईआर दर्ज कराई गई. इंदौर से शुरू हो कर शिलांग और फिर गाजीपुर तक राजा रघुवंशी हत्या कांड फैल गया. शिलांग की अदालत से आरोपियों का 8 दिन का रिमांड मिल गया तो फिर प्याज के छिलकों की तरह परतदरपरत मामला खुलता गया.

सोनम और राजा रघंवुशी चेरापूंजी में झरना देखने जा रहे थे. वक्त बीतने के साथ ही सोनम की बेचैनी बढऩे लगी, योजना के अनुसार वह जल्द से जल्द राजा को ठिकाने लगाना चाहती थी, लेकिन सही जगह नहीं मिल पा रही थी. दोपहर 12 बजते ही पीछे से तेजी से आए तीनों किलर्स राजा से अच्छे से बातचीत करने लगे, ऐसे में राजा को भी कोई शक नहीं हुआ. दोपहर करीब डेढ़ बजे सोनम ने राजा की हत्या के लिए अपना प्लान ऐक्टिव किया. इस के तहत उस ने सब से पहले अपनी सास यानी कि राजा की मम्मी को फोन लगाया. उन के साथ मीठीमीठी बातें कीं. इस का मकसद यही था कि वह परिवार को भरोसा दिला रही थी कि सब कुछ ठीक है.

फोन पर बातचीत के दौरान सोनम ने अपने उपवास की भी चर्चा की. सास के कहने पर उन के बेटे राजा से भी कुछ देर बाद बात कराई. चेरापूंजी की करीब 10 किलोमीटर ऊंची चढ़ाई पर एक सेल्फी स्पौट बना था. उस से पहले पार्किंग स्थल था, सोनम राजा एक स्कूटी से गए थे. तीनों किलर्स ने 2 दुपहिया वाहन किराए पर लिए थे. तीनों गाडिय़ां पार्किंग में खड़ी की गई थीं. उस के बाद किलर्स राजा के पीछे चल दिए. वहां पहुंच कर पतिपत्नी मौसम का नजारा कर रहे थे. तभी सोनम ने मौका पाते ही किलर्स को इशारा किया और अपने पति राजा रघुवंशी को सेल्फी के लिए तैयार करने लगी. इतने में पीछे से एक किलर ने कुल्हाड़ीनुमा एक तेज धार वाले हथियार से पूरी ताकत से राजा पर वार कर दिया. राजा नीचे गिर गया. राजा ने उठने की कोशिश की. तभी दूसरे ने दूसरे हथियार से सामने से उस के सिर पर जोरदार वार किया.

योजना के अनुसार की थी राजा की हत्या

राजा वहीं ढेर हो गया, उस के बाद भी मिनी कुल्हाड़ी से एक वार उस पर और किया गया. उस का काम तमाम हो जाने पर और शरीर का सारा खून निकल जाने पर तीनों ने सेल्फी पौइंट पर उसे उठा कर रखा. वहां  करीब 3 फीट ऊंची ग्रिल लगी हुई थी. राजा की लाश को उठा कर नीचे गहरी खाई में फेंकने की तीनों ने कोशिश की, मगर सफलता नहीं मिली. तब सोनम ने आगे बढ़ कर लाश को ऊपर उठा कर खाई में फेंकने के लिए मदद की. ऐसा करने से उन के कपड़ों पर खून लग गया तो उन्होंने खून में सने कपड़े उतार कर वहीं फेंक दिए. उस के बाद तीनों पार्किंग स्थल पर पहुंचे. वहां से तीनों किलर्स वाली 2 स्कूटियों पर बैठ कर चारों निकल लिए.

पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि एक बुरका, जो विशाल ले कर आया था, सोनम को दिया. सोनम वह बुरका पहन कर अकेले वहां से निकली, ताकि बीच में जो टोल आते हैं या सीसीटीवी में उस का चेहरा  कैद न होने पाए. उस के बाद सोनम वहां से गुवाहाटी पहुंची. वहां के आईएसबीटी से वह बस ले कर पटना के लिए और फिर पटना से वह आरा पहुंच गई. आरा से वह लखनऊ पहुंची और लखनऊ से 26 तारीख को इंदौर पहुंच गई. इंदौर में राज कुशवाहा से उस की मुलाकात हुई. देवास नाके के पास एक किराए के फ्लैट में वह 8 जून तक इंदौर में रही. इस बीच राज कुशवाहा ने सोनम की सहूलियत का पूरा खयाल रखा था.

4 जून, 2025 को राजा के शव को इंदौर लाया गया. सोनम ने अपने पति राजा की अर्थी के लिए कफन और फूल मालाओं का इंतजाम कर के अपने प्रेमी राज के हाथ अपनी ससुराल भिजवाया. राजा के परिवार में सब से ज्यादा उस की मम्मी और बहन सृष्टि का रोरो कर बुरा हाल था. पूरे इंदौर में रघुवंशी समाज में रोष व्याप्त था. शोक की लहर दौड़ गई थी. इस के लिए एक दिन कैंडल मार्च का आयोजन हुआ. इस में बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित हुए.

शिलांग के एसपी विवेक सिएम ने प्रैस कौन्फ्रेंस कर कहा कि पहले राजा के कत्ल करने का प्लान गुवाहाटी में था, लेकिन यह प्लान फेल होने पर शिलांग में राजा रघुवंशी मारा गया. 3 बार कत्ल करने का प्रयास किया गया, लेकिन किलर्स असफल हो गए और चौथी बार में हत्या कर पाए. उन्होंने बताया कि राजा मर्डर केस का मास्टरमाइंड राज कुशवाहा है, सोनम ने उस का साथ दिया. पहले दिन की पूछताछ में आरोपियों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. तीनों आरोपी राज कुशवाहा और सोनम के दोस्त हैं, जिस में एक राज का चचेरा भाई था. दोस्ती के कारण तीनों आरोपी हत्या में शामिल हुए. शिलांग एसपी विवेक सिएम ने आगे कहा कि यह मामला सुपारी का नहीं है. तीनों आरोपी भी 19 मई को गुवाहाटी आ गए थे.

पुलिस की जांच में यह भी पता चला कि सोनम रघुवंशी और राज कुशवाहा राजा रघुवंशी की हर हालत में हत्या करना चाहते थे. उन्होंने इस के लिए एक पिस्टल खरीदी थी. यदि कुछ भी नहीं हो पाता तो सोनम सेल्फी देने के बहाने राजा को सेल्फी पौइंट से नीचे गहरी खाई में जिंदा ही धकेल देती. पुलिस को यह भी पता चला कि राज और सोनम ने हीराबाग के फ्लैट में एक बैग छिपाया था. इस बैग में कपड़ों के बीच देसी पिस्टल, 5 लाख रुपए, सोने की चेन, अंगूठी और राजा की हत्या से संबंधित कुछ अन्य सबूत वाली चीजें थीं. मेघालय पुलिस ने पांचों अपराधियों से पूछताछ कर उन्हें जेल भिजवा दिया.

अभी इंदौर में मेघालय पुलिस की टीम एक बैग की तलाश कर रही है. यह ट्रौली बैग मेघालय से विशाल चौहान ने देवास नाका के उस फ्लैट पर पहुंचाया था, जहां पर सोनम हत्या के बाद रुकी थी. अब एक प्रौपर्टी डीलर, जिस का नाम है सिलोन जेम्स, की गिरफ्तारी हुई है. यह वही प्रौपर्टी डीलर है, जिस ने सोनम को राजा रघुवंशी की हत्या के बाद जब सोनम इंदौर लौटी थी तो इंदौर में रेंट पर फ्लैट दिलाया था. गुना का एक सिक्योरिटी गार्ड भी अब शिलांग पुलिस के शक के घेरे में है. पुलिस सूत्रों ने बताया कि सुरक्षा गार्ड बलबीर अहिरवार उर्फ बल्लू को गिरफ्तार कर लिया गया है. इसी मामले में आठवें आरोपी की भी गिरफ्तारी हुई है.

प्रौपर्टी डीलर ने पुलिस को बताया कि किसी स्थान पर बैग जला दिया है. पुलिस ने  उस स्थान की भी जांच की. कुछ नमूने लिए हैं. पुलिस ने उसे मेघालय ले जा कर अदालत में पेश किया. आठवें आरोपी ग्वालियर निवासी लोकेंद्र सिंह तोमर को मेघालय पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जो उस फ्लैट का मालिक है जिस में हत्या के बाद फरार हुई सोनम रघुवंशी इंदौर में छिपी थी.

सोनम की फैक्ट्री में एंप्लाई था राज

राज कुशवाहा गाजीपुर थाना क्षेत्र के रामपुर गांव का निवासी है. राज कुशवाहा के पापा 3 भाई थे. 2 भाई रामपुर सुकेति गांव में अभी भी रहते हैं. 15 साल पहले राज कुशवाहा के पिता की स्थिति अच्छी नहीं थी. वह इंदौर चले गए थे. वहां फल की दुकान लगाने लगे. परिवार की हालत सुधरने पर करीब 10 साल पहले परिवार को वहीं बुला लिया. राज कुशवाहा की मम्मी चुन्नीबाई, बड़ी बहन सुहानी और छोटी बहन प्रिया और राज कुशवाहा अपने पापा के पास इंदौर चले आए. कोरोना काल में उस के पापा परिवार के साथ गांव आ गए. उस समय राज कुशवाहा भी आ गया.

कोरोना काल में ही राज के पापा की मौत हो गई. राज कुशवाहा परिवार के साथ फिर इंदौर आ गया. यहां राज कुशवाहा  प्लाईवुड की एक कंपनी में काम करने लगा. यह कंपनी सोनम रघुवंशी की थी. सोनम के यहां पर राज प्लाईवुड का काम करता था. उस ने ज्यादा तो नहीं, लेकिन हाईस्कूल परीक्षा पास कर रखी थी. इस कंपनी में उसे अकाउंट के काम पर लगा लिया गया. एक दिन राज कुशवाहा सोनम रघुवंशी के केबिन में पहुंचा. उसे देखते ही सोनम रघुवंशी ने पूछा, ”हां बताओ, कैसे आना हुआ?’’

”मैडम, मुझे 5 हजार रुपए की जरूरत है.’’

सोनम मलिकाना तेवर में बोली, ”अभी एक हफ्ता पहले ही तो वेतन मिला है. अभी से एडवांस लेने आ गए.’’

कुछ और खरीखोटी सुनाई. राज कुशवाहा बड़ा निराश हुआ, उस की आंखें डबडबा गईं. औफिस से बाहर जाने के लिए राज कुशवाहा जैसे ही मुड़ा, सोनम की आवाज आई, ”रुपए किस काम के लिए चाहिए?’’

राज कुशवाहा ने कहा, ”मम्मी की तबीयत खराब है. उन के इलाज के लिए जरूरत है.’’ मासूम चेहरे पर बड़ीबड़ी आंखों में छलकते आंसू देख कर सोनम का दिल पसीज गया. सोनम ने दराज से 5 हजार रुपए निकाल कर राज को दे दिए. सोनम के अहसान के बोझ को सिर पर लिए डगमगाते कदमों से राज औफिस से बाहर आ गया. यहीं से उम्र में करीब 5 साल छोटे अपने कर्मचारी राज के लिए सोनम के दिल में हमदर्दी का बीज अंकुरित हो गया. दूसरे दिन फैक्ट्री की साप्ताहिक छुट्टी थी.

अगले दिन राज अपनी ड्यूटी पर समय से फैक्ट्री आ गया और अपने काम में जुट गया. अचानक कदमों की आहट उसे सुनाई दी. उस के टेबल के पास तक कोई आया. इस से पहले कि वह सिर उठा कर देखता, तभी उस के कानों में एक मधुर आवाज सुनाई दी, ”ये लो एक हजार रुपए. यह एडवांस में नहीं जुड़ेंगे. यह मेरी तरफ से अपनी मम्मी की दवाई में खर्च कर लेना. और हां, अब उन की तबीयत कैसी है?’’

इतना सुन कर राज अपनी सीट से उठ कर खड़ा हो गया. नजरें नीची रहीं. अपनी मम्मी की तबीयत के बारे में जानकारी दी. राज ने कहा, ”मैम, आप का दिल कितना बड़ा है, आप जैसे लोग समाज में अब कम ही मिलते हैं. यह एहसान मैं जिंदगी भर नहीं भूल सकता.’’

एक दिन इंदौर के खूबसूरत मार्केट में राज गया था, तभी अचानक किसी ने उसे आवाज दी. उस ने मुड़ कर देखा तो सोनम स्कूटी रोके खड़ी थी. उस ने पास की ही एक कौफी हाउस की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यहां आओ, मैं भी पहुंच रही हूं.

उस दिन फैक्ट्री का साप्ताहिक अवकाश था. कौफी हाउस पहुंच कर दोनों आमनेसामने की सीट पर बैठे. सोनम ने कोई बात नहीं की, बल्कि अपने मोबाइल में मगन रही. वेटर 2 कौफी टेबल पर रख गया. राज नजरें नीचे किए हुए बैठा था. राज को सोनम की उस बात का इंतजार था, जिस के लिए उसे यहां कौफी हाउस में बुलाया था.

अचानक सोनम ने कहा, ”हां राज, बताओ मम्मी की कैसी तबीयत है?’’

सिर झुकाए बैठे राज ने कहा, ”अब तो काफी ठीक है.’’

”चलो, कौफी पियो!’’

राज ने कौफी का कप उठाया. उस की नजर सोनम की तरफ गई तो उस के हाथ कांप गए. बड़ी मुश्किल से कप को गिरने से रोक पाया. फिर भी थोड़ी सी कौफी छलक कर गिरी. सोनम की नजरें उस पर गड़ी थीं, उस प्यार भरी नजरों को कोई भी आसानी से समझ सकता था. कातिलाना नजरें और जादुई मुसकराहट उस के दिल में उतर गई. राज ने बड़ी मुश्किल से अपने आप को संभाला. इस तरह हमदर्दी के साथ प्रेम के बीज की भी बुवाई हो गई.

रातें अब ख्वाबों में और दिन उस की यादों में गुजरने लगे. प्रेम का ये अंकुर धीरेधीरे एक विशाल वृक्ष बनने को बेताब था. उस की बातें जैसे ठंडी हवा की तरह गर्म दुपहरी में सुकून दे रही हों. आंखों ही आंखों में जो बातें होतीं, वो लफ्जों से परे थीं. राज का दिल अब हर धड़कन में उस का नाम लेने लगा. वह साथ हो या न हो, उस की मौजूदगी हर पल महसूस होती. राज को अब समझ आने लगा कि ये सिर्फ आकर्षण नहीं, कुछ गहरा ताल्लुक है.

इस तरह हमदर्दी से शुरू हुआ रिश्ता अब इश्क की दहलीज पर दस्तक दे रहा था. राज के दिन अब मस्ती में गुजरने लगे. आर्थिक संकट भी दूर हो गया था, क्योंकि 20 हजार रुपए महीने की नौकरी में उस के परिवार का गुजारा करना मुश्किल होता था. अब तो ठाट ही ठाट थे. दिन गुजरते गए, प्यार की पींगें बढ़ती रहीं और फिर 2 जिस्म एक जान हो गए. साथ जीनेमरने की कसमें खाई गईं और एकदूसरे का साथ न छोडऩे का वादा किया गया.

राजा रघुवंशी हत्याकांड खुल जाने के बाद मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के. संगमा ने  कहा कि जिन लोगों ने मेघालय को बदनाम किया है, उन्हें माफी मांगनी चाहिए, नहीं तो उन के खिलाफ काररवाई की जाएगी. मेघालय के गृहमंत्री बोले, ”हमारी पुलिस को बेवजह बदनाम किया गया.’’

पुलिस के गले की फांस बन गया था यह केस

मेघालय के गृहमंत्री प्रेस्टोन टेनसांग ने अपने बयान में कहा कि मेघालय पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए. ये बात शुरू से हजम नहीं हो रही थी कि यहां के स्थानीय लोग लूटपाट के लिए किसी पर्यटक की हत्या कर दें. अब हमारी पुलिस ने सब दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया. इस केस में जल्दी से जल्दी तसवीर साफ होना इसलिए भी जरूरी था कि मेघालय में हर साल 11 लाख टूरिस्ट आते हैं. उन के भरोसे के लिए भी ये जरूरी था कि जल्द से जल्द इस केस का खुलासा हो. उधर सोनम रघुवंशी अपने प्रेमी राज कुशवाहा और अन्य लोगों के पकड़े जाने पर इंदौर से गाजीपुर कैसे गई, उस रहस्य का भी पुलिस ने परदाफाश कर दिया. जिस टैक्सी से सोनम इंदौर से उत्तर प्रदेश रवाना हुई थी, उस के ड्राइवर पीयूष तक भी पुलिस पहुंच गई है.

टैक्सी ड्राइवर पीयूष से भी एक घंटे तक क्राइम ब्रांच थाने में पूछताछ की गई. उधर उजाला यादव ने यह दावा किया था सोनम मुझे वाराणसी कैंट स्टेशन पर मिली थी. एक ड्राइवर और एक व्यक्ति उसे वहां तक छोडऩे आए थे. तुरंत ट्रेन न होने पर सोनम वाराणसी के बस अड्डे पर आई और उसी बस में बैठ गई, जिस में वह बैठी थी. उजाला ने बताया कि वह गोरखपुर जाने के लिए कह रही थी. उस ने एक लड़के से फोन करने के लिए मोबाइल मांगा. उस ने नहीं दिया. मुझ से भी उस ने मोबाइल मांगा, मैं ने दिया. एक नंबर डायल कर के डिलीट कर दिया. काल नहीं की.

ऐसा हो सकता है कि उस के पास कोई मोबाइल होगा. कहीं बीच में उस के पास काल आई होगी कि सभी लोग पकड़े गए हैं. गाजीपुर ही उतर जाए. गाजीपुर उतर कर उस ने वह छोटा मोबाइल नष्ट कर दिया होगा. तभी वह रात के 2 बजे चाय की दुकान पर पहुंच गई. वरना राज और सोनम का इरादा गोरखपुर से नेपाल भाग जाने का था. राज इतना शातिरदिमाग होगा, यह अंदाजा किसी को नहीं था.  ऐसा प्लान पेशेवर अपराधी भी नहीं बना पाते. यदि मामला हाईप्रोफाइल नहीं बनता तो सोनम और राज अपनी योजना में सफल हो जाते. वह तो मेघालय की पुलिस ने ड्रोन कैमरे से रघुवंशी की डेडबौडी तलाश कर ली थी.

एक तरफ राजा की मम्मी हैं, जिन्होंने अपने जिगर के टुकड़े को खोया है, उन पर क्या बीत रही होगी. दूसरी तरफ सोनम की मम्मी का दर्द है, जिसे मर्डर की मास्टरमाइंड बताया जा रहा है. तीसरी मां उस आरोपी राज की है, जिसे सोनम का बौयफ्रेंड बताया जा रहा है. तीनों मां का अपना अलगअलग दर्द है. राज कुशवाह की मम्मी चुन्नीबाई, बड़ी बहन सुहानी और छोटी बहन प्रिया मानने को तैयार नहीं हैं कि राज कुशवाहा राजा रघुवंशी की हत्या कर सकता है. सुहानी ने कहा, ”मेरा भाई ऐसा कर ही नहीं सकता. वह तो सोनम को दीदी कहता था.’’

जहां मृतक राजा की बहन सृष्टि अपने भाई के खोने का दर्द बयां कर रही है, वहीं आरोपी सोनम के प्रेमी राज कुशवाहा की बहन अपने भाई को बेगुनाह बताते हुए साजिश का आरोप लगा रही है. दोनों बहनों का दर्द, एक भाई की हत्या और दूसरे की गिरफ्तारी ने इस हनीमून मर्डर को और मार्मिक बना दिया है. Hindi Crime Story

 

 

Hindi Love Story : सूटकेस में मिली प्रेमिका

Hindi Love Story  : 24 साल की अनन्या निषाद और 22 साल के विशाल साहनी के बीच 5 साल पुराना प्यार था. प्रेमी की खातिर अनन्या अपने पति को भी छोड़ आई थी. अब वह प्रेमी से शादी करने के सपने संजोए थी. इसी बीच 27 फरवरी, 2025 को एक सूटकेस में अनन्या की लाश मिली. आखिर किस ने की उस की हत्या?

प्रेमिका अनन्या द्वारा पति का घर छोड़ कर वापस लौट आने से विशाल बहुत खुश था, लेकिन शादी वाली बात सुन कर पता नहीं क्यों उस ने अजीब सा बरताव अख्तियार कर लिया था. मतलब अभी शादी की इतनी जल्दी क्या है, अभी अपने पैरों पर और मजबूती से खड़ा हो जाऊं, तब शादी करूंगा, ताकि परिवार बढ़े तो उन्हें सुख से पालापोसा जा सके. अनन्या निषाद अपना मायका (बनारस) छोड़ कर जौनपुर आ गई. यहां उस ने पौश इलाका मछलीशहर मोहल्ले में वकील विमलेश का एक कमरा किराए पर ले लिया और अकेली रहने लगी थी.

उस की माली हालत इतनी मजबूत नहीं थी कि घर बैठे जीवन खुशहाली से बिता सके, फिर घर पर अकेली बैठेबैठे बोर भी हो जाती थी. इसलिए उस ने कोई जौब करने का मन बना लिया था. फिर क्या था, मकान मालिक वकील की मदद से इस्टाइल बाजार स्थित एक शौपिंग माल में जौब शुरू कर दी तो उस की माली हालत में सुधार भी होने लगा और अच्छे से समय भी कटने लगा था. रात ड्यूटी से वापस घर लौटने के बाद वह विशाल से घंटों प्यार भरी बातें करती थी. और जल्द शादी करने के लिए उस पर दबाव भी बना रही थी.

विशाल साहनी अपना मन बदल चुका था. दरअसल, जो विशाल अपनी अनन्या से टूट कर अंधा प्यार करता था, उस के दिल में अब वह प्यार नहीं रह गया था. उसे अनन्या अब जूठन लगने लगी थी. दिखावे के लिए वह उस पर जान छिड़कता था, लेकिन भीतर ही भीतर उस से नफरत करने लगा था. विशाल सिर्फ उस के सुंदर और गदराए बदन से प्यार करने लगा था ताकि वह अपनी कामपिपासा की आग को समयसमय पर बुझा सके.

अनन्या विशाल के इस घृणित विचार से नावाकिफ थी. वह तो आज भी उसे समुद्र की गहराइयों जैसे ही प्यार करती थी और विश्वास भी, लेकिन विशाल के मन में क्या चल रहा है, इस से वह अनभिज्ञ थी. इसी साल के फरवरी महीने के पहले सप्ताह में केरल से विशाल बनारस अपने घर आया था. अनन्या का मोबाइल नंबर उस के पास था ही. दोनों फोन पर घंटों मीठीमीठी प्यार भरी बातें करते थे. अनन्या उस से शादी करने की बात कहना नहीं भूलती थी. अनन्या के बारबार शादी करने के दबाव से अब विशाल बुरी तरह परेशान रहने लगा था और अनन्या से जल्द से जल्द छुटकारा पाने के उपाय ढूंढने लगा था. अनन्या एक तरह से उस के गले की हड्डी बन गई थी.

अनन्या नाम की गले की हड्डी से कैसे छुटकारा पाया जाए, इस के लिए वह तरकीबें ढूढने लगा. एक तरकीब उस के मन में खतरनाक रूप ले चुकी थी, वह तरकीब थी अनन्या की मौत. यानी इस से छुटकारा पाने के लिए उसे मरना होगा. प्लान के मुताबिक, 24 फरवरी, 2025 की शाम 4 बजे विशाल बनारस से बस से जौनपुर के लिए चला और रात 8 बजे जौनपुर पहुंच गया. 2 घंटे इधरउधर बिता कर रात 10 बजे अनन्या के कमरे पर पहुंचा. उस ने प्रेमिका अनन्या को फोन पर पहले ही बता दिया था कि वह उस से मिलने जौनपुर आ रहा है.

प्यार से मिलन के जमीं पर पलक पांवड़े बिछाए अनन्या विशाल के आने का बेसब्री से इंतजार करने लगी थी. उस समय वह कितनी खुश थी, यह किसी से बता नहीं सकती थी. आखिरकार इंतजार की घडिय़ां रात 10 बजे तब खत्म हुईं, जब विशाल को अपने सामने खड़ा पाया. उसे देख कर वह फूली नहीं समा रही थी. बहरहाल, अनन्या और विशाल देर रात तक जागते रहे. दोनों ने साथसाथ खाना खाया और फिर सो गए. विशाल को नींद नहीं आ रही थी, क्योंकि उस के मन में  अनन्या को मौत के घाट उतारने की उथलपुथल मची हुई थी, लेकिन रात में बात नहीं बनी तो उस की आंखें कब लग गईं, उसे पता नहीं चला.

रोज की तरह अगली सुबह यानी 25 फरवरी को भी अनन्या अपने नियत समय पर उठ कर तरोताजा हुई और फिर नाश्ता बना कर तैयार कर दिया था. विशाल सुबह 9 बजे के करीब उठा और फ्रेश हो कर दोनों ने एक साथ बैठ नाश्ता किया. फिर अनन्या खाना बनाने किचन में चली गई, क्योंकि उसे ड्यूटी भी तो जाना था. इसी दरमियान अनन्या ने अपनी शादी करने की बात विशाल से फिर छेड़ दी थी. शादी की बात सुन कर वह भीतर ही भीतर जलभुन उठा और गुस्से से लाल हो गया, ”अरे, कर लूंगा शादी. तुम शादी करने के लिए इतना परेशान क्यों रहती हो. अच्छा समय देख कर शादी कर लेंगे. थोड़ा सा हमें और समय दे दो.’’ विशाल ने अनन्या को समझाने की कोशिश की.

”देखो विशाल, हमें तुम धोखा तो नहीं दोगे. मैं ने अपने प्यार के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी है. पति का घर छोड़ा, मम्मीपापा का घर छोड़ा, सिर्फ तुम्हारे लिए. अगर तुम ने मुझे धोखा दिया तो…’’

”…तो क्या कर लोगी. जाओ, नहीं करता शादी.’’

इतना सुनते ही अनन्या का गुस्सा भी सातवें आसमान पर चढ़ गया. उस समय विशाल वहीं किचन के दरवाजे के सामने खड़ा बातें कर रहा था. उस ने आव देखा न ताव, स्लैब पर रखा चावल निकालने वाला पल्टा ले विशाल पर घायल शेरनी की तरह टूट पड़ी. यह देख कुछ पल के लिए विशाल घबरा गया था. पहली बार उस ने अनन्या का यह रूप देखा था. फिर क्या था विशाल और अनन्या के बीच गुत्थमगुत्थी हो गई. अपनी जान बचाने के लिए विशाल ने उस के हाथ से पल्टा छीन लिया और उसी पल्टे से उस के सिर पर कई वार किए. वार इतना जोरदार था कि अनन्या वहीं किचन में कटे वृक्ष की तरह फर्श पर धड़ाम से गिर गई और थोड़ी देर में ही उस की मौत हो गई.

कुछ देर बाद जब विशाल का गुस्सा शांत हुआ तो फर्श पर निढाल पड़ी अनन्या को हिलाडुला कर देखा तो उस के होश उड़ गए. उस की सांसें बंद थीं, यानी वह मर चुकी थी. यह देख कर वह घबरा गया और उस के दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. उस की आंखों के सामने जेल की सलाखें दिखने लगी थीं, लेकिन वह जेल नहीं जाना चाहता था. फिर क्या था? किचन में अनन्या की लाश छोड़ कर विशाल दरवाजे पर चिटकनी लगा कर कमरे में लौट आया. कमरे में नजर घुमा कर चारों ओर देखा तो उसे एक कोने में लाल रंग का बड़ा सा सूटकेस दिखाई दिया.

झट से खोल कर उस ने देखा, उस में अनन्या के रोजमर्रा के कपड़े और कुछ सामान था. फटाफट उस ने सूटकेस खाली किया और सारा सामान वहीं फर्श पर उड़ेल दिया. उसी लाल रंग के सूटकेस में उस ने अनन्या की लाश तोड़मरोड़ कर भर दी. लाश ठिकाने लगाने के लिए वह कुछ देख के लिए कमरे पर ताला लगा कर भाड़े का टैंपो लेने चला गया, टैंपो वाले से उस ने यह बताया था कि कुछ भारी सामान है, रिश्तेदार के यहां पहुंचाना है तो टैंपो वाला तैयार हो गया. फिर टैंपो ले कर वह घर पहुंचा. विशाल लाल सूटकेस को कंधे पर लाद कर बाहर ले आया और टैंपो पर लाद दिया.

वहां से वह कोतवाली के वाजिदपुर तिराहे पर उतर गया और भारी सूटकेस को कंधों पर लाद कर कमला हौस्पिटल के सामने स्थित झाडिय़ों में फेंक कर बनारस के लिए बस पकड़ कर चल दिया. सबूत मिटाने के लिए उस ने अनन्या का फोन अपने पास रख लिया था, ताकि ट्रेस कर के पुलिस किसी भी तरह उस तक न पहुंच सके. उस समय सुबह के 10 बज कर 34 मिनट हो रहे थे. अनन्या निषाद की हत्या का विशाल साहनी को काफी दुख था और पश्चाताप भी. अपने पश्चाताप को कम करने के लिए उस ने सिर मुड़वा दिया और गंगा घाट पहुंच कर नदी में डुबकी लगा कर खुद को पापमुक्त होने का अहसास किया.

यही नहीं, सबूत मिटाने के लिए अपने साथ लाए अनन्या के मोबाइल फोन को नदी में प्रवाहित भी कर दिया. फिर आराम से अपने घर बनारस लौट गया. इधर 27 फरवरी, 2025 की सुबह एक राहगीर ने झाड़ी के पास लाल रंग का सूटकेस देखा तो उस का मन चहक उठा और वह यह सोच कर उस ओर बढ़ा था कि उस में शायद माल भरा होगा. यह सोच कर जैसे ही उस ने सूटकेस की थोड़ी सी चेन खोली तो उस में से पैर निकल आया. यह देख कर उस के मुंह से चीख निकल पड़ी और वह उलटे पांव ‘लाश..लाश’ चिल्लाते हुए बाहर भागा. थोड़ी देर में वहां तमाशबीनों की भारी भीड़ जमा हो गई थी, उसी भीड़ में से किसी ने कोतवाली थाने को फोन कर दिया था.

सूटकेस में लाश पाए जाने की सूचना पा कर कोतवाल मिथिलेश मिश्र कुछ पुलिसकर्मियों के साथ मौके पर पहुंच गए. सूटकेस खोल कर देखा तो उस में किसी महिला की लाश थी, जो बुरी तरह सड़ चुकी थी. पहनावे से वह किसी मध्यमवर्गीय परिवार की लग रही थी. मौके पर जमा तमाशबीनों से कोतवाल मिश्रा ने शिनाख्त कराने की कोशिश की, लेकिन उस की शिनाख्त न हो सकी. कोतवाल मिथिलेश मिश्र ने लाश मिलने की सूचना एसपी डा. कौस्तुभ, एएसपी (सिटी) अरविंद वर्मा और ट्रेनी आईपीएस सीओ (सिटी) आयुष श्रीवास्तव को दे दी थी. सूचना पा कर सभी पुलिस अधिकारी थोड़ी देर में मौके पर पहुंच गए थे.

खैर, लाश की शिनाख्त नहीं हुई तो कोतवाल मिथिलेश ने पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया था. इस के अगले दिन यानी 28 फरवरी की सुबह में अनन्या के पेरेंट्स उसे ढंूढते हुए जौनपुर कोतवाली थाने पहुंचे, बेटी की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए. दरअसल, बेटी भले ही मायके से दूर रहती थी, पेरेंट्स भले ही उस से नाराज रहते थे, लेकिन मोबाइल पर उस से बातें होती रहती थीं. अनन्या की मम्मी 25 फरवरी से ही बेटी से बात करने के लिए उस के मोबाइल पर काल कर रही थी. हर बार उस का फोन स्विच औफ बता रहा था.

यह देख कर वह बुरी तरह से परेशान थी और पति से यह बात बताई. बेटी का पता लगाने के लिए ही 28 फरवरी को पेरेंट्स बनारस से जौनपुर चले थे. जिस कमरे में रहती थी. मकान मालिक से पूछने पर पता चला कि अनन्या 25 फरवरी से ही नहीं दिख रही थी. उस के कमरे में ताला जड़ा था. किसी अनहोनी को देखते हुए पेरेंट्स कोतवाली पहुंच कर बेटी की गुमशुदगी की सूचना लिखाने पहुंचे थे. कोतवाल मिथिलेश मिश्र ने बीते दिन मिली अज्ञात युवती की लाश की तसवीर उन्हें दिखाई और पहचान करने के लिए कहा. तसवीर देखते ही पेरेंट्स फफकफफक कर रोने लगे. मतलब यह था कि युवती उन की बेटी थी और उस का अनन्या नाम था.

लाश की शिनाख्त हो जाने से कोतवाल मिथिलेश मिश्र ने थोड़ी राहत भरी सांस ली. फिर उन्होंने किसी पर आशंका होने की बात पूछी तो जय कुमार ने बताया 24 फरवरी को जब बेटी से बात हो रही थी तो उस ने गांव के ही विशाल साहनी के वहां आने की जानकारी दी थी. विशाल ने ही कोई कांड किया होगा. यह जानकारी उन्होंने एसपी डा. कौस्तुभ और एएसपी (सिटी) अरविंद वर्मा को दे दी. फिर विस्तार से उन्होंने पूरी बात बताई.

इस के बाद पुलिस विशाल साहनी को गिरफ्तार करने वाराणसी पहुंची और उस के फोन नंबर को सर्विलांस पर भी लगा दिया. पहली मार्च 2025 की सुबह विशाल की लोकेशन जौनपुर जंक्शन पर मिली तो पुलिस की तत्परता से वह गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस पूछताछ में विशाल ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया था. उस की निशानदेही पर किचन से पल्टा भी बरामद कर लिया गया. विशाल से पूछताछ के बाद अनन्या की हत्या की जो स्टोरी सामने आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के मूड़ादेव टिहरी के रहने वाले थे विशाल और अनन्या निषाद के घर थोड़ी दूरी पर विपरीत दिशाओं में थे. चूंकि दोनों एक ही जातिबिरादरी के थे, ऊपर से पट्टीदार भी, इसलिए दोनों परिवार ही एकदूसरे के सुखदुख में एक पैर पर खड़े रहते थे. यहां तक कि शादीब्याह में भी दोनों एकदूसरे की भरपूर मदद करते थे. अनन्या के पिता का नाम जय कुमार निषाद था तो राकेश कुमार साहनी विशाल के पिता थे. दोनों ही अलगअलग प्राइवेट कंपनियों में काम करते थे और बड़े खुशहाल से उन का परिवार चलता था.

जय निषाद के 4 बच्चों में अनन्या निषाद सब से बड़ी थी. राकेश साहनी के 3 बच्चों में विशाल साहनी सब से बड़ा था. फिलहाल, अनन्या विशाल से करीब 2 साल बड़ी थी. बचपन की गलियों में साथसाथ दोनों चले और बड़े हुए. साथसाथ खेले और स्कूल में भी साथसाथ पढ़े. अनन्या ने बचपन की गलियों को छोड़ कर जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो इस की सब से पहले खुशबू विशाल तक पहुंची थी. अनन्या ने विशाल की आंखों के रास्ते उस के दिल में मुकाम बना लिया था. उठतेबैठते, हंसतेखेलते, सोतेजागते और दिनरात, हर घड़ी, हर पल अनन्या की तसवीर उस के आंखों के सामने घूमती रहती थी. एक दिन उसे न देखे तो वह बेचैन हो जाता है.

ऐसा नहीं था कि यह आलम एक ओर ही था, बल्कि अनन्या का भी हाल ऐसा ही था. जब से विशाल को देखा था, अपने दिल के कोरे कागज पर उस का सुनहरे अक्षरों में नाम लिख दिया था. विशाल और अनन्या एकदूजे से दिलोजान से प्यार करने लगे थे. लेकिन दोनों अपने प्यार का इजहार करने में झिझक रहे थे. एक दिन विशाल ने अनन्या से जरूरी बात करने के लिए बगीचे में बुलाया. नियत समय पर अनन्या वहां पहुंच गई.

”तुम से कुछ कहना चाहता हूं अनन्या,’’ मीठी सी आवाज अनन्या निषाद के कानों से टकराई तो पलकें नीची झुकाती हुई वह बोली, ”हां, कहो न विशाल, क्या कहना चाहते हो?’’

”अनन्या, जब से मैं ने तुम को देखा है, मेरा दिन का चैन और रातों की नींद उड़ चुकी है. बस, हर घड़ी तुम्हारे बारे में ही ये नादान दिल सोचता रहता है…’’ विशाल ने आगे कहा, ”जैसे तुम्हारे बिना धड़कना भूल जाए. तुम दूर जाती हो तो ये बेचैन हो जाता है. मन परेशान हो जाता है. अपने दिल को कैसे समझाऊं मैं, यही सोचसोच कर हमेशा परेशान रहता हूं.’’

”बस, इतनी सी बात है.’’ मचलती हुई अनन्या बोली, ”मैं ने सोचा कुछ और कहना चाहते हो, तभी तुम ने मुझे यहां बगीचे में बुलाया है. यही बात कहनी थी तो तुम फोन पर भी कह सकते थे, इतनी दूर बुलाने की क्या जरूरत थी.’’ गुस्से में तुनक कर अनन्या बोली.

दरअसल, अनन्या और विशाल के बीच करीब 5 कदम की दूरी रही होगी. आगे अनन्या खड़ी थी तो विशाल उस के पीछे खड़ा था. दोनों अपनेअपने फेमिली वालों की नजरों से बचते हुए गांव के बाहर स्थित इस बगीचे तक पहुंचे थे. विशाल फैसला कर के ही घर से निकला था कि चाहे कुछ भी हो जाए, अनन्या से अपने प्यार का इजहार कर के ही रहेगा. इसीलिए उस ने फोन कर के उसे बगीचे में बुलाया था. अनन्या भी विशाल को अपना दिल दे चुकी थी. वह भी विशाल से सागर की गहराइयों से प्यार करती थी, बस अपने प्यार का इजहार करने से झिझकती थी, जबकि दोनों इस बात से निश्चिंत थे कि दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं.

”नहीं…नहीं…नहीं, ऐसी बात नहीं है अनन्या,’’ विशाल तड़प कर बोला, ”दरअसल, मैं तुम से कुछ और ही कहना चाहता था.’’

”तो कह दो न, किस ने रोका है तुम्हें.’’ अनन्या विशाल की ओर पलटी तो विशाल चौंक कर अनन्या को आश्चर्य से देखने लगा. दिल तो सीने में ऐसे धकड़ रहा था जैसे अभी छलक कर बाहर निकल जाएगा. वह थी कि उस की आंखों में आंखें डाले एकटक देखे जा रही थी.

”ऐसे क्यों देख रही हो?’’ विशाल नर्वस हो कर बोला.

”तुम्हें पढऩे की कोशिश कर रही हूं.’’ अनन्या मासूमियत भरे स्वर में बोली.

”मैं कोई दिलचस्प नावेल थोड़े न हूं, जो मुझे पढऩे की कोशिश कर रही हो.’’

”सो तो मैं देख ही रही हूं, तुम क्या बला हो. बहरहाल, यूं ही बकवास करने के लिए मुझे यहां बुलाए हो तो मैं वापस घर जा रही हूं, तुम यहीं खड़ेखड़े पेड़ के पत्तों को गिनते रहना, समझे.’’

कह कर अनन्या वापस जाने के लिए जैसे ही पलटी कि विशाल तड़प उठा, ”नहीं अनन्या, मुझे छोड़ मत जाओ. मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा, तुम ही मेरी जिंदगी हो. तुम्हें देख कर मैं जीता हूं, सो प्लीज! मुझे छोड़ कर मत जाओ.’’

”तुम्हारी कोई बात नहीं सुनूंगी, मैं जा रही हूं.’’ अनन्या ने जैसे ही कदम आगे बढ़ाया, तभी उसे दिल को सुकून देने वाला एक शब्द उस के कानों से टकराया.

”आई लव यू, अनन्या.’’

प्रेमी विशाल के मुंह से आई लव यू सुन कर उस के पांव वहीं रुक गए और खुशी के मारे चेहरा खिल उठा और पलट कर मुसकराती दुई दबे पांव उस तक पहुंची, ”एक बार फिर से कहो, क्या कहा तुम ने? मैं ने सुना नहीं.’’ अनन्या ने उसे छेड़ा.

”आई लव यू, अनन्या.’’ अनन्या की गोरी कलाइयां अपने हाथों में थामे उस ने आगे कहा, ”मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं अनन्या. तुम्हीं मेरी जिंदगी हो और बंदगी भी. तुम्हारे प्यार के बिना एक पल भी मैं जी नहीं सकता, मर जाऊंगा.’’

”आज तो तुम ने यह कह दिया, फिर दोबारा कभी ये शब्द मत कहना.’’

विशाल की बातें सुन अनन्या तड़प उठी और उस के होंठों पर अपनी अंगुलियां रखती हुई आगे बोली, ”तुम्हारे बिना मैं भी जी नहीं सकती विशाल. आई लव यू वैरी मच. यही सुनने के लिए मेरे कान कब से तरस रहे थे.’’

कह कर अनन्या ने विशाल को अपनी बांहों में भर लिया तो उस ने भी उसे अपनी मजबूत बांहों में कस कर जकड़ लिया. कुछ पल तक दोनों एकदूसरे के साथ आलिंगनबद्ध थे और भावनाओं के सागर में डुबकी लगा रहे थे. लेकिन दोनों ने अपनी मर्यादाओं की सीमा को सुरक्षित रखा था. थोड़ी देर बाद जब भावनाओं की लहरें ठंडी पड़ीं और दोनों एकदूसरे के आगोश से अलग हुए तो उन के चेहरे खिले हुए थे. इस सुनहरे और खूबसूरत पल को दोनों ने यादों के पिंजरे में कैद कर लिया था. अपने प्यार का इजहार कर के दोनों ही फूले नहीं समा रहे थे. फिर वे एकदूसरे को बायबाय कह अपने घरों को वापस चले गए.

अनन्या अपनी मम्मी से सहेली से मिलने का बहाना कर घर से निकली थी. उसे घर से निकल हुए घंटों बीत गए थे. उस की चोरी पकड़ी न जाए, इसलिए वह जल्द से जल्द घर पहुंचना चाहती थी. अनन्या के वापस घर लौटते ही विशाल भी अपने घर को लौट गया था. आखिरकार दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर ही दिया. ये बात साल 2019 की है, तब विशाल 17 साल के करीब था और अनन्या निषाद 19 साल की. अनन्या और विशाल साहनी का प्यार खुले आसमान के तले कुलांचे भर रहा था. दोनों अपने प्यार के सुनहरे सपने बुन रहे थे. उन का प्यार 3 सालों तक परदे के पीछे छिपा रहा.

धीरेधीरे दोनों के प्यार के चर्चे फिजाओं में तैरने लगे. गांव वालों से होते हुए यह बात जब अनन्या की फेमिली तक पहुंची तो पेरेंट्स आगबबूला हो उठे. बेटी पर उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि एक दिन वह ऐसा भी गुल खिलाएगी. उस दिन के बाद से अनन्या के पापा जय कुमार ने उस का घर से निकलना बंद कर दिया और पत्नी शीला को सख्त हिदायत देते हुए कहा, ”अनन्या पर कड़ी निगरानी रखो. देखो उस विशाल से चोंच से चोंच मिलाने फिर से न निकल जाए. अगर ऐसा हुआ तो इस की जिम्मेदार तुम होगी और मैं तुम्हें छोडऩे वाला नहीं, समझी तुम.’’ पत्नी पर जय कुमार के मुंह से शब्दों के अंगार निकले थे.

”अब ध्यान रखूंगी, आप बेफिक्र रहिए.’’ अदब के साथ पत्नी शीला ने जबाव दिया, ”जितना नैनमटक्का करना था, कर लिया. मेरे जीते जी फिर विशलवा से नहीं मिल सकती है. फिर मिलने की कोशिश की तो उस की दोनों टांगें तोड़ कर हाथ में दे दूंगी, फिर सारी जिंदगी लंगड़ी बन कर लश्क लड़ाती रहेगी.’’

”यही काम पहले किया होता, उस पर नजर रखी होती तो आज ये दिन देखने नहीं पड़ते. लेकिन तुम्हें तो दिन भर मोबाइल देखने और खाट तोडऩे से फुरसत मिलती तब न बेटी पर ध्यान देती कि वह कब कहां जा रही है, किस से मिल रही है.’’

”देखो अनन्या के पापा, मैं कह देती हूं, नाहक मुझ पर मत भड़को. मैं ने क्या किया है? वो विशाल घर पर आता था, तब आप भी देखते थे. बेटी से मिलता था. बातें करता था तो आप भी सुनते थे, बहरे नहीं थे. फिर क्यों नहीं उसे घर आने से मना किया? आप भी तो बेटी से मिलने से रोक सकते थे, क्यों मना नहीं किया उसे?’’ पति पर जब शीला भड़की तो जय कुमार की घिग्घी बंध गई.

”ठीक है, ठीक है. मैं सोचता हूं कि मुझे क्या करना है, लेकिन उस पर कड़ी नजर रखना, फिर से उस कमीने से मिलने की कोशिश करे तो इस की टांगें तोड़ देना. आगे मैं देख लूंगा.’’

विशाल और अनन्या के प्यार के चर्चे चटखारे ले कर गांव वाले कर रहे थे. गांव मोहल्ले में जय कुमार की खूब बदनामी हो रही थी. जय कुमार ने विशाल के पापा राकेश से साफतौर पर कह दिया था कि वह अपने बेटे को समझा दें कि वह अनन्या से दूर रहे. उस ने यह भी धमकी दी थी कि अगर बेटी से दूर नहीं हुआ और कुछ ऊंचनीच की बात हो गई तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. इस के लिए मैं किसी भी हद तक जा सकता हूं.

जय कुमार की धमकियों से राकेश बुरी तरह डर गए थे. वह उस के नेचर से भलीभांति परिचित थे. इसलिए जय की बातों को उन्होंने गंभीरता से लिया. राकेश ने बेटे विशाल को समाज के रीतिरिवाजों को घोल कर घुट्टी की तरह पिलाया. उसे नीचऊंच के भेदभाव को समझाया, मगर उस के सिर पर तो अनन्या के प्यार का भूत इस कदर सवार था कि उसे अनन्या के अलावा कुछ भी सूझ नहीं रहा था. पापा ने क्या कहा, क्या समझाया, उस के पल्ले तनिक भी नहीं पड़ा था. बस वह अपने प्यार की धुन में मगन था. राकेश समझ चुके थे कि बेटे के सिर इश्क का भूत सवार है, इसलिए उसे समझाने का कोई मतलब नहीं है. कुछ ऐसा करना होगा, जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

काफी सोचविचार कर राकेश साहनी इस फैसले पर पहुंचे कि बेटे को घर पर रखना ठीक नहीं है. जब यहां नहीं होगा तो अनन्या से कैसे मिलेगा. राकेश साहनी के परिवार के कई लोग केरल में जौब करते थे. उन्होंने भी बेटे विशाल साहनी को वहीं भेजने का फैसला किया और उसे वहां भेज दिया. हालांकि विशाल केरल जाना नहीं चाहता था, लेकिन पेरेंट्स के फैसले के आगे उस की एक न चली. मजबूर हो कर उसे घर से दूर जाना पड़ा था. विशाल केरल चला तो गया था, लेकिन उस का दिल अनन्या के पास ही था. इधर अनन्या विरह की अग्नि में हौलेहौले जल रही थी, उधर विशाल जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था.

प्रेमी युगल एकदूजे से मिलने के लिए बेताब थे. अपनी बेताबियां मोबाइल पर बात कर मिटा लेते थे. बहरहाल, जय कुमार इस बात से बेहद खुश था कि बेटी के रास्ते का कांटा विशाल फिलहाल दूर चला गया है. तभी आननफानन में उस ने एक अच्छा सा लड़का ढूढ कर बेटी अनन्या का हाथ पीला कर दिया था. फेमिली वालों के कठोर फैसले के आगे अनन्या की एक न चली थी, लेकिन उस ने अपने फेमिली वालों को कह दिया था, ”विशाल उस के जीवन का पहला और अंतिम युवक है, जिसे वह अपना पति मान चुकी है. उस के बिना जीवन अधूरा है.

आप सभी के जिद के सामने मैं ने शादी कर तो ली है, लेकिन यह शादी अधूरी है. मैं मर जाऊंगी, लेकिन इस अशोक को कभी अपना पति स्वीकार नहीं करूंगी, कभी नहीं.’’ ये बात 2023 की थी. विशाल को जब पता चला कि अनन्या के घर वालों ने उस की जबरन शादी करवा दी है तो यह सुन कर वह आगबबूला हो उठा था, ‘ये कभी नहीं हो सकता है.’

विशाल होंठों में ही बुदबुदाया, ‘मुझे छोड़ कर अनन्या किसी और से शादी कैसे कर सकती है. वह सिर्फ मेरी है, मेरी. किसी ने उसे मुझ से छीनने की कोशिश को तो मैं उस की बची हुई सांसें छीन लूंगा. जान से मार डालूंगा उसे मैं. अनन्या सिर्फ मेरी थी, मेरी है और मेरी ही रहेगी. क्या हुआ जो उस के घर वालों ने उस की शादी किसी और से करा दी है, मैं जल्द ही अपनी अनन्या को उस से भी छीन लूंगा. चाहे जबरन या चाहे प्यार से. मेरा प्यार मेरे पास ही लौट कर आएगा ये वायदा है जय चाचा तुम से.’

दरअसल, विशाल और अनन्या एक ही गांव के सगे पट्टीदार थे, इसलिए सामाजिक परंपरा के अनुसार उन की शादी नहीं हो सकती थी, दोनों के परिवार प्रेमी युगल के इस फैसले के खिलाफ थे. अनन्या के पापा जय कुमार कभी नहीं चाहते थे कि रिश्ते के भाईबहन लगने वाले मर्यादा को लांघें. खैर, नियति को तो कुछ और ही मंजूर था. अनन्या के जीवन की कुंडली ऐसी बनाई थी कि उस का प्यार विशाल ही उस की सांसों की डोर तोडऩे पर आमादा हो गया था. जिस प्यार को पाने के लिए अनन्या ने घर और समाज यहां तक कि पति से भी बगावत कर घर छोड़ दिया था, वही यमराज बन कर उस की जिंदगी में कुंडली मार कर बैठ गया था.

अनन्या के जीवन में ज्वारभाटा की तरह भूचाल तब आया था, जब उस के पति अशोक को उस के अतीत के बारे में पता चला कि पत्नी का गांव के ही किसी विशाल के साथ लंबे अरसे से अफेयर चला आ रहा है और आज भी दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. ये बात अशोक पचा नहीं सका. कोई भी पुरुष यह कभी नहीं चाहेगा कि उस की पत्नी शादी के बाद भी अपने यार की बांहों में सजने के लिए सजीसवंरी रहे. अशोक ही नहीं, उस के घर वाले भी चरित्रहीन बहू को स्वीकारने के लिए कतई तैयार नहीं थे, लिहाजा 6 महीने के भीतर उन्होंने अनन्या को तलाक दे दिया.

एक ओर अनन्या निषाद जहां इस फैसले से मन ही मन खुश थी कि अब हमारे विशाल साहनी से एक होने से कोई भी रोक नहीं सकता है तो वहीं दूसरी ओर अनन्या के फेमिली वाले बेटी के तलाक से दुखी और परेशान थे. ये सब उस के चलते ऐसा हुआ था, इसलिए घर वालों ने अनन्या को मायके में शरण नहीं दी, बल्कि उसे उसी के हाल पर छोड़ दिया. अनन्या ने भी फैसला कर लिया था कि वह अपने घर वालों के सिर पर बोझ नहीं बनेगी और न ही मायके (बनारस) जाएगी, बल्कि अपने प्यार के साथ शादी कर के अपनी नई दुनिया बसाएगी.

विशाल को उस ने पति का घर हमेशाहमेशा के लिए छोड़ कर वापस आ जाने की सूचना दे दी थी और विशाल से यह भी कह दिया कि वह उस के बिना जी नहीं सकती. जल्द से जल्द हम दोनों शादी कर लेंगे और सदा के लिए एक हो जाएंगे. लेकिन शादी करने के बजाए विशाल प्रेमिका से पीछा छुड़ाने के रास्ते तलाशने लगा. उस के मन की बात अनन्या भांप नहीं सकी, क्योंकि वह तो विशाल की दीवानी हो चुकी थी. जब भी वह शादी के लिए कहती, विशाल टाल देता था. और फिर एक दिन उस ने प्रेमिका अनन्या की हत्या कर दी. विशाल साहनी से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे शाम को उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया. Hindi Love Story

 

 

Delhi News : बौयफ्रेंड क्यों बना कातिल

Delhi News :  22 वर्षीय कोमल और 26 वर्षीय मोहम्मद आसिफ की पिछले 4 सालों से गहरी दोस्ती थी. कैब ड्राइवर आसिफ उसे जीजान से चाहता था, इसलिए वह उसे इधरउधर घुमाता और शौपिंग कराता था. फिर एक दिन आसिफ ने कार में ही कोमल की न सिर्फ हत्या कर दी, बल्कि उस की लाश को गहरे नाले में ठिकाने लगा दिया. आखिर बौयफ्रेंड क्यों बना कातिल?

उत्तरपूर्वी दिल्ली के सुंदरनगरी के रहने वाले 26 वर्षीय मोहम्मद आसिफ का चेहरा उदास था. वह बहुत परेशान नजर आ रहा था. उस का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. वह कैब ड्राइवर था. उस की कैब बुक करने के लिए सुबह से कितने ही फोन आ चुके थे, लेकिन वह किसी की बुकिंग स्वीकार नहीं कर रहा था. उस दिन वह सुबह उठ कर वह नहाया भी नहीं था, बस बिस्तर में पड़ा हुआ कुछ सोच रहा था. उस के विचारों में कौन है, यह केवल वही जानता था, लेकिन उसी के खयालों में वह खोया हुआ था और परेशान हुए जा रहा था. उस का मोबाइल उस के पास ही पड़ा हुआ था. जिस पर उस वक्त किसी का मैसेज फ्लैश हो रहा था.

एकाएक आसिफ का ध्यान मोबाइल पर चला गया. उस ने मोबाइल उठा कर मैसेज पढ़ा, ‘यार, तुम्हें कितनी बार फोन किया है, तुम फोन ही नहीं उठा रहे हो. खैरियत तो है? हार कर मैसेज करना पड़ा है. फोन कर के बताओ, क्या बात है? —मोहम्मद जुबैर उर्फ जावेद.’

आसिफ ने काल डिटेल्स में देखा, जुबैर की 4 मिस्ड काल थीं. आसिफ को हैरानी हुई, वह इतना परेशान था कि किसी की काल आने का भी पता नहीं चला.

कुछ सोच कर आसिफ ने जुबैर को फोन लगाया. जुबैर को जैसे यकीन था कि आसिफ फोन जरूर करेगा. उस ने तुरंत आसिफ की काल अटेंड कर ली, ”हां आसिफ, कहां बिजी हो तुम, मेरा फोन भी नहीं उठा रहे हो?’’

”बस, ऐसे ही यार…’’ आसिफ धीरे से बोला.

”चलो, हम कनाट प्लेस चलते हैं, मुझे पालिका बाजार से 2 जींस खरीदनी हैं.’’

”तुम जाओ जुबैर, मेरी कहीं आने जाने की इच्छा नहीं है.’’

”क्यों? घर में पड़ेपड़े क्या मुरगी के अंडे निकाल रहे हो.’’ जुबैर झल्ला कर बोला, ”तुम्हारे कहने पर तो मैं जहन्नुम तक चलने को तैयार हो जाता हूं.’’

”कहा न जुबैर, मेरा मूड नहीं है. आज तुम अकेले चले जाओ.’’ आसिफ ने कह कर फोन काट दिया.

उस ने फोन को टेबल पर रख दिया और एक गहरी सांस लेने के बाद वह फिर खयालों में डूब गया.

कुछ ही देर हुई थी कि बाहर के दरवाजे पर आहट हुई. आसिफ दरवाजा धकेल कर अंदर आ रहा था.

”क्या हुआ है तुझे? आज तूने मुझे पहली बार कहीं चलने से इंकार किया है.’’ जुबैर अंदर आ कर कुरसी पर बैठते हुए बोला, ”तेरी तबियत तो ठीक है न?’’

”तबियत ठीक है.’’ आसिफ मरी सी आवाज में बोला.

”तो तेरा चेहरा क्यों मुरझाया हुआ है?’’

”ऐसे ही.’’

”ऐसे तो नहीं है आसिफ, कुछ बात जरूर है जो तू मुझ से छिपा रहा है.’’

”कोई बात नहीं है जुबैर, मैं ठीक हूं.’’

”तुझे मेरी कसम है, बता क्या बात है?’’ जुबैर इस बार आसिफ के हाथ को पकड़ कर जिद्ïदी स्वर में बोला.

आसिफ ने गहरी सांस ली और बोला, ”मैं कोमल को ले कर परेशान हूं जुबैर.’’

”कोमल! उसे क्या हुआ है. वह तो तेरी चाहत है, उस पर तू जान छिड़कता है यार.’’

”वह कई दिनों से मुझ से बात नहीं कर रही है जुबैर.’’

”कमाल है.’’ जुबैर मुसकराया, ”वह किसी घरेलू टेंशन से परेशान होगी, इसलिए बात नहीं कर रही है. यह कोई टेंशन का इशू नहीं है आसिफ.’’

”टेंशन का ही विषय है. कोमल मुझ से नहीं किसी दूसरे लड़के से बातें करने लगी है. मैं ने उसे ऐसा करते हुए 2-3 बार देखा है.’’

”तू कोमल से पूछ लेता कि वह दूसरे लड़के में दिलचस्पी क्यों ले रही है?’’

”पूछा है यार.’’ आसिफ धीरे से बोला, ”कोमल कहती है, मैं किसी से बात करती हूं तो तुम्हें जलन क्यों हो रही है. मैं तुम्हारी दासी नहीं हूं, जो तुम्हारे कहने पर चलूं. अब बता, मैं क्या करूं?’’

”तू एक बार कोमल से मिल कर उसे समझा दे, उस पर पहला हक तेरा है. तेरी उस से मोहब्बत 4 साल पुरानी है, वह तुझे धोखा नहीं दे सकती.’’ जुबैर ने समझाया.

”वह फिर वैसा ही जवाब देगी.’’ आसिफ ने निराशा भरे स्वर में कहा.

”देख आसिफ, हमारी डिक्शनरी में लिखा होता है जिसे चाहो, उस को अपना बनाओ. वह सिर्फ अपनी होनी चाहिए. यदि वह ऐसा नहीं करती जो उस के पर कतर दो.’’

”तू कहना क्या चाहता है.’’ आसिफ ने चौंक कर जुबैर की तरफ देखा.

”देख, तू आज कोमल से मिल कर साफसाफ पूछ ले कि उस के मन में क्या है. वह तुझे चाहती है या किसी और को. यदि वह किसी और को चाहती है तो उस का टेंटुआ दबा कर किस्सा खत्म कर दो. बेकार की टेंशन मत पालो.’’

आसिफ ने सिर झटका, ”तू कहता है तो मैं ऐसा ही करूंगा. चल, अब तू कहां चलना चाहता है.’’

”हम कनाट प्लेस जा रहे हैं.’’ जुबैर उठते हुए बोला, ”तू फटाफट तैयार हो जा, मैं बाहर खड़ा हूं.’’

आसिफ ने जल्दीजल्दी फ्रैश हो कर कपड़े चेंज किए और बाहर आ गया. कुछ देर में ही दरवाजे को ताला लगा कर वह जुबैर के साथ कनाट प्लेस जाने के लिए निकल पड़ा था.

आसिफ ने क्यों की गर्लफ्रेंड की हत्या

12 मार्च, 2025 बुधवार का दिन था. आसिफ शाम को 5 बजे ही अपनी कैब ले कर निर्माण विहार पहुंच गया था. उस ने कैब को एक तरफ पार्क कर लिया और मोबाइल निकाल कर कोमल का नंबर मिलाया. दूसरी ओर घंटी बजी. पहली बार में उस की काल अटेंड नहीं की गई तो उस ने फिर ट्राई किया. दूसरी बार में उस का फोन उठा लिया गया.

कोमल का झुंझलाया हुआ स्वर उभरा, ”क्या बात है, मुझे बारबार फोन क्यों मिला रहे हो?’’

”कोमल, आज मेरा मूड बहुत अच्छा है. मैं तुम्हें आइसक्रीम खिलाना चाहता हूं.’’

”मेरे को आइसक्रीम नहीं खानी है आसिफ.’’

”क्यों? तुम्हें तो मैंगो फ्लेवर वाली आइसक्रीम बहुत पसंद है.’’

”हां, लेकिन आज मेरी तबियत खराब है, मैं आइसक्रीम नहीं खाऊंगी.’’ कोमल का स्वर कुछ नरम हो गया.

”चलो, कुछ और खा लेना. मैं तुम्हें शौपिंग भी करवाना चाहता हूं.’’

”अरे! कहीं गड़ा खजाना हाथ लग गया है क्या?’’ कोमल ने उपहास भरे स्वर में कहा, ”तुम्हारी जेब में मैं ने इकट्ठे 5 सौ रुपए भी कभी नहीं देखे.’’

”हर समय एक जैसा नहीं रहता कोमल. आज मेरी जब में 5 हजार रुपए हैं, तुम बढिय़ा सा सूट खरीद लेना.’’

”हूं.’’ कोमल ने स्वीकार करते हुए कहा, ”कहां पर हो तुम?’’

”मैं यहीं दिल्ली के निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर-1 के सामने खड़ा हूं.’’ आसिफ ने अपनी लोकेशन समझा दी. फिर पूछा, ”कितनी देर में आ रही हो कोमल?’’

”आधाएक घंटा लग सकता है, इस वक्त प्रीत विहार में थोड़ा जाम लगा होता है, फिर भी मैं पहुंच जाऊंगी.’’

”मैं इंतजार कर रहा हूं.’’ आसिफ ने कहने के बाद फोन काट दिया. वह पुश्त से लग गया और आराम से लेट गया.

करीब 40 मिनट में ही कोमल उस की कैब के पास आटो से आ गई. वह काफी खुश नजर आ रही थी. उसे देख कर आसिफ ने कैब का दरवाजा खोल दिया. कोमल अंदर बैठ गई. आसिफ ने कैब को आगे बढ़ा दिया, वह नई दिल्ली की तरफ कैब ले जा रहा था.

”हम कहां जा रहे हैं?’’

”मैं आज तुम्हें नई मार्केट दिखाऊंगा कोमल. तुम बैठी रहो. हम बस 10-15 मिनट ने वहां पहुंच जाएंगे.’’

आसिफ ने मुसकराते हुए कहा और कैब की स्पीड बढ़ा दी. काफी देर बाद एक सुनसान सड़क का किनारा देख कर आसिफ ने कैब को रोक लिया.

”यह तुम मुझ को कहां ले आए हो आसिफ?’’ कोमल परेशान स्वर में बोली.

”घबराओ मत यार, मैं तुम्हें घर पहुंचा दूंगा. तुम पानी पी लो, गरमी कुछ ज्यादा है.’’ आसिफ ने अपनी पानी की बोतल कोमल को देते हुए कहा.

कोमल ने बोतल ले ली और ढक्कन खोल कर पानी पीने लगी. आसिक उस का चेहरा देखता रहा.

”ऐसे क्यों देख रहे हो?’’ कोमल ने मुसकरा कर पूछा.

”देखने में तुम कितनी भोली और शरीफ लगती हो कोमल.’’

”वो तो मैं हूं ही.’’ कोमल इठला कर बोली.

”हो नहीं, मेरे सामने बन जाती हो.’’ आसिफ गंभीर हो गया, ”तुम्हें मैं 4 साल से प्यार करता हूं, लेकिन अब तुम मुझे कुछ दिनों से भाव नहीं दे रही हो.’’

कोमल ने आसिफ को घूरा, फिर शब्दों को चबाते हुए बोली, ”तुम मुझे यह सब सुनाने के लिए यहां लाए हो क्या?’’

”मुझे आज तुम से फैसला करना है कोमल.’’ आसिफ गंभीर हो गया, ”मुझे बताओ, तुम मुझे प्यार करती हो या नहीं?’’

”मैं इस बारे में कुछ नहीं बोलूंगी आसिफ, यह मेरे दिल पर निर्भर करता है कि मैं किसी को प्यार करूं या न करूं.’’ कोमल शुष्क स्वर में बोली, ”तुम मुझे कैब से उतार दो, मैं आटो कर के घर चली जाऊंगी.’’

”ऐसे कैसे चली जाओगी, तुम्हें मेरी बात का जवाब देना है पहले. मुझे बताओ, आज तुम्हारे को महसूस हो रहा है कि दिल जिसे चाहेगा, उसी से करोगी. अगर ऐसा है तो मुझ से 4 साल से क्या प्यार करने का नाटक कर रही थी? क्या तुम्हें मैं बेवकूफ नजर आता था?’’

”मैं ने ऐसा कभी नहीं सोचा आसिफ, तुम मेरे घर के नजदीक रहते हो, उस नाते मैं तुम से हंसतीबोलती रही हूं.’’

”नहीं, वह पड़ोस में रहने वाला प्यार नहीं था कोमल, तुम मुझे चाहती थी. मेरे एक इशारे पर मेरे साथ शौपिंग करने चल देती थी, मेरे साथ पार्कों में टहलती थी, लेकिन अब तुम्हारी नजरें बदल गई हैं. सिर्फ इसलिए कि अब तुम्हारी जिंदगी में दूसरा युवक आ गया है.’’

कोमल चुप रही.

”मैं ने कई बार तुम्हें किसी युवक से हंसहंस कर बातें करते देखा है, उसी की वजह से तुम ने मुझ से किनारा करना अब शुरू कर दिया है.’’

”यह तुम्हारी सोच है आसिफ, मेरी जिंदगी में कोई और नहीं आया है.’’

”झूठ मत बोलो कोमल, मैं ने तुम्हें अपनी आंखों से एक युवक से कई बार बात करते देखा है. बताओ, वह कौन है और कहां रहता है?’’

”बता दूंगी तो क्या करोगे तुम?’’ कोमल ऐंठ कर बोली.

”मैं उस का खून कर दूंगा, फिर तुम्हारी भी जान ले लूंगा.’’ आसिफ गुस्से से चीख कर बोला, ”बताओ, वह कौन है?’’

”नहीं बताऊंगी.’’ कोमल कंधे झटक कर बोली और उस ने कार का दरवाजा खोलने के लिए हैंडल की तरफ हाथ बढ़ाया.

आसिफ ने उस का हाथ झटक कर एक थप्पड़ कोमल के गाल पर रसीद कर दिया.

”तेरी ये हिम्मत… तू मुझ पर हाथ उठाएगा.’’ कोमल चीखी, ”आज मैं पछता रही हूं तेरे जैसे आदमी को मुंह लगा कर. तू आवारा और बदतमीज है.’’

आसिफ का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. गुस्से में वह अपना होश खो बैठा. उस ने कोमल को बगल की सीट पर गिरा दिया और दोनों हाथों से गला पकड़ कर दबाने लगा. कोमल की सांसें फंसीं तो वह जोरजोर से हाथपांव पटकने लगी. आसिफ अपने हाथों का दबाव बढ़ाता चला गया, वह तब रुका, जब कोमल निर्जीव हो गई. आसिफ के होश लौटे तो वह घबरा गया. कोमल की आंखें गले पर गहरा दबाव पडऩे से बाहर फैल गई थीं.

आसिफ ने जल्दी से मोबाइल निकाल कर जुबैर का नंबर मिलाया. दूसरी तरफ जुबैर ने फोन उठाया तो आसिफ कांपती आवाज में बोला, ”जुबैर, मैं ने कोमल को मार डाला है. उस की लाश कैब में है, अब मै क्या करूं.’’

”तू घबरा मत आसिफ, मुझे बता इस वक्त तू कहां पर है?’’

”यह दिल्ली के द्वारका का इलाका है, तू आ जा दोस्त.’’ कहने के साथ आसिफ ने अपनी कैब की स्थिति समझा दी.

”मैं आ रहा हूं आसिफ. तू कैब में ही रह, दरवाजा तब तक मत खोलना, जब तक मैं तेरे पास न आ आऊं!’’ जुबैर ने आगाह किया और फोन काट दिया.

दोनों दोस्तों ने इत्मीनान से लगाई लाश ठिकाने

आसिफ कोमल की लाश के पास बैठ गया. उस की सांसें भारी होने लगी थीं और दिल बुरी तरह घबरा रहा था. करीब एक घंटे बाद आटो कर के जुबैर आसिफ के पास पहुंच गया. अब तक रात का अंधेरा अच्छी तरह जमीन पर उतर आया था. जुबैर को देख कर आसिफ की घबराहट कम हुई. जुबैर अपने साथ नायलौन की रस्सी लाया था. कैब में घुस कर जुबैर ने कोमल की लाश के हाथपांव नायलौन की रस्सी से बांध दिए. आसिफ चुपचाप खड़ा था.

”आसिफ, हम इसे आसपास किसी नदीनाले में डाल देते हैं. यह डूब जाए, इस के लिए एक भारी पत्थर लाश के साथ बांधना होगा हमें. तुम कैब चलाते हो, सोचो यहां आसपास कोई नाला है?’’

आसिफ ने दिमाग दौड़ाया और फिर धीमे से बोला, ”नजफगढ़ में एक गहरा नाला है. हम लाश वहां फेंक सकते हैं.’’

”तो कैब चलाओ और सुनसान जगह पहुंच कर नाले के पास कैब को रोक देना.’’

”ठीक है.’’ आसिफ ने कहा और ड्राइविंग सीट पर बैठ गया. उस ने कैब स्टार्ट कर के आगे बढ़ा दी. नजफगढ़ में नाले के पास पहुंच कर एक सुनसान जगह पर उस ने कैब रोक दी. जुबैर के साथ वह कैब से उतरा. यहां गहरा सन्नाटा था.

जुबैर ने एक भारी पत्थर तलाश किया और कोमल की लाश के साथ बांध दिया. फिर आसिफ को इशारा किया. दोनों ने कोमल की लाश को कैब से निकाल कर नजफगढ़ नाले में डाल दिया.

”अब कोमल की कहानी का लव चैप्टर यहां पर समाप्त हो गया है. कल से नारमल जिंदगी जिओ. रोज की तरह कैब चलाओ, ताकि कोई तुम पर संदेह न करे.’’ जुबैर ने समझाया तो आसिफ ने सिर हिला कर इस बात को स्वीकार करने की स्वीकृति दी. अब यहां रुकना खतरा मोल लेना था. दोनों चुपचाप कैब में बैठ गए. आसिफ अब कैब को सावधानी से नंदनगरी की ओर ले जा रहा था.’’

12 मार्च, 2025 को उधर कोमल की मम्मी विमला देवी की नजरें बारबार घड़ी की तरफ जा रही थीं. रात के 9 बजने को आ गए थे, लेकिन बेटी कोमल अभी तक घर नहीं लौटी थी. और दिन तो वह 7 बजे ही ड्ïयूटी से घर आ जाती थी.

विमला देवी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरने लगीं. कोमल अंगदनगर में स्थित एक औफिस में नौकरी करती थी. जब घड़ी की सूइयां और आगे बढऩे लगीं तो परेशान हो कर विमला देवी ने अपने बेटे अजय को आवाज लगाई, ”अजय …ओ अजय, यहां आ.’’

अजय बाहर बैठा मोबाइल देख रहा था. वह उठ कर मम्मी के पास आ गया, ”हां मम्मी, क्या कह रही हो?’’

”बेटा, आज कोमल तभी तक घर नहीं आई है, साढ़े 9 बजने को आ गए हैं. तू जरा मालूम तो कर वह कहां रह गई है?’’

”मम्मी, कोमल बच्ची नहीं रह गई है, औफिस से लेट निकली होगी, आ जाएगी.’’ अजय ने कहा.

”तू फोन तो कर ले, कोमल को घर आने में कभी इतनी देर नहीं हुई है. मालूम करने में तेरा क्या जा रहा है.’’ विमला देवी ने अपनी बात पर जोर दिया तो अजय ने मोबाइल निकाल कर कोमल का नंबर मिलाया.

कोमल के फेमिली वाले हुए परेशान

दूसरी ओर से फोन स्विच्ड औफ होने की सूचना मिली. अजय ने 2-3 बार और ट्राई किया. कोमल का फोन स्विच्ड औफ होने की जानकारी बारबार मिलती रही.

अजय के माथे पर बल पड़ गए. वह परेशान हो कर बड़बड़ाया, ‘कोमल कहां रह गई. उस का फोन क्यों स्विच औफ आ रहा है.’

”क्या हुआ बेटा?’’ विमला देवी ने बेटे को परेशान देख कर पूछा.

”मम्मी, कोमल का फोन नहीं लग रहा है.’’ अजय परेशान स्वर में बोला, ”अब समय भी ज्यादा हो गया है, कहां रह गई यह लड़की. और दिन तो समय से घर आ जाती थी.’’

”तू जा कर पता लगा, जवान लड़की का इतनी देर तक घर न लौटना, अच्छी बात नहीं है. जमाना खराब है.’’ विमला देवी की आवाज में कंपन था.

”मैं जा कर देखता हूं मम्मी.’’ अजय ने कहा और चप्पलें पहन कर वह घर से बाहर निकल गया.

अजय अपनी बहन कोमल की 2-3 सहेलियों के नाम और घर जानता था. बर्थडे पार्टी या किसी जरूरी काम से कोमल उसे अपने साथ उन सहेलियों के घर ले जा चुकी थी.

अजय ने उन सहेलियों के घर जा कर मालूम किया, लेकिन तीनों के यहां से पता चला कोमल आज उन से न तो मिली है, न उस से फोन पर बात हुई है.

निराश हो कर अजय वहां से निकल कर कोमल के अंगदनगर में स्थित औफिस में गया. वहां ताला लगा हुआ था. अजय को वहां से भी निराश लौटना पड़ा. उस ने हर संभावित स्थान पर कोमल की तलाश की, लेकिन वह उसे नहीं मिली.

अब रात के साढ़े 12 बज गए थे. कोमल की गुमशुदगी दर्ज करवाने का इरादा ले कर अजय उत्तरपूर्वी दिल्ली के नंदनगरी थाने में पहुंच गया.

ड्यूटी अफसर ने उसे ऊपर से नीचे तक देख कर पूछा, ”क्या हुआ है?’’

”सर, मेरी बहन कल सुबह काम पर गई थी, लेकिन वह अभी तक घर नहीं लौटी है. मैं उस की गुमशुदगी लिखवाना चाहता हूं.’’

”देखो, किसी के गुम होने की रिपोर्ट 24 घंटे बाद लिखी जाती है. तुम्हारी बहन पढ़ीलिखी है, अपनी मरजी से कहीं रुक गई होगी. तुम कल तक इंतजार करो, वह घर लौट कर आ जाएगी. नहीं आई तो हम रिपोर्ट लिख लेंगे.’’ ड्यूटी अफसर ने गंभीर स्वर में कहा तो अजय चुपचाप घर लौट आया.

कोमल पूरी रात घर नहीं लौटी. फेमिली वाले पूरी रात सो नहीं पाए. दिन निकलने पर अजय ने फिर बहन की तलाश शुरू की, लेकिन कोमल का कुछ पता नहीं चला.

गहरे नाले में मिली कोमल की लाश

अजय रिश्तेदारों को साथ ले कर फिर नंदनगरी थाने में पहुंच गया. उसे वहां से उत्तरपूर्वी जिले के ही सीमापुरी थाने में जा कर बहन की गुमशुदगी दर्ज कराने की सलाह दी गई. अजय सीमापुरी थाने में पहुंच गया. वहां उस की रिपोर्ट एफआईआर नंबर 126/25 पर लिखी गई. पुलिस ने अजय से कोमल की तसवीर ले कर सभी थानों में फ्लैश कर दी, लेकिन 3 दिन बीत जाने के बाद भी कोमल का कुछ पता नहीं चल पाया. उधर 17 मार्च, 2025 की सुबह 8 बज कर 40 मिनट पर दिल्ली के द्वारका जिले के थाना छावला में सूचना मिली कि नजफगढ़ नाले (नजदीक बाड़ूसराय गांव) में एक लड़की की लाश पानी पर तैर रही है.

छावला थाने के एसएचओ राजकुमार मिश्रा अपने साथ एसआई दीपक, एएसआई बहादुर, हैडकांस्टेबल भूपेंद्र, महेंद्र, हेतराम और एटीओ सुरेंद्र कुमार को साथ ले कर घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. जब वह घटनास्थल पर पहुंचे, वहां अच्छीखासी भीड़ जमा हो चुकी थी. नाले के पानी में एक जवान लड़की की फूली हुई लाश तैर रही थी. लड़की के हाथपांव प्लास्टिक की डोरी से बंधे दिख रहे थे. एसएचओ राजकुमार मिश्रा ने एक पुलिसकर्मी को गहरे नाले में उतारा, वह तैरना जानता था. उस ने लाश के पास पहुंच कर उसे किनारे की ओर लाना चाहा तो वह किसी चीज में अटकी हुई मिली.

पुलिसकर्मी ने नीचे टटोल कर देखा तो उसे लाश किसी भारी पत्थर से बंधी महसूस हुई. उस ने चाकू मंगवाया और लाश से बंधी डोरी को काट कर पत्थर से अलग कर दिया. फिर वह लाश को बड़े आराम से खींच कर किनारे पर ले आया. लाश को दूसरे पुलिस वालों ने बाहर निकाल कर जमीन पर लिटा दिया. एसएचओ राजकुमार मिश्रा ने लाश की जांच की तो उस जवान युवती की हत्या गला दबा कर की गई प्रतीत हुई. वह हरे रंग की नायलौन रस्सी से बंधी थी और उस की पैंट कमर से नीचे खिसकी हुई थी. युवती के शरीर पर चोट के निशान नहीं मिले.

पानी में डुबोने के लिए उस के हाथपांव और बौडी को रस्सी से बांध कर बड़े पत्थर के साथ पानी में डाला गया था, ताकि वह किसी को ऊपर सतह पर नजर न आए. लाश फूल कर हलकी हुई तो ऊपर सतह पर आ गई. मृतका की उम्र 20-22 साल के आसपास थी. उस की तलाशी में पुलिस को कुछ नहीं मिला तो उन्होंने फोरैंसिक जांच के लिए टीम को बुला लिया. साथ ही डीसीपी अंकित सिंह को भी इस लाश की जानकारी दे दी.

थोड़ी देर में उच्चाधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. लाश का मुआयना कर के वह आवश्यक निर्देश दे कर चले गए. फोरैंसिक टीम आ कर अपने काम में लग गई थी. एसएचओ ने भीड़ को लाश की शिनाख्त करने के लिए कहा, लेकिन भीड़ में से कोई उस लड़की को नहीं पहचानता था. इस से अनुमान लगाया गया कि लाश को कहीं दूसरी जगह से ला कर यहां पर फेंका गया है.

उन्होंने कागजी काररवाई पूरी की और लाश को पोस्टमार्टम के लिए राव तुलाराम अस्पताल में भिजवा दिया. थाने में लौट कर इस मामले को दर्ज कर लिया गया. युवती की शिनाख्त जरूरी थी. इस के लिए उस के पोस्टर छपवा कर छावला तथा द्वारका क्षेत्र में चिपकाए गए, लेकिन 2 दिन बीत जाने पर भी कोई भी जानकार सामने नहीं आया. पुलिस अपने तरीके से मृतका की पहचान करने की कोशिश कर थी. उन्हें 19 मार्च को मालूम हुआ कि उत्तरपूर्वी दिल्ली के सीमापुरी थाने में एक हफ्ता पहले कोमल नाम की एक युवती के किडनैपिंग का मामला दर्ज किया था. पुलिस ने शिकायतकर्ता का मोबाइल नंबर ले कर फोन मिलाया तो कोमल के भाई अजय को लगा.

घंटी बजने पर अजय ने फोन उठा कर धीमे स्वर में कहा, ”मैं अजय बोल रहा हूं, आप कौन हैं?’’

”मैं छावला थाने से एसआई दीपक बोल रहा हूं. क्या आप की ओर से सीमापुरी थाने में किसी लड़की की किडनैपिंग का मामला दर्ज कराया गया था अजयजी?’’

अजय कुमार खुशी से चहक पड़ा, ”वह मेरी बहन है साहब. कोमल नाम है उस का, क्या वह आप को मिल गई है?’’

”एक लड़की की लाश हमें नजफगढ़ ड्रेन से मिली है, आप आ कर शिनाख्त करें. आप को राव तुलाराम अस्पताल की मोर्चरी में आना है, लाश अभी वहीं है.’’

”मैं 1-2 घंटे में अस्पताल पहुंच रहा हूं साहब.’’ अजय रो देने वाले स्वर में बोला और फिर काल कट होने पर वह अपने रिश्तेदारों के साथ राव तुलाराम अस्पताल के लिए निकल गया.

दोनों आरोपी ऐसे चढ़े पुलिस के हत्थे

डेढ़ घंटे बाद वे लोग राव तुलाराम अस्पताल की मोर्चरी में पहुंच गए. वहां एसआई दीपक कुमार और एटीओ (एडिशनल एसएचओ) सुरेंद्र कुमार मिल गए. उन्होंने उन्हें मोर्चरी में ले जा कर लड़की की लाश दिखाई तो देखते ही कोमल की मम्मी, दादी गश खा कर गिर पड़ीं. अजय फफकफफक कर रोने लगा. रोतेरोते ही बोला, ”यह मेरी बहन कोमल है साहब, इस की यह हालत किस ने की?’’

”हम जांच कर रहे हैं. जहां लाश मिली है, वहां के सीसीटीवी फुटेज चैक किए जा रहे हैं. आप बताएं, कोई ऐसा व्यक्ति आप की पहचान में है, जो आप की बहन का दुश्मन रहा हो?’’ एसआई दीपक ने पूछा.

”दुश्मन तो नहीं साहब, एक युवक है जो काफी दिनों से मेरी कोमल के पीछे पड़ा है. एक बार मैं ने उसे गुस्से में थप्पड़ भी मार दिया था साहब. वह मेरी बहन का पीछा करता था.’’ अजय ने बताया.

”उस का नाम बताइए,’’ एटीओ सुरेंद्र ने कौतूहल से पूछा.

”उस का नाम मोहम्मद आसिफ है. मेरी गली में ही रहता है और कैब ड्राइवर है.’’

एसआई दीपक ने यह जानकारी थाना छावला में दी तो एसएचओ राजकुमार मिश्रा ने तुरंत अपनी टीम को तैयार किया और एसआई दीपक से मोर्चरी के बाहर अजय को साथ ले कर खड़े मिलने को कहा. एटीओ सुरेंद्र और एसआई दीपक अपने साथ अजय को ले कर मोर्चरी से बाहर आ गए. थोड़ी देर में छावला थाने की पुलिस जीप वहां आ गई. उस में एसएचओ राजकुमार मिश्रा टीम के साथ मौजूद थे. उन तीनों को उन्होंने साथ लिया और उत्तरपूर्वी दिल्ली के सुंदरनगरी के लिए रवाना हो गए. रास्ते से उन्होंने थाना सीमापुरी से एक पुलिस टीम को सुंदरनगरी आने को कह दिया.

करीब एक घंटे बाद छावला थाना के साथ सीमापुरी थाने के पुलिस दल से सुंदर नगरी में अजय द्वारा बताए घर को घेर लिया. वह घर मोहम्मद आसिफ का था. उस समय वह घर में ही था. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. उस का मोबाइल एसएचओ ने अपने कब्जे में ले कर जांच की तो उस की काल डिटेल्स में 12 मार्च, 2025 की शाम 5 से 6 बजे के बीच कोमल से बात करने की डिटेल्स मिल गई. यह आसिफ को शक के दायरे में ले आया. थाने में आसिफ से कड़ी पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह 4 साल से कोमल को प्यार करता था. कोमल भी उसे चाहती थी, लेकिन कुछ दिनों से कोमल किसी और लड़के से बात करने लगी थी. इस से वह कोमल से खफा था.

12 मार्च को उस ने कोमल को दिल्ली के निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पर बुलाया तो वह आ गई. उसे ले कर वह द्वारका के इलाके में आ गया. उस ने कोमल से उस लड़के से बात करने का कारण पूछा तो वह गुस्से में बोली, ”वह जिसे चाहेगी, उस से बात करेगी.’’

उस ने मुझे बुराभला भी कहा तो मैं ने गुस्से में उस का गला दबा कर मार डाला. फिर अपने दोस्त मोहम्मद जुबैर उर्फ जावेद के साथ मिल कर कोमल के हाथपांव बांध कर एक पत्थर से बांध कर उसे नजफगढ़ के नाले में फेंक दिया. आसिफ ने अपने दोस्त जुबैर का घर दिखा दिया. वह पास में ही स्थित ओ ब्लौक, गली नंबर 2 में रहता था. उस के पिता का नाम मोहम्मद सलीम खान था. जुबैर घर में ही था.

उसे पकड़ कर थाना सीमापुरी लाया गया. उस ने भी अपना गुनाह कुबूल कर लिया. दोनों को दूसरे दिन सक्षम न्यायालय में पेश किया गया तो दोनों को जेल भेज दिया गया. कोमल का शव परिजनों को सौंप दिया गया. कथा लिखने तक पुलिस हत्या से संबंधित पुख्ता सबूत एकत्र करने में लगी थी. Delhi News

 

 

Parivarik Kahani Hindi : जीजा ने की जिद साली पर कहर

Parivarik Kahani Hindi : नौकरीपेशा बेटी वर्तिका की जिद के आगे सविनय सक्सेना को झुकना पड़ा और उन्होंने उस की शादी उस के प्रेमी अंशुल शर्मा से कर दी. बेरोजगार अंशुल इतने पर ही संतुष्ट नहीं हुआ, वह वर्तिका की उच्चशिक्षित छोटी बहन कोमल सक्सेना की शादी अपने नाकारा भाई छोटू के साथ कराने का प्रेशर ससुरालियों पर डालने लगा. इस जिद ने घर में ऐसा कोहराम मचा दिया कि…

उत्तर प्रदेश के जिला शाहजहांपुर के लाला तेली बजरिया मोहल्ले में आईटीआई कालोनी है. सुरेशबाबू सक्सेना आईटीआई में प्राध्यापक के रूप में नौकरी करते थे, इसलिए इसी कालोनी में परिवार के साथ रहते थे. उन की पत्नी का नाम सविनय सक्सेना था. इन के बच्चों में 3 बेटियां और एक बेटा था. सब से बड़ी बेटी का विवाह इन्होंने अपनी ही जाति के कुलदीप के साथ धूमधाम से किया था.

डायबिटीज के रोगी होते हुए भी सुरेशबाबू अपना मिठाई का शौक छोडऩे को तैयार नहीं थे. सलोनी के विवाह के बाद डायबिटीज काबू में न रहने के कारण सुरेशबाबू की मौत हो गई थी. नौकरी कार्यकाल में ही उन की मौत हुई थी, इसलिए मृतक आश्रित के रूप में उन के बेटे अंकुर सक्सेना को आईटीआई में नौकरी मिल गई थी. ससुर की मौत के बाद घर में सब से बड़ा दामाद होने के कारण कुलदीप इस परिवार की हर काम में मदद करता था. अपना घर तो था ही, परिवार की आर्थिक स्थिति भी मजबूत थी.

सलोनी से छोटी बेटी वर्तिका पढऩे में ठीकठाक तो थी ही, आजाद स्वभाव की भी थी. अपनी पढ़ाई की बदौलत उस ने आईटीआई में क्लर्क की नौकरी पा ली थी. एक दिन सलोनी और कुलदीप अपनी ससुराल खाने पर आए थे. खाने के बाद सभी हंसीखुशी से बातें कर रहे थे. उसी बातचीत के दौरान सलोनी और कुलदीप ने अपनी जाति के 2 लड़कों का बायोडाटा और फोटो दिखाते हुए सास सविनय सक्सेना से कहा कि इन में से जो ज्यादा उचित लगे, उस से वर्तिका के ब्याह की बात चलाई जा सकती है.

जीजा कुलदीप की बात सुन कर वर्तिका तमक कर बोली, ”मेरे विवाह की चिंता करने की किसी को जरूरत नहीं है और न मेरे लिए कोई लड़का बताने की जरूरत है. मैं अंशुल शर्मा से प्यार करती हूं और हम दोनों ने विवाह करने का फैसला कर लिया है.’’

”अंशुल शर्मा?’’ कुलदीप ने हैरानी से कहा, ”वह कोई कामधंधा तो करता नहीं है. उस के बाप की पेंट की दुकान है. वहां दोपहर को जा कर उन के साथ बैठ कर टाइम पास करता है. दुकान की कमाई से उन के घर का खर्च मुश्किल से पूरा होता है. उस का खंडहर जैसा तो घर है, जिस की मरम्मत कराने की भी उन की औकात नहीं है. तुम्हारी सैलरी पर उस की नजर है, इसीलिए तुम्हें फंसाया है. मेरी बात मानो, उस नकारा लड़के के साथ विवाह करने का विचार तुम छोड़ दो.’’

”कुलदीप सही कह रहे हैं.’’ सविनय ने भी बेटी वर्तिका को समझाया, ”बिना नौकरीधंधे वाला वह ब्राह्मण है और हम कायस्थ हैं. तुम उस का विचार छोड़ दो, अपनी जाति में भी तमाम लड़के हैं.’’

”तुम लोगों को सलाह देने की जरूरत नहीं है. मुझे जो उचित लगा है, मैं ने उसी के अनुसार निर्णय लिया है. और अब मैं उस में कोई बदलाव करने वाली नहीं हूं.’’ बहन, बहनोई और मां की ओर देखते हुए वर्तिका ने मजबूती से कहा, ”अब इस बारे में मैं कोई बात नहीं करना चाहती. मैं मर जाऊंगी, पर अंशुल के अलावा किसी और से विवाह नहीं करूंगी.’’

वर्तिका का जवाब सुन कर सलोनी और कुलदीप उठे और अपने घर चले गए. इस पूरी बातचीत के दौरान छोटा भाई अंकुर और छोटी बहन कोमल चुप बैठे सभी की बातें सुनते रहे. उन दोनों को भी वर्तिका का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा था. एक मां होने के नाते अगले दिन से सविनय ने वर्तिका को समझाना शुरू किया कि अच्छी नौकरी करने वाले किसी युवक के बजाय इस तरह बेरोजगार युवक के साथ वह विवाह न करे. हम कायस्थ हैं और वह ब्राह्मण है. बाद में पछताने के बजाय वह अभी संबंध तोड़ ले. परंतु वर्तिका नहीं मानी तो नहीं मानी. इस वजह से अब घर का माहौल तनावपूर्ण रहने लगा था.

अंकुर और छोटी बहन कोमल ने भी वर्तिका से बातचीत करनी कम कर दी थी. बगल के मोहल्ले में रहने वाले एक कायस्थ परिवार ने घर आ कर अपनी बेटी का अंकुर के साथ रिश्ता तय कर दिया. अपमान का घूंट पी कर वर्तिका का हित सोचते हुए सलोनी और कुलदीप ने सविनय को अन्य 3 लड़कों के बारे में जानकारी दी. सभी के लाख समझाने के बावजूद वर्तिका ने अपनी जिद नहीं छोड़ी. आखिर कुंवारी बेटी को कब तक घर में बैठाए रहतीं. इसलिए विधवा मां ने अपना मन मार कर बेटी की जिद के आगे हार स्वीकार कर ली और वर्तिका के विवाह की तैयारी शुरू कर दी.

दिसंबर, 2021 में वर्तिका का विवाह अंशुल शर्मा के साथ हो गया. पर इस विवाह में सलोनी और कुलदीप ने आने से इनकार कर दिया. जब सविनय ने बहुत मनाया तो सलोनी और कुलदीप थोड़ी देर के लिए शादी में आए तो पर बिना खाना खाए ही चले गए थे. विवाह के 2 महीने बाद वर्तिका और अंशुल सविनय के पास आए. दोनों ने मकान की मरम्मत कराने के लिए सविनय से 7 लाख रुपए उधार मांगे. अंकुर और कोमल को यह जरा भी अच्छा नहीं लगा, पर सविनय ने अंशुल को 7 लाख रुपए दे दिए.

अंकुर की भी शादी 6 महीने बाद पड़ोस के मोहल्ले में रहने वाली लड़की के साथ हो गई. कोमल पढ़ाई में अच्छी थी. बीएससी फस्र्ट क्लास पास करने के बाद उस ने बीएड किया और फिर टीचर बनने के लिए यूपी टेट की परीक्षा भी पास कर ली थी. सेंट्रल स्कूल में नौकरी के लिए वह सीटेट परीक्षा की तैयारी कर रही थी. मम्मी या भाई से पैसा मांगने के बजाय वह अपने खर्च के लिए एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने के साथसाथ हाईस्कूल और इंटरमीडिएट कक्षा के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी.

इस दौरान वर्तिका और अंशुल उन 7 लाख रुपयों को भूल से गए, जो घर की मरम्मत के लिए सविनय से लिए थे. क्योंकि वे लौटाने की बात ही नहीं  कर रहे थे. सविनय ने 2-3 बार अंशुल से पैसे मांगे भी, पर अंशुल ने ‘आप को अभी पैसों की क्या जरूरत है’, कह कर उन की बात को हवा में उड़ा दिया. इसीलिए उन के संबंध इस परिवार से लगभग बिगड़ गए थे. वे दोनों यहां आते भी नहीं थे.

अंकुर की पत्नी को कुछ खरीदने के लिए पैसा चाहिए था. उस ने अंकुर से रुपए मांगे तो अंकुर ने कहा कि अभी रुपए नहीं हैं, बाद में ले लेना. यह सुन कर वह बिफर उठी, ”अपनी बहन को देने के लिए आप लोगों के पास 7 लाख रुपए थे और मैं 20 हजार रुपए मांग रही हूं तो कह रहे हो कि नहीं हैं. इस घर में मेरी कोई कीमत नहीं है.’’

यह विवाद इतना बढ़ा कि अंकुर की पत्नी नाराज हो कर मायके चली गई. मायके पहुंची तो अपने मम्मीपापा के सिखाने में आ कर उस ने थाने जा कर दहेज उत्पीडऩ का केस दर्ज करा दिया. इस परिस्थिति में सविनय को अपनी छोटी बेटी कोमल की चिंता सताने लगी थी. 24 साल की पढ़ीलिखी कोमल के लिए ठीकठाक लड़का देख कर वह उस का ब्याह कर देना चाहती थीं, लेकिन उस के ब्याह के लिए उन्हें पैसों की जरूरत पडऩी थी. संबंधों में कड़वाहट तो थी, पर बेटी के विवाह के लिए पैसों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने वर्तिका और अंशुल से रुपए मांगने शुरू किए, पर अंशुल बहाने बनाता रहा.

भाईदूज को वर्तिका पति अंशुल के साथ मायके आई तो सभी को सुखद आश्चर्य लगा कि शायद इन के बीच समझौता हो गया है. सविनय ने अंशुल से कहा कि उन्हें जल्दी ही कोमल की शादी करनी है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके, उन के 7 लाख रुपए लौटा दें.

”आप की यही चिंता दूर करने के लिए ही हम इतने समय बाद आप के घर आए हैं.’’ अंशुल ने कहा, ”आप अपनी कोमल का विवाह मेरे छोटे भाई छोटू के साथ कर दीजिए. आप को लड़का भी नहीं ढंूढना पड़ेगा और समझ लीजिएगा कि आप ने 7 लाख रुपए कोमल के विवाह में दहेज दे दिए. इस तरह हमारा और आप का हिसाब बराबर हो जाएगा.’’ फिर उस ने हंसते हुए आगे कहा, ”एक ही घर में 2 बहनें रहेंगी तो एकदूसरे का सहारा रहेंगी.’’

”जीजाजी, आई एम वेरी सौरी.’’ भयानक गुस्से में कोमल ने कहा, ”हाईस्कूल फेल अपने नाकारा भाई के लिए आप कोई दूसरी लड़की खोज लीजिए. मैं कुंवारी रह कर मर जाना पसंद करूंगी, पर तुम्हारे उस नाकारा भाई छोटू के साथ कभी भी विवाह नहीं करूंगी. आप अपनी इस धारणा को भूल जाइए और कहीं और ट्राई कीजिए.’’

कोमल का यह जवाब सुन कर भी बेवकूफ गरजवान की तरह अंशुल उसे समझाने की कोशिश करता रहा. पर कोमल साफ मना करते हुए उठी और दूसरे कमरे में चली गई. इस के बाद अंशुल और वर्तिका ने मम्मी को समझाना शुरू किया. आखिर सविनय ने भी ऊब कर कहा, ”दामादजी, मेरी कोमल बीएससी, बीएड है. उस ने टेट की परीक्षा भी पास पर ली है. इसलिए वह जल्दी ही टीचर की नौकरी पा लेगी. तुम्हारा भाई छोटू हाईस्कूल फेल है और कोई नौकरीधंधा भी नहीं करता, इसलिए उन दोनों का बिलकुल मेल नहीं खाता. मेहरबानी कर के तुम यह बात भूल जाओ और जितनी जल्दी हो सके, मेरे 7 लाख रुपए लौटा दो.’’

साली और सास की बातों से चिढ़ कर अंशुल उठ कर खड़ा हो गया और वर्तिका का भी हाथ पकड़ कर खींच कर खड़ा किया. इस के बाद दनदनाता हुआ वहां से चला गया. अंशुल ने 2 दिन बाद कोमल को फोन कर के फिर से समझाने का प्रयास किया. तब कोमल ने सख्त शब्दों में स्पष्ट कह दिया कि छोटू के साथ विवाह करने की बात वह सपने में भी नहीं सोच सकती. अगर उन्होंने फिर कभी इस बारे में बात की तो वह उस का नंबर ब्लौक कर देगी. इस पर अंशुल ने कोमल को धमकाते हुए कहा, ”कोमल, यह तुम जो कह रही हो, इस का परिणाम अच्छा नहीं होगा. एक बार फिर सोच लो.’’

अंशुल की इस धमकी से चिढ़ कर कोमल ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. अंशुल ने बारबार फोन कर के सास को मनाने की कोशिश की, परंतु सविनय उसे स्पष्ट मना करती रही.

कोमल सुबह 8 बजे ट्यूशन पढ़ाने जाती थी और 11 बजे वापस आती थी. अंशुल को इस बात की जानकारी थी. 18 दिसंबर, 2024 दिन बुधवार को पौने 11 बजे कोमल की नजर न पड़े, इस तरह अंशुल आ कर गली के नाके पर बैठ गया. कोमल को आते देख कर उस ने अपना इरादा पक्का कर लिया. कोमल जैसे ही घर में घुसी, उसी समय सविनय सब्जी लेने के लिए घर से बाहर निकलीं. कोमल घर में अकेली ही है, यह विश्वास होते ही अंशुल आगे बढ़ा.

बैडरूम में पलंग पर बैठ कर कोमल किताबें पलट रही थी, उसी समय अंशुल सीधे उस के पास पहुंचा. जैकेट में संभाल कर रखी छुरी निकाल कर उस ने कोमल के गले पर रख कर कहा, ”छोटू के साथ विवाह करने से तू क्यों मना कर रही है? बड़ा घमंड है तुझे खुद पर न, आज मैं तेरा वह घमंड चूर करने के लिए ही आया हूं. अभी तेरा खेल खत्म किए देता हूं.’’

अंशुल के यह तेवर देख कर कोमल ने भागना चाहा, परंतु अंशुल की ताकत के आगे उस की एक न चली. अंशुल ने पूरी ताकत से उस की गरदन पर वार किया. खून से लथपथ हो कर कोमल गिर पड़ी. फिर अंशुल ने दनादन वार करने शुरू कर दिए. वह तब तक कोमल पर छुरी के वार करता रहा, जब तक उसे विश्वास नहीं हो गया कि कोमल मर गई है. खून लगी छुरी लिए अंशुल घर से बाहर निकल रहा था, उसी समय सविनय घर में घुसी. दामाद के हाथ में खून लगी छुरी देख कर वह चौंकी. वह कुछ पूछती, उस के पहले ही अंशुल ने उन्हें खत्म करने के इरादे से उन का हाथ पकड़ कर अंदर खींचा.

पूरी ताकत लगा कर सविनय ने अपना हाथ छुड़ाया और चिल्लाते हुए भागीं. सविनय की चीख सुन कर पड़ोसी घर से बाहर निकल आए तो छुरी फेंक अंशुल भाग गया. कोमल की हालत देख कर सविनय बेहोश हो गईं. पड़ोसियों ने उन्हें संभाला. पड़ोसियों ने पुलिस, अंकुर और सलोनी को फोन किया. बहन की लाश देख कर अंकुर और सलोनी चौंक गए थे. कुलदीप ने उन दोनों को संभाला. वर्तिका को इस सब की बिलकुल खबर नहीं थी. रोज की तरह उस ने औफिस से मायके और ससुराल फोन किया, पर दोनों जगहों के फोन बंद थे. इसलिए वह अपने घर गई. वहां ताला लगा देख कर वह मायके आई तो यहां घर के सामने भीड़ लगी देख कर वह दौड़ कर घर में आई.

घर में उस ने जो देखा, वह हैरान रह गई. उसे देख कर सविनय को गुस्सा आ गया. वह उस पर चिल्लाईं, ”तू अब इस घर में कदम मत रखना. यह जो भी हुआ है, सब तुम्हारी वजह से ही हुआ है. तू निकल जा मेरे घर से.’’

वेदना से बिलबिलाती मम्मी रोरो कर आक्रोश व्यक्त कर रही थी. घटना और मम्मी के गुस्से से स्तब्ध वर्तिका को पड़ोसी बाहर ले आए और जो हुआ था, उन्होंने वर्तिका को बताया. सच्चाई जान कर पश्चाताप करते हुए वर्तिका दोनों हाथ सिर पर रख कर वहीं बैठ गई. सूचना मिलते ही एसएचओ सुरेंद्र पाल सिंह घटनास्थल पर आ पहुंचे. उन्हीं की सूचना पर एसपी (सिटी) संजय कुमार, सीओ (सिटी) प्रियांक जैन भी आ पहुंचे थे. पुलिस अधिकारियों ने जांच में पाया कि कमरे में खून फैला था.

फोरैंसिक टीम बुला कर छुरी तथा कोमल की टूटी हुई चूडिय़ां भी कब्जे में ले लीं. 2 घंटे में ही पुलिस ने अंशुल को पकड़ लिया. अपने बचाव में उस ने पुलिस से कहा कि मेरे साले अंकुर का उस की पत्नी से झगड़ा चल रहा है, इसलिए अंकुर की ससुराल वालों ने घर में घुस कर कोमल की हत्या कर दी है. पुलिस ने उस के साथ थोड़ी सख्ती की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दरअसल, अंशुल को पता ही था कि अंकुर की पत्नी मायके चली गई है और दोनों में विवाद चल रहा है.

सविनय के पास काफी संपत्ति है. इसलिए वह कोमल का विवाह अपने भाई से करा कर उन की संपत्ति पर कब्जा करना चाहता था. लेकिन लगभग दरजन भर गवाहों और छुरी पर अंगुलियों के निशान के कारण अंशुल को सजा मिल सकती है. पर जीजा और मम्मी की उचित सलाह न मान कर वर्तिका ने एक आवारा युवक से विवाह कर के जो मूर्खता की, उस की सजा उसे तो भोगनी ही होगी, उसी की इस मूर्खता की सजा एक बेकुसूर व होनहार लड़की को भी अपना जीवन गंवा कर भोगनी पड़ी. Parivarik Kahani Hindi

 

Love Affair : इश्क में पति की आहुति

Love Affair : मीना के संजय कुशवाहा से अवैध संबंध बने तो उसे अपना पति कांटे की तरह चुभने लगा. संजय के हाथों पति की हत्या कराने के बाद मीना और उस के प्रेमी ने यही सोचा था कि वे कभी पकड़े नहीं जाएंगे, लेकिन पुलिस ने ऐसी युक्ति अपनाई कि वह हत्यारों तक पहुंच गई…

मीना ने अपने प्रेमी संजय कुशवाहा के साथ पति चरण सिंह को मौत के घाट उतारने की योजना बना ली थी. इस के बाद चरण सिंह की हत्या करने का दिन और स्थान भी तय कर लिया गया, लेकिन चरण सिंह इस बात से पूरी तरह बेखबर था. वह तो अपनी पत्नी का मोबाइल तोड़ कर निश्चिंत था कि मीना अब अपने प्रेमी संजय कुशवाहा से बात नहीं कर पाएगी, लेकिन चरण सिंह नहीं जानता था कि घायल शेरनी कितनी खूंखार और खतरनाक होती है.

 

प्लान के अनुसार, मीना अपने व्यवहार में बदलाव ला कर पति का भरोसा जीतने का प्रयास कर रही थी. इस से चरण सिंह को लगा कि सब कुछ ठीक हो गया है. जबकि हकीकत में मामला और बिगड़ गया था. मीना अपने पति को प्रेमी संजय के हाथों मरवाने के बाद निश्चिंत हो कर उसी के साथ मौजमस्ती करना चाहती थी. 20 दिसंबर, 2024 को चरण सिंह के इकलौते बेटे का जन्मदिन था. अत: वह अपने गांव जारह से 19 दिसंबर की सुबह जन्मदिन के लिए जरूरी सामान लेने मुरैना आया था. योजनाबद्ध ढंग से मुरैना में बस स्टैंड पर उसे संजय खड़ा मिल गया.

संजय ने उस से कहा, ”चरण सिंह, तुम बेटे के जन्मदिन का सामान बाद में खरीद लेना, आज मौसम बहुत ही बेहतरीन है. चलो, पहले बाइक से पगारा डैम पर चलते हैं. वहीं बैठ कर तसल्ली के साथ 2-2 पैग लगा लेते हैं.’’

आने वाली आफत से बेखबर चरण सिंह संजय के कहने पर बसस्टैंड से संजय की बाइक पर बैठ कर पगारा डैम चला आया. पगारा डैम पर दोनों ने बैठ कर शराब पी. इस दौरान संजय ने चरण सिंह से उधार लिए डेढ़ लाख रुपए लौटाने को कहा. पैसे मांगने की बात पर उन के बीच झगड़ा हो गया. दोनों में जम कर मारपीट हुई. चरण सिंह समझ गया कि उस के साथ धोखा हुआ है. उस ने वहां से भागने की कोशिश की, लेकिन नशा चढऩे के कारण वह भाग नहीं सका, वहीं मारपीट में सिर में चोट लगाने से चरण सिंह बेहोश हो गया तो संजय ने अपने मकसद को पूरा करने के लिए उसे उठा कर पगारा डैम में फेंक दिया और अपने घर लौट आया.

चरण सिंह की मौत के बाद संजय और मीना ने राहत की सांस ली, लेकिन जेल जाने और सजा पाने का डर दोनों की आंखों में साफ नजर आ रहा था. उन के इश्क की दीवानगी का सुरूर उतर चुका था. इधर 4 दिन गुजर जाने के बावजूद भी जब चरण सिंह मुरैना से लौट कर घर नहीं आया तो फेमिली वाले चिंतित हो गए. उस का मोबाइल फोन भी स्विच औफ आ रहा था. यह देख कर कर फेमिली वालों का माथा ठनका तो चरण सिंह का छोटा भाई रामचंद्र थाना सराय छौला में उस की गुमशुदगी की सूचना लिखाने चला गया. रामचंद्र ने अपने भाई की गुमशुदगी की सूचना लिखाते हुए शक अपनी भाभी मीना और उस के प्रेमी संजय कुशवाहा पर जताया.

एसएचओ के.के. सिंह ने रामचंद्र को भरोसा दिया कि वह जल्दी ही चरण सिंह का पता लगाने का प्रयास करेंगे. इस के बाद रामचंद्र ने अपनी रिश्तेदारियों में भी फोन किए, लेकिन चरण सिंह का कुछ पता नहीं चला. 26 दिसंबर, 2024 को जिला मुरैना के गांव लख्खा का पुरा निवासी श्याम सुंदर ने जौरा थाने के एसएचओ उदयभान सिंह यादव को फोन कर के सूचना दी कि गुमशुदा चरण सिंह की लाश पगारा डैम में पड़ी हुई है. यह सूचना मिलते ही उदयभान सिंह यादव तुरंत मौके पर पहुंच गए. उन्होंने ग्रामीणों की मदद से पगारा डैम से चरण सिंह की लाश को डैम से निकलवाने के बाद रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस के बाद जौरा थाने के एसएचओ उदयभान सिंह यादव द्वारा वायरलैस से चरण सिंह की लाश पगारा डैम में पड़ी मिलने की सूचना प्रसारित करवाई. इस सूचना को सुन कर सराय छौला के एसएचओ के.के. सिंह ने चरण सिंह के भाई रामचंद्र को थाने बुलाया, क्योंकि रामचंद्र ने सराय छौला थाने में चरण सिंह की गुमशुदगी दर्ज करा रखी थी. इस के बाद वह रामचंद्र को ले कर जौरा के पगारा डैम पहुंच गए. रामचंद्र ने जैसे ही वह लाश देखी तो वह दहाड़ें मार कर रोने लगा. रामचंद्र ने पगारा डैम से बरामद हुई लाश की शिनाख्त अपने बड़े भाई चरण सिंह के रूप में की. इस के बाद एसएचओ ने लाश को अपने कब्जे में ले कर धारा 103 (1) बीएनएस के तहत रिपोर्ट तरमीम कर दी.

जैसे ही पगारा डैम से चरण सिंह की लाश मिलने की खबर इलाके के लोगों को हुई तो वे हैरान रह गए. सराय छौला पुलिस को अब कातिलों की तलाश थी. चरण सिंह के भाई ने अपनी भाभी  मीना और उस के प्रेमी संजय पर अपना शक जताया था, लिहाजा पुलिस उन दोनों के पीछे लग गई. काफी कोशिश के बाद पुलिस के लंबे हाथ आखिर संजय कुशवाहा तक पहुंच गए. 27 दिसंबर, 2024 को मुखबिर की सूचना पर संजय कुशवाहा को जौरा में नए अस्पताल के पास से पुलिस ने दबोच लिया. पुलिस उसे थाने ले आई. सख्ती से पूछताछ करने पर संजय ने स्वीकार कर लिया कि चरण सिंह की हत्या उस ने ही की थी. हत्या की साजिश में मृतक की पत्नी और उस की प्रेमिका मीना भी शामिल थी.

संजय से मिली जानकारी के बाद पुलिस ने मृतक चरण सिंह की पत्नी मीना को गांव जारह से गिरफ्तार कर लिया. उस ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद चरण सिंह की हत्या की चौंकाने वाली कहानी सामने आई—

मध्य प्रदेश के जिला मुरैना के थाना सराय छौला के अंतर्गत आने वाले गांव जारह का रहने वाला चरण सिंह जब मेहनतमजदूरी कर के ठीकठाक पैसे कमाने लगा तो उस के विवाह के लिए समाज के लोग आने लगे. तमाम लड़कियां देखने के बाद फेमिली वालों ने उस के लिए जौरा के नयापुरा इलाके की रहने वाली मीना नाम की युवती को पसंद किया. फिर उस के साथ चरण सिंह की शादी कर दी. शादी के बाद मीना ससुराल आई तो जल्द ही उस ने घर की सारी जिम्मेदारी संभाल ली. जिस से घरपरिवार में उस की गिनती अच्छी बहू के रूप में होने लगी. धीरेधीरे चरण सिंह का परिवार बढऩे लगा. चरण सिंह और मीना 3 बच्चों के मातापिता बन गए, जिन में 2 बेटियां और एक बेटा था. सब कुछ अच्छा चल रहा था, लेकिन वक्त कब बदल जाए, कहा नहीं जा सकता.

एक सप्ताह पहले चरण सिंह ने एक प्लौट का बयाना दे कर सौदा कर लिया था. शेष डेढ़ लाख रुपए उसे एक पखवाड़े के भीतर चुकाने थे, लेकिन काफी भागदौड़ के बाद जब चरण सिंह पैसों का इंतजाम करने में नाकाम रहा तो उस की पत्नी मीना ने अपने पुराने परिचित संजय कुशवाहा को फोन कर कहा कि मेरे पति ने एक प्लौट का सौदा कर लिया है, अत: उन्हें डेढ़ लाख रुपए की जरूरत है. यदि तुम कुछ समय के लिए डेढ़ लाख रुपए उधार दे दोगे तो मेहरबानी होगी. संजय कुशवाहा ने कुछ सोचविचार कर कहा, ”देखो मीना, इस तरह की बातें मोबाइल फोन पर नहीं हो सकतीं, ऐसा करता हूं कि मैं तुम्हारे घर पर आ जाता हूं. वहीं बैठ कर आराम से इस बारे में बात करेंगे.’’

मीना को लगा कि संजय उस के पति को पैसे उधार देना चाहता है, इसीलिए वह घर पर आना चाहता है. अगले दिन संजय चरण सिंह के घर पहुंच गया. इत्तफाक से जिस वक्त संजय आया, चरण सिंह घर पर नहीं था. मीना ने संजय से पूछा, ”तुम ने कुछ सोचा?’’

”किस बारे में?’’ संजय बोला.

”अरे, पैसे उधार देने के बारे में. मैं ने तुम से डेढ़ लाख रुपए उधार देने के लिए कहा था न…’’

”अच्छा, वह तो मैं तुम्हारे पति को दे दूंगा, लेकिन जो पैसे मैं उधार दूंगा, वह जल्द से जल्द लौटाने की कोशिश करना.’’ संजय कुशवाहा ने कहा.

”संजय, इस बात से तुम बेफिक्र रहो, मैं पूरापूरा प्रयास करूंगी कि जितनी जल्दी हो सके, तुम्हारा पैसा अदा करवा दूं.’’

अगले दिन संजय ने लिखापढ़ी करके चरण सिंह को डेढ़ लाख रुपए दे दिए. चरण सिंह को संजय से डेढ़ लाख रुपए उधार मिल गए तो वह खुश हो गया और खुशीखुशी प्लौट वाले को वायदे के मुताबिक डेढ़ लाख रुपए दे दिए. चरण सिंह को रुपए उधार देने के कारण संजय कुशवाहा का चरण सिंह के यहां आनाजाना शुरू हो गया. चरण सिंह तो सुबह होते ही नाश्तापानी करने के बाद टिफिन ले कर मजदूरी करने निकल पड़ता था और अकसर देर रात को ही घर लौटता था. इस बीच घरगृहस्थी के काम मीना को देखने पड़ते थे, लेकिन जब से संजय उस के घर आनेजाने लगा था, जरूरत पडऩे पर वह मीना की मदद कर देता था. इस के बदले में मीना उसे चायनाश्ता करा देती थी. यदि खाने का समय होता तो खाना भी खिला देती.

ऐसे में ही एक दिन संजय ने कहा, ”मीना, तुम सारे दिन कितना काम करती हो. इस के बाबजूद चरण सिंह तुम्हारी जरा भी फिक्र नहीं करता.’’

मीना ने उसे तिरछी नजरों से देखते हुए कहा, ”यह तुम कैसे कह सकते हो कि वह हमारी फिक्र नहीं करते. मेरे और बच्चों के लिए सुबह से शाम तक मेहनतमजदूरी करते हैं. जब तुम्हारी शादी हो जाएगी

तो तुम्हें भी अपने बालबच्चों के लालनपालन के लिए इसी तरह भागदौड़ करनी पड़ेगी.’’

दरअसल, चरण सिंह के घर आतेजाते संजय कुशवाहा का दिल मीना पर आ गया था, इसलिए वह उसे अपने प्रेम जाल में फंसाने के लिए चारा डालने लगा था. मीना की इस बात से वह निराश तो हुआ, लेकिन उस ने हिम्मत नहीं हारी. संयोग से एक दिन मीना को घर की जरूरत का सामान खरीदने के लिए बाजार जाना था. वह तैयारी कर ही रही थी कि तभी संजय आ गया. मीना को तैयार होते देख उस ने पूछा, ”कहीं जा रही हो मीना?’’

”गृहस्थी का सामान खरीदना है, इसलिए बाजार जा रही हूं. उन के पास तो इस काम के लिए वक्त है नहीं, इसलिए मुझे ही जाना पड़ रहा है.’’ मीना ने कहा.

” तुम अकेली मत जाओ, मैं तुम्हारे साथ चलता हूं.’’ संजय बोला.

मीना को भला क्यों ऐतराज होता. वह संजय के साथ बाइक से बाजार पहुंच गई. सामान खरीदने के बाद थैला संजय ने उठाया तो मीना हंसते हुए बोली, ”मेरी शादी को 10 साल हो गए, लेकिन वो कभी मेरे साथ बाजार तक नहीं आए.’’ मीना बोली.

”मीना, एक बात बताऊं, यदि तुम्हारे साथ चरण सिंह की शादी नहीं हुई होती तो उसे घर में रोटी भी नसीब नहीं होती. तुम ही हो जो पूरा घर चला रही हो.’’

इस पर मीना कुछ नहीं बोली, लेकिन मुसकरा पड़ी. संजय मीना को ले कर घर पहुंचा तो मीना ने कहा, ”मैं खाना बना रही हूं, अब तुम खाना खा कर जाना.’’

संजय कुशवाहा दालान में पड़े तख्त पर जा कर लेट गया. मीना ने उसे पहले चाय बना कर पिलाई. उस के बाद खाना बना कर खिलाया. संजय मन ही मन सोचने लगा कि मीना के दिल में जरूर ही उस के लिए कोई नरम कोना है, तभी तो वह उस का इतना खयाल रखती है. अब सवाल यह था कि वह उस के दिल की बात जाने कैसे?

उसी दौरान संजय हरियाणा के सूरजकुंड में लगे हस्तशिल्प मेले में गया. वहां हाथ से बनी चीजों की प्रदर्शनी लगी थी. वह प्रदर्शनी देखने गया तो वहां उसे एक दुकान पर एक जोड़ी झुमके पसंद आ गए तो संजय ने वह खरीद लिए. अगले दिन दोपहर को वह चरण सिंह के घर पहुंचा तो मीना घर पर अकेली मिल गई. मीना ने संजय को बैठाया, चायनाश्ता कराया. इस के बाद उस ने झुमके की डब्बी मीना के हाथ में थमा दी. मीना ने डब्बी खोली तो झुमके देख कर बोली, ”झुमके तो बहुत ही शानदार हैं. किस के लिए लाए हो?’’

”मीना, तुम भी कमाल करती हो. जब तुम्हारे हाथ में दिए हैं तो तुम्हारे लिए ही होंगे. कौन मेरी घरवाली बैठी है, जिस के लिए लाऊंगा.’’

”संजय, मेरे लिए तुम इतने महंगे झुमके क्यों खरीद कर लाए हो?’’ मीना ने कहा.

”मुझे अच्छे लगे, इसलिए खरीद लाया. अब जरा पहन कर तो दिखाओ.’’

मीना मुसकराते हुए भीतर कमरे में गई और थोड़ी देर में झुमके पहन कर बाहर दालान में आई तो संजय बोला, ”अरे मीना, झुमके पहन कर तुम बहुत ही खूबसूरत लग रही हो.’’

”क्यों झूठी तारीफ करते हो.’’ शरमाते हुए मीना ने कहा.

”तुम्हारी कसम मीना, सच कह रहा हूं, रात को घर लौटने पर जब चरण सिंह देखेगा तो वह भी यही बात कहेगा.’’

मीना ने आह भरते हुए कहा, ”उन के पास इतना टाइम कहां है कि वह मुझे झुमके पहने हुए देख कर मेरी तारीफ करें. काम से लौट कर उन्हें तो दारू पीने से फुरसत ही कहां मिलती है.’’

संजय मुसकराया, क्योंकि मीना की कमजोर नस अब उस के हाथ में आ गई थी. उस की समझ में आ गया कि पतिपत्नी के बीच पतली सी दरार है, जिसे वह प्रयास कर चौड़ी कर सकता है. इस के बाद संजय कुशवाहा मीना के करीब आने की कोशिश करने लगा. मीना को भी उस का आनाजाना और उस से बातचीत करना अच्छा लगने लगा था, लेकिन संजय को अपनी मंजिल नहीं मिल रही थी. उसी बीच संजय ने चरण सिंह से अपने डेढ़ लाख रुपए वापस लौटाने को कहा. चरण सिंह इस बात से काफी परेशान हो गया, क्योंकि उस के पास लौटाने के लिए रुपए नहीं थे.

कड़वा सच तो यह था कि अब उस की नीयत खराब हो गई थी. वह संजय से उधार लिया रुपया लौटाना नहीं चाहता था. एक दिन दोपहर को संजय चरण सिंह के घर पहुंचा तो मीना ने कहा, ”क्या इधरउधर मारेमारे फिरते हो, शादी क्यों नहीं कर लेते?’’

”शादी..? अभी कुछ महीने पहले ही तो मैं ने तुम्हारे कहने पर चरण सिंह को डेढ़ लाख रुपए बैंक से निकाल कर बिना ब्याज के उधार दिया था, लेकिन कई बार तकादा करने के बावजूद भी तुम्हारा पति मेरे पैसे लौटा नहीं रहा है. वह मेरा रुपया लौटाए, तब मैं शादी करने के बारे में सोचूं. क्योंकि वह मेरी अब तक की कुल कमाई का हिस्सा है.

”मेरे कहने पर जो डेढ़ लाख रुपए तुम ने मेरे पति को उधार दिया है, उस की बिलकुल भी चिंता मत करो.’’ मीना ने तिरछी नजरों से संजय को देखते हुए कहा, ”संजय, तुम मुझे बहुत डरपोक लगते हो. जो तुम्हारे मन में है, वह भी नहीं कह पा रहे.’’

”मीना, मैं ने तुम्हारी बात का मतलब नहीं समझा.’’ संजय अनभिज्ञ बनते हुए बोला.

”तुम ऐसा करो कि आज रात को आना, चरण सिंह आज रिश्तेदारी में शादी में जाएगा. मैं घर पर अकेली ही रहूंगी, तब अच्छे से समझा दूंगी.’’ मीना ने मुसकराते हुए कहा.

इतना सुनते ही संजय कुशवाहा का दिल एकदम से धड़क उठा. वह भाग कर घर गया और नहाधो कर रात होने का इंतजार करने लगा, लेकिन सूरज था कि अस्त होने का नाम ही नहीं ले रहा था. किसी तरह शाम हुई तो वह अपने गांव नयापुरा से जारह के लिए चल दिया. जारह पहुंचतेपहुंचते अधेरा हो चुका था. चरण सिंह के घर पहुंच कर संजय ने धीरे से दरवाजा खटखटाया. मीना ने जैसे ही दरवाजा खोला, वह फुरती से घर के भीतर घुस गया कि कोई उसे देख न ले.

घर में सन्नाटा पसरा हुआ था. बच्चे सो चुके थे. मीना संजय का हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई. वासना से वशीभूत मीना भूल गई कि वह अपने पति से बेवफाई करने जा रही है. संजय को अंदाजा लग गया था कि मीना ने अपने पति की गैरमौजूदगी में उसे क्यों बुलाया है. वह बिना किसी हिचकिचाहट के पलंग पर बैठ गया तो उस से सट कर बैठते हुए मीना ने कहा, ”संजय, मुझे तुम से इश्क हो गया है संजय.’’

”यदि तुम्हारे पति को यह सब पता चल गया तो…?’’

”किसी को कुछ पता नहीं चलेगा. तुम भी तो मुझ से इश्क फरमाना चाहते हो, बोलो?’’

संजय ने कुछ कहने के बजाय मीना को अपनी बाहों में समेट लिया तो वह उस से लिपट गई. इस के बाद दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. उन्होंने वह गुनाह कर डाला, जिस का अंजाम आगे चल कर बुरा ही होता है. रात दोनों की अपनी थी. क्योंकि मीना का पति घर पर नहीं था, इसलिए दोनों को किसी तरह का कोई डर नहीं था. लेकिन वे जिस दलदल में उतर गए थे, उस से वे चाह कर भी बाहर नहीं आ सकते थे. भोर होने से पहले ही संजय अपने गांव लौट गया. दोपहर को जब चरण सिंह घर लौट कर आया, मीना बिस्तर पर औंधे मुंह लेटी हुई थी. उसे समझते देर नहीं लगी कि पत्नी की तबियत ठीक नहीं है. उसे क्या पता था कि वह रात की थकावट उतार रही है.

हौलेहौले मीना और संजय का प्यार परवान चढऩे लगा. अवसरों की कोई कमी नहीं थी. चरण सिंह मजदूरी करने गांव से बाहर निकल जाता था. उसी बीच मीना संजय को अपने घर पर बुला कर रंगरलियां मना लिया करती थी. चरण सिंह को भले ही उन दोनों की कारगुजारियों की भनक अभी तक नहीं लग सकी थी, लेकिन पड़ोसी तो देख ही रहे थे. पड़ोसियों को समझते देर नहीं लगी कि चरण सिंह की गैरमौजूदगी में संजय के आने का मतलब क्या हो सकता है. आखिर एक दिन एक बुजुर्ग ने चरण सिंह को रोक कर कह ही दिया, ”चरण सिंह, मेहनतमजदूरी में इतना ज्यादा व्यस्त रहते हो, अपनी घरवाली का भी खयाल रखा करो.’’

”दादाजी मैं समझा नहीं, आप कहना क्या चाहते हैं?’’ चरण सिंह ने पूछा.

”मेरा मतलब संजय से है, आजकल वह तुम्हारी गैरमौजूदगी में तुम्हारे घर कुछ ज्यादा ही आ रहा है.’’

पड़ोसी बुजुर्ग की बात सुन कर चरण सिंह सन्न रह गया. वह सब काम छोड़ कर अपने घर पहुंचा और अपनी पत्नी से पूछा, ”मेरी गैरमौजूदगी में संजय यहां क्यों आता है?’’

”नहीं तो, किस ने कहा?’’ मीना ने लापरवाही से कहा.

”आगे से अब मेरी गैरमौजूदगी में संजय यहां आए तो उसे साफ मना कर देना, क्योंकि आसपड़ोस में उसे ले कर तरहतरह की चर्चा हो रही है. मैं नहीं चाहता कि बिना मतलब के हमारी बदनामी हो.’’

मीना ने कोई उत्तर नहीं दिया. चरण सिंह इस बात को ले कर काफी परेशान था. वह खुद भी महसूस कर रहा था कि पिछले कुछ दिनों से मीना का व्यवहार उस के प्रति लापरवाह सा रहने लगा है. कहीं वह गुमराह तो नहीं हो गई, लेकिन उस ने अपनी आंखों से अभी तक दोनों को कोई गलत हरकत करते हुए नहीं देखा था, इसलिए कोई निर्णय कैसे ले सकता था. उधर मीना ने भी फोन कर के संजय कुशवाहा को सचेत कर दिया कि वह कुछ दिनों तक उस के पति की गैरमौजूदगी में मिलने न आए, क्योंकि चरण सिंह और पड़ोसियों  को शक हो गया है. इस के बाद 2 हफ्ते तक संजय ने चरण सिंह के घर की तरफ रुख नहीं किया.

जब मीना ने देखा कि इस मामले में उस का पति लापरवाह हो गया है तो उस ने एक दिन संजय को फोन कर के घर पर बुला लिया, क्योंकि उस दिन चरण सिंह मथुरा जाने को कह कर गया हुआ था. लेकिन जैसे ही वह टिकट लेने के लिए कतार में खड़ा हुआ, तभी उस के पड़ोसी का उस के मोबाइल पर फोन आ गया. वह बोला, ”तुम कहां पर हो? तुम्हारी पत्नी तुम्हारी गैरमौजूदगी में संजय के साथ गुलछर्रे उड़ा रही है. संजय घर पर आया हुआ है.’’

पत्नी को रंगेहाथों पकडऩे के लिए चरण सिंह मथुरा जाने का इरादा त्याग कर घर लौट आया और पड़ोस की छत से घर के भीतर पहुंचा तो मीना को संजय की बाहों में पाया. चरण सिंह ने संजय को पकडऩा चाहा, लेकिन वह उसे धक्का दे कर भाग गया. इस के बाद चरण सिंह ने मीना की जम कर ठुकाई कर दी. जब कुछ गुस्सा शांत हुआ तो वह इस सोच में लग गया कि वह इस चरित्रहीन पत्नी का क्या करे. यदि वह उसे तलाक दे देता है तो उस के तीनों बच्चों का क्या होगा, अपनी मेहनतमजदूरी छोड़ कर वह उन की देखभाल भी नहीं कर सकता था.

मीना ने स्वयं को संभाला और सोचने लगी कि उसे क्या करना चाहिए? पति के द्वारा आपत्तिजनक हालत में रंगेहाथ पकड़े जाने के बाद वह संजय को किसी भी कीमत पर छोडऩा नहीं चाहती थी और चरण सिंह का घर भी नहीं छोडऩा चाहती थी. क्योंकि जो सुखसुविधा चरण सिंह के घर में थी, वह संजय नहीं दे सकता था. फिर कुछ सोच कर उस ने पति के पैरों में सिर रख कर माफी मांगते हुए कहा, ”मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई, अब मैं कसम खाती हूं कि आगे से ऐसी गलती कभी नहीं होगी.’’

चरण सिंह के पास पत्नी को माफ करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था, इसलिए उस ने पत्नी को माफ कर दिया. दूसरी ओर संजय की अब मीना से मिलने के लिए उस के पास जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन मीना ने उस से कहा कि वह उस के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. उस के बिना उस का जीवन नीरस हो जाएगा. दोनों ने अब घर के बाहर मेलमिलाप का कार्यक्रम तय किया. बहाना बना कर मीना अपने मायके नयापुरा चली जाती थी, जहां उस से मिलने के लिए संजय आ जाता था.

लेकिन वहां भी वे कई लोगों की निगाहों में आ गए. जिस से चरण सिंह को इस मेलमिलाप के बारे में पता चल गया. उस का भरोसा अपनी पत्नी से उठ गया था, वह शराब पी कर उस के साथ आए दिन मारपीट करने लगा. चरण सिंह से एक दिन बाजार में अचानक मुलाकात होने पर संजय ने उस से अपने डेढ़ लाख रुपए लौटाने को कहा. जबकि चरण सिंह अब उस के रुपए लौटाने के मूड में नहीं था. एक दिन मीना और संजय मिले तो मीना ने कहा, ”संजय, चलो हम कहीं दूर जा कर अपनी दुनिया बसा लेते हैं.’’

”देखो, हम अपनी दुनिया तो बसा लेंगे, लेकिन खाएंगेपहनेंगे क्या? मीना, इस के लिए हमें कुछ और सोचना होगा.’’ संजय बोला.

चरण सिंह की गृहस्थी में ग्रहण लग चुका था. आसपड़ोस के लोग उस की पत्नी की चुगली करते रहते थे, लेकिन चरण सिंह की समझ में नहीं आ रहा था कि वह अपनी बेहया पत्नी का क्या करे. उसे अपने बच्चों का भविष्य बरबाद होता दिखाई दे रहा था. पतिपत्नी के बीच आए दिन होने वाले झगड़ों का असर बच्चों पर भी पड़ रहा था. जबकि मीना पति से छुटकारा पाना चाहती थी. उसी बीच एक रात चरण सिंह ने मीना को मोबाइल फोन पर बातें करते हुए देखा तो उस के हाथ से मोबाइल फोन छीन कर नंबर चैक किया तो वह नंबर संजय का निकला. चरण सिंह ने कहा, ”इतना सब होने के बावजूद तुम अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही हो?’’

 

जब मीना ने कोई उत्तर नहीं दिया तो चरण सिंह को गुस्सा आ गया. उस ने मीना के गाल पर थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ”चरित्रहीन औरत, अब तू बिलकुल भी भरोसे लायक नहीं रही.’’

इस के बाद उस ने मोबाइल छीन कर तोड़ दिया.

इस पर मीना ने कहा, ”यह तुम ने अच्छा नहीं किया.’’ पति के द्वारा मोबाइल फोन तोड़ देने से तिलमिलाई मीना ने तय कर लिया कि अब वह अपने पति को जिंदा नहीं छोड़ेगी. अगले दिन उस ने अपनी सहेली के मोबाइल से संजय को फोन किया और पूछा, ”अब तुम्हारा क्या इरादा है, मुझे आज साफसाफ बताओ?’’

”मेरी माली स्थिति के बारे में तुम सब कुछ जानती हो. अब मीना तुम्हीं बताओ कि मैं क्या करूं? मैं तुम्हारे पति को उधार दिए डेढ़ लाख रुपए लौटाने के लिए अनेक बार कह चुका, लेकिन वह देने का नाम नहीं ले रहा है. मेरी समझ में नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं?’’

”देखो संजय, मैं तुम्हारी वजह से रोजरोज तो पिट नहीं सकती, इसलिए अब फैसला लेने का वक्त आ गया है. या तो तुम मुझे छोड़ दो या फिर कुछ ऐसा करो कि हम दोनों सुकून से जी सकें.’’

”अब तुम ही बताओ मीना कि मुझे क्या करना चाहिए?’’

”तुम कुछ ऐसा करो कि मुझे हमेशाहमेशा के लिए चरण सिंह से छुटकारा मिल जाए. उस के बाद हम दोनों सुकून की जिंदगी गुजार सकेंगे.’’

”लेकिन यह सब कैसे होगा?’’

”सब आराम से हो जाएगा, क्योंकि यह हमारे बीच दीवार की तरह है. यह अब मुझे सहन नहीं हो रहा है.’’

”चरण सिंह को ठिकाने लगाने के लिए पैसों की जरूरत होगी, जो मेरे पास हैं नहीं.’’

”पैसे में दे दूंगी. पति का डेढ़ लाख रुपया मेरे पास सुरक्षित रखा हुआ है.’’

सौदा कहीं से भी घाटे का नहीं था. संजय मन ही मन खुश हो गया. उधार दिए डेढ़ लाख रुपए भी वापस मिल जाएंगे और प्रेमिका मीना के साथ उस की संपत्ति भी मिल जाएगी. वह मौज करेगा. लेकिन ऐसा नहीं जो सका. उन का गुनाह छिप न सका और दोनों ही पुलिस की पकड़ में आ गए. हत्या के बाद हर कातिल कानून से बचना चाहता है. इश्क में अंधी मीना पति की हत्या के बाद अधूरी खुशियों को पूरा करना चाहती थी, लेकिन उस के यह अरमान धरे के धरे रह गए. उसे क्या पता था कि वह मौज करने के बजाय प्रेमी संजय कुशवाहाा के साथ जेल चली जाएगी. पुलिस ने दोनों आरोपियों को चरण सिंह की हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

 

 

Crime Story : तीसरे पति की चाहत में दूसरे पति का मर्डर

Crime Story : पति की एक्सीडेंट में मौत हो जाने के बाद 3 बच्चों की मम्मी गीता यादव ने चरन सिंह से दूसरी शादी कर ली थी. इसी दौरान गीता की लाइफ में जबर सिंह आ गया. उस के आने से घर में ऐसा जलजला आया कि…

गीता यादव फितरती औरत थी. उसे बच्चों से तो हमदर्दी थी, लेकिन पति चरन सिंह फूटी आंख भी नहीं सुहाता था. पति रूपी बाधा को दूर करने के लिए एक रोज गीता ने प्रेमी जबर सिंह को उकसाया, ”जबर, हम कब तक परदेस में पड़े रहेंगे. कब तक हम मजदूरीधतूरी करते रहेंगे. तुम्हें मेरे साथ जीवन बिताना है तो कुछ करना होगा?’’

”क्या करना होगा?’’ जबर सिंह ने पूछा.

”तुम्हें मेरे सिंदूर को मिटाना होगा, ताकि मैं तुम्हारे हाथ का सिंदूर अपनी मांग में सजा सकूं. अभी तो मैं तुम्हारी रखैल ही हूं.’’

”चाहता तो मैं भी हूं, लेकिन पकड़े गए तो..?’’

”कुछ नहीं होगा. तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारा पूरा साथ दूंगी. ऐसा प्लान बनाऊंगी कि सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी.’’

कुछ देर चुप्पी साधने के बाद वह फिर बोली, ”चरन सिंह जीवित नहीं रहेगा तो उस के घर तथा जमीनजायदाद पर भी उसी का कब्जा हो जाएगा. हम दोनों उसी घर में बच्चों के साथ हंसीखुशी से रहेंगे.’’

”ठीक है. मैं तैयार हूं.’’ जबर सिंह ने सहमति जताई.

उस के बाद गीता और जबर सिंह ने कान से कान जोड़ कर चरन सिंह की हत्या का प्लान बनाया. तय हुआ कि इस बार जब गांव जाएंगे, तब योजना के तहत चरन सिंह को ठिकाने लगा देंगे. 14 नवंबर, 2024 को इटावा कोर्ट में गीता द्वारा पति के खिलाफ दर्ज कराए गए मारपीट के मुकदमे की तारीख थी. इसलिए गीता प्रेमी जबर सिंह के साथ सोनीपत से गांव रम्पुरा लौहरई आई. कोर्ट में तारीख पर गई, फिर शाम को वापस घर आ गई. उस ने घर में खाना पकाया और बच्चों को खिलाया. पति चरन सिंह से भी हमदर्दी भरी बातें कीं. चरन सिंह को लगा कि गीता को अपनी भूल का अहसास हो गया है. अब वह घर में बच्चों के साथ ही रहेगी, लेकिन यह उस की भूल थी.

गांव के बाहर प्राइमरी स्कूल था. यहां कई कमरे ऐसे थे, जिस में दरवाजे नहीं लगे थे. ऐसे ही एक कमरे में चरन सिंह का कब्जा था. यहां वह आलू का बीज रखे था, जिसे वह 2 दिन बाद खेत में लगाने वाला था. बीज की रखवाली के लिए वह रात में स्कूल वाले कमरे में सोता था. गीता ने इस की जानकारी पहले ही कर ली थी. 15 नवंबर, 2024 की शाम गीता पति चरन सिंह के साथ स्कूल वाले कमरे में सोने के लिए गई. इस की जानकारी गीता ने मोबाइल फोन के जरिए प्रेमी जबर सिंह को दे दी. योजना के तहत गीता चरन सिंह से मीठीमीठी बातें करती रही. चरन सिंह भी उस से बतियाता रहा. फिर वह सो गया. लेकिन गीता की आंखों में नींद नहीं थी. वह तो जबर सिंह के आने का इंतजार कर रही थी.

गीता क्यों बनी पति का काल

आधी रात को जब गांव के लोग गहरी नींद में सो गए, तब जबर सिंह लोहे की रौड ले कर घर से निकला. रौड का इंतजाम जबर सिंह ने गीता का फोन आने के बाद कर लिया था. जबर सिंह स्कूल पहुंचा तो गीता ने उस के कान में कुछ फुसफुसाया. इस के बाद गीता ने चरन सिंह के पैर दबोच लिए और जबर सिंह ने उस के सिर पर रौड से कई प्रहार किए. चरन सिंह की हल्की चीख निकली, फिर शांत हो गया. हत्या करने के बाद दोनों चरन सिंह के शव को स्कूल की टूटी बाउंड्री वाल के पास ले गए, फिर शव पर घासफूस डाल कर जलाने का प्रयास किया. इस के बाद जबर सिंह फरार हो गया और गीता अपने घर आ गई.

16 नवंबर, 2024 की सुबह पढऩे वाले बच्चे स्कूल पहुंचे तो उन्होंने बाउंड्री वाल के पास अधजला शव देखा. बच्चों ने शोर मचाया तो गांव वाले आ गए. ग्राम प्रधान सुधर सिंह ने थाना बसरेहर पुलिस को सूचना दी तो एसएचओ समित चौधरी पुलिस बल के साथ घटनास्थल आ गए. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को घटना से अवगत कराया तो एसएसपी संजय कुमार वर्मा तथा डीएसपी पुहुप सिंह मौकाएवारदात पर आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया.

अब तक ग्रामीणों ने शव की पहचान कर ली थी. उन्होंने पुलिस अधिकारियों को बताया कि मृतक का नाम चरन सिंह है. वह रम्पुरा गांव का ही रहने वाला था. शव के पास मृतक की पत्नी गीता छाती पीटपीट कर रो रही थी. पुलिस अधिकारियों ने उसे धैर्य बंधाया, फिर घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया. मृतक चरन सिंह की उम्र 48 वर्ष के आसपास थी. उस की हत्या किसी ठोस वस्तु से सिर में प्रहार कर की गई थी. पहचान मिटाने के लिए शव को जलाने का प्रयास किया गया था. फोरैंसिक टीम ने भी घटनास्थल पर जांच की और सबूत जुटाए. निरीक्षण के बाद पुलिस ने चरन सिंह के शव को पोस्टमार्टम हेतु जिला अस्पताल इटावा भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल पर मौजूद मृतक की पत्नी गीता से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति चरन सिंह की हत्या उस के देवर मुन्नालाल ने की है. वह उस की जमीन हड़पना चाहता था. यह पता चलते ही पुलिस ने मुन्नालाल को हिरासत में ले लिया. अधिकारियों ने जब मुन्नालाल से पूछताछ की तो उस ने बताया कि गीता झूठ बोल रही है. वह उसे फंसाना चाहती है. रोनेधोने का नाटक कर वह पुलिस को गुमराह करना चाहती है. जबकि हकीकत यह है कि गीता ने ही अपने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर भाई की हत्या की है.

उस का भाई चरन सिंह नाजायज रिश्तों का विरोध करता था. गीता अपने पति व 3 बच्चों को छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई थी. वह सोनीपत में उस के साथ रहने लगी थी. अवैध रिश्तों की बात पता चली तो पुलिस अधिकारियों के आदेश पर एसएचओ समित चौधरी ने गीता को हिरासत में ले लिया. गीता की 13 वर्षीया बेटी सान्या ने भी पुलिस को बताया कि उस के पिता की हत्या मम्मी गीता ने जबर सिंह के साथ मिल कर की है.

एसएचओ समित चौधरी ने थाने पर जब गीता से चरन सिंह की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गई और त्रियाचरित्र दिखाने लगी, लेकिन जब सख्ती की गई तो वह टूट गई और उस ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति की हत्या करने का जुर्म कुबूल कर लिया. दूसरे रोज पुलिस ने नाटकीय ढंग से जबर सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया. पूछताछ में उस ने भी हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया और हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड भी बरामद करा दी, जिसे उस ने स्कूल के पास झाडिय़ों में छिपा दिया था.

हत्यारोपियों की गिरफ्तारी की सूचना एसएचओ समित चौधरी ने पुलिस अधिकारियों को दी तो उन्होंने पुलिस लाइन स्थित सभागार में प्रैसवार्ता की और हत्या का खुलासा किया. गीता यादव और उस के प्रेमी जबर सिंह से पूछताछ के बाद चरन सिंह की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह अवैध संबंधों की बुनियद पर रचीबसी निकली—

गीता 3 साल में हो गई विधवा

गीता के पिता रूपसिंह यादव औरैया जनपद के दिबियापुर कस्बे के रहने वाले थे. परिवार में पत्नी गोमती के अलावा एक बेटा भागीरथ तथा 2 बेटियां गीता व अनीता थी. रूपसिंह बढ़ईगीरी का काम करता था. इस काम में बेटा भागीरथ भी उस की मदद करता था. रूपसिंह की आर्थिक स्थिति कमजोर थी. बड़ी मुश्किल से परिवार चल पाता था.

भाईबहनों में सब से बड़ी गीता यादव थी. वह घर में सब की लाडली थी. इसी लाड़प्यार ने उसे बिगाड़ दिया था. उस का रूपरंग तो साधारण था, लेकिन नैननक्श आकर्षक थे. गीता ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, फिर भी ऊंचे ख्वाब देखा करती थी. जब वह बनठन कर अपनी जवानी के जलवे बिखेरती हुई गलियों से गुजरती तो मनचलों के दिलों पर बिजली सी गिरती थी. गीता यादव आजादखयाल की जरूर थी, लेकिन मनचलों को अपने पास फटकने नहीं देती थी. वह बस यही कल्पना करती कि उस का पति भी उसी की तरह हैंडसम और आजादखयाल का होगा.

गीता यौवन के भार से लद गई तो रूपसिंह को उस की शादी की चिंता हुई. रूपसिंह ने लड़का देखना शुरू किया तो उसे संजय के बारे में पता चला. संजय के पिता रामसिंह कानपुर के घाटमपुर कस्बे के रहने वाले थे. उन के 2 बेटे अजय व संजय थे. अजय का विवाह हो चुका था. संजय कुंवारा था. वह आटो चलाता था. संजय देखने में आकर्षक व शरीर से हृष्टपुष्ट था. कमाता भी था. अत: रूपसिंह ने संजय को अपनी बेटी गीता के लिए पसंद कर लिया. रिश्ता तय होने के बाद रूपसिंह ने गीता का विवाह संजय के साथ कर दिया.

शादी के बाद गीता व संजय ने बड़े प्यार से जिंदगी की शुरुआत की. सुखमय जीवन व्यतीत करते 5 साल कब बीत गए, दोनों में से किसी को पता ही नहीं चला. इन 5 सालों में गीता ने एक बेटी को जन्म दिया. गीता ने उस का नाम सान्या रखा. नन्ही परी सान्या से गीता व संजय दोनों ही बेहद प्यार करते थे. उस के पालनपोषण में कोई कमी नहीं रखते थे. संजय घाटमपुर-कानपुर मार्ग पर आटो चलाता था. वह सुबह 8 बजे घर से निकलता, फिर रात 8 बजे तक ही घर वापस आता था. दोपहर का खाना वह होटल पर खाता था, जबकि रात का खाना पत्नी व बेटी के साथ ही खाता था. गीता उस के खानपान का विशेष ध्यान रखती थी.

जीवन सुखमय बीत रहा था. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था, जिस ने गीता की जिंदगी में अंधेरा कर दिया. उस दिन संजय सुबह आटो ले कर घर से निकला. दोपहर बाद गीता को खबर मिली कि संजय का एक्सीडेंट हो गया. उस के आटो में किसी लोडर चालक ने टक्कर मार दी. वह सीएचसी घाटमपुर में भरती है. गीता अपने ससुर रामसिंह के साथ अस्पताल पहुंची. लेकिन तब तक डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था. बेटी सान्या अभी 3 साल की ही थी कि उस के सिर से पिता का साया उठ गया. गीता ने कुछ महीने तक तो आंसू बहाए, उस के बाद बेटी के भविष्य को ले कर चिंतित हो उठी. लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सासससुर ने कुछ दिनों तक तो हमदर्दी जताई, उस के बाद उन का भी रवैया बदल गया.

विधवा बहू व उस की बेटी उन्हें बोझ लगने लगी थी. वह उसे ताने भी मारने लगे थे. सास कहती, ‘बहू उस के बेटे को खा गई.’ ससुर कहता, ‘अभागिन बहू ने उस के बुढ़ापे का सहारा छीन लिया.’ गीता कब तक ससुराल वालों के ताने सहती. एक रोज उस ने बेटी को साथ लिया और मायके आ गई. मम्मीपापा ने उस के दर्द को समझा और उसे घर में शरण दे दी. गीता उन पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, अत: उस ने काम की तलाश शुरू कर दी. काफी प्रयास के बाद उसे बाल भारती स्कूल में आया की नौकरी मिल गई. नौकरी से वह अपना तथा बेटी का भरणपोषण करने लगी.

गीता भरी जवानी में विधवा हो गई थी. पेरेंट्स को चिंता सता रही थी कि वह पूरा जीवन कैसे बिताएगी. कोई न कोई सहारा उसे जरूर चाहिए. अत: रूपसिंह उस का घर बसाने के प्रयास में जुट गए. एक रोज एक रिश्तेदार के माध्यम से उन्हें चरन सिंह के बारे में पता चला. चरन सिंह इटावा जिले के बसरेहर थाना के गांव रम्पुरा लौहरई का रहने वाला था. बड़ा भाई मुन्नालाल अपने परिवार के साथ अलग रहता था. दोनों भाइयों के बीच घर जमीन का बंटवारा हो चुका था. चरनसिंह किसान था. मनरेगा में भी मजदूरी कर लेता था. चरन सिंह उम्रदराज जरूर था, फिर भी रूपसिंह ने उसे पसंद कर लिया था. कारण उन की बेटी गीता भी विधवा और एक बेटी की मां थी.

दूसरे पति से खुश क्यों नहीं थी गीता

गीता और चरन सिंह का कोई मेल नहीं था. गीता 30 साल की थी तो चरन सिंह 40 साल का था. गीता दिखने में आकर्षक व सुंदर थी, जबकि चरन सिंह सांवले रंग का इकहरे बदन का था. इस बेमेल विवाह में गीता का विधवा होना तथा उस के पिता की गरीबी, चरन सिंह के लिए वरदान बन गई. मजबूरी में गीता का विवाह चरन सिंह से हो गया. मन मसोस कर गीता ने भी इस बेमेल संबंध को स्वीकार कर लिया. गीता जैसी जवान और सुंदर पत्नी पा कर अधेड़ उम्र का चरन सिंह अपने भाग्य पर इतरा उठा. गीता के घर संभालते ही चरन सिंह ने उसे घर की चाबी सौंप दी. वह गीता से तो प्यार करता ही था, उस की बेटी को भी भरपूर प्यार देता था. सान्या भी चरन सिंह को पापा कह कर बुलाती थी. अब चरन सिंह जो कमाता था, वह गीता के हाथ पर रखता था. दूसरे पति के रूप में गीता को चरन सिंह का सहारा मिल गया था. अत: उस के दिन सुख से बीतने लगे थे.

समय बीतता गया. गीता के एक बेटी पहले से थी. दूसरे पति चरन सिंह से उस ने एक के बाद एक 2 बेटों अमन व करन को जन्म दिया. इस तरह गीता अब 3 बच्चों की मां बन चुकी थी. गीता यादव अपने तीनों बच्चों से बेहद प्यार करती थी तथा उन के पालनपोषण में कोई कोताही नहीं बरतती थी. चरन सिंह भी अपने बेटों जैसा ही सान्या को भी प्यार देता था और उस की हर जिद पूरी करता था. गीता 3 बच्चों की मां जरूर थी, लेकिन उस के आकर्षण में कमी नहीं आई थी. वह अब भी हर रात पति का साथ चाहती थी. जबकि 2 बेटों के जन्म के बाद चरन सिंह की कामेच्छा कम हो गई थी.

5 साल भी नहीं बीते थे कि गीता की रातें काली होनी शुरू हो गईं. अब उस की समझ में आया कि चरन सिंह के हाथों से मंगलसूत्र पहनना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. ऐसी भूल, जिसे सुधारा भी नहीं जा सकता था. चरन सिंह तो बुझता हुआ दीया था. बुझने से पहले जिस तरह दीया भड़कता है, शादी के बाद चरन सिंह उसी तरह भड़का था. इसी अंतिम जोश में 2 बच्चे हो गए और खुद चरन सिंह बुझ गया. हर रात की असफलता चरन सिंह की रोजमर्रा बन गई तो शर्मिंदगी से बचने के लिए वह गीता का सामना करने से कतराने लगा. दिन में वह खेत पर रहता. शाम को दारू पी कर आता. कभी खाना खाता, कभी बिना खाए ही सो जाता. गीता रात भर करवटें बदलती रहती.

पति की उपेक्षा से गीता यादव का मन गृहस्थी में कम ही लगता था. अब तक उस की बेटी सान्या 10 वर्ष की उम्र पार कर चुकी थी. घर का कुछ काम वह संभाल लेती थी. दोनों भाइयों का भी खयाल रखती थी. पापा को भी नाश्तापानी खेत पर दे आती थी. वहीं गीता एक तरफ उदास रहती थी तो दूसरी तरफ उस का मन भटकता रहता था. चंचल चितवन की गीता के चेहरे पर अकसर उदासी के बादल छाए रहने से उस के घर से 4 घर दूर रहने वाला युवक जबर सिंह समझ गया कि अवश्य उसे कोई दुख कचोट रहा है. वह गीता को जब भी देखता, उसे बांहों में लेने को मचलने लगता. गीता भी उसे देख कभीकभी मुसकरा देती. इस से जबर सिंह को यकीन हो गया कि गीता उस से कुछ चाहती है.

जबर सिंह के पापा गजोधर की मौत हो चुकी थी. उस के 2 बेटे गब्बर व जबर सिंह थे. गब्बर दूध का व्यवसाय करता था. जबकि जबर सिंह खेतीकिसानी के साथ मनरेगा में मजदूरी भी करता था. मनरेगा मे काम करने के दौरान ही जबर सिंह की दोस्ती गीता के पति चरन सिंह से हुई थी. हालांकि जबर सिंह और चरन सिंह की उम्र में 10-12 साल का फासला था. लेकिन दोनों शराब के लती थे, सो उन के बीच दोस्ती हो गई थी. जबर सिंह का आनाजाना गीता के घर बना रहता था. देखनेभालने में जबर सिंह गठीले बदन वाला युवक था. गीता का हमउम्र था. बातें भी लच्छेदार करता था. गीता को उस की बातें अच्छी लगती थीं. वह जब भी जबर सिंह को देखती, सोचने लगती कि काश! उस का पति भी मजबूत कदकाठी वाला और चुहलबाज होता तो उस की भी जिंदगी मजे से बीतती.

चरन सिंह कमजोर शौहर तो था ही, शराब का लती भी था. इसलिए गीता उस से मन ही मन नफरत करने लगी. पति से निराश हुई तो उस का झुकाव जबर सिंह की तरफ होने लगा. जबर सिंह जब भी आता था, गीता व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ खानेपीने की चीज जरूर लाता था. इस से गीता यही सोचती कि जबर सिंह उस का कितना खयाल रखता है. गीता का पति चरन सिंह उस के आनेजाने पर ऐतराज न करे, इसलिए जबर सिंह उस की आर्थिक मदद करता रहता था. चरन सिंह को दारू भी पिलाता था. उस के घर में बैठ कर एकदो पैग वह भी लगा लेता था. ऐसा वह गीता की नजदीकी हासिल करने के लिए करता था. इस बीच गीता और जबर के बीच नैनमटक्का चलता रहता था. कभीकभी चरन सिंह की नजर बचा कर वह गीता को छेड़ भी देता था.

इस के बावजूद चरन सिंह जब पत्नी और जबर सिंह को हंसीमजाक व बतियाते देख लेता था तो वह पत्नी पर नाराज होता था और लांछन लगाने लगता था. लेकिन जबर सिंह बीच में आ जाता और दारू का लालच दे कर चरन सिंह का गुस्सा शांत कर देता था. एक रोज जबर सिंह शाम को गीता के घर आया. उस के एक हाथ में बोतल तथा दूसरे में मीट की थैली थी. आते ही उस ने पूछा, ”भाभी, भैया नहीं दिख रहे हैं, आज मैं उन की मनपसंद चीज लाया हूं.’’

”ऐसी क्या चीज लाए हो, जिस से तुम्हारे भैया खुश हो जाएंगे?’’ गीता ने आंखें नचाईं.

”बकरे का मीट और शराब की बोतल.’’ जबर सिंह ने थैली और शराब दिखाते हुए गीता से कहा.

”लेकिन वो तो आज घर पर हैं नहीं.’’

”कहां गए हैं?’’ जबर ने पूछा.

”किसी काम से रिश्तेदारी में गए हैं. कल दोपहर तक वापस आएंगे.’’ गीता ने बताया.

”तब तो कल ही महफिल जमेगी.’’ जबर सिंह मायूस हो गया.

”अरे भैया नहीं तो क्या हुआ, मैं तो हूं. मैं मीट पका लूंगी. तुम मायूस क्यों होते हो.’’ कहते हुए उस ने मीट की थैली जबर सिंह के हाथ से ले ली. इस के बाद गीता ने पानी, गिलास तथा नमकीन जबर सिंह के आगे रख दी. गीता मटन पकाने लगी. जबर सिंह पैग बनाबना कर मजे से पीने लगा. रसोई का काम निपटा कर गीता पास आ बैठी तो नशे के सुरूर में जबर सिंह उस के हुस्न के कसीदे पढऩे लगा. गीता को उस की बातों में रस आ रहा था. जबर सिंह शराब का गिलास उठा कर बोला, ”भाभी, भैया न जानें क्यों शराब का नशा करते हैं, आप की मदभरी आंखों में इतना नशा है कि कोई भी शराब उस का मुकाबला नहीं कर सकती.’’

”ये तुम समझते हो, वो तो नहीं समझते.’’ गीता ने ठंडी आह भरी.

”मैं तो भाभी यह भी कहता हूं…’’ नशे की झोंक में वह गीता के पास खिसक आया फिर बोला, ”भाभी, तुम्हारे रस भरे होठों में इतनी तासीर है कि इन्हें अंगुली से छू कर शराब में अंगुली डुबो दो, नशा 4 गुना बढ़ जाएगा.’’

”वो कैसे?’’ गीता ने आंखें नचाते हुए पूछा.

”वो ऐसे भाभी,’’ जबर सिंह ने अपनी तर्जनी अंगुली गीता के निचले होंठ पर फिराई, फिर अंगुली शराब के गिलास में डुबो कर एक ही सांस में पूरी शराब गटक गया. जबर सिंह के इस स्पर्श ने गीता की देह में अंगारे भर दिए. कामाग्नि की आंच से उस का बदन सुलगने सा लगा. चारपाई से उठते हुए वह बोली, ”अब बस करो, बहुत पी चुके हो. मैं खाना ले कर आती हूं.’’

5 मिनट बाद ही गीता थाली परोस कर ले आई. जबर सिंह को लगा, शायद उस की हरकत से गीता नाराज है, इसलिए वह बिना कुछ बोले चुपचाप खाना खाता रहा और सामने बैठी गीता अपलक उसे देखती रही. देह की भड़की हुई प्यास उसे बेचैन किए थी. जबर सिंह का मजबूत बदन रहरह कर उस की कामनाओं को हवा दे रहा था. वह किसी तरह खुद को संभाले हुए थी. खाना खा कर जबर सिंह जाने लगा तो गीता फंसीफंसी आवाज में बोली, ”कैसे मर्द हो तुम? मुझ अकेली औरत को यूं तन्हा छोड़ कर जा रहे हो?’’

”तुम्हें डर लग रहा है तो मैं यहीं सो जाता हूं.’’ जबर सिंह बोला.

गीता के बच्चे दूसरे कमरे में सो रहे थे. बच्चे जाग न जाएं और उस के खेल में खलल न डाल दें, सो उस ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. गीता ने जबर सिंह की कलाई पकड़ी और अपने कमरे में ले गई. फिर चारपाई की ओर इशारा करते हुए बोली, ”जबर सिंह, तुम इस पर लेट जाओ.’’

”खाट तो एक ही है, फिर तुम कहां सोओगी?’’ जबर ने उत्सुकता से पूछा.

”इसी चारपाई पर तुम्हारे साथ.’’ वासना ने गीता का विवेक हर लिया था. उस ने धक्का दे कर जबर सिंह को चारपाई पर गिरा दिया और स्वयं उस पर ढेर हो गई, ”बुद्धू, इतना भी नहीं समझते कि शबाब मिले तभी शराब पीने का मजा आता है.’’

जबर सिंह नशे में था तो गीता कामातुर थी. पका हुआ फल खुद ही गोद में आ गिरा था. जबर सिंह ने कामातुर गीता को अपनी बांहों में भर लिया और चारपाई पर लुढ़क गया. उस के बाद कमरे में सीत्कार की आवाजें गूंजने लगीं. काम पिपासा मिटाने के बाद ही दोनों एकदूसरे से अलग हुए. दोनों के चेहरों पर पूर्ण संतुष्टि थी. गीता यादव और जबर सिंह एक बार अवैध संबंधों के दलदल में समाए तो समाते ही चले गए. दोनों को जब भी मौका मिलता, एकदूसरे में समा जाते. गीता ने जहां पति के साथ विश्वासघात किया था तो वहीं जबर सिंह ने दोस्ती में दगा दी थी. लेकिन उन दोनों को कोई मलाल न था.

जबर सिंह के बारबार घर आनेजाने पर चरन सिंह को शक हो गया कि जरूर इस का गीता के साथ कोई चक्कर चल रहा है, जिस से यह यहां इतने चक्कर लगाता है. एक दिन चरन सिंह ने इस बाबत पत्नी गीता से पूछा तो वह झूठ बोली, ”जरूर तुम्हें कोई वहम हो गया है. जैसा तुम सोच रहे हो, ऐसा कुछ नहीं है.’’

पति ने रंगेहाथ ऐसे पकड़ा गीता को

 

दिन भर का थकाहारा चरन सिंह शाम को घर में दाखिल हुआ तो उस की नजर कमरे में बैठे जबर सिंह पर पड़ी. वह उस की पत्नी गीता से हंसीठिठोली कर रहा था. गीता भी उस की बातों में सराबोर थी. यह देख कर चरन सिंह का गुस्सा सातवेें आसमान पर जा पहुंचा. वह चीखते हुए बोला, ”गीता, अपने यार से ही बतियाती रहेगी या फिर चायपानी को भी पूछेगी.’’

पति का कटाक्ष सुन कर गीता भी फट पड़ी, ”कैसी बातें करते हो, थोड़ा सोचसमझ कर बोला करो. जबर सिंह मेरा यार नहीं, गलीटोला के नाते देवर लगता है. वैसे भी जबर सिंह तुम्हारा ही दोस्त है. तुम्हीं उस के साथ उठतेबैठते हो, कामधंधा करते हो और शराब की महफिल सजाते हो. दोष तुम्हारा और लांछन मुझ पर लगाते हो. उस का घर आना तुम्हें इतना ही बुरा लगता है तो उसे बेइज्जत कर भगा दो. ताकि दोबारा उस के कदम घर की ओर न बढ़ें.’’

”तेरी लोमड़ी चाल को मैं अच्छी तरह समझता हूं. तू चाहती है कि मैं उस का बुरा बन जाऊं और तू उस की भली बनी रहे. मैं भी उड़ती चिडिय़ा के पर गिन लेता हूं. तेरे दिल में उस के लिए जो प्यार उमड़ता है, उसे मैं भलीभांति जानता हूं. तेरे कारण ही वह कुत्ते की तरह पूंछ हिलाता हुआ चला आता है. मुझ से मिलने का तो बस बहाना होता है.’’

गीता और चरन सिंह की तूतूमैंमैं की भनक जबर सिंह के कानों में पड़ी तो वह कमरे से निकल कर बरामदे में आ गया और बोला, ”चरन भैया, लगता है आप खेतों पर किसी से झगड़ कर आए हो. इसलिए मूड ठीक नहीं है और सारा गुस्सा भौजाई पर उतार रहे हो. लेकिन भैया, तुम चिंता मत करो. तुम्हारा मूड ठीक करने के लिए मैं साथ में लाल परी लाया हूं. हलक में उतरते ही मूड ठीक हो जाएगा.’’

चरन सिंह शराब का लती था. जबर सिंह ने शराब लाने की बात कही तो उस का सारा गुस्सा जाता रहा. वह खुशी का मुखौटा ओढ़ कर बोला, ”जबर सिंह, मैं तेरी भौजाई से झगड़ नहीं रहा था. बीजखाद का इंतजाम करने की बात कर रहा था.’’

उस के बाद उस ने हांक लगाई, ”गीता, कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम कर दो. हम और जबर सिंह महफिल सजाएंगे.’’

पति की हांक सुन कर गीता मन ही मन बुदबुदाई, ”कैसा पति है. कुछ देर पहले लांछन लगा रहा था. जबर सिंह को भलाबुरा कह रहा था और अब देखो, शराब पार्टी की बात सुन कर कैसा गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा है?’’

गीता ने कमरे में गिलास, पानी, नमकीन का इंतजाम किया. उस के बाद चरन सिंह और जबर सिंह शराब पीने लगे. शराब पीते वक्त जबर सिंह की निगाहें गीता पर ही टिकी रहीं. गीता भी मंदमंद मुसकरा कर जबर सिंह का नशा बढ़ाती रही. लेकिन गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिपता, एक न एक दिन उस की पोल खुल ही जाती है. एक रोज चरन सिंह खेतों पर जाने के लिए निकला ही था कि तभी जबर सिंह उस के घर आ गया. आते ही उस ने गीता को बांहों में भर लिया. दोनों काम वासना में अभी डूबे हुए ही थे कि चरन सिंह की पुकार सुन कर दोनों घबरा गए.

गीता ने अपने कपड़े तुरंत दुरुस्त किए और दरवाजा खोल दिया. घर में अंदर जबर सिंह मौजूद था. बिस्तर कुछ पल पहले गुजरे तूफान की चुगली कर रहा था. चरन सिंह सब समझ गया. उस ने गीता को धुनना शुरू किया तो जबर सिंह चुपके से खिसक लिया. चरन सिंह जान गया था कि जबर सिंह उस पर इतना मेहरबान क्यों था? अब उस ने जबर सिंह के साथ शराब पीना बंद कर दी और उस के घर आने पर पाबंदी भी लगा दी. देह की लगी पाबंदियों को भला कहां मानती है.

चरन सिंह ने जब एक रोज जबर सिंह को गीता के साथ बतियाते देख लिया तो उस ने जबर सिंह के साथ गालीगलौज व मारपीट की. साथ ही जबर सिंह को चेतावनी भी दे डाली कि वह उस की पत्नी का पीछा छोड़ दे, वरना अंजाम अच्छा नहीं होगा. यही नहीं, उस ने जबर की शिकायत भी उस के बड़े भाई गब्बर से कर दी. गब्बर सिंह ने भाई को समझाया और गीता से दूर रहने को कहा. लेकिन जबर सिंह ने भाई की बात नहीं मानी. वह गीता के इश्क में इतना अंधा हो चुका था कि उसे अपनी पत्नी बनाने के सपने देखने लगा था. दोनों के मिलने पर पाबंदी लगी तो वे मोबाइल फोन के जरिए एकदूसरे से बात करने लगे. गीता को मोबाइल फोन जबर सिंह ने ही मुहैया करा दिया था.

एक रात चरन सिंह ने पत्नी गीता को फोन पर बतियाते छत पर पकड़ा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान जा पहुंचा. उस ने गीता से फोन छीन कर दूर फेंक दिया, फिर उस ने गीता को डंडे से जम कर पीटा. इस पिटाई से गीता का सिर फट गया. उस ने सुबह जा कर बसरेहर थाने में पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. इस पर पुलिस ने चरन सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. 2 दिन बाद उसे जमानत मिली.

इस घटना के बाद गीता ने तय कर लिया कि वह पति की मार अब और सहन नहीं करेगी. वह उस के साथ रहेगी भी नहीं. गीता का नाजायज रिश्ता जबर सिंह के साथ बन ही चुका था, इसलिए उस ने जबर सिंह को तीसरे पति के रूप में चुन लिया और बच्चों का मोह त्याग कर जबर सिंह के साथ रहने की ठान ली. उस ने अपनी मंशा से जबर सिंह को भी अवगत करा दिया.

बच्चों को छोड़ प्रेमी के साथ भाग गई गीता

जबर सिंह तो गीता को पत्नी बनाने का प्रयास पहले से ही कर रहा था, अत: गीता ने प्रस्ताव रखा तो वह उसे पत्नी का दरजा देने को राजी हो गया. इस के बाद गीता और जबर सिंह ने गांव छोडऩे का निश्चय किया. उन्होंने इस की भनक किसी को नहीं लगने दी. मौका देख कर एक रात गीता अपने तीनों बच्चों को घर में छोड़ कर जबर सिंह के साथ भाग गई. जबर सिंह गीता को सोनीपत (हरियाणा) ले गया. वहां दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे. जीविका चलाने के लिए दोनों मेहनतमजदूरी करने लगे. वहां गीता को किसी तरह का डर नहीं था. गीता व जबर सिंह को सोनीपत में बसाने का काम जबर सिंह के एक दूर के रिश्तेदार ने किया था, जो पहले से वहां रहता था.

इधर चरन सिंह की सुबह आंखें खुलीं तो पत्नी घर से गायब थी. तीनों बच्चे भी मां को खोजने लगे. चरन सिंह ने गांव भर में गीता की खोज की, जब वह नहीं मिली तो वह समझ गया कि गीता जबर सिंह के साथ भाग गई है. उस ने यह बात पूरे गांव को भी बता दी. कुछ लोगों ने उसे रिपोर्ट दर्ज कराने की सलाह दी. लेकिन उस ने रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई. गीता कई महीने तक जबर सिंह के साथ रही, उस के बाद उसे बच्चों की याद सताने लगी. उस से नहीं रहा गया, तब वह एक रोज गांव वापस आ गई. बच्चों ने मां को सामने देखा तो उन की आंखों से आंसू बहने लगे. गीता ने बच्चों को गले लगा लिया. चरन सिंह भी बच्चों की देखभाल के लिए परेशान था सो उस ने झगड़ा करने की बजाय गीता को बच्चों के साथ रहने के लिए समझाया. उस ने मारपीट के लिए क्षमा भी मांगी.

लेकिन जबर सिंह के पौरुष की दीवानी गीता ने चरन सिंह की बात ठुकरा दी. वह सप्ताह भर बच्चों के साथ रही, उस के बाद सोनीपत लौट गई. इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. गीता 2-4 महीने में जबर सिंह के साथ गांव आती और हफ्ता-10 दिन बच्चों के साथ रहती, फिर दोनों वापस चले जाते. गांव प्रवास के दौरान गीता का चरन सिंह से झगड़ा भी होता. कुछ समय बाद गीता का मारपीट वाले मुकदमे की कोर्ट में तारीखें पडऩे लगीं. अत: उसे इटावा कोर्ट में तारीख पर आना पड़ता. तारीख पर आने के बाद वह बच्चों से भी मिल लेती थी. तारीख पर चरन सिंह भी जाता था.

वहां कभी दोनों की नोंकझोंक होती तो कभी साथ बैठ कर बतियाते और खातेपीते भी थे, लेकिन गीता केस में सुलह को राजी नहीं होती थी. फिर 15 नवंबर की रात को गीता यादव ने प्रेमी जबर सिंह के साथ मिल कर पति चरन सिंह की हत्या कर दी. चूंकि गीता यादव और जबर सिंह ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और आलाकत्ल लोहे की रौड भी बरामद करा दी थी, अत: एसएचओ समित चौधरी ने मृतक की बेटी सान्या की तहरीर के आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 238(ए) के तहत गीता व जबर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया तथा उन्हें विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया.

19 नवंबर, 2024 को पुलिस ने गीताजबर सिंह को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा में सान्या परिवर्तित नाम है

 

 

वेब सीरीज : THE WAKING OF A NATION

Webseries : वेब सीरीज ‘द वेकिंग औफ ए नैशन’ इतिहास के पन्नों में सिमटी इंडियन एडवोकेट कांतिलाल साहनी की कहानी पर आधारित है. एडवोकेट कांतिलाल ने अमृतसर में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद न्याय की मांग करते हुए ब्रिटिश राज की गहरी साजिश का परदाफाश किया था.

कलाकार:

तारुक रैना, निकिता दत्ता, साहिल मेहता, भावशील सिंह साहनी, निखिल दुबे, एंड्रयू स्लोमन, रंजीत सिंह, अंश वर्मा, कार्ल व्हार्टन, रिचर्ड भक्ति, जेमी आल्टर, मीनाक्षी चुग, एड रौबिन्सन, डेविड माइकल हैरिसन, कृष्णकांत सिंह, टौमस हावसर, देव राज, एलेक्स रीस

लेखक: शांतनु श्रीवास्तव, शत्रुजीतनाथ एवं राम माधवानी निर्माता: राम माधवानी, अमिता माधवानी, निर्देशक: राम माधवानी, एडिटर: अभिमन्यु चौधरी, ओटीटी: सोनी लिव

यह वेब सीरीज जलियांवाला हत्याकांड के बाद की घटनाओं को उजागर करने का प्रयास करती है, विशेष तौर पर हत्याकांड के बाद ब्रिटिश सरकार की प्रतिक्रिया और हंटर कमीशन जांच. जब हंटर कमीशन सत्ताधारी साम्राज्य के हित में इतिहास को तोड़मरोड़ कर पेश करता है, तब वकील कांतिलाल नस्लवाद, सच को मिटाने की कोशिशों और न्याय की लड़ाई से जूझता है.

बचपन की अटूट दोस्ती से बंधे कांतिलाल साहनी और उस के साथियों अली अल्लाहबख्श, हरि सिंह औलख और हरि सिंह की पत्नी पूनम की विचारधाराएं भले ही अलगअलग हों, लेकिन वे सब मिल कर एक ऐसी साजिश से परदा उठाते हैं, जो उन की तकदीर बदल देती है. एक ऐसी दुनिया में जहां न्याय केवल एक भ्रम है, क्या वे छिपे हुए सच को दुनिया के सामने ला पाएंगे या खुद ही इस साजिश का शिकार हो जाएंगे? यही सब कुछ इस वेब सीरीज में दिखाया गया है.

एपिसोड नंबर 1

पहले एपिसोड के शुरुआत में वकील कांतिलाल साहनी (तारुक रैना) को यह कहते हुए दिखाया गया है कि 13 अप्रैल, 1919 जलियांवाला हत्याकांड के बारे में सब जानते हैं, सब को यह लगता है कि उस के जिम्मेदार जनरल डायर थे. कहीं यह पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर और ब्रिटिश राज का एक खेल तो नहीं था.

इस के बाद पहले दृश्य में कांतिलाल साहनी (तारुक रैना) कोर्ट रूम के दरवाजे का रौड से ताला तोड़ कर अंदर घुस जाता है और दरवाजे का भीतर से बंद कर देता है. फिर टौर्च से कोर्ट रूम के औफिस में एक फाइल ढूंढने लगता है, तभी वहां पर एक अधिकारी पुलिस को साथ ले कर दरवाजा तोड़ कर भीतर घुस जाता है. वकील कांतिलाल फाइल ले कर वहां से भाग जाता है.

अगला दृश्य 11 दिसंबर, 1919 का दिखाया गया है, जहां पर पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर और लार्ड विलियम हंटर (कार्ल व्हार्टन) की मुलाकात को दिखाया गया है, जहां विलियम हंटर पंजाब के गवर्नर माइकल डायर से कहता है कि उसे जालियांवाला कांड का चेयरमैन बनाया गया है. अगले सीन में कांतिलाल साहनी (तारुक रैना) को हरि सिंह औलख (भावशील सिंह साहनी) की पत्नी पूनम (निकिता दत्ता) समझाती है कि कल हंटर कमीशन में तुम क्या जबाब देने वाले हो. वह उसे समझाती है कि इस मामले में तुम चुप रहोगे तो बेहतर होगा. मगर कांतिलाल कहता है कि मैं सब कुछ बोलने वाला हूं.

13 अप्रैल, 1919 वैशाखी का दिन, जो खूनी दिन में बदल गया, जिस में 1650 गोलियां चलीं. 400 से ज्यादा लोग मारे गए. इस बीच फ्लैशबैक में वह सीन दिखाया जाता है, जिस में अंगरेज पुलिस निहत्थे भारतीयों पर गोलियां बरसा रही थी. इधर कांतिलाल साहनी कोर्ट में बताता है कि घटना के 5 दिन पहले कुछ ब्रिटिशर्स, जिस में महिलाएं भी शामिल थीं, डिप्टी कमिश्नर माइल्स इरविंग (टौमस हाक्सर) से क्यों मिलने गए थे. फ्लैशबैक में कांतिलाल, अली अल्लाहबख्श जैदी (साहिल मेहता) और हरि सिंह औलख (भावशील सिंह साहनी) की बचपन की दोस्ती और बातचीत करते हुए दिखाया गया है. कांतिलाल विदेश से अपने दोस्तों के लिए व्हिस्की की बोतल व पूनम भाभी के लिए एक चश्मा देता है.

अब कांतिलाल अपने दोस्त अली अल्लाहबख्श को एक पेन गिफ्ट करता है, क्योंकि अल्लाहबख्श एक रिपोर्टर है. अल्लाहबख्श कहता है कि दोस्त कांतिलाल तेरे गिफ्ट में तो गोरों की गुलामी की बू आ रही है. अगले दृश्य में पंजाब का गवर्नर कहता है कि हिंदुस्तान हमारा है और हमेशा रहेगा. तभी अमृतसर में तनाव फैलने लगता है तो वहां के 2 प्रतिष्ठित व्यक्ति डा. सत्यपाल सिंह (अनन्यब्रत सिंह) और मुसलिम नेता डा. किचलू भीड़ को समझा कर उन्हें नियंत्रित करते हैं. उधर हंसराज सिंह अंगरेजों की शह पर शहर में दंगे भड़काने के प्रयास में लगा रहता है.

तभी वहां पर जनता की ओर से चारों तरफ तालियां ही तालियां बजने लगती हैं. इस पर लार्ड विलियम हंटर (कार्ल व्हार्टन), वकील कांतिलाल साहनी को डांटने लगता है. तभी फिर सीन भीड़ पर चला जाता है, जहां पर अंगरेजों का पिट्ठू हरिसिंह एक पत्थर वकील कांतिलाल साहनी के सिर पर मारता है, जिस के कारण उस के सिर से खून बहने लगता है और आक्रोशित भीड़ गुस्से से भीतर घुस जाती है. भीड़ बढऩे लगती है तो पुलिस भीड़ पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाने लगती है और इसी के साथ पहला एपिसोड समाप्त हो जाता है.

यदि पहले एपिसोड का विश्लेषण करें तो इस एपिसोड में बिखराव ही बिखराव दिखाई दिया है. कोर्ट रूम के दृश्य जो इस एपिसोड की जान बन सकते थे, दर्शकों को इमोशनल कर सकते थे, वह अपनी रफ्तार के कारण बिखरते हुए दिखाई देते हैं. हंटर कमीशन की जांच भी बस घिसटती हुई नजर आती है. इस एपिसोड में कोई भी कलाकार अपने अभिनय की छाप छोडऩे मैं बिलकुल भी सफल नहीं हो पाया है.

एपिसोड नंबर 2

इस एपिसोड की शुरुआत में वकील कांतिलाल साहनी कोर्ट में हंटर कमीशन को बताता है कि कैसे जालियांवाला हत्याकांड को अंजाम दिया गया था. वह बताता है कि भीड़ को रोकने के लिए मात्र 6 पुलिस के जवान तैनात किए गए थे, जिन पर आक्रोशित भीड़ आसानी से विजय हासिल कर सकती थी, लेकिन रिंग मास्टर ने तो अपनी ओर से ऐसा प्लान बुना था कि उस की माचिस की एक तीली ने शहर में तबाही ला दी थी. यह उस रिंग मास्टर की अगली चाल थी, ताकि जब घायल लोगों को बचाने के लिए शहर ले जाया जा रहा हो तो उन्हें देख कर अन्य लोगों में आक्रोश फैल जाए. उस के बाद आक्रोशित भीड़ अंगरेजों को मारने लगती है और अंगरेजों के झंडे व अन्य सामान जलाने लग जाती है.

उस के बाद वकील कांतिलाल साहनी कोर्ट को बताता है कि यदि ब्रिटिश सरकार चाहती तो अपने लोगों को सुरक्षित कर सकती थी, लेकिन उन्होंने एक सुनियोजित प्लान के अनुसार अपने 5 ब्रिटिशर्स की बलि दे कर इस में आग को सुलगाने का प्रयास किया. लेकिन बाकी बचे हुए ब्रिटिशर्स की जान की सलामती का प्रयास केवल अमृतसर के लोगों ने किया. इस बीच पूनम (निकिता दत्ता) मिशनरी हौस्पिटल में डिलीवरी के लिए भरती होती है तो वहां पर आक्रोशित भीड़ अंगरेज महिला डाक्टर को मारने के लिए आ जाती है तो वहां पर पूनम और नर्स उस महिला डाक्टर की जान किसी तरह से बचा लेते हैं. इसी तरह एक जगह पर जब अंगरेज महिला टीचर को भीड़ मार रही होती है तो उसे हरि सिंह औलख (भावशील सिंह साहनी) बचा लेता है.

कांतिलाल कोर्ट को आगे बताता है कि मी लार्ड, उसी दिन 10 अप्रैल को ब्रिटिशर्स का अगला प्लान सामने आया, जिस के तहत मिलिट्री को अमृतसर में मार्शल ला लगाने के लिए मेजर मैकडोनल्ड के नेतृत्व में बुलवा लिया गया. इधर पै्रस में अली अल्लाहबख्श पूनम से कहता है कि अंगरेजों ने जो जुल्म ढाया है, जो कत्ल किए हैं, उस की पूरी जानकारी पंजाब, दिल्ली और पूरे देश को होनी चाहिए. पूनम उसे ऐसा न करने के लिए समझाती है कि कहीं अंगरेज प्रैस को जब्त कर सकते हैं और अल्लाहबख्श के ऊपर रौलेट एक्ट लगा सकते हैं. इसलिए पूनम उस न्यूज को फाड़ कर अपने घर चली जाती है.

अगले दिन 11 अप्रैल को ‘इंकलाब’ नाम का अखबार सभी स्थानों पर पहुंच जाता है. जब कमिश्नर किचन (रेमंड बेथले) अखबार देखता है तो वह मेजर मैकडोनल्ड से चिल्ला कर कहता है कि 20 भारतीयों की मौत का जिक्र तो इस अखबार में किया गया है, लेकिन 5 ब्रिटिशर्स की मौत का जिक्र नहीं किया गया. अगले दृश्य में पूनम अल्लाहबख्श को पेपर देते हुए कहती है कि अशरफ भाई, यह नोटिस सरकार की ओर से आया है. इंसपेक्टर अशरफ यह नोटिस दे कर गए हैं. नोटिस में यह लिखा गया था कि आप के ‘इंकलाब’ अखबार की सिक्योरिटी के 2,500 रुपए जब्त किए जाते हैं और इस अखबार को तत्काल बंद कर दो. यदि यह बंद नहीं हुआ तो ब्रिटिश सरकार अल्लाहबख्श को तत्काल गिरफ्तार कर लेगी.

अल्लाहबख्श कांतिलाल से कहता है कि तू मेरी ओर है या सरकार की ओर? कांतिलाल उस से कहता है कि तू एक बार भी खबर छापने से पहले सोचता नहीं है क्या? तू सच भी तो नहीं लिखता. मुझे यह बता कि जो 5 अंगरेज मरे, उस की खबर तूने क्यों नहीं छापी?

इस पर उसे अल्लाहबख्श कहता है कि कांति तू ये बता कि तू मेरा केस लड़ सकता है या नहीं? तब कांतिलाल उस का केस लडऩे से मना कर देता है. इस पर अल्लाहबख्श उसे कहता है कि तू कहां का हिंदुस्तानी है कांतिलाल. ला अपना सूट उतार कर फेंक दे अंगरेज कहीं का. इस पर कांतिलाल वहां से गुस्सा हो कर चला जाता है. यदि दूसरे एपिसोड का विश्लेषण करें तो इस एपिसोड में समय सीमाओं के बीच आगेपीछे कूदने का जटिल प्रारूप बनाया गया है, जो वास्तव में कहानी में कुछ भी नहीं जोड़ता, जो पहले से ही भारतीय दर्शकों को अच्छी तरह से पता भी है.

वकील कांतिलाल साहनी ज्यादातर अदालत कक्ष में आयोग के सदस्यों के बजाय भीड़ को संबोधित करते हुए भावशून्य चेहरे के साथ घूमता नजर आता है. अभिनय की दृष्टि से भी सभी कलाकारों का अभिनय औसत दरजे का रहा है.

एपिसोड नंबर 3

तीसरे एपिसोड के शुरुआत में हरि सिंह औलख को अंगरेज महिला टीचर शेरवुड मैडम को बताते हुए दिखाया गया है. उस के बाद हरि सिंह औलख और उस की पत्नी पूनम प्लान बनाते हैं कि अल्लाहबख्श और कांतिलाल साहनी को खाने पर बुला कर अपने होने वाले बच्चे की खुशखबरी दे देंगे. हरि सिंह पूनम से कहता है कि ‘इंकलाब’ अखबार को डूबने से केवल तुम्हीं बचा सकती हो. समय अवधि पूरी होने के बाद थाने से इंसपेक्टर अशरफ जब अल्लाहबख्श को प्रैस में गिरफ्तार करने आता है तो इसी बीच पूनम खुद ‘इंकलाब’ अखबार की एडिटर इन चीफ बन जाती है और अल्लाहबख्श का इंकलाब अखबार से इस्तीफे की खबर छपवा देती है, जिस के कारण अल्लाहबख्श की गिरफ्तारी रुक जाती है.

अगले दृश्य में 11 अप्रैल जलियांवाला कांड से 2 दिन पहले का दृश्य दिखाया गया है. कोर्ट में वकील कांतिलाल कहता है कि अमृतसर में शांति लाने का नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण शहर में खूनी मंजर लाने का प्लान था. मेरे दोस्त अल्लाहबख्श ने रामनवमी के दिन मेरे लिए एक दुआ मांगी थी कि तेरे मुंह में जुबान आ सके, इसलिए अब मैं आप को बताता हूं कि ब्रिटिशर्स और उस शातिर आदमी का अगला प्लान क्या था. अब सीन वर्तमान में आ जाता है, जहां लार्ड हंटर को यह बात याद आ रही है. कांतिलाल कहता है कि मैं अब बताता हूं कि इस के पीछे मास्टरमाइंड कौन है.

तभी कमिश्नर किचन (रेमंड बेयूले) लार्ड हंटर को इशारा करता है तो लार्ड हंटर समय की बात करते हुए कोर्ट की काररवाई को अगले दिन तक स्थगित कर देता है. अगले सीन में कांतिलाल अपने पिता गिरधर के साथ खाना खा रहा होता है, तभी कांतिलाल के वकालत के गुरु शेरवुड वहां पर माइकल ओ डायर यानी पंजाब के गवर्नर को ले कर आ जाता है. माइकल डायर गिरधर के पिता को जबरदस्ती छुरीकांटे से खाना खाने की विधि समझाता है यानी कि गिरधर को प्रताडि़त करता है ताकि कांतिलाल डर कर केस न लड़े.

जाते समय शेरवुड लंदन की एक बड़ी फर्म का नियुक्तिपत्र कांतिलाल को देता है. कांति मना कर देता है तो शेरवुड उसे कहता है कि ब्रिटिश सम्राट नहीं चाहता है कि तुम भारतीयों के लिए केस लड़ो. शेरवुड कहता है कि ये नियुक्तिपत्र लंदन की लार्ड एंड थामसन कंपनी का है, जिस में नौकरी पाने के लोग सपने देखते हैं. लेकिन कांतिलाल यह औफर ठुकरा देता है. दूसरे दिन कोर्ट में कहता है कि लार्ड हंटर मेरे गुरु (शेरवुड) ने मुझे सिखाया है कि मुझे मेरा कर्तव्य कैसे निभाना है. तभी दर्शक दीर्घा में दर्शकों के बीच में कांतिलाल के गुरु शेरवुड उस के पिता गिरधर को दिखाया जाता है.

उस के बाद जालियांवाला कांड के 2 दिन पहले 11 अप्रैल का दृश्य दिखाया जाता है, जहां पर कमिश्नर किचन मेजर मैकडोनल्ड से पूरे शहर का नियंत्रण अपने हाथ में लेने को कहता है. इस पर मेजर से मैकडोनल्ड कहता है कि हमें हिंसा को भी रोकना है, लेकिन कमिश्नर उसे आदेश जारी करने के लिए कहता है. अगले दृश्य में जनाजे और अर्थियां ले जाते हुए लोग दिखाई देते हैं, तभी वहां पर सरकारी फरमान सुनाया जाता है कि अंतिम संस्कार और जनाजे के लिए केवल 2 बजे तक का समय निर्धारित किया गया है. 2 बजे बिगुल बजेगा, अगर उस के बाद कोई सड़कों पर दिखा तो उसे गोली मार दी जाएगी.

तभी वहां पर अंगरेजों का चमचा हंसराज (अध्याय बख्शी) आ कर लोगों को भड़काता है कि सरकार का जवाब हाथ जोड़ कर नहीं, बल्कि उन का हाथ तोड़ कर देना होगा और वहां से चुपचाप खिसक जाता है. उस के बाद दलबीर भुल्लर भड़क कर नारेबाजी करने लगता है तो कांतिलाल उसे आ कर शांत करता है. हरिसिंह पत्नी पूनम के साथ घर पर होता है. वे दोनों बच्चे के होने की खुशखबरी अल्लाहबख्श और कांति को देना चाहते हैं. हरि सिंह अपने भतीजे तेज को खाने पर बुलाने के लिए निमंत्रण देने भेजता है.

कोर्ट में कांतिलाल कहता है कि लार्ड हंटर 11 अप्रैल को अमृतसर में पूरी शांति थी. यह शांति मेजर मैकडोनल्ड के कारण हुई थी, इसलिए रिंगमास्टर की दूसरी चाल भी फेल हो गई. इसलिए एक बार 11 अप्रैल को यह चाल एक बार फिर से अमल में लाई गई.

कमिश्नर किचन गवर्नर माइकल डायर को मेजर मैकडोनल्ड के आदेश न मानने के बारे में बताता है. इधर कांति कोर्ट को बताता है कि इस बार हमारा रिंगमास्टर पुरानी गलती को दोहराना नहीं चाहता था, इसलिए उस ने एक नई चाल चल कर जनरल हैरी डायर (एलेक्स रीस) को अमृतसर बुलवा लिया. जनरल हैरी डायर के अमृतसर पहुंचने पर कमिश्नर किचन उसे झूठी खबर देता है कि गवर्नर माइकल ओ डायर को ऐसा लगता है कि 300 भारतीय विभिन्न जगहों से असलहे सहित अमृतसर पहुंच कर 1857 जैसी क्रांति को अंजाम देने वाले हैं.

कमिश्नर किचन जनरल हैरी डायर को अस्पताल में भरती टीचर के पास ले जाता है, जिसे भारतीयों ने मारा था. अगले सीन में शहर में पूरी तरह से शांति थी. हरि सिंह और पूनम अपने घर पर डिनर पर अल्लाहबख्श और कांतिलाल के आने का ब्रेसबी से इंतजार कर रहे थे, तभी हरि सिंह और पूनम की नजर अपने दोमंजिले से नीचे पड़ती है तो कांतिलाल और अल्लाहबख्श दोनों अलगअलग रास्ते से आते दिखे. अल्लाहबख्श की नजर जब कांतिलाल पर पड़ी तो उसे याद आ जाता है कि कैसे कांतिलाल ने उस का केस लडऩे से साफ मना कर दिया था.

दोनों नफरत से एकदूसरे को देख कर वापस अपनेअपने रास्ते अपने घर चले जाते हैं. इसी के साथ तीसरा एपिसोड समाप्त हो जाता है. यदि तीसरे एपिसोड के बारे में बात करें तो डबिंग और साउंड मिक्सिंग इतनी खराब है कि आप वायस ओवर और डायलौग में अंतर नहीं कर सकते. अभिनय की दृष्टि से भी कलाकारों का अभिनय अपनी कोई छाप छोडऩे में असफल रहा है.

एपिसोड नंबर 4

इस एपिसोड की शुरुआत में जलियांवाला कांड से 2 दिन पहले 12 अप्रैल का दृश्य दिखाया गया है, जहां पर हंसराज अंगरेजी साजिश के तहत लोगों को भड़का रहा है कि किचलू और डा. सत्यपाल की रिहाई के लिए अधिक से अधिक लोगों के साथ जलियांवाला बाग में धरनाप्रदर्शन किया जाएगा, ताकि अंगरेजों पर दबाव बढ़ाया जा सके. अगले दृश्य में कांतिलाल कोर्ट को बताता है कि 12 अप्रैल की शाम को एक विशेष सत्याग्रही हंसराज जनरल डायर को यह खबर देता है कि 13 अप्रैल को जलियांवाला बाग में अधिक से अधिक लोगों को आने के लिए खबर फैला दी गई है. उस के बाद जनरल डायर सभी अंगरेज नागरिकों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से उन सब को सिविल लाइंस में आने के लिए आदेश पारित कर देता है.

इसी बीच जनरल डायर अमृतसर में अतिरिक्त फौज की टुकडिय़ों को भी बुलवा लेता है. अगले दृश्य में कांतिलाल एक राजस्थानी युवक भीमसेन को कोर्ट में पेश करते हुए कोर्ट को बताता है कि भीमसेन गायबैल खरीदने अमृतसर आए थे और उन के साथ अन्य लोग भी थे, जिन्हें अन्य स्थान से जलियांवाला बाग में जाने के लिए जबरदस्ती उकसाया गया था, ताकि वहां पर अधिक भीड़ इकट्ठा करवाई जा सके. 13 अप्रैल को हंसराज जलियांवाला बाग की भीड़ को इकट्ठा करवाता है. दूसरी तरफ जनरल डायर फौज को जलियांवाला बाग में पुलिस और फौज की टुकड़ी को भीड़ पर गोली चलाने का हुक्म दे देता है.

मृतकों के परिजन भी कोर्ट के सामने गोलीकांड के बाद के नजारे का दृश्य बयां करते हैं. कुछ लोग बताते हैं कि उन के बेटे, पति, पत्नी, बेटी की लाश मिली ही नहीं. जबकि वे सभी उस दिन जलियांवाला बाग में गए थे. उस के बाद कोर्ट में पूनम बताती है कि जब 13 अप्रैल की शाम को उसे इस हादसे के बारे में पता चला तो अंधेरा काफी हो चुका था. तभी एक उम्रदराज चाचा ने उसे 8 बजे तक कफ्र्यू लगने की बात बताई थी. जब उस ने अपने पति की लाश को देखा तो उस ने वहां पर अन्य लोगों से लाश उठाने की प्रार्थना की, लेकिन तब तक 8 बज चुके थे और सभी लोग कफ्र्यू के डर से अपने घर को लौट गए थे.

उस पूरी रात मैं अपने हरि का हाथ पकड़ कर वहीं पर रही. एक बार मैं ने सोचा कि अब मैं अकेले जी कर क्या करूंगी तो मैं ने सोचा कि यदि मैं मर गई तो हरि का सपना भी मर जाएगा. मैं अपने जन्म लेने वाले बच्चे को बता सकूंगी कि उस दिन जो अमृतसर में हुआ, वह कभी भूलना नहीं है. उस के बाद वहां मृतकों की लिस्ट दिखाई जाती है, जिसे देख कर कोर्ट में मौजूद मृतकों के परिजन रोने लगते हैं.

फिर एक महीने पहले का दृश्य दिखाया जाता है, जब जनरल डायर कोर्ट में अपना बयान देता है. कोर्ट में उपस्थित अन्य जज और एडवोकेट शाह (निखिल) जनरल डायर से तरहतरह के प्रश्न पूछते हैं कि जब भीड़ शांत थी तो उस ने बेगुनाहों और निहत्थे लोगों पर गोलियां चलाने का हुक्म क्यों दिया? उन को चेतावनी क्यों नहीं दी?

इस पर जनरल डायर कहता है कि यदि मैं चेतावनी देता और लोग मेरा आदेश नहीं मानते, फिर से इकट्ठा हो जाते तो इस से मेरा अपमान हो सकता था, इसलिए मैं ने गोली चलाने का आदेश दिया था. चौथे एपिसोड का विश्लेषण करें तो इस एपिसोड में कई बार भावुकता भरे क्षण आए हैं, जिस से दर्शक अवश्य प्रभावित हुए, लेकिन इस एपिसोड में भी एक ही घटना को एक बार में पूरा न दिखा कर टुकड़ेटुकड़े में दिखाया गया है, जिस से दर्शक बोरियत महसूस करने लगते हैं. अभिनय की दृष्टि से भी कलाकारों का अभिनय औसत दरजे का रहा है.

एपिसोड नंबर 5

पांचवें एपिसोड की शुरुआत में जनरल डायर उस गली में जाता है, जहां पर भारतीयों ने अंगरेज महिला टीचर को बेदर्दी से मारा था. जनरल डायर वहां के सभी लोगों को चेतावनी देता है कि तुम ने उस दिन एक निर्दोष को मारा था, जब भी कोई यहां से गुजरेगा तो वह घुटने झुका कर अपने कृत्य की माफी मांग कर आगे बढ़ेगा. यह मेरा हुक्म है तुम सब के लिए. अगला दृश्य 12 दिसंबर कोर्ट का दिखाया जाता है, जहां कांतिलाल साहनी कोर्ट को बताता है कि जलियांवाला कांड करने के बाद भी जनरल डायर का दिल भरा नहीं था. वह 10 अप्रैल की कीमत पूरे शहर में मार्शल ला की आड़ ले कर सभी शहरवासियों पर अपना कहर बरपा रहा था. झूठे मुकदमे, झूठी गवाहियां दिखा कर लोगों को बुरी तरह से प्रताडि़त कर रहा था.

जनरल डायर को पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर की ओर से इनाम के रूप में शाबाशी मिली. उस के बाद के दृश्यों में कई लोगों को घुटने और हाथपैर के सहारे जमीन पर रेंगने के लिए मजबूर किया गया, जिन में कांतिलाल भी था. कई लोग कोर्ट में अपने ऊपर हुए जुल्म की कहानी भी बयां करते हैं. अगले दृश्य में कांतिलाल लंदन में अपने गुरु लार्ड अंडरहिल को लिख कर 10 अप्रैल के हत्याकांड और बाद में जनरल डायर द्वारा लोगों पर किए जुल्मों की सारी कहानी बताता है और उन से मदद की गुहार लगाता है. लार्ड अंडर हिल वहां के समाचार पत्रों को अन्य अधिकारियों को भेजता है. लार्ड अंडरहिल फिर कांतिलाल को चिट्ठी लिख कर बताता है कि यहां की संसद में भी इस विषय को गंभीरता के साथ लिया गया है.

उस के बाद सुबह कांति के पिता गिरधर अखबार की खबर सुनाते हुए कांतिलाल से कहते हैं कि जलियांवाला हत्याकांड की जांच के लिए लार्ड हंटर को कमीशन का अध्यक्ष बनाया गया है और वकील के तौर पर तुम्हारा नाम आया है. गिरधर अपने बेटे को बधाई देते हैं और यह खबर सुन कर अमृतसर के लोग खुश हो जाते हैं कि अब उन्हें न्याय अवश्य मिल सकता है. सब के सब कांतिलाल को बधाई देते हैं, मगर अल्लाहबख्श कहता है कि ये सब ब्रिटिशर्स का दिखावा है. फिर वह कांति से कहता है कि इस हत्याकांड का सच कोर्ट में नहीं, बल्कि अमृतसर की गलियों में मिलेगा.

कांतिलाल जब उस का विरोध करता है तो दोनों में उसी पेन की शर्त लग जाती है कि यदि सबूत अल्लाहबख्श लाएगा तो कांति को पेन वापस लेना पड़ेगा और यदि कांतिलाल कोर्ट में खुद जीतेगा तो अल्लाह बख्श उसी पेन से अखबार ‘इंकलाब’ की हेडलाइंस लिखेगा. अगले दृश्य में तेजू कांतिलाल को अल्लाहबख्श का मैसेज देता है, जिस में उस ने आज रात को प्रेस वाली गली में सबूत देने और मिलने के लिए कांति को बुलाया था. रात को जब कांति वहां पर जाता है तो उसे अल्लाहबख्श की खून से सनी लाश, वही पेन व खून से सना एक परचा मिलता है, जिस में ‘साजिश’ लिखा होता है. उस के बाद दूसरे दिन अल्लाहबख्श के शरीर का कब्रिस्तान में अंतिम संस्कार कर दिया जाता है.

पांचवें एपिसोड को भी बेवजह लंबा खींचा गया है. कांतिलाल को शराब पीते हुए अपने आप से बातें करता हुआ काफी लंबा दृश्य बनाया गया है, जिस की कोई आवश्यकता ही नहीं थी. अपने अभिनय से वह दर्शकों को और बोर करता हुआ दिखाई देता है.

एपिसोड नंबर 6

छठे एपिसोड में कांतिलाल को अल्लाहबख्श की लाश से चिपट कर रोते हुए दिखाया गया है. उस के बाद कांतिलाल उस परचे के प्रैस मालिक मान सिंह से मिलता है, जहां से अंगरेज लोग सरकार के लिए आदेशों के परचे छपवाते हैं. वहां जा कर पता चलता है कि प्रैस से केवल एक ही प्रिंट छपता था, बाकी सब पर्चों को साइक्लोस्टाइल किया जाता था. कांतिलाल फिर साइक्लोस्टाइल की दुकान पर जा कर पता करता है और फिर हंसराज के घर और गोदाम तक पहुंचता है.

अगले दृश्य में कांतिलाल पूनम के घर पर होता है तो पूनम उसे बताती है कि हंसराज की पत्नी मंजोत डा. इनिस के पास रोज आया करती थी. इस के बाद कांतिलाल उस आदमी के पास जाता है, जिस ने जलियांवाला बाग का स्टेज बनाया था. इस बीच पूनम डा. इनिस से मंजोत के बारे में पता करती है तो डा. इनिस बताती है कि मंजोत और उस के पति पानी के जहाज से विदेश चले गए हैं. उस के लिए मैडिकल सर्टीफिकेट बनाने मंजोत मेरे पास आया करती थी.

इस बीच कांतिलाल सिपाही गुरंग से बातचीत करता है, जो उस दिन गोलीकांड में जनरल डायर के साथ था. उस के बाद कांतिलाल हंसराज के गोदाम में जा कर दरवाजे को लोहे की रौड से तोड़ कर गोदाम के भीतर कुछ पेपर देखता है, तभी उस के ऊपर गोलियां चलने लगती हैं, जहां से किसी तरह वह भाग जाता है. यह दृश्य पहले एपिसोड में भी दिखाया जा चुका है. अगला दृश्य 12 दिसंबर कोर्ट रूम का दिखाया जाता है, जहां पर डिवीजनल कमांडर जनरल बे्रनन का बयान लिया जाता है. वह कोर्ट में बताता है कि उन्होंने मेजर मैकडोनल्ड के बदले में कर्नल मोर्गन को भेजा था. कांति तब कोर्ट में कहता है कि जनरल डायर को किस के आदेश से अमृतसर भेजा गया. वह जनरल डायर से पूछता है कि सारे सबूत हमारे पास हैं, बताइए आप अमृतसर क्यों आए?

तभी कोर्ट में पंजाब का गवर्नर माइकल ओ डायर पहुंच जाता है और कोर्ट में बैठ जाता है. अब जनरल डायर कहता है कि मैं यह बात गोपनीय होने के कारण कोर्ट में नहीं बता सकता. तब कांतिलाल कहता है कि जनरल डायर, आप ने खुद लाउडस्पीकर से अमृतसर के हर क्षेत्र में ऐलान कराया, लेकिन जलियांवाला बाग और अमृतसर टेंपल में, जहां भीड़ रहती है, वहां पर ऐलान जानबूझ कर नहीं कराया. उस के बाद कांतिलाल गवाहों के माध्यम से स्टेज बनाने वाले और सिपाही गुरंग के माध्यम से सबूत देता है कि स्टेज को ऊंचा कराने का काम हंसराज ने किया था और 12 अप्रैल की रात को हंसराज जनरल डायर से मिलने उस के घर पर भी गया था.

फिर कांतिलाल कोर्ट में यह साबित कर देता है कि इन सब के पीछे केवल गवर्नर माइकल ओ डायर ही था. जनरल डायर तो मात्र उस की एक कठपुतली था. अब कोर्ट में उपस्थित भीड़ ‘जनरल डायर को फांसी दो’ और ‘रिंगमास्टर का नाम उजागर करो’ चिल्लाने लग जाती है तो लार्ड हंटर परेशान हो कर आधे घंटे के लिए कोर्ट को स्थगित कर देता है. अगले दृश्य में लार्ड हंटर बहुत गुस्से में होता है तो पंजाब का गवर्नर माइकल ओ डायर एक परचा दिखाता है, जिस से लार्ड हंटर देख कर खुश हो जाता है. जब आधे घंटे में कोर्ट में लोग दोबारा बैठते हैं, तभी वह परचे सभी लोगों में बांट दिए जाते हैं.

उस परचे में लिखा था कि रौलेट ऐक्ट बनाने में वकील कांतिलाल साहनी का हाथ भी था. यह देख कर वहां पर उपस्थित सभी लोग कांतिलाल पर परचे फेंक कर उसे गद्ïदार कह कर चिल्लाने लगते हैं. कोर्ट को बंद कर देना पड़ता है. जब कांतिलाल वहां से घर जाने लगा तो लोग उस के ऊपर ईंटपत्थर फेंकते हैं और गाली देने लगते हैं. किसी तरह उस के पिता गिरधर कांति को बचा कर घर पर लाते हैं. कांति के पिता उस से कहते हैं यह मेरी ही भूल थी, मैं ने तुझे लंदन भेजना ही नहीं था.

अगले दृश्य में कांतिलाल उदास जलियांवाला बाग में बैठा है, जहां पूनम आ कर उसे समझाती है कि यदि तुम ने हार मान ली तो अमृतसर के लोगों को कौन न्याय दिला पाएगा. उन्होंने तुम्हारी कमजोरी पकड़ी है, इसलिए अब तुम्हें उन की कमजोर नस को पकड़ कर पलटवार करना होगा, तभी जीत संभव हो सकती है. फिर 13 दिसंबर कोर्ट का है, जहां पर कांतिलाल कहता है कि मुझे कुछ कन्फैशन करने की अनुमति दी जाए. वह कहता है कि हम भारतीय काला रंग होने के कारण गोरों से आज भी पिछड़े हुए हैं. अंगरेज तो सभी रोशनी को तरह होते हैं. मैं यह बताना चाहता हूं कि इस कांड के पीछे एक जो रिंग मास्टर था, उस का नाम था हंसराज, जिस की मां हिंदू और बाप एक  मुसलमान था.

हिंदुओं के लिए वह हंसराज और मुसलमानों लिए हसन रियाज था. उस की मां की मौत हुई तो हिंदुओं ने उस की मां को जलाने और मुसलमानों की उस कब्र में दफनाने से मना कर दिया. तब उस ने प्रण किया कि वह अमृतसर के श्मशान घाटों और कब्रिस्तानों को लाशों से भर देगा. कांतिलाल गवर्नर माइकल ओ डायर से कहता है एक काले हिंदुस्तानी आदमी ने सारे ब्रिटिश हुकूमत को बंदर की तरह नचाया. छुरीकांटे से खाना खाने वाले पढ़ेलिखे अंगरेजों को सरकस के रिंग मास्टर की तरह नचाया.

इस पर पंजाब का गवर्नर माइकल ओ डायर अपना धैर्य खो बैठता है और अपने अहं को बचाने के लिए अपना अपराध स्वीकार कर लेता है. जनता माइकल ओ डायर को फांसी दो, फांसी दो जोरजोर से चिल्लाने लग जाती है. एडवोकेट शाह आ कर कांतिलाल से कहता है शाबाश कांति, आखिर तुम जड़ तक पहुंच ही गए. जड़ तक पहुंच कर यह जरूरी नहीं होता कि जो व्यक्ति पेड़ लगाए, उसे उस की छांव मिले, लेकिन हां आने वाली पीढ़ी जब उन पेड़ों की छांव में बैठती है तो वे पेड़ लगाने वालों को जरूर दुआ देते हैं.

कांतिलाल जब घर आता है तो उस के पिता गिरधर उस से पूछते हैं कि मैं ने तो हंसराज के बारे में यह बात पहले नहीं सुनी. इस पर कांतिलाल कहता है कि पिताजी आप ने यह सुना होगा कि संत कबीर की मृत्यु पर हिंदूमुसलमानों के बीच शव को जलाने और दफनाने की होड़ लग गई थी. मुझे तो अंगरेजों की नाभि तक पहुंचना था, इसलिए यह कहानी गढऩी पड़ी. अगले दृश्य में पूनम की बेटी हो जाती है, उस का नाम हरि सिंह औलख की इच्छानुसार, विक्टोरिया यानी जीत कौर रखा जाता है, जो अपनी आंखों से वर्षों के गुलाम हिंदुस्तान को आजाद होते देखती है. इसी के साथ छठवां और आखिरी एपिसोड भी समाप्त हो जाता है.

छठें एपिसोड की बात करें तो यह एपिसोड धीमी गति और नाटकीय तनाव की कमी के कारण अपना प्रभाव छोडऩे में संघर्ष करता दिखाई देता है. बारबार फ्लैशबैक के कारण कहानी नाटकीय सी दिखाई देती है. कलाकारों का प्रदर्शन भी अपना प्रभाव छोडऩे से असफल रहा है. इस में कोई दोराय नहीं कि सीरीज की थीम इसे देखने के लिए आकर्षित करती है, लेकिन इसे जिस तरह से परदे पर उतारा गया है, वह बिलकुल भी दमदार नहीं है.

राम माधवानी राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके डायरेक्टर हैं, जिन से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन जिस तरह वह इस महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना को दिखाने और प्रभावशाली बनाने से चूकते हैं, वह जरूर चौंकाता है. डायरेक्टर राम माधवानी ने इस में इतिहास, ड्रामा और ऐक्शन को बैलेंस करने की अपनी तरफ से काफी कोशिशें कीं, लेकिन कहानी की धीमी रफ्तार, ऐतिहासिक घटनाओं की प्रस्तुति और हंटर कमीशन कमेटी की बेहद धीमी, कमजोर बहसों के बीच यह इधर से उधर और उधर से इधर केवल झूलती सी दिखाई देती है, जिस का नतीजा यह होता है कि यह वेब सीरीज आप को भावनात्मक रूप से बिलकुल भी नहीं जोड़ पाती है.

कोर्ट रूम के दृश्य जो इस वेब सीरीज की जान बन सकते थे, वह अपनी सुस्त रफ्तार के कारण बिखरते हुए से दिखाई पड़ रहे हैं. हंटर कमीशन की जांच भी इस कहानी को एक मजबूती दे सकती थी, लेकिन वह भी एक लीगल ड्रामा के रूप में घिसटतीसिमटती सी दिखाई देती है. यह दिल की गहराइयों में नहीं उतर पाती है. डायलौग्स में भी गहराई नहीं है.

तारुक रैना

अभिनेता तारुक रैना का जन्म 29 सितंबर, 1994 को मुंबई में हुआ था. तारुक रैना एक अभिनेता, गायक, गीतकार और संगीतकार है. तारुक रैना केवल 6 साल की उम्र से ही गाना गा रहा है. वह रौक संगीत, रैप, हैवी मेटल और गजलों को सुनते हुए बड़ा हुआ है. संगीत के बारे में तकनीकी ज्ञान की कमी के कारण उस ने यूट्यूब के माध्यम से गाना गाने का अभ्यास शुरू किया और कुछ सालों के बाद उस ने बार और शादियों में गिग्स परफार्म करना शुरू कर दिया. वर्ष 2015 में फिल्म ‘बेफिक्रे’ के लिए उस ने यशराज फिल्म्स में आदित्य चोपड़ा के सहायक के रूप में काम करना शुरू किया.

इस के बाद तारुक रैना ने थिएटर नाटकों में अभिनय किया. विशेष रूप से डिज्नी के अलादीन के भारतीय रूपांतरण में मुख्य किरदार के रूप में, जहां पर उसे लाइव दर्शकों के सामने अभिनय करने के साथसाथ गाने भी गाने पड़ते थे. वर्ष 2021 में तारुक नेटफ्लिक्स मिनी सीरीज ‘आर्यन एंड मीरा’ में जैन मैरी खान के साथ आर्यन के रूप में दिखाई दिया था. तारुक रैना वर्ष 2020 में वेब सीरीज ‘पवन और पूजा’ में पवन श्रीवास्तव की भूमिका में, वेब सीरीज ‘बेमेल’ अनमोल मेहरोत्रा के किरदार में, वर्ष 2021 में ‘आर्यन और मीरा’ में आर्यन खन्ना के चरित्र में, वर्ष 2022 में ‘टूटी हुई खबरें’ में अनुज सक्सेना के किरदार में, वर्ष 2022 में ‘जुगाडि़स्तान’ में लकी कोहली के किरदार में और वेब सीरीज ‘एक राष्ट्र का जागरण’ यानी कि ‘द वेकिंग औफ ए नेशन’ वर्ष 2025 में वकील कांतिलाल साहनी के किरदार के रूप में सामने आया है.

तारुक रैना का फिल्मी करिअर किसी भी अवसर को पाने के लिए हमेशा से उत्साही रहा है. वह अपने स्कूल के गायक मंडली में भी गाने गाता था. फिल्म ‘मिसमैच्ड’ के लिए आडिशन देने के डेढ़ साल के बाद उसे फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ के लिए चुना गया. तारुक रैना ने इस फिल्म में ऋषि कपूर के सब से छोटे बेटे की भूमिका निभाई थी.

 निकिता दत्ता

अभिनेत्री निकिता दत्ता का जन्म 13 नवंबर, 1991 को दिल्ली में हुआ था. इन के पापा का नाम आनंद दत्त व मम्मी का नाम अल्का दत्त है. निकिता के परिवार में उस की एक छोटी बहन भी है, जिस का नाम अंकिता दत्त है. निकिता के पिता आनंद दत्ता भारतीय नौसेना में अधिकारी रह चुके हैं. भारतीय अभिनेत्री निकिता दत्ता जो फेमिना मिस इंडिया 2012 की फाइनलिस्ट में से एक रही थी. उस ने बौलीवुड में अपने करिअर की शुरुआत फिल्म ‘ले कर हम दीवाना दिल’ से की थी, जहां उस ने सहायक की भूमिका निभाई थी.

निकिता दत्ता ने ‘ड्रीम गर्ल’ धारावाहिक के साथ अपने टेलीविजन करिअर की शुरुआत की. उस ने फिल्म ‘गोल्ड’ और ‘कबीर सिंह’ में भी काम किया. निकिता दत्ता को ‘एक दूजे के वास्ते’ धारावाहिक में सब से अच्छी जोड़ी के लिए (नामिक पौल के साथ) लायंस गोल्ड अवार्ड और ‘हासिल’ धारावाहिक के लिए पंसदीदा अभिनेत्री का लायंस गोल्ड अवार्ड भी मिल चुका है.

 

 

Crime Story : प्रेमी के साथ मिल कर पत्नी बनी कातिल

Crime Story : प्रविंद्र ने अपने चचेरे भाई अनुज को अपने यहां इसलिए रख लिया था कि परदेस में रह कर अनुज के चार पैसे बच जाएंगे. लेकिन अनुज ने आस्तीन का सांप बन कर प्रङ्क्षवद्र की ही 22 वर्षीय पत्नी सरिता को अपने प्रेम जाल में फांस लिया. प्रङ्क्षवद्र ने जब इस का विरोध किया तो…

22 वर्षीया सरिता खूबसूरत, गोरीचिट्टी व छरहरी काया की हसीना थी. उस के नैननक्श भी काफी तीखे थे. उस के चेहरे में कुछ ऐसा जादू था कि जो भी उसे एक बार देख लेता था, बस उसी में ही खो सा जाता था. 10 साल पहले जब सरिता प्रविंद्र की दुलहन बन कर आई थी तो प्रविंद्र का चचेरा भाई अनुज उसे देखता ही रह गया था.

अनुज उस वक्त एक इंस्टीट्यूट से इलैक्ट्रिकल ट्रेड में आईटीआई कर रहा था. उस समय उस की उम्र 18 साल थी. वैसे तो सरिता की शादी प्रविंद्र से हो गई थी, मगर अकसर अनुज भी हर दूसरेतीसरे दिन प्रविंद्र के घर में किसी न किसी बहाने से आताजाता रहता था. वह सरिता पर डोरे डाल रहा था. इसी तरह से जब कई महीने हो गए तो सरिता भी अनुज के मन में चल रही बात को भांप गई.

एक दिन सरिता ने अकेले में अनुज से पूछ ही लिया, ”देवरजी, आजकल तुम कहां खोए से रहते हो?’’ सरिता की इतनी बात सुन कर अनुज समझ गया था कि सरिता भी उस की ओर आाकर्षित होने लगी है. उस वक्त तो वह अपने दिल की बात सरिता से कह नहीं पाया, वह सिर्फ इतना बोला, ”कहीं नहीं भाभी.’’ मगर वह अपने दिल की बात सरिता से कहने के लिए अच्छे वक्त का इंतजार करने लगा था.

और फिर एक दिन अनुज को अपने दिल की बात कहने का मौका मिल गया. उस दिन प्रविंद्र का पूरा परिवार मेला देखने गया हुआ था. सरिता उस समय घर पर अकेली ही थी, तभी अनुज ने उस के घर के दरवाजे पर जा कर दस्तक दी. अनुज को देख कर सरिता बड़ी खुश हो गई. वह अनुज के लिए चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई. इसी बीच घर के ड्राईंगरूम में बैठा अनुज सरिता के खयालों में डूब चुका था, तभी अचानक सरिता चाय की ट्रे ले कर वहां आई. जैसे ही सरिता ने चाय के प्याले मेज पर रखे तो अनुज उस समय बेकाबू हो गया और उस ने सरिता का हाथ पकड़ लिया.

अनुज ने कहा, ”भाभी, मुझे अब तुम से प्यार हो गया है, अब मैं तुम्हारी जुदाई सहन नहीं कर सकता. तुम्हारे बिना मैं मर जाऊंगा.’’

इस के बाद अनुज को सरिता की मौन स्वीकृति मिल चुकी थी और दोनों पहली बार अलिंगनबद्ध हो गए थे. इस के बाद से अकसर अनुज व सरिता चोरीछिपे एकदूसरे से मिलने लगे थे. दोनों के अवैध संबंधों का यह सिलसिला बेरोकटोक चलने लगा था. इसी बीच 5 साल बीत चुके थे. तब तक सरिता एक बेटी एक बेटे की मां बन चुकी थी.

देवरभाभी के कैसे हुए संबंध

सरिता का प्रविंद्र व अनुज आपस में चचेरे भाई थे तथा वे मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला सहारनपुर के थाना फतेहपुर के अंतर्गत गांव कमालपुर के रहने वाले थे. उस समय प्रविंद्र गांव में बाइक मिस्त्री का काम करता था. अनुज उस वक्त इलैक्ट्रिकल ट्रेड से आईटीआई करने के बाद नौकरी की तलाश करने लगा था. इसी दौरान वर्ष 2020 में देश में कोरोना संकट आ गया था. इस कारण समूचे देश में सभी कारोबार ठप्प होने लगे थे.

काम की तलाश में प्रविंद्र व अनुज अपने गांव से 40 किलोमीटर दूर देहरादून में आ कर रहने लगे थे. प्रविंद्र ने तो वहां अपना बाइक की मरम्मत का काम शुरू कर दिया था. अनुज ने भी नौकरी के लिए उत्तराखंड के विद्युत विभाग में अप्लाई कर दिया था. इसी बीच अनुज व प्रविंद्र मोहल्ला पटेल नगर में एक साथ ही रहते थे. जब प्रविंद्र घर से चला जाता तो अनुज और सरिता घर में रंगरलियां मनाते थे. इसी प्रकार 2 साल बीत चुके थे. इसी दौरान अनुज की नौकरी उत्तराखंड पावर कारपोरेशन में अस्थाई रूप से बतौर लाइनमैन लग गई थी. नौकरी लगने के बाद अनुज ने अपनी तनख्वाह सरिता पर खर्च करनी शुरू कर दी थी तथा सरिता अब खूब बनठन कर फैशनेबल कपड़ों में रहने लगी थी. अब प्रविंद्र को कुछकुछ शक होने लगा था कि उस के घर में कुछ गड़बड़ हो रहा है.

एक दिन किसी काम से दोपहर को प्रविंद्र को घर में आना पडा. जब वह घर पहुंचा तो उस ने देखा कि दरवाजा अंदर से बंद था और घर के अंदर से हंसीठहाकों की आवाजें आ रही थीं. प्रविंद्र चुपचाप हो कर बाहर खडा ये आवाजें सुनता रहा. प्रविंद्र को यकीन हो गया कि घर के अंदर से आने वाली आवाजें अनुज व सरिता की ही हैं. तब प्रविंद्र ने घर का दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद दरवाजा खुला तो कमरे में सरिता व अनुज अपने अस्तव्यस्त कपड़ों को ठीक करते हुए निकले थे. अनुज तो तुरंत ही घर से निकल कर भाग खड़ा हुआ था.

सरिता तो अपनी गलती पर प्रविंद्र से माफी मांगने लगी थी. प्रविंद्र ने सरिता से कहा कि कल तक अनुज अपना सामान व कपड़े उठा कर कहीं अलग चला जाए. वह मेरे घर में रहने के लायक नहीं है. इस के बाद ऐसा ही हुआ. अनुज अब अपने चचेरे भाई प्रविंद्र से अलग कमरा ले कर रहने लगा था. सरिता व अनुज भले ही अलग रहने लगे थे, मगर उन दोनों के बीच जो अवैध संबंध थे, वे खत्म नहीं हुए थे. 2 महीने बीत जाने के बाद दोनों में एकदूसरे के प्रति वासना की आग फिर से भड़कने लगी थी. इस के बाद दोनों मोबाइल से एकदूसरे से बातें करने लगे.

पहले तो दोनों में मोबाइल द्वारा बातें करने का सिलसिला शुरू हुआ, इस के बाद अकसर सरिता व अनुज घर से बाहर चोरीछिपे मिलने लगे. कुछ समय तक दोनों इसी प्रकार मिलते रहे. वह चोरीछिपे नहीं बल्कि खुले रूप से साथ रहना चाहते थे, इसलिए दोनों ने मिल कर एक खतरनाक योजना बनाई. वह योजना प्रविंद्र को रास्ते से हटाने की थी. इस के बाद वे दोनों अपनी इस योजना को अमलीजामा पहनाने के प्रयास में जुट गए.

पुलिस को क्यों लगा हत्या का मामला

वह 16 दिसंबर, 2024 का दिन था. उस समय सुबह के 11 बज रहे थे. देहरादून की कोतवाली पटेल नगर के एसएचओ कमल कुमार लुंठी उस समय कोतवाली में ही थे. तभी उन के औफिस में संतरी ने उन्हें जानकारी दी कि क्षेत्र के श्री महंत इंद्रेश अस्पताल से एक डैथ मेमो आया है. जब श्री लुंठी ने डैथ मेमो को देखा तो उस में डाक्टर ने लिखा था कि बीती रात पटेलनगर निवासी विवाहिता सरिता ने अपने कुछ रिश्तेदारों के साथ अपने बीमार पति प्रविंद्र को उपचार हेतु इमरजैंसी में भरती कराया था. उस वक्त प्रविंद्र के गले पर चोटों के निशान थे तथा उस के कान से खून रिस रहा था. इस कारण प्रविंद्र की मौत संदिग्ध लग रही है. कृपया उचित काररवाई करने की कृपा करें.

एसएचओ कमल कुमार लुंठी को यह मामला संदिग्ध मौत का लग रहा था. इस के बाद उन्होंने तुरंत ही श्री महंत इंद्रेश अस्पताल पहुंचने का निश्चय किया. चलने से पहले श्री लुंठी ने इस संदिग्ध मौत की जानकारी अपने सीओ अभिनय चौधरी तथा एसएसपी अजय सिंह को मोबाइल द्वारा दे दी. जब श्री लुंठी अस्पताल पहुंचे तो उन्होंने सब से पहले मृतक प्रविंद्र की डैडबौडी की बड़े ध्यान से जांच की. शव के गले पर चोटों के निशान थे. शव के कानों से खून भी आ रहा था. उसे देख कर उन्हें लगा कि यह सामान्य मौत नहीं, बल्कि हत्या का हो सकता है. इसी दौरान संदिग्ध मौत की सूचना पा कर सीओ अभिनय चौधरी भी अस्पताल पहुंच गए थे.

इस के बाद अभिनय चौधरी ने भी प्रविंद्र के शव का निरीक्षण किया. इस के बाद कमल कुमार लुंठी ने प्रविंद्र के शव का पंचनामा भर कर उसे पोस्टमार्टम के लिए कोरोनेशन अस्पताल भिजवा दिया था. प्रविंद्र के शव को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने के बाद श्री लुंठी ने थानेदार योगेश दत्त को पटेल नगर भेजा और उन्होंने प्रविंद्र के घर के आसपास जा कर उस के बारे में जानकारी जुटाने को कहा. इस के बाद पुलिस ने प्रविंद्र के भाई सुमित की ओर से प्रविंद्र की संदिग्ध मौत का मुकदमा बीएनएस की धारा 103 (1) के तहत दर्ज कर लिया. उसी दिन शाम को पुलिस ने प्रविंद्र के परिवार की सारी जानकारी जुटा ली. जांच में पता चला कि प्रविंद्र की पत्नी सरिता के साथ प्रविंद्र के चचेरे भाई अनुज के अवैध संबंध थे. प्रविंद्र के घर से जाने के बाद अकसर अनुज पहले उस के घर जा कर रंगरलियांमनाता था.

एक बार आपत्तिजनक हालत में पकड़े जाने के बाद अनुज ने सरिता से होटलों में मिलना शुरू कर दिया था. हो सकता है कि उन दोनों ने ही कहीं प्रविंद्र की हत्या न कर दी हो? इस के बाद लुंठी ने अनुज से पूछताछ करने का फैसला किया. अनुज व सरिता को पटेलनगर कोतवाली लाने के लिए पुलिस की 2 टीमों का गठन किया गया था. कुछ ही घंटों में पुलिस अनुज को हिरासत में ले कर कोतवाली आ गई थी. सीओ अभिनय चौधरी व कोतवाल कमल कुमार लुंठी ने प्रविंद्र की मौत के बारे में अनुज से पूछताछ की. उन्होंने पूछा कि जब प्रविंद्र ने तुम्हें सरिता से मिलने के लिए मना किया था तो फिर तुम सरिता से अलगअलग होटलों में क्यों मिलते थे? घटना वाले दिन तुम्हारी लोकेशन प्रविंद्र के घर की हमें मिल रही है. तुम हमें प्रविंद्र की मौत की सच्चाई सचसच बता दो.

अनुज ने सोचा कि जब पुलिस को सारी बातें पता ही चल गई हैं तो अब सच्चाई छिपाने से कोई फायदा नहीं है. अत: अनुज ने प्रविंद्र की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. उस ने हत्या की जो जानकारी पुलिस को जुबानी बताई, वह इस प्रकार थी.

अवैध संबंध के रास्ते पर इस तरह फिसलते गए देवरभाभी

उस ने बताया सरिता रिश्ते में मेरी भाभी लगती थी. जब से वह मेरे चचेरे भाई प्रविंद्र से ब्याह कर आई थी, मैं तब से ही उस पर फिदा हो गया था. बाद में मेरे सरिता के साथ अवैध संबंध बन गए थे. एक बार प्रविंद्र ने हम दोनों को रंगेहाथों पकड़ भी लिया था. तब उस ने मुझे कमरे से निकाल दिया था. इस के बाद मैं प्रविंद्र के मकान के पास में ही कमरा ले कर रहने लगा था. वैसे तो हम दोनों बाद में भी चोरीछिपे मिलते ही रहते थे, मगर हम दोनों से यह जुदाई सहन नहीं हो पा रही थी. हम दोनों एकदूसरे को पाने के लिए शादी करना चाहते थे, मगर प्रविंद्र हम दोनों के रास्ते का कांटा बना हुआ था. अत: हम दोनों शीघ्र ही प्रविंद्र को रास्ते से हटाने की योजना बना रहे थे. इस के लिए हम उचित मौके की तलाश में रहने लगे थे.

15 दिसंबर, 2024 की रात को मैं पावर हाउस पर अपनी ड्यूटी पर था. इसी दौरान मेरे मोबाइल पर सरिता की वाट्सऐप काल आई कि प्रविंद्र नशे में है, तुम जल्दी घर पर आ जाओ. मैं जैसे ही प्रविंद्र के घर की ओर चला तो वहां पर मोहल्ले की स्ट्रीट लाइटें जल रही थीं. पहचाने जाने के डर से मैं वापस अपने बिजलीघर आया था और उस क्षेत्र की बिजली सप्लाई बंद कर दी थी. उस समय प्रविंद्र के घर के आसपास अंधेरा छा गया था. जब मैं प्रविंद्र के घर पहुंचा था तो प्रविंद्र नशे में धुत अपने बच्चों के साथ सो रहा था. मुझे देख कर सरिता दोनों बच्चों को ऊपर के कमरे में छोड़ कर नीचे आ गई थी.

इस के बाद मैं ने व सरिता ने चुन्नी से प्रविंद्र का गला घोंट दिया था. जब प्रविंद्र ने खुद को छुड़ाने का प्रयास किया तो सरिता ने प्रविंद्र के सिर को कई बार बैड के सिरहाने पर पटका था. इस के बाद प्रविंद्र निढाल हो कर एक ओर लुढ़क गया था. मैं वापस अपनी ड्यूटी पर बिजली घर आ गया था. योजना के अनुसार, सरिता ने अपने एक रिश्तेदार को यह कह कर घर बुला लिया कि प्रविंद्र की तबीयत खराब है. उस रिश्तेदार के साथ सरिता प्रविं्रद को ले कर श्री महंत इंद्रेश अस्पताल पहुंची, जहां डाक्टरों ने प्रविंद्र को मृत घोषित कर दिया.

दूसरी पुलिस टीम सरिता को ले कर कोतवाली आई तो सरिता ने भी पुलिस के सामने अपने पति की हत्या करनी कुबूल कर ली थी. अपने बयानों में भी सरिता ने अनुज के ब्यानों का समर्थन किया था. इस के बाद पुलिस ने प्रविंद्र की हत्या में प्रयुक्त चुन्नी, अनुज की स्प्लेंडर बाइक व अनुज और सरिता के मोबाइल फोन भी अपने कब्जे में ले लिए थे. इस के बाद एसएसपी अजय सिंह ने एक प्रैसवार्ता कर प्रविंद्र हत्याकांड का खुलासा किया. हत्याकांड का खुलासा करने वाली पुलिस टीम को एसएसपी अजय सिंह ने ढाई हजार रुपए का नकद इनाम देने की घोषणा की.

प्रविंद्र की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण गला घोंटा जाना तथा सिर में चोटें लगना बताया गया था. कथा लिखे जाने तक अनुज व सरिता देहरादून जेल में बंद थे. प्रविंद्र हत्याकांड की विवेचना थानेदार योगेश दत्त द्वारा की जा रही थी. योगेश दत्त आरोपियों के खिलाफ सबूत इकट्ठे कर अदालत में चार्जशीट दाखिल करने की तैयारी कर रहे थे.

 

 

Extramarital Affair : दूसरी पत्नी की आशनाई

Extramarital Affair : आए दिन होने वाले शिकवेशिकायतों के बावजूद बबलू की जिंदगी 2 बीवियों संग राजीखुशी से गुजर रही थी. एक बार उस ने आधी रात में दूसरी बीवी को जब उस के प्रेमी की बांहों में देखा तो घर में ऐसा भूचाल आ गया कि…

रतलाम के दीनदयाल नगर के रहने वाले बबलू उर्फ संजय की दोनों बीवियों को अपनीअपनी सौतन के बारे में मालूम था. उस की पहली बीवी कुआंझागर गांव में बूढ़े सासससुर के साथ रहते हुए गृहस्थ जीवन गुजार रही थी, जबकि दूसरी पास के तेतरी गांव में रहती थी. संयोग से दोनों का नाम माया था. दूसरी बीवी पास में ही हुसैन समोसावाला के कौटेज पर चौकीदारी का काम करती थी, जहां बबलू भी चौकीदार था. दोनों की जानपहचान काम करते हुए करीब ढाई साल पहले हुई थी. बबलू उस की अल्हड़ जवानी और खूबसूरती पर फिदा हो गया था. जबकि दिलफेंक और बातूनी बबलू भी कुछ कम आशिकमिजाज नहीं था.

 

एक दिन बातोंबातों में उस ने बोल दिया, ”मेरी जिंदगी भी गजब की हसीन और माया से भरी हुई है. इधर भी माया, उधर भी माया.’’

”क्या मतलब हुआ इस का? चौकीदारी के काम में नईनई आई माया ने सवाल किया था.

”एक तुम माया हो और एक वह मोहमाया है…’’ बबलू बोला और वहां से चला गया. थोड़ी देर में ही उस के पास लौट आया… उस के दोनों हाथों में चाय का कप था.

”यह लो अब चाय के मजे लो!’’

”अरेअरे! तुम क्यों लाए, बोल देते मैं थर्मस में ले आती. वैसे एक बात कहूं, तुम हो मजेदार इंसान!’’ माया हंसती हुई बोली.

”वह तो हूं ही, यहां टाइम पास करने के लिए ऐसा बनना पड़ता है. यह लो पहले चाय पीयो…’’

इस तरह दोनों के बीच बातें होने लगीं. इधरउधर की बातें करते और चौकीदारी के उबाऊपन को दूर करते थे. जल्द ही उन के बीच अच्छी दोस्ती हो गई और एकदूसरे को दिल दे बैठे. बबलू माया की हर बात का खयाल रखने लगा था. बिंदास और बोल्ड स्वभाव की माया को उस के शादीशुदा होने के बारे में पता चल चुका था. यही बात उसे अच्छी लगी कि बबलू ने अपने बारे में कुछ भी उस से नहीं छिपाया था. उस ने प्रेम का इजहार करते हुए पहली बार में ही अपने बारे में सच्चाई बता दी थी. माया को उस में एक सच्चे इंसान की झलक दिखी और फिर भी उसे न जाने क्या सूझी, उस के साथ पतिपत्नी की तरह रहने लगी.

और फिर बबलू 2 बीवियों वाला एक जिम्मेदार पति बन गया. उस ने पहली बीवी से भी कुछ नहीं छिपाया. उसे भी सब कुछ सचसच बता दिया. बबलू की यही सच्चाई पहली बीवी को भी पसंद आई और इस का कोई विरोध नहीं किया.

2 पत्नियों के साथ खुश था बबलू

उस की दोनों बीवियों की उम्र में काफी अंतर था. दूसरी बीवी उम्र में उस से काफी छोटी, खिली हुई कली जैसी जवानी से भरी हुई थी. कहने को तो पहली पत्नी के मन में सौतन को ले कर तकलीफ नहीं थी, लेकिन किसी ब्याहता स्त्री के लिए यह सहन करना आसान नहीं होता. ऐसा ही बबलू की पहली पत्नी के साथ भी हुआ था. वह जब भी 2-3 दिनों के बाद  अपने गांव आता था, तब उस की पहली पत्नी शिकायतों का पिटारा ले कर बैठ जाती थी.

”अरे! तुम गलत टाइम पर आए हो!’’ अचानक घर आए पति बबलू से उस के सामान का थैला ले कर पहली पत्नी माया बोली.

”ऐसा क्यों भला?’’ बबलू आश्चर्य से बोला.

”अब छोड़ो, बाद में बताऊंगी!’’ माया ने कहा.

”अरे परेशान मत करो, तुम तो जानती हो कि माया के साथ रह कर भी मैं तुम्हें कितना याद करता हूं.’’ बबलू बोला.

”अब रहने भी दो. इतना ही मुझ पर मरते तो सौतन ला कर मेरी छाती पर नहीं बिठाते. महीने में 2 दिन के लिए आते हो और बातें करते हो जैसे मेरे बिना सैंयाजी के गले से खाना भी नहीं उतरता हो.’’ पहली पत्नी माया ने शिकायती अंदाज में कहा.

”तुम जलीकटी बातें करना कब छोड़ोगी?’’

”जब तुम मेरी सौतन को छोड़ दोगे.’’

”यह नहीं हो सकता.’’

”तो सुनते रहो मेरी जलीकटी. गनीमत मनाओ कि इस के बाद भी मैं तुम्हें पास आने देती हूं. कोई और होती तो अब तक भाग गई होती किसी के साथ.’’ माया तेवर के साथ बोली.

बात को बदलते हुए बबलू बोला, ”अच्छा ठीक है, अब खाना खिला दो, बहुत भूख लगी है.’’

”सच है, दूसरी भूख पूरी करने वाली माया जो है.’’

”अरे? तुम फिर शुरू हो गई.’’

”अच्छा, गुस्सा न करो, हाथमुंह धो लो… थोड़ा सुस्ता लो… तब तक खाना पक जाएगा.’’ माया बोली.

बबलू ने पत्नी की बात को आज्ञा की तरह मान लिया. हाथमुंह धो कर बाहर कमरे में अपने मातापिता के पास जा कर बैठ गया. उन का हालसमाचार पूछने लगा. उन से बातें करने लगा.

मांबाप की देखभाल उस की पहली पत्नी ही गांव में रहते हुए करती थी, जबकि दूसरी पत्नी माया उस के साथ ही तेतरी में रहती थी. माया की उम्र बबलू से करीब 20 साल कम थी. उस से शादी कर साथ रहने को ले कर पहली पत्नी काफी नाराज हो गई थी, लेकिन उसे माया की कमाई से मिलने वाले पैसे का लालच दे कर मना लिया था. उस के पास महीने में 2-3 बार कुआंझागर आने लगा था.

21 जनवरी के रोज भी वह माया को छोड़ कर पहली पत्नी के पास आया था. वह अपनी मां से बात कर रहा था. तभी पत्नी ने तेज आवाज दी, ”अम्मा!…अरी ओ अम्मा!’’

”अच्छा अभी आती हूं… तू बाबूजी के पास बैठ, मैं तेरे लिए रोटी सेंक कर आती हूं.’’ बोलती हुई मां वहां से उठ कर तुरंत चली गई. मां को इस तरह से अपनी बहू की एक आवाज पर चली जाना बबलू को कुछ अच्छा नहीं लगा. वह सोचने लगा, इस का मतलब पत्नी उस से घर का सारा कामकाज करवाती होगी.

हालांकि उस का ऐसा सोचना गलत तब निकला, जब उसे पत्नी से मालूम हुआ कि वह इन दिनों मासिक धर्म के दौर में है. उसे अपनी सोच पर कुछ समय के लिए पछतावा हुआ, साथ ही अफसोस भी कि वह ऐसे वक्त में बेकार ही आया! उसे यह भी समझने में देरी नहीं लगी कि पत्नी ने आते ही क्यों कहा था कि वह गलत वक्त पर आया है. वह अब क्या करे, क्या नहीं! इसी उधेड़बुन में  पड़ गया. इसी बीच मां ने खाना खाने के लिए आवाज लगाई. अचानक उस के दिमाग में बिजली कौंध गई. इसी अपने अधलेटे बाबूजी से बोला, ”मैं दूसरे गांव से तेतरी लौट रहा था, सोचा आप लोगों से मिलता चलूं. खाना खा कर लौट जाऊंगा.’’

बबलू रोमांटिक मूड बना कर आया था, जिस पर पानी फिर चुका था. इसलिए वापस दूसरी पत्नी के पास लौटना ही बेहतर समझा. शाम हो चुकी थी और ठंड भी बढ़ गई थी. पत्नी और अम्माबाबूजी के मना करने के बावजूद वह तेतरी के लिए घंटे भर में ही लौट गया. उस के भीतर वासना हिलोरें मार रही थी. वह शराब का भी शौकीन था और उस ने माया को भी इस का जबरदस्त चस्का लगा दिया था. शराब के नशे में माया और भी कामुक हो जाती थी. वह उसे तृप्त कर देती थी. शराब के नशे में यौनसंबंध बनाना उसे बेहद पसंद था. यही सोचते हुए उस ने शराब की अद्धा बोतल खरीद ली.

बंद कमरे का ऐसा खुला रहस्य

तेतरी पहुंचतेपहुंचते आधी रात के करीब हो गई थी. घर के पास पहुंच कर वह चौंक गया. ठीक दरवाजे के बाहर एक बाइक खड़ी थी. दरवाजे तक जाने का रास्ता भी नहीं बचा था. वह भुनभुनाया, ‘कौन कमबख्त यहां बाइक लगा गया है?’

इधरउधर नजरें दौड़ाईं, कोई नजर नहीं आया. बाइक भी अनजानी लगी. फिर किसी तरह बाइक को थोड़ी टेढ़ी कर कमरे के दरवाजे का पास पहुंच गया. दरवाजे की कुंडी के पास की दरार से अंदर की थोड़ी रोशनी बाहर आ रही थी. वहां से वह झांक कर देखने लगा. भीतर का नजारा देख कर फिर चौंक गया. माया बैड पर अधनंगी बैठी थी. हाथ में शराब का गिलास लिए घूंट मार रही थी. वह कुंडी खटखटाने को ही था कि उस ने देखा माया के चेहरे पर सिगरेट का गहरा धुंआ भर गया है. वह समझ गया कि उस के साथ कोई मर्द है, जो सिगरेट पी रहा है.

तभी एक मर्द दिखा, उस ने माया के हाथ से शराब का गिलास ले लिया. फिर उस ने माया को बाहों में जकड़ लिया था. जैसे ही उस ने माया को अपनी गोद में बिठाया, उस का चेहरा दिख गया. बबलू ने उसे पहचान लिया. वह भरत भाभोर था. जेतवाड़ा का रहने वाला था और वहीं लोडिंग पिकअप पर काम करता था. माया उसी के साथ अंतरंग स्थिति में बेसुध थी. भाभोर उसे शराब पिला रहा था. चूम रहा था. दोनों कामवासना से भरे खोए हुए थे. बबलू के लिए यह नजारा एक बिजली के झटके के समान था. वह आक्रोश से भर गया था. हालांकि गुस्से में उस ने धैर्य से काम लिया. दरवाजा खटखटाने के बजाय वहां से हट कर उस ने पास के गांव में रहने वाले आपने रिश्तेदारों और दोस्तों को फोन कर दिया. उन्हें तुरंत उस के पास आने के लिए बोला.

थोड़ी देर में ही कोलावाखेड़ी गांव से उस का मौसेरा भाई सुनील, जुलवानिया से दिनेश परमार और आलेनिया गांव से ईश्वर सिंगाड़ा और राहुल, राहुल मालीवाड़ पहुंच गए. कड़ाके की ठंड में घर के बाहर बैठे बबलू ने उन्हें कमरे के भीतर दूसरे मर्द के साथ अय्याशी कर रही माया के बारे में बताया. उन्हें रंगेहाथों पकडऩे के लिए उन से मदद मांगी. इसी बीच कमरे के भीतर माया ने बाहर की हलचल सुन ली. वह चौंकने के साथसाथ अज्ञात आशंका को ले कर चिंतित हो गई.  उस ने खिड़की से बाहर देखा. वहां बबलू को कुछ लोगों के साथ देख कर परेशान हो गई. कमरे से बाहर निकलने का कोई दूसरा रास्ता नहीं था. वह बेहद डर गई कि आगे क्या होने वाला है. डर कर उस ने कमरे में अंदर से ताला लगा लिया. जबकि बबलू ने दरवाजा खटखटाना शुरू कर दिया था.

दूसरी पत्नी का प्यार चढ़ा परवान

बबलू के पास एक ही उपाय था कि किसी तरह से दरवाजे को तोड़ दिया जाए. सभी  दरवाजे के किनारे से खुदाई करने लगे. जबकि भीतर कमरे में माया दुबकी रही और भाभोर दरवाजा खुलने के साथ भाग निकलने की ताक में था. जल्द ही बबलू और दूसरे लोगों ने मिल कर दरवाजा बाहर से तोड़ दिया. दरवाजे का आधा भाग खुलते ही भाभोर ने भागने की कोशिश की, लेकिन उसे सभी ने पकड़ लिया. उस ने जान छुड़ा कर भागना चाहा, किंतु तब तक उस पर लाठी, लोहे के सब्बल आदि से मार पडऩे लगी. भाभोर धराशाई हो गया. उस के बाद बबलू ने सभी साथियों के साथ मिल कर वहां शराब पी, जबकि माया पीटे जाने के डर से कमरे में ही दुबकी रही.

सुबह होने से पहले बबलू ने अपने दोस्त दिनेश परमार के साथ मरणासन्न भाभोर को उस की बाइक पर लाद कर कनेरी गांव में हाईस्कूल के पास फेंककर वापस तेतरी गांव लौट आया. सुबह होते ही 22 जनवरी, 2025 को मध्य प्रदेश के रतलाम के डीडी नगर थाने के टीआई रविंद्र दंडोतिया को कनेरी में किसी युवक की लाश होने की सूचना मिली. लाश की शिनाख्त होने पर उस की पहचान भरत भाभोर के रूप में हुई, जो जैतमाड़ी का निवासी था.

इस की जांच के लिए एसपी अमित कुमार ने एएसपी राजेश खाखा और सीएसपी सत्येंद्र घनोरिया के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. जांच के लिए चौतरफा पुलिस के मुखबिर लगा दिए गए. उन की सक्रियता से पता चला कि भरत भाभोर का तेतरी निवासी बबलू की पत्नी माया के साथ महीनों से प्रेम संबंध बनाए हुए था. इस की जानकारी बबलू को जरा भी नहीं थी. जबकि उस ने भी माया से प्रेम किया था और औपचारिक विवाह बंधन में बंध कर उस के साथ रह रहा था.

घटना के बाद से माया भी घर से लापता थी. जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी. सुनील पुलिस के कब्जे में आ गया. वह कोलवाखेड़ी निवासी रामलाल गणवा का बेटा था. उस ने भाभोर की हत्या की पूरी दास्तान सुना दी. उस के बाद उसे अदालत में पेश कर जेल भेज दिया गया. पुलिस को माया और बबलू के प्रेम संबंधों के बारे में अच्छी तरह से मालूम हो गया था. बबलू माया को 2-3 दिनों के लिए छोड़ कर अपनी पहली पत्नी और मातापिता से मिलने के लिए पुश्तैनी गांव कुआंझागर चला जाता था. इसी बीच माया और भरत भाभोर एकदूसरे के करीब आ गए थे. माया अपने पति की गैरमौजूदगी में प्रेमी भाभोर को घर बुला लेती थी और उस के संग बेफिक्र हो कर गुलछर्रे उड़ाती थी.

वारदात के दिन भी बबलू अपनी पहली पत्नी के पास गया था. मगर संयोग से वह उसी रात लौट आया था. उस ने माया को भरत के साथ कमरे में बंद देखा था. उन्हें सबक सिखाने के लिए उस ने भरत की जम कर पिटाई की थी. इस बीच मौका देख कर माया फरार हो गई थी. डीडी नगर थाने में धारा 103(1) बीएनएस के तहत केस दर्ज कर लिया गया था. टीआई रविंद्र दंडोदिया और जांच टीम के प्रयास से वारदात के 10 दिन बाद बबलू और उस की पत्नी माया को भी गिरफ्तार कर लिया. बबलू ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. तब उसे भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक 3 आरोपी फरार थे.