True Crime Stories : बेरहम बेटी ने प्रेमी के लिए कर डाली पिता की हत्या

True Crime Stories : कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु देश का तीसरा सब से बड़ा नगर है. बेंगलुरु के राजाजी नगर थाना क्षेत्र में भाष्यम सर्कल के पास वाटल नागराज रोड स्थित पांचवें ब्लौक के 17वें बी क्रौस में जयकुमार जैन अपने परिवार के साथ रहते थे. जयकुमार जैन का कपड़े का थोक व्यापार था. पत्नी पूजा के अलावा उन के परिवार में 15 वर्षीय बेटी राशि (काल्पनिक नाम) और उस से छोटा एक बेटा था. जयकुमार मूलरूप से राजस्थान के जयपुर जिले के विराटनगर के पास स्थित मेढ़ गांव के निवासी थे. पैसे की कोई कमी नहीं थी, इसलिए परिवार के सभी सदस्य ऐशोआराम की जिंदगी जीने में यकीन करते थे.

जैन परिवार को देख कर कोई भी वैसी ही जिंदगी की तमन्ना कर सकता था. इस परिवार में सब कुछ था. सुख, शांति और समृद्धि के अलावा संपन्नता भी. ये सभी चीजें आमतौर से हर घर में एक साथ नहीं रह पातीं. मातापिता अपनी बेटी व बेटे पर जान छिड़कते थे. 41 वर्षीय जयकुमार जैन चाहते थे कि उन की बेटी राशि जिंदगी में कोई ऊंचा मुकाम हासिल करे. उन की पत्नी पूजा व बेटे को पुडुचेरी में एक पारिवारिक समारोह में शामिल होना था. जयकुमार जैन शाम 7 बजे पत्नी व बेटे को कार से रेलवे स्टेशन छोड़ने के लिए गए. इस बीच घर पर उन की बेटी राशि अकेली रही. यह बात 17 अगस्त, 2019 शनिवार की है.

पत्नी व बेटे को रेलवे स्टेशन छोड़ने के बाद जयकुमार घर वापस आ गए. घर आने के बाद बापबेटी ने साथसाथ डिनर किया. रात को उन की बेटी राशि पापा के लिए दूध का गिलास ले कर कमरे में आई और उन्हें पकड़ाते हुए बोली, ‘‘पापा, दूध पी लीजिए.’’

वैसे तो प्रतिदिन रात को सोते समय ये कार्य उन की पत्नी करती थी. लेकिन आज पत्नी के चले जाने पर बेटी ने यह फर्ज निभाया था. दूध पीने के बाद जयकुमार जैन अपने कमरे में जा कर सो गए. दूसरे दिन यानी 18 अगस्त रविवार को सुबह लगभग 7 बजे पड़ोसियों ने जयकुमार जैन के मकान के बाथरूम की खिड़की से आग की लपटें और धुआं निकलते देख कर फायर ब्रिगेड के साथसाथ पुलिस को सूचना दी. इस बीच जयकुमार की बेटी राशि ने भी शोर मचाया.सूचना मिलते ही फायर ब्रिगेड की गाड़ी बताए गए पते पर पहुंची और जयकुमार के मकान के अंदर पहुंच कर उन के बाथरूम में लगी आग को बुझाया. दमकलकर्मियों ने बाथरूम के अंदर जयकुमार जैन का झुलसा हुआ शव देखा.

कपड़ा व्यापारी जयकुमार के मकान के बाथरूम में आग लगने और आग में जल कर उन की मृत्यु होने की जानकारी मिलते ही मोहल्ले में सनसनी फैल गई. देखते ही देखते जयकुमार जैन के घर के बाहर पड़ोसियों की भीड़ इकट्ठा हो गई. जिस ने भी सुना कि कपड़ा व्यवसाई की जलने से मौत हो गई, वह सकते में आ गया. आग बुझाने के दौरान थाना राजाजीपुरम की पुलिस भी पहुंच गई थी. मौकाएवारदात पर पुलिस ने पूछताछ शुरू की.

बेटी का बयान  मृतक जयकुमार की बेटी ने पुलिस को बताया कि सुबह पापा नहाने के लिए बाथरूम में गए थे, तभी अचानक इलैक्ट्रिक शौर्ट सर्किट से आग लगने से पापा झुलस गए और उन की मौत हो गई. घटना के समय जयकुमार के घर पर मौजूद युवक प्रवीण ने बताया कि आग लगने पर हम दोनों ने आग बुझाने का प्रयास किया. आग बुझाने के दौरान हम लोगों के हाथपैर भी झुलस गए.

मामला चूंकि एक धनाढ्य प्रतिष्ठित व्यवसाई परिवार का था, इसलिए पुलिस के उच्चाधिकारियों को भी अवगत करा दिया गया था. खबर पा कर सहायक पुलिस आयुक्त वी. धनंजय कुमार व डीसीपी एन. शशिकुमार घटनास्थल पर पहुंच गए. इस के साथ ही फोरैंसिक टीम भी आ गई. मौके से आवश्यक साक्ष्य जुटाने व जरूरी काररवाई निपटाने के बाद पुलिस ने व्यवसाई जयकुमार की लाश पोस्टमार्टम के लिए विक्टोरिया हौस्पिटल भेज दी.

पुलिस ने भी यही अनुमान लगाया कि व्यवसाई जयकुमार की मौत शौर्ट सर्किट से लगी आग में झुलसने की वजह से हुई होगी. लेकिन जयकुमार के शव की स्थिति देख कर पुलिस को संदेह हुआ. प्राथमिक जांच में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो पाया, इसलिए पुलिस ने इसे संदेहास्पद करार देते हुए मामला दर्ज कर गहन पड़ताल शुरू कर दी. डीसीपी एन. शशिकुमार ने इस सनसनीखेज घटना का शीघ्र खुलासा करने के लिए तुरंत अलगअलग टीमें गठित कर आवश्यक निर्देश दिए. पुलिस टीमों द्वारा आसपास रहने वाले लोगों व बच्चों से अलगअलग पूछताछ की गई तो एक चौंका देने वाली बात सामने आई.

पुलिस को मृतक जयकुमार की बेटी राशि व पड़ोसी युवक प्रवीण के प्रेम संबंधों के बारे में जानकारी मिली. घटना के समय भी प्रवीण जयकुमार के घर पर मौजूद था. पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि जरूर दाल में कुछ काला है. मकान में जांच के दौरान फोरैंसिक टीम को गद्दे पर खून के दाग मिले थे, जिन्हें साफ किया गया था. इस के साथ ही फर्श व दीवार पर भी खून साफ किए जाने के चिह्न थे.

दूसरे दिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो गई. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया कि मृतक के झुलसने से पहले उस की हत्या किसी धारदार हथियार से की गई थी. इस के बाद उच्चाधिकारियों को पूरी जानकारी से अवगत कराया गया. पुलिस का शक मृतक की बेटी राशि व उस के बौयफ्रैंड प्रवीण पर गया.

पुलिस ने दूसरे दिन ही दोनों को हिरासत में ले कर उन से घटना के संबंध में अलगअलग पूछताछ की. इस के साथ ही दोनों के मोबाइल भी पुलिस ने कब्जे में ले लिए. जब राशि और प्रवीण से सख्ती से पूछताछ की गई तो दोनों संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए और सवालों में उलझ कर पूरा घटनाक्रम बता दिया. दोनों ने जयकुमार की हत्या कर उसे दुर्घटना का रूप देने की बात कबूल कर ली. डीसीपी एन. शशिकुमार ने सोमवार 19 अगस्त को प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया कि पुलिस ने मामला दर्ज कर गहन पड़ताल की. इस के साथ ही जयकुमार जैन हत्याकांड 24 घंटे में सुलझा कर मृतक की 15 वर्षीय नाबालिग बेटी राशि और उस के 19 वर्षीय प्रेमी प्रवीण को गिरफ्तार कर लिया गया.

उन की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल चाकू, जिसे घर में छिपा कर रखा गया था, बरामद कर लिया गया. साथ ही खून से सना गद्दा, कपड़े व अन्य साक्ष्य भी जुटा लिए गए. हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

जयकुमार जैन की बेटी बेंगलुरु शहर के ही एक इंटरनैशनल स्कूल में पढ़ती थी. उसी स्कूल में जयकुमार के पड़ोस में ही तीसरे ब्लौक में रहने वाला प्रवीण कुमार भी पढ़ता था. प्रवीण के पिता एक निजी कंपनी में काम करते थे. कुछ महीने पहले उस के पिता सहित कई कर्मचारियों को कुछ लाख रुपए दे कर कंपनी ने हटा दिया था. ये रुपए पिता ने प्रवीण के नाम से बैंक में जमा कर दिए थे. इन रुपयों के ब्याज से ही परिवार का गुजारा चलता था. प्रवीण उन का एकलौता बेटा था.

राशि और प्रवीण में पिछले 5 साल से दोस्ती थी और दोनों रिलेशनशिप में थे. प्रवीण राशि से 3 साल सीनियर था. फिलहाल राशि 10वीं की छात्रा थी, जबकि इंटर करने के बाद प्रवीण ने शहर के एक प्राइवेट कालेज में बी.कौम फर्स्ट ईयर में एडमीशन ले लिया था. अलगअलग कालेज होने के कारण दोनों का मिलना कम ही हो पाता था. इस के चलते राशि अपने प्रेमी से अकसर फोन पर बात करती रहती थी. मौडल बनने की चाह  अकसर देर तक बेटी का मोबाइल पर बात करना और चैटिंग में लगे रहना पिता जयकुमार को पसंद नहीं था. बेटी को ले कर उन के मन में सुनहरे सपने थे. राशि और प्रवीण की दोस्ती को ले कर भी पिता को आपत्ति थी. जयकुमार ने कई बार राशि को प्रवीण से दूर रहने को कहा था. राशि को पिता की ये सब हिदायतें पसंद नहीं थीं.

महत्त्वाकांक्षी राशि देखने में स्मार्ट थी. गठा बदन व अच्छी लंबाई के कारण वह अपनी उम्र से अधिक की दिखाई देती थी. उसे फैशन के हिसाब से कपड़े पहनना पसंद था. उस की सहेलियां भी उस के जैसे विचारों की थीं, इसलिए उन में जब भी बात होती तो मौडलिंग, फिल्मों और उन में दिखाए जाने वाले रोमांस की ही बात होती थी. पुलिस जांच में सामने आया कि एक बार परिवार को गुमराह कर के राशि अपनी सहेलियों के साथ शहर से बाहर घूमने के बहाने बौयफ्रैंड प्रवीण के साथ मुंबई गई थी. मुंबई में 4 दिन रह कर उस ने कई फोटो शूट कराए थे और फैशन शो में भी भाग लिया.

उस ने मुंबई से अपनी मां को फोन कर बताया था कि वह मुंबई में है और 5 दिन बाद घर लौटेगी. बेटी के चुपचाप मुंबई जाने की जानकारी जब पिता जयकुमार को लगी तो वह बेहद नाराज हुए. राशि के लौटने पर उन्होंने उस की बेल्ट से पिटाई की और उस का मोबाइल छीन लिया. जयकुमार को बेटी की सहेलियों से पता चला था कि राशि उन के साथ नहीं, बल्कि अपने बौयफ्रैंड प्रवीण के साथ मुंबई गई थी. इस जानकारी ने उन के गुस्से में आग में घी का काम किया.

बचपन को पीछे छोड़ कर बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी थी. पिता जयकुमार को बेटी के रंगढंग देख कर उस की चिंता रहती थी. जबकि राशि के खयालों में हरदम अपने दोस्त से प्रेमी बने प्रवीण की तसवीर रहती थी. वह चाहती थी कि उस का दीवाना हर पल उस की आंखों के सामने रहे. पिता द्वारा जब राशि पर ज्यादा पाबंदियां लगा दी गईं, तब दोनों चोरीचोरी शौपिंग मौल में मिलने लगे. पिता द्वारा मोबाइल छीनने की बात जब राशि ने अपने प्रेमी को बताई तो उस ने राशि को दूसरा मोबाइल ला कर दे दिया. अब राशि चोरीछिपे प्रवीण के दिए मोबाइल से बात करने लगी. जल्दी ही इस का पता राशि के पिता को चल गया. उन्होंने उस का वह मोबाइल भी छीन लिया. इस से राशि का मन विद्रोही हो गया.

पिता की हिदायत व रोकटोक से नाराज राशि ने प्रवीण को पूरी बात बताने के साथ अपनी खोई आजादी वापस पाने के लिए कोई कदम उठाने की बात कही. हत्या के आरोप में गिरफ्तार मृतक की नाबालिग बेटी ने खुलासा किया कि वह पिछले एक महीने से पिता की हत्या की योजना बना रही थी. इस दौरान उस ने टीवी सीरियल, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर हत्या करने के विभिन्न तरीकों की पड़ताल की थी. उस ने प्रेमी दोस्त प्रवीण के साथ मिल कर हत्या की योजना को अंजाम देने का षडयंत्र रचा. दोनों जुलाई महीने से ही जयकुमार की हत्या के प्रयास में लगे थे, लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी.

अंतत: 17 अगस्त को जब राशि की मां और भाई एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने पुडुचेरी गए तो उन्हें मौका मिल गया. यह कलयुगी बेटी अपने पिता की हत्या करने तक को उतारू हो गई. उस ने हत्या की पूरी योजना बना डाली. जालिम बेटी  राशि ने घर में किसी के नहीं होने का फायदा उठा कर योजना के मुताबिक रात को खाना खाने के बाद पिता को पीने को जो दूध दिया, उस में नींद की 6 गोलियां मिला दी थीं. कुछ ही देर में पिता बेहोश हो कर बिस्तर पर लुढ़क गए.

पिता को सोया देख राशि ने उन्हें आवाज दे कर व थपथपा कर जाना कि वह पूरी तरह बेहोश हुए या नहीं.  संतुष्ट हो जाने पर राशि ने प्रवीण  को फोन कर घर बुला लिया. वह चाकू साथ ले कर आया था. घर में रखे चाकू व प्रवीण द्वारा लाए चाकू से दोनों ने बिस्तर पर बेहोश पड़े जयकुमार जैन के गले व शरीर पर बेरहमी से कई वार किए, जिस से उन की मौत हो गई. इस के बाद दोनों शव को घसीट कर बाथरूम में ले गए.

हत्या के सबूत मिटाने के लिए कमरे में फैला खून व दीवार पर लगे खून के छींटे साफ करने के बाद बिस्तर की चादर वाशिंग मशीन में धो कर सूखने के लिए फैला दी. इस के बाद दोनों आगे की योजना बनाने लगे. सुबह 7 बजते ही राशि घर से निकली और 3 बोतलों में पैट्रोल ले कर आ गई. दोनों ने बाथरूम में लाश पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी.

इस दौरान दोनों के पैर व प्रवीण के हाथ भी आंशिक रूप से झुलस गए. आग लगते ही पैट्रोल की वजह से तेजी से आग की लपटें और धुआं निकलने लगा. बाथरूम की खिड़की से आग की लपटें व धुआं निकलता देख कर पड़ोसियों ने फायर ब्रिगेड व पुलिस को फोन कर दिया था. इस बीच राशि ने नाटक करते हुए मदद के लिए शोर मचाया और लोगों को बताया कि उस के पिता बाथरूम में नहाने गए थे तभी अचानक इलैक्ट्रिक शौर्ट सर्किट होने से आग लग गई, जिस से वह जल गए. इस तरह दोनों ने हत्या को दुर्घटना का रूप देने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं हो पाए.

बेटी को पिता की हत्या करने का फिलहाल कोई मलाल नहीं है. हत्याकांड का खुलासा होने के बाद पुलिस ने जब उसे गिरफ्तार किया तब परिवार के सभी लोग अचंभित रह गए. सोमवार की शाम को राशि की मां व भाई भी लौट आए थे. मां ने कहा कि शायद हमारी परवरिश में ही कोई कमी रह गई थी. हालांकि घर वालों ने उसे पिता के अंतिम संस्कार में भाग लेने को कहा, लेकिन राशि ने साफ इनकार कर दिया. उधर प्रवीण के मातापिता को अपने बेटे के प्रेम प्रसंग की कोई जानकारी नहीं थी.

प्रवीण राशि के पिता से नाराज था. उस ने गिरफ्तारी के बाद बताया कि उन्होंने उसे सार्वजनिक रूप से चेतावनी देते हुए अपनी बेटी से दूर रहने को कहा था. साथ ही कुछ दिन पहले उन्होंने राशि का मोबाइल छीन लिया था. इस पर उस ने अपनी गर्लफ्रैंड को नया मोबाइल गिफ्ट किया तो उस के पिता ने वह भी छीन लिया. वह उस की गर्लफ्रैंड को पीटते, डांटते थे, जो उसे अच्छा नहीं लगता था. आखिर में प्रवीण ने अपनी गर्लफ्रैंड को पिता की प्रताड़ना से बचाने का फैसला लिया.

मंगलवार को हत्यारोपी बेटी से मिलने कोई भी रिश्तेदार नहीं पहुंचा. लड़की की मां भी घर पर ही रही. राशि ने पुलिस को बताया कि उस ने अपने पिता को चाकू नहीं मारा, लेकिन घटना के समय वह मौजूद थी.  राजाजीनगर पुलिस द्वारा मंगलवार को किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) के सामने राशि को पेश किया, जहां के आदेश के बाद उसे बलकियारा बाल मंदिर भेज दिया गया. राशि सामान्य दिखाई दे रही थी. जब उसे जेजेबी के सामने ले जाया गया तो उस के चेहरे पर अपने पिता की हत्या करने का कोई पश्चाताप नहीं दिखा. वहीं राशि के प्रेमी प्रवीण को मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश कर जेल भेज दिया गया.

हत्या करना इतना आसान काम नहीं होता. प्रवीण और राशि ने योजना बनाते समय अपनी तरफ से तमाम ऐहतियात बरती. दोनों हत्या को हादसा साबित करना चाहते थे. लेकिन वे भूल गए थे कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून के लंबे हाथों से ज्यादा देर तक नहीं बच सकता. बेटा हो या बेटी, मांबाप को उन के चरित्र और व्यक्तित्व का ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि मांबाप की आंखों में धूल झोंक कर गलत राहों पर उतर जाते हैं तो उन्हें संभाल पाना आसान नहीं होता. True Crime Stories

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Stories in Hindi Love : प्रेम ने किया रिश्तों का अंत

Stories in Hindi Love : उत्तर प्रदेश के बदायूं शहर के सिविल लाइंस इलाके में एक स्कूल है होली चाइल्ड. निशा इसी स्कूल में पढ़ाती थी. उस का पति राजकुमार पादरी था और उस की पोस्टिंग बदायूं जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर वजीरगंज की एक चर्च में थी. चर्च में जब ज्यादा काम रहता था तो राजकुमार रात में वहीं रुक जाता था.

निशा को स्कूल की बिल्डिंग में ही रहने के लिए कमरा मिला हुआ था, जहां पर वह पति राजकुमार और 2 बेटियों रागिनी व तमन्ना के साथ रहती थी. राजकुमार और निशा की मुलाकात लखनऊ में पादरी के काम की ट्रेनिंग के दौरान हुई थी, जोकि वीसीसीआई संस्था द्वारा अपने धर्म प्रचारकों को दी जाती है. कुछ मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे.

निशा मूलरूप से गोरखपुर जिले की रहने वाली थी. उस के पिता दयाशंकर पादरी थे. निशा की बड़ी बहन शारदा की शादी बरेली निवासी रघुवीर मसीह के बेटे दिलीप के साथ हुई थी. इसी के चलते बहन के देवर राजकुमार से निशा की नजदीकियां बढ़ने लगीं. दोनों जानते थे कि घर वालों को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं होगा, अत: दोनों ने अपनी पसंद की बात अपने परिवार वालों को बता दी थी. राजकुमार ने लखनऊ में अपनी ट्रेनिंग पूरी कर ली लेकिन किन्हीं कारणों से निशा को ट्रेनिंग बीच में ही छोड़ देनी पड़ी. राजकुमार बरेली निवासी रघुवीर मसीह का बेटा था. रघुवीर मसीह पुलिस विभाग में वायरलैस मैसेंजर के पद पर बदायूं में तैनात था.

सन 2014 में पारिवारिक सहमति से राजकुमार और निशा का विवाह हो गया. रघुवीर मसीह के 4 बेटे और 2 बेटियां थीं. सब से बड़ा बेटा रवि था, जिस की शादी बाराबंकी निवासी अनुराधा से हुई थी. दूसरा दिलीप था, जिस की शादी निशा की बड़ी बहन शारदा से हुई थी. उस से छोटा राजकुमार था और सब से छोटा राहुल. राजकुमार की पहली पोस्टिंग कासगंज जिले के सोरों कस्बे में नवनिर्मित चर्च में हुई थी. इसी बीच राजकुमार की शादी हो गई और रघुवीर मसीह ने कोशिश कर के राजकुमार का तबादला कासगंज से वजीरगंज करवा दिया.

शादी के बाद कुछ समय तो अच्छा कटा. राजकुमार की मां आशा मसीह ने नवविवाहिता बहू निशा को हाथोंहाथ लिया, पर निशा को राजकुमार के घर का माहौल रास नहीं आया. इसलिए उस ने पति से कहा कि वह घर में बैठ कर वक्त बरबाद नहीं करना चाहती. निशा इंटरमीडिएट पास थी और उस की अंगरेजी भाषा पर अच्छी पकड़ थी. वह सोचती थी कि किसी भी इंग्लिश स्कूल में उसे नौकरी मिल सकती है. नौकरी करने वाली बात निशा ने पति और सासससुर से बताई तो उन्हें इस पर कोई ऐतराज नहीं हुआ. निशा को इजाजत मिल गई और थोड़ी कोशिश से निशा को होली चाइल्ड स्कूल में नौकरी मिल गई.

कालांतर में निशा 2 बेटियों की मां बनी, जिन के नाम रागिनी और तमन्ना रखे गए. अब उन का छोटा सा खुशहाल परिवार था. वे स्कूल परिसर में स्थित कमरे में रहते थे. राजकुमार और निशा का दांपत्य जीवन काफी सुखद था. किन्हीं खास मौकों पर वे लोग बरेली चले जाते थे. बदलने लगी निशा की सोच  सब कुछ ठीक चल रहा था, पर वक्त कब करवट ले लेगा, इस का आभास किसी को नहीं था. स्कूल की नौकरी करतेकरते निशा को लगने लगा था कि राजकुमार से शादी करना उस के जीवन की सब से बड़ी भूल थी. वह अच्छाखासा कमा लेती है. अगर उस ने शादी की जल्दबाजी न की होती तो उसे कोई पढ़ालिखा अच्छा पति मिलता और वह ऐश करती.

ऐसे विचार मन में आते ही उस का दिल बेचैन होने लगा. जितना उसे मिला था, उस से उसे संतोष नहीं था. उस की कुछ ज्यादा पाने की चाहत बढ़ रही थी.  कहते हैं, अकसर ज्यादा पाने की चाह में लोग बहुत कुछ गंवा देते हैं. निशा का भी यही हाल था. अब धीरेधीरे राजकुमार और निशा के जीवन में तल्खियां बढ़ने लगीं. निशा छोटीछोटी बातों को ले कर मीनमेख निकालती और उस से झगड़ा करने की कोशिश करती. सीधेसादे राजकुमार को हैरानी होती थी कि निशा को आखिर हो क्या गया है. एक दिन निशा ने कहा, ‘‘तुम क्या थोड़ी और पढ़ाई नहीं कर सकते थे? कम से कम मेरी तरह इंटर तो पास कर लेते. पढ़ेलिखे होते तो तुम्हारा दिमाग भी खुला होता.’’

‘‘मैं ज्यादा पढ़ालिखा न सही, पर अपने काम में तो परफैक्ट हूं. लोगों को अपने धर्म का ज्ञान बेहतर तरीके से देता हूं. हालांकि मैं केवल हाईस्कूल पास हूं लेकिन मैं ने यह ठान लिया है कि अपनी बेटियों को खूब पढ़ाऊंगा.’’ राजकुमार बोला.

‘‘बेटियों की फिक्र तुम छोड़ो. यह सब मुझे सोचना है कि उन के लिए क्या करना है.’’ निशा ने पति की बात काटते हुए कहा. राजकुमार तर्क कर के बात बढ़ाना नहीं चाहता था. इसलिए वह पत्नी के पास से उठ गया. दोनों बेटियों को साथ ले कर वह यह सोच कर घर से बाहर निकल गया कि थोड़ी देर में निशा का गुस्सा शांत हो जाएगा.

थोड़ी देर बाद जब वह घर पहुंचा तो निशा नार्मल हो चुकी थी. राजकुमार ने राहत की सांस ली. निशा ने राजकुमार का खाना लगा दिया, तभी स्कूल का चपरासी 20 वर्षीय अर्जुन आया और वह निशा को चाबियां देते हुए बोला, ‘‘मैडम, मैं ने बाकी ताले बंद कर दिए हैं. आप केवल बाहरी गेट का ताला लगा लेना, मैं घर जा रहा हूं.’’

‘‘अर्जुन, बैठो, चाय पी कर जाना.’’ निशा ने कहा.  निशा के कई बार कहने पर अर्जुन कुरसी पर बैठ गया. अर्जुन बाबा कालोनी निवासी ओमेंद्र सिंह का बेटा था. वह स्कूल में चपरासी था और उस का छोटा भाई किरनेश स्कूल के प्रिंसिपल के घर का नौकर था.

कुछ देर में निशा चाय बना कर ले आई. चाय पी कर अर्जुन चला गया. लेकिन राजकुमार के दिल में कुछ खटकने लगा. उस ने निशा से कहा, ‘‘मुझे इस अर्जुन की आदतें कुछ अच्छी नहीं लगतीं. वैसे भी ये स्कूल का चपरासी है और तुम टीचर, तुम्हें अपने स्टैंडर्ड का ध्यान रखना चाहिए.’’

निशा ने तुनक कर कहा, ‘‘मैं ने ऐसा क्या कर दिया जो तुम मेरे स्टैंडर्ड को कुरेद रहे हो.’’

राजकुमार ने कोई जवाब नहीं दिया. वह बात को बढ़ाना नहीं चाहता था. लेकिन उस दिन के बाद निशा का ध्यान अर्जुन पर टिक गया. जब वह अकेली होती तो अचानक अर्जुन उस के जेहन में आ बैठता.

निशा के दिल के दरवाजे पर दस्तक दी अर्जुन ने  कुछ दिनों बाद राजकुमार की तबीयत खराब हो गई. वह कभीकभी 2 दिन तक चर्च में ही रुक जाता और बदायूं नहीं आ पाता था. इस अकेलेपन ने निशा को गुमराह कर दिया. अर्जुन एक स्वस्थ और स्मार्ट युवक था. वैसे भी निशा के साथ वह घुलनेमिलने लगा था. अब राजकुमार की गैरमौजूदगी में वह निशा के कमरे में आ जाता और उस की बेटियों के लिए खानेपीने की चीजें ले आता था. निशा के मन में अर्जुन अपनी जगह बनाने लगा था. निशा भी अर्जुन के बारे में सोचती रहती थी. वह उस की मजबूत बांहों में समाने के लिए बेताब रहने लगी थी. उधर अर्जुन निशा को चाहता तो था लेकिन निशा के पति की वजह से पहल करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

कहा जाता है कि फिसलन की ओर बढ़ने वाले कदम आसानी से दलदल तक पहुंच जाते हैं. यही निशा के साथ हुआ. एक दिन शाम को निशा के पास राजकुमार का फोन आया. उस ने कहा कि वह आज रात को घर नहीं आ पाएगा. इस फोन काल ने निशा के दिल में हलचल मचा दी. उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. निशा के दिमाग में अर्जुन घूम रहा था. उस ने कमरे से बाहर निकल कर देखा तो उस समय अर्जुन स्कूल के अपने काम निपटा कर घर जाने की तैयारी कर रहा था. तभी निशा ने उसे आवाज दे कर बुलाया, ‘‘अर्जुन, तुम कमरे में आओ, कुछ बात करनी है.’’

अर्जुन कमरे में आ गया. निशा उस के लिए चाय बना कर ले आई. निशा ने चाय का प्याला उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अर्जुन, आज रात राजकुमार घर नहीं आएगा. अकेले में मुझे डर लगेगा, तुम आज रात यहीं रुक जाओ, जिस से मेरा भी मन लगा रहेगा.’’

अर्जुन ने गहरी नजर से निशा को देखा. उसे निशा का अंदाज कुछ अजीब सा लगा. उस की चुप्पी देख कर निशा ने पूछा, ‘‘कुछ परेशानी है क्या?’’

‘‘नहीं मैडम, ऐसी कोई बात नहीं है. मैं सोच रहा हूं कि अगर साहब को पता चला तो पता नहीं वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे, वह तो वैसे भी मुझे पसंद नहीं करते.’’

‘‘तुम उन की चिंता मत करो. तुम्हें मैं तो पसंद करती हूं न.’’ निशा ने मुसकराते हुए कहा तो अर्जुन की भावनाओं में जैसे तूफान उठने लगा. उस ने उसी समय जेब से मोबाइल निकाला और अपने घर फोन कर के बता दिया कि स्कूल में कुछ काम होने की वजह से वह आज घर नहीं आ पाएगा. इस के बाद अर्जुन उस के कमरे में बैठ गया. निशा ने खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दी. तब तक अर्जुन उस के दोनों बच्चों के साथ खेलने लगा. खाना बनने के बाद निशा ने बच्चों को पहले खाना खिलाया और उन्हें सुला दिया.

फिर निशा ने अपना और अर्जुन का खाना लगाया. खाना खातेखाते अर्जुन उस के खाने की तारीफ करते हुए बोला, ‘‘मैडम, आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं.’’

‘‘खाना बनाना ही नहीं, मैं बहुत से काम बहुत अच्छे से करती हूं.’’ कह कर निशा हंसने लगी. फिर उस ने एक प्रश्न किया, ‘‘अर्जुन, तुम ने अभी तक शादी क्यों नहीं की?’’

अर्जुन निशा को गौर से देखते हुए बोला, ‘‘रिश्ते तो कई आए थे मैडम, लेकिन जब से आप को देखा है मेरा इरादा बदल गया है.’’

‘‘क्या मतलब?’’ निशा ने चौंकते हुए पूछा.

‘‘मतलब यह कि मुझे आप जैसी स्मार्ट जीवनसाथी की जरूरत है.’’

निशा की चाहत बन गया अर्जुन  अर्जुन की बात सुन कर निशा मन ही मन खुश हुई कि इस का मतलब वह उसे पहले से ही चाहता है. निशा कुछ नहीं बोली बल्कि मुसकराने लगी. खाना खाते हुए दोनों इसी तरह की बातें करते रहे. खाना खाने के बाद निशा ने अर्जुन का बिस्तर जमीन पर लगाते हुए कहा कि वह यहां आराम कर सकता है. इस के बाद रसोई का काम खत्म कर के वह भी आ गई. उस ने चटाई बिछा कर अपना बिस्तर भी जमीन पर लगा लिया. धीरेधीरे रात गहराती जा रही थी और वहां भी कुछ ऐसा होने वाला था, जो किसी के लिए बरबादी ला सकता था.

निशा की आंखों में नींद नहीं थी. उस ने अर्जुन की तरफ देखा तो वह भी करवटें बदल रहा था. उस ने पूछा, ‘‘अर्जुन, नींद नहीं आ रही क्या?’’  ‘‘हां, नींद नहीं आ रही. पर सोच रहा हूं कि आप के पति तो अकसर वजीरगंज में ही रुक जाते हैं, फिर आप ने आज मुझे यहां क्यों रोका है?’’

निशा ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम क्या सचमुच अनाड़ी हो या अनजान बनने का नाटक कर रहे हो. मैं ने तुम्हारी आंखों में कुछ खास देखा था, वही पिछले कई दिनों से मुझे परेशान कर रहा है. अर्जुन भूख अकसर 2 लोगों को एकदूसरे के करीब ले आती है.’’

‘‘यह क्या कह रही हैं आप?’’ अर्जुन बोला.  ‘‘ठीक ही कह रही हूं. मैं तुम से प्यार करने लगी हूं अर्जुन.’’

अर्जुन को जैसे करंट सा लगा, पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था. निशा ने आगे बढ़ कर अर्जुन का हाथ पकड़ा और कहा, ‘‘डरो मत अर्जुन, मैं सचमुच तुम्हें चाहती हूं और यह कोई गुनाह नहीं है. मैं अपने पति से तंग आ चुकी हूं.’’

अर्जुन फिसलन की कगार पर खड़ा था. निशा के स्पर्श से वह दलदल में जा गिरा. शादीशुदा और 2 बच्चों की मां ने उसे एक ऐसे दलदल में खींच लिया, जिस के अंदर जाना तो आसान था पर बाहर आने का कोई रास्ता नहीं था. उस दिन के बाद रिश्तों की दिशा और दशा ही बदल गई. अपनी तबाही से बेखबर राजकुमार अगले दिन घर आ गया. राजकुमार की बरबादी की नींव रखी जा चुकी थी. बीवी ने बेवफाई करने के लिए कमर कस ली थी. अब आए दिन वह पति से झगड़ने लगी. राजकुमार भी महसूस कर रहा था कि स्कूल का चपरासी अर्जुन अब पहले की तरह उस की इज्जत नहीं करता.

एक दिन वह जब वजीरगंज से लौटा तो उस ने अर्जुन को कमरे में चारपाई पर पसरा हुआ देखा. यह देख कर राजकुमार का माथा गरम हो गया. वह बोला, ‘‘अर्जुन, तुम यहां क्या कर रहे हो? लगता है, तुम अपनी औकात भूल रहे हो. मेरी गैरमौजूदगी में तुम्हें यहां आने की जरूरत नहीं है.’’

उस समय तो अर्जुन वहां से चला गया. उस ने खुद को अपमानित महसूस किया और तय किया कि राजकुमार को सबक सिखाएगा.  राजकुमार के तेवर देख कर निशा भी डर गई थी. राजकुमार ने कहा, ‘‘निशा, यह अर्जुन मुझे बिलकुल भी पसंद नहीं है. तुम इस से दूर ही रहो. देखो, मैं सोच रहा हूं कि अपना तबादला बरेली में ही करा लूं. पापा भी रिटायर हो गए हैं, अपना मकान भी उन्होंने बना लिया है. फिर तुम्हें भी बरेली में कहीं नौकरी मिल ही जाएगी.’’

‘‘देखो, अर्जुन इसी स्कूल में काम करता है. तुम्हारे जाने के बाद वह मार्केट से घर की जरूरत का सामान भी ला देता है. तुम खामख्वाह उस पर गरम हो रहे थे. देखो, हमें यहां कमरा मिला हुआ है. यहां कोई परेशानी भी नहीं है. और फिर यह बात तुम जानते हो कि मैं जौइंट फैमिली में नहीं रह सकती.’’ निशा ने पति को समझाया.

‘‘इस मामले में मैं घर वालों से बात करूंगा.’’ कह कर राजकुमार बाथरूम चला गया.

राजकुमार अनभिज्ञ था पत्नी के संबंधों से राजकुमार को अभी तक यह पता नहीं था कि अर्जुन और उस की पत्नी निशा के बीच किस तरह के संबंध हैं. पिछले 6 महीने से वह महसूस कर रहा था कि निशा बदल रही है.  कहते हैं कि इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपता. निशा और अर्जुन के संबंधों की असलियत भी सामने आ ही गई. उस दिन अर्जुन घर जाने ही वाला था कि राजकुमार का पत्नी के पास फोन आ गया कि वह आज रात को घर नहीं आएगा. यह खबर सुन कर निशा खुश हुई. उस ने अर्जुन को बुला कर कहा, ‘‘आज रात फिर अपनी ही है क्योंकि राजकुमार आज भी नहीं आएगा. ऐसा करो कि तुम नहाधो कर फ्रैश हो जाओ. तब तक मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं.’’

निशा ने गैस पर चाय चढ़ा दी. अर्जुन भी फ्रैश होने के लिए बाथरूम में घुस गया. फ्रैश होने के बाद वह निशा के साथसाथ चाय पीने लगा. चाय की चुस्कियां लेते हुए वह बोला, ‘‘ऐसा आखिर कब तक चलेगा, हमें कुछ करना ही होगा.’’

‘‘हां करेंगे.’’ कहते हुए निशा ने कहा, ‘‘अभी तो इन पलों को जिओ, जो हमें मिल रहे हैं.’’  इस के बाद दोनों मौजमस्ती में लीन हो गए. अर्जुन इस बात से बेखबर था कि उस ने बाहरी गेट बंद नहीं किया था. तभी अचानक दबेपांव राजकुमार वहां आ गया. बीवी को अर्जुन की बाहों में देख कर वह आगबबूला हो गया. उस ने अर्जुन की टांग पकड़ कर खींची और उसे कई तमाचे जड़ दिए.

किसी तरह अर्जुन उस के चंगुल से निकल कर भाग गया. तभी राजकुमार ने कहा कि वह इस की शिकायत स्कूल से करेगा.

अर्जुन के चले जाने के बाद राजकुमार ने निशा को जम कर लताड़ा. निशा उस के पैरों में गिर कर अपनी गलती की माफी मांगने लगी, पर राजकुमार के तेवर सख्त थे. उस ने  कह दिया कि अब हम यहां नहीं रहेंगे. राजकुमार ने पिता को फोन पर सारी बातें बता दीं और कहा कि अब हम बरेली में नेकपुर स्थित अपने घर में रहेंगे. पति का फैसला सुन कर निशा परेशान हो गई. वह किसी भी हालत में बदायूं को छोड़ना नहीं चाहती थी. अत: उस ने तय कर लिया कि वह पति नाम के इस कांटे को अपनी जिंदगी से उखाड़ फेंकेगी.

अगले दिन राजकुमार वजीरगंज चला गया. निशा ने मौका मिलते ही अर्जुन को एकांत में बुला कर कहा, ‘‘अगर मुझे चाहते हो तो तुम्हें राजकुमार को रास्ते से हटाना होगा.’’

अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा क्योंकि ऐसा तो उस ने कभी सोचा ही नहीं था.  उसे चुप देख निशा बोली, ‘‘हां, मैं ठीक ही कह रही हूं. आज राजकुमार जब घर आएगा तो तुम घर आ कर उस से अपनी गलती की माफी मांगना और उस का विश्वास जीतना. इस के आगे क्या करना है, मैं बाद में बताऊंगी.’’

अर्जुन ने ऐसा ही किया. राजकुमार जब घर पहुंचा तो अर्जुन उस के घर चला गया. उसे देखते ही राजकुमार उस पर भड़का तो अर्जुन ने उस से अपनी गलती पर अफसोस जताते हुए माफी मांग ली. सीधेसादे राजकुमार ने उसे माफ कर दिया और कहा कि अब वैसे भी हमें यहां नहीं रहना है. माफी मांग कर काट दी जीवन की डोर  पर अर्जुन के दिल में राजकुमार के प्रति क्या था, यह बात राजकुमार नहीं जानता था. राजकुमार मौत की दस्तक को सुन ही नहीं पाया था. 15 जून, 2019 को अपनी योजना के मुताबिक अर्जुन अपनी बाइक पर आया. उस ने राजकुमार से कहा, ‘‘चलिए, मछली लेने चलते हैं.’’

राजकुमार भी माहौल का तनाव कम करना चाहता था. वह अर्जुन को माफ कर चुका था.  साजिश से अनजान राजकुमार अर्जुन के साथ बाइक पर बैठ गया. अर्जुन बाइक को इधरउधर घुमाता रहा. फिर बाइक मझिया गांव के सुनसान इलाके में ले गया और बोला, ‘‘अब बाइक आप चलाओ, मैं पीछे बैठता हूं.’’

राजकुमार ने ड्राइविंग सीट संभाली. दोनों शर्की रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूरी पर पहुंचे थे कि बाइक पर पीछे बैठे अर्जुन ने जेब से तमंचा निकाला और राजकुमार के सिर पर गोली मार दी. राजकुमार का बैलेंस बिगड़ा और वह बाइक समेत जमीन पर गिर गया. राजकुमार खून से लथपथ था. अब योजना के मुताबिक राजकुमार को रेलवे ट्रैक पर डालना था ताकि उस की मौत ट्रेन एक्सीडेंट लगे.

अर्जुन चाहता था ट्रेन एक्सीडेंट समझा जाए  खून से लथपथ राजकुमार को अर्जुन ने रेलवे ट्रैक पर डाल दिया. उस के कपडे़ भी खून से लथपथ थे. रेलवे लाइन पर पड़ा राजकुमार तड़प रहा था. वह अभी जिंदा था पर अर्जुन ने जो सोचा था, हो नहीं सका. कासगंज से बरेली जाने वाली ट्रेन तब तक गुजर गई थी. अब सुबह 5 बजे से पहले वहां से कोई गाड़ी निकलने वाली नहीं थी. अर्जुन ने बाइक स्टार्ट की और घर आ गया. उस ने खून सने कपड़े उतारे. कपड़ों पर लगा खून देख कर घर वाले सन्न रह गए. उन्होंने अर्जुन से जब सख्ती से पूछताछ की तो पता चला कि अर्जुन ने राजकुमार का कत्ल कर दिया है.

अर्जुन ने अपने कपड़े धो डाले और घर वालों से सख्त लहजे में कहा कि कोई भी अपना मुंह नहीं खोलेगा. उस ने निशा को काम हो जाने की खबर फोन पर दे दी. रात जैसेतैसे गुजर गई. सुबह मार्निंग वाक पर निकले लोगों ने रेलवे ट्रैक पर लाश देखी तो किसी ने इस की सूचना रेलवे पुलिस को दे दी. पुलिस वहां आ गई और लोगों से लाश की शिनाख्त कराने की कोशिश की. पर उस की शिनाख्त नहीं हो पाई. सिविल लाइंस थाने की पुलिस भी वहां पहुंच गई.

उधर राजकुमार को 15 जून को बरेली जाना था, यह बात उस ने फोन पर अपने पिता रघुवीर को बता दी थी, लेकिन वह रात में घर नहीं पहुंचा तो घर वाले परेशान हो गए.  इधर थाना सिविल लाइंस के थानाप्रभारी ओ.पी. गौतम, सीओ राघवेंद्र सिंह राठौर और एसपी (सिटी) जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव भी मौके पर पहुंच गए थे. फोरैंसिक टीम भी जांच के लिए पहुंच गई थी. जांच में पुलिस को मृतक की जेब से 100 रुपए का एक नोट और एक परची मिली. पुलिस ने जरूरी काररवाई कर के लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.  17 जून को लाश का फोटो अखबारों में छपा तो रघुवीर के एक रिश्तेदार जे.पी. मसीह ने उन्हें फोन कर के पूछा कि राजकुमार कहां है? रघुवीर ने कहा कि राजकुमार को बरेली आना था, पर आया नहीं है.

सब जगह फोन कर लिया, पर उस का कुछ पता नहीं है. तब जे.पी. मसीह अखबार ले कर रघुवीर के घर पहुंच गए और उन्हें अखबार दिखाया. अखबार में अपने बेटे की लाश का फोटो देख कर रघुवीर की आंखों से आंसू निकल आए. वह परेशान हो गए तभी उन के पास पुलिस कंट्रोल रूम से भी फोन आ गया. रघुवीर अपने रिश्तेदारों के साथ पोस्टमार्टम हाउस पहुंच गए और लाश की शिनाख्त बेटे राजकुमार के रूप में कर दी. निशा भी किसी से खबर पा कर घडि़याली आंसू बहाती हुई पोस्टमार्टम हाउस पहुंची. वह वहां इस तरह से रो रही थी, जैसे उस का सब कुछ लुट गया हो.

पोस्टमार्टम के बाद लाश बरेली ला कर उस का अंतिम संस्कार कर दिया गया. निशा के हावभाव देख कर रघुवीर की समझ में कुछकुछ आ रहा था. उन्हें शक था कि उन के बेटे की हत्या निशा ने कराई होगी. क्योंकि उसे रंगेहाथ पकड़ने पर राजकुमार ने उस की शिकायत अपने पिता से कर दी थी. रघुवीर ने जांच अधिकारी के सामने अपनी पुत्रवधू और अर्जुन के नाजायज संबंधों का खुलासा कर दिया था. पुलिस ने अर्जुन को हिरासत में ले लिया. अर्जुन ने अपने हाथ पर ब्लेड से निशा का नाम लिख रखा था.

पुलिस ने निशा और अर्जुन को आमनेसामने बैठा कर पूछताछ की तो दोनों एकदूसरे पर इलजाम लगाने लगे. उन की दीवानेपन आशिकी की हवा निकल चुकी थी. दोनों ने ही अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अब दोनों को जेल जाने का डर सता रहा था. पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201 के तहम मुकदमा दर्ज कर के उन से विस्तार से पूछताछ की और कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.  रागिनी और तमन्ना ने मांबाप दोनों को खो दिया था. राजकुमार की मां आशा मसीह ने कहा कि उसे तो विश्वास ही नहीं हो रहा कि उन की बहू उन के सीधेसादे बेटे को मरवा सकती है. अब इस उम्र में उन्हें अपने बेटे की बच्चियों की परवरिश के लिए जीना होगा.

निशा के पिता दयाशंकर और मां गीता को बेटी के इस गुनाह पर अफसोस होता है. उन्होंने तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि निशा ऐसा भी कर सकती है. काश, राजकुमार मौत की दस्तक को सुन पाता तो उसे अपनी जान से हाथ न धोना पड़ता. Stories in Hindi Love

किरण की आंखों का काजल

राजस्थान के जिला दौसा के गांव बीनावाला की रहने वाली किरण बैरवा गोरे रंग की खूबसूरत युवती थी. जब वह टाइट जींस टीशर्ट पहन कर निकलती थी तो देखने वाले ताकते रह जाते थे. किरण को अपने रूपसौंदर्य पर बहुत नाज था. वह जानती थी कि उस से कोई भी व्यक्ति दोस्ती करने को तैयार हो जाएगा, क्योंकि वह बला की खूबसूरत है.

किरन को पाने के लिए पुरुषरूपी भंवरेउस के आसपास मंडराते रहते थे, मगर उस ने किसी को लिफ्ट नहीं दी. किरण के ख्वाब ऊंचे थे. खूबसूरत होने के साथ वह शातिरदिमाग भी थी. शादी योग्य होने पर घर वालों ने उस की शादी कर दी थी.

किरण को जैसा जीवनसाथी चाहिए था, उस का पति वैसा नहीं था. किरण ने उस के साथ सात फेरे जरूर लिए थे, मगर पति को मन से कभी नहीं स्वीकारा. ऐसे में मतभेद स्वभाविक बात थी. शादी के कुछ समय बाद ही किरण का पति से तलाक हो गया. तलाक के बाद वह मायके में आ कर रहने लगी.

किरण ने अपने मांबाप को कह दिया कि वह पढ़ीलिखी है और कहीं नौकरी या कामधंधा कर के अपना गुजरबसर कर लेगी.

मायके आने के बाद किरण नौकरी की तलाश के लिए गांव से दौसा आनेजाने लगी. शहर में उसे नौकरी तो नहीं मिली, मगर जैसा जीवनसाथी उसे चाहिए था, वैसा दोस्त जरूर मिल गया. उस का नाम अक्षय उर्फ आशू था. अक्षण मीणा के पिता दौसा के पूर्व पार्षद हैं. पिता के पैसों पर ऐश करने वाला अक्षय मीणा भी शातिरदिमाग और तेजतर्रार युवक था.

उस की किरण से मुलाकात हुई तो पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर मर मिटे. दोनों ने एकदूसरे को मोबाइल नंबर दे दिए. इस के बाद उन की फोन पर बातें होने लगीं. किरण का जब मन करता, तब अक्षय मीणा से मिलने गांव से दौसा शहर आ जाती.

दो जवां दिल अगर एक दूसरे के लिए धड़कने लगें तो मिलन होने में देर नहीं लगती. ऐसा ही किरण और अक्षय के मामले में भी हुआ. 4-6 मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे के बारे में बहुत कुछ जान गए. अक्षय को जब पता चला कि किरण तलाकशुदा है तो वह बोला, ‘‘किरण, तुम मेरी हो. इसी कारण तुम्हारा अपने पति से तलाक हुआ है. हम दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.’’

अक्षय के मुंह से यह सुन कर किरण को उस पर विश्वास हो गया कि वह उस का बहुत खयाल रखेगा. फिर तो उस ने अक्षय को अपना तनमन सब कुछ न्यौछावर कर दिया. एक बार शारीरिक संबंध बने तो सारी लाजशरम जाती रही. जब मन चाहता, दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते.

अक्षय ने किरण से वादा किया था कि वह उस से शादी करेगा और जीवन भर साथ निभाएगा. किरण तो अक्षय की दीवानी थी ही. मगर बगैर कामधाम किए मौजमस्ती से तो जिंदगी नहीं चलती.

किरण और अक्षय दोनों ही शातिरदिमाग थे, एक रोज उन्होंने बातोंबातों में पैसा कमाने का उपाय ढूंढना शुरू कर दिया. अंत में दोनों ने पैसा कमाने की अलग राह चुन ली. वह राह थी तन सौंप कर ब्लैकमेल करने यानी हनीट्रैप की.

अक्षय और किरण ने टीवी और अखबारों में हनीट्रैप के तमाम केस देखे और सुने थे. ऐसी घटनाओं से प्रेरित हो कर उन्होंने भी ऐसा ही कुछ कर के पैसा कमाने की योजना बना ली. तय हुआ कि मोटा पैसा कमाने के बाद शादी कर लेंगे.

योजना तैयार होने के बाद दोनों शिकार की तलाश में लग गए. उन की यह तलाश पूरी हुई दौसा शहर की रामनगर कालोनी निवासी विश्राम बैरवा पर. विश्राम बैरवा युवा प्रौपर्टी डीलर और ठेकेदार था. किरण ने कहीं से विश्राम बैरवा का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. यह सन 2016 की बात है.

फोन नंबर से उस ने विश्राम के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली. फिर एक दिन उस ने बैरवा को फोन किया. विश्राम ने काल रिसीव की तो किरण बोली, ‘‘मैं किरण बैरवा बोल रही हूं, आप विश्रामजी बोल रहे हैं न?’’

‘‘हां जी, मैं विश्राम बैरवा बोल रहा हूं. कहिए, कैसे फोन किया. मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’ विश्राम ने कहा.

‘‘विश्रामजी, आप अच्छे आदमी हैं इसलिए फोन किया था. मैं तलाकशुदा हूं और यहीं दौसा में अपने चाचा आशू के साथ रहती हूं. लोगों से आप की बहुत तारीफ सुनी थी, इसलिए आप से बात करने की इच्छा हो रही थी तो फोन कर लिया. ’’

‘‘कोई बात नहीं, वैसे कोई काम हो तो बोलिए.’’

‘‘नहीं सर, कोई काम नहीं था, ऐसे ही फोन कर लिया, अगर आप को बुरा न लगा हो तो आगे भी फोन कर के आप का समय खराब करती रहूं.’’

किरण ने कहा तो विश्राम बोला, ‘‘आप से बात कर के खुशी होगी. जरूर फोन कीजिएगा.’’

इस के बाद किरण अकसर फोन कर के विश्राम बैरवा से इधरउधर की गप्पें मारने लगी. विश्राम भी उस से खुल कर बतियाने लगा था. इस तरह एक साल गुजर गया. अपनी बातों से किरण ने विश्राम पर ऐसा जादू कर दिया था कि वह उस से मिलने को आतुर रहने लगा. अब तक किरण और विश्राम की मोबाइल पर ही बातें हुई थीं, दोनों मिले नहीं थे.

एक बरस बाद जब एक रोज किरण ने विश्राम को फोन किया तो रुआंसे स्वर में बोली, ‘‘नमस्ते सर, किरण बोल रही हूं.’’

‘‘हां किरणजी, बोलिए. आज आवाज में वह चहक नहीं है, जो हमेशा होती है. तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं, मगर मुझे कुछ रुपए चाहिए थे. पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है, इलाज कराना है. मुझे नौकरी के लिए भी भागदौड़ करनी पड़ रही है. पैसों की तंगी है. अगर आप हेल्प कर देंगे तो मैं आप का एकएक रुपया चुका दूंगी.’’

‘‘किरण, पैसों की चिंता मत करो. मैं हूं न, सब संभाल लूंगा. मैं तुम से मिलता हूं. हम शाम को बैठ कर इस बारे में बात करेंगे.’’

शाम को किरण और विश्राम मिले. विश्राम ने किरण को 2 लाख रुपए नकद दे दिए. किरण रुपए ले कर धन्यवाद देते हुए बोली, ‘‘सर, मैं आप का एकएक रुपया चुकाऊंगी. नौकरी लगने दीजिए.’’

किरण की सहायता कर के विश्राम को यह सोच कर आत्मिक खुशी हुई कि उस ने एक जरूरतमंद महिला की मदद की है.

कुछ दिनों बाद किरण फिर मां की बीमारी के बहाने विश्राम से 2 लाख रुपए ले आई.

कमरे पर पहुंचने के बाद उस ने अक्षय से कहा, ‘‘आशू, आज 2 लाख रुपए तो मां की बीमारी के बहाने से ले आई, मगर अब आगे बहाना नहीं चलने वाला. अब हमें विश्राम को फांसना पड़ेगा.’’

‘‘किरण, तुम सही कह रही हो. तुम्हें अब उसे अपने तन की चकाचौंध दिखानी पड़ेगी, तभी इस मुर्गे को हलाल किया जा सकेगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कल उसे कमरे पर बुला कर अपने जिस्म की गरमी देती हूं. फिर तुम देखना कि मैं उसे कैसे इशारों से नचाती हूं.’’ किरण हंस कर बोली.

अगले दिन किरण ने विश्राम बैरवा को किसी बहाने से सिंगवाड़ा रोड, दौसा स्थित अपने कमरे पर बुलाया. विश्राम जब कमरे पर पहुंचा तो किरण ने उस का स्वागत हंस कर किया. चायपानी के बाद दोनों पासपास बैठ कर बातें करने लगे.

बातचीत के दौरान किरण उस के शरीर से अपना जिस्म इस तरह टकरा देती थी, जैसे लापरवाही में ऐसा हो गया हो. इस से विश्राम के बदन में झुरझुरी दौड़ जाती थी. किरण यह सब इसलिए कर रही थी ताकि विश्राम उस के शरीर को भोगने के लिए मजबूर हो जाए. हुआ भी यही.

किरण ने उसे इस तरह उकसाया कि विश्राम खुद  पर नियंत्रण खो बैठा. विश्राम ने किरण से पूछा, ‘‘तुम्हारे आशू चाचा कहां हैं?’’

‘‘आशू चाचा कल तक आएंगे. आज बाहर गए हैं. यहां पर आज हम दोनों का राज है. हम जो चाहे, करेंगे.’’ किरण ने खुल कर कहा.

यह सुन कर विश्राम खुश हो गया. उस ने किरण को बांहों में भर कर किस करना शुरू कर दिया. किरण भी अपने हाथों का कमाल दिखाने लगी. कुछ ही देर में दोनों बेलिबास हो गए और एकदूसरे के तन से खेलने लगे. हसरतें पूरी करने के बाद विश्राम ने किरण को चूम कर विदा ली.

विश्राम के चले जाने के बाद किरण ने आशू को फोन कर कहा, ‘‘आ जाओ, मुर्गा फंस गया है.’’

आशू कमरे पर आ गया. किरण ने उसे सब कुछ विस्तार से बता दिया. इस के बाद वह बोली, ‘‘आशू, अब देखो मेरा खेल. कैसे विश्राम को नचाती हूं.’’

दोनों ने विश्राम को दुष्कर्म के मामले में फंसाने की धमकी दे कर रुपए ऐंठने की योजना बनाई. योजनानुसार अगले रोज किरण ने विश्राम को फोन कर 20 लाख रुपए मांगे. विश्राम ने कहा कि इतने रुपयों का क्या करोगी तो किरण बोली, ‘‘कुछ भी करूं, अगर पैसे नहीं दिए तो आप को बलात्कार के आरोप में अंदर करा दूंगी. इस के लिए मैं आप को शाम तक का समय देती हूं.’’

विश्राम कुछ कहता, उस से पहले ही किरण ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

विश्राम बैरवा इज्जतदार आदमी था. दौसा में उस का नाम था. अगर किरण उस के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देती तो उस की इज्जत मिट्टी में मिल जाती.

विश्राम समझ गया कि वह किरण को जैसा समझता था, वह वैसी नहीं है. मगर जो नहीं होना था, वह हो चुका था. अब पछताने से क्या होने वाला था. विश्राम बैरवा ने अपना मानसम्मान इज्जत बचाने के लिए किरण की 20 लाख रुपए की डिमांड पूरी कर दी.

किरण पैसे ले कर विश्राम से बोली, ‘‘मेरे दिल के दरवाजे हमेशा खुले हैं. कभी भी आ कर मेरे तन से रुपए की वसूली कर सकते हो.’’

विश्राम बैरवा क्या बोलता. वह 20 लाख दे कर समझ रहा था कि बला टली. मगर किरण उसे कहां छोड़ने वाली थी. वह अक्षय मीणा उर्फ आशू के साथ विश्राम के दिए रुपयों से ऐश की जिंदगी जीने लगी.

दोनों दिल्ली, अहमदाबाद, नागपुर, मुंबई, गोवा आदि शहरों में घूमने गए और खूब अय्याशी की. किरण ने विश्राम बैरवा को अपने हुस्न के प्रेमजाल में ऐसा फांसा कि वह चाह कर भी किरण से दूर नहीं रह सका. किरण ने बातोंबातों में विश्राम से पहले ही पता कर लिया था कि वह करोड़पति है और उस का प्रौपर्टी का व्यवसाय अच्छा चल रहा है.

एक बार शारीरिक संबंध बना कर विश्राम किरण के प्रेमजाल में ऐसा फंसा कि वह उस के हाथों की कठपुतली बन कर नाचने लगा. किरण उसे बलात्कार के केस में फंसाने की धमकी दे कर कभी कैश तो कभी मांबाप और खुद के खाते में रुपए डलवा लेती थी. कभी बीमारी का बहाना कर के तो कभी होटल खोलने के नाम पर किरण विश्राम से पैसे ऐंठऐंठ कर उसे करोड़पति से रोड पर ले आई.

विश्राम ने अपना घर, जमीन, गहने, फ्लैट सब कुछ बेच कर किरण की मांग पूरी की ताकि उस की इज्जत बची रहे. जबकि किरण ने रुपए ऐंठ कर आशू के साथ नागपुर और दिल्ली में होटल भी खोले, मगर होटल व्यवसाय का ज्ञान न होने के कारण उन का बिजनैस नहीं चल सका.

दोनों होटल बंद कर के दौसा चले आए. होटल व्यवसाय में किरण व आशू की दोस्ती दिल्ली के कई लोगों से हो गई थी. लोग किरण और आशू को अच्छा बिजनैसमैन समझते थे. उन्हें इन की करतूत का पता नहीं थी.

विश्राम बैरवा सन 2016 से जनवरी 2020 तक किरण को करीब डेढ़ करोड़ रुपए दे चुका था. विश्राम की सारी जमीनजायदाद बिक गई थी. वह रोटीरोटी को मोहताज हो गया था. यह सब उस की एक गलती से हुआ था. विश्राम को बरबाद करने के बाद भी किरण उसे धमकी दे कर रुपए मांगती थी. वह कहती कि पैसे नहीं दिए तो बलात्कार के आरोप में जेल में सड़ा दूंगी.

विश्राम ने किरण से कहा कि अब उस के पास फूटी कौड़ी तक नहीं है तो उसे रकम कहां से दे. मगर किरण अपना ही राग अलापती रहती कि कुछ भी करो, उसे पैसे चाहिए. अगर पैसे नहीं दिए तो…

विश्राम बैरवा के पास अब कुछ नहीं बचा था. किरण भी उसे हड़का रही थी. ऐसे में विश्राम ने निर्णय कर लिया कि अब इज्जत जाए तो जाए, उसे पुलिस की मदद लेनी ही पड़ेगी. अगर इस से पहले किरण ने उस के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी तो वह अपनी सफाई भी नहीं दे सकेगा और उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी.

इसलिए वह एसपी प्रह्लाद कृष्णैया से मिला और उन्हें सारी बात विस्तार से बताई. एसपी साहब ने विश्राम की शिकायत को गंभीरता से लिया और कोतवाली दौसा के इंसपेक्टर श्रीराम मीणा को फोन पर निर्देश दिए कि विश्राम की रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ सख्त काररवाई करें.

कप्तान साहब के आदेश पर इंसपेक्टर श्रीराम मीणा ने 28 जनवरी, 2020 को विश्राम बैरवा की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस के बाद एसपी प्रह्लाद कृष्णैया ने एएसपी अनिल सिंह चौहान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में डीएसपी नरेंद्र कुमार, शहर कोतवाल श्रीराम मीणा, एसआई राजेश कुमार, कांस्टेबल बसंताराम, नवीन कुमार, गोपीराम, महिला कांस्टेबल रेखा, मंजू देवी आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने किरण बैरवा के मोबाइल की लोकेशन खंगाली तो उस की लोकेशन पुष्कर, जिला अजमेर, राजस्थान की मिली. पुलिस टीम दौसा से पुष्कर आई और किरण बैरवा व उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू, निवासी सैंथल मोड़, दौसा को धर दबोचा.

पुष्कर के होटल में किरण व आशू शादी रचाना चाहते थे. दोनों के दोस्त शादी में शरीक होने दिल्ली से पुष्कर आए हुए थे.

यहां यह भी बता दें कि शादी के खर्च के लिए भी किरण बैरवा ने विश्राम बैरवा को फोन कर पैसे मांगे, लेकिन किरण ने यह नहीं बताया कि वह शादी कर रही है. किरण ने विश्राम से पहले तो डेढ़ लाख रुपए मांगे, फिर वह 55 हजार रुपए तक आ गई.

साइबर सैल की मदद से दौसा कोतवाली थाना पुलिस ने इस अनोखे जोड़े को 2 फरवरी, 2020 को पुष्कर के एक होटल से दबोच लिया. दिल्ली से जो बाराती आए थे, उन को भी प्रेमी जोड़े की असलियत पता नहीं थी. दिल्ली से आए इन के मित्रों को होटल का 67 हजार रुपए का बिल भी भरना पड़ा. क्योंकि उन्हें शादी में बुलाने वालों को तो पुलिस शादी से पहले ही पकड़ कर दौसा ले गई थी.

पुलिस पूछताछ में किरण और आशू मीणा ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अगले दिन 3 फरवरी को दोनों को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया और विस्तृत पूछताछ की.

पूछताछ में ब्लैकमेलर प्रेमी जोड़े ने सारी कहानी बयान कर दी. किरण और आशू ने स्वीकार किया कि उन्होंने विश्राम बैरवा को हनीट्रैप में फांस कर उस से लाखों रुपए ऐंठे थे.

पुलिस ने इस मामले की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए पीडि़त व आरोपियों की मोबाइल काल डिटेल्स तथा बैंक खातों की जानकारी जुटाई. बैंक खातों में विश्राम बैरवा के बैंक खाते से रुपए लेनदेन की बात सामने आई. पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर किरण बैरवा और उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

विश्राम बैरवा सब कुछ गंवा कर पुलिस के पास गया. अगर वह तभी पुलिस के पास चला जाता जब किरण ने ब्लैकमेलिंग की पहली किस्त

20 लाख मांगी थी तो आज सड़क पर नहीं आता.

एक मजनूं की प्रेम गली: सिरफिरे आशिक की करतूत

25 वर्षीय अंकिता पिसुदे महाराष्ट्र के वर्धा जिले के गांव दरोदा की रहने वाली थी. वह हिंगनघाट तालुका नांदोरी चौक स्थित मातोश्री आशाताई कुमारन डिग्री कालेज में बतौर प्रोफेसर कार्यरत थी. यह कालेज उस के गांव से लगभग 75 किलोमीटर दूर था, इसलिए वह रोजाना कालेज बस से आतीजाती थी. उस के पढ़ाने का तरीका इतना सरल था कि सभी छात्रछात्राएं उस से खुश रहते थे.

3 फरवरी, 2020 सोमवार का दिन था. उस दिन अंकिता हिंगनघाट के बस स्टाप पर उतर कर नांदोरी चौक स्थित अपने कालेज जा रही थी. अभी वह कालेज से 100 कदम की दूरी पर ही थी कि तभी अचानक विकेश नागराले ने मोटरसाइकिल से उस का रास्ता रोक लिया.

विकेश अंकिता के मोहल्ले में ही रहता था. अचानक उसे सामने देख अंकिता बुरी तरह डर गई. जिस तरह से उस ने रास्ता रोका था, वह शुभ संकेत नहीं था.

‘‘यह क्या बदतमीजी है विकेश?’’ अंकिता उस पर भड़कते हुए बोली, ‘‘तुम ने मेरा रास्ता क्यों रोका और तुम यहां क्या कर रहे हो?’’

‘‘मैं यहां क्या कर रहा हूं, तुम जान जाओगी और रास्ता क्यों रोका, यह तुम से अच्छा और कौन जान सकता है.’’ विकेश ने सख्त शब्दों में कहा.

‘‘देखो विकेश, बहुत तमाशा हो चुका है. मेरा पीछा बंद करो और मेरा रास्ता छोड़ दो.’’ अंकिता ने गुस्से में कहा.

‘‘तमाशा मैं नहीं, तुम कर रही हो अंकिता. आखिर तुम मेरे प्यार को मान क्यों नहीं लेतीं. देखो, हम दोनों एकदूसरे के लिए बने हैं. दोनों मिल कर एक ऐसी दुनिया बसाएंगे, जहां हम दोनों के सिवा और कोई नहीं होगा.’’ विकेश बोला.

‘‘विकेश, यह तुम्हारी गलतफहमी है. मुझे न तुम से पहले प्यार था और न आज है. यह बात मैं तुम से न जाने कितनी बार कह चुकी हूं, लेकिन तुम्हारी समझ में बात आती ही नहीं. हम सिर्फ एक दोस्त थे, लेकिन तुम्हारी हरकतों ने दोस्ती को भी इस लायक नहीं छोड़ा कि मैं तुम्हें दोस्त मान सकूं.’’ अंकिता ने कहा.

‘‘मुझ से भूल हुई थी अंकिता, मुझे माफ कर दो.’’ विकेश ने अंकिता के सामने हाथ जोड़े फिर कान पकड़ते हुए माफी मांगी.

‘‘देखो विकेश, तुम अच्छे और समझदार युवक हो, जो तुम चाहते हो वह कभी नहीं होगा. तुम्हारी शादी हो गई है. घर में सुंदर पत्नी और बच्ची है. मेरे पीछे अपना समय खराब मत करो. अपने परिवार पर ध्यान दो और मुझे भूल जाओ.’’ अंकिता ने समझाते हुए कहा.

‘‘तो क्या यह तुम्हारा आखिरी फैसला है?’’ विकेश ने निराशाभरे शब्दों में पूछा.

‘‘हां,’’ अंकिता ने सख्त शब्दों में जवाब दिया.

‘‘अंकिता यही तो मुश्किल है, न तो मैं तुम्हें भूल सकता हूं और न तुम्हारे बिना रह सकता हूं. इस के लिए तो सिर्फ अब एक ही रास्ता बचा है,’’ कहते हुए विकेश नागराले का चेहरा लाल हो गया.

‘‘एक ही रास्ता…क्या मतलब है तुम्हारा, क्या कहना चाहते हो तुम?’’ अंकिता ने प्रश्न किया, ‘‘देखो विकेश, तुम ऐसा कुछ नहीं करोगे कि बाद में पछताना पड़े. अब मेरा रास्ता छोड़ो. मुझे कालेज के लिए देर हो रही है.’’

जब विकेश को लगा कि अंकिता मानने वाली नहीं है और न ही वह उस की बातों को तवज्जो दे रही है तो वह गुस्से से भर उठा. उस ने अपनी मोटरसाइकिल की डिक्की से पैट्रोल भरी बोतल निकाली और अंकिता के ऊपर उड़ेल कर आग लगाते हुए बोला, ‘‘तुम अगर मेरी नहीं हो सकी तो मैं तुम्हें किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’

इस के बाद वह फरार हो गया.

आग के गोले में लिपटी अंकिता को जब उधर से गुजर रही कुछ छात्राओं ने देखा तो वे अंकिता की मदद के लिए चीखनेचिल्लाने लगीं. छात्राओं की चीखपुकार सुन कर कई लोग दौड़े आए. उन के हाथों में जो कुछ था, उसे ले कर उन्होंने अंकिता की मदद करने की कोशिश की.

जलती अंकिता पर पानी डाल कर आग बुझाई गई. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. उस का सिर, चेहरा, हाथ, पीठ, गरदन झुलस गई थी, उस की दोनों आंखें भी चली गई थीं. उसे इलाज के लिए तुरंत हिंगनघाट के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचाया गया. इस मामले की जानकारी पुलिस कंट्रोल रूम के साथसाथ हिंगनघाट पुलिस थाने को भी दे दी गई थी.

थाना हिंगनघाट के थानाप्रभारी सत्यवीर बांदीवार ने यह खबर सुनी तो बिना देर किए उन्होंने इस बारे में वरिष्ठ अधिकारियों को बताया और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर निकल गए. कुछ पुलिसकर्मियों को घटनास्थल पर छोड़ कर थानाप्रभारी हिंगनघाट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंचे.

फिल्मी अंदाज में घटी इस इस मार्मिक घटना को पूरे जिले में फैलते देर नहीं लगी. जिस ने भी सुना और देखा, उस का कलेजा मुंह तक आ गया. घटना की जानकारी मिलते ही अंकिता के कालेज प्रशासन ने छुट्टी घोषित कर दी.

कालेज का सारा स्टाफ और छात्रछात्राएं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में एकत्र हो कर अंकिता के स्वस्थ होने की दुआ मांग रहे थे. इस के बाद उन्होंने थानाप्रभारी से मांग की कि वह हमलावर को शीघ्र गिरफ्तार कर उस के खिलाफ सख्त काररवाई करें.

थानाप्रभारी ने आश्वासन दिया कि वह जल्दी ही हमलावर को गिरफ्तार कर सींखचों के पीछे भेज देंगे. घटना की खबर पाते ही नागपुर के पुलिस कमिश्नर डा. भूषण कुमार उपाध्याय, डीएसपी तृप्ति जाधव तत्काल हिंगनघाट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पहुंच गए. डाक्टरों से बातचीत के बाद उन्होंने बुरी तरह जली अंकिता का निरीक्षण किया और थानाप्रभारी सत्यवीर बांदीवार को आवश्यक दिशानिर्देश दिए.

अंकिता 50 प्रतिशत जल चुकी थी. उस की स्थिति काफी नाजुक थी. डाक्टरों ने उस की गंभीरता को देखते हुए उसे औरेंज सिटी हौस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर भेजने की सलाह दी.

थानाप्रभारी इस घटना की खबर अंकिता के परिवार वालों को दे चुके थे. बेटी के साथ घटी घटना की खबर पाते ही अंकिता के परिवार वाले सन्न रह गए. घर में रोनापीटना मच गया. उन्हें जिस बात का डर था, वही हुआ. वे जिस हालत में थे, वैसे ही हिंगनघाट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की ओर दौड़ पड़े. करीब डेढ़ घंटे में वे स्वास्थ्य केंद्र पहुंच गए.

स्वास्थ्य केंद्र पहुंचने पर थानाप्रभारी सत्यवीर बांदीवार ने उन्हें सांत्वना दे कर फौरी तौर पर पूछताछ की. अंकिता के परिवार वालों ने इस मामले में सीधेसीधे विकेश नागराले का हाथ बताया और कहा कि विकेश नागराले ही वह युवक है जो उन की बेटी अंकिता से एकतरफा प्यार करता था.

वह आए दिन उसे परेशान किया करता था. अंकिता के परिवार वालों के बयान के बाद अंकिता को नागपुर औरेंज सिटी हौस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर भेज दिया गया.

अंकिता के परिवार वालों के बयान पर थानाप्रभारी सत्यवीर बांदीवार ने अपनी एक विशेष टीम के साथ विकेश नागराले की तलाश शुरू कर दी. फिर 4 फरवरी यानी घटना के दूसरे दिन ही उसे गिरफ्तार कर लिया. मगर इस के बाद भी मामला शांत नहीं हुआ.

चूंकि मामला एक प्रतिष्ठित परिवार की प्रोफेसर से जुड़ा था, इसलिए महाराष्ट्र के दैनिक समाचारपत्रों ने खबरों को हवा दे दी, जिस की आंच से महाराष्ट्र शासन भी नहीं बचा. भारी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए. प्रदेश में अशांति पैदा न हो, इसलिए महाराष्ट्र सरकार ने भी इसे गंभीरता से लिया. मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अंकिता के इलाज के लिए अपने मुख्यमंत्री राहत कोष का मुंह खोल दिया.

महाराष्ट्र महिला विकास और स्वास्थ्य मंत्री यशोमती ठाकुर ने अंकिता के इलाज के लिए मुंबई के डाक्टरों का एक दल तुरंत नागपुर के औरेंज सिटी अस्पताल के लिए रवाना कर दिया. डाक्टरों की टीम अंकिता के इलाज में जुट गई लेकिन अथक प्रयासों के बावजूद अंकिता जिंदगी की लड़ाई हार गई.

घटना के 8 दिन बाद 10 फरवरी को सुबह लगभग 7 बजे अंकिता ने दुनिया को अलविदा कह दिया.

अंकिता की मौत की खबर वर्धा जिले के अलावा नागपुर में भी फैल गई. इस के बाद तो मानो भूचाल सा आ गया था. नाराज लोग एक बार फिर सड़कों पर उतर आए और उन्होंने जगहजगह प्रदर्शन करने शुरू कर दिए. आक्रोशित भीड़ ने कलेक्टर हाउस और पुलिस मुख्यालय को घेर लिया. प्रदर्शनकारी अभियुक्त को फांसी के साथसाथ अंकिता के परिवार वालों को सरकारी नौकरी देने की मांग करने लगे. गुस्साई भीड़ ने नागपुर-हैदराबाद हाइवे को जाम कर दिया.

आखिर नागपुर वर्धा डीएम के लिखित आदेश पर आंदोलन शांत हुआ. महाराष्ट्र शासन ने मामले को फास्टट्रैक कोर्ट में चलाने का आदेश दिया. साथ ही इस क्रिमिनल केस को लड़ने के लिए मुंबई के जानेमाने सरकारी वकील उज्ज्वल निकम को नियुक्त किया.

27 वर्षीय विकेश नागराले उसी गांव दरोदा का रहने वाला था, जिस गांव में अंकिता पिसुदे रहती थी. अंकिता पिसुदे की पारिवारिक आर्थिक स्थिति काफी मजबूत थी. उस के पिता गांव के जानेमाने काश्तकार थे.

अंकिता और विकेश नागराले के स्तर का कोई मेल नहीं था. विकेश के पिता मध्यम श्रेणी के किसान थे. उनके पास नाममात्र की खेती थी. विकेश पढ़ाईलिखाई में तेज और महत्त्वाकांक्षी युवक था.

स्कूल एक ऐसी पाठशाला है, जहां अमीरगरीब का कोई भेदभाव नहीं होता. साथ ही दोस्ती और प्यार के बीच कोई दीवार भी नहीं होती. यही विकेश नागराले और अंकिता के साथ हुआ. एक ही गांव और एक स्कूल में होने के नाते दोनों के बीच दोस्ती हो गई थी.

दोनों एक साथ स्कूल आतेजाते थे. एक ही कक्षा में पढ़ते थे. पढ़ाई में दोनों एकदूसरे की मदद करते थे. दोनों साथ मिल कर स्कूल का होमवर्क करते थे. कभी अंकिता विकेश के घर तो कभी विकेश अंकिता के घर पर आ जाता था.

इंटरमीडिएट तक की शिक्षा दोनों ने साथसाथ ली थी. इंटरमीडिएट पास करने के बाद अंकिता के परिवार ने उस के अच्छे भविष्य के लिए आगे की पढ़ाई का बंदोबस्त नागपुर शहर में कर दिया.

नागपुर कालेज से पढ़ाई करने के बाद अंकिता प्रोफेसर बन गई थी, जबकि विकेश नागराले ने आर्थिक स्थिति के कारण आगे की पढ़ाई छोड़ रेलवे में कैटरिंग का काम शुरू कर दिया था.

रास्ते अलगअलग थे. लेकिन उन की दोस्ती में कोई फर्क नहीं आया था. अंकिता जब भी कालेज से छुट्टी पाती, विकेश के साथ घूमतीफिरती, जिस का विकेश ने अलग मतलब निकाल लिया था. वह अंकिता की दोस्ती को उस का प्यार समझ बैठा था. जबकि वह दोस्ती सिर्फ औपचारिकता भर थी.

अंकिता जब भी सामने आती थी, विकेश के दिल की धड़कनें बढ़ जाती थीं. अंकिता का रंगरूप उस की आंखों में समा जाता था. उसे ले कर वह रंगीन सपनों में खो जाता था. इसी गलतफहमी में विकेश ने जब अपनी सीमाओं को लांघना चाहा तो उन की दोस्ती में दरार आ गई. विकेश के इस अनुचित व्यवहार से अंकिता के मन को गहरी ठेस लगी और उस ने उस से दूरी बना ली. जब विकेश को महसूस हुआ कि उस से गलती हो गई है तो गलती का अहसास होने के बाद वह माफी के लिए कई बार अंकिता के सामने आया.

एक दिन उस ने अंकिता का रास्ता रोका तो अंकिता ने उसे भाव नहीं दिया. उलटे उस ने विकेश की शिकायत अपने परिवार वालों से कर दी. अंकिता के परिवार वालों ने विकेश नागराले के परिवार वालों को आड़े हाथ लिया और उन्हें चेतावनी दे कर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने की धमकी दी.

विकेश की हरकतों से दुखी उस के घर वालों ने उस की शादी कर देने में भलाई समझी. आखिर 2018 के जनवरी महीने में उस की शादी कर दी गई. शादी के डेढ़ साल बाद वह एक बच्ची का पिता भी बन गया था. फिर भी वह अंकिता को भूल नहीं पाया.

जब भी वह अंकिता को सामने पाता तो उस से बात करने की कोशिश करता, तब अंकिता उसे दुत्कार देती थी. अंकिता की इस बेरुखी से उस के दिल को आघात पहुंचता.

घटना से करीब 4 महीने पहले उस ने अंकिता की बेरुखी के चलते फिनायल पी कर आत्महत्या करने की कोशिश की थी, लेकिन डाक्टरों ने किसी तरह उसे बचा लिया था.

मामला दोनों परिवारों की प्रतिष्ठा का था, इसलिए बात पुलिस तक नहीं पहुंची थी. इस हादसे से निकलने के बाद भी जब अंकिता को उस के प्रति कोई हमदर्दी नहीं हुई तो उस के मन में भी अंकिता के लिए नफरत जाग उठी, जो एक क्रूर भावना में बदल गई. उस की इस भावना की आग तब और भड़क गई, जब उसे यह बात मालूम पड़ी कि अंकिता की शादी तय हो गई है. तभी उस ने फैसला लिया कि अंकिता अगर उस की नहीं हुई तो वह अंकिता को किसी और की भी नहीं होने देगा.

घटना के दिन विकेश नागराले ने अपनी मोटरसाइकिल से एक बोतल पैट्रोल निकाल कर डिक्की में रख लिया और घटनास्थल पर अंकिता से पहले पहुंच कर उस का इंतजार करने लगा. अपने तय समय पर जब अंकिता बस स्टाप पर उतर कर कालेज की तरफ बढ़ी, तभी विकेश नागराले उस के सामने आ कर खड़ा हो गया. फिर उस ने वारदात को अंजाम दे दिया.

घटना के बाद वह भाग कर अपनी ससुराल में जा कर छिप गया था, जहां से पुलिस टीम ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया.

विकेश नागराले से विस्तृत पूछताछ के बाद पुलिस ने उसे भादंवि की धारा 307, 326, 302 के तहत गिरफ्तार कर कड़ी सुरक्षा में महानगर मजिस्ट्रैट के सामने पेश, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

सौजन्य: सत्यकथा, अप्रैल 2020

ब्लैकमेलर हसीना किरण : प्रेमी हुए जेल में कैद

राजस्थान के जिला दौसा के गांव बीनावाला की रहने वाली किरण बैरवा गोरे रंग की खूबसूरत युवती थी. जब वह टाइट जींस टीशर्ट पहन कर निकलती थी तो देखने वाले ताकते रह जाते थे. किरण को अपने रूपसौंदर्य पर बहुत नाज था. वह जानती थी कि उस से कोई भी व्यक्ति दोस्ती करने को तैयार हो जाएगा, क्योंकि वह बला की खूबसूरत है.

किरन को पाने के लिए पुरुषरूपी भंवरेउस के आसपास मंडराते रहते थे, मगर उस ने किसी को लिफ्ट नहीं दी. किरण के ख्वाब ऊंचे थे. खूबसूरत होने के साथ वह शातिरदिमाग भी थी. शादी योग्य होने पर घर वालों ने उस की शादी कर दी थी.

किरण को जैसा जीवनसाथी चाहिए था, उस का पति वैसा नहीं था. किरण ने उस के साथ सात फेरे जरूर लिए थे, मगर पति को मन से कभी नहीं स्वीकारा. ऐसे में मतभेद स्वभाविक बात थी. शादी के कुछ समय बाद ही किरण का पति से तलाक हो गया. तलाक के बाद वह मायके में आ कर रहने लगी.

किरण ने अपने मांबाप को कह दिया कि वह पढ़ीलिखी है और कहीं नौकरी या कामधंधा कर के अपना गुजरबसर कर लेगी.

मायके आने के बाद किरण नौकरी की तलाश के लिए गांव से दौसा आनेजाने लगी. शहर में उसे नौकरी तो नहीं मिली, मगर जैसा जीवनसाथी उसे चाहिए था, वैसा दोस्त जरूर मिल गया. उस का नाम अक्षय उर्फ आशू था. अक्षण मीणा के पिता दौसा के पूर्व पार्षद हैं. पिता के पैसों पर ऐश करने वाला अक्षय मीणा भी शातिरदिमाग और तेजतर्रार युवक था.

उस की किरण से मुलाकात हुई तो पहली मुलाकात में ही दोनों एकदूसरे पर मर मिटे. दोनों ने एकदूसरे को मोबाइल नंबर दे दिए. इस के बाद उन की फोन पर बातें होने लगीं. किरण का जब मन करता, तब अक्षय मीणा से मिलने गांव से दौसा शहर आ जाती.

दो जवां दिल अगर एक दूसरे के लिए धड़कने लगें तो मिलन होने में देर नहीं लगती. ऐसा ही किरण और अक्षय के मामले में भी हुआ. 4-6 मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे के बारे में बहुत कुछ जान गए. अक्षय को जब पता चला कि किरण तलाकशुदा है तो वह बोला, ‘‘किरण, तुम मेरी हो. इसी कारण तुम्हारा अपने पति से तलाक हुआ है. हम दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं.’’

अक्षय के मुंह से यह सुन कर किरण को उस पर विश्वास हो गया कि वह उस का बहुत खयाल रखेगा. फिर तो उस ने अक्षय को अपना तनमन सब कुछ न्यौछावर कर दिया. एक बार शारीरिक संबंध बने तो सारी लाजशरम जाती रही. जब मन चाहता, दोनों अपनी हसरतें पूरी कर लेते.

अक्षय ने किरण से वादा किया था कि वह उस से शादी करेगा और जीवन भर साथ निभाएगा. किरण तो अक्षय की दीवानी थी ही. मगर बगैर कामधाम किए मौजमस्ती से तो जिंदगी नहीं चलती.

किरण और अक्षय दोनों ही शातिरदिमाग थे, एक रोज उन्होंने बातोंबातों में पैसा कमाने का उपाय ढूंढना शुरू कर दिया. अंत में दोनों ने पैसा कमाने की अलग राह चुन ली. वह राह थी तन सौंप कर ब्लैकमेल करने यानी हनीट्रैप की.

अक्षय और किरण ने टीवी और अखबारों में हनीट्रैप के तमाम केस देखे और सुने थे. ऐसी घटनाओं से प्रेरित हो कर उन्होंने भी ऐसा ही कुछ कर के पैसा कमाने की योजना बना ली. तय हुआ कि मोटा पैसा कमाने के बाद शादी कर लेंगे.

योजना तैयार होने के बाद दोनों शिकार की तलाश में लग गए. उन की यह तलाश पूरी हुई दौसा शहर की रामनगर कालोनी निवासी विश्राम बैरवा पर. विश्राम बैरवा युवा प्रौपर्टी डीलर और ठेकेदार था. किरण ने कहीं से विश्राम बैरवा का मोबाइल नंबर हासिल कर लिया. यह सन 2016 की बात है.

फोन नंबर से उस ने विश्राम के बारे में काफी जानकारी हासिल कर ली. फिर एक दिन उस ने बैरवा को फोन किया. विश्राम ने काल रिसीव की तो किरण बोली, ‘‘मैं किरण बैरवा बोल रही हूं, आप विश्रामजी बोल रहे हैं न?’’

‘‘हां जी, मैं विश्राम बैरवा बोल रहा हूं. कहिए, कैसे फोन किया. मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूं?’’ विश्राम ने कहा.

‘‘विश्रामजी, आप अच्छे आदमी हैं इसलिए फोन किया था. मैं तलाकशुदा हूं और यहीं दौसा में अपने चाचा आशू के साथ रहती हूं. लोगों से आप की बहुत तारीफ सुनी थी, इसलिए आप से बात करने की इच्छा हो रही थी तो फोन कर लिया. ’’

‘‘कोई बात नहीं, वैसे कोई काम हो तो बोलिए.’’

‘‘नहीं सर, कोई काम नहीं था, ऐसे ही फोन कर लिया, अगर आप को बुरा न लगा हो तो आगे भी फोन कर के आप का समय खराब करती रहूं.’’

किरण ने कहा तो विश्राम बोला, ‘‘आप से बात कर के खुशी होगी. जरूर फोन कीजिएगा.’’

इस के बाद किरण अकसर फोन कर के विश्राम बैरवा से इधरउधर की गप्पें मारने लगी. विश्राम भी उस से खुल कर बतियाने लगा था. इस तरह एक साल गुजर गया. अपनी बातों से किरण ने विश्राम पर ऐसा जादू कर दिया था कि वह उस से मिलने को आतुर रहने लगा. अब तक किरण और विश्राम की मोबाइल पर ही बातें हुई थीं, दोनों मिले नहीं थे.

एक बरस बाद जब एक रोज किरण ने विश्राम को फोन किया तो रुआंसे स्वर में बोली, ‘‘नमस्ते सर, किरण बोल रही हूं.’’

‘‘हां किरणजी, बोलिए. आज आवाज में वह चहक नहीं है, जो हमेशा होती है. तबीयत तो ठीक है न?’’

‘‘मैं तो ठीक हूं, मगर मुझे कुछ रुपए चाहिए थे. पिताजी की तबीयत ठीक नहीं है, इलाज कराना है. मुझे नौकरी के लिए भी भागदौड़ करनी पड़ रही है. पैसों की तंगी है. अगर आप हेल्प कर देंगे तो मैं आप का एकएक रुपया चुका दूंगी.’’

‘‘किरण, पैसों की चिंता मत करो. मैं हूं न, सब संभाल लूंगा. मैं तुम से मिलता हूं. हम शाम को बैठ कर इस बारे में बात करेंगे.’’

शाम को किरण और विश्राम मिले. विश्राम ने किरण को 2 लाख रुपए नकद दे दिए. किरण रुपए ले कर धन्यवाद देते हुए बोली, ‘‘सर, मैं आप का एकएक रुपया चुकाऊंगी. नौकरी लगने दीजिए.’’

किरण की सहायता कर के विश्राम को यह सोच कर आत्मिक खुशी हुई कि उस ने एक जरूरतमंद महिला की मदद की है.

कुछ दिनों बाद किरण फिर मां की बीमारी के बहाने विश्राम से 2 लाख रुपए ले आई.

कमरे पर पहुंचने के बाद उस ने अक्षय से कहा, ‘‘आशू, आज 2 लाख रुपए तो मां की बीमारी के बहाने से ले आई, मगर अब आगे बहाना नहीं चलने वाला. अब हमें विश्राम को फांसना पड़ेगा.’’

‘‘किरण, तुम सही कह रही हो. तुम्हें अब उसे अपने तन की चकाचौंध दिखानी पड़ेगी, तभी इस मुर्गे को हलाल किया जा सकेगा.’’

‘‘ठीक है, मैं कल उसे कमरे पर बुला कर अपने जिस्म की गरमी देती हूं. फिर तुम देखना कि मैं उसे कैसे इशारों से नचाती हूं.’’ किरण हंस कर बोली.

अगले दिन किरण ने विश्राम बैरवा को किसी बहाने से सिंगवाड़ा रोड, दौसा स्थित अपने कमरे पर बुलाया. विश्राम जब कमरे पर पहुंचा तो किरण ने उस का स्वागत हंस कर किया. चायपानी के बाद दोनों पासपास बैठ कर बातें करने लगे.

बातचीत के दौरान किरण उस के शरीर से अपना जिस्म इस तरह टकरा देती थी, जैसे लापरवाही में ऐसा हो गया हो. इस से विश्राम के बदन में झुरझुरी दौड़ जाती थी. किरण यह सब इसलिए कर रही थी ताकि विश्राम उस के शरीर को भोगने के लिए मजबूर हो जाए. हुआ भी यही.

किरण ने उसे इस तरह उकसाया कि विश्राम खुद  पर नियंत्रण खो बैठा. विश्राम ने किरण से पूछा, ‘‘तुम्हारे आशू चाचा कहां हैं?’’

‘‘आशू चाचा कल तक आएंगे. आज बाहर गए हैं. यहां पर आज हम दोनों का राज है. हम जो चाहे, करेंगे.’’ किरण ने खुल कर कहा.

यह सुन कर विश्राम खुश हो गया. उस ने किरण को बांहों में भर कर किस करना शुरू कर दिया. किरण भी अपने हाथों का कमाल दिखाने लगी. कुछ ही देर में दोनों बेलिबास हो गए और एकदूसरे के तन से खेलने लगे. हसरतें पूरी करने के बाद विश्राम ने किरण को चूम कर विदा ली.

विश्राम के चले जाने के बाद किरण ने आशू को फोन कर कहा, ‘‘आ जाओ, मुर्गा फंस गया है.’’

आशू कमरे पर आ गया. किरण ने उसे सब कुछ विस्तार से बता दिया. इस के बाद वह बोली, ‘‘आशू, अब देखो मेरा खेल. कैसे विश्राम को नचाती हूं.’’

दोनों ने विश्राम को दुष्कर्म के मामले में फंसाने की धमकी दे कर रुपए ऐंठने की योजना बनाई. योजनानुसार अगले रोज किरण ने विश्राम को फोन कर 20 लाख रुपए मांगे. विश्राम ने कहा कि इतने रुपयों का क्या करोगी तो किरण बोली, ‘‘कुछ भी करूं, अगर पैसे नहीं दिए तो आप को बलात्कार के आरोप में अंदर करा दूंगी. इस के लिए मैं आप को शाम तक का समय देती हूं.’’

विश्राम कुछ कहता, उस से पहले ही किरण ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया.

विश्राम बैरवा इज्जतदार आदमी था. दौसा में उस का नाम था. अगर किरण उस के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा देती तो उस की इज्जत मिट्टी में मिल जाती.

विश्राम समझ गया कि वह किरण को जैसा समझता था, वह वैसी नहीं है. मगर जो नहीं होना था, वह हो चुका था. अब पछताने से क्या होने वाला था. विश्राम बैरवा ने अपना मानसम्मान इज्जत बचाने के लिए किरण की 20 लाख रुपए की डिमांड पूरी कर दी.

किरण पैसे ले कर विश्राम से बोली, ‘‘मेरे दिल के दरवाजे हमेशा खुले हैं. कभी भी आ कर मेरे तन से रुपए की वसूली कर सकते हो.’’

विश्राम बैरवा क्या बोलता. वह 20 लाख दे कर समझ रहा था कि बला टली. मगर किरण उसे कहां छोड़ने वाली थी. वह अक्षय मीणा उर्फ आशू के साथ विश्राम के दिए रुपयों से ऐश की जिंदगी जीने लगी.

दोनों दिल्ली, अहमदाबाद, नागपुर, मुंबई, गोवा आदि शहरों में घूमने गए और खूब अय्याशी की. किरण ने विश्राम बैरवा को अपने हुस्न के प्रेमजाल में ऐसा फांसा कि वह चाह कर भी किरण से दूर नहीं रह सका. किरण ने बातोंबातों में विश्राम से पहले ही पता कर लिया था कि वह करोड़पति है और उस का प्रौपर्टी का व्यवसाय अच्छा चल रहा है.

एक बार शारीरिक संबंध बना कर विश्राम किरण के प्रेमजाल में ऐसा फंसा कि वह उस के हाथों की कठपुतली बन कर नाचने लगा. किरण उसे बलात्कार के केस में फंसाने की धमकी दे कर कभी कैश तो कभी मांबाप और खुद के खाते में रुपए डलवा लेती थी. कभी बीमारी का बहाना कर के तो कभी होटल खोलने के नाम पर किरण विश्राम से पैसे ऐंठऐंठ कर उसे करोड़पति से रोड पर ले आई.

विश्राम ने अपना घर, जमीन, गहने, फ्लैट सब कुछ बेच कर किरण की मांग पूरी की ताकि उस की इज्जत बची रहे. जबकि किरण ने रुपए ऐंठ कर आशू के साथ नागपुर और दिल्ली में होटल भी खोले, मगर होटल व्यवसाय का ज्ञान न होने के कारण उन का बिजनैस नहीं चल सका.

दोनों होटल बंद कर के दौसा चले आए. होटल व्यवसाय में किरण व आशू की दोस्ती दिल्ली के कई लोगों से हो गई थी. लोग किरण और आशू को अच्छा बिजनैसमैन समझते थे. उन्हें इन की करतूत का पता नहीं थी.

विश्राम बैरवा सन 2016 से जनवरी 2020 तक किरण को करीब डेढ़ करोड़ रुपए दे चुका था. विश्राम की सारी जमीनजायदाद बिक गई थी. वह रोटीरोटी को मोहताज हो गया था. यह सब उस की एक गलती से हुआ था. विश्राम को बरबाद करने के बाद भी किरण उसे धमकी दे कर रुपए मांगती थी. वह कहती कि पैसे नहीं दिए तो बलात्कार के आरोप में जेल में सड़ा दूंगी.

विश्राम ने किरण से कहा कि अब उस के पास फूटी कौड़ी तक नहीं है तो उसे रकम कहां से दे. मगर किरण अपना ही राग अलापती रहती कि कुछ भी करो, उसे पैसे चाहिए. अगर पैसे नहीं दिए तो…

विश्राम बैरवा के पास अब कुछ नहीं बचा था. किरण भी उसे हड़का रही थी. ऐसे में विश्राम ने निर्णय कर लिया कि अब इज्जत जाए तो जाए, उसे पुलिस की मदद लेनी ही पड़ेगी. अगर इस से पहले किरण ने उस के खिलाफ बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करा दी तो वह अपनी सफाई भी नहीं दे सकेगा और उसे जेल की हवा भी खानी पड़ेगी.

इसलिए वह एसपी प्रह्लाद कृष्णैया से मिला और उन्हें सारी बात विस्तार से बताई. एसपी साहब ने विश्राम की शिकायत को गंभीरता से लिया और कोतवाली दौसा के इंसपेक्टर श्रीराम मीणा को फोन पर निर्देश दिए कि विश्राम की रिपोर्ट दर्ज कर आरोपियों के खिलाफ सख्त काररवाई करें.

कप्तान साहब के आदेश पर इंसपेक्टर श्रीराम मीणा ने 28 जनवरी, 2020 को विश्राम बैरवा की तरफ से रिपोर्ट दर्ज कर ली.

इस के बाद एसपी प्रह्लाद कृष्णैया ने एएसपी अनिल सिंह चौहान के नेतृत्व में एक पुलिस टीम बनाई. टीम में डीएसपी नरेंद्र कुमार, शहर कोतवाल श्रीराम मीणा, एसआई राजेश कुमार, कांस्टेबल बसंताराम, नवीन कुमार, गोपीराम, महिला कांस्टेबल रेखा, मंजू देवी आदि को शामिल किया गया.

पुलिस टीम ने किरण बैरवा के मोबाइल की लोकेशन खंगाली तो उस की लोकेशन पुष्कर, जिला अजमेर, राजस्थान की मिली. पुलिस टीम दौसा से पुष्कर आई और किरण बैरवा व उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू, निवासी सैंथल मोड़, दौसा को धर दबोचा.

पुष्कर के होटल में किरण व आशू शादी रचाना चाहते थे. दोनों के दोस्त शादी में शरीक होने दिल्ली से पुष्कर आए हुए थे.

यहां यह भी बता दें कि शादी के खर्च के लिए भी किरण बैरवा ने विश्राम बैरवा को फोन कर पैसे मांगे, लेकिन किरण ने यह नहीं बताया कि वह शादी कर रही है. किरण ने विश्राम से पहले तो डेढ़ लाख रुपए मांगे, फिर वह 55 हजार रुपए तक आ गई.

साइबर सैल की मदद से दौसा कोतवाली थाना पुलिस ने इस अनोखे जोड़े को 2 फरवरी, 2020 को पुष्कर के एक होटल से दबोच लिया. दिल्ली से जो बाराती आए थे, उन को भी प्रेमी जोड़े की असलियत पता नहीं थी. दिल्ली से आए इन के मित्रों को होटल का 67 हजार रुपए का बिल भी भरना पड़ा. क्योंकि उन्हें शादी में बुलाने वालों को तो पुलिस शादी से पहले ही पकड़ कर दौसा ले गई थी.

पुलिस पूछताछ में किरण और आशू मीणा ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया. अगले दिन 3 फरवरी को दोनों को पुलिस ने कोर्ट में पेश कर रिमांड पर लिया और विस्तृत पूछताछ की.

पूछताछ में ब्लैकमेलर प्रेमी जोड़े ने सारी कहानी बयान कर दी. किरण और आशू ने स्वीकार किया कि उन्होंने विश्राम बैरवा को हनीट्रैप में फांस कर उस से लाखों रुपए ऐंठे थे.

पुलिस ने इस मामले की कड़ी से कड़ी जोड़ते हुए पीडि़त व आरोपियों की मोबाइल काल डिटेल्स तथा बैंक खातों की जानकारी जुटाई. बैंक खातों में विश्राम बैरवा के बैंक खाते से रुपए लेनदेन की बात सामने आई. पुलिस ने रिमांड अवधि पूरी होने पर किरण बैरवा और उस के प्रेमी अक्षय मीणा उर्फ आशू को कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

विश्राम बैरवा सब कुछ गंवा कर पुलिस के पास गया. अगर वह तभी पुलिस के पास चला जाता जब किरण ने ब्लैकमेलिंग की पहली किस्त 20 लाख मांगी थी तो आज सड़क पर नहीं आता.

सौजन्य: सत्यकथा, मई 2020

बेवफाई का लाल रंग

यह क्षण भर का सुख घर में ऐसा जलजला ले कर आया, जिस में लक्ष्मी और दीपक को तो जान से हाथ धोना ही पड़ा, साथ ही पति ऋषि तोमर भी पहुंच गया जेल…

5फरवरी, 2019 मंगलवार की शाम लगभग 4 बजे का समय था. उसी समय आगरा जिले के थाना मनसुखपुरा में खून से सने हाथ और कपड़ों में एक युवक पहुंचा. पहरे की ड्यूटी पर तैनात सिपाही के पास जा कर वह बोला, ‘‘स…स…साहब, बड़े साहब कहां हैं, मुझे उन से कुछ बात कहनी है.’’

थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस समय थाना प्रांगण में धूप में बैठे कामकाज निपटा रहे थे. उन्होंने उस युवक की बात सुन ली थी, नजरें उठा कर उन्होंने उस की ओर देखा और सिपाही से अपने पास लाने को कहा. सिपाही उस शख्स को थानाप्रभारी के पास ले गया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह उस से कुछ पूछते, इस से पहले ही वह शख्स बोला, ‘‘साहब, मेरा नाम ऋषि तोमर है. मैं गांव बड़ापुरा में रहता हूं. मैं अपनी पत्नी और उस के प्रेमी की हत्या कर के आया हूं. दोनों की लाशें मेरे घर में पड़ी हुई हैं.’’

ऋषि तोमर के मुंह से 2 हत्याओं की बात सुन कर ओमप्रकाश सिंह दंग रह गए. युवक की बात सुन कर थानाप्रभारी के पैरों के नीचे से जैसे जमीन ही खिसक गई. वहां मौजूद सभी पुलिसकर्मी ऋषि को हैरानी से देखने लगे.

थानाप्रभारी के इशारे पर एक सिपाही ने उसे हिरासत में ले लिया. ओमप्रकाश सिंह ने टेबल पर रखे कागजों व डायरी को समेटा और ऋषि को अपनी जीप में बैठा कर मौकाएवारदात पर निकल गए.

हत्यारोपी ऋषि तोमर के साथ पुलिस जब मौके पर पहुंची तो वहां का मंजर देख होश उड़ गए. कमरे में घुसते ही फर्श पर एक युवती व एक युवक के रक्तरंजित शव पड़े दिखाई दिए. कमरे के अंदर ही चारपाई के पास फावड़ा पड़ा था.

दोनों मृतकों के सिर व गले पर कई घाव थे. लग रहा था कि उन के ऊपर उसी फावडे़ से प्रहार कर उन की हत्या की गई थी. कमरे का फर्श खून से लाल था. थानाप्रभारी ने अपने उच्चाधिकारियों को घटना से अवगत कराया.

डबल मर्डर की जानकारी मिलते ही मौके पर एसपी (पश्चिमी) अखिलेश नारायण सिंह, सीओ (पिनाहट) सत्यम कुमार पहुंच गए. उन्होंने थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह से घटना की जानकारी ली. वहीं पुलिस द्वारा मृतक युवक दीपक के घर वालों को भी सूचना दी गई.

कुछ ही देर में दीपक के घर वाले रोतेबिलखते घटनास्थल पर आ गए थे. इस बीच मौके पर भीड़ एकत्र हो गई. ग्रामीणों को पुलिस के आने के बाद ही पता चला था कि घर में 2 मर्डर हो गए हैं. इस से गांव में सनसनी फैल गई. जिस ने भी घटना के बारे में सुना, दंग रह गया.

दोहरे हत्याकांड ने लोगों का दिल दहला दिया. पुलिस ने आला कत्ल फावड़ा और दोनों लाशों को कब्जे में लेने के बाद लाशें पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दीं. इस के बाद थानाप्रभारी ने हत्यारोपी ऋषि तोमर से पूछताछ की तो इस दोहरे हत्याकांड की जो कहानी सामने आई, इस प्रकार थी—

उत्तर प्रदेश के जिला आगरा के थाना मनसुखपुरा के गांव बड़ापुरा के रहने वाले ऋषि तोमर की शादी लक्ष्मी से हुई थी. लक्ष्मी से शादी कर के ऋषि तो खुश था, लेकिन लक्ष्मी उस से खुश नहीं थी. क्योंकि ऋषि उस की चाहत के अनुरूप नहीं था.

ऋषि मेहनती तो था, लेकिन उस में कमी यह थी कि वह सीधासादा युवक था. वह ज्यादा पढ़ालिखा भी नहीं था. बड़ापुरा में कोई अच्छा काम न मिलने पर वह दिल्ली जा कर नौकरी करने लगा.

करीब 2 साल पहले की बात है. ससुराल में ही लक्ष्मी की मुलाकात यहीं के रहने वाले दीपक से हो गई. दोनों की नजरें मिलीं तो उन्होंने एकदूसरे के दिलों में जगह बना ली.

पहली ही नजर में खूबसूरत लक्ष्मी पर दीपक मर मिटा था तो गबरू जवान दीपक को देख कर लक्ष्मी भी बेचैन हो उठी थी. एकदूसरे को पाने की चाहत में उन के मन में हिलोरें उठने लगीं. पर भीड़ के चलते वे आपस में कोई बात नहीं कर सके थे, लेकिन आंखों में झांक कर वे एकदूसरे के दिल की बातें जरूर जान गए थे.

बाजार में मुलाकातों का सिलसिला चलने लगा. मौका मिलने पर वे बात भी करने लगे. दीपक लक्ष्मी के पति ऋषि से स्मार्ट भी था और तेजतर्रार भी. बलिष्ठ शरीर का दीपक बातें भी मजेदार करता था. भले ही लक्ष्मी के 3 बच्चे हो गए थे, लेकिन शुरू से ही उस के मन में पति के प्रति कोई भावनात्मक लगाव पैदा नहीं हुआ था.

लक्ष्मी दीपक को चाहने लगी थी. दीपक हर हाल में उसे पाना चाहता था. लक्ष्मी ने दीपक को बता दिया था कि उस का पति दिल्ली में नौकरी करता है और वह बड़ापुरा में अपनी बेटी के साथ अकेली रहती है, जबकि उस के 2 बच्चे अपने दादादादी के पास रहते थे.

मौका मिलने पर लक्ष्मी ने एक दिन दीपक को फोन कर अपने गांव बुला लिया. वहां पहुंच कर इधरउधर की बातों और हंसीमजाक के बीच दीपक ने लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले लिया. लक्ष्मी ने इस का विरोध नहीं किया.

दीपक के हाथों का स्पर्श कुछ अलग था. लक्ष्मी का हाथ अपने हाथ में ले कर दीपक सुधबुध खो कर एकटक उस के चेहरे पर निगाहें टिकाए रहा. फिर लक्ष्मी भी सीमाएं लांघने लगी. इस के बाद दोनों ने मर्यादा की दीवार तोड़ डाली.

एक बार हसरतें पूरी होने के बाद उन की हिम्मत बढ़ गई. अब दीपक को जब भी मौका मिलता, उस के घर पहुंच जाता था. ऋषि के दिल्ली जाते ही लक्ष्मी उसे बुला लेती फिर दोनों ऐश करते. अवैध संबंधों का यह सिलसिला करीब 2 सालों तक ऐसे ही चलता रहा.

लेकिन उन का यह खेल ज्यादा दिनों तक लोगों की नजरों से छिप नहीं सका. किसी तरह पड़ोसियों को लक्ष्मी और दीपक के अवैध संबंधों की भनक लग गई. ऋषि के परिचितों ने कई बार उसे उस की पत्नी और दीपक के संबंधों की बात बताई.

लेकिन वह इतना सीधासादा था कि उस ने परिचितों की बातों पर ध्यान नहीं दिया. क्योंकि उसे अपनी पत्नी पर पूरा विश्वास था, जबकि सच्चाई यह थी कि लक्ष्मी पति की आंखों में धूल झोंक कर हसरतें पूरी कर रही थी.

4 फरवरी, 2019 को ऋषि जब दिल्ली से अपने गांव आया तो उस ने अपनी पत्नी और दीपक को ले कर लोगों से तरहतरह की बातें सुनीं. अब ऋषि का धैर्य जवाब देने लगा. अब उस से पत्नी की बेवफाई और बेहयाई बिलकुल बरदाश्त नहीं हो रही थी. उस ने तय कर लिया कि वह पत्नी की सच्चाई का पता लगा कर रहेगा.

ऋषि के दिल्ली जाने के बाद उस की बड़ी बेटी अपनी मां लक्ष्मी के साथ रहती थी और एक बेटा और एक बेटी दादादादी के पास गांव राजाखेड़ा, जिला धौलपुर, राजस्थान में रहते थे.

ऋषि के दिमाग में पत्नी के चरित्र को ले कर शक पूरी तरह बैठ गया था. वह इस बारे में लक्ष्मी से पूछता तो घर में क्लेश हो जाता था. पत्नी हर बार उस की कसम खा कर यह भरोसा दिला देती थी कि वह गलत नहीं है बल्कि लोग उसे बेवजह बदनाम कर रहे हैं.

घटना से एक दिन पूर्व 4 फरवरी, 2019 को ऋषि दिल्ली से गांव आया था. दूसरे दिन उस ने जरूरी काम से रिश्तेदारी में जाने तथा वहां 2 दिन रुक कर घर लौटने की बात लक्ष्मी से कही थी. बेटी स्कूल गई थी. इत्तफाक से ऋषि अपना मोबाइल घर भूल गया था, लेकिन लक्ष्मी को यह पता नहीं था. करीब 2 घंटे बाद मोबाइल लेने जब घर आया तो घर का दरवाजा अंदर से बंद था.

उस ने दरवाजा थपथपाया. पत्नी न तो दरवाजा खोलने के लिए आई और न ही उस ने अंदर से कोई जवाब दिया. तो ऋषि को गुस्सा आ गया और उस ने जोर से धक्का दिया तो कुंडी खुल गई.

जब वह कमरे के अंदर पहुंचा तो पत्नी और उस का प्रेमी दीपक आपत्तिजनक स्थिति में थे. यह देख कर उस का खून खौल उठा. पत्नी की बेवफाई पर ऋषि तड़प कर रह गया. वह अपना आपा खो बैठा. अचानक दरवाजा खुलने से प्रेमी दीपक सकपका गया था.

ऋषि ने सोच लिया कि वह आज दोनों को सबक सिखा कर ही रहेगा. गुस्से में आगबबूला हुए ऋषि कमरे से बाहर आया.

वहां रखा फावड़ा उठा कर उस ने दीपक पर ताबड़तोड़ प्रहार किए. पत्नी लक्ष्मी उसे बचाने के लिए आई तो फावड़े से प्रहार कर उस की भी हत्या कर दी. इस के बाद दोनों की लाशें कमरे में बंद कर वह थाने पहुंच गया.

ऋषि ने पुलिस को बताया कि उसे दोनों की हत्या पर कोई पछतावा नहीं है. यह कदम उसे बहुत पहले ही उठा लेना चाहिए था. पत्नी ने उस का भरोसा तोड़ा था. उस ने तो पत्नी पर कई साल भरोसा किया.

उधर दीपक के परिजन इस घटना को साजिश बता रहे थे. उन का आरोप था कि दीपक को फोन कर के ऋषि ने अपने यहां बहाने से बुलाया था. घर में बंधक बना कर उस की हत्या कर दी गई. उन्होंने शक जताया कि इस हत्याकांड में अकेला ऋषि शामिल नहीं है, उस के साथ अन्य लोग भी जरूर शामिल रहे होंगे.

मृतक दीपक के चाचा राजेंद्र ने ऋषि तोमर एवं अज्ञात के खिलाफ तहरीर दे कर हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई.

पुलिस ने हत्यारोपी ऋषि से विस्तार से पूछताछ करने के बाद उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया.

उधर पोस्टमार्टम के बाद लक्ष्मी के शव को लेने उस के परिवार के लोग नहीं पहुंचे, जबकि दीपक के शव को उस के घर वाले ले गए.

हालांकि मृतका लक्ष्मी के परिजनों से पुलिस ने संपर्क भी किया, लेकिन उन्होंने अनसुनी कर दी. इस के बाद पुलिस ने लक्ष्मी के शव का अंतिम संस्कार कर दिया. थानाप्रभारी ओमप्रकाश सिंह मामले की तफ्तीश कर रहे थे.

सौजन्य- सत्यकथा, जुलाई 2019

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

प्यार की दावत : प्रेमी को मिला सबक

25 नवंबर, 2019 की बात है. उत्तर प्रदेश के गोंडा का रहने वाला रमेश गुप्ता घर में बिस्तर पर लेटा आराम कर रहा था. तभी अचानक उस के फोन की घंटी बजी. उस ने फोन उठा कर काल रिसीव की, बात होने के बाद उस ने कपडे़ बदले और छोटे भाई सुरेश से यह कह कर चला गया कि मनोज के घर जा रहा है. अगर जरूरत हुई तो वह उन के घर पर रुक जाएगा. दरअसल, मनोज गुप्ता के ससुर बीमार थे, सुरेश उन की देखभाल के लिए उन के घर जाता रहता था. दोनों परिवारों के घ्निष्ठ संबंध थे.

रमेश को गए काफी देर हो गई. जब वह नहीं लौटा तो सुरेश ने समझा कि वह मनोज के घर रुक गए होंगे. रमेश जब 26 नवंबर की सुबह तक भी नहीं लौटा तो सुरेश ने मनोज गुप्ता को फोन किया तो उन्होंने बताया कि रमेश कल रात को उन के यहां आया ही नहीं था.

यह जान कर सुरेश को चिंता हुई. रमेश जहांजहां जा सकता था, सुरेश ने उन सभी जगहों पर उस की खोज की, लेकिन उस का कहीं पता नहीं चला.

30 वर्षीय रमेश गुप्ता अपने परिवार के साथ जिला गोंडा के थाना कोतवाली क्षेत्र में स्थित विष्णुपुरी कालोनी में रहता था. जब सुरेश रिश्तेदारों, मित्रों और परिचितों से पूछपूछ कर परेशान हो गया तो उस ने 29 नवंबर को थाना कोतवाली जा कर भाई रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

कोतवाल आलोक राव ने सुरेश की तहरीर पर रमेश गुप्ता की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने उस की तलाश के लिए आवश्यक काररवाई शुरू कर दी.

गोंडा शहर के ही सिविल लाइंस क्षेत्र में अफीम कोठी मोहल्ले में एक खाली मैदान है, जिस में तमाम झाडि़यां थीं. इस खाली मैदान में 2 दिसंबर को कुछ लोग गए तो वहां बदबू के तेज भभके उठ रहे थे.

लोगों ने खोजबीन शुरू की तो वहां एक सूखे कुएं में क्षतविक्षत अवस्था में लाश पड़ी देखी. वह कुआं मिट्टी से आधा पट चुका था, इसलिए चित अवस्था में पड़ी उस लाश का चेहरा स्पष्ट दिख रहा था. उन लोगों ने वह लाश पहचान ली. वह लाश विष्णुपुरी कालोनी के रहने वाले रमेश गुप्ता की थी.

रमेश के मकान से उस जगह की दूरी महज 200 मीटर थी. उन में से ही एक आदमी ने जा कर रमेश के भाई सुरेश गुप्ता को रमेश की लाश मिलने की सूचना दे दी.

सुरेश तुरंत मौके पर पहुंचा तो उस ने कुएं में पड़ी भाई की लाश पहचान ली. सुरेश ने कोतवाल आलोक राव को भाई की लश मिलने की सूचना दे दी.

सूचना पा कर इंसपेक्टर आलोक राव, एसएसआई राजेश मिश्रा आदि के साथ मौके पर पहुंच गए. मौके पर लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा था. इंसपेक्टर राव ने लाश कुएं से निकलवाई. लाश काफी सड़गल चुकी थी, इसलिए लाश का निरीक्षण करने पर मौत की वजह पता नहीं चल रही थी.

इसी बीच एसपी राजकरन नैयर और एएसपी महेंद्र कुमार भी मौके पर पहुंच गए. लाश का मुआयना करने के बाद उन्होंने रमेश के भाई सुरेश से पूछताछ की. सुरेश ने भाई की हत्या में उस की प्रेमिका मानसी का हाथ होने का शक जताया. वैसे भी अफीम कोठी मोहल्ले में ही 100 मीटर की दूरी पर मानसी चौरसिया का मकान था.

सुरेश से पूछताछ के बाद पुलिस ने मौके की काररवाई निपटा कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी. फिर सुरेश की तहरीर पर मानसी चौरसिया के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201 के तहत मुकदमा पंजीकृत कर लिया.

इंसपेक्टर राव ने मृतक रमेश गुप्ता के फोन नंबर की काल डिटेल्स निकलवा कर जांच की तो पता चला कि 25 नवंबर की रात को उस के मोबाइल पर जो काल आई थी, वह मानसी चौरसिया के फोन नंबर से ही की गई थी.

अब मानसी से पूछताछ करनी जरूरी थी. लिहाजा 3 दिसंबर को इंसपेक्टर आलोक राव ओर एसएसआई राजेश मिश्रा ने महिला कांस्टेबल की मदद से मानसी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. कोतवाली ला कर जब मानसी से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने आसानी से अपना जुर्म कबूल कर लिया.

उस ने बताया कि रमेश की हत्या करने में उस के दूसरे प्रेमी अंकित सिंह, पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू चौरसिया ने साथ दिया था. पूछताछ के बाद मानसी ने रमेश की हत्या की जो कहानी बताई, इस प्रकार निकली—

उत्तर प्रदेश के जिला गोंडा की नगर कोतवाली अंतर्गत रामचंद्र गुप्ता अपने परिवार के साथ रहते थे. रामचंद्र के परिवार में उन की पत्नी राजकुमारी और 2 बेटियों के अलावा 3 बेटे दिनेश, रमेश और सुरेश थे.

रामचंद्र प्राइवेट नौकरी करते थे. उन्होंने दिनेश का विवाह कर दिया था. दिनेश को विवाह के कुछ समय बाद ही चालचलन ठीक न होने पर रामचंद्र ने उसे घर से निकाल दिया. यह लगभग 8 साल पहले की बात है. इस समय दिनेश परिवार के साथ बस्ती जिले में रहता है. रामचंद्र ने अपनी दोनों बेटियों का विवाह कर दिया था. रमेश और सुरेश अभी अविवाहित थे. रमेश ने बीए तक पढ़ाई की थी.

रामचंद्र के कूल्हे में रौड पड़ी थी. उस रौड की वजह से उन्हें इंफेक्शन हो गया था, जो कि किडनी और उस के आसपास फैल गया था. वह काफी समय से बीमार थे.

इस की वजह से उन की देखभाल बड़ा बेटा रमेश किया करता था. देखभाल करने के कारण रमेश कोई काम नहीं करता था. घर पर ही रहता था. जबकि सुरेश एक बैंक में मैनेजर के रहमोकरम पर काम करने लगा था.

विष्णुपुरी कालोनी से सटा अफीम कोठी मोहल्ला था. इसी मोहल्ले में रोहित चौरसिया परिवार के साथ रहता था. रोहित रेलवे में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था. उस की पत्नी जगदेवी का देहांत हो चुका था. रोहित के 2 बेटे दीपू चौरसिया और सूरज चौरसिया और एकलौती बेटी मानसी थी.

दीपक का रीमा नाम की युवती से विवाह हो चुका था. सूरज अविवाहित था और मुंबई में रहता था. मानसी ने इंटरमीडिएट तक शिक्षा ग्रहण की थी, इस के बाद उस का पढ़ाई में मन नहीं लगा तो वह घर के रोजमर्रा के काम करने लगी.

रमेश और मानसी के मकान के बीच महज 200 मीटर की दूरी थी. दोनों एकदूसरे से परिचित थे. मानसी काफी महत्त्वाकांक्षी थी. छरहरी काया वाली मानसी को लड़कों से दोस्ती करना बहुत अच्छा लगता था. उस की वजह थी कि उस के नाजनखरे उठाने में लड़कों की लाइन लगी रहती थी. उन के साथ घूमने, मौजमस्ती के उसे खूब मौके मिलते थे.

रमेश मोहल्ले में ही घूमता रहता था, इसलिए वह मानसी के चालचलन से बखूबी वाकिफ था. उस ने भी मानसी की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया तो मानसी ने सहर्ष स्वीकार कर लिया. दोनों की दोस्ती धीरेधीरे रंग दिखाने लगी. वैसे भी दोस्ती प्यार की पहली सीढ़ी होती है. रमेश और मानसी दोनों यह सीढ़ी चढ़ चुके थे.

दोनों साथ में काफी समय बिताने लगे. उन के बीच मोबाइल पर भी बातें होती रहती थीं. जैसेजैसे समय गुजरने लगा, दोनों को अहसास होने लगा कि दोनों दोस्ती की सीमाओं को पार कर उस से भी आगे निकल चुके हैं. उन के दिलों में प्यार की उमंगें हिलारें मार रही थीं. दोनों का प्यार दिनोंदिन परवान चढ़ने लगा. यह भी तय कर लिया कि जीवन भर दोनों पतिपत्नी के रूप में साथसाथ रहेंगे.

दोनों ने विवाह करने की बात अपने घरों में की तो रमेश के घर वालों को तो शादी से कोई ऐतराज नहीं था, लेकिन मानसी के पिता रोहित और भाई दीपू ने मना कर दिया. उन्होंने मानसी से कहा कि रमेश एक तो उन की जातिबिरादरी का नहीं और दूसरे वह निठल्ला है. कुछ कामधाम नहीं करता. ऐसे में शादी के बाद वह उसे कैसे रख पाएगा.

बाप की नसीहत बेटी के दिमाग में घर कर गई. मानसी ने अभी तक इस बारे में सोचा ही नहीं था. वह तो प्यार में इतनी डूब गई थी कि और कुछ सोचसमझ ही नहीं पा रही थी. बाप की नसीहत ने जैसे उस की आंखें खोल दी थीं.

अब उस ने रमेश से दूरी बनानी शुरू कर दी. लेकिन रमेश था कि उस का पीछा छोड़ने को तैयार ही नहीं था. इसी बीच मानसी की मुलाकात कुछ दूर जानकीनगर मोहल्ला निवासी अंकित से हो गई. अंकित अच्छा कमाता था. रमेश के मुकाबले हर लिहाज से अंकित मानसी को अच्छा लगा था. दोनों की मुलाकातें दिनोंदिन बढ़ने लगीं. दोनों के बीच की दूरियां कम होती गईं. मानसी अंकित के साथ बहुत खुश थी.

रमेश ने मानसी चौरसिया को अपने से दूरी बनाते देखा तो उसे अच्छा नहीं लगा. वह ऐसा क्यों कर रही है, यह जानने की उस ने कोशिश की तो उस के सामने हकीकत आते देर नहीं लगी.

रमेश को लगा कि दूसरा प्रेमी मिलते ही मानसी ने उस से किनारा कर लिया है. यह बात रमेश के दिमाग में बारबार कौंध रही थी. वह इसे बरदाश्त नहीं कर पा रहा था. वह मानसी को हर हाल में पाना चाहता था. एक दिन रमेश ने मानसी से मिल कर उसे समझाया लेकिन मानसी नहीं मानी.

मानसी ने उसे बताया कि परिवार वाले उस से विवाह करने को तैयार नहीं हैं और वह अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सकती. इस पर रमेश ने सीधे कहा कि ऐसे में तुम्हें अपने घर वालों को मनाना चाहिए. लेकिन तुम ने तो दूसरा प्रेमी ही ढूंढ लिया. तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था.

मानसी को न मानते देख रमेश ने उसे धमकाया कि अगर उस ने उसे छोड़ कर किसी दूसरे को चुना तो उस के जो अश्लील फोटो उस के पास हैं, वह उन्हें वायरल कर देगा. रमेश के इतना कहने पर मानसी डर गई लेकिन उस ने हिम्मत कर के कह दिया कि वह अब उस की नहीं हो सकती.

इस के बाद मानसी के दिमाग में यही चलता रहता था कि कहीं रमेश उस के अश्लील फोटो को वायरल न कर दे. वह इसी डर में जी रही थी. ऐसे में उस ने रमेश को सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

उस ने अपने दूसरी प्रेमी अंकित से कहा कि कुछ दिनों पहले रमेश ने धोखे से उस के कुछ अश्लील फोटो खींच लिए थे, उन के बल पर वह उसे ब्लैकमेल कर फोटो वायरल करने की धमकी दे रहा है.

मानसी ने अंकित से कहा कि उसे रोकने का एक ही तरीका है कि उसे मार दिया जाए. अंकित इस काम में उस का साथ देने को तैयार हो गया. उसे कहां और कैसे मारना है, इस पर दोनों ने विचार कर लिया.

इस के बाद दोनों को लगा कि वे दोनों इस काम को ठीक से अंजाम नहीं दे पाएंगे. इस पर मानसी ने रमेश को ठिकाने लगाने के लिए अपने पिता और भाई को राजी करने का उपाय सोचा.

योजनानुसार मानसी ने रोते हुए अपने पिता रोहित चौरसिया और भाई दीपू को बताया कि रमेश के पास उस के कुछ अश्लील फोटो हैं. उन को वायरल कर के वह उस की जिंदगी बरबाद करना चाहता है.

यह सुन कर दोनों को मानसी और रमेश पर गुस्सा आया. पर पहले तो उन्हें रमेश को देखना था, क्योंकि उन के लिए मानसी की इज्जत यानी परिवार की इज्जत पहले थी. इज्जत बचाने की खातिर उस के पिता व भाई रमेश को सबक सिखाने को तैयार हो गए.

तब मानसी ने दोनों को बता दिया था कि इस सब में उस का एक दोस्त अंकित भी मदद करने को तैयार है. इस के बाद एक दिन मानसी ने अंकित को घर बुला लिया. फिर सब ने मिल कर रमेश को ठिकाने लगाने की योजना बनाई.

25 नवंबर को मानसी के भाई दीपू की पत्नी रीमा अपने मायके गई हुई थी. योजनानुसार रात साढ़े 10 बजे मानसी ने फोन कर के रमेश को अपने घर बुलाया.

रमेश अपने भाई सुरेश से घर के सामने रहने वाले मनोज गुप्ता के यहां जाने की बात कह कर निकला और सीधे मानसी के घर पहुंच गया.  वहां मानसी, उस के पिता रोहित, भाई दीपू के अलावा अंकित भी मौजूद था.

रमेश के पहुंचने पर सब ने पहले उसे शराब पिलाई. शराब में पहले से ही जहरीला पदार्थ मिला दिया गया था. शराब में मिले जहर ने अपना असर दिखाना शुरू किया तो रमेश की हालत बिगड़ने लगी. वह उठ कर जाने की कोशिश करने लगा तो सब ने मिल कर उसे दबोच लिया और गला दबा कर उसे मार डाला.

रमेश को मौत की नींद सुलाने के बाद रात एक बजे उस की लाश अपने घर के पीछे झाडि़यों से पटे खाली मैदान में बने सूखे कुएं में डाल दी. इस के बाद अंकित अपने घर चला गया.

लेकिन उन का गुनाह छिप न सका. मानसी चौरसिया ने सभी के नाम खोले तो इंसपेक्टर आलोक राव ने अंकित, रोहित चौरसिया और दीपू चौरसिया की गिरफ्तारी के लिए दबिश देनी शुरू कर दी. मानसी के हिरासत में लिए जाने के बाद ही तीनों अपने घरों से फरार हो गए थे.

पुलिस के बढ़ते दबाव के चलते अंकित ने 6 दिसंबर, 2019 को न्यायालय में आत्मसमर्पण कर दिया. 8 दिसंबर को इंसपेक्टर राव ने दीपू चौरसिया को गिरफ्तार कर लिया. आवश्यक लिखापढ़ी के बाद अभियुक्तों को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक रोहित चौरसिया फरार चल रहा था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. मनोज गुप्ता परिवर्तित नाम है.

सौजन्य- सत्यकथा, फरवरी 2020

खून में डूबा प्यार

मंजू सिदार सैफ से पहली दफा मिलने वाली थी. लगभग एक साल से दोनों फेसबुक और वाट्सऐप पर ही बातें करते रहे थे. उन की दोस्ती फेसबुक के माध्यम से ही हुई थी.

धीरेधीरे उन की दोस्ती परवान चढ़ती गई. उन्होंने तय किया कि पहली जनवरी को वे एक साथ पिक्चर देखने चलेंगे. जब मंजू सिदार और सैफ ने एकदूसरे को देखा तो दोनों बहुत खुश हुए. शोएब अहमद अंसारी ने मंजू को बताया कि उस ने टिकट ले ली है और मूवी शुरू होने में अभी थोड़ा समय है. क्यों न पास के रेस्टोरेंट में बैठ कर कुछ बातें कर लें.

मंजू की स्वीकृति के बाद दोनों रेस्टोरेंट में जा कर बैठ गए. एकदूसरे को निकटता से समझने के प्रयास में मंजू और सैफ बातों में डूब गए. सैफ मंजू को पहली बार देख कर उस का दीवाना ही हो गया.

मंजू की बातों से सैफ मंत्रमुग्ध सा हो गया. उस दिन उस ने मौका हाथ से नहीं जाने दिया. पिक्चर देखने के बाद तीनों एक गार्डन में बैठ गए, जहां दोनों ने अपने प्यार का इजहार कर दिया. सैफ ने तो यहां तक कह दिया कि मैं शादी करूंगा तो तुम से ही करूंगा.

मंजू पहली ही मुलाकात में सैफ के व्यवहार से प्रभावित हो गई. वह बोली, ‘‘सैफ, मैं तुम्हें पसंद करती हूं. मगर शादी के लिए इतनी जल्दबाजी ठीक नहीं. अभी हम एकदूसरे को और समझ लें. वैसे भी अभी मेरी नर्सिंग की पढ़ाई पूरी नहीं हुई है. मैं रायपुर जा कर पढ़ाई पूरी कर लूं.’’

‘‘ठीक है, तुम सोच लो, मैं तो तुम्हारा हो गया. समझ लो, मैं तुम्हारी इच्छा का गुलाम हूं. जब तुम कहोगी, तब शादी कर लेंगे.’’ सैफ ने कहा.

यह सुन मंजू हंसते हुए बोली, ‘‘तुम मुसलिम हो न, मुझे जाने क्यों मुसलिम बहुत अच्छे लगते हैं. मैं शादी करूंगी, मगर थोड़ा समय दो.’’

मंजू के मुसलमान वाले फिकरे को सुन कर सैफ के कान खड़े हो गए. वह सोचने लगा कि मंजू कहीं उस के मुसलिम होने की वजह से उस से निकाह नहीं करना चाहती या और कोई बात है. सैफ ने मंजू की आंखों में झांकते हुए प्यार से कहा, ‘‘मंजू, अगर तुम्हें आपत्ति है तो मैं तुम्हारी खातिर अपना धर्म बदलने को तैयार हूं.’’

‘‘नहींनहीं, तुम्हें धर्म बदलने की कोई जरूरत नहीं है. न तुम धर्म बदलो और न मैं बदलूंगी. यह तय है.’’ मंजू बोली.

मंजू की बात सुन कर सैफ खुश हुआ. मंजू ने उस से कहा, ‘‘सैफ, मैं अभी पढ़ना चाहती हूं. मेरे जीवन का उद्देश्य पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ा होना है. मैं नर्स बनना चाहती हूं. बस तुम मुझे थोड़ा समय दो.’’

सैफ ने उस की बातों पर अपनी स्वीकृति दे दी.

इस घटनाचक्र के बाद मंजू सिदार और सैफ अकसर मिलते और साथसाथ समय बिताते. उन की दोस्ती ने रंग लाना शुरू कर दिया. उन का प्यार बढ़ता गया.

शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ रायगढ़ के बोइरदादर कस्बे का रहने वाला था. रायगढ़ में उस की मोबाइल फोन और एक्सेसरीज की दुकान थी.

एक दिन जब दोनों मिले तो मंजू बोली, ‘‘सैफ, मैं अगले हफ्ते रायपुर जाऊंगी, क्योंकि वहीं रह कर मुझे पढ़ाई पूरी करनी है.’’

अब मंजू को पढ़ाई के लिए 2 साल रायपुर में रहना था. त्यौहार आदि पर वह साल में 1-2 बार ही रायगढ़ आ सकती थी.

मंजू की बातें सुन कर सैफ निराश हुआ. उसे निराश होते देख मंजू चहकी, ‘‘तुम इतने दुखी क्यों हो गए?’’

‘‘मैं क्या कहूं,’’ सैफ ने दुखी स्वर में कहा, ‘‘मैं तो तुम्हारा गुलाम हूं, जो कहोगी सुनूंगा, करूंगा.’’

मंजू ने हंस कर कहा, ‘‘मगर एक खुशी की खबर है.’’

‘‘क्या?’’ सैफ उत्सुक हुआ.

‘‘उस से पहले हम शादी कर सकते हैं, अगर तुम चाहो तो…’’

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? अंधे से पूछ रही हो कि आंखें चाहिए, मैं तैयार हूं.’’ वह खुश हो कर बोला.

इस के बाद फैसला कर दोनों ने 21 मार्च, 2019 को रायगढ़ से नोटरी पब्लिक शपथ पत्र बनवा लिया और कोर्ट में औपचारिक रूप से विवाह कर लिया. इस विवाह के साक्षी दोनों के नजदीकी मित्र बने. दोनों ने तय किया कि कुछ समय दोनों अलगअलग ही रहेंगे, मगर जल्द ही एकदूसरे के हो जाएंगे.

मंजू छत्तीसगढ़ के जिला रायगढ़ के विनीतानगर वार्ड में रहने वाले गजाधर सिदार की बेटी थी. गजाधर रायगढ़ तहसील में पटवारी हैं. उन की 2 बेटियां थीं मंजू और मनीषा. दोनों बेटियों को वह उन के मनमुताबिक पढ़ा रहे थे. दोनों बहनों में आपस में बहुत प्यार था.

मंजू सिदार की छोटी बहन मनीषा कहने को तो उस की बहन थी, लेकिन वह उस की दोस्त भी थी. वह भी मंजू और सैफ के विवाह की गवाह थी. एक दिन उस ने अपनी मां प्रभावती को बातों ही बातों में बता दिया कि मंजू दीदी ने शादी कर ली है.

यह बात जब मां प्रभावती और पिता गजाधर सिदार को पता चली तो दोनों मंजू से बेहद नाराज हुए. मां प्रभावती तो मानो टूट ही गईं. उस ने मंजू को प्यार से समझाया. साथ ही दुहाई दे कर कहा कि तुम गलत दिशा में जा रही हो. तुम ने जो कदम उठाया है, उस से तुम्हारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा.

मां की सलाह से धीरेधीरे मंजू के विचार बदल गए. उसे समझ में आने लगा कि उस ने जीवन की बहुत बड़ी भूल की है. सैफ और उस के रास्ते बिलकुल अलग हैं. जब मंजू को यह बात समझ में आई तो धीरेधीरे उस ने सैफ से कन्नी काटनी शुरू कर दी. इतना ही नहीं, उस ने सैफ से बातचीत भी बहुत कम कर दी. सैफ समझ नहीं पा रहा था कि आखिर मंजू उसे इग्नोर क्यों कर रही है.

एक दिन दोनों की मुलाकात हुई तो सैफ ने बहुत सारे गिफ्ट, जरूरी सामान और पैसे मंजू को देने चाहे. मगर मंजू ने लेने से इनकार करते हुए कहा, ‘‘सैफ, तुम्हारे और मेरे रास्ते अब जुदाजुदा हैं.’’

सैफ मानो आसमान से जमीन पर गिर पड़ा. वह अचंभित सा मंजू को देखता रह गया.

मंजू ने आगे कहा, ‘‘सैफ, अच्छा तो यही रहेगा कि अब तुम मुझे भूल जाओ.’’

इस पर सैफ बोला, ‘‘मंजू, तुम ने मेरे साथ ब्याह किया है, कोर्ट मैरिज. और अब कहती हो भूल जाऊं. यह भला कैसे हो सकता है. मंजू अगर ऐसी बात थी तो तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिए था. यह तो सरासर धोखा है.’’

‘‘नहींनहीं, यह धोखा नहीं बल्कि हमारा बचपना था. मुझ से भूल हुई. बिना मांबाप, परिवार की सहमति के भला विवाह कैसे हो सकता है?’’ वह बोली.

‘‘हम ने कोर्टमैरिज की है, उस का क्या होगा?’’

‘‘उन कागजों को जला दो.’’ मंजू ने सपाट स्वर में कहा.

मंजू की कठोरता देख शोएब अंसारी उर्फ सैफ का दिल टूट गया. उस की आंखों के आगे जैसे अंधेरा घिर आया. उस ने कातर स्वर में कहा, ‘‘मंजू, तुम चाहे जो सोचो, जो कहो, मगर मैं साफसाफ कहता हूं मैं ने सच्चे दिल से तुम्हें चाहा है और सदैव चाहता रहूंगा. मैं तुम्हें अपनी पत्नी स्वीकार कर चुका हूं.’’

मंजू सैफ की आंखों में देखती रही. उसे लगा सैफ उसे सचमुच दिल से चाहता है, उस का सिर घूम गया. फिर वह अपने घर चली गई.

10 दिसंबर, 2019 को मंगलवार था. उस दिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के टिकरापारा के गोदावरी नगर स्थित फ्लैट के बाहर शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ अपने 2 साथियों गुलाम मुस्तफा (18 वर्ष) और रामलाल (15 वर्ष) के साथ खड़ा था.

मंजू वहीं फ्लैट में रह कर अपनी पढ़ाई कर रही थी. उस समय उस की छोटी बहन मनीषा भी उस के पास आई हुई थी. सैफ ने मुस्तफा से कहा, ‘‘देखो, मंजू ने मेरे साथ जो धोखा किया है, उसे मैं अब और बरदाश्त नहीं कर पा रहा हूं. मंजू मेरे साथ ऐसा करेगी, मैं ने कभी सोचा नहीं था. अब मैं ने फैसला कर लिया है कि ऐसी धोखेबाज को सबक जरूर सिखाना है. यानी उस का काम तमाम करना है. अगर तुम मेरा यह काम कर दोगे, तो मैं तुम्हें 7 लाख रुपए दूंगा.’’ कहतेकहते उस का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

सैफ की बात सुन गुलाम मुस्तफा बोला, ‘‘देख यार सैफ, तू गुस्सा न हो. तू उस से बात कर. हो सकता है अभी भी वह तेरी हो जाए. मगर सुन ले हमारे पैसे तुम्हें दोनों ही हालत में देने होंगे.’’

‘‘मेरा वादा है, पैसे जरूर दूंगा. बस मेरा काम हो जाए.’’ सैफ ने कहा.

‘‘आओ, फिर हम अपना काम करें.’’ गुलाम मुस्तफा ने कहा. मंजू घर में है या नहीं, पता लगाने के लिए सैफ ने उस के मोबाइल पर फोन कर कहा, ‘‘मंजू, मैं तुम से आखिरी बार कुछ बात करना चाहता हूं. उस के बाद तुम्हें कभी परेशान नहीं करूंगा.’’

मंजू सुबह का नाश्ता बना कर नर्सिंग कालेज जाने के लिए तैयार थी. उसे वहां 12 बजे पहुंचना था. उस ने सैफ को फ्लैट पर बुला लिया. सैफ और मुस्तफा फ्लैट में चले गए और रामलाल फ्लैट के बाहर ही खड़ा रहा. फ्लैट में प्रवेश करते ही सैफ ने देखा मंजू उस समय अपनी छोटी बहन मनीषा के साथ नाश्ता कर रही थी.

सैफ पास पहुंच कर बोला, ‘‘मंजू, मैं आखिरी बार तुम्हारे पास आया हूं, क्योंकि मैं रोजरोज की बातों से आजिज आ चुका हूं. बताओ, तुम मेरे साथ ऐसा क्यों कर रही हो?’’

यह सुनते ही मंजू और मनीषा नाश्ता छोड़ उस की ओर देखने लगीं. तभी मंजू बोली, ‘‘सैफ, मैं तो तुम्हें पहले ही बोल चुकी हूं कि अब तुम मुझे भूल जाओ. जो हुआ, वह भी भूल जाओ.’’

मंजू की तल्ख बातें सुन कर सैफ आपे में नहीं रहा. वह गुस्से में बोला, ‘‘तुम ने रमन के साथ टिकटौक पर वीडियो क्यों डाला? क्या यह वीडियो अपलोड करना तुम्हारी फितरत को बयां नहीं करता?’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘सीधी सी बात है, तुम ने मुझे बरबाद किया अब रमन को बरबाद करोगी. पहले मेरे साथ कोर्टमैरिज की, अब उसे फंसा रही हो.’’

‘‘नहीं, मेरी रमन के साथ शादी होने जा रही है.’’ मंजू ने एकाएक जैसे बड़े रहस्य से परदा उठा दिया.

‘‘मुझे छोड़ कर तुम किसी और के साथ शादी नहीं कर सकती.’’ सैफ तल्ख हो गया.

मंजू भी आगबबूला हो गई. दोनों में कहासुनी बढ़ती गई.

तभी सैफ ने वहीं रखा फ्राइंग पैन उठा कर मंजू के सिर पर दे मारा. जिस से मंजू की चीख निकल गई और उस के सिर से खून बहने लगा.

वह वहीं ढेर हो गई. बहन की गंभीर हालत देख कर मनीषा सैफ पर हमलावर हो उठी तो उस ने उसी फ्राइंग पैन से कई वार कर के मनीषा को भी मरणासन्न कर डाला. इस बीच गुलाम मुस्तफा उस का बराबर साथ दे रहा था. वह अपना गमछा ले कर मंजू के पास पहुंचा और गमछे से मंजू का गला घोंट दिया. फिर उसी गमछे से मनीषा का भी गला घोंट दिया, जिस से दोनों की ही मौत हो गई.

सैफ और गुलाम मुस्तफा दोनों ने उन के मोबाइल उठा कर अपने पास रख लिए. अपना काम निपटा कर जब वह घर से बाहर भागने को हुए तो घर के बाहर से किसी की आवाज सुनाई दी.

आवाज सुन कर वे घबरा गए, जिस से जल्दबाजी में गुलाम मुस्तफा का एक जूता किसी चीज में फंस कर वहीं रह गया. वह दरवाजा खोल भाग खड़ा हुआ. इस दरमियान उस फ्लैट के बाहर दूसरी मंजिल पर लगे सीसीटीवी कैमरे में वे सब कैद हो गए.

मंजू और मनीषा की चीखें सुन कर आसपड़ोस वाले भी वहां आ गए. उन्होंने फ्लैट की खिड़की से झांक कर देखा तो दोनों लड़कियों को लहूलुहान देख कर वह माजरा समझ गए.

उन्होंने सूचना फ्लैट मालिक इंद्रजीत सिंह को दे दी. इंद्रजीत फ्लैट पर पहुंचे तो वहां रहने वाली मंजू और उस की बहन को लहूलुहान हालत में देख कर वह घबरा गए. उन्होंने तुरंत फोन कर के थाना तिकरापारा पुलिस को सूचना दी.

सूचना पा कर टीआई कय्यूम मेमन पुलिस मौके पर पहुंच गए. उन्होंने सब से पहले दोनों बहनों को रायपुर के अंबेडकर हौस्पिटल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. अस्पताल में 2 पुलिसकर्मियों को छोड़ कर टीआई कय्यूम मेमन घटनास्थल पर पहुंचे.

सूचना पा कर एसपी आरिफ एच. शेख और एएसपी (क्राइम) पंकज चंद्रा भी घटनास्थल पर पहुंचे. स्थिति का मुआयना कर उन्होंने इस दोहरे हत्याकांड को खोलने के लिए 5 पुलिस टीमें बनाईं. टीआई ने मंजू के घर भी फोन कर सूचना दे दी.

कुछ देर बाद मंजू के मातापिता और अन्य लोग अंबेडकर अस्पताल की मोर्चरी पहुंच गए. दोनों बेटियों के शव देख कर वे फूटफूट कर रोने लगे.

पिता गजाधर सिदार से पुलिस ने पूछताछ की तो उन्होंने रायगढ़ के ही रहने वाले शोएब अहमद अंसारी उर्फ सैफ पर अपना शक जताया. उन्होंने बताया कि उस ने उन की बेटी मंजू से कथित रूप से विवाह कर लिया था. मंजू जब रावतपुरा नर्सिंग कालेज, रायपुर में पढ़ाई कर रही थी, तब सैफ लगातार फोन कर के उसे परेशान किया करता था.

उन्होंने यह भी बताया कि सैफ ने उन की बेटी के कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए थे. तब उन्होंने उस के खिलाफ मामला दर्ज कराया था. जिस पर पुलिस ने उसे पोक्सो एक्ट के तहत गिरफ्तार कर जेल भेजा था.

गजाधर सिदार से यह जानकारी मिलने के बाद टीआई कय्यूम मेमन ने एक पुलिस टीम रायगढ़ के बोइरदादर भेजी, जहां का सैफ रहने वाला था. मगर पुलिस को जानकारी मिली कि वह पिछले 2 दिनों से गायब है.

पुलिस ने उस के मोबाइल को ट्रेस करना शुरू किया और सूत्रों से उस की जानकारी लेनी आरंभ की तो खबर मिली कि सैफ बिलासपुर से पेंड्रा के शहडोल मैहर होता हुआ रीवा पहुंच चुका है. रायपुर पुलिस ने 11 दिसंबर, 2019 को रीवा (मध्य प्रदेश) पुलिस की सहायता से तोपखाना के निकट छिप कर रह रहे सैफ को अपनी गिरफ्त में ले लिया.

सैफ से पूछताछ के बाद पुलिस ने गुलाम मुस्तफा को रायगढ़ से और नाबालिग रामलाल को जिला चांपा जांजगीर से अपनी गिरफ्त में ले लिया. उन्होंने इकबालिया बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने मंजू और मनीषा की हत्या में सैफ की मदद की थी. सैफ ने बताया कि मंजू ने अपनी मरजी से उस के साथ कोर्टमैरिज की थी.

मगर उस के बाद मंजू अपना रंग दिखाने लगी, जिस से वह बहुत निराश हो गया था. मगर जब एक लड़के के साथ उस ने टिकटौक वीडियो सोशल मीडिया पर जारी किया तो उस के तनबदन में आग लग गई और उस ने उसी दिन निर्णय लिया कि अब मंजू को मार डालेगा.

इस बारे में उस ने अपने दोस्तों गुलाम मुस्तफा और रामलाल के साथ प्लानिंग की. उस की मंशा सिर्फ मंजू की हत्या करने की थी, लेकिन घटना के समय मनीषा ने जिस तरह विरोध करना शुरू किया तो गुस्से में उन्होंने उस की भी हत्या कर दी.

पुलिस ने हत्यारोपी शोएब अहमद अंसारी, गुलाम मुस्तफा और रामलाल को भादंवि की धारा 302, 201, 34 के तहत गिरफ्तार कर उन्हें मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, रायपुर के न्यायालय में पेश किया, जहां से तीनों आरोपियों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित है. कथा में रामलाल परिवर्तित नाम है.

सौजन्य- सत्यकथा, फरवरी 2020

कुकर्मी बाप की बेटियां

महाराष्ट्र के सतारा जिले की रहने वाली योगिता की शादी करीब 5 साल पहले संजय देवरे से हुई थी. पतिपत्नी दोनों पढ़ेलिखे थे और कमाते भी थे. संजय एक अच्छी कंपनी में काम करता था, तो बीकौम की पढ़ाई कर चुकी योगिता एक एकाउंटेंट के यहां नौकरी करती थी.

जब दोनों कमा रहे थे तो उन की गृहस्थी हंसीखुशी से चलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं था. भले ही दोनों पढ़ेलिखे थे लेकिन उन के विचारों में काफी अंतर था. दोनों छोटीछोटी बात पर बहस करने लगते थे, जिस से उन के बीच विवाद हो जाता था.
जिस से संजय योगिता की पिटाई कर देता था. यह बात योगिता को बहुत बुरी लगती थी. योगिता ने पति के साथ गृहस्थी को चलाने के तमाम सपने देखे थे. लेकिन शादी के कुछ ही दिनों बाद उसे पति से प्यार के बजाए पिटाई मिल रही थी. जिस से उस के सारे सपने बिखरते दिख रहे थे. लिहाजा उस ने तय कर लिया कि वह ऐेसे पति के साथ नहीं रहेगी.

इसी दौरान योगिता ने एकाउंटेंट के यहां से नौकरी छोड़ कर एक बिल्डर के यहां नौकरी करनी शुरू कर दी. वहीं पर उस की मुलाकात सुशील मिश्रा नाम के युवक से हुई. सुशील मूल रूप से उत्तर प्रदेश का रहने वाला था. वह काम की तलाश में मुंबई आया था और अपनी बीवी बच्चों के साथ पालघर जिले के नालासोपारा में रहता था.

जिस बिल्डर के यहां योगिता नौकरी करती थी, सुशील उस के यहां बिल्डिंग बनाने का ठेका लेता था. इस वजह से सुशील का योगिता से अकसर मिलनाजुलना होता रहता था. बातूनी स्वभाव के सुशील ने जल्दी ही योगिता से दोस्ती कर ली. इस के बाद योगिता उस से अपने सुखदुख की बातें शेयर करने लगी.

सुशील अय्याश प्रवृत्ति का था. पार्वती नाम की एक महिला के साथ भी उस के अवैध संबंध थे. पार्वती बिल्डरों के यहां बेगार करती थी.

खिलाड़ी था सुशील

शादीशुदा पार्वती शराबी पति से त्रस्त हो कर पति और बच्ची को गांव में छोड़ कर अकेली ही नालासोपारा में रहने लगी थी. पार्वती अकेली ही रहती थी. सुशील ने उस के अकेलेपन का फायदा उठाया. पार्वती से नजदीकियां बन जाने पर जब उस का मन होता वह पार्वती के कमरे पर मौजमस्ती करने चला जाता था. कभीकभी वह उसे खर्चे आदि के पैसे भी दे देता था.

सुशील का मन पार्वती से भर चुका था, इसलिए अब वह योगिता से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश में जुट गया. वह योगिता से इस तरह बात करता कि योगिता को भी उस में अपनापन झलकने लगा.

एक दिन योगिता ने उसे पति से दूर रहने की वजह बता दी. सुशील ने उस से सहानुभूति जताते हुए कह दिया कि वह खुद को अकेला महसूस न करे. कभी भी किसी भी चीज की जरूरत हो तो उसे बता दे. जब भी वह उसे याद करेगी, हाजिर हो जाएगा.

योगिता को सुशील पसंद आ गया. जिस तरह के सुख व सहानुभूति वह पति से चाहती थी, वह सारे सुशील दे सकता था. लिहाजा एक दिन योगिता ने सुशील के सामने अपने प्यार का इजहार कर दिया. सुशील की खुशी का ठिकाना नहीं रहा.
मौका देख सुशील ने उस से कहा, ‘‘योगिता मैं भी तुम्हें दिलोजान से चाहता हूं, लेकिन मेरे साथ समस्या यह है कि मैं शादीशुदा और 2 बेटियों का पिता हूं और उन्हें छोड़ नहीं सकता.’’

यह सुन कर योगिता कुछ पल चुप रहने के बाद बोली, ‘‘कोई बात नहीं, मुझे मंजूर है. यदि आप मेरे साथ शादी नहीं करोगे तब भी मैं बिना शादी के आप के साथ रह लूंगी. आप अपनी पत्नी को गांव छोड़ देना, यहां पर मैं दोनों बेटियों को अच्छे से संभाल लूंगी.’’

योगिता के इस प्रस्ताव से सुशील मन ही मन बहुत खुश हुआ. वह योगिता के प्यार में इतना डूब चुका था कि उस ने पार्वती के पास जाना बंद कर दिया.
पार्वती इस बात को समझ गई थी कि योगिता ने उस के प्रेमी सुशील को उस से छीन लिया है, इसलिए वह योगिता से नफरत करने लगी.

दूसरी ओर सुशील पत्नी को गांव भेजने का उपाय खोजने लगा. एक दिन उस ने पत्नी को विश्वास में लेते हुए कहा, ‘‘गांव में मातापिता की तबीयत खराब है. ऐसा करो, तुम उन की देखभाल के लिए गांव चली जाओ. यहां बच्चों को मैं संभाल लूंगा, वैसे भी हमारी दोनों बेटियां अब बड़ी हो चुकी हैं.’’

पत्नी ने सुशील की बात मान ली तो वह उसे गांव छोड़ आया. इस के बाद योगिता अपने पति को कुछ बोल कर अपने कपड़े आदि ले कर सुशील के घर चली आई. उसे आया देख सुशील की लड़कियां समझ गईं कि इसी महिला के लिए उन के पिता ने मां को गांव का रास्ता दिखा दिया.

उस दिन सुशील को योगिता के साथ अपनी हसरत पूरी करनी थी, इसलिए शाम का खाना खाने के बाद वह योगिता को ले कर बेडरूम में घुस गया. रात में दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं. इस से दोनों ही खुश थे.

अब योगिता सुशील के घर पत्नी की तरह रहने लगी. उसे वहां रहते हुए लगभग एक साल हो चुका था. योगिता का व्यवहार भी बदल चुका था जो सुशील की बेटियों को पसंद नहीं था. जब सुशील घर पर नहीं होता तब दोनों लड़कियां योगिता से झगड़ा मोल लेती थीं. शाम को जब सुशील घर लौटता तब योगिता उस से उन दोनों की शिकायत करती थी.

योगिता की बात पर वह बच्चों को ही डांट देता था. पिता के इस रवैये से दोनों लड़कियां काफी दुखी थीं. दोनों यही सोचती रहती थीं कि इस औरत से कैसे छुटकारा पाया जाए. क्योंकि उसी की वजह से उन की मां उन से दूर चली गई थी.

उसी की वजह से उन्हें रोजाना पिता की डांट भी सुननी पड़ती थी. सुशील की बड़ी बेटी सुधा और छोटी बेटी सुजाता (काल्पनिक नाम) की एक दिन पार्वती माने से जानपहचान हो गई थी.

फिर दोनों बहनों ने पार्वती को अपना दुखड़ा सुनाया और उस से योगिता को घर से बाहर करने का उपाय पूछा.

योगिता का बुरा वक्त

पार्वती भी योगिता से चिढ़ी हुई थी. क्योंकि उस ने उस के प्रेमी सुशील को उस से छीन लिया था. इसलिए वह दोनों बहनों की मदद करने को तैयार हो गई. पार्वती ने कहा कि इस का एक ही उपाय है कि योगिता का पता ही साफ कर दिया जाए. एक दिन सुशील को शादी के किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गुजरात जाना पड़ा. अच्छा मौका देख पार्वती, सुजाता और सुधा के प्रेमी शैलेश काले ने मिल कर योगिता की हत्या की साजिश रच डाली.

वारदात के दिन पार्वती और शैलेश काले सुजाता के घर के नजदीक पहुंचे. इमारत के गेट पर मौजूद सुरक्षा गार्ड को शराब का लालच दे कर वे दोनों इमारत में प्रवेश कर गए. उस वक्त योगिता कमरे में बेड पर गहरी नींद में सोई थी. उसी का फायदा उठा कर उन्होंने नींद में ही योगिता का गला चुनरी से घोंट दिया.

उस की हत्या करने के बाद शैलेश काले ने सुजाता के प्रेमी नीरज मिश्रा को फोन कर के आटो रिक्शा लाने को कहा. उस ने नीरज को बताया कि योगिता की तबीयत खराब है, उसे डाक्टर के पास ले जाना है. फिर पार्वती ने योगिता की लाश एक कंबल में लपेट कर आटो रिक्शा में रख दी. उन्होंने जंगल में ले जा कर लाश फेंक दी.

पहली अप्रैल, 2019 को किसी शख्स की नजर लाश पर गई तो उस ने फोन पर यह जानकारी पुलिस को दे दी. सूचना पा कर थाना तुलिंज के सीनियर पीआई डानियल बेन, पीआई राकेश, हवलदार दीपक पाटिल, नायक नवनाथ वारडे को ले कर मौके पर पहुंच गए. लाश किसी महिला की थी और छिन्नभिन्न अवस्था में थी.

मौके की काररवाई के बाद पुलिस ने लाश की शिनाख्त करानी चाही लेकिन मृतका को कोई नहीं पहचान पाया. तब पुलिस ने लाश मोर्चरी में रखवा दी. हत्यारों तक पहुंचने से पहले महिला की लाश की शिनाख्त जरूरी थी, इसलिए पुलिस ने जिस जगह पर लाश मिली, उस जगह के सारे रास्तों के सीसीटीवी फुटेज की जांच की. इस में पुलिस को सफलता मिल गई.

फुटेज में एक आटोरिक्शा दिखाई दिया, जिस पर जाह्नवी लिखा था. पता लगाने पर जानकारी मिली कि आटोरिक्शा नीरज नाम के युवक का था. पुलिस ने नीरज को हिरासत में ले कर पूछताछ की तो उस ने सारी कहानी बता दी. इस के बाद पुलिस ने पार्वती माने को भी हिरासत में ले लिया.

पार्वती ने पुलिस के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने पुलिस को योगिता की हत्या की सारी कहानी सुना दी. जिस के बाद पुलिस ने 3 अप्रैल, 2019 को शैलेश काले, सुधा और सुजाता को भी हिरासत में ले लिया. पुलिस ने सभी को कोर्ट में पेश कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया.

कथा लिखे जाने तक दोनों बहनों की जमानत हो चुकी थी. मामले की तफ्तीश पीआई राकेश के. जाधव कर रहे थे.

सौजन्य- मनोहर कहानियां, मई 2019

दो पाटों के बीच : जितेंद्र ने दी प्यार की कुर्बानी

जितेंद्र सरिसाम और राधा कहार पैसों से भले ही गरीब थे, लेकिन सैक्स के मामले में किसी रईस से कम नहीं थे. भोपाल के पौश इलाके बागमुगालिया की रिहायशी कालोनी डिवाइन सिटी के एक 2 मंजिला बंगले में रहने वाले 26 वर्षीय जितेंद्र को अकसर अमीरों जैसी फीलिंग आती थी. भले ही वह जानतासमझता था कि इस महंगे डुप्लेक्स मकान में वह कुछ दिनों का मेहमान है, इस के बाद तो फिर किसी झोपड़े में आशियाना बनाना है.

दरअसल, जितेंद्र पेशे से मजदूर था. चूंकि रहने का कोई ठिकाना नहीं था, इसलिए ठेकेदार ने उसे इस शानदार मकान में रहने की इजाजत दे दी थी, जो अभी बिका नहीं था. यह कोई नई बात नहीं है क्योंकि जहांजहां भी कालोनियां बनती हैं, वहांवहां ठेकेदार या कंस्ट्रक्शन कंपनी मजदूरों को बने अधबने मकानों में रहने को कह देती हैं. इस से मकान और सामान की देखभाल भी होती रहती है और मजदूरों के वक्तबेवक्त भागने का डर भी नहीं रहता.

मध्य प्रदेश के आदिवासी बाहुल्य जिले छिंदवाड़ा की तहसील जुन्नारदेव के गांव गुरोकला का रहने वाला जितेंद्र देखने में हैंडसम लगता था और उन लाखों कम पढ़ेलिखे नौजवानों में से एक था, जो काम और रोजगार की तलाश में शहर चले आते हैं.

इन नौजवानों के बाजुओं में दम, दिलों में जोश और आंखों में सपने रहते हैं कि खूब मेहनत कर वे ढेर सा पैसा कमा कर रईसों सी जिंदगी जिएंगे. यह अलग बात है कि अपनी ही हरकतों और व्यसनों की वजह से वे कभी रईस नहीं बन पाते.

जितेंद्र भोपाल आया तो उस के सामने भी पहली समस्या काम और ठिकाने की थी. जानपहचान के दम पर भागदौड़ की तो न केवल मजदूरी का काम मिल गया बल्कि ठेकेदार ने रहने के लिए एक अधबना मकान भी दे दिया.

यह कमरा जितेंद्र के लिए जन्नत से कम साबित नहीं हुआ. आने के 4 दिन बाद ही उसे पता चला कि बगल वाले कमरे में एक अकेली औरत रहती है, जिस का नाम राधा है. बातचीत हुई और पहचान बढ़ी तो उसे यह जान कर खुशी हुई कि राधा भी उस की तरह न केवल अकेली है, बल्कि उस के ही जिले यानी छिंदवाड़ा की रहने वाली है.

35 वर्षीय राधा को देख कर कोई नहीं कह सकता था कि वह 13 साल के एक बेटे की मां भी है. गठीले कसे बदन की सांवली छरहरी राधा जैसी पड़ोसन पा कर जितेंद्र खुद को धन्य समझने लगा. जल्द ही दोनों में दोस्ती हो गई.

इस इलाके के लोग जब बाहर निकलते हैं तो उन की बातें अपने इलाके के इदगिर्द घूमती रहती हैं. जितेंद्र को राधा ने बता दिया कि उस की शादी कोई 15 साल पहले मदन कहार से हुई थी, जिस ने उसे छोड़ दिया है.

बेटा उस के पिता यानी अपने नाना के घर रहता है और जिंदगी गुजारने की गरज से वह भी उस की तरह मजदूरी कर रही है. कुल मिला कर वह इस दुनिया में अकेली है.

ऐसी ही बातों के दौरान एक दिन जितेंद्र ने उस से कहा, ‘‘अकेली कहां हो, मैं जो हूं तुम्हारा.’’

इतना सुनने के बाद राधा बहुत खुश हुई और उसी रात दोनों एकदूसरे के हो भी गए. आग और घी पास रखे जाएं तो नतीजा क्या होता है, यह जितेंद्र और राधा की हालत देख कर समझा जा सकता था. जितेंद्र ने पहली बार और राधा ने मुद्दत बाद देहसुख का आनंद लिया तो दोनों एकदूसरे की उम्मीदों पर पूरी तरह खरे उतरे.

दोनों दिन भर मजदूरी करते थे और शाम के बाद रात को एकदूसरे में समा जाते थे. धीरेधीरे दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे चूल्हाचौका एक हो गया, गृहस्थी के लिए आने वाला राशनपानी एक हो गया, खर्चे एक हो गए. फिर देखते ही देखते बिस्तर भी एक हो गया. यानी दोनों लिवइन रिलेशन में रहने लगे. दूसरे नए मजदूर साथी इन्हें मियांबीवी ही समझते थे, लेकिन पुराने जानते थे कि हकीकत क्या है.

प्यार और शरीर सुख में डूबतेउतराते जितेंद्र और राधा को दुनिया जमाने की परवाह नहीं थी कि कौन क्या कहतासोचता है. वे तो अपनी दुनिया में मस्त थे, जहां तनहाई थी, सुकून था और प्यार के अलावा रोज तरहतरह से किया जाने वाला सैक्स था,जो मजे को दो गुना, चार गुना कर देता था.

देखा जाए तो दोनों वाकई स्वर्ग की सी जिंदगी जी रहे थे, जिस में कोई बाहरी दखल नहीं था. न तो कोई कुछ पूछने वाला था और न ही कोई रोकनेटोकने वाला. इन्हें और इन की जिंदगी देख कर कोई भी रश्क कर सकता था कि जिंदगी हो तो ऐसी, प्यार और शरीर सुख में डूबी हुई जिस में गरीबी या अभाव आड़े नहीं आते.

राधा को एक गबरू जवान का सहारा मिल गया था तो जितेंद्र को ऐसी पड़ोसन मिल गई थी, जो रोज उसे तरहतरह से कुछ इस तरह प्यार देती थी कि वह निहाल हो उठता था. और कभी थकता या ऊबता नहीं था. एक मर्द और औरत को भरपेट खाने के बाद इस से ज्यादा कुछ और ख्वाहिश भी नहीं रह जाती.

राधा पर भले ही कोई बंदिश नहीं थी, लेकिन जितेंद्र पर थी. इस साल की शुरुआत से ही उस के घर वाले उस पर शादी कर लेने का दबाव बना रहे थे, जिसे शुरू में तो वह तरहतरह के बहाने बना कर टरकाता रहा, लेकिन घर वालों खासतौर से गांव में रह रहे पिता भारत सिंह को उस की दलीलों और बहानों से कोई लेनादेना नहीं था.

उन की नजर में बेटा ठीकठाक कमाने लगा था, इसलिए अब उसे शादी के बंधन में बांधना जरूरी हो चला था, जिस से वह घरगृहस्थी बसाए और बहके नहीं.

लेकिन उन्हें क्या मालूम था कि बेटा 4 साल पहले भोपाल आने के तुरंत बाद ही बहक चुका था. घर वालों का दबाव जितेंद्र पर बढ़ा तो उस ने शादी के बाबत हां कर दी.

लेकिन उस ने जब यह बात राधा को बताई तो वह बिफर उठी. उस ने साफसाफ कह दिया कि वह उसे किसी दूसरी औरत, चाहे वह उस की ब्याहता ही क्यों न हो, से बंटते नहीं देख सकती.

राधा की बात सुन कर जितेंद्र सकपका उठा. घर वालों को वह शादी के लिए न कहता तो वे भोपाल आ टपकते और राधा उस की मजबूरी को समझने के लिए तैयार नहीं थी.

अब एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई थी. धर्मसंकट में पड़े जितेंद्र ने राधा को तरहतरह से समझाया. घर वालों की दुहाई दी और यह वादा भी कर डाला कि वह होने वाली पत्नी रिनिता को भोपाल नहीं लाएगा, बल्कि बहाने बना कर उसे गांव में ही रहने देगा. अपने आशिक की इस मजबूरी से समझौता करते हुए राधा को आखिर तैयार होना ही पड़ा.

मई के महीने में जितेंद्र अपने गांव गुरीकला गया और सलैया गांव की रिनिता से उस की शादी हो गई. रिनिता काफी खूबसूरत भी थी और मासूम और भोली भी, जो शादी तय होने के बाद से ही सपने देख रही थी कि शादी के बाद वह पति के साथ भोपाल जा कर रहेगी. जब वह काम से लौटेगा तो उस के लिए अच्छाअच्छा खाना बना कर खिलाएगी और दोनों भोपाल घूमेंगेफिरेंगे.

इधर राधा चिलचिलाती गरमी के अलावा ईर्ष्या की आग में भी जल रही थी कि कहीं ऐसा न हो कि नईनवेली पत्नी के चक्कर में फंस कर जितेंद्र उसे भूल जाए और 4 साल सुख भोगने के बाद वह फिर अकेली रह जाए.

रहरह कर उसे दिख रहा था कि जितेंद्र रिनिता की मांग में सिंदूर भर रहा है, उसे मंगलसूत्र पहना रहा है और उस के साथ सात फेरे लेने के बाद सुहागरात मना रहा है.

वह जलभुन कर खाक हुई जा रही थी. राधा के पास सांत्वना देने वाली एकलौती बात यह और थी कि जितेंद्र पत्नी को साथ ले क र नहीं आएगा और फिर दोनों पहले की तरह मौजमस्ती में डूब जाएंगे.

ऐसा हुआ भी, जितेंद्र शादी के कुछ दिनों बाद जब भोपाल आया तो उस समय वह अकेला था. यह देख राधा खुशी से फूली न समाई और उस की बांहों में झूल गई.

दोनों फिर अपनी दुनिया में मशगूल हो गए. शादी के बाद रिनिता के साथ सैक्स में जितेंद्र को वह मजा कतई नहीं आया था, जो भोपाल में राधा के साथ आता था. रिनिता शर्मीली थी और सैक्स के बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानती थी, जबकि जितेंद्र पक्का खिलाड़ी था, जिसे नाजनखरे, मनाना और देरी बिलकुल पसंद नहीं आती थी.

बहाने बना कर वह रिनिता को घर छोड़ आया. जब उस ने रिनिता की कोई खोजखबर नहीं ली तो पिता भारत को चिंता हुई. लिहाजा 3 महीने इंतजार करने के बाद उन्होंने रिनिता को भोपाल भेज दिया.

अपने पिता से डरने वाला और उन का लिहाज करने वाला जितेंद्र रिनिता को भोपाल आया देख सकते में आ गया. जबकि राधा के तो मानो तनबदन में आग लग गई. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था, इसलिए वह कसमसा कर रह गई.

कुछ दिन तो दोनों सब्र का दामन थामे एकदूसरे से बेमन से दूर रहे, लेकिन अगस्त के महीने की बारिश राधा के तनमन को कुछ इस तरह सुलगा रही थी कि उस से जितेंद्र की दूरी बरदाश्त नहीं हो रही थी.

इधर रिनिता खुश थी. भीड़भाड़ वाले शहर की रौनक, मौसम और अपना घर इस नईनवेली को उत्साह और रोमांस से भर रहे थे लेकिन पति की बेरुखी की वजह से वह समझ नहीं पा रही थी. राधा को उस ने दूर से देखा भर था, जिस ने पड़ोसन होने का शिष्टाचार भी नहीं निभाया था. इसे वह शहर का दस्तूर मान कर चुप रही और रोज सजसंवर कर पति का दिल जीतने की कोशिश करती रही.

 

2 सितंबर को वह उस वक्त सन्न रह गई, जब उस ने दिनदहाड़े पति को राधा के साथ एकदम निर्वस्त्र हालत में रंगरलियां मनाते देख लिया. रिनिता पर बिजली सी गिरी. पति और पड़ोसन की बेशरमी और बेहयाई के दृश्य देख उस का सब कुछ लुट चुका था. पति की हकीकत उस के सामने थी कि क्यों वह पहले ही उस से खिंचाखिंचा रहता था.

जितेंद्र राधा के साथ रासलीला मना कर वापस आया तो भरी बैठी रिनिता ने उस से सवालजवाब करने के साथसाथ उस के नाजायज संबंधों पर पर भी सख्त ऐतराज जताया. पहले तो जितेंद्र ने सफाई दे कर उसे तरहतरह के बहाने और दलीलें दे कर बहलाने फुसलाने की कोशिश की, लेकिन कुछ देर पहले ही रिनिता ने जो देखा था, उस से कोई भी पत्नी समझौता नहीं कर सकती.

लिहाजा वह पति पर भड़क गई. बात बढ़ते देख रिनिता ने उसे धमकी दे दी कि सुबह होते ही वह ससुर को उस की सारी करतूत बता देगी.

इस पर जितेंद्र की रूह कांप उठी. उसे मालूम था कि सख्त और उसूलों के धनी उस के पिता को यह सब पता चलेगा तो वह उसे यहीं से छिंदवाड़ा तक घसीटते हुए ले जाएंगे और उस का जो हाल करेंगे, वह नाकाबिले बरदाश्त होगा.

पतिपत्नी में तूतू मैंमैं चल ही रही थी कि उसी समय राधा भी वहां आ पहुंची और जितेंद्र के पक्ष में बोलने लगी. राधा और रिनिता दोनों खूंखार बिल्लियों की तरह लड़ते हुए एकदूसरे को दोषी ठहराने लगीं.

इसी दौरान जितेंद्र ने फैसला ले लिया कि रिनिता उसे वह सुख नहीं दे सकती जोकि राधा देती है. लिहाजा उस ने उसी समय दोनों में से राधा को चुनने का फैसला ले लिया.

इस के बाद जितेंद्र ने पत्नी रिनिता की गरदन दबोच ली. राधा भी उस का साथ देने आ गई और दोनों ने उस का गला घोंट दिया. कुछ देर छटपटा कर रिनिता वहीं लुढ़क गई.

हत्या तो कर दी, लेकिन इस के बाद जितेंद्र और राधा दोनों घबरा उठे कि अब लाश का क्या करें, लेकिन कुछ तो करना ही था. उन्होंने उस की लाश बोरे में भर कर एक नाले में फेंक दी.

फिर 5 सितंबर को खुद को हैरानपरेशान दिखाता हुआ जितेंद्र बागमुगालिया थाने पहुंचा और अपनी पत्नी रिनिता की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई.

टीआई शैलेंद्र शर्मा को उस ने बताया कि उस की 22 वर्षीय पत्नी रिनिता 3 दिनों से गायब है, जिस की वह हर मुमकिन जगह तलाश कर चुका है लेकिन वह नहीं मिली. अनुभवी शैलेंद्र शर्मा ने जब सारी जानकारी ली तो उन्हें लगा कि आमतौर पर नवविवाहितों के नैतिकअनैतिक संबंध हादसे की वजह होते हैं.

उन्होंने जब और गहराई से जितेंद्र से सवालजवाब किए तो यह जान कर हैरान रह गए कि रिनिता तो भोपाल में एकदम नई थी. इसी पूछताछ में राधा का और जिक्र आया तो उन्हें कहानी कुछकुछ समझ आने लगी.

रिपोर्ट दर्ज कर टीआई ने जितेंद्र को जाने दिया, लेकन उस के पीछे अपने मुलाजिम लगा दिए, जो जल्द ही काम की यह जानकारी खोद कर ले आए कि जितेंद्र और राधा के कई सालों से नाजायज संबंध हैं और दोनों पतिपत्नी की तरह रह रहे हैं.

मामला जब भोपाल (साउथ) एसपी संपत उपाध्याय के पास पहुंचा तो उन्होंने एएसपी संजय साहू और एसडीपीओ अनिल त्रिपाठी को इस मामले की छानबीन के लिए लगा दिया.

पुलिस वालों को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी. 6 दिसंबर को इसी इलाके की एक और कालोनी रुचि लाइफस्केप के चौकीदार गोवर्धन साहू ने पुलिस को इत्तला दी कि कालोनी के पास बहने वाले नाले में एक बोरे में लाश तैर रही है.

लाश बरामद करने के लिए पुलिस टीम नाले के पास पहुंची तो लाश के बोरे के बाहर झांकते पैर साफ बता रहे थे कि वह किसी युवती की है. पुलिस बोरा खोल पाती, इस के पहले ही जितेंद्र वहां पहुंच गया और बिना लाश देखे ही कहने लगा कि यह उस की पत्नी रिनिता की लाश है.

बात अजीब थी लेकिन एक तरह से खुद जितेंद्र ने जल्दबाजी में अपने गुनाह की पोल खोल दी थी. फिर कहनेकरने को कुछ नहीं बचा था. अनिल त्रिपाठी ने जितेंद्र को बैठा कर पुलिसिया अंदाज में पूछताछ की तो उस ने सब कुछ उगल दिया, जिस की बिनाह पर राधा को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया.

दरअसल, सितंबर के पहले सप्ताह में भोपाल में जोरदार बारिश हो रही थी. हत्या के बाद जितेंद्र और राधा ने रिनिता की लाश को बोरे में बंद कर यह सोचते हुए घर से कुछ ही दूरी पर नाले में फेंक दी थी कि वह पानी में बह जाएगी और कुछ दिनों में सड़गल जाएगी. फिर किसी को हवा भी नहीं लगेगी कि रिनिता कहां गई. बाद में जितेंद्र घर वालों के सामने उस के गायब होने का कोई भी बहाना बना देगा. इस के बाद दोनों पहले जैसी ही जिंदगी जिएंगे.

 

पर लाश नहीं बही तो दोनों को चिंता हुई. जितेंद्र जिस ने 3 दिन बाद पत्नी की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाई थी, वह दरअसल बोरे की निगरानी कर रहा था कि बोरा वहां से बहे तो पिंड छूटे. 6 दिसंबर को जब चौकीदार ने पुलिस को नाले में लाश पड़ी होने की खबर दी तो वह पुलिस टीम के पीछेपीछे ही पहुंच गया और बोरा खुलने से पहले लाश की पहचान भी कर ली.

अब राधा और जितेंद्र जेल में बैठे अपने मौजमस्ती के दिन याद करते कलप रहे हैं. दोनों को सजा होनी तय है, लेकिन बड़ी गलती जितेंद्र की है, जिस ने अधेड़ प्रेमिका की हवस के लिए बेगुनाह बीवी को ठिकाने लगाना ज्यादा बेहतर समझा.

नाजायज संबंधों का ऐसा अंजाम नई बात नहीं है, लेकिन अगर जितेंद्र घर वालों से बगावत कर के और उन की परवाह न करते हुए राधा से ही शादी कर लेता तो दोनों शायद हत्या के गुनाह से भी बच जाते.

लगता नहीं कि दोनों यह सब सोच रहे होंगे, बल्कि वे सोच रहे होंगे कि रिनिता की लाश बह कर सड़गल जाती तो रास्ते का कांटा निकल जाता.

सौजन्य- सत्यकथा, नवंबर 2019