Family Crime : अवैध संबंधों में ली बेटी की जान

Family Crime : दादी के जिस कमरे में अभिरोज सोया करती थी, उसी कमरे में ज्योति ने पहले तकिए से अभिरोजप्रीत का गला दबा दिया. जब वह मरणासन्न अवस्था में हो गई तो उस ने रसोई से नमक कूटने वाली वजनी चीज से उस के सिर, मुंह, पांव, हाथ और अंगुलियों पर वार किए. उस ने उस बच्ची के हाथों और दोनों पांवों को भी तोड़ दिया. जब अभिरोज की मृत्यु हो गई तो उस की लाश को बड़ी बाल्टी में डाल कर स्कूल के पास एक वीरान छप्पर के अंदर फेंक आई. हत्या की इस खबर से गांव रामपुराफूल में सनसनी फैल गई.

पंजाब के अमृतसर के गांव रामपुराफूल से 15 मई, 2023 की रात 10 बजे अमृतसर पुलिस को सूचना मिली कि उन के गांव की 7 साल की अभिरोजप्रीत कौर, जो गांव के ही सरकारी स्कूल में कक्षा 2 की छात्रा थी, 15 मई, 2023 की शाम 4 बजे ट्यूशन पढऩे घर से निकली थी, लेकिन वह अपनी ट्यूशन टीचर के पास नहीं पहुंची. वह रास्ते में ही गायब हो गई थी. जब रात के 10 बजे तक भी उस का कोई पता नहीं चला तो उस के घर वालों ने थाने में आ कर उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

गुमशुदगी दर्ज हो जाने के बाद पुलिस हरकत में आ गई. पुलिस ने गांव में घरों के बाहर लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज चैक की तो उस में एक नया ऐंगल सामने आया. पुलिस को पता चला कि एक आदमी बाइक चला रहा था. बीच में एक बच्ची बैठी थी और बच्ची के पीछे एक औरत थी, जिस ने बच्ची को पकड़ रखा था.

इस बीच पुलिस ने अगवा हुई बच्ची के बारे में और जानकारी जुटानी शुरू की तो पता चला कि अगवा हुई बच्ची अभिरोजप्रीत कौर के पिता का नाम अजीत सिंह था. अजीत सिंह ने 2 विवाह किए थे. उन का पहला विवाह हरजीत कौर से हुआ था. उन की एक बेटी हुई, जिस का नाम अभिजोतप्रीत कौर रखा गया था. शादी के 2 साल के बाद दोनों में आपस में मनमुटाव होने लगा. दिन प्रतिदिन दोनों के आपसी संबंध बद से बदतर होते जा रहे थे. तब दोनों ने आपसी रजामंदी से संबंध विच्छेद कर दिए. अजीत सिंह ने अपनी पहली पत्नी हरजीत कौर को तलाक दे दिया और बेटी अपने पास रख ली.

उस के बाद अजीत सिंह के घर वालों ने अजीत का दूसरा विवाह ज्योति के साथ कर दिया. सब ने यही सोचा था कि बेटी अभिजोतप्रीत कौर को एक नई मां मिल जाएगी और अजीत सिंह का जीवन पटरी पर आ जाएगा. ज्योति की एक बेटी हुई जो अभी 3 माह की थी.

मां पर हुआ बेटी की हत्या का शक

पुलिस छानबीन में जब सीसीटीवी फुटेज में एक आदमी और औरत के बीच एक छोटी बच्ची दिखाई दी तो सभी का शक अजीत सिंह की पहली पत्नी हरजीत कौर पर गया, क्योंकि अभिजीतप्रीत कौर उस की बेटी थी. पुलिस पूछताछ में यह सामने आया कि जब से अभिजोतप्रीत कौर घर से गायब हुई थी, इस की खबर उस की सगी मां को मिली थी तो वह भी बहुत चिंतित थी. पुलिस ने हरजीत कौर से पूछताछ की तो वह निर्दोष पाई गई.

इधर 7 वर्षीय अभिजोतप्रीत कौर के अचानक गायब होने के बाद यह मामला सोशल मीडिया में सुर्खियों में छाता जा रहा था. अभिजोतप्रीत कौर की सौतेली मां बार बार मीडिया से अपनी बेटी को खोजने की रोरो कर गुहार लगा रही थी. ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की ओर से पुलिस पर दबाव बनाया जा रहा था. पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे.

इस के बाद पुलिस इस केस में पूरी मुस्तैदी से जुट गई और अपने मुखबिरों को भी काम पर लगा दिया. इधर अभिजोतप्रीत कौर की सौतेली मां ज्योति उस की फोटो मीडिया के सामने प्रस्तुत कर के रोरो कर अपनी बेटी को तलाशने का गुहार लगा रही थी.

सीसीटीवी कैमरे से पुलिस के हाथ लगा एक अहम सुराग

पुलिस ने पूरे गांव को सील कर के घरघर सघन तलाशी का अभियान चलाया. पूरे शहर भर में अभिजोत प्रीत कौर को ढूंढा गया, मगर पुलिस के पास हाथ अब तक कोई भी सुराग नहीं लग पाया था. लेकिन बाद में पुलिस के हाथ एक अहम सुराग लग गया. ज्योति के घर के सामने लगे सीसीटीवी कैमरे में सौतेली मां ज्योति एक बाल्टी में बच्ची के शव को ले जाते हुए दिखाई दी. उस के करीब 20 मिनट बाद वह खाली बाल्टी ले कर अपने घर पर आती दिखाई दी. सीसीटीवी फुटेज देखने के के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि अभिजोतप्रीत कौर के गायब होने में उस की सौतेली मां की भूमिका है.

कत्ल का सबूत हाथ में आते ही अमृतसर पुलिस ने हत्यारी मां ज्योति को हिरासत में ले कर उस से कड़ी पूछताछ की तो सारा मामला उजागर हो गया. उस ने अभिजोतप्रीत कौर की हत्या करने की बात स्वीकार कर ली. पुलिस ने उस की निशानदेही पर गांव के स्कूल के पास से बच्ची की लाश बरामद कर ली. इस के बाद एसएसपी सतिंदर सिंह ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर पत्रकारों को अभिजोतप्रीत की हत्या का खुलासा कर दिया.

सौतेली मां देती थी यातनाएं

मृतका अभिरोजप्रीत कौर की नृशंस हत्या की खबर जब लोगों के सामने आई तो लोगों के दिल दहल उठे थे. इस संबंध में जानकारी देते हुए मृतका अभिरोजप्रीत कौर की ट्यूशन टीचर जगमोहन कौर ने बताया कि अभिरोजप्रीत कौर 15 मई को उस के पास ट्ïयूशन के लिए नहीं आई थी. वह गांव के सरकारी स्कूल में कक्षा 2 में पढ़ती थी. पढ़ाई में वह काफी होशियार थी और स्कूल की हर गतिविधि में हमेशा सब से आगे रहती थी.

जगमोहन कौर ने बताया कि अभिरोजप्रीत कौर की सगी मां उसे छोड़ कर चली गई तो उस के पिता अजीत सिंह ने दूसरा विवाह ज्योति के साथ कर लिया था. इस के बाद तो उस मासूम बच्ची के ऊपर दुखों और यातनाओं का पहाड़ ही टूट पड़ा था. सौतेली मां ज्योति उसे यातनाएं दिया करती थी. इस के बारे में जब अभिरोजप्रीत कौर की दादी को पता चला तो वह हर रोज उसे स्कूल में छोडऩे और छुट्टी के वक्त घर लाया करती थीं. दादी का उस के प्रति काफी लगाव था. दादी स्कूल में दिन में भी उसे देखने आती रहती थी. उस की हर बात का, उस के हर सामान, कौपीकिताब, ड्रेस, खानेपीने का दादी विशेष ख्याल रखती थीं.

इस बीच दादी की तबीयत काफी खराब हो गई और उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. क्योंकि उन के स्टेंट पडऩे थे, इसलिए वह पिछले 10 दिनों से आईसीयू में वेंटिलेटर पर थीं. इसी बात का फायदा उठाते हुए सौतेली मां ज्योति ने अभिरोजप्रीत कौर की हत्या कर डाली. बेटी की मौत पर गमगीन पिता अजीत सिंह को गहरा सदमा लगा. उन्होंने बताया कि यह सोच कर ज्योति से विवाह किया था कि बेटी को भी एक मां मिल जाएगी, जो उस का सही तरह से लालनपालन कर सकेगी. लेकिन ज्योति ने शुरू से ही अभिरोजप्रीत को सच्चा प्यार नहीं दिया. बातबात पर उस से वह नाराज हो जाया करती थी. हर समय वह उसे डांटतीफटकारती रहती थी, इसलिए मेरी बेटी अपनी दादी के कमरे में ही सोया करती थी. दादी उसे बहुत प्यार करती थीं.

मां अवैध संबंधों पर डालना चाहती थी परदा

पुलिस द्वारा पूछताछ करने पर पता चला कि ज्योति की मौसी की बेटी प्रिया (काल्पनिक नाम) गांव के किसी युवक के साथ प्रेम करती थी. उन दोनों प्रेमियों को अभिरोजप्रीत ने एक दिन आपत्तिजनक हालत में देख लिया था. तब बहन ने यह बात ज्योति को बता दी थी. इस पर ज्योति अभिरोज को यह बात किसी को न बताने की हर समय चेतावनी देती रहती थी. बाद में ज्योति ने यह सोचा कि कहीं अभिरोजप्रीत ने अवैध संबंधों की यह बात घर वालों या गांव के किसी व्यक्ति को बता दी तो उस की बहन और उस के परिवार की सारे गांव में बदनामी हो सकती है. इसलिए उस ने अभिरोजप्रीत कौर का मर्डर करने का फैसला कर लिया.

पता चला कि दादी के जिस कमरे में अभिरोज सोया करती थी, उसी कमरे में ज्योति ने पहले तकिए से अभिरोजप्रीत का गला दबा दिया. जब वह मरणासन्न अवस्था में हो गई तो उस ने रसोई से नमक कूटने वाली वजन चीज से उस के सिर, मुंह, पांव, हाथ और अंगुलियों पर वार किए. उस ने उस बच्ची के हाथों और दोनों पांवों को भी तोड़ दिया. जब अभिरोज की मृत्यु हो गई तो उस की लाश को बड़ी बाल्टी में डाल कर स्कूल के पास एक वीरान छप्पर के अंदर फेंक आई. हत्या की इस खबर से गांव रामपुराफूल में सनसनी फैल गई.

ज्योति से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पश कर जेल भेज दिया. ज्योति की मौसेरी बहन का हत्या में कोई सहयोग था या नहीं, इस बारे में पुलिस की जांच की जारी थी. Family Crime

—कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित है.

Love Story : बड़ी भाभी का दीवाना देवर 

Love Story : भोपाल से 35 किलोमीटर दूर बैरसिया तहसील हमेशा से अनदेखी का शिकार रही है, जिस का फर्क यहां की जिंदगी पर भी पड़ा है. इस इलाके के पिछड़ेपन के चलते यहां अपराध की दर उम्मीद से ज्यादा है. जंगलों से घिरे बैरसिया के बाहरी इलाकों में आए दिन हत्या की वारदातें होती रहती हैं.

ऐसी ही एक वारदात बीती 26 नवंबर को हुई थी. उन दिनों पूरे मध्यप्रदेश की तरह इस क्षेत्र में भी चुनावी चर्चा और गतिविधियां शवाब पर थीं. चुनाव के वक्त पुलिस वालों को सोने के लिए वक्त नहीं मिलता. उस रात करीब 12 बजे नजीराबाद थाने के इंचार्ज योगेंद्र परमार थाने में बैठे कामकाज निपटा रहे थे कि तभी अधेड़ उम्र के एक शख्स ने थाने में कदम रखा. इतनी रात गए जो भी थाने आता है वह कोई बुरी खबर ही लाता है, यह बात योगेंद्र परमार जानते थे. वह उस व्यक्ति के चेहरे की बदहवासी देख कर ही समझ गए कि जो भी होगी, अच्छी खबर नहीं होगी. लेकिन उन्हें यह पता नहीं था कि खबर हत्या की होगी.

आगंतुक ने अपना नाम लक्ष्मण सिंह गुर्जर, निवासी चंद्रपुर गांव बताया. लक्ष्मण सिंह ने आते ही परमार को बताया कि उस के भाई सोनाथ सिंह की हत्या हो गई है और उस की लाश गांव में उस के घर पर पड़ी है. योगेंद्र परमार ने बिना वक्त गंवाए टेबिल पर बिखरे पड़े कागजात समेटे और लक्ष्मण सिंह के साथ चंद्रपुर गांव की रवानगी डाल दी. उन्होंने कुछ सिपाही भी साथ ले लिए थे. जातेजाते उन्होंने थाना क्षेत्र में हुई हत्या की खबर एसडीपीओ संजीव कुमार सिंह को भी दे दी.

घटनास्थल गांव के कोने का एक मकान था, जहां एक कमरे में 40 वर्षीय सोनाथ सिंह की लाश पड़ी थी. लाश के आसपास काफी मात्रा में खून फैला था. पहली नजर में ही समझ आ रहा था कि हत्या पूरी बेरहमी से की गई है, क्योंकि सोनाथ सिंह की गर्दन पर धारदार हथियार के आधा दर्जन से भी ज्यादा जख्म दिख रहे थे. अंदाजा लगाया जा सकता था कि ये निशान कुल्हाड़ी या फरसे के हैं, जिन का गांवों में अकसर इस्तेमाल होता है.

लाश पर भरपूर नजर डाल कर योगेंद्र परमार ने जब लक्ष्मण सिंह से हत्या के बारे में पूछा तो उस ने कुछ बातें चौंका देने वाली बताईं, जिस से योगेंद्र परमार समझ गए कि मामला जर, जोरू और जमीन में से जोरू का है. बकौल लक्ष्मण सिंह जब वह खेत में पानी दे कर घर लौट रहा था तो उस ने गांव के बाहर अपनी भाभी भूलीबाई को भागते हुए देखा था. इतनी रात गए भाभी, भतीजी को ले कर कहां जा रही है, इस बात से चौंके लक्ष्मण सिंह ने भूलीबाई को रोक कर जब उस से बात करनी चाही तो बजाए रुकने के उस ने अपने कदमों की गति और बढ़ा दी.

लक्ष्मण सिंह ही नहीं, यह बात पूरा गांव जानता था कि भूलीबाई और सोनाथ सिंह में आए दिन लड़ाईझगड़ा होता रहता है. इसलिए उस ने यह अंदाजा लगाया कि दोनों में किसी बात पर चिकचिक हुई होगी. इसलिए भाभी यूं घर छोड़ जा रही है. पास के ही गांव कढ़ैया में उस का मायका था. आखिर हुआ क्या, यह जानने के लिए लक्ष्मण सिंह सोनाथ सिंह के घर पहुंचा तो वहां उस का सामना भाई की लाश से हुआ. इस के बाद यह खबर देने के लिए वह थाने जा पहुंचा था.

पति की हत्या पर भूलीबाई ने कोई शोरशराबा नहीं मचाया था और न ही किसी से मदद की गुहार लगाई थी. यह बात ही उसे शक के कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी थी. लेकिन अंदाजे की बिना पर किसी नतीजे पर पहुंच जाना समझदारी नहीं थी, इसलिए योगेंद्र परमार ने तुरंत पुलिस टीम भेज कर भूलीबाई को थाने बुलवा लिया.

भूलीबाई के थाने आने से पहले की गई पूछताछ में पुलिस वालों को कोई खास जानकारी हाथ नहीं लगी थी, सिवाय इस के कि मांगीलाल ने अपनी जमीन दोनों बेटों में बराबर बांट दी थी. लेकिन जमीन इतनी नहीं थी कि उस से किसी एक परिवार का भी गुजारा हो पाता इसलिए सोनाथ सिंह रोजगार की तलाश में बाहर चला गया था. लेकिन साल में कुछ दिनों के लिए वह गांव जरूर आता था. उस की गैरमौजूदगी में भूलीबाई खेतीकिसानी संभालती थी. दोनों बच्चों में से बेटे को उस ने अपने मायके में छोड़ रखा था.

इन जानकारियों से एक कहानी तो आकार लेती दिख रही थी, जिस में भूलीबाई का रोल अहम था. लेकिन पुलिस किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी. ऐसे में भूलीबाई के बयान ही सोनाथ सिंह की हत्या पर पड़ा परदा उठा सकते थे. थाने आ कर अच्छेअच्छे मुलजिमों के हौसले पस्त पड़ जाते हैं, फिर भूलीबाई की क्या बिसात थी. लेकिन इस के बाद भी वह अनाडि़यों की तरह ही सही पुलिस को गुमराह करने की कोशिश करती रही.

पहले तो उस ने अपने देवर लक्ष्मण सिंह को ही फंसाने की गरज से यह बयान दे डाला कि जमीन जायदाद के लालच में उस ने सोनाथ की हत्या की है. साथ ही यह भी कि इस में उस के अलावा और लोग भी शामिल हैं. ये और लोग कौन हैं, इस सवाल पर वह चुप रही. बात यहां तक तो सच लग रही थी कि सोनाथ सिंह की हत्या में एक से ज्यादा लोग शामिल हैं, क्योंकि एक हट्टेकट्टे मर्द को काबू करना आसान बात नहीं थी. दूसरे घटनास्थल पर किसी तरह के संघर्ष के निशान भी नजर नहीं आ रहे थे, इस का सीधा सा मतलब यह निकल रहा था कि पहले सोनाथ को काबू किया गया, फिर उस पर धारदार हथियार से प्रहार किए गए.

जाहिर था, हत्या अगर भूलीबाई ने की थी तो कोई न कोई उस का संगीसाथी रहा होगा. लक्ष्मण सिंह पर शक करने की कोई वजह पुलिस वालों को समझ नहीं आ रही थी, क्योंकि वह कोई कहानी गढ़ता या झूठ बोलता नहीं लग रहा था. उलट इस के भूलीबाई अपने बयानों में गड़बड़ा रही थी. पुलिस ने जब सख्ती दिखाई तो कुछ ही देर में उस ने अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि सोनाथ सिंह उस के चालचलन पर शक करता और मारतापीटता था, इसलिए उस ने पति की हत्या कर दी.

लेकिन भूलीबाई ने पूरी बात अभी भी नहीं बताई थी. यह तो कोई बच्चा भी कह सकता था कि एक अकेली औरत धारदार हथियार से लगातार इतने वार, वे भी सोनाथ जैसे तगड़े मर्द पर, नहीं कर सकती थी. अब पुलिस को उस के और टूटने का इंतजार था, जिस से कत्ल की इस वारदात का पूरा सच सामने आ जाए. सोनाथ सिंह की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी गई थी. दूसरी कानूनी औपचारिकताएं भी पुलिस वालों ने पूरी कर ली थीं. सुबह होतेहोते सोनाथ की हत्या की खबर पूरे इलाके में फैल चुकी थी. लोग चुनावी चर्चा छोड़ तरहतरह की बातें करने लगे थे.

भरेपूरे बदन की भूलीबाई को देख कोई भी यह नहीं कह सकता था कि वह 2 बच्चों की मां है. 35 की उम्र में खासी जवान दिखने वाली भूलीबाई ने आखिरकार पति की हत्या क्यों की होगी, यह राज भी सुबह का सूरज उगने से पहले उस ने उगल ही दिया. पता चला कि इस वारदात में उस का चचेरा देवर प्रेम सिंह और उस का एक दोस्त पन्नालाल भी शामिल थे. नाजायज संबंध का जो शक किया जा रहा था, वह सच निकला. हुआ यूं था कि उम्र में आधा रिश्ते का देवर प्रेमसिंह भूलीबाई को दिल दे बैठा था. आजकल हर हाथ में मोबाइल है, जिस का उपयोग प्रेमसिंह जैसे नौजवान पोर्न फिल्में देखने में ज्यादा करते हैं.

दिनरात ऐसी ही अश्लील और सैक्सी वीडियो के समंदर में डूबे प्रेमसिंह को औरत की तलब लगने लगी थी, पर प्यास मिटाने का जरिया उसे नजर नहीं आ रहा था. हालांकि गांव में लड़कियों की कमी नहीं थी, लेकिन पिछड़ेपन के चलते और प्राइवेसी न होने के कारण किसी को पटा पाना आसान काम नहीं था. इन दिनों गांवों में निकम्मे और अय्याश किस्म के नौजवानों की तादाद तेजी से बढ़ रही है. उन में से एक प्रेमसिंह का दोस्त पन्नालाल भी था.

एक दिन प्रेमसिंह ने जब अपनी जरूरत पन्नालाल को खुल कर बताई तो वह हंस कर बोला, ‘‘लो, बगल में छोरा और गांव में ढिंढोरा.’’

इशारे में कही इस बात को प्रेमसिंह समझ नहीं पाया. लेकिन उम्मीद की एक किरण तो उसे बंधी थी कि पन्नालाल खेला खाया आदमी है, जो उस के लिए जरूर किसी औरत का इंतजाम कर देगा. जल्द ही दारूमुर्गे की एक दावत हुई, जिस में पन्नालाल ने खुल कर उस से कहा कि तू अपनी भाभी भूलीबाई पर लाइन मार, काम बन जाएगा. बात का खुलासा करते हुए पन्नालाल ने उस की मनोवैज्ञानिक और शारीरिक वजहें भी बताईं. मसलन, तेरा चचेरा भाई साल भर बाहर रहता है, ऐसे में भूलीबाई को मर्द की जरूरत तो पड़ती ही होगी. भूलीबाई किसी को घास नहीं डालती, लेकिन तू ट्राई करेगा तो बात बन भी सकती है.

बात प्रेमसिंह की समझ में आ गई और उस रात वह सो नहीं पाया. रातभर ख्वाबों खयालों में वह भूलीबाई को उसी तरह लपेटे सैक्स करता रहा, जैसा कि पोर्न वीडियो में वह देखता था. इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए प्रेमसिंह अकसर भूलीबाई के घर जा कर बैठने लगा. यह बात भी उसे समझ आ गई थी कि जल्दबाजी, बेसब्री और हड़बड़ाहट दिखाने से बात बिगड़ भी सकती है, इसलिए पहले औरत का दिल जीतो, फिर जिस्म तो वह खुद ही सौंप देती है.

इसी आनेजाने में वह रोज भूलीबाई के अंगों और उभारों को देखता था तो पागल सा हो जाता था. लेकिन प्रेमसिंह मौके की तलाश में था और दिल जीतने की राह पर चल रहा था. छोटे मोटे कामों में वह अपनी भाभी की मदद करने लगा था. यहां तक कि वह पैसा खर्च करने में भी नहीं हिचकता था. अच्छी बात यह थी कि उस पर कोई शक नहीं करता था, क्योंकि वह था तो परिवार के सदस्य सरीखा ही.

भूलीबाई को भी अब समझ आने लगा था कि जिस देवर को शादी के बाद उस ने गोद में खिलाया था, वह कौन सा खेल खेलने की जुगत में आता जाता है. जल्द ही उस की झिझक दूर होने लगी और पन्नालाल की यह सलाह साकार होती दिखने लगी कि एक बार भी सैक्स का लुत्फ उठा चुकी औरत सैक्स के बगैर ज्यादा दिन नहीं रह सकती. अब दिक्कत यह थी कि प्रेमसिंह पहल कैसे करे. भूलीबाई उस की द्विअर्थी बातों पर हंस कर उसे शह देने लगी थी और इशारों में यदाकदा हल्कीफुल्की सैक्स की बातें भी कर लेती थी. लेकिन प्रेमसिंह को डर इस बात का था कि कहीं ऐसा न हो कि वह पहल करे और भाभी झिड़क दे. डर इस बात का भी था कि भूलीबाई ने अगर घर में शिकायत कर दी तो उस की खासी पिटाई होगी.

लेकिन जिस राह पर दोनों चल पडे़ थे, उस में बहाना खुद चाहने वालों को नजदीक लाने का मौका ढूंढ लेता है. एक दिन यूं ही बातोंबातों में प्रेमसिंह ने डरतेडरते भूलीबाई को एक पोर्न फिल्म दिखा डाली तो भूलीबाई की भी कनपटियां गर्म हो उठीं. इस फिल्म में वह सब बल्कि उस से भी ज्यादा मौजूद था, जो वह सोचती रहती थी. बस फिर क्या था, एक दिन झिझक की दीवार टूटी तो दोनों बेशर्मी के समंदर में गोता लगा बैठे.

अब यह रोजरोज का काम हो चला था. कोई रोकटोक न होने से दोनों सैक्स का यह खेल आए दिन खेलने लगे. प्रेमसिंह ने भूलीबाई पर वे सारे टिप्स और तौरतरीके आजमा डाले जो पोर्न फिल्मों में दिखाए जाते हैं. मुद्दत से संसर्ग के लिए तरस रही भूलीबाई के लिए कुछ अनुभव एकदम नए और रोमांचक थे. भूलीबाई के पास पुराना तजुर्बा था और प्रेमसिंह के पास नया जोश. सैक्स के दरिया में दोनों ऐसे डूबे कि उन्हें इस बात का भी होश नहीं रहा कि जो वे कर रहे हैं वह गैरकानूनी न सही लेकिन खतरनाक तो है.

हर साल की तरह बीती दीवाली पर भी सोनाथ सिंह गांव आया. लेकिन जब उस ने यह बताया कि इस बार वह 4-6 दिन नहीं बल्कि महीने भर से भी ज्यादा रुकेगा, तो भूलीबाई बजाय खुश होने के इस गम में डूब गई कि जब तक सोनाथ रुकेगा तब तक वह अपने किशोर प्रेमी से सैक्स का लुत्फ नहीं उठा पाएगी. यही हाल प्रेमसिंह का था, जो अब एक दिन भी भूलीबाई के बगैर नहीं रह पाता था. वह मन ही मन भूलीबाई भाभी से प्यार भी करने लगा था. यह बेमेल प्यार भले ही शरीर की जरूरत भर था, जिसे वह खुद नहीं समझ पा रहा था.

सोनाथ ने ज्यादा दिन रुकने का फैसला बेवजह नहीं लिया था, बल्कि उसे भूलीबाई पर शक हो चला था. इस की पहली वजह तो यह थी कि भूलीबाई अब पहले की तरह सैक्स के लिए उतावली नहीं होती थी और दूसरी वजह वे बातें थीं जो उस ने उड़ते उड़ते सुनी थीं. सोनाथ के पास अपने शक को ले कर कोई प्रमाण नहीं था, इसलिए वह गुपचुप भूलीबाई की निगरानी करने लगा. फिर एक दिन उस ने भूलीबाई और प्रेमसिंह को नग्नावस्था में रंगरलियां मनाते रंगेहाथों पकड़ लिया. बात आई गई नहीं हुई, बल्कि सोनाथ को अब गांव के लोगों की कही पुरानी कहावत याद आने लगी कि खेती खुद न करो तो जमीन कोई और जोतने लगता है. यही बात औरत पर भी लागू होती है.

पत्नी की इस चरित्रहीनता को न तो वह पेट में पचाए रख सकता था और न ही सार्वजनिक कर सकता था, क्योंकि इस से जगहंसाई उस की ही होनी थी. ठंडे दिमाग से विचार करने पर उस ने अब गांव में ही रहने का फैसला कर लिया, इस से भूलीबाई और प्रेमसिंह दोनों परेशान हो उठे, जिन्हें एकदूसरे का चस्का लग चुका था. यही लत उन्हें चोरी छिपे मिलने के लिए उकसाने लगी. सोनाथ ने पत्नी से पहले ही कह दिया था कि अब अगर वह प्रेमसिंह से मिली तो खैर नहीं.

पर वह यह भूल रहा था कि खैर तो अब उस की नहीं थी. एक दिन उस ने भूलीबाई को फोन पर बात करते पकड़ लिया, तो उस की खासी धुनाई कर डाली. यह बात जब प्रेमसिंह को पता चली तो उस का खून खौल उठा. अपने इकलौते इश्किया सलाहकार पन्नालाल को उस ने बताया कि अब उस से भूलीबाई की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही है. दूसरे अगर सोनाथ भूलीबाई की पिटाई करे, यह उस से बरदाश्त नहीं हो रहा है. तैश में आ कर फिल्मी स्टाइल में उस ने सोनाथ के वे हाथ काट डालने की बात भी कह डाली, जो भूलीबाई पर उठे थे.

इस पर पन्नालाल ने बजाए समझाने के आग में घी डालते हुए कहा कि अकेले हाथ काटने से कुछ हासिल नहीं होगा, उलटे सोनाथ पुलिस में सारी बात बता देगा. अगर कांटे को जड़ से खत्म करना है तो सोनाथ की गरदन ही उड़ानी पड़ेगी.

बस फिर क्या था दोनों ने मिल कर सोनाथ के कत्ल की योजना बना डाली. दूसरी ओर वासना की आग में तड़प रही भूलीबाई भी उन का साथ देने तैयार हो गई. पन्नालाल ने प्रेमसिंह को यह भी मशविरा दिया कि सोनाथ के कत्ल के पहले वह जी भर कर भूलीबाई के जिस्म का सुख उठा ले, नहीं तो फिर 13 दिन मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि इस दौरान भूलीबाई शोक में होगी और उस के आसपास कोई न कोई बना रहेगा.

ये तमाम बातें इस ढंग से हुईं, इस्तेमाल  मानो इन्हें कत्ल नहीं करना बल्कि बकरी का बच्चा पकड़ना है. हादसे की रात सोनाथ सिंह के गहरी नींद सो जाने के बाद भूलीबाई ने घर का दरवाजा खोला और प्रेमसिंह को अंदर बुला लिया. पहले तो दोनों ने जी भर के जिस्मों की प्यास बुझाई और फिर पन्नालाल को बुला कर हमेशा के लिए सोनाथ की जिंदगी का चिराग बुझा डाला.

सो रहे सोनाथ पर प्रेमसिंह और पन्नालाल ने कुल्हाड़ी से वार किए. इस दौरान भूलीबाई ने पति के पैर पकड़ रखे थे, सोनाथ सिंह नींद में ही नीचे से ऊपर कब पहुंच गया, यह उसे भी पता नहीं चला. प्लान के मुताबिक भूलीबाई बेटी को गोद में उठा कर भागी, लेकिन इत्तफाकन लक्ष्मण ने उसे देख लिया और तीनों पकड़े गए. जो अब जेल में अपनी करनी की सजा भुगत रहे हैं. Love Story

Crime Story in Hindi : बैंकाक का सैक्स स्कैंडल

Crime Story in Hindi : 34 साल की विलावान सिका गोल्फ एम्सावत उर्फ मिस गोल्फ ऐसी सुंदरी थी, जो अच्छेअच्छे संन्यासियों तक को अपने रूपजाल में फांस लेती थी. अपनी मोहिनी अदा के चलते उस ने बैंकाक के प्रसिद्ध बौद्ध मंदिरों के मठाधीशों से न सिर्फ अवैध संबंध बनाए, बल्कि उन के अश्लील फोटो व वीडियो के जरिए उन से 91 करोड़ से अधिक रुपए भी वसूले. आखिर मिस गोल्फ कैसे फांसती थी बौद्ध संन्यासियों को अपने जाल में?

थाईलैंड के बैंकाक में स्थित वाट त्रि थोत्सथेप वोराविहान बौद्ध मंदिर के मठाधीश चाओखुन अर्ज एक आकर्षक कदकाठी का व्यक्ति है. उस की दैहिक बनावट, बौडी लैंग्वेज और बातचीत करने के लहजे को देख कर कोई भी उस की उम्र 58 वर्ष होने का अनुमान नहीं लगा पाता था. यह कहें कि वह किसी फिल्मी नायक की तरह जवान दिखता था. उस की सोच पर भी उम्र का कोई असर नहीं हुआ था. कहने को वह बौद्ध धर्म का एक संत था, लेकिन आधुनिक सोच से भरा हुआ था. उस की बातें नए जमाने के गैजेट और इंटरनेट और सोशल मीडिया फ्रेंडली युवाओं की तरह होती थीं.

चाओखुन अर्ज का असली नाम फ्राथेप वाचिरापामोक था, लेकिन वह मठ के लोगों के बीच अर्ज के नाम से लोकप्रिय था. त्रि थोत्सथेप वोराविहान थाईलैंड के सब से महत्त्वपूर्ण बौद्ध मंदिरों में से एक है. इस का ऐतिहासिक महत्त्व है. इस का निर्माण 19वीं सदी में वहां के तत्कालीन राजतंत्र के शासक द्वारा किया गया था. इस की भव्यता में शाही झलक दिखती है. यहां सभी तरह की आधुनिक और उत्तम रहनसहन की सुविधाएं उपलब्ध हैं. चाओखुन जब से मठाधीश के पद पर नियुक्त हुआ था, तब से उसे मंदिर प्रशासन की तरफ से शाही सुविधाएं और संसाधन मिल गए थे.

साथ ही उस के पास अपने निजी कामकाज के लिए पर्याप्त समय भी होता था. जब भी वह फुरसत में होता, अपना लैपटाप खोल कर देशदुनिया से जुड़ जाता था, उस ने फेसबुक पर अपनी आईडी भी बना रखी थी. उस के हजारों में वर्चुअल फ्रेंड थे. उन के साथ वह अध्यात्म, सेहत, सलाह और समाज सरोकार की बातें करता रहता था. इस दौरान उस की नजर रील्स, गेम्स, औफर आदि पर बनी रहती थी.

वह इस में कम से कम 2 से 3 घंटे तक गुजारता था. फेसबुक में नएनए दोस्त तलाशने से ले कर उस के बारे में जांचपड़ताल करने आदि पर ध्यान देता था. वैसे तो वह फ्रेंड रिक्वेस्ट को बहुत सोचसमझ कर ही स्वीकारता था. हालांकि उन में अधिकतर उस के परिचित या फिर अनुयायी थे. उन के साथ फेसबुक, वाट्सऐप और मैसेंजर के माध्यम से संपर्क बनाता था. वह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत या पारिवारिक समस्या या परेशानी से निकालने का भी काम करता था.

बात 16 मई, 2024 की थी. रात का वक्त था. पूरे बौद्ध मठ का परिसर नींद के आगोश में था. नि:शब्द शांति थी. इसी एकांत में चाओखुन अर्ज की अंगुलियां लैपटाप के कीबोर्ड पर चल रही थीं. सामने स्क्रीन पर फेसबुक से निकली रोशनी में उस के चेहरे पर चमक बनी हुई थी. माउस पैड में अंगुली सरकाते हुए अचानक उस की नजर एक रिक्वेस्ट पर ठहर गई. बेहद खूबसूरत तसवीर थी. दोस्ती करना चाहती थी. चाओखुन ने तुरंत उस की प्रोफाइल खोली. उस का अबाउट पढऩा शुरू किया.

नाम विलावान सिका गोल्फ एम्सावत उर्फ मिस गोल्फ लिखा था. उम्र 34 वर्ष थी. प्रोफाइल में उस ने स्वयं को नोनयाबुरी में एक आलीशान विला की मालकिन और महिला उद्यमी बताया था. उस ने खुद को बौद्ध धर्म का अनुयायी बताया था. वह चाओखुन अर्ज की पहले से ही फालोअर भी थी. मिस गोल्फ की प्रोफाइल में कई तसवीरें भी थीं. कई तसवीरों में अल्ट्रा मौडर्न ड्रेस पहने थी.

उस की तसवीरों ने संन्यासी चाओखुन की कामुकता को उकसा दिया था. एक बार मन भटका तो मिस गोल्फ की सुंदरता और सैक्स अपील का कीड़ा उस संत के मस्तिष्क को कुरेदने लगा था. फिर उस की अंगुली ने कब रिक्वेस्ट बटन को दबा दिया, पता ही नहीं चला. अगले पल संन्यासी का मन कुछ और जिज्ञासाओं से भर गया था. मैसेजिंग शुरू कर दिया. ‘हाय!’ के बाद दनादन 2-3 सवाल कर डाले…

”कहां से हैं?’’

”क्या करती हैं?’’

”आप की सुंदरता का राज क्या है?’’

इन के जवाब में उस ने लिखा, ”मैं महसूस करती हूं कि आप के दिल के करीब हूं… आप से फ्रेंडशिप कर भाग्यशाली बनना चाहती हूं. देखिए, आप से दोस्ती के बगैर मेरी आध्यात्मिक पिपासा शांत नहीं हो पाएगी. मन को शांति के लिए जरूरी है, संत समागम किया जाए!’’

मिस गोल्फ का भावुक मैसेज चाओखुन अर्ज के दिल की गहराइयों तक चला गया था. वह खुद को चाह कर भी नहीं रोक पाया और धड़कते दिल से अपनी इस नई दोस्त पर लिख डाला, ‘मिस गोल्फ! जितनी सुंदर आप हो, उस से अधिक खूबसूरत आप के शब्द! मन आनंदित हो गया!’

दोनों के दिलों में भावनाओं का उफान आ चुका था. दनादन मैसेजिंग का दौर शुरू हो गया. काफी समय तक यह सब चलता रहा. वह चाओखुन के लिए बहुत ही खुशनुमा था. फिर वह सो गया. अच्छी नींद आई. अगले रोज दिनचर्या में लगा हुआ था…

उस के भीतर एक नई सी स्मृति का संचार हो गया था. हर काम को वह बड़ी समझदारी और मुसकराते हुए कर रहा था, लेकिन उस की आंखें बारबार हाल में टंगी दीवार घड़ी पर भी बराबर लगी हुई थीं. आज समय उसे काफी बड़ा और लंबा सा लग रहा था. जैसेतैसे चाओखुन ने रात के 9 बजे तक का समय किसी तरह पास किया. रात के भोजन करने के बाद उस ने अपने सभी अनुचरों को छुट्टी दे दी. अब वह हमेशा की तरह अपने एकांत के निजी समय में था, किंतु उस रात उस में गजब का उतावलापन था. लैपटाप औन करते ही तुरंत फेसबुक के अपने पेज पर था. कई मैसेज उस के जवाब के इंतजार में थे.

मैसेज को पढऩे के बाद चाओखुन अर्ज के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. वह मैसेज मिस गोल्फ के थे. अपने प्रतिष्ठित पद की गरिमा और मैसेज भेजने वाली की उम्र के अंतर को ले कर वह सतर्कता बरतना चाहता था. तभी ‘गुड नाइट!’ के साथ ‘हाय हैंडसम!’ का मैसेज आया.

चाओखुन ने भी जवाब में ‘हैलो!…हाउ आर यू?’ लिख दिया.

”आप की फ्रेंडशिप पा कर बहुत खुशी हुई है. मैं आप को दिल से शुक्रिया अदा करती हूं. मेरे लिए यह प्यार की तरह मिला उपहार है. मैं कितनी खुश हूं, इस का बयान नहीं कर सकती. इस के लिए आप का तहेदिल से धन्यवाद करती हूं मिस्टर चाओखुन! आप बहुत हैंडसम दिखते हैं… कितनी उम्र होगी आप की?’’ मिस गोल्फ ने लिखा.

”जी, 2 साल बाद 60 का हो जाऊंगा.’’ चाओखुन ने लिखा.

”अच्छा! लेकिन लगते तो 40 प्लस के हैं.’’ मिस गोल्फ ने हैरानी जताई.

”तुम भी तो 20 प्लस की दिखती हो, लेकिन प्रोफाइल के अनुसार 33 साल की हो. ईश्वर ने गजब की सुंदरता दी है. भाग्यशाली हो!’’

”मुझे आज तक आप जैसा हैंडसम इंसान ही नहीं मिला, आप को पा कर धन्य हो गई हूं… मिलना चाहूंगी.’’ इसी के साथ गोल्फ ने प्यार का धड़कता हुआ इमोजी भेज दिया.

”किंतु मिस गोल्फ, आप को दोस्ती और प्यार करने के लिए बहुत से नौजवान मिल सकते थे, फिर मैं ही क्यों?’’ चाओखुन ने गोल्फ के इशारे को समझते हुए लिखा.

”मैं उम्र से नहीं, बल्कि वैसा पुरुष चाहती हूं, जिस में पुरुषार्थ हो. गंभीरता हो. विचार हो. आजादी पसंद हो. व्यवहारिक हो. आस्थावान हो… अब भला आप से बेहतर मेरे लिए और कोई नहीं हो सकता. प्यार तो आंतरिक भावना की अनुभूति है… मुझे तो ऐसा लगता है, जैसे वह सभी गुण आप में हैं और मेरी चाहत आप को पा कर पूरी हो गई.’’ मिस गोल्फ ने लिखा.

”तुम बातें बहुत लुभावनी करती हो. मन मोह लिया.’’

”क्यों न हम लोग कहीं मिलें?’’

”जरूर, जल्द समय बताऊंगा.’’

इस के बाद चाओखुन और मिस गोल्फ का प्यार तेजी से परवान चढऩे लगा था. पहले वे वर्चुअल थे, जल्द ही दोनों वास्तविकता की धरातल पर आ चुके थे. उन का आपस में मिलनाजुलना भी शुरू हो गया… और चाओखुन अर्ज ने अपने संत की गरिमा, मानमर्यादा और संकल्प के बावजदू गोल्फ के साथ अवैध संबंध तक बना लिया. कहते हैं न कि सुखचैन की बंसी ज्यादा समय तक नहीं बजती. अगर यह बंसी अय्याशी से भरी हो, तब तो कभी भी इस पर ग्रहण लग सकता है. ऐसा ही कुछ बौद्ध संत चाओखुन अर्ज के साथ हुआ.

चाओखुन अर्ज और गोल्फ की मौजमस्ती एक साल तक खूब परवान चढ़ी. उन के बीच काफी लेनदेन हुआ. इस का अड्डा मिस गोल्फ का आलीशान घर था, जहां अय्याशी के सारे संसाधन थे. चाओखुन ने इसे अपने शौक में शामिल कर लिया था, जबकि गोल्फ के लिए यह आमदनी का जरिया था. गोल्फ अपने कामधंधे को सात तालों में छिपा कर रखती थी. इस बारे में उस ने कभी भी चाओखुन को कुछ नहीं बताया. फिर भी न जाने कैसे गोल्फ के कुछ कारनामों की जानकारी बैंकाक की पुलिस को हो गई.

पुलिस को मिलीं 56 हजार पोर्न वीडियो

अचानक जुलाई 2025 के पहले सप्ताह में मिस गोल्फ के महलनुमा घर पर छापेमारी हुई. उसे जानने वाले लोग हैरान रह गए कि आखिर गोल्फ ने क्या किया, जो उस के घर पर पुलिस की पूरी फौज आ गई. थाईलैंड सरकार की नजर में उस ने क्या गैरकानूनी काम किया? खैर, इस का खुलासा 15 जुलाई, 2025 को हो गया. चौतरफा सनसनीखेज खबर फैल गई. जिस ने भी उस बारे में सुना, उस ने दांतों तले अंगुली दबा ली. और फिर यह मामला पूरी दुनिया में फैल गया.

दरअसल, थाइलैंड पुलिस ने एक बड़े सैक्स ब्लैकमेल रैकेट का खुलासा किया था. इस बारे में सबूत जुटाए थे. उस में लिप्त लोगों में बौद्ध भिक्षुकों की सूची भी थी, जबकि इस का मुख्य आरोपी मिस गोल्फ थी. उस के घर से 56,000 पोर्न यानी अश्लील वीडियो और 80,000 न्यूड तसवीरें बरामद की गई थीं. उस में उन बौद्ध भिक्षुओं के अश्लील अय्याशी के वीडियो थे, जिन्होंने बौद्ध धर्म में त्याग, पवित्रता और संन्यास की सौगंध खाई थी. उन्हीं भिक्षुओं में चाओखुन अर्ज का नाम भी था. उस के गोल्फ के साथ अंतरंग संबंधों के कई वीडियो थे.

इस मामले में पकड़ी गई 35 साल की विलावान सिका गोल्फ एम्सावत उर्फ मिस गोल्फ पर कई बौद्ध भिक्षुकों को यौन संबंध बनाने के लिए उकसाने और फिर उन्हें ब्लैकमेल करने का आरोप लगा. रौयल थाई पुलिस सेंट्रल इनवैस्टिगेशन ब्यूरो के अनुसार उस के घर की तलाशी के दौरान बौद्ध भिक्षुकों को ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल की गई हजारों अश्लील तसवीरें और हजारों अश्लील वीडियो जब्त कर लिए. साथ ही इस में संलिप्त थाईलैंड के 9 बौद्ध भिक्षुकों के नाम सामने आने के बाद उन्हें उन के मठों से निष्काषित कर दिया गया.

पुलिस को बैंकाक के उत्तर में नौथबुरी प्रांत में रहने वाली मिस गोल्फ के पास से कई चोरी के सामान भी मिले. उस के बैंक खातों से यह भी पता चला कि कई बौद्ध भिक्षुकों एवं एक बौद्ध मंदिर के बैंक खाते से एक वरिष्ठ भिक्षुक चाओखुन अर्ज ने उस के खाते में 11.9 मिलियन अमेरिकी डौलर यानी 102.33 करोड़ रुपए ट्रांसफर करवाए थे. इन में से ज्यादातर रकम बौद्ध भिक्षुकों द्वारा मिस गोल्फ के खाते में ट्रांसफर की गई थी. जांच में इस बात का भी पता चला कि इन में से अधिकांश रकम मिस गोल्फ द्वारा औनलाइन खेली जाने वाली जुए वाली वेबसाइट पर खर्च की गई थी.

कौन है मिस गोल्फ

इस गंभीर और संवेदनशील मामले के सामने आने के बाद थाईलैंड के मठ प्रशासन पर कई सवालिया निशान खड़े हो गए. देश भर में थेरवाद संप्रदाय के बौद्ध भिक्षुकों की संख्या काफी अधिक है, जिन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है. महिलाओं को केवल छूने मात्र से इन के ब्रह्मचर्य पर सवाल उठने लगते हैं. सैक्स स्कैंडल और ब्लैकमेलिंग में फंसी विलावान सिका गोल्फ एम्सावत उर्फ सिका गोल्फ उर्फ मिस गोल्फ फिचित प्रांत के साकलेक जिले की मूल निवासी है. मीडिया में उस का नाम ‘सिका गोल्फ’ प्रचारित है. ‘सिका’ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा महिलाओं के लिए एक आदर की उपाधि है.

गोल्फ एक गरीब परिवार में पलीपढ़ी युवती है. पापा उस की मम्मी जेनी को उस के जन्म के कुछ सालों बाद ही छोड़ कर चले गए थे. गरीबी से जूझते हुए उस की मम्मी ने किसी तरह से पालापोसा. इस कारण उस की ज्यादा पढ़ाई नहीं हो पाई. बड़ी होने पर उस में स्वच्छंदता आ गई. अपने मन की मालिक बन गई. युवावस्था आतेआते वह बेहद खूबसूरत दिखने लगी. उस की सुंदरता पर हर कोई मोहित हो जाता था. वह इस का नाजायज फायदा उठाने लगी.

पढ़ाई से कोई वास्ता नहीं था, लेकिन अच्छे रहनसहन, फैशन और पहनावे की ललक थी. इस की पूर्ति के लिए उस ने अमीर लड़कों को फंसाना शुरू किया. उन से दोस्ती की, बौयफ्रेंड बनाया. उन के साथ घूमनेफिरने और मटरगश्ती करने लगी. यह सब करते हुए उस का कौमार्य कब भंग हुआ, उसे यह सब याद नहीं. इस बात की उसे कोई चिंता नहीं थी. जब वह हर क्लास में बारबार फेल हो जाती थी, तब उस की मम्मी जेनी उसे बारबार अच्छेबुरे की नसीहतें देती थी, लेकिन गोल्फ पर उस का कोई असर नहीं होता था.

गरीबी और अभाव में घुटन महसूस कर चुकी गोल्फ कभीकभी तो अपनी मम्मी से भी झगड़ पड़ती थी. ताने देती थी कि तुम ने मेरे उस धोखेबाज पापा से शादी कर मुझे क्यों पैदा किया, जब तुम मुझे अच्छे कपड़े, अच्छा खाना, अच्छा रहना नहीं दिलवा सकती थी. मुझे इस दुनिया में क्यों आने दिया. वैसे गोल्फ ने एक स्टोर में जब नौकरी की शुरुआत की थी, तभी उस की मम्मी की तबीयत अचानक एक दिन ज्यादा खराब हो गई. अच्छी देखरेख नहीं होने के कारण उस की मम्मी जेनी की मृत्यु हो गई.

मम्मी की मौत के बाद गोल्फ पूरी तरह से आजाद हो गई थी. उस ने अपना घर और अपनी मम्मी के सारे गहने बेच दिए. नई नौकरी और सुनहरे भविष्य को बनाने के लिए पुश्तैनी शहर छोड़ कर बैंकाक आ गई. एक बड़े जनरल स्टोर में रिसैप्शनिस्ट की नौकरी कर ली. एक छोटा सा घर किराए पर ले लिया. यहां रहते हुए उस के सपनों ने एक नई सुनहरी उड़ान भरनी शुरू कर दी थी. उसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, टेलीग्राम पर चैटिंग का शौक चढ़ गया था. उसे नएनए पुरुष दोस्त बनाना और फिर उन के साथ अश्लील चैटिंग करना बहुत पसंद था.

वर्ष 2018 के शुरू में उस की फेसबुक द्वारा एक बौद्ध भिक्षु सोमचाई (परिवर्तित नाम) के साथ दोस्ती हो गई. उस के बाद उन दोनों ने आपस में अपने मोबाइल नंबर शेयर किए. प्यार भी ऐसा रंग लाने लगा कि दोनों मिलने लगे. एक मुलाकात में ही दोनों में प्यार का रंग ऐसा चढ़ा कि सोमचाई ने गोल्फ के लिए एक खूबसूरत फ्लैट किराए पर दिलवा दिया. सोमचाई उस के बाद गोल्फ से मिलने अकसर उस फ्लैट पर आने लगा. दोनों लिवइन  में रहने लगे. गोल्फ कुछ दिनों बाद गर्भवती हो गई और उस ने एक बेटे को जन्म दिया. 2019 में बेटा होने के बाद सोमचाई ने गोल्फ से दूरी बढ़ानी शुरू कर दी तो उस ने उसे मीडिया के सामने बदनाम करने की धमकी दे डाली.

इस धमकी का बौद्ध भिक्षुक सोमचाई पर असर हुआ. उस ने बचने के लिए गोल्फ को एकमुश्त 86,206 डौलर (लगभग 74,99,922 रुपए) और प्रतिवर्ष 2,294 डौलर (लगभग 1,99,578 रुपए) बेटे की परवरिश करने के लिए देने को तैयार हो गया. इस के बाद दोनों का मिलनाजुलना लगभग समाप्त होता चला गया था. उन के बीच केवल पैसों का ही लेनदेन होता था.

उस के बाद गोल्फ के दिमाग में तो मानो नया आइडिया आ गया. स्वच्छंदता के मानो पंख लग गए. उस ने अपना टारगेट अब बौद्ध मठाधीशों और बौद्ध भिक्षुओं को बनाना शुरू कर दिया. वह हमेशा 50 वर्ष से अधिक उम्र के बौद्ध मठाधीशों को अपना शिकार बनाने लगी. पहले वह उन बौद्ध भिक्षुओं से फेसबुक के माध्यम से दोस्ती करती थी, फिर अपनी कामोत्तेजक जवानी की तसवीरें भेज कर उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी. उस के बाद जैसे ही उसे शिकार फंसता नजर आता तो उन के साथ रसीली और कामवासना उकसाने वाली बातें करनी शुरू कर देती थी.

जब उसे लगता कि शिकार फंस चुका है, तब वह उसे अपनी रसीली बातों में फंसा कर किसी अनजान होटल या अपने फ्लैट पर अवैध संबंध बनाने के लिए बुला लेती थी.  उस ने अपने फ्लैट के बैडरूम और बाथरूम में हिडन कैमरे लगा रखे थे. यहां तक कि जब वह किसी होटल में बौद्ध भिक्षुओं को आमंत्रित करती तो वह उन के आने से पहले ही बैडरूम और बाथरूम में हिडन कैमरे लगा देती थी. इस तरह उन की अश्लील वीडियो बना कर रख लेती थी. करीब 5-6 महीने के बाद वह अपने प्रैगनेंट होने का झांसा दे कर उन्हें अश्लील तसवीरें और वीडियो दिखाती थी. उस के बाद ब्लैकमेल शुरू कर देती थी.

गोल्फ का खेल ऐसा हुआ खत्म

उस के इस खेल के अंत की शुरुआत 14 जून, 2025 को तब हो गई, जब विलावान सिका यानी गोल्फ ने बैंकाक की रौयल थाई पुलिस में एक लिखित शिकायत दर्ज कराई. अपनी शिकायत में विलावान ने लिखा कि वाट त्रि थोत्सथेप वोराविहान के बौद्ध मठाधीश फ्राथेप वाचिरापामोक उर्फ चाओखुन अर्ज उस के पति हैं और उन से उन का एक बेटा भी है. विलावान सिका ने दावा किया कि पहले कुछ समय तक चाओखुन अर्ज उस के और बच्चे के भरणपोषण के लिए पैसे नियमित रूप से देते रहे, मगर अब पैसे देने से मुकर रहे हैं. पिछले काफी समय से चाओखुन अर्ज ने उसे बिलकुल भी पैसा नहीं दिया है.

सिका ने यह भी दावा किया कि गर्भावस्था और बच्चे के जन्म के बाद से अब तक चाओखुन अर्ज के ऊपर उस के 7.2 मिलियन बाट (भारतीय करेंसी में लगभग एक करोड़ 70 लाख 7 हजार 200 रुपए) बकाया हैं. कृपया चाओखुन अर्ज से मेरे बकाया रुपए दिलवाने की कृपा की जाए.

धर्मगुरु ने करोड़ों रुपए लुटा दिए मिस गोल्फ पर

यह खबर जैसे ही बैंकाक राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख पोल जनरल कितरत फनफेट तक पहुंची तो उन्होंने इस की विस्तृत जांच के लिए तुरंत केंद्रीय जांच ब्यूरो के डिप्टी कमिश्नर पोल मेजर जनरल जारुनाकियात पंकव के नेतृत्व में एक विशेष पुलिस टीम का गठन कर दिया. वाट त्रि थोत्सथेप वोराविहान मंदिर, बैंकाक, थाईलैंड का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे आमतौर पर ‘वाट फो’ के नाम से जाना जाता है. इस प्रसिद्ध मंदिर का इतिहास 16वीं शताब्दी से जुड़ा है, जब इसे एक मठ के रूप में स्थापित किया गया था.

थाईलैंड के राजा राम प्रथम ने 18वीं शताब्दी में इस का जीर्णोद्धार कराया और राजा राम तृतीय के शासन काल में इसे वर्तमान स्वरूप दिया गया, जिस में लेटे हुए बुद्ध की विशाल प्रतिमा स्थापित की गई. 18 जून, 2025 को राष्ट्रीय पुलिस प्रमुख के आदेश के बाद बैंकाक की रौयल थाई पुलिस के केंद्रीय जांच ब्यूरो के डिप्टी कमिश्नर पोल मेजर जनरल जारुनकियात पंकव के  नेतृत्व में वाट त्रि थोत्सयेप मंदिर वोराविहान के मठाधीश चाओखुन अर्ज की तलाशी के लिए छापा मारा.

पुलिस ने जब मंदिर के अन्य भिक्षुओं से बातचीत की तो पता चला कि मठाधीश चाओखुन वहां से सीमा पार लाओस भाग चुका है. उस के बाद पुलिस टीम ने जब मठ के खाते की विस्तृत जांचपड़ताल शुरू की तो जांच में यह पाया गया कि मठाधीश फ्राथेप वाचिरा पामोक उर्फ चाओखुन अर्ज ने मंदिर के खातों से 9.05 मिलियन डालर (भारतीय करेंसी में लगभग 75 करोड़ 43 लाख 91 हजार 723 रुपए) की धनराशि अपने निजी खाते में ट्रांसफर की थी.

लेकिन असली जानकारी तभी सामने आ सकती थी, जब चाओखुन अर्ज से पूछताछ होती, इसलिए रौयल थाई पुलिस अब चाओखुन अर्ज की तलाश में जगहजगह छापे मारने लगी. चाओखुन भी जानता था कि वह अधिक समय तक पुलिस की नजरों से छिपा नहीं रह सकता है, इसलिए अंतत: चाओखुन अर्ज ने 27 जून, 2025 को पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

पुलिस द्वारा विस्तृत पूछताछ में चाओखुन अर्ज ने बताया कि करीब 2 साल पहले विलावान सिका उर्फ मिस गोल्फ ने उस से फेसबुक के माध्यम से संपर्क किया था और दोस्ती बढ़ाई. बाद में हमारे बीच यौन संबंध स्थापित हो गए, उस के बाद हमारा एक बेटा भी हो गया. फिर विलावान मुझ से पैसे की मांग करने लगी. पहले मैं उसे काफी पैसे देता रहा. लेकिन जब मुझे इस बात की जानकारी हुई कि विलावान के अन्य बौद्ध भिक्षुओं के साथ भी संबंध हैं तो मैं ने धीरेधीरे उस से दूरियां बढ़ानी शुरू कर दी.

उस के बाद विलावान मुझ से फोन कर के मुझ से पैसे मांगने लगी, जब मैं ने और पैसे देने से इंकार कर दिया तो उस ने मेरे साथ एक सौदा किया कि अगर उसे एकमुश्त 7.2 मिलियन बाट (लगभग 17 करोड़ भारतीय रुपए) दे दूं तो वह मेरे साथ खींचे गए अश्लील वीडियो और अश्लील फोटो मुझे दे देगी. यह रकम काफी ज्यादा थी और इसलिए मैं ने इतनी धनराशि देने से साफसाफ मना कर दिया, क्योंकि मैं उसे पहले ही काफी रकम दे चुका था. उस के बाद विलावान ने मुझे धमकी दी कि यदि इसे यह रकम यहीं दी तो वह मेरी पुलिस से लिखित शिकायत दर्ज करा देगी.

मैं उस से नहीं डरा. उसे पैसा देने से इनकार कर दिया. मुझे उम्मीद थी कि वह पैसे ऐंठने के लिए पुलिस की धमकी दे रही थी, लेकिन जब उस ने सही में पुलिस से मेरे खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी, तब बदनामी के डर से सीमा पार लाओस भागना पड़ा. इस के बाद चाओखुन को 27 जून, 2025 को वाट त्रि थोत्सथेप वोराविहान के मठाधीश पद से हटा दिया गया था.

ब्लैकमेलर मिस गोल्फ हुई गिरफ्तार

अब रौयल थाई पुलिस की विशेष जांच टीम गोपनीय ढंग से विलावान सिका के पीछे लग गई और उस की हर गतिविधि पर अपनी पैनी नजर रखे हुई थी. इस के लिए विशेष जांच टीम ने अपने गुप्त मुखबिरों को अलगअलग जानकारियां एकत्रित करने के लिए लगा रखा था. विलावान सिका के घर के आसपास भी मुखबिर उस पर कड़ी नजर रखे हुए थे. इसी क्रम में जांच प्रमुख पोल मेजर जनरल जारुनकियात पंकव के नेतृत्व में पुलिस टीम ने विलावान सिका के घर पर छापा मारा तो पुलिस टीम की आंखें खुली की खुली रह गईं.

पुलिस जांच में पाया गया कि विलावान सिका को कुछ सालों में बौद्ध भिक्षुओं की ओर से उस के खाते में 385 मिलियन बाट (भारतीय रुपयों में लगभग 91 करोड़ 57 लाख 75 हजार 635 रुपए) मिले थे. पुलिस द्वारा मीडिया को साझा किए एक वीडियो में एक बौद्ध भिक्षु को सोफे पर विलावान सिका के साथ लेटा हुआ दिखाया गया. विलावान बौद्ध भिक्षु पर उस के सिर में थप्पड़ मारती दिखी.  पुलिस ने वीडियो क्लिप और कई तसवीरों में यौन क्रियाओं वाली वीडियो भी जब्त कर लीं. पुलिस पूछताछ में एक बौद्ध भिक्षु ने स्वीकार किया कि उस ने विलावान को एक कार भी गिफ्ट की थी.

बैंकाक के वाट माई याई पेन के एक बौद्ध भिक्षु ने पुलिस को बताया कि विलावान सिका गोल्फ ने धार्मिक वस्तुओं की मदद मांगने के बहाने उन से संपर्क किया था. यह भी स्वीकार किया कि वह विलावान के घर पूरी रात रुका था. उस ने दावा किया कि विलावान सिका ने उस के साथ अंतरंग संबंध बनाने की पहल खुद की और उस के बाद विलावान ने उस से एक लाख थाई बाट (भारतीय रुपयों में लगभग 2 लाख 26 हजार 643 रुपए) उधार भी लिए थे.

वाट चुजित थम्मारम के पूर्व मठाधीश फ्रा थेप्पाचारापोर्न, जिसे मठाधीश पद से हटा दिया गया है, जिसे अब सोम्पोंग के नाम से जाना जाता है. उस के भी अश्लील वीडियो विलावान के साथ मिले थे. सोम्पोंग ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि उस ने 12 मिलियन थाई बाट (भारतीय रुपयों में लगभग 32 करोड़ 40 लाख रुपए) से अधिक की राशि विलावान के खातों में हस्तांतरित की थी. पुलिस ने अब तक 12 भिक्षुओं द्वारा विलावान सिका के अवैध संबंधों की पुष्टि की है, जिन में से 9 बौद्ध भिक्षुओं को उन के मठाधीश पद से हटा दिया गया है, जबकि अन्य की जांच अभी जारी है. पुलिस ने बौद्ध भिक्षुओं पर 2 आरोप लगाए हैं.

आपराधिक संहिता की धारा 147 के तहत एक राज्य अधिकारी द्वारा गबन तथा धारा 157 के तहत एक राज्य अधिकारी द्वारा कार्यालय में कदाचार के आरोप थे. दूसरी ओर विलावान सिका पर भ्रष्टाचार निरोधक प्रभाग द्वारा 4 आरोप लगाए गए हैं. आपराधिक संहिता की धारा 147 के तहत संपत्ति के गबन में एक राज्य अधिकारी का समर्थन करना, धारा 157 के तहत कर्तव्य के कदाचार में एक राज्य अधिकारी का समर्थन करना, धन शोधन की साजिश और चोरी की संपत्ति प्राप्त करना है.

इस पूरे प्रकरण में थाईलैंड के राजा वजीरालोंगकोर्न ने दिनांक 22 जुलाई, 2025 को एक शाही आदेश जारी कर दिया. जिस में दरजनों वरिष्ठ भिक्षुओं को मठाधीश संबंधी उपाधियां प्रदान करने की पूर्व घोषणाओं को रद्द कर दिया गया है. राजा ने कहा कि बौद्ध धर्म में आस्था तो बनी रहेगी, लेकिन भिक्षुओं पर भरोसा कम हो सकता है. भिक्षु शायद अपनी वासनाओं में खो गए हैं. Crime Story in Hindi

कथा लिखने तक बैंकाक पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही थी.

 

 

Love Crime : पति को दफन कर लगवा दीं टाइल्स

Love Crime : 32 वर्षीय विजय चौहान मुंबई में काम करता था. वह अपनी 28 वर्षीय पत्नी चमन देवी उर्फ गुडिय़ा को यूपी के जौनपुर में स्थित अपने गांव से मुंबई इसलिए ले गया कि इकलौते बेटे की किसी अच्छे स्कूल में पढ़ाई करा सके. लेकिन मुंबई जाते ही चमन कुमारी को शहर की ऐसी हवा लगी कि उस के रंगढंग ही बदल गए. फिर उस ने एक दिन पति की हत्या कर लाश कमरे में ही दफन कर ऊपर से टाइल्स लगवा दीं. आखिर एक पत्नी इतनी बेवफा और निर्दयी क्यों बनी?

मूलरूप से उतर प्रदेश के जिला जौनपुर के गांव कलीचाबाद का रहने वाला विजय चौहान पिछले 10 सालों से मुंबई में रह कर राजमिस्त्री का काम करता था. मुंबई में वह परिवार के साथ नालासोपारा के गाड़ीपाड़ा इलाके की ओम साईं वेलफेयर सोसाइटी की एक चाल में रहता था. मुंबई आने से पहले विजय चौहान का विवाह चमन देवी उर्फ गुडिय़ा के साथ हुआ था. उसी साल वह पत्नी गुडिय़ा को अपने साथ मुंबई ले आया था, ताकि वहां अच्छी पढ़ाई करा सके. इस समय उस का 7 साल का बेटा था.

विजय का बड़ा भाई अजय चौहान मुंबई में पहले से ही रहता था. वह जम गया तो उस का छोटा भाई अखिलेश चौहान भी मुंबई आ गया था. कुछ दिनों तक साथ रख कर उसे भी राजमिस्त्री का काम सिखा दिया. जब वह पूरी तरह काम में निपुण हो गया और कमाने लगा तो उस ने उसे अलग रहने के लिए कह कर अलग कमरा दिला दिया था. अजय और अखिलेश भी वहीं करीब ही एक चाल में रहते थे. रहते भले ही सभी अलग थे, लेकिन जब भी किसी को कोई जरूरत होती थी, सभी एकदूसरे की मदद करते थे.

इसी साल जुलाई महीने के पहले सप्ताह में विजय चौहान के छोटे भाई अखिलेश को कुछ पैसों की जरूरत पड़ी तो उस ने अपने बड़े भाई विजय को फोन किया. लेकिन विजय का फोन स्विच्ड औफ था. अखिलेश ने सोचा कि काम पर होने की वजह से फोन चार्ज नहीं हो पाया होगा, इसलिए फोन स्विच्ड औफ है. उस ने शाम को फोन किया कि अब तो भाई घर आ गया होगा, लेकिन उस समय भी उस का फोन बंद था. देर रात फिर फोन किया, तब भी उस के फोन को बंद बताया तो उसे थोड़ी चिंता हुई. रात ज्यादा हो गई थी, इसलिए उस ने सोचा कि सुबह भाई के घर जा कर पता करेगा कि उस का फोन बंद क्यों है?

हैरानपरेशान अखिलेश सुबह भाई के घर पहुंचा. जब उस ने भाभी चमन देवी से भाई के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ”तुम्हारे भैया तो किसी काम के सिलसिले में कुर्ला गए हैं.’’

”उन का फोन भी बंद है.’’ अखिलेश ने कहा.

”हां, उन का फोन खराब है. कल सुबह किसी के मोबाइल से फोन कर के बताया था. वहां कोई जानपहचान का मिस्त्री तो है नहीं, इसलिए फोन ठीक नहीं कराया है.’’ चमन देवी ने बताया.

”आएंगे कब तक, कुछ बताया है?’’ अखिलेश ने पूछा.

”कहा तो है कि जल्दी ही लौट आएंगे. फिर लौटना काम पर निर्भर करता है. कोई और काम आ गया तो देर भी हो सकती है. कोई जरूरी काम है क्या?’’ चमन ने पूछा.

”भाभी, कोई जरूरी काम हो, तभी भैया को पूछूंगा क्या? ऐसे नहीं पूछ सकता क्या?’’

”मेरे कहने का मतलब वह नहीं था लाला. क्यों नहीं पूछ सकते अपने भैया को. मेरा मतलब यह था कि अगर मेरे लायक काम हो तो बता देते, मैं ही कर देती.’’ चमन देवी बोली.

”नहीं, आप से मेरा काम नहीं होगा. भैया को आने दीजिए, उन्हीं से बात कर लूंगा.’’ कह कर अखिलेश चला गया.

घर में दफन निकली विजय की लाश

अखिलेश भाई को लगातार फोन करता रहा. पर उस का फोन चालू नहीं हुआ. तब वह भाभी को फोन कर के भाई तथा उस के परिवार के बारे में पूछ लेता था. लेकिन वहां से आने के 9 दिन बाद भाभी का भी फोन लगना बंद हो गया. तब उसे चिंता हुई. अपनी चिंता दूर करने के लिए वह 20 जुलाई, 2025 को एक बार फिर भाभी के घर जा पहुंचा. भाभी के घर जाने से पहले उस ने बड़े भाई अजय को भी फोन कर के विजय के घर पहुंचने के लिए कह दिया था.

जब दोनों भाई विजय के घर पहुंचे तो घर पर भाभी भी नहीं मिली. तब उन्हें शक हुआ. घर में नई टाइल्स भी लगी थीं. इस से उन का शक और बढ़ गया. इस की वजह यह थी कि जब भी अखिलेश चमन से भाई (विजय) के बारे में पूछता था, वह टालमटोल करने लगती थी. कभी कहती कि वह नाराज हो कर गए हैं तो कभी कहती कि गोरेगांव काम करने गए हैं.

भाभी के ही कहने पर अखिलेश विजय के बारे में पता करने गोरेगांव भी गया था. वहां से पता चला था कि वह 8-10 दिन पहले ही काम छोड़ कर चला गया था. चमन देवी ने यह भी कहा था कि उस ने दूसरा सिम ले लिया है. लेकिन जब अजय और अखिलेश ने दूसरे सिम का नंबर मांगा था तो इस के लिए भी उस ने बहाना बना दिया था कि उस के पास भी दूसरे सिम का नंबर नहीं है. भाभी की इस बहानेबाजी पर ही अखिलेश ने अजय से कहा था, ”भैया, मुझे शक हो रहा है. मामला गड़बड़ लगता है. कहीं विजय भैया के साथ कोई अनहोनी तो नहीं घट गई.’’

इस की वजह यह थी कि अखिलेश ने इस तरह की तमाम घटनाओं के बारे में पढ़ा था, जिन में पत्नियों ने पति की हत्या करवा कर लाश घर में ही गड़वा दी थीं और ऊपर फर्श बनवा दिया था. चमन ने भी घर में नई टाइल्स लगवाई थीं. इसीलिए अखिलेश ने भाई से शक जाहिर करते हुए आगे कहा, ”घर में नई टाइल्स भी लगी हैं. मेरा मन करता है कि खोद कर देखा जाए. 1-2 टाइल्स टूट भी जाएगी तो क्या होगा?’’

अजय को छोटे भाई अखिलेश की बात सच लगी. इस के बाद अजय और अखिलेश ने पड़ोसियों से बात की. पड़ोसियों को भी उन की बात में दम लगा. सभी ने तय किया कि खुद ही कुछ टाइल्स हटा कर देखते हैं. अगर वैसा कुछ होगा तो पुलिस को सूचना दी जाएगी. टाइल्स हटा कर खुदाई की गई. करीब डेढ़ फुट खुदाई की गई होगी, तभी तेज बदबू आने लगी. इस से उन्हें समझते देर नहीं लगी कि उन का जो सोचना था, वह सच है.

उसी दिन यानी 20 जुलाई, 2025 को अजय और अखिलेश ने मुंबई के थाना पेल्हार जा कर शिकायत दर्ज कराई कि उन का बड़ा भाई विजय और भाभी चमन देवी लापता हैं. उन्होंने पड़ोसियों की मौजूदगी में घर के अंदर खुदाई की तो तेज बदबू आई. रात को तो पुलिस नहीं आई, लेकिन 21 जुलाई, 2025 को सवेरा होते ही थाना पेल्हार के सीनियर इंसपेक्टर जितेंद्र वनकोटी कुछ पुलिसकर्मियों और फोरैंसिक टीम के साथ ओम साईं वेलफेयर सोसायटी की उस चाल में जा पहुंचे, जहां विजय चौहान अपनी पत्नी और बेटे के साथ रहता था. पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर उस जगह की खुदाई शुरू हुई, जहां खुदाई करने पर बदबू आई थी. करीब आधे घंटे की खुदाई के बाद घर और उस के आसपास का पूरा इलाका दुर्गंध से भर गया.

शाम 6 बजे के आसपास 4 फुट की गहराई से एक लाश निकाली गई. लाश इस कदर सड़ी हुई थी कि उसे पहचाना नहीं जा सकता था, लेकिन लाश पर मौजूद कपड़ों और कदकाठी से स्पष्ट हो गया था कि वह लाश किसी और की नहीं, बल्कि 32 साल के विजय चौहान की थी. विजय की लाश मिलने के बाद पहला सवाल यह था कि उस की हत्या किस ने और क्यों की? घर की तलाशी, खुदाई और विजय की लाश मिलने के बाद पुलिस हरकत में आई. पूछताछ में मोनू शर्मा का नाम सामने आया. लोगों ने बताया कि मोनू और विजय की पत्नी चमन का चक्कर चल रहा था.

फिर मोनू तथा चमन देवी का पता लगाने के लिए पेल्हार पुलिस ने 2 टीमें बनाईं. विजय चौहान की पत्नी चमन देवी उर्फ गुडिय़ा भी लापता थी. मोनू के बारे में पता किया गया तो जानकारी मिली कि वह भी गायब है. इस से यही अंदाजा लगाया गया कि चमन मोनू के साथ ही है. सच्चाई तभी सामने आ सकती थी, जब चमन देवी और मोनू पकड़े जाते, लेकिन उन्हें पकडऩा आसान नहीं था. दोनों कहां हैं, इस का पुलिस के पास कोई सुराग नहीं था. पुलिस ने चमन और मोनू के फोन नंबर सर्विलांस पर लगवा दिए थे. इस के अलावा अपने मुखबिरों को भी सक्रिय कर दिया था. एक टीम तकनीकी जांच कर रही थी तो दूसरी टीम मुखबिरों के जरिए जानकारी जुटाने में लगी थी.

चमन, मोनू और उन के एक मददगार सुरेश, तीनों के मोबाइल फोन स्विच्ड औफ थे. इस वजह से पुलिस उन्हें ट्रैक नहीं कर पा रही थी. लेकिन पुलिस की पैनी नजर उन के मोबाइल नंबरों पर थी. इत्तफाक से 22 जुलाई, 2025 को विजय चौहान के फोन से एक पेमेंट किया गया. पुलिस ने तुरंत उस फोन की लोकेशन पता की. पता चला कि पुणे के हड़पसर इलाके की एक दुकान पर विजय चौहान के फोन से औनलाइन पेमेंट किया गया था.

इसी के आधार पर मुंबई पुलिस ने तुरंत लोकेशन ट्रैस कर ली थी. चंद घंटों बाद पेल्हार पुलिस हड़पसर में थी. फिर तो पुलिस को चमन और मोनू तक पहुंचने मे देर नहीं लगी. सीनियर इंसपेक्टर जितेंद्र वनकोटी ने अपनी टीम की मदद से चमन और मोनू को गिरफ्तार कर लिया था. उन के साथ विजय का 7 साल का बेटा सुरक्षित था.

इस के बाद पुलिस ने मोनू और चमन देवी की मदद से उन की भागने में मदद करने वाले सुरेश को भी गिरफ्तार कर लिया था. थाने ला कर चमन देवी, मोनू शर्मा और सुरेश की गिरफ्तारी की सूचना पुलिस कमिश्नर सुवास बावचे को देने के साथ ही उन्हें वसई कोर्ट में पेश किया गया, जहां विस्तार से पूछताछ के लिए तथा साक्ष्य जुटाने के लिए तीनों को 7 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर लिया गया. रिमांड के दौरान पूछताछ में चमन देवी और मोनू शर्मा के लव क्राइम की जो कहानी सामने आई, वह कुछ इस प्रकार थी.

उत्तर प्रदेश के जिला जौनपुर के रहने वाले 32 साल के विजय चौहान का विवाह करीब 10 साल पहले उस के गांव के नजदीक रहने वाली 28 साल की चमन देवी उर्फ गुडिय़ा के साथ हुआ था. चूंकि विजय विवाह के पहले से मुंबई में रहता था, इसलिए शादी के बाद वह पत्नी को भी अपने साथ मुंबई ले आया था. मुंबई में वह राजमिस्त्री का काम करता था. वह मेहनती था, इसलिए कमाता भी ठीकठाक था. पत्नी आ गई तो वह और भी मेहनत करने लगा था. क्योंकि खर्च बढ़ गए थे. काम की वजह से भले ही वह पत्नी को समय नहीं दे पाता था, पर उस की वह हर भौतिक इच्छा पूरी करता था, जो वह कर सकता था.

शायद पत्नी को समय न दे पाने की वजह से वह खुश नहीं रहती थी. विवाह के 3 साल बाद उसे बेटा हुआ था, जो इस समय 7 साल का था. इस बीच विजय का छोटा भाई अखिलेश गांव से भाई के पास आ गया था. विजय ने उसे भी अपनी तरह राजमिस्त्री का काम सिखा दिया था. दोनों भाई राजमिस्त्री का काम करते हुए अलग रहते थे. विजय का जो काम था, उस में उसे घर आने में देर हो जाती थी. सुबह जल्दी निकलना पड़ता था. इसलिए वह पत्नी को उस के मनमाफिक समय नहीं दे पाता था. यही वजह थी कि चमन का झुकाव पड़ोस में रहने वाले 20 साल के मोनू शर्मा की ओर हो गया. जबकि मोनू उस से उम्र में 8 साल छोटा था. लेकिन दिल ही तो है, वह किसी पर भी आ जाए. वैसे भी कहा जाता है कि प्यार न उम्र देखता है और न जातिधर्म.

पत्नी ने खाने में मिला दी नशीली दवा

बिहार का रहने वाला मोनू शर्मा फेमिली के साथ विजय चौहान के पड़ोस में रहता था. वह बीएससी (आईटी) के तीसरे साल में पढ़ता था. वह पढ़ाई में काफी होशियार था. पड़ोस में रहने की वजह से दिन में चमन देवी को कभी कुछ मंगाना होता था तो वह मोनू से मंगा लेती थी. इसी तरह लव अफेयर होने पर मोनू का चमन के घर आनाजाना शुरू हुआ तो कुछ ही दिनों में यह संबंध शारीरिक संबंध तक पहुंच गया. कुंवारे मोनू को चमन देवी की देह क्या मिली, मानो सारा जहां मिल गया. फिर तो जब देखो, तब चमन के घर में पड़ा रहता था. किसी जवान महिला के घर में पति की गैरहाजिरी में कोई कुंवारा लड़का जब देखो तब घुसा रहेगा तो पड़ोसियों में खुसुरफुसुर होगी ही.

चमन और मोनू को ले कर भी कानाफूसी होने लगी थी. फिर इस बात की जानकारी विजय को भी हो गई कि उस की गैरहाजिरी में पड़ोस में रहने वाला मोनू शर्मा उस के घर में घुसा रहता है. विजय ने जब चमन से कहा कि वह मोनू को घर न आने दे तो वह पति की बात मानने के बजाए उस से लडऩे लगी. विजय ने मोनू को भी डांटाफटकारा, पर उस पर भी कोई फर्क नहीं पड़ा. दोनों पहले की ही तरह मिलते रहे.

2 जुलाई, 2025 की शाम विजय घर आया तो चमन देवी मोनू से फोन पर बात कर रही थी. वह मोनू से जिस तरह की बातें कर रही थी, उसे सुन कर किसी भी गैरतमंद पति को गुस्सा आ सकता था. विजय को भी गुस्सा आ गया. उस ने पत्नी की चार्जर के तार से पिटाई कर दी. इस के बाद मोनू को भी खूब खरीखोटी सुनाई. उस रात घर में खाना नहीं बना. रात में विजय को भूख लगी तो उस ने पत्नी से खाना बनाने को कहा, लेकिन वह खाना बनाने नहीं उठी. तब विजय ने उस की फिर से पिटाई कर दी. तब चमन देवी ने गुस्से में दाल चावल बनाया और उस में नशीली दवा मिला कर खिला दिया. थोड़ी देर में विजय सो गया तो चमन ने फोन कर के मोनू को अपने घर बुला लिया. फिर दोनों ने गला दबा कर पति विजय चौहान की हत्या कर दी.

जबकि चमन का कहना था कि उस का पति से अकसर लड़ाईझगड़ा होता रहता था. विजय सुबह 7 बजे काम पर जाता था तो रात 9 साढ़े 9 बजे लौटता था. दिन भर का थकामांदा विजय घर आ कर खाना खा कर सो जाता था. पति का प्यार न मिलने की वजह से चमन देवी का झुकाव युवा और खुशमिजाज मोनू की तरफ हो गया था. दोनों को जब भी मौका मिलता था, मिलने भी लगे थे.

जल्दी ही विजय चौहान और उस के फेमिली वालों को चमन और मोनू के अवैध संबंधों का पता चल गया था. विजय को पत्नी चमन के फोन से दोनों की चैट और फोटो भी मिल गए थे. उस के बाद पतिपत्नी में लगभग रोज ही लड़ाईझगड़ा होने लगा था. विजय चमन के साथ मारपीट भी करता था. चमन को वैसे भी पति से प्यार नहीं मिलता था, इसीलिए पति की मारपीट से तंग आ कर उस ने उस से छुटकारा पाने का निश्चय कर लिया.

चमन देवी के बताए अनुसार, उस ने पति विजय के खाने में जहर दे कर उस की हत्या की है. पति की हत्या करने के बाद उस की लाश को ठिकाने लगाने के लिए उस ने पानी की टंकी बनवाने के बहाने मजदूर बुला कर घर के अंदर गड्ढा खुदवाया और उसी में पति विजय की लाश दफना कर गड्ढे में मिट्टी भर दी. इस के बाद अपने देवर अजय को बुला कर ऊपर से टाइल्स लगाने के लिए कहा. अजय ने पूछा कि यहां की टाइल्स कैसे टूटीं? इस पर चमन देवी ने बताया कि पाइप जाम हो गई थी. उसी की मरम्मत के लिए टाइल्स तोड़वानी पड़ीं. अजय ने भाभी की बात सच मानी और टाइल्स लगा कर चला गया.

चमन देवी का कहना था कि यह काम उस ने अकेले ही किया है. मोनू की इस में कोई भूमिका नहीं है. इसी के साथ उस ने पुलिस से कहा कि वह मोनू को बहुत प्यार करती है. उस का कोई दोष नहीं है, इसलिए उसे छोड़ दिया जाए. दूसरी ओर मोनू का कहना था कि वह चमन देवी से मिलने गया था. उस समय चमन सब्जी खरीदने बाजार गई थी. तभी विजय आ गया. वह उस से लडऩे लगा. विजय उस के और चमन के प्यार में बाधा बन रहा था. इसलिए वह उस से लडऩे लगा. दोनों के बीच बहस बढ़ गई. उसे गुस्सा आ गया और उस ने लड़ाई के दौरान विजय का गला पकड़ कर दबा दिया, जिस की वजह से उस की मौत हो गई थी.

इस के बाद उस ने विजय की लाश को ठिकाने लगाने के लिए उसी के घर मे गड्ढा खोद कर दफना दिया. उस के बाद चमन ने अपने जेठ अजय से टाइल्स लगवा दी थी. मोनू का कहना था कि चमन का इस मामले में कोई दोष नहीं है. इसलिए उसे इस मामले में बिलकुल न घसीटा जाए.

पुलिस का मानना है कि मोनू झूठ बोल रहा है. विजय उस से लंबाचौड़ा और तंदुरुस्त था. वह उस पर अकेले कतई काबू नहीं पा सकता था. दोनों ही झूठे बयान दे कर एकदूसरे को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार विजय की हत्या नशीली दवा देने के बाद गला दबा कर की गई थी. इस से स्पष्ट हो गया था कि विजय की हत्या दोनों ने मिल कर की थी. उस के बाद दोनों ने मिल कर विजय की लाश को घर में गड्ढा खोद कर दफना दिया था. उस के बाद चमन ने अजय को बुला कर टाइल्स लगवा दी थीं.

जब अखिलेश और अजय भाई के बारे में बारबार पूछने लगे तो चमन और मोनू घर से भाग निकले. खर्च के लिए उन्होंने विजय का फोन साथ ले लिया था, क्योंकि वह नेट बैंकिंग चलाता था. फोन की पिन उन्होंने सुरेश से बदलवा ली थी. इस तरह उस ने उन की घर से भागने में मदद की थी. उसी फोन से पेमेंट करने पर दोनों पकड़े गए थे. पुलिस ने सारे साक्ष्य जुटा कर चमन देवी उर्फ गुडिय़ा और मोनू शर्मा को 30 जुलाई, 2025 को फिर से अदालत में पेश किया था, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया था. Love Crime

 

 

UP Crime News : मां का मदहोशी प्यार

UP Crime News : जवान बेटे होने के बावजूद 35 वर्षीय यशोदा शर्मा ने पति संजय शर्मा के होते हुए जेठ रामनिवास से शादी कर ली. तब वह रामनिवास के साथ ही रहने लगी. इस अपमान को संजय शर्मा बरदाश्त नहीं कर सका, उस की मौत हो गई. बेटों को भी समाज में जलालत भरी जिंदगी नासूर बनती दिखी तो उन्होंने ऐसा कदम उठाया कि…

जैसेजैसे समय बीतता जा रहा था, वैसेवैसे कौशल शर्मा की उलझन बढ़ती जा रही थी. कौशल एक टीचर था. उस का दिन तो स्कूल के बच्चों को पढ़ाने में बीत जाता था, लेकिन रातें करवटें बदलते बीतती थीं. उस की इस उलझन का कारण थी, उस की सगी मम्मी यशोदा देवी. दरअसल, यशोदा देवी ने पति संजय शर्मा का साथ छोड़ कर रिश्ते के जेठ लगने वाले रामनिवास शर्मा से शादी रचा ली थी. मम्मी के इस गलत कदम से कौशल शर्मा की पूरे समाज में घोर बदनामी हो रही थी. बिरादरी के कुछ परिवारों ने उस का हुक्कापानी भी बंद कर दिया था. उस के पापा संजय शर्मा तो इस बदनामी से इतना ज्यादा दुखी हुए कि मम्मी द्वारा शादी रचाने के एक माह बाद ही उन्होंने दम तोड़ दिया.

मम्मी की चरित्रहीनता ने कौशल को झकझोर कर रख दिया था. उस का गांव में सिर उठा कर चलना दूभर हो गया था. गांव के लोग मम्मी के चरित्र को ले कर उस पर कमेंट करते तो उस के दिल को गंभीर चोट लगती. हमउम्र युवक मम्मी को ले कर गंदी व अश्लील बातें करते तो कौशल तिलमिला उठता. कभीकभी कमेंट करने वालों से उस का झगड़ा व मारपीट भी हो जाती थी. कई साल बीत गए थे, लेकिन मम्मी की चरित्रहीनता उस का पीछा नहीं छोड़ रही थी. इसी के चलते कौशल अभी तक कुंवारा था. जो भी रिश्ता आता, मम्मी के चालचलन की वजह से टूट जाता. गांव के लोग भी आग में घी डालने का काम करते, जिस के कारण कोई भी बाप अपनी बेटी का हाथ देने को राजी न होता.

समय बीतते कौशल शर्मा के मन में मम्मी के प्रति नफरत पनपने लगी. नफरत पनपने का दूसरा कारण यह भी था कि वह कौशल से जमीन व मकान में अपना हिस्सा मांगने लगी थी. कौशल दिखावे के तौर पर तो मम्मी से मिलने उस के घर जाता था और बतियाता भी था, लेकिन सीने में नफरत की चिंगारी सुलगती थी. कौशल शर्मा अब तक अच्छी तरह समझ चुका था कि जब तक उस की मम्मी जीवित है, तब तक उस की जिंदगी में जहर घुला रहेगा. न उस का घर बसेगा, न ही उस के भाई का. मम्मी उस की जमीन भी हड़प लेगी, अत: मम्मी को सबक सिखाना ही पड़ेगा.

उस रोज कौशल की उलझन बढ़ी तो उस ने फोन कर दोस्तों को घर बुला लिया. थोड़ी देर बाद ही बौबी, रजत, सतबीर, कबीर व सौरभ उस के घर आ गए. कौशल ने दोस्तों से कहा कि मम्मी ने जीना हराम कर रखा है. इसलिए मैं मम्मी को सबक सिखाना चाहता हूं. इस में मुझे तुम सब का साथ चाहिए.

”कौशल भैया, आप ने अपनी मम्मी को सबक सिखाने में बहुत देर कर दी. तुम्हारी जगह मैं होता तो बदचलन मम्मी को कब का सबक सिखा दिया होता.’’ रजत बोला.

रजत की बात का उस के अन्य दोस्तों ने भी समर्थन किया और उस का साथ देने का वादा किया. इस के बाद कौशल ने दोस्तों के साथ मिल कर मम्मी को सबक सिखाने की योजना बनाई. 28 जुलाई, 2025 की रात 10 बजे थाना बलरई के एसएचओ दिवाकर सरोज को सूचना मिली कि यमुना नदी पर बने खंदिया पुल के पास सड़क किनारे एक महिला की लाश पड़ी है. यह सूचना इटावा जिले के फकीरे की मड़ैया गांव निवासी धीरेंद्र सिंह ने मोबाइल फोन के जरिए दी थी. प्राप्त सूचना से दिवाकर सरोज ने पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया, फिर पुलिस बल के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. उस समय पानी बरस रहा था और रात का अंधेरा छाया था, जिस से कोई भी काररवाई संभव न थी.

अत: महिला के शव को सुरक्षित कर घटनास्थल पर पुलिस का पहरा लगा दिया गया. आसपास के गांवों में महिला की सड़क किनारे लाश पड़ी होने की खबर फैली तो वहां ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ी. कुछ देर बाद इटावा के एसएसपी ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव, एसपी (सिटी) अभयनाथ त्रिपाठी तथा सीओ (जसवंत नगर) आयुषि सिंह भी घटनास्थल पर आ गईं. पुलिस अधिकारियों ने फोरैंसिक टीम को भी मौके पर बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने बड़ी बारीकी से घटनास्थल का निरीक्षण किया. सड़क किनारे पड़ी मृत महिला की उम्र 35 साल के आसपास थी.

उस के शरीर पर गुलाबी रंग की साड़ी लिपटी थी. साड़ी पर सफेद रंग के फूलों के प्रिंट थे. हाथों में सुनहरे रंग की चूडिय़ां पहने थी. उस के सिर व माथे पर चोट के निशान थे. खून जम चुका था. उस का रंग साफ तथा शरीर स्वस्थ था. जामातलाशी में उस के पास कोई भी सामान बरामद नहीं हुआ. फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. निरीक्षण के बाद पुलिस अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि महिला की मौत या तो सड़क दुर्घटना में हुई या फिर हत्या कर लाश यहां फेंकी गई. लूटपाट के साथ रेप की आशंका भी जताई. अब तक सैकड़ों ग्रामीण शव को देख चुके थे, लेकिन कोई भी शव को पहचान नहीं पाया था.

अत: अधिकारियों ने यह भी अनुमान लगाया कि शायद मृतका दूरदराज के किसी गांव, शहर या कस्बे की रहने वाली है. चूंकि लाश की पहचान नहीं हो पाई थी, इसलिए पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर एसएचओ दिवाकर सरोज ने महिला के शव के फोटो हुलिए सहित सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दिया. साथ ही आसपास के थानों में भी सूचना भेज दी. इस के अलावा इटावा सीमा से सटे आगरा जिले के थाना चित्राहट व जैतपुर को भी महिला का शव पाए जाने की जानकारी दे दी. इस के बाद शव का पंचनामा सीओ आयुषी सिंह की निगरानी में करा कर शव को पोस्टमार्टम के लिए इटावा के जिला अस्पताल भेज दिया गया.

एसएचओ दिवाकर सरोज 30 जुलाई, 2025 की सुबह 10 बजे अपने कक्ष में मौजूद थे. तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आया. उस ने कहा, ”हुजूर, मेरा नाम रामनिवास शर्मा है. मैं आगरा जिले के थाना जैतपुर के गांव बिठौना का रहने वाला हूं. मेरी पत्नी यशोदा दवा लेने जैतपुर कस्बा 28 जुलाई, 2025 की शाम गई थी. उस के बाद वापस घर नहीं आई. उस का मोबाइल फोन भी बंद है. बीती शाम हम गुमशुदगी दर्ज कराने थाना जैतपुर गए थे. वहां पता चला कि बलरई थाना क्षेत्र में एक महिला की लाश सड़क किनारे मिली है. कहीं वह लाश मेरी पत्नी यशोदा की तो नहीं? इसलिए थाने आया हूं.’’

उस की बात सुनने के बाद एसएचओ दिवाकर सरोज ने उसे लाश के फोटो दिखाए. फोटो देखते ही रामनिवास शर्मा की आंखों में आंसू छलक आए. बोले कि यह तो उस की बीवी यशोदा है. लाश की शिनाख्त होने पर एसएचओ ने राहत की सांस ली. क्योंकि अब अगला काम हत्यारों का पता लगाना था. वह उन्हें मोर्चरी ले गए. मोर्चरी में शव देखते ही रामनिवास रो पड़े और बोले, ”हुजूर, यह लाश मेरी पत्नी यशोदा की है. उस की मौत सड़क दुर्घटना में नहीं हुई, बल्कि उस की हत्या की गई है. आप रिपोर्ट दर्ज कर काररवाई करें.’’

शव की शिनाख्त हो जाने पर एसएसपी ब्रजेश कुमार श्रीवास्तव ने केस के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम एसपी (सिटी) अभयनाथ त्रिपाठी व सीओ (जसवंत नगर) आयुषी सिंह की निगरानी में गठित कर दी. इस गठित पुलिस टीम ने सब से पहले घटनास्थल का फिर से निरीक्षण कर पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन किया. रिपोर्ट के मुताबिक यशोदा देवी की मौत किसी वाहन से कुचलने से लग रही थी. सिर और माथे पर चोट लगना मौत का कारण बना था. उस के साथ बलात्कार करने जैसी बात सामने नहीं आई. टीम ने मृतका के पति रामनिवास शर्मा से भी पूछताछ की तथा उस का बयान दर्ज किया. उस ने बताया कि यशोदा के पास मोबाइल फोन था. वह नहीं मिला.

सीसीटीवी फुटेज से मिला हत्यारों का सुराग

पुलिस टीम ने खंदिया पुल के रास्तेे सड़क किनारे लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगाला तो बाइक से महिला को ले जाते एक युवक दिखा. इस फुटेज को पुलिस टीम ने मृतका के पति रामनिवास शर्मा को दिखाया तो उस ने बाइक चलाने वाले युवक को तुरंत पहचान लिया. उस ने पुलिस को बताया कि बाइक चलाने वाला युवक कोई और नहीं यशोदा का बड़ा बेटा कौशल शर्मा है और पीछे बैठी उस की मम्मी यशोदा है. रामनिवास शर्मा की बात सुन कर पुलिस टीम चौंक पड़ी. टीम ने फिर यशोदा के बेटे कौशल शर्मा को हिरासत में लेने का जाल बिछाया.

पुलिस टीम ने पहले उस के गांव खुरियापुर में छापा मारा, लेकिन वह घर से फरार था. उस के बाद पुलिस ने जैतपुर कस्बा स्थित मकान पर छापा मारा, वह पुलिस को चकमा दे गया. 2 अगस्त, 2025 की रात 8 बजे पुलिस टीम ने नाटकीय ढंग से कौशल शर्मा को जैतपुर कस्बा के बस स्टाप से गिरफ्तार कर लिया. उसे थाना बलरई लाया गया. थाने में जब पुलिस टीम ने कौशल शर्मा से यशोदा की हत्या के संबंध में पूछा तो वह साफ मुकर गया, लेकिन जब उस से पुलिसिया अंदाज में पूछताछ शुरू हुई तो वह ज्यादा देर तक टिक नहीं सका और अपनी मम्मी यशोदा की हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया. इतना ही नहीं, उस ने इस वारदात में शामिल लोगों के नाम भी बता दिए.

कौशल शर्मा के कुबूलनामे के बाद पुलिस टीम ने रात में ही उस के साथियों के घर दबिश दी और कौशल शर्मा की निशानदेही पर गड़ा रमपुरा थाना जैतपुर (आगरा) निवासी बौबी तथा इसी थानाक्षेत्र के गांव कमतरी गोपालपुरा थाना निवासी रजत को गिरफ्तार कर लिया. लेकिन जैतपुर कस्बा निवासी सतबीर, कबीर और सौरभ पुलिस के हाथ नहीं आए. पुलिस ने उन की गिरफ्तारी के लिए मुखबिरों को लगा दिया. पुलिस टीम ने हत्यारोपियों की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त होंडा शाइन बाइक, स्कौर्पियो कार तथा 3 मोबाइल फोन बरामद किए.

इस के अलावा मृतका का मोबाइल फोन भी कौशल शर्मा की निशानदेही पर बरामद किया, जिसे उस ने तोड़ कर जला दिया था. बौबी व रजत ने भी बिना किसी दबाव के हत्या का जुर्म कुबूल किया. गिरफ्तारी व बरामदगी के बाद एसपी (सिटी) अभयनाथ त्रिपाठी व सीओ आयुषी सिंह ने पुलिस सभागार में संयुक्त प्रैसवार्ता की और मीडिया के समक्ष यशोदा देवी हत्याकांड का खुलासा किया. चूंकि हत्यारोपियों ने हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया था और हत्या में प्रयुक्त कार व बाइक को भी बरामद करा दिया था. अत: पुलिस ने मृतका के दूसरे पति रामनिवास शर्मा को वादी बना कर बीएनएस की धारा 103(1) तथा 201(3) (5) के तहत कौशल शर्मा, बौबी, रजत, सतबीर, कबीर व सौरभ के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली. पुलिस जांच में कलियुगी बेटे द्वारा अपनी मम्मी की हत्या की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

घूंघट से ऐसे निकले मोहब्बत के तीर

उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद के थाना जैतपुर अंतर्गत एक गांव है-खुरियापुर. इसी गांव में संजय शर्मा सपरिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी यशोदा देवी के अलावा 2 बेटे कौशल व अनुपम थे. संजय शर्मा के पास लगभग 10 बीघा उपजाऊ भूमि थी, जिस में अच्छी पैदावार होती थी. खेतीबाड़ी से ही वह परिवार का भरणपोषण करता था. संजय शर्मा स्वयं तो ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था, लेकिन वह अपने दोनों बेटों को पढ़ालिखा कर अफसर बनाना चाहता था. इसी कारण वह घर खर्च में कटौती कर बेटों की पढ़ाई पर ध्यान देता था.

समय बीतते बड़े बेटे कौशल ने बीए पास कर लिया. उस का रुझान शिक्षा विभाग की ओर था. वह बीएड की परीक्षा पास कर अध्यापक बनना चाहता था. जबकि अनुपम का सपना अफसर बनने का था, अत: वह भी मन लगा कर पढ़ता था. उस ने भी इंटरमीडिएट की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली थी. संजय शर्मा किसान था. वह खेतों पर हाड़तोड़ मेहनत करता था. अधिक मेहनत करने से संजय शर्मा का शरीर कमजोर हो गया था और वह बीमार रहने लगा था. अब वह खेतों की उचित देखभाल नहीं कर पाता था, जिस से उपज कम होने लगी थी और उस की कृषि आय में कमी आ गई थी. उसे अब आर्थिक संकट से जूझना पड़ता था.

पापा की आर्थिक स्थिति खराब हुई तो कौशल व अनुपम ट्यूशन पढ़ा कर अपनी पढ़ाई का खर्च पूरा करने लगे. साथ ही खेतों की भी देखभाल करने लगे. संजय शर्मा जितना सीधा था, उस की पत्नी यशोदा उतनी ही तेजतर्रार थी. वह बनसंवर कर रहती थी. उसे देख कर कोई कह नहीं सकता था कि वह 2 जवान बेटों की मां है. यशोदा घर की मालकिन थी. उसे घर में वैसे तो सब सुख था, लेकिन पति सुख से वंचित रहती थी. दरअसल, बीमारी के चलते वह पत्नी से दूरी बनाए रखता था. जबकि यशोदा अब भी पति का साथ चाहती थी.

35 वर्षीया यशोदा माथे पर बिंदी सजा कर और काला चश्मा लगा कर घर से बाजारहाट जाने को निकलती तो गांव के लोग उसे घूरघूर कर देखते. लोगों का घूर कर देखना यशोदा को मन ही मन तो अच्छा लगता, लेकिन दिखावे के तौर पर वह आंखें तरेरती. हालांकि कभीकभी कोई युवक फब्तियां भी कस देते, ”बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम.’’

यह कमेंट सुन यशोदा आपे से बाहर हो जाती और उस युवक को खूब खरीखोटी सुनाती. यशोदा अब ऐसे अधेड़ की तलाश में रहने लगी जो उस की कामनाओं को पार लगाए साथ ही आर्थिक मदद भी करे. उस के घर आनेजाने पर किसी को शक भी न हो और उस की इज्जत भी बरकरार रहे. उन्हीं दिनों एक रोज रामनिवास शर्मा यशोदा के घर आया. वह पड़ोस के गांव बिठौना का रहने वाला था. 40 वर्षीय रामनिवास रिश्ते में यशोदा का जेठ लगता था. वह अभी तक अविवाहित था. पेशे से वह भी किसान था. उस के पास 15-20 बीघा जमीन थी. उस की आर्थिक स्थिति मजबूत थी. शरीर से वह तंदुरुस्त था.

यशोदा का पति संजय शर्मा व रामनिवास रिश्ते में चचेरे भाई थे. बीमार चल रहे छोटे भाई संजय का हालचाल लेने ही रामनिवास उस के घर आया था. उस रोज दोनों भाइयों के बीच खूब बातें हुईं. यशोदा ने भी जेठ की खूब खातिरदारी की. यशोदा की खातिरदारी से रामनिवास खूब गदगद हुआ. उस ने खुशी जाहिर करते हुए यशोदा के हाथ पर चंद नोट रखे, जिन्हें यशोदा ने नानुकुर के बाद स्वीकार कर लिए.

इस के बाद रामनिवास बीमार भाई को देखने के बहाने अकसर यशोदा के घर आने लगा. घर आतेजाते ही रामनिवास की नजर छोटे भाई संजय की पत्नी यशोदा पर पड़ी. यशोदा रामनिवास से परदा करती थी. घूंघट के भीतर वह उसे हूर की परी लगती थी. रामनिवास यशोदा को मन ही मन चाहने लगा और उसे अपना बनाने के लिए जुगत भिड़ाने लगा. अब रामनिवास जब भी आता, यशोदा को रिझाने के लिए कोई न कोई सामान जरूर लाता. वह उस से खूब बतियाता और उस के रूप तथा व्यवहार की तारीफ करता. धीरेधीरे यशोदा को भी जेठ की बातों में रस आने लगा. घूंघट के भीतर वह तिरछी नजरों से जेठ को देखती और उस की रसभरी बातों का उसी अंदाज में जवाब देती.

कहते हैं मर्द की नजर को कोई भी औरत बहुत जल्दी भांप लेती है. यशोदा भी भांप गई थी कि जेठ रामनिवास की नजर में खोट है. उस की नजरें सदैव उस के जिस्म पर गड़ी रहती हैं. वह उस के जिस्म को पाने के लिए बेताब है. इसलिए वह उसे ललचाई नजरों से देखता है. उस से रसभरी बातें करता है और तोहफे लाता है.

ऐसे ढह गई रिश्तों की दीवार

एक रोज परखने के लिए यशोदा बोली, ”जेठजी, आप जब भी आते हैं, मेरे आगेपीछे घूमते रहते हैं. मुझ से मीठीमीठी बातें करने का प्रयास करते हैं. मेरे रूप की भी तारीफ करते हो और मेरे लिए तोहफे भी लाते हो. आखिर आप मुझ से चाहते क्या हो?’’

”मैं तुम्हें चाहने लगा हूं यशोदा और तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं. तुम्हारे बिना अब मेरा जीवन अधूरा है. तुम ने मेरा प्यार स्वीकार न किया तो मैं तड़पता रहूंगा.’’ आखिर रामनिवास की दिल की बात जुबान पर आ ही गई.

जेठ रामनिवास की बात सुन कर यशोदा मन ही मन खुश हुई. लेकिन दिखावे के तौर पर बोली, ”जेठजी, आप यह क्या कह रहे हैं. मैं आप की बहू हूं. लोग सुनेंगे तो क्या कहेंगे. नहींनहीं, यह अनर्थ है.’’

”मैं कुछ नहीं जानता. मैं तो तुम्हें अपनी घरवाली बनाना चाहता हूं और वो सुख देना चाहता हूं, जो मेरा भाई संजय तुम्हें अभी तक नहीं दे पाया. वैसे भी हम दोनों का दर्द एक समान है. तुम पति सुख से वंचित हो और मैं स्त्री सुख से. हम दोनों मिल जाएं तो जीवन में बहार आ जाएगी.’’

यशोदा तो रामनिवास जैसे ही अधेड़ पुरुष की तलाश में थी, अत: उस ने रामनिवास को अपना जीवनसाथी बनाने का फैसला कर लिया. फैसले के बाद यशोदा ने जेठ को खुली छूट दे दी. वह उस के समक्ष अपने सुघड़ अंगों का भी प्रदर्शन करने लगी. उस ने जेठ से परदा करना भी बंद कर दिया और खुल कर बतियाने लगी. एक दोपहर रामनिवास यशोदा के घर आया तो वह घर में अकेली थी. पति संजय दवा लेने जैतपुर गया था और दोनों बेटे कालेज में थे. सूना घर पा कर रामनिवास ने यशोदा को बांहों में भर लिया और शारीरिक छेड़छाड़ करने लगा. यशोदा ने कुछ पल बनावटी विरोध किया, उस के बाद बिस्तर पर स्वयं ही सहयोग करने लगी. फिर तो उस रोज जेठबहू के रिश्ते की दीवार ढह गई. दोनों ने ही अपनी हसरतें पूरी कीं.

अवैध संबंधों का रिश्ता एक बार कायम हुआ तो वक्त के साथ बढ़ता ही गया. उन्हें जब भी मौका मिलता, एकदूसरे की बांहों में समा जाते. यशोदा ने सारी मर्यादाओं का ताक पर रख दिया और आए दिन जेठ के साथ रास रचाने लगी. वह भूल गई कि वह 2 जवान बेटों की मां है और परिवार की समाज में प्रतिष्ठा है.

यशोदा के दोनों बेटे कौशल व अनुपम, रामनिवास शर्मा को ताऊ कह कर बुलाते थे और पैर छू कर आशीर्वाद लेते थे. उन्हें पता ही नहीं था कि रिश्ते का ताऊ उन की इज्जत तारतार कर रहा है. संजय शर्मा भी बड़े भाई रामनिवास को अपना हमदर्द समझता था, इसलिए उस के आनेजाने पर कोई पाबंदी नहीं थी. संजय को भी पता नहीं था कि बड़ा भाई उस के साथ विश्वासघात कर रहा है और इज्जत का छुरा उस की पीठ में घोंप रहा है.

जब रामनिवास का उस के यहां आनाजाना बढ़ा और उस के द्वारा मदद शुरू की तो उसे उस पर शक हुआ. लेकिन यशोदा ने कोई ऐतराज नहीं जताया तो वह शांत हो गया. कहते हैं कि कोई भी गलत काम ज्यादा दिनों तक नहीं छिप सकता है. यशोदा और रामनिवास के साथ भी ऐसा ही हुआ. एक रात संजय शर्मा ने पत्नी यशोदा को रामनिवास के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया. फिर तो उस रात घर में खूब कोहराम मचा. संजय ने रामनिवास को खूब खरीखोटी सुनाई और यशोदा की पिटाई की. मम्मी की करतूत की जानकारी बेटों को हुई तो उन्होंने शर्म से सिर झुका लिया.

इस घटना के बाद संजय व उस के बेटे कौशल ने रामनिवास के घर आने पर प्रतिबंध लगा दिया. लेकिन प्रतिबंध के बावजूद यशोदा व रामनिवास का मिलन बंद नहीं हुआ. वह बहाने से घर से निकलती और पड़ोसी गांव बिठौना में रामनिवास के घर पहुंच जाती और मिलन कर वापस आ जाती. लेकिन यहां भी एक रोज हंगामा हो गया. अब तक यशोदा और रामनिवास एकदूसरे के इतने दीवाने बन गए थे कि उन्होंने शादी रचाने का निश्चय कर लिया, लेकिन शादी रचाने की भनक उन्होंने किसी को भी नहीं लगने दी. रामनिवास ने गुपचुप तरीके से शादी की पूरी तैयारी कर ली.

10 जनवरी, 2017 की दोपहर रामनिवास यशोदा को साथ ले कर गांव के बाहर स्थित शीतला माता के मंदिर पहुंचा. फिर एकदूसरे के गले में माला पहना कर शादी रचा ली. रामनिवास ने यशोदा की मांग में सिंदूर भर कर अपनी जीवनसंगिनी बना लिया. यशोदा ने भी रामनिवास को दूसरे पति के रूप में स्वीकार कर लिया. यशोदा रामनिवास की दुलहन बन कर उस के घर आई तो पूरे बिठौना गांव में चर्चाएं शुरू हो गईं. महिलाएं चटखारे ले कर बातें करतीं और हंसीठिठोली करती. शाम होतेहोते यशोदा की शादी की बात खुरियापुर गांव भी पहुंच गई. फिर तो गांव में कोलाहल मच गया.

यशोदा द्वारा दूसरा विवाह रचाने की बात संजय शर्मा के कानों में पड़ी तो उसे लगा जैसे उस के कानों में किसी ने गर्म शीशा उड़ेल दिया. वह अवाक रह गया. उस ने अपना माथा पीट लिया. उस के बेटे कौशल का भी सिर शर्म से झुक गया. दोनों कई दिनों तक घर से बाहर नहीं निकले. पत्नी यशोदा के गलत कदम से संजय शर्मा को गहरा सदमा लगा. वह बीमार पड़ गया और कुछ दिनों में ही दम तोड़ दिया. पापा की मौत से कौशल और अनुपम को बड़ा दुख हुआ. पापा की मौत का दोषी उन दोनों ने मम्मी को ही ठहराया.

नासूर बन रही थी अपमान की जिंदगी

यशोदा द्वारा दूसरी शादी रचाने से परिवार की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई थी. कौशल का भी गांव में सिर उठा कर चलना दूभर हो गया था. गांव के लोग उस की मम्मी के चरित्र को ले कर कमेंट करते तो वह तिलमिला उठता था. इस समस्या से निपटने के लिए कौशल ने कुछ समय बाद गांव छोड़ दिया और जैतपुर कस्बा में जा कर बस गया. कस्बे में उस ने स्कूल खोल लिया और कक्षा 8 तक के बच्चों को पढ़ाने लगा. उस ने गांव की जमीन को बंटाई पर दे दिया. वहीं यशोदा पति संजय शर्मा की जायदाद से भी हिस्सा मांग रही थी.

कौशल शर्मा कस्बे में रहता जरूर था, लेकिन मम्मी की चरित्रहीनता अब भी उस का पीछा नहीं छोड़ रही थी. जब भी गांव का कोई युवक या यारदोस्त उस के सामने पड़ता, वह कमेंट जरूर करता. मम्मी की चरित्रहीनता से उस का विवाह भी नहीं हो पा रहा था. इस सब के बावजूद कौशल ने मम्मी से रिश्ता जोड़ रखा था. वह दिखावे के तौर पर मम्मी से मिलने जाता, लेकिन दिल में नफरत की चिंगारी सुलगती रहती थी.

कौशल के 2 खास दोस्त थे— रजत और बौबी. रजत कमतरी गोपालपुरा का रहने वाला था, जबकि बौबी गढ़ी रमपुरा का था. इन दोनों के मार्फत ही कौशल की 3 अन्य जैतपुरा कस्बा निवासी सतबीर, कबीर व सौरभ से दोस्ती हो गई. रविवार वाले दिन सभी साथ घूमते और पार्टी करते. कौशल अपने दोस्तों से दुखदर्द साझा करता था. एक शाम कौशल ने अपने पांचों दोस्तों को अपने घर बुलाया और अपना दर्द बयां कर मम्मी को सबक सिखाने व साथ देने के लिए कहा. चूंकि उन में गहरी दोस्ती थी, अत: वे सब कौशल का साथ देने को राजी हो गए. इस के बाद कौशल ने दोस्तों के साथ मिल कर यशोदा की हत्या की योजना बनाई.

28 जुलाई, 2025 की शाम कौशल शर्मा अपनी मम्मी यशोदा से मिलने बिठौना गांव पहुंचा. गांव के बाहर सड़क पर उसे मम्मी दिखाई पड़ी. वह मम्मी के पास पहुंचा और पूछा, ”मम्मी, तुम कहां जा रही हो?’’

यशोदा ने जवाब दिया, ”बेटा, कई दिनों से बीमार हूं. दवा लेने जैतपुर कस्बे जा रही थी. टैंपो के इंतजार में खड़ी हूं.’’

”मम्मी, तुम बाइक पर बैठो. मैं तुम्हें इटावा के अच्छे डाक्टर को दिखाऊंगा. उस की दवा से तुम जल्दी ठीक हो जाओगी. फिर बारबार बीमार नहीं पड़ोगी.’’

यशोदा कौशल की चाल को समझ नहीं सकी और उस की बाइक पर बैठ कर चल दी. कुछ दूर जा कर कौशल ने बाइक रोकी और दोस्त सौरभ से फोन पर बात की, ”सौरभ, तुम अपनी कार से दोस्तों को साथ ले कर यमुना नदी के खंदिया पुल पर आ जाओ. मम्मी मेरे साथ में है.’’

सौरभ समझ गया कि कौशल मम्मी को सबक सिखाने ले गया है. अत: सौरभ ने अपनी स्कौर्पियो कार यूपी75एक्यू0876 निकाली फिर दोस्त रजत, बौबी, सतबीर व कबीर को कार में बिठा कर बलरई कस्बे की ओर चल पड़ा. लगभग एक घंटे बाद वह खंदई पुल पहुंच गया. खंदई पुल पर कौशल व उस की मम्मी यशोदा पहले से मौजूद थी. इशारा पा कर रजत व बौबी ने यशोदा को कार में बिठा लिया फिर कार धीमी गति से बढ़ा दी. कार के पीछे बाइक से कौशल चल रहा था. लगभग एक किलोमीटर दूर जा कर रजत व बौबी ने यशोदा को कार से सड़क पर फेंक दिया, फिर कार से कुचल कर मार डाला.

हत्या करने के बाद शव को खंदिया पुल के पास सड़क किनारे फेंक दिया. कौशल ने मम्मी के मोबाइल फोन को कूंच कर जला दिया. उस के बाद सड़क के रास्ते सभी फरार हो गए. इधर दवा लेने गई यशोदा देवी रात 10 बजे तक वापस घर नहीं आई तो रामनिवास को चिंता हुई. उस ने यशोदा को काल लगाई तो उस का फोन बंद था. दूसरे रोज रामनिवास पत्नी यशोदा की गुमशुदगी दर्ज कराने थाना जैतपुर गया तो वहां बलरई थाना क्षेत्र के खंदिया पुल के पास सड़क किनारे अज्ञात महिला की लाश पाए जाने की जानकारी हुई.

तब रामनिवास थाना बलरई पहुंचा और मोर्चरी में रखी महिला की लाश को अपनी पत्नी यशोदा के रूप में शिनाख्त की. उस ने हत्या की आशंका जताई तो पुलिस ने गंभीरता से जांच कर हत्या का खुलासा किया और आरोपियों को गिरफ्तार किया. 4 अगस्त, 2025 को पुलिस ने आरोपी कौशल शर्मा, रजत व बौबी को इटावा कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया. कथा  संकलन तक उन की जमानत नहीं हुई थी. फरार आरोपी सतबीर, कबीर व सौरभ की तलाश में पुलिस जुटी थी. UP Crime News

 

 

MP News : बीवी के बहके कदम उठीं 4 अर्थियां

MP News : 2 बच्चों की मां द्रौपदी लोधी पति के दोस्त के प्यार में इस कदर अंधी हो गई कि वह खुल्लमखुल्ला उस के साथ इश्क लड़ाने लगी. फेमिली वालों ने समझाया तो उस ने डरने के बजाय फेमिली वालों को ही झूठे मामले में फंसाने की धमकी दे डाली. बदनामी के डर से जब पानी सिर के ऊपर हो गया तो फेमिली वालों को सामूहिक रूप से मजबूरन ऐसा कदम उठाना पड़ा, जिस की गूंज सैकड़ों मील तक पहुंची…

25 जुलाई, 2025 की रात करीब 2 बजे की बात है. मध्य प्रदेश के जिला सागर के गांव टीहर का रहने वाला जगदीश लोधी बाथरूम जाने के लिए बिस्तर से उठा तो उसे उल्टियां करने की आवाज सुनाई दी. उसे लगा कि शायद ऊपर की मंजिल पर छोटे भाई के साथ रहने वाली उस की मम्मी की तबीयत ठीक नहीं है. आवाज सुन कर नीचे की मंजिल से जगदीश जब ऊपर की मंजिल पर बने कमरे में आया तो यहां का दृश्य देख कर हैरान रह गया. उस की मम्मी फूलरानी, भाई मनोहर और उस के बच्चे तड़पते हुए उल्टियां कर रहे थे. जगदीश को कुछ समझ नहीं आ रहा था, तभी उस ने गांव में रहने वाले अपने भाई नंदराम को खबर दी तो नंदराम भी आननफानन में खेत में बने मनोहर के मकान पर पहुंच गया.

उस ने गांव के कुछ लोगों को फोन कर के बुलाया और उन की मदद से सभी को खुरई के अस्पताल ले जाया गया. खुरई सिविल अस्पताल की ड्यूटी डौक्टर वर्षा केशरवानी ने चारों की जांच की तो उन में से अस्पताल पहुंचने के पहले ही मम्मी फूलरानी और भतीजे अनिकेत की  मौत हो चुकी थी. शिवानी और उस के पापा मनोहर की हालत गंभीर थी. कुछ ही देर बाद शिवानी ने भी खुरई अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया और मनोहर को गंभीर हालत में जिला अस्पताल सागर रैफर किया गया, जहां  रास्ते में ही उस ने दम तोड़ दिया. सूचना मिलते ही खुरई (सिटी) थाने के टीआई योगेंद्र सिंह दांगी टीम के साथ जिला अस्पताल पहुंच गए.

औपचारिक जांच पूरी करने के बाद उन्होंने चारों शवों को मोर्चरी में रखवा दिया. इस मामले की सूचना उन्होंने उच्चाधिकारियों को भी दे दी. पोस्टमार्टम के बाद पुलिस कस्टडी में चारों लोगों की 26 जुलाई को दोपहर जब डैडबौडी गांव लाई गई, तब मनोहर के घर के सामने लोगों की भीड़ जमा हो गई थी. पूरे गांव में शोक का माहौल था. पुलिस टीम जब घटनास्थल पर पहुंची तो वहां पर जहरीले पदार्थ की 3 खाली डिब्बियां मिलीं, जिन में जहर की कुल 30 गोलियां थीं. कमरे में 4 गिलास भी मिले, जिन में घोल कर गोलियां पी गई थीं.

घटना के समय मकान की पहली मंजिल के कमरे में फूलरानी का शव पलंग पर मिला, जबकि उन का बेटा मनोहर और उस के दोनों बच्चे अनिकेत और शिवानी पलंग के पास बेहोशी की हालत में पाए गए. मध्य प्रदेश के सागर जिले की खुरई तहसील के एक छोटे से गांव टीहर के 45 साल का मनोहर लोधी पहले गांव में ही बने मकान में संयुक्त परिवार में रहता था. उन्नत खेती करने वाले मनोहर ने अपनी मेहनत के बलबूते 4 माह पहले ही गांव के घर से करीब 600 मीटर की दूरी पर दोमंजिला मकान बनवा लिया था.

मकान बनते ही वह परिवार के साथ उस में शिफ्ट हो गया. 4 भाई और 4 बहनों के परिवार में मनोहर सब से छोटा था. उस का एक भाई जगदीश लोधी मानसिक रोगी था, इसलिए वह भी मनोहर के साथ में रहता था. मनोहर के परिवार के पास करीब 16 एकड़ पैतृक जमीन थी, जो पापा की डैथ के बाद बंटवारे में चारों भाइयों में बराबर बांट दी गई थी. मनोहर के अलावा उस के 2 बड़े भाई नंदराम और गोविंद लोधी भी खेतीकिसानी करते थे. मनोहर की मम्मी फूलरानी उसी के साथ नए मकान में रहती थीं.

मनोहर लोधी तो किसी कारण पढ़ नहीं पाया था, लेकिन वह अपने दोनों बच्चों को अच्छी शिक्षा देना चाहता था. उस की बेटी शिवानी ने इंगलिश मीडियम प्राइवेट स्कूल से 12वीं का एग्जाम पास किया था. और वह डौक्टर बनना चाहती थी, इसलिए मनोहर ने 2 लाख रुपए फीस जमा कर के उसे सागर के एक प्राइवेट कालेज में दाखिला दिलाया था. 16 साल का बेटा अनिकेत भी इसी साल कक्षा 10वीं पास कर चुका था.

सामूहिक आत्महत्या की ऐसे बनाई योजना

सामूहिक आत्महत्या की खबर सोशल मीडिया पर वायरल होते ही सागर जिले के एसपी विकास कुमार साहबाल, एसडीओपी सचिन परते, खुरई शहरी थाने के टीआई योगेंद्र सिंह दांगी पूरे दलबल और फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंचे. फोरैंसिक टीम को मनोहर के घर के कमरे में कुरसी पर 3 सल्फास की डिब्बियां रखी हुई मिलीं, जबकि जमीन पर रखी एक ट्रे में चम्मच और 3 खाली गिलास भी रखे मिले थे, जिसे देख कर पुलिस ने अनुमान लगाया कि इसी का सेवन कर चारों लोगों ने सुसाइड किया होगा.

रात का समय था. 45 साल का मनोहर लोधी अपनी बुजुर्ग मां फूलरानी के कमरे में पहुंचा, उस समय फूलरानी पलंग पर लेटी हुई थीं. पास में ही मनोहर की 18 साल की बेटी शिवानी और 16 साल का बेटा अनिकेत भी बैठे हुए थे. मनोहर चुपचाप पलंग पर जा कर बैठ गया. मनोहर के गमगीन चेहरे को फूलरानी ने पढ़ लिया था. फूलरानी ने अपने बेटे के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, ”मनोहर, तू इतना उदास क्यों रहता है, तेरी हालत मुझ से देखी नहीं जाती बेटा.’’

”मम्मी, आंखों देखी मक्खी कौन खा सकता है? द्रौपदी ने तो परिवार की नाक ही कटा दी. मेरा तो गांव में उठनाबैठना ही दूभर कर दिया है.’’ मनोहर दुखड़ा सुनाते हुए बोला.

”हां बेटा, गांव में बदनामी तो हमारी हो ही रही है, मगर बालबच्चों की खातिर अपने आप को संभाल बेटा.’’ मम्मी ने ढांढस बंधाते हुए कहा.

”दादी, मुझे भी गांव के लड़के खूब ताना मारते हैं, मम्मी की हरकतों ने हमें सिर उठाने लायक नहीं छोड़ा.’’ अनिकेत ने बीच में अपने दिल का दर्द बताते हुए कहा.

”पापा, मेरी सहेलियां भी कहती हैं कि गांव की महिलाएं भी मम्मी के चालचलन को ले कर खूब चटखारे ले कर बतियाती हैं.’’ बेटी शिवानी भी बोल पड़ी.

मनोहर बोला, ”हां बेटा, तुम्हारी मम्मी ने हम लोगों को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. जी तो करता है कि जहर खा कर अपनी जान ही दे दूं.’’

”बुढ़ापे में ये दिन देखने पड़ेंगे, मैं ने तो सपने भी नहीं सोचा था. नाशपीटी बहू लाजशरम बेच कर सुरेंद्र के साथ खुलेआम रंगरलियां मना रही है. तू तो बेटा पहले मुझे जहर दे दे.’’ फूलरानी ने मन की बात जाहिर करते हुए कहा.

”पापा, मम्मी की बेशरमी से तो भैया और मैं भी तंग आ चुके हैं. हम लोगों ने तो मम्मी को सुरेंद्र चाचा के साथ भी देख लिया था, मगर मम्मी तो बेशरमी की हद पार चुकी है. ऐसी मां के साथ जीने का कोई फायदा नहीं है.’’ बेटी शिवानी ने रोते हुए कहा.

”अनाज में मिलाने वाली दवा अपने कमरे में रखी हुई हैं, मैं तो उसे घोल कर सब को दे देता हूं. ऐसे घुटघुट कर जीने से अच्छा है कि हम लोग मौत को गले लगा लें.’’ मनोहर बोला.

”हां बेटा, तेरी बात सही है. अपने मरते ही घर की जमीनजायदाद का हिस्सा ले कर बहू उसी सुरेंद्र के साथ मजे से रह लेगी.’’ फूलरानी बोलीं.

”मम्मी, उस को तो इस घर के हिस्से से फूटी कौड़ी भी नहीं मिलने दूंगा. मैं मरने से पहले सब कुछ लिखापढ़ी कर दूंगा. चल अनिकेत, कागज पेन निकाल और मैं जैसा कह रहा हूं, वैसा लिख दे.’’ बेटे को आदेश देते हुए मनोहर बोला.

मनोहर बहुत सीधा था और गांव में खेतीबाड़ी करता था. उस ने खूब मेहनत कर के हाल ही में अपना दोमंजिला मकान बनवाया था, जिस में 4 महीने पहले ही गृह प्रवेश किया था. वह पढ़ालिखा नहीं था, इसीलिए उस ने आत्महत्या से पहले अपने बेटे अनिकेत को अपनी जमीनजायदाद के बंटवारे को लिखने को कहा तो अनिकेत अपने स्कूल बैग से कौपी का पन्ना और पेन निकाल कर लिखने बैठ गया.

संपत्ति से पत्नी को नहीं दी फूटी कौड़ी

मनोहर के कहने पर लेटर में अनिकेत ने लिखा कि उन की संपत्ति में पत्नी द्रौपदी का कोई हिस्सा नहीं है. मनोहर के हिस्से की 4 एकड़ जमीन भाइयों को मिलेगी. 4 भैंसें बुआओं को देने के साथ भैंसों के 2 बच्चे अपने सब से बड़े भाई गोविंद सिंह को दे दिए जाएं. दादी के गहने भी अपनी 4 बुआओं को  बराबरबराबर बांट दिए जाएं. लेटर में उन पर कोई कर्ज न होने की बात भी लिखी. लेटर में यह भी लिखवाया कि पापा ने मामा से 2 लाख रुपए उधार लिए थे, उस के बदले 2 लाख 40 हजार रुपए चुका दिए हैं.

साथ ही अपनी तेरहवीं में खर्च करने के लिए 1 लाख 20 हजार रुपए गोदरेज की अलमारी में रखे होने की बात कही. पापा के फोनपे एकाउंट में 68 हजार रुपए होने का हवाला देते हुए लेटर में फोनपे का पासवर्ड भी लिखा गया है. हमारी पूरी जमीन 3 भाइयों को दी जाती है. जगदीश चाचा की सेवा जो करेगा, उसे ही उन के हिस्से की जमीन मिलेगी. पूजा के बरतन और सामग्री गांव के पंडितजी को दे दिए जाएं. मनोहर की पत्नी द्रौपदी के भाई चंद्रेश सिंह लोधी को 3 दिन पहले ही मनोहर ने फोन कर के तुरंत घर बुलाया था और बहन को घर ले जाने को कहा. उस समय के हालात को भांपते हुए चंद्रेश बहन को ले कर खुरई वाले अपने घर पर आ गया.

उसी दिन शाम को मनोहर अपने साले के घर गया और उस से अपना मकान बनवाते समय अलगअलग समय पर करीब 2 लाख रुपए लिए थे, वह अपने साले को दे कर आ गया था. मनोहर और उस की पत्नी द्रौपदी के बीच आए दिन झगड़े होते थे, जिस से बच्चे भी मानसिक रूप से परेशान रहने लगे थे. मनोहर की पत्नी द्रौपदी कुछ दिन पहले अपने मायके डोमा-केसली गांव चली गई थी. उस दिन भी पहले फोन पर मनोहर की पत्नी से बहस भी हुई थी. घरपरिवार की चलअचल संपत्ति के बंटवारे लौकर में लिख कर रखने के कुछ ही घंटों बाद परिवार ने अनाज को सुरक्षित रखने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सलफास जहर की गोलियां पानी में घोल कर पी ली थीं.

पुलिस को जांच में ऐसा लगा कि सुसाइड नोट मनोहर और उस के बच्चों ने मिल कर लिखा है. क्योंकि इस में कई जगह मां तो कई जगह बुआ और मामा का जिक्र है. बच्चों ने अपनी मम्मी को इस संपत्ति से अलग रखा है, जिस से लगता है कि बच्चे भी अपनी मम्मी से नाराज थे. हालांकि सुसाइड नोट में आत्महत्या के कारण का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और न ही किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया गया है. शुरुआत में मनोहर ने भाइयों के बारे में जिक्र किया है.

द्रौपदी को जब पति मनोहर ने सुरेंद्र के साथ आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया था तो गुस्से में उसे खूब खरीखोटी सुनाते हुए कहा, ”तूने लाजशरम सब खो दी थी, बच्चे बड़े हो गए हैं, मगर तेरे ऊपर जवानी का रंग चढ़ा हुआ है. तूने हमें गांव के लोगों के सामने मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. तेरी भलाई इसी में है कि तू इस घर से निकल जा और हमें और बच्चों को स्वाभिमान से जीने दे.’’

मामामामी से हुई थी बातचीत

इस के बाद द्रौपदी घर छोड़ कर अपने भैयाभाभी के घर चली गई.  घटना के 2 दिन पहले मनोहर और उस की बेटी शिवानी और उस की मामी के बीच गरमागरम बातचीत हुई, जिसे मोबाइल में रिकौर्ड भी किया गया. शिवानी के मोबाइल की यह रिकौर्डिंग मनोहर के एक भतीजे ने पुलिस को सुनाई.

”शिवानी तुम लोगों ने अपनी मम्मी के साथ यह गलत किया है.’’ मामी बोली.

”तुम कह रही हो कि हम ने गलत किया है, आखिर मामी हम ने क्या गलत किया है?’’ शिवानी ने पूछा.

”तुम ने अपनी मम्मी को घर से बाहर निकाल कर गलत किया है, उन के साथ गलत बरताव किया है.’’ मामी गुस्सा हो कर बोली.

”ऐसी शर्मनाक हरकत करने वाली हमारी मम्मी हमारे लिए मर गई है, बस हमें उस से कोई सरोकार नहीं है.’’ शिवानी ने कहा.

”मम्मी मर गई है तो यहां से ले जा कर उस का क्रियाकर्म करो, हमारे पास अपनी मरी मम्मी को मत छोड़ो. वैसे भी शादीशुदा औरतों की मायके में अर्थी नहीं जाती, ससुराल में ही सब होता है.’’ मामी बड़बड़ाते हुए बोली, ”जब सब कुछ 5 साल से चल रहा था तो पहले सब बतातीं, एक दिन पहले हमें

बुला कर हम से रंगेहाथ पकड़वातीं तो कोई बात होती, तुम ने आंखों से देखा तो हमें एक दिन पहले बुलातीं कि आज आने वाले हैं. हम भी आ कर देखते कि हमारी ननद क्या गुल खिला रही है. तुम लोग आंखों से देखते भी रहे और 5 साल तक हम से यह बात छिपा कर रखी.’’

”जब हमारी मम्मी पापा के समझाने से नहीं समझी तो हम तो दूर की बात हैं, उन्हें तो कोई लोकलाज का डर ही नहीं रहा.’’ शिवानी ने कहा.

”हम ने तुम्हें भी 50 बार काल की, तुम लोगों ने उठाई नहीं. तुम उसी दिन आ जाती भाभी तो बात दब जाती. अब पूरे गांव को सब पता चल गया है. हम तो मुंह दिखाने लायक नहीं रहे.’’ शिवानी से फोन ले कर मनोहर बोला.

इसी बीच मामी ने फोन अपने पति को पकड़ा दिया तो मामा भी गुस्से में उबल पड़ा, ”पहले मुंह क्यों नहीं खुला, 5 साल से बात को दबाए क्यों थे?’’

”भैया, पहले किसी को पता नहीं था तो बदनामी के डर से हम ने भी किसी को नहीं बताया. अब सब को सब कुछ पता चल गया है. बदनामी होने लगी है, हम रंगेहाथों पकडऩे का इंतजार कर रहे थे.’’ मनोहर सफाई देते हुए बोला.

”गलती तुम्हारी भी है, तुम्हारे घर में औरत रह रही है, तुम्हें यह पता नहीं है कि वो क्या कर रही है. हम रह रहे क्या तुम्हारे घर? अब हमारे ऊपर थोपने लगे. उसे पकडऩा था तो पकड़ कर वहीं मरोड़ कर फेंक देते. हम ने शादी कर के बहन तुम्हें दे दी, तुम जानो तुम्हारा काम जाने.’’ मामा ने तैश में आ कर कहा.

”हम तो कभी का उसे ठिकाने लगा देते, मगर यदि हम तुम्हारी बहन को रंगेहाथ पकडऩे के बाद उसे कुछ कर देते तो तुम हमारा जीना हराम कर देते.’’ मनोहर ने यह कहते हुए फोन काट दिया. मनोहर लोधी और सुरेंद्र लोधी अच्छे दोस्त थे, लेकिन सुरेंद्र ने दोस्ती का नाजायज फायदा उठाते हुए मनोहर की पत्नी द्रौपदी को अपने प्रेमजाल में फंसा लिया. सुरेंद्र और द्रौपदी के संबंधों को ले कर गांव में चर्चाएं होने लगीं, जो मनोहर के कानों तक भी पहुंच गईं. मनोहर जब पत्नी से इस बात का जिक्र करता तो द्रौपदी उस से कहती कि वह बेवजह उस पर शक कर रहे हैं.

मनोहर के मन में बैठा शक एक दिन सच साबित हुआ, जब मनोहर के बच्चों ने अपनी मम्मी को सुरेंद्र के साथ पकड़ लिया. बच्चों ने यह बात अपने पापा मनोहर को बता दी. कुछ दिन पहले सुरेंद्र ने द्रौपदी को नया मोबाइल फोन ले कर दिया था. घटना वाले दिन शाम को सुरेंद्र ने मनोहर को फोन कर के पूछा, ”कहां हो, घर पहुंच गए कि नहीं?’’

”नहीं, अभी नहीं पहुंचा खेत पर हूं, घर में क्या काम है?’’ मनोहर ने झल्ला कर कहा.

”यही कहने के लिए फोन लगाया है कि तुम मुझ पर शक कर रहे थे, तो मैं ने तो तुम्हारा शक सच साबित कर ही दिया. जो होना था वो हो भी गया, अब ठीक है. संतुष्टि है मैं ने यही कहने के लिए काल की है कि जब मैं गलत नहीं करता था, तब तुम ने मुझे गलत समझा, अब गलत कर दिया तो अब तो संतुष्ट हो.’’ सुरेंद्र इठलाते हुए बोला.

”तुम तब भी गलत थे, अभी भी गलत हो, तुम्हें अपने किए पर जरा भी शरम नहीं आती. तुम दोस्ती के नाम पर कलंक हो.’’ मनोहर ने जबाब देते हुए कहा, ”जब तक तुम गलत नहीं थे, तब तक मैं ने शक नहीं किया. जब गलत किया, तब शक किया. नहीं तो मैं शक क्यों करता. जब तुम ने द्रौपदी को फोन दिया, मैं ने तब से शक किया. मैं ने तुम्हें सच्चे दिल से अपना दोस्त माना, लेकिन तुम ने मेरे साथ ये किया. तुम ने मेरा नहीं, मेरे बच्चों का जीवन बरबाद किया. मेरे और मेरी मम्मी के साथ विश्वासघात किया है. अब तो तुम उसे अपने साथ रख भी लो तो मुझे क्या करना.’’ मनोहर बोला.

”तुम ने मुझ पर इतना शक किया, इसलिए मुझे ये करना पड़ा, तुम ने शक किया तो मैं ने उसे अंजाम दे दिया. मैं उसे अपने साथ क्यों रखूंगा. मुझे जो करना था वो तो मैं ने कर ही दिया.’’ सुरेंद्र ने गुस्सा होते हुए काल डिसकनेक्ट कर दी. अपने पति मनोहर लोधी, सास और दोनों बच्चों के सुसाइड करने की खबर पत्नी द्रौपदी लोधी को हुई तो वह अपने भैया, भाभी के साथ ससुराल पहुंची. जब एक ही घर से 4 अर्थियां निकलीं तो देखने वालों की आंखें नम हो गईं. अंतिम संस्कार के 3 दिन बाद खुरई थाने की पुलिस टीम ने द्रौपदी और परिवार के दूसरे सदस्यों से पूछताछ कर बयान दर्ज किए.

पूछताछ में पता चला कि मनोहर के बचपन के दोस्त सुरेंद्र लोधी और मनोहर की पत्नी द्रौपदी के बीच लंबे समय से अवैध संबंध थे. कई बार द्रौपदी के बच्चों और सास ने उसे सुरेंद्र के साथ आपत्तिजनक हालत में भी पकड़ा था, लेकिन पकड़े जाने के बाद भी द्रौपदी को कोई डर या पछतावा नहीं था. फेमिली वाले जब उस से कुछ कहते तो उल्टा उन्हें ही झूठे केसों में फंसाने की धमकी देती थी.

बीवी की बेवफाई बनी सुसाइड की वजह

घटना के एक माह पहले की बात है. शाम का वक्त था, द्रोपदी की बेटी शिवानी कालेज से घर आई तो दादी काम में लगी थीं, कमरे में मम्मी नहीं थी. उस ने सोचा कि वह शायद घर में भैंस बांधने वाले स्थान पर होगी तो शिवानी उसी तरफ चली गई. वहां पर उस ने अपनी मम्मी को सुरेंद्र चाचा के साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया था, लेकिन बेटी ने कुछ नहीं कहा. शिवानी बड़ी उलझन में थी कि मम्मी से कैसे कुछ कहे. इस के 15 दिन बाद बेटी ने जब दूसरी बार फिर दोनों को संबंध बनाते देखा तो उस ने अपनी मम्मी को समझाया, लेकिन वह नहीं मानी, जिस के बाद बेटी ने यह बात अपने पापा को बताई.

मनोहर और उस की मम्मी ने द्रौपदी को बैठा कर समझाया, लेकिन वह नहीं मानी, उल्टे पति व सास को झूठे मामले में फंसाने की धमकी देने लगी. इस के बाद मनोहर ने अपने दोस्त सुरेंद्र लोधी को भी समझाया, लेकिन उस ने भी मनोहर की समाज में बदनामी करने की धमकी दी. इस के बाद पति, सास और दोनों बच्चों ने सामूहिक आत्महत्या करने का निर्णय लिया. पुलिस ने जब गांव वालों और मनोहर के भाइयों से पूछताछ की तो पता चला कि मनोहर की पत्नी द्रौपदी और मनोहर के चचेरे भाई सुरेंद्र के बीच अवैध संबंध थे और इस की जानकारी मनोहर के साथसाथ उस के बच्चों को भी थी.

गांव के लोगों को भी धीरे धीरे इस की भनक हुई तो इस के बाद गांव में तरहतरह की बातें शुरू हो गईं. लोग पूरे परिवार पर तंज कसने लगे. यह सब मनोहर और उस के परिवार के लिए इतना असहनीय हो गया कि वे इस सामाजिक बदनामी को सहन नहीं कर पाए. मनोहर और फेमिली वालों ने कई बार द्रौपदी और सुरेंद्र को इस रिश्ते को खत्म करने के लिए समझाने की कोशिश की, लेकिन दोनों ने किसी की एक न सुनी. उलटे सुरेंद्र ने द्रौपदी को धमकी देनी शुरू कर दी कि अगर उस ने उस से मिलना बंद किया तो वह पूरे परिवार को बरबाद कर देगा.

हैरानी की बात यह है कि सुरेंद्र सिर्फ मनोहर का चचेरा भाई ही नहीं, बल्कि उस का करीबी दोस्त भी था, लेकिन सुरेंद्र ने उसी की पीठ पर छुरा भोंकने का काम कर दिया. पुलिस ने जांच के बाद खुरई शहर थाने में धारा 107, 108, 3, 5, बीएनएस के तहत अपराध पंजीबद्ध किया. द्रौपदी और उस के प्रेमी को गिरफ्तार कर खुरई न्यायालय में पेश किया, जहां से सुरेंद्र लोधी को खुरई और द्रौपदी को सागर केंद्रीय जेल में भेज दिया गया. MP News

 

 

Extramarital Affair : शादीशुदा से प्यार हक मगर गले की फांस भी

Extramarital Affair : शादीशुदा केहर सिंह ने किरण को अवैध संबंधों के जाल में फांस तो लिया, लेकिन यही संबंध एक दिन उस के गले की फांस बन गए. इस से निकलने के लिए वह एक ऐसा अपराध कर बैठा कि…

अपने प्रेमी केहर सिंह के बुलावे पर किरण दौड़ीदौड़ी उस के कमरे पर चली आई. आती भी क्यों नहीं, वह उस से सच्चा प्रेम जो करती थी. उस के आते ही केहर ने उसे बांहों में भींच लिया. लगातार 2-3 चुंबन ले लिए. जल्द ही किरण उस से अलग हो कर बोली, ”अब और देरी मत करो, पेरेंट्स ने मेरा रिश्ता तय कर दिया है.’’

”उसी बारे में जरूरी बात करने के लिए तो तुम्हें यहां बुलाया है.’’ केहर सिंह बोला.

”यह जगह अच्छी है…शांत भी…यहां पढ़ाई अच्छी होती होगी.’’ किरण बोली.

”मुरादाबाद शहर के मिलन विहार के अच्छे इलाके में इस की गिनती होती है.’’

”अच्छा!’’आश्चर्य से किरण बोली.

”मैं तुम्हारे लिए कुछ खाने को लाता हूं, फिर इत्मीनान से बातें करेंगे.’’ केहर बोला.

”हां! मैं तो कब से तुम से मिलने को बेचैन हो रही थी. तुम्हें एक खुशखबरी भी सुनानी थी.’’ किरण ने कहा.

”खुशखबरी! कैसी खुशखबरी?’’ केहर चौंकता हुआ बोला.

”अरे, भूल गए! मैं ने तुम्हें फोन पर बताया तो था कि मेरी माहवारी 2 महीने से नहीं हुई है. लगता है प्रेग्नेंट हो गई हूं.’’

किरण का यह कहना था कि केहर चौंकता हुआ बोला, ”क्या कहा, फिर से तो कहना!…ऐसा नहीं हो सकता. लगता है तुम ने ठीक से गोलियां नहीं खाईं.’’

केहर की इस बात का किरण ने कोई जवाब नहीं दिया. सिर्फ उस से लिपट गई. सुबकने लगी. केहर ने उसे अलग किया.

”पहले जांच तो करवाओ, मैं अपने दोस्त को बोल देता हूं. वह तुम्हारी चुपचाप जांच करवा देगा, किसी को इस बारे में पता भी नहीं चलेगा. ..और इसे खत्म करने का उपाय भी कर देगा.’’

”यह क्या कह रहे हो तुम?’’ किरण आंखों के आंसू पोंछती हुई आश्चर्य से बोली.

”मैं तुम्हारे भले के लिए कह रहा हूं. तुम्हारी शादी अक्तूबर में होने वाली है. यह कदम उठाना जरूरी है.’’ केहर ने समझाया.

”लेकिन, मैं ने तुम से प्यार किया है, तुम ने हमारी पढ़ाई में कितनी मदद की है. तुम भी तो मुझे बहुत प्यार करते हो. मुझे तो तुम से ही शादी करनी है तो फिर अबौर्शन क्यों करवाना?’’ किरण बिफरती हुई बोली.

”बात समझा करो. अभी यह जरूरी है.’’ केहर बोला.

”कोई जरूरी नहीं है, मैं कोई जांच नहीं करवाने वाली…और अबार्शन तो कतई नहीं करवाऊंगी.’’ किरण जिद्दी अंदाज में बोलती हुई तन गई.

”अच्छा छोड़ो, इस बात को. इस पर बाद में बात करेंगे. अभी कुछ खातेपीते हैं.’’ बोलते हुए केहर ने माहौल को थोड़ा हलका किया. किरण के बोझिल मन को थोड़ी राहत मिली. उस ने पूछा, ”वाशरूम किधर है?’’

केहर हाथ से इशारा कर बोला, ”उधर ही. बाहर में हवाई चप्पल रखी हैं. बत्ती का स्विच दरवाजे के बाईं ओर है. अंदर ही नया तौलिया रखा है.’’

”ठीक है,’’ बोलती हुई किरण अपना छोटा बैग ले कर वाशरूम चली गई. जब वह थोड़ी देर में कमरे में आई, तब उस ने पाया कि छोटे से स्टूल पर केहर ने कई प्लेटों में खाने की चीजें सजा रखी थीं. नमकीन, मिठाई से ले कर कोल्डड्रिंक तक थी.

उस ओर निहारती हुई बोली, ”इतना सारा लाने की क्या जरूरत थी…वह भी बाजार से, मैं कोई गेस्ट हूं! मैं यहीं कुछ बना देती!’’

”कोई बात नहीं, रात का खाना पकाना… कहो तो तुम्हारी पसंद पनीर या चिकन वगैरह ले आऊंगा.’’ केहर बोला.

”अरे, नहींनहीं! मैं रात को नहीं रुक सकती. घर में लौट आने को बोल कर आई हूं. नहीं जाऊंगी तो सभी चिंता करेंगे.’’

”ऐसे कैसे होगा? तुम्हें रात को ठहरना होगा. तुम से बहुत बातें करनी हैं.’’ केहर बोला और कोल्डड्रिंक का गिलास उस के होंठों से लगा दिया.

फिर दोनों बातें करने में मशगूल हो गए. वे रुकरुक कर नमकीन, समोसे और मिठाइयां भी खाते रहे. केहर जबरन किरण को कोल्डड्रिंक्स पिलाता रहा. कुछ समय बाद किरण को लगातार हिचकी आने लगी. इस पर मजाक में केहर बोला, ”लगता है, तुम्हें घर वाले याद कर रहे हैं.’’

”मेरी हिचकी बंद नहीं हो रही है…और तुम्हें मजाक सूझ रहा है. पेट भी भारी लग रहा है, लगता है काफी गैस बन गई है.’’ किरण बोली.

”गैस की दवा दूं क्या?’’

”नहींनहीं.’’

”थोड़ी देर बैड पर आराम कर लो. अपने आप ठीक हो जाएगा.’’

”कोल्डड्रिंक्स पीने से हिचकी आने लगी है. सिर भी भारी लग रहा है. मितली आ रही है.’’

किरण अपनी शारीरिक परेशानी के लक्षण गिनवाती हुई बोली.

”कोई बात नहीं, मैं अपने दोस्त से बोल कर कोई दवा मंगवा ही लेता हूं.’’ केहर के बोलतेबोलते किरण भागती हुई वाशरूम में चली गई. अंदर से उल्टियां करने की आवाजें आने लगीं. कुछ मिनट बाद बाहर आई. बोली, ”जो खाया था, सब निकल गया.’’

”ठंडा पानी पी लो. जा कर बैड पर आराम करो.’’ केहर ने किरण का हाथ पकड़ लिया और उसे सहारा दे कर कमरे में ले गया. किरण जब बैड पर लेट गई, तब केहर ने उस के सिरहाने तकिया लगा दिया. किरण मुसकरा दी, ”तुम मेरा कितना खयाल रखते हो!’’

”कोई बात नहीं. यह तो मेरा फर्ज बनता है. तुम आराम करो. थोड़ी देर में ठीक हो जाओगी. कहो तो कमरे की लाइट बुझा दूं?’’ केहर आत्मीयता दर्शाते हुए बोला.

उस वक्त शाम का अंधेरा छाने लगा था. धीरेधीरे कर किरण ने भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं.

उस के आंखें बंद करते ही केहर के होंठों पर एक कुटिल मुसकान फैल गई. वह चुपचाप रसोई का बिखरा काम समेटने लगा. बरतनों की आवाज के बीच उसे फोन की रिंग सुनाई दी. आधा मिनट की रिंग के बाद फोन बंद हो गया. रिंग किरण के फोन पर आई थी. केहर ने किरण का फोन ले कर उसे साइलेंट मोड में डाल दिया. उस के बाद उस पर फिर से काल आई. काल करने वाले का नाम मदर था.

केहर समझ गया कि काल किरण के घर से थी. वह फोन को स्विच औफ कर अपने कमरे में जा कर बैठ गया. तभी किरण तेजी से वाशरूम की ओर भागी. शायद उस का जी फिर से मितलाया था. वह उल्टियां कर रही थी. केहर अपने कमरे में बैठा रहा. जब किरण वाशरूम से निकली, तब एकदम से सुस्त और बेजान थी. किसी तरह बोल पाई, ”मुझे किसी डाक्टर के पास ले चलो.’’

”तबीयत ठीक नहीं लग रही है क्या?’’ केहर ने सवाल किया. उसी वक्त वाशरूम से बैडरूम तक जाते हुए वह धड़ाम से गिर पड़ी.

”जल्दी ले चलो डाक्टर के पास…’’

”क्या हुआ, मन कैसा लग रहा है?’’ केहर ने पूछा.

”खून आ रहा है…लगता है अबार्शन…’’ इतना बोलने के बाद किरण बेहोश हो गई. केहर चौंक गया.

उत्तर प्रदेश के जिला मुरादाबाद के गांव जानकपुर का रहने वाला था केहर सिंह, लेकिन वह मुरादाबाद शहर में ही मझोला थानांतर्गत मिलन विहार कालोनी में अकेले रह रहा था. वह 29 वर्षीया किरण से बेइंतहा प्रेम करता था. किरण मुरादाबाद में ही स्थित शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान आरएसडी अकेडमी में बेसिक ट्रेनिंग सर्टिफिकेट (बीटीसी) की पढ़ाई कर रही थी. केहर सिंह भी उसी कालेज में बीटीसी का छात्र था. उस रोज 20 मई, 2025 थी. रात होने लगी थी. किरण को बेहोश होने पर केहर ने तुरंत अपने दोस्त विशेष पाल को फोन किया. वह पास के ही प्रीत विहार कालोनी में ही मैडिकल स्टोर चलाता था. उसे थोड़ीबहुत बीमारियों और इलाज की जानकारी थी.

उस ने फोन पर ही केहर से किरण की हालत के बारे में पूछा और कुछ मिनटों में कुछ दवाइयां ले कर केहर के पास आ गया. संयोग से किरण को तब तक होश आ चुका था, लेकिन वह एकदम से सुस्त पड़ी थी. केवल आंखें खुली थीं. बोलने में तकलीफ हो रही थी. इशारे से पीने के लिए उस ने पानी मांगा. दूसरी तरफ किरण जब घर नहीं पहुंची, तब उस के फेमिली वाले परेशान हो गए. वे उस के फोन पर काल पर काल कर थे, लेकिन उस का फोन ही स्विच औफ आ रहा था. किरण 20 मई को दिन में ही अपने घर से यह बता कर निकली थी कि कालेज से उस का टूर जा रहा है. वह शाम या फिर देर रात तक वापस लौट आएगी, किंतु जब वह समय से वापस नहीं लौटी और मोबाइल से भी कोई संपर्क नहीं हुआ, तब उस के फादर ने मैनाठेर थाने में उस की गुमशुदगी की शिकायत दर्ज करवा दी. साथ ही उन्होंने जानकपुर निवासी केहर सिंह द्वारा अगवा करने का आरोप भी लगा दिया.

किरण के लापता होने की सूचना बिलारी सर्किल के सीओ राजेश कुमार तिवारी को दी गई. वह उस दिन दूसरे थानों की रुटीन चेकिंग पर थे. जब उन्हें पता चला कि उन के क्षेत्र के नगलिया गांव  की 29 वर्षीया छात्रा किरण लापता है, तब उन्होंने इस की जानकारी उन्होंने  मुरादाबाद के एसपी (देहात) कुंवर आकाश सिंह को दी. सूचना मिलते ही वह भी थाने पहुंच गए. पहले उन्होंने किरण के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल की. उस के बाद आरोपी की डिटेल्स मालूम करने में जुट गए. सीओ राजेश तिवारी के नेतृत्व में पुलिस टीम का गठन किया गया. मैनाठेर के एसएचओ किरनपाल सिंह टीम के प्रमुख बनाए गए.

पुलिस ने केहर सिंह और  किरण के साथ संबंध के बारे में जानकारियां जुटानी शुरू कर दी. पता चला कि केहर एक विवाहित युवक था, इस के बावजूद वह अपने साथ पढऩे वाली छात्रा से ही प्यार करने लगा था. केहर सिंह के छात्र जीवन की कहानी भी कुछ कम रोचक नहीं थी. किरण के पिता ने शिकायत में लिखवाया कि केहर सिंह उन की बेटी को बहलाफुसला कर ले गया है. इस के बाद पुलिस टीम ने नामजद अभियुक्त केहर सिंह के घर पर दबिश दी. वहां पता चला कि वह तो यहां पर रहता नहीं है. वह अपने बच्चों के साथ मुरादाबाद के थाना मझोला की मिलन विहार कालोनी में किराए के मकान में रह रहा है. उस के बाद कालोनी में दबिश दी गई, तब मालूम हुआ कि वह अपने परिवार के साथ मकान में ताला डाल कर फरार हो गया है.

उस के बारे में पता लगाने के लिए पुलिस टीम ने मुखबिरों को भी लगा दिया. किरण के लापता होने के करीब 3 हफ्ते बाद 13 जून, 2025 को पुलिस ने केहर सिंह उस समय गिरफ्तार कर लिया, जब वह अपने गांव परिवार से मिलने गया हुआ था. मैनाठेर पुलिस केहर सिंह को गिरफ्तार कर थाने ले आई. केहर सिंह की गिरफ्तारी की सूचना एसएचओ किरन पाल ने उच्च अधिकारियों को भी दे दी. सूचना पा कर बिलारी के सीओ राजेश कुमार तिवारी और एसपी (देहात) कुंवर आकाश सिंह भी थाने पहुंच गए. आरोपी केहर सिंह से किरण के बारे में कड़ाई से पूछताछ की जाने लगी. पहले तो वह पुलिस के सवालों के जवाब आधेअधूरे देता रहा. खुद को निर्दोष कहता रहा, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि पुलिस उस के बारे में बहुत सारी जानकारी जुटा चुकी है, तब उस ने जो सच बताया उस से केहर की चापलूसी, मक्कारी और क्रूरता का एक अमानवीय चेहरा सामने आ गया.

कड़ाई से पूछताछ में केहर सिंह टूट गया वह बोला, ”साहब बताता हूं. किरण के बारे में मैं अब क्या बताऊं, वह तो अब इस दुनिया में ही नहीं है.’’

”क्या कहते हो?’’ सीओ तिवारी चौंकते हुए बोले.

”सच कहता हूं सर! वह अब जीवित नहीं है. उस की मौत हो चुकी है.’’

”कैसे मरी? कब मरी? तुम ने उसे मार डाला क्या?’’ उन के द्वारा पूछे गए एक साथ कई सवालों से वह घबरा गया.

सहमता हुआ बोला, ”सर, वह अचानक बीमार हो गई थी. उसे ब्लीडिंग होने लगी थी. हम ने उसे बचाने की बहुत कोशिश की. ग्लूकोज चढ़वाया. अस्पतालों में भी भरती करवाया. पूरी रात उसे एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल और नर्सिंग होम तक ले कर भटकते रहे. आखिर में वह नहीं बच पाई. मैं इस का दोषी नहीं हूं.’’

उस का यह कहना था कि उस के गाल पर एसएचओ का एक जोरदार तमाचा लगा. उस का कान झन्ना गया. अभी वह संभल पाता कि एक दूसरे पुलिस अधिकारी ने उस की आंखों के सामने अपनी दोनों अंगुलियां सटा दीं और तीखे लहजे में बोले, ”बताओ, तुम ने किरण को कैसे मारा? उस की लाश कहां है?’’

केहर सिंह पुलिस की दोनों अंगुलियां अपनी आंखों से मात्र एक इंच की दूरी पर देख कर सहम गया. उसे ऐसा महसूस हुआ कि अंगुलियां कभी भी उस की आंखों में घुसेड़ी जा सकती हैं. जल्दी से बोला, ”बताता हूं सर, बताता हूं!’’

”बताओ, सब कुछ सचसच बताओ, वरना समझो तुम्हारा एनकाउंटर हुआ!’’ पुलिस ने उस पर एक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाया. उस के बाद केहर सिंह ने जो कहानी बताई, वह इस प्रकार है—

बात 4 साल पुरानी है. किरण जिस गांव में रहती थी, वहीं केहर सिंह नगरिया मशकुला के एक निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाता था. इसी दौरान दोनों की नजदीकियां बढ़ीं. किरण भी उसी स्कूल में पढ़ाती थी. उन के बीच प्रेम संबंध गहरे होते चले गए. तभी दोनों ने 7 फेरे लेने की कसमें खाईं. किरण बहुत महत्त्वांकाक्षी युवती थी और जीवन में कुछ कर गुजरने की तमन्ना रखती थी. उस की इच्छा मुरादाबाद से बीटीसी की ट्रेनिंग करने की थी, जिस से वह शिक्षा विभाग में नौकरी हासिल कर सके. किरण की महत्त्वाकांक्षा को देखते हुए करीब 2 साल पहले केहर सिंह ने भी बीटीसी करने का मन बनाया, ताकि उस का साथ बना रहे.

मुरादाबाद के रामगंगा विहार कालोनी में आरएसडी अकादमी शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान है. दोनों ने वहीं अपनाअपना नामांकन करवा लिया. तब तक उन के प्रेम संबंध काफी गहरे हो चुके थे. जल्द ही दोनों दो जिस्म एक जान भी हो चुके थे. यह कहें कि दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बनने लगे. किरण सीधेसरल स्वभाव की युवती थी. उस ने केहर से कुछ भी नहीं छिपाया था. अपने दिल की हर बात खुले मन से उस से कह देती थी. जबकि केहर ऐसा नहीं था. वह उस की सुंदरता और देह का आशिक था. उसे वासना की नजरों से देखता था. यही वजह थी कि उस ने खुद के शादीशुदा होने की बात उस से छिपा ली थी. उस ने किरण को इस की भनक तक नहीं लगने दी कि वह शादीशुदा है और उस के बच्चे भी हैं.

किराए के मकान में जब उस की पत्नी और बच्चे नहीं होते थे, तब वह बहाने से किरण को बुलाता था. एक रोज इस बात की जानकारी केहर की पत्नी को हो गई. फिर क्या था, वह केहर के साथ झगडऩे लगी. वैसे केहर सिंह भी अपनी वैवाहिक जिंदगी पर आंच नहीं आने देना चाहता था. पत्नी को किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था. जबकि किरण उस से बेइंतहा प्रेम करती थी. उस पर शादी का दबाव बनाए हुए थी. इस प्रेम कहानी की भनक जब किरण के परिवार में हुई, तब उस के लिए वर की तलाश तेजी से की जाने लगी. किरण के पिता रामपाल ने उस के लिए जल्द रिश्ता ढूंढ लिया और शादी की तारीख तक तय कर करवा दी. किरण की शादी अक्तूबर में होनी तय हो गई.

उस के बाद से किरण बेचैन रहने लगी थी. उस की बेचैनी तब और बढ़ गई, जब उसे अपने गर्भ का पता चला, जो केहर का था. वह केहर को बारबार फोन करने लगी, जबकि केहर उस से कन्नी काटने लगा. नहीं मिलने के बहाने बनाने लगा. एक तरफ किरण का मनोवैज्ञानिक दबाव था तो दूसरी तरफ पत्नी और बच्चों के साथ भावनात्मक लगाव. केहर सिंह तनाव में आ गया था. खुद को 2 औरतों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा था. मई महीने के दूसरे सप्ताह में जब किरण के लगातार फोन आने लगे, तब उस ने उसे 20 मई को अपने घर बुला लिया. उस रोज उस की पत्नी और बच्चे स्कूल की छुट्टियों में गांव गए हुए थे.

केहर ने किरण को यह कह कर बुलाया था कि आगे की योजना बनानी है. शादी के बारे में सब कुछ तय करना है. किंतु किरण को इस बात का अंदाज बिलकुल भी नहीं था कि केहर के मन में खोट है. किरण जब केहर के घर पर आई, तब उस ने अपनी योजना के मुताबिक उस की खूब आवभगत की. खानेपीने का अच्छा इंतजाम किया. कोल्डड्रिंक्स में अबौर्शन की दवा मिला दी. जब उस की तबीयत खराब होने लगी और ब्लीडिंग शुरू हो गई. तब उस ने इलाज करवाने का नाटक किया. अस्पताल में भरती करवाने में जानबूझ कर देरी की. आखिर में उस की मौत हो गई, तब उस ने अपने 3 साथियों के साथ मिल कर उस की लाश को ठिकाने लगा दिया. लाश को ठिकाने लगाने के लिए केहर ने अपने साले तारेश की भी मदद ली.

उसे फोन कर बुलाया. वह मुरादाबाद के ही थाना डिडोली के गांव वाजिदपुर का निवासी है. केहर सिंह ने उसे पूरी बात समझाई. तारेश अपने भतीजे मनीष के साथ अपनी वैगनआर कार से केहर के मकान पर पहुंचा. कमरे पर सभी लोगों ने किरण के शव को ठिकाने लगाने की योजना बनाई. योजना के मुताबिक लाश को थाना छजलैट के गांव नन्हैडा गांगन नदी के पास जंगल में फेंक देना था. जंगल में गुलदार सियार बहुत हैं. उन का मानना था कि जंगली जानवर किरण की लाश को खा कर खत्म कर देंगे. उन्होंने वैसा ही किया. तारेश की वैगनआर गाड़ी में लाश रखी गई. गांगन नदी के पुल के पास से लाश को फेंक दी गई.

केहर सिंह की निशानदेही पर पुलिस ने 23 दिनों बाद किरण की सड़ीगली लाश बरामद की. इस के बाद पुलिस ने केहर सिंह के अलावा उस का सहयोग करने वाले प्रमोद कुमार, जगदीश, विशेष पाल को भी गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से सभी आरोपी जेल भेज दिए गए. इस के अलावा तारेश और मनीष की तलाश में पुलिस ने उन के घरों पर दबिश दी, लेकिन दोनों ही कथा लिखे जाने तक फरार थे. Extramarital Affair

 

UP News : खोखले निकले मौहब्बत के वादे

UP News : मनोरंजन तिवारी ने गीता यादव को पहली मुलाकात में ही अपने दिल में बसा लिया था. तभी तो उस ने उस से अंतरजातीय विवाह किया था. लेकिन शादी के कई साल बाद भी उन के बच्चा न हुआ तो उन दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि उन की मोहब्बत के वादे खोखले साबित हुए…

राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद का वसुंधरा इलाका नवधनाढ्यों का ऐसा इलाका है, जहां देश के सभी प्रांतों एवं धर्मों के लोग रहते हैं. दिल्ली व आसपास के इलाकों में सरकारी, गैरसरकारी संस्थानों में काम करने वालों से ले कर कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों से ले कर छोटेबड़े कारोबारी तक इस इलाके में रहते हैं. मूलरूप से ओडिशा के जगतसिंहपुर के गांव अछिंदा का रहने वाला मनोज उर्फ मनोरंजन 1999 में नई विकसित वसुंधरा कालोनी में रोजीरोटी की तलाश में आया था. वसुंधरा इलाके में ओडिशा के कुछ लोग पहले से रहते थे. मनोरंजन फोटोग्राफी का काम जानता था. इसलिए उस ने अपने परिचितों की मदद से एक फोटोग्राफर की दुकान पर नौकरी कर ली.

कुछ महीनों में जब वह काम में पारंगत हो गया तो इलाके में कुछ लोगों से उस की जानपहचान हो गई तो उस ने वसुंधरा के सेक्टर-15 में एक दुकान किराए पर ले कर फोटो स्टूडियो खोल लिया. संयोग से काम भी ठीक चलने लगा. चेहरे पर भोली मुसकान और बातचीत में बेहद सरल और विनम्र स्वभाव के मनोरंजन का काम उस की मेहनत और लगन के कारण जल्द ही चल निकला. मनोरंजन उर्फ मनोज तिवारी जाति से ही ब्राह्मण नहीं था, बल्कि कर्म से भी वह ब्राह्मण ही था. माथे पर तिलक सदकर्मों के कारण क्षेत्र के लोग उसे पंडितजी के नाम से पुकारने लगे. मनोरंजन के पिता भी ओडिशा में पंडिताई का काम करते हैं. बड़ी बहन की शादी हो चुकी थी. गांव में अब मातापिता ही रहते हैं.

3-4 साल में उस का कामधंधा ठीकठाक चलने लगा. खूब पैसा कमाने लगा था. वसुंधरा सैक्टर 15 में ही मनोरंजन ने रहने के लिए एक अच्छा फ्लैट भी किराए पर ले लिया. इसी तरह वक्त तेजी से गुजरने लगा. मनोरजंन के पास अब सब कुछ था. किराए का ही सही एक अच्छा घर था, जिस में सुखसुविधा का हर सामान मौजूद था. फोटोग्राफी का अच्छा कारोबार चल रहा था, जिस से हर महीने डेढ़ से 2 लाख रुपए कमा लेता था. लेकिन ऐसा कोई नहीं था, जो उस का सुखदुख बांट सके. जिंदगी में कमी थी तो एक जीवनसाथी की, जो उस की तनहा जिंदगी का अकेलापन दूर कर सके. मातापिता ने गांव से बिरादरी की कई लड़कियों की तसवीरें भेजी थीं, लेकिन पता नहीं क्यों कोई भी उस की आंखों को पसंद नहीं आई.

गाजियाबाद में रहने वाले ओडिशा के परिचितों ने भी मनोरंजन को शादी करने के लिए कई रिश्ते बताए, लेकिन संयोग से यहां भी कोई लड़की उसे पसंद नहीं आई. दरअसल, मनोरंजन बेहद संवेदनशील और भावुक किस्म का इंसान था. जिंदगी में वही काम करता था, जिस के लिए दिल कहता. अभी तक उस ने जिन लड़कियों को भी देखा था, उन में से कोई भी ऐसी नहीं थी जिसे देख कर उसके दिल में कोई उमंग या खुशी की भावना जगी हो. इसलिए उसे एक ऐसी लड़की का इंतजार था, जिसे देख कर पहली ही नजर में दिल से आवाज निकले कि हां ये सिर्फ मेरे लिए बनी है. वक्त तेजी से गुजरता गया. लेकिन 2006 में अचानक एक ऐसा भी दिन आया जब एक लड़की को देख कर उस के दिल से वो आवाज निकली, जिस का उसे इंतजार था.

हुआ यूं कि एक दिन एक लड़की, जिस का नाम गीता यादव था. वह उस के स्टूडियो में फोटो खिंचवाने आई. करीब 20 साल की अल्हड़ उम्र थी और चेहरे पर चंचल मासूमियत देख कर पता नहीं मनोरजन का दिल पहली बार एक अजीब से अहसास के साथ धड़का. गीता जब खिलखिला कर हंसती तो उस के गालों के बीच पड़ने वाले डिंपल किसी भी इंसान को उस का दीवाना बना देने के लिए काफी थे. मूलरूप से इटावा की रहने वाली गीता यादव पिछले 10 सालों से अपने परिवार के साथ किराए के मकान में कनावनी गांव में रहती थी. परिवार में मां शांति के अलावा एक बड़ा भाई था राजेश यादव. भाई एक फैक्ट्री में नौकरी कर के अपनी पत्नी, बच्चे के साथ मां और बहन का पेट पालता था.

कुल मिला कर गीता निम्न मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की थी. परिवार उन दिनों गीता की शादी को ले कर चिंतित था. गीता तीखे नाकनक्श वाली बेहद खूबसूरत थी. परिवार चाहता था कि गीता की शादी बिरादरी में ही किसी अच्छे परिवार के ठीकठाक कमाई करने वाले लड़के से हो. लेकिन जहां भी पसंद का लड़का मिलता तो दहेज की ऐसी मांग होती कि गीता के परिवार के लिए दहेज की मांग पूरी करना मुश्किल हो जाता. इसीलिए गीता की उम्र तेजी से बढ़ रही थी और गीता के परिवार की चिंताएं भी. पहली मुलाकात में हो गया था दीवाना लेकिन जब मनोरंजन ने गीता को देखा तो उसे पहली ही नजर में उस से प्यार हो गया. कुछ समय पहले तक वह नहीं मानता था कि किसी लड़की को देख कर उस के मन में ऐसा मीठामीठा अहसास जगेगा.

जब उस ने गीता को देखा था, तब उस से कुछ पल की मुलाकात हुई थी. लेकिन तभी से न जाने कब उस का दिल खो सा गया. हालांकि मनोरंजन ने गीता से भी ज्यादा हसीन लड़कियां देखी थीं. लेकिन गीता की हसीन मुसकराहट और खिलखिलाहट भरी खनखनाती मीठी आवाज ने उस पर अजीब सा जादू कर दिया था. पहली बार किसी लड़की की याद में उस ने एक शेर लिख डाला ‘न तीर न तलवार से, उन की नजर के वार से, हम तो घायल हो गए, उन की भोली सी मुसकान पे.’ उस दिन रात भर नींद की तलाश में मनोरजन करवटें बदलता रहा. लेकिन आंखें बंद करते ही कानों में उस की मीठी आवाज गूंजने लगती थी. इस अहसास के बाद उसे लगने लगा कि सालों बाद हो रहा ये अहसास प्यार है.

अगला पूरा दिन मनोरंजन ने गीता के इंतजार में बिता दिया. क्योंकि उसे अपने फोटो लेने के लिए आना था. आंखें उस का इंतजार करते हुए थक गईं लेकिन वह नहीं आई. फिर उस रात वही बेकरारी, रात भर उस का खयाल और यही सोचना… आखिर ये प्यार क्या चीज है. 3 दिन हो गए लेकिन गीता फोटो लेने नहीं आई. इंतजार जैसेजैसे बढ़ता जा रहा था, बेकरारी भी उसी तरह बढ़ती जा रही थी. आखिर चौथे दिन जब गीता अपना फोटो लेने के लिए उस के स्टूडियो पर आई तो दिल को वैसे ही सुकून मिला, जैसे तपती रेत पर पानी गिरने से ठंडक का अहसास होता है. संयोग ये भी था कि पहले दिन जब गीता फोटो खिंचाने आई थी तो उस के साथ पड़ोस में रहने वाली कोई महिला थी. लेकिन उस दिन वह अकेली पहुंची.

‘‘आप की फोटो उतनी खूबसूरत नहीं आई, जितनी खूबसूरत आप हो.’’ फोटो का लिफाफा गीता के हाथ में थमाते हुए मनोरंजन ने कहा.

‘‘फिर तो मैं फोटो का कोई पैसा नहीं दूंगी.’’ गीता बोली.

‘‘आप की खूबसूरती को कैमरे में कैद करने की गुस्ताखी तो हम कर चुके हैं, इसलिए आप का पैसा नहीं देना हमें मंजूर है.’’ मनोरंजन ने हिम्मत जुटा कर थोड़ा सा खुलना शुरू किया.

‘‘वैसे अगर आप मांग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगातीं तो आप की फोटो और भी खूबसूरत आती.’’ कुछ जानकारी की जिज्ञासा लिए मनोरंजन ने कहा.

मनोरंजन के इतना कहते ही गीता ने नाक सिकोड़ते हुए कह, ‘‘छि: हम क्यों मांग में सिंदूर लगाएं, वो तो शादीशुदा औरतें लगाती हैं. हमारी तो अभी शादी भी नहीं हुई.’’

गीता ने नाराजगी का इजहार किया तो मनोरंजन का दिल खुशियों से उछलता हुआ सीने से बाहर आने को हो गया. क्योंकि घुमाफिरा कर वह यही तो पूछना चाहता था कि गीता शादीशुदा है या नहीं. उस का काम हो गया क्योंकि जो लड़की उसे पसंद आई थी वो सिंगल है या शादीशुदा, यह जानना उस के लिए जरूरी था. बस, उस के बाद मनोरंजन के लिए गीता से दोस्ती करना आसान हो गया. गीता की तरह वह भी भोलाभाला था. उस ने गीता का नामपता पूछा, उस के परिवार के बारे में जानकारी ली और उस का मोबाइल नंबर हासिल कर उसे भी अपना मोबाइल नंबर दे दिया.

गीता भी चाहने लगी मनोरंजन को गीता को उस ने यह बात इशारेइशारे में बता दी कि वह उस को पसंद करता है और फोन पर उस से बात करेगा. इस के बाद दोनों के बीच फोन पर बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. कुछ दिनों बाद दोनों एकदूसरे से मुलाकात भी करने लगे. साथ में सिनेमा देखने, रेस्टोरेंट में साथ जा कर खाना खाने का सिलसिला भी शुरू हो गया. एकदो महीने के बाद मनोरंजन की तरह गीता भी उसे पूरे दिल से प्यार करने लगी. एक दिन मनोरंजन ने अपने दिल का इजहार करते हुए गीता से कह दिया. गीता क्या तुम मेरी सूनी जिंदगी में आ कर उसे रोशन कर सकती हो. गीता खुद भी मनोरंजन से कुछ ऐसा ही कहना चाहती थी. दोनों ने उस दिन साथ जीनेमरने की सौगंध खा ली.

बस, एक ही अड़चन थी. मनोरंजन जाति से ब्राह्मण था, जबकि गीता यादव बिरादरी से थी. मनोरंजन को तो कोई ऐतराज नहीं था. लेकिन गीता के परिवार को ऐतराज न हो, इसलिए उस ने गीता से अपने परिवार की राय जानने के लिए कहा. गीता ने जब अपनी मां शांति व भाई राजेश यादव को मनोरंजन के बारे में बताया तो पहले उन्होंने नाराजगी दिखाई कि एक गैरबिरादरी के लड़के से हम कैसे उस की शादी कर दें. लेकिन फिर यही सवाल उठा कि बिरादरी में अच्छे लड़के तो मोटा दहेज मांग रहे हैं. जबकि मनोरंजन अच्छा लड़का भी है और कमाता भी अच्छा है. ऊपर से वह गीता को बेहद प्यार भी करता है. अगर वह मनोरंजन से गीता की शादी करते हैं तो अच्छा लड़का भी मिल जाएगा और दहेज भी नहीं देना पड़ेगा.

ना ना करतेकरते गीता की मां और भाई दोनों मान गए और उन्होंने शादी के लिए हां कर दी. फरवरी, 2007 में दोनों परिवार वालों की रजामंदी से मंदिर में जा कर मनोरंजन और गीता ने शादी कर ली. शादी के बाद मनोरंजन को मानो जीने का मकसद मिल गया. उस की चाहत गीता उस की जिंदगी की रोशनी बन चुकी थी. 6 महीने कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. मनोरंजन पूरी तरह गीता के प्यार के आगोश में डूब चुका था. वक्त का पहिया तेजी से घूमने लगा. महीने गुजरे फिर साल गुजरने लगे. दोनों के प्यार की तपिश के वक्त के साथ तेजी से बढ़ती गई. लेकिन 2 साल गुजर गए तो एक कमी दोनों को खलने लगी. उन की चाहत थी कि घरआंगन में एक बच्चे की किलकारी गूंजे. लेकिन वो चाहत पूरी नहीं हो रही थी.

3 साल हो गए, लेकिन गीता मां नहीं बन सकी. जब मनोरंजन अपनी इस चाहत का जिक्र कर गीता से इस कमी को पूरा करने की फरमाइश करता तो वह कहती, ‘‘इस में मेरा क्या दोष है. तुम्हारी मर्दानगी में कमी होगी, जो बच्चा पैदा नहीं हो रहा.’’

गीता जब उस की फरमाइश पर ऐसी बात बोलती तो मनोरंजन के तनबदन में जैसे आग लग जाती. वैसे भी दुनिया का कोई मर्द सबकुछ बरदाश्त कर सकता है लेकिन अगर कोई उस की मर्दानगी को ले कर सवाल उठाए तो भले ही उस में सच्चाई हो लेकिन इस बात से उस के अहम को चोट लगती है. जब ऐसा होता तो वह भी गीता से कह देता, ‘‘खोट मेरी मर्दानगी में नहीं बल्कि तुम्हारी जमीन ही बंजर है, जिस में फसल पैदा करने की ताकत नहीं है.’’

औरत की कोख पर कोई अंगुली उठाए तो यह बात एक औरत को भी कभी बरदाश्त नहीं होती. अब अकसर ऐसा होने लगा कि बच्चे की चाहत में मनोरंजन और गीता एकदूसरे में कमियां गिनाने लगे. लेकिन जब बात आती कि चलो किसी डाक्टर को दिखा लें तो दोनों ही एकदूसरे पर तोहमत लगाने लगते कि उस में कोई कमी नहीं है. तुम अपना इलाज कराओ. हकीकत यह थी कि दोनों ही अहं की लड़ाई लड़ते थे. पता किसी को नहीं था कि बच्चा पैदा न होने की कमी किस में है. मनोरंजन ने जब बच्चा नहीं होने की बात अपने मातापिता को बताई तो उन्होंने कहा कि वह गीता को ले कर ओडिशा आ जाए. वहां वह इलाज करा कर सब ठीक कर देंगे.

जब मनोरंजन ने गीता से सब कुछ छोड़ कर उस के साथ ओडिशा चलने की बात कही तो गीता ने साफ इंकार कर दिया कि वह गाजियाबाद को छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी. इस बात से मनोरंजन गीता से और भी ज्यादा नाराज हो गया. कुछ दिन और बीते तो बच्चे को ले कर बात इतनी बढ़ने लगी कि मुंह बहस के बाद दोनों में मारपीट तक की नौबत आने लगी. इसी परेशानी में मनोरंजन ने शराब भी पीनी शुरू कर दी. गीता जब इस पर ऐतराज जताती तो मनोरंजन इस का जिम्मेदार भी उसी को ठहरा देता. इस के बाद फिर दोनों के बीच मारपीट होती. अब ऐसा होने लगा कि शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता कि जब पतिपत्नी के बीच कोई कलह या मारपीट न होती हो.

गीता को अब मनोरंजन से शादी करने का अफसोस होने लगा. कई बार तो उस का मन चाहता कि वह घर छोड़ कर चली जाए. उधर, मनोरंजन को भी अब गीता से शादी करने का मलाल होने लगा. दोनों ही लड़ाई झगड़े के दौरान अपने इस पछतावे की बात एकदूसरे पर जाहिर भी कर देते. ऐसे में मनोरंजन गीता को ताना देते हुए कह देता कि मैं ही था जो तुझ पर मर मिटा और शादी कर ली, वरना तुझे कोई रखैल बना कर भी नहीं रखेगा. यह बात गीता को इस तरह चुभ जाती, जिस से उस के अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता. आखिर पानी सर से ऊपर गुजर गया. एक दिन दोनों के बीच लड़ाईझगड़ा इस कदर बढ़ा कि उस दिन गीता ने घर छोड़ने का फैसला कर लिया.

मनोरंजन ने भी उस के इस फैसले का विरोध नहीं किया. अप्रैल, 2011 में गीता ने मनोरंजन का घर छोड़ दिया. चूंकि मनोरंजन से शादी करने का फैसला उस का अपना था और परिवार की हैसियत भी ऐसी नहीं थी कि गीता पति को छोड़ कर फिर से परिवार पर बोझ बन कर उन के साथ रहे. गीता के पास बैंक में थोडे़बहुत पैसे थे. उस ने प्रह्लादगढ़ी में किराए का एक कमरा ले लिया. रहनेखाने के लिए थोड़ा सामान भी जुटा लिया और एकांत जीवन बसर करने लगी. थोड़े ही दिन में प्रयास करने पर उसे वसुंधरा में एक नर्सिंगहोम में मेड का काम भी मिल गया, जिस से भरणपोषण की समस्या भी खत्म हो गई. लेकिन एकाएक टूट कर प्यार करने वाले पति से अलग होने की कमी को भुलाए नहीं भूल रही थी.

29 सितंबर, 2012 शनिवार की रात के करीब साढे़ 9 बजे का वक्त था. तत्कालीन इंदिरापुरम थानाप्रभारी गोरखनाथ यादव को सूचना मिली कि एक महिला को सेक्टर 16 में मोटरसाइकिल सवार किसी बदमाश ने सड़क पर जाते हुए गोली मार दी है. इंदिरापुरम थानाप्रभारी टीम के साथ मौके पर पहुंचे. गोली महिला की पीठ में लगी थी. तत्कालीन एसपी (सिटी) शिवशंकर भी फोरैंसिक टीम को ले कर घटनास्थल पर पहुंचे. घटनास्थल के निरीक्षण के बाद गोली लगने से घायल महिला को तत्काल अस्पताल भिजवाया गया. लेकिन पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. बाद में छानबीन करने पर पता चला कि मृतक महिला का नाम गीता यादव (26) है.

जानकारी यह भी मिली कि गीता यादव प्रह्लाद गढ़ी में किराए का कमरा ले कर अपने पति से अलग रहती थी. गीता के मायके वालों के बारे में जानकारी मिली तो उस का भाई राजेश और मां शांति देवी इंदिरापुरम थाने पहुंचे. उन्होंने अपनी बेटी की हत्या के पीछे अपने दामाद मनोरंजन का हाथ होने का शक जताया. पति मनोरंजन के खिलाफ लिखाई रिपोर्ट इंदिरापुरम पुलिस ने उसी दिन हत्या की धारा 302 में मुकदमा पंजीकृत कर लिया. थानाप्रभारी गोरखनाथ यादव ने एसआई धर्मवीर सिंह के नेतृत्व में एक टीम गठित कर दी. पुलिस टीम ने परिजनों के शक की बुनियाद पर जब सेक्टर 15 में मनोरंजन तिवारी के फ्लैट पर छापा मारा तो पता चला कि वह घर पर नहीं है.

पता चला कि वह 2 दिन से अपना सामान कमरे से निकाल कर कहीं ले जा रहा था. पुलिस टीम जब अगले दिन मनोरंजन तिवारी की दुकान पर पहुंची तो पता चला कि उस ने किसी को अपनी दुकान सामान समेत बेच दी है. गीता के परिजनों ने पुलिस को बताया था कि उस का पति मनोरंजन तिवारी उस के साथ लड़ाईझगड़ा करता था, इसलिए उन की बेटी डेढ़ साल से उस से अलग रह रही थी और खुद कमा कर अपना पेट पालती थी. परिवार वालों ने यह भी बताया था कि मनोरंजन ने गीता को कई बार धमकी दी थी. गीता की हत्या के बाद जिस तरह मनोरंजन अपना घर व दुकान छोड़ कर भाग गया था, उस से साफ था कि गीता की हत्या में उसी का हाथ है.

लिहाजा पुलिस ने उस के फोन को सर्विलांस पर लगा दिया. लेकिन उस का फोन स्विच्ड औफ हो चुका था. काफी मशक्कत के बाद पुलिस को मनोरंजन तिवारी के ओडिशा स्थित घर का पता मिल गया. पुलिस की एक टीम वहां पहुंची तो पता चला कि वह अपने घर भी नहीं पहुंचा था. तब निराश हो कर पुलिस टीम ओडिशा से वापस लौट आई. इस के बाद पुलिस ने काफी दिनों तक तिवारी को इधरउधर तलाश किया, लेकिन वह कहीं नहीं मिला. आखिर पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत से कुर्की वारंट हासिल कर उस के ओडिशा स्थित घर की कुर्की कर ली. बाद में पुलिस ने अदालत में प्रार्थना पत्र दे कर उसे भगौड़ा घोषित कर दिया. पुलिस ने पहले उस की गिरफ्तारी पर 25 हजार रुपए का ईनाम घोषित किया. बाद में 2 साल बाद ईनाम की धनराशि 50 हजार रुपए कर दी.

पुलिस दल ने 2-3 बार मनोरंजन की तलाश में ओडिशा में छापे मारे, लेकिन वह कभी भी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. वक्त तेजी से गुजरता रहा. इंदिरापुरम थाने में एक के बाद एक कई थानाप्रभारी बदल गए. हर अधिकारी आने के बाद गीता हत्याकांड के फरार आरोपी मनोरंजन की फाइल देखता, एक नई पुलिस टीम का गठन होता और फिर उस की फाइल धूल फांकने लगती. इसी तरह 9 साल बीत गए. जुलाई 2021 में इंदिरापुरम सर्किल में सीओ अभय कुमार मिश्रा और इंदिरापुरम थानाप्रभारी के रूप में इंसपेक्टर संजय पांडे की नियुक्ति हुई. दोनों ही अधिकारियों को पुराने मामलों को सुलझाने में महारथ हासिल थी. उन्होंने जब गीता हत्याकांड की फाइल देखी तो उन्होंने इस बार फाइल को अलमारी में रखने की जगह इस मामले को चुनौती के रूप में ले कर फरार मनोरंजन तिवारी को गिरफ्तार करने की रणनीति बनाई.

दरअसल, सीओ अभय कुमार मिश्रा के एक परिचित अधिकारी जगतसिंहपुर जिले में तैनात हैं, जहां का मनोरंजन तिवारी मूल निवासी है. अभय मिश्रा को अपराधियों के मनोविज्ञान से इतना तो समझ में आ रहा था कि इतना लंबा वक्त बीत जाने के बाद हो न हो, मनोरंजन तिवारी को अपने परिवार के साथ जरूर कुछ संपर्क होगा. भले ही वह उन के साथ नहीं रहता हो, मगर उन से संपर्क जरूर करता होगा. अगर थोड़ा सा प्रयास किया जाए तो वह पकड़ में जरूर आ सकता है. लिहाजा अभय कुमार मिश्रा ने ओडिशा के जगतसिंहपुर में तैनात अपने परिचित अधिकारी को गीता हत्याकांड की सारी जानकारी दे कर मनोरंजन को गिरफ्तार कराने में मदद मांगी.

संबधित अधिकारी ने स्थानीय स्तर पर अपनी पुलिस को मनोरंजन तिवारी के गांव अछिंदा में घर के आसपास सादे लिबास में तैनात कर दिया. वहां तैनात पुलिस टीम को पता चला कि पास के गांव में एक मंदिर का पुरोहित, जिस का नाम मनोज है, वह अकसर मनोरंजन तिवारी के घर आताजाता रहता है. लेकिन चेहरे मोहरे व हुलिए से वह एकदम मनोरंजन तिवारी जैसा है. जगतसिंहपुर पुलिस ने जब यह बात इंदिरापुरम सीओ अभय कुमार मिश्रा को बताई तो वे समझ गए कि हो न हो मनोरंजन तिवारी अपने गांव के आसापास ही कहीं वेशभूषा बदलकर रह रहा है. पुलिस ने 9 साल बाद ढूंढ निकाला मनोरंजन को अभय मिश्रा ने इंदिरापुरम थानाप्रभारी संजय पांडे को तत्काल एक टीम गठित कर ओडिशा रवाना करने का आदेश दिया.

आदेश मिलते ही इंसपेक्टर संजय पांडे ने अभयखंड चौकीप्रभारी एसआई भुवनचंद शर्मा, नरेश सिंह और कांस्टेबल अमित कुमार की टीम गठित की. टीम को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर ओडिशा रवाना कर दिया गया, जहां पुलिस टीम ने जगतसिंहपुर में स्थानीय बालिंदा थाने की पुलिस से संपर्क साधा. सीओ अभय मिश्रा के परिचित अधिकारी के निर्देश पर स्थानीय पुलिस पहले ही मनोज पुरोहित के बारे में तमाम जानकारी जुटा चुकी थी. 25 जुलाई, 2021 को इंदिरापुरम थाने से गई पुलिस टीम ने बालिंदा थाने की पुलिस टीम की मदद से मनोरंजन तिवारी को दबोच लिया. वह मनोज तिवारी के नाम से मंदिर का पुरोहित बन कर रह रहा था और वेषभूषा बदलने के लिए उस ने दाढ़ी तक बढ़ा ली थी.

लेकिन जब उस ने अपने मातापिता के घर आनाजाना शुरू कर दिया तो लोगों को उस पर शक हो गया. हालांकि जब पुलिस टीम ने उसे पकड़ा तो उस ने पुलिस को बरगलाने का प्रयास किया. लेकिन थोड़ी सी सख्ती के बाद ही उस ने कबूल कर लिया कि वही मनोरंजन तिवारी उर्फ मनोज तिवारी है. आवश्यक लिखापढ़ी व कानूनी काररवाई के बाद पुलिस टीम अगले दिन गीता हत्याकांड के 9 साल से फरार चल रहे आरोपी मनोरंजन को गिरफ्तार कर गाजियाबाद ले आई. इंसपेक्टर संजय पांडे और सीओ अभय कुमार मिश्रा के अलावा एसपी (सिटी हिंडन पार) के सामने मनोरंजन तिवारी ने कबूल किया कि उसी ने सोचसमझ कर गीता की हत्या की थी.

तिवारी ने बताया कि 2011 में उस के साथ विवाद के बाद जब गीता अलग हो कर किराए का कमरा ले कर रहने लगी और कहीं नौकरी करने लगी तो उस के संबंध सचिन यादव नाम के एक ठेकेदार से हो गए थे. जब उसे इस बात की खबर लगी तो वह मन मसोस कर रह गया. भले ही गीता से उस का झगड़ा हो गया था और वह अलग रहता था लेकिन इस के बावजूद भी वह उस से मोहब्बत करता था. यह बात उसे मंजूर नहीं थी कि बिना तलाक लिए गीता किसी गैरमर्द के बिस्तर की शोभा बने. मनोरंजन अकसर गीता पर नजर रखने लगा. उस ने गीता को एकदो बार समझाया भी कि अगर वह किसी गैर के साथ संबध रखेगी तो वह उस की जान ले लेगा. लेकिन गीता ने उस की बात को हंसी में उड़ा दिया. उस ने उलटा मनोरंजन को धमकी दी कि अगर वह उस के रास्ते में आएगा तो सचिन उसी का काम तमाम कर देगा.

मनोरंजन समझ गया कि गीता पर गैरमर्द से आशिकी का भूत सवार हो चुका है. वह जानता था कि यादव बिरादरी के जिस शख्स से इन दिनों गीता की आशिकी चल रही है, वह न सिर्फ स्थानीय है बल्कि ऐसे लोगों के लिए खून कराना कोई बड़ी बात नहीं. मनोरंजन की सचिन यादव से तो कोई दुश्मनी नहीं थी. इसलिए मनोरंजन ने तय कर लिया कि इस से पहले कि गीता अपने आशिक से कह कर उस पर वार कराए, वह उसी का काम तमाम कर देगा. मनोरंजन ने साजिश रची. गीता की हत्या के बाद गाजियाबाद से फौरन भागने की उस ने पूरी प्लानिंग बना ली. 29 सितंबर, 2012 की शाम को गीता जब अपने काम से घर लौट रही थी. मनोरंजन ने उसे रोक लिया और गोली मार दी. गोली गीता को ऐसी जगह लगी थी कि उस की मौके पर ही मौत हो गई. इत्मीनान होने के बाद मनोरंजन मौके से फरार हो गया.

गीता की हत्या करने के फौरन बाद उस ने अपने परिवार वालों को इस बात की सूचना दे दी थी और उन्हें सतर्क कर दिया था कि पुलिस अगर उन तक पहुंचे तो वे उसके बारे में अंजान बने रहें. कई महीनों तक इधरउधर रहने के बाद पुलिस की गतिविधियां जब शांत हो गईं तो वह एक रात अपने परिवार वालों से जा कर मिला. उस ने उन्हें बता दिया कि अब वह पड़ोस के ही गांव के मंदिर में नाम व वेशभूषा बदल कर पुरोहित के रूप में रहेगा और उन से अकसर मिलता रहेगा. कहते हैं कि अपराधी कितना भी चालाक क्यों न हो, कानून व पुलिस के हाथ एक दिन उस की गरदन तक पहुंच ही जाते हैं चाहे वह सात समंदर पार जा कर छिप जाए.

मनोरंजन तिवारी को इस बात का भ्रम था कि ओडिशा गाजियाबाद से इतनी दूर है कि 9 साल बीत जाने पर पुलिस बारबार उस की तलाश में न तो उस के गांव आएगी और न ही इतनी बारीकी से तहकीकात करेगी. लेकिन यह उस की भूल साबित हुई. क्योंकि पुलिस चाहे किसी भी प्रदेश की हो, लेकिन कानून के गुनहगार को पकड़ने के लिए प्रदेश की दूरियां मिनटों में खत्म हो जाती हैं. UP News

—कथा पुलिस की जांच, अभियुक्त से पूछताछ व परिजनों से मिली जानकारी पर आधारित

Family Dispute : पहचान मिटाने की खौफनाक साज़िश – पेट्रोल से जलाया पति का चेहरा

Family Dispute : लाभनी साहू ने हाथ जोड़ कर बाल कल्याण समिति न्यायालय में कहा, ‘‘सर, मेरे बच्चे को मुझे सौंप दिया जाए,  मैं उस का लालनपालन करूंगी. मैं मां हूं, मुझे मेरा बच्चा सौंप दिया जाए. इस के बिना मैं जी नहीं पाऊंगी.’’

यह कहते हुए लाभनी की आंखों में आंसू आ गए थे. लाभनी साहू और उस के पति गोविंद साहू का पारिवारिक प्रकरण बाल कल्याण समिति, राजनांदगांव में चल रहा था, जहां अन्य सदस्यों के साथ चंद्रभूषण ठाकुर न्यायकर्ता सदस्य के रूप में बैठा हुआ था. उन्हें यह फैसला करना था कि आखिर 5 साल के राजू को मां को सौंपा जाए या पिता गोविंद साहू को. हर दृष्टि से लाभनी साहू का दावा मजबूत था, क्योंकि कानून और प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से वह मां होने के कारण अपने बेटे राजू को अपने पास रख कर परवरिश कर सकती थी.

मगर उस के पति गोविंद साहू ने बच्चे को अपने पास जबरदस्ती रख कर के उसे सौंपने से इंकार कर दिया था. वह बाल कल्याण समिति पर प्रभाव डालने का प्रयास कर रहा था कि जिस तरह पुलिस थाने में उस का पक्ष मजबूत रहा है, यहां भी वह अपने बेटे का संरक्षण प्राप्त कर ले. लाभनी साहू की भोली सूरत और आंखों में आंसुओं को देख कर चंद्रभूषण ठाकुर ने अन्य सदस्यों से चर्चा कर कहा, ‘‘देखो मिस्टर साहू, कानून को अपने घर की जागीर मत समझो. मां तो मां होती है और आज हम सभी सदस्य यह फैसला करते हैं कि राजू जब तक नाबालिग है, वह अपनी मां के पास ही रहेगा. और तुम्हें राजू की परवरिश का खर्च भी उठाना होगा.’’

यह सुनना था कि लाभनी साहू की आंखों से और मोटेमोटे आंसू टपकने लगे और दौड़ कर के वह बेटे राजू को अपने गले से लगा कर बिलखने लगी. गोविंद साहू को आखिरकार बाल कल्याण समिति में मुंह की खानी पड़ी और बाल कल्याण समिति के फैसले के बाद लाभनी को उस का बेटा राजू सौंप दिया गया. जब मामला समाप्त हो गया तो बाहर शहर के गुप्ता होटल में चंद्रभूषण ठाकुर और लाभनी व उस के बेटे राजू की मुलाकात हुई. चंद्रभूषण ने लाभनी से कहा, ‘‘देखो, तुम्हें राजू तो मिल गया है मगर अब तुम्हारे सामने लंबी जिंदगी पड़ी है,राजू का अच्छे से लालन-पालन और शिक्षा की व्यवस्था करनी है.’’

‘‘सर, मैं तो गरीब हूं. मगर जैसे भी हो, इसे पालूंगी और बड़ा आदमी बनाऊंगी.’’ लाभनी बोली.

चंद्रभूषण ठाकुर ने कहा, ‘‘तुम्हारे जज्बे को सलाम है. मैं बाल कल्याण समिति में साल भर से हूं. कितने ही मामले आते हैं मगर आज तुम्हारे जैसा मामला मैं ने पहले कभी नहीं देखा था. तुम सच्ची मां हो और सुनो कभी मेरे लायक कोई भी मदद हो तो मुझे निस्संकोच याद करना.’’

चंद्रभूषण ठाकुर ने लाभनी को अपना मोबाइल नंबर दे कर उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया. इसी दिन चंद्रभूषण ठाकुर की नीयत लाभनी  पर आ गई थी. उस के रूप और यौवन पर चंद्रभूषण लट्टू हो गया. इस के बाद धीरेधीरे दोनों की मुलाकात होने लगी और बहुत जल्द चंद्रभूषण ठाकुर और लाभनी साहू एकदूसरे से प्रेम करने लगे और दोनों के संबंध प्रगाढ़ हो गए. छत्तीसगढ़ का जिला राजनांदगांव प्रदेश की संस्कारधानी के रूप में देश भर में जाना जाता है. यह अपने साहित्य और संस्कृति की धरोहर के कारण प्रसिद्ध है. रियासत काल में राजनांदगांव एक राज्य के रूप में विकसित था. यहां पर कभी सोमवंशी, कलचुरी और मराठों का शासन रहा.

पहले यह नंदग्राम के नाम से जाना जाता था. यहां रियासतकालीन महल, हवेलियां राजमंदिर इत्यादि अभी भी आकर्षण का केंद्र हैं. राजनांदगांव छत्तीसगढ़ राज्य के मध्य भाग में स्थित है. जिला मुख्यालय दक्षिण पूर्व रेलवे मार्ग पर स्थित है. राजधानी रायपुर से यहां की दूरी करीब 80 किलोमीटर है. राजनांदगांव के कोतवाली थानाक्षेत्र के चंद्रभूषण ठाकुर कांग्रेस की राजनीति में एक जानापहचाना नाम बन चुका था. प्रदेश में भूपेश बघेल सरकार द्वारा बाल कल्याण समिति में चंद्रभूषण ठाकुर की सदस्य के रूप में नियुक्ति की गई तो उस का रुतबा शहर में और भी बढ़ गया था.

चंद्रभूषण ठाकुर और लाभनी की अब रोजाना ही मुलाकात होती थी. एक दिन चंद्रभूषण ने मौका देख कर के घर में लाभनी का हाथ पकड़ लिया. जब वह हाथ छुड़ाने लगी तो उस ने उसे आगोश में ले कर अपने प्रेम का इजहार किया. लाभनी भी उस का विरोध नहीं कर सकी. उसी दिन चंद्रभूषण ने प्रसन्न हो कर कहा, ‘‘मैं तुम्हें एक दुकान खुलवा देता हूं ताकि तुम अपने खर्चे खुद उठा सको और बच्चे का लालनपालन भी कर सको.’’

‘‘मैं भला कैसे दुकान चला पाऊंगी.’’ लाभनी बोली.

चंद्रभूषण ठाकुर ने उस का हौसला बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मैं तुम्हें डेढ़दो लाख रुपए की व्यवस्था करवा दूंगा. उस पैसे से तुम आराम से 4 पैसे कमा लोगी और जब कभी कमाई हो जाए तो मेरे पैसे लौटा देना.’’ यह कह कर के चंद्रभूषण ने उस का चेहरा अपने हाथों में ले लिया.

लाभनी ने हंस कर कहा, ‘‘ऐसा होगा तो अच्छा है, मैं भी किसी की मोहताज नहीं रहना चाहती.’’

इस के बाद चंद्रभूषण ठाकुर और लाभनी के संबंध और भी गहरे हो गए. चंद्रभूषण जब भी समय मिलता, लाभनी के घर जाता और दोनों प्रेम में डूब जाते. लाभनी ने एकदो दफा जब उसे दुकान की याद दिलाई तो चंद्रभूषण ने कहा, ‘‘मैं ने दुकान तय कर ली है बस कुछ ही दिनों में पैसे आ जाएंगे तो मैं तुम्हें दुकान खुलवा दूंगा.’’

और एक दिन चंद्रभूषण ने जो कहा था, वह कर के भी दिखा दिया. फास्टफूड की एक दुकान किराए पर  लाभनी को दिलवा दी. चंद्रभूषण ठाकुर और लाभनी कुछ समय तक तो हंसीखुशी दिन बिताते रहे. एक दिन चंद्रभूषण को यह जानकारी मिली कि लाभनी के यहां नूतन साहू (25 वर्ष) नामक नवयुवक आजकल कुछ ज्यादा ही आजा रहा है. इसे जानने के लिए चंद्रभूषण ने निगाह रखनी शुरू कर दी और एक दिन दोनों को रंगेहाथ पकड़ भी लिया और लाभनी को फटकार लगाई तो लाभनी ने पलट कर जवाब दिया, ‘‘तुम कौन होते हो मुझे रोकने वाले? मुझे तो मेरा बाप भी कुछ नहीं बोल पाता है.’’

यह सुन कर के चंद्रभूषण मानो आसमान से जमीन पर गिर पड़ा. चंद्रभूषण ने जिस तरह लाभनी की 2 लाख रुपए से अधिक की मदद की थी, उस से वह समझता था कि लाभनी अब उस की संपत्ति है और उस पर उस का अधिकार है. लेकिन उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि लाभनी इस तरह उस का विरोध कर सकती है. चंद्रभूषण को बहुत गुस्सा आया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें क्या समझा था और तुम क्या निकली. आज जब मैं ने तुम्हारी सच्चाई अपनी आंखों से देख ली है तो अब तुम्हारे और हमारे संबंध खत्म. और सुनो, मेरा पैसा एक सप्ताह के अंदर मुझे लौटा दो.’’

‘‘पैसा, कैसा पैसा, किस का पैसा?’’ लाभनी चीखने लगी.

‘‘देखो, तुम मुझे नहीं जानती हो, मैं कौन हूं. पूरे 2 लाख रुपए मैं ने तुम्हें दुकान खुलवाने के लिए दिया है. एकएक पैसा तुम्हें लौटाना होगा…’’

इस पर लाभनी नरम हो गई और धीरे से कहा, ‘‘तुम ने मेरी मदद तो क्या सिर्फ मेरे शरीर के लिए की है, मैं तुम्हें धीरेधीरे रुपए लौटा दूंगी.’’

‘‘नहीं, एक सप्ताह के भीतर मुझे मेरा पूरा पैसा चाहिए, यह मेरी  चेतावनी है.’’ कह कर चंद्रभूषण फुंफकारने लगा.

तभी नूतन साहू सामने आ गया और बोला, ‘‘तुम यहां से चले जाओ, नहीं तो ठीक नहीं होगा.’’

जैसेतैसे लाभनी ने दोनों को अलग किया और हाथ जोड़ कर बोली, ‘‘ठीक है, तुम्हारे पैसे हम लौटा देंगे.’’

चंद्रभूषण ठाकुर अपने से आधी उम्र (27 साल) की लाभनी को बहुत चाहता था. उस के रूपलावण्य पर एक तरह से फिदा था. उस के हाथ से लाभनी के निकलने से बड़ा दुख हो रहा था. यही कारण है कि उस ने सीधे अपने रुपए मांग लिए थे और सोच रहा था कि पैसे मांगने पर वह आत्मसमर्पण कर देगी. मगर जब पलट कर लाभनी ने रुपए लौटाने की बात कही तो वह मन ही मन टूट गया. एक हफ्ता गुजर गया, चंद्रभूषण ठाकुर ने अपने रुपए के लिए तकादा नहीं किया. करीब 15 दिन बाद यह सोच कर कि लाभनी शायद उस के दबाव में आ जाएगी, उस के पास पहुंचा और बड़े ही हंसमुख तरीके से उस से बात करने लगा. लाभनी ने भी उस के सवालों का जवाब दिया.

चंद्रभूषण ठाकुर को बातचीत से समझ आ गया कि उस का काम अब बिगड़ चुका है. अत: उस ने खुल कर कहा, ‘‘मेरे रुपए का क्या हुआ?’’

लाभनी ने तल्ख लहजे में जवाब दिया, ‘‘मै जल्दी लौटा दूंगी.’’

चंद्रभूषण ने बहुत कोशिश की कि लाभनी उस के दबाव में आ कर नूतन साहू को भूल जाए. मगर ऐसा नहीं हो पा रहा था. उस ने रुपए के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. इधर जब लाभनी और नूतन साहू की मुलाकात हुई और पैसे की बात सामने आई तो नूतन ने कहा, ‘‘क्यों न एक दिन हम इस का काम ही तमाम कर दें.’’

लाभनी को नूतन की बात अच्छी लगी क्योंकि इस के अलावा और कोई दूसरा चारा उसे दिखाई नहीं दे रहा था. दोनों ने मिल कर एक योजना बनाई और उस को अंजाम देने के लिए आगे बढ़े.

राजनांदगांव कोतवाली में कोतवाल नरेश पटेल जब शाम के समय पहुंचे तो देखा सामने 2-3 लोग उन से मिलने के लिए खड़े हैं. एक महिला ने आगे आ कर उन से कहा, ‘‘सर, मेरे पति चंद्रभूषण ठाकुर कल से घर नहीं आए हैं.’’ महिला ने अपना नाम हेमलता ठाकुर बताया. हेमलता ने जब बताया कि पति चंद्रभूषण ठाकुर बाल कल्याण समिति के छत्तीसगढ़ शासन सदस्य हैं तो उन्होंने महिला को अपने कक्ष में बैठा कर के पूरी जानकारी ली और गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली. हेमलता ठाकुर ने उन्हें बताया कि लाभनी साहू का फोन आया था वह बता रही थी कि उन की स्कूटी उस के घर के बाहर ही खड़ी है. बातोंबातों में टीआई नरेश पटेल को हेमलता ने यह भी बताया कि कुछ समय से उस के पति का लाभनी के यहां कुछ ज्यादा ही आनाजाना था.

पुलिस ने जांचपड़ताल शुरू की, मगर कोई भी सूत्र नहीं मिल पा रहा था जिस से कि पुलिस आगे बढ़ सके. इस बीच 16 दिसंबर, 2022, दिन शुक्रवार को राजनांदगांव जिले से 60 किलोमीटर की दूरी पर डोंगरगढ़ स्थित बोरा तालाब के पास कोटना पानी जंगल में लोगों ने एक लाश देखी और स्थानीय चौकीदार दूधराम भैंसारे बोरा तालाब थाने में इंसपेक्टर ओमप्रकाश धु्रव को यह सूचना दे दी. पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तो पाया कि लाश पूरी तरह नग्न थी और जली हुई थी. पुलिस ने मौके की काररवाई कर शव को डोंगरगढ़ की मोर्चरी भेज दिया और अज्ञात शव मिलने की जानकारी स्थानीय अखबारों और वाट्सऐप ग्रुप में शेयर कर दी गई.

जब इस लाश को हेमलता और चंद्रभूषण ठाकुर के अन्य परिजनों दिखाया गया तो लाश देखते ही हेमलता बिलखने लगी. हेमलता ने उस की शिनाख्त अपने पति चंद्रभूषण ठाकुर के रूप में कर दी. पुलिस के सामने अब यह स्थिति स्पष्ट थी कि किसी ने चंद्रभूषण को मार कर उस के शव को जलाने की कोशिश की है. इस के बाद पुलिस ने इस मामले की जांचपड़ताल तेज कर दी. चंद्रभूषण ठाकुर के घर वालों से बातचीत करने के बाद पुलिस का शक लाभनी साहू पर ही हुआ. पुलिस ने उसे हिरासत में ले कर पूछताछ शुरू कर दी. पहले तो लाभनी ने कुछ भी बताने से इंकार कर दिया. लेकिन जब पुलिस ने उस के सामने अनेक तथ्य रखे और एक ड्रम को ले जाते हुए सीसीटीवी फुटेज दिखा कर उस से पूछताछ की, तब अंतत: वह टूट गई.

उस ने बताया कि अपने प्रेमी नूतन साहू के साथ मिल कर उस की हत्या की थी. 14 दिसंबर, 2022 को हत्या की मंशा से उस ने चंद्रभूषण ठाकुर को फोन किया. जब चंद्रभूषण ने काल रिसीव की तो उस ने कहा, ‘‘हैलो, मैं तुम से मिलना चाहती हूं.’’

लाभनी की आवाज सुन कर चंद्रभूषण ठाकुर ने कहा, ‘‘क्या बात है, आज कुछ ज्यादा ही मीठी हो गई हो. क्या तुम ने मेरा औफर स्वीकार कर लिया है?’’

‘‘हां, मैं आप की बात समझ गई हूं. मैं ही गलत थी.’’

‘‘लाभनी, तुम कैसे उस के चक्कर में आ गई? क्या है उस के पास? मैं ने तुम्हारे लिए दुकान खुलवा दी, पैसे दिए आगे भी दूंगा, यह सब तुम भूल गई और मेरे साथ दगा किया. मुझे कितना दुख हुआ है. मैं तुम्हें कितना चाहता हूं, प्रेम करता हूं तुम शायद नहीं समझती. मैं सच कह रहा हूं कि उस वक्त मुझे बहुत दुख हुआ था.’’

‘‘चलो ठीक है, आज शाम को आओ घर पर, सारे गिलेशिकवे दूर कर दूंगी. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगी.’’ लाभनी बोली.

शाम को सजसंवर कर चंद्रभूषण ठाकुर यह सोच कर के लाभनी के घर पहुंचा कि वहां उस का स्वागत लाभनी अपनी बाहों में ले कर करेगी. लाभनी ने चंद्रभूषण को बड़े प्रेम से बैठाया और दोनों में बातें होने लगीं. धीरेधीरे चंद्रभूषण को यह महसूस होने लगा कि लाभनी में कोई सुधार नहीं आया है. तभी अचानक वहां पीछे से नूतन साहू ने आ कर के कपड़े का एक फंदा चंद्रभूषण ठाकुर के गले में डाल दिया और दोनों ने मिल कर चंद्रभूषण की गला घोट कर हत्या कर दी. फिर लाश को ठिकाने लगाने के लिए एक ड्रम में उसे डाल दिया. स्कूटी पर उस ड्रम को रख कर के डोंगरगढ़ की ओर निकल गए और कोटना पानी जंगल के पास गढ़ माता डोंगरी पहाड़ी जंगल में लाश के सारे कपड़े उतार दिए, ताकि कोई उसे पहचान ना सके.

लेकिन जब उन्हें लगा कि कोई न कोई लाश को पहचान लेगा तो नूतन ने स्कूटी से पैट्रोल निकाल कर के उस के चेहरे को भी जला दिया और यह सोच कर कि कि अब उन्हें कोई छू भी नहीं सकेगा, दोनों खुशीखुशी घर आ गए. इस केस के जांच अधिकारी ओमप्रकाश धु्रव ने बताया कि केस के खुलासे में महत्त्वपूर्ण भूमिका सीसीटीवी फुटेज की थी, जो पुलिस को बड़ी मशक्कत के बाद मिली. जिस में लाभनी साहू और नूतन साहू स्कूटी पर एक ड्रम को ले कर जा रहे थे. उसी ड्रम में चंद्रभूषण की लाश थी.

पुलिस ने आरोपी नूतन साहू और लाभनी को घटनास्थल पर ले जा कर मामले की जांच की और उन की निशानदेही पर मृतक चंद्रभूषण ठाकुर का मोबाइल भनपुरी नदी से और कपड़े भी बरामद किए. पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 302, 201, 34 के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक दंडाधिकारी, डोंगरगढ़ के समक्ष पेश  किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया. Family Dispute

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित हैa

Crime News : डाक्टर ने की हैवानियत की हद पार

Crime News : गोरखपुर पुलिस लाइंस स्थित मनोरंजन कक्ष खबर नवीसों से खचाखच भरा हुआ था. सामने कुरसी पर स्पैशल  टास्क फोर्स (एसटीएफ) के आईजी अमिताभ यश और एसएसपी डा. सुनील गुप्ता बैठे हुए थे. चूंकि पत्रकार वार्ता का आयोजन आईजी यश ने किया था, इसलिए ये वार्ता और भी खास लग रही थी. पत्रकारों के मन में एक अजीब सा कौतूहल था. ऐसा लग रहा था जैसे एसटीएफ के हाथ कोई बड़ा मामला लगा है और उसी के खुलासे के लिए लखनऊ से आए अमिताभ यश ने प्रैस वार्ता आयोजित की हो.

थोड़ी देर बाद पत्रकारों के मन से कौतूहल के बादल छंट गए, जब उन के सामने 3 आरोपियों को कतारबद्ध खड़ा किया गया. उन में से एक आरोपी गोरखपुर शहर का जाना माना डाक्टर और आर्यन हौस्पिटल का संचालक डा. डी.पी. सिंह उर्फ धीरेंद्र प्रताप सिंह था.

वार्ता शुरू करते हुए एसटीएफ आईजी अमिताभ यश ने सनसनीखेज खुलासा करते हुए कहा, ‘‘यह पत्रकारवार्ता 6 महीने पहले 2 जून, 2018 को नेपाल के पोखरा से रहस्यमय तरीके से गायब हुई गोरखपुर की सरस्वतीपुरम कालोनी निवासी राजेश्वरी उर्फ राखी श्रीवास्तव केस से जुड़ी हुई है, जिस की लाश 4 जून, 2018 को पोखरा की एक गहरी खाई से बरामद की गई थी.’’

नेपाल पुलिस ने मृतका का पोस्टमार्टम करवाया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में उस का पेट फटने के कारण मौत की पुष्टि हुई थी. इधर 4 जून, 2018 को राखी के भाई अमर प्रकाश श्रीवास्तव ने बिहार के गया निवासी अपने बहनोई मनीष सिन्हा पर गोरखपुर के शाहपुर थाने में राखी के अपहरण और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज करवाया था. मनीष सिन्हा ने खुद को बेगुनाह बताते हुए मामले की जांच एसटीएफ से कराए जाने की मांग की थी.

मुकदमे से संबंधित विवेचना की फाइल एसटीएफ के पास आई तो जांच शुरू की गई. नेपाल पुलिस ने भारतीय पुलिस से मृतका के फोटो साझा करते हुए केस का खुलासा करने में मदद मांगी थी. फोटो को एसटीएफ के तेजतर्रार सिपाही शुक्ला ने पहचान लिया. वह राखी श्रीवास्तव की तसवीर थी.

जांचपड़ताल में पता चला कि राखी श्रीवास्तव आर्यन हौस्पिटल के संचालक डा. डी.पी. सिंह की दूसरी पत्नी थी. 7 साल पहले दोनों ने आर्यसमाज मंदिर में शादी की थी. शादी के बारे में डाक्टर की पहली पत्नी ऊषा सिंह को जानकारी नहीं थी. जब जानकारी हुई तो परिवार में हड़कंप मच गया.

आगे चल कर डा. डी.पी. सिंह और राखी के बीच संबंधों को ले कर टकराव पैदा हो गया. राखी की उम्मीदें और डिमांड लगातार बढ़ती जा रही थीं. इस सब के चलते डाक्टर राखी से पीछा छुड़ाना चाह रहा था.

आईजी ने आगे बताया, ‘‘राखी ने शहर के कैंट थाने में डी.पी. सिंह के खिलाफ रेप और धमकी देने का मुकदमा भी दर्ज कराया था. हालांकि बाद में दोनों ने सुलह कर लिया था. फरवरी 2018 में राखी ने मनीष सिन्हा से दूसरी शादी कर ली थी, लेकिन इस के बावजूद डा. डी.पी. सिंह और राखी श्रीवास्तव के बीच रिश्ता बना रहा. इस के बावजूद राखी की डिमांड बढ़ती जा रही थी.

‘‘राखी की डिमांड से तंग आ कर डा. डी.पी. सिंह ने राखी की हत्या की साजिश रच डाली. बीते 4 जून, 2018 को राखी नेपाल के पोखरा घूमने गई थी. इस की जानकारी मिलने पर डा. डी.पी. सिंह अपने 2 कर्मचारियों देशदीपक निषाद और प्रमोद सिंह के साथ किराए की स्कौर्पियो से नेपाल गया. जहां उस ने राखी से मुलाकात कर उसे अपने झांसे में ले लिया.

‘‘डा. डी.पी. सिंह ने राखी को शराब पिलाई और नशे की गोली दे कर बेहोश कर दिया. बेहोशी की हालत में डी.पी. सिंह ने राखी को अपने दोनों कर्मचारियों के साथ पहाड़ी से नीचे खाई में फेंक दिया, जहां सिर और पेट में चोट आने से उस की मौत हो गई. बाद में डी.पी. सिंह अपने दोनों साथियों के साथ फरार हो गया. इस हाईप्रोफाइल मामले की जांच में स्थानीय पुलिस के साथ एसटीएफ भी लगी थी. ऐसे में गहराई से मामले की जांच किए जाने पर डा. डी.पी. सिंह और राखी के पहले के संबंधों की तह तक जाने पर हत्याकांड का खुलासा हो पाया.’’

पत्रकारों के पूछे जाने पर डा. डी.पी. सिंह और दोनों कर्मचारियों देशदीपक निषाद तथा प्रमोद सिंह ने अपना अपना जुर्म कबूल करते हुए राखी श्रीवास्तव हत्या में संलिप्तता स्वीकार ली. पत्रकारवार्ता के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया. अदालत ने तीनों आरोपियों को जेल भेजने का आदेश दिया. तब पुलिस ने तीनों को गोरखपुर जिला जेल भेज दिया. यह 21 दिसंबर, 2018 की बात है.

आरोपियों के इकबालिया बयान और पुलिस जांचपड़ताल के बाद इस केस की हाईप्रोफाइल प्रेम कहानी कुछ ऐसे सामने आई—

गोरखपुर के कैंट थाना क्षेत्र की पौश कालोनी बिलंदपुर में विद्युत विभाग से सेवानिवृत्त इंजीनियर हरेराम श्रीवास्तव अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में कुल जमा 6 सदस्य थे, जिन में 2 बेटे और 2 बेटियां थीं. उन के चारों बच्चों में राजेश्वरी सब से छोटी थी. सब उसे प्यार से राखी कहते थे.

चारों भाईबहनों में राखी सब से अलग थी. उस के काम करने का तरीका, उठनेबैठने और पढ़नेलिखने का सलीका, बातचीत करने का अंदाज सब कुछ अलग था. परिवार में सब से छोटी होने की वजह से घर वाले उसे प्यार भी बहुत करते थे.

राखी मांबाप की दुलारी तो थी ही, बड़ा भाई अमर प्रकाश भी उसे बहुत चाहता था. बहन में जान बसती थी बड़े भाई अमर की. जिद्दी स्वभाव की राखी लाड़प्यार में भाई से जो मांगती थी, अमर कभी इनकार नहीं करता था.

राखी पर मोहित हो गया था डा. डी.पी. सिंह

सन 2006 की बात है. राखी के पिता हरेराम श्रीवास्तव बीमार थे. उन्हें इलाज के लिए आर्यन हौस्पिटल में इलाज के लिए भरती कराया गया था. यह हौस्पिटल घर के पास तो था ही, पूर्वांचल का जानामाना भी था. बेहतर इलाज और नजदीक समझते हुए अमर प्रकाश ने पिता को डा. डी.पी. सिंह के हौस्पिटल में भरती करा दिया. पिता की तीमारदारी के लिए घर वाले अस्पताल आतेजाते रहते थे. राखी भी आतीजाती थी.

करीब साढ़े 5 फीट लंबी राखी छरहरी तो थी ही ऊपर से गठीला बदन, गोरा रंग, गोलमटोल चेहरा, नागिन सी लहराती चोटी, झील सी गहरी आंखों से वह बला की खूबसूरत दिखती थी. डा. डी.पी. सिंह उर्फ डा. धीरेंद्र प्रताप सिंह की नजर जब राखी पर पड़ी तो उस का मन राखी में ही उलझ कर रह गया. एक तरह से वह उस के दिल में समा गई.

राखी प्राय: रोज ही पिता को देखने जाती थी. जब भी वह अस्पताल में होती तो डा. डी.पी. सिंह ज्यादा से ज्यादा समय उस के पिता के बैड के आसपास चक्कर लगाता रहता. राखी को यह देख कर खुशी होती कि डाक्टर उस के पिता के इलाज को ले कर गंभीर हैं. वह उन का कितना ध्यान रख रहा है.

2-3 दिन में ही राखी समझ गई कि डा. डी.पी. सिंह जब भी चैकअप के लिए पिता के बैड के आता है तो उस की नजरें पिता पर कम, उस पर ज्यादा टिकती हैं. उस की नजरों में आशिकी झलकती थी. डी.पी. सिंह भी गबरू जवान था. साथ ही स्मार्ट भी. पिता की तीमारदारी में डी.पी. सिंह की सहानुभूति देख कर राखी भी उस के आकर्षक व्यक्तित्व पर फिदा हो गई. वह भी डी.पी. सिंह को कनखियों से देखा करती थी. जब दोनों की नजरें आपस में टकरातीं तो दोनों ही मुसकरा देते.

राखी ने भी खोल दिया दिल का दरवाजा

कह सकते हैं कि राखी और डी.पी. सिंह दोनों के दिल एकदूसरे की चाहत में धड़कने लगे. अंतत: मौका देख कर एक दिन दोनों ने अपने अपने प्यार का इजहार कर दिया. बाली उमर की कमसिन राखी डी.पी. सिंह को दिल से मोहब्बत करने लगी जबकि डी.पी. सिंह राखी को दिल से नहीं, बल्कि उस की खूबसूरती से प्यार करता था.

कई दिनों के इलाज से हरेराम श्रीवास्तव स्वस्थ हो कर अपने घर लौट गए. पिता के हौस्पिटल से डिस्चार्ज होने के बाद राखी किसी न किसी बहाने हौस्पिटल आ कर डी.पी. सिंह से मिलने लगी. सालों तक दोनों एक दूसरे की बाहों में बाहें डाले प्यार के झूले पर पेंग बढ़ाते रहे. आलम यह हो गया कि एकदूसरे को देखे बिना दोनों को चैन नहीं मिलता था.

डा. डी.पी. सिंह के दिल के पिंजरे में कैद हुई राखी ने उस के अतीत में झांका तो उसे ऐसा लगा जैसे उस के पैरों तले जमीन खिसक गई हो. राखी के सपनों का महल रेत की दीवार की तरह भरभरा कर ढह गया. क्योंकि डी.पी. सिंह पहले से शादीशुदा था. उस ने यह बात छिपा कर रखी थी. राखी को जब यह सच्चाई दूसरों से पता चली तो उसे गहरा धक्का लगा. वह डाक्टर से नाराज हो कर गोंडा चली गई. वहां वह बीएड की पढ़ाई करने लगी.

डा. डी.पी. सिंह राखी के अचानक मुंह मोड़ लेने से तड़प कर रह गया. वह समझ नहीं पा रहा था कि अचानक राखी उस से रूठ क्यों गई. डी.पी. सिंह से जब राखी की जुदाई बरदाश्त नहीं हुई तो उस ने राखी से बात की, ‘‘क्या बात है राखी, तुम अचानक रूठ कर क्यों गईं? जाने अनजाने में मुझ से कोई भूल हो गई हो तो मुझे माफ कर दो.’’

‘‘मैं माफी देने वाली कौन होती हूं,’’ राखी तुनक कर बोली.

‘‘अरे बाप रे बाप, इतना गुस्सा!’’ मुसकराते हुए डी.पी. सिंह ने कहा.

‘‘ये गुस्सा नहीं दिल की टीस है, जो आप ने दी है डाक्टर साहब.’’ राखी के चेहरे पर दिल का दर्द छलक आया.

आश्चर्य से डा. डी.पी. सिंह ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हारे दिल को ऐसी कौन सी टीस दे दी कि तुम मुझ से रूठ गईं और शहर छोड़ कर चली गईं. तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम से कितना प्यार करता हूं.’’

‘‘डाक्टर साहब, आप इतनी बड़ी बड़ी बातें कर रहे हो. ये बताओ, आप ने अपनी जिंदगी की इतनी बड़ी सच्चाई मुझ से क्यों छिपाई? आप ने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि आप शादीशुदा हो.’’

‘‘हां, यह सच है कि मैं शादीशुदा हूं. यह भी सच है कि मुझे तुम्हें यह सच्चाई पहले बता देनी चाहिए थी लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या?’’ बीच में बात काटते हुए राखी बोली.

‘‘बताने का मौका ही नहीं मिला,’’ डा. सिंह ने सफाई दी, ‘‘मैं तुम्हें अपने जीवन की यह सच्चाई बताने वाला था, लेकिन बताने का मौका नहीं मिला. इस बात का मुझे दुख है.’’

‘‘तो फिर अब यहां क्या लेने आए हैं?’’

‘‘अपने प्यार की भीख. मैं तुम से अपने प्यार की भीख मांगता हूं राखी. तुम मेरा प्यार मुझे लौटा दो. मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता. फिर मैं यहां से चला जाऊंगा.’’

‘‘ठीक है, लेकिन मेरी भी एक शर्त है.’’ राखी बोली.

‘‘क्या शर्त है तुम्हारी?’’

‘‘यही कि आप को मुझ से शादी करनी होगी. मेरी यह शर्त मंजूर है तो बताओ?’’

‘‘मुझे तुम्हारी यह शर्त मंजूर है. मैं तुम से शादी करने के लिए तैयार हूं. शादी के बाद तुम्हें पत्नी की नजरों से बचा कर ऐसी जगह रखूंगा, जहां तुम पर किसी की नजर न पड़ सके.’’

राखी ने सभी गिलेशिकवे भुला दिए.

राखी बन गई डाक्टर की दूसरी पत्नी

सन 2011 के फरवरी में राखी और डा. डी.पी. सिंह ने परिवार वालों से छिप कर गोंडा जिले के आर्यसमाज मंदिर में प्रेम विवाह कर लिया. प्रेमी प्रेमिका दोनों पतिपत्नी बन गए. लेकिन यह बात राखी के परिवार वालों से ज्यादा दिनों तक छिपी नहीं रही.

राखी के पिता हरेराम श्रीवास्तव को बेटी द्वारा एक शादीशुदा आदमी से शादी करने की बात पता चली तो उन्हें गहरा सदमा पहुंचा. वह इस सदमे को सहन नहीं कर सके और उन की मौत हो गई. उस के बाद राखी के परिवार वालों ने उस से हमेशा हमेशा के लिए रिश्ता तोड़ लिया.

शादी के बाद डी.पी. सिंह ने दूसरी पत्नी राखी के रहने के लिए गोरखपुर के शाहपुर क्षेत्र की पौश कालोनी सरस्वतीपुरम में एक आलीशान मकान खरीद दिया. राखी इसी मकान में रहती थी. हौस्पिटल से खाली होने के बाद डी.पी. सिंह राखी से मिलने उस के पास आता था. घंटों साथ बिता कर वह पहली पत्नी ऊषा सिंह के पास चला जाता था. उस के साथ कुछ समय बिता कर रात में राखी के पास आ जाता.

पहली पत्नी को पता चल गई डाक्टर की हकीकत 

डी.पी. सिंह की पहली पत्नी ऊषा सिंह देख समझ रही थी कि उस के पति के स्वभाव और रहनसहन में काफी तब्दीलियां आ गई हैं. वह उस में पहले की अपेक्षा कम दिलचस्पी ले रहा था. रात रात भर घर से गायब रहता था. वह रात में कहां जाता था, उसे कुछ भी नहीं बताता था. वह बताता भी तो क्या.

हालांकि वह जानता था कि जिस दिन यह सच पहली पत्नी ऊषा को पता चलेगा तो उस की खैर नहीं. आखिरकार डी.पी. सिंह का अंदेशा सच साबित हुआ. ऊषा को पति पर शक हो गया और उस ने पति की दिनचर्या की खोजबीन शुरू कर दी.

ऊषा से पति की सच्चाई ज्यादा दिनों नहीं छिप पाई. आखिर पूरा सच उस के सामने खुल कर आ गया. उस ने भी तय कर लिया कि अपने जीते जी वह अपने सिंदूर का बंटवारा हरगिज नहीं करेगी. या तो सौतन को मार देगी या खुद मर जाएगी.

इस बात को ले कर पतिपत्नी के बीच विवाद खड़ा हो गया. दूसरी औरत राखी को  ले कर ऊषा ने पति को आड़े हाथों लिया तो डी.पी. सिंह की बोलती बंद हो गई. वह हैरान था कि उस की सच्चाई पत्नी तक कैसे पहुंची, जबकि उस ने इस राज को काफी गहराई तक छिपा रखा था.

पत्नी के सामने सच्चाई आने के बाद डी.पी. सिंह की स्थिति बड़ी विचित्र हो गई. वह न तो पत्नी को छोड़ सकता था और न प्रेमिका से पत्नी बनी राखी के बिना रह सकता था. उस की हालत 2 नावों के सवार जैसी थी. इस के बावजूद वह दोनों नावों को डूबने नहीं देना चाहता था. डी.पी. सिंह किसी निष्कर्ष पर पहुंचता, इस से पहले ही पहली पत्नी ऊषा ने डी.पी. सिंह के खिलाफ कैंट थाने में मुकदमा दर्ज करा दिया.

भले ही ऊषा ने उस के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया था, डी.पी. सिंह ने इस की कोई परवाह नहीं की. वजह यह थी कि राखी मां बनने वाली थी. राखी और डी.पी. सिंह दोनों इसे ले कर काफी खुश थे. आने वाले बच्चे के भविष्य को ले कर संजीदा थे. समय आने पर राखी ने हौस्पिटल में बेटी को जन्म दिया. लेकिन वह मां की गोद तक जाने से पहले ही दुनिया छोड़ गई. बेटी की मौत ने राखी को झकझोर कर रख दिया. नवजात शिशु की मौत का असर डी.पी. सिंह पर भी पड़ा.

डाक्टर को होने लगा गलती का पछतावा

डी.पी. सिंह को अपने किए का पश्चाताप होने लगा था. वक्त के साथ स्थितियां बदल गईं. उसे लगने लगा कि राखी की खूबसूरती महज एक छलावा था. असल जीवनसाथी तो ऊषा है. अब डा. डी.पी. सिंह अपनी भूल सुधारने के लिए पत्नी की ओर आकर्षित होने लगा. उस ने अपनी भूल सुधारने के लिए ऊषा से एक मौका मांगा, साथ ही वादा किया कि अब ऐसा कभी नहीं होगा.

पति के वादे पर ऊषा को भरोसा नहीं था. सालों तक वह उस की पीठ पीछे रंगरलियां मनाता रहा था. यहां तक कि उसे भनक तक नहीं लगने दी थी. यही सब सोच कर ऊषा ने उसे माफ नहीं किया बल्कि फैसला पति पर छोड़ दिया.

दूसरी ओर डी.पी. सिंह ने राखी से बिलकुल ही मुंह मोड़ लिया. डी.पी. सिंह में पहले से काफी बदलाव आ गया था. लेकिन राखी को यह मंजूर नहीं था कि उस का पति उसे छोड़ कर पहली पत्नी के पास जाए.

राखी ने डी.पी. सिंह को चेतावनी दे दी कि अगर वह उसे छोड़ कर पहली पत्नी के पास गया तो इस का परिणाम भुगतने को तैयार रहे. जब उस ने प्यार के लिए अपना घरबार सब छोड़ दिया तो वह रिश्ता तोड़ने से पहले अच्छी तरह सोच ले.

राखी की चेतावनी ने डा. डी.पी. सिंह के संपूर्ण अस्तित्व को हिला कर रख दिया. वह जानता था कि राखी जिद्दी स्वभाव की है, जो ठान लेती है, कर के रहती है. घरगृहस्थी को बचाने के लिए डी.पी. सिंह धीरेधीरे राखी से किनारा करने लगा.

राखी समझ गई थी कि डी.पी. सिंह उस से बचने के लिए किनारा कर रहा है. डी.पी. सिंह ने भले ही राखी से दूरी बनानी शुरू कर दी थी, लेकिन उस के खर्चे में कमी नहीं की थी. उसे वह उस की मुंहमांगी रकम देता था.

राखी मांगने लगी अपना हक

यह अलग बात है कि राखी रुपए नहीं, अपना पूरा हक चाहती थी. उसे दूसरी औरत बन कर रहना मंजूर नहीं था. वह पत्नी का पूरा अधिकार चाहती थी. जबकि डी.पी. सिंह पहली पत्नी ऊषा को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था. राखी उस पर दबाव बनाने लगी थी कि वह ऊषा को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर उस के पास आ जाए. लेकिन डी.पी. सिंह ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया था.

राखी ने सोच लिया था कि वह तो बरबाद हो गई है, पर उसे भी इतनी आसानी से मुक्ति नहीं देगी. डाक्टर को सबक सिखाने के लिए साल 2017 के शुरुआती महीने में राखी ने राजधानी लखनऊ के चिनहट थाने में डा. डी.पी. सिंह के खिलाफ अपहरण और गैंगरेप का मुकदमा दर्ज करा दिया.

यही नहीं उस ने गोरखपुर के महिला थाने में भी डा. सिंह के खिलाफ महिला उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराया. एक साथ 2-2 मुकदमे दर्ज होते ही डा. सिंह के होश उड़ गए. गैंगरेप का मुकदमा दर्ज होते ही डी.पी. सिंह की शहर ही नहीं, पूर्वांचल भर में थूथू होने लगी. इस के चलते हौस्पिटल बुरी तरह प्रभावित हो गया. मरीज उस के क्लीनिक पर आने से कतराने लगे.

गैंगरेप केस ने डी.पी. सिंह की इज्जत पर बदनुमा दाग लगा दिया था. लोग उसे हिकारत भरी नजरों से देखने लगे और उस पर अंगुलियां उठने लगीं. इस से उस की सामाजिक प्रतिष्ठा की खूब छिछालेदर हुई. अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए डी.पी. सिंह ने राखी से केस वापस लेने को कहा और उसे मुंहमांगी रकम देने का औफर दिया.

राखी ने उस के सामने सरस्वतीपुरम कालोनी की उस आलीशान कोठी की रजिस्ट्री अपने नाम कराने की शर्त रखी, जिस में वह रह रही थी. वह कोठी करोड़ों की थी. इस के लिए डी.पी. सिंह तैयार नहीं हुआ. उस ने बात टाल दी.

धी रेधीरे डा. डी.पी. सिंह का राखी से मोह खत्म हो गया. दोनों के बीच का प्यार टकराव में बदल गया. कल तक जिस राखी की गंध डी.पी. सिंह की रगों में खून के साथ बहती थी, अब वह दुर्गंध बन गई थी. टकराव की स्थिति में डी.पी. सिंह का जीना मुश्किल हो गया था. उस की पलपल की खुशियां छिन गई थीं. राखी द्वारा पैदा की गई दुश्वारियों से डी.पी. सिंह बौखला गया और उसे रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा.

राखी को हो गया फौजी मनीष से प्यार

इस बीच राखी के जीवन में एक नई कहानी की कड़ी जुड़ गई थी. सरस्वतीपुरम कालोनी में जहां राखी रहती थी, उसी के पड़ोस में मनीष कुमार श्रीवास्तव नाम का एक खूबसूरत और स्मार्ट युवक रहता था. वह आर्मी का जवान था और अपने एक रिश्तेदार के घर अकसर जाताआता था. वह मूलरूप से बिहार के गया जिले का रहने वाला था.

डी.पी. सिंह से रिश्ते खराब होने के बाद राखी अकेलापन दूर करने के लिए मनीष से नजदीकियां बढ़ाने लगी. मनीष भी राखी की खूबसूरती पर फिदा हो गया. थोड़ी मुलाकातों के बाद दोनों एकदूसरे के करीब आ गए. अंतत: फरवरी 2018 में राखी और मनीष ने कोर्टमैरिज कर ली.

शादी के बाद राखी मनीष के साथ गया चली गई. उस ने मनीष से अपने अतीत की सारी बातें बता दीं. मनीष समझदार और सुलझा हुआ इंसान था. वह राखी को समझाता रहता था. मनीष को पत्नी की अतीत की कहानी सुन कर उस के साथ सहानुभूति हो गई. उस ने राखी को समझाया कि जो बीत गया, उसे याद करने से कोई फायदा नहीं है. उसे बुरा सपना समझ कर भुला दो.

राखी ने भले ही मनीष से शादी कर ली थी, लेकिन अपने पहले प्यार डी.पी. सिंह को अपने दिल से निकाल नहीं पाई थी. डा. डी.पी. सिंह जान चुका था कि राखी ने दूसरी शादी कर ली है. डी.पी. सिंह ही नहीं वरन राखी का बड़ा भाई अमर प्रकाश भी इस बात को जान चुका था कि राखी ने दूसरी शादी कर ली है. राखी के इस कृत्य पर उस ने बहन को काफी डांटाफटकारा भी था और समझाया भी था.

दरअसल परिवार वालों ने राखी से संबंध तोड़ लिए थे. एक अमर ही था जिसे राखी की परवाह थी. वह उसे अकसर फोन कर के उस का हालचाल पूछ लेता था. राखी के इस बार के कृत्य से वह दुखी था और उस ने राखी से बात करनी बंद कर दी थी.

इधर राखी डी.पी. सिंह को बारबार फोन कर के मकान की रजिस्ट्री अपने नाम कराने का दबाव बना रही थी. राखी के दबाव बनाने से डी.पी. सिंह परेशान हो गया था. उस का दिन का चैन और रात की नींद उड़ चुकी थी. इस मुसीबत से निजात पाने के लिए वह राखी को रास्ते से हटाने की योजना बनाने लगा.

इस के लिए उस ने 5 बार योजना बनाई, लेकिन पांचों बार अपने मकसद में असफल रहा. अब आगे वह अपने मकसद में असफल नहीं होना चाहता था, इसलिए इस बार उस ने अपने हौस्पिटल के 2 कर्मचारियों देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह को पैसों का लालच दे कर साथ मिला लिया.

सब कुछ डा. डी.पी. सिंह की योजना के अनुसार चल रहा था. डी.पी. सिंह ने भले ही राखी से कन्नी काट ली थी, लेकिन राखी से फोन पर बात करनी बंद नहीं की थी. ऐसा वह राखी को विश्वास में लेने के लिए कर रहा था. राखी समझ रही थी कि डी.पी. सिंह अभी भी उस से प्यार करता है. राखी डी.पी. सिंह की इस योजना को समझ नहीं पाई. वह उस पर पहले जैसा ही यकीन करती रही.

31 मई, 2018 की बात है. राखी पति मनीष के साथ नेपाल के भैरहवा घूमने गई थी. 2 जून की सुबह पति से नजरें बचा कर उस ने डी.पी. सिंह को फोन कर के बता दिया कि वह भैरहवा घूमने आई है.

यह जान कर डी.पी. सिंह को लगा जैसे खुदबखुद उस की मुराद पूरी हो गई हो. वह जो चाह रहा था, वैसी स्थिति खुदबखुद बन गई. उस ने राखी से कहा कि वह भैरहवा में रुकी रहे. वह भी उस से मिलने आ रहा है. दूसरी ओर भैरहवा घूमने के बाद मनीष ने राखी से घर वापस चलने को कहा तो उस ने कुछ जरूरी काम होने की बात कह कर मनीष को अकेले ही घर वापस भेज दिया. मनीष अकेला ही गोरखपुर वापस लौट आया. वह कुछ दिनों की छुट्टी पर आया हुआ था.

डाक्टर ने रच ली थी खूनी साजिश

2 जून, 2018 को डा. डी.पी. सिंह, देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह के साथ स्कौर्पियो से नेपाल गया. नेपाल जाते हुए प्रमोद कुमार गाड़ी चला रहा था, जबकि देशदीपक निषाद ड्राइवर के बगल वाली सीट पर बैठा था और डा. सिंह पिछली सीट पर.

दोपहर के समय ये लोग सोनौली (भारत-नेपाल सीमा) होते हुए नेपाल पहुंचे. प्रमोद कुमार ने सोनौली बौर्डर पार करते हुए भंसार बनवाया था. भंसार बनवाने के लिए प्रमोद के ड्राइविंग लाइसेंस की कौपी लगाई गई थी. भंसार नेपाल द्वारा लगाया जाने वाला एक टैक्स होता है जो भारत से नेपाल सीमा में आने वाले वाहनों पर लगता है.

नेपाल के भैरहवा में राखी सड़क पर बैग लिए खड़ी इंतजार करती मिली. राखी से डी.पी. सिंह की बात नेपाल के नंबर से हुई थी. डी.पी. सिंह ने अपना मोबाइल जानबूझ कर घर पर छोड़ दिया था, ताकि जांचपड़ताल के दौरान पुलिस उस पर शक न कर सके.

राखी ने बताया कि वह भैरहवा में सड़क किनारे अकेली खड़ी है. राखी डी.पी. सिंह के पास गाड़ी में बैठ गई. वहां से चारों लोग पोखरा के लिए निकले. इन लोगों ने बुटवल से थोड़ा आगे और पालपा से पहले नाश्ता किया.

सभी लोग बुटवल से लगभग 100 किलोमीटर आगे मुलंग में एक छोटे होटल में रुके. इन लोगों ने होटल में 2 रूम बुक किए थे. डी.पी. सिंह और राखी एक कमरे में ठहरे थे. इस के बाद सुबह लगभग 11 बजे ये लोग खाना खा कर पोखरा के लिए निकले.

शाम को लगभग 4-5 बजे सभी पोखरा पहुंचे और डेविस फाल घूमे. इस के बाद राखी ने शौपिंग की, फिर सभी ने पोखरा में ही नाश्ता किया. इस के बाद ये लोग पहाड़ के ऊपर सारंगकोट नामक जगह पर होटल में रुके. इस होटल में सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे थे. डा. डी.पी. सिंह ने खुद इस होटल का चुनाव किया था. होटल में इन लोगों ने पहले चाय पी और बाद में शराब. राखी की चाय में डी.पी. सिंह ने एल्प्रैक्स का पाउडर मिला दिया था.

रात के लगभग 11 बजे दवा ने अपना असर दिखाया तो राखी की तबीयत खराब होने लगी. यह देख डा. डी.पी. सिंह ने इंसानियत की सारी हदें पार कर दीं. उस ने राखी को लातघूंसों से जम कर मारापीटा. मारपिटाई में एक लात राखी के पेट में ऐसी लगी कि वह अर्द्धचेतना में चली गई. थोड़ी देर में उस की सांसें भी बंद हो गईं.

उस की मौत के बाद तीनों राखी की लाश को ले कर उसी रात पोखरा के लिए निकल गए. लाश की शिनाख्त न हो सके, तीनों शातिरों ने राखी का मतदाता पहचानपत्र, मोबाइल फोन, नेपाल रिचार्ज कार्ड कीमत 100 रुपए, सहित कई सामान अपने पास रख लिए थे.

इस के बाद इन लोगों ने राखी को गाड़ी से निकाला और पहाड़ से नीचे धक्का दे दिया और फिर नेपाल से वापस घर लौट आए.

3 जून, 2018 को झाड़ी से नेपाल पुलिस ने राखी की लाश बरामद की. लेकिन उस की शिनाख्त नहीं हुई. नेपाल पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम कराया तो राखी की मौत का कारण पेट फटना सामने आया. पोखरा पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के जांच शुरू कर दी.

इधर मनीष पत्नी को ले कर परेशान था कि उस ने काम निपटा कर शाम तक घर वापस लौटने को कहा था, लेकिन न तो वह घर आई और न ही उस का फोन काम कर रहा था.

मनीष पर ही किया गया शक

मनीष फिर नेपाल के भैरहवा पहुंचा, जहां वह पत्नी के साथ रुका था. वहां जाने पर उसे पता चला कि राखी 2 जून को यहां से चली गई थी. इस के बाद वह कहां गई, किसी को पता नहीं था. 2 दिनों तक मनीष राखी को भैरहवा में खोजता रहा. जब वह नहीं मिली तो 4 जून को मनीष ने फोन कर के इस की सूचना राखी के बड़े भाई अमर प्रकाश श्रीवास्तव को दे दी.

अमर प्रकाश श्रीवास्तव ने राखी के पति मनीष कुमार श्रीवास्तव पर शक जताते हुए गोरखपुर के शाहपुर थाने में मनीष के खिलाफ बहन के अपहरण और जान से मारने की धमकी का मुकदमा दर्ज करा दिया. पुलिस ने काररवाई करते हुए मनीष को गिरफ्तार कर लिया.

जांचपड़ताल में वह कहीं भी दोषी नहीं पाया गया. अंतत: पुलिस ने उसे हिदायत दे कर छोड़ दिया. उधर नेपाल पुलिस ने लाश की शिनाख्त के लिए लाश की कुछ तसवीरें गोरखपुर आईजी जोन जयप्रकाश सिंह के कार्यालय भिजवा दीं. आईजी जोन ने इस की जिम्मेदारी आईजी एसटीएफ अमिताभ यश को सौंप दी. अमिताभ यश ने एसएसपी एसटीएफ अभिषेक सिंह को जांच सौंप दी.

मनीष ने खुद किया जांच में सहयोग

इस बीच मनीष ने आईजी से मिल कर राखी के लापता होने की जांच की मांग की और खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे से बरी करने की गुहार लगाई. मनीष के आवेदन पर एसटीएफ ने अपने विभाग के तेजतर्रार सिपाहियों यशवंत सिंह, अनूप राय, धनंजय सिंह, संतोष सिंह, महेंद्र सिंह आदि को लगाया.

एसटीएफ की जांचपड़ताल में राखी के मोबाइल की लोकेशन गुवाहाटी में मिली. फिर एक दिन अचानक राखी की डेडबौडी की फोटो सिपाही राजीव शुक्ला के सामने आई तो वह पहचान गया. इस क्लू ने डा. डी.पी. सिंह की साजिश का परदाफाश कर दिया. पुलिस ने जब डा. डी.पी. सिंह को गिरफ्तार कर के पूछताछ की तो सारी सच्चाई सामने आ गई.

डी.पी. सिंह के बयान के बाद उस के दोनों कर्मचारी देशदीपक निषाद और प्रमोद कुमार सिंह को भी गिरफ्तार कर लिया गया. दोनों ने राखी की हत्या करने और डी.पी. सिंह का साथ देने का अपना जुर्म कबूल कर लिया. पुलिस को गुमराह करने के लिए डी.पी. सिंह ने राखी के मोबाइल को गुवाहाटी भिजवा दिया था, ताकि पुलिस को लगे कि राखी जिंदा है और वह गुवाहाटी में है. लेकिन पुलिस ने उस के गुनाहों को बेपरदा कर दिया.

घटना के बाद डी.पी. सिंह ने राखी के दूसरे प्रेमी को फंसाने की योजना बनाई थी. लेकिन उस की यह योजना धरी का धरी रह गई. एसटीएफ ने डी.पी. सिंह और उस के साथियों के पास से राखी का मतदाता पहचान पत्र, मोबाइल फोन, 100 रुपए का नेपाल रिचार्ज कार्ड व अन्य सामान बरामद कर लिया. नेपाल पुलिस ने अपने यहां हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था. डी.पी. सिंह और उस के दोनों साथियों पर दोनों देशों में एक साथ मुकदमा चलाया जाएगा. Crime News

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित